विकिसूक्ति hiwikiquote https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.9 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिसूक्ति विकिसूक्ति वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk हिन्दी 0 1793 32991 32955 2026-07-05T05:48:13Z अनुनाद सिंह 658 32991 wikitext text/x-wiki '''[[:w:हिन्दी|हिन्दी भाषा]]''' विश्व की तीसरी और [[भारत]] में यह सबसे अधिक बोले जाने वाली [[भाषा]] है। इसके मातृ भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या 50 करोड़ से भी अधिक है। यह भारत में 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक है। भारतीय संविधान में इसे संघ की राजभाषा स्वीकार किया गया है। == उद्धरण == '''आज पहली ही बार ऐसा संविधान बना है जब कि हमने अपने संविधान में एक भाषा रखी है, जो संघ के प्रशासन की भाषा होगी। इस अपूर्व अध्याय का देश के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ेगा।''' -- डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, 14 सितम्बर की शाम को संविधान सभा में हुई बहस के समापन के बाद '''यह मानसिक दशा का भी प्रश्न है जिसका हमारे समस्त जीवन पर प्रभाव पड़ेगा। हम केन्द्र में जिस भाषा का प्रयोग करेंगे उससे हम एक-दूसरे के निकटतर आते जाएँगे। आख़िर अंग्रेज़ी से हम निकटतर आए हैं, क्योंकि वह एक भाषा थी। अब उस अंग्रेज़ी के स्थान पर हमने एक भारतीय भाषा को अपनाया है। इससे अवश्यमेव हमारे संबंध घनिष्ठतर होंगे, विशेषतः इसलिए कि हमारी परम्पराएँ एक ही हैं, हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता में सब बातें एक ही हैं। अतएव यदि हम इस सूत्र को स्वीकार नहीं करते तो परिणाम यह होता कि या तो इस देश में बहुत-सी भाषाओं का प्रयोग होता या वे प्रांत पृथक हो जाते जो बाध्य होकर किसी भाषा विशेष को स्वीकार करना नहीं चाहते थे। हमने यथासम्भव बुद्धिमानी का कार्य किया है और मुझे हर्ष है, मुझे प्रसन्नता है और मुझे आशा है कि भावी संतति इसके लिए हमारी सराहना करेगी।''' -- डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, 14 सितम्बर की शाम को संविधान सभा में हुई बहस के समापन के बाद के वक्तव्य के उपसंहार में '''राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है।''' - अवनीन्द्रकुमार विद्यालंकार <br/> <br/> '''हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है।''' - बाबूराम सक्सेना <br/> <br/> '''समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है।''' - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर <br/> <br/> '''हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है।''' - शंकरराव कप्पीकेरी <br/> <br/> '''अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू।''' -रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/> '''राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।''' - अनंत गोपाल शेवड़े <br/> <br/> '''दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है।''' - के.सी. सारंगमठ <br/> <br/> '''हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।''' - वी. कृष्णस्वामी अय्यर <br/> <br/> '''राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है।''' - बालकृष्ण शर्मा '''नवीन''' <br/> <br/> '''विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है।''' - वाल्टर चेनिंग <br/> <br/> '''हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये।''' - बेरिस कल्यएव <br/> <br/> '''अंग्रेजी सिर पर ढोना डूब मरने के बराबर है।''' - सम्पूर्णानंद <br/> <br/> '''एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित।''' - केशवचंद्र सेन <br/> <br/> '''देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/> '''इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है।''' -सर जार्ज ग्रियर्सन <br/> <br/> '''मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/> '''भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है।''' - नलिनविलोचन शर्मा <br/> <br/> '''जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी।''' - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह <br/> <br/> '''यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है।''' - शिवनंदन सहाय <br/> <br/> '''प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है।''' - (राजा) कीर्त्यानंद सिंह <br/> <br/> '''अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई।''' - भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/> '''यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये?''' - चंद्रशेखर मिश्र <br/> <br/> '''साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है।''' - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा <br/> <br/> '''जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है।''' - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल <br/> <br/> '''भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है।''' - टी. माधवराव <br/> <br/> '''हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/> '''यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं।''' - [[राजेन्द्र प्रसाद]] <br/> <br/> '''उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है।''' - मुहम्मद हुसैन '''आजाद''' <br/> <br/> '''समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है।''' - जनार्दनप्रसाद झा '''द्विज''' <br/> <br/> '''मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है।''' - शिवप्रसाद सितारेहिंद <br/> <br/> '''हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है।''' - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह <br/> <br/> '''वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके।''' - पीर मुहम्मद मूनिस <br/> <br/> '''भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहुँचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/> '''चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै।''' - बेनी कवि <br/> <br/> '''यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा।''' - ब्रजनंदन दास <br/> <br/> '''देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है।''' - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा <br/> <br/> '''हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है।''' - छविनाथ पांडेय <br/> <br/> '''देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/> '''हमारी नागरी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपि है।''' - [[राहुल सांकृत्यायन]] <br/> <br/> '''नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/> '''साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है।''' - [[गणेशशंकर विद्यार्थी]] <br/> <br/> '''अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती।''' - पं. कृ. पिल्लयार <br/> <br/> '''उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/> '''हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है।''' - जगन्नाथप्रसाद मिश्र <br/> <br/> '''हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है।''' - देवव्रत शास्त्री <br/> <br/> '''हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'''। - गोविन्दवल्लभ पंत <br/> <br/> '''भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/> '''किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/> '''हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय।''' - ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह <br/> <br/> '''भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/> '''संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है।''' - डॉ. फादर कामिल बुल्के <br/> <br/> '''भाषा विचार की पोशाक है।''' - डॉ. जानसन <br/> <br/> '''रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है।''' - यशोदानंदन अखौरी <br/> <br/> '''साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/> '''कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं।''' - श्रीनारायण चतुर्वेदी <br/> <br/> '''हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया।''' - राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/> '''देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है?''