विकिपीडिया awawiki https://awa.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A4%BE MediaWiki 1.47.0-wmf.9 first-letter मीडिया खास बातचीत यूजर यूजर बातचीत विकिपीडिया विकिपीडिया बातचीत फाइल फाइल बातचीत मीडियाविकी मीडियाविकी बातचीत खाँचा खाँचा बातचीत मदद मदद बातचीत श्रेणी श्रेणी बातचीत TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk अवध 0 261 35193 35191 2026-07-05T18:21:41Z Avimaarak 3578 Fixed grammar 35193 wikitext text/x-wiki == अवध एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। == == भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। == == १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। == == सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। == == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] [[श्रेणी:इतिहास]] [[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> == बाहरी कड़ी== * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] swgj8x9pfolh5wr14z64rkkacs7wy57 35194 35193 2026-07-05T18:26:40Z Avimaarak 3578 Created by translating the section "External links" from the page "[[:en:Special:Redirect/revision/1360801324|Awadh]]" 35194 wikitext text/x-wiki == अवध एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। == == भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। == == १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। == == सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। == == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] [[श्रेणी:इतिहास]] [[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> == बाहरी कड़ी== * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] == बाहरी कड़ी == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न तीन जा सकै, अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] 74wqnvwr4ilao5661wcxnm48zn3vyj4 35195 35194 2026-07-05T18:40:03Z Avimaarak 3578 Created by translating the section "Rulers" from the page "[[:en:Special:Redirect/revision/1360801324|Awadh]]" 35195 wikitext text/x-wiki == अवध एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। == == भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। == == १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। == == सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। == == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] [[श्रेणी:इतिहास]] [[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> == बाहरी कड़ी== * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] == बाहरी कड़ी == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न तीन जा सकै, अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] == शासक == <templatestyles src="Module:Message box/ambox.css"></templatestyles>  * सूबेदार नवाब ** 1732 – 19 मार्च 1739 बुरहान अल-मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मूसवी सआदत अली खान प्रथम (जनम 1680 - मृत्यु 1739) ** 19 मार्च 1739 - 28 अप्रैल 1748 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (पहिली बार) (ईसा पूर्व 1708 - मृत्यु 1754) * नवाब वजीर अल-ममालिक ** 28 अप्रैल 1748 – 13 मई 1753 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (29 जून 1748 तक कार्यकाल) * सूबेदार नवाब ** 5 नवंबर 1753 – 5 अक्टूबर 1754 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (स) (दुसरी बार) ** 5 अक्टूबर 1754 – 15 फरवरी 1762 जलाल अद-दीन शोजा` अद-दौला हैदर (जन्म 1732 – मृत्यु 1775) * नवाब वजीर अल-ममालिक ** 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलाल अद-दीन शोजा` अद-दौला हैदर (स) ** 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ अद-दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) ** 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर `अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) ** 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिन अद-दौला नाज़ेम अल-मोलक साअदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) ** 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 गाजी अद-दीन रफाअत अद-दौला अबू ́ल-मोजफ्फर हैदर खान (जन्म 1769 – म. 1827) * बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए ज़मन) ** 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन मोईज़ुद्दीन अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह (स) ** 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिर-अद-दीन हैदर सोलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) ** 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मो'इन अद-दीन अबू'ल-फत मोहम्मद `अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) ** 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासर अद-दौला अमजद `अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) ** 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासर अद-दीन अब्द अल-मंसूर मोहम्मद वाजेद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) ** 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र'', उपरोक्त के पुत्र (विद्रोह मा)'' (ईसा पूर्व 1845 - मृत्यु 1893) 18yc4lkfxy7tbsvxwzatvz40th9ybfg 35196 35195 2026-07-05T18:44:47Z Avimaarak 3578 35196 wikitext text/x-wiki == अवध एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। == == भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। == == १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। == == सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। == == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] [[श्रेणी:इतिहास]] [[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> == बाहरी कड़ी== * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] == शासक == <templatestyles src="Module:Message box/ambox.css"></templatestyles>  * सूबेदार नवाब ** 1732 – 19 मार्च 1739 बुरहान अल-मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मूसवी सआदत अली खान प्रथम (जनम 1680 - मृत्यु 1739) ** 19 मार्च 1739 - 28 अप्रैल 1748 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (पहिली बार) (ईसा पूर्व 1708 - मृत्यु 1754) * नवाब वजीर अल-ममालिक ** 28 अप्रैल 1748 – 13 मई 1753 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (29 जून 1748 तक कार्यकाल) * सूबेदार नवाब ** 5 नवंबर 1753 – 5 अक्टूबर 1754 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (स) (दुसरी बार) ** 5 अक्टूबर 1754 – 15 फरवरी 1762 जलाल अद-दीन शोजा` अद-दौला हैदर (जन्म 1732 – मृत्यु 1775) * नवाब वजीर अल-ममालिक ** 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलाल अद-दीन शोजा` अद-दौला हैदर (स) ** 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ अद-दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) ** 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर `अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) ** 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिन अद-दौला नाज़ेम अल-मोलक साअदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) ** 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 गाजी अद-दीन रफाअत अद-दौला अबू ́ल-मोजफ्फर हैदर खान (जन्म 1769 – म. 1827) * बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए ज़मन) ** 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन मोईज़ुद्दीन अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह (स) ** 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिर-अद-दीन हैदर सोलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) ** 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मो'इन अद-दीन अबू'ल-फत मोहम्मद `अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) ** 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासर अद-दौला अमजद `अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) ** 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासर अद-दीन अब्द अल-मंसूर मोहम्मद वाजेद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) ** 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र'', उपरोक्त के पुत्र (विद्रोह मा)'' (ईसा पूर्व 1845 - मृत्यु 1893) ccbogq4i3e92mnz4rh62wn4pa0d5wtv 35197 35196 2026-07-05T19:04:06Z Avimaarak 3578 Created by translating the section "Rulers" from the page "[[:en:Special:Redirect/revision/1360801324|Awadh]]" 35197 wikitext text/x-wiki == अवध एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। == == भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। == == १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। == == सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। == == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] [[श्रेणी:इतिहास]] [[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> == बाहरी कड़ी== * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] == शासक == <templatestyles src="Module:Message box/ambox.css"></templatestyles>  * सूबेदार नवाब ** 1732 – 19 मार्च 1739 बुरहान अल-मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मूसवी सआदत अली खान प्रथम (जनम 1680 - मृत्यु 1739) ** 19 मार्च 1739 - 28 अप्रैल 1748 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (पहिली बार) (ईसा पूर्व 1708 - मृत्यु 1754) * नवाब वजीर अल-ममालिक ** 28 अप्रैल 1748 – 13 मई 1753 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (29 जून 1748 तक कार्यकाल) * सूबेदार नवाब ** 5 नवंबर 1753 – 5 अक्टूबर 1754 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (स) (दुसरी बार) ** 5 अक्टूबर 1754 – 15 फरवरी 1762 जलाल अद-दीन शोजा` अद-दौला हैदर (जन्म 1732 – मृत्यु 1775) * नवाब वजीर अल-ममालिक ** 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलाल अद-दीन शोजा` अद-दौला हैदर (स) ** 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ अद-दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) ** 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर `अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) ** 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिन अद-दौला नाज़ेम अल-मोलक साअदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) ** 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 गाजी अद-दीन रफाअत अद-दौला अबू ́ल-मोजफ्फर हैदर खान (जन्म 1769 – म. 1827) * बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए ज़मन) ** 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन मोईज़ुद्दीन अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह (स) ** 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिर-अद-दीन हैदर सोलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) ** 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मो'इन अद-दीन अबू'ल-फत मोहम्मद `अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) ** 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासर अद-दौला अमजद `अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) ** 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासर अद-दीन अब्द अल-मंसूर मोहम्मद वाजेद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) ** 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र'', उपरोक्त के पुत्र (विद्रोह मा)'' (ईसा पूर्व 1845 - मृत्यु 1893) == शासक == <templatestyles src="Module:Message box/ambox.css"></templatestyles>  * सूबेदार नवाब ** 1732 – 19 मार्च 1739 बुरहान उल मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मूसवी सआदत अली खान प्रथम (जनम 1680 - मृत्यु 1739) ** 19 मार्च 1739 - 28 अप्रैल 1748 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (पहिली बार) (जनम 1708 - मृत्यु 1754) * नवाब वज़ीर अल मुमालिक ** 28 अप्रैल 1748 – 13 मई 1753 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (29 जून 1748 तक कार्यकाल) * सूबेदार नवाब ** 5 नवंबर 1753 – 5 अक्टूबर 1754 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (दूसरी बार) ** 5 अक्टूबर 1754 – 15 फरवरी 1762 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर (जन्म 1732 – मृत्यु 1775) * नवाब वजीर अल-मुमालिक ** 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर ** 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ़ुद्दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) ** 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) ** 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिनुद्दौला नाज़िमुल मुल्क सआदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) ** 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर खान (जन्म 1769 – मृत्यु 1827) * बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए-ज़मन) ** 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह ** 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिरुद्दीन हैदर सुलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) ** 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मोईनुद्दीन अबुल फ़तह मोहम्मद अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) ** 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासिरुद्दौला अमजद अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) ** 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासिरुद्दीन अब्दुल मंसूर मुहम्मद वाजिद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) ** 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र'', उपर्युक्त के पुत्र (विद्रोह मा)'' (जनम 1845 - मृत्यु 1893) qhjav4569hzj2srhxveulhs366gojzt 35198 35197 2026-07-05T19:05:05Z Avimaarak 3578 35198 wikitext text/x-wiki == अवध एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। == == भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। == == १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। == == सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। == == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] [[श्रेणी:इतिहास]] [[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> == बाहरी कड़ी== * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] == शासक == * सूबेदार नवाब ** 1732 – 19 मार्च 1739 बुरहान अल-मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मूसवी सआदत अली खान प्रथम (जनम 1680 - मृत्यु 1739) ** 19 मार्च 1739 - 28 अप्रैल 1748 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (पहिली बार) (ईसा पूर्व 1708 - मृत्यु 1754) * नवाब वजीर अल-ममालिक ** 28 अप्रैल 1748 – 13 मई 1753 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (29 जून 1748 तक कार्यकाल) * सूबेदार नवाब ** 5 नवंबर 1753 – 5 अक्टूबर 1754 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (स) (दुसरी बार) ** 5 अक्टूबर 1754 – 15 फरवरी 1762 जलाल अद-दीन शोजा` अद-दौला हैदर (जन्म 1732 – मृत्यु 1775) * नवाब वजीर अल-ममालिक ** 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलाल अद-दीन शोजा` अद-दौला हैदर (स) ** 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ अद-दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) ** 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर `अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) ** 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिन अद-दौला नाज़ेम अल-मोलक साअदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) ** 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 गाजी अद-दीन रफाअत अद-दौला अबू ́ल-मोजफ्फर हैदर खान (जन्म 1769 – म. 1827) * बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए ज़मन) ** 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन मोईज़ुद्दीन अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह (स) ** 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिर-अद-दीन हैदर सोलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) ** 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मो'इन अद-दीन अबू'ल-फत मोहम्मद `अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) ** 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासर अद-दौला अमजद `अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) ** 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासर अद-दीन अब्द अल-मंसूर मोहम्मद वाजेद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) ** 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र'', उपरोक्त के पुत्र (विद्रोह मा)'' (ईसा पूर्व 1845 - मृत्यु 1893) == शासक == <templatestyles src="Module:Message box/ambox.css"></templatestyles>  * सूबेदार नवाब ** 1732 – 19 मार्च 1739 बुरहान उल मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मूसवी सआदत अली खान प्रथम (जनम 1680 - मृत्यु 1739) ** 19 मार्च 1739 - 28 अप्रैल 1748 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (पहिली बार) (जनम 1708 - मृत्यु 1754) * नवाब वज़ीर अल मुमालिक ** 28 अप्रैल 1748 – 13 मई 1753 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (29 जून 1748 तक कार्यकाल) * सूबेदार नवाब ** 5 नवंबर 1753 – 5 अक्टूबर 1754 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (दूसरी बार) ** 5 अक्टूबर 1754 – 15 फरवरी 1762 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर (जन्म 1732 – मृत्यु 1775) * नवाब वजीर अल-मुमालिक ** 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर ** 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ़ुद्दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) ** 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) ** 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिनुद्दौला नाज़िमुल मुल्क सआदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) ** 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर खान (जन्म 1769 – मृत्यु 1827) * बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए-ज़मन) ** 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह ** 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिरुद्दीन हैदर सुलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) ** 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मोईनुद्दीन अबुल फ़तह मोहम्मद अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) ** 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासिरुद्दौला अमजद अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) ** 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासिरुद्दीन अब्दुल मंसूर मुहम्मद वाजिद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) ** 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र'', उपर्युक्त के पुत्र (विद्रोह मा)'' (जनम 1845 - मृत्यु 1893) pd042i6vu5ci3jscyswfgx7dpvjbguw 35199 35198 2026-07-05T19:05:48Z Avimaarak 3578 35199 wikitext text/x-wiki == अवध एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। == == भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। == == १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। == == सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। == == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] [[श्रेणी:इतिहास]] [[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 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वजीर अल-ममालिक ** 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलाल अद-दीन शोजा` अद-दौला हैदर (स) ** 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ अद-दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) ** 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर `अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) ** 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिन अद-दौला नाज़ेम अल-मोलक साअदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) ** 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 गाजी अद-दीन रफाअत अद-दौला अबू ́ल-मोजफ्फर हैदर खान (जन्म 1769 – म. 1827) * बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए ज़मन) ** 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन मोईज़ुद्दीन अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह (स) ** 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिर-अद-दीन हैदर सोलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) ** 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मो'इन अद-दीन अबू'ल-फत मोहम्मद `अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) ** 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासर अद-दौला अमजद `अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) ** 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासर अद-दीन अब्द अल-मंसूर मोहम्मद वाजेद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) ** 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र'', उपरोक्त के पुत्र (विद्रोह मा)'' (ईसा पूर्व 1845 - मृत्यु 1893) h9x8mx705zi1rbity1yfhfza5yxc7r9 35200 35199 2026-07-05T19:10:21Z Avimaarak 3578 35200 wikitext text/x-wiki == अवध एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। == == भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। == == १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। == == सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। == == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] [[श्रेणी:इतिहास]] [[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> == बाहरी कड़ी== * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] == शासक == '''सूबेदार नवाब''' * 1732 – 19 मार्च 1739 बुरहान उल मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मूसवी सआदत अली खान प्रथम (जनम 1680 - मृत्यु 1739) * 19 मार्च 1739 - 28 अप्रैल 1748 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (पहिली बार) (जनम 1708 - मृत्यु 1754) नवाब वज़ीर अल मुमालिक 28 अप्रैल 1748 – 13 मई 1753 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (29 जून 1748 तक कार्यकाल) '''सूबेदार नवाब''' * 5 नवंबर 1753 – 5 अक्टूबर 1754 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (दुसरी बार) * 5 अक्टूबर 1754 – 15 फरवरी 1762 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर (जन्म 1732 – मृत्यु 1775) नवाब वजीर अल-मुमालिक * 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर * 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ़ुद्दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) * 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) * 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिनुद्दौला नाज़िमुल मुल्क सआदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) * 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर खान (जन्म 1769 – मृत्यु 1827) '''बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए-ज़मन)''' * 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह * 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिरुद्दीन हैदर सुलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) * 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मोईनुद्दीन अबुल फ़तह मोहम्मद अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) * 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासिरुद्दौला अमजद अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) * 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासिरुद्दीन अब्दुल मंसूर मुहम्मद वाजिद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) * 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र, उपर्युक्त के पुत्र (विद्रोह मा) (जनम 1845 - मृत्यु 1893) 1pl0az49ii9qq33yudg93tr0b5bvcp1 35201 35200 2026-07-05T19:17:08Z Avimaarak 3578 35201 wikitext text/x-wiki == अवध एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। == == भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। == == १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। == == सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। == ==शासक== =='''सूबेदार नवाब'''== ==* 1732 – 19 मार्च 1739 बुरहान उल मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मूसवी सआदत अली खान प्रथम (जनम 1680 - मृत्यु 1739)== ==* 19 मार्च 1739 - 28 अप्रैल 1748 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (पहिली बार) (जनम 1708 - मृत्यु 1754)== ==नवाब वज़ीर अल मुमालिक== == 28 अप्रैल 1748 – 13 मई 1753 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (29 जून 1748 तक कार्यकाल) == =='''सूबेदार नवाब'''== ==* 5 नवंबर 1753 – 5 अक्टूबर 1754 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (दुसरी बार) == ==* 5 अक्टूबर 1754 – 15 फरवरी 1762 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर (जन्म 1732 – मृत्यु 1775) नवाब वजीर अल-मुमालिक == ==* 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर == ==* 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ़ुद्दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) == ==* 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) == ==* 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिनुद्दौला नाज़िमुल मुल्क सआदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) == ==* 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर खान (जन्म 1769 – मृत्यु 1827) == =='''बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए-ज़मन)'''== ==* 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह == ==* 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिरुद्दीन हैदर सुलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) == ==* 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मोईनुद्दीन अबुल फ़तह मोहम्मद अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) == ==* 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासिरुद्दौला अमजद अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) == ==* 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासिरुद्दीन अब्दुल मंसूर मुहम्मद वाजिद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) == ==* 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र, उपर्युक्त के पुत्र (विद्रोह मा) (जनम 1845 - मृत्यु 1893)== == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] [[श्रेणी:इतिहास]] [[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> == बाहरी कड़ी== * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] tg1powt1tjcspda97fwhudpx6ozgorr 35202 35201 2026-07-05T19:51:00Z Avimaarak 3578 35202 wikitext text/x-wiki {{Infobox settlement <!-- See Template:Infobox settlement for additional fields and descriptions -->| name = अवध | settlement_type = [[क्षेत्र]] | image_map = Awadhi language.png | image_skyline = {{multiple image | border = infobox | total_width = 300 | image_style = | perrow = 1/2/2/1 | caption_align = center | image1 = Sarayu River night view, Ayodhya 001.jpg | caption1 = [[राम की पैड़ी]], [[अयोध्या]] | image2 = Bada Imambara aka Bhool Bhulaiya.jpg | caption2 = [[बड़ा इमामबाड़ा]], [[लखनऊ]] | image3 = 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c.1801.jpg|thumb|250px|फैजाबाद मा लाल दरवाजा, [[अयोध्या]],''Gate of the Loll-Baug at Fyzabad'' by Thomas and William Daniell, 1801* (BL).<ref>{{cite web|url=http://www.bl.uk/onlinegallery/onlineex/apac/other/019xzz000004323u00003000.html|title=Gate of the Loll-Baug at Fyzabad|publisher=British Library, Online Gallery|access-date=26 November 2019|archive-date=12 December 2011|archive-url=https://web.archive.org/web/20111212071149/http://www.bl.uk/onlinegallery/onlineex/apac/other/019xzz000004323u00003000.html|url-status=live}}</ref>]] अवध ({{IPA|hi|əˈʋədʱ|lang|hi-Awadh.ogg}}) एक क्षेत्र कय नाँव होय जवन आज कय उत्तर प्रदेश, भारत औ नेपाल कय कपिलवस्तु, रूपांदेही औ डांग कय घेरे अहै, जवन प्राचीन समय मा कोसल कय नाँव से जाना जात रहा। यहि कय राजधानी अयोध्या रहा। अवध शब्द अयोध्या से बना है। शुरू मा अवध कै राजधानी फैजाबाद रही, लेकिन बाद मा लखनऊ सामने आवा। अवध पै नवाब शासन करत रहें जवन काफी हद तक स्वतंत्र रहें। चूंकि नवाब शिया मुसलमान रहें, यहै कारन इस्लाम कै यहि पंथ का अवध मा विशेष संरक्षण मिला। लखनऊ उर्दू कविता कै प्रसिद्ध केन्द्र भी रहा। दिल्ली केंद्र के पतन के बाद दिल्ली से कईयो प्रसिद्ध उर्दू कवि लखनऊ लौटे। लखनऊ अवध कै पारम्परिक राजधानी बनी। भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन अवध कय भूभाग भारत कय कइयौ जिला अउर वर्तमान नेपाल कय कइयौ जिला कय समाहित करत है। १७६५ मा बक्सर कै लड़ाई मा अवध कै नवाब पराजित भा रहा। हालांकि, लार्ड रॉबर्ट क्लाइव अवध का ओनके पास लौटा दिहिन, केवल इलाहाबाद अऊर कारा जिला मुगल सम्राट शाह आलम का सौंप दिहिन। वारेन हेस्टिंग्स बाद मा रोहिलखंड का अवध मा शामिल करै मा नवाब के सहायता किहिन। शाह आलम से नाराज होइकै इलाहाबाद औ कारा अवध के नवाब का सौंप दिहिन। १७७५ मा अंग्रेज अवध के नवाब से बनारस जिला छीन लिहिन, औ १८०१ मा रोहिलखण्ड। यहि तरह अवध बढ़त-बढ़त सिकुड़त रहा। सन् १८५६ मा अवध पै फिर से अंग्रेजन कै कब्जा होइ गवा। १८५७ के विद्रोह के समय अवध अंग्रेजन के हाथन से खिसक गै, मुला डेढ़ साल के लड़ाई के बाद आखिर मा अंग्रेज जीत गये। सन् १९०२ मा आगरा औ अवध प्रान्तन कय विलय कइके यक नवा प्रान्त बनावा गा रहा, जेकर नाँव "संयुक्त प्रान्त आगरा औ अवध" रखा गा रहा, जेका छोट कइके "संयुक्त प्रान्त" या बस "यू.पी." कै दीन गा रहा। ई प्रान्त कय बाद मा उत्तर प्रदेश कय नाँव बदलि दिहा गा जवने कय आजौ "यू.