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भारत का विभाजन
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अनुनाद सिंह
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अगस्त १९४७ में [[भारत]] को स्वतन्त्र घोषित करने के साथ ही अंग्रेजों ने भारत के दो टुकड़े कर दिये और भारत से पाकिस्तान नामक एक अन्य देश बनाकर अलग कर दिया। इसे ही '''[[:w:भारत का विभाजन|भारत का विभाजन]]''' कहते हैं। 14 अगस्त को पाकिस्तान अधिराज्य (बाद में जम्हूरिया ए पाकिस्तान) और 15 अगस्त को भारतीय संघ (बाद में भारत गणराज्य) की संस्थापना की गई। इस घटनाक्रम में मुख्यतः ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रान्त को पूर्वी पाकिस्तान और भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में बाँट दिया गया और इसी तरह ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रान्त को पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त और भारत के पंजाब राज्य में बाँट दिया गया।
== उक्तियाँ ==
* कांग्रेस के नेताओं ने सत्ता के लोभ में विभाजन करवाया। -- [[योगेन्द्र नाथ मंडल]], बीरभूम के उत्तर तिलपाड़ा शिविर में
* भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा। -- [[महात्मा गांधी]]
* कांग्रेस ने साम्प्रदायिकता से संघर्ष नही किया और उसके मूल कारणों को नहीं समझा जिससे मुस्लिम लीग और जिन्ना मजबूत होते गए। कांग्रेस स्वतंत्रता की चेतना का प्रसार तो कर सकी परन्तु राष्ट्र से नहीं जोड़ सकी खासकर मुसलमानों को। यह कांग्रेस की बड़ी कमजोरी थी। -- विपिन चन्द, 'भारत का स्वतंत्रता संग्राम' में पृष्ट 353, 387,395 पर
* कलकत्ता के नोआखली नरसंहार में कई हिन्दुओ की हत्याएं हुई, सैकड़ों ने इस्लाम कबूल लिया । हिंदू महिलाओं का बलात्कार और अपहरण किया गया । लेकिन फिर भी मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग जारी रखा। पाकिस्तान के अस्तित्व में आने बाद दलितों पर अत्याचार काफी बढ़ गए हैं। कई बार इस ओर ध्यान दिलाया गया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। हत्या और अत्याचार आम हो गया है। मैंने अपने आप से पूछा, 'क्या मै इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान आया था। -- [[योगेन्द्र नाथ मंडल]]
* विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल के 5 लाख हिन्दुओ को देश छोड़ना पड़ा है। पूर्वी पाकिस्तान के साथ पश्चिमी पाकिस्तान में भी ऐसे ही हालात हैं। बटवारे के बाद पश्चिमी पंजाब में 1 लाख पिछड़ी जाति के लोग रह रहे थे, उनमे से ज्यादातर को बलपूर्वक इस्लाम में परिवर्तित कर दिया गया है। मुझे जानकारी मिली है 363 मंदिरों और गुरूद्वारे मुस्लिमों के कब्जे में हैं । इनमे से कुछ को मोची की दुकान, कसाईखाना और होटलों में बदल दिया है। इसलिए मैं झूठे दिखाबे और असत्य के बोझ को अपनी अंतरात्मा पर नहीं लाद सकता हूं और अपना इस्तीफा आपको सौंप रहा हूँ। -- [[योगेन्द्र नाथ मंडल]]
* मैं यहाँ अपने दृढ़ विश्वास को दोहराना चाहता हूँ कि पूर्वी पाकिस्तान की सरकार अभी तक हिंदुओं को प्रांत से खदेड़ने की नीति पर चल रही है। मुझे ये कहना पड़ रहा है कि पश्चिम पाकिस्तान से हिंदुओं को भगाने की नीति पूरी तरह से कामयाब रही है और पूर्वी पाकिस्तान में भी ये कामयाबी की तरफ़ बढ़ रही है। -- [[योगेन्द्र नाथ मंडल]]
==इन्हें भी देखें==
*[[भारत]]
*[[द्विराष्ट्र सिद्धान्त]]
*[[एकता]]
*[[गुरबचन सिंह तालिब]]
==बाहरी कड़ियाँ==
*[https://www.mea.gov.in/Images/CPV/VolumeH15.pdf पाकिस्तान, अथवा भारत का विभाजन] (भीमराव अम्बेदकर)
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बाबू जगदेव प्रसाद
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अनुनाद सिंह
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"'''बाबू जगदेव प्रसाद''' ( 2 फरवरी 1922 - 5 सितम्बर 1974) भारत के एक राजनेता एवं विचारक थे। उन्हें 'बिहार का लेनिन' कहा जाता है। == विचार == * दस का शासन नब्बे पर, : नहीं चलेगा, नहीं चलेगा। *..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''बाबू जगदेव प्रसाद''' ( 2 फरवरी 1922 - 5 सितम्बर 1974) भारत के एक राजनेता एवं विचारक थे। उन्हें 'बिहार का लेनिन' कहा जाता है।