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/> '''जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता।''' - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद <br/> <br/> '''कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप।''' - राधाचरण गोस्वामी <br/> <br/> '''हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/> '''हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है।''' - कमलापति त्रिपाठी <br/> <br/> '''मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता।''' - मनोरंजन प्रसाद <br/> <br/> '''हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है।''' - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/> '''नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है।''' - (प्रो.) तान युन् शान <br/> <br/> '''राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है।''' - कमलापति त्रिपाठी <br/> <br/> '''सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए।''' - श्रीधर पाठक <br/> <br/> '''भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/> '''हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।''' - धीरेन्द्र वर्मा <br/> <br/> '''जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/> '''कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।''' - शेली <br/> <br/> '''भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है।''' - लक्ष्मीनारायण '''सुधांशु''' <br/> <br/> '''भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है।''' - सम्पूर्णानन्द <br/> <br/> '''हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है।''' - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल <br/> <br/> '''परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें।''' - हरगोविंद सिंह <br/> <br/> '''अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं।''' - अनंतशयनम् आयंगार <br/> <br/> '''वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।''' - [[मैथिलीशरण गुप्त]] <br/> <br/> '''दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है।''' - अज्ञात <br/> <br/> '''वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।''' - बिस्मार्क <br/> <br/> '''हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/> '''कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।''' - हजारी प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/> '''हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है।''' - भूदेव मुखर्जी <br/> <br/> '''हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। ''' - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/> '''हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है।''' - नन्ददुलारे वाजपेयी <br/> <br/> अकबर की सभा में सूर के '''जसुदा बार-बार यह भाखै''' पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।'''- राधाचरण गोस्वामी <br/> <br/> '''देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है।''' - सुधाकर द्विवेदी <br/> <br/> '''हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी।''' - (डॉ.) भगवानदास <br/> <br/> '''हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/> '''वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है।''' - ठाकुरदत्त शर्मा <br/> <br/> '''निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है।''' - पंडित सुधाकर पांडेय <br/> <br/> '''अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/> '''बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है।''' - भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/> '''यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है।''' - दरियाये लताफत <br/> <br/> '''भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है।''' - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह <br/> <br/> '''अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता।''' - देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/> '''हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/> '''बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती।''' - [[संपूर्णानंद]] <br/> <br/> '''भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है।''' - बदरीनाथ शर्मा <br/> <br/> '''तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/> '''अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/> '''हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।'''- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/> '''भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है।''' - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी <br/> <br/> '''हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।'''- मथुरा प्रसाद दीक्षित <br/> <br/> '''भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।'''- रवींद्रनाथ ठाकुर <br/> <br/> '''इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता।''' - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल <br/> <br/> '''संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है।''' - केशवचंद्र सेन <br/> <br/> '''हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है।''' - गोविंदबल्लभ पंत <br/> <br/> '''हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/> '''हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है।''' - (डॉ.) रामविलास शर्मा <br/> <br/> '''जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए।''' - सेठ गोविंददास <br/> <br/> '''साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है।''' - (म. म.) सत्यनारायण शर्मा <br/> <br/> '''जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं।''' - शिवनंदन सहाय <br/> <br/> '''उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दूदाँ तक तंग आ गए हैं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/> '''गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/> '''अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है।''' - ब्रजभूषण पांडेय <br/> <br/> '''लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है।''' - कंक <br/> <br/> '''मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/> '''देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/> '''हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके।''' - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री <br/> <br/> '''साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है।''' - अंबाप्रसाद सुमन <br/> <br/> '''हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है।''' - पं. गिरिधर शर्मा <br/> <br/> '''हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों।''' - [[वासुदेवशरण अग्रवाल]] <br/> <br/> '''भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है।''' - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री <br/> <br/> '''क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था।''' - विष्णुदेव पौद्दार <br/> <br/> '''सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है।''' - वाल्टर चेनिंग <br/> <br/> '''हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है।''' - जहूरबख्श <br/> <br/> '''किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा।''' - सैयद इंशा अल्ला खाँ <br/> <br/> '''अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है''' - संपूर्णानंद <br/> <br/> '''हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए।''' - रविशंकर शुक्ल <br/> <br/> '''हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है।''' - छविनाथ पांडेय <br/> <br/> '''साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है।''' - पार्वती देवी <br/> <br/> '''विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/> '''भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता''' - वासुदेवशरण अग्रवाल <br/> <br/> '''पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है।''' - अज्ञात <br/> <br/> '''समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती।''' - पं. सुधाकर पांडेय <br/> <br/> '''तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती।''' - मौलाना मुहम्मद अली <br/> <br/> '''भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर।''' - रामवृक्ष बेनीपुरी <br/> <br/> '''हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/> '''जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है।''' - शांतानंद नाथ <br/> <br/> '''भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए।''' - नाथूराम '''शंकर''' शर्मा <br/> <br/> '''राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए।''' - राजकुमार वर्मा <br/> <br/> '''हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है।''' - सुनीति कुमार चाटुर्ज्या <br/> <br/> '''स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है।''' - निराला <br/> <br/> '''कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।''' - सुमित्रानंदन पंत <br/> <br/> '''बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।''' - गोविंद शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/> '''उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है।''' - रामरणविजय सिंह <br/> <br/> '''राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है।''' - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव <br/> <br/> '''बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी।''' - पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी <br/> <br/> '''जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि।''' - देवी प्रसाद गुप्त <br/> <br/> '''हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है।''' - शांतानंद नाथ <br/> <br/> '''आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है।''' - [[माखनलाल चतुर्वेदी]] <br/> <br/> '''विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है।''' - सूर्यनारायण व्यास <br/> <br/> '''कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती।''' - सैयद अमीर अली '''मीर''' <br/> <br/> '''हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है।''' - ब्रजनंदन सहाय <br/> <br/> '''कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/> '''हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/> '''जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/> '''कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है।''' - सू. च. धर <br/> <br/> '''मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता।''' - विनोबा भावे <br/> <br/> '''आज का आविष्कार कल का साहित्य है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/> '''भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती।''' - माधव राव सप्रे <br/> <br/> '''हिंदी विश्व की महान भाषा है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''मैंने नाम बदला, वेशभूषा बदली, खान-पान बदला लेकिन हिन्दी के संबंध में मैंने विचारों में कोई परिवर्तन नहीं किया।