पी." कहा जात है। नाम के आद्याक्षर के बाद। ==शासक== ==='''सूबेदार नवाब'''=== * 1732 – 19 मार्च 1739 बुरहान उल मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मूसवी सआदत अली खान प्रथम (जनम 1680 - मृत्यु 1739) * 19 मार्च 1739 - 28 अप्रैल 1748 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (पहिली बार) (जनम 1708 - मृत्यु 1754) नवाब वज़ीर अल मुमालिक *28 अप्रैल 1748 – 13 मई 1753 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (29 जून 1748 तक कार्यकाल) ==='''सूबेदार नवाब'''=== * 5 नवंबर 1753 – 5 अक्टूबर 1754 अबुल मंसूर मोहम्मद मोकिम खान (दुसरी बार) * 5 अक्टूबर 1754 – 15 फरवरी 1762 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर (जन्म 1732 – मृत्यु 1775) नवाब वजीर अल-मुमालिक * 15 फरवरी 1762 – 26 जनवरी 1775 जलालुद्दीन शुजाउद्दौला हैदर * 26 जनवरी 1775 – 21 सितम्बर 1797 आसफ़ुद्दौला अमानी (जन्म 1748 – मृत्यु 1797) * 21 सितम्बर 1797 – 21 जनवरी 1798 मिर्जा वजीर अली खान (जन्म 1780 – मृत्यु 1817) * 21 जनवरी 1798 – 11 जुलाई 1814 यामिनुद्दौला नाज़िमुल मुल्क सआदत अली खान द्वितीय बहादुर (जन्म 1752 – मृत्यु 1814) * 11 जुलाई 1814 – 19 अक्टूबर 1818 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर खान (जन्म 1769 – मृत्यु 1827) ==='''बादशाह (शीर्षक पदशाह-ए अवध, शाह-ए-ज़मन)'''=== * 19 अक्टूबर 1818 – 19 अक्टूबर 1827 ग़ाज़ीउद्दीन रफ़ातुद्दौला अबुल मुज़फ़्फ़र हैदर शाह * 19 अक्टूबर 1827 – 7 जुलाई 1837 नासिरुद्दीन हैदर सुलेमान जाह शाह (जन्म 1803 – मृत्यु 1837) * 7 जुलाई 1837 - 17 मई 1842 मोईनुद्दीन अबुल फ़तह मोहम्मद अली शाह (जन्म 1777 - मृत्यु 1842) * 17 मई 1842 – 13 फरवरी 1847 नासिरुद्दौला अमजद अली थोरैया जाह शाह (जन्म 1801 – मृत्यु 1847) * 13 फरवरी 1847 – 7 फरवरी 1856 नासिरुद्दीन अब्दुल मंसूर मुहम्मद वाजिद अली शाह (जन्म 1822 – मृत्यु 1887) * 5 जुलाई 1857 – 3 मार्च 1858 बिरजिस क़द्र, उपर्युक्त के पुत्र (विद्रोह मा) (जनम 1845 - मृत्यु 1893) == यहौ द्याखौ == *[[अवध के नवाब]] *[[श्रेणी:इतिहास]] *[[श्रेणी:अवधी]] == व्युत्पत्ति == ''अवध'' शब्द के व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] नाम [[अयोध्या]] ते भै है। यहिका अर्थ है, "जेहिके विरुद्ध युद्ध न कीन जा सकै अथवा अप्रतिरोध्य"। <ref>{{Cite book|url=http://archive.org/details/SubahOfAwadhUnderTheMughals15821724|title=Subah Of Awadh Under The Mughals 1582 1724|last=Mohamed nasr|pages=1|language=English}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Imperial Gazetteer2 of India, Volume 24, page 132 -- Imperial Gazetteer of India -- Digital South Asia Library |url=https://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20220629061359/http://dsal.uchicago.edu/reference/gazetteer/pager.html?objectid=DS405.1.I34_V24_138.gif |archive-date=29 June 2022 |access-date=20 June 2022 |website=dsal.uchicago.edu}}</ref> <ref>{{Cite web |title=Sanskrit Dictionary |url=https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |url-status=live |archive-url=https://web.archive.org/web/20221229224756/https://www.sanskritdictionary.com/?q=ayodhya |archive-date=29 December 2022 |access-date=29 December 2022}}</ref> == बाहरी कड़ी== * [https://www.worldstatesmen.org/India_princes_A-J.html WorldStatesmen – India – Princely States A-J] rufj8wshm3piqjslj3z40pa0zi116yx उत्तराखण्ड 0 525 35218 28248 2026-07-06T10:57:00Z Avimaarak 3578 Created by translating the section "Etymology" from the page "[[:en:Special:Redirect/revision/1360933707|Uttarakhand]]" 35218 wikitext text/x-wiki '''उत्तराखण्ड''' [[भारत]] कय २८ राज्य में से एक होय। एकर राजधानी [[देहरादून]] होय। [[File:Uttarakhand in India (disputed hatched).svg|thumb|उत्तराखण्ड]] [[File:Uttarakhand Montage.png|thumb|]] एकर निर्माण ९ नवम्बर २००० कय कय कई साल के आंदोलन के बाद भारत गणराज्य कय सत्ताइसवाँ राज्य के रूप मा करल गईल रहे । सन २००० से २००६ तक इ उत्तरांचल कय नाम से जाना जात रहा। जनवरी २००७ मा स्थानीय लोगन की भावनाओं का ध्यान में रखत हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिहल गईल। राज्य क सीमा उत्तर मँ तिब्बत अउर पूरुब मँ [[नेपाल]] स जुड़ी अहइ। [[हिमाचल प्रदेश]] पच्छु ओर अउर [[उत्तर प्रदेश]] दक्खिन ओर एकर सीमा से लगे राज्य अहँय। सन २००० मा अपने गठन से पहिले ई उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहा। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों अउर प्राचीन साहित्य मा इ क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप मा कीन गवा है। [[हिन्दी]] अउर [[संस्कृत]] में उत्तराखण्ड कय मतलब उत्तरी क्षेत्र या भाग होत है। राज्य में हिन्दू धर्म का पवित्रतम अउर भारत का सबसे बड़ा नदी गंगा अउर यमुना का उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री अउर यमुनोत्री तथा इनके तट पर बसे वैदिक संस्कृति का कई महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं। ==भौगोलिक स्थिति== उत्तराखण्ड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल २८° ४३' N है। से ३१°२७ उ. अउर देशांतर ७७°३४' पूर्व से ८१°०२' पूर्व के बीच में ५३,४८३ वर्ग किमी है, जवने में से ४३,०३५ किमी. मी.२ पहाड़ी ह अउर ७,४४८ किमी. मी.२ मैदानी अहै अउर ३४,६५१ कि. मी. मी.२ भूभाग वन आच्छादित अहै । राज्य का अधिकतर उत्तरी भाग वृहदतर हिमालय शृंखला का हिस्सा अहै, जवन ऊँच हिमालयी चोटीयन अउर हिमनदियन से ढका अहै, जबकि निचला तराई घने वन से ढका अहै जिनका पहिले अंग्रेज लकड़ी व्यापारियन अउर आजादी के बाद वन अनुबंधक लोगन द्वारा दोहन कइल गइल. हाल के वनीकरण के प्रयास के कारन स्थिति का उल्टा करे मा सफलता मिली अहै। हिमालय कय विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र बड़ी संख्या मा जानवरन (जैसे भैंस, हिम तेंदुआ, तेंदुआ औ बाघ), पौधों औ दुर्लभ जड़ी - बूटी कय घर अहै। भारत की दुइ सबसे महत्वपूर्ण नदियन, गंगा अउर यमुना, का उद्गम इ राज्य से होत ह अउर गढ़वाली मार्ग से ढलान तक कई तालाब, झीलें, हिमनद पीली बर्फ से लेकर पानी की झीलें तक होत ह. [[Category:भारत कय राज्य]] == व्युत्पत्ति == उत्तराखंड क नाँव [[संस्कृत]] शब्द {{Lang|sa|[[wikt:उत्तर|उत्तर]]}} अउर {{Lang|sa|[[wikt:खण्ड|खण्ड]]}} ते मिलि के व्युत्पन्न होत है। जेहि का सम्मिलित अर्थ है, 'उत्तरी हिस्सा’।<ref>{{Cite web |title=Escape to Uttarakhand: Your Himalayan Getaway |url=https://www.traveldreams.in/uttarakhand/ |access-date=31 March 2025 |website=Traveldreams |language=en-US}}</ref> ई नाम का उल्लेख प्राचीन हिन्दू ग्रंथन मा "केदारखंड" (वर्तमान गढ़वाल) अउर "मानसखंड" (वर्तमान कुमाऊँ) के संयुक्त क्षेत्र के रूप मा पावा जात है। उत्तराखंड, भारतीय [[हिमालय]] के मध्यम खंडौ के खातिर प्राचीन [[पुराण|पौराणिक]] नाम रहै। dfjsbol2lufk0yxc32q9n9u22cvhvzl 35219 35218 2026-07-06T11:00:40Z Avimaarak 3578 35219 wikitext text/x-wiki '''उत्तराखण्ड''' [[भारत]] कय २८ राज्य में से एक होय। एकर राजधानी [[देहरादून]] होय। [[File:Uttarakhand in India (disputed hatched).svg|thumb|उत्तराखण्ड]] [[File:Uttarakhand Montage.png|thumb|]] एकर निर्माण ९ नवम्बर २००० कय कय कई साल के आंदोलन के बाद भारत गणराज्य कय सत्ताइसवाँ राज्य के रूप मा करल गईल रहे । सन २००० से २००६ तक इ उत्तरांचल कय नाम से जाना जात रहा। जनवरी २००७ मा स्थानीय लोगन की भावनाओं का ध्यान में रखत हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिहल गईल। राज्य क सीमा उत्तर मँ तिब्बत अउर पूरुब मँ [[नेपाल]] स जुड़ी अहइ। [[हिमाचल प्रदेश]] पच्छु ओर अउर [[उत्तर प्रदेश]] दक्खिन ओर एकर सीमा से लगे राज्य अहँय। सन २००० मा अपने गठन से पहिले ई उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहा। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों अउर प्राचीन साहित्य मा इ क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप मा कीन गवा है। [[हिन्दी]] अउर [[संस्कृत]] में उत्तराखण्ड कय मतलब उत्तरी क्षेत्र या भाग होत है। राज्य में हिन्दू धर्म का पवित्रतम अउर भारत का सबसे बड़ा नदी गंगा अउर यमुना का उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री अउर यमुनोत्री तथा इनके तट पर बसे वैदिक संस्कृति का कई महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं। == व्युत्पत्ति == उत्तराखंड क नाँव [[संस्कृत]] शब्द {{Lang|sa|[[wikt:उत्तर|उत्तर]]}} अउर {{Lang|sa|[[wikt:खण्ड|खण्ड]]}} ते मिलि के व्युत्पन्न होत है। जेहि का सम्मिलित अर्थ है, 'उत्तरी हिस्सा’।<ref>{{Cite web |title=Escape to Uttarakhand: Your Himalayan Getaway |url=https://www.traveldreams.in/uttarakhand/ |access-date=31 March 2025 |website=Traveldreams |language=en-US}}</ref> ई नाम का उल्लेख प्राचीन हिन्दू ग्रंथन मा "केदारखंड" (वर्तमान गढ़वाल) अउर "मानसखंड" (वर्तमान कुमाऊँ) के संयुक्त क्षेत्र के रूप मा पावा जात है। उत्तराखंड, भारतीय [[हिमालय]] के मध्यम खंडौ के खातिर प्राचीन [[पुराण|पौराणिक]] नाम रहै। ==भौगोलिक स्थिति== उत्तराखण्ड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल २८° ४३' N है। से ३१°२७ उ. अउर देशांतर ७७°३४' पूर्व से ८१°०२' पूर्व के बीच में ५३,४८३ वर्ग किमी है, जवने में से ४३,०३५ किमी. मी.२ पहाड़ी ह अउर ७,४४८ किमी. मी.२ मैदानी अहै अउर ३४,६५१ कि. मी. मी.२ भूभाग वन आच्छादित अहै । राज्य का अधिकतर उत्तरी भाग वृहदतर हिमालय शृंखला का हिस्सा अहै, जवन ऊँच हिमालयी चोटीयन अउर हिमनदियन से ढका अहै, जबकि निचला तराई घने वन से ढका अहै जिनका पहिले अंग्रेज लकड़ी व्यापारियन अउर आजादी के बाद वन अनुबंधक लोगन द्वारा दोहन कइल गइल. हाल के वनीकरण के प्रयास के कारन स्थिति का उल्टा करे मा सफलता मिली अहै। हिमालय कय विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र बड़ी संख्या मा जानवरन (जैसे भैंस, हिम तेंदुआ, तेंदुआ औ बाघ), पौधों औ दुर्लभ जड़ी - बूटी कय घर अहै। भारत की दुइ सबसे महत्वपूर्ण नदियन, गंगा अउर यमुना, का उद्गम इ राज्य से होत ह अउर गढ़वाली मार्ग से ढलान तक कई तालाब, झीलें, हिमनद पीली बर्फ से लेकर पानी की झीलें तक होत ह. [[Category:भारत कय राज्य]] ==सन्दर्भ== iv5fu4sp7yynl769svsex082q9kirr3 35220 35219 2026-07-06T11:14:26Z Avimaarak 3578 35220 wikitext text/x-wiki '''उत्तराखण्ड''' [[भारत]] कय २८ राज्य में से एक होय। एकर राजधानी [[देहरादून]] होय। [[File:Uttarakhand in India (disputed hatched).svg|thumb|उत्तराखण्ड]] [[File:Uttarakhand Montage.png|thumb|]] एकर निर्माण ९ नवम्बर २००० कय कय कई साल के आंदोलन के बाद भारत गणराज्य कय सत्ताइसवाँ राज्य के रूप मा करल गईल रहे । सन २००० से २००६ तक इ उत्तरांचल कय नाम से जाना जात रहा। जनवरी २००७ मा स्थानीय लोगन की भावनाओं का ध्यान में रखत हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिहल गईल। राज्य क सीमा उत्तर मँ तिब्बत अउर पूरुब मँ [[नेपाल]] स जुड़ी अहइ। [[हिमाचल प्रदेश]] पच्छु ओर अउर [[उत्तर प्रदेश]] दक्खिन ओर एकर सीमा से लगे राज्य अहँय। सन २००० मा अपने गठन से पहिले ई उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहा। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों अउर प्राचीन साहित्य मा इ क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप मा कीन गवा है। [[हिन्दी]] अउर [[संस्कृत]] में उत्तराखण्ड कय मतलब उत्तरी क्षेत्र या भाग होत है। राज्य में हिन्दू धर्म का पवित्रतम अउर भारत का सबसे बड़ा नदी गंगा अउर यमुना का उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री अउर यमुनोत्री तथा इनके तट पर बसे वैदिक संस्कृति का कई महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं। == व्युत्पत्ति == उत्तराखंड क नाँव [[संस्कृत]] शब्द {{Lang|sa|[[wikt:उत्तर|उत्तर]]}} अउर {{Lang|sa|[[wikt:खण्ड|खण्ड]]}} ते मिलि के व्युत्पन्न होत है। जेहि का सम्मिलित अर्थ है, 'उत्तरी हिस्सा’।<ref>{{Cite web |title=Escape to Uttarakhand: Your Himalayan Getaway |url=https://www.traveldreams.in/uttarakhand/ |access-date=31 March 2025 |website=Traveldreams |language=en-US}}</ref> ई नाम का उल्लेख प्राचीन हिन्दू ग्रंथन मा "केदारखंड" (वर्तमान गढ़वाल) अउर "मानसखंड" (वर्तमान कुमाऊँ) के संयुक्त क्षेत्र के रूप मा पावा जात है। उत्तराखंड, भारतीय [[हिमालय]] के मध्यम खंडौ के खातिर प्राचीन [[पुराण|पौराणिक]] नाम रहै। ==भौगोलिक स्थिति== उत्तराखण्ड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल २८° ४३' N है। से ३१°२७ उ. अउर देशांतर ७७°३४' पूर्व से ८१°०२' पूर्व के बीच में ५३,४८३ वर्ग किमी है, जवने में से ४३,०३५ किमी. मी.२ पहाड़ी ह अउर ७,४४८ किमी. मी.२ मैदानी अहै अउर ३४,६५१ कि. मी. मी.२ भूभाग वन आच्छादित अहै । राज्य का अधिकतर उत्तरी भाग वृहदतर हिमालय शृंखला का हिस्सा अहै, जवन ऊँच हिमालयी चोटीयन अउर हिमनदियन से ढका अहै, जबकि निचला तराई घने वन से ढका अहै जिनका पहिले अंग्रेज लकड़ी व्यापारियन अउर आजादी के बाद वन अनुबंधक लोगन द्वारा दोहन कइल गइल. हाल के वनीकरण के प्रयास के कारन स्थिति का उल्टा करे मा सफलता मिली अहै। हिमालय कय विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र बड़ी संख्या मा जानवरन (जैसे भैंस, हिम तेंदुआ, तेंदुआ औ बाघ), पौधों औ दुर्लभ जड़ी - बूटी कय घर अहै। भारत की दुइ सबसे महत्वपूर्ण नदियन, गंगा अउर यमुना, का उद्गम इ राज्य से होत ह अउर गढ़वाली मार्ग से ढलान तक कई तालाब, झीलें, हिमनद पीली बर्फ से लेकर पानी की झीलें तक होत ह. [[Category:भारत कय राज्य]] ==सन्दर्भ== 1jyi87rnbib7zxfmmaa02j1bo0y4p3b 35221 35220 2026-07-06T11:17:15Z Avimaarak 3578 35221 wikitext text/x-wiki {{Infobox Indian state or territory | name = Uttarakhand | image_skyline = {{multiple image | border = infobox | total_width = 280 | image_style = | perrow = 1/2/2/1 | caption_align = center | image1 = Nanda Devi - Hidden Summit, Uttarakhand India 2013.jpg | caption1 = [[Nanda Devi]] | image2 = Har Ki Dun.jpg | caption2 = [[Har Ki Doon]] | image3 = Wilderness,Corbett National Park.jpg | caption3 = [[Jim Corbett National Park]] | image4 = Nainital metro.jpg | caption4 = [[Nainital]] | image5 = AjitHota BirthPlaceOfGanges.jpg | caption5 = [[Devprayag]] | image6 = Kedarnath Temple in Rainy season.jpg | caption6 = [[Kedarnath Temple]] | image_alt = }} | type = State | image_seal = Seal of Uttarakhand.svg | etymology = Northern Land | nickname = Devabhumi; Land of the Gods | motto = [[Satyameva Jayate]] ([[Sanskrit]])<br />"Truth alone 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Indian states 2025 - StatisticsTimes.com| url=https://statisticstimes.com/demographics/india/indian-states-population.php| access-date=23 May 2025| website=statisticstimes.com}}</ref> | population_as_of = 2025 | population_rank = 21st | population_density = 213<ref name="Niti Ayog">{{cite web|title=Macro and Fiscal Landscape of the State of Uttarakhand|url=https://niti.gov.in/sites/default/files/2025-03/Macro-and-Fiscal-Landscape-of-the-State-of-Uttarakhand.pdf|website=[[Niti Ayog]]|access-date=20 May 2025}}</ref> | population_urban = 35.90%<ref name="Niti Ayog"/> | population_rural = 64.10%<ref name="Niti Ayog"/> | population_demonym = [[List of people from Uttarakhand|Uttarakhandi]] | official_langs = [[Hindi]]<ref name="2011lang" /> | additional_official = [[Sanskrit]]<ref name="sanskrit">{{cite news|last=Trivedi|first=Anupam|title=Sanskrit is second official language in 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[[Devanagari]] | GDP_footnotes = <ref>{{cite web|title=Uttarakhand Budget Analysis 2026-27|url=https://prsindia.org/budgets/states/uttarakhand-budget-analysis-2026-27}}</ref> | GDP_total = {{Increase}} {{INRConvert|4.28|lc|lk=r}} (nominal)<br/>{{increase}} $210.28 billion (PPP) | GDP_year = 2026–2027 | GDP_rank = 20th | GDP_per_capita = {{Increase}} {{INRConvert|359033|lk=r}} (nominal)<br/>{{increase}} $17,652 (PPP) | GDP_per_capita_rank = 10th | HDI = {{Increase}} 0.722 {{color|green|high}} <ref>{{cite web|title=India: Subnational HDI|url=https://globaldatalab.org/shdi/table/shdi/IND/|website=Global Data Labs|access-date=8 June 2025}}</ref> | HDI_year = 2023 | HDI_rank = 20th | literacy = 87.6%<ref>{{Cite web| title=Literacy and education| url=https://mospi.gov.in/sites/default/files/reports_and_publication/statistical_publication/social_statistics/WM16Chapter3.pdf| 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उत्तरांचल कय नाम से जाना जात रहा। जनवरी २००७ मा स्थानीय लोगन की भावनाओं का ध्यान में रखत हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिहल गईल। राज्य क सीमा उत्तर मँ तिब्बत अउर पूरुब मँ [[नेपाल]] स जुड़ी अहइ। [[हिमाचल प्रदेश]] पच्छु ओर अउर [[उत्तर प्रदेश]] दक्खिन ओर एकर सीमा से लगे राज्य अहँय। सन २००० मा अपने गठन से पहिले ई उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहा। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों अउर प्राचीन साहित्य मा इ क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप मा कीन गवा है। [[हिन्दी]] अउर [[संस्कृत]] में उत्तराखण्ड कय मतलब उत्तरी क्षेत्र या भाग होत है। राज्य में हिन्दू धर्म का पवित्रतम अउर भारत का सबसे बड़ा नदी गंगा अउर यमुना का उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री अउर यमुनोत्री तथा इनके तट पर बसे वैदिक संस्कृति का कई महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं। == व्युत्पत्ति == उत्तराखंड क नाँव [[संस्कृत]] शब्द {{Lang|sa|[[wikt:उत्तर|उत्तर]]}} अउर {{Lang|sa|[[wikt:खण्ड|खण्ड]]}} ते मिलि के व्युत्पन्न होत है। जेहि का सम्मिलित अर्थ है, 'उत्तरी हिस्सा’।<ref>{{Cite web |title=Escape to Uttarakhand: Your Himalayan Getaway |url=https://www.traveldreams.in/uttarakhand/ |access-date=31 March 2025 |website=Traveldreams |language=en-US}}</ref> ई नाम का उल्लेख प्राचीन हिन्दू ग्रंथन मा "केदारखंड" (वर्तमान गढ़वाल) अउर "मानसखंड" (वर्तमान कुमाऊँ) के संयुक्त क्षेत्र के रूप मा पावा जात है। उत्तराखंड, भारतीय [[हिमालय]] के मध्यम खंडौ के खातिर प्राचीन [[पुराण|पौराणिक]] नाम रहै। ==भौगोलिक स्थिति== उत्तराखण्ड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल २८° ४३' N है। से ३१°२७ उ. अउर देशांतर ७७°३४' पूर्व से ८१°०२' पूर्व के बीच में ५३,४८३ वर्ग किमी है, जवने में से ४३,०३५ किमी. मी.२ पहाड़ी ह अउर ७,४४८ किमी. मी.२ मैदानी अहै अउर ३४,६५१ कि. मी. मी.२ भूभाग वन आच्छादित अहै । राज्य का अधिकतर उत्तरी भाग वृहदतर हिमालय शृंखला का हिस्सा अहै, जवन ऊँच हिमालयी चोटीयन अउर हिमनदियन से ढका अहै, जबकि निचला तराई घने वन से ढका अहै जिनका पहिले अंग्रेज लकड़ी व्यापारियन अउर आजादी के बाद वन अनुबंधक लोगन द्वारा दोहन कइल गइल. हाल के वनीकरण के प्रयास के कारन स्थिति का उल्टा करे मा सफलता मिली अहै। हिमालय कय विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र बड़ी संख्या मा जानवरन (जैसे भैंस, हिम तेंदुआ, तेंदुआ औ बाघ), पौधों औ दुर्लभ जड़ी - बूटी कय घर अहै। भारत की दुइ सबसे महत्वपूर्ण नदियन, गंगा अउर यमुना, का उद्गम इ राज्य से होत ह अउर गढ़वाली मार्ग से ढलान तक कई तालाब, झीलें, हिमनद पीली बर्फ से लेकर पानी की झीलें तक होत ह. [[Category:भारत कय राज्य]] ==सन्दर्भ== t0d64mgbd0x47a3c49vduxs2vim8pll प्रेमचन्द 0 2928 35209 14100 2026-07-06T08:27:53Z Avimaarak 3578 Created by translating the section "Biography" from the page "[[:en:Special:Redirect/revision/1357010023|Premchand]]" 35209 wikitext text/x-wiki '''प्रेमचंद''' ([[३१ जुलाई]], [[१८८०]] - [[८ अक्टूबर]] [[१९३६]]) [[हिन्दी]] और [[उर्दू]] कय बढहन् भारतीय लेखक में से एक होयँ।मूल नावँ '''धनपत राय श्रीवास्तव''' वाले प्रेमचंद कय '''नवाब राय''' औ '''मुंशी प्रेमचंद''' कय नावँ से भी जाना जात है। == जीवन परिचय == <templatestyles src="Hlist/styles.css"></templatestyles><templatestyles src="Module:Sidebar/styles.css"></templatestyles> === सुरुवाती जिंदगी === प्रेमचंद का जनम 31 जुलाई 1880 का [[वाराणसी|बनारस]] के लगे लमही नाँव के एक गाँव मा भा रहै। छुटपने मा उनका नाँव धनपत राय ("धन का स्वामी") रखा गा रहै। इनके पूर्वज बड़े चित्रगुप्तवंशी कायस्थ रहैं, जिनके लगे आठ ते नौ बिगहा जमीन रहै। इनके दादा गुरुसहायराय पटवारी (गाँव के जमीन के अभिलेख रखने वाले) रहैं अउर इनके पिता अजयबलाल डाकघर के चपरासी रहैं। इनकी महतारी आनंदी देवी करौनी गाँव की रहै वाली रहैं, जो संभवतः इनके "बड़े घर की बेटी" मा आनंदी किरदार के लिए इनकी प्रेरणौ रहीं। धनपत राय अजयब लाल और आनंदी की चौथे संतान रहैं; पहिले दुई बिटेवा रहैं मुला उइ छोटेहे मा मर गईं, अउर याक तीसर बिटेवा रहै जेहिका नाँव सामा रहै। उनके चाचा, महाबीर, एक अमीर जमींदार रहैं, वई उनका " नवाब " उपनाम दिहिन। "नवाब राय" धनपत राय जी द्वारा चुना गा पहिल उपनाम रहै। <ref name="amrit">{{Cite book|title=Premchand: A Life|last=Rai|first=Amrit|publisher=People's Publishing House|year=1982|location=New Delhi|translator-last=Trivedi|translator-first=Harish|author-link=Amrit Rai}}</ref> [[फाइल:Lamhi,_Varanasi.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल गेट, लमही, वाराणसी]] सात साल की उमर मा धनपत राय लमही के लगे लालपुर, [[वाराणसी]] के एक मदरसा मा अपनि शिक्षा शुरू किहिन। अउर मदरसा मा एक मौलवी ते उर्दू अउर फारसी सीखेनि । जब उइ 8 साल के रहैं, तब उनकी महतारी क्यार लंबी बीमारी के बाद निधन होइ गा। वहिके बादि उनकी दादी, उनका पालै-प्वासै के जिम्मेदारी लिहिन, मगर कुछ दिन बादि उनहुँन क देहावसान होइ गा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> मुंशी प्रेमचंद अलग-थलग महसूस करत रहे, काहे से कि उनकी बड़ी बहिन सुग्गी के शादी होइ चुकी रही, अऊर उनके पिताजी हमेशा काम मा व्यस्त रहत रहें। उनके पिता, जे अब [[गोरखपुर]] मा तैनात रहे, दुबारा शादी किहिन, लेकिन प्रेमचंद का उनकी सौतेली महतारी से बहुत कम स्नेह मिला। सौतेली महतारी बाद मा प्रेमचंद के रचना मा आवर्ती विषय बन गै। बचपनै मा धनपत राय के रुचि कथा उपन्यासन के प्रति होइ गै। तबहीं एक तमाखू वाले की दुकान पर उइ फारसी भासा के काल्पनिक महाकाव्य तिलिस्म ए दिलरुबा की कहानी सुनेनि। फिर एक थोक किताब विक्रेता खियां किताबै ब्यांचै का काम किहिन। ई काम मा उनका खुब किताबै पढ़ै का मौका मिला। उइ एक मिशनरी स्कूल मा अंग्रेजी सीखिन अउर जॉर्ज डब्ल्यूएम रेनॉल्ड्स के आठ खंडन के ''द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन'' सहित कथासाहित्य के कईयो कामन का अध्ययन किहिन। [[गोरखपुर]] मा अपनि पहिलि साहित्यिक रचना किहिन, जउन कबहूँ प्रकाशित नाइ भै औ अब खोय गै है। यो एक कुंवारे पर एक तमाशा रहै जो एक निम्न जाति की औरत ते प्यार करत है। यहु चरित्र प्रेमचंद के चाचा पर आधारित रहै, जो उनका कथा-साहित्य पढ़ै के जुनून के खातिर डांटत रहें; यो तमाशा शायद यहीके बदला के रूप मा लिखा गा रहै। <ref name="Gupta_1998_10" /> 1890 के दशक के मध्य मा अपने पिता के जमानिया मा तैनात होए के बाद, धनपत राय ने [[वाराणसी|बनारस]] के [[Queen's College Varanasi|क्वींस कॉलेज]] मा एक दिन के विद्वान के रूप मा दाखिला लिहिन। 1895 मा, जब उ नौवीं कक्षा मा पढ़त रहें, तब 15 साल के उमर मा उनकर बियाह होइ गवा। ई मैच उनके मातृक सौतेला दादा द्वारा आयोजित कीन गा रहा। ऊ लड़की एक अमीर जमींदार परिवार से रही अऊर प्रेमचंद से बड़ी रही, जे ओका झगड़ालू अऊर सुन्नर नाहीं पावत रही। <ref name="Gupta_1998_11" /> <ref name="Sigi_2006_17" /> लंबी बीमारी के बाद 1897 में उनके पिताजी का निधन होइ गवा। उ दूसरा वर्ग (60% अंक से नीचे) के साथ मैट्रिक परीक्षा पास करै में कामयाब रहे। हालांकि, क्वींस कॉलेज मा केवल पहिला संभाग वाले छात्रन का फीस रियायत दीन जात रही। तब उ सेंट्रल हिन्दू स्कूल मा दाखिला मांगिन लेकिन अंकगणित के कमजोर कौशल के कारण उ असफल रहे। यहि तरह, ओनका आपन पढ़ाई बंद करै का पड़ा। तब उइ बनारस मा एक अधिवक्ता के बेटवा का पांच रुपिया के मासिक वेतन मा कोचिंग देय का असाइनमेंट प्राप्त किहिन। ऊ अधिवक्ता के अस्तबल के ऊपर एक कीचड़ के कोठरी मा रहत रहा अऊर आपन वेतन का 60% घर वापस भेजत रहा। <ref name="Gupta_1998_12" /> इन दिनन मा प्रेमचंद खूब पढ़िन। कई कर्ज जमा करै के बाद, 1899 मा, उ आपन एकत्रित किताबन मा से एक का बेचै के लिए एक किताबन के दुकान मा गें। वहिमा, उ चुनार के एक मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर से मिले, जे ओनका ₹18 के मासिक वेतन पर एक शिक्षक के रूप मा नौकरी के पेशकश किहिन। <ref name="Gupta_1998_12" /> उ ₹5 के मासिक शुल्क पर एक छात्र का ट्यूशन पढ़ावै का काम भी लिहिन। 1900 मा, प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराइच मा ₹20 के मासिक वेतन पर सहायक शिक्षक के रूप मा नौकरी प्राप्त किहिन। तीन महीना बाद, उनका प्रतापगढ़ के जिला स्कूल मा स्थानांतरित कीन गा रहा, जहां उ एक प्रशासक के बंगला मा रहे अऊर अपने बेटवा का ट्यूशन पढ़ावत रहे। उनकर पहिला लघु उपन्यास ''असरार-ए-माबिद'' ("भगवान के निवास के रहस्य", हिंदी मा ''देवस्थान रहस्य'' ) रहा, जवन मंदिर के पुजारियन के बीच भ्रष्टाचार अऊर गरीब औरतन के यौन शोषण का पता लगावत है। ई उपन्यास बनारस स्थित उर्दू साप्ताहिक ''आवाज-ए-खलक'' मा 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक एक श्रृंखला मा प्रकाशित कीन गा रहा। साहित्यिक आलोचक सिगफ्राइड शुल्ज़ कहत हैं कि "उनके पहिला उपन्यास मा उनकर अनुभवहीनता काफी स्पष्ट है", जवन सुव्यवस्थित नाहीं है, एक अच्छा कथानक अऊर विशेषता के कमी है। प्रकाशचन्द्र गुप्ता इका "अपरिपक्व रचना" कहत हैं, जवन "जीवन का केवल काला या सफेद मा देखै" के प्रवृत्ति देखावत है। <ref name="Gupta_1998_13" /> === कानपुर प्रवास === प्रतापगढ़ से, धनपत राय का प्रशिक्षण के लिए [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] स्थानांतरित कीन गा रहा अऊर बाद मा 1905 मा कानपुर मा तैनात कीन गा रहा। उ लगभग चार साल तक कानपुर मा रहे, मई 1905 से जून 1909 तक। वहिजा, उ उर्दू पत्रिका ''[[Zamana (magazine)|जमाना]]'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम से मिले, जेहिमा उ बाद मा कईयो लेख अऊर कहानी प्रकाशित किहिन। प्रेमचंद गर्मी के छुट्टी मा अपने गांव लम्ही मा गये रहैं पै कइयौ कारन से रहैं का मजा नहीं आवा रहै। उनका मौसम या वातावरण लेखन के अनुकूल नाहीं लाग। यही से, अपनी पत्नी अऊर अपनी सौतेली महतारी के बीच झगड़ा के कारण उनका घरेलू परेशानी का सामना करै का पड़ा। प्रेमचन्द अपनी मेहरारू का गुस्सा मा डांटिन जब मेहरारू फांसी लगाय के आत्महत्या करै कै असफल कोशिश करिन। निराश होइके, ऊ अपने पिता के घरे चली गै, अऊर प्रेमचंद ओका वापस लावै मा कौनो दिलचस्पी नाहीं देखाइस। 1906 मा प्रेमचंद कय बियाह एक बाल विधवा शिवरानी देवी से भा, जवन फतेहपुर कय पास एक गाँव कय एक जमींदार कय बिटिया रही। <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=I2UnQES-79gC|title=The Illustrated Weekly of India|publisher=Published for the proprietors, Bennett, Coleman & Company, Limited, at the Times of India Press|year=1984|pages=68–69|access-date=17 May 2019}}</ref> ई कदम उ समय क्रांतिकारी माना जात रहा, अऊर प्रेमचंद का बहुत सामाजिक विरोध का सामना करै का पड़ा। इनके निधन के बाद शिवरानी देवी इनके ऊपर यक किताब लिखिन, जेकर शीर्षक रहा ''प्रेमचंद घर में'' ("घर पर प्रेमचंद")। 1905 मा, राष्ट्रवादी सक्रियता से प्रेरित होइके, प्रेमचंद ने ''जमाना'' मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले पर एक लेख प्रकाशित किहिन। उ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करै के लिए गोखले के तरीकन के आलोचना किहिन अऊर वहिके बजाय बाल गंगाधर तिलक द्वारा अपनाए गए अउर चरमपंथी उपायन का अपनावै के सिफारिश किहिन। प्रेमचंद कय पहिली प्रकाशित कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" ("दुनिया कय सबसे अनमोल गहना") रही, जवन 1907 मा ''जमाना'' मा छपी रही। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> यहि कहानी के अनुसार सबसे अनमोल 'रत्न' आजादी पावै कय खातिर आवश्यक खून कय आखिरी बूंद रहा। प्रेमचंद के कईयो शुरुआती लघुकथाओं मा देशभक्ति के सुर रहे, जवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> प्रेमचंद कै दुसरा लघु उपन्यास ''हमखुरमा-ओ-हमसवब'' (हिंदी मा ''प्रेमा'' ) 1907 मा प्रकाशित भा रहा, "बाबू नवाब राय बनारसी" नाम से लिखा गा रहा। ई समकालीन रूढ़िवादी समाज मा विधवा पुनर्विवाह के मुद्दा का पता लगावत है: नायक, अमृत राय, अपनी अमीर अऊर सुंदर मंगेतर प्रेमा का त्याग करत हुए, युवा विधवा, पूर्णा से शादी करै के सामाजिक विरोध का दूर करत है। प्रकाश चन्द्र गुप्ता के अनुसार, "कई मायनों मा उनके भविष्य के महानता के बीज समाहित करत हुए, उपन्यास अबहियों युवा है अऊर अनुशासन के कमी है जवन पूर्ण परिपक्वता लावत है"। सन १९०७ मा बनारस के मेडिकल हॉल प्रेस से प्रेमचंद कै एक अउर लघु उपन्यास ''किशना'' प्रकाशित भा। गहना के प्रति औरतन के लगाव पै व्यंग्य करै वाली ई 142 पन्नन कै रचना अब खो गै है। साहित्यिक आलोचक नोबत राय ने ''ज़माना'' मा काम के आलोचना किहिन, अऊर ईका महिलाओं के हालात का मजाक बताइन। अप्रैल-अगस्त 1907 के दौरान, प्रेमचंद के उपन्यास ''रूठी रानी'' ''जमाना'' मा धारावाहिक रूप मा प्रकाशित कीन गा रहा। साथै 1907 मा, ''जमाना'' के प्रकाशकन प्रेमचंद के पहिला लघुकथा संग्रह प्रकाशित किहिन, जेकर शीर्षक रहा ''सोज-ए-वतन'' । बाद मा प्रतिबंधित कीन गा संग्रह मा चार कहानी रहीं जवन भारतीयन का राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष मा प्रेरित करै के कोशिश करत रहीं। <ref name="Mohan2006">{{Cite book|title=[[Encyclopaedia of Indian Literature]]: Sasay to Zorgot|last=Lal|first=Mohan|publisher=[[Sahitya Akademi]]|year=2006|isbn=978-81-260-1221-3|volume=5|page=4149}}</ref> ==== प्रेमचंद नाम का अपनाना ==== सन १९०९ मा प्रेमचंद कै स्थानांतरण महोबा होइगा अउर बाद मा हमीरपुर मा स्कूलन के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पै लगावा गा। यहि समय के आसपास, ''सोज-ए-वतान का'' ब्रिटिश सरकार के अधिकारियन द्वारा देखल गै रहा, जे एकरा विद्रोही काम के रूप मा प्रतिबंधित कइ दिहिन। हमीरपुर जिला के ब्रिटिश कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवनसन ने प्रेमचंद के घर पर छापामारी का आदेश दिया, जहां ''सोज-ए-वतन'' के लगभग पाँच सौ प्रतियां जला दी गईं। <ref name="SahniPaliwal1980">{{Cite book|title=Prem Chand: A Tribute|last=Sahni|first=Bhisham|last2=Paliwal|first2=Om Prakash|publisher=Premchand Centenary Celebrations Committee|year=1980|author-link=Bhisham Sahni}}</ref> यहिके बाद उर्दू पत्रिका ''जमाना'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम, जे धनपत राय के पहिली कहानी " दुनिया का सबसे अनमोल रतन" छपवाये रहे, "प्रेमचंद" छद्म नाम के सलाह दिहिन। धनपत राय "नवाब राय" नाम लेब बन्द कइकै प्रेमचंद बनि गये। प्रेमचंद का अक्सर मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जात रहा। बात ई है कि वै कन्हैयालाल मुंशी के साथे हंस पत्रिका कै संपादन किहिन। क्रेडिट लाइन मा लिखा रहा "मुंशी, प्रेमचंद"। तब से उनका मुंशी प्रेमचंद कहा जाय लाग। <sup class="noprint Inline-Template Template-Fact" style="white-space:nowrap;">&#x5B; ''<nowiki><span title="This claim needs references to reliable sources. (November 2023)">citation needed</span></nowiki>'' &#x5D;</sup> 1914 मा, प्रेमचंद हिंदी मा लिखै लाग ( [[हिन्दी|हिंदी]] अऊर [[उर्दू]] का एक भाषा हिंदुस्तानी के अलग-अलग रजिस्टर माना जात है, जेहिमा हिंदी आपन बहुत शब्दावली [[संस्कृत]] से लेत है अऊर उर्दू फारसी से अधिक प्रभावित है)। यहि समय तक, उ उर्दू मा एक कथा लेखक के रूप मा पहिले से ही प्रतिष्ठित होइ चुका रहा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> सुमित सरकार नोट करत हैं कि उर्दू मा प्रकाशक ढूंढै के कठिनाई से स्विच प्रेरित कीन गा रहा। <ref name="Sarkar1983">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=x1uBQgAACAAJ|title=Modern India, 1885–1947|last=Sarkar|first=Sumit|publisher=Macmillan|year=1983|isbn=978-0-333-90425-1|pages=85–86|author-link=Sumit Sarkar}}</ref> उनकर पहिली हिन्दी कहानी "सौत" दिसम्बर 1915 मा ''सरस्वती'' पत्रिका मा प्रकाशित भै, अउर उनकर पहिला लघुकथा संग्रह ''सप्त सरोज'' जून 1917 मा प्रकाशित भा। === गोरखपुर === [[फाइल:Shilalekh.