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भारतीय काव्यशास्त्र/शब्द शक्तियाँ
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2026-07-03T06:52:12Z
अजीत कुमार तिवारी
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{{संचरण|पिछला=काव्य दोष|अगला=रस सिद्धांत}}
शब्द तथा अर्थ के संबंध को शक्ति या शब्दशक्ति कहते हैं। इसको व्यापार भी कहा गया हैं। शब्द में निहित अर्थ-संपत्ति को प्रकट करने वाला तत्त्व शब्दव्यापार या शब्दशक्ति है। शब्दशक्तियाँ साधन के रूप में समादृत हैं। शब्द कारण है और अर्थ कार्य और शब्दशक्तियाँ साधन या व्यापार-रूप हैं। शब्दशक्ति के बिना शब्द के अर्थ का ज्ञान संभव नहीं है। शब्द तथा अर्थ के संबंध में विचार करनेवाले तत्व को शब्दशक्ति कहते हैं। शब्द की तीन शक्तियाँ हैं - अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। शब्द तीन प्रकार के होते हैं - वाचक, लक्षक और व्यंजक तथा इनसे क्रमशः तीन प्रकार के अर्थ प्रकट होते हैं - वाच्यार्थ, लक्ष्यार्थ तथा व्यंग्यार्थ। इन तीनों अर्थों की प्रतीति तीन प्रकार की शक्तियों - अभिधा, लक्षणा और व्यंजना द्वारा होती है।
==अभिधा==
अभिधा को परिभाषित करते हुए आचार्य विश्वनाथ कहते हैं- 'तत्र संकेतितार्थस्य बोधनादग्रिमाभिधा' अर्थात् उनमें (वाक्य में) संकेतित यानि कि मुख्य अर्थ का बोध कराने वाली वृत्ति या शक्ति को अभिधा कहते हैं।
चार प्रकार के शब्द होते हैं- जातिवाचक, गुणवाचक,द्रव्यवाचक और क्रियावाचक। इन शब्दों के अर्थ का बोध कराने में जहां किसी अन्य दूसरी शक्ति की आवश्यकता नहीं होती , वहाँ मुख्य अर्थ का व्यवधान रहित बोध कराने वाली शब्द की शक्ति अभिधा कहलाती है। जैसे अश्व , क्रीड़ा, मुख आदि ।
=== अभिधा के भेद ===
अभिधा के निम्न तीन भेद है:-
==== रूढ़ि ====
वे शब्द जिनका अर्थ तय हो, उनमे बदलाव नही हो सकते उन्हें रूढ़ि कहते है।
जैसे:- रोटी, कलम, पेड़ आदि
==== योग ====
दो शब्दों के जोड़ से प्राप्त एक नये अर्थ की प्रतीति कराने वाले शब्द को योग कहते है। इसमे दोनो शब्दों को अलग अलग करने पर उनका एक स्वतंत्र अर्थ भी होता है। जैसे:- बैलगाड़ी, मालगाड़ी आदि।
==== योगरूढ़ि ====
वे योग शब्द जो समाज में अब एक विशेष अर्थ के लिए रूढ़ हो गये है अर्थात उनका कोई भिन्न अर्थ हो भी फिर भी उन सबसे एक अर्थ विशेष की प्रतीति होती है। जैसे:- मुरलीधर, मधुसूदन, गोपाल आदि। यहाँ गोपाल 'गो' तथा 'पाल' के योग से निर्मित है जिसका अर्थ है गाय पालने वाला पर इसका अर्थ कृष्ण के लिए रूढ़ हो गया है।
==लक्षणा==
'मुख्यार्थ बाधे तद्युक्तो ययान्योsर्थः प्रतीयते ।
रूढ़ेः प्रयोजनाद्वासौ लक्षणा शक्तिरर्पिता।।'(साहित्य दर्पण- २.५)
अर्थात् अभिधा शक्ति से निरूपित मुख्य अर्थ को बाधित करके रूढ़ि(प्रसिद्धि) या प्रयोजन (उद्देश्य) के कारण जिस वृत्ति या शक्ति से अन्य अर्थ की प्रतीति होती है, शब्द के अर्थ का बोध कराने वाली उस शक्ति को लक्षणा शक्ति कहते हैं। जैसे कुशल अर्थात् कुश को लाने वाला। लेकिन यहाँ पर कुशल का अर्थ कार्य में दक्षता प्राप्त व्यक्ति से है। वैसे ही 'कलिंग साहसिक होता है।' यहाँ कलिंग से देश का अर्थ न लेकर कलिंग का निवासी कहना अभिप्रेत है।
=== लक्षणा के भेद ===
लक्षणा के दो भेद है- १) प्रयोजनवती २) रूढ़ा
