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तुलसीदास
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2026-07-22T03:18:50Z
अनुनाद सिंह
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[[चित्र:Gosvami Tulsidas II.jpg|thumb|right|200px|तुलसीदास ]]
'''तुलसीदास''' हिन्दी के महान कवि थे। [[रामचरितमानस]] उनकी महानतम रचना है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल वाल्मीकीय रामायण को आर्य काव्य का आदर्श मानते हैं। ’मानस‘ में तुलसीदास धर्मोपदेष्टा और नीतिकार के रूप में सामने आते हैं। वह ग्रंथ एक धर्मग्रंथ के रूप में भी लिखा गया है।
वास्तव में ’रामायण‘ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का अमृतमय रूप है तो ’रामचरितमानस‘ रामभक्ति की श्रद्धा की सरयू एवं भक्ति की भागीरथी है।
’रामचरितमानस‘ शाश्वत जीवन मूल्यों का आकाशदीप है। प्रत्येक संस्कृति के कुछ ऐसे शाश्वत नियम, उपनियम एवं परंपराएँ होती हैं, जो इसकी आधारशिला होती है। व्यक्ति के निजी जीवन, समाज एवं राष्ट्र को निर्मल, समुन्नत एवं आदर्शलक्षी बनाने के लिए ऐसे नियम विवेकपूर्ण जीवनरीति-नीति के मार्गदर्शक होते हैं। ऐसे मानदंड निर्धारित करने में धर्मग्रंथों, शास्त्रग्रंथों एवं जीवनमूल्यनिष्ठ साहित्यिक रचनाएँ सहायक होती हैं।
तुलसीकृत रामचरितमानस उनकी विराट् प्रतिभा का साधनाजन्य वह पुरस्कार है, जो व्यक्ति के इहलोक एवं परलोक सुधारने की अद्वितीय क्षमता रखता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ’अग्निपुराण‘ के वचन का उल्लेख करते हुए कहा है, ’’नरत्वं दुलर्भं लोके विद्या सुदुर्लभा, कवित्वं दुलर्भं तत्र, शक्तिस्तत्र दुलर्भा।‘‘ महाकवि तुलसीदास को उक्त चारों विभूतियाँ परिप्राप्त थीं और इन का सदुपयोग उन्होंने ’सर्वजनहिताय‘ ही किया।
== रामचरित मानस में शाश्वत मूल्यचेतना==
तुलसी का साहित्यिक दृष्टिकोण कलालक्षी नहीं, जीवनलक्षी था। उन्होंने उस भक्ति को आदर्श स्वरूप माना, जिसमें श्रेय एवं प्रेय का समन्वय हो। तुलसी कभी किसी वाद के चौखटे में परिबद्ध नहीं रहे, क्योंकि वे सत्यग्रहणलक्षी साधक थे। इसलिए वे मनुष्य की केन्द्रीय स्थिति एवं जीवन की सार्थकता विषयक एक समन्वित दृष्टिकोण ’रामचरितमानस‘ में प्रस्तुत कर सके। विविध आदर्शों एवं समन्वयतात्मक दृष्टि के कारण ही तुलसी का लोकनायकत्व स्वयं सिद्ध होता है। वास्तव में गोस्वामी तुलसीदास जी ने हिन्दू धर्म में निरन्तर उत्पन्न हो रहे मत-मतान्तरों, सम्प्रदायों और सामाजिक वैषम्य को दूर करके एक आदर्श समाज की कल्पना रामचरित मानस में की हैं । वे शुभ को ही जीवन का ’मूल्य‘ मानते हैं इसलिए उनका साहित्य मानवमूल्यों के जय जयकार के प्रति समर्पित है।
पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन के मधुर आदर्श तथा उत्सर्ग की भावना ’रामचरितमानस‘ में सर्वत्र बिखरी पडी है। तुलसी की काव्य चेतना में जीवन मूल्यों एवं मानव मूल्यों का समन्वय है और यह मूल्य निरूपण भारतीय संस्कृति के उदात्त मूल्यों एवं नैतिकता के आदर्शों से अनुप्राणित है। कर्त्तव्य परायणता, शिष्टाचार, सदाचरण, कर्मण्यता, निष्कपटता, कृतज्ञता, सच्चाई, न्यायप्रियता, उत्सर्ग की भावना समदृष्टि, क्षमा आदि नैतिक मूल्यों का इसलिए भक्ति काव्य में अग्रस्थान प्राप्त किए हुए दिखाया गया है, ताकि समाज, राजनीति एवं लोकजीवन उन्नत बने।‘
’रामचरितमानस‘ में जीवन मूल्यों का क्षेत्र सीमित नहीं है। उनमें वैश्विक दृष्टि है। मानव मात्र के कल्याण की कामना है। जीवन मूल्य स्थान, काल के बंधनों से मुक्त स्वस्थ समाज एवं कल्याणकारी राजनीति की स्थापना में सहायक एवं मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।
’रामचरितमानस‘ में धार्मिक-दार्शनिक, सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन मूल्यों का निरूपण सुंदर ढंग से हुआ है।
धर्म का उद्देश्य है मनुष्य को शुभत्व एवं शिवत्व की राह दिखा कर आत्मोन्नति की ओर अग्रसर कराना। इसके लिए तप और त्याग आवश्यक है। तप की महत्ता बतानेवाली अनेक उक्तियाँ ’रामचरितमानस‘ में मिलती हैं जैसे.....
: ''तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा। (१/७३)''
: ''तप के अगम न कछु संसारा। (१/१६३)''
तुलसीदास जी ने तप का महत्त्व निरूपित करने के लिए ही वाल्मीकि, अत्रि, भरद्वाज, नारद आदि को तपस्यालीन चित्रित किया है।
त्याग का मूर्तिमंत उदाहरण यह है - बंधुत्रय - राम, लक्ष्मण एवं भरत। चक्रवर्ती होने वाले राम वनवासी हो जाते हैं। लक्ष्मण अपने दाम्पत्य सुख की बलि देकर भ्रातृसेवा का त्यागदीप्त जीवनमार्ग अपनाता है और भरत महल में प्राप्त राज्य में लक्ष्मी को तृणवत् मानकर भाई को ढूँढने निकल पडता है। तुलसीदास ने भरत के इस त्यागपूर्ण व्यक्तित्व को प्रशंसित करते हुए कहा है -
: ''चलत पयादे खात फल, पिता दीन्ह तजि राजु।''
: ''जात मनावन रघुबरहि, भरत सरसि को आजु॥'' (रामचरित मानस २/२२२)
सामान्य धर्म के दस अंग माने गये हैं। ’रामचरित मानस‘ में तुलसीदास जी ने धर्म के इन सभी अंगों को भली-भाँति प्रतिपादित किया है। परधन हडप लेने की वृत्ति चौर्य कार्य है। तुलसीदास जी कहते हैं -
: ''धन पराय विष ते विष भारी'' (रामचरित मानस - ७/४९/१)
संयम के लिए इन्दि्रय-निग्रह आवश्यक है। पंचेन्दि्रयों को मनमाना न करने देना ही संयम है। इसलिए संत पुरुष काम-क्रोधादि का परित्याग करते हैं -
: ''काम-क्रोध मद लोभ सब, नाथ नरक के पंथ।''
: ''सब परिहरि रघुबीरहिं, भजहु भजहिं जेहि संत॥'' (रामचरित मानस - सुंदरकाण्ड ५/३९)
सत्य को धर्म का पर्याय मानकर तुलसीदास कहते हैं- ’धरमु न दूसर सत्य समाना।‘ इसी प्रकार परहित और अहिंसा की भावना का निरूपण करते हुए वे कहते हैं -
: ''परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीडा सम नहिं अधमाई॥ '' (रामचरित मानस - ७/४९/१)
विश्व का व्यवहार धर्मपालन पर अवलम्बित है। तुलसीदास के मतानुसार धर्म का पालन करने से ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति होती है और सुख-संतोष की अनुभूति होती है -
: ''धरम तडाग ग्यान विज्ञाना। ये पंकज विसके विधि नाना॥ ''
: ''सुख संतोष विराग विवेका। विगत सोक ये कोक अनेका॥'' (रामचरित मानस - ७/३२/४)
ऐसी धार्मिकता कष्टसाध्य है। जिसमें
: '' ''नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी, कोउ एक होइ धर्मब्रतधारी।''
गोस्वामी तुलसीदास ने धर्मरथ के रूपक के माध्यम से धर्म के विभिन्न अंगों का विस्तार से प्रतिपादन किया है। (७/१०३) ’ज्ञानदीपक‘ (लंकाकांड ८०/३-६) के प्रसंग में भी उन्होंने धर्म के विविध अंगों का परिचय दिया है। जीवन मनुष्य की कडी कसौटी लेता है। रामचरितमानस में वर्णधर्म, आश्रमधर्म, पुत्रधर्म, स्त्रीधर्म, युगधर्म का भी निरूपण किया है। जैसे :
: '' नित जुग धर्म होहिं सब केरे, हृदय राम माया के प्रेरें॥'' (७/१.४/१.२)
तत्पश्चात् उन्होंने युगविशेष में मनुष्य के हृदय में कौन-सी भावनाएँ धर्म प्रेरक हो सकती हैं, इसका वर्णन किया है। ’रामचरितमानस‘ समानाचरण मूल्यों की दृष्टि से भी एक समन्वय ग्रंथ है। समाज में संत का कार्य संसारियों का मार्गदर्शन बनता है। अतः समाज को शिक्षा देने हेतु तुलसी ने सन्त के लक्षण एवं आचरणों को विस्तार से उल्लेख किया है। जैसे -
: ''उमा संत कइ इहइ बडाई। मंद करत जो करइ भलाई॥'' (सु.का. ४१-६)
: संतहृदय जस निर्मल बारी,
: बाँधे घाट मनोहर चारी।
: संत उदय संतत सुखकारी,
: संत विटप सरिता गिरि धरनी,
: परहित हेतु सबन्ह कै करनी।
: संत हृदय नवनीत समाना,
: कहा कबिन्ह करि कहइ न जाना।
: निज परिताप दवइ नवनीता,
: परदुख द्रवहिं संत सुपुनीता।
(रामचरित मानस - ७/१२५/७)
तुलसी का संत, शील का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करता है। ऐसे संतत्व के लिए संन्यास ग्रहण करना आवश्यक नहीं। तुलसीदास ने भरत, विभीषण, हनुमान आदि में इसी संतत्व के महान् गुणों का निरूपण किया है। संत समाज का उन्नायक होता है और असंत अर्थात् खल प्रगतिपथ में रोडा। असंत के अवगुणों का भी उन्होंने वर्णन किया है। रावण के बारे में तुलसीदास जी ने कहा है -
: ''काम रूप जानहिं सब माया।''
: ''सपनेहु जिन्ह के धरम न दाया।'' (रामचरितमानस १/१८१)
तुलसीदास जी गुरुशिष्य सम्बन्ध को पावनतम संबंध मानते हैं। गुरु के गरिमामय व्यक्तित्व का उन्होंने प्रभावशाली शब्दों में वर्णन किया है।
: ''हरइ शिष्य धन सोक न हरई,
: ''सो गुरु घोर नरक महुँ परई॥'' (रामचरितमानस ७/९९)
कहकर धोखेबाज गुरुओं को उन्होंने आडे हाथों लिया है। गुरु की तरह मैत्री में वफादारी का मूल्य भी सुंदर ढंग से निरूपित किया है।
: ''जे न मित्र दुख होहिं दुखारी''
: ''तिन्हहिं विलोकत पातक भारी।'' (रामचरित मानस ४/८)
’रामचरितमानस‘ में राजनीतिपरक मूल्यों का भी तुलसीदास जी ने विशद् निरूपण किया है। ’रामचरितमानस‘ में तुलसी ने तत्कालीन मुगलप्रशासन तंत्र का चित्रण कलियुग के वर्णन के रूप में उत्तरकांड में किया है। उन्होंने नृपतंत्र के रूप में दशरथ के शासनतंत्र की मर्यादाएँ बताई हैं तो दूसरी ओर जनक जैसे दार्शनिक तथा त्यागी सम्राट के राज्य संचालन को भी वर्णित किया है। किन्तु तुलसीदास को राम के शासनतंत्र के समर्थक और रावण के शासनतंत्र के विरोधी हैं। तुलसी ने राजा को प्रजा का प्रतिनिधि माना है। राजा की सर्वोपरि सत्ता को स्वीकार करते हुए भी उन्होंने उसकी निरंकुशता को सह्य नहीं माना है। उन्होंने उसी शासक को सच्चा शासक माना है जो पद को प्रजा की सेवा का निमित्त मानता है।
जनता की अपेक्षाओं के परिपुष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि - ’जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।‘ राजा को तुलसी ने सूरज से उपमित किया है -
: ''बरषत, हरषत लोग सब, करषत लखै न कोई।''
: ''तुलसी प्रजा सुभाग ते, भूप भानु सो होई॥''
’राजा‘ को मुख समान होकर सब विधि प्रजा का पोषण करना चाहिए - इस बात पर जोर देते हुए कहा है कि -
: ''मुखिया मुख सा चाहिए, खान पान को एक''
: ''पालहिं-पोषहिं सकल अंग, तुलसी सहित विवेक॥''
तुलसीदास ने इसके लिए ’राम-राज्य‘ अथवा कल्याण-राज्य का आदर्श प्रस्तुत किया है।
यह कल्याणकारी राज्य धर्म का राज्य होता है, न्याय का राज्य होता है, कर्त्तव्य-पालन का राज्य होता है। वह सत्ता का नहीं, सेवा का राज्य होता है। इस कल्याणकारी राज्य की झोली में है - क्षमा, समानता, सत्य, त्याग, बैर का अभाव, बलिदान एवं प्रजा का सर्वांगीण उत्कर्ष। इस कल्याणकारी राज्य की कल्पना की परिधि में व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य और विश्व का कल्याण समाविष्ट है। इसके केन्द्र में है धर्म जिसे हम वर्तमान के संदर्भ में ’कर्त्तव्य पालन‘ के स्वरूप में भी ले सकते हैं। जहाँ धर्म होगा, वहाँ सत्य होगा, शिवत्व होगा, सौंदर्य होगा, सुख होगा, शान्ति होगी, कल्याण होगा।
तुलसीदास ने देखा कि अपने युग में जनता पारस्परिक कलह, ईर्ष्या, द्वेष और अधर्म में फँसी हुई है। पति-पत्नी, भाई-भाई, राजा-प्रजा, परिवार-कुटुम्ब में छोटी-मोटी बातों पर कलह-विवाद ओर संघर्ष हो रहे हैं।
जहाँ समाज मानस-रोगों से विमुक्त होकर विमलता, शुभ्रता, नीति और धर्म का चरण करे, उसी का नाम कल्याणकारी राज्य। यह कल्याणकारी राज्य अशत्रुत्व और समता का राज्य है। इसके अभाव में राज्य कल्याण - राज्य न रहकर अनेक दूषणों से दूषित हो जाता है, जिसकी झाँकी तुलसी ने हमें ’कलि-काल‘ वर्णन में कराई है।
’रामचरित-मानस‘ उन आदर्शों की उर्वर भूमि है, जिसको अपनाने से किसी युग की प्रजा अपने कल्याण की साधना कर सकती है। वैसे तो रामराज्य का वर्णन रामचरितमानसेतर अन्य ग्रंथों में भी मिलता है : जैसे भागवत, महापुराण, पद्मपुराण इत्यादि में। किन्तु ’रामचरितमानस‘ के ’उत्तर-कांड‘ में तुलसी ने राम-राज्य अथवा कल्याण-राज्य की परिकल्पना की है - पारस्परिक स्नेह, स्वधर्म पालन, धर्माचरण और आत्मिक उत्कर्ष का संदेश, प्रजा एवं प्रजेश की आत्मीयता और आदरभाव, प्रीति एवं नीतिपूर्ण दाम्पत्य जीवन, उदारता एवं परोपकार, प्रजा-कल्याण एवं सुराज्य का संतोषप्रद वातावरण- ये हैं उस धर्मयुक्त कल्याणमय राज्य की विशेषताएँ। रामराज्य के इस चित्रण के साथ तुलसी के आदर्श अथवा कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना सन्निहित है।
रामराज्य का विस्तृत वर्णन हमें ’रामचरितमानस‘ के ’उत्तरकांड‘ में मिलता है। तुलसीदास कहते हैं -
: ''रामराज्य बैठे त्रैलोका, हरषित भये गए सब सोका।''
: ''बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप विषमता खोई॥''
: ''बरनाश्रम निज-निज धरम, निरत बेद पथ लोग।''
: ''चलहिं सदा पावहिं सुखहि, नहि भय सोक न रोग॥''
: ''दैहिक दैविक भौतिक तापा। रामराज नहीं काहुहिं व्यापा।''
: ''सब नर करहि परस्पर प्रीति। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति-नीति।''
: ''चारिऊ चरन धर्म जग माही। पूरि रहा सपनेहुँ दुःख नाही॥''
अर्थात् रघुनाथ जी को जिस समय राज्य-तिलक दिया, उस समय त्रिलोक आनंदित हुए और सारे शोक मिट गये। कोई किसी से बैर नहीं रखता और राम के प्रभाव से सब की कुटिलता जाती रही। चारों वर्ण, चारों आश्रम - सब अपने वैदिक धर्म के अनुसार चलते हैं। सुख प्राप्त करते हैं, किसी को भय, शोक और रोग नहीं हैं दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त होकर सब लोग परस्पर स्नेह करने लगे और अपने कुल धर्मानुसार जीवन जीने लगे।
आगे की पंक्तियों में तुलसी ने गाया है कि तप, ज्ञान, यज्ञ, दान इन चारों चरण से धर्म जगत् में परिपूर्ण हो गया था कहीं पाप का नाम नहीं। नर-नारी राम के भक्त हो गये थे। राम-राज्य में अल्पमृत्यु अथवा किसी तरह की शारीरिक पीडा किसी को न थी। कोई दुःखी न था, दरिद्र न था, दीन न था, मूर्ख न था। सब लोग धर्म निरत, दयालु और गुणवान थे। रघुनाथ जी के राज्य की सुख-संपत्ति का वर्णन खुद शारदा भी नहीं कर सकती। मनुष्य का एक-नारी व्रत था। दंड के बजाय प्रेम से सबको जीत लिया गया था।
मनुष्यों के नीति - पूर्ण जीवन से प्रसन्न प्रकृति ने भी पूर्ण उदारता से फल, फूल इत्यादि देने में कोई कसर नहीं रखी थी। तुलसी कहते हैं -
: ''फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक संग गज पंचानन।''
: ''खग-मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढाई।''
: ''कूजहिं खग-मृग नाना वृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनन्दा।''
: ''सीतल सुरभ पवन वह मन्दा। गुंजत अलि लै चलि मकरन्दा।''
: ''ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेता भइ कृतजुग कै करनी॥''
पर्वतों में से अनेक तरह की मणियों की खानें जगत्-प्राण राम को देखकर प्रकट हो गईं। सब नदियों में सुन्दर जल प्रवाहित होने लगा, जो शीतल, निर्मल और मजेदार था। सागर अपनी सीमा का अनुल्लंघन करते हुए किनारों पर रत्न फेंकते थे। सरोवरों में पंकज खिले थे। पूरा वायुमंडल मनोहर था।
इस प्रकार राम के राज्य में शशि की अमृतमयी किरणों से अवनि परिपूर्ण थी और बादल माँगने पर जलधारा बरसाते थे।
धर्मयुक्त कल्याणकारी राज्य का मूल है : प्रजा-कल्याण एवं शासकों की नीतिमता। राम के राजतंत्र में हमें प्रजा-सत्ता के कल्याणमय स्वरूप का दर्शन होता है। राम हमारे सामने कल्याणकारी शासक का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। आदर्श शासक अथवा सरकार वही है, जो प्रजा को सुख प्रदान करे। इसलिए तुलसीदासजी इस बात पर जोर देते हैं कि .....
: ''जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।''
: ''सो नृप अवसि नरक अधिकारी॥''
जिसमें प्रजा सुखी है, वही कल्याणकारी राज्य है, वही सुराज्य है - ’’सुखी प्रजा जनु पाई सुराजु‘‘ - पंक्ति में वही भाव ध्वनित है - कल्याणकारी राज्य के राजा का प्रधान धर्म है : वचन-पालन, सत्यनिष्ठा एवं स्वावलंबन। राम का राजा के रूप में वर्णन करते हुए तुलसीदास ने कहा हैं:
: ''साधु, सुजान, सुशील, नृपाला ईश अंश भव राम कृपाला।''
: ''रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्रान जाहि पर वचन न जाई॥''
कल्याणकारी राज्य में व्यक्तिगत स्वातंत्र्य का बहुत बडा महत्त्व है। राम-राज्य एक तरह से प्रजा-तंत्रात्मक राज्य था। उसकी प्रजा को संपूर्ण स्वातंत्र्य था। अतः लोग निर्भीक होकर रानी कैकेयी के कलुषित कार्यों की आलोचना कर सकते थे। यहाँ तक कि राम के व्यक्तिगत जीवन की भी। प्रजा की भावना का आदर करते हुए राम ने सीता का परित्याग किया, इससे बढकर शायद ही कोई सबूत किसी राजा की प्रजा-प्रियता एवं महानता का मिल सके। कल्याणकारी राज्य में सत्ता प्रजा की धरोहर मानी जाती है। राम के राज्य में प्रजा अथवा पंचों के परामर्श को महत्त्व मिलता था। राम-राज्य सत्य, दया, नीति और धर्म का राज्य था। किसी भी राज्य के उत्कर्ष के लिए ये चार वस्तुएँ आधार-शिलाएँ हैं।
जहाँ मानव मात्र को समान समझा जाय, वही कल्याकारी राज्य। ’रामचरितमानस‘ में इसका भी चित्र मिलता है। वनगमन के सिलसिले में राम चित्रकूट में डेरा लगाते हैं। उनके आगमन की खबर सुनकर गुह-किरात-शबर इत्यादि वनवासी लोग उनके दर्शनार्थ दौड आते हैं। उस समय राम का स्नेहासिक्त व्यवहार दर्शनीय है -
: ''राम स्नेह मगन सब जाने। कवि प्रिय वचन सकल सनमाने।''
: ''वचन किरातन के सुनत, जिमि पितु बालक बैन॥''
: ''राम सकल बनचर परितोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।''
राज्य बनता है - व्यक्तियों से, परिवारों से और समाजों से। रामराज्य अथवा कल्याणकारी राज्य तभी संभव होता है, जब पारिवारिक जीवन शुद्ध और मर्यादायुक्त हो। पिता-पुत्र, पति-पत्नी, सास-बहू इत्यादि का पारस्परिक संबंध एवं व्यवहार यदि मर्यादापूर्ण एवं विवेकयुक्त होगा तो सामाजिक जीवन स्वस्थ रहेगा। भाई-भाई के बीच स्नेह, विश्वास और प्रेम होना चाहिए। राम भरत से कहते हैं -
: ''गुरु, पितु-मातु स्वामि सिख पालें,''
: ''चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें''
: ''अस विचारि सब सोच बिहाई,''
: ''पालहु अवध अवधि भरि जाई॥''
तुलसी ने स्वराज्य का स्वरूप, सुराज्य का आदर्श, राजा का आचरण, प्रजा का व्यवहार, मंत्री का कर्त्तव्य एवं दूत का धर्म कैसा होना चाहिए आदि के बारे में अपने विचार अनेक स्थलों पर प्रकट किये हैं, जो प्रजा-कल्याण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। राजा-राजा के बीच, सेवक-स्वामी के बीच कैसा व्यवहार अपेक्षित है, उसकी चर्चा तुलसी ने ’रामचरित मानस‘ में स्पष्टतः की है।
इस तरह हम देखते हैं कि तुलसीकृत राम-राज्य के वर्णन में हमें धर्मयुक्त कल्याणलक्षी आदर्श राज्य का दर्शन होता है। राम का राज्य एकतंत्रात्मक था, किन्तु वही सही अर्थ में लोक-तंत्रात्मक था। क्योंकि सत्ता नहीं सेवा, सेवा नहीं जनकल्याण ही राम का आदर्श था। अतः धर्म अथवा कर्त्तव्यपरायणता ही उनका जीवन-मंत्र था।
’तुलसीदासः आज के संदर्भ में‘ - पुस्तक में युगेश्वर जी ने उचित ही कहा है कि राष्ट्र की भावात्मक एकता के लिए जिस उदात्त चरित्र की आवश्यकता है, वह रामकथा में है। मानस एक ऐसा वाग्द्वार है जहाँ समस्त भारतीय साधना और ज्ञान परम्परा प्रत्यक्ष दीख पडती है। दूसरी ओर देशकाल से परेशान, दुःखी और टूटे मनों का सहारा तथा संदेश देने की अद्भुत क्षमता है। आज भी करोडों मनों का यह सहारा है।
’रामचरितमानस‘ के संदेश को केवल भारत तक सीमित स्वीकृत करना इस महान् ग्रंथ के साथ अन्याय होगा। ’रामचरितमानस‘ युगवाणी है। विश्व का एक ऐसा विशिष्ट महाकाव्य जो आधुनिक काल में भी ऊर्ध्वगामी जीवनदृष्टि एवं व्यवहारधर्म तथा विश्वधर्म का पैगाम देता है। ’रामचरितमानस‘ अनुभवजन्य ज्ञान का ’अमरकोश‘ है।
’तुलसी के हिय हेरि‘ में तुलसी-साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री जी ने ’आधुनिकता की चुनौती और तुलसीदास‘ शीर्षक अध्याय में कहा है कि तुलसीदास की विचारधारा का विपुलांश आज भी वरणीय है। श्रीराम सगुण या निर्गुण ब्रह्म, अवतार, विश्वरूप, चराचर व्यक्त जगत् या चाम मूल्यों की समष्टि और स्रोत-उन का जो भी रूप आप को ग्राह्य हो) के प्रति समर्पित, सेवाप्रधान, परहित निरत, आधि-व्याधि-उपाधि रहित जीवन, मन, वाणी और कर्म की एकता, उदार, परमत सहिष्णु, सत्यनिष्ठ, समन्वयी दृष्टि, अन्याय के प्रतिरोध के लिए वज्र - कठोर, प्रेम-करुणा के लिए कुसुम कोमल चित्त, गिरे हुए को उठाने और आगे बढने की प्रेरणा और आश्वासन, भोग की तुलना में तप को प्रधानता देने वाला विवेकपूर्ण संयत आचरण, दारिद्रय मुक्त, सुखी, सुशिक्षित, समृद्ध समतायुक्त समाज, साधुमत और लोकमत का समादर करनेवाला प्रजाहितैषी शासन-संक्षेप में यही आदर्श प्रस्तुत किया है, तुलसी की ’मंगल करनि, कलिमल हरनि‘-वाणी ने। क्या आधुनिकता इस को खारिज कर सकती है ?
विष्णुकान्त शास्त्री जी एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने रखते हुए पूछते है : ’’और फिर आधुनिकता को यह आदर्श चुनौती नहीं दे सकता ? क्या यह उस से नहीं पूछ सकता कि आधुनिक प्राचुर्ययुक्त समाज बाहर से जितना भरा-भरा लगता है, भीतर से उतना ही खोखला नहीं है ? भौतिक समृद्धि के साथ-ही-साथ मनुष्य की बेचैनी, छटपटाहट, हताशा, क्यों बढती जा रही है ? आज की उद्धत बौद्धिकता परंपरागत मूल्यों के खंडन में सफल होने का दावा करती है, वैसा दावा हृदय को अवलम्ब दे पाने वाले किसी विश्वास के निर्माण के लिए क्यों नहीं कर पाती ?
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मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक। <Br/>
पाले पोसे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।
समरथ को नहिं दोश गोसांई
शठ सुधरहि सतसंगति पाई,पारस परसि कुधातु सुहाई।
परहित सरसि धरम नहि भाई, परपीड़ा सम नहिं अधमाई।
का बर्षा जब कृषी सुखानी
सिया राम मै सब जग जानी, <Br/>
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी।
धीरज धरम मित्र अरु नारी, <Br/>
आपद काल परखिये चारी।
जाके प्रिय न राम वैदेही, <Br/>
तजिये ताम कोटि बैरी सम जदपि परम सनेही ।
शूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु । <Br/>
विद्यमान रन पाई रिपु कायर कथहिं प्रतापु ।।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे अचरहिं ते नर न घनेरे।
भय बिनु होहिं न प्रीति ।
कादर मन कहुँ एक अधारा । दैव-दैव आलसी पुकारा ॥
सकल पदारथ एहि जग मांही, कर्महीन नर पावत नाही।
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहिं सो तस फल चाखा।
जथा उलूकंहि तम पर नेहा।
कीरति भनिति भूति भलि सोई, सुरसरि सम सबकंह हित होई ।
'''तुलसी का धर्ममय-रथ'''
सुनहु सखा, कह कृपानिधाना, जेहिं जय होई, सो स्यन्दन आना। <Br/>
सौरज धीरज तेहि रथ चाका, सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका। <Br/>
बल बिबेक दम पर-हित घोर, छमा कृपा समता रजु जोरे। <Br/>
ईस भजनु सारथी सुजाना, बिरति चर्म संतोष कृपाना। <Br/>
दान परसु बुधि सक्ति प्रचण्डा, बर बिग्यान कठिन कोदंडा। <Br/>
अमल अचल मन त्रोन सामना, सम जम नियम सिलीमुख नाना। <Br/>
कवच अभेद बिप्र-गुरुपूजा, एहि सम बिजय उपाय न दूजा। <Br/>
सखा धर्ममय अस रथ जाकें, जीतन कहँ न कतहूँ रिपु ताकें।
महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर । <Br/>
जाकें अस रथ होई दृढ़, सुनहु सखा मति-धीर ।। <Br/>
'''(लंकाकाण्ड)'''
अति संघरषन जौं कर कोई । <Br/>
अनल प्रगट चन्दन तें होई ।। <Br/>
परद्रोही कि होंहि निशंका । <Br/>
कामी पुनि कि रहैं अकलंका ।। <Br/>
कहत कठिन, समुझत कठिन, साधत कठिन बिबेक । <Br/>
होइ घुनाक्षर न्याय जौं, पुनि प्रत्यूह अनेक ।। <Br/>
मोह सकल ब्याधिन को मूला । <Br/>
तिन तें पुनि उपजें बहु सूला ।। <Br/>
बिनु संतोस न काम नसाहीं। <Br/>
काम अक्षत सुख सपनेहुं नाहीं।। <Br/>
रघुकुल रीति सदा चलि आई। <Br/>
प्राण जाइ पर बचन न जाई।। <Br/>
जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी। <Br/>
पण्डित सोई जो गाल बजावा। <Br/>
मति अति नीच, ऊँचि रुचि आछी । <Br/>
चहिअ अमिय जग, जुरइ न छाछी ॥ <Br/></big>
: सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ।
: सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥
अर्थ : स्वाभाविक ही हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता ,वह हृदय में खूब पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है ।
: सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
: ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि ॥
अर्थ : जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते हैं वे क्षुद्र और पापमय होते हैं । दरअसल ,उनका तो दर्शन भी उचित नहीं होता ।
== तुलसीदास के बारे में उक्तियाँ ==
=== रामचन्द्र शुक्ल===
* भारतीय भक्ति मार्ग सरलता और स्पष्टता का पक्षधर है क्योंकि उसके अनुसार भक्ति का संबंध भावना से है, कठिन योग साधना से नहीं।
* भक्ति रस का पूर्ण परिपाक जैसा विनयपत्रिका में देखा जा सकता है, वैसा अन्यत्र नहीं। भक्ति में प्रेम के अतिरिक्त आलंबन के महत्त्व और अपने दैन्य का अनुभव परमावश्यक अंग है। तुलसी के हृदय से इन दोनों अनुभवों के ऐसे निर्मल शब्द स्रोत निकले हैं, जिसमें अवगाहन करने से मन की मैल करती है और अत्यंत पवित्र प्रफुल्लता आती है। -- रामचंद्र शुक्ल
* हम निःसंकोच कह सकते हैं कि यह एक कवि ही हिन्दी की एक प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफी है।
* तुलसीदास जी अपने ही तक दृष्टि रखने वाले भक्त न थे, संसार को भी दृष्टि फैलाकर देखने वाले भक्त थे। जिस व्यक्त जगत के बीच उन्हें भगवान के रामरुप की कला का दर्शन कराना था, पहले चारों ओर दृष्टि दौङाकर उसके अनेक रूपात्मक स्वरूप को उन्होंने सामने रखा है।
* शील और शील का, स्नेह और स्नेह का, नीति और नीति का मिलन है। (राम-भरत मिलन)
* यदि कहीं सौन्दर्य है तो प्रफुल्लता, शक्ति है तो प्रणति, शील है तो हर्ष पुलक, गुण है तो आदर, पाप है तो घृणा, अत्याचार है तो क्रोध, अलौकिकता है तो विस्मय, पाखंड है तो कुढ़न, शोक है तो करुणा, आनंदोत्सव है तो उल्लास, उपकार है तो कृतज्ञता, महत्त्व है तो दीनता, तुलसीदास के हृदय में बिम्ब-प्रतिबिंब भाव से विद्यमान है।
* अनुप्रास के तो वह बादशाह थे। अनुप्रास किस ढंग से लाना चाहिए, उनसे यह सीखकर यदि बहुत से पिछले फुटकर कवियों ने अपने कवित सवैये लिखे होते तो उनमें भद्दापन और अर्थन्यूनता न आने पाती।
=== हजारी प्रसाद द्विवेदी ===
* तुलसीदास को जो अभूतपूर्व सफलता मिली उसका कारण यह था कि वे समन्वय की विशाल बुद्धि लेकर उत्पन्न हुए थे। भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर सामने आया हो।
* तुलसीदास जी की कविता में लोकजीवन को बहुत दूर तक प्रभावित किया है। उत्तर भारत में जन्म से लेकर मरण काल तक के सभी अनुष्ठानों और उत्सवों में तुलसीदास की रामभक्ति का कुछ न कुछ असर जरुर है।
=== अन्य ===
'''रामनरेश त्रिपाठी''' – महात्मा गाँधी का आत्मशुद्धि का उपदेश और तुलसीदास का रामचरितमानस दोनों एक ही वस्तु है।
'''उदयभानु सिंह''' – विनयपत्रिका उत्तम प्रगीत काव्य का उत्कृष्ट नमूना है।
'''उदयभानु सिंह''' – मानस भक्तिजल से लबालब भरा है। पहले ही सोपान के आरंभ से भक्तिरस मिलने लगता है। पाठक ज्यों-ज्यों गहराई में उतरता जाता है त्यों-त्यों भक्तिजल में प्रवेश करता जाता है और सातवें सोपान पर पहुँचकर वह भक्ति रस में पूर्णतः मग्न हो जाता है।
'''[[रामविलास शर्मा|डॉ० रामविलास शर्मा]]''' – भक्ति आंदोलन और तुलसी काव्य का राष्ट्रीय महत्त्व यह है कि उनसे भारतीय जनता की भावात्मक एकता दृढ़ हुई।
'''रामविलास शर्मा''' – भक्ति आंदोलन और तुलसी काव्य का अन्यतम सामाजिक महत्त्व यह है कि इनमें देश की कोटि-कोटि जनता की व्यथा, प्रतिरोध-भावना और सुखी जीवन की आकांक्षा व्यक्त हुई है। भारत के नए जागरण का कोई महान कवि भक्ति आंदोलन और तुलसीदास से पराङ मुख नहीं रह सकता।
'''ग्राउस''' – महलों और झोपङियों में समान रुप से लोग इसमें रस लेते हैं। वस्तुतः भारतवर्ष के इतिहास में गोस्वामी जी का जो महत्त्वपूर्ण स्थान है, उसकी समानता में कोई आता ही नहीं, उसकी ऊँचाई को कोई छू नहीं पाता।
'''लल्लन सिंह''' – तुलसी ने काव्य के संबंध में अपने लिए जो प्रतिमान निर्धारित किए थे, उनमें समाजनिष्ठता सर्वोपरि है।
'''विश्वनाथ त्रिपाठी''' – तुलसी की पंक्तियाँ लोगों को बहुत याद है। वे उत्तरी भारत के गाँवों, पुरबों, खेतों, खलिहानों, चरागाहों, चौपालों में दूब, जल, धूल, फसल की भाँति बिखरी हैं।
'''रामकिंकर उपाध्याय''' – रामचरितमानस के राम ज्ञानियों के परब्रह्म परमात्मा हैं। भक्तों के सगुण साकार ईश्वर हैं। कर्म मार्ग के अनुयायियों के लिए महान मार्ग दर्शक और दीनों के लिए दीनबंधु हैं। चार बाटों के माध्यम से रामचरितमानस में गोस्वामी जी ने सारे समाज के व्यक्तियों को आमंत्रण दिया कि वे श्रीराम के चरित्र से अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लें।
==इन्हें भी देखें==
*[[रामचरितमानस]]
==बाहरी कडियाँ==
* [https://www.roshandan.com/tulsidas-ke-dohe-in-hindi/ गोस्वामी तुलसीदास जी के १२१ दोहे और गूढ़ बातें]
* [https://www.divyahimachal.com/2018/08/तुलसी-के-नीति-वचन/ तुलसी के नीति वचन]
* [https://hillspost.com/गोस्वामी-तुलसीदास-और-उनक/56891/ गोस्वामी तुलसीदास और उनके वचन]
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रामचरितमानस
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अनुनाद सिंह
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'''''[[w:रामचरितमानस|रामचरितमानस]]''''' [[तुलसीदास]] कृत प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसकी रचना के सम्बन्ध में स्वयं गोस्वामी जी ने कहा है- ''....स्वांतः सुखाय श्री रघुनाथगाथा भाषानिबंधमतिमंजुलमातनोति।'' (अनेक पुराण,आगम-निगमों से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध रघुनाथ की कथा को तुलसीदास अपने अंत:करण के सुख के लिए अत्यंत मनोहर भाषा रचना में निबद्ध करता है।)
: रामचरित मानस एहिनामा । सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा ॥
== सुभाषित ==
विभिन्न भावों से सम्बन्धित कुछ सूक्तियाँ नीचे प्रस्तुत हैं -
===संगति===
; गगन चढ़इ रज पवन प्रंसगा । कीचहिं मिलइ नीच जल संगा ॥
; साधु असाधु सदन सुक सारीं । सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं ॥
पवन के साथ मिलकर धूल आँधी बनकर आकाश तक छू जाती है और वही धूल नीचे की ओर बहने वाले जल के साथ कीचड़ में मिल जाती है। साधु के घर के तोता-मैना परमात्मा का नाम जपते हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिन कर गालियाँ देते हैं।
; बिनु सतसंग विवेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥
; सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥
; शठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पास परस कुधात सुहाई ॥
सत्संगति के बिना विवेक की प्राप्ति नहीं होती और भगवान की कृपा के बिना सत्संगति का प्राप्त होना सहज नहीं। यह सत्संगति आनन्द और कल्याण की मूल है, सत्संगति की प्राप्ति फल है और सब साधन फूल हैं। सन्तों की संगति पाकर दुष्ट व्यक्ति भी उसी प्रकार सुधर जाते हैं, जिस प्रकार पारस के स्पर्श से लोहा भी सुहावना हो जाता है अर्थात् लोहा स्वर्ण में परिवर्तित होकर सुन्दर, मूल्यवान और सबका प्रिय बन जाता है।
; बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ॥
किन्तु दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं। (अर्थात् जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।)॥5॥
; को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।
खराब संगति से सब बर्बाद हो जाते हैं। नीच लोगों के विचार के अनुसार चलने से चतुराई बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती हैं।
; एक घड़ी आधी घड़ी ,आधी की पुनि आध ।
; तुलसी संगत साधु की ,काटे कोटि अपराध॥
भावार्थ - साधु पुरुष की संगत से हमारे अनंत कोटि जन्मों के अपराध नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद सिर्फ प्रारब्ध भोगना ही शेष रह जाता है। व्यक्ति पूर्व जन्म के पापकर्मों के फल से यानी संचित कर्मों से मुक्त हो जाता है। अब करने को क्रियमाण कर्म (वह कर्म जो तुम अब कर रहे हो जिन्हें आगामी कर्म भी कहा जाता है क्योंकि इनका फल आगे के जन्मों में मिलता है ) और प्रारब्श कर्मफल ही शेष रह जाता है।
; मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी॥
; नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥
मणि, माणिक और मोती की जैसी सुंदर छबि है, वह साँप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाती। राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर को पाकर ही ये सब अधिक शोभा को प्राप्त होते हैं।
===गोस्वामी जी की विनम्रता===
; बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
; बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥
अब मैं सन्त और असन्त दोनों के चरणों की वन्दना करता हूँ, दोनों ही दुःख देने वाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अंतर यह है कि संत तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और असन्त मिलते हैं, तब दारुण दुःख देते हैं।
; करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा ॥
; सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राउ ॥
मैं श्री रघुनाथजी के गुणों का वर्णन करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और श्री रामजी का चरित्र अथाह है। इसके लिए मुझे उपाय का एक भी अंग अर्थात् कुछ (लेशमात्र) भी उपाय नहीं सूझता। मेरे मन और बुद्धि कंगाल हैं, किन्तु मनोरथ राजा हैं।
; मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी ॥
; छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई ॥
मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है, चाह तो अमृत पाने की है, पर जगत् में जुड़ती छाछ भी नहीं। सज्जन मेरी ढिठाई को क्षमा करेंगे और मेरे बाल वचनों को मन लगाकर सुनेंगे।
; कवि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू । सकल कला सब बिद्या हीनू ॥
; आखर अरथ अलंकृत नाना । छन्द प्रबंध अनेक बिधाना ॥
; भाव भेद रस भेद अपारा । कवित दोष गुन बिबिध प्रकारा ॥
; कवित विवेक एक नहिं मोरे । सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे ॥
मैं न तो कवि हूँ और न बोलने में ही प्रवीण हूँ। सब कलाओं, सब विद्याओं से रहित हूँ। अक्षर, अर्थ, अनेक प्रकार के अलंकार ( और उनसे) अनेक प्रकार की छंद रचनाएँ, भावों और रसों के अपार भेद और अनेक प्रकार के दोष और गुण काव्य के होते हैं। काव्यसंबंधी एक भी ज्ञान मुझे नहीं है। मैं कोरे काग़ज़ पर लिखकर सत्य कहता हूँ।
; बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥
; राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई ॥
उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि शोभा बहुत अधिक है और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्री राम, लक्ष्मण और सीताजी की सुंदरता को सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनों को लगाकर देख रहे हैं।
===मित्र===
;जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातकभारी॥
;निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥
जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने॥1॥
;जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥
;कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥
जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसी से मित्रता करते हैं? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपावे॥2॥
;देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥
;बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥3॥
देने-लेने में मन में शंका न रखे। अपने बल के अनुसार सदा हित ही करता रहे। विपत्ति के समय तो सदा सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्र के गुण (लक्षण) ये हैं॥3॥
;आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥
;जाकर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई॥4॥
जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है- हे भाई! (इस तरह) जिसका मन साँप की चाल के समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्र को तो त्यागने में ही भलाई है॥4॥
;सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥
;सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥
मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र- ये चारों शूल के समान पीड़ा देने वाले हैं। हे सखा! मेरे बल पर अब तुम चिंता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा (तुम्हारी सहायता करूँगा)॥5॥
=== राजा ===
* जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥ -- अयोध्याकाण्ड 71/6
: जिस राजा के राज्य में प्यारी जनता दुखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरकगामी होता है।
* मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥ -- अयोध्याकाण्ड 126/3
: जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही (अपने दुष्ट कर्मों से ही) जलकर भस्म हो जाते हैं।
* मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
: पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक ॥ -- श्रीराम, भरतजी से ; अयोध्याकाण्ड 315
: मुखिया (घर का मालिक, राजा आदि) मुख के समान होना चाहिए। खाना-पानी केवल मुख में प्रवेश करता है, लेकिन वह अकेले उसे पचा नहीं जाता। उसे आगे बढ़ा देता है जिससे विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण होता है।
=== भक्ति ===
तुलसीदास ने यद्यपि भक्ति तथा ज्ञान का समन्वय किया है, परन्तु उन्होंने भक्ति की श्रेष्ठता को प्रतिपादित की है। "साधन सिद्धि राम पद नेहूँ " कहकर उन्होंने मोक्ष का साधन राम के चरण कमलों में प्रेम का होना स्वीकारा है।
: '' ग्यान भगति साधन अनेक सब सत्य झूठ कछु नाहीं ।
: '' तुलसीदास हरि कृपा मिटै भ्रम यह भरोस मन माहीं ॥
: '' भगति तात अनुपम सुख मूला। मिलै जो सन्त होइ अनुकूला॥
: '' जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई । कोटि भाँति कोऊ कर उपाई ॥
: '' तथा मोच्छ-सुख सुन खगराई । रहि न सकड़ हरि भगति बिहाई ॥
: मोक्ष भक्ति रहित हो नहीं सकता दोनों एक-दूसरे पर आधारित हैं।
: '' भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा । उभय हरहि भव सम्भव खेदा ॥
: '' नाथ मुनीस कहहिं कछु अन्तर। सावधान सोउ सुनु विहंगबर ॥
: '' ग्यान विराग जोग विग्याना। ऐ सब पुरुष सुनहु हरि जाना ॥
: '' जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥
: '' भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
: जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है।
; '' नवधा भक्ति
: '' प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥
: '' गुरू पद पंकज सेवा तीसरि भगत अमान
: '' चौथी भगति मन गुन गन करड़ प्रकट तजि गान ॥
: '' मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा। पंचम भजन सो वेद प्रकासा ॥
: '' छठ दमसील विरति बहु करना। निरत निरन्तर सज्जन धरना ।।
: '' सातवं सम मोहि भय जग देखा। मोते संत अधिक कर देखा ॥
: '' आठवं जथा लाभ-संतोषा। सपनेहु नहिं देखइ पर दोषा ॥
: '' नवम् सरल सब सन छल होना। मम भरोस हिय हरषित होना ॥
: '' नव महुँ एकऊ जिनके होई। नारि पुरुष सचराचर कोई ।
===आयुर्वेद एवं आरोग्य ===
: काम भुजंग डसत जब जाही, विषय नींब कटु लगत ना ताही॥
: औषध मूल फूल फल पाना, कहे नाम गनि मंगल नाना॥
: अरुन नयन उर बाहू बिसाला, नील जलज तनु स्याम तमाना॥
: (स्वस्थ व्यक्ति का वर्णन करते हुए )
=== ज्ञान ===
; कहहिं सन्त मुनि वेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना ॥
; ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिं बारा ॥
; जो निर्विघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहईं॥
ज्ञान का रास्ता दुधारी तलवार की धार के जैसा है । इस रास्ते में भटकते देर नही लगती । जो ब्यक्ति बिना विघ्न बाधा के इस मार्ग का निर्वाह कर लेता है वह मोक्ष के परम पद को प्राप्त करता है ।
; कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन विवेक।
; होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्युह अनेक ॥
सच्चा ज्ञान कहने समझने में मुश्किल एवं उसे साधने में भी कठिन है । यदि संयोग से कभी ज्ञान हो भी जाता है तो उसे बचाकर रखने में अनेकों बाधायें हैं ।
===विविध===
; कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।
; तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥
जैसे काम के अधीन व्यक्ति को नारी प्यारी लगती है और लालची व्यक्ति को जैसे धन प्यारा लगता है । वैसे हीं हे रघुनाथ, हे राम, आप मुझे हमेशा प्यारे लगिए ।
; बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा॥
— बालकाण्ड, रामचरितमानस
(अर्थ: यह मनुष्य शरीर बड़े भाग्य से मिला है, जिसे देवता भी दुर्लभ मानते हैं।)
; मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।
; अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥
राम मच्छर को भी ब्रह्मा बना सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी छोटा बना सकते हैं । ऐसा जानकर बुद्धिमान लोग सारे संदेहों को त्यागकर राम को ही भजते हैं।
; अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति ।
; नेक जो होती राम से तो काहे भव-भीति ॥
यह मेरा शरीर तो अस्थि और चमड़े से बना हुआ है फिर भी इस के प्रति इतनी मोह, अगर मेरा ध्यान छोड़कर राम नाम में ध्यान लगाते तो संसार-सागर से कोई डर नहीं लगता।
; बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय ।
; आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय ॥
तेजहीन व्यक्ति की बात को कोई भी व्यक्ति महत्व नहीं देता है, उसकी आज्ञा का पालन कोई नहीं करता है । ठीक वैसे हीं जैसे, जब राख की आग बुझ जाती है, तो उसे हर कोई छूने लगता है ।
; तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक ।
; साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक ॥
तुलसीदास जी कहते हैं कि विपत्ति में अर्थात मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है । ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, आपका सत्य और राम (भगवान) का नाम ।
; काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान ।
; तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान ॥
जब तक व्यक्ति के मन में काम की भावना, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं तब तक एक ज्ञानी व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता है, दोनों एक हीं जैसे होते हैं।
; आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह ।
; तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ॥
जिस स्थान या जिस घर में आपके जाने से लोग खुश नहीं होते हों और उन लोगों की आँखों में आपके लिए न तो प्रेम और न हीं स्नेह हो । वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की हीं वर्षा क्यों न होती हो ।
; मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर
; अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥
हे रघुवीर, मेरे जैसा कोई दीनहीन नहीं है और तुम्हारे जैसा कोई दीनहीनों का भला करने वाला नहीं है । ऐसा विचार करके, हे रघुवंश मणि । । मेरे जन्म-मृत्यु के भयानक दुःख को दूर कर दीजिए ।
; सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत ।
; श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत ॥
हे उमा, सुनो वह कुल धन्य है, दुनिया के लिए पूज्य है और बहुत पावन (पवित्र) है, जिसमें श्री राम (रघुवीर) की मन से भक्ति करने वाले विनम्र लोग जन्म लेते हैं।
; तुलसी किएं कुंसग थिति, होहिं दाहिने बाम ।
; कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकंर नाम ॥
; बसि कुसंग चाह सुजनता, ताकी आस निरास ।
; तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास ॥
बुरे लोगों की संगती में रहने से अच्छे लोग भी बदनाम हो जाते हैं। वे अपनी प्रतिष्ठा गँवाकर छोटे हो जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे, किसी व्यक्ति का नाम भले हीं देवी-देवता के नाम पर रखा जाए, लेकिन बुरी संगती के कारण उन्हें मान-सम्मान नहीं मिलता है। जब कोई व्यक्ति बुरी संगती में रहने के बावजूद अपनी काम में सफलता पाना चाहता है और मान-सम्मान पाने की इच्छा करता है, तो उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं होती है । ठीक वैसे हीं जैसे मगध के पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम “गया” पड़ गया ।
; सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥
; काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥
जो लोग मनुष्य का शरीर पाकर भी राम का भजन नहीं करते हैं और बुरे विषयों में खोए रहते हैं । वे लोग उसी व्यक्ति की तरह मूर्खतापूर्ण आचरण करते हैं, जो पारस मणि को हाथ से फेंक देता है और काँच के टुकड़े हाथ में उठा लेता है ।
; मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
; पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ॥
परिवार के मुखिया को मुँह के जैसा होना चाहिए, जो खाता-पीता मुख से है और शरीर के सभी अंगों का अपनी बुद्धि से पालन-पोषण करता है ।
; तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ ।
; तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ॥
जो लोग दूसरों की निन्दा करके खुद सम्मान पाना चाहते हैं । ऐसे लोगों के मुँह पर ऐसी कालिख लग जाती है, जो लाखों बार धोने से भी नहीं हटती है ।
; बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि ।
; सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि॥
किसी की मीठी बातों और किसी के सुंदर कपड़ों से, किसी पुरुष या स्त्री के मन की भावना कैसी है यह नहीं जाना जा सकता है । क्योंकि मन से मैले सूर्पनखा, मारीच, पूतना और रावण के कपड़े बहुत सुन्दर थे ।
; तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर
; सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥
किसी व्यक्ति के सुंदर कपड़े देखकर केवल मूर्ख व्यक्ति हीं नहीं बल्कि बुद्धिमान लोग भी धोखा खा जाते हैं । ठीक उसी प्रकार जैसे मोर के पंख और उसकी वाणी अमृत के जैसी लगती है, लेकिन उसका भोजन सांप होता है ।
; सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
; राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥
मंत्री ( सलाहकार ), चिकित्सक और शिक्षक यदि ये तीनों किसी डर या लालच से झूठ बोलते हैं, तो राज्य,शरीर और धर्म का जल्दी हीं नाश हो जाता है ।
; एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानन्द पर धामा ।
; ब्यापक विश्वरूप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ।
भगवान एक हैं, उन्हें कोई इच्छा नहीं है । उनका कोई रूप या नाम नहीं है । वे अजन्मा औेर परमानंद के परमधाम हैं । वे सर्वव्यापी विश्वरूप हैं । उन्होंने अनेक रूप, अनेक शरीर धारण कर अनेक लीलायें की हैं ।
; सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ।
जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहि करूना करि कीन्ह न कोहू ।
प्रभु भक्तों के लिये हीं सब लीला करते हैं । वे परम कृपालु और भक्त के प्रेमी हैं । भक्त पर उनकी ममता रहती है । वे केवल करूणा करते हैं । वे किसी पर क्रोध नही करते हैं ।
; जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ।
; राम भगत जग चारि प्रकारा । सुकृति चारिउ अनघ उदारा ।
संकट में पड़े भक्त नाम जपते हैं तो उनके समस्त संकट दूर हो जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं । संसार में चार तरह के अर्थाथ; आर्त; जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं और वे सभी भक्त पुण्य के भागी होते हैं ।
; सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन
; नाम सुप्रेम पियुश हृद तिन्हहुँ किए मन मीन ।
जो सभी इच्छाओं को छोड़कर राम भक्ति के रस में लीन होकर राम नाम प्रेम के सरोवर में अपने मन को मछली के रूप में रहते हैं और एक क्षण भी अलग नही रहना चाहते वही सच्चा भक्त है ।
; भगति निरुपन बिबिध बिधाना, क्षमा दया दम लता विताना ।
; सम जम नियम फूल फल ग्याना, हरि पद रति रस बेद बखाना ।
अनेक तरह से भक्ति करना एवं क्षमा, दया, इन्द्रियों का नियंत्रण, लताओं के मंडप समान हैं । मन का नियमन अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणधन, भक्ति के फूल और ज्ञान फल है । भगवान के चरणों में प्रेम भक्ति का रस है । वेदों ने इसका वर्णन किया है ।
; झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें । जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचाने ।
; जेहि जाने जग जाई हेराई । जागें जथा सपन भ्रम जाई ।
ईश्वर को नही जानने से झूठ सत्य प्रतीत होता है । बिना पहचाने रस्सी से सांप का भ्रम होता है । लेकिन ईश्वर को जान लेने पर संसार का उसी प्रकार लोप हो जाता है जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम मिट जाता है ।
; जिन्ह हरि कथा सुनी नहि काना । श्रवण रंध्र अहि भवन समाना ।
जिसने अपने कानों से प्रभु की कथा नही सुनी उसके कानों के छेद सांप के बिल के समान हैं ।
; जिन्ह हरि भगति हृदय नहि आनी । जीवत सब समान तेइ प्राणी ।
; जो नहि करई राम गुण गाना । जीह सो दादुर जीह समाना ।
जिसने भगवान की भक्ति को हृदय में नही लाया वह प्राणी जीवित मुर्दा के समान है । जिसने प्रभु के गुण नही गाया उसकी जीभ मेंढ़क की जीभ के समान है ।
; कुलिस कठोर निठुर सोई छाती । सुनि हरि चरित न जो हरसाती
तुलसीदास जी कहते हैं – उसका हृदय बज्र की तरह कठोर और निश्ठुर है जो ईश्वर का चरित्र सुनकर प्रसन्न नही होता है ।
; सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा । गाबहि मुनि पुराण बुध भेदा ।
; अगुन अरूप अलख अज जोई । भगत प्रेम बश सगुन सो होई ।
तुलसीदास जी कहते हैं – सगुण और निर्गुण में कोई अंतर नही है । मुनि पुराण पन्डित बेद सब ऐसा कहते । जेा निर्गुण निराकार अलख और अजन्मा है वही भक्तों के प्रेम के कारण सगुण हो जाता है ।
; हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता । कहहि सुनहि बहु बिधि सब संता ।
; रामचंन्द्र के चरित सुहाए । कलप कोटि लगि जाहि न गाए ।
भगवान अनन्त है, उनकी कथा भी अनन्त है । संत लोग उसे अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं । श्रीराम के सुन्दर चरित्र करोड़ों युगों मे भी नही गाये जा सकते हैं ।
; प्रभु जानत सब बिनहि जनाएँ । कहहुँ कवनि सिधि लोक रिझाए ।
तुलसीदास जी कहते हैं – प्रभु तो बिना बताये हीं सब जानते हैं । अतः संसार को प्रसन्न करने से कभी भी सिद्धि प्राप्त नही हो सकती ।
; तपबल तें जग सुजई बिधाता । तपबल बिश्णु भए परित्राता ।
; तपबल शंभु करहि संघारा । तप तें अगम न कछु संसारा ।
– तपस्या से कुछ भी प्राप्ति दुर्लभ नही है । इसमें शंका आश्चर्य करने की कोई जरूरत नही है । तपस्या की शक्ति से हीं ब्रह्मा ने संसार की रचना की है और तपस्या की शक्ति से ही विष्णु इस संसार का पालन करते हैं । तपस्या द्वारा हीं शिव संसार का संहार करते हैं । दुनिया में ऐसी कोई चीज नही जो तपस्या द्वारा प्राप्त नही किया जा सकता है ।
; हरि ब्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम ते प्रगट होहिं मै जाना ।
देस काल दिशि बिदि सिहु मांही । कहहुँ सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ।
तुलसीदास जी कहते हैं – भगवान सब जगह हमेशा समान रूप से रहते हैं और प्रेम से बुलाने पर प्रगट हो जाते हैं । वे सभी देश विदेश एव दिशाओं में ब्याप्त हैं । कहा नही जा सकता कि प्रभु कहाँ नही है ।
; तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय
; जन गुन गाहक राम दोस दलन करूनायतन ।
तुलसीदास जी कहते हैं – प्रभु पूर्णकाम सज्जनों के शिरोमणि और प्रेम के प्यारे हैं । प्रभु भक्तों के गुणग्राहक बुराईयों का नाश करने वाले और दया के धाम हैं ।
; करहिं जोग जोगी जेहि लागी । कोहु मोहु ममता मदु त्यागी ।
व्यापकु ब्रह्मु अलखु अविनासी । चिदानंदु निरगुन गुनरासी ।
योगी जिस प्रभु के लिये क्रोध मोह ममता और अहंकार को त्यागकर योग साधना करते हैं – वे सर्वव्यापक ब्रह्म अब्यक्त अविनासी चिदानंद निर्गुण और गुणों के खान हैं ।
; मन समेत जेहि जान न वानी । तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ।
; महिमा निगमु नेति कहि कहई । जो तिहुँ काल एकरस रहई ।
जिन्हें पूरे मन से शब्दों द्वारा ब्यक्त नहीं किया जा सकता-जिनके बारे में कोई अनुमान नही लगा सकता – जिनकी महिमा बेदों में नेति कहकर वर्णित है और जो हमेशा एकरस निर्विकार रहते हैं ।
; जे न मित्र दुख होहिं दुखारी । तिन्हहि विलोकत पातक भारी ।
; निज दुख गिरि सम रज करि जाना । मित्रक दुख रज मेरू समाना ।
तुलसीदास जी कहते हैं – जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होता है उसे देखने से भी भारी पाप लगता है । अपने पहाड़ समान दुख को धूल के बराबर और मित्र के साधारण धूल समान दुख को सुमेरू पर्वत के समान समझना चाहिए ।
; जिन्ह कें अति मति सहज न आई । ते सठ कत हठि करत मिताई ।
; कुपथ निवारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अबगुनन्हि दुरावा ।
जिनके स्वभाव में इस प्रकार की बुद्धि न हो वे मूर्ख केवल जिद करके हीं किसी से मित्रता करते हैं । सच्चा मित्र गलत रास्ते पर जाने से रोककर सही रास्ते पर चलाता है और अवगुण छिपाकर केवल गुणों को प्रकट करता है ।
; देत लेत मन संक न धरई । बल अनुमान सदा हित करई ।
; विपति काल कर सतगुन नेहा । श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ।
मित्र से लेन देन करने में शंका न करे । अपनी शक्ति अनुसार हमेशा मित्र की भलाई करे । वेद के अनुसार संकट के समय वह सौ गुणा स्नेह-प्रेम करता है । अच्छे मित्र के यही गुण हैं ।
; आगें कह मृदु वचन बनाई । पाछे अनहित मन कुटिलाई ।
; जाकर चित अहिगत सम भाई । अस कुमित्र परिहरेहि भलाई ।
जो सामने बना-बनाकर मीठा बोलता है और पीछे मन में बुरी भावना रखता है तथा जिसका मन सांप की चाल के जैसा टेढा है ऐसे खराब मित्र को त्यागने में हीं भलाई है ।
; सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं । माया कृत परमारथ नाहीं ।
इस संसार में सभी शत्रु और मित्र तथा सुख और दुख, माया झूठे हैं और वस्तुतः वे सब बिलकुल नहीं हैं ।
; सुर नर मुनि सब कै यह रीती । स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ।
तुलसीदास जी कहते हैं – देवता, आदमी, मुनि – सबकी यही रीति है कि सब अपने स्वार्थपूर्ति हेतु हीं प्रेम करते हैं ।
; कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के वचन बाघ हरि ब्याला ।
; गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल विसाला ।
खराब संगति अत्यंत बुरा रास्ता है । उन कुसंगियों के बोल बाघ, सिंह और सांप की भांति हैं । घर के कामकाज में अनेक झंझट ही बड़े बीहड़ विशाल पहाड़ की तरह हैं ।
; सुभ अरू असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ।
; समरथ कहुँ नहि दोश् गोसाईं । रवि पावक सुरसरि की नाई ।
तुलसीदास जी कहते हैं – गंगा में पवित्र और अपवित्र सब प्रकार का जल बहता है परन्तु कोई भी गंगाजी को अपवित्र नही कहता । सूर्य, आग और गंगा की तरह समर्थ व्यक्ति को कोई दोष नही लगाता है ।
; तुलसी देखि सुवेसु भूलहिं मूढ न चतुर नर
; सुंदर के किहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ॥
सुंदर वेशभूशा देखकर मूर्ख हीं नही चतुर लोग भी धोखा में पर जाते हैं । मोर की बोली बहुत प्यारी अमृत जैसा है परन्तु वह भोजन सांप का खाता है ।
; बडे सनेह लघुन्ह पर करहीं । गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं ।
; जलधि अगाध मौलि बह फेन । संतत धरनि धरत सिर रेनू ।
तुलसीदास जी कहते हैं – बडे लोग छोटों पर प्रेम करते हैं । पहाड के सिर में हमेशा घास रहता है । अथाह समुद्र में फेन जमा रहता है एवं धरती के मस्तक पर हमेशा धूल रहता है ।
; बैनतेय बलि जिमि चह कागू । जिमि ससु चाहै नाग अरि भागू ।
; जिमि चह कुसल अकारन कोही । सब संपदा चहै शिव द्रोही ।
; लोभी लोलुप कल कीरति चहई । अकलंकता कि कामी लहई ॥
यदि गरूड का हिस्सा कौआ और सिंह का हिस्सा खरगोश चाहे – अकारण क्रोध करने वाला अपनी कुशलता और शिव से विरोध करने वाला सब तरह की संपत्ति चाहे – लोभी अच्छी कीर्ति और कामी पुरूष बदनामी और कलंक नही चाहे तो उन सभी की इच्छाएं व्यर्थ हैं ।
; ग्रह भेसज जल पवन पट पाई कुजोग सुजोग ।
; होहिं कुवस्तु सुवस्तु जग लखहिं सुलक्षन लोग ॥
ग्रह दवाई पानी हवा वस्त्र -ये सब कुसंगति और सुसंगति पाकर संसार में बुरे और अच्छे वस्तु हो जाते हैं । ज्ञानी और समझदार लोग ही इसे जान पाते हैं ।
; को न कुसंगति पाइ नसाई । रहइ न नीच मतें चतुराई ।
तुलसीदास जी कहते हैं – खराब संगति से सभी नष्ट हो जाते हैं । नीच लोगों के विचार के अनुसार चलने से चतुराई, बुद्धि भ्रष्ट हो जाती हैं ।
; तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग
; तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥
यदि तराजू के एक पलड़े पर स्वर्ग के सभी सुखों को रखा जाये तब भी वह एक क्षण के सतसंग से मिलने बाले सुख के बराबर नहीं हो सकता ।
; सुनहु असंतन्ह केर सुभाउ । भूलेहु संगति करिअ न काउ ।
; तिन्ह कर संग सदा दुखदाई । जिमि कपिलहि घालइ हरहाई ॥
अब असंतों का गुण सुनें । कभी भूलवश भी उनका साथ न करें । उनकी संगति हमेशा कश्टकारक होता है । खराब जाति की गाय अच्छी दुधारू गाय को अपने साथ रखकर खराब कर देती है ।
; खलन्ह हृदयँ अति ताप विसेसी । जरहिं सदा पर संपत देखी ।
; जहँ कहुँ निंदासुनहि पराई । हरसहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥
दुर्जन के हृदय में अत्यधिक संताप रहता है । वे दुसरों को सुखी देखकर जलन अनुभव करते हैं । दुसरों की बुराई सुनकर खुश होते हैं जैसे कि रास्ते में गिरा खजाना उन्हें मिल गया हो ।
; काम क्रोध मद लोभ परायन । निर्दय कपटी कुटिल मलायन ।
; वयरू अकारन सब काहू सों । जो कर हित अनहित ताहू सों ।
वे काम, क्रोध, अहंकार, लोभ के अधीन होते हैं । वे निर्दयी, छली, कपटी एवं पापों के भंडार होते हैं । वे बिना कारण सबसे दुशमनी रखते हैं । जो भलाई करता है वे उसके साथ भी बुराई ही करते हैं ।
; झूठइ लेना झूठइ देना । झूठइ भोजन झूठ चवेना ।
; बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा । खाइ महा अति हृदय कठोरा ।
दुष्ट का लेनादेना सब झूठा होता है । उसका नाश्ता भोजन सब झूठ ही होता है जैसे मोर बहुत मीठा बोलता है । पर उसका दिल इतना कठोर होता है कि वह बहुत विषधर सांप को भी खा जाता है । इसी तरह उपर से मीठा बोलने बाले अधिक निर्दयी होते हैं ।
; पर द्रोही पर दार पर धन पर अपवाद
; तें नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥
वे दुसरों के द्रोही परायी स्त्री और पराये धन तथा पर निंदा में लीन रहते हैं । वे पामर और पापयुक्त मनुष्य शरीर में राक्षस होते हैं ।
; लोभन ओढ़न लोभइ डासन । सिस्नोदर नर जमपुर त्रास ना ।
; काहू की जौं सुनहि बड़ाई । स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥
लोभ लालच हीं उनका ओढ़ना और विछावन होता है । वे जानवर की तरह भोजन और मैथुन करते हैं । उन्हें यमलोक का डर नहीं होता । किसी की प्रशंसा सुनकर उन्हें मानो बुखार चढ़ जाता है ।
; जब काहू कै देखहिं बिपती । सुखी भए मानहुँ जग नृपति ।
; स्वारथ रत परिवार विरोधी । लंपट काम लोभ अति क्रोधी ।
वे जब दूसरों को विपत्ति में देखते हैं तो इस तरह सुखी होते हैं जैसे वे हीं दुनिया के राजा हों । वे अपने स्वार्थ में लीन परिवार के सभी लोगों के विरोधी, काम वासना और लोभ में लम्पट एवं अति क्रोधी होते हैं ।
; मातु पिता गुर विप्र न मानहिं । आपु गए अरू घालहिं आनहि ।
; करहिं मोहवस द्रोह परावा । संत संग हरि कथा न भावा ।
वे माता पिता गुरू ब्राम्हण किसी को नही मानते । खुद तो नष्ट रहते ही हैं । दूसरों को भी अपनी संगति से बर्बाद करते हैं । मोह में दूसरों से द्रोह करते हैं । उन्हें संत की संगति और ईश्वर की कथा अच्छी नहीं लगती है ।
; अवगुन सिधुं मंदमति कामी । वेद विदूसक परधन स्वामी ।
; विप्र द्रोह पर द्रोह बिसेसा । दंभ कपट जिए धरें सुवेसा ।
वे दुर्गुणों के सागर, मंदबुद्धि, कामवासना में रत वेदों की निंदा करने बाला जबरदस्ती दूसरों का धन लूटने वाला, द्रोही विशेषत: ब्राह्मनों के शत्रु होते हैं । उनके दिल में घमंड और छल भरा रहता है पर उनका लिबास बहुत सुन्दर रहता है ।
; भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ।
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता । सत संगति संसृति कर अंता ॥
भक्ति स्वतंत्र रूप से समस्त सुखों की खान है । लेकिन बिना संतों की संगति के भक्ति नही मिल सकती है । पुनः बिना पुण्य अर्जित किये संतों की संगति नहीं मिलती है । संतों की संगति हीं जन्म मरण के चक्र से छुटकारा देता है ।
; जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसाबा ।
; धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥
नीच आदमी जिससे बड़प्पन पाता है वह सबसे पहले उसी को मारकर नाश करता है । आग से पैदा धुंआ मेघ बनकर सबसे पहले आग को बुझा देता है ।
; रज मग परी निरादर रहई । सब कर पद प्रहार नित सहई ।
; मरूत उड़ाव प्रथम तेहि भरई । पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥
धूल रास्ते पर निरादर पड़ी रहती है और सभी के पैर की चोट सहती रहती है । लेकिन हवा के उड़ाने पर वह पहले उसी हवा को धूल से भर देती है । बाद में वह राजाओं के आँखों और मुकुटों पर पड़ती है ।
; सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ।
; कवि कोविद गावहिं असि नीति । खल सन कलह न भल नहि प्रीती ॥
बुद्धिमान मनुष्य नीच की संगति नही करते हैं । कवि एवं पंडित नीति कहते हैं कि दुष्ट से न झगड़ा अच्छा है न हीं प्रेम ।
; उदासीन नित रहिअ गोसांई । खल परिहरिअ स्वान की नाई ॥
दुष्ट से सर्वदा उदासीन रहना चाहिये । दुष्ट को कुत्ते की तरह दूर से ही त्याग देना चाहिये ।
; सन इब खल पर बंधन करई । खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई ।
; खल बिनु स्वारथ पर अपकारी । अहि मूशक इब सुनु उरगारी ॥
कुछ लोग जूट की तरह दूसरों को बाँधते हैं । जूट बाँधने के लिये अपनी खाल तक खिंचवाता है । वह दुख सहकर मर जाता है । दुष्ट बिना स्वार्थ के साँप और चूहा के समान बिना कारण दूसरों का अपकार करते हैं ।
; पर संपदा बिनासि नसाहीं । जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं ।
; दुश्ट उदय जग आरति हेतू । जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू ।
वे दूसरों का धन बर्बाद करके खुद भी नष्ट हो जाते हैं जैसे खेती का नाश करके ओला भी नाश हो जाता है । दुष्ट का जन्म प्रसिद्ध नीच ग्रह केतु के उदय की तरह संसार के दुख के लिये होता है ।
; जद्यपि जग दारून दुख नाना । सब तें कठिन जाति अवमाना ॥
इस संसार में अनेक भयानक दुख हैं किन्तु सब से कठिन दुख जाति अपमान है ।
; रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु
; अजहुँ देत दुख रवि ससिहि सिर अवसेशित राहु ।
बुद्धिमान शत्रु अकेला रहने पर भी उसे छोटा नही मानना चाहिये । राहु का केवल सिर बच गया था परन्तु वह आजतक सूर्य एवं चन्द्रमा को ग्रसित कर दुख देता है ।
; भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ विधाता वाम
; धूरि मेरूसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम ।
जब ईश्वर विपरीत हो जाते हैं तब उसके लिये धूल पर्वत के समान पिता काल के समान और रस्सी सांप के समान हो जाती है ।
; सासति करि पुनि करहि पसाउ । नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाउ ।
अच्छे स्वामी का यह सहज स्वभाव है कि पहले दण्ड देकर पुनः बाद में सेवक पर कृपा करते हैं ।
; सुख संपति सुत सेन सहाई । जय प्रताप बल बुद्धि बडाई ।
; नित नूतन सब बाढत जाई । जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ।
सुख, धन, संपत्ति, संतान, सेना, मददगार, विजय, प्रताप, बुद्धि, शक्ति और प्रशंसा जैसे जैसे नित्य बढते हैं, वैसे वैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढता हैै ।
; जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीढी । नहि पावहिं परतिय मनु डीठी ।
; मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं । ते नरवर थोरे जग माहीं ।
ऐसे वीर जो रणक्षेत्र से कभी नहीं भागते, दूसरों की स्त्रियों पर जिनका मन और दृष्टि कभी नहीं जाता और भिखारी कभी जिनके यहाँ से खाली हाथ नहीं लौटते । ऐसे उत्तम लोग संसार में बहुत कम हैं ।
; टेढ जानि सब बंदइ काहू । वक्र्र चंद्रमहि ग्रसई न राहू ।
टेढा जानकर लोग किसी भी व्यक्ति की बंदना प्रार्थना करते हैं । टेढे चन्द्रमा को राहु भी नहीं ग्रसता है ।
; सेवक सदन स्वामि आगमनु । मंगल मूल अमंगल दमनू ।
सेवक के घर स्वामी का आगमन सभी मंगलों की जड और अमंगलों का नाश करने वाला होता है ।
; काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि
; तिय विसेश पुनि चेरि कहि भरत मातु मुसकानि ।
भरत की मां हंसकर कहती है – कानों, लंगरों और कुवरों को कुटिल और खराब चालचलन वाला जानना चाहिये ।
; कोउ नृप होउ हमहिं का हानि । चेरी छाडि अब होब की रानी ।
कोई भी राजा हो जाये, हमारी क्या हानि है । दासी छोड क्या मैं अब रानी हो जाउँगी?
; तसि मति फिरी अहई जसि भावी ।
जैसी भावी होनहार होती है – वैसी हीं बुद्धि भी फिर बदल जाती है ।
; रहा प्रथम अब ते दिन बीते । समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते ।
पहले वाली बात बीत चुकी है । समय बदलने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं ।
; अरि बस दैउ जियावत जाही, मरनु नीक तेहि जीवन चाही
ईश्वर जिसे शत्रु के अधीन रखकर जिन्दा रखें, उसके लिये जीने की अपेक्षा मरना अच्छा है ।
; सूल कुलिस असि अंगवनिहारे । ते रतिनाथ सुमन सर मारे ।
जो व्यक्ति त्रिशूल, बज्र और तलवार आदि की मार अपने अंगों पर सह लेते हैं वे भी कामदेव के पुष्प बाण से मारे जाते हैं ।
; कवने अवसर का भयउँ नारि विस्वास
; जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अविद्या नास ।
किस मौके पर क्या हो जाये-स्त्री पर विश्वास करके कोई उसी प्रकार मारा जा सकता है जैसे योग की सिद्धि का फल मिलने के समय योगी को अविद्या नष्ट कर देती है ।
; दुइ कि होइ एक समय भुआला । हँसब ठइाइ फुलाउब गाला ।
; दानि कहाउब अरू कृपनाई । होइ कि खेम कुसल रीताई ।
ठहाका मारकर हँसना और क्रोध से गाल फुलाना एक साथ एक ही समय में सम्भव नहीं है । दानी और कृपण बनना तथा युद्ध में बहादुरी और चोट भी नहीं लगना कदापि सम्भव नही है ।
; सत्य कहहिं कवि नारि सुभाउ । सब बिधि अगहु अगाध दुराउ ।
निज प्रतिबिंबु बरूकु गहि जाई । जानि न जाइ नारि गति भाई ।
स्त्री का स्वभाव समझ से परे, अथाह और रहस्यपूर्ण होता है । कोई अपनी परछाई भले पकड ले पर वह नारी की चाल नहीं जान सकता है ।
; काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ
; का न करै अवला प्रवल केहि जग कालु न खाइ ।
अग्नि किसे नही जला सकती है? समुद्र में क्या नही समा सकता है? अबला नारी बहुत प्रबल होती है और वह कुछ भी कर सकने में समर्थ होती है । संसार में काल किसे नही खा सकता है?
; जहँ लगि नाथ नेह अरू नाते । पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते ।
; तनु धनु धामु धरनि पुर राजू । पति विहीन सबु सोक समाजू ।
पति बिना लोगों का स्नेह और नाते रिश्ते सभी स्त्री को सूर्य से भी अधिक ताप देने बाले होते हैं । शरीर धन घर धरती नगर और राज्य यह सब स्त्री के लिये पति के बिना शोक दुख के कारण होते हैं ।
; सुभ अरू असुभ करम अनुहारी । ईसु देइ फल हृदय बिचारी ।
; करइ जो करम पाव फल सोई । निगम नीति असि कह सबु कोई ।
ईश्वर शुभ और अशुभ कर्मों के मुताबिक हृदय में विचार कर फल देता है । ऐसा ही वेद नीति और सब लोग कहते हैं ।
; काहु न कोउ सुख दुख कर दाता । निज कृत करम भोग सबु भ्राता ।
कोई भी किसी को दुख-सुख नही दे सकता है । सभी को अपने हीं कर्मों का फल भेागना पड़ता है ।
; करम प्रधान विस्व करि राखा । जो जस करई सो तस फलु चाखा ॥
ईश्वर ने इस संसार में कर्म को महत्ता दी है अर्थात जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल भी भोगना पड़ेगा।
; जोग वियोग भोग भल मंदा । हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा ।
; जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू । संपति बिपति करमु अरू कालू ।
मिलाप और बिछुड़न, अच्छे बुरे भोग ,शत्रु मित्र और तटस्थ -ये सभी भ्रम के फांस हैं । जन्म, मृत्यु संपत्ति, विपत्ति कर्म और काल- ये सभी इसी संसार के जंजाल हैं ।
; बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी । सकल कपट अघ अवगुन खानी ।
स्त्री के हृदय की चाल ईश्वर भी नहीं जान सकते हैं । वह छल, कपट, पाप और अवगुणों की खान है ।
; सुनहुँ भरत भावी प्रवल विलखि कहेउ मुनिनाथ
; हानि लाभ जीवनु मरनु जसु अपजसु विधि हाथ ।
मुनिनाथ ने अत्यंत दुख से भरत से कहा कि जीवन में लाभ नुकसान जिंदगी मौत प्रतिष्ठा या अपयश सभी ईश्वर के हाथों में है ।
; विशय जीव पाइ प्रभुताई । मूढ़ मोह बस होहिं जनाई ।
मूर्ख सांसारिक जीव प्रभुता पा कर मोह में पड़कर अपने असली स्वभाव को प्रकट कर देते हैं ।
; रिपु रिन रंच न राखब काउ ।
शत्रु और ऋण को कभी भी शेष नही रखना चाहिये । अल्प मात्रा में भी छोड़ना नही चाहिये ।
; लातहुँ मोर चढ़ति सिर नीच को धूरि समान ।
धूल जैसा नीच भी पैर मारने पर सिर चढ़ जाता है ।
; अनुचित उचित काजु किछु होउ । समुझि करिअ भल कह सब कोउ ।
; सहसा करि पाछें पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ।
किसी भी काम में उचित अनुचित विचार कर किया जाये तो सब लोग उसे अच्छा कहते हैं । बेद और विद्वान कहते हैं कि जो काम बिना विचारे जल्दी में करके पछताते हैं – वे बुद्धिमान नहीं हैं ।
; विशई साधक सिद्ध सयाने । त्रिविध जीव जग बेद बखाने ।
संसारी, साधक और ज्ञानी सिद्ध पुरुष – इस दुनिया में इसी तीन प्रकार के लोग बेदों ने बताये हैं ।
; सुनिअ सुधा देखिअहि गरल सब करतूति कराल
; जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ।
अमृत मात्र सुनने की बात है किन्तु जहर तो सब जगह प्रत्यक्षतः देखे जा सकते हैं । कौआ, उल्लू और बगुला तो जहां तहां दिखते हैं परन्तु हंस तो केवल मानसरोवर में ही रहते हैं ।
; सुनि ससोच कह देवि सुमित्रा । बिधि गति बड़ि विपरीत विचित्रा ।
; तो सृजि पालई हरइ बहोरी । बालकेलि सम बिधि मति भोरी ।
ईश्वर की चाल अत्यंत विपरीत एवं विचित्र है । वह संसार की सृश्टि उत्पन्न करता और पालन और फिर संहार भी कर देता है । ईश्वर की बुद्धि बच्चों जैसी भोली विवेक रहित है ।
; कसे कनकु मनि पारिखि पायें । पुरूश परिखिअहिं समयँ सुभाए ।
सोना कसौटी पर कसने और रत्न जौहरी के द्वारा ही पहचाना जाता है । पुरूष की परीक्षा समय आने पर उसके स्वभाव और चरित्र से होती है ।
; सुहृद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि ।
बिना कारण हीं दूसरों की भलाई करने बाले बुद्धिमान और श्रेष्ठ मालिक से बहुत कहना गलत होता है ।
; धीरज धर्म मित्र अरू नारी । आपद काल परिखिअहिं चारी ।
; बृद्ध रोगबश जड़ धनहीना । अंध बधिर क्रोधी अतिदीना ।
धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री की परीक्षा आपद या दुख के समय होती हैै । बूढ़ा, रोगी, मूर्ख, गरीब, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यधिक गरीब सभी की परीक्षा इसी समय होती है ।
; कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप ।
कलियुग अनेक कठिन पापों का भंडार है जिसमें धर्म ज्ञान योग जप तपस्या आदि कुछ भी नहीं है ।
; मैं अरू मोर तोर तैं माया । जेहिं बस कहन्हें जीव निकाया ।
में और मेरा तू और तेरा-यही माया है जिाने सम्पूर्ण जीवों को बस में कर रखा है ।
; रिपु रूज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि ।
शत्रु रोग अग्नि पाप स्वामी एवं साँप को कभी भी छोटा मानकर नहीं समझना चाहिये ।
; नवनि नीच कै अति दुखदाई । जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई ।
; भयदायक खल कै प्रिय वानी । जिमि अकाल के कुसुम भवानी ।
नीच ब्यक्ति की नम्रता बहुत दुखदायी होती हैजैसे अंकुश धनुस सांप और बिल्ली का झुकना । दुष्ट की मीठी बोली उसी तरह डरावनी होती है जैसे बिना ऋतु के फूल ।
; कबहुँ दिवस महँ निविड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग
; बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग ।
बादलों के कारण कभी दिन में घोर अंधकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रगट हो जाते हैं । जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है ।
; भानु पीठि सेअइ उर आगी । स्वामिहि सर्व भाव छल त्यागी ।
सूर्य का सेवन पीठ की ओर से और आग का सेवन सामने छाती की ओर से करना चाहिये । किंतु स्वामी की सेवा छल कपट छोड़कर समस्त भाव मन वचन कर्म से करनी चाहिये ।
; भानु पीठि सेअइ उर आगी । स्वामिहि सर्व भाव छल त्यागी ।
सूर्य का सेवन पीठ की ओर से और आग का सेवन सामने छाती की ओर से करना चाहिये । किंतु स्वामी की सेवा छल कपट छोड़कर समस्त भाव मन वचन कर्म से करनी चाहिये ।
; उमा संत कइ इहइ बड़ाई । मंद करत जो करइ भलाई ।
संत की यही महानता है कि वे बुराई करने वाले पर भी उसकी भलाई ही करते हैं ।
; साधु अवग्या तुरत भवानी । कर कल्यान अखिल कै हानी ।
; साधु संतों का अपमान तुरंत संपूर्ण भलाई का अंत नाश कर देता है ।
; कादर मन कहुँ एक अधारा । दैव दैव आलसी पुकारा ।
; ईश्वर का क्या भरोसा । देवता तो कायर मन का आधार है ।
; आलसी लोग ही भगवान भगवान पुकारा करते हैं ।
; सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती । सहज कृपन सन सुंदर नीती ।
मूर्ख से नम्रता दुष्ट से प्रेम कंजूस से उदारता के सुंदर नीति विचार व्यर्थ होते हैं ।
; ममता रत सन ग्यान कहानी । अति लोभी सन विरति बखानी ।
; क्रोधिहि सभ कर मिहि हरि कथा । उसर बीज बए फल जथा ।
मोह माया में फँसे ब्यक्ति से ज्ञान की कहानी अधिक लोभी से वैराग्य का वर्णन क्रोधी से शान्ति की बातें और कामुक से ईश्वर की बात कहने का वैसा हीं फल होता है जैसा उसर खेत में बीज बोने से होता है ।
; काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच
; बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच ।
करोड़ों उपाय करने पर भी केला काटने पर ही फलता है । नीच आदमी विनती करने से नहीं मानता है – वह डांटने पर ही झुकता – रास्ते पर आता है ।
; पर उपदेश कुशल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ।
दूसरों को उपदेश शिक्षा देने में बहुत लोग निपुण कुशल होते हैं परन्तु उस शिक्षा का आचरण पालन करने बाले बहुत कम हीं होते हैं ।
; संसार महँ त्रिविध पुरूश पाटल रसाल पनस समा
; एक सुमन प्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहिं ।
संसार में तीन तरह के लोग होते हैं-गुलाब आम और कटहल के जैसा । एक फूल देता है-एक फूल और फल दोनों देता है और एक केवल फल देता है । लोगों मे एक केवल कहते हैं-करते नहीं । दूसरे जो कहते हैं वे करते भी हैं और तीसरे कहते नही केवल करते हैं ।
; नयन दोस जा कहँ जब होइ्र्र । पीत बरन ससि कहुँ कह सोई ।
; जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उपउ दिनेसा ।
जब किसी को आंखों में दोष होता है तो उसे चन्द्रमा पीले रंग का दिखाई पड़ता है । जब पक्षी के राजा (गरुड़) को दिशाभ्रम होता है तो उसे सूर्य पश्चिम में उदय दिखाई पड़ता है ।
; नौका रूढ़ चलत जग देखा । अचल मोहबस आपुहिं लेखा ।
; बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी । कहहिं परस्पर मिथ्यावादी ।
नाव पर चढ़ा हुआ आदमी दुनिया को चलता दिखाई देता है लेकिन वह अपने को स्थिर अचल समझता है । बच्चे गोलगोल घूमते है लेकिन घर वगैरह नहीं घूमते । लेकिन वे आपस में परस्पर एक दूसरे को झूठा कहते हैं ।
; एक पिता के बिपुल कुमारा । होहिं पृथक गुन सील अचारा ॥
; कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता । कोउ घनवंत सूर कोउ दाता ॥
एक पिता के अनेकों पुत्रों में उनके गुण और आचरण भिन्न भिन्न होते हैं । कोई पंडित कोई तपस्वी कोई ज्ञानी कोई धनी कोई बीर और कोई दानी होता है ।
; कोउ सर्वग्य धर्मरत कोई । सब पर पितहिं प्रीति समहोई ।
; कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा । सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा ।
कोई सब जानने बाला धर्मपरायण होता है । पिता सब पर समान प्रेम करते हैं । पर कोई संतान मन वचन कर्म से पिता का भक्त होता है और सपने में भी वह अपना धर्म नहीं त्यागता ।
; सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना । जद्यपि सो सब भाँति अपाना ।
; एहि बिधि जीव चराचर जेते । त्रिजग देव नर असुर समेते ।
तब वह पुत्र पिता को प्राणों से भी प्यारा होता है भले हीं वह सब तरह से मूर्ख हीं क्यों न हो । इसी प्रकार पशु पक्षी देवता आदमी एवं राक्षसों में भी जितने चेतन और जड़ जीव हैं ।
; जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहि प्रीती ।
; प्रीति बिना नहि भगति दृढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ।
किसी की प्रभुता जाने बिना उस पर विश्वास नहीं ठहरता और विश्वास की कमी से प्रेम नहीं होता । प्रेम बिना भक्ति दृढ़ नही हो सकती जैसे पानी की चिकनाई नही ठहरती है ।
; सोहमस्मि इति बृति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ।
; आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भ्रमनासा ।
मैं ब्रम्ह हूँ – यह अनन्य स्वभाव की प्रचंड लौ है । जब अपने नीजि अनुभव के सुख का सुन्दर प्रकाश फैलता है तब संसार के समस्त भेदरूपी भ्रम का अन्त हो जाता है ।
; नहिं दरिद्र सम दुख जग माँहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ।
; पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ।
संसार में दरिद्रता के समान दुख एवं संतों के साथ मिलन समान सुख नहीं है । मन बचन और शरीर से दूसरों का उपकार करना यह संत का सहज स्वभाव है ।
; मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ।
; काम वात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥
अज्ञान सभी रोगों की जड़ है । इससे बहुत प्रकार के कष्ट उत्पन्न होते हैं । काम वात और लोभ बढ़ा हुआ कफ है । क्रोध पित्त है जो हमेशा हृदय जलाता रहता है ।
; सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह ।
; ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥
महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है (एक का नाम शुक्ल और दूसरे का नाम कृष्ण रख दिया)। एक को चन्द्रमा का बढ़ाने वाला और दूसरे को उसका घटाने वाला समझकर जगत ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दे दिया।
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*'' को जग काम नचाव न जेही ।
:जगत में ऐसा कौन है, जिसे काम ने नचाया न हो [उत्तरकांड]
* ''खल सन कलह न भल नहिं प्रीति
:खल के साथ न कलह अच्छा न प्रेम अच्छा [उत्तरकांड]
* ''केहिं कर हृदय क्रोध नहिं दाहा
:क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया [उत्तरकांड]
:'' चिंता सांपिनि को नहिं खाया
चिंता रूपी सांपिन ने किसे नहीं डंसा [उत्तरकांड]
:'' तप ते अगम न कछु संसारा
संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो तप से न मिल सके [बालकांड]
:'' तृष्णा केहि न कीन्ह बीराहा
: तृष्णा ने किसको बावला नहीं किया [उत्तरकांड]
:'' नवनि नीच के अति दुःखदाई, जिमि अंकुस धनु उरग विलाई।
: नीच का झुकना भी अत्यन्त दुखदायी होता है, जैसे -अंकुश, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना । [उत्तरकांड]
:'' परहित सरस धरम नहिं भाई
:'' पर पीडा़ सम नहिं अधमाई॥
: परोपकार के समान दूसरा धर्म नहीं है [उत्तरकांड]
: दूसरों को पीडित करने जैसा कोई पाप नहीं है [उत्तरकांड]
:'' दुचित कतहुं परितोष न लहहीं
: चित्त के दोतरफा हो जाने से कहीं परितोष नहीं मिलता [अयोध्या कांड]
:'' तसि पूजा चाहिअ जस देवा
: जैसा देवता हो, वैसी उसकी पूजा होनी चाहिए [अयोध्याकांड]
:'' नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं
:'' प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं
: संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसको प्रभुता पाकर घमंड न हुआ हो [बालकांड]
:'' प्रीति विरोध समान सन
:'' करिअ नीति असि आहि
: प्रीति और बैर बराबरी में करना चाहिए [लंकाकांड]
:'' मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला
: सभी मानस रोगों की जड़ मोह / अज्ञान है [उत्तरकांड]
:'' कीरति भनिति भूति भलि सोई।
:'' सुरसरि सम सब कहं हित होई॥
: कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की भांति सबका हित करती है [बालकांड]
:'' सचिव बैद गुरु तीनि जौं , प्रिय बोलहिं भय आस।