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद जी 1916 से 1921 तक [[गोरखपुर]] मा जहाँ रहत रहें, वहि झोपड़ी मा एक पट्टिका।]] अगस्त 1916 मा पदोन्नति पै प्रेमचन्द कै स्थानांतरण गोरखपुर कै दीन गा। उ [[गोरखपुर]] के नॉर्मल हाई स्कूल मा सहायक मास्टर बनिन। <ref name="Madan1964">{{Cite book|title=Munshi Premchand: A Literary Biography|last=Gopal|first=Madan|publisher=Asia Pub. House|year=1964|pages=114–117}}</ref> गोरखपुर मा, ओनके किताब बेचै वाले बुद्धि लाल से दोस्ती होइ गै, जे ओनका स्कूल मा परीक्षा क्रैम किताबन के बेचे के बदले मा पढ़ै के लिए उपन्यास उधार लेय के अनुमति दिहिन। प्रेमचंद अन्य भाषाओं के क्लासिक्स के उत्साही पाठक रहे अऊर इनमा से कईयो रचनाओं का हिंदी मा अनुवाद किहिन। सन १९१९ तक प्रेमचंद जी लगभग सौ-सौ पन्नन के चार उपन्यास प्रकाशित कइ चुके रहैं। सन १९१९ मा प्रेमचंद कै पहिला प्रमुख उपन्यास ''सेवा सदन'' हिन्दी मा प्रकाशित भा। ई उपन्यास मूल रूप से ''बाजार-ए-हुसन'' शीर्षक से उर्दू मा लिखा गा रहा लेकिन कलकत्ता स्थित एक प्रकाशक द्वारा सबसे पहिले हिंदी मा प्रकाशित कीन गा रहा, जे प्रेमचंद का उनके काम के लिए ₹450 पेशकश किहिन। [[लाहौर]] के उर्दू प्रकाशक ने बाद मा 1924 मा प्रेमचंद का ₹250 भुगतान कइके ई उपन्यास प्रकाशित किहिन। उपन्यास एक दुखी गृहिणी के कहानी बतावत है, जे पहिले एक दरबारी बन जात है, अऊर फिर दरबारी के जवान बिटियन के लिए एक अनाथालय का प्रबंधन करत है। ई आलोचकन द्वारा बहुत पसंद कीन गा अऊर प्रेमचंद का व्यापक पहचान पावै मा मदद मिली। 1919 मा प्रेमचंद [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] से बीए डिग्री प्राप्त किहिन। 1921 तक, उनका स्कूलन के उप निरीक्षक के रूप मा पदोन्नत कीन गा रहा। फरवरी 1921 का, उ गोरखपुर मा एक बैठक मा शामिल भए, जहां [[महात्मा गाँधी|महात्मा गांधी ने]] असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप मा लोगन से सरकारी नौकरियन से इस्तीफा देय का कहिन। प्रेमचंद, हालांकि शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे अऊर उनके पास दुई बच्चा अऊर एक गर्भवती पत्नी का समर्थन करै के लिए रहा, पांच दिन तक यहिके बारे मा सोचा अऊर अपनी पत्नी के सहमति से अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देय का फैसला किहिन। === बनारस वापसी === नौकरी छोड़ै के बाद प्रेमचंद 18 मार्च 1921 का गोरखपुर से बनारस चले गें अऊर अपने साहित्यिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करै का फैसला किहिन। 1936 मा अपनी मृत्यु तक, उनका गंभीर वित्तीय कठिनाइयन अऊर पुरानी बीमारी का सामना करै का पड़ा। <ref name="DavidRubin1994">{{Cite book|title=Masterworks of Asian Literature in Comparative Perspective: A Guide for Teaching|last=Rubin|first=David|publisher=[[M. E. Sharpe]]|year=1994|isbn=978-1-56324-258-8|editor-last=Miller|editor-first=Barbara Stoler|editor-link=Barbara Stoler Miller|pages=168–177|chapter=Short Stories of Premchand|author-link=David Rubin (writer)}}</ref> सन १९२३ मा बनारस मा यक छपाई औ प्रकाशन घर कै स्थापना किहिन जेहकै नाँव "सरस्वती प्रेस" रखिन। <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> सन 1924 मा प्रेमचंद के ''रंगभूमि'' का प्रकाशन भा, जेहिमा सूरदास नामक एक अंधा भिखारी दुखद नायक है। शुल्ज़ उल्लेख करत हैं कि ''रंगभूमि'' मा, प्रेमचंद एक "शानदार सामाजिक इतिहासकार" के रूप मा आवत हैं, अऊर यद्यपि उपन्यास मा कुछ "संरचनात्मक खामी" अऊर "बहुत सारा लेखकीय स्पष्टीकरण" हैं, ई प्रेमचंद के लेखन शैली मा "चिह्नित प्रगति" देखावत है। शुल्ज़ के अनुसार, ई ''निर्मला'' (1925) अऊर ''प्रतिज्ञा'' (1927) मा रहा कि प्रेमचंद का "एक संतुलित, यथार्थवादी स्तर" तक आपन रास्ता मिला जवन ओनके पहिले के कामन का पार करत है अऊर "अपने पाठकन का संरक्षण मा रखै" का प्रबंधन करत है। ''निर्मला'', भारत मा दहेज प्रणाली से संबंधित एक उपन्यास, एक उपन्यास के रूप मा प्रकाशित होए से पहिले नवंबर 1925 अऊर नवंबर 1926 के बीच ''चंद'' पत्रिका मा क्रमबद्ध कीन गा रहा। ''प्रतिज्ञा'' ("प्रतिज्ञा") विधवा पुनर्विवाह के विषय से निपटत रही। १९२८ मा मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित प्रेमचंद कै उपन्यास ''गबन'' ("गबन" छपा। मार्च 1930 मा, प्रेमचंद ''हंस'' शीर्षक से एक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका शुरू किहिन, जेकर उद्देश्य भारतीयन का ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुटावै के लिए प्रेरित करब रहा। अपने राजनीतिक रूप से भड़काऊ विचारन के लिए विख्यात पत्रिका मुनाफा कमाए में विफल रही। फिर प्रेमचंद ने काम संभाला अऊर ''जागरण नामक एक अउर पत्रिका का संपादन किहिन,'' जवन भी घाटे मा चलत रही। 1931 मा प्रेमचंद मारवाड़ी कालेज मा अध्यापक के रूप मा कानपुर चले गें पै कालेज प्रशासन से मतभेद होय के कारन छोड़ै का पड़ा। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> तब उ बनारस लौटि आए अऊर ''मर्यादा'' पत्रिका के संपादक बनिन। 1932 मा, उ ''कर्मभूमि'' शीर्षक से एक अउर उपन्यास प्रकाशित किहिन। उ संक्षेप मा काशी विद्यापीठ, एक स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर के रूप मा काम किहिन। स्कूल बंद होय के बाद, उ [[लखनऊ]] मा ''माधुरी'' पत्रिका के संपादक बने। <ref name="Giriraj2001" /> === बम्बई === प्रेमचंद 31 मई 1934 का हिंदी फिल्म उद्योग मा आपन किस्मत आजमावै [[मुम्बई|बम्बई]] पहुँचे। उ प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन के लिए पटकथा लेखन के नौकरी स्वीकार किहिन रहैं, ई उम्मीद मा कि ₹8,000 के सालाना वेतन से ओनके वित्तीय परेशानियन का दूर करै मा मदद मिली। उ दादर मा रहे, अऊर फिल्म ''मजदूर'' ("द लेबरर") के पटकथा लिखिन। मोहन भवानानी के निर्देशन मा बनी ई फिलिम मा मजदूर वर्ग के खराब हालात का देखावा गा रहा। फिल्म मा मजदूरन के नेता के रूप मा खुद प्रेमचंद कैमियो किहिन। कुछ प्रभावशाली व्यापारी बम्बई मा एकर रिलीज पर रोक लगावै मा कामयाब रहे। ई फिलिम लाहौर अउर दिल्ली मा रिलीज भै लेकिन मिल के मजदूरन का मालिकन के खिलाफ खड़ा होय के प्रेरणा देय के बाद फिर से प्रतिबंधित कीन गा। विडंबना ई है कि ई फिलिम [[वाराणसी|बनारस]] मा अपने घाटे वाले प्रेस के मजदूरन का वेतन न मिलै के बाद हड़ताल करै के लिए प्रेरित किहिस। 1934–35 तक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस ₹400 के भारी कर्ज मा रहा, अऊर प्रेमचंद का ''जागरण'' के प्रकाशन बंद करै का मजबूर कीन गा रहा। इसी बीच प्रेमचंद बम्बई फिल्म उद्योग के गैर-साहित्यिक व्यावसायिक माहौल का नापसंद करै लाग रहे, अउर बनारस लौटै चाहत रहे। हालांकि, उ प्रोडक्शन हाउस के साथे एक साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किहिन रहैं। एक साल पूरा होय से पहिले, उ अंततः 4 अप्रैल 1935 का बम्बई छोड़ दिहिन। बम्बई टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु रॉय प्रेमचंद का वापस रहै के लिए मनावै के कोशिश किहिन लेकिन असफल रहे। === आखिरी दिन === बम्बई छ्वाड़ै के बाद, प्रेमचंद [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] मा बसब चहति रहैं, जहाँ उनके लरिका श्रीपत राय अउर अमृत कुमार राय पढ़ति रहैं। उइ हुँवा ते ''हंस का'' प्रकाशित करै के योजना बनाइन। हालांकि, अपनि वित्तीय स्थिति द्याखत भए अऊर बीमार स्वास्थ्य के कारण, उनका ''हंस'' का इंडियन लिटरेरी काउंसल के हवाले करै का पड़ा अउर बनारस जाय का पड़ा। प्रेमचंद का 1936 मा लखनऊ मा प्रगतिशील लेखक संघ क्या पहिला अध्यक्ष चुना गा रहै <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> 8 अक्टूबर 1936 का कइयो दिनन की बीमारी के बाद पद पर रहतै रहत उनक्या निधन होइ गा। ''गोदान'' ( ''द गिफ्ट ऑफ ए काउ'', 1936), प्रेमचंद क्यार आखिरी पूरा कीन गा काम है, आम तौर पर यहिका उनके सबते श्रेष्ठ उपन्यास के रूप मा स्वीकार कीन जात है अउर सबते अच्छे हिंदी उपन्यासननौ मा गिना जात है। <ref>{{Cite web |last=Deepak |first=Sunil |title=Phanishwar Nath Renu |url=http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080313043341/http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |archive-date=13 March 2008 |access-date=25 August 2021 |website=Kalpana.it}}</ref> येहिका नायक, होरी, एक गरीब किसान, ग्रामीण भारत मा धन अउर प्रतिष्ठा के प्रतीक गाय के लिए तरसत देखावा गा है। सिगफ्राइड शुल्ज़ के अनुसार, " ''गोदान'' एक सुव्यवस्थित अउर सुसंतुलित उपन्यास है जउन पश्चिमी साहित्यिक मानक द्वारा स्थापित साहित्यिक आवश्यकतन का पर्याप्त रूप ते पूरा करत है।" [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ टैगोर]] जइसे अन्य समकालीन प्रसिद्ध लेखकन के विपरीत, प्रेमचंद के भारत ते बाहर बहुत सराहना नहीं कीन गै। शुल्ज़ का मानबु है कि यहिके कारण उनके काम के अच्छे अनुवादन क अभाव है। साथै, टैगोर अउर इकबाल के विपरीत, प्रेमचंद कबो भारत ते बाहर नहीं गें, विदेश मा पढ़ाई नहीं कीन्हेनि या प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक हस्तिन के साथै मिलैजुलै नहीं गें। 1936 मा प्रेमचंद जी "कफन" (" कफन ") नामक कहानी प्रकाशित कीन्हेनि, जेहिमा एक गरीब मनई अपनी मरी मेहेरिया के अंतिम संस्कार के खातिर पइसा इकट्ठा करत है लेकिन सब पइसा खावै पिएम उड़ा देत है। प्रेमचंदजी के आखिरी प्रकाशित कहानी "क्रिकेट मैच" रहै, जउन उनके मरै के बाद 1938 मा ''जमाना'' मा छपी रहै। fzraktz2lj3c04tfi2vctqiwtz6g8pq 35210 35209 2026-07-06T08:31:44Z Avimaarak 3578 35210 wikitext text/x-wiki '''प्रेमचंद''' ([[३१ जुलाई]], [[१८८०]] - [[८ अक्टूबर]] [[१९३६]]) [[हिन्दी]] और [[उर्दू]] कय बढहन् भारतीय लेखक में से एक होयँ।मूल नावँ '''धनपत राय श्रीवास्तव''' वाले प्रेमचंद कय '''नवाब राय''' औ '''मुंशी प्रेमचंद''' कय नावँ से भी जाना जात है। == जीवन परिचय == === सुरुवाती जिंदगी === प्रेमचंद का जनम 31 जुलाई 1880 का [[वाराणसी|बनारस]] के लगे लमही नाँव के एक गाँव मा भा रहै। छुटपने मा उनका नाँव धनपत राय ("धन का स्वामी") रखा गा रहै। इनके पूर्वज बड़े चित्रगुप्तवंशी कायस्थ रहैं, जिनके लगे आठ ते नौ बिगहा जमीन रहै। इनके दादा गुरुसहायराय पटवारी (गाँव के जमीन के अभिलेख रखने वाले) रहैं अउर इनके पिता अजयबलाल डाकघर के चपरासी रहैं। इनकी महतारी आनंदी देवी करौनी गाँव की रहै वाली रहैं, जो संभवतः इनके "बड़े घर की बेटी" मा आनंदी किरदार के लिए इनकी प्रेरणौ रहीं। धनपत राय अजयब लाल और आनंदी की चौथे संतान रहैं; पहिले दुई बिटेवा रहैं मुला उइ छोटेहे मा मर गईं, अउर याक तीसर बिटेवा रहै जेहिका नाँव सामा रहै। उनके चाचा, महाबीर, एक अमीर जमींदार रहैं, वई उनका " नवाब " उपनाम दिहिन। "नवाब राय" धनपत राय जी द्वारा चुना गा पहिल उपनाम रहै। <ref name="amrit">{{Cite book|title=Premchand: A Life|last=Rai|first=Amrit|publisher=People's Publishing House|year=1982|location=New Delhi|translator-last=Trivedi|translator-first=Harish|author-link=Amrit Rai}}</ref> [[फाइल:Lamhi,_Varanasi.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल गेट, लमही, वाराणसी]] सात साल की उमर मा धनपत राय लमही के लगे लालपुर, [[वाराणसी]] के एक मदरसा मा अपनि शिक्षा शुरू किहिन। अउर मदरसा मा एक मौलवी ते उर्दू अउर फारसी सीखेनि । जब उइ 8 साल के रहैं, तब उनकी महतारी क्यार लंबी बीमारी के बाद निधन होइ गा। वहिके बादि उनकी दादी, उनका पालै-प्वासै के जिम्मेदारी लिहिन, मगर कुछ दिन बादि उनहुँन क देहावसान होइ गा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> मुंशी प्रेमचंद अलग-थलग महसूस करत रहे, काहे से कि उनकी बड़ी बहिन सुग्गी के शादी होइ चुकी रही, अऊर उनके पिताजी हमेशा काम मा व्यस्त रहत रहें। उनके पिता, जे अब [[गोरखपुर]] मा तैनात रहे, दुबारा शादी किहिन, लेकिन प्रेमचंद का उनकी सौतेली महतारी से बहुत कम स्नेह मिला। सौतेली महतारी बाद मा प्रेमचंद के रचना मा आवर्ती विषय बन गै। बचपनै मा धनपत राय के रुचि कथा उपन्यासन के प्रति होइ गै। तबहीं एक तमाखू वाले की दुकान पर उइ फारसी भासा के काल्पनिक महाकाव्य तिलिस्म ए दिलरुबा की कहानी सुनेनि। फिर एक थोक किताब विक्रेता खियां किताबै ब्यांचै का काम किहिन। ई काम मा उनका खुब किताबै पढ़ै का मौका मिला। उइ एक मिशनरी स्कूल मा अंग्रेजी सीखिन अउर जॉर्ज डब्ल्यूएम रेनॉल्ड्स के आठ खंडन के ''द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन'' सहित कथासाहित्य के कईयो कामन का अध्ययन किहिन। [[गोरखपुर]] मा अपनि पहिलि साहित्यिक रचना किहिन, जउन कबहूँ प्रकाशित नाइ भै औ अब खोय गै है। यो एक कुंवारे पर एक तमाशा रहै जो एक निम्न जाति की औरत ते प्यार करत है। यहु चरित्र प्रेमचंद के चाचा पर आधारित रहै, जो उनका कथा-साहित्य पढ़ै के जुनून के खातिर डांटत रहें; यो तमाशा शायद यहीके बदला के रूप मा लिखा गा रहै। <ref name="Gupta_1998_10" /> 1890 के दशक के मध्य मा अपने पिता के जमानिया मा तैनात होए के बाद, धनपत राय ने [[वाराणसी|बनारस]] के [[Queen's College Varanasi|क्वींस कॉलेज]] मा एक दिन के विद्वान के रूप मा दाखिला लिहिन। 1895 मा, जब उ नौवीं कक्षा मा पढ़त रहें, तब 15 साल के उमर मा उनकर बियाह होइ गवा। ई मैच उनके मातृक सौतेला दादा द्वारा आयोजित कीन गा रहा। ऊ लड़की एक अमीर जमींदार परिवार से रही अऊर प्रेमचंद से बड़ी रही, जे ओका झगड़ालू अऊर सुन्नर नाहीं पावत रही। <ref name="Gupta_1998_11" /> <ref name="Sigi_2006_17" /> लंबी बीमारी के बाद 1897 में उनके पिताजी का निधन होइ गवा। उ दूसरा वर्ग (60% अंक से नीचे) के साथ मैट्रिक परीक्षा पास करै में कामयाब रहे। हालांकि, क्वींस कॉलेज मा केवल पहिला संभाग वाले छात्रन का फीस रियायत दीन जात रही। तब उ सेंट्रल हिन्दू स्कूल मा दाखिला मांगिन लेकिन अंकगणित के कमजोर कौशल के कारण उ असफल रहे। यहि तरह, ओनका आपन पढ़ाई बंद करै का पड़ा। तब उइ बनारस मा एक अधिवक्ता के बेटवा का पांच रुपिया के मासिक वेतन मा कोचिंग देय का असाइनमेंट प्राप्त किहिन। ऊ अधिवक्ता के अस्तबल के ऊपर एक कीचड़ के कोठरी मा रहत रहा अऊर आपन वेतन का 60% घर वापस भेजत रहा। <ref name="Gupta_1998_12" /> इन दिनन मा प्रेमचंद खूब पढ़िन। कई कर्ज जमा करै के बाद, 1899 मा, उ आपन एकत्रित किताबन मा से एक का बेचै के लिए एक किताबन के दुकान मा गें। वहिमा, उ चुनार के एक मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर से मिले, जे ओनका ₹18 के मासिक वेतन पर एक शिक्षक के रूप मा नौकरी के पेशकश किहिन। <ref name="Gupta_1998_12" /> उ ₹5 के मासिक शुल्क पर एक छात्र का ट्यूशन पढ़ावै का काम भी लिहिन। 1900 मा, प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराइच मा ₹20 के मासिक वेतन पर सहायक शिक्षक के रूप मा नौकरी प्राप्त किहिन। तीन महीना बाद, उनका प्रतापगढ़ के जिला स्कूल मा स्थानांतरित कीन गा रहा, जहां उ एक प्रशासक के बंगला मा रहे अऊर अपने बेटवा का ट्यूशन पढ़ावत रहे। उनकर पहिला लघु उपन्यास ''असरार-ए-माबिद'' ("भगवान के निवास के रहस्य", हिंदी मा ''देवस्थान रहस्य'' ) रहा, जवन मंदिर के पुजारियन के बीच भ्रष्टाचार अऊर गरीब औरतन के यौन शोषण का पता लगावत है। ई उपन्यास बनारस स्थित उर्दू साप्ताहिक ''आवाज-ए-खलक'' मा 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक एक श्रृंखला मा प्रकाशित कीन गा रहा। साहित्यिक आलोचक सिगफ्राइड शुल्ज़ कहत हैं कि "उनके पहिला उपन्यास मा उनकर अनुभवहीनता काफी स्पष्ट है", जवन सुव्यवस्थित नाहीं है, एक अच्छा कथानक अऊर विशेषता के कमी है। प्रकाशचन्द्र गुप्ता इका "अपरिपक्व रचना" कहत हैं, जवन "जीवन का केवल काला या सफेद मा देखै" के प्रवृत्ति देखावत है। <ref name="Gupta_1998_13" /> === कानपुर प्रवास === प्रतापगढ़ से, धनपत राय का प्रशिक्षण के लिए [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] स्थानांतरित कीन गा रहा अऊर बाद मा 1905 मा कानपुर मा तैनात कीन गा रहा। उ लगभग चार साल तक कानपुर मा रहे, मई 1905 से जून 1909 तक। वहिजा, उ उर्दू पत्रिका ''[[Zamana (magazine)|जमाना]]'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम से मिले, जेहिमा उ बाद मा कईयो लेख अऊर कहानी प्रकाशित किहिन। प्रेमचंद गर्मी के छुट्टी मा अपने गांव लम्ही मा गये रहैं पै कइयौ कारन से रहैं का मजा नहीं आवा रहै। उनका मौसम या वातावरण लेखन के अनुकूल नाहीं लाग। यही से, अपनी पत्नी अऊर अपनी सौतेली महतारी के बीच झगड़ा के कारण उनका घरेलू परेशानी का सामना करै का पड़ा। प्रेमचन्द अपनी मेहरारू का गुस्सा मा डांटिन जब मेहरारू फांसी लगाय के आत्महत्या करै कै असफल कोशिश करिन। निराश होइके, ऊ अपने पिता के घरे चली गै, अऊर प्रेमचंद ओका वापस लावै मा कौनो दिलचस्पी नाहीं देखाइस। 1906 मा प्रेमचंद कय बियाह एक बाल विधवा शिवरानी देवी से भा, जवन फतेहपुर कय पास एक गाँव कय एक जमींदार कय बिटिया रही। <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=I2UnQES-79gC|title=The Illustrated Weekly of India|publisher=Published for the proprietors, Bennett, Coleman & Company, Limited, at the Times of India Press|year=1984|pages=68–69|access-date=17 May 2019}}</ref> ई कदम उ समय क्रांतिकारी माना जात रहा, अऊर प्रेमचंद का बहुत सामाजिक विरोध का सामना करै का पड़ा। इनके निधन के बाद शिवरानी देवी इनके ऊपर यक किताब लिखिन, जेकर शीर्षक रहा ''प्रेमचंद घर में'' ("घर पर प्रेमचंद")। 1905 मा, राष्ट्रवादी सक्रियता से प्रेरित होइके, प्रेमचंद ने ''जमाना'' मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले पर एक लेख प्रकाशित किहिन। उ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करै के लिए गोखले के तरीकन के आलोचना किहिन अऊर वहिके बजाय बाल गंगाधर तिलक द्वारा अपनाए गए अउर चरमपंथी उपायन का अपनावै के सिफारिश किहिन। प्रेमचंद कय पहिली प्रकाशित कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" ("दुनिया कय सबसे अनमोल गहना") रही, जवन 1907 मा ''जमाना'' मा छपी रही। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> यहि कहानी के अनुसार सबसे अनमोल 'रत्न' आजादी पावै कय खातिर आवश्यक खून कय आखिरी बूंद रहा। प्रेमचंद के कईयो शुरुआती लघुकथाओं मा देशभक्ति के सुर रहे, जवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> प्रेमचंद कै दुसरा लघु उपन्यास ''हमखुरमा-ओ-हमसवब'' (हिंदी मा ''प्रेमा'' ) 1907 मा प्रकाशित भा रहा, "बाबू नवाब राय बनारसी" नाम से लिखा गा रहा। ई समकालीन रूढ़िवादी समाज मा विधवा पुनर्विवाह के मुद्दा का पता लगावत है: नायक, अमृत राय, अपनी अमीर अऊर सुंदर मंगेतर प्रेमा का त्याग करत हुए, युवा विधवा, पूर्णा से शादी करै के सामाजिक विरोध का दूर करत है। प्रकाश चन्द्र गुप्ता के अनुसार, "कई मायनों मा उनके भविष्य के महानता के बीज समाहित करत हुए, उपन्यास अबहियों युवा है अऊर अनुशासन के कमी है जवन पूर्ण परिपक्वता लावत है"। सन १९०७ मा बनारस के मेडिकल हॉल प्रेस से प्रेमचंद कै एक अउर लघु उपन्यास ''किशना'' प्रकाशित भा। गहना के प्रति औरतन के लगाव पै व्यंग्य करै वाली ई 142 पन्नन कै रचना अब खो गै है। साहित्यिक आलोचक नोबत राय ने ''ज़माना'' मा काम के आलोचना किहिन, अऊर ईका महिलाओं के हालात का मजाक बताइन। अप्रैल-अगस्त 1907 के दौरान, प्रेमचंद के उपन्यास ''रूठी रानी'' ''जमाना'' मा धारावाहिक रूप मा प्रकाशित कीन गा रहा। साथै 1907 मा, ''जमाना'' के प्रकाशकन प्रेमचंद के पहिला लघुकथा संग्रह प्रकाशित किहिन, जेकर शीर्षक रहा ''सोज-ए-वतन'' । बाद मा प्रतिबंधित कीन गा संग्रह मा चार कहानी रहीं जवन भारतीयन का राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष मा प्रेरित करै के कोशिश करत रहीं। <ref name="Mohan2006">{{Cite book|title=[[Encyclopaedia of Indian Literature]]: Sasay to Zorgot|last=Lal|first=Mohan|publisher=[[Sahitya Akademi]]|year=2006|isbn=978-81-260-1221-3|volume=5|page=4149}}</ref> ==== प्रेमचंद नाम का अपनाना ==== सन १९०९ मा प्रेमचंद कै स्थानांतरण महोबा होइगा अउर बाद मा हमीरपुर मा स्कूलन के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पै लगावा गा। यहि समय के आसपास, ''सोज-ए-वतान का'' ब्रिटिश सरकार के अधिकारियन द्वारा देखल गै रहा, जे एकरा विद्रोही काम के रूप मा प्रतिबंधित कइ दिहिन। हमीरपुर जिला के ब्रिटिश कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवनसन ने प्रेमचंद के घर पर छापामारी का आदेश दिया, जहां ''सोज-ए-वतन'' के लगभग पाँच सौ प्रतियां जला दी गईं। <ref name="SahniPaliwal1980">{{Cite book|title=Prem Chand: A Tribute|last=Sahni|first=Bhisham|last2=Paliwal|first2=Om Prakash|publisher=Premchand Centenary Celebrations Committee|year=1980|author-link=Bhisham Sahni}}</ref> यहिके बाद उर्दू पत्रिका ''जमाना'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम, जे धनपत राय के पहिली कहानी " दुनिया का सबसे अनमोल रतन" छपवाये रहे, "प्रेमचंद" छद्म नाम के सलाह दिहिन। धनपत राय "नवाब राय" नाम लेब बन्द कइकै प्रेमचंद बनि गये। प्रेमचंद का अक्सर मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जात रहा। बात ई है कि वै कन्हैयालाल मुंशी के साथे हंस पत्रिका कै संपादन किहिन। क्रेडिट लाइन मा लिखा रहा "मुंशी, प्रेमचंद"। तब से उनका मुंशी प्रेमचंद कहा जाय लाग। <sup class="noprint Inline-Template Template-Fact" style="white-space:nowrap;">&#x5B; ''<nowiki><span title="This claim needs references to reliable sources. (November 2023)">citation needed</span></nowiki>'' &#x5D;</sup> 1914 मा, प्रेमचंद हिंदी मा लिखै लाग ( [[हिन्दी|हिंदी]] अऊर [[उर्दू]] का एक भाषा हिंदुस्तानी के अलग-अलग रजिस्टर माना जात है, जेहिमा हिंदी आपन बहुत शब्दावली [[संस्कृत]] से लेत है अऊर उर्दू फारसी से अधिक प्रभावित है)। यहि समय तक, उ उर्दू मा एक कथा लेखक के रूप मा पहिले से ही प्रतिष्ठित होइ चुका रहा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> सुमित सरकार नोट करत हैं कि उर्दू मा प्रकाशक ढूंढै के कठिनाई से स्विच प्रेरित कीन गा रहा। <ref name="Sarkar1983">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=x1uBQgAACAAJ|title=Modern India, 1885–1947|last=Sarkar|first=Sumit|publisher=Macmillan|year=1983|isbn=978-0-333-90425-1|pages=85–86|author-link=Sumit Sarkar}}</ref> उनकर पहिली हिन्दी कहानी "सौत" दिसम्बर 1915 मा ''सरस्वती'' पत्रिका मा प्रकाशित भै, अउर उनकर पहिला लघुकथा संग्रह ''सप्त सरोज'' जून 1917 मा प्रकाशित भा। === गोरखपुर === [[फाइल:Shilalekh.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद जी 1916 से 1921 तक [[गोरखपुर]] मा जहाँ रहत रहें, वहि झोपड़ी मा एक पट्टिका।]] अगस्त 1916 मा पदोन्नति पै प्रेमचन्द कै स्थानांतरण गोरखपुर कै दीन गा। उ [[गोरखपुर]] के नॉर्मल हाई स्कूल मा सहायक मास्टर बनिन। <ref name="Madan1964">{{Cite book|title=Munshi Premchand: A Literary Biography|last=Gopal|first=Madan|publisher=Asia Pub. House|year=1964|pages=114–117}}</ref> गोरखपुर मा, ओनके किताब बेचै वाले बुद्धि लाल से दोस्ती होइ गै, जे ओनका स्कूल मा परीक्षा क्रैम किताबन के बेचे के बदले मा पढ़ै के लिए उपन्यास उधार लेय के अनुमति दिहिन। प्रेमचंद अन्य भाषाओं के क्लासिक्स के उत्साही पाठक रहे अऊर इनमा से कईयो रचनाओं का हिंदी मा अनुवाद किहिन। सन १९१९ तक प्रेमचंद जी लगभग सौ-सौ पन्नन के चार उपन्यास प्रकाशित कइ चुके रहैं। सन १९१९ मा प्रेमचंद कै पहिला प्रमुख उपन्यास ''सेवा सदन'' हिन्दी मा प्रकाशित भा। ई उपन्यास मूल रूप से ''बाजार-ए-हुसन'' शीर्षक से उर्दू मा लिखा गा रहा लेकिन कलकत्ता स्थित एक प्रकाशक द्वारा सबसे पहिले हिंदी मा प्रकाशित कीन गा रहा, जे प्रेमचंद का उनके काम के लिए ₹450 पेशकश किहिन। [[लाहौर]] के उर्दू प्रकाशक ने बाद मा 1924 मा प्रेमचंद का ₹250 भुगतान कइके ई उपन्यास प्रकाशित किहिन। उपन्यास एक दुखी गृहिणी के कहानी बतावत है, जे पहिले एक दरबारी बन जात है, अऊर फिर दरबारी के जवान बिटियन के लिए एक अनाथालय का प्रबंधन करत है। ई आलोचकन द्वारा बहुत पसंद कीन गा अऊर प्रेमचंद का व्यापक पहचान पावै मा मदद मिली। 1919 मा प्रेमचंद [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] से बीए डिग्री प्राप्त किहिन। 1921 तक, उनका स्कूलन के उप निरीक्षक के रूप मा पदोन्नत कीन गा रहा। फरवरी 1921 का, उ गोरखपुर मा एक बैठक मा शामिल भए, जहां [[महात्मा गाँधी|महात्मा गांधी ने]] असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप मा लोगन से सरकारी नौकरियन से इस्तीफा देय का कहिन। प्रेमचंद, हालांकि शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे अऊर उनके पास दुई बच्चा अऊर एक गर्भवती पत्नी का समर्थन करै के लिए रहा, पांच दिन तक यहिके बारे मा सोचा अऊर अपनी पत्नी के सहमति से अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देय का फैसला किहिन। === बनारस वापसी === नौकरी छोड़ै के बाद प्रेमचंद 18 मार्च 1921 का गोरखपुर से बनारस चले गें अऊर अपने साहित्यिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करै का फैसला किहिन। 1936 मा अपनी मृत्यु तक, उनका गंभीर वित्तीय कठिनाइयन अऊर पुरानी बीमारी का सामना करै का पड़ा। <ref name="DavidRubin1994">{{Cite book|title=Masterworks of Asian Literature in Comparative Perspective: A Guide for Teaching|last=Rubin|first=David|publisher=[[M. E. Sharpe]]|year=1994|isbn=978-1-56324-258-8|editor-last=Miller|editor-first=Barbara Stoler|editor-link=Barbara Stoler Miller|pages=168–177|chapter=Short Stories of Premchand|author-link=David Rubin (writer)}}</ref> सन १९२३ मा बनारस मा यक छपाई औ प्रकाशन घर कै स्थापना किहिन जेहकै नाँव "सरस्वती प्रेस" रखिन। <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> सन 1924 मा प्रेमचंद के ''रंगभूमि'' का प्रकाशन भा, जेहिमा सूरदास नामक एक अंधा भिखारी दुखद नायक है। शुल्ज़ उल्लेख करत हैं कि ''रंगभूमि'' मा, प्रेमचंद एक "शानदार सामाजिक इतिहासकार" के रूप मा आवत हैं, अऊर यद्यपि उपन्यास मा कुछ "संरचनात्मक खामी" अऊर "बहुत सारा लेखकीय स्पष्टीकरण" हैं, ई प्रेमचंद के लेखन शैली मा "चिह्नित प्रगति" देखावत है। शुल्ज़ के अनुसार, ई ''निर्मला'' (1925) अऊर ''प्रतिज्ञा'' (1927) मा रहा कि प्रेमचंद का "एक संतुलित, यथार्थवादी स्तर" तक आपन रास्ता मिला जवन ओनके पहिले के कामन का पार करत है अऊर "अपने पाठकन का संरक्षण मा रखै" का प्रबंधन करत है। ''निर्मला'', भारत मा दहेज प्रणाली से संबंधित एक उपन्यास, एक उपन्यास के रूप मा प्रकाशित होए से पहिले नवंबर 1925 अऊर नवंबर 1926 के बीच ''चंद'' पत्रिका मा क्रमबद्ध कीन गा रहा। ''प्रतिज्ञा'' ("प्रतिज्ञा") विधवा पुनर्विवाह के विषय से निपटत रही। १९२८ मा मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित प्रेमचंद कै उपन्यास ''गबन'' ("गबन" छपा। मार्च 1930 मा, प्रेमचंद ''हंस'' शीर्षक से एक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका शुरू किहिन, जेकर उद्देश्य भारतीयन का ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुटावै के लिए प्रेरित करब रहा। अपने राजनीतिक रूप से भड़काऊ विचारन के लिए विख्यात पत्रिका मुनाफा कमाए में विफल रही। फिर प्रेमचंद ने काम संभाला अऊर ''जागरण नामक एक अउर पत्रिका का संपादन किहिन,'' जवन भी घाटे मा चलत रही। 1931 मा प्रेमचंद मारवाड़ी कालेज मा अध्यापक के रूप मा कानपुर चले गें पै कालेज प्रशासन से मतभेद होय के कारन छोड़ै का पड़ा। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> तब उ बनारस लौटि आए अऊर ''मर्यादा'' पत्रिका के संपादक बनिन। 1932 मा, उ ''कर्मभूमि'' शीर्षक से एक अउर उपन्यास प्रकाशित किहिन। उ संक्षेप मा काशी विद्यापीठ, एक स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर के रूप मा काम किहिन। स्कूल बंद होय के बाद, उ [[लखनऊ]] मा ''माधुरी'' पत्रिका के संपादक बने। <ref name="Giriraj2001" /> === बम्बई === प्रेमचंद 31 मई 1934 का हिंदी फिल्म उद्योग मा आपन किस्मत आजमावै [[मुम्बई|बम्बई]] पहुँचे। उ प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन के लिए पटकथा लेखन के नौकरी स्वीकार किहिन रहैं, ई उम्मीद मा कि ₹8,000 के सालाना वेतन से ओनके वित्तीय परेशानियन का दूर करै मा मदद मिली। उ दादर मा रहे, अऊर फिल्म ''मजदूर'' ("द लेबरर") के पटकथा लिखिन। मोहन भवानानी के निर्देशन मा बनी ई फिलिम मा मजदूर वर्ग के खराब हालात का देखावा गा रहा। फिल्म मा मजदूरन के नेता के रूप मा खुद प्रेमचंद कैमियो किहिन। कुछ प्रभावशाली व्यापारी बम्बई मा एकर रिलीज पर रोक लगावै मा कामयाब रहे। ई फिलिम लाहौर अउर दिल्ली मा रिलीज भै लेकिन मिल के मजदूरन का मालिकन के खिलाफ खड़ा होय के प्रेरणा देय के बाद फिर से प्रतिबंधित कीन गा। विडंबना ई है कि ई फिलिम [[वाराणसी|बनारस]] मा अपने घाटे वाले प्रेस के मजदूरन का वेतन न मिलै के बाद हड़ताल करै के लिए प्रेरित किहिस। 1934–35 तक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस ₹400 के भारी कर्ज मा रहा, अऊर प्रेमचंद का ''जागरण'' के प्रकाशन बंद करै का मजबूर कीन गा रहा। इसी बीच प्रेमचंद बम्बई फिल्म उद्योग के गैर-साहित्यिक व्यावसायिक माहौल का नापसंद करै लाग रहे, अउर बनारस लौटै चाहत रहे। हालांकि, उ प्रोडक्शन हाउस के साथे एक साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किहिन रहैं। एक साल पूरा होय से पहिले, उ अंततः 4 अप्रैल 1935 का बम्बई छोड़ दिहिन। बम्बई टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु रॉय प्रेमचंद का वापस रहै के लिए मनावै के कोशिश किहिन लेकिन असफल रहे। === आखिरी दिन === बम्बई छ्वाड़ै के बाद, प्रेमचंद [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] मा बसब चहति रहैं, जहाँ उनके लरिका श्रीपत राय अउर अमृत कुमार राय पढ़ति रहैं। उइ हुँवा ते ''हंस का'' प्रकाशित करै के योजना बनाइन। हालांकि, अपनि वित्तीय स्थिति द्याखत भए अऊर बीमार स्वास्थ्य के कारण, उनका ''हंस'' का इंडियन लिटरेरी काउंसल के हवाले करै का पड़ा अउर बनारस जाय का पड़ा। प्रेमचंद का 1936 मा लखनऊ मा प्रगतिशील लेखक संघ क्या पहिला अध्यक्ष चुना गा रहै <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> 8 अक्टूबर 1936 का कइयो दिनन की बीमारी के बाद पद पर रहतै रहत उनक्या निधन होइ गा। ''गोदान'' ( ''द गिफ्ट ऑफ ए काउ'', 1936), प्रेमचंद क्यार आखिरी पूरा कीन गा काम है, आम तौर पर यहिका उनके सबते श्रेष्ठ उपन्यास के रूप मा स्वीकार कीन जात है अउर सबते अच्छे हिंदी उपन्यासननौ मा गिना जात है। <ref>{{Cite web |last=Deepak |first=Sunil |title=Phanishwar Nath Renu |url=http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080313043341/http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |archive-date=13 March 2008 |access-date=25 August 2021 |website=Kalpana.it}}</ref> येहिका नायक, होरी, एक गरीब किसान, ग्रामीण भारत मा धन अउर प्रतिष्ठा के प्रतीक गाय के लिए तरसत देखावा गा है। सिगफ्राइड शुल्ज़ के अनुसार, " ''गोदान'' एक सुव्यवस्थित अउर सुसंतुलित उपन्यास है जउन पश्चिमी साहित्यिक मानक द्वारा स्थापित साहित्यिक आवश्यकतन का पर्याप्त रूप ते पूरा करत है।" [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ टैगोर]] जइसे अन्य समकालीन प्रसिद्ध लेखकन के विपरीत, प्रेमचंद के भारत ते बाहर बहुत सराहना नहीं कीन गै। शुल्ज़ का मानबु है कि यहिके कारण उनके काम के अच्छे अनुवादन क अभाव है। साथै, टैगोर अउर इकबाल के विपरीत, प्रेमचंद कबो भारत ते बाहर नहीं गें, विदेश मा पढ़ाई नहीं कीन्हेनि या प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक हस्तिन के साथै मिलैजुलै नहीं गें। 