प्रयोजनवती के दो भेद गौणी और शुद्धा है। गौणी और शुद्धा के दो-दो भेद है उपादान और लक्षण। उपादान और लक्षण के भी दो-दो भेद है सारोपा और साध्यवसाना।<ref>काव्य के तत्व, देवेन्द्रनाथ शर्मा, लोकभारती प्रकाशन, आईएसबीएन : ९७८९३५२२१११५९, पृष्ठ - २१</ref>
==== रूढ़ा ====
रूढ़ि कहते हैं प्रयोग-प्रसिद्धि को अर्थात् वैसा बोलने का प्रचलन है, तरीका है। उदाहरणार्थ,' नौ दो ग्यारह होना '। इसके अंतर्गत सभी मुहावरे आदि आते है।
==== प्रयोजनवती ====
जब मन में कोई ऐसा अभिप्राय हो जो प्रयुक्त शब्द से व्यक्त ना हो तो प्रयोजनवती का प्रयोग होता है। जैसे:- नौकर बैल है।
===== गौणी =====
जहाँ सादृश्य संबंध होता है वहाँ गौणी लक्षणा होता है। जैसे:- मुख चंद्र है, अर्थात् चंद्र के समान मुख मे भी चमक है। विषय और विषयी में सादृश्य संबंध है।
===== शुद्धा =====
जहाँ विषय और विषयी में सादृश्येतर संबंध होता है वहाँ शुद्धा लक्षणा होता है। जैसे:- चाँद निकला। अब यहाँ हमे विषय और विषयी का संबंध दिख नहीं रहा है।
===== उपादान =====
जहाँ मुख्यार्थ और लक्ष्यार्थ दोनों रहते हैं वहां उपादान लक्षणा होती है। जैसे:- लालपगड़ी कहने पर मुख्य अर्थ के साथ सिद्धी पूर्ति के लिए लक्ष्यार्थ 'पुलिस वाले' का भी बोध हो रहा है।
===== लक्षण =====
जहाँ मुख्यार्थ लक्ष्यार्थ के कारण तिरस्कृत हो जाता है वहां लक्षण लक्षणा होता है। जैसे:- कुशल का अर्थ कुश को लाने वाला होता है किन्तु इसका यह अर्थ प्रायः ग्रहण नहीं किया जाता।
===== सारोपा =====
जहाँ विषय और विषयी अर्थात् उपमेय और उपमान का संबंध दिखे वहाँ सारोपा लक्षणा होता है। जैसे:- चरण कमल है।
===== साध्यवसाना =====
यदि विषय और विषयी में विषय को छोड़ केवल विषयी का नाम ले तो वहीँ साध्यवसाना होता है। जैसे:- दीपक जला।
==व्यंजना==
अभिधा और लक्षणा की सीमा के बाहर पड़नेवाले अर्थ को जो शक्ति व्यक्त करती है, उसे व्यंजना कहते हैं ।
===व्यंजना के भेद===
व्यंजना के दो भेद है-- शाब्दी व्यंजना और आर्थी व्यंजना। शाब्दी व्यंजना के दो और भेद है अभिधामूलक व्यंजना और लक्षणामूलक व्यंजना।<ref>देवेन्द्रनाथ शर्मा, काव्य के तत्व,लोकभारती प्रकाशन, २०१५,पृष्ठ संख्या२४</ref>
==== शाब्दी व्यंजना ====
जहाँ शब्द से व्यंग्य की प्रतीति होती है वहां शाब्दी व्यंजना होता है। जैसे:- ऊधो तुम अपनो जतन करो, आयों घोष बड़ो व्यापारी।
====आर्थी व्यंजना ====
जहाँ अर्थ से व्यंग्य की प्रतीति होती है वहाँ आर्थी व्यंजना। जैसे:- कागज की आजादी मिलती ले लो दो दो आने में।
===== अभिधामूलक व्यंजना =====
जिसमें वाच्यार्थ व्यंग्यार्थ तक पहुँचाता है। वहां अभिधामूलक व्यंजना होता है। जैसे:- मैं द्रोणाचार्य हो कर भील शिष्य रखूँ! यहाँ द्रोणाचार्य व्यंग्यार्थ में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे हैं।
===== लक्षणामूलक व्यंजना =====
जहाँ लक्षणा से व्यंग्यार्थ का प्रतीति हो वहाँ लक्षणामूलक व्यंजना होती है। जैसे:- वियोग में नायिका हवा में उड़ने लगी। यहाँ नायिका सच में हवा में नहीं उड़ रही अपितु उसके वियोग के हाल का वर्णन मिलता है।
== संदर्भ ==
ta60toi4jn4wqtqtrwxkn3qd0mcanm0
भारतीय काव्यशास्त्र/रस का स्वरूप
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अजीत कुमार तिवारी
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{{संचरण|पिछला=रस के अंग|अगला=रस-निष्पत्ति}}
===रस का स्वरूप===