:'' राजधर्म, तन तीनि कर, होई बेगहिं नास ॥
: मंत्री, बैद्य और गुरु ये तीन यदि अप्रसन्नता के भय या लाभ की आशा से ठकुरसुहाती कहते हैं तो समझिए कि राजधर्म का इन्होने तिनका-तिनका कर दिया है, जिससे इसका (राजधर्म का) शीघ्र ही नाश हो जाएगा। [सुन्दरकांड]
:'' लोकमान्यता अनल सम, कर तपकानन दाहु
: लोक में प्रतिष्ठा आग के समान है जो तपस्या रूपी बन को भस्म कर डालती है [बालकांड]
:''मुखिया मुख सों चाहिए खान पान को एक।
:''पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक ॥
: परिवार के मुखिया को मुख के सामान होना चाहिए, जो खाता तो अकेले है, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगो का पालन-पोषण करता हैं।
:''तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर ।
:''बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ॥
: मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं। किसी को भी वश में करने का ये एक मन्त्र होते हैं। इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोडकर मीठा बोलने का प्रयास करे॥
: ''तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
: ''साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥
: सी विपत्ति यानि किसी बड़ी परेशानी के समय आपको ये सात गुण बचायेंगे: आपका ज्ञान या शिक्षा, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने की आदत और ईश्वर में विश्वास।
== रामचरितमानस के बारे में महापुरुषों के विचार==
* लोक और शास्त्र का समन्वय, ग्राहस्थ और वैराग्य का समन्वय, भक्ति और ज्ञान का समन्वय, भाषा और संस्कृति का समन्वय,निर्गुण और सगुण का समन्वय, कथा और तत्व ज्ञान का समन्वय, ब्राह्मण और चांडाल का समन्वय, पांडित्य और अपांडित्य का समन्वय, रामचरित मानस शुरू से आखिर तक समन्वय का काव्य है। -- [[हजारी प्रसाद द्विवेदी|आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी]]
==इन्हें भी देखें==
*[[तुलसीदास]]
==बाह्य सूत्र==
*[http://www.apnimaati.com/2018/08/blog-post_10.html रामचरितमानस में नीति तत्व] (डॉ. गीता कौशिक)
{{विकिपीडिया}}
[[श्रेणी:हिन्दी लोकोक्तियाँ]]
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33093
33092
2026-07-22T17:30:35Z
अनुनाद सिंह
658
/* रामचरितमानस के बारे में महापुरुषों के विचार */
33093
wikitext
text/x-wiki
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'''''[[w:रामचरितमानस|रामचरितमानस]]''''' [[तुलसीदास]] कृत प्रसिद्ध ग्रंथ है। इसकी रचना के सम्बन्ध में स्वयं गोस्वामी जी ने कहा है- ''....स्वांतः सुखाय श्री रघुनाथगाथा भाषानिबंधमतिमंजुलमातनोति।'' (अनेक पुराण,आगम-निगमों से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध रघुनाथ की कथा को तुलसीदास अपने अंत:करण के सुख के लिए अत्यंत मनोहर भाषा रचना में निबद्ध करता है।)
: रामचरित मानस एहिनामा । सुनत श्रवन पाइअ विश्रामा ॥
== सुभाषित ==
विभिन्न भावों से सम्बन्धित कुछ सूक्तियाँ नीचे प्रस्तुत हैं -
===संगति===
; गगन चढ़इ रज पवन प्रंसगा । कीचहिं मिलइ नीच जल संगा ॥
; साधु असाधु सदन सुक सारीं । सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं ॥
पवन के साथ मिलकर धूल आँधी बनकर आकाश तक छू जाती है और वही धूल नीचे की ओर बहने वाले जल के साथ कीचड़ में मिल जाती है। साधु के घर के तोता-मैना परमात्मा का नाम जपते हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिन कर गालियाँ देते हैं।
; बिनु सतसंग विवेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥
; सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥
; शठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पास परस कुधात सुहाई ॥
सत्संगति के बिना विवेक की प्राप्ति नहीं होती और भगवान की कृपा के बिना सत्संगति का प्राप्त होना सहज नहीं। यह सत्संगति आनन्द और कल्याण की मूल है, सत्संगति की प्राप्ति फल है और सब साधन फूल हैं। सन्तों की संगति पाकर दुष्ट व्यक्ति भी उसी प्रकार सुधर जाते हैं, जिस प्रकार पारस के स्पर्श से लोहा भी सुहावना हो जाता है अर्थात् लोहा स्वर्ण में परिवर्तित होकर सुन्दर, मूल्यवान और सबका प्रिय बन जाता है।
; बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ॥
किन्तु दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं। (अर्थात् जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।)॥5॥
; को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।
खराब संगति से सब बर्बाद हो जाते हैं। नीच लोगों के विचार के अनुसार चलने से चतुराई बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती हैं।
; एक घड़ी आधी घड़ी ,आधी की पुनि आध ।
; तुलसी संगत साधु की ,काटे कोटि अपराध॥
भावार्थ - साधु पुरुष की संगत से हमारे अनंत कोटि जन्मों के अपराध नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद सिर्फ प्रारब्ध भोगना ही शेष रह जाता है। व्यक्ति पूर्व जन्म के पापकर्मों के फल से यानी संचित कर्मों से मुक्त हो जाता है। अब करने को क्रियमाण कर्म (वह कर्म जो तुम अब कर रहे हो जिन्हें आगामी कर्म भी कहा जाता है क्योंकि इनका फल आगे के जन्मों में मिलता है ) और प्रारब्श कर्मफल ही शेष रह जाता है।
; मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी॥
; नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥
मणि, माणिक और मोती की जैसी सुंदर छबि है, वह साँप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाती। राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर को पाकर ही ये सब अधिक शोभा को प्राप्त होते हैं।
===गोस्वामी जी की विनम्रता===
; बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
; बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥
अब मैं सन्त और असन्त दोनों के चरणों की वन्दना करता हूँ, दोनों ही दुःख देने वाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अंतर यह है कि संत तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और असन्त मिलते हैं, तब दारुण दुःख देते हैं।
; करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा ॥
; सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राउ ॥
मैं श्री रघुनाथजी के गुणों का वर्णन करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और श्री रामजी का चरित्र अथाह है। इसके लिए मुझे उपाय का एक भी अंग अर्थात् कुछ (लेशमात्र) भी उपाय नहीं सूझता। मेरे मन और बुद्धि कंगाल हैं, किन्तु मनोरथ राजा हैं।
; मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी ॥
; छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई ॥
मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है, चाह तो अमृत पाने की है, पर जगत् में जुड़ती छाछ भी नहीं। सज्जन मेरी ढिठाई को क्षमा करेंगे और मेरे बाल वचनों को मन लगाकर सुनेंगे।
; कवि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू । सकल कला सब बिद्या हीनू ॥
; आखर अरथ अलंकृत नाना । छन्द प्रबंध अनेक बिधाना ॥
; भाव भेद रस भेद अपारा । कवित दोष गुन बिबिध प्रकारा ॥
; कवित विवेक एक नहिं मोरे । सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे ॥
मैं न तो कवि हूँ और न बोलने में ही प्रवीण हूँ। सब कलाओं, सब विद्याओं से रहित हूँ। अक्षर, अर्थ, अनेक प्रकार के अलंकार ( और उनसे) अनेक प्रकार की छंद रचनाएँ, भावों और रसों के अपार भेद और अनेक प्रकार के दोष और गुण काव्य के होते हैं। काव्यसंबंधी एक भी ज्ञान मुझे नहीं है। मैं कोरे काग़ज़ पर लिखकर सत्य कहता हूँ।
; बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥
; राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई ॥
उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि शोभा बहुत अधिक है और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्री राम, लक्ष्मण और सीताजी की सुंदरता को सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनों को लगाकर देख रहे हैं।
===मित्र===
;जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातकभारी॥
;निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥
जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने॥1॥
;जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥
;कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥
जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसी से मित्रता करते हैं? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपावे॥2॥
;देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥
;बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥3॥
देने-लेने में मन में शंका न रखे। अपने बल के अनुसार सदा हित ही करता रहे। विपत्ति के समय तो सदा सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्र के गुण (लक्षण) ये हैं॥3॥
;आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई॥
;जाकर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई॥4॥
जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है- हे भाई! (इस तरह) जिसका मन साँप की चाल के समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्र को तो त्यागने में ही भलाई है॥4॥
;सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥
;सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें॥
मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र- ये चारों शूल के समान पीड़ा देने वाले हैं। हे सखा! मेरे बल पर अब तुम चिंता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा (तुम्हारी सहायता करूँगा)॥5॥
=== राजा ===
* जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥ -- अयोध्याकाण्ड 71/6
: जिस राजा के राज्य में प्यारी जनता दुखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरकगामी होता है।
* मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥ -- अयोध्याकाण्ड 126/3
: जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही (अपने दुष्ट कर्मों से ही) जलकर भस्म हो जाते हैं।
* मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
: पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक ॥ -- श्रीराम, भरतजी से ; अयोध्याकाण्ड 315
: मुखिया (घर का मालिक, राजा आदि) मुख के समान होना चाहिए। खाना-पानी केवल मुख में प्रवेश करता है, लेकिन वह अकेले उसे पचा नहीं जाता। उसे आगे बढ़ा देता है जिससे विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन-पोषण होता है।
=== भक्ति ===
तुलसीदास ने यद्यपि भक्ति तथा ज्ञान का समन्वय किया है, परन्तु उन्होंने भक्ति की श्रेष्ठता को प्रतिपादित की है। "साधन सिद्धि राम पद नेहूँ " कहकर उन्होंने मोक्ष का साधन राम के चरण कमलों में प्रेम का होना स्वीकारा है।
: '' ग्यान भगति साधन अनेक सब सत्य झूठ कछु नाहीं ।
: '' तुलसीदास हरि कृपा मिटै भ्रम यह भरोस मन माहीं ॥
: '' भगति तात अनुपम सुख मूला। मिलै जो सन्त होइ अनुकूला॥
: '' जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई । कोटि भाँति कोऊ कर उपाई ॥
: '' तथा मोच्छ-सुख सुन खगराई । रहि न सकड़ हरि भगति बिहाई ॥
: मोक्ष भक्ति रहित हो नहीं सकता दोनों एक-दूसरे पर आधारित हैं।
: '' भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा । उभय हरहि भव सम्भव खेदा ॥
: '' नाथ मुनीस कहहिं कछु अन्तर। सावधान सोउ सुनु विहंगबर ॥
: '' ग्यान विराग जोग विग्याना। ऐ सब पुरुष सुनहु हरि जाना ॥
: '' जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥
: '' भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
: जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है।
; '' नवधा भक्ति
: '' प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥
: '' गुरू पद पंकज सेवा तीसरि भगत अमान
: '' चौथी भगति मन गुन गन करड़ प्रकट तजि गान ॥
: '' मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा। पंचम भजन सो वेद प्रकासा ॥
: '' छठ दमसील विरति बहु करना। निरत निरन्तर सज्जन धरना ।।
: '' सातवं सम मोहि भय जग देखा। मोते संत अधिक कर देखा ॥
: '' आठवं जथा लाभ-संतोषा। सपनेहु नहिं देखइ पर दोषा ॥
: '' नवम् सरल सब सन छल होना। मम भरोस हिय हरषित होना ॥
: '' नव महुँ एकऊ जिनके होई। नारि पुरुष सचराचर कोई ।
===आयुर्वेद एवं आरोग्य ===
: काम भुजंग डसत जब जाही, विषय नींब कटु लगत ना ताही॥
: औषध मूल फूल फल पाना, कहे नाम गनि मंगल नाना॥
: अरुन नयन उर बाहू बिसाला, नील जलज तनु स्याम तमाना॥
: (स्वस्थ व्यक्ति का वर्णन करते हुए )
=== ज्ञान ===
; कहहिं सन्त मुनि वेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना ॥
; ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिं बारा ॥
; जो निर्विघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहईं॥
ज्ञान का रास्ता दुधारी तलवार की धार के जैसा है । इस रास्ते में भटकते देर नही लगती । जो ब्यक्ति बिना विघ्न बाधा के इस मार्ग का निर्वाह कर लेता है वह मोक्ष के परम पद को प्राप्त करता है ।
; कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन विवेक।
; होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्युह अनेक ॥
सच्चा ज्ञान कहने समझने में मुश्किल एवं उसे साधने में भी कठिन है । यदि संयोग से कभी ज्ञान हो भी जाता है तो उसे बचाकर रखने में अनेकों बाधायें हैं ।
===विविध===
; कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।
; तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥
जैसे काम के अधीन व्यक्ति को नारी प्यारी लगती है और लालची व्यक्ति को जैसे धन प्यारा लगता है । वैसे हीं हे रघुनाथ, हे राम, आप मुझे हमेशा प्यारे लगिए ।
; बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा॥
— बालकाण्ड, रामचरितमानस
(अर्थ: यह मनुष्य शरीर बड़े भाग्य से मिला है, जिसे देवता भी दुर्लभ मानते हैं।)
; मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।
; अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥
राम मच्छर को भी ब्रह्मा बना सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी छोटा बना सकते हैं । ऐसा जानकर बुद्धिमान लोग सारे संदेहों को त्यागकर राम को ही भजते हैं।
; अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति ।
; नेक जो होती राम से तो काहे भव-भीति ॥
यह मेरा शरीर तो अस्थि और चमड़े से बना हुआ है फिर भी इस के प्रति इतनी मोह, अगर मेरा ध्यान छोड़कर राम नाम में ध्यान लगाते तो संसार-सागर से कोई डर नहीं लगता।
; बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय ।
; आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय ॥
तेजहीन व्यक्ति की बात को कोई भी व्यक्ति महत्व नहीं देता है, उसकी आज्ञा का पालन कोई नहीं करता है । ठीक वैसे हीं जैसे, जब राख की आग बुझ जाती है, तो उसे हर कोई छूने लगता है ।
; तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक ।
; साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक ॥
तुलसीदास जी कहते हैं कि विपत्ति में अर्थात मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है । ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, आपका सत्य और राम (भगवान) का नाम ।
; काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान ।
; तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान ॥
जब तक व्यक्ति के मन में काम की भावना, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं तब तक एक ज्ञानी व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता है, दोनों एक हीं जैसे होते हैं।
; आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह ।
; तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ॥
जिस स्थान या जिस घर में आपके जाने से लोग खुश नहीं होते हों और उन लोगों की आँखों में आपके लिए न तो प्रेम और न हीं स्नेह हो । वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की हीं वर्षा क्यों न होती हो ।
; मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर
; अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥
हे रघुवीर, मेरे जैसा कोई दीनहीन नहीं है और तुम्हारे जैसा कोई दीनहीनों का भला करने वाला नहीं है । ऐसा विचार करके, हे रघुवंश मणि । । मेरे जन्म-मृत्यु के भयानक दुःख को दूर कर दीजिए ।
; सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत ।
; श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत ॥
हे उमा, सुनो वह कुल धन्य है, दुनिया के लिए पूज्य है और बहुत पावन (पवित्र) है, जिसमें श्री राम (रघुवीर) की मन से भक्ति करने वाले विनम्र लोग जन्म लेते हैं।
; तुलसी किएं कुंसग थिति, होहिं दाहिने बाम ।
; कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकंर नाम ॥
; बसि कुसंग चाह सुजनता, ताकी आस निरास ।
; तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास ॥
बुरे लोगों की संगती में रहने से अच्छे लोग भी बदनाम हो जाते हैं। वे अपनी प्रतिष्ठा गँवाकर छोटे हो जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे, किसी व्यक्ति का नाम भले हीं देवी-देवता के नाम पर रखा जाए, लेकिन बुरी संगती के कारण उन्हें मान-सम्मान नहीं मिलता है। जब कोई व्यक्ति बुरी संगती में रहने के बावजूद अपनी काम में सफलता पाना चाहता है और मान-सम्मान पाने की इच्छा करता है, तो उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं होती है । ठीक वैसे हीं जैसे मगध के पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम “गया” पड़ गया ।
; सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥
; काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥
जो लोग मनुष्य का शरीर पाकर भी राम का भजन नहीं करते हैं और बुरे विषयों में खोए रहते हैं । वे लोग उसी व्यक्ति की तरह मूर्खतापूर्ण आचरण करते हैं, जो पारस मणि को हाथ से फेंक देता है और काँच के टुकड़े हाथ में उठा लेता है ।
; मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
; पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ॥
परिवार के मुखिया को मुँह के जैसा होना चाहिए, जो खाता-पीता मुख से है और शरीर के सभी अंगों का अपनी बुद्धि से पालन-पोषण करता है ।
; तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ ।
; तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ॥
जो लोग दूसरों की निन्दा करके खुद सम्मान पाना चाहते हैं । ऐसे लोगों के मुँह पर ऐसी कालिख लग जाती है, जो लाखों बार धोने से भी नहीं हटती है ।
; बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि ।
; सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि॥
किसी की मीठी बातों और किसी के सुंदर कपड़ों से, किसी पुरुष या स्त्री के मन की भावना कैसी है यह नहीं जाना जा सकता है । क्योंकि मन से मैले सूर्पनखा, मारीच, पूतना और रावण के कपड़े बहुत सुन्दर थे ।
; तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर
; सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥
किसी व्यक्ति के सुंदर कपड़े देखकर केवल मूर्ख व्यक्ति हीं नहीं बल्कि बुद्धिमान लोग भी धोखा खा जाते हैं । ठीक उसी प्रकार जैसे मोर के पंख और उसकी वाणी अमृत के जैसी लगती है, लेकिन उसका भोजन सांप होता है ।
; सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
; राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥
मंत्री ( सलाहकार ), चिकित्सक और शिक्षक यदि ये तीनों किसी डर या लालच से झूठ बोलते हैं, तो राज्य,शरीर और धर्म का जल्दी हीं नाश हो जाता है ।
; एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानन्द पर धामा ।
; ब्यापक विश्वरूप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ।
भगवान एक हैं, उन्हें कोई इच्छा नहीं है । उनका कोई रूप या नाम नहीं है । वे अजन्मा औेर परमानंद के परमधाम हैं । वे सर्वव्यापी विश्वरूप हैं । उन्होंने अनेक रूप, अनेक शरीर धारण कर अनेक लीलायें की हैं ।
; सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ।
जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहि करूना करि कीन्ह न कोहू ।
प्रभु भक्तों के लिये हीं सब लीला करते हैं । वे परम कृपालु और भक्त के प्रेमी हैं । भक्त पर उनकी ममता रहती है । वे केवल करूणा करते हैं । वे किसी पर क्रोध नही करते हैं ।
; जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ।
; राम भगत जग चारि प्रकारा । सुकृति चारिउ अनघ उदारा ।
संकट में पड़े भक्त नाम जपते हैं तो उनके समस्त संकट दूर हो जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं । संसार में चार तरह के अर्थाथ; आर्त; जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं और वे सभी भक्त पुण्य के भागी होते हैं ।
; सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन
; नाम सुप्रेम पियुश हृद तिन्हहुँ किए मन मीन ।
जो सभी इच्छाओं को छोड़कर राम भक्ति के रस में लीन होकर राम नाम प्रेम के सरोवर में अपने मन को मछली के रूप में रहते हैं और एक क्षण भी अलग नही रहना चाहते वही सच्चा भक्त है ।
; भगति निरुपन बिबिध बिधाना, क्षमा दया दम लता विताना ।
; सम जम नियम फूल फल ग्याना, हरि पद रति रस बेद बखाना ।
अनेक तरह से भक्ति करना एवं क्षमा, दया, इन्द्रियों का नियंत्रण, लताओं के मंडप समान हैं । मन का नियमन अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणधन, भक्ति के फूल और ज्ञान फल है । भगवान के चरणों में प्रेम भक्ति का रस है । वेदों ने इसका वर्णन किया है ।
; झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें । जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचाने ।
; जेहि जाने जग जाई हेराई । जागें जथा सपन भ्रम जाई ।
ईश्वर को नही जानने से झूठ सत्य प्रतीत होता है । बिना पहचाने रस्सी से सांप का भ्रम होता है । लेकिन ईश्वर को जान लेने पर संसार का उसी प्रकार लोप हो जाता है जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम मिट जाता है ।
; जिन्ह हरि कथा सुनी नहि काना । श्रवण रंध्र अहि भवन समाना ।
जिसने अपने कानों से प्रभु की कथा नही सुनी उसके कानों के छेद सांप के बिल के समान हैं ।
; जिन्ह हरि भगति हृदय नहि आनी । जीवत सब समान तेइ प्राणी ।
; जो नहि करई राम गुण गाना । जीह सो दादुर जीह समाना ।
जिसने भगवान की भक्ति को हृदय में नही लाया वह प्राणी जीवित मुर्दा के समान है । जिसने प्रभु के गुण नही गाया उसकी जीभ मेंढ़क की जीभ के समान है ।
; कुलिस कठोर निठुर सोई छाती । सुनि हरि चरित न जो हरसाती
तुलसीदास जी कहते हैं – उसका हृदय बज्र की तरह कठोर और निश्ठुर है जो ईश्वर का चरित्र सुनकर प्रसन्न नही होता है ।
; सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा । गाबहि मुनि पुराण बुध भेदा ।
; अगुन अरूप अलख अज जोई । भगत प्रेम बश सगुन सो होई ।
तुलसीदास जी कहते हैं – सगुण और निर्गुण में कोई अंतर नही है । मुनि पुराण पन्डित बेद सब ऐसा कहते । जेा निर्गुण निराकार अलख और अजन्मा है वही भक्तों के प्रेम के कारण सगुण हो जाता है ।
; हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता । कहहि सुनहि बहु बिधि सब संता ।
; रामचंन्द्र के चरित सुहाए । कलप कोटि लगि जाहि न गाए ।
भगवान अनन्त है, उनकी कथा भी अनन्त है । संत लोग उसे अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं । श्रीराम के सुन्दर चरित्र करोड़ों युगों मे भी नही गाये जा सकते हैं ।
; प्रभु जानत सब बिनहि जनाएँ । कहहुँ कवनि सिधि लोक रिझाए ।
तुलसीदास जी कहते हैं – प्रभु तो बिना बताये हीं सब जानते हैं । अतः संसार को प्रसन्न करने से कभी भी सिद्धि प्राप्त नही हो सकती ।
; तपबल तें जग सुजई बिधाता । तपबल बिश्णु भए परित्राता ।
; तपबल शंभु करहि संघारा । तप तें अगम न कछु संसारा ।
– तपस्या से कुछ भी प्राप्ति दुर्लभ नही है । इसमें शंका आश्चर्य करने की कोई जरूरत नही है । तपस्या की शक्ति से हीं ब्रह्मा ने संसार की रचना की है और तपस्या की शक्ति से ही विष्णु इस संसार का पालन करते हैं । तपस्या द्वारा हीं शिव संसार का संहार करते हैं । दुनिया में ऐसी कोई चीज नही जो तपस्या द्वारा प्राप्त नही किया जा सकता है ।
; हरि ब्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम ते प्रगट होहिं मै जाना ।
देस काल दिशि बिदि सिहु मांही । कहहुँ सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ।
तुलसीदास जी कहते हैं – भगवान सब जगह हमेशा समान रूप से रहते हैं और प्रेम से बुलाने पर प्रगट हो जाते हैं । वे सभी देश विदेश एव दिशाओं में ब्याप्त हैं । कहा नही जा सकता कि प्रभु कहाँ नही है ।
; तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय
; जन गुन गाहक राम दोस दलन करूनायतन ।
तुलसीदास जी कहते हैं – प्रभु पूर्णकाम सज्जनों के शिरोमणि और प्रेम के प्यारे हैं । प्रभु भक्तों के गुणग्राहक बुराईयों का नाश करने वाले और दया के धाम हैं ।
; करहिं जोग जोगी जेहि लागी । कोहु मोहु ममता मदु त्यागी ।
व्यापकु ब्रह्मु अलखु अविनासी । चिदानंदु निरगुन गुनरासी ।
योगी जिस प्रभु के लिये क्रोध मोह ममता और अहंकार को त्यागकर योग साधना करते हैं – वे सर्वव्यापक ब्रह्म अब्यक्त अविनासी चिदानंद निर्गुण और गुणों के खान हैं ।
; मन समेत जेहि जान न वानी । तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ।
; महिमा निगमु नेति कहि कहई । जो तिहुँ काल एकरस रहई ।
जिन्हें पूरे मन से शब्दों द्वारा ब्यक्त नहीं किया जा सकता-जिनके बारे में कोई अनुमान नही लगा सकता – जिनकी महिमा बेदों में नेति कहकर वर्णित है और जो हमेशा एकरस निर्विकार रहते हैं ।
; जे न मित्र दुख होहिं दुखारी । तिन्हहि विलोकत पातक भारी ।
; निज दुख गिरि सम रज करि जाना । मित्रक दुख रज मेरू समाना ।
तुलसीदास जी कहते हैं – जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होता है उसे देखने से भी भारी पाप लगता है । अपने पहाड़ समान दुख को धूल के बराबर और मित्र के साधारण धूल समान दुख को सुमेरू पर्वत के समान समझना चाहिए ।
; जिन्ह कें अति मति सहज न आई । ते सठ कत हठि करत मिताई ।
; कुपथ निवारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अबगुनन्हि दुरावा ।
जिनके स्वभाव में इस प्रकार की बुद्धि न हो वे मूर्ख केवल जिद करके हीं किसी से मित्रता करते हैं । सच्चा मित्र गलत रास्ते पर जाने से रोककर सही रास्ते पर चलाता है और अवगुण छिपाकर केवल गुणों को प्रकट करता है ।
; देत लेत मन संक न धरई । बल अनुमान सदा हित करई ।
; विपति काल कर सतगुन नेहा । श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ।
मित्र से लेन देन करने में शंका न करे । अपनी शक्ति अनुसार हमेशा मित्र की भलाई करे । वेद के अनुसार संकट के समय वह सौ गुणा स्नेह-प्रेम करता है । अच्छे मित्र के यही गुण हैं ।
; आगें कह मृदु वचन बनाई । पाछे अनहित मन कुटिलाई ।
; जाकर चित अहिगत सम भाई । अस कुमित्र परिहरेहि भलाई ।
जो सामने बना-बनाकर मीठा बोलता है और पीछे मन में बुरी भावना रखता है तथा जिसका मन सांप की चाल के जैसा टेढा है ऐसे खराब मित्र को त्यागने में हीं भलाई है ।
; सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं । माया कृत परमारथ नाहीं ।
इस संसार में सभी शत्रु और मित्र तथा सुख और दुख, माया झूठे हैं और वस्तुतः वे सब बिलकुल नहीं हैं ।
; सुर नर मुनि सब कै यह रीती । स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ।
तुलसीदास जी कहते हैं – देवता, आदमी, मुनि – सबकी यही रीति है कि सब अपने स्वार्थपूर्ति हेतु हीं प्रेम करते हैं ।
; कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के वचन बाघ हरि ब्याला ।
; गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल विसाला ।
खराब संगति अत्यंत बुरा रास्ता है । उन कुसंगियों के बोल बाघ, सिंह और सांप की भांति हैं । घर के कामकाज में अनेक झंझट ही बड़े बीहड़ विशाल पहाड़ की तरह हैं ।
; सुभ अरू असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ।
; समरथ कहुँ नहि दोश् गोसाईं । रवि पावक सुरसरि की नाई ।
तुलसीदास जी कहते हैं – गंगा में पवित्र और अपवित्र सब प्रकार का जल बहता है परन्तु कोई भी गंगाजी को अपवित्र नही कहता । सूर्य, आग और गंगा की तरह समर्थ व्यक्ति को कोई दोष नही लगाता है ।
; तुलसी देखि सुवेसु भूलहिं मूढ न चतुर नर
; सुंदर के किहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ॥
सुंदर वेशभूशा देखकर मूर्ख हीं नही चतुर लोग भी धोखा में पर जाते हैं । मोर की बोली बहुत प्यारी अमृत जैसा है परन्तु वह भोजन सांप का खाता है ।
; बडे सनेह लघुन्ह पर करहीं । गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं ।
; जलधि अगाध मौलि बह फेन । संतत धरनि धरत सिर रेनू ।
तुलसीदास जी कहते हैं – बडे लोग छोटों पर प्रेम करते हैं । पहाड के सिर में हमेशा घास रहता है । अथाह समुद्र में फेन जमा रहता है एवं धरती के मस्तक पर हमेशा धूल रहता है ।
; बैनतेय बलि जिमि चह कागू । जिमि ससु चाहै नाग अरि भागू ।
; जिमि चह कुसल अकारन कोही । सब संपदा चहै शिव द्रोही ।
; लोभी लोलुप कल कीरति चहई । अकलंकता कि कामी लहई ॥
यदि गरूड का हिस्सा कौआ और सिंह का हिस्सा खरगोश चाहे – अकारण क्रोध करने वाला अपनी कुशलता और शिव से विरोध करने वाला सब तरह की संपत्ति चाहे – लोभी अच्छी कीर्ति और कामी पुरूष बदनामी और कलंक नही चाहे तो उन सभी की इच्छाएं व्यर्थ हैं ।
; ग्रह भेसज जल पवन पट पाई कुजोग सुजोग ।
; होहिं कुवस्तु सुवस्तु जग लखहिं सुलक्षन लोग ॥
ग्रह दवाई पानी हवा वस्त्र -ये सब कुसंगति और सुसंगति पाकर संसार में बुरे और अच्छे वस्तु हो जाते हैं । ज्ञानी और समझदार लोग ही इसे जान पाते हैं ।
; को न कुसंगति पाइ नसाई । रहइ न नीच मतें चतुराई ।
तुलसीदास जी कहते हैं – खराब संगति से सभी नष्ट हो जाते हैं । नीच लोगों के विचार के अनुसार चलने से चतुराई, बुद्धि भ्रष्ट हो जाती हैं ।
; तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग
; तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥
यदि तराजू के एक पलड़े पर स्वर्ग के सभी सुखों को रखा जाये तब भी वह एक क्षण के सतसंग से मिलने बाले सुख के बराबर नहीं हो सकता ।
; सुनहु असंतन्ह केर सुभाउ । भूलेहु संगति करिअ न काउ ।
; तिन्ह कर संग सदा दुखदाई । जिमि कपिलहि घालइ हरहाई ॥
अब असंतों का गुण सुनें । कभी भूलवश भी उनका साथ न करें । उनकी संगति हमेशा कश्टकारक होता है । खराब जाति की गाय अच्छी दुधारू गाय को अपने साथ रखकर खराब कर देती है ।
; खलन्ह हृदयँ अति ताप विसेसी । जरहिं सदा पर संपत देखी ।
; जहँ कहुँ निंदासुनहि पराई । हरसहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥
दुर्जन के हृदय में अत्यधिक संताप रहता है । वे दुसरों को सुखी देखकर जलन अनुभव करते हैं । दुसरों की बुराई सुनकर खुश होते हैं जैसे कि रास्ते में गिरा खजाना उन्हें मिल गया हो ।
; काम क्रोध मद लोभ परायन । निर्दय कपटी कुटिल मलायन ।
; वयरू अकारन सब काहू सों । जो कर हित अनहित ताहू सों ।
वे काम, क्रोध, अहंकार, लोभ के अधीन होते हैं । वे निर्दयी, छली, कपटी एवं पापों के भंडार होते हैं । वे बिना कारण सबसे दुशमनी रखते हैं । जो भलाई करता है वे उसके साथ भी बुराई ही करते हैं ।
; झूठइ लेना झूठइ देना । झूठइ भोजन झूठ चवेना ।
; बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा । खाइ महा अति हृदय कठोरा ।
दुष्ट का लेनादेना सब झूठा होता है । उसका नाश्ता भोजन सब झूठ ही होता है जैसे मोर बहुत मीठा बोलता है । पर उसका दिल इतना कठोर होता है कि वह बहुत विषधर सांप को भी खा जाता है । इसी तरह उपर से मीठा बोलने बाले अधिक निर्दयी होते हैं ।
; पर द्रोही पर दार पर धन पर अपवाद
; तें नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥
वे दुसरों के द्रोही परायी स्त्री और पराये धन तथा पर निंदा में लीन रहते हैं । वे पामर और पापयुक्त मनुष्य शरीर में राक्षस होते हैं ।
; लोभन ओढ़न लोभइ डासन । सिस्नोदर नर जमपुर त्रास ना ।
; काहू की जौं सुनहि बड़ाई । स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥
लोभ लालच हीं उनका ओढ़ना और विछावन होता है । वे जानवर की तरह भोजन और मैथुन करते हैं । उन्हें यमलोक का डर नहीं होता । किसी की प्रशंसा सुनकर उन्हें मानो बुखार चढ़ जाता है ।
; जब काहू कै देखहिं बिपती । सुखी भए मानहुँ जग नृपति ।
; स्वारथ रत परिवार विरोधी । लंपट काम लोभ अति क्रोधी ।
वे जब दूसरों को विपत्ति में देखते हैं तो इस तरह सुखी होते हैं जैसे वे हीं दुनिया के राजा हों । वे अपने स्वार्थ में लीन परिवार के सभी लोगों के विरोधी, काम वासना और लोभ में लम्पट एवं अति क्रोधी होते हैं ।
; मातु पिता गुर विप्र न मानहिं । आपु गए अरू घालहिं आनहि ।
; करहिं मोहवस द्रोह परावा । संत संग हरि कथा न भावा ।
वे माता पिता गुरू ब्राम्हण किसी को नही मानते । खुद तो नष्ट रहते ही हैं । दूसरों को भी अपनी संगति से बर्बाद करते हैं । मोह में दूसरों से द्रोह करते हैं । उन्हें संत की संगति और ईश्वर की कथा अच्छी नहीं लगती है ।
; अवगुन सिधुं मंदमति कामी । वेद विदूसक परधन स्वामी ।
; विप्र द्रोह पर द्रोह बिसेसा । दंभ कपट जिए धरें सुवेसा ।
वे दुर्गुणों के सागर, मंदबुद्धि, कामवासना में रत वेदों की निंदा करने बाला जबरदस्ती दूसरों का धन लूटने वाला, द्रोही विशेषत: ब्राह्मनों के शत्रु होते हैं । उनके दिल में घमंड और छल भरा रहता है पर उनका लिबास बहुत सुन्दर रहता है ।
; भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ।
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता । सत संगति संसृति कर अंता ॥
भक्ति स्वतंत्र रूप से समस्त सुखों की खान है । लेकिन बिना संतों की संगति के भक्ति नही मिल सकती है । पुनः बिना पुण्य अर्जित किये संतों की संगति नहीं मिलती है । संतों की संगति हीं जन्म मरण के चक्र से छुटकारा देता है ।
; जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसाबा ।
; धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥
नीच आदमी जिससे बड़प्पन पाता है वह सबसे पहले उसी को मारकर नाश करता है । आग से पैदा धुंआ मेघ बनकर सबसे पहले आग को बुझा देता है ।
; रज मग परी निरादर रहई । सब कर पद प्रहार नित सहई ।
; मरूत उड़ाव प्रथम तेहि भरई । पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥
धूल रास्ते पर निरादर पड़ी रहती है और सभी के पैर की चोट सहती रहती है । लेकिन हवा के उड़ाने पर वह पहले उसी हवा को धूल से भर देती है । बाद में वह राजाओं के आँखों और मुकुटों पर पड़ती है ।
; सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ।
; कवि कोविद गावहिं असि नीति । खल सन कलह न भल नहि प्रीती ॥
बुद्धिमान मनुष्य नीच की संगति नही करते हैं । कवि एवं पंडित नीति कहते हैं कि दुष्ट से न झगड़ा अच्छा है न हीं प्रेम ।
; उदासीन नित रहिअ गोसांई । खल परिहरिअ स्वान की नाई ॥
दुष्ट से सर्वदा उदासीन रहना चाहिये । दुष्ट को कुत्ते की तरह दूर से ही त्याग देना चाहिये ।
; सन इब खल पर बंधन करई । खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई ।
; खल बिनु स्वारथ पर अपकारी । अहि मूशक इब सुनु उरगारी ॥
कुछ लोग जूट की तरह दूसरों को बाँधते हैं । जूट बाँधने के लिये अपनी खाल तक खिंचवाता है । वह दुख सहकर मर जाता है । दुष्ट बिना स्वार्थ के साँप और चूहा के समान बिना कारण दूसरों का अपकार करते हैं ।
; पर संपदा बिनासि नसाहीं । जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं ।
; दुश्ट उदय जग आरति हेतू । जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू ।
वे दूसरों का धन बर्बाद करके खुद भी नष्ट हो जाते हैं जैसे खेती का नाश करके ओला भी नाश हो जाता है । दुष्ट का जन्म प्रसिद्ध नीच ग्रह केतु के उदय की तरह संसार के दुख के लिये होता है ।
; जद्यपि जग दारून दुख नाना । सब तें कठिन जाति अवमाना ॥
इस संसार में अनेक भयानक दुख हैं किन्तु सब से कठिन दुख जाति अपमान है ।
; रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु
; अजहुँ देत दुख रवि ससिहि सिर अवसेशित राहु ।
बुद्धिमान शत्रु अकेला रहने पर भी उसे छोटा नही मानना चाहिये । राहु का केवल सिर बच गया था परन्तु वह आजतक सूर्य एवं चन्द्रमा को ग्रसित कर दुख देता है ।
; भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ विधाता वाम
; धूरि मेरूसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम ।
जब ईश्वर विपरीत हो जाते हैं तब उसके लिये धूल पर्वत के समान पिता काल के समान और रस्सी सांप के समान हो जाती है ।
; सासति करि पुनि करहि पसाउ । नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाउ ।
अच्छे स्वामी का यह सहज स्वभाव है कि पहले दण्ड देकर पुनः बाद में सेवक पर कृपा करते हैं ।
; सुख संपति सुत सेन सहाई । जय प्रताप बल बुद्धि बडाई ।
; नित नूतन सब बाढत जाई । जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ।
सुख, धन, संपत्ति, संतान, सेना, मददगार, विजय, प्रताप, बुद्धि, शक्ति और प्रशंसा जैसे जैसे नित्य बढते हैं, वैसे वैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढता हैै ।
; जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीढी । नहि पावहिं परतिय मनु डीठी ।
; मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं । ते नरवर थोरे जग माहीं ।
ऐसे वीर जो रणक्षेत्र से कभी नहीं भागते, दूसरों की स्त्रियों पर जिनका मन और दृष्टि कभी नहीं जाता और भिखारी कभी जिनके यहाँ से खाली हाथ नहीं लौटते । ऐसे उत्तम लोग संसार में बहुत कम हैं ।
; टेढ जानि सब बंदइ काहू । वक्र्र चंद्रमहि ग्रसई न राहू ।
टेढा जानकर लोग किसी भी व्यक्ति की बंदना प्रार्थना करते हैं । टेढे चन्द्रमा को राहु भी नहीं ग्रसता है ।
; सेवक सदन स्वामि आगमनु । मंगल मूल अमंगल दमनू ।
सेवक के घर स्वामी का आगमन सभी मंगलों की जड और अमंगलों का नाश करने वाला होता है ।
; काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि
; तिय विसेश पुनि चेरि कहि भरत मातु मुसकानि ।
भरत की मां हंसकर कहती है – कानों, लंगरों और कुवरों को कुटिल और खराब चालचलन वाला जानना चाहिये ।
; कोउ नृप होउ हमहिं का हानि । चेरी छाडि अब होब की रानी ।
कोई भी राजा हो जाये, हमारी क्या हानि है । दासी छोड क्या मैं अब रानी हो जाउँगी?
; तसि मति फिरी अहई जसि भावी ।
जैसी भावी होनहार होती है – वैसी हीं बुद्धि भी फिर बदल जाती है ।
; रहा प्रथम अब ते दिन बीते । समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते ।
पहले वाली बात बीत चुकी है । समय बदलने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं ।
; अरि बस दैउ जियावत जाही, मरनु नीक तेहि जीवन चाही
ईश्वर जिसे शत्रु के अधीन रखकर जिन्दा रखें, उसके लिये जीने की अपेक्षा मरना अच्छा है ।
; सूल कुलिस असि अंगवनिहारे । ते रतिनाथ सुमन सर मारे ।
जो व्यक्ति त्रिशूल, बज्र और तलवार आदि की मार अपने अंगों पर सह लेते हैं वे भी कामदेव के पुष्प बाण से मारे जाते हैं ।
; कवने अवसर का भयउँ नारि विस्वास
; जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अविद्या नास ।
किस मौके पर क्या हो जाये-स्त्री पर विश्वास करके कोई उसी प्रकार मारा जा सकता है जैसे योग की सिद्धि का फल मिलने के समय योगी को अविद्या नष्ट कर देती है ।
; दुइ कि होइ एक समय भुआला । हँसब ठइाइ फुलाउब गाला ।
; दानि कहाउब अरू कृपनाई । होइ कि खेम कुसल रीताई ।
ठहाका मारकर हँसना और क्रोध से गाल फुलाना एक साथ एक ही समय में सम्भव नहीं है । दानी और कृपण बनना तथा युद्ध में बहादुरी और चोट भी नहीं लगना कदापि सम्भव नही है ।
; सत्य कहहिं कवि नारि सुभाउ । सब बिधि अगहु अगाध दुराउ ।
निज प्रतिबिंबु बरूकु गहि जाई । जानि न जाइ नारि गति भाई ।
स्त्री का स्वभाव समझ से परे, अथाह और रहस्यपूर्ण होता है । कोई अपनी परछाई भले पकड ले पर वह नारी की चाल नहीं जान सकता है ।
; काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ
; का न करै अवला प्रवल केहि जग कालु न खाइ ।
अग्नि किसे नही जला सकती है? समुद्र में क्या नही समा सकता है? अबला नारी बहुत प्रबल होती है और वह कुछ भी कर सकने में समर्थ होती है । संसार में काल किसे नही खा सकता है?
