विकिसूक्ति hiwikiquote https://hi.wikiquote.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.10 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिसूक्ति विकिसूक्ति वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk कृष्ण 0 3514 33000 29823 2026-07-10T16:47:38Z अनुनाद सिंह 658 /* कृष्ण के बारे में */ 33000 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Krishna statue, Chambal.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|कृष्ण - एक हिन्दू देव]] '''[[:w:कृष्ण|कृष्ण]]''' हिन्दू धर्म की अनेक परंपराओं में पूजे जाने वाले एक देवता है। कई वैष्णव समूह उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जानते हैं जबकि [[:w:वैष्णव सम्प्रदाय|वैष्णव सम्प्रदाय]] की कुछ दूसरी परंपराओं में उन्हें स्वयं भगवान अथवा परमात्मा माना गया है। कृष्ण का अवसान [[:w:द्वापर युग|द्वापर युग]] का अंत और [[:w:कलियुग|कलियुग]] (वर्तमान) की शुरुआत निर्देशित करता है, जो फरवरी १७/१८, ३१०२ ईसा पूर्व को दिनांकित है। कृष्ण की आराधना का चलन, भगवान कृष्ण के रूप में या [[:w:वसुदेव|वसुदेव]], बालकृष्ण अथवा गोपाल के रूप में, कम से कम चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से पाया जाता है। == उक्तियाँ == [[चित्र:Krishna and Arjun on the chariot, Mahabharata, 18th-19th century, India.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|जब जब धर्म का लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए अवतार लेता हूँ।]] * ''यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। : ''अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ : ''परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्। : ''धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥'' -- श्रीमद्भगवद्गीता ४:०७-०८ : हे अर्जुन! जब-जब धर्म का लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूँ अर्थात् अवतार लेता हूँ। सज्जनों के कल्याण, दुष्टों के विनाश एवं धर्म की पुनर्स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ। * ''युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्राश्मकाञ्चनः।'' -- श्रीमद्भगवद्गीता ६:०८ : प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए गंदगी का ढेर, पत्थर और सोना सभी समान हैं। * ''सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।< : ''श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छृद्धः स एव सः।'' -- श्रीमद्भगवद्गीता १७:०३ : हे अर्जुन! हर व्यक्ति का विश्वास उसकी प्रकृति (संस्कारों) के अनुसार होता है। मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है। वह जो चाहे बन सकता/सकती है (यदि वह विश्वास के साथ इच्छित वस्तु पर लगातार चिंतन करे)। * ''कमण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।'' : कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी भी नहीं। * इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। * संतुष्ट मन इस विश्व का सबसे बड़ा धन है। * भगवान प्रत्येक वस्तु में, प्रत्येक जीव में मौजूद हैं। * आत्मा अमर है, इसलिए मरने की चिंता मत करो। * आत्मा का अंतिम लक्ष्य परमात्मा में मिल जाना होता है। * इंसान नहीं, उसका मन किसी का दोस्त या दुश्मन होता हैं। * बड़प्पन वह गुण है जो पद से नहीं, संस्कारों से प्राप्त होता है। * व्यक्ति या जीव का कर्म ही उसके भाग्य का निर्माण करता है। * वर्तमान परिस्थिति में जो तुम्हारा कर्तव्य है, वही तुम्हारा धर्म है। * मन बहुत चंचल है, जो इंसान के दिल में उथल-पुथल कर देता है। * जब वे अपने कार्य में आनंद खोज लेते हैं, तब वे पूर्णता प्राप्त करते हैं। * प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए, गंदगी का ढेर, पत्थर और सोना सभी समान हैं। * आपके कर्म ही आपकी पहचान है, वरना एक नाम के हजारों इंसान हैं। * धर्म केवल कर्म से होता है कर्म के बिना धर्म की कोई परिभाषा ही नहीं है। * अहंकार करने पर इंसान की प्रतिष्ठा, वंश, वैभव, तीनों ही समाप्त हो जाते हैं। * जीवन में कभी भी किसी से अपनी तुलना मत कीजिये, आप जैसे हैं सर्वश्रेष्ठ हैं। * बुरे कर्म करने नहीं पड़ते हो जाते है, और अच्‍छे कर्म होते नहीं करने पड़ते हैं। * जो अपने मन पर नियंत्रण नहीं रखता, वह स्वयं का शनै – शनै शत्रु बनता जाता है। * बुद्धिमान व्यक्ति को समाज कल्याण के लिए बिना आसक्ति के काम करना चाहिए। * स्वार्थ संसार का एक ऐसा कुआं है जिसमें गिरकर निकल पाना बड़ा कठिन होता हैं। * सेहत के लिए योग और किसी की जरूरत पर सहयोग दोनों से ही जीवन बदलता है। * आत्म-ज्ञान की तलवार से काटकर अपने ह्रदय से अज्ञान के संदेह को अलग कर दो। * दुष्ट लोग अगर समझाने मात्र से समझ जाते तो यकीन मानो महाभारत कभी ना होता। * मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है, जैसा वो विश्वास करता है वैसा वो बन जाता है। * मान, अपमान, लाभ-हानि, खुश हो जाना या दुखी हो जाना यह सब मन की शरारत है। * जिसे तुम अपना समझ कर मग्न हो रहे हो बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दुखों का कारण हैं। * उस इंसान का मंजिल से भटक जाना तय है जिसकी संगत में नकारात्मक लोग रहते हैं। * प्रेम सदैव माफी मांगना पसंद करता है और अहंकार सदैव माफी सुनना पसंद करता है। * सिर्फ दिखावे के लिए अच्छा मत बनो मैं आपको बाहर से नहीं बल्कि भीतर से जानता हूं। * जो इस लोक में अपने काम की सफलता की कामना रखते हैं, वे देवताओं का पूजन करें। * व्‍यक्ति जो चाहे बन सकता है, यदि विश्‍वास के साथ इच्छित वस्‍तु पर लगातार चिंतन करें। * शब्द उतने ही बाहर निकालने चाहिए, जिन्हें वापिस भी लेना पड़े तो खुद को तकलीफ न हो। * परायों को अपना बनाना उतना मुश्किल नहीं, जितना अपनों को अपना बनाए रखना होता है। * इंसान की सोच ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है वरना दुनिया में एक नाम के अनेक इंसान है। * बहुत विनम्रता चाहिए रिश्तों को निभाने के लिए, छल कपट से तो सिर्फ महाभारत रची जाती है। * यदि आप किसी के साथ मित्रता नहीं कर सकते हैं, तो उसके साथ शत्रुता भी नहीं करना चाहिए। * मनुष्य का जीवन केवल उसके कर्मों पर चलता है, जैसा कर्म होता है, वैसा उसका जीवन होता है। * मन अशांत हो तो उसे नियंत्रित करना कठिन है, लेकिन अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है। * दिव्यता केवल शक्तिशाली होने में