1936 मा प्रेमचंद जी "कफन" (" कफन ") नामक कहानी प्रकाशित कीन्हेनि, जेहिमा एक गरीब मनई अपनी मरी मेहेरिया के अंतिम संस्कार के खातिर पइसा इकट्ठा करत है लेकिन सब पइसा खावै पिएम उड़ा देत है। प्रेमचंदजी के आखिरी प्रकाशित कहानी "क्रिकेट मैच" रहै, जउन उनके मरै के बाद 1938 मा ''जमाना'' मा छपी रहै। hkrlonybyvm93z8atmplja3s2jnelv4 35211 35210 2026-07-06T08:32:18Z Avimaarak 3578 35211 wikitext text/x-wiki '''प्रेमचंद''' ([[३१ जुलाई]], [[१८८०]] - [[८ अक्टूबर]] [[१९३६]]) [[हिन्दी]] और [[उर्दू]] कय बढहन् भारतीय लेखक में से एक होयँ।मूल नावँ '''धनपत राय श्रीवास्तव''' वाले प्रेमचंद कय '''नवाब राय''' औ '''मुंशी प्रेमचंद''' कय नावँ से भी जाना जात है। जीवन परिचय === सुरुवाती जिंदगी === प्रेमचंद का जनम 31 जुलाई 1880 का [[वाराणसी|बनारस]] के लगे लमही नाँव के एक गाँव मा भा रहै। छुटपने मा उनका नाँव धनपत राय ("धन का स्वामी") रखा गा रहै। इनके पूर्वज बड़े चित्रगुप्तवंशी कायस्थ रहैं, जिनके लगे आठ ते नौ बिगहा जमीन रहै। इनके दादा गुरुसहायराय पटवारी (गाँव के जमीन के अभिलेख रखने वाले) रहैं अउर इनके पिता अजयबलाल डाकघर के चपरासी रहैं। इनकी महतारी आनंदी देवी करौनी गाँव की रहै वाली रहैं, जो संभवतः इनके "बड़े घर की बेटी" मा आनंदी किरदार के लिए इनकी प्रेरणौ रहीं। धनपत राय अजयब लाल और आनंदी की चौथे संतान रहैं; पहिले दुई बिटेवा रहैं मुला उइ छोटेहे मा मर गईं, अउर याक तीसर बिटेवा रहै जेहिका नाँव सामा रहै। उनके चाचा, महाबीर, एक अमीर जमींदार रहैं, वई उनका " नवाब " उपनाम दिहिन। "नवाब राय" धनपत राय जी द्वारा चुना गा पहिल उपनाम रहै। <ref name="amrit">{{Cite book|title=Premchand: A Life|last=Rai|first=Amrit|publisher=People's Publishing House|year=1982|location=New Delhi|translator-last=Trivedi|translator-first=Harish|author-link=Amrit Rai}}</ref> [[फाइल:Lamhi,_Varanasi.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल गेट, लमही, वाराणसी]] सात साल की उमर मा धनपत राय लमही के लगे लालपुर, [[वाराणसी]] के एक मदरसा मा अपनि शिक्षा शुरू किहिन। अउर मदरसा मा एक मौलवी ते उर्दू अउर फारसी सीखेनि । जब उइ 8 साल के रहैं, तब उनकी महतारी क्यार लंबी बीमारी के बाद निधन होइ गा। वहिके बादि उनकी दादी, उनका पालै-प्वासै के जिम्मेदारी लिहिन, मगर कुछ दिन बादि उनहुँन क देहावसान होइ गा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> मुंशी प्रेमचंद अलग-थलग महसूस करत रहे, काहे से कि उनकी बड़ी बहिन सुग्गी के शादी होइ चुकी रही, अऊर उनके पिताजी हमेशा काम मा व्यस्त रहत रहें। उनके पिता, जे अब [[गोरखपुर]] मा तैनात रहे, दुबारा शादी किहिन, लेकिन प्रेमचंद का उनकी सौतेली महतारी से बहुत कम स्नेह मिला। सौतेली महतारी बाद मा प्रेमचंद के रचना मा आवर्ती विषय बन गै। बचपनै मा धनपत राय के रुचि कथा उपन्यासन के प्रति होइ गै। तबहीं एक तमाखू वाले की दुकान पर उइ फारसी भासा के काल्पनिक महाकाव्य तिलिस्म ए दिलरुबा की कहानी सुनेनि। फिर एक थोक किताब विक्रेता खियां किताबै ब्यांचै का काम किहिन। ई काम मा उनका खुब किताबै पढ़ै का मौका मिला। उइ एक मिशनरी स्कूल मा अंग्रेजी सीखिन अउर जॉर्ज डब्ल्यूएम रेनॉल्ड्स के आठ खंडन के ''द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन'' सहित कथासाहित्य के कईयो कामन का अध्ययन किहिन। [[गोरखपुर]] मा अपनि पहिलि साहित्यिक रचना किहिन, जउन कबहूँ प्रकाशित नाइ भै औ अब खोय गै है। यो एक कुंवारे पर एक तमाशा रहै जो एक निम्न जाति की औरत ते प्यार करत है। यहु चरित्र प्रेमचंद के चाचा पर आधारित रहै, जो उनका कथा-साहित्य पढ़ै के जुनून के खातिर डांटत रहें; यो तमाशा शायद यहीके बदला के रूप मा लिखा गा रहै। <ref name="Gupta_1998_10" /> 1890 के दशक के मध्य मा अपने पिता के जमानिया मा तैनात होए के बाद, धनपत राय ने [[वाराणसी|बनारस]] के [[Queen's College Varanasi|क्वींस कॉलेज]] मा एक दिन के विद्वान के रूप मा दाखिला लिहिन। 1895 मा, जब उ नौवीं कक्षा मा पढ़त रहें, तब 15 साल के उमर मा उनकर बियाह होइ गवा। ई मैच उनके मातृक सौतेला दादा द्वारा आयोजित कीन गा रहा। ऊ लड़की एक अमीर जमींदार परिवार से रही अऊर प्रेमचंद से बड़ी रही, जे ओका झगड़ालू अऊर सुन्नर नाहीं पावत रही। <ref name="Gupta_1998_11" /> <ref name="Sigi_2006_17" /> लंबी बीमारी के बाद 1897 में उनके पिताजी का निधन होइ गवा। उ दूसरा वर्ग (60% अंक से नीचे) के साथ मैट्रिक परीक्षा पास करै में कामयाब रहे। हालांकि, क्वींस कॉलेज मा केवल पहिला संभाग वाले छात्रन का फीस रियायत दीन जात रही। तब उ सेंट्रल हिन्दू स्कूल मा दाखिला मांगिन लेकिन अंकगणित के कमजोर कौशल के कारण उ असफल रहे। यहि तरह, ओनका आपन पढ़ाई बंद करै का पड़ा। तब उइ बनारस मा एक अधिवक्ता के बेटवा का पांच रुपिया के मासिक वेतन मा कोचिंग देय का असाइनमेंट प्राप्त किहिन। ऊ अधिवक्ता के अस्तबल के ऊपर एक कीचड़ के कोठरी मा रहत रहा अऊर आपन वेतन का 60% घर वापस भेजत रहा। <ref name="Gupta_1998_12" /> इन दिनन मा प्रेमचंद खूब पढ़िन। कई कर्ज जमा करै के बाद, 1899 मा, उ आपन एकत्रित किताबन मा से एक का बेचै के लिए एक किताबन के दुकान मा गें। वहिमा, उ चुनार के एक मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर से मिले, जे ओनका ₹18 के मासिक वेतन पर एक शिक्षक के रूप मा नौकरी के पेशकश किहिन। <ref name="Gupta_1998_12" /> उ ₹5 के मासिक शुल्क पर एक छात्र का ट्यूशन पढ़ावै का काम भी लिहिन। 1900 मा, प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराइच मा ₹20 के मासिक वेतन पर सहायक शिक्षक के रूप मा नौकरी प्राप्त किहिन। तीन महीना बाद, उनका प्रतापगढ़ के जिला स्कूल मा स्थानांतरित कीन गा रहा, जहां उ एक प्रशासक के बंगला मा रहे अऊर अपने बेटवा का ट्यूशन पढ़ावत रहे। उनकर पहिला लघु उपन्यास ''असरार-ए-माबिद'' ("भगवान के निवास के रहस्य", हिंदी मा ''देवस्थान रहस्य'' ) रहा, जवन मंदिर के पुजारियन के बीच भ्रष्टाचार अऊर गरीब औरतन के यौन शोषण का पता लगावत है। ई उपन्यास बनारस स्थित उर्दू साप्ताहिक ''आवाज-ए-खलक'' मा 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक एक श्रृंखला मा प्रकाशित कीन गा रहा। साहित्यिक आलोचक सिगफ्राइड शुल्ज़ कहत हैं कि "उनके पहिला उपन्यास मा उनकर अनुभवहीनता काफी स्पष्ट है", जवन सुव्यवस्थित नाहीं है, एक अच्छा कथानक अऊर विशेषता के कमी है। प्रकाशचन्द्र गुप्ता इका "अपरिपक्व रचना" कहत हैं, जवन "जीवन का केवल काला या सफेद मा देखै" के प्रवृत्ति देखावत है। <ref name="Gupta_1998_13" /> === कानपुर प्रवास === प्रतापगढ़ से, धनपत राय का प्रशिक्षण के लिए [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] स्थानांतरित कीन गा रहा अऊर बाद मा 1905 मा कानपुर मा तैनात कीन गा रहा। उ लगभग चार साल तक कानपुर मा रहे, मई 1905 से जून 1909 तक। वहिजा, उ उर्दू पत्रिका ''[[Zamana (magazine)|जमाना]]'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम से मिले, जेहिमा उ बाद मा कईयो लेख अऊर कहानी प्रकाशित किहिन। प्रेमचंद गर्मी के छुट्टी मा अपने गांव लम्ही मा गये रहैं पै कइयौ कारन से रहैं का मजा नहीं आवा रहै। उनका मौसम या वातावरण लेखन के अनुकूल नाहीं लाग। यही से, अपनी पत्नी अऊर अपनी सौतेली महतारी के बीच झगड़ा के कारण उनका घरेलू परेशानी का सामना करै का पड़ा। प्रेमचन्द अपनी मेहरारू का गुस्सा मा डांटिन जब मेहरारू फांसी लगाय के आत्महत्या करै कै असफल कोशिश करिन। निराश होइके, ऊ अपने पिता के घरे चली गै, अऊर प्रेमचंद ओका वापस लावै मा कौनो दिलचस्पी नाहीं देखाइस। 1906 मा प्रेमचंद कय बियाह एक बाल विधवा शिवरानी देवी से भा, जवन फतेहपुर कय पास एक गाँव कय एक जमींदार कय बिटिया रही। <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=I2UnQES-79gC|title=The Illustrated Weekly of India|publisher=Published for the proprietors, Bennett, Coleman & Company, Limited, at the Times of India Press|year=1984|pages=68–69|access-date=17 May 2019}}</ref> ई कदम उ समय क्रांतिकारी माना जात रहा, अऊर प्रेमचंद का बहुत सामाजिक विरोध का सामना करै का पड़ा। इनके निधन के बाद शिवरानी देवी इनके ऊपर यक किताब लिखिन, जेकर शीर्षक रहा ''प्रेमचंद घर में'' ("घर पर प्रेमचंद")। 1905 मा, राष्ट्रवादी सक्रियता से प्रेरित होइके, प्रेमचंद ने ''जमाना'' मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले पर एक लेख प्रकाशित किहिन। उ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करै के लिए गोखले के तरीकन के आलोचना किहिन अऊर वहिके बजाय बाल गंगाधर तिलक द्वारा अपनाए गए अउर चरमपंथी उपायन का अपनावै के सिफारिश किहिन। प्रेमचंद कय पहिली प्रकाशित कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" ("दुनिया कय सबसे अनमोल गहना") रही, जवन 1907 मा ''जमाना'' मा छपी रही। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> यहि कहानी के अनुसार सबसे अनमोल 'रत्न' आजादी पावै कय खातिर आवश्यक खून कय आखिरी बूंद रहा। प्रेमचंद के कईयो शुरुआती लघुकथाओं मा देशभक्ति के सुर रहे, जवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> प्रेमचंद कै दुसरा लघु उपन्यास ''हमखुरमा-ओ-हमसवब'' (हिंदी मा ''प्रेमा'' ) 1907 मा प्रकाशित भा रहा, "बाबू नवाब राय बनारसी" नाम से लिखा गा रहा। ई समकालीन रूढ़िवादी समाज मा विधवा पुनर्विवाह के मुद्दा का पता लगावत है: नायक, अमृत राय, अपनी अमीर अऊर सुंदर मंगेतर प्रेमा का त्याग करत हुए, युवा विधवा, पूर्णा से शादी करै के सामाजिक विरोध का दूर करत है। प्रकाश चन्द्र गुप्ता के अनुसार, "कई मायनों मा उनके भविष्य के महानता के बीज समाहित करत हुए, उपन्यास अबहियों युवा है अऊर अनुशासन के कमी है जवन पूर्ण परिपक्वता लावत है"। सन १९०७ मा बनारस के मेडिकल हॉल प्रेस से प्रेमचंद कै एक अउर लघु उपन्यास ''किशना'' प्रकाशित भा। गहना के प्रति औरतन के लगाव पै व्यंग्य करै वाली ई 142 पन्नन कै रचना अब खो गै है। साहित्यिक आलोचक नोबत राय ने ''ज़माना'' मा काम के आलोचना किहिन, अऊर ईका महिलाओं के हालात का मजाक बताइन। अप्रैल-अगस्त 1907 के दौरान, प्रेमचंद के उपन्यास ''रूठी रानी'' ''जमाना'' मा धारावाहिक रूप मा प्रकाशित कीन गा रहा। साथै 1907 मा, ''जमाना'' के प्रकाशकन प्रेमचंद के पहिला लघुकथा संग्रह प्रकाशित किहिन, जेकर शीर्षक रहा ''सोज-ए-वतन'' । बाद मा प्रतिबंधित कीन गा संग्रह मा चार कहानी रहीं जवन भारतीयन का राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष मा प्रेरित करै के कोशिश करत रहीं। <ref name="Mohan2006">{{Cite book|title=[[Encyclopaedia of Indian Literature]]: Sasay to Zorgot|last=Lal|first=Mohan|publisher=[[Sahitya Akademi]]|year=2006|isbn=978-81-260-1221-3|volume=5|page=4149}}</ref> ==== प्रेमचंद नाम का अपनाना ==== सन १९०९ मा प्रेमचंद कै स्थानांतरण महोबा होइगा अउर बाद मा हमीरपुर मा स्कूलन के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पै लगावा गा। यहि समय के आसपास, ''सोज-ए-वतान का'' ब्रिटिश सरकार के अधिकारियन द्वारा देखल गै रहा, जे एकरा विद्रोही काम के रूप मा प्रतिबंधित कइ दिहिन। हमीरपुर जिला के ब्रिटिश कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवनसन ने प्रेमचंद के घर पर छापामारी का आदेश दिया, जहां ''सोज-ए-वतन'' के लगभग पाँच सौ प्रतियां जला दी गईं। <ref name="SahniPaliwal1980">{{Cite book|title=Prem Chand: A Tribute|last=Sahni|first=Bhisham|last2=Paliwal|first2=Om Prakash|publisher=Premchand Centenary Celebrations Committee|year=1980|author-link=Bhisham Sahni}}</ref> यहिके बाद उर्दू पत्रिका ''जमाना'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम, जे धनपत राय के पहिली कहानी " दुनिया का सबसे अनमोल रतन" छपवाये रहे, "प्रेमचंद" छद्म नाम के सलाह दिहिन। धनपत राय "नवाब राय" नाम लेब बन्द कइकै प्रेमचंद बनि गये। प्रेमचंद का अक्सर मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जात रहा। बात ई है कि वै कन्हैयालाल मुंशी के साथे हंस पत्रिका कै संपादन किहिन। क्रेडिट लाइन मा लिखा रहा "मुंशी, प्रेमचंद"। तब से उनका मुंशी प्रेमचंद कहा जाय लाग। <sup class="noprint Inline-Template Template-Fact" style="white-space:nowrap;">&#x5B; ''<nowiki><span title="This claim needs references to reliable sources. (November 2023)">citation needed</span></nowiki>'' &#x5D;</sup> 1914 मा, प्रेमचंद हिंदी मा लिखै लाग ( [[हिन्दी|हिंदी]] अऊर [[उर्दू]] का एक भाषा हिंदुस्तानी के अलग-अलग रजिस्टर माना जात है, जेहिमा हिंदी आपन बहुत शब्दावली [[संस्कृत]] से लेत है अऊर उर्दू फारसी से अधिक प्रभावित है)। यहि समय तक, उ उर्दू मा एक कथा लेखक के रूप मा पहिले से ही प्रतिष्ठित होइ चुका रहा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> सुमित सरकार नोट करत हैं कि उर्दू मा प्रकाशक ढूंढै के कठिनाई से स्विच प्रेरित कीन गा रहा। <ref name="Sarkar1983">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=x1uBQgAACAAJ|title=Modern India, 1885–1947|last=Sarkar|first=Sumit|publisher=Macmillan|year=1983|isbn=978-0-333-90425-1|pages=85–86|author-link=Sumit Sarkar}}</ref> उनकर पहिली हिन्दी कहानी "सौत" दिसम्बर 1915 मा ''सरस्वती'' पत्रिका मा प्रकाशित भै, अउर उनकर पहिला लघुकथा संग्रह ''सप्त सरोज'' जून 1917 मा प्रकाशित भा। === गोरखपुर === [[फाइल:Shilalekh.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद जी 1916 से 1921 तक [[गोरखपुर]] मा जहाँ रहत रहें, वहि झोपड़ी मा एक पट्टिका।]] अगस्त 1916 मा पदोन्नति पै प्रेमचन्द कै स्थानांतरण गोरखपुर कै दीन गा। उ [[गोरखपुर]] के नॉर्मल हाई स्कूल मा सहायक मास्टर बनिन। <ref name="Madan1964">{{Cite book|title=Munshi Premchand: A Literary Biography|last=Gopal|first=Madan|publisher=Asia Pub. House|year=1964|pages=114–117}}</ref> गोरखपुर मा, ओनके किताब बेचै वाले बुद्धि लाल से दोस्ती होइ गै, जे ओनका स्कूल मा परीक्षा क्रैम किताबन के बेचे के बदले मा पढ़ै के लिए उपन्यास उधार लेय के अनुमति दिहिन। प्रेमचंद अन्य भाषाओं के क्लासिक्स के उत्साही पाठक रहे अऊर इनमा से कईयो रचनाओं का हिंदी मा अनुवाद किहिन। सन १९१९ तक प्रेमचंद जी लगभग सौ-सौ पन्नन के चार उपन्यास प्रकाशित कइ चुके रहैं। सन १९१९ मा प्रेमचंद कै पहिला प्रमुख उपन्यास ''सेवा सदन'' हिन्दी मा प्रकाशित भा। ई उपन्यास मूल रूप से ''बाजार-ए-हुसन'' शीर्षक से उर्दू मा लिखा गा रहा लेकिन कलकत्ता स्थित एक प्रकाशक द्वारा सबसे पहिले हिंदी मा प्रकाशित कीन गा रहा, जे प्रेमचंद का उनके काम के लिए ₹450 पेशकश किहिन। [[लाहौर]] के उर्दू प्रकाशक ने बाद मा 1924 मा प्रेमचंद का ₹250 भुगतान कइके ई उपन्यास प्रकाशित किहिन। उपन्यास एक दुखी गृहिणी के कहानी बतावत है, जे पहिले एक दरबारी बन जात है, अऊर फिर दरबारी के जवान बिटियन के लिए एक अनाथालय का प्रबंधन करत है। ई आलोचकन द्वारा बहुत पसंद कीन गा अऊर प्रेमचंद का व्यापक पहचान पावै मा मदद मिली। 1919 मा प्रेमचंद [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] से बीए डिग्री प्राप्त किहिन। 1921 तक, उनका स्कूलन के उप निरीक्षक के रूप मा पदोन्नत कीन गा रहा। फरवरी 1921 का, उ गोरखपुर मा एक बैठक मा शामिल भए, जहां [[महात्मा गाँधी|महात्मा गांधी ने]] असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप मा लोगन से सरकारी नौकरियन से इस्तीफा देय का कहिन। प्रेमचंद, हालांकि शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे अऊर उनके पास दुई बच्चा अऊर एक गर्भवती पत्नी का समर्थन करै के लिए रहा, पांच दिन तक यहिके बारे मा सोचा अऊर अपनी पत्नी के सहमति से अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देय का फैसला किहिन। === बनारस वापसी === नौकरी छोड़ै के बाद प्रेमचंद 18 मार्च 1921 का गोरखपुर से बनारस चले गें अऊर अपने साहित्यिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करै का फैसला किहिन। 1936 मा अपनी मृत्यु तक, उनका गंभीर वित्तीय कठिनाइयन अऊर पुरानी बीमारी का सामना करै का पड़ा। <ref name="DavidRubin1994">{{Cite book|title=Masterworks of Asian Literature in Comparative Perspective: A Guide for Teaching|last=Rubin|first=David|publisher=[[M. E. Sharpe]]|year=1994|isbn=978-1-56324-258-8|editor-last=Miller|editor-first=Barbara Stoler|editor-link=Barbara Stoler Miller|pages=168–177|chapter=Short Stories of Premchand|author-link=David Rubin (writer)}}</ref> सन १९२३ मा बनारस मा यक छपाई औ प्रकाशन घर कै स्थापना किहिन जेहकै नाँव "सरस्वती प्रेस" रखिन। <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> सन 1924 मा प्रेमचंद के ''रंगभूमि'' का प्रकाशन भा, जेहिमा सूरदास नामक एक अंधा भिखारी दुखद नायक है। शुल्ज़ उल्लेख करत हैं कि ''रंगभूमि'' मा, प्रेमचंद एक "शानदार सामाजिक इतिहासकार" के रूप मा आवत हैं, अऊर यद्यपि उपन्यास मा कुछ "संरचनात्मक खामी" अऊर "बहुत सारा लेखकीय स्पष्टीकरण" हैं, ई प्रेमचंद के लेखन शैली मा "चिह्नित प्रगति" देखावत है। शुल्ज़ के अनुसार, ई ''निर्मला'' (1925) अऊर ''प्रतिज्ञा'' (1927) मा रहा कि प्रेमचंद का "एक संतुलित, यथार्थवादी स्तर" तक आपन रास्ता मिला जवन ओनके पहिले के कामन का पार करत है अऊर "अपने पाठकन का संरक्षण मा रखै" का प्रबंधन करत है। ''निर्मला'', भारत मा दहेज प्रणाली से संबंधित एक उपन्यास, एक उपन्यास के रूप मा प्रकाशित होए से पहिले नवंबर 1925 अऊर नवंबर 1926 के बीच ''चंद'' पत्रिका मा क्रमबद्ध कीन गा रहा। ''प्रतिज्ञा'' ("प्रतिज्ञा") विधवा पुनर्विवाह के विषय से निपटत रही। १९२८ मा मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित प्रेमचंद कै उपन्यास ''गबन'' ("गबन" छपा। मार्च 1930 मा, प्रेमचंद ''हंस'' शीर्षक से एक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका शुरू किहिन, जेकर उद्देश्य भारतीयन का ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुटावै के लिए प्रेरित करब रहा। अपने राजनीतिक रूप से भड़काऊ विचारन के लिए विख्यात पत्रिका मुनाफा कमाए में विफल रही। फिर प्रेमचंद ने काम संभाला अऊर ''जागरण नामक एक अउर पत्रिका का संपादन किहिन,'' जवन भी घाटे मा चलत रही। 1931 मा प्रेमचंद मारवाड़ी कालेज मा अध्यापक के रूप मा कानपुर चले गें पै कालेज प्रशासन से मतभेद होय के कारन छोड़ै का पड़ा। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> तब उ बनारस लौटि आए अऊर ''मर्यादा'' पत्रिका के संपादक बनिन। 1932 मा, उ ''कर्मभूमि'' शीर्षक से एक अउर उपन्यास प्रकाशित किहिन। उ संक्षेप मा काशी विद्यापीठ, एक स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर के रूप मा काम किहिन। स्कूल बंद होय के बाद, उ [[लखनऊ]] मा ''माधुरी'' पत्रिका के संपादक बने। <ref name="Giriraj2001" /> === बम्बई === प्रेमचंद 31 मई 1934 का हिंदी फिल्म उद्योग मा आपन किस्मत आजमावै [[मुम्बई|बम्बई]] पहुँचे। उ प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन के लिए पटकथा लेखन के नौकरी स्वीकार किहिन रहैं, ई उम्मीद मा कि ₹8,000 के सालाना वेतन से ओनके वित्तीय परेशानियन का दूर करै मा मदद मिली। उ दादर मा रहे, अऊर फिल्म ''मजदूर'' ("द लेबरर") के पटकथा लिखिन। मोहन भवानानी के निर्देशन मा बनी ई फिलिम मा मजदूर वर्ग के खराब हालात का देखावा गा रहा। फिल्म मा मजदूरन के नेता के रूप मा खुद प्रेमचंद कैमियो किहिन। कुछ प्रभावशाली व्यापारी बम्बई मा एकर रिलीज पर रोक लगावै मा कामयाब रहे। ई फिलिम लाहौर अउर दिल्ली मा रिलीज भै लेकिन मिल के मजदूरन का मालिकन के खिलाफ खड़ा होय के प्रेरणा देय के बाद फिर से प्रतिबंधित कीन गा। विडंबना ई है कि ई फिलिम [[वाराणसी|बनारस]] मा अपने घाटे वाले प्रेस के मजदूरन का वेतन न मिलै के बाद हड़ताल करै के लिए प्रेरित किहिस। 1934–35 तक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस ₹400 के भारी कर्ज मा रहा, अऊर प्रेमचंद का ''जागरण'' के प्रकाशन बंद करै का मजबूर कीन गा रहा। इसी बीच प्रेमचंद बम्बई फिल्म उद्योग के गैर-साहित्यिक व्यावसायिक माहौल का नापसंद करै लाग रहे, अउर बनारस लौटै चाहत रहे। हालांकि, उ प्रोडक्शन हाउस के साथे एक साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किहिन रहैं। एक साल पूरा होय से पहिले, उ अंततः 4 अप्रैल 1935 का बम्बई छोड़ दिहिन। बम्बई टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु रॉय प्रेमचंद का वापस रहै के लिए मनावै के कोशिश किहिन लेकिन असफल रहे। === आखिरी दिन === बम्बई छ्वाड़ै के बाद, प्रेमचंद [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] मा बसब चहति रहैं, जहाँ उनके लरिका श्रीपत राय अउर अमृत कुमार राय पढ़ति रहैं। उइ हुँवा ते ''हंस का'' प्रकाशित करै के योजना बनाइन। हालांकि, अपनि वित्तीय स्थिति द्याखत भए अऊर बीमार स्वास्थ्य के कारण, उनका ''हंस'' का इंडियन लिटरेरी काउंसल के हवाले करै का पड़ा अउर बनारस जाय का पड़ा। प्रेमचंद का 1936 मा लखनऊ मा प्रगतिशील लेखक संघ क्या पहिला अध्यक्ष चुना गा रहै <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> 8 अक्टूबर 1936 का कइयो दिनन की बीमारी के बाद पद पर रहतै रहत उनक्या निधन होइ गा। ''गोदान'' ( ''द गिफ्ट ऑफ ए काउ'', 1936), प्रेमचंद क्यार आखिरी पूरा कीन गा काम है, आम तौर पर यहिका उनके सबते श्रेष्ठ उपन्यास के रूप मा स्वीकार कीन जात है अउर सबते अच्छे हिंदी उपन्यासननौ मा गिना जात है। <ref>{{Cite web |last=Deepak |first=Sunil |title=Phanishwar Nath Renu |url=http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080313043341/http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |archive-date=13 March 2008 |access-date=25 August 2021 |website=Kalpana.it}}</ref> येहिका नायक, होरी, एक गरीब किसान, ग्रामीण भारत मा धन अउर प्रतिष्ठा के प्रतीक गाय के लिए तरसत देखावा गा है। सिगफ्राइड शुल्ज़ के अनुसार, " ''गोदान'' एक सुव्यवस्थित अउर सुसंतुलित उपन्यास है जउन पश्चिमी साहित्यिक मानक द्वारा स्थापित साहित्यिक आवश्यकतन का पर्याप्त रूप ते पूरा करत है।" [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ टैगोर]] जइसे अन्य समकालीन प्रसिद्ध लेखकन के विपरीत, प्रेमचंद के भारत ते बाहर बहुत सराहना नहीं कीन गै। शुल्ज़ का मानबु है कि यहिके कारण उनके काम के अच्छे अनुवादन क अभाव है। साथै, टैगोर अउर इकबाल के विपरीत, प्रेमचंद कबो भारत ते बाहर नहीं गें, विदेश मा पढ़ाई नहीं कीन्हेनि या प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक हस्तिन के साथै मिलैजुलै नहीं गें। 1936 मा प्रेमचंद जी "कफन" (" कफन ") नामक कहानी प्रकाशित कीन्हेनि, जेहिमा एक गरीब मनई अपनी मरी मेहेरिया के अंतिम संस्कार के खातिर पइसा इकट्ठा करत है लेकिन सब पइसा खावै पिएम उड़ा देत है। प्रेमचंदजी के आखिरी प्रकाशित कहानी "क्रिकेट मैच" रहै, जउन उनके मरै के बाद 1938 मा ''जमाना'' मा छपी रहै। pynvgb3sl8dfkxmqxb9gigeigtc2vhi 35212 35211 2026-07-06T08:33:14Z Avimaarak 3578 35212 wikitext text/x-wiki '''प्रेमचंद''' ([[३१ जुलाई]], [[१८८०]] - [[८ अक्टूबर]] [[१९३६]]) [[हिन्दी]] और [[उर्दू]] कय बढहन् भारतीय लेखक में से एक होयँ।मूल नावँ '''धनपत राय श्रीवास्तव''' वाले प्रेमचंद कय '''नवाब राय''' औ '''मुंशी प्रेमचंद''' कय नावँ से भी जाना जात है। जीवन परिचय === सुरुवाती जिंदगी === प्रेमचंद का जनम 31 जुलाई 1880 का [[वाराणसी|बनारस]] के लगे लमही नाँव के एक गाँव मा भा रहै। छुटपने मा उनका नाँव धनपत राय ("धन का स्वामी") रखा गा रहै। इनके पूर्वज बड़े चित्रगुप्तवंशी कायस्थ रहैं, जिनके लगे आठ ते नौ बिगहा जमीन रहै। इनके दादा गुरुसहायराय पटवारी (गाँव के जमीन के अभिलेख रखने वाले) रहैं अउर इनके पिता अजयबलाल डाकघर के चपरासी रहैं। इनकी महतारी आनंदी देवी करौनी गाँव की रहै वाली रहैं, जो संभवतः इनके "बड़े घर की बेटी" मा आनंदी किरदार के लिए इनकी प्रेरणौ रहीं। धनपत राय अजयब लाल और आनंदी की चौथे संतान रहैं; पहिले दुई बिटेवा रहैं मुला उइ छोटेहे मा मर गईं, अउर याक तीसर बिटेवा रहै जेहिका नाँव सामा रहै। उनके चाचा, महाबीर, एक अमीर जमींदार रहैं, वई उनका " नवाब " उपनाम दिहिन। "नवाब राय" धनपत राय जी द्वारा चुना गा पहिल उपनाम रहै। <ref name="amrit">{{Cite book|title=Premchand: A Life|last=Rai|first=Amrit|publisher=People's Publishing House|year=1982|location=New Delhi|translator-last=Trivedi|translator-first=Harish|author-link=Amrit Rai}}</ref> [[फाइल:Lamhi,_Varanasi.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल गेट, लमही, वाराणसी]] सात साल की उमर मा धनपत राय लमही के लगे लालपुर, [[वाराणसी]] के एक मदरसा मा अपनि शिक्षा शुरू किहिन। अउर मदरसा मा एक मौलवी ते उर्दू अउर फारसी सीखेनि । जब उइ 8 साल के रहैं, तब उनकी महतारी क्यार लंबी बीमारी के बाद निधन होइ गा। वहिके बादि उनकी दादी, उनका पालै-प्वासै के जिम्मेदारी लिहिन, मगर कुछ दिन बादि उनहुँन क देहावसान होइ गा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> मुंशी प्रेमचंद अलग-थलग महसूस करत रहे, काहे से कि उनकी बड़ी बहिन सुग्गी के शादी होइ चुकी रही, अऊर उनके पिताजी हमेशा काम मा व्यस्त रहत रहें। उनके पिता, जे अब [[गोरखपुर]] मा तैनात रहे, दुबारा शादी किहिन, लेकिन प्रेमचंद का उनकी सौतेली महतारी से बहुत कम स्नेह मिला। सौतेली महतारी बाद मा प्रेमचंद के रचना मा आवर्ती विषय बन गै। बचपनै मा धनपत राय के रुचि कथा उपन्यासन के प्रति होइ गै। तबहीं एक तमाखू वाले की दुकान पर उइ फारसी भासा के काल्पनिक महाकाव्य तिलिस्म ए दिलरुबा की कहानी सुनेनि। फिर एक थोक किताब विक्रेता खियां किताबै ब्यांचै का काम किहिन। ई काम मा उनका खुब किताबै पढ़ै का मौका मिला। उइ एक मिशनरी स्कूल मा अंग्रेजी सीखिन अउर जॉर्ज डब्ल्यूएम रेनॉल्ड्स के आठ खंडन के ''द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन'' सहित कथासाहित्य के कईयो कामन का अध्ययन किहिन। [[गोरखपुर]] मा अपनि पहिलि साहित्यिक रचना किहिन, जउन कबहूँ प्रकाशित नाइ भै औ अब खोय गै है। यो एक कुंवारे पर एक तमाशा रहै जो एक निम्न जाति की औरत ते प्यार करत है। यहु चरित्र प्रेमचंद के चाचा पर आधारित रहै, जो उनका कथा-साहित्य पढ़ै के जुनून के खातिर डांटत रहें; यो तमाशा शायद यहीके बदला के रूप मा लिखा गा रहै। <ref name="Gupta_1998_10" /> 1890 के दशक के मध्य मा अपने पिता के जमानिया मा तैनात होए के बाद, धनपत राय ने [[वाराणसी|बनारस]] के [[Queen's College Varanasi|क्वींस कॉलेज]] मा एक दिन के विद्वान के रूप मा दाखिला लिहिन। 1895 मा, जब उ नौवीं कक्षा मा पढ़त रहें, तब 15 साल के उमर मा उनकर बियाह होइ गवा। ई मैच उनके मातृक सौतेला दादा द्वारा आयोजित कीन गा रहा। ऊ लड़की एक अमीर जमींदार परिवार से रही अऊर प्रेमचंद से बड़ी रही, जे ओका झगड़ालू अऊर सुन्नर नाहीं पावत रही। <ref name="Gupta_1998_11" /> <ref name="Sigi_2006_17" /> लंबी बीमारी के बाद 1897 में उनके पिताजी का निधन होइ गवा। उ दूसरा वर्ग (60% अंक से नीचे) के साथ मैट्रिक परीक्षा पास करै में कामयाब रहे। हालांकि, क्वींस कॉलेज मा केवल पहिला संभाग वाले छात्रन का फीस रियायत दीन जात रही। तब उ सेंट्रल हिन्दू स्कूल मा दाखिला मांगिन लेकिन अंकगणित के कमजोर कौशल के कारण उ असफल रहे। यहि तरह, ओनका आपन पढ़ाई बंद करै का पड़ा। तब उइ बनारस मा एक अधिवक्ता के बेटवा का पांच रुपिया के मासिक वेतन मा कोचिंग देय का असाइनमेंट प्राप्त किहिन। ऊ अधिवक्ता के अस्तबल के ऊपर एक कीचड़ के कोठरी मा रहत रहा अऊर आपन वेतन का 60% घर वापस भेजत रहा। <ref name="Gupta_1998_12" /> इन दिनन मा प्रेमचंद खूब पढ़िन। कई कर्ज जमा करै के बाद, 1899 मा, उ आपन एकत्रित किताबन मा से एक का बेचै के लिए एक किताबन के दुकान मा गें। वहिमा, उ चुनार के एक मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर से मिले, जे ओनका ₹18 के मासिक वेतन पर एक शिक्षक के रूप मा नौकरी के पेशकश किहिन। <ref name="Gupta_1998_12" /> उ ₹5 के मासिक शुल्क पर एक छात्र का ट्यूशन पढ़ावै का काम भी लिहिन। 1900 मा, प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराइच मा ₹20 के मासिक वेतन पर सहायक शिक्षक के रूप मा नौकरी प्राप्त किहिन। तीन महीना बाद, उनका प्रतापगढ़ के जिला स्कूल मा स्थानांतरित कीन गा रहा, जहां उ एक प्रशासक के बंगला मा रहे अऊर अपने बेटवा का ट्यूशन पढ़ावत रहे। उनकर पहिला लघु उपन्यास ''असरार-ए-माबिद'' ("भगवान के निवास के रहस्य", हिंदी मा ''देवस्थान रहस्य'' ) रहा, जवन मंदिर के पुजारियन के बीच भ्रष्टाचार अऊर गरीब औरतन के यौन शोषण का पता लगावत है। ई उपन्यास बनारस स्थित उर्दू साप्ताहिक ''आवाज-ए-खलक'' मा 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक एक श्रृंखला मा प्रकाशित कीन गा रहा। साहित्यिक आलोचक सिगफ्राइड शुल्ज़ कहत हैं कि "उनके पहिला उपन्यास मा उनकर अनुभवहीनता काफी स्पष्ट है", जवन सुव्यवस्थित नाहीं है, एक अच्छा कथानक अऊर विशेषता के कमी है। प्रकाशचन्द्र गुप्ता इका "अपरिपक्व रचना" कहत हैं, जवन "जीवन का केवल काला या सफेद मा देखै" के प्रवृत्ति देखावत है। <ref name="Gupta_1998_13" /> === कानपुर प्रवास === प्रतापगढ़ से, धनपत राय का प्रशिक्षण के लिए [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] स्थानांतरित कीन गा रहा अऊर बाद मा 1905 मा कानपुर मा तैनात कीन गा रहा। उ लगभग चार साल तक कानपुर मा रहे, मई 1905 से जून 1909 तक। वहिजा, उ उर्दू पत्रिका ''[[Zamana (magazine)|जमाना]]'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम से मिले, जेहिमा उ बाद मा कईयो लेख अऊर कहानी प्रकाशित किहिन। प्रेमचंद गर्मी के छुट्टी मा अपने गांव लम्ही मा गये रहैं पै कइयौ कारन से रहैं का मजा नहीं आवा रहै। उनका मौसम या वातावरण लेखन के अनुकूल नाहीं लाग। यही से, अपनी पत्नी अऊर अपनी सौतेली महतारी के बीच झगड़ा के कारण उनका घरेलू परेशानी का सामना करै का पड़ा। प्रेमचन्द अपनी मेहरारू का गुस्सा मा डांटिन जब मेहरारू फांसी लगाय के आत्महत्या करै कै असफल कोशिश करिन। निराश होइके, ऊ अपने पिता के घरे चली गै, अऊर प्रेमचंद ओका वापस लावै मा कौनो दिलचस्पी नाहीं देखाइस। 1906 मा प्रेमचंद कय बियाह एक बाल विधवा शिवरानी देवी से भा, जवन फतेहपुर कय पास एक गाँव कय एक जमींदार कय बिटिया रही। <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=I2UnQES-79gC|title=The Illustrated Weekly of India|publisher=Published for the proprietors, Bennett, Coleman & Company, Limited, at the Times of India Press|year=1984|pages=68–69|access-date=17 May 2019}}</ref> ई कदम उ समय क्रांतिकारी माना जात रहा, अऊर प्रेमचंद का बहुत सामाजिक विरोध का सामना करै का पड़ा। इनके निधन के बाद शिवरानी देवी इनके ऊपर यक किताब लिखिन, जेकर शीर्षक रहा ''प्रेमचंद घर में'' ("घर पर प्रेमचंद")। 1905 मा, राष्ट्रवादी सक्रियता से प्रेरित होइके, प्रेमचंद ने ''जमाना'' मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले पर एक लेख प्रकाशित किहिन। उ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करै के लिए गोखले के तरीकन के आलोचना किहिन अऊर वहिके बजाय बाल गंगाधर तिलक द्वारा अपनाए गए अउर चरमपंथी उपायन का अपनावै के सिफारिश किहिन। प्रेमचंद कय पहिली प्रकाशित कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" ("दुनिया कय सबसे अनमोल गहना") रही, जवन 1907 मा ''जमाना'' मा छपी रही। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> यहि कहानी के अनुसार सबसे अनमोल 'रत्न' आजादी पावै कय खातिर आवश्यक खून कय आखिरी बूंद रहा। प्रेमचंद के कईयो शुरुआती लघुकथाओं मा देशभक्ति के सुर रहे, जवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> प्रेमचंद कै दुसरा लघु उपन्यास ''हमखुरमा-ओ-हमसवब'' (हिंदी मा ''प्रेमा'' ) 1907 मा प्रकाशित भा रहा, "बाबू नवाब राय बनारसी" नाम से लिखा गा रहा। ई समकालीन रूढ़िवादी समाज मा विधवा पुनर्विवाह के मुद्दा का पता लगावत है: नायक, अमृत राय, अपनी अमीर अऊर सुंदर मंगेतर प्रेमा का त्याग करत हुए, युवा विधवा, पूर्णा से शादी करै के सामाजिक विरोध का दूर करत है। प्रकाश चन्द्र गुप्ता के अनुसार, "कई मायनों मा उनके भविष्य के महानता के बीज समाहित करत हुए, उपन्यास अबहियों युवा है अऊर अनुशासन के कमी है जवन पूर्ण परिपक्वता लावत है"। सन १९०७ मा बनारस के मेडिकल हॉल प्रेस से प्रेमचंद कै एक अउर लघु उपन्यास ''किशना'' प्रकाशित भा। गहना के प्रति औरतन के लगाव पै व्यंग्य करै वाली ई 142 पन्नन कै रचना अब खो गै है। साहित्यिक आलोचक नोबत राय ने ''ज़माना'' मा काम के आलोचना किहिन, अऊर ईका महिलाओं के हालात का मजाक बताइन। अप्रैल-अगस्त 1907 के दौरान, प्रेमचंद के उपन्यास ''रूठी रानी'' ''जमाना'' मा धारावाहिक रूप मा प्रकाशित कीन गा रहा। साथै 1907 मा, ''जमाना'' के प्रकाशकन प्रेमचंद के पहिला लघुकथा संग्रह प्रकाशित किहिन, जेकर शीर्षक रहा ''सोज-ए-वतन'' । बाद मा प्रतिबंधित कीन गा संग्रह मा चार कहानी रहीं जवन भारतीयन का राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष मा प्रेरित करै के कोशिश करत रहीं। <ref name="Mohan2006">{{Cite book|title=[[Encyclopaedia of Indian Literature]]: Sasay to Zorgot|last=Lal|first=Mohan|publisher=[[Sahitya Akademi]]|year=2006|isbn=978-81-260-1221-3|volume=5|page=4149}}</ref> ==== प्रेमचंद नाम का अपनाना ==== सन १९०९ मा प्रेमचंद कै स्थानांतरण महोबा होइगा अउर बाद मा हमीरपुर मा स्कूलन के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पै लगावा गा। यहि समय के आसपास, ''सोज-ए-वतान का'' ब्रिटिश सरकार के अधिकारियन द्वारा देखल गै रहा, जे एकरा विद्रोही काम के रूप मा प्रतिबंधित कइ दिहिन। हमीरपुर जिला के ब्रिटिश कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवनसन ने प्रेमचंद के घर पर छापामारी का आदेश दिया, जहां ''सोज-ए-वतन'' के लगभग पाँच सौ प्रतियां जला दी गईं। <ref name="SahniPaliwal1980">{{Cite book|title=Prem Chand: A Tribute|last=Sahni|first=Bhisham|last2=Paliwal|first2=Om Prakash|publisher=Premchand Centenary Celebrations Committee|year=1980|author-link=Bhisham Sahni}}</ref> यहिके बाद उर्दू पत्रिका ''जमाना'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम, जे धनपत राय के पहिली कहानी " दुनिया का सबसे अनमोल रतन" छपवाये रहे, "प्रेमचंद" छद्म नाम के सलाह दिहिन। धनपत राय "नवाब राय" नाम लेब बन्द कइकै प्रेमचंद बनि गये। प्रेमचंद का अक्सर मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जात रहा। बात ई है कि वै कन्हैयालाल मुंशी के साथे हंस पत्रिका कै संपादन किहिन। क्रेडिट लाइन मा लिखा रहा "मुंशी, प्रेमचंद"। तब से उनका मुंशी प्रेमचंद कहा जाय लाग। <sup class="noprint Inline-Template Template-Fact" style="white-space:nowrap;">&#x5B; ''<nowiki><span title="This claim needs references to reliable sources. (November 2023)">citation needed</span></nowiki>'' &#x5D;</sup> 1914 मा, प्रेमचंद हिंदी मा लिखै लाग ( [[हिन्दी|हिंदी]] अऊर [[उर्दू]] का एक भाषा हिंदुस्तानी के अलग-अलग रजिस्टर माना जात है, जेहिमा हिंदी आपन बहुत शब्दावली [[संस्कृत]] से लेत है अऊर उर्दू फारसी से अधिक प्रभावित है)। यहि समय तक, उ उर्दू मा एक कथा लेखक के रूप मा पहिले से ही प्रतिष्ठित होइ चुका रहा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> सुमित सरकार नोट करत हैं कि उर्दू मा प्रकाशक ढूंढै के कठिनाई से स्विच प्रेरित कीन गा रहा। <ref name="Sarkar1983">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=x1uBQgAACAAJ|title=Modern India, 1885–1947|last=Sarkar|first=Sumit|publisher=Macmillan|year=1983|isbn=978-0-333-90425-1|pages=85–86|author-link=Sumit Sarkar}}</ref> उनकर पहिली हिन्दी कहानी "सौत" दिसम्बर 1915 मा ''सरस्वती'' पत्रिका मा प्रकाशित भै, अउर उनकर पहिला लघुकथा संग्रह ''सप्त सरोज'' जून 1917 मा प्रकाशित भा। === गोरखपुर === [[फाइल:Shilalekh.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद जी 1916 से 1921 तक [[गोरखपुर]] मा जहाँ रहत रहें, वहि झोपड़ी मा एक पट्टिका।]] अगस्त 1916 मा पदोन्नति पै प्रेमचन्द कै स्थानांतरण गोरखपुर कै दीन गा। उ [[गोरखपुर]] के नॉर्मल हाई स्कूल मा सहायक मास्टर बनिन। <ref name="Madan1964">{{Cite book|title=Munshi Premchand: A Literary Biography|last=Gopal|first=Madan|publisher=Asia Pub. House|year=1964|pages=114–117}}</ref> गोरखपुर मा, ओनके किताब बेचै वाले बुद्धि लाल से दोस्ती होइ गै, जे ओनका स्कूल मा परीक्षा क्रैम किताबन के बेचे के बदले मा पढ़ै के लिए उपन्यास उधार लेय के अनुमति दिहिन। प्रेमचंद अन्य भाषाओं के क्लासिक्स के उत्साही पाठक रहे अऊर इनमा से कईयो रचनाओं का हिंदी मा अनुवाद किहिन। सन १९१९ तक प्रेमचंद जी लगभग सौ-सौ पन्नन के चार उपन्यास प्रकाशित कइ चुके रहैं। सन १९१९ मा प्रेमचंद कै पहिला प्रमुख उपन्यास ''सेवा सदन'' हिन्दी मा प्रकाशित भा। ई उपन्यास मूल रूप से ''बाजार-ए-हुसन'' शीर्षक से उर्दू मा लिखा गा रहा लेकिन कलकत्ता स्थित एक प्रकाशक द्वारा सबसे पहिले हिंदी मा प्रकाशित कीन गा रहा, जे प्रेमचंद का उनके काम के लिए ₹450 पेशकश किहिन। [[लाहौर]] के उर्दू प्रकाशक ने बाद मा 1924 मा प्रेमचंद का ₹250 भुगतान कइके ई उपन्यास प्रकाशित किहिन। उपन्यास एक दुखी गृहिणी के कहानी बतावत है, जे पहिले एक दरबारी बन जात है, अऊर फिर दरबारी के जवान बिटियन के लिए एक अनाथालय का प्रबंधन करत है। ई आलोचकन द्वारा बहुत पसंद कीन गा अऊर प्रेमचंद का व्यापक पहचान पावै मा मदद मिली। 1919 मा प्रेमचंद [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] से बीए डिग्री प्राप्त किहिन। 1921 तक, उनका स्कूलन के उप निरीक्षक के रूप मा पदोन्नत कीन गा रहा। फरवरी 1921 का, उ गोरखपुर मा एक बैठक मा शामिल भए, जहां [[महात्मा गाँधी|महात्मा गांधी ने]] असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप मा लोगन से सरकारी नौकरियन से इस्तीफा देय का कहिन। प्रेमचंद, हालांकि शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे अऊर उनके पास दुई बच्चा अऊर एक गर्भवती पत्नी का समर्थन करै के लिए रहा, पांच दिन तक यहिके बारे मा सोचा अऊर अपनी पत्नी के सहमति से अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देय का फैसला किहिन। === बनारस वापसी === नौकरी छोड़ै के बाद प्रेमचंद 18 मार्च 1921 का गोरखपुर से बनारस चले गें अऊर अपने साहित्यिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करै का फैसला किहिन। 1936 मा अपनी मृत्यु तक, उनका गंभीर वित्तीय कठिनाइयन अऊर पुरानी बीमारी का सामना करै का पड़ा। <ref name="DavidRubin1994">{{Cite book|title=Masterworks of Asian Literature in Comparative Perspective: A Guide for Teaching|last=Rubin|first=David|publisher=[[M. E. Sharpe]]|year=1994|isbn=978-1-56324-258-8|editor-last=Miller|editor-first=Barbara Stoler|editor-link=Barbara Stoler Miller|pages=168–177|chapter=Short Stories of Premchand|author-link=David Rubin (writer)}}</ref> सन १९२३ मा बनारस मा यक छपाई औ प्रकाशन घर कै स्थापना किहिन जेहकै नाँव "सरस्वती प्रेस" रखिन। <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> सन 1924 मा प्रेमचंद के ''रंगभूमि'' का प्रकाशन भा, जेहिमा सूरदास नामक एक अंधा भिखारी दुखद नायक है। शुल्ज़ उल्लेख करत हैं कि ''रंगभूमि'' मा, प्रेमचंद एक "शानदार सामाजिक इतिहासकार" के रूप मा आवत हैं, अऊर यद्यपि उपन्यास मा कुछ "संरचनात्मक खामी" अऊर "बहुत सारा लेखकीय स्पष्टीकरण" हैं, ई प्रेमचंद के लेखन शैली मा "चिह्नित प्रगति" देखावत है। शुल्ज़ के अनुसार, ई ''निर्मला'' (1925) अऊर ''प्रतिज्ञा'' (1927) मा रहा कि प्रेमचंद का "एक संतुलित, यथार्थवादी स्तर" तक आपन रास्ता मिला जवन ओनके पहिले के कामन का पार करत है अऊर "अपने पाठकन का संरक्षण मा रखै" का प्रबंधन करत है। ''निर्मला'', भारत मा दहेज प्रणाली से संबंधित एक उपन्यास, एक उपन्यास के रूप मा प्रकाशित होए से पहिले नवंबर 1925 अऊर नवंबर 1926 के बीच ''चंद'' पत्रिका मा क्रमबद्ध कीन गा रहा। ''प्रतिज्ञा'' ("प्रतिज्ञा") विधवा पुनर्विवाह के विषय से निपटत रही। १९२८ मा मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित प्रेमचंद कै उपन्यास ''गबन'' ("गबन" छपा। मार्च 1930 मा, प्रेमचंद ''हंस'' शीर्षक से एक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका शुरू किहिन, जेकर उद्देश्य भारतीयन का ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुटावै के लिए प्रेरित करब रहा। अपने राजनीतिक रूप से भड़काऊ विचारन के लिए विख्यात पत्रिका मुनाफा कमाए में विफल रही। फिर प्रेमचंद ने काम संभाला अऊर ''जागरण नामक एक अउर पत्रिका का संपादन किहिन,'' जवन भी घाटे मा चलत रही। 1931 मा प्रेमचंद मारवाड़ी कालेज मा अध्यापक के रूप मा कानपुर चले गें पै कालेज प्रशासन से मतभेद होय के कारन छोड़ै का पड़ा। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> तब उ बनारस लौटि आए अऊर ''मर्यादा'' पत्रिका के संपादक बनिन। 1932 मा, उ ''कर्मभूमि'' शीर्षक से एक अउर उपन्यास प्रकाशित किहिन। उ संक्षेप मा काशी विद्यापीठ, एक स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर के रूप मा काम किहिन। स्कूल बंद होय के बाद, उ [[लखनऊ]] मा ''माधुरी'' पत्रिका के संपादक बने। <ref name="Giriraj2001" /> === बम्बई === प्रेमचंद 31 मई 1934 का हिंदी फिल्म उद्योग मा आपन किस्मत आजमावै [[मुम्बई|बम्बई]] पहुँचे। उ प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन के लिए पटकथा लेखन के नौकरी स्वीकार किहिन रहैं, ई उम्मीद मा कि ₹8,000 के सालाना वेतन से ओनके वित्तीय परेशानियन का दूर करै मा मदद मिली। उ दादर मा रहे, अऊर फिल्म ''मजदूर'' ("द लेबरर") के पटकथा लिखिन। मोहन भवानानी के निर्देशन मा बनी ई फिलिम मा मजदूर वर्ग के खराब हालात का देखावा गा रहा। फिल्म मा मजदूरन के नेता के रूप मा खुद प्रेमचंद कैमियो किहिन। कुछ प्रभावशाली व्यापारी बम्बई मा एकर रिलीज पर रोक लगावै मा कामयाब रहे। ई फिलिम लाहौर अउर दिल्ली मा रिलीज भै लेकिन मिल के मजदूरन का मालिकन के खिलाफ खड़ा होय के प्रेरणा देय के बाद फिर से प्रतिबंधित कीन गा। विडंबना ई है कि ई फिलिम [[वाराणसी|बनारस]] मा अपने घाटे वाले प्रेस के मजदूरन का वेतन न मिलै के बाद हड़ताल करै के लिए प्रेरित किहिस। 1934–35 तक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस ₹400 के भारी कर्ज मा रहा, अऊर प्रेमचंद का ''जागरण'' के प्रकाशन बंद करै का मजबूर कीन गा रहा। इसी बीच प्रेमचंद बम्बई फिल्म उद्योग के गैर-साहित्यिक व्यावसायिक माहौल का नापसंद करै लाग रहे, अउर बनारस लौटै चाहत रहे। हालांकि, उ प्रोडक्शन हाउस के साथे एक साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किहिन रहैं। एक साल पूरा होय से पहिले, उ अंततः 4 अप्रैल 1935 का बम्बई छोड़ दिहिन। बम्बई टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु रॉय प्रेमचंद का वापस रहै के लिए मनावै के कोशिश किहिन लेकिन असफल रहे। आखिरी दिन बम्बई छ्वाड़ै के बाद, प्रेमचंद [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] मा बसब चहति रहैं, जहाँ उनके लरिका श्रीपत राय अउर अमृत कुमार राय पढ़ति रहैं। उइ हुँवा ते ''हंस का'' प्रकाशित करै के योजना बनाइन। हालांकि, अपनि वित्तीय स्थिति द्याखत भए अऊर बीमार स्वास्थ्य के कारण, उनका ''हंस'' का इंडियन लिटरेरी काउंसल के हवाले करै का पड़ा अउर बनारस जाय का पड़ा। प्रेमचंद का 1936 मा लखनऊ मा प्रगतिशील लेखक संघ क्या पहिला अध्यक्ष चुना गा रहै <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> 8 अक्टूबर 1936 का कइयो दिनन की बीमारी के बाद पद पर रहतै रहत उनक्या निधन होइ गा। ''गोदान'' ( ''द गिफ्ट ऑफ ए काउ'', 1936), प्रेमचंद क्यार आखिरी पूरा कीन गा काम है, आम तौर पर यहिका उनके सबते श्रेष्ठ उपन्यास के रूप मा स्वीकार कीन जात है अउर सबते अच्छे हिंदी उपन्यासननौ मा गिना जात है। <ref>{{Cite web |last=Deepak |first=Sunil |title=Phanishwar Nath Renu |url=http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080313043341/http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |archive-date=13 March 2008 |access-date=25 August 2021 |website=Kalpana.it}}</ref> येहिका नायक, होरी, एक गरीब किसान, ग्रामीण भारत मा धन अउर प्रतिष्ठा के प्रतीक गाय के लिए तरसत देखावा गा है। सिगफ्राइड शुल्ज़ के अनुसार, " ''गोदान'' एक सुव्यवस्थित अउर सुसंतुलित उपन्यास है जउन पश्चिमी साहित्यिक मानक द्वारा स्थापित साहित्यिक आवश्यकतन का पर्याप्त रूप ते पूरा करत है।" [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ टैगोर]] जइसे अन्य समकालीन प्रसिद्ध लेखकन के विपरीत, प्रेमचंद के भारत ते बाहर बहुत सराहना नहीं कीन गै। शुल्ज़ का मानबु है कि यहिके कारण उनके काम के अच्छे अनुवादन क अभाव है। साथै, टैगोर अउर इकबाल के विपरीत, प्रेमचंद कबो भारत ते बाहर नहीं गें, विदेश मा पढ़ाई नहीं कीन्हेनि या प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक हस्तिन के साथै मिलैजुलै नहीं गें। 1936 मा प्रेमचंद जी "कफन" (" कफन ") नामक कहानी प्रकाशित कीन्हेनि, जेहिमा एक गरीब मनई अपनी मरी मेहेरिया के अंतिम संस्कार के खातिर पइसा इकट्ठा करत है लेकिन सब पइसा खावै पिएम उड़ा देत है। प्रेमचंदजी के आखिरी प्रकाशित कहानी "क्रिकेट मैच" रहै, जउन उनके मरै के बाद 1938 मा ''जमाना'' मा छपी रहै। ruofozziffp4icytt8oui89zbq1idhs 35214 35212 2026-07-06T08:48:42Z Avimaarak 3578 Added links 35214 wikitext text/x-wiki {{Infobox writer | name =प्रेमचंद | honorific_prefix = [[मुंशी]] | image = Premchand in 1930s.jpg | birth_name =धनपत राय श्रीवास्तव | birth_date =३१ जुलाई १८८० | birth_place = [[लमही]], [[बनारस रियासत]], [[ब्रिटिस राज|ब्रिटिस भारत]] (present-day [[उत्तर प्रदेश]], [[भारत]]) | death_date =८ अक्टूबर १९३६ | death_place = [[बनारस]],बनारस रियासत,अंग्रेजी राज (वर्तमान [वाराणसी]], उत्तर प्रदेश, भारत) | pseudonym =प्रेमचंद,नवाब राय | occupation =उपन्यासकार,कथाकार | language = [[हिंदी]], [[उर्दू]] | nationality = [[भारतीय जनसमुदाय|भारतीय]] | notableworks = ''[[गोदान]]'', ''[[बाज़ार-ए-हुस्न]]'', ''[[कर्मभूमि]]'', ''[[शतरंज के खिलाड़ी]]'', ''[[गबन (उपन्यास)|गबन]]'', ''मानसरोवर'', ''[[ईदगाह (कथा)|ईदगाह]]'' | spouse =अज्ञात({{abbr|वि.|विवाहित}}&nbsp;1895;तलाक), {{marriage|सिवरानी देवी|1906|1936|end=died}}<ref>{{Cite news |last=Kumar |first=Kuldeep|title=Not just Premchand's wife|date=6 February 2020 |work=The Hindu |url=https://www.thehindu.com/books/books-authors/not-just-premchands-wife/article30750280.ece |access-date=30 August 2021}}</ref> | children = [[अमृत राय]] | signature = Hastakshar premchand.jpg | years_active = 1920–1936 | caption =सन् १९३० ई. मा प्रेमचंद }} '''प्रेमचंद''' ([[३१ जुलाई]], [[१८८०]] - [[८ अक्टूबर]] [[१९३६]]) [[हिन्दी]] और [[उर्दू]] कय बढहन् भारतीय लेखक में से एक होयँ।मूल नावँ '''धनपत राय श्रीवास्तव''' वाले प्रेमचंद कय '''नवाब राय''' औ '''मुंशी प्रेमचंद''' कय नावँ से भी जाना जात है। जीवन परिचय === सुरुवाती जिंदगी === प्रेमचंद का जनम 31 जुलाई 1880 का [[वाराणसी|बनारस]] के लगे लमही नाँव के एक गाँव मा भा रहै। छुटपने मा उनका नाँव धनपत राय ("धन का स्वामी") रखा गा रहै। इनके पूर्वज बड़े चित्रगुप्तवंशी कायस्थ रहैं, जिनके लगे आठ ते नौ बिगहा जमीन रहै। इनके दादा गुरुसहायराय पटवारी (गाँव के जमीन के अभिलेख रखने वाले) रहैं अउर इनके पिता अजयबलाल डाकघर के चपरासी रहैं। इनकी महतारी आनंदी देवी करौनी गाँव की रहै वाली रहैं, जो संभवतः इनके "बड़े घर की बेटी" मा आनंदी किरदार के लिए इनकी प्रेरणौ रहीं। धनपत राय अजयब लाल और आनंदी की चौथे संतान रहैं; पहिले दुई बिटेवा रहैं मुला उइ छोटेहे मा मर गईं, अउर याक तीसर बिटेवा रहै जेहिका नाँव सामा रहै। उनके चाचा, महाबीर, एक अमीर जमींदार रहैं, वई उनका " नवाब " उपनाम दिहिन। "नवाब राय" धनपत राय जी द्वारा चुना गा पहिल उपनाम रहै। <ref name="amrit">{{Cite book|title=Premchand: A Life|last=Rai|first=Amrit|publisher=People's Publishing House|year=1982|location=New Delhi|translator-last=Trivedi|translator-first=Harish|author-link=Amrit Rai}}</ref> [[फाइल:Lamhi,_Varanasi.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल गेट, लमही, वाराणसी]] सात साल की उमर मा धनपत राय लमही के लगे लालपुर, [[वाराणसी]] के एक मदरसा मा अपनि शिक्षा शुरू किहिन। अउर मदरसा मा एक मौलवी ते उर्दू अउर फारसी सीखेनि । जब उइ 8 साल के रहैं, तब उनकी महतारी क्यार लंबी बीमारी के बाद निधन होइ गा। वहिके बादि उनकी दादी, उनका पालै-प्वासै के जिम्मेदारी लिहिन, मगर कुछ दिन बादि उनहुँन क देहावसान होइ गा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> मुंशी प्रेमचंद अलग-थलग महसूस करत रहे, काहे से कि उनकी बड़ी बहिन सुग्गी के शादी होइ चुकी रही, अऊर उनके पिताजी हमेशा काम मा व्यस्त रहत रहें। उनके पिता, जे अब [[गोरखपुर]] मा तैनात रहे, दुबारा शादी किहिन, लेकिन प्रेमचंद का उनकी सौतेली महतारी से बहुत कम स्नेह मिला। सौतेली महतारी बाद मा प्रेमचंद के रचना मा आवर्ती विषय बन गै। बचपनै मा धनपत राय के रुचि कथा उपन्यासन के प्रति होइ गै। तबहीं एक तमाखू वाले की दुकान पर उइ फारसी भासा के काल्पनिक महाकाव्य तिलिस्म ए दिलरुबा की कहानी सुनेनि। फिर एक थोक किताब विक्रेता खियां किताबै ब्यांचै का काम किहिन। ई काम मा उनका खुब किताबै पढ़ै का मौका मिला। उइ एक मिशनरी स्कूल मा अंग्रेजी सीखिन अउर जॉर्ज डब्ल्यूएम रेनॉल्ड्स के आठ खंडन के ''द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन'' सहित कथासाहित्य के कईयो कामन का अध्ययन किहिन। [[गोरखपुर]] मा अपनि पहिलि साहित्यिक रचना किहिन, जउन कबहूँ प्रकाशित नाइ भै औ अब खोय गै है। यो एक कुंवारे पर एक तमाशा रहै जो एक निम्न जाति की औरत ते प्यार करत है। यहु चरित्र प्रेमचंद के चाचा पर आधारित रहै, जो उनका कथा-साहित्य पढ़ै के जुनून के खातिर डांटत रहें; यो तमाशा शायद यहीके बदला के रूप मा लिखा गा रहै। <ref name="Gupta_1998_10" /> 1890 के दशक के मध्य मा अपने पिता के जमानिया मा तैनात होए के बाद, धनपत राय ने [[वाराणसी|बनारस]] के [[Queen's College Varanasi|क्वींस कॉलेज]] मा एक दिन के विद्वान के रूप मा दाखिला लिहिन। 1895 मा, जब उ नौवीं कक्षा मा पढ़त रहें, तब 15 साल के उमर मा उनकर बियाह होइ गवा। ई मैच उनके मातृक सौतेला दादा द्वारा आयोजित कीन गा रहा। ऊ लड़की एक अमीर जमींदार परिवार से रही अऊर प्रेमचंद से बड़ी रही, जे ओका झगड़ालू अऊर सुन्नर नाहीं पावत रही। <ref name="Gupta_1998_11" /> <ref name="Sigi_2006_17" /> लंबी बीमारी के बाद 1897 में उनके पिताजी का निधन होइ गवा। उ दूसरा वर्ग (60% अंक से नीचे) के साथ मैट्रिक परीक्षा पास करै में कामयाब रहे। हालांकि, क्वींस कॉलेज मा केवल पहिला संभाग वाले छात्रन का फीस रियायत दीन जात रही। तब उ सेंट्रल हिन्दू स्कूल मा दाखिला मांगिन लेकिन अंकगणित के कमजोर कौशल के कारण उ असफल रहे। यहि तरह, ओनका आपन पढ़ाई बंद करै का पड़ा। तब उइ बनारस मा एक अधिवक्ता के बेटवा का पांच रुपिया के मासिक वेतन मा कोचिंग देय का असाइनमेंट प्राप्त किहिन। ऊ अधिवक्ता के अस्तबल के ऊपर एक कीचड़ के कोठरी मा रहत रहा अऊर आपन वेतन का 60% घर वापस भेजत रहा। <ref name="Gupta_1998_12" /> इन दिनन मा प्रेमचंद खूब पढ़िन। कई कर्ज जमा करै के बाद, 1899 मा, उ आपन एकत्रित किताबन मा से एक का बेचै के लिए एक किताबन के दुकान मा गें। वहिमा, उ चुनार के एक मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर से मिले, जे ओनका ₹18 के मासिक वेतन पर एक शिक्षक के रूप मा नौकरी के पेशकश किहिन। <ref name="Gupta_1998_12" /> उ ₹5 के मासिक शुल्क पर एक छात्र का ट्यूशन पढ़ावै का काम भी लिहिन। 1900 मा, प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराइच मा ₹20 के मासिक वेतन पर सहायक शिक्षक के रूप मा नौकरी प्राप्त किहिन। तीन महीना बाद, उनका प्रतापगढ़ के जिला स्कूल मा स्थानांतरित कीन गा रहा, जहां उ एक प्रशासक के बंगला मा रहे अऊर अपने बेटवा का ट्यूशन पढ़ावत रहे। उनकर पहिला लघु उपन्यास ''असरार-ए-माबिद'' ("भगवान के निवास के रहस्य", हिंदी मा ''देवस्थान रहस्य'' ) रहा, जवन मंदिर के पुजारियन के बीच भ्रष्टाचार अऊर गरीब औरतन के यौन शोषण का पता लगावत है। ई उपन्यास बनारस स्थित उर्दू साप्ताहिक ''आवाज-ए-खलक'' मा 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक एक श्रृंखला मा प्रकाशित कीन गा रहा। साहित्यिक आलोचक सिगफ्राइड शुल्ज़ कहत हैं कि "उनके पहिला उपन्यास मा उनकर अनुभवहीनता काफी स्पष्ट है", जवन सुव्यवस्थित नाहीं है, एक अच्छा कथानक अऊर विशेषता के कमी है। प्रकाशचन्द्र गुप्ता इका "अपरिपक्व रचना" कहत हैं, जवन "जीवन का केवल काला या सफेद मा देखै" के प्रवृत्ति देखावत है। <ref name="Gupta_1998_13" /> === कानपुर प्रवास === प्रतापगढ़ से, धनपत राय का प्रशिक्षण के लिए [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] स्थानांतरित कीन गा रहा अऊर बाद मा 1905 मा कानपुर मा तैनात कीन गा रहा। उ लगभग चार साल तक कानपुर मा रहे, मई 1905 से जून 1909 तक। वहिजा, उ उर्दू पत्रिका ''[[Zamana (magazine)|जमाना]]'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम से मिले, जेहिमा उ बाद मा कईयो लेख अऊर कहानी प्रकाशित किहिन। प्रेमचंद गर्मी के छुट्टी मा अपने गांव लम्ही मा गये रहैं पै कइयौ कारन से रहैं का मजा नहीं आवा रहै। उनका मौसम या वातावरण लेखन के अनुकूल नाहीं लाग। यही से, अपनी पत्नी अऊर अपनी सौतेली महतारी के बीच झगड़ा के कारण उनका घरेलू परेशानी का सामना करै का पड़ा। प्रेमचन्द अपनी मेहरारू का गुस्सा मा डांटिन जब मेहरारू फांसी लगाय के आत्महत्या करै कै असफल कोशिश करिन। निराश होइके, ऊ अपने पिता के घरे चली गै, अऊर प्रेमचंद ओका वापस लावै मा कौनो दिलचस्पी नाहीं देखाइस। 1906 मा प्रेमचंद कय बियाह एक बाल विधवा शिवरानी देवी से भा, जवन फतेहपुर कय पास एक गाँव कय एक जमींदार कय बिटिया रही। <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=I2UnQES-79gC|title=The Illustrated Weekly of India|publisher=Published for the proprietors, Bennett, Coleman & Company, Limited, at the Times of India Press|year=1984|pages=68–69|access-date=17 May 2019}}</ref> ई कदम उ समय क्रांतिकारी माना जात रहा, अऊर प्रेमचंद का बहुत सामाजिक विरोध का सामना करै का पड़ा। इनके निधन के बाद शिवरानी देवी इनके ऊपर यक किताब लिखिन, जेकर शीर्षक रहा ''प्रेमचंद घर में'' ("घर पर प्रेमचंद")। 1905 मा, राष्ट्रवादी सक्रियता से प्रेरित होइके, प्रेमचंद ने ''जमाना'' मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले पर एक लेख प्रकाशित किहिन। उ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करै के लिए गोखले के तरीकन के आलोचना किहिन अऊर वहिके बजाय बाल गंगाधर तिलक द्वारा अपनाए गए अउर चरमपंथी उपायन का अपनावै के सिफारिश किहिन। प्रेमचंद कय पहिली प्रकाशित कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" ("दुनिया कय सबसे अनमोल गहना") रही, जवन 1907 मा ''जमाना'' मा छपी रही। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> यहि कहानी के अनुसार सबसे अनमोल 'रत्न' आजादी पावै कय खातिर आवश्यक खून कय आखिरी बूंद रहा। प्रेमचंद के कईयो शुरुआती लघुकथाओं मा देशभक्ति के सुर रहे, जवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> प्रेमचंद कै दुसरा लघु उपन्यास ''हमखुरमा-ओ-हमसवब'' (हिंदी मा ''प्रेमा'' ) 1907 मा प्रकाशित भा रहा, "बाबू नवाब राय बनारसी" नाम से लिखा गा रहा। ई समकालीन रूढ़िवादी समाज मा विधवा पुनर्विवाह के मुद्दा का पता लगावत है: नायक, अमृत राय, अपनी अमीर अऊर सुंदर मंगेतर प्रेमा का त्याग करत हुए, युवा विधवा, पूर्णा से शादी करै के सामाजिक विरोध का दूर करत है। प्रकाश चन्द्र गुप्ता के अनुसार, "कई मायनों मा उनके भविष्य के महानता के बीज समाहित करत हुए, उपन्यास अबहियों युवा है अऊर अनुशासन के कमी है जवन पूर्ण परिपक्वता लावत है"। सन १९०७ मा बनारस के मेडिकल हॉल प्रेस से प्रेमचंद कै एक अउर लघु उपन्यास ''किशना'' प्रकाशित भा। गहना के प्रति औरतन के लगाव पै व्यंग्य करै वाली ई 142 पन्नन कै रचना अब खो गै है। साहित्यिक आलोचक नोबत राय ने ''ज़माना'' मा काम के आलोचना किहिन, अऊर ईका महिलाओं के हालात का मजाक बताइन। अप्रैल-अगस्त 1907 के दौरान, प्रेमचंद के उपन्यास ''रूठी रानी'' ''जमाना'' मा धारावाहिक रूप मा प्रकाशित कीन गा रहा। साथै 1907 मा, ''जमाना'' के प्रकाशकन प्रेमचंद के पहिला लघुकथा संग्रह प्रकाशित किहिन, जेकर शीर्षक रहा ''सोज-ए-वतन'' । बाद मा प्रतिबंधित कीन गा संग्रह मा चार कहानी रहीं जवन भारतीयन का राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष मा प्रेरित करै के कोशिश करत रहीं। <ref name="Mohan2006">{{Cite book|title=[[Encyclopaedia of Indian Literature]]: Sasay to Zorgot|last=Lal|first=Mohan|publisher=[[Sahitya Akademi]]|year=2006|isbn=978-81-260-1221-3|volume=5|page=4149}}</ref> ==== प्रेमचंद नाम का अपनाना ==== सन १९०९ मा प्रेमचंद कै स्थानांतरण महोबा होइगा अउर बाद मा हमीरपुर मा स्कूलन के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पै लगावा गा। यहि समय के आसपास, ''सोज-ए-वतान का'' ब्रिटिश सरकार के अधिकारियन द्वारा देखल गै रहा, जे एकरा विद्रोही काम के रूप मा प्रतिबंधित कइ दिहिन। हमीरपुर जिला के ब्रिटिश कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवनसन ने प्रेमचंद के घर पर छापामारी का आदेश दिया, जहां ''सोज-ए-वतन'' के लगभग पाँच सौ प्रतियां जला दी गईं। <ref name="SahniPaliwal1980">{{Cite book|title=Prem Chand: A Tribute|last=Sahni|first=Bhisham|last2=Paliwal|first2=Om Prakash|publisher=Premchand Centenary Celebrations Committee|year=1980|author-link=Bhisham Sahni}}</ref> यहिके बाद उर्दू पत्रिका ''जमाना'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम, जे धनपत राय के पहिली कहानी " दुनिया का सबसे अनमोल रतन" छपवाये रहे, "प्रेमचंद" छद्म नाम के सलाह दिहिन। धनपत राय "नवाब राय" नाम लेब बन्द कइकै प्रेमचंद बनि गये। प्रेमचंद का अक्सर मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जात रहा। बात ई है कि वै कन्हैयालाल मुंशी के साथे हंस पत्रिका कै संपादन किहिन। क्रेडिट लाइन मा लिखा रहा "मुंशी, प्रेमचंद"। तब से उनका मुंशी प्रेमचंद कहा जाय लाग। <sup class="noprint Inline-Template Template-Fact" style="white-space:nowrap;">&#x5B; ''<nowiki><span title="This claim needs references to reliable sources. (November 2023)">citation needed</span></nowiki>'' &#x5D;</sup> 1914 मा, प्रेमचंद हिंदी मा लिखै लाग ( [[हिन्दी|हिंदी]] अऊर [[उर्दू]] का एक भाषा हिंदुस्तानी के अलग-अलग रजिस्टर माना जात है, जेहिमा हिंदी आपन बहुत शब्दावली [[संस्कृत]] से लेत है अऊर उर्दू फारसी से अधिक प्रभावित है)। यहि समय तक, उ उर्दू मा एक कथा लेखक के रूप मा पहिले से ही प्रतिष्ठित होइ चुका रहा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> सुमित सरकार नोट करत हैं कि उर्दू मा प्रकाशक ढूंढै के कठिनाई से स्विच प्रेरित कीन गा रहा। <ref name="Sarkar1983">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=x1uBQgAACAAJ|title=Modern India, 1885–1947|last=Sarkar|first=Sumit|publisher=Macmillan|year=1983|isbn=978-0-333-90425-1|pages=85–86|author-link=Sumit Sarkar}}</ref> उनकर पहिली हिन्दी कहानी "सौत" दिसम्बर 1915 मा ''सरस्वती'' पत्रिका मा प्रकाशित भै, अउर उनकर पहिला लघुकथा संग्रह ''सप्त सरोज'' जून 1917 मा प्रकाशित भा। === गोरखपुर === [[फाइल:Shilalekh.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद जी 1916 से 1921 तक [[गोरखपुर]] मा जहाँ रहत रहें, वहि झोपड़ी मा एक पट्टिका।]] अगस्त 1916 मा पदोन्नति पै प्रेमचन्द कै स्थानांतरण गोरखपुर कै दीन गा। उ [[गोरखपुर]] के नॉर्मल हाई स्कूल मा सहायक मास्टर बनिन। <ref name="Madan1964">{{Cite book|title=Munshi Premchand: A Literary Biography|last=Gopal|first=Madan|publisher=Asia Pub. House|year=1964|pages=114–117}}</ref> गोरखपुर मा, ओनके किताब बेचै वाले बुद्धि लाल से दोस्ती होइ गै, जे ओनका स्कूल मा परीक्षा क्रैम किताबन के बेचे के बदले मा पढ़ै के लिए उपन्यास उधार लेय के अनुमति दिहिन। प्रेमचंद अन्य भाषाओं के क्लासिक्स के उत्साही पाठक रहे अऊर इनमा से कईयो रचनाओं का हिंदी मा अनुवाद किहिन। सन १९१९ तक प्रेमचंद जी लगभग सौ-सौ पन्नन के चार उपन्यास प्रकाशित कइ चुके रहैं। सन १९१९ मा प्रेमचंद कै पहिला प्रमुख उपन्यास ''सेवा सदन'' हिन्दी मा प्रकाशित भा। ई उपन्यास मूल रूप से ''बाजार-ए-हुसन'' शीर्षक से उर्दू मा लिखा गा रहा लेकिन कलकत्ता स्थित एक प्रकाशक द्वारा सबसे पहिले हिंदी मा प्रकाशित कीन गा रहा, जे प्रेमचंद का उनके काम के लिए ₹450 पेशकश किहिन। [[लाहौर]] के उर्दू प्रकाशक ने बाद मा 1924 मा प्रेमचंद का ₹250 भुगतान कइके ई उपन्यास प्रकाशित किहिन। उपन्यास एक दुखी गृहिणी के कहानी बतावत है, जे पहिले एक दरबारी बन जात है, अऊर फिर दरबारी के जवान बिटियन के लिए एक अनाथालय का प्रबंधन करत है। ई आलोचकन द्वारा बहुत पसंद कीन गा अऊर प्रेमचंद का व्यापक पहचान पावै मा मदद मिली। 1919 मा प्रेमचंद [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] से बीए डिग्री प्राप्त किहिन। 1921 तक, उनका स्कूलन के उप निरीक्षक के रूप मा पदोन्नत कीन गा रहा। फरवरी 1921 का, उ गोरखपुर मा एक बैठक मा शामिल भए, जहां [[महात्मा गाँधी|महात्मा गांधी ने]] असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप मा लोगन से सरकारी नौकरियन से इस्तीफा देय का कहिन। प्रेमचंद, हालांकि शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे अऊर उनके पास दुई बच्चा अऊर एक गर्भवती पत्नी का समर्थन करै के लिए रहा, पांच दिन तक यहिके बारे मा सोचा अऊर अपनी पत्नी के सहमति से अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देय का फैसला किहिन। === बनारस वापसी === नौकरी छोड़ै के बाद प्रेमचंद 18 मार्च 1921 का गोरखपुर से बनारस चले गें अऊर अपने साहित्यिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करै का फैसला किहिन। 1936 मा अपनी मृत्यु तक, उनका गंभीर वित्तीय कठिनाइयन अऊर पुरानी बीमारी का सामना करै का पड़ा। <ref name="DavidRubin1994">{{Cite book|title=Masterworks of Asian Literature in Comparative Perspective: A Guide for Teaching|last=Rubin|first=David|publisher=[[M. E. Sharpe]]|year=1994|isbn=978-1-56324-258-8|editor-last=Miller|editor-first=Barbara Stoler|editor-link=Barbara Stoler Miller|pages=168–177|chapter=Short Stories of Premchand|author-link=David Rubin (writer)}}</ref> सन १९२३ मा बनारस मा यक छपाई औ प्रकाशन घर कै स्थापना किहिन जेहकै नाँव "सरस्वती प्रेस" रखिन। <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> सन 1924 मा प्रेमचंद के ''रंगभूमि'' का प्रकाशन भा, जेहिमा सूरदास नामक एक अंधा भिखारी दुखद नायक है। शुल्ज़ उल्लेख करत हैं कि ''रंगभूमि'' मा, प्रेमचंद एक "शानदार सामाजिक इतिहासकार" के रूप मा आवत हैं, अऊर यद्यपि उपन्यास मा कुछ "संरचनात्मक खामी" अऊर "बहुत सारा लेखकीय स्पष्टीकरण" हैं, ई प्रेमचंद के लेखन शैली मा "चिह्नित प्रगति" देखावत है। शुल्ज़ के अनुसार, ई ''निर्मला'' (1925) अऊर ''प्रतिज्ञा'' (1927) मा रहा कि प्रेमचंद का "एक संतुलित, यथार्थवादी स्तर" तक आपन रास्ता मिला जवन ओनके पहिले के कामन का पार करत है अऊर "अपने पाठकन का संरक्षण मा रखै" का प्रबंधन करत है। ''निर्मला'', भारत मा दहेज प्रणाली से संबंधित एक उपन्यास, एक उपन्यास के रूप मा प्रकाशित होए से पहिले नवंबर 1925 अऊर नवंबर 1926 के बीच ''चंद'' पत्रिका मा क्रमबद्ध कीन गा रहा। ''प्रतिज्ञा'' ("प्रतिज्ञा") विधवा पुनर्विवाह के विषय से निपटत रही। १९२८ मा मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित प्रेमचंद कै उपन्यास ''गबन'' ("गबन" छपा। मार्च 1930 मा, प्रेमचंद ''हंस'' शीर्षक से एक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका शुरू किहिन, जेकर उद्देश्य भारतीयन का ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुटावै के लिए प्रेरित करब रहा। अपने राजनीतिक रूप से भड़काऊ विचारन के लिए विख्यात पत्रिका मुनाफा कमाए में विफल रही। फिर प्रेमचंद ने काम संभाला अऊर ''जागरण नामक एक अउर पत्रिका का संपादन किहिन,'' जवन भी घाटे मा चलत रही। 