== विचार ==
* दस का शासन नब्बे पर,
: नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
* सौ में नब्बे शोषित है,
: नब्बे भाग हमारा है।
* धन-धरती और राजपाट में,
: नब्बे भाग हमारा है।
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अनुनाद सिंह
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'''बाबू जगदेव प्रसाद''' ( 2 फरवरी 1922 - 5 सितम्बर 1974) भारत के एक राजनेता एवं विचारक थे। उन्हें 'बिहार का लेनिन' कहा जाता है।
== विचार ==
* दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
* सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है।
: धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है॥
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मै डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
* मानववाद की क्या पहचान
: ब्रह्मण भंगी एक सामान॥
* पुनर्जन्म और भाग्यवाद।
: इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद॥
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अनुनाद सिंह
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'''बाबू जगदेव प्रसाद''' ( 2 फरवरी 1922 - 5 सितम्बर 1974) भारत के एक राजनेता एवं विचारक थे। उन्हें 'बिहार का लेनिन' कहा जाता है।
== विचार ==
* दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
* सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है।
: धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है॥
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मै डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
* मानववाद की क्या पहचान
: ब्रह्मण भंगी एक सामान॥
* पुनर्जन्म और भाग्यवाद।
: इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद॥
* लेनिन ने रूस के समाज का विश्लेषण किया। वहां की आर्थिक और सामाजिक नब्ज़ पर उन्होंने अपना हाथ रखा। जिसको हम शोषित कहते हैं, उसको वहां सर्वहारा कहा गया। मार्क्स ने एक को उच्च वर्ग या बुर्जुआ वर्ग और दूसरे को सर्वहारा कहा। उन्होंने सर्वहारा का साथ दिया जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ, सामाजिक दृष्टि से सताया हुआ, सांस्कृतिक दृष्टि से ग़ुलाम और मानसिक दृष्टि से दबाया हुआ था। लेनिन ने आर्थिक ग़ैर-बराबरी से मुक्ति दिलाने का रास्ता बताया। -- 14 जून 1969 को राष्ट्रीय शोषित संघ के वार्षिक उत्सव का उद्धाटन करते हुए
* अर्जक संघ के सिद्धांतो के द्वारा ही ब्राह्मणवाद को ख़त्म किया जा सकता है और सांस्कृतिक परिवर्तन कर मानववाद स्थापित किया जा सकता है।
* यूरोप में जाति प्रथा नहीं है, ऊंच-नीच की भावना नहीं है। यूरोप में ब्राह्मण और ग़ैर-ब्राह्मण की लड़ाई नहीं है। उन लोगों ने सिर्फ़ आर्थिक क्रांति की और आर्थिक ग़ैर-बराबरी को दूर किया। लेकिन हिंदुस्तान एक विशेष स्थिति में है। इसलिए जो यूरोप में था ठीक वही हिंदुस्तान में नहीं है। हिंदुस्तान में आर्थिक ग़ैर-बराबरी के साथ सामाजिक ग़ैर-बराबरी भी है। सामाजिक ग़ैर-बराबरी इज़्ज़त की लड़ाई है। हमें विश्वास है जब तक सामाजिक क्रांति नहीं होगी, तब तक आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती। जब तक शोषित समाज के हाथ में हुकूमत की बागडोर नहीं आएगी, तब तक आर्थिक ग़ैर-बराबरी नहीं मिटेगी।
* हिंदुस्तान का शोषित हिंदुस्तान का सर्वहारा, तमाम हरिजन, आदिवासी, पिछड़ी जाति और कथित नीची जाति के लोग हैं। इनकी आबादी नब्बे प्रतिशत है। दस प्रतिशत शोषक पूंजीपति, ज़मींदार, ब्राह्मण, ऊंची जाति के हैं। उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा है। इस नब्बे प्रतिशत शोषित और दस प्रतिशत शोषक की लड़ाई ही वैज्ञानिक समाजवाद की लड़ाई है। मार्क्स अगर हिंदुस्तान में पैदा हुए होते तो उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय शोषित संघ और बिहार के शोषित दल के साथ होते।