भारतीय काव्यशास्त्र में रस सिध्दांत सर्वाधिक महत्त्व का अधिकारी रहा है। भरतमुनि का विख्यात सूत्र - '''विभावानुभाव व्यभिचारसंयोगाद् रस-निष्पति:''' की मान्यताओं को परवर्ती आचार्यों ने अपने-अपने रूप में की। संस्कृत-काल में दो तरह की धारणाएं थी। १) भट्टनायक तक रस को आस्वाध का विषय माना जाता था २) अभिनवगुप्त और उसके बाद के आचार्यों ने रस को आस्वाध न मानकर 'आस्वाद' माना। इस प्रकार भरतमुनि, भट्टलोल्ट और शंकुक मानते थे कि जगत् की नाना प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रियाओं की कलात्मक अभिव्यंजना रस है, अतः संसार की प्रत्येक वस्तु पारस्परिक रूप से आस्वाध होने के कारण रस भी आस्वाध है। अभिनवगुप्त इत्यादि आचार्य मानते हैं कि रस जगत् का प्रतिबिम्ब है, ठीक है किंतु यह सहृदय की मनसाचर्वणा में विलोड़ित होता है। सहृदय काव्य का अध्ययन करते समय या नाटक देखते समय उनसे गृहीत सम्पूर्ण साम्रगी को अपने मानस के पूर्व संचित संस्कारों से संगति स्थापित करने देता है। इसी संगति स्थापना में उस प्रतिबिम्ब का मूल रूप खंडित हो जाता है और दोनों के संयोग से जो नई वृत्ति जन्म लेती है वह है आनंद। यह आनंद ही रस का पर्याय है। अभिनवगुप्त के बाद के आचार्यों मम्मट,विश्वनाथ आदि ने अपनी - अपनी तरह से प्रतिपादित किया। इन सब आचार्यों में विश्वनाथ का यह प्रसंग संग्रह और अवस्था दोनों दृष्टियों से उपादेय हैं। चित्त में सतोगुण के उद्रेक की स्थिति में विशिष्ट संस्कारवान् सहदयजन, अखण्ड, स्वप्रकाशानंद, चिन्मय, अन्य सभी प्रकार के ज्ञान से विनिमुक्त, ब्रह्मानंदसहोदर, लोकोत्तरचमत्कारप्राण रस का निज रूप से आस्वादन करते हैं। अर्थात् सहदय सांसारिक राग-द्वेष से विमुक्त-सा हो जाता है। उसके ऐन्द्रिय विषय सामान्य धरातल से ऊपर उठकर परिष्कृत एवं उदात्त बन जाते हैं। प्रमाता रस का आस्वादन केवल इसी स्थिति में ही कर पाता है। इस प्रकार 'साहित्यदर्पणकार' विश्वनाथ के अनुसार-
{{block center|<poem>
सत्वोद्रेकादखण्ड स्वप्रकाशानन्द चिन्मय:।
वेद्यान्तर स्पर्शशून्यो ब्रह्मास्वाद सहोदर:॥
लोकोत्तरचमत्कारप्राण: कैश्चित्प्रमातृभि:।
स्वाकारवद्भिन्नत्वेनायमास्वाद्यते रस:॥
</poem>}}
१) '''रस अखण्ड है'''- इसका तात्पर्य यह है कि रस उस स्थायिभाव का अपर नाम है जिसका संयोग विभाव, अनुभाव, संचारिभाव, इन तीनों के समन्वित अथवा समंजित रूप के साथ हो, न कि इनमें से किसी एक अथवा दो के साथ। वस्तुत: इन सबके 'समूहालम्बनात्मक ज्ञान' को ही रस कहते हैं। तथापि इसे इन अंगों से पृथक नहीं किया जा सकता। रस स्वत:पूर्ण होता है, यह न तो अधिक हो सकता है, और न कम। इसे कोटियों
में विभक्त भी नहीं कर सकते, अर्थात् प्रत्येक सहदय को रस का आस्वाद समान रूप से होता है।
२) '''रस स्वप्रकाश है'''- इसका तात्पर्य यह है कि जीस प्रकार सूर्य को दिखाने के लिए किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं रहती, उसी प्रकार रस भी स्वयं प्रकाशित होता है, इसे प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है। सम्भवत: इसी कारण इसे भी 'अपने आकार से अभिन्न' कहा जा सकता है।
३) '''रस 'अपने आकार से अभिन्न रूप में' आस्वादित किया जाता है'''- अर्थात् रस जिस रूप में आस्वादित होता है, उससे इतर यह और किसी प्रकार की अनुभूति नहीं है। इस कथन की व्याख्या में कह सकते हैं कि सहदय की निजी अनुभूति ही रस का रूप धारण कर लेती है, अर्थात् रस के आस्वादन-प्रसंग में एक सहदय की अनुभूति में किसी अन्य सहदय की अनुभूति न तो सहायक बनती है और न उसे किसी रूप में प्रभावित ही कर सकती हैं।