1931 मा प्रेमचंद मारवाड़ी कालेज मा अध्यापक के रूप मा कानपुर चले गें पै कालेज प्रशासन से मतभेद होय के कारन छोड़ै का पड़ा। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> तब उ बनारस लौटि आए अऊर ''मर्यादा'' पत्रिका के संपादक बनिन। 1932 मा, उ ''कर्मभूमि'' शीर्षक से एक अउर उपन्यास प्रकाशित किहिन। उ संक्षेप मा काशी विद्यापीठ, एक स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर के रूप मा काम किहिन। स्कूल बंद होय के बाद, उ [[लखनऊ]] मा ''माधुरी'' पत्रिका के संपादक बने। <ref name="Giriraj2001" /> === बम्बई === प्रेमचंद 31 मई 1934 का हिंदी फिल्म उद्योग मा आपन किस्मत आजमावै [[मुम्बई|बम्बई]] पहुँचे। उ प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन के लिए पटकथा लेखन के नौकरी स्वीकार किहिन रहैं, ई उम्मीद मा कि ₹8,000 के सालाना वेतन से ओनके वित्तीय परेशानियन का दूर करै मा मदद मिली। उ दादर मा रहे, अऊर फिल्म ''मजदूर'' ("द लेबरर") के पटकथा लिखिन। मोहन भवानानी के निर्देशन मा बनी ई फिलिम मा मजदूर वर्ग के खराब हालात का देखावा गा रहा। फिल्म मा मजदूरन के नेता के रूप मा खुद प्रेमचंद कैमियो किहिन। कुछ प्रभावशाली व्यापारी बम्बई मा एकर रिलीज पर रोक लगावै मा कामयाब रहे। ई फिलिम लाहौर अउर दिल्ली मा रिलीज भै लेकिन मिल के मजदूरन का मालिकन के खिलाफ खड़ा होय के प्रेरणा देय के बाद फिर से प्रतिबंधित कीन गा। विडंबना ई है कि ई फिलिम [[वाराणसी|बनारस]] मा अपने घाटे वाले प्रेस के मजदूरन का वेतन न मिलै के बाद हड़ताल करै के लिए प्रेरित किहिस। 1934–35 तक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस ₹400 के भारी कर्ज मा रहा, अऊर प्रेमचंद का ''जागरण'' के प्रकाशन बंद करै का मजबूर कीन गा रहा। इसी बीच प्रेमचंद बम्बई फिल्म उद्योग के गैर-साहित्यिक व्यावसायिक माहौल का नापसंद करै लाग रहे, अउर बनारस लौटै चाहत रहे। हालांकि, उ प्रोडक्शन हाउस के साथे एक साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किहिन रहैं। एक साल पूरा होय से पहिले, उ अंततः 4 अप्रैल 1935 का बम्बई छोड़ दिहिन। बम्बई टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु रॉय प्रेमचंद का वापस रहै के लिए मनावै के कोशिश किहिन लेकिन असफल रहे। आखिरी दिन बम्बई छ्वाड़ै के बाद, प्रेमचंद [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] मा बसब चहति रहैं, जहाँ उनके लरिका श्रीपत राय अउर अमृत कुमार राय पढ़ति रहैं। उइ हुँवा ते ''हंस का'' प्रकाशित करै के योजना बनाइन। हालांकि, अपनि वित्तीय स्थिति द्याखत भए अऊर बीमार स्वास्थ्य के कारण, उनका ''हंस'' का इंडियन लिटरेरी काउंसल के हवाले करै का पड़ा अउर बनारस जाय का पड़ा। प्रेमचंद का 1936 मा लखनऊ मा प्रगतिशील लेखक संघ क्या पहिला अध्यक्ष चुना गा रहै <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> 8 अक्टूबर 1936 का कइयो दिनन की बीमारी के बाद पद पर रहतै रहत उनक्या निधन होइ गा। ''गोदान'' ( ''द गिफ्ट ऑफ ए काउ'', 1936), प्रेमचंद क्यार आखिरी पूरा कीन गा काम है, आम तौर पर यहिका उनके सबते श्रेष्ठ उपन्यास के रूप मा स्वीकार कीन जात है अउर सबते अच्छे हिंदी उपन्यासननौ मा गिना जात है। <ref>{{Cite web |last=Deepak |first=Sunil |title=Phanishwar Nath Renu |url=http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080313043341/http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |archive-date=13 March 2008 |access-date=25 August 2021 |website=Kalpana.it}}</ref> येहिका नायक, होरी, एक गरीब किसान, ग्रामीण भारत मा धन अउर प्रतिष्ठा के प्रतीक गाय के लिए तरसत देखावा गा है। सिगफ्राइड शुल्ज़ के अनुसार, " ''गोदान'' एक सुव्यवस्थित अउर सुसंतुलित उपन्यास है जउन पश्चिमी साहित्यिक मानक द्वारा स्थापित साहित्यिक आवश्यकतन का पर्याप्त रूप ते पूरा करत है।" [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ टैगोर]] जइसे अन्य समकालीन प्रसिद्ध लेखकन के विपरीत, प्रेमचंद के भारत ते बाहर बहुत सराहना नहीं कीन गै। शुल्ज़ का मानबु है कि यहिके कारण उनके काम के अच्छे अनुवादन क अभाव है। साथै, टैगोर अउर इकबाल के विपरीत, प्रेमचंद कबो भारत ते बाहर नहीं गें, विदेश मा पढ़ाई नहीं कीन्हेनि या प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक हस्तिन के साथै मिलैजुलै नहीं गें। 1936 मा प्रेमचंद जी "कफन" (" कफन ") नामक कहानी प्रकाशित कीन्हेनि, जेहिमा एक गरीब मनई अपनी मरी मेहेरिया के अंतिम संस्कार के खातिर पइसा इकट्ठा करत है लेकिन सब पइसा खावै पिएम उड़ा देत है। प्रेमचंदजी के आखिरी प्रकाशित कहानी "क्रिकेट मैच" रहै, जउन उनके मरै के बाद 1938 मा ''जमाना'' मा छपी रहै। ==सन्दर्भ== sj0irs2wu8517x4jbng0siwyr58bm0v 35215 35214 2026-07-06T09:00:05Z Avimaarak 3578 35215 wikitext text/x-wiki {{Infobox writer | name =प्रेमचंद | honorific_prefix = [[मुंशी]] | image = Premchand in 1930s.jpg | birth_name =धनपत राय श्रीवास्तव | birth_date =३१ जुलाई १८८० | birth_place = [[लमही]], [[बनारस रियासत]], [[ब्रिटिस राज|ब्रिटिस भारत]] (present-day [[उत्तर प्रदेश]], [[भारत]]) | death_date =८ अक्टूबर १९३६ | death_place = [[बनारस]],बनारस रियासत,अंग्रेजी राज (वर्तमान [वाराणसी]], उत्तर प्रदेश, भारत) | pseudonym =प्रेमचंद,नवाब राय | occupation =उपन्यासकार,कथाकार | language = [[हिंदी]], [[उर्दू]] | nationality = [[भारतीय जनसमुदाय|भारतीय]] | notableworks = ''[[गोदान]]'', ''[[बाज़ार-ए-हुस्न]]'', ''[[कर्मभूमि]]'', ''[[शतरंज के खिलाड़ी]]'', ''[[गबन (उपन्यास)|गबन]]'', ''मानसरोवर'', ''[[ईदगाह (कथा)|ईदगाह]]'' | spouse =अज्ञात({{abbr|वि.|विवाहित}}&nbsp;1895;तलाक), {{marriage|सिवरानी देवी|1906|1936|end=died}}<ref>{{Cite news |last=Kumar |first=Kuldeep|title=Not just Premchand's wife|date=6 February 2020 |work=The Hindu |url=https://www.thehindu.com/books/books-authors/not-just-premchands-wife/article30750280.ece |access-date=30 August 2021}}</ref> | children = [[अमृत राय]] | signature = Hastakshar premchand.jpg | years_active = 1920–1936 | caption =सन् १९३० ई. मा प्रेमचंद }} '''प्रेमचंद''' ([[३१ जुलाई]], [[१८८०]] - [[८ अक्टूबर]] [[१९३६]])({{IPA|hns|preːm t͡ʃənd̪|उच्चारण|Premchand.ogg}})[[हिन्दी]] और [[उर्दू]] कय बढहन् भारतीय लेखक में से एक होयँ।मूल नावँ '''धनपत राय श्रीवास्तव''' वाले प्रेमचंद कय '''नवाब राय''' औ '''मुंशी प्रेमचंद''' कय नावँ से भी जाना जात है। जीवन परिचय === सुरुवाती जिंदगी === प्रेमचंद का जनम 31 जुलाई 1880 का [[वाराणसी|बनारस]] के लगे लमही नाँव के एक गाँव मा भा रहै। छुटपने मा उनका नाँव धनपत राय ("धन का स्वामी") रखा गा रहै। इनके पूर्वज बड़े चित्रगुप्तवंशी कायस्थ रहैं, जिनके लगे आठ ते नौ बिगहा जमीन रहै। इनके दादा गुरुसहायराय पटवारी (गाँव के जमीन के अभिलेख रखने वाले) रहैं अउर इनके पिता अजयबलाल डाकघर के चपरासी रहैं। इनकी महतारी आनंदी देवी करौनी गाँव की रहै वाली रहैं, जो संभवतः इनके "बड़े घर की बेटी" मा आनंदी किरदार के लिए इनकी प्रेरणौ रहीं। धनपत राय अजयब लाल और आनंदी की चौथे संतान रहैं; पहिले दुई बिटेवा रहैं मुला उइ छोटेहे मा मर गईं, अउर याक तीसर बिटेवा रहै जेहिका नाँव सामा रहै। उनके चाचा, महाबीर, एक अमीर जमींदार रहैं, वई उनका " नवाब " उपनाम दिहिन। "नवाब राय" धनपत राय जी द्वारा चुना गा पहिल उपनाम रहै। <ref name="amrit">{{Cite book|title=Premchand: A Life|last=Rai|first=Amrit|publisher=People's Publishing House|year=1982|location=New Delhi|translator-last=Trivedi|translator-first=Harish|author-link=Amrit Rai}}</ref> [[फाइल:Lamhi,_Varanasi.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल गेट, लमही, वाराणसी]] सात साल की उमर मा धनपत राय लमही के लगे लालपुर, [[वाराणसी]] के एक मदरसा मा अपनि शिक्षा शुरू किहिन। अउर मदरसा मा एक मौलवी ते उर्दू अउर फारसी सीखेनि । जब उइ 8 साल के रहैं, तब उनकी महतारी क्यार लंबी बीमारी के बाद निधन होइ गा। वहिके बादि उनकी दादी, उनका पालै-प्वासै के जिम्मेदारी लिहिन, मगर कुछ दिन बादि उनहुँन क देहावसान होइ गा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> मुंशी प्रेमचंद अलग-थलग महसूस करत रहे, काहे से कि उनकी बड़ी बहिन सुग्गी के शादी होइ चुकी रही, अऊर उनके पिताजी हमेशा काम मा व्यस्त रहत रहें। उनके पिता, जे अब [[गोरखपुर]] मा तैनात रहे, दुबारा शादी किहिन, लेकिन प्रेमचंद का उनकी सौतेली महतारी से बहुत कम स्नेह मिला। सौतेली महतारी बाद मा प्रेमचंद के रचना मा आवर्ती विषय बन गै। बचपनै मा धनपत राय के रुचि कथा उपन्यासन के प्रति होइ गै। तबहीं एक तमाखू वाले की दुकान पर उइ फारसी भासा के काल्पनिक महाकाव्य तिलिस्म ए दिलरुबा की कहानी सुनेनि। फिर एक थोक किताब विक्रेता खियां किताबै ब्यांचै का काम किहिन। ई काम मा उनका खुब किताबै पढ़ै का मौका मिला। उइ एक मिशनरी स्कूल मा अंग्रेजी सीखिन अउर जॉर्ज डब्ल्यूएम रेनॉल्ड्स के आठ खंडन के ''द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन'' सहित कथासाहित्य के कईयो कामन का अध्ययन किहिन। [[गोरखपुर]] मा अपनि पहिलि साहित्यिक रचना किहिन, जउन कबहूँ प्रकाशित नाइ भै औ अब खोय गै है। यो एक कुंवारे पर एक तमाशा रहै जो एक निम्न जाति की औरत ते प्यार करत है। यहु चरित्र प्रेमचंद के चाचा पर आधारित रहै, जो उनका कथा-साहित्य पढ़ै के जुनून के खातिर डांटत रहें; यो तमाशा शायद यहीके बदला के रूप मा लिखा गा रहै। <ref name="Gupta_1998_10" /> 1890 के दशक के मध्य मा अपने पिता के जमानिया मा तैनात होए के बाद, धनपत राय ने [[वाराणसी|बनारस]] के [[Queen's College Varanasi|क्वींस कॉलेज]] मा एक दिन के विद्वान के रूप मा दाखिला लिहिन। 1895 मा, जब उ नौवीं कक्षा मा पढ़त रहें, तब 15 साल के उमर मा उनकर बियाह होइ गवा। ई मैच उनके मातृक सौतेला दादा द्वारा आयोजित कीन गा रहा। ऊ लड़की एक अमीर जमींदार परिवार से रही अऊर प्रेमचंद से बड़ी रही, जे ओका झगड़ालू अऊर सुन्नर नाहीं पावत रही। <ref name="Gupta_1998_11" /> <ref name="Sigi_2006_17" /> लंबी बीमारी के बाद 1897 में उनके पिताजी का निधन होइ गवा। उ दूसरा वर्ग (60% अंक से नीचे) के साथ मैट्रिक परीक्षा पास करै में कामयाब रहे। हालांकि, क्वींस कॉलेज मा केवल पहिला संभाग वाले छात्रन का फीस रियायत दीन जात रही। तब उ सेंट्रल हिन्दू स्कूल मा दाखिला मांगिन लेकिन अंकगणित के कमजोर कौशल के कारण उ असफल रहे। यहि तरह, ओनका आपन पढ़ाई बंद करै का पड़ा। तब उइ बनारस मा एक अधिवक्ता के बेटवा का पांच रुपिया के मासिक वेतन मा कोचिंग देय का असाइनमेंट प्राप्त किहिन। ऊ अधिवक्ता के अस्तबल के ऊपर एक कीचड़ के कोठरी मा रहत रहा अऊर आपन वेतन का 60% घर वापस भेजत रहा। <ref name="Gupta_1998_12" /> इन दिनन मा प्रेमचंद खूब पढ़िन। कई कर्ज जमा करै के बाद, 1899 मा, उ आपन एकत्रित किताबन मा से एक का बेचै के लिए एक किताबन के दुकान मा गें। वहिमा, उ चुनार के एक मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर से मिले, जे ओनका ₹18 के मासिक वेतन पर एक शिक्षक के रूप मा नौकरी के पेशकश किहिन। <ref name="Gupta_1998_12" /> उ ₹5 के मासिक शुल्क पर एक छात्र का ट्यूशन पढ़ावै का काम भी लिहिन। 1900 मा, प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराइच मा ₹20 के मासिक वेतन पर सहायक शिक्षक के रूप मा नौकरी प्राप्त किहिन। तीन महीना बाद, उनका प्रतापगढ़ के जिला स्कूल मा स्थानांतरित कीन गा रहा, जहां उ एक प्रशासक के बंगला मा रहे अऊर अपने बेटवा का ट्यूशन पढ़ावत रहे। उनकर पहिला लघु उपन्यास ''असरार-ए-माबिद'' ("भगवान के निवास के रहस्य", हिंदी मा ''देवस्थान रहस्य'' ) रहा, जवन मंदिर के पुजारियन के बीच भ्रष्टाचार अऊर गरीब औरतन के यौन शोषण का पता लगावत है। ई उपन्यास बनारस स्थित उर्दू साप्ताहिक ''आवाज-ए-खलक'' मा 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक एक श्रृंखला मा प्रकाशित कीन गा रहा। साहित्यिक आलोचक सिगफ्राइड शुल्ज़ कहत हैं कि "उनके पहिला उपन्यास मा उनकर अनुभवहीनता काफी स्पष्ट है", जवन सुव्यवस्थित नाहीं है, एक अच्छा कथानक अऊर विशेषता के कमी है। प्रकाशचन्द्र गुप्ता इका "अपरिपक्व रचना" कहत हैं, जवन "जीवन का केवल काला या सफेद मा देखै" के प्रवृत्ति देखावत है। <ref name="Gupta_1998_13" /> === कानपुर प्रवास === प्रतापगढ़ से, धनपत राय का प्रशिक्षण के लिए [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] स्थानांतरित कीन गा रहा अऊर बाद मा 1905 मा कानपुर मा तैनात कीन गा रहा। उ लगभग चार साल तक कानपुर मा रहे, मई 1905 से जून 1909 तक। वहिजा, उ उर्दू पत्रिका ''[[Zamana (magazine)|जमाना]]'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम से मिले, जेहिमा उ बाद मा कईयो लेख अऊर कहानी प्रकाशित किहिन। प्रेमचंद गर्मी के छुट्टी मा अपने गांव लम्ही मा गये रहैं पै कइयौ कारन से रहैं का मजा नहीं आवा रहै। उनका मौसम या वातावरण लेखन के अनुकूल नाहीं लाग। यही से, अपनी पत्नी अऊर अपनी सौतेली महतारी के बीच झगड़ा के कारण उनका घरेलू परेशानी का सामना करै का पड़ा। प्रेमचन्द अपनी मेहरारू का गुस्सा मा डांटिन जब मेहरारू फांसी लगाय के आत्महत्या करै कै असफल कोशिश करिन। निराश होइके, ऊ अपने पिता के घरे चली गै, अऊर प्रेमचंद ओका वापस लावै मा कौनो दिलचस्पी नाहीं देखाइस। 1906 मा प्रेमचंद कय बियाह एक बाल विधवा शिवरानी देवी से भा, जवन फतेहपुर कय पास एक गाँव कय एक जमींदार कय बिटिया रही। <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=I2UnQES-79gC|title=The Illustrated Weekly of India|publisher=Published for the proprietors, Bennett, Coleman & Company, Limited, at the Times of India Press|year=1984|pages=68–69|access-date=17 May 2019}}</ref> ई कदम उ समय क्रांतिकारी माना जात रहा, अऊर प्रेमचंद का बहुत सामाजिक विरोध का सामना करै का पड़ा। इनके निधन के बाद शिवरानी देवी इनके ऊपर यक किताब लिखिन, जेकर शीर्षक रहा ''प्रेमचंद घर में'' ("घर पर प्रेमचंद")। 1905 मा, राष्ट्रवादी सक्रियता से प्रेरित होइके, प्रेमचंद ने ''जमाना'' मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले पर एक लेख प्रकाशित किहिन। उ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करै के लिए गोखले के तरीकन के आलोचना किहिन अऊर वहिके बजाय बाल गंगाधर तिलक द्वारा अपनाए गए अउर चरमपंथी उपायन का अपनावै के सिफारिश किहिन। प्रेमचंद कय पहिली प्रकाशित कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" ("दुनिया कय सबसे अनमोल गहना") रही, जवन 1907 मा ''जमाना'' मा छपी रही। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> यहि कहानी के अनुसार सबसे अनमोल 'रत्न' आजादी पावै कय खातिर आवश्यक खून कय आखिरी बूंद रहा। प्रेमचंद के कईयो शुरुआती लघुकथाओं मा देशभक्ति के सुर रहे, जवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> प्रेमचंद कै दुसरा लघु उपन्यास ''हमखुरमा-ओ-हमसवब'' (हिंदी मा ''प्रेमा'' ) 1907 मा प्रकाशित भा रहा, "बाबू नवाब राय बनारसी" नाम से लिखा गा रहा। ई समकालीन रूढ़िवादी समाज मा विधवा पुनर्विवाह के मुद्दा का पता लगावत है: नायक, अमृत राय, अपनी अमीर अऊर सुंदर मंगेतर प्रेमा का त्याग करत हुए, युवा विधवा, पूर्णा से शादी करै के सामाजिक विरोध का दूर करत है। प्रकाश चन्द्र गुप्ता के अनुसार, "कई मायनों मा उनके भविष्य के महानता के बीज समाहित करत हुए, उपन्यास अबहियों युवा है अऊर अनुशासन के कमी है जवन पूर्ण परिपक्वता लावत है"। सन १९०७ मा बनारस के मेडिकल हॉल प्रेस से प्रेमचंद कै एक अउर लघु उपन्यास ''किशना'' प्रकाशित भा। गहना के प्रति औरतन के लगाव पै व्यंग्य करै वाली ई 142 पन्नन कै रचना अब खो गै है। साहित्यिक आलोचक नोबत राय ने ''ज़माना'' मा काम के आलोचना किहिन, अऊर ईका महिलाओं के हालात का मजाक बताइन। अप्रैल-अगस्त 1907 के दौरान, प्रेमचंद के उपन्यास ''रूठी रानी'' ''जमाना'' मा धारावाहिक रूप मा प्रकाशित कीन गा रहा। साथै 1907 मा, ''जमाना'' के प्रकाशकन प्रेमचंद के पहिला लघुकथा संग्रह प्रकाशित किहिन, जेकर शीर्षक रहा ''सोज-ए-वतन'' । बाद मा प्रतिबंधित कीन गा संग्रह मा चार कहानी रहीं जवन भारतीयन का राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष मा प्रेरित करै के कोशिश करत रहीं। <ref name="Mohan2006">{{Cite book|title=[[Encyclopaedia of Indian Literature]]: Sasay to Zorgot|last=Lal|first=Mohan|publisher=[[Sahitya Akademi]]|year=2006|isbn=978-81-260-1221-3|volume=5|page=4149}}</ref> ==== प्रेमचंद नाम का अपनाना ==== सन १९०९ मा प्रेमचंद कै स्थानांतरण महोबा होइगा अउर बाद मा हमीरपुर मा स्कूलन के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पै लगावा गा। यहि समय के आसपास, ''सोज-ए-वतान का'' ब्रिटिश सरकार के अधिकारियन द्वारा देखल गै रहा, जे एकरा विद्रोही काम के रूप मा प्रतिबंधित कइ दिहिन। हमीरपुर जिला के ब्रिटिश कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवनसन ने प्रेमचंद के घर पर छापामारी का आदेश दिया, जहां ''सोज-ए-वतन'' के लगभग पाँच सौ प्रतियां जला दी गईं। <ref name="SahniPaliwal1980">{{Cite book|title=Prem Chand: A Tribute|last=Sahni|first=Bhisham|last2=Paliwal|first2=Om Prakash|publisher=Premchand Centenary Celebrations Committee|year=1980|author-link=Bhisham Sahni}}</ref> यहिके बाद उर्दू पत्रिका ''जमाना'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम, जे धनपत राय के पहिली कहानी " दुनिया का सबसे अनमोल रतन" छपवाये रहे, "प्रेमचंद" छद्म नाम के सलाह दिहिन। धनपत राय "नवाब राय" नाम लेब बन्द कइकै प्रेमचंद बनि गये। प्रेमचंद का अक्सर मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जात रहा। बात ई है कि वै कन्हैयालाल मुंशी के साथे हंस पत्रिका कै संपादन किहिन। क्रेडिट लाइन मा लिखा रहा "मुंशी, प्रेमचंद"। तब से उनका मुंशी प्रेमचंद कहा जाय लाग। <sup class="noprint Inline-Template Template-Fact" style="white-space:nowrap;">&#x5B; ''<nowiki><span title="This claim needs references to reliable sources. (November 2023)">citation needed</span></nowiki>'' &#x5D;</sup> 1914 मा, प्रेमचंद हिंदी मा लिखै लाग ( [[हिन्दी|हिंदी]] अऊर [[उर्दू]] का एक भाषा हिंदुस्तानी के अलग-अलग रजिस्टर माना जात है, जेहिमा हिंदी आपन बहुत शब्दावली [[संस्कृत]] से लेत है अऊर उर्दू फारसी से अधिक प्रभावित है)। यहि समय तक, उ उर्दू मा एक कथा लेखक के रूप मा पहिले से ही प्रतिष्ठित होइ चुका रहा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> सुमित सरकार नोट करत हैं कि उर्दू मा प्रकाशक ढूंढै के कठिनाई से स्विच प्रेरित कीन गा रहा। <ref name="Sarkar1983">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=x1uBQgAACAAJ|title=Modern India, 1885–1947|last=Sarkar|first=Sumit|publisher=Macmillan|year=1983|isbn=978-0-333-90425-1|pages=85–86|author-link=Sumit Sarkar}}</ref> उनकर पहिली हिन्दी कहानी "सौत" दिसम्बर 1915 मा ''सरस्वती'' पत्रिका मा प्रकाशित भै, अउर उनकर पहिला लघुकथा संग्रह ''सप्त सरोज'' जून 1917 मा प्रकाशित भा। === गोरखपुर === [[फाइल:Shilalekh.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद जी 1916 से 1921 तक [[गोरखपुर]] मा जहाँ रहत रहें, वहि झोपड़ी मा एक पट्टिका।]] अगस्त 1916 मा पदोन्नति पै प्रेमचन्द कै स्थानांतरण गोरखपुर कै दीन गा। उ [[गोरखपुर]] के नॉर्मल हाई स्कूल मा सहायक मास्टर बनिन। <ref name="Madan1964">{{Cite book|title=Munshi Premchand: A Literary Biography|last=Gopal|first=Madan|publisher=Asia Pub. House|year=1964|pages=114–117}}</ref> गोरखपुर मा, ओनके किताब बेचै वाले बुद्धि लाल से दोस्ती होइ गै, जे ओनका स्कूल मा परीक्षा क्रैम किताबन के बेचे के बदले मा पढ़ै के लिए उपन्यास उधार लेय के अनुमति दिहिन। प्रेमचंद अन्य भाषाओं के क्लासिक्स के उत्साही पाठक रहे अऊर इनमा से कईयो रचनाओं का हिंदी मा अनुवाद किहिन। सन १९१९ तक प्रेमचंद जी लगभग सौ-सौ पन्नन के चार उपन्यास प्रकाशित कइ चुके रहैं। सन १९१९ मा प्रेमचंद कै पहिला प्रमुख उपन्यास ''सेवा सदन'' हिन्दी मा प्रकाशित भा। ई उपन्यास मूल रूप से ''बाजार-ए-हुसन'' शीर्षक से उर्दू मा लिखा गा रहा लेकिन कलकत्ता स्थित एक प्रकाशक द्वारा सबसे पहिले हिंदी मा प्रकाशित कीन गा रहा, जे प्रेमचंद का उनके काम के लिए ₹450 पेशकश किहिन। [[लाहौर]] के उर्दू प्रकाशक ने बाद मा 1924 मा प्रेमचंद का ₹250 भुगतान कइके ई उपन्यास प्रकाशित किहिन। उपन्यास एक दुखी गृहिणी के कहानी बतावत है, जे पहिले एक दरबारी बन जात है, अऊर फिर दरबारी के जवान बिटियन के लिए एक अनाथालय का प्रबंधन करत है। ई आलोचकन द्वारा बहुत पसंद कीन गा अऊर प्रेमचंद का व्यापक पहचान पावै मा मदद मिली। 1919 मा प्रेमचंद [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] से बीए डिग्री प्राप्त किहिन। 1921 तक, उनका स्कूलन के उप निरीक्षक के रूप मा पदोन्नत कीन गा रहा। फरवरी 1921 का, उ गोरखपुर मा एक बैठक मा शामिल भए, जहां [[महात्मा गाँधी|महात्मा गांधी ने]] असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप मा लोगन से सरकारी नौकरियन से इस्तीफा देय का कहिन। प्रेमचंद, हालांकि शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे अऊर उनके पास दुई बच्चा अऊर एक गर्भवती पत्नी का समर्थन करै के लिए रहा, पांच दिन तक यहिके बारे मा सोचा अऊर अपनी पत्नी के सहमति से अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देय का फैसला किहिन। === बनारस वापसी === नौकरी छोड़ै के बाद प्रेमचंद 18 मार्च 1921 का गोरखपुर से बनारस चले गें अऊर अपने साहित्यिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करै का फैसला किहिन। 1936 मा अपनी मृत्यु तक, उनका गंभीर वित्तीय कठिनाइयन अऊर पुरानी बीमारी का सामना करै का पड़ा। <ref name="DavidRubin1994">{{Cite book|title=Masterworks of Asian Literature in Comparative Perspective: A Guide for Teaching|last=Rubin|first=David|publisher=[[M. E. Sharpe]]|year=1994|isbn=978-1-56324-258-8|editor-last=Miller|editor-first=Barbara Stoler|editor-link=Barbara Stoler Miller|pages=168–177|chapter=Short Stories of Premchand|author-link=David Rubin (writer)}}</ref> सन १९२३ मा बनारस मा यक छपाई औ प्रकाशन घर कै स्थापना किहिन जेहकै नाँव "सरस्वती प्रेस" रखिन। <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> सन 1924 मा प्रेमचंद के ''रंगभूमि'' का प्रकाशन भा, जेहिमा सूरदास नामक एक अंधा भिखारी दुखद नायक है। शुल्ज़ उल्लेख करत हैं कि ''रंगभूमि'' मा, प्रेमचंद एक "शानदार सामाजिक इतिहासकार" के रूप मा आवत हैं, अऊर यद्यपि उपन्यास मा कुछ "संरचनात्मक खामी" अऊर "बहुत सारा लेखकीय स्पष्टीकरण" हैं, ई प्रेमचंद के लेखन शैली मा "चिह्नित प्रगति" देखावत है। शुल्ज़ के अनुसार, ई ''निर्मला'' (1925) अऊर ''प्रतिज्ञा'' (1927) मा रहा कि प्रेमचंद का "एक संतुलित, यथार्थवादी स्तर" तक आपन रास्ता मिला जवन ओनके पहिले के कामन का पार करत है अऊर "अपने पाठकन का संरक्षण मा रखै" का प्रबंधन करत है। ''निर्मला'', भारत मा दहेज प्रणाली से संबंधित एक उपन्यास, एक उपन्यास के रूप मा प्रकाशित होए से पहिले नवंबर 1925 अऊर नवंबर 1926 के बीच ''चंद'' पत्रिका मा क्रमबद्ध कीन गा रहा। ''प्रतिज्ञा'' ("प्रतिज्ञा") विधवा पुनर्विवाह के विषय से निपटत रही। १९२८ मा मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित प्रेमचंद कै उपन्यास ''गबन'' ("गबन" छपा। मार्च 1930 मा, प्रेमचंद ''हंस'' शीर्षक से एक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका शुरू किहिन, जेकर उद्देश्य भारतीयन का ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुटावै के लिए प्रेरित करब रहा। अपने राजनीतिक रूप से भड़काऊ विचारन के लिए विख्यात पत्रिका मुनाफा कमाए में विफल रही। फिर प्रेमचंद ने काम संभाला अऊर ''जागरण नामक एक अउर पत्रिका का संपादन किहिन,'' जवन भी घाटे मा चलत रही। 1931 मा प्रेमचंद मारवाड़ी कालेज मा अध्यापक के रूप मा कानपुर चले गें पै कालेज प्रशासन से मतभेद होय के कारन छोड़ै का पड़ा। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> तब उ बनारस लौटि आए अऊर ''मर्यादा'' पत्रिका के संपादक बनिन। 1932 मा, उ ''कर्मभूमि'' शीर्षक से एक अउर उपन्यास प्रकाशित किहिन। उ संक्षेप मा काशी विद्यापीठ, एक स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर के रूप मा काम किहिन। स्कूल बंद होय के बाद, उ [[लखनऊ]] मा ''माधुरी'' पत्रिका के संपादक बने। <ref name="Giriraj2001" /> === बम्बई === प्रेमचंद 31 मई 1934 का हिंदी फिल्म उद्योग मा आपन किस्मत आजमावै [[मुम्बई|बम्बई]] पहुँचे। उ प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन के लिए पटकथा लेखन के नौकरी स्वीकार किहिन रहैं, ई उम्मीद मा कि ₹8,000 के सालाना वेतन से ओनके वित्तीय परेशानियन का दूर करै मा मदद मिली। उ दादर मा रहे, अऊर फिल्म ''मजदूर'' ("द लेबरर") के पटकथा लिखिन। मोहन भवानानी के निर्देशन मा बनी ई फिलिम मा मजदूर वर्ग के खराब हालात का देखावा गा रहा। फिल्म मा मजदूरन के नेता के रूप मा खुद प्रेमचंद कैमियो किहिन। कुछ प्रभावशाली व्यापारी बम्बई मा एकर रिलीज पर रोक लगावै मा कामयाब रहे। ई फिलिम लाहौर अउर दिल्ली मा रिलीज भै लेकिन मिल के मजदूरन का मालिकन के खिलाफ खड़ा होय के प्रेरणा देय के बाद फिर से प्रतिबंधित कीन गा। विडंबना ई है कि ई फिलिम [[वाराणसी|बनारस]] मा अपने घाटे वाले प्रेस के मजदूरन का वेतन न मिलै के बाद हड़ताल करै के लिए प्रेरित किहिस। 1934–35 तक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस ₹400 के भारी कर्ज मा रहा, अऊर प्रेमचंद का ''जागरण'' के प्रकाशन बंद करै का मजबूर कीन गा रहा। इसी बीच प्रेमचंद बम्बई फिल्म उद्योग के गैर-साहित्यिक व्यावसायिक माहौल का नापसंद करै लाग रहे, अउर बनारस लौटै चाहत रहे। हालांकि, उ प्रोडक्शन हाउस के साथे एक साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किहिन रहैं। एक साल पूरा होय से पहिले, उ अंततः 4 अप्रैल 1935 का बम्बई छोड़ दिहिन। बम्बई टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु रॉय प्रेमचंद का वापस रहै के लिए मनावै के कोशिश किहिन लेकिन असफल रहे। आखिरी दिन बम्बई छ्वाड़ै के बाद, प्रेमचंद [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] मा बसब चहति रहैं, जहाँ उनके लरिका श्रीपत राय अउर अमृत कुमार राय पढ़ति रहैं। उइ हुँवा ते ''हंस का'' प्रकाशित करै के योजना बनाइन। हालांकि, अपनि वित्तीय स्थिति द्याखत भए अऊर बीमार स्वास्थ्य के कारण, उनका ''हंस'' का इंडियन लिटरेरी काउंसल के हवाले करै का पड़ा अउर बनारस जाय का पड़ा। प्रेमचंद का 1936 मा लखनऊ मा प्रगतिशील लेखक संघ क्या पहिला अध्यक्ष चुना गा रहै <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> 8 अक्टूबर 1936 का कइयो दिनन की बीमारी के बाद पद पर रहतै रहत उनक्या निधन होइ गा। ''गोदान'' ( ''द गिफ्ट ऑफ ए काउ'', 1936), प्रेमचंद क्यार आखिरी पूरा कीन गा काम है, आम तौर पर यहिका उनके सबते श्रेष्ठ उपन्यास के रूप मा स्वीकार कीन जात है अउर सबते अच्छे हिंदी उपन्यासननौ मा गिना जात है। <ref>{{Cite web |last=Deepak |first=Sunil |title=Phanishwar Nath Renu |url=http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080313043341/http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |archive-date=13 March 2008 |access-date=25 August 2021 |website=Kalpana.it}}</ref> येहिका नायक, होरी, एक गरीब किसान, ग्रामीण भारत मा धन अउर प्रतिष्ठा के प्रतीक गाय के लिए तरसत देखावा गा है। सिगफ्राइड शुल्ज़ के अनुसार, " ''गोदान'' एक सुव्यवस्थित अउर सुसंतुलित उपन्यास है जउन पश्चिमी साहित्यिक मानक द्वारा स्थापित साहित्यिक आवश्यकतन का पर्याप्त रूप ते पूरा करत है।" [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ टैगोर]] जइसे अन्य समकालीन प्रसिद्ध लेखकन के विपरीत, प्रेमचंद के भारत ते बाहर बहुत सराहना नहीं कीन गै। शुल्ज़ का मानबु है कि यहिके कारण उनके काम के अच्छे अनुवादन क अभाव है। साथै, टैगोर अउर इकबाल के विपरीत, प्रेमचंद कबो भारत ते बाहर नहीं गें, विदेश मा पढ़ाई नहीं कीन्हेनि या प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक हस्तिन के साथै मिलैजुलै नहीं गें। 1936 मा प्रेमचंद जी "कफन" (" कफन ") नामक कहानी प्रकाशित कीन्हेनि, जेहिमा एक गरीब मनई अपनी मरी मेहेरिया के अंतिम संस्कार के खातिर पइसा इकट्ठा करत है लेकिन सब पइसा खावै पिएम उड़ा देत है। प्रेमचंदजी के आखिरी प्रकाशित कहानी "क्रिकेट मैच" रहै, जउन उनके मरै के बाद 1938 मा ''जमाना'' मा छपी रहै। ==सन्दर्भ== 3ihg6ytdckcuuj5yws6nherw9js86i2 35216 35215 2026-07-06T09:58:22Z Avimaarak 3578 35216 wikitext text/x-wiki {{Infobox writer | name =प्रेमचंद | honorific_prefix = [[मुंशी]] | image = Premchand in 1930s.jpg | birth_name =धनपत राय श्रीवास्तव | birth_date =३१ जुलाई १८८० | birth_place = [[लमही]], [[बनारस रियासत]], [[ब्रिटिस राज|ब्रिटिस भारत]] (वर्तमान [[उत्तर प्रदेश]], [[भारत]]) | death_date =८ अक्टूबर १९३६ | death_place = [[बनारस]],बनारस रियासत,अंग्रेजी राज (वर्तमान [[वाराणसी]], उत्तर प्रदेश, भारत) | pseudonym =प्रेमचंद,नवाब राय | occupation =उपन्यासकार,कथाकार | language = [[हिंदी]], [[उर्दू]] | nationality = [[भारतीय जनसमुदाय|भारतीय]] | notableworks = ''[[गोदान]]'', ''[[बाज़ार-ए-हुस्न]]'', ''[[कर्मभूमि]]'', ''[[शतरंज के खिलाड़ी]]'', ''[[गबन (उपन्यास)|गबन]]'', ''मानसरोवर'', ''[[ईदगाह (कथा)|ईदगाह]]'' | spouse 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प्रेमचंद जी दर्जन भर ते अधिक उपन्यास अउर ३०० ते ज्यादे कहानिन के रचना करिन। उनके अनेक उपन्यास अउर कहानिन का विदेसी भासन मा अनुवाद भा है। जीवन परिचय === सुरुवाती जिंदगी === प्रेमचंद का जनम 31 जुलाई 1880 का [[वाराणसी|बनारस]] के लगे लमही नाँव के एक गाँव मा भा रहै। छुटपने मा उनका नाँव धनपत राय ("धन का स्वामी") रखा गा रहै। इनके पूर्वज बड़े चित्रगुप्तवंशी कायस्थ रहैं, जिनके लगे आठ ते नौ बिगहा जमीन रहै। इनके दादा गुरुसहायराय पटवारी (गाँव के जमीन के अभिलेख रखने वाले) रहैं अउर इनके पिता अजयबलाल डाकघर के चपरासी रहैं। इनकी महतारी आनंदी देवी करौनी गाँव की रहै वाली रहैं, जो संभवतः इनके "बड़े घर की बेटी" मा आनंदी किरदार के लिए इनकी प्रेरणौ रहीं। धनपत राय अजयब लाल और आनंदी की चौथे संतान रहैं; पहिले दुई बिटेवा रहैं मुला उइ छोटेहे मा मर गईं, अउर याक तीसर बिटेवा रहै जेहिका नाँव सामा रहै। उनके चाचा, महाबीर, एक अमीर जमींदार रहैं, वई उनका " नवाब " उपनाम दिहिन। "नवाब राय" धनपत राय जी द्वारा चुना गा पहिल उपनाम रहै। <ref name="amrit">{{Cite book|title=Premchand: A Life|last=Rai|first=Amrit|publisher=People's Publishing House|year=1982|location=New Delhi|translator-last=Trivedi|translator-first=Harish|author-link=Amrit Rai}}</ref> [[फाइल:Lamhi,_Varanasi.