; जहँ लगि नाथ नेह अरू नाते । पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते ।
; तनु धनु धामु धरनि पुर राजू । पति विहीन सबु सोक समाजू ।
पति बिना लोगों का स्नेह और नाते रिश्ते सभी स्त्री को सूर्य से भी अधिक ताप देने बाले होते हैं । शरीर धन घर धरती नगर और राज्य यह सब स्त्री के लिये पति के बिना शोक दुख के कारण होते हैं ।
; सुभ अरू असुभ करम अनुहारी । ईसु देइ फल हृदय बिचारी ।
; करइ जो करम पाव फल सोई । निगम नीति असि कह सबु कोई ।
ईश्वर शुभ और अशुभ कर्मों के मुताबिक हृदय में विचार कर फल देता है । ऐसा ही वेद नीति और सब लोग कहते हैं ।
; काहु न कोउ सुख दुख कर दाता । निज कृत करम भोग सबु भ्राता ।
कोई भी किसी को दुख-सुख नही दे सकता है । सभी को अपने हीं कर्मों का फल भेागना पड़ता है ।
; करम प्रधान विस्व करि राखा । जो जस करई सो तस फलु चाखा ॥
ईश्वर ने इस संसार में कर्म को महत्ता दी है अर्थात जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल भी भोगना पड़ेगा।
; जोग वियोग भोग भल मंदा । हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा ।
; जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू । संपति बिपति करमु अरू कालू ।
मिलाप और बिछुड़न, अच्छे बुरे भोग ,शत्रु मित्र और तटस्थ -ये सभी भ्रम के फांस हैं । जन्म, मृत्यु संपत्ति, विपत्ति कर्म और काल- ये सभी इसी संसार के जंजाल हैं ।
; बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी । सकल कपट अघ अवगुन खानी ।
स्त्री के हृदय की चाल ईश्वर भी नहीं जान सकते हैं । वह छल, कपट, पाप और अवगुणों की खान है ।
; सुनहुँ भरत भावी प्रवल विलखि कहेउ मुनिनाथ
; हानि लाभ जीवनु मरनु जसु अपजसु विधि हाथ ।
मुनिनाथ ने अत्यंत दुख से भरत से कहा कि जीवन में लाभ नुकसान जिंदगी मौत प्रतिष्ठा या अपयश सभी ईश्वर के हाथों में है ।
; विशय जीव पाइ प्रभुताई । मूढ़ मोह बस होहिं जनाई ।
मूर्ख सांसारिक जीव प्रभुता पा कर मोह में पड़कर अपने असली स्वभाव को प्रकट कर देते हैं ।
; रिपु रिन रंच न राखब काउ ।
शत्रु और ऋण को कभी भी शेष नही रखना चाहिये । अल्प मात्रा में भी छोड़ना नही चाहिये ।
; लातहुँ मोर चढ़ति सिर नीच को धूरि समान ।
धूल जैसा नीच भी पैर मारने पर सिर चढ़ जाता है ।
; अनुचित उचित काजु किछु होउ । समुझि करिअ भल कह सब कोउ ।
; सहसा करि पाछें पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ।
किसी भी काम में उचित अनुचित विचार कर किया जाये तो सब लोग उसे अच्छा कहते हैं । बेद और विद्वान कहते हैं कि जो काम बिना विचारे जल्दी में करके पछताते हैं – वे बुद्धिमान नहीं हैं ।
; विशई साधक सिद्ध सयाने । त्रिविध जीव जग बेद बखाने ।
संसारी, साधक और ज्ञानी सिद्ध पुरुष – इस दुनिया में इसी तीन प्रकार के लोग बेदों ने बताये हैं ।
; सुनिअ सुधा देखिअहि गरल सब करतूति कराल
; जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ।
अमृत मात्र सुनने की बात है किन्तु जहर तो सब जगह प्रत्यक्षतः देखे जा सकते हैं । कौआ, उल्लू और बगुला तो जहां तहां दिखते हैं परन्तु हंस तो केवल मानसरोवर में ही रहते हैं ।
; सुनि ससोच कह देवि सुमित्रा । बिधि गति बड़ि विपरीत विचित्रा ।
; तो सृजि पालई हरइ बहोरी । बालकेलि सम बिधि मति भोरी ।
ईश्वर की चाल अत्यंत विपरीत एवं विचित्र है । वह संसार की सृश्टि उत्पन्न करता और पालन और फिर संहार भी कर देता है । ईश्वर की बुद्धि बच्चों जैसी भोली विवेक रहित है ।
; कसे कनकु मनि पारिखि पायें । पुरूश परिखिअहिं समयँ सुभाए ।
सोना कसौटी पर कसने और रत्न जौहरी के द्वारा ही पहचाना जाता है । पुरूष की परीक्षा समय आने पर उसके स्वभाव और चरित्र से होती है ।
; सुहृद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि ।
बिना कारण हीं दूसरों की भलाई करने बाले बुद्धिमान और श्रेष्ठ मालिक से बहुत कहना गलत होता है ।
; धीरज धर्म मित्र अरू नारी । आपद काल परिखिअहिं चारी ।
; बृद्ध रोगबश जड़ धनहीना । अंध बधिर क्रोधी अतिदीना ।
धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री की परीक्षा आपद या दुख के समय होती हैै । बूढ़ा, रोगी, मूर्ख, गरीब, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यधिक गरीब सभी की परीक्षा इसी समय होती है ।
; कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप ।
कलियुग अनेक कठिन पापों का भंडार है जिसमें धर्म ज्ञान योग जप तपस्या आदि कुछ भी नहीं है ।
; मैं अरू मोर तोर तैं माया । जेहिं बस कहन्हें जीव निकाया ।
में और मेरा तू और तेरा-यही माया है जिाने सम्पूर्ण जीवों को बस में कर रखा है ।
; रिपु रूज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि ।
शत्रु रोग अग्नि पाप स्वामी एवं साँप को कभी भी छोटा मानकर नहीं समझना चाहिये ।
; नवनि नीच कै अति दुखदाई । जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई ।
; भयदायक खल कै प्रिय वानी । जिमि अकाल के कुसुम भवानी ।
नीच ब्यक्ति की नम्रता बहुत दुखदायी होती हैजैसे अंकुश धनुस सांप और बिल्ली का झुकना । दुष्ट की मीठी बोली उसी तरह डरावनी होती है जैसे बिना ऋतु के फूल ।
; कबहुँ दिवस महँ निविड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग
; बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग ।
बादलों के कारण कभी दिन में घोर अंधकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रगट हो जाते हैं । जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है ।
; भानु पीठि सेअइ उर आगी । स्वामिहि सर्व भाव छल त्यागी ।
सूर्य का सेवन पीठ की ओर से और आग का सेवन सामने छाती की ओर से करना चाहिये । किंतु स्वामी की सेवा छल कपट छोड़कर समस्त भाव मन वचन कर्म से करनी चाहिये ।
; भानु पीठि सेअइ उर आगी । स्वामिहि सर्व भाव छल त्यागी ।
सूर्य का सेवन पीठ की ओर से और आग का सेवन सामने छाती की ओर से करना चाहिये । किंतु स्वामी की सेवा छल कपट छोड़कर समस्त भाव मन वचन कर्म से करनी चाहिये ।
; उमा संत कइ इहइ बड़ाई । मंद करत जो करइ भलाई ।
संत की यही महानता है कि वे बुराई करने वाले पर भी उसकी भलाई ही करते हैं ।
; साधु अवग्या तुरत भवानी । कर कल्यान अखिल कै हानी ।
; साधु संतों का अपमान तुरंत संपूर्ण भलाई का अंत नाश कर देता है ।
; कादर मन कहुँ एक अधारा । दैव दैव आलसी पुकारा ।
; ईश्वर का क्या भरोसा । देवता तो कायर मन का आधार है ।
; आलसी लोग ही भगवान भगवान पुकारा करते हैं ।
; सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती । सहज कृपन सन सुंदर नीती ।
मूर्ख से नम्रता दुष्ट से प्रेम कंजूस से उदारता के सुंदर नीति विचार व्यर्थ होते हैं ।
; ममता रत सन ग्यान कहानी । अति लोभी सन विरति बखानी ।
; क्रोधिहि सभ कर मिहि हरि कथा । उसर बीज बए फल जथा ।
मोह माया में फँसे ब्यक्ति से ज्ञान की कहानी अधिक लोभी से वैराग्य का वर्णन क्रोधी से शान्ति की बातें और कामुक से ईश्वर की बात कहने का वैसा हीं फल होता है जैसा उसर खेत में बीज बोने से होता है ।
; काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच
; बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच ।
करोड़ों उपाय करने पर भी केला काटने पर ही फलता है । नीच आदमी विनती करने से नहीं मानता है – वह डांटने पर ही झुकता – रास्ते पर आता है ।
; पर उपदेश कुशल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ।
दूसरों को उपदेश शिक्षा देने में बहुत लोग निपुण कुशल होते हैं परन्तु उस शिक्षा का आचरण पालन करने बाले बहुत कम हीं होते हैं ।
; संसार महँ त्रिविध पुरूश पाटल रसाल पनस समा
; एक सुमन प्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहिं ।
संसार में तीन तरह के लोग होते हैं-गुलाब आम और कटहल के जैसा । एक फूल देता है-एक फूल और फल दोनों देता है और एक केवल फल देता है । लोगों मे एक केवल कहते हैं-करते नहीं । दूसरे जो कहते हैं वे करते भी हैं और तीसरे कहते नही केवल करते हैं ।
; नयन दोस जा कहँ जब होइ्र्र । पीत बरन ससि कहुँ कह सोई ।
; जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उपउ दिनेसा ।
जब किसी को आंखों में दोष होता है तो उसे चन्द्रमा पीले रंग का दिखाई पड़ता है । जब पक्षी के राजा (गरुड़) को दिशाभ्रम होता है तो उसे सूर्य पश्चिम में उदय दिखाई पड़ता है ।
; नौका रूढ़ चलत जग देखा । अचल मोहबस आपुहिं लेखा ।
; बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी । कहहिं परस्पर मिथ्यावादी ।
नाव पर चढ़ा हुआ आदमी दुनिया को चलता दिखाई देता है लेकिन वह अपने को स्थिर अचल समझता है । बच्चे गोलगोल घूमते है लेकिन घर वगैरह नहीं घूमते । लेकिन वे आपस में परस्पर एक दूसरे को झूठा कहते हैं ।
; एक पिता के बिपुल कुमारा । होहिं पृथक गुन सील अचारा ॥
; कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता । कोउ घनवंत सूर कोउ दाता ॥
एक पिता के अनेकों पुत्रों में उनके गुण और आचरण भिन्न भिन्न होते हैं । कोई पंडित कोई तपस्वी कोई ज्ञानी कोई धनी कोई बीर और कोई दानी होता है ।
; कोउ सर्वग्य धर्मरत कोई । सब पर पितहिं प्रीति समहोई ।
; कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा । सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा ।
कोई सब जानने बाला धर्मपरायण होता है । पिता सब पर समान प्रेम करते हैं । पर कोई संतान मन वचन कर्म से पिता का भक्त होता है और सपने में भी वह अपना धर्म नहीं त्यागता ।
; सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना । जद्यपि सो सब भाँति अपाना ।
; एहि बिधि जीव चराचर जेते । त्रिजग देव नर असुर समेते ।
तब वह पुत्र पिता को प्राणों से भी प्यारा होता है भले हीं वह सब तरह से मूर्ख हीं क्यों न हो । इसी प्रकार पशु पक्षी देवता आदमी एवं राक्षसों में भी जितने चेतन और जड़ जीव हैं ।
; जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहि प्रीती ।
; प्रीति बिना नहि भगति दृढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ।
किसी की प्रभुता जाने बिना उस पर विश्वास नहीं ठहरता और विश्वास की कमी से प्रेम नहीं होता । प्रेम बिना भक्ति दृढ़ नही हो सकती जैसे पानी की चिकनाई नही ठहरती है ।
; सोहमस्मि इति बृति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ।
; आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भ्रमनासा ।
मैं ब्रम्ह हूँ – यह अनन्य स्वभाव की प्रचंड लौ है । जब अपने नीजि अनुभव के सुख का सुन्दर प्रकाश फैलता है तब संसार के समस्त भेदरूपी भ्रम का अन्त हो जाता है ।
; नहिं दरिद्र सम दुख जग माँहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ।
; पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ।
संसार में दरिद्रता के समान दुख एवं संतों के साथ मिलन समान सुख नहीं है । मन बचन और शरीर से दूसरों का उपकार करना यह संत का सहज स्वभाव है ।
; मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ।
; काम वात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥
अज्ञान सभी रोगों की जड़ है । इससे बहुत प्रकार के कष्ट उत्पन्न होते हैं । काम वात और लोभ बढ़ा हुआ कफ है । क्रोध पित्त है जो हमेशा हृदय जलाता रहता है ।
; सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह ।
; ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥
महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है (एक का नाम शुक्ल और दूसरे का नाम कृष्ण रख दिया)। एक को चन्द्रमा का बढ़ाने वाला और दूसरे को उसका घटाने वाला समझकर जगत ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दे दिया।
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*'' को जग काम नचाव न जेही ।
:जगत में ऐसा कौन है, जिसे काम ने नचाया न हो [उत्तरकांड]
* ''खल सन कलह न भल नहिं प्रीति
:खल के साथ न कलह अच्छा न प्रेम अच्छा [उत्तरकांड]
* ''केहिं कर हृदय क्रोध नहिं दाहा
:क्रोध ने किसका हृदय नहीं जलाया [उत्तरकांड]
:'' चिंता सांपिनि को नहिं खाया
चिंता रूपी सांपिन ने किसे नहीं डंसा [उत्तरकांड]
:'' तप ते अगम न कछु संसारा
संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो तप से न मिल सके [बालकांड]
:'' तृष्णा केहि न कीन्ह बीराहा
: तृष्णा ने किसको बावला नहीं किया [उत्तरकांड]
:'' नवनि नीच के अति दुःखदाई, जिमि अंकुस धनु उरग विलाई।
: नीच का झुकना भी अत्यन्त दुखदायी होता है, जैसे -अंकुश, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना । [उत्तरकांड]
:'' परहित सरस धरम नहिं भाई
:'' पर पीडा़ सम नहिं अधमाई॥
: परोपकार के समान दूसरा धर्म नहीं है [उत्तरकांड]
: दूसरों को पीडित करने जैसा कोई पाप नहीं है [उत्तरकांड]
:'' दुचित कतहुं परितोष न लहहीं
: चित्त के दोतरफा हो जाने से कहीं परितोष नहीं मिलता [अयोध्या कांड]
:'' तसि पूजा चाहिअ जस देवा
: जैसा देवता हो, वैसी उसकी पूजा होनी चाहिए [अयोध्याकांड]
:'' नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं
:'' प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं
: संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसको प्रभुता पाकर घमंड न हुआ हो [बालकांड]
:'' प्रीति विरोध समान सन
:'' करिअ नीति असि आहि
: प्रीति और बैर बराबरी में करना चाहिए [लंकाकांड]
:'' मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला
: सभी मानस रोगों की जड़ मोह / अज्ञान है [उत्तरकांड]
:'' कीरति भनिति भूति भलि सोई।
:'' सुरसरि सम सब कहं हित होई॥
: कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की भांति सबका हित करती है [बालकांड]
:'' सचिव बैद गुरु तीनि जौं , प्रिय बोलहिं भय आस।
:'' राजधर्म, तन तीनि कर, होई बेगहिं नास ॥
: मंत्री, बैद्य और गुरु ये तीन यदि अप्रसन्नता के भय या लाभ की आशा से ठकुरसुहाती कहते हैं तो समझिए कि राजधर्म का इन्होने तिनका-तिनका कर दिया है, जिससे इसका (राजधर्म का) शीघ्र ही नाश हो जाएगा। [सुन्दरकांड]
:'' लोकमान्यता अनल सम, कर तपकानन दाहु
: लोक में प्रतिष्ठा आग के समान है जो तपस्या रूपी बन को भस्म कर डालती है [बालकांड]
:''मुखिया मुख सों चाहिए खान पान को एक।
:''पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक ॥
: परिवार के मुखिया को मुख के सामान होना चाहिए, जो खाता तो अकेले है, लेकिन विवेकपूर्वक सब अंगो का पालन-पोषण करता हैं।
:''तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर ।
:''बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ॥
: मीठे वचन सब ओर सुख फैलाते हैं। किसी को भी वश में करने का ये एक मन्त्र होते हैं। इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोडकर मीठा बोलने का प्रयास करे॥
: ''तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
: ''साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥
: सी विपत्ति यानि किसी बड़ी परेशानी के समय आपको ये सात गुण बचायेंगे: आपका ज्ञान या शिक्षा, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने की आदत और ईश्वर में विश्वास।
== रामचरितमानस के बारे में महापुरुषों के विचार==
* लोक और शास्त्र का समन्वय, ग्राहस्थ और वैराग्य का समन्वय, भक्ति और ज्ञान का समन्वय, भाषा और संस्कृति का समन्वय,निर्गुण और सगुण का समन्वय, कथा और तत्व ज्ञान का समन्वय, ब्राह्मण और चांडाल का समन्वय, पांडित्य और अपांडित्य का समन्वय, रामचरित मानस शुरू से आखिर तक समन्वय का काव्य है। -- [[हजारी प्रसाद द्विवेदी|आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी]]
* रूस में मैंने प्रसिद्ध समीक्षक तिखानोव से प्रश्न किया था कि ”सियाराम मय सब जग जानी” के आस्तिक कवि तुलसीदास का रामचरितमानस ग्रंथ आपके देश में इतना लोकप्रिय क्यों है? तब उन्होंने उत्तर दिया था कि आप भले ही राम को अपना ईश्वर माने, लेकिन हमारे समक्ष तो राम के चरित्र की यह विशेषता है कि उससे हमारे वस्तुवादी जीवन की प्रत्येक समस्या का समाधान मिल जाता है। इतना बड़ा चरित्र समस्त विश्व में मिलना असंभव है। ऐसा संत तुलसीदासजी का रामचरित मानस है। -- डॉ० रामकुमार वर्मा, अपने ग्रन्थ "संत तुलसीदास" में
==इन्हें भी देखें==
*[[तुलसीदास]]
==बाह्य सूत्र==
*[http://www.apnimaati.com/2018/08/blog-post_10.html रामचरितमानस में नीति तत्व] (डॉ. गीता कौशिक)
{{विकिपीडिया}}
[[श्रेणी:हिन्दी लोकोक्तियाँ]]
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माओ त्से तुंग
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wikitext
text/x-wiki
'''माओ त्से तुंग''' (१८९३ - १९७३), चीनी क्रान्तिकारी, राजनैतिक विचारक और साम्यवादी दल के सबसे बड़े नेता थे जिनके नेतृत्व में चीन की क्रान्ति सफल हुई। उन्होंने जनवादी गणतन्त्र चीन की स्थापना (सन् 1949) से मृत्यु पर्यन्त (सन् 1973) तक चीन का नेतृत्व किया। मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा को सैनिक रणनीति में जोड़कर उन्होंने जिस सिद्धान्त को जन्म दिया उसे माओवाद नाम से जाना जाता है। कई लोग माओ को एक विवादास्पद व्यक्ति मानते हैं परन्तु चीन में वे राजकीय रुप में महान क्रान्तिकारी, राजनैतिक रणनीतिकार, सैनिक पुरोधा एवं देशरक्षक माने जाते हैं। चीनियों के अनुसार माओ ने अपनी नीति और कार्यक्रमों के माध्यम से आर्थिक, तकनीकी एवं सांस्कृतिक विकास के साथ देश को विश्व में प्रमुख शक्ति के रुप में ला खडा करने में मुख्य भूमिका निभाई।
==उद्धरण==
* कठिनाई के समय में हमें अपनी उपलब्धियों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, उज्ज्वल भविष्य देखना और साहस जुटाना चाहिए।
* इंक़िलाब कोई जेवनार, निबंध लेखन, चित्रकारी, या फुलकारी नहीं है; उतना शालीन, ब-इत्मीनान और सौम्य, उतना संयमी, दयालु, विनम्र, संयमित और उदार नहीं हो सकता। इंक़िलाब बग़ावत है, एक हिंसक कार्य जिसके द्वारा एक वर्ग दूसरे का तख़्ता उलट देता है।
* द्वितीय विश्व युद्ध को देखिए, हिटलर की क्रूरता को देखिए। जितनी ज़्यादा क्रूरता होती है, उतना ही ज़्यादा लोगों में इंक़िलाब के लिए उत्साह बढ़ता है।
* प्रत्येक साम्यवादी को यह सच समझ लेना चाहिए; "राजनीतिक शक्ति बंदूक़ की नली से निकलती है।"
* जनता के विचारों को लें और उन्हें केंद्रित करें, फिर जनता के पास जाएँ, विचारों पर क़ायम रहें और उन्हें आगे बढ़ाएँ, ताकि नेतृत्व के सही विचार तैयार हो सकें - यही नेतृत्व की मूल विधि है।
* स्वतंत्रता की लड़ाई में प्राकृतिक विज्ञान मनुष्य के हथियारों में से एक है। समाज में स्वतंत्रता प्राप्त करने के उद्देश्य से मनुष्य को समाज को समझने और बदलने तथा सामाजिक क्रांति लाने के लिए सामाजिक विज्ञान का उपयोग करना चाहिए। प्रकृति की दुनिया में स्वतंत्रता प्राप्त करने के उद्देश्य से, मनुष्य को प्रकृति को समझने, जीतने और बदलने के लिए प्राकृतिक विज्ञान का उपयोग करना चाहिए और इस प्रकार प्रकृति से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए।
* मृत्यु के अनेक लाभ हैं, यह धरती को उपजाऊ बनाता है।
* राजनीति रक्तहीन रण है, जबकि रण रक्तरंजित राजनीति है।
* राजनीति सारे आर्थिक कामों की रीढ़ है।
* लोग और केवल लोग ही वह शक्ति हैं, जो विश्व में इतिहास बनाते हैं।
* लोग पानी की तरह होते हैं, और सेना मछली की तरह।
* संघर्ष के बाद ही विश्व में चमत्कार मुमकिन होते हैं।
* '''सबसे महत्त्वपूर्ण बात है, मजबूत बनना। मजबूत होकर हम दूसरों को जीत सकते हैं। दूसरों को जीतना एक गुण है।'''
* समाजवाद की घास, पूंजीवाद की फसल से बेहतर है।
* सही राजनीतिक दृष्टिकोण नहीं होना, आत्मा नहीं होने जैसा है।
* सेना को चाहिए कि वह जनता के साथ एक रूप हो, ताकि जनता उसे अपनी ही सेना समझे, ऐसी सेना अपराजेय बन जाएगी।
* स्टालिन ने गलतियां की। उसने हमें लेकर गलतियां की, 1927 में। उसने योगोस्वालव को लेकर भी गलतियां की। गलतियां किए बिना कोई आगे नहीं बढ़ सकता। गलतियां करना जरूरी है। पार्टी गलती किए बिना आगे नहीं बढ़ सकती। यह बड़ी बात है।
* हम मार्क्स, एंगल्स, लेनिन और स्टालिन के आभारी हैं कि उन्होंने हमें हथियार दिया। ये हथियार मशीन गन नहीं है। यह मार्क्सवाद – लेनिनवाद है।
* हमारा लक्ष्य अपने शत्रुओं को अपना मित्र बनाना होना चाहिए।
* हमें अपनी लड़ाई हमेशा साहस के साथ लड़नी चाहिए।
* '''हमें उन सभी बातों का समर्थन करना चाहिए जिसका हमारे दुश्मन विरोध करते हैं। उन सभी बातों का विरोध करना चाहिए, जिसका हमारे दुश्मन समर्थन करते हैं।'''
* हर सुधार विरोधी व्यक्ति कागज के शेर की तरह होता है।
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==इन्हें भी देखें==
* [[साम्यवाद]]
*[[कार्ल मार्क्स]]
* [[व्लादिमीर लेनिन]]
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साहित्य
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'''साहित्य''' समाज का दर्पण है। किसी भी राष्ट्र या सभ्यता की जानकारी उसके साहित्य से प्राप्त होती है। किसी भी काल के साहित्य से उस समय की परिस्थितियों, जनमानस के रहन-सहन, खान-पान व अन्य गतिविधियों का पता चलता है। समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है। दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं।
संस्कृत के विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- “हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी भाव।
== उक्तियाँ ==
* ''साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः । -- [[भर्तृहरि]]
: अर्थ : साहित्य संगीत और कला से हीन पुरूष साक्षात् पशु ही है जिसके पूँछ और सींग नहीं हैं ।
* कीरति भनिति भूति भलि सोई।
: सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥ -- [[गोस्वामी तुलसीदास]]
* साहित्य समाज का दर्पण है। -- अज्ञात
* साहित्य जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब है। -- [[रामचंद्र शुक्ल|आचार्य रामचंद्र शुक्ल]]
* ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। -- [[महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]
* साहित्य जन समूह के हृदय का विकास है। -- बालकृष्ण भट्ट
* सच्चे साहित्य का निर्माण एकान्त चिन्तन और एकान्त साधना में होता है। -- अनन्त गोपाल शेवड़े
* साहित्य का कर्तव्य केवल ज्ञान देना नहीं है , परन्तु एक नया वातावरण देना भी है। -- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
* समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता। -- योननागोची
* साहित्य आम लोगों के बारे में कुछ असाधारण की खोज, और साधारण शब्दों में कुछ असाधारण के साथ कहने की कला है। -- बोरिस पास्टेरनक
* अंततः, साहित्य कुछ भी नहीं सिर्फ बढ़ईगीरी है। दोनों के साथ आप वास्तविकता के साथ काम कर रहे हो, एक सामग्री के साथ जो लकड़ी की तरह सख्त है। -- गेब्रियल गार्सिया मार्केज़
* यदि साहित्य सब कुछ नहीं है, यह किसी के लिए परेशानी का एक घंटे के लायक नहीं है। -- ज्यां पॉल सार्त्र
* हम बहुत ज्यादा जानते हैं, और बहुत कम के प्रति आश्वस्त हैं। हमारा साहित्य धर्म के लिए एक विकल्प है, और इसलिए हमारे धर्म है। -- टी एस एलियट
* मैं किसी भी रचनात्मक लेखन कार्यशाला में नहीं गया; मैंने साहित्य में बड़ी उपाधि नहीं ली । यदि मैं लिख सकता हूँ तो कोई भी लिख सकता है। जरूरत सिर्फ कल्पना की है। -- विकास स्वरूप
* चिकित्सा मेरी वैध पत्नी और साहित्य मेरी मालकिन है; जब मैं एक से थक जाता हूँ, मैं दूसरे के साथ रात बिताता हूँ। -- एंटोन चेखव
* साहित्य और तितलियां मनुष्य के दो मधुर ज्ञात भावनाएं होती हैं। -- व्लादिमीर नबोकोव
* सारा साहित्य गपशप है। -- ट्रूमैन कपौट
* अमेरिकी साहित्य हमेशा से आप्रवासी रहा है।
* अच्छा गद्य लिखने की कला चीजों उनके सही नाम से पुकारने की कला है। -- रैल्फ फॉक्स
* गद्य जीवन संग्राम की भाषा है। -- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
* यदि गद्य कवियों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है। भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबंधों में ही सबसे अधिक संभव होता है। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल
* कहानी ऐसी रचना है जिसमें जीवन के किसी अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा-विन्यास सभी उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं। -- मुंशी प्रेमंचद
* हर आदमी की स्मृति उसका निजी साहित्य है। -- अल्ड्स हक्सले
* काव्य साहित्य का ताज है। -- डब्ल्यू सोमरसेट मौघम
* श्रद्धा साहित्य के लिए घातक है। -- ई. एम. फोरस्टर
* प्रतिभा साहित्य का एकमात्र स्कूल है। -- व्लादिमीर नबोकोव
==इन्हें भी देखें==
* [[हिन्दी साहित्य]]
* [[संस्कृत साहित्य]]
* [[भारतीय साहित्य]]
* [[कला]]
* [[काव्य]]
* [[संगीत]]
* [[विज्ञान]]
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'''साहित्य''' समाज का दर्पण है। किसी भी राष्ट्र या सभ्यता की जानकारी उसके साहित्य से प्राप्त होती है। किसी भी काल के साहित्य से उस समय की परिस्थितियों, जनमानस के रहन-सहन, खान-पान व अन्य गतिविधियों का पता चलता है। समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है। दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं।
संस्कृत के विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- “हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी भाव।
== उक्तियाँ ==
* ''साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषाणहीनः ।'' -- [[भर्तृहरि]]
: अर्थ : साहित्य संगीत और कला से हीन पुरूष साक्षात् पशु ही है जिसके पूँछ और सींग नहीं हैं ।
* कीरति भनिति भूति भलि सोई।
: सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥ -- [[गोस्वामी तुलसीदास]]
* साहित्य समाज का दर्पण है। -- अज्ञात
* साहित्य जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब है। -- [[रामचंद्र शुक्ल|आचार्य रामचंद्र शुक्ल]]
* ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है। -- [[महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]
* साहित्य जन समूह के हृदय का विकास है। -- बालकृष्ण भट्ट
* सच्चे साहित्य का निर्माण एकान्त चिन्तन और एकान्त साधना में होता है। -- अनन्त गोपाल शेवड़े
* साहित्य का कर्तव्य केवल ज्ञान देना नहीं है , परन्तु एक नया वातावरण देना भी है। -- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
* समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता। -- योननागोची
* साहित्य आम लोगों के बारे में कुछ असाधारण की खोज, और साधारण शब्दों में कुछ असाधारण के साथ कहने की कला है। -- बोरिस पास्टेरनक
* अंततः, साहित्य कुछ भी नहीं सिर्फ बढ़ईगीरी है। दोनों के साथ आप वास्तविकता के साथ काम कर रहे हो, एक सामग्री के साथ जो लकड़ी की तरह सख्त है। -- गेब्रियल गार्सिया मार्केज़
* यदि साहित्य सब कुछ नहीं है, यह किसी के लिए परेशानी का एक घंटे के लायक नहीं है। -- ज्यां पॉल सार्त्र
* हम बहुत ज्यादा जानते हैं, और बहुत कम के प्रति आश्वस्त हैं। हमारा साहित्य धर्म के लिए एक विकल्प है, और इसलिए हमारे धर्म है। -- टी एस एलियट
* मैं किसी भी रचनात्मक लेखन कार्यशाला में नहीं गया; मैंने साहित्य में बड़ी उपाधि नहीं ली । यदि मैं लिख सकता हूँ तो कोई भी लिख सकता है। जरूरत सिर्फ कल्पना की है। -- विकास स्वरूप
* चिकित्सा मेरी वैध पत्नी और साहित्य मेरी मालकिन है; जब मैं एक से थक जाता हूँ, मैं दूसरे के साथ रात बिताता हूँ। -- एंटोन चेखव
* साहित्य और तितलियां मनुष्य के दो मधुर ज्ञात भावनाएं होती हैं। -- व्लादिमीर नबोकोव
* सारा साहित्य गपशप है। -- ट्रूमैन कपौट
* अमेरिकी साहित्य हमेशा से आप्रवासी रहा है।
* अच्छा गद्य लिखने की कला चीजों उनके सही नाम से पुकारने की कला है। -- रैल्फ फॉक्स
* गद्य जीवन संग्राम की भाषा है। -- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
* यदि गद्य कवियों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है। भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबंधों में ही सबसे अधिक संभव होता है। -- आचार्य रामचंद्र शुक्ल
* कहानी ऐसी रचना है जिसमें जीवन के किसी अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा-विन्यास सभी उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं। -- मुंशी प्रेमंचद
* हर आदमी की स्मृति उसका निजी साहित्य है। -- अल्ड्स हक्सले
* काव्य साहित्य का ताज है। -- डब्ल्यू सोमरसेट मौघम
* श्रद्धा साहित्य के लिए घातक है। -- ई. एम. फोरस्टर
* प्रतिभा साहित्य का एकमात्र स्कूल है। -- व्लादिमीर नबोकोव
==इन्हें भी देखें==
* [[हिन्दी साहित्य]]
* [[संस्कृत साहित्य]]
* [[भारतीय साहित्य]]
* [[कला]]
* [[काव्य]]
* [[संगीत]]
* [[विज्ञान]]
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सज्जन
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'''सज्जन''' (सत् + जन) का अर्थ है 'अच्छा व्यक्ति'। साधु, सन्त, सुजन आदि इसके पर्याय हैं।
== उक्तियाँ ==
* ''परोपकारय सतां विभूतयः।''
: सज्जन लोगों का धन परोपकार के लिए होता है।
* ''विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय ।
: ''खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥'' -- सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
: दुर्जन पुरुष की विद्या विवाद के लिये होती है, धन घमण्ड के लिये होता है, और शक्ति दूसरों को पीड़ित करने के लिये होती है। इसके विपरीत सज्जनों की विद्या ज्ञान के लिये, धन दान के लिये और शक्ति रक्षा के लिये होती है।
* ''उदेति सविता ताम्रस्ताम्रः एवास्तमेति च।
: ''सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥
: सूर्य उदित होने के समय भी लाल रहता है और अस्त होने के समय भी। महान् पुरुष सम्पत्ति (सुख) एवं विपत्ति (द:ख) में एक समान रहते हैं।
* ''योऽसाधुभ्योऽर्थमादाय साधुभ्यः संप्रयच्छति ।
: ''स कृत्वा प्लवमात्मानं संतारयति तावुभौ ॥ '' -- [[मनुस्मृति]]
: जो दुर्जन व्यक्तियों का धन लेकर सज्जन लोगों को देता है वह अपने आप को तो पार लगाता ही है, उन दोनों (दुर्जन मनुष्य और सज्जन मनुष्य) को भी तार देत है।
* ''न प्राष्यति सम्माने नापमाने च कुप्यति ।
: ''न क्रुद्ध: परूषं ब्रूयात् स वै साधूत्तमः स्मॄतः ॥
: जो मान देने पर हर्षित नहीं होता अपमान होने पर क्रोधित नहीं होता तथा स्वयं क्रोधित होने पर कठोर शब्द नही बोलता, वही उत्तम साधु है।
* ''श्लोकस्तु श्लोकतां याति यत्र तिष्ठन्ति साधवः।
: ''लकारो लुप्यते तत्र यत्र तिष्ठन्त्यसाधवः ॥
: जिस सभा में सज्जन व्यक्ति उपस्थित रहते हैं वहाँ श्लोकों (संस्कृत काव्य) के संचालक होते हैं और उनके मनोरंजक लोग कलाकार होते हैं। जिस सभा में असाधु (नीच और दुष्ट) व्यक्ति रहते हैं वहां 'श्लोक' शब्द से 'ल' अक्षर लुप्त हो जाता है अर्थात वहाँ 'शोक' होता है।
* ''न प्रहॄष्यति सन्माने नापमाने च कुप्यति ।
: ''न क्रुद्धः परूषं ब्रूयात् स वै साधूत्तम: स्मॄतः ॥'' -- [[मनुस्मृति]]
: जो सम्मान से गर्वित नहीं होते, अपमान से क्रोधित नहीं होते, क्रोधित होकर भी जो कठोर नहीं बोलते, वे ही श्रेष्ठ साधु हैं।
* ''यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।
: ''चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता॥
: अर्थात एक अच्छा व्यक्ति मन में जो होता है, और जैसा बोलता है वैसा ही करता है। सज्जन पुरुषों के मन, वाणी और क्रिया में एकरूपता होती है।
* साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
: सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय ॥ -- कबीरदास
* सन्त न छोड़े सन्तई, कोटिक मिले असन्त
: मलय भुजंगहि बेधिया, शीतलता न तजन्त ॥'' -- कबीरदास
: सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।
* साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥
: जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥ -- [[तुलसीदास]] ([[रामचरितमानस]] में)
: संतों का चरित्र कपास के चरित्र (जीवन) के समान शुभ होता है जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है।जैसे कपास का धागा सुई के किए हुए छेद को अपना तन देकर ढँक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढँकता है, उसी प्रकार संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के छिद्रों (दोषों) को ढँकता है, जिसके कारण उसने जगत में वंदनीय यश प्राप्त किया है।
*मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥
: राम भगति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥ –- बालकांड , रामचरितमानस
: संतों का समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहां (उस संत समाज रूपी प्रयागराज में) राम भक्ति रूपी गंगाजी की धारा है और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वतीजी हैं।
* ''संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥
: ''काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई॥''
: ''ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड।
: ''अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड॥'' -- तुलसीदास
: संत और असंतों की करनी ऐसी है जैसे चंदन और कुठार (कुल्हाड़ी) का आचरण होता है। हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चंदन को काटती है (क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षों को काटना है), किन्तु चन्दन अपने स्वभाववश उसे (काटने वाली कुल्हाड़ी को) अपना गुण (सुगंध) देकर उसे सुसंधित कर देता है॥
: इसी गुण के कारण चंदन देवताओं के सिरों पर चढ़ता है और जगत् का प्रिय है। (इसके उल्टा) कुल्हाड़ी के मुख को यह दंड मिलता है कि उसको आग में जलाकर फिर घन से पीटते हैं।
* ''बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥
: ''सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी॥'' -- तुलसीदास
: संत विषयों में लंपट (लिप्त) नहीं होते, शील और सद्गुणों की खान होते हैं। उन्हें पराया दुःख देखकर दुःख और पराया सुख देखकर सुख होता है। वे (सबमें, सर्वत्र, सब समय) समता रखते हैं, उनके मन कोई उनका शत्रु नहीं है। वे मद से रहित और वैराग्यवान् होते हैं तथा लोभ, क्रोध, हर्ष और भय का त्याग किए हुए रहते हैं।
* ''कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया॥
: ''सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी॥'' -- तुलसीदास
: उनका चित्त बड़ा कोमल होता है। वे दीनों पर दया करते हैं तथा मन, वचन और कर्म से मेरी निष्कपट (विशुद्ध) भक्ति करते हैं। सबको सम्मान देते हैं, पर स्वयं मानरहित होते हैं। हे भरत! वे प्राणी (संतजन) मेरे प्राणों के समान हैं।
* ''अब सन्तन की मण्डली, बन्दत हौं शिरनाय।
: ''बिना कृपा जिनकी भये, हरि-यश गाय न जाय॥'' -- ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
* पवित्र हृदय वाले सज्जनों को बुद्धि कभी कुंठित ( कुंद ) नही होती। – वाल्मीकि रामायण
* सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता। -- संत कबीर
* प्रशंसा सफलता की नहीं, सज्जनता की होनी चाहिए। -- श्री राम शर्मा आचार्य
* सज्जन व्यक्ति वह होता है जो कभी भी अनजाने में भी किसी की भावनाओं को ठेस नही पहुँचाता हैं। -- ऑस्कर वाइल्ड
* सज्जन व्यक्ति वह होता है जो दुनिया से कम लेता है और ज्यादा देता हैं। -- जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
* जहाँ एक ओर सोना, सज्जन और साधुजन सौ बार टूट कर अर्थात पराजित हो कर भी अपनी हिम्मत नहीं हारते हैं और पुनः प्रयास करते रहते हैं, वही दूसरी ओर दुर्जन और कुम्हार के बनाये हुए मिट्टी के घड़े बस एक ठोकर में ही चूर चूर हो जाते हैं। -- कबीर दास
* सज्जन व्यक्ति जरूर शर्मिंदा होगा यदि उसने कुछ कहा और किया नहीं। -- कन्फ्यूशियस
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==इन्हें भी देखें==
*[[दुर्जन]]
*[[सत्संगति]]
*[[धर्म]]
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महावीर प्रसाद द्विवेदी
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अनुनाद सिंह
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text/x-wiki
[[चित्र:Mahavir Prasad Dwivedi 1966 stamp of India.jpg|right|thumb|300px|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]
'''[[:w:महावीर प्रसाद द्विवेदी|आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी]]''' [[हिन्दी]] के प्रसिद्ध साहित्यकार थे जिन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका का अठारह वर्षों तक सम्पादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक महान् कीर्तिमान स्थापित किया। वे हिन्दी के पहले व्यवस्थित समालोचक थे, जिन्होंने [[समालोचना]] की कई पुस्तकें लिखी थीं। वे खड़ी बोली हिन्दी की कविता के प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण कवि थे। आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयत्नों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी। वे [[भाषाशास्त्र|भाषाशास्त्री]] थे, अनुवादक थे, [[व्याकरण|वैय्याकरणिक]] थे, [[इतिहास|इतिहासज्ञ]] थे, [[अर्थशास्त्र|अर्थशास्त्री]] थे तथा [[विज्ञान]] में भी गहरी रूचि रखने वाले थे। अन्ततः वे युगान्तर लाने वाले साहित्यकार थे, या दूसरे शब्दों में कहें, युग निर्माता थे। वे अपने चिंतन और लेखन के द्वारा हिन्दी प्रदेश में नव जागरण पैदा करने वाले साहित्यकार थे।
द्विवेदी जी बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे। जनवरी, 1903 ई॰ से दिसम्बर, 1920 ई॰ तक इन्होंने ‘[[:w:सरस्वती|सरस्वती]]’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर एक कीर्तिमान स्थापित किया था, इसीलिए इस काल को हिन्दी साहित्येतिहास में ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है।
उनका जन्म 6 मई, 1864 ई॰ में हुआ था । उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। तत्पश्चात् वे रेलवे में नौकरी करने लगे थे। उसी समय इन्होंने अपने लिए चार सिद्धांत निश्चित किये - वक्त की पाबंदी करना, रिश्वत न लेना, अपना काम ईमानदारी से करना और ज्ञान-वृद्धि के लिए सतत प्रयत्न करते रहना। 1882 ई॰ से उन्होंने नौकरी प्रारम्भ की थी। नौकरी करते हुए वे अजमेर, बम्बई, नागपुर, होशंगाबाद, इटारसी, जबलपुर एवं झाँसी शहरों में रहे। इसी दौरान उन्होंने संस्कृत एवं ब्रजभाषा पर अधिकार प्राप्त करते हुए पिंगल अर्थात् छंदशास्त्र का अम्यास किया। उन्होंने अपनी पहली पुस्तक 1885 ई॰ में ‘श्रीमहिम्नस्तोत्र’ की रचना की, जो पुष्पदंत के संस्कृत काव्य का ब्रजभाषा में काव्य रूपान्तर है।
अदम्य साहस, निष्ठा, तर्कशीलता, विवेकशीलता और जोखिम महावीर प्रसाद द्विवेदी में कूट-कूट कर भरा था। इस चेतना और चिंतन का प्रसार उन्होंने हिन्दी प्रदेशों में किया। आजादी के पूर्व के जितने हिन्दी साहित्यकार हैं, प्रायः उन सभी में द्विवेदी जी के विद्रोही रूप का प्रभाव पड़ा। उनके बाद की पीढ़ी उनकी तरह ही ऐसे विद्रोही विचारों की पैदा हुई, जिसने प्रचलित मान्यताओं एवं धारणाओं की धज्जी उड़ाते हुए अपना महान् रचना-कार्य किया। प्रेमचंद, रामचन्द्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त, राहुल सांस्कृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, उग्र, पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि बड़े साहित्यक व्यक्तित्वों को यदि गहराई से देखें तो द्विवेदी जी की छाप उनपर दिखाई पड़ेगी।
== महावीर प्रसाद द्विवेदी की उक्तियाँ ==
* अपना लिखा सभी को अच्छा लगता है परन्तु उसके अच्छे-बुरे का विचार दूसरे लोग ही कर सकते हैं। जो लेख हमने लौटाए वह समझ-बूझकर ही लौटाए, किसी और कारण से नहीं। अतएव यदि उसमें किसी को बुरा लगा तो हमें खेद है। यदि हमारी बुद्धि के अनुसार लेख हमारे पास आवें तो उन्हें हम क्यों लौटाएँ। उनको हम आदर स्वीकार करें, भेजने वाले को भी धन्यवाद दें और उसके साथ ही यदि हो सके तो कुछ पुरस्कार भी दें। यदि किसी को सर्वज्ञता का घमंड नहीं है तो वह अपने लेख में दूसरे के द्वारा किए हुए परिशोधन को देखकर कदापि रुष्ट नहीं होगा। लेखक अपने लेख का प्रूफ स्वयं शोध सकता है और संशोधन के समय हमारे किए गए परिवर्तन यदि उसे ठीक न जान पड़े तो वह हमें सूचना देकर वह उसको अपने मनोनुकूल बना सकता है। -- '''गगनाञ्चल''', नवंबर-दिसंबर, 2013, पृ. 11 पर उद्धृत
* हमारी भाषा [[हिंदी]] है। उसके प्रचार के लिए गवर्नमेंट जो कुछ कर रही है, सो तो कर ही रही है, हमें चाहिए कि हम अपने घरों का अज्ञान तिमिर दूर करने और अपना ज्ञानबल बढ़ाने के लिए इस पुण्यकार्य में लग जाएं। -- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, 1903 में सरस्वती के संपादकीय में<ref>[https://www.jagran.com/uttar-pradesh/allahabad-city-publication-of-saraswati-magazine-resumes-from-prayagraj-jagran-special-20849706.html प्रयागराज से 40 वर्ष बाद फिर निकली 'सरस्वती' की साहित्य धारा]</ref>
* यदि देशी भाषाओं में शिक्षा दी जाए तो समय और श्रम की बहुत ही बचत हो सकती है । उस समय और श्रम के सद्व्यय से और उपयोगी काम किया जा सकता हैI अपने देश की भाषाओं के साहित्य और कविता के परिशीलन से इस देश के निवासियों के संस्कार, विचार और सदाचार में जितनी उन्नति हो सकती है उतनी अंग्रेजी भाषा के साहित्य के परिशीलन से नहीं। -- 'सरस्वती' पत्रिका में (1913 में)
* मुझे आचार्य की पदवी मिली है। क्यों मिली है, मालूम नहीं। कब, किसने दी है, यह भी मुझे मालूम नहीं। मालूम सिर्फ इतना ही है कि मैं बहुधा - इस पदवी से विभूषित किया जाता हूँ। .... शंकराचार्य, मध्वाचार्य, सांरव्याचार्य आदि के सदृश किसी आचार्य के चरणरजः कण की बराबरी मैं नहीं कर सकता। बनारस के संस्कृत काॅलेज या किसी विश्वविद्यालय में भी मैंने कभी कदम नहीं रक्खा। फिर इस पदवी का मुस्तहक मैं कैसे हो गया ? -- मई, 1933 ई॰ में [[नागरी प्रचारिणी सभा]] द्वारा उनकी सत्तरवीं वर्षगांठ पर बनारस में आयोजित उनके अभिनन्दन के अवसर पर द्विवेदी जी का ‘आत्म-निवेदन’
* बचपन से ही मेरा अनुराग तुलसीदास की रामायण और ब्रजवासीदास के ‘ब्रजविलास’ पर हो गया था। फुटकर कविता भी मैंने सैकड़ों कण्ठ कर लिये थे। हुशंगाबाद में रहते समय भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कविवचन सुधा और गोस्वामी राधाचरण के एक मासिक पत्र ने मेरे उस अनुराग की वृद्धि कर दी। वहीं मैंने बाबू हरिश्चन्द्र कुलश्रेष्ठ नाम के एक सज्जन से, जो वहीं कचहरी में मुलाजिम थे, पिंगल का पाठ पढ़ा। फिर क्या था, मैं अपने को कवि ही नहीं, महाकवि समझने लगा। मेरा यह रोग बहुत दिनों तक ज्यों का त्यों बना रहा।-- द्विवेदी जी, अपने ‘आत्म-निवेदन’ में
* ज्ञान-राशि के संचित कोष का ही नाम साहित्य है।
* इस तरह की बातें किसी इतिहसकार के ग्रंथ में यदि पाई जायँ तो उसके इतिहास का महत्त्व कम हुए बिना नहीं रह सकता। इतिहास-लेखक की भाषा तुली हुई होनी चाहिए। उसे बेतुकी बातें न हाँकनी चाहिए। अतिशयोक्तियाँ लिखना इतिहासकार का काम नहीं। उसे चाहिए कि वह प्रत्येक शब्द, वाक्य और वाक्यांश के अर्थ को अच्छी तरह समझकर उसका प्रयोग करे। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘हिन्दी-नवरत्न’ की समीक्षा में
* वेद के विषय में हम हिन्दुओं की श्रद्धा कुछ इतनी बढ़ गई है कि वेदों को भगवान् की वाणी कहते-कहते हमने उन्हें खुद भगवान् ही बना डाला है। हम बहुधा अखबारों में पढ़ते हैं - अमुक शहर में ‘वेद भगवान्’ की सवारी निकली। अमुख तारीख को ‘वेदभगवान्’ का षोडशोपचारपूजन हुआ। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, वेदों के प्रति हिन्दुओं में अन्धश्रद्धा की वृद्धि के बारे में
* यदि यह बात है तो इन सूक्तों में इन ऋषियों की निज की दशा का वर्णन कैसे आया ? ये मंत्र उनकी दशा के ज्ञापक कैसे हुए ? ऋग्वेद का कोई ऋषि कुवें में गिर जाने पर उसी के भीतर पड़े-पड़े स्वर्ग और पृथिवी आदि की स्तुति कर रहा है। कोई इन्द्र से कह रहा है, आप हमारे शत्रुओं का संहार कीजिए। कोई सविता से प्रार्थना कर रहा है कि हमारी बुद्धि को बढ़ाइए। कोई बहुत-सी गायें माँग रहा है, कोई बहुत-से पुत्र। कोई पेड़, सर्प, अरण्यानी, हल और दुन्दुभी पर मंत्र रचना कर रहा है। कोई नदियों को भला-बुरा कह रहा है कि ये हमें आगे बढ़ने में बाधा डालती हैं। कहीं माँस का उल्लेख है, कहीं सुरा का। कहीं द्यूत का। ऋग्वेद के सातवें मंडल में तो एक जगह एक ऋषि ने बड़ी दिल्लगी की है। सोमपान करने के अनन्तर वेद-पाठरत ब्राह्मणों की वेद-ध्वनि की उपमा आपने बरसाती मेंढ़कों से दी है। ये सब तों वेद के ईश्वर प्रणीत न होने की सूचक हैं। ईश्वर के लिए गाय, भैंस, पुत्र, कलत्र, दूध, दही माँगने की कोई जरूरत नहीं। यह ऋग्वेद की बात हुई। यजुर्वेद का भी प्रायः यही हाल है। सामवेद के मंत्र तो कुछ को छोड़ कर शेष सब ऋग्वेद ही से चुने गये हैं। रहा अथर्ववेद, सो यह तो मारण, मोहन, उच्चाटन और वशीकरण आदि मंत्रों से परिपूर्ण है। स्त्रियों को वश करने और जुवे में जीतने तक के मंत्र ऋग्वेद में हैं। ..... न ईश्वर जुवा खेलता है, न वह स्त्रैण ही है और न वह ऐसी बातें करने के लिए औरों को प्रेरित ही करता है। ये सब मनुष्यों ही के काम हैं, उन्होंने वेदों की रचना की है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी का वेदमन्त्रों के रचनाकारों के बारे में
* वैदिक समय में भारतवासियों की सामाजिक अवस्था कैसी थी, वे किस तरह अपना जीवन निर्वाह करते थे, कहाँ रहते थे, क्या किया करते थे - इन सब बातों का पता यदि कहीं मिल सकता है तो वेदों ही में मिल सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी
* इस बदले हुए जमाने में भी अभी तक पांडेय रामावतार शर्मा के सदृश कुछ ही स्वतंत्र स्वभाव के पंडित देख पड़ते हैं। स्वतंत्र स्वभाव से हमारा मतलब ऐसे स्वभाव वाले सज्जनों से है जो मन की बात, समाज की समझ के प्रतिकूल होने पर भी, निःशंक कह डालने का साहस कर सकें। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, पांडेय रामावतार शर्मा के बारे में
* इस महाकवि की इस कलियुग-वर्णना से एक बात और भी बड़े मार्के की मालूम हो सकती है। वेदों में बहुत पुराने जमाने की कुछ रूढ़ियों का उल्लेख है। वे रूढ़ियाँ उस समय रायज थीं। जन-समुदाय उन्हें सुदृष्टि से देखता था। आजकल वे कुदृष्टि से देखी जाती हैं। इसी से आजकल के कुछ वेदज्ञ उनका अर्थ उस समय के समाज के अनुसार करके अपनी विद्वता और वेदज्ञता प्रकट करते हैं। पांडित्य और वेद-ज्ञान में वे शायद अपने को श्रीहर्ष से भी सौगुना समझते होंगे। .... श्रीहर्ष के वर्णन से हम यदि इतना ही जान सकें कि वे वेद के कुछ संशयास्पद स्थलों का क्या अर्थ समझते थे, तो पुराने वेद-व्याख्याताओं की संख्या में एक की और वृद्धि हो जाय। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘श्रीहर्ष का कलियुग’ शीर्षक ललित निबन्ध में
* आपके वेदों में लिखा है कि यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। ज़रा बताइए तो सही, किसने-किसने यज्ञ करके स्वर्ग पाया है। वेदों में अगर लिखा हो कि पत्थर फेंकने से पानी पर तैरने लगते हैं तो क्या आप वेदों की इस उक्ति को सच मान लेंगे ? नहीं, तो आपने स्वर्ग-प्राप्ति की बात कैसे सच मान ली ? ..... आपके एक आचार्य वृहस्पति हो गये हैं। .... वे कहते हैं कि अग्निहोत्र, वेद-पाठ, तंत्रोक्त-क्रियाओं का साधन, त्रिपुण्ड धारण करना और ललाट पर त्रिपुण्ड लगाना उन लोगों के पेट पालने का साधन-मात्र है, जिनमें न अक्ल है, न पौरुष है और न खर्च करने के लिए जिनके पास एक छदाम ही है ! फिर क्यों तुम लोग इन शुष्क आडम्बरों के पीछे पड़कर लोगों को ठग रहे हो ? -- वैदिक मान्यताओं का खण्डन करने एवं उनकी कुरीतियाँ दर्शाने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कलियुग-प्रसंग की पुनर्रचना में
* अति नीरस, अति कर्कश, अति कटु, वेद-वाक्य-विस्तार
: क्षण भर तू समेटकर सुन निज अविचारों का सार।
: नित्य असत्य बोलने में जो तनिक नहीं सकुचाते हैं,
: सींग क्यों नहीं उनके सिर पर बड़े-बड़े उग आते हैं ?