* पूरे बिहार को 'सहार' बना दो। -- नक्सलबाड़ी आंदोलन के केंद्र 'सहार' को आदर्श मानते हुए
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अनुनाद सिंह
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'''बाबू जगदेव प्रसाद''' ( 2 फरवरी 1922 - 5 सितम्बर 1974) भारत के एक राजनेता एवं विचारक थे। उन्हें 'बिहार का लेनिन' कहा जाता है।
== विचार ==
* दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
* सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है।
: धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है॥
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मै डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
* मानववाद की क्या पहचान
: ब्रह्मण भंगी एक सामान॥
* पुनर्जन्म और भाग्यवाद।
: इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद॥
* लेनिन ने रूस के समाज का विश्लेषण किया। वहां की आर्थिक और सामाजिक नब्ज़ पर उन्होंने अपना हाथ रखा। जिसको हम शोषित कहते हैं, उसको वहां सर्वहारा कहा गया। मार्क्स ने एक को उच्च वर्ग या बुर्जुआ वर्ग और दूसरे को सर्वहारा कहा। उन्होंने सर्वहारा का साथ दिया जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ, सामाजिक दृष्टि से सताया हुआ, सांस्कृतिक दृष्टि से ग़ुलाम और मानसिक दृष्टि से दबाया हुआ था। लेनिन ने आर्थिक ग़ैर-बराबरी से मुक्ति दिलाने का रास्ता बताया। -- 14 जून 1969 को राष्ट्रीय शोषित संघ के वार्षिक उत्सव का उद्धाटन करते हुए
* अर्जक संघ के सिद्धांतो के द्वारा ही ब्राह्मणवाद को ख़त्म किया जा सकता है और सांस्कृतिक परिवर्तन कर मानववाद स्थापित किया जा सकता है।
* यूरोप में जाति प्रथा नहीं है, ऊंच-नीच की भावना नहीं है। यूरोप में ब्राह्मण और ग़ैर-ब्राह्मण की लड़ाई नहीं है। उन लोगों ने सिर्फ़ आर्थिक क्रांति की और आर्थिक ग़ैर-बराबरी को दूर किया। लेकिन हिंदुस्तान एक विशेष स्थिति में है। इसलिए जो यूरोप में था ठीक वही हिंदुस्तान में नहीं है। हिंदुस्तान में आर्थिक ग़ैर-बराबरी के साथ सामाजिक ग़ैर-बराबरी भी है। सामाजिक ग़ैर-बराबरी इज़्ज़त की लड़ाई है। हमें विश्वास है जब तक सामाजिक क्रांति नहीं होगी, तब तक आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती। जब तक शोषित समाज के हाथ में हुकूमत की बागडोर नहीं आएगी, तब तक आर्थिक ग़ैर-बराबरी नहीं मिटेगी।
* हिंदुस्तान का शोषित हिंदुस्तान का सर्वहारा, तमाम हरिजन, आदिवासी, पिछड़ी जाति और कथित नीची जाति के लोग हैं। इनकी आबादी नब्बे प्रतिशत है। दस प्रतिशत शोषक पूंजीपति, ज़मींदार, ब्राह्मण, ऊंची जाति के हैं। उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा है। इस नब्बे प्रतिशत शोषित और दस प्रतिशत शोषक की लड़ाई ही वैज्ञानिक समाजवाद की लड़ाई है। मार्क्स अगर हिंदुस्तान में पैदा हुए होते तो उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय शोषित संघ और बिहार के शोषित दल के साथ होते।
* पूरे बिहार को 'सहार' बना दो। -- नक्सलबाड़ी आंदोलन के केंद्र 'सहार' को आदर्श मानते हुए
* यदि आपके घर में आपके ही बच्चे या सगे-संबंधी की मौत हो गयी हो किन्तु यदि पड़ोस में ब्राह्मणवाद विरोधी कोई सभा चल रही हो तो पहले उसमें शामिल हो।
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
=== बाबू जगदेव प्रसाद के नारे ===
<poem>
अगला सावन भादों में
गोरी कलाई कादों में।'
‘दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा’
‘सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है
धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है’
‘पढ़ो-लिखो, भैंस पालो, अखाड़ा खोदो और राजनीति करो।'
‘कमाए धोतीवाला और खाये टोपी वाला’
‘चपरासी हो या राष्ट्रपति की संतान,
सबको शिक्षा एक सामान।
‘मानववाद की क्या पहचान
ब्राह्मण भंगी एक सामान’
‘पुनर्जन्म और भाग्यवाद
इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद’