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल गेट, लमही, वाराणसी]] सात साल की उमर मा धनपत राय लमही के लगे लालपुर, [[वाराणसी]] के एक मदरसा मा अपनि शिक्षा शुरू किहिन। अउर मदरसा मा एक मौलवी ते उर्दू अउर फारसी सीखेनि । जब उइ 8 साल के रहैं, तब उनकी महतारी क्यार लंबी बीमारी के बाद निधन होइ गा। वहिके बादि उनकी दादी, उनका पालै-प्वासै के जिम्मेदारी लिहिन, मगर कुछ दिन बादि उनहुँन क देहावसान होइ गा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> मुंशी प्रेमचंद अलग-थलग महसूस करत रहे, काहे से कि उनकी बड़ी बहिन सुग्गी के शादी होइ चुकी रही, अऊर उनके पिताजी हमेशा काम मा व्यस्त रहत रहें। उनके पिता, जे अब [[गोरखपुर]] मा तैनात रहे, दुबारा शादी किहिन, लेकिन प्रेमचंद का उनकी सौतेली महतारी से बहुत कम स्नेह मिला। सौतेली महतारी बाद मा प्रेमचंद के रचना मा आवर्ती विषय बन गै। बचपनै मा धनपत राय के रुचि कथा उपन्यासन के प्रति होइ गै। तबहीं एक तमाखू वाले की दुकान पर उइ फारसी भासा के काल्पनिक महाकाव्य तिलिस्म ए दिलरुबा की कहानी सुनेनि। फिर एक थोक किताब विक्रेता खियां किताबै ब्यांचै का काम किहिन। ई काम मा उनका खुब किताबै पढ़ै का मौका मिला। उइ एक मिशनरी स्कूल मा अंग्रेजी सीखिन अउर जॉर्ज डब्ल्यूएम रेनॉल्ड्स के आठ खंडन के ''द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन'' सहित कथासाहित्य के कईयो कामन का अध्ययन किहिन। [[गोरखपुर]] मा अपनि पहिलि साहित्यिक रचना किहिन, जउन कबहूँ प्रकाशित नाइ भै औ अब खोय गै है। यो एक कुंवारे पर एक तमाशा रहै जो एक निम्न जाति की औरत ते प्यार करत है। यहु चरित्र प्रेमचंद के चाचा पर आधारित रहै, जो उनका कथा-साहित्य पढ़ै के जुनून के खातिर डांटत रहें; यो तमाशा शायद यहीके बदला के रूप मा लिखा गा रहै। <ref name="Gupta_1998_10" /> 1890 के दशक के मध्य मा अपने पिता के जमानिया मा तैनात होए के बाद, धनपत राय ने [[वाराणसी|बनारस]] के [[Queen's College Varanasi|क्वींस कॉलेज]] मा एक दिन के विद्वान के रूप मा दाखिला लिहिन। 1895 मा, जब उ नौवीं कक्षा मा पढ़त रहें, तब 15 साल के उमर मा उनकर बियाह होइ गवा। ई मैच उनके मातृक सौतेला दादा द्वारा आयोजित कीन गा रहा। ऊ लड़की एक अमीर जमींदार परिवार से रही अऊर प्रेमचंद से बड़ी रही, जे ओका झगड़ालू अऊर सुन्नर नाहीं पावत रही। <ref name="Gupta_1998_11" /> <ref name="Sigi_2006_17" /> लंबी बीमारी के बाद 1897 में उनके पिताजी का निधन होइ गवा। उ दूसरा वर्ग (60% अंक से नीचे) के साथ मैट्रिक परीक्षा पास करै में कामयाब रहे। हालांकि, क्वींस कॉलेज मा केवल पहिला संभाग वाले छात्रन का फीस रियायत दीन जात रही। तब उ सेंट्रल हिन्दू स्कूल मा दाखिला मांगिन लेकिन अंकगणित के कमजोर कौशल के कारण उ असफल रहे। यहि तरह, ओनका आपन पढ़ाई बंद करै का पड़ा। तब उइ बनारस मा एक अधिवक्ता के बेटवा का पांच रुपिया के मासिक वेतन मा कोचिंग देय का असाइनमेंट प्राप्त किहिन। ऊ अधिवक्ता के अस्तबल के ऊपर एक कीचड़ के कोठरी मा रहत रहा अऊर आपन वेतन का 60% घर वापस भेजत रहा। <ref name="Gupta_1998_12" /> इन दिनन मा प्रेमचंद खूब पढ़िन। कई कर्ज जमा करै के बाद, 1899 मा, उ आपन एकत्रित किताबन मा से एक का बेचै के लिए एक किताबन के दुकान मा गें। वहिमा, उ चुनार के एक मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर से मिले, जे ओनका ₹18 के मासिक वेतन पर एक शिक्षक के रूप मा नौकरी के पेशकश किहिन। <ref name="Gupta_1998_12" /> उ ₹5 के मासिक शुल्क पर एक छात्र का ट्यूशन पढ़ावै का काम भी लिहिन। 1900 मा, प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराइच मा ₹20 के मासिक वेतन पर सहायक शिक्षक के रूप मा नौकरी प्राप्त किहिन। तीन महीना बाद, उनका प्रतापगढ़ के जिला स्कूल मा स्थानांतरित कीन गा रहा, जहां उ एक प्रशासक के बंगला मा रहे अऊर अपने बेटवा का ट्यूशन पढ़ावत रहे। उनकर पहिला लघु उपन्यास ''असरार-ए-माबिद'' ("भगवान के निवास के रहस्य", हिंदी मा ''देवस्थान रहस्य'' ) रहा, जवन मंदिर के पुजारियन के बीच भ्रष्टाचार अऊर गरीब औरतन के यौन शोषण का पता लगावत है। ई उपन्यास बनारस स्थित उर्दू साप्ताहिक ''आवाज-ए-खलक'' मा 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक एक श्रृंखला मा प्रकाशित कीन गा रहा। साहित्यिक आलोचक सिगफ्राइड शुल्ज़ कहत हैं कि "उनके पहिला उपन्यास मा उनकर अनुभवहीनता काफी स्पष्ट है", जवन सुव्यवस्थित नाहीं है, एक अच्छा कथानक अऊर विशेषता के कमी है। प्रकाशचन्द्र गुप्ता इका "अपरिपक्व रचना" कहत हैं, जवन "जीवन का केवल काला या सफेद मा देखै" के प्रवृत्ति देखावत है। <ref name="Gupta_1998_13" /> === कानपुर प्रवास === प्रतापगढ़ से, धनपत राय का प्रशिक्षण के लिए [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] स्थानांतरित कीन गा रहा अऊर बाद मा 1905 मा कानपुर मा तैनात कीन गा रहा। उ लगभग चार साल तक कानपुर मा रहे, मई 1905 से जून 1909 तक। वहिजा, उ उर्दू पत्रिका ''[[Zamana (magazine)|जमाना]]'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम से मिले, जेहिमा उ बाद मा कईयो लेख अऊर कहानी प्रकाशित किहिन। प्रेमचंद गर्मी के छुट्टी मा अपने गांव लम्ही मा गये रहैं पै कइयौ कारन से रहैं का मजा नहीं आवा रहै। उनका मौसम या वातावरण लेखन के अनुकूल नाहीं लाग। यही से, अपनी पत्नी अऊर अपनी सौतेली महतारी के बीच झगड़ा के कारण उनका घरेलू परेशानी का सामना करै का पड़ा। प्रेमचन्द अपनी मेहरारू का गुस्सा मा डांटिन जब मेहरारू फांसी लगाय के आत्महत्या करै कै असफल कोशिश करिन। निराश होइके, ऊ अपने पिता के घरे चली गै, अऊर प्रेमचंद ओका वापस लावै मा कौनो दिलचस्पी नाहीं देखाइस। 1906 मा प्रेमचंद कय बियाह एक बाल विधवा शिवरानी देवी से भा, जवन फतेहपुर कय पास एक गाँव कय एक जमींदार कय बिटिया रही। <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=I2UnQES-79gC|title=The Illustrated Weekly of India|publisher=Published for the proprietors, Bennett, Coleman & Company, Limited, at the Times of India Press|year=1984|pages=68–69|access-date=17 May 2019}}</ref> ई कदम उ समय क्रांतिकारी माना जात रहा, अऊर प्रेमचंद का बहुत सामाजिक विरोध का सामना करै का पड़ा। इनके निधन के बाद शिवरानी देवी इनके ऊपर यक किताब लिखिन, जेकर शीर्षक रहा ''प्रेमचंद घर में'' ("घर पर प्रेमचंद")। 1905 मा, राष्ट्रवादी सक्रियता से प्रेरित होइके, प्रेमचंद ने ''जमाना'' मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले पर एक लेख प्रकाशित किहिन। उ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करै के लिए गोखले के तरीकन के आलोचना किहिन अऊर वहिके बजाय बाल गंगाधर तिलक द्वारा अपनाए गए अउर चरमपंथी उपायन का अपनावै के सिफारिश किहिन। प्रेमचंद कय पहिली प्रकाशित कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" ("दुनिया कय सबसे अनमोल गहना") रही, जवन 1907 मा ''जमाना'' मा छपी रही। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> यहि कहानी के अनुसार सबसे अनमोल 'रत्न' आजादी पावै कय खातिर आवश्यक खून कय आखिरी बूंद रहा। प्रेमचंद के कईयो शुरुआती लघुकथाओं मा देशभक्ति के सुर रहे, जवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> प्रेमचंद कै दुसरा लघु उपन्यास ''हमखुरमा-ओ-हमसवब'' (हिंदी मा ''प्रेमा'' ) 1907 मा प्रकाशित भा रहा, "बाबू नवाब राय बनारसी" नाम से लिखा गा रहा। ई समकालीन रूढ़िवादी समाज मा विधवा पुनर्विवाह के मुद्दा का पता लगावत है: नायक, अमृत राय, अपनी अमीर अऊर सुंदर मंगेतर प्रेमा का त्याग करत हुए, युवा विधवा, पूर्णा से शादी करै के सामाजिक विरोध का दूर करत है। प्रकाश चन्द्र गुप्ता के अनुसार, "कई मायनों मा उनके भविष्य के महानता के बीज समाहित करत हुए, उपन्यास अबहियों युवा है अऊर अनुशासन के कमी है जवन पूर्ण परिपक्वता लावत है"। सन १९०७ मा बनारस के मेडिकल हॉल प्रेस से प्रेमचंद कै एक अउर लघु उपन्यास ''किशना'' प्रकाशित भा। गहना के प्रति औरतन के लगाव पै व्यंग्य करै वाली ई 142 पन्नन कै रचना अब खो गै है। साहित्यिक आलोचक नोबत राय ने ''ज़माना'' मा काम के आलोचना किहिन, अऊर ईका महिलाओं के हालात का मजाक बताइन। अप्रैल-अगस्त 1907 के दौरान, प्रेमचंद के उपन्यास ''रूठी रानी'' ''जमाना'' मा धारावाहिक रूप मा प्रकाशित कीन गा रहा। साथै 1907 मा, ''जमाना'' के प्रकाशकन प्रेमचंद के पहिला लघुकथा संग्रह प्रकाशित किहिन, जेकर शीर्षक रहा ''सोज-ए-वतन'' । बाद मा प्रतिबंधित कीन गा संग्रह मा चार कहानी रहीं जवन भारतीयन का राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष मा प्रेरित करै के कोशिश करत रहीं। <ref name="Mohan2006">{{Cite book|title=[[Encyclopaedia of Indian Literature]]: Sasay to Zorgot|last=Lal|first=Mohan|publisher=[[Sahitya Akademi]]|year=2006|isbn=978-81-260-1221-3|volume=5|page=4149}}</ref> ==== प्रेमचंद नाम का अपनाना ==== सन १९०९ मा प्रेमचंद कै स्थानांतरण महोबा होइगा अउर बाद मा हमीरपुर मा स्कूलन के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पै लगावा गा। यहि समय के आसपास, ''सोज-ए-वतान का'' ब्रिटिश सरकार के अधिकारियन द्वारा देखल गै रहा, जे एकरा विद्रोही काम के रूप मा प्रतिबंधित कइ दिहिन। हमीरपुर जिला के ब्रिटिश कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवनसन ने प्रेमचंद के घर पर छापामारी का आदेश दिया, जहां ''सोज-ए-वतन'' के लगभग पाँच सौ प्रतियां जला दी गईं। <ref name="SahniPaliwal1980">{{Cite book|title=Prem Chand: A Tribute|last=Sahni|first=Bhisham|last2=Paliwal|first2=Om Prakash|publisher=Premchand Centenary Celebrations Committee|year=1980|author-link=Bhisham Sahni}}</ref> यहिके बाद उर्दू पत्रिका ''जमाना'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम, जे धनपत राय के पहिली कहानी " दुनिया का सबसे अनमोल रतन" छपवाये रहे, "प्रेमचंद" छद्म नाम के सलाह दिहिन। धनपत राय "नवाब राय" नाम लेब बन्द कइकै प्रेमचंद बनि गये। प्रेमचंद का अक्सर मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जात रहा। बात ई है कि वै कन्हैयालाल मुंशी के साथे हंस पत्रिका कै संपादन किहिन। क्रेडिट लाइन मा लिखा रहा "मुंशी, प्रेमचंद"। तब से उनका मुंशी प्रेमचंद कहा जाय लाग। <sup class="noprint Inline-Template Template-Fact" style="white-space:nowrap;">&#x5B; ''<nowiki><span title="This claim needs references to reliable sources. (November 2023)">citation needed</span></nowiki>'' &#x5D;</sup> 1914 मा, प्रेमचंद हिंदी मा लिखै लाग ( [[हिन्दी|हिंदी]] अऊर [[उर्दू]] का एक भाषा हिंदुस्तानी के अलग-अलग रजिस्टर माना जात है, जेहिमा हिंदी आपन बहुत शब्दावली [[संस्कृत]] से लेत है अऊर उर्दू फारसी से अधिक प्रभावित है)। यहि समय तक, उ उर्दू मा एक कथा लेखक के रूप मा पहिले से ही प्रतिष्ठित होइ चुका रहा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> सुमित सरकार नोट करत हैं कि उर्दू मा प्रकाशक ढूंढै के कठिनाई से स्विच प्रेरित कीन गा रहा। <ref name="Sarkar1983">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=x1uBQgAACAAJ|title=Modern India, 1885–1947|last=Sarkar|first=Sumit|publisher=Macmillan|year=1983|isbn=978-0-333-90425-1|pages=85–86|author-link=Sumit Sarkar}}</ref> उनकर पहिली हिन्दी कहानी "सौत" दिसम्बर 1915 मा ''सरस्वती'' पत्रिका मा प्रकाशित भै, अउर उनकर पहिला लघुकथा संग्रह ''सप्त सरोज'' जून 1917 मा प्रकाशित भा। === गोरखपुर === [[फाइल:Shilalekh.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद जी 1916 से 1921 तक [[गोरखपुर]] मा जहाँ रहत रहें, वहि झोपड़ी मा एक पट्टिका।]] अगस्त 1916 मा पदोन्नति पै प्रेमचन्द कै स्थानांतरण गोरखपुर कै दीन गा। उ [[गोरखपुर]] के नॉर्मल हाई स्कूल मा सहायक मास्टर बनिन। <ref name="Madan1964">{{Cite book|title=Munshi Premchand: A Literary Biography|last=Gopal|first=Madan|publisher=Asia Pub. House|year=1964|pages=114–117}}</ref> गोरखपुर मा, ओनके किताब बेचै वाले बुद्धि लाल से दोस्ती होइ गै, जे ओनका स्कूल मा परीक्षा क्रैम किताबन के बेचे के बदले मा पढ़ै के लिए उपन्यास उधार लेय के अनुमति दिहिन। प्रेमचंद अन्य भाषाओं के क्लासिक्स के उत्साही पाठक रहे अऊर इनमा से कईयो रचनाओं का हिंदी मा अनुवाद किहिन। सन १९१९ तक प्रेमचंद जी लगभग सौ-सौ पन्नन के चार उपन्यास प्रकाशित कइ चुके रहैं। सन १९१९ मा प्रेमचंद कै पहिला प्रमुख उपन्यास ''सेवा सदन'' हिन्दी मा प्रकाशित भा। ई उपन्यास मूल रूप से ''बाजार-ए-हुसन'' शीर्षक से उर्दू मा लिखा गा रहा लेकिन कलकत्ता स्थित एक प्रकाशक द्वारा सबसे पहिले हिंदी मा प्रकाशित कीन गा रहा, जे प्रेमचंद का उनके काम के लिए ₹450 पेशकश किहिन। [[लाहौर]] के उर्दू प्रकाशक ने बाद मा 1924 मा प्रेमचंद का ₹250 भुगतान कइके ई उपन्यास प्रकाशित किहिन। उपन्यास एक दुखी गृहिणी के कहानी बतावत है, जे पहिले एक दरबारी बन जात है, अऊर फिर दरबारी के जवान बिटियन के लिए एक अनाथालय का प्रबंधन करत है। ई आलोचकन द्वारा बहुत पसंद कीन गा अऊर प्रेमचंद का व्यापक पहचान पावै मा मदद मिली। 1919 मा प्रेमचंद [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] से बीए डिग्री प्राप्त किहिन। 1921 तक, उनका स्कूलन के उप निरीक्षक के रूप मा पदोन्नत कीन गा रहा। फरवरी 1921 का, उ गोरखपुर मा एक बैठक मा शामिल भए, जहां [[महात्मा गाँधी|महात्मा गांधी ने]] असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप मा लोगन से सरकारी नौकरियन से इस्तीफा देय का कहिन। प्रेमचंद, हालांकि शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे अऊर उनके पास दुई बच्चा अऊर एक गर्भवती पत्नी का समर्थन करै के लिए रहा, पांच दिन तक यहिके बारे मा सोचा अऊर अपनी पत्नी के सहमति से अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देय का फैसला किहिन। === बनारस वापसी === नौकरी छोड़ै के बाद प्रेमचंद 18 मार्च 1921 का गोरखपुर से बनारस चले गें अऊर अपने साहित्यिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करै का फैसला किहिन। 1936 मा अपनी मृत्यु तक, उनका गंभीर वित्तीय कठिनाइयन अऊर पुरानी बीमारी का सामना करै का पड़ा। <ref name="DavidRubin1994">{{Cite book|title=Masterworks of Asian Literature in Comparative Perspective: A Guide for Teaching|last=Rubin|first=David|publisher=[[M. E. Sharpe]]|year=1994|isbn=978-1-56324-258-8|editor-last=Miller|editor-first=Barbara Stoler|editor-link=Barbara Stoler Miller|pages=168–177|chapter=Short Stories of Premchand|author-link=David Rubin (writer)}}</ref> सन १९२३ मा बनारस मा यक छपाई औ प्रकाशन घर कै स्थापना किहिन जेहकै नाँव "सरस्वती प्रेस" रखिन। <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> सन 1924 मा प्रेमचंद के ''रंगभूमि'' का प्रकाशन भा, जेहिमा सूरदास नामक एक अंधा भिखारी दुखद नायक है। शुल्ज़ उल्लेख करत हैं कि ''रंगभूमि'' मा, प्रेमचंद एक "शानदार सामाजिक इतिहासकार" के रूप मा आवत हैं, अऊर यद्यपि उपन्यास मा कुछ "संरचनात्मक खामी" अऊर "बहुत सारा लेखकीय स्पष्टीकरण" हैं, ई प्रेमचंद के लेखन शैली मा "चिह्नित प्रगति" देखावत है। शुल्ज़ के अनुसार, ई ''निर्मला'' (1925) अऊर ''प्रतिज्ञा'' (1927) मा रहा कि प्रेमचंद का "एक संतुलित, यथार्थवादी स्तर" तक आपन रास्ता मिला जवन ओनके पहिले के कामन का पार करत है अऊर "अपने पाठकन का संरक्षण मा रखै" का प्रबंधन करत है। ''निर्मला'', भारत मा दहेज प्रणाली से संबंधित एक उपन्यास, एक उपन्यास के रूप मा प्रकाशित होए से पहिले नवंबर 1925 अऊर नवंबर 1926 के बीच ''चंद'' पत्रिका मा क्रमबद्ध कीन गा रहा। ''प्रतिज्ञा'' ("प्रतिज्ञा") विधवा पुनर्विवाह के विषय से निपटत रही। १९२८ मा मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित प्रेमचंद कै उपन्यास ''गबन'' ("गबन" छपा। मार्च 1930 मा, प्रेमचंद ''हंस'' शीर्षक से एक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका शुरू किहिन, जेकर उद्देश्य भारतीयन का ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुटावै के लिए प्रेरित करब रहा। अपने राजनीतिक रूप से भड़काऊ विचारन के लिए विख्यात पत्रिका मुनाफा कमाए में विफल रही। फिर प्रेमचंद ने काम संभाला अऊर ''जागरण नामक एक अउर पत्रिका का संपादन किहिन,'' जवन भी घाटे मा चलत रही। 1931 मा प्रेमचंद मारवाड़ी कालेज मा अध्यापक के रूप मा कानपुर चले गें पै कालेज प्रशासन से मतभेद होय के कारन छोड़ै का पड़ा। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> तब उ बनारस लौटि आए अऊर ''मर्यादा'' पत्रिका के संपादक बनिन। 1932 मा, उ ''कर्मभूमि'' शीर्षक से एक अउर उपन्यास प्रकाशित किहिन। उ संक्षेप मा काशी विद्यापीठ, एक स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर के रूप मा काम किहिन। स्कूल बंद होय के बाद, उ [[लखनऊ]] मा ''माधुरी'' पत्रिका के संपादक बने। <ref name="Giriraj2001" /> === बम्बई === प्रेमचंद 31 मई 1934 का हिंदी फिल्म उद्योग मा आपन किस्मत आजमावै [[मुम्बई|बम्बई]] पहुँचे। उ प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन के लिए पटकथा लेखन के नौकरी स्वीकार किहिन रहैं, ई उम्मीद मा कि ₹8,000 के सालाना वेतन से ओनके वित्तीय परेशानियन का दूर करै मा मदद मिली। उ दादर मा रहे, अऊर फिल्म ''मजदूर'' ("द लेबरर") के पटकथा लिखिन। मोहन भवानानी के निर्देशन मा बनी ई फिलिम मा मजदूर वर्ग के खराब हालात का देखावा गा रहा। फिल्म मा मजदूरन के नेता के रूप मा खुद प्रेमचंद कैमियो किहिन। कुछ प्रभावशाली व्यापारी बम्बई मा एकर रिलीज पर रोक लगावै मा कामयाब रहे। ई फिलिम लाहौर अउर दिल्ली मा रिलीज भै लेकिन मिल के मजदूरन का मालिकन के खिलाफ खड़ा होय के प्रेरणा देय के बाद फिर से प्रतिबंधित कीन गा। विडंबना ई है कि ई फिलिम [[वाराणसी|बनारस]] मा अपने घाटे वाले प्रेस के मजदूरन का वेतन न मिलै के बाद हड़ताल करै के लिए प्रेरित किहिस। 1934–35 तक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस ₹400 के भारी कर्ज मा रहा, अऊर प्रेमचंद का ''जागरण'' के प्रकाशन बंद करै का मजबूर कीन गा रहा। इसी बीच प्रेमचंद बम्बई फिल्म उद्योग के गैर-साहित्यिक व्यावसायिक माहौल का नापसंद करै लाग रहे, अउर बनारस लौटै चाहत रहे। हालांकि, उ प्रोडक्शन हाउस के साथे एक साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किहिन रहैं। एक साल पूरा होय से पहिले, उ अंततः 4 अप्रैल 1935 का बम्बई छोड़ दिहिन। बम्बई टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु रॉय प्रेमचंद का वापस रहै के लिए मनावै के कोशिश किहिन लेकिन असफल रहे। आखिरी दिन बम्बई छ्वाड़ै के बाद, प्रेमचंद [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] मा बसब चहति रहैं, जहाँ उनके लरिका श्रीपत राय अउर अमृत कुमार राय पढ़ति रहैं। उइ हुँवा ते ''हंस का'' प्रकाशित करै के योजना बनाइन। हालांकि, अपनि वित्तीय स्थिति द्याखत भए अऊर बीमार स्वास्थ्य के कारण, उनका ''हंस'' का इंडियन लिटरेरी काउंसल के हवाले करै का पड़ा अउर बनारस जाय का पड़ा। प्रेमचंद का 1936 मा लखनऊ मा प्रगतिशील लेखक संघ क्या पहिला अध्यक्ष चुना गा रहै <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> 8 अक्टूबर 1936 का कइयो दिनन की बीमारी के बाद पद पर रहतै रहत उनक्या निधन होइ गा। ''गोदान'' ( ''द गिफ्ट ऑफ ए काउ'', 1936), प्रेमचंद क्यार आखिरी पूरा कीन गा काम है, आम तौर पर यहिका उनके सबते श्रेष्ठ उपन्यास के रूप मा स्वीकार कीन जात है अउर सबते अच्छे हिंदी उपन्यासननौ मा गिना जात है। <ref>{{Cite web |last=Deepak |first=Sunil |title=Phanishwar Nath Renu |url=http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080313043341/http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |archive-date=13 March 2008 |access-date=25 August 2021 |website=Kalpana.it}}</ref> येहिका नायक, होरी, एक गरीब किसान, ग्रामीण भारत मा धन अउर प्रतिष्ठा के प्रतीक गाय के लिए तरसत देखावा गा है। सिगफ्राइड शुल्ज़ के अनुसार, " ''गोदान'' एक सुव्यवस्थित अउर सुसंतुलित उपन्यास है जउन पश्चिमी साहित्यिक मानक द्वारा स्थापित साहित्यिक आवश्यकतन का पर्याप्त रूप ते पूरा करत है।" [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ टैगोर]] जइसे अन्य समकालीन प्रसिद्ध लेखकन के विपरीत, प्रेमचंद के भारत ते बाहर बहुत सराहना नहीं कीन गै। शुल्ज़ का मानबु है कि यहिके कारण उनके काम के अच्छे अनुवादन क अभाव है। साथै, टैगोर अउर इकबाल के विपरीत, प्रेमचंद कबो भारत ते बाहर नहीं गें, विदेश मा पढ़ाई नहीं कीन्हेनि या प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक हस्तिन के साथै मिलैजुलै नहीं गें। 1936 मा प्रेमचंद जी "कफन" (" कफन ") नामक कहानी प्रकाशित कीन्हेनि, जेहिमा एक गरीब मनई अपनी मरी मेहेरिया के अंतिम संस्कार के खातिर पइसा इकट्ठा करत है लेकिन सब पइसा खावै पिएम उड़ा देत है। प्रेमचंदजी के आखिरी प्रकाशित कहानी "क्रिकेट मैच" रहै, जउन उनके मरै के बाद 1938 मा ''जमाना'' मा छपी रहै। ==सन्दर्भ== 6e9pqc3mh4cfzuqpuox4w4zaqmlpc2z 35217 35216 2026-07-06T10:09:22Z Avimaarak 3578 35217 wikitext text/x-wiki {{Infobox writer | name =प्रेमचंद | honorific_prefix = [[मुंशी]] | image = Premchand in 1930s.jpg | birth_name =धनपत राय श्रीवास्तव | birth_date =३१ जुलाई १८८० | birth_place = [[लमही]], [[बनारस रियासत]], [[ब्रिटिस राज|ब्रिटिस भारत]] (वर्तमान [[उत्तर प्रदेश]], [[भारत]]) | death_date =८ अक्टूबर १९३६ | death_place = [[बनारस]],बनारस रियासत,अंग्रेजी राज (वर्तमान [[वाराणसी]], उत्तर प्रदेश, भारत) | pseudonym =प्रेमचंद,नवाब राय | occupation =उपन्यासकार,कथाकार | language = [[हिंदी]], [[उर्दू]] | nationality = [[भारतीय जनसमुदाय|भारतीय]] | notableworks = ''[[गोदान]]'', ''[[बाज़ार-ए-हुस्न]]'', ''[[कर्मभूमि]]'', ''[[शतरंज के खिलाड़ी]]'', ''[[गबन (उपन्यास)|गबन]]'', ''मानसरोवर'', ''[[ईदगाह (कथा)|ईदगाह]]'' | spouse 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प्रेमचंद जी दर्जन भर ते अधिक उपन्यास अउर ३०० ते ज्यादे कहानिन के रचना करिन। उनके अनेक उपन्यास अउर कहानिन का विदेसी भासन मा अनुवाद भा है। ==जीवन परिचय== === सुरुवाती जिंदगी === प्रेमचंद का जनम 31 जुलाई 1880 का [[वाराणसी|बनारस]] के लगे लमही नाँव के एक गाँव मा भा रहै। छुटपने मा उनका नाँव धनपत राय ("धन का स्वामी") रखा गा रहै। इनके पूर्वज बड़े चित्रगुप्तवंशी कायस्थ रहैं, जिनके लगे आठ ते नौ बिगहा जमीन रहै। इनके दादा गुरुसहायराय पटवारी (गाँव के जमीन के अभिलेख रखने वाले) रहैं अउर इनके पिता अजयबलाल डाकघर के चपरासी रहैं। इनकी महतारी आनंदी देवी करौनी गाँव की रहै वाली रहैं, जो संभवतः इनके "बड़े घर की बेटी" मा आनंदी किरदार के लिए इनकी प्रेरणौ रहीं। धनपत राय अजयब लाल और आनंदी की चउथि संतान रहैं; पहिले दुई बिटेवा रहैं मुला उइ छोटेहे मा मर गईं, अउर याक तीसर बिटेवा रहै जेहिका नाँव समा रहै। उनके चाचा, महाबीर, एक अमीर जमींदार रहैं, वई उनका " नवाब " उपनाम दिहिन। "नवाब राय" धनपत राय जी द्वारा चुना गा पहिल उपनाम रहै। <ref name="amrit">{{Cite book|title=Premchand: A Life|last=Rai|first=Amrit|publisher=People's Publishing House|year=1982|location=New Delhi|translator-last=Trivedi|translator-first=Harish|author-link=Amrit Rai}}</ref> [[फाइल:Lamhi,_Varanasi.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल गेट, लमही, वाराणसी]] सात साल की उमर मा धनपत राय लमही के लगे लालपुर, [[वाराणसी]] के एक मदरसा मा अपनि शिक्षा शुरू किहिन। अउर मदरसा मा एक मौलवी ते उर्दू अउर फारसी सीखेनि । जब उइ 8 साल के रहैं, तब उनकी महतारी क्यार लंबी बीमारी के बाद निधन होइ गा। वहिके बादि उनकी दादी, उनका पालै-प्वासै के जिम्मेदारी लिहिन, मगर कुछ दिन बादि उनहुँन क देहावसान होइ गा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> मुंशी प्रेमचंद अलग-थलग महसूस करत रहे, काहे से कि उनकी बड़ी बहिन सुग्गी के शादी होइ चुकी रहै, अउर उनके पिताजी हमेशा काम मा व्यस्त रहत रहैं। उनके पिता [[गोरखपुर]] मा तैनाती के दौरान दुबारा शादी किहिन, लेकिन प्रेमचंद का उनकी सौतेली महतारी ते बहुत कम स्नेह मिला। 'सौतेली महतारी' बाद मा प्रेमचंद के रचना मा आवर्ती विषय बन गै। बचपनै मा धनपत राय के रुचि कथा उपन्यासन के प्रति होइ गै। तबहीं एक तमाखू वाले की दुकान पर उइ फारसी भासा के काल्पनिक महाकाव्य तिलिस्म-ए-दिलरुबा की कहानी सुनेनि। फिर एक थोक किताब विक्रेता खियां किताबै ब्यांचै का काम किहिन। ई काम मा उनका खुब किताबै पढ़ै का मौका मिला। उइ एक मिशनरी स्कूल मा अंग्रेजी सीखिन अउर जॉर्ज डब्ल्यूएम रेनॉल्ड्स के आठ खंडन के ''द मिस्ट्रीज ऑफ द कोर्ट ऑफ लंदन'' सहित कथासाहित्य के कईयो कामन का अध्ययन किहिन। [[गोरखपुर]] मा अपनि पहिलि साहित्यिक रचना किहिन, जउन कबहूँ प्रकाशित नाइ भै औ अब खो गै है। यो एक कुंवारे पर एक तमाशा रहै जो एक निम्न जाति की औरत ते प्यार करत है। यहु चरित्र प्रेमचंद के चाचा पर आधारित रहै, जो उनका कथा-साहित्य पढ़ै के जुनून के खातिर डांटत रहैं; यो तमाशा शायद यहीके बदला के रूप मा लिखा गा रहै। <ref name="Gupta_1998_10" /> 1890 के दशक के मध्य मा अपने पिता के जमानिया मा तैनात होए के बाद, धनपत राय [[वाराणसी|बनारस]] के [[Queen's College Varanasi|क्वींस कॉलेज]] मा विद्वान के रूप मा दाखिला लिहिन। 1895 मा, जब उइ नौवीं कक्षा मा पढ़त रहैं, तब 15 साल के उमर मा उनकर बियाह होइ गवा। ई मैच उनके मातृक सौतेला दादा द्वारा आयोजित कीन गा रहा। ऊ लड़की एक अमीर जमींदार परिवार से रही अऊर प्रेमचंद से बड़ी रही, जे ओका झगड़ालू अऊर सुन्नर नाहीं पावत रही। <ref name="Gupta_1998_11" /> <ref name="Sigi_2006_17" /> लंबी बीमारी के बाद 1897 में उनके पिताजी का निधन होइ गवा। उ दूसरा वर्ग (60% अंक से नीचे) के साथ मैट्रिक परीक्षा पास करै में कामयाब रहे। हालांकि, क्वींस कॉलेज मा केवल पहिला संभाग वाले छात्रन का फीस रियायत दीन जात रही। तब उ सेंट्रल हिन्दू स्कूल मा दाखिला मांगिन लेकिन अंकगणित के कमजोर कौशल के कारण उ असफल रहे। यहि तरह, ओनका आपन पढ़ाई बंद करै का पड़ा। तब उइ बनारस मा एक अधिवक्ता के बेटवा का पांच रुपिया के मासिक वेतन मा कोचिंग देय का असाइनमेंट प्राप्त किहिन। ऊ अधिवक्ता के अस्तबल के ऊपर एक कीचड़ के कोठरी मा रहत रहा अऊर आपन वेतन का 60% घर वापस भेजत रहा। <ref name="Gupta_1998_12" /> इन दिनन मा प्रेमचंद खूब पढ़िन। कई कर्ज जमा करै के बाद, 1899 मा, उ आपन एकत्रित किताबन मा से एक का बेचै के लिए एक किताबन के दुकान मा गें। वहिमा, उ चुनार के एक मिशनरी स्कूल के हेडमास्टर से मिले, जे ओनका ₹18 के मासिक वेतन पर एक शिक्षक के रूप मा नौकरी के पेशकश किहिन। <ref name="Gupta_1998_12" /> उ ₹5 के मासिक शुल्क पर एक छात्र का ट्यूशन पढ़ावै का काम भी लिहिन। 1900 मा, प्रेमचंद ने सरकारी जिला स्कूल, बहराइच मा ₹20 के मासिक वेतन पर सहायक शिक्षक के रूप मा नौकरी प्राप्त किहिन। तीन महीना बाद, उनका प्रतापगढ़ के जिला स्कूल मा स्थानांतरित कीन गा रहा, जहां उ एक प्रशासक के बंगला मा रहे अऊर अपने बेटवा का ट्यूशन पढ़ावत रहे। उनकर पहिला लघु उपन्यास ''असरार-ए-माबिद'' ("भगवान के निवास के रहस्य", हिंदी मा ''देवस्थान रहस्य'' ) रहा, जवन मंदिर के पुजारियन के बीच भ्रष्टाचार अऊर गरीब औरतन के यौन शोषण का पता लगावत है। ई उपन्यास बनारस स्थित उर्दू साप्ताहिक ''आवाज-ए-खलक'' मा 8 अक्टूबर 1903 से फरवरी 1905 तक एक श्रृंखला मा प्रकाशित कीन गा रहा। साहित्यिक आलोचक सिगफ्राइड शुल्ज़ कहत हैं कि "उनके पहिला उपन्यास मा उनकर अनुभवहीनता काफी स्पष्ट है", जवन सुव्यवस्थित नाहीं है, एक अच्छा कथानक अऊर विशेषता के कमी है। प्रकाशचन्द्र गुप्ता इका "अपरिपक्व रचना" कहत हैं, जवन "जीवन का केवल काला या सफेद मा देखै" के प्रवृत्ति देखावत है। <ref name="Gupta_1998_13" /> === कानपुर प्रवास === प्रतापगढ़ से, धनपत राय का प्रशिक्षण के लिए [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] स्थानांतरित कीन गा रहा अऊर बाद मा 1905 मा कानपुर मा तैनात कीन गा रहा। उ लगभग चार साल तक कानपुर मा रहे, मई 1905 से जून 1909 तक। वहिजा, उ उर्दू पत्रिका ''[[Zamana (magazine)|जमाना]]'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम से मिले, जेहिमा उ बाद मा कईयो लेख अऊर कहानी प्रकाशित किहिन। प्रेमचंद गर्मी के छुट्टी मा अपने गांव लम्ही मा गये रहैं पै कइयौ कारन से रहैं का मजा नहीं आवा रहै। उनका मौसम या वातावरण लेखन के अनुकूल नाहीं लाग। यही से, अपनी पत्नी अऊर अपनी सौतेली महतारी के बीच झगड़ा के कारण उनका घरेलू परेशानी का सामना करै का पड़ा। प्रेमचन्द अपनी मेहरारू का गुस्सा मा डांटिन जब मेहरारू फांसी लगाय के आत्महत्या करै कै असफल कोशिश करिन। निराश होइके, ऊ अपने पिता के घरे चली गै, अऊर प्रेमचंद ओका वापस लावै मा कौनो दिलचस्पी नाहीं देखाइस। 1906 मा प्रेमचंद कय बियाह एक बाल विधवा शिवरानी देवी से भा, जवन फतेहपुर कय पास एक गाँव कय एक जमींदार कय बिटिया रही। <ref>{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=I2UnQES-79gC|title=The Illustrated Weekly of India|publisher=Published for the proprietors, Bennett, Coleman & Company, Limited, at the Times of India Press|year=1984|pages=68–69|access-date=17 May 2019}}</ref> ई कदम उ समय क्रांतिकारी माना जात रहा, अऊर प्रेमचंद का बहुत सामाजिक विरोध का सामना करै का पड़ा। इनके निधन के बाद शिवरानी देवी इनके ऊपर यक किताब लिखिन, जेकर शीर्षक रहा ''प्रेमचंद घर में'' ("घर पर प्रेमचंद")। 1905 मा, राष्ट्रवादी सक्रियता से प्रेरित होइके, प्रेमचंद ने ''जमाना'' मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता गोपाल कृष्ण गोखले पर एक लेख प्रकाशित किहिन। उ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करै के लिए गोखले के तरीकन के आलोचना किहिन अऊर वहिके बजाय बाल गंगाधर तिलक द्वारा अपनाए गए अउर चरमपंथी उपायन का अपनावै के सिफारिश किहिन। प्रेमचंद कय पहिली प्रकाशित कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रतन" ("दुनिया कय सबसे अनमोल गहना") रही, जवन 1907 मा ''जमाना'' मा छपी रही। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> यहि कहानी के अनुसार सबसे अनमोल 'रत्न' आजादी पावै कय खातिर आवश्यक खून कय आखिरी बूंद रहा। प्रेमचंद के कईयो शुरुआती लघुकथाओं मा देशभक्ति के सुर रहे, जवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित रहे। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> प्रेमचंद कै दुसरा लघु उपन्यास ''हमखुरमा-ओ-हमसवब'' (हिंदी मा ''प्रेमा'' ) 1907 मा प्रकाशित भा रहा, "बाबू नवाब राय बनारसी" नाम से लिखा गा रहा। ई समकालीन रूढ़िवादी समाज मा विधवा पुनर्विवाह के मुद्दा का पता लगावत है: नायक, अमृत राय, अपनी अमीर अऊर सुंदर मंगेतर प्रेमा का त्याग करत हुए, युवा विधवा, पूर्णा से शादी करै के सामाजिक विरोध का दूर करत है। प्रकाश चन्द्र गुप्ता के अनुसार, "कई मायनों मा उनके भविष्य के महानता के बीज समाहित करत हुए, उपन्यास अबहियों युवा है अऊर अनुशासन के कमी है जवन पूर्ण परिपक्वता लावत है"। सन १९०७ मा बनारस के मेडिकल हॉल प्रेस से प्रेमचंद कै एक अउर लघु उपन्यास ''किशना'' प्रकाशित भा। गहना के प्रति औरतन के लगाव पै व्यंग्य करै वाली ई 142 पन्नन कै रचना अब खो गै है। साहित्यिक आलोचक नोबत राय ने ''ज़माना'' मा काम के आलोचना किहिन, अऊर ईका महिलाओं के हालात का मजाक बताइन। अप्रैल-अगस्त 1907 के दौरान, प्रेमचंद के उपन्यास ''रूठी रानी'' ''जमाना'' मा धारावाहिक रूप मा प्रकाशित कीन गा रहा। साथै 1907 मा, ''जमाना'' के प्रकाशकन प्रेमचंद के पहिला लघुकथा संग्रह प्रकाशित किहिन, जेकर शीर्षक रहा ''सोज-ए-वतन'' । बाद मा प्रतिबंधित कीन गा संग्रह मा चार कहानी रहीं जवन भारतीयन का राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष मा प्रेरित करै के कोशिश करत रहीं। <ref name="Mohan2006">{{Cite book|title=[[Encyclopaedia of Indian Literature]]: Sasay to Zorgot|last=Lal|first=Mohan|publisher=[[Sahitya Akademi]]|year=2006|isbn=978-81-260-1221-3|volume=5|page=4149}}</ref> ==== प्रेमचंद नाम अपनाबु ==== सन १९०९ मा प्रेमचंद कै स्थानांतरण महोबा होइगा अउर बाद मा हमीरपुर मा स्कूलन के सब-डिप्टी इंस्पेक्टर के पद पै लगावा गा। यहि समय के आसपास, ''सोज-ए-वतान का'' ब्रिटिश सरकार के अधिकारियन द्वारा देखल गै रहा, जे एकरा विद्रोही काम के रूप मा प्रतिबंधित कइ दिहिन। हमीरपुर जिला के ब्रिटिश कलेक्टर जेम्स सैमुअल स्टीवनसन ने प्रेमचंद के घर पर छापामारी का आदेश दिया, जहां ''सोज-ए-वतन'' के लगभग पाँच सौ प्रतियां जला दी गईं। <ref name="SahniPaliwal1980">{{Cite book|title=Prem Chand: A Tribute|last=Sahni|first=Bhisham|last2=Paliwal|first2=Om Prakash|publisher=Premchand Centenary Celebrations Committee|year=1980|author-link=Bhisham Sahni}}</ref> यहिके बाद उर्दू पत्रिका ''जमाना'' के संपादक मुंशी दया नारायण निगम, जे धनपत राय के पहिली कहानी " दुनिया का सबसे अनमोल रतन" छपवाये रहे, "प्रेमचंद" छद्म नाम के सलाह दिहिन। धनपत राय "नवाब राय" नाम लेब बन्द कइकै प्रेमचंद बनि गये। प्रेमचंद का अक्सर मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना जात रहा। बात ई है कि वै कन्हैयालाल मुंशी के साथे हंस पत्रिका कै संपादन किहिन। क्रेडिट लाइन मा लिखा रहा "मुंशी, प्रेमचंद"। तब से उनका मुंशी प्रेमचंद कहा जाय लाग। <sup class="noprint Inline-Template Template-Fact" style="white-space:nowrap;">&#x5B; ''<nowiki><span title="This claim needs references to reliable sources. (November 2023)">citation needed</span></nowiki>'' &#x5D;</sup> 1914 मा, प्रेमचंद हिंदी मा लिखै लाग ( [[हिन्दी|हिंदी]] अऊर [[उर्दू]] का एक भाषा हिंदुस्तानी के अलग-अलग रजिस्टर माना जात है, जेहिमा हिंदी आपन बहुत शब्दावली [[संस्कृत]] से लेत है अऊर उर्दू फारसी से अधिक प्रभावित है)। यहि समय तक, उ उर्दू मा एक कथा लेखक के रूप मा पहिले से ही प्रतिष्ठित होइ चुका रहा। <ref name="pib_2001_great">{{Cite web |title=Munshi Premchand: The Great Novelist |url=http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20120228022503/http://pib.nic.in/feature/feyr2001/fjul2001/f190720011.html |archive-date=28 February 2012 |access-date=13 January 2012 |publisher=Press Information Bureau, Government of India}}</ref> सुमित सरकार नोट करत हैं कि उर्दू मा प्रकाशक ढूंढै के कठिनाई से स्विच प्रेरित कीन गा रहा। <ref name="Sarkar1983">{{Cite book|url=https://books.google.com/books?id=x1uBQgAACAAJ|title=Modern India, 1885–1947|last=Sarkar|first=Sumit|publisher=Macmillan|year=1983|isbn=978-0-333-90425-1|pages=85–86|author-link=Sumit Sarkar}}</ref> उनकर पहिली हिन्दी कहानी "सौत" दिसम्बर 1915 मा ''सरस्वती'' पत्रिका मा प्रकाशित भै, अउर उनकर पहिला लघुकथा संग्रह ''सप्त सरोज'' जून 1917 मा प्रकाशित भा। === गोरखपुर === [[फाइल:Shilalekh.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|मुंशी प्रेमचंद जी 1916 से 1921 तक [[गोरखपुर]] मा जहाँ रहत रहें, वहि झोपड़ी मा एक पट्टिका।]] अगस्त 1916 मा पदोन्नति पै प्रेमचन्द कै स्थानांतरण गोरखपुर कै दीन गा। उ [[गोरखपुर]] के नॉर्मल हाई स्कूल मा सहायक मास्टर बनिन। <ref name="Madan1964">{{Cite book|title=Munshi Premchand: A Literary Biography|last=Gopal|first=Madan|publisher=Asia Pub. House|year=1964|pages=114–117}}</ref> गोरखपुर मा, ओनके किताब बेचै वाले बुद्धि लाल से दोस्ती होइ गै, जे ओनका स्कूल मा परीक्षा क्रैम किताबन के बेचे के बदले मा पढ़ै के लिए उपन्यास उधार लेय के अनुमति दिहिन। प्रेमचंद अन्य भाषाओं के क्लासिक्स के उत्साही पाठक रहे अऊर इनमा से कईयो रचनाओं का हिंदी मा अनुवाद किहिन। सन १९१९ तक प्रेमचंद जी लगभग सौ-सौ पन्नन के चार उपन्यास प्रकाशित कइ चुके रहैं। सन १९१९ मा प्रेमचंद कै पहिला प्रमुख उपन्यास ''सेवा सदन'' हिन्दी मा प्रकाशित भा। ई उपन्यास मूल रूप से ''बाजार-ए-हुसन'' शीर्षक से उर्दू मा लिखा गा रहा लेकिन कलकत्ता स्थित एक प्रकाशक द्वारा सबसे पहिले हिंदी मा प्रकाशित कीन गा रहा, जे प्रेमचंद का उनके काम के लिए ₹450 पेशकश किहिन। [[लाहौर]] के उर्दू प्रकाशक ने बाद मा 1924 मा प्रेमचंद का ₹250 भुगतान कइके ई उपन्यास प्रकाशित किहिन। उपन्यास एक दुखी गृहिणी के कहानी बतावत है, जे पहिले एक दरबारी बन जात है, अऊर फिर दरबारी के जवान बिटियन के लिए एक अनाथालय का प्रबंधन करत है। ई आलोचकन द्वारा बहुत पसंद कीन गा अऊर प्रेमचंद का व्यापक पहचान पावै मा मदद मिली। 1919 मा प्रेमचंद [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] से बीए डिग्री प्राप्त किहिन। 1921 तक, उनका स्कूलन के उप निरीक्षक के रूप मा पदोन्नत कीन गा रहा। फरवरी 1921 का, उ गोरखपुर मा एक बैठक मा शामिल भए, जहां [[महात्मा गाँधी|महात्मा गांधी ने]] असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप मा लोगन से सरकारी नौकरियन से इस्तीफा देय का कहिन। प्रेमचंद, हालांकि शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहे अऊर उनके पास दुई बच्चा अऊर एक गर्भवती पत्नी का समर्थन करै के लिए रहा, पांच दिन तक यहिके बारे मा सोचा अऊर अपनी पत्नी के सहमति से अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देय का फैसला किहिन। === बनारस वापसी === नौकरी छोड़ै के बाद प्रेमचंद 18 मार्च 1921 का गोरखपुर से बनारस चले गें अऊर अपने साहित्यिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करै का फैसला किहिन। 1936 मा अपनी मृत्यु तक, उनका गंभीर वित्तीय कठिनाइयन अऊर पुरानी बीमारी का सामना करै का पड़ा। <ref name="DavidRubin1994">{{Cite book|title=Masterworks of Asian Literature in Comparative Perspective: A Guide for Teaching|last=Rubin|first=David|publisher=[[M. E. Sharpe]]|year=1994|isbn=978-1-56324-258-8|editor-last=Miller|editor-first=Barbara Stoler|editor-link=Barbara Stoler Miller|pages=168–177|chapter=Short Stories of Premchand|author-link=David Rubin (writer)}}</ref> सन १९२३ मा बनारस मा यक छपाई औ प्रकाशन घर कै स्थापना किहिन जेहकै नाँव "सरस्वती प्रेस" रखिन। <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> सन 1924 मा प्रेमचंद के ''रंगभूमि'' का प्रकाशन भा, जेहिमा सूरदास नामक एक अंधा भिखारी दुखद नायक है। शुल्ज़ उल्लेख करत हैं कि ''रंगभूमि'' मा, प्रेमचंद एक "शानदार सामाजिक इतिहासकार" के रूप मा आवत हैं, अऊर यद्यपि उपन्यास मा कुछ "संरचनात्मक खामी" अऊर "बहुत सारा लेखकीय स्पष्टीकरण" हैं, ई प्रेमचंद के लेखन शैली मा "चिह्नित प्रगति" देखावत है। शुल्ज़ के अनुसार, ई ''निर्मला'' (1925) अऊर ''प्रतिज्ञा'' (1927) मा रहा कि प्रेमचंद का "एक संतुलित, यथार्थवादी स्तर" तक आपन रास्ता मिला जवन ओनके पहिले के कामन का पार करत है अऊर "अपने पाठकन का संरक्षण मा रखै" का प्रबंधन करत है। ''निर्मला'', भारत मा दहेज प्रणाली से संबंधित एक उपन्यास, एक उपन्यास के रूप मा प्रकाशित होए से पहिले नवंबर 1925 अऊर नवंबर 1926 के बीच ''चंद'' पत्रिका मा क्रमबद्ध कीन गा रहा। ''प्रतिज्ञा'' ("प्रतिज्ञा") विधवा पुनर्विवाह के विषय से निपटत रही। १९२८ मा मध्यम वर्ग के लालच पर केंद्रित प्रेमचंद कै उपन्यास ''गबन'' ("गबन" छपा। मार्च 1930 मा, प्रेमचंद ''हंस'' शीर्षक से एक साहित्यिक-राजनीतिक साप्ताहिक पत्रिका शुरू किहिन, जेकर उद्देश्य भारतीयन का ब्रिटिश शासन के खिलाफ जुटावै के लिए प्रेरित करब रहा। अपने राजनीतिक रूप से भड़काऊ विचारन के लिए विख्यात पत्रिका मुनाफा कमाए में विफल रही। फिर प्रेमचंद ने काम संभाला अऊर ''जागरण नामक एक अउर पत्रिका का संपादन किहिन,'' जवन भी घाटे मा चलत रही। 1931 मा प्रेमचंद मारवाड़ी कालेज मा अध्यापक के रूप मा कानपुर चले गें पै कालेज प्रशासन से मतभेद होय के कारन छोड़ै का पड़ा। <ref name="Giriraj2001">{{Cite book|title=Premchand: Karam Bhoomi (Abhyas Pustika)|last=Agarwal|first=Girirajsharan|publisher=Diamond|year=2001|isbn=978-81-7182-328-4|pages=5–9|language=hi}}</ref> तब उ बनारस लौटि आए अऊर ''मर्यादा'' पत्रिका के संपादक बनिन। 1932 मा, उ ''कर्मभूमि'' शीर्षक से एक अउर उपन्यास प्रकाशित किहिन। उ संक्षेप मा काशी विद्यापीठ, एक स्थानीय स्कूल के हेडमास्टर के रूप मा काम किहिन। स्कूल बंद होय के बाद, उ [[लखनऊ]] मा ''माधुरी'' पत्रिका के संपादक बने। <ref name="Giriraj2001" /> === बम्बई === प्रेमचंद 31 मई 1934 का हिंदी फिल्म उद्योग मा आपन किस्मत आजमावै [[मुम्बई|बम्बई]] पहुँचे। उ प्रोडक्शन हाउस अजंता सिनेटोन के लिए पटकथा लेखन के नौकरी स्वीकार किहिन रहैं, ई उम्मीद मा कि ₹8,000 के सालाना वेतन से ओनके वित्तीय परेशानियन का दूर करै मा मदद मिली। उ दादर मा रहे, अऊर फिल्म ''मजदूर'' ("द लेबरर") के पटकथा लिखिन। मोहन भवानानी के निर्देशन मा बनी ई फिलिम मा मजदूर वर्ग के खराब हालात का देखावा गा रहा। फिल्म मा मजदूरन के नेता के रूप मा खुद प्रेमचंद कैमियो किहिन। कुछ प्रभावशाली व्यापारी बम्बई मा एकर रिलीज पर रोक लगावै मा कामयाब रहे। ई फिलिम लाहौर अउर दिल्ली मा रिलीज भै लेकिन मिल के मजदूरन का मालिकन के खिलाफ खड़ा होय के प्रेरणा देय के बाद फिर से प्रतिबंधित कीन गा। विडंबना ई है कि ई फिलिम [[वाराणसी|बनारस]] मा अपने घाटे वाले प्रेस के मजदूरन का वेतन न मिलै के बाद हड़ताल करै के लिए प्रेरित किहिस। 1934–35 तक, प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस ₹400 के भारी कर्ज मा रहा, अऊर प्रेमचंद का ''जागरण'' के प्रकाशन बंद करै का मजबूर कीन गा रहा। इसी बीच प्रेमचंद बम्बई फिल्म उद्योग के गैर-साहित्यिक व्यावसायिक माहौल का नापसंद करै लाग रहे, अउर बनारस लौटै चाहत रहे। हालांकि, उ प्रोडक्शन हाउस के साथे एक साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किहिन रहैं। एक साल पूरा होय से पहिले, उ अंततः 4 अप्रैल 1935 का बम्बई छोड़ दिहिन। बम्बई टॉकीज़ के संस्थापक हिमांशु रॉय प्रेमचंद का वापस रहै के लिए मनावै के कोशिश किहिन लेकिन असफल रहे। आखिरी दिन बम्बई छ्वाड़ै के बाद, प्रेमचंद [[प्रयागराज|इलाहाबाद]] मा बसब चहति रहैं, जहाँ उनके लरिका श्रीपत राय अउर अमृत कुमार राय पढ़ति रहैं। उइ हुँवा ते ''हंस का'' प्रकाशित करै के योजना बनाइन। हालांकि, अपनि वित्तीय स्थिति द्याखत भए अऊर बीमार स्वास्थ्य के कारण, उनका ''हंस'' का इंडियन लिटरेरी काउंसल के हवाले करै का पड़ा अउर बनारस जाय का पड़ा। प्रेमचंद का 1936 मा लखनऊ मा प्रगतिशील लेखक संघ क्या पहिला अध्यक्ष चुना गा रहै <ref name="MichaelArbolina2008">{{Cite book|title=The Facts on File Companion to the World Novel: 1900 to the Present|publisher=Infobase Publishing|year=2008|isbn=978-0-8160-6233-1|editor-last=Sollars|editor-first=Michael D.|pages=631–633|editor-last2=Jennings|editor-first2=Arbolina Llamas}}</ref> 8 अक्टूबर 1936 का कइयो दिनन की बीमारी के बाद पद पर रहतै रहत उनक्या निधन होइ गा। ''गोदान'' ( ''द गिफ्ट ऑफ ए काउ'', 1936), प्रेमचंद क्यार आखिरी पूरा कीन गा काम है, आम तौर पर यहिका उनके सबते श्रेष्ठ उपन्यास के रूप मा स्वीकार कीन जात है अउर सबते अच्छे हिंदी उपन्यासननौ मा गिना जात है। <ref>{{Cite web |last=Deepak |first=Sunil |title=Phanishwar Nath Renu |url=http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |url-status=dead |archive-url=https://web.archive.org/web/20080313043341/http://www.kalpana.it/eng/writer/indian_writers/phanishwarnath_renu.htm |archive-date=13 March 2008 |access-date=25 August 2021 |website=Kalpana.it}}</ref> येहिका नायक, होरी, एक गरीब किसान, ग्रामीण भारत मा धन अउर प्रतिष्ठा के प्रतीक गाय के लिए तरसत देखावा गा है। सिगफ्राइड शुल्ज़ के अनुसार, " ''गोदान'' एक सुव्यवस्थित अउर सुसंतुलित उपन्यास है जउन पश्चिमी साहित्यिक मानक द्वारा स्थापित साहित्यिक आवश्यकतन का पर्याप्त रूप ते पूरा करत है।" [[रबीन्द्रनाथ ठाकुर|रवीन्द्रनाथ टैगोर]] जइसे अन्य समकालीन प्रसिद्ध लेखकन के विपरीत, प्रेमचंद के भारत ते बाहर बहुत सराहना नहीं कीन गै। शुल्ज़ का मानबु है कि यहिके कारण उनके काम के अच्छे अनुवादन क अभाव है। साथै, टैगोर अउर इकबाल के विपरीत, प्रेमचंद कबो भारत ते बाहर नहीं गें, विदेश मा पढ़ाई नहीं कीन्हेनि या प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक हस्तिन के साथै मिलैजुलै नहीं गें। 1936 मा प्रेमचंद जी "कफन" (" कफन ") नामक कहानी प्रकाशित कीन्हेनि, जेहिमा एक गरीब मनई अपनी मरी मेहेरिया के अंतिम संस्कार के खातिर पइसा इकट्ठा करत है लेकिन सब पइसा खावै पिएम उड़ा देत है। प्रेमचंदजी के आखिरी प्रकाशित कहानी "क्रिकेट मैच" रहै, जउन उनके मरै के बाद 1938 मा ''जमाना'' मा छपी रहै। ==सन्दर्भ== 3qn6ufziyhig2rifxwx920ooxtfu5u5 रमई काका 0 5245 35203 30359 2026-07-05T22:02:21Z Avimaarak 3578 Created by translating the section "References" from the page "[[:en:Special:Redirect/revision/1362330403|Ramai Kaka]]" 35203 wikitext text/x-wiki '''रमई काका''' [[अवधी भाषा]] के एक कवि रहेन। अवधी के आधुनिक कबियन मा सबसे पापुलर कवि रमई काका कै जनम रावतपुर, [[उन्नाव]] जिला (अवध) मा दुइ फरौरी सन्‌ १९२५ क भा रहा। काका जी कै पूरा नाव है चंद्रभूशन त्रिवेदी। काका केरी कबिताई मा व्यंग्य कै छटा जनता के जबान पै चढ़ि के बोलति रही। आजौ कविता कै उहै असर बरकरार अहै। १९४० से काका जी आकासबानी मा काम करै लागे अउर तब से काका जी कै ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी [[लखनऊ]] से काका जी कै प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गवा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन से ह्वै चुकी है। इनकै कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा कै जस फैलाय के माटी कै ई सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क ई दुनिया छोड़ दिहिस। == प्रमुख कृतियाँ == * ‘भिनसार’, * ‘बौछार’, * ‘फुहार’, * ‘गुलछर्रा’, * ‘नेताजी’ ==बाहर के कड़ियाँ== * [http://awadh.org/2012/11/13/ramai-kaka-3/ अवधी भाषा में रमई काका के कविता] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140817151937/http://awadh.org/2012/11/13/ramai-kaka-3/ |date=2014-08-17 }} *[http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE कविताकोश पर रमई काका] *[http://arglaa.blogspot.in/2014/01/blog-post_9834.html चन्द्र भूषण त्रिवेदी यानि रमई काका] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140810224203/http://arglaa.blogspot.in/2014/01/blog-post_9834.html |date=2014-08-10 }} *[http://awadh.org/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE/ रमई काका] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140805123608/http://awadh.org/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE/ |date=2014-08-05 }} (अवधी कै अरघान) *[http://www.jagran.com/uttar-pradesh/unnao-11075730.html तुलसी के बाद रमई काका अवधी का सबसे बड़ा नाम] [[श्रेणी:कवि]] == सन्दर्भ == {{Reflist}} co4dr3hemh6g0uv13s8wd2pfedvhq1d 35204 35203 2026-07-05T22:35:11Z Avimaarak 3578 Fixed grammar 35204 wikitext text/x-wiki {{Infobox writer <!-- for more information see [[:Template:Infobox writer/doc]] --> | name =चंद्र भूषण त्रिवेदी | pseudonym = रमई काका | image = Ramai Kaka.jpg | imagesize = | alt = | caption = | birth_date =०२ फरवरी १९१५ | death_date = १८ अप्रैल १९८२ | death_place = [[लखनऊ]], [[भारत ]] | birth_place = [[रावतपुर]], [[उन्नाव]], [[उत्तर प्रदेश]] | occupation =लेखक, कवि अउर रंगकर्मी | notableworks = भिनसार,बौछार,फुहार,गुलछर्रा,नेताजी, बहिरे बाबा और वरखोज । }} '''रमई काका''' [[अवधी भाषा]] के एक कवि रहैं। अवधी के आधुनिक कबिन मा सबसे पापुलर कवि, रमई काका, का जनम रावतपुर, जिला [[उन्नाव]] ([[अवध]]) मा दुइ फरवरी सन्‌ १९२५ क भा रहै। काका जी का पूरा नाव रहै चंद्रभूषण त्रिवेदी। काका केरी कबिताई मा व्यंग्य कै छटा जनता के जबान पै चढ़ि के ब्वालति रहै। आजौ उनकी कविता क्या वहै असर बरकरार है। १९४० ते काका जी आकासबानी मा काम करै लाग अउर तब ते काका जी के ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी [[लखनऊ]] से काका जी कै प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन ते होइ चुकी है। इनकै कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा क जस फैलाय के माटी क यो सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क दुनिया छाँड़ि दीन्हेसि। == प्रमुख कृतियाँ == * ‘भिनसार’, * ‘बौछार’, * ‘फुहार’, * ‘गुलछर्रा’, * ‘नेताजी’ ==बाहर के कड़ियाँ== * [http://awadh.org/2012/11/13/ramai-kaka-3/ अवधी भाषा में रमई काका के कविता] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140817151937/http://awadh.org/2012/11/13/ramai-kaka-3/ |date=2014-08-17 }} *[http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE कविताकोश पर रमई काका] *[http://arglaa.blogspot.in/2014/01/blog-post_9834.html चन्द्र भूषण त्रिवेदी यानि रमई काका] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140810224203/http://arglaa.blogspot.in/2014/01/blog-post_9834.html |date=2014-08-10 }} *[http://awadh.org/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE/ रमई काका] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140805123608/http://awadh.org/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE/ |date=2014-08-05 }} (अवधी कै अरघान) *[http://www.jagran.com/uttar-pradesh/unnao-11075730.html तुलसी के बाद रमई काका अवधी का सबसे बड़ा नाम] [[श्रेणी:कवि]] == सन्दर्भ == {{Reflist}} pv8psgila7pdcqav1fp0h1igoyqqp9f 35206 35204 2026-07-05T22:58:12Z Avimaarak 3578 Added links 35206 wikitext text/x-wiki {{Infobox writer <!-- for more information see [[:Template:Infobox writer/doc]] --> | name =चंद्र भूषण त्रिवेदी | pseudonym = रमई काका | image = Ramai Kaka.jpg | imagesize = | alt = | caption = | birth_date =०२ फरवरी १९१५ | death_date = १८ अप्रैल १९८२ | death_place = [[लखनऊ]], [[भारत ]] | birth_place = [[रावतपुर]], [[उन्नाव जिला]], [[उत्तर प्रदेश]] | occupation =लेखक, कवि अउर रंगकर्मी | notableworks = भिनसार,बौछार,फुहार,गुलछर्रा,नेताजी, बहिरे बाबा और वरखोज । }} '''रमई काका''' [[अवधी भाषा]] के एक कवि रहैं। अवधी के आधुनिक कबिन मा सबसे पापुलर कवि, रमई काका, का जनम रावतपुर, जिला [[उन्नाव जिला]] ([[अवध]]) मा दुइ फरवरी सन्‌ १९२५ क भा रहै। काका जी का पूरा नाव रहै चंद्रभूषण त्रिवेदी। काका केरी कबिताई मा व्यंग्य कै छटा जनता के जबान पै चढ़ि के ब्वालति रहै। आजौ उनकी कविता क्या वहै असर बरकरार है। १९४० ते काका जी आकासबानी मा काम करै लाग अउर तब ते काका जी के ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी [[लखनऊ]] से काका जी कै प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन ते होइ चुकी है। इनकै कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा क जस फैलाय के माटी क यो सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क दुनिया छाँड़ि दीन्हेसि। == प्रमुख कृतियाँ == * ‘भिनसार’, * ‘बौछार’, * ‘फुहार’, * ‘गुलछर्रा’, * ‘नेताजी’ ==बाहर के कड़ियाँ== * [http://awadh.org/2012/11/13/ramai-kaka-3/ अवधी भाषा में रमई काका के कविता] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140817151937/http://awadh.org/2012/11/13/ramai-kaka-3/ |date=2014-08-17 }} *[http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE कविताकोश पर रमई काका] *[http://arglaa.blogspot.in/2014/01/blog-post_9834.html चन्द्र भूषण त्रिवेदी यानि रमई काका] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140810224203/http://arglaa.blogspot.in/2014/01/blog-post_9834.html |date=2014-08-10 }} *[http://awadh.org/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE/ रमई काका] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140805123608/http://awadh.org/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE/ |date=2014-08-05 }} (अवधी कै अरघान) *[http://www.jagran.com/uttar-pradesh/unnao-11075730.html तुलसी के बाद रमई काका अवधी का सबसे बड़ा नाम] [[श्रेणी:कवि]] == सन्दर्भ == {{Reflist}} ikjh5wtohweav4i0k9ttq8ec3giwyun 35208 35206 2026-07-06T07:20:27Z Satviknarayantripathi 3168 Fixed grammar 35208 wikitext text/x-wiki {{Infobox writer <!-- for more information see [[:Template:Infobox writer/doc]] --> | name =चंद्र भूषण त्रिवेदी | pseudonym = रमई काका | image = Ramai Kaka.jpg | imagesize = | alt = | caption = | birth_date =०२ फरवरी १९१५ | death_date = १८ अप्रैल १९८२ | death_place = [[लखनऊ]], [[भारत ]] | birth_place = [[रावतपुर]], [[उन्नाव जिला]], [[उत्तर प्रदेश]] | occupation =लेखक, कवि अउर रंगकर्मी | notableworks = भिनसार,बौछार,फुहार,गुलछर्रा,नेताजी, बहिरे बाबा और वरखोज । }} '''रमई काका''' [[अवधी भाषा]] के एक कवि रहैं। अवधी के आधुनिक कबिन मा सबते पापुलर कवि, रमई काका, का जनम रावतपुर, [[उन्नाव जिला]] ([[अवध]]) मा दुइ फरवरी सन्‌ १९२५ क भा रहै। काका जी का पूरा नाव रहै चंद्रभूषण त्रिवेदी। काका की कबिताई मा व्यंग्य के छटा जनता की जबान पर चढ़ि के ब्वालति रहै। आजौ उनकी कविता क्या वहै असर बरकरार है। १९४० ते काका जी आकासबानी मा काम करै लाग अउर तब ते काका जी के ख्याति बढ़तै गै। आकासबानी [[लखनऊ]] ते प्रकाशित काका जी क प्रोग्राम ‘बहिरे बाबा’ बहुतै सराहा गा। काका जी के कार्यक्रम कै प्रस्तुति बी.बी.सी. लंदन ते होइ चुकी है। इनकी कबिता चौपाल मा, किसानन के खेतन मा, मेलन मा, चौराहन पै सहजै मिलि जात है। ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, ‘नेताजी’ जैसे कयिउ काब्य-संग्रह हजारन की संख्या मा छपे अउर बिके। दूर-दूर तक अपनी लोक-भासा क जस फैलाय के माटी क यो सपूत अठारह अपरैल सन्‌ १९८२ क दुनिया छाँड़ि दीन्हेसि। == प्रमुख कृतियाँ == * ‘भिनसार’, * ‘बौछार’, * ‘फुहार’, * ‘गुलछर्रा’, * ‘नेताजी’ ==बाहर के कड़ियाँ== * [http://awadh.org/2012/11/13/ramai-kaka-3/ अवधी भाषा में रमई काका के कविता] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140817151937/http://awadh.org/2012/11/13/ramai-kaka-3/ |date=2014-08-17 }} *[http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE कविताकोश पर रमई काका] *[http://arglaa.blogspot.in/2014/01/blog-post_9834.html चन्द्र भूषण त्रिवेदी यानि रमई काका] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140810224203/http://arglaa.blogspot.in/2014/01/blog-post_9834.html |date=2014-08-10 }} *[http://awadh.org/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE/ रमई काका] {{Webarchive|url=https://web.archive.org/web/20140805123608/http://awadh.org/tag/%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE/ |date=2014-08-05 }} (अवधी कै अरघान) *[http://www.jagran.com/uttar-pradesh/unnao-11075730.html तुलसी के बाद रमई काका अवधी का सबसे बड़ा नाम] [[श्रेणी:कवि]] == सन्दर्भ == {{Reflist}} hc39p25khxpea8ijjb4dn8i0iqjgfx6 तीजनबाई 0 8169 35213 35192 2026-07-06T08:38:34Z Lp0 on fire 4997 [[Special:Contributions/Simoni.IBC24|Simoni.IBC24]] ([[User talk:Simoni.IBC24|बातचीत]])से [[User:Suyash.dwivedi|Suyash.dwivedi]] कय करल पिछला संशोधन उल्टाई कय पहिले जैसन कै गय: cross-wiki spam 29890 wikitext text/x-wiki {{Infobox person |image = Teejan Bai after performnce at Bharat Bhawan Bhopal.jpg |caption = तीजन बाई पंडवानी का प्रदर्शन के बाद | name = तीजन बाई | birthdate = २४ अप्रैल १९५६ | residence = गनियारी ग्राम, [[भिलाई]],<br />[[दुर्ग जिला]], [[छत्तीसगढ़]]<ref name="Bharat 2023 v004">{{cite web | last=Bharat | first=ETV | title=Teejan bai birthday : पंडवानी गायिका तीजन बाई का जन्मदिन, दिग्गजों ने दी शुभकामनाएं | website=ETV Bharat News | date=24 April 2023 | url=https://www.etvbharat.com/hindi/chhattisgarh/state/raipur/pandwani-singer-teejan-bai-birthday/ct20230424141351159159962 | language=hi | access-date=20 March 2024}}</ref> | height = | deathdate = | deathplace = | yearsactive = | birthname = | othername = | occupation = [[पंडवानी]] लोक गीतकार | spouse = तुक्का राम | children = | homepage = | awards = [[पद्म भूषण]] २००३<br />[[पद्म श्री]] १९८८<br />[[संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार]] १९९५ ,पद्म विभूषण २०१९ }} '''तीजनबाई''' (जन्म - २४ अप्रैल १९५६) भारत कय [[छत्तीसगढ़]] राज्य कय [[पंडवानी]] लोक गीत-नाट्य कय पहिली महिला कलाकार अहै। देश-विदेश में आपन कला का प्रदर्शन करे वाली तीजनबाई का [[बिलासपुर]] विश्वविद्यालय द्वारा डी लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है<ref name="Dainik Bhaskar 2016 n667">{{cite web | title=5वीं फेल लेकिन चौथी बार डीलिट की डिग्री, मां के विरोध के चलते छोड़ना पड़ा था घर | website=Dainik Bhaskar | date=19 July 2016 | url=https://www.bhaskar.com/news/chh-oth-degree-offered-to-tejan-news-hindi-5375916-pho.html | language=hi | access-date=20 March 2024}}</ref>। उ सन १९८८ में भारत सरकार द्वारा [[पद्म श्री]] अउर २००३ में कला के क्षेत्र में [[पद्म भूषण]] से अलंकृत रहिन। उनका १९९५ मा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार अउर २००७ मा नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित करल गइल बा।<ref name="Bharat 2023 v004">{{cite web | last=Bharat | first=ETV | title=Teejan bai birthday : पंडवानी गायिका तीजन बाई का जन्मदिन, दिग्गजों ने दी शुभकामनाएं | website=ETV Bharat News | date=24 April 2023 | url=https://www.etvbharat.com/hindi/chhattisgarh/state/raipur/pandwani-singer-teejan-bai-birthday/ct20230424141351159159962 | language=hi | access-date=20 March 2024}}</ref> भिलाई के गनियारी गाँव में जनमल इ कलाकार के पिता का नाम हुनकलाल परधा अउर माता का नाम सुखवती रहे। नन्हें तीजन आपन नाना ब्रजलाल का [[महाभारत]] की कहानियां गावत देखत रहिन अउर धीरे धीरे इनका इ कहानियां याद आवे लागिन। ओकर अद्भुत लगन अउर प्रतिभा का देखके उम्मेद सिंह देशमुख उनका अनौपचारिक प्रशिक्षण भी दिहिन। १३ साल की उमर मा ऊ अपने पहले मंच पर अइली. उ समय महिला पंडवानी गायिका केवल बैठकर ही गा सकती थी, जेके वेदमती शैली कहल जात बा। पुरुष खड़ा होइके कापलिक शैली मा गावा करत रहेन । तीजनबाई पहिली महिला रहीं जे कापलिक शैली में पंडवानी का प्रदर्शन कइलीं। एक दिन ऐसा भी आया जब प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर इनका सुने अउर तब से तीजनबाई का जीवन बदल गयल.कई अति विशिष्ट लोगन के सामने देश-विदेश में ऊ आपन कला का प्रदर्शन कईलन प्रदेश अउर देश कय सरकारी अउर गैर सरकारी संस्था कय द्वारा पुरस्कृत तीजनबाई मंच पे सम्मोहित कर देवे वाला अद्भुत नृत्य नाट्य कय प्रदर्शन करत है। जइसहिं प्रदर्शन शुरू होत है, उनकर रंग बिरंगी फुलदान वाला तानपूरा अभिव्यक्ति के अलग अलग रूप लेत है. कभी दुःशासन की बाँह, कभी अर्जुन का रथ, कभी भीम का गदा तो कभी द्रौपदी का बाल बनकर, यह तानपूरा श्रोताओं को इतिहास के उस समय पर पहुंचाता है जहाँ वे तीजन के साथ - साथ जोश, होश, क्रोध, दर्द, उत्साह, उमंग और छल - कपट की ऐतिहासिक संवेदना का अनुभव करते हैं। उनकर ठोस लोकनाट्य वाली आवाज अउर अभिनय, नृत्य अउर संवाद उनकर कला के खास अंग हयेन। ==पंडवानी== [[File:Teejan Bai performing at Bharat Bhawan Bhopal (3).jpg|thumb|पंडवानी]] पंडवानी [[छत्तीसगढ़]] का ऊ एकल नाट्य है जेकर अर्थ है पांडववाणी - यानि पांडवकथा, यानि महाभारत का कथा. इ कथाएं छत्तीसगढ़ की परधान अउर देवार छत्तीसगढ़ की जातियन की गायन परंपरा है। परधान [[गोंड]] की एक उपजाति है अउर देवार धुमन्तू जाति है। इ दुन्नो जातिन कय बोली, वाद्ययंत्रन मा अंतर है । परधान जाति का कथा वाचक या वाचिका के हाथ मा "किंकनी " होत है अउर देवरन के हाथ मा ररुंझु होत है। परधानन अउर देवारन पंडवानी लोक महाकाव्य का छत्तीसगढ़ भर फैलाइन। तीजन बाई पांडवानी का आज के संदर्भ में ख्याति दिहिस, न केवल हमरे देश मा बल्कि विदेशों मा भी। ==सन्दर्भ == {{reflist}} [[श्रेणी:महिला कलाकार]] [[श्रेणी:छत्तीसगढ़ के लोग]] 1pu828gs96zacxv41heq44x60a9s84r उन्नाव जिला 0 9767 35205 2026-07-05T22:56:52Z Avimaarak 3578 "[[:en:Special:Redirect/revision/1349259564|Unnao district]]" पन्ना कै अनुवाद कइके बनवा गा 35205 wikitext text/x-wiki '''उन्नाव जिला''' मध्य भारत के [[उत्तर प्रदेश]] राज्य का एक [[उत्तर प्रदेश कय ज़िला|जिला]] है। उन्नाव शहर यहिका जिला मुख्यालय है। यो जिला [[लखनऊ मंडल]] का हिस्सा है। 2011 की जनगणना के अनुसार, उन्नाव जिला के आबादी 3,108,367 है, जउन यहिका उत्तर प्रदेश क्या 31वाँ सबसे ज़्यादा आबादी वाला जिला बनावत है। <ref name="Census 2011">{{Cite web |title=Census of India 2011: Uttar Pradesh District Census Handbook - Unnao, Part A (Village and Town Directory) |url=https://censusindia.gov.in/2011census/dchb/UPA.html |access-date=26 June 2021 |website=Census 2011 India |pages=xiii-xv, 5–11, 14, 19–20, 75, 93, 110, 135, 160, 178, 204, 237, 262, 280, 298, 323, 348, 373, 390, 416, 525–39}}</ref> यो एक मुख्य रूप ते ग्रामीण आबादी वाला जिला है, जेहिमा 80% ते ज्यादा आबादी ग्रामीण क्षेत्रन मा रहति है। <ref name="Census 2011" /> == महाकाव्यन मा उन्नाव == [[रामायण]] मा, देवी सीता का सुतियातारा चौराहा (जेहिका तब सीता-उतारा जंगल कहा जात रहै) मा लक्ष्मण जी द्वारा छोड़ दीन गा रहै। अब सुतियातारा मा एक चौराहा अउर एक [[शिव]] मंदिर है। उइ अपने दुसरे बनबास मा हियैं परियर (परियर) गाँव मा रहत रहीं, जहाँ पर ऋषि वाल्मीकि क्यार आश्रम रहै। तबै हियाँ पर आम, नीम, बरगद, [[पीपर|पीपल के पेड़न]] आदि ते हरा भरा जंगल रहै। वही मा उइ अपने दून्हो लरिकन का जन्म दिहिन। अब, हियाँ पर सीता, कुश अउर लव का एक प्रसिद्ध मंदिर है जेहिका जानकी कुंड कहा जात है (मतलब एक अइसि जगह जहाँ ते सीता मइया अपनी आध्यात्मिक महतारी भुइँया माता के साथ क्षीर सागर मा समा गई रहैं) अउर हियाँ एक शिवालौ बना है जेहिका लोधेसुर कहा जात है। 785r0ma2rrfxjrt2w2i0ku9fz5aorow 35207 35205 2026-07-05T23:14:51Z Avimaarak 3578 35207 wikitext text/x-wiki {{Infobox settlement | name = उन्नाव ज़िला | settlement_type = उत्तर प्रदेश मा एक जिला | total_type =कुल | native_name = | image_skyline = {{multiple image | border = infobox | total_width = 300 | image_style = | perrow = 1/2 | image1 = Sarosi Rajbhawan.jpg | caption1 = Palace of [[Sarosi estate]] | image2 = Nawabganj Bird Sanctuary, Unnao 03.JPG | caption2 = [[नवाबगंज पक्षी विहार]] }} | image_map = India_Uttar_Pradesh_districts_2012_Unnao.svg | map_caption = Location of Unnao district in Uttar Pradesh | coordinates = | coor_pinpoint = Unnao | subdivision_type = Country | subdivision_name = {{flag|India}} | subdivision_type1 = [[States and union territories of India|राज्य]] | subdivision_name1 = [[उत्तर प्रदेश]] | subdivision_type2 = [[Administrative divisions of India|मंडल]] | subdivision_name2 = [[Lucknow division|लखनऊ]] | established_title = 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का जन्म दिहिन। अब, हियाँ पर सीता, कुश अउर लव का एक प्रसिद्ध मंदिर है जेहिका जानकी कुंड कहा जात है (मतलब एक अइसि जगह जहाँ ते सीता मइया अपनी आध्यात्मिक महतारी भुइँया माता के साथ क्षीर सागर मा समा गई रहैं) अउर हियाँ एक शिवालौ बना है जेहिका लोधेसुर कहा जात है। <ref name="Census 2011">{{Cite web |title=Census of India 2011: Uttar Pradesh District Census Handbook - Unnao, Part A (Village and Town Directory) |url=https://censusindia.gov.in/2011census/dchb/UPA.html |access-date=26 June 2021 |website=Census 2011 India |pages=xiii-xv, 5–11, 14, 19–20, 75, 93, 110, 135, 160, 178, 204, 237, 262, 280, 298, 323, 348, 373, 390, 416, 525–39}}</ref> iwxnnfpq37t4uqhdstqljxxcmcn1ubk