नहीं, बल्कि वास्तविक दिव्यता दूसरों में शक्ति जाग्रत करने में है। * मन की गतिविधियों, होश, श्वास, और भावनाओं के माध्यम से भगवान की शक्ति सदा तुम्हारे साथ है। * जीवन में वाणी को संयम में रखना अनिवार्य है क्योंकि वाणी से दिए हुए घाव कभी भरे नहीं जा सकते। * जब हम स्वयं जीवन के शिल्पकार हैं, तो चलो हम अपनी मुश्किलों को हराते हैं, जीवन में मुस्कुराते हैं। * एक बार माफ़ करके अच्छे बन जाओ, पर दुबारा उसी इन्सान पर भरोसा करके बेवकूफ कभी न बनो। * न हार चाहिए ना जीत चाहिए। जीवन में अच्छी सफलता के लिए परिवार और कुछ मित्र का साथ चाहिये। * रिश्तो को निभाने के लिए वक़्त निकालिये, कहीं ऐसा न हो जब आपके पास वक़्त हो तो रिश्ता ही न बचे। * वह जो इस ज्ञान में विश्वास नहीं रखते, मुझे प्राप्त किये बिना जन्म और मृत्यु के चक्र का अनुगमन करते हैं। * लोग आपके अपमान के बारे में हमेशा बात करेंगे। सम्मानित व्यक्ति के लिए, अपमान मृत्यु से भी बदतर है। * जो दूसरों की तकलीफों को समझते हैं, जिनमें दया है, दिल से अच्छे हैं। उन्हें दोबारा जन्म लेना नहीं पड़ता। * जीवन में आधे दु:ख इस वजह से आते है, क्यूंकि हमने उनसे आशाऐं रखी जिन से हमें नहीं रखनी चाहिए थी। * जीवन में समय चाहे जैसा भी हो, परिवार के साथ रहो। सुख हो तो बढ़ जाता है, और दुःख हो तो बट जाता है। * इस संसार में मूर्ख व्यक्ति, अधर्मी, अज्ञानी व नास्तिक प्रकृति का व्यक्ति, मेरी शरण स्वीकार नहीं कर सकता। * ज्ञानी व्यक्ति को कर्म के प्रतिफल की अपेक्षा कर रहे अज्ञानी व्यक्ति के दिमाग को अस्थिर नहीं करना चाहिए। * अपने जीवन में कभी भी ना किसी को आनंद में वचन दे, ना क्रोध में उत्तर दे और ना ही दुख में कभी निर्णय ले। * किसी और का काम पूर्णता से करने से कहीं अच्छा है कि अपना काम करें, भले ही उसे अपूर्णता से करना पड़े। * मैं हीं इस सृष्टि की रचना करता हूँ, मैं हीं इसका पालन-पोषण करता हूँ और मैं हीं इस सृष्टि का विनाश करता हूँ। * कृष्ण कहते हैं जब – जब संसार में धर्म की हानि होगी, अधर्म की विजय। तब – तब मैं इस पृथ्वी पर अवतार लूंगा। * अमीर बनने के लिए एक एक क्षण संग्रह करना पड़ता है, किन्तु अमर बनने के लिए एक एक कण बांटना पड़ता है। * जिंदगी में सब कुछ ख़त्म होना जैसा कुछ भी नही होता, हमेशा एक नही शुरूआत हमारा इन्तजार कर रही होती हैं। * हे अर्जुन !, मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ, किन्तु वास्तविकता में कोई मुझे नहीं जानता। * लोग कहते हैं अपनों के आगे झुक जाना चाहिए, किंतु सच बात तो यह है जो अपने होते हैं वह कभी झुकने नहीं देते। * वह दिन मत दिखाना कान्हा कि हमें खुद पर गुरुर हो जाए, रखना अपने दिल में इस तरह कि जीवन सफल हो जाए। * वह जो सभी इच्छाएं त्याग देता है। मैं और मेरा की लालसा तथा भावना से मुक्त हो जाता है। उसे शांति प्राप्त होती है। * हमेशा छोटी छोटी गलतियों से बचने की कोशिश किया करो, क्योंकि इन्सान पहाड़ों से नहीं पत्थरों से ठोकर खाता है। * शांति से भी दुखों का अंत हो जाता है और शांत चित्त मनुष्य की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर होकर परमात्मा से युक्त हो जाती है। * अपनी पीड़ा के लिए संसार को दोष मत दो अपने मन को समझाओ तुम्हारे मन का परिवर्तन ही तुम्हारे दुखों का अंत है। * श्री कृष्ण कहते हैं एक बार माफ़ करके अच्छे बन जाओ। पर दुबारा उसी इन्सान पर भरोसा करके बेवकूफ कभी न बनो। * इच्छा पूरी नहीं होती तो क्रोध बढ़ता है, और इच्छा पूरी होती है तो लोभ बढ़ता है। इसलिये जीवन की हर स्थिति में धैर्य बनाये रखना। * अगर तुम अपना कल्याण चाहते हो, तो सभी उपदेशों, सभी धर्मों को छोड़ कर मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें मुक्ति प्रदान करुंगा। * जो हुआ अच्छा हुआ, जो होगा अच्छा होगा। स्वयं को मुझ पर छोड़ दो अपने कर्म पर ध्यान दो। कर्म ऐसा जो स्वार्थरहित पापरहित हो। * कृष्ण ने दुष्टों को भी अपनी गलती सुधारने का मौका दिया, क्योकि वो किसी मनुष्य को नहीं उसके अंदर के बुराई को मारना चाहते थे। * संदेह की स्याही से संबंध के पृष्ठ पर कभी शुभ अंकित नहीं होता इसलिए अपने मन के विचार और संबंधों का आधार दोनों ही शुभ रखें। * मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्य पथ से हट जाना मूर्खता है, क्योंकि इससे ना तो तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी और ना ही तुम्हारी कीर्ति बढ़ेगी। * इस भौतिक संसार का यह नियम है जो वस्तु उत्पन्न होती है, कुछ काल तक रहती है अंत में लुप्त हो जाती है चाहे वे शरीर हो या फल हो। * यदि कोई व्यक्ति प्रेम से, भक्ति से, पुष्प, फल, जल भी मुझ पर चढ़ा दे तो उसी भाव से उसे स्वीकार करता हूं वह मेरा प्रिय भक्त होता है। * उससे मत डरो जो वास्तविक नहीं है, ना कभी था ना कभी होगा। जो वास्तविक है, वो हमेशा था और उसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। * जीवन में आधे दुख इस कारण जन्म लेते हैं, क्योंकि हमारी आशाएं बड़ी होती है। इन आशाओं का त्याग करके देखो, जीवन में सुख ही सुख है। * अपने परम भक्तों, जो हमेशा मेरा स्मरण या एक-चित्त मन से मेरा पूजन करते हैं, मैं व्यक्तिगत रूप से उनके कल्याण का उत्तरदायित्व लेता हूँ। * जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु उतनी ही निश्चित है जितना कि मृत होने वाले के लिए जन्म लेना। इसलिए जो अपरिहार्य है उस पर शोक मत करो। * श्री कृष्ण ने कहा है, अगर तुम्हें किसी ने दुखी किया है तो बुरा मत मानना। लोग उसी पेड़ पर पत्थर मारते है, जिस पेड़ पर ज्यादा मीठे फल होते है। * अंत काल में जो मनुष्य मेरा स्मरण करते हुए, देह त्याग करता है वह मेरी शरण में आता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि अंत काल में मेरा चिंतन करें। * यह सच बात हैं कि भूल करके इन्सान कुछ सीखता है। परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि वह जीवन भर भूल करता रहे और कहे कि हम सीख रहे हैं। * कृष्ण कहते हैं, इस जगत में मनुष्य भौतिक वस्तुओं का भोग कर सकता है। अगर वे चाहे तो सब कुछ छीन सकते हैं। मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। * स्वार्थ से रिश्ते बनाने की कितनी भी कोशिश करें, वो कभी नही बनते हैं। और प्रेम से बने रिश्तों को कितना भी तोड़ने की कोशिश करें, वो कभी नही टूटते। * क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है, जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है। जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है। * आत्मा न तो जन्म लेती है, न कभी मरती है और ना ही इसे कभी जलाया जा सकता है, ना ही पानी से गीला किया जा सकता है, आत्मा अमर और अविनाशी है। * अगर व्यक्ति शिक्षा से पहले संस्कार, व्यापार से पहले व्यवहार और भगवान से पहले माता पिता को पहचान ले तो जिंदगी में कभी कोई कठिनाई नही आएगी। * विषयों का चिंतन करने से विषयों की आसक्ति होती है। आसक्ति से इच्छा उत्पन्न होती है और इच्छा से क्रोध होता है।