</poem>
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अनुनाद सिंह
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'''बाबू जगदेव प्रसाद''' ( 2 फरवरी 1922 - 5 सितम्बर 1974) भारत के एक राजनेता एवं विचारक थे। उन्हें 'बिहार का लेनिन' कहा जाता है।
== विचार ==
* दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
* सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है।
: धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है॥
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मै डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
* मानववाद की क्या पहचान
: ब्रह्मण भंगी एक सामान॥
* पुनर्जन्म और भाग्यवाद।
: इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद॥
* लेनिन ने रूस के समाज का विश्लेषण किया। वहां की आर्थिक और सामाजिक नब्ज़ पर उन्होंने अपना हाथ रखा। जिसको हम शोषित कहते हैं, उसको वहां सर्वहारा कहा गया। मार्क्स ने एक को उच्च वर्ग या बुर्जुआ वर्ग और दूसरे को सर्वहारा कहा। उन्होंने सर्वहारा का साथ दिया जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ, सामाजिक दृष्टि से सताया हुआ, सांस्कृतिक दृष्टि से ग़ुलाम और मानसिक दृष्टि से दबाया हुआ था। लेनिन ने आर्थिक ग़ैर-बराबरी से मुक्ति दिलाने का रास्ता बताया। -- 14 जून 1969 को राष्ट्रीय शोषित संघ के वार्षिक उत्सव का उद्धाटन करते हुए
* अर्जक संघ के सिद्धांतो के द्वारा ही ब्राह्मणवाद को ख़त्म किया जा सकता है और सांस्कृतिक परिवर्तन कर मानववाद स्थापित किया जा सकता है।
* यूरोप में जाति प्रथा नहीं है, ऊंच-नीच की भावना नहीं है। यूरोप में ब्राह्मण और ग़ैर-ब्राह्मण की लड़ाई नहीं है। उन लोगों ने सिर्फ़ आर्थिक क्रांति की और आर्थिक ग़ैर-बराबरी को दूर किया। लेकिन हिंदुस्तान एक विशेष स्थिति में है। इसलिए जो यूरोप में था ठीक वही हिंदुस्तान में नहीं है। हिंदुस्तान में आर्थिक ग़ैर-बराबरी के साथ सामाजिक ग़ैर-बराबरी भी है। सामाजिक ग़ैर-बराबरी इज़्ज़त की लड़ाई है। हमें विश्वास है जब तक सामाजिक क्रांति नहीं होगी, तब तक आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती। जब तक शोषित समाज के हाथ में हुकूमत की बागडोर नहीं आएगी, तब तक आर्थिक ग़ैर-बराबरी नहीं मिटेगी।
* हिंदुस्तान का शोषित हिंदुस्तान का सर्वहारा, तमाम हरिजन, आदिवासी, पिछड़ी जाति और कथित नीची जाति के लोग हैं। इनकी आबादी नब्बे प्रतिशत है। दस प्रतिशत शोषक पूंजीपति, ज़मींदार, ब्राह्मण, ऊंची जाति के हैं। उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा है। इस नब्बे प्रतिशत शोषित और दस प्रतिशत शोषक की लड़ाई ही वैज्ञानिक समाजवाद की लड़ाई है। मार्क्स अगर हिंदुस्तान में पैदा हुए होते तो उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय शोषित संघ और बिहार के शोषित दल के साथ होते।
* पूरे बिहार को 'सहार' बना दो। -- नक्सलबाड़ी आंदोलन के केंद्र 'सहार' को आदर्श मानते हुए
* यदि आपके घर में आपके ही बच्चे या सगे-संबंधी की मौत हो गयी हो किन्तु यदि पड़ोस में ब्राह्मणवाद विरोधी कोई सभा चल रही हो तो पहले उसमें शामिल हो।
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
=== बाबू जगदेव प्रसाद के नारे ===
<poem>
अगला सावन भादों में
गोरी कलाई कादों में।'
‘दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा’
‘सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है
धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है’
‘पढ़ो-लिखो, भैंस पालो, अखाड़ा खोदो और राजनीति करो।'
‘कमाए धोतीवाला और खाये टोपी वाला’
‘चपरासी हो या राष्ट्रपति की संतान,
सबको शिक्षा एक सामान।
‘मानववाद की क्या पहचान
ब्राह्मण भंगी एक सामान’
‘पुनर्जन्म और भाग्यवाद
इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद’
ऊँची जाति की क्या पहचान?
गिट बिट बोले करे न काम॥
नीची जाति की क्या पहचान?
करे काम पर सहे अपमान।
जो जमीन को जोते बोय.. वही जमीन का मालिक होय.