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है।''' - ब्रजनंदन सहाय <br/> <br/> '''जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो।''' - संत रामदास <br/> <br/> '''पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/> '''मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा।''' - लीलावती मुंशी <br/> <br/> '''हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए।''' - देवी प्रसाद गुप्त <br/> <br/> '''साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है।''' - पं. वागीश्वर जी <br/> <br/> '''हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है।''' - डॉ. राजेंद्रप्रसाद <br/> <br/> '''हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता।''' - सूर्य कांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/> '''भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/> '''यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है।''' - [[सुभाषचन्द्र बोस|सुभाषचंद्र बसु]] <br/> <br/> '''पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है।''' - पं. वागीश्वर जी <br/> <br/> '''विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है।''' - बी. सी. जोशी <br/> <br/> '''हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/> '''यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे।''' - बृजनंदन सहाय <br/> <br/> '''भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है।''' - म. म. रामावतार शर्मा <br/> <br/> '''साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है।''' - रघुवरप्रसाद द्विवेदी <br/> <br/> '''यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें।''' - एक फ्रांसीसी बालिका <br/> <br/> '''निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है।''' - पंडित सुधाकर पांडेय <br/> <br/> '''हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो।''' - सैयद अमीर अली मीर <br/> <br/> '''इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है।''' - [[जयचंद्र विद्यालंकार]] <br/> <br/> '''सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है।''' - अमरनाथ झा <br/> <br/> '''हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं।''' - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/> '''एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं।''' - अयोध्याप्रसाद वर्मा <br/> <br/> '''किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है।''' - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री <br/> <br/> '''जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/> '''बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो।''' - सकलनारायण पांडेय <br/> <br/> '''संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी।''' - मौलवी महमूद अली <br/> <br/> '''संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है।''' - ताराचंद्र दूबे <br/> <br/> '''सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं।''' - राजा कृत्यानंद सिंह <br/> <br/> '''जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है।''' - नरोत्तम व्यास <br/> <br/> '''भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है।''' - बदरीनाथ भट्ट <br/> <br/> '''साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा।''' - बिहारीलाल चौबे <br/> <br/> '''देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है।''' - मन्नन द्विवेदी <br/> <br/> '''है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/> '''संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा।''' - हरिऔध <br/> <br/> '''हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें।''' - पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/> '''जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है।''' - गिरजाकुमार घोष <br/> <br/> '''यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का।''' - अज्ञात <br/> <br/> '''क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो।''' - डॉ. श्यामसुंदर दास <br/> <br/> '''बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है।''' - रमेशचंद्र दत्त <br/> <br/> '''वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है।''' - सैयद अमीर अली '''मीर''' <br/> <br/> '''दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है।''' - गिरींद्रमोहन मित्र <br/> <br/> '''समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है।''' - म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी <br/> <br/> '''नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है।''' - बाबू राव विष्णु पराड़कर <br/> <br/> '''अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है।''' - अनादिधन वंद्योपाध्याय <br/> <br/> '''व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता।''' - अनंतराम त्रिपाठी <br/> <br/> '''स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए।''' - रामजी लाल शर्मा <br/> <br/> '''गुणवान '''खानखाना''' सदृश प्रेमी हो गए '''रसखान''' और '''रसलीन''' से हिंदी प्रेमी हो गए।''' - राय देवीप्रसाद <br/> <br/> '''वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है।''' - गणपति जानकीराम दूबे <br/> <br/> '''हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/> '''अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है।''' - अज्ञात <br/> <br/> '''कवि का हृदय कोमल होता है।''' - गिरिजाकुमार घोष <br/> <br/> '''श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं।''' - शैलजाकुमार घोष <br/> <br/> '''हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।''' - चंद्रबली पाण्डेय <br/> <br/> '''भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है।''' - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री <br/> <br/> '''पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे।''' - सत्यदेव परिव्राजक <br/> <br/> '''खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है।''' - बदरीनाथ भट्ट <br/> <br/> '''भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है।''' - विनयकुमार सरकार <br/> <br/> '''हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है।''' - बदरीनारायण चौधरी '''प्रेमधन''' <br/> <br/> '''हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/> '''निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।''' - भारतेन्द्न्दु हरिश्चंद्र <br/> <br/> '''आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है।''' - वीम्स साहब <br/> <br/> '''क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे।''' - हरिऔध <br/> <br/> '''जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती।''' - विष्णु दिगंबर <br/> <br/> '''जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/> '''राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।''' - महात्मा गाँधी <br/> <br/> '''जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/> '''इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है।''' - [[महात्मा गांधी]] <br/> <br/> '''जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है।''' - डॉ. भगवानादास <br/> <br/> '''विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय।''' - भीमसेन शर्मा <br/> <br/> '''भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/> '''अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था।''' - छोटूलाल मिश्र <br/> <br/> '''नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है।''' - गोपालदास गहमरी <br/> <br/> '''किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/> '''जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है।''' - '''निराला''' <br/> <br/> '''देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है।''' - '''चकोर''' <br/> <br/> '''शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है।''' - पं. रामनारायण मिश्र <br/> <br/> '''भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/> '''जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए।''' - श्यामसुंदर दास <br/> <br/> '''विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो।''' - पं. गिरधर शर्मा <br/> <br/> '''विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/> '''यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं।''' - लक्ष्मण नारायण गर्दे <br/> <br/> '''हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/> '''सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते।''' - म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी <br/> <br/> '''किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं।''' - साहित्याचार्य रामावतार शर्मा <br/> <br/> '''जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती।''' - पांडेय रामवतार शर्मा <br/> <br/> '''नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है।''' - नाथूराम शंकर शर्मा <br/> <br/> '''जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है।''' - घनश्याम सिंह <br/> <br/> '''विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/> '''मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/> '''मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती।''' - डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा <br/> <br/> '''हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/> '''राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/> '''यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है।''' - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी <br/> <br/> '''स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है।''' - मोहनलाल महतो वियोगी <br/> <br/> '''युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है।''' - सु. च. धर <br/> <br/> '''हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना।''' - नूर मुहम्मद <br/> <br/> '''आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए।''' - महावीर प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/> '''हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है।''' - गिरधर शर्मा <br/> <br/> '''भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/> '''देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/> '''जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं।''' - गोविन्ददास <br/> <br/> '''नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है।''' - गोपाललाल खत्री <br/> <br/> '''देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो।''' - पं. गिरधर शर्मा <br/> <br/> '''राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है।''' - जगन्नाथप्रसाद मिश्र <br/> <br/> '''साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/> '''अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/> '''साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे।''' - चंद्रशेखर मिश्र <br/> <br/> '''सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है।''' - शरच्चंद <br/> <br/> '''सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी।''' - संतराम शर्मा <br/> <br/> '''हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है।''' - मौलाना हसरत मोहानी <br/> <br/> '''भारतीय भाषाएं नदियां हैं जबकि हिन्दी महानदी।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/> '''ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी।''' - रवीन्द्रनाथ ठाकुर <br/> <br/> '''लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है।''' - मिश्रबंधु <br/> <br/> '''हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है।''' - चंद्रबली पांडेय <br/> <br/> '''भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।''' - अरविंद <br/> <br/> '''हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/> '''मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें।''' - विनोबा भावे <br/> <br/> '''साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला।''' - माखनलाल चतुर्वेदी <br/> <br/> '''एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है।''' - वी. सी. जोशी <br/> <br/> '''हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।''' - [[स्वामी दयानन्द सरस्वती|स्वामी दयानंद]] <br/> <br/> '''इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना।''' - [[जयशंकर प्रसाद]] <br/> <br/> '''विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है।''' - अरस्तु <br/> <br/> '''अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं।''' - डिजरायली <br/> <br/> '''जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी।''' - श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् <br/> <br/> '''शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज।''' - कबीर <br/> <br/> '''यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है।''' - सुभाषचन्द्र बसु <br/> <br/> '''प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/> '''सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है।''' - एक जपानी सूक्ति <br/> <br/> '''संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं।''' - यशेदानंदन अखौरी <br/> <br/> '''राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/> '''शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -'''स्वत्व''' का रक्षण हो।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/> '''विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है।''' - जयशंकर प्रसाद <br/> <br/> '''जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती।''' - बाबूराव विष्णु पराड़कर <br/> <br/> '''वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/> '''हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है।''' - मैथिलीशरण गुप्त <br/> <br/> '''पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है।''' - अज्ञात <br/> <br/> '''कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है।''' - मैक्सिम गोर्की <br/> <br/> '''कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है।''' - महादेवी वर्मा <br/> <br/> '''क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है।''' - माघ <br/> <br/> '''प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।''' - पास्कल <br/> <br/> '''हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है।''' - धीरेन्द्र वर्मा <br/> <br/> '''साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है।''' - अज्ञात <br/> <br/> '''बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता।''' - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/> '''विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है।''' - बागीश्वरजी <br/> <br/> '''श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/> '''कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है।''' - शेली <br/> <br/> '''भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है।''' - प्रेमचंद <br/> <br/> '''वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम।''' - बिस्मार्क <br/> <br/> '''रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है।''' - पंडितराज जगन्नाथ <br/> <br/> '''प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।''' - रामचंद्र शुक्ल <br/> <br/> '''अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/> '''अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है।''' - भास्कर गोविन्द धाणेकर <br/> <br/> '''यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती।''' - माधवराव सप्रे <br/> <br/> '''भाषा ही राष्ट्र का जीवन है।''' - पुरुषोत्तमदास टंडन <br/> <br/> '''कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है।''' - हजारी प्रसाद द्विवेदी <br/> <br/> '''हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी।''' - पं. नेहरू <br/> <br/> '''भाषा विचार की पोशाक है।''' - डॉ. जोनसन <br/> <br/> '''हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है।''' - सेठ गोविन्ददास <br/> <br/> '''अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है।''' - लक्ष्मीनारायण सिंह '''सुधांशु''' <br/> <br/> '''आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे।''' - चन्द्रबली पांडेय <br/> <br/> '''जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है।''' - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर <br/> <br/> '''हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/> '''हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं।''' - सूर्यकांत त्रिपाठी '''निराला''' <br/> <br/> '''भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो।''' - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार <br/> <br/> '''हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है।''' - ग्रियर्सन <br/> <br/> '''मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया।''' - महात्मा गांधी <br/> <br/> '''मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।''' - राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन <br/> <br/> '''संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता।''' - डॉ. सम्पूर्णानन्द <br/> <br/> '''उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए।''' - मौलाना मुहम्मद अली <br/> <br/> '''राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है।''' - लक्ष्मण नारायण गर्दे <br/> <br/> '''प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है।''' - पास्कल <br/> <br/> '''विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य।''' - मन्नन द्विवेदी <br/> <br/> '''जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है।''' - शारदाचरण मित्र <br/> <br/> '''हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है।''' - राहुल सांकृत्यायन <br/> <br/> '''सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है।''' - रणवीर सिंह जी <br/> <br/> '''वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है।''' - ठाकुरदत्त शर्मा <br/> <br/> '''हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है।''' - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी <br/> <br/> '''हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे।''' - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद <br/> <br/> '''नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान।''' - मिश्रबंधु <br/> <br/> '''साहित्य ही हमारा जीवन है।''' - डॉ. भगवानदास <br/> <br/> '''मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है।''' - मुकुन्दस्वरूप