क्रोध से सम्मोहन और अविवेक उत्पन्न होता है। * कृष्ण कहते हैं जैसे प्राणी अपने पुराने कपड़ों उतार कर फेंक देता है, नए को धारण करता है। उसी प्रकार यह आत्मा पुराने शरीर से त्याग करके नया शरीर प्राप्त करती हैं। * तुम उसके लिए शोक करते हो जो शोक करने के योग्य नही हैं, और फिर भी ज्ञान की बातें करते हो, बुद्धिमान व्यक्ति ना जीवित और ना ही मृत व्यक्ति के लिए शोक करते हैं। * मन की गतिविधियों, होश, श्वास और भावनाओं के माध्यम से भगवान की शक्ति सदा तुम्हारे साथ है और लगातार तुम्हे बस एक साधन की तरह प्रयोग कर सभी कार्य कर रही है। * हर किसी के अंदर अपनी ताकत और अपनी कमज़ोरी होती है। मछली जंगल में नहीं दौड़ सकती और शेर पानी में राजा नही बन सकता, इसलिए अहमियत सभी को देनी चाहिए। * धर्म युद्ध में कोई भी व्यक्ति निष्पक्ष नहीं रह सकता है। धर्म युद्ध में जो व्यक्ति धर्म के साथ नहीं खड़ा है। इसका मतलब है वह अधर्म का साथ दे रहा है, वह अधर्म के साथ खड़ा है। * अगर कोई मनुष्य हमारे साथ बुरा कर रहा है, तो उसे करने दो यह उसका कर्म है। और समय उसके कर्म का फल उसे जरूर देगा। लेकिन हमें कभी भी किसी के साथ बुरा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही हमारा धर्म है। == कृष्ण के बारे में == : ''वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । : ''देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥'' -- -- कृष्णाष्टकम् : वसुदेव के पुत्र; कंस, चाणूर आदि का मर्दन करनेवाले, (माता) देवकी को परमानंद देनेवाले और संपूर्ण जगत के गुरु भगवान श्रीकृष्‍ण को मैं वंदन करता हूँ। * ''कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । : ''प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ : हे वसुदेवपुत्र कृष्‍ण, सर्व दु:ख हरण करनेवाले परमात्‍मा शरणागत के क्‍लेश दूर करनेवाले गोविंद; मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं । * ''यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। : ''तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥'' -- [[गीता]], संजय द्वारा कहा गया : जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है - ऐसा मेरा मत है। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[राम]] *[[महाभारत]] *[[गीता]] == बाहरी कडियाँ == {{commons|Krishna|कृष्ण}} {{wikipedia}} eogpjhbjpchyc0mud88dj9gngncau63 33001 33000 2026-07-10T16:54:11Z अनुनाद सिंह 658 /* कृष्ण के बारे में */ 33001 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Krishna statue, Chambal.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|कृष्ण - एक हिन्दू देव]] '''[[:w:कृष्ण|कृष्ण]]''' हिन्दू धर्म की अनेक परंपराओं में पूजे जाने वाले एक देवता है। कई वैष्णव समूह उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जानते हैं जबकि [[:w:वैष्णव सम्प्रदाय|वैष्णव सम्प्रदाय]] की कुछ दूसरी परंपराओं में उन्हें स्वयं भगवान अथवा परमात्मा माना गया है। कृष्ण का अवसान [[:w:द्वापर युग|द्वापर युग]] का अंत और [[:w:कलियुग|कलियुग]] (वर्तमान) की शुरुआत निर्देशित करता है, जो फरवरी १७/१८, ३१०२ ईसा पूर्व को दिनांकित है। कृष्ण की आराधना का चलन, भगवान कृष्ण के रूप में या [[:w:वसुदेव|वसुदेव]], बालकृष्ण अथवा गोपाल के रूप में, कम से कम चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से पाया जाता है। == उक्तियाँ == [[चित्र:Krishna and Arjun on the chariot, Mahabharata, 18th-19th century, India.jpg|दाएँ|अंगूठाकार|जब जब धर्म का लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए अवतार लेता हूँ।]] * ''यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। : ''अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ : ''परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्। : ''धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥'' -- श्रीमद्भगवद्गीता ४:०७-०८ : हे अर्जुन! जब-जब धर्म का लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूँ अर्थात् अवतार लेता हूँ। सज्जनों के कल्याण, दुष्टों के विनाश एवं धर्म की पुनर्स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ। * ''युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ट्राश्मकाञ्चनः।'' -- श्रीमद्भगवद्गीता ६:०८ : प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए गंदगी का ढेर, पत्थर और सोना सभी समान हैं। * ''सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।< : ''श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छृद्धः स एव सः।'' -- श्रीमद्भगवद्गीता १७:०३ : हे अर्जुन! हर व्यक्ति का विश्वास उसकी प्रकृति (संस्कारों) के अनुसार होता है। मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है। वह जो चाहे बन सकता/सकती है (यदि वह विश्वास के साथ इच्छित वस्तु पर लगातार चिंतन करे)। * ''कमण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।'' : कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कभी भी नहीं। * इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है। * संतुष्ट मन इस विश्व का सबसे बड़ा धन है। * भगवान प्रत्येक वस्तु में, प्रत्येक जीव में मौजूद हैं। * आत्मा अमर है, इसलिए मरने की चिंता मत करो। * आत्मा का अंतिम लक्ष्य परमात्मा में मिल जाना होता है। * इंसान नहीं, उसका मन किसी का दोस्त या दुश्मन होता हैं। * बड़प्पन वह गुण है जो पद से नहीं, संस्कारों से प्राप्त होता है। * व्यक्ति या जीव का कर्म ही उसके भाग्य का निर्माण करता है। * वर्तमान परिस्थिति में जो तुम्हारा कर्तव्य है, वही तुम्हारा धर्म है। * मन बहुत चंचल है, जो इंसान के दिल में उथल-पुथल कर देता है। * जब वे अपने कार्य में आनंद खोज लेते हैं, तब वे पूर्णता प्राप्त करते हैं। * प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए, गंदगी का ढेर, पत्थर और सोना सभी समान हैं। * आपके