</poem>
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अनुनाद सिंह
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'''[[:w:बाबू जगदेव प्रसाद|बाबू जगदेव प्रसाद]]''' ( 2 फरवरी 1922 - 5 सितम्बर 1974) भारत के एक राजनेता एवं विचारक थे। उन्हें 'बिहार का लेनिन' कहा जाता है।
== विचार ==
* दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
* सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है।
: धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है॥
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मै डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
* मानववाद की क्या पहचान
: ब्रह्मण भंगी एक सामान॥
* पुनर्जन्म और भाग्यवाद।
: इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद॥
* लेनिन ने रूस के समाज का विश्लेषण किया। वहां की आर्थिक और सामाजिक नब्ज़ पर उन्होंने अपना हाथ रखा। जिसको हम शोषित कहते हैं, उसको वहां सर्वहारा कहा गया। मार्क्स ने एक को उच्च वर्ग या बुर्जुआ वर्ग और दूसरे को सर्वहारा कहा। उन्होंने सर्वहारा का साथ दिया जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ, सामाजिक दृष्टि से सताया हुआ, सांस्कृतिक दृष्टि से ग़ुलाम और मानसिक दृष्टि से दबाया हुआ था। लेनिन ने आर्थिक ग़ैर-बराबरी से मुक्ति दिलाने का रास्ता बताया। -- 14 जून 1969 को राष्ट्रीय शोषित संघ के वार्षिक उत्सव का उद्धाटन करते हुए
* अर्जक संघ के सिद्धांतो के द्वारा ही ब्राह्मणवाद को ख़त्म किया जा सकता है और सांस्कृतिक परिवर्तन कर मानववाद स्थापित किया जा सकता है।
* यूरोप में जाति प्रथा नहीं है, ऊंच-नीच की भावना नहीं है। यूरोप में ब्राह्मण और ग़ैर-ब्राह्मण की लड़ाई नहीं है। उन लोगों ने सिर्फ़ आर्थिक क्रांति की और आर्थिक ग़ैर-बराबरी को दूर किया। लेकिन हिंदुस्तान एक विशेष स्थिति में है। इसलिए जो यूरोप में था ठीक वही हिंदुस्तान में नहीं है। हिंदुस्तान में आर्थिक ग़ैर-बराबरी के साथ सामाजिक ग़ैर-बराबरी भी है। सामाजिक ग़ैर-बराबरी इज़्ज़त की लड़ाई है। हमें विश्वास है जब तक सामाजिक क्रांति नहीं होगी, तब तक आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती। जब तक शोषित समाज के हाथ में हुकूमत की बागडोर नहीं आएगी, तब तक आर्थिक ग़ैर-बराबरी नहीं मिटेगी।
* हिंदुस्तान का शोषित हिंदुस्तान का सर्वहारा, तमाम हरिजन, आदिवासी, पिछड़ी जाति और कथित नीची जाति के लोग हैं। इनकी आबादी नब्बे प्रतिशत है। दस प्रतिशत शोषक पूंजीपति, ज़मींदार, ब्राह्मण, ऊंची जाति के हैं। उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा है। इस नब्बे प्रतिशत शोषित और दस प्रतिशत शोषक की लड़ाई ही वैज्ञानिक समाजवाद की लड़ाई है। मार्क्स अगर हिंदुस्तान में पैदा हुए होते तो उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय शोषित संघ और बिहार के शोषित दल के साथ होते।
* पूरे बिहार को 'सहार' बना दो। -- नक्सलबाड़ी आंदोलन के केंद्र 'सहार' को आदर्श मानते हुए
* यदि आपके घर में आपके ही बच्चे या सगे-संबंधी की मौत हो गयी हो किन्तु यदि पड़ोस में ब्राह्मणवाद विरोधी कोई सभा चल रही हो तो पहले उसमें शामिल हो।
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
=== बाबू जगदेव प्रसाद के नारे ===
<poem>
अगला सावन भादों में
गोरी कलाई कादों में।'
‘दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा’
‘सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है
धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है’
‘पढ़ो-लिखो, भैंस पालो, अखाड़ा खोदो और राजनीति करो।'
‘कमाए धोतीवाला और खाये टोपी वाला’
‘चपरासी हो या राष्ट्रपति की संतान,
सबको शिक्षा एक सामान।
‘मानववाद की क्या पहचान
ब्राह्मण भंगी एक सामान’
‘पुनर्जन्म और भाग्यवाद
इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद’
ऊँची जाति की क्या पहचान?
गिट बिट बोले करे न काम॥
नीची जाति की क्या पहचान?
करे काम पर सहे अपमान।
जो जमीन को जोते बोय.. वही जमीन का मालिक होय.