वर्मा <br/> <br/> '''बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है।''' - माधव शुक्ल <br/> <br/> '''हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है।''' - अंबिका प्रसाद वाजपेयी <br/> <br/> '''हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है।''' - शिवपूजन सहाय <br/> <br/> '''भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं।''' - अरविंद <br/> <br/> '''राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये।''' - शारदाचरण मित्र (जस्टिस) <br/> <br/> '''समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिदीभाषी जाति की एकता आवश्यक है।''' - रामविलास शर्मा <br/> <br/> '''राजा बलवंत सिंह कालेज के हिन्दी अध्यापक डॉ. श्री मोहन द्विवेदी की देखरेख में महेश चन्द्र गुप्त ´राजस्थान के प्रशासनिक कार्यों में हिन्दी का प्रयोग’ विषय पर शोध कार्य कर रहे हैं। उन्होंने सन् 1857 के पहले के और उसके बाद के भी काफी दस्तावेज़ इकट्ठे किए हैं। इन दस्तावेज़ों में वे पत्र हैं जो अंग्रेजों ने राजाओं को लिखे, राजाओं ने अंग्रेजों को लिखे; साथ ही ऐसे पत्र हैं जोराजाओं ने एक दूसरे को लिखे। यदि राजस्थान में 19 वीं सदी में हिन्दी राजभाषा के रूप में काम आती थी और उसका व्यवहार हिन्दुस्तान के लोग हीं नहीं अंग्रेज भी करते थे तो कोई कारण नहीं कि 20 वीं सदी के अन्तिम चरण में अंग्रेजी प्रेमी भारतवासी अपना अंग्रेजी मोह त्यागकर हिन्दी का उपयोग न कर सकें।''' - रामविलास शर्मा, भारत की भाषा समस्या, पृष्ठ 13, तीसरा संस्करण, राजकामल प्रकाशन (2003)<ref>[https://www.pravakta.com/official-language-hindi-condition-and-direction/ राजभाषा हिन्दी : दशा एवं दिशा]</ref><br/> <br/> '''हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ।''' - आचार्य क्षितिमोहन सेन <br/> <br/> '''हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं।''' - अनंत गोपाल शेवड़े <br/> <br/> '''अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं।''' - सैयद अली बिलग्रामी <br/> <br/> '''हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए।''' - शचींद्रनाथ बख्शी <br/> <br/> '''अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए।''' - र. रा. दिवाकर <br/> <br/> '''हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है।''' - विनयमोहन शर्मा <br/> <br/> '''अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं।''' - अवनींद्र कुमार विद्यालंकार <br/> <br/> '''हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा।''' - अनंतशयनम् आयंगार <br/> <br/> '''संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी।''' - राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन <br/> <br/> '''(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया।''' - अमृतलाल नागर <br/> <br/> * और तो और, जिन लोगों ने उसे राष्ट्रभाषा स्वीकार किया था, वही आज यह प्रयत्न कर रहे हैं कि 'हिंदी', 'हिंदुस्तानी' हो जाए और हिंदी वाले 'राम' को 'रहीम' और 'धर्म' को 'मजहब' लिखा करें। इस तरह वे हिंदी को 'वर्णसंकरी' भाषा बना डालना चाहते हैं।.... राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद ने भी ऐसा ही प्रयत्न एक बार पहले किया था, परंत् बाबू हरिश्चंद्र ने उनके सारे प्रयत्नों को बेकार कर दिया, यहां तक कि उसके लिए उन्होंने अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया ।.. ..परंतु हिंदी आत्महत्या करने को तैयार न होगी। उसकी भी अपनी संस्कृति है । .... संसार में एक हिंदी ही ऐसी भाषा है, जो एकमात्र सर्वसाधारण के सहारे पर जीवित रही है। -- पं० देवीदत्त शुक्ल, 'हिंदी पर संकट' नामक लेख में, नवम्बर १९३६ में 'मदारी' नामक पत्रिका में [[महात्मा गांधी]] की ओर संकेत करते हुए<ref>[https://www.publicationsdivision.nic.in/journals/Journalarchives/Ajkal/Ajkal-Hindi/1990/April/Ajkal_1990_April_pdf.pdf विदग्ध-वाक् पंओ देवीदत्त शुक्त की हिन्दीधारिता] (सरस्वती पत्रिका, जनवरी १९४१ अंक)</ref> * हिंदी की प्रतिस्पर्धा स्थानीय भाषाओं से नहीं है। सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने से ही देश सशक्त होगा। ... प्रधानमंत्री मोदी ने 10 भाषाओं में इंजीनियरिंग और मेडिकल पाठ्यक्रम शुरू करने की पहल की है और जल्द ही ये पाठ्यक्रम सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होंगे। वह क्षण स्थानीय भाषाओं और आधिकारिक भाषाओं के उत्थान की शुरुआत का प्रतीक होगा। -- भारतीय गृहमन्त्री [[अमित शाह]], राजभाषा पर संसद की समिति की 38वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए (4 अगस्त 2023) * भारत वर्षों से ही विविध भाषाओं का देश रहा है और हिंदी को एक जनतांत्रिक भाषा के रूप में माना जाता है। इसने अलग-अलग भारतीय भाषाओं और बोलियों के साथ कई वैश्विक भाषाओं को सम्मान देने का भी काम किया है।... हिंदी भाषा ने देश की स्वतंत्रता के दौरान देशवासियों को एकसूत्र में बांधने और अनेक भाषाओं में बंटे देश में एकता की भावना को स्थापित करने का भी काम किया था।... हमारी सभी भारतीय भाषाएं और बोलियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं और हमें इसे लेकर चलना है। हिंदी की किसी भी भाषा न कभी स्पर्धा थी और न कभी होगी। हमारी सभी भाषाओं को सशक्त करने से एक ही सशक्त राष्ट्र बनेगा और मुझे यकीन है कि हिंदी सभी भाषाओं को सशक्त बनाने का काम करेगी। -- भारतीय गृहमन्त्री [[अमित शाह]], १४ सितम्बर २०२३ को अपने हिन्दी दिवस सम्बोधन में * मेरी कामना है कि हिंदी भाषा राष्ट्रीय एकता और सद्भावना की डोर को निरंतर मजबूत करती रहे।''' भारतीय प्रधानमन्त्री [[नरेन्द्र मोदी]], १४ सितम्बर २०२३ को अपने हिन्दी दिवस सम्बन्धी एक सोसल मिडिया पोस्ट में * तमिलनाडु में हमारे लिए हिन्दी न जानना बहुत ही बड़ी बाधा हो जाती है। हमारे लिए हिन्दी सीखना 'स्मार्ट' है। -- [[श्रीधर वम्पू]], तमिलनाडु में जन्मे जोहो के संस्थापक एवं प्रसिद्ध उद्योगपति<ref>[https://panchjanya.com/2025/02/27/393047/bharat/tamil-nadu/hindi-v-controversy-zoho-founder-urges-hindi-learning/ तमिलनाडु के उद्योगपतियों ने सरकार से कहा “हिन्दी को पढ़ाने दें!”]</ref> * कड़वी सच्चाई है कि हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है, लेकिन सरकारी विभागों में हिंदी में काम करने का दिखावा हो रहा है। अधिकतर अफसरशाही अंग्रेजी में काम कर रहे हैं। हिंदी का पत्रकार परिचय-पत्र अंग्रेजी में बनाकर पेश करता है। जबकि लोगों को समझना चाहिए कि जब चुनाव होता है तो नेता हिंदी में जनता से संवाद करते हैं। क्योंकि उन्हें पता है भारत में अंग्रेजी में बात करके लोगों से जुड़ा नहीं जा सकता। हमें तो हिंदी में काम करने पर गर्व होता है। देहरादून कॉलेज में था, तभी संकल्प लिया था कि अपना हस्ताक्षर हिंदी में करेंगे। राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण की 10 साल बाद हिंदी में वेबसाइट बनवाया। हिंदी दिवस मनाना शुरू किया। अब हिंदी में काम करने के लिए प्रेरित किए जाने से कर्मचारी भी खुश हैं। अब प्राधिकरण का विधि उपनियम हिंदी में बनाकर वेब साइट पर डाला जा रहा है। -- तरुण विजय, अध्यक्ष, राष्ट्रीय संस्मारक प्राधिकरण * साहित्य अकादमी के साथ काम करते हुए यह अनुभव किया है कि हिंदी देश की 24 क्षेत्रीय भाषाओं के लिए पुल है। गुजराती भाषा की पुस्तक का मणिपुरी में सीधा अनुवाद कराना आसान नहीं है। लेकिन गुजराती से हिंदी में अनुवाद कराने के बाद हिंदी से मणिपुरी में अनुवाद आसानी से हो जाता है। करीब सभी क्षेत्रीय साहित्यकारों के लिए हिंदी समझना आसान है। हिंदी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बनकर उभरी है। विदेशी शक्तियां भारत में व्यापार करने के लिए अपने लोगों को हिंदी सिखा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर हिंदी में भाषण देकर वैश्विक पटल पर हिंदी का दबदबा और बढ़ा दिया है। देश में करीब 50 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं। दुनिया में कई देशों की इतनी आबादी है। अब बिना देर किए संयुक्त राष्ट्र को हिंदी को आधिकारिक भाषा की मान्यता देनी चाहिए। -- के. श्रीनिवासराव, सचिव, साहित्य अकादमी * भारत बहुभाषायी देश है, लंबे समय से हिंदी या उसका कोई स्वरूप इसके बहुत बड़े भाग पर सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त होता था। स्वतंत्रता आन्दोलन में हिंदी पत्रकारिता ने अहम भूमिका अदा की है। यह समस्त भारत में आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक सम्पर्क माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए सक्षम है, इसे सारे देश के लिए सीखना आवश्यक है। संविधान सभा में लंबी चर्चा के बाद 14 सितम्बर सन् 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकारा गया। इसके बाद संविधान में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा के सम्बन्ध में व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये 14 सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज लगभग प्रत्येक कार्यालय में एक राजभाषा विभाग है, जो राजभाषा हिंदी में काम करने के लिए नीतियों, नियमों और पुरस्कार प्रोत्साहन आदि की न केवल जानकारी प्रदान करता है, बल्कि कार्यालयों के सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए तत्पर है। दिल्ली हिंदी भाषी क्षेत्र है। हिंदी में काम करना हमारा संवैधानिक उत्तरदायित्व भी है। हिंदी बहुआयामी भाषा है इसकी खूबी है कि ये सभी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात कर लेती है। हिंदी में काम करना बहुत सरल है क्योंकि जो बोलना है वही लिखना है। आप अपनी बात आसानी से दूसरे तक पहुंचा सकते हैं। विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी दूसरे स्थान पर है। हमारी रेलवे में भी हिंदी में बहुत कार्य किया जा रहा है, विशेष रूप से स्टेशनों पर। हिंदी का प्रचार