कर्म ही आपकी पहचान है, वरना एक नाम के हजारों इंसान हैं। * धर्म केवल कर्म से होता है कर्म के बिना धर्म की कोई परिभाषा ही नहीं है। * अहंकार करने पर इंसान की प्रतिष्ठा, वंश, वैभव, तीनों ही समाप्त हो जाते हैं। * जीवन में कभी भी किसी से अपनी तुलना मत कीजिये, आप जैसे हैं सर्वश्रेष्ठ हैं। * बुरे कर्म करने नहीं पड़ते हो जाते है, और अच्‍छे कर्म होते नहीं करने पड़ते हैं। * जो अपने मन पर नियंत्रण नहीं रखता, वह स्वयं का शनै – शनै शत्रु बनता जाता है। * बुद्धिमान व्यक्ति को समाज कल्याण के लिए बिना आसक्ति के काम करना चाहिए। * स्वार्थ संसार का एक ऐसा कुआं है जिसमें गिरकर निकल पाना बड़ा कठिन होता हैं। * सेहत के लिए योग और किसी की जरूरत पर सहयोग दोनों से ही जीवन बदलता है। * आत्म-ज्ञान की तलवार से काटकर अपने ह्रदय से अज्ञान के संदेह को अलग कर दो। * दुष्ट लोग अगर समझाने मात्र से समझ जाते तो यकीन मानो महाभारत कभी ना होता। * मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है, जैसा वो विश्वास करता है वैसा वो बन जाता है। * मान, अपमान, लाभ-हानि, खुश हो जाना या दुखी हो जाना यह सब मन की शरारत है। * जिसे तुम अपना समझ कर मग्न हो रहे हो बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दुखों का कारण हैं। * उस इंसान का मंजिल से भटक जाना तय है जिसकी संगत में नकारात्मक लोग रहते हैं। * प्रेम सदैव माफी मांगना पसंद करता है और अहंकार सदैव माफी सुनना पसंद करता है। * सिर्फ दिखावे के लिए अच्छा मत बनो मैं आपको बाहर से नहीं बल्कि भीतर से जानता हूं। * जो इस लोक में अपने काम की सफलता की कामना रखते हैं, वे देवताओं का पूजन करें। * व्‍यक्ति जो चाहे बन सकता है, यदि विश्‍वास के साथ इच्छित वस्‍तु पर लगातार चिंतन करें। * शब्द उतने ही बाहर निकालने चाहिए, जिन्हें वापिस भी लेना पड़े तो खुद को तकलीफ न हो। * परायों को अपना बनाना उतना मुश्किल नहीं, जितना अपनों को अपना बनाए रखना होता है। * इंसान की सोच ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है वरना दुनिया में एक नाम के अनेक इंसान है। * बहुत विनम्रता चाहिए रिश्तों को निभाने के लिए, छल कपट से तो सिर्फ महाभारत रची जाती है। * यदि आप किसी के साथ मित्रता नहीं कर सकते हैं, तो उसके साथ शत्रुता भी नहीं करना चाहिए। * मनुष्य का जीवन केवल उसके कर्मों पर चलता है, जैसा कर्म होता है, वैसा उसका जीवन होता है। * मन अशांत हो तो उसे नियंत्रित करना कठिन है, लेकिन अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है। * दिव्यता केवल शक्तिशाली होने में नहीं, बल्कि वास्तविक दिव्यता दूसरों में शक्ति जाग्रत करने में है। * मन की गतिविधियों, होश, श्वास, और भावनाओं के माध्यम से भगवान की शक्ति सदा तुम्हारे साथ है। * जीवन में वाणी को संयम में रखना अनिवार्य है क्योंकि वाणी से दिए हुए घाव कभी भरे नहीं जा सकते। * जब हम स्वयं जीवन के शिल्पकार हैं, तो चलो हम अपनी मुश्किलों को हराते हैं, जीवन में मुस्कुराते हैं। * एक बार माफ़ करके अच्छे बन जाओ, पर दुबारा उसी इन्सान पर भरोसा करके बेवकूफ कभी न बनो। * न हार चाहिए ना जीत चाहिए। जीवन में अच्छी सफलता के लिए परिवार और कुछ मित्र का साथ चाहिये। * रिश्तो को निभाने के लिए वक़्त निकालिये, कहीं ऐसा न हो जब आपके पास वक़्त हो तो रिश्ता ही न बचे। * वह जो इस ज्ञान में विश्वास नहीं रखते, मुझे प्राप्त किये बिना जन्म और मृत्यु के चक्र का अनुगमन करते हैं। * लोग आपके अपमान के बारे में हमेशा बात करेंगे। सम्मानित व्यक्ति के लिए, अपमान मृत्यु से भी बदतर है। * जो दूसरों की तकलीफों को समझते हैं, जिनमें दया है, दिल से अच्छे हैं। उन्हें दोबारा जन्म लेना नहीं पड़ता। * जीवन में आधे दु:ख इस वजह से आते है, क्यूंकि हमने उनसे आशाऐं रखी जिन से हमें नहीं रखनी चाहिए थी। * जीवन में समय चाहे जैसा भी हो, परिवार के साथ रहो। सुख हो तो बढ़ जाता है, और दुःख हो तो बट जाता है। * इस संसार में मूर्ख व्यक्ति, अधर्मी, अज्ञानी व नास्तिक प्रकृति का व्यक्ति, मेरी शरण स्वीकार नहीं कर सकता। * ज्ञानी व्यक्ति को कर्म के प्रतिफल की अपेक्षा कर रहे अज्ञानी व्यक्ति के दिमाग को अस्थिर नहीं करना चाहिए। * अपने जीवन में कभी भी ना किसी को आनंद में वचन दे, ना क्रोध में उत्तर दे और ना ही दुख में कभी निर्णय ले। * किसी और का काम पूर्णता से करने से कहीं अच्छा है कि अपना काम करें, भले ही उसे अपूर्णता से करना पड़े। * मैं हीं इस सृष्टि की रचना करता हूँ, मैं हीं इसका पालन-पोषण करता हूँ और मैं हीं इस सृष्टि का विनाश करता हूँ। * कृष्ण कहते हैं जब – जब संसार में धर्म की हानि होगी, अधर्म की विजय। तब – तब मैं इस पृथ्वी पर अवतार लूंगा। * अमीर बनने के लिए एक एक क्षण संग्रह करना पड़ता है, किन्तु अमर बनने के लिए एक एक कण बांटना पड़ता है। * जिंदगी में सब कुछ ख़त्म होना जैसा कुछ भी नही होता, हमेशा एक नही शुरूआत हमारा इन्तजार कर रही होती हैं। * हे अर्जुन !, मैं भूत, वर्तमान और भविष्य के सभी प्राणियों को जानता हूँ, किन्तु वास्तविकता में कोई मुझे नहीं जानता। * लोग कहते हैं अपनों के आगे झुक जाना चाहिए, किंतु सच बात तो यह है जो अपने होते हैं वह कभी झुकने नहीं देते। * वह दिन मत दिखाना कान्हा कि हमें खुद पर गुरुर हो जाए, रखना अपने दिल में इस तरह कि जीवन सफल हो जाए। * वह जो सभी इच्छाएं त्याग देता है। मैं और मेरा की लालसा तथा भावना से मुक्त हो जाता है। उसे शांति प्राप्त होती है। * हमेशा छोटी छोटी गलतियों से बचने की कोशिश किया करो, क्योंकि इन्सान पहाड़ों से नहीं पत्थरों से ठोकर खाता है। * शांति से भी दुखों का अंत हो जाता है और शांत चित्त मनुष्य की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर होकर परमात्मा से युक्त हो जाती है। * अपनी पीड़ा के लिए संसार को दोष मत दो अपने मन को समझाओ तुम्हारे मन का परिवर्तन ही तुम्हारे दुखों का अंत है। * श्री कृष्ण कहते हैं एक बार माफ़ करके अच्छे बन जाओ। पर दुबारा उसी इन्सान पर भरोसा करके बेवकूफ कभी न बनो। * इच्छा पूरी नहीं होती तो क्रोध बढ़ता है, और इच्छा पूरी होती है तो लोभ बढ़ता है। इसलिये जीवन की हर स्थिति में धैर्य बनाये रखना। * अगर तुम अपना कल्याण चाहते हो, तो सभी उपदेशों, सभी धर्मों को छोड़ कर मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें मुक्ति प्रदान करुंगा। * जो हुआ अच्छा हुआ, जो होगा अच्छा होगा। स्वयं को मुझ पर छोड़ दो अपने कर्म पर ध्यान दो। कर्म ऐसा जो स्वार्थरहित पापरहित