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अनुनाद सिंह
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/* बाबू जगदेव प्रसाद के नारे */
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'''[[:w:बाबू जगदेव प्रसाद|बाबू जगदेव प्रसाद]]''' ( 2 फरवरी 1922 - 5 सितम्बर 1974) भारत के एक राजनेता एवं विचारक थे। उन्हें 'बिहार का लेनिन' कहा जाता है।
== विचार ==
* दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
* सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है।
: धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है॥
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मै डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
* मानववाद की क्या पहचान
: ब्रह्मण भंगी एक सामान॥
* पुनर्जन्म और भाग्यवाद।
: इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद॥
* लेनिन ने रूस के समाज का विश्लेषण किया। वहां की आर्थिक और सामाजिक नब्ज़ पर उन्होंने अपना हाथ रखा। जिसको हम शोषित कहते हैं, उसको वहां सर्वहारा कहा गया। मार्क्स ने एक को उच्च वर्ग या बुर्जुआ वर्ग और दूसरे को सर्वहारा कहा। उन्होंने सर्वहारा का साथ दिया जो आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ, सामाजिक दृष्टि से सताया हुआ, सांस्कृतिक दृष्टि से ग़ुलाम और मानसिक दृष्टि से दबाया हुआ था। लेनिन ने आर्थिक ग़ैर-बराबरी से मुक्ति दिलाने का रास्ता बताया। -- 14 जून 1969 को राष्ट्रीय शोषित संघ के वार्षिक उत्सव का उद्धाटन करते हुए
* अर्जक संघ के सिद्धांतो के द्वारा ही ब्राह्मणवाद को ख़त्म किया जा सकता है और सांस्कृतिक परिवर्तन कर मानववाद स्थापित किया जा सकता है।
* यूरोप में जाति प्रथा नहीं है, ऊंच-नीच की भावना नहीं है। यूरोप में ब्राह्मण और ग़ैर-ब्राह्मण की लड़ाई नहीं है। उन लोगों ने सिर्फ़ आर्थिक क्रांति की और आर्थिक ग़ैर-बराबरी को दूर किया। लेकिन हिंदुस्तान एक विशेष स्थिति में है। इसलिए जो यूरोप में था ठीक वही हिंदुस्तान में नहीं है। हिंदुस्तान में आर्थिक ग़ैर-बराबरी के साथ सामाजिक ग़ैर-बराबरी भी है। सामाजिक ग़ैर-बराबरी इज़्ज़त की लड़ाई है। हमें विश्वास है जब तक सामाजिक क्रांति नहीं होगी, तब तक आर्थिक क्रांति नहीं हो सकती। जब तक शोषित समाज के हाथ में हुकूमत की बागडोर नहीं आएगी, तब तक आर्थिक ग़ैर-बराबरी नहीं मिटेगी।
* हिंदुस्तान का शोषित हिंदुस्तान का सर्वहारा, तमाम हरिजन, आदिवासी, पिछड़ी जाति और कथित नीची जाति के लोग हैं। इनकी आबादी नब्बे प्रतिशत है। दस प्रतिशत शोषक पूंजीपति, ज़मींदार, ब्राह्मण, ऊंची जाति के हैं। उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा है। इस नब्बे प्रतिशत शोषित और दस प्रतिशत शोषक की लड़ाई ही वैज्ञानिक समाजवाद की लड़ाई है। मार्क्स अगर हिंदुस्तान में पैदा हुए होते तो उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय शोषित संघ और बिहार के शोषित दल के साथ होते।
* पूरे बिहार को 'सहार' बना दो। -- नक्सलबाड़ी आंदोलन के केंद्र 'सहार' को आदर्श मानते हुए
* यदि आपके घर में आपके ही बच्चे या सगे-संबंधी की मौत हो गयी हो किन्तु यदि पड़ोस में ब्राह्मणवाद विरोधी कोई सभा चल रही हो तो पहले उसमें शामिल हो।
* जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।
=== बाबू जगदेव प्रसाद के नारे ===
<poem>
अगला सावन भादों में
गोरी कलाई कादों में।'
‘दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा’
‘सौ में नब्बे शोषित है, नब्बे भाग हमारा है
धन-धरती और राजपाट में, नब्बे भाग हमारा है’
‘पढ़ो-लिखो, भैंस पालो, अखाड़ा खोदो और राजनीति करो।'
‘कमाए धोतीवाला और खाये टोपी वाला’
‘चपरासी हो या राष्ट्रपति की संतान,
सबको शिक्षा एक सामान।
‘मानववाद की क्या पहचान
ब्राह्मण भंगी एक सामान’
‘पुनर्जन्म और भाग्यवाद
इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद’
ऊँची जाति की क्या पहचान?
गिट बिट बोले करे न काम॥
नीची जाति की क्या पहचान?