प्रसार बढ़ाने में राजभाषा विभाग भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है। -- डिंपी गर्ग, दिल्ली रेल मंडल प्रबंधक ===अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' === * जिसने जग में जन्म दिया औ पोसा, पाला। : जिसने यक यक लहू बूँद में जीवन डाला। : उस माता के शुचि मुख से जो भाषा सीखी। : उसके उर से लग जिसकी मधुराई चीखी। : क्या उस भाषा का मोह कुछ हम लोगों को है नहीं। : दो सूबों के भिन्न भिन्न बोली वाले जन। : जब करते हैं खिन्न बने, मुख भर अवलोकन। : जो भाषा उस समय काम उनके है आती। : जो समस्त भारत भू में है समझी जाती। : उस अति सरला उपयोगिनी हिन्दी भाषा के लिए। : हम में कितने हैं जिन्होंने तन मन धान अर्पण किए। : गुरु गोरख ने योग साधाकर जिसे जगाया। : औ कबीर ने जिसमें अनहद नाद सुनाया। : प्रेम रंग में रँगी भक्ति के रस में सानी। : जिस में है श्रीगुरु नानक की पावन बानी। : हैं जिस भाषा से ज्ञान मय आदि ग्रंथसाहब भरे। : क्या उचित नहीं है जो उसे निज सर आँखों पर धारे। : करामात जिसमें है चंद-कला दिखलाती। : जिसमें है मैथिल-कोकिल-काकली सुनाती। : सूरदास ने जिसे सुधामय कर सरसाया। : तुलसी ने जिसमें सुर-पादप फलद लगाया। : जिसमें जग पावन पूत तम रामचरित मानस बना। : क्या परम प्रेम से चाहिए उसे न प्रति दिन पूजना। : बहुत बड़ा, अति दिव्य, अलौकिक, परम मनोहर। : दशम ग्रंथ साहब समान बर ग्रंथ बिरच कर। : श्रीकलँगीधार ने जिसमें निज कला दिखाई। : जिसमें अपनी जगत चकित कर ज्योति जगाई। : वह हिन्दी भाषा दिव्यता-खनि अमूल्य मणियों भरी। : क्या हो नहिं सकती है सकल भाषाओं की सिर-धारी। : यह कविता हिन्दी को माँ के समान बताते हुए, उसे पूरे भारत की समझी जाने वाली भाषा के रूप में स्थापित करती है और गोरख, कबीर, नानक, सूर, और तुलसी जैसे महान संतों व कवियों की साहित्यिक विरासत से जोड़कर उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव को व्यक्त करती है। === हिन्दी की विकासयात्रा === * कोई कहानी ऐसी कहिये कि जिसमें हिंदो को छुट और किसी बोली की पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली रूप खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उनके बीच में न हो। हिन्दवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो। जितने भले लोग आपस में बोलते-चलाते हैं, ज्यों का त्यों डोल रहे और छाँह किसी की न दे। -- इंशाअल्ला खाँ, 'रानी केतकी की कहानी' की भाषा के सम्बन्ध में * हमारे मत में हिंदी और उर्दू दो बोली न्यारी न्यारी हैं। हिंदी इस देश के हिंदू वालते हैं और उर्दू यहाँ के मुसलमानों और फारसी पढ़े हुए हिंदुओं की बोलचाल है। हिंदी में संस्कृत के शब्द बहुत आते हैं, उर्दू में अरबी फारसी के। परन्तु कुछ आवश्यक नहीं कि अरबी-फारसी के शब्दों के बिना हिन्दी न बोली जाय और न हम उस भाषा को हिन्दी कहते हैं जिसमें अरबी-फारसी के शब्द भरे हों। -- राजा लक्ष्मण सिंह, संस्कृत महाकाव्य "रघुवश" के अनुवाद के प्राक्कथन में * हिन्दी नई चाल से ढली सन् १८७३ ई०। -- [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]] * समय के साथ, [[संस्कृत]] से प्राकृत भाषाए विकसित हुईं, जो आम जनता की बोलचाल की भाषाएं थीं। -- डॉ भोलानाथ तिवारी की पुस्तक “भारतीय भाषाओं का इतिहास” * प्राकृत से आगे चलकर अपभ्रंश (लगभग 6ठी से 12वीं शताब्दी) का विकास हुआ, जो हिंदी और अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं का आधार बनी। अपभ्रंश में शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी जैसी बोलियां शामिल थीं। -- ग्रियर्सन के अध्ययन और केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशनों के अनुसार * उत्तरी भारत में, विशेष रूप से दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के क्षेत्र में, शौरसेनी अपभ्रंश से हिंदी की प्रारंभिक बोलियाँ जैसे खड़ी बोली, ब्रज, अवधी और भोजपुरी उभरीं। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक “हिंदी साहित्य का इतिहास” * 10वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान मुस्लिम शासकों (दिल्ली सल्तनत और मुगल काल) के प्रभाव से हिंदी में फारसी, अरबी और तुर्की शब्दों का समावेश हुआ. इससे हिंदुस्तानी भाषा का विकास हुआ, जो हिंदी और उर्दू का साझा रूप थी। -- सतीश चंद्रा की पुस्तक “मध्यकालीन भारत का इतिहास” * भक्ति और सूफी आंदोलनों ने हिंदी को लोकप्रिय बनाया। कबीर, सूरदास, तुलसीदास और मलिक मुहम्मद जायसी जैसे कवियों ने अवधी, ब्रज और अन्य बोलियों में साहित्य रचकर हिंदी को समृद्ध किया। -- हजारीप्रसाद द्विवेदी की पुस्तक “हिंदी साहित्य का आदिकालीन इतिहास” * 18वीं शताब्दी में खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में अपनाया गया। इसे दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में बोला जाता था। -- नंददुलारे वाजपेयी की पुस्तक “आधुनिक हिंदी साहित्य” * मुगल दरबारों और बाजारों में हिंदुस्तानी के रूप में इसका प्रयोग बढ़ा। -- “द कैंब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया” * ब्रिटिश शासन के दौरान 19वीं शताब्दी में हिंदी को देवनागरी लिपि के साथ मानकीकृत करने का प्रयास हुआ। भारतेंदु हरिश्चंद्र को “आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक” माना जाता है, जिन्होंने खड़ी बोली में नाटक, कविता और निबंध लिखे। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल * 20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी को राष्ट्रीय एकता की भाषा के रूप में बढ़ावा दिया गया। महात्मा गांधी और अन्य नेताओं ने हिंदी को जन-जन की भाषा बनाने की वकालत की। -- “द नेशनल मूवमेंट इन इंडिया” * प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और अन्य लेखकों ने खड़ी बोली में उपन्यास, कहानी और कविता लिखकर हिंदी को आधुनिक साहित्यिक भाषा बनाया। -- साहित्य अकादमी और नंददुलारे वाजपेयी * 20वीं शताब्दी में हिंदी अखबारों, पत्रिकाओं, रेडियो और बाद में टेलीविजन ने हिंदी के प्रसार को बढ़ाया। -- “बीबीसी हिंदी” की रिपोर्ट्स * हिंदी स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली प्रमुख भाषा बनी। -- केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रकाशनों के अनुसार * 21वीं शताब्दी में इंटरनेट, सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे मंचों ने हिंदी को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया। -- “स्टैटिस्टिता” और “गूगल ट्रेंड्स” के आंकड़ों के अनुसार * हिंदी कंटेंट क्रिएटर्स और बॉलीवुड ने भी हिंदी के प्रसार में योगदान दिया। -- “द टाइम्स ऑफ इंडिया” और “बीबीसी हिंदी” की रिपोर्ट्स के अनुसार * वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, केंद्रीय हिंदी संस्थान और अन्य संगठनों ने हिंदी के शब्दकोश, व्याकरण और शब्दावली को मानकीकृत करने में मदद की। * हिंदी का विकास जनता के बीच संचार की जरूरत से हुआ। -- डॉ भोलानाथ तिवारी के अध्ययनों के अनुसार * २०१४ के बाद भारत में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्रित्व काल में सभी मंचों पर हिन्दी में विचारविमर्श को अत्यधिक बढ़ावा मिला। ==इन्हें भी देखें== * [[हिन्दी साहित्य]] * [[देवनागरी]] * [[संस्कृत]] * [[भाषा]] ==बाह्य सूत्र== {{wikipedia}} *[http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2009/hindi.htm हिंदी के विषय में विदेशियों के विचार] - बदरीनारायण तिवारी ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} [[श्रेणी:हिन्दी]] ommymit51ipei56jjrebyfu078l95ry महावीर प्रसाद द्विवेदी 0 7120 32981 25244 2026-07-05T03:07:05Z अनुनाद सिंह 658 32981 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रूचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। --महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव a0m4pqgcjvvo7fop8ryqiq0amqqcrq0 32982 32981 2026-07-05T03:17:23Z अनुनाद सिंह 658 32982 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रूचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में) * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। --महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव 9nvcmdjlsrqvzegsoeohano87r3umg5 32983 32982 2026-07-05T03:19:32Z अनुनाद सिंह 658 32983 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में) * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। --महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव 7szvctec5lmsdqk2dkwdfvwcbsdtip2 32984 32983 2026-07-05T03:25:16Z अनुनाद सिंह 658 /* महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ */ 32984 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में) * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। --महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ पृष्ट ७७ * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव jqnsctb5nptmzh0p98gryfdbmnialgx 32985 32984 2026-07-05T03:40:53Z अनुनाद सिंह 658 32985 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में) * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक नहीं होनी चाहिए। यह एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।... इसलिए कवियों को चाहिए कि क्रम-क्रम से वे गद्य की भाषा में भी कविता लिखना आरंभ करें। बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। -- ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली में कविता करने का समर्थन करते हुए ; महावीर प्रसाद द्विवेदी, सत्यप्रकाश मिश्र द्वारा उद्धृत, 1996, पृ.