हो। * कृष्ण ने दुष्टों को भी अपनी गलती सुधारने का मौका दिया, क्योकि वो किसी मनुष्य को नहीं उसके अंदर के बुराई को मारना चाहते थे। * संदेह की स्याही से संबंध के पृष्ठ पर कभी शुभ अंकित नहीं होता इसलिए अपने मन के विचार और संबंधों का आधार दोनों ही शुभ रखें। * मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्य पथ से हट जाना मूर्खता है, क्योंकि इससे ना तो तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी और ना ही तुम्हारी कीर्ति बढ़ेगी। * इस भौतिक संसार का यह नियम है जो वस्तु उत्पन्न होती है, कुछ काल तक रहती है अंत में लुप्त हो जाती है चाहे वे शरीर हो या फल हो। * यदि कोई व्यक्ति प्रेम से, भक्ति से, पुष्प, फल, जल भी मुझ पर चढ़ा दे तो उसी भाव से उसे स्वीकार करता हूं वह मेरा प्रिय भक्त होता है। * उससे मत डरो जो वास्तविक नहीं है, ना कभी था ना कभी होगा। जो वास्तविक है, वो हमेशा था और उसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। * जीवन में आधे दुख इस कारण जन्म लेते हैं, क्योंकि हमारी आशाएं बड़ी होती है। इन आशाओं का त्याग करके देखो, जीवन में सुख ही सुख है। * अपने परम भक्तों, जो हमेशा मेरा स्मरण या एक-चित्त मन से मेरा पूजन करते हैं, मैं व्यक्तिगत रूप से उनके कल्याण का उत्तरदायित्व लेता हूँ। * जन्म लेने वाले के लिए मृत्यु उतनी ही निश्चित है जितना कि मृत होने वाले के लिए जन्म लेना। इसलिए जो अपरिहार्य है उस पर शोक मत करो। * श्री कृष्ण ने कहा है, अगर तुम्हें किसी ने दुखी किया है तो बुरा मत मानना। लोग उसी पेड़ पर पत्थर मारते है, जिस पेड़ पर ज्यादा मीठे फल होते है। * अंत काल में जो मनुष्य मेरा स्मरण करते हुए, देह त्याग करता है वह मेरी शरण में आता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि अंत काल में मेरा चिंतन करें। * यह सच बात हैं कि भूल करके इन्सान कुछ सीखता है। परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि वह जीवन भर भूल करता रहे और कहे कि हम सीख रहे हैं। * कृष्ण कहते हैं, इस जगत में मनुष्य भौतिक वस्तुओं का भोग कर सकता है। अगर वे चाहे तो सब कुछ छीन सकते हैं। मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। * स्वार्थ से रिश्ते बनाने की कितनी भी कोशिश करें, वो कभी नही बनते हैं। और प्रेम से बने रिश्तों को कितना भी तोड़ने की कोशिश करें, वो कभी नही टूटते। * क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है, जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है। जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है। * आत्मा न तो जन्म लेती है, न कभी मरती है और ना ही इसे कभी जलाया जा सकता है, ना ही पानी से गीला किया जा सकता है, आत्मा अमर और अविनाशी है। * अगर व्यक्ति शिक्षा से पहले संस्कार, व्यापार से पहले व्यवहार और भगवान से पहले माता पिता को पहचान ले तो जिंदगी में कभी कोई कठिनाई नही आएगी। * विषयों का चिंतन करने से विषयों की आसक्ति होती है। आसक्ति से इच्छा उत्पन्न होती है और इच्छा से क्रोध होता है।क्रोध से सम्मोहन और अविवेक उत्पन्न होता है। * कृष्ण कहते हैं जैसे प्राणी अपने पुराने कपड़ों उतार कर फेंक देता है, नए को धारण करता है। उसी प्रकार यह आत्मा पुराने शरीर से त्याग करके नया शरीर प्राप्त करती हैं। * तुम उसके लिए शोक करते हो जो शोक करने के योग्य नही हैं, और फिर भी ज्ञान की बातें करते हो, बुद्धिमान व्यक्ति ना जीवित और ना ही मृत व्यक्ति के लिए शोक करते हैं। * मन की गतिविधियों, होश, श्वास और भावनाओं के माध्यम से भगवान की शक्ति सदा तुम्हारे साथ है और लगातार तुम्हे बस एक साधन की तरह प्रयोग कर सभी कार्य कर रही है। * हर किसी के अंदर अपनी ताकत और अपनी कमज़ोरी होती है। मछली जंगल में नहीं दौड़ सकती और शेर पानी में राजा नही बन सकता, इसलिए अहमियत सभी को देनी चाहिए। * धर्म युद्ध में कोई भी व्यक्ति निष्पक्ष नहीं रह सकता है। धर्म युद्ध में जो व्यक्ति धर्म के साथ नहीं खड़ा है। इसका मतलब है वह अधर्म का साथ दे रहा है, वह अधर्म के साथ खड़ा है। * अगर कोई मनुष्य हमारे साथ बुरा कर रहा है, तो उसे करने दो यह उसका कर्म है। और समय उसके कर्म का फल उसे जरूर देगा। लेकिन हमें कभी भी किसी के साथ बुरा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही हमारा धर्म है। == कृष्ण के बारे में == : ''वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । : ''देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥'' -- -- कृष्णाष्टकम् : वसुदेव के पुत्र; कंस, चाणूर आदि का मर्दन करनेवाले, (माता) देवकी को परमानंद देनेवाले और संपूर्ण जगत के गुरु भगवान श्रीकृष्‍ण को मैं वंदन करता हूँ। * ''कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने । : ''प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ : हे वसुदेवपुत्र कृष्‍ण, सर्व दु:ख हरण करनेवाले परमात्‍मा शरणागत के क्‍लेश दूर करनेवाले गोविंद; मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं । * ''यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। : ''तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥'' -- [[गीता]], संजय द्वारा कहा गया : जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है - ऐसा मेरा मत है। * सेस गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं। : जाहिं अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥ : नारद से सुक व्यास रटै पचि हारे तऊ पुनि पार न पावै। : ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै॥ -- रसखान : रसखान कहते हैं कि जिस कृष्ण के गुणों का शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य, इंद्र निरंतर स्मरण करते हैं। वेद जिसके स्वरूप का निश्चित ज्ञान प्राप्त न करके उसे अनादि, अनंत, अखंड अछेद्य आदि विशेषणों से युक्त करते हैं। नारद, शुकदेव और व्यास जैसे प्रकांड पंडित भी अपनी पूरी कोशिश करके जिसके स्वरूप का पता न लगा सके और हार मानकर बैठ गए, उन्हीं कृष्ण को अहीर की लड़कियाँ छाछिया-भर छाछ के लिए नाच नचाती हैं। ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[राम]] *[[महाभारत]] *[[गीता]] == बाहरी कडियाँ == {{commons|Krishna|कृष्ण}} {{wikipedia}} eakz5cdn0rwt9kd9jdkuhk7vgzpyd1k राम 0 5986 32998 28222 2026-07-10T15:53:52Z अनुनाद सिंह 658 /* राम के बारे में कथन */ 32998 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Lord Rama with arrows.jpg|अंगूठाकार|धनुष और बाण धारण किए '''राम''' का चित्र]] '''[[w:राम|राम]]''' हिंदू भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं। वे अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के पुत्र थे। [[रामायण]] में उनकी कथा है। उन्हें 14 साल के वनवास पर भेज दिया गया। रावण ने श्री राम की पत्नी “सीता” का अपहरण कर लिया और लंका ले गया। बहुत समझाने पर भी रावण सीता को लौटाने को तैयार नहीं हुआ तब श्री राम ने रावण से युद्ध की और “शुक्ला दशमी“ के दिन रावण का वध किया। == सुवचन == * ''द्विः शरं नाभिसन्धत्ते द्विः स्थापयति नाश्रितान्। : ''द्विर्ददाति न चार्थिभ्यो, रामो द्विर्नाभिभाषते ॥ : (राम) बाण को दो बार निशाने पर नहीं साधते, (राम) शरणागत आश्रित को दो बार स्थापित नहीं करते, (राम) माँगनेवाले को दो बार नहीं देते, राम (एक ही बात) दो बार नहीं कहते। अर्थात् एक ही बार में कार्य पूर्ण करते हैं, दूसरी बार करने की आवश्यकता ही रहती। * '' न सुप्रीतकरं तत्तु मात्रा पित्रा च यत्कृतम् : कोई व सन्तान अपने माता एवं पिता का ऋण कभी नहीं चुका सकता चाहे वह अपने माता पिता के लिए कितना व श्रेष्ठ कार्य क्यों न कर दे। वह कभी इस ऋण से मुक्त नहीं हो सकता है। * ''लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् । : ''अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥ : (श्री राम ऋषि वशिष्ठ जी से कहते हैं कि) चन्द्रमा अपनी शोभा छोड़ सकता है, गिरिराज हिमालय हिमहीन हो सकता है और सागर अपना तट बदल सकता है लेकिन में अपने माता-पिता के वचनों का उल्लंघन कभी नहीं कर सकता। * ''कुलीनमकुलीनं वा वीरं पुरुषमानिनम् । : ''चारित्रमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाऽशुचिम् ॥ : (श्री राम ऋषि जाबालि से कहते है कि) मनुष्य का चरित्र ही इसकी व्यख्य करता है कि कोई पुरुष कुलीन है या अकुलीन, कपटी है या सज्जन, वीर है यह डरपोक। * ''दुर्लभं हि सदा सुखम् ॥'' -- वाल्मीकि रामायण : सदा रहने वाला सुख दुर्लभ है। ( सुख सदा नहीं बना रहता।) : भगवान राम जब अपने पिता दशरथ जी को टूटा हुआ देखते है तब प्रभु राम माता कैकेयी से कहते है कि अगर इस जीवन में अगर कोई मनुष्य सदैव खुश रहना चाहता है तो वह ब्रह्म में है। * परहित बस जिन्ह के मन माही। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कुछ नाही॥ : जिनके मन में सदैव दूसरे का हित करने की अभिलाषा रहती है। अथवा जो सदा दूसरों की सहायता करने में लगे रहते हैं, उनके लिए संपूर्ण जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। * देखिअहिं रूप नाम आधीना, रूप ज्ञान नहिं नाम बिहीना। : व्यक्ति सामने ना होने पर भी नाम से उसको जाना जा सकता है, परंतु नाम के बिना व्यक्ति की पहचान नहीं हो सकती। == स्तोत्र == :'' लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। :'' कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ :'' शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं :'' ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌। :'' रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं :'' वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥ :'' नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्। :'' पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥ :'' रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। :'' रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥ :'' नमामि भक्त वत्सलम्। कृपालु शील कोमलम्॥ :'' भजामि ते पदाम्बुजं। अकामिनां स्वधामदम्॥ :'' निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मन्दरम्॥ :'' प्रफुल्ल कञ्ज लोचनं। मदादि दोष मोचनम्॥ :'' प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवम्॥ :'' निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥ :'' दिनेश वंश मण्डनं। महेश चाप खण्डनम्॥ :'' मुनीन्द्र सन्त रञ्जनं। सुरारि वृन्द भंजनम्॥ :'' मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितम्॥ :'' विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहम्॥ :'' नमामि इन्दिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिम्॥ :'' भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजम्॥ :'' त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजन्ति हीन मत्सराः॥ :'' पतन्ति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥ :'' विविक्त वासिनः सदा। भजन्ति मुक्तये मुदा॥ :'' निरस्य इन्द्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं॥ :'' तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुम्॥ :'' जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलम्॥ :'' भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभम्॥ :'' स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहम्॥ :'' अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिम्॥ :'' प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥ :'' पठन्ति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदम्॥ :'' व्रजन्ति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता॥ == राम के बारे में कथन == * ''क्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः । : ''नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी ।। 1 ।। : ''बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमाञ्छत्रुनिवर्हणः । : ''विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ।। 2 ।। : ''महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः । : ''आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः ।। ३ ।। : ''समः समविभक्ताङ्गः स्निग्धवर्णः प्रतापवान्। : ''पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः ॥