करे काम पर सहे अपमान।
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वही जमीन का मालिक होय।
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मार्कस ऑरेलियस
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अनुनाद सिंह
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"'''[[:w:मार्कस ऑरेलियस|मार्कस ऑरेलियस]]''' (26 अप्रैल 121 – 17 मार्च 180 ई०) रोम का सम्राट था जिसने १६१ से १८० ई॰ तक शासन किया। वह उन पाँच सम्राटों में अन्तिम सम्राट था जिन्हें 'पाँच अ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''[[:w:मार्कस ऑरेलियस|मार्कस ऑरेलियस]]''' (26 अप्रैल 121 – 17 मार्च 180 ई०) रोम का सम्राट था जिसने १६१ से १८० ई॰ तक शासन किया। वह उन पाँच सम्राटों में अन्तिम सम्राट था जिन्हें 'पाँच अच्छे सम्राट' कहा जाता है। वह स्टोइक दर्शन का अभ्यासी था। उसने बिना शीर्षक के एक पुस्तक की रचना की थी जिसे आजकल 'मेडिटेशन्स' (Meditations) नाम से जाना जाता है।
== विचार ==
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अनुनाद सिंह
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/* विचार */
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'''[[:w:मार्कस ऑरेलियस|मार्कस ऑरेलियस]]''' (26 अप्रैल 121 – 17 मार्च 180 ई०) रोम का सम्राट था जिसने १६१ से १८० ई॰ तक शासन किया। वह उन पाँच सम्राटों में अन्तिम सम्राट था जिन्हें 'पाँच अच्छे सम्राट' कहा जाता है। वह स्टोइक दर्शन का अभ्यासी था। उसने बिना शीर्षक के एक पुस्तक की रचना की थी जिसे आजकल 'मेडिटेशन्स' (Meditations) नाम से जाना जाता है।
== विचार ==
* हमारे जीवन की खुशी हमारे विचारों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
* आपको अपनी सोच पर अधिकार है, बाहरी घटनाओं पर नहीं। इस बात को समझें और आपको अपनी शक्ति मिल जाएगी।
* सबसे अच्छा बदला यह है कि आप अपने दुश्मन की तरह न बनें।
* हर वह चीज़ जो हम सुनते हैं, वह एक राय है, तथ्य नहीं। हर वह चीज़ जो हम देखते हैं, वह एक दृष्टिकोण है, सत्य नहीं।
* मृत्यु हमें मुस्कुराती है, और हम केवल इतना ही कर सकते हैं कि उसे देखकर वापस मुस्कुरा दें।
* यदि यह सही नहीं है, तो इसे न करें; यदि यह सच नहीं है, तो इसे न कहें।
* इंसान का मूल्य उसकी महत्त्वाकांक्षाओं के मूल्य से अधिक नहीं होता।
* अतीत और भविष्य से परेशान न हों; केवल वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करें।
* ब्रह्मांड परिवर्तन है; हमारा जीवन वही है जो हमारे विचार इसे बनाते हैं।
* सुबह जब आप उठें, तो सोचें कि जीवित रहना, सोचना, आनंद लेना और प्रेम करना कितना अनमोल सौभाग्य है।
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2026-05-05T03:38:30Z
अनुनाद सिंह
658
/* विचार */
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text/x-wiki
'''[[:w:मार्कस ऑरेलियस|मार्कस ऑरेलियस]]''' (26 अप्रैल 121 – 17 मार्च 180 ई०) रोम का सम्राट था जिसने १६१ से १८० ई॰ तक शासन किया। वह उन पाँच सम्राटों में अन्तिम सम्राट था जिन्हें 'पाँच अच्छे सम्राट' कहा जाता है। वह स्टोइक दर्शन का अभ्यासी था। उसने बिना शीर्षक के एक पुस्तक की रचना की थी जिसे आजकल 'मेडिटेशन्स' (Meditations) नाम से जाना जाता है।
== विचार ==
* हमारे जीवन की खुशी हमारे विचारों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
* आपको अपनी सोच पर अधिकार है, बाहरी घटनाओं पर नहीं। इस बात को समझें और आपको अपनी शक्ति मिल जाएगी।
* दूसरों के प्रति सहिष्णु रहें। स्वयं के प्रति कठोर रहें।
* सबसे अच्छा बदला यह है कि आप अपने दुश्मन की तरह न बनें।
* हर वह चीज़ जो हम सुनते हैं, वह एक राय है, तथ्य नहीं। हर वह चीज़ जो हम देखते हैं, वह एक दृष्टिकोण है, सत्य नहीं।
* मृत्यु हमें मुस्कुराती है, और हम केवल इतना ही कर सकते हैं कि उसे देखकर वापस मुस्कुरा दें।
* यदि यह सही नहीं है, तो इसे न करें; यदि यह सच नहीं है, तो इसे न कहें।
* इंसान का मूल्य उसकी महत्त्वाकांक्षाओं के मूल्य से अधिक नहीं होता।
* अतीत और भविष्य से परेशान न हों; केवल वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करें।
* ब्रह्मांड परिवर्तन है; हमारा जीवन वही है जो हमारे विचार इसे बनाते हैं।
* सुबह जब आप उठें, तो सोचें कि जीवित रहना, सोचना, आनंद लेना और प्रेम करना कितना अनमोल सौभाग्य है।
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काज़ी नज़रुल इस्लाम
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"'''काज़ी नजरुल इसलाम''' (কাজী নজরুল ইসলাম), (२४ मई १८९९ - २९ अगस्त १९७६ एक [[बांग्लादेश|बांग्लादेशी]] [[कवि]], [[लेखक]], [[संगीतकार]] और देश के राष्ट्रीय कवि थे। नजरुल को बांग्ला साह..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''काज़ी नजरुल इसलाम''' (কাজী নজরুল ইসলাম), (२४ मई १८९९ - २९ अगस्त १९७६ एक [[बांग्लादेश|बांग्लादेशी]] [[कवि]], [[लेखक]], [[संगीतकार]] और देश के राष्ट्रीय कवि थे। नजरुल को बांग्ला साहित्य के सबसे महान कवियों में से एक माना जाता है। नजरुल के नाम से लोकप्रिय, उन्होंने [[कविता]], [[संगीत]], [[संदेश]], [[उपन्यास]], [[कहानी|कहानियाँ]] आदि का एक बड़ा समूह तैयार किया, जिसमें [[समानता]], [[न्याय]], [[साम्राज्यवाद]]<nowiki/>-विरोधी, मानवता, उत्पीड़न के खिलाफ विद्रोह और धार्मिक भक्ति शामिल थे।
==कविता==
* आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
क्षमा कीजिए, हजरत
भूल गया हूँ आपके आदर्श
आपका दिखाया हुआ पथ
क्षमा कीजिए, हजरत।
विलास वैभव को रौंदा है पाँव तले
धूल समान आपने प्रभु
आपने नहीं चाहा कि हम बने
बादशाह, नवाब कभू।
इस धरणी की धन सम्पदा
सभी का है उस पर समान अधिकार,
आपने कहा था धरती पर हैं सब
समान पुत्रवत
क्षमा कीजिए, हजरत।
आपके धर्म में नास्तिकों से
आप घृणा नहीं करते,
आपने उनकी की है सेवा
आश्रय दिया उन्हें घर में
भिन्न धर्मियों के पूजा मन्दिर
तोड़ने का आदेश नहीं दिया, हे वीर !