-36 * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ पृष्ट ७७ * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव nxv2lsmw5dutzzfj9zeq08izil7hx9c 32986 32985 2026-07-05T03:46:55Z अनुनाद सिंह 658 /* महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ */ 32986 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में) * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक नहीं होनी चाहिए। यह एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।... इसलिए कवियों को चाहिए कि क्रम-क्रम से वे गद्य की भाषा में भी कविता लिखना आरंभ करें। बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। -- ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली में कविता करने का समर्थन करते हुए ; महावीर प्रसाद द्विवेदी, सत्यप्रकाश मिश्र द्वारा उद्धृत, 1996, पृ.-36 * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ पृष्ट ७७ * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * यदि द्विवेदी जी द्वारा संपादित सरस्वती के पुराने अंक उठाकर किसी भी नई-पुरानी पत्रिका के अंकों से मिलाए जाएँ तो ज्ञात होगा कि पुराने हो चुकने पर भी इन अंकों में सीखने-समझने के लिए अन्य पत्रिकाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सामग्री है। 'सरस्वती' सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी। वह हिंदी नवजागरण का मुखपत्र थी और हिंदीभाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका भी, ऐसे साहित्य की जो रूढ़िवादी रीतियों का नाश करके नवीन सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था। द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ के लिए नए लेखक, नए पाठक ही नहीं तैयार किए अपितु प्रगतिशील विचारधारा के [[बाबूराव विष्णु पराड़कर]] और [[गणेश शंकर विद्यार्थी]] जैसे पत्रकार भी तैयार किए जिन्हें देश की सामाजिक, सास्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सम्पूर्ण ज्ञान था।-- डॉ० रामविलास शर्मा, अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए, पृष्ट ३७७ * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव 6e1x6wgv1e0eqsqlzndtnnhmi7a4sg3 32987 32986 2026-07-05T03:53:42Z अनुनाद सिंह 658 32987 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * अपना लिखा सभी को अच्छा लगता है परन्तु उसके अच्छे-बुरे का विचार दूसरे लोग ही कर सकते हैं। जो लेख हमने लौटाए वह समझ-बूझकर ही लौटाए, किसी और कारण से नहीं। अतएव यदि उसमें किसी को बुरा लगा तो हमें खेद है। यदि हमारी बुद्धि के अनुसार लेख हमारे पास आवें तो उन्हें हम क्यों लौटाएँ। उनको हम आदर स्वीकार करें, भेजने वाले को भी धन्यवाद दें और उसके साथ ही यदि हो सके तो कुछ पुरस्कार भी दें। यदि किसी को सर्वज्ञता का घमंड नहीं है तो वह अपने लेख में दूसरे के द्वारा किए हुए परिशोधन को देखकर कदापि रुष्ट नहीं होगा। लेखक अपने लेख का प्रूफ स्वयं शोध सकता है और संशोधन के समय हमारे किए गए परिवर्तन यदि उसे ठीक न जान पड़े तो वह हमें सूचना देकर वह उसको अपने मनोनुकूल बना सकता है। -- '''गगनाञ्चल''', नवंबर-दिसंबर, 2013, पृ. 11 पर उद्धृत * यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में) * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक नहीं होनी चाहिए। यह एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।... इसलिए कवियों को चाहिए कि क्रम-क्रम से वे गद्य की भाषा में भी कविता लिखना आरंभ करें। बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। -- ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली में कविता करने का समर्थन करते हुए ; महावीर प्रसाद द्विवेदी, सत्यप्रकाश मिश्र द्वारा उद्धृत, 1996, पृ.-36 * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ पृष्ट ७७ * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * यदि द्विवेदी जी द्वारा संपादित सरस्वती के पुराने अंक उठाकर किसी भी नई-पुरानी पत्रिका के अंकों से मिलाए जाएँ तो ज्ञात होगा कि पुराने हो चुकने पर भी इन अंकों में सीखने-समझने के लिए अन्य पत्रिकाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सामग्री है। 'सरस्वती' सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी। वह हिंदी नवजागरण का मुखपत्र थी और हिंदीभाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका भी, ऐसे साहित्य की जो रूढ़िवादी रीतियों का नाश करके नवीन सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था। द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ के लिए नए लेखक, नए पाठक ही नहीं तैयार किए अपितु प्रगतिशील विचारधारा के [[बाबूराव विष्णु पराड़कर]] और [[गणेश शंकर विद्यार्थी]] जैसे पत्रकार भी तैयार किए जिन्हें देश की सामाजिक, सास्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सम्पूर्ण ज्ञान था।-- डॉ० रामविलास शर्मा, अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए, पृष्ट ३७७ * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव rvy4l60yzcb7ylyq845fucubdfvn875 32988 32987 2026-07-05T04:10:58Z अनुनाद सिंह 658 32988 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * अपना लिखा सभी को अच्छा लगता है परन्तु उसके अच्छे-बुरे का विचार दूसरे लोग ही कर सकते हैं। जो लेख हमने लौटाए वह समझ-बूझकर ही लौटाए, किसी और कारण से नहीं। अतएव यदि उसमें किसी को बुरा लगा तो हमें खेद है। यदि हमारी बुद्धि के अनुसार लेख हमारे पास आवें तो उन्हें हम क्यों लौटाएँ। उनको हम आदर स्वीकार करें, भेजने वाले को भी धन्यवाद दें और उसके साथ ही यदि हो सके तो कुछ पुरस्कार भी दें। यदि किसी को सर्वज्ञता का घमंड नहीं है तो वह अपने लेख में दूसरे के द्वारा किए हुए परिशोधन को देखकर कदापि रुष्ट नहीं होगा। लेखक अपने लेख का प्रूफ स्वयं शोध सकता है और संशोधन के समय हमारे किए गए परिवर्तन यदि उसे ठीक न जान पड़े तो वह हमें सूचना देकर वह उसको अपने मनोनुकूल बना सकता है। -- '''गगनाञ्चल''', नवंबर-दिसंबर, 2013, पृ. 11 पर उद्धृत * यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में) * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक नहीं होनी चाहिए। यह एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।... इसलिए कवियों को चाहिए कि क्रम-क्रम से वे गद्य की भाषा में भी कविता लिखना आरंभ करें। बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। -- ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली में कविता करने का समर्थन करते हुए ; महावीर प्रसाद द्विवेदी, सत्यप्रकाश मिश्र द्वारा उद्धृत, 1996, पृ.-36 * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ पृष्ट ७७ * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * यदि द्विवेदी जी द्वारा संपादित सरस्वती के पुराने अंक उठाकर किसी भी नई-पुरानी पत्रिका के अंकों से मिलाए जाएँ तो ज्ञात होगा कि पुराने हो चुकने पर भी इन अंकों में सीखने-समझने के लिए अन्य पत्रिकाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सामग्री है। 'सरस्वती' सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी। वह हिंदी नवजागरण का मुखपत्र थी और हिंदीभाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका भी, ऐसे साहित्य की जो रूढ़िवादी रीतियों का नाश करके नवीन सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था। द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ के लिए नए लेखक, नए पाठक ही नहीं तैयार किए अपितु प्रगतिशील विचारधारा के [[बाबूराव विष्णु पराड़कर]] और [[गणेश शंकर विद्यार्थी]] जैसे पत्रकार भी तैयार किए जिन्हें देश की सामाजिक, सास्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सम्पूर्ण ज्ञान था।-- डॉ० रामविलास शर्मा, अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए, पृष्ट ३७७ * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} 9mxmr9d0mz4mg3m53pktwidtwggi3a4 32989 32988 2026-07-05T04:26:00Z अनुनाद सिंह 658 32989 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * अपना लिखा सभी को अच्छा लगता है परन्तु उसके अच्छे-बुरे का विचार दूसरे लोग ही कर सकते हैं। जो लेख हमने लौटाए वह समझ-बूझकर ही लौटाए, किसी और कारण से नहीं। अतएव यदि उसमें किसी को बुरा लगा तो हमें खेद है। यदि हमारी बुद्धि के अनुसार लेख हमारे पास आवें तो उन्हें हम क्यों लौटाएँ। उनको हम आदर स्वीकार करें, भेजने वाले को भी धन्यवाद दें और उसके साथ ही यदि हो सके तो कुछ पुरस्कार भी दें। यदि किसी को सर्वज्ञता का घमंड नहीं है तो वह अपने लेख में दूसरे के द्वारा किए हुए परिशोधन को देखकर कदापि रुष्ट नहीं होगा। लेखक अपने लेख का प्रूफ स्वयं शोध सकता है और संशोधन के समय हमारे किए गए परिवर्तन यदि उसे ठीक न जान पड़े तो वह हमें सूचना देकर वह उसको अपने मनोनुकूल बना सकता है। -- '''गगनाञ्चल''', नवंबर-दिसंबर, 2013, पृ. 11 पर उद्धृत * हमारी भाषा [[हिंदी]] है। उसके प्रचार के लिए गवर्नमेंट जो कुछ कर रही है, सो तो कर ही रही है, हमें चाहिए कि हम अपने घरों का अज्ञान तिमिर दूर करने और अपना ज्ञानबल बढ़ाने के लिए इस पुण्यकार्य में लग जाएं। -- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, 1903 में सरस्वती के संपादकीय में) * यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में) * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक नहीं होनी चाहिए। यह एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।... इसलिए कवियों को चाहिए कि क्रम-क्रम से वे गद्य की भाषा में भी कविता लिखना आरंभ करें। बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। -- ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली में कविता करने का समर्थन करते हुए ; महावीर प्रसाद द्विवेदी, सत्यप्रकाश मिश्र द्वारा उद्धृत, 1996, पृ.-36 * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ पृष्ट ७७ * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * यदि द्विवेदी जी द्वारा संपादित सरस्वती के पुराने अंक उठाकर किसी भी नई-पुरानी पत्रिका के अंकों से मिलाए जाएँ तो ज्ञात होगा कि पुराने हो चुकने पर भी इन अंकों में सीखने-समझने के लिए अन्य पत्रिकाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सामग्री है। 