4॥'' -- वाल्मीकि रामायण (नारद, वाल्मीकि से) : इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं, जो लोगों में राम नाम से विख्यात हैं। : वे ही मन को वश में रखने वाले, महाबलवान, कांतिमान, धैर्यवान और जितेन्द्रिय हैं। : वे बुद्धिमान, नीति में पारंगत, वाक्पटु (वाग्मी), धन-सम्पन्न हैं। वे शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। : उनकी भुजाएँ विशाल और मजबूत हैं, गर्दन लंबी और वे महान योद्धा हैं। : राम का हँसना बड़ा प्रभावशाली है, उनकी साँस भारी है, वे छुपे हुए शत्रुओं के नाशक हैं। : उनके बाजू बिना कोहनी वले हैं। सिर सुंदर, माथा चौड़ा है। वे साहसी हैं। : उनका शरीर समान रूप से विभाजित है। उनका वर्ण स्निग्ध है। वे प्रतापी हैं। : उनकी छाती गहरी, आँखें बड़ी हैं। वे लक्ष्मीवान हैं तथा शुभलक्षणों से युक्त हैं। * ''रामो विग्रहवान् धर्मः ।'' -- वाल्मीकि रामायण : राम, धर्म के मूर्त रूप हैं। अर्थात धर्म ने शरीर धारण करके राम के रूप में अवतार लिया है। * ''राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।'' : ''सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥'' -- : राम राम कहो। एक बार राम कहने से विष्णुसहस्रनाम का सम्पूर्ण फल मिल जाता है। क्योंकि श्रीराम नाम ही विष्णु सहस्रनाम के तुल्य है। : (इस मंत्र को 'श्री राम तारक मंत्र' भी कहा जाता है और इसका जाप सम्पूर्ण विष्णु सहश्रनाम या विष्णु के 1000 नामों के जाप के समतुल्य है। यह मंत्र 'श्री राम रक्षा स्तोत्रम्' के नाम से भी जाना जाता है।) * सहस नाम सम सुनि शिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी॥ -- [[रामचरितमानस]] १-१९-६ : जव शंकर जी ने कहा कि राम-नाम अकेले विष्णु के हजार नामों के बराबर है, तब राम नाम का जाप करके पार्वती जी ने प्रसन्न होकर शिवजी के साथ भोजन किया। * मंत्र महामनि विषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥ -- रामचरितमानस – बालकाण्ड : श्री राम के च्रित्र क चिन्त्न विषय रूपी सर्पों के लिये मंत्र और महाऔषध हि। जिस प्रकार मंत्र, महाऔषध और मणि सर्प विष को उतार देता है, ठीक उसी प्रकार श्रीराम चरित्र का स्मरण-चिन्तन करने से विषय भोग रूपी जहर को उतर जाता है। और ललाट पर लिखे हुए कठिन कुअंक (बुरे अंक / दुर्भाग्य) मिट जाते हैं। * सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥ -- रामचरितमानस (बालकाण्ड) : (तुलसीदास जी कहते हैं कि) मैं पूरे संसार को सीता और राम से युक्त जानता हूँ। इसलिये दोनों हाथ जोड़कर (सारे संसार को) प्रणाम कर रहा हूँ। * राम के बिना हिन्दू जीवन नीरस है – फीका है। यही रामरस उसका स्वाद बनाए रहा और बनाए रहेगा। राम ही का मुख देख हिन्दू जनता का इतना बड़ा भाग अपने धर्म और जाति के घेरे में पड़ा रहा। न उसे तलवार काट सकी, न धन-मान का लोभ, न उपदेशों की तड़क-भड़क। -- [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] “गोस्वामी तुलसीदास” नामक अपनी पुस्तक में * ''है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़ '' : ''अहल-ए-नज़र समझते हैं इस को इमाम-ए-हिंद'' -- अलम्मा इक़बाल === रामराज्य === : राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका॥ : बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥ : दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ : अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥ : नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥ : सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥ : राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं। : काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥ -- [[रामचरितमानस]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[रामायण]] ka5d0v5m5hvg5vqt77bltjdcg7ga4l9 32999 32998 2026-07-10T15:55:08Z अनुनाद सिंह 658 /* राम के बारे में कथन */ 32999 wikitext text/x-wiki [[चित्र:Lord Rama with arrows.jpg|अंगूठाकार|धनुष और बाण धारण किए '''राम''' का चित्र]] '''[[w:राम|राम]]''' हिंदू भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं। वे अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के पुत्र थे। [[रामायण]] में उनकी कथा है। उन्हें 14 साल के वनवास पर भेज दिया गया। रावण ने श्री राम की पत्नी “सीता” का अपहरण कर लिया और लंका ले गया। बहुत समझाने पर भी रावण सीता को लौटाने को तैयार नहीं हुआ तब श्री राम ने रावण से युद्ध की और “शुक्ला दशमी“ के दिन रावण का वध किया। == सुवचन == * ''द्विः शरं नाभिसन्धत्ते द्विः स्थापयति नाश्रितान्। : ''द्विर्ददाति न चार्थिभ्यो, रामो द्विर्नाभिभाषते ॥ : (राम) बाण को दो बार निशाने पर नहीं साधते, (राम) शरणागत आश्रित को दो बार स्थापित नहीं करते, (राम) माँगनेवाले को दो बार नहीं देते, राम (एक ही बात) दो बार नहीं कहते। अर्थात् एक ही बार में कार्य पूर्ण करते हैं, दूसरी बार करने की आवश्यकता ही रहती। * '' न सुप्रीतकरं तत्तु मात्रा पित्रा च यत्कृतम् : कोई व सन्तान अपने माता एवं पिता का ऋण कभी नहीं चुका सकता चाहे वह अपने माता पिता के लिए कितना व श्रेष्ठ कार्य क्यों न कर दे। वह कभी इस ऋण से मुक्त नहीं हो सकता है। * ''लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् । : ''अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥ : (श्री राम ऋषि वशिष्ठ जी से कहते हैं कि) चन्द्रमा अपनी शोभा छोड़ सकता है, गिरिराज हिमालय हिमहीन हो सकता है और सागर अपना तट बदल सकता है लेकिन में अपने माता-पिता के वचनों का उल्लंघन कभी नहीं कर सकता। * ''कुलीनमकुलीनं वा वीरं पुरुषमानिनम् । : ''चारित्रमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाऽशुचिम् ॥ : (श्री राम ऋषि जाबालि से कहते है कि) मनुष्य का चरित्र ही इसकी व्यख्य करता है कि कोई पुरुष कुलीन है या अकुलीन, कपटी है या सज्जन, वीर है यह डरपोक। * ''दुर्लभं हि सदा सुखम् ॥'' -- वाल्मीकि रामायण : सदा रहने वाला सुख दुर्लभ है। ( सुख सदा नहीं बना रहता।) : भगवान राम जब अपने पिता दशरथ जी को टूटा हुआ देखते है तब प्रभु राम माता कैकेयी से कहते है कि अगर इस जीवन में अगर कोई मनुष्य सदैव खुश रहना चाहता है तो वह ब्रह्म में है। * परहित बस जिन्ह के मन माही। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कुछ नाही॥ : जिनके मन में सदैव दूसरे का हित करने की अभिलाषा रहती है। अथवा जो सदा दूसरों की सहायता करने में लगे रहते हैं, उनके लिए संपूर्ण जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। * देखिअहिं रूप नाम आधीना, रूप ज्ञान नहिं नाम बिहीना। : व्यक्ति सामने ना होने पर भी नाम से उसको जाना जा सकता है, परंतु नाम के बिना व्यक्ति की पहचान नहीं हो सकती। == स्तोत्र == :'' लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। :'' कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ :'' शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं :'' ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्‌। :'' रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं :'' वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्‌॥ :'' नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्। :'' पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥ :'' रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। :'' रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥ :'' नमामि भक्त वत्सलम्। कृपालु शील कोमलम्॥ :'' भजामि ते पदाम्बुजं। अकामिनां स्वधामदम्॥ :'' निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मन्दरम्॥ :'' प्रफुल्ल कञ्ज लोचनं। मदादि दोष मोचनम्॥ :'' प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवम्॥ :'' निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥ :'' दिनेश वंश मण्डनं। महेश चाप खण्डनम्॥ :'' मुनीन्द्र सन्त रञ्जनं। सुरारि वृन्द भंजनम्॥ :'' मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितम्॥ :'' विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहम्॥ :'' नमामि इन्दिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिम्॥ :'' भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजम्॥ :'' त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजन्ति हीन मत्सराः॥ :'' पतन्ति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥ :'' विविक्त वासिनः सदा। भजन्ति मुक्तये मुदा॥ :'' निरस्य इन्द्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं॥ :'' तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुम्॥ :'' जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलम्॥ :'' भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभम्॥ :'' स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहम्॥ :'' अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिम्॥ :'' प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥ :'' पठन्ति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदम्॥ :'' व्रजन्ति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता॥ == राम के बारे में कथन == * ''इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः । : ''नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी ।। 1 ।। : ''बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमाञ्छत्रुनिवर्हणः । : ''विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ।। 2 ।। : ''महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः । : ''आजानुबाहुः सुशिराः सुललाटः सुविक्रमः ।। ३ ।। : ''समः समविभक्ताङ्गः स्निग्धवर्णः प्रतापवान्। : ''पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः ॥4॥'' -- वाल्मीकि रामायण (नारद, वाल्मीकि से) : इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं, जो लोगों में राम नाम से विख्यात हैं। : वे ही मन को वश में रखने वाले, महाबलवान, कांतिमान, धैर्यवान और जितेन्द्रिय हैं। : वे बुद्धिमान, नीति में पारंगत, वाक्पटु (वाग्मी), धन-सम्पन्न हैं। वे शत्रुओं का नाश करने वाले हैं। : उनकी भुजाएँ विशाल और मजबूत हैं, गर्दन लंबी और वे महान योद्धा हैं। : राम का हँसना बड़ा प्रभावशाली है, उनकी साँस भारी है, वे छुपे हुए शत्रुओं के नाशक हैं। : उनके बाजू बिना कोहनी वले हैं। सिर सुंदर, माथा चौड़ा है। वे साहसी हैं। : उनका शरीर समान रूप से विभाजित है। उनका वर्ण स्निग्ध है। वे प्रतापी हैं। : उनकी छाती गहरी, आँखें बड़ी हैं। वे लक्ष्मीवान हैं तथा शुभलक्षणों से युक्त हैं। * ''रामो विग्रहवान् धर्मः ।'' -- वाल्मीकि रामायण : राम, धर्म के मूर्त रूप हैं। अर्थात धर्म ने शरीर धारण करके राम के रूप में अवतार लिया है। * ''राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।'' : ''सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥'' -- : राम राम कहो। एक बार राम कहने से विष्णुसहस्रनाम का सम्पूर्ण फल मिल जाता है। क्योंकि श्रीराम नाम ही विष्णु सहस्रनाम के तुल्य है। : (इस मंत्र को 'श्री राम तारक मंत्र' भी कहा जाता है और इसका जाप सम्पूर्ण विष्णु सहश्रनाम या विष्णु के 1000 नामों के जाप के समतुल्य है। यह मंत्र 'श्री राम रक्षा स्तोत्रम्' के नाम से भी जाना जाता है।) * सहस नाम सम सुनि शिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी॥ -- [[रामचरितमानस]] १-१९-६ : जव शंकर जी ने कहा कि राम-नाम अकेले विष्णु के हजार नामों के बराबर है, तब राम नाम का जाप करके पार्वती जी ने प्रसन्न होकर शिवजी के साथ भोजन किया। * मंत्र महामनि विषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥ -- रामचरितमानस – बालकाण्ड : श्री राम के च्रित्र क चिन्त्न विषय रूपी सर्पों के लिये मंत्र और महाऔषध हि। जिस प्रकार मंत्र, महाऔषध और मणि सर्प विष को उतार देता है, ठीक उसी प्रकार श्रीराम चरित्र का स्मरण-चिन्तन करने से विषय भोग रूपी जहर को उतर जाता है। और ललाट पर लिखे हुए कठिन कुअंक (बुरे अंक / दुर्भाग्य) मिट जाते हैं। * सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥ -- रामचरितमानस (बालकाण्ड) : (तुलसीदास जी कहते हैं कि) मैं पूरे संसार को सीता और राम से युक्त जानता हूँ। इसलिये दोनों हाथ जोड़कर (सारे संसार को) प्रणाम कर रहा हूँ। * राम के बिना हिन्दू जीवन नीरस है – फीका है। यही रामरस उसका स्वाद बनाए रहा और बनाए रहेगा। राम ही का मुख देख हिन्दू जनता का इतना बड़ा भाग अपने धर्म और जाति के घेरे में पड़ा रहा। न उसे तलवार काट सकी, न धन-मान का लोभ, न उपदेशों की तड़क-भड़क। -- [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] “गोस्वामी तुलसीदास” नामक अपनी पुस्तक में * ''है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़ '' : ''अहल-ए-नज़र समझते हैं इस को इमाम-ए-हिंद'' -- अलम्मा इक़बाल === रामराज्य === : राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका॥ : बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥ : दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ : अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥ : नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥ : सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥ : राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं। : काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं॥ -- [[रामचरितमानस]] ==सन्दर्भ== {{टिप्पणीसूची}} ==इन्हें भी देखें== *[[रामायण]] qgtjlbalf2i2tvdwp68su4klx9379xy