हम आजकल सहन
नहीं कर पाते दूसरों का मत
क्षमा कीजिए, हजरत।
नहीं चाहा आपने कि हो धर्म के नाम पर
ग्लानिकर हत्या — जीवन हानि
तलवार आपने नहीं दी हाथ में
दी है अमर वाणी
हमने भूल कर आपकी उदारता
बढ़ा ली है धर्मान्धता,
जन्नत से नहीं झरती है अब
तभी आपकी रहमत
क्षमा कीजिए, हजरत।
आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
क्षमा कीजिए, हजरत
भूल गया हूँ आपके आदर्श
आपका दिखाया हुआ पथ
:क्षमा कीजिए, हजरत।
:* क्षमा कीजिए हजरत: अनुवाद: सुलोचना वर्मा[https://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B2_%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AE]
== बाहरी संबंध ==
{{विकिपीडिया}}
[[श्रेणी:कवि]]
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/* कविता */
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'''काज़ी नजरुल इसलाम''' (কাজী নজরুল ইসলাম), (२४ मई १८९९ - २९ अगस्त १९७६ एक [[बांग्लादेश|बांग्लादेशी]] [[कवि]], [[लेखक]], [[संगीतकार]] और देश के राष्ट्रीय कवि थे। नजरुल को बांग्ला साहित्य के सबसे महान कवियों में से एक माना जाता है। नजरुल के नाम से लोकप्रिय, उन्होंने [[कविता]], [[संगीत]], [[संदेश]], [[उपन्यास]], [[कहानी|कहानियाँ]] आदि का एक बड़ा समूह तैयार किया, जिसमें [[समानता]], [[न्याय]], [[साम्राज्यवाद]]<nowiki/>-विरोधी, मानवता, उत्पीड़न के खिलाफ विद्रोह और धार्मिक भक्ति शामिल थे।
==कविता==
* आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
:क्षमा कीजिए, हजरत
:भूल गया हूँ आपके आदर्श
:आपका दिखाया हुआ पथ
:क्षमा कीजिए, हजरत।
:विलास वैभव को रौंदा है पाँव तले
:धूल समान आपने प्रभु
:आपने नहीं चाहा कि हम बने
:बादशाह, नवाब कभू।
:इस धरणी की धन सम्पदा
:सभी का है उस पर समान अधिकार,
:आपने कहा था धरती पर हैं सब
:समान पुत्रवत
:क्षमा कीजिए, हजरत।
:आपके धर्म में नास्तिकों से
:आप घृणा नहीं करते,
:आपने उनकी की है सेवा
:आश्रय दिया उन्हें घर में
:भिन्न धर्मियों के पूजा मन्दिर
:तोड़ने का आदेश नहीं दिया, हे वीर !
:हम आजकल सहन
:नहीं कर पाते दूसरों का मत
:क्षमा कीजिए, हजरत।
:नहीं चाहा आपने कि हो धर्म के नाम पर
:ग्लानिकर हत्या — जीवन हानि
:तलवार आपने नहीं दी हाथ में
:दी है अमर वाणी
:हमने भूल कर आपकी उदारता
:बढ़ा ली है धर्मान्धता,
:जन्नत से नहीं झरती है अब
:तभी आपकी रहमत
:क्षमा कीजिए, हजरत।
:आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
:क्षमा कीजिए, हजरत
:भूल गया हूँ आपके आदर्श
:आपका दिखाया हुआ पथ
:क्षमा कीजिए, हजरत।
:* क्षमा कीजिए हजरत: अनुवाद: सुलोचना वर्मा[https://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B2_%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AE]
== बाहरी संबंध ==
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[[श्रेणी:कवि]]
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