: घोर घमंडी पुरुषों की क्यों टेढ़ी हुई न लंक ?
: चिह्न देख जिसमें सब उनको पहचानते निःशंक।
: दुराचारियों को तू प्रायः धर्माचार्य बनाता है,
: कुत्सित-कर्म-कुशल कुटिलों को अक्षरज्ञ उपजाता है।
: मूर्ख धनी, विद्वतजन निर्धन, उलटा सभी प्रकार !
: तेरी चतुराई को ब्रह्मा ! बार बार धिक्कार !!
: शुद्धाशुद्ध शब्द तक का है जिनका नहीं विचार,
: लिखवाता है उनके कर से नए-नए अखबार !
: -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘विधि-विडम्बना’ नामक कविता में (१९०१)
: (इस कविता में पहले वेद जो नीरस, कर्कश, कटु हैं, उन्हें समेटकर ब्रह्मा को अपने अविचारों का सार सुनाने का आग्रह किया गया है और ब्रह्मा या विधाता की बनाई सृष्टि का मजाक उड़ाया गया है। जो धर्माचारी हैं, प्रायः वे दुराचारी हैं। अक्षरज्ञ यानी शिक्षित जन कुटिल होते हैं और गंदे कामों में लिप्त रहते हैं। अखबार निकालने वालों को सही भाषा-ज्ञान तक नहीं होता। धनी लोग मुर्ख और विद्वान् लोग निर्धन होते हैं। ऐसी बातें लिखने वाले का विरोध तो होगा ही। और उसपर ब्रह्मा तक को धिक्कार !)
* शब्द-शास्त्र है किसका नाम ?
: इस झगड़े से जिसे न काम,
: नहीं विराम-चिह्न तक रखना जिन लोगों को आता है।
: इधर-उधर से जोड़-बटोर,
: लिखते हैं जो तोड़-मरोड़,
: इस प्रदेश में वे ही पूरे ग्रंथकार कहलाते हैं।
: अपनी पुस्तक की सानन्द
: स्वयं समीक्षा लिख स्वच्छन्द,
: अन्य नाम से अखबारों में जो शतबार छपाते हैं
: निज मुख से जो गुण विस्तार
: करते सदा पुकार-पुकार,
: ग्रंथकार-पद-योग्य सर्वथा वे ही समझे जाते हैं।
: किसी समालोचक के द्वार
: सिर घिस-घिसकर बारम्बार
: निज पुस्तक की समालोचना जो सविनय लिखवाते हैं।
: -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, अगस्त, 1901 ई॰ की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘ग्रंथकार-लक्षण’ कविता में
: (द्विवेदी जी के अनुसार सही भाषा लिखनी तक नहीं आती और इधर-उधर से जोड़-बटोर कर यानी सामग्री जुटा कर लोग लेखक बन जाते हैं। उनकी पुस्तक को कोई पूछने वाला जब नहीं होता तो वे अपनी पुस्तक की स्वयं समीक्षा लिखकर छद्म नामों से अखबारों में छपा लेते हैं। वे अपनी प्रशंसा स्वयं ही किया करते हैं। वे ऐसे लेखक हैं जो किसी आलोचक की दहलीज पर सिर रगड़कर अपनी पुस्तक की आलोचना लिखवाते हैं।)
* आप रसिकों के शहनशाह हैं। महामारी का अस्पताल आपकी राजधानी है। पुलिस और पल्टन के गोरे आपके पताकाधारी नक़ीब हैं। डाक्टर आपके पार्षद हैं। सेग्रिगेशन कैम्प आपका क्रीड़ाकानन है। वहीं आप और आपके आश्रित लोग नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ किया करते हैं। -- प्लेगस्तवन में
* कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता के लिए कविता करना एक तमाशा है।
* अंतःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है। नाना प्रकार के विकारों के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख के मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, अर्थात् मनोभाव शब्दों का स्वरूप धारण करते हैं। वही कविता है। चाहे वह पद्यात्मक हो, चाहे गद्यात्मक। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, दिसम्बर, 1903 की ‘सरस्वती’ में ‘कविता’ शीर्षक वाले निबन्ध में
* किसी प्रभावोत्पादक लेख, बात या वक्तृता का नाम कविता है। जिस पद्य के पढ़ने या सुनने से चित्त पर असर नहीं होता, वह कविता नहीं है। तुकबन्दी और अनुप्रास कविता के लिए अपरिहार्य नहीं। कवि का सबसे बड़ा गुण नयी-नयी बातों का सूझना है। उसके लिए कल्पना की बड़ी जरूरत है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय कि सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसी का नाम कविता है। आगे वे बताते हैं कि कवियों को प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखना चाहिए। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कवि और कविता’ निबन्ध में
* कवि का काम न तो शिक्षा देना है, न दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से वह ज्ञान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे।
* प्राचीन काल में सभी कवि प्रकृति की देदीप्यमान शक्तियों का गान करते हैं। इसके बाद कवि वीरों का यशोगान करते हैं। इसके बाद नाटकों की सृष्टि होती है, फिर शृंगार-रस पर काव्य-रचना होती है, भाषा का माधुर्य बढ़ता है, अलंकारों की ध्वनि सुन पड़ती है और पद-नैपुण्य प्रदर्शित किया जाता है। इसके बाद सांसारिक विषयों से घृणा होती है। भक्ति के उन्मेष में कोई प्रकृति का आश्रय लेता है, कोई प्राचीन आदर्शों का।
* बाह्य प्रकृति के बाद मनुष्य अपने अन्तर्जगत की ओर दृष्टिपात करता है। तब साहित्य में कविता का रूप परिवर्तित हो जाता है। कविता का लक्ष्य ‘मनुष्य’ हो जाता है। संसार से दृष्टि हटा कर कवि व्यक्ति पर ध्यान देता है। तब उसे आत्मा का रहस्य ज्ञात होता है। वह सान्त (स + अन्त) में अनन्त का दर्शन करता है और भौतिक पिण्ड में असीम ज्योति का आभास पाता है।
* अभी तक वह मिट्टी में सने हुए किसानों और कारखाने से निकले हुए मैले मजदूर को अपने काव्य का नायक बनाना नहीं चाहता था। वह राजस्तुति, वीरगाथा अथवा प्रकृति-वर्णन में लीन रहता था। परन्तु अब वह क्षुद्रों की भी महत्ता देखेगा और तभी जगत् का रहस्य सबको विदित होगा। जगत् का रहस्य क्या है, इस पर एक ने कहा है कि असाधारण में यह रहस्य नहीं है। जो साधारण है वही रहस्यमय है, वही अनन्त सौंदर्य से युक्त है। इसी सौंदर्य को स्पष्ट कर देना भविष्य-कवियों का काम होगा।
* क्षीण शक्ति और राजनीतिक स्वत्व से हीन हिन्दू भगवान का आश्रय खोजे और भक्तिरस के काव्यों में तल्लीन हो जाय तो आश्यर्च नहीं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘कविता का भविष्य’ निबन्ध में भक्तिकाव्य के अम्युदय के सन्दर्भ में (सन १९२० में)
* राज्याश्रय मिलने की देरी, राजाओं को सब प्रकार की नायिकाओं के रसास्वादन का आनन्द चखाने के लिए कविजी की देरी नहीं। दस वर्ष की अज्ञात यौवना से लेकर पचास वर्ष की प्रौढ़ा तक सूक्ष्म से सूक्ष्म भेद बतलाकर और उनके हाव-भाव, विलास आदि की सारी दिनचर्या वर्णन करके कविजन संतोष नहीं करते थे। दुराचार में सुकरता के लिए दूती कैसी होनी चाहिए, मालिन, नाइन, धोबिन में से इस काम के लिए कौन सबसे प्रवीण होती है, इन बातों का भी वे निर्णय करते थे। नायक के सहायक बिट और चेटक आदि का वर्णन करने में भी वे नहीं चूकते थे। इस प्रकार की पुस्तकों अथवा कविताओं का बनना अभी बन्द नहीं, वे बराबर बनती जाती हैं। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, ‘नायिका भेद’ नामक निबन्ध में, जो ‘सरस्वती’ के जून, 1901 ई॰ के अंक में छपा था
* प्रकृत कवि क्या नहीं कर सकता ? वह रोते हुओं को हँसा सकता है, सोते हुओं को जगा सकता है, देशद्रोहियों को देशभक्त बना सकता है और मार्ग-भ्रष्टों को सुमार्ग में ला सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, जनवरी, 1926 ई॰ में 'कविकिंकर' नाम से ‘सरस्वती’ में ‘कवि-सम्मेलन’ शीर्षक के एक लेख में
* अब उर्दू कवियों और मुशायरों की देखा-देखी हिन्दी के भी कवियों के खूब सम्मेलन हो रहे हैं और समस्या-पूर्तियों का तूफान-सा आ रहा है।
* कवियों की दलबन्दी को विवेकशील जन निंद्य समझें, समझा करें। कुछ भी क्यों न हो जाये, पर कवियों की शान में फ़रक न पड़े। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी, कवियों में दलबन्दी पर व्यंग्य करते हुए
* ब्रजभाषा की कविता के पक्षपातियों को जानना चाहिए कि अब उसका समय गया। उसका तिरोभाव अवश्यंभावी है। अब वह पुरानी प्राकृत भाषाओं के काव्य और साहित्य की तरह केवल पुस्तकों में ही पायी जायेगी। समय को उसकी चाह नहीं। यह बात हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं।
* गद्य और पद्य की भाषा पृथक-पृथक नहीं होनी चाहिए। यह एक हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसके गद्य में एक प्रकार की और पद्य में दूसरे प्रकार की भाषा लिखी जाती है। सभ्य समाज की जो भाषा हो उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।... इसलिए कवियों को चाहिए कि क्रम-क्रम से वे गद्य की भाषा में भी कविता लिखना आरंभ करें। बोलना एक भाषा और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा, प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है। -- ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली में कविता करने का समर्थन करते हुए ; महावीर प्रसाद द्विवेदी, सत्यप्रकाश मिश्र द्वारा उद्धृत, 1996, पृ.-36
* दलबन्दी भारत के भाग्य ही में लिख-सी गयी है। देखिए न, लिबरल, इंडिपेंडेंट, स्वराजिस्ट - सभी आपस में दलबन्दी कर रहे हैं। दल के भीतर दल पैदा हो रहे हैं। फिर कवि यदि अपने फ़िरके अलग-अलग बनावें तो क्या आश्यर्च ? -- भारत की राजनीतिक पार्टियों पर व्यंग्य करते हुए
== महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में उक्तियाँ ==
* उनके सुदृढ़ विशाल और भव्य कलेवर को देखकर दर्शक पर सहसा आतंक छा जाता था और यह प्रतीत होने लगता था कि मैं एक महान् ज्ञानराशि के नीचे आ गया हूँ। -- [[किशोरी दास वाजपेयी|आचार्य किशोरी दास वाजपेयी]]
* द्विवेदी जी सीमित अर्थों में साहित्यकार नहीं हैं। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना रहा है, उन्होंने उसे साबित भी किया। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]] अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ पृष्ट ७७
* द्विवेदीजी ने अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में पहला काम यह किया कि उन्होंने अर्थशास्त्र का अध्ययन किया। उन्होंने जो पुस्तक बड़ी मेहनत से लिखी और जो आकार में उनकी और पुस्तकों से बड़ी है, वह ‘सम्पत्तिशास्त्र’ है। ..... अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के कारण द्विवेदी जी बहुत-से विषयों पर ऐसी टिप्पणियाँ लिख सके जो विशुद्ध साहित्य की सीमाएँ लाँघ जाती हैं। इसके साथ उन्होंने राजनीतिक विषयों का अध्ययन किया और संसार में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ हो रही थीं, उन पर उन्होंने लेख लिखे। राजनीति और अर्थशास्त्र के साथ उन्होंने आधुनिक विज्ञान से परिचय प्राप्त किया और इतिहास तथा समाजशास्त्र का अध्ययन गहराई से किया। इसके साथ भारत के प्राचीन दर्शन और विज्ञान की ओर इन्होंने ध्यान दिया और यह जानने का प्रयत्न किया कि हम अपने चिंतन में कहाँ आगे बढ़े हुए हैं और कहाँ पिछड़े हैं। इस तरह की तैयारी उनसे पहले किसी सम्पादक या साहित्यकार ने न की थी। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना के प्रसार के लिए वह सबसे उपयुक्त व्यक्ति सिद्ध हुए। -- [[रामविलास शर्मा|डाॅ॰ रामविलास शर्मा]]
* यदि द्विवेदी जी द्वारा संपादित सरस्वती के पुराने अंक उठाकर किसी भी नई-पुरानी पत्रिका के अंकों से मिलाए जाएँ तो ज्ञात होगा कि पुराने हो चुकने पर भी इन अंकों में सीखने-समझने के लिए अन्य पत्रिकाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सामग्री है। 'सरस्वती' सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी। वह हिंदी नवजागरण का मुखपत्र थी और हिंदीभाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका भी, ऐसे साहित्य की जो रूढ़िवादी रीतियों का नाश करके नवीन सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था। द्विवेदी जी ‘सरस्वती’ के लिए नए लेखक, नए पाठक ही नहीं तैयार किए अपितु प्रगतिशील विचारधारा के [[बाबूराव विष्णु पराड़कर]] और [[गणेश शंकर विद्यार्थी]] जैसे पत्रकार भी तैयार किए जिन्हें देश की सामाजिक, सास्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का सम्पूर्ण ज्ञान था।-- डॉ० रामविलास शर्मा, अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में द्विवेदी जी और ‘सरस्वती’ के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए, पृष्ट ३७७
* द्विवेदीजी ने सन् 1903 ई॰ में ‘सरस्वती’ के सम्पादन का भार लिया। तब से अपना सारा समय लिखने में ही लगाया। लिखने की सफलता वे इस बात में मानते थे कि पाठक भी उसे बहुत-कुछ समझ जायँ। कई उपयोगी पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने फुटकल लेख भी बहुत लिखे। पर इन लेखों में अधिकतर लेख ‘बातों के संग्रह’ के रूप में ही है। भाषा के नूतन शक्ति चमत्कार के साथ नए-नए विचारों की उद्भावना वाले निबन्ध बहुत ही कम मिलते हैं। स्थायी निबन्धों की श्रेणी में दो चार ही लेख, जैसे ‘कवि और कविता’, ‘प्रतिभा’ आदि आ सकते हैं। पर ये लेखनकला या सूक्ष्म विचार की दृष्टि से लिखे नहीं जान पड़ते। ‘कवि और कविता’ कैसा गम्भीर विषय है, कहने की आवश्यकता नहीं। पर इस विषय की बहुत मोटी-मोटी बातें बहुत मोटे तौर पर कही गई है। -- [[रामचन्द्र शुक्ल|आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] ('हिन्दी साहित्य का इतिहास' में)
* कहने की आवश्यकता नहीं कि द्विवेदी जी के लेख या निबन्ध विचारात्मक श्रेणी में आएँगे। पर विचार की वह गूढ़ गुंफित परम्परा उनमें नहीं मिलती जिससे पाठक की बुद्धि उत्तेजित होकर किसी नई विचारपद्धति पर दौड़ पड़े। शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वही कहा जा सकता है जहाँ एक पैराग्राफ में विचार दबा दबाकर कसे गए हों और एक एक वाक्य किसी संबद्ध विचारखण्ड को लिए हों। द्विवेदी जी के लेखों को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है कि लेखक बहुत मोटी अक्ल के पाठकों के लिए लिख रहा है। -- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
* यद्यपि द्विवेदीजी ने हिन्दी के बड़े बड़े कवियों को लेकर गम्भीर साहित्य समीक्षा का स्थायी साहित्य नहीं प्रस्तुत किया, पर नई निकली पुस्तकों की भाषा की खरी आलोचना करके हिन्दी साहित्य का बड़ा भारी उपकार किया। यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसा अव्यवस्थित, व्याकरणविरुद्ध और ऊटपटाँग भाषा चारों और दिखाई पड़ती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती। उसके प्रभाव से लेखक सावधान हो गए और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया। -- रामचन्द्र शुक्ल
* पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्पष्टवादिता से भरे हुए और नयी प्रेरणा देने वाले निबन्ध यद्यपि बहुत गंभीर नहीं कहे जा सकते, परन्तु उन्होंने गम्भीर साहित्य के निर्माण में बहुत सहायता पहुँचाई। -- [[हजारीप्रसाद द्विवेदी]] ( ‘हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास’ ; 1952 ई॰ )
* आर्य, आपके मनःस्वप्न को ले पलकों पर
: भावी चिर साकार कर सके रूप-रंग भर,
: दिशि-दिशि की अनुभूति, ज्ञान-विज्ञान निरंतर
: उसे उठावें युग-युग के सुख-दुख अनश्वर
: -- [[सुमित्रानन्दन पन्त]] (1931-32)
* आज हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं (महावीर प्रसाद द्विवेदी) के बनाए हुए हैं। यदि पं॰ महावीर प्रसाद द्विवेदी न होते तो बेचारी हिन्दी कोसों पीछे होती - समुन्नति की इस सीमा तक आने का उसे अवसर ही नहीं मिलता। उन्होंने हमारे लिए पथ भी बनाया और पथ-प्रदर्शक का काम भी किया। -- [[प्रेमचंद]], ‘हंस’ के द्विवेदी जी पर विशेषांक में, 1933 ई॰
* द्विवेदीजी का व्यक्तित्व बड़ा ही प्रभावशाली है। मुखमण्डल पर दृष्टि डालते ही यह बात स्पष्ट मालूम हो जाती है कि उनमें रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है, वे सच्चे युग-प्रवर्तक हैं, उनमें क्रांति ले आने की विलक्षण क्षमता है। उन्नत ललाट, घनी भौंहें, रोबदार मूँछें, रसभरी गंभीर आँखें और जलद-गंभीर वाणी - उनकी विशिष्टता ज्ञापित करती है और देखने से ऐसा मालूम पड़ता है मानो किसी ऐसे व्यक्ति के पास हैं जो हमारे लिए हमारे बीच भेजा गया है - जो सब तरह से हमारा ही है। ....... हमारे लिए उन्होंने वह तपस्या की है, जो हिन्दी साहित्य की दुनिया में बेजोड़ ही कही जाएगी। किसी ने हमारे लिए इतना नहीं किया, जितना उन्होंने। वे हिन्दी के सरल सुन्दर रूप के विधायक बने, हिन्दी साहित्य में विश्व-साहित्य के उत्तमोत्तम उपकरणों का उन्होंने समावेश किया, दर्जनों कवि, लेखक और संपादक बनाये। जिसमें कुछ प्रतिभा देखी उसी को अपना लिया और उसके द्वारा मातृभाषा की सच्ची सेवा कराई। हिन्दी के लिए उन्होंने अपना तन, मन, धन सब कुछ अर्पित कर दिया। हमारी उपस्थित उपलब्धि उन्हीं के त्याग का परिणाम है। -- प्रेमचंद
* द्विवेदी जी का जीवन साहित्य, साधना और तप का जीवन है। .... साहित्य की लगन का कितना ऊँचा आदर्श है। कहाँ से क्या लें और उसे किस तरह अच्छे-से-अच्छे रूप में संसार को दें, यही धुन है। जनहित का कोई अंग उनसे नहीं छूटा। जहाँ कोई उपयोगी चीज देखी, चाहे वह पुरातत्त्व से संबंध रखती हो, या दर्शन से, या भाषा-विज्ञान से, या प्राकृतिक दृश्यों से, उसे पाठकों के लिए संकलन करना उनका कत्र्तव्य था। वह जिस चीज को पढ़कर स्वयं आनंदित होते थे, उसका रस पाठकों को चखाना एक लाजिमी बात थी। ‘सरस्वती’ की फाइल उठाकर द्विवेदी जी की संपादकीय टिप्पणियाँ देखिए, विविध ज्ञान का भंडार है। ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर द्विवेदीजी ने न लिखा हो, गहरे से गहरे तात्त्विक विवेचन और साधारण-से-साधारण दंतकथाएँ तक आपको उनमें मिलेंगी, और आप उस व्यक्ति के ज्ञान-विस्तार पर चकित हो जाएँगे। और यह काम किसी विद्या और ज्ञान के केन्द्र में बैठकर नहीं, एक गाँव की एकांत कुटिया में होता था। साहित्य की वह छटा उसी कुटिया से निकलकर, हिन्दी-संसार को आलोकित कर देती थी। -- प्रेमचन्द, मई, 1933 के ‘हंस’ के सम्पादकीय में
* उस दिन उनका प्रयाग में, कैसा अभूतपूर्व स्वागत हुआ था ! देश के कोने-कोने से राष्ट्रभाषा के पुजारी, अपने इष्टदेव के चरणों में श्रद्धा के स्नेहमय फूल चढ़ाने के लिए - उनकी एक झलक से अपने जीवन को सफल बनाने के लिए - उमड़ पड़े थे। वह उस दिन कैसा भव्य लगते थे ! कभी उनके मुखमण्डल पर वृहस्पति का पाण्डित्य प्रतिबिम्बित हो उठता था, तो कभी सरस्वती की प्रतिभा ! सहस्रों साहित्यसेवियों के बीच में वह भोले-भाले, दम्भहीन, विनयशील महापुरुष हीरे की तरह चमक रहे थे। वह हिन्दी भाषा के प्रकाण्ड पंडित हैं। हिन्दी-भाषा के सर्वश्रेष्ठ संपादक, समालोचक और लेखक हैं। हिन्दी भाषा कैसे लिखी जाती है, यह उन्होंने लिखकर दिखा दिया, पत्र का सम्पादन कैसे किया जाता है, यह उन्होंने स्वयं सम्पादन करके बता दिया, समालोचना क्या वस्तु है, यह उन्होंने अपनी समालोचनाओं द्वारा व्यक्त कर दिया। वह आधुनिक हिन्दी के निर्माता हैं। विधाता हैं। सर्वस्व हैं। वह राष्ट्रभाषा हिन्दी के मूर्तिमान स्वरूप हैं। उन्हें लोग आचार्य कहते हैं - वह सचमुच आचार्य हैं। आधुनिक हिन्दी की उन्नत्ति और विकास का अधिकांश श्रेय उन्हीं आचार्य को है। वह तो अपने को राष्ट्रभाषा के विनम्र सेवक बतलाते हैं, राष्ट्रभाषा उन्हें अपना निर्माता कहकर पुकारती है। दोनों एक-दूसरे के अनन्य भक्त हैं, प्रगाढ़ प्रेमी हैं। हम दोनों ही के उपासक हैं। राष्ट्रभाषा हमें प्राणों से प्यारी है, आचार्य भी हमें उतने ही प्रिय हैं। वह इतने बड़े होकर भी हमसे कितने प्यार से बोलते हैं। वह इतने ऊँचे होकर भी हम तुच्छ साहित्य-सेवियों से किस स्नेह से मिलते हैं ! यह उनकी उदारता है, बड़प्पन है। वह हमें पथभ्रष्ट होते देख चुमकारकर, बड़े मधुर शब्दों में, चेतावनी देते हैं - कभी रौद्र-रूप धारण कर झिड़की नहीं देते। वह हमें गलती करते देख कटु शब्द नहीं कहते, वरन् बड़े प्यार से हमें सावधान करते तथा हमारी भूल संशोधन करते हैं। हिन्दी-संसार ने ऐसे असाधारण, असामान्य तथा अलौकिक व्यक्ति की जयन्ती मनाकर वास्तव में अपना आदर किया है। आचार्य सचमुच आदर तथा उपासना के पात्र हैं। वह चिरायु हों, अमर हों, हमारी परमेश्वर से यही प्रार्थना है। -- [[सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला']] ने ‘सुधा’ के जुलाई, 1933 के अंक में, मई, 1933 ई॰ में ही हिन्दी साहित्य सम्मेलन और इंडियन प्रेस के सहयोग से प्रयाग के ‘द्विवेदी-मेला’ की भव्यता के बारे में
* साहित्य-क्षेत्र में प्रचलित धारणा यह है कि द्ववेदी-युग की स्थूल इतिवृतात्मक कविता के विरूद्ध प्रतिक्रिया के रूप में ‘छायावाद’ नामक सूक्ष्म लाक्षणिक काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ। इस धारणा में आंशिक सच्चाई हो सकती है, पर महत्त्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि छायावाद एक नहीं है, उसके अनेक रूप हैं। एक छायावाद नये प्रकार के यथार्थवाद का समर्थक है, जिसे द्विवेदी युगीन देसी स्वच्छन्दतावाद और सांस्कृतिक नवजागरण से सम्बद्ध करके देखा जा सकता है। .... अंग्रेजी राज, जमींदारी प्रथा, किसान आन्दोलन जैसे विषयों पर लिखते हुए निराला उसी नवजागरण के पोषक जान पड़ते हैं, जिसे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने लेखन के द्वारा प्रतिपादित किया था। -- डा॰ परमानन्द श्रीवास्तव
==सन्दर्भ==
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हजारी प्रसाद द्विवेदी
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अनुनाद सिंह
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* साहित्य वस्तुतः मनुष्य का वह उच्छलित आनन्द है जो उसके अंतर में अँटाये नहीं अट सका था। -- (ज्ञान शिखा में)
* साहित्य मानव-जीवन से सीधा उत्पन्न होकर सीधे मानव-जीवन को प्रभावित करता है। साहित्य में उन सारी बातों का जीवन्त विवरण होता है, जिसे मनुष्य ने देखा है, अनुभव किया है, सोचा है और समझा है। -- (साहित्य सहचर में)
* साहित्य यदि जनता के भीतर आत्मविश्वास और अधिकार चेतना की संजीवनी शक्ति नहीं संचारित करता , तो परिणाम बड़े भयंकर होंगे।
* जो साहित्य मनुष्य समाज को रोग, शोक, दारिद्रय, अज्ञान तथा परामुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है।
* जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परामुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता हैं।
* कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* समूचे भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है । इसी का नाम भक्ति साहित्य है । यह एक नई दुनिया है। -- (भक्तिसाहित्य के बारे में)
* निराला से बढकर स्वच्छंदतावादी कवि हिन्दी में नहीं है ।
* महान संकल्प ही महान फल का जनक होता है।
* कर्मफल का सिद्धान्त भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त खोजने पर अन्यान्य देशों के मनीषियों में भी पाया जाता है।
* आध्यात्मिक ऊँचाई तक समाज के बहुत थोड़े लोग ही पहुँच सकते हैं। बाकी लोग छोटे-मोटे दुनियावी टंटों में उलझे रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक आदर्श को विकृत कर देते हैं।
* आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है।
* आसमान में निरन्तर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है।
* कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
* कभी कभी शिष्य परम्परा में ऐसे भी शिष्य निकल आते हैं, जो मूल सम्प्रदाय प्रवर्त्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। फिर भी सम्प्रदाय स्थापना का अभिशाप यह है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिन्तन कम हो जाता है।
* कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंक कर आगे बढ़ जाती है।
* घृणा और द्वेष से जो बढ़ता है, वह शीघ्र ही पतन के गह्वर में गिर पड़ता है।
* जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, अशक्त हो।
* जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कार्य, कितनी ही व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरम्भ किया जाय, वह फलदायक नहीं होगा।
* जितना कुछ इस जीवन शक्ति को समर्थ बनाता है उतना उसका अंग बन जाता है, बाकी फेंक दिया जाता हैं।
* जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है, उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है।
* डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं।
* धर्म मनुष्य से त्याग की आशा रखता है।
* पंडिताई भी एक बोझ है। जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबोती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है, तो सहज हो जाती है तब वह बोझ नहीं रहती।
* प्रवृतियों को दबाना नहीं चाहिए, उनसे दबना भी नहीं चाहिए।
* पावक को कभी कलंक स्पर्श नहीं करता, दीपशिखा को अंधकार की कालिमा नहीं लगती, चंद्रमंडल को आकाश की नीलिमा कलंकित नहीं करती और जाह्नवी की वारिधारा को धरती का कलुष स्पर्श भी नहीं करता।
* पुरुष का सत्य और है, नारी का और।
* पुरुष निःसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वव्द्व है, स्त्री द्वन्द्वोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध।
* पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है, पर स्त्री स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।
* प्रेम बड़ी वस्तु है, त्याग बड़ी वस्तु है और मनुष्य मात्र को वास्तविक मनुष्य बनाने वाला ज्ञान भी बड़ी वस्तु है।
* ब्राह्मण न भिखारी होता है, न महासंधिविग्रहिक, वह धर्म का व्यवस्थापक होता है।
* मनुष्य के भीतर नाखून बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उनके काटने की जो प्रवृत्ति है वह उसकी मनुष्यता की निशानी है।
* मनुष्य में जो मनुष्यता है, जो उसे पशु से अलग कर देती है, वही आराध्य है। क्या साहित्य और क्या राजनीति, सबका एक मात्र लक्ष्य इसी मनुष्यता की सर्वांगीण उन्नति है।
* माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं, यह इतिहास की चिरोद्धोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है।
* माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए , यह सत्य है।
* मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूँ।
* यदि आप संसार की सारी समस्याओं का विश्लेषण करें तो इनके मूल में एक ही बात पाएँगे-मनुष्य की तृष्णा।
* यह नहीं समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जो अनुभव करता है, वह सत्य ही है। शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक है।
* राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है, असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत शिखा से भी अधिक चंचल है।
* राजनैतिक पराधीनता बड़ी बुरी वस्तु है। वह मनुष्य को जीवन यात्रा में अग्रसर होने वाली वस्तुओं से वंचित कर देती है।
* विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक सा होता है। आप दुर्दान्त डाकू के दिल में विनोदप्रियता भर दीजिए, वह लोकतन्त्र का लीडर हो जाएगा, आप समाज सुधार के उत्साही कार्य कर्त्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजेक्शन दे दीजिए, वह अखबारनवीस हो जाएगा।
* शंकाशील हृदयों में प्रेम की वाणी भी शंका उत्पन्न करती है।
* शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा सी अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है।
* सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
* सीधी रेखा खींचना सबसे टेढ़ा काम है।
* स्त्री प्रकृति है। उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किन्तु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है।
* स्नेह बड़ी दारुण वस्तु है, ममता बड़ी प्रचंड शक्ति है।
* स्यारों के स्पर्श से सिंह किशोरी कलुषित नहीं होती। असुरों के गृह में जाने से लक्ष्मी घर्षित नहीं होती। चींटियों के स्पर्श से कामधेनु अपमानित नहीं होती। चरित्रहीनों के बीच वास करने से सरस्वती कलंकित नहीं होती।
* स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होती।
* हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति और हमारी नवनिर्माण की योजनाएँ तभी सर्वमंगल विधायिनी बन सकेंगी जब हमारा हृदय उदार और संवेदनशील होगा, बुद्धि सूक्ष्म और सारग्रहिणी होगी और संकल्प महान और शुभ होगा।
* सुविधाओं को पा लेना ही बड़ी बात नहीं है, प्राप्त सुविधाओं को मनुष्य मात्र के मंगल के लिए नियोजित कर सकना भी बहुत बड़ी बात है।
* सत्य सार्वदेशिक होता है।
=== हिन्दी के बारे में ===
* हिंदी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।
* उसका (हिन्दी का) कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं क्योंकि उसकी जीवन-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने-आपकी भीतरी शक्ति से महत्वपूर्ण आसन पर अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।
* हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है। हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है क्योंकि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकती है।
* यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। वास्तव में हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है अन्यथा यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो 'हिंदी-हिंदी' चिल्लाना व्यर्थ है।
=== संस्कृति और सभ्यता के बारे में ===
* मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति हैं।
* मानव जीवन की तीन स्थितियाँ मानी गई हैं- विकृति, प्रवृति और संस्कृति। विकृति अधोगामिनी स्थिति है तो संस्कृति ऊर्ध्वगामिनी।
* संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की चरम परिणति है। धर्म के समान वह भी अविरोधी वस्तु है। वह समस्त दृश्यमान विरोधों में सामंजस्य उत्पन्न करती है।
* भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सबसे सुन्दर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता हैं।
* मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है।
* सभ्यता की दृष्टि वर्तमान की सुविधा-असुविधा पर रहती है, संस्कृति की भविष्य या अतीत के आदर्श पर।
* सभ्यता बाह्य होने के कारण चंचल है, संस्कृति आंतरिक होने के कारण स्थायी।
* सभ्यता समाज की बाह्य व्यवस्थाओं का नाम है, संस्कृति व्यक्ति के अंतर के विकास का।
* नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और सेवा भक्ति तथा योग मूलक अनूभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम 'संस्कृति' शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं।
===कबीर के बारे में ===
* संयोग से वे ऐसे युग–संधि के समय उत्पन्न हुए थे, जिसे हम विविध धर्म–साधनाओं और मनोभावनाओं का चौराहा कह सकते हैं।
* वे मुसलमान होकर भी असल में मुसलमान नहीं थे। वे हिंदू होकर भी हिंदू नहीं थे। वे साधु होकर भी साधु (अगृहस्थ) नहीं थे।वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे। वे योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे कुछ भगवान की ओर से ही सबसे न्यारे बनाकर भेजे गए थे। वे भगवान के नृसिंहावतार की मानो प्रतिमूर्ति थे।
* उन्हें सौभाग्यवश सुयोग भी अच्छा मिला था। जितने प्रकार के संस्कार पड़ने के रास्ते हैं, वे प्रायः सभी उनके लिए बन्द थे।
* हिंदी साहित्य के हजारों वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेकर उत्पन्न नहीं हुआ।
* पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर सबसे शक्तिशाली और प्रभावोत्पादक व्यक्ति थे।
* कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे।
* भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे।
* कबीर में एक प्रकार घर फूंक मस्ती और पक्कड़ाना लापरवाही के भाव मिलते हैं। उनमें अपने–आपके ऊपर अखंड विश्वास था । उन्होंने कभी भी अपने ज्ञान को, अपने गुरू को, अपनी साधना को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा।
* कबीर ने ऐसी बहुत बातें कही है जिनसे समाज सुधार में सहायता मिलती है। पर, इसलिए उनको समाज सुधारक समझना गलती है।
* कबीर जब पंडित या शेख पर आक्रमण करने को उद्यत होते है तो उतने सावधान नहीं होते जितने अवधूत या योगी पर आक्रमण करते समय दिखते हैं।
* हमने देखा है कि वाह्याचार पर आक्रमण करने वाले संतों और योगियों की कमी नहीं है, पर इस कदर सहज और सरल सरल ढंग से चकनाचूर करने वाली भाषा कबीर के पहले बहुत कम दिखाई दी है।
* व्यंग्य वह है, जहां कहने वाला अधरोष्ठों में हँस रहा हो और सुननेवाला तिलमिला उठा हो और भी कहने वाले को जवाब देना अपने की ओर भी उपहासस्पद् बना लेना हो , कबीर ऐसे ही व्यंग्यकर्त्ता थे।
* ऐसे थे कबीर। सिर से पैर तक मस्त–मौला, स्वभाव में फक्कड़, आदत से अक्खड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचण्ड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय। वे जो कुछ कहते थे अनुभव के आधार पर कहते थे इसलिए उनकी उक्तियॉ बंधने वाली और व्यंग्य चोट करने वाले होते थे।
===सूरदास के बारे में ===
* वात्सल्य भाव के काव्य के लिए सूरदास की बड़ी ख्याति है।
* सूरदास ने यदि राधिका के प्रेम को लेकर गीतिकाव्य की रचना न करके प्रबंध काव्य की रचना की होती तो आज असफल हुए होते हैं।
* गीतिकाव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य ही सूरसागर है।
* प्रेम के इस स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया।
* सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे–पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपको की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है।वह अपने को भूल जाता है।
===नन्ददास के बारे में ===
* सूरदास की गोपियों में जिस प्रकार का अशिक्षित पटुत्व और सारल्यगर्भ माधुर्य पाया जाता है, वैसा नंददास की गोपियों में नहीं पाया जाता। भ्रमरगीत में उद्धव के तर्कों को सुनकर वे शिथिलवाक् होकर परास्त नहीं हो जाती बल्कि आगे बढ़कर उत्तर देती है और तर्क को तर्क से काटने का प्रयत्न करती है।
* निर्गुण भाव के प्रत्याख्यान सूरदास ने भी कराया है और नन्ददास ने भी, पर सूरदास का एकमात्र अस्त्र प्रेमातिरेक है जबकि नन्ददास का सबसे अस्त्र है युक्ति और तर्क, फिर भी नन्ददास की रचनाओं में अपना मोहक सौंदर्य है।
===मीरा के बारे में ===
* माधुर्य भाव में अन्यान्य भक्त कवियों की भाँति मीरा का प्रेम निवेदन है और विरह व्याकुलता अभिमानाश्रित और अध्यंतरित नही है बल्कि सहज और साक्षात् संबंधित है।
* वह सहृदय को स्पंदित और चालित करती है और अपने रग में रंग डालती है।
===रहीम के बारे में ===
* निस्संदेह इस कवि का हृदय मानवीय रस से परिपूर्ण और अनासक्त तथा अनाविल सौंदर्य दृष्टि से समृद्ध था।
* जीवन के अनेक घात प्रतिघात के भीतर से भी राजकीय षड्यंत्रों के चपेट में बार-बार आते रहने के बाद भी और हर प्रकार के उतार-चढ़ाव में उठते – गिरते रहने के बाद भी जिस कवि के हृदय का मानवीय रस निःशेष नही हुआ उसके हृदय की अद्भुत सरसता का अनुमान सहज किया जा सकता है।
===तुलसीदास के बारे में ===
* तुलसीदास असाधारण शक्तिशाली कवि,लोकनायक और महात्मा थे।
* वे समन्वय की विशाल बुद्धि लेकर उत्पन्न हुए थे।
* भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो।
* तुलसी के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय शक्ति में है।
* लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके।
===अन्य कवियों के बारे में ===
* भगवान ने उन्हें रूप देने की बड़ी कंजूसी की थी किंतु शुद्ध निर्मल प्रेमपरायण हृदय देने में बड़ी उदारता से कम लिया था। (जायसी के बारे में )
* जायसी को रहस्यवादी कवि कहा जाता है।
* जिन भजनों में मधुर भाव बोलता दिखता हो उनके लेखक को रहस्र सुख के अधिकारी कहना ही उचित है। (सूरदास के संबंध में )
* कबीर के पूर्ववर्ती सिद्ध और योगी लोगों की आक्रमणात्मक उक्तियों में एक प्रकार की ‘हीन भावना की ग्रंथि’ या ‘इनफीरियारिटी कम्पलेक्स’ पाया जाता है। वे मानो लोमड़ी के खट्टे अंगूर की प्रतिध्वनि है, मानो चिलम न पा सकने वालों का आक्रोश है । उनमें तर्क है पर लापरवाही नहीं है, आक्रोश है पर मस्ती नहीं है, तीव्रता है पर मृदुता नहीं।
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अनुनाद सिंह
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/* हिन्दी के बारे में */
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* साहित्य वस्तुतः मनुष्य का वह उच्छलित आनन्द है जो उसके अंतर में अँटाये नहीं अट सका था। -- (ज्ञान शिखा में)
* साहित्य मानव-जीवन से सीधा उत्पन्न होकर सीधे मानव-जीवन को प्रभावित करता है। साहित्य में उन सारी बातों का जीवन्त विवरण होता है, जिसे मनुष्य ने देखा है, अनुभव किया है, सोचा है और समझा है। -- (साहित्य सहचर में)
* साहित्य यदि जनता के भीतर आत्मविश्वास और अधिकार चेतना की संजीवनी शक्ति नहीं संचारित करता , तो परिणाम बड़े भयंकर होंगे।
* जो साहित्य मनुष्य समाज को रोग, शोक, दारिद्रय, अज्ञान तथा परामुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है।
* जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परामुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता हैं।
* कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* समूचे भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है । इसी का नाम भक्ति साहित्य है । यह एक नई दुनिया है। -- (भक्तिसाहित्य के बारे में)
* निराला से बढकर स्वच्छंदतावादी कवि हिन्दी में नहीं है ।
* महान संकल्प ही महान फल का जनक होता है।
* कर्मफल का सिद्धान्त भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त खोजने पर अन्यान्य देशों के मनीषियों में भी पाया जाता है।
* आध्यात्मिक ऊँचाई तक समाज के बहुत थोड़े लोग ही पहुँच सकते हैं। बाकी लोग छोटे-मोटे दुनियावी टंटों में उलझे रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक आदर्श को विकृत कर देते हैं।
* आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है।
* आसमान में निरन्तर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है।
* कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
* कभी कभी शिष्य परम्परा में ऐसे भी शिष्य निकल आते हैं, जो मूल सम्प्रदाय प्रवर्त्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। फिर भी सम्प्रदाय स्थापना का अभिशाप यह है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिन्तन कम हो जाता है।
* कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंक कर आगे बढ़ जाती है।
* घृणा और द्वेष से जो बढ़ता है, वह शीघ्र ही पतन के गह्वर में गिर पड़ता है।
* जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, अशक्त हो।
* जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कार्य, कितनी ही व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरम्भ किया जाय, वह फलदायक नहीं होगा।
* जितना कुछ इस जीवन शक्ति को समर्थ बनाता है उतना उसका अंग बन जाता है, बाकी फेंक दिया जाता हैं।
* जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है, उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है।
* डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं।
* धर्म मनुष्य से त्याग की आशा रखता है।
* पंडिताई भी एक बोझ है। जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबोती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है, तो सहज हो जाती है तब वह बोझ नहीं रहती।
* प्रवृतियों को दबाना नहीं चाहिए, उनसे दबना भी नहीं चाहिए।
* पावक को कभी कलंक स्पर्श नहीं करता, दीपशिखा को अंधकार की कालिमा नहीं लगती, चंद्रमंडल को आकाश की नीलिमा कलंकित नहीं करती और जाह्नवी की वारिधारा को धरती का कलुष स्पर्श भी नहीं करता।
* पुरुष का सत्य और है, नारी का और।
* पुरुष निःसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वव्द्व है, स्त्री द्वन्द्वोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध।
* पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है, पर स्त्री स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।
* प्रेम बड़ी वस्तु है, त्याग बड़ी वस्तु है और मनुष्य मात्र को वास्तविक मनुष्य बनाने वाला ज्ञान भी बड़ी वस्तु है।
* ब्राह्मण न भिखारी होता है, न महासंधिविग्रहिक, वह धर्म का व्यवस्थापक होता है।
* मनुष्य के भीतर नाखून बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उनके काटने की जो प्रवृत्ति है वह उसकी मनुष्यता की निशानी है।
* मनुष्य में जो मनुष्यता है, जो उसे पशु से अलग कर देती है, वही आराध्य है। क्या साहित्य और क्या राजनीति, सबका एक मात्र लक्ष्य इसी मनुष्यता की सर्वांगीण उन्नति है।
* माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं, यह इतिहास की चिरोद्धोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है।
* माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए , यह सत्य है।
* मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूँ।
* यदि आप संसार की सारी समस्याओं का विश्लेषण करें तो इनके मूल में एक ही बात पाएँगे-मनुष्य की तृष्णा।
* यह नहीं समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जो अनुभव करता है, वह सत्य ही है। शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक है।
* राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है, असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत शिखा से भी अधिक चंचल है।
* राजनैतिक पराधीनता बड़ी बुरी वस्तु है। वह मनुष्य को जीवन यात्रा में अग्रसर होने वाली वस्तुओं से वंचित कर देती है।
* विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक सा होता है। आप दुर्दान्त डाकू के दिल में विनोदप्रियता भर दीजिए, वह लोकतन्त्र का लीडर हो जाएगा, आप समाज सुधार के उत्साही कार्य कर्त्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजेक्शन दे दीजिए, वह अखबारनवीस हो जाएगा।
* शंकाशील हृदयों में प्रेम की वाणी भी शंका उत्पन्न करती है।
* शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा सी अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है।
* सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
* सीधी रेखा खींचना सबसे टेढ़ा काम है।
* स्त्री प्रकृति है। उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किन्तु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है।
* स्नेह बड़ी दारुण वस्तु है, ममता बड़ी प्रचंड शक्ति है।
* स्यारों के स्पर्श से सिंह किशोरी कलुषित नहीं होती। असुरों के गृह में जाने से लक्ष्मी घर्षित नहीं होती। चींटियों के स्पर्श से कामधेनु अपमानित नहीं होती। चरित्रहीनों के बीच वास करने से सरस्वती कलंकित नहीं होती।
* स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होती।
* हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति और हमारी नवनिर्माण की योजनाएँ तभी सर्वमंगल विधायिनी बन सकेंगी जब हमारा हृदय उदार और संवेदनशील होगा, बुद्धि सूक्ष्म और सारग्रहिणी होगी और संकल्प महान और शुभ होगा।
* सुविधाओं को पा लेना ही बड़ी बात नहीं है, प्राप्त सुविधाओं को मनुष्य मात्र के मंगल के लिए नियोजित कर सकना भी बहुत बड़ी बात है।