'सरस्वती' सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी। वह हिंदी नवजागरण का मुखपत्र थी और हिंदीभाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका भी, ऐसे साहित्य की जो रूढ़िवादी रीतियों का नाश करके नवीन सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था। द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ के लिए नए लेखक, नए पाठक ही नहीं तैयार किए अपितु प्रगतिशील विचारधारा के [[बाबूराव विष्णु पराड़कर]] और [[गणेश शंकर विद्यार्थी]] जैसे पत्रकार भी तैयार किए जिन्हें देश की सामाजिक, सास्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सम्पूर्ण ज्ञान था।-- डॉ० रामविलास शर्मा, अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए, पृष्ट ३७७ * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} opr5crkieskyjljlii531l39e61yyft 32990 32989 2026-07-05T04:27:49Z अनुनाद सिंह 658 /* महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ */ 32990 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]] '''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे। द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘सरस्वती’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है। अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी। == महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ == * अपना लिखा सभी को अच्छा लगता है परन्तु उसके अच्छे-बुरे का विचार दूसरे लोग ही कर सकते हैं। जो लेख हमने लौटाए वह समझ-बूझकर ही लौटाए, किसी और कारण से नहीं। अतएव यदि उसमें किसी को बुरा लगा तो हमें खेद है। यदि हमारी बुद्धि के अनुसार लेख हमारे पास आवें तो उन्हें हम क्यों लौटाएँ। उनको हम आदर स्वीकार करें, भेजने वाले को भी धन्यवाद दें और उसके साथ ही यदि हो सके तो कुछ पुरस्कार भी दें। यदि किसी को सर्वज्ञता का घमंड नहीं है तो वह अपने लेख में दूसरे के द्वारा किए हुए परिशोधन को देखकर कदापि रुष्ट नहीं होगा। लेखक अपने लेख का प्रूफ स्वयं शोध सकता है और संशोधन के समय हमारे किए गए परिवर्तन यदि उसे ठीक न जान पड़े तो वह हमें सूचना देकर वह उसको अपने मनोनुकूल बना सकता है। -- '''गगनाञ्चल''', नवंबर-दिसंबर, 2013, पृ. 11 पर उद्धृत * हमारी भाषा [[हिंदी]] है। उसके प्रचार के लिए गवर्नमेंट जो कुछ कर रही है, सो तो कर ही रही है, हमें चाहिए कि हम अपने घरों का अज्ञान तिमिर दूर करने और अपना ज्ञानबल बढ़ाने के लिए इस पुण्यकार्य में लग जाएं। -- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, 1903 में सरस्वती के संपादकीय में<ref>[https://www.jagran.com/uttar-pradesh/allahabad-city-publication-of-saraswati-magazine-resumes-from-prayagraj-jagran-special-20849706.html प्रयागराज से 40 वर्ष बाद फिर निकली 'सरस्वती' की साहित्य धारा]</ref> * यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में) * मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’ * बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में * ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। * इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में * वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में * यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में * वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी * इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में * इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में * आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में * अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार : क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार। : नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं, : सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ? : घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ? : चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक। : दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है, : कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है। : मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार ! : तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !! : शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार, : लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार ! : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१) : (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !) * शब्द-शास्त्र है किसका नाम ? : इस झगड़े से जिसे न काम, : नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है। : इधर-उधर से जोड़-बटोर, : लिखते हैं जो तोड़-मरोड़, : इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं। : अपनी पुस्तक की सानन्द : स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द, : अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं : निज मुख से जो गुण विस्तार : करते सदा पुकार-पुकार, : ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं। : किसी समालोचक के द्वार : सिर घिस-घिसकर बारम्बार : निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं। : -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में : (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।) * आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में * कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है। * अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में * किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में * कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे। * प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का। * बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है। * अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा। * क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में) * राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था * प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में * अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है। * कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए * ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। * गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक नहीं होनी चाहिए। यह एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।... इसलिए कवियों को चाहिए कि क्रम-क्रम से वे गद्य की भाषा में भी कविता लिखना आरंभ करें। बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। -- ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली में कविता करने का समर्थन करते हुए ; महावीर प्रसाद द्विवेदी, सत्यप्रकाश मिश्र द्वारा उद्धृत, 1996, पृ.-36 * दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए == महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ == * उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]] * द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ पृष्ट ७७ * द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] * यदि द्विवेदी जी द्वारा संपादित सरस्वती के पुराने अंक उठाकर किसी भी नई-पुरानी पत्रिका के अंकों से मिलाए जाएँ तो ज्ञात होगा कि पुराने हो चुकने पर भी इन अंकों में सीखने-समझने के लिए अन्य पत्रिकाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सामग्री है। 'सरस्वती' सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी। वह हिंदी नवजागरण का मुखपत्र थी और हिंदीभाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका भी, ऐसे साहित्य की जो रूढ़िवादी रीतियों का नाश करके नवीन सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था। द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ के लिए नए लेखक, नए पाठक ही नहीं तैयार किए अपितु प्रगतिशील विचारधारा के [[बाबूराव विष्णु पराड़कर]] और [[गणेश शंकर विद्यार्थी]] जैसे पत्रकार भी तैयार किए जिन्हें देश की सामाजिक, सास्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सम्पूर्ण ज्ञान था।-- डॉ० रामविलास शर्मा, अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए, पृष्ट ३७७ * द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में) * कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल * यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल * पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ ) * आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर : भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर, : दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर : उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर : -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32) * आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰ * द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद * द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में * उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में * साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} qoy8m0zkm0pjc2t63h3b99gvuef20f4 प्रेरक वाक्य 117 0 8883 32980 31433 2026-07-04T18:54:01Z ~2026-38198-61 5514 /* श्रेणियाँ */ 32980 wikitext text/x-wiki == '''उद्धरण''' == “परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।” == लेखक == विनोबा भावे '''5G '''== श्रेणियाँ == [[श्रेणी:हिंदी उद्धरण]] [[श्रेणी:प्रेरणादायक कथन]] 6cjjh47v7vz2tqqieqi86ejph2cyfj8