४) '''रस चिन्मय है'''- इसका तात्पर्य यह है कि यह शुध्द चेतन न होकर चेतनता-प्रधान है। मधपान, निद्रया इत्यादि की तरह जड़ आनंद न होकर काव्यानंद (रस) आत्मा के समान प्राणवान् , सचेतन है।
५) '''रस वेद्यान्तरस्पर्शशून्य है'''- अर्थात् रस ज्ञान के अनुभव से परे है। रस की अनुभूति के समय सम्पूर्ण ज्ञान-कोटियां और उनका स्वरूप नष्ट होकर आनंद रूप में परिणत हो जाता है। इसलिए कहा गया है कि रस के आस्वादन के समय अन्य किसी प्रकार के वेद्य अर्थात् ज्ञान का स्पर्श तक नहीं हो पाता। हम उस समय अपना अस्तिव तक भूल जाते हैं, फिर वातावरण देश-काल और अन्य सामान्य घटनाओं के याद रहने का तो प्रश्न ही नहीं ।
६) '''रस ब्रह्मास्वादसहोदर है'''- यहां रस (काव्यास्वाद) को ब्रह्मास्वांद न कहकर उसका 'सहोदर' कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि इन दोनों में स्पष्ट अन्तर यह है कि ब्रह्मास्वाद की प्राप्ति के समय योगी ऐन्द्रिय विकारों से विमुक्त होता है, इधर काव्यास्वाद के समय भी सहदय ऐन्द्रिय विकारों से विमुक्त होता है, किन्तु तत्काल के लिए। दूसरे शब्दों में, इधर काव्यास्वाद प्राप्ति के समय मानव के रति आदि भावों की परिष्कृति तो हो जाती है, पर उनका विनाश नहीं होता, वे तत्काल के लिए दब अवश्य जाते हैं, पर सामान्य स्थिति आने पर पुन: अपने रूप में और प्राय: पहले की अपेक्षा अधिक उद्दाम रूप में जाग्रत हो उठते हैं। उधर इसके विपरीत ब्रह्मास्वाद-प्राप्ति के समय में इतने विनष्ट हो जाते हैं कि पुनः अंकुरित नहीं होते।
७ '''रस लोकोत्तरचमत्कारप्राण (अनिर्वचनीय) है'''- रस का प्राण है लोकोत्तर चमत्कार। 'चमत्कार' का अर्थ है विस्मय, अर्थात् चित्त का विस्तार, और स्पष्ट शब्दों में कहें तो 'चमत्कार' चित्त का विकासजनक आहद है। रस का प्राण यही आनन्द है, किन्तु वह लोकात्तर होना चाहिए। 'रस लोकोत्तर-आहादवान् है' इसका अर्थ है कि रस का आहाद है तो इह-लौकिक, पर वह इस लोक के आश्रय आहादों से सर्वोपरि है। उदाहरणार्थ- स्वादिष्ट भोजन, पेय आदि से उपजे आनन्द की अपेक्षा, शतरंज की चालों, गणित के प्रश्नों से प्राप्त आनन्द की अपेक्षा रस-जन्य आनन्द कहीं अधिक बढ़-चढ़कर है।
अतः 'काव्यास्वाद से सहदयों के हृदय में उत्पन्न स्वप्रकाश, अखण्ड, चिन्मय आनंद को रस कहते हैं, जो ब्रह्यानंद सहोदर अनिर्वचनीय लोकोत्तरचमत्कार और ज्ञान अनुभव से परे है।'
अत: डां. नगेन्द्र के शब्दों में - '''विविध भावों और अभिनयों से व्यंजित भाव की कलात्मक अभिव्यंजना का भावमूलक काव्यसौंदर्य रस है।'''
पाश्चात्य दृष्टि से- '''काव्य द्वारा प्राप्त आनन्द (रस) को साधारणतः 'काव्यानन्द' कह सकते हैं, और इसे अंग्रेजी में प्राय: Aesthetic experience अथवा Poetic pleasure कहा जाता है।'''
===संदर्भ===
१. भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र---डाँ. सत्यदेव चौधरी, डाँ. शन्तिस्वरूप गुप्त। अशोक प्रकाशन, नवीन संस्करण-२०१८, पृष्ठ--५६-६१
२. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र की पहचान---प्रो. हरिमोहन । वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण-२०१३,पृष्ठ--२८,२९,३४,३५
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