* सत्य सार्वदेशिक होता है।
* सूचनात्मक संप्रेषण उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना रचनात्मक संप्रेषण।
* भाषा के संदर्भ में आचार्य द्विवेदी ज्ञान को दो-मुँहा पदार्थ मानते हैं। उनके अनुसार एक ओर वैयक्तिक तथ्य जगत है, जो व्यक्तिसापेक्ष होता है, दूसरी तरफ अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत है जो समाजसापेक्ष होता है। इन दोनों के संबंधों की प्रकृति पर विचार करते हुए उनका यह मत है कि वैयक्तिक तथ्य जगत निरंतर दूसरे लोगों के उपलब्ध तथ्य जगत से टकराते रहने के कारण अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत के रूप में परिवर्तित होता रहता है। यह संसार दूसरों की उपलब्धि और स्मृति से बनी तथ्यात्मक ज्ञान राशि से टकरा-टकरा कर बना हुआ पदार्थ है। --डॉ० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, आचार्य द्विवेदी का भाषा विषयक चिंतन, १९९१
* हमारी भाषा सामान्य वैयक्तिक तथ्यात्मक अनुभूतियों को एक व्यक्ति के चित्त से दूसरे के चित्त तक ढोने का साधन भी है; और दीर्घकाल से अनेक अंतर्वैयक्तिक तथ्य-जगतों के संघर्ष से विकसित होनेवाली और संचित होती रहनेवाली ज्ञान-राशि का वाहन भी।
* शब्द इस उद्देश्य से बनाए गए हैं कि व्यक्ति की भावना (अर्थ) दूसरे के चित्त में आसानी से उतार दी जा सके। रुपए का यह कागजी नोट हमारी उलझी हुई सामाजिक व्यवस्था को प्रतीक-रूप में उपस्थित करता है। अति परिचयवश उसके इस रूप की हम उपेक्षा करते हैं। जिस प्रकार बाजार में हमारे श्रम और उत्पादन के जटिल संबंधों को रुपए का नोट प्रतीक-रूप में सामने ला देता है, ठीक उसी प्रकार शब्द हमारी सामाजिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* मैथिली मातृभाषियों की तरह मैं भी अपनी मातृबोली भोजपुरी को देश की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा सिद्ध कर सकता हूँ। इसके लिए, कई तरह के तर्क हो सकते हैं। जैसे इतिहास से गवाही ढूँढ कर कहा जा सकता है कि भारतवर्ष का ज्ञात इतिहास भोजपुरियों से प्रारंभ होता है। जिन सैनिकों के नाम मात्र से सम्राट सिकंदर काँप उठे थे, वे भोजपुरी थे। जिन भिक्षुओं ने पर्वत और समुद्र लाँघकर चीन से जापान तक भारतीय संस्कृति की पताका फहराई थी, वे अधिकांश भोजपुरी थे। चंद्रगुप्त और कुमारजीव भोजपुर की संतान थे और मध्ययुग का सबसे बड़ा प्राणवान पुरुष भोजपुरी था : मेरा मतलब कबीर से है, आदि।
* नाना कारणों से इस देश में और बाहर यह बार-बार विज्ञापित किया जाता है कि इस महादेश में सैकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं और इसीलिए इसमें अखंडता या एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। किन्तु मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि हमारे इस देश ने हजारों वर्ष पहले से भाषा की समस्या हल कर ली थी। हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक ही (संस्कृत) रही है।
* कुछ शताब्दियों तक भारतवर्ष एक विचित्र अवस्था में से गुजरा। उसके न्याय, राजनीति और व्यवहार की भाषा फारसी रही है, हृदय की भाषा तत्तत् प्रदेशों की प्रांतीय भाषाएँ रही हैं और मस्तिष्क की भाषा संस्कृत रही है।
* मैंने जैन-प्रबंधों की प्राकृतगन्धी संस्कृत देखी है और मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि संस्कृत को इतना सरल और प्रांजल बनाना एकदम नवीन और स्फूर्तिदायक प्रयास था। जैन मुनियों ने इसमें प्रांजलता ले आने में कमाल का काम किया है।
* सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता तब तक भाषा का सहज होना असंभव है।
* मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।
* इस युग का मुख्य उद्देश्य मनुष्य है। इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि विज्ञान की सहायता से जहाँ बाह्य भौगोलिक बंधन तड़ातड़ टूट गए हैं वहाँ मानसिक संकीर्णता दूर नहीं हुई है। हम एक-दूसरे को पहचानते नहीं। तीन दिन में सारे संसार की यात्रा करके लौटे हुए यात्रा-विलासी लोगों और नाना प्रकार के स्वार्थपरायणों की पुस्तकों ने संसार में घोर गलतफहमी फैला रखी है। इस देश में ही हम एक प्रदेश वाले दूसरे प्रदेश के लोगों को समझ नहीं रहे, एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों को पहचान नहीं रहे। इसीलिए इतनी मारामारी काटाकाटी चल रही है।
=== हिन्दी के बारे में ===
* हिन्दी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।<ref>[https://sahityakunj.net//entries/view/lokvadi-bhashachintak-acharya-hajari-prasad-dwivedi लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी]</ref>
* उसका (हिन्दी का) कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं क्योंकि उसकी जीवन-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने-आपकी भीतरी शक्ति से महत्वपूर्ण आसन पर अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।
* हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है। हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है क्योंकि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकती है।
* यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। वास्तव में हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है अन्यथा यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो 'हिंदी-हिंदी' चिल्लाना व्यर्थ है।
* सिर्फ यही बात नहीं है कि इस देश में देशी भाषाओं में सदा काव्य लिखे जाते रहे, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उनका भरपूर सम्मान भी बराबर होता रहा। अभिप्राय यह कि संस्कृत का कभी किसी भारतीय भाषा के साथ झगड़ा नहीं रहा। इसी प्रकार अब जब कि संस्कृत की भूमिका में हिंदी को अपनाया गया है तो उसका भी किसी भारतीय भाषा से द्वेष संभव नहीं है।
* हमें एक ऐसी भाषा चुन लेनी है जो हमारी हजारों वर्ष की परंपराओं से कम-से-कम विच्छिन्न हो और हमारी नूतन परिस्थिति का सामना अधिक-से-अधिक मुस्तैदी से कर सकती हो, संस्कृत न होकर भी संस्कृत-सी हो और साथ ही जो प्रत्येक नए विचार को, प्रत्येक नयी भावना को अपना लेने में एकदम हिचकिचाती न हो, जो प्राचीन परंपरा की उत्तराधिकारिणी भी हो और नवीन चिंता की वाहिका भी।
* वस्तुतः हिंदी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं में चौदह आना साम्य ही है, दो आना ही हमें नए सिरे से गढ़ना है।
* हिंदी केंद्रीय भाषा है। बड़े परिश्रम से और बड़ी कठिनाइयों के भीतर से इसके उपासकों ने इसे सार्वदेशिक भाषा का रूप दिया है।
* हिंदी को किसी केंद्रीय राजशक्ति की अंगुली पकड़ाकर आगे नहीं बढ़ाया गया है। विरोधों, आघात-प्रतिघातों के भीतर से ही इसकी शानदार सवारी निकली है।
* वे सब बोलियाँ, जिनका मुख केंद्राभिमुख है, अर्थात् जिनके बोलनेवालों की नाड़ियों में मूल केंद्रीय भाषा से संबद्ध बने रहने के संस्कार दृढ़ निबद्ध हैं - हिंदी हैं। जो बोलियाँ केंद्राभिमुख न होकर अपने आप में ही केंद्रित हो जाती हैं, और तुलसी और सूर को अपना कवि नहीं मानना चाहतीं, वे टूटकर अलग हो जाती हैं।
* हिंदी मात्र व्याकरण नहीं और न ही वह केवल खड़ीबोली के रूप में एक विशिष्ट भाषिक संरचना है। भाषा के रूप में वह एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में भाषाई प्रतीक भी है, और साहित्य के रूप में वह एक जातीय परंपरा भी है।
* हिंदी भारत के केंद्रीय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है जिसके लिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान के विकास का वाहन बनाना आवश्यक है।
* जिस हिंदी को आजकल हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं, वह उर्दू के पर से बनाई गई है तथा हिंदी, मुसलमानी भाषा है क्योंकि शुरू-शुरू में खड़ी बोली मुसलमानों की भाषा मानी जाती थी। उन्होंने उदारतापूर्वक इस तथ्य को रेखांकित किया है कि “पुराने हिंदी कवियों ने जब मुसलमान पात्रों से कोई कविनिषिद्ध प्रौढ़ोक्ति कहलाई है तो खड़ीबोली में बुलवाया है। जिस भाषा को हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं उसकी प्रथम भित्ति-प्रतिष्ठा मुसलमान भाइयों के हाथों हुई है।” वे बलपूर्वक कहते हैं कि यह नहीं कि वह भाषा ही कोई नई बनाई गई है बल्कि यह कि इसे साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का वाहन मुसलमानों ने बनाया।
* उर्दू अभी तक आत्मकेन्द्रित भाषा बनी रही है क्योंकि केंद्राभिमुख-भाषा होने में वह हिंदी के समान है, न कि उसकी जनपदीय बोलियों के। इसीलिए वह सूर, तुलसी, कबीर की परंपरा को अपनी परंपरा नहीं मानती और अन्य संतों और भक्तों के सात्विक साहित्य को अपना साहित्य मानने में कुंठा अनुभव करती रही। साथ ही उसने इस देश की पुरानी परंपरा से, अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत के साहित्य से, घनिष्ठ और अविच्छेद्य संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कभी नहीं किया।
=== संस्कृति और सभ्यता के बारे में ===
* मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति हैं।
* मानव जीवन की तीन स्थितियाँ मानी गई हैं- विकृति, प्रवृति और संस्कृति। विकृति अधोगामिनी स्थिति है तो संस्कृति ऊर्ध्वगामिनी।
* संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की चरम परिणति है। धर्म के समान वह भी अविरोधी वस्तु है। वह समस्त दृश्यमान विरोधों में सामंजस्य उत्पन्न करती है।
* भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सबसे सुन्दर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता हैं।
* मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है।
* सभ्यता की दृष्टि वर्तमान की सुविधा-असुविधा पर रहती है, संस्कृति की भविष्य या अतीत के आदर्श पर।
* सभ्यता बाह्य होने के कारण चंचल है, संस्कृति आंतरिक होने के कारण स्थायी।
* सभ्यता समाज की बाह्य व्यवस्थाओं का नाम है, संस्कृति व्यक्ति के अंतर के विकास का।
* नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और सेवा भक्ति तथा योग मूलक अनूभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम 'संस्कृति' शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं।
===कबीर के बारे में ===
* संयोग से वे ऐसे युग–संधि के समय उत्पन्न हुए थे, जिसे हम विविध धर्म–साधनाओं और मनोभावनाओं का चौराहा कह सकते हैं।
* वे मुसलमान होकर भी असल में मुसलमान नहीं थे। वे हिंदू होकर भी हिंदू नहीं थे। वे साधु होकर भी साधु (अगृहस्थ) नहीं थे।वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे। वे योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे कुछ भगवान की ओर से ही सबसे न्यारे बनाकर भेजे गए थे। वे भगवान के नृसिंहावतार की मानो प्रतिमूर्ति थे।
* उन्हें सौभाग्यवश सुयोग भी अच्छा मिला था। जितने प्रकार के संस्कार पड़ने के रास्ते हैं, वे प्रायः सभी उनके लिए बन्द थे।
* हिंदी साहित्य के हजारों वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेकर उत्पन्न नहीं हुआ।
* पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर सबसे शक्तिशाली और प्रभावोत्पादक व्यक्ति थे।
* कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे।
* भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे।
* कबीर में एक प्रकार घर फूंक मस्ती और पक्कड़ाना लापरवाही के भाव मिलते हैं। उनमें अपने–आपके ऊपर अखंड विश्वास था । उन्होंने कभी भी अपने ज्ञान को, अपने गुरू को, अपनी साधना को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा।
* कबीर ने ऐसी बहुत बातें कही है जिनसे समाज सुधार में सहायता मिलती है। पर, इसलिए उनको समाज सुधारक समझना गलती है।
* कबीर जब पंडित या शेख पर आक्रमण करने को उद्यत होते है तो उतने सावधान नहीं होते जितने अवधूत या योगी पर आक्रमण करते समय दिखते हैं।
* हमने देखा है कि वाह्याचार पर आक्रमण करने वाले संतों और योगियों की कमी नहीं है, पर इस कदर सहज और सरल सरल ढंग से चकनाचूर करने वाली भाषा कबीर के पहले बहुत कम दिखाई दी है।
* व्यंग्य वह है, जहां कहने वाला अधरोष्ठों में हँस रहा हो और सुननेवाला तिलमिला उठा हो और भी कहने वाले को जवाब देना अपने की ओर भी उपहासस्पद् बना लेना हो , कबीर ऐसे ही व्यंग्यकर्त्ता थे।
* ऐसे थे कबीर। सिर से पैर तक मस्त–मौला, स्वभाव में फक्कड़, आदत से अक्खड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचण्ड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय। वे जो कुछ कहते थे अनुभव के आधार पर कहते थे इसलिए उनकी उक्तियॉ बंधने वाली और व्यंग्य चोट करने वाले होते थे।
===सूरदास के बारे में ===
* वात्सल्य भाव के काव्य के लिए सूरदास की बड़ी ख्याति है।
* सूरदास ने यदि राधिका के प्रेम को लेकर गीतिकाव्य की रचना न करके प्रबंध काव्य की रचना की होती तो आज असफल हुए होते हैं।
* गीतिकाव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य ही सूरसागर है।
* प्रेम के इस स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया।
* सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे–पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपको की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है।वह अपने को भूल जाता है।
===नन्ददास के बारे में ===
* सूरदास की गोपियों में जिस प्रकार का अशिक्षित पटुत्व और सारल्यगर्भ माधुर्य पाया जाता है, वैसा नंददास की गोपियों में नहीं पाया जाता। भ्रमरगीत में उद्धव के तर्कों को सुनकर वे शिथिलवाक् होकर परास्त नहीं हो जाती बल्कि आगे बढ़कर उत्तर देती है और तर्क को तर्क से काटने का प्रयत्न करती है।
* निर्गुण भाव के प्रत्याख्यान सूरदास ने भी कराया है और नन्ददास ने भी, पर सूरदास का एकमात्र अस्त्र प्रेमातिरेक है जबकि नन्ददास का सबसे अस्त्र है युक्ति और तर्क, फिर भी नन्ददास की रचनाओं में अपना मोहक सौंदर्य है।
===मीरा के बारे में ===
* माधुर्य भाव में अन्यान्य भक्त कवियों की भाँति मीरा का प्रेम निवेदन है और विरह व्याकुलता अभिमानाश्रित और अध्यंतरित नही है बल्कि सहज और साक्षात् संबंधित है।
* वह सहृदय को स्पंदित और चालित करती है और अपने रग में रंग डालती है।
===रहीम के बारे में ===
* निस्संदेह इस कवि का हृदय मानवीय रस से परिपूर्ण और अनासक्त तथा अनाविल सौंदर्य दृष्टि से समृद्ध था।
* जीवन के अनेक घात प्रतिघात के भीतर से भी राजकीय षड्यंत्रों के चपेट में बार-बार आते रहने के बाद भी और हर प्रकार के उतार-चढ़ाव में उठते – गिरते रहने के बाद भी जिस कवि के हृदय का मानवीय रस निःशेष नही हुआ उसके हृदय की अद्भुत सरसता का अनुमान सहज किया जा सकता है।
===तुलसीदास के बारे में ===
* तुलसीदास असाधारण शक्तिशाली कवि,लोकनायक और महात्मा थे।
* वे समन्वय की विशाल बुद्धि लेकर उत्पन्न हुए थे।
* भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो।
* तुलसी के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय शक्ति में है।
* लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके।
===अन्य कवियों के बारे में ===
* भगवान ने उन्हें रूप देने की बड़ी कंजूसी की थी किंतु शुद्ध निर्मल प्रेमपरायण हृदय देने में बड़ी उदारता से कम लिया था। (जायसी के बारे में )
* जायसी को रहस्यवादी कवि कहा जाता है।
* जिन भजनों में मधुर भाव बोलता दिखता हो उनके लेखक को रहस्र सुख के अधिकारी कहना ही उचित है। (सूरदास के संबंध में )
* कबीर के पूर्ववर्ती सिद्ध और योगी लोगों की आक्रमणात्मक उक्तियों में एक प्रकार की ‘हीन भावना की ग्रंथि’ या ‘इनफीरियारिटी कम्पलेक्स’ पाया जाता है। वे मानो लोमड़ी के खट्टे अंगूर की प्रतिध्वनि है, मानो चिलम न पा सकने वालों का आक्रोश है । उनमें तर्क है पर लापरवाही नहीं है, आक्रोश है पर मस्ती नहीं है, तीव्रता है पर मृदुता नहीं।
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2026-07-22T13:30:11Z
अनुनाद सिंह
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/* अन्य कवियों के बारे में */
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wikitext
text/x-wiki
* साहित्य वस्तुतः मनुष्य का वह उच्छलित आनन्द है जो उसके अंतर में अँटाये नहीं अट सका था। -- (ज्ञान शिखा में)
* साहित्य मानव-जीवन से सीधा उत्पन्न होकर सीधे मानव-जीवन को प्रभावित करता है। साहित्य में उन सारी बातों का जीवन्त विवरण होता है, जिसे मनुष्य ने देखा है, अनुभव किया है, सोचा है और समझा है। -- (साहित्य सहचर में)
* साहित्य यदि जनता के भीतर आत्मविश्वास और अधिकार चेतना की संजीवनी शक्ति नहीं संचारित करता , तो परिणाम बड़े भयंकर होंगे।
* जो साहित्य मनुष्य समाज को रोग, शोक, दारिद्रय, अज्ञान तथा परामुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है।
* जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परामुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता हैं।
* कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* समूचे भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है । इसी का नाम भक्ति साहित्य है । यह एक नई दुनिया है। -- (भक्तिसाहित्य के बारे में)
* निराला से बढकर स्वच्छंदतावादी कवि हिन्दी में नहीं है ।
* महान संकल्प ही महान फल का जनक होता है।
* कर्मफल का सिद्धान्त भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त खोजने पर अन्यान्य देशों के मनीषियों में भी पाया जाता है।
* आध्यात्मिक ऊँचाई तक समाज के बहुत थोड़े लोग ही पहुँच सकते हैं। बाकी लोग छोटे-मोटे दुनियावी टंटों में उलझे रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक आदर्श को विकृत कर देते हैं।
* आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है।
* आसमान में निरन्तर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है।
* कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
* कभी कभी शिष्य परम्परा में ऐसे भी शिष्य निकल आते हैं, जो मूल सम्प्रदाय प्रवर्त्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। फिर भी सम्प्रदाय स्थापना का अभिशाप यह है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिन्तन कम हो जाता है।
* कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंक कर आगे बढ़ जाती है।
* घृणा और द्वेष से जो बढ़ता है, वह शीघ्र ही पतन के गह्वर में गिर पड़ता है।
* जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, अशक्त हो।
* जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कार्य, कितनी ही व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरम्भ किया जाय, वह फलदायक नहीं होगा।
* जितना कुछ इस जीवन शक्ति को समर्थ बनाता है उतना उसका अंग बन जाता है, बाकी फेंक दिया जाता हैं।
* जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है, उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है।
* डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं।
* धर्म मनुष्य से त्याग की आशा रखता है।
* पंडिताई भी एक बोझ है। जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबोती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है, तो सहज हो जाती है तब वह बोझ नहीं रहती।
* प्रवृतियों को दबाना नहीं चाहिए, उनसे दबना भी नहीं चाहिए।
* पावक को कभी कलंक स्पर्श नहीं करता, दीपशिखा को अंधकार की कालिमा नहीं लगती, चंद्रमंडल को आकाश की नीलिमा कलंकित नहीं करती और जाह्नवी की वारिधारा को धरती का कलुष स्पर्श भी नहीं करता।
* पुरुष का सत्य और है, नारी का और।
* पुरुष निःसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वव्द्व है, स्त्री द्वन्द्वोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध।
* पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है, पर स्त्री स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।
* प्रेम बड़ी वस्तु है, त्याग बड़ी वस्तु है और मनुष्य मात्र को वास्तविक मनुष्य बनाने वाला ज्ञान भी बड़ी वस्तु है।
* ब्राह्मण न भिखारी होता है, न महासंधिविग्रहिक, वह धर्म का व्यवस्थापक होता है।
* मनुष्य के भीतर नाखून बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उनके काटने की जो प्रवृत्ति है वह उसकी मनुष्यता की निशानी है।
* मनुष्य में जो मनुष्यता है, जो उसे पशु से अलग कर देती है, वही आराध्य है। क्या साहित्य और क्या राजनीति, सबका एक मात्र लक्ष्य इसी मनुष्यता की सर्वांगीण उन्नति है।
* माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं, यह इतिहास की चिरोद्धोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है।
* माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए , यह सत्य है।
* मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूँ।
* यदि आप संसार की सारी समस्याओं का विश्लेषण करें तो इनके मूल में एक ही बात पाएँगे-मनुष्य की तृष्णा।
* यह नहीं समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जो अनुभव करता है, वह सत्य ही है। शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक है।
* राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है, असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत शिखा से भी अधिक चंचल है।
* राजनैतिक पराधीनता बड़ी बुरी वस्तु है। वह मनुष्य को जीवन यात्रा में अग्रसर होने वाली वस्तुओं से वंचित कर देती है।
* विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक सा होता है। आप दुर्दान्त डाकू के दिल में विनोदप्रियता भर दीजिए, वह लोकतन्त्र का लीडर हो जाएगा, आप समाज सुधार के उत्साही कार्य कर्त्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजेक्शन दे दीजिए, वह अखबारनवीस हो जाएगा।
* शंकाशील हृदयों में प्रेम की वाणी भी शंका उत्पन्न करती है।
* शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा सी अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है।
* सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
* सीधी रेखा खींचना सबसे टेढ़ा काम है।
* स्त्री प्रकृति है। उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किन्तु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है।
* स्नेह बड़ी दारुण वस्तु है, ममता बड़ी प्रचंड शक्ति है।
* स्यारों के स्पर्श से सिंह किशोरी कलुषित नहीं होती। असुरों के गृह में जाने से लक्ष्मी घर्षित नहीं होती। चींटियों के स्पर्श से कामधेनु अपमानित नहीं होती। चरित्रहीनों के बीच वास करने से सरस्वती कलंकित नहीं होती।
* स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होती।
* हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति और हमारी नवनिर्माण की योजनाएँ तभी सर्वमंगल विधायिनी बन सकेंगी जब हमारा हृदय उदार और संवेदनशील होगा, बुद्धि सूक्ष्म और सारग्रहिणी होगी और संकल्प महान और शुभ होगा।
* सुविधाओं को पा लेना ही बड़ी बात नहीं है, प्राप्त सुविधाओं को मनुष्य मात्र के मंगल के लिए नियोजित कर सकना भी बहुत बड़ी बात है।
* सत्य सार्वदेशिक होता है।
* सूचनात्मक संप्रेषण उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना रचनात्मक संप्रेषण।
* भाषा के संदर्भ में आचार्य द्विवेदी ज्ञान को दो-मुँहा पदार्थ मानते हैं। उनके अनुसार एक ओर वैयक्तिक तथ्य जगत है, जो व्यक्तिसापेक्ष होता है, दूसरी तरफ अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत है जो समाजसापेक्ष होता है। इन दोनों के संबंधों की प्रकृति पर विचार करते हुए उनका यह मत है कि वैयक्तिक तथ्य जगत निरंतर दूसरे लोगों के उपलब्ध तथ्य जगत से टकराते रहने के कारण अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत के रूप में परिवर्तित होता रहता है। यह संसार दूसरों की उपलब्धि और स्मृति से बनी तथ्यात्मक ज्ञान राशि से टकरा-टकरा कर बना हुआ पदार्थ है। --डॉ० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, आचार्य द्विवेदी का भाषा विषयक चिंतन, १९९१
* हमारी भाषा सामान्य वैयक्तिक तथ्यात्मक अनुभूतियों को एक व्यक्ति के चित्त से दूसरे के चित्त तक ढोने का साधन भी है; और दीर्घकाल से अनेक अंतर्वैयक्तिक तथ्य-जगतों के संघर्ष से विकसित होनेवाली और संचित होती रहनेवाली ज्ञान-राशि का वाहन भी।
* शब्द इस उद्देश्य से बनाए गए हैं कि व्यक्ति की भावना (अर्थ) दूसरे के चित्त में आसानी से उतार दी जा सके। रुपए का यह कागजी नोट हमारी उलझी हुई सामाजिक व्यवस्था को प्रतीक-रूप में उपस्थित करता है। अति परिचयवश उसके इस रूप की हम उपेक्षा करते हैं। जिस प्रकार बाजार में हमारे श्रम और उत्पादन के जटिल संबंधों को रुपए का नोट प्रतीक-रूप में सामने ला देता है, ठीक उसी प्रकार शब्द हमारी सामाजिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* मैथिली मातृभाषियों की तरह मैं भी अपनी मातृबोली भोजपुरी को देश की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा सिद्ध कर सकता हूँ। इसके लिए, कई तरह के तर्क हो सकते हैं। जैसे इतिहास से गवाही ढूँढ कर कहा जा सकता है कि भारतवर्ष का ज्ञात इतिहास भोजपुरियों से प्रारंभ होता है। जिन सैनिकों के नाम मात्र से सम्राट सिकंदर काँप उठे थे, वे भोजपुरी थे। जिन भिक्षुओं ने पर्वत और समुद्र लाँघकर चीन से जापान तक भारतीय संस्कृति की पताका फहराई थी, वे अधिकांश भोजपुरी थे। चंद्रगुप्त और कुमारजीव भोजपुर की संतान थे और मध्ययुग का सबसे बड़ा प्राणवान पुरुष भोजपुरी था : मेरा मतलब कबीर से है, आदि।
* नाना कारणों से इस देश में और बाहर यह बार-बार विज्ञापित किया जाता है कि इस महादेश में सैकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं और इसीलिए इसमें अखंडता या एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। किन्तु मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि हमारे इस देश ने हजारों वर्ष पहले से भाषा की समस्या हल कर ली थी। हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक ही (संस्कृत) रही है।
* कुछ शताब्दियों तक भारतवर्ष एक विचित्र अवस्था में से गुजरा। उसके न्याय, राजनीति और व्यवहार की भाषा फारसी रही है, हृदय की भाषा तत्तत् प्रदेशों की प्रांतीय भाषाएँ रही हैं और मस्तिष्क की भाषा संस्कृत रही है।
* मैंने जैन-प्रबंधों की प्राकृतगन्धी संस्कृत देखी है और मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि संस्कृत को इतना सरल और प्रांजल बनाना एकदम नवीन और स्फूर्तिदायक प्रयास था। जैन मुनियों ने इसमें प्रांजलता ले आने में कमाल का काम किया है।
* सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता तब तक भाषा का सहज होना असंभव है।
* मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।
* इस युग का मुख्य उद्देश्य मनुष्य है। इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि विज्ञान की सहायता से जहाँ बाह्य भौगोलिक बंधन तड़ातड़ टूट गए हैं वहाँ मानसिक संकीर्णता दूर नहीं हुई है। हम एक-दूसरे को पहचानते नहीं। तीन दिन में सारे संसार की यात्रा करके लौटे हुए यात्रा-विलासी लोगों और नाना प्रकार के स्वार्थपरायणों की पुस्तकों ने संसार में घोर गलतफहमी फैला रखी है। इस देश में ही हम एक प्रदेश वाले दूसरे प्रदेश के लोगों को समझ नहीं रहे, एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों को पहचान नहीं रहे। इसीलिए इतनी मारामारी काटाकाटी चल रही है।
=== हिन्दी के बारे में ===
* हिन्दी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।<ref>[https://sahityakunj.net//entries/view/lokvadi-bhashachintak-acharya-hajari-prasad-dwivedi लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी]</ref>
* उसका (हिन्दी का) कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं क्योंकि उसकी जीवन-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने-आपकी भीतरी शक्ति से महत्वपूर्ण आसन पर अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।
* हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है। हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है क्योंकि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकती है।
* यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। वास्तव में हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है अन्यथा यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो 'हिंदी-हिंदी' चिल्लाना व्यर्थ है।
* सिर्फ यही बात नहीं है कि इस देश में देशी भाषाओं में सदा काव्य लिखे जाते रहे, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उनका भरपूर सम्मान भी बराबर होता रहा। अभिप्राय यह कि संस्कृत का कभी किसी भारतीय भाषा के साथ झगड़ा नहीं रहा। इसी प्रकार अब जब कि संस्कृत की भूमिका में हिंदी को अपनाया गया है तो उसका भी किसी भारतीय भाषा से द्वेष संभव नहीं है।
* हमें एक ऐसी भाषा चुन लेनी है जो हमारी हजारों वर्ष की परंपराओं से कम-से-कम विच्छिन्न हो और हमारी नूतन परिस्थिति का सामना अधिक-से-अधिक मुस्तैदी से कर सकती हो, संस्कृत न होकर भी संस्कृत-सी हो और साथ ही जो प्रत्येक नए विचार को, प्रत्येक नयी भावना को अपना लेने में एकदम हिचकिचाती न हो, जो प्राचीन परंपरा की उत्तराधिकारिणी भी हो और नवीन चिंता की वाहिका भी।
* वस्तुतः हिंदी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं में चौदह आना साम्य ही है, दो आना ही हमें नए सिरे से गढ़ना है।
* हिंदी केंद्रीय भाषा है। बड़े परिश्रम से और बड़ी कठिनाइयों के भीतर से इसके उपासकों ने इसे सार्वदेशिक भाषा का रूप दिया है।
* हिंदी को किसी केंद्रीय राजशक्ति की अंगुली पकड़ाकर आगे नहीं बढ़ाया गया है। विरोधों, आघात-प्रतिघातों के भीतर से ही इसकी शानदार सवारी निकली है।
* वे सब बोलियाँ, जिनका मुख केंद्राभिमुख है, अर्थात् जिनके बोलनेवालों की नाड़ियों में मूल केंद्रीय भाषा से संबद्ध बने रहने के संस्कार दृढ़ निबद्ध हैं - हिंदी हैं। जो बोलियाँ केंद्राभिमुख न होकर अपने आप में ही केंद्रित हो जाती हैं, और तुलसी और सूर को अपना कवि नहीं मानना चाहतीं, वे टूटकर अलग हो जाती हैं।
* हिंदी मात्र व्याकरण नहीं और न ही वह केवल खड़ीबोली के रूप में एक विशिष्ट भाषिक संरचना है। भाषा के रूप में वह एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में भाषाई प्रतीक भी है, और साहित्य के रूप में वह एक जातीय परंपरा भी है।
* हिंदी भारत के केंद्रीय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है जिसके लिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान के विकास का वाहन बनाना आवश्यक है।
* जिस हिंदी को आजकल हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं, वह उर्दू के पर से बनाई गई है तथा हिंदी, मुसलमानी भाषा है क्योंकि शुरू-शुरू में खड़ी बोली मुसलमानों की भाषा मानी जाती थी। उन्होंने उदारतापूर्वक इस तथ्य को रेखांकित किया है कि “पुराने हिंदी कवियों ने जब मुसलमान पात्रों से कोई कविनिषिद्ध प्रौढ़ोक्ति कहलाई है तो खड़ीबोली में बुलवाया है। जिस भाषा को हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं उसकी प्रथम भित्ति-प्रतिष्ठा मुसलमान भाइयों के हाथों हुई है।” वे बलपूर्वक कहते हैं कि यह नहीं कि वह भाषा ही कोई नई बनाई गई है बल्कि यह कि इसे साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का वाहन मुसलमानों ने बनाया।
* उर्दू अभी तक आत्मकेन्द्रित भाषा बनी रही है क्योंकि केंद्राभिमुख-भाषा होने में वह हिंदी के समान है, न कि उसकी जनपदीय बोलियों के। इसीलिए वह सूर, तुलसी, कबीर की परंपरा को अपनी परंपरा नहीं मानती और अन्य संतों और भक्तों के सात्विक साहित्य को अपना साहित्य मानने में कुंठा अनुभव करती रही। साथ ही उसने इस देश की पुरानी परंपरा से, अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत के साहित्य से, घनिष्ठ और अविच्छेद्य संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कभी नहीं किया।
=== संस्कृति और सभ्यता के बारे में ===
* मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति हैं।
* मानव जीवन की तीन स्थितियाँ मानी गई हैं- विकृति, प्रवृति और संस्कृति। विकृति अधोगामिनी स्थिति है तो संस्कृति ऊर्ध्वगामिनी।
* संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की चरम परिणति है। धर्म के समान वह भी अविरोधी वस्तु है। वह समस्त दृश्यमान विरोधों में सामंजस्य उत्पन्न करती है।
* भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सबसे सुन्दर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता हैं।
* मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है।
* सभ्यता की दृष्टि वर्तमान की सुविधा-असुविधा पर रहती है, संस्कृति की भविष्य या अतीत के आदर्श पर।
* सभ्यता बाह्य होने के कारण चंचल है, संस्कृति आंतरिक होने के कारण स्थायी।
* सभ्यता समाज की बाह्य व्यवस्थाओं का नाम है, संस्कृति व्यक्ति के अंतर के विकास का।
* नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और सेवा भक्ति तथा योग मूलक अनूभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम 'संस्कृति' शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं।
===कबीर के बारे में ===
* संयोग से वे ऐसे युग–संधि के समय उत्पन्न हुए थे, जिसे हम विविध धर्म–साधनाओं और मनोभावनाओं का चौराहा कह सकते हैं।
* वे मुसलमान होकर भी असल में मुसलमान नहीं थे। वे हिंदू होकर भी हिंदू नहीं थे। वे साधु होकर भी साधु (अगृहस्थ) नहीं थे।वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे। वे योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे कुछ भगवान की ओर से ही सबसे न्यारे बनाकर भेजे गए थे। वे भगवान के नृसिंहावतार की मानो प्रतिमूर्ति थे।
* उन्हें सौभाग्यवश सुयोग भी अच्छा मिला था। जितने प्रकार के संस्कार पड़ने के रास्ते हैं, वे प्रायः सभी उनके लिए बन्द थे।
* हिंदी साहित्य के हजारों वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेकर उत्पन्न नहीं हुआ।
* पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर सबसे शक्तिशाली और प्रभावोत्पादक व्यक्ति थे।
* कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे।
* भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे।
* कबीर में एक प्रकार घर फूंक मस्ती और पक्कड़ाना लापरवाही के भाव मिलते हैं। उनमें अपने–आपके ऊपर अखंड विश्वास था । उन्होंने कभी भी अपने ज्ञान को, अपने गुरू को, अपनी साधना को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा।
* कबीर ने ऐसी बहुत बातें कही है जिनसे समाज सुधार में सहायता मिलती है। पर, इसलिए उनको समाज सुधारक समझना गलती है।
* कबीर जब पंडित या शेख पर आक्रमण करने को उद्यत होते है तो उतने सावधान नहीं होते जितने अवधूत या योगी पर आक्रमण करते समय दिखते हैं।
* हमने देखा है कि वाह्याचार पर आक्रमण करने वाले संतों और योगियों की कमी नहीं है, पर इस कदर सहज और सरल सरल ढंग से चकनाचूर करने वाली भाषा कबीर के पहले बहुत कम दिखाई दी है।
* व्यंग्य वह है, जहां कहने वाला अधरोष्ठों में हँस रहा हो और सुननेवाला तिलमिला उठा हो और भी कहने वाले को जवाब देना अपने की ओर भी उपहासस्पद् बना लेना हो , कबीर ऐसे ही व्यंग्यकर्त्ता थे।
* ऐसे थे कबीर। सिर से पैर तक मस्त–मौला, स्वभाव में फक्कड़, आदत से अक्खड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचण्ड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय। वे जो कुछ कहते थे अनुभव के आधार पर कहते थे इसलिए उनकी उक्तियॉ बंधने वाली और व्यंग्य चोट करने वाले होते थे।
===सूरदास के बारे में ===
* वात्सल्य भाव के काव्य के लिए सूरदास की बड़ी ख्याति है।
* सूरदास ने यदि राधिका के प्रेम को लेकर गीतिकाव्य की रचना न करके प्रबंध काव्य की रचना की होती तो आज असफल हुए होते हैं।
* गीतिकाव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य ही सूरसागर है।
* प्रेम के इस स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया।
* सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे–पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपको की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है।वह अपने को भूल जाता है।
===नन्ददास के बारे में ===
* सूरदास की गोपियों में जिस प्रकार का अशिक्षित पटुत्व और सारल्यगर्भ माधुर्य पाया जाता है, वैसा नंददास की गोपियों में नहीं पाया जाता। भ्रमरगीत में उद्धव के तर्कों को सुनकर वे शिथिलवाक् होकर परास्त नहीं हो जाती बल्कि आगे बढ़कर उत्तर देती है और तर्क को तर्क से काटने का प्रयत्न करती है।
* निर्गुण भाव के प्रत्याख्यान सूरदास ने भी कराया है और नन्ददास ने भी, पर सूरदास का एकमात्र अस्त्र प्रेमातिरेक है जबकि नन्ददास का सबसे अस्त्र है युक्ति और तर्क, फिर भी नन्ददास की रचनाओं में अपना मोहक सौंदर्य है।
===मीरा के बारे में ===
* माधुर्य भाव में अन्यान्य भक्त कवियों की भाँति मीरा का प्रेम निवेदन है और विरह व्याकुलता अभिमानाश्रित और अध्यंतरित नही है बल्कि सहज और साक्षात् संबंधित है।
* वह सहृदय को स्पंदित और चालित करती है और अपने रग में रंग डालती है।
===रहीम के बारे में ===
* निस्संदेह इस कवि का हृदय मानवीय रस से परिपूर्ण और अनासक्त तथा अनाविल सौंदर्य दृष्टि से समृद्ध था।
* जीवन के अनेक घात प्रतिघात के भीतर से भी राजकीय षड्यंत्रों के चपेट में बार-बार आते रहने के बाद भी और हर प्रकार के उतार-चढ़ाव में उठते – गिरते रहने के बाद भी जिस कवि के हृदय का मानवीय रस निःशेष नही हुआ उसके हृदय की अद्भुत सरसता का अनुमान सहज किया जा सकता है।
===तुलसीदास के बारे में ===
* तुलसीदास असाधारण शक्तिशाली कवि,लोकनायक और महात्मा थे।
* वे समन्वय की विशाल बुद्धि लेकर उत्पन्न हुए थे।
* भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो।
* तुलसी के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय शक्ति में है।
* लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके।
===अन्य कवियों के बारे में ===
* भगवान ने उन्हें रूप देने की बड़ी कंजूसी की थी किंतु शुद्ध निर्मल प्रेमपरायण हृदय देने में बड़ी उदारता से कम लिया था। (जायसी के बारे में )
* जायसी को रहस्यवादी कवि कहा जाता है।
* जिन भजनों में मधुर भाव बोलता दिखता हो उनके लेखक को रहस्र सुख के अधिकारी कहना ही उचित है। (सूरदास के संबंध में )
* कबीर के पूर्ववर्ती सिद्ध और योगी लोगों की आक्रमणात्मक उक्तियों में एक प्रकार की ‘हीन भावना की ग्रंथि’ या ‘इनफीरियारिटी कम्पलेक्स’ पाया जाता है। वे मानो लोमड़ी के खट्टे अंगूर की प्रतिध्वनि है, मानो चिलम न पा सकने वालों का आक्रोश है । उनमें तर्क है पर लापरवाही नहीं है, आक्रोश है पर मस्ती नहीं है, तीव्रता है पर मृदुता नहीं।
==सन्दर्भ==
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33090
33089
2026-07-22T13:38:02Z
अनुनाद सिंह
658
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wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:हजारी प्रसाद द्विवेदी|हजारी प्रसाद द्विवेदी''' आधुनिक युग के [[हिन्दी]] के प्रमुख साहित्यकार थे।
== उक्तियाँ ==
* साहित्य वस्तुतः मनुष्य का वह उच्छलित आनन्द है जो उसके अंतर में अँटाये नहीं अट सका था। -- (ज्ञान शिखा में)
* साहित्य मानव-जीवन से सीधा उत्पन्न होकर सीधे मानव-जीवन को प्रभावित करता है। साहित्य में उन सारी बातों का जीवन्त विवरण होता है, जिसे मनुष्य ने देखा है, अनुभव किया है, सोचा है और समझा है। -- (साहित्य सहचर में)
* साहित्य यदि जनता के भीतर आत्मविश्वास और अधिकार चेतना की संजीवनी शक्ति नहीं संचारित करता , तो परिणाम बड़े भयंकर होंगे।
* जो साहित्य मनुष्य समाज को रोग, शोक, दारिद्रय, अज्ञान तथा परामुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है।
* जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परामुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता हैं।
* कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* समूचे भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है । इसी का नाम भक्ति साहित्य है । यह एक नई दुनिया है। -- (भक्तिसाहित्य के बारे में)
* निराला से बढकर स्वच्छंदतावादी कवि हिन्दी में नहीं है ।
* महान संकल्प ही महान फल का जनक होता है।
* कर्मफल का सिद्धान्त भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त खोजने पर अन्यान्य देशों के मनीषियों में भी पाया जाता है।
* आध्यात्मिक ऊँचाई तक समाज के बहुत थोड़े लोग ही पहुँच सकते हैं। बाकी लोग छोटे-मोटे दुनियावी टंटों में उलझे रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक आदर्श को विकृत कर देते हैं।
* आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है।
* आसमान में निरन्तर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है।
* कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
* कभी कभी शिष्य परम्परा में ऐसे भी शिष्य निकल आते हैं, जो मूल सम्प्रदाय प्रवर्त्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। फिर भी सम्प्रदाय स्थापना का अभिशाप यह है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिन्तन कम हो जाता है।
* कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंक कर आगे बढ़ जाती है।
* घृणा और द्वेष से जो बढ़ता है, वह शीघ्र ही पतन के गह्वर में गिर पड़ता है।
* जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, अशक्त हो।
* जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कार्य, कितनी ही व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरम्भ किया जाय, वह फलदायक नहीं होगा।
* जितना कुछ इस जीवन शक्ति को समर्थ बनाता है उतना उसका अंग बन जाता है, बाकी फेंक दिया जाता हैं।
* जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है, उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है।
* डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं।
* धर्म मनुष्य से त्याग की आशा रखता है।
* पंडिताई भी एक बोझ है। जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबोती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है, तो सहज हो जाती है तब वह बोझ नहीं रहती।
* प्रवृतियों को दबाना नहीं चाहिए, उनसे दबना भी नहीं चाहिए।
* पावक को कभी कलंक स्पर्श नहीं करता, दीपशिखा को अंधकार की कालिमा नहीं लगती, चंद्रमंडल को आकाश की नीलिमा कलंकित नहीं करती और जाह्नवी की वारिधारा को धरती का कलुष स्पर्श भी नहीं करता।
* पुरुष का सत्य और है, नारी का और।
* पुरुष निःसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वव्द्व है, स्त्री द्वन्द्वोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध।
* पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है, पर स्त्री स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।
* प्रेम बड़ी वस्तु है, त्याग बड़ी वस्तु है और मनुष्य मात्र को वास्तविक मनुष्य बनाने वाला ज्ञान भी बड़ी वस्तु है।
* ब्राह्मण न भिखारी होता है, न महासंधिविग्रहिक, वह धर्म का व्यवस्थापक होता है।
* मनुष्य के भीतर नाखून बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उनके काटने की जो प्रवृत्ति है वह उसकी मनुष्यता की निशानी है।
* मनुष्य में जो मनुष्यता है, जो उसे पशु से अलग कर देती है, वही आराध्य है। क्या साहित्य और क्या राजनीति, सबका एक मात्र लक्ष्य इसी मनुष्यता की सर्वांगीण उन्नति है।
* माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं, यह इतिहास की चिरोद्धोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है।
* माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए , यह सत्य है।
* मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूँ।
* यदि आप संसार की सारी समस्याओं का विश्लेषण करें तो इनके मूल में एक ही बात पाएँगे-मनुष्य की तृष्णा।
* यह नहीं समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जो अनुभव करता है, वह सत्य ही है। शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक है।
* राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है, असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत शिखा से भी अधिक चंचल है।
* राजनैतिक पराधीनता बड़ी बुरी वस्तु है। वह मनुष्य को जीवन यात्रा में अग्रसर होने वाली वस्तुओं से वंचित कर देती है।
* विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक सा होता है। आप दुर्दान्त डाकू के दिल में विनोदप्रियता भर दीजिए, वह लोकतन्त्र का लीडर हो जाएगा, आप समाज सुधार के उत्साही कार्य कर्त्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजेक्शन दे दीजिए, वह अखबारनवीस हो जाएगा।
* शंकाशील हृदयों में प्रेम की वाणी भी शंका उत्पन्न करती है।
* शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा सी अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है।
* सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
* सीधी रेखा खींचना सबसे टेढ़ा काम है।
* स्त्री प्रकृति है। उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किन्तु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है।
* स्नेह बड़ी दारुण वस्तु है, ममता बड़ी प्रचंड शक्ति है।
* स्यारों के स्पर्श से सिंह किशोरी कलुषित नहीं होती। असुरों के गृह में जाने से लक्ष्मी घर्षित नहीं होती। चींटियों के स्पर्श से कामधेनु अपमानित नहीं होती। चरित्रहीनों के बीच वास करने से सरस्वती कलंकित नहीं होती।
* स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होती।
* हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति और हमारी नवनिर्माण की योजनाएँ तभी सर्वमंगल विधायिनी बन सकेंगी जब हमारा हृदय उदार और संवेदनशील होगा, बुद्धि सूक्ष्म और सारग्रहिणी होगी और संकल्प महान और शुभ होगा।
* सुविधाओं को पा लेना ही बड़ी बात नहीं है, प्राप्त सुविधाओं को मनुष्य मात्र के मंगल के लिए नियोजित कर सकना भी बहुत बड़ी बात है।
* सत्य सार्वदेशिक होता है।
* सूचनात्मक संप्रेषण उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना रचनात्मक संप्रेषण।
* भाषा के संदर्भ में आचार्य द्विवेदी ज्ञान को दो-मुँहा पदार्थ मानते हैं। उनके अनुसार एक ओर वैयक्तिक तथ्य जगत है, जो व्यक्तिसापेक्ष होता है, दूसरी तरफ अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत है जो समाजसापेक्ष होता है। इन दोनों के संबंधों की प्रकृति पर विचार करते हुए उनका यह मत है कि वैयक्तिक तथ्य जगत निरंतर दूसरे लोगों के उपलब्ध तथ्य जगत से टकराते रहने के कारण अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत के रूप में परिवर्तित होता रहता है। यह संसार दूसरों की उपलब्धि और स्मृति से बनी तथ्यात्मक ज्ञान राशि से टकरा-टकरा कर बना हुआ पदार्थ है। --डॉ० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, आचार्य द्विवेदी का भाषा विषयक चिंतन, १९९१
* हमारी भाषा सामान्य वैयक्तिक तथ्यात्मक अनुभूतियों को एक व्यक्ति के चित्त से दूसरे के चित्त तक ढोने का साधन भी है; और दीर्घकाल से अनेक अंतर्वैयक्तिक तथ्य-जगतों के संघर्ष से विकसित होनेवाली और संचित होती रहनेवाली ज्ञान-राशि का वाहन भी।
* शब्द इस उद्देश्य से बनाए गए हैं कि व्यक्ति की भावना (अर्थ) दूसरे के चित्त में आसानी से उतार दी जा सके। रुपए का यह कागजी नोट हमारी उलझी हुई सामाजिक व्यवस्था को प्रतीक-रूप में उपस्थित करता है। अति परिचयवश उसके इस रूप की हम उपेक्षा करते हैं। जिस प्रकार बाजार में हमारे श्रम और उत्पादन के जटिल संबंधों को रुपए का नोट प्रतीक-रूप में सामने ला देता है, ठीक उसी प्रकार शब्द हमारी सामाजिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* मैथिली मातृभाषियों की तरह मैं भी अपनी मातृबोली भोजपुरी को देश की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा सिद्ध कर सकता हूँ। इसके लिए, कई तरह के तर्क हो सकते हैं। जैसे इतिहास से गवाही ढूँढ कर कहा जा सकता है कि भारतवर्ष का ज्ञात इतिहास भोजपुरियों से प्रारंभ होता है। जिन सैनिकों के नाम मात्र से सम्राट सिकंदर काँप उठे थे, वे भोजपुरी थे। जिन भिक्षुओं ने पर्वत और समुद्र लाँघकर चीन से जापान तक भारतीय संस्कृति की पताका फहराई थी, वे अधिकांश भोजपुरी थे। चंद्रगुप्त और कुमारजीव भोजपुर की संतान थे और मध्ययुग का सबसे बड़ा प्राणवान पुरुष भोजपुरी था : मेरा मतलब कबीर से है, आदि।
* नाना कारणों से इस देश में और बाहर यह बार-बार विज्ञापित किया जाता है कि इस महादेश में सैकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं और इसीलिए इसमें अखंडता या एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। किन्तु मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि हमारे इस देश ने हजारों वर्ष पहले से भाषा की समस्या हल कर ली थी। हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक ही (संस्कृत) रही है।
* कुछ शताब्दियों तक भारतवर्ष एक विचित्र अवस्था में से गुजरा। उसके न्याय, राजनीति और व्यवहार की भाषा फारसी रही है, हृदय की भाषा तत्तत् प्रदेशों की प्रांतीय भाषाएँ रही हैं और मस्तिष्क की भाषा संस्कृत रही है।
* मैंने जैन-प्रबंधों की प्राकृतगन्धी संस्कृत देखी है और मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि संस्कृत को इतना सरल और प्रांजल बनाना एकदम नवीन और स्फूर्तिदायक प्रयास था। जैन मुनियों ने इसमें प्रांजलता ले आने में कमाल का काम किया है।
* सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता तब तक भाषा का सहज होना असंभव है।
* मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।
* इस युग का मुख्य उद्देश्य मनुष्य है। इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि विज्ञान की सहायता से जहाँ बाह्य भौगोलिक बंधन तड़ातड़ टूट गए हैं वहाँ मानसिक संकीर्णता दूर नहीं हुई है। हम एक-दूसरे को पहचानते नहीं। तीन दिन में सारे संसार की यात्रा करके लौटे हुए यात्रा-विलासी लोगों और नाना प्रकार के स्वार्थपरायणों की पुस्तकों ने संसार में घोर गलतफहमी फैला रखी है। इस देश में ही हम एक प्रदेश वाले दूसरे प्रदेश के लोगों को समझ नहीं रहे, एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों को पहचान नहीं रहे। इसीलिए इतनी मारामारी काटाकाटी चल रही है।
=== हिन्दी के बारे में ===
* हिन्दी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।<ref>[https://sahityakunj.net//entries/view/lokvadi-bhashachintak-acharya-hajari-prasad-dwivedi लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी]</ref>
* उसका (हिन्दी का) कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं क्योंकि उसकी जीवन-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने-आपकी भीतरी शक्ति से महत्वपूर्ण आसन पर अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।
* हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है। हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है क्योंकि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकती है।
* यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। वास्तव में हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है अन्यथा यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो 'हिंदी-हिंदी' चिल्लाना व्यर्थ है।
* सिर्फ यही बात नहीं है कि इस देश में देशी भाषाओं में सदा काव्य लिखे जाते रहे, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उनका भरपूर सम्मान भी बराबर होता रहा। अभिप्राय यह कि संस्कृत का कभी किसी भारतीय भाषा के साथ झगड़ा नहीं रहा। इसी प्रकार अब जब कि संस्कृत की भूमिका में हिंदी को अपनाया गया है तो उसका भी किसी भारतीय भाषा से द्वेष संभव नहीं है।
* हमें एक ऐसी भाषा चुन लेनी है जो हमारी हजारों वर्ष की परंपराओं से कम-से-कम विच्छिन्न हो और हमारी नूतन परिस्थिति का सामना अधिक-से-अधिक मुस्तैदी से कर सकती हो, संस्कृत न होकर भी संस्कृत-सी हो और साथ ही जो प्रत्येक नए विचार को, प्रत्येक नयी भावना को अपना लेने में एकदम हिचकिचाती न हो, जो प्राचीन परंपरा की उत्तराधिकारिणी भी हो और नवीन चिंता की वाहिका भी।
* वस्तुतः हिंदी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं में चौदह आना साम्य ही है, दो आना ही हमें नए सिरे से गढ़ना है।
* हिंदी केंद्रीय भाषा है। बड़े परिश्रम से और बड़ी कठिनाइयों के भीतर से इसके उपासकों ने इसे सार्वदेशिक भाषा का रूप दिया है।
* हिंदी को किसी केंद्रीय राजशक्ति की अंगुली पकड़ाकर आगे नहीं बढ़ाया गया है। विरोधों, आघात-प्रतिघातों के भीतर से ही इसकी शानदार सवारी निकली है।
* वे सब बोलियाँ, जिनका मुख केंद्राभिमुख है, अर्थात् जिनके बोलनेवालों की नाड़ियों में मूल केंद्रीय भाषा से संबद्ध बने रहने के संस्कार दृढ़ निबद्ध हैं - हिंदी हैं। जो बोलियाँ केंद्राभिमुख न होकर अपने आप में ही केंद्रित हो जाती हैं, और तुलसी और सूर को अपना कवि नहीं मानना चाहतीं, वे टूटकर अलग हो जाती हैं।
* हिंदी मात्र व्याकरण नहीं और न ही वह केवल खड़ीबोली के रूप में एक विशिष्ट भाषिक संरचना है। भाषा के रूप में वह एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में भाषाई प्रतीक भी है, और साहित्य के रूप में वह एक जातीय परंपरा भी है।
* हिंदी भारत के केंद्रीय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है जिसके लिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान के विकास का वाहन बनाना आवश्यक है।
* जिस हिंदी को आजकल हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं, वह उर्दू के पर से बनाई गई है तथा हिंदी, मुसलमानी भाषा है क्योंकि शुरू-शुरू में खड़ी बोली मुसलमानों की भाषा मानी जाती थी। उन्होंने उदारतापूर्वक इस तथ्य को रेखांकित किया है कि “पुराने हिंदी कवियों ने जब मुसलमान पात्रों से कोई कविनिषिद्ध प्रौढ़ोक्ति कहलाई है तो खड़ीबोली में बुलवाया है। जिस भाषा को हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं उसकी प्रथम भित्ति-प्रतिष्ठा मुसलमान भाइयों के हाथों हुई है।” वे बलपूर्वक कहते हैं कि यह नहीं कि वह भाषा ही कोई नई बनाई गई है बल्कि यह कि इसे साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का वाहन मुसलमानों ने बनाया।
* उर्दू अभी तक आत्मकेन्द्रित भाषा बनी रही है क्योंकि केंद्राभिमुख-भाषा होने में वह हिंदी के समान है, न कि उसकी जनपदीय बोलियों के। इसीलिए वह सूर, तुलसी, कबीर की परंपरा को अपनी परंपरा नहीं मानती और अन्य संतों और भक्तों के सात्विक साहित्य को अपना साहित्य मानने में कुंठा अनुभव करती रही। साथ ही उसने इस देश की पुरानी परंपरा से, अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत के साहित्य से, घनिष्ठ और अविच्छेद्य संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कभी नहीं किया।
=== संस्कृति और सभ्यता के बारे में ===
* मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति हैं।
* मानव जीवन की तीन स्थितियाँ मानी गई हैं- विकृति, प्रवृति और संस्कृति। विकृति अधोगामिनी स्थिति है तो संस्कृति ऊर्ध्वगामिनी।
* संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की चरम परिणति है। धर्म के समान वह भी अविरोधी वस्तु है। वह समस्त दृश्यमान विरोधों में सामंजस्य उत्पन्न करती है।
* भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सबसे सुन्दर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता हैं।
* मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है।
* सभ्यता की दृष्टि वर्तमान की सुविधा-असुविधा पर रहती है, संस्कृति की भविष्य या अतीत के आदर्श पर।
* सभ्यता बाह्य होने के कारण चंचल है, संस्कृति आंतरिक होने के कारण स्थायी।
* सभ्यता समाज की बाह्य व्यवस्थाओं का नाम है, संस्कृति व्यक्ति के अंतर के विकास का।
* नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और सेवा भक्ति तथा योग मूलक अनूभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम 'संस्कृति' शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं।
===कबीर के बारे में ===
* संयोग से वे ऐसे युग–संधि के समय उत्पन्न हुए थे, जिसे हम विविध धर्म–साधनाओं और मनोभावनाओं का चौराहा कह सकते हैं।
* वे मुसलमान होकर भी असल में मुसलमान नहीं थे। वे हिंदू होकर भी हिंदू नहीं थे। वे साधु होकर भी साधु (अगृहस्थ) नहीं थे।वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे। वे योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे कुछ भगवान की ओर से ही सबसे न्यारे बनाकर भेजे गए थे। वे भगवान के नृसिंहावतार की मानो प्रतिमूर्ति थे।
* उन्हें सौभाग्यवश सुयोग भी अच्छा मिला था। जितने प्रकार के संस्कार पड़ने के रास्ते हैं, वे प्रायः सभी उनके लिए बन्द थे।
* हिंदी साहित्य के हजारों वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेकर उत्पन्न नहीं हुआ।
* पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर सबसे शक्तिशाली और प्रभावोत्पादक व्यक्ति थे।
* कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे।
* भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे।
* कबीर में एक प्रकार घर फूंक मस्ती और पक्कड़ाना लापरवाही के भाव मिलते हैं। उनमें अपने–आपके ऊपर अखंड विश्वास था । उन्होंने कभी भी अपने ज्ञान को, अपने गुरू को, अपनी साधना को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा।
* कबीर ने ऐसी बहुत बातें कही है जिनसे समाज सुधार में सहायता मिलती है। पर, इसलिए उनको समाज सुधारक समझना गलती है।
* कबीर जब पंडित या शेख पर आक्रमण करने को उद्यत होते है तो उतने सावधान नहीं होते जितने अवधूत या योगी पर आक्रमण करते समय दिखते हैं।
* हमने देखा है कि वाह्याचार पर आक्रमण करने वाले संतों और योगियों की कमी नहीं है, पर इस कदर सहज और सरल सरल ढंग से चकनाचूर करने वाली भाषा कबीर के पहले बहुत कम दिखाई दी है।
* व्यंग्य वह है, जहां कहने वाला अधरोष्ठों में हँस रहा हो और सुननेवाला तिलमिला उठा हो और भी कहने वाले को जवाब देना अपने की ओर भी उपहासस्पद् बना लेना हो , कबीर ऐसे ही व्यंग्यकर्त्ता थे।
* ऐसे थे कबीर। सिर से पैर तक मस्त–मौला, स्वभाव में फक्कड़, आदत से अक्खड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचण्ड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय। वे जो कुछ कहते थे अनुभव के आधार पर कहते थे इसलिए उनकी उक्तियॉ बंधने वाली और व्यंग्य चोट करने वाले होते थे।
===सूरदास के बारे में ===
* वात्सल्य भाव के काव्य के लिए सूरदास की बड़ी ख्याति है।
* सूरदास ने यदि राधिका के प्रेम को लेकर गीतिकाव्य की रचना न करके प्रबंध काव्य की रचना की होती तो आज असफल हुए होते हैं।
* गीतिकाव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य ही सूरसागर है।
* प्रेम के इस स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया।
* सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे–पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपको की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है।वह अपने को भूल जाता है।
===नन्ददास के बारे में ===
* सूरदास की गोपियों में जिस प्रकार का अशिक्षित पटुत्व और सारल्यगर्भ माधुर्य पाया जाता है, वैसा नंददास की गोपियों में नहीं पाया जाता। भ्रमरगीत में उद्धव के तर्कों को सुनकर वे शिथिलवाक् होकर परास्त नहीं हो जाती बल्कि आगे बढ़कर उत्तर देती है और तर्क को तर्क से काटने का प्रयत्न करती है।
* निर्गुण भाव के प्रत्याख्यान सूरदास ने भी कराया है और नन्ददास ने भी, पर सूरदास का एकमात्र अस्त्र प्रेमातिरेक है जबकि नन्ददास का सबसे अस्त्र है युक्ति और तर्क, फिर भी नन्ददास की रचनाओं में अपना मोहक सौंदर्य है।
===मीरा के बारे में ===
* माधुर्य भाव में अन्यान्य भक्त कवियों की भाँति मीरा का प्रेम निवेदन है और विरह व्याकुलता अभिमानाश्रित और अध्यंतरित नही है बल्कि सहज और साक्षात् संबंधित है।
* वह सहृदय को स्पंदित और चालित करती है और अपने रग में रंग डालती है।
===रहीम के बारे में ===
* निस्संदेह इस कवि का हृदय मानवीय रस से परिपूर्ण और अनासक्त तथा अनाविल सौंदर्य दृष्टि से समृद्ध था।
* जीवन के अनेक घात प्रतिघात के भीतर से भी राजकीय षड्यंत्रों के चपेट में बार-बार आते रहने के बाद भी और हर प्रकार के उतार-चढ़ाव में उठते – गिरते रहने के बाद भी जिस कवि के हृदय का मानवीय रस निःशेष नही हुआ उसके हृदय की अद्भुत सरसता का अनुमान सहज किया जा सकता है।
===तुलसीदास के बारे में ===
* तुलसीदास असाधारण शक्तिशाली कवि,लोकनायक और महात्मा थे।
* वे समन्वय की विशाल बुद्धि लेकर उत्पन्न हुए थे।
* भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो।
* तुलसी के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय शक्ति में है।
* लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके।
===अन्य कवियों के बारे में ===
* भगवान ने उन्हें रूप देने की बड़ी कंजूसी की थी किंतु शुद्ध निर्मल प्रेमपरायण हृदय देने में बड़ी उदारता से कम लिया था। (जायसी के बारे में )
* जायसी को रहस्यवादी कवि कहा जाता है।
* जिन भजनों में मधुर भाव बोलता दिखता हो उनके लेखक को रहस्र सुख के अधिकारी कहना ही उचित है। (सूरदास के संबंध में )
* कबीर के पूर्ववर्ती सिद्ध और योगी लोगों की आक्रमणात्मक उक्तियों में एक प्रकार की ‘हीन भावना की ग्रंथि’ या ‘इनफीरियारिटी कम्पलेक्स’ पाया जाता है। वे मानो लोमड़ी के खट्टे अंगूर की प्रतिध्वनि है, मानो चिलम न पा सकने वालों का आक्रोश है । उनमें तर्क है पर लापरवाही नहीं है, आक्रोश है पर मस्ती नहीं है, तीव्रता है पर मृदुता नहीं।
==सन्दर्भ==
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अनुनाद सिंह
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wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:हजारी प्रसाद द्विवेदी|हजारी प्रसाद द्विवेदी]]''' आधुनिक युग के [[हिन्दी]] के प्रमुख साहित्यकार थे।
== उक्तियाँ ==
* साहित्य वस्तुतः मनुष्य का वह उच्छलित आनन्द है जो उसके अंतर में अँटाये नहीं अट सका था। -- (ज्ञान शिखा में)
* साहित्य मानव-जीवन से सीधा उत्पन्न होकर सीधे मानव-जीवन को प्रभावित करता है। साहित्य में उन सारी बातों का जीवन्त विवरण होता है, जिसे मनुष्य ने देखा है, अनुभव किया है, सोचा है और समझा है। -- (साहित्य सहचर में)
* साहित्य यदि जनता के भीतर आत्मविश्वास और अधिकार चेतना की संजीवनी शक्ति नहीं संचारित करता , तो परिणाम बड़े भयंकर होंगे।
* जो साहित्य मनुष्य समाज को रोग, शोक, दारिद्रय, अज्ञान तथा परामुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है।
* जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परामुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता हैं।
* कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* समूचे भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है । इसी का नाम भक्ति साहित्य है । यह एक नई दुनिया है। -- (भक्तिसाहित्य के बारे में)
* निराला से बढकर स्वच्छंदतावादी कवि हिन्दी में नहीं है ।
* महान संकल्प ही महान फल का जनक होता है।
* कर्मफल का सिद्धान्त भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त खोजने पर अन्यान्य देशों के मनीषियों में भी पाया जाता है।
* आध्यात्मिक ऊँचाई तक समाज के बहुत थोड़े लोग ही पहुँच सकते हैं। बाकी लोग छोटे-मोटे दुनियावी टंटों में उलझे रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक आदर्श को विकृत कर देते हैं।
* आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है।
* आसमान में निरन्तर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है।
* कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
* कभी कभी शिष्य परम्परा में ऐसे भी शिष्य निकल आते हैं, जो मूल सम्प्रदाय प्रवर्त्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। फिर भी सम्प्रदाय स्थापना का अभिशाप यह है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिन्तन कम हो जाता है।
* कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंक कर आगे बढ़ जाती है।
* घृणा और द्वेष से जो बढ़ता है, वह शीघ्र ही पतन के गह्वर में गिर पड़ता है।
* जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, अशक्त हो।
* जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कार्य, कितनी ही व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरम्भ किया जाय, वह फलदायक नहीं होगा।
* जितना कुछ इस जीवन शक्ति को समर्थ बनाता है उतना उसका अंग बन जाता है, बाकी फेंक दिया जाता हैं।
* जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है, उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है।
* डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं।
* धर्म मनुष्य से त्याग की आशा रखता है।
* पंडिताई भी एक बोझ है। जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबोती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है, तो सहज हो जाती है तब वह बोझ नहीं रहती।
* प्रवृतियों को दबाना नहीं चाहिए, उनसे दबना भी नहीं चाहिए।
* पावक को कभी कलंक स्पर्श नहीं करता, दीपशिखा को अंधकार की कालिमा नहीं लगती, चंद्रमंडल को आकाश की नीलिमा कलंकित नहीं करती और जाह्नवी की वारिधारा को धरती का कलुष स्पर्श भी नहीं करता।
* पुरुष का सत्य और है, नारी का और।
* पुरुष निःसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वव्द्व है, स्त्री द्वन्द्वोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध।
* पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है, पर स्त्री स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।
* प्रेम बड़ी वस्तु है, त्याग बड़ी वस्तु है और मनुष्य मात्र को वास्तविक मनुष्य बनाने वाला ज्ञान भी बड़ी वस्तु है।
* ब्राह्मण न भिखारी होता है, न महासंधिविग्रहिक, वह धर्म का व्यवस्थापक होता है।
* मनुष्य के भीतर नाखून बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उनके काटने की जो प्रवृत्ति है वह उसकी मनुष्यता की निशानी है।
* मनुष्य में जो मनुष्यता है, जो उसे पशु से अलग कर देती है, वही आराध्य है। क्या साहित्य और क्या राजनीति, सबका एक मात्र लक्ष्य इसी मनुष्यता की सर्वांगीण उन्नति है।
* माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं, यह इतिहास की चिरोद्धोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है।
* माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए , यह सत्य है।
* मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूँ।
* यदि आप संसार की सारी समस्याओं का विश्लेषण करें तो इनके मूल में एक ही बात पाएँगे-मनुष्य की तृष्णा।
* यह नहीं समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जो अनुभव करता है, वह सत्य ही है। शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक है।
* राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है, असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत शिखा से भी अधिक चंचल है।
* राजनैतिक पराधीनता बड़ी बुरी वस्तु है। वह मनुष्य को जीवन यात्रा में अग्रसर होने वाली वस्तुओं से वंचित कर देती है।
* विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक सा होता है। आप दुर्दान्त डाकू के दिल में विनोदप्रियता भर दीजिए, वह लोकतन्त्र का लीडर हो जाएगा, आप समाज सुधार के उत्साही कार्य कर्त्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजेक्शन दे दीजिए, वह अखबारनवीस हो जाएगा।
* शंकाशील हृदयों में प्रेम की वाणी भी शंका उत्पन्न करती है।
* शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा सी अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है।
* सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
* सीधी रेखा खींचना सबसे टेढ़ा काम है।
* स्त्री प्रकृति है। उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किन्तु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है।
* स्नेह बड़ी दारुण वस्तु है, ममता बड़ी प्रचंड शक्ति है।
* स्यारों के स्पर्श से सिंह किशोरी कलुषित नहीं होती। असुरों के गृह में जाने से लक्ष्मी घर्षित नहीं होती। चींटियों के स्पर्श से कामधेनु अपमानित नहीं होती। चरित्रहीनों के बीच वास करने से सरस्वती कलंकित नहीं होती।
* स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होती।
* हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति और हमारी नवनिर्माण की योजनाएँ तभी सर्वमंगल विधायिनी बन सकेंगी जब हमारा हृदय उदार और संवेदनशील होगा, बुद्धि सूक्ष्म और सारग्रहिणी होगी और संकल्प महान और शुभ होगा।
* सुविधाओं को पा लेना ही बड़ी बात नहीं है, प्राप्त सुविधाओं को मनुष्य मात्र के मंगल के लिए नियोजित कर सकना भी बहुत बड़ी बात है।
* सत्य सार्वदेशिक होता है।
* सूचनात्मक संप्रेषण उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना रचनात्मक संप्रेषण।
* भाषा के संदर्भ में आचार्य द्विवेदी ज्ञान को दो-मुँहा पदार्थ मानते हैं। उनके अनुसार एक ओर वैयक्तिक तथ्य जगत है, जो व्यक्तिसापेक्ष होता है, दूसरी तरफ अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत है जो समाजसापेक्ष होता है। इन दोनों के संबंधों की प्रकृति पर विचार करते हुए उनका यह मत है कि वैयक्तिक तथ्य जगत निरंतर दूसरे लोगों के उपलब्ध तथ्य जगत से टकराते रहने के कारण अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत के रूप में परिवर्तित होता रहता है। यह संसार दूसरों की उपलब्धि और स्मृति से बनी तथ्यात्मक ज्ञान राशि से टकरा-टकरा कर बना हुआ पदार्थ है। --डॉ० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, आचार्य द्विवेदी का भाषा विषयक चिंतन, १९९१
* हमारी भाषा सामान्य वैयक्तिक तथ्यात्मक अनुभूतियों को एक व्यक्ति के चित्त से दूसरे के चित्त तक ढोने का साधन भी है; और दीर्घकाल से अनेक अंतर्वैयक्तिक तथ्य-जगतों के संघर्ष से विकसित होनेवाली और संचित होती रहनेवाली ज्ञान-राशि का वाहन भी।
* शब्द इस उद्देश्य से बनाए गए हैं कि व्यक्ति की भावना (अर्थ) दूसरे के चित्त में आसानी से उतार दी जा सके। रुपए का यह कागजी नोट हमारी उलझी हुई सामाजिक व्यवस्था को प्रतीक-रूप में उपस्थित करता है। अति परिचयवश उसके इस रूप की हम उपेक्षा करते हैं। जिस प्रकार बाजार में हमारे श्रम और उत्पादन के जटिल संबंधों को रुपए का नोट प्रतीक-रूप में सामने ला देता है, ठीक उसी प्रकार शब्द हमारी सामाजिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* मैथिली मातृभाषियों की तरह मैं भी अपनी मातृबोली भोजपुरी को देश की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा सिद्ध कर सकता हूँ। इसके लिए, कई तरह के तर्क हो सकते हैं। जैसे इतिहास से गवाही ढूँढ कर कहा जा सकता है कि भारतवर्ष का ज्ञात इतिहास भोजपुरियों से प्रारंभ होता है। जिन सैनिकों के नाम मात्र से सम्राट सिकंदर काँप उठे थे, वे भोजपुरी थे। जिन भिक्षुओं ने पर्वत और समुद्र लाँघकर चीन से जापान तक भारतीय संस्कृति की पताका फहराई थी, वे अधिकांश भोजपुरी थे। चंद्रगुप्त और कुमारजीव भोजपुर की संतान थे और मध्ययुग का सबसे बड़ा प्राणवान पुरुष भोजपुरी था : मेरा मतलब कबीर से है, आदि।
* नाना कारणों से इस देश में और बाहर यह बार-बार विज्ञापित किया जाता है कि इस महादेश में सैकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं और इसीलिए इसमें अखंडता या एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। किन्तु मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि हमारे इस देश ने हजारों वर्ष पहले से भाषा की समस्या हल कर ली थी। हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक ही (संस्कृत) रही है।
* कुछ शताब्दियों तक भारतवर्ष एक विचित्र अवस्था में से गुजरा। उसके न्याय, राजनीति और व्यवहार की भाषा फारसी रही है, हृदय की भाषा तत्तत् प्रदेशों की प्रांतीय भाषाएँ रही हैं और मस्तिष्क की भाषा संस्कृत रही है।
* मैंने जैन-प्रबंधों की प्राकृतगन्धी संस्कृत देखी है और मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि संस्कृत को इतना सरल और प्रांजल बनाना एकदम नवीन और स्फूर्तिदायक प्रयास था। जैन मुनियों ने इसमें प्रांजलता ले आने में कमाल का काम किया है।
* सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता तब तक भाषा का सहज होना असंभव है।
* मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।
* इस युग का मुख्य उद्देश्य मनुष्य है। इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि विज्ञान की सहायता से जहाँ बाह्य भौगोलिक बंधन तड़ातड़ टूट गए हैं वहाँ मानसिक संकीर्णता दूर नहीं हुई है। हम एक-दूसरे को पहचानते नहीं। तीन दिन में सारे संसार की यात्रा करके लौटे हुए यात्रा-विलासी लोगों और नाना प्रकार के स्वार्थपरायणों की पुस्तकों ने संसार में घोर गलतफहमी फैला रखी है। इस देश में ही हम एक प्रदेश वाले दूसरे प्रदेश के लोगों को समझ नहीं रहे, एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों को पहचान नहीं रहे। इसीलिए इतनी मारामारी काटाकाटी चल रही है।
=== हिन्दी के बारे में ===
* हिन्दी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।<ref>[https://sahityakunj.net//entries/view/lokvadi-bhashachintak-acharya-hajari-prasad-dwivedi लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी]</ref>
* उसका (हिन्दी का) कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं क्योंकि उसकी जीवन-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने-आपकी भीतरी शक्ति से महत्वपूर्ण आसन पर अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।
* हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है। हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है क्योंकि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकती है।
* यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। वास्तव में हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है अन्यथा यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो 'हिंदी-हिंदी' चिल्लाना व्यर्थ है।
* सिर्फ यही बात नहीं है कि इस देश में देशी भाषाओं में सदा काव्य लिखे जाते रहे, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उनका भरपूर सम्मान भी बराबर होता रहा। अभिप्राय यह कि संस्कृत का कभी किसी भारतीय भाषा के साथ झगड़ा नहीं रहा। इसी प्रकार अब जब कि संस्कृत की भूमिका में हिंदी को अपनाया गया है तो उसका भी किसी भारतीय भाषा से द्वेष संभव नहीं है।
* हमें एक ऐसी भाषा चुन लेनी है जो हमारी हजारों वर्ष की परंपराओं से कम-से-कम विच्छिन्न हो और हमारी नूतन परिस्थिति का सामना अधिक-से-अधिक मुस्तैदी से कर सकती हो, संस्कृत न होकर भी संस्कृत-सी हो और साथ ही जो प्रत्येक नए विचार को, प्रत्येक नयी भावना को अपना लेने में एकदम हिचकिचाती न हो, जो प्राचीन परंपरा की उत्तराधिकारिणी भी हो और नवीन चिंता की वाहिका भी।
* वस्तुतः हिंदी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं में चौदह आना साम्य ही है, दो आना ही हमें नए सिरे से गढ़ना है।
* हिंदी केंद्रीय भाषा है। बड़े परिश्रम से और बड़ी कठिनाइयों के भीतर से इसके उपासकों ने इसे सार्वदेशिक भाषा का रूप दिया है।
* हिंदी को किसी केंद्रीय राजशक्ति की अंगुली पकड़ाकर आगे नहीं बढ़ाया गया है। विरोधों, आघात-प्रतिघातों के भीतर से ही इसकी शानदार सवारी निकली है।
* वे सब बोलियाँ, जिनका मुख केंद्राभिमुख है, अर्थात् जिनके बोलनेवालों की नाड़ियों में मूल केंद्रीय भाषा से संबद्ध बने रहने के संस्कार दृढ़ निबद्ध हैं - हिंदी हैं। जो बोलियाँ केंद्राभिमुख न होकर अपने आप में ही केंद्रित हो जाती हैं, और तुलसी और सूर को अपना कवि नहीं मानना चाहतीं, वे टूटकर अलग हो जाती हैं।
* हिंदी मात्र व्याकरण नहीं और न ही वह केवल खड़ीबोली के रूप में एक विशिष्ट भाषिक संरचना है। भाषा के रूप में वह एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में भाषाई प्रतीक भी है, और साहित्य के रूप में वह एक जातीय परंपरा भी है।
* हिंदी भारत के केंद्रीय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है जिसके लिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान के विकास का वाहन बनाना आवश्यक है।
* जिस हिंदी को आजकल हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं, वह उर्दू के पर से बनाई गई है तथा हिंदी, मुसलमानी भाषा है क्योंकि शुरू-शुरू में खड़ी बोली मुसलमानों की भाषा मानी जाती थी। उन्होंने उदारतापूर्वक इस तथ्य को रेखांकित किया है कि “पुराने हिंदी कवियों ने जब मुसलमान पात्रों से कोई कविनिषिद्ध प्रौढ़ोक्ति कहलाई है तो खड़ीबोली में बुलवाया है। जिस भाषा को हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं उसकी प्रथम भित्ति-प्रतिष्ठा मुसलमान भाइयों के हाथों हुई है।” वे बलपूर्वक कहते हैं कि यह नहीं कि वह भाषा ही कोई नई बनाई गई है बल्कि यह कि इसे साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का वाहन मुसलमानों ने बनाया।
* उर्दू अभी तक आत्मकेन्द्रित भाषा बनी रही है क्योंकि केंद्राभिमुख-भाषा होने में वह हिंदी के समान है, न कि उसकी जनपदीय बोलियों के। इसीलिए वह सूर, तुलसी, कबीर की परंपरा को अपनी परंपरा नहीं मानती और अन्य संतों और भक्तों के सात्विक साहित्य को अपना साहित्य मानने में कुंठा अनुभव करती रही। साथ ही उसने इस देश की पुरानी परंपरा से, अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत के साहित्य से, घनिष्ठ और अविच्छेद्य संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कभी नहीं किया।
=== संस्कृति और सभ्यता के बारे में ===
* मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति हैं।
* मानव जीवन की तीन स्थितियाँ मानी गई हैं- विकृति, प्रवृति और संस्कृति। विकृति अधोगामिनी स्थिति है तो संस्कृति ऊर्ध्वगामिनी।
* संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की चरम परिणति है। धर्म के समान वह भी अविरोधी वस्तु है। वह समस्त दृश्यमान विरोधों में सामंजस्य उत्पन्न करती है।
* भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सबसे सुन्दर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता हैं।
* मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है।
* सभ्यता की दृष्टि वर्तमान की सुविधा-असुविधा पर रहती है, संस्कृति की भविष्य या अतीत के आदर्श पर।
* सभ्यता बाह्य होने के कारण चंचल है, संस्कृति आंतरिक होने के कारण स्थायी।
* सभ्यता समाज की बाह्य व्यवस्थाओं का नाम है, संस्कृति व्यक्ति के अंतर के विकास का।
* नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और सेवा भक्ति तथा योग मूलक अनूभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम 'संस्कृति' शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं।
===कबीर के बारे में ===
* संयोग से वे ऐसे युग–संधि के समय उत्पन्न हुए थे, जिसे हम विविध धर्म–साधनाओं और मनोभावनाओं का चौराहा कह सकते हैं।
* वे मुसलमान होकर भी असल में मुसलमान नहीं थे। वे हिंदू होकर भी हिंदू नहीं थे। वे साधु होकर भी साधु (अगृहस्थ) नहीं थे।वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे। वे योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे कुछ भगवान की ओर से ही सबसे न्यारे बनाकर भेजे गए थे। वे भगवान के नृसिंहावतार की मानो प्रतिमूर्ति थे।
* उन्हें सौभाग्यवश सुयोग भी अच्छा मिला था। जितने प्रकार के संस्कार पड़ने के रास्ते हैं, वे प्रायः सभी उनके लिए बन्द थे।
* हिंदी साहित्य के हजारों वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेकर उत्पन्न नहीं हुआ।
* पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर सबसे शक्तिशाली और प्रभावोत्पादक व्यक्ति थे।
* कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे।
* भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे।
* कबीर में एक प्रकार घर फूंक मस्ती और पक्कड़ाना लापरवाही के भाव मिलते हैं। उनमें अपने–आपके ऊपर अखंड विश्वास था । उन्होंने कभी भी अपने ज्ञान को, अपने गुरू को, अपनी साधना को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा।
* कबीर ने ऐसी बहुत बातें कही है जिनसे समाज सुधार में सहायता मिलती है। पर, इसलिए उनको समाज सुधारक समझना गलती है।
* कबीर जब पंडित या शेख पर आक्रमण करने को उद्यत होते है तो उतने सावधान नहीं होते जितने अवधूत या योगी पर आक्रमण करते समय दिखते हैं।
* हमने देखा है कि वाह्याचार पर आक्रमण करने वाले संतों और योगियों की कमी नहीं है, पर इस कदर सहज और सरल सरल ढंग से चकनाचूर करने वाली भाषा कबीर के पहले बहुत कम दिखाई दी है।
* व्यंग्य वह है, जहां कहने वाला अधरोष्ठों में हँस रहा हो और सुननेवाला तिलमिला उठा हो और भी कहने वाले को जवाब देना अपने की ओर भी उपहासस्पद् बना लेना हो , कबीर ऐसे ही व्यंग्यकर्त्ता थे।
* ऐसे थे कबीर। सिर से पैर तक मस्त–मौला, स्वभाव में फक्कड़, आदत से अक्खड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचण्ड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय। वे जो कुछ कहते थे अनुभव के आधार पर कहते थे इसलिए उनकी उक्तियॉ बंधने वाली और व्यंग्य चोट करने वाले होते थे।
===सूरदास के बारे में ===
* वात्सल्य भाव के काव्य के लिए सूरदास की बड़ी ख्याति है।
* सूरदास ने यदि राधिका के प्रेम को लेकर गीतिकाव्य की रचना न करके प्रबंध काव्य की रचना की होती तो आज असफल हुए होते हैं।
* गीतिकाव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य ही सूरसागर है।
* प्रेम के इस स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया।
* सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे–पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपको की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है।वह अपने को भूल जाता है।
===नन्ददास के बारे में ===
* सूरदास की गोपियों में जिस प्रकार का अशिक्षित पटुत्व और सारल्यगर्भ माधुर्य पाया जाता है, वैसा नंददास की गोपियों में नहीं पाया जाता। भ्रमरगीत में उद्धव के तर्कों को सुनकर वे शिथिलवाक् होकर परास्त नहीं हो जाती बल्कि आगे बढ़कर उत्तर देती है और तर्क को तर्क से काटने का प्रयत्न करती है।
* निर्गुण भाव के प्रत्याख्यान सूरदास ने भी कराया है और नन्ददास ने भी, पर सूरदास का एकमात्र अस्त्र प्रेमातिरेक है जबकि नन्ददास का सबसे अस्त्र है युक्ति और तर्क, फिर भी नन्ददास की रचनाओं में अपना मोहक सौंदर्य है।
===मीरा के बारे में ===
* माधुर्य भाव में अन्यान्य भक्त कवियों की भाँति मीरा का प्रेम निवेदन है और विरह व्याकुलता अभिमानाश्रित और अध्यंतरित नही है बल्कि सहज और साक्षात् संबंधित है।
* वह सहृदय को स्पंदित और चालित करती है और अपने रग में रंग डालती है।
===रहीम के बारे में ===
* निस्संदेह इस कवि का हृदय मानवीय रस से परिपूर्ण और अनासक्त तथा अनाविल सौंदर्य दृष्टि से समृद्ध था।
* जीवन के अनेक घात प्रतिघात के भीतर से भी राजकीय षड्यंत्रों के चपेट में बार-बार आते रहने के बाद भी और हर प्रकार के उतार-चढ़ाव में उठते – गिरते रहने के बाद भी जिस कवि के हृदय का मानवीय रस निःशेष नही हुआ उसके हृदय की अद्भुत सरसता का अनुमान सहज किया जा सकता है।
===तुलसीदास के बारे में ===
* तुलसीदास असाधारण शक्तिशाली कवि,लोकनायक और महात्मा थे।
* वे समन्वय की विशाल बुद्धि लेकर उत्पन्न हुए थे।
* भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो।
* तुलसी के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय शक्ति में है।
* लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके।
===अन्य कवियों के बारे में ===
* भगवान ने उन्हें रूप देने की बड़ी कंजूसी की थी किंतु शुद्ध निर्मल प्रेमपरायण हृदय देने में बड़ी उदारता से कम लिया था। (जायसी के बारे में )
* जायसी को रहस्यवादी कवि कहा जाता है।
* जिन भजनों में मधुर भाव बोलता दिखता हो उनके लेखक को रहस्र सुख के अधिकारी कहना ही उचित है। (सूरदास के संबंध में )
* कबीर के पूर्ववर्ती सिद्ध और योगी लोगों की आक्रमणात्मक उक्तियों में एक प्रकार की ‘हीन भावना की ग्रंथि’ या ‘इनफीरियारिटी कम्पलेक्स’ पाया जाता है। वे मानो लोमड़ी के खट्टे अंगूर की प्रतिध्वनि है, मानो चिलम न पा सकने वालों का आक्रोश है । उनमें तर्क है पर लापरवाही नहीं है, आक्रोश है पर मस्ती नहीं है, तीव्रता है पर मृदुता नहीं।
==सन्दर्भ==
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2026-07-22T17:38:04Z
अनुनाद सिंह
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wikitext
text/x-wiki
'''[[:w:हजारी प्रसाद द्विवेदी|हजारी प्रसाद द्विवेदी]]''' आधुनिक युग के [[हिन्दी]] के प्रमुख साहित्यकार थे। उन्होंने हिंदी समीक्षा को सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक दोनों दृष्टियों से काफी समृद्ध बनाया है। उन्होंने अपने मानवतावादी दर्शन से मनुष्य की महत्ता प्रतिपादित करते हुए साहित्य की व्याख्या की। नए लेखकों को भी इस ओर प्रेरित किया । इतिहास के उन तत्वों को खोज निकाला जिनमें मानवता के विकास के सूत्र मिलते हैं और भारतवर्ष के विकास की कहानी मिलती है। इस तरह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का हिंदी समीक्षा के विकास में बहुत बड़ा एवं अतुलनीय योगदान है।
== उक्तियाँ ==
* साहित्य वस्तुतः मनुष्य का वह उच्छलित आनन्द है जो उसके अंतर में अँटाये नहीं अट सका था। -- (ज्ञान शिखा में)
* साहित्य मानव-जीवन से सीधा उत्पन्न होकर सीधे मानव-जीवन को प्रभावित करता है। साहित्य में उन सारी बातों का जीवन्त विवरण होता है, जिसे मनुष्य ने देखा है, अनुभव किया है, सोचा है और समझा है। -- (साहित्य सहचर में)
* साहित्य यदि जनता के भीतर आत्मविश्वास और अधिकार चेतना की संजीवनी शक्ति नहीं संचारित करता , तो परिणाम बड़े भयंकर होंगे।
* जो साहित्य मनुष्य समाज को रोग, शोक, दारिद्रय, अज्ञान तथा परामुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है।
* जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परामुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता हैं।
* कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
* समूचे भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है । इसी का नाम भक्ति साहित्य है । यह एक नई दुनिया है। -- (भक्तिसाहित्य के बारे में)
* निराला से बढकर स्वच्छंदतावादी कवि हिन्दी में नहीं है ।
* महान संकल्प ही महान फल का जनक होता है।
* कर्मफल का सिद्धान्त भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त खोजने पर अन्यान्य देशों के मनीषियों में भी पाया जाता है।
* आध्यात्मिक ऊँचाई तक समाज के बहुत थोड़े लोग ही पहुँच सकते हैं। बाकी लोग छोटे-मोटे दुनियावी टंटों में उलझे रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक आदर्श को विकृत कर देते हैं।
* आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है।
* आसमान में निरन्तर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है।
* कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
* कभी कभी शिष्य परम्परा में ऐसे भी शिष्य निकल आते हैं, जो मूल सम्प्रदाय प्रवर्त्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। फिर भी सम्प्रदाय स्थापना का अभिशाप यह है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिन्तन कम हो जाता है।
* कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंक कर आगे बढ़ जाती है।
* घृणा और द्वेष से जो बढ़ता है, वह शीघ्र ही पतन के गह्वर में गिर पड़ता है।
* जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, अशक्त हो।
* जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कार्य, कितनी ही व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरम्भ किया जाय, वह फलदायक नहीं होगा।
* जितना कुछ इस जीवन शक्ति को समर्थ बनाता है उतना उसका अंग बन जाता है, बाकी फेंक दिया जाता हैं।
* जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है, उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है।
* डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं।
* धर्म मनुष्य से त्याग की आशा रखता है।
* पंडिताई भी एक बोझ है। जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबोती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है, तो सहज हो जाती है तब वह बोझ नहीं रहती।
* प्रवृतियों को दबाना नहीं चाहिए, उनसे दबना भी नहीं चाहिए।
* पावक को कभी कलंक स्पर्श नहीं करता, दीपशिखा को अंधकार की कालिमा नहीं लगती, चंद्रमंडल को आकाश की नीलिमा कलंकित नहीं करती और जाह्नवी की वारिधारा को धरती का कलुष स्पर्श भी नहीं करता।
* पुरुष का सत्य और है, नारी का और।
* पुरुष निःसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वव्द्व है, स्त्री द्वन्द्वोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध।
* पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है, पर स्त्री स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।
* प्रेम बड़ी वस्तु है, त्याग बड़ी वस्तु है और मनुष्य मात्र को वास्तविक मनुष्य बनाने वाला ज्ञान भी बड़ी वस्तु है।
* ब्राह्मण न भिखारी होता है, न महासंधिविग्रहिक, वह धर्म का व्यवस्थापक होता है।
* मनुष्य के भीतर नाखून बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उनके काटने की जो प्रवृत्ति है वह उसकी मनुष्यता की निशानी है।
* मनुष्य में जो मनुष्यता है, जो उसे पशु से अलग कर देती है, वही आराध्य है। क्या साहित्य और क्या राजनीति, सबका एक मात्र लक्ष्य इसी मनुष्यता की सर्वांगीण उन्नति है।
* माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं, यह इतिहास की चिरोद्धोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है।
* माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए , यह सत्य है।
* मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूँ।
* यदि आप संसार की सारी समस्याओं का विश्लेषण करें तो इनके मूल में एक ही बात पाएँगे-मनुष्य की तृष्णा।
* यह नहीं समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जो अनुभव करता है, वह सत्य ही है। शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक है।
* राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है, असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत शिखा से भी अधिक चंचल है।
* राजनैतिक पराधीनता बड़ी बुरी वस्तु है। वह मनुष्य को जीवन यात्रा में अग्रसर होने वाली वस्तुओं से वंचित कर देती है।
* विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक सा होता है। आप दुर्दान्त डाकू के दिल में विनोदप्रियता भर दीजिए, वह लोकतन्त्र का लीडर हो जाएगा, आप समाज सुधार के उत्साही कार्य कर्त्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजेक्शन दे दीजिए, वह अखबारनवीस हो जाएगा।
* शंकाशील हृदयों में प्रेम की वाणी भी शंका उत्पन्न करती है।
* शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा सी अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है।
* सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
* सीधी रेखा खींचना सबसे टेढ़ा काम है।
* स्त्री प्रकृति है। उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किन्तु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है।
* स्नेह बड़ी दारुण वस्तु है, ममता बड़ी प्रचंड शक्ति है।
* स्यारों के स्पर्श से सिंह किशोरी कलुषित नहीं होती। असुरों के गृह में जाने से लक्ष्मी घर्षित नहीं होती। चींटियों के स्पर्श से कामधेनु अपमानित नहीं होती। चरित्रहीनों के बीच वास करने से सरस्वती कलंकित नहीं होती।
* स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होती।
* हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति और हमारी नवनिर्माण की योजनाएँ तभी सर्वमंगल विधायिनी बन सकेंगी जब हमारा हृदय उदार और संवेदनशील होगा, बुद्धि सूक्ष्म और सारग्रहिणी होगी और संकल्प महान और शुभ होगा।
* सुविधाओं को पा लेना ही बड़ी बात नहीं है, प्राप्त सुविधाओं को मनुष्य मात्र के मंगल के लिए नियोजित कर सकना भी बहुत बड़ी बात है।
* सत्य सार्वदेशिक होता है।
* सूचनात्मक संप्रेषण उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना रचनात्मक संप्रेषण।
* भाषा के संदर्भ में आचार्य द्विवेदी ज्ञान को दो-मुँहा पदार्थ मानते हैं। उनके अनुसार एक ओर वैयक्तिक तथ्य जगत है, जो व्यक्तिसापेक्ष होता है, दूसरी तरफ अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत है जो समाजसापेक्ष होता है। इन दोनों के संबंधों की प्रकृति पर विचार करते हुए उनका यह मत है कि वैयक्तिक तथ्य जगत निरंतर दूसरे लोगों के उपलब्ध तथ्य जगत से टकराते रहने के कारण अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत के रूप में परिवर्तित होता रहता है। यह संसार दूसरों की उपलब्धि और स्मृति से बनी तथ्यात्मक ज्ञान राशि से टकरा-टकरा कर बना हुआ पदार्थ है। --डॉ० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, आचार्य द्विवेदी का भाषा विषयक चिंतन, १९९१
* हमारी भाषा सामान्य वैयक्तिक तथ्यात्मक अनुभूतियों को एक व्यक्ति के चित्त से दूसरे के चित्त तक ढोने का साधन भी है; और दीर्घकाल से अनेक अंतर्वैयक्तिक तथ्य-जगतों के संघर्ष से विकसित होनेवाली और संचित होती रहनेवाली ज्ञान-राशि का वाहन भी।
* शब्द इस उद्देश्य से बनाए गए हैं कि व्यक्ति की भावना (अर्थ) दूसरे के चित्त में आसानी से उतार दी जा सके। रुपए का यह कागजी नोट हमारी उलझी हुई सामाजिक व्यवस्था को प्रतीक-रूप में उपस्थित करता है। अति परिचयवश उसके इस रूप की हम उपेक्षा करते हैं। जिस प्रकार बाजार में हमारे श्रम और उत्पादन के जटिल संबंधों को रुपए का नोट प्रतीक-रूप में सामने ला देता है, ठीक उसी प्रकार शब्द हमारी सामाजिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* मैथिली मातृभाषियों की तरह मैं भी अपनी मातृबोली भोजपुरी को देश की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा सिद्ध कर सकता हूँ। इसके लिए, कई तरह के तर्क हो सकते हैं। जैसे इतिहास से गवाही ढूँढ कर कहा जा सकता है कि भारतवर्ष का ज्ञात इतिहास भोजपुरियों से प्रारंभ होता है। जिन सैनिकों के नाम मात्र से सम्राट सिकंदर काँप उठे थे, वे भोजपुरी थे। जिन भिक्षुओं ने पर्वत और समुद्र लाँघकर चीन से जापान तक भारतीय संस्कृति की पताका फहराई थी, वे अधिकांश भोजपुरी थे। चंद्रगुप्त और कुमारजीव भोजपुर की संतान थे और मध्ययुग का सबसे बड़ा प्राणवान पुरुष भोजपुरी था : मेरा मतलब कबीर से है, आदि।
* नाना कारणों से इस देश में और बाहर यह बार-बार विज्ञापित किया जाता है कि इस महादेश में सैकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं और इसीलिए इसमें अखंडता या एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। किन्तु मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि हमारे इस देश ने हजारों वर्ष पहले से भाषा की समस्या हल कर ली थी। हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक ही (संस्कृत) रही है।
* कुछ शताब्दियों तक भारतवर्ष एक विचित्र अवस्था में से गुजरा। उसके न्याय, राजनीति और व्यवहार की भाषा फारसी रही है, हृदय की भाषा तत्तत् प्रदेशों की प्रांतीय भाषाएँ रही हैं और मस्तिष्क की भाषा संस्कृत रही है।
* मैंने जैन-प्रबंधों की प्राकृतगन्धी संस्कृत देखी है और मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि संस्कृत को इतना सरल और प्रांजल बनाना एकदम नवीन और स्फूर्तिदायक प्रयास था। जैन मुनियों ने इसमें प्रांजलता ले आने में कमाल का काम किया है।
* सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता तब तक भाषा का सहज होना असंभव है।
* मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।
* इस युग का मुख्य उद्देश्य मनुष्य है। इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि विज्ञान की सहायता से जहाँ बाह्य भौगोलिक बंधन तड़ातड़ टूट गए हैं वहाँ मानसिक संकीर्णता दूर नहीं हुई है। हम एक-दूसरे को पहचानते नहीं। तीन दिन में सारे संसार की यात्रा करके लौटे हुए यात्रा-विलासी लोगों और नाना प्रकार के स्वार्थपरायणों की पुस्तकों ने संसार में घोर गलतफहमी फैला रखी है। इस देश में ही हम एक प्रदेश वाले दूसरे प्रदेश के लोगों को समझ नहीं रहे, एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों को पहचान नहीं रहे। इसीलिए इतनी मारामारी काटाकाटी चल रही है।
=== हिन्दी के बारे में ===
* हिन्दी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।<ref>[https://sahityakunj.net//entries/view/lokvadi-bhashachintak-acharya-hajari-prasad-dwivedi लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी]</ref>
* उसका (हिन्दी का) कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं क्योंकि उसकी जीवन-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने-आपकी भीतरी शक्ति से महत्वपूर्ण आसन पर अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।
* हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है। हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है क्योंकि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकती है।
* यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। वास्तव में हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है अन्यथा यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो 'हिंदी-हिंदी' चिल्लाना व्यर्थ है।
* सिर्फ यही बात नहीं है कि इस देश में देशी भाषाओं में सदा काव्य लिखे जाते रहे, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उनका भरपूर सम्मान भी बराबर होता रहा। अभिप्राय यह कि संस्कृत का कभी किसी भारतीय भाषा के साथ झगड़ा नहीं रहा। इसी प्रकार अब जब कि संस्कृत की भूमिका में हिंदी को अपनाया गया है तो उसका भी किसी भारतीय भाषा से द्वेष संभव नहीं है।
* हमें एक ऐसी भाषा चुन लेनी है जो हमारी हजारों वर्ष की परंपराओं से कम-से-कम विच्छिन्न हो और हमारी नूतन परिस्थिति का सामना अधिक-से-अधिक मुस्तैदी से कर सकती हो, संस्कृत न होकर भी संस्कृत-सी हो और साथ ही जो प्रत्येक नए विचार को, प्रत्येक नयी भावना को अपना लेने में एकदम हिचकिचाती न हो, जो प्राचीन परंपरा की उत्तराधिकारिणी भी हो और नवीन चिंता की वाहिका भी।
* वस्तुतः हिंदी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं में चौदह आना साम्य ही है, दो आना ही हमें नए सिरे से गढ़ना है।
* हिंदी केंद्रीय भाषा है। बड़े परिश्रम से और बड़ी कठिनाइयों के भीतर से इसके उपासकों ने इसे सार्वदेशिक भाषा का रूप दिया है।
* हिंदी को किसी केंद्रीय राजशक्ति की अंगुली पकड़ाकर आगे नहीं बढ़ाया गया है। विरोधों, आघात-प्रतिघातों के भीतर से ही इसकी शानदार सवारी निकली है।
* वे सब बोलियाँ, जिनका मुख केंद्राभिमुख है, अर्थात् जिनके बोलनेवालों की नाड़ियों में मूल केंद्रीय भाषा से संबद्ध बने रहने के संस्कार दृढ़ निबद्ध हैं - हिंदी हैं। जो बोलियाँ केंद्राभिमुख न होकर अपने आप में ही केंद्रित हो जाती हैं, और तुलसी और सूर को अपना कवि नहीं मानना चाहतीं, वे टूटकर अलग हो जाती हैं।
* हिंदी मात्र व्याकरण नहीं और न ही वह केवल खड़ीबोली के रूप में एक विशिष्ट भाषिक संरचना है। भाषा के रूप में वह एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में भाषाई प्रतीक भी है, और साहित्य के रूप में वह एक जातीय परंपरा भी है।
* हिंदी भारत के केंद्रीय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है जिसके लिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान के विकास का वाहन बनाना आवश्यक है।
* जिस हिंदी को आजकल हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं, वह उर्दू के पर से बनाई गई है तथा हिंदी, मुसलमानी भाषा है क्योंकि शुरू-शुरू में खड़ी बोली मुसलमानों की भाषा मानी जाती थी। उन्होंने उदारतापूर्वक इस तथ्य को रेखांकित किया है कि “पुराने हिंदी कवियों ने जब मुसलमान पात्रों से कोई कविनिषिद्ध प्रौढ़ोक्ति कहलाई है तो खड़ीबोली में बुलवाया है। जिस भाषा को हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं उसकी प्रथम भित्ति-प्रतिष्ठा मुसलमान भाइयों के हाथों हुई है।” वे बलपूर्वक कहते हैं कि यह नहीं कि वह भाषा ही कोई नई बनाई गई है बल्कि यह कि इसे साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का वाहन मुसलमानों ने बनाया।
* उर्दू अभी तक आत्मकेन्द्रित भाषा बनी रही है क्योंकि केंद्राभिमुख-भाषा होने में वह हिंदी के समान है, न कि उसकी जनपदीय बोलियों के। इसीलिए वह सूर, तुलसी, कबीर की परंपरा को अपनी परंपरा नहीं मानती और अन्य संतों और भक्तों के सात्विक साहित्य को अपना साहित्य मानने में कुंठा अनुभव करती रही। साथ ही उसने इस देश की पुरानी परंपरा से, अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत के साहित्य से, घनिष्ठ और अविच्छेद्य संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कभी नहीं किया।
=== संस्कृति और सभ्यता के बारे में ===
* मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति हैं।
* मानव जीवन की तीन स्थितियाँ मानी गई हैं- विकृति, प्रवृति और संस्कृति। विकृति अधोगामिनी स्थिति है तो संस्कृति ऊर्ध्वगामिनी।
* संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की चरम परिणति है। धर्म के समान वह भी अविरोधी वस्तु है। वह समस्त दृश्यमान विरोधों में सामंजस्य उत्पन्न करती है।
* भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सबसे सुन्दर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता हैं।
* मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है।
* सभ्यता की दृष्टि वर्तमान की सुविधा-असुविधा पर रहती है, संस्कृति की भविष्य या अतीत के आदर्श पर।
* सभ्यता बाह्य होने के कारण चंचल है, संस्कृति आंतरिक होने के कारण स्थायी।
* सभ्यता समाज की बाह्य व्यवस्थाओं का नाम है, संस्कृति व्यक्ति के अंतर के विकास का।
* नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और सेवा भक्ति तथा योग मूलक अनूभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम 'संस्कृति' शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं।
===कबीर के बारे में ===
* संयोग से वे ऐसे युग–संधि के समय उत्पन्न हुए थे, जिसे हम विविध धर्म–साधनाओं और मनोभावनाओं का चौराहा कह सकते हैं।
* वे मुसलमान होकर भी असल में मुसलमान नहीं थे। वे हिंदू होकर भी हिंदू नहीं थे। वे साधु होकर भी साधु (अगृहस्थ) नहीं थे।वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे। वे योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे कुछ भगवान की ओर से ही सबसे न्यारे बनाकर भेजे गए थे। वे भगवान के नृसिंहावतार की मानो प्रतिमूर्ति थे।
* उन्हें सौभाग्यवश सुयोग भी अच्छा मिला था। जितने प्रकार के संस्कार पड़ने के रास्ते हैं, वे प्रायः सभी उनके लिए बन्द थे।
* हिंदी साहित्य के हजारों वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेकर उत्पन्न नहीं हुआ।
* पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर सबसे शक्तिशाली और प्रभावोत्पादक व्यक्ति थे।
* कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे।
* भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे।
* कबीर में एक प्रकार घर फूंक मस्ती और पक्कड़ाना लापरवाही के भाव मिलते हैं। उनमें अपने–आपके ऊपर अखंड विश्वास था । उन्होंने कभी भी अपने ज्ञान को, अपने गुरू को, अपनी साधना को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा।
* कबीर ने ऐसी बहुत बातें कही है जिनसे समाज सुधार में सहायता मिलती है। पर, इसलिए उनको समाज सुधारक समझना गलती है।
* कबीर जब पंडित या शेख पर आक्रमण करने को उद्यत होते है तो उतने सावधान नहीं होते जितने अवधूत या योगी पर आक्रमण करते समय दिखते हैं।
* हमने देखा है कि वाह्याचार पर आक्रमण करने वाले संतों और योगियों की कमी नहीं है, पर इस कदर सहज और सरल सरल ढंग से चकनाचूर करने वाली भाषा कबीर के पहले बहुत कम दिखाई दी है।
* व्यंग्य वह है, जहां कहने वाला अधरोष्ठों में हँस रहा हो और सुननेवाला तिलमिला उठा हो और भी कहने वाले को जवाब देना अपने की ओर भी उपहासस्पद् बना लेना हो , कबीर ऐसे ही व्यंग्यकर्त्ता थे।
* ऐसे थे कबीर। सिर से पैर तक मस्त–मौला, स्वभाव में फक्कड़, आदत से अक्खड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचण्ड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय। वे जो कुछ कहते थे अनुभव के आधार पर कहते थे इसलिए उनकी उक्तियॉ बंधने वाली और व्यंग्य चोट करने वाले होते थे।
===सूरदास के बारे में ===
* वात्सल्य भाव के काव्य के लिए सूरदास की बड़ी ख्याति है।
* सूरदास ने यदि राधिका के प्रेम को लेकर गीतिकाव्य की रचना न करके प्रबंध काव्य की रचना की होती तो आज असफल हुए होते हैं।
* गीतिकाव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य ही सूरसागर है।
* प्रेम के इस स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया।
* सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे–पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपको की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है।वह अपने को भूल जाता है।
===नन्ददास के बारे में ===
* सूरदास की गोपियों में जिस प्रकार का अशिक्षित पटुत्व और सारल्यगर्भ माधुर्य पाया जाता है, वैसा नंददास की गोपियों में नहीं पाया जाता। भ्रमरगीत में उद्धव के तर्कों को सुनकर वे शिथिलवाक् होकर परास्त नहीं हो जाती बल्कि आगे बढ़कर उत्तर देती है और तर्क को तर्क से काटने का प्रयत्न करती है।
* निर्गुण भाव के प्रत्याख्यान सूरदास ने भी कराया है और नन्ददास ने भी, पर सूरदास का एकमात्र अस्त्र प्रेमातिरेक है जबकि नन्ददास का सबसे अस्त्र है युक्ति और तर्क, फिर भी नन्ददास की रचनाओं में अपना मोहक सौंदर्य है।
===मीरा के बारे में ===
* माधुर्य भाव में अन्यान्य भक्त कवियों की भाँति मीरा का प्रेम निवेदन है और विरह व्याकुलता अभिमानाश्रित और अध्यंतरित नही है बल्कि सहज और साक्षात् संबंधित है।
* वह सहृदय को स्पंदित और चालित करती है और अपने रग में रंग डालती है।
===रहीम के बारे में ===
* निस्संदेह इस कवि का हृदय मानवीय रस से परिपूर्ण और अनासक्त तथा अनाविल सौंदर्य दृष्टि से समृद्ध था।
* जीवन के अनेक घात प्रतिघात के भीतर से भी राजकीय षड्यंत्रों के चपेट में बार-बार आते रहने के बाद भी और हर प्रकार के उतार-चढ़ाव में उठते – गिरते रहने के बाद भी जिस कवि के हृदय का मानवीय रस निःशेष नही हुआ उसके हृदय की अद्भुत सरसता का अनुमान सहज किया जा सकता है।
===तुलसीदास के बारे में ===
* तुलसीदास असाधारण शक्तिशाली कवि,लोकनायक और महात्मा थे।
* वे समन्वय की विशाल बुद्धि लेकर उत्पन्न हुए थे।
* भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो।
* तुलसी के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय शक्ति में है।
* लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके।
===अन्य कवियों के बारे में ===
* भगवान ने उन्हें रूप देने की बड़ी कंजूसी की थी किंतु शुद्ध निर्मल प्रेमपरायण हृदय देने में बड़ी उदारता से कम लिया था। (जायसी के बारे में )
* जायसी को रहस्यवादी कवि कहा जाता है।
* जिन भजनों में मधुर भाव बोलता दिखता हो उनके लेखक को रहस्र सुख के अधिकारी कहना ही उचित है। (सूरदास के संबंध में )
* कबीर के पूर्ववर्ती सिद्ध और योगी लोगों की आक्रमणात्मक उक्तियों में एक प्रकार की ‘हीन भावना की ग्रंथि’ या ‘इनफीरियारिटी कम्पलेक्स’ पाया जाता है। वे मानो लोमड़ी के खट्टे अंगूर की प्रतिध्वनि है, मानो चिलम न पा सकने वालों का आक्रोश है । उनमें तर्क है पर लापरवाही नहीं है, आक्रोश है पर मस्ती नहीं है, तीव्रता है पर मृदुता नहीं।
==सन्दर्भ==
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संन्यास
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अनुनाद सिंह
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संन्यास, वैराग्य, त्याग, विरक्ति आदि समानार्थक शब्द हैं।
==उक्तियाँ==
* ''अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
: ''स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥'' -- [[गीता]] 6.1
: (श्रीभगवान् बोले)- कर्मफल का आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्नि का त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओं का त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।
* ''ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
: ''निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥'' -- गीता ५:३
: हे महाबाहो ! जो मनुष्य न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकाङ्क्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझने योग्य है; क्योंकि द्वन्द्वों से रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
* '' पृथिव्यां सागरान्तायां द्वाविमौ पुरुषाधमौ।
: ''गृहस्थश्च निरारम्भः सारम्भश्चैव भिक्षुकः॥'' -- विदुर नीति
: समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथिवी में दो प्रकार के अधम पुरुष हैं - अकर्मण्य गृहस्थ और कर्मों में लगा हुआ संन्यासी।
* ''द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।
: ''गृहस्थस्य निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः॥'' -- विदुर नीति
: दो ही अपने विपरीत कर्मके कारण शोभा नहीं पाते - अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपञ्चमें लगा हुआ संन्यासी।
* ''द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमण्डलभेदिनौ।
: ''परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखे हतः॥'' -- विदुर नीति
: पुरुषश्रेष्ठ ! ये दो प्रकार के पुरुष सूर्यमण्डल को भेदकर ऊर्ध्वगति को प्राप्त होते है- योगयुक्त संन्यासी, और संग्राममें शत्रुओं के सम्मुख युद्ध करके मारा गया योद्धा।
* ''BDS२।१०।१८।१ एकदण्डी त्रिदण्डी वा ॥
:''BDS२।१०।१८।२ अथेमानि व्रतानि भवन्ति । अहिंसा सत्यम् अस्तैन्यंमैथुनस्य च वर्जनम् । त्याग इत्य् एव ॥
:''BDS२।१०।१८।३ पञ्चैवोपव्रतानि भवन्ति । अक्रोधोगुरुशुश्रूषाप्रमादः शौचम् आहारशुद्धिश् चेति ॥
:''BDS२।१०।१८।४ अथ भैक्षचर्या । ब्राह्मणानां शालीनयायावराणामपवृत्ते वैश्वदेवे भिक्षां लिप्सेत ॥
:''BDS२।१०।१८।५ भवत्पूर्वां प्रचोदयेत् [k: प्रचोदयात्] ॥
:''BDS२।१०।१८।६ गोदोहमात्रम् [k: गोदोहनमात्रम्] आकाङ्क्षेत् ॥
:''BDS२।१०।१८।७ अथ भैक्षचर्याद् उपावृत्य शुचौ देशेन्यस्य हस्तपादान् प्रक्षाल्यादित्यस्याग्रं निवेदयेत् । उद् उ त्यम् । चित्रम् इति । ब्रह्मणे निवेदयते । ब्रह्म जज्ञानम् इति ॥ [k: उपावृत्तः ॥। अग्रे]
:''BDS२।१०।१८।८ विज्ञायते । आधानप्रभृति यजमान एवाग्नयो भवन्ति । तस्य प्राणो गार्हपत्योऽपानोऽन्वाहार्यपचनो व्यान आहवनीयौदानसमानौ सभ्यावसथ्यौ । पञ्च वा एतेऽग्नय आत्मस्थाः ।आत्मन्य् एव जुहोति ॥
:''BDS२।१०।१८।९ स एष आत्मयज्ञ आत्मनिष्ठ आत्मप्रतिष्ठ आत्मानंक्षेमं नयतीति विज्ञायते ॥
:''BDS२।१०।१८।१० भूतेभ्यो दयापूर्वं संविभज्य शेषम् अद्भिः संस्पृश्यौषधवत् प्राश्नीयात् ॥ '' -- बौधायन धर्मसूत्र
: '''These are the vows a Sannyasi must keep –'''
: Abstention from injuring living beings, truthfulness, abstention from appropriating the property of others, abstention from sex, liberality (kindness, gentleness) are the major vows. There are five minor vows: abstention from anger, obedience towards the guru, avoidance of rashness, cleanliness, and purity in eating. He should beg (for food) without annoying others, any food he gets he must compassionately share a portion with other living beings, sprinkling the remainder with water he should eat it as if it were a medicine.
* हे मानवो ! जैसे अग्नि आप शुद्ध हुआ सबको शुद्ध करता है, वैसे संन्यासी लोग स्वयं पवित्र हुये सबको पवित्र करते हैं। -- वेद
* जो मनुष्य न किसी से द्वेष करता है, और न किसी चीज़ की अपेक्षा करता है, वह सदा ही संन्यासी समझने के योग्य है। -- [[महाभारत]]
* भिक्षुक (संन्यासी) को उस पर नाराज़ नहीं होना चाहिए जो उसके साथ दुर्व्यवहार करता है। अन्यथा वह एक अज्ञानी व्यक्ति की तरह होगा। इसलिए उसे क्रोधित नहीं होना चाहिए। -- [[महावीर स्वामी]]
* संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* हमारे सभी [[योग|योगों]] में संन्यास आवश्यक है।-- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* संन्यास के बिना कोई मुक्ति नहीं। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* संन्यास और केवल संन्यास ही सभी सिद्धियों का मूलमन्त्र है। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* संन्यास ही सभी उपनिषदों की आत्मा है। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* संन्यास, भारत का ध्वज है। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* व्यवसायियों को जितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, वह अगर संन्यासियों को झेलनी पड़े, तो सारा संन्यास भूल जाएं। -- [[प्रेमचन्द]]
==सन्दर्भ==
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==इन्हें भी देखें==
*[[पुरुषार्थ]]
*[[मोक्ष]]
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अनुनाद सिंह
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/* इन्हें भी देखें */
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संन्यास, वैराग्य, त्याग, विरक्ति आदि समानार्थक शब्द हैं।
==उक्तियाँ==
* ''अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
: ''स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥'' -- [[गीता]] 6.1
: (श्रीभगवान् बोले)- कर्मफल का आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्नि का त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओं का त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।
* ''ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
: ''निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥'' -- गीता ५:३
: हे महाबाहो ! जो मनुष्य न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकाङ्क्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझने योग्य है; क्योंकि द्वन्द्वों से रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
* '' पृथिव्यां सागरान्तायां द्वाविमौ पुरुषाधमौ।
: ''गृहस्थश्च निरारम्भः सारम्भश्चैव भिक्षुकः॥'' -- विदुर नीति
: समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथिवी में दो प्रकार के अधम पुरुष हैं - अकर्मण्य गृहस्थ और कर्मों में लगा हुआ संन्यासी।
* ''द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।
: ''गृहस्थस्य निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः॥'' -- विदुर नीति
: दो ही अपने विपरीत कर्मके कारण शोभा नहीं पाते - अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपञ्चमें लगा हुआ संन्यासी।
* ''द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमण्डलभेदिनौ।
: ''परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखे हतः॥'' -- विदुर नीति
: पुरुषश्रेष्ठ ! ये दो प्रकार के पुरुष सूर्यमण्डल को भेदकर ऊर्ध्वगति को प्राप्त होते है- योगयुक्त संन्यासी, और संग्राममें शत्रुओं के सम्मुख युद्ध करके मारा गया योद्धा।
* ''BDS२।१०।१८।१ एकदण्डी त्रिदण्डी वा ॥
:''BDS२।१०।१८।२ अथेमानि व्रतानि भवन्ति । अहिंसा सत्यम् अस्तैन्यंमैथुनस्य च वर्जनम् । त्याग इत्य् एव ॥
:''BDS२।१०।१८।३ पञ्चैवोपव्रतानि भवन्ति । अक्रोधोगुरुशुश्रूषाप्रमादः शौचम् आहारशुद्धिश् चेति ॥
:''BDS२।१०।१८।४ अथ भैक्षचर्या । ब्राह्मणानां शालीनयायावराणामपवृत्ते वैश्वदेवे भिक्षां लिप्सेत ॥
:''BDS२।१०।१८।५ भवत्पूर्वां प्रचोदयेत् [k: प्रचोदयात्] ॥
:''BDS२।१०।१८।६ गोदोहमात्रम् [k: गोदोहनमात्रम्] आकाङ्क्षेत् ॥
:''BDS२।१०।१८।७ अथ भैक्षचर्याद् उपावृत्य शुचौ देशेन्यस्य हस्तपादान् प्रक्षाल्यादित्यस्याग्रं निवेदयेत् । उद् उ त्यम् । चित्रम् इति । ब्रह्मणे निवेदयते । ब्रह्म जज्ञानम् इति ॥ [k: उपावृत्तः ॥। अग्रे]
:''BDS२।१०।१८।८ विज्ञायते । आधानप्रभृति यजमान एवाग्नयो भवन्ति । तस्य प्राणो गार्हपत्योऽपानोऽन्वाहार्यपचनो व्यान आहवनीयौदानसमानौ सभ्यावसथ्यौ । पञ्च वा एतेऽग्नय आत्मस्थाः ।आत्मन्य् एव जुहोति ॥
:''BDS२।१०।१८।९ स एष आत्मयज्ञ आत्मनिष्ठ आत्मप्रतिष्ठ आत्मानंक्षेमं नयतीति विज्ञायते ॥
:''BDS२।१०।१८।१० भूतेभ्यो दयापूर्वं संविभज्य शेषम् अद्भिः संस्पृश्यौषधवत् प्राश्नीयात् ॥ '' -- बौधायन धर्मसूत्र
: '''These are the vows a Sannyasi must keep –'''
: Abstention from injuring living beings, truthfulness, abstention from appropriating the property of others, abstention from sex, liberality (kindness, gentleness) are the major vows. There are five minor vows: abstention from anger, obedience towards the guru, avoidance of rashness, cleanliness, and purity in eating. He should beg (for food) without annoying others, any food he gets he must compassionately share a portion with other living beings, sprinkling the remainder with water he should eat it as if it were a medicine.
* हे मानवो ! जैसे अग्नि आप शुद्ध हुआ सबको शुद्ध करता है, वैसे संन्यासी लोग स्वयं पवित्र हुये सबको पवित्र करते हैं। -- वेद
* जो मनुष्य न किसी से द्वेष करता है, और न किसी चीज़ की अपेक्षा करता है, वह सदा ही संन्यासी समझने के योग्य है। -- [[महाभारत]]
* भिक्षुक (संन्यासी) को उस पर नाराज़ नहीं होना चाहिए जो उसके साथ दुर्व्यवहार करता है। अन्यथा वह एक अज्ञानी व्यक्ति की तरह होगा। इसलिए उसे क्रोधित नहीं होना चाहिए। -- [[महावीर स्वामी]]
* संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* हमारे सभी [[योग|योगों]] में संन्यास आवश्यक है।-- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* संन्यास के बिना कोई मुक्ति नहीं। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* संन्यास और केवल संन्यास ही सभी सिद्धियों का मूलमन्त्र है। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* संन्यास ही सभी उपनिषदों की आत्मा है। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* संन्यास, भारत का ध्वज है। -- [[स्वामी विवेकानन्द]]
* व्यवसायियों को जितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, वह अगर संन्यासियों को झेलनी पड़े, तो सारा संन्यास भूल जाएं। -- [[प्रेमचन्द]]
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
==इन्हें भी देखें==
*[[पुरुषार्थ]]
*[[मोक्ष]]
*[[सेवानिवृत्ति]]
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भगीरथ सेना
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+ शीघ्र हटाने हेतु नामांकन / प्रचार पृष्ठ
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श्री भागीरथ सेना (ओड़ राजपूत युवा संगठन)<ref>'''श्री भागीरथ सेना''' (अंग्रेज़ी: ''Shri Bhagirath Sena'') भारत में ओड़ राजपूत समुदाय का एक प्रमुख और सक्रिय सामाजिक व युवा संगठन है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य ओड़ राजपूत समाज के युवाओं को एकजुट करना, समाज में शिक्षा का प्रसार करना, सामाजिक कुरीतियों को मिटाना और समाज के लोगों को राजनीतिक व आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। संगठन की मुख्य सक्रियता राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में है।</ref>
<references />'''<u><big>स्थापना और इतिहास</big></u>'''
श्री भागीरथ सेना की स्थापना किसी एक व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं की गई, बल्कि वर्ष '''2018–2019 के दौरान''' ओड़ राजपूत समुदाय के विभिन्न प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों और जागरूक युवाओं द्वारा सामूहिक रूप से की गई थी। संगठन का नाम ओड़ समाज के आराध्य और ऐतिहासिक पूर्वज '''महाराज भागीरथ''' के नाम पर रखा गया है, जिन्हें समाज अपनी प्रेरणा का मुख्य स्रोत मानता है।
'''<big><u>मुख्य उद्देश्य और कार्यसूची</u></big>'''
संगठन मुख्य रूप से निम्नलिखित सामाजिक और धार्मिक क्षेत्रों में कार्य करता है:
* '''शिक्षा का बढ़ावा:''' समाज के गरीब और पिछड़े वर्ग के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना और मेधावी छात्रों को सम्मानित करना।
* '''सामाजिक सुधार:''' मृत्युभोज, नशामुक्त समाज और बाल-विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जन-जागरूकता अभियान चलाना।
* '''धर्मांतरण पर रोक (धार्मिक संरक्षण):''' ओड़ राजपूत समुदाय की सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों को सुरक्षित रखना। प्रलोभन या दबाव में होने वाले धर्मांतरण के खिलाफ समाज में जागरूकता पैदा करना और सनातन संस्कारों का संरक्षण करना।
* '''युवा सशक्तिकरण:''' युवाओं के लिए रोजगार के अवसर तलाशना, उन्हें करियर गाइडेंस देना और नेतृत्व क्षमता का विकास करना।
* '''राजनीतिक प्रतिनिधित्व:''' ओड़ राजपूत समुदाय की समस्याओं को सरकार के समक्ष उठाना और समाज के लिए उचित राजनीतिक भागीदारी की मांग करना।
<big><u>सांगठनिक ढांचा और प्रमुख नेतृत्व</u></big>
श्री भागीरथ सेना एक लोकतांत्रिक और सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत पर काम करती है। इसमें राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर तक की कार्यकारिणी समितियाँ होती हैं।
'''सोनू कूड़ावला (वर्तमान नेतृत्व):''' वर्तमान में अलवर के जिला अध्यक्ष श्री सोनू कूड़ावला जी हैं। उन्होंने श्री इन्द्रजीत '''मांगल''' जी की सेवानिवृत्ति के बाद इस पदभार को संभाला है। राजस्थान के अलवर (गोविंदगढ़) और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर युवाओं को जोड़ने और संगठन को मजबूती देने में उनकी मुख्य भूमिका रही है।
'''<big><u>गतिविधियाँ और सम्मेलन</u></big>'''
संगठन द्वारा समय-समय पर समाज को एकजुट करने के लिए 'ओड़ राजपूत युवा सम्मेलन', 'रक्तदान शिविर', और 'प्रतिभा सम्मान समारोह' आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न राज्यों के पदाधिकारी एक मंच पर आकर समाज के विकास की रूपरेखा तैयार करते हैं।
'''<big><u>इन्हें भी देखें (See Also)</u></big>'''
* ओड़ राजपूत समाज का इतिहास
* महाराज भागीरथ
* ओड़ महासभा राजस्थान (Oad Mahasabha Rajasthan)
* ओड़ महासभा मध्य प्रदेश (Oad Mahasabha Madhya Pradesh)
* श्री जस्मा सेना (Shri Jasma Sena)
* उत्कल विकास परिषद (Utkal Vikas Parishad)
* ओढ़-चासा और ओढ़-खंडायत समाज (Orh-Chasa & Orh-Khandayat Samaj)
'''<big><u>संदर्भ (References)</u></big>'''
# Dainik Bhaskar : https://www.bhaskar.com/amp/local/rajasthan/alwar/ramgarh/news/meeting-of-od-rajput-youth-organization-in-ramgarh-135301857.html
# Khaskhabar : https://www.m.khaskhabar.com/news/news-the-first-youth-convention-of-the-od-rajput-youth-organization-will-be-held-on-september-14-news-hindi-1-751397-KKN.html
# Dainik Bhaskar : Pratham Yuva adhiveshan https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/alwar/news/first-youth-convention-on-behalf-of-shri-bhagirath-sena-on-14th-135882720.html
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सेवानिवृत्ति
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अनुनाद सिंह
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"'''सेवानिवृत्ति''' (Retirement) जीवन का वह दिन है जब कोई व्यक्ति अपना अब तक का काम छोड़कर कुछ ऐसा करता है जिससे उसे अधिक सन्तोष मिलता हो। == उक्तियाँ == * सरल गणित का देश जहाँ काम करन..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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'''सेवानिवृत्ति''' (Retirement) जीवन का वह दिन है जब कोई व्यक्ति अपना अब तक का काम छोड़कर कुछ ऐसा करता है जिससे उसे अधिक सन्तोष मिलता हो।
== उक्तियाँ ==
* सरल गणित का देश जहाँ काम करने वाला जोड़ता है और सेवानिवृत्त होने वाला घटाता है। -- Núria Añó, 2066. Beginning the Age of Correction (2006)
* [अधिकांश सेवानिवृत व्यापारी लोग] जानते हैं हैं कि काम कैसे करना चाहिये लेकिन वे नहीं जानते कि खेलना कैसे चाहिये। विश्रांति और मनोरंजन की भावना उनमें बिलकुल नहीं होती। ऐसी जबरन थोपी गयी निष्क्रियता बहुत से लोगों के आत्मविश्वास को नष्ट करने वाली होती है। -- Dr. Burrill Bernard Crohn, speaking at the second annual graduate fortnight of the New York Academy of Medicine, 15 October 1929
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अनुनाद सिंह
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'''सेवानिवृत्ति''' (Retirement) जीवन का वह दिन है जब कोई व्यक्ति अपना अब तक का काम छोड़कर कुछ ऐसा करता है जिससे उसे अधिक सन्तोष मिलता हो।
== उक्तियाँ ==
* सरल गणित का देश जहाँ काम करने वाला जोड़ता है और सेवानिवृत्त होने वाला घटाता है। -- Núria Añó, 2066. Beginning the Age of Correction (2006)
* [अधिकांश सेवानिवृत व्यापारी लोग] जानते हैं हैं कि काम कैसे करना चाहिये लेकिन वे नहीं जानते कि खेलना कैसे चाहिये। विश्रांति और मनोरंजन की भावना उनमें बिलकुल नहीं होती। ऐसी जबरन थोपी गयी निष्क्रियता बहुत से लोगों के आत्मविश्वास को नष्ट करने वाली होती है। -- Dr. Burrill Bernard Crohn, speaking at the second annual graduate fortnight of the New York Academy of Medicine, 15 October 1929
==इन्हें भी देखें==
*[[संन्यास]]
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गोस्वामी तुलसीदास
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अनुनाद सिंह
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[[तुलसीदास]] को अनुप्रेषित
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#पुनर्प्रेषित [[तुलसीदास]]
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वार्ता:भगीरथ सेना
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/* Bhagirath Sena ko Wikipedia se hatana uchit nahi h */ नया अनुभाग
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== Bhagirath Sena ko Wikipedia se hatana uchit nahi h ==
Jaisa ki aapne dekha Maine yaha wo sabhi rules follow kiye h Wikipedia mai Ek informational page k liye jaruri h. Maine yaha uchit reference bhi diye h.
ye koi rajnetik sangathan nahi h apitu Ek samajik sangathan h Isliye iski jankari janmanas Tak pahuchni chahiye.
mera yehi anurodh rahega ki is page ko nahi hataya jaye. [[सदस्य:Arunsingh.rathor|Arunsingh.rathor]] ([[सदस्य वार्ता:Arunsingh.rathor|वार्ता]]) १७:४३, २२ जुलाई २०२६ (IST)
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Arunsingh.rathor
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== Bhagirath Sena ko Wikipedia se hatana uchit nahi h ==
Jaisa ki aapne dekha Maine yaha wo sabhi rules follow kiye h Wikipedia mai Ek informational page k liye jaruri h. Maine yaha uchit reference bhi diye h.
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mera yehi anurodh rahega ki is page ko nahi hataya jaye. [[सदस्य:Arunsingh.rathor|Arunsingh.rathor]] ([[सदस्य वार्ता:Arunsingh.rathor|वार्ता]]) १७:४३, २२ जुलाई २०२६ (IST)
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