विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.9 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१९ 250 75681 664797 609002 2026-07-03T08:20:58Z MuskanChaudhary121 6707 664797 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|'''१८'''|'''इटली'''|}}</noinclude> मनोज, नियत तथा स्वास्थाकर और केन्द्रस्थलमें सवि-। आग्नेयोहार, गन्धक, बालुका प्रभृति पदार्थ भरा है। शेष सुखप्रद है। किन्तु दक्षिणको भोर उष्णता अधिक ताम, लोह और फिटकरीको भो खानि है। विभिन्न रहती और प्रायः अफ्रीकाको उत्तप्त वायु पानसे बढ़ प्रान्तमें उष्ण तथा शीतल जलके प्रस्त्रवण मिलते हैं। जाती है। वसन्त और ग्रीष्म ऋतुमें मलेरियाके प्रकोप पर्वत और वनमें शूकर, हरिण, तक, विज्ज, बात- से कितने ही स्थानका स्वास्थय बिगड़ता है। कारण- प्रमो और अज, आरण्य पशु रहते हैं। आबरुज्जो पवेतमें आबद्ध कच्छसे जो वायु उठता, वह मारात्मक होता है। वनमार्जार और दक्षिणांशमें शिखायुक्त शल्लको देख पो प्रधान और चिसोन, मैरा, ग्रना, दोरा-रिपारिश्रा, पड़ता है। शशक, शृगाल और वन्यपक्षीको कोई दोरा बालतिश्रा, बोरमिदा, तनारो, सेसिआ, तिसिनो, कमी नहीं। दक्षिण सागरतटपर अफ्रीका के जलचर अहा, प्रोग्लिो , मिनसिपो, टेब्बिा , परमा एवं पक्षी प्रायः वर्तमान रहते हैं। कहीं कहीं समुद्र में पनारो शाखा नदी है। उत्तरपश्चिममें आडिज, | विद्रुम भी विद्यमान है। नदीमें अनेक प्रकारके मतस्य ब्रेन्ता, पित्राव और तगलिअामन्तो पाल्पससे निकल तैरते हैं। दक्षिणको बहती है। मध्यस्थलको प्रधान नदी ताइवेर इटलीमें रेशमका, काम बहुत बनता है। सन भूमध्यसागरमें जाकर गिरती है। किन्तु अनेक और ऊनको चीज़ भी तैयार होती है। कितना हो नदीमें जहाज. चल नहीं सकता। इस अभावको दर मद्य टपकाया जाता है। फ्रान्स, ग्रेटबटेन, ग्रीस करने के लिये तिकिनो और मिलनके बीच २८ मील और स्विटजलेण्ड के साथ प्रधानत: व्यवसाय चलता लम्बी नहर निकली, जिसमें बड़ीसे बड़ी नाव चली है। है। फान्स के साथ प्रति वर्ष करोडो रुपयेका लेन- दूसरी नहर एदिज और पोको मिलाती है। उत्तरमें देन होता है। अन्न और रूई बाहरसे मंगाते हैं। सब मिलाकर ५१०से अधिक नहरें हैं। गार्दा और रेशम, शराब और तेल दूसरी जगह भेजा जाता लागो मामिगओर वा लोकारनो इद प्रधान है। है। क्षेत्रफल ११०६२३ वर्गमील है। १८०१ ई० को लुगानो, कोमो, लेको, इसको, पेरुजित्रा, बोलसेना, मनुष्य-गणनाके अनुसार लोकसंख्या ३२८६५५०४ कास्तेल, गानडोलफो, ब्रेस्मिानो, सेलानो, वारानो रही। इटलीमें सैकड़े पीछे ८७-१२% लोग रोमन और पावाछोटा इद है। विचित्र दृश्य के लिये काथलिक हैं । प्रायः २०००० प्रोटेष्टाण्ट और ४०००० इनमें कितने हौ इद प्रशंसनीय हैं। मेग्गिओर परम यहूदी निकलेंगे। तीन-चौथायी आदमी लिख-पढ़ सुन्दर और कोमो अत्यन्त चित्ताकर्षक है। नहीं सकते। दश-बीस प्राचीन प्रतिष्ठित विश्व ___ द्राक्षा, जितवृक्ष, जम्बौर, न्यग्रोध, तरम्बुज, पिस्ता, | विद्यालय विद्यमान हैं। सुपारी तथा कितने ही दूसरे फल होते और खाटु प्रायः ५००० मौल रेलवे और १५००० मोल लगते हैं। उत्तर प्रान्तमें दाल, चावल, ज्वार और टेलीग्राफ विस्तृत है। इटलीका प्रान्तीय विभाग यह दूसरे शाक उपजते हैं। लोमबार्डीमें रेशमके कोड़े है,-मोदेना, पार्मा, बेल्ल नो, पाटुश्रा, रोविगो पालनको लाखों शहतूतके पेड़ लगाये जाते हैं। नेविसो, अदाइन, बेनेज़िश्रा, वेरोना, विसेञ्जा, पो नदोके मैदानमें सहस्र-सहस्र गो चरा करती हैं। आरञ्जो, फ्लोरेन्स, ग्रोस्म तो लेघोरन, लुक्का, पिसा, इटलीका बना पणोर अनोखा होता और प्रथिवीके सोना, अनकोना, अर्कोलो, पिकेनो, बोलोना, फेरारी, प्रत्येक प्रान्तमें बिकने जाता है। उत्तर जर्मण-सीमान्तके कोली, मार्कराता, पेसारो, उबिनो, रावेत्रा, रोम, समीप और वेनिस, जिनोभा और तासकैनीमें तेसमो, एक्विला, बासिलिकाता, कालेधा, कितेरि- मरमरपत्थरकी खानि है। अपनाइनसे जराहत, ओर, रेग्गियो, काटनज़रो, केपितानाता, मोलिस, सूर्यकान्त, मशब, शिलास्फटिक, वैदूर्य और अपर | नापोली, प्रिन्सिपाती कितरिओर, प्रिन्सिपाती उलते- रत्न निकलता है। उपरोक्त पर्वतमें क्षार, घनीभूत | रिपोर, तेरा दी बरो, तेरा दी लिवोरो, तेरा दी श्रोत-<noinclude></noinclude> ik6i0ob38mze1gduxtzvyvg8keozr7i पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१४३ 250 75836 664747 608958 2026-07-03T00:44:58Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664747 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१४२'''|'''ईसाई'''|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{smaller|{{C|अर्मनी समाज।}}}} ई॰ के २रे शताब्दको अर्मेनिया राज्यमें ईसाई धर्म पहले घुसा था। उस समय मेरुजनेश नामक एक व्यक्ति विशप रहे। किन्तु लोग ईसाई धर्मको अधिक मानते न थे। २७६ ई॰ के समय सेण्ट ग्रेगरीने आकर अर्मनीराज तिरिदतेशको ईसाई धर्मकी दोक्षा दी। उसी समयसे अर्मनीमें ईसाई धर्म प्रबल पड़ा है। ई॰ के ७वें शताब्दको अर्मनी भाषामें बाइबिलका अनुवाद हुआ। ईसा मसीहकी दो प्रकति पर गड़बड़ पड़नेसे अर्मनियोंने कालसिडन-महासभाका आदेश न सुन एक प्रकृतिवादीका पक्ष पकड़ा था। फिर अर्मनी-समाज पृथक् हुआ और ग्रेगोरोके कारण प्रथम नाम ग्रेगोरीय (Gregorian) पड़ा। कुछ काल-तक इस समाजमें ज्ञानतत्वपर घोरतर आन्दोलन रहा। ई॰ के १२वें शताब्दको अर्मनी ईसायियोंमें ‘क्ला’(Klah) नामक एक महाज्ञानीने जन्म लिया था। उनके सकल आध्यात्मिक ग्रन्थोंको अर्मनी अति समादरकी दृष्टिसे देखते हैं। इस समाजके लोग हमेशा रोमक-समाजसे घृणा करते हैं। जब इसलाम धर्मको रणभेरी अर्मनीमें बजी, तब अर्मनी समाजने युरोपके राजगणसे सहायता देनेकी कही। उसी समय पर पोपने कई बार (११४५, १३४१, १४४० ई॰) अमनियोंको रोमके शासनाधीन बनानेकी चेष्टा की थी। अर्मनीके कितने ही सम्भ्रान्त व्यक्ति सम्मत भी हो गये। किन्तु जनसाधारणका मनोभाव किसी प्रकार न बदला। इसपर पोप (१२श) वेनिडिकने अर्मनी-समाजको तीव्र समालोचना कर ११७ दोष देखाये थे। उसी समय कितने ही अर्मनी रोमक समाजमें मिल गये। इसीसे उन्हें संयुक्त अर्मनी (United Armenians) कहते हैं। इस मिलित समाजके लोग आजकल पारस्य, रूस, मासयेल, इटली, पोलेण्ड प्रभृति स्थानोमें रहते हैं। ई॰ के १७वें शताब्दमें मुसलमानोंके प्रबल आक्रमणसे बहुतसे लोगोंने वाध्य हो इसलाम धर्म पकड़ा था। फिर भी अधिकांश अर्मनी आजतक पूर्वमत और विश्वासको बचाते चले आते हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अर्मनी समाज ईसापर एक ही प्रकृतिका आरोप करता है। उसके मतमें केवल ईश्वरसे ही दिव्यात्मा-(Holy Ghost)ने अवतरण किया। दीक्षाके समय मत्थे पर तीन बार जल छिड़कना पड़ता है। ईसाके सशिष्य भोजोद्देशक पर्वपर सबको खालिस शराब और पावरोटी देनेसे पहले शराबमें पावरोटो डुबोयी जाती है। याजक, पुरोहित प्रभृति धर्माध्यापक ही मरने-पर तैल लगानका अधिकार रखते हैं, दूसरे नहीं। ईसाई महापुरुष भी अर्मनी ईसाई समाजके उपास्य हैं। ये लोग अधिक धर्मोत्सव नहीं मनाते, फिर भी ग्रोक समाजकी अपेक्षा अधिक उपवास करते हैं। पुरोहित एकबार विवाह कर सकते हैं। रूसाधिकृत अर्मनी एरिबान नगरके निकट एसमिया-दजिम नामक आश्रममें प्रधान धर्माचार्य रहते हैं। यह स्थान अर्मनी समाजका महातीर्थ है। प्रत्येक अर्मनी ईसाईको जीवन में एकबार इस महातीर्थका दर्शन करना पड़ता है। {{smaller|{{c|प्रोटेष्टाण्ट सम्प्रदाय।}}}} ई॰ के १६वें शताब्दमें यह सम्प्रदाय उपजा है। इस सम्प्रदायके अभुदयसे पूर्व पोपने अपनेको समस्त ईसाई जगत्का अधिपति बताया था। जहां ईसाई न रहते, वहां पोपके मतसे जन-मानवशून्य वन थे। वह ईसाई समाजके शीर्षस्थानपर बैठ बाइबिल और ईसाई मतके विरुद्ध अनेक अन्याय-कार्य करने लगे। इसपर धार्मिक ईसाई मात्र उनसे मन ही मन अत्यन्त विरक्त हो गये। किन्तु प्रबल पराक्रान्त पोपके विरुद्ध बात कहनेका साहस किसीको न था। अनेक लोग पोपका अत्याचार सह और मुख बन्दकर रह न सके। १५१७ ई॰ में महात्मा मार्टिन-लूथरने समाजके संस्कार करने पर कमर कसो। वे जर्मनीके अन्तर्गत विटेम्बर्ग नगर में पुस्तकके प्रधान अध्यापक हो गये। उसी समय तेजेल नामक एक ईसाई उदासीन विटेम्बर्ग में जा पहुंचे। ये साधारणको पोपका मुक्तिपत्र दे कर ठग रहे थे। धर्मवीर लूथरको वह अच्छा न लगा। उन्होंने अपने ९५ प्रधान शिष्यों को तेजेलकी गति रोकने पर रखा। तेजलने<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> rtze41t3w5el6v4jr5i1x5q8n5oi5qj 664748 664747 2026-07-03T00:49:41Z अँजली चौधरी 2439 664748 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१४२'''|'''ईसाई'''|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{smaller|{{C|अर्मनी समाज।}}}} {{gap}}ई॰ के २रे शताब्दको अर्मेनिया राज्यमें ईसाई धर्म पहले घुसा था। उस समय मेरुजनेश नामक एक व्यक्ति विशप रहे। किन्तु लोग ईसाई धर्मको अधिक मानते न थे। २७६ ई॰ के समय सेण्ट ग्रेगरीने आकर अर्मनीराज तिरिदतेशको ईसाई धर्मकी दोक्षा दी। उसी समयसे अर्मनीमें ईसाई धर्म प्रबल पड़ा है। ई॰ के ७वें शताब्दको अर्मनी भाषामें बाइबिलका अनुवाद हुआ। ईसा मसीहकी दो प्रकति पर गड़बड़ पड़नेसे अर्मनियोंने कालसिडन-महासभाका आदेश न सुन एक प्रकृतिवादीका पक्ष पकड़ा था। फिर अर्मनी-समाज पृथक् हुआ और ग्रेगोरोके कारण प्रथम नाम ग्रेगोरीय (Gregorian) पड़ा। कुछ काल-तक इस समाजमें ज्ञानतत्वपर घोरतर आन्दोलन रहा। ई॰ के १२वें शताब्दको अर्मनी ईसायियोंमें ‘क्ला’(Klah) नामक एक महाज्ञानीने जन्म लिया था। उनके सकल आध्यात्मिक ग्रन्थोंको अर्मनी अति समादरकी दृष्टिसे देखते हैं। इस समाजके लोग हमेशा रोमक-समाजसे घृणा करते हैं। जब इसलाम धर्मको रणभेरी अर्मनीमें बजी, तब अर्मनी समाजने युरोपके राजगणसे सहायता देनेकी कही। उसी समय पर पोपने कई बार (११४५, १३४१, १४४० ई॰) अमनियोंको रोमके शासनाधीन बनानेकी चेष्टा की थी। अर्मनीके कितने ही सम्भ्रान्त व्यक्ति सम्मत भी हो गये। किन्तु जनसाधारणका मनोभाव किसी प्रकार न बदला। इसपर पोप (१२श) वेनिडिकने अर्मनी-समाजको तीव्र समालोचना कर ११७ दोष देखाये थे। उसी समय कितने ही अर्मनी रोमक समाजमें मिल गये। इसीसे उन्हें संयुक्त अर्मनी (United Armenians) कहते हैं। इस मिलित समाजके लोग आजकल पारस्य, रूस, मासयेल, इटली, पोलेण्ड प्रभृति स्थानोमें रहते हैं। ई॰ के १७वें शताब्दमें मुसलमानोंके प्रबल आक्रमणसे बहुतसे लोगोंने वाध्य हो इसलाम धर्म पकड़ा था। फिर भी अधिकांश अर्मनी आजतक पूर्वमत और विश्वासको बचाते चले आते हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}अर्मनी समाज ईसापर एक ही प्रकृतिका आरोप करता है। उसके मतमें केवल ईश्वरसे ही दिव्यात्मा-(Holy Ghost)ने अवतरण किया। दीक्षाके समय मत्थे पर तीन बार जल छिड़कना पड़ता है। ईसाके सशिष्य भोजोद्देशक पर्वपर सबको खालिस शराब और पावरोटी देनेसे पहले शराबमें पावरोटो डुबोयी जाती है। याजक, पुरोहित प्रभृति धर्माध्यापक ही मरने-पर तैल लगानका अधिकार रखते हैं, दूसरे नहीं। ईसाई महापुरुष भी अर्मनी ईसाई समाजके उपास्य हैं। ये लोग अधिक धर्मोत्सव नहीं मनाते, फिर भी ग्रोक समाजकी अपेक्षा अधिक उपवास करते हैं। पुरोहित एकबार विवाह कर सकते हैं। रूसाधिकृत अर्मनी एरिबान नगरके निकट एसमिया-दजिम नामक आश्रममें प्रधान धर्माचार्य रहते हैं। यह स्थान अर्मनी समाजका महातीर्थ है। प्रत्येक अर्मनी ईसाईको जीवन में एकबार इस महातीर्थका 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2026-07-03T01:04:42Z अँजली चौधरी 2439 664749 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''ईसाई'''|'''१४३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पीठ देखायी। पोपने लूथरके विरुद्ध वृषभाक्ङित दण्डनियोग-पत्र भेजा था। किन्तु लूथरने पोपको न मान १५२० ई॰की १६वीं दिसम्बरको विटेम्बर्गके तोरणद्वार पर सबके समक्ष दण्डनियोगका पत्र जला दिया। इसी समय पर स्विजरलेण्डमें कई अनुचर "पोपका मुक्तिपत्र ( Indulgences ) बांटते थे। हिन्द ऑमें जैसे पापका प्रायश्चित्त करनेको अर्थ देकर ब्राह्मण-पण्डितसे व्यवस्थाको लेना पड़ता, वैसे ही रोमक ' समाजमें उक्त मुक्तिपत्रका व्यवहार चलता है। उस कालमें अनेक ईसाइयोंको विश्वास था,-इस मुक्तिः । पत्रको खरीदने से हमारे पापका प्रायश्चित्त होगा| और पापका दुःख उठाना न पड़ेगा। उस समय स्विजरलेण्डमें जुइङ्गली नामक एक महापण्डित थे। वे मुक्तिपत्रके घोरतर विरोधी बने । लथरकी तरह राज फेडरिकके सत्परामर्श से लूथर कुछ दिन छिपे वे भी पोपके समाजका बन्धन एककाल हो तोड़ने की रहे। उसी समयपर साक्सनीमें सर्वत्र उनका मत चेष्टामें लगे थे। जूरिच, बरन, वेसिल प्रभृति स्थानके सादर माना गया। इङ्गलेण्ड* और देनमार्कक लोगोंने उनका मत मान लिया। अधिपति तथा प्रजावर्ग भी समाज-संस्कारकै पक्षपाती ___ इधर लथरने जर्मनीके उच्चपदस्थ व्यक्तिको सम्बोधन हुये थे। देनमार्क के राजा लथरका एक शिष्य बला कर कहा,-"वाटगण ! रोमके विपक्षमें खड़े हो | निज राज्यमें यह नया मत चलाने लगे। जायो। यही प्रकृत समय है। घर घर क्रश- १५२२ ई०को लथरने मेलयन (Melanction)के युद्धकी बात का ध्यान रहना चाहिये। भयङ्कर रोमक | साथ बाइबिलके शेषभाग इनोल (New Testament)- तुर्कमे सभीको खा डाला है। जगतके धनसे रोमक को अनुवाद कर छपाया था। अनुवाद देखकर लोग भाण्डार भर गया है।" लघरने रोमक-समाजके सात चकराये। उन्होंने समझ लिया-'पोपके नियमसे अङ्ग माने न थे। उनके मतसे धर्मको दीक्षा, ईसाका ईसा मसोहका मत सम्पूर्ण विभिन्न है। लूथर जो मशिष्य भोजपर्व और निग्रह स्वीकार, तीन ही ईसाई | मत चलाते, उसीको यथार्थ ईसाका मत मानते हैं।' 'धर्मके प्रधान अङ्ग हैं। फिर जर्मनीके सत्व्यक्तिने प्रकाश्यरूपसे रोमका १५२१ ई० को ५म चालेस जर्मनी में रहे। पोप- धर्मानुशासन छोड़ा था। जर्मनोके वषकने धर्मके पर वे कुछ भक्तिवद्धा रखते थे। रोमक-समाजके | लिये अस्त्र उठाये। जर्मेन राज्य में सर्वत्र घोरतर कर्ट पक्षगणने लूथरका दोष देखा सम्राट्को भड़- | काया। सम्राट् समाजसंस्कारके विरोधी बन गये। १५२३ ई में फ्रान्स-राज फ्रान्सिस की भमिनो उन्होंने लूथरके पुस्तकादि ध्वंस करनेको आदेश दिया | | मार्गारेटने नतन मतका पक्ष लिया और फ्रान्स- था। किन्तु राज्यके प्रधान प्रधान सचिव उससे राजाके नाना स्थानोमें बहुतसे लोगोंने इस मतको ग्रहण किया। फान्सराज प्रथम संस्कारके पक्षपाती - इस देशमै जेसे पल्प एवं अधिक पापकै अनुसार अर्थ लगाकर प्रायवित्त करना, वैसेही पोपका मुक्तिपत्र खरीदने में विभिन्न मूल्य देना • कितने हो लोगोंके मतानुसार १२६१ ई०को धर्मप्रचारक विक्लिक ..पड़ता था। (Wicliffe )से धमें समाजसंसारका सूत्रपात पा । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> असम्मत हुये। उनके परामर्शसे वारमस नगर में एक महासभा लगी। इस सभामें जर्मनीके सकल राजा और अध्यापक आ पहुंचे। संस्कारके विरुद्ध कितनी ही बातें निकली थीं। लूथर भी इस सभामें आये। सभाने लूथरसे कहा,―‘तुमने रोमक-समाजके विरुद्ध जो आपत्ति उठायी, वह बहुत ठीक है। इस सुयोगमें परिवर्तन करो। तुम्हारा मङ्गल होगा।’ लूथरने निर्भीक चित्तसे उत्तर दिया,― ‘सच बात कहूंगा। प्राण जाने में कोई क्षति नहीं। मैं ईश्वरके आदेशसे बंधा हूं। मेरे हृदयका बलवान् विश्वास जबतक भ्रान्त प्रमाणित न होगा, तबतक रोमक समाजका गौरव कैसे समझ पड़ेमा!’ उनकी यह बात जर्मनीमें सर्वत्र चल पड़ी। विपक्षने लूथरके प्राण लेने का बीड़ा उठाया था। किन्तु साक्सनी-<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> 34rp6biih56tdnz4cq0223d76f8j8i3 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२६७ 250 75925 664750 303451 2026-07-03T01:25:37Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 664750 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{Rh|२६६|उद्भिद्विद्दा}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पत्र होते और प्रत्येक पत्र एक-एक विन्दु जल देता है। इसीप्रकार असंख्य वृक्षोंसे अधिक परिमाणमें जल गिरता है। जल यदि पत्रसे निकल वायुमण्डलमें पुनः न पहुंचता, तो अत्यन्त ग्रीष्मके समय वह सूखकर नितान्त हो उष्णभाव धारण करता। पत्रदल अर्थात् अन्तकिसलयकी भूमि अग्रविन्दु और हितल है। एक आकाश और अपर तल भूमिकी ओर रहता है। दलके प्रान्तमागको धार कहते हैं। क्योंकि वह वृन्त वा दण्डपत्रके तलको धारण करता है। उक्त दण्ड काण्ड के साथ संयोग-स्थलपर फैलकर वृन्तकोष निकलता है। सवृन्तक पत्र में एक बहुत (Crenate) भूमि रहती है। पत्रको पशु का वा शिरा स्पष्ट रेखा दलके मध्य पड़ती है। उसका नाम मध्यरेखा है। वृन्तका दण्ड स्वयं दलके मध्य न फैल प्रायः प्रवेशकालमें दो वा अधिक शिरामें बंट जाता है। इन रेखाओंका दैर्ध्य प्रायः समान और उतपत्तिस्थानसे सर्वत्र प्रसारित अथवा दलके मध्य किञ्चित सरल वा वक्र रहता है। प्रधान रेखा वा शिरासे बहु शाखा ये निकलती है और पीछे वृद्धिगत हो पत्रदलकी सकल दिशाओं में केशाकार सूक्ष्म सूक्ष्म प्रशाखा छोड़ती हैं। उनके परस्पर संयोगसे एक जाल बनता है। इस प्रकार जालविशिष्ट रहते, उनमें दो एकको छोड़ प्रायः सकल ही हिपर्णिक होते हैं। फिर उक्त जालविहीन और पत्रदलके मध्य समानान्तर शिरा- विशिष्ट पत्र एकपर्णिक हैं। जटिल शिरायुक्तको जालाकृति (Reticulate) और अपर पत्रको अजालाकृति (Non- reticulate) कहते हैं। उनमें अश्वस्थ, कटहल जाला कृति और बांस, अदरक, सवैजया प्रभृति अजालाकृति हैं। वृन्तका दण्ड स्वयं पत्रके दलमें फैलता है। वह दलको दो भागमें बांट दक्षिण और वाम पार्श्व पर्यन्त शाखा छोड़ता है। उसकी मध्यरेखा परके मध्यांश जैसी और पक्षाकार (Pinate) नाम पानेवाली होती है। फिर वृन्तका दण्ड जलके पत्रमें घुसते ही घटकर दो वा अधिक शिरा निकालता है। उनमें कोई छत्रकी कमानीकी तरह प्रसारिताकार (Radiate), कोई कराकार (Palmate), कोई वक्रशिरायुक्त (Curve- {{Multicol-break}} nerved) और कोई दलकी मध्यरेखा समान्तर शिरायुक्त (Parallel-veined) होती है। पत्र दो प्रकारके होते हैं-सरल और यौगिक। जिस पत्र में एकसे अधिक ग्रन्थि पड़े, वह यौगिक है। अवृन्तक पत्रकी कर्णाकार (Auriculate) आकृति लक्षित होती है। सवृन्तक पत्रकी भूमि नानाप्रकार है। कहीं पानके पत्ते जैसी (Corvate), कहों तीक्ष्णा एवं शुण्डाकृति, कहीं ढाल किनारेदार, कहीं दन्तुर, कहीं क्रकचाकृति (Lorate) किंवा एक-एक बड़ी मेहराबके अन्तर्गत छोटी छोटी मेहराबके आकारमें खण्डित (Crenate) भूमि रहती है। पत्र की पर्शुका वा शिरा अपने छिन्न किनारासे जो सम्बन्ध रखती, उसको बात सहज ही समझ नहीं पड़ती। छिद्रका परिणाम अधिक रहनेसे पत्र कई खण्डमें बंट जाता है। उससमय देखने में आता है-पत्रका आकार पर्शु का वा शिरापर निर्भर है। खण्डके पत्रको संख्या यदि हस्ताङ्गलिसे न्यून होती है, तो दिखण्डित विखण्डित इत्यादि उसके नाम एड़ते है। जिसमें दल इस प्रकार कट जाता है, वह व्यवच्छिन्न (Dissected) पत्र कहलाता-जैसे जमींकन्दका पत्ता। यौगिक पत्रका दल सहजमें ही वृन्तदण्डसे पृथक् हो जाता है। किन्तु सूख जाने पर मी सकल पत्रके दण्डका वृन्तदण्डसे छुटना कठिन है। पत्र, मुकुल और पुष्यविशिष्ट काण्ड श्वासके ग्रहण और पुनरुत्पादनका कार्य करता है। पुष्प ही पुन-रुत्पादनका साधन है। पुष्पकी कलिका प्रधान विषयों में पत्रकलिका हो जैसी रहती है। जिस पत्रके कक्षमें पुष्यको कलिका निकलती है, उसकी संज्ञा पुष्पोत्पादक पत्र (Bract) है। पुष्योत्पादक पत्र प्रायः हरा और अपर पत्र जैसा होता है। कभी कभी वाह्य सौन्दर्य देखनेसे उसीके पुष्प होनेका भ्रम हो जाता है। पत्रको कलिकाके कक्षसे अन्य पत्र फिर उसी स्थानसे अपरापर कलिका भी पर्यायक्रमसे निकल सकती हैं। किन्तु पुष्यको कलिकासे केवल एक पुष्प किंवा पुष्यस्तवकयुक्त शिखाका उत्पादन होता है। प्रस्फुटित पत्रकी कलिकाके मेरूदण्डको शाखा कहते हैं। फिर पुष्पकी कलिकामें {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 4qxjhywxhbjzb47asxanldd92cmtgvg पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६३८ 250 76119 664806 609377 2026-07-03T10:24:05Z अंजली राजभर 4516 664806 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh|<big>कटाहक-कटिया</big>|<big>६३७</big>|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black }} कटाहक (सं० लो०) कटाइ स्वार्थे कन्। भाजन,पान, वर्तन, कड़ाह।<br> कटाय (सं० क्लो०) पद्मकन्द, कमलगट्टा।<br> कटि (सं० पु०-स्त्री.) कव्यते वस्त्रादिना सुध्रियतेऽसौ,<br> कट-हन्। १ शरीरका मध्यदेश, कमर। इसका संस्कृत पर्याय-कट, श्रोविफलक, श्रोणी, ककुयती,श्रोणिफल, कटी, थोणि, कलव, कटोर, काचीपद,और करभ है। सुश्रुतके मतसे कटिदेशमें पांच अस्थि रहते हैं। उनसे गुध, योनि एवं नितम्बदेशमें चार और त्रिक स्थानमें एक अस्थि पाता है। पस्थि-सहातक एक है। अखिको सन्धियां तीन बैठती हैं। ' कटिकूप (सलो . ) कटिदेशस्वं कपम्, मध्यपद- पान, वर्तन, कड़ाह। लो। ककुन्दर, मुल्ब, चतड़का गड्डा। कटिजेब (हिं. स्त्री०) करधनी, कमरको खबसूरती बढ़ानवाला जे.वर। इसका कटितट (सं• क्लो०) कटिरेव तट स्थानम् । १ कटि- देश, कमर। २ नितम्ब, चतड़। कटिव (सं. ली.) कटिं वायते, कटि-वे-क। १ परिधेय वस्त्र, धोती। २ चन्द्रहार। ३ कटिवर्म, कमरका बखू तर । ४ चक्रात । ५ कमरबंद । करधनी। "मचालगौर शितिवासस' स्फुरत् । उनका नाम तुब्रसेवनौ है। सायु साठ होती हैं। विरोटकेरकटिवकायम्:" (भागवत ६ १३.) दोनों नितम्बों में पांच-पांचके हिसाबसे दश पेशी हैं। कटिदेश (संलो०) कटिनामक देश अवयवम. कटिदेशस्थ मम अखिमम कहाता है। उसका नाम मध्यपदलो। योगी, कमर। कटोक है। तरुण अस्थिके पृष्ठवंश अर्थात् मेरुदण्डके कटिन् (सं.वि.) कटोऽस्त्वस्थ, कट-इनि। बुवक- उभय पाव पर पनतिनिय कुकुन्दर नामक दो मर्म ठजिल इत्यादि । पा ॥रा० । कटियुक्त, जिसके कमर रहे। पड़ते हैं। उनसे किसी प्रकार शोणित बहनेपर स्पर्श- कटिमोथ (सं० पु०) कव्याः प्रोधः मांसपिण्डः। ज्ञान और शरीरको चेष्टा दोनोंका नाश होता है। नितम्ब, चतड़। इसका संस्कृत पर्याय-स्मिक, पूलक, नितम्बके ऊपरिभागपर पार्खान्तरसे प्रतिबद्ध नितम्ब ! कटीप्रोध, कटि, प्रोथ और पूल है। नामक ममैहय हैं। उनसे शोणित गिरनेपर प्रधः- कटिबद्ध (सं० वि०) तत्पर, तैयार, कमर बांध काय शुष्क एवं दुर्बल पड़ता और मृत्व पर्यन्त पा हुा। पहुंचता है। कटिदेशके अभ्यन्तरस्थ मांस और कटिबन्ध (सं० पु०) १ कमरबंद । २ पृथ्वीका भाग- रक्तविशिष्ट भाशयका नाम मूत्राशय वा वस्ति है। विशेष, मिनतका, जमीनका एक हिस्सा। यह भौत- अश्मरी रोग व्यतीत अन्य कारणसे उसको दोनों ओर लता भार उष्णाताके अनुसार निर्धारित होता है। विध होनेपर सद्यः मृत्य पाता है। एक पाखभेद विहानोंने पूधिवौको पांच कटिबन्धों में बांटा है। . करनसे मूवसावी व्रण उत्पन्न होता है। वह भी कटिभूषण (सं० लो०) कटेभूषणम्, ६-तत् । कटि- कष्टसाध्य है। कटिदेशमें आठ शिरायें हैं। उनसे देशका अलङ्कार, कमरका गहना। क्टिपस्थल और कटिकतरण में चार-चार रहती हैं। कटिमालिका (स. स्त्री०) कटी मालेव, कटिमाल- २हस्तीका गण्डस्थल, हाथोकी कनपटी। देवा- कन् इत्वम्। चन्द्रहार, औरतका कमरबंद। सयका हार, मन्दिरका दरवाजा। ४ कलन, बीवो। कटिया (हिं॰ स्त्री.) १ हक्काक, नग बनानवाला। ५ काञ्ची, घची। ६ कटोर, कूला। यह नग काट छांट कर सुधारता है। २ पशुखाद्य- कटिका (सं० स्त्री०) प्रशस्ता कटिरस्थाः, कटि- विशेष, चौपायोंका एक चारा। यह ज्वार मकई कन्-टाप । १ अतिसुन्दर कटिदेशयुक्ता स्त्री, जिस पादिके वृक्ष गडांससे टुकड़े-टुकड़े कर बनायो जाता पौरतके पतली कमर रहे। २ कटोर, कूला। है। कटिया पहुंटेवर कटती है। अलङ्कारविशेष, कटिकुष्ठ (सं• को०) श्रोणीका कुष्ठरोग, कमर- एक जे.वर। इसे स्त्रियां मस्तकपर धारण करती हैं। का कोढ़। कंटिया, मछलो पकड़नेका एक छोटा काटा। ___Vol. IIL. 160<noinclude></noinclude> q863bs14ls7229l6ra5t0ldixkye1a5 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१५ 250 76337 664790 609241 2026-07-03T07:21:08Z आदेश यादव 3609 664790 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|'''४७४'''|'''ऐज़न—ऐतावाड खुर्द'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> एजन (अ॰ अव्य॰) तथा, वैसा ही। गणना आदिमें किसी विषयको बार–बार न लिख एकही बार लिखते और उसके नीचे ऐज़न रखते हैं। इससे उक्त विषय बार बार लिखा समझा जाता है। ऐड़ (सं॰ पु॰) एड़ा अस्तात्र, एड़ा-अण। १ एड़ा शब्दयुक्त अध्याय वा अनुवाक। २ इड़ाके पुत्र पुरुरवा। (त्रि.) ३ बलकारक पदार्थयुक्त। ४ इड़ा शब्दयुक्त। ऐड़क (सं० पु.) एड़क स्वाधै अण। १ मेषाकार पशुविशेष, किसी कि.स्मका भेड़ा। (त्रि.) २ मेषसम्बन्धीय, एड़क पशुसे उत्पन्न। ऐडमिरल (अं. पु०= Admiral ) नौसेनाका अध्यक्ष, जहाजी फौजका बड़ा अफसर। ऐडविड (स० पु.) १ कुवेर। २ दशरथ राजाके एक पुत्र। ऐडवोकेट (० पु०% Advocate) न्यायालयमें परार्थवक्ता, मुखतार, वकील। ऐडवोकेट-जनरल (अं० पु० = Advocate-general) हाइकोर्टका बड़ा सरकारी वकील। ऐड़क (स. क्लो. ) एड़क एव, स्वार्थे अण्। अस्थि एवं तुच्छ द्रव्यको भित्ति, हड्डी और कूड़े की दीवार। ऐण (सं. वि.) एणस्य इदम्, एण-अण्। १ मृग सम्बन्धीय, काले हिरनसे पैदा। ऐणिक (सं० त्रि०) एणं मृगं हन्ति, एण-ठक्। मृगहन्ता, काले हिरनका शिकार करनेवाला। ऐणोपचन (सं.वि.) एणौपचनदेशभवः, एणीपचन-अण्। एणीपचन देशीय। एणीपचन देखो। ऐणेय (सं० वि०) एण्या इदम्, एणी-ठञ् । १ कृष्णसार मृगीसे उत्पन, काली हिरनीसे पैदा। (पु.)२ कृष्ण सारमृग, काला हिरन । (क्लो०) ३ रतिबन्धविशेष। ऐणेयक (सं० लो०) एलबालुक। ऐण्डिनेय (सं० पु.) वेदको एक शाखा। ऐतदात्म्य (सं० लो०) यह पदार्थ वा प्रधानता रखनेका भाव। ऐतरेय (वै० पु.) ऋग्वेदको एक शाखा। भाष्यकारोंके मतसे महिदास ऐतरेय नामक एक ऋषि <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इस शाखाके प्रवर्तक हैं। छान्दोग्योपनिषद में लिख दिया, कि महिदास ऐतरेयने पूर्णज्ञान लाभ किया था। भाष्यकार शङ्कराचार्य के मतसे 'इतराया अपत्यं ऐतरेयः' अर्थात् इतराके अपत्यको ऐतरेय कहते हैं। सायणाचार्य ने ऐतरेय-ब्राह्मणके भाष्यको उपक्रमणिकामें महिदास ऐतरेयका परिचय इस प्रकार दिया है— "किसी महर्षि के अनेक पत्नियां रहीं। उनमें एकका नाम इतरा था। उनके महिदास नामक एक पुत्र हुआ। 'अरण्यकाण्डमें' उन्हीं को 'महिदास ऐतरेय' कहा है। महर्षि अपर पत्निवोंको बहुत चहते. किन्तु महिदाससे दूर रहते थे। किसो यज्ञसभामें उन्होंने महिदासको उपेक्षा कर अपर पुत्र गोद पर बैठा लिये। इतराने अपने पुत्रका म्लानमुख देख कुलदेवता भूमिसे प्रार्थना की थी। उसी समय भूमि- देवता दिव्यमूर्ति धारण कर यज्ञसभामें प्राविभूत हुई। उन्होंने महिदासको दिव्य सिंहासनपर बैठा वर दिया था-तुम सकल पुत्रोंकी अपेक्षा अधिक पण्डित होगे और ऐतरेय ब्राह्मण प्रतिभाषण कर दोगे।" आजकल ऐतरेय-शाखाका ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय-भारण्यक और ऐतरेय उपनिषत् पुस्तक मिलता है। .. ऐतरेयक, ऐतरेयाश्रण देखो। ऐतरेयब्राह्मण (सं० ली.) ऋग्वेदका एक ब्राह्मख । इसमें होताका कार्य निर्दिष्ट है। ऐतरेय ब्राह्मणके ४० अध्याय ८ पञ्चिकामें विभक्त हैं। वैद और ब्राप देखो। ऐतरेयो ( पु.) ऐतरेय-ब्राह्मण पढनेवाला । ऐतरेयोपनिषद् (सं० स्त्री०) ऐतरेय आरण्यकको एक उपनिषत्। ऐतश. (सं० पु.) भृगुवंशीय एक मुनि। इन्होंने ही “ऐतश प्रलाप' नामक वैदिक ग्रन्थ बनाया था। ऐतशायन (स.पु.) ऐतशके सन्तान। ऐतावाड खुर्द-बम्बई प्रान्तके सतारा जिले का एक ग्राम। यह वालवा तहसीलके प्रधान नगर पेठसे दक्षिण ७ मील पड़ता है। मालखेड़के राष्ट्रकूट नृपतिने ब्राह्मणोंको ६७५ शकको रथाष्टमीपर जो भूमिदान किया, उसमें इसका नाम भी दिया है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> t9d4ii42i8bhqxe9cgrw2c0smat47oj 664795 664790 2026-07-03T08:11:12Z आदेश यादव 3609 664795 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|'''४७४'''|'''ऐज़न—ऐतावाड खुर्द'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> एजन (अ॰ अव्य॰) तथा, वैसा ही। गणना आदिमें किसी विषयको बार–बार न लिख एकही बार लिखते और उसके नीचे ऐज़न रखते हैं। इससे उक्त विषय बार बार लिखा समझा जाता है<br> ऐड़ (सं॰ पु॰) एड़ा अस्तात्र, एड़ा-अण। १ एड़ा शब्दयुक्त अध्याय वा अनुवाक। २ इड़ाके पुत्र पुरुरवा। (त्रि.) ३ बलकारक पदार्थयुक्त। ४ इड़ा शब्दयुक्त।<br> ऐड़क (सं० पु.) एड़क स्वाधै अण। १ मेषाकार पशुविशेष, किसी कि.स्मका भेड़ा। (त्रि.) २ मेषसम्बन्धीय, एड़क पशुसे उत्पन्न। ऐडमिरल (अं. पु०= Admiral ) नौसेनाका अध्यक्ष, जहाजी फौजका बड़ा अफसर। ऐडविड (स० पु.) १ कुवेर। २ दशरथ राजाके एक पुत्र। ऐडवोकेट (० पु०% Advocate) न्यायालयमें परार्थवक्ता, मुखतार, वकील। ऐडवोकेट-जनरल (अं० पु० = Advocate-general) हाइकोर्टका बड़ा सरकारी वकील। ऐड़क (स. क्लो. ) एड़क एव, स्वार्थे अण्। अस्थि एवं तुच्छ द्रव्यको भित्ति, हड्डी और कूड़े की दीवार। ऐण (सं. वि.) एणस्य इदम्, एण-अण्। १ मृग सम्बन्धीय, काले हिरनसे पैदा। ऐणिक (सं० त्रि०) एणं मृगं हन्ति, एण-ठक्। मृगहन्ता, काले हिरनका शिकार करनेवाला। ऐणोपचन (सं.वि.) एणौपचनदेशभवः, एणीपचन-अण्। एणीपचन देशीय। एणीपचन देखो। ऐणेय (सं० वि०) एण्या इदम्, एणी-ठञ् । १ कृष्णसार मृगीसे उत्पन, काली हिरनीसे पैदा। (पु.)२ कृष्ण सारमृग, काला हिरन । (क्लो०) ३ रतिबन्धविशेष। ऐणेयक (सं० लो०) एलबालुक। ऐण्डिनेय (सं० पु.) वेदको एक शाखा। ऐतदात्म्य (सं० लो०) यह पदार्थ वा प्रधानता रखनेका भाव। ऐतरेय (वै० पु.) ऋग्वेदको एक शाखा। भाष्यकारोंके मतसे महिदास ऐतरेय नामक एक ऋषि <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इस शाखाके प्रवर्तक हैं। छान्दोग्योपनिषद में लिख दिया, कि महिदास ऐतरेयने पूर्णज्ञान लाभ किया था। भाष्यकार शङ्कराचार्य के मतसे 'इतराया अपत्यं ऐतरेयः' अर्थात् इतराके अपत्यको ऐतरेय कहते हैं। सायणाचार्य ने ऐतरेय-ब्राह्मणके भाष्यको उपक्रमणिकामें महिदास ऐतरेयका परिचय इस प्रकार दिया है— "किसी महर्षि के अनेक पत्नियां रहीं। उनमें एकका नाम इतरा था। उनके महिदास नामक एक पुत्र हुआ। 'अरण्यकाण्डमें' उन्हीं को 'महिदास ऐतरेय' कहा है। महर्षि अपर पत्निवोंको बहुत चहते. किन्तु महिदाससे दूर रहते थे। किसो यज्ञसभामें उन्होंने महिदासको उपेक्षा कर अपर पुत्र गोद पर बैठा लिये। इतराने अपने पुत्रका म्लानमुख देख कुलदेवता भूमिसे प्रार्थना की थी। उसी समय भूमि- देवता दिव्यमूर्ति धारण कर यज्ञसभामें प्राविभूत हुई। उन्होंने महिदासको दिव्य सिंहासनपर बैठा वर दिया था-तुम सकल पुत्रोंकी अपेक्षा अधिक पण्डित होगे और ऐतरेय ब्राह्मण प्रतिभाषण कर दोगे।" आजकल ऐतरेय-शाखाका ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय-भारण्यक और ऐतरेय उपनिषत् पुस्तक मिलता है। .. ऐतरेयक, ऐतरेयाश्रण देखो। ऐतरेयब्राह्मण (सं० ली.) ऋग्वेदका एक ब्राह्मख । इसमें होताका कार्य निर्दिष्ट है। ऐतरेय ब्राह्मणके ४० अध्याय ८ पञ्चिकामें विभक्त हैं। वैद और ब्राप देखो। ऐतरेयो ( पु.) ऐतरेय-ब्राह्मण पढनेवाला । ऐतरेयोपनिषद् (सं० स्त्री०) ऐतरेय आरण्यकको एक उपनिषत्। ऐतश. (सं० पु.) भृगुवंशीय एक मुनि। इन्होंने ही “ऐतश प्रलाप' नामक वैदिक ग्रन्थ बनाया था। ऐतशायन (स.पु.) ऐतशके सन्तान। ऐतावाड खुर्द-बम्बई प्रान्तके सतारा जिले का एक ग्राम। यह वालवा तहसीलके प्रधान नगर पेठसे दक्षिण ७ मील पड़ता है। मालखेड़के राष्ट्रकूट नृपतिने ब्राह्मणोंको ६७५ शकको रथाष्टमीपर जो भूमिदान किया, उसमें इसका नाम भी दिया है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> r9uyp2vvnja0i8laex4svsrioo8txn9 664796 664795 2026-07-03T08:13:07Z आदेश यादव 3609 664796 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|'''४७४'''|'''ऐज़न—ऐतावाड खुर्द'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> एजन (अ॰ अव्य॰) तथा, वैसा ही। गणना आदिमें किसी विषयको बार–बार न लिख एकही बार लिखते और उसके नीचे ऐज़न रखते हैं। इससे उक्त विषय बार बार लिखा समझा जाता है<br> ऐड़ (सं॰ पु॰) एड़ा अस्तात्र, एड़ा-अण। १ एड़ा शब्दयुक्त अध्याय वा अनुवाक। २ इड़ाके पुत्र पुरुरवा। (त्रि.) ३ बलकारक पदार्थयुक्त। ४ इड़ा शब्दयुक्त।<br> ऐड़क (सं० पु.) एड़क स्वाधै अण। १ मेषाकार पशुविशेष, किसी कि.स्मका भेड़ा। (त्रि.) २ मेषसम्बन्धीय, एड़क पशुसे उत्पन्न। {{outdent|ऐडमिरल (अं. पु०= Admiral ) नौसेनाका अध्यक्ष, जहाजी फौजका बड़ा अफसर।}} ऐडविड (स० पु.) १ कुवेर। २ दशरथ राजाके एक पुत्र। ऐडवोकेट (० पु०% Advocate) न्यायालयमें परार्थवक्ता, मुखतार, वकील। ऐडवोकेट-जनरल (अं० पु० = Advocate-general) हाइकोर्टका बड़ा सरकारी वकील। ऐड़क (स. क्लो. ) एड़क एव, स्वार्थे अण्। अस्थि एवं तुच्छ द्रव्यको भित्ति, हड्डी और कूड़े की दीवार। ऐण (सं. वि.) एणस्य इदम्, एण-अण्। १ मृग सम्बन्धीय, काले हिरनसे पैदा। ऐणिक (सं० त्रि०) एणं मृगं हन्ति, एण-ठक्। मृगहन्ता, काले हिरनका शिकार करनेवाला। ऐणोपचन (सं.वि.) एणौपचनदेशभवः, एणीपचन-अण्। एणीपचन देशीय। एणीपचन देखो। ऐणेय (सं० वि०) एण्या इदम्, एणी-ठञ् । १ कृष्णसार मृगीसे उत्पन, काली हिरनीसे पैदा। (पु.)२ कृष्ण सारमृग, काला हिरन । (क्लो०) ३ रतिबन्धविशेष। ऐणेयक (सं० लो०) एलबालुक। ऐण्डिनेय (सं० पु.) वेदको एक शाखा। ऐतदात्म्य (सं० लो०) यह पदार्थ वा प्रधानता रखनेका भाव। ऐतरेय (वै० पु.) ऋग्वेदको एक शाखा। भाष्यकारोंके मतसे महिदास ऐतरेय नामक एक ऋषि <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इस शाखाके प्रवर्तक हैं। छान्दोग्योपनिषद में लिख दिया, कि महिदास ऐतरेयने पूर्णज्ञान लाभ किया था। भाष्यकार शङ्कराचार्य के मतसे 'इतराया अपत्यं ऐतरेयः' अर्थात् इतराके अपत्यको ऐतरेय कहते हैं। सायणाचार्य ने ऐतरेय-ब्राह्मणके भाष्यको उपक्रमणिकामें महिदास ऐतरेयका परिचय इस प्रकार दिया है— "किसी महर्षि के अनेक पत्नियां रहीं। उनमें एकका नाम इतरा था। उनके महिदास नामक एक पुत्र हुआ। 'अरण्यकाण्डमें' उन्हीं को 'महिदास ऐतरेय' कहा है। महर्षि अपर पत्निवोंको बहुत चहते. किन्तु महिदाससे दूर रहते थे। किसो यज्ञसभामें उन्होंने महिदासको उपेक्षा कर अपर पुत्र गोद पर बैठा लिये। इतराने अपने पुत्रका म्लानमुख देख कुलदेवता भूमिसे प्रार्थना की थी। उसी समय भूमि- देवता दिव्यमूर्ति धारण कर यज्ञसभामें प्राविभूत हुई। उन्होंने महिदासको दिव्य सिंहासनपर बैठा वर दिया था-तुम सकल पुत्रोंकी अपेक्षा अधिक पण्डित होगे और ऐतरेय ब्राह्मण प्रतिभाषण कर दोगे।" आजकल ऐतरेय-शाखाका ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय-भारण्यक और ऐतरेय उपनिषत् पुस्तक मिलता है। .. ऐतरेयक, ऐतरेयाश्रण देखो। ऐतरेयब्राह्मण (सं० ली.) ऋग्वेदका एक ब्राह्मख । इसमें होताका कार्य निर्दिष्ट है। ऐतरेय ब्राह्मणके ४० अध्याय ८ पञ्चिकामें विभक्त हैं। वैद और ब्राप देखो। ऐतरेयो ( पु.) ऐतरेय-ब्राह्मण पढनेवाला । ऐतरेयोपनिषद् (सं० स्त्री०) ऐतरेय आरण्यकको एक उपनिषत्। ऐतश. (सं० पु.) भृगुवंशीय एक मुनि। इन्होंने ही “ऐतश प्रलाप' नामक वैदिक ग्रन्थ बनाया था। ऐतशायन (स.पु.) ऐतशके सन्तान। ऐतावाड खुर्द-बम्बई प्रान्तके सतारा जिले का एक ग्राम। यह वालवा तहसीलके प्रधान नगर पेठसे दक्षिण ७ मील पड़ता है। मालखेड़के राष्ट्रकूट नृपतिने ब्राह्मणोंको ६७५ शकको रथाष्टमीपर जो भूमिदान किया, उसमें इसका नाम भी दिया है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> prku382rnbw2u5lck8btrrqf7tbis28 664801 664796 2026-07-03T09:16:18Z आदेश यादव 3609 664801 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|'''४७४'''|'''ऐज़न—ऐतावाड खुर्द'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ऐज़न (अ॰ अव्य॰) तथा, वैसा ही। गणना आदिमें किसी विषयको बार–बार न लिख एकही बार लिखते और उसके नीचे ऐज़न रखते हैं। इससे उक्त विषय बार बार लिखा समझा जाता है। ऐड़ (सं॰ पु॰) एड़ा अस्त्रात्र, एड़ा–अण्। १ एड़ा शब्दयुक्त अध्याय वा अनुवाक। २ इड़ाके पुत्र पुरुरवा। (त्रि॰) ३ बलकारक पदार्थयुक्त। ४ इड़ा शब्दयुक्त। ऐड़क (सं॰ पु॰) एड़क स्वार्थे अण्। १ मेषाकार पशुविशेष, किसी क़िस्मका भेड़ा। (त्रि॰) २ मेषसम्बन्धीय, एड़क पशुसे उत्पन्न। {{outdent|ऐडमिरल (अं॰ पु॰ = Admiral ) नौसेनाका अध्यक्ष, जहाजी फौजका बड़ा अफसर।}} ऐडविड (स॰ पु॰) १ कुवेर। २ दशरथ राजाके एक पुत्र। ऐडवोकेट (अ॰ पु॰ = Advocate) न्यायालयमें परार्थवक्ता, मुखतार, वकील। ऐडवोकेट–जनरल (अं॰ पु॰ = Advocate–general) हाइकोर्टका बड़ा सरकारी वकील। ऐड़क (स॰ ल्की) एड़क एव, स्वार्थे अण्। अस्थि एवं तुच्छ द्रव्यकी भित्ति, हड्डी और कूड़ेकी दीवार। ऐण (सं॰ त्रि॰) एणस्य इदम्, एण-अण्। १ मृगसम्बन्धीय, काले हिरनसे पैदा। ऐणिक (सं॰ त्रि॰) एणं मृगं हन्ति, एण-ठक्। मृगहन्ता, काले हिरनका शिकार करनेवाला। एणीपचन (सं॰ त्रि॰) एणीपचनदेशभवः, एणीपचनअण्। एणीपचन देशीय। {{x-smaller|एणीपचन देखो}}। ऐणेय (सं० वि०) एण्या इदम्, एणी-ठञ् । १ कृष्णसार मृगीसे उत्पन, काली हिरनीसे पैदा। (पु.)२ कृष्ण सारमृग, काला हिरन । (क्लो०) ३ रतिबन्धविशेष। ऐणेयक (सं० लो०) एलबालुक। ऐण्डिनेय (सं० पु.) वेदको एक शाखा। ऐतदात्म्य (सं० लो०) यह पदार्थ वा प्रधानता रखनेका भाव। ऐतरेय (वै० पु.) ऋग्वेदको एक शाखा। भाष्यकारोंके मतसे महिदास ऐतरेय नामक एक ऋषि <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इस शाखाके प्रवर्तक हैं। छान्दोग्योपनिषद में लिख दिया, कि महिदास ऐतरेयने पूर्णज्ञान लाभ किया था। भाष्यकार शङ्कराचार्य के मतसे 'इतराया अपत्यं ऐतरेयः' अर्थात् इतराके अपत्यको ऐतरेय कहते हैं। सायणाचार्य ने ऐतरेय-ब्राह्मणके भाष्यको उपक्रमणिकामें महिदास ऐतरेयका परिचय इस प्रकार दिया है— "किसी महर्षि के अनेक पत्नियां रहीं। उनमें एकका नाम इतरा था। उनके महिदास नामक एक पुत्र हुआ। 'अरण्यकाण्डमें' उन्हीं को 'महिदास ऐतरेय' कहा है। महर्षि अपर पत्निवोंको बहुत चहते. किन्तु महिदाससे दूर रहते थे। किसो यज्ञसभामें उन्होंने महिदासको उपेक्षा कर अपर पुत्र गोद पर बैठा लिये। इतराने अपने पुत्रका म्लानमुख देख कुलदेवता भूमिसे प्रार्थना की थी। उसी समय भूमि- देवता दिव्यमूर्ति धारण कर यज्ञसभामें प्राविभूत हुई। उन्होंने महिदासको दिव्य सिंहासनपर बैठा वर दिया था-तुम सकल पुत्रोंकी अपेक्षा अधिक पण्डित होगे और ऐतरेय ब्राह्मण प्रतिभाषण कर दोगे।" आजकल ऐतरेय-शाखाका ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय-भारण्यक और ऐतरेय उपनिषत् पुस्तक मिलता है। .. ऐतरेयक, ऐतरेयाश्रण देखो। ऐतरेयब्राह्मण (सं० ली.) ऋग्वेदका एक ब्राह्मख । इसमें होताका कार्य निर्दिष्ट है। ऐतरेय ब्राह्मणके ४० अध्याय ८ पञ्चिकामें विभक्त हैं। वैद और ब्राप देखो। ऐतरेयो ( पु.) ऐतरेय-ब्राह्मण पढनेवाला । ऐतरेयोपनिषद् (सं० स्त्री०) ऐतरेय आरण्यकको एक उपनिषत्। ऐतश. (सं० पु.) भृगुवंशीय एक मुनि। इन्होंने ही “ऐतश प्रलाप' नामक वैदिक ग्रन्थ बनाया था। ऐतशायन (स.पु.) ऐतशके सन्तान। ऐतावाड खुर्द-बम्बई प्रान्तके सतारा जिले का एक ग्राम। यह वालवा तहसीलके प्रधान नगर पेठसे दक्षिण ७ मील पड़ता है। मालखेड़के राष्ट्रकूट नृपतिने ब्राह्मणोंको ६७५ शकको रथाष्टमीपर जो भूमिदान किया, उसमें इसका नाम भी दिया है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 0hp5mow7cwnw9j2ysxt0at1kj67mja7 पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/४६ 250 77063 663919 662946 2026-07-02T15:22:54Z सौरभ तिवारी 05 49 /* शोधित */ 663919 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||असमान आय के दुष्परिणाम|३९}}</noinclude>समझदार आदमी ने कभी भी इनकी इच्छा नहीं की। बात यह है कि जब कभी दूसरों की अपेक्षा कुछ कुटुम्ब बहुत अधिक धनी होंगे तभी इन बुराइयों का जन्म होना निश्चित है। धनी आदमी जब पति और पिता बन कर स्त्री को अपने साथ घसीटता है तब वह भी यही करता है। तब अन्य लोगों की भांति वह भी पहिले भोजन, वस्त्र और मकान का प्रबन्ध करता है। ग़रीब आदमी भी यही करता है। किन्तु अपनी शक्तिभर खर्च कर डालने पर भी ग़रीब आदमी की ये आवश्यकतायें पूर्णतः पूरी नहीं होतीं, भोजन पूरा नहीं पड़ता, कपड़े पुराने और मैले रहते हैं, रहने के लिये एक कोठरी या उसका कुछ भाग मिल पाता है और यह भी अस्वास्थ्यकर होता है। दूसरी ओर धनी आदमी शानदार कोठी में रहता है, ख़ूब खाता और पहनता है। फिर भी उसके पास अपनी रुचियों और कल्पनाओं को सन्तुष्ट करने तथा दुनिया में बड़प्पन जमाने के लिये फाफ़ी रुपया बचा रहता है। ग़रीब आदमी कहता है—"मुझे और रोटी, और कपड़े, तथा अपने कुटुम्ब के लिये अधिक अच्छा घर चाहिए, किन्तु मेरे पास उसके लिये ख़र्च करने को कुछ नहीं है।" धनी आदमी कहता है—"मुझे कई मोटरें जल-नौकाएं, पत्नी और पुत्रों के लिये हीरे-मोती और घने जंगल में एक शिकारगाह चाहिए।" स्वभावतः व्यवसायी मोटरें और जल-नौकाएं बनाने में जुट पड़ते हैं, अफ़रीका में जाकर हीरे खुदवाते हैं, समुद्र की तह से मोती निकलवाते हैं और मिनटों में शिकारगाह खड़ी कर देते हैं। ग़रीब आदमी की ओर कोई ध्यान नहीं देता जिसकी आवश्यकतायें तात्कालिक होती हैं, किन्तु जिसकी जेबें खाली रहती हैं। इसी बात को दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं। ग़रीब आदमी जिन चीजों का कभी अनुभव करता है उनको {{SIC|बनाने|यनाने}} के लिए मज़दूर लगाना चाहता है। वह चाहता है कि लोग पकाने, बुनने, सीने और मकान बनाने का काम करें। किन्तु वह पाक-शास्त्रियों और बुनकर मास्टरों को इतना रुपया नहीं दे सकता जिससे वे अपने अधीन काम करने वालों को मजदूरी चुका सकें। उधर धनी आदमी अपनी पसन्द<noinclude></noinclude> ltz5yiur8fl9phojta3hflwrtwd2hmw पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६१ 250 82724 664744 663304 2026-07-02T18:56:15Z Shivaniya shaw 4129 664744 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />br>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&</noinclude>{{rh||अक्षरलिपि|५६}} <noinclude><div style="display: flex; gap: 20px; align-items: flex-start; justify-content: space-between; border-left: 1px solid transparent;"></noinclude> <div style="width: 48%; float: left; padding-right: 10px; border-right: 1px solid black; min-height: 600px;"> {{outdent|युक्तिका समर्थन किसी तरह किया जा नहीं सकता, कि सन् ई० से पहलेकी ८वीं शताब्दीके बाद फिनिक (Phoenician) नामक बणिकोंसे भारतवासियोंने अक्षरज्ञान प्राप्त किया था।<br> {{gap}}सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें शाक्य बुद्धका अभ्युदय हुआ। उनके निर्वाण प्राप्त होनेसे कुछ ही पीछे उनके धर्मोपदेशकी रक्षा करनेके लिये उनके प्रधान-प्रधान शिष्यों ने इकट्ठा हो पहला बौद्धसङ्घ आह्वान किया। फ्रान्सीसी पण्डित फूको (Foucaux) और राजा राजेन्द्रलाल मित्र महाशयने ललितविस्तर-की समालोचनाके समय लिखा था, कि ललितविस्तरमें जो गाथा हैं, वह इसी समय (सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें) बनाई और संग्रह की गई थीं।* उन गाथाओंमें इस तरह वर्णन किया गया है— {{center|{{smaller|"सा गाथलेखलिखिते गुण अर्थयुक्ता<br>या कन्य ईदृश भवेन्मम तां वरयेथाः।" ।<br> {{Right|(ललितविस्तर १२ अ०)}} (शाक्यसिंहने कहा) जो कन्या गाथालेख लिखने और गाथाका अर्थ समझनेमें चतुर होगी, उससे मैं विवाह करूँगा।<br> {{gap}}कही हुई गाथासे क्या हम नहीं जान सकते, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले इस देशमें लिपिज्ञानकुशला महिलाओंका भी अभाव न था। यह बात सहज ही अनुमेय है, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले जहाँ कन्या लिखनेमें निपुण न होनेसे राजकुमारकी पत्नी बननेके योग्य न समझी जाती थी, उस देशके लिये अक्षर-लिपिकी चर्चा कितनी पुरानी है। ललितविस्तरकी गाथामें लिपिशाल† और लिपिशास्त्र‡ का उल्लेख}} {{Rule|}} <br><br> <hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;"> {{smaller|* Dr. Rajendralal Mitra's Lalita Vistara, Intro. p. 56.<br> † "शास्त्राणि यानि प्रचरन्ति च देवलोके<br>संख्या लिपिच गणनाऽपि च धातुतन्त्रः।<br>ये शिल्पयोगपृथु लौकिक अप्रमेया-<br>स्तेष्वेषु शिक्षितु पुरा बहुकल्पकोट्यः।<br>किन्तु जनस्य अनुवर्त्तनतां करोति<br>लिपिशालमागतु सुशिक्षितशिक्षणार्थं"॥<br> (ललितविस्तर १० अ०)}} ‡ "लोकोत्तरेषु चतुःसत्यपथविधिज्ञो हेतुप्रतीत्यकुशली यथ सम्भवति।<br>यथ चानिरोधक्षयु संस्कृ तसोऽस्तिभावस्तस्मिन् विधिज्ञः किमथो लिपिशास्त्रमात्रे"॥< (ललितविस्तर १० अ०)}} </div> <div style="width: 48%; float: right; padding-left: 10px;"> होनेसे स्पष्ट मालूम होता है, कि उस पुराने समयमें भी लिपि सिखानेकी पाठशालाएं और नाना देशीय लिपिज्ञानके उपयुक्त लिपि-शास्त्र (Palaeography and Epigraphy) प्रचलित था।<br> {{center|{{smaller|ब्राह्मी आदि लिपियोंका उत्पत्ति-काल।}}}} {{gap}}इस समय यहाँ आलोच्य है, कि जिस प्राचीन कालकी बात चल रही है, उस समय भारतमें कैसे अक्षर प्रचलित थे।<br> {{gap}}पूर्वोक्त ललितविस्तरमें चौंसठ प्रकारकी लिपिका उल्लेख देख पड़ता है। यथा—<br> {{gap}}१ ब्राह्मी, २ खरोष्ठी, ३ पुष्करसारी, ४ अङ्ग, ५ वङ्ग, ६ मगध, ७ माङ्गल्य, ८ मनुष्य, ९ अङ्गुलीय, १० शकारि, ११ ब्रह्मवल्ली, १२ द्राविड़, १३ कनारी, १४ दक्षिण, १५ उग्र, १६ संख्या, १७ अनुलोम, १८ अवधनु, १९ दरद, २० खास्य, २१ चीन, २२ हूण, २३ मध्याक्षरविस्तर, २४ पुष्प, २५ देव, २६ नाग, २७ यक्ष, २८ गन्धर्व, २९ किन्नर, ३० महोरग, ३१ असुर, ३२ गरुड़, ३३ मृगचक्र, ३४ चक्र, ३५ वायुमरुत्, ३६ भौमदेव, ३७ अन्तरीक्षदेव, ३८ उत्तरकुरुद्वीप, ३९ अपरगौड़ादि, ४० पूर्वविदेह, ४१ उत्क्षेप, ४२ निक्षेप, ४३ विक्षेप, ४४ प्रक्षेप, ४५ सागर, ४६ वज्र, ४७ लेख-प्रतिलेख, ४८ अनुद्रुत, ४९ शास्त्रावर्त्त, ५० गणनावर्त्त, ५१ उत्क्षेपावर्त्त, ५२ विक्षेपावर्त्त, ५३ पादलिखित, ५४ द्विरुत्तरपदसन्धि, ५५ दशोत्तरपदसन्धि, ५६ अध्या-हारिणी, ५७ सर्वभूतसंग्रहणी, ५८ विद्यानुलोम, ५९ विमिश्रित, ६० ऋषितपस्तप्ता, ६१ धरणीप्रप्रेक्षण, ६२ सर्वौषधिनिष्यन्दा, ६३ सर्वसारसंग्रहणी और ६४ सर्वभूतरुतग्रहणी। {{Right|(ललितविस्तर १० अ०)}} जिस ललितविस्तरमें पूर्वोक्त लिपिमालाका नाम उद्धृत हुआ है, उसी ग्रंथका चू-फ-लन्ने सन् ६५ ई० के समय चीन-भाषामें अनुवाद किया था।\* ऐसे स्थलमें मूल ग्रंथके सब जगह फैलने और इसके बाद चीनदेश पहुँचनेमें अल्प समय न लगा होगा। पाश्चात्य और इस देशके राजा राजेन्द्रलाल मित्र-प्रमुख† <br><br> <hr style="width:100%; border:0; border-top:1px solid #ccc;"> {{smaller|* Beal's Romantic Legend of Sakya Buddha, Intro-duction.}} </div> <noinclude></div><div style="clear:both;"></div></noinclude><noinclude></noinclude> ayuvaznf67qpeh9777i5repf24y51h6 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६३ 250 82727 664766 663254 2026-07-03T04:46:45Z Shivaniya shaw 4129 664766 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{rh||अक्षरलिपि|६१}} जैनियोंके ४थे उपाङ्ग पन्नवणा (प्रज्ञापना)-सूत्रमें पूर्वोक्त अट्ठारह लिपियोंका उल्लेख वर्तमान है। लिपिकरोंके दोषसे विभिन्न पुस्तकोंमें कुछ पाठ- भेद देख पड़ता है। प्रज्ञापनासूत्रके टीकाकार मलय- गिरिने लिखा है— "ब्राह्मी यवनानीत्यादयो लिपिभेदास्तु सम्प्रदायादवशेषः" अर्थात् ब्राह्मी, यवनानी इत्यादि अट्ठारह प्रकार- की लिपि विभिन्न सम्प्रदायोंसे उद्भूत हुई है। जैनशास्त्रके मतसे जैनाङ्गसमूह महावीर स्वामी- के समय पहले फैला और वीर-निर्वाणके १६४ वर्ष बाद (सन् ई० से ३६३ वर्ष पहले) पाटलिपुत्रके श्रीसङ्घमें संग्रहीत हुआ। ऐसे स्थलमें कहा जा सकता है, कि सम्राट् अशोकसे पहले भारतमें ब्राह्मी- प्रभृति १८ प्रकारकी लिपि चलती थी। {{Rh|यवनानी।}} यवनानी नाम देख कोई-कोई कहना चाहते हैं, कि मकदूनिया-वीर सिकन्दरके समय इस देशमें यूनानी यवनोंने जो लिपि चलाई वही यवनानी लिपि है। इस यूनानी शब्दका उल्लेख देखकर मोक्षमूलर- प्रभृति कोई-कोई पाश्चात्य अध्यापक अष्टाध्यायीके सूत्र- कार पाणिनिको भी इसी समयका व्यक्ति बताना चाहते हैं। किन्तु पाणिनिसूत्रके वार्त्तिककार और महाभाष्यकारके 'यवनानी' शब्दका लिपि* अर्थ करते भी पाणिनिने कहीं स्पष्टतः यह अर्थ नहीं प्रकाश किया। स्त्रीलिङ्गमें जिन शब्दोंके उत्तर 'आनुक्' होता है, उन्होंने दृष्टान्तकी तरह उन्हीं शब्दोंका उल्लेख किया है— "इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलआचार्याणामानुक्" {{C|(पा० ४।१।४९)}} जो हो, यवनानी शब्दमें आधुनिक सन्देहके करनेका कोई कारण नहीं देखा जाता। यवनों (Ionian) का अभ्युदय बहुत पुराना है। हमने दूसरी जगह दिखाया है, कि सन् ई० से पहलेकी १०वीं शताब्दिमें यवन या योन जातिका पराक्रम सब जगह {{Rule}} * 'यवनाल्लिप्याम् इति वक्तव्यम्'—वार्त्तिक। दीपौ यवौ यवानी। यवनाल्लिप्याम्। यवनानी लिपिः।—(महाभाष्य ४।१।४९) विघोषित हुआ। इससे पहले यवन जातिका अभ्युदय हुआ था। रामायण, महाभारत प्रभृति पुराने संस्कृत ग्रन्थोंमें भी यवन जातिका विशेष उल्लेख वर्तमान है। यवनानी कहनेसे बहुत पुरानी कीलरूपा (Cuneiform) लिपि ही समझी जाती थी। यवन देखो। {{C|पुष्करसारी।}} समवायाङ्ग और ललितविस्तरमें जिस "पुष्करसारी" लिपिकी बात लिखी है, वह भी भारतकी एक बहुत पुरानी लिपि है। पाणिनिने पुष्करसादीका उल्लेख किया है। उत्तरकुरुका और गन्धर्वलिपि प्रभृति। ऐतरेय-ब्राह्मणमें उत्तरकुरु और उत्तरमद्रकी बात लिखी है। ऐतरेय ब्राह्मणसे यह भी मालूम होता है कि, वहाँ वैदिक यागयज्ञ प्रचलित था। याग-यज्ञका निर्धारण करनेके लिये जैसे ज्योतिषका प्रयोजन पड़ता, वैसे ही उसके लिये शुल्व-सूत्र भी जानना आवश्यक है। [शुल्वसूत्र देखो!] इसीलिये अंकलिपि और गणित- लिपि भी उसी प्राचीनकालमें चली थी। गन्धारमें प्रचलित लिपि ही सम्भवतः गन्धर्व लिपि है। कन्धारके साथ बहुत पुराने समयसे ही वैदिक आर्योंका संस्रव रहा है। वहाँकी लिपि भी नितान्त आधुनिक नहीं है। खरोष्ठी-लिपिकी प्रसङ्गमें यह बात पीछे बताई जायगी। {{C|माहेश्वरलिपि।}} पाणिनिसूत्रमें जो चौदह प्रत्याहार हैं, उन्हींको वररुचि, पतञ्जलि प्रभृति वैयाकरण शिवसूत्र कहकर मानते हैं। देशमें सर्वसाधारण वैयाकरणोंको विश्वास है, कि महेश्वरने ही सबसे पहले व्याकरण प्रकाशित किया था। वेदाङ्गके अन्तर्गत जो शिक्षा है, उसमें देखा जाता है, कि महेश्वरने ही चौंसठ अक्षर प्रकाशित किये। जो हो, इसमें सन्देह नहीं, कि पाणिनिसे बहुत पहले शिवसूत्र उत्पन्न हुए थे। चीन-परिव्राजक इत्सिङ्गने सन् ई० की ७वीं शताब्दीके अन्तिम भाग- में भारत आ संस्कृत पढ़ी। उन्होंने लिखा है, 'सिद्धि- रस्तु' से आरम्भकर अक्षरमाला-सम्बन्धीय जो महेश्वर- के रचे 'सिद्धान्त' छः वर्षके बालक पहले मुखस्थ<noinclude></noinclude> 2yn8eplhx4fhxuhdvp0fkyis2q66vsz 664767 664766 2026-07-03T04:52:10Z Shivaniya shaw 4129 664767 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{rh||अक्षरलिपि|६१}} जैनियोंके ४थे उपाङ्ग पन्नवणा (प्रज्ञापना)-सूत्रमें पूर्वोक्त अट्ठारह लिपियोंका उल्लेख वर्तमान है। लिपिकरोंके दोषसे विभिन्न पुस्तकोंमें कुछ पाठ- भेद देख पड़ता है। प्रज्ञापनासूत्रके टीकाकार मलय- गिरिने लिखा है— {{blockcenter|{{x-smaller|"ब्राह्मी यवनानीत्यादयो लिपिभेदास्तु सम्प्रदायादवशेषः"}}}} अर्थात् ब्राह्मी, यवनानी इत्यादि अट्ठारह प्रकार- की लिपि विभिन्न सम्प्रदायोंसे उद्भूत हुई है। जैनशास्त्रके मतसे जैनाङ्गसमूह महावीर स्वामी- के समय पहले फैला और वीर-निर्वाणके १६४ वर्ष बाद (सन् ई० से ३६३ वर्ष पहले) पाटलिपुत्रके श्रीसङ्घमें संग्रहीत हुआ। ऐसे स्थलमें कहा जा सकता है, कि सम्राट् अशोकसे पहले भारतमें ब्राह्मी- प्रभृति १८ प्रकारकी लिपि चलती थी। {{Rh|{{blockcenter|{{x-smaller|यवनानी।}}}} यवनानी नाम देख कोई-कोई कहना चाहते हैं, कि मकदूनिया-वीर सिकन्दरके समय इस देशमें यूनानी यवनोंने जो लिपि चलाई वही यवनानी लिपि है। इस यूनानी शब्दका उल्लेख देखकर मोक्षमूलर- प्रभृति कोई-कोई पाश्चात्य अध्यापक अष्टाध्यायीके सूत्र- कार पाणिनिको भी इसी समयका व्यक्ति बताना चाहते हैं। किन्तु पाणिनिसूत्रके वार्त्तिककार और महाभाष्यकारके 'यवनानी' शब्दका लिपि* अर्थ करते भी पाणिनिने कहीं स्पष्टतः यह अर्थ नहीं प्रकाश किया। स्त्रीलिङ्गमें जिन शब्दोंके उत्तर 'आनुक्' होता है, उन्होंने दृष्टान्तकी तरह उन्हीं शब्दोंका उल्लेख किया है— {{Right|(पा० ४।१।४९)}} जो हो, यवनानी शब्दमें आधुनिक सन्देहके करनेका कोई कारण नहीं देखा जाता। यवनों (Ionian) का अभ्युदय बहुत पुराना है। हमने दूसरी जगह दिखाया है, कि सन् ई० से पहलेकी १०वीं शताब्दिमें यवन या योन जातिका पराक्रम सब जगह {{Rule}} * 'यवनाल्लिप्याम् इति वक्तव्यम्'—वार्त्तिक। दीपौ यवौ यवानी। यवनाल्लिप्याम्। यवनानी लिपिः।—(महाभाष्य ४।१।४९) विघोषित हुआ। इससे पहले यवन जातिका अभ्युदय हुआ था। रामायण, महाभारत प्रभृति पुराने संस्कृत ग्रन्थोंमें भी यवन जातिका विशेष उल्लेख वर्तमान है। यवनानी कहनेसे बहुत पुरानी कीलरूपा (Cuneiform) लिपि ही समझी जाती थी। यवन देखो। {{C|पुष्करसारी।}} समवायाङ्ग और ललितविस्तरमें जिस "पुष्करसारी" लिपिकी बात लिखी है, वह भी भारतकी एक बहुत पुरानी लिपि है। पाणिनिने पुष्करसादीका उल्लेख किया है। उत्तरकुरुका और गन्धर्वलिपि प्रभृति। ऐतरेय-ब्राह्मणमें उत्तरकुरु और उत्तरमद्रकी बात लिखी है। ऐतरेय ब्राह्मणसे यह भी मालूम होता है कि, वहाँ वैदिक यागयज्ञ प्रचलित था। याग-यज्ञका निर्धारण करनेके लिये जैसे ज्योतिषका प्रयोजन पड़ता, वैसे ही उसके लिये शुल्व-सूत्र भी जानना आवश्यक है। [शुल्वसूत्र देखो!] इसीलिये अंकलिपि और गणित- लिपि भी उसी प्राचीनकालमें चली थी। गन्धारमें प्रचलित लिपि ही सम्भवतः गन्धर्व लिपि है। कन्धारके साथ बहुत पुराने समयसे ही वैदिक आर्योंका संस्रव रहा है। वहाँकी लिपि भी नितान्त आधुनिक नहीं है। खरोष्ठी-लिपिकी प्रसङ्गमें यह बात पीछे बताई जायगी। {{C|माहेश्वरलिपि।}} पाणिनिसूत्रमें जो चौदह प्रत्याहार हैं, उन्हींको वररुचि, पतञ्जलि प्रभृति वैयाकरण शिवसूत्र कहकर मानते हैं। देशमें सर्वसाधारण वैयाकरणोंको विश्वास है, कि महेश्वरने ही सबसे पहले व्याकरण प्रकाशित किया था। वेदाङ्गके अन्तर्गत जो शिक्षा है, उसमें देखा जाता है, कि महेश्वरने ही चौंसठ अक्षर प्रकाशित किये। जो हो, इसमें सन्देह नहीं, कि पाणिनिसे बहुत पहले शिवसूत्र उत्पन्न हुए थे। चीन-परिव्राजक इत्सिङ्गने सन् ई० की ७वीं शताब्दीके अन्तिम भाग- में भारत आ संस्कृत पढ़ी। उन्होंने लिखा है, 'सिद्धि- रस्तु' से आरम्भकर अक्षरमाला-सम्बन्धीय जो महेश्वर- के रचे 'सिद्धान्त' छः वर्षके बालक पहले मुखस्थ<noinclude></noinclude> mfkx2z6bue1rw1f3zmw0xjlxu1dxwje 664769 664767 2026-07-03T05:02:13Z Shivaniya shaw 4129 664769 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude>{{rh||अक्षरलिपि|६१}} {{Gap}}जैनियोंके ४थे उपाङ्ग पन्नवणा (प्रज्ञापना)-सूत्रमें पूर्वोक्त अट्ठारह लिपियोंका उल्लेख वर्तमान है। लिपिकरोंके दोषसे विभिन्न पुस्तकोंमें कुछ पाठ- भेद देख पड़ता है। प्रज्ञापनासूत्रके टीकाकार मलय- गिरिने लिखा है— {{blockcenter|{{x-smaller|"ब्राह्मी यवनानीत्यादयो लिपिभेदास्तु सम्प्रदायादवशेषः"}}}} अर्थात् ब्राह्मी, यवनानी इत्यादि अट्ठारह प्रकार- की लिपि विभिन्न सम्प्रदायोंसे उद्भूत हुई है। जैनशास्त्रके मतसे जैनाङ्गसमूह महावीर स्वामी- के समय पहले फैला और वीर-निर्वाणके १६४ वर्ष बाद (सन् ई० से ३६३ वर्ष पहले) पाटलिपुत्रके श्रीसङ्घमें संग्रहीत हुआ। ऐसे स्थलमें कहा जा सकता है, कि सम्राट् अशोकसे पहले भारतमें ब्राह्मी- प्रभृति १८ प्रकारकी लिपि चलती थी। {{blockcenter|{{x-smaller|यवनानी।}}}} यवनानी नाम देख कोई-कोई कहना चाहते हैं, कि मकदूनिया-वीर सिकन्दरके समय इस देशमें यूनानी यवनोंने जो लिपि चलाई वही यवनानी लिपि है। इस यूनानी शब्दका उल्लेख देखकर मोक्षमूलर- प्रभृति कोई-कोई पाश्चात्य अध्यापक अष्टाध्यायीके सूत्र- कार पाणिनिको भी इसी समयका व्यक्ति बताना चाहते हैं। किन्तु पाणिनिसूत्रके वार्त्तिककार और महाभाष्यकारके 'यवनानी' शब्दका लिपि* अर्थ करते भी पाणिनिने कहीं स्पष्टतः यह अर्थ नहीं प्रकाश किया। स्त्रीलिङ्गमें जिन शब्दोंके उत्तर 'आनुक्' होता है, उन्होंने दृष्टान्तकी तरह उन्हीं शब्दोंका उल्लेख किया है— {{Right|(पा० ४।१।४९)}} जो हो, यवनानी शब्दमें आधुनिक सन्देहके करनेका कोई कारण नहीं देखा जाता। यवनों (Ionian) का अभ्युदय बहुत पुराना है। हमने दूसरी जगह दिखाया है, कि सन् ई० से पहलेकी १०वीं शताब्दिमें यवन या योन जातिका पराक्रम सब जगह {{Rule}} * 'यवनाल्लिप्याम् इति वक्तव्यम्'—वार्त्तिक। दीपौ यवौ यवानी। यवनाल्लिप्याम्। यवनानी लिपिः।—(महाभाष्य ४।१।४९) <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> विघोषित हुआ। इससे पहले यवन जातिका अभ्युदय हुआ था। रामायण, महाभारत प्रभृति पुराने संस्कृत ग्रन्थोंमें भी यवन जातिका विशेष उल्लेख वर्तमान है। यवनानी कहनेसे बहुत पुरानी कीलरूपा (Cuneiform) लिपि ही समझी जाती थी। यवन देखो। {{C|{{x-smaller|पुष्करसारी।}}}} समवायाङ्ग और ललितविस्तरमें जिस "पुष्करसारी" लिपिकी बात लिखी है, वह भी भारतकी एक बहुत पुरानी लिपि है। पाणिनिने पुष्करसादीका उल्लेख किया है। {{blockcenter|{{x-smaller|उत्तरकुरुका और गन्धर्वलिपि प्रभृति।}}}} ऐतरेय-ब्राह्मणमें उत्तरकुरु और उत्तरमद्रकी बात लिखी है। ऐतरेय ब्राह्मणसे यह भी मालूम होता है कि, वहाँ वैदिक यागयज्ञ प्रचलित था। याग-यज्ञका निर्धारण करनेके लिये जैसे ज्योतिषका प्रयोजन पड़ता, वैसे ही उसके लिये शुल्व-सूत्र भी जानना आवश्यक है। [शुल्वसूत्र देखो!] इसीलिये अंकलिपि और गणित- लिपि भी उसी प्राचीनकालमें चली थी। गन्धारमें प्रचलित लिपि ही सम्भवतः गन्धर्व लिपि है। कन्धारके साथ बहुत पुराने समयसे ही वैदिक आर्योंका संस्रव रहा है। वहाँकी लिपि भी नितान्त आधुनिक नहीं है। खरोष्ठी-लिपिकी प्रसङ्गमें यह बात पीछे बताई जायगी। {{blockcenter|{{x-smaller|माहेश्वरलिपि।}}}} पाणिनिसूत्रमें जो चौदह प्रत्याहार हैं, उन्हींको वररुचि, पतञ्जलि प्रभृति वैयाकरण शिवसूत्र कहकर मानते हैं। देशमें सर्वसाधारण वैयाकरणोंको विश्वास है, कि महेश्वरने ही सबसे पहले व्याकरण प्रकाशित किया था। वेदाङ्गके अन्तर्गत जो शिक्षा है, उसमें देखा जाता है, कि महेश्वरने ही चौंसठ अक्षर प्रकाशित किये। जो हो, इसमें सन्देह नहीं, कि पाणिनिसे बहुत पहले शिवसूत्र उत्पन्न हुए थे। चीन-परिव्राजक इत्सिङ्गने सन् ई० की ७वीं शताब्दीके अन्तिम भाग- में भारत आ संस्कृत पढ़ी। उन्होंने लिखा है, 'सिद्धि- रस्तु' से आरम्भकर अक्षरमाला-सम्बन्धीय जो महेश्वर- के रचे 'सिद्धान्त' छः वर्षके बालक पहले मुखस्थ <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 724g7c7itgyf84q5zkcht2zm0xt6ghh पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६४ 250 82728 664772 663255 2026-07-03T05:50:45Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664772 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{rh|६२|अक्षरलिपि}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> करते, उनमें उनचास अक्षर हैं। उनके मिले हुए अक्षर अट्ठारह भागों में बंटे और इस तरह इस सिद्धान्तमें दश हजार शब्द और अनुष्टुप् छन्दके तीन- सौ श्लोक वर्तमान हैं।' अध्यापक मोक्षमूलरका* विश्वास है, कि यही 'शिवसूत्र' हैं। किन्तु इत्सिङ्गने पाणिनि-रचित एक हजार सूत्रोंको ही शिवके प्रत्या- दिष्ट सूत्र मान अपनी सम्मति प्रकाशित की है। यही शिवसूत्र जिस लिपिमें लिखे गये थे, सम्भवतः वही माहेश्वर लिपि होगी। अथवा पाणिनिने जिस माहेश्वर सम्प्रदायकी बात लिखी और वह जिस लिपिका व्यवहार करती थी, वही माहेश्वर लिपि है। {{blockcenter|{{x-smaller|आदर्शकलिपि।}}}} पतञ्जलिने महाभाष्यमें आर्यावर्त्त वाली सीमा- निर्देशके समय लिखा है,— {{blockcenter|{{x-smaller|"प्रागादर्शात् प्रत्यक्कालकवनाद्दक्षिणेन हिमवन्तमुत्तरेण पारियात्रम्॥"}}}} आदर्शके पूर्व और कालकवनके पश्चिम, हिमा- लयके दक्षिण और पारियात्रके उत्तर आर्यावर्त्त प्रदेश अवस्थित है। यानी आर्यावर्त्तो पश्चिम-सीमा पर आदर्श है। मनुसंहितामें आर्यावर्त्तके पश्चिम भी समुद्र माना गया है।† ऐसे स्थलमें समुद्रके पूर्व-किनारेसे आर्यावर्त्तका अवस्थान स्थिर करना पड़ता है। विष्णुपुराणादिमें भी भारतकी पश्चिम-सीमा यवन (Ionia) बताई गई है। इससे मालूम होता है, कि सम्भवतः आदर्श पुराना मिस्र या रूम राज्य ही है और वहाँकी सुप्राचीन लिपि ही आदर्शक-लिपि है। उसी लिपिका आदर्श ग्रहणकर पाश्चात्य सभ्य जातियों- की लिपि उत्पन्न होनेसे उस सुप्राचीन चित्रलिपिका "आदर्शकलिपि" नाम होना कुछ विचित्र नहीं। {{blockcenter|{{x-smaller| द्राविड़ी लिपि।}}}} दाक्षिणात्यके लिपितत्त्वप्रणेता बूलर साहबके बताये मतसे द्राविड़ी लिपि अशोककी (ब्राह्मी) लिपिसे स्वतन्त्र होते भी उसी एक मूल लिपि या सेमेटिक लिपिसे निकली है। द्राविड़की बट्टेलेत्तु नामक पुरानी {{Rule}} * Max Müller's India, what can it teach us, p. 343. †"आसमुद्रात् तु वै पूर्वात् आसमुद्रात् तु पश्चिमात्। तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त्तं विदुर्बुधाः॥" (मनु २।२२) <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> लिपिके 'इ' और 'उ' यह दोनों स्वर 'य' और 'व' से कुछ ही पृथक् हैं, और सेमेटिक लिपिमें सादृश्य रखते हैं। भारतके व्यवहारोपयोगी बना लिये जानेपर भी उनमें असम्पूर्णता रह गई है। डाक्टर बूलर कहते हैं, कि दाक्षिणात्य के भट्टीप्रोलुमें जो सुप्राचीन अशोकाक्षरीकी लिपि निकली है, उत्तर- भारतीय अशोकलिपिसे उसका कुछ ही पार्थक्य लक्षित होता है। दक्षिण भारतीय उक्त लिपिका 'दा' उत्तर भारतीय 'अ'कार जैसा है; उत्तर भारतीय अशोक- लिपिके व्यञ्जनके साथ आकारका चिह्न एक समानान्तर रेखा होती, किन्तु दक्षिण भारतीय लिपिमें ऐसी समानान्तर रेखाके बदले व्यञ्जनके शिरपर (।) ऐसी एक खड़ी रेखा बनी है। इससे मालूम होता है, कि बहुत पहले समयसे ही इन दोनों लिपियोंमें कुछ कुछ अलगाव रहा है। पूर्वोक्त पाश्चात्य पण्डित कहते हैं, कि फिनिकीय बणिकोंके साथ दक्षिण भारतका सा- क्षात् सम्बन्ध हो गया था। बाइबिलमें सोलोमनका मोर 'तुकी' नामसे परिचित था; द्राविड़में आज भी मोर- को 'तोकै' ही कहते हैं। इसलिये इस बातमें सन्देह नहीं, कि बाइबिलोक्त 'तुकी' दक्षिण भारतसे ही गया था। इसी तरह दक्षिण-भारतमें वाणिज्य कार्य द्वारा फिनिकोंके यत्नसे जो लिपि चला था, वही उत्तर भारतमें धीरे-धीरे फैल गई। सिवा अनुमानके इस बातका स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता कि, द्राविड़के साथ फ़िनिकोंका बहुत पहले समयसे संस्रव रहते भी फिनिक लिपि द्राविड़ोंने ग्रहण की। रामायणके समयमें द्राविड़में वैदिक आर्य-सभ्यता फैल गई थी। वाल्मीकिकी रामायणमें दाक्षिणात्यवासी हनुमान् सर्वशास्त्रदर्शी और वेदान्त- ज्ञाता परिकीर्तित हुए हैं; वे रामनामाङ्कित अँगुठी ले लङ्काको गये थे। ऐसे स्थलमें हम इसमें सन्देह करनेका कारण नहीं देखते, कि सोलोमनसे बहुत पहले दक्षिणापथके कृतविद्य लोगोंमें अक्षरलिपि प्रचलित थी। यह बात सभी पुराविद मानते हैं, कि द्राविड़ी सभ्यता अतीव पुरातन है। यह भी असम्भव नहीं है, कि द्राविड़ी सभ्यतासे फिनिक लोग आलो- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> pq8a4gpdqqmww4n7drn4a2aaopjejxw पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६५ 250 82729 664802 663256 2026-07-03T09:40:17Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664802 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अक्षरलिपि'''|'''६३'''}}   </noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>                       कित हो गये हों। इसके सम्बन्धमें यहाँ दो-एक बातें कहना हम अप्रासङ्गिक नहीं समझते। फिनिक (Phoenician) लोग पुराने यूनानियों और जर्मनजोंके निकट फोनिक या फनिक नामसे परिचित थे। फणिक जातिको आदि बणिक जाति कहा जा सकता है। फणिक और बणिक शब्दमें उच्चारणका कुछ अधिक अलगाव नहीं। सेमेटिक फ = प। ऋग्वेदके बहुतसे स्थानोंमें 'पणि' शब्द लिखा है। ५वें मण्डलवाले ३२ सूक्तके भाष्यमें सायणाचार्यने 'पणि' शब्दका 'बणिक्' अर्थ बताया है। इधर पाणिनि-के उणादि-सूत्रके अनुसार भी 'पण' धातुसे बणिक शब्द निष्पन्न हुआ है; सुतरां पणिक और बणिक एक ही बात है। ऋग्वेदमें पणि लोग गोदुग्ध-व्यवसायी और समृद्धिशाली जातिरूपसे ही परिचित हैं। दूध, दही, और घी बनानेके लिये, उनके पास 'चतुःशृङ्ग' और 'दशयन्त्र उत्स' (ऋक् ६।४४।२४) नामक यन्त्र थे। अङ्गिरा प्रभृति वेदोक्त याज्ञिक उनके घोर शत्रु थे; सदा उनका गोधन छीन लेते थे। इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब pणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।* फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद-में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।† गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों-के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर-पर उनका अधिकार हुआ। अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार-तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग-के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)-का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है। वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने-पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर * Pococke's India in Greece, p. 218. † "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४) {{block center|<poem><small>{{gap}}<noinclude></noinclude> dlet8l1yx5q9ap0j7nueva5n7iydd5e 664803 664802 2026-07-03T09:41:29Z Shivaniya shaw 4129 664803 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अक्षरलिपि'''|'''६३'''}}   </noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>                       कित हो गये हों। इसके सम्बन्धमें यहाँ दो-एक बातें कहना हम अप्रासङ्गिक नहीं समझते। फिनिक (Phoenician) लोग पुराने यूनानियों और जर्मनजोंके निकट फोनिक या फनिक नामसे परिचित थे। फणिक जातिको आदि बणिक जाति कहा जा सकता है। फणिक और बणिक शब्दमें उच्चारणका कुछ अधिक अलगाव नहीं। सेमेटिक फ = प। ऋग्वेदके बहुतसे स्थानोंमें 'पणि' शब्द लिखा है। ५वें मण्डलवाले ३२ सूक्तके भाष्यमें सायणाचार्यने 'पणि' शब्दका 'बणिक्' अर्थ बताया है। इधर पाणिनि-के उणादि-सूत्रके अनुसार भी 'पण' धातुसे बणिक शब्द निष्पन्न हुआ है; सुतरां पणिक और बणिक एक ही बात है। ऋग्वेदमें पणि लोग गोदुग्ध-व्यवसायी और समृद्धिशाली जातिरूपसे ही परिचित हैं। दूध, दही, और घी बनानेके लिये, उनके पास 'चतुःशृङ्ग' और 'दशयन्त्र उत्स' (ऋक् ६।४४।२४) नामक यन्त्र थे। अङ्गिरा प्रभृति वेदोक्त याज्ञिक उनके घोर शत्रु थे; सदा उनका गोधन छीन लेते थे। इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब pणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।* फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व- {{Rule}} * Pococke's India in Greece, p. 218. <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद-में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।† गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों-के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर-पर उनका अधिकार हुआ। अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार-तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग-के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)-का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है। वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने-पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर {{Rule}} † "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४) {{block center|<poem><small>{{gap}}<noinclude></noinclude> qiq1fh7enpqozzplubgpeo1e66daz3t पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६८ 250 82732 664804 642833 2026-07-03T10:10:40Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664804 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अक्षरलिपी'''|'''६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पार्थक्य, प्रयोग और नियमको देखते एक ब्राह्मी लिपिसे ही सब देशीय लिपि उत्पन्न हुई हैं । आज तक भारतमें जितनी लिपि आविष्कृत हुई हैं, उनमें कपिलवास्तु ( वर्त्तमान पिप्रावा) गांवकौ बौद्धलिपि ही सबसे पुरानी है । यह लिपि सन् ई॰से कोई ४५० यानी २३६४ वर्ष पहलेका है । इस लिपिके साथ आजकलको अशोक-लिपिक अक्षरोंका अलगाव नहीं है। इसलिये यह स्वीकार करना पड़ेगा, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले ब्राह्मो-लिपिका ही परिणाम होनेवाली मगधलिपि चल रही थी । पूर्वोक्त लिपिको पूर्व वर्त्ती लिपि आज तक लोगोंमें प्रचारित न होनेसे प्रत्नतत्त्वविदोंको विश्वास है, कि अशोकने ही पहले अनुशासन - प्रचारका प्रबन्ध किया, उनसे पहले ऐसे अनुशासन - प्रचारकी व्यवस्था न हुई थी । किन्तु ऐसे विश्वासका कोई मूल नहीं । जितने दिन पिप्रावेको बौद्धलिपि आविष्कृत न हुई थी, उतने दिन पुराविदोंका ऐसा विश्वास रहा सही, किन्तु इस समय उनका यह विश्वास दूर हो गया है । अशोकावदान प्रभृति बहुत से पुराने बौद्ध-ग्रन्थोंसे जाना जाता है, कि अशोकने ८४००० धर्मराजिका प्रतिष्ठित की थीं ; किन्तु अब उनमें से २५।२६ ही विद्यमान हैं । ऐसे स्थलमें विचार कीजिये, कि उनसे पूर्ववर्ती कर्त्ति का क्या परिणाम है ! काशीजीके पास- वाले सारनाथको दश हाथ मट्टीके नीचेसे भी बहुत सो पुरानी बौद्धकीर्त्ति, अशोक और कनिष्क लिपि निकली हैं । ऐसा अनुसन्धान होनेसे यह नहीं है, कि बहुत नीचे भूगर्भ से पुरानीसे भी पुरानी लिपि नहीं निकल सकतीं। सैकड़ों बार भूकम्प में प्राकृतिक विपर्यंयसे जो लाखो सुप्राचीन भारतीय कीर्ति भूगर्भशायी हुई हैं, उनका हिसाब कौन लगायेगा ? जब ८४ हज़ार अशोक कौत्ति में केवल बीस -पचीस बाक़ी बची हैं, तब यह बात सहज ही अनुमेय है, कि उनसे पहले- को लाखो कीर्ति विलुप्त हो गई । इसलिये पिप्रावे- को बौद्ध-लिपिसे पहलेको कोई शिलालिपि आज तक न निकली बता हम यह न ख़्याल करेंगे, कि उससे पहले किसी राजकीय लिपिका चलन न था । {{Gap}}१७ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हम यह मान सकते हैं, कि अधिकांश भारतीय धर्मशास्त्र बौद्धयुगसे पहले के बने हुए हैं । [स्मृति देखी। याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ, व्यास, वृहस्पति, कात्यायन प्रभृति सभी धर्मशास्त्रकारोंने राजलेख्य और राजानुशासन- लिपिका उल्लेख किया है। महर्षि याज्ञवल्काने निर्देश किया है- {{block center|<poem><small>{{gap}}“दत्त्वा भूमिं निबन्धं वा कृत्वा लेख्य' तु कारयेत् । {{gap}}आगामिभद्रनृपतिपरिज्ञानाय पार्थिवः ॥ {{gap}}पटे वा ताम्रपट्ट वा खमुद्री परिचिह्नितम् । {{gap}}अभिलेख्यात्मनो वंश्यानात्मनञ्च महीपतिः ॥ {{gap}}प्रतिग्रहपरिमाणं दानच्छ दीपवर्णनम् । {{gap}}स्वहस्तकालसम्पनं शासनं कारयेत् स्थिरम् ॥” (१।३१७ ३१८)</small></poem>}} राजा भूमिदान या कोई चिरस्थायी बन्दोबस्त करनेपर भाव भद्रनृपतियोंको समझानेके उपयोगी लेख लिखायें । राजा रूईके वस्त्र या ताम्रफलक पर अपना, वंशीय पितृपुरुषों और प्रतिग्टहीताका नाम, प्रतिग्रहका परिमाण, ग्राम क्षेत्रादि दो हुई भूमिको चतुःसौमा और उसका परिमाण निर्देश करें । पूर्वोक्त पत्र में राजा अपने निजके दस्तख़्त करें और सन्, तारीख़ और अपनौ मुहरको छाप लगवा दें । यूनानी लेखक नियार्खुस्ने सन् ई०से पहलेको ४थौ शताब्दिमें जिन कार्पासादि लेखोंकी बात कही थी, उनको ही हम याज्ञवल्कयोक्त 'पट' कह और समझ सकते हैं । अशोकलिपिसे पहले की पिप्रावावालो बौद्धलिपि- के अक्षर पूर्णावयवसम्पन्न हैं । इस लिपिका पूर्णादयव बननेमें बहुत सी शताब्दि बीत गई थीं। जब ऐसी सुप्राचीन सभी भारतीय लिपिमें बांईं ओरसे दाहनी ओरका मूल मिलता है, तब ब्राह्मौलिपिको भी हम ऐसी ही लिपि या इसका प्राचीन रूप बता ग्रहण कर {{Rule}} {{blockcenter|{{x-smaller| * इस समय जो कई एक धर्मशास्त्र प्रचलित हैं, उनमें याज्ञवल्क्य-संहिता - से मानवधर्भसूत्र बिलकुल मिल जाता है। इसीलिये पाश्चात्य संस्कृतज्ञ पण्डित प्रचलित धम्म शास्त्रोंमें याज्ञवल्क्य - सातिको बहुत पुरानी समझते हैं। मनुके नामसे जो श्लोक रामायण और महाभारतमें उदधृत हुए हैं, उनके कितने ही लोक हमने याज्ञवल्का स्मृतिमे देखे हैं । ऐसे स्थल में याज्ञ वल्का-धर्मशास्त्रको बुद्धदेव से बहुत पहलेका कहकर ग्रहण करने में कोई आपत्ति नहीं होती ।}}}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> l7pzvg303b5pfm2ad4uuuekqm29i46v पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७१ 250 83545 664760 346946 2026-07-03T03:44:51Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664760 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''अतिवृष्टिहत-अतिशक्तिभाज'''||'''२६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इसके बाद जो व्यक्ति अपनी माताका इकलोता बेटा होता, वह पीतलको कटोरीके भौतर वही नाम और एक जवाका फूल रख, एक ही गोतमें उसे तालाबके पानीके भीतर गाड़ आता था। अज लोगोंको विश्वास था, कि यह प्रक्रिया करनेसे तीन दिनमें अवश्य वृष्टि बन्द हो जाती है। अनावृष्टि देखो। अतिवृष्टिहत (स. त्रि०) मूषलधार वृष्टिसे मारा गया, गहरी बारिशसे चोट खाया हुआ। अतिवेगित (सं० त्रि०) अतिवेगः जातोऽस्य । जाताति वेग, बड़े वेगका।अतिवेध (सं० पु०) ' अत्यन्तो वेधः सम्पर्कः । एकादशौके साथ दशमीका सम्पर्क-विशेष।'अतिवेपथु (स• त्रि.) १ बहुत कांपता हुआ। ( स्त्री०) २ बड़ी कंपकपी, अजहद लरजिश । अतिवेल (सं० त्रि०) अतिक्रान्तं वेलां मर्यादां कुलं वा। १ अधिक, असोम, मर्यादातिक्रान्त । (अव्ययो०) २ वेलातिक्रम। अतिवेला (स० स्त्री०) देर, विलम्ब, कुसमय । अतिवचक्षण्य (सं० लो०) अधिक बुद्धिमत्ता, बड़ी होशियारी, अजहद कमाल। अतिवैसस् (सं० त्रि०) अत्यन्त प्रतिकूल, निहायत बरखिलाफ। अतिवोढ ( स० त्रि०) अति वहनकर्ता, प्रापक । अतिव्यथन (सं० लो०) अत्यन्तपीड़न, बड़ी भारी व्यथाअतिव्यथा (सं० स्त्री०) अत्यन्त पौड़ा, अज़हद दर्द अतिव्यय (सं० त्रि०) अतिशयितो व्ययः। अपरिमित व्यय, फ़िज़ ल-खचं । शास्त्रकार कहते हैं कि उपार्जित धनका आधा भाग खाने-पौने और नित्य-नैमित्तिक कामोंमें खर्च और चौथाईसे पुण्य सञ्चय करे। बाकी चौथाईसे मूलधन या पूंजी बढ़ाये। इस नियमसे अधिक जो व्यय किया जाता है, उसोको अतिव्यय कहते हैं।अतिव्याधिन् (सं• त्रि.) तौखा, चुभनेवाला। अतिव्याप्त (सं० वि०) सर्वत्र वर्तमान, अपरिमित रूपसे स'लग्न, निहायत आलूदा। अतिव्याप्ति (स० स्त्री०) अतिशयेन लक्ष्यमलच्य-ञ्चाविशिष्य व्याप्तिः। अतिशय व्यापन, अधिक व्याप्ति, लक्ष्य तथा अलच्यमें लक्षणका गमन । 'श्रलच्ये लक्षागमनमतिव्याप्तिः ।' लक्ष्य पदार्थमें पहुंचके अलक्ष्य पदार्थमें भी लक्षणके चले जानेको अतिव्याप्ति कहते हैं। इसका मतलब यह है किसी एक. वस्तुको लक्ष्यकर यदि उसके लक्षणादि निर्देश किये जायें, फिर वही लक्षण यदि उस वस्तुमें मिलें, जिसको पहले लक्ष्यकर वह लक्षण निर्दिष्ट नहीं हुए, तो ऐसी अवस्था में अतिव्याप्ति कही जा सकती है। जैसे-शाखापह्नवत्व वृक्षत्वम् । जिसमें डालियां और पत्तियां होती हैं, वही वृक्ष है। इस स्थानमें वृक्षको ही लक्ष्यकर यह लक्षण बताया गया, कि डालियों और पत्तियोंके होनसे ही वृक्ष कहाता; किन्तु यह लक्षण लताके प्रति भी पाया जाता है, जिसको पहले लक्षाकर लक्षण नहीं कहा गया था। इसलिये यह लक्षणको अतिव्याप्ति कहो जाती है। अतिव्यायाम (सं० पु०) अपरिमित परिश्रम, अज़हद कसरत। अतिव्यायाम यानी हदसे ज्यादा कसरत पथ्य नहीं। इससे कास, ज्वर, छर्दि, श्रम, क्लम, तृष्णा,, क्षय, प्रतमक, रक्तपित्त प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अतिशक्करी (सं० स्त्री०) अतिक्रान्ता शक्करों तनामक वृतम्। पन्द्रह अक्षरका छन्दीविशेष। अतिशक्त (सं० त्रि०) अत्यन्तशक्तिशालो, निहायत कवो। अतिशक्ति (स. स्त्री०) अतिशयितो शक्तिः, प्रादि-स० । १ अत्यन्त सामर्थ्य, हदसे ज्यादा ताकत । (त्रि.) अतिशयिता शक्तिर्बलं यस्य, बहुव्रौ । अत्यन्त बलवान्। निहायत ताकतवर। अतिक्रान्तः शक्तिम् अतिक्रा-तत्। सामर्थ्यका अतिक्रमकरनेवाला। सामर्थ्यातिक्रम (अव्ययो०)। अतिशक्तिता (स. स्त्री०) अतिशक्ति-तल्-टाप् । विक्रम-शोलका धर्म, महाबलत्व, जोरावरी। अतिशक्तिभाज् (सं० पु.) अतिशक्ति-भज-खि । अतिशय शक्तिविशिष्ट, क्षमतावान्। (अंशभाज देखो।)<noinclude></noinclude> dub1ptuc5vy59ne28mgejc7wytiu617 664761 664760 2026-07-03T04:22:31Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 664761 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''अतिवृष्टिहत-अतिशक्तिभाज'''||'''२६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इसके बाद जो व्यक्ति अपनी माताका इकलोता बेटा होता, वह पीतलकी कटोरीके भीतर वही नाम और एक जवाका फूल रख, एक ही गोतेमें उसे तालाबके पानीके भीतर गाड़ आता था। अज्ञ लोगोंको विश्वास था, कि यह प्रक्रिया करनेसे तीन दिनमें अवश्य वृष्टि बन्द हो जाती है। <small>अनावृष्टि देखो।</small> अतिवृष्टिहत (सं॰ त्रि॰) मूषलधार वृष्टिसे मारा गया, गहरी बारिशसे चोट खाया हुआ। अतिवेगित (सं॰ त्रि॰) अतिवेगः जातोऽस्य। जातातिवेग, बड़े वेगका। अतिवेध (सं॰ पु॰) अत्यन्तो वेधः सम्पर्कः। एकादशीके साथ दशमीका सम्पर्क-विशेष। अतिवेपथु (सं॰ त्रि॰) १ बहुत कांपता हुआ। (स्त्री॰) २ बड़ी कँपकपी, अज़हद लरज़िश। अतिवेल (सं॰ त्रि॰) अतिक्रान्तं वेलां मर्यादां कुलं वा। १ अधिक, असीम, मर्यादातिक्रान्त। (अव्ययी॰) २ वेलातिक्रम। अतिवेला (सं॰ स्त्री॰) देर, विलम्ब, कुसमय। अतिवैचक्षण्य (सं॰ क्ली॰) अधिक बुद्धिमत्ता, बड़ी होशियारी, अज़हद कमाल। अतिवैसस् (सं॰ त्रि॰) अत्यन्त प्रतिकूल, निहायत बरखिलाफ़। अतिवोढृ (सं॰ त्रि॰) अति वहनकर्ता, प्रापक। अतिव्यथन (सं॰ क्ली॰) अत्यन्तपीड़न, बड़ी भारी व्यथा। अतिव्यथा (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्त पीड़ा, अज़हद दर्द। अतिव्यय (सं॰ त्रि॰) अतिशयितो व्ययः। अपरिमित व्यय, फ़िज़ू ल-ख़चं। शास्त्रकार कहते हैं कि उपार्जित धनका आधा भाग खाने-पीने और नित्य-नैमित्तिक कामोंमें खर्च और चौथाईसे पुण्य सञ्चय करे। बाकी चौथाईसे मूलधन या पूंजी बढ़ाये। इस नियमसे अधिक जो व्यय किया जाता है, उसीको अतिव्यय कहते हैं। अतिव्याधिन् (सं॰ त्रि॰) तीखा, चुभनेवाला। अतिव्याप्त (सं॰ वि॰) सर्वत्र वर्त्तमान, अपरिमित रूपसे संलग्न, निहायत आलूदा।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अतिव्याप्ति (सं॰ स्त्री॰) अतिशयेन लक्ष्यमलक्ष्य-ञ्चाविशिष्य व्याप्तिः। अतिशय व्यापन, अधिक व्याप्ति, लक्ष्य तथा अलच्यमें लक्षणका गमन। <small>'अलक्ष्ये लक्षणगमनमतिव्याप्तिः।'</small> लक्ष्य पदार्थमें पहुंचके अलक्ष्य पदार्थमें भी लक्षणके चले जानेको अतिव्याप्ति कहते हैं। इसका मतलब यह है—किसी एक वस्तुको लक्ष्यकर यदि उसके लक्षणादि निर्द्देश किये जायें, फिर वही लक्षण यदि उस वस्तुमें मिलें, जिसको पहले लक्ष्यकर वह लक्षण निर्दिष्ट नहीं हुए, तो ऐसी अवस्थामें अतिव्याप्ति कही जा सकती है। जैसे-<small>शाखापल्लवत्वं वृक्षत्वम्।</small> जिसमें डालियां और पत्तियां होती हैं, वही वृक्ष है। इस स्थानमें वृक्षको ही लक्ष्यकर यह लक्षण बताया गया, कि डालियों और पत्तियोंके होनसे ही वृक्ष कहाता; किन्तु यह लक्षण लताके प्रति भी पाया जाता है, जिसको पहले लक्षाकर लक्षण नहीं कहा गया था। इसलिये यह लक्षणकी अतिव्याप्ति कही जाती है। अतिव्यायाम (सं॰ पु॰) अपरिमित परिश्रम, अज़हद कसरत। अतिव्यायाम यानी हदसे ज्यादा कसरत पथ्य नहीं। इससे कास, ज्वर, छर्दि, श्रम, क्लम, तृष्णा, क्षय, प्रतमक, रक्तपित्त प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अतिशक्करी (सं॰ स्त्री॰) अतिक्रान्ता शक्करीं तन्नामक वृतम्। पन्द्रह अक्षरका छन्दीविशेष। अतिशक्त (सं॰ त्रि॰) अत्यन्तशक्तिशाली, निहायत क़वो। अतिशक्ति (सं॰ स्त्री॰) अतिशयितो शक्तिः, प्रादि-स॰। १ अत्यन्त सामर्थ्य, हदसे ज्य़ादा ताक़त। (त्रि॰) अतिशयिता शक्तिर्बलं यस्य, बहुव्री॰। अत्यन्त बलवान्। निहायत ताक़तवर। अतिक्रान्तः शक्तिम् अतिक्रा॰-तत्। सामर्थ्यका अतिक्रमकरनेवाला। सामर्थ्यातिक्रम (अव्ययी॰)। अतिशक्तिता (सं॰ स्त्री॰) अतिशक्ति-तल्-टाप्। विक्रम-शीलका धर्म्म, महाबलत्व, ज़ोरावरी। अतिशक्तिभाज् (सं॰ पु॰) अतिशक्ति-भज्-ण्वि। अतिशय शक्तिविशिष्ट, क्षमतावान्। <small>(अंशभाज् देखो।)</small> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 10jb9yw0hypcthtwm9nenpvmme35egg 664762 664761 2026-07-03T04:37:17Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 664762 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''अतिवृष्टिहत-अतिशक्तिभाज'''||'''२६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इसके बाद जो व्यक्ति अपनी माताका इकलोता बेटा होता, वह पीतलकी कटोरीके भीतर वही नाम और एक जवाका फूल 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2026-07-03T04:38:51Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664764 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिवृष्टिहत-अतिशक्तिभाज'''|'''२६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इसके बाद जो व्यक्ति अपनी माताका इकलोता बेटा होता, वह पीतलकी कटोरीके भीतर वही नाम और एक जवाका फूल रख, एक ही गोतेमें उसे तालाबके पानीके भीतर गाड़ आता था। अज्ञ लोगोंको विश्वास था, कि यह प्रक्रिया करनेसे तीन दिनमें अवश्य वृष्टि बन्द हो जाती है। <small>अनावृष्टि देखो।</small> {{outdent|अतिवृष्टिहत (सं॰ त्रि॰) मूषलधार वृष्टिसे मारा गया, गहरी बारिशसे चोट खाया हुआ।}} {{outdent|अतिवेगित (सं॰ त्रि॰) अतिवेगः जातोऽस्य। जातातिवेग, बड़े वेगका।}} {{outdent|अतिवेध (सं॰ पु॰) अत्यन्तो वेधः सम्पर्कः। एकादशीके साथ दशमीका सम्पर्क-विशेष।}} {{outdent|अतिवेपथु (सं॰ त्रि॰) १ बहुत कांपता हुआ। (स्त्री॰) २ बड़ी कँपकपी, अज़हद लरज़िश।}} {{outdent|अतिवेल (सं॰ त्रि॰) अतिक्रान्तं वेलां मर्यादां कुलं वा। १ अधिक, असीम, मर्यादातिक्रान्त। (अव्ययी॰) २ वेलातिक्रम।}} 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अतिशङ्का (सं० स्त्री०) अत्यन्त भय, अजहद, खौफ़। अतिशय (स• पु०) अति-शोङ्-अच् । १ आधिक्य, अतिरेक, बहुतायत, ज़ियादतौ। वेगातिशय जैसे रूपोंमें अतिशय शब्द विशेष्य और अतिशयसाधु जैसे स्थलोंमें विशेषण होता है। २ काव्यालङ्कार-विशेष, जिसमें किसो वस्तुका होना या न होना लगातार दिखाया जाता है। (त्रि.) ३ बहुत ज्यादा, अधिकसे अधिक। अतिक्रान्तः शयं हस्तम् । ४ हस्ताति- क्रमकारक। अतिक्रम्य शक्ति (अव्य०)। ५ शक्त्यतिक्रम । भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ़, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ़, वाढ़, दृढ़, अतिमर्याद, उत्कर्ष, बलवत्, सुष्छु, किमुत, सु, अतीव, अति, हार, व्यापार, समधिक, अतिरिक्त- यह पर्याय हैं। अतिशयन (सं० क्लो०) अति शौङ्-भावे ल्युट् । १ बहुत सोना। २ अतिरेक, अतिशय, कसरत । (त्रि०) ३ अतिशययुक्त, ज़ियादतोका। अतिशयोक्ति (सं० सी०) अतिशयेन उक्तिः निहे शोऽस्मिन् वर्णने । १ जो बात बहुत बढ़ाकर कही जाय । २ काव्यालङ्कार-विशेष, एक प्रकारका अलङ्कार। साहित्य-दर्पण-प्रणेताने अतिशयोक्ति अलङ्कारका इसतरह लक्षण बताया है- "सिद्धत्वे ऽध्यवसायस्वातिशयोक्तिनिंगद्यते।" प्रकृत विषयका अप्राधान्य दिखाके उसके उद्देश्यमें अप्रकृत विषयको निश्चल भावसे स्थापन करनेपर अतिशयोक्ति होतो है। यथा, मुखं द्वितीयश्चन्द्रः । मुख तो दूसरा चन्द्र है। इस स्थानमें प्रकृत विषय मुख है, किन्तु मुखको चन्द्र बताके उल्लेख किया गया है। इसीसे ऐसे स्थलमें एकका प्राधान्य और दूसरेका अप्राधान्य प्रतिपन्न होता है। अधःकरण यानी अप्राधान्य और निगरणके सम्बन्धमें अलङ्कारिकोंने एक कारिका लिखी है। यथा- "विषयस्यानुपादानेऽप्युपादानेऽपि सूरयः । अध:करणमावेण निगौर्यात्व' प्रचचते ॥"<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>प्रकृत विषय निर्देश किया या न किया जाय, अधःकरण अर्थात् अप्राधान्य समझ पड़नेसे ही उस विषयका निगरण करना होता है। अतिशयोक्ति अलङ्कार पांच प्रकारका है-१ दो विषयों में भेद रहते भी अभेदकल्पना। २ अभेदविषयों में भेदकल्पना । ३ सम्बन्ध होते भी असम्बन्ध कल्पना। ४ असम्बन्धमें सम्बन्धकल्पना। ५ कार्य और हेतुके पौर्वापर्यका अभाव अर्थात् विपर्यय। "भेदैऽप्यभेदः सम्बन्ध सम्बन्धस्तविपर्ययी। पौवापर्यात्ययः कार्यहतोः सा पञ्चधा ततः ॥" (साहित्यद०) १। भेदमें अभेद- "कथमुपरि कलापिन: कलापो विलसति तस्व तलेऽष्टमीन्दुखण्डम् । कुवलययुगल' ततो विलोलं तिलकुसुमं तदध: प्रवालममात् ॥" मोर पूछ ऊपर लसत नीचे आ चन्द । तापर चञ्चल युग कमल फूले पानंद कन्द ॥ क्या हो आश्चर्य है ! ऊपर मोरको पूंछ (केश ) शोभा पा रही है; उसके नीचे अष्टमोका चन्द्र (ललाट) उदय हुआ है ; उसके बाद दो चञ्चल कमल (चक्षु) फूले हैं; उनके नौचे तिलको कली (नासिका) खिली हुई है; उसके नौचे प्रवाल (ोष्ठ ) मनको हरे लेते हैं। इस जगह केशादिके साथ मोरको पूंछ प्रभृतिका पूरा भेद रहते भी अभेद रूपसे वर्णना की गई है। २। अभेदमें भेद- "अन्धदैवाङ्गलावण्यमन्याः सौरभसम्पद. । तस्याः पद्मपलाशाया: सरसत्वमलौकिकम् ।" उस पद्मपलाशाक्षी कामिनीको देहमें जैसा लावण्य है, वैसा और कहीं नहों, वह सौन्दर्य और माधुर्य सभी अलौकिक है। जगत्में जो रूपलावण्यादि देखा जाता, इस जगह उससे कोई विभिन्नता न रहते भी भिन्न रूपसे कल्पना की गई है। राधाम जो-रूप है, वैसो कहुन दिखात । सकल सराहत रात-दिन, धन्ध अलौकिक मात ॥ ३। सम्बन्धमें असम्बन्ध- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> f9gqz23tbmrvh8q9gwc52jgo0s25g7l पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७३ 250 83547 664771 346948 2026-07-03T05:41:23Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664771 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अतिशयोक्ति—अतिशायिन्'''|'''२६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> "अस्याः सर्गविधी प्रजापतिरभूच्च न्द्री नु कान्तिप्रदः ?सङ्गारकरसः स्वयं नु मदनी मासो नु पुष्याकरः ?वेदाभ्यासजड़ः कथं नु विषयव्याहत्तकोतूहलो निर्मातु प्रभवेन्मनोहरमिद रूपं पुराणो मुनिः ?"सौन्दर्यदाता चन्द्र क्या इस स्त्रीरत्नके सृष्टिकर्ता हैं, अथवा शृङ्गाररसके एकमात्र आधार स्वयं कन्दने क्या इसे निर्माण किया है ? या पुष्पके आकर चैत्र-मासने अपने हाथसे संवारा है? कारण सृष्टिकर्ताब्रह्मा बहुत वेदाभ्याससे इतने जड़-बुद्धि और विषयसेनिवृत्त हो गये हैं, कि उनका फिर विषय-व्यापारसे कौतूहलाक्रान्त हो, ऐसा मनोहर रूप बना सकना सम्भव नहीं। इस जगह प्रजापति ब्रह्माके प्रकृत निर्माणकर्ता होते भी दूसरेके निर्माणकर्तृत्वको कल्पना कोगई है। रचो अवसि कन्दर्पने, नव राधाको रूप। विधिना बूढ़े ह पर, जानकाण्डके कूप ॥ ४। असम्बन्धमें सम्बन्ध- "यदि स्यान्मण्डले सक्तमिन्दोरिन्दीवरदयम् । तदोपमौयते तस्या वदनं चारुलोचनं ॥"तो उस कामिनीके मनोहर नेत्र-य-शोभित मुखसे उसकी तुलना की जा सकती है।होत निशाकर में कहू', जो युग नौल-सरोज ।नयन सुशोभित वदनको, भाषत उपमा खोज ॥५। कार्य और कारणके पौर्वापर्यका अभाव । खाभाविक नियम यही है, कि आगे कारण विद्यमानरहता, पीछे कार्यको उत्पत्ति होती है। किन्तु इसका विपर्यय होनेसे अर्थात् जिस जगह आगेकार्य निर्दिष्ट होता और पीछे उसका कारणउल्लिखित हुआ करता, उसी जगह कार्य और कारणका अन्यथा करना होता है। इसे छोड़ इसप्रकारसे कहनेपर भी, कभी-कभी अतिशयोक्ति होजाती है, कि कार्य और कारण दोनो एक ही साथउत्पन्न हुए हैं।(१) “प्रागेव हरिणाक्षीणां चित्तमुत्कलिकाकुलं । पश्चादुदृभिन्नवकुलरसालमुकुलश्रियः ॥" पहले ही मृगनयना रमणियोंका चित्त आकुल हो उठा, पोछे वकुल और आम्रके मुकुल प्रकाशित हो शोभा पाने लगे।वकुलादिका पुष्पसौन्दर्य देखने से ही कामिनीयों-का मन चञ्चल होनेको सम्भावना है। किन्तु इस जगह पहले उनके मनको व्याकुलतावालो बात कह, पोछे पुष्पसौन्दर्यका विषय उल्लिखित किया गया है। इसलिये इसके द्वारा कार्य और कारणका विपरीत भाव सङ्घटित हुआ है। (२) "सममेव समाक्रान्तं यं हिरदगामिना । तेन सिंहासनं पिवा मण्डलञ्च महीचिताम् ॥" हस्तौके तुल्य मन्दगामा उन रघुन पैटक सिंहासन और विपक्ष राजमण्डलपर एक ही कालमें आक्रमण किया था। पहले सिंहासनपर अधिरूढ होकर पीछे शत्रुओंका जय करना सम्भव है; किन्तु इस जगह दोनो कार्य एक ही समयमें उल्लिखित हुए हैं। इसलिये यहां भी कार्य-कारणका विपरीत भाव हुआ। अतिशयोक्तिको जगह इव-जैसे, आदि शब्द रहनेसे यदि चन्द्रमण्डलमें दो नौलपद्म लगा दिये जायं, उत्प्रेक्षालङ्कार होता है। अतिशयोपमा (सं० स्त्री० ) वह उपमा, जिसमें किसी वस्तुको उपमा दूसरो वस्तु के साथ न दी जा सके। "सब उपमा कवि रहे जुठारी। केहि पटतरिय विदेह कुमारी॥" तुलसौ अतिशर्वर (वै० क्लो०) आधीरात, मध्यनिशा।अतिशष्कुलौ (स• स्त्री०) तिलको रोटी। बहुत बढ़िया, निहायत अतिशस्त (स० वि०) उम्दा। अतिशस्त्र (स० त्रि०) हथियारोंसे बढ़िया। अतिशाक्कर (सं. त्रि०) अतिशक्कर छन्दमें लिख गया या उसके सम्बन्धका । अतिशायन (सं० पु.) अति-शोङ्भावे ल्युट, निपातनादीर्घः। आधिक्य, प्रकर्ष, कसरत। अतिशायिन् (सं. त्रि.) अति-शी-णिनि। अधिक, ज्यादा।<noinclude></noinclude> r78w5z8trkgeg0v3aogd4iu77d4ellq 664773 664771 2026-07-03T06:02:30Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664773 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अतिशयोक्ति—अतिशायिन्'''|'''२६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> "अस्याः सर्गविधी प्रजापतिरभूच्च न्द्री नु कान्तिप्रदः ?सङ्गारकरसः स्वयं नु मदनी मासो नु पुष्याकरः ?वेदाभ्यासजड़ः कथं नु विषयव्याहत्तकोतूहलो निर्मातु प्रभवेन्मनोहरमिद रूपं पुराणो मुनिः ?"सौन्दर्यदाता चन्द्र क्या इस स्त्रीरत्नके सृष्टिकर्ता हैं, अथवा शृङ्गाररसके एकमात्र आधार स्वयं कन्दने क्या इसे निर्माण किया है ? या पुष्पके आकर चैत्र-मासने अपने हाथसे संवारा है? कारण सृष्टिकर्ताब्रह्मा बहुत वेदाभ्याससे इतने जड़-बुद्धि और विषयसेनिवृत्त हो गये हैं, कि उनका फिर विषय-व्यापारसे कौतूहलाक्रान्त हो, ऐसा मनोहर रूप बना सकना सम्भव नहीं। इस जगह प्रजापति ब्रह्माके प्रकृत निर्माणकर्ता होते भी दूसरेके निर्माणकर्तृत्वको कल्पना कोगई है। रचो अवसि कन्दर्पने, नव राधाको रूप। विधिना बूढ़े ह पर, जानकाण्डके कूप ॥ ४। असम्बन्धमें सम्बन्ध- "यदि स्यान्मण्डले सक्तमिन्दोरिन्दीवरदयम् । तदोपमौयते तस्या वदनं चारुलोचनं ॥"तो उस कामिनीके मनोहर नेत्र-य-शोभित मुखसे उसकी तुलना की जा सकती है।होत निशाकर में कहू', जो युग नौल-सरोज ।नयन सुशोभित वदनको, भाषत उपमा खोज ॥५। कार्य और कारणके पौर्वापर्यका अभाव । खाभाविक नियम यही है, कि आगे कारण विद्यमानरहता, पीछे कार्यको उत्पत्ति होती है। किन्तु इसका विपर्यय होनेसे अर्थात् जिस जगह आगेकार्य निर्दिष्ट होता और पीछे उसका कारणउल्लिखित हुआ करता, उसी जगह कार्य और कारणका अन्यथा करना होता है। इसे छोड़ इसप्रकारसे कहनेपर भी, कभी-कभी अतिशयोक्ति होजाती है, कि कार्य और कारण दोनो एक ही साथउत्पन्न हुए हैं।(१) “प्रागेव हरिणाक्षीणां चित्तमुत्कलिकाकुलं । पश्चादुदृभिन्नवकुलरसालमुकुलश्रियः ॥"<noinclude>{{Multicol-break}}</noincludeपहले ही मृगनयना रमणियोंका चित्त आकुल हो उठा, पोछे वकुल और आम्रके मुकुल प्रकाशित हो शोभा पाने लगे।वकुलादिका पुष्पसौन्दर्य देखने से ही कामिनीयों-का मन चञ्चल होनेको सम्भावना है। किन्तु इस जगह पहले उनके मनको व्याकुलतावालो बात कह, पोछे पुष्पसौन्दर्यका विषय उल्लिखित किया गया है। इसलिये इसके द्वारा कार्य और कारणका विपरीत भाव सङ्घटित हुआ है। (२) "सममेव समाक्रान्तं यं हिरदगामिना । तेन सिंहासनं पिवा मण्डलञ्च महीचिताम् ॥" हस्तौके तुल्य मन्दगामा उन रघुन पैटक सिंहासन और विपक्ष राजमण्डलपर एक ही कालमें आक्रमण किया था। पहले सिंहासनपर अधिरूढ होकर पीछे शत्रुओंका जय करना सम्भव है; किन्तु इस जगह दोनो कार्य एक ही समयमें उल्लिखित हुए हैं। इसलिये यहां भी कार्य-कारणका विपरीत भाव हुआ। अतिशयोक्तिको जगह इव-जैसे, आदि शब्द रहनेसे यदि चन्द्रमण्डलमें दो नौलपद्म लगा दिये जायं, उत्प्रेक्षालङ्कार होता है। अतिशयोपमा (सं० स्त्री० ) वह उपमा, जिसमें किसी वस्तुको उपमा दूसरो वस्तु के साथ न दी जा सके। "सब उपमा कवि रहे जुठारी। केहि पटतरिय विदेह कुमारी॥" तुलसौ अतिशर्वर (वै० क्लो०) आधीरात, मध्यनिशा।अतिशष्कुलौ (स• स्त्री०) तिलको रोटी। बहुत बढ़िया, निहायत अतिशस्त (स० वि०) उम्दा। अतिशस्त्र (स० त्रि०) हथियारोंसे बढ़िया। अतिशाक्कर (सं. त्रि०) अतिशक्कर छन्दमें लिख गया या उसके सम्बन्धका । अतिशायन (सं० पु.) अति-शोङ्भावे ल्युट, निपातनादीर्घः। आधिक्य, प्रकर्ष, कसरत। अतिशायिन् (सं. त्रि.) अति-शी-णिनि। अधिक, ज्यादा। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 4ddqtylzdcuouo92qc7qh0p7jdvpa16 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७४ 250 83548 664774 346950 2026-07-03T06:21:32Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664774 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२६८'''|'''अतिशारिवा—अतिसान्तपन'''|}}</noinclude> अतिशारिवा (सं० स्त्री०) अनन्ता, अनन्तमूल । अतिशीत (सं० अव्य०) १ जाड़ेसे बाहर, जाड़े के बाद ।(पु.) २ अधिक जाड़ा।अतिशोलन (स० पु०) अभ्यास, महावरा, मश्क,किसी कामका बार-बार विचार ।अतिशुक्र, अतिशुक्ल (सं. त्रि.) बहुत उज्ज्वल, निहायत सफेद। अतिशूकज (सं० पु०) गोधूम, गेहूं। अतिशूक ( स० पु०) यव, बेभरा। अतिसंस्कृत (संत्रि.) बहुत संस्कार किया गया, निहायत दुरुस्त किया हुआ। अतिसक्ति (सं० त्रि०) बड़ा प्रेम, अजहद मुहब्बत । अतिसक्तिमत् (सं० त्रि.) बहुत लगा हुआ, निहायत मुश्ताक। अतिसय (सं० पु.) बड़ा ढेर, भारी जखोरा। अतिसन्तप्त (सं० त्रि.) बहुत दुःखी, निहायत अफसुर्दा। अतिसन्ध (सं० पु०) वचन या आदेशका अमान्य, अतिशूद्र (सं० पु.) जिस शूद्रके हाथका पानी शास्त्रको आज्ञाका उल्लङ्घन । ब्राह्मण आदि न पीयें, अन्त्यज-कोरी, चमार, धोबी, अतिसन्धान (सं० पु०) अतिक्रान्तं सन्धानम्। सन्धान- मेहतर आदि। वर्जित, वञ्चना, धोखा, फरेब, जाल । अतिशृतक्षौर (स' क्लो०) मावा, खोया। अतिसन्धित (स त्रि.) १ जिसका खूब फैसला हो. अतिशेष (सं० पु०) अति-शिष-कर्मणि घञ्, अति गया हो। २ ठगा गया। शिष्यते । स्वल्पावशिष्ट, जो बहुत थोड़ा बचा हो। अतिसन्धेय (स. त्रि०) प्रसन्न करने योग्य, फैसला अतिशोभन (सं• त्रि०) अति-शुभ-ल्युट । अत्यन्त होने काबिल। शोभायुक्त, श्रेष्ठ, निहायत खूबसूरत । अतिसन्ध्या (सं० स्त्री०) अतिशयेन सन्ध्या, प्रादि-स। अतिशोष (सं० पु०) क्षयरोग। अतिशय सन्ध्याकाल, ठीक सन्ध्याका समय । अतिथी (सं० वि०) बहुत सम्पन्न, निहायत आसूदा। अतिसमर्थ (सं० त्रि०) बहुत समर्थ, निहायत कामिल । अतिश्रेयसो (सं० स्त्री०) उत्तम स्त्रीयोंसे भी उत्तम अतिसमीप (सं० त्रि.) बहुत निकट, निहायत कल्याण करनेवाली। नजदीक। अतिश्रेष्ठ (स० वि०) सबसे बड़ा, निहायत अफज़ल । अतिसम्पर्क (सं० पु०) बड़ा सहवास । अतिश्रेष्ठत्व (सं० लो०) बड़ी बड़ाई, अज़हद अतिसर (सं• त्रि०). अति-स-अच् । खस्य गति- सबकत। मतीत्य सरति गच्छति। अतिचारी, अग्रसर, अपनी अतिख (सं० वि०) अतिक्रान्तं खानं टच । अते गुनः । चालसे बाहर चलनेवाला। पा ५४६६। कुत्तेको हरा देनेवाला ; जैसे सूअर, भेड़िया अतिसर्ग (सं० पु०) अति-सृज-घञ्। १ दान, आदि, वेगवान्, कुत्तेसे तेज, दौड़नेवाला। उत्सर्ग। (त्रि.) २ सृष्टि-अतिक्रमकारी। अतिश्वन् (सं० पु०) अतिशयितः सुन्दरः श्वा। अतिसज्जन (स'• पु० ) अति-स-ल्य ट। १ विसर्जन उत्तम कुत्ता। २ दान। ३त्याग। ४ नियोग, वध। ५ विप्रलम्भ । अतिष्कहरौ ( स. स्त्री०) लुच्ची स्त्री, आवारा औरत। ६ अतिशय दान। अतिष्ठत् (स० वि०) न टिकनेवाला, नापायदार। अतिसव (सं० त्रि०) अतिक्रान्तः सर्वान् सबसे अतिष्ठा (सं० स्त्री०) अति-स्था-क्विप, सर्बानतीत्य अतीत, सबसे आगे निकला हुआ। तिष्ठतौति। सबसे अतीत, वह स्त्री जो सबसे बढ़ी अतिसाध्वस् (सं० लौ० ) बड़ा डर, भारौ खौफ। चढ़ी हो। अतिसान्तपन (स' क्लो०) १ अतिक्रान्तः सान्तपनम् । अतिष्ठावत्, अतिष्ठावन् (सं० त्रि०) टिकाऊ, पायदार। अधिकदिनसाध्यत्वात्, अत्यादि-तत्। २ एक व्रत। 1<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ts8axr69x61evo80qs90e3fxoer326q 664775 664774 2026-07-03T06:33:50Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664775 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२६८'''|'''अतिशारिवा—अतिसान्तपन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अतिशारिवा (सं० स्त्री०) अनन्ता, अनन्तमूल । अतिशीत (सं० अव्य०) १ जाड़ेसे बाहर, जाड़े के बाद ।(पु.) २ अधिक जाड़ा।अतिशोलन (स० पु०) अभ्यास, महावरा, मश्क,किसी कामका बार-बार विचार ।अतिशुक्र, अतिशुक्ल (सं. त्रि.) बहुत उज्ज्वल, निहायत सफेद। अतिशूकज (सं० पु०) गोधूम, गेहूं। अतिशूक ( स० पु०) यव, बेभरा।अतिशूद्र (सं० पु.) जिस शूद्रके हाथका पानीब्राह्मण आदि न पीयें, अन्त्यज-कोरी, चमार, धोबी,मेहतर आदि।अतिशृतक्षौर (स' क्लो०) मावा, खोया।अतिशेष (सं० पु०) अति-शिष-कर्मणि घञ्, अतिशिष्यते । स्वल्पावशिष्ट, जो बहुत थोड़ा बचा हो।अतिशोभन (सं• त्रि०) अति-शुभ-ल्युट । अत्यन्तअतिशोष (सं० पु०) क्षयरोग। शोभायुक्त, श्रेष्ठ, निहायत खूबसूरत । अतिसंस्कृत (संत्रि.) बहुत संस्कार किया गया, निहायत दुरुस्त किया हुआ। अतिसक्ति (सं० त्रि०) बड़ा प्रेम, अजहद मुहब्बत । अतिसक्तिमत् (सं० त्रि.) बहुत लगा हुआ, निहायत 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अतिशारिवा (सं० स्त्री०) अनन्ता, अनन्तमूल । अतिशीत (सं० अव्य०) १ जाड़ेसे बाहर, जाड़े के बाद ।(पु.) २ अधिक जाड़ा।अतिशोलन (स० पु०) अभ्यास, महावरा, मश्क,किसी कामका बार-बार विचार ।अतिशुक्र, अतिशुक्ल (सं. त्रि.) बहुत उज्ज्वल, निहायत सफेद। अतिशूकज (सं० पु०) गोधूम, गेहूं। अतिशूक ( स० पु०) यव, बेभरा।अतिशूद्र (सं० पु.) जिस शूद्रके हाथका पानीब्राह्मण आदि न पीयें, अन्त्यज-कोरी, चमार, धोबी,मेहतर आदि।अतिशृतक्षौर (स' क्लो०) मावा, खोया।अतिशेष (सं० पु०) अति-शिष-कर्मणि घञ्, अतिशिष्यते । स्वल्पावशिष्ट, जो बहुत थोड़ा बचा हो।अतिशोभन (सं• त्रि०) अति-शुभ-ल्युट । अत्यन्तअतिशोष (सं० पु०) क्षयरोग। शोभायुक्त, श्रेष्ठ, निहायत खूबसूरत ।अतिथी (सं० वि०) बहुत सम्पन्न, निहायत आसूदा।अतिश्रेयसो (सं० स्त्री०) उत्तम स्त्रीयोंसे भी उत्तमकल्याण करनेवाली।अतिश्रेष्ठ (स० वि०) सबसे बड़ा, निहायत अफज़ल ।अतिश्रेष्ठत्व (सं० लो०) बड़ी बड़ाई, अज़हदसबकत।अतिख (सं० वि०) अतिक्रान्तं खानं टच । अते गुनः ।पा ५४६६। कुत्तेको हरा देनेवाला ; जैसे सूअर, भेड़ियाआदि, वेगवान्, कुत्तेसे तेज, दौड़नेवाला।अतिश्वन् (सं० पु०) अतिशयितः सुन्दरः श्वा। उत्तम कुत्ता।अतिष्कहरौ ( स. स्त्री०) लुच्ची स्त्री, आवारा औरत।अतिष्ठत् (स० वि०) न टिकनेवाला, नापायदार।अतिष्ठा (सं० स्त्री०) अति-स्था-क्विप, सर्बानतीत्यतिष्ठतौति। सबसे अतीत, वह स्त्री जो सबसे बढ़ी चढ़ी हो।अतिष्ठावत्, अतिष्ठावन् (सं० त्रि०) टिकाऊ, पायदार। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अतिसंस्कृत (संत्रि.) बहुत संस्कार किया गया, निहायत दुरुस्त किया हुआ। अतिसक्ति (सं० त्रि०) बड़ा प्रेम, अजहद मुहब्बत । अतिसक्तिमत् (सं० त्रि.) बहुत लगा हुआ, निहायत मुश्ताक। अतिसय (सं० पु.) बड़ा ढेर, भारी जखोरा। अतिसन्तप्त (सं० त्रि.) बहुत दुःखी, निहायत अफसुर्दा। अतिसन्ध (सं० पु०) वचन या आदेशका अमान्य, शास्त्रको आज्ञाका उल्लङ्घन । अतिसन्धान (सं० पु०) अतिक्रान्तं सन्धानम्। सन्धान- वर्जित, वञ्चना, धोखा, फरेब, जाल । अतिसन्धित (स त्रि.) १ जिसका खूब फैसला हो गया हो। २ ठगा गया। अतिसन्धेय (स. त्रि०) प्रसन्न करने योग्य, फैसला होने काबिल। अतिसन्ध्या (सं० स्त्री०) अतिशयेन सन्ध्या, प्रादि-स।अतिशय सन्ध्याकाल, ठीक सन्ध्याका समय । अतिसमर्थ (सं० त्रि०) बहुत समर्थ, निहायत कामिल । अतिसमीप (सं० त्रि.) बहुत निकट, निहायत नजदीक।अतिसम्पर्क (सं० पु०) बड़ा सहवास । अतिसर (सं• त्रि०). अति-स-अच् । खस्य गतिमतीत्य सरति गच्छति। अतिचारी, अग्रसर, अपनी चालसे बाहर चलनेवाला। अतिसर्ग (सं० पु०) अति-सृज-घञ्। १ दान, उत्सर्ग। (त्रि.) २ सृष्टि-अतिक्रमकारी अतिसज्जन (स'• पु० ) अति-स-ल्य ट। १ विसर्जन २ दान। ३त्याग। ४ नियोग, वध। ५ विप्रलम्भ । ६ अतिशय दान। अतिसव (सं० त्रि०) अतिक्रान्तः सर्वान सबसे अतीत, सबसे आगे निकला हुआ। अतिसाध्वस् (सं० लौ० ) बड़ा डर, भारौ खौफ। अतिसान्तपन (स' क्लो०) १ अतिक्रान्तः सान्तपनम् । अधिकदिनसाध्यत्वात्, अत्यादि-तत्। २ एक व्रत। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> q4w4fxi7zf7dmphf65qqpnomii94p2s पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७५ 250 83549 664789 346951 2026-07-03T07:20:59Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664789 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" /></noinclude>अतिसान्द्र-अतिसार २६६ <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> मनुसंहितामें लिखा है, कि जान-बूझकर जातिभ्रंश इस बातका ठीक-ठीक कोई उत्तर नहीं, कि कर पाप करनेपर सान्तपन व्रत करे, किन्तु यदि यह कुपथ्य और गुरुपाक द्रव्य अर्थात् भारी चीजें. कौन- पाप बिना जाने हो जाय, तो प्राजापत्य व्रत करना कौन हैं। क्यों कि, एक मनुष्यके लिये जो वस्तु चाहिये। यथा- कुपथ्य और गुरुपाक है तथा जिसे थोड़ोसी ही "जातिय शकर कम्म कृत्वान्यतममिच्छया। खानेपर उसके पौड़ा उत्पन्न हो जाती है, दूसरा चरेत् सान्तपनं कच्छ प्राजापत्यमनिच्छया ॥ १५॥१२५ । विष्णुसंहिताके मतसे, पहले दिन गोमूत्र, गोमय वही वस्तु दशगुण खाके अच्छोतरह पचा जाता है। फिर जाड़े में जो चोज, अनायास ही जीर्ण ( हज.म) यानी गोबर, दूध, दही, घी और कुशोदक सेवन करे; होती, गर्मी और बरसातमें उसके खानेसे पीड़ा दूसरे दिन उपवास करे। इसौको सान्तपन कहते हैं। यह व्रत तीन बार अभ्यस्त होनेसे हो अति- होने लगती है। इससे तो, दैहिक स्वभाव, अभ्यास और जाड़े-गर्मीको कमी-वेशी देख सुपथ्य और सान्तपन कहाता है। अतिसान्द्र (सपु.) राजमाष, लोबिया, चौंला। कुपथ्य विचारना पड़ता है। प्राय: लडडू, पूड़ी, अतिसांवत्सर (सं० त्रि०) एक वर्षके ऊपर, संवत्सरसे जलेबी प्रभृति मिठाइयों और पुलाव प्रभृति जिन अधिक क। चीजोंमें घी और मसाला ज्यादा रहता है, उन्हें अतिसामान्य (सं० पु०) १ वह उक्ति जो कहनेवाले गुरुपाक कहते हैं। सिवा इसके, जिन चीजोंमें के मतलबसे बाहर निकल जाती है। (त्रि.) बकला, रेशा और वीज अधिक रहता है, वही २ निहायत मामूली, बहुत सौधा । कुपथ्य होती हैं। प्याज और लहसुन भी सुपथ्य अतिसाम्या (स. स्त्री०) अत्यन्तं साम्य अधुना नहीं। किन्तु युरोपीय पण्डित इन दोनो चीजोंको अस्याः बहुव्रौ०। १ मधुयष्टिलता, मौरठौकी बेल । आग्नेय समझते हैं। भारतवर्ष में गर्मी बहुत पड़ती (लो०) प्रादि-स० । २ अत्यन्त सादृश्य । है, यहां प्याज और लहसुन सुपथ्य नहीं हो सकता। अतिसायं (सं० अव्य० ) अतिशयितं सायं। अत्यन्त मनुसंहितामें लिखा है,-ऋषियोंने मनुके सन्तान सायंकाल। भृगुसे पूछा, कि सत्ययुगमें जब मनुष्यको आयु चार अतिसार, अतीसार (स० पु०) रुधिरादिकं अतिशयेन सौ वर्षको लिखी है तब वेदपारग ब्राह्मणोंको सारयतौति, अति-स-घञ्। सरति अतीव इत्यतिसारः। जो अकाल मृत्यु क्यों होती है। भृगुने इसके उत्तरमें रुधिर आदिको बहुत गिराये, रोग-विशेष, उदरामय खाद्यदोष हो मृत्युका प्रधान कारण बताया। रोग, वह बीमारी, जिसमें आँव और खून गिरता अभक्षा देखो। तथा लहसुनको. है। अतिसार रोग साधारणतः दो प्रकारका होता है। दूषित कहा। अपर लिखे हुए कुपथ्यके सिवा और श्लेष्मातिसार (diarrhea) और दूसरा रक्तातिसार भी अनेक अनिष्टकर ट्रव्य प्रायः सकल हो खाया (dysentery)। इसके भिन्न-भिन्न कारण, लक्षण करते हैं। इसमें बाजारको मिठाई प्रधान है। और चिकित्सादि इस तरह हैं,- प्रायः हलवाईको दुकानमें जो खानेको चौजे मिलती कुपथ्य या गुरुपाक द्रव्य अधिक खाकर, कितने हैं, वह विषके बराबर हैं। हलवाई सस्ते घोको ही लोग पचा नहीं सकते। विशेषतः जिन्हें क्रय करते हैं, जो कभी स्वास्थ्य के लिये लाभदायक शारीरिक परिश्रम नहीं करना पड़ता, आठों पहर नहीं होता। नारियलका तेल, बकरे और बैलको केवल एक ही स्थानमें बैठके लिखने-पढ़नेको चर्चा चर्बी और अण्डौका तेल इस धीमें अधिक परिमाणसे करनी होती है, या जो स्वभावसे ही आलसी हैं, मिला रहता; अधिक क्या बताया जाये. घौमें जो चीज़ खानेकी नहीं, वही पड़ती है। ऐसे थोड़ी दूर चलने में जिन्हें कष्ट होता, उनके लिये भारी चीज, खाना मना है। हो घौमें मिठाई तय्यार की जाती है। इसके बाद और प्याज<noinclude></noinclude> m73mdau08fgbwi8vo00ew4bqah7k1wx 664791 664789 2026-07-03T07:35:38Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664791 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अतिसान्द्र-अतिसार'''|'''२६६'''}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> मनुसंहितामें लिखा है, कि जान-बूझकर जातिभ्रंश कर पाप करनेपर सान्तपन व्रत करे, किन्तु यदि यह पाप बिना जाने हो जाय, तो प्राजापत्य व्रत करना चाहिये। यथा-"जातिय शकर कम्म कृत्वान्यतममिच्छया।चरेत् सान्तपनं कच्छ प्राजापत्यमनिच्छया ॥ १५॥१२५ ।विष्णुसंहिताके मतसे, पहले दिन गोमूत्र, गोमय यानी गोबर, दूध, दही, घी और कुशोदक सेवन करे;दूसरे दिन उपवास करे। इसौको सान्तपन कहते हैं। यह व्रत तीन बार अभ्यस्त होनेसे हो अति-सान्तपन कहाता है। अतिसान्द्र (सपु.) राजमाष, लोबिया, चौंला।अतिसांवत्सर (सं० त्रि०) एक वर्षके ऊपर, संवत्सरसे अधिक क।अतिसामान्य (सं० पु०) १ वह उक्ति जो कहनेवाले के मतलबसे बाहर निकल जाती है। (त्रि.)२ निहायत मामूली, बहुत सौधा ।अतिसाम्या (स. स्त्री०) अत्यन्तं साम्य अधुनाअस्याः बहुव्रौ०। १ मधुयष्टिलता, मौरठौकी बेल ।(लो०) प्रादि-स० । २ अत्यन्त सादृश्य ।अतिसायं (सं० अव्य० ) अतिशयितं सायं। अत्यन्तसायंकाल।अतिसार, अतीसार (स० पु०) रुधिरादिकं अतिशयेन सारयतौति, अति-स-घञ्। सरति अतीव इत्यतिसारः। जो रुधिर आदिको बहुत गिराये, रोग-विशेष, उदरामयरोग, वह बीमारी, जिसमें आँव और खून गिरताहै। अतिसार रोग साधारणतः दो प्रकारका होता है।श्लेष्मातिसार (diarrhea) और दूसरा रक्तातिसार (dysentery)। इसके भिन्न-भिन्न कारण, लक्षणऔर चिकित्सादि इस तरह हैं,-कुपथ्य या गुरुपाक द्रव्य अधिक खाकर, कितनेही लोग पचा नहीं सकते। विशेषतः जिन्हें शारीरिक परिश्रम नहीं करना पड़ता, आठों पहरकेवल एक ही स्थानमें बैठके लिखने-पढ़नेको चर्चाकरनी होती है, या जो स्वभावसे ही आलसी हैं,थोड़ी दूर चलने में जिन्हें कष्ट होता, उनके लियेभारी चीज, खाना मना है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इस बातका ठीक-ठीक कोई उत्तर नहीं, कि कुपथ्य और गुरुपाक द्रव्य अर्थात् भारी चीजें. कौन-कौन हैं। क्यों कि, एक मनुष्यके लिये जो वस्तु कुपथ्य और गुरुपाक है तथा जिसे थोड़ोसी ही खानेपर उसके पौड़ा उत्पन्न हो जाती है, दूसरा वही वस्तु दशगुण खाके अच्छोतरह पचा जाता है। फिर जाड़े में जो चोज, अनायास ही जीर्ण ( हज.म) होती, गर्मी और बरसातमें उसके खानेसे पीड़ा होने लगती है। इससे तो, दैहिक स्वभाव, अभ्यास और जाड़े-गर्मीको कमी-वेशी देख सुपथ्य और कुपथ्य विचारना पड़ता है। प्राय: लडडू, पूड़ी, जलेबी प्रभृति मिठाइयों और पुलाव प्रभृति जिन चीजोंमें घी और मसाला ज्यादा रहता है, उन्हें गुरुपाक कहते हैं। सिवा इसके, जिन चीजोंमें बकला, रेशा और वीज अधिक रहता है, वही कुपथ्य होती हैं। प्याज और लहसुन भी सुपथ्य नहीं। किन्तु युरोपीय पण्डित इन दोनो चीजोंको आग्नेय समझते हैं। भारतवर्ष में गर्मी बहुत पड़ती है, यहां प्याज और लहसुन सुपथ्य नहीं हो सकता। मनुसंहितामें लिखा है,-ऋषियोंने मनुके सन्तान भृगुसे पूछा, कि सत्ययुगमें जब मनुष्यको आयु चार सौ वर्षको लिखी है तब वेदपारग ब्राह्मणोंको अकाल मृत्यु क्यों होती है। भृगुने इसके उत्तरमें खाद्यदोष हो मृत्युका प्रधान कारण बताया। अभक्षा देखो। तथा लहसुनको. दूषित कहा। अपर लिखे हुए कुपथ्यके सिवा और भी अनेक अनिष्टकर ट्रव्य प्रायः सकल हो खाया करते हैं। इसमें बाजारको मिठाई प्रधान है। प्रायः हलवाईको दुकानमें जो खानेको चौजे मिलती हैं, वह विषके बराबर हैं। हलवाई सस्ते घोको क्रय करते हैं, जो कभी स्वास्थ्य के लिये लाभदायक नहीं होता। नारियलका तेल, बकरे और बैलको चर्बी और अण्डौका तेल इस धीमें अधिक परिमाणसे मिला रहता; अधिक क्या बताया जाये. घौमें जो चीज़ खानेकी नहीं, वही पड़ती है। ऐसे हो घौमें मिठाई तय्यार की जाती है। इसके बाद और प्याज <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 4n1tpb3mngqivg3gezz4okljqs5frzj पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२४९ 250 105302 664753 371936 2026-07-03T02:03:41Z रेखा साव 5914 664753 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{Rh|२५०|कवचपन-कवर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>रका पेड़। ५ त्वक, दारचीनी। ६ भूर्जपत्र, भोज- ७ नन्दीक्ष, वेलिया पीपर। ८ डिण्डिमवाद्य, डड़्का, नकारा। ९ प्राचीन जातिभेद । <small>कोष देखो।</small> कवचयन (सं० ली.) कवचलेखनसाधनं पवमिव कवन (सं० लो० ) कौति यदायने, कु-त्युट्। १ जन- पत्र वल्कलें यस्य, बहुव्री०। भूर्जपत्र, भोजपत्र । पानी। (पु.) २ शृङ्गोके एक पुत्र । कवचपाश (वै. पु.) कवच व वर्मबन्ध, जिरह कवन (हि. ) कोन देखो। बांधनेका पट्टा (अधसहिता) भवन्तक (पु.) व्यक्तिविशेष, किसी आदमीका कवचहर (संपु०) कवचं हरति येन वयमा, कवच. माम। पाणिनिने इनका उल्लेख किया है। है अच् । १ कवच इरणका उद्यम करनेके उपयुक्त ववन्ध कवन्ध देखी। वयस्क बालक, लड़का, वश्चा। (वि०) २ कवचधारी, कवपथ (सं० पु०) कु पथ, कोः कवादेशः । पपिच जिरह पहननेवाला। ३ कवचका यन्त्र धारण करने इन्दसि । 10 मन्दपथ, दुरा रास्ता। वाला, जो तावीज पहने हो। ३ कूसकधारी, | कवयि, ऋवनी देखो। मिरजाई पहने हुवा। कवयी (सं. स्त्रो०) कात् अलात् वयवे गति, कवचित (म'ये त्रि.) कवर्ष सञ्जालमस्थ, कवर क-वय-इन् कोम्। मत्स्यविशेष, सुम्भा मछली। इसका इतन्। कवचयुका, जिरह पहने हुवा। संस्कृत पर्याय-कविकापुच्छ और चक्रपटो है। कवची (त्रि.) कवचं अस्त्यस्य, कवच इनि । (Coius coloius ) पन्चान्य मत्स्यकी अपचा यह १ वर्मयुक्त, जिरह पहने हुवा। (पु.) २ राष्ट्रक जन्लशून्य स्थानमें अधिक क्षण हो सकती है। एक पुत्र। (महाभारत १।११०११) शिव, महादेव । इसके तालवक्षपर चढ़नेका प्रवाद सुन पड़ता है। कवचीयन्त्र (सली.) औषधक पाकाय यन्त्र विशेष, वस्तुतः यह कर्णदेशस्य काण्ट शके सहार उच्चस्थान पर ' दवा पकानेका एक धाला। किसो दृढ़ काचो पहुंच जाती है। फिर भूमिपर भी कवयो बहुत दूर (शीयो )का यह बनता है। कूपो न तो प्रतिइख तक चला करती है। बङ्गालके यगोर और फरिदपुर और अतिदीर्घ रहना चाहिये। पहले इसे कर्द- जिलेमें यह वृहदाकार देख पड़ती है। वैद्यक मतसे मात (भोगे) वस्त्रसे अच्छीतरह लपेट पोछे मुटु कवयो मधुर, स्निग्ध, कपाय, रुथ, वस्य, ईषत्-पित्तकर मृत्तिकाका लेप चढ़ाते हैं। फिर धूममें कूयो सुखायो और वातघ्न होती है। जाती है। अन्तको इसमें औषध रख मुख बन्द कर कवर (स': पु०-सी.) के मस्तके वरं शोभमानलात् देते हैं। इसी प्रकार कठिन और दृढ़ पग्निमें पक्ष येष्ठम्। १ देशपाश, जुल्फ। २ कवरी, वनतुलमी! सकनेवाली कूपोका नाम कवचीयन्त्र है। (भानेयस) कु-परम्। कोवरन् । उप111१५।३ पाठक, व्याख्यान कवटी (स' स्त्री. ) कौति शब्दायते, कु-प्रटन डीम् । दाता। ४ लवण, नमक। ५ प्रम्स, खठाई।(वि.) कवाट, किवाड़ी। कवड़ (पु.) केन जलेन वलते चलति, क-वल वर्ण, चितकबरा। "दृष्ट वनिनितकलापमरानधक्षात् । पच् लड़योरैक्यम् । १ ग्रास, लुकमा, कौर। २ गण्डष, च्याकीर्ण मानश्वरां कवरी नरुणाः।" (नाधार) । ६ सस्प है, गुच्छेदार। ७ खुचित, जहाज। ८ चित्र कुल्ला। कवडग्रह (स० पु.) कर्प, २ तोलेको तौल । कवर (हि.) कौर देखो। कवतो (स'. स्त्री० ) कशब्द प्रस्त्यस्य, क-मतुप-डीम् कवर (अं० पु० = Cover ) १ पाच्छादन, पोशिश, मस्य का कयानपिन' इत्यादि ऋक्-विशेष, जो ऋचा गिलाफ़। २ कोष, ढकना। ३ लिफाफा, चिट्ठी । ४ पट्टा, दफती। * से शुरू हो। कवन (वै वि. ) १ स्वार्थपर, मतगयी। २ मन्द-कर्म, बुरा काम करनेवाला। "पुपति न देवासः कदवई ।" (सन् ०१ ३२ 11)<noinclude></noinclude> ncubud3ptb035gvfjupch5vqaxzxr2a पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७३ 250 105971 664756 372750 2026-07-03T02:25:14Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664756 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|३०४| कादर-कादिर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{gap}}हिन्दुवों में यह बहुत छोटे समझे जाते हैं। डोमा और हाड़ियों को छोड़ दूसरी कोई जाति इनका छुवा पानी नहीं पीती। कादर भुइयों और कहारांका अन्न खा लेते है, किन्तु वह लोग इनका अन्न ग्रहण नहीं करते। यह लोग गोमांस, शूकरमांस, मुरगा तथा चहा खाते और मद्यादि भो पो जाते हैं। कभी कभी कति पौर कुल्हाड़ीको पूजा होती है। कादर हिन्दू होते भी अपर असभ्य जातियोंकी भांति कुसंस्काराच्छन्न हैं। इनमें कितने ही चोग -विश्वास करते कि कुछ विशेष शक्तिसम्पन्न अपदेवता उनकी चारोभोर रहते हैं। उन देवतापांमें अनेक इनके पूर्व पुरुषों के पामा होते हैं। दूसरे लोगोंके विश्वासानुसार अपदेवता कहीं नहीं, फिर भी नदी पर्व सादिसे प्रति उन्नत होती है।..उसकी कोई मूर्ति वा प्रतिमा मानी नहीं जाती। कही थोडीसी रंगी मृत्तिका पौर कहीं एक खण्ड सिन्दूरक्षेपित प्रस्तर खण्डमान भगवान्के उद्देशसे मार्गके मध्य प्रतिष्ठित रहता है। उता स्कल प्रतिष्ठित देवताम कारूदानी, हर्दियादानो, सिमरादानो, पहाडदानो, मोहन, दूया, लिलू, परदोना इत्यादि प्रधान हैं। इनके मत सांग समझ नहीं सकते उक्त पपदेवता कौन कौन शक्ति रखते हैं। कादरीके कथनानुसार उक्त सकल अपदेवतावोंको पूजाम अवहेला करनेसे देशमें नाना अमङ्गल होते हैं। पूजाके समय यह लोग शूकरशावक, छागल, कबूतर, और मुरगा. काट कर चढ़ाते हैं। शस्थको शिखा और घृतादिका उत्सर्ग किया जाता है। इनके देवता जहां स्थापित रइते, उन कुजोंको सरना कहते हैं। नापित हो इनके पुरोहित हैं। उपासक मूलाका द्रव्य खाते हैं। यह अपनेको हिन्दू बताते और परमेश्वर महादेव, विष्णु प्रभृति नामीपर विश्वास लाते हैं। दाधिणायके कादर पर्वत विभागमें वास करते हैं। वह पुलियार और मासय भावसार जातिपर प्रमुत्व चलाते हैं। कभी कभी तोप और युह सब्जादि बहन करते भी दासादिके कार्यसे प्रक्षग राते हैं। पले- गोरके पुष शासनादे मुहम्मद अकबरने में अपना दार कहने से बुरा मानते हैं। वह बड़े विखासी, सत्य- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> वादी और वाध्य होते हैं। कृधित केयांका बंधाव रहता है। वनसे हरिद्रा, पदरक, मधु, मोम इलायची, रोठो, माजूफल इत्यादि संग्रह कर चावस और तम्बाकूके साथ बदलते हैं। वह अंगरेजी नंगलसे जो चीज साते, उसका महसूल नहीं चुकाते। कोचिम-राजके अधिकत वनभागसे इलायची संग्रह करने के लिये केवल वार्षिक १०१)रु रानख देते हैं। कादर वनमें पथ प्रदर्शक का कार्य करते हैं, किन्तु कभी बोझ नहीं ढोते । कादलेय (सं० वि०) कदलेन नित्तम्, कदल-ठन ।कदत निर्मित, केलेका बमा हुवा। शुद्ध (हिं पु०) जहानको एक पटरी। यह शहतीरों और कड़ियाँके नीचे सगती है।कादाचिल्क (सं० त्रि०) कदाचित् भवम्, कदाचित्-ठञ् ।समय पर होनेवाला, जो कभी कभी हो।कादाचित्कता (सं० खो०) कादाचित्कस्य भावः, कादाचित्क-तल -टाप । कदाचित् उत्पत्ति । कादिपुर-अवध प्रदेशके सुलतानपुर जिलेको एक तहसील। यह पक्षा० २५५८३० से २६ २३ उ०पौर देशा०२२.४४ पू.सक अवस्थित है।इसके उत्तर अकबरपुर तहसील, पूर्व पाजमगढ़ जिला,दक्षिण पत्ती तहसील और पश्चिम सुलतानपुर तहसील है। भूमिका परिमाण ४३९ वर्गमौल है।यहां सुलतानपुर और जौनपुरको सड़क पा मिली है।रानकुमार जमिन्दार हैं। ब्राह्मण बहुत रहते हैं। तहसीलको छोड़ थाना और स्कूल भी है। एक देशातीहै। बाजार बहुत छोटा है। भूमि समान-गुणविशिष्ट है। नाले चारो ओर लगे हैं। बड़ी नदी पर पुल बंधा है। कादियान-बोरनिमो दीपवासी एक अनार्य जाति। पानकल इस नातिन मुसलमान धर्म प्रहर कर लिया कादियान ही-बोरनियो द्वीपके आदिम अधिवासी यह सरस और भान्तिप्रिय है।इनकी स्त्रियों अधिक मुत्री होती हैं। कादिर-१ शैल अब्दुल कादिरशा उपनाम। भासम-गोरखे पुष्प शहजादे सुखभद अकड़ने इन्हें यवना<noinclude></noinclude> dhut5sjni5n809ci39vtil2hyaqpn50 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७४ 250 105972 664798 372751 2026-07-03T08:29:16Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664798 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कादिर-कानगीः ३७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} मुंशी बनाया था। इनीने एक दीवान् सिखा है। २वजीर खानका उपनाम। यह पागरेके निवासी रहे। पालमगीर और उनके दोनों उत्तराधिकारी इन्हें बहुत ‘चाहते थे। १७२४ ई में इनकी मृत्यु हुई। इन्होंने एक दीवान बनाया है। ३ बदाऊंवाले अब्दुल कादिरका उपनाम। इन्हें लोग कादिरी भी कहते थे। 'कादिर (सं० लो०) खुदिरसार। कादिर अली एक मुसलमान पोर । प्रायः सन् ५२७ हिजरीको सौजीस्थानमें इन्दाने जन्मग्रहण किया था। उसके पीछे कुसब-उद-दीनके राज्यकालमें यह पजमेर गये। वहां सैयद हुसेन मशीदीकी कन्यासे इनका विवाह हुवा। ६२८ ई० का यह मर गये। १.२७ हिमरीमें नहांगीर बादशाहने इनकी कनके पास एक सुन्दर मसजिद बनवायी थी। इनके स्मरणार्थ टुकड़ा। इसे हलके भागे कूड चौड़ा करनेको बांधते नगरमें भी एक मसजिद है। मोपला मुसलमान कादिर अलीकी बड़ी बहाभक्ति करते है। ११ वां जमाद-उल-अखीर इनके उत्सवका दिन है। कादिरगच-युवप्रान्तके एटा जिलेका एक गांव । यहां कंकड़के बने एक प्राचीन टुगंका ध्वंसावशेष विद्यमान है। कादिरगक्षम अरबी भाषाको एक शिवालिपि निकली थी। उसमें लिखा है, यह सन् ११०४ हिनरीको आलमगौरके राज्यकालमें राजात खानकी दरगाह बनी थी। कादिरशाह-मालवके एक वादशाह। सम्राट् हुमायूने मानवी अधिकार कर अपने अफसरोंके हाथ छोड़ दिया था। किन्तु उनके आगरे वापिस जाते ही पूर्वसन खिक्षनी रान्यके एक पदाधिकारी मुथु खान्ने बारह मास दिलौके पफसरोंसे लड़ नर्मदा और भेलसा, नगरके बीचका समस्त देश अधिकृत किया तथा 'अपना उपाधि कादिरशाह रख लिया। इन्होंने १५४२ ई० तक राज्य चलाया था। पीछे शेरशाइने मानव अधिकार किया और इनके मन्त्री एवं सम्बन्धी राजा खानको राज्य सौंप दिया। कादिरी-१ शाहजहांक ज्येष्ठ पुत्र याहजादे दारा. मिकीका उपनाम । २ बदाके पन्दु सकादिरका उपनाम। (प.सो.)३ चोची। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कादीहाटी-बालके चौबीसपरंगनेका एक नगर।यह अचा. २२ ३८१०. और देशा..'२९४८"पू. पर पवखित है। साधारण लोग इसे कोदिटो कहते हैं। यहां Crispy ५...मादमी रहते विद्यालय पौर डाकघरको छोड़ कादीहाटीमें अनेक सम्भान्त लोगोंके घर भी बने हैं। काट्वेय (सं.पु.) करोरपत्य पुमान्, कट्ठ-ठक । प्रबादिभाय । पा ४१२२ । १ कट्ठ के पुत्र। शेष, अनन्स,वासुकि, तक्षक, भुजङ्गम और कुलिक 'कावेय'कहाते हैं।७ {{Gap}}२ अर्बुद। ३ कसीर। कान (हिं. पु०)१ कर्ण, गोश । कर्प देखो। २ श्रवण-शक्ति, ताकृत। ३ कन्ना, सकड़ीका एक हैं। ४ स्वर्णालङ्कार विशेष, एक गहना। इसे कानमें पहनते हैं। ५ भद्दा काना। ६ कनेव, चारपायीका टेढ़ापन। ७ पर्सगा। ६ रनकदानी, पियाली। (स्त्री.) कानि देखो। कानक (सं० लो) कनकं फलमिव उग्रं फलं पस्तास्य, कनक भण्। १ पालवीज, जायफल । रामवलमके मतानुसार यह तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, सारक पौर उत्-केदकारक है। २ धुस्तूरवील, धतूरेका वीज । (वि.) {{Gap}}३ कनक सम्बन्धीय, सोने का बना हुवा। कानकर्ण (सं• क्लो॰) औषधविशेष, एक दवा।गुडधूम, यवक्षार, विकटु, पाठा, रसाजन, चव्य, त्रिफला, जारित लौह और चित्रक बराबर बरावर कूटपीस कर छाननेमे यह बनता है। इसे मधुके साथ मुखमैं रखनेसे मुखरोग प्रारोग्य होते हैं। (सारकीसदो) कानगी (हिं. पु.) वृक्षविशेष; एक पेड़। यह कीण देशमें होता है। इसका तेल पोला रहता.पौर दवा बनाने तथा जलाने में लगता है।जायफलसे मिलता है। .. "सेषोऽनन्ती वासुधिर वचकच मुजामः । कूर्मय कुखिवयरकावेयाः प्रशोसिवा". {{Rh|||(महामारव ११)}}<noinclude></noinclude> nu06dw4kzlduqs593z2k7utpa8cyxrn 664799 664798 2026-07-03T08:29:33Z Lado Shaw 6039 664799 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कादिर-कानगीः| ३७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} मुंशी बनाया था। इनीने एक दीवान् सिखा है। २वजीर खानका उपनाम। यह पागरेके निवासी रहे। पालमगीर और उनके दोनों उत्तराधिकारी इन्हें बहुत ‘चाहते थे। १७२४ ई में इनकी मृत्यु हुई। इन्होंने एक दीवान बनाया है। ३ बदाऊंवाले अब्दुल कादिरका उपनाम। इन्हें लोग कादिरी भी कहते थे। 'कादिर (सं० लो०) खुदिरसार। कादिर अली एक मुसलमान पोर । प्रायः सन् ५२७ हिजरीको सौजीस्थानमें इन्दाने जन्मग्रहण किया था। उसके पीछे कुसब-उद-दीनके राज्यकालमें यह पजमेर गये। वहां सैयद हुसेन मशीदीकी कन्यासे इनका विवाह हुवा। ६२८ ई० का यह मर गये। १.२७ हिमरीमें नहांगीर बादशाहने इनकी कनके पास एक सुन्दर मसजिद बनवायी थी। इनके स्मरणार्थ टुकड़ा। इसे हलके भागे कूड चौड़ा करनेको बांधते नगरमें भी एक मसजिद है। मोपला मुसलमान कादिर अलीकी बड़ी बहाभक्ति करते है। ११ वां जमाद-उल-अखीर इनके उत्सवका दिन है। कादिरगच-युवप्रान्तके एटा जिलेका एक गांव । यहां कंकड़के बने एक प्राचीन टुगंका ध्वंसावशेष विद्यमान है। कादिरगक्षम अरबी भाषाको एक शिवालिपि निकली थी। उसमें लिखा है, यह सन् ११०४ हिनरीको आलमगौरके राज्यकालमें राजात खानकी दरगाह बनी थी। कादिरशाह-मालवके एक वादशाह। सम्राट् हुमायूने मानवी अधिकार कर अपने अफसरोंके हाथ छोड़ दिया था। किन्तु उनके आगरे वापिस जाते ही पूर्वसन खिक्षनी रान्यके एक पदाधिकारी मुथु खान्ने बारह मास दिलौके पफसरोंसे लड़ नर्मदा और भेलसा, नगरके बीचका समस्त देश अधिकृत किया तथा 'अपना उपाधि कादिरशाह रख लिया। इन्होंने १५४२ ई० तक राज्य चलाया था। पीछे शेरशाइने मानव अधिकार किया और इनके मन्त्री एवं सम्बन्धी राजा खानको राज्य सौंप दिया। कादिरी-१ शाहजहांक ज्येष्ठ पुत्र याहजादे दारा. मिकीका उपनाम । २ बदाके पन्दु सकादिरका उपनाम। (प.सो.)३ चोची। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कादीहाटी-बालके चौबीसपरंगनेका एक नगर।यह अचा. २२ ३८१०. और देशा..'२९४८"पू. पर पवखित है। साधारण लोग इसे कोदिटो कहते हैं। यहां Crispy ५...मादमी रहते विद्यालय पौर डाकघरको छोड़ कादीहाटीमें अनेक सम्भान्त लोगोंके घर भी बने हैं। काट्वेय (सं.पु.) करोरपत्य पुमान्, कट्ठ-ठक । प्रबादिभाय । पा ४१२२ । १ कट्ठ के पुत्र। शेष, अनन्स,वासुकि, तक्षक, भुजङ्गम और कुलिक 'कावेय'कहाते हैं।७ {{Gap}}२ अर्बुद। ३ कसीर। कान (हिं. पु०)१ कर्ण, गोश । कर्प देखो। २ श्रवण-शक्ति, ताकृत। ३ कन्ना, सकड़ीका एक हैं। ४ स्वर्णालङ्कार विशेष, एक गहना। इसे कानमें पहनते हैं। ५ भद्दा काना। ६ कनेव, चारपायीका टेढ़ापन। ७ पर्सगा। ६ रनकदानी, पियाली। (स्त्री.) कानि देखो। कानक (सं० लो) कनकं फलमिव उग्रं फलं पस्तास्य, कनक भण्। १ पालवीज, जायफल । रामवलमके मतानुसार यह तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, सारक पौर उत्-केदकारक है। २ धुस्तूरवील, धतूरेका वीज । (वि.) {{Gap}}३ कनक सम्बन्धीय, सोने का बना हुवा। कानकर्ण (सं• क्लो॰) औषधविशेष, एक दवा।गुडधूम, यवक्षार, विकटु, पाठा, रसाजन, चव्य, त्रिफला, जारित लौह और चित्रक बराबर बरावर कूटपीस कर छाननेमे यह बनता है। इसे मधुके साथ मुखमैं रखनेसे मुखरोग प्रारोग्य होते हैं। (सारकीसदो) कानगी (हिं. पु.) वृक्षविशेष; एक पेड़। यह कीण देशमें होता है। इसका तेल पोला रहता.पौर दवा बनाने तथा जलाने में लगता है।जायफलसे मिलता है। .. "सेषोऽनन्ती वासुधिर वचकच मुजामः । कूर्मय कुखिवयरकावेयाः प्रशोसिवा". {{Rh|||(महामारव ११)}}<noinclude></noinclude> ivi5dery26bcrcsjsw0c9ya4wqirbu6 664800 664799 2026-07-03T08:30:48Z Lado Shaw 6039 664800 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कादिर-कानगीः| ३७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} मुंशी बनाया था। इनीने एक दीवान् सिखा है। २वजीर खानका उपनाम। यह पागरेके निवासी रहे। पालमगीर और उनके दोनों उत्तराधिकारी इन्हें बहुत ‘चाहते थे। १७२४ ई में इनकी मृत्यु हुई। इन्होंने एक दीवान बनाया है। ३ बदाऊंवाले अब्दुल कादिरका उपनाम। इन्हें लोग कादिरी भी कहते थे। 'कादिर (सं० लो०) खुदिरसार। कादिर अली एक मुसलमान पोर । प्रायः सन् ५२७ हिजरीको सौजीस्थानमें इन्दाने जन्मग्रहण किया था। उसके पीछे कुसब-उद-दीनके राज्यकालमें यह पजमेर गये। वहां सैयद हुसेन मशीदीकी कन्यासे इनका विवाह हुवा। ६२८ ई० का यह मर गये। १.२७ हिमरीमें नहांगीर बादशाहने इनकी कनके पास एक सुन्दर मसजिद बनवायी थी। इनके स्मरणार्थ टुकड़ा। इसे हलके भागे कूड चौड़ा करनेको बांधते नगरमें भी एक मसजिद है। मोपला मुसलमान कादिर अलीकी बड़ी बहाभक्ति करते है। ११ वां जमाद-उल-अखीर इनके उत्सवका दिन है। कादिरगच-युवप्रान्तके एटा जिलेका एक गांव । यहां कंकड़के बने एक प्राचीन टुगंका ध्वंसावशेष विद्यमान है। कादिरगक्षम अरबी भाषाको एक शिवालिपि निकली थी। उसमें लिखा है, यह सन् ११०४ हिनरीको आलमगौरके राज्यकालमें राजात खानकी दरगाह बनी थी। कादिरशाह-मालवके एक वादशाह। सम्राट् हुमायूने मानवी अधिकार कर अपने अफसरोंके हाथ छोड़ दिया था। किन्तु उनके आगरे वापिस जाते ही पूर्वसन खिक्षनी रान्यके एक पदाधिकारी मुथु खान्ने बारह मास दिलौके पफसरोंसे लड़ नर्मदा और भेलसा, नगरके बीचका समस्त देश अधिकृत किया तथा 'अपना उपाधि कादिरशाह रख लिया। इन्होंने १५४२ ई० तक राज्य चलाया था। पीछे शेरशाइने मानव अधिकार किया और इनके मन्त्री एवं सम्बन्धी राजा खानको राज्य सौंप दिया। कादिरी-१ शाहजहांक ज्येष्ठ पुत्र याहजादे दारा. मिकीका उपनाम । २ बदाके पन्दु सकादिरका उपनाम। (प.सो.)३ चोची। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कादीहाटी-बालके चौबीसपरंगनेका एक नगर।यह अचा. २२ ३८१०. और देशा..'२९४८"पू. पर पवखित है। साधारण लोग इसे कोदिटो कहते हैं। यहां Crispy ५...मादमी रहते विद्यालय पौर डाकघरको छोड़ कादीहाटीमें अनेक सम्भान्त लोगोंके घर भी बने हैं। काट्वेय (सं.पु.) करोरपत्य पुमान्, कट्ठ-ठक । प्रबादिभाय । पा ४१२२ । १ कट्ठ के पुत्र। शेष, अनन्स,वासुकि, तक्षक, भुजङ्गम और कुलिक 'कावेय'कहाते हैं।७ {{Gap}}२ अर्बुद। ३ कसीर। कान (हिं. पु०)१ कर्ण, गोश । कर्प देखो। २ श्रवण-शक्ति, ताकृत। ३ कन्ना, सकड़ीका एक हैं। ४ स्वर्णालङ्कार विशेष, एक गहना। इसे कानमें पहनते हैं। ५ भद्दा काना। ६ कनेव, चारपायीका टेढ़ापन। ७ पर्सगा। ६ रनकदानी, पियाली। (स्त्री.) कानि देखो। कानक (सं० लो) कनकं फलमिव उग्रं फलं पस्तास्य, कनक भण्। १ पालवीज, जायफल । रामवलमके मतानुसार यह तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, सारक पौर उत्-केदकारक है। २ धुस्तूरवील, धतूरेका वीज । (वि.) {{Gap}}३ कनक सम्बन्धीय, सोने का बना हुवा। कानकर्ण (सं• क्लो॰) औषधविशेष, एक दवा।गुडधूम, यवक्षार, विकटु, पाठा, रसाजन, चव्य, त्रिफला, जारित लौह और चित्रक बराबर बरावर कूटपीस कर छाननेमे यह बनता है। इसे मधुके साथ मुखमैं रखनेसे मुखरोग प्रारोग्य होते हैं। (सारकीसदो) कानगी (हिं. पु.) वृक्षविशेष; एक पेड़। यह कीण देशमें होता है। इसका तेल पोला रहता.पौर दवा बनाने तथा जलाने में लगता है।जायफलसे मिलता है। .. "सेषोऽनन्ती वासुधिर वचकच मुजामः । कूर्मय कुखिवयरकावेयाः प्रशोसिवा". {{Rh|||(महामारव ११)}}<noinclude></noinclude> ttn1epds8o6q6q09cxf05y0a2pinxwn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७५ 250 106235 664805 373093 2026-07-03T10:16:39Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664805 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|२ चमो| कानड़गौड़-कानपुर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कानड़गौड़ (संयु.) कानड़ा और गौड़से उत्पव एक राग। कानड़नट (सं० पु. ) कानड़ा और नटके . संयोगले निकला एक राग। कानड़ा (सं• स्त्री०) एक रागिणी। इसका स्वरग्राम निसा ऋगम प.ध है। ११से १५ दण्ड रात्रि चढ़ते यह गायी जाती है। मिव मित्र रागवागिणीसे मिलने पर १८ प्रकारके मिश्रकानड़ाकी उत्पत्ति होती है, १ दरबारी कानड़ा, २ नायको कानड़ा, ४ काशिकी कानड़ा, ५ वागेश्री कानड़ा, ६ नट कानड़ा, ७ काफी कानड़ा, ८ कोलाहल कानड़ा. ९ मङ्गल कानड़ा, १. स्याम कानड़ा, ११ र कानड़ा, १२ नागध्वनि कानड़ा, १३ अड़ाना, १४ शाहाना, :१५ सूहा कानड़ा, १६ सुधर कानड़ा, १७ हुसेनी कानड़ा और १८ मियांकी जयनयन्ती। कानड़ा (हिं० वि०) १ काण, काना। २ पन्ना रानीका घर। यह सात समुन्दर खेल में होता है। कानद ( सं० पु०) धीमरणके पुत्र । कानन (सं० लो०) के जलं अननं जीवन अस्य, बहुवी. यहा कानयति दीपयति, कन-णिच-त्यु। १ वन, जंगल। कस्य ब्रह्मणः माननम्। २ बयाका मुख। सूख ३गह, घर) काननचन्द्र-टिकारीले एक विख्यात राना। {{Rh|||(देशावली ५५ ॥ २॥१) }} काननाग्नि (सं. पु०) कामनालातोऽग्निः, मध्य पदलो। दावानल जंगल में लगनेवाली आग। काननारि (सं० पु.) काननस्य परिरिक, अपमित समा। मौवच, कुमतिया पेड़। इसको मध्यस्थित शाखा रगड़नेसे अग्नि प्रज्वलित हो कभी कभी समप्र बन जला डालता है। इससे इसको 'काननारि (जङ्गलका दुश्मन) कहते हैं। काननौका (सं. पु.) काननं भोकः स्थानमस्य, बहुव्री०।१ वनवासी, जहाल में रहनेवासा। २ कपि, सर। ३ वानर, बन्दर। कानपुर-युवाप्रदेशका एक जिला और नगर । यह जिला पचा० २५.२६ से २५५६० और देशा. <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ७९*३१से ८०। ३४ पू० तक अवस्थित है।इलाहाबाद विभागके पश्चिमांध में पड़ता है। इसके उत्तरपूर्व गानदा, पश्चिम फरुखाबाद तथा इटावा,दक्षिणपसिम यमुना पौर पूर्व फतेहपुर है। इस जिलेका सदर मुकाम कानपुर नगर है। कानपुर जिया गङ्गा-यमुनाक मन्तर्गत सुविख्यात दोवाब प्रदेशका मध्यवर्ती है। इस जिलेमें गङ्गा और यमुनाको छोड़ दूसरी भो भनेक तुट्र क्षुद्र नदी हैं।३ मुद्रा कानड़ा। साधारणत: भूमिका भाग दक्षिण-पथिमके पभिमुख ढान पड़ता है। चार प्रधान क्षुद्र नदियोंसे कानपुर जिला चार प्रधान आगों में विभक्त है। गलाको उपनदी ईशानने उत्तर दिक एक खण्ड त्रिकोणाकार भूमिको बांट दिया है। मध्यमें पाण्डु (पांडव) और रिन्द दो.नदियोंसे दूसरे दो विभाग बने है। फिर अवशिष्ट भूखण्ड मध्य यमुनाको उपनदी सेगुर वर्तमान है। इन सकल नदियोंका तोड़ फोड़ बहुत अधिक विस्तृत और गम्भीर है। कानपुर जिलाके मध्य गङ्गा यमुनामें वर्षाके समय बड़ी बड़ी नौका पा-जा सकती हैं, किन्तु.अन्य समय क्षुद्र क्षुद्र नौका व्यतीत बड़ी नौकायाका चलना कठिन है। सुटू बुद्र नदी ग्रीष्मकाल में प्राय:जाती हैं। १८५० तक कानपुर नगरके नीचेःप्रान-जानेको गङ्गापर नावका पुल बंधा था। फिर अवध-पहलखण्ड रेलपथके लिये गङ्गापर पक्का पुत्त बना। पानकल बी० एन० डवल्या पार ने भी अपना दूसरा पक्का पुल बनवा लिया है। कानपुर जिलेको भूमि स्वभावत: एक है, किन्तु. अब गङ्गामे नहर निकलनेके कारण अधिक हरा धोर शस्वशालिनी बन गई है। इस नारकी शाखाप्रथाखा. से छोड़ समस्त निलेमें जल पहुंचानेका प्रबन्ध धाहै। इस जिसमें कई झोल हैं। सिकन्दरा परगनिमें सोना झील है; यह सिकन्दरसे भोगिनीपुर तक चली गई है। सोना झोल यमुनासे दो मील यमुना पाजकन जहां जैसे जितनी झुक झुक कर रही है. यह झोल भी ठीक उसके समानान्तर भाव, वैसे ही.घूम धम कर चली है। इससे कोई कोई सीमा झोल. को यमुना नदीका प्राचीन गर्भ समझते हैं। बिन्दु.<noinclude></noinclude> kou7oqssy6ex3kvc4zoum0hs1a4xkiv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७६ 250 106237 664808 373095 2026-07-03T10:50:53Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664808 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|३७७|कानपुर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} भान भी इस सम्बन्धमें कोई प्रमाण वा प्रतिवाद नहीं मिलता । इसी प्रकार रसूलाबाद और शिवरानपुरमें २५ मौल विस्तृत स्रोत है। उसे भी लोग प्राचीन नदी का गम मानते हैं। इस जिले में जंगल नहति भी स्थान स्थान पर भूमि पड़ी है। पतित भूमिमें कि एक (ढाक) वृक्ष ही अधिक विद्यमान है। कानपुर जिले में चौता, बाघ, नोलगाय, हरिण, लोमड़ी, शृगाल, शूकर इत्यादिको छोड़ पन्च काई वन्य जन्तु देख नहीं पड़ता। इस जिलेमें युवप्रान्तके सब जातिवाले हिन्दू, सकच श्रेणीके मुसलमान और यूरोपीय रहते है। ग्रामका सामाजिक बन्धन अन्तर्वेदके अन्यान्य स्थानांकी भांति है। जमीन्दार ही प्रथम गण्य हैं। प्रधानतः ही जमीन्दार होते हैं। उसके हो संग्रहीत होता है, उसके पोछे साविक अधिवासियोंके वंशधर कषक हैं। यह जमीन्दारोंको नमौन वंशानुक्रमसे मौरूसी तौरपर जोती है। फिर बनियाँ और दुकान्दार हैं। इसो प्रकार दूसरे किसान, नाई, लोहार, कुम्हार इत्यादि रहते हैं। कानपुर जिलेमें खेती बाराका विशेष प्रभेद देख नहीं पड़ता। दोवाबके अन्यान्य स्थलोंमें जैसी प्रणाचीसे कृषिकार्य चलता, यहां भी वैसे ही दुवा करता है। कानपुरमें दो बड़ी फसलें होती है। परत्कारमें होन वाची फसलको खरीफ और वसन्त कालमें होनेवाली फसलको रवी कहते हैं। ज्योटको प्रथम बष्टिम खरीफ़ा बोते हैं। इस फसलमें धान, मकई, बाजरा, ज्वार, कापास, नील इत्यादि होता है। इसका अधिकांय पाखिन मासमें पक जाता है। धान शीघ्र शीघ्र पकनसे भाद्रमें भी काट लेते हैं, किन्तु कपास फाल्गुन व्यतीत बुननेके लायक नहीं होती। रबी भाखिनमें बोई और चैत्र बैशाखमें काटी जाती है। इस जिलेका प्रधान खाद्य गेहू है। आज कल कानपुर में कपास बहुत बोते हैं। कारण इससे लाभ बहुत होता है। यहां खेतीकर लोग एक प्रकार स्वच्छन्द संसारयात्रा चलाते हैं। किन्तु चमार, काछी, कुरमी प्रति कृषक श्रेयी बहुत दरिद है। इसीसे कानपुरको दरिद्रता Vol. IV: 95 <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> प्रति प्रसिद्ध है। उत्तराचल में ज्वार तथा गई पौर दक्षिणाचलम वाजरा पधिक उपजता है। बिल्हौर, रसूलाबाद और शिवराजपुरके दक्षिणायमें धान्य होता है। शिवराजपुरके उत्तरांशमै नौल ही प्रधान है। सकल क्षेत्र गङ्गाको नहर, कूप, पुष्करिणी, गड्ढे, झोल इत्यादिसे सौंच पाबाद किये जाते हैं। कानपुर में अनाष्टिका भय अधिक रहता है, सुतरां दुर्मिक्ष भी यथेष्ट ठहरता है। प्रधानतः इस जिलेके पश्चिमांशमें दुर्भिक्षके भयसे लोग घबराया करते हैं। कानपुरमें कई दुर्भिक्ष पड़े और उनसे लाखों लोग और जान-वर मरे हैं। {{Gap}}कानपुरसे गला, कपास और नालका बीज बाहर भेजते हैं। यहां जो नील उपजता, उससे केवल बीज राजपूत वंद्य वीज विहार प्रदेशमें पधि कविकता है । कानपुर नगर में घोड़े का साज, जूता,पोटमाण्टो इत्यादि चमड़े का ,व्यादि यथेष्ट और उत्कृष्ट रूपये प्रस्तुत होता है। चमड़े के कई कारं-खाने खुले हैं। कानपुरके पुतलीघरों में रूईका कपड़ा भी बनता है। बहुतसे तम्बू और डेरे तैयार किये जाते हैं।कानपुरके पुराने किलेमें गवरनमेण्टने अपना.चमड़ेको कारखाना खोल रखा है। उसमें सैन्यका व्यवहार्य ट्रव्यादि बनता है। सरकारी पाटेको कल भी है।इसमें सैन्य के लिये भाटा, सत्त इत्यादि तैयार करते हैं। रेलपथ, नदी, नहर, पक्की और कच्ची सड़क प्रभृति नानाविध पथ यथेष्ट है। आर्यावर्तका प्रधान मार्ग प्राण्ड-ट्राइरोड गङ्गाके समान्तरात इस जिलेमें प्रायः ६८ मोल विस्तृत है। यहां एक कलेकर मजिष्ट्रेट; दो ज्वाइण्ट मजि- ट्रेट, एक प्रसिष्टण्ट और दो डिपटी मजिष्ट्रेट रहते हैं। सकल प्रकारकै राजनका पूरा परिमाण ३८.०२८६०) रु० है। पुलिस, टेलीग्राफ, विद्याजय इत्यादि सुविधाके पनुसार विद्यमान हैं। कानपुर जिले में चार प्रधान नगर हैं। उनसे प्रत्येक ५ हजारसे अधिक लोग रहते हैं। प्रधान नगर कानपुर में कोई ८७१७०, विठ रमें ७१०३,<noinclude></noinclude> 2yaic3av2sbmq7ufhjl71oaapy7x8iq विषयसूची:1911 छत्रपति महाराज शिवाजी का जीवन चरित्र हिन्दी PDF.pdf 252 193563 663880 663737 2026-07-02T14:50:31Z सुबोध कुलकर्णी 2034 663880 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=छत्रपति महाराज शिवाजी का जीवन चरित्र |Language=hi |Volume= |Author=लज्जाराम शर्मा |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=श्रीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस |Address=बम्बई |Year=1911 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=अ |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 1j5jqy4ghwrm6l4nm24wwmxa8xxhie2 विषयसूची:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf 252 193566 663877 663806 2026-07-02T14:39:56Z अजीत कुमार तिवारी 12 663877 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=कर्त्तव्य शास्त्र |Language=hi |Volume= |Author=बाबू गुलाब राय |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor=श्यामसुंदर दास |Illustrator= |Publisher=काशी नागरीप्रचारिणी सभा |Address=वाराणसी |Year=1919 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=य |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:हिंदी साहित्य]] [[श्रेणी:निबंध]] q09yk4o9m8w0q3y77dzj8yw4yilkxj8 विषयसूची:Sahityalochan.pdf 252 193626 664782 663782 2026-07-03T07:03:32Z नीलम 26 [[विकिस्रोत:HotCat|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:काव्यशास्त्र]] जोड़ी गई 664782 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title= |Language=hi |Volume= |Author=Babu Shyamsundar Das |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year=1922 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=य |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:श्यामसुंदर दास]] [[श्रेणी:काव्यशास्त्र]] pymttc9ob6e9wrxvmpq4moaielmz775 664783 664782 2026-07-03T07:05:12Z नीलम 26 664783 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=साहित्यालोचन |Language=hi |Volume= |Author=बाबू श्यामसुंदर दास |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year=1922 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=य |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:श्यामसुंदर दास]] [[श्रेणी:काव्यशास्त्र]] 2tl4cfxacgqo1aah9n59ld1bya7y64e विषयसूची:2015.264005.Hindi-Bangla.pdf 252 193640 664776 663742 2026-07-03T06:46:29Z नीलम 26 [[विकिस्रोत:HotCat|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:समस्याकारक]] जोड़ी गई 664776 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=हिंदी बांगला |Language=hi |Volume= |Author=हरिदास वैद्य |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year= |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=य |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:समस्याकारक]] 8uvfuw008jmbjo3lxceoacmcwia6n0c विषयसूची:2015.343748.Jatibhaskar.pdf 252 193641 664778 663743 2026-07-03T06:55:33Z नीलम 26 [[विकिस्रोत:HotCat|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:कविता]] जोड़ी गई 664778 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=जातिभास्कर |Language=hi |Volume= |Author=ज्वालाप्रसाद मिश्र |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year= |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=य |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:कविता]] ddabxsuqgnb49kanb6ltjhds5z3m7at विषयसूची:Vasantavilasa Mahakavya of Balachandra Suri (1917).pdf 252 193645 664786 663791 2026-07-03T07:12:25Z नीलम 26 [[विकिस्रोत:HotCat|HotCat]] द्वारा [[श्रेणी:समस्याकारक]] जोड़ी गई 664786 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=वसन्तविलास महाकाव्यम् |Language=hi |Volume= |Author=सी. डी. दलाल (C. 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निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 5d7a9i3ddwjc56tv7nf7ce51heoq6cc 663870 663869 2026-07-02T12:10:56Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* पुस्तक सूची */ 663870 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 5yhb69cgfezj03zbd4utuqa08uewbb8 663871 663870 2026-07-02T12:11:49Z Lado Shaw 6039 /* प्रतिभागी */ 663871 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 6cfgaalnenh4acg5cgyrozvkrs9xsnk 663872 663871 2026-07-02T12:12:33Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* प्रतिभागी */ 663872 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] f6z9huk921f5i9boflv2nntpo0jibjl 663873 663872 2026-07-02T12:13:52Z Lado Shaw 6039 /* पुस्तक सूची */ 663873 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 880tpf2g4c04cq02kqntj871zpptlxc 663874 663873 2026-07-02T12:15:03Z ~2026-37845-58 6706 /* प्रतिभागी */ 663874 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[विशेष:योगदान/&#126;2026-37845-58|&#126;2026-37845-58]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-37845-58|वार्ता]]) १२:१५, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] te8lvkpez99jwz8hnho4e31ogackf9c 663875 663874 2026-07-02T13:34:31Z MuskanChaudhary121 6707 /* प्रतिभागी */ 663875 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[विशेष:योगदान/&#126;2026-37845-58|&#126;2026-37845-58]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-37845-58|वार्ता]]) १२:१५, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) १३:३४, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] ipsu4fxk6soxmw989t56b1hspxmz201 663876 663875 2026-07-02T13:36:37Z MuskanChaudhary121 6707 /* प्रतिभागी */ 663876 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[विशेष:योगदान/&#126;2026-37845-58|&#126;2026-37845-58]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-37845-58|वार्ता]]) १२:१५, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] te8lvkpez99jwz8hnho4e31ogackf9c 663878 663876 2026-07-02T14:48:46Z Sonu kumar 07 6479 /* प्रतिभागी */ 663878 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[विशेष:योगदान/&#126;2026-37845-58|&#126;2026-37845-58]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-37845-58|वार्ता]]) १२:१५, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४८, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 57w7fq92ke6op62m81248wsw1g57u0o 663879 663878 2026-07-02T14:49:40Z Sonu kumar 07 6479 /* पुस्तक सूची */ 663879 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[विशेष:योगदान/&#126;2026-37845-58|&#126;2026-37845-58]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-37845-58|वार्ता]]) १२:१५, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४८, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] eiywwiefcjep9nz28ckk1wbqd7nqav2 663881 663879 2026-07-02T14:50:57Z Sonu kumar 07 6479 /* प्रतिभागी */ 663881 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४८, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 0bsp361fammon0e0hjce3nzjynv8cxu 663882 663881 2026-07-02T14:52:16Z Sonu kumar 07 6479 /* प्रतिभागी */ 663882 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४८, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] qum18cm6g4ywzzz6at15tx5zlwv0bc8 664073 663882 2026-07-02T15:53:00Z Sanjana Chowdhury 5438 /* प्रतिभागी */ 664073 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) — # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] gyobr98zbc1wzc93535lc2ja25eizrc 664121 664073 2026-07-02T16:01:24Z Sanjana Chowdhury 5438 /* पुस्तक सूची */ 664121 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] kad9ih28crx0c2w80okbso8hzn1e2y5 664329 664121 2026-07-02T16:38:38Z रेखा साव 5914 /* प्रतिभागी */ 664329 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 4nbfe6kvkihvxhutgr81dwajm5t1xip 664337 664329 2026-07-02T16:40:05Z रेखा साव 5914 /* पुस्तक सूची */ 664337 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) [[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 1yqimr61azwzgyejpvqrw0q84fyfjba 664741 664337 2026-07-02T18:36:19Z संजीव कुमार 612 /* प्रतिभागी */ सूची सुधारी 664741 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] mpep5fsifknukv6c1e3ayg8c0pdvm66 664742 664741 2026-07-02T18:50:37Z अनुश्री साव 80 /* प्रतिभागी */ 664742 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 3qvezfkjjcy1xwniundncs9hdlvesuw 664743 664742 2026-07-02T18:51:42Z अनुश्री साव 80 /* पुस्तक सूची */ 664743 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 4sibqhw5nnc706he6pdkeamlvg0m5x3 664745 664743 2026-07-02T19:07:03Z शीतल सिन्हा 2068 /* प्रतिभागी */ 664745 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] oggalxlzr35zm2875pw2ptvhcbdrb89 664746 664745 2026-07-02T19:12:33Z शीतल सिन्हा 2068 664746 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] nkogcwa4ilx7gd99kp5h7i3fgl0cd8f 664754 664746 2026-07-03T02:03:50Z आदेश यादव 3609 /* प्रतिभागी */ 664754 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 99gqd0xd9gtdy5tqza1ktuurvp2bbcs 664755 664754 2026-07-03T02:06:10Z आदेश यादव 3609 /* पुस्तक सूची */ 664755 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 1g3mk1pypo0nafikxkucrrfl9csm40i 664765 664755 2026-07-03T04:45:47Z अंजली राजभर 4516 /* प्रतिभागी */ 664765 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] dotuhlxvh0s3edlls05c3t9vquwowht 664770 664765 2026-07-03T05:08:32Z अंजली राजभर 4516 /* पुस्तक सूची */ 664770 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] rocpz599fti5bbyc8g9eeerlxphy0gk 664792 664770 2026-07-03T07:43:13Z ~2026-38104-17 6712 /* प्रतिभागी */ 664792 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38104-17|&#126;2026-38104-17]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38104-17|वार्ता]]) ०७:४३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] t51vsru1vdkk99aktb3sxbqg2ifxvba 664793 664792 2026-07-03T07:52:02Z MuskanChaudhary121 6707 /* प्रतिभागी */ 664793 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 1eyhbmbs09a53kq9w0g1epm7tgt13bj 664794 664793 2026-07-03T08:08:28Z MuskanChaudhary121 6707 /* पुस्तक सूची */ 664794 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] ti4ikgg5xlt41lbcuwq22mjzd7m5qnm 664807 664794 2026-07-03T10:49:44Z Sweta rani Gupta 6713 /* प्रतिभागी */ 664807 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] cir6xb5bxhou9d43x89hjnmlgdjz5r1 664809 664807 2026-07-03T10:57:41Z Sweta rani Gupta 6713 /* पुस्तक सूची */ 664809 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] e6me1od3dah0m79amqb00fi4xj12qpr पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१ 250 193665 663883 2026-07-02T15:03:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663883 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मनोरंजन पुस्तकमाला - २९ संपादक श्यामसुंदरदास पी० ए० प्रकाशक काशी नागरीप्रचारिणी सभा<noinclude></noinclude> dsaq2tpi2wlh6eo4glozhgvd7d109ww पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२ 250 193666 663884 2026-07-02T15:03:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663884 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कर्त्तव्य - शास्त्र | (Ethics) लेखक गुलाबराय एम० ए०. एल-एल० बी० १९०६. श्रीलक्ष्मीनारायण प्रेस बनारस में मुद्रित। मूल्य १)<noinclude></noinclude> 6seilba8quf3u9d4yr6607j3jvx3zxf पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३ 250 193667 663885 2026-07-02T15:03:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663885 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१) (२) मा मनोरंजन पुस्तकमाला | निम्न पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जीवन-लेखक रामचंद्र शुक्र (३) गुरु गोविंदसिंह-लेखका रामचंद्र (४) आदर्श हिंदू लेखक मेहतासाराम राम । (4)- (8) (3) राहा अंगबहादुर जोन व (=) भीष्म पितामह लेखक चतुर्वेदी द्वारकाप्रसाद सम्म । (2) जीवनानं गपत जानकीराम दूवे पी० ए० (१०) भौतिक विज्ञान० (११) सालीन सहाय टी० (१२) काय (१३) महादेव रानडेकराराची.ए (१०)ोन (१४) चंद्र (१६) और नंदकुमार देव सम्<noinclude></noinclude> bb8jyt30kjhs9s1j2h2hxrxyt8izy9x पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४ 250 193668 663886 2026-07-02T15:07:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663886 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१७) ( R ) स्वामविहारी मिश्र एम० ए०४ देवविहारी मिश्र बी० ए० । (१०) नेपोलियन बोनापार्टले राधामोहन मो (18) प्रानाय विद्यालंकार। (२०) हिंदुस्तान पहला खंड से दयाचंद्र गोयलीय बी० ए० दूसरा खंड- (११) - (२२) महर्षि सुकरात साद - (२३) ज्योतिर्विद (२४) मखिक संपूर्णानंद एससी- श्यामविहारी मिश्र एम और देबिहारी मिश्र पी २० (२१) सुंदरसाहरु हरिनारायण पुरोहित बी०ए० (२३) जर्मनी का विकास, पहला भागले सूर्यकुमार व (90) दूसरा भाग (२८) पीलेखक दुर्गाप्रसाद सिंह ए-जी (२४) या लेखाचरा०- Printed by G. K. Gurjar at the Sri Lakshmi Narays Press. Befares City<noinclude></noinclude> hn3ih9r9oqiel84bmwnp1y7mvhyavl4 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५ 250 193669 663887 2026-07-02T15:07:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663887 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शुद्धिपत्र | पुत्र पंडि अपनायेंगे Specialism Specialisation १२ में २६ * Nietze Nietzsche १२ १२ प्रेम प्रेय 4 मान ११५ विस्तार विस्तार १२५ की हानि करते हैं की हानि नहीं करते १२० मानमन मानन ૨૪૨<noinclude></noinclude> 47wv4wd7wbt86rdf6mq9h2xzzx5ndgw पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६ 250 193670 663888 2026-07-02T15:08:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663888 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भूमिका । हमारे देश में उच्च शिक्षा के होते हुए भी मीि है। इस म्यूनता के मुख्यता दो क एक तो यह कि हमारी दिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा नहीं और दूसरा यह कि हमारी वर्तमान शिक्षा प्राचीन शिक्षापद्धति से बहुत कम संबंध रखती है, और इस कारण सेतो वह हमारे मानसिक संस्थान से मेल रखती है और उसमें हमारे लिये विचारसंघालिनी शक्ति ही दिखाई देती है। हमारे एक विकास को पुराना सूत्रकर है। इन कार पर थोड़ी सी विवेचना कर लेना भाषा और विचारों का बड़ा पनि है। संबंध है। यह संबंध ना कि महाकवि पतिहास को जी के योग का न करते हुए इस पा योग की ही उपमा देनी पड़ी। और पार्वती और के सम्मृती वागर्थ स्थान प्रति विचार के विकास में भाषा एक उस पाती है और दोनों का विकास प्रायः साथ ही साथ होता है। भाषा हमारे विचारों को स्पष्ट करती है और जैसे जैसे भाषा में हमारे विचारों के आनुसार नए नए शब्द बनते विचार और युक्ति में साहाय्य मिलता विचार का दुर्गम सरूपसुगम हो द्वारा बड़े बड़े अंकों के स्थान में छोटे जाते हैं, रहता है [] द्वारा हम जैसे छोटे एक एक अक्षर के चिन्ह रखकर बड़े बड़े संक होते है, उसी प्रकार आषा की मानसिक<noinclude></noinclude> itdo0zxpwka0p19ojwb81qgq8om1ofl पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७ 250 193671 663889 2026-07-02T15:08:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663889 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१) चिन्हासी से बड़े बड़े पॅची विचारों को हम सहज ही दांत में पति कर सकते हैं। चिन्हों से हमारा काम नहीं चल सकता अंगरेजी भाषा के लेखक सिफ्ट (Swift) ने एक ऐसे काल्पनिक देश का है जहां के निवासी भाषा के बदले स्थूल चिन्हों से काम चलाते थे। वे लोग विसाठी की भांति अपनी अपनी गहरी बाँधे फि करते थे, जिसमें उनके सहर रहते थे और लोगों को बैठ कर ही पात चीत करनी पड़ती थी। फिर क्या उनके विचार स्कूल वालों से तक विचार भाषा में न रचत तक सच पूछिए तो वे हमारे लिये भी स्पष्ट नहीं होते और विचार हो ये बुक कैसे बताए जा सकते हैं? होने उपर्युक्त आलोचना से भाषा की आवश्यकता तो सिद्ध हो गई, किंतु किसी विशेष भाषा की नहीं मनुष्य जिस भाषा को अपने समाज में बोलता रहा हो, वही भाषा [सिक संस्थान के अनुकूल पड़ जाती है। जब तक परभाषा में पूरानो तक उसमें विचार करा यह दी है। ऐसे लोग थोड़े ही होते हैं, जिनको अन्य भाषा में पूर्ण हो जाती है। हजारो हजार मनुष्य अन्य भाषा में विचार कर भी लें, किंतु सारे समाज के लिये ऐसा होना है, कि वह मातृभाषा को छोड़ करना काव्यवहार करने मे विचारोत्कर्ष के लिये विचार के प्रचार की आवश्यकता है। यह प्रचार मातृभाषा द्वारा ही हो सकता है। इसके अतिरिक्त एक कर सी बात है कि जितना समय दूसरी भाषा के सीखने में सरोगा उतने समय में विचारों है। इसके साथ यह भी कहना कुछ तो<noinclude></noinclude> ki7l8khyyxgbugniv0lz5yfsl2la09a पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८ 250 193672 663890 2026-07-02T15:08:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663890 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>और की बहुत से बाले होते हैं। भांडार से लाभ (*) होगा कि केवल हिंदी जाननेवालों का भी पैसा ही मस्तिष्क होती है, जैसी कि अंगरेजी जाननेवाले भी पहले निरी हिंदी जानने- क्या हिंदी जाननेवाले को संसार के शान उठाने का उतना अधिकार नहीं है, जितना कि भाषा-भाषी को ज्ञान के कोप से पेक मनुष्य को साम उठाने का एक सा स्वाभाविक अधिकार है। उसको को स्वदेश के चलते हुए करे सिके में बदल कर सर्वसाधारण अर्थ उपयोगी बना देना परमावश्यक है। दूसरी बात की विवेचना में केवल इतना ही बना आवश्यक है कि शान की उन्नति पु चत् होती है। बे बढ़ते हैं, जिनकी थोड़ी दूर तक जमीन में पहुँच जाती है। हमारी आधुनिक शिक्षा गुलदस्ता की फूल-पत्तियों की है ये फूल-पत्तियां देखने में चाहे जितनी सुंदर हॉ किंतुं न तो ये बहुत देर तक ठहर हो सकती है और न की तरह बढ़ ही सकती है। प्रत्येक सिद्धांत अपना इतिहास रखता है। उसके तंतु समाज में तक पैसे होते हैं। यद्यपि सचाई देश की सीमाओं में वेष्ठित नहीं है, तथापि जो जिस देश में जन्म लेते हैं, वे स्थानीय रंग कुछ जाते है। इस बात को अनुवादक लोग भली भांति जानते हैं कि किसी एक भाषा के भाष दूसरी भाषा में जाकर अपनी मधुरता को देते है जाति के विचारों में कुछ न कुछ विशेषता होती है। काल से हमारे देश के दार्शनिक विचारों की है। दम उन्हें विस्तृत करने का यह नहीं करते। जो विचार दो अंगरेजी शिक्षा द्वारा मिले हैं, उनका अभी पुराने<noinclude></noinclude> ksz0uoegifmgr1wqlxs2hisb0xwd1t9 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९ 250 193673 663891 2026-07-02T15:08:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663891 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विचारों से सहयोग नहीं हुआ है। पुराने पुरा में छान की नकलने लगा कर पुराने और दान को एक वी मिया में मिला देना एक महान कर्तव्य है जब तक से आया हुआ पुराने आधार पर रखा जाय तब तक उसके जीवित रहने की संभावना नहीं और जब तक पुराने पर अमन होता रहेगा, तब तक उसके बढ़ने और हरे भरे रहने की आशा नहीं इसको पूरा ज्ञान हरा भरा करके विस्तृत करना चाहिए। पुराने आधार को छोड़ कर हमारा काम न चलेगा हमारे देश बांधों की विशेष करीनानेवालों की प्रथा प्राचीन ग्रंथों पर से हर नहीं गई है। बाहर से प्राप्त सिद्धांतों की अपेक्षा देशीय सिद्धांत उन लोगों की समझ में जाते हैं। प्राचीन विद्या का इतना हास हो जाने पर भी अभी पुराणों के हरण, बाइबिल और यूनानी धर्म-ग्रंथों के उदाहरणों की 1 समें जल्दी यह जाते है। होमर के नाम से वाल्मीकि का नाम अधिकतर - शेक्सपियर सार्वजनिक होने पर भी भारतवासियों के हृदय में कालिदास स्थान नहीं पाता। प्लेटों और धरस्तु की और व्यास के नाम हमको अधिक सुपरिचित मानस होते हैं। फिर वे ही सिद्धांत जो कि यूरोपीय प्रतिपादित है देशी महात्माओं की पाणी द्वारा भारत बासि के इस पर क्यों दि सदी की भाषा' इस वाक्य में बहुत कुछ सचाई है। इ सचाई से लाभ उठाना चाहिए। इसे धर्म या पक्षपात की संज्ञा देनी चाहिए। स्वदेशी विचारों को खत करने में केवल हमारा ही भला नहीं है, वरन् संसारभरका<noinclude></noinclude> fhk8akmu87dk8mjo504avscmuz8k764 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१ 250 193674 663892 2026-07-02T15:09:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663892 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>योगमाय नमः श्रीमते नमः। * श्री भक्तमाल K- टीका, तिलक, और नामावली सहित। श्री अयोध्याजी प्रमोदमनकटिया निवासी सीताराम शरण भगवान् प्रसाद विरचित -ollle 4.159 श्रीकाशी चन्द्रप्रभा प्रेस में मुद्रित । १९०५ (SESBP) All rights reserved. Registered undr Act XXV of 1867.<noinclude></noinclude> 6uzfivfjj6zklfz3i0w6p1z44tctbp1 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२ 250 193675 663893 2026-07-02T15:09:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663893 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>। श्रीगचेमाय नमः ॥ 11ft: 11 श्रीहनुमते नमः ॥ ● श्रीभकमाल • BHAKTA MÁLA, टीकम स्वामी श्री १०८ नामा जी कृत मूल छप्पे या श्री मियादासजी प्रणीत टीका कवित अनेक प्रतियों से बड़े परिश्रम से संशोधित मीर मक्ति सुभाविन्दु स्वाव" मा वार्तिकलिक कुटिया यो H. 1590 श्रीसीतारामशरण भगवान् प्रसाद मेरा और श्रीमानवी बाबू श्रीबलदेव नारायण सिंह जी प्रकाशित किया । YYYYYY 1905, S. 5. B. P. All righg reared Repgatered under Aa XXV of 1807.<noinclude></noinclude> t95vp1hhtl08nj2l0wbwg60iio1qsbi पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३ 250 193676 663894 2026-07-02T15:09:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663894 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>०००- श्री भक्तिधाविन्दु स्वाद । ● श्री अयोध्या मिथिलाम्यां नमः ॥० श्री चारुशीलादन्यैनमः। श्री चन्द्रादयेनमः । श्रीमदनमः ॥ भगवती प्रसाद हरिनान्त्रि च । पवतां राजन् विश्वासी नैवजायते ॥ श्रीराम श्रीहनुमते नमः । परितोष रामहिं सुमिरिय सेइय रामहिं । गाइव सुनिय रामगुण ग्रामहिं ॥ (साग) नमामि पूजनीय प्रिय परम जहांते । मानिय समहि राम के नाते । पशु आया हा मेरो काममा ि मेरी दूरी<noinclude></noinclude> pgp6l2gn5ys6fgb33s8ayms45qki6lz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४ 250 193677 663895 2026-07-02T15:13:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663895 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सम्बत् १९६० श्री भक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । सीताराम श्री हनुमते नमः । श्रturerter देव्यै नमः श्रीचंद्रकलादेव्यै नमः 'देखिय रूप नाम प्राधीना । रूप ज्ञान नहिं नाम बिहीना" || जेहिकर जेहिपर सत्य सनेहू । सो तेहि मिले न कछु सन्देहू” ॥ "जाकी सुरति लगी है जहां । कहै कबीर सो पहुंचे तहां" ॥ " सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु त सरिस "सब सन्तन निर्णय सुहाई” ॥ कियो । श्रुति, पुराण, इतिहास | भजिबे को दोई सुघर, के हरि के हरिदास” श्रीअयोध्या प्रमोदवन कुटिया सीताराम शरण भगवान् प्रसाद सौभाग्यकला (रूपकला) सन् १९०३<noinclude></noinclude> dsbn8g4mn158hc7it3s7ool59qqdxc3 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५ 250 193678 663896 2026-07-02T15:14:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663896 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीमतिसुधाविन्दु स्वाद । जानिय तबहि जीव जग जागा । जब सब विषय बिलास बिरागा ॥ होय विवेक, मोहतम भागा । तब सियराम चरण अनुरागा ॥ श्रीसीताराम नामरसिकेभ्यो नमः । श्रीसीताराम जपे रटे रमे । प्रतीति प्रीति<noinclude></noinclude> aiejn0amtrj7e7yj3ynr76xmsnorv6f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६ 250 193679 663897 2026-07-02T15:14:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663897 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"यह सोभा समाज सुख, कहत न बने खगेश वरमै शरद शेष श्रुति, सो रस जान महेश ॥" ১১১১১- ১১১৯১: नमो नमोब्राह्मणेभ्यो- RECE .LAX श्री भक्ति सुधाविन्दु स्वाद । ॥ श्रीगुरवे नमः ॥ श्रीसीताराम सुखमा शील निधान । जय श्रीसिय, सियमाणप्रिय, वैष्णवेभ्योनमोनमः । ১১>>১--- "यह विधि कृपा रूप गुंण धान राम आसीन धन्य ते नर यहि ध्यान जे रहत सदा लय लीन ॥” १९६० ] जन रक्षक हनुमान ॥ भरत, लक्षम, रिपुदमन, जय, (प्रमोदवन कुटिया ) सीताराम शरण भगवान् प्रसाद । श्री अयोध्या सरयू [१९०३ .<<<<<<noinclude></noinclude> d2vyfgcrbz29v9zzzuzj6br1koi2gt7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७ 250 193680 663898 2026-07-02T15:14:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663898 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री हनुमते नमः ॥ श्री सीता राम श्रीभक्ति सुधाविन्दु स्वाद । राम राम (श्री अयोध्या) mww. h प्रमोदवन ॥ सीताराम माररण भगवानप्रसाद ॥ भारतजीवन प्रेस.<noinclude></noinclude> 3xbhiw9v2bpxu1jnviklci1vk1fzq66 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८ 250 193681 663899 2026-07-02T15:14:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663899 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"श्रीसीताराम . सौभाग्यकला ( रूपकला ), प्रमोदवन कुटिया श्री अयोध्याजी सीताराम शरण भगवान् प्रसाद श्रीभक्तमालतिलककार ॥ C. P. Puss Benares City.<noinclude></noinclude> 3awkxb4quz0qcavjwtnyt55a6o1jf76 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९ 250 193682 663900 2026-07-02T15:14:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663900 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१० 250 193683 663901 2026-07-02T15:14:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663901 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>66 श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । ॥ श्रोः ॥ श्रीमम्लेश्वरीदेव्यै नमः । XVII -90981 श्रीहनुमत जन्म विलास " में नामानुरागी मुन्शी रामम्बे सहाय जी ने लिखा है कि (चौ० ) " एक दिवस, हरि हरिरस पागे। योगाभ्यास करन तहँ लागे ॥ नैनमूंदिबैठेगुणसागर । तपनिधान कपिवंशदिवाकर ॥ बह्यो प्रस्वेद शरमध्पतिकीन्हा ।" गुप्तमेव गिरिनायक चीन्हा ॥ सो श्रमबिन्दु ईश गहि- लीन्ही । जगतारन की इच्छा कीन्ही ॥ शिवानाथ तेहि राख्यो गोई । यह प्रसङ्ग जाना नहिं कोई ॥ हे मुनि- तपसा | यहां भविष्य सुनो इतिहासा ॥ है जब कलि कर परचारा। छीजे भक्तिभाव घ्याचारा ॥ तब गिरीश सो विन्दु सुहाई। नभमग तजिहिं देवसुख- दाई || (दोहा) है भूमि बरबिन्दु सो, हरि जन काज विचार | उपजै ताते रूप शुभ, भक्ति योग यागार ॥ नैन मंदि बैठे कपी, यहिते होइ रुपनैन । “हनुमतवंशी” विमल मति, योग भक्ति तप ऐन । सो अयोनिजा, योगधन, जाको वर्णन ज्ञात । स्वयं सिद्ध पातक विगत, जग में हो विख्यात ॥ "भक्तमाल" अद्भुत रचै, पूर जन मन काम । " नाभा नाभा" सब कहें, “नभोभूज” हो नाम ॥ 188600--<noinclude></noinclude> jngchajwa7ovey4c5hw9l6zrkgeh65u पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११ 250 193684 663902 2026-07-02T15:15:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663902 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XVIII श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । ॥ श्रीः ॥ श्रीमद्गल्यऋषीश्वरायनमः ॥ श्रीमाढकरणी ऋषीश्वराय नमः ॥ नमो नमो ब्राह्मणेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः । ( दोहा ) श्रीसीता सीतारमण, गौरी गौरीकन्त सानुकूल नित दोउपर रहैं बिबुध हनुमन्त ॥१॥ मनिजर् *विष्णुसहाय, जो, बी० ए० शीलनिधान । शास्त्री श्रीमणिराम रत धर्म भक्ति विज्ञान ॥ २ ॥ ( * श्रीकाशीचन्द्रप्रभामेस म्यानेजर ) --9001<noinclude></noinclude> so3q5ift4k9mnxzt844uufqqaqap9hw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३ 250 193685 663903 2026-07-02T15:15:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663903 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XXXIF श्री भक्तमाल (समालोचना ) लता और सुगमता ऐसी रक्खी गई है जिससे सर्व साधारण मनुष्य उस्को अच्छी तरह समझ सक्ते हैं; क्योंकि पूर्व समय को हिन्दी और आधुनिक हिन्दी में बहुत तर पड़ गया है। जैसे “पृथ्वीराज रायसो” की हिन्दी बड़ी विचित्र है वैसेही प्रियादास जी की टीका की हिन्दी भी अस्फुटार्थक है । इस्में "स्थालीपुलाक" न्यायेन लिखा जाता है उपन्य छापे में छपी हुई पुस्तक में खिचड़ी के भांति मिला हुप पदच्छेद रहित (६९) कवित्त का आकार देखिये, और उसी कवित्त को तिलककर्ता ने पृष्ठ २६८ पद छेद, कामा ( पल्प विश्राम ), प्यारन्थिसिस ( कोष), यादि देकर कैसा स्पष्ट कर दिया है तथा वार्तिक तिलक इस्का कैसा हृदय ग्राही है कि जड़ बांध कर हृदयग्राही सीधी रास्ते से समझाया है सो देखने ही योग्य है । और एक बात यह पूर्व है कि जो जो कथा टीकाकारने छोड़ दी है उन्हें ढूंढ २ कर पूरी किया है। छपाई तथा काग़ज़ सुन्दर है, और छप्पे के पन- न्तर विषय सूची का टेबलू (यंत्र) देकर तब विषय उठाया है। किन्तु यावत् कथा का विश्राम अपने ही इष्ट में बलात्कार से खींच कर किया है, पर यह भी साधा- रथ काम नहीं है।<noinclude></noinclude> rmis61d1kl5b7quny3dpmtbj028uvig पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४ 250 193686 663904 2026-07-02T15:15:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663904 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1600- श्रीभक्तमाल (समालोचना ) XXXV इसकी भाषा भी बहुत रमणीय, पर कहीं कहीं पुन- रुक्तियुक्त, है । वैष्णवनामावली अर्थात् (नवभक्तमाल ) भी इसके प्रादि में है । जगह जगह श्रीमानस रामायण ध्यादि का, तथा संस्कृत भागवत पादि का, प्रमाण भी दिया है। सभी इस ग्रंथ का प्रथम भाग इस सभा को भेजा गया है। श्रीकाशीजी टेड्रीनींद ( ( हस्ताक्षर ) मणिराम शास्त्री ता: ३ जुलाई सन् १९०४ सहकारीमंत्री, कान्यकुब्ज सभा स्वामी श्री ६ गङ्गादास जी महाराज, तथा पण्डितवर श्री ६ रामवल्लभा शरण जी महाराज । ( श्री अयोध्या जी, श्रावण शुक्ला सप्तमी १९६१) श्री रामायण, श्री भक्तमाल, श्रीभागवत और श्री- भगवद्गीता, समस्त वैष्णवों के प्राण तो हैं हीं ॥ टिप्पनी तो लखनऊ पर बम्बई में भी छपी ही है, परन्तु श्री १०८ भक्तमाल जी और भक्तिरसबोधिनी का तिलक लाज तक हमारे देखने सुनने में नहीं आया है; इस भाव को इस वार्तिक भाषा तिलक “भक्ति सुधा बिन्दु स्वाद" ने दूर किया ।<noinclude></noinclude> t4af5n81l76zbhjkcig9b3pdwoqhvts पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५ 250 193687 663905 2026-07-02T15:15:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663905 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>600- XXXVI श्री भक्तमाल (समालोचना ) छप्पय तथा कवित्त की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया हुआ है | चन्द्रप्रभा प्रेस की उत्तमता का कहना ही क्या है । इस तिलक को सहायता से अब साधा- रणतः सब को बड़ी सुभीता होगी; पर प्रेमी जन तो अतिशय आनन्द प्राप्त करेंगे। अनेक कथा जो तिलक- कार ने लिखी हैं उनके संग्रह में भी, कुछ थोड़ा परिश्रम ना होगा। जहां प्रबन्ध में बहुत गुण होते हैं, वहां दोषों का होना भी उपवश्य ही है । किन्तु, हित- कारी तिलककार की सच्ची दोनता प्रार्थना, उस्से बढ़ी हुई है ॥ A00-<noinclude></noinclude> ps2cmuv46wn0fomqaocyxnbfden220n पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६ 250 193688 663906 2026-07-02T15:15:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663906 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीः ॥ ॐ नमो भगवते गुरवे हनुमते श्रीरामदूताय मम सर्वविघ्नविनाशकाय श्रीसीतारामभक्ति प्रदाय ॥ - (दोश ) जय श्रीसियपिय दूत कपि, महाबीर हनुमान । “सौभाग्या" पितु मातु हितु रक्षक गुरुभगवान ॥१॥ - सियपिय अनुप सुभाव, व्रत, श्रीभक्तन को टेक | वरनि यथामतितव कृपा, भक्ति रहस्य पनेक ॥२॥ श्री कर कंजन मांहिं सोइ परपों मन बच काय । कृपासिन्धु करुणायतन, सो लीजे पपनाय ॥३॥ पुन farai प्रभु जोरि कर, मोहि कृपा करि देहु । श्री- सियसियपिय पद कमल अविरल अमल सनेहु ॥४॥ नमो नमो श्रीमारुति जनरक्षक बलवान । महा- रजनी-नन्दन, बुद्धिनिधान ॥५॥ श्रीपयोध्याप्रमोदवन सौभाग्यकला (रूपकला) ४ (दो०), भक्ति-ज्ञान-निजधर्म-रत, शास्त्री श्री मणिराम ।। धन्यवाद तेहि शतसहस, सहित सुप्रेम प्रणाम ॥ मार्गशीर्ष शुक्ल १९६२ } दीन सीतारामशरण भगवान् प्रसाद<noinclude></noinclude> a8wviu27xw8xwd6rg6gokdi3thy2pjt पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७ 250 193689 663907 2026-07-02T15:16:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663907 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२ श्रीभक्त धाबिन्दु स्वाद । ॥ श्रीः ॥ 188600- काशीकान्यकुब्जसभातः समालोचना तथा धन्यवादः श्री श्युत महामान्य - घन्यतम - सौजन्य मूर्तिभिः श्री- सीतारामशर भगवत्प्रसादः श्री १००८ नाभास्वामिकृत- भक्तमालग्रन्थस्य तदुपरि श्री १०८ प्रियादासप्रणीतटी- काप्रवन्धस्यापि निर्मितो भक्ति सुधाविन्दुस्वादनामको व्याख्यानरूपः संदर्भों भक्तिरसिकजनानां चेतस्सु परमा- ह्वादमुत्पादयति । प्रायद्वताशी सरलता सरसता च व्याख्यानग्रन्थेषु न क्वापि दृग्गोचरीभूता, प्रशंसनीयः खलु व्याख्यातुर्म- हाशयस्य परिश्रमः किंच बहुस्थलेषु प्रियादासेन यः कथाभागो न समासादितः, सोपि भगवद्भक्तिपरायणैर्भग- वत्प्रसादैर्महता परिश्रमेणान्विष्य परिपूर्तिमापितः ॥ तथाच पस्य ग्रन्थस्य पूर्वीभागस्तिलक कर्त्रा प्रेषि- तस्तत्समालोचनायां सभातो यानि दूषणानि परिमा- टु विज्ञप्तिः कृता तद्विषये यथाशक्यं यतते ग्रन्थकारः ॥<noinclude></noinclude> 134g94rn9k34blbwdr55jnzfiim51tp पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८ 250 193690 663908 2026-07-02T15:16:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663908 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>3 श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । समायात द्वितीयभागे ऋष्यशृङ्ग (शृङ्गीऋषि) वृत्ता- तं समीक्ष्या पूर्वतरं साचय्र्या भवन्ति सभ्याः ॥ एवंच २१७ पृष्ठे स्वपचवाल्मीकेः कथापि भगवद्भक्तिं सुदृढं दृढ़यति ॥ २०८ पृष्ठे गोपिकावृन्दस्य भगवच्चरणार- विन्दे परमप्रेमवोधिकां गीतिं दृष्ट्वा प्रस्तरमयहृदयस्यापि द्रता भवति । इत्थमनेकगुणगया गुम्फितोयं ग्रन्थः सु भक्तजनानां परमोपादेयः ॥ माषापि प्रसंशनीया, पुष्टचिक्कणपत्राणामुपरि मुद्रण मिति शम् । ३ श्रीकाशीजी टेढ़ीनम ( ताः १७ मार्च सन् १९०५ । ( हस्ताक्षर ) काशीनाथ (हस्ताक्षर ) मंत्री, कान्यकुब्ज सभा Mani Ram Shasdii सहकारी मंत्री, का० स० पण्डित श्री ५ रामबल्लभाशरण जी, तथा पण्डित श्री ५ रामनारायणदास जी । ( श्रीअयोध्यानी, १४ नवेम्बर १९०५) "भक्ति सुधाबिन्दुस्वादनामक व्याख्यारूप सन्दर्भस्य काशी कान्यकुब्ज सभाया या सुष्ठुतरा समालोचनाऽस्ति, तद्विषये श्रीपण्डित रामबल्लभाशरणस्य श्रीपण्डित राम- नारायणदासस्य च सम्मतिरस्ति || "<noinclude></noinclude> dpgse5x3kzxemx47ycferr43lgv32bq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९ 250 193691 663909 2026-07-02T15:16:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663909 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४ 188600- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । श्री काशी "भारतजीवन" । (६ अगस्त १९०४ ) "श्री भक्तमाल । टीका, तिलक सहित । श्रीसीतारामशरणभगवानूप्रसाद विरचित । छपाई सफाई बहुत की है । विशेषता यह है कि पुस्तक शुद्धता पूर्वक छपी है ॥ " कविवर श्रीसर्वरीश जी के कृपापात्र पंडित श्री रामाधारी पाण्डेय, तथा श्री राधामोहन सहाय (सोरठा) "भक्तमाल" सुखधाम, मोहबिनाशन प्रहरन । रीत सीताराम, प्रेम सहित नित पढ़त ही ॥ ( कवित्त ) " मियस "भक्तमाल, ” गुरुनिदेश 'मन्द्राचल, ' वेद पुराण पति छम्बुध अपार है। कृपासिन्धु नाभा स्वामी मधिकै प्रगट कियो, जासो साधु भक्त पौज- गत उपकार है ॥ प्रियादास बाक ससि सोभित सुछन्द सुचि, 'भक्तिरसबोधिनी' सु रैन राका सार है । 'बा- लक,' 'चोरनि “सौभाग्यकला" जोहि ताहि, “भक्ति- सुधाबिन्दु स्वाद" रच्यो मन हार है ॥ गोरखपूर, ( सा० वि० श० रामाधारी पाण्डेय, १५-११-१९०५) सी० रा० राधामोहन सहाय (बालक ) 1600-<noinclude></noinclude> nyqe5x35ssm0fypc4my6r8eyv3xu64w पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२० 250 193692 663910 2026-07-02T15:16:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663910 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद | ॥ श्रीहरिः ॥ श्रीभारतधर्म्ममहामण्डल श्रीनिगमागमचन्द्रिका | (कार्तिक - पौष १९६२ । पृष्ट १२५३६) "भक्तमाल, (टीका तिलक और नामावली सहित) श्रध्या जी, प्रमोद बन कुटिया निवासी, श्रीमान सीतारामशरण भगवान्प्रसाद जो विरचित पहा! किस सुन्दर भक्तिपूर्ण प्रेमभाव के साथ यह पुस्तक छापी गई है, मानो मोती पिरोये हैं। यह इस सुन्दर पुस्तक का तीसरा भाग है जो हमें प्राप्त हुआ है; इस से पीछे इसी पुस्तक के पहले दोनों भाग भी ऐसी ही मनोहरताई से छापे मिले हैं। पहले दो भागों में सतयुग, त्रेता पर द्वापर युग के भक्तों का वृत्तान्त है और इस तीसरे भाग में कलियुग भक्तावली यारम्भ हुई है। इस तृतीय भाग में कलियुग के ४० (चालीस ) भक्तों की कथा गाई गई है। पहले श्री १०८ नामा जी कृत मूल छप्पै; फिर श्री प्रियादास जी प्रणीत टीका कवित्त, बहुत ही परिश्रम के साथ अपनेक प्रतियों से शोधकर छापे हैं; और उनसे नीचे भाषा बार्तिक तिलक (टीका), श्री रामरसरंगमति जी की सहायता से, श्री सीताराम शस्त्रां भगवान् प्रसाद जी द्वारा रचित है, जिसने इस ग्रन्थ के अभिप्राय को बहुत ही सुन्दर और सरस कर दिया है ।<noinclude></noinclude> 7bussl832wk2s1bozhqdva9ia9ncudu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१ 250 193693 663911 2026-07-02T15:16:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663911 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>188606- 16 ६ श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । यह पुस्तक श्रीमान बाबू बलदेव नारायण सिंह जी वकील गया ने बड़े प्रेम से छपवाकर प्रकाशित की है। भक्तमाल प्रेमियों के लिये अत्यन्त मन-मोहनी पुस्तक है । ” ( मूल्य तीन भागों का ३३ है ) -- श्री अयोध्या कनकभवन निवासी परमहंस श्री ६ सीताशरण महाराज जी के शिष्य टाडा निवासी कवीश्वर पंडित श्री रामगया प्रसाद जी बेदान्ती (सोरठा) मारुति दीन दयाल, जाकी कृपा कटाक्ष ते । प्रगट्यो सिलकरसाल, बिनव युगकर जोरि तेहि ॥ जिसे देखतेही सर्ब साधारण को सच्ची भक्ति का उपदेश पर श्रद्धा हो, श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद (श्री मक्तमाल) का तीसरा भाग भी बहुत प्रेमियों के कर कमल में देख पड़ता है। अपने रस के अतिरिक्त रसिक तिलककार की रसज्ञता पपर रसों में भी चमत्कृत ही प्रतीत होती है; वरञ्च भक्तों के चरित्रों से उनके रस का विलक्षण प्रकाश कलकता है। प्रसिद्ध भक्तों के ऐतिहासिक समय के पनुसन्धान में प्रेमी जी ने अपने मूल्य समय को कम नहीं लगाया है। भाषा के कठिन शब्दों के पर्थ प्रत्येक कवित्त और छप्पय के अनन्तर दर्शा दिये गये हैं । सरलता, सुगमता, शुद्धता और सुन्दरता का कहना ही क्या है ॥ (दोहा) भक्त चकोरन के हृदय, जो लखि होत पनन्द । त्रिविध ताप हर तिलक सोइ, उदय सुपूरण चन्द ॥ 8000-<noinclude></noinclude> cddujkrumcjx84abdbfmi0vkohg85om पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२ 250 193694 663912 2026-07-02T15:16:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663912 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>88000- '886-06- शास्त्री श्री मणीराम शर्मा | श्रीकाशीजी, ७-१-१९०६ ॥ श्रीः ॥ श्रीरामचन्द्रचरणाब्जपरागराग- मग्न शुभ्रवपुषा मधुपेन साम्यम् ॥ संप्राप्य तद्रससुपाननिमग्नचेता- दीनातिदीनहृदयो भगवत्प्रसादः ॥ १ ॥ हृन्मन्दिरेऽस्य करुणावरुणालयस्य जाता कदाप्यखिललोकहितार्थबुद्धिः ॥ किं कुर्महे कथमसी खलु सर्वलोकः पीयूषभक्तिरसविन्दुमपि प्रपेयात ॥२॥ निर्धार्य्य लोकगतसचरितद्वयस्य श्रीभक्तद्गवतीः परमां प्रतिष्ठाम् ॥ यद्यप्यही द्वयमपीह दुरूहमस्मात् कं वर्णयामि मम शक्तिगतोऽपि भूयात् ॥३॥ सेतुद्वयं विरचितं भवदुस्तराब्धौ नाभाभिधैस्तुलसिदास महात्मभिश्च ॥ तेनेह कर्तुमनसा खलु राजमार्ग लील्यं पुरा भगवतश्चरिते वितेने ||४||<noinclude></noinclude> 5bugxof1d05fzx4cyyww6tdgmiqq8zc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३ 250 193695 663913 2026-07-02T15:17:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663913 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>5000- 1880-06- 1886-06- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । संचिन्त्य यद्भगवतः स्वचरित्रतोऽपि भक्तस्य सच्चरित एव विशेषप्रेम ॥ श्रीभक्तमालगतभक्त चरित्रटीका- टीकां ततः सुतनुते ऽतिसुगम्यगयेः ॥५॥ न श्रीप्रियादासमहात्मना यो- लब्धः कथायाः परिशेषभागः ॥ सोऽन्विष्य दत्तो भगवत्प्रसादै- विभूषितो रामचरित्रतोऽपि ॥ ६ ॥ भक्ताः सदा चातकचेष्टया यं तृषार्दिताः स्वातिसुधाऽमृतस्य ॥ विन्दु ं समाकाङ्क्षितवन्त एव- स ग्रन्थरूपेण समुद्बभूव ॥७॥ रूपाख्या सौभाग्यनाम्नी कला या श्रीमत्सीतारामयोः संस्थिताऽऽसीत् ॥ पायाता सा भक्तरूपेण भूमी लोकास्तस्मात्तां तथैवाभ्यनन्दन् ॥८॥ इति जनकतनूजा जानकीजीवनोऽपि - जगति जयतु टीका भक्तिविन्दु जीयात् ॥ भगवति सुखधात्रि ग्रन्थकर्तुश्च भक्ति- र्भवतु सतत माशंसुर्मणी रामशर्मा au 186-06-<noinclude></noinclude> lu4kxkuupzzebxkiaszork06r1dkhiv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४ 250 193696 663914 2026-07-02T15:17:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663914 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्तिसुधा बिन्दु स्वाद । "श्री वेङ्कटेश्वर समाचार" । [ २३ फेब्रवरी १९०६ ] मामाजी के लिखेहुए कितने भागवतों की कथा इस्में नहीं है । खैर ! जो कुछ लिखा गया है बहुत सुन्दर लिखा गया है | छपाई भी बहुत अच्छी है । पु- स्तक संग्रह करने योग्य है ॥ " श्रीवेङ्कटेश्वर समाचार" । ( १३ एप्रिल १९०६ ) भक्तमाल | श्रीस्वामीनाभा जी कृत मूल छप्पय, प्रियादास जी प्रणीत टीकाकवित, तथा श्रीसीताराम शरण भगवान्प्रसादजी (अयोध्याप्रमोदवनकुटियानि- वासी) कृत भाषा वार्तिक तिलकसहित । इसका तृतीय भाग पहिले प्राप्त हुआ था। पथ प्रथम और द्वितीय भी मिले हैं। प्रत्येक भाग का मूल्य १, है । पुस्तक का विषय जैसा उत्तम है, छपाई इत्यादि भी वैसीही पच्छी है। वैष्णवको तो अवश्य मँगानी चाहिये ॥ 000 श्रीकाशी "भारतजीवन" । [५ मार्च १९०६ ] श्रीभक्तमाल टीका तिलक और नामावली सहित । श्रीप्रयोध्या जी प्रमोदवन कुटिया निवासी --00088<noinclude></noinclude> qwh95uk3rv6cb34ivb3c7h40n5rtkjt पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५ 250 193697 663915 2026-07-02T15:17:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663915 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१० 98606-- श्रीमति सुधाबिन्दुस्वाद । श्रीसीतारामशरण भगवान् प्रसाद विरचित। यह भक्त- माल ग्रन्थ भक्त पुरुषों के अवश्य धारण करने के योग्य है । इस तृतीय माला में कलियुग के चालीस भक्तों की कथा उत्तम रूप से बर्णित है । छपाई सफ़ाई प्रशंस- नीय है । NABHA SWAMI'S BHAKTA MÁLA, With annota- tions by Shri Sita Ram Sharan Bhagavan Prasad of Ayodhya, published by B. Baldev Narayan Sinha a Pleader of Gaya,- will prove a very valuable addition to every efficient library of Hindi literature. 10-1-06. R. MAHESH PRASAD, B. A. HARJIVAN LAI., B. A. I have gone through the first three volumes of the work. It is a book I have read with keen interest and much pleasure. I think every Hindi library should have a copy of this valuable publication, and no Hindu family should be without a copy of this book which is bound to evolve sincere love for the Maker in any mind it meets. Nowgong, Bundelkhand. MATHURA PRASAD, B. A. Registered under Act XXV of 1867: (Office of the Registrar and Superintendent, Govt Book Depot, United Provinces, Allahabad) (Part 111.) No. 203 Dated the 16 th February 1906. ०. 600-<noinclude></noinclude> se3nia7q8th53qy9uxjzb1swjqmg30j पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६ 250 193698 663916 2026-07-02T15:17:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663916 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>॥ श्रीः ॥ श्रीहनुमते नमः । श्रीवैष्णव नामावली अर्थात् अष्टोत्तरशत वैष्णवों के नामों की मंगलमयीमाला | सीतारामशरण भगवान् प्रसाद बिरचित ॥ "हरि को निज जस सों अधिक भक्तन जस पर प्यार" श्रीकाशीजी चन्द्रप्रभा प्रेस में मुद्रित सम्बत् १९६० सन १९०३ ई० दूसरी भावृत्ति) SKS. B. P. ( १००० प्रतियां ।<noinclude></noinclude> 10mob2nn0gai3hilecam49rytkd9tdb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७ 250 193699 663917 2026-07-02T15:17:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663917 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>II 28- श्री सीतारामाभ्यां नमः ॥ श्रीहनुमते नमः । :0: श्रीवैष्णव नामावली का सूचीपत्र । नाम १०८ महात्माओं को वन्दना और उनसे प्रार्थना । स्वामी अनन्त श्रीरामचरणदास (* मौद्गल्य ऋषि " ) महाराजजी, परसा छपरा । स्वामी श्री १६ जीवाराम ( युगलप्रिय ) जी, चिद् । स्वामी श्री १६ जानकीवर शरण (प्रीतिलता ) जी, लक्ष्मण किला । स्वामी श्री १६ सीताशरण परमहंस जी, कनक- भवन । स्वामी अनन्त श्री रामचरण दास जी, बड़ी- कुटिया प्रमोदवन | स्वामी अनन्त श्रीरामचरणदास (श्रीमदमालसा अंक पृष्ठ १ ३-४ 1986-06- हंस कला) जी, गुहहहा नागलपूर । ६ --90982<noinclude></noinclude> rjwas0padkinlz2dlblk87xui4ouax0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८ 250 193700 663918 2026-07-02T15:18:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663918 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>800- श्री वैष्णनामावली का सूचीपत्र । III 3600- नाम स्वामी अनन्त श्रीरामदास ( श्री अमंगकुसुमा श्यामनाथको उर्मिलाश्रिता ) जी, बेगू- सराय मुंगेर । स्वामी श्री १६ पति रामवज्ञभाशरण जी । श्री १६ कामदेन्द्रमणि जी, साकेतराजमहल । स्वामी श्री १६ रामरसरंगमणि सीताराम शरण जी । स्वामी श्री १६ नारायणाचारी स्वामी जी, भागलपुर । स्वामी श्री १६ टीकमदास ( टेकधारी जी पुजारी | स्वामी श्री १६ नारायखदास जी, रत्नसागर श्री मिथिला । अंक पृष्ठ 9 ५-६ ८ ६ ६-७ १० の ११ १२ १३ स्वामी अनन्त श्री रामदास जी, बदनपूर प्रयाग जी । १४ स्वामी श्री १६ कान्हदास जी, कस्मर छपरा । १५ श्री १६ भीष्मदास जी, पटना बाँकीपुर । ยาย श्री १६ प्रमोदवन विहारीशरण परमहंसजी । १७ ९-१० श्री १६ रामसरनदास ( नवलभली) जी । १८ १० श्री ६ रघुनाथदास जी, बड़ी छावनी । महन्त श्री ५ रामोदार शरवजी, किला । स्वामी अनन्त श्री गोमतीदास श्रीमतीशरण ( माधुष्यंता) श्रीहनुमनिवास अवध श्री ६ अवध शरण जी; श्री तुलसीदास जी । स्वामी श्री १६ पुजारी श्यामसुन्दरीशरण (चन्द्रप्रभा “श्रीसुयज्ञात्मजसुदेव") जी । १० १०-११ fir * * ११ ११ ११ २४ ११-१२<noinclude></noinclude> k9q85dauuhdcil432ornslauk843kir पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२ 250 193701 663920 2026-07-02T15:25:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663920 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XXXIII श्री भक्तमाल (समालोचना ) श्रीगणेशाय नमः । श्रीहनुमते नमः । ॥ श्रीरामानन्दाय नमः ॥ रामायणा सुप्रसिद्ध सम्पादकीय समालोचना । श्रीकाशी" भारतजीवन" ८ अगस्त १६०४ ई० । (" साहित्य- समाचार " ;) "श्रीभक्तमाल । टीका, तिलक और नामावली के सहित । श्रीसीतारामशरण भगवान् प्रसाद विरचित । छपाई सफाई बहुत अच्छी है । विशेषता यह है, कि पुस्तक शुद्धता पूर्वक छपी है ॥” श्रीकाशी कान्यकुञ्ज सभा । श्रीसीतारामशरण भगवान् प्रसाद जी की रची हुई, "श्री भक्तमाल जी” तथा प्रियादास जी कृत टीका का भी तिलक, “श्रीभक्तिसुधा विन्दु स्वाद" पुस्तक में सर- 188,000-<noinclude></noinclude> gf661czkgkug6gq66y6i5gll0qgp025 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९ 250 193702 663921 2026-07-02T15:25:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663921 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>IV श्री वैष्णवनामावली का सूचीपत्र । ४00- 600- 93 नाम अंक पृष्ठ श्री ६ राघवशरण जी; २५ १२ स्वा०श्री१६ पं० गंगादास जी बड़ीकुटिया । श्री ६ रघुनाथदास जी श्री ५ माघवदासदजी | १२ २७-२८ १२ श्री १६ रामसियाशरणपरमहंस जी । P १३ श्री ५ स्यामसुन्दरशरणजी । ३० १३ श्री ६ कनकभवनविहारीशरण जी; ३१ १३ श्री ६ सीतलदास । ३२ १३ पति श्री ६ रामनारायणदास जी महाराज । ३३ १३-१४ श्री ६ जानकी दास जी; श्री ६ रामरमदासजी । ३४-३५ १४ श्री ६ नारायणदास जी, पटनाः श्रीभगवानदा ३६-३७ १४ श्री ६ परिहत रामरवदास जो अधिकारी; । ३८ १४ श्री ५ पण्डित विश्वेश्वरदास जी । १५ श्री ५ महन्त रामकुमारदास जी, बड़ोकुटिया । ૦ १५ श्री ६ पुजारीजगदेवदास जी (प्रियसखी) । श्री ५ सियारामदासजी श्रीगंगादासजी मधुकर | श्री ५ महावीर दास । महन्त श्री ६ भगवानदासजी, श्री ६ ज्ञानाभली जी । श्री ५ रामध्यानदास जी कपरा । श्री सरयूदास जी श्री अवधबिहारीशरण । श्री ५ वैष्णवदासः श्री सरयूशरण । महन्त श्री ६ रघुवीरशरणदास जी. पटना । श्री ५ गोविन्ददा०; श्री भरत दासपरमहंस | श्री ६ पंडित जगनाथदास जी; श्रीठाकुरदा० । श्रीराघवदास; पति श्री ५ साघवदास । श्रीरामटहलदास । ४१ ९५ ४२-४३ १५ ४४ १५ ४५-४६ १५-१६ ४ १६ १६ 9-K १७ ५२ १७ ५३-५४ ९८ ५५-५६ १८ १८ ye १८ श्रीराज किशोरशरण (मंगलता) श्रीगोपालदा० ६०-६१ १ श्रीअवधनन्दन शरण; ६२ [600- 109<noinclude></noinclude> jn46qhntgay511z0hz8rvo3bk4xm2jx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३० 250 193703 663922 2026-07-02T15:25:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663922 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री वैष्णव नामावली का सूचीपत्र । नाम श्रीराम जी, शरण ( रसमोद लता ) श्रीराधिकादास; विरक्त ६ श्रीरामप्रकाश दास जी पुजारी । श्रीरामरघुवीरशरण; श्री ६ खाकी जो सेरा । श्री प्रेमदा०जी परमहंस श्रीरामदा०काले बाबा श्री ६ रामगुलामशरण ( नवललता) जी गोवर्द्धनदा० श्री ६ रामदासजीराजगृह । श्रीरामचरणदासः श्रीतपसोजी । श्रीरामदास; श्रीजानकदासओ | श्रीरामनारायणादा०; श्रीलक्ष्मीनारायणदा० । श्रीहरिदास; श्रीदामोदरदासः । श्री सि० रा० श० श्रीरघुनन्दन श० । श्रीविखला श० श्रोतुलसीदास । श्री ६ रामवज्ञभाशरण ( युगल विहारिनी) जी । श्री जगवाथदास; श्री ६ सीतलदा० परमहंस श्रीकामता श० । श्री ६ हनुमतप्रपत्र सीतारामचन्द्र शरण जी । श्री ६ सियारामशरण श्रीरूपलताजी । स्वामी श्री १६ सीतारामशरण जी जयपूर । श्रीपिताम्वरदास | श्री जा० दा०; श्रीजा० द० श्रीरामदास रामशिला गयाजी । श्री ६ गंगादासजी गयाजी । श्री रा० च० दास मशिराम छावनी श्रीमहन्त जगन्नाथदास जी स्वर्गद्वार श्रीरामभूषणदास जी श्रीफकीराजीमहाराज 8000- V -२००४ अंक पृष्ठ ६३ Pe 转 १९० ६५ १९ ६६-६७ १९ ६८-६९ २० 90 २० ७१-७२ २० १३-१४ २० ७५-७६ 56-66 3-50 ८१-८२ ८३.८४ FFFF & KK K २१ २१ २१ २१ 9- २२ ८ २२ २३ २३ २३ २३ २४ २५ २५ २५ १०० २५<noinclude></noinclude> bgrvmvc8tvubvksxm7v1oe75d69v105 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१ 250 193704 663923 2026-07-02T15:26:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663923 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>360 VI 183400 183000 श्रीवैष्णव नामावली का सूचीपत्र । नाम श्री परमहंस जी नवाही के अंक पृष्ठ १०१ २६ श्री अयोध्या तीर्थं विवेचनोसभासद- श्रीमहन्त राममनोहरप्रसाद जीं १०२ महन्त श्री सरयूदास जी १०३ महन्त श्री दयालदास जी १०४ महान्त श्री 'रघुवरदास जी, परसा (सारन) १०५ 蕊蕊蕊蕊 महान्त श्रीरामप्रपत्र जी १०६ २६-२० महन्त श्रीजानकीवरथरत २७ महन्त श्री लालदास जी १०८ २१ विनय आदि, &c. २८-३२ -शुद्धि- पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध २ १९ कृषि १९७ टोक फोट<noinclude></noinclude> qmc047o65os6arpojan4f63ks2n3e4s पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२ 250 193705 663924 2026-07-02T15:26:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663924 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>18000- •90988 300 ॥ श्रीः ॥ " मंगल मूल विप्र परितोष " "मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ " "मुदमंगल मय सन्त समाजू ” " "सकल सुमंगलमूल जग, सिय पिय चरण सनेहु ॥” - मंगलमयी माला, अथवा १०८ वैष्णवों की (अष्टोत्तरशत नामावली । -20: श्लोक ! उदूभवस्थितिसंहारकारियों क्लेशहारिणीं । सर्वश्रेयस्करों सीतां नतोहं रामवल्लभाम् ॥ रामं रघुवरं वीरं धनुर्वेदविशारदम् ॥ मंगलायतनं देवं रामं राजीवलोचनम् ॥ ॥चौपाई॥ श्री गुरु पद रज विमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रती ॥ भाव, कुभाव, अनख आलसहू । नाम जपत मंगल दिशि दसहू ॥ नाम प्रसाद शम्भु अविनाशी । साज अमंगल मंगलराशी ॥ मंगल मूरति मारुतनन्दन। सकल भ्रमंगलमूल निकन्दन ॥ जगमंगल गुण भाव राम के दानि मुक्ति धन धर्म धाम के ॥ सुजन समाज सकल गुणखानी । करों प्रणाम सप्रेम सुबानी ॥ ॥ दोहा ॥ सन्त सरलचित जगतहित, जानि सुभाव सनेहु | बालविनय सुनि, करि कृपा, सियपिय पद रति देहु ॥ सीताराम शरण भगवान्प्रसाद सौभाग्यकला (रूपकला) 1826-06- -<noinclude></noinclude> 6evr3pwbngvmuuqi1vyxiog2tr2i2m6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३ 250 193706 663925 2026-07-02T15:26:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663925 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-9008 ( २ ) ॥ श्रीमते हनुमते नमः ॥ - १०८ वैष्णवों की नामावली सुजन समाज सकल गुण खानी । करों प्रणाम सप्रेम सुबानी ॥ ( १ ) श्रीसम्प्रदायभूषण भगवान् श्री १०८ रामानन्द स्वामीजीमहाराज के शिष्य जो श्री १६ सुरसुरानन्द जी, तिनके शिष्य श्री बलीयानन्द जी, उनके सेउरिया स्वामी, उनके श्रीबिहारीदास जी, उनके श्रीरामदास 'जी, उनके श्री बिनोदानन्द जी, उनके परम कृपापात्र श्री ६ धरनीदास जी जिनकी जगह "माँझी” जिला सारन श्री सरयूतट में है, उनके शिष्य श्री करुणा- निधानजी, उनके श्री केवल रामजी, उनके शिष्य श्री स्वामी रामप्रसादीदास जी, जिनका स्थान परसा जिला सारन एकमा रेलवे स्टेशन के समीप में है ॥ स्वामी श्री रामप्रसादीदास महाराजजी के शिष्य श्री रामसेवक दासजी; जिनके परम कृपापात्र, करुणासिन्धु भक्ति ज्ञान वैराग्य योग निवास, अनन्तश्री स्वामी " रामचरण दास" मौद्गल्यकृषि महाराजजी इस "दीन प्रपत्र के गुरु भगवान् करुणानिधान हैं। सम्बत् १९१६ में श्रीसरयूतट यहदीन * शरणागतहुरुपाथा ॥ [ साकेत वास, सम्बत १९४३], 188600- • सीताराम शरण भगवान् प्रसाद<noinclude></noinclude> mrq8pl42sjplbc0ye31bi7lfuevspwf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४ 250 193707 663926 2026-07-02T15:26:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663926 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३ ) (२) महानुभाव श्री " जीवाराम, युगल प्रिया” जी, प्रेमखानि [ साकेतबासी ] श्री गङ्गातट चिरांदस्थान, जिला छपरा सारन । ये महोदय श्री जानकीबल्लभ जी के मागे गाने बजाने में प्रति निपुण थे इनकी "रसिक- प्रकाश भक्तमाल" तथा पदावली छपी ही है; श्री रामरहस्य महोत्सव पापने भली भांति विधिपूर्वक किया था, कि जो समाज और संघट श्री कृपाही से संभव था | इनके स्थान के महन्त छाब प्रभु अवध- बासी श्री श्याम सुन्दर शरा जीहें ॥ सम्बत १९१६ में पाप की कृपा इस बालक पर हुई ॥ (३) उक्त महाराजजी के कृपापात्र महानुभाव श्री६ “युगला- नन्यशरणजी " तिन के चरणानुग पण्डितवर श्रीस्वामी जानकीवर शरण महाराजजी, लक्ष्मणकोट श्री अयोध्या जी; नित्यही तीन चार बजे से पापकी सभा मण्डप में सब प्रकार के लोग पाके कृतार्थ होते थे । झाप योगी, पण्डित, रसिक, दानी, प्रेमी, विज्ञ, कालीन, सरल और बढ़ेही प्रसिद्ध महात्मा थे। (७१९४ तथा १९५५) * जिस र सम्बत में जिस महानुभाव की विशेष कृपा इस दीन ( सीतारामशरण भगवान् प्रसाद) पर हुई, उन महोदय के नाम के वापसी सम्बत का भट्ट उपस्थित है ॥ 1000-<noinclude></noinclude> 5svgk6g8udb0r1jclzdfya8r6m6geo6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५ 250 193708 663927 2026-07-02T15:26:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663927 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( 8 ) सम्बत १९५८ • (बन्द मंजु) "लदिमन किले मिले” सवसों पुनि रहें पवन सम न्यारे" हैं । सब सन प्रीति, रीति सन्तन को, सुरतरुसरिस तदारे हैं | सियरघुनन्दन रसिक सनेहो करि, बहुओव उधारे हैं | "श्रीजानकिवर शरण मृणो-रसरङ्ग सबहि को प्यारे हैं ॥ १ ॥ क्षमा क्षमा सम, शील सोमसम, सबसों प्रिय बतराहों जू || ज्ञान बिचार भक्ति मण्डित सत “पण्डितजी” कहवाहीं जू ॥ सीताराम रूप सुरतरु मति 'प्रीतिलता' लहराहीं जू । श्री जानकिबरथरण सन्त गुरुपुंज गने नहिं जाहीं ॥२॥ सम्बत शत उन्नीस अठावन माघ अमावस नाहीं जू । पर्व्वमहोदय ब्रह्म मुहूरत अवध सरयुसट पाहीं जू ॥ "श्रीजानकिश्वर शरण” गए श्रीजानकि- बर पुर काहीं जू ॥ जहाँ गए, रसरङ्गमणी, जिय पुनि आवहिं भव नाहीं ॥ ३ ॥ श्री राम रस रङ्कमणि) में पाप श्री १०८ साकेत को सिधारे । (8) प्रतिपकिंचन परमहंस श्री ६ स्वामी "सीताशरण” महाराजजी नामानुरागी, कनकभवन श्री अयोध्याजी; जिनके ठाकुर श्री "लालसाहिब जी चोर के साथ जाने पर भी आपकी वृद्धावस्था, व्रत विरह ज्वर, और प्रेम से प्रसन्न होकर, पाठ नव महीने पर पुनः पा मिले। बड़े योग्य दर्शनीय, विरक्त और पूज्य हैं। जो पूजती है सो श्री गुरु तिथि और भगवदुत्सव में शीघ्र ही लग जाती है | ( सम्बत १९५३ ० ) एक दिन तीता कद्दू "श्रीकनक भवन विहारी जी" को धोखे से भोग लग गया, तो आपने बहुतसा घी तथा ओषधि भोग लगाई, बड़ा प्रेम किया वह भोग लगा विक कहूँ आप पागए। कहां तक प्रशंसा की जावे ॥ 600- ••000<noinclude></noinclude> 7lz9911fwyotzyiypnuezskq0kubrku पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६ 250 193709 663928 2026-07-02T15:26:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663928 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>300- ( ५ ) ५. श्री स्वामी " रामचरणदास” महाराजजी [साकेत- बासी], बड़ी कुटिया प्रमोदवन श्रीअयोध्याजी, इन महाराज जी के निर्दम्भत्व, जाप, और परिक्रमा के नेम, तथा साष्टाङ्ग दण्डवत पराकाष्ठा, पत्यन्त सरलता एवं साधुनिष्ठा, इत्यादि गुण विख्यात हैं । ये सर्वप्रिय महात्मा थे। आप के स्थान में भगवत कथा नेम से नित्यशः हुआ करती है। काशीनरेश हरिहरभक्त महाराज "श्री ईश्वरी प्रसाद" ने पाप को ग्राम दिये परन्तु आपने स्वीकार नहीं किया । ( सम्बत १९५० ) ६. श्री ६ स्वामी " रामचरणदास महाराज ("श्री- हंस कला" ) जी, गुड़हद्वास्थान शहर भागलपूर; श्री सन्तचरणामृत के विशेष नैष्ठिक, पौर श्रीप्रभु शृङ्गार- रसके रसज्ञ हैं; नामानुष्ठान और झूलन का उत्सव, बड़े नेमप्रेम से किया करते हैं । ( सम्बत* १९३८) ७. श्री ६ "रामदास" जी उर्मिलाश्रित श्यामनायकी (“ " श्रीमनङ्गकुसुमा " जी, साकेतबासी) विष्णुपुर • जिस र सम्वत में जिनजिन महानुभाव की विशेष कृपा इस दीन ( सीतारामशरण भगवान् प्रसाद) पर हुई, उन महोदय के नाम के साथ उसी सम्बत का अडू उपस्थित है ॥ 886-00-<noinclude></noinclude> er9ho5uvzza7tqm3j6md6jzjizqm6wq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७ 250 193710 663929 2026-07-02T15:27:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663929 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>18300- ( ६ ) बेगूसराय, जिला मुंगेर, तैलंग पर द्राविड़ भाषाओं के भी बड़े पण्डित श्री उमाजी श्रीशारदाजी के कृपापात्र थे, भक्ति शास्त्र के अनेक ग्रन्थ पाप ने भले प्रकार से देखे विचारे थे; श्री राम कुशल और पत्यन्त प्रेमी थे भोग में बड़ेही सावधान (१९२८ * ) इन महात्मा के अनेक परिचय, अलग पुस्तकाकार ढापे जायेंगे हरिकृपासे ॥ ८ महानुभाव श्री ६ “विद्यादास” महाराज के कृपापात्र पण्डित श्री ६ स्वामी "रामबल्लभा शरण" जी, मणि राम जी की छावनी के समीप, श्री अयोध्या जी; भगवत् कथामृत की वृष्टि नेम से आप नित्यशः करते हैं, जो अधिकारी इनकी मोहध्वंसिनी प्रेमवर्द्धिनी कथा सुनता है सो इनके हाथों बिक ही जाता है । बड़ी भारी सम्पत्ति सम्पन्न स्थान (नर्मदा तटस्थ ) की महंती श्री अयोध्या बास के अर्थ अत्युत्तम रीति से छोड़ दी ॥ पूजा जो चढ़ती है सो सब सन्त भगवन्त के भोग लगता है। प्रति मिष्टभाषी हैं ॥ नायक स्याम सुन्दर शरण शर्मा नाम के एक बड़े वैराग्यविमुख प्रवैष्णव पण्डित को अति प्रेमी श्रीवैष्णव बनाया । इनके रूपनेक चेले लोग प्रशंसनीय हैं । (१९५५ *) श्रीमद्राघवेन्द्रसखा "श्रीकामदेन्द्रमणि" जी, श्री अयोध्या जी "साकेत राजमहल," (श्री कनकभवन के 2000 --009<noinclude></noinclude> l599vocou09lke8qfv0sa3ttxa360zu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८ 250 193711 663930 2026-07-02T15:27:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663930 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ) उत्तरः) ये भाविक महाराज बड़े विज्ञ, कृपालु और पारसी भाषा के भी ज्ञाता थे। ( सम्बत १९५४ * ) १०. उक्त महानुभाव के चरणानुग श्री १६ स्वामी “श्री- सीतरामशरण रामरसरंग मणि” जी महाराज भक्तमाली, श्री पयोध्या जी; सख्यरस के छके, बड़े विरक्त, कविवर मितभाषी, श्री बालमीकीयरामायण तथा श्रीमद्गी- स्वामी तुलसीदास कृत ग्रंथों के अपत्यन्त श्रद्धावन्त नेमी प्रेमी हैं; “श्रीरामानन्द यशावली श्रीहनुमत् यशतरंगिनी ” | श्री "सरयू रसरंगलहरी,” “श्रीरामस्तवराजतिलक,” "श्रीराम लीला संवाद, "इत्यादि इत्यादि, पनेक पोथियां इन महाराज की प्रणीत छप चुकी हैं । भक्तमाल की कथा तो पत्युत्तम रीति से कहते हैं । श्रीगुरु स्मरण । तथा श्री सीतारामचन्द्र जी के भजन के पतिरिक्त दूसरा कोई उद्यम वा कर्म प्राप को है ही नहीं । ( सम्बत १९५५ तथा १९६०) ११ श्री ६ स्वामी “श्री मन्नारायणाचारी स्वामी” जी, सूजागंज शहर भागलपूर; रहस्यज्ञ; वैष्णव शास्त्र के घड़े भारी पण्डित, (साकेतबासी), बाल ब्रह्मचारी, कालीन, परमविरक्त, श्रद्धाविश्वास भक्ति के स्वरूप, श्रीरंगव्यंकटेश्वर जी के कृपापात्र । (सम्बत १९४१ ) १२ महात्मा श्री ६ “हरिहर प्रसाद" सीतारामीय जू के कृपापात्र पुजारी श्री स्वामी "टीकम दास" जी, कमक्षा<noinclude></noinclude> iz6n87nqicjyqrcfmbswmi4xkplmq9c पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९ 250 193712 663931 2026-07-02T15:27:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663931 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( : ) स्थान श्री काशी जी; भक्ति ज्ञान और योगसम्पन्न, संस्कृत तथा बंगला भाषा के पण्डित, सख्य रस के रसिक, कृपालु और प्रतिउत्तम सदाचारी हैं। दभंगा सलोना के रूपनेक लोगों को चेताया प्रभु के सम्मुख किया है ॥ बगौरा के डिपुटी बाबू द्वारका प्रसाद आपही की कृपा से श्री अवधवासी हुए हैं । (सम्बत * १९२९) १३. श्री ६ स्वामी " नारायणदास " महाराजजी, जानुबाहु विशालाक्ष महान्त, रत्नसागर श्री जनक- पूर; पति उत्तम संस्कारी और विख्यात हैं । पाप की प्रशंसा किस्से हो सके ॥ श्री विवाह समय्या बड़े धूमसे करते हैं । "श्रीसीतामढ़ी" "पुपरीजनकपुर रोड” स्टेशन इत्यादि में भी इनकी ठाकुर बारियां हैं । बहुत २ लोगों को महात्मा जी ने कृतार्थ किया है पौर करते हैं ॥ (१९४६) १४ परमारथी श्री ६ स्वामी "रामदास " जी [साकेत- ari], श्री गंगातट 'बदनपूर” जिला इलाहाबाद; दोनों परमाथों पर, (तथा इस देह के पितामह श्री " केवल कृष्णाजी" पर और “प्रेमगंग तरंग" के कती पिता श्री " तपस्वी राम" जी सीतारामीय पर, कि जो उस स्थान में बारंबार जाया करते थे, तथा इस दीन बालक* सीताराम शरण पर, सम्वत् १९०६ में पाप की बड़ी ही कृपा रहाकरती थी; पनगनित लोगों ने आप से 600-<noinclude></noinclude> iaohm8qmt0vhhbbsdbgzgnadjztimwf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४० 250 193713 663932 2026-07-02T15:27:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663932 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>188600- 18600- ( ε ) --90988 भागवत वेष पाया, उस कठिन प्रदेश को आप ने भलीभांति चेताया; पाप के कई स्थानों में से श्री अयोध्या जी में भी एक जगह "श्री जानकी घाट" के 66 समीप “ जानकी कुंज" वर्त्तमान है ( *१९०६ ) । १५. श्री स्वामी "कान्हर दास" जू [गोलोक बासी, ] गंगातट रेपूरा परगना कसमर जिला छपरा सारन; अन्नदान में अत्यन्त प्रख्यात; साधु सेवा इनकी प्रमुख्य निष्ठा थी । इनके कई बड़े २ परिचय भी सुने गये हैं । (सम्बत १९१७* ) १६. श्री ६ स्वामी “भीष्म दास" जो, बाकरगंज बांकीपूर शहर पटना; पानसौ छः सौ मूर्त्ति सन्त चतुर्मासा में इन सरलसुभाव महाराज के स्थान में रहते, झूलन देखते, और पण्डित श्री सर्वानन्द जी की कथा सुनते थे; इनकी साधु सेवा सब को विदित थी श्रीअयोध्या जी में आके आपने १९५७ में साकेत बास पाया (* १९४५) ॥ १७. श्री ६ स्वामी हरिहर प्रसाद जी के दूसरे शिष्य श्री ६ " प्रमोदवनविहारी शरण” जी महाराज, ऋण- मोचन, श्री अयोध्या जी; आपने भी दरभंगा इत्यादि के लोगों को पच्छ प्रकार से चेताया है । श्रीचित्र- कूट, पर पूर्व में बहुत दिनों तक श्री गंगातट एकान्त- स्थान के मध्य एक काठ के गुफा में रहकर आप 80-<noinclude></noinclude> 1q24sspyfrkl8yjchqymakmpq86opfg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१ 250 193714 663933 2026-07-02T15:27:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663933 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>800- ( १० ) --99 भजन करते थे। सूखे साम्ब के वृक्ष को, बगौरा में, अनुष्ठान से हरा किया (१९५५) ॥ १८. श्री " रामसरन दास” नवलपलीजी, पब्दुल्ला- हचक, जुगेसर जिला पटना। “महाशम्भुक्षेत्र माहात्म्य" नाम एक शृङ्गार रस की इनकी पोथी (जो छपी नहीं) बड़ी उत्तम है ॥ ( सम्बत १९४६) १९. श्री५ " रघुनाथदास” महाराजजी [साकेत वासी], घड़ीछावनी श्री अयोध्या जी, जिनका प्रताप और यश देश देश पर्य्यन्त विदित ही है कि सहस्रशः मूर्त्ति प्रति दिन प्रसाद पाते थे । ( सम्बत १९२८) इनकी रचित नाम " सुमिरनी" ( पदावली ) प्रसिद्ध है | दोहा । जय उदार रघुनाथ सम, जन रघुनाथ उदार । जासु सुजस जग जगमगत संतन मुख उजियार ॥ इनकी सम्मति से इनके एक नाम राखी ने "विश्राम सागर" खपवाया था । २०. श्री६ "रामोदार शरणा"जी, (साकेतवासी) लक्ष्मण कोट ( लछिमन किले के ) महन्त, श्रो अजोध्या जी । ये महात्मा यथा नाम तथा कीर्त्ति उदार वर, बड़े दानी; सन्तों और विद्यार्थियों के साथ बड़ा भाव रखते थे; बड़े ही धूमधाम से, एवं वित्तशाठा रहित विभवपूर्वक, सब उत्सव पर समैया भलीभांति करते थे; बड़े गुरुनैष्ठिक और पूर्वोक्त श्री १६ स्वामी 2000-<noinclude></noinclude> 8rws4oshhebjdxizwngb84k8efown8g पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२ 250 193715 663934 2026-07-02T15:28:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663934 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>BA... ( ११ ) -90983 जानकीवरशरण महाराजजीके गुरु बन्धु पौर बड़े कृपा- पात्र थे [१९५० * ] २१. उक्त श्री ६ जानकी वरशरण महाराज जी के कृपा- पात्र श्री १६ " गोमती दास' "श्री मतीशरण" ( " माधुर्य्य लता") जी महाराज, “श्री हनुमनिवास" श्री प्रयोध्या जी। पूर्व में पाप मणिपर्वत जी पर कुछ काल पर्य्यन्त एकान्त बास करके भजन किया है; श्री हनु- मप्रसाद से समैया उत्सव बड़े प्रेम से करते हैं; पूज्य हैं ॥ इनके कृपापात्र मुनशी “ एम्बे सहाय " जी बड़े श्रद्धावंत और कवि हैं ॥ (• सम्बत १९५४; १९६०) २२- महानुभाव श्री ६ राम सखे जी के गद्दी स्थान के महन्त श्री ५ " वधशरण" जी महाराज (साकेत- वासी) वासुदेव घाट श्री अयोध्या जी । श्री बाल्मीकि कथा पति उत्तम कहते थे । ( सम्बत १९२९) २३. श्री६ “तुलसीदास” जी (साकेतवासी,) नयाघाट, श्री अयोध्या जी, कई (धनाढ्य) महाजनों को आपने चेताया था । उनकी भारती और सदाबरत प्रख्यात था । (सम्बत १९५३) २४. पुजारी श्री१६ “श्यामसुन्दरी शरण" (चन्द्र- प्रभा) जी, श्री अयोध्या श्री कनकभवन बिहारी जी के विशेष स्नेहपात्र, शृङ्गार रस के जाग्रत स्वप्र में दिनरात पर्चा छके, अनन्य, विरक्त; पूजा भोग राग और 600<noinclude></noinclude> 9kimfejmpga9w0vsy7ibs9ui45z7ck8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३ 250 193716 663935 2026-07-02T15:28:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663935 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>3600- ( १२ ) सतसंग के अतिरिक्त दूसरा कोई व्यवहार जिनको स्पर्श ही नहीं करता है (१९५२) । स्वप्न में कई बार श्री कनक भवन बिहारिणी बिहारी जी के दरशन पाए हैं। २५. श्री६ "राघव शरण" जी महाराज, (साकेतवासी) श्री लक्ष्मण मन्दिर बढ़या जिला मुंगेर; नामानुरागी, श्री गंगाजल के दृढ़ नेमी और शृङ्गाररस के ज्ञाता थे । ( १९४४ ) २६. पण्डितवर श्री ५ " गंगादास जी” परमहंस, पति सरल, बड़ी कुटिया प्रमोदवन श्री अयोध्या जी; नित्य पूर्वक"श्री प्रमोदवन रासबिहारिणी बिहारी जी” को कथा सुनाया करते हैं, जो पूजा चढ़ती है सो भगवान् को भोग लगा देते हैं; इसके अतिरिक्त इनका सम्पूर्ण काल विद्यार्थियों और साधुओं को वेदान्त तथा पुराणादिक पढ़ाने में कटता है। (सम्बत १९३९) २७. श्री ५ " रघुनाथ दास" जी महाराज गुफा पर, शहर बिहार जिला पटना; नित्य, और विशेषतः राजगृह के मेले के समय डेढ़ महीना, आप तन मन धन से साधु सेवा करते हैं। इनके चरण प्रशंसनीय हैं (१९४९) २८. पण्डित श्री ५ " माघवदास" मानसव्यास ज, विरक्त, शृङ्गार कुंज श्री अयोध्याजी; सरल स्वभाव; पाप नित्य नेम से श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदास कृत ग्रन्थों का पाठ दिया करते हैं । (१९५५) श्री “रामदास' नाम रामायणी इनके शिष्यों में प्रधान हैं ॥ --90988<noinclude></noinclude> mx35swq9azot2x9yshmy35ohz2q3fl9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४ 250 193717 663936 2026-07-02T15:28:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663936 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[83600- ( १३ ) २९. परमहंस श्री रामसियाशरणजी, (साकेत वासी) सन्तनिवास श्रीअयोध्या जी इनके कृपा पात्रों में काशी के बेणीप्रसाद, छोटेलाल इत्यादि थे, पर बाबू जगन्नाथ प्रसाद प्रशंसनीय हैं । (*१९५५) । ३०. श्री ५ " स्यामसुन्दर शरणा" जी महाराज शृङ्गार कुंज प्रमोदवन श्री अयोध्याजी; बड़े प्रेमी हैं, पर पाप के स्थान में प्रायः उत्सव और लीला आदि होती है और श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदास जी कृत “श्रीरामचरित मा नस" नेम से कथन होता है, जिसके सुने को बहुत महात्मा एकत्र होते हैं आप का शील स्वभाव प्रशं- सनीय है। अब ये महात्मा चिरांद स्थान के महान्त भी हैं ( सम्वत् १९५५) ३१. श्री ५ " कनकभवन बिहारी शरण" जी (साकेत- वासा) रसिक निवास श्री अयोध्या जी। बड़े ही विज्ञ थे बाबू " दुर्गाप्रसाद" वकील हकमा जानकी नगर (छपरा) पर इनकी पतिशय कृपा हुई | (१९५३) ३२. महाराज श्री ६ "सीतलदास " जी, अस्सीसंगम श्रीकाशीजी; साधुसेवी ( १९५३ ) ३३. पण्डित श्री ६ "रामनारायणदास जी, वैष्णव रीवां मन्दिर तथा बड़ी जगह रामकोट श्रीअयोध्याजी; दयालु विद्यादानप्रवाह रूपनेक विद्यार्थियों को प्राप से नित्य पाठ लाभ होता है; श्रीचरणचिन्ह और श्री -909<noinclude></noinclude> 70ck2sitvsobpb715yc5brq177rtjqk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५ 250 193718 663937 2026-07-02T15:28:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663937 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>188800- ( १४ ) अयोध्या जी का चित्र बड़े परिश्रम से बनाया है; पती- वोत्साही हैं। भगवान के कार्यों में अत्यन्त उद्यतः कई पोथियां छपवाई हैं; श्री अगस्त्यसंहिता भी छप- वायी है (*१९४४)। ३४. श्री ६ जानकीदास जी, (साकेतवासी) चौकाघाट बरुणातट श्रीकाशी बनारस । सन्त सीध प्रसादी के विशेष नैष्ठिक; श्रीरामचरित मानस के रसिक थे (१९५३) ३५. स्वामी श्री १६ रामचरणदास महाराज जी भाग- लपुरवासी के गुरु भाई श्री ५ " रामरत्नदास' महाराज जी शृंगारी ने मदेहपूरा जिला भागलपूर और स्थान कजरा जिलामुंगेर को चेताया है ॥ ( १९४२ • ) । ३६. श्री ६ " नारायणदास" जी महाराज [ साकेतवासी,] हावलपूरा स्थान शहर बांकीपूर जिला पटना साम्ब ( रसाल फल ) को विशेष नेम तथा विलक्षण प्रेम से निवेदन किया करते थे ( सम्बत १९४६ )। ३७ पडित श्री ६ भगवानदास जी, ( साकेतवासी) श्री ६ महाराज रघुनाथदास जी साकेतवासी के कृपा- पात्र, बड़ीछावनी श्रीप योध्याजी (१९५१' ) । स्वामी श्री हरिहर प्रसाद जी के बड़े कृपापात्र थे । ३८. पण्डित श्री५ " रामरत्नदास” जी बड़ी जगह श्री अयोध्या जी, उपासना ग्रंथों इत्यादि के बड़े विज्ञ हैं ॥ (१९५३) ।<noinclude></noinclude> psdthfrkyhoomlon6o5x67xp4v3d2r7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६ 250 193719 663938 2026-07-02T15:28:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663938 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १५ ) ३८, पण्डित श्री५ “विश्वेश्वर दास ' जी तुलसीबाड़ी है श्री अयोध्याजी, वेदान्त के बड़े ज्ञाता श्री यन्त्रराज के नेमी ( * १९५४) । ४०. महान्त श्री ५ "रामकुमारदास" जी बड़ी कुटिया प्रमोद वन श्री अयोध्या जी; जितेन्द्री; नेम से नित्यशः प्रतिदिन पान्सी दण्डवत करते हैं; मुठ्ठी मांग २ कर साधुसेवा करते हैं; स्वभाव के बड़े सरल हैं ॥ (१९५९) ४१. पुजारी श्री ५ " जगदेवदास" जी, (प्रियसखी ) श्री अयोध्या जी; श्री किशोरी जी के विशेष कृपा पात्र हैं; श्री कनक भवन विहारी जी की पूजा का प भुदानन्द मापने पाया है; ( *१९२९) ४२. श्रीरामनामानुरागी श्री ५ “सियराम गोपाल- दास" जी तपस्वी, श्री मणिराम जी की छावनी श्री अयोध्याजी । पण्डित श्री १६ रामवल्लभाशरण जी के कृपापात्र | (१९५५) ४३. श्री " गंगादास" जी, विरक्त, मधुकर, प्रशान्त; श्रीप्रयोध्याजी श्रीजानकीकुंजश्री जानकी घाट (*१९५४) ४४. श्री हजूरी जी के स्थान के महान्त श्री "महा- बीर दास जी जिन की सम्मति से श्री अयोध्या जी श्रीजानकीरामघाट पर भी (ज्येष्ठपूनो को, बार्षिक) श्री सरयू जन्मोत्सव समाज होने लगा है ( *१९५४) । ४५. श्री ६ “भगवानूदास" जी ग्रामवीर दरियाबाद<noinclude></noinclude> g97oic8eb540iaswf83lay851j4seqm पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७ 250 193720 663939 2026-07-02T15:28:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663939 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1830-00- ( १६ ) जिला बारहबंकी; दंडवत के पत्यन्त नेमी हैं; श्री सरयू घाघरा संगम पर, पूस मकर महीना भर प्रति सम्बत्सर, साधु सेवा बड़ी श्रद्धा से करते हैं; श्रीप्रमी- बिहारी जी के बड़े कृपा पात्र, संगीत निपुण, कालीन ( सम्बत् * १९५२ ) ४६. श्री ६ "ज्ञाना पली" जी (साकेत वांसी) वासु- देव घाट श्री अयोध्या जी; संगीत भजन तथा प्रेम में प्रसिद्ध पौर श्री जानकीजीवन जी के विरही थे; इनकी पदावली लखनऊ (श्रीलक्ष्मणपुर) में छपी है (* १९३४) ४५. पुजारी श्री६ "अवधविहारीशरण" जी साकेत- वासी के कृपापात्र श्री ६ रामध्यानदास जी ( साकेत- वासी शहर छपरा, जिला सारन; पाप ने “श्रीरूपसखी की होली" की रहस्य लीला बड़े धूमधाम और पत्यन्त प्रेम नेम से कराई थी. जिस के परमानन्द की प्रशंसा साधारणतः [पसम्भव है, देखने वालों ही की अनुभूत है [* १९४१ ] आप मुनशी श्री तपस्वी राम जी के [ जो इस शरीर के पिता थे ] अत्यन्त प्रेमी थे ॥ ४८. विरक्तवर परमहंस श्री ५ " सरयूदास " जी श्री अयोध्या श्रीजन्मस्थान के कुंज में [ १९३३* ] ge पण्डित श्री " अवध बिहारी शरण" जो खाकी ( गोलोकवासी ) रौज़ा ज़िला सारन छपरा, श्रीराधा- -90018<noinclude></noinclude> mmrlm2zeqn2gbc86w9ln3lrkemks7l5 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८ 250 193721 663940 2026-07-02T15:29:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663940 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1000 ( १७ ) --900 रमण जी के लगे नाचने और श्री गंगा जी के दर्शन तथा श्री भागवत के पाठ का नित्यनियम अति ही दृढ़ रखते थे । श्री भागीरथी जी के तीर तीर श्री सरयू महारानी जी के संगम से सोनभद्र के संगम तक के अनेक लोगों को पाप ने भली भांति चेताया (१९४६) ५० श्री ५ " वैष्णवदास जी महाराज (साकेत वासी) श्री मणिराम जी की छावनी श्री अयोध्या जी, संतों के हेतु द्वार दिन रात खुला ही रहा करता था (केवाड़लगाए नहीं जाते थे) किन जानें साधु किस क्षण पा पहुँचें; सरलता, दयालुता, इत्यादिक गुण संपन्न थे (१९५४ ) ५१ श्री ५ " सरयूशरण जी साकेतवासी गौतमक्षेत्र श्रीसरयूतट, जिला छपरा सारन [ १९५० ] श्री " दामोदरदास" जी महात्मा इसी क्षेत्र में बिराजते हैं; बड़े प्रेम से ताम्रपत्र पर श्री यन्त्रराज श्री अयोध्या जी से लेगए हैं ॥ पाही के प्रेमपात्र बाबू श्रीसूर्य प्रसाद जी वकील छपरा, कि जिन पर श्रीमारुति जी की पनूठी कृपा हुई, सन्तों और रामभक्तों के अत्यन्त श्रद्धावान् हैं ॥ ५२ श्री ५ "रघुवीर शरण दास जी महाराज, चोहटा मन्दिर, बांकीपूर शहर पटना तथा बदल पूरा खगोल, शहर दानापूर ये महात्मा अंक ३६ (पृष्ठ १४) के श्री ६ नारायणदास जी महाराज के कृपापात्र, बड़ेही प्रेमी तथा विवेकी; श्री अयोध्या श्री प्रमोदयन बिहारी जी के बड़े कृपापात्र (१९४९) 886-06-<noinclude></noinclude> cpapou78nvsm9zfzyq8ktfjvcewratw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९ 250 193722 663941 2026-07-02T15:29:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663941 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>600- ( १८ ) बदमपुरीय महात्मा श्री ६ रामदास महाराज जी के तथा श्री ६ युगखप्रिया जो कृपानिधि के, कुछ और भी चरित्र तथा परिचय, कवि- वर श्रीमहावीर प्रसाद नारायण सिंह शर्मा जी ने सम्बत् १९४५: १९४७ के मध्य ) अपनी पोथी “ भागवत् चरित्र चन्द्रिका" में जिसे हैं ॥ ५३ श्री ५ " गोविन्ददास” जी ब्रजवासी कथा श्रवण के बड़ेही रसिक, मधुकर, विरक्त, कभी श्री रामकोट में, कभी श्री मणिपर्वत के पास श्री अयोध्याजा (१९५३) ५४ श्री ६ “भरतदास" जी, रामनामानुरागी, मधुकर, विरक्त, कथा के नेमी, केवल एक लंगोटी पर माला मात्र रखते हैं, प्रमोदवन श्री अयोध्याजी (१९५४) । ५५ पण्डितवर श्री ६ "जगन्नाथदास” जी, श्री योध्याजी, श्री गढ़ी में श्रीहनुमान जी को नित्य कथा सुनाया करते हैं, बड़े गुरुनिष्ठ पोर प्रेमी (१९५६) ५६ श्री " ठाकुरदास" जी महाराज, बांका जिला भागलपूर (१९४३) । ५७ श्री " राघवदास" जी, श्री कनक भवन के द्वार पर श्री अयोध्याजी श्री युगल सर्कार के पुष्प शृङ्गार एवं प्रेम कैंकर्य में बढ़े ही कुशल, (१९५४) ५८ श्रीपति "माधवदास" जी, बड़ी जगह, श्री अयोध्या जी, विद्यादान के हेतु अतिशय कष्ट उठाते हैं, वैष्णववर श्री रामनारायणदास जी के गुरुभाई (१९५५) श्री " रामटहलदास" जी, महाप्रसाद के मधुकर, ५९ श्री रामकोट श्री अयोध्या जी (१९५४)<noinclude></noinclude> 3efhkwfmhs49w6dz8c56a4n5ianfsx0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५० 250 193723 663942 2026-07-02T15:29:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663942 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>18400- ( १९ ) ६० श्री अयोध्या जी श्रीहनुमनिवास में श्री राज- किशोर शरण जी, पुजारी (१९५९) ६१ श्री “गोपालदास” जी (साकेत वासी) पुजारी, बड़ी कुटिया प्रमोदवन श्री अयोध्यां जी, व्यापार में भी बड़े सत्याच्चरणवाले, तथा शृङ्गार में घड़े निपुण थे (१९२९)। १२ श्री " पवधनन्दन" शरण जी, पुजारी रङ्गमहल रामटोक श्री अयोध्या जी; सन्तों में छापकी भारी निष्ठा थी ( साकेतत्रासी १९६० ) ३३ श्री " रामजी शरण" श्री हनुमनिवास श्री अयोध्या, पति सरल और गुरु भक्त, नामानुष्ठान में बड़ा कष्ट करते हैं (१९६०)। ६४ श्री "राधिकादास जी, (साकेतवासी) प्रमोदवन श्रीsयोध्याजी, इनके अधिकार के समय में बाढ़ जनगोवि द स्थान जिला पटना साधुसेवा में प्रख्यात था (१९५९) । ६५ श्री " रामप्रकाश दास" जी, श्री अयोध्या जी प्रमोदयन कुटिया, के पुजारी, आप के श्रीनामानुराग एवं तीव्रतर वैराग्य की प्रशंसा किस से हो सकती है। (१९५२) ६६ श्री रामरघुबीरशरण महाराज श्री लखन कोट श्री अयोध्या जी (१९५५) ६७ श्री ३ " खाकी जी महाराज" ( साकेतवासी ) खैरा परगना बाल जिला छपरा सारन, समदमादि सद्- गुणों के पूरे थे, पर घड़े ही उपकिंचन (१९४५)<noinclude></noinclude> 2m7d5gpuzabcf1x3v8v89cfvfb2ootl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१ 250 193724 663943 2026-07-02T15:29:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663943 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २० ) आप ही के प्रेमपात्र श्री पण्डित रामहितोपाध्यायजी हैं कि जिनका, श्री वाल्मीकीय द्वारा अद्भुत उपदेश प्रति वर्ष सैकड़ों विमुखों को श्रीभक्ति महारानी जी 'सन्मुख करके कृतार्थ कर देता है ॥ के ६८ श्री ५ " प्रेमदासजी," ऋणमोचन श्री अयोध्या जी पहिले पोस्टमास्टर थे प्रति प्रशंसनीय (१९२९) ६ श्री ५ " रामदास काले बाबा” जी, श्री गंगातट बाढ़ जिला पटना, स्वयंही कोरी फेर के साधु सेवा बड़ी निष्ठा से करते थे ॥ (१९४४) कुसंग से किसने दुख न पाया ? " " ७० श्री ६ “ रामगुलामशरण" जी, बड़े कृपापात्र, दरशनीय कमी श्री हनुमनिवास कभी श्री प्रमोदबन कुटिया श्री अयोध्या जी (१९५९) ७१ श्री ५ गोवर्द्धनदास जी, उलाव जिला मुंगेर; मुंगेर के श्रीगंगातट कष्टहरणी घाट पर भी 'कुछ काल पर्यंत, ये भजन करते थे ॥ (१९४१ ) ७२ श्री ६ रामदास जी, साकेतवासी राजगृह जिला पटना लौंदके ( अधिकमासके ) मेले में तीन २ बर्ष पर इनके यहां वैष्णवों की भारी भीड़ भाड़ होती है, दर्शन योग्य (१९४६) ७३ श्री रामचरण दास जी (साकेतवासी) चम्पा- नाला, भागलपूर (१९३८) । ॐ श्री " तपसी जी” साकेतवासी श्री कमलातट,<noinclude></noinclude> 31d275gob7ufe0pok2zyxzvpp8mgud9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२ 250 193725 663944 2026-07-02T15:29:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663944 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २१ ) शहर दगा तिहूत (१९४० ) । ७५ श्रीरामदास जी साकेतवासी शहर पारा, भोज- पूर जिला शाहाबाद (१९२२) । ७६ श्रीजानकी दास जी, साकेतवासी बकसर क्षेत्र श्रीगंगातट, जिला शाहाबाद, प्रेमी, मृत्यप्रवीण, संगीत - निपुण, (१९३९) ७७ श्री रामनारायण दासजी ( जड़ावयाले ) श्री रामचरित मानस के चमत्कृत प्रेमी, रामायण निवास " बड़ी कुटिया,” प्रमोदवन श्रीअयोध्याजी प्रतिमिष्ट- भाषी (१९५३) ७८ श्रीलक्ष्मीनारायणदास जी, साकेतवासी शहर कलकत्ता (१९१९ ) . ७९ श्री हरिदासजी प्रियवर, श्रीतपस्वी जी की छावनी, रामघाट, श्रीप्रयोध्या, जैसा सुनें वैसा पक्ष २ सुना दें, श्रीहरिकथा के बड़े नेमी प्रेमी ( १९५४ ) ॥ ८० श्रीदामोदरदास जी, "नया घाट" श्री अयोध्या कथा के प्रेमी ( १९५४ ) ॥ ८१ श्री सियारामशरण जी, श्री अयोध्या, नेम से fare श्री जानकीवल्लभ को संगीत सुनाते हैं; श्री- कृपानिवास जी के ग्रन्थों में अत्यन्त ही श्रद्धा रखते हैं; (१९५५) ॥ ८२ श्री६ रघुनन्दनशरण जी संतनिवास श्रीपयोध्या श्रीरामचरितमानस के बड़े पंडित रसज्ञ प्रेमी १९५५ 600-<noinclude></noinclude> rplf5x8v1xbbnx0tefyo5nl8y202vbv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३ 250 193726 663945 2026-07-02T15:30:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663945 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>13:00- ( २२ ) 909 ८३ श्री ५ विमलाशरण जी, सन्तनिवास श्री अयोध्या (१९५६) ८४ श्री ६ तुलसीरामदास जी साकेतवासी श्री अयो- ध्या रामघाट रामकिंकरदास जी की जगह में थे । इन्ही महात्मा के गृहस्तीसमय के पुत्र मुन्शी जानकी प्रसाद पेनशनर हैं, महन्त श्री ५ जगन्नाथदास जी स्वर्गद्वार पुराने थाने के पास (१९२८) ८५ श्री ६ रोमवल्लभा शरण जी श्रीलक्ष्मण किला, श्रीप्रयोध्याजी, कृपासिंधु श्री १६ जानकीवर शरण महा राज जी के चित्रपट के पुजारी, बड़े कृपापात्र, बढ़े विवेकी, प्रेमी, कवि, संगीत निपुण (१९५१) ॥ ८६ श्रीजगन्नाथदासजी, साकेतबासी लक्ष्मीपूर, फाड़ी में, जिला सन्ताल परगना श्री १६ स्वामी रामदास जी "नृत्यकला” (साकेतवासी) के स्थान में (१९३८) ८० परमहंस श्री ५ सीतलदास जी; कभी २ बांकीपुर पटना के श्री भीष्मदास साकेतवासीजी के स्थान में, कभी श्री पयोध्याजी में पण्डितवर श्री १६ रामवल्लभाशरण जी महाराज के साथ; बड़े योग्य पुरुष हैं (१९५६) श्री कामताशरण जी, ठाकुर जी के टहलों में कुशल (१९५५) २९ वैष्याव श्रीसीतारामचन्द्र शरण (साकेत वासी अंक दर के भतीजा बेठा, और अंक १०५ के गुरु<noinclude></noinclude> ab86qu2ddqrfdxt78e3xh0owf1bycm0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४ 250 193727 663946 2026-07-02T15:30:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663946 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २३ ) भाई) आप सब लौकिक नाते तोड़ के, अपना मन धन प्राण तन श्री प्रमोदवनविहारी जी को अर्पण करके, श्रीसाकेत को पधारे; श्री अयोध्या जी ॥ (१९५०) ९० श्री १६ सियारामशरण रूपलताजी (साकेतवासी), पानन्द भवन रामकोट श्री अयोध्या जी; वड़े ही प्रसिद्ध प्रेमी, शृङ्गाररस के पद्भुत भावना शाली, और श्री कृपानिवास जी के ग्रंथों के मम दरशनीय थे (*१९३०) १ जयपूर निवासी महानुभाव श्री १६ सीताराम- शरण जी महाराज साकेतवासी श्री किशोरी जी के करुणापात्र, जो श्री आनन्द भवन में झाके ठहरा करते थे; विशेष प्रावेशी; विरह दुःख तथा अनुकम्पा सुख में कभी २ चार २ दिन पर्यंत सुधि हीन रहते थे कभी २ दस दिन पर संज्ञा लौटती थी; दर्शनीय थे (१९५४) यह आप ही के सत्सङ्ग का प्रभाव है कि कविवर वेदान्ती पण्डित श्रीरामगयाप्रसाद जी (टांडा निवासी) अपनी हठ और कुतर्क छोड़कर परमहंस श्री १६ सीता- शरण महाराज जी (अंक ४ पृष्ठ ४) के शरणागत होके विलक्षण सीताराम नामानुरागी होही गए ॥ ९२ श्री पिताम्बर दास जी बिचरने हारे, छातावाले महात्मा, बड़ी छावनी श्री अयोध्या जी, मानो तप और भजन के स्वरूप, घड़े प्रशांत तथा देशकाली साधु श्री मूर्ति से स्वभावतः बातें किया ही<noinclude></noinclude> 3ds3i9wvekwtptuqcm396wfujaweomu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५ 250 193728 663947 2026-07-02T15:30:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663947 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>13600- ( २४ ) करते हैं कि जिन सरल सप्रेम वचनों का पूर्व अधिकार चित्तों पर होता है (*१९५०) ९३ श्री ६ “जानकीदास जी भक्तमाली," ग्राम गोर- गावां सबडिबीन बेगूसराय जिला मुंगेर, सरल, प्रेमी, बिशुद्ध (१९४५) ॥ ४ श्री "जानकीदास जी बदनपूरी" श्री अयोध्या । विधरनेहारे, उपदेश में कुशल ( *१९५६) ९५. श्री " रामदास" जी श्री रामशिला गया जी (मगध), साधु सेवा में प्रसिद्ध । (१९५८) आपके प्रेमियों में श्री सीतामढ़ी बुलाकीपूर निवासी, या जी के वकील बाबू श्री बै० कृ० प्रा० बलदेव नारायण सिंह जीहैं, कि जिनकी विषयाशक्त मति श्री सरयू जी महारानी के दरशन मात्र से पवित्र होकर श्री जानकी वल्लभ वधकिशोर के चरण कमलों में लीन हो गई ॥ ६. स्वामी श्री लक्ष्मणदास जी रामायणी के कृपा- पात्र "श्रीगंगादास जी महाराज, श्री गया जी (मगध), अतिशय वैराग्य और नेम प्रेम युक्त, केवल केले के छाल की लिंगोटी मात्र रखते हैं और सदैव प्रभु के भजन में सम्न रहते हैं । ( १९५७ *) ● जिस सम्बत में जिन जिन वैष्णव विरक्त महोदय की विशेष कृपा इस दीन पर हुई, उन महानुभाव के नाम के साथ उसी सम्बत का अंक उपस्थित है; प्रत्येक नाम के साथ जो सम्बत है उस का तात्पर्य केवल इतना ही जानिये ॥<noinclude></noinclude> boyvs1hk309ufpr4amwnig98n0lm0jw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६ 250 193729 663948 2026-07-02T15:30:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663948 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>8000- ( २५ ) •9098 महंत श्री रामचरणदास जी, श्री ५ मणिराम जी की छावनी, श्री अयोध्या जी; बड़ी प्रसिद्धछावनी है ८ स्वामी श्रीमहंत नरसिंहदास जी [ साकेतवासी ] शहर मोतिहारी जिला चम्पारण के कृपापात्र पौर वहां के महंत भी, श्री अयोध्या जी स्वर्गद्वार पुराने थाने के पास महान्त श्री जगन्नाथदास जी " परसा- की जगह " के । इन्ही के समीप, मुन्शी गौरीशंकर, (अपनी ज़मीं- दारी और वकालत छोड़के,) छपरे से पा, श्रीप्रवध में बसे हैं ॥ श्री ५ रामभूषणदास जी, विरक्त, मधुकर, श्रीजानकीघाट श्रीअयोध्या जी, घड़े बिरही ॥ आपके प्रेमियोंमें, पण्डित श्रीसीतारामप्रपन्न गया- दत्तचौबेजी ( चौबेबेल ज़िला बलिया निवासी ) जो श्री १६ गोस्वामीकृत " मानस रामचरित " द्वारा, जीवों के हृदय तिमिर को नष्ट करके, भक्ति प्रबोध- चन्द्रोदय की निरन्तर चेष्टा करते रहते हैं, चित्त की सरलता तथा प्रियाप्रियतम के चरणाम्बुज में अनुराग, उनके दरशन मात्र ही से विदित होता है ॥ १०० महात्मा श्री ६ " फकीराजी ", श्रीप्रयोध्या जी रामकोट कैकेयी भवन । (सम्बत १९५४) साकेतवासी ॥ इस स्थान के पुजारी श्रीसियारामशरण जी बड़ेही 1830:00-<noinclude></noinclude> c49a5qghd57gudrdz2c3u7r69g0ql8f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७ 250 193730 663949 2026-07-02T15:30:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663949 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>600- ( २३ ) प्रेम शृङ्गारी हैं। यहां झूलन, वसन्त्र इत्यादिक सब समैया बड़े प्रेम से होते हैं ॥ १०१ तिहुत सुरसर के समीप के " नवाही” स्थान के परमहंस श्री ६ रामचरणदास जी महाराज, बड़े उदार हैं और विख्यात हैं ( सम्बत् * १९५५ ) १०२ महंत श्री " राममनोहर प्रसाद" जी, श्रीराम- प्रसाद जी की बड़ी जगह, श्रीरामकोट श्रीपयोध्याजी । आपके उत्साह से "श्रीअयोध्यामाहात्म्य" अनुसार १५० ( डेढ़ सौ ] तीर्थों पर, नामांकित पत्थर लगाए गए हैं, जिसमें पण्डित श्रीरामनारायण दास जी ने बड़ा परिश्रम किया है ("तीर्थविवेचनीसभा” की सहायता से ) | १०३ महांत श्री सरयू दास जी, प्रमोदवन श्री अयोध्या जी, कथा के प्रेमी ॥ इन्हीं के पड़ोस में, “ श्रीजानकीदास जी चतुर्भुजी " गुरुनिg, सन्त भगवन्त के कैंकर्य्यमें उपस्थित, कथा प्रेमी १०४ महंत श्री दयालदास जो रामायणी जी की कुटिया, प्रमोदवन, श्री अयोध्या जी, जिन के चेले श्री हरिनाम दास जो ॥ १०५ महान्त श्री रघुवरदास जी, साकेतवासी, परसा ज़िला छपरा सारन, अंक दर के गुरुभाई (१९४०*) १०६ श्री महंत रामप्रपन्न जी, रीवां मन्दिर के तथा श्री अयोध्या रत्नसिंहासन के, दोनों जगहों के 1886-00-<noinclude></noinclude> 7x8nspmhq9a2ue0g1osi0pu0cg4p2mj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८ 250 193731 663950 2026-07-02T15:30:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663950 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>600- 8000- ( २७ ) महन्त हैं (१९५२*) बड़ेशान्त ॥ १०० महान्त, श्री जानकी वर शरण जी श्री जानकी घाट श्री अयोध्या "श्री ६ महाराज रामचरणदास जी मानस टीकाकार करुणानिधानं" के स्थान में ॥ श्री जानकीघाट में "जय" बुलाने वाले बड़े प्रेमी महात्मा रहते हैं; तथा " प्रेमीजी " के नामसे ख्यात श्रीरामप्रिया शरण जी, जो कथा के प्रसिद्ध प्रेमी हैं । १०८ महंत श्री लालदास जी तपस्वी जी की छावनी, श्री रामघाट श्री अयोध्या जी ॥ ( दोहा ) काहू के बल जाग जग, गुन करनी की पास । भक्त नाम माला अगर, उर नारायण दास ॥ १ ॥ अनुग यश गाव जे, सीतापति तेहि होहिं बश । हरिसुयशप्रीति हरिदास कहँ, हरिहि भाषहरिदासयश ॥२॥ भक्त दाम जिन जिन कधी, तिन की जूठनि पाय । अनुसार अक्षर दुई, कीन्हों सिलौ बनाय ॥३॥ सन्त जिते श्री अवध में, कथ्यौ कौन पै जाय । जलधि पान श्रद्धा करै, कहँ चिरि पेट समाय ॥ ४ ॥ श्री मूरति सब वैष्णवा, लघु दीरघ गुनगाध | आगे पीछे बरनते, जनि मानिय अपराध ॥ ५ ॥ • "सिल" वृति; विनयांचुनियां ॥<noinclude></noinclude> g5woeuo3280zslnvtvj4cezxzpbg2qq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९ 250 193732 663951 2026-07-02T15:31:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663951 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २८ ) "भक्तन के शुभ चरित अमित महिमा सुखकारी । किमि बरनों मैं लोह चुम्बवत लेहु सुधारी” ॥ ६ ॥ इति " श्रीवैष्णवनामावली " ॥ शुभम् ॥ 18600- पृष्ठ ६ अंक के महात्मा की कुछवार्त्ता । छप्पै । श्री कामदेन्द्रमणि सुहृद रस-प्रावेशी एक प्रबल ॥ राघवेन्द्र बरसखा भुवन बिख्यात सुहाए । दिव्यरूप पनुभाव यहीतनु प्रगट दिखाए || श्रीयुत दम्पति नाम पदब से उचरत प्रानन । वाल व्याह तजि चरित बनादिक सुनत न कानन ॥ शिष्य किए सियराम रस सम्बधी बहु मति विमल । श्री कामदेन्द्रमणि सुहृद रस पावेशी एकै प्रबल ॥ १ ॥<noinclude></noinclude> g8qlk5o7lsgws1toj8m0hyh5gp5kjf3 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६० 250 193733 663952 2026-07-02T15:31:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663952 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>8600- ( २९ ) कवित्त। सम्बत उन्नीसशत साठि में कुमार मास सुकल परीवा वार मङ्गल विचारे हैं। अवध सुधाम में प्रभात समे सावधान, मणि रसरङ्ग, नाम युगल उचारे हैं || रामविरहानल में तीनों तन जारि पाय दिव्यरूप सीताराम ध्यान उरधारे हैं। स्वामी श्री राघवेन्द्र सखा कामदेन्द्रमणि सबै लोक त्यागि राम- धाम को पधारे हैं ॥ १ ॥ इन महानुभाव के गुण कुछ साधुनाम माला के नवमे मणि में वर्णित हैं । इस १९६० सम्बत्सर में परधाम श्री साकेत को पधारे हैं। आप श्री राघ- वेन्द्र लाल जी के अधिक अवस्था वाले सुहृद सखा थे, श्री प्रभु के और तत्सम्बंधी माननीयों के श्री नामों को पति पादर महामान से ग्रहण करते थे भाषा संस्कृत छन्दी में भी विना श्री के संयुक्त श्री- नाम नहीं उच्चारण करते थे, वरंच श्री सीताराम सबंधी निज शिष्यों के नाम भी श्री युक्त ही ग्रहण करते थे और प्रति ही उदार थे, श्री युगल वा- त्सल्य रस के उपासकों को माता पिता के समान ही मानते थे और मधुर सखापों को अपने कर कंज से पवाउते थे इत्यादिक माप के सख्य रसावेश युक्त गुण किस्से वर्णन हो सक्ते हैं यह दिग्दर्शनमात्र मैंने सूचन कर दिया है । 18600-<noinclude></noinclude> d5qne3v1kjrreacpislwnwjoxqxdx8j पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१ 250 193734 663953 2026-07-02T15:31:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663953 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३० ) --90988 पृष्ट ३ अंक ३ के महात्मा पण्डित श्री जानकी वर शरण साकेतवासी के जीवनचरित मेरे प्रेमी श्रीप्रभुद- या शरण जी (हैदरगढ़ ) ने उर्दू में, और श्री राम वल्लभ सहाय जी, सारनपैगा निवासी, नेमि कि जो श्री राम कृपा से अब श्री प्रयोध्या जी में श्री हनुन्निवास के पश्चिम निज राम मन्दिर में वसते हैं, लिखे हैं ॥ कविवर मुनशी श्री राम पम्बे सहाय जी कृत- ( १ ) श्री जानकी सहस्र नाम ( २ ) श्री राम सहल नाम ( ३ ) श्री हनुमत सहस्र नाम ( ४ ) श्री हनुमत जन्म विलास ( ५ ) श्री राम नवमी जयन्ती (६) श्री जानकी जन्म विलास ( ७ ) श्री शिवरात्रि माहाम्य (६) मुक्तधाम प्रकास, बड़े अक्षरों में (९) श्री अयोध्या माहात्म्य युत महातत्व प्रकाश; यह ( न० ९ ) उर्दू में है ॥ पृष्ट ७ अंक १० के महात्मा श्री रामरसरंगमणि सीताराम शरण जी कृत पोथियों में से कई एक के नाम- (१) श्री रामानन्दयशावली (२) श्री हनुमत यश तरंगिनी ( ३ ) श्री जानकी जन्म ( ४ ) श्री सरयू रसरंग लहरी तथा बारह मास माहात्म्य ( ५ ) श्री 3000- 9098<noinclude></noinclude> 5bd6kci47dtfu7utnsf3voj8r1srkh4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२ 250 193735 663954 2026-07-02T15:31:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663954 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>18600- 188800- ( ३१ ) सीताराम नाम मंजरी (६) श्री ध्यान मंजरी का तिलक ( ७ ) श्री रामस्तवराज का तिलक ( ८ ) श्री रामलीला सम्बाद ( ९ ) श्री पंचरतन (१०) श्री सीताराम पदावली ( ११ ) श्री होली विलास (१३) श्री सीताराम शोभावली (१४) श्री सीताराम नखसिखी श्रीकृष्यादेवनारायणसिंह जी रुत - १ अनुरागमंजरी; १ अनुरागमुकुल ३ वेद सार ४ सनेहसुमन &c. D मुनशी श्री तपस्वीराम जी सीतारामीय कृत ग्रन्थों में से कई एक के नाम- ( १ ) प्रेम गंग तरंग (२) श्री सीताराम चरण चिन्ह (३) उपदुभुत रामायण ( ४ ) श्री भक्तमाल ( फारसी ) by air 1). (५) वकाए दिल्ली (इतिहास) (६) श्री मदभागवत की सूची ( ७ ) श्री अयोध्या माहात्म्य (८) कथामाला । इत्यादि श्रीवैष्णव नामावली श्री सीतारामार्पण ॥ “हरिसुयशप्रीति हरिदासको, हरिहिभाव हरिदासयश” ॥ "हरिको निजयशसे अधिक भक्तन जसपर प्यार" ॥ 30:00- 183600-<noinclude></noinclude> amzb50g5ok0244qzla1csdea1v9mhwq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३ 250 193736 663955 2026-07-02T15:31:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663955 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३२ ) ॥ श्री ॥ श्रीमारुतिबीरकला की जय । यह " श्रीवैष्णवनामावली, " "श्री भक्तमाल" जी के पादि में मङ्गलाचरण रूप निवेदित है ॥ ( दोहा ) " मंगल आदि विचारि रह, वस्तु न और अनूप । हरिजन के यश गावतें, हरिजन मंगलरूप ॥१॥ भक्तन की नामावली, जे सुनि हैं चितलाय । ताकेँ भक्ति बढ़े घनी, श्रीहरि होइँ सहाय”॥२॥<noinclude></noinclude> dtd7qdpcgzt3ohgu2l1ohjwzne4ksvl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४ 250 193737 663956 2026-07-02T15:31:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663956 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीः ॥ श्रीहनुमते नमः । ** श्री भक्तमाल + सटीक, अर्थात् स्वामी श्री १०८ नाभा जी कृत मूल छप्पै; तथा . श्री प्रियादासजी प्रणीत टीका कवित्त, अनेक प्रतियों से बड़े परिश्रम से संशोधित और " भक्ति सुधाविन्दु खाद" भाषा वार्तिक तिलक श्रीसीतारामशरण भगवान् प्रसाद विरचित ज़िला गया जो के बकील, श्रीसीतामढ़ी बुलाकीपूर निवासी बाबू श्रीबलदेव नारायण सिंह जी ce मे पवाकर प्रकाशित किया ॥ 'सत्ययुग, नेता, और द्वापर " पय्येन्त । श्रीकाशीजी ] श्रीविश्वनाथपुरी [ मनारस पं. जगदम्वा शङ्कर मिश्र के प्रबंध से " चन्द्रमा " यन्त्रालय में मुदित। सन १९०४ सम्बत १९६१ म्यौछावर एक मुद्रा १) All rights reserved. Registred under act XXV of 1867.<noinclude></noinclude> 1ph1o30oepql6epsa8u71nd18rjn642 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५ 250 193738 663957 2026-07-02T15:32:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663957 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६ 250 193739 663958 2026-07-02T15:32:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663958 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>॥ श्रीमंगलमूर्त्तये नमः ॥ JONNES ॥ श्रीसीताराम ॥ श्रीमारुतिबीरकला की जय । (सो०) प्रणव पवन कुमार, खलबन पावक ज्ञान घर । जासु हृदय प्रागार, वसहिँ राम शरचाप घर ॥ (दो०) तुमहि मातु पितु परमहित, तुम मम गुरु भगवान । “सौभाग्या" सियकिंकरी, विम- यति श्री हनुमान ॥ १ ॥ सिपि करुणा, नाम, गुण, "श्रीभक्तन" कौ टेक | बिरचि यथामति कपिकृपा, भक्तिरहस्य अपनेक ॥ २ ॥ कपिकर कंजनि माहिं सोइ, परपों मन बच काय । राम दूत करुणायतन ! सो लीजे अपनाय || ३ ॥ पुनि पुनि बिन देहु जोरिकर, मोहि कृपा करि । श्री सिय सियपिय पद कमल, अविरल बिमल सनेहु ॥ ४ ॥ पुनि, गुरुकपि ! निज चरणरति, सियपद मम मन गेहु । सिय सेवा, दम्पतिचरण, भक्ति, सुसंगति देहु ॥ श्री अयोध्याजी प्रमोदवन } "सौभाग्य कला" (रूपकला) दोन बोसोताराम मदच भगवान्प्रसाद । सम्बत् १८६१ ।<noinclude></noinclude> qjbt8pvbolsoti2i4im9tlqk1nkjmgn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६७ 250 193740 663959 2026-07-02T15:32:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663959 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६८ 250 193741 663960 2026-07-02T15:32:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663960 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>83600- श्रीपयोध्या सरयूभ्यां नमः । श्रीसीताराम ओम् नमो भगवते हनुमते श्रीरामदूताय । ॥ श्रीमते रामानन्दाय नमः ॥ अथ श्री भक्तमाल सठीक •909838600- भक्त, भक्ति, भगवन्त, गुरु, चतुर नाम बपु एक । इनके पद बंदन किये, नाशहिं विघ्न पनेक ॥ अथ टीकाकर्त्ता श्री प्रियादास जी का मंगलाचरण, तथा आज्ञानिरूपण । ( कवित्त ) महाप्रभु “कृष्ण चैतन्य,” मनहरन जू के चरण की ध्यान मेरे नाम मुख गाइये । ताही समय " नाभा जू” मे आज्ञा दई, लई धारि, टीका विस्तारि भक्तमाल की<noinclude></noinclude> g97shjyvcog0gf4osmb9lyafxqgxyve पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६९ 250 193742 663961 2026-07-02T15:32:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663961 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>186000- श्रीभक्तमाल सटीक । सुनाइये | कीजिये कवित्त बंदछंद अति प्यारो लगे, जगे महि, कहि, वाणी बिरमाइये । जानों निजमति, ऐ सुन्यों भागवत शुक द्रुमनि प्रवेश कियो, ऐसेई कहाइये ॥ १ ॥ "भक्ति सुधा स्वाद" वार्त्तिक तिलक | ॐ नमो भगवते हनुमते श्रीरामदूताय । श्रीचारु शोलादेव्यै नमः। श्रीचन्द्रकलादेव्यै नमः । श्रीमत्यै रामा- नन्दायै नमः ॥ श्री नृत्यकलायै नमः | श्री हंसकलाये नमः ॥ (श्लोक) यं प्रव्रजंतमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव । पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिने दुस्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोस्मि ॥ १ ॥ (दो) भक्तमाल प्राचार्य्य वर श्री नाभा पद कंज । प्रियादास पद कमलपुनि बंदों मङ्गल पुंज ॥ सन्त सरलचित जगत हित, जानि सुभाव सनेहु । बाल बिनय सुनि करि कृपा, रामचरण रति देहु ॥ स्वामी "श्री नाभाजी" करुणासिंधु कृत 'श्रीभक्तमाल” जी की प्रसिद्ध टीका श्रीभक्तिरसबोधिनीके कर्त्ता, श्रीप्रियादासजी कृपानिधि, यों कहतेहैं कि "महाप्रभ श्रीकृष्ण चैतन्य मनहरण ” पद कंज का, तथा तद्रूप मन- हर [निज स्वामी ] "श्री मनोहर दास” जी का, ध्यान एक समय अपने मन में मैं कर रहा था, और साथ<noinclude></noinclude> pflh2096kxx630z7nq4y27au4v41kgj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७० 250 193743 663962 2026-07-02T15:33:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663962 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>5 300- श्रीभक्तमाल सटांक | ही साथ श्री नाम कीर्त्तन भी। उसी समय गोस्वामी श्री नाभाजी ने मुझे आज्ञा दी कि भक्तमाल की विस्तृत टीका करो, और ऐसी कि कवित्त छंद से बंध बहुत ही मधुर तथा प्रिय लगे, और जगत में प्रसिद्ध होवे ॥ ऐसी प्रज्ञा दे जब आप की बाणी शान्त हो गई, तब अपनी मति प्रति मंद जानकर पहिले अपने को सकोच तो निःसन्देह बड़ा भारी हुआ ही, परन्तु यह विचार करके प्राज्ञा को सीस पर घर लिया कि “ श्रीमद्भागवत" में सुन चुका हूं कि " परमहंस श्री शुकदेव जी " वृक्षों में प्रवेश करके *स्वयं बोल उठे थे और “शुकोऽहं, शुकोऽहं” कहने लगे थे; ऐसेही मुझ जड़मति में भी स्वयं श्रीनाभा जी ही प्रवेश करके अपनी कृपासे ही मुझ से भी ति- लक बनवालेंगे । इसमें पार्थ्य वा संदेहही क्या है ॥ [दो०] सरल वरण, भाषा सरल, सरल अर्थ मय मान । तुलसी सरले सन्त जन जाइ करिय पहिचान ॥ * श्री मद्भागवत के आरम्भ में ही कहा है कि जब श्री शुकदेव भगवान् जम्मते ही परम विरक्तिमान् सब त्याग कर, घर से निकल अन को चल दिये, और उनके पिता श्री ध्यास भगवान् पुत्र के (उनके) विरह में कातर होकर उनके पीछे पोछे " हे पुत्र ! हे पुत्र ! " ऐसा पुकारते हुवे साथ हो लिये तब योगीश्वर सर्व हृदय प्रवेशक श्रीशुकदेव जी ने तो पीछे की ओर मुंह तक भी न फेरा, और न साक्षात उत्तरही LABI --००००<noinclude></noinclude> isi5ii78hfkpry07b77t3jvvz51063x पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७१ 250 193744 663963 2026-07-02T15:33:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663963 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>co श्रीभक्तमाल सटीक । (महर्षि पिताजी को ) दिया, किन्तु उस प्रदेश के समस्त वृक्षगण आप आप को बोलने लगे कि "हां, मैं शुक हूं' में एक हूं, क्या आधा होती है ?" ॥ टीका का नाम स्वरूप वर्णन कवित्त | रची कविताई सुखदाई लागे निपट सुहाई पो सचाई पुनरुक्ति ले मिटाई है । अक्षर मधुरताई मनु- प्रास जमकाई, पति छवि छाई मोद झरीसी लगाई है ॥ काव्य की बढ़ाई निज मुख न भलाई होति नाभा जू कहाई, याते ( ताते) प्रौढिकै सुनाई है । हृदै सर- साई जी सुनियै सदाई, यह “भक्ति रस बोधिनी” सुनाम टीका गाई है ।॥ २ ॥ वार्त्तिक कविताई ऐसी रची है, कि अति सुहाई (सुहाने - वाली) और सुखदाई लगती है; पुनरुक्ति के दोष को भी मिटा डाला है; सचाई, और कोमल अक्षरों की मधुरता, (रसों के स्वरूपादि और टीका के बिचित्र चमत्कार) तथा अनुप्रासों और यमकों की छषि ने. मोद (आनन्द) की दृष्टि सी बरसाई है । अस्तु । काव्य की प्रशंसा (“आप मुंह मिट्ट”) अपने ही मुख से कहनी, कुछ अच्छी बात तो नहीं ही है, पर- न्तु श्री नाभाजी ने कहलाई है, (जैसी कि ऊपर 1000-<noinclude></noinclude> 6atgfac2ek7jrbb6yyx32wg4f3boqbp पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७३ 250 193745 663964 2026-07-02T15:33:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663964 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>" श्रीभक्तमाल सटीक i १. उबटन-कथा का सुना । भगवत लीला तथा भक्तों के यश का श्रवण । (चौ०) रामचरित जे सुनत पाहीं । रस विशेष जाना तिन नाहीं ॥ जिनके श्रवण समुद्र समाना । कथा तुम्हारि सुभग सरिनाना ॥ भरहिं निरंतर होहिं न पूरे । तिनके हृदय सदन शुभ रुरे ॥ २ मैल अभि- मान । सब प्रकार के पर्थात् भीतर के बाहर के प- कार (चौ०) उर अंकुरेउ गर्व तरु भारी । बेगि सो मैं डारि उपारी ॥ अहंकार प्रति दुखद डमरुरूपा इत्यादि । (दो०) विद्या रूप सुजाति धन इत्यादिक अभिमान । जब लगि उर तब लगि कभू मिलें न श्री भगवान ॥ ३ फुलेल= श्रद्धा । शास्त्र और प्राचार्य के बचनों इत्यादिक में प्रीति प्रतीति सहित स्पृहा । (लोक) भवानीशङ्करौ बन्दे 'श्रद्धा' विश्वासरूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् । सात्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा, कर्म श्रद्धा तु राजसी । तामस्यधर्मे या श्रद्धा, मत्सेवायान्तु निर्गुणा (भागवते) (चौ०) रघुपति भक्ति सजीवन मूरी। पनूपान 'श्रद्धा' शुचि पूरी ॥ ४ सुनीर - मनन । मन में उस्को चितवन करना कि जो कुछ श्रवण किया है वा जो कुछ पढ़ा है, 3000- --000881 -909<noinclude></noinclude> 1x5l3dut1i4nvmdi0d2rgcoh25zgiza पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७४ 250 193746 663965 2026-07-02T15:33:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663965 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>18.06- 118400- भक्ति सुधास्वाद तिलक | श्रीहरिकृपा से ऐसे सविवेक चिन्तन मनन रूपी निर्मल सुगन्धित पवित्र अनुकूल सुन्दर जल से स्नान, [ मान- हारी दोन सुखद अभिमानभंजन गर्वप्रहारी प्रणतहित-:: कारी भगवतचरित्रों के श्रवण रूपी उपटन के अनन्तर ] योग्य ही है; तथा दया रूपी पप्रचालन पर नवनि ( नम्रता ) रूपी वसन ( वस्त्र ) की आवश्यकता भी, भक्ति और २नेक सुसाधनोंसे पूर्व ही समझना चाहिये । क्योंकि यह तो प्रसिद्ध ही है कि उपटन, स्नान, तथा वसन, सब शृङ्गारों और भूषणों से पहिले ही त्यावश्यकीय हैं । (सो० ) विद्या, बोध, विवेक, सुमति, ज्ञान, सद्गुणयमित । श्रीहरिरहस अनेक प्राप्ति" श्रवण " ते; रामहित ! ॥ ( चौ० ) " मनन” बिना है विद्या भार । " मननशील " सद्गुण झागार बिधुबदनी सबभांति सँवारी । सोहन “वसन" विना वरनारी ॥ ५ अँगुछाइब (अङ्गछालन ) - "दया" । करुणा से द्रवमा, क्षमा करनी, छोहसे पघिलना, कृपासे पसी- जना, अहिंसा, पनुकम्पा; भलेबुरे जीव मात्र के क्लेश को देखसुन के दुखी होना । (दो० ) "दया" धर्मकी मूल है, यह प्रसिद्ध जगमाहिँ । शास्त्रनिपुण कैसोउ को, भक्ति "दया" बिनु नाहिं (चौ०) परहित बस जिनके मन माहीं । तिनकहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥ 06-- 188600--<noinclude></noinclude> g8umn0xpejktz30rn27kctq47ukz6q3 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७५ 250 193747 663966 2026-07-02T15:33:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663966 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्तमाल सटीक । ६ वसन (विशुद्ध सुन्दर पनुकूल वस्त्र ) - " नवनि” मान अहङ्कार अभिमान मदादि का प्रभाव; नम्रता, प्रणता, दीनता, कार्पण्य, झुकना; पूर्व ही बन्दना दण्डवत करना, दूसरे के प्रणाम नमस्कार की कदापि प्रतीक्षा न करनी; अपनी निचाई समझना, अपने दोषों को कदापि न भूलना; श्री गौरी गणपति विधाता गुरु त्रिपुरारि तमारि तो ईश ही हैं, ऋषि मुनि सुर महिर गो पितर माता पिता तो पूज्य हैं ही, किन्तु नरनारी गन्धर्व दनुज प्रेत और भूत मात्र को प्रणाम करके उनसे अविरल अमल " श्री हरिभक्ति" की भीख मांगनी, भगवतके अनन्यभक्तोंकी शोभा है ॥ (चौ०) तब रामहि विलोकि बैदेही । समय हृदय विनवति जेहि ॥ प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना । बोला बचन विगत अभिमाना ॥ धाखामृग के बढ़िमनुसाई । शाखा शाखा पर जाई । " मांगी भीख त्यागि निज घरमू ।” (०) की तुम " राम दीन अनुरागी " । हु मोहि करन बड़भागी ॥ बरषहिं जलद भूमि निराए । यथा नवहिं बुध विद्यापाए || (दो०) फलभर 'नम्र' विटप सब रहे भूमि नियरा । पर उपकारी पुरुष जिमि, 'नवहिं' सुसम्पतिपाइ ॥ सत्य वचन, अरु 'दीनता' पर त्रियमात समान । एहु पर हरि जो ना मिले तुलसीदास जमान (क० ) हौं तो सदा खर 1000-- 10 10<noinclude></noinclude> 7w3hbqqly4t8ot9meb52cxgfe7rmwbc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७६ 250 193748 663967 2026-07-02T15:34:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663967 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>11 900- भक्ति सुधास्वाद 'तिलक 1 ११ --90% कौ सवार तिहारोह नाम गयन्द चढ़ायेो ॥ (पद) यह दरबार दीन को पादर रीति सदा चलि पाई । (चौ०) सकल शोक दायक "अभिमाना" | संसृत मूल शूलप्रद नाना ॥ दम्भ कपट " मदमान " नहरुया । "पहंकार " पति दुषद डमरुमा । ( दो० ) दीनरहा नहिं दीनभा, नाहिं दीन पद भास । दीन बन्धु केहि बिधि मिलें बिन दीनता निवास ॥ ७ सोंधा (अरगजा, चन्दन, सुगन्ध ) - " पम" । श्री गिरिराज किशोरीकृपासे नियम, नेम, व्रत, दृढ़ता, अनन्यता । (चौ० ) रामभक्ति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीश प्रवीना ॥ तजन नारद कर उपदेश | पापु हैं शतबार महेशू । ( दो० ) चातकि कौ, अरु मीनको, भक्तनकी 'पन' एक । सुयश 'मेम' विख्यात जग, धनि धनि धन्य सो टेक ॥ 1 तथा एकादशी व्रत, ऊर्द्ध पुण्ड, पोर वैष्णवों के चरणरज को सीसपर रखने का नेम पोर पन ॥ ८ आभरण (पनेक* भूषण ) " हरिनाम " । श्रीशारदाकृपा और श्रीनारददया से " श्रीसीताराम” नाम का कीर्त्तन, पखण्ड तैलधारावत रटना अपना उसमें रमना; रागस्वर से उस्का मधुर कीर्तन सप्रेम; " चारु हरिनाम लेत अश्रुअन झरी हे " (चौ० ) पुलक गात, हिय सियरघुबीरू । जीह नाम जप, लोचन 1000-<noinclude></noinclude> 5wb8rgquqhtse1p1l9tapbg18jct5kx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७७ 250 193749 663968 2026-07-02T15:34:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663968 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२ श्रीमत्क्तमाल सटीक । 12 --00098 नीरू ॥ तथा, श्रीहरिसहस्रनाम, युगलनाममंजरी, और भगवन्नामकीर्त्तन का पाठ करना नेमप्रेमपूर्वक *केश सुधारने और बेणी सँवारने तथा सेन्दुर से भूषित करने के उपरान्त, बेन्दी; परगजा चन्दन सुगन्ध; और तिलक; तिल, कस्तूरिबिन्दु, दन्त शृङ्गार, सुरमा, [ काजल, अंजन ] मुखराग [बीरी ]; इत्यादि; पुनि तिनके अनन्तर नाना मणि जटित स्वर्णाभरण पुष्पों के भूषण ॥ भूषण विविध प्रकारके हैं और झपनेक हैं जैसे, चन्द्रिका, सोसफूल, मँगटीका, बैंदनी, चूड़ामणि, [ नथिया ] बेसर, [ कर्णफूल ] बुलाक, कंठिका, चम्पाकली, भूमक, मुक्ताहार, पँचलरी, कंकना चूड़ी, मुद्रिका, पहुंच, इत्यादि ॥ श्रीसीतारामनाम प्रतापप्रकाश, कवित्तरामायण, बिनय पत्रिका, तथा श्रीमानसरामचरित और "नाम तत्व भास्कर " में "श्रीनाम प्रभाव' देखना चाहिये । यहां केवल एक श्लोक लिखे देता हूं । (लोक) कल्याणानां निधानं कलिमलमधनं पावनं पावनानां पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परपदप्राप्तये प्रस्थितस्य । विश्रामस्थानमेकं कविवर वचसां जीवनं सज्जनानां बीजं धर्म्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम ॥ [ चौ०] कहीं कहां लगि नाम बड़ाई । राम न कहिं नाम गुण गाई ॥ [ दोहा० ] राम नाम नर 5800- 00:08<noinclude></noinclude> sqtwswel9ki98kx1woe0fx5pn2e4anb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७८ 250 193750 663969 2026-07-02T15:34:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663969 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>13 भक्ति सुधास्वाद तिलक । १३ --90983 केसरी, कमक कशिपु कलिकाल । जापक जन प्रहलाद जिमि पालहिं दलि सुरसाल ॥ बरषाऋतु रघुपति भगति, तुलसी सालि सुदास । राम नाम वर वरण युग श्रावण भादों मास ॥ राम नाम जो चित धरै सुमिरे निशिदिन सोइ । योग यज्ञ तप, व्रत, सकल, तेहि पटतर नहिँ कोइ ॥ कवित्त ज्ञान पौ विराग तप, जोग, जाग, त्याग करे सिद्ध भए तर माया बीचही में लूटती । तीरथ व्रतादि दान साधना पनेक धरै पचि मरे चावल लहै न भूसी कूटती | भक्ति महासनी भव भानी युक्ति जानि परे ताहू में तो लालच लबारी घ्यादि जूटती । शम्भु सिर सुरसरि घरी भनी रंगमनी राम नाम जाप बिनु साप त्रय न छूटती ॥ १ ॥ कर्णफूल - मन, तन, मन, धन, बचन से "हरि- सेवा, तथा साधु सेवा”। बाएं कान का भूषण भग- तू कैंकर्य को जानिये और दाहिने कान का अलङ्कार भागवत सेवा को समझिये क्योंकि एक कुछ गुप्त होता है और दूसरा कुछ प्रत्यक्ष सा । [चौ०] उमा ! रामस्वभाव जिन जाना । तिनहि भजन तजि भाव न आना ॥ सेवहिं लषण सीयरथुबीरहि । जिमि विवेकी पुरुष शरीरहि ॥ [ चौ० ] सुमिरन, सेवा, 1286-00-<noinclude></noinclude> dobcuxu1djeb3ojgpaj8rnux1gejvpr पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७९ 250 193751 663970 2026-07-02T15:34:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663970 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४ 88000- श्रीमतमाल सटीक । प्रीति, प्रतीती । गुरु शरणागति भक्ति कि रीती ॥ सीतापतिसेवक सेवकाई । कामधेनु शत सरिस सुहाई ॥ १० सुनध ( नाक की नथिया ) - " मानसी " अष्ट यामरीति, मानस पूजा; भावना; निरन्तर सुरति से स्मरण; सुरति से सप्रेम परिचर्य्या; भक्तियोग; ध्यानः गुप्तस्मरण; मनही बन्धन तथा मोक्ष का कारण ॥ है (चौ०) रहति न प्रभु चित चूक किये की । करत सुरति सौ बार हिये की ॥ "मन परिहरे चरण जनि ,"मन तहँ जहँ रघुपति बैदेही " ॥ यह वार्ता किस्को विदित नहीं है कि सब अंगों के सिँगारों तथा भूषणों प्राभरणों में नाक कान और आंखों के ही शृङ्गार मुख्य हैं; पुनः तिम में भी नाक की नथिया तो सर्वोसम हे वरञ्च सुहाग ही कही और जानी जाती है ॥ भोरे" । पुनः, ११ अंजन [काजल सुरमा ] - " सुसंग" । सतसंग, सन्तसंग, साधु संगति, सम्प्रदायी सजाती भक्तों का संग; सद्ग्रन्थ विचार; श्रीगुरुहरिहरिजन परचा प्रादिः तथा, भक्ति शास्त्रावलोकन, सज्जन संसर्ग, महा त्मा का दरस परस, भागवत धर्म वेत्ता महानुभावों से जिज्ञासा, हरिभक्त समागम, निजसम्प्रदाय के रहस्य का ज्ञान, सन्तासन्तलक्षण विवेक, श्रीसीतारामगुणस्त्र- भाव का कथन परस्पर ॥ 14<noinclude></noinclude> i6k8biypvtter5nbeeza4pkqhlq678v पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८० 250 193752 663971 2026-07-02T15:34:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663971 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>15 भक्ति सुधास्वाद तिलक | (सवैया) सो जननी, सो पिता, सोइ भ्रात, सो भामिनि, सो सुत, सो हित, मेरो । सोइ सगो, सो सखा, सोइ सेवक, सो गुरु, सो सुरु साहिब, चेरो ॥ सो तुलसी प्रिय प्राण समान कहां बहुतेरो । जो तजि देह को गेह को राम को होइ सवेरो ॥ लो वनाइ कहीं मेह' सनेह सो (चौ०) मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहि यतन जहां जे पाई ॥ सेो जानष सतसंग प्रभाऊ । लोक वेद न पान उपाऊ ॥ ( चौ०) सत्संगति मुद- मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥ (द०) तात ! स्वर्ग अपवर्ग सुख घरिय तुला एक अंग । तुलै न ताहि सकल मिलि, जो सुख लब सतसंग ॥ १२ बीरी [पान, अधरराग] - 'चाह (नेह, भक्ति)” [ चौ०] स्वारथ सांच जीव कहँ एहा । मन क्रम न रामपद नेहा ॥ (सा० ) लोभिहि प्रिय जिमि दाम काभिहि नारि पियारि जिमि । हरि पद "रवि" निःकाम, “भक्ति' सुसंज्ञा ताहि की ॥ " भक्ति - प्रेम, अनुरक्ति, चाह, इश्क़, लव, लो, लगन । भाव, भजन, आसक्ति, राग, प्रीति, अनुराग, रति ॥ [सूत्र ] “सा पराऽनुरक्तिरीश्वरे” [श्रीशाण्डिल्य ] [सूत्र ] "सा कस्मै परमप्रेमरूपा” [श्रीमारद] -- BB!<noinclude></noinclude> s6g5if4r46virivqfcwrv6ijqrrpubp पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८१ 250 193753 663972 2026-07-02T15:34:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663972 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६ श्रीभक्तमाल सटीक । भक्ति । 'भक्ति भजना, भजन करना, प्रणय, प्रिय लगना; सेवा करनी, चाहना, प्यार करना, प्रीति, प्रेम, लोह, अनुरक्ति, अनुराग, परमं प्रेम, परा प्रीति, रति, प्रिय- तम बिन दुखी रहना, प्यारे बिन न जीना, सकल प्यारी वस्तुयों को प्रियतम पर न्योछावर करना, कैक प्रिय लगना, सदैव चिन्तवन, प्रियतम की प्रसन्नता में ही सुख मानना, पी पी रटना ॥ “मनुज देह सुर साधु सराहत को सनेह सिय पी के, "स्वाति सलिल रघुवंश मणि, चातक तुलसी दास" (चौ०) प्रभु व्यापक सर्वत्र समाना । “प्रेम” ते प्रगट होहिं मैं जाना ॥ रामहिं केवल प्रेम पियारा | जानि हु जे जाननिहारा ॥ देवि ! परन्तु भरत रघुबर की । प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी ॥ 1 [ श्लोक ] मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नम- स्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे [ १८-६५ ] मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपा- सते । श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः [१३-२] मय्येव मन प्राधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसि - व्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः [१२-८] अभ्यासे - treate aesर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि (१२-१०) 16 886-00- 1100-<noinclude></noinclude> e8fj4mz73sbe8pe2ch256n0b03luvtx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८२ 250 193754 663973 2026-07-02T15:35:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663973 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>17 17 1986-00- 10-06- भक्ति सुधास्वाद तिलक । “थोरे महँ सब कहीं बुझाई । सुनहु तात ! मति मन चितलाई ॥ [ चौ०] प्रथम हि विप्र चरण अति प्रीती । निज निज धर्म निरत श्रुति रीती ॥ यहि कर फल पुनि विषय विरागा । तब मम चरण उपज अनुरागा ॥ श्रवणादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं । * १७ * [ श्लोक - श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनं अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ १ ॥ ] मम लीला रति प्रति मन माहीं ॥ सन्त चरण पंकज अति प्रेमा || मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ॥ गुरु पितु मातु बन्धु पति देवा । सब मोहिकहँ जाने दृढ़ सेवा ॥ मम गुण गावत पुलक शरीरा । गद्गद - गिरा नयन बह नोरा ॥ काम यादि मद दम्भ न जाके तात निरन्तर बस मैं ताके (दो०) मन क्रम बचन कपट तजि भजन करे निःकाम । तिनके हृदय कमल महँ क सदा विश्राम ॥ (चौ०) प्रथम भक्ति सन्तन कर संगा । दूसरि रति मम कथा प्रसंगा । (दो०) गुरु पद पंकज सेवा, तीसरि भक्ति अमान । चौधि भक्ति मम गुणगण करें कपट तजि गान ॥ ( चौ०) मन्त्र जाप मम दृढ विश्वासा | पंचम भजन सो वेद प्रकासा ॥ छठ दम शील बिरति बहु कर्मा निरत निरन्तर सज्जन धर्मा | सातव सम मोहि मय जग देखा। मोते सन्त अधिक करि लेखा ॥ पाठव यथा लाभ सन्तोषा । ३ 4151<noinclude></noinclude> 7wmxgqcrtm6c973kkce8a1cm7pxfmse पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८३ 250 193755 663974 2026-07-02T15:35:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663974 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८ 1986-00- श्रीभक्तमाल सटीक । हु नहिँ देखे पर दोषा ॥ नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हिय हरष न दीना ॥ सन्मुख होय जीव मोहि जबही । जन्म कोटि पघ नाशों तब ही ॥ जननी जनक बन्धु सुतदारा । तन धन भवन सुहृद परिवारा ॥ सब के ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बांध बटि डोरी ॥ समदर्शी इच्छा कछु नाहीं । हर्ष शोक भय नहिं मन माहीं ॥ अस सज्जन मम हि बस कैसे । लोभी हृदय बसे धन जैसे ॥ भक्ति स्वतन्त्र सकल सुखखानी । बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥ पुन्यपुंज बिनु मिलहिं न सन्ता । सतसंगति संसृति करता ॥ पुण्य एक जगमहँ नहिँ दूजा । मन क्रम बचन विप्र पद पूजा ॥ सानुकूल तेहि पर मुनि देवा । जो तजि कपट करै द्विज सेवा ॥ (दो०) छोरी एक गुप्त मत सबहि कहीं कर जोरि । शंकर भजन बिना नर भक्तिन पावइ मोरि ॥ (चौ०) कहहु भगति पथ कौन प्रवासा । योग न मख जप तप उप- वासा ॥ सरल सुभाव न मन कुटिलाई । यथा लाभ सन्तोष सदाई ॥ मोर दास कहाइ नर मासा | करै तो कह कहां विश्वासा ॥ बहुत कहीं का कथा बढ़ाई। यहि पाचरण वश्य में भाई ॥ बैर न विग्रहपास न नासा । सुख मय ताहि सदा सब पासा ॥ अनारम्भ अनिकेत रूपमानी । अनघ रोष दक्ष विज्ञानी ॥ प्रीति 1 सदा सज्जन संसर्गा । तृण सम विषय स्वर्ग पवर्गा --909 18<noinclude></noinclude> eg9r2gu859p7fgp9drmtcw5rzgae7ux पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८४ 250 193756 663975 2026-07-02T15:35:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663975 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>19 1886-06- भक्ति सुधास्वाद तिलक | १९ 8000-- भगति पक्ष हट नहिं' शठताई । दुष्ट तर्क सब दूरि हूँ बहाई ॥ (दो०) सम गुण ग्राम नाम रत गत समता मद मोह । ताके सुख सोइ जानै चिदानन्द सन्दोह ” ॥ श्री भक्तमाल सम्पूर्ण ही श्री " भक्ति" शब्द का अर्थही अर्थ तो है; तो फिर अब भक्ति का अर्थ अलग क्या लिखा जावे ॥ इति " भक्ति के स्वरूप” का संक्षिप्त वर्णन अथ भक्तिपंचरस वर्णन कवित्त । "शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य, औौ शृङ्गार चारु” पांची रस सार बिस्तार नीके* गाये हैं। Heart जानोगे बिचारि मन, इन के ॥ टीका को स्वरूप मैं नूपले दिखाये हैं | जिनके न 'अश्रुपात पुलकित गात भू, तिनहू को "भाव" सिन्धुधोरि सो छकाये हैं । जोलीं रहें दूर रहें विमुखता पूर, हियो होय चूर चूर नेकु श्रवण लगाये हैं ॥ ४ ॥ में ( * सत्रहवीं शताब्दी में अर्थात् सम्बत साढ़ेसोलह सौ तथा सत्रहसी के बीच में, श्री "भक्तमाल " जी का अवतार जाना गया है । और, सम्बत १७६९ श्री प्रियादास जी ने "भक्तिरसबोधिनी टीका " लिखी है, अनुमान तथा अनुसंधान से ऐसाही निश्चय किया गया है ।) 600- RG-00-<noinclude></noinclude> l9j16ghydn63g8q190db3bd5snc1sqi पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८५ 250 193757 663976 2026-07-02T15:35:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663976 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री भक्तमाल सटीक । वार्त्तिक । " 20 भक्ति के जो पांच रस हैं, नाम (१) शान्तरस (२) दास्यरस (३) सख्यरस (४) वात्सल्य रस तथा (५) दिव्य शृङ्गार रस ( " रसराज ” वा “ उज्वल" रस), तिन पांचा रससार की भली भांति बिस्तार व्याख्या याप इस " भक्तिरसबोधिनी" में पाइयेगा || (बिचारमान महाशय ! ) आप स्वतः अपने मन में विचार करके टोका के चमत्कार को जान लीजियेगा, कि इन पांचो रसों के स्वरूप कैसे अनूप दिखलाए गए हैं | जिन पाखा हृदय प्राणियों की आंखों से कभी अनबिन्दु नहीं निकलता, और जिनका अंग कभी पुलकित नहीं होता, ऐसे २ कठोरहिय जनों को भी श्रीसीताराम कृपा से प्रेम भाव के समुद्र में कहां तक बोर के छकाया है, सो स्वयं आप समझ लीजियेगा । यदि तनकभी कान लगाके भक्तों के भाव तथा भगवत भागवतयश की वैसे लोग भी सुनें, तो उनके भी, प्रेम से चूरचूर चित्त, गद्गद कण्ठ, पुलकतनूरुह, और नेत्रों से प्रेमा- प्रवाह यह प्रावेंगे। पूरे बिमुख तो वे भी केवल उसी कालतक रहेंगे कि जब तक " भक्त माल" तथा "भक्तिरस बोधिनी " से न्यारे रहेंगे ॥ भक्ति के पांच रस (१) “शृङ्गार (२) सख्य (३) वात्सल्य (४) दास्य और (५) शान्त रस की व्याख्या का संक्षेप कुछ, प आगे यन्त्रो में लिखा जाता है ॥ 8000- --90%<noinclude></noinclude> 0h70ojg44hvpzk1jdg7oua8l8i7q13w पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८६ 250 193758 663977 2026-07-02T15:35:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663977 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- 21 188600- भक्ति सुधास्वाद तिलक | २१ विभाव रस अनुभाव सात्विक भाव व्यभिचारो स्थाई भाव भाव विषयालम्बन चाश्रयालम्बन उद्दीपन "सख्य | मित्रसुखद लाललाइले भूषण, साथ साथ १ रोमांच ३३ भाव मित्र द्विभुजसुवेव लखन जी, धनुष भोजन २ स्तम्भ भाव रस" चतुर श्रीसुग्रीव, शर खेल शिरोमणि श्रीविभीषण, मधुर मृगया, सत्यसंकल्प श्रीवीरमणि; वचन; विचित्र ३ प्रलय ४ स्वेद ५ विवर्स मुखसिन्धु | राजकुमार, परिहास; &c. श्रीरामभद्र | इत्यादि रघुनाथ अवघ ६ कम्प 9 अन ु स्वरभंग (पृष्ठ २३ देखिये ) निरन्तर बिहारी S. R. S. B. P.<noinclude></noinclude> c8qid03m2o7wejdja0f9ebsk3a3i7ta पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८७ 250 193759 663978 2026-07-02T15:35:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663978 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२ श्रीभक्तमाल सटीक । 22 विभाव व्यभिचारी रस विषयालम्बन आश्रयालम्बन अनुभाव सात्विकभाव स्थाई भाव उद्दीपन भाव "श- ङ्गार" माधु- G प्रेमसिन्धु श्री जनक- किशोरी जी कमनीयता; श्री किशोरी १ रोमांच ३३भाव प्रियतम बसन्त जी की २ स्तम्भ पदरति रूपमाधुय्य संकल्प; ३ प्रलय रस कमनीय कि कोकिल प्रियतमका ४ स्वेद वा शोर मूर्ति, कूक, मंदस्मित ५ विव "उ प्राणषज्ञ, पवन, खू विक्षेप ६ कम्प श्री जानकी ज्वल " पावस; स्पर्श, 9 अश्रु जीवन कटाक्ष, कटाक्ष; ८ स्वरभंग ( पृष्ठ २३ में देखिये ) मनोहर रस रामचन्द्र मुस्क्वाम; कर में कर छवि को अचला सुरति; भावना; प्रीति प्रणय घा शोभाधान वचन, नयन में नयन "इस ! विसिन्धु शील, राज" परम 1834000 SR. S. B. P. 083 शोभा<noinclude></noinclude> pkzaxteyuaqqbgt0ne9cv2719ebe0rz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८८ 250 193760 663979 2026-07-02T15:36:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663979 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>23 18600- ४०००- भक्ति सुधास्वाद तिलक । २३ -909: • पथ ३३ व्यभिचारी भाव । 16-06- १ निर्वेद १० चिन्ता १९. निद्रा २७ वितर्क २ ग्लानि ११ श्रास २० सुषुप्ति २८. अवहित्था ३ शंका १२ २१ संज्ञा १९. व्याधि ४ श्रम १३ श्रमर्ष वा अवबोध ५ धृति १४ गर्व २२ बीड़ा ३०. उनमाद ६ जड़ता १५ स्मृति २३ मोह ३१ विषाद ७ हर्ष १६ अपस्मृति २४ मति ३२ चपलता ८ दीनता १७ मरण २५ घालस्य ३३ औत्सुका ९ उप्रता १८ मद २६ भावेश ( श्लोक ) पञ्चधा भेदमस्तीह तच्छृणुष्वमहामुने ! शान्तो दास्य- स्तथा सख्यः वात्सल्य शृङ्गारकः ॥ १ ॥ मधुरं मनो- हरं रामं पतिसम्बन्धपूर्वकं । ज्ञात्वा सदैव भजते सा शृङ्गार रसाश्रया ॥ २ ॥ ( श्री हनुमत् संहिता) [श्लोक ] मन्मना भव मभक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्तेव मात्मानं मत्परायणः ॥ ( भ० गो अ० ९ हो० ३४ ) ये यथा मां प्रपद्यते तांस्तथैव भजाम्यहं । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥" ( भ० गौ० ६ )<noinclude></noinclude> 771hkk45v75tdtfwiyb508z3liq6i16 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/८९ 250 193761 663980 2026-07-02T15:36:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663980 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४ 600- श्रीभक्तमाल सटीक | मृत्यु भाव रस अनुमाव सात्विक भाव व्यभिचारी भाव स्थाई भाव विषयालम्बन आश्रयालम्बन उद्दीपन "वात्स- दाशरथी अम्बा मीठे खिलाना; १ रोमांच, अंगताप श्रीराम लाल श्रीकौशल्या श्रीकौशल्या तोतरे २ लाह; २ स्तम्भ, जी में य” नन्दवर्द्धक महारानी जी, वचन; दुलार ३ प्रलय जागर्स, अलोल रस बालक म० श्रीदशरथजी बुलाक, सेलीने ४ वेद आलंबन मन ॥ राम अम्बाश्री सुनयना घुंघुरू, देना; विवर्स शून्यता, “सुतविषयक लला जीमहारानी; काला- जन्मोत्सव ६ कम्प आधृति, हरि पद जी; अम्बा श्री विन्दु सन्माद, रति सियावर सुमित्रा जी; बाल- ८ स्वरभंग सीतापतिः लीला; सूर्खा, प्रहर्ष, होऊ" 18000- SR.S. B. P. महाराज कुमार; सुकुमार -900* 24<noinclude></noinclude> i9t34oajfrgqc60mm23cdasr3edmppu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९० 250 193762 663981 2026-07-02T15:36:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663981 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>18600- & विभाष रस विषया लम्बन आश्रयालम्बन 25 भक्ति सुधास्वाद तिलक | अनुभाव सात्विक भाव व्यभिचारी भाव स्थाई भाव आजा १ रोमांच चितधड़क, अविरल पालन; तुलसी २ स्तम्भ दुर्बलता, भक्ति; ३ मलय रंगविकार, तैलधारा- कंठी, ४ स्वेद विराग, धत स्मरण; तुलसीमाला ५ विव सूर्ष्या, प्रेम; ६ कम्प व्याधि, भजन, पुस्ड अश्रु उन्माद, सेवा संस्कार; स्वरभंग स्तम्भ, भक्ति प्रहर्ष, शरण सुखदता, सेवक प्रियत्व "दास्य" सर्वेश्वर श्रीहनुमत भक्त वत्सल श्रीमहलाद रस दीनदयालु ब्रह्माजी, सेवक सुखद शिवजी; भक्त मात्र S. R. S. B. P. 986-00-- सचिदानन्द जगदेव त्राता व्यापक श्रीसीतापति राम भद्र पतितपावन अशरण शरण मृत्यु, --909 २५<noinclude></noinclude> 909sepm61ookxgx7df5sor5vgwot9n4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९१ 250 193763 663982 2026-07-02T15:36:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663982 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>88000-- 188600- २६ Goe श्रीभक्तमाल सटीक । 26 विभाव अनुभाव सात्विक भाव व्यभिचारी स्थाई भाव भाव विषयालम्बन, आश्रयालम्बन उद्दीपन “शा इष्ट श्रीरा- न्ति” मचन्द्र हरि ब्रह्मा, शिव उपनिषद् नासाग्रपर १ स्तम्भ स्मृति, प्रशान्त, सनकादि, विचार दृष्टि; २ रोनाल निर्वेद, भद्म, पर प्रश्न श्रीनारद अवधूत ३ स्वेद आवेग, निर्द्वन्द्व, रस चिदानन्द | श्रीवशिष्ठ, रूपेष्टा; ४ विवर्ष वृति, समदरशी, जगदेक- श्री अगस्ति, परमवेरागः ५ कम्प उत्सुकता, विरक्तपर, निर्व कर्ता भगवत इत्यादि ६ अभु विषाद, तन्मय विश्वम्भर निर्ममता शान्तरस 9 स्वरभङ्ग वितर्क, एकाग्र व्यापक सर्वच वाले भक्त शार्ङ्गधर श्रीसीतापति प्रय इत्यादि निस्पृह इत्यादि S. R. S. B. P. परमात्मा<noinclude></noinclude> dngykjdfo1b2ejczge13mr7byratptl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९२ 250 193764 663983 2026-07-02T15:36:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663983 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>27 भक्ति सुधास्वाद तिलक । २ 8000- (१) अथ भक्ति के शान्तिरसमें कुछ बचनः- (श्लोक) यो मां पश्यति सर्वत्र मयि सर्वं च पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि सच मे न प्रणश्यति ॥ ( गी०६ । ३०) (दो०) तुलसी ! यह तनु है तवा, सदा तपत त्रयताप । शान्त होय जय “शान्ति” पद, पावै रामप्रताप ॥ नासिकाग्र करि दृष्टि पुनि, घरै भेष अवधूत । निर्म- मता, निर्वाक्यता, यथा शास्त्र अनुसूत ॥ २ ॥ दारुमांह पावक लगे, तीन रूप दरसाय । जरे, बरे, हो भस्म जब, तब सो “शान्त" कहाथ ॥ ३ ॥ प्रति शीतल, अतिही अमल, सकल कामना हीन । तुलसी ताहि "अतीत " गनि, “शान्ति वृत्ति लयलीन ॥ ४ ॥ अहङ्कार . " कार के ग्नि में, जरत सकल संसार । तुलसी ! यांचे सन्त जन, केवल “शान्ति" अधार ॥ ५ ॥ ज्ञाना- भूषण ध्यान घृत, ध्यानाभूषण त्याग । त्यागाभूषण " शान्ति” पद, तुलसी पमल अदाग ॥ ६ ॥ (२) भक्ति के "दास्य रस" में कुछ बचनः- (ली०) दासोऽहं कौशलेन्द्रस्य रामस्य क्लिष्ट कर्मणः । हनुमान् शत्रुसैन्यानाम् निहन्ता मारुतात्मजः ॥ (दो०) "सेवक सेव्य भाव” बिनु, भवन तरिय उरगारि । भजहु राम पद पंकज, स्पस सिद्धान्त विचारि ॥ (चौ०) सिर भर चलीं धर्म पस मोरा । सब ते "सेवक 18600- 3600- .-909 X*<noinclude></noinclude> emt91nxkb0do9bvzbasmvxhbgowrgeg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९३ 250 193765 663984 2026-07-02T15:37:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663984 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८ 3600- श्रीभक्तमाल सटीक । धर्म कठोरा ॥ स अभिमान जाय जनि भोरे । मैं 1 "सेवक” रघुपति "पति” मोरे ॥ "सेवक" हम “स्वामी” सियाहू । होउ नाथ ! एहि पोर निबाहू | मैं मारुत सुत हनुमत बन्दर । दीन बन्धु रघुपति कर किंकर ॥ सेवक प्रिय यह सब की रीती । मोरे अधिक दास पर प्रीती ॥ सुनु कपि जिय अनि मानसि ऊना । तैं मम प्रिय लक्ष्मण ते दूना ॥ कोउ मोहि प्रिय नहिं तुमहि समाना । मृषा न कहीं मोर यह बाना ॥ “ सम दरशी" मोहि कह सब कोऊ । “सेवक प्रिय, "पनन्य- गति' सोऊ ॥ तैंतिस कोटि भर्जें संसार | खोटा बन्दा खोटी नार ॥ खाविन्दों का ख़ाविन्द एक । तिस्को जपै यह कविरा टेक ॥ सीतापति सेवक सेवकाई । काम धेनु शत सरिस सुहाई ॥ “भज को दोई सुघर -(१) की हरि (२) की हरिदास” ॥ (३) अथ भक्ति के " वात्सल्य" रस में कुछ बचनः- (चौ०) सुत "विषयक" हरिपद रति होऊ । मोहि बरु मूढ कहें किन कोऊ ॥ देखि "मातु” प्रातुर उठ घाई | कहि मृदु बचन लिये उर लाई । गोद राखि कराव पै पाना । रघुपतिः चरित ललित करि गाना ॥ (tra) पिता विवेकनिधान वर, मातु दया युतः नेह । तासु " सुवन" किमि पाई हैं पनत टन तजि गेह ॥ 28 3600--<noinclude></noinclude> 4fuino8pwg44mab29nrxzb1v2n65mnd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९४ 250 193766 663985 2026-07-02T15:37:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663985 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>29 90983 भक्ति सुधास्वाद तिलक । (चौ०) सेो "सुत" "पितु" प्रिय प्राण समाना । यद्यपि सो सब भांति प्रजाना ॥ ( गीत ) बूढोबड़ी प्रमाणिक ब्राह्मण शङ्कर नाम सुहायो । मेले चरण चारु चारिउ सुत माथे हाथ दि- वायो ॥ (चौ०) 'सेवक, सुत' "पितु मातु" भरोसे । रहे शोध, बने "प्रभु" पोसे ॥ (४) अथ भक्ति के "सख्य रस" में कुछ बचन:- (लो०) न तथा मे प्रियतमात्मयोनिर्न शंकरः । न संकर्षणी न श्री नैवात्मा च यथा भवान् ॥ ( एकादशे, २४ । श्रीऊधव प्रति ) (चौ० ) ये सब, मुनिवर ! "सखा" हमारे । भरतहु मोहि अधिक पियारे ॥ तुम सब प्रिय मोहि प्राण समाना । मृषा न कहीं मोर यह बाना ॥ (स० ) “जानि सिया जू को दास पदाम्बुज को, अलि खास ! भै मोहि दीजै । जौ मिथिलेश किशोरी के दास बने रसरंगमणी, तुम्हरी जै ॥ " די मातु पिता आज्ञा अनुसरहीं । अनुज "सखा" सँग भोजन करहीं ॥ बन्धु "सखा" संग लेहिँ बुलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई ॥ (दो०) "चपल तुरंगन फेरनी, मृग तकि मारब बान । करि पन लक्षण बेधनी, सब उद्दीपन जान ॥ धरि IER600- --900*<noinclude></noinclude> fm8zc2mwjtk4z0fwyik5g7iw91n30wu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९५ 250 193767 663986 2026-07-02T15:37:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663986 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३० श्रीभक्तमाल सटीक । 30 880-00- भुज गल बतलावनी, इक सँग भोजन सैन। अनुभाव ये “सखन" के, सब बिधि सुख के ऐन” ॥ (५) अथ भक्ति के "शङ्गार रस" में कुछ बचनः- (श्लो०) येते सुजात चरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधो मिह कर्कशेषु । ते नाटवीमटसि सद्- व्यथते न किं स्वित् कूर्पादि भिर्भ्रमति धर्मव दायुषां नः ॥ (श्री भागवते ) "हरिरिति हरिरिति जपति सकामम्" इत्यादि ॥ ( श्री जयदेव गीत गोविन्द ) (चौ०) प्राणनाथ ! तुम विनु जग माहीं । मो कहँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ॥ जिय बिनु देह नदी बिनु बारी । तैसेइ नाथ ! पुरुष बिनु नारी । नाथ ! सकल सुख साथ तुम्हारे | शरद विमल बिधु बदन निहारे । (दो०) प्राणनाथ करुणायतन, सुन्दर सुखद सुजान । तुम बिनु रविकुल कुमुद बिधु ! सुर- पुर नरक समान ॥ (चौ०) छिनु छिनु पिय पद कमल विलोकी | रहिहीं मुदित दिवस जिमि कोकी ॥ “को न बिकी बिनु मोल सखी! लखि जानकीनाथ की सुन्दरताई" ॥ ( गीत ) सखि, रघुनाथ रूप निहारु । &C. सखि रघुबीर 'मुख छवि देखु । &C. पाली री राघो जी के रुचिर हिँडोलना झूलन जैए इत्यादि ॥ 000-<noinclude></noinclude> bipmh3c16ixrfot5zb5abbahjf3rwou पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९६ 250 193768 663987 2026-07-02T15:37:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663987 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>31 183400- भक्ति सुधास्वाद तिलक | ३१ (स०) सोहहिं स्वामिनिसीय सुसंग, "सहेली सबै रूपलबेली नबेली; गौरी, गिरा कहिये जिन मागे वेली लगें रति मानहुं चेली । सारी सबै जरतारी किनारिन की पहिरे तन रंग रंगेली; पीरी, हरी, रस- Ju रंगमनी, कुसुमी, सित, ऊदी पौ नीली रमेली ॥ ऐसी "सखीं" चहुँ ओर लसें, सिय मध्य कृपा रस सागर बोरी; दै सब को मुदपुंज बिलोकहिं मंजुल कंज विलो- चकोरी । कोबरने छवि सुन्दर राजकिशोरी की, जो तिहुँ लोक अँजोरी; जासुकटाक्ष विलास पिया चित की, रसरंगमनी, लिय चोरी ॥ १ श्री कथा श्रवण अभिमान २ श्रद्धा ३ मनन ४ दया ५ नवनि ६ पन ७ भगवनाम हरि साधु सेवा ९ मानसी १० सुसंग = उपटन = ਸੈਲ = फुलेल = = सुनीर अँगुछा इब = वसन सोंधो = आभरण - • कर्णफूल सुनध == अंजन ११ बाह = बोरी<noinclude></noinclude> 1v0xkhr5yt7c4nokktgc82l8nriobaa पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९७ 250 193769 663988 2026-07-02T15:37:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663988 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२ 88600- 3600- श्रीभक्तमाल सटीक । (दो०) जेहि के हियसर सियकमल पावन विकसे आय। प्रियाशरण ! रघुबर भ्रमर रहे तहां मँडराय ॥ नहीं जप तप व्रत ज्ञान ते, नहिं विराग ते कोय । "उज्वल रस" अधिकार वर, "लली कृपा" ते होय ॥ सिद्ध योग देखे नहीं जो थल सुर समुदाय । सीय कृपा "अलियेष" घरि सहजहिं देखहु उपाय || निज निज सेवा द्रव्य युत, “युवति" नृन्दसिय पास । रूप कला तिन महँ लिये बहु सुगन्ध सहुलास ॥ (चौ०) सो मन रहत सदा तोहि पाहीं । जानु रस इतनेहि माहिं ॥ प्रीति “द्विभुज स्याम दशरथ कुंवर, रामऽरु जनक कुमारि । कारण कारज ते परे, इनहि कहत श्रुति चारि ॥ सदा अवध में ध्यावहीं, रासादिक बहु रंग । बीच बीच मिथिला गवन, चहुँ कुँअरिन मिलि संग ॥ रीति भाव स्थाइ पुनि, “प्रणय” प्रेम अरू नेह । अनुराग पस जानिये मनो एक दुइ देह ॥ मन्द हँसनि दृग फेरनी, सो पनुभाव बखानु । कोकिल शब्द वसन्त ऋतु, सो उद्दीपन जानु ॥ स्थाई प्रियतम रती नवनि प्रणय पति नेह । कर पंकज स्परस पर वारत तन मन गेह" ॥ (चौ०) नाथ सकल सुख शरण तुम्हारे । शरद विमल विधु, वदन निहारे इत्यादि ॥ 188,000- 32<noinclude></noinclude> aizmbpc4pdjuahyyphxu2qap54jldzl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९८ 250 193770 663989 2026-07-02T15:37:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663989 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>33 - भक्ति सुभास्वाद तिलक । (दोहा) प्राणनाथ करुणायतन, सुन्दर सुखद सुजान तुम विनु रविकुलकुमुदविधु ! सुरपुर नरक संमान ॥ "सी" कहते सुख ऊपजै, “ता” कहते तम नास । तुलसी "सीता” जो कहै, राम न छोड़ें पास ॥ ३३ 1 प्रियपाठक ! श्रीगोस्वामी तुलसीदास जी कृत | "श्रीगीतावली,” श्रीदेव स्वामी (काष्ठ जिहा जी ) प्रणीत "शृङ्गारप्रदीप,” श्रीजयदेव स्वामी कृत "गीत गोविन्द "; प्रधान कृत “रामहोली, रामकलेवा,” श्रीरूप सखी जी की होली; श्रीनाभाजी, श्रीरसिक अली, श्रीतपस्वी राम जी, श्रीरामरसरङ्गमणि जी तथा श्रीरामचरणदास जी कृत “ अष्टयाम मानसपूजा "; “श्री अगस्त्य संहिता" इत्यादि और श्रीमद्भागवत ( दशम), एवं श्रीकृपानिवास जी की पोथियां भी देखिये ॥ . कवित्त । पंचरस सोई पंच रंग फूल थाके नीके, पीके पहिराइबे को रचिकै बनाई है। बैजयंती दाम, भाव- .वती अलि "नाभा" नाम लाई अभिराम श्याम मति ललचाई है | धारी उर प्यारी, किहूं करत न न्यारी, अहो ! देखो गति न्यारी ढरि पायन को आई है। भक्ति कृषि भार, ताते नमित “शंगार" होत, होते वश लखे जोई यांते जानि पाई है ॥ ५ ॥<noinclude></noinclude> lq15nywko2nwy6vwwnmnx3ulvmlqc54 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/९९ 250 193771 663990 2026-07-02T15:38:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663990 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४ श्री भक्तमाल सटीक । 34 भक्तिसुधा स्वाद । “शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार" ये जो भक्ति के पांचा रस, सोही पंचरंगे फूलों के विचित्र *थाके हैं; इन्ही की बैजयन्ती माला सप्रेम नीके रच रच के, प्रियतम को पहिराने के हेतु, श्रीनाभा नाम की प्रतिभाववती अलीजी सुन्दर मनोहर बनायलाई हैं; जिस को देख के, भक्तवत्सल भावग्राहक प्रेमप्रिय श्रीशार्ङ्गधर श्यामसुन्दर जी की भी मति ललच गई है; आपने इस मालाको उरमें धारण किया, यह विल- क्षण अनूप रीति गति देखनेही योग्य है कि आप इस परमप्रिय माला को किसी क्षण गले से अलग नहीं करते हैं | भक्ति रस पुष्प थाकों की यह वैजयन्ती बनमाला है, इस कारण से यह श्री चरण कमल पर भुक के आ लगी है; अहा ! भक्ति की गति क्या न्यारी होती है, "उज्वल रस" ("रसराज" अर्थात् “शृङ्गार” रस) भक्ति की अपार छवि के भार से नमित, क्याही . सुन्दर होता है; यह बात इससे जानने में आती है कि श्री भक्ति महारानी का जो दरशन पाता है सो अवश्य प्रभु के प्रेम के बश हो ही जाता है ॥ Searc (१) "सोह न वसन विना वर नारी" । (२) " नवनि वसन, (पन सोंधी ले लगाइये)” “यद्यपि गृह सेवक सेवकिनी । विपुल . सकल सेवा बिधि गुनी ॥ निज कर श्री.<noinclude></noinclude> cn1p1t4eywe1a8p5k8vh9m53zzttnxw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०० 250 193772 663991 2026-07-02T15:38:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663991 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ॐ 35 भक्ति सुधास्वाद तिलक । परिचय करई । रामचन्द्र श्रायसु अनुस- र" ॥ इत्यादि ॥ (४) "पद सेवा श्रीलक्ष्मी, (आसन वर श्री शेष)" इत्यादि, इत्यादि ॥ सतसंग प्रभाव वर्णन । कविस । भक्ति तरु पौधा ताहि विघ्न डर छेरी हू की, बारि दै बिचार, बारिसींच्या सतसंग सें । लाग्योई. बढ़न, गोंदा चहुँ दिशि कढ़न, सो चढ़न प्रकाश, यश फैल्यो | बहुरंग से ॥ संत उर आलवाल शोभित विशालकाया, जिये जीव जाल, ताप गये यों प्रसंग सों। देखो बढ़- वारि, जाहि अजहू की शंका हुती, ताहि पेड़ बांधे भूलें हाथी जीते जंग सां ॥ ६ ॥ वार्त्तिक । ३५ १ श्री हरिभक्ति रूप तरुवर की आदि अवस्था एक नवीन वृक्ष की सीं समझिये कि जिस्को एक बकरी के बच्चे से भी विघ्न का भय रहा करता है, और सन्त वा भक्त के हृदय को थाला सरिस जानिये । इस पौधे की रक्षा चारों ओर विचार रूप घेरे से जब की गई तथा सत्सङ्ग के अल से यह सींचा गया तब यह बढ़ने लगा; चारों ओर गोंदे (शाखा प्रशाखा) निकले. फैले और वृक्ष आकाश की ओर चढ़ने बढ़ने लगा भगवद् भक्ति का सुयश अनेक प्रकार से लोक में • * मिट्टी रेटों वा कांटों के घेरे को "बारी" वा "धार" जानिये ॥<noinclude></noinclude> k6m9v13y9osohafvv2778soggqtpp34 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०१ 250 193773 663992 2026-07-02T15:38:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663992 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६ R श्रीभक्तमाल सटीक । विख्यात हो गया। इस तरुवर की विस्तृत छाया कैसी सुशोभित हुई कि जिस्के तले पहुँचने ही से महाताप गए; और नारिनरवृन्द वरन् जीव मात्र जी उठे अत्यन्त सुखी हुए। इस वृक्ष की उन्नति पर तनक चित्त की दृष्टि तो दीजिये कि जिस्को प्रथमतः छेरी बकरी की भी महा शंका रहा करती थी वही अब आज (रामकृपा से) ऐसा सुदृढ़ हो गया कि ज्ञान वैराग्य यश महत्वादिक बड़े बड़े प्रबल हाथी भी इस्में बँधे हुए भूला करते हैं; सत्सङ्ग के प्रभाव का विधारियेगा ॥ चौपाई | सत सङ्गति मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि, सब साधन फूला # - श्रीनाभाजूका वर्णन | कवित्त । 36° आको जो जो स्वरूप से अनूप लै दिखाय दियो, कियेr यों कवित्त पट मिहीं मध्य लाल है। गुण पै अपार साधु कहें अांक चारिहो में, अर्थ विस्तार कबिराज टकसाल है ॥ सुनि संत सभा भूमि रही, अलि श्रेणी मानों, घूमि रही, कहैं यह कहा धीं रसाल | है। सुने हे अगर अब जाने में अगर सही, चोवा भये नाभा, सो सुगंध भक्तमाल है ॥ १ ॥ वार्त्तिक । जिस सन्तका जैसा स्वरूप है, श्रीनाभा जी स्वामी<noinclude></noinclude> lmtn5cejhgo6pj8gb3eem9slrjfn6fl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०२ 250 193774 663993 2026-07-02T15:38:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663993 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>37 भक्ति सुधास्वाद तिलक । ३७ उस्का अपने अनूठे काव्य में वैसाही अनूप दिखा दिया है और कविताई ऐसी की है कि जिस्का अर्थ ऐसा झलकता है कि जैसे बहुत भीने बस्त्र के बाहर से उसके भीतर का लाल मणि (रत्न ) झलकता है || | सन्तों के अपार गुणों को श्रीनाभाजी ने थोड़ेही अक्षरों में यों कहा है, कि उन में अर्थ अनोखे विस्तृत भरे हैं, जैसे बड़े बड़े कविवरों की चमत्कृत रीति होती ही है ॥ सन्तों की सभाएं इस भक्तमाल काव्य को सुन के भ्रमर वृन्दों की भांति मँडराती तथा भूमती रहती हैं, और यह कहती हैं कि "यह कैसा आश्चर्य रस मय रसाल है" ॥ मैंने “अगर" जी का नाम सुना तो था परन्तु अब ठीक ठीक जान भी लिया कि श्राप वस्तुतः 'अगर' हैं, जिन से "नाभा' * रूप 'चाचा' हुए, कि जिन नाभा ("नाफ़ा") + का "भक्तमाल" ऐसा 'सुगन्ध' फैल रहा है ॥ भागवतधर्माचरण के प्रसिद्ध तथा प्रधान आधार "भक्तमाल" की क्या बात है। इस आदरणीय ग्रन्थका अनुवाद केवल महाराष्ट्री, बङ्गला, फारसी, उर्दू, आदि अनेक प्राकृत भाषाओं मात्र में ही नहीं. वरंच देववाणी (संस्कृत) में भी हो गया है ॥ * नाभाजी "नभेोभूत" का अपभ्रंश है + नाफ़ा (कस्तूरी वाला) aili<noinclude></noinclude> 38wo2g8nsbp8w3fr49hggktfz11qqly पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०३ 250 193775 663994 2026-07-02T15:38:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663994 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८ - श्रीभकमाल सटीक । यह तो ठीक ही है कि इस ग्रन्थ (भक्तमाल) में प्रायः सात सौ भक्तों के नाम हैं, सतयुग त्रेता द्वापर के अतिरिक्त कलियुग के ४१४० वें वर्ष तक के नाम हैं ॥ अर्थात्- | हिन्दू महाराजाओं के ४२९६ बर्ष के, तथा मुसल्मान् बादशाहों के ४४४ बर्ष के, (सम्बत १६९६, सन १६३९ ईसवी) . कलियुग के ४७४० वें वर्ष पर्य्यन्त के महात्मा के, (विक्रमी सत्रहवीं शताब्दि तक के ); कि जिस समय को आज, * ५६४ बर्ष हुए गोस्वामी श्री ६ नाभा जी के "भक्तमाल" के अनु- वाद और टिप्पणी तथा टीकाएं भी अपनी अपनी चाल पर, अनेक हो चुकी हैं - " थाके " शब्द का अर्थ | एक एक रंग के पांच सात फूलों का समूह एकत्रित, ऐसे समूहों को "थाके" कहते हैं। जैसे गुलाबी वा लाल पुष्पों का एक थाका, ऐसे ही पीले, हरे, स्वेत, स्याम तुलसीदलों फूलों के विचित्र थाके ॥ ऐसे पंचरंगे भाकाओं से मालाएं रची जाती हैं, यह प्रसिद्ध ही है । • > कलियुगीय सम्बतसर ५००४ - विक्रमीय सम्बत १९६० - सन् १९०३ ईसवी ॥ 38<noinclude></noinclude> qpp4phn2ioiscn0v07ln5cwjk4ii01c पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०४ 250 193776 663995 2026-07-02T15:38:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663995 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>39 भक्ति सुधास्वाद तिलक । ३६ g-co गिनती सम्बत भक्त नामावलियों के नाम उनके कोचों के नाम १ १०६९ भक्ति रस बोधिनी टीका श्री प्रिया दास जी २ १८०० भक्त उरवसी (अनुवाद) लालचन्द्र दास ३ १८९८ ( फ़ारसी) मु० गुमानी लाल 8 १९११ भक्ति प्रदीप (२४ निष्ठा) श्री तुलसीराम जी ५ १८०० ० ८ 3 भक्त कल्पद्रुम (२४ निष्ठा) ronto टिप्पनी (श्रीकाशी१९२३ लखनऊ १९५२, बम्बई १९५० में छपी है) १९२१ रामसिकावली (चपाई) १९२५ रसिकभक्तमाला प्रतापसिंह जी निम्बार्क सम्प्रादायी वृन्दावनवासी वैण्डवदास } राजा श्रीरघुराजसिंह श्रीयुगलप्रिया बी श्री हरिश्चन्द्र जी श्री तपस्वी राम जी सीतारामीय १९३० भक्तमाल १० १९३४ ११ भक्फ़नामावली श्री ध्रुवदास १२ १९५८ भक्तनामावली श्रीराधाकृष्णा दास "श्रीकाशी नागरीप्रचारिणी सभा " इन में, भक्तों के निवास स्थान देश तो प्रायः वर्णित | हैं, परन्तु उनके जन्मादि के काल की चरचा पाई नहीं जाती। हां, इस बात के अनुमान तथा अनुसन्धान की और इन चार महाशयों की दृष्टि तो अवश्य ही गई है (१) प्रेमीवर श्रीहरिश्चन्द्र जी (२) “प्रेमगंगतरंग".<noinclude></noinclude> s6qshcbo48vw3aqs8w7j9qhl9mc8c38 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०५ 250 193777 663996 2026-07-02T15:39:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663996 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>| ४० श्रीभक्तमाल सटीक । 40 “समूजे मिहो वफ़ा" और "वक़ार देहली" * इत्यादिक के कर्त्ता श्रीतवीराम जी सीतारामीय (३) श्रीराधा- कृष्णदास जी (४) “दिमाडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर अब | हिन्दुस्तान' + के कत्ती डाक्टर ग्रियर्सन् साहिब् ॥ तथापि, किसी को उनकी तारीखें मिलीं नहीं ॥ तो जिन वाताओं की टोह ऐसे २ ऐतिहासिक तत्त्व रसिक अनुसन्धान कारियों को न मिलीं, उन बातों में इस दीन का हस्ताक्षेप भला कब फलदायक होना सम्भव ? (चौपाई) "जेहि मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं । कहहु तूल केहि लेखे माहीं ॥” अतः उस्को छोड़कर इस दीन ने स्वमति अनु- सार, केवल मूल तथा कवित के अर्थ मात्रही लिखने पर चित दिया। श्रीसीताराम कृपा से, “श्रीहनुमत यश तरंगिणि" + "श्रीरामानन्दयशावली", इत्यादिक अनेक ग्रन्थों के कती स्वामी श्री ६ रामरसरङ्गमणि ! जी भक्तमाली से, इस दीन का बड़ी भारी सहायता पहुंची है; कृपा का धन्यवाद ॥ सब सज्जनों से पुनः पुनः कृपा आसीस की इस दीन की प्रार्थना है ॥ * slow is, is gsraj jaj * + The Modern Vernacular Literature of Hindustan by Dr. Grierson. 1" श्री सीताराम शोभावली " · सीताराम शरण भगवान् प्रसाद सोभाग्यकला (पाला)<noinclude></noinclude> kf4mksuh4mi5qle9jh1fj0zalnskrzn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०६ 250 193778 663997 2026-07-02T15:39:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663997 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>41 भक्ति सुधास्वाद तिलक | ४१ 188600- --909 कवित्त | नाभाजू दयाल, आज्ञा ते, उताल, वंदि संत सिया लाल, रचे 'भक्त जस जाल है। मेटत कुचाल, भरे भूरि भाग भाल, तम नाशै, शोभा साल, प्रभा पूरे ज्यों मशाल है ॥ निरखि निहाल, रस राममणि बाल, वेष वैष्णवी बिशाल, प्रीति पालनी निराल है। पढ़े सर्व काल, सदा सुन जो रसाल, होय काग ते मराठ हाल, ऐसी "भक्तमाल" है ॥ (श्रीराम रसरंगमणि) यह बात विदित ही है कि "भक्तमाल" की शुद्ध प्रति आज कल ढूंढ निकालती भी कोई सहज ही सी वार्त्ता नहीं है ॥ भक्तमाल स्वरूप वर्णन । कबित्त । बड़े भक्तिमान, निशिदिन गुण गान करें, हरें जग पाप, जाप हियो परिपूर है । जानि सुखमानि हरि सन्त सनमान सचे, बचेऊ जगत रीति, प्रीति जानी मूर है। तऊ दुराराध्य, कोऊ कैसे के उपराधि सकै, समझी न जात, मन कंप भयो चूर है। शोभित तिलक भाल, माल उर राजे, ऐपै बिना भक्त माल भक्तिरूप अति दूर है ॥ ८ ॥ वार्त्तिक । चाहे कोई कैसेही बड़े भक्तिमान हो, रात दिन --909881<noinclude></noinclude> jbrvowtp05frazucnud2zvmya22vw9l पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०७ 250 193779 663998 2026-07-02T15:39:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663998 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२ 1830:00- 88 श्रीभक्तमाल सटीक । 42 88- हरि गुण गाया करते हों, संसार के पापों को हरते भी हों, भगवन्नाम जपा करते भी हों, उनका हृदय सद्गुणों तथा भगवदुध्यान से भरा भी हो, ज्ञानमान भी हों, (तनु कम्प पर हिय चूर्ण भी हों,) श्री हरि तथा सन्तों के सम्मान में भी सांचे हों, और उसी में सुख मानते भी हों, रीति से नाम जपते भी हैं; सांसारिक प्रपंच से बचे भी हों, प्रेम को ही जड़ वा सार जानते हों, ललाट में तिलक और उर में माला भी सुशोभित हों; यह सब ठीक है सब कुछ हो, तथापि भक्ति की प्राराधना कठिन ही है; पोह ! कोई किस प्रकार से प्याराधना कर सकता है ? भक्ति की बिलक्षण सूक्ष्मगति समझ में नहीं पाती, मन कांप उठता है, हृदय चूर चूर हो आता है। सारांश यह कि “श्री भक्तमाल जी" को पढ़े समझे और मनन किये बिना, श्री भक्तिमहारानी की आराधना और उनके स्वरूप का जानना अतीव दूर तथा असम्भव है ॥ इस कविता में यह शंका है कि "जो जो श्री मति के अंग इस में कहे हैं, तिस से पृथक् भी क्या और भी कोई भक्ति का रूप है?" समाधान:- महीं परन्तु इन्हीं अंगों की निष्ठा पर काष्टा रूप भक्तमाल में भक्तों ने आचरण करके दिलाए हैं, कि जिन्हके श्रवणमात्र से ही, हम अंगों संपर जम भी, मिज भक्ति का अभिमान त्यागि के निराभिमान परा- काष्ठा भक्ति पद की आशा करते हैं। (उदाहरण) यथा बड़े भक्तिमान श्री पीपा जो ने श्रीधर भक्त की भक्ति को देखि निज भक्ति को माना || 'गुन गाम' जैसे सुखकनारायणदास कि शरीर हो त्याग दिया || 'नाम जाप' अंतरनिष्ट राजा का कि, तमही त्याग दिया ॥ --9098<noinclude></noinclude> ledl2omout2cleyuce7sa5ibgopt5jv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०८ 250 193780 663999 2026-07-02T15:39:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 663999 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-90-98 * 43 भक्ति सुधास्वाद तिलक । ४३ 'श्री हरिसम्मान सेवा' जैसे मामा भानजे की कि, सरावगी के शिष्य होके कहा कि पावैं प्रभु सुख इन नरक हूं गए तो कहा । 'सन्त सन्मान' जैसे सदाप्रतीवणिक जो की कि वेष धारी मे बेटावर किया तब बेटी विवाहिके प्रva faur || इत्यादिक उदाहरण श्री भक्तमाल में देख लीजिए । विस्तार के भय से बहुत नहीं लिये ॥ “श्रीमकमाल" क्या है ? उन महानुभाओं का जीवन चरित्र कि जिनकी हमारे करुणाकर प्रभु की दयालुता विशेष अपने दविसमुद्र में मन कर चुकी है। उसके श्रवण मनन निदिध्यासन बिन, उस रस में ' किसी का प्रवेश कैसे सम्भव है ? क्रिया का यथार्थ स्वरूप कर्त्ताओंही के आचारण जान्ने से पूर्णतः तथा शीघ्रतर अन्तःकरण में श्रवणादि द्वारा पहुँचकर गुणकारक और सुखप्रद होता है। श्री भक्तमाल के अपूर्व अधिकार की विलक्षणता चित्त पर कैसी होती है, इस्का अनु- भव श्री भक्तमाल के पढ़ने तुम्नेवालों हो को होता है ॥ पथ मूल मंगलाचरण ॥ दोहा ॥ भक्त, भक्ति, भगवंत, गुरु, चतुर नाम पु एक । इन के पद बंदन किये, नाशैं (बिनशैं) विघ्न अनेक ॥ १ ॥ वार्त्तिक । "श्रीभगवद्भक्त" "श्रीभगवद्भक्ति” “श्रीभगवत्” और "श्रीगुरु", इनके नाम ही मात्र तो चार हैं, परन्तु वास्तविक स्वरूप एक ही जानिये; इनमें भेद कुछ भी नहीं । विश्वासपूर्वक ऐसा समझरखिये कि इनके पद- सरोजकी बन्दना समस्त विघ्नों को निःशेष नाश करती 18600-<noinclude></noinclude> 3qosxlscm4yx8nbrdvoy8mcmljnvqfd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१०९ 250 193781 664000 2026-07-02T15:39:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664000 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1300 ४४ 53600- - श्रीभक्तमाल सटीक । है, चाहे वे विघ्न हृदय के भीतर के हों; वा बाहर के ॥ पाठवें कवित्त तक तो श्रीप्रिया दास जी की हो निज भूमिका, मंगलाचरण, और उपक्रमणिका हुई । मागे, नवें कवित्त से, उनकी "टीका" प्रारम्भ हां होती है । टोका ॥ कबित्त ॥ हरि गुरु दासान सों सांचो सोई भक्त सही, गही एक टेक, फेरि उरते न टरी है । भक्ति रस रूप की स्वरूप यह छवि सार चारु हरि नाम लेत अँसुवन भरी है | वही भगवंत संत प्रीति को विचार करे, घरे दूरि ईशता हू, पांडुन सो करी है । गुरु गुरुताई की सचाई ले दिखाई जहां गाई श्री पैहारी जू की रीति रंग भरी है ॥ ९ ॥ वार्त्तिक । 44 (१) "भक्त" उन को समझिये सही कि जिन को “हरि” (भगवत) चरणारविन्द में तथा श्री "गुरु" पद कंज में और "हरिदासों" (भागवतों) के पद पंकज में 'सच्चा' प्रेम हो; तथा “श्री हरि, श्री गुरु और श्री हरिगुरुदासों" के प्रति जिन का सत्य (निच्छल निष्कपट) बरताव होवे; और जो श्रीकृपा से अपनी निज गृहीत निष्ठा के टेक में सदैव अचल रहे । भक्तिमान जन भक्त<noinclude></noinclude> 7cr5q1h4aax9f1thdkv1gq8bkh7ht0o पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११० 250 193782 664001 2026-07-02T15:40:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664001 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>45 256-06- 3600- भक्ति सुधास्वाद तिलक । -90) कहे जाते हैं अर्थात् जिन भाग्यभाजनों के हृदय कमल में श्री भक्ति महारानी विराजती हैं तिन्ह सज्जनों को भक्त कहते हैं | (श्लोक) वैष्णवो मम देहस्तु तस्मा- त्पूज्यो महामुने । अन्ययत्नं परित्यज्य वैष्णवान् भज सुव्रत ॥ (२) “भक्ति" जो रसरूपा है उस्का सुन्दर छवि सार स्वरूप संक्षेपतः यह पहिचान लीजे कि श्री सीता राम नाम उच्चारण करने के साथ ही आंखों में से प्रेमाश्रु के बिन्दु टपकने लगे वरंच पांसू की झड़ी बरसने लगे ॥ “भक्ति" की कुछ व्याख्या पृष्ठ ७ से पृष्ट ३४ पर्य्यन्त लिख आए हैं । "भक्त" के भाव का नाम “भक्ति" है अर्थात जिसअनूप सम्पत्ति के भजन को "भक्त" कहते हैं उस पविरलमल पवित्र सर्वोत्तमोत्तम फलों के रस का नाम "भक्ति” जानिये ॥ . (३) "भगवत' तो सन्तों और भक्तों की प्रीतिही को विचार करता है; प्रेम के आगे अपनी ईशता (ईश्वरत्व) को न्यारे ही छोड़ देता है; जैसे कि गृद्ध, निषाद, शबरी, पाण्डव । इत्यादिकन के साथ। ऐसा भगवत, सो उस्की इस भक्तवत्सलता की जय ॥ (४) ऐसे व्यापक, सच्चिदानन्द, परब्रह्म, सुखराशि, शार्ङ्गधर, शोभाधाम, परमसमर्थ, “भगवंत" श्रीजानकी वल्लभजी के पद पंकज की भक्ति जिस्के उपदेश तथा 188400-- ४५ •9098<noinclude></noinclude> szshu1z3gb6yz04o094qsg6kxtbg0ew पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१११ 250 193783 664002 2026-07-02T15:40:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664002 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६ 00- श्रीभक्तमाल सटीक । कृपा द्वारा भक्तों को प्राप्त होती है, उस्को श्री "गुरु" कहते हैं। गुरुताई की रीति तथा सच्चाई को श्रीकृष्णदास पैहारी ( पयोहारी जी महाराज के रङ्ग भरे चरित्र में सुन्ना सम झना चाहिये ॥ कुछ न लेना और पूरा २ कृतार्थ कर देना ॥ (१) प्रीति जिसको होती है (भक्त); (२) तथा प्रीति (भक्ति); (३) पर जिस्की प्रीति होती है (भगवन्त) (४) एवं जिसके द्वारा प्रीति होती है और प्रियतम मिलता है, जो कि भगवत प्रेम के ही निमित्त पूजा जाता है, सो (गुरु); ये चारों के चारों ही केवल कहने मात्र को ही चार हैं, नहीं तो ध्रुत्र करके इन्हें वस्तुतः एक ही जानिये || जैसे यदि किसी को अपनी आंखें दर्पण में देखनी हो, तो उस समय विचारिये कि करता वा देखनेवाली तो पांखें ही हैं; तथा देखना हांखें ही की क्रिया है; पर जिस्को (कर्म) पांखें देखती हैं सो भी अपनी पांखे ही हैं; एवं जो पाप के देखने के करण स्वरूप हैं नाम जिनसे आप देखते हैं वे भी आंखेंही हैं, और फिर दर्पण बना भी है केवल आंखों ही के लिये; अर्थात् कर्त्ता कर्मकरण सम्प्रदान ये सब कारक पाखें ही हैं। या सब एक ही तत्व हैं। उनमें भेद वा भिन्नता कहां है? ऐसे ही भक्त, भक्ति, भगवन्त, गुरु, ये चारों प्रभेद हैं ॥ भगवत की ही विचित्रता हैं। चारों नामों से भगवत ही बन्दनीय है वही एक नामी है ॥ 1880- 46<noinclude></noinclude> awh8yy3xdtjlzeu6qixee6el3x4ovvy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११२ 250 193784 664003 2026-07-02T15:40:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664003 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>47 भक्ति सुधास्वाद तिलक । चारो की एकता का तात्पर्य यह कि श्रीभगवत ही जीवों के कल्याण के निमित्त अपनी कृपा से चार रूप हुए हैं, क्योंकि भक्तों के पन्तर्यामी तथा उरमेरक आप ही हैं; उपाय रूपा भक्ति भी पापही की साक्षात कृपा शक्ति हैं; हितोपदेशक इष्टमन्त्र गर्भित श्री गुरु तो भगवद्रूप प्रसिद्ध ही हैं। इस प्रकार से तत्त्वतः चारो एक हैं ॥ दोहा ॥ मंगल आदि विचारि रह, बस्तु न और अनूप । हरिजन की यश गावते, हरिजन मंगलरूप ॥ २ ॥ सब सन्तन निर्णय कियो, श्रुति पुराण इतिहास | भजिबे को दोई सुघर, कै हरि के हरिदास ॥ ३॥ वार्त्तिक । मंगलाचरण तथा मंगल वस्तुओं में विचारने से भगवत भक्तों का गुण वर्णन ही रूपनूप जँचता है, इसके सरीखा मंगल मूल पर कुछ भी नहीं ठहरता। भग- ● प्रकट हो कि "अ" प्रतियों में ऐसा पाठ है कि सब सन्तममिली निर्णय कियो मषि श्रुति पुराण इतिहास ॥ इत्यादि । 600-<noinclude></noinclude> bwzoz9weaee7whcb10543vuxy8ay3zl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११३ 250 193785 664004 2026-07-02T15:40:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664004 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४८ 123600-- श्रीभक्तमाल सटीक । --900 तथा महात्माओं के सुयश को गाते गातेही, भगवत के जन मंगलमय हो जाया करते हैं ॥ सब वेद पुराण इतिहासों ने तथा सब सन्तोंने यह बात पक्की ठहराय रक्खी है कि भजे जाने के योग्य दो ही हैं (९) भगवान् तथा (२) भगवान् के साधु भक्त; सो इन दोनों ही की सेवा वा भजन, उत्तम ठीक पर सुन्दर है ॥ ॥ दोहा ॥ | अग्रदेव आज्ञा दई, भक्तन को यश गाउ । भवसागर के तरनको, नाहिन और उपाउ४ वार्त्तिक । स्वामी श्री ६ अग्रदेव महाराज जी ने प्राज्ञा दी कि भागवत के सुयश वर्णन कर; भवसिन्धु से पार होने के पर्थ अमोघ महानौका दूसरा कोई नहीं है ॥ आज्ञा समय की टीका ॥ कवित्त ॥ " मानसी स्वरूप" में लगे हैं पग्रदास जू वै, करत बयार नाभा मधुर सँभार सीं । चढ्यो हो जहाज पै जु शिष्य एक, आपदा में कस्बो ध्यान खिच्यो मन, छुट्यो रूपसार सीं ॥ कहत समर्थ "गयो बोहित बहुत दूरि आयो छवि पूरि फिरि ढरौ ताही ढार सां" ॥ लोचन उचारिकै निहारि, कह्यो "बोल्यो कौन?" " वही जीन पाल्यौ सीध दे दे सुकुँबार से " ॥ १० ॥ 48 14:00-<noinclude></noinclude> quoyf9wlxv5iok8rkbaq7slcpt07rad पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११४ 250 193786 664005 2026-07-02T15:40:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664005 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>49 भक्ति सुधास्वाद तिलक | 1886-06- 1984-00- वार्त्तिक । एक समय स्वामी श्री ६ उपग्रदास महाराज जी मानसी भावना में मग्न थे, और श्रीनाभाजी महाराज आप को प्रेम से धीरे धीरे पंखा झल रहे थे । उसी समय प्राप के एक शिष्य ने, कि जो सागर (समुद्र) में एक जहाज़ पर चढ़ा था, जहाज़ के रुक जाने से प्रार्त्तवश स्वामी श्री ६ अग्रदेव महाराजजी का ध्यान किया। एक तो स्मरण, दूसरे दीनता से, फिर क्या था, उक्त स्वामी जी कृपालु के मन को सार स्वरूप की सेवा से छुड़ा के अपनी ओर पाकर्षण कर ही तो लिया । समर्थ श्री नाभाजी अपने स्वामी के अनुपम रहस्य सेवा का यो विघ्न सह न सके; कृपापूर्वक उसी पंखे के वायुबल से जहाज़ को उस आपदा से छुड़ा कर, विनय किया कि "प्रभो ! वह बोहित ( जहाज़ ) तो आप की कृपा ही से आपदा से बच कर बहुत दूर निकल गया; अब आप अपने चित्त को उधर से ater के शान्तिपूर्वक स्वकार्य में तत्पर करके पुनः उसी अनुपम छवि में लगाइये" । इस वर्त्ता के सुन्तेही नेत्र उघार उनकी पोर निहार आपने पूछा कि "कौन बोला ? " श्रीनाभाजी ने हाथ जोड़ के प्रार्थना की कि " नाथ ! वही शरणागत बालक, कि जिस्को सीथ प्रसाद देदे के आपने कृपापूर्वक पाला है ॥ " 198400-<noinclude></noinclude> hyqlle32t6y121lq7odvwn807kts4c2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११५ 250 193787 664006 2026-07-02T15:40:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664006 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>S श्रीभक्तमाल सटीक । टीका। कवित । દ अचरज दयो नयो यहां लौं प्रवेश भयो, मन सुख छयो, जान्यो संतन प्रभाव को । प्राज्ञा तब दई, “ यह भई तो साधु कृपा, उनहों को रूप गुण कहो हिय भाव को " ॥ बोल्यो करजोरि, "याको पावत न पोर छोर, गाऊं राम कृष्ण नहीं पाऊं भक्ति दाव को" । कही सकाइ, “बोई हृदय पाइ कहें सब, जिन ले दिखाइ दई सागर में नाव को" ॥ ११ ॥ वार्त्तिक । इतना सुन्तेही पाप नवीन आश्चर्य में पाकर विचार ने लगे कि इसकी यहां तक पहुंच हुई ! तथा मन में पत्यन्त पानन्द छाय गया, और जाना कि यह सन्तों के प्रसादी और चरणामृत का प्रभाव है । तब आपने इन्हें आज्ञा दी कि " वत्स ! यह तुझ पर साधुओं की अलभ्य कृपा हुई; अतः अब तू सन्तोंही के गुण स्वरूप तथा हृदय के भाव को वर्णन कर" । ( भवसागर के तरने का यही उपाय है। ) इनने हाथ जोड़ के निवेदन किया कि “स्वामी ! श्री रामकृष्ण चरित्र गा सकूं तो गा सकूं, परन्तु भक्तों के अपार रहस्य चरित्रों का ध्यादि अन्त पाना तो मुझको सम्भव ही है। पापने समझाया कि “पुत्र ! जिनने तुम्हें समुद्र में जहाज़ को दिखा दिया, वेही 1004 60<noinclude></noinclude> 1hgarj26k21xtg4k1uzy6l59txhtonz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११६ 250 193788 664007 2026-07-02T15:41:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664007 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>51 भक्ति सुधास्वाद तिलक । तुम्हारे हृदय में प्रवेश करके अपने अलौकिक रहस्यों को कहेंगे। सो, तुम व भक्त यश कह ही चली ॥ " ऐसे वरदानात्मक वचनवर सुनके श्रीकृपा से श्री- भाजी महाराजानन्द पूर्वक उद्यत होही तो गए, और “श्रीभक्तमाल" रचड़ी तो दिया ॥ श्रीभक्तमाल जी में १९५ छप्पय (षटपदी) हैं; पादि में चार दोहे हैं; एक कुण्डलिया तथा एक दोहा मध्य में; और अन्त में बारह दोहे हैं; सब मिलके २११ (दो सौ तेरह) छन्द हैं | यही "मूल भक्तमाल" है, जो ( यही मूल), इस ग्रन्थ में 'बड़े पक्षरों में छपा है ॥ पर, श्रीप्रियादास जी की "भक्तिरस बोधिनी” टीका ( उक्त भक्तमाल की ), ६२९ कवित्तों में है । इन्हीं पाठ सौ यतालीस (२१३+१२९-८४२) छन्दों का भावार्थ, यथा मति, सन्तों की कृपा से लिखना, इस दीन का उद्देश्य है ॥ श्रीनाभाजी की धूपादि अवस्था वर्णन | कवित्त । हनूमान बंश ही में जनम प्रशंस जाको भयो दृगहीन सो नवीन बात धारिये । उमरि वरष पांच, मानि के काल पांच, माता वन छोड़ि गई विपति विश्वारिये ॥ कीही अगर ताहि डगर दरश दियो लियो यों अनाथ जानि, पूछी, सो उच्चारये । बड़े सिद्ध जल ले कमण्डलु सों सींचे नैंन, चैन भयो खुले अख, जोरी की निहारिये ॥ १२ ॥ ५१<noinclude></noinclude> qi9k8mrwuespehu4fuu8l6zqm7hc1kc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११७ 250 193789 664008 2026-07-02T15:41:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664008 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५२ 183600- श्रीभक्तमाल सटीक । वार्त्तिक । स्वामी श्री नाभाजी महाराज के जन्म, और प्रथम अवस्था की दशा, इस प्रकार है कि परम प्रशंसनीय श्रीहनुमान वंश में अवतार लिया ॥ सो हनुमान 'वंश का निर्णय मुन्शी श्रीतुलसी राम जी और उनके पग श्रीभक्तकल्पद्रुम के कर्त्ता श्री प्रतापसिंह जी ने, इस प्रकार किया है कि दक्षिण में तैलङ्ग देश गोदावरी के समीप श्रीरामभद्राचल के पास "श्रीरामदास" नाम के एक महाराष्ट्र ब्रह्मण श्रीहनुमान् जी के अंशावतार हुए, उनके छोटी सी पूंछ भी थी) वे बड़े प्रसिद्ध श्रीरामोपासक परम भक्त सानुराग सिद्ध बहुतों को श्रीसीताराम भक्त भवविरक्त श्री चरणा- नुरक्त करके श्री सीताराम धाम को प्राप्तहुए। इस प्रकार श्रीहनुमान अवतार होने से वह हनुमान वंश करके विख्यात है, अबतक उसवंश के लोग गानविद्या के अधिकारी होते हैं राजा लोगों के यहां नौकरी गानेपर करते हैं ऐसा उन्होंने लिखा है ॥ . और इसी भक्तमाल को, दोहा चौपाई में रचनेवाले राजा श्रीरघुराजसिंह जी ने ऐसा लिखाहै कि “सो शिशु लागूली द्विजकेरो” अर्थात् उन्होंने हनुमान वंश का "लागूली" ब्राह्मण अर्थ किया है ॥ और कोई २ तो स्वामी श्रीनाभाजी का जन्म डोम 188600- 52<noinclude></noinclude> lwuqg8vxm2oxa5cfvc25z5uyp4lm1bj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११८ 250 193790 664009 2026-07-02T15:41:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664009 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>58 8600- भक्ति सुधास्वाद तिलक । वंश में भी कहते हैं, परन्तु पश्चिम देश में "डोम" किस को कहते हैं यह न जाननेवाले लोग इस देश में डोम भंगी को नामान्तर समझ के "भंगी” भी कह बैठते हैं सो भंगी कहना महा अनुचित प्रविचार है क्योंकि पश्चिम माड़वार यादिक देशों में, 'डोम, कलावँत, ढाढ़ी, भाट, कथक, इन गानविद्या के उपजीवीयों की तुल्य जाति (ज्ञाति और प्रतिष्ठा है। इसका प्रमाण (१११ वें छप्पय में) श्रीमूल कारने "लाखा" भक्त को बानर अर्थात् बानरवंशी लिखा और (४२६ वें कवित्त में) भक्त- माल के टीकाकारने "लाखा नाम भक्त ताको बानरो वखान कियो कहैं जग डोम जासो मेरो शिरमोर है" ऐसा लिख के आगे इन के गृह में सन्तों का जाना और रोटी प्रसाद का खाना भी लिखा है सो देख लीजे ॥ लाखा भक्त के इहां सन्तों का प्रसाद रोटी पाना अन्यथा असंभव था ॥ उपस्तु, इहां तो दोनों प्रकार से उत्तमता है श्रीनामा स्वामी तो श्री सीताराम जी अन्य विशुद्ध जगत पूज्य दास हैं न ब्राह्मण हैं न डोम इन पच्युतगोत्र की देह तो जात्याभिमान से रहित है ! इत्यलम् ॥ पीर श्रीनाभाजी के अवतार की कथा इस प्रकार भीत से सुनी है कि जब ब्रह्माजी ने वत्स बालको को हरण किया तब श्रीकृष्ण कृपालु जी ने कहा “ब्रह्मा ५३ --१००%<noinclude></noinclude> 58ox96idkltre5udunctmu4ig3p4x99 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/११९ 250 193791 664010 2026-07-02T15:41:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664010 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्तमाल सटीक । जी पाप विमोह दृष्टि से हमारे प्रिय वत्स बालको का हरण किया तिस हेतु से कलिकाल में लोचनहीन जन्म लोगे" तब श्रीब्रह्माजी ने स्तुति की और श्रीभ- वान् ने प्रसन्न होके वर दिया कि “पांच वर्ष तक अंधे रहोगे तदुपरि बाहिर भीतर दोनों प्रकार के दिव्य नेत्र खुलेंगे पर परम यश को प्राप्त होगे" । सोई श्री ब्रह्मा जीके अंश से अवतार लिया ॥ प्रशंसनीय हनुमान वंश में, हरि इच्छा से पापने अन्धेही जन्म लिया, और "नवीन बात," से यही कि नेत्रों के चिन्ह तक न थे, तिन्ह को भी महात्मा- पों की कृपा से दिव्य लोचन मिले। प्राप पांचधर्ष के हुए तब देश में प्रति दुकाल पड़ा। पिता का भी शरीर छूट गया। माता आप को लेके और देश को चलों; च; परन्तु भूखों मरने लगीं, लेके न चल सकीं इसी बिपत्ति के बश बनही में छोड़कर चली गईं । वह दीनता, और भगवत की यह दीनदयालुता बिचारनेही योग्य है कि स्वामी श्री कोल्ह देव जी तथा स्वामी श्री पग्रदेव जी श्रीहरि कृपा से उसी पोर जा निकले; रूपनाथ बालक को देख आपने पूछा कि "बालक ! तू कौन है ? और अकेला क्यों है ? तू कोई और भी तेरा संगी सहायक है ? तेरे माता पिता कौन हैं ? " 100-00- 54<noinclude></noinclude> 0vnjl91l7u4yoaxc57cj2iwa0qryc63 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२० 250 193792 664011 2026-07-02T15:41:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664011 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>55 भक्ति सुधास्वाद तिलक । ५५ 90988 सो उसी अवस्था में, ( होनेहार बिरवे के चिकने चिकने पात) आपने उत्तर कुछ विलक्षण सा दिया, कि "महाराज! अब तक तो यह दीन अपने को सहाय ही सम था परन्तु पाप का कृपा पूर्वक पूछना ही मुझे सुधि दिलाता है कि मेरा और तो माता पिता संगी सहायक कोई नहीं है, पर जो सब जगत का माता पिता साथी और सहायक है, सोई अनाथ नाथ मेरा भी संगी सहायक और माता पिता है ॥ " दोनों महात्मा सिद्ध तो थे ही, बड़े भाई श्री कील्ह देव जी ने अपने कमण्डल से कृपा रूपी जल के छींटे जों ही उनकी आंखों पर दिये, उसी छन उनकी पांखें खुली तो गईं। दोनों महानुभावों की जोड़ी का दरशन पाकर उनके नेत्रों में प्रेमाश्रु भर आए ॥ इस विषय में (अर्थात श्री नाभा जी के जन्म जाति तथा नाम की बार्त्ता) कुछ और भी निवे- दन की जाती है- स्वामी श्री नाभा जी का नाम "नभभूज" है; आप योनि पुरुष हैं; आपकी जाति तो कोई नहीं; ध्याप श्री हनुमत स्वेद से हैं, प्रतएव हनुमानवंशी प्रसिद्ध | " श्री सूर्य भगवान् से विद्यापढ़ने के अनन्तर जिस समय श्री अंजनीनन्दन पवनतनय श्री हनु- मान जी श्री शिव जी के समीप योग सीख रहे थे, 3000-<noinclude></noinclude> s92yl241hsnyxdqi84z5briqk5kign0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२१ 250 193793 664012 2026-07-02T15:41:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664012 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६ 88600- श्रीभक्तमाल सटीक । $6 -900 88 उस समय विचार के परिश्रम से जो स्वेद (पसीना ) श्री मारुति भगवान् केपन से निकला, उसको भक्तिरत्न के कोषाध्यक्ष त्रिकालज्ञ जगद्गुरु श्री शिव जी ने एक पात्र में रखलिया । कालान्तर में श्री भगवद्भक्ति के बिवर्द्धन के निमित्त उसी को नभसे भू में निक्षेप किया; इसी से इनका नाम " नभभूज" हुआ कि जो “नाभा के नाम से प्रसिद्ध है। हनुमान बंसी इसी से कह लाए ।" अयोनिज पुरुष की जाति कोई नहीं ॥ वह पसीना ( स्वेद) उस समय का था कि जब आप नेत्रों को बन्द किए हुए योग की पराकाष्ठा दशा (समाधि) में थे; अतएव श्री नाभा जी भी वाह्य नयनों से हीन (परन्तु अन्तःकरण की दिव्य दृष्टि से अनुपम रहस्य के देखने वाले ही) हुए ॥ " टीका । कबित्त । पायँ पर पांसू कृपा करि संग लाये, कोल्ह आज्ञा पाइ, मंत्र पर सुनायो है । "गलते" प्रगट साधु सेवा सो बिराजमान जानि अनुमान, ताही टहल लगायो है ॥ चरण प्रछालि संत सीध से अनंत प्रीति, जानी रस रीति, ताते हृदय रंग छायो है । बढ़वारि ताको पावे कौन पारवार, जैसो भक्ति रूप सी पनूप गिरा गायो है ॥ १३ ॥ सोप 3000<noinclude></noinclude> fc8bh9ioo9n1yzhkl70cej7hnpgfmak पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२२ 250 193794 664013 2026-07-02T15:42:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664013 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>57 भक्ति सुधास्वाद तिलक । ५७ 3000- वार्त्तिक तिलक । बड़ी श्रधा से उनने अपना सीस दोनों महात्माओं के पद पर रख दिया । कृपापूर्वक वे “गलता" स्थान में ( गालव मुनि के आश्रम में कि जो जयपुर के पास है, ) लाए गए ॥ स्वामी श्री कोल्हदेवजी की आज्ञा से, स्वामी श्री अग्रदेवजी ने नारायणदास नाम रख कर इनको श्री राम मन्त्र उपदेश किया । उक्त गादी की साधु सेवा तो प्रसिद्ध है ही, श्री नाभा जी (नारायणदास जी ) की यह टहल सौंपा गया कि “सन्तों के चरण धोया करें, तथा उच्छिष्ट पत्तल उठाया करें" " वही सन्त प्रसादी पाया करें और सन्त चरणामृत पिया करें" ॥ महात्माओं की आज्ञानुसार कुछ काल पर्य्यन्त ऐसाही करने से श्री राम कृपा से इनको सन्तों के चरणामृत तथा सीथ प्रसाद में अत्यन्त प्रीति हो गई; पर उसका स्वाद विशेष भी इनने जाना । एवं इनका अन्तःकरण भागवतों तथा भगवत के विलक्षण प्रेमरङ्ग से रङ्गगया, और ऐसे पनुपम विद्युत के चमत्कृत प्रकाश से सुशोभित हुआ कि जिसकी अलौकिक किं- चितलक की पूर्व अवस्था से ( कवित्त १० पृष्ट ४८ ) ज्ञान वैराग रूपी नेत्रों को चकचौंध सी हो जाती है ॥ जैसी पपार बढ़वारी ( बड़ाई) इनकी हुई, उस 88600-<noinclude></noinclude> p8aqi4zwrkeuviv5nemydmyoe8h1hzv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२३ 250 193795 664014 2026-07-02T15:42:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664014 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५८ --009 FRI श्री भक्तमाल सटीक ! का वार पार कौन पा सकता है ? देखिये, श्री भक्ति जी का जैसा विलक्षण स्वरूप है उसको अपनी अनूप बाणी से श्री भक्तमाल में आपने (श्रीनामा स्वामीजी ने ) कैसा गाया है ॥ श्री भक्तमालकार स्वामी श्री नाभाजी प्रथमतः "दोहाओं” में ही मङ्गलाचरण करके, अब “पटपदी (छप्पय ) छन्द” के प्रारम्भ में पहिले, चौबीसौं अवतारों का जयकारात्मक मङ्गलाचरण करते हैं । (मूल) इप्ये । जय जय मीन', बराह, कमठ', नर- हरि ं, बलि वावन' । परशुराम', रघुबीर', कृष्ण, कीरतिजगपावन ॥ बुद्ध े, क लक्की", व्यास", पृथू", हरि", हंस", मन्वन्तर" । यज्ञ", ऋषभ, हयग्रीव" ध्रुबबरदैन", धन्वन्तर" ॥ बद्रीपति", दत्त", कपिलदेव, सनकादिक", क- रुणा करौ । चौबीस रूप लीला रुचिर, श्री अग्रदास ! उर पद धरौ ॥ १ ॥ ( ५ ) २४ वार्त्तिक । जय जय जय, हे श्री मच्छ रूप भगवान ! आप की जय; हे श्री शूकर रूप भगवान ! आप की 18000- 58<noinclude></noinclude> 78ctzckp0o9umn29rrd353f254wglm7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२४ 250 193796 664015 2026-07-02T15:42:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664015 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>AL 1980-06- 59 भक्ति सुधास्वाद तिलक । जय; हे श्री कच्छप रूप भगवान! आप की जय ; हे श्री प्रह्लादपति नरसिंह जी ! पाप की जय; हे for श्री बामन जी ! आप की जय; हे श्री परशु राम ! पाप की जय ; हे प्रभों श्रीरामचन्द्र रघुवंश- ! आपकी जय हे यदुपति श्रीकृष्णचन्द्र ! पाप की जय; हे बुद्धावतार! आपकी जय ; हे श्री कल्कि भगवान ! आपकी जय; हे श्री वेदव्यास जी ! आपकी जय श्री पृथु जी ! पाप की जय ; हे गजेन्द्र रक्षक हे श्री हरि ! आपकी जय ; हे श्रीहंस रूप भगवान ! झाप की जय; हे चतुर्दश मनु पवतार ! पाप की जय; श्री स्वयंभू मनु के रक्षक श्री यज्ञ भगवान ! आप की जय; हे श्री ऋषभ भगवान ! आप की जय ; हे श्री हयग्रीव रूप भगवान ! ध्पाप की जय; हे श्री ध्रुवजी के बरदाताजी ! आप की जय; हे श्री धन्वन्तर जी ! आप की जय; हे बद्रीपति श्री नर नारायण जी ! आप की जय; हे श्री दत्तात्रेय जी ! पाप की जय; हे श्री कपिलदेव जी ! आपकी जय; हे श्रीसनक श्रीसनन्दन श्रीसनातन श्रीसनतकुमार जी पाप की जय जय हे भगवन् ! आप के चौबीस रूपों की रुचिर लीलाओं की कीर्त्ति जगत को पावन करने हारी है; आप मेरे ऊपर कृपा कीजै, अर्थात् अपने निज भक्तन सहित रुचि लीला मेरे हृदय में प्रकाश कीजिये । और हे गुरु --900*<noinclude></noinclude> bo6gdlw81knk5410zi7dx8i7xse033x पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२५ 250 193797 664016 2026-07-02T15:42:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664016 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>गिनती १० 8006- श्रीभक्तमाल सटीक । -909 देव श्री अग्रदास जी । इन चौबीस अवतारों के साथ पाप भी अपना २ पदसरोज मेरे हृदय में रखिये ॥ 60 अवतारों के नाम युग मास पक्ष* तिथि● समय जिस देश में अवतोर्ण हुए उस्का नाम १ मत्स्य कृत अ० शु० ११ प्रात पुष्पभद्रा ૨ कच्छप कृत आ० कृ० ३ प्रात समुद्र शूकर कृत भा० शु० ५ मध्यान्ह हरिद्वार ४ नृसिंह कृत बै० शु० १४ पंजाब मुलतान ५ वामन त्रेता भा० शु०१२ मध्यान्ह प्रयाग जी. ६ परशुराम त्रेता वे० शु० ३ मध्यान्ह मुनिया प्राम ७ श्रीरघुपति त्रेता चै० शु० ९ मध्यान्ह श्रीअयोध्यानी ८ ी डापर भा० कृ० ८ अहं रात्रि मथुरा जो बुद्ध डापर पू० शु० १० कल्कि | कलि मा० | शु० 9 m ७ प्रात गया कीकट) सम्बलभाम सुगवा बाद ** ये प्रसिद्ध " दश" अवतार हैं। ●करूपमेद से तिथियों में भी कहीं कहीं कमी कभी भेद पाया जाता है।<noinclude></noinclude> 4jwwflr5fliitpnhpqa58x2z05x6vpf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२६ 250 193798 664017 2026-07-02T15:42:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664017 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>61 8000- गिन्ती भक्ति सुधास्वाद तिलक । अवतारों के नाम युग देस ११ व्यास हापर १२ पृथु कृत श्री अयोध्या १३ हरि कृत त्रिकूटाचल १४ हंस कृत ब्रह्मलोक १५ मन्वन्तर कृत बिर चीवह १६ यह (रुकुम) कल द्रो १७ १८ 22 ध्रुववरदेन कृत विर श्रीव कृत कामरूप १९ ऋषभदेव कृत श्री अयोध्या २० 2 धन्वन्तर कृत समुद्र २१ नरनारायण कन बद्रिकाश्रम २२ दत्तात्रेय चित्रकूट २३ कपिलदेव विन्दसर के समीप २४ सनकादि कत ब्रह्मलोक चार ६१ टीका (कवित्त ) अवतार, सुखसागर न पारावार, करे विसतार लीला जीवन उधार कीं । जाही रूप मांझ मन लागे जाको, पागे ताही; जागे हिय भाव वही, पावे कोन -408<noinclude></noinclude> qm0ao3c81vcdnhn4aqnjnp1w18sltyt पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२७ 250 193799 664018 2026-07-02T15:43:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664018 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२ 3000 श्रीभक्तमाल सटीक । पार क ॥ सब हो हैं नित्त, ध्यान करत प्रका चित्त, जैसे रंक पावे वित्त, जोपे जाने सार कौं । के- शनि कुटिलताई ऐसे मीन सुखदाई, अगर सुरीति भाई, बसौ उर हार की ॥ १४ ॥ वार्त्तिक ॥ भगवतके जितने अवतार हैं, वे सबही सुखके समुद्र हैं, जिनका वारपार (योर छोर) कौन पासकता है; प्रत्येक की लीला का विस्तार पसार, जीवों के ही उद्धार के निमित्त है। जिस भक्त का, जिस अवतार के रूप नाम लीला धाम में मन लगे, और उसमें वह रंगै, उसके हृदय में वही भाव ऐसा जाग उठता है ( प्रकाश मान होता है) कि कहांतक उस्की प्रशंसा कीजाय, उस्का पन्त नहीं । सबही अवतार नित्य हैं, सबही ध्यान करने से चित्त को प्रकोश कारक; पौर सथ ही ऐसे सुखद हैं कि जैसे दरिद्री को धन का मिलना सुख देता है। हां, इतनी बात तो अवश्य है कि यदि सारांश तत्व का ज्ञान होवे, तब सुख प्राप्ती होती है ॥ की जिस प्रकार से 'टेढ़ापन' रूपी दोष भी बालो ( केशों) के सम्बन्ध में सुखद गुणही होता है, वैसेही मी बाराह आदि तिर्यक शरीर भी भगवत की प्रभु- ता के सम्बन्ध से प्रति सुखदाई ही हैं ॥ 1800- 62<noinclude></noinclude> a5kc91gz5fela0h9rpeulafk4sp7jj0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२९ 250 193800 664019 2026-07-02T15:43:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664019 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६४ 1860-00- श्रीभक्तमाल सटीक । छप्पय । चरण चिन्ह रघुबीर के, संतन सदा सहायका ॥ अंकुश, अंबर, कुलिस, क- मल, जव, धुजा, धेनुपद । शंष, चक्र, स्वस्तिक, जंबूफल, कलस, सुधाहृद ॥ अर्द्धचन्द्र, षटकोन, मीन, बिंदु, ऊरध- रेखा । अष्टकोन, त्रैकोन, इन्द्रधनु, पु- रुषविशेषा ॥ सीतापतिपद नित बसत, एते मंगल दायका । चरण चिन्ह रघु- बीर के, संतन सदा सहायका ॥२॥ (६) 'वार्त्तिक । चौबीसें अवतारों का मङ्गलाचरण करके, स्वामी श्री नाभा जो महाराज अब, साकेतपति श्री अवध बिहारी निज प्रभु श्री सीतापति रघुबीर जी के चरण पङ्कजों में के सुखदायक सहायक पापहारी जन उद्धार- कारी चिन्हों का मङ्गलाचरण करते हैं । श्री जानकी जीवन रघुबीर जी के पदकंज में " अंकुश” प्रमुख (अठतालीस) चिन्ह सदैव विराजते हैं; परम मङ्गल के देनेवाले तथा संतों की विशेष सहायता करने वाले हैं ॥ 64<noinclude></noinclude> t29byskz3wnnz6qyqger3xi4hr7kvfr पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३० 250 193801 664020 2026-07-02T15:43:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664020 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>65 158400- 18600- 66 भक्ति सुधास्वाद तिलक । 'महारामायण " प्रमुख की मति से श्रीचरण चिन्ह तो वस्तुतः ४८ (अड़तालीस) हैं, २४ (चौबीस) दक्षिण पदपंकज में, और २४ (चौबीस ) बामचरण सरोज में ॥ श्री अगस्तिमुनीश्वर कृत “श्री रघुनाथ चरण चिन्ह स्तोत्र" में ४८ में से केवल १८ (अट्ठारह) ही रेखाओं का वर्णन है अर्थात् (१) अम्बुज (२) अंकुश (३) यव (४) ध्वज (५) चक्र (६) ऊर्द्धरेखा (७) स्वस्तिक (८) अष्टकोण (९) पवि (१०) बिन्दु (११) त्रिकोण (१२) धनु (१३) शुक वा पम्बर अर्थात् वस्त्र (१४) मत्स्य (१५) शङ्क (१६) चन्द्रार्द्ध (१७) गोष्पद और (१८) घट ॥ ऐसेही, श्री किशोरी जी की एक कृपाश्रिता ने केवल ९ (नव) ही रेखाओं की बन्दना की है (सोरठा) बन्द सिय पद (१) रेख, (२) श्री लक्ष्मी, परु (३) श्री सरयू । (४) शक्ती (५) पुरुष बिसेख, (६) स्वस्तिक (७) शर (८) धनु (९) चन्द्रिका ॥ एवं श्रीयामुनाचार्य महाराज जी ने "आल वन्दार स्त्रोत्र" में इन पठतालीस में से केवल सातही चिन्ह चुन के लिखे (१) दर (२) चक्र (३) कल्पवृक्ष (४) ध्वजा (५) कमल (६) अंकुश और (७) यज्ञ ॥ गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी ने तो पति कल्याण दायक केवल चारही चिन्ह लिखे, अर्थात् (१) ध्वज (२) कुलिश (३) पङ्कुश (४) कमल ॥ ६५<noinclude></noinclude> 5j7ifah2wj16okynccn8p8tgiawkpe4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३१ 250 193802 664021 2026-07-02T15:43:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664021 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>183600-- श्रीभक्तमाल सटीक । ( कवित्त ) ध्यावहीं मुनीन्द्र राम पदकंज चिन्ह राज, सन्तन सहायक परु मङ्गल सन्दोहहीं । ऊर्द्ध रेखा स्वस्तिक, परु अष्टकोण, लक्ष्मी, हल, मूसल, परु शेष, शर, जन जिय जोहहीं ॥ अम्बर, कमल, रथ, बज्ज, जव, कल्पतरु, अंकुश, ध्वजा, मुकुट, मुनि मन मोहहीं । चक्र पौ सिंहासनऽरु यमदण्ड, चामर पि, छत्र, नर, जवमाल दहिने पद सोहहीं ॥१॥ ( पथ चिन्हों के स्थान ) भक्तवत्सल श्री जानकीवर के दक्षिण पद की रेखाएं । 138600-- २४ जयमाल २३ नर २२ न २९ चामर २० यमदण्ड १९ सिंहासन १८ च १७ मुकुट १६ १५ अंकुश १४ कल्पतरू १ अर्द्ध रेखा २ स्वस्तिक १३ जव (अँगूठेमें) १२ ब ११ रघ १० कमल ९ अम्बर घर ७ शेष ६ मूसल ५ इल ४ ३ अष्टकोन 66<noinclude></noinclude> jyfx3tr7e2eg9taho61ga0j7wp38nid पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३२ 250 193803 664022 2026-07-02T15:43:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664022 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>BG00- 67 भक्ति स्वाद तिलक । (कवित्त) वाम पद, सरयू, गोपद, भूमि, कलशा, पताका, जम्बूफल, अर्द्धचन्द्र, शंख, राजहीं । षटकोण, तीनकोन, गदा, जीव, विन्दु, शक्ति, सुधाकुण्ड, त्रिबली प्रताप सुर गाजहीं ॥ मीन, पूर्णचन्द्र अरु वीणा अपि, बंशी पुनि धनुष, तुणीर, हंस, चन्द्रिका, विराजहीं । एते चिन्ह श्रीसियपिय पद पंकज के, “ तपसी " मंगलमूल, सब सुख साजहीं ॥ २ ॥ ( अथ चिन्हों के स्थान ) दीनघन्धु श्री जानकीवर के वामपदकी रेखाएं । ३७ बिन्दु (अँगूठे में) ३६ जीव ३५ गंदा ३४ तीन कोन ३३ षट्कोण ३२ शंख ३१ अर्द्धचन्द्र o २९ पताका 9 भूम २५ सरपू ४८ चन्द्रिका 23 ਵਿੱਚ ४६ तूणीर ४५ धभुष ४४ वंशी ४३ वीणा ४२ पूर्णचन्द्र ४१ भोन ४० त्रिमली ३९ सुधाकुल ३८ शक्ति 3600- २६ गोपद<noinclude></noinclude> enc02mh765vzo94ueij9em680ujrm4u पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३३ 250 193804 664023 2026-07-02T15:44:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664023 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६८ BG00- 600- श्रीभक्तमाल सटीक । 68 3000 रेखाओं के उनके रंग नाम उनकेध्यानलाम विशेष उस चिन्हमे कावतार १. ऊर्व ध्वरेखा लाल (गुलबी) महायोग, भवसिन्धु तु सनकादिक • चारो २ स्वस्तिक पीत मंगल, कल्याण श्रीनारद जी ३ अष्टकोण लाल & सपेद अष्टसिद्धिदायक कपिल देव यन्त्र ४ महालक्ष्मी महासुन्दर गुलाबी सर्व सम्पत्ति श्रीलक्ष्मी जी ५ हल स्वेत विजय वलरामजीकाहल ६ मूसल धूम ान वलरामजी कामूसल ७ शेष स्वेत शान्तिप्रद ८ शर स्वतः पीत सद्गुण अम्बर नीला, (वस्त्र) बिजलीसा भयार्त्तहरण १० कमल गुलाबी हरि भक्ति ११ चार घोड़ों घोड़े सपेव का रथ रथ विचित्र विशेष पराक्रम श्रीरामानजस्वामी, शेष प्रसिद्ध वाणसम बराह भगवन् विष्णुकाम स्वयंभू मनुः पुष्पक विमान १२ वज्र ( पवि) बिजलीसा बलदायकः पापसंहारक इन्द्रका बज्र १३ यब ( जव) स्वेत रक्त मोक्षः शृंगार कुवेर; यज्ञावतार १४ कल्पतरु हरा इच्छित फल सुरतर, पारिजात १५ अंकुश श्याम मन निमह १६ ध्वजा विचित्र विजयः यश १७ मुकुट सोनहरा भूषण पृथुः वित्र्यभूषण १८ चक्र तप्तकांचन शत्रु का विनाश सुदर्शन कल्कि १९ | सिंहासन तप्त कांचन विजय २० यम दण्ड कांस निभर्यता यमराज: धर्मराव<noinclude></noinclude> 0vikg9hsr891hjehae65hr2csgr3ynu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३६ 250 193805 664024 2026-07-02T15:44:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664024 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>71 18000- दुःखहारी रेखाएं भक्ति सुधास्वाद तिलक | झलकारी रेखाएं १ उर्द्ध रेखा १ अष्टकोण● २ ह ३ महालक्ष्मी ३ मसल ५ शर २ स्वस्तिक ४ शेष ६ कंज ४ अम्बर 9 स्पन्दन ८ कल्पवृक्ष ५ कुलिश ९ मुकुट १० सिंहासन ६ यव ११ चामर १२ क 9 अंकुश १३ पुरुष १४ जयमाल ८ ध्वजा • अष्टकोण ● यव चक्र १० यमदवड ११ गोपद १५ सरयू १७ घट १९ जीव १६ पृथ्वी १२ पताका १३ अर्द्धचन्द्र १८ जम्बुल २० बिन्दु २१ शक्ति २२ सुधाइद २३ त्रिवली १४ दर २४ मरस्प २५ पूर्णसि १५ षट्कोण २६ वीणा २७ निषंग १६ त्रिकोण २० हंस २९ चन्द्रिका • अर्द्धचन्द्र १७ गदा १० वंशी १९ धनुष ४८ में १९ दुःखहारी हैं और २९ सुखकारी । ये तीन दुःखहारी भी हैं और सुखकारी भी - अष्टकोण, यव, और अर्तुचन्द्र ॥ करुणासिन्धु श्रीनाभाजी महाराज ने ४८ में से बिशेष सहायक २२ (बाईस) चिन्हों का ही मंगलाचरण किया है, जिनमें से ११ (ग्यारह ) प्रत्येक पद के हैं ॥ अर्थात् (९) अंकुश (२) रूपम्बर (३) कुलिश (४) कमल (५) जव 188600-<noinclude></noinclude> 2omqbw4czjdmysudpjz8u4co2kbu1sk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३७ 250 193806 664025 2026-07-02T15:44:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664025 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७२ श्रीभक्तमाल सटीक । (६) ध्वजा (७) चक्र (८) स्वस्तिक (९) ऊद्ध रेखा (१०) अष्ट कोणा (११) पुरुष । ये ग्यारह दाहिने पद के पौर (१) गोपद (२) शंख (३) जम्बु फल (४) कलस (५) सुधाकुण्ड (६) अर्द्धचन्द्र (७) षट्कोण (c) मीन (९) बिन्दु (१०) त्रिकोण (११) इन्द्रधनुष ये ग्यारह बाएं चरणकंज के ॥ टीका | कवित्त | सन्तनि सहाय काज, धारे राम नृपराज चरण- सरोजन में चिन्ह सुखदाइये । मनही मतंग मतवारो हाथ पावे नाहिं, ताकेलिये " " पङ्कुश ” " ले धायो, हिये ध्याइये ॥ सठता सतावै शीत, ताही तें "अम्बर" यो हो जन शोक ध्यान कीन्हे सुखपाइये | ऐसेही " कुलिश" पाप पर्वत के फोरिबे को, भक्ति निधि जोरिबे को " कंज " मनल्याइये ॥ १५ ॥ वार्त्तिक तिलक | सन्तों की सहायता के अर्थ नृपराज महाराज श्रीरामचन्द्र कृपासिन्धुजी ने अपने पदकमलोंमें भक्तों के सुखदाई चिन्ह वृन्द धारण किये हैं । मन रूपी मतवाला गजेन्द्र अपने बशमें नहीं होता है; इसी लिये प्रभु "अंकुश " चिन्ह निज चरण पंकज में धारण किया, कि भक्त जन निज मन रूपी मत्त हस्ती को बश करने ने 72<noinclude></noinclude> 6nr035wgz5jx2wew3q372xm5fv8vhik पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३८ 250 193807 664026 2026-07-02T15:44:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664026 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>73 भक्ति सुधास्वाद तिलक । " के निमित्त, उक्त चिन्ह का ध्यान अपने हृदय में करके, इसकी सहायता से यश करलें । इससे " अंकुश' चिन्ह का ध्यान करना चाहिये ॥ सठता ( जड़ता * ) रूपी शीत हरिजनों को दुख देता है, इसी लिये "अम्बर" ( बस्त्र ) चिन्ह को धरा, कि जिसमें इस चिन्ह का ध्यान भक्त जनों के शोक की हरे, तथा प्रतिष्ठादि सुख प्राप्त हों। 1 • (चौ०) जड़ता बाड़ विषम तर लांगा गयडु न मज्जन पाव अभागा ॥ (मानस राम चरित) इसी प्रकार, पाप रूपी पर्वत के फोड़ने के हेतु " वज्ज" रेखा, और प्रेम मय नवधा भक्ति रूपी नवों निधियों के जोड़ने के हेतु, सर्व निधीश्वरी श्री लक्ष्मी जी का वास स्थान कमल तिसका चिन्ह धारण किया । उक्त सहाय के हेतु दोनों चिन्ह मन में लाके ध्यान करना चाहिये ॥ " टीका | कवित्त | "जय" हेतु सुनो सदा दाता सिद्धि विवाहों को, सुमति सुगति सुख सम्पति निवास है । छिनुमें सभीत होत कलि की कुचाल देखि, "ध्वजा " सो विशेष जानो भै को विश्वास है ॥ गोपद सो हेहैं भवसागर ना- गर नर जो पै नैन हिय के लगावे, मिटे त्रास है । कपट कुचाल मायाबल सबै जीतथे को, " दर" को दरस कर, जीत्यो अनायास है ॥ १६ ॥ 3000- १०<noinclude></noinclude> r48761vd5aicy2bos6uhhpypqqfooy0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३९ 250 193808 664027 2026-07-02T15:45:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664027 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७४ 1886-00- श्रीभक्तमाल सटीक । वार्त्तिक तिलक । 74 "जव ( यव ) " चिन्ह के धारण का अभिप्राय सुनो कि ध्यान करनेवाले को यह चिन्ह सर्व विद्या सर्व सिद्धियां देता है; पोर सुमति सुगति सुखसम्पत्ति का निवास स्थान है; इससे, ध्याता को भी इन गुणों का घरही कर देता है ॥ afort कुचालों को देख देख के भक्त जन क्षण- मात्र में भय ग्रसित हो जाते हैं, उनको विशेष करके मयत्व का विश्वास दिलाने के लिये प्रभु ने ध्वजा चिन्ह को धारण किया है । और "गोपद" चिन्ह धारण करने का हेतु यह है कि जो प्रवीण (नागर) जन इस का ध्यान करेगा तिसको अपार भ्रवसागर गोपद के सरीखा सुलभ हो जायगा, सो जो कोई जन अपने हृदय के नेत्रों को इस " गोपद" के ध्यान में लगावे, तो उसको भवसागर में डूबने यादि का डर मिट जावे दंभ कपट कुचाल इत्यादिक माया के जालों को बिना प्रयास जीतने के हेतु "शंख" चिन्ह को श्री प्रभुने धारण किया तिसको दर्शन करके भक्तजनों ने उक्त माया जाल को बिना प्रयास हो जीत लिया, क्योंकि शंख बिजयकारी शब्द संयुत है | इस सहायता रूप कृपा की जय ॥ टीका | कवित्त । काहुं निशाचर के मारिये को " चक्र" घारखो, 18000-- -90988<noinclude></noinclude> dactvajcyngtmc8kfbxzdc5cyic7lzg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४० 250 193809 664028 2026-07-02T15:45:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664028 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>75 183600-- 66 भक्ति सुधस्वाद तिलक । ॥ ७५ -90983 मङ्गल कल्याण हेतु स्वस्तिक हुँ मानिये । मंगलीक 'जम्बूफल, फल चारिहूं को फल, कामना पनेक fafa पूर्ण, नित ध्यानिये ॥ " कलस" " सुधाकोसर" भयो हरि भक्ति रस, नैन पुट पान कीजे, जीजै मन यानिये । भक्ति को बढ़ावे औ घटावे तीन तापहूं को, "अर्ध चन्द्र" धारण ये कारण हैं जानिये ॥ १७ ॥ वार्त्तिक तिलक | कामरूपी निशाचर के बध के लिये " चक्र" चिन्ह को धारण किया, मङ्गल और कल्याण के निमित्त “स्वस्तिक” रेखा का धारण मानिये ॥ “जम्बूफल ” को मङ्गलों का करने वाला, तथा चारोंही फलों का फल रूप, और सत्र मनकामनाओं को नाना प्रकार से पूरा करनेवाला, जानके नित्य ध्यान कीजे ॥ "अमृत का घड़ा" और "अमृत का हूद ” (तालाब) इसलिये धारण किये, कि इन्हें ध्यान करनेवाले के हृदय में भक्तिरस भ; और मानसिक नयन पुट से पीकर परम अमरत्व प्राप्त हो ॥ "पर्द्धचन्द्र" चिन्ह के धारण के कारण ये जानिये कि, इसके ध्यान से तीनों ताप घटते हैं, और प्रेमाभक्ति बढ़ती है ॥ " टीका | कवित्त | विषया भुजङ्ग बलमीक तनमांहिँ बसे, दास को न उसे, ताते यत्न अनुसस्यो है। "स्पष्ठकोन” “षटकोन” 880-00-<noinclude></noinclude> tt9w85iqkhff0xw0m28vpegk7d55383 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४१ 250 193810 664029 2026-07-02T15:45:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664029 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>30-00- श्री भक्तमाल सटीक । "त्रिकोन" जंत्र किये, जिये जोई जानि जाके ध्यान उर भयो है। “मीन” “विन्दु” रामचन्द्र कान्ह्यों वशीकर्ण पायें ताहिते निकाय जन मन जात हस्थो, है । संसार सागर को पारंवार पावैं, नाहिँ “ऊर्ध्वरेखा " दासन को सेतुबन्ध कस्यो है ॥ १८ ॥ वार्त्तिक तिलक । शरीर रूपी वल्मीक ( बामी वा बमीठ ) में कामा- दिक विषय रूपी सांप जो बास करता है, सो जिसमें भक्तों को न काखाय, इस लिये प्रभुने ये यत्न किये, कि " अष्टकोण", " षटकोण", और "त्रिकोण" यत्रों को धारण किया। जिसने इस बात को जानके इन रेखाओं का ध्यान हृदयमें किया, सोई जन विषय भुजंग से बच के खण्ड जिया ॥ Tea पौर श्रीरामचन्द्र जी ने अपने पाय (पद पङ्कज) में "मी" और "बिन्दु” चिन्हों को बशीकरण यन्त्र बनाके धारण किया, क्योंकि मीन जगत बशीकारक "कामदेव" का ध्वजा है तथा "बिन्दु" ( बेंदी ) भी वशीकरण तिलक रूप है। इसी से, श्री प्रभु चरणा चिन्तवन करने हारे समस्तजनों के मन हरे जाते हैं अर्थात् प्रभुके बिबश होते हैं ॥ अपार संसार रूपी समुद्र को पार कोई नहीं पा सकता; अतएव ऊर्ध्व रेखा रूप सेतु (पुल) बांधा है, कि जिसमें ध्यानारूढ़ होके, मेरे भक्त, सुगमही, संसारसागर उतर जावें ॥ 8000- 76<noinclude></noinclude> 405jdremegraihqqmr7h22poklc64fd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४२ 250 193811 664030 2026-07-02T15:45:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664030 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>77 |8600- भक्ति सुधास्वाद तिलक टीका | कवित्त । | "धनु" पद मांहिँ घरखो, हस्यो शोक ध्यानिन को, मानिन को मारो मान, रावणादि साखिये। “पुरुषं विशेष” पद कमल बसायो राम हेतु सुनो अभिराम, श्याम भिलाखिये ॥ सूधी मन सूधी बन सूधो कर- तूति सब ऐसो जन होय मेरो, याही के ज्यों राखिये । जो बुधिवन्त रसवन्त रूप सम्पति में, करि हिये यान हरिनाम मुख भाखिये ॥ १९ ॥ * वार्त्तिक तिलक || श्री धनुधारीजी ने पदकंज में " इन्द्रधनुष" को चिन्ह धारण करके ध्यानधारी जनों का शोक नाथ किया, क्योंकि महामानी रावणादिकों के मान और प्राण का क्षय, धनुषही से किया; सो वे मरके साक्षी दे रहे हैं कि हम लोग भक्त द्रोही थे तिन्हों को श्री राम धनुष ने नाश किया; तैसेही, “इन्द्रधनुष" चिह्न ध्यानियों के समस्त शत्रुपों का नाश करके विशोक करेगा ॥ "पुरुष" नाम चिन्ह को अपने पदकमल में बसाया, तिसका अति सुन्दर कारण सुनके श्यामसुन्दर सियावर श्री राम की अभिलाषा कीजे; श्री प्रभु इस चिन्ह से यह जाते हैं कि जो हमारा जन सरल *१५ से १९ तक, इन पांच चार कवितों को किसी किसी ने "क्षेपक" " बताया है।<noinclude></noinclude> 04slv9onmzy3r1r3xiiafywc5gq2mlu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४३ 250 193812 664031 2026-07-02T15:45:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664031 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७८ श्रीभक्तमाल सटीक | (सूधा) मनवाला, सरल बचनवाला, सरल कर्म वाला और इस चिन्ह का ध्यान करनेवाला हो, तिसको इसी चिन्ह के समान मैं अपने पद में अर्थात् पद प्रेम रूपी स्थान में, तथा ( अन्त में ) परम पद श्री सा- केत धाम में रखूंगा ॥ जो जन कदाचित् ऐसे बुद्धिमान हों, तथा श्री राम रूप सम्पत्ति में रस ( स्नेह ) वन्त हों, सो समस्त श्री चरण चिन्हों का ध्यान करके श्री सीताराम नाम ही मुख से निरन्तर कहें || 78 छप्पय । बिधि', नारद, शङ्कर', सनकादिक", क- पिलदेव',मनुभूप'; नरहरिदास, जनक, भीषम, वलि, शुक" मुनि, धर्म स्वरूप । अंतरंग अनुचर हरि जू के, जो इन hi यश गावै; आदि अन्त लौ मङ्गल तिनको स्रोता बक्ता पावें । अजामेल" प- रसंग यह निर्णय परम धर्म के जान; इनकी कृपा और पुनि समझे " द्वादश भक्त" प्रधान ॥ ३ ॥ (9) 400-<noinclude></noinclude> crrg6v5hg88fgbpd1xv8uh16vfe2sj1 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४४ 250 193813 664032 2026-07-02T15:45:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664032 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>79 भक्ति [630-00- 18600- सुधास्वाद तिलक | वार्त्तिक तिलक । स्वामी श्री नाभा जी १२ (द्वादश) महाभक्त राजी . के नामोच्चारण पूर्व्वक भक्तों की "माला" का प्रारम्भ करते हैं । ( १ ) श्री ब्रह्माजी ( २ ) श्रीनारदजी ( ३ ) श्री उमापति शिवजी (8) [१] श्रीसनक [२] श्रीसनन्दन; [३] श्रीसनातन, [४] श्री सनत्कुमार (५) श्रीकपिलदेवजी (६) महाराज श्री मनु जी (७) श्री प्रह्लादजी [ नृसिंह दास ]; ( ८ ) पिता श्री जनक जी महाराज ( ९ ) श्री भीष्माचार्य जी (१०) श्री बलिजी (११) परम हंस श्री शुकदेव जी महा मुनि, भागवत, धर्मस्वरूप, (१२) श्री अजामिलजी ॥ जो जन श्री सीतारामचन्द्रजी के इन ऐकान्तिक प्रिय समीपी प्रधान द्वादश भक्तराजों के यश गावें, तिन महा भक्तों के यशों के श्रोता वक्ता यादि पन्त तक ( सदैव ) मंगल पावैं । परम धर्म के निर्णय में श्री- जामिल जी का प्रसंग जानने योग्य है; अर्थात् श्री नामोच्चारणादि भागवत धर्म सप्रेम करने की तो बातही क्या है, नामाभास मात्र ने भी सब महापातकों का विनाश कर ही दिया ॥ ये द्वादश, ( ऊपर लिखे हुए श्री विरंचि महेश नारदादि बारही), तो महा प्रसिद्ध भक्तराज हैं हो, पुनि और समस्त भक्त मात्र इन्ही 1800-00- 1886.00 -•90983<noinclude></noinclude> s4m5e0bx6e33ettgi7pfvc0szrpojdx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४५ 250 193814 664033 2026-07-02T15:46:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664033 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>& Go श्रीभक्तमाल सटीक । की कृपा उपदेश तथा सतसंग से समझना चाहिये; अर्थात् श्री लक्ष्मीनारायण की शिक्षित वैष्णव संप्र- दायों के भागवतधर्म विशेष के प्राचार्य्यवर और प्रचारक शिरोमणि ये ही बारहो तो हुवे ॥ 80 90 (दो) “बिधि, शिव, नारद, शुक, जनक, सनकादिक, प्रहलाद | ज्यों हरि प्रापुन नित्य हैं, त्यों ये भक्त पनाद ॥ " (१) श्री ब्रह्मा जी । (सो०) बन्दों बिधिपद रेणु, भवसागर जिन कीन्ह यह । सन्त सुधा ससि धेनु, प्रगटे खल विष वारुणी ॥ सृष्टि और सुख दुःखादि प्रारब्धरेखाओं के कर्त्ता जगत पिता सुगम गमवरदाता श्री ब्रह्मा जी की (श्री भगवत नाभी कमल से जन्म प्रादि) कथाऐं, पु- राणों में गणित हैं । " हानि लाभ जीवन मरन यश अपयश विधि हाथ " ॥ श्रीविधाता जी यद्यपि सब निष्ठा में श्रेष्ठ तथा प्रधान हैं, तथापि इनकी गणना" धर्मप्रचारक निष्ठा" में प्रत्यक्ष है । जिन देव ** मुनि गो महि इत्यादिक की प्रार्थना से भगवत के विविध अवतार होते हैं उन मण्डलों के अगुवा और मुखिया श्रीपज हो तो होते हैं, सो व्यवस्था Treat विदित नहीं हैं ?<noinclude></noinclude> 56j3btn0b7547srxgbazipqgbayl810 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४६ 250 193815 664034 2026-07-02T15:46:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664034 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>81 भक्ति सुधास्वाद तिलक | ८१ (२) श्री नारद जी । ( चौ० ) बन्दों श्री नारद मुनि नायक । करतल बीण राम गुण गायक ॥ प्रतिहतगति देवर्षि श्रीनारद भगवान् तो परमात्मा ही हैं, भगवत के पवतार हैं, और जगत के परम उपकारक प्रसिद्ध हैं । सेवापूजा, कीर्तन, प्रसाद, भक्ति प्रचारक इत्यादिक सबही निष्ठाों में प्रधान हैं। पुराण मात्र में की शुभ कथा भरी है। सर्व लोकों में पाप आपका पर्यटन केवल परोपकार के निमित्त यही आपका व्रत साहै ॥ (३) श्री शिव जी । टीका | कवित्त | द्वादश प्रसिद्ध भक्तराज कथा "भागवत " अति सुखदाई, नाना विधि करि गाए हैं। शिवजी की बात एक बहुधा न जाने कोऊ, सुनि रस साने, हियो भाव उरझाए हैं । " सीता" के बियोग "राम " बिकल बिपिन देखि "शंकर" निपुण “सती " बचन सुनाए हैं । " कैसे ये प्रबीन ईश ? कौतुक नवीन देखौं"; हूँ करत अंग वैसेही बनाए हैं ॥ २० ॥ वार्त्तिक तिलक | बारहो प्रधान भक्त राजों की कथाएं "श्री मद्- भागवत" प्रभृति में व्यास शुकादि ने नाना प्रकार से कही हैं । परन्तु श्री महादेव जी की एक बात प्रायः 18000- ११<noinclude></noinclude> 98y432jy05cwjl9txjyr11jmnnq6dj1 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४७ 250 193816 664035 2026-07-02T15:46:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664035 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>8 f ८२ -90099 श्रीभक्तमाल सटीक | सुन सब लोग नहीं जाते; सो उस अपूर्व बार्त्ता को .के, पपने हृदय को श्रीसीताराम भक्ति रस में सान देना चाहिये, देखिये श्रीमहेश्वरजी श्री सीताराम भक्ति के भाव में पपने मन को कैसा उलझाए (अटकाए हुए हैं ॥ श्रीशंकर जी तो परम प्रवीण ही हैं परन्तु "सती" जी ने मोह वश श्री महादेव जी से कहा कि “हे प्रभो ! इन (श्रीराम) को आप प्रवीण परमेश्वर परमात्मा कहते हैं सो कैसे ? क्योंकि इनका यह कौतुक नवीन तो देखही रही हू कि स्त्री श्री सीताके वियोग से बन में ये विकल हैं ! तब श्री शिवजी ने बहुत समझाया पर न समझ, पर परीक्षा लेने को चलीं ही । तब, जगद्गुरु श्री शिवजी ने वरज दिया कि "सावधान ! कोई प्रविवेक की क्रिया मत करना " । तथापि, सतीजी ने जगजननी श्रीरामप्रिया श्रीजानकी जी महारानी कासा अपना रूप बनाया ॥ टीका | कवित्त | ताही सो रूप वेष, लेश हू न फेर फार, रामजी निहारि नेकु मन में न आई है। तब फिरि पाइकै सुनाइ दई शंकर को; पति दुख पाइ, बहु बिधि समुझाई है | इष्ट को स्वरूप धरखो, ताते तनु परिहस्यो, पखो बड़ी शोच मति प्रति भरमाई है। ऐसे प्रभु भाव पगे, पोधिन में जगमगे, लगे मो को प्यारे, यह बात रीझि गाई है ॥ २१ ॥ 188600-- 18000--<noinclude></noinclude> pqq7qw93pqz5tdsgabsjx2jv9kr7s34 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४८ 250 193817 664036 2026-07-02T15:46:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664036 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>83 भक्ति सुधास्वाद तिलक । वार्तिक तिलक । अपने जाते ती सतीजी ने कुछ भी श्रीजनकललीजी के रूप और वेष से पन्तर न रक्खा, पर, सर्वज्ञ श्रीप्रभु ८३ को देख के मन में कुछ भी न लाए । तब फिर पाके सतीजी ने श्रीशिवजी को सब सुना दिया; श्रीशिवजी ने मन में बड़ा ही दुख पाया और पनेक प्रकार से सती जी को समझाया कि तुम ने मेरी परम इष्ठ देवता श्रीजानकी सीता जी महारानी का रूप धारण किया, पत: मैं ने तुम्हारे इस शरीर में से पत्नी भाव को त्याग किया। श्री सती जी मति के भ्रम वश यो बड़े ही शोच में पड़ीं। सो कथा प्रसिद्ध ही है कि सती जी ने वह तन त्याग ही तो दिया और श्रीशिव जी से तब मिल सकीं कि जब श्री गिरिवरराजकिशोरी हुईं हो ! धन्य श्रीगिरिजापति हैं कि अपने प्रभु के भाव में ऐसे पगे हुए हैं कि पुराणों में पाप की भाव भक्ति की कथाएं जगमगा रही हैं। यह बात अति- शय प्रिय मुझे लगी; इस्से रीझ २ के गान किया है ॥ -:0:- टीका | कवित । चले जात मग उभे खेरे शिव दोठि परे, करे पर- नाम, हिय भक्ति लागी प्यारी है। पारवती पूछें “किये कोन को ? जू! कहो मोसों, दोखत न जन कोऊ" (3600-<noinclude></noinclude> erprt2uzraelvq8pnikwmrdiniym0vb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१४९ 250 193818 664037 2026-07-02T15:46:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664037 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८४ श्री भक्तमाल सटीक । तब सो उचारी है ॥ " बरष हजार दश बीते तहां भक्त भयो; नयो और है दूजी ठौर बीते धारी है। " सु निकै प्रभाव, हरि दासनि सो भाव बढ्यो, रढ़यो कैसे जात चढ्यौ रंगपति भारी है ॥ २२ ॥ वार्त्तिक तिलक | 84 एक समय श्री चन्द्रभूषण अपनी प्राणप्रिया श्री पारवतीजी के सहित कैलाशशिखर को छोड़कर भूम- डल में विचरने के हेतु निकले, मार्ग में दो उजड़े २ छोटे ग्रामों के टीले ( खेरे ) देखके नन्दी से उतर के दोनों को प्रणाम किया। क्योंकि भक्तों की भक्ति प्राप को प्रतिही प्यारी लगती है । तब श्री पारवतीजी ने पूछा कि "प्रभो ! आपने प्रणाम किस्को किया ? प्रत्यक्ष में तो कोई जन दिखाई देताही नहीं ।" श्रीमहादेवजी ने उत्तर दिया कि “हे प्रिये ! यह जो एक टीला दीखता है तहां दस हजार बर्ष बीते कि एक श्रीसीतारामानु- रागी परम भक्त निवास करते थे, पर वह जो दूसरा. खेरा दिखाई दे रहा है उसमें दस सहस्र वर्ष व्यतीत होने पर एक दूसरे भक्तराज निवास करनेवाले हैं । इसी से ये दोनों स्थल मेरे बन्दनीय हैं" ऐसा श्राचर्य्य- जनक प्रेम देख और भागवत प्रभाव सुनके, श्रीपार्वती जी ने इस बात को पपने मन में धारण किया, उनका प्रेमभाव भगवद्भक्तों में अत्यन्तही बढ़ा, कि जो 88400- --0008<noinclude></noinclude> rs7s225z880kz71soelvzivia04tkgy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५० 250 193819 664038 2026-07-02T15:46:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664038 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>85 33600- भक्ति सुधास्वाद तिलक | 대 क्योंकर कहा जासकता है (रढ़घो कैसे आत), क्योंकि उनके अन्तःकरण रूपी स्वच्छ वस्त्र पर अनुराग का रंग गहरा चढ़ाया ॥ श्लोक | भवानीशङ्करी बन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् ॥ श्री शिवजी इसी से भागवतों में शिरोमणि गिने जाते हैं और इनके अनेक चरित्र ऐसे परउपकार भरे हैं कि जैसे “विषभक्षक, त्रिपुरारि,” इत्यादिक नामों से ही सूचित होते हैं । आपकी कथासमूह पुराणों में प्रसिद्ध हैं; पाप जगद्गुरु परमोपदेशक हैं, श्रीरामनाम माहात्म्य के प्रकाशक हैं, और श्री काशीजी में मरनेवाले जीवमात्र को श्रीरामतारक मन्त्र सुनाके मुक्ति देते हैं ॥ (४) सनकादि । सनकादिकारी भाई (१) श्रीसनक (२) श्रीसनन्दन (३) श्रीसनातन (४) श्रीसनतकुमार, श्रीभगवत के पव- तार और श्रीब्रह्माजी के पुत्र हैं । ( चौपाई ) जानि समय सनकादिक पाए। तेज पुंज गुण शील सुहाए ॥ ब्रह्मानन्द सदालयलीना । देखत बालक बहु कालीना ॥ रूप धरे जनु चार वेदा । समदरसी मुनि विगत विभेदा ॥ पासा बसन व्यसन यह तिनहीं । रघुपति चरित होय तहँ नहीं ॥ मुनि रघुपति छवि तुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥ 0000<noinclude></noinclude> 1z7cxwuvkxqiynjupch0svm14tpidh9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५१ 250 193820 664039 2026-07-02T15:47:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664039 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८६ 183600- श्रीभक्तमाल सटीक । (दोहा) बार बार प्रस्तुति करि, प्रेम सहित सिरुनाइ ॥ ब्रह्म भवन सनकादि गे, प्रति अभीष्ट वर पाइ ॥ (५) श्रीकपिलदेव । श्रीकपिलदेव जी श्रीभगवत के अवतार पुरुष प्र- कृति विवेकमय तत्त्वज्ञान खानि साङ्ख्य शास्त्र के विशेष प्राचार्य्य हैं ॥ ( चौपाई) आदि देव प्रभु दीन दयाला । जठर धरेउ जेहि "कपिल" कृपाला ॥ " सांख्य शास्त्र " जिन्ह प्रगट बषाना । तत्व विश्चार निपुन भगवाना ॥ (६) श्री मनुजी । यह बात तो सभी जानते हैं कि "मनु" ही से मनुज, मनुष्य (नर) वा मानव सृष्टि हुई है। "श्री स्वायंभू मनु | जी" की कथित "मनुस्मृति" सर्व धर्मशास्त्रों में अग्रगण्य है ॥ पापकी कठिन तपस्या, पलौकिक भजन, विलक्षण प्रीति, तथा अनन्यभक्ति तो श्रीतुलसीकृत रामायण "मानस राम चरित" बालकाण्ड में प्रसिद्धही है कि जिन्होंने सर्वावतारी पर ब्रह्म को पुत्र करके प्रत्यक्ष सच को सुलभ कर दिया ॥ स्वायंभू मनु अरु शतरूपा । जिनते भइ नरसृष्टिरूपनूपा ॥ (दोहा) जासु सनेह सकोच बश, राम प्रगट भए आइ । जे हरहिय नयनन कबहुँ, निरखे नहीं अधाइ ॥ 800- (१) श्री प्रह्लाद जी । श्री नरहरि दास अर्थात् "श्रीमह्नाद जी” द्वादश भक्त- 86 8000-<noinclude></noinclude> k79p1snmsoy9sz1ohwq0n6l2mxvapih पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५२ 250 193821 664040 2026-07-02T15:47:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664040 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>87 भक्ति सुधास्वाद तिलक | राज में हैं; ये महाभागवत " दास्य निष्टा" में ग्र गण्य हैं । श्रीनरसिंहावतार ध्यापही के हेतु प्रसिद्ध है ही । श्री नरसिंह जी तथा श्री प्रह्लाद जी का यश । नेक पुराणों में गाया हुआ है। भगवत की इच्छा से श्री सनकादिक ने "श्री जय, श्री बिजय " को तीन जन्म निशाचर होने का शाप दिया; पुनः भगवत तथा श्री सनकादिक ने शापानुग्रह किया कि भगवत पवतार लेले ले के तीन जन्म में उद्धार करेंगे। सो पहिले जन्म में " हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु " हुए; दूसरे जन्म वही " रावण और कुम्भकर्ण एवं तीसरे जन्म में " शिशुपाल और दन्तवक्त्र” ॥ । जब हिरण्याक्ष को भगवत ने बाराह अवतार लेके मारा, तब हिरण्यकशिपु ने तप करके श्री 'ब्रह्मा जी से बर मांगा कि किसी देशकाल में किसी पत्र शस्त्र से किसी जीव से मैं मारा न जाऊं । श्री ब्रह्मा जी ने ऐसाही बर दिया। उस्की स्त्री के गर्म में श्री प्रह्लाद जी थे इसलिये श्री नारद जी ने राजा इन्द्र से उसे बचाकर ज्ञानोपदेश किया। हिरण्यकशिपु अलौकिक वर पाके राज गादी पर बैठ देवतों को कष्ट देने लगा । परन्तु श्री प्रह्लाद जी जिसके बेटे हुए उसके भाग्य की क्या बात है । जब गुरु जी पढ़ाने लगे आपने “श्रीसीताराम सीताराम" की मधुरध्वनि करना 1600- 8000- 85600-<noinclude></noinclude> t8w7o9f7cgdwd7tjzcnyw23zx9ztpp3 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५३ 250 193822 664041 2026-07-02T15:47:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664041 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>A 63600- श्रीभक्तमाल सटीक | आरम्भ किया | बरंच पाठशाला भर के लड़कों को इसी में लगा दिया। और इसके बिरुद्ध यद्यपि उनके पिता माता गुरु ने लाख समझाया पर आपने भग- ad बिमुख बाप की एक न मानी ॥ दुष्टपिता की आज्ञा से ये पहाड़पर से गिराए गए, जल में डुबाए गए, आग में जलाए गए, हाथी तथा हत्यारों से प्राण लेने का उद्योग किया गया, बिष दिया गया, यह सब किया परन्तु जिस श्री प्रहलादजी के मुखारविन्द पर अष्टमहर श्रीसीताराम नाम बसता था उनका एक बाल भी बांका न हुआ। तब हिरण्य afry खड्ग निकाल क्रोध से लाल हो आपसे पूछने कशिपु लगा " बता तेरा रक्षक कहाँ है ?" आप ने उत्तर दिया कि "वह समर्थ सर्व व्यापी है” उसने पूछा कि क्या वह इस खम्भे में भी है जिसमें तू बँधा है ? श्री भक्त राजमहाराज बोले कि हां निस्सन्देह ऐसाही है ” उस मूर्ख तामसी ने जो ही उस खम्भे में मुष्टिका मारी, उस खम्भे में से महा भयङ्कर प्रचण्ड शब्द के साथ साथ प्रति तेजमय महाभयानक रूप ऐसी एक तेजोमयी मूर्त्ति उस्को देख पड़ी कि जिस्की वह न तो मनुष्य ही कह सकता था और न सिंह ही समझ सकता था। यह अद्भुत पव- तार मध्यान्ह समय बैसाख शुक्ल चतुर्दशी को भक्त- वत्सल भगवत ने श्रीमहलाद जी के निमित्त लिया, "मुल तान" में कि जो उक्त कनककशिपु की राजधानी थी । 88<noinclude></noinclude> 4zi6ro9dg8us0lzzx1e5wzluzb1botn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५४ 250 193823 664042 2026-07-02T15:47:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664042 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>800- 89 0 भक्ति सुधास्वाद तिलक | बहुत काल तक लड़ाई होती रही । अन्त को सन्ध्या काल में घर के द्वार की देहली पर अपनी जांघ पर रख के अपने नखों से उस्का शरीर विदार डाला । ब्रह्मा शिव इन्द्र तथा सब देवतें की और विशेष कर के श्रीप्रहलाद जी की स्तुति से प्रसन्न हो भक्तिवर दिया । और राज तिलक देके अन्तर्ध्यान हो गए ॥ ( सवैया ) भारतपाल कृपाल जो राम जहां सुमिरे तेहि को तहँ ठाढ़े। नाम प्रताप महामहिमा उपकरे किय छोटेउ खोटेउ बाढ़े ॥ सेवक एक से एक अनेक भए तुलसी तिहुँ ताप न ढाढ़े। प्रेम प्रहलाद की जिन पाहन ते परमेश्वर काढ़े ॥ श्रीप्रहलाद जी के राज में भगवद् भक्ति कैसी फैली इस्का कहना ही क्या है ॥ श्री भगवत की भक्तवत्सलता की जय ॥ (c) श्री जनक जी । पिता श्रीजनक जी महाराज योगीराज की महिमा वर्णन कर सके ऐसा त्रिभुवन में कोन है ? भगवद्गीता भगवत ने प्रसंगतः पापही का नाम कहा है ("जनका- दय: ० ३ श्लो० २०) जिनके ज्ञान वैराग्य रूपी प्रचण्ड arrat देख श्री शुकादि ऋषीश्वरों के भी हृदय कमल विकशित होते थे । १२ पृष्ठ ८ में, बारहवां "धर्म स्वरूप" ("अजामिल" नहीं) ८९<noinclude></noinclude> eis17ozrku4b0f6t8qvjrag08emhzbt पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५५ 250 193824 664043 2026-07-02T15:47:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664043 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६० श्रीभक्तमाल सटीक ।" 90 -909881 (चौपाई) प्रणव परिजन सहित विदेहू । जिनहि रामपद गूढ़ सनेहू ॥ योगभोग महँ राखेउ गोई । राम विलोकत प्रगटेड सोई ॥ जासु ज्ञान रवि भवनिशि नाशा । वचन किरण मुनि कमल विकाशा ॥ पाप की " सौहार्द निष्ठा" की बात हो क्या है कि जगजननि महारानी श्रीजानकी जी ने ही जिनको स्वयं अपना पिता मान लिया, और प्रभु ने भी “पितु कौशिक वशिष्ट सम जाने” ॥ (E) श्री भीष्म जी । श्रीभीष्माचार्य जी को बहुतेरे महाशयों ने “धर्म कर्म" निष्ठा में लिखा है । श्रीभीष्माचार्य जी पाठ ar में से एक “वसु" के पत्रतार हैं। इनकी माता साक्षात “श्री गंगाजी " और पिता महाराज " शन्तनु " जी हैं इनकी प्रशंसनीय कीर्ति “महाभारत” इत्यादि में देखनेही सुन्ने योग्य है। ज्ञान वैराग्य भक्ति और धर्मशास्त्र के बड़े ही विज्ञ प्राचार्य्यं हुए हैं, बड़े ही पर उपकारी थे यहां तक कि महाभारत की कठिन लड़ाई में श्रीयुधिष्ठिर महाराज के लिये, पपने मरने का उ- पाय आापही बता दिया, पापने बाणशय्या पर शयन किया, और पर्व का पर्व नीति व्याख्या की ॥ महाभारत में भगवान् अपनी प्रतिज्ञा छोड़ के महाभागवत भीष्मजी के प्रण को पूरा करने के निमित्त अपने भक्त पर्जुन जी के हितार्थ रथ का चक्र लेकर भीष्मजी पर 8000-<noinclude></noinclude> f6qgiapbui3g88or2jqgnlrc5rgxjg5 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५६ 250 193825 664044 2026-07-02T15:48:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664044 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>91 भक्ति सुधास्वाद तिलक । | दौड़े, यहां तक भक्तवत्सलता भगवत की देखिये ॥ बावन दिन पर्य्यन्त शर शय्या पर रहके सन्त और भगवन्त के समागम में प्राण परित्याग किया ॥ श्रीकृष्णभगवान के सामने ही परमधाम को गए ॥ (१०) श्री बलि जी । राजा बलिजी श्रीप्रहलाद जी के पौत्र (बिरोचन के पुत्र) “धर्मकर्म" निष्ठा में वर्णित हैं। इनने १०० (एक सव) यज्ञ का संकल्प करके यज्ञ करना प्रारम्भ किया। सुरेशमाता श्री प्रदिति जी ने भगवत से विनय किया कि बलि मेरे बेटे (इन्द्र) का राज लेके इन्द्रपद की अचलता के निमित्त यज्ञ कर रहा है। भगवत ने "श्री वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन डेग पृथ्वी भीख मांगी । यद्यपि दैत्यकुलगुरु शुक्र जी ने बलि को रोका, पर इन ने उनकी एक न सुनी और दान देही दिया । पृथ्वी नापने के समय बामन से विराट हो कर हरि ने दोनों लोक (स्वर्ग, पाताल) नाप लिये; औौर शेष तीसरे डेग की जगह बलि जी ने पति हर्षित मन से अपना शरीर निवेदन कर दिया। प्रभु ने प्रसन्न हो अगले जन्म में सुर पुर का राज्य और ततकाल इस जन्म में पाताल का राज्य बली जी को अनुग्रह किया । केवल इतना नहीं वरन भक्त से छल करने के कारण स्वयं आपने (उनके द्वारपाल होकर) उस (वामन) रूप से नित्यशः उनको दरशन देना स्वीकार करलिया ! 600- ९१<noinclude></noinclude> qxu926vh64uf54vfxor2rplbpymjdm7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५७ 250 193826 664045 2026-07-02T15:48:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664045 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२ श्रीभक्तमाल सटीक । (११) श्री शुक जी । (श्लोक) निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृत द्रवसंयुतं । पिवत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ परमहंस श्रीशुकदेव जी की आदि अवस्था की कथा कुछ पांचवें पृष्ठ में लिख भी आए हैं। पाप महर्षि श्रीव्यास भगवान् के पुत्र हैं। आपही ने श्रीम- भागवत सुनाके श्रीपरीक्षित महाराज को एक सप्ताह मात्र में परमधाम को पहुँचा दिया ॥ किसी समय श्रीपारवतीजी ने श्रीशिवजी से श्रीरामनाम माहात्म्य के तत्वज्ञान का गुप्त रहस्य सुनाचाहा; तब श्रीशङ्कर जी ने अपनी प्राणप्रिया की यह अनोखी अभिलाषा देखकर (जैसे प्रभु की कृपा ने उनके अन्तःकरण से अन्य साधनों की महिमा का प्रभाव कर दिया था ) प्रथम उस शुभस्थान को पर जीवों से शून्य करके उसके अनन्तर अपना उप- देश प्रारम्भ किया । श्रीगिरिजा जी तो नींद यश हो गईं, परन्तु हरिइच्छा से शुक पक्षी का एक बच्चा वहां रहगया था, सो श्रीरामनाम माहात्म्य श्रवण के प्रभा- वसे वही बच्चा परम तत्त्ववेत्ता तथा अमर होकर * 'हूं हूं " कार भरता रहा; महेश्वर ने यह जानकर शीघ्र उस्को मारने की इच्छा की । भागकर उसने श्री व्यास जी की धर्मपत्नी के पेट में जा शरण लिया ॥ 92<noinclude></noinclude> 1s229ebmg993uimyhoxtubmvc0hjcqq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५८ 250 193827 664046 2026-07-02T15:48:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664046 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>93 1230-00- BG00- भक्ति सुधास्वाद तिलक । (१२) श्री धर्मराज जी । "अजामिल" जी की ठीका ( कवित्त ) धौ पितु मातु नाम “अजामेल”, सांचो भयो, भोजा मेल, तिया छूटी शुभ जात की । कियो मदपान, सो समान गहि दूरि डारो गारो तनु वाही सों, जो कीन्हो लैकै पातकी । करि परिहास काहू दुष्ट ने पठाए साधु, पाए घर, देखि बुद्धि पाई गई सातकी । सेवा करि सावधान, सन्तन रिझाइ लियो, " नारायण" नाम धरौ गर्भ बाल पात की ॥ २३ ॥ पृष्ठ १९ में “ (१२) मोअजामिलजी" नहीं, घरंच " (१२) श्री * धर्मराज जी " वार्त्तिक तिलक | ये ब्राह्मण के पुत्र थे; इनका नाम माता पिता ने पजामेल रक्खा था । सो वह पजामेल सच्चा ही हो गया, अर्थात् जा ( माया, अविद्या) की पन्त सीमा शूद्री वेश्या मय वह होगया; और ब्राह्मण ज्ञाति शुभ धर्मपत्नी को छोड़ दिया । इस कार्य का कारण पब टीकाकार बताते हैं कि “ कियो मद पान " अर्थात मंद पान करतेही सात्विकी बुद्धि ने अन्तःकरण को परित्याग किया उस्के पयान करते ही तामसी दशा प्रगट हुई, तमोगुण के करतब होने लगे, पिता के रक्खे हुए नाम ने अपनी सचाई दिखाई ॥ सत्यसंकल्प प्रभु के अनुरागियों के साथ लौकिक परिहास का भी कैसा अनोखा फल होता है सो देखिये । 88400- --909 ९३<noinclude></noinclude> d4klwlklfk1f09tgfoqju5k0yvsmymh पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१५९ 250 193828 664047 2026-07-02T15:48:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664047 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>९४ 83600-- श्री भक्तमाल सटीक । किसी खलने हँसी से सन्तों को भेज दिया ( कि जामिल बड़ा साधु सेई हरि भक्त है उसके घर जावो) सन्त चले चले अजामिल के घर आए; उनके दर्शन से उस्की बुद्धि श्रीसीतारामकृपासे सात्विकी हो पाई; अर्थात् सन्तन में श्रद्धा पाई। और साथ- धानता से सेवा करिके साधुओं को रिझाय लिया। जब सन्त चलने लगे तब उस गर्भवती अपनी दासी को सन्तन के चरण पर गिराय के बोला कि इस गर्भवती को पासीस दिया जाय । सन्त ने प्रसन्न होके कहा कि श्रीरामकृपासे “इस्के पुत्रही होगा, सो उस्का तू 'नारायण' नाम रखना” । साधु तो ऐसा कहके चले गए; कालान्तर में उसके पुत्र जन्मा और कुछ काल का हुवा || टोका । कबित्त । यो काल, मोह जाल में लपटि रह्यौ, महा बिक- राल यमदूत सों दिखाइये। वोही सुत “नारायण” नाम जो कृपा के दियो, लियो सो पुकारि सुर भारत सुना- इये ॥ सुनत ही पारषद आए वोही ठौर दौर, तारि ढारे पास को धर्म्म समुझाइये। हरि लै विडारे जाइ पति पै पुकारे कहि "सुनो वज्रमारे! मत जावो हरि गाइये ॥ २४ ॥ स्त्री पुत्र के स्नेह रूप महा मोह जाल में लपटा पड़ा था, 94<noinclude></noinclude> 0bmx1bgofno6r9vefyo356odun7u4wc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६० 250 193829 664048 2026-07-02T15:48:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664048 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>95 39 1886-06- भक्ति सुधास्वाद तिलक | इतने में उस्का मरण काल लागया । महा भयानक यमदूत मुगदर (मुदुगर) फांसी लिये हुए देख पड़े । तब अतिशय मोह तथा महाभय से उस सुत का कि जिस्को सन्तों ने कृपा करके दिया था और नाम भी रख दिया था बड़े ऐसा पुकारा 1 और उच्चस्वर से "नारायण ! भक्तरक्षार्थ जो भगवत पार्षद जगत में विचरते रहते हैं वे नारायण शब्द पार्त्तनाद से सुन्तेही उसी ठिकाने दौड़ के ही तो पहुंचे। और उस बेचारे की फांसी को तोड़ के उस्को छुड़ा ही लिया ॥ दूने पापी की सहायता का कारण पूछा तब पार्षदों ने बिबशहु भगवन्नामोच्चारण का माहात्म्य कहिके उनको हराया ही नहीं बरंच भगा भी दिया उन्ने जाके अपने पति यमराज से पुकार किया । यमराज ने सब व्यवस्था सुन के उन दूतों को डाट बताया कि "अरे ! तुम सबों पर बज्त्र पढ़े, मेरी बात समझ के चित्त में दृढ़ गहि रक्खो कि कोई कहीं कैसाहू पापी क्यों न हो परन्तु वह यदि किसी प्रकार से भगवदा- मोचारण करे तहां तुम भूलके भी कदापि मत जाव वहां तो तुम्हारा वा मेरा भी कोई प्रयोजन ही नहीं । उनको तो भगवद्भक्तही जाना " ॥ प्रियपाठक ! नाम का माहात्म्य तनक चित्त लगा के देखिये ॥<noinclude></noinclude> d0molzftshp4e6pr8ay040oyln6nwzw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६१ 250 193830 664049 2026-07-02T15:48:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664049 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>98 1886-00- 18000-- श्रीभक्तमाल सटीक । (चौ०) विशहु जासु नाम नर कहहीं । जन्म पनेक सचित अघ दहहीं ॥ सादर सुमिरन जे नर करहीं । ते गोपद इव भवनिधि तरहीं ॥ ( कप्पे ) मोचित वृति नित तहँ रहो जहाँ नारायण पद पारषद ॥ विषवकसेन, जय, विजय, प्रबल बल, मङ्गल कारी । नन्द, सुनन्द, सुभद्र, भद्र, जग ग्रामय हारी चण्ड, प्रचण्ड, विनीत, कुमुद, कुमुदाक्ष, करुणालय । शील, सुशील, सुषेन, भाव भक्तन प्रतिपालय | लक्ष्मी- पति प्रीणन प्रवीन भजनानन्द भक्तन सुहृद । मोचित वृति नित तहँ रहौ जहँ, “नारायण पद पारषद" ||४|| (८) वार्त्तिक तिलक । मेरे चित्त की वृत्ति सर्वदा तहां रहे कि जहां श्री नारायण जी के पद पंकज सेवी पारषद हो, किजो मंगल के करने वाले; संसार रूपी महा रोग के हरने वाले; करुणा के स्थान; विनीत; और भावयुक्त भक्तों के प्रति- पालक हैं; जो श्रीलक्ष्मीपतिजी की सेवा करके 1000-<noinclude></noinclude> 9tjkd1lxm1ji53gmpn92gztmfbs3fm9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६२ 250 193831 664050 2026-07-02T15:49:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664050 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>97 भक्ति सुधास्वाद तिलक | -9001 14:00 उनको प्रसन्न करने में परम प्रवीण हैं; तथा जो भजना नन्द भक्तों की हद हैं; अर्थात सब में श्रेष्ठ सीमा रूप हैं । (१) श्रीविष्वकसेन जी, (२) श्रीसुषेन जी, (३) श्री जय जी, (१) श्री विजय जी, (५) श्री बल जी, (६) श्रीप्रबल जी, (७) श्रीनन्द जी, (६) श्रीसुनन्द जी, (९) श्रीभद्र जी, (१०) श्री सुभद्र जी, (११) श्रीचण्ड जी, (१२) श्रीप्रचण्ड जी, (१३) श्रीकुमुद जी, . (१४) श्रीकुमुदाक्ष जी, (१५) श्रीशील जी, (१६) श्रीसुशील जी ॥ किसी किसी पोथी में, इस छप्पय के पाठ में " पद " शब्द नहीं ही है। श्री यमराज ( श्रीधर्मराज) महा भागवत की, श्री रामनाम माहात्म्य वर्णन द्वारा श्रीभगवद्भक्ति, अजामिल के प्रसंग में वर्णन हो हो चुकी है टीका | कवित्त । पारषद मुख्य कहे सोरह सुभाव सिद्धि सेवाही की ऋद्धि हिये राखी बहु जोरि कै। श्री पति नारायण के प्रीणन प्रवीण महा, ध्यान करें जन पार्ले भाव दृग कोरि कै ॥ सनकादि दियो शाप, प्रेरि के दिवायी आप, प्रगट है की पियो सुधा जिमि धोरि कै ॥ गही प्रतिकूलताई जो पै यही मन भाई, याते रीति हद गाई धरी रङ्ग बोरि के ॥ २५ ॥ 18000- १३<noinclude></noinclude> oi0jcqw2yishpa38mhmcee844ar36do पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६३ 250 193832 664051 2026-07-02T15:49:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664051 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>Beoc श्री भक्तमाल सटीक । वार्तिक तिलक । श्रीनाभाजी ने जो सोलह मुख्य पारषद कहे सो उनको स्वाभाविक सिद्ध अर्थात् नित्यमुक्त जानिये, सो प्रभु की सेवा रूपा सम्पत्ति को एकट्ठी करके अपने अपने हृदय में रख ली हैं; श्रीलक्ष्मीपतिनारायण जी hat प्रसन्नकारिणी सेवा में महा प्रवीण हैं; और सर्वदा उन्ही के ध्यान में मग्न रहते हैं; समस्त भगवद्भक्त जनों का पालन यों करते हैं कि जैसे पलक नेत्रगोलकों की रक्षा करते हैं । और तत्सुखी आज्ञाकारी यहां तक हैं कि उनमें श्री जय जी और श्री विजय जी को जब श्री प्रभु की प्रेरणा से सनकादिकों ने तीन जन्म तक असुर होने का शाप दे दिया ( पृष्ठ ८५) और उसी समय शीलसिन्धु श्री- नारायण जी प्रगट हो के बोले कि "इस शाप को मेरी ही इच्छा समझ के सुधापान सरिस ग्रहण करो,” तब इतना सुन कहा कि " जो यह पाप की इच्छा है तो हम को सहस्र सुधा समान है" ॥ इससे सेवक धर्म की रीति " हद" (सीमा) है, क्योंकि नित्य सेवा का सुख छोड़ के पापकी प्रज्ञा से प्रसन्नतापूर्वक, प्रतिकूलता को अर्थात पसुर भाव को अङ्गीकार किया। ऐसे रँगीले सेवक हैं । (छप्पे ) हरि वल्लभ सब प्रार्थी, जिन चरण रेणु आशा धरी ॥ कमला, गरुड़, सुनन्द 98<noinclude></noinclude> 732g3173qu6lngwgbx7wfyzrbw0zeen पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६४ 250 193833 664052 2026-07-02T15:49:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664052 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>99 1980-00-- : भक्ति सुधास्वाद तिलक । प्रादि षोड़श प्रभु पद रति । हनुमन्त जामवन्त, सुग्रीव, विभीषण, शवरी, खगपति ॥ ध्रुव, उद्भव, अम्बरीष, विदुर, अक्रूर, सुदामा । चन्द्रहास, चित्रकेतु, ग्राह, गज, पाण्डव नामा ॥ कौषारव, कुन्ती, बधू, पट ऐं चत लज्जा हरी । हरि वल्लभ सब प्रार्थी, जिन चरण रेणु आसा धरी ॥ ५ ॥ ( ) वार्त्तिक तिलक | श्रीहरि के समस्त परम प्रिय श्रीप्रभुपदप्रीतिपरायण भक्तों की प्रार्थना करता हूं कि जिन्हके चरण रज कण की आसरा संसार सागर के तरने के हेतु अपने हृदय में रक्खे हुआ हूं— (१) श्रीलक्ष्मी जी (२) श्रीगरुड़जी (३) श्री सुनन्द आदि (पृष्ट ९६ पर ९७) सोलहो पारषद (४) श्रीराम दासा- धिपति कपीन्द्र श्रीहनुमन्त जी (५) श्रीजामवन्त जी (६) श्रीरामसखा श्रीसुग्रीव जी (७) श्रीविभीषण जी (c) श्रीशवरी जी (९) खगपति श्रीजटायू जी (१०) श्रीध्रुव जी (१९) श्रीउद्धव जी (१२) श्री अम्बरीष जी (१३) श्रीविदुर जी (१४) श्रीक्रूर जी (१५) श्री सुदामा जी (१६) श्रीचन्द्रहास जी (१७) श्रीचित्रकेतु जी (१८) गजराज (१९) ग्राह (२०) पाण्डव [१ श्रीयुधिष्ठिर जी €<noinclude></noinclude> 5xbp0xkdpm4yod0u79fzc0mxwaxcakc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६५ 250 193834 664053 2026-07-02T15:49:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664053 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०० श्रीभक्तमाल सटीक २ श्रीपर्जुनजी ३ भीमसेन जी ४ नकुलजी ५ सहदेव जी ] (२१) श्रीमैत्रेय मुनि जी (२२) श्री कुन्ती जी (२३) श्री कुन्तीबधू जी जिनकी लज्जा दुःशासन के पट छीनते समय श्री प्रभु ने रक्खी है सो पर्थात् श्रीद्रौपदी जी ॥ टीका । कवित्त । हरि के जे बल्लभ हैं दुर्लभ भुवन मांझ तिनही की पद रेणु आसा जिय करी है। योगी, यती, तपी, तास मेरो कछु काज नाहिं प्रीति परतीतिरीति मेरी मति हरी है ॥ कमला, गरुड़, जाम्बवान, सुग्रीव, रूपादि सबै स्वादरूप कथा पोथिन में घरी है । प्रभु सौं सचाई जग कीरति चलाई प्रति मेरे मन भाई सुख दाई रस भरी है ॥ २६ ॥ के वार्त्तिक तिलक । श्रीहरिके बल्लभ जगत में परम दुर्लभ हैं, सो मैंने उन्ही पदरज रेणु की पासा की है । और कोरे योगी यती तपस्वी लोगों से मुझे कुछ कार्य नहीं है; मेरी मति को तो श्रीभगवत के प्यारों की "प्रीति" "प्रतीति" और "शेति" ने ही हर ली है । पूर्व कथित भक्तों में, श्रीलक्ष्मी जी, श्रीगरुड़ जी, श्री जामवन्त जी, श्रीसुग्रीवजी, पादिकों की भक्तिरसास्वादरूपा कथाएं तो पुराणों में प्रसिद्ध ही हैं, जिन्होंने प्रभु से सच्ची प्रीति करके जगत में अपनी कोर्तियां फैलाई हैं, और मुझे अत्यन्त ही भली लगी हैं क्योंकि रसीली तथा सुख दाई है 1000- 100<noinclude></noinclude> m5agcefl0csoaig0g7qhvz6ctvtm3bh पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६६ 250 193835 664054 2026-07-02T15:49:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664054 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>101 भक्ति सुधास्वाद तिलक | १०१ 909 सोलहो पारषद तथा पांचो पाटो समेत ४२ ( बयालीस ) हरि- बज्ञभों के नाम इस (पांचवें कप्पथ में हैं ॥ (चौ०) वन्दनीय पद पंकज तिन्ह के । Perforप्रिय, प्रिय सियपिय जिन्ह के ॥ श्री लक्ष्मी जी । जग जननी श्री लक्ष्मी जी महारानी तथा श्री मन्नारायण जी, गिरा अर्थ जल वीचि सम वास्तव में एकही हैं। भक्तों के हेतु युगल मूर्त्ति से प्रगट हैं। वस्तुतः जो यह हैं सो वह और जो वह हैं सो यह ॥ भगवत आपही, श्री लक्ष्मी रूप से, जगत को उत्पन्न करके, संरक्षण पालन करि भुक्ति, मुक्ति, भक्ति, प्रभु मंत्र म प्रेम दे के जीवों को श्रीप्रभु समीप निवासी करते हैं | इसी से श्रीलक्ष्मी जी भक्तिमार्ग "श्री संप्रदाय" की परमाचार्य्य स्यादि भक्त रूपा श्रीहरि - वल्लभा हैं ॥ जितने वेद पुराण भागवत इतिहास और सद्ग्रन्थ हैं, सब के सब युगल सरकार की ही लीला यश चरित्र को तो वर्णन करते हुए “नेति नेति " पुकारते हैं ॥ श्री कृपा की जय जय जय ॥ (लोक) या देवी सर्वभूतेषु भक्ति रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः ॥ 3600- श्री पार्षद । भगवत के प्रमुख पार्षद ओ सोलह [१६] हैं श्री<noinclude></noinclude> rkgcla59gk2pxs2yfvmjsca1clo9lhn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६७ 250 193836 664055 2026-07-02T15:49:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664055 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०२ श्रीभक्तमाल सटीक ! 'सुनन्द, प्रमुख, तिनका वर्णन पृष्ट ६ तथा पृष्ठ ९८ में कुछ हो ही चुका है; और इनकी कृपा पजामिल के प्रसङ्ग में भी विदित ही है । भक्तों के रक्षक हैं, इनकी कृपा कौन वर्णन कर सकता है | यहां श्री नाभाजी स्वामी ने इनकी प्रार्थना" हरि वल्लभों में भी पुनः की है ॥ श्री गरुड़ जी । श्री हरिबल्लभ (श्री गरुड़) जी भी भगवत पार्षद हैं, प्रभु के बाहन हैं "श्री हनुमान गरुड़ देव की जय" यह तो सबको प्रसिद्ध है ही ॥ (चौ०) गरुड़ महा ज्ञानी गुण रासी । हरि सेवक पति निकट निवासी ॥ आप पनेक भाव रूप, पर्थात् दास, सखा, बाहन, मासन, ध्वजा, वितान, व्यजन, हो के श्री प्रभु की सेवा करते हैं और सदा सन्मुख खड़े रहते हैं ॥ "श्री यामुनाचार्य स्वामी जी” ने तो श्रीगरुड़ जी को वेद त्रयी रूपही कहा है, जिन्ह के पक्षों से "सामवेद" उच्चारण होता है, सो प्रभु चढ़े हुए सप्रेम सुनते हैं ॥ श्री का "भुशुण्डिजी से प्रापने "श्री राम चरित मानस" जिस प्रेम से श्रवण किया उसका कहना ही क्या। ( चौ० ) सुनि शुभ राम कथा खग नाहा ॥ विगत मोह मन परम उछाहा ॥ सुनि भुशुण्डि के बचन सुहाए । हरषित षगपति पंख फुलाए ॥ नयन नीर 102<noinclude></noinclude> s31ta6jd4gc30f8yt5u2wgqxbizy9xn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६८ 250 193837 664056 2026-07-02T15:50:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664056 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>103 0-00- भक्ति सुधास्वाद free । १०३ मन पति हरषाना । श्री रघुपति प्रताप उर माना ॥ पुनि पुनि काग चरण सिरु नावा । जानि राम सम प्रेम बढ़ाया ॥ ( दो० ) काक चरण सिर नाइ करि, प्रेम सहित मति धीर | गरुड़ गएउ बैकुण्ठ तब, हृदय राखि रघुबीर ॥ . . और इनका बल पराक्रम भक्ति चरित्र के वर्णन में तो महाभारत येक "सौपर्ण” पर्व का पर्व ही प्रसिद्ध है ॥ श्रीबाल्मीकि युद्ध काण्ड में श्री बैनतेय जी ने निज बल्लभता श्री सीता कान्त जी से स्वयं कही है कि " श्री ककुत्स्थ कुल भूषण जी ! मैं पाप का सखा हूं परमप्रिय वाहर का विचरने वाला आप के प्राण हूं यह नरनाटूय नाग पास बंधन लीला सुन के निज सख्य सहायता निवेदन करने को पाया हूं ॥ श्री हनुमान जी । (चौ०) महाबीर बिनव हनुमाना । राम जासु यश प्रापु बखाना ॥ टीका | कवित्त । रतन अपार सार सागर उधार किये लिये हित चायके बनाइ माला करी है । सब सुख साज रघुनाथ महा राजजू को, भक्ति सों, विभीषण जू पानि भेंट धरी है ॥ माही की चाह वाह हनुमान गरे डारि दई सुधि भई, मति अरवरी है। राम बिन काम कोन, 3400-<noinclude></noinclude> 1qnkovt5mbg7tvcjny0taj4rvbxw6td पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१६९ 250 193838 664057 2026-07-02T15:50:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664057 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०४ श्रीभक्तमाल सटीक । 104 --0001 फोरि मणि दीन्हें डारि खोलि तुचा नामही दिखायो; बुद्धिहरी है ॥ २७ ॥ वार्त्तिक तिलक । सागर से निकाले हुए जिन रत्नों में अपार सार अर्थात् पति प्रकाश युतपमूल्यता थी, वे रत्न तीनों लोकों के देव भूप नागों के मस्तकों के महामुख्य भूषण थे; तिनको जीत के रावण ने बड़े चाव से अपने कोश में रक्खा था । उन्ही रत्नों को बड़े हित चाह से श्री विभीषण जी ने मोला बना के, सब सुखसाजयुक्त महाराज श्रीरघुनाथ जी को भक्ति पूर्वक भेंट दी ॥ उस महा मनोहर माला को देख के सभा भर के लोगों को उसकी अथाह (अवगाह) चाह उत्पन्न हुई। श्रीजानकी जीवन जी ने देखा कि इस माला ने तो हमारे सब निष्काम भक्तों के मन को चाह युक्त कर दिया; इस्से सब को चाह रहित करने के निमित्त श्री- हनुमान जी के गले में वह माला पहरा दी ॥ श्री- मारुती जी तो प्रभु के रूपरूपनूप के पवलोकन से छके अपनी विसारे हुए थेही माला कण्ठ में पढ़ते ही मणियों के सौन्दर्य को देखकर और उसमें कहीं श्री- राम नाम न देख कर पाप की मति मकुला उठी और विचार किया "कदाचित इसके भीतर श्री नाम हो" इस हेतु से उस माला की एक मणि को फोर के छापने देखा तो भीतर भी श्री नाम न पाया। तब यह विचार<noinclude></noinclude> o2c42t22pdecarmbeke9qfo156z96wx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७० 250 193839 664058 2026-07-02T15:50:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664058 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>105 भक्ति सुधास्वाद तिलक | किया कि "यह तो श्री राम रहित है" उस मणि कौ डाल दिया; इसी प्रकार से एक एक मणि की फोर फोर देख देख फेंकने लगे। यह कौतुक देख के सब समा चकित हुई और श्रोविभीषण जी बोल ही उठे " कपिवर जी ! आप इन अमूल्य मणियों को फोर फोर फेंकते क्यों हैं ? कपि जाति स्वभाव से ही, वा इस्में कोई हेतु भी है ? » १०५ तब श्रीसीताराम सम्पत्ति के घनिक श्री अंजनी नन्दन जी ने उत्तर दिया कि "श्रीरामनाम से हीन ये मणि मेरे काम के नहीं " यह सुन श्रीविभीषण जी - ने पुनः पूछा कि आप के शरीर में भी तो श्री राम नाम दीखता नहीं, फिर उसे क्यों रक्खे हुए हैं? इतना सुनते ही आपने नखों से अपने दिव्य विग्रह की त्वचा खोल के दिखाया तो तेजोमय सूक्ष्म शब्द युत सर्वाङ्ग में श्रीरामनाम सब को देख पड़े । और सब की मति मग्न में हो गई ॥ देखिए, इस कौतुक से श्री कपिकुलकेतु जी ने aa को परम वैराग्य धुत निष्काम श्रीरामानुराग का उपदेश किस प्रकार दृढ़ाया । भला इन्ह के ज्ञान बैराग्यादि दिव्य रत्नों से पूर्ण विमल भक्ति जल से भरे हुए परम प्रेमरूपी सिंधुकी थाह किसको मिल सती है ? और श्री सीताराम सेवा में ऐसा अनू अनुराग किस का होगा, कि तीन रूप से सेवा सुख 600- 1986-06- ३४<noinclude></noinclude> 4lcth31qh9cabps5fp86n6b8f18v36x पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७१ 250 193840 664059 2026-07-02T15:50:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664059 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०६ 03400- श्रीभक्तमाल सटीक । 106 --900* लेते हैं (१) “श्रीरघुकुलकुमार चारुशीलमणि जी" हो के सख्य सेवा सुख लूटते हैं; (२) "श्रीनिमिकुल कुमारी चारुशीला जी" हो के सखी सेवा सुख अनुभव करते हैं; (३) एवं "श्री अंजनीनन्दन" रूप से दिव्यदम्पती जी के दास्य सेवा का सुख लेते हैं । इस कपि रूप की प्रीति भक्ति सेघा तो लोक प्रसिद्ध है कि जिसके वश खिल ब्रह्माण्ड के स्वामी श्रीजानकी जीवन जी पाप तो ऋणी कहाए पर सेवा धर्म धुरंधर श्री हनुमन्त जी को धनी बनाया ॥ (चौ०) "सुनु सत तोहिँ उरिन मैं नाहीं । देखउ करि विचार मन माहीं ॥ प्रति उपकार करों का तोरा । सन्मुख होइ न सकत मन मोरा ॥ (चौ०) हनूमान सम नहिँ बड़ भागी । नहिँ कोउ रामचरण अनुरागी ॥ गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार बार प्रभु निज मुखगाई ॥ " श्री हनुमान जी के यश को बारबार सुनते भी हैं ॥ (दो०) किमि वरन हनुमन्त की कायकान्ति कमनीय । रोम रोम जाके सदा राम नाम रमनीय ॥ १॥ (विनय) जाके गति है हनुमान की । ताकी पयज पूजि पाई यह रेखा कुलिश पखान की ॥ अघटित घटन सुघट विघटन ऐसी बिरुदावली नहीं पानकी ॥ सुमिरत संकट सोच विमोचन मूरति मोद निधान की । तापर सानुकल गिरिजा हर लखन राम श्री जानकी । तुलसी कपि की कृपा बिलोकनि खानि सकल कल्यान की॥ 128600-<noinclude></noinclude> ao4lja7furzr5aybptushvh9rqna8f1 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७२ 250 193841 664060 2026-07-02T15:50:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664060 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>107 3600-- 18606- भक्ति सुधास्वाद तिलक । ( दोहा ) १०७ । जय जय कपि श्री राम प्रिय ! धन्य धन्य हनु- मन्त । नमोनमो श्री मारुती ! वलिहारी बलवन्त ॥१॥ सिया दुलारे, पवनसुत ! मम गुरु, अंजनि पूत । सतसंगति, निज चरण रति, देहु, सीयपियदूत ॥ २॥ श्रीसियस पिय पद कमल अविरल अमल सनेहु । युगल चरण कैंकर्य पुनि मोहि कृपा करि देहु ॥ ३ ॥ "बीरकला श्रीमारुती” ! तुमहि निहोरि निहोरि । रूप कला सियचेरि लघु विनय करति करजोरि ॥ ४ ॥ श्री जाम्बवान जी । श्री जाम्बवान जी, श्री ब्रह्मा जी के अवतार हैं । श्री प्रभु तथा सुग्रीव जी के मन्त्रीवर हैं । लंका के युद्ध में बुढ़ापे में भी बड़ा पराक्रम ऋक्षपतिजी का प्रसिद्ध है । और युवावस्था में तो—- । -- (दो०) "बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ, सो तनु बरनि न जाइ । उभय घड़ी महँ दीन्ह मैं, सात प्रदक्षिण धाइ ॥ " श्रीमद् भागवत में वर्णित है कि इन ने बहुत बूढ़ेपन में भी, श्री कृष्ण भगवान् के साथ बड़ा परा- क्रम दिखाया, जब तक कि इन ने आप को पहिचाना नथा ॥ फिर तो अपनी कन्यारत्न "जाम्बवती” को भगवत को प्रदान कर दिया ॥<noinclude></noinclude> k46s5xh6omz7uvxx8r7vjrbucbznkad पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७३ 250 193842 664061 2026-07-02T15:51:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664061 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०८ 15600- श्रीभक्तमाल सटीक । श्री सुग्रीव जी । हैं । श्री सुग्रीव जी, श्री सूर्य्य भगवान् के पुत्र श्री सुकण्ठ जी से प्रभु ने श्री अग्निदेव की साक्षी करके मित्रता की। आप ने जैसी सख्यता सम्पत्ति प्राप को प्रदान किया और निबाहा, सो श्री बाल्मीकीय रामायण ही के देखने वालों को विदित है । कपीश्वर जी सब ऋक्षों और कपियों के राजा थे । पौर श्री जानकीजीवन जी के तो प्राण से भी प्रिय " पंचम भ्राता" ही थे ॥ श्री विभीषण जी । 108 श्रीसीताराम भक्त लंकेश श्रीविभीषणजी की भक्ति तथा शरणागति को वर्णन कर सके ऐसा कौन जन है? तथापि कुछ थोड़ा सा कहाही जाता है, सो चित्त लगाके सुनिये | देखिये कि प्रात समय इनका नाम लेना बड़ाही मंगल दायक है । और, श्री रामायण जी में जो इनकी कथा है, सो तो प्रसिद्ध है ही, एक नवीन इतिहास यों है- टीका | कवित भक्ति जो विभीषण की कहे ऐसो कौन जन, ऐ पै कछु कही जाति सुनो चित लाइ के चलत जहाज परी अटक; विचार कियो, कोऊ अंगहीन नर दियो ॥ जाइ लग्यो टापू ताहि राक्षसनि गोद ले बहाइ कै -9098<noinclude></noinclude> 5fxzq6c4pfw46wspkfzfws51z4f6a7c पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७४ 250 193843 664062 2026-07-02T15:51:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664062 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>109 30-00-- भक्ति सुधास्वाद तिलक १० लियो, मोदभरि, राजा पास गए किलकाइ कै । देखत सिंहासन ते कूदि परे, नैन भरे, "याही के ध्याकार राम देखे भाग पाइकै " ॥ २८ ॥ वार्त्तिक तिलक | एक वणिक की जहाज चली जाती थी । किसी कारण से इपटक गई; उसने बहुत यत्न किये पर नहीं चली । तब वणिक ने ऐसा विचार करके कि समुद्र के देवता ने रोका है, उसके लिये किसी मनुष्य को बलि की भांति समुद्र में गिरा दिया । वह मनुष्य श्रीराम कृपा से मरा नहीं, वरंच "लंका टापू” के तीर पर जा लगा। उसे राक्षसों ने देखा; और वे बड़े आनन्द से उस्को अपने गोद में उठा के बहुत खिल- खिलाते हुए, राक्षसेन्द्र “श्रीविभीषण जी” के समीप ले गए । उस समय श्रीविभीषण जी श्रीरामविरह अनुराग प्रभु का न करते हुए बैठे थे; पाप इस मनुष्य को देखतेही सिंहासन से कूद पड़े; क्योंकि मनुष्य रूप का दरशन आपको एक उद्दीपन ही हो- गया। ऐसा विचारने लगे कि “इसी की नाई मेरे स्वामी नराकार विग्रह श्री राम जी हैं, इनके दरशन इस समय बड़े भाग्य से पाये” इस भाव से नयनों से प्रेमाश्रु बह चले ॥ •१००<noinclude></noinclude> auk48njyvl0i232os322y0fm6ubyou5 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७५ 250 193844 664063 2026-07-02T15:51:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664063 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११० 3000- श्रीभक्तमाल सटीक । टोका | कवित्त | 110 -909 रचि सो सिंहासन पै ले बैठाए ताही छन, राक्षसन रोमि देत मानि शुभघरी है । चाहत मुखारविन्द, प्रतिहीनन्द भरि, ढरकत नैन नीर, टेकि ठाढ़ो छरी है ॥ तक न प्रसन्न होत, छन छन छीन ज्योति, हूजिये कृपाल, मति मेरी प्रति हरी है । " करो सिन्धु पार, मेरे यही सुख सार"; दियो रतन अपार, लाये वाही ठौर फेरी है ॥ २९ ॥ वार्त्तिक तिलक । दिव्य वस्त्र, चन्दन, मणि और सुवर्ण के भूषण से, उनके शरीर की रचना शृङ्गार करके सिंहासन पर बैठाय धूप दीप, नैवेद्य, भारती के अनन्तर भूषण वस्त्रादि न्योछावर करके, राक्षसों को रीझ पारितोषिक दिये | उस घड़ी को प्रति शुभदायक माना । और, श्री प्रभु का भाव करके सुवर्ण की छड़ी लेके प्रतीहार की भांति सम्मुख खड़े हो, उनके मुखारविन्द का सप्रेम दरशन करने लगे और आपके नेत्रों से पानन्द का जल चलने लगा; तथापि उस मनुष्य के मुख प्रसन्नता का लेश भी न दीख पड़ा, वरंच क्षण क्षण प्रति उसकी चेतना ( चेष्टा ) क्षीण ही होती जाती थी उस्की पांखों से पांसू बहते थे, पर उसके मन में यह भय बढ़ता जाता था कि इन सब सत्कार पूर्वक, मुझे ये सब बलि दे देंगे ॥ 28100- में 4000-<noinclude></noinclude> dlcqahfb3q4dwgfgo8ja45ps8pz1yxw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७६ 250 193845 664064 2026-07-02T15:51:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664064 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>111 1930-00- भक्ति सुधास्वाद तिलक | १११ श्रीविभीषण जी ने प्रार्थना की कि "इस दास पर कृपा करके कुछ प्राज्ञा दोजे, उदास देख के मेरी मति सभीत हो क्योंकि पापकी रही है" ॥ तब वे बोले कि "मुझे समुद्र पार उतार दीजे, मुझको तो इसी में परमसुख होगा ॥ तब श्री विभीषण जी बहुत रत्न देके फिर उसी ठौर सिन्धुतीर उनको ले आए ॥ टीका | कवित्स । “राम” नाम लिखि, सीस मध्य धरि दियो; "याको यही जल पार करै," भाव सांचो पायो है। ताही ठौर बैठ्यो, मानो नयो और रूप भयो, गयी जो जहाज सोई फिरि करि आयो है ॥ लियो पहिचान, पूछूयो सब, सो बखान किया, हियो हुलसायो, सुनि, विने के चढ़ा है। पर नीर कूद, नेकु पांय न परस कस्यो, हस्यो मन देखि, 'रघुनाथ नाम' भायो है ॥ ३० ॥ वार्त्तिक तिलक | श्रीविभीषण जी ने "श्री राम नाम" लिख के उनके मस्तक पर श्रीकरकमल से भाव पूर्वक रख के वस्त्र से बांध दिया और कहा कि "इस 'श्रीराम' नाम के प्रताप से लोग संसारसागर से पार हो जाते हैं, सो इस समुद्र के जल को तो आप बिना प्रयास ही पार हो जाइयेगा" 600-<noinclude></noinclude> ae9n8er4kcwej3a03kf9duntdbd680b पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७७ 250 193846 664065 2026-07-02T15:51:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664065 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११२ --000 श्रीभक्तमाल सटीक । उनके सच्चे भाव और विश्वास से वह मनुष्य जल में स्थल की नाई चल के उसी ठौर पहुंच गया कि जहां संयोग वश वही जहाज़ लौट के मा लगा था ॥ उन लोगों ने इसको देखके पहिचाना और उसके शरी- रके तेज तथा अवस्था को दिव्य पाया। पूछने पर उसने अपनी सब कथा और श्रीविभीषण जी की भक्ति कह सुनाई। सुनके सब को अति आनन्द हुरुपा; बड़े विनय से उस्को जहाज़ पर चढ़ा के क्षमा मांगी। प्रसन्न होके श्रीराम नाम का प्रभाव उन सबों से कहा वरंच समुद्र के दिखा दिया कि जल में उस्का पांव तक भी में कूद भीगा नहीं । 112 अथवा (ऐसा भी कहते हैं कि), उसके पास अनमोल रत्नों की गठरी देख कर नौकापति को लोभ प्रबल हुपा; उस्के ये ढंग देख के उस्की माया से बचने के नि- मित्त यह मनुष्य पुनि जल में कूद पड़ा और यों चल दिया जैसे कोई सूखी धरती पर सहज ही में चले ॥ इस प्रभाव को देख के, “श्रीसीताराम” नाम में ear को श्रद्धा और प्रतीति उपजी, और प्रति प्रीति पूर्वक जप के सब के सब संसार के पार हो गए ॥ -:०:- देवी श्री सवरी जी । समस्त प्रेमी भक्तों में शिरोमणि रूपा श्री "सव रो”<noinclude></noinclude> qd331tzpc9zqeum2dhkf1nc6bxj5gbe पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७८ 250 193847 664066 2026-07-02T15:51:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664066 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>118 600-- भक्ति सुधास्वाद तिलक ११३ -9001 जी, किसी हेतु से सवर (भिल्ल) जाति में उत्पन्न हुई; 3 परन्तु बालपन से ही इनकी दशा तथा मति लोक से विलक्षण ही थी । जब विवाह योग्य अवस्था इनकी हुई, तब माता पिता उसके प्रबंन्ध में उद्यत हुए और सम्बन्धी लोगों के भक्षण के लिये, बहुत से जीव, एकट्ठे किये। इन्हों ने विचारा कि "ओह! मेरे निमित्त इतने जीवों का बध होगा ! धिक् इस लोक के प्रपंच को है" । रात्रि में प्रापने उन सब जीवों को छोड़ दिया और उसी रात आप भी वहां से चल के पंपा- सर के पास जा छुपीं, और वहीं बन के फल मूल से निर्वाह करती हुई दिन बिताने लगीं ॥ टीका | कवित्त । बन में रहति, नाम “सवरी" कहत सब चाहत टहल साधु, तनु न्यूनताई है। रजनी के शेष, ऋषि आश्रम प्रवेश करि, लकरीन बोझ घरि सावे, मन भाई है ॥ न्हाइ को मग कारि, कांकरनि बीनिडारि, बेगि उठि जाइ, कुदेति न लखाई है । उठत सधारें, कहैं "कौन धौ बहारि गयो”, भयो हिये शोच, "कोउ बड़ी सुखदाई है” ॥ ३१ ॥ वार्त्तिक तिलक | उसी बन में रहती थीं; इन को सब "सवरी" ही कहते थे । इन्हें संतो की सेवा की चाह विशेष थी, परंतु अपनी नीच जाति जान के साधुवों के समीप नहीं १५ --9008<noinclude></noinclude> 48d4qyofwqp0svxke3e0qhqe73rzkkl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१७९ 250 193848 664067 2026-07-02T15:52:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664067 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११४ 88000- श्रीभक्तमाल सटीक 114 जाती थां । तथापि बिना सेवा किये नहीं हो रहा गया, तब कुछ रात रहते श्री मतंगादि ऋषि जनों के आश्रम में लकड़ियों के बोझ रख पाया करती थीं; मन में इस्से सुख मानती थीं; और स्नान के मार्ग की कंक- ढ़ियां भी रात्रि ही में बहार के चली आया करती थीं, जिसमें कोई देख न लेवे। श्री राम भक्त ऋषि- जन प्रभात उठके इस टहल को देख विचारते कि " मार्ग को झाड़ बहार के लकड़ियां रख जाने वाला सुखदायक कौन है ? " ॥ टीका | कवित । बड़ेई संग वे "मतंग” रस रंग भरे, घरे देखि are, कह्यो “कौन चोर आयो है ? करें नित चोरी; हो ! गहो वाहि एक दिन; बिना पाए, प्रीति बाकी मन भरमायो है” || बैठे निशि चौकी देत शिष्य सब सावधान; पाई गई; गहि लई; कांपै, तनु नायो है । देखत ही ऋषी जल धारा बही नैनन ते, बैनन सों कह्यो जात, कहा कछु पायो है ॥ ३२ ॥ वार्त्तिक तिलक | सब ऋषियों में बड़ेही असंग श्री राम रंग से भरे श्रीमतङ्गजी लकड़ियों का बोझ घरा देख के बोले कि "हमारे सुकृत का चोर यह कौन आता हैं ? जो नित्य ही चोरी से सेवा करके चला जाता है । उस प्रीतिवान को विना देखे उस की प्रीति ने मेरे मन 188600--<noinclude></noinclude> 7keu3wgc27uzcog13re4dj7b8tp74le पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८० 250 193849 664068 2026-07-02T15:52:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664068 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>115 भक्ति सुधास्वाद तिलक | ११५ को चपल कर रखा है। रात्रि में जाग के उस्को पकड़ो " ॥ रात को शिष्य लोगों ने सावधान रहके चौकी देके उस्को पकड़ा । उरुसे शिष्यों ने पूछा कि तू ने यहां लकड़ियां पहुंचाने के लिये किसी से कुछ पाया है ? प्रति भय से वह कांपती हुई पांव पर गिर पड़ी। देखतेही श्रीमतंग जी के नेत्रों से प्रेमानन्दजल की धारा चलने लगी । और ऐसे पकथ आनन्द में मग्न हो गए मानो कोई महा पलभ्य वस्तु पाया है ॥ टीका | कवित्त । डीठी हू न सोही होत, मानि तन गोत छोत, परी जाय शोच सोत, कैसे निकारियै । भक्ति को प्रताप ऋषि जानत निपट नीके "कैऊ कोटि प्रिताई यापै वारिडारियै" । दियो बास आश्रम में, श्रवण में नाम दियो; कियो सुनि रोष सबै, कोनी पांति न्यारियै । सवरी सों कह्यो “तुम रामदरशन करो, मैं तो परलोक जात, प्राज्ञा प्रभु पारियै " ॥ ३३ ॥ वार्त्तिक तिलक | श्रीसवरी जी की तो दृष्टि भी मुनिवर जी के सामने नहीं होती थी, अपनी जाति को अति नीच मान के सोच रूपी प्रवाह में पड़ गईं। इधर श्रीमतङ्ग मुनिजी शोध विचार के प्रवाह में पड़े कि इस्को सोच के सात (धारा) से कैसे निकालूं ? क्योंकि ऋषी- 3000- -0098<noinclude></noinclude> qzlcfv8zefvwclhkycz446vvdqgapyx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८१ 250 193850 664069 2026-07-02T15:52:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664069 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११६ 1980-00- श्रीभक्तमाल सटीक । 116 •००० ४४| श्वर जी "श्रीरामभक्ति जी” का प्रताप भले प्रकार जान्ते थे । शिष्यों से कहने लगे कि "यह जाति की तो नीच है सही, परन्तु इस्की भक्ति पर तो कई कोटि ब्राह्मणा- भिमान को न्योछावर करना योग्य है" ॥ निदान, सवरी जी को अपने आश्रमही में निवास देकर के महामन्त्र श्रीसीताराम नाम श्रवणमें सुना दिया ॥ इस वार्ताको सुनके परसब मुनि जनोंने प्रति रोष करके आपको अपनी ज्ञाति पंक्ति से न्यारा कर दिया। इस बात का कुछ हर्ष विषाद श्रीराम भक्त " मतङ्ग” मुनि जी को लेश भी न हुरूपा । श्रीसवरी जी सेवा में तत्पर हो के रहने लगीं ॥ कुछ काल में श्रीमतङ्ग जी के देह त्याग का समय आपहुँचा; श्रीसवरी जी से आपने कहा कि "मुझे तो अब इस लोक में रहने की प्रभु की आज्ञा नहीं है, श्रीरामधाम को जाता हूं; परन्तु तुम यहां ही बनी रहो" । इतना सुन श्रीसवरी जी प्रत्यन्तव्याकुल हुईं । आपने समझाके कहा कि "मेरे इस आश्रम में 'परब्रह्म परमात्मा श्रीरामचन्द्र 'अपने अनुज 'श्रीलक्ष्मण जी के सहित पावेंगे, तू उनका दरशन पूजन सप्रेम करना । तब श्रीरामधाम को पाना ॥ " ऐसा समझा के श्रीमतङ्ग जी परमधाम को पधारे ॥ टीका | कवित्त | गुरु के वियोग हिये दारुण ले शोक दिया, जियो<noinclude></noinclude> 5brbhyguy5ct7ybq2g0g45isc7va4vr पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८२ 250 193851 664070 2026-07-02T15:52:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664070 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>117 श्रीभक्तमाल सटीक । ११७ नहीं जात; तक राम पासा लागी है। न्हाइबे को बाट निशि जात ही बहारि सब भई यों बार ऋषि देखि व्यथा पागी है || छुयो गयो नेकु कहूं, खोजत अनेक भांति; करिकै विवेक गयी म्हान; यह भागी है। जल सों रुधिर भयो, नाना कृमि भरि गयो, नयो पायो शोच, तोहू जाने न प्रभागी है ॥ ३४ ॥ वार्त्तिक तिलक | श्रीसवरी जी को श्री गुरु वियोग से बढ़ाही दुसह दुःख हुपा कि जिसमें वह प्राण को नहीं रक्खा चाहती थीं; पर श्रीराम रूप अनूप के दरशन की लालसा ने प्राणों को निकलने न दिया । पाप मुनियों के स्नान के पथ को रात ही को भार आया करती थीं । एक दिन कुछ बिलम्ब हो गया; प्रतिपक्षी एक मुनि ने श्रीसवरी जी को देख लिया, इस्से श्रीसवरी जी भय से व्यथित हुई। वन का मार्ग पतला तो होता ही है, मुनि, किंचित छू जाने से, क्रोध करके रूपनेक दुर्वचन बोले ॥ अपने मन में विचार के उस मुनि ने फिर जाके स्नान किया । और श्री सवरी जी भाग के अपनी कुटी में चली आई |॥ मुनि जब स्नान करने लगे, तो श्रीरामभक्त सवरी जी के प्रति अपराध से, जल रुधिर हो गया, पर देखते ही देखते उस सर में कीड़े भी पड़ गए। मुनि को यह एक नया सोच हुआ 3600-<noinclude></noinclude> brvmvtp1qw20wg0aaumx1zz7nea7rhk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८३ 250 193852 664071 2026-07-02T15:52:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664071 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११३ 18000- श्रीभक्तमाल सटीक । तथापि इस बात की तो न समझे कि 'श्री सवरीजीको दुर्वचन जो कहे, पर उनके स्पर्स के अपन- न्तर पुन: स्नान किया, तिसी से इस सर का जल far हो गया किन्तु भक्ति भाग्यहीन मुनि ने उलटे ऐसा समझा कि " सवरी ही के स्पर्स के दोष से यह जल बिगड़ गया है" ॥ टीका कबित्त । ला बन बेर, लागी राम को पवसेर भल, चाखै® धरिराखे फिर, मीठे उन जोग हैं । मारग में जाइ, रहे लोचन विछाइ, कभू पावें रघुराई, दृग पावें निज भोग हैं | ऐसे ही बहुत दिन बीते मग जोहत ही, पाइ गए पौचक सो; मिटे सब सोग हैं। ऐपै तनु नूताई पाई सुधि, छिपि जाई; पूछें आप "सवरी कहां ? " ठाढ़े सब लोग हैं ॥ ३५ ॥ वार्त्तिक तिलक | श्रीसवरी जी के मन में श्री राम जी की प्रति पव- रथी अर्थात् प्रभु के पाने के सोच सन्देह में मग्न हो रही थीं; सो बन के बेर घ्पादिक फल लाकर चखती थीं * कोर मीठे प्रभु के योग्य जान कर रख छोड़तीथीं ॥ •हरका अर्थ कोईएक महात्मा ऐसा बताते हैं कि चलने पर जिस वृक्ष के फल मीठे पाती चीं उसी वृक्ष के फल प्रभु के योग्य जान तोड़ के रख छोड़ती थीं ॥ 18600- 113 100-<noinclude></noinclude> 4a1bff545khb4p50e33e79drqd5ycry पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८४ 250 193853 664072 2026-07-02T15:53:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664072 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>119 भक्ति सुधास्वाद तिलक | ११९ प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा में अपनी आंखें बिछाए रहती थीं और अति उत्कण्ठा से ऐसा विचारा करती थीं कि" कब वह दिन आएगा ? कि जिस दिन श्रीरघुनन्दन लाल जी पावेंगे और उनके दरशन रूपी सुधा को मेरे नेत्र चखेंगे ॥ " प्रिय पाठक ! श्री शवरी जी का प्रेम पकथ अगाध है ॥ "गीतावली” में गोस्वामी श्री ६ तुलसी- दास जी ने भी कुछ गाया है ॥ “छन भवन, छन बाहर बिलोकति पंथ,” इत्यादि ॥ इसीप्रकार मार्ग जोहते २ बहुत दिन व्यतीत हुए ॥ पवचकही एक दिन लालजी (प्रभु) पायही तो पहुँचे; सुन के सब शोक सन्देह जाते रहे; पर अपने शरीर की नीचता की सुधि गई, और प्रेम की विचित्र विकलता से, पागे लेने को तो न बढ़ीं, वरंच छुप गईं ॥ प्रभु के बनबासी लोगों से पूछने लगे कि "वह सरस भक्तिवती सवरी कहां रहती है ? " ॥ टीका कबित्त । पूछि पूछि पाए तहां, स्योरीको प्रस्थान जहाँ, कहां वह भागवती ? देखों दृग प्यासे हैं । आाइ गई आश्रम में; जानिकै पधारे आप, दूर ही ते साष्टाङ्ग करी व भासे हैं ॥ रवकि उठाइ लई, बिधा तनु दूरि गई, नई नीर भरी नैन, परे प्रेम पासे हैं। बैठे, सुख पाइ फल खाइ के सराहे, वेइ कह्यो “कहा कहीं मेरे मग दुख नासे हैं ॥ ३६ ॥ 3000<noinclude></noinclude> dg35244jchr99cu5o0402jquch1rzfp पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८५ 250 193854 664074 2026-07-02T15:53:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664074 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२० 06-00- | BG00- भक्ति सुधास्वाद तिलक । वार्त्तिक तिलक | इस प्रकार पूछते २ जहां श्रीसवरी जी की कुटी थी तहां ही पाके यह बात पूछी कि "हमारी वह परम भागवती शवरी कहां है ? हम उस्को नयन भर देखा चाहते हैं, हमारे नेत्र उस्के दरशन रूपी जल के प्यासे हो रहे हैं। प्रीति पगे श्रीमुख बचनों को सुनके उनको अपनी नीचता का सोच मिट गया और यह देखा कि आश्रम में ही दोनों भाई कृपा करके झाखड़े हैं; तब सन्मुख झाके जहां से आपके दरशन पाए वहीं से प्रेम पूरित साष्टाङ्ग प्रणाम किया । प्रभु ललक के आए और श्रीकरकमलों से मापने श्रीशवरी जी को उठा लिया। श्रीकरकंज के स्पर्स हीसे वियोग की सब व्यथा जाती रही और नेत्रों से नवल प्रेम मय जल की झड़ी लग गई। क्योंकि इस समय इनके पौ बारह सरीखे प्रेम के पासे पनुकूल पड़ गए अथवा श्रीशवरी जी के नयन श्रीरामप्रेम पास में बँध गए ॥ चरण धोके दोनों भाइयों को अनुराग रंजित आसन पर बैठाय फूलमाला पहिराय फलों को नवीन २ दोना- करके आगे रक्खा। प्रभु उन फलों को खाते हुए बारम्बार उन के स्वाद की प्रशंसा, और शिव जी घ्यादि उसके भाग्य की तथा प्रभु की भक्तवत्सलता की स- राहना करने लगे ॥ पर बोले कि क्या कहूं पाज तुम ने मेरे मार्ग भर के परिश्रम दुःखों को मिटा के परम सुख दिया ॥ 168000- 120 3600-<noinclude></noinclude> s8p5g303u93x4kh8rwu98bt1h7hwg7p पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८६ 250 193855 664075 2026-07-02T15:53:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664075 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>IZL श्री भक्तमाल सटीक १२१ टीका । कमित्त । करत हैं सोच सब ऋषि बैठे आश्रम में, जल को बिगार ! सो सुधार कैसे कीजिये ? पावत सुने हैं बन पथ रघुनाथ कहूँ; पावें जब, कहैं "याको भेद कहि दीजिये " ॥ इतनेही मांझ सुनी "सवरी के बिराजे पान यो अभिमान ! चलो पग गहि लीजिये । प्राय, खुन- साय, कही "नीर कौ उपाय कही " " गहौ पग भोलिनी के छुए स्वच्छ भीजिये" ॥ ३७ ॥ वार्त्तिक तिलक । उधर ऋषी लोग अपने आश्रमों में बैठे सोच रहे थे कि यह जल जो बिगड़ गया है सो इसकी शुद्धता किस प्रकार से की जावे । इतने में कोई बोल उठे कि सुनते हैं कि इस बन मार्ग से कहीं श्री रघुनाथ जी चले आते हैं; सो जब पावें तब इस्का हेतु तथा शुद्धि का उपाय पापही से पूछ लिया जायेगा । ये बातें होही रही थीं कि उसी क्षण मुनियों ने सुना काही गए. शवरी के कुटी में बिराज रहे हैं ॥ यह सुनते ही सभों के अभिमान जाते रहे और वे लोग बोले कि चलो उनके चरणों में दण्डवत प्रणाम करें। खुनाए हुए आए और प्रभु से कहा कि हमारे स्नान पान का जल बिगड़ गया है इसके सुधरने का यत्न बता दीजिये । इसके उत्तर में प्रभु ने कहा कि आप लोगों ने परम भागवती शवरी का अनादर किया इसी भक्ता- १६ 3600-<noinclude></noinclude> 6e246v7ofgmepqxc2v15wwl034zjby8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८७ 250 193856 664076 2026-07-02T15:53:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664076 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२२ 11000- भक्ति सुधास्वाद तिलक | 122 --909 18 पराध से जल की यह दुर्दशा हो रही है । पतएव इसी के चरणों की गहिये और "सादर इन्हें लेजाके इनका चरण स्परस कराइये तो जल निःसन्देह निर्मल हो जावेगा ॥ आप लोग सुख से स्नान पान कीजियेगा ॥ क्या करें उन ने ऐसाही किया; और जल परम निर्मल पर स्वाद सुगन्धित युक्त हो गया ॥ प्रभु ने जब वहां से चलना चाहा, श्री शवरीजी ने अपना प्राण न्यवछावर कर दिया और परम धाम को चली गईं । धन्य, धन्ध ! अहो ! प्रीति परमेश्वरी परम आश्चर्य ! श्री शवरी जी के प्रेम की प्रशंसा करें ? कि श्री प्रभु की प्रेम पालकता की ? दोनों ही की बलिहारी || देखिये तो श्री शवरी जी ने केवल बन के फल ही खिलाने में प्रभु में पराग, अनुराग, उससे शतसहखगुण अधिक किया कि जो प्रेम माता सुत को खिलाने में करती है; और वैसेही प्रभु ने श्रीमातु कौशल्या जी महारानी के पवाए भोजनों से भी अधिक- तर मीठे स्वादिष्ट मान के उन फलों को पाया ॥ इस प्रेम की जय हो और इस प्रेम भाव ग्राहकता ॥ (०) क चूक परी, ताते नीच योनि धरी, तक ऊंचे पोर ढरी, होमजाति पांति न बरी । सन्त सेवा करी, मुनि राम भक्ति भरी, प्रेम पथ पनुसरी, भई प्रीति रीति जबरी ॥ पाए राम हरी, देखि लागी --900 400-<noinclude></noinclude> dmzkk3634s1hxf8xmro81hg6ybzjwwj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८८ 250 193857 664077 2026-07-02T15:53:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664077 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>123 800- श्रीभक्तमाल सटीक । पांझरी, आसा बेलि सुख फरी, भूली तन मन खबरी । रस रंग, बदरी, सुधा को स्वाद मिदरी, सो खाए राम दरी, पौ माने मातु सवरी ॥ १२३ (दोहा) श्रीरामहिँ रस रङ्गमणि, प्रेम भाव की भूख । सबरी की बदरी चखे, मन मह निदरि पियूष ॥ १ ॥ घर गुरु गृह ससुरारि प्रिय, सदन पाय पहुनाय । सवरी फल रुचि माधुरी, कहुँ न लही रघुराय ॥ २ ॥ प्रेम पगे खि चार फल, कौशल्या के लाल । भक्तन की करी मणी सवरी करी कृपाल ॥ ३ ॥ अधिक बढ़ावत, पते, जन महिमा, रघुबीर । तुलसी, शवरी पद रज से, शुडुभयो सरनीर ॥ ४ ॥ खगपति श्रीजटायू जी । टीका | कवित | “जानकी" हरण कियो “रावण" मरण काज; सुनि "सीता" बाणी " खगराज" दोड़ो आयो है । बड़ी ये लड़ाई लीन्ही, देह वारि फेरि दोन्ही, राखे प्राण, राम मुख देखियौ सुहायो है ॥ पाए पापु, गोद शीश धारि दुग धार सोंच्यो, दई सुधि लई गति तन हू जरायो है । " दशरथ" वत मान कियो जल दान, यह पति सनमान, निज रूप धाम पायो है ॥ ३८ ॥ वार्तिक तिलक | पक्षियों के राजा महाभक्त श्रीजटायु जी ने अपना तन भी भगवत के निमित्त अर्पण कर दिया। जब 8000-<noinclude></noinclude> kdiurozw1xjv2diqksa8k8tcbk7ivpl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१८९ 250 193858 664078 2026-07-02T15:53:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664078 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२४ भक्ति सुधास्वाद तिलक | 124 --90983 रावण अपना मरना प्रभु के शर से संकल्प करके उस्के निमित्त श्रीमायासीताजी को हरके लेचला, तो आपकी वाणी और विलाप सुन के सहायता करने को उक्त श्रीभक्तराज महाराज प्रति शीघ्र पहुँचे । आप जगतविख्यात निशाचरपति रावण से बहुत लड़े, रावण ने भी जाना कि किसी से काम पड़ा । जब उस दुष्ट ने आपके दोनों पक्ष काट डाले तब आपने अपना शरीर प्रभु के निमित्त न्यवछावर कर दिया; परन्तु श्री चक्रवर्त्तिकुमार महाराज के प्रिय दरशन के हेतु प्राण रक्खे हुए प्रभु का स्मरण कर रहे थे ॥ श्रीप्रिया जी को ढूंढते ढूंढते श्रीजानकीजीवन जी श्री लक्ष्मणजी के साथ साथ वहां आए ॥ (क) जाति के निषिद्ध, मांसभक्षक अशुद्ध "अवधेश" धर्म रद्ध, सखा किये निज शुद्ध हैं। पातक पिनद्ध बली रावण अबुद्ध मूढ़ काल पre बद्ध कियो करम बिरुद्ध है | सुनत सन जुरे रसरङ्ग जुद्ध, सिया बोनि लिये परे पंख बिनु बिद्ध हैं। रामकृपा रुद्ध दिये प्रेम ते प्रबुद्ध धाम सुख को समृद्ध धम्य श्री जटायू तु हैं । (दो०) कर सरोज सिर परसेउ कृपासिन्धु रघुबीर । निरषि राम छविधाम मुख विगत भई सब पीर ॥ प्रभु श्रीजी का सीस पपने श्रीगोद में लेके, स्नेह के से सींचा ॥ ( सवय्या ) दोन मलीन अधीन है अंग विहंग परेड क्षिति लिन दुखारी । " राघव" दीन दयालु रूपालु को देखि दुखी करुणा नत्र भारी ॥ S-000-<noinclude></noinclude> czvuuciblsxpnz17u1wv1uiqz6xonc6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९० 250 193859 664079 2026-07-02T15:54:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664079 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>125 3600- श्रीभक्तमाल सटीक | गोको गोद राखि कृपानिधि मैन सरोजन में भरि बारी । बाहिँ बार सुधारत पंख "जटायु" की धूरि जटान सो कारी ॥ १२५ --9091 (चौ० ) " राम: कहा तनु राखहु ताता”। मन मुसु- काइ कही तिन्ह वाता ॥ "जाकर नाम मरत मुख पावा । अधमी मुक्त होय श्रुतिगावा ॥ सो मम लोचन गोचर लागे । राखौं नाथ ! देह केहिषांगे ? ॥ " चौ० ॥ गीध अधम खग प्रामिष भोगी गति तेहि दीन्ह जो जांचत जोगी ॥ प्रभुने पिता श्रीदशरथ जी महाराज के सदृश जान के, क्रिया का; इस सनमान की बलिहारी ॥ (चौ०) गीध देह तजि धरि हरि रूपा । भूषण बहु पट पीत पनूपा ॥ (दो०) अविरल भगति मांगि घर, गीध गएउ हरि धाम । तेहि की क्रिया । यथोचित, निज कर कीन्ही राम ॥ ( गीत ) फिरत न बारहिंबार प्रचारयो । चपरि चोच लहति हय रथ खण्ड खंड करि डायो ॥ विरथ विकल कियो, इत्यादि, इत्यादि । तुलसीदास सुर सिद्ध सराहत धन्य बिहंग बड़भागी ॥ (दो०) दशरथ से दशगुन भगति सहित तासु कृत का । तुलसी सोच बन्धु युत राम गरीबनिवाज ॥ मुए, मरत, मरिहैं, सकल, घरी पहर के बीच । लही न काहू पाजु ल, गोधराज की मीच ॥ २ ॥ गोदसीस धरि, पितुसखा जानि कृपा के धाम । भारी धूरि ज टायु की, निज जटान सो राम ॥ ३ ॥ 1600-<noinclude></noinclude> 3k1uqb8r6i8mnhlvfct079h4wjdrph6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९१ 250 193860 664080 2026-07-02T15:54:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664080 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२६ 800- भक्ति सुधास्वाद तिलक | ( बच्चे ) 126 भक्ति भूमि भूपाल श्री दशरथ दश दिशि विदित यथ ॥ मनु अपु में बहु भक्ति तपकरि ब्रह्म विलोके । परमातम प्रिय पुत्र पाय सिय वधू विशोके || फणि मणि इव जल मीन सरिस प्रभु प्रौति सुपाने । सत्य प्रेम के सोम राम बिहुरतं तन त्यागे || कौशल्या पति पूज्य जग धर्म ध्वज वात्सल्य रस | भक्ति भूमि भूपाल श्री दशरथ दस दिशि विदित अस ॥ १ ॥ वारिधि रस वात्सल्य की कौशल्या बेला मनहु ॥ कृपा प्रीति प्रभु भक्ति सुकीरति सकल सकेली । विरचेठ चतुर विरंचि राम जननो मुदवेली ॥ सीता सरिस स्वभाव धनं घुर धरनि उदारा। भरता- दिक को करनि रामते अधिक दुलारा ॥ मातु सुमित्रा आदि सब "रस रङ्ग मणी " तेहिं सम गनहु | वारिधि रस वात्सल्य की कौशल्या वेला मम ॥ २ ॥ (राम रस रङ्ग मवि) ॥ श्री अम्बरीष जी । टीका। कवित्त | "अम्बरीष" भक्त की जो रीस कोऊ करे पोर, बड़ो तर, किहूं जान नहीं भाखिये । " दुरयासा" रीसि खीस सुनी नहीं हूं साधु मानि अपराध, सिर जटा चिनाखिये ॥ लई उपजाइ काल कृत्या विकराल रूप भूप महाघीर रह्यो ठाढ़ी अभिलाखिये । चक्र दुख मानि ले कृशानु तेज राख करी, परी भीर ब्राह्मण को भागवत साखिये ॥ ३९ ॥ बार्तिक तिलक । श्री अम्बरीष भक्तराजऋषि जी की समानता जो पौर कोई किया चाहे सो बढ़ाही मतिमन्द विक्षिप्त है, क्यों- कि उनकी भक्ति किसी प्रकार कथन में भी नहीं प्रा- सक्ती । देखिये, दुर्वासा ऋषि ने किसी साधु की 183600-<noinclude></noinclude> mz996i0m31pc0b6d6z8k7lvax0qwowi पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९२ 250 193861 664081 2026-07-02T15:54:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664081 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>88 127 188 600- श्री भक्तमाल सटीक । १२० सिखावनि नहीं सुनी, श्री अम्बरीषजी के बिना पप- राध ही अपराध माना, अर्थात एक समय द्वादशी के दिन महाराज के यहां दुर्बासा जी पाए महाराज ने नमस्कार विनय के अनन्तर भोजन के लिये प्रार्थना की । ऋषि जी ने कहा कि स्नान कर पावें तो भो- जन करें। इतना कह स्नान को गए। परन्तु उस दिन द्वादशी दोही दगड थी । राजा ने विचार किया कि त्रयोदशी में पारण करने से शास्त्राज्ञा उलंघित arit | तब ब्राह्मणों ने कहा कि चरणामृत पी लीजिये । एसाही किया । दुर्बासाजी प्राए पौर अनुमान से जाना कि इन्हों ने जल पिया है । फिर तो अत्यन्त क्रोध करके अपने जटा को भूमि में पटक के महा विकराल " काल कृत्या " उत्पन्न करके उससे कहा कि 66 इस राजा को भस्म करदे" इतने पर भी श्री अम्ब- रीषजी हाथ जोड़े, दुर्बासा की प्रसन्नता के अभिलाष में खड़ेही रहे । “श्री सुदर्शनचक्र जी" जो श्री प्रभु की ज्ञानुसार राजा की रक्षार्थ सदा समीप ही रहते थे, उनने दुर्भासा के दुखदाई क्रोध से दुखित होके उस कालाग्निकृत्या को अपने तेज से जला के राख करदी | और ब्राह्मण की पर भी चले, यह देख दुर्वासा जी भागे और चक्रतेज से पत्यन्त बिकल हुए, कि जैसा श्री मद्भागवत में लिखा ही है ॥ 600- 1986-06-<noinclude></noinclude> ipmxmtbbf1mjp5q4nf0832pg8x9bbhy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९३ 250 193862 664082 2026-07-02T15:54:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664082 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२८ 188600-- 23600- भक्ति सुधास्वाद तिलक टीका कवित्त | 1 भाज्यो दिशादिशा सब लोक लोक पाल पास गये, नयो तेजचक्र चून किये डारे हैं। ब्रह्मा शिव कही यह ही तुम टेव बुरी, दासन को भेद नहीं जान्यो, वेद धारे हैं ॥ पहुंचे बैकुंठ जाय, कह्यो दुःख पकु- लाय, हाय हाय ! राखौ प्रभु ! खरौ तन जारे हैं। "मैं तो हौं प्रधीन; तीनगुण को न मान मेरे 'भक्तवा- तसल्य गुण' सबही को टारे हैं” ॥ ४० ॥ में वार्त्तिक तिलक | ऋषिजी श्री चक्र के भय से भागे हुए गए; चारों दि शाओं, तथा चारो विदिशाओं, को, और सब लोकोँ ए; और लोकपाल केपास अर्थात् इन्द्र, वरुण, कु- बेर, यम, के पास जाके, उनने शरण शरण पुकारा; परन्तु चक्रका प्रतिक्षण बढ़ता हुआ तेज दुर्बासाजीको यो जलाके चूनासा कियेडालता था जैसे अग्नि कंकड़ पत्थर को । जब श्री ब्रह्माजी एवं श्री शिवजीके लो- क में वह पहुंचे, तब पदोनोंने कहा कि “दुर्यासाजी ! तुम ने यह बड़ीनिकम्मी टेव पकड़ी है कि भगवद्भक्तों का भेव (भेद, मर्म) न समझके उनसे उलझतेहो, कि जिनका प्रभाव वेद गानकरते हैं। तुम्हारी रक्षा हम नहीं करसक्ते"। हां, श्री नारद जी ने हित उपदेश दिया || तब पन्त में, श्री वैकुण्ठ जापहुंचे और हायहाय ! करके कुलाके प्रभु से अपना दुःखकहा कि “हे प्रभो ! 18600- 128 Boot-<noinclude></noinclude> hvvjwn4ukx7y62qyupu8mtpbumb3e7q पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९४ 250 193863 664083 2026-07-02T15:54:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664083 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>129 18000- श्रीभक्तमाल सटीक । १२९ रक्षा कीजिये । त्राहि त्राहि दयालु रघुराई ! रघुबीर करुणा सिन्धु भारतबन्धु जनरक्षक हरे !! इस चक्र का प्रति तीक्ष्ण तेज मुझे जलाए डालता है । (९) ध्याप शरणागतपाल हैं, मैं शरणागत हू, (२) आप नार्ति- नाशक हैं, मैं यात हूं; और (३) आप ब्रह्मण्यदेव हैं, मैं ब्राह्मण हूं ॥" यह सुन ॥" यह सुन श्री भगवान् बोले कि "पापने बात तो ठीक कही, परन्तु मैं भक्तों के आधीन स्वतन्त्र हूँ; जो मेरे उक्त तीन गुण आपने कहे, उनका नहीं है, क्योंकि 'भक्तवात्सल्यगुण' ने इस देश काल में उन तीनों गुणों का तिरस्कार कर दिया है” ॥ टीका । कबित्त । "मोको प्रति प्यारे साधु, उनकी अगाध मति; करो अपराध तुम, सह्यो कैसे जात है । धाम, धन, वाम, सुत, प्राण, तनु, त्याग करें, डरें मेरी ओर, नि- शि भोर मोसी बात है ॥ मेरेऊ न सन्त बिनु पौर कछु सांची कहों, जापो वाही ठौर, जाते मिटै उत पात है। बड़े दयाल, सदा दीन प्रतिपाल करें; न्यूनता न धरैं कहूँ; भक्ति गात गात है” ॥ ४१ ॥ बार्शिक तिलक । "मुझे साधु परयन्तप्यारे हैं, काहे कि उनका अगाध - मत है। जब तुमने उन्हीं का अपराधकिया तो मुझसे कैसे सहा जासकता है ? वे मेरे लिये, गृह, धन, तन, sपन्न, जन, वरंच स्त्री, पुत्र तथा प्राण तक, परित्याग 3000- १७ 3600--<noinclude></noinclude> nqwvs9wk8alrjeaopm146v93rmx6tk8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९५ 250 193864 664084 2026-07-02T15:54:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664084 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३० 8600- भक्ति सुधास्वाद तिलक | करके मेरी पोर, लगते हैं । और रात्रि दिवस मेरा भजन छोड़ उनके दूसरी बात ही नहीं ॥ एवं, मेरे भी सन्तों के लालन पालन सार सँभार बिना पर कोई कार्य कुछ भी नहीं है, मैं सच्ची २ कहे देता हूं । (चौ०) पससज्जन मम उर बस कैसे । लोभी हृदय बसत धन जैसे ॥ झाप उन्ही के पास जाइये, जिससे यह चक्रकृत दुःख उत्पात मिट जावे । यह शंका न कीजिये कि वे मुझे कैसे क्षमा करेंगे, क्योंकि मेरे सन्त भक्त बड़ेही क्षमाशील, प्रकारण पर- उपकारी एवं दयालु होते हैं तथा दोनों का सदा प्रतिपाल करते हैं । दूसरे का चूक अपने हिय में नहीं रखते; क्योंकि उनके तो सम्पूर्ण ङ्गी में मेरी भक्ति ही ● भरी है, किसी की न्यूनता रखने के लिये जगह ही उनके चित्त में बची नहीं है ॥ (चौ०) सुनु, मुनि ! सन्तन के गुण जेते । कहि न सकहिं श्रुति शारद तेते ॥ " टीका | कवित्त । कुछ भी कर निरास, ऋषि आयो नृप पास, चल्यो गर्व सों उदास, पग गहे, दोन भाष्यो है । राजा लाज मानि, मृदु कहि, सनमान कस्यो ढखो, चक्र पोर, कर जोर, अभिलाष्यो है ॥ भक्त निसकाम, कभू कामना न चाहत हैं, चाहत है विप्र, टूरि करो दुख, चाख्यो है ॥ देखिकै विकलताई, सदा सन्त सुखदाई, पाई मन मांझ, सब तेज ढांकि राख्यो है ॥ ४२ ॥ 8000- 180<noinclude></noinclude> g3lzie7o1qbc4y8g6n0qg61pqbbporg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९६ 250 193865 664085 2026-07-02T15:55:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664085 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>131 श्री भक्तमाल सटीक । १३१ 1810:00- वार्त्तिक तिलक । प्रभु के ऐसे वचन सुन के, ऋषिजी निरास, तथा अपने गर्व (अभिमान) से उदासीन होके चले, पौर राजा अम्बरीष जी के पास के चरणों को पकड़कर ऋषि ने दीन वचनों से क्षमा मांगी। महाराज लज्जित हो, सादर पग छुड़ा, कोमल वचनों से मुनिजी का सनमान करके, श्री चक्र जी की पोर जा हाथ जोड़, यो प्रार्थना करने लगे, कि "हे क्षमामन्दिर श्रीसुद- र्शन जी ! यद्यपि हरि भक्तों को कोई कामना नहीं होती, वे सदा निष्काम रहते हैं, तथापि मेरी यह कामना है कि, इन विप्रजी ने बहुत दुःख पाया सो आप मुझ पर कृपा करके इनकी रक्षा कीजिये" सन्तों के सुखदाता श्री सुदर्शन चक्र जी ने द्विज के दुख से श्रीभगवतभक्त को विकल देख, प्रसन्न हो, प्रार्थना मान, अपने तेज को छिपा लिया, और भाग्यभाजन राजा ने दुर्वासा जी को अभयदान दे भोजन करा, बिदा किया ॥ ( चौ० ) "श्रापत ताड़त परुष कहन्ता । पूजिय विप्र कहहिं अस सन्ता ॥ ( दो० ) मन क्रम बचन, कपट तजि, जो कर भूसुर- सेव । विष्णु समेत विरंचि शिव, यश ताके सब देव ॥” टीका । कबित | एक नृपसुता सुनि अम्बरीष भक्तिभाव, भयो हिय भाव ऐसो बर कर लीजिये । पितासों निशंक के 1886-06-<noinclude></noinclude> 56ievem8c3m1e7dl25nz698c84dcp01 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९७ 250 193866 664086 2026-07-02T15:55:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664086 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३२ भक्ति सुधास्वाद तिलक । कही " पति कियो मैं ही, विनय मानि मेरी, बेगि चीटी लिखिदीजिये ॥ " पाती लेके चल्यो विप्र, छि वही पुरी गयो, नयो चाव जान्यो ऐपै कैसे तिया धीजिये । कहो तुम जाय, “रानी बैठीं सत पाय, मोको बोल्यो न सुहाय, प्रभुसेवा मांझ भीजिये ॥४३॥ वार्त्तिक तिलक । श्रम्बरीष जी की एक पाख्यायिका कहकर ब राजसुता सम्बन्धी भक्ति उनकी वर्णन करते हैं । एक राज कन्या को श्री अम्बरीष जो की भक्ति और प्रेम भाष सुनके बड़ा आनन्द हुपा, उसके हृदय में यह भाव उत्पन्न हुआ कि “ऐसा पति कर लेना चाहिये; जो भाग्यशालिनी ऐसे भक्तराज की दासी हो वह धन्य है " यों विचार कर, निशंक हो, उसने अपने पिता से कहा कि मैंने श्री ६ पम्बरीष जी को पति मान लिया, "बरौंताहि न तु रहौं कुमारी"; "आप मेरा विनय मान के राजा को एक पत्रिका लिख दीजिए" । कन्या के पिताने पत्र लिखके एक ब्राह्मण के हाथ दिया । ब्राह्मण ने, वह पत्र ले, बड़ी शीघ्रता से उस पुरी में जा, महा- राज (श्रीपम्बरीषजी) को दिया । महाराज ने पत्र पढ़ के कहा कि "उसका नवीन अभिलाष मैंने भली भांति जाना, परन्तु मैं स्त्री को कैसे ग्रहण करूं ? क्योंकि मेरे तो सैकड़ों रानियां घर में बैठी हैं और मुझको उनसे बात तक करनी नहीं भाती । 132<noinclude></noinclude> 4ys41y42um129xqbzink0m6856dn2qm पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९८ 250 193867 664087 2026-07-02T15:55:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664087 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>600- 188 श्रीभक्तमाल सटीक । (चौ०) उमा ! राम सुभाव जिन जामा । तिनहिं भजन तजि, भाव न पाना ॥ १३३ -90983 | मेरा मन तो केवल भगवत सेवा ही में रँग गया है। यह बात पाप जाके राजकन्या से कह दीजिये" ॥ टीका | कवित्त । को नृपसुतासो जु कीजिये यतन कौन ? पौन जिमि गयो आयो काम नाही बिया कौ । फेरिकै 'पठायो, सुख पायो मैं तो जान्यों वह बड़े धर्मज्ञ, वाके लोभ नाहीं तिया कौ । बोली अकुलाइ मन भक्ति ही रिझाइ लियो, कियो पति, मुख नहीं देखौं और पिया कौ । जाइ निशंक यह बात तुम मेरी कहौ, “चेरी ओ न करो तो पै लेवो पाप जिया की" ॥४४॥ कहा कि बार्त्तिक तिलक । सुना के ब्राह्मण ने आके राजकन्या से सब बार्त्ता क्या यतन किया जाय ? मैं पवन के समान बेग से गया और आया पर कार्य्य कुछ भी (गुंजा के बीया भर भी) न हुस्र्पा ! राजकन्या ने कहा कि "उनके तीव्रतर वैराग्य की अनुपम व्याख्या सु. के मुझको बड़ा ही आनन्द हुपा; मैं जानती हूं कि वे बड़े ही धर्मज्ञ हैं तथा उनके शुद्ध अन्तःकरण में भक्ति लता ऐसी सघन फैली है कि स्त्री पादिक की चाह कुर की जगह रही नहीं है"। इतना कहने के साथही साथ भक्तराज के स्नेह से व्याकुल होके वह सुशीला<noinclude></noinclude> jw1fpbpgmimo1g2q0chgljrfrzq5ejm पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१९९ 250 193868 664088 2026-07-02T15:55:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664088 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३४ 8600- भक्ति सुधास्वाद तिलक । 134 -90983 फिर बोल उठी कि "उनकी भगवद्भक्ति ही ने मेरे अंत:- करण को पाकर्षण करके मुझे ऐसा रिका लिया है कि मैं उनको अपना पति मान चुकी हूँ । पौर प दूसरे पुरुष का मुँह मैं देखनेवाली नहीं । आप फिर जाके निःशंक कहिये कि 'जो आप अपने चरण की चेरी न कीजियेगा तो मेरे देह त्याग का पाप लीजिये मैं उनके बिन अपने प्राण नहीं रखने की ॥ (दो० ) के अपनावहिँ मोहि वे, के में त्याग देह । भक्त शिरोमणि नृपति ते, कहेहु विप्रवर ! नेह” ॥ टीका | कवित्त । कही विप्राय, सुनि चाय भहराय गयो, दयो लै खड़ग “यासों फेरी फेरि लीजिये" । भयो जू विबाह उत्साह कहूं मात नाहि; पाई पुर अम्बरीष देखि छबि भीजिये ॥ कह्यो “नव मन्दिर में झारिकै बसेरो देवो, देवो सब भोग विभो, नाना सुख कीजिये । पूरय जनम को मेरे भक्ति गन्ध हुती, याते सनबन्ध पायो यह मानि धीजिये ॥४५॥ वार्त्तिक तिलक | । | ब्राह्मण ने फिर जा के श्रीपम्बरीष जी से राज- कन्या की प्रति प्रतीति प्रणय पातिव्रत्य का पन पर प्राण त्याग का संकल्प पर्यन्त कहा । राजा ने, ऐसा प्रेम व सुन, धर्म संकष्ट से पधीर हो, अपना खड्ग दिया, कि "इसी से भांवरी फिरा लीजियेगा "<noinclude></noinclude> 2bmdoq9pog1hfvl50alx7jkcui51p9h पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०० 250 193869 664089 2026-07-02T15:55:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664089 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>135 श्रीभक्तमाल सटीक । १३५ --00083 [ राजा ने खुद इस कारण से दिया कि क्षत्रियों का शस्त्र शास्त्र में उनका अंग ही माना गया है ] इस प्रकार से बिवाह होजाने पर राजकन्या का नन्द तन मन में अँटता नहीं था। बड़ेही उत्साह से मन्त्री वर्गों के साथपुर में पाईं। राजसुता तथा श्रम्बरीषजी दोनों श्री युगल सरकार के भक्तिरस माधुरी से छके हुए अन्योन्य छवि देख के श्रीप्रभु प्रेम में मग्न हो गए। महाराज ने आज्ञा दी कि "नए मन्दिर को झाड़ वहार, स्वच्छ कर, रानी को निवास देके, सब भोग सामग्री दिया जावे, कि वे नाना प्रकार के सुख भोगें । जाना जाता है कि पूर्व जन्म की मेरी इनकी कोई भक्ति सम्बन्धी विमल वासना थी; इसी हेतु से मेरा इनका सम्बन्ध हुआ; और ऐसाही अनु- मान कर के इनका स्वीकार किया गया" ॥ टीका | कवित | रजनी के सेस पतिभौन में प्रवेश कियो, लियो प्रेम साथ, ढिग मन्दिर के पाइये । बाहिरी टहल पात्र चौका करि रीझ रही, गही कौन जाय, जामें होत ना लखा- इये ॥ आवतही राजा देखि लगे न निमेष क्यों कौन चोर आयो मेरी सेवा ले चुराइये | देखी दिन तीन, फेरि चीन्हि के प्रवीन कही, “ऐसो मन जो पै प्रभु माथे पधराइयै” ॥ ४६ ॥<noinclude></noinclude> nnpkv41m70ilxj25m5hiqtlaaqv2yhx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०१ 250 193870 664090 2026-07-02T15:56:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664090 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३६ भक्ति सुधास्वाद तिलक | 136 वार्त्तिक तिलक | भक्तिवती रानी अपने निवास में रहने लगी । एक दिन कुछ रात रहते हुए पकेली केवल अपने प्रिय प्रेम ही को संग लेके पति के करके भगवतमन्दिर के समीप पूजामहल में प्रवेश के बाहर की सेवा टहल किये अर्थात पूजा के पार्षद मांज के चौका लगाके, उस सेवा सुख के से अति प्रसन्नता पुर्बक अनुभव चली आई, जिसमें किसी को लखाई न पड़े। तो इस्में सेवा करनेवाली कोन रानी कही जावे ? तदन- न्तर श्रीभक्तराजा जी ने, आके देखा कि वाह्य कैंकर्य्य (पार्षद चौका) कोई कर गया है । इस्से उनको ऐसी चंचलता हुई कि उनके मन रूपी नेत्र में स्थिरता का निमेष भी नहीं लगता था । विचारने लगे कि यह कौन चतुर चोर नाके मेरी सेवा सम्पति चुरा ले गया ? इस प्रकार तीन दिन पर्य्यन्त देखा; चौथे दिन उसी समय परम प्रवीण राजा छिप के बैठे और देख के भक्तिवती रानी को पहिचान के कहा कि "जो तुम्हारे मन में ऐसीही सेवा की उत्कंठा और भक्ति है तो अपने मनभावन को अपने निज भवन में ही क्यों नहीं पधरा लेती हो ? जिसमें तुम्हारेही सीस पर सेवा सुख भार रहे" ॥ 8000- 1920-06- (लोक) “ पुस्तक, माला, पसनो, बसनो । ठाकुर बटुवा, पपनी अपनी ॥ "<noinclude></noinclude> dd4toyudt9mhg1vafguq477ze2xrwxg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०२ 250 193871 664091 2026-07-02T15:56:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664091 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>137 भक्ति सुधास्वाद तिलक | १३० टोका | कवित्त | लई बात मानि, मानो मन्त्र ले सुनायो कान; होत हृीं बिहान, सेवा नीकी पधराई है । करति सिँगार, फिरि माही निहारि रहे, लहे नहीं पार, ढंग झरी सी लगाई है || भई बढ़वार, राग भोग सो अपार भाव, भक्ति विस्तार रीति पुरी सब छाई है । नृपहू सुनत लागि चोप देखिये की; पाए ततकाल मति पति कुलाई है ॥ ४७ ॥ वार्शिक तिलक । श्री भक्तराज के स्वच्छ अंतःकरण से प्रीति युक्त निकले हुए ऐसे अनुपम वचन सुनते ही प्रेम मूर्त्ति रानी ने महामुदित मन में इस प्रकार मान लिया कि मानो गुरु मन्त्र ही काम में सुना दिया गया है। प्रातःकाल होते ही उनने भगवत के दिव्य पर्चा विग्रह नीके प्रकार से उत्सव पूर्व्वक विराजमान किया । (चौ०) जाकर जापर सत्य सनेहू । सो तेहि मिले न कछु सन्देहू ॥ फिर क्या कहना है, अपने हाथों से सप्रेम शृङ्गार करके पुनि उस छवि को आपही अवलोकन करती हुई चन्द्रकोरवत एक टक रहजाती, शोभासिन्धु श्रीप्रभु की शोभा का पार नहीं पाती थी; उसके नेत्रों से प्रेमानन्द जल की झड़ी सी लग जाती थी । सेवा राग भोग से अपार भाव हुआ । इस भक्तिरसिका रानी की प्रीति प्रतीति रीति भक्ति की ऐसी अभि દ્ર<noinclude></noinclude> jwgb9y2q4v7bkld86u0eil70fohb6mw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०३ 250 193872 664092 2026-07-02T15:56:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664092 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३८ 2006- श्रीभक्तमाल सटीक | वृद्धि हुई कि संपूर्ण नगर में सुकीर्त्ति छा गई ॥ यहां तक कि राजा ने भी सुना; तब उनको भी प्रेमवती के प्रेमवर्द्धकप्रभु के दर्शन की अतिशय चाह उत्पन्न हुई; वरंच दर्शन बिना व्याकुल होके ततकाल चलही तो दिया ॥ टोका | कवित्त । हरे हरे पांव धरै, पौरियानि मने करै, खरे रबर, कब देख भागभरी को । गए चलि मन्दिर लौ, सुन्दरी न सुधिङ्ग, रङ्ग भीजि रही, दृग लाइ रहे झरी को ॥ बीन ले बजावै, गावे, लालन रिझावे, त्यों त्यों पति मन भावे, कहें धन्य यह घरी को । द्वार पै रह्यो न जाय, गए ढिग ललचाय, भई उठि ठाढ़, देखि राजा गुरु हरी को ॥ ४८ ॥ वार्त्तिक तिलक । जब निकट पहुँचे तब धीरे धीरे पांव रखते और पौडियों को पर्थात् वृद्ध द्वाररक्षकों तथा द्वार रक्षिणीयों को रसे रसे निवारण करते, कि रानी को जाके जता मत और पत्यन्त कुला रहे हैं कि उस भक्ति भाग्य- पूर्ण को मैं कब देखूं । यों ही जब मन्दिर के समीप जा पहुँचे तब देखते क्या हैं कि सानुरागा सुन्दरी अपने शरीर की सुधि भूल के प्रेम रस रंग में मग्न है, और उसके नेत्रों से प्रेमानन्द जल की प्रविचिन्न वर्षा हो रही है; वीणा बजा के कीने स्वर से प्रभु का नाम- 138 18600-- 1386-06-<noinclude></noinclude> 42ylus5si1tnx0n3lc4pfd6eox8d340 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०४ 250 193873 664093 2026-07-02T15:56:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664093 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>189 18006- भक्ति सुधास्वाद तिलक | यश गाके प्राणप्रिय को रिझा रही है। यह दशा ज्यों ज्यों देखते हैं त्यों त्यों श्रम्बरीष जी के मन में यह दशा तथा प्रीतिदशावतीरानी अत्यन्तही प्रिय लगती हैं। महाराज मन में कहते हैं कि यह घड़ी धन्य है ॥ ( रा०क०) "कोउ ले बीन नवीन सुरनते, मनहु बशी- कर जाएँ । कोउ मृगनयनी कोकिलबयनी, पंचम राग पलापैं ॥” (श्लोक) “नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये नच । मभक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ! " ॥ , १३९ प्रेम सुख की लालच से द्वार पर ठहरा नहीं गया, तब रानी के पासही जा खड़े हुए। “हरि ते अधिक गुरुहि जिय जानी" के प्राशय ने प्रेम निमग्न रानी की सुरति को श्री सेवा से खींच के, भक्तराज के सन्मुख कर दिया; रानी ने देखा कि मेरे हरि (पति) हितो- पदेशक गुरु, राजा, पासही खड़े हैं | इस्से उनके पादर के निमित्त उठ खड़ी हुई || टोका | कवित वैसे ही बजाओ बीन ताननि नबीन लैकै, झीन सुरकान पर जाति मति खोइये। जैसे रंग भीजि रही, कही सो न जाति मोपे, ऐपै मन नैन चैन कैसे करि- गोइये । करिकैाप चारो फेरिकै सँभारि तान, इगयो ध्यान रूप ताहि मांझ भोइये । प्रीति रस रूप भई, राति सब वीति गई, नई कछु रीति अहो ! जामें नहिं सोइये ॥ ४९ ॥ . 8606-<noinclude></noinclude> n1ze8ytes8y8xmi7d5tib0t9qlcemt2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०५ 250 193874 664094 2026-07-02T15:56:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664094 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४० 1986-00- श्रीभक्तमाल सटीक । वार्त्तिक तिलक । 140 -9098 तब राजा ने कहा कि "इस सन्मान को इस घड़ी जाने दो; जैसे बीन बजाती रही हो, वैसेही बजा के नए तान लेके मधुर स्वर से स्वामी के यश गान करो; क्योंकि उस श्रवणामृत के सुने बिना मेरी मति विकल हुआ चाहती है। " रानी जैसे पनुराग रंग में मग्न हो रही है, सो दशा मुझ से कही नहीं जासकती, परन्तु ध्यान से देखते ही मन तथा मानसिक नेत्रों को ओपती अर्थात् चमाचम प्रेमप्रभामय कर देती है; वह प्रेमानन्द कुछ कहे बिना किसी प्रकार से रहा नहीं जाता । राजा के बचन सुनतेही रानी ने वीणा लेके फिर सरस स्वरपलाप करके गान तान को सँभाला; कि जिसके साथ ही मन में श्यामसुन्दररूप अनूप का ध्यान आ गया और उसी में मग्न हो गई । इस भांति, रानी राजा दोनों को ऐसी भक्ति रस रूपा प्रीति बढ़ी कि जिसमें सारी रात पल सरीखी व्यतीत हो गई। प्रार्य मय प्रीति की अलौकिक रीति की पनूठी घटनाएं ऐसी ही विलक्षण हैं, कि जिसमें नींद पालस भूख इत्यादि बाधावों का तो कहनाही क्या है, जागरित स्वप्न सुषुप्त अवस्था पर्यन्त भी अपना २ निराद रदेखकर अन्तःकरण और वाह्य इन्द्रियों से अपना शासन प्राप ही उठा लेती हैं ॥ 4:00-<noinclude></noinclude> dezzefenndyc8iyqo2irrkbyiroy99b पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०६ 250 193875 664095 2026-07-02T15:56:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664095 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>200-00- 141 88600- ० भक्ति सुधास्वाद तिलक | टीका | कवित्त । १४१ बात सुनी रानी पोर, राजा गए नई ठौर, भई सिर मोरे, अब कौन वाकी सर है । हमहूं ले सेवा करें, पति मति बश करें, धरै नित्य ध्यान, विषय बुद्धि राखी घर है ॥ सुनिकै प्रसन्न भए अति सम्ब रीष ईस लागी चीफ़, फैल गई भक्ति घर घर है । बड़े दिन दिन चाव, ऐसोई प्रभाव कोई, पलटै सुभाव होत मानंद को भर है ॥ ५० ॥ वार्त्तिक तिलक । यह वृतान्त और सब रानियों ने सुना, कि नई रानी के समीप में जाके प्रभु का नाम गुण गान सुन्ते २ राजा ने आज रात्रिभर बिता दिया; पतएव वह तो सब सबकी शिरोमणि हो गई, अब उस्की समानता हम सब कैसे कर सकती हैं । तब सबों ने यह विचारा कि महाराज यदि श्रीभगवत सेवा भक्ति ही से प्रसन्न होते हैं तो हम सब भी क्यों न भगवत सेवा करके प्राणपति को अपने बश करलें । सब रानियों ने ऐसाही किया; विषयात्मक बुद्धि को अलग रखके केवल भगवत सेवा पूजा गुणगान और रूप अनूप के ध्यान में ही दिन रात बिताने लगीं। उन सबों को भक्ति को भी उनके स्वामी श्री अम्बरीष जी सुनके बड़ेही प्रसन्न हुए। और उन<noinclude></noinclude> g5lxl3cbef6dtfkewihriwdub697ai6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०७ 250 193876 664096 2026-07-02T15:57:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664096 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>९४२ श्रीभक्तमाल सटीक । 142 100- -9098 सब रानियों के हरि मन्दिरों में भी जा जाके उनको वैसाही आनन्द देने लगे ॥ महाराज की यह रीति समस्त पुरवासियों ने सुनी; तब तो नगर भर के लोगों को भगवद्भक्ति में पति- शय भाव चाव उत्पन्न हुआ और घर घर में भक्ति कल्पलता फैल फूल के फल युक्त हुई । इस प्रकार महाराज श्रीप्रम्बरीष जी के घर नगर तथा देश में दिन दिन प्रति प्रेमभाव भक्ति की वृद्धि और उन्नति हुई । देखिये, परमप्रेमवती एक रानी की भक्ति के प्रभाव सेहो, सब रानियों बरंच सम्पूर्ण नगर वासियों का स्वभाव संसार से पलट के प्रभु लग गया। और सर्वत्र भगवत प्रेमानन्द छा गया ॥ सत्संग ऐसा पदार्थ है । श्रीविदुरानीजी और श्रीविदुरजी । टीका | कवित्त | न्हात ही विदुर नारि, अंगन पखारि करि; आइ गए द्वार कृष्णा बोलि के सुनायो है । सुनतही स्वर, निरि, मानो राख्यो मद भरि, दौरि मानिके चितायो है ॥ डारि दियो पीत पट, कटि पटाइ लियो, हियो सकुचायो, वेष बेगिही बनायो है। बैठी ढिग पाइ, केरा छीलि छिलका खवाइ; यो पति, खीभयो, दुःख कोटि गुनी पायो है ॥ ५१ ॥ वार्त्तिक तिलक | 1986-00-- महाभारत होने के पूर्व श्रीकृष्ण भगवान् पाण्डवों<noinclude></noinclude> 6hz0j7svyhbjwpbw3bzc1csu9zh6z2i पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०८ 250 193877 664097 2026-07-02T15:57:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664097 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>143 भक्ति सुधास्वाद तिलक । १४३ --909881 की पर से मिलाप की वार्ता करने को दुर्योधन के पास गए; पर उसने नहीं माना; इस्से उसके घर भोजन भी नहीं किया । श्रीविदुर जी के गृह पाएं, उस समय श्रीविदुर जी की स्त्री, दूसरे वल के अभाव से विवस्त्र हो अंगो को धो २ खान कर रही थीं। द्वार पर पाके श्रीकृष्ण भगवान् ने महा मधुर स्वर से 'पुकारा; श्री विदुरानी जी आपका वह मधुर स्वर सुनतेही सुध बुध भूल गईं, क्योंकि वह स्वर मानो प्रेम से भरा हुआ था; दौड़ती हुई लाके किवाड़ों को खोल के दरशन किया । श्रीयादवेन्द्र जी भी उनको प्रेमी- न्मत्त वस्त्रहीन देख के अपना पीताम्बर शीघ्रही पाप की उढ़ा दिया; जिसको आपने अपनी कटि में लपेट लिया और संकोच युक्त हो, शीघ्रता से अपने वेष को सँभाल लिया ॥ श्रीकृष्ण भगवान् ने कुछ भोजन मांगा। पाप केले ला, पास बैठ, केले को छीलने लगीं, पर प्रेम तथा हर्ष से विह्वल होके, छिलकों ही को तो खिलाती जाती थीं और सार को फेंक २ देती थीं। भक्तवत्सल भगवान् प्रेम के स्वाद में छके छिलकों ही को बड़े चाव से खाते जाते थे; इतने में श्रीविदुर जी के इस कौतुक को देख अपनी धर्मपत्नी पर 600-<noinclude></noinclude> 3dpyvb9jamsx4znwncj7nx6xjdwwoem पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२०९ 250 193878 664098 2026-07-02T15:57:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664098 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४४ 83000- 8000- श्रीभक्तमाल सटीक । बहुत मिलाए; तब सचेत हो अपने व्यतिक्रम को सम के श्रीविदुरानी जी ने अत्यन्त दुख पाया ॥ (दो०) अहह ! भइउँ मैं बावरी ! रही न तनु सुधिनेकु । ऐसी सुधि भूली, कि नहिं छिलका सार विवेकु ॥ टीका | कवित्त | प्रेम को विचार झापु लागे फल सार दैन, चैन पायो हियो, नारि बड़ी दुखदाई है । बोले रीझि श्याम, तुम कीनो बड़ी काम, ऐपै स्वाद अभिराम वैसी वस्तु में नपाई है ॥ तिया सकुचाय, कर काटि डारों हाय प्राणप्यारे को खवाई छीलि छीलिका न भाई है । हित ही की बातें दोऊ, पार पावै नाहिं, कोउ, नीके कै लड़ावै, सोई जाने, यह गाई है ॥ ५१ ॥ वार्त्तिक तिलक । प्रिय पाठक ! प्रेम के प्रवल प्रभाव को विचार कीजे । अथवा, विदुरजी अपनी धर्मपत्नी के प्रेम प्रमाद को विचार के, प्रभु को फल का सारांश खिलाने लगे, तब उनके हृदय में आनंद आया; और मन में वे यह कहने लगे कि इसने प्रेम से विक्षिप्त हो यह दुःखप्रद कार्य किया । श्याम सुन्दर जी ने प्रसन्न होके कहा कि "आपने काम तो बहुत अच्छा किया कि केलों का सारांश खिलाया; परंतु न जानूं क्या कारण है कि जैसा उन 18000- 144 00:08<noinclude></noinclude> 2ilr7zatqgi5y6evh6cempa39gn68zi पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१० 250 193879 664099 2026-07-02T15:57:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664099 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>145 18000- ---- भक्ति सुधाविन्दुवाद तिलक । १४५ छिलकाओं में प्रत्यन्त सुन्दर स्वाद मुझे मिलता था वैसा इस सारांश में नहीं प्राप्त हुआ । (लो०) पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ अभी अभी, दुर्योधन के घर अनेक षटरस व्यंजनादि का त्याग किये हुए चला पाता हूं। ॥ उधर श्रीविदुरानी जी अतिशय संकोच को पाके पश्चात्ताप करने लगीं कि, "हाय ! मैं तो इन हाथों को काट डालूं, जिन हाथों से प्राणप्रिय को छिलके खिलाए। लालन को छिलके कैसे प्रिय लगे होंगे ? । " देखिये ! श्री विदुरानी जी तथा श्री विदुरजी का छिलका और सार खिलाना, ये दोनों ही बातें प्रेम की ही हैं; तथापि प्रेमरूपी सागर ऐसा अपार है कि कोई उस्का पार नहीं पासकता; हां, जो इस प्रेम में परायण होके प्रेमग्राहकप्रभु को लाड़ लड़ावे, प्रेम करे, सीई इस अनुराग सिन्धु को गम्भीरता तथा अपारता को कुछ जाने; अपने तो, आप सब की कृपा से, केवल गान मात्र कर दिया है ॥ श्री सुदामाजी । टीका | कवित । बड़ो निसकाम, सेर चून हू न धाम, ढिग पाई 1800- 88400 १९ 600----<noinclude></noinclude> 3tovd88r6xntc2nxb7h89r4jru9fwaa पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२११ 250 193880 664100 2026-07-02T15:57:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664100 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४६ 188300- श्रीभक्तमाल सटीक । 146 -•90988 निज भाम, प्रीति हरि सों जनाई है । सुनि सोच परखो हियो खरो अरबौ मन गाढ़ो लैकै कस्यो, बोल्यो हांजू सरसाई है " | " जावो एक बार, वह बदन निहार घ्यावी, जोपे कछु पावो, ल्यावो, ल्यावो, मोको सुख- दाई है " । " कही भलीबात, सात लोक में कलंक है, जानियत याही लियें कीन्ही मित्रताई है ” ॥५३॥ वार्त्तिक तिलक | श्रीकृष्णभगवान् के मित्र श्रीसुदामा जी बड़े नि- काम भक्त थे; यहां तक कि घर में सेरमर खाटा भी न रहता था । एकदिन उनकी धर्मपत्नी श्री " सुशीला” देवी, समीप में पाके, कहने लगीं कि " 'सुना है कि श्रीलक्ष्मीपति द्वारकाधीश श्रीकृष्णचन्द्र जी से और आपसे मित्रता है ।" यह सुन, श्रीसुदामा जी उस्का आशय विचार के, हृदय में पत्यन्त घबड़ाकर सोच में पड़ गए; परन्तु फिर मन को दृढ़ करके बोले कि "हां, उनकी मेरी तो बड़ी सरस प्रीति है । " एक इसपर ब्राह्मणी (उनकी स्त्री) ने कहा कि “ बेर जाके अपने मित्रवर का मुखचन्द्र अवलोकन कर पाइये; और यदि कुछ मिले तो लाइये कि वह मुझे थड़ा सुखदाई होगा । ” भक्तजीने उत्तर दिया कि " तुमने बात तो भली कही, परन्तु मुकको समस्त लोकों में कलंक होगा कि --0008<noinclude></noinclude> n05u33w6dysr9ypkr6by4lxkasuasdu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१२ 250 193881 664101 2026-07-02T15:58:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664101 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>147 भक्ति सुधाविन्दुस्वाद तिलक । १४७ 88400 188400 इस अर्थार्थी भिक्षुक ब्राह्मण ने केवल द्रव्य ही की लालच से प्रभु से मित्रता की है. ॥ (दो०) चाहत नहिँ रसरंगमणि चन्द्रमुखी, सुत, वित्त | चाह यही प्रभु ! दीजिये 'चाह न उपजै चित्त' ॥१॥ जन बिगारी कामिनी, सभा बिगाड़ी कूर । भक्ति घिगाड़ी 'लालची' केसर मिलगइ धूर ॥ २ ॥ एवमादि, इनने बहुत "नहीं, नहीं" किया; परन्तु - टीका | कवित्त | तिया सुनि कहे " कृष्णरूप क्यों न चहे ? जाय, दहे द दुख आपही सो, " बचन सुनाए हैं । आाई सुधि प्यारे की, विचारे, मति दारे सब, धारे पग, मग भूमि "द्वारावती” आए हैं ॥ देखिकै विभूति, सुख उपज्यो भूत कोऊ, चल्यो मुखमाधुरी के लोचन तिसाए हैं। डरपत हियो, ड्योढ़ी लाँधि, मन गाढ़ो कियो, लियोकर हि चाह तहां पहुंचाए हैं ॥५४॥ वार्तिक तिलक | इनका उत्तर सुन, इनकी स्त्री ने कहा कि “जाके केवल अपने प्रिय मित्र के रूप अनूप का दर्शन मात्र क्यों नहीं करते ? " और ऐसा प्रमाण बचन भी सु- नाया कि "भगवत् के दर्शनही से दारिद्रयादि सब दुःख आपही आप भस्म हो जाते हैं । " श्री सुदामा जी को प्राणप्यारे मित्र के रूप का ध्यान गया; तब विचार करके लोभादिकों के उपहास की 18600--<noinclude></noinclude> l0ti5icj70ybp73dp08fwfmh87josjb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१३ 250 193882 664102 2026-07-02T15:58:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664102 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४८ 183600- शङ्का को श्रीभक्तमाल सटीक । 148 को चित से हटाके, श्रीकृष्ण भगवान् के दर्शन 'चले; प्रेममद में छके झूम झूम पग धरते, सानुराग मिलन 'सुख का मंजुमनोरथ करते हु श्रीहरि कृपा से पति शीघ्र श्रीद्वारका जी में पहुंचे। परम प्रिय प्रभु का ऐश्वर्य्य विभूति देख के मन में कोई आश्चर्य सुख उत्पन्न हुआ, और आगे बढ़े ॥ मित्र मुखचन्द्र सुधा पान के हेतु नेत्र चकोर अतिशय प्यासे हैं; इससे आप प्रत्यन्तातुर हो रहे हैं; हृदय में किसी के रोक देने का भयं भी हो रहा है; परन्तु मन को दृढ़ करके, राजसदन पर सावित्र जीने देवढ़ियों को उल्लंघन किया, मानो मिलनकीचाह रूपा प्रतिहारी ने इनका हाथ गहके (यांभके) इनको श्रीकृष्ण महाराज के पास पहुँचा दिया ॥ “जाकी सुरति लगी है जहां । कहै कबीर सो पहुँचै तहां ॥" टीका कवित्त । देख्यो श्याम आयो मित्र, चित्रवत रहे नेकु; हित को चरित्र, दौरि रोइ गरे लागे हैं। मानो एकतन भयो, लयो ऐसे लाइ छाती, नयो यह प्रेम, छूटे नाहिँ अंग पागे हैं | आई दुबराई सुधि, मिलन छुटाई ताने; पाने जल रानी, पग धोए भाग जागे हैं। सेज पध- राइ, गुरु चरचा चलाई, सुखसागर बुड़ाई, आपति अनुरागे हैं ॥ ५५ ॥ 88 06- 600- GM.<noinclude></noinclude> a8nbfdkl7smlmp7avtap6kttti6hrc7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१४ 250 193883 664103 2026-07-02T15:58:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664103 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>149 मक्ति सुधाविन्दुस्वाद तिलक । १४९ वार्तिक तिलक । श्रीश्यामसुन्दर जी ने देखा कि मेरे मित्र पाए, तब प्रेमानन्द की विचित्रता से कुछ काल तो अपनपी भूलके चित्रवत जहां के तहां रह गए; फिर दौड़के प्रति विह्वल होके मित्र के, चरित्र में पगे, नेत्रों में आंसू भर, खा (सुदामाजी की अपने कण्ठ में लपटा, और इस प्रकार से अपने हृदय में लगालिया, कि मानो श्याम- सुदामा एकही मूर्त्ति हो गए; एवं इस लोकोत्तर प्रेम के वश हो के परस्पर अंग ऐसे पग गए कि छुड़ाए से दोनों छूटते नहीं । फिर श्रीश्यामसुन्दर जी की यह सुधि गई कि " मेरे मित्र पति दुर्व्वल हैं, सो कहीं इनको क्लेश न हो ; तब पाप ने छोड़दिया । हाथ में हाथ मिलाए हुए रंग महल में लाए; श्रीरु- farणी जी जल और थार लाई, आप ने अपने कर कमलों से उनके चरण कमल धोए; और कहा कि पाज मेरे धन्य भाग्य हैं । ( सवैया ) 'ऐसे बेहाल बे वायन सो भए कंटक जाल गुँधे पग जीए। हाय सखा ! दुख पाए महा, तुम पाए इ न कतै दिन खोए || देखि सुदामा की दीन दशा करुणाकरिकै करुणामय रोए । पानी परात को हाथ हुए नहिँ, नैननकेजलसों पगधीए ॥ " ( श्रीनरोत्तमकवि )<noinclude></noinclude> 0qchdz8yutyidnhcpaoprruu9cj2fxe पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१५ 250 193884 664104 2026-07-02T15:58:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664104 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>Go- १५० श्रीभक्तमाल सटीक । लेजा के निज दिव्य सेज पर विराजमान करके, कुशल पूछ, श्रीगुरु गृह में जो इकट्ठे पढ़ते थे सो उन दिनों के चरित्रों की चरचा चलोके, पानन्द के सा- गर में इनको मग्न करदिया; और आप भी इनके अनुराग में मग्न होगए ॥ टीका | कवित्त । चिरवा छिपाए कांख, पूछे कहाल्याए मोको ? अति सकुचाए, भूमि तकें, दृग भोंजे हैं। कैंचि लई गांठि, मूठि एक मुख मांझ दई, दूसरी हूं लेत स्वाद पाइ पापु रीके हैं ॥ गह्यो कर रानी, " सुखसानी प्यारी बस्तु यह, पाव बांटि " मानों श्री सुदामा प्रेम धीजें हैं ॥ श्याम जू विचारि दीनी सम्पति अपार, बिदा भए, पैन जानी सार बिकुरनि छीजे हैं ॥ ५६ ॥ पापने पूछा वार्त्तिक तिलक | कि "सखे! मेरे लिये क्या लाए हो ?" यह सुन श्री सुदामा जी सकोच के बश होके पृथ्वी की ओर देखने लगे और इनकी आंख में आंसू भर आए । श्रीश्यामसुन्दर जी ने देखा कि फटे कपड़े में एक छोटी सी गठरी बांधे हुए ये कांख में दबाए छुपाए हुए हैं; देखते ही उस्को खींच के खोल देखा कि उस्में चिउड़े हैं। पाप उसमें से एक मुट्ठी लेके शीघ्रता से श्रीमुख में डाल के चबाने, पुनः दूसरी मुट्ठी भी भर के पाने लगे, पर मित्र की लाई वस्तु जान के 150 *600-<noinclude></noinclude> 22azt57svbznrykwbkp0l29cy4gj6c5 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१६ 250 193885 664105 2026-07-02T15:58:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664105 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>151 35600- भक्ति सुधाविन्दुवाद तिलक । १५१ -909 X में अपूर्व स्वाद पर अत्यन्त रोक के आपने तीसरी मुट्ठी भी भर ली; मानों उस चिउड़े को श्रीसुदामा जी के प्रेम का रूपही मानके ग्रहण करते हैं। श्री रुक्मिणी जी महारानी ने आपका करकंज पकड़के कहा कि " यह वस्तु प्रेमसुख से सनी हुई आप के- लेही सब न पालीजिये, किन्तु हमसबों का भागभी बांट दीजिये " । तब आपने मुट्ठी छोड़दी और उस्को श्रीमती रुक्मिणी जी को देदिया । सत्यसंकल्प श्रीकृष्ण भगवान् ने उस चिउड़े को ग्रहण करके, विचार के, अपने मन ही से इनको प्र पार सम्पति देवी, प्रत्यक्ष में कुछ न दिया; परन्तु इन ने इस भेद को न जाना । श्री सुदामा जी प्रिय मित्र का परम सत्कार पाते हुए (बहुत ग्रह करने से ) सात दिन रहकर, विदा हुए । श्रीमत्रवर के वियोग से अतिशय दुःख पाते अपने गृह को लौट चले ॥ (चौ०) मिलत एक दारुण दुखदेहीं । विरत एक प्राण हरिलेहीं ॥ टीका कवित्त । पाए निज ग्राम वह, अति अभिराम भयो, नयो पुर द्वारका सो, देखि मति गई है । तिया रंग भीनी संग सतनि सहेली लीनी, कीनी मनुहारि यों प्रतीति उर भई है | वह हरि ध्यान रूप माधुरी को पान, तासी राखेँ निज प्रान, जाके प्रीति रीति नई है । 3000 1986-06-<noinclude></noinclude> 30vbrq0uzg53r1ekcu1ueuy1gekci9h पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१७ 250 193886 664106 2026-07-02T15:58:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664106 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५२ - श्रीभक्तमाल सटीक | 152 •009 भोग की न चाह ऐसे तनु निरबाह करें, ढरें सोई चाल सुखजाल रसमयी है ॥५७॥ वार्त्तिक तिलक । जब अपने गांव ('सुदामापुर ) में या पहुँचे तो देखते क्या हैं कि वह ग्राम अतिशय रमणीय होगया है यहां तक कि सब नवीन रचनायुक्त मानों साक्षात् द्वारका ही है। ऐसा देखते ही श्रीसुदामा जी की मति तो भ्रम में डूब गई। परन्तु इनकी धर्मपत्नी जी अपनी अटारी पर से इनको देखके परम अनुराग में भरी हुई आरती कलश वर आदि सामग्रीयों सहित प्रभु की दी हुई सैकड़ों सहचरीयों के साथ साथ, सामने झाके, पारती कर, प्रभु की कृपा से इन सब विभवों की प्राप्ति परम प्रिय वचनों से समझा के, विश्वास कराके अपने कंचन भवन में लेगई ॥ यद्यपि श्रीसुदामा जी ने सब प्रकार के विभव भोग पाए तथापि उसमें आशक्त न हुए । श्यामसु- न्दर सखावर जी के उसी रूप अनूप का ध्यान और सुधामाधुरी का पान मन से करते, नवीन प्रीति रीति में पगे हुए, अपने प्राणों को रखते थे; इसी प्रकार से अपने शरीर का निरबाह करते, विषय भोगों से विरक्त रहके भक्ति प्रेमानन्दमयी रस भरी चाल से जीवनावधि पर्य्यन्त चलते रहे । (चौ० ) अमित बोध पनीह, मितभोगी । सत्यसार, कवि, कोविद, योगी ॥ 98400--<noinclude></noinclude> 221sateop95ija3zpt129i8kjq47jbv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१८ 250 193887 664107 2026-07-02T15:59:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664107 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>153 भक्ति सुधाविन्दु स्वाद । १५३ -9098 ] (दो) गुणागार संसार दुख रहित विगत सन्देह । तजि प्रभु चरण सरोज प्रिय तिनके देह न गेह ॥ (श्लो०) युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ वैराग्य की जय ! अनुराग की जय !! प्रिय पाठक ! कहाँ श्री सुदामा जी का विमल चरित्र, और कहां इस दीन की उपसमर्थ लेखनी ॥ श्रीचन्द्रहास जी । टीका | कवित्त । तो नृप एक, ताके सुत " चन्द्रहास " भयो; परी यों त्रिपति, धाई · ल्याई और पुर है । राजा कौ दीवान, ताके रही घर पान, बाल आपने समान संग खेले रसदुर है ॥ भयो ब्रह्मभोज, कोई ऐसोई संयोग बन्यो, आए व कुमार, जहां विप्रन को सुर है। बोलि उठे सबै “तेरी सुता कौ जु पति यहै, हुवो चाहे जानी;" सुन गयोलाजर है ॥ ५८ ॥ वार्त्तिक तिलक । केरलदेशका एक मेधावी नाम राजा था, उसके पुत्र " चन्द्रहास " हुए । उनके पिताको दूसरे राजा युद्धमें मार डाला, तब माता भी सती होगई; इस विपत्ति से एक दासी उनको लेके, कुन्तलपुर के राजा के प्रधानमन्त्री "धृष्टबुद्धि" के घर में रहने, और निज 1886-06- २०<noinclude></noinclude> e1fa4eluhq0239oy54mnegz2i5jotk5 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२१९ 250 193888 664108 2026-07-02T15:59:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664108 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५४ [ads-00- श्रीभक्तमाल सटीक । पुत्र करके इनको पालने लगी । जब चन्द्रहास जी पांच वर्ष के हुए, वह धाई भी मर गई। क्या बात है ! जय हरि । एकदिन इनके भाग्यबश दयासिन्धु श्रीनारदजी कृपाकर पाके एकान्त में मिले, और एक श्रीशालग्राम जी की छोटीसी मूर्त्ति देके समभागए कि "इनको धोके पीलिया करो, और दिखाके खाया करो; फिर उसमूर्त्ति की मुखमें ही रखने की युक्ति भी बता के श्रीभगवन्ना- मका उपदेश कर गए। ये वैसा ही करते और समा- नवयसवाले बालकों के साथ २ भगवत सम्बन्धी (रसदुर) खेल खेला करते थे ॥ एकदिन धृष्टबुद्धिकेघर ब्राह्मणोंका भोजन था । विधिसंयोगवश लड़कोंके साथ २ उन ब्राह्मणों के मु- खियापण्डित केसामने पाके उनको श्रीचन्द्रहास जी प्रणाम किया। उसी समय धृष्टबुद्धिने विप्रबरसे पूछा - था कि मेरी इस कन्याको पति कैसा मिलेगा ? तब वे श्रीचन्द्रहासजीकीपोर अंगुल्या निर्देशकर के कह- उठे कि यही बालक तेरी इस कन्याका पति होगा । हम यह भावी निश्चय जानते हैं ॥ " सुन्तेही, वह प्रधान लज्जा ग्लानि में डूबगया ॥ टीका | कवित्त । पस्यौ सोच भारी " कहा करौं ? यौं विचारी; "अहो ! सुता जो हमारी, ताको पति ऐसो चाहिये ? डा याहि मार, याको यहै है विचार; " तब बोलि 1986-06- 154 188600-<noinclude></noinclude> jy82fvhvu38a6qtnv89d1a2j0ipqv8y पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२० 250 193889 664109 2026-07-02T15:59:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664109 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>155 1830.00 भक्ति सुधाविन्दु स्वाद | १५५ 1800- नीजन, कह्यौ " मारौ, हिय दाहियै " ॥ लैकैगएदूर, देखि बाल छविपूर, "हम योनि परै धूर, दुख ऐसो वगाहियै " ! बोले कुलाय, “तोहि मारेंगे; सहाय ガラ कौन ?” “मांग एक बात 'जब कहीं तब बाहिये' ” ॥५९ वार्त्तिक तिलक । उस्केमनमें बढ़ाभारी सोच हुआ कि “पय क्या करनाचाहिये ? " तब धृष्टबुद्धि ने निज भ्रष्ट बुद्धिसे ऐसा विचार किया कि “ इसबालक ( चन्द्रहास ) को मारडालना चाहिये । बड़े पाचर्य की बात है ! क्या मेरी बेटीको ऐसा दासीपुत्र दीन पति होना चाहिये ?” ऐसा विचार ठीक करके घातक नीचजनों की बुल- आज्ञा दी कि "इस बालक को देख मेरा हृदय जलभुना जाता है, इस्को लेजाव शीघ्र मारडालो ॥” वे घातक लोग इनको बाहरबनमें लेगए; परन्तु मारने के काल में इनकी अतिशय सुन्दरता देख श्री- प्रभुप्रेरित दया उनके हृदय में लागई; वे अपने मनमें कह- नेलगे कि “धिक ! धिक हमारी जातिकर्मको है, इस पर क्षारपड़े, कि ऐसे दुःख झेलने पड़ते हैं"; फिर, उपकुला के श्रीचन्द्रहासजी से वे बोले कि "अब हम तुम्हारा बध- करेंगे, बताओ तुम्हारा सहायक रक्षक कोई है ? " इनने उत्तरदिया कि "मैं केवल एकही बात चाहता हूं कि जब मैं कहूं तब मुझपर खड्ग का हाथ छोड़ना " ॥ 188600-<noinclude></noinclude> a6bgp74jbxr2ujkauve1yiwt42b4nwb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२१ 250 193890 664110 2026-07-02T15:59:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664110 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५६ [0600- श्रीभक्तमाल सटीक | टोका कवित्त । मानिलीन्हो बोल वे, कपोलमध्य गोल एक “गंड- की ", काढ़ि सेवानीकीकीनी है। भयो तदाकार, निहार सुख भार भरि, नैननि की कोर ही सों आज्ञा बध दोनी है ॥ गिरे मुरझाइ, दया याइ, कछु भाय भरे, ढरे प्रभु पोर, मति प्रानंद सो भोनी है। हुती छठी प्रांगुरी, सो काटि लई, दूषन हो, भूषनही भयो, जाइकही सांचु चीनी * है ॥६॥ (* चीन्ही है) वार्त्तिक तिलक । दुष्टने इनकी वार्त्ता मानली । तदनन्तर श्रीचन्द्र- हासजी अपने गाल में से श्रीनारदजी की दी हुई श्रीशाल- ग्रामजी की मूर्त्तिको निकालके तड़ागके जल एवं वनके पुष्प से उनकी सप्रेम पूजन भलेप्रकारसे कर, अपने करकमल पर विराजमान करके, एकाग्रचित्त हो देखने लगे; तब प्रभुने उसी मूर्त्तिमें ऐसा सच्चिदानन्द सूक्ष्म रूप का दर्शन दिया, कि जिसके भारी प्रेमानन्द में ये मग्न होके देहाभिमान भूल के तन्मय होगए। जय, जय ॥ उसी क्षण अपनी आंखोंकी कोरसे अपने बधकी आज्ञा देदी। जोही बधिकों ने मारडालने का विचार किया त्योंही प्रभुप्रेरित ऐसी दया बधिकोंके हृदय में आई कि मूर्छित होके वे सब भूमिपर गिरपड़े । फिर सावधान होके उठे तो उनके मन में भगवतकी भक्ति का भाव भी कुछ गया । अपने पापोंसे ग्लानि कर, 98606-- 156 --90988<noinclude></noinclude> rwsohxwhuylwjri6rhowwioeuk89sjn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२२ 250 193891 664111 2026-07-02T15:59:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664111 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>157 3 Go भक्ति सुधाविन्दु स्वाद । प्रभुके सन्मुख हो; प्रेमानन्दको प्राप्तहुए। प्रभुकी जय ॥ १५७ श्रीचन्द्रहासजीके एक पगमें छः उंगलियां थीं, कि जिस्का होना सामुद्रिक में दूषण बताया है । उसी छठी उंगली काट, उन्होंने इनको छोड़दिया; मानों वह कि अंगुली रूप दूषण ( अपलक्षण ) निकलगवा पाप भवभूषणरूप सुलक्षण रहगए ॥ और जा, दुष्ट धृष्टयुद्धको वही अंगुली सहदानी (चि- न्हासी) दिखा, कहदिया कि "हमने उस्को मारडाला” उसने अंगुली पहिचानी, और वह बात सच मानी । “कौन की त्रास करे ? तुलसी, जोपै राखि हैं राम, तो मारि को रे ? ॥ ” (चौ०) गरलसुधा, रिपुकरै मिताई। गोपद सिन्धु, नलशितलाई ॥ रुरूपसुमेरु रेणुसम ताही । रामकृपा- करि चितवहिं जाही ॥ टीका | कवित्त । वह देश भूमि मैं रहत लघु भूप और, और सुख सब, एक सुत चाह भारी है। निकस्यी विपिन, नि देखि याहि, मोद मानि, कीन्ही खग छांह, घिरी मृगी पांति सारी है । दौरिकै, निशंक लियो, पाइनिधि कजियो, कियो मनभायो, सो बधायो, श्री हु वारीहै । को दिन बीतें, नृप भए चित चीते, दियो राज को तिल, भाव भक्ति विसतारी है ॥ ६१ ॥ 88000-<noinclude></noinclude> 697eui3vqjudiyarx0m47sxyk92gi4d पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२३ 250 193892 664112 2026-07-02T15:59:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664112 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५८ श्रीभक्तमाल सटीक | वार्त्तिक तिलक | 158 -9098 उसी कुन्तलपुर के राजा के राज्यही में एक छोटासा राजा रहता था; वह स्त्री धनादि सब प्रकार के सुखें। सेतो सुखी था, परन्तु उसके पुत्र न था, सो उस्के पुत्र की अतिशय अभिलाषा थी। भावीवश वह राजा उसी बनके मार्ग से जानिकला; देखता क्या है कि श्रीचन्द्रहास जी बैठे हुए हैं, और श्रीसर्वान्तर्यामी प्रभुका प्रिय जानके, इनके सुन्दर रूपको देखती हुई, हरनीयों के समूह इनको घेरे हैं, और एक बड़ा पक्षी सीसपर छाया किये हुए है कि जिस्की छाया माथेपर होना महा- राज्य प्राप्ति का सूचक है "उसे कृपाकरते नहींलगतीवार" । यह देख, अत्यन्तानन्दयुक्त हो, इसप्रकार से दौड़के राजाने अपने गोद में लेलिया, कि जैसे दरिद्री महा धनको पाके प्राणसमान ग्रहणकरता है; घरमें लाके, जैसा निजपुत्र होनेसे मनमाना मंगल लोग करते हैं वैसाही पानन्दबधावा नांचगान करकराके बहुत सा द्रव्य लुटाया, और लालनपालन करने लगा । कुछ दिन बीतने पर श्रीचन्द्रहासजीकी योग्यता देख अपने चित्त में विश्चारकरके उस राजाने इनको राज्यतिलक कर दिया । (दो०) मसकहि करहि विरंचि प्रभु, अजहि मसक ते हीन । अस विचारि तजि संशय, रामहिं भजहिँ प्रवीन ॥<noinclude></noinclude> i4sf5dw6h53h5ndo9oaludae1divmib पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२४ 250 193893 664113 2026-07-02T16:00:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664113 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>159 1800- भक्ति सुधाविन्दु स्वाद | १५९ राजाहो के श्रीचन्द्रहासजी ने अपने राज्य में भगवद्- भक्ति और प्रेम भाव का बड़ाही प्रचार किया ॥ टीका | कवित्त | रहे जाके देश सो नरेश कंळु पावै नाहीं, बांह बल जोरि दियो सचिव पठाइकै । आायो घर जानि, कियो प्रति सनमान, सो पिछान लिपी व बाल मारो छल छाइ के ॥ दई लिखि चिट्ठी, जाओ मेरे सुत हाथ दीजे, कीजे वही बात जाको आयोले लिखाइ कै । गऐ पुर पास बाग, सेवा मति पाग करि, भरी दृग नींद नेकु सोयो सुख पाइकै ॥६२॥ . वार्त्तिक तिलक । चन्दनावती का राजा कलिन्द जिस महा राज (कुन्तलपुर वाले) के राज्य में था, उस महाराज को अत्र श्री चन्द्रहास जी के यहां से कर नहीं पहुंचने लगा, क्योकि साधु सेवाही में इनका पैसा लग जाताथा, कौड़ी यती न थी । इसीसे उसने कुछ सेना समेत अपने मन्त्री घृष्टबुद्धिको कर लेने के लिये चन्द- नावती में भेजा । राजा कलिन्द तथा श्रीचन्द्रहास जी (अपने घर में पाया हुआ जानकर के ) उसका बड़ा यादर सतकार किया ॥ पृष्ठबुद्धि ने पहिचान लिया कि यह तो वही लड़का है जिस्के बधका प्रबन्ध किया था; वह क्रोध से जलभुनकर सोचने लगा कि अब "छल से<noinclude></noinclude> nhur2sv9or9b5rbc0qbbqd8yinibqz4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२५ 250 193894 664114 2026-07-02T16:00:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664114 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६० *600- श्री भक्तमाल सटीक । इस्का बध करो” । कुछ बातें बनाकर चन्न्द्रहास जी | को एक पत्र दे धृष्टबुद्धि ने अपने घर भेजा कि यह पाती मेरे पुत्र मदन के हाथ में दीजिये और कहिये कि जो कुछ इस्में लिखा है सो कृपा करके करवा दीजिये । पत्रले, उस ग्राम में पहुच, एक सुन्दर बाटिका में, जो उसी मन्त्री घृष्ट बुद्धि का था, ठहरके इनने श्री शालग्राम जी की सेवा बड़े प्रेम से की; और प्रसाद पाके श्रीराम भरोसे निर्द्वन्द्व विश्राम किया । हरि इच्छा से उनको नींद पागई, सुखसे सो गए ॥ टीका कवित्त । 160 खेलति सहेलिनिमो, पाइ वाहि बाग मांझ करि अनुराग, भईन्यारी, देखि रीका है । पाग मधि पाती छाती कि चिलई, बांची खोलि, लिख्यो बिष दैन, पिता खी ॥ " विषया " सुनाम अभिराम, अंजनसो बिषयाचनाइ, मनभाइ, रसभीजी है। पाइ मिली पालिन में, लालन को ध्यान हिये, पिये मद मानो, गृह लाइ तब धीजी हे ॥ ६३ ॥ वार्त्तिक तिलक । हरिइच्छा से उसी मन्त्री की लड़की " विषया" नामा अपने उस बाटिका में अपनी सखियों सहित पाई; अचानक उसकी दृष्टि चन्द्रहासजी पर पढ़ी, और साथ ही प्रति अनुरक्त और आशक्त हो गई । दूसरी पोर जा, वहां से अपनी सहचारियों से अलग हो, वह €:00-<noinclude></noinclude> 7mbd5yif6holrythmuke482uega6n1n पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२६ 250 193895 664115 2026-07-02T16:00:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664115 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>161 13600- सुधाविन्दु स्वाद । १६१ चक्कर लगाके फिर वहीं पहुंची जहां श्रीचन्द्रहास जी सोए थे; "जिनसे अटक हैं ये नैना | खटकत है उर सी दिन रैना ॥" इनको देखही रहीथी कि इतने में एक पत्रिका दिखाईदी जिस्को उस सुन्दरीने निकाल के पढ़ा; उस पत्रको अपने भाई मदन के नाम अपने पिता धृष्टबुद्धि का लिखा, पाया; और उस्का आशय यह था कि " इस पत्रिका जानेवालेको शीघ्रही विषदेदेना, विलम्ब करने से मैं तुमपर क्रोध करूंगा । " यह पढ़ उस बालिका को अपने पितापर क्रोध, तथा प्रीतिवश इस प्रिय मूर्त्तिपर दयांझाई; श्रीहरिकृपासे उसीक्षण उस्को ऐसी सूझी, कि उसने बड़ीही फुरती के साथ अपनी आंख के काजल से विष शब्द के पन न्तर 'या' अक्षर बना दिया, जिससे “विषय "विषया" होगया । श्री भगवतकृपाको मनन करती हुई, प्रेम रस में पगी, वहां से चटपट चली और अपनी सहचरियों में मिली ॥ जैसे मद से मांती हो इस भांति वह प्रेमाशक्त हो अपने मनोरथ की सफलता के लिये घर आई । और संतुष्ट ही प्यारे के ध्यान में मग्न, परमात्मा से प्रार्थना करने लगी ॥ " जगदम्बे ! मोर मनोरथ जानसि नीके" टीका | कवित्त । उठ्यो चन्द्रहास; जिहि पास लिख्यो लायो, जायो २१<noinclude></noinclude> 0s5ondj2cgoihxy0px48ionrabhoddh पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२७ 250 193896 664116 2026-07-02T16:00:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664116 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>९६२ २०००-- 9098 श्रीभक्तमाल सटीक । देखि मन भायो, गाढ़े गरे से लगायो है । देई कर पाती, बात लिखी में सुहाती; बोलि विप्र, घरी एक मां ब्याह उभरायो है ॥ करी ऐसी रीति, डारे बड़े नृप जीति, श्री देत गई बीति, चाव पार पैन पायो है। आयो पिता नीच; सुनि घूमि पाई मीच माना; Part ofख दूलह को, शूल सरसायो है ॥ ६४ ॥ बानो लखि वार्त्तिक तिलक । 169 श्रीचन्द्रहास जी उठे और ठिकाने पर पहुँ चक्रे चिट्ठी दी; मदनसेन बहुत ही प्रसन्न हुआ उसने इमको अपने गले से लगा लिया और अपना हर्ष प्रगट किया; बड़ी त्वरासे, ब्राह्मणोंको बुला, लग्न सोधके भगवत कृपा से एकही घड़ी के भीतर अपनी बहिन विषयाका विवाह चन्द्रहास से करदिया । सारी रात यानन्द और दान पुण्य में व्यतीत हुई; ऐसा उत्सव किया, कि अपने से बड़े २ राजासेभी बढ़के, पौर तबभी महो- सबसे अघातान था। प्रियपाठक ! देखिये -- विष देते विपया भयो; राम "गरीब निवाज " उसका बाप, नीच धृष्टबुद्धि, आने पर यहां यह रंग, और चन्द्रहास जी को दूलह वेष में, देख, पति शय शलपा, अत्यन्त मूर्च्छित हो गया ॥ a 'पर दुख लागि सन्त अभागी ! ” टीका । कबित्त । बैट्यो ले इकान्त, " सुत! करी कहा भ्रान्त यह ? " 128800-<noinclude></noinclude> 10vlxqout14tony7hgsokoa0kno2251 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२८ 250 193897 664117 2026-07-02T16:00:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664117 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>168 23 Goa- भक्ति सुधाविन्दु स्वाद । १६३ •90988 को सो नितान्त, कर पाती ले दिखाई है । बांचि झांच लागी; मैं तो बड़ोई अभागी ! ऐ पै मारो मति पागी बेटी रांड हू सुहाई है ॥ बोलि नीच जाती, बात कही “ तुम जो मठ, घ्यावे तहां कोऊ, मारि डारौं " जावो मोहि भाई है" । चन्द्रहास जू सों भाष्यो “देवी पूजि वो पाप मेरी कुलपूज, सदा रीतिचलिलाई है” ॥६५॥ वार्त्तिक: तिलक । परहित घृतमाखी दुर्मतिक्रोधी धृष्टबुद्धिने अपने पुत्र से एकान्त में पूछा कि " रे ! तूने यह क्या गड़बड़ किया ?" मदनसेन ने पाती दिखादी। पढ़के कुबुद्धिके तनमें लागसी लगगई; यहांतक कि बेटी का बिधवा रहना तक, वह अभागा अच्छा समझा । बध करनेवालों को बुलाया और चुपचाप आज्ञा दी कि " कल भोरे जिसको देवीमन्दिर में पाना, बिना- विचार कियेही उस्का वध कर देना; और इधर निरपरा- धी चन्द्रहास जी से कहा कि “ देवी मेरी कुलपूज्य है, तुम प्रात ही उठके जाके उस्की पूजा कर पापी, विवाह के अनन्तर उस्की पूजा हमारे कुल की रीति चली आती है " ॥ सठने अपनासा उपाय, गढ़ारचा तो परन्तु उसने यह जाना कि (दो) “जो भावी सो होइहैं, झूठीमन की दौर। मेरे मन कछु पर है, करता के कछु और ॥ १ ॥<noinclude></noinclude> 49i3vye2q1bibb33rz18trk5dcbb4dl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२२९ 250 193898 664118 2026-07-02T16:01:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664118 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६४ श्री भक्तमाल सटीक । परहित को सोचियो परम अमंगल मूल | कांट जो बोबे और को, ताहों को तिरसूल ॥ २ ॥ टीका । शवित्त । करन पूजा; देशपति राजा कही “मेरे सुत नाहीं, राजवाहीको लै दीजिये " । सचिव सुवन सों " तुम लावी जावो, पावो नहीं फेरि समय, काम कीजिये " ॥ दौरयो सुख पाइ चाइ, मग ही में लियो जाइ, दियो सो पठाइ, नृप रंग माहिं भीजिये । देवी अपमान ते न डरो, सनमान करों; जात मारि डायो, यासों भाथ्यो भूप" लीजिये ॥६६॥ वार्त्तिक तिलक । 164 प्रभातहोते स्नान और श्रीशालग्रामजीको पूजा से अवकाशपा श्रीचन्द्रहासजी, श्रीदेवीजी महारानी को पूजने चले | उसीसमय श्रीसीतारामकृपासे देशाधि - पति (कुन्तलपुर के महाराज) के मनमें आया कि मेरे पुत्र ही नहीं, तो अब यही उत्तम है कि सुयोग्य चन्द्रहास को ही मैं राज्य तिलक करदू ; हरिभजूं ” ऐसा विचार कर मन्त्री के पुत्र मदन को बुलाकर हरिकृपासे यों कहा कि “ मेरे मन में यह बात पाई है, सो तुम अभी अभी दौड़े जाव; अपने बहनोई - न्द्रहास को लामो इसी समय काम कर लो; नहीं तो बिलम्ब करने से फिर न होगा; हरि इच्छा ऐसी ही है; पीछे पछताओगे " ॥ ( " मन ! पछते है अवसर बीते” ) 1830-00- BG00-<noinclude></noinclude> pe1qg968ym0qodiq56lemjyuss6m0ty पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३० 250 193899 664119 2026-07-02T16:01:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664119 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>FOG- 165 भक्ति सुधाविन्दु स्वाद । १६५ मदनसेन प्रहर्षमेंभरा बड़े चाव से दोड़ा, पंथही में दोनों (साला बहनोई) मिले । चन्द्रहासको महाराज केपास भेजा कि ऐसी ऐसी वार्ता है, इस घड़ी महा- राज बैराग और पनुराग में पगे हैं, इस संकल्प में दृढ़ हैं, सीधे उनके पास पहुँची, राज्यको प्राप्त हो; श्रीदेवी महारानी जी के अपमान का भय मत करो; मानसी प्रार्थना कर लो; मैं मठ में जा उनका पूरा सनमान पूजन करता हूं " । उधर जाते ही मदनसेन को घातकों ने मारडाला; और इधर चन्द्रहास से महाराज ने कहा कि " यह लीजिये, और राज्याभिषेक करही दिया। आप भग- वटुजन में लगा ॥ * * (मनुस्मृति ) प्रवृतं कर्म संसेव्यं देवानामेतिसम्बताम् । निवृत्तं सेवमानस्तु भूतान्यत्येतिपचवे (१२-९० ) (चौ० ) " उमा ! कहीं में अनुभव अपना । सत हरि भजन जगत सब सपना " टीका । कवित्त । काहू पनि कही " सुत तेरो मारो नीचनिने, सचन शरीर दृग नीर झरी लागी है। चल्यो ततकाल, देखि गियो है बिहाल, सीस पाथर सों फोरि मस्यो ऐसोही भागी है । सुनि चन्द्रहास, चलि बेगि मठपास पाये, ध्याये पग देवताके, काटे अंग, रागी है । कह्यो 18000- 000<noinclude></noinclude> hpby64m2v3p4nd63kk4bd3ucp6xqaq3 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३१ 250 193900 664120 2026-07-02T16:01:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664120 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६६ - श्रीभक्तमाल सटीक । " तेरो द्वेषी, याहि क्रोध करि मायों मैं हों, दोऊ दीजै दान " जिये बड़ भागी है ॥ ६७ ॥ वार्त्तिक तिलक | " " उठें कुबुद्धिसे पाकर किसीने कहा कि " तेरे बेटेका घातकोंने बध करडाला ? " यह सुन, डाढ़ें मारमार कर, वह रोने पीटने लगा । दौड़ता हुआ मन्दिर में जा - वैसाही देखा । वह अभागा भी पत्थरपर सीस पटक कर कालवश होगया ! " कर्म प्रधान विश्वकरि राखा” श्रीचन्द्रहास जी सब वृतान्त सुनकर शीघ्र ही देवी- भवन में प्रस्तुतिकरने लगे; वरंच अपना सीस बलि- देनेपर उद्यत हुए। श्रीदेवीमहारानीजी प्रगट हो, इनका हाथ पकड़, यह बोलीं कि " धृष्टबुद्धि तेरा द्वेषी, है इसलिये वत्स! मैंहीने उस्को पुत्रसमेत मारडाला है । " श्रीचन्द्रहास जी ने उनको प्राणदान सुमतिदान के लिये देवीजी से विनय किया और पुनः स्तुतिकी ॥ 166 "जय महेश भामिनी ! पनेकरूपनामिनी, समस्तलोक स्वामिनी, हिमशैल बालिका । सिय पिय पद पट्स, प्रेम तुलसी चहचल नेम, देहु प्रसन्न, पाहि प्रणत पालिका ॥ श्रीदेवीमहारानी जी ने साधुता देख, हरिभक्तजान इनकी प्रार्थना स्वीकार की और प्रसन्न हो, दोनों को जिला के उन्हें सुमति भी दी कृपा की जय २ ॥ सन्त सहहिँ दुख परहित लागी ॥ " * 1360 BBG00- " ● माहित करुपलभ्यम, कृपासिन्धुभ्य एवच । पतितानां पावनेभ्यश्च वैष्णवेभ्यो नमो नमः ॥ 600-<noinclude></noinclude> n83s3zf96b8kvagnqyq573v59cb3bnk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३२ 250 193901 664122 2026-07-02T16:01:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664122 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>167 406- भक्ति सुधाविन्दु स्वाद । १६७ 08 टीका । कवित्त | कस्यो ऐसी राज, सब देश भक्तराज कस्यो, ढिग को समाज ताकी बात कहा भाषिये । "हरिहरि” नाम अभिराम धामधाम सुन, और काम कामना न, सेवा अभिलाषिये ॥ काम, क्रोध, लोभ, मद, आदि, लेके दूरि किए, जिये नृप पाइ, ऐसो नैननि में राखिये । कही जितीबात प्रान्तिलों सुहाति हिये, पढ़ें उठि प्रात फल " जैमिनि ” में साखिये ॥ ६८ ॥ वासिंक तिलक | कहते हैं कि श्रीचन्द्रहासजीने तीनसौबर्ष राज्य- किया और राज्य भी इसप्रकार से कि देशमें हरिभक्ति फैलादी, अपने समीपियों की तो वार्त्ताही क्या है, घर घर " श्रीसीताराम सीताराम " प्रीति से और मधुर स्वर से सुन लीजियें; किसीको किसी काम की कामना न थी; सब भगवत सेवा भजन में रत रहते थे; इस्के कहने की आवश्यकताही क्या कि ऐसा राजा पाकर सब प्रजा चैनसे जीवन बिताती थी; और कहती थी कि ऐसे नृपति को पांखों में रखना चाहिये ॥ (चौ०) प्रससिख तुमबिनुदेइ न कोऊ । मातुपिता स्वारथरताऊ ॥ हेतु रहित जग युग उपकारी । हरि- सेवक, रु श्रीपसुरारी । अस सुराज बसि दूनों लाहू । लोक लाभ परलोक निबाहू ॥ 8600- -90988<noinclude></noinclude> nzl0gz5fh3xipqgvne6z8jmb33bw9kj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३३ 250 193902 664123 2026-07-02T16:01:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664123 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>183404 १६८ श्री भक्तमाल सटीक । श्री चन्द्रहासकथा सुनेका तथा श्रीचन्द्रहास जी का नाम प्रातसमय लेने का माहात्म्य को “जैमिनी” जी ने वर्णन कियाही है ॥ श्री मैत्रेयऋषि जी । टीका | कवित्त । "कौषारव” नाम सो बखान कियो नाभाजूने मैत्रे अभिराम ऋषि जानि लीजे बात में । आज्ञा प्रभु दई 66 'जाहु 'विदुर' है भक्त मेरौ, करौ उपदेस रूप गुण गात गात में || 'चित्रकेतु' प्रेमकेतु 'भागवत' ख्यात, जाते पलट्यो जनम प्रतिकूल, फल घात में । 'क्रूर' आदि ध्रुव' भए सब भक्तभूप 'उद्धव' से प्यारेन की ख्यात पात पात में ॥ ६९ ॥ वार्त्तिक तिलक | 168 आपकी माताजीका नाम श्रीमित्राजी और पिता- Author श्रीकुरुजी था; इसीसे पाप "श्रीमैत्रेय" ऋषि, तथा श्री " कौषारव " भी कहेजाते हैं; कि जो नाम श्रीनभोभूज (श्री नाभा जी) स्वामी ने वर्णन किया है । आप श्रीपराशर मुनि के शिष्य हैं। जिसघड़ी श्रीकृष्ण भगवान विदुरजी के लिखे, अपने सखा श्रीऊधवजी को, ज्ञान और भक्ति का उपदेश कर रहेथे, उस समय वहीं श्रीमैत्रेयऋषि जी भी थे तथा उन्होंने भी उपदेश लाभ किया था; और प्रभुने इनसे आज्ञा की थी कि " मैत्रेयजी ! पाप मेरे परम प्रिय 3600- --१००<noinclude></noinclude> 82git4tyv76jb4nu9j0ku10l5p0d6n4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३४ 250 193903 664124 2026-07-02T16:01:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664124 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>169 8000- श्रीभक्तिसुधाधन्दु स्वाद । 1-9001 भक्त विदुर जी को यह उपदेश इस प्रकार सुनादी- जियेगा कि जिसमें मेरा नाम मेरे गुण पर मेरारूप उनके रोम रोम में, नाड़ी नाड़ी में, प्रविष्ट व्याप्त और विराजमान हो जायें " ॥ દ जब श्रीकृष्ण भगवान् गोलोक को गए, और श्री उद्धवजी " प्रभुके विरह में बद्रिकाश्रम को चलेजा- रहेथे, तो श्रीविदुर जी से श्रीउद्धवजी मिले, परन्तु श्रीविरह में अत्यन्त विकल होरहेथे इस्से कुछ उप- देश न करके श्रीउद्धव जी ने श्रीविदुर जी से इतनाही मात्र कह दिया कि प्रभु ने श्रीमैत्रेय जी के सामने मुझसे पके लिये बहुत कुछ उपदेश किया है, सो मैं तो बिरहाकुल हूं, पाप उनसे सत्संग करके उस्को प्राप्त कर लीजियेगा "। श्रीविदुर जी ने ऐसाही किया; यह प्रसंग (श्रीमैत्रेय विदुर सम्वाद ) श्रीमद्भागवत के तीसरे स्कन्ध में विस्तार पूर्वक है। धन्य वे, कि जिनने स्वयं भगवतही से उपदेश पाया ॥ प्रेम के भवन वा प्रेम के ध्वजा "श्रीचित्रकेतु" जी की कथा श्रीमदभागवत में ख्यात है, कि कई शरीर पलटके प्रतिकूल जन्म अर्थात असुर ( "वृत्तासुर" ) होके, श्रीइन्द्र जी के त्रिशूल को फूल सरीखा समझ, घात से प्रसन्न हो, अपनी भक्ति और ज्ञान के चम- त्कार से सबको प्रफुल्लित कर दिया ॥ 188600- २२<noinclude></noinclude> sni261ek12gircov38fxl60u0mq98ja पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३५ 250 193904 664125 2026-07-02T16:02:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664125 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७० 18000- श्रीभक्तमाल सटीक । “श्री क्रूर जी", श्रीभक्तराज "ध्रुव" जी, तथा अतिशय प्रिय श्री " उद्धव” जी, इत्यादिक (समुदाय) की कथाएं श्रीमद्भागवत के पत्र पत्र में प्रख्यात और प्रसिद्ध हैं ही ॥ ६१॥ श्री अक्रूर जी । श्रीग्रन्थ कर्त्ता, श्रीक्रूर जी का वर्णन, आगे चल के करेंगे, अर्थात् 'नवधाभक्ति' के भक्तों के प्रसंग में । श्री चित्रकेतु जी । राजा " चित्रकेतु" के लाखोंस्त्रियां थीं । “कृतदूती” नामा एक स्त्री के, (श्रीनारदजी के एवं श्रीअंगिरा जी के यज्ञकराने से) एक पुत्र हुरुपा था, जिस्को औौर- सब रानियों ने मिलकर विष देदिया; वह मरगया ॥ स्नेह बश राजा उस्का दाहकर्म नहीं करता था; यद्यपि श्रीनारद जी ने उपदेश किया समझाया, तथापि उस्का मोह नहीं गया बोध नहीं हुआ। तब श्रीनारद जी के प्रभाव से वह पुत्र जीवित होके स्वयं कहने लगा कि “हे राजा ! सैकड़ों बार मैं तुम्हारा और तुम मेरे पुत्र हो चुके हो; मोह कहां तक पर कैसा ? ॥” "पस्तु, पूर्व जन्म में मैं साधु था और श्रीशालग्राम जी की पूजा करताथा। एक दिन इस माई ने, जो मेरी माता कृतदूती है, मुझे भोजन कराना चाहा तो अमनिया सीधा के साथ रसोई करने के लिये जो 170<noinclude></noinclude> rzlhf1n21irfxssr7gknnjqeb4ygcev पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३६ 250 193905 664126 2026-07-02T16:02:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664126 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>171 श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । जलावन दी, उस्में लाखों चींटियां भरी थीं !!! मैंने प्रभुको भोग लगाकर प्रसाद पालिया । १७१ -909 | "उन चींटियों के कारण एक एक बेर प्रत्येक के हाथों से मुझे मरने के लिये (पोह ! ) लाखों जन्म लेने पड़ते (हरे ! हरे !!) परन्तु अपने लिये तो रसोई नहीं की थी वरंच प्रभु का निमित्त करके, और प्रभुही को भोग लगाया था, इसी से श्रीसीताराम कृपा से, इस एकही जन्म में वह बात सघगई, अर्थात् वेही लाखों चींटियां सबकी सब रानियां हुईं, वही माई मेरी यह माता हुई, मैं पुत्र हुवा, जिन हमदोनों से उन्हों ने अपना पलटा इस प्रकार से लेलिया । "प्रभु राखेउ श्रुति नीति सरु मैं नहिं पाव कलेश " इतना कह, लड़केने पुनः उसशरीरकोछोड़दिया । उस्का दाह क्रिया कर श्रोत्रिकेतु जी मोह रहित होगए । "यह सब माया कर परिवारा" । "" श्रीनारद जी ने चित्रकेतु जी को संकर्षण भगवान् का मन्त्र उपदेश किया; जिस्से सातही दिन में श्री नारद कृपासे चित्रकेतु श्रीसंकर्षण भगवान् के समीप जा पहुंचे ॥ स्तुति कर श्रीवासुदेव मन्त्र पा, उस्के जप सेहत (प्रतिहत) गति पाई अर्थात् जहां चाहें जावें, रोके न जावें । एकदिन विमान पर चढ़ श्रीशिव जी के पास पहुंचे वहां सभा में देखा कि समर्थ महाप्रभु शिव जी अपनी 14:00<noinclude></noinclude> o4zdccc9h7pshd0psr58j2yt29s6b6o पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३७ 250 193906 664127 2026-07-02T16:02:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664127 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२ 15600-- श्री भक्तमाल सटीक | प्राणप्रिया श्रीपार्वती जगतमाता को अपने जंघापर faory हैं। यह देख मूर्खताबश ("छोटा मुँह बड़ी बात") वह देवदेव महादेव को उपदेश करने लगा । के श्री गिरिजा जी ने शाप दिया; शापवश "वृत्रासुर" होने परभीं उस्को ज्ञान बना रहा। दधीच राजा की हड्डी द्वारा इन्द्र के हांथों से मारा गया। संग्राम में जो विलक्षण वार्त्ता उसने सुरेन्द्र जी से कही है, सो श्रीमद्- भागवत के छठे स्कन्ध में पढ़ने सुन्नेही योग्य है । शरीर त्याग करके उसे परांगति पाई ॥ श्रीउद्धव जी । महात्मा श्रीउद्धव जी को श्रीकृष्ण भगवान् अपना पतिसमीपी नाता वाले सुहृद जानते थे, आप परम ज्ञानी भागवत थे और श्रीयदुवंशमणि महाराज की सेवा प्रेमपूर्वक अतिशय उत्तम प्रकार से कियाकरते थे । जब श्रीब्रजराज जी की आज्ञा से आप श्रीगोपियों के पास ब्रज में पहुंचे, तो उनकी पद्भुत प्रीति देखी- 172 (पूर्वी) सुधि न लीन्हि पिय बिरहिनि हियकी । afa ! मोहि कत दिन तरसत बोते, सुधि न लीन्हि for बिरहिनि हिम की ॥ पाह धुरूषां मुख, हिय बिर- हागी, ठाढ़ि जरों जैसी बाती दिय की । अधिक दाह चित चातक कोकिल, बिरह अनल जिमि आहुति घिय 600-<noinclude></noinclude> 1yz5hnxxzjm8zsb95bwatwlq3x7twn2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३८ 250 193907 664128 2026-07-02T16:02:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664128 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२००३ 178 श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । १७३ की ॥ सब उर व्यापक, पन्तरयामी, जानत हैं पिय रुचि तिय जिय की । सांच स्वपनेहु कब लगि देखिहीं मधुर मनोहर छवि सियपिय की ॥ क्षमा निधान बिलोकि निजदिशि, करिहहिँ खोज न मोरे किय की । कृपा निधान दया सुख सागर, मनिहैं सखि ! विनती लघु ति की ॥ रूपकला विनवति हनुमत ही, चन्द्रकला रु गिरिवरधिय हो, एको उपाय न सूत झाली ! मोहि झासा केवल श्री सिय की ॥१॥ ( सौभाग्यकला रूपकला ) अब तो सुरतिया दिखादे पियरवा ! धीर धरो नहिँ जात शमा । तलफत बीति गई ऋतु सारी, शीत गरम बरसात रामा | हाय तिहारी सदसवो न पायों रहि रहि जिय पकुलात रामा | अब तो० ॥ नीको न लागत भोजन भूषण तात मात परु भ्रात रामा । संग की सहेली पीली सब जहाँ लौं कुटुम परु नात रामा ॥ अब तो० ॥ घर ना सुहात घने बन बहार भीतर दिन परु रात रामा । सांझ सुहात न धूप छांह कछु अरु ना सुहात प्रभात रामा ॥ अथ तो० ॥ जानत हीं नहिं ज्ञान ध्यान जप जोग जुगुत की बात रामा । श्रवण मनन निदिध्यासन झासन कीर्त्तन सुमिरन प्रात रामा । पब तो० ॥ सहिनहिँ जात व्यथा बिठुरन की नाहि कछु कहि जात रामा । काह करों जिय निक- सत नाहीं नातो बनत बिष खात रामा ॥ पत्र तो सु०॥ 3600-<noinclude></noinclude> 7lrd5gdhkthme0x38ia06jh04hi86cj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२३९ 250 193908 664129 2026-07-02T16:02:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664129 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७४ 900- श्रीभक्तमाल सटीक | हारी जतन करि राह न सूझत कित जाऊं नहिँ ज्ञात रामा । दीन दयाल दया दरसापो, “जीत" जगत । विख्यात रामा ॥ पब तो सुरतिया दिखादे पियरवा धीर धरो नहिं जात रामा ( सर्वजीतलाल ) प्रिय पाठक। “सूरसागर”, कृष्णगीतावली, ललितगीत, गीतगोविन्द इत्यादिक देखनेही योग्य हैं ॥ निदान, श्रीसखावर उद्धव जी महाराज उनके चरण रजमें लोटने लगे, पर अपने को धन्य और कृतकृत्य, तथा अपना सब सुकृत सफल समझा । धन्य २ श्री जी, जिनने श्रीब्रजसुन्दरियों की महिमा अपने हृदय में बसाई । " तव महिमा जेहि उर बसे, तासु परम बड़भाग । " आप जब जसे लौट के ब्रजवल्लभ महाराज केपास पाए, तो प्रभुसे श्रीब्रजसुन्दरियों की ऐसी स्तुति की कि जिस्के लिये श्रीउद्धव जी की प्रशंसा जहां तक की जावे सव थोड़ी ही है | पाप मथुरा से श्रीगोपिकाप्राणवल्लभ जी के साथ साथ श्रीद्वारका जी को गए। वहां से देशकालानुसार उपदेश तथा ज्ञान और भक्ति प्रभु से प्राप्त करके, प्राज्ञा पाके, प्रभु के वियोगाग्नि से संतप्त बद्रिकाश्रम को गए ॥ - श्रीध्रुवजी । जैसे करुणाकर प्रभु श्रीमादजीका कष्ट न सहके 174<noinclude></noinclude> mt89kwk5he41jtrxe962a47mb1mxf0h पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४० 250 193909 664130 2026-07-02T16:03:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664130 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>175 88000-- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । १७५ --909 नरक्षार्थ आप प्रगट होहीगये, वैसेही आपने "श्री- " ध्रुववरदेन अवतारमी धारण किया ॥ श्री जी की कथा प्रसिद्ध ही है । ध्रुव सगलानि जपेड हरिनामू। पाएंउ पञ्चलपनूपमठामू । राजा उत्तानपाद की रानीसुनीतिके गर्भ से प्रापका जन्म हुआ; और श्रीसुनीतिजी की सपत्नी सुरुची के गर्भसे जो पुत्रथा, उस्का नाम “उत्तम”था । एकसमय, राजा उत्तमको गोद में लिये हुए थे, श्रीध्रुवजीने भी (जो चारथर्षके थे ) राजा के गोद में बैठना चाहा; परन्तु उनकी वह सौतेलीमाता बोलउठी कि " भगवतका तप करके तू पहिले मेरे उदरसे जन्म तो ले, तब तुझको राजा के अंक में बैठने की योग्यता और अधिकार होवे" यहसुन आप रोतेहुए निज माता के पास गए, और उनकी आज्ञा पाकर तपकरनेको निकले ॥ मार्ग में दयासिन्धु देवर्षि श्रीनारदजी मिले। "ला- गिदया कोमल चित सन्ता” श्रीदेवर्षिजीने प्रतिशय कृपासे 'द्वादशाक्षर मन्त्र' का उपदेशकिया; श्रीध्रुवजी मथुराजीमें श्रीयमुनाजीके तटपर लाकर- "द्वादश अक्षरमंत्रवर जपत सहितपनुराग । " हरिने साक्षात प्रगट होकर भक्तिबर दिया और कृपा- करके, अपना शंख श्रीध्रुवजी के कपोल में स्पर्शकरदिया कि जिस्से उसीही अवस्थामें मापने भगवतकी स्तुतिकी - 606- •90988<noinclude></noinclude> 9lps0vek1ww1f5bap7ggnlrw05ntmxv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४१ 250 193910 664131 2026-07-02T16:03:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664131 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७३ 830-06- श्रीभक्तमाल सटीक । 176 -90988 जै शरन शरन, राम ! दशरथ किशोर | जनकनंदिनी मुख विधूवर चकोर || पवधनाथ, श्रीनाथ, मम प्राण नाथ । लखन मारुती नाथ, शरचाप हाथ ॥ प्रभो ! जानकीप्राणवल्लभ हरी । कृपासिंधु, भगवंत, रावण परी ॥ मुनीम कृत् सखाभालुकीश । निजेच्छाबिहारी, रमास्वामिनीश ॥ बिबुध वृन्द सुखदाइ, दूषण दमन । महादेव गो देव महि दुख शमन ॥ उपलख, सच्चिदानन्द, छबि मूर्त्तिमान । पतित पावन, अव्यक्त, करुणानिधान ॥ नगुन में, न निर्गुण, न तू रत्न में । न है ज्ञान में तू न है यनून में ॥ प सब रंग में, और परतीत में । चमकता है तू प्रेम में प्रीत में ॥ तुझी में मही, स्वर्ग, सात पताल | नहीं शून्य तुझसे कोई देशकाल ॥ तुही सब में है, पौ तुझी में हैं सब । तुही एकही था, न था कुछ भी जय ॥ सकलही पदारथ भरे हैं यहीं । प तुझ बिन तो कुछ भी है अपना नहीं || भटकते बहुत दूर ढूंढ़ें जान । तुम्हें आप में ही हैं पाते सुजान ॥ मैं दिनरात देखूं हूं लीला तेरी । है चक्कर में, हे प्यारे ! बुद्धी मेरी ॥ मी कथनीय महिमा तेरी । है पति क्षुद्र बुधि, मन्दतर मति मेरी ॥ न देखी किसू ने “ गिरा” थाह लेति । कहा "शेष” मौ "वेदों" ने "नेति नेति” ॥<noinclude></noinclude> 5lzntdfyn2nthfv7n3vmeybaw1nlqkc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४२ 250 193911 664132 2026-07-02T16:03:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664132 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>177 600- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । बड़े से बड़े भी सके कर न जो । प्रस्तुति तेरी मुझ से किस भांति हो । तेरे पद्म पद छुट नहीं और ठौर । न तव प्रेम तजि, जग में, कुछ सार और ॥ मैं कलिमलग्रसित, प्रतिबिकल पाहि पाहि । तेरी माया गाढ़ी प्रबल, त्राहि त्राहि ॥ अधिक इससे क्या कह सके 'रामहित*, । प्रमित है, अमित है, अमित है, अमित ॥ कृपा करके दो प्रेम अपना, विभो ! " सियाराम सियराम" जपना, प्रभो ! -90988 ( * पण्डित श्री राम हितोपाध्याय जी ) प्रभुने कहा कि "छत्तीस सहस्रवर्ष इस पृथ्वीका राज्य करके, तब पलपनुपमलोक का राज्य करोगे; अब तुम घर जाव " । आप घर को चले ॥ श्रीनारदजीकी प्राज्ञासे महाराज उत्तानपादजीने पापा के इनका आदरसत्कार कर, घरला, इनको राज्य देदिया, स्वयं पर स्त्री भगवद्भजन करने के लिये बनको गए ॥ भूमण्डल के राज्य के अनन्तर, श्रीघ्र व जी अपनी दोनों माता और पिता के समेत "ध्रुव लोक में जा बिराजमान हैं; महाप्रलयकेपीछे परमपदको जायँगे ॥ २३<noinclude></noinclude> ch66e800oxe4c8op2xb2bo9h2nx6jjn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४३ 250 193912 664133 2026-07-02T16:03:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664133 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७८ 18600-- la3600- श्रीभक्तमाल सटीक | श्री अर्जुन जी । श्री अर्जुन जी श्रीयादवेन्द्र प्रभु के फुफेरे भाई थे; भगवत में सवाभाव से प्रेम रखते थे । सुहृद होने के उपरान्त मित्रता भी पापस्में ऐसी थी कि करुणाकर प्रभु आप के सारथी का कामभी किया करते थे । 178 मित्रता की अधिकता से श्रीअर्जुन जी निष्कपट भी ऐसे होगए थे कि जब आप श्रीयदुपति महाराज की बहिन सुभद्रा जी की सुन्दरता पर प्रशिक्त होगए, (दो०) व्याकुलता अरु व्यग्रता व्याप्यो रगरग प्राय । चंचल चित प्रति छटपटी, घर आंगन न सुहाय ॥१॥ गद्गद स्वर रोमांच उपरु नैनन नीर बहंत । प्रेम मग्न उन्मत्त ज्यों, पन्तः पीर सहंस ||२|| तो अपनी पूरी विकलता श्रीकृष्णभगवान् से निःशंक होके कह सुनाई । (दो) परदा कौन सुमित्र सन, हित सन कौन दुराब, हिकी सब परगट करे, तुरतहि भाव कुभाव ॥ (चौ०) जिन्हके असमति सहज न पाई । ते सठ कत हठि करत मिताई ॥ (चौ०) राम सदा सेवक रुचि राखी । बेद पुराण सन्त सब साखी ॥ जेहिजन पर ममता परु छोहू । तेहि करुणाकर कीन्ह न कोहू ॥ श्रीकृष्णचन्द्र जी ने, लौकिक निन्दा उपहास के भयशंका को घरखे परधर, $400 1000<noinclude></noinclude> 2pvp90tbpzp23prldrv81n1lpmixjdk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४४ 250 193913 664134 2026-07-02T16:03:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664134 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>170 श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । १७९ भक्त रहस्यानुकूल ऐसा गुप्त मन्त्र बताया कि उस्के अनुसार श्रीपर्जुन जी अपने मनोरथ को प्राप्तही हो गए । मित्रवत्सलता की जय ॥ (चौ० ) " जाकर जापर सत्य सनेहू । सो तेहि मिले न कछु ॥” सन्देहू ॥ " एक बेर प्रभु अपने सखा पर्जुनजी के पास, बेखटके वहां चलेगए कि जहां आप श्रीसु- भद्राजी के साथ विराजते थे ।" हो सख्य जो तो ऐसा, हो प्रीति जो तो ऐसी । विश्वास हो तो ऐसा, परतीति हो तो ऐसी ॥ " भक्त की प्रशंसा की जावे ? कि भक्तव- त्सल जी की ? कि प्रेमाभक्ति महारानी की ? एक समय मंगलमूर्त्ति श्रीमारुतिजी गन्धमादन निजस्थल से श्रीसीतारामजी के दर्शनार्थ दिव्यमाकेत- लोकप्राए, जहाँपर श्रीसनकादि ऋषिवृन्द और श्रुतियां स्तुति कर रही हैं । किञ्चित काल प्रभु सेवाकर श्रीराम दूत जी ने गन्धमादन जाना चाहा; तो भक्तवत्सल श्रीसीतानाथजी ने कहा कि " जाव, परन्तु हमारे अवतारान्तर के भक्त ' पाण्डवों की रक्षा कौरवों से अवश्य ही करना " । इस प्रभुवचनामृत को अङ्गीकार और दण्डवत कर श्रीपवनात्मज जी पाकाशमार्ग होकर चले; जब "द्वैतवन" के समीप पहुंचे, तब अर्जुनादिपाण्डव और श्रीकृष्णचन्द्रकी वार्त्ता सुनी । सो वह वार्ता यह है :- 600--<noinclude></noinclude> hutzcrovahfvq1n9rsyughrmd83wwax पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४५ 250 193914 664135 2026-07-02T16:03:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664135 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>18000- श्रीभक्तमाल सटीक । अर्जुनादि ने कहा कि "कौरव रूपी दुख से कैसे बचेंगे ?” यह सुन, श्रीकृष्णचंद्रजी ने कहा कि “देखो, ये पवन पुत्र हनुमान श्रीसाकेत विहारी के दूत, पाकाशमार्ग हो के जारहे हैं; सी ये ही तुम्हारी रक्षा करेंगे ' " इतना सुनते ही, वृत्त जानने की वांच्छा से श्रीमारुति जी श्रीकृष्णचंद्रजी के समीप पहुंचे, तब आपने अपने को 'श्रीसाकेत विहारी जी का अवतार' ज्ञापन करने के लिये, श्रीरामरूप हो दर्शन दिया; और पाण्डवों को श्रीहनुमत् शरण में लगा दिया । श्री अंजनी नन्दन जी ने पाण्डवों को निज पनूप भक्त और दास जान, कौरवों से उनकी रक्षा की ॥ इसीसे श्रीमारुति जी का "अर्जुन सहायकारी” ऐसा ख्यात हुआ || पाण्डवों की भक्ति की प्रशंसा किस्से हो सकती है ॥ " तुलसी, सकल सुकृत सुख लागे राम भक्ति के पाछे ॥” श्रीयुधिष्ठिरादि [ पाण्डव ] श्री पाण्डव पांचो भाइयों में से, श्रीपर्जुन जी की कथा तो अभी अभी निवेदन की जा चुकी है। श्री- युधिष्ठिर जी महाराज, श्रीभीमसेनजी, श्रीनकुलजी, और श्रीसहदेव जी, ये चारो श्री यादवेन्द्र जी के ममेरे भाई थे। वे आपको पूर्ण ब्रह्म तथा अपना स्वामी मानते थे । श्रीयुधिष्ठिर जी और श्री भीमसेन को 18600-- 180<noinclude></noinclude> 85w4yngq82hgi90y3fnt6j249ih8fea पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४६ 250 193915 664136 2026-07-02T16:04:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664136 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>181 श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । (जो बड़े थे) पाप प्रणाम; तथा, श्रीनकुल जी पोर श्रीसहदेव जी (जो छोटे थे) आप को दण्डवत, किया करते थे । १८१ श्रीयुधिष्ठिर जी की महिमा कौन कह सके कि जो साक्षात् "धर्म" के ही अवतार थे। महाभारत में भग- यत की भक्तवत्सलता और बारम्बार सहायता के साथ पाण्डवों का सुयश भी प्रसिद्ध है ही ॥ “ कहां न प्रभुता करी ? हे प्रभु ! तुम कहां न प्रभुता करी " गजेन्द्रजी; ग्राहजी | ( कल्पान्तभेदसे एक कथा ) स्वेतद्वीप में एक सर में श्री देवलमुनि स्नान कर रहे थे, हाहा नाम गन्धर्व ने, खेलसे पानी के भीतर, ग्राह की नाईं उनका पांव पकड़ लिया; इसलिये मुनि के शाप से वही वहीं ग्राह हुआ । बड़ों से हँसी खेल का फल ऐसाही है । इन्द्र दवन राजा अपने मन्त्री को राज्य देकर पहाड़ पर जा मौनी हो भजन करता था; भक्तराज ऋषीश्वर श्रीपगस्त्य जी महाराज कृपाकर वहां गए, पर उसने अभिमान से आप का सरकार आदर नहीं किया । फलत: मुनि जी के शाप से गजेन्द्र हुआ || पोह ! अभिमान से किस्का सर्वनाश न हुआ ? 84-06-<noinclude></noinclude> nc6xk5uhl3crb68l69wsqzi8tbn2bh9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४७ 250 193916 664137 2026-07-02T16:04:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664137 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८२ 188600- श्रीभक्तमाल सटीक । ( कल्पान्त भेद से दूसरी कथा ) मरु देश के राजा के यज्ञ में भगवद्क्त दो भाई ब्राह्मणों में, एक ब्रह्मा दूसरे होता हुए; होता ने बहुत परन्तु ब्रह्मा ने उनकी अपेक्षा थोड़ी दक्षिणा पायी; अतएव ब्रह्मा ने दोनों दक्षिणा इकट्ठा मिला के प्राधा- आधा बांट लेना चाहा । होता ने न माना । ब्रह्मा ने शाप दिया " तुम गंडकी में ग्राह हो; एवं होता ने भशाप दिया तुम गज हो” ॥ आपस की लड़ाई और लोभ के लाभ हैं तो ये हैं ॥ सारांश यह कि ये दोनों वैष्णव वा ब्राह्मण थे और शाप से एक ग्राह दूसरे गजेन्द्र हुए 1 एक दिन संयोगवश गजेन्द्र उसी ठौर अपनी हथि- नियों पर पट्टों के समेत जल पीने गया कि जहां वही ग्राह रहता था; ग्राह ने गज का पांव पकड़ लिया; ग्राह अपनी ओर जल में, गज जी अपनी ओर थल में खींचते थे; कुछ काल पर्यन्त और हाथियों ने गजे- न्द्र जी की सहायता की, परन्तु अंत को हारमान के उनको अकेले असहाय छोड़ छोड़ के चले गए । 188600- “कौन काको मीत कुसमय कौन काको मीत " (दो०) हरे चरें, तापहि बरे, फरे पसारहिँ हाथ । 182 तुलसी स्वारध मीत जग, परमारथ रघुनाथ ॥ सह वर्ष पर्यन्त लड़ाई होती रही अंत को ग्राह<noinclude></noinclude> 1ra0bulnd47ng19x721rs01teiwi1ja पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४८ 250 193917 664138 2026-07-02T16:04:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664138 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>183 183600- श्रीभक्तिधाविन्दु स्वाद । १८३ प्रबल हो गज को नदी में ले चला, केवल सूंड़मात्र बाहर रह गया । पत्र गज का ध्यान दीन रक्षक भारत हरन की पर आया । "सुख समय तो दुइ नशान सब के द्वार वाजे । दुख समय दशरथ के लाल तू गरीब निवाजे" ॥ श्रीगजेन्द्र जी ने भगवान की शरण ली और एक कमल का फूल तोड़ कर श्रीबैकुण्ठ नाथ को पर्पण करके पुकारा:- यः कश्चनेशी नलिनोंsaकोरगात् प्रचंड वेगादभिधावतो भृशं, मीतं- प्रणं परिपाति यद्भयान्मृत्युः प्रधावत्यरखं तमीमहि ॥ नायं वेदस्वमा मानं यच्छक्त्याऽहं चियाहतं । तंदुरस्ययमाहात्म्यं भगवंतंनतोस्म्यहम् ॥ की टेर को सुनतेही प्रार्तिहरण चक्रधर हरि गरुड़ को छोड़ के बैकुण्ठ से दौड़ उसी निमिष श्रीगजे- न्द्रजी के पास पहुंच, ग्राह को चक्र से मार श्रीगजेन्द्र जी को छुड़ा लिया। शीघ्रता देखिये कि "पानी में प्रगट्यो किधों वानी गयंदके ॥ भगवत ने श्री गजेन्द्र जी को तो परम पद दियाही, किन्तु ग्राह ने भी मुक्ति पाई । श्रीमद् भागवत पादिकमें श्रीगजेन्द्र कृत स्तुति पढ़ने ही योग्य है ॥ किसने प्रभु को पुकारा और अपने कष्ट से छुट- कारा न पाया ?<noinclude></noinclude> 7kn1ox2jbjoftlg23mv75knwiw43ty4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२४९ 250 193918 664139 2026-07-02T16:04:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664139 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>128600- १८४ श्रीभक्तमाल सटीक । श्रीकुन्ती जी । टीका। कवित्त । कुन्तीकरतूति ऐसी करे कौन भूत प्रांणी; मांगति विपति, आसों भार्जे संघ जन हैं। देख्यो मुख चाहीँ लाल ! देखे बिनु हिये शाल, हूजिये कृपाल, नहीं दीजे बास बन हैं ॥ देखि बिकलाई प्रभु पांखि भरि पाई, फेरि घरही को लाई, कृष्ण प्राण तन धन हैं । श्रवण वियोग सुनि तनक न रह्यो गयो, भयो बघु न्यारो हो ! यही सांचो पन हैं ॥ ७० ॥ वार्त्तिक तिलक | श्रीयादवेन्द्र महाराज श्रीकुन्ती जी के भतीजा थे; परन्तु छाप प्रभु में ब्रह्मसच्चिदानन्दही का भाव रखती थीं, उनकी पन्तःकरणदृष्टि के सामने मोह माया का धुंधलापन नहीं था, सदा भगवत की मूर्त्ति सन्मुख विराजमानही रहती थी । श्री कुंतीजीकी प्रशंसा करसके ऐसा कौन है ? जिस विपत्ति से सबलोग भागते हैं, सोई विपत्ति झापने प्रभुसे माँगी, कि “ हेलालजी ! सुखसे वह दुःखही भला कि जिस दुःखमें तुम सदैव दर्शन दिया करते हो; मैं सदा तुम्हारा मुखारविंद देखती रहाचा- हती हूं, जिसके अवलोकन विना मेरे हृदय में बड़ा भूल होता है; मुझपर कृपाकरके सदा मेरेपास रहाकरो; 184 88.00-<noinclude></noinclude> 559wwgbytkplpqqfalzak085mls7ynh पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५० 250 193919 664140 2026-07-02T16:04:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664140 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>186 1886-06- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । १८५ -90018 और नहीं तो, बनवास दो, क्योंकि बनवास में सदा तुम साथ रहते थे, राज्य होने पर तुम्हारा वियोग हुवा- चाहता है । " जबकि श्रीयुधिष्ठर जी को राज्य प्राप्त होनेकेपनंतर भगवत द्वारका जाने का विचार करते थे, तब इस प्रकारकी प्रार्थना आपकिया करतीं । आपकी यह व्याकुलता और विकलता देखके प्रभुकी में प्रेमभर पाया, पर श्रीद्वारकाकीयात्रा को छोड़ दिया; पाप इस प्रकार से प्रानंदकंदको रथपरसे उतारके अपने पास लौटा लाई । सारांश यह कि श्रीकृष्ण भगवान्ही आपके घन, जन, तन, प्राण, सभ कुछ थे । जब हरि इस जगत को छोड़ गोलोक को गए, तो यह समाचार सुनने के साथही, श्रीकुंतीजी भी शरीर परित्यागकरके, हरिके पास जा पहुँची ॥ देखिये 'प्रेमकापन निवाहना' इसको कहते हैं, ऐसे पन का नाम सच्चापन है। (दोहा) मीन आदि के प्रेम at afare कियौ बखान। प्रीति सो सांचि सराहिये, बिकुरत निसरे प्रान ॥१॥ पाली ! मैंने यह सुनी, पह फाटत पिगौन । 'पह' में, 'हिय' में है रही, “पहिले फाटै कौन ? " ॥ २ ॥ २४<noinclude></noinclude> nkwh1mbph1tbk4gef7kq6lx4ezbffpn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५१ 250 193920 664141 2026-07-02T16:05:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664141 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८६ 83000- श्रीभक्तमाल सटीक 1 नारायण अति कठिन है, प्रेम नगर की बाट । या मारग सो पगधरे, प्रथम सोसदे काट ॥३॥ श्रीद्रौपदी जी । . 186 द्रौपदी सती की बात कहै ऐसो कौम पटु ? खैचतही पट, पट कोटि गुने भए हैं। " द्वारकाकेनाथ !" जब घोली तब साथहु ते द्वारका सो फेरि पाए, , भक्तवाणी नए हैं ॥ गए दुर्वासा ऋषि बनमें पठाए नीच धर्म- पुत्र बोले विनया पन लए हैं। भोजन निवारि त्रियाइ कही शोच पस्यो, चाहै तनु त्यागो, कह्यो "कृष्ण कहूं गए हैं ? ” ॥ ७१ ॥ वार्त्तिक तिलक । परमसती श्री द्रौपदीजी की महिमा वर्णनकरनेका सामर्थ्य किस प्रवीण (पटु) को है ? आप श्रीयाद- बेन्द्र भगवान्को ब्रह्मसच्चिदानन्द जानके देवरभावसे विशुद्ध भक्ति रखती थीं; और श्रीहरीभी आपको अपनी भावज जानते थे । (चौ० ) तिन सम पुण्य पुंज जग थोरे । जिनहिं राम जानत करि “मोरे” । को रघुबीर सरिस संसारा । शील सनेह निबाहनिहारा ॥ श्रीद्रौपदीजी की कथा महाभारत में विस्तार के साथ वर्णित है । जध श्रीयुधिष्ठिर जी बरबस जूपा खेलके छली दुर्योधन के हाथ श्रीद्रौपदी सतीजी की हारगए,<noinclude></noinclude> ocjmq5mir47tde9ohbpb77kokal9hrz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५२ 250 193921 664142 2026-07-02T16:05:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664142 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>187 8800-- श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । १८७ -909881 कलिरूप दुर्योधन की आज्ञा से दुष्ट दुःशासन भरीसभा में आपको नग्न करने के निमित्त वस्त्र खींचने लगा, ( केवल एक सारी मात्र पाप उस समय पहिरे हुए थीं), तब उस कठिन कालमें, आपने अपने देवर श्रीकृष्णभगवान् भक्तवत्सल प्रणतहित को " द्वारका- नाथ !" नाम लेके स्मरण किया । करुणासिन्धु महाराज यद्यपि साथही में विद्यमान थे, तथापि भक्तवचन चरितार्थ करने के लिये उसी क्षण द्वारका से हो पाये । भक्तरक्षक भगवान् उस चीर ( सारी) को अपनी कृपासेबढ़ाने लगे. वह वस्त्र इतना बढ़ताजाताथा कि दुःशासन, जिस्को दशमहल हाथियों का बल था, खींचते खींचते हारगया, परन्तु आपके एक नखके कोरका भी वत्र मर्य्यादासेनहीं सरका; वरंच आप सारीसे हरिकृपासे ज्यों की त्यों सम्पूर्णतः ढँकी हुई खड़ी रहीं। दुष्टोंके मुख काले होगये ! ६पौर सज्जनी' के मुखसे " भक्ति भक्त भगवन्त की जय " ध्वनि गूंज उठी, आपके चारो ओर वस्त्र का ढेर होगया ॥ (०) दुर्जन दुशासन दुकूल गह्यो " दोनबंधु ! " दीन के द्रुपददुलारी मौं पुकारी है । आपनो सबल छांड़ि ठाढ़े पति पारथ से भीम महा भीम ग्रीवानीचे करि डारी ॥ अम्बर लौ अम्बर पहाड़ कीन्हो, शेष<noinclude></noinclude> p9z34s0shg6627z6fp9vkm24jvsqzz1 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५३ 250 193922 664143 2026-07-02T16:05:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664143 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८८ 3000- 83000- श्रीमतमा सटीका कवि, भोषम, करण, द्रोण, सभी यो' विधारी है। नारी मध्य सारी है, कि सारीमध्यमारी है, कि सारीही की नारी है, कि मारीही की सारी है ?" ८५ 188 (दो०) कहा करे वैरो प्रबल, जो सहाय रघुबीर । दशहजार गजबल घट्यो, घट्यो न दशगजवीर ॥ (कु० गी०) अपनेनिक अपनी बिलोकिबल, सकल- सविश्वास घिसारी । हाथउठाइ अनाथनाथसों पाहि पाहि प्रभु पाहि !” पुकारी ॥ तुलसी परखि प्रतीति प्रीति गति पारतपाल कृपालुमुरारी । " वसन वेष" राखी विशेष लखि बिरदावलि मूरति नरनारी ॥१॥ प्रीति प्रतीति दुरपदतनया की भली भूरि भयभभरि म भाजी | कहि पारथ सारथिहि सराहत राईब होरि गरीबनवाजी ॥ शिथिल सनेह मुदित मनही मन, वसनबीच बधू विराजी। सभा सिन्धु यदुपति जय- मय जनु रमा प्रगटि त्रिभुवन भरि भ्राजी ॥ युग युग जग साके केशव के शमन कलेश कुसाजसुसाजी । तुलसी को न होइ सुनि कीरति कृष्णकृपालु प्रगति पथ राजी ॥२॥ एकदिन जब नीच दुर्योधनने जगतप्रसिद्ध श्री दुर्वासा ऋषीजीको श्रीयुधिष्ठिरजीकेपास बनमें ( किसीप्रकार से) भेजा तो वह महात्मा ऐसे समय पहुंचे कि जब श्री द्रौपदीजी सबको भोजन कराके श्रीसूर्य भगवान् की<noinclude></noinclude> h8j65udmsqwjs9vxrijmsbirhfxiits पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५४ 250 193923 664144 2026-07-02T16:05:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664144 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>189 श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । १८९ दी हुई टोकनी को घोघा चुकी थीं* । घ्पतः श्रीयुधिष्ठिर यादि बड़े शोध में पड़े कि दससहस्र चेलो' समेत दुर्वासाजी को ब कहां से भोजन करावें ! दुर्वासा जीने कहाकि जबतक कि तुमभोजनका ठीक- ठाक करो, इतने में हमसब खानादिक: नित्यक्रिया करके ही हैं।" धर्मात्मा श्रीयुधिष्ठिर जीने विचार किया कि "उपय तो शरीर परित्याग करनाही भला जानपड़ता है " परन्तु श्रीद्रौपदीजी ने कहा कि "आप किसीप्रकार की चिन्ता मत कीजिये; क्या हमारे शोकबिमोचन प्रभु कहीं गए हैं ? " टीका | कवित ॥ सुम्यो भागवतों को बचन भक्ति भाव भयो, करचो मन, आए श्याम, पूजे हिये काम है। सावतही कही " मोहि भूख लागी देवी कछु, " महा सकुचाये मांगें प्यारी " नहीं धाम है " | " विश्व के भरण हार घरे है हार, प्रजू, हमसौं दुराके " कही वाणी अभि- राम है | लग्यो शाक पत्र पात्र, जल संग पाइ गए पूरण त्रिलोकी far गिनै कौन नाम है ॥ ७२ ॥ *"श्री सूर्य्य मारायच जी ने प्रसन्न होकर वोह टोकनी दोथी । उसका यह चमत्कार था कि जब तक श्री द्रौपदी जी भोजन कराके उसको नहीं घोडालती थीं, तब तक विविध भाँतिको भोजन सामग्री उसमें से निकला करती थी " 8000-- -9098<noinclude></noinclude> pv8eem35e76hqqlm15sasmjpe42y1kk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५५ 250 193924 664145 2026-07-02T16:05:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664145 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९० 3600- ने श्रीमतमाल सटीक | वार्त्तिक तिलक । " 190 प्रेमी के शुद्धान्तःकरणकी भक्ति भावभरी वाणी ( " क्या श्रीकृष्णचन्द्र कहीं गए हैं ? ) सर्वव्यापी करुणाकर ने ज्यों ही सुनी, फिर क्या था ? दयालुता सुहृद के अन्तःकरण का चित्र सामने धरही तो दिया । भक्तवत्सलता कैसे स्थिर रहने देती ? निजधाम छोड़ने पर भक्त के सम्मुख पहुंचने में शीघ्रताने विद्युत को लज्जित कर दिया । भगवत तथा भक्त के एकत्र होने से प्रमोद पाकर पन्तःकरण की जो दशा होती है, वह अन्तःकरण ही के समझने की वार्त्ता है; लेखनी के सामर्थ्य से बाहर है कि उस्का किंचित अंश भी प्रकाश कर सके । (चौ० ) “ बारबार प्रभु चहत उठावा । प्रेम मग्न तेइ उठब न भावा ॥ " नन्दकन्द विश्वभरणप्रभु ने बड़ी आतुरता से पाप से मांगा कि “भौजी ! शीघ्र कुछ खिलावो, मैं बड़ा भूखा हूँ । ” यह सुन, पति सकुचाय, पापने उत्तर ।" दिया कि “ प्यारे ! खानेपीने का तो कोई वस्तु घर नहीं है " हरि मुसक्या बड़ेहीमधुरस्वर से वोले कि "भौजी ! मुझसे तुम दुराव क्योंकरतीहौ ? तुमने तो वह (बटुई टोकनी) घरमे धररक्खी है, कि जिससे चाहो तो 10:00-<noinclude></noinclude> qchlpfvcx8fn9x7ndblwxfgw3y5z60l पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५६ 250 193925 664146 2026-07-02T16:05:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664146 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>191 8600- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । १९१ -90981 हरि कृपासे तुम संसार भरको खिला सकती हो " । आपने कहा कि "प्यारे ! मैं पाके उस बटुई को धोधा चुकी हूं ॥ " प्रभुने टोकनी मांगी, कि “ लाओ, देखूं " पाप उठा लांई, और प्रभुकेसामने उसको रखदिया । भगवत्ने उसमेंसे एक पत्ता साग का ( सटा हुआ ) ढूंढ निकाला, जिसको, श्रीद्रौपदी जी को दिखलाके, झाप पाए और उसके ऊपर से थोड़ासा जल भी पीलिया । उसीक्षण, दुर्वासाजी और उनके चेलों की कौन कहै, वरंच सारेत्रैलोक्य के प्राणी भोजनसे पूर्ण होगये । दुर्वासा जी, श्रीपम्बरीष जी की वार्ता स्मरणकरके, डरे; और बाहरहीसे बाहर नदी तटसे अपने चेलोँ समेत भागे । "जन को पन, राम !न राखो कहां ?" (०) शील सोच सिन्धु रघुराऊ सुमुख, सुलोचन, सरल सुभाऊ ॥ । "वह अपनी, नाथ ! कृपालुता तुम्हें यादही किन याद हो । वह जो कौल भक्तों से थाकिया, तुम्हें याद हो किन याद हो ॥ सुनी गजकी जोही वह पांपदा, न बिलम्ब छिन का सहा गया; वहीं दौड़े उठके पयादापा, तुम्हेंयाद हो कि यादी ||१|| वह जो चाहा लोगोंने द्रौपदी को कि लाज उस्की सभा में लें; वह बढ़ाया वस्त्रको तुमने पा 188606-<noinclude></noinclude> m8rzlq5dcjz676zjfszej2o79q74e4h पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५७ 250 193926 664147 2026-07-02T16:06:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664147 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>188 १९२ 13600- श्री भक्तमाल सटीक | तुम्हें याद किया हो ||२|| वह प्रजामिल एक जो पापी था, लियामाम मरने में बेटे का; उसे तुमने ऊंचा पददिया, तुम्हें यादही किनयादही ||३|| जिन बानरों में न रूप था न तो जाति थी, न तो गुन ही था; रहे उलटे उनके ऋणी सदा, तुम्हें यादहो, किन यादही ||१|| वह जो गोपी गोप थे ब्रज के सब, उन्हे इतना चाहा कि क्या कहूं उन्हें भाइयों कासा मानना, तुम्हें याद किया हो ||५|| वह जो गीध था, गनि- काजी थी, वह जो व्याध था, वह मलाह था; उन्हें तुमने भक्तों का पद दिया, तुम्हें यादही किनयादही ॥६॥ खाना भिल्लनी के वह जूठे फल, कहीं भाजि छिलके विदुरके चल; योहों लाखों किस्से कहूं मैं क्या, तुम्हें यादहो, किनयादहो ॥७॥ वह गोपियों से कहा था क्या करो याद गीता की भी ज़रा; यानी विरद शरण निवाह का, तुम्हें यादही किनयादही ॥८॥ यह तुम्हाराही "हरिचन्द" है, गो फ़साद में जग के बन्द है; वह है दास जन्मों का पापका, तुम्हें यादही किन यादही ॥९॥ -०००० शुभमस्तु [*००- 192<noinclude></noinclude> 8qul00ngy7v4aybyaf62lp8zrftesly पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५८ 250 193927 664148 2026-07-02T16:06:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664148 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>193 1800- 198000- श्रीभक्तमाल सटीक । श्रीगणेशाय नमः | ॥ श्री जानकीवल्लभाय नमः ॥ श्री हनुमते नमः ॥ श्रीमते रामानुजाय नमः । श्री रामानन्दाय नमः ॥ ॥ रुप्पे ॥ १९३ पदपङ्कज बांछौं सदा, जिनके हरि नित उर बसें ॥ योगेश्वर, श्रुतिदेव, अङ्ग, मुचुकुन्द, प्रियव्रत जेता । एथू, परीक्षित, शेष, सूत, शौनक, परचेता, ॥ सतरूपा, त्रयसुता, सुनीति, सतीसबही, मन्दालसा यज्ञपत्नि, ब्रजनारि, किये केशव अपने बस ॥ ऐसे नरनारी जिते, तिनही के गाऊं जसें । पदपङ्कज बांकों सदा, जिनके हरि नित उर बसें ॥ ॥ ६ ॥ (१०) [ जसें=यर्थे; बांद=पार्थौ ] वार्त्तिक तिलक । जिन जिन भक्तजनों के हृदय में श्रीहरि भगवान् नित्यही निवास करते हैं, तिन भक्तों के कमलरूपी चरणों की (मैं मधुपसम) सदा इच्छा करता हूं-- " जाहि न चाहिय कबहुँ कछु, हरि सन सहज सनेह । सहिँ निरन्तर तासु उर, सो हरि कौ निज गेह ॥" 188600-- २५ * 400-<noinclude></noinclude> pguxnlmv22yhfvkplqxbaectq3i16ua पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२५९ 250 193928 664149 2026-07-02T16:06:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664149 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९४ 15600- श्रीमतिसुधा बिन्दु स्वाद । (१) ९ (नव ) योगीश्वर, इत्यादिक योगीश्वर बृन्द । (२) श्री श्रुतिदेव जी, (३) राजा श्रीङ्ग जी, (४) श्रीमुचुकुन्द जी, (५) जगत विजयी श्री प्रियव्रत जी महाराज (१०) श्री शौनकादिक (११) श्री प्रचेता गण (१२) श्री सतरूपाजी; उनकी तीनों कन्या अर्थात् (१३) श्री प्रसूती जी, (१४) श्री पाकृती जी, (१५) श्री देवहूती जी । (१६) श्री सुनीली जी (१७) श्री मन्दालसा जी (१८) श्री सती (शिवा) जी (६) श्री पृथु जी (७) श्री परीक्षित जी (८) सहस्रानन श्री शेष (१९) सम्पूर्ण सती (पति- ता ) स्त्री वर्ग भगवान् (९) श्री सूत जी 194 (२०) श्रीमथुरावासिनी यज्ञ पत्नी समूह (२१) श्री ब्रजगोपिका वृन्द, जिन्होंने भगवान् को अपने वश कर लिया ॥ जय जय जय ॥ (२२) भगवत को इस प्रकार अपने हृदय में बसा- नेवाले पुरुष वा स्त्री वर्ग जितने हैं, तिन्हीं के सुयश को मैं नित्य गान करता हूं पर करूंगा ॥ टीका | कवित्त जिनही के हरि नित उर वर्से तिनही की पदरेनु नुआभरण कीजिये। योगेश्वर रूपादि रस स्वाद में<noinclude></noinclude> b5duml3l8txu2f4f8hbt7s6gx9czu2h पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६० 250 193929 664150 2026-07-02T16:06:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664150 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>195 600- श्रीभक्तमाल सटीक । १९५ -909 प्रवीन महा, मितिदेव ताकी बात कहि दीजिये ॥ पाए हरि घर देखि गयी प्रेम भरि हियो ऊंची कर करि, पट फेरि, मति भीजिये। जिते साधु संग, तिन्हें विनय न प्रसंग कियो, कियो उपदेश "मोसो बाढ़, पांव ली- जिये ॥ ७३ ॥ वार्त्तिक तिलक | जिन महानुभावों के हृदय में सर्व दुःख हरनहारे तथा मन हरनेवाले भगवान् सर्वदा बसते हैं, तिन्हीं के पदपंकज की सर्व सुख देनेहारी धूरि को अपने मस्तक में सदा धारण करना चाहिये । तिन भक्तों में योगी- श्वरादिक प्रेमापराभक्तिरस के छके हुए परम प्रवीण प्रसिद्ध ही हैं । उनमें से, "श्रुतिदेव” नाम ब्राह्मण परम प्रेमी की बार्त्ता कहे देता हूं- श्री श्रुतिदेव जी । एक समय श्रीकृष्णचन्द्र जी द्वारकाजी से श्रीधिदे- हपुर (जनकपुर) में निमिवंशी राजा श्री बहुलास्वजी से जाके मिले और साथ ही, उसी समय सब साथियों स- दूसरे रूप से श्रीश्रुतिदेवजी के घरमें भी कृपा करके गए। ये दर्शन करतेही परम प्रेम में भरे, भक्ति रस में मति को भिगाए, ऊंचे हाथों से, अपने बस्त्र को फिरा २ के, नाचने लगे। परन्तु श्रीकृष्ण भगवान् के 1886-00- -9008<noinclude></noinclude> g2vt8w7pzkmz1ypkr7ezldj9xovuh61 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६१ 250 193930 664151 2026-07-02T16:06:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664151 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९६ - श्रीभक्त सुधाबिन्दु स्वाद । साथ में और जो सन्त थे, तिनको विनय प्रणाम क़ादर सत्कार इनने कुछ नहीं किया ! तत्र, प्रभु ने इनके प्रेम विचित्रता को देखके स्वयं यों उपदेश किया कि " तुमने सन्तों का तो सतकार नहीं किया ! इनको मुझ अधिक जानके दण्डवत प्रणाम तथा पूजन करो" ॥ ऐसा सुन, सुख मान, इनने वैसा ही किया । चतुर्मासा भर दोनों के घर कृपा कर रहे; तब भी एक को दूसरे का समाचार नहीं मिला ॥ योगीश्वर । 196 नवो (९) योगीश्वरों के नाम श्री ग्रन्थ कर्त्ता जी आगे चलके, ९ (नवें) छप्पै अर्थात् १३ (तेरहवें) मूल में कहेंगे ॥ राजा श्री जी । राजा"" सोमवंशी विठूर निवासी बड़े धर्मात्मा थे; इनके पुत्र न था । ब्राह्मणों से यज्ञ कराया परन्तु देवतों ने ( पूर्व पाप के कारण ) यज्ञ स्वीकार न किया। बहुत विनयश ब्राह्मणों ने बसु का यज्ञ क्रिया; वसु महाराज ने प्रगट होकर हविष (क्षीरात्र) दिया; जिससे राजाबेणु उत्पन्न हुआ परन्तु वह अपने धर्मात्मा पिताश्रीजी की आज्ञानुसार नहीं चलता था । पतः श्रपङ्गजी चुपचाप परण्य में जाकर भग- वत के भजन में भली भांति लगे । भजन प्रभाव से परमधाम को गए ॥ 2600-<noinclude></noinclude> mex4tsa6aym6kg651s2oqg21mp99zng पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६२ 250 193931 664152 2026-07-02T16:06:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664152 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>197 183600- 406- 18000- श्रीभक्तमाल सटीक | पङ्ग नाम के दूसरे राजा "अङ्ग प्रदेश" ( पटना बिहार प्रान्त ) के थे। इनके पुत्र श्री रोमपादजी बड़े भक्त हुए || राजा मुचुकुन्द जी । श्री मुचुकुन्द जी श्री अयोध्याजी के राजा थे; देवतों की लड़ाई में, बड़ी सहायता की; थकके एक पर्वत के कन्दरे में बिश्राम कर रहे थे । श्रीकृष्णचन्द्र "काल यवन" के पीछा करने से, भागते भागते उसी खोह में पहुंचे; और अपना पीताम्बर श्रीमुचुकुन्दजी के शरीर पर उढ़ाकर पाप कहीं छुप गए । कालयवन इन्हीं को श्रीकृष्णजी समझ कर उलटी पुल्टी सुनाने लगा । । इन आंखें खोलीं तो इनकी दृष्टि पड़तेही काल- यवन मृत्यु को प्राप्त होगया । क्योंकि भक्तापराध का दण्ड शीघ्रतर मिलता है। और भगवान् ने स्वयं इस लिये उस्को न मारा कि गर्गाचार्य का बचन था कि कालयवन किसी यदुबंशी के हाथ से न मरे ॥ ( ऐसा सुना गया है कि यही श्रीमुचुकुन्द जी श्री जयदेव कविशिरोमणि हुए कि जिनका " गीतगोविन्द” प्रसिद्ध है ) ॥ IRA00- महाराज श्रीप्रियव्रत जी । भगवान् श्रीस्वयंभू मनुजी तथा महारानी श्रीमत- १९७<noinclude></noinclude> g7i8axxqxpwsvs32mhjf5j5puqd448b पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६३ 250 193932 664153 2026-07-02T16:07:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664153 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>pez 3000- श्रीभसुधाबिन्दु स्वाद । 198 --9001 रूपा जी के पुत्र श्री प्रियव्रतजी, पाँच बर्ष के हो जब थे श्रीनारद भगवान् के उपदेश से, विरक्त हो बनमें हरि भजन करने लगे । ( चौ० ) "जेतो श्रम संसृति हित कीजै । कसनहिँ तेती हरि मन दीजै" ॥ महाराज श्रीमनुजी ने श्री ब्रह्माजी से कहा। तब दोनों प्रियव्रतजी को समझाने चले | इसलिये श्रीनारदजी नेपाज्ञा देदी कि " वत्स ! श्रीब्रह्माजी तथा श्रीमनु महाराज तेरे पास जाते हैं, उनके बचन मान लेना” ॥ श्रीब्रह्माजी के उपदेश से श्रोप्रियव्रतजी बिबाह कर गृहस्थ हुए । उनके दस बेटे, तीम ऊर्द्धरेता (विरक्त) और सात गृहस्थ कि जो सातो द्वीप के राजा हुए ॥ ये महाराज ऐसे प्रतापी भक्तवीर तेजस्वी थे कि इनका प्रकाश सूर्य के तेज के तुल्य थो; जब सूर्य्य नारायण अस्ताचल को जाते तब भी इनके रथ के प्रकाश पौर तेज से दिन बनाही रहता था। श्रीब्रह्माजी के उपदेश से इनने अपने तेज को ढांप लिया। तब सब को रात्रि का बोध होने लगा (चौ०) घुसुत नाम "प्रियव्रत" ताही । वेद पुराण प्रशंसत जाही “गुरुशासन मुनि पुनि घर पायो । कियो राज्य रघुपतिपद ध्यायो” # श्रीप्रियव्रतजी ग्यारह पर्बुद वर्ष राज्य कर भगवत भजन करते हुए, शरीर का परित्याग करके परधाम को गए ॥ 300-<noinclude></noinclude> dgvz7u92bax53t8y57873qw06zhscto पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६४ 250 193933 664154 2026-07-02T16:07:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664154 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>6000- 199 श्रीभक्तमाल सटीक । राजा श्री जी । pee --900 राजा श्री पृथुजी का नाम पहिले चौबीस अवतारों (मूल ५ छप्पै १ पृष्ठ ५८ ) में आचुका है । आप भगवत यश के ऐसे बड़े प्रेमी थे कि उसके श्रवण के निमित्त अपने कानों में दस सहल कर्यों का सामर्थ्य मांगा और पाया ॥ राजा श्रीपरीक्षितजी । हस्तिनापुर के राजा श्रीपरीक्षितजी ही के प्रति, परमहंस श्रीशुकदेवजी ने श्रीमद्भागवत सुनाया, कि जो सब पुराणों मे श्रेष्ठ तथा पारमहंसीसंहिता है; सब का सार पोर, संसार समुद्र के तरने की दीर्घ नौका ( जहाज़ ) है ॥ आप श्रीर्जुन जी के पोता थे । भगवान् ने गर्भ में ही इनकी विशेष रक्षा की थी । पापने "कलियुग" को दण्ड किया था, और इस्को बासके लिये पाँच ही स्थान दिये थे अर्थात् (१) हिंसा जहां हो; (२) मद्यपान जहां हो; (३) द्यूत (पा) जहां हो; (४) वेश्या जहां रहें; और (५) सुबर्ण पर | आपको ५००४ वर्ष हुए ॥ श्री शेषजी । शेष सहस्र सीस जग कारण । जो अवतरेउ भूमि<noinclude></noinclude> 0shuj04ez63vt3vzugbj6pzatatbf32 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६५ 250 193934 664155 2026-07-02T16:07:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664155 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०० श्रीभक्तिसुधाषिन्दु स्वाद । 200 --0008 भय टारण ॥ " चौदह भुवन सहित ब्रह्मण्डा । एक सीस सरसब सम मंडा ॥ श्रीशेष भगवान् । श्रीक्षीरशायी प्रभु के सय्या तथा छत्र रूप से अखण्ड सेवा करते हैं और सहस्र मुख से शेषी (भगवत) का यशगान करते हैं । "अनन्त " के चरित्र का अन्त कौन पासकता है ? किस्से बर्णन हो ? " श्रीसम्प्रदा" के प्रगट करनेवाले आचार्य आप ही हैं । इसी लिये श्रीसम्प्रदा को शेष सम्प्रदा के नाम से भी पुकारते हैं। आपकी ही सम्प्रदा “श्री रामानुज सम्प्रदा" कही जाती है जिसकी परम्परा यों है (१) नारा- यण (२) श्रीलक्ष्मीजी (३) श्रीविष्यक सेन (४) श्रीशठकोप (५) श्री श्रीनाथ (६) श्रीपुण्डरीकाक्ष (७) श्रीराममिश्र (८) श्रीयामुनाचार्य जी जिनके "सालवन्दारस्तोत्र " इत्यादि हैं (९) श्रीपूर्णाचार्य (१०) स्वामी अनन्त श्री रामानुज भगवान् ॥ श्रीसूतजी; श्रीशौनक जी । यह बात प्रसिद्ध है ही कि सब पुराणादिक के कीर्त्तन करनेवाले श्रीसूतजी हैं; एवं उनके अठासी सहल श्रोताओं में श्रीशौनक जो प्रसिद्ध ही हैं ॥ श्री प्रचेता । ये दस भाई थे और दसों का नाम “प्रचेता" ही है; ये प्राचीनबह के पुत्र थे ॥ 2000-<noinclude></noinclude> n0oal7winxkqrpgxyfufijtl8kmavq6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६६ 250 193935 664156 2026-07-02T16:07:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664156 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>201 Kapo- श्रीभक्तमाल सठीक । २०१ -900 88| पिता की पाज्ञानुसार लप करने के लिये सिद्धिसर वा " नारायणसर" को जाते थे। पन्थ में व श्रीनारद जी मिले और कृपा करके भक्ति के लिये तप का उपदेश कर दिया। दश सहस्र वर्ष तप करने के अनन्तर, गरुड़ पर चढ़े पाकर भगवत ने दर्शन तथा भक्ति का बरदान दिया, पुनः एकही लड़की से दसो भाई को बिवाह करने की आज्ञा भी दी । उससे "एक" प्रजापति का दूसरा जन्म हुआ, जिनको राज्य देकरके दसो भाई पुनः भगवत भजन करने के लिये बन में गए ॥ देवर्षि श्रीनारद जी कृपासिन्धु के उपदेश से ऐसी भक्ति की कि देह त्याग कर दिव्य शरीर घर भगवत के धाम को चले गए ॥ श्रीसतरूपा जी; और श्री १०८ कौशल्यानी । महाराज श्रीस्वायंभूमनु की धर्मपत्नी, श्रीसतरूपा और महाराज श्री दशरथजी की महारानी श्री कौशल्या जी थीं ॥ (चौ० ) सतरूपहिं बिलोकि करजोरे । “देखि ? मांगु बरु जो रुचि तोरे ॥” “जो बरु माथ! चतुर नृप माँगा । सोइ कृपालु मोहि प्रति प्रिय लागा ॥ प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई । जदपि भगतहित तुम्हहिँ सुहाई ॥ तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी । ब्रह्म सकल-उर- अंतरजामी ॥ अस समुझत मन संसय होई । कहा जो प्रभु प्रमान पुनि सोई ॥ जे निज भगत नाथ ! तब पहहीं । जो Go- २६<noinclude></noinclude> 4u4mzckvm5t519pgaiim17mqmrwahjs पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६७ 250 193936 664157 2026-07-02T16:07:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664157 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०२ 26-06- श्रीभक्तिसुधा बिन्दु स्वाद । सुख पावहिँ जो गति लहहीं ॥ ( दो०) सोड़ सुख, सोइ गति, सोइ भगति, सोइ निज चरन सनेहु । सोइ बिबेक, सोइ रहनि प्रभु!हमहिँ कृपाकरि देहु " ॥ (चौ० ) सुनि मृदु गूढ रुचिर बचरचना । कृपा सिंधु बोलें, मृदु बचना ॥ "जो कुछ रुचि तुम्हरे मन माहीं । मैं सो दीन्ह सब संशय नाहीं ॥ मातु ! बिबेक पलौकिक तोरे । कबहुँ न मिटिहि पनुग्रह मोरे ॥" । 202 श्री सतरूपाजी श्री सुरपुर में बसने के नन्तर श्री १०८ अयोध्या जी में, मातु श्री १०८ कौशल्याजी महारानी हुईं, जिनकी भक्तिवश खण्डेक परात्पर ब्रह्म प्रियतम प्रभु श्रीरामचन्द्र जी, श्रीपवध में प्रगट हुए ॥ अम्बा श्री १०८ कौशल्या महारानी जी की जय ॥ मङ्गल मूल राम सुत जासू । जो कछु कहिय थोर सव तासू ॥ तेहि ते मैं कछु कहेउँ बखानी । करन पुनीत हेतु निज बानी ॥ "कौन तासु महिमा कहीं, जासु सुवन श्रीराम । बिना काम सब कामप्रद, सहित काम नहिं काम ॥” बारिधि रसवात्सल्य की कौशल्या वेला मनहुँ ॥ श्री प्रसूतीजी । श्री सतरूपा मनुजी की कन्या, श्रीदक्षजी की धर्म पत्नी, श्रीप्रसूती जी, अतिशय पतिव्रता तथा भगवद् 1886-08--<noinclude></noinclude> ftoqtfjddw6on9gw84jz4yftgeq4j1b पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६८ 250 193937 664158 2026-07-02T16:08:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664158 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>203 183600-- श्रीभक्तमाल सटीक । २०३ --9096 भक्तिपरायणा हुई । पापकी स्तुति किससे हो सकती है । तीनों बहिनें एक से एक बढ़के प्रशंसनीय हुईं ॥ श्रीश्राकूती जी । महाराज श्रीस्वायंभू मनु और महारानी श्रीसतरूपा जी की नन्दिनी श्रीप्राकूती जी का विवाह, श्रीरुचिऋ- षिजी से हुआ । इनकी भगवद् भक्ति तथा पातिव्रत्य की प्रशंसा कौन कवि कर सकता है। आप तीनों श्रीउत्ता- नपादजी और श्रीप्रियव्रत जी की भगिनी (बहिन ) थीं ॥ श्रीदेवहूती जी । ( चौ० ) स्वायंभूमनु परु सतरूपा । जिन्हतें भइ नरसृष्टि अनूपा ॥ दम्पति धरम आचरन नीका । पजहुँ गाव श्रुति जिन्हकै लीका ॥ देवहूति पुनि तासु कुमारी । जो मुनि कर्दम के प्रियनारी | आदि देव प्रभु दीन दयाला । जठर धरेउ जेहि कपिल कृपाला । "देवहूति, तहँ करि दृढ़ नेमा । करि सियपिय पद पूरण ॥ ही जगत महँ छु तेहि संसृत जंजाला ॥ जो स्वयं हरि (कपिलजी) की माता हुई, और जिन्ह देवी ने साक्षात् भगवत से उपदेश पाया, उनकी स्तुति जहां तक की जासके सो थोड़ी ही है तीनों बहिनों की कथा उक्त प्रकार से है ॥ 909<noinclude></noinclude> i3aa95womavmkd711ypp0k27bk2qjoe पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७० 250 193938 664159 2026-07-02T16:08:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664159 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>205 -900 श्रीभक्तमाल सटीक | २०५ इनके जो पुत्र होता था, श्रीमन्दालसा जी उस्को बचपनही से ऐसा उपदेश किया करतीं कि वह ग्यार- हवें ही बर्ष में तीक्ष्ण विरक्त हो, हरि भक्त परम अनु रक्त हो जाता था । इसी प्रकार से जब पांच छ पुत्र विराग और अनुराग पूर्वक हरि भजन परायण हो ही गए, तब राजा ने बड़ी युक्ति से रानी श्रीमन्दालसा जी से यह बर मांग लिया कि "यह सातवां बेटा अलर्क (सुबाहु ) मेरे लिये रहने दो कि राज काज प्रवृत्ति नीति सीख सके " । बचन बश रानी ने यह बात स्वीकार की । और एक श्लोक लिखके एक यन्त्र में अपने इस लघुतम पुत्र सुबाहु के दक्षिणहस्त में बांध के यह सिखा दिया कि "बत्स ! जब तुझपर कोई कष्ट पड़े तो तू इस यन्त्र को खोलके पढ़ना " । पुत्र को राज दिलवा रानी श्रीमन्दालसा जी पति को सुन्दर उपदेश कर, हरि भजन के निमित्त पति के साथ साथ कोई और सुबाहु (पलर्क) राज्य करने लगा ॥ न में अपने पुत्रों को बासनाविगत श्रीहरि पद रत देख पति प्रसन्न हो यह बोलीं कि " हे पुत्र ! सबसे छोटे सुत की मुझे चिन्ता है उस्को भी किसी प्रकार से निवृत्ति मार्ग में लावो " ॥ सबसे बड़े पुत्र जी ने मातुवचन सीस घर, घर सबसे छोटे भाई (राजा) से उचित वार्त्ता करके 16-06-<noinclude></noinclude> kzy7jlwqkhrfiiptgwul5wb5iv0q3cj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७१ 250 193939 664160 2026-07-02T16:08:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664160 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०६ 188600- श्रीभसुधाबिन्दु स्वाद । देखा कि 'वह रजोगुण में बहुत ही डूबा है और उस प्रमाद में उपदेश कुछ काम नहीं करता' । तव उनने अपने मामू काशीराज को उभारा, आधा राज देने का बचन दिया, पर यो 'उसने इनके छोटे भाई पर चढ़ाई की इस संकट के समय, सुबाहु (पलर्क) ने अपनी माता के दिये यन्त्र को खोलके पढ़ा (चौ०) " करे न संग कबहुँ केहु के । करे तो सन्त हि संग घनेरो ॥” (श्लो०) “संगः सर्वात्मना त्याज्यः सचेद्वातुं न श- क्यते । ससदुभिः सह कर्तव्यः संगः संगारिभेषजम् ॥१॥ शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि, संसार माया परिवर्जि- तोऽसि संसारनिद्रां त्यज स्वप्न रूपां” मन्दालसा वाक्य- मुवाच पुत्रम् ॥ २ ॥ यह पढ़ते ही श्रीसीताराम कृपा से श्री माता के पा- सीस से इसबचन का ऐसा अधिकार इनके चित्त पर हुआ कि उसीक्षण वहीं से बन की पोर चल निकले ॥ श्रीरामकृपासे श्रीदत्तात्रेय जी मिले । ( बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेउ राम तुम शमन विषादा") उनके सत्संग के उपरान्त, प्रसन्नतापूर्वक अपने बड़े भाई जी से जामिले तथा माता के चरण पर गिरे और पिता एवं सब भाइयों के सत्संग का आनन्द पाया । सब मिल भगवद्भजन करने लगे | (दो०) "ऐसी श्री 206<noinclude></noinclude> paeqexymzw7q18o5op7rdumuh2wq6jf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७२ 250 193940 664161 2026-07-02T16:08:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664161 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>207 ४०००- श्रीभक्तमाल सटीक । २०७ --90988 मन्दालसा, राम भक्त सिरताज । पति सुत तारण भव उदधि, पाहिँ भई जहाज ॥ " यह घटना सुन वह राजा भी, कि जिसने लर्क (सुबाहु ) पर चढ़ाई कर सुबाहु के जाने पर राज कर रहा था, अपने पुत्र की राज्य दे उन्ही के पास जा भगवद्भजन परायण हो गया ॥ श्रीमदालसाजी की जय । श्री सतीजी । दक्षसुता श्री सती जी महारानी की कथा, श्री शिव जी की कथा के अन्तर्गत, पृष्ठ ८२/८३ में हो चुकी है “सिय बेष सती जो कीन्ह तहि अपराध शंकर परि हरी । हर बिरह जाइ बहोरि पितु के यज्ञ योगानल जरी ॥" यज्ञपत्नी (श्रीमथुरानी चौबाइन ) भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी ने गऊ चराते समय एकदिन चतुर्बेदीविप्रो ( चौबे लोगों ) को, यज्ञ करते देखा; अपने सखाओं को उनसे भोजन मांगने के लिये भेजा; चौबे लोगों ने नहीं दिया; सखा सब लोटपाए ॥ पुनः, प्रभु ने उनको भेजा कि "चौबाइनो' (उनकी स्त्रियों) से मांगना " । ब्रजचन्द महाराज का नाम सुन्तेही वे सब अतिशय प्रेम से (अपने पतियों की आज्ञा के विरुद्ध) थालियों में भोजन व्यञ्जन ले ले बन में 88000-<noinclude></noinclude> oknn2rbpmvimm7ar3vkgj2bs713rma1 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७३ 250 193941 664162 2026-07-02T16:08:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664162 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०: R000- श्रीभक्तिधाविन्दु स्वाद । 208 पहुंच, श्रीनन्दनन्दन महाराज को सखायों समेत भोजन करा, मनमानी भक्ति का बरदान पा, घर घर पा मंगलकारी हुई ॥ ( सवैया ) " रूप गुन्यौ प्रथमे सुनिकै हरि देखन की प्रति लालसा जागी । प्राय प्रत्यक्ष लखी तिनको अपने को गुनी जगमें बड़भागी ॥ श्रीरघुराज अनूप स्वरूप हिये धरि मूंद दुर्गे अनुरागी । मोहन को मिलिके मनमें द्विजारिकाइ दई बिरहागी ॥” श्रीगोपिका बृन्द । “प्रेम” – हा ! इस शब्द (प्रेम) के तो सुन्तेही हृदय की कुछ पौरही दशा होजाती है; नेत्रों के सामने एक व्यवधान सा आजाता है। प्रिय पाठक ! संसार में ऐसा कौन सा पन्तःकरण है कि जिसपर इस तीक्ष्ण शस्त्र ने अपना कठिन घाव न किया हो ? चाहे थोड़ा चाहे बहुत । परन्तु कहीं कहीं तो इसने ऐसी पपूर्व तथा विल- क्षण दशा प्रगट की है कि जिसके सुन्ने समझने से बड़े बड़े कठोर चित्तवाल के नयनों से भी मघा की सी झड़ी लग जाती है। श्री ब्रजगोपियां ज्ञान और भक्ति की खानि वरच साक्षात परा प्रीति ही तो थीं । -0008<noinclude></noinclude> 2b36ajahxktuwaw0pcaza8h18msfhqn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७४ 250 193942 664163 2026-07-02T16:09:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664163 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>200 श्रीभक्तमाल सटीक । २०९ " श्री नारद भक्ति सूत्र " देखिये । वेद, ब्रह्मा, शिव, शेष, सनकादि, गणेश, नारद, शारदा, सूत, श्री नाभा- स्वामी, श्री तुलसीदास जी, श्री सूरदास जी, इत्यादिक बड़े बड़े कुशल, कोई भी तो श्री ब्रजगोपिकाओं की पूरी प्रशंसा न कर सका पर, अपनी अपनी बाणी की कृतार्थ करने के हेतु कोई कुछ न कुछ कहे बिन रहा भी तो नहीं ॥ आज तक साधारण लोक भी इनके प्रेम को गाते ही हैं। श्री ब्रज के कुंज कुंज घर घर हाट घाट बाट से सुन्दरियों की ऐसी पुकार सुनाई देती है कि “हाय श्याम ! मिलिहो कबै? तुम बिन छिनुयुगजात ” १ ऊधी ! जोग कहत हैं काको ? की दधिमाखन के चाखन को, लाखन पाखन ताकी । की जमुना तट पनघट ऊपर घट पटकन लीला को ॥ मधु संग श्याम बिहरिबो, हरियो चीर पबला को । की मुरली की तान मनोहर प्रान हरो नहि थाको ॥ की रस रास बास में बसिबो हंसियो हेरि हहा को । तो गई गुजरी उनही पे बांकी चितौनि जाको इनते कळू पोर नहिं चाहीं पावों "जीत" पिया को ॥२॥ कब से पियारे तिहारे दरस को तरसत हैं मोरे नैन - राम । जोत बाट कपाट सो लागी, आठो पहर दिन रैन- राम ॥ ऐसी सुरतिया हारी बसी है, पलको न लागत दैन - राम । जानोंन ठांव कहां तुम छाये, ध्याये नहीं सुधि लेन -राम ॥ २०<noinclude></noinclude> teinqwgzgn3zqi0szhpxv3nrgknqjit पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७५ 250 193943 664164 2026-07-02T16:09:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664164 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१. श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 210 --900181 पतियां की बतियाँ कोकोन चलावे, नेकहु संदसवोसरैन- राम कहू को सुनत न मोरी, बिछुरन की तोरी बैन- राम जो को सुनत करेजवा है थामत, बिसरावत सुख चैन- राम वो पै वो देखा वोछटा छबि, नैना नोकीले वपेन -राम नही पठाव खबरिया, ऐसी नठुरता पैन- राम अन्तर की गति जाननहारो, तुम बिन कोऊ तो है न-राम मन भावे करो सोई प्रीतम, जीत कबहुँ बिसरैन- राम३ माथी ! कही न जाति गति ब्रज की। &c. & ॥ ४ ॥ कहि न जात बृज की कछु घतियां ॥ देखत ही मोको उठिधाईं ग्वाल गोपिका जतियां । दिन की और दसा गोसाई ह्रां की और रतियां ॥ नहि प्रतीत कोऊ उर पानत रहत वैसिये पतियां । काह कहूं कहि जात न मोवै भरि लावत हैं छतियाँ ॥ ही जाय तो देखो निबहत है केहि भतियां ॥५॥ जीत ( सजाता ॥ सवैया 11 सुत दारा पो गेहकी नेह सबै तजि जाहि बिरागी निरन्तर ध्यावें । यम नेम पौ धारना पासन पादि करें fra योगी समाधि लगावें ॥ जेहि ज्ञान प्रौ ध्यान ते जानें कौऊ अनादि अनन्त पखण्ड बतावें । ताही अहीर की छोहरियां, छछिया भर छांछ पै, नाच नचावें ॥६॥ यह श्लोक "यते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः 2000-<noinclude></noinclude> 3u9600x2588ksjagzcj058fkgsjjr0a पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७६ 250 193944 664165 2026-07-02T16:09:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664165 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>211 88000 श्रीभक्तमाल सटीक । २११ -909931 शनैः प्रियदभीमहि कर्कशेषु । ते नाटवीमटसि तदुव्य- ते न किंस्वित् कूर्पादिभिभ्रमति धीर्भवदायुषं नः” ( जो दशमस्कन्ध का प्राण कहा जाता है, ) सो कैसे अनूठेचित्त से निकला है ॥ गोपियों के प्रेम सा प्रेम, न तो होनेवाला, न है, पौर हु; हां श्री जनक नगर की युबतियों की प्रीति और श्रीरघुवीरचरणानुरक्ति, का क्या कहना ॥ (चौ०) कहि न कहिँ संत शारद शेसू । वेद बिरंचि महेश गनेसू ॥ . सो मैं कहउँ कवनि बिधि बरनी । भूमि नाग सिर घरह कि धरनी ॥ ॥ छप्पै ॥ अम्बुज पांशु को जनम जनम हौं जाचिहौं ॥ प्राचीन बर्हि', सत्यव्रत', रहुगण', सगर, भगीरथ', । 'बाल्मीकि', 'मिथि - लेश', गए जे गोबिंद पथ ॥ रुक्नाङ्गद", हरिचन्द", भरत", दधीचि उदारा। सुरथ", सुधन्वा ", शिविर ", सुमति प्रति बलि-की- दारा, ॥ नील मोरध्वज", ता- म्रध्वज", लरक की कीरति राचिहौं । अम्बुज पांशु को, जनम जनम हौं जाहि ॥ ७ (११)<noinclude></noinclude> cozzfj9c6pujsn7sc7cfwso5z582p74 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७७ 250 193945 664166 2026-07-02T16:09:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664166 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१२ 183600- श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । वार्त्तिक तिलक | 212 -900/ इन भक्तों के चरण कमल की धूरि (पांशु) को, मैं जन्म जन्म याहूंगा इन्ही भक्तों की रङ्गीली कीर्त्तियों से मैं रंग जाऊंगा ॥ (१) श्री प्राचीनबह जी (२) श्री सत्यप्रत जी (३) श्री रहूगण जी (४) श्री सगर जी (५) श्री भगीरथ जी (६) महर्षि श्रीथाल्मीकिजी (५) श्री बाल्मीकिजी, दूसरे (८) श्री मिथिलेशजी महा- राज (९) जो जो श्री विदेहवंशी श्री भगवद्भक्ति के पथ में चले, ते सब (१०) श्री रुक्माङ्गद जी (११) श्री हरिश्चन्द्र जी (१२) श्री भरत जी (१३) परमोदार श्री दधी- चिजी (१४) श्री सुरजी (१५) श्री सुधन्वा जी (१६) राजा श्री शिवि जी (१७) पति सुमति श्री ब- लिपत्नी रानी श्री बिन्ध्यावली जी (१८) श्री नीलमोरध्वज जी (१९) श्री ताम्रध्वज जी (२०) श्री अलर्क जी टीका | कवित जन्म पुनि जन्म को न मेरे कछु सोच, स्पहो ! सन्तपद कंज रेनु सीस पर धारिये । प्राचीनवर्हि यादि कथा परसिद्ध जग, उभे बालमीकि बात चित तें न<noinclude></noinclude> jiivc45gurniv3o2l1fpyibviha4y0q पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७८ 250 193946 664167 2026-07-02T16:09:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664167 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>£13 88600- श्रीभक्तमाल सटीक । टारिये ॥ भए भील संग भील, ऋषि संग ऋषि भए, भए राम दरशन, लीला विसतारिये । जिन्हें जग गाय कि हूं सके ना प्रधाय चाय भाय भरि, हियो भरि, नैन भरि ढारिये ॥७४॥ वार्त्तिक तिलक । २१३ हो ! मुझ को इस बात का तो कुछ भी शोच नहीं है कि मोक्ष न पाके जगत में बारम्बार जन्म लूं, क्योंकि जन्म लेके यदि सन्तों के चरण कमल की रज सीस पर धारण करूं तो मुक्ति से भी अधिकतर सुख मानूंगा । प्राचीनबह प्रादिक भक्तों की कथा श्री गवत पादि ग्रन्थों से जगत में प्रसिद्धही है | परन्तु महर्षि श्री बाल्मीकि जी, तथा दूसरे बाल्मीकि जी, इन दोनों भक्तों की कथा चित्त से न टालना चाहिये क्योंकि दोनों की बार्त्ता अनोखी हैं ॥ महर्षि श्री बाल्मीकि जी । आदि कवि श्री बाल्मीकिजी भिल्लों का संग पाके भिल्ल ही होगए; पुनः श्रीसप्तर्षि के सत्संग से महर्षि होगए, कि साक्षात् श्री सीतारामलक्ष्मणजी ने आपके आश्रम में जाके दर्शन दिया ॥ आपने विस्तार पूर्वक श्री रामायण लीला को गान क्रिया, कि जिसके श्रवण पनुकथन से संसार के सज्जनों को किसी प्रकार से दप्ति होती ही नहीं । “राम चरित<noinclude></noinclude> ngjbd6flap6rusq49gvcxftia6tpz4c पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२७९ 250 193947 664168 2026-07-02T16:09:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664168 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१४ -909 जे श्रीभक्त सुधाबिन्दु स्वाद । सुनत पाहीं । रस विशेष जाना तिन नाहीं ॥ " वरंच श्रवण और गान करने पर अत्यन्त चाव भाव ' में भर आता है। और नेत्रों से प्रेमाश्रु का प्रवाह ढलने लगता है ॥ हृदय (सो०) बन्दों मुनि पद कंज, रामायण जिन निर्मएउ | सखर सक्रोमल मंजु, दोष रहित दूषण सहित ॥ श्रीबाल्मीकिजी थे तो ब्राह्मण परन्तु भीलद्वारा पाले गए तथा भीलनी ही से बिबाह भी हुआ । पथिकों को मारमा लूटना यही उनका उद्यम था । " को न कुसं- गति पाइ नशाई” । करुणाकर हरि की इच्छा से एक दिन श्रीसप्तर्षि (१ कश्यप २ पत्रि ३ भरद्वाज ४ बसिष्ठ ५ गौतम ६ विश्वामित्र पीर ७ जमदग्नि) उसी पोर से जा निकले। इन्हें भी जब आपने लूटना मारना चाहा तो महात्मानों ने यों उपदेश किया कि “रे द्वि- जाधम ! (दो०) जो तेरे यमदण्ड में, भागी होय न कोइ ! ती कत कीजत पाप हठि, घोर दण्ड जिहि होइ ? " (चौ०) सुत तिथ उत्तर दियो प्रचण्डा । "हम नाहीं भागी यमदण्डा |” श्रीसीताराम कृपा से महाभागवत सप्त- र्षि के दर्शन सम्भाषण से उनकी किरातबुद्धि जाती रही; विरक्ति तथा सुबुद्धि उत्पन्न हुई; "पाहि पाहि" कह, चरण पर गिर, रूपपने कल्याण का उपदेश पूछा । दिव्यदर्शन करुतापूर्ण सन्तों ने कृपा करके देशकाल 214 600 *600-<noinclude></noinclude> 99auxgbm2ikix1i96ioahekpx8txgwo पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८० 250 193948 664169 2026-07-02T16:10:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664169 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>218 8800- श्रीभक्तमाल सटीक । २१५ पात्रानुसार प्राज्ञा यह दी कि “मरा मरा रट" | वे वहीं बैठ समित काल पर्य्यन्त "मरामरामरामरा" रटते जपते रहे (चौ०)" सठ सुधरहिँ सतसंगति पाई । पारस पर सि कुधातु सुहाई ॥" सहल युग बीतने पर पुनः श्रीसप्तर्षि कृपा करके उधरही से आए, और बल्मीकि (बामी) में से पन्वेषण करके उन्हें ढूंढ निकाला, "बाल्मीकि" नाम रक्वा । व्याघ को राम कृपा तथा नाम प्रताप से शुद्ध सिद्ध मुनीन्द्र पाया । सत्सङ्ग की जय "जहां बालमीक भए व्याध तें मुनीन्द्र साधु. 'मरा मरा अपि, सुनि सिष ऋषि सात की”। (चौ०) उलटा नाम जपत जग जाना । बालमीक भए ब्रह्म समाना ॥ श्रीसीताराम मन्वराज का उपदेश करके, श्रीसप्तर्षि चले गए ॥ श्रीरामनाम का माहात्म्य कौन किस प्रकार से कहे ? श्री नारद भगवान् तथा जगतपिता श्री ब्रह्मा जी ने कृपा करके महर्षि आदिकवि महाराज को श्रीराम गुण तथा रामचरित से परिचित किया । महर्षि ने शतकोटि रामायण कीर्तन किया । "चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरं । एकैकमक्षरं पुंसां महापातक ना- शनम्' ॥ कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरं । प्रारुह्य कविताशाखां बन्दे बाल्मीकिकोकिलम् ” ( कवित्त) 8<noinclude></noinclude> 8kbyoxh2ayfldqmx8u3rjo8vfc96dyy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८१ 250 193949 664170 2026-07-02T16:10:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664170 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१ 600- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । विधिजू सुजस बीज बोये विश्व बाग बीच, बारिबर दै बढ़ाए मोक्षफल काम हैं। सगुणावतार ब्रह्म यश 'रसराम भ, काण्ड सप्तकाण्ड, सर्ग पत्र ऋतुराज, रामायन रसाल तर, अभिराम हैं ॥ त्रेता कविता सुसाखा पै विराजें वसु जाम हैं। कूजत मधुर मधुराखर श्रीराम राम बन्द बालमीकि कवि कोकिल ललाम हैं ॥ (चौ०) राम लषन सिय प्रीति सुहाई । बचन लगो- घर किमिकहि जाई || देखत बनसर सेल सुहाए। बा- लमीक श्रम प्रभु खाए ॥ (दो०) सुचि सुन्दर पाश्रम 'निरखि, हरषे राजिव नैन । सुनि रघुबर उपागमन मुनि पागे प्रायड लैन ॥ (चौ० ) मुनि कहँ राम दण्डवत कीन्हा । प्रासिरबाद विप्रवर दीन्हा ॥ देखि राम छवि नैन जुड़ाने । करि सनमान आसमहिं माने ॥ मुनिबर पतिथि प्रान प्रिय पाए । कंदमूलफल मधुर मंगाए ॥ सिय सौमित्रि रामफल खाए । तब मुनि पासन दिये सुहाए ॥ बालमोक मनपानंद भारी । मंगल मूरति नैन निहारी ॥ (सो०) "राम स्वरूप तुम्हार, बचन पगोचर बुद्धि पर । बिगत कथ अपार, 'नेति नेति' नित निगम कह ॥" / " श्री धारनीकीय रामायण " बड़ा प्रनाषिक धन्य है । (1) भी बाल्मीकीय (२) श्री भगवद्गीता (३) पराशरीय- श्री विष्णुपुराण (४) मनुस्मृति, और (५) महाभारत, ये पांचों बड़ेही प्रना- जिक माने जाते हैं। इङ्गरेज़ी, फारसी, आदि में भी इनके अनुवाद हैं। 216 90988<noinclude></noinclude> ld3aiq52lwjdxroaw5wyw1vdxd9tvt3 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८२ 250 193950 664171 2026-07-02T16:10:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664171 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>217 श्रीभक्तमाल सटीक । दूसरे श्री बाल्मीकि जी । टीका | कवित्त । २१७ -90983 हुतो बालमीक एक सुपच सुनाम, ताको श्यामले प्रगट कियो, भारथ में गाइये । पाँडवन मध्य मुख्य धर्मपुत्र राजा, पाप कीनो यज्ञ भारी, ऋषि पाए, भूमि छाइये ॥ ताको अनुभाव शुभ शंख से प्रभाव कहै, जो नहीं बाजे तो अपूरनता झाइये | सोई बात भई वहु बाज्यो नाहिँ, शोच पस्यो, पूछें प्रभु पास "याकी न्यूनता बताइये ॥ ७५॥ " सुपच" (अपच) = जो खान का मांस भी रांधके खा जाये, भंगी ॥ वार्त्तिक तिलक । अब दूसरे बाल्मीकि जी की कथा कहते हैं। एक सुपच गुप्त भगवद् क्त " बाल्मीकि" नाम के थे । उनको श्रीश्यामसुन्दर जी ने प्रगट किया; सो कथा " महा भारत" ग्रन्थ में गाई हुई है । पांचो पाण्डवों के मध्य में ज्येष्ठ धर्म्मपुत्र श्री युधि - ष्ठिर जी राजा थे । आपने इन्द्रप्रस्थ में एक बड़ा भारी यज्ञ किया । जिसमें सम्पूर्ण ऋषिवर्ग पाए, जिनसे समस्त यज्ञभूमि भर गई । उस यज्ञ के पूर्ण होने का अनुभाव प्रभाव यह था कि एक शंख रखा गया, कि जब वह पाप पाप बज- उठे तब यज्ञ को सम्पूर्ण जानें । पर यदि शंख स्वतः २८<noinclude></noinclude> nzbi4cfg0vgqtex811lejpg67sydsm2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८३ 250 193951 664172 2026-07-02T16:10:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664172 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१८ श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । 218 00 न बजे, तो जानिये कि यज्ञ पूर्ण न हुवा; सो वैसाही हुआ अर्थात् शंख नहीं बजा ॥ ne युधिष्ठिरादिक को बड़ाही शोज हुरुपा; और श्रीकृष्णचन्द्र जी से पूछने लगे कि “किस घटती ( न्यूनता ) से शंख नहीं बजा ? सो कारण आप कृपा करके बता दीजिये " ॥ टीका | कवित्त | बोले कृष्णदेव, "याको सुनौ सब भेव, ऐपै नीकेमानि- लेव बातदुरी समझाइये | भागवत संरसवंत कोऊ नाहिं, ऋषि समूह भूमि चहूंदिशि छाइये ॥ जौपै- कहो "भक्तनाहीं" नाहीं कैसे कहीं, गहौंगांस एक पौर कुलजाति सो बहाइये । दाखनि को दास, अभिमान को वास कहू, पूरण को पास, तोपे ऐसो लैजिंबाइये ॥ ७६ ॥ " दुरी" खुवी, गुप्त। "गाँस"= गुप्त सूक्ष्मवात | "बास"=गन्ध; तमककुद्ध | वार्त्तिक तिलक । श्रीकृष्ण भगवान् ने उत्तर दिया कि इसका सब भेद सुनो। परन्तु सुनके उस्को भले प्रकार से मात्रा | क्योंकि मैं तुम्हें गोप्य रहस्य बताए देता हूं । यद्यपि ऋषियों के वृन्द तो पाके यज्ञ भूमि में चारों पर छाए हुए हैं, परंच किसी भक्ति रस रसिक मागवत मेरे प्यारे सन्स ने तुम्हारे इस यज्ञ में भोजन नहीं किया, इसीसे शंख नहीं बजा । यदि यह कहिये कि " क्या ये सब मुनिगण पापके भक्त नहीं हैं? "तो यह कैसे -9098<noinclude></noinclude> kik8wwx47n5jw4xaq503nt9kt9q4hgv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८४ 250 193952 664173 2026-07-02T16:10:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664173 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>219 1886-06- श्रीभक्तमाल सटीक 1- २१ कहूँ कि “ये मेरे भक्त नहीं हैं" परन्तु एक पर ही गांस ग्रहण करने योग्य है; कि ये सब ऋषिमुनि आचार, ब्रह्म ज्ञान, जाति तथा कुल के अभिमान से भरे हुए हैं; पर मेरा भक्त तो जाति और कुल घ्यादिक के अभिमान को भक्तिरूपी निर्मल नदी में बहाके मेरे दासों का भी दास होकर समस्त अभिमानों के लेश से रहित रहता है। (चौ०) भक्ति बिरति विज्ञान निधाना। बास वि- होन गलित अभिमाना ॥ रहहिँ पनपी सदा दुराए । सब बिधि कुशल कुवेष बनाए । तेहिते कहहिं सन्त श्रुति रे । परम अकिंचन प्रिय हरि केरे । प्रभु जानत सब बिनहिं जनाए । कहहु लाभ का लोक रिझाए | (दो०) तिनहिं न जानहिँ प्रगट सब, ते न जनावहिं काहु | लोकमान्यता पनल सम, कर साधन बन दाहु ॥ यदि तुम्हें यज्ञ की पूर्णता की इच्छा हो, तो ऐसे. मेरे प्यारे भक्त को भोजन करावो " ॥ टीका | कवित्त । ऐसी हरिदास पुर आसपास दोसे नाहिं, बासबिनु कोऊ लोक लोकनि में पाइये । "तेरेई नगर मांझ निशि दिनभर सांझ आ जाय, ऐवे काहू बात न जनाइये " सुनि सब चौंकिपरे, भाव पचरज भरें, हरे मन नैन 'मजू ! बेगिही बताइये | कहानांव ? कहां ठावँ ? 66 -90-988<noinclude></noinclude> 43b55k51uhxlxjc8g22ea9cfstqa3qm पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८५ 250 193953 664174 2026-07-02T16:11:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664174 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२० श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 220 •900 8 जहाँ हम जाय देखें, लेखेँ करि भाग, धाय पाय लप- टाइये ॥७७॥ " are far " गृहहीन, विरक्त; वासना विगत, इच्छा रहित । वार्तिक लिखक ऐसे श्रीमुखबचन सुनके श्रीयुधिष्ठिर जी बोले कि 'ऐसे भगवतदास तो हमारे नगर के आसपास कहीं दिखाई नहीं देते; वरंच ऐसे विरक्त सर्ववासनावि- गत सन्त कदाचित कहीं किसी लोकलोकान्तर में मिलें तो मिलें” । तब आपने कहा कि " तुम्हारे ही पुर में तो दिनरात रहते हैं और नित्यही सांझ सवेरे तुम्हारे हां आते जाते हैं; परन्तु न कोई उनके प्रभाव को जानता है, और न वे किसी को जताते हैं । " यह सुनते ही सब चकित होके पावर्ण्य भाव में मग्न हो गए; सब के मन तथा नेत्र दर्शन के अभि- लाप से अकुला उठे और सब कहने लगे कि प कृपाकरके शीघ्र ही बता दीजिये कि उनका क्या नाम है और वे कहां विराजते हैं, जहाँ हम जाके दर्शन करके अपना धन्यभाग्य मानें और उनके चरणकमल में लपट जायें । ” टीका | कवित | जिते मेरे दास कभूं चाहें न प्रकास भयो, करौं जो प्रकास, मानें महा दुखदाइये । मोको पश्यो सोच यज्ञ MGO- 13600-<noinclude></noinclude> mx03mxoxhx4sremtd87zudmlz3on2d0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८६ 250 193954 664175 2026-07-02T16:11:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664175 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>221 1800.00 3600- | श्रीभक्तमाल सटीक १२१ -90983) पूरन की लोच हिये, लिये वाको नाम; जिनि ग्राम ज जाइये ॥ ऐसी तुम कहो, जामें रहो न्यारे प्यारे ! सदा, हमहीं लिवाइ ल्याइ, नीकेकै जिमाइये । जावो ' वालमीक' घर, बड़ो पवलीक साधुः कियो अप- राध हम दियो जो बताइये " ॥ ७८ ॥ " जिनि मत, नहीं " लोच देखने की इच्छा || "जिनाइये"= जिवाइये, भोजन कराये ॥ " अवलीक "निव्यलीक, सच्चा ॥ वार्त्तिक तिलक । तब प्रभु ने कहा कि “जितने मेरे सच्चे दास हैं, वे कभी लोकमें प्रकाशित नहीं हुआा चाहते; और यदि मैं उनके गुणों का प्रकाश करूं, तो वे उस प्रकाश को पपनें मनमें बड़ा दुखद ईमानते हैं । परन्तु पब मुझे बड़ाही सोच पड़ा क्योंकि तुम्हारे यज्ञ को पूर्ण देखने की बड़ी भारी इच्छा है । और यदि मैं तुमसे उनका नाम बताऊं तो कहीं ऐसा न हो कि वे इस ग्राम ही को छोड़के चलेजावें” । श्रीयुधिष्ठिर जी बोले कि " हे प्यारे ! पाप इस प्रकार से बतादीजिये कि जिसमें प्राप तो सदा लग के पलही रहिये, पर हमही जाके लिवायलावें, और भलीभांति से भोजन करावें" । श्रीकृष्ण भगवान् ने पांज्ञा दी कि "वाल्मीकि के घर जापो; वे सच्चे बड़े ही साधु हैं। araहूं ! मैंने उनका बड़ा अपराध किया कि तुमसे प्रगट कर बता दिया " ॥ 190600-<noinclude></noinclude> 64j88vj34hj1urletz6e9s76ikp9rx8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८७ 250 193955 664176 2026-07-02T16:11:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664176 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1886-06- २२२ श्रीभक्त सुधाबिन्दु स्वाद । टीका | कवित्त । पर्जुन प्रो भीमसेन चलेई निमन्लन को, अन्तर उघारि कही भक्तिभाव दूर है। पहुँचे भवन जाइ, चहुँ दिशि फिरि, पाइ, परे भूमि, भूमि, घर देख्यो छवि पूर है । आाए नृपराजनि को देखि, तजे काजनि को, लाजनि सो कांपि कांपि भयो मन चूर है। पायनि को धारिये जू, जूठन को डारिये जू, पाप ग्रह टारिये • कीजे भाग भूर है ॥ ७९ ॥ जू, "दूर", दुरी, समीपनहीं, हुपी, अप्रगट ॥ "पापग्रह शनि, राहु, केतु, जो जो प्रतिकूल हों ॥ = धार्मिक तिलक | 212 प्रभुप्राज्ञानुसार श्री अर्जुन जी तथा भीमसेन जी उनको नेवता देके लाने के लिये चले; प्रभुने हृदय खोलके कह दिया कि “जाते तो हो परन्तु मनमें कोई न्यूनता नहीं लाना, क्योंकि भक्ति का भाव बहुत ही गम होता है ।" वे दोनों इनके घर जा पहुँचे; चारो मोर फिर के इनके घर की परिकर्मा कर, सन्मुख स्पा, प्रेम से भूम भूम, भूमि में पड़ उन दोनों ने दण्डवत किये, पोर देखा कि इनका भवन, भीतर श्रीभगवन्नाम शंख चक्र चि- न्ह श्रीतुलसीवृन्द इत्यादिक भक्तिसामग्री की छवि से भरा है । जब इनने देखा कि राजाओं के राजा मुझ दीन BG00-<noinclude></noinclude> fwp8hvb1z8g7a69qj8ebwl9jc6hp4lb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८८ 250 193956 664177 2026-07-02T16:11:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664177 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>323 श्रीभक्तमाल सटीक । के घर आए, तो भजन के कायों को छोड़ दिया, और अत्यन्त लज्या से मनमें चूरचूर होके कांपने लगे । श्री अर्जुन जी ने प्रार्थना की कि "महात्मा जी ! आप कृपाकरके मेरे घर धरणं धरिये, भोजन करके पपना जूठन गिराइये और हमारे घरको सम्पूर्ण पापों से रहित तथा शुद्ध करके हमको पापग्रहों से छुड़ाके हम सबको बड़भागी कीजिये ॥ " टीका | कवित्त । २२३ जूठनि ले डारों, सदा द्वार को बुहारीं नहीं पौर को निहारों, अजू ! यही सांचोपन है" । " कहो कहा ?" जेंवी वो कछू पाछे ले विवो हमे जानीगई शेति भक्ति भाव तुमतन है ॥ तब तो लजांनी; हिये कृष्ण पै रिसानी, नृप चाहौ सोई ठानी, मेरे संग कोऊ जन है । भोर ही पधारी अब यही उर धारी और भूलि न बिचारी कही भी जो पै मन है ॥ ८० ॥ वार्तिक तिलक | यह सुन, श्रीवाल्मीक जी अपने प्रभाव को छिपाते और निज जाति की न्यूनता को प्रगट करते। हुए बोले कि, "जी महाराज ! मेरी तो यही प्रतिज्ञा है ही कि सदा पापके जूठे पत्तल स्यादि बाहर फेंक पाया करता हूं, और आपही के द्वार को झाड़ता बहारता हूं; दूसरे किसी की पोर तो मैं देखता तक नहीं " । 188600- 8<noinclude></noinclude> 3dmic3n7nhrw43udtn3senehs5l50yb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२८९ 250 193957 664178 2026-07-02T16:11:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664178 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२४ 1800- श्रीभक्तिसुधाषिन्दु स्वाद । 224 -90982 श्रीर्जुन जी ने सादर कहा कि “ आप यह क्या कहते हैं ? कृपाकरके चलिये, हमारे हां कुछ भोजन कीजिये और पीछे हम लोगों को खिलाइये; पापको भोजन कराए विन हमलोग खा नहीं सकते, क्योंकि हम आपके स्वरूप तथा प्रभाव को भले प्रकार से जान चुके हैं प्रभु की प्रीति रीति भक्ति भाव से आपका तन पूर्ण है ।" तब तो श्रीबाल्मीकि जी लजाए और हृदय में श्री- कृष्णचन्द्र पर रिसियाने कि "प्रभो ! मुझे प्रगट करना यह तुम्हारा ही काम है ! तुमने यह क्या किया ? " फिर प्रत्यक्ष में श्री अर्जुन जो से कहा कि "आप राजा हैं, जो चाहिये सो कीजिये; मैं क्या कर सकता हूँ, क्या कोई सहाय करने वाले मनुष्य मेरे साथ हैं ? ” श्रीपर्जुन जी ने कहा कि "इन सब बातों को छोड़के हम पर कृपा कीजिये, और हमारे घर पाप कल सवे- रेही पधारिये; अब दूसरा कुछ भूल के भी न बिचारिये; केवल हमारी प्रार्थनाही को अङ्गीकार कीजिये " । जब महात्मा जी ने उनका यह प्राग्रह तथा ऐसी श्रद्धा और प्रीति देखी, तो सरलवाणी से बोले कि बहुत अच्छा, जो आपकी वही रुचि है तो वैसा ही करूंगा ॥”<noinclude></noinclude> coxurvgaycvy97j9srol21glkozy7fy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९० 250 193958 664179 2026-07-02T16:11:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664179 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>225 88600- श्रीभक्तमाल सटीक । २२५ टीका | कवित्स । कही सब रीति, सुनि धर्मपुत्र प्रीति भई, करी ले रसोई, कृष्णा द्रौपदी सिखाई है । "जेतिक प्रकार सब जन सुधारि करो, पाजु तेरे हाथनि को होतिसफ- लाई है" || ल्याए जा लिवाई, कहे " बाहिर जिमाई देवो,” कही प्रभु "पापु ल्यावो अंक भरि भाई है” । " पानिके बैठायो पाकशाल में, रसोल ग्रासलेत बाज्यो शंख, हरि दण्डकी लगाई है ॥८१॥ वार्त्तिक तिलक । ध्यायके, श्रीपर्जुन जी और भीमसेन जी ने श्री युधिष्ठिर जी से श्री बाल्मीकजी की रीति प्रीति भक्ति का वर्णन किया। सुन के श्रीधर्म पुत्र महाराज को अत्यन्त हुआ पौर मन में कहा कि प्रेम “हरि को भजै सो हरि को होई । जाति पांति पूछे नहिं कोई” ॥ तदनन्तर श्री द्रौपदी जी रसोई करने लगीं; श्री कृष्ण भगवान् ने उनको सिखाया कि “जितने प्रकार के बयञ्जन तुम जानती हो सो सब पच्छे प्रकार से सुधार के करो; घ्याज तुम्हारे हाथों की सफलता है ।" फिर भोजन के समय युधिष्ठिरादि स्वयं जाके उनको सादर ले पाए। श्री बाल्मीक जी ने कहा कि "मुझे बाहरयहीं बैठाके प्रसाद पवादीजिये" परन्तु प्रभु ने श्री पर्जुन जी से प्राज्ञा की कि ऐसा नहीं, घरंच मेरी तो यह 188 0.06- २९<noinclude></noinclude> rbdfnwizw8wn3rvg70vsc37n512cibl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९१ 250 193959 664180 2026-07-02T16:12:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664180 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२६ 18000-- श्रीसुधाबिन्दु स्वाद । रुचि है कि इनको सादर भीतर ले चल के बैठाइपो” । ऐसा- ही किया अर्थात् पाकशाला में ही बिठला के उनके पा यंजनों के धार ला रक्वे श्री बाल्मीकजी ने मनही में श्रीकृष्ण भगवान् को पर्पण किया । (चौ०) प्रभुहि निवेदित भोजन करहीं । प्रभु प्रसाद पट भूषण धरहीं । फिर जांहीं परम रसाल ग्रास मुख में डाला, उसी क्षण शंख बजा । बजा तो सही, परन्तु भली भाँति से नहीं । तब श्रीकृष्णचन्द्रजी ने उस शंख को एक छड़ी लगाई || टीका | कवित्त । "सीत सीत प्रति क्यों न बाज्यो ? कछु लाज्यो कहा ? भक्ति को प्रभाव तें न जानत यों जानिये" | बोल्यो अकुलाय, “जाय पूछिये जू द्रौपदी कौं, मेरो दोष नांहिं, यह पापु मन पानिये ॥ मांनि सांच बात "जाति बुद्धि पाई देखि याहि, सबही मिलाई मेरी चातुरी बिहानिये” । पूंछेते, कही है बालमीक “ मैं मिलायों यातें आदि प्रभु पायो पाउं स्वाद उन मा- निये ॥ ८२ ॥ वार्त्तिक तिलक । र, प्रभु ने पूछा कि “क्यों रे शंख ! तू प्रत्येक सोध पर नीके प्रकार से क्यों नहीं बजता ? कुछ लज्जित सां होके क्यों बजा है ? मुझे ऐसा जान पड़ता है कि तू इनकी भक्ति के प्रभाव को नहीं जानता । " तय 1600- 226 -90-988<noinclude></noinclude> 2v75blbxiua5e5sq1bdm70j6fzm13jl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९२ 250 193960 664181 2026-07-02T16:12:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664181 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>227 श्रीभक्तमाल सटीक ।. . २२० यह अभिमन्त्रित दिव्य शंख उपकुलाके स्पष्ट बोला कि "इस्का कारण पाप जाके श्री द्रौपदी जी से पूछिये; इसमें मेरा दोष नहीं है आप इसे अपने मन में निश्चय मानिये" ॥ श्री प्रभु के पूछने पर श्री द्रौपदीजी ने शंख की वार्त्ता को सत्यमानके कहा कि “हां प्रभो ! मुझे इन्में जाति बुद्धि पाई क्योंकि इन्होंने पदार्थों को एक में मिला करके मेरी चातुरी की हानि कर डाली । मैं इनसे, शंख से, तथा पाप से तीनों से क्षमा माँगता हूं ।' इस पर प्रभु श्री धालमीक जी से पूछा कि "तुम' इन विविध प्रकार के व्यंजनों को एक में मिलाके क्यों पाते हों ?" आपने उत्तर दिया कि "इन सब पदार्थों को प्रथ- मतः पापने तो पाया ही है, इससे ये सब पापके प्रसाद हुए। अब मैं इन्हें पृथक पृथक पाके' प्रत्येक के स्वाद को मान नहीं किया चाहता हूं, स्वाद लेने से प्रसाद का भाव जाता रहेगा" ॥ ऐसा सुनते ही, श्रीद्रौपदी युधिष्ठिरादि का अधिक भाव इनमें हुआ; तब शंख की ध्वनि भली भाँति हुई और यज्ञ पूर्ण हुपा । देवते फूलों की बर्षा करने लगे । सब बोले कि श्रीभक्ति महारानी जी की जय ! 183600- 188606- श्री प्राचीन जी। राजा प्राचीन बर्हि पूर्वमीमांसा के अनुसार यज्ञा- 90988<noinclude></noinclude> e8yd8qmt8a36513qrycdcjdondbfsfx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९३ 250 193961 664182 2026-07-02T16:12:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664182 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>၃၃ 300 श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 228 -900* दिक कर्म विधिवत् किया करते थे । इनके कई सहस्र पुत्र हुए; परन्तु देवर्षि श्रीनारदजी कृपासिन्धु ने दया करके भक्ति योग के अनुपम रहस्य का उपदेश कर, उन सब को विरक्त बना, हरि भजन में तत्पर कर ही तो दिया । कृपा करके राजा से कहा कि "पाँखें मूंद के देख तो” । उसने और यज्ञ करानेवालों ने देखा कि बहुत पशु कि जिनको उन्होंने यज्ञ में बलि दिया था कोप करके खड़े हैं और इनसे पपना २ पलटा लेने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। " पर पीड़ा सम नहि अध- माई" | "परम धर्म श्रुति विदित पहिंसा " ॥ यह देख राजा के रोमांच खड़े हो गए पर वह समझ गया कि हिंसा वास्तव में महा पाप है। श्रीनारद जी का उपदेश पाकर श्रीराम कृपा से राजा तथा यज्ञ कराने- वाले ब्राह्मण सब भगवद्भक्ति रूपी बोहित के सहारे संसार सागर तर के परम धाम को चले गए । (दो०) "उमा ! दान, मष, यज्ञ, तप, नानाग्रत, रूपक नेम । राम कृपा नहिँ करहिं तस, जस निःकेवल प्रेम ॥ श्रीसत्यव्रत जी । श्रीभगवत के "मोन" अवतार इन्ही की अंजली में प्रगट हुए थे । राजा सत्यव्रत जी सिन्धुतीर संध्या कर रहे थे सूर्य्य भगवान को अर्घ देने के समय एक विचित्र मत्स्य इनकी पाली में आगिरा । राजा ने कमण्डल में छोड़ दिया। वह बढ़ने लगा और ऐसी<noinclude></noinclude> t1b60riv31olmbq33kz06btunjhs60x पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९५ 250 193962 664183 2026-07-02T16:12:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664183 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३० 1986-00-- श्रीभक्त सुधाबिन्दु स्वाद । 230 --90088 183606. जिन ने उनके साथ समर में जाकर श्री पर्जुन जी. की बहुत सेना जला डाली; श्री पर्जुन जी ने वरुणा- स्त्र से पम्नि को शान्त किया चाहा, पर नहोसका । तब श्री कृष्ण भगवान् के उपदेश से वैष्णवस्त्र च- लाया, जिस्से पावक देव भाग चले और जाकर उनने नील जी से कहा कि जीतना कदापि सम्भव नहीं; अब यज्ञाश्व को छोड़ढो, देदो ” ॥ " श्री नील जी ने घोड़ा देकर पश्वमेध के पनन्तर, प्रभु के प्रिय सखा श्री अर्जुन जी से विनय कर, उनके तथा प्रद्युम्न जी के द्वारा, श्री हरि भक्ति पार्क, श्री बैकुण्ठ में अचल बास पोयां ॥ श्रीरहुगण जी । राजा श्रीरहुगण जी बड़े प्रतापी तथा बुद्धिमान थे । एक दिन पाप, ज्ञान प्राप्ति के लिये श्रीकपिल भगवान् के दर्शन को शिविका (पालकी) पर जा रहेथे। पंथ में एक कहार की प्रावश्यकता पापड़ी तो लोग एक हृष्ट पुष्ट मनुष्य को पकड़ लाए और पालकी में दुरादिया (लगा दिया। आप "श्री जड़भरत जी थे" । प्राप मार्ग को देख भालके जीव जन्तु बच्चाके पग धरते और कभी २ कूद भी जाते थे । इस्से पालकी बहुत हिलती तथा राजा को कष्ट होता था । राजा के रजोगुणी हृदय से तमोगुणमय वार्ता --90-981<noinclude></noinclude> dlawizbu61b5qnqmwuoc0m725dshbrz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९६ 250 193963 664184 2026-07-02T16:12:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664184 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>231 3600- | श्रीभक्तमाल सटीक २३१ श्रवण करके जब महात्माने सतोगुणी प्रसंग प्रारंभ किया तब राजा जो समझ गए कि ये कोई महान् पुरुष ( परम हंस ) हैं । तब शिविका से उतर पांव पड़, पाप से सादर बिनय किया, क्षमा मांगी, और इष्ट बार्ता लाप करने लगे । पाप के उपदेश से राजा कृतार्थ हो अपनी राज- धानी को लौट आए । श्री " जड़ भरत" जी और राजा रहुगण का सम्बाद श्रीमद्भागवत के पांचवें स्कन्ध में अवश्य देखना सुन्ना चाहिये ॥ श्रीसगर जी । राजा सगर को उनकी सौतेली माता ने गर्भ ही में विष देदिया था; परन्तु राम कृपा से बचे । राजा सगर के, एक स्त्री से, समंजस नाम एक पुत्र, पौर दूसरी स्त्री से ६०००० (षष्ठि सहस्र) बेटे हुए। अस- मंजस ने प्रजा के साथ कठिन उपद्रव किया इससे राजा ने उस्को देश से निकाल दिया । तब इपसमंजस जी, अपने योग बल से प्रजा का कल्यान करके, आप न में रहके हरिभजन करने लगे । राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ से इन्द्र घोड़ा चुरा लेजाकर श्रीकपिल देव जी के आश्रम में बांध पाए । सगर के साठसहल पुत्रों ने घोड़ा ढूंढने में पृथ्वी खोदी कि जिस्से सागर हुआ। वे जब श्रीकपिल देव जी के<noinclude></noinclude> crz9vqjx6dbpqwn3y03bjmrn3frl0jk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९७ 250 193964 664185 2026-07-02T16:13:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664185 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३२ श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । - पास यज्ञपशु (अव) को देख कपिल भगवान् को दुर्वचन कहने लगे, तब मापने आंखें खोलीं। दृष्टि पड़ते ही साठी सहस्र भस्म हो गए ॥ असमंजस के पुत्र अंशुमान ने श्री कपिल महाराज की स्तुति की। मापने प्रसन्न हो घोड़ा देदिया; तथा श्री गंगाजी को लाने की आज्ञा दी । घोड़ा लाकर अंशुमान ने अपने दादा ( पितामह ) राजा सगर को दिया ॥ श्री सगर जी ने यज्ञ पूर्ण कर, अंशुमान को राज्य दे आप बन को जा भगवत भजन कर परांगति पाई ॥ श्री भगीरथजी । राजा अंशुमान ने बहुत दिन राज्य कर, अपने पुत्र दिलीप को राज्य दे, तप किया तथा दिलीप राजाने भी श्री गंगाजी हो के लिये तप किया। राजा भगीरथ नेविवाह करने के पूर्व ही तप करना झारम्भ क्रिया, उनके तप से राम कृपा से श्री गंगाजी पाईं, इसीलिये श्री गंगाजी भागी- रथी के नाम से भी पुकारी जाती हैं । श्रीभगीरथ जी की भक्ति को धन्यवाद जिनके द्वारा श्री गंगाजी प्रगट हुई हैं ॥ जय ३ सुरसरि ! तव रेनू । सकल सुखद सेवक सुरधेनू ॥ जय भगीरथनन्दिनी, मुनिषय चकोर चन्दिनी, नर नाग विबुध बन्दिनी, जय जन्हू बालिका। बिष्णु पद सरोजजासि, ईश सीस पर विभासि, त्रिपथगासि, 132 -90<noinclude></noinclude> 9vxdqfbc2eyg629m1r7eafbccogda7t पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९८ 250 193965 664186 2026-07-02T16:13:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664186 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>233 188600- श्रीभक्तमाल सटीक । २३३ 0831 पुण्यराशि, पाप छोलिका ॥ बिमल विपुल बहसि वारि, शीतल त्रयताप हारि, भँवरबर विभंगतर तरंग मालिका । पुरजन पूजोपहार शोभित शशिधवल धार, भंजनि भवभार भक्त कलपथालिका ॥ निज तटबासी बिहंग जलथलचर पश पतंग कीट जटिल तापस, सब सरिस पालिका । "पवधपुरीसरयु तीर सुमिरत रघुबंशबीर बिचरत मति" देहि मोहमहिष कालिका ! श्रीरुक्माङ्गद जी | (v) टोका कविच । रुक्मांगद बाग शुभ गन्ध फूल पागि रह्यो, करि- अनुराग देवबधू लेन पावहीं। रहि गई एक कांटा चुभ्यो पग बैंगन को, सुनि, नृप माली पास आए सुख पावहीं ॥ कहो “को उपाय स्वर्ग लोक को पठाइ दीजे" "करे 'एकादशी' जलधरे कर जावहीं" । " व्रत को तो नाम यहि ग्राम कोऊ जांने नाहिँ” “कीनो हो जान काल्हि लावो गुन गावहीं ॥८३॥ (६२९-८४६) वार्त्तिक तिलक | भगवद्भक्त राजा श्री रुक्माङ्गद जी की पुष्प- बाटिका फूलके सुन्दर सुगन्धित फूलों से भरी पगी सुशोभित हो रही थी, यहाँतक कि स्वर्ग के वाटिकाओं से भी अधिक उत्तम थी, और इस्से स्वर्गस्त्रीयां (अपू- सराएं भी रात्रि में प्रेम से फूल लेजाया करतीथीं । [8600- ३०<noinclude></noinclude> s90e7ztukori3heed1b6slwt3rthma4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९९ 250 193966 664187 2026-07-02T16:13:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664187 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३४ श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । 234 34 -9098 एक बार उन्में से एक अप्सरा के पांव में भांटे का कांटा चुभ गया, अतः उस्का पुण्य क्षीण होने से उस्की प्रकाश में उड़ने की दिव्यगति नष्ट होगई अत एव बाटिकाही में रह गई। यह बात मालियों से सुनके श्रीरुक्माङ्गद जी ने स्वयं वहां पहुंचके उस अप्सरा को (राम कृपा से पकाम दृष्टि से हो) देखा, पौर प्रसन्न होके उससे पूछा कि "तुम्हारे स्वर्ग जाने का कोई उपाय हो तो बता कि जिस्से हम तुम को स्वर्ग को भेज दें" । उस अप्सरा ने उत्तर दिया कि “जिसने 'एकादशी' का व्रत किया हो, वह यदि अपने एक एकादशी के व्रत का फल संकल्प करके जल मेरे हाथ में देदेवे तो मैं स्वर्ग को चली जाऊं" राजा ने उत्तर दिया कि इस व्रत का तो नाम भी कोई इस नगर में नहीं जानता। तिस्पर अप्सरा बोली कि "कल एकादशी थी; कदा- चित कोई ज्ञातहू से भूखा रह गया हो, तो उस्को ला उस्का ही फल मुझ को दिलवा दीजिये, तो मैं स्वर्ग की चली जाऊंगी और पाप के इस उपकार को सदा मानती गाती रहूंगी।" (ट) टीका । कबित्त । फेरो नृप डौंडी; सुनि, बनिक की लौंड़ी भूखी रही ही कनौड़ी, निशि जागी, उन मारियै । राजा ढिग मानि करिदियो प्रतदान; गई तिया यों उड़ानि निज लोक 1986-06-<noinclude></noinclude> s6pxed82pmp3icqy27e811mlsngeshd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०० 250 193967 664188 2026-07-02T16:13:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664188 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>235 58000-- श्रीभक्तमाल सटीक । २३५ -90988 कोपधारिये ॥ महिमा अपार देखि, भूप ने बिचारी याको "कोउ अन्नखाय ताको बांधि मार डारिये। याही के प्रभाव भाव भक्ति बिसतार भयो, नयो जोंज सुनो सब पुरी ले उधारिये ॥ ८४ ॥ ( ५२९-५४५) वार्त्तिक तिलक । यहसुन, राजा ने अपने नगर में डौंड़ी फिरवादी कि " कल जो कोई दिनरात भूखा रहगया हो सो राजा के समीप चले !!! उसपर महाराज प्रति प्रसन्न होंगे”। ऐसा ढिढोरा सुनके एक बनिये की कनौड़ी टहलनी सामने आई, जिसको किसी अपराध से बनिये ने अ- हुत पीटा और भोजन भी नहीं दिया था; इसी हेतु से वह भूखी और रातभर रोती जागी हुई थी। राजाने उसी लौंड़ी (टलनी) से संकल्प कराके उस अज्ञात व्रत का फल अप्सरा को दिलादिया; इतनेही मात्र के प्रभाव से उस अप्सरा को दिव्य गति प्राप्त होगई, तथा उड़के वह निज लोक को चली भी गई ॥ इस प्रकार एकादशी व्रत का आश्वर्य्यजनक प- मोघ माहात्म्य देख के, राजा ने अपने पुर और देश भर में प्राज्ञा देदी कि "एकादशी को यदि कोई पन्न खायगा, तो उस्को बांधके प्रायान्ति दंड दिया जायगा। ये सब लोग राजा की आज्ञा से व्रत और जागरन तथा भगवन्नाम कीर्त्तन में तत्पर होगए ॥ इसी व्रत के प्रभाव से राजा के पुर भर में भावभ- -90090<noinclude></noinclude> 99fl7jxgj1pq8zyu9tmmel16aj0cjs4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०१ 250 193968 664189 2026-07-02T16:13:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664189 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३६ 8000-- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । क्ति का पति प्रचार हुआ; पौर नवीन पनोखी बात यह हुई कि पन्त में सब के सब मुक्तरूप होकर श्री भगवदुधाम को प्राप्त होगए ॥ राजा रुक्माङ्गद की सुता (v) टीका | कवित्त । एकादशी व्रत की सच्चाई ले दिखाई राजा; सुता की निकाई सुनौ नीके चित्त लाइकै । पिताघर प्रायो पति, भूख ने सतायो यति, मांगे तिया पास, नहीं दियो यह भाइ कै ॥ “पाजु 'हरि बासर' सो ता सर न पूजे कोऊ; डर कहा मीच की" यों मानी सुख पाइ कै । जेन प्रान, पाए बेगि भगवान, बधू हिये सरसान भई; कह्यों पन गाइ कै ॥ ८५ ॥ (६२९-५४४) वार्त्तिक तिलक । श्री एकादशी व्रत का प्रभाव और सच्चाई तो राजा ने प्रगट की, अब राजा की लड़की की महिमा वा प्रशंसा लिखते हैं सो भली भाँति से चित देके सुनिये । उस्का पति रुक्माङ्गद जी के घर (पपने सुसराल ) में पाया; उसी दिन एकादशी थी । राजपुत्र अति सुकुमार तो थाही उस्को क्षुधा ने पत्यन्त बाधा किया; जब उस्को किसी ने भोजन न दिया तब उसने अपनी से यह कहो कि खाने बिना मेरे प्राण छूट जाएंगे; परन्तु तब भी उसने एकादशी के भावसे भोजन नहीं दिया, और बोली कि "स्पाज हरिबासर है कि जिस्की 236 8000- 1000-<noinclude></noinclude> qm6oi7kdyas5u85qsnrb9whkxdr6z03 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०२ 250 193969 664190 2026-07-02T16:13:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664190 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>237 के श्रीभक्तमाल सटीक । २३० समानता को कोई और व्रत नहीं पहुँच सकता । प्राज का क्या भय है ? कि जिसमें अभय परमपद की प्राप्ति है। सुख पूर्वक ऐसी दृढ़ता को वह गहे रही मृत्यु उसने भूख से प्राण छोड़ही तो दिये। उसी समय वैकुण्ठ से विमान या पीर सबके देखते दिव्यरूप हो वह उसपर चढ़ भगवदुधाम को चला गया ॥ यह देखके उनकी स्त्री का हृदय भक्ति से अत्यन्त सरस हुआ। प्रभुने प्रसन्न हो पारषदों को विमान समेत भेजकर आपको (उनकी प्रिया) को भी कृपा करके अपने धाम में बुला लिया इस भांति उनके एकादशी व्रत का पन हमने गान किया ॥ टीका (समुदाय) | (ट) कवित्त । सुनौ " हरिचंद " कथा, व्यथा बिन द्रव्य दियो, तथा नहीं राखी बेचि सुत तिया तन है ।" सुरथ"" सु- धन्वा" जू से दोष के करत मरे, "शंख" प्रौ "लिखि- त" विप्र भयो मैलो मन है ॥ इन्द्र सौगिन गये शिवि पै परीक्षा लेन, काटि दियो मांस रीझि सांचो जान्यो पन है । " भरत" " दधीच", यादि भागवत बीच गाए, गाए, सबनि है ॥ ८६ ॥ (६२९-५४३) 1880-06- सुहाए जिन दियो तन धन<noinclude></noinclude> pau8w3nabwqna90dom8v7bhteupuzwy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०३ 250 193970 664191 2026-07-02T16:14:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664191 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३८ 3000 श्रीभक्तिसुधाषिन्दु स्वाद । वार्त्तिक तिलक | महाराज श्रीहरिषचन्द्र जी की कथा सुनिये । दुः वरहित मनसे ( श्रीविश्वामित्र जी को ) सम्पूर्ण द्रव्य दिया, तथा पुत्र अपनी रानी और अपना शरीर तक भी नहीं रक्खा तीनों को बेच डाला ॥ श्रीसुरथ जी तथा श्री सुधन्वा जी इन भक्त राज पुत्र से शंख और लिखित मलीन मनवाले ब्राह्मया, द्वेष एवं भक्तद्रोह करते ही मर गए || इन्द्र, सेन पक्षी का रूप धरके एवं अग्नि कपोत का रूप बनाके राजा शिवि जी की परीक्षा लेने के निमित्त गए। उनके धर्म की सचाई पर रीकके प्रगट होके इन्द्र और अग्नि ने बरदान दिया ॥ श्रीभरत जी श्रीदधीचि जी घ्यादिक भक्तों की कथा श्रीमद्भागवत ग्रन्थ में गान की हुई हैं । इन सब ने अपने तन और धन परमार्थ में देदिये इससे ये धर्म और भगवद्भक्ति की शोभा को प्राप्त हुए ॥ " हम सब की कथा नीचे लिखी जाती हैं देखिये ॥ -:०: श्रीहरिश्चन्द्र जी । राजा श्रीहरिचन्द्र जी सूर्य्यवंशी श्री अयोध्या जी के राजा धर्म कर्म निष्ठा में बड़े पक्के तथा प्रतापी थे । एक समय इनके कुलपूज्य पुरोहित श्री बशिष्ट जी महाराज कहीं गए थे इसी से श्रीविश्वामित्र जी से इनने यज्ञ कराया जिनने दक्षिणा में राज्यादि तथा 238<noinclude></noinclude> o7u4jnylhkqy67puamdny90gnb7239r पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०४ 250 193971 664192 2026-07-02T16:14:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664192 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>239 श्रीमतमाल सटीक । २३ -0001 तीनभार ( इक्कीस मन ) सोना भी संकल्प करालिया; पर उक्त तीनभार सुवर्ण राजा से बड़ी कड़ाई से मांगा । श्रीवशिष्ठ जी पाकर राजासे बोले कि " श्रीकाशी जी श्रीविश्वनाथपुरी है किसी प्राकृत राज्य के मध्य नहीं गिना जाता सोतुम वहीं कुमार रोहिताश्व तथा रानी समेत अपने आप को बेचकर दक्षिणा का सोना मुनि को देदेसकतेहो, उस्में विश्वामित्र जी कोई बखेड़ा नहीं लगा सकते। तब, श्रीकाशी जी में जाकर राजा के और धर्मपत्नी एक ब्राह्मण के पुत्र बिके और स्वयं राजा एक चाण्डाल के यहां बिका | यों पूर्ण दक्षिणा दे डाली । हाथ कालियाचाण्डाल ने इनको मृतक का कर लेनेको स्मसानघाट पर रख दिया ॥ श्री कौशिक (विश्वामित्र) जी ने सांप होकर रोहि- को काटा, कुमार मरगया; रानी पुत्रके मृतशरीर को ले ती पीटती हुई घाटपर गई । उस्से भी धम्मी- स्मा दुःखी राजा ने चाण्डाल (डोम) के लिये कर मांगाही । और कुछ तो थाही नहीं इस लिये इनने रानी के वस्त्र में से ही प्राधा फड़वा के लिया, अपना धर्म न छोड़ा | इन्द्र तथा विश्वामित्र जी ने जब राजा को यो ढ़ पाया, तो वे पुनः दूसरी चाल चले अर्थात् का- शी नरेश के पुत्र को मार कर और हरिश्चन्द्र जीकी निर्दोष रानी को डाकिनी बताकर राज पुत्रके मृत्यु का 188600- --90988<noinclude></noinclude> joe7jd9qd2lowsnkycknmq0b4wthpel पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०५ 250 193972 664193 2026-07-02T16:14:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664193 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४० श्रीभक्त सुधाबिन्दु स्वाद । कलंक उस्पर लगाया, यहां तक कि काशी नरेश ने राजा हरिश्चन्द्र ही को उस रानी के मारडालने की आज्ञा दी । 'इस पन्तिम परीक्षा में भी हरि कृपा से उत्तीर्ण धर्मात्मा श्री हरिश्चन्द्र जी' ने जही रानी के बध 240 अर्थ शस्त्र उठाया, वहीं श्रीसूर्य भगवान्ने, निज कुलभूषण पर प्रसन्न हो, पाकोश वाणी की कि “ध- म्ममा हरिवन्द्र की जय" एवं इन्द्रादिने पुष्पवृष्टि भी की, विष्णु विधाता महेश्वर ने साक्षात प्रगट हो- कर दर्शन दे राजा का हाथ रोक लिया; राजकुमार को भी जिला दिया; विष्णुभगवान ने भक्ति वरदान दिया; विश्वामित्र ने भी नरेश को अपनी सब करतूत कहके प्रशंसात श्री अयोध्या जी के राज्य करने की आज्ञा दी । श्रीसीतारामकृपासे राजाने भक्ति प्रचार और राज्य कर अपने उसी पुत्र को राज दिया; परम धाम को सिधार, जग में अपना और धर्म का यश फैलाया ॥ श्रीसुरथ; श्रीसुधन्वा जी । ये दोनों परम भागवत तथा सगे भाई थे; किसी ग्रन्थकार ने लिखा है कि ये दोनों चम्पक पुरी के राजा "हंसध्वज" के पुत्र थे; औरों ने राजा नीलध्वज जी के पुत्र इन्हें लिखा है; अस्तु ।<noinclude></noinclude> 9q286j0xlw7qt9l4zn396ncbsqwwfln पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०६ 250 193973 664194 2026-07-02T16:14:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664194 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>241 श्रीमतमाल सटीक । इनके पिताने एक समय पर्जुन जी से युद्ध करने के हेतु यह प्राज्ञादी कि "सब सेना तुलसी माला तथा ऊर्द्धपुगढ तिलक धारण करके रण भूमि में पाये और जो कदराई करेगा सो तप्ततेल के कड़ाह में छोड़ा जावेगा” । २४१ परमभक्त राजकुमार श्रीसुधन्वा जी चलते समय श्रीमातुचरण कमल को दण्डवत करके निजधर्मपत्नी से विदा होने गये। स्त्री ने कर जोड़के प्रार्थना की कि" प्राण माथ ! मैं ने खोधर्म से छुट्टी पा पाज ही स्नान कि- या है, तुमसे विशेष प्रेमालिङ्गन चाहती हूं; मेरे परि- तोष पनन्तर खान करके, तिलक माला शस्त्रादि स- अ, तब हरिस्मरण करते हुए सानन्द समरभूमि में जाव" । श्रीसुधन्वा जी मे, जो "एक स्त्री व्रत धारी" थे, ऐसा- ही किया । इसीलिये वह धर्म कर्म निष्ठा में प्रसिद्ध हुए । में विलम्ब के साथ पहुँचने से निज आज्ञा भंग समझ राजा (इनका पिता) बड़ा प्रसन्न हुघ्पा और "शंख" तथा "लिखित" नाम के मनमलीन दो ब्राह्मण मन्त्रियों ने, द्वेषसे, राजा के उस क्रोध को और भड़- कादिया । निदान निर्दोष राजकुमार श्रीसुधन्वा जी खौलते तेल के कड़ाह में डाल दिये गए। परन्तु वह तो परम भागवत थे, भक्तरक्षक : हरि की कृपा से तप्त तेल 'उनको श्री सरयू जल (शीतल सुखद होगया जैसे श्रीप्र- ङ्काद जीको । ३९<noinclude></noinclude> n7uve91tyyi3s18g4rqs1042qyjq0m7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०७ 250 193974 664195 2026-07-02T16:14:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664195 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४२ श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । (दो) पिता विवेक निघाम बर, मातु दयायुत मेह | तासु सुपन किमि पाइहे पनत पटन तजि गेह ॥ शंख और लिखित ने तेल के ताप की परीक्षा के लिये कड़ाह में एक सजल नारियलफल छुड़वाया जो पड़ते ही फूटा; और दो टुकड़े होकर हरि इच्छा से शंख तथा लिखित की खोपड़ियों पर ऐसे जालगे कि उन दोनों भक्तद्रोहियों के प्राण ही लेलिये । ( चौ० ) कर्म प्रधान विश्व करि राखा । जो जस करे सो तस फल चाखा ॥ जो अपराध भक्त कर करई । राम रोष पावक सो जरई ॥ भक्त द्रोह करि कोउ न बांचा । भक्तसुरक्षक हरि पन सांचा ॥ 742 atri भाइयों श्रीसुरथ तथा सुधन्वा जीने श्री- र्जुन जी से (जिनके सारथी स्वयं श्रीकृष्ण भगवान् थे) भली भांति लड़के रणक्षेत्र में शरीर त्यागा। उनके सीसों को श्रीशिव जी ने अपने माला में रखलिया । (छप्पे ) भस्म अंग, मर्दन पनंग संतत पसङ्ग, हर । सोस गंग, गिराईंग, भूखन भुजंग बर ॥ गल मुण्डमाल, बिधुवाल भाल, डमरू कपाल कर । बिबुध वृन्द नवकुमुद चन्द सुखकन्द शूलधर ॥ त्रिपुरारि त्रिलोचन दिगवसन विषभोजन भवभय हरन । कह तुलसिदास सेवत सुलभ, शिव शिव शिव शंकरशरन ॥ भगवत के सन्मुख तन तजके, परम भागवत दोनों भाई श्रीभगवत के धाम को गए।<noinclude></noinclude> flg36t15tst2v7j331tbj8b49c7h0fo पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०८ 250 193975 664196 2026-07-02T16:15:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664196 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>3000-- श्रीभक्तमाल सटीक । श्रीभक्ति महारानी जी की जय ॥ राजा श्रीशिव जी । २४३ दानशील धर्मधुरन्धर महाराज श्री " शिवि" जी दया- सिन्धु “धर्म कर्म निष्टा" में प्रसिद्ध हैं, यहां तक कि इश्में देवतों के राजा इन्द्र जी ने इनकी परीक्षा लेनी चाही इन्द्र ने पाप तो सेन (बाजू) पक्षी का रूप धारण किया और अग्नि देव कपोत बने । सेन कपोत पर झपटा, तब कपोत भागकर श्रीशिवि जी के गोद में जा छुपा पर बोला कि "महाराज ! मैं पाप के शरण हूं मुझे सेन के चंगुल से अभय देकर रक्षाकी - जिये"; साथही सेम भी पहुंचा और कहा कि "यह पक्षी मेरा भक्ष्य है, मैं भूखा हूं; आप मेरे स्पहार में बाधा न डालिये इस्को मुझे दीजिये" । राजा ने कहा "मैं नदूंगा" । धर्माधर्म पर बाद विवाद के अनन्तर दोनों में प्रसन्नता पूर्वक यह बात ठहरी कि महाराज कपोत के तुल्य मांस अपने शरीर से सेन को दें। राजा कपोत की तुला के एक पल्ले पर बैठाके, दूसरे पल्ले पर अपने शरीर का मांस काट २ तुलवाने लगे। परन्तु समस्त शरीर का मांस भी उस कपोत के तुल्य न हुआ, कबूतर भारी होता ही गया ! पन्त को राजा जी ज्योंही - अपना सीस देने पर उद्यत हुए, वहीं उसी क्षण प्रति प्रसन्न हो, सेन पर कपोत का रूप छोड़ छोड़, प्रगट 8000<noinclude></noinclude> 02ww9rz9uscvzd16uop3yappl1qnhgh पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३०९ 250 193976 664197 2026-07-02T16:15:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664197 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४४ श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । 24% 9098 हो, श्रीसुरेश इन्द्र जी तथा पावक देव ने दरशन दे, राजा को सीस काटने से रोका, पीर उनका तन जैसा था पुनः वैसाही हृष्ट पुष्ट कर दिया; फिर उनकी शर- णागतवत्सलता दानशीलता दया दृढ़ता आदिक घ की प्रशंसा कर, वे यह बरदान दे, चरने गए, कि (दो०) " जीवत भोगो प्रति विभव, तनु तजि हरिपुर जाइ । पान करो हरिभक्ति रस' पुनरागमन बिहाइ” ॥ श्रीभरत जी । श्रीभरत जी के पिता का नाम श्रीऋषभ देव जीथा, । आप जो नौ जोगीश्वरों के बड़े भाई थे, बहुत दिन राज करने के अनन्तर अपने बड़े लड़के को राज देकर बहुत काल पर्य्यन्त मुक्तिनाथ क्षेत्र में गंडकी जी के तीर तप करते रहे । एक दिन नदी तट बैठे थे; उसी समय एक गर्भ- वती हरिणी जलपीने पाई; सो सिंहका गर्जना रुपक- स्मात सुनके ऐसी घबड़ाहट में कूदी कि उसका गर्भ- पात हो गया, और वह मरगई; उस्का बच्चा श्रीभरत जी के सामने नदी में बहचला; यह देख दयावश इनने उस्को शीघ्र निकाला, तथा असहाय जान, छुपाकर, ये उस्को, निज स्पाश्रम में ला पालने लगे । उस्में इनका मन इतना लगा, उस्को इतना चाहने लगे कि उस मृगसावक की प्रीति में ये बहुतही आ- 10.00-<noinclude></noinclude> k4rxqygtgyax8wj5ereiaj0ewa8lxuu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१० 250 193977 664198 2026-07-02T16:15:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664198 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>245 श्रीभक्तमाल सटीक २४५ सक्त होगए; यहाँ तक कि जब वह सयाना हो, मृगा- के झुगड में मिल किसी पर चला गया, तो उसके लिये ये अत्यन्त बिकल हुए । यह प्राख्यायिका श्री- भागवत में पढ़ने सुने योग्य है। हरे! हरे! मोह, माया, शक्ति, इनकी बातें बिलक्षण और अपार हैं ॥ जब इनका शरीर छूटा तो उसराग (लेह) तथा मन गति के कारन इनको पुनर्जन्म लेकर मृगाही होना पढ़ा जो भरत एक समय सारे भारत खंड के महाराज थे पब वह मृगा होकर कलिंजर के बन में रहने लगे; परन्तु पूर्व भजन और प्रभु की कृपा से हरिण तन पूर्व जन्म की सुधि तथा शुद्ध बुद्धि बनी की बनी ही रही; इसी लिये पाप रूपकेले ही रहा करते थे । कारण रहित कृपालु प्रभु ने उस मृग शरीर से छुड़ा कर आपको ब्राह्मण के घर में जन्म दिया। यहां भी 'भरत' नाम पड़ा । श्रीहरिकृपासे ज्ञान तथा दोनों जन्मों की सुधि इनको बनी रही । (चौ०) "निशिदिन लगे रहत हरिध्याना । का जा- मत का होत जहाना ॥ जिनकी हृदय ग्रन्थि सब छूटीं । स इन्द्रिय हरि पद महँ जूटों ॥ " आपकी मति बचपन से ही बिरक्त और श्रीहरि- भक्ति में नुरक्त हुई । पूर्व घटना स्मरण कर पाप किसी से मिलते न कोई संसारी काम यथार्थ कर देते किसी से बोलते भी न थे धरन किसी के प्रश्न का उत्तर तक नहीं देते थे । 3600-<noinclude></noinclude> cuqhpafz7crogzce8btj4esz4ff7cfz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३११ 250 193978 664199 2026-07-02T16:15:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664199 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४६ श्रीभक्तिसुधाषिन्दु स्वाद । 246 --909 13/ (दो) घन्य रहनि “जड़ भरत” की, धन्य तासु वैराग्य ॥ जग से जड़ धनि राम पद, पगे धन्यतर भाग्य ॥१॥ ॥ एक दिन भिल्लो का राजा इनको पकड़वा, पपनी इष्टदेवी काली के सामने लेजाकर खड्ग ले इन्हें बल देने को उद्यत हुआ। श्रीदुर्गा जी महारानी ने वही खड्ग छन उन सब दुष्टों को बघ किया और श्रीभगवद् भक्त आप को जानकर मापसे अपना अपराध क्षमा कराया।भक्त भय हारिणी श्रीभगवती महा माया की जय (चौ०) श्रीसियराम कृपा जाहीपर। सुर नर मुनि प्रसन्न ताहीपर ॥ राजा रहूगण ( पृष्ट २३० । २३१ ) की कथा में लिख पाए हैं कि एकबेर उसने पाप को पालकी में लगाया, आप चींटियां बचा कर पग धरते थे जिससे पालकी उचकी तो झापसे उसने कढ़ाई के साथ बात को; आपने ऐसे उत्तर दिये कि शीघ्र वह श्रीचरणों पर गिरा, तथा पापके सत्सङ्ग से ज्ञान विराग प्राप्त किया; सो यह सम्बाद श्रीभागवत में पढ़ने सुने ही योग्य है । अस्तु ॥ समय पा, योगाभ्यास से तनुत्याग, श्रीजड़भरत जी परम धाम को गए श्रीदधीचि जी । परमोदार दधीचि ऋषि का सुयश प्रसिद्ध ही है। वृत्रासुर के उत्पात से अकुला के देवते भगवत के शरा 8000-<noinclude></noinclude> 346solfv4qwxhoi42qpip0uoj3v3vbw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१२ 250 193979 664200 2026-07-02T16:15:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664200 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>600- 347 is Goo श्रीभक्तमाल सटीक । २४० में गए, तब प्रमुने प्राज्ञादी कि "ऋषीश्वर दधीचि महाराज की हड्डी का बज्ज बनाओ तो इस उपाय से सुर का नाश होगा; मुनि महादानी धर्मात्मा हैं, स्थ मांगने पर 'नहीं' नहीं कहेंगे" । ऐसाही कि- या । राजाने अपनी पीठ की पस्थि देडाली उसी का बज्ज इन्द्र ने बनवाकर उसी से वृत्रासुर का वध किया ॥ (चौ०) "ते नर बर थोड़े जग माहीं । मंगन लहहिँ न जिनके नाहीं ॥ शिवि दधीचि हरिचन्द कहानी । सुन न चित ते नहिँ दानी ॥ -::- श्रीविन्ध्यावली जी । (ET) टीका | कवित्त । बिन्ध्यावली तियासी न देखी कहूं तियो नैन, बां- यो प्रभु पिया, देखि किया मन चौगुनी । " करि प भिमान, दान देन बैठो तुमहीं को, कियो अपमान में तो मान्य सुख सोगुनी ॥ त्रिभुवन छीनि लिये, दिये चेरी देवतान प्रान मात्र रहे, हरि मान्यों नहीं सौगुनी । ऐसी भक्ति होइ जो पे जागो रहो सोइ, अहो ! रही ! भव मां ऐपै लागे नहीं भी गुनी ॥८॥ (६२९-५४२) । वार्त्तिक तिलक | जैसी राजा बलि (पृष्ट ९१ ) की स्त्री श्रीबिन्ध्याव- जो थीं, वैसी स्त्री तो कहीं देखने सुने में नहीं पाती; कि श्रीवामन भगवान ने इनके प्रियपति को बाँध<noinclude></noinclude> cq3buqdk2hu9sce4prbhfby0nx8lkhq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१३ 250 193980 664201 2026-07-02T16:15:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664201 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४ श्रीभक्ति सुधाविन्दु : खाद । 248 की डाला और इनने उनको बँधे हुए अपने नेत्रों से देखा तिस्पर भी इनका मन मलीन न हुआ, वरंच कृपा समझ चित में चौगुना हर्ष बढ़ाया । प्रभु प्रभु से ये प्रार्थना करने लगीं कि "प्रभो ! आपने बहुत अच्छा किया; ये अभिमान करके, त्रिभुवन के नाथ स्वयं पाप को दान देने बैठे, पाप की ही तो पृथ्वी, तिरुको अपनी समझ के अपनेको दामी मान, इनने जो पाप को भिक्षुक माना, सी यही बड़ा अपमान किया । पने इनका अभिमान छुड़ाया, इस्से मैं ने शतगुण सुख माना ॥ श्र देखिये ! त्रिभुवन को इनसे छीनि के इनके शत्रु देववों को देडाला और केवल प्राण मात्र इनके रह- · गए, तब भी श्री बिन्ध्याबली जी ने प्रभु में अवगुण नहीं प्रारोपण किया बरंच गुण ही समझा । पहा ! जो कदाचित ऐसी प्रबल भक्ति जिसके हो, सो जन चाहे भजन करता हुआ जागता रहे, चोहे प्रभु पर विश्वास कर निश्चिन्त सोता हुआ संसार ही में रहे, तथापि उस्को संसार के कोई गुण स्पर्श नहीं कर सकते । वह भक्त जीवन मुक्त ही है ॥ अति सुमतिरानो श्री विन्ध्यावली की प्रेमभक्ति निष्ठा को प्रसंसा कौन कर सकता है ?.<noinclude></noinclude> 034us131lhyusbidrq8zpvb2f9sv3nx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१४ 250 193981 664202 2026-07-02T16:16:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664202 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1000- श्रीभक्तमाल सटीक • श्रीमयूरध्वज जी श्री ताम्रध्वज जी । (ट) टीका । कवि । २४९ अर्जुन के गर्व भयो, कृष्ण प्रभु जानि लयो, दयो रस भारी, याहि रोग ज्या मिटाइये। “मेरो एक भक्त पाहि तोको ले दिखाऊं ताहि, भए बिम वृद्ध, संग बाल, चलि जाइये ॥ पहुंचत भाग्यो जाइ "मोरध्वज राजा कहाँ ? वेग सुधि देवो” काहू बात जा जनाइये । “सेवा" प्रभु करौं, नेकु रहो, पांउ घरों, जाइ कहो तुम बैठो; कही, आग सी लगाइये ॥ ८८ ॥ (६२९-५४१) वार्त्तिक तिलक । एक समय श्रीर्जुन जी को अपनी भक्ति का प- भिमान हुआ । इस बात को भगवान् श्रीकृष्ण चन्द्र जी ने जानकर मनमें बिचार किया कि "इनको हमने अपना भारी सख्य रस दिया तिस्का अभिमान इन- को रोग सरीखा होगया, सो उस्को यत्न रूपी औषधि से मिटा डालूं” ! ऐसा बिचारकर पर्जुन जी से बोले कि "हे सखे मेरा एक भक्त है चलो मैं उस्को तुम्हें दिखा लाऊं । तुम ब्राह्मण का बालक बन जावो और मैं वृद्ध ब्रा- लगा होके दोनों चलें" । ऐसाही किया । राजा मोरध्वज के द्वार पर पहुंच के प्रतिहार से कहा कि " राजा कहाँ हैं? शीघ्र जाके जनावी कि दो बम आए हैं" किसी ने जाके राजा से जनाया । मो-<noinclude></noinclude> 9jzij1ujgwsvsw92p2i2voot5v5bq80 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१५ 250 193982 664203 2026-07-02T16:16:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664203 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५० श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । रध्वज जी ने उत्तर दिया कि “प्रभु की पूजा कर रहा हूं; जाके कहो कि थोड़ा ठहरिये कृपाकर बैठ जाइये, प- भी मैं पाके आपके चरणों पर पड़तां हूं" पाकर प्रतिहार ने ऐसा ही कहा; सो सुन्तेही, ब्रा या देवता के पाग सी लग गई ॥ (2) टीका | कवित्त । चले पनखाय पायँ गहि अटकाय जाय नृप को सुनाय ततकाल दौरे आए हैं। " बड़ी कृपा करी आज फरी चाह बेलि मेरी, निपट नबेल फल पायँ याते पाये हैं | दीजै पाज्ञा मोहि सोई कीजै, मुख लीजै य- ही. पीजे बाणी रस, मेरे नैन ले सिराए हैं। सुनि क्रोध गयो, मोद भयो, सो परिक्षा हिये लिये चित चाव ऐसे वचन सुनाए हैं ॥ ८९॥ (६२६ - ५४०) किसी प्रति में पायें नहीं है, 'पायो' पाठ है। “अनलाय”=रिसाय; अनखसे । “सिराये" = ठंढे, शीतल, जुड़ाने, तृप्त ॥ वार्त्तिक तिलक । ब्राह्मण देवता रिसायके चल दिये। तब राजां के सेव कों ने उनके चरणों को पकड़ के बहुत बिनय कर उन्हें रोक रक्खा, और सब वृत्तान्त महारोज से जा· सुनाया । सुन्तेही उसी क्षण राजा दौड़े आए पीर प्रणाम करके हाथ जोड़ प्रार्थना करने लगे कि "प्रभो! आपने बड़ी कृपा की; पाज मेरी चाह रूपी बेलि फल युक्त हुई जिससे प्रत्यन्त नवीन फल रूपी पापके पाएँ (चरण) 250 -90988<noinclude></noinclude> fjz6my1xgm9y717kiuqv4mg95vgeu1i पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१६ 250 193983 664204 2026-07-02T16:16:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664204 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>251 18000-- श्रीभक्तमाल सटीक | मैंने पाए। अब जिस हेतु ध्यापने कृपाकी हो सो मु- आज्ञा दीजिये कि मैं वही करके सुख लूटूं पोर २५१ अमृत रसमय बचन श्रवण पुट से पान करूं, पापके दर्शनों से मेरी आंखें भली भोति शीतल हुईं ।" भक्त राज जीके ऐसे बचन सुन विप्र देव ने क्रोध को त्याग कर आनन्द पाया; फिर परीक्षा लेने का fert जो आपके हृदय में है तिस्से चित में प्रसन्न होके राजा से यों बोले ॥ (ex) टीका | कवित्त । "देवे की प्रतिज्ञा करो", "करी जू प्रतिज्ञा एम, हि भांति सुख तुम्हैं, सोई मोकी भाई है” । “मिल्यो मग सिंह यहि बालक को खाए जात, कही खावी मो- हि नहीं यही सुखदाई है" । " काहू भांति छोड़ो” ? "नृपाधी जो शरीर घ्यावे, तौही याहि तज कहि बातमी जनाई है। बोलि उठी तिया "परधंगी मोहि जाइ देवो”, पुत्र कहे "मोको लेवी", "पौर सु- धि आई है” ॥ ९० ॥ (६२९-५३९) "माई "= सुहाई, नीक वा भली लगी, सुखदाई हुई वार्त्तिक तिलक । ब्राह्मण - हे राजा ! तुम देने की प्रतिज्ञा करो तो मैं कहूं । राजा -- मैं ने प्रतिज्ञा की; जिस प्रकार से आपको सुख हो, सीई मुके परम प्रिय है; मैं वही करूंगा ।<noinclude></noinclude> s6tp6tszs8kn21j0w6qowiwllyysctc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१७ 250 193984 664205 2026-07-02T16:16:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664205 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>18600- २५२ श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । ब्राह्मण - हमको मार्ग में एक अदभुत सिंह मिला, सो इस बालक को खाए जाता था। मैं ने उस्से कहा कि “हे सिंह ! तुम इस्को तो छोड़ दो और मुझे खा लो” । परन्तु सिंह बोला कि "मुझको इसी के मांस खाने से सुख होगा" । तब मैं ने पूछा कि “भला किसी प्रकार से तुम इस बालक को छोड़ सकते हो? " उसने उत्तर दिया कि “हां, यदि राजा मयूरध्वज का आधा शरीर पाऊं, तब हो तो इसको न खाऊंगा" इस भांति बार्त्ता उसने कही है। श्रीमयूरध्वज जी कीरानी -- (बिप्र से) मैं राजा की पङ्गही हूं, मुझे ही लेचलिये, उस्को दे दीजिये, खा जावे । श्रीमयूरध्वजजीका पुत्र ताम्रध्वज- मैं राजा का आत्मज पतः दूसरा शरीर ही हूं, मुझेही उस सिंह को दे दीजिये कि खाले क्योंकि उस्को बालक का मांस बहुत प्रिय है । 252 ब्राह्मण - हां, गया था सो उस्की कही हुई एक बात मैं भूल सुधि आई है, सुनो। (21) टीका । कबित्त । सुनो एक बात "सुत तिया ले करौंत गात चीरें धीरें भीरें नाहिँ,” पीछे उन भाषिये । कीन्ह्यो वाही भांति, अहो नासा लगि आयो जब ढखो दुग नीर, भीर वा- कर न चाखिये ॥ भले अनखाय गहि पायँ सो सुनाये 600<noinclude></noinclude> p88tl5bt63l5a8i3y7l2024rokkqwzt पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१८ 250 193985 664206 2026-07-02T16:16:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664206 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>253 श्रीभक्तमाल सटीक २५३- बैन "जैन जल बायौं, अंग काम किहिं नाखिये” । सुनि मरि पायो हियो, निज तनु श्याम कियो, दियो सुख रूप, व्यथा गई, अभिलाषिये ॥ ९१ ॥ (६२९-५३८) “करौंत”=आरा, अरकस । "मीरें"-हरें, कादर हों। "नाविबो"= पटकना | "बाकरि”=उसकरके, तिस्से । . वार्शिक तिलक । उससिंह ने पीछे से एह एक बात कही सो भी सुनो कि" आधा अंग ही न लाना, बरन् इस भांति से चीर के दाहिना अंग लाना कियारों का एक छोर राजाका पुत्र, तथा दूसरा छोर उनकी रानी पकड़े पर दोनों धीरे धीरे चीरें, पर तीनों मन को दृढ़ रक्वें कोई कद राय नहीं” ॥ श्रीराम कृपा से तीनों ने ऐसाही किया । पहा ! ये भगवत् कृपा पात्र धन्य हैं । जब चीरते चीरते प्यारा नासिका पर्य्यत्र पाया, तब राजा की बाईं आंख से आंसू निकलने लगा । यह देख ब्राह्मण देव बोल उठे कि "राजा ! तुम कदरा गए, रोने लगे, तिस्से वह तुम्हारा मांस नहीं खाएगा और इतना कह रिसियाके चलभोदिये । ब्रह्मण्यशिरोमणि राजा ने बिप्र देव के चरण पक- के प्रार्थना की कि "हे द्विजदेव जी ! देखिये मेरे दा- हिने नेत्र में श्रुबिन्दुका लेशभी नहीं है कि जो ग्रा- लय के पर्थ लगा; । हां बाईं आंख से मांसू इस का<noinclude></noinclude> jw3f5imtb2cp5taup7rshdvk8ivbhbl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३१९ 250 193986 664207 2026-07-02T16:17:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664207 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५४ श्रीभक्तिसुधाषिन्दु स्वाद । 254 •000 रण से चलता है कि धाम अंग सांप के कार्य में न आया, व्यर्थ ही फेंक दिया जायगां ।” यह भाव युक्त बचन सुन्तेही अपार करुणा से पाप का हृदय भर पाया, और अपने सुन्दर श्याम शरीर की प्रगट करके सपरिवार भक्तराज को दर्शन दिये तथा सिर पर कर स्पर्श कर घाव और व्यथां दोनों का नाश करके रूपभूत सुख दिया। राजा प्रति अभि- or पूर्वक दर्शनानन्द में मग्न हो गए । • श्रीकृष्ण भगवान को यह अभिलाषा उत्पन्न हुई। कि राजा कुछ बरदान मांगे । (३) टोका । कविश । “मो पैतो दियो न जाइ निपट रिझाइ लियो, त रीझि दिये बिना मेरे हिये साल है। मांगी पर कोटि, बदल न चूकत है, सूकत है मुख, सुधि आए वही हाल है ।" बोल्यो भक्तराज “तुम बड़े महाराज, कोऊ थोरोऊ करत काज, मानो कृत जाल है । एक मोको दीजै दान”, “दोयो जू बखानो बेगि”, “साधु पै परीक्षा जन करो कलिकाल है" ॥९२॥ (६२९-५३७) "त"तथापि तिरपदभी । "सूकत"=सूलता है। "ख" समूह। वार्त्तिक तिलक | श्रीप्रभु ने भक्तज से कहा कि “जैसा तुमने प- चना शरीर चीर के दिया वैसा मुझसे तो नहीं दिया- जाता, और पथ जो इस्का पलटा मैं तुमको दिया था- G00-<noinclude></noinclude> iu9tiwwfi2235dxu0ezbqxgn3gg93fm पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२० 250 193987 664208 2026-07-02T16:17:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664208 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>255 12600- श्रीभक्तमाल सटीक । २५५ हता हूं तोभी इसके योग्य की तो कोई बस्तु है ही नहीं; इस्से सो भी मुझसे नहीं दिया जाता, क्योंकि तुमने मुझको पत्यन्त ही रिझा लिया । तथापि कुछ रीझ (पारितोषिक) दिये बिना मेरे हिये का साल मिटता नहीं; ध्पतः यदि करोड़ों बरदान मांगो तो भी जो घोट मैंने तुम्हें दी है उसका पलटा चुक नहीं सकता; इसलिये कुछ अवश्य मांगो। हे प्रिय भक्त तुम्हारी उस दशा की सुधि पाने से मेरा मुख सूख जाता है, और क्या कहूं " श्रीभक्त राज जो प्रेम से बिहूल हो हाथ जोड़ के बोले कि " नाथ! आप बड़े महाराज हैं जो कोई थोड़ा भी भला कार्य्य करे उस्को पाप अपनी कृतज्ञता से सुकृतों का पुंज मान लेते हैं (चौ०) जेहि समान प तिशय नहिँ कोई । ताकर शील कस न एस होई ॥ (श्लोक) * कथञ्चिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । नस्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥ १ ॥ बहुत अच्छा, पाप एक बरदान मुझे दीजिये" प्रभु ने कहा कि “दिया, शीघ्र कहो क्या मांगते हो ? तब परोपकारी श्रीमयूरध्वधजी ने यह बर मांग लिया ● यदि किसी प्रकार से कोई किंचित भी उपकार करे, तो उसीसे प्रभु अतिशय संतुष्ट हो जाते हैं। फिर जो सैकड़ों अपकार मी करे, तो उस जन में अपनपी मान के उसके दोषों का स्मरव ही नहीं करते; ऐसा प्रभुका खाव है (श्रीवाल्मीकिः)<noinclude></noinclude> p8w9tt5xw2lcrrtn37j1e6x7u3chlqz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२१ 250 193988 664209 2026-07-02T16:17:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664209 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५६ 88000- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 256 कि "कलिकाल में भक्त सन्तों की परीक्षा मत लिया- कीजियेगा ।" श्रीलर्क जी । (v) टीका | कवित्त । परक की कीरति में रांचों नित, सांचो हिये, किये उपदेशहू न छूटै बिष बासना । माता मन्दालसा की बड़ी यह प्रतिज्ञा सुनी “पावे जो उदर मांझ, फिरी गर्भासना || पति को निहोरो ताते रह्यो छोटी कोरो; ताकी लैगए निकासि; मिलि काशी नृप शासना । मुद्रिका उधार, पौ निहारि दत्तात्रेय जू को, भए भवपार करी प्रभु की उपासना ॥९३॥ (६२९-५२६) " निहोरो” = प्रार्थना, विनयः “कोरो" =गोद का लड़का, कोठे का वालक। रांचीग जाता हूं । वार्त्तिक तिलक । श्री पलर्क जीकी माता श्री मन्दालसा जी की कथा पीछे ( पृष्ठ २०४ से २०७ तक में ) लिख पाए हैं । श्री लर्क जीकी कीर्त्ति में मैं सच्चे हृदय से नित्य ही रेंगता हूं। लोगों की विषय भोग वासना, उपदेश किये से भी नहीं छूटती परन्तु श्री रामकृपा से पलर्क जीकी सर्वथा 'छूट गई। सुनिये, श्री लर्क जीकी माता श्री मन्दालसा जी की यह बड़ी भारी दृढ़ प्रतिज्ञा थी कि "जो जीव मेरे 188400-<noinclude></noinclude> 4i7g18scksitpcx9grua328e65j7t4f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२२ 250 193989 664210 2026-07-02T16:17:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664210 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>257 188600- श्रीभक्तमाल सटीक । गर्भ में आवे, उस्को फिर गर्भ में नहीं जाना पड़े अर्थात पासा तृष्णा आदि से छूटके वह मोक्ष पद को प्राप्त हो जावे” । “घढोहि को ? 'यो विषयानुरागः ” “ कोवा विमुक्तिर् ?" “ विषये विरक्तिः" । सो अपनी प्रतिज्ञा उन ने पूर्ण की ही तो सही । कई पुत्रों को उपदेश करके आपने विरक्त जीवन मुक्त कर दिया । जब सबसे छोटा पुत्र श्री मन्दालसा जी के हुपा, तो उनके पति ने आप से बहुत विनय निहोरा किया कि " इस पुत्र को भी उपदेश देकर वि- रागी मत बनादो, इस्को राज्य तथा वंश के निमित्त गृहस्थ रहने दो” । यो, पति के विनय यश उस्को बन में न भेजा । परन्तु पति समेत पाप बन को चलीं और उसी समय एक श्लोक लिख मुद्रिका में रखके पलर्क जी को दे दिया कि तुम्हें जब कोई कष्ट पड़े तो इस्को खोलके देखना । (लोक) संगः सर्वात्मनात्याज्यः यदित्यक्तुं न शवयते । सदुभिरेव प्रकर्तव्यः सत्सङ्गी भव भञ्जनः ॥१॥ न में जापापनेापने ज्येष्ठ पुत्रों से कहा कि " जिसमें मेरी प्रतिज्ञा भंग नहो इस लिये जाके किसी भांति अपने भाई लर्क को भी विरक्त करके प्रभु के चरणों में लगा दो” । पाज्ञा मान, पाके, उन्हेंों ने प्रथम पलर्क को बहुत उपदेश किया परन्तु उपदेश से विषय वासना नहीं छूटी । तब पपने मामू काशीराज को 8600- ३३ २५७<noinclude></noinclude> d072jvtcwnezcq60phwlcdip4xdg36q पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२३ 250 193990 664211 2026-07-02T16:17:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664211 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८ 8800- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । ॥ सेना सहित लाके पुर को घेर लिया | इस पापदा के समय स्पलर्क जी ने मुद्रिका को खोल के देखा तो लिखा पाया कि " संसार के संग को सर्वथा त्याग करना चाहिये पर जो त्याग न सके तो समीचीन महात्माओं का संग करे क्योंकि सत्सङ्ग भवरोग नाशक है " यह विचार श्री अलर्क जी राज को परित्याग कर रात्रि में निकल के श्री दत्तात्रेय जी से मिले । एवं उनके उपदेश से भगवत की उपासना करके मोक्ष पद को प्राप्त हुए ॥ श्री पoर्क जी ने अपनी पांखें निकालके एक बेद पाठी ब्राह्मण को उनके मांगने पर देदी धीं ॥ पलर्कजी एक समय कालंजर के समीप वन में विचरने लगे; ती एक दिव्य सर देखा, जिसके तट में एक मृतक मनुष्य पड़ा था; इतने में दो पिशाच में झगड़ा होने लगा, एक कहताथा कि मैं खांऊंगा, दूसरा कहता था कि मैं । लर्क जीने पूछा क्यों विवाद करते हो ? तब दोनों पिशाच बोले कि वस्तु एकही है और हम दोनों भूखे हैं; उदर कैसे भरे ? श्री अलर्क जीने कहा कि " एक शव को खावे, पर दूसरा मेरी देह को " यह सुन प्रसन्न हो दोनों ने "वरं ब्रूहि" कहा । 258 श्री अलर्क जीने पूछा कि तुम दोनों कौन हो ? ?. तब उसी क्षण, एक श्री विष्णु, दूसरे शिव जी होके<noinclude></noinclude> ncxuf0iumfho9wg5om8pvkjtg8b31lu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२४ 250 193991 664212 2026-07-02T16:17:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664212 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>259 188000- श्री भक्तमाल सटीक २५९ बोले कि "हम विष्णु शिव हैं" पत: पर, स्तुति कर उनसे यह वर मांगा कि "सकल विश्व सुखी रहे, किसी वस्तु का कोई दुःखी न रहे, " यही घर दीजिये । इस पर दोनों ने प्राज्ञा की कि यह नहीं होता तुझ कर्म सब के पृथक २ हैं; परन्तु हमारी कृपा से प यह सामर्थ्य में रहेगा कि जिस वाञ्छा से तेरे पास कोई पावेगा तू पूरी कर सकेगा; अन्त में तुझे मोक्ष प्राप्त होगा " । इस प्रकार श्रीविष्णु जी और शिव जी,पलर्क जी की परीक्षा ले बरदे, निज निज स्थल को चले गए | (छप्पै । तिन चरण धूरि मो भूरि सिर, जेजे हरि माया तरे ॥ रिभु, इक्ष्वाक रु ऐल, गांधि, रघु, रै, गै, शुचि शतधन्वा । अमूरति अरु रंति, उतंग, भूरि, देवल, बैवस्वत मन्वा ॥ नहुष, जजाति, दिलीप, पूरु, यदु, गुह, मान्धाता । पिप्पल, निमि, भरद्वाज, दक्ष, सभंग, सँघाता ॥ संजय, समीक, उत्तानपाद, जाग्यवल्क, जस जग भरे । तिन चरण धूरि मी भूरि सिर, जेजे हरि माया तरे ॥ ॥ (<noinclude></noinclude> nogcrkp1rj7m5gw8pdxnuxqgrjn8bcs पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२५ 250 193992 664213 2026-07-02T16:18:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664213 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६० श्रीभक्तिसुधाविन्दु स्वाद । “ऐड " =हला के पुत्र पुरुरवा । "सभंग सँघाता"= श्रीसभंग प्रभृति दमन के मुनिवृन्द । वार्त्तिक तिलक | 260 उन श्री भगवद्भक्तों के चरणों की घूर बहुतसी बहुमान्यपूर्वक मेरे सीस पर है, कि जो जो भगवान् की माया के पार होगए हैं, और उन पवितात्मानों के सुयश सम्पूर्ण जगत में भर रहे हैं ॥ १ श्री ऋभु जी २ श्री इक्ष्वाकु जी ३ श्री ऐल ( पुरुरवा) जी ४ श्री गाधि जी ५ श्री रघु जी महाराज ६ श्री रय जी ● श्री गय जी ८ श्री शतधन्वा जी ९ श्री अमूरति जी १० श्री रन्तिदेव जी १६ श्री दिलीप जी १७ श्री पूरुजी १८ श्री दु जी १९ श्री गुह (निषाद) जी २० श्री मान्धाता जी २९ श्री पिप्पलायन जी २२ श्री निमि जी २३ श्री भरद्वाज जी २४ श्री दक्ष जी २५ श्री शरभंग जो २६ श्री संजय जी २० श्री समीक जी मनु जी २८ श्री उत्तानपद जी ११ श्री उत्तक जी १२ श्री देवल जी १३ श्री वैवस्वत १४ श्री नहुष जी १५ श्री ययाति जी २९ श्री याज्ञवल्क्य जी (३०) इत्यादि, इत्यादि ।<noinclude></noinclude> 6ns98dkmvcajmmiatagxu7fvooa45do पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२६ 250 193993 664214 2026-07-02T16:18:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664214 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>261 600- श्रीमत्क्तमाल सटीक । • २६१ (लोक) श्वाकुरेल मुचुकुन्द विदेह गाधि रच्यम्बरीष सगरा गय नाहु- वाद्याः। सान्धा अलर्क शतधन्वनु रन्तिदेवा देवव्रतो बलिरमूर्त रयो दिलोपः ॥१ सौभर्युतं शिवि देवल पिप्पलाद सारस्वतोद्वव पराशर भूरिषेणः । येऽन्ये विभीषण इमदुपेन्द्र दत्त पार्घार्ष्टि येण विदुर श्रुतिदेव वर्याः ||२|| ते वे विदन्त्यति तरंति च देव मायां की शूद्र हूण शवरा अपि पाथ- जीवाः । यद्यद्भुत कम परायण शील शिक्षा स्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा मे ॥३॥ ( श्रीमद्भागवते ) श्रीरन्तिदेव जी । (21) टीका | कवित्त । हो ! तीदेव नृप सन्त दुसकंत बंस पतिही प्रशंस सो प्रकास वृत्ति लई है। भूखे को न देखिसके, सो उठाइ देत, नेति नहिं करें भूखे देह छीन भई है ॥ चालीस-ओ-आठ दिन पाछे जल पत्र आयो, दियो विप्र शूद्र नीच श्वान, यह नई है । हरि ही निहारे उन मांझ, तब आए प्रभु, भाए, भोग, भक्ति छई है ॥९४॥ (६२९-५३५) जग दुख जिते " आकाश वृत्ति " ऐसी वृत्ति कि जीविका के अर्थ कर्म चेष्टा शून्य; ऐसी वृति कि जो कुछ अमासत अकस्मात (विन प्रबन्ध जैसे आ- काश से जल) आजावे, उसी को लेना । "हीम" = सीज, सिन, दुर्बल। वार्षिक तिलक | राजा दुष्यन्त के वंश में महाराज श्रीरन्तिदेव जी पति व प्रशंसनीय सन्त हुए, कि जिन्होंने पा- काश वृत्ति जीविका ग्रहण की। तिस्पर भी उस पकाश वृत्ति में भी जो कुछ भोजन पा जाता था सो भी भूखों को दे दिया करते थे क्योंकि किसी को<noinclude></noinclude> qzqiagkn4i6lb6m3wpzpyf028eh7o7z पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२७ 250 193994 664215 2026-07-02T16:18:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664215 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६२ श्रीभक्तिसुधाषिन्दु स्वाद । भूखा नहीं देख सकते थे। अपने लिये यत्न वा संचय नहीं करते थे पतएव भूख से शरीर प्रति दुर्बल हो गया । एक बेर तालीस उपवास हो चुकने पर पन जल हरि कृपा से पाया । सो, प्रथम एक भूखे ब्रा- ह्मण को खिलाया; फिर उसके पीछे एक भूखे शूद्र को दिया; पुनः एक नीच को, और फिर शेष भूखे वान को खिला पिला दिया । यह इनकी कृपालुता तथा सम दृष्टि की नवीन रीति है, क्योंकि सबों में सर्वात्मा हरि ही को देखते थे। जब जल पर्य्यन्त भी दे दिया और पाप भूखे वरंच प्यासे रह गए, तब इनकी दया और सम दृष्टि देख के प्रभु ने पाके दर्शन दिया परम कृतार्थ किया। प्रभु को प्रसन्न पा यह बर मांगा कि सब जीव मात्र का दुःख में ही भोगूं और वे सब के सब दुःखरहित हो जाँय ॥ प्रभु पति प्रसन्न हो उनको स्त्री पुत्र तथा पुत्र बधूतीनो सहित विमान पर बैठाके निज लोक को ले गऐ ॥ ऐसे विलक्षण सन्त थे तब तो उनकी भक्ति की महिमा जग में छा रही है ॥ " दुखवंत" नाम दुष्यन्त जिनकी श्री शकुन्तला संग्रक, प्रसिद्ध है ॥ श्रीगुह निषाद जी | जिस समय श्रीभरत जी महारज प्रभु के दरशन 262<noinclude></noinclude> g8c07tr79tdxtv5pma3k9ss975dva9w पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२८ 250 193995 664216 2026-07-02T16:18:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664216 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>+968 श्रीभक्तमाल सटीक । २६२ को चित्रकूट जा रहे थे उस समय कुछ और संदेह होने के कारण, श्रीनिषाद जी ने पहिले यह चाहा था कि यद्यपि श्रीभरत जी की सेना अपार है। तथापि अपनी प्रति पल्प सेना सहित अपने को श्रीसीताराम हेतु न्योछावर कर देना चाहिये सो यह सं- कल्पकर लड़ने के लिये इच्छा की थी। किंतु जब प्यारे भरत जी को मन कर्म बचन से श्रीसीताराम भक्त पाया, तब श्रीभरत जी की सेवा की। पुन: जिस समय श्री सर्कार रघुवंश मणि ध्यानंद कंद, लंका पत्तन का विजय हस्त गत कर, श्रीभरद्वाज जी के पाश्रम पहुँचे, उस क्षण निज दूत श्रीपवनसुत जी को वध श्रीभरत जी की चेष्टा देखने को भेजा पौर निषाद जी से भी श्रीमान् अनंत ऐश्वर्य ने अपना सुखागमन निवेदन करने की श्रीहनुमान जी की पाज्ञ दी । उसी समय “ द्रुमिल राक्षस " को जो श्रीप्रयोध्या- निवासी जनों को दुःख देने को प्राप्त था, निषाद राज ने शृंगवेरपुरही में यह विचार रोक डाला, कि "यह दुष्ट स्वामिपुर को न जाने पावै, बरन बीचही में इस को यमद्वार दिखलाऊँ" । तीन सहस्र धनुर्धरों को साथ ले, "डुमिल" से श्रीनिषाद जी तीन दिन से युद्ध कर रहे थे; उस समय तक निषादराज द्रुमिल की सात खहर सेना मार चुके थे, शेष तीन सइख सेना श्री; परन्तु निषाद राज बड़े थके तथा कुछ हत पराक्रम. 8600-<noinclude></noinclude> jqc5k1ke33m1zln75e87cckp2h85rn8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३२९ 250 193996 664217 2026-07-02T16:18:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664217 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-9008 600- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । प्रतीयमान होते थे । वहीं उसी क्षण पहुंचतेही श्री- रामदूत जी ने हांक दिया, कि जिसमें निषाद राज का बल संबर्द्धन ही " मैं श्रीरामदूत पहुंच गया । " यह हांक सुनाकर तीन सहल राक्षसों को लागूल में लपेट वायु मण्डल को पहुँचा दिया; और निषाद राज जी ने द्रुमिल के साथ मल्लयुद्ध करिके उस्को पृथ्वी पटक, उसके हृदय में शस्त्र चुभा दिया, जिस्से द्रुमिल का प्राणान्त होगया | इसके अनन्तर दोनों श्रीराम प्रेमी परस्पर मिले; और निषाद राज से स्वामि प्रा- गमन जना करके श्रीमारुति जी भरत जी के समीप चले गये | श्रीनिषाद जी श्रीभरद्वाज जी के प्राश्रम को प्राणनाथ से मिलने चले ॥ ( छन्द ) पदकमलधोइ चढाइ नाव न नाथ उतराई नहीं । मोहि राम ! रोउरि पान दसरथसपथ सब सांची कहीं ॥ रु तीर मारहिं लपन पै जब लगिन पांव पखारिहौं । तब लगिन तुलसीदास नाथ कृपालु पारु उतारिहीं ॥१॥ (वित्त) प्रमुख पाइके बुलाइ बाल घरनीको, यन्दिकै चरण चहुंदिशि बैठे घेरि घेरि । छोटोसो कठोसी भरि पनि पानी गंगा जी को, धोइ पाय पियत पुनीत बारि फेरि फेरि ॥ तुलसी सराहे ताको भाग सानुराग, सुर बरषि सुमन जय जयति कहें टेरि टेरि ॥१॥ 18600- 26+<noinclude></noinclude> hvnd02zkptl8ifwg345uvsdhmqnn2ij पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३० 250 193997 664218 2026-07-02T16:18:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664218 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्तमाल सटीक । २६५ बिबिध सनेहसानी बानी सयानी सुनि, हँसे राघ- जानकी लषनतन हेरिहेरि ॥१॥ (दो०) पदपखारि, जलपान करि, झापु सहित परि- वार । पितर पारुकरि प्रभुहिं पुनि, मुदित गयउलेइपार १ (v) टोका | कवित्त । भोलन को राजा " गुह " राम अभिराम प्रीति भयो बन बास, मिल्यो मारग में माइकै । करो यह राज जू विराजि सुख दीजै मोको, बोले चैनसाज तज्यों प्राज्ञापितु पाइकै ॥ दारुण वियोग उपकुलात दृग अनुपात पाछे लोहु जात, वह सके कौन गाइकै । रहे नैन मंदि “ रघुनाथ बिन देखों कहा ? " पहा ! प्रेम रीति, मेरे हिये रही छाइके ॥६५॥ (६२६-५३४) 66 “चैनसाज”=राज्य । “जात” = बहता था, भरता था, निकलताथा । वार्त्तिक तिलक | सम्पूर्ण बनबासी भिल्लों के राजा शृङ्गबेरपुर बासी श्रीहनिषादराज जी की, प्राणनाथ शोभाधाम श्री - रामचन्द्र कृपालु जी से अतिशय अभिराम प्रीति थी, कि जिनको प्राणनाथ यात्म समान सखा मानते कहते थे । सो जब श्रीप्रभु बन बिहार मिसु सुरमुनि जनों का दुःख छुड़ाने के लिये चलके, श्रीगंगाकूल में शृङ्गवेरपुर के समीप पाए; तब निषाद जी श्रीप्रभु का बनगवन सुन, पगों से चलके, समाज सहित प्राण- नाथ से मिले । प्रभु ने हृदय से लगा के अपने परम ।<noinclude></noinclude> 3ubbbk4lqi147jyup1skplrwvezqzp8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३१ 250 193998 664219 2026-07-02T16:19:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664219 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६६ श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । समीप बैठा लिया । तब निषादराज हाथ जोड़ बोले कि " हे, सुखरास रघुवीर जी ! चलिये, यह राज्य आपका ही है, यहीं विराज, राज्य करते हुए, मुझे सुख दीजिये, मैं पापका सेवक हूं, आप मेरे स्वामी हैं, में सब प्रकार से सेवा करूंगा । " यह सुन, प्राणेश्वर श्रीरघुनन्दन जी ने उत्तर दिया कि " हे सखे ! इस बात को क्या कहना, है आपका राज्य तथा पाप मेरे हैं ही, परन्तु मैं तो श्रीपिता जी की आज्ञा से राज्य भोग सुख सामग्री त्योग के चला हूं चौदह वर्ष पर्य्यन्त बन ही में वसूंगा "। इतना सुन्ते ही श्रीनिषादराज विहुल होगए । तब प्राणपति प्रभु बहुत प्रकार से इनको समझा के श्री- चित्रकूट में जा बसे । " ( दो०) गमन समय अंचल गह्यो, छाड़न को सुजान। प्राण पियारे ! प्रथमही अंचल तजौं कि प्रान ? यहां श्रीनिषादराज जी अपने प्राणप्रिय मित्र के दारुणा वियोग से अत्यन्त व्याकुल हुए; पांखों पशुपति की धारा निरन्तर बहने लगी; यहां तक कि कुछ दिन पीछे नेत्रों से रक्त टपकने लगा । हा ! वह दशा कौन कह सकता है ! प्रेमनिधि निषाद जी अपनी पांखें मूंदेही रहा करते थे, इस विचार से कि " मित्रवर प्राण प्रिय श्रीरघुनाथ जी के बिना और क्या देखूं ! " 266<noinclude></noinclude> g2ipapkmq2u7ujxv5s03jjyesw5zc1h पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३२ 250 193999 664220 2026-07-02T16:19:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664220 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>267 श्रीमतमाल सटीक | अहा ! यह इनके परम प्रेम की रीति मेरे हृदय छरही है मुख से कहते नहीं बनती ॥ २६७ (दो) “ जासु संग सुख लहि रह्यो, सारे दुख बि- सराइ । ता प्रियतम के विरह में कुटत न यह तनु हाइ !” ( सवैमा ) प्रीति की रीति कछू नहिं राखत जाति न पांति नहीं कुल गारी । प्रेम के नेम कहूं नहिँ दीसत लाज म कानि, लग्यो सब खारो ॥ लीन भयो हरि सौं - भ्यन्तर, आठहु याम रहे मतवारी । "सुन्दर" कोउ न जान सके यह प्रेम के गांव की पैड़ोहि न्यारो ॥ (पद) सदनमोरे, पावी हो बांके यार ! दशरथ राज कुमार ! कित गयो ? हाय ! बिहाय सेज को, करद करेजे मार ॥ हाय ! निहारत डगर तिहारी होइ गई भिनुसार । कित जाऊं ? पाऊं कहँ तुमको ? जग मो को अँधियार ॥ तुम्हरे कारन, हम सब त्यागा, लाज का घर बार । बिरह बारि बिच, बूढ़त तुम विनु ! कौन लगे है पार ? सुधि लीजे; दीजे देखाय छबि; प्री तम प्राण आधार ! जो नहिँ हो, मैं मरि जइहौं, " जीत" पुकार पुकार (ii) टोका । कबित्त । चौदह बरस पाछे पाए रघुनाथ नाथ; साथ के जे भी कहें “आए प्रभु देखिये " । बोल्यो “प्रयपाऊँ sita न प्रतीति क्याँहूं प्रीति करि मिले राम, 18000-<noinclude></noinclude> pt860cxg0ua5gd85qyk24w4sbojvjxr पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३३ 250 194000 664221 2026-07-02T16:19:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664221 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>13000- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । कहि “ मोको पेखिये | परसि पिछाने लपटाने सुख सागर समाने प्राण पाये, मानो भाल भाग लेखिये । प्रेम की जू बात क्योंहूं बानी में समात नाहिं प्रति कुलात कहो कैसेकै विशेषिये ॥९६॥ (६२९-५३३) " पेखिये "देखिये । “ पिलाने "=पहिचाने। क्योंहूं "=किसी भांति से भी । वार्त्तिक तिलक । इस प्रकार चौदह वर्ष व्यतीत हुए पर निषाद राज के नाथ श्रीरघुनाथ जी पा, पुष्पक विमान से उतर, श्री निषादराज से मिलने को पधारे; सो देख, इनके साथ के भिल्लांने दौड़ के श्रीनिषाद जी से कहा कि "आप के प्रभु पाए, पांखें खोलके दर्शन कीजिये । " तब आप बोले कि " मैं प्राणनाथ प्रभु को कहां पासको हूं, मुझे किसी प्रकार से भी प्रतीति नहीं होती ” । इतने में स्वयं प्राणप्रिय मित्रवर जी प्रा, हाथों से उनको उठा, सप्रेम हृदय में लगा, कहने लगे कि " सखे ! नयन उधार मुझको देखो ॥ श्रीप्रभु के वचनामृत सुन, तथा दिव्य मङ्गल विग्रह का सुखद स्पर्श पहिचान, ये भली भाँति से लपट गए । श्रीनिषादराज से मिलने का सुख श्रीभक्तवत्सल कृपालु जी को श्रीभरतजी के ही मिलन सुख के समान हुमा; पर श्रीनिषाद राज जिस असीम श्रानन्द- 188€.00- 268<noinclude></noinclude> nd3b8msw7ckjf5id19ag63m304omgbd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३४ 250 194001 664222 2026-07-02T16:19:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664222 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>269 श्रीमत्क्तमाल सटीक । २६ -909 सिन्धु में मग्न हुए, सो सर्वधा प्रगाध और अपारही है। मृतक शरीर प्राण जनु भेटे " पर ये अपने भाल में लिखे सुन्दर भाग्य का पूर्ण उदय जानके घ- न्यतर कृतार्थ हुए ॥ प्रेम की बातें वाणी में किसी प्रकार समातों ही नहीं, प्रीति की वार्त्ता वर्णन करने के लिये बुद्धि नी अतिशय कुलाती है परन्तु किस विशेषण से उसकी व्याख्या की जासवे ॥ (दो०) प्रेम न बारी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय । माथी बदले मिलत है, भावे सो लेजाय ॥१॥ पांडियन कोईं पड़ी, पन्थ निहारि निहारि । जीभड़िया छाले पड़े, नाम पुकारि पुकारि ॥२॥ छनक पढ़ें, छन ऊतरे, सो तो प्रेम न होइ । पाठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावें सोइ ॥३॥ श्रीऋभु जी । श्रीऋभु जी ब्राह्मण के बालक थे एक दिन श्री- उमामहेश्वर जी के मन्दिर हो के चले जा रहे थे, शिव लिङ्ग की बहुत चिकना सुन्दर देख चित्त में पूजन की श्रद्धा हुई; सो एक फूल ( जो उस समय इनके हाथ में था ) उसको उस विग्रह पर रख के बोले कि " नमः शिवायै च नमः शिवाय " । प्राशु- सोष मोटरढरन महादानी श्रीगिरिजावर जी के मन्दिर से वाकी हुई कि “घरमांग" । 188400-<noinclude></noinclude> ff8tti1qyn5lzqfrk9e3300cr0dujfa पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३५ 250 194002 664223 2026-07-02T16:19:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664223 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७० श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । इन ने कर जोड़ के प्रार्थना की कि "महाप्रभो ! आप से भी बड़ा जो कोई परम पुरुष हो, आप कृपा करके उनका दर्शन इस अबोध बालक को अपनी कृपा से करा दीजिये " । (स०) देवनके शिरदेव बिराजत ईश्वरके शिर ईश्वर कहिये । लालनके शिर लाल निरंतर खूबनके शिर खूबनलहिये || पाकनके शिर पाक शिरोमणि देख बि चार वही दृढ़ गहिये । सुन्दर एक सदा शिर ऊपर और कलू हमको नहिं चहिये ॥ इस भारी वर की याचना से श्री गिरजापति कुछ विचारने लगे। इतने ही में, अपने भक्तराज महाभागवत परमप्रिय देव देव महादेव के वचन के पूरा करने के हेतु, श्रीहरि स्वयं वहां प्रगट होगये । करुणासागर भक्त- वत्सल त्रिभुवनपति जगदाधार शोभाधाम को देख- तेही, श्रीशिवजी भी प्रत्यक्ष हो, प्रेम और हर्ष में च- कित होते हुये द्विजबालक (श्रीऋभु जी) से बोले कि " वत्स ! ले जिन दीनबन्धु ब्रह्मण्यदेव जगतत्राता प्रा- श्वर को तू ढूढ़ता था, सो तेरे सुकृतियों के फल कारणरहित कृपालु यही हैं; तेरे भाग्य धन्य, तू धन्य, तेरी माता और तेरे गुरु धन्य " ॥ ( सवैया) होत बिनोद जिती अभियंतर सो सुख आप में पापही पैये । बाहिर क्यों उमग्यो पुनिभावत कंठ ते 270<noinclude></noinclude> 7jkl5jxfnfqywuvjsxlus2idgtmue4w पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३६ 250 194003 664224 2026-07-02T16:20:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664224 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>271 श्रीभक्तमाल सटीक । २०१ सुन्दर फेर पठेये । स्वाद निवेर निवेखो न जात मनो गुड़ गूंगहि ज्यौं नित खैये । क्या कहिये कहते न बने क जो कहिये कहतेही लजैये ॥ श्रीऋभुजी को भक्ति वरदान देके दोनों अन्तर्धान होगये ॥ · श्री इक्ष्वाकु जी । श्रीसूर्यवंश में महाराज श्रीइक्ष्वाकु जी बड़े ही प्रतापी हुये पापकी राजधानी यही साकेतपुरी अर्थात् श्रीप्रयोध्या जी थी झाप तप वल से शरीर त्याग कर परमधाम को चलेगये, आपने तप करके जब बरदान मांगा था तो, “मुस- काइ कह्यो हरि तेरेइ बंशमें खेलिहौं झौध के अंगन में " पुराणों में पापकी विचित्र कथा है। उसके लिखने की यहां कोई आवश्यता नहीं देखी। श्रीसेल (पुरूरवा) जी राजा पुरूरवाही का नाम ऐल है क्योंकि उनकी माता इला जी थीं, और पिता श्रीबुध जी श्रीइला जी की कथा पुराणो मैं विचित्र लिखी है जिसको संक्षिप्त वार्ता यह है कि एक महीना यह खी रहती थी और दूसरे महीने में पुरुष अर्थात् राजा सुयुम्न, पस्तु । सोई इलाजी के पुत्र श्रीपुरूरवा जी उर्वशी अप्सरा<noinclude></noinclude> tbai5ielaa8fc73966vfrfqrbjong8s पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३७ 250 194004 664225 2026-07-02T16:20:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664225 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२ BG00-- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । 270 के संग और प्रेम में बहुत दिन तक मृत्युलोक और गन्धर्वलोक में रहे । पुन: जब पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में पाये तो पिछली बातें स्मरण होने से इनकी बड़ा विराग हुवा जिस विराग का फल श्रीहरिपद पनुराग पाकर पाप हरि कृपा से बैकुण्ठ को गये । श्री गाधि जी । । राजा श्रीगाधि जी के ही पुत्र श्रीविश्वामित्र जी हैं जिनने साक्षात् प्रभु को अपनी वात्सल्य भक्ति से प्रसन्न किया कि जिनको प्रभु ने श्रीवशिष्ठ जी के समान आदर दिया, यह कथा श्री मानस रामायण जी में सब . प्रेमियों ने देखी ही है ॥ गाधिजी की बेटी के पुत्र श्री यमदग्नि जी हैं ॥ राजा गाधि बड़े भक्तिमान हुये ॥ -:०:- महाराज श्रीरघु जी । श्रीध्या जी के महाराज श्रीरघु जी का प्रताप atest भुवन में छाया हुआ था ॥ एक समय उनकी महारानी को देख एक ब्राह्मण वैसीही स्त्री पाने के लिये श्रीशिव जी को अपना मस्तक अर्पण कर देना चाहा। यह वार्त्ता सुन के महाराज ने अपनी स्त्री राज समेत उस ब्राह्मण देवता को दे दी और उसी विप्र के मनोरथ हेतु इन्द्र ब्रह्मा तथा स्वयं 14:00-<noinclude></noinclude> 5yrjixh0n6ajdmqj90w9d72rbxi4rut पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३८ 250 194005 664226 2026-07-02T16:20:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664226 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>278 श्रीभक्तमाल सटीक । २७३ श्रीकुण्ठनाथ से बहुत विनय प्रार्थना की कि जिससे प्रसन्न होके उस ब्राह्मण ने वैकुण्ठ में निवास पाया । आप ऐसे प्रतापी हुये कि झापही के नाम पर वह वंश आज तक [रघुवंश के नाम से] प्रसिद्ध है और भाग्य की बढ़ाई इससे अधिक और क्या कि श्रीसा- केत विहारी आपही के वंश में पाके प्रगट हुये । श्रीरय जी । श्रीरय जी राजा पुरुरवा के पुत्र थे ( उर्वशी अप्सरा जिनकी माता थी ) (१) जय (२) विजय (३) र (४) (५) श्रुतायु (६) सत्यायु ये छः सहोदर भ्राता थे । " रथ" इन में बड़े प्रतापी थे ॥ -:०:- श्रीगय जी । महाराज श्रीप्रियव्रत जी के कुल में राजा " नक्त " के पुत्र श्रीति जी से हुये। एक बार यज्ञ में प्रापने ऐसा मनोरथ किया कि जिस प्रकार से देवता लोगों ने कृपा कर के प्रत्यक्ष हो के अपना २ भाग लिया, वैसे प्रभु भी अनुग्रह करके प्रगट हों, पर जब ऐसा न हुआ तो राजा ने पन जल त्याग दिया और प्रभु की प्र- तीक्षा करते रहे । सच्चे व्रत पर प्रेम वाले पर हमारे प्रभु ने कब कृपा नहीं की है ? करुणाकर भक्तवत्सल हरि मख में ही तो पहुंचे। 1600- ३५<noinclude></noinclude> 1kz5mhy0uaebekdkz0itdj4223875a9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३३९ 250 194006 664227 2026-07-02T16:20:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664227 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७४ श्रीभक्त सुधाबिन्दु स्वाद । यज्ञ पूर्ण कर के राजा वद्रिकाश्रम जाय योगसे शरीर तज प्रभु के लोक में जा पहुंचे और उनकी धर्मपत्नी भी सती होकर पति से जा मिली । श्रीसतधन्वा जी । सतधन्वां की कथा (समन्तक मणि के सम्बन्ध में) श्रीमत में विस्तार से वर्णित है । इनको श्रीकृष्ण भगवान ने मारा और मुक्ति दी । श्रीउतंक जी । श्रीउसंग (उतङ्क) जी डण्डकबन बासी थे । उनके गुरू, स्वामी श्रीमतंग ऋषिजी, जय श्रीराम धाम जाने लगे तो उनको पांज्ञा दी कि तुम इसी बन में भजन करो । यहीं श्रीसीतानांथ साकेत पति शार्ङ्गधर वेंगे और कृपा करके तुम को दर्शन देंगे सी साही हु श्रीदेवल जी; श्रीमूर्त जी । श्रीदेवल जी, जो ब्राह्मण पर मौनी थे, और श्री- हरिदास ( अमूर्त ) जी, ये दोनों वचपनही से त्यागी बड़भागी और रामानुरागी हुये । श्री नहुष जी । एक नहुष श्रीसूर्य्यवंश में हुये हैं और दूसरे नहुष 274<noinclude></noinclude> patzkyyqf687zeml8jehbxrxqkpoqws पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४० 250 194007 664228 2026-07-02T16:20:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664228 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>275 श्रीभक्तमाल सटीक । । २७५ श्रीचन्द्रवंश में । श्रीसूर्य्यवंशी नहुष जी श्रोप्रयोध्या जी के राजा थे। जब गौतम जी के शाप से वा ब्रह्म हत्या के भय से इन्द्र मशक सरिस लघु होके मान- सरोवर के कंज नाल में जा छिपे तब नहुष जी देवतां के राजा इन्द्र के स्थान पर बिठाये गये। वह उस समय अपने यान को मुनियों के कन्धे पर उठवा के इन्द्रानी के पास चला | उन ब्राह्मणों के शाप से सर्प होकर मृत्युलोक में गिरा और एक गिरि कन्दरा में काल वितानेगा | भागवश श्रीयुधिष्ठिर जी उधर से जा निकले उनके पुण्य प्रभाव से शापं से उधार होके परम धाम को पाया । श्रीययाति जी । श्रीनाहुषजी अर्थात् श्रीनहुष जी के पुत्र श्रीययाति जी, पाखेट को बनमें गये वहां श्रीशुक्राचार्य की बेटी देवजानी से बहुत बात चीत हुई; संक्षेप यह कि शुक्राचार्य जी ने देवजानी का विवाह राजा ययाति से करदिया | उनसे दो लड़केहुये । श्रीशुक्राचार्य जी के शाप से बृद्ध हो गये, फिर अपने पुत्र की सहायता से ध्पापने युवावस्था पाई, पन्त को घर छोड़ बन में गये । Boot निदान भगवत भजन के प्रभाव से परम धाम पाया ।<noinclude></noinclude> l6bwxwgj5l4tjidag59r5lbtgbx80qp पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४१ 250 194008 664229 2026-07-02T16:20:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664229 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७६ 88000 श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । श्रीदिलीप जी । श्रीदिलीप जी सातो द्वीप के राजा थे; प्राप की राजधानी श्रीप्रयोध्या जी थी । एक दिन रावण विप्रवेष बनाके प्रांप के पास पहुंचा, उस समय महाराज पूजा कर रहे थे । 276 एक कुश पोर किंचित जल दक्षिण दिशा की ओर फेंका; यह देख रावण को संदेह हुआ और उसने पूछा कि आपने यह क्या किया ? महाराज ने उत्तर दिया किन में गायें चर रही थीं, उनको सिंह ने पकड़ना चाहा था । इसी लिये मैंने मंत्रित कर के वह दण फेंका है, सो उस घाण ने बाघ को मार के गायों की रक्षा की और लंका में जाके रावण का घर जलाने लगा इस लिये उसके पीछे जल छोड़ दिया कि जिसने वह पाग बुझा दी है। यह सुनकर रावण झटपट चलदिया और जाकर देखा तो पाप की सब बातें ठीक पाईं और सा तथा शंका में डूबके फिर कभी यहां (श्रीप्रयोध्या जी) पाने का नाम नलिया वरन् महाराज दिलीप के नाम से डरा करता था । reat महाराज दिलीप जी ने अपने पुत्र श्रीभगीरथ जी को राज देकर वनजाय श्रीगंगा जी के हेतु तप करते २ तन तज दिया । पाप का मनोरथ श्रीभगीरथ जी ने पूरन किया कि जिनकी कथा पृष्ट २३२ में लिखी जा चुकी है।<noinclude></noinclude> awrjggnk5xtyffrzlethz42pd4akbmd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४२ 250 194009 664230 2026-07-02T16:21:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664230 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>277 88800- श्रीमरुमाल सटीक । श्रीयदु जी । २०७: श्रदु जी, राजा श्री ययाति के पुत्र थे देवजानी के गर्भ से । श्रीदत्तात्रय जी महाराज ने कृपा कर के राजायदु के यहां पाकर दर्शन दिया और इनके सतसङ्ग से राजा- यदु को विवेक उत्पन्न हुपा पौर राजतज बन में जा भगवत भजन कर परम धाम को गये । पापही के वंश में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र प्रगट हुये थे । (१) श्री पुरुषोत्तम भग- श्री वान् के (२) श्री ब्रह्माजी; यदु उनके (३) श्री त्रिजी; ययाति जिनके (8) श्री चन्द्रजी; नहुष जिनके (५) श्री बुधजी; पायु जिनके (६) श्री पुरूरवा पुरूरवा जी; जिनके (७) पायु; बुध जिनके (८) श्री नहुषजी; चन्द्र जिनके (९) श्री यातिजी; (१९) उनके पुत्र श्री यदु जी और श्री " पुरु" जी थे पत्रि ब्रह्मा 00000000000000 पुरुषोत्तम<noinclude></noinclude> ppl9fspkmd7a68yc3b7ozy28559ekxt पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४३ 250 194010 664231 2026-07-02T16:21:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664231 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>၃ श्रीभक्तिसुघाबिन्दु स्वाद । श्रीमानधाता जी । श्रीमानधाता जी श्रीपयोध्या जी के राजा घड़े प्रतापी और धम्मात्मा थे। श्री " सौमरी " ऋषि ने आप से मांगा कि " मुझे अपनी एक कन्या दीजिये, ” राजा ने उत्तर दिया कि " बहुत अच्छा, मेरी पचासी कन्याओं में से जो आप को बरे, पाप उसको लेजाइये मुनि को देख के सबही ने उनको बरा; तब राजा ने पचासी कन्यां मुनि को दान कर दीं । श्रीविदेहनिमि जी । 278 महाराज श्री " निमि " जी विदेह ने जिनकी रोज धानी श्रीमिथिलापुरी थी, यज्ञ करना चाहा; उसी समय उनके पुरोहित श्री १०८ वशिष्ठ जी महाराज को श्रीइन्द्र जी ने बोलालिया । जब महोमुनीश्वर श्रीबशिष्ठ जी इन्द्रलोक से लौट आये, तब देखा कि राजा तो गौतम जी से यज्ञ करोरहे हैं; क्रोध में पाके राजा को शाप दिया कि तू विदेह हो जो; राजा ने तू भी वशिष्ठ जी को शापदिया कि आप भी विदेह हो जाइये। यह देख श्रीब्रह्मा जी ने वशिष्ट जी को देह (शरीर) दिया; और राजा को यह आशीष कि म्हारा बास सब की मांखों की पलकों पर रहे " ! 'तु- तब से वहां के राजा " विढेह" कहलाने लगे ।<noinclude></noinclude> e8hve90kvwpmfox3mpmobgewpqw28m8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४४ 250 194011 664232 2026-07-02T16:21:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664232 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>279 श्रीमतमाल सटीक । २७९ महाराज श्रीनिमि जी के पास एकदिन नवो योगेश्वर कृपाकर पहुंचे महाराज ने पोदर सत्कार पूजा के उपरान्त, आप से कई प्रश्न पूछे; और, नव योगी- श्वरों से एक २ करके सबका उत्तर पाया; कि जो विस्तार पूर्व्यक श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में है । उस्की वयही पढ़ना सुखा चाहिये । पृष्ट २२९ श्रीनिमि जी महाराज एक अंश से तो सब की पलकों पर बसते हैं, पर एक रूप से श्रीसाकेत मे विराजते हैं। श्रीभरद्वाज जी । महामुनि श्री " भरद्वाज" जी का यश श्री "मानस रामचरित्र में प्रसिद्ध है, कि जिनके ही मनोरम प्रश्न पर श्री " याज्ञवल्क" जी ने परम हित कारिणी कथा प्रगट की पाप की महिमा कहांतक वर्णन कीजावे कि जिनके अतिथि श्रीराम प्राणप्रिय " भरत जी हुये, पुनः स्वयं प्रभु श्रीजनकनन्दिनी जी और लाल लोड़ले श्रीषण जी समेत बड़े प्रेम से इनके आश्रम में लाए। श्रीतीर्थराज प्रयाग में आप का पावन आश्रम पाज भी प्रसिद्ध है। श्रीदक्ष जी । दक्ष जी ने एक पहाड़ पर भजन किया, भगवत ने प्रसन्न होकर दर्शन दे यह आज्ञा की कि " पहिले<noinclude></noinclude> hyzwq5zfwd1g24n82k3pqs7mc5jhh8f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४५ 250 194012 664233 2026-07-02T16:21:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664233 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>၃၀ 3000- गृह में श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । रह के भोग विलास और प्रजा उत्पत्ति करलो तब मेरे धाम में आना " । '280 श्रीदक्ष जी के, कई वेर, दश दश सहल बैटे हुये पर इनने सब को सृष्टि हेतु तप करने के लिये " नारायण सर" पर भेजा; परन्तु, "श्रीनारद उपदे- पाई, ते पुनि भवन न देखेउजाई ” । तब, श्रीब्रह्मा जी के उपदेश से श्रीदक्ष जी ने सांठ कन्यायें उत्पन्न का; जिनकी कथा श्रीमद्भगवत में विस्तार पूर्वक है, अस्तु । अन्ततः, श्री हरिहर कृपा से श्रीदक्ष जी ने परम गति पाई । श्रीपुरु जी । श्रीपुरु" जी श्रीयदु जी के भाई थे और भगवद्भक्त।। श्रीभूरिन जी । श्रीभूरिन जी बड़े भक्त थे ॥ श्रीवैवस्वतमनु जी । चौदह में प्रथम श्रीस्वायंभू मनु जी हैं कि जिनकी धर्मपत्नी श्रीसतरूपा जी हैं कि जिनकी कथा पृष्ठ ८६ में लिखी जा चुकी है । शेष तेरह मनु और हैं; 880-<noinclude></noinclude> bo5daw9d5wr5g2y4yzt8ymk0694zjml पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४६ 250 194013 664234 2026-07-02T16:21:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664234 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>281 श्रीभक्तमाल सटीक 1. मनु और मन्वन्तर । पथ चौदहो मनु के नाम- १ श्रीस्वायम्भू मनु जी | २ स्वारोचिष मनु ३ उत्तम मनु ४ तामस मनु ५ रैवत मनु ६ चाक्षुष मनु ७ श्रीवैवस्वत मनु 66 सावर्णि मनु ९ दक्ष सावर्णि मनु १० ब्रह्म सावर्णि मनु ११ धर्म सावर्णि मनु मनु १२ रुद्र सावर्णि १३ देव सावर्णि मनु १४ इन्द्र सावर्णि मन 66 २८१ जैसे सातो दिनों का एक “ सप्ताह ”, तथा बारह महीनों का एक “घर्ष" हुवा करता है, वैसेही सत्ययुग त्रेता द्वापर कलियुग इन चारों की एक 'चौकड़ी" ( "चतुर्युग" ) जानिये । हां तो ऐसे ऐसे सहस्र चतुर्युगों वा १००० चौकड़ियों का, केवल "एक- दिन- श्री ब्रह्मा जी का होता है; सो, ब्रह्मा जी के प्रत्येक दिन में चीदह मनु होजाया करते हैं । अर्थात् एक एक मनु, (१०००+१४) कुछ ऊपर एकहत्तर चतु- युगों पर्य्यन्त रहा करते हैं। जब एक मनु की अवधि पूरी होती है तो उनके साथही साथ उस समय के इन्द्र, सप्तर्षि, मनुपुत्र, भगवदवतारं, और देवता, ये छपी पहिले की जगह नए नए होते हैं। प्रत्येक समूह ( इन छपों का ), एक एक " मन्वन्तर " कहलाता है; जय चीदह मन्वन्तर हो चुकते हैं, अर्थात् चौदही २५<noinclude></noinclude> 047cv7gfxr2i6r27hxf05o0swmh9h9y पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४७ 250 194014 664235 2026-07-02T16:21:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664235 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८२ 800- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । (१) मनु (२) इन्द्र (३) सप्तर्षि (४) मनुपुत्र (५) भगवद- वतार (६) देवता, की एक एक आवृत्ति हो चुकती है, तो तब, एक सहस्त्र चौकड़ियां व्यतीत होती हैं वा श्रीब्रह्मा जी का एक दिन पूरा होता है । ऐसे ऐसे दिनों से जब एक सौ बर्ष पूरे होते हैं, तब श्रीराम- इच्छासे पूर्व ब्रह्मा के स्थान में नए ब्रह्मा जी होते हैं। प्रभु की रचना की महिमा अपार तथा छाक- घनीय है । ( सवैया ) बेद थके कहि, तन्त्र थके कहि, ग्रन्थ थके निशि वासर गाते । शेष थके, शिव, इन्द्र थके, पुनि खोज कियो बहु भांति विधाते ॥ पीर थके, पो फ़कीर थके, पुनि धीर थके, बहुबोलिगिराते । “सुन्दर” मौन गी सिघ, साधक, कौन कहे उसकी मुख बाते ॥ श्रीशरभंग जी । महामुनि श्री शरभंग जी की स्तुति जितनी की जोय थोड़ी है । पाप कृतयुग से ही श्री सीताराम दर्शन के लिये तप कर रहे थे । इन्द्रने बहुत विघ्न किये पर श्रीराम कृपा से मुनि जी का मनोरथ सुफल हुआ हो । (चौ० ) पुनि आये जहँ मुमि सरभंगा । सुन्दर छानुज जानकी संगा ॥ 282<noinclude></noinclude> nqydr3xclfpgulwaokclh56sazf8kog पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४८ 250 194015 664236 2026-07-02T16:22:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664236 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>283 श्रीभक्तमाल सटीक । २८३ (दो० ) देखि राम मुख पंकज, मुनिवर लोचन भृंग | सादर पान करत प्रति, धन्य जनम सरभंग ॥ ( चौ० ) कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला । संकर मानस राज मराला ॥ जात रहेउं विरंचि के धामा । सुखवन बनाइहहिं रामा ॥ चितवत पंथ रहेउ दिन राती । अथ प्रभु देखि जुड़ानी छाती ॥ नाथ ! सकल साधन में होना । कीन्ही कृपा जानि जन दीना ॥ सो कछु देव ! न मोहि निहोरा । निजपन राखेहु जनमन चोरा ॥ तब लगि रहहु दीन हत लागी । जब लगि मिलउं तुम्हहिं तनु त्यागी ॥ जोग जग्य जप तप व्रत कीन्हा । प्रभु कहं देह भगतिवर लीन्हा ॥ एहि विधि र रबि मुनि सरभंगा। बैठे हृदय छाड़ि सब संगा ॥ ( दो० ) सीता पनुज समेत प्रभु, नीलजलद तनु स्याम । मम हिय बसहु निरंतर, सगुनरूप श्रीराम ॥ ( चौ० ) पस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपा वैकुंठ सिधारा ॥ तातैं मुनि हरि लोन न भयऊ । प्रथमहिं भेद भगति मन दयऊ ॥ रिषि निकाय मुनि वर गति देखी । सुखी भये निज हृदयविसेखी ॥ - स्तुति करहँ सकल मुनि वृंदा | जयति प्रनतहित करुनाकंदा ॥ 188600- श्रीसंजय जी । सत्यवादी हरिभक्त श्री संजय जी, महर्षि श्री<noinclude></noinclude> 2rqjablt0sjq9p753p4bz6f0xb4hm1k पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३४९ 250 194016 664237 2026-07-02T16:22:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664237 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८४ श्रीमति धाविन्दु स्वाद । से " व्यास" जी के शिष्य और राजा " धृतराष्ट्र” के मन्त्री तथा पुरोहित थे। श्री प्रभु कृपा पीर व्यास जी के आशिष से इनको दिव्य दृष्टि मिली “श्रीभग- वद्गीता" को पहिले. श्रीसंजय जीही ने धृतराष्ट्र कहा था। महा भारत में इनकी कथा बहुत विस्तार है। जब धृतराष्ट्र ने अपनी खी गन्धारी समेत श्रीबि- दुर जी के उपदेश से सप्तधारा गंगा के तट जाके प्राण त्याग किया, तब श्रीसंजय जी भी थिरक्त हो मुक्त होगये ॥ श्रीउत्तानपाद जी | श्रीमहाराज उत्तानपाद जी सब बिधि प्रशंसनीय हैं, कि जिनने भक्तराज श्री "ध्रुव" जी सा (पृष्ट १०४) पुत्र पाया। श्री ध्रुव जी को राज के, बन जा, । हरि का मजन कर पापने परांगति पाई । श्रीयाज्ञवल्क्य जी । श्रीसूर्य भगवान ने कि जिनसे श्रीयाज्ञवल्क्य जी ने विद्या प्रथमतः पढ़ी थी, पतिशय प्रसन्न होके यह पाशिष दिया कि " जो तुमसे विवाद करेगा उस्का सीस स्वतः फट जायेगा । " आप महर्षियों में हैं। आपने श्रीभरद्वाज जी के प्रश्न के उत्तर में, कृपा करके श्रीपार्वती शिव सम्बाद 600. 284<noinclude></noinclude> gnxog2t6gczv3rm32p8pd1pzjyo0sfz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५० 250 194017 664238 2026-07-02T16:22:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664238 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>285 188600-- श्री भक्तमाल सटीक | " मानस राम चरित" गाया है। पाप की स्मृति भी प्र- सिद्ध है ही । माप पत्यन्त प्रेमी महाभागवत परम frant महानुभाव हैं || मापकृत उपदेश विख्यात है ॥ श्रीसमीक जी; श्रीपिप्पलाद जी । श्रीसमीक जी तथा महा भागवत श्रीपिप्पलाद जी बड़े ज्ञानी ध्यानी प्रेमी थे ॥ -::- (iii) छप्पे । २८३ निमि रु नौ योगेश्वरा पाद त्राण की ह्रौं शरण । कवि', हरि, करभाजन' भक्ति रत्नाकर भारी ॥ अन्तरिक्ष, अरु 'चमस', अनन्यता पधति उधारी ॥ प्रबुध', प्रेम की राशि भूरिदा प्राबिर होता । पिप्पल', द्रुमिल', प्रसिद्ध भवाब्धि पार के पोता ॥ जयन्ती नन्दन जगत के त्रि- विधि ताप ग्रामय हरण । निमि अरु नव योगेश्वरा पादत्राण की हौं शरण ॥ é ॥ ( १ ) ११ २१२ "पाद प्राण" खड़ानं, पनही, जोड़ा, पगरी । भूरिदा-बहुत देनेवाला ।<noinclude></noinclude> ji2xk0mzce0nfys6nbgi7mhdmc4cv64 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५१ 250 194018 664239 2026-07-02T16:22:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664239 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८६ श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । वार्त्तिक तिखक । 286 महाराज श्री निमि जी और नौ (९) योगेश्वरौं के पादत्राणों के मैं शरणागत हूं पर उनके पादत्राण मेरे रक्षक हैं। उन नवो योगेश्वरों के नाम और गुण कहते हैं। श्री कवि जी, श्रीहरि जी, और श्री कर- भाजन जी, जो नवधा प्रेमा परादि भक्तियों के महा- रत्नाकर [ समुद्र ] हैं। श्री अन्तरिक्ष जी और श्री चमस जी, जो भागवत धर्म अनन्य मार्ग के उद्धार करने वाले हैं। श्री प्रबद्ध जी जो भगवत प्रेम की राशिही हैं। श्री अविर्होता जी जी भक्ति ज्ञान वैराग्य के महा दानी हैं। श्री पिप्यलायन जी और श्री द्रुमिल जी, जो संसार सागर से पार जाने के पर्थ प्रसिद्ध महा नौका हैं। श्रीनिमि जी की कथा पृष्ठ २७८ में देखिये ॥ १ श्री कवि जी, २ श्री हरि जी, ३ श्री करभाजन जी, ४ श्री अन्तरिक्ष जी, ५ श्री चमस जी, ६ श्री प्रबुध जी, ७ श्री सबिता जी, ८ श्री पिप्पलायन जी, ९ श्री द्रुमिल जी, (१०) श्री निमि जी महाराज (११) श्री जयन्ती जी देवी । [पृष्ट १९६, पंक्ति ९ । १० । ११ देखिये ॥] देवी श्री जयन्ती जी । श्री ऋषभदेव जी (पुष्ट ६१ ) की धर्म पत्नी परम<noinclude></noinclude> 7wbsllntuatnrxb9wy758zg7qrho83n पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५२ 250 194019 664240 2026-07-02T16:22:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664240 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>287 600 श्रीमक्तमाल सटीक | २८७ भागवती देवी श्री जयन्ती जी धन्य हैं, कि जिनके एक सौ पुत्रों में, परमानन्द दायक ये नवो पुत्र संपूर्ण जगत के जनों के तीनो ताप तथा काम क्रोधादिक मानसिक महा रोगों के हरने हारे, और श्री भरत जी भगवत के प्यारे, हुए। धन्य धन्य, जय जय ॥ दम्पति के उन एक सौ पुत्रों में से ८१ महिसुर ( ब्राह्मण) और शेष महीश (पवनीश) हुए ॥ (V) कप्पय । पद पराग करुणा करो, जे नेता " नवधा भगति" के ॥ श्रवण' परीक्षित; सुमति व्यास सावक सुकीरतन' । सुठि सुमिरन' प्रहलाद; पृथु पूजा ; कमला ' चरनन मन || वन्दन' सुफलक सुवन; दास्य' दीपत्ति कपीश्वर । संख्यत्वे पार थ; समर्थन प्रातम बर्लि' घर ॥ उप जीवी इन नाम के एते त्राता प्रगति के । पद पराग करुणा करौ (जे) नेता नवधा भगति के ॥ १० ॥ ( २ ) १४ "दीपति" दीप्ति; प्रकाश । वन्दन-नमस्कार, अभिवादन | "नेता" के स्थान में, पाठान्तर नियन्ता भी है। "नेता" प्रवर्तक प्राप्तकराने वाले। “सुफलक सुवम;अक्रूर जी । व्यास सावक= व्यासजी के पुत्र परम श्रीशुकदेव जी! एट १७ का खोक देखिये ॥<noinclude></noinclude> 4i3ldp5kienpe5t5oqczngagwgtjemi पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५३ 250 194020 664241 2026-07-02T16:23:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664241 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८८ श्रीभक्तिसुषाबिन्दु स्वाद । [ लोक ] श्रीकृष्ण श्रवणे परीक्षिदभबदु वैयासकी कीर्त्तने, प्रह्लादः स्मरणेऽङ्घ्रि पष्प्रभजने लक्ष्मीः, पृथुः पूजने । अक्रूरस्त्वभिवादने कपिपतिर्दास्ये च, सख्येऽर्जुनः, सर्व स्वात्मनिवेदने बलिरभूत् कैवल्यमेते विदुः ॥ १ ॥ वार्त्तिक तिलक | जो जो महानुभाव नवधा भक्ति के प्राप्त कराने वाले आचार्यरूप हौ, सो आप सब मुझपर करुणा करके, पपने पद पंकजों की धूरी मुझ को दीजिए । (१) श्रवण भक्ति निष्ठ मतिमान श्री परीक्षित जी; ( २ ) कीर्त्तन भक्ति निष्ठ वैद्यासकी महासुमति परम हंस श्री शुक जी; (३) सुन्दर स्मरण भक्ति निष्ठ श्री प्रह्लाद जी; ( ४ ) भगवत चरण सेवन भक्ति निष्ठा मानस वती महारानी कमला श्री लक्ष्मी जी; (५) पर्चन पूजम भक्ति निष्ठ श्री पृ जी; (६) बन्दन भक्ति निष्ठ श्री अक्रूर जी ; (७) श्री सीतापति दास्य भक्ति निष्ठा दीप्ति युक्त कपीन्द्र श्री हनुमान जी । (८) सख्य भक्तिनिष्ठ प्रथा पुत्र श्री अर्जुन जी; (९) आत्म निवेदन भक्ति निष्टाधारी श्री बलि जी; ये श्रवणादिक नवो नाम वाली भक्तियां ही जिमकी प्राणाधार जीविका हैं, सो नवो महा भागवत, सघ गति मति हीन जनों के रक्षक हैं 1000- 288<noinclude></noinclude> qwx83zdbkdk8k0n9wyu1cm5f1elxoh2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५४ 250 194021 664242 2026-07-02T16:23:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664242 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>289 श्रीभक्तमाल सटीक । -00088 स्वामी श्री ६ राम रसरंगमणि जी का छप्पय, कि जिन से इस दीन ने भक्तमाल पढ़ी है । (छ०) नवधा भक्ति निधान ये, राम प्राया प्रिय भक्त दश ॥ श्रवण समीरकुमार, कीरतन कुश लव निर्भर । शुचि सुमिरन रत भरत, चरण सेवन अङ्गद कर ॥ पूजन शवरी, शुभ सुमन्त्र बन्दन अधिकारी । लखन दास्य, सुग्रीव सख्य सुख लूट्यो भारी । आत्म समर्पण गीधपति, रसरङ्ग मणी करि लिये यश । नवधा भक्ति निधान ये राम प्राणप्रिय भक्त दश ॥ श्री परीक्षित जी । (2) टोकर कवित्त । । श्रवणरसिक कहूं सुने न परीक्षित से, पान हूं करत mrit कोटि गुण प्यास है। मुनि मन मांझ क्योहूं ध्यावत न ध्यावत हूं वहीं गर्भ मध्य देखि पायो रूप रास है ॥ कही शुकदेव जू से टेव मेरी लीजै जानि, प्रानलागे कथा, नहीं तक्षक को त्रास है । कीजिये परिक्षा उर पानी मति सानी अहो! बानी विरमानी जहां जीवन निरास है ॥ ९७ ॥ (६२९-५३२) "टेव मान, प्रकृति, खनाथ । “विरमानी "=ठहर गई, रुकी। वार्त्तिक तिलक | राजा परीक्षित के समान भगवतकथा श्रवण रसि- क कहीं सुनने में नहीं आता । श्रवण पुटन से हरि 600-- ३७ 600<noinclude></noinclude> qu7iqm97t3i1hi1trlztvy7gm8thkah पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५५ 250 194022 664243 2026-07-02T16:23:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664243 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२९० श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 290 कथा सुधा पान करते ! हु भी प्यास कोटि गुनी बढ़- ती ही जाती थी। ऐसा क्यों न हो ? देखिये जो प्रभु मुनियों के ध्यान करने से भी उनके मन में किसी प्र- कोर से नहीं पाते, उन्हीं रूपरास भगवान को गर्भ के मध्य में पाप दर्शन कर आए हैं। श्री भागवत सुनते समय श्री शुक जी से कहा कि “मेरी प्रकृति जान ली- जिये कि प्रभु की कथा ही में मेरे प्राण लगे हैं । मुक की तक्षक का कुछ भय नहीं है। चाहे पाप मेरी परीक्षा ले लीजिये" यह सुन श्री शुकदेव जी अपने हृदय में यह बात लाए कि राजा सत्य कहते हैं कथा में इनकी मति सनि गई है । हो ! श्री परीक्षित जी की क्या प्रशंसा की जावे कि ज्योंही श्री शुकदेव जी की बाणी समाप्त हुई, उसी क्षण शरीर को त्याग दिया परमधाम चले गए ॥ श्री परीक्षित जी की कथा पृष्ट १९९ में भी लिखी जा चुकी है कि ("जिनके हरि नित उर बसैं " ) ॥ परम हंस श्री शुकदेव जी । (३) टीका | कवित्त । गर्भ ते निकसि चले बनड़ी में कीयो वास, व्यास से पिता को नहिं उत्तर दियो है । दशम श्लोक सुनि गुनि मति हरि गई, लई नई रीति, पढ़ि भागवत लियो है ॥ रूप गुन भरि सह्याजात कैसे करि; पाए समानुप 100-<noinclude></noinclude> f0p5kb3o2hgz8vo973ccy9yc64j7lh4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५६ 250 194023 664244 2026-07-02T16:23:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664244 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>291 600- श्रीभक्तमाल सटीक । ढरि भोज्यो प्रेम रस हियो है। पूछे भक्त भूप २९१ ठौरठौर परें भौंर, जाई, गाई उठे जबे मानो रंगभर कियो है ॥ ९८ (६२९५३१) ढरिचालिके, ढरक के, कृपा करके । वार्त्तिक तिलक | परम हंस श्री शुकदेव जी की कथा ( पृष्ठ ५ तथा ९२ में) यहां तक तो लिखी जाचुकी है कि शुक का बच्चा श्री व्यास जी की स्त्री के मुख द्वारा उदर में प्रवेश कर गया। बारह वर्ष उनके उदा में ही प्रोप रहे । पुनः देवdi मुनीश्वरों की प्रार्थना से आप गर्भ से निकल के उसी क्षण चल दिये और जाके बन ही में बसे । महर्षि श्री व्यास जी सरीखे पिता को ( पृष्ट ५) “ पुत्र ! पुत्र !!" पुकारने पर स्वयं उत्तर तक न दिया, किन्तु वृक्षों से ही कहला के प्रबोध कर दिया । तब श्री व्यास जी ने एक पनुरागका जाल फेंका अर्थात् भगवदुयश के श्लोक सिखाकर लड़कों को (श्री अगस्त्य जी के शिष्यों को) बन में आपकी ओर भेजा । किसी दिन एक लड़के को अपूर्व भगवदुयश का एक* लोक भागवत के तृतीयस्कन्ध का गाते सुनके पाप की मति हर गई । भगवत प्रेम में आप ऐसे पगे कि उस लड़के से पता पूछकर श्रीव्यास जी के पास पाकर • अहो बकोयं रतनकालकूटं जिघांसया पायवदप्यसाथी । लेने गतिं चायुचितां ततोऽम्यं कं वा दयालु शरणं व्रजेम ॥ 800--<noinclude></noinclude> pjjgttfcri473bz4h1su2cxefrikrmd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५७ 250 194024 664245 2026-07-02T16:23:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664245 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८२ श्रीभक्तिधाविन्दु स्वाद । 292 --0008 नवीन रीति ग्रहाकर (पर्थात् जिनने उत्तर मी न दिया था सो अब पास में रह के श्रीमद्भागवत को पढ़ा ॥ तय संपूर्ण श्री भागवत में जो श्री भगवत रूप और गुणों का वर्णन था, सो सब इनके मन में भरके उसके पानन्द का भार इतना हो गया कि जो किसी प्रकार से सहा नहीं जाता था । एवं, जब ऋषिपुत्र के शाप से राजा परीक्षित जी राज तज के श्रीगंगा कूल में मुनियों के बृन्द समेत सभा में बैठे और भक्त राजा जी ठौर ठौर के मुनीश्वरों से अपनी सुगति का उपाय पूछ रहे थे; मुनीश्वर लोग इस विचार के चक्कर (भंबर) में पड़े थे कि राजा को क्या उपदेश देना चाहिये । उसी क्षण उस सभा में, श्री परीक्षित जी के भाग्य यश, श्री शुकदेव जी, कि जिन का हृदय श्री भगवत प्रेमरस से भीगा हुआ है, सो परोपकारता की ठरन से ढरके, मा पहुंचे और राजा से कहा कि तुम भगवत यश सुनो। यह कह श्री " भागवत" कथा गा चले, मानो प्रेमरंग की झड़ी सी लगा दी । श्री भागवत, श्री परीक्षित महाराज को श्री शुकजी ने ऐसा सुनाया कि सातही दिन में महाराज ने परम पद ही पालिया ॥ • श्रीव्यास जी तथा सुरगुरु श्री वृहस्पति जी की आज्ञा से श्रीशुक- जीने, विज्ञान सिन्धु श्री जनक जी महाराज से उपदेश लिया । एक समय किसी तीर्थ पर देवाङ्गनाएं वल रहित 1000-<noinclude></noinclude> pd919y9xbmw9m5tfrdhjiv7436vb08o पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५८ 250 194025 664246 2026-07-02T16:23:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664246 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>293 12886-p0-- श्रीभक्तमाल सटीक । २९३ नान कर रही थीं परमहंस श्री शुकदेव जी अकस्मात उधरही से जा निकले, उन देवियों ने पाप से तो लज्जा न की, परन्तु व्यास जी को देखतेही शीघ्रता एवं लज्जा पूर्बक वस्त्र धारण करने लगों । पौर, व्यास जी की शंका का उत्तर उन बड़भागियों ने यह दिया कि "प्रभो ! आप से अथवा सब से लज्जा तो सामान्यतः पवश्य है हो, रही वार्ता यह कि परमहंस श्रीशुकदेव क्यों हुई ? सो उनकी तो स्त्री पुरुष का नहीं, वे तो सब को भगवत्मय ही देखते हैं; उनको इतनी भी सुधि नहीं कि हम को लज्जा पाई वा नहीं, हैं वा नग्न, वे तो भगवद्रूप में छके केवल उसी में मग्न हैं ॥ श्री प्रह्लाद जी । (३) टीका | कवित्त । । सुमिरन सांचो कियो, लियो देखि सबहीं में एक भगवान कैसे काटे तरवार है। काटियो खड़ग जलबोरियो कति जाकी, ताहि को निहारै चहुंपोर सो अपार है ॥ पूते बतायी खंभ, तहांही दिखायी रूप, प्रगट पनूप भक्त बाणीहीं सो प्यार है। दुष्ट डायो मारि, गरे प्रांतलई डारि; तऊ क्रोध को न पार, कहा कियो बिचार है ॥ ee ॥ (६२९-५३०) “ सकति शक्ति । 'आगेहु रामहि, पोछेहु रामहि, व्यापक रामहि हैं बन पाने" । “सुन्दर राम दशोदिशि पूरण स्वर्गहु राम पतालहु राने " ॥<noinclude></noinclude> jcqb89gmn0u88rwosacduztz1r1qyyu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३५९ 250 194026 664247 2026-07-02T16:24:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664247 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२९४ 83800- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । वार्तिक तिलक | महाभागवताग्रगण्य श्री प्रह्लाद जी की कथा " द्वादश भक्त राजों” के साथ पृष्ठ ८६ । ८६ में लिखीजा चुकी है। इने श्री रामनाम का सच्चा स्मरण किया; जिस स्मरण से इनको पूर्ण परब्रह्म दृष्टि प्राप्त हुई। कि जिस दृष्टि से चराचर में एक भगवान् ही को देखा । यह भजन और स्मरण देखके भक्त द्रोही हिरण्यकशिपु ने इनके के अनेक प्रयत्न किये; अग्नि में जलाया, जल में डुवाया, तथा खड्ग का प्रहार भी कराया; परन्तु इन की खड्ग कैसे काट सकता था। क्योंकि खड्डू में काटने की शक्ति अग्नि में जलाने की एवं जल में डुबाने की शक्ति जिस परमात्मा श्री राम जी की है, उन्ही को पचा पोर ग्नि जल खड्गादिकों में उपपार प्रीति प्रतीत से देखते थे । अन्त में हियकशिपु ने पूछा कि "तेरा राम कहां है ?" तो आपने उत्तर दिया कि “प्रभु सर्वत्र हैं, (दो०) तोमें, मोमें खड़ग में, खम्भहु में हैं राम । मोहि दीखें, तोहि नाहि, पितु ! बिना जपे हरि नाम ॥ * ऐसा सुन दुष्ट ने पुन: पूछा कि "क्या इस खंभे में भी है ?" आपने उत्तर दिया कि “हां, निस्सन्देह हैं” तिरुपर, उसने महो क्रोध करके उस खंभे में एक घूसा ( मुष्टिक) मारा । तब अपने भक्त की प्रियबाणी को सत्य करने वाले 800- 294<noinclude></noinclude> c2k3qw38behnjsk8gxlnhg6z1q3l394 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६० 250 194027 664248 2026-07-02T16:24:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664248 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>295 88800- श्री भक्तमाल सटीक | प्रभु, उसके मुष्टि मारतेही, उस खंभे में से महा हट्टहास शब्द करके पद्भुत रूप से (अर्थात् आधा "नर " का और साधा "सिंह" का शरीर धारण कर ) प्रगट हो उस दुष्ट को मार डाला । फिर उस्की प्राँतें निकाल के अपने गले में डाल लीं; पर इतने पर भी आप का अपार क्रोध बनाही रहा, शान्त नही हुवा, न जानें मन में क्या विचार आ गया ॥ डरे शिव (ट) टोका । कवि । २९५ आदि, देख्यो नहीं क्रोध ऐसो, पावत न ढिग को लछिमीहूं त्रास है। तंत्र तो पठायो प्रह्लाद लाद महा हो भक्ति भाव पग्यो झायो प्रभु पास है । गोद में उठाइलियो, शीसपर हाथ दियो, हियो हुसायो, कही वाणी विनयरास है । पाई जगदया लगि श्री नृसिंह जू को, स्त्रो यों छुटावो, करो माया ज्ञान नास है ॥ १०० ॥ (६२९-~~-५२९) " हिन" = समीप, पास, लगे “ अस्यो"=हठ पड़े, अड़ गए। “उगिपस्यो "= मुंह लगू हुए, लहूहुए, अरुति पस्यो, उल्लक पड़े। वार्तिक तिलक | श्री नरहरि भगवान् का वह क्रोध देख के, पौरों की तो बात ही क्या है श्री ब्रह्माशिवादिकभी डर गए क्योंकि इन्होंने प्रभु का ऐसा क्रोध कदापि देखाही न था। कोई समीप नहीं जा सकते थे, वरंच श्री लक्ष्मी जी भी भय से प्रभु के पास नहीं जा सकीं ।<noinclude></noinclude> o5wnqzuvx8zhqff5xukc7o48q6z6xcz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६१ 250 194028 664249 2026-07-02T16:24:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664249 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२९६ श्रीभक्तिसुधा बिन्दु स्वाद । तब तो श्री ब्रह्मादिक ने श्री प्रह्लाद जी से कहा कि " वत्स ! तुम प्रभु के पास जाके क्रोध की शान्ति करावी " यह सुन भक्ति भाव के महान प्रह्लाद में पगे हुए श्री प्रह्लाद जी श्री प्रभु के पास बे खटके गये । श्री भक्तवत्सल जी ने प्रसन्न हो दोनों हाथों से उठ के पाप को गोद में बिठला लिया, और मस्तक - घ्राण कर सीस पर पखण्ड अभयप्रद हस्त फेरा । तदनन्तर, श्री प्रह्लाद जी का हृदय पकथनीय पानंद हुलास को प्राप्त हुआ और प्रेमराशिसानी बाणी से स्तुति प्रार्थना करने लगे । प्रभु ने पाज्ञा की कि " वत्स ! कुछ वर मांग " ॥ से आप बोले कि प्रभो ! मैं वरदान नहीं चाहता हूं । परन्तु पुनः आज्ञा पाय पाप को जगत के जीवों पर दया आ गई; इस्से चरणों में लग के और हठ करके यही पर मांगा कि नाथ! इस पाप की माया ने सब जीवों का ज्ञान हर लिया है इसलिये अपनी माया से जीवों को छुड़ाइये, जिसमें पाप का भजन करें । ( सवैया ) राम सुनाम बिना, रसरंग मनी, मुख जानि लज मैं लज रे । चातक ज्योंधन, रंक भजे धन, त्यों प्रभु राम भजों में भज रे ॥ काक कुसंगति छोड़ि सुसंगति हंस सुधेष सर्जी में सर्जी रे। जानकीजीवन राम को नाम कयूं न तज न तजौँ न तज रे ॥१॥ .. 296 1000<noinclude></noinclude> fzn0wnxrcw2tm46lunyh99gfp5b7hxf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६२ 250 194029 664250 2026-07-02T16:24:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664250 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>297 1800-00- श्रीभक्तमाल सटीक | ၃၆၈ 'काढ़ि कृपान कृपा न कहूं पितु कालकराल बिलोकि न भागे। " राम कहां ?” “सत्र ठाउँ हैं” “खंभ में" ?" हां " सुनिहाँक नकेहरि आगे ॥ बैरी बिदारि भए विकराल, क प्रहलाद हि के अनुरागे । प्रीति प्रतीति बढ़ी, तुलसी, तब सब पाहन पूजन लागे ॥२॥ (दो०) नाम नोद भजि, वादतजि, चखि सुप्रेम रस स्वाद । धन्य धन्य, रस रङ्गमणि, राम भक्त प्रहूद || महाबीर श्रीहनुमान जी । ( ओं नमो भगवते हनुमते श्रीरामदूताय ) "श्रीहरिवल्लभों" (पृष्ट १०३ - १०७) में भी, परम प्रिय श्रीश्री मारुति जी की कथा कही जा चुकी है; फिर यहां " नवधा भक्ति की निष्ठा में पाप का यश श्रीग्रन्थकर्त्ता ने गाया है; और पुनः लागे, १६ वें छप्पे (मूल २० ) में भी, “श्रीरघुबीर सहचर" महाबीर पव- नात्मज जी का सुयश देखिये | उसी प्रसंग में आप के जन्म की कथा भी पढ़के परमानन्द लाभ कीजिये ॥ (चौ०) “सुमिरि पवन सुत पावन नामू। अपने यश करि राखे रामू पौर, पापकी " श्रवणनिष्ठभक्ति इस वार्त्ता से प्रसिद्ध ही है कि जब श्री अवधेश राघवेन्द्र जी महाराज निज साकेत धाम को जाने लगे, पाप की पज्ञा दी कि " सात! तुम यहीं रही " तिस्पर पापने कहा कि "प्रभो ! जो आज्ञा, परन्तु यह र F<noinclude></noinclude> eqpoy5txl5dy9mu3kjbv6qe8jpkq1kb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६३ 250 194030 664251 2026-07-02T16:24:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664251 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>pec 8000-- श्रीभसुधाबिन्दु स्वाद । 298 दान मिले कि कदापि किसी काल में श्रीरामायण मुझे सुनानेवालों का प्रभाव नहीं हो ।” प्रभु बोले कि "पच्छा, ऐसा ही होगा, सदैव मेरी कथा तुम्हारे श्रवण गोचर होती रहेगी, नर नाम गन्धर्ष सुर, मेरे यश तुम प्रति गायाही करेंगे, तथा भाग्यशालिनि अप्सराएं निरन्तर मेरे चरित्र तुम्हें सुनातीही रहेंगी ॥” निदाम, आप किस रस के प्राचार्य्य नहीं हैं ? सब ही के हैं ॥ (चौ०) दुर्गम काज जगत में जेते । सुगम अनुग्रह कपि के तेते ॥ सीयदुलारे रामपियारे । सन्त भक्त के कपि रखवारे ॥ नहिँ कोउ हनुमत समं बड़ भागी । सीताराम चरण अनुरागी ॥ मंगल मूरति मारुतनन्दन सकल अमंगल मूल निकन्दन ॥ (सो०) सेइय श्रीहनुमान, भुक्ति-मुक्ति- हरिभक्ति- प्रद । जनरक्षक, भगवान, बीर, धीर, करुणायतन ॥ 66 श्री अर्जुनजी; श्रीथुजी | हरिबल्लभ" (पृष्ट १७८) में भी, श्रीपर्जुन जी की कथा हो चुकी है; और यहां ( इस छप्पय में ) पापको श्रीग्रन्थकार स्वामीने "नवधा भक्ति” (सख्य रस ) के प्रसंग में लिखा है । (श्लोक) “ सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे दृढ़मिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ &c. &c. प्रियोऽसि मे ॥ " (२) भगवत के अवतारों (पृष्ट ६१ ) में तथा “जिनके<noinclude></noinclude> la8wgfmk0ht9cbhue2m22xdp38aa7uq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६४ 250 194031 664252 2026-07-02T16:24:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664252 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>299 13600- 6 श्रीभक्तमाल सटीक । हरि नित उर बसैं " तिन भाग्यभाजनों (पृष्ट १९९) में भी महाराज श्री २६६ जी की चर्चा हो चुकी है । किसी २ महात्मा ने आपको "श्रवण" निष्ठा में लिखा है; और यहां पापको श्रीनाभास्वामी जी, प्रमुख, ने " पूजन" निष्ठा में वर्णन किया है । पृष्ठ २१५ में जिस " महुष" को वार्ता लिखी गई है, मो 'चन्द्रवंशी महुच जानिये | सूर्यवंशी नहीं पष्ट २९१ की १९ (उम्रीखों पंक्ति में, तथा कई लोक दशमस्कन्ध --इतने शब्द और वहां चाहिये को रहगए हैं। PRE- श्री अक्रूर जी (21) टोका कवित्त । । कर मधुपुरीतें, विसूर, नैन चली जल धारा, कयदेखीं छवि पूर को । सगुन मनाबै, एक देखियोई । भावें, देहसुधि विसरावे, लोटे, लखि पगधूर को। बंदन प्रोन, चोह निपट नवीन भई, दई शुकदेव कहि जीवन की मूर को । मिले राम कृष्ण, झिले, पाईकै मनोरथ hot हिले दृगरूप कियो हियो चूर चूर को ॥१०१॥ (६२९-५२८) "बिसूरना = रूप चितवन करना। “मिलेआगे बढ़े, लपके। "हिले "प्रवेश किया; हिल गए, हिताए, परके, सस्नेह मिले। वार्षिक तिलक | श्री रूप क्रूर जी कंस के भेजे हुए मधुरा जी से (श्री -909881<noinclude></noinclude> d82a36irtf62l1kc9ebx48gf0dw16y6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६५ 250 194032 664253 2026-07-02T16:25:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664253 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०० 130-00- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । ब्रज की पोर ) प्रति बिरह उतकण्ठा से चले, यों विचारते हुए कि (पद) जे पद पदम सदा शिव के रह, सिन्धुसुता उरते नहिं टारे । सूरदास तेई पद पंकज, त्रिविध ताप दुख हरम हमारे । (दो०) ग्रज बाला जे पद कमल, रहीं सदा उर लाइ । तेइ पद पंकज देखिहों, हो इन्ह नैनन्ह जाइ ॥ श्रीकृष्ण बल- देव जी का रूप चिन्तवन करतेही आंखों से प्रेम जल की धारा बहने लगी; और श्याम गौर छविपूर्ण दोनों भाइयों के दर्शन का मनोरथ भी हृदय में भर श्रया । सगुन मनाते जाते थे; केवल दर्शन ही सुहाता था, इस्से अपने शरीर का भान भूल जाया करते थे । इसी दशा से जब श्रीज के समीप पहुंचे, तो मार्ग की धूरि में " कमल बज ध्वज अंकुशादि चिन्ह " युक्त भगवत के चरण उबटे हुए देखके उनको दण्डवत कर पाप उन्हीं चरण चिन्हों में लोटने लगे और इन्हें प्रीति अतिशय नवीन उत्पन्न हुई इसी से इनकी "जी- वन की जड़ी बन्दन भक्ति प्रवीणता” श्रीशुकदेव जी ने श्री भागवत में भली भाँति कही है। श्री वृन्दाबन में पाप पो पहुंचे; श्री बलराम जी तथा श्री कृष्ण जी का दर्शन कर अपना मनोरथ पूर्ण देखा पागे बढ़ जा मिले; छवि सागर में इनके नेत्र मग्न हो गए और हृदय प्रेम से चूर चूर हो गया ॥ प्रेम पूरितवन्तःकरणा से शुभमार्ग में जिनका चि-<noinclude></noinclude> tak7pw91i36hkost4owh5aa21vi1b1i पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६६ 250 194033 664254 2026-07-02T16:25:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664254 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>301 15600- श्रीभक्तमाल सटीक । ३०१ -0001 न्तवन करते चले आते थे, यहां आकर उनके और विचित्र चरित्रों के अतिरिक्त, यह भी देखा कि (स० ) "सुत- दारा पो गेहकी नेह सबै तजि जाहि विरागी निरन्तर यावें । यम नेम झी धारणा आसन आदि करें नित योगी समाधि लगावें ॥ जेहि ज्ञान प्रौध्यान तें जाने कोऊ सो अनादि अनन्त पखण्ड बतावें । ताहि हि गोप की छोरियां कँछिया भर छाँछ पै नांच नचावैं ॥ " जिससे आप असीम सुख को प्राप्त हुए । क्रूर जी की चरणा श्री "हरि बल्लभो” (पृष्ट १७०) भाई है और यहां "नवधा भक्ति" के प्रसंग में ॥ श्री बलि जी । (*) टीका | कवित दियो सरबसु, करि अति पनुराग बलि, पागिगयो हियो प्रहलाद सुधि पाई है। गुरु भरमावै, नीति कहि समुका, बोल उर में न आवे केती भीति उपजाई है। को जोई कियो सांचो भाव पनलियो, अहो ! दियो डर हरिहूंने, मति न चलाई है। रीके प्रभु, रहेद्वार, भये हरि मानी, श्रीशुक बखानी, प्रीति रीति सोई गाई है ॥१०२॥ (६२९५२७) भरमावे = घुमाये फिरावे, इधर उधर करे, बहकावे, टाल मटाल करे, हेर फेर करे। "बाई" चलो, टकसी, हटो, डोली ॥ 3000- -90980<noinclude></noinclude> s8xyu88vqoat1k76ace1tfetpjrzud4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६७ 250 194034 664255 2026-07-02T16:25:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664255 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०२ 15600- श्रीभक्तिसुधाविन्दु स्वाद । बार्तिक तिलक | श्री बलि जी ने प्रति अनुराग पूर्वक श्री वामन भगवान् को अपना सर्वस्व दे डाला; यद्यपि इनके गुरु शुक्राचार्य ने इनकी बहुत भरमाया; और यह भी जता दिया कि ये देवतों के पक्षपाती विष्णु हैं; तथापि इनने न माना, वरंच इनको अपने पितामह श्री प्रङ्काद जी की प्रेमा भक्ति की सुधि मा गई । इस्से श्री बलि जी का हृदय प्रभु के अनुरोग में पग गया । (वि०प०)" जाके प्रिय न राम वैदेही । तजिये ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही । तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषण बन्धु, भरत महतारी । बलि गुरु तजेउ, कन्त व्रजनितनि, भयो मुदमंगलकारी । नाते नेह रामके मनियत सुहृद सुसेवथ जहांलो । अंजन कहा ? पांखि जो फू, बहुतक कहीं कहांलौं । तुलसी, सो सब भांति परमहित पूज्य प्राणते प्यारो । जाते होय सनेह राम पद, एतो मतो हमारी ॥ " पुनः शुक्राचार्य ने बहुत प्रकार से राजनीति समझाई तथा अनेक भय भी दिखाए परन्तु शुक्र का बचन आप के मन में एक भी न जमा; किन्तु जो कुछ प्रभु से प्रतिज्ञा की थी, सोई बात की। सच्चे भाव से अपना दृढ़ प्रण (पन) गहे ही रहे । 400- श्री हरि ने भी बहुत डराया, पर इनने अपनी मति 802<noinclude></noinclude> lbxw3twqtoec1w9pky47lx7uy97jo3c पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६८ 250 194035 664256 2026-07-02T16:25:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664256 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>803 03-0 श्रीभक्तमाल सटीक । ३८३ हरिकृपासे स्थिर ही रक्वी; अर्थात् अपना देह आत्मा as प्रभु को समर्पण कर दिया । छन्दइन्दव । “ के यह देह सदासुख सम्पति के यह देह विपत्ति परो । के यह देह निरोगरहो नित के यह देहहि रोग चरीजू । के यह देह हुताशन पेठहु के यह देह हिमाले गजू । सुन्दर रामहिं सौंपिदियो जब, तब यह देह जियो कि मरोजू” ॥ प्रभु इनकी सत्यसन्धता तथा प्रात्मनिवेदन भक्ति देख, पत्यन्त ही रीफ, इनके द्वारपाल बन के सदा द्वार पर ही रहने लगे और अपने मन में हार मान, पाप के बश ही हो गए। सो परम हंस श्रीशुक जी ने श्री भागवत में पच्छे प्रकार से बखान किया है । सोई श्री बलि प्रीति नीति हमने भी गान की है । श्री बलिजी की कथा " द्वादश भक्तों" (पृष्ट १ ) भी लिखी जा चुकी है और यहां "पात्म समर्पण" में ॥ (५) । हरिप्रसाद रस स्वाद के भक्त इते पर- मान ॥ शङ्कर', शुक', सनकादि', कपिल नारद', हनुमाना । विष्वकसेन, प्रह लाद', बलि, भीषम, जग जाना । - र्जुन", ध्रुव, अम्बरीष", विभीषण", 1986-00- -900*<noinclude></noinclude> bsz75rzy9augggoaoxo86b8rs50kd4r पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३६९ 250 194036 664257 2026-07-02T16:25:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664257 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>Go- ३०४ -90988 श्रीमतिसुधाषिन्दु स्वाद । महिमा भारी । अनुरागी अक्रूर", सदा उद्धव ", अधिकारी । भगवन्त भुक्त व- शिष्ठ की कीरति कहन सुजान । हरिप्रसाद रस स्वाद के भक्त इते परमान ॥११॥ (२) वार्तिक तिलक | श्रीहरि के प्रसाद के रसस्वाद लेनेवाले, और श्रीभग वत के भोजन किये हुए शेष पमृतान्न की कीर्त्ति महिमा कहने में परम सुजान, इतने भक्त प्रमाण हैं- श्रीशङ्कर जी श्री शुक जी सनकादिक चारो भाई श्री कपिल जी श्रीनारद जी श्रीरामानन्य हनुमान जी श्री विष्वक- न जी, श्री प्रह्लाद जी श्री बलि जी, और प्रसिद्ध देवव्रत श्री भीष्म जी श्री अर्जुन जी श्री ध्रुव जी श्री अम्ब जी, महा महिमायुक्त श्री विभीषण जो, अनुरागी श्री क्रूर जी, सदा प्रेमाधिकारी श्री उद्धव जी । तात्पर्य यह है कि भगवत का उच्छिष्ट प्रसाद इन भक्तों को अर्पण करना चाहिये, उसमें प्रमाया पद्म- पुराण का (लोक) “बलि विभीषणो भीष्मः कपिलो नारदोऽर्जुनः । प्रह्लादो जनको व्यासी सम्बशेषः पृधु स्तथा ॥१॥ विष्वक्सेनो धुत्रोऽक्रूरो सनकाद्याः शुक्रादयः । वासुदेव प्रसादानं सर्वे गृह्णन्तु वैष्णवाः ॥ २ ॥ १ श्री शिव जी, पृष्ट* ८१ ३ श्री सनकादि जी, ८५ २ श्री शुकदेव जी, पृष्ट ९२ । ४ श्री कपिलदेव जी, 8000- पृष्ट ६ - 99 304<noinclude></noinclude> i7apjarv5z5qk22e2i82l0vvh5tn6g2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७० 250 194037 664258 2026-07-02T16:26:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664258 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>805 400 श्रीभक्तमाल सटीक । ५ श्री नारद जी पृष्ट ८१ | ६ श्री हनुमानजी, पृष्ट १०३ ७ श्री विष्वकसेन जी, ९७ ८ श्री प्रह्लाद जी, पृष्ट ५ ९ श्री बलि जी, पृष्ट ९९ १० श्री भीष्म जी पृष्ट ९० | ३०५ ११ श्री पर्जुन जी, पृष्ट १७८ १२ श्री ध्रुव जी, पृष्ट १७४ १३ श्री अम्बरीष जी, १२६ १४ श्री विभीषण जी, १०८ १५ श्री पक्रूर जी, पृष्ठ १०० १६ श्री उद्धव जी, पृष्ट१७२ जिस जिस पृष्ट में जिन जिन भक्तों की चर्चा हो आई है, उस पृष्ट का अंक अपर उनके लाभ के सामने, लिखे गए हैं। (115) ध्यान चतुर्भुज चित धस्यौ, तिन्हें शरण अनुसरौं । अगस्त्य पुलस्त्य पुलह च्यवन वशिष्ठ सौभरि ऋषि । कर्द्दम अत्रि रिवीक गर्ग गौतम सुव्यासशिषि ॥ लोमश भृगु दालभ्य अङ्गिराशङ्गि प्रकाशी। मांडव्य विश्वामित्र दुर्वासा, सहस - ठासी ॥ जाबालि यमदग्नि मायादर्श कश्यप परवत पराशर पद रज धरों ध्यान चतुर्भुज चित धरयो, तिन्हें शरण हौं अनुसरौं ||१२|| (2) वार्तिक तिलक । श्री भगवान के चतुर्भुज रूप का ध्यान जिन भक्त ऋषियों ने अपने चित्त में धारण किया, मैं उनके<noinclude></noinclude> 9ya17jhe7npwxfenyvoocn7oojgwdhl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७१ 250 194038 664259 2026-07-02T16:26:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664259 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०६ श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 806 शरण में प्राप्त हूं और उन्ही के चरणों की धूरि अपने सीस में धरता हूं -. १ श्री अगस्त्य जी १५ श्री दालभ्य जी २ श्री पुलस्त्य जी १६ श्री अङ्गिरा जी ३ श्री पुलह जी ४ श्रीच्यवन जी ५ श्री वशिष्ठ जी ६ श्री सोमरी जी ७ श्री कईम जी ८ श्री अनि जी ९ श्री ऋचीक जी १७ श्री ऋष्यशृङ्ग जी १८ श्री मांडव्य जी १९ श्री विश्वामित्र जी २० श्री दुर्वासा जी २१ श्री जाबाली जी २२ श्री यमदग्नि जी २३ श्री मायादर्श (मारक- ण्डेय) जी २४ श्री कश्यप जी १० श्री गर्ग जी ११ श्री गौतम जी १२भी (संजयजी) व्यासशिष्य २५ श्री पर्वत जी १३ श्री लोमश जी २६ श्री पराशर जी १४ श्री भृगु जी (२७) अठासी सहस्र (८८०००) श्रीगस्त्य जी । श्री सीतारामकृपापात्र शिरोमणि ऋषीश्वर श्री१८ sure भगवान् को, कि जिनका दूसरा नाम “ श्री योनि वा कुम्भज जी " भी है, रूपन्य महर्षियों के ही सरिस नहीं, बरंच इनको श्री प्रभु का दूसरा व्यक्ति ही समझना चाहिये, किमधिकम् ? एवं भाप की<noinclude></noinclude> ilkwe7vfb91t3rtl4m8pvqihc4ts0or पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७२ 250 194039 664260 2026-07-02T16:26:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664260 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>307 460 श्रीमतमाल सटीक | ३० स्त्री " श्री लोपामुद्रा जी", श्रीजनकनन्दिनी जी की अतिशय कृपापात्र सखी हैं। आप दोनों की जय । श्रीअगस्त भगवान् की उत्पत्ति घड़े से हुई; बरुण देवता तथा मित्र जी दोनों के तेज़ एक कलश में रक्वे हुए थे, श्रीब्रह्मा जी की इच्छा से उसी घट से आप निकले। और ऐसा भी कहा है कि एक राजा ने पुत्र- काम यज्ञ कराया; उस से जो क्षीरात्र मिला, उसको उसने एक कलश में रख दिया ( वह अपनी रानी की न खिला सका ); उसी घड़े से पाप प्रगट हुए। पाप की बनाई "श्री अगस्त संहिता" प्रसिद्ध ही है । साकेतपति शार्ङ्गधर दिव्य पखगर्ड के नित्यकिशोर मूर्त्ति व्यापक परात्पर भगवत सच्चिदानन्द घन शोभाधाम श्री जानकीवल्लभरामचन्द्र जी की उपासना पूजा इत्यादि के बड़े भारी प्राचार्य्य श्रीअगस्त भगवान् हैं । आपने सर्व जगत पर कैसी कृपा की बरषा की है, बर्णन नहीं हो सकता । पांच छः कारणों से एक समय आप सम्पूर्ण विशाल समुद्र ही को पान कर गए थे; सो कथा विख्यात है ही । (च) कहें कुम्भज, कहँ सिन्धु अपारा। सोखेउ विदित सकल संसारा ॥ आज भी पाप का नामही लेते महा अजीर्ण को- भागता है । श्री पार्वती जी और महादेव जी के विवाह उत्सव में<noinclude></noinclude> j8b69j3w13r6icro6tgec1wp5619e1a पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७३ 250 194040 664261 2026-07-02T16:26:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664261 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>S 18000- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । --900 जब गिरिराज हिमाद्री के हां देवतों दानवों पादिक के इकट्ठे होने पर उनके बोझ से धरती उत्तर की पोर नीची हो गई, तो सब की प्रार्थना से परम समर्थ श्रीअगस्ति जी दक्षिण को चले गए; तब पाप हो के प्रभाव से पृथ्वी दक्षिण की ओर नीची हो गई ॥ नदान न करके केवल मणि सुवर्ण वसन भूष- खादि दान करने पर भी एक व्यक्ति बड़ी दुर्गति को प्राप्त हुआ था; सो उसका उद्धार महामुनि श्री प्रगस्ति जी ही महाराज ने कराया । और उसके दिये भूषणों से आपने श्री प्रभु की पूजा की। श्री सीताराम नाम का माहात्म्य, श्रीपगस्त जी ने कहा भी है और श्री शेष जी की सभा में देवतों तथा मुनियों को आपने नामप्रभाव दिखा भी दिया है । देवतों की प्रार्थना पर श्रीपगस्त भगवान् ने ही मन्दराचल (विन्ध्यगिरि) को प्राज्ञा दी जिस्केपन- सार वह चल प्याज तक वैसा ही पड़ा का पढ़ाही जैसा पाप को साष्टाङ्ग दण्डवत करने के समय गिरा था। श्री हनुमान जी, श्रीशिव जी, और श्रीब्रह्मा जी, जिस प्रकार से श्रीपगस्त जी महाराज की महिमा आते हैं, वैसी और कोई क्या जानेगा ? आप के शिष्य श्रीसुतीक्षणादि की ही भक्ति प्रीति की व्याख्या तो अपार है फिर स्वयं आप की तो वार्त्ताही क्या ? 308<noinclude></noinclude> 4yz62us9a1oakj142i7phjkygbi9ewf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७४ 250 194041 664262 2026-07-02T16:26:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664262 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>809 श्रोभक्तमाल सटीक । ३०९ लंका में, सर्कार पर कृपा करके राक्षस प्रेरित शस्त्रों से रक्षा की है; और श्री प्रादित्य हृदय पढ़ाया है कि जिसकी महिमा प्रसिद्ध ही है । (चौ०) दीन दयाल दिवाकर देवा । कर मुनिमनुज सुरासुर सेवा ॥ हिम तम करि केहरि करमाली । दहन दोष दुख दुरित रुजाली ॥ कोक कोकनद लोक प्रकाशी। तेजप्रताप रूप रस राशी ॥ सारथि पंगु दिव्य रथ गामी । विधिशंकर हरि मूरति स्वामी ॥ बेदपुराण प्रगट यश जागे । तुलसी राम भक्ति वर मांगे ॥ छारराय में, प्रभु ने स्वयं पापं के प्राश्रम में जाके आप को दर्शन दिया है । श्री अयोध्या जी में राज्याभिषेक के अनन्तर श्री- अगस्त जी से प्रभु ने अनेक कथा, तथा श्रीमहाबीर हनुमान जी के सुयश सुने हैं। श्रस्य गुणग्राम, वेद तथा पुराणों में विदित । श्रीसीताराम जी की पूजा भक्ति के प्राचार्य महा- मुनस्य भगवान् को जय जय ॥ [ सवैया] पूरण ब्रह्म बताय दियो जिन एक पखंड है व्यापकसारे । रागद्वेष करे पब कौन सो जोई है मूल सोई सबडारे ॥ संशय शोक मिट्यो मनको सब- तत्त्वविचारि को निरधारे। "सुन्दर" शुद्धकिये मल- धोके है गुरुको उर ध्यान हमारे ॥ -900<noinclude></noinclude> cypahy9e2tc6xyvlptncbemi3bw43az पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७५ 250 194042 664263 2026-07-02T16:26:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664263 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१० श्रीमान्दु स्वाद । श्री पुलस्त जी श्रीजी, श्री ब्रह्मा जी के पुत्र हैं। गृहस्थाश्रममें रह, पुत्र उत्पादन कर, बेटों को विद्या पढ़ा, आपने मोक्षपद का साधन किया ॥ श्रीपुलहजी । श्रीपुलह जी श्रीपुलस्त जी के भाई हैं। इन ने भी अपने भ्राता ही के सरिस आचरण किये ॥ श्रीच्यवन जी । श्री च्यवन जी, बन में रह, भगवान के ध्यान समाधि में ऐसे निमग्न हो गए कि उनके शरीर भर में दीमकों ने मिट्टी का ढेर (बालमीक) लगा दिया । उसी बन में राजा शर्याति प्राखेट की गया । उस्को कन्या तथा कुछ सेना भी साथ थी। उस कन्या ने उसी मिट्टी के ढेर (बलमीक) में कुछ चमकती सी 'वस्तु देख के कौतुक यश उसमें लकड़ी खोद दो । उस्में से रुधिर निकल पाया। लड़की बहुत डरी और चुपचाप अपनी सेना में भाग आई । मुनि के उद्वेग पाने से, राजा तथा उसके सब साथियों का अपान वायु रुक गया। इस प्रकार से est पतिकष्ट होने के कारण की, बुद्धिमान राजा 310<noinclude></noinclude> mct32mq75hk72fdvqabundyonpwx2u7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७६ 250 194043 664264 2026-07-02T16:27:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664264 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>311 1.800. श्रीभक्तमाल सटीक । ३११ ने यह ठीक ठीक अनुमान कर लिया कि “किसी ने यहां के किसी तपस्वी का कोई अपराध अवश्य किया है; तब राजा इसकी पूछ जांच करने लगा । राजकन्या ने विनय किया कि “पिता जी ! मुझ बालिका की पज्ञता से एक तपस्वी के नेत्रों में लकड़ी चुभ गई है। मुझे उसका बड़ा ही पश्चाताप तथा भय है ।" श्री जी की सेवा में [उस कन्या को साथ लिये ] जाके, नृपति ने, स्तुति प्रार्थना की। मुनि प्रसन्न हुए। श्रीराम कृपा से सब का कष्ट जाता रहा । राजा, मुनि महाराज को वह कन्या दान कर, अपनी राजधानी श्री अयोध्या जी में लौट आए। स्वपत्नी के तोषार्थ, श्रीच्यवन ऋषी जी हरि- कृपा से पश्वनी कुमार की सहायता से युवा अवस्था को प्राप्त हो, विषय भोग करने लगे । यद्यपि मुनि जी शरीर से तो इतने बड़े भोगी थे, तथापि वास्तव में मन के निर्दोष और परम विरक्त ही थे, क्योंकि भोगाभोग सुख दुख से निर्द्वन्द्व थे । (लोक) सुखदुःखे समेकृत्वा, लाभालाभी जयाजयी । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पाप मवाप्स्यसि ॥ १ ॥ (दो०) “ तुलसी" सीताराम पद, लगा रहे जो नेह । घर घटनबाट में, कहूं रहे कि न देह ॥ (सवैया) क्षीबरु पुष्ट शरीर को धर्म जो शीतहु उष्ण जरामृतठाने । भूख दषा गुण मास को व्यापत-<noinclude></noinclude> n6ozgehpgijujh7s8677ve9658hxt15 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७७ 250 194044 664265 2026-07-02T16:27:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664265 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१५ 10000.. श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । शोकमोह भय मनपाने | बुद्धि विचार करे निशि बासर चित्तचितेसे अहं अभिमाने । सर्वको प्रेरक सर्व को साक्षिजु "सुन्दर" आप को न्यारोहि जाने ॥ १.५ एकही कूप ते नीरहि सोंचत ईख अफीम हि अम्ब नारा। होत वही जलस्वाद अनेकनि मिष्टकटूकनि खट्टकखारा । त्योंहिं उपाधि संघोगते पातम दीसत surface सविकारा | काढिलिये सुबिबेक बिचार सो "सुन्दर" शुद्धस्वरूप है न्यारा ॥ २ ॥ भगवत कृपा से दम्पति भगवद् भजन से ( चौ० ) रघुपति चरण प्रीति प्रति जिनहीं । विषय भोग बरा करे कि तिनहीं ॥ म चूके वरंच भजन प्रभाव से भगवदुधाम को गए। श्रीवशिष्ठ जी । "बड़ वसिष्ठ सम को जग माहीं" ॥ मुनीश्वर पनन्तश्री वशिष्ठ जी महाराज श्रीब्रह्मा की के पुत्र, श्री रघुकुल के गुरु हैं। आप प्रायः सब शास्त्रों के प्राचार्य हैं। स्वर्ग और भूमि के बीच पकाश में बहुत दिन स्थित रह के पाप ने युगल सरकार का भजन किया है । “सो गुसाई विधिगति जिन फेंकी” । अपने मजन प्रभाव से एक दूसरे ब्रह्माण्ड में जाके वहां के ब्रह्मा जी से मिले हैं। 812<noinclude></noinclude> ac6yma0egatqxl46kknk1fy47ouiy3c पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७८ 250 194045 664266 2026-07-02T16:27:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664266 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>313 श्रीभक्तमाल सटीक ३१३ --0008 उपदेश आदि के लिये आप कई शरीर धारण किये हुए कई स्थान पर रहते हैं; जैसे, (१) ब्रह्मलोक में; (२) धर्मराज की सभा और (३) श्रीअवध में । (४) " सप्त ऋषियों" में भी माप हैं। इत्यादि श्री विश्वामित्र जी अपार तप करने पर भी “ब्रह्मर्षि" तो तब हुए, कि जब आप (भगवान् श्री १०८ वशिष्ठ जी) ने उनको "ब्रह्मर्षि" कहा। परमाचार्य जगद्गुरु महर्षि श्री १०८ वशिष्ठ जी महाराज की, तथा अपने २ श्रीगुरु महाराज की, महिमा को जो बिचारे सो परम बड़भागी है । (क) जगमें न कोऊ हितकारी गुरुदेवसों ॥ बूढ़त भव- सागर में प्राय बँधावेधीर पारहूलगायदेत नावको ज्यों खेव सों । परउपकारी सब जीवनके सारेकाज कबहूँ न पावे जाके गुणनको छेवसों । बचन सुना- कर भ्रम दूर करे "सुन्दर" दिखायदेत पलख भेव । औरहूसुनेहि हम नीके करि देखे शोधि जगमें न कोऊ हितकारीगुरु देवसों ॥ १ ॥ गुरुकी तो महिमा है अधिकगोबिंदते । गोबिंदके कियेजीव जात हैं रसातल को गुरु उपदेश सोतो छूटै यमकंदते । गोबिंद के किये जीव यशपरे कर्म- नके गुरुके निवाज सूं तो फिरतसुकंदते । गोबिंद के किजीव बृतभवसागर में "सुन्दर" कहत गुरु कार्ड "दुखद्वंदते । कहांदी बनाय कछु मुखते कहूं जू मीर,<noinclude></noinclude> 8ww485drdqvdtq6q3eh0g0fpg811219 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३७९ 250 194046 664267 2026-07-02T16:27:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664267 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६१४ श्रीमतिसुघाबिन्दु स्वाद । मुरुकी तो महिमा है अधिक गोबिंद ॥ २ ॥ पाप का "योग वाशिष्ठ संज्ञक ग्रन्थ प्रसिद्ध ही है । (दो०) "श्रीवशिष्ठ मुनिनाथ यश, कहीं कवन मुँह लाय । जिन्हें स्वयं श्री राम ही, लीन्हो गुरु बनाय ॥१॥ (to) "राम ! सुनहु मुनि कह कर जोरी। “कृपा धु ! fort कछु मीरी ॥ महिमा अमित वेद नहिं जाना । मैं केहि भांति कहउँ भगवाना ! ॥ उपरोहिती धर्म पति मन्दा । वेद पुरान सुमृति कर निन्दा जय न लेउ मैं तब विधि मोही । कहा 'लाभ पागे सुत ! तोही ॥ परमातमा ब्रह्म नर रूपा । होइहि रघुकुलभूषन भूपा ॥ (दो०) तब मैं हृदय विधारा, जोग जज्ञ व्रत दान । जाकहँ करिय सो पहउं, धर्म न एहि सम पान ॥ (चौ०) तवेपद पंकज प्रीति निरन्तर । सब साधन कर यह फल सुन्दर ॥ दक्ष सकललच्छनजुत सोई । के पदसरोजरति होई ॥ [ दो०] नाथ ! एक वर मांगउं, राम ! कृपा करि देहु । 'जनम जनम प्रभुपद कमल, sages जनि नेहु' ॥ * श्री सौभरि जी । श्रीसौभरि जी की कुछ कथा, श्री मान्धाता जी की कथा के अन्तर्गत (पृष्ट २७८ में) चुकी 814<noinclude></noinclude> cxce52vaskgpnv858c85a5y7lyrjoqz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८० 250 194047 664268 2026-07-02T16:27:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664268 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>815 श्रीभकमाल सटीक -३१५ श्रीसोभरी जो को जल में मछलियों का विलास देख के विषय वासना हुई। श्रीमान्धाता जी (पृष्ट२०८) की कन्यायों को तप से अपना युवा स्वरूप दिखा के प्रसन्न कर, उनके पितासे मांगलिया; और अपने तप प्रभाव से बड़ा विभव रचके उनमें उन पचासों सहित बास किया । बहुत दिन भोग विलास करने पर मोह निशा से नींद टूटी पर राम कृपा से तम्र मुनिजी महाराज पश्चाताप करने तथा सोचने विचारने लगे कि - (दो०) दीप शिखा सम युत्रति जन, मन जनि होसि पतंग | भजसि राम तजि काम मद, करसि सदा सत संग || • (सवैया) हे तृष्णा ! पय तौ करितोषा | बाद वृधामटके निशियासर दूरिकियो बहू नहिं घोषा । तू हति- यारिनि पापिनिकोढ़िनि सांच कहूं मतिमानहिं शेषा । तोहिमिले तब भयो बंधन तू मरिहै तयहीं होयमोषा "सुन्दर" और कहा कहिये स्वहिं हे तृष्णा ! पती- करितोषा ॥ १ हे तृष्णा !! त्वहिं नेक न लाजा ॥ तूही भ्रमाय प्रदेश पठावत बूड़तजाय समुद्र जहाजा । तूही भ्रमाय पहाड़ चढ़ावत वाद वृथा मरिजाय काजा । लोक नचायभलीबिधि मांड़किये सबरंकहुराणा ।<noinclude></noinclude> i4d6ao1du3wjdwyx5cgqdkbgieg3pg1 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८१ 250 194048 664269 2026-07-02T16:27:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664269 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१६ Boe श्रीमान्दु स्वाद । “सुन्दर" एतो दुखाय कहीं रूपय हे तृष्णा ! त्वहिं नेक न लाजा ॥ २ ॥ भह कमान सयान सुठान जो नारि बिलोकनि धाण ते यांचे । कोप कृसानु गुमान घ्पवा घट जे, जिनके मन सांच न प्रांचे ॥ लोभ सबै नट के वश हूँ, कपि ज्यों जग में बहु नाच न नांचे । नोकेहैं साधु सबै, “तुलसी,” पै तेई रघुबीर के सेवक सांचे ॥ ३॥ (वि० प०) अबलो नसानी पब न नसैहों ॥ &c. &c. ॥ इनकी उन स्त्रियों को भी विराग उत्पन्न हुरुपा; श्रीसीतारामजी का भजन करके प्रापने और उन सब की सब ने परमधाम पाया ॥ श्री कर्द्दम जी । श्रीकर्दमजी श्रीब्रह्मा जी की छाया से प्रगट हुए। श्री ब्रह्मा जी ने सृष्टि की आज्ञा दी, पर इनको इनके तीव्र वैराग्य ने गृहस्थाश्रम अंगीकार करने म दिया। और वे बम में जाकर तप करने लगे । प्रभु ने दर्शन दिया । रामचरण पंकज अब देखे । तब निज जन्म सफल करि लेखे ॥ प्रभुने पाज्ञा की कि "परसों स्वायम्भू मनु तुम्हारे पास श्राकर अपनी लड़की देवहूति (पृष्ट २०३ ) तुम्हें देंगे; स्वीकार कर लेना । 'ताके में हीं अवतारा । करिहीं योग ज्ञान परचारा ॥ * 816<noinclude></noinclude> b8jkkvslxbhcn8n6ykzsr27ojm5zqx5 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८२ 250 194049 664270 2026-07-02T16:28:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664270 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>317 600- श्रीमतमाल सटीक । ३१७ श्री देवहूति जी की सेवा से प्रसन्न होकर, आप (श्री- कर्दम जी) ने विश्वकर्मा से एक विमान बनवाया तथा श्रीदेवहूति जी की सेवा के अर्थ सहस्र सुन्दरियां भी प्रगट सब समेत विमान में बसके भोग विलास करते लोकों में विचरने लगे। श्रीदेवहूति जी को पति सुख दिया । (दो०) धर्मशील हरिजनन के दिन सुखसंयुत जाहिँ । सदासुखीप्रति मीनगण, जिमि अगाध जल माहिँ ॥ दम्पति से श्री कपिल भगवान ( पृष्ट ६१ ) ने तार लिया; और ( नव) लड़कियां भी हुई । जिनका विवाह श्रीब्रह्मा जी के ९ (नव) बेटों से हुआ- (१) श्रीपरुन्धती जी से श्रीवसिष्ठजी महाराज का; (२) श्रीकला, मरीचि जी; (४) श्री श्रद्धा, अङ्गिरा जी (६) श्रीगति, पुलह जी; (८) श्रीख्याति, भृगु जी; (३) श्री अनुसूया, प्रत्रि जी (५) श्रीहवी, पुलस्त जी; | (७) श्रीक्रिया, क्रतु जी, (९) श्रीशान्ति, अथर्वनजी ॥ श्रीकर्द्दम जी, पपनी धर्मपत्नी देवहूती जी को यह आशिष देकर कि "भगवान श्रीकपिलदेव (तुम्हारे पुत्र) अपनी माता का (तुम्हारा) भवबन्धन छुड़ावेंगे”, पाप परम विरक्त हो, बन में जा, भगवत चरण- कमल के परम अनुरक्त हुए श्री अत्रि जी श्री अनुसूया जी । श्रीजी श्रीब्रह्माजी के पुत्र हैं। आपने<noinclude></noinclude> 2hcwhxm4t4jhsk1c5g98laksfeblef0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८३ 250 194050 664271 2026-07-02T16:28:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664271 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीमतिधाविन्दु स्वाद । 318 अपनी धर्मपत्नी श्रीमनुसूया जी सहित महेन्द्रा चल पर है (श्रीचित्रकूट में ) तप किया । पापनिज सपयल से श्रीसुरसरिधार मन्दाकिनी जी, पयसरनी जी, को लाई । श्रीपत्रिजी श्रीजी ने चाहा कि जगदीश मेरे पुत्र हों । हरि ने विधि हर युत कृपा करके दर्शन तथा बरदान दिया कि "बहुत अच्छा, श्रीअनुसूया जी के गर्भ से 'हमतीनों' के अंशावतार होंगे”। सो, वैसा ही हुआ, अर्थात् (१) श्रीविष्णु भगवान् के अंश से "दत्तात्रेय जी (पृष्ट६१); (२) श्रीब्रह्मा जी के अंश से "चन्द्रमा" मुनि जी; स्पोर (३) रुद्रांश से श्री दुर्वासा जी । श्रीमनुसूयाजी और श्री पनि जो को पभिलाषा हुई कि श्रीसीताराम जी के दरशन पाऊं । लाल लाडले श्री लखन जी सहित भक्तवत्सल श्री सीताराम जी ने आप के आश्रम पर जा दर्शन दिया। सो श्री "रान- चरितमानस" से सब प्रेमियों को विदित ही है ॥ श्री गर्ग जी । श्रीगर्गाचार्य जी ने बड़ा तप किया। बहुतों विद्या पढ़ाई । यदुवंश के पुरोहित और श्रीकृष्ण भगवान् के गुरु हैं । श्रीगर्ग संहिता में श्रीकृष्ण भग- वान् के पति मनोहर परित लिखे हैं । " गर्ग संहिता” विख्यात ग्रन्थ, सुन्ने योग्य है ! 1000-<noinclude></noinclude> 6q5urhs8v6cpp5aik6k9iv1wz8ox1bj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८४ 250 194051 664272 2026-07-02T16:28:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664272 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>319 श्रीमतमाल सटीक श्री गौतम जी । । श्री सरयू के तट पर जहां, ( गोदना सेमरिया ), कार्त्तिक पूनो को बहुत सन्त और लोग एकट्ठे होते हैं और पहल्या जी की सुन्दर मूर्त्ति है, वही श्री- गौतम जी का आश्रम है । आप "न्यायशास्त्र" के प्राचार्य हैं। गुणवती पादरणीया सुशीला परमसुन्दरी श्रीमहल्या जी "पंच कन्यायों" (१ पहल्या २ द्रौपदी; ३ तारा; 8 कुन्ती; ५ मन्दोदरी ) में से, प्रसिद्ध हैं ही; बहुतों आप की चाह की तब श्रीब्रह्मा जी ने आज्ञा दी कि "जो एक दगड (२४ मिनिट ) भर में : त्रिभुवन की परिक्रमा कर पाये उसोको यह कन्या दी जावे । " ने श्रीगौतम जी की सालिग्राम जी में लौकिक निष्ठा थी; उनके सालग्राम जी ने पाज्ञा की कि तू मेरी प्रदक्षिणा कर ले; इन ने ऐसाही किया । इन्द्रादि जो अपने अपने बाइन ऐरावतादि पर सहर्ष चले थे, सध ने अपने अपने मागेही श्री गौतम जी को हुए देखा और सब ने उनका अग्रगण्य होना स्वीकार किया । इन्द्रादि हाथ मलते रह गए, और गौतम जी का विवाह श्रीमहल्या जी से, हो गया । श्रीमती की कृपा से श्री अहल्या जी को प्रभु मे दर्शन दिया । जाते 0.00<noinclude></noinclude> j8r376s8yss1voco0batc8kerbl0cpo पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८५ 250 194052 664273 2026-07-02T16:28:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664273 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२० श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । -900 एक समय बड़े दु:काल में पंचवटी से भाग के मुनिवृन्द श्रीगौतम जी के आश्रम में आए। तप बल से आप सब का पातिथ्य और बहुत सत्कार करते रहे । पाप के ही पुत्र महामुनि श्रीशतानन्द महाराज जी हैं, कि जो परमपुनीत श्रीनिमिवंश के गुरु हैं ॥ श्रीशुकदेव जी । श्री व्यासशिष्य अर्थात् परमहंस श्रीशुकदेवजी की कथा पृष्ट ५ । ९२ में देखिये । गऊ के दूध दुहने में प्रायः जितना काल लगता है, आप उससे अधिक काल पर्य्यन्त एक समय कहीं नहीं बिलम्बते रुकते हैं। पाप अमर हैं ॥ श्रीलोमश जी । श्रीलोमश जी के प्रायु की दीर्घता प्रख्यात ही है । श्रीलोमश जी यमुना जी के तट पर तप कर रहे थे, श्रीकृष्ण भगवान् का बाल चरित देख के भ्रम यश हुए कि “ये परमेश्वर कैसे कहे जाते हैं? " रूपतः हरि ने उनको अपने स्वांस से खींच कर अपने में छानेक ब्रह्माण्ड तथा अनेक लोमश पर बहुत से पदभुत चरित्र दिखाए, जिसे कल्पान्त पर्य्यन्त देखते देखते ये प्रति घबराए, व्याकुल हुऐ, तब कृपासिन्धु ने इनको स्वांस हो द्वारा बाहर कर दिया। इनको वे कई कल्पान्त केवल एक क्षण मात्र सरीखा जान पड़ा । 8000 820<noinclude></noinclude> 0xr4qah1xp92r2z2wa5iq5swl7vg0o9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८६ 250 194053 664274 2026-07-02T16:28:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664274 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>821 18600- • श्रीमतमाल सटीक भ्रम से छूट प्रभु की स्तुति की भक्ति बरदान लिया । ३२९ इनने भगवत् की माया देखनी चाही, और श्री- महारायण से अपना मनोरथ निवेदन किया । भगवत की इच्छा से प्रलयादि देखा; जब बहुत बिकल हुए, हरि ने माया लग की । तब इनने ज्यों का त्यों' अपने को पाया और सब पदभुत चरित्र को एक क्षण मात्र का खेल जाना | बड़ी स्तुति की। “चिरंजीवी मुनि" यह नाम और घर पाया । एक समय अपने चिरंजीवित्व वा दीर्घायुता से कुला कर इनने अपना मृत्यु भगवान् से मांगा । प्रभु ने उत्तर दिया कि "यदि जलग्रह्म की वा ब्राह्मण की निन्दा करो तो उस महा पातक से मर सकते हो ।” इन कहा कि आश्रम में जाता हूं वहां पहुंच कर ऐसाही करूंगा। मार्ग में मगवत इच्छा से इनने घोड़ा सा जल देखा जिसमें शूकर के लोटने से अतिशय मलीनता पाई थी, पर एक स्त्री भी देखी जिस्के गोद में दो बालक थे । इनके देखते ही देखते उसने पहिले एक बालक को दूध पिलाया फिर अपना स्तन धोकर तथ दूसरे बच्चे को । लोमश जी ने इस्का कारण पूछा; उसने कहा कि "यह एक पुत्र तो ब्राह्मण के तेज से है, और वह दूसरा दुसाध [ नीच जाति] से अर्थात् मेरे पति से जन्मा है; अतएव धोए स्तम का दूध पिलाया है । " ४१ खोद्भव को<noinclude></noinclude> 901cxdzgk1uk089ppkusgyvcvkwrt00 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८७ 250 194054 664275 2026-07-02T16:29:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664275 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-३२२ श्रीमतिसुधाविन्दु स्वाद् । श्रीलोमश मुनि जी का नियम था कि ब्राह्मसं का चरणोदक नित्य अवश्य लेते थे। दूसरा जल वा दूसरा ब्राह्मण वहां मिला नहीं; मुनि महाराज ने उसी जल से उसी ब्रह्मवीर्य्य-से-उत्पका बालक का चरणामृत ले लिया | उसी देशकाल में, प्रभु प्रगट हो घोले कि "तुमने जब ऐसे जल को भी आदर दिया और ऐसे ब्राह्मण के चरण सरोज की भी भक्ति की, तो तुम जल वा विप्र के निन्दक कब हो सकते हो ? मैं तुमसे अति प्रसन्न हूं प्यार मासीस देता हूं कि विप्रप्रसाद तुम 'चिरंजीव' ही बने रहोगे ।" (ची०) जे नर विप्ररेणु सिर घरहीं । से जनु सकल विमव यश कर हीं ॥ रेमन ! पाजकल के एक प्रकार के बुद्धिमानों की बातें ล सुन, नहीं तो ब्राह्मखों के चरणरज की यह महिमा तु भूल ही जायेगा "इरितोषक व्रत द्विज सेवकाई" ॥ (चौ०) पुण्य एक जग महँ, नहिँ दूजा । मन क्रम वचन विप्र पद पूजा ॥ श्री ऋचीक जी । भृगुवंशी “ श्री ऋचीक जी" ने श्रीगाधिजी से उनकी सुता (श्री विश्वामित्र जी की बहिनि ) श्री "सत्यवती” जी को माँगा। उनने विचारा कि 'कम्पा 8000- 322<noinclude></noinclude> b1kacjeovurytbzt8uvjgcdtatdwl1d पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८८ 250 194055 664276 2026-07-02T16:29:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664276 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>323 18000- श्रीभकमाल सटीक २२३ तो छोटी है और मुनि बूढ़े हैं, परन्तु सीधे २" नहीं” कहने में मुनि के क्रोध का भय है; मतः उनने इनसे कहा कि " यदि पाप १००० [ एक सहरू ] श्यामकर्ण घोड़ लाइये तो मैं आप को अपनी कन्या दूं। कह इस बात को असम्भव जान्ते थे । पर, मुनि ने "श्रीषरुख जी' से मांग के, सहल श्यामकर्ण घोड़े बिना प्रयास उनके सामने प्रस्तुत करदिये; तब तो उन्हे लड़की देनी ही पड़ी। मुनि जी श्री सत्यवती सी धर्मपत्नी पा पतीव प्रसन्न हुए । अपनी सास ( श्रीगाधिजो की खी) की, तथा अपनी धर्मपत्नी की प्रार्थना से, आपने दोनों को क्षीरान मन्त्रित करके दिया, कि जिस्में उनकी प्रिया को ब्राह्मण और उनकी सास को क्षत्री प्रसव हो । परन्तु ईश्वर की इच्छा से मां बेटी ने अपना उपना भाग क्षीरान पलट दिया। आपने यह बात जान ली, और अपनी ही से कहा कि तुमने अयोग्य कार्य्यं किया, अब तुम्हारे सत्वगुणो पुत्र महीं होगा किन्तु राजस- तामस - प्रकृति का होगा । पुनः, श्रीसत्यवती जी की प्रार्थना के अनुरूप प्रा पने यह घर दिया कि "अच्छा, पुत्र तो राम कृपा से समदर्शी परन्तु पीत्र बड़ा क्रोषी होगा" । इसी आशीर्वाद से पुत्र तो श्रीसीताराम कृपा से श्री यम-<noinclude></noinclude> o0nn2z3p03r3269dg0y5t96iq5odo3k पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३८९ 250 194056 664277 2026-07-02T16:29:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664277 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>172 श्रीम दग्नि जो सरिस किन्तु पौत्र परशुराम जी सरीखा हुए; तथा गाधिजी के पुत्र श्री विश्वामित्र जी इव । पस्तु श्री ऋचीक मुनि जी बड़े प्रभावशाली और भग- वत भक्त थे । प्राप के समागम से गाधिजी भी हरि- भक्त हो गए । [सवैया] संतनको जु प्रभाव है ऐसी ॥ जो कोउ प्रावत है उनके ढिग ताहि सुनावत शब्द संदेसी । वाहिको तै- सही पोषध लावत जाहिको रोगहि जानत जैसो ॥ कर्म कलंकहि काटत हैं सब शुद्धकरें पुनि कंचन पैसो । सुन्दर तत्व विचारत हैं नितः संतन को जु प्रभाव है ऐसो ॥ श्रीभृगु जी । श्रीभृगु ऋषि जी श्रीनारदजी के उपदेश से बड़े भगवद्भक्त हुए। ये बहुत सी विद्याओं के प्रभार्य्यं हैं । इन परीक्षा के अर्थ भगवान् की छाती में लात मार कर ब्राह्मणों की महिमा और भगवंत का अपार सर्वो- रकृष्ट ब्रह्मण्यदेवत्व यश प्रगट किया है । प्रभु ने इनकी त्रिकालदर्शी ऐसा पासीस दिया है ॥ श्री भृगु जी का माहात्म्य प्रगट ही है कि (लोक) “महर्षीणां भृगुरई, गिरामस्म्येकमक्षरम् । 60. 824<noinclude></noinclude> fgea4mjczwpxmxwglw8zwhxz4u1efem पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९० 250 194057 664278 2026-07-02T16:29:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664278 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>885 000 श्री भक्तमाल सटीक । ३२५ याज्ञानां जपयज्ञोस्मि स्थावराणां हिमालयः” ॥ १ श्रीगीता जी में भगवत मे श्रीमुख से कहा है कि 'मैं महर्षियों में “भृगु" हूं; शब्दों में एकाक्षरी मंत्र ॐ [प्रोम् ] हूं; यज्ञों में जप यज्ञ हूं; और पहाड़ों में गिरि- राजहिमालय हूं श्री दालभ्य जी । विप्रवर श्री दालभ्य जी ने भगवान् श्रीदत्तात्रेय जो के उपदेश से श्रीसीताराम जी का भजन किया । प्रभु ने दर्शन दिया। हरि प्राशिष से दालभ्य संहिता दैहिक दैविक भौतिक तीनों तापों को छुड़ानेवाली और सकार्य सिद्ध करनेवाली है ॥ श्रीअङ्गिराजी । श्रीपङ्गिरा जी ने श्रीनारद जी के उपदेश से वासुदेव भगवान् की पूजा की । इनके टहस्पति जी 'पुत्र हुए, जिनकी अपनी जगह पर समझ के, भगवत का ध्यान करते हुए पापने भगवद्दाम पाया || श्री ऋषिङ्ग जी । श्रीऋषिशृङ्ग जी श्रीविभाण्डक मुनि के पुत्र हैं । इनने अपने पिता से विद्या पढ़ी। ये नित्य विपिन --00082<noinclude></noinclude> 7h2algzg7xx1k837v7tjhf9kd18sx4u पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९१ 250 194058 664279 2026-07-02T16:29:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664279 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२६ श्रीमतिसुषाबिन्दु स्वाद । ही में रहा करते थे, ग्राम पुरी नगर को खम में भी नहीं देखा था। बड़ेही वैराग्यवान थे । बंग देश से पश्चिम जो देश ( जिसमें विहार ) है 66 उस्को ही “अङ्ग” देश कहते हैं; उस्की राजधानी अभी तक पटना नगर है। वहां के राजा "श्री.रोमपाद" जी थे, उन में और चक्रवर्त्ति महाराजाधिराज प्रव- पेश श्रीदशरथ जी में परस्पर बड़ी मित्रता थी । श्रीरोमपाद जी की कन्या श्रीशान्ता जी थीं, जो प्रभु श्रीरामचन्द्र जी की भगिनी (बहिन) प्रसिद्ध* हैं। प्रस्तु । अङ्ग देश में दुःकाल पड़ा; ज्योतिषियों ने बताया कि यदि श्री शृङ्गीऋषि जी आयें तो यह महा अव- पंख मिटे, जल बरसे । निदान वेश्याओं ने बड़ी युक्ति की और बन से आप को पटने लाई । दुर्भिक्ष मिट गया । और विभाण्डक मुनि के भय से श्रीरोमपाद जी ने अपनी कन्या का विवाह श्रीशृङ्गिऋषि जी से कर दिया । और इस प्रकार इनके पिता को प्रसन्न किया ॥ जय श्री चक्रवर्त्ति महाराज को वंश न होने से खेद हुरुपा, तो- (चौ०) लुंगी रिषि हिँ बसिष्ठ बुलाया । पुत्र काम (सो०) श्रीमान् दशरो राजा शान्तां मान व्यजीजनत्। अपत्यकृतियां राजे लोमपादाय यां ददौ।<noinclude></noinclude> sv1zo64oi0hprrokpswsmh2a17vzw9x पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९२ 250 194059 664280 2026-07-02T16:29:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664280 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>327 श्रीमतमाल सटीक । ३२७ सुभ जज्ञ करावा ॥ तब, (दो०) विप्र धेनु सुर सन्त हित लीन्ह मनुज पवतार । निज इच्छा निर्मित तनु मायानगोपार ॥ श्रीमाण्डव्य जी । :- श्रीमाडष्य मुनि श्रीभगवत के अनुराग में रंगे प्रेम में मग्न ध्यान समाधि में थे, उनकी कुटी के पासही चोर सब चोरी के द्रव्य को बांट रहे थे । राजा सुकेतु के भट वहां पहुंचे, एक. चोरने फुर्ती से एक मणिमाला मुनि के गले में छोड़ दी । भटों ने मुनि समेत कई चोरों को पकड़, न्याय कर्त्ता तथा राजा की आज्ञा से सब के सब को सूली पर चढ़ा दिया। मुमिः हरिस्मरण में मग्न थे इस्की कुछ सुधि न हुई । सब चोर मर गए, पर मुनि की फांसी तीन बेर टूट २ गई। राजा ने, “एक चोर का मुनि के शेष में होना तथा सूरी पर चढ़के भी उसका जीते ही बचना" सुन के, उस्को पपने सामने लाने की आज्ञा दी । चोर के भ्रम में, वा कर्मचारियों के अत्याचार में, अथवा पूर्व कर्म के फन्दे में, पड़े हुए भी माजव्य जी, राजा के सामने लाये गए । मुनि जी को पहिचान, घर घर कांपता हुआ राजा सिंहासन: सेउठ शीघ्र आप के पद पंकज पर सीस घर<noinclude></noinclude> 9t08df3pzvei597k1g4d443bqhddqe4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९३ 250 194060 664281 2026-07-02T16:30:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664281 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२६ 13000- श्रीभक्तिचाबिन्दु स्वाद । 328 हाथ जोड़ सजल नयन हो अपराध की क्षमा मांगने • लगा। महामुनि ने धीरे से कहा कि "राजा ! तेरा कुछ . दोष नहीं; यह यमराज की चूक है; मैं अभी जाके इसका उत्तर उस्सेही पूछता हूँ " । मुनि के क्रोध से डर यमराज ने हाथ जोड़ कहा कि "मुनिनाथ ! यह पाप के पूर्व जन्म की बालमवस्था के दोष का फल था, कारण जो आपने एक पतंगे ( फरफुंदे ) के शरीर में नीचे से ऊपर तक एक कांटा छेद दिया था " । छाप बोले “रे मूर्ख ! अज्ञान वालक को भी तूने न छोड़ा, जिस्का दोष धर्मशास्त्र भी ग्रहण नहीं करता । शूद्र के योनि में जन्म ले, दासी पुत्र हो" । वही श्री- यमराज जी श्रीविदुर जी हुए बड़े भगवद् भक्त ॥ 'मुनि शाप जो दीन्हा पति मलकीन्हा ॥ " 6 श्रीमाण्डव्य मुनि भगवत भजन कर, शरीर तज परम धाम को गए । श्रीविश्वामित्र जी । पुत्र | . श्रीविश्वामित्र जी राजा थे, राजा गाधि के एक बेर राजा बिश्वामित्र नगर ग्राम देखते बन में गए । मुनीश्वर श्राशिष्ठ जी का आश्रम देखा। वहां इनकी सेना सहित मारा सरकार और पहुमई हुई। यह नन्दिनी<noinclude></noinclude> kyl8jiksx5xrzk5vipqd1qi7t3vczdj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९४ 250 194061 664282 2026-07-02T16:30:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664282 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>319 श्रीभक्तमाल सटीक । ३२९ या सबला नाम गऊ का प्रताप जानकर राजा ने गऊ. मांगी, पर ब्रह्मर्षिशिरोमणि ने नहीं कर दी। राजा मे . युद्ध किया। परन्तु, यद्यपि उस्की बड़ी भारी सेना थो तथापि राजा जीत न सका, पराजय पाया । तथ ब्रह्मर्षि की महिमा समझ उसने चाहा कि ब्राह्मख धनूं इसलिये पपार तप किया; और पत्त को, श्री वशिष्ठ जी महाराज की कृपा से, श्रीषिधि जी से विश्वामित्र जी "ब्रह्मर्षि” पद पाके बहुत प्रसन्न हुए । ३२६ तीन सौ छब्बीसवां पृष्ठ देखिये - कानपुर के जिले में बहीर स्टेशन से मकनपुर को जाना होता है, उसी में "शृङ्गीरामपुर धाम है; ऐसो प्रख्याति है कि मकनपुर "विभाजक ऋषि' का स्थान है उसमें लोग यह प्रभावित करते हैं कि जब राजा के कर्मचारियों से प्रेरित बेवायें बड़ी नौका पर चारूढ़ हो मधुर गान नृत्य करती हुई बाजे के साथ वहां का पहुंची, उस समय श्रीविभाण्डक जो कहीं दूर जाने के लिये अपने पुत्र के सर्वोपद्रव से रचार्थ एक मेड़रा O खीच कर चले गये थे। धीरे गा तट पर माय धान पहुंची। ऋषि जो मधुर अपूर्व गान सुनकर मेरे को उलंघन करके देखने चले | तो स्त्री जाति पुंजाति का भेदही नहीं जानते थे, तट पर जाकर खड़े २ गान सुनते रहे। इस भांति तीन दिन जाते आते रहे। मौका पर लगे गमलों के बच्चों के फल की जगह लड्डू लटकाये गये थे एक बेश्या ने उस में से कुछ फल से वर पषि को भेंट किया और कहा कि हमारे देश के ये फस ऋषि ने खाकर अपने स्वाभ के भी फल उन्हें उपहार किये। चौथे दिन पक बेक्षा ने कहा कि हमारे देश की यह रीति है कि अपने प्रेमियों से प्रेमी लोग ट है। जो तो कुछ जानतेही न थे, पासिम के साथही कुछ ऋषि का चित्त उस ओर खिँच गया, तदनन्तर वे मौका पर भी गान सुनने जाने लगे एक दिन ऋषि को राग सुनने में मन्य देश भने मौका छोड़ दी गई- परंच ऋषिको मौका के भीतर न जानपड़ा कि हम कहीं जाते है क्योंकि कधी उन्होंने मौका देखो न वो ॥ स्वस्थान में जब नाव कई दिनों के पीछे भा गई-तब ऋषि लोग नही जी को लेने गये-फिर द मिटाचारी की कथा तो विख्याती - 18000- ४२<noinclude></noinclude> j6yosm4d5invo54fio3d1gj8ultgyb9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९५ 250 194062 664283 2026-07-02T16:30:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664283 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३० 188600- safare स्वाद । 880 सो विभाण्डक के मेङ्गरा के स्थान में स्त्रो जाने से भस्म हो जाती इस चमत्कार को देख सुसलमानों ने स्वराज्य के समय उस पर अधिकार कार लिया | अब भी स्त्री जाति मात्र को भीतर जाने को मात्रा नहीं है, अद्यापि ari बड़ा मेला लगता है परन्तु मेसा दूसरेही अभिप्राय से होता है-यापिन्य विशेष होती है । श्रीविश्वामित्र जी को अब यह लालसा बाढ़ी कि- सियपियपद सरोज जब देखीं। सुकृत समूह सफल तब लेख | इस मनोरथ से यज्ञ करने लगे, पर ताड़का राक्षसी और उसके पुत्र सुबाहु यादि ने उपद्रव और उत्पात करना आरंभ किया । (चौ०) तथ मुनियर मन कीन्ह विचारा। प्रभु पव- तरेउ हरन महि भारा ॥ एहु मिस देखहुं प्रभुपद जाई । करि, निती पाउं दोउ भाई ॥ (सो०) पुरुष सिंह दोउ बीर हरषि चले मुनिभय हरन । कृपा सिन्धु मति धीर, अखिल विश्वकारन करन ॥ प्रभु ने आपसे प्रस्त्रादि विद्या पढ़ी, और आपको अनन्त श्रीगुरु वशिष्ठ जी सम ध्मादर दिया। जय, जय ॥ श्रीविश्वामित्र जी की स्तुति और क्या की जावे ? इस्से इति है कि (चौ०) जिन्हके चरन सरोरुहु लागी । करत विविध जप जोग विरागी ॥ तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते । गुरुपद कमल पलोटत प्रीते ॥ श्री दुर्वासा जी । श्रीपत्रि जी की कथा ( पृष्ठ ३१८) में लिखी जा 16000- 001<noinclude></noinclude> hax2md5o3k1i96oj7e0xo1nmvcqhbt6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९६ 250 194063 664284 2026-07-02T16:30:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664284 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>331 130-00- श्रीमतमाल सटीक और रुद्र के ३३९ चुकी है कि श्री दुर्वासा जी उनके पुत्र अवतार हैं। श्री ब्रह्मा जी प्रायः इन्ह के द्वारा, लोगों को शाप दिलाया करते थे। इनकी कथा पुराणों में बहुत हैं । समर्थ की इर्षा कौन कर सकता है ? भगवत के जितने काम हैं गूढ़ हैं उनका भेद जानना कठिन है ॥ श्री अम्बरीष जी के (पृष्ठ १२३) तथा श्री द्रौपदीजी के (पृष्ठ १८८) सुयश के प्रसङ्ग इस ग्रन्थ में भी हो चुकी है। में कुछ इनकी चर साठ सहल वर्ष तप किया, पूरे होने पर श्रीनन्द जी के घर लाए; माता श्री यशोमति जी ने प्रेम से पति उत्तम दधि, जिसमें से भगवत को पवाया था, आपको भी पवाया। श्रीदुर्वासा जी ने, अति प्रसन्न होकर, उनको “गोपाल कवच" पढ़ा दिया और वर- दान दिया कि इस कवच को जो पढ़ेगा वा इस्से जिस्को कार देगा सो तीनों तापों से बचेगा | श्री याज्ञवल्क्य जी । आप बड़े प्रतापी मुनि हैं। आपने पहिले श्री सूर्य्यनारायण से विद्या पढ़ी। किसी कारण से सूर्य्य भगवान् प्रसन्न हुए तो इनने सब विद्या उगल दी (वमन कर दिया) । यह पराक्रम देख प्रसा हो श्री रविदेव ने वर दिया कि जो तुम से वाद विबाद करेगा उस्का 100-<noinclude></noinclude> lsyjraoerlk72669bpfrydjxwlgm1gy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९७ 250 194064 664285 2026-07-02T16:30:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664285 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीमतिषामिन्दु स्वाद । 882 3600 सीस फट जागा । पृष्ट २८४ देखिये ॥ कह चुके हैं कि आपने श्रीराम चरित मानस (तथा अद्भुत रामायण) श्री भरद्वाज जी को सुनाए हैं। श्री जाबाली जी । आप श्री अवधेश जी के मंत्रियों में से थे । श्री यमदग्नि जी । श्रीमदग्नि ऋषि, भक्ति सहितम्यग्निहोत्र यज्ञ किया करते थे और इनकी रखी श्री रेणुका जी आपकी सेवा करती थीं। एक दिन, पति अप्रसन्न होके, आपने अपने पुत्र श्रीपरशुराम जी से आज्ञा की कि तू अपनी माता तू (रेणुका) का, तथा अपने दोनों बड़े भाइयों के, सीस अपने परशु से उतार ले । श्रीपरशुराम जी ने पिता की आज्ञा मान ली [दो०] “पनुचित उचित विचार तजि, जे पालहिं पितु न ते भाजन सुख सुयश के, बसहिं अमरपति ऐन ॥ आपने बहुत प्रसका ही पुत्र से कहा बरमाँग । पर शुराम जी ने माँगा कि " एक तो इन तीनों को जिला दीजिये, दूसरा यह वरदान दीजिये कि ये तीनों मुझ से सदैव भ्रांति प्रसा रहा करें ॥ श्रीसीताराम कृपा से ऐसाही हुआ । 100<noinclude></noinclude> kmby5zbznneue1jhn8fmdzo6jfj0zqa पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९८ 250 194065 664286 2026-07-02T16:30:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664286 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>888 श्रीमतमाल सटीक 1 २३३ श्री कश्यप जी । श्रीकश्यप जी श्री मरीचि मुनि के पुत्र हैं। भगवत ने पाप को दर्शन दे आज्ञा की कि सृष्टि उत्पन्न करो । कश्यप जी से बहुत कुल प्रगट हुए हैं कि जो " कश्यप गोत्र ” प्रसिद्ध है ॥ एक काश्यपी कल्प हुआ था जिसमें सब सृष्टि कश्यप जी से ही हुई थी। श्रीमार्कण्डेय जी । श्रीमार्कण्डेय जी ने प्रभु से विनय की कि मुझे पनी माया दिखाइये। देखा कि जल बाढ़ पाया और प्रलय हो गया, सर्वत्र जलमय, और कहीं कुछ नहीं । अपने को उस जल में इधर उधर बहते डूबते उतराते पाया | छानेक वर्ष पर्यन्त ऐसाही बीतने पर, एक वट वृक्ष के एक पसे पर बालक स्वरूप प्रभु का दर्शन पा, स्वांस द्वारा उनके उदर में जा, वहां पनेक अद्धभुत देख, पुनिबाहर या, बड़ी स्तुति कर, हरिकृपासे, हरि-की-उस-माया से निकले ॥ श्रीमायादर्श जी । कोई कहते हैं कि मायादर्श एक मक्तविशेष का ही नाम है। पर उनका पता तो कहीं चलता मिलता नहीं ।<noinclude></noinclude> lohl0oizh610azmdndnrg14h3he35zf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/३९९ 250 194066 664287 2026-07-02T16:31:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664287 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३४ 10:00- श्रीभक्तिसुधाविन्दु स्वाद । बहुतेरे बताते हैं कि मायादर्श श्रीषोमश जी, वा श्रीमार्कण्डेय जी हैं; क्योंकि दोनों ने माया देखी है। इन महात्मा की कथा पृष्ठ ३२० और ३३३ में देखिये श्रीपर्वत जीं । "पद्भुत रामायण" में लिखा है कि एक कल्प में इन्ही के शाप से श्रीलक्ष्मीनारायण जी ने पवतार लेकर रावण कुम्भकर्ण का वध किया । श्रीपराशर जी । श्रीब्रह्मा जी के पुत्र श्रीवशिष्ठ जी उनके पुत्र श्री शक्ति जी उनके पुत्र श्रपराशर जी हैं। प्रभु ने दर्शन दे के प्राज्ञा की कि "मैं तुम्हारापुत्र हूंगा । " श्रीपराशर जी ही के पुत्र श्रीव्यास भगवान् ( पृष्ट ६१ ) . हैं, जिनने पुराण बनाए हैं ॥ (पृष्ठ (ट) बप्पय । साधन साध्य सत्रह पुरान, फल रूपी श्री भागवत ॥ ब्रह्मविष्णु, शिव, लिङ्ग, पद्म, स्कन्द विस्तारा । वामन, मीन,' बराह,' अग्नि," कूरम" ऊदारा॥ गरुड़, " नारदी" भविष्य, " ब्रह्मवैवर्त, " श्रवण 334<noinclude></noinclude> nwlnohkxme3kvlzf3tvuro5bw4tdqjd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०० 250 194067 664288 2026-07-02T16:31:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664288 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>835 श्रीभक्तमाल सटीक । ३२५ : शुचि । मार्कण्डे, " ब्रह्माण्ड, "कथा नाना उपजै रुचि ॥ परम धर्म श्री सुख कथित चतुःश्लोकी निगम सत । साधन साध्य सत्रह पुराण, फलं रूपी श्रीभागवत " ॥ १३ ॥ (१) वार्तिक तिलक । ही पुराण, साधन रूप हैं; और अठारहवां पुराण श्रीमदभागवत साध्यफलरूपी है । तदन्तर्गत स्वयं श्री भगवत मुख कथित परधर्म ( भगवदुधर्म ) रूप "चतुश्लोकी भागवत" तो वेदों का सारांशही है। और वे १८ पुराण कैसे हैं कि कोई कोई प्रति विस्तार हैं, और सब उदार, परम पवित्र, और श्रवण करने से धर्मरुचि उत्पादक विचित्र हैं ॥ ( राजस ) ( सात्विक ) १ विष्णु पु० श्लोक २३००० ७ ब्रह्माण्ड पु०, १२००० ८ ब्रह्मवैवर्त्त ब्रह्मवैवर्त पु०, १८००० २ नारद पु०, ३ श्रीमागवत, २५००० ९ मार्कण्डेय ९ मार्कण्डेय पु०, ९५०० १८००० | १० भविष्य पु०, १४५०० 8 गरुड पु १९००० | ११ वामन पु०, १०००० ५ पद्म पु०, ५५००० | १२ ब्रह्म पु०, १०००० ६ बाराह पुण्, २४०१० ( तामस ) spooo १६४००० (श्लोक) “वैष्णवं, नार- ९३ मत्स्य पु०, १४००० दीय, तथा भागवतं | १४ कूर्म पु०, " १७०००<noinclude></noinclude> s22l9j3woew6j4y67umdd0jmk41kpne पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०१ 250 194068 664289 2026-07-02T16:31:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664289 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३६ श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । 236 शुभम् । गारुड़ज्जु, तथा १५ लिङ्ग पु०, ११००० पान, वाराहं शुभदर्शने ५१॥ तानि पुराणानि सात्वि- कानि मतानि मे । ब्रह्मागड, १६ शिव पु०, * २४००० १७ स्कन्द पु०, ८५००० १८ अग्नि पु०, १५००० १६२००० । मार्कण्डेयं तथैवच । भविष्यं वामनं ब्राह्मं, राजसानि निबोध मे ॥ २ ॥ मात्स्य, कौ, तथा लैङ्गं शेषं, स्कान्दं तथैवच । प्राग्नेयञ्च षडेता- | नितामसानि निबोधमे॥३॥ श्र । सा० १६४००० लोक रा० ७४००० श्लोक ता० १६२००० लोक जोड़ ४,००,००० श्लोक चार लाख लोक • कोई तो " माहेश्वर” नाम का एक उपपुराण कहते हैं, "शिव पुराण" नहीं बताते वरंच २४००० लोक का "वायु पुराण" लिखते हैं ॥ अठारहो पुराणों के झोकों की गिन्ती चार खास (४००००० ) प्रसिद्ध हो है ॥ (ई) बच्चय । दश आठ स्मृति जिन उच्चरी, तिन पद सरसिज भाल मो ॥ मनुस्मृति, ' अत्रे, वैष्णवी,' हारितक, यामी । याज्ञवल्क्य,' अंगिरा, शनैश्वर, 'साम- र्तक, नामी ॥ कात्यायनि " सांखल्य, " गौतमी, " वासिष्ठी, " दाखी, "सुरगुरु,"<noinclude></noinclude> iqhotfime11tf80drsjfx1urvad94ol पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०२ 250 194069 664290 2026-07-02T16:31:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664290 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>337 श्रीमतमाल सटीक । . ३३० आतातापि " ( शातातप), पराशर, " कृत" सुनि भाखी ॥ आशा पास उदार धी, परलोक लोक साधन सो । दश ग्राठ स्मृति जिन उच्चरी, तिन पदसरसिज भाल मी ॥ १४ ॥ ( ) २१३ वार्त्तिक तिलक | पठार स्मृतियाँ जिन महानुभावों ने कही हैं, उनके चरण कमल मेरे भाल (लाट) के भूषण हैं; सो वे स्मृतियां कैसी हैं कि पासा रूपी कठिन पास ( फांस ) के छुड़ाने के लिये उदार बुद्धि देने वाली- और लोक परलोक की साधन रूपा हैं- १ मनु स्मृति, १० कात्यायनस्मृति २ पात्र स्मृति, ११ सांखल्यस्मृति ३ वैष्णवस्मृति, ४ हारितस्मृति, ५ याम्यस्मृति, ६ याज्ञवल्क्यस्मृति, आङ्गिरसस्मृति, ८ शनैश्चरस्मृति; ९ सम्बर्तकस्मृति, १२ गौतमस्मृति, १३ वाशिष्ठस्मृति १४ दाक्ष्यस्मृति, १५ श्रार्हस्पत्यस्मृति, १६ तातपस्मृति, १७ पाराशर स्मृति, १८ कृतुस्मृति । हम अठारह के अतिरिक्त और कई प्रसिद्ध स्मृतियों (धर्मशास्त्रों) नाम- ४३<noinclude></noinclude> cbp3sk5kqwv6wn0k9isfjbuh8god13y पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०३ 250 194070 664291 2026-07-02T16:31:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664291 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३८ 800-00- श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । 888 are, atraert, aftgau ar, vent(ym), viften, negro, mizus, शंख, लिखित इत्यादि । वसिष्ठ, हारित, पाराशर, भारद्वाज, पर काश्यप इत्यादिक कई एक स्मृतियां "सात्विका" कही जाती हैं; आत्रेय, याज्ञवल्क्य, दाक्ष्य, कात्यायनि इत्यादिक, "राजस”; एवं गौतम, बार्हस्पत्य, सांधर्त, याम्य, इत्या- दिक " तामस" कहलाती हैं ॥ "दस पाठ स्मृति जिन उच्चरी तिन" के नाम- १ श्रीमनु जी १० श्रीकात्यायनजी २ श्रीमत्रि जी ३. श्रीविष्णु जी ४ श्रीहरित जी ११ श्री शांतल्य १५ श्रीयमराज जी ६ श्रीयाज्ञवल्क्य जी ७ श्रीमङ्गिरा जी ८ श्रीशनैश्वर जी ● श्रीसम्पर्त जी (2) ब १२ श्रीगौतम जी १३ श्रीवसिष्ठ जी १४ श्रीदक्ष जी १५ श्रीबृहस्पति जी १६ श्रीशतातप जी १० श्रीपराशर जी १६ श्रीकृमुनि जी । - पावें भक्ति नपायिनी, जेरामसचिव सुमिरन करें। धृष्टी, विजय, नीतिपर शुचिर विनीता । राष्टर वर्धन, निपुण, सुराष्टर परम पुनीता । अशोक, सदा<noinclude></noinclude> cn4ec8o5p00svedcm96ep4v3xhavq10 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०४ 250 194071 664292 2026-07-02T16:32:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664292 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रममा सटीक । * नन्दधर्मपालक, तत्ववेत्ता । मंत्रीव- र्ज सुमंत्र, चतुर्जुग मंत्री जेता । अना- यास रघुपति प्रसन्न, भवसागर दुस्तर तरें । पावें भक्ति नपायिनी जे राम सचिव सुमिरण करें ।। १५ ।। ( २ ) "चतुर्युग मन्त्री जेता"- चारो युगों के भूत वर्तमान भविष्य मन्त्रियों को जीतनेवाले । श्रीरामसचिव (मन्त्रिवर्ग) | वार्त्तिक तिलक | अनन्त श्री महाराजाधिराज श्रीरामचन्द्र जी के मन्त्रिवर्गों को, जो भक्त जन प्रभातादिकालों में नित्य स्मरण करते हैं, सो अबल श्रीरामभक्ति पाते हैं; और अपने परमभक्त सचिवों के स्मरण करने से श्रीरघुपति अनायास ( विन परिश्रम ) ही प्रसन होते हैं; रूपतः श्रीप्रभु की प्रसन्नता से दुस्तर संसार समुद्र को भी तर जाते हैं-श्रीधृष्टि जी,' श्री जयन्त जी, श्रीविजय जी, ये तीनों अतिशय नीतिशुक्त, परम पवित्र, तथा शिक्षित और नमः श्री राष्ट्रबर्द्धन" जी उभय लोक कृत्यों में परम प्रवीण; श्रीसुराष्ट्र' जी अतिशय पुनीत; श्री अशोक' जी सदा प्रेमानन्द युक्त; श्रीधर्मपालक' जी भगवत तत्वज्ञानी; इन सचिवों में<noinclude></noinclude> 82yohuddhkjouhyjpd7f7a5alpeu6v2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०५ 250 194072 664293 2026-07-02T16:32:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664293 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४० 15600- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । ad (परम श्रेष्ठ), अपनी बुद्धिविज्ञता सुनीतियुक्तता से चारों युगों के मन्त्रियों को जीतनेवाले श्री सुमन्त्रजी ॥ १ श्रीधृष्टि जी २ श्री जयन्त जी ३ श्री विजय जी ४ श्री राष्ट्रवर्द्धन जी ५ श्री सुराष्ट्र जी ६ श्री अशोक जी ७ श्रीधर्मपाल जी श्रीमन्त जी (लोक) दृष्टि जयन्ती विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्द्धनः । कोपी धर्मपालच सुमन्त्रश्राष्टमो महान् ॥ १ ॥ ( श्रीवाल्मीकि ) : पाठभेद - " पशोको" श्रीसुमन्त्र जी । श्री ६ सुमन्त्र जी के विवेक, महा विरह, प्रेम, चैपादिक गुण, श्री मानस राम चरित से सबकी विदित ही हैं। "तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी" । (चौपाई मन्त्रि हि राम उठाइ प्रबोधा । "तात ! चरम मत सम तुम्ह सोधा" || इत्यादि ॥ (27) शुभदृष्टि वृष्टि मोपर करौ, जे सहचर रघुवीर के ॥ दिनकरसुत हरि राज, वालि वळ, केशरि औौरस । दधिमुख दुविद, मयंद, ऋच्छ पति सम, को पौरस ॥ उल्का सुभट, सुषेन, दरी मुख, कुमुद, 840<noinclude></noinclude> sna6rss61b4klwdu7svwvmqlcifrv8f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०६ 250 194073 664294 2026-07-02T16:32:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664294 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-841 श्रीमतमाल सटीक । नील, नल । सरभ रु, गर्वे, गवाच्छ, पनस, गँध मादन, अतिबल, । पद्मश्रठा- रह यूथपाल, राम काजभट भीरके । शुभदृष्टि वृष्टि मोपर करौ, जे सहचर रघुबीर के ॥ १६ ॥ (ं) "मीर" =भीड़; समूहः समीप t श्रीरामसहचर वर्ग | वार्तिक तिलक | ३४१ जगदुविजयी श्रीरघुबीर के संग चलनेवाले जो ओ सवावर्ग हो, सो पाप सब मुझ पर कृपा प्रसन्नता युक्त शुभ दृष्टि की वर्षा कीजिये । श्रीदिनेशपुत्रकपि- राजा श्रीसुग्रीव जी, बालिपुत्र श्रीमद जी, श्रीकेशरी मन्दन हनुमान जी, श्रदधिमुख जी, श्रीद्विविद जी, श्रीमद जी, और जिनके समान दूसरे का पुरुषार्थ महीं ऐसे ऋक्ष राज श्रीजाम्बवान जी, परम सुभट श्रीउल्कामुख जी, श्रीसुषेण जी, श्रीदरीमुख जी, श्रीकुमुद जी, श्रीनील जी, श्रीनल जी, श्रीशरभ जी, श्रीगवय जी, श्रीगवाक्ष जी, श्रीपनस जी, अतिशय श्रीगन्धमादन जी, इत्यादिक अठारह पद्म यूथ पति और भी सेना समूह के सम्पूर्ण भट श्रीराम काय करने वाले भी, मुझपर कृपा दृष्टि की वर्षा कीजिये<noinclude></noinclude> f3mh13xktt61w1nm2rrzqg93xno6mtg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०७ 250 194074 664295 2026-07-02T16:32:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664295 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४२ श्रीभक्तिधाविन्दु स्वाद । 242 १ श्रीसुग्रीव जी २ श्रीहनुमान जी १० श्री दरीमुख की ११ श्री कुमुद जी १२ श्री नील जी १३ श्री नल जी १४ श्री शरभ जी १५ श्री गवय जी ३ श्री अङ्गद जी ४ श्रीजाम्बवान् जी ५ श्रीदधिमुख जी ६ श्रीद्विविद जी ● श्रीमैन्द जी १६ श्री गवाक्ष जी ८ श्रीलका सुभटजी १७ श्री पनस जी ९ श्री सुषेण जी १८ श्रीगन्धमादन जी महावीर श्रीहनुमान जी । जय श्रीसीताराम जी राजसिंहासन पर विराजे, श्रीर चारो दिशाओं से सब मुनि लोग दर्शन के लिये श्री अयोध्या जी में इकट्ठे हुए, तब प्रभु ने श्री अगस्त जी महाराज से पूछा कि ( चौ० ) "सौरज, बोरज, धीरज, नीती । बरबिक्रम, दक्षता, प्रतीती ॥ तिमि प्रभाव, प्रज्ञता, प्रमाना । हनुमत हिय किय पथन निदाना ॥ हनुमत चारु चरित विस्तारा । सुखद सुना- इय मोहिउदारा ॥ " तथा नैमिष क्षेत्र में ऋषियों ने श्रीसूत जी से पूछा कि (दो०) "एकादश रुद्रहि कहत महाशंभु अवतार | ताकी जग जीवन कथा, कहौ सूत विस्तार ॥" इसके उत्तर में---<noinclude></noinclude> bo3l9d0sicqdne15meh4ow4rsa866fc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०८ 250 194075 664296 2026-07-02T16:32:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664296 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>848 श्रीभक्तमाल सटीक । ३४३ (सो०) कह अगस्त भगवान, “सत्य कहहु रघुबर तुम । नहिँ हँ हनुमान समान, गति मति बलहू में कोऊ ॥ ११ कहेउ सूत, "सुख मूल, कहीं चरित्र पवित्र पब । हरण सकल पशूल, चित लगाय ऋषिगण सुनी ॥” २ श्रीकेशरीमिया शुभमतरता परंमविनीता श्रीपञ्जना जी एक समय धीरे धीरे विचरती हुईं बन और पर्बत की शोभा देख रही थीं, उसी समय श्रीपवन देव के उद्वेग से पाप का वस्त्र उड़ने लगा था; इस्से आपने वायु देव पर क्रोध करना चाहा । परन्तु श्रीमरुत देव जीने कोमलवाणी से आप को, श्रीरामकृपा से श्रीब्रह्मा जी का विचार सुना कर, बहुत कुछ समझाया- " तूं भयमानहि मति मन माहीं । हम तव तन व्रत हिंसय नाहीं " ॥ और “होइहिँ महाबलवान बुद्धि निधान सुत मेरे दिये। पति तेजमान महान सत्व पराक्रमी ममसम तिये " | "बीरज बिलंघन बेगवान सुमो अधिकाइके । अस तनय लहि तिहुं लोक तेरी सुयश रहिहै छाइकै ॥ " पुनि पर और देवते भी पाके उसी देशकाल में आप से बोले- (छन्द) भय छाड़ि संशय तजौ, चिन्ता त्यागि मन धीरज घरी । पिय-त्रास, लोक-विवाद की सन्देह चितसे परिहरी ॥ 1920:00-<noinclude></noinclude> sjvaogcunzndotdaz9eiepnwnd79so6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४०९ 250 194076 664297 2026-07-02T16:32:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664297 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४४ श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । 344 -9001 600- पाए महाशिव गर्भ तब ये देव मुनि चिन्ता हरे । करि वेगि निशिचर कुल निधन, बिधिधेनु की रक्षा करे ॥ ९ ॥ | मन पवन खग से गति पधिक, पद कंज जे चितलावहीं। ' धरि र निज सुर सीस पे, साकेत पद नर पावहीं ॥ सियनाइ सेवा करन हित जग माहिँ यह अवतार है। सेवै सिया रघुनाथ के पद कंज गुट से पार है ॥ २ ( दो० ) धर्मशील बिद्या निपुण, सकल कला परबीन । माचारज ये होयँगे, रहे विश्व आाधीन ॥ " (सो०) सुर सब भेत्र जनाय, गए सकल निज२ भवन । सुनो सजन चितलाय, अग्र कथा भव भय हरन ॥ महामरुत की मूल, तेज गर्भ उर धारिकै । सुख संपति पनुकूल, जनि निवसीं गिरिगुहा ॥ निदान, शरद ऋतु, कार्तिक मास, कृष्णपक्ष चतु- देशी, भीम वार, स्वाति नक्षत्र, मेष लग्न, उच्च उच्च स्थानों में सब ग्रह एवं सर्व योगों तथा समय के सब बिधि अनुकूल होने पर (दो०) निशा दिवस के सन्धि में, मुदमंगल दातार । महाशम्भु परगट भए, हरन हेत भवभार ॥ १ ॥ खल परविन्द विनासकर, सुजन कुमुद आनन्द । अंजनि उर अंभोधि ते, उदित भए कपिचन्द ॥ २ ॥ धन्यधाम अरु धन्यथल, धन्य तात अरुमात । धन्य वंश जेहि वंश में जन्मे तिहुपुर प्रात ॥ ३ ॥ 118600-<noinclude></noinclude> 6dx6zbzcl87424lun6msnryhsicwew6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१० 250 194077 664298 2026-07-02T16:33:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664298 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>345 श्रीभक्तमाल सटीक । कहिँ वेदधुनि विप्रगण, जै जै शब्द विशेष । सुख समाज तेहिकाल को, कहि न सकेँ शत शेष ॥४॥ ३४५ (क०) मङ्गल सु मास, कल कातिक सरद बास, मंगल प्रथम पक्ष, चौदसि सोहाई है। मंगल सु बार, महामंगल नखत स्वाती, संध्या समय, मंगल लगन मेष आई है ॥ मंगल सुथल, जल, अनल, सु मंगल मे, अनिल, रूपकास भरी फूल की लगाई है। मंगल स्वरूप हनुमन्त जन्म मंगल की, बाजे रस रंग जग मंगल बधाई है ॥ १ ॥ भोरे, सूर्य को देख, श्रीमंजनीनन्दन, बालभाव से लाल फल पनुमान करके उछले कि रवि को मुखमें रखलें । यह प्रभाव देख, देव दानत्र सब विस्मयवन्त हुए। रवि के तेज को विचार के श्री पवन देव भी पुत्र के पीछे पीछे शीतलता करते हुए जा रहे थे । एवं श्री दिवाकर भगवान ने भी इन्हे श्रीरामकृपापात्र जानकर पपने ताप का लेशभी इनको नहीं लगने दिया । उसी दिन सूर्य ग्रहण का योग था, इसलिये राहु श्रीमान भगवान के समीप गया। वहां श्रीपवनसुत को देख, भयमान राहु वहां से लौट, सुरेश से जा कहने लगा कि आप ही ने सूर्य्य तथा चन्द्र को मेरा ग्राह्य निर्मित किया । फिर लाज आपने मेरा भाग दूसरे को क्यों दे दिया है ? यह सुन सुरपति अपने 1000- ४४ -000<noinclude></noinclude> eyuo6mbm2si83btzqpw2hlfiaks07uj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४११ 250 194078 664299 2026-07-02T16:33:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664299 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४६ 18000-- श्रीमतिसुधाविन्दु स्वाद । ऐरावत नाम ( स्वेत) हस्तीपर चढ़ के शीघ्रही वहां पहुँचे कि जहां सूर्य्यदेव पीर मारुती थे । श्रीमानन्दन जी राहु को नील फल मान सूर्य्य को छोड़ पहिले तो उसी की ओर लपके, परन्तु ऐरा- वत को देख स्वेत फल अनुमान कर के, राहु को भी छोड़ ऐरावत ही की पोर लपके। यह देख इन्द्र मे बिन बिचारे ही बज्ज चलाही तो दिया । राहु कुसंग का यह फल देखिये । निदान. वह वज्ज श्रीप्रभ- जनसुत के अंग में पा लगा । उस पविप्रहार से व्यथित हो श्री पवनज जी पर्वत पर या गिरे, जिस्से के के बाएं हनु में कुछ चोट पहुँचा । श्रीमरुत । देव ने पुत्र की गोद में उठा लिया। कोप करके, सारे जगत से प्रभंजन देवने अपनी गति खींच ली । तब तो प्राण के राजा श्री पवन जी के रुकने से, समस्त जीवों को प्रत्यन्त क्लेश हुआ। सुर मुनि नर नागन्धर्व पर सब के सब स्वांस उस्वांस प्राण पान के निरोध से, विकल होगए; शरीर की सन्धियां अति पीड़ित हो गईं। कोई कुछ कर्म धर्म करने योग न रहा | देखिये ! एक इन्द्र के अपराध से त्रिलोक दुखी हो गया । कुमन्त्र तथा कुसंग स कहां कष्ट नहीं पहुँ- ता है ? 546 सय प्रजापो ने इन्द्र के साथ २ श्रीब्रह्मा जी के है 00-<noinclude></noinclude> 2xw6fg7ynwmh9is78o6dcmvgrn2ojdq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१२ 250 194079 664300 2026-07-02T16:33:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664300 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>247 श्रीभक्तमाल सटीक । ३४० पास जा पुकारा । श्रीबिधाता जी सब को साथ लिये वहां पाए जहां श्रीपवन देव श्रीमहाबीर जी को गोद में लिये पाप का मुख अवलोकन कर रहे थे। अगत पिता श्रीविधि जी को अपने निकट देखतेही, श्री- मरुतदेवने उठके अपने सीस और प्रियपुत्र दोनों को श्रीविरंचि जी के चरणारविन्द पर रक्खा । प्रभु ने कृपा करके बालक के सीस पर ज्योंही निज हस्तकमल फेरा, त्योंही आप सुखी हो गए; तथा पापकी प्रसन्नता के साथ साथही त्रैलोक्य के प्राणी भी सब सुखी हुए श्रीइन्द्र जी ने एक अपूर्व माला श्रीमारुती जी के गले में पहिरा के, और "हनुमान" आपका नाम रख के, असीस दिया कि पब से मेरे बज्ज से इनको कभी कुछ भय नहीं । श्रीगिरिजा पति जी ने भक्ति र दे अपने शूल से पाप को निर्भय किया; तथा, श्रीविधि जी ने निज ब्रह्मा से श्रीकुबेर जी ने अपने गदा से, श्रीयम जी ने यमदण्ड से; एवं श्री- दुर्गा जी ने अपने खड्ग से, बरुणा जी ने निज पास से; पौर विश्वकम्मी जी ने अपने सर्व पायुधों से अभयत्व दिया। श्रीसूर्य भगवान् ने अपने तेज का ० (शतांश) अनुग्रह किया; और कहा कि “मैं इन्हें शाख पढ़ा दूँगा”। पुनः, सब ने अनेक विचित्र अनुभुत बरदान पापको दिये, जिनका विक्षित वर्णन कहां तक किया जावे ।<noinclude></noinclude> 5kxmy01iu5dyru4nnauid5nb9h6i665 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१३ 250 194080 664301 2026-07-02T16:33:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664301 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४८ 3600- श्रीभक्ति सुधाविन्दु स्वाद । 348 (दो०) देखि सुरन के बरन ते भूषित हनुमत काहिं पुनि बोले बिधि पवन प्रति अति प्रसन्न मन माहिँ ॥ (चौ०) यहिके सेवा बस रघुनाथा । यहिके बेगि वि हाथा ॥ मारुत ! तब यहसुतको पाई। रहिहै सुयश तिहूं- पर छाई ॥ (दो०) रूपस कहि बिधि प्रमरन सहित, दे दे पर बरदान | गवने पवनहि पूछि सब, अपने अपने थान ॥ १ ॥ कारण रुद्र रूपनेक के, "महाशंभु” पर धाम । समय समान स्वरूप करि, सेवहिँ सीता- राम ॥ २ ॥ तेऊ प्रभु रुचि पाइकै, प्रबिसे पवन स्वरूप । “अंजनिमारुत सुत” भए, कपि बपु विरचि अनूप ॥३॥ गिरि सुमेरु के मुनि सकल, सादर सदन बुलाय । पूजि पगन मेले ललन, भोजन बिबिध कराय ॥ ४ ॥ तब पानन्दित अंजना, केसरि बसि निज गेह । दम्पति सुतहि दुलारहों, दिन प्रति सहित सनेह ॥ ५ ॥ आप के जन्म के चरित्र, स्वामी श्री ६ रामरस रङ्ग मणि जी प्रणीत "श्रीहनुमत यश तरंगिनी" में, कि जिस्को परम प्रसिद्ध महानुभाष सन्तमण्डलभूषण स्वामी श्री ६ “श्रीमतीशरणगोमतीदास* महाराज जी ने छपवाकर अपने श्रीहनुमत निवास से प्रकाशित किया है, तथा श्रीरामनामानुरागी मुन्शी श्रीरामयम्बे सहाय जी कृत श्रीकाशी जी की छपी “श्रीहनुमत जन्म विलास" में भी देखिये ॥<noinclude></noinclude> j6h14h2lr8zweh9go7gg1ob25tpespn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१४ 250 194081 664302 2026-07-02T16:33:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664302 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>349 3400 श्रीभक्तमाल सटीक । ३४९ श्री मारुती जी के सुयश श्रीबाल्मीकीय में एवं श्रीगोस्वामी तुलसीदास जी कृत जगत विख्यात ग्रन्थों में प्रेमी जन पढ़ते सुनते हैं ही ॥ और एक चुटकुला यहां पृष्ठ १०३ में भी देखही पाए हैं ॥ ( वि० ) जयति अंजनी गर्भ अम्बोधिसम्भूत &c. ( दो० ) नमो नमो श्रीमारुती, जाके बश श्रीराम । करहु कृपा निशिदिन जपौं श्रीसियसियपिय नाम ॥ श्रीङ्गद जी । श्रीसीतारामपदकंज में प्रेम करने ही से लोक पर- लोक की कोई वार्ता ऐसी नहीं रह जाती जिसमें मति- मान प्रेमी कुशल न हो । श्रीमङ्गद जी, किष्किन्धाधिप बालि के योग्य पुत्र, अपने पिता सम बली ने, लंका की रणभूमि में किस कुशलता से प्रशंसित पराक्रम किये कि जिस्की सराहना स्वयं प्रभु ही श्रीमुख से करते हैं। (चौ० ) कह रघुबीर " देखु रण सीता ! लछिमन यहां हते इन्द्रजीता ॥ हनूमान अंगद के मारे । रम महिं पड़े निसावर भारे" ॥ त्रैलोक्यविजयी रावण की सभा में, कि जहां भययश इन्द्रादिक देवताओं की afar क्षोभित हो जाया करती थी, किस उत्साह दृढ़ता, पराक्रम तथा प्रतीति के साथ अपनी बुद्धि की दर- साया कि लङ्कानिवासियों ने आपको श्री हनुमान जी ही हनुमान किया । 128600-<noinclude></noinclude> l8blrdjp0ivgrjb1wizihmelitkh3mu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१५ 250 194082 664303 2026-07-02T16:34:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664303 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५० 18000 श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । ( सबैपा ) छाति कोप से रोप्यो है पाँव सभा, सब लंक सशो- कित शोर मचा । तमके घननाद से बीर प्रचारिके, हारि निशाचर सैन पथा ॥ न दरे पग मेरु हु ते गरु भो, सो मनो महि संग बिरंचि रचा। तुलसी सब शूर सरोहत हैं, "जग में बलशालि है बालि बचा" ॥ (दो०) रिपु बल धरषि हरषि कपि, बालितनय बलपुंज । पुलक शरीर नयन जल, गहे रामपद कंज ॥ श्री अवध में आने पर जब सय बिदा होने लगे और आप का अवसर पाया, तो यहां रहने के निमित आपका हठ आग्रह एवं विनय करना ही पाप के गूढ़ सच्चे प्रेम का यथार्थ चित्र नेत्रों के सामने खींचे देता है ॥ (दो०) पङ्गद बचन विनीत सुनि, रघुपति करुणा- सी। प्रभु उठाइ उरलाएऊ, सजल नयन राजीव ॥१॥ निज उर माला वसन मणि, बालि तनय पहिराह । विदा कीन्ह भगवान तब, बहु प्रकार समुझाइ ॥ २ ॥ श्रीपङ्गद जी की माता, श्रीतारा जी, जो " पंच कन्या" में से हैं, अतिशय सुन्दरी, बुद्धिमती, पतिव्रता, गुणमयी, तथा श्रीसीताराम भक्ता हैं। इनकी प्रशं- सनीय वार्त्ता श्रीबाल्मीकीय में देखने योग्य ही है ॥ श्रीजाम्बवन्त जी । श्रीजाम्बवान जी श्रीब्रह्मा जी के अवतार हैं । 350<noinclude></noinclude> dse2fiywpnh4axaqiv5uxqg0y0jv3h9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१६ 250 194083 664304 2026-07-02T16:34:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664304 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>851 श्रीभक्तमाल सटीक । आपकी चर्चा पृष्ठ १०७ में भी हो पाई है ॥ (दो०) जानि समय सेवा सरस, समुझि कर अनुमान । पुरुखा ते सेवक भए, चतुरानन जैबवान ॥ (चौ०) जामवन्त मन्त्री मतिमाना । पति विजयी बल बुद्धि निधामा ॥ नामनिष्ठ अति दृढ़ विश्वासी । सेतु समय रूपस बचन प्रकासी ॥ (सो) सुनहु भानुकुलकेतु ! जामवन्त करजोरि कह नाम तब से, नर चढ़ि भवसागर तरहिँ ॥ श्रीनल जी और श्री नील जी । २५१ (चौ०) नाथ ! "नील, नल" कपि दोउ भाई । लरि- काई रिषि पासिष पाई ॥ तिन्ह के परस किये गिरि भारे । तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥ (सो०) सिन्धु बच्चन सुनिराम, सचिव बोलि प्रभु पस कहेउ । अथ बिलम्ब केहि काम, करहु सेतु, उतरे कटक || (चौ०) शैल बिशाल यानि कपि देहीं । कन्दुक इव नल नील ते लेहीं ॥ देखि सेतु प्रति सुन्दर रचना । बिहँसि कृपा निधि बोले बचना ॥ जे 'रामेश्वर " दरशन करिहहिं । ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिँ । होइ रूपकाम जो छलतजि सेइहि । भक्ति मोरि तेहि शङ्कर देहि । (दो०) श्री रघुबीर प्रताप ते सिन्धु<noinclude></noinclude> fnsugzyrmzr5kayx4d1gcczeu7usij6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१७ 250 194084 664305 2026-07-02T16:34:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664305 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५२ • श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । तरे पाषान । ते मति मन्द जे राम तजि, मजहिँ जाइ प्रभु पान ॥ थेश्वर दोनों भ्राता नल जी और श्री नीलजी का भी, लङ्का की लड़ाई में श्री कृपा से जो पराक्रम देखने में आया; सो, श्रीबाल्मीकीय में वर्णित और प्रशंसनीय है ॥ र, श्री अवधपति राम जी महाराज के सिंहासन- स्थ होने पर, "चीन" देशीय राजा, "वीरसिंह” ने अपनी वीरता प्रकट करने के लिये, श्रीराघव से युद्ध (दूत द्वारा) माँगा; तव श्रीराम जी युद्धोन्मुख हुये । उसी समय खड़े हो प्रणाम करके, प्राज्ञा ले के, निज शत्रुभंजनी सेना सहित श्रीनलनील जी ने चीन पर चढ़ाई की। वहाँ जाय, रात्रिदिवस पच्चीस दिन संग्राम करके वीर- सिंह का बध किया; और श्रीराम जी की दोहाई फिराई । पुन: शरणागत पाने पर, श्रीरामाज्ञा पाके, “बीरसिंह" के पुत्र “इन्द्रमणि” को चीनी राजसिंहासनासीन करके तब श्री नल नील जी, श्रीरामपार्श्व में प्राप्त हुये । श्रीराघव दया सागर जी उक्त वीरों से अंक भरि अँटे; और पन्त में निज पद का लाभदे, कृतार्थ किया ॥ (३) कप्पथ | ब्रज बड़े गोप "पर्जन्य" के, सुत नीके नव नन्द ॥ धरानन्द', ध्रुवनन्द, तृतिय 352<noinclude></noinclude> 3do8g9g3b0doosh6ogeu7wzhf4lf4v0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१८ 250 194085 664306 2026-07-02T16:34:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664306 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>353 183600- श्रीभक्तमाल सटीक | ३५३ -900* उपनन्द, सु नागर । चतुर्थ तहां अभि- नन्द'; नन्द' सुखसिन्धु उजागर ॥ सुठि सुनन्द' पशुपाल, निर्मल निश्चय अभि- नन्दन । कर्मा धर्मानन्द; अनुज बल्लभ' जग बन्दन ॥ आस पास वा बगर के, जह बिहरत पशुप सुन्द । ब्रज बड़े गोप "पर्जन्य" के, सुत नीके नव नन्द ॥१७॥ (ख) 66 बगर " र"= टोला, पुरवा फैलाव | भिनभित्र ग्रन्थों में, कई नाम भिन्न पाए जाते हैं जैसे "- मनन्द" के स्थान में "नन्दन" वा "अभिनन्दन,” एवमादि बहुत सी हाथ की लिली पुरानी प्रतियों को मिला के जो पाठ अधिक पोथियोंमें मिला, सोही लिखा है ॥ नवी नन्द जी । वार्तिक तिलक । गोकुल (ब्रज) में, (१) सुजन्य जी (२) श्रीपर्जन्य जी (४) पर्जन्य और (४) राजन्य, ये चारो गोप सहोदर भ्राता थे; तिनमें तीन भाइयों के वंश का तो बर्णन नहीं; पर श्री " पर्जन्य” जी नवो नन्दों के बड़े (नाम वृद्ध पिता) थे; इन्हों के सुन्दर सुत नवो नन्द जी थे; अर्थात् श्री धरानन्द जी, श्रीध्रुवानन्द जी, तीसरे परम प्रवीण (सुनागर) श्रीउपनन्द जी; तिनमें चौथे ४५ --०००:<noinclude></noinclude> qtpyvm49dpucuovp5peew3zqlucatwn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४१९ 250 194086 664307 2026-07-02T16:34:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664307 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५४ 8800-- श्रीमान्दु स्वाद । 854 --000831 श्रीअभिनन्द जी; और सुख के समुद्र परम प्रसिद्ध महर श्रीनन्द जी । गौपों के विशेष पालक, निर्मल, निश्चय करके प्रभु की मानन्द देनेहारे श्रीसुनन्द जी; श्रीकर्मानन्द जी तथा श्री धर्मानन्द जी; और इन पाठों के छोटे भाई जगत में वन्दनीय श्रीवल्लभ जी। जहां गोपाल लोग स्वच्छन्दता से बिहरते थे, तिस बगर के पास पास में नवो नन्द बिराजते थे ॥ ( मैं उनके चरण की धूरि चाहता हूं ) ॥ १ श्रीधरानन्द जी, २ श्री ध्रुवनन्द जी, १ श्री उपनन्द जी, ४ श्रीमभिनन्द जी, ५ श्रीनन्द जी, सुख सिन्धु | ६ श्री सुनन्द जी, ७ श्री कर्मानन्द जी, ८ श्री धर्मानन्द जी, श्री बल्लभनन्द जी, पाठ भेद कई हैं | जो, श्रीकृष्णभगवान् के ही पिता चचा हैं, भला उनकी कढ़ाई कहां तक की जा सकती है ॥ (2) क बाल बृद्ध नर नारि गोप, हौं अर्थी उन पाद रज ॥ नन्द गोप, उपनंद, ध्रुव धरानंद, महरि जसोदा । कीरतिदा " वृषभानु" कुँअरि सहचरि (विहरति ) मन मोदा ॥ मधु, मंगल, सुबल, सुबाहु, -90)<noinclude></noinclude> pumo3cgodoy5j7pjygfmtn999nd1k9o पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२० 250 194087 664308 2026-07-02T16:34:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664308 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>355 1830-00- श्रीभक्तमाल सटीक । भीज, अर्जुन, श्रीदामा । मंडल ग्वाल अनेक श्याम संगी बहु नामा ॥ घोष निवासनि की कृपा, सुर नर बांळूत आदि अज । बाल बृद्ध नर नारि गोप, हौं अर्थी उन पाद रज ॥ १८ ॥ (२३) ३५५ " आदि अज" = अजादि, विरंचिप्रमुख, विधि प्रभृति, ब्रह्मा आदि । "महरी " = बड़ो, महर की स्त्री । “घोष" =अहिरों का टोला, घोषियों का पुरषा; अहीर, घोसी, ग्वाल, गोप । गोपवृन्द । धार्तिक तिलक । जिन घोषनिवासियों (गोप गोपियों ) की कृपा को ब्रह्मादिक सुर और नर लोग चाहते हैं, तिन बालक वृद्ध और स्त्री पुरुष गोपों के पाद रज का मैं पर्थी हूं, अर्थात् जांचता हूं । उनमें मुख्यों के नाम - (१) महर श्रीनन्द गोप जी, (२) श्री उपनन्द जी, (४) श्रीध्रुवनन्द जी, (४) श्रीधरानन्द जी, (५) महरी श्रीयशोदा जी, (६) स्मरण मात्र से कीर्ति देनेवालों श्रीवृषभानु जी की स्त्री श्री "कीर्त्ति" जी, (७) श्रीवृष- भानु जी; (८) सदा प्रसन्न प्रानन्दयुक्त मन वाली सखि - के सहित श्रीवृषभानु नन्दिनी श्रीराधिका जी, (e) श्रीमधु जी, (१०) श्रीमंगल जी, (११) श्री सुबल जी, (१२) श्री बाहुजी, (१२) श्रीभोज जी, (१४) श्रीपर्जुनगोप 06-<noinclude></noinclude> frgl3nlof0x75fkorvj41vijy0o575o पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२१ 250 194088 664309 2026-07-02T16:35:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664309 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५६ 58600- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । जी, (१५) श्री "श्रीदामा" जी, तथा (१६) श्रीश्यामसुन्दर जी के साथी, अनेक नाम वाले, अनेक ग्वालमण्डलों के पद रज की मैं चाहता हूं ॥ धन्य गोकुल ग्रज; धन्य धन्य वहां के बासी; और धन्य धन्य उन सब की चरणरज ॥ श्रीयशोदा जी । महरि श्रीयशोदा जी की कथा श्रीमद्भागवत, सुख- सागर, व्रजबिलास तथा प्रेमसागर प्रभृति ग्रन्थों में पति प्रसिद्ध है। विशेष कुछ लिखने की प्रावश्यकता क्या है । हरिमाता की स्तुति क्या कोई साधारण वार्त्ता है ॥ रानी श्रीकीर्त्तिीः श्रीवृषभानु जी । श्रीकृष्णप्रिया जगत जननि सुरमुनिवन्दिता भक्त- जन इष्टदेवता “श्रीराधा जी” केही मातु पिता, यही तो सब स्तुतियों की अवधि है; वात्सल्य रस के सुखों की खानि के भाग्य की प्रशंसा और बड़ाई कौन कर सकता है और क्योंकर सम्भव है ॥ श्रीसहचरियां; ग्वाल मंडल । प्रिया जी ( श्रीराधाजी) की सहचरियों की स्तुति प्रार्थना किये बिन, जो कोई श्रीप्रिया प्रियतम के चरणों की भक्ति चाहे, उस्की बुद्धि प्ररूप है । 356 $400 --0008<noinclude></noinclude> 9p5w9knrqa1tychhdhc4e773p86o8vy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२२ 250 194089 664310 2026-07-02T16:35:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664310 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>357 श्रीभक्तमाल सटीक । ३५७ जिन ग्वालिन तथा ग्वाल मण्डल को भगवान् ने अपना करके जाना माना, और श्रीब्रह्मा ऐसे बड़ों के बड़े ने जिनकी कृपा चाही, उनके चरणसरोज की रज अपने मस्तक पर धरने की बांछा करनी अतिशय बड़भागी का चिन्ह है ॥ (2) बच्चे । २ ब्रजराजसुवन सँग सदन बन, अनुग सदा तत्पर रहैं । रक्तक,' पत्रक, और पत्र, सबही मन भावें । मधुकण्ठी, ' मधुवर्त्त', 'रसाल, 'बिशाल, सुहावें ॥ प्रेम कन्द" मकरन्द' सदा, चन्द्रहासा"। पयद बकुल," रसदान, "सारद, "बुद्धिप्रकासा ॥ सेवासमय विचारिर्के, चारु चतुर चित- की हैं। ब्रजराज सुवन सँग सदन बन अनुग सदा तत्पर रहें ॥ १८ ॥ (2) २१३ "चित्त की लड़ें"मन की रुचि को समझ जाते हैं ॥ श्रीचन्द्र जी के (१६) षोडश सखा । वार्तिक तिलक | ब्रजराजश्रीनन्द जी के पुत्र श्रीकृष्णचन्द्र जी के साथ साथ घर में और सब बन में ये सब षोडश 188000- -<noinclude></noinclude> eeqeytq4b6ebzqg8m74wqrju792l8a8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२३ 250 194090 664311 2026-07-02T16:35:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664311 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५८ 15600- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 858 -9093 सेवक सदा सेवा में तत्पर रहते हैं । (१) रक्तकजी (२) पत्रक जी तथा (३) पत्रीजी, ये तीनों प्रभु के मन में भाते हैं; (४) मधुकठ जी (५) मधुवर्त्त जी (६) रसाल जी (७) विशाल जी, प्रभु को बहुत सुहाते हैं; (८) प्रेमकन्द जी (९) मकरन्द जी (१०) सदा आनन्द जी (११) चन्द्रहास जी; (१२) पयद जी (१३) बकुल जी (१४) रसदान जी (१५) शारद जी और (१६) बुद्धि प्रकाश जी । सोलहो चारु चतुरनुग अपनी अपनी सेवा का समय विचार के श्रीनन्दनन्दन जी के चित्त की रुचि को जान लेते हैं, सोई २ सेवा किया करते हैं ॥ इन के भाग्य की बड़ाई किससे हो सकती है ? (३३) बच्चे । सप्त दीप में दास जे, ते मेरे सिर ताज ॥ जम्बू', और पलच्छ', सालमलि', बहुत राजऋषि । कुश, पवित्र, पुनि क्रौंच, कौन महिमा जानै लिषि ॥ साक' विपुल विस्तार, प्रसिध नामी प्रति पुहकर | पर्वत "लोकालोक", ग्रीक " टापू कंचनधर" ॥ हरिभृत बसत जे जे जहां, तिन सो नित प्रति काज । 8806- --000<noinclude></noinclude> l6f79vyhlphf6g10j0z68m3dcpfmhgs पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२४ 250 194091 664312 2026-07-02T16:35:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664312 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>359 600- श्रीभक्तमाल सटीक 1 "सप्त दीप" में दास जे, ते मेरे सिर ताज ॥ २० ॥ (२) " साज = टोपी, मुकुट । “ओक=स्थान, आश्रम | सप्तद्वीप के भक्त । वार्त्तिक तिलक | ३५९ सातो द्वीपों में, जितने श्री भगवत् दास जहां२ हैं सो सब मेरे मस्तक के मुकुट हैं । (१) जम्बू द्वीप (२) लक्ष द्वीप (३) शाल्मलिद्वीप इन में बहुत से राजर्षि भगवत भक्त हैं; (४) परमपवित्र कुशाद्वीप, तथा (५) क्रौंचद्वीप भक्त समूह हैं तिनकी महिमा जो अनेक पुराणों में लिखी हुई है सो कौन जान सकता है (६) बहुत विस्तारवाला शाकद्वीप और (७) उस्से भी पति प्रसिद्ध नाम बड़ा पुष्कर द्वीप; तथा, लोकालोक पर्वत एवं कांचनघर टापू के स्थानों पर श्रमों में जहां जहां जो जो, श्री भगवत के सेवक बसते हैं उन्हीं से नित्य ही मेरा प्रयोजन है; वेही मेरे सीस के मुकुट मणि हैं ॥ (चौ०) मोरे मन प्रभु यस विश्वासा । राम ते अधिक राम के दासा ॥ १ जम्बू द्वीप* २ लक्षद्वीप ३ शामली द्वीप 8 कुशद्वीप *600- ५ क्रौंच द्वीप ६ शाकद्वीप ७ ● पुष्कर द्वीप ( इति "सप्तद्वीप" )<noinclude></noinclude> e38r2vonldjziqoa5cr5pgpo6l00mwk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२५ 250 194092 664313 2026-07-02T16:35:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664313 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६० *900-- श्रीभक्तिसुघाबिन्दु स्वाद । ● अपना यह "भारतबर्ध" देश, जम्बूद्वीप ही में है । प्रथम (जम्मू) द्वीप से, दूसरा दूना है; उमसे उत्तर उत्तर दूना । अर्थात द्वितीय से तृतीय दूना, नाम प्रथम से चौगुना है; एवं चौधा प्रथम से आठ गुना बड़ा है; पांचवां सोलह गुना छठा बत्तीस गुना; और सातवाँ (पुष्कर) द्वीप प्रथम (जम्बू द्वीप से चौंसठ गुण बड़ाई । प्रत्येक द्वीप में शतावधि योजन का एक एक वृक्ष है, सो उसी केनाम से वह द्वीप भी पुकारा जाता है जैसे (१) आसुन, (२) पाकड़ि (३) सेमर, (४) कुश, इत्यादि का ॥ “कांचनधर” टापू तयो “लोकालोक पर्वत," इन सातो द्वीपों से बाहर हैं ॥ (2) इप्पय । मध्य दीप नव खंड में, भक्त जिते, मम भप ॥ इलाब,' अधीस संकर्षन, अनुग सदाशिव । रमनक, मळ, मनु दास; हिरन्य' कूरम, अर्जम इव ॥ कुरु, " बराह, भूभृत्य; बर्षहरि,' सिंह, प्रह्लादा । किंपु- रुष, राम, कपिः भरत, नरायन, बीना नादा ॥ भद्रा, ग्रीवहय, भद्रस्रव, केतु, ' काम, कमला अनूप । मध्य दीप नव खंड में, भक्त जिते, मम भूप ॥ २१ ॥ ८ ( " मध्य दीप'जम्बू द्वीप। "मक' मत्स्य, मच्छ, मीन । "बीनानादा'' श्रीनारदजी 860 *400 3600- 8000<noinclude></noinclude> tqh0az1om6o0g3zcv5uwtj67fmy6139 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२६ 250 194093 664314 2026-07-02T16:35:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664314 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ॐ ape- श्रीभक्तमाल सटीक 1 ३६१ जम्बूद्वीप के भक्त । वार्तिक तिलक 1 मध्यद्वीप अर्थात् "जम्बूद्वीप" के नवो खण्डों में जितने श्रीभगवत के भक्त हैं, वे सब मेरे राजा हैं, (मैं उन सब का सुयश कहनेवाला बन्दी हूं) | नवी खण्डों के अधीश्वर भगवद्रूपों के, तथा उनके मुख्य भक्तसेवकों के नाम कहते हैं। (१) इलावर्त खड के अधिपति, भगवान् श्रीसंकर्षण जी हैं, पौर उनके सेवक श्रीसदाशिव जी हैं; (२) रमयाकरखण्ड के स्वामी श्रीमत्स्य भगवान् और उनके भृत्य श्री मनु जी ( सत्यप्रत ); एवं (३) हिरण्य खण्ड के पधीश्वर श्रीकूर्म भगवान्, और उनके दास श्रीपर्यमा जी (१) कुरु खण्ड के पति श्री बाराह भगवान् और उनकी सेवा करनेवाली श्री भूमि देवी जी; (५) हरिवर्ष खण्ड के स्वामी, भगवान् श्रीनृसिंह जी, और उनके भक्त- राजश्री प्रह्लाद जी; (६) किम्पुरुष खण्ड के महाराज, स्वयं श्रीसीतापतिरामचन्द्र जी; और पाप के प्रिय- दास, कपिनायक - श्री हनुमान जी हैं; (५) भरतखण्ड के पालक बदरिकाश्रम वासी श्रीनारायण जी, पीर उनके पुजारी बीणा नाद - कारी श्रीनारद जू; (८) भद्रा स्वखण्ड के ईश्वर श्रीहयग्रीव भगवान्, पर उनके सेवक श्री भद्रा जी; (९) केतुमाल खण्ड के स्वामी श्रीकाम- --900<noinclude></noinclude> a646solezlzjdukrqawxuldiqiiqcca पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२७ 250 194094 664315 2026-07-02T16:36:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664315 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६२ 183 300- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 362 -900 देव भगवान्, पर उनकी पूजा करने वाली उपमारहित श्री कमला जी हैं ॥ गिन्ती जम्बू द्वीप के नवो खण्ड अधीश भगवान् १ इलावर्त्तखंड संकर्षणभगवा० सदाशिव २ रमाक खंड मत्स्य भगवान् श्रीमनु जी ३ हिरण्य खंड कूर्म भगवान् श्रीपर्यमा जी 8 (उत्तर) कुरु खंड बाराह भगवान् श्राभूदेवीजी ५ माल खंड कामदेव भगवा श्रीलक्ष्मी जी ६ भद्रास्व खंड हयग्रीव भगवान् श्रीभद्रश्रवजी 16 हरिवर्ष खण्ड | नृसिंह भगवान् श्रीमह्लाद जी ८ किम्पुरुष खंड श्रीसीताराम जी श्रीहनुमान जी भरत खण्ड* | श्रीनारायणजी श्रीनारद जी (अथ देश काल) यह तो विदित है ही कि हम सब इसी खरड ( जंबू द्वीप भरत खंड) के आर्यावर्त्त देश में हैं। भरतखंड को "भा- रतवर्ष” भी पुकारते हैं; तथा इसी को विदेशी "हिन्दूस्तान् ” [uttyasts] एवं "वियt" [Iidin] भी कहते हैं। और यह मन्यन्तर जिसमें हम स वर्तमान हैं, "स्वत मन्वन्तर" है । इस मन्वन्तर के अट्ठाईस्खें चतुर्युग का यह "कलियुग है; जिसके ४३२००० बर्षों में से केवल प्रथम ही चरण का ५००५ [पाच सहस्र पांचवां ] सम्बत्मर, अर्थात् विक्रमी सम्बत १९६१ यह है । अस्तु । इन्ही श्री वैवस्वत मनुजी के वंश में, “श्री दशग्य चक्रवर्ती जी" जिनके पुत्र हो स्वयं साकेत विहारी शाई घर श्रीसीतापति राम- चन्द्र महाराज जी प्रगट हुए हैं। हुए,<noinclude></noinclude> iaz5v3zsbzron8n0rolo1tj9luw2cxv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२८ 250 194095 664316 2026-07-02T16:36:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664316 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>863 18600- श्री भक्तमाल सटीक । - ३६३ ५८ में पृष्ट प्रथम बच्चे (पाचवें सूख) में, ग्रन्थकर्ता स्वामी मन्द- न्तरों की बन्दना कर आए हैं, जिन में से श्रविवस्वत मनुजी [वर्त्तमान] की बन्दना, आप इस आठवीं षटपदी नाम बारहवें मूल [पृष्ट २५९ ] मैं करते हैं । इसी (किम्पुरुष) खण्ड ही में महारानी श्रीमिथि शलली जी की, तथा श्री जानकी जीवन जी की सेवा, श्रीसीताअंजनीदुलारे जी कई ( “कपिमहाबीर, " “श्रीरामदूत, " " श्रीमारुतिबीर कला," श्री चारुशीला, " इत्यादिक) रूप से सदैव करते हैं । एवं वहीं, मुमुक्षु जनों को श्री केशरी नन्दन कपीश जी, श्रीरामायणीय कथा और श्रीसीताराप्राराधन सिखला के मुक्त कराते हैं (ई) कप्पय । स्वेत दीप में दास जे, श्रवण सुनो तिनकी कथा | श्रीनारायण (को) बदन निरन्तर ताही देखें। पलक परै जो बीच कोटि जमातन लेखें । तिनके दरशन काज गए तहँ बीणाधारी । श्याम दई कर सैन उलटि अब नहिँ अधिकारी ॥ नारायण आख्यान दृढ़, तह प्रसंग ना- हिन तथा । स्वेत द्वीप में दास जे, श्रवण सुनो तिनकी कथा ॥ २२ ॥ (<noinclude></noinclude> 8hdjnqt0l0kgarfs6par40bza1i1yjo पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४२९ 250 194096 664317 2026-07-02T16:36:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664317 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६४ श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । वार्त्तिक तिलक । 568 -9001 " श्वेतद्वीप" में जो श्रीभगवान् के दास बसते हैं, तिनकी कथा कान लगा के सुनिये। वे दास, श्वेत- द्वीप बासी श्रीमन्नारायण के मुखचन्द्र को सदा देखाही करते हैं, और नेत्रों में जो पलक पढ़ते हैं उस अन्तर को कोटिन यमयातना के सरीखा दुःख मानते हैं । उन भगवत- दर्शनानन्द-निष्ठों के दर्शन तथा ज्ञानी- पदेश करने के हेतु बीणाधारी श्री नारद जी गए; तब श्रीमन्नारायण जी ने श्रीनारद जी के मन की रुचि आन के हाथ के सैन से निवारण किया कि “सम्प उलटे पांव फिर आइये, ये हमारे रूप-माधुरी के निष्ठ लोग आपके ज्ञानोपदेश के अधिकारी नहीं हैं ॥ " नारायण के रूपाशक्ति प्रेमाभक्ति का प्राख्यान जैसा वर्णित है सोही वहां के भक्तों को भली भांति दृढ है । जैसी अन्यत्र के भागवतों की ज्ञानमिश्रा भक्ति में प्रवृत्ति है, वैसा प्रसंग श्वेतद्वीप में नहीं है, वहां वाले तो केवल शुद्ध माधुर्य्य रूप के ही उपासक हैं ॥ द्वीप के भक्त । (2) टीका कविस । श्वेतदीप वासी, सदा रूप के उपासी; गए नाग्द बिलासी, उपदेश पोसा लागी है। दई प्रभु सेन जिनि 4:00. 18600--<noinclude></noinclude> s6i66cimmhxmj88jjj3ctox4rsuluwu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३० 250 194097 664318 2026-07-02T16:36:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664318 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>365 1000- श्रीभक्तमाल सटीक | ३६५ --900 यो इहि ऐन, दृग देखें सदा चैन, मति गति पनु- रागी है ॥ फिरे दुख पाइ, जाइ कही श्री बैकुण्ठनाथ, साथ लिये चले लखो भक्ति अंग पागी है । देख्यो एक सर, खग रह्यो ध्यान धरि, ऋषि पूछें कहो हरि, को " बड़ी बड़भागी है" ॥ १०३ ॥ ( ६२९ – ५२६ ) वार्तिक तिलक | श्वेतद्वीप के बासी भक्त जन सदा श्री भगवत रूप ही के उपासक हैं; वहां एक समय ज्ञानोपदेश करने की पासा करके सत्संगविलासी श्रीनारद जी गए; उनके मन की गति जान के प्रभु ने सेन से आज्ञा की कि "इस स्थान में मताप, क्योंकि ये भक्त हमारे रूप अनूप ही को देख कर परमानन्द मानते हैं, और रूपही के अत्यन्त अनुरागी हैं, इनको पथ ज्ञान उपदेश का प्रयोजन नहीं है" । यह सुन, उदास हो के, श्रीनारद जी फिरे, और श्रीकुण्ठनाथ भगवान् के हां जाके सब वार्त्ता निवेदन की । भगवान् बोले कि ठीक तो है; और, उनको अपने साथ ले चल के कहा कि "चलो, हम दिखादें कि, यथार्थ में उन भक्तों के अंग अंग रोम रोम सब प्रेम भक्ति से पगे हैं" । दोनों तद्वीप में पहुँचे। वहाँ एक सरोवर में एक भक्त पक्षी प्रभु का ध्यान घरे हुए बैठा था; देख --0008<noinclude></noinclude> lk2zqbmvc48gdmlgkchb4bzldgv51md पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३१ 250 194098 664319 2026-07-02T16:36:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664319 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६६ श्रीभक्तिसुधा बिन्दु स्वाद । 366 -9098 के श्रीनारद जी ने श्री बैकुण्ठनाथ जी से प्रश्न किया कि प्रभो ! यह खग ऐसा शान्त क्यों बैठा है ? ” श्री हरि ने उत्तर दिया कि "यह भक्त खग पति बड़- भागी है" ॥ (ट) टोका | कवित वर्ष हजार बीते, भए नहीं चित चीते, प्यासोई रहत, ऐपै पानी नहीं पीजिये । पावे जो प्रसाद अब जीभ सो सवाद लेत, लेत नहीं और, याकी मति रस भोंजिये ॥ लीजे बात मानि, जल पान करि डारि दियो, लियो चच भरि, दृग भरि बुधि धीजिये। अचरज देखि, चष लगेन निमेष किहूं, चहूं दिशि फिस्यो; अब सेवा याकी कीजिये ॥ १०४ ॥ ( ६२९-५२५ ) "नहि चित चीते"=चित चित्ता नहीं; ध्यान न दिया । "निमेशन लगै”=एक टक । “चहूँ दिशि फिरि परिक्रमा करके । 5 वार्त्तिक तिलक | " नारद! देखो, इस्को एक सहस्र (१९००) वर्ष बीत गए, इसके चित्त में चिन्ता नहीं, यह इतने दिनों से प्यासा ही रहता है परन्तु जल नहीं पीता, केवल मेरे ध्यामा- मृत हो से जीता है; क्योंकि जब यह मेरा प्रसाद पाता है तबही जीभ से खानपान का स्वाद लेता है; 'इस्की मति भक्तिरस में ऐसी भीग गई है कि प्रसाद बिना और वस्तु का ग्रहण ही नहीं करता। मेरी इस 2006- 1600-<noinclude></noinclude> rz3p61ev009a7rixzdi903q30gxkrs8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३२ 250 194099 664320 2026-07-02T16:36:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664320 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>367 98600- श्रीभक्तमाल सटीक । ३६७ बात को सत्य मानो; देखो, मैं प्रसाद करके जल इस्को देता हूं, उस्को पियेगा " । प्रभु ने पाप जल - पीके प्रसाद उसके आगे रख दिया, तब तुरन्त ही उसने भर चोंच पान कर लिया; प्रेमानन्द का जल भी उस्की आंखों में भर आया तथा मति प्रसन्नता से पूर्ण हो गई । (श्लोक) यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः । ते त्वघं भुञ्जते पापान् ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ ( भ० गी० ३|१३ ) वैष्णवे भगवद्भक्ती प्रसादे हरिनाम्नि च । पुण्यवतां राजन् बिश्वासो नैव जायते ॥ इस भक्ति को देख के श्रीनारद जी के नेत्रों में किसी प्रकार से निमेष नहीं पड़े उस्की पोर देखते ही रह गए; फिर चारो ओर फिर करके उस्की प्रदक्षिणा की। और प्रभु से बोले कि "मेरा तो जी चाहता हैकि मैं इस्की सेवा किया करूं ॥ " (2) टीका कवित चलो लागे देखी, कोऊ रहे न परेखो; भाव भक्ति करि लेखो; गए द्वीप; हरि गाइये । आायो एक जन धाई, आरती समय विहाई, खेंचि लिये प्राण, फिरि बधू की आइये | वही इन कही, पति देख्यो नहीं, मही पस्यो; हट्यो याकी जीव, तन गिरयो; मन भाइये । ऐसे, 8000--<noinclude></noinclude> ecptaqzoaghkz087ck9z3l81nh2xlj2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३३ 250 194100 664321 2026-07-02T16:37:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664321 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६८ ... श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 368 पुत्रादि पाए, सांचे हित में दिखाए, फेरि के जिवाए, ऋषि गाए चित लाइये ॥ १०५ ॥ ( ६२९ -- ५२४ ] "परेखो"=जांच, परचो, परीक्षा । "लेखो"= लेखा करो, मानो, गिन्ती में डाओ || वार्शिक सिलक । यह सुन श्री भगवान् बोले कि "चलो, अभी मागे पौर देखो; कोई परीक्षा रह न जाय, जिस्में उन भक्तों की सब दशा देख के तुम भावपूर्वक उनकी भक्ति को लेखा में लापो" यों बातें करते हुवे, उस (श्वेत) द्वीप के मध्य मन्दिर में दोनों गए, कि जहां सब भक्त लोग हरि के गुण और नाम ही प्रेम से गा रहे हैं। देखते क्या हैं कि एक प्रार्ती दर्शन का नेमी दौड़ता पाया परन्तु पार्ती का समय बीत गया था । आर्ती का दर्शन न पाने के बिरह से उसने प्राण को वीके छोड़ ही दिया । उसके पीछे ही उसकी धर्मपत्नी भी पाई और पूछने लगी कि क्या पार्ती हो गई ? आपने कहा कि हां, होगई बरनू तेरे पति को भी दर्शन नहीं हुया ! देख, प्राणत्याग के धरती पर गिरा पड़ा है । प्रात बिरह ने इसके भी प्राण हर लिये, उस्का भी मृतक शरीर पृथ्वी पर गिर पड़ा । 600-<noinclude></noinclude> 7sba60rt7ovllir43uwsn2he9zg6ue0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३४ 250 194101 664322 2026-07-02T16:37:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664322 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>869 1000 श्रीभक्तमाल सटीक । इन दोनों का नेम प्रेम देख प्रभु के और नारदजी के मन में यह अत्यन्त भाया । इसी प्रकार से, उनके पुत्रादि सब पाए और पार्ती के दर्शन विना प्राण त्याग त्याग गिर गिर पड़े। इस भांति, प्रभु ने इन सच्चे भक्तों का प्रेम नेम नारद जी को दिखाया; जिस्से श्रीनारद जी का प्रबोध हुआ । पुनः जब पार्ती होने लगी तो उस समय प्रभु ने सबको सजीव करपात दर्शन का ध्यानन्द दिया । यह प्राख्यान, श्वेतद्वीप माहात्म्य में ऋषियों ने गाया है। इनके प्रेम भक्ति में सब को चित लगाना चाहिये ॥ (2) इप्यय । उरगष्टकुल द्वारपाल सावधान हरि- धाम थिति ॥ इला पत्र, ' मुख अनन्त' अनन्तकीरति विसतारत । पद्म संकु, " पन प्रगट ध्यान उरते नहिं टारत || अशुकम्बल, 'वासुकी,'अजित प्राज्ञा अनु- बरती। करकोटक' तक्षक' सुभट सेवा सिर धरती ॥ श्रागमील शिव संहिता "अगर " एक रस भजन रति । उरग अष्टकुल द्वार पाल सावधान हरिधाम थिति ॥२३॥ () ३६९ 1800- ४७<noinclude></noinclude> j1s8zdbbpqrtvpv9ntowp4adhj23agp पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३५ 250 194102 664323 2026-07-02T16:37:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664323 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३७० 88000- 183600- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 370 -9098 "श्वेत द्वीप" को भूमंडल पर एक बैकुण्ठ हो जानिये ॥ पृष्ट ३३१ (श्रीया लक्ष्य जी) । १८/१९ वीं पंक्ति में "एक सुनि" के स्थान में "सूनारायण,” और “वह मुनि की जगह "सूर्य भगवान् " भूल है। चाहिये कि "आप ने पहिले किमी एक मुनि से विद्या पढ़ी किसी कारण मे वह मुनि अप्रसन्न हुए तो हमने सब विद्या उगलदी । यह प्रभाव देख प्रसन हो, श्रीसूयं नारायण मे आप को विद्या तथा वरदान दिया . ॐ ॥ " अष्टकुल नाग | वार्त्तिक तिलक इष्टकुली महासर्पों को श्रीभगवत के धाम में स्थिति है, श्रीहरि मन्दिर के द्वार पालक हैं, और निज निज सेवा में सदा सावधान रहते हैं— (१) एलापत्र जी पोर (२) अनन्त (शेष) जी, पपने मुख से श्री अनन्त ( श्रीभगवान् ) की कमनीय कीर्त्तिविस्तारपूर्वक सदा वर्णन करते हैं। (३) पदजी तथा (४) संकुजी की प्रतिज्ञा (पन) प्रगट है कि श्रीप्रभु के स्वरूप का ध्यान निज हृदय से क्षणमात्र नहीं टारते हैं (५) पशुकम्बल जी और (६) वासुकी जी श्री- जित महाराज की पाज्ञा के सर्वदा अनुवर्त्ती रहते हैं। (७) कर्कोटक जी तथा (८) तक्षक जी ये दोनों सुभट श्रीप्रभु की सेवा रूपा भूमि अपने सीसपर निरन्तर धारण किए रहते हैं । स्वामी श्रीदेव जी कहते हैं कि यह शिवसंहिता तंत्र (पागम) में कहा गया है, ये स्पष्टकुली महानागों 188600 •90981<noinclude></noinclude> jv5pd64ceimicp35ak05ejdmampsr9o पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३६ 250 194103 664324 2026-07-02T16:37:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664324 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>371 $400 श्रीभक्तमाल सटीक ३७१ Boo की श्रीभगवत के भजन में सदा एक रस प्रीति (रति ) रहती है ॥ (श्लोक)" * १० तेषां प्रधानभूतास्ते, शेष,' वासुकि, 'तक्षकाः * ॥१॥ शंखः, श्वेतो, महापसः' कम्बलाश्वतरौ तथा । एला पत्र, स्तथा नागः, कर्कोटक, " धनंजयौ १२ 11211 [ विष्णु पुराण, अंश १, अध्याय २१] इनकी चर्चा "श्रीरामतापनीयोपनिषद्” में भी है ॥ १. एलापत्र २. अनन्त [शेष ] ३. महापदुम ४. अश्वतर ५. कंबल ६. वासुकि ७ कर्कोटक . ८. तक्षक ९ धनंजय १० नागा ११ श्वेत. १२ शंख 126400- प्रिय पाठक ! आप सब धर्मशीलों के गृह गृह सब यज्ञादिकों में पुरोहित लोग अवश्य ही "स्पष्टकुली नाग" की ( और २ देवतों के समूह में ) पूजा करते. कराते हैं; के नाग ये हो हैं जिनकी बन्दना प्रार्थना श्रीग्रन्थकार स्वामी श्रीभक्तमाल के इस पूर्व खण्ड के अंत में कर रहे हैं। अंत में इसलिये कि ये " द्वारपाल" हैं; इनकी कृपा बिन भीतर प्रवेश नहीं हो सकता; भीतर जाने ०<noinclude></noinclude> 1de0ojdh63w3sfkk6w5552b4ak6rz8n पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३७ 250 194104 664325 2026-07-02T16:37:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664325 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३७२ श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 872 9०७४ वाले को प्रथम पापड़ी की कृपा की आवश्यकता होती है ॥ चित्रमय तथा मन्त्रमय "श्रीयन्त्र राज” * का दर्शन अवश्य कीजिये, देखिये कि यन्त्र कोट के बाहर ये द्वादश उरग कैसे शोभते विराजते हैं । -:0: * श्रीअयोध्या जी में यन्त्रराज जी अनेक ठिकाने मित्य पूजें जाते हैं श्रीकनक भवन निवासी परमहंस श्रीसीताशरण जी महाराज के पास, तथा इन्ही की कृपा से कपरे के वकील श्रीजानकी नगर निवासी बाबू दुर्गा प्रसाद जी के पास जो श्रीयन्त्र राज जी हैं, अवश्य दर्शनीय हैं ॥ श्रीयन्त्र राज जी के भीतर वे हरिबल्लभ लोग कई (सात) आवृत्तियों में विराजते हैं कि जिनकी बंदना तथा यशकीर्त्तनादि ऊपर, चार दोहों, २३ छप्पयों, और १०५ कवित्तों (प्रायः चार सौ पृष्ठों) में वर्णित हैं; सब के बीच में श्रीयुगल सर्कार विराजमान हैं। “धन्यते नर यहि ध्यान जे रहत सदा लवलीन" ॥ पनुमान से ऐसा भी निश्रय होता है कि यह छप्पे (पट पदी) “अपने गुरुस्वामी श्रीपग्रदेव जी” कृत, श्री नाभास्वामी जी ने पति मंगल जान के यहां स्थापन किया है, जैसे पृष्ट ५८ की प्रथम षटपदी (मूल ५) को भी ॥ "बाल मराल कि' मन्दर लेहीं ॥” प्रार्थना | श्री 'भक्तिरसबोधिनी” की भाषा समझना कठिन है तिरुपर भी उसका तिलक करना इस प्रबोध *900*<noinclude></noinclude> i6du6076c61fr287zqjn2d7e3qet1sx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३८ 250 194105 664326 2026-07-02T16:38:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664326 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>--90988 373 श्रीभक्तमाल सटीक । ३७३ कुछ बालक के लिये विशेषतः क्लिष्टतर है । परन्तु जो बड़ों से पढ़ा सुना उसमें से संतों की कृपा से जो कुछ मति अनुसार हो सका सो, परम प्रेमी श्रीबलदेव नारायण सिंह जी की अतिशय प्राग्रह से, लिख कर पाठकों के कर कमल में निवेदन कर रहा हूं। चूक क्षमा करके, कृपा पूर्वक सुधार लिया जावे, भक्तिवर दिया जावे ॥ यही विनय पुनः पुनः ॥ (दोहा) नमो नमो श्रीमारुती, जाके बश श्रीराम । करहु कृपा निशिदिन जप, श्रीसियसियपिय नाम ॥ १ ॥ भक्त भक्ति भगवंत गुरु, चतुरनामं, बंपु एक । पुनि पुनि पद बंदन करौं, बिनशे विघ्न रूपनेक ॥ २ ॥ (लोक) श्रीराम, रामभक्तिं च, रामभक्तांस्था गुरून् । वाक्काय, मनसा, प्रेम्णा, प्रणमामि पुनः पुनः ॥ इति श्री भक्तमाल "सत्ययुग त्रेता और द्वापर के भक्तों का वर्णन" नाम पूर्वनामावली तमाप्ता ॥ शुभमस्तु ॥ 1886-06- ** श्री सीतारामार्पणम् ००-०- ॥ श्रीहनुमते नमः ॥ ॥ संम्बत् १९६१ सन् १९०४ श्रीअयोध्या प्रमोदवन ॥<noinclude></noinclude> bm75msp6n64ialzlglj75qnb6ntddhv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४१ 250 194106 664327 2026-07-02T16:38:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664327 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४२ 250 194107 664328 2026-07-02T16:38:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664328 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४३ 250 194108 664330 2026-07-02T16:38:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664330 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>374 600- श्रीभक्तिधाविन्दु स्वाद । ३४ 600- ॥ श्रीगणेशायनमः । श्रीहनुमते नमः ॥ छप्पे | भक्त 6 १३ ८ १६ S २६ १० २० ११ ၃၀ १२ २९ १३ १० १६ २७ १७ १८ १८ १८ १९ ८ २० २१ श्रीमते रामानन्दाय नमः । गोस्वामी श्री १०८ नाभा जी महाराज सत्ययुग त्रेता द्वापर पर्यन्त के भक्त, २७ (सत्ताईस्यें) मूल (२३ वें छप्पे ) तक वर्णन किये हैं; इस्में २७५ (पौनेतीन- सो) भक्तों के नाम हैं । किस किस मूल (छप्पय ) में कितने कितने भक्तों की चर्चा है, सोही इस सूचीयन्त्र में देख लीजिये, ग्रन्थ में प्रत्येक छन्द पर अंक तो लगे ही हैं। सब भक्तों के नाम " सूचीपत्र" में तो लिखे जा चुके ही हैं, तथापि वर्णमाला १८ | के (अकारादि) क्रम से भी सब नामों की पूरी सूची श्रीसीतारामकृपासे दी- जावेगी । E २२ १६ २३ १६ २४ १ २६ २ २७ ८ “भक्ति सुधाबिन्दु स्वाद" के ३७३ पृष्ठों में, इन्हीं के चरित्र वर्णित हैं । पृष्ठ (३७४ वां तो यही है) २७५ वें से कलियुग के भक्त श्रीसीतारमकृपासे गाए जावेंगे ॥ सब=२७५ श्रीअयोध्या जी ६रुप गहन सुदी पंचमी, १९६१ 188 4:00- सीतारामशरण भगवानूप्रसाद (S. R. S. B. P. Y<noinclude></noinclude> j71ltm415u6ke2pnrz7fmc8isfgc42i पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४४ 250 194109 664331 2026-07-02T16:38:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664331 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>375 श्रीभक्तमाल सटीक । श्री सीताराम श्रीहनुमते नमः श्रीमते रामानुजायनमः । श्रीमते रामानन्दाय नमः । श्रीभक्तमाल सटीक । ( कलियुग भक्तावली । ) ३०५ (३) कप्पे । " atre प्रथम हरि पु धरे, त्यों चतु- र्व्यूह कलियुग प्रगट || “श्रीरामानुज'' उदार, सुधानिधि, अवनि कल्पतरु | "विष्णु स्वामि " बीहित्य सिन्धुसंसार पारकरु | "मध्वाचारज" मेघ भक्ति सर<noinclude></noinclude> fburnm2cnqnzpr6d60xlykl38acdkxv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४५ 250 194110 664332 2026-07-02T16:39:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664332 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०६ श्रीमान्दु स्वाद । ऊसर भरिया । " निम्बादित्य" श्रादित्य कुहर अज्ञान जु हरिया || जनम करम भागवत धरम सम्प्रदाय थापी घट | atara प्रथम हरि पु धरे, त्यों चतु- ह्यूह कलियुग प्रगट ॥ २४ ॥ (३) " बपुधरे " = अवतार लिये, अवतीर्ण हुए, प्रगटे ॥ "द्यापी" = स्थापित किया । (2) दोहा । "रमा" पद्धति, रामानुज; विष्णु स्वामि, " त्रिपुरारि निम्बादित्य, “सनाकादिका;" मधुकर, गुरु " मुखचारि ॥५॥ (२६) चौथा दोहा मूल पृष्ठ ४८ में है और पांचवां दोहा (वा उन्ती- मूल ) यही दोहा है, जिसकी चरचा ५१ वें पृष्ठ ( पंक्ति ७/८ ) में हुई है । चारो सम्प्रदाय | 876 १ श्री "श्री" सम्प्रदाय श्रीरामानुज स्वामी सं० २ श्री शिव सम्प्रदाय श्रीविष्णुस्वामी सम्प्रदाय ३ श्रीसनकादिक सम्प्रदायाश्रीनिम्बार्क स्वामी सं० 8 श्री ब्रह्म सम्प्रदाय श्रीमध्वाचार्य सम्प्र०<noinclude></noinclude> jy7xvt07aywkakuq5gexirkk91xbfw7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४६ 250 194111 664333 2026-07-02T16:39:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664333 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>377 198000- श्रीभक्तमाल सटीक । वार्तिक तिलक । ३७७ --90-05 (१) यतीन्द्र स्वामी श्री रामानुज महाराज जी भाष्यकार, बड़े ही उदार, श्रीसीतारामभक्ति रूपी अमृत के सागर, कल्पवृक्ष के समान जगत में सर्वकामप्रदः (२) श्रीविष्णु स्वामी जी महाराज, संसार समुद्र से पार करनेवाले दीर्घ नाव (जहाज) ; (३) श्रीमध्वाचार्य्यजी महाराज, ऊसरके सूखेसर समान जीवों के हृदय में श्री भक्ति रूपी जल बर्षा- करके भरनेवाले घन; पौर (४) श्रीनिम्बार्कजी महाराज, जनों के अज्ञान रूपी कुहेसे को नाश करके उनके हृदयमें ज्ञान तथा मक्ति प्रकाश करनेवाले सूर्य्य भागवत जन्म, भागवत कर्म, भागवत धर्म, तथा भगवतधर्म्मो के चारो सम्प्रदाय, पापही चारोके स्था- पित किये हुए प I जैसे भगवान् पहिले चौबीस रूपसे पवतरे, वैसेही भगवती कलियुग में इन चारो प्राचार्य रूप प्रगट हो चारी भागवत सम्प्रदाय स्थापन किये हैं । स्वामी श्रीरामानुज की पद्धति, श्रीलक्ष्मी जी की पौर श्रीविष्णु स्वामी जी की पद्धति श्रीशिव जी की है । श्रीनिम्बार्क पद्धति के आचार्य श्रीसनकादिक हैं; पोर, श्रीमध्वाचार्य जी का मार्ग, श्री गुरु ब्रह्मा जी की पद्धति है ॥<noinclude></noinclude> g5cjddrbq8ebqq5vxalajdxmcwsegmc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४७ 250 194112 664334 2026-07-02T16:39:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664334 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>5 8000- 60 श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । श्रीनिम्बादित्य जी । (५) । टीका कविस । निंबादित्य नाम जाते भयो अभिराम कथा, प्रायो एक दंडी ग्राम, न्योतो करी, झाए हैं। पाक को बार भई, संध्या मानिलई जंती, "रतीहूं न पाऊँ" वेद वचन सुनाए हैं॥आंगन में नींब, ताथै स्पादित दिखाय वाहि, भोजन करायो, पाछे निशि चिन्ह पाए हैं । प्रगट प्रभाव देखि, जान्यो भक्ति भाव जग, दांव पाइ, नांव पत्री, हस्खो मन, गाए हैं ॥ १०६ ॥ (१२६-५२३) "दावपेच, अक्सर, अवकाश, सन्धि, सुगमता । रती- माशा वार्तिक तिलक | भागवत धर्मप्रचारक स्वामी श्री निम्बादित्य (नि. बार्क) जी के ग्राम में एक समय एक दंडी स्वामी ए; आपने उनका न्योता किया, संन्यासीजी इनके स्थान में आए। शिष्टाचार तथा रसोई में संध्या (व- रंधिक विलम्ब) होगई: यतीजी ने वेदवचन का प्रमाण देकर कहा कि “रात्रि में रतीमात्र भी मैं पाता नहीं हूं" यह सुन, पापको दया आई कि 'मेरेराम जी के हां अतिथि उपवास करे, (पीर मेरीही असावधानता से ! ) यह विचारकर मापने कहा कि इस आंगन में जो "नि- " का वृक्ष है, उस्पर देखिये कि अभी ("पर्क" घा 378 -90988<noinclude></noinclude> muq25zi0184yxk4082is3na2qvf7ecq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४८ 250 194113 664335 2026-07-02T16:39:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664335 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>379 188600- 600- श्रीभक्तमाल सटीक । ३७९ -9001 “प्रादित्य" अर्थात् ) सूर्य्य देव विराजते हैं, और ऐसाही दिखाके दंडी जी को सन्तुष्टता पूर्वक प्रसाद पवा दिया । पीछे, (दो तीन घड़ी) रात्रिके चिन्ह पाकर, दंडीजी ने पापका प्रभाव प्रगट देखा; तथा जगतमें सर्वत्र इनकी भक्तिभाव की दाव एवं महिमा प्रख्यात होगई, और इसीसे पापका यह नाम (निम्बार्क) विख्यात हुआ । इसीसे मेरा मन हर गया, और मैने श्रद्धा पूर्वक आपका यश गान किया ॥ पाप, दक्षिण में "श्रीगोदावरीगंगा” के तट “मुँगेर" नाम के ग्राम के वासी महाराष्ट्र ब्राह्मण "अरुजी और माता "जयन्ती जी" के पुत्र हैं । भगवान् ने "श्रीहंस" (पृष्ठ ६१) अवतार लेके श्रीस- सनकादिक को उपदेशकिया और श्रीसनकादिक से श्री नारद जी ने पाया, जिससे यह सम्प्रदाय " सनकादिक सम्प्रदाय" कहलाता है; उसीको स्वामीजी ने श्रीनारद जी से पार्क, प्रचलित किया; जिससे वही, श्रीनिम्बार्क ( निम्बादित्य ) सम्प्रदाय के नाम से विख्यात हुवा | गोलोक बासी श्रीकृष्ण भगवान् की माधुर्य्य उपासना, इस संप्रदाय की मुख्य बात है। आपकी गादी (१) अरुण और (२) सलेमाबाद इत्यादिक नगरों में हैं ॥ निम्बार्क सम्प्रदाय तथा श्री श्रीसम्प्रदाय की “श्रीगुरु- परम्परा" लागे देखिये -<noinclude></noinclude> 6150b8eqrklzgsq9v51cb78co0r67nk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४९ 250 194114 664336 2026-07-02T16:39:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664336 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८० 1986-00- 18600- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । 380 स्वामी श्रीरामानुज महा पूर्णाचार्य श्री यामुनाचार्य्य श्री परांकुश मुनि श्रीराममिश्र श्री पुण्डरीकाक्ष श्रीनाथ मु श्रीवोपदेवजी श्रीनिम्बा- श्रीशठकोपजी के स्वामी श्रीविष्यक सेनजी श्रीनारदजी श्रीलक्ष्मीजी श्रीसनकादिक | श्रीहंस भगवान् श्रीमन्नारायण भगवान 108000--<noinclude></noinclude> gkjhkuh22i2f0vn6wc1rdv6h6b9d8ek पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५१ 250 194115 664338 2026-07-02T16:40:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664338 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८२ 188600-- 88 श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 382 तारक शिष्य प्रथम भक्ति बपु मंगलका- ६ री ॥ कृपणपाल करुणा समुद्र, "रामानु- ज" सम नहिँ बियो । सहस्र ग्रास्य उप- देश करि, जगत उधारन जतन कियो ३१ UREN (***) । वार्त्तिक तिलक | श्री सिन्धुजी (नाम श्रीलक्ष्मी) महारानीजी का सम्प्र- दाय, सब सम्प्रदायोंका शिरोमणि, और संसारताप से बचाने के निमित्त भक्ति के मण्डप का दोक्षा रचा हुआ है। श्रीश्रीजी महारानीसे, श्रीविष्वकसेन जी भग- तपार्षद फिर उनसे पुण्यपुंज मुनिवर्य्य नम्रता-नीति- शील "श्रीशठकोप" जी; श्री "वोपदेव जी कि जिनने श्रीमद्भागवत रूपी लुप्त मक्खन का उद्धार किया; मंगल स्वरूप " श्रीनाथमुनि” जी; तथा परम यश- स्वी श्री "पुण्डरीकाक्ष” जी; भक्तिरस के राशि श्री "राम मिश्र" जी; श्री शंकुश जी, कि जिनका प्रताप प्रगट है; स्वामी श्री " यामुनाचार्य्य” जी; तथा भाष्य- कार स्वामी अनन्तश्री रामानुज जी, कि जो संसार के मोहान्धकार हरनेवाले सूर्य उदय हुए ॥ ऊंचे गोपुर (बृहद्वारकोइल ) पर चढ़के, पतिउच्च- स्वरसे, श्रीमन्त्रजी का उच्चारण किया, सोये हुये लोग<noinclude></noinclude> erl5thwbt96yb2hcnxy1hdmbd9grung पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५२ 250 194116 664339 2026-07-02T16:40:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664339 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>383 श्राभक्तमाल सटाक । ३८३ जाग पड़े; बहत्तर ने अपने अपने श्रवण में रामकृपा से धारण किया; इसीसे उतनी ही अर्थात् बहत्तर न्यारी न्यारी पद्धतियां गुरुदेव की हुईं जिन में प्रथम शिष्य श्रीकुरुतारक (श्रीकुरेश जी) को, मंगलकारी श्री भक्ति प्रेम रूप ही जानिये । दीनपालक पर करुणा के सागर, स्वामी श्री १०८ " रामानुज " जी के सरिस दूसरा कोई नहीं । आपने सह मुखसे उपदेश करके जगतके उद्धारार्थ उपाय ( प्रयत्न) किया ॥ (231) टीका । कबित्त । पास्य सो बदन नाम, सहस हजार मुख, शेष पव- तार जानी, वही सुधि आई है। गुरु उपदेशि मन्त्र, कह्यो “नीके राख्यो” अन्त्र, जपतहि श्याम जू ने मूरति दिखाई है || करुणानिधान कही "सब भगवत पायें” चढ़ि दरवाजे सो पुकारयो धुनि छाई है । सनि शिष्य लियो यों बहत्तर हि सिद्ध भए नए मक्ति चीज, यह रीति लेके गाई है ॥ १०० ॥ (६२९-५२२) "आस्य"=मुँह, बदन; "सहस= १००० वार्तिक तिखक । पास्य नाम वदन (मुँह), सहस नाम सहस्र (१०००) यह जान लेना चाहिये कि झाप सहस्र मुख श्री शेष के aar हैं । श्रीगुरु “गोष्ठी पूर्णाचार्य्य” जी ने प्रापकी मन्त्र देकर पाज्ञा की कि "बड़े यत्न से अन्तःकरण में गुप्त तथा नीके रक्खो” । 1986- 18B 0·00-<noinclude></noinclude> 9m9j0p4u1u0ac1fxhij6xppk3ev43do पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५३ 250 194117 664340 2026-07-02T16:40:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664340 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८४ 118800- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । जपते ही श्रीभगवान् श्याम सुन्दर श्रीरामचन्द्र ने दर्शन दिये । मन्त्र का यह प्रभाव देख, पाप की करुणा का लहर उठा, जीवों पर दया पाई, जो में कहा कि सब लोग प्रभु को जिस्से पावें सो मन्त्र सबको सुना देना चाहिये । यों विचारकर, रातके समय गोपुर ( फाटक ) पर चढ़गए और यहां ही से चिल्ला के मन्त्रोचारण किया; पपूर्व ध्वनि छाई ॥ - यह शिक्षा पा ७२ बहत्तर सिद्ध होगए । “जिसे चाहे पिया सोती जगावे" || प्रत्येक की पद्धति न्यारी न्यारी हुईं। यह चीज, यह नई रीति गाने योग्य है कि उधर परहित के लिये आपने श्रीगुरुप्राज्ञा उल्लंघन पापभार अपने सीस पर घर लिया, और इधर भाव- ग्राही गुरु तथा भगवान् ने इस्से अपनी अतिशय प्रस- नता प्रगट की ॥ (चौ० ) "रहति न प्रभुचित चूक किये की । करत सुरति सौ बार हिये की ॥ " (2) टीका कवि | गए " नीलाचल" जगन्नाथ जू के देखिये को, देख्यो अनाचार, सब पंडा दूरि किये हैं । संग लै हजार शिष्य रंग भरि सेवा करें, धरें हिये भाव गूढ़ दरसाई दिये हैं। बोले प्रभु "वेई स्पावें, करे अंगीकार मैं तो; प्यार ही को लेत, कमूं पौगुन न लिये हैं" । तऊ दृढ़ कीनी; फिर कही, नहीं कान दोनी; लोनी वेद वाणी 12000- 384 988<noinclude></noinclude> 9ec9pnmsb5z372trakrbdkawctwhus9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५४ 250 194118 664341 2026-07-02T16:40:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664341 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>8800- 385 69-00- श्रीभक्तमाल सटीक । ३८५ बिधि कैसे जात छिये हैं ॥ १०८ ॥ (६२९-५२१) "नीलाचल’=मोलगिरि, उड़सा प्रदेश में, जिसपर श्रीजगनाथजी का मन्दिर है । “रंगभरि” = प्रेम में पूर्ण होके, पूरी प्रीति से, स्नेह में भरके । “करे”=किये, कर चुके । “नहिं कान दोनी” - ध्यान नहीं दिया, उसके अनुसार चले नहीं । "ढिये जात हैं"=क्षय वा नष्ट किये जाते हैं । बार्तिक तिलक | श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन के लिये (उड़ेसा, पुरुषी- तम पुरी में) एक बेर पाप सहस्र शिष्यों सहित गए वहां धोनेमाँजने तथा बरतन चौका घ्यादिक विचार चार का बड़ा प्रभाव पण्डों में देखकर, पनाचार को बुढ़ाना चाहा; पण्डों की सेवा से अलग करके बड़े प्रेमसे पूजा सेवा करने लगे; महानुभावों के भाव बड़े गूढ़ होते हैं, उनका कहना ही क्या है । परन्तु सीधे पंडे दुखी हुए। नेम से अधिक प्रेम के चाहनेवाले प्रभुने स्वप्नमें दर्शन देकर कहा कि "मैं पंडों को अंगीकार कर चुकाहूं मैं कदापि दोषों पर दृष्टि नहीं देता, प्रेम ही को ग्रहण किया करता हूं; ही लोग पाकर सेवा करें" । तब भी पाप पपपाचार की रीति में दृढ़ही रहे । श्रीजगन्नाथ जी ने पुनः पुनः पाज्ञा की, पर पापने एक न सुनी बरन प्रार्थना की कि प्रभो ! देखिये पापकी सेवा - विधि बेद में कैसी वर्णित है, भला में उन्हें क्यों- कर छोड़सकताहू ॥ 3000-<noinclude></noinclude> 4l389ue8y0jervreqm1z8mvvyeyphm4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५५ 250 194119 664342 2026-07-02T16:40:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664342 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८६ 18000- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । (e) टीका कवित्त | जोरावर भक्त से बसाइ नहीं, कही किती, रती हू न लावैं मन चीज दरसायो है। गरुड़ को प्राज्ञा दर्द, सीई मानि लई उन, शिष्यनि समेत निज देश छोड़ि आयो है ॥ जागि के निहारे, ठौर और ही, मगन भए, द यों प्रगट करि गूढ़ भाव पायो है । वेई सब सेवा करें, श्याम मन सदा हरें, घरें सांचो प्रेम, हिय प्रभु जू दिखायो है ॥ १०९ ॥ (६२९-५२०) "जोरावर्"= बलवन्त, बलो, प्रबल । "रती =, रत्ती, एक माशेकाट (आठवां) भाग, अति अल्प, कुछ भी नहीं । "किलो"= कितनी हो । वार्तिक तिलक | प्रेमयुक्तम का बल भी कैसा भारी है, कि जिस्से स्वयं प्रभु भी हार मान जाते हैं। प्रभुने कितनीही कही, परन्तु पापके प्रेमभरे हृदय में एक भी नलगी । अन्ततः, श्रीजगन्नाथ जी ने श्रीगरुड़ जी को आज्ञा कि "इनको सब सेवकों सहित रात्रिमें श्रीरंगपुरी पहुँचा पाप" । श्री खगेशजी ने वैसाही किया । नींद टूटी तो अपने सब को श्रीजगन्नाथपुरी में न पाकर श्रीरङ्गधाम में देख के, शीलसंकोचसिन्धु प्रभु के स्वभाव तथा गूढ़ भाव को देख कर, आप प्रेम में डूब गए । वहां, बेही पंडा लोग फिर सेवापूजा करनेलगे । सेवा के बिरहवियोग के अनन्तर जो पुनः सेवाकी प्राप्ति हुई, इस्से उनकी प्रीति दूनी होगई । प्रभु की सदैव पपनी पूजा से पतिही प्रसन्न रखने लगे । 386<noinclude></noinclude> o9ifq1u6nhu8gxgmrldqdiw8y6ho8i8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५६ 250 194120 664343 2026-07-02T16:41:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664343 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>387 88600- 3400 श्रीभक्तमाल सटीक । स्वामी पनन्तश्री रामानुज जी का समय- कलि विक्रमी ईस्वी | शक जन्म ४९१८ १०७४ १०१७ ९३९ परधाम ४२३८ ११९४ ११३७ * १०५९ वर्त्तमान ५००५ | १९६१ | १९०४ ८८. ३८७ -900 गत वर्ष ८८७ १८२६ बय १२० वर्ष "कल्यऽब्देषु प्रयाते वह व' सुनिशा 'नाथ चन्द्राग्धि'- सख्येष्वायाते पिंगलाब्दे सवितरिच गते मेषराशिं मृगांके ||स्थे कान्तिमत्यां हरितकुलमणेः केशवा- व्यद्विजाग्याच्छ्रीमत्यां भूतपुर्यामथ, धरणितले ऽभूत्स रामानुजाः ॥ १ ॥ " ("विष्णुचिन्ह" ग्रन्थे ) + आपके जन्म को "आठसौ बर्ष से अधिक (८८७) हुए । * ऐतिहासिकतत्त्ववेत्ता " हरप्रसाद शास्त्री एम० ए०" ने भी १९३७ ही (ईस्वी) आपके परधाम का समय लिखा है; Dr. W.W. Hunter M. A. तथा “A.C. Mukerji, M. A.; मुन्शी श्री तपस्वी राम जी, और R. C. Datta; इन सब ही ने “12th century (ईस्वी बारहवीं शताब्दी) "लिखी है ॥ Dr. W. W. Hunter ने ११३७ की जगह सीधे सीधे ११५० लिख दिया है; केवल १३ वर्ष ८१३ मात्र का भेद (इतने में), भेद ही क्या ? अपने ग्रन्थों से १९३७ ही ठीक है । 188600-- (S. R. S. B. P . )<noinclude></noinclude> 5jk50r4byh78f21eadjei8uxeqmdidq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५७ 250 194121 664344 2026-07-02T16:41:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664344 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८८ 1983 ace ' श्रीभसुिधाबिन्दु स्वाद । 388 श्रीपतीन्द्र जी के यश श्री प्रपत्रामृत" में देखिये ॥ भाष्यकार सम्प्रदाय शिरोमणि (श्री लक्ष्मीपद्धति) के प्रसिद्धकर्ता, संसारसागर के लिये दीर्घनाव, भक्त जनों के कल्पतरु, श्रीभक्ति रूपी भूमिको स्थिर रखने के लिये दिग्गज, भागवतधर्म के प्रचार तथा प्रकाश के हेतु सूर्य के समान, स्वामी अनंतश्री यतीन्द्र रामा- नुज महाराज जी के रूप से श्रीशेष जी, भगवान् की आज्ञा से पृथ्वी पर द्राविड़ देश में कांचीपुरी के पास श्रीकावेरी गंगा के तट “भूतनगरी" ग्राम में, श्रीहारीत ऋषीश्वर के वंश (गोत्र) में, “श्री केशवजज्वा” नामक याज्ञिक ब्राह्मण की धर्म पत्नी "श्रीकांतिमती” जी के गर्भ- से, पिंगल नाम संवत्सर में मेष संक्रान्ति के पीछे आर्द्रा नक्षत्र में चैत शुक्ल पंचमी गुरुवार को, अवतीर्ण हुए। श्री केशव ज्वाजी के गुरु श्री "शैलपूर" जी ने पापके संस्कार किये । कांचीपुरी में पंडित यादवगिरि से १६ सोलह वर्ष की अवस्था में वेदांत पढ़ते थे। उसी वस्था में उनके पिता का बैकुण्ठ बास हुप्रा । वहां के राजा की सुता एक ब्रह्मराक्षस से पीड़ित थी; राजा के बुलाने से यादव पंडित, अपने शिष्य श्री १०८ रामानुज जी समेत, वहां गया । ब्रह्मराक्षस ने कहा "तुझसे मैं नहीं जानेका, पर यदि तेरे यह शिष्य श्रीरामानुज जी अपना चरणामृत मुझे दें तो --00088<noinclude></noinclude> or3m8uuc53ppfg9yjjkmvgkt1me5b1l पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५८ 250 194122 664345 2026-07-02T16:41:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664345 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>389 183000-- श्रीभक्तमाल सटीक । ३८९ मैं अभी इसको छोड़दू" । राजा के विनय से श्री स्वामी जी ने अपना चरणतीर्थ ब्रह्मराक्षस को दिया वह कृतकृत्य हो गया । लड़की सुखी होगई । इस बात में, और "कप्यास” शब्द के स्पर्थ निरु- पण, तथाद्वैत के खंडन में पापका महा प्रभाव देख, मत्सर से भर, उक्त पण्डित यादव आापका शत्रु बरन आपके प्राण का गाहक हो गया। वह अपने एक निज शिष्य से सम्मति करके, चुपचाप त्रिबेणी में डुबा देने के निमित्त आपको तीर्थ यात्रामिसु श्रीप्रयाग जी ले चला । पाप के मौसेरे भाई "गोविन्दजी" भी उसी पण्डित से पढ़ते थे; श्री रामकृपा से इनको उस दुष्ट पण्डित की गुप्त इच्छा जान्ने में आगई; इनने पापको साब- धान कर दिया। मार्ग के एक बन में छुप रहे और श्री "सहायों के परम-रक्षक" जी का स्मरण करने लगे ॥ करुणासिन्धु भक्तवत्सल श्रीलक्ष्मीनारायण जी ने, व्याधा भिल्ल और भिल्लिनी के वेष से आपके पास उस न में रातभर रहके आपकी रक्षा की और प्रातःकाल आपके हाथों से एक कूप का जल पीके वे दोनों अन्तर्धान हो गए; और आपने अपने को कानूचीपुरी में पाया; श्रीजनरक्षक भगवान् का धन्यबाद कर घर जा, माता के चरणों के दर्शन कर इनसे सारा वृतान्त सुनाया । श्रीमातु कान्तिमती जी ने उपदेश दिया कि “बस्स ! Marath सत्यव्रत क्षेत्र" में श्री " कानूची पूर" -9098<noinclude></noinclude> rjjjpoxttgg0xr7n5iym80cnatxfqul पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५९ 250 194123 664346 2026-07-02T16:41:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664346 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३९० -0001 श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । नाम वैष्णव महात्मा (श्रीयामुनाचार्य जी के शिष्य) श्रीलक्ष्मीनारायण जी के अनन्योपासक हैं। बेटा ! जाके उनसे मिल सब प्रसंग सुना और महात्माजी जो आज्ञा दें सो करना ॥ ” तू आपने वैसाही किया । श्रीकान्ची पूरण जी ने बताया कि " वत्स ! वे भिल्लिनी तथा व्याध के वेष में स्वयं श्रीलक्ष्मीनारायणजी थे, जिनने कृपा करके तुझे उस कूपके जलका माहात्म्य लखाया है । इस्का शय यह है कि उस कूप के जल से तू प्रभु की (श्री तू वरदराजंभगवान् की सेवा कर, तेरे सकल मनोरथ पूरे होंगे, प्रभु तुझपर विशेष कृपा करेंगे" । यह सुन, नन्दमग्न हो, धन्यबाद दे, आपने ऐसाही किया । श्रीलबन्दारस्तोत्र के कर्त्ता श्रीयामुनाचार्य महाराज जी जी श्रीरङ्ग भगवान की सेवा में उस समय थे, पापको (श्रीरामानुज स्वामी को) बड़े योग्य बालक समककर अपने एक शिष्य को आपके लाने के लिये भेजा । ज्ञानुसार आप श्रीरङ्ग नगर को चले । परन्तु पाठ दिन के भीतर ही श्रीरंग भगवान् की आज्ञा पा श्री ६ यामुनाचार्य स्वामी शरीरत्याग कर परमधाम को चले गए। इसकारण यहां आनेपर छापने श्रीस्वामी जी महाराज का दर्शन न पाया; केवल श- रीर मात्र को श्रीकारी तट पर बड़ी भीड़भाड़ के मध्य देखकर प्रणाम किया। बड़े शोक मग्न हुए । 390 088<noinclude></noinclude> 2op0guz2mg94dpuydwin9t6zg20h07s पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६० 250 194124 664347 2026-07-02T16:41:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664347 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>391 4600- 2806 श्रीभक्तमाल सटीक । ३९१ श्री स्वामीजी की तीन उङ्गलियां मुड़ी देखकर पा पने कहा कि "इस्का तात्पर्य यदि प्रमुक तीन बातें हैं, तो पङ्गुलियां खुल जावें । इस बचन के उच्चारण के साथ ही तीनों अँगुलियां एक एक करके खुलही तो गईं; और इसी आश्रय संघट के समय से सब लोग पापका अधिकतर स्यादर करने लगे । वे तीनों बातें ये थीं- (१) श्री संप्रदाय प्रचार । (२) ब्रह्मसूत्र पर भाष्य करना । (३) ईश्वर जीव माया की व्याख्या करनी । आपने श्री यामुनाचार्य जी के पांच शिष्यों से उपदेश लिये, अर्थात्— (१) श्री महापूर्णजी से, पंच संस्कारयुत श्रीनारायणमन्त्र; (२) श्रीकाजीपूर्ण जीसे, श्रीवरदराज की सेवा विधि; (३) श्रीगोष्ठीपूर्णजी से, श्रीराम षडक्षर मन्त्रराज; (४) श्रीशैलपूर्णजी से, श्रीरामायण जी के पर्थ; (५) श्रीमालाधर जी से, सहस्रगीति के अर्थ । इसके पश्चात विरक्त हो आपने त्रिदंड धारण किया। (चौ० ) " घरे त्रिदण्ड उदण्ड पानि में । रति पछिन्नजानकी जानि में " ॥ आप श्रीरंगनगर में पहुँच, श्रीरंगभगवान् की सेवा में रहने लगे । यह वार्त्ता तो पूर्व ही लिखी जा चुकी है कि रात SAGO-- --9098<noinclude></noinclude> iiz7kk65v9bx6gvevq0ronlqlevxwvw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६१ 250 194125 664348 2026-07-02T16:41:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664348 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६२ श्रीभक्ति सुधाविन्दु स्वाद । 392 को गोपुर पर चढ़के मन्त्र उच्चस्वर से उच्चारण करके आपने जीवों को कृतार्थ कर दिया ॥ (पृष्ट ३८२ पंक्ति २१) श्रीजगन्नाथपुरी का चरित भी ऊपर ही कहा गया है। (क०१०८।१०९ पृष्ट ३८५३८६) ऊपर के लिखे तीनों काय्यों में लगे और पूरा किया । दिग्विजय में पनेक प्रदेशों को कृतार्थ और लाखों मनुष्यों को श्रीभगवान् के शरणागत कर दिया। आपके अति प्रिय शिष्य "श्री कूरेश जी” ने तथा "पण्डित यादव की माताजी ने भी अपने पुत्र को (उक्त पण्डित को) बहुत कुछ उपदेश किया कि "यतीन्द्र महाराज का शिष्य होजा, नहीं तो तेरा कल्याण नहीं ।" तब वह पाप का शरणागत हुआ, आपने उसके पंचसंस्कार कर गोविन्द प्रपन्न उनका नाम रश्वा । बारहसहरु सेवक साथ रहा करते थे; चौहत्तर वा पचहत्तर तो मुख्य शिष्य थे, जिनसे जगत में शरणा- गति उपदेश का प्रचार हुआ । दिल्लीपति यवन के यहां से एक भगवन्मूर्त्ति लाकर आपने विराजमान किया । उस बादशाह की लड़की भी भगवत प्रेमिन होकर परम पद की गई । एक स्त्रीभक्त विषयी को जिस प्रकार से पापने हरि सम्मुख करके " धनुर्दास” नाम रक्खा, वह चरित्र; तथा विषयी बनिये को सुमति प्राप्त होने के वृत्तान्त भी, सुन्ने ही योग्य हैं ।<noinclude></noinclude> 4e1sx4aczytmqgrtp51heo7e004cjr5 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६२ 250 194126 664349 2026-07-02T16:42:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664349 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>393 - श्रीभक्तमाल सटीक । ३९३ आपके सुयश अपार हैं। "प्रपन्नामृत" नामक ग्रंथ में, पापके जन्म से भगवद्धाम यात्रा पर्यंत के मुख्य मुख्य चरित्र सब संक्षेप से वर्णित हैं। अपने सम्म - दाय के प्रत्येक मूर्त्ति की अवश्य देखना सुन्ना चाहिये । पाप १२० (एकसी घीस) वर्ष पृथ्वी पर विराजते रहे । कलि सम्बतसर ४२३८, विक्रमी सम्बत १९९४ (कलियुग की पांचवी सहस्राब्दी में) अर्थात विक्रमी १९९४ तक इस भूमि पर वर्तमान थे | ऐसा महानु- भावों ने तथा ऐतिहासिक विज्ञों ने लिखा है। श्रीविष्णुस्वामीजी । श्रीशिव जी ने यह सम्प्रदाय पहिले श्री प्रेमा- नन्द (परमानन्द) मुनि जी को उपदेश किया; इसी से यह "शिव (रुद्र) सम्प्रदाय" कहा जाता है । श्री- "परमानन्द मुनि” जी श्री " विष्णुकांची" पुरी में हुए । पाप श्रीवरदराज महाराज के मन्दिर में पूजासेवा किया करते थे । भगवान् श्रीवरदराज प्रसन्न होके श्री- शिव जी को साझा दी, जिनने मन्त्र उपदेश करके (सातवर्ष के बालक रूप का ध्यान बताया । इस स- प्रदाय का श्रीविष्णुस्वामी जी ने प्रचार किया, कि जो दक्षिण देश में ब्राह्मणवंश में हुए । इसलिये “बि- स्वामी सम्प्रदाय" प्रसिद्ध हुवा ॥<noinclude></noinclude> cywxegae8ntsa5yd91daxydm7g3um3u पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६३ 250 194127 664350 2026-07-02T16:42:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664350 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६४ 8000- श्री सुषाबिन्दु स्वाद । परम्परा में पाप श्रीवरदराजभगवान् से पचासवें, श्रीशिव जी से ४९ वें, श्रीप्रेमानन्द मुनि से ४८ वें हैं ॥ आप के परहित तथा उदार चित्त को समझ श्री जगन्नाथ जी ने अपने मन्दिर में चारद्वार कर दिये ॥ श्रीमध्वाचार्यजी । पहिले, भगवत ने यह (माध्य) सम्प्रदाय श्री- ब्रह्मा जी को उपदेश किया । फिर इसका प्रचार श्रीमध्वा श्रीमध्वाचार्य्यं चार्य स्वामीजी से हुआ। श्री मध्वाचार्य जी द्राविड़ देश में कांचीपुरी से पश्चिमदक्षिण (नैऋत्य) कोने पर "उरपी कृष्णा" ग्राम में ब्राह्मण हुए। आपने पंजाब देश में राजा को परिचय दे, उस्का अभि- सान नष्ट कर, उस्को उसके दल श्रीनरहर्याचा सुबुद्धाचार्य्यं श्रीवेदव्यास श्रीनारदजी श्री ब्रह्माजी 394 3600- 1880 समेत हरिसम्मुख कर दिया। श्रीहंसभगवान्। (ई) । चतुर महन्त चतुर महंत दिग्गज चतुर, भक्तिभूमिदा- बेर हैं। "श्रुति प्रज्ञा" "श्रुति' देव" "ऋ-<noinclude></noinclude> jbnaj4p9taaglfte608iv1xsd86jn12 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६४ 250 194128 664351 2026-07-02T16:42:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664351 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>395 [0-00- श्रीभक्तमाल सटीक । ३९५ षभ" "पुहकर" इभ ऐसे । “ श्रुतिधामा " "श्रुति उदधि” “पराजित” “वामन" जै- से ॥ श्रीरामानुज गुरुबंधु विदित जग मङ्गल- कारी । "शिव संहिता”-प्रणीत ज्ञान सन- कादिक सारो ॥ इन्दिरा पद्धति उदार धी सभा साखि सारंग कहैं । चतुर महंत दिग्गज चतुर, भक्तिभूमि दाबे रहें ||२१||(3) = T " सारी" - इव, सरिस, नाई, सरीखा समान । "इभ धारण, करि, सिन्धुर, गयन्द, गज, हस्ती, हाथी "सारङ्ग” " मत्त गजेन्द्र । पपीहा । भ्रमर | रामगुणगायक भक्त | "इन्दिरा पद्धति" - श्री श्री सम्प्रदाय, श्रीलक्ष्मी जी का मार्ग। "दिग्गज चतुर” - चारो दिशाओं के हाथी, नाम (१) ऋषभ (२) पुहकर (३) पराजित (४) वामन | १. श्रुतिप्रज्ञा श्रुतिदेव ३. श्रुतिधामा ४. श्रुतिउदधि ऋषभ पुष्कर पराजित वामन वार्तिक तिलक । चारो महान्त, चारो दिग्गजों की भांति, भक्तिरूपी धरती को दबाए रहते हैं । श्रीश्रुतिप्रज्ञाजी तथा श्री श्रुतिदेव जी, "ऋषभ" और "पुष्कर" नाम के दिशा- गजों के सरिस हैं; एवं श्रीश्रुतिधामाजी तथा श्री- श्रुतिउदधि जी, "पराजित" और "वामन" सरीखा हैं । --009<noinclude></noinclude> 5k6mxy7xevmdbowzx5wkudla4pzq96d पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६५ 250 194129 664352 2026-07-02T16:42:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664352 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>396 ३९६ He.... श्री सुधाबिन्दु स्वाद । ये चारो महानुभाव, स्वामी पनन्तश्री रामानुज महा- राज जी के गुरु भाई जगत के बड़े मंगलकारी पर जगत में प्रसिद्ध हैं। शिवसंहिता में जैसा बर्णन है, उसी रीति से सनकादिक चारो माइयों के समान ए- कतुल्य ज्ञानी हैं। श्रीलक्ष्मी जी के सम्प्रदाय में प्रति उदार बुद्धिवाले हैं । सन्त सभा के ( पक्षपातरहित ) साक्षी सज्जन, इन चारो भक्तिरक्षक को श्रीरामानु- रागमें मत्त गजराज ही कहा करते थे; अतएव अपने भजन सदाचारों से भक्ति रूपी भूमि को ऐसा दबाए रखते हैं कि किंचित डगने डोलने नहीं पाती ॥ (3) (श्री) आचारजजामात की कथा सुनत हरि होइ रति । कीउ मालाधारी मृतक सरिता में आयो । दाह कृत्य ज्यों बन्धु न्योति सब कुटुंब बुलायो ॥ नाक aara हिँ विप्र तबहिं हरिपुर जन आए। जेवत देखे सबनि, जात काहू नहिँ पाए ॥ 66 लालाचारज " लक्षधा प्रचुर भई महिमा जगति । (श्री) आचा- रजजामाता की कथा सुनत हरि होइ Tfa || 2 ||(11) "लक्षधा”=लक्षगुण, लाख गुना । "जामात" - सुता का पत्ति, दामाद, जमाई । “हरिपुर"बै कुष्ठ ! " जगति" लोक में । -900 60- --900*<noinclude></noinclude> lf577liviwc3v18d31a92cyg1xtj0ck पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६६ 250 194130 664353 2026-07-02T16:42:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664353 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>397 52000- श्रीभक्तमाल सटीक । ३९७ श्रीलालाचार्य्यजी । वार्त्तिक तिलक । * कोई मालाधारी मृतकशरीर नदी में बहता हुआा जा रहा था; श्रीलालाचार्य जी ने गुरभाई सरीखा उस्की दाहक्रिया इत्यादि करके, ब्राह्मणों तथा सब कुटुम्बों की न्योता देके बुलाया । भूसुर लोगों ने पनजाने मृतक के भण्डारे को जानकर नाकसिकोड़ भोजन नहीं स्वीकार किया; तब बैकुण्ठ से हरिजन लोग हरिकृपा से प्राके प्रसाद पाने लगे । उनको जेंवते तो सबों ने देखा परन्तु जाते हुए उनको किसी ने नहीं देखा । इस्से श्रीलालाचार्य्यजी का माहात्म्य जगत में लाखों गुना अधिक प्रसिद्ध हो गया । प्राचार्य स्वामी श्रीरामा- नुज जी महाराज के जामात की यह कथा जो सुनेगा तिस्की श्री भगवत तथा वेषधारी भागवतों में पवश्य प्रीति होगी ॥ (2*३) टीका | कवित्त । प्राचारज को जामात बात ताकी सुनो नीके, पायो उपदेश “सन्त बन्धु करि मानिये | कीजै कोटि गुनी प्रीति, ऐन बनति रीति तातें इति करो याते घटती न पानिये ॥ मालाधारी साधु तनु सरिता में बह्यो आयो, ल्यायो घर फेरिके विमान सब जानिये | गा- ad बजावत ले नीर तीर दाह कियो. हियो दुख पायो सुख पायो समाधानिये ॥ ११० ॥ (६२९---५१९) " इति "= मर्यादा, सीमा ।<noinclude></noinclude> 4c7vjuhat6kux6smgc9jijhedq6giok पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६७ 250 194131 664354 2026-07-02T16:43:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664354 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८ श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 308 SBG00- 34.00- वार्तिक तिलक | स्वामी श्री १०८ रामानुज जी के जामात श्रीलाला- to की कथा भली भांति सुनिये । श्रीगुरुमहाराज ने उपदेश किया कि "सन्तों' को अपने भाई मानना और भाई से कोटि गुनी प्रीति उनसे करनी” तब श्रीलालाचार्य जी ने कहा कि "स्वामिन् प्राज्ञा तो हुई परन्तु कोटि गुनी प्रीति रीति बनती तो नहीं " श्री गुरुस्वामी ने कहा कि, “ ( ताते) भाई की प्रीति से, सन्तों में न्यून न होने पावै इति । एक बेर आपने एक मालाधारी मृतक शरीर नदी में बहते हुए पाया । वेष से सन्त जानके उसमें भ्राता तनु का भाव मानके उसे घर ला विमान पर विठा गाते बजाते फिर उस नदी के तीर ले जाके उस्की दाह क्रिया की । (v) टीका | कवित्स । कियो सो महोच्छी, ज्ञाति विप्रन को न्योतो दियो, लियो पाए नाहिँ कियो शंका दुःखदाइयें । भए एक ठौरे, माया कीनी सब बौरे कछु कहैं बात औरे मरी देह बही आइयें ॥ याते नहीं खात, वाकी जानत न जाति, पांति बड़ौ उतपात घर ल्याइ जाइ दाहियें । मग लोक उत पस्यो सुनि शोक हिये जिये प्राइ पूछें गुरु कैसेकै निबाहियें ॥ १११ ॥ (६२९-५१८) 1886-06- -0002<noinclude></noinclude> dtnlx1wsmc3dmx7amjsarufqjtk46l4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६८ 250 194132 664355 2026-07-02T16:43:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664355 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>399 GO- 000 श्रीभक्तमाल सटीक । ३९९ "मायाकीनीखेड़ा मठा, भोट खड़ा किया, जाल फैलाया। "मग अवलोकि" - बाट हेरके, मार्ग देखके, प्रतीक्षा करके । "लियो" = क्योतो डियो "क बात और दूसरी ही वार्ता कहने लगे। "पूर्वी गुरु" =भी गुरु जी से पूछूं। "कैसे?" - किस प्रकार से ! वार्त्तिक तिलक | इनने अपने भाई सरीखा उस्की तेरहीं का महो रसव किया; ब्राह्मणों और अपने जातिवर्ग को नेवता दिया; उनने नेवता तो लेलिया, परन्तु छपाए नहीं; इम महात्मा जी की दुखदेनेवाली शंका उन्होंने की और जाल्याभिमान रूपी मद से बावरे वे सब इकट्ठे होके पीर की और ही कहने लगे कि "देखी उमृतकका शरीर नदी में बहके पाया था, उस्को घर लाके, घाट पर लेजाके, उसको जलाया, कर्म किया; उसकी जाति पांति कुछ भी जानते नहीं, सो यह बात तो बड़ेही उत्पात की है"। ऐसा गठ के कहा कि "हम सब भोजन नहीं करेंगे” । श्रीलालाचार्य जी ने उनकी प्रतीक्षा की; पर जब पर उनकी दुष्ट सम्मति सुन्ने में पाई, तब आपका हृदय शोकाकुल हुषा । जी में यह बात लाई कि चलूं, श्री गुरुदेव स्वामीसे पूछूं कि पथ किस भांति मेरा निर्वाह होये ? (2] टीका | कवित । चले श्रीमाधारण पै वारिज बदन देखि करि सा- ठाङ्ग, बात कहि सो जनाइये। “यो निशंक, वे प्रसोद 600-<noinclude></noinclude> j9rxj4s1zulfui33xriqt764wsulfaa पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४६९ 250 194133 664356 2026-07-02T16:43:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664356 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०० *600- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद | 400 -909 को न जानें रंक; जानें जे प्रभाव, पावें बेगि सुखदाइये ।।" देखे नभ भूमि द्वार ऐहें निरधार जन बैकुंठनिवासी पांति ढिग के पाइये । इन्हें पय जान देवो जनि कबू कहो हो हो करौ हांसी जब घर जाँइ खाइये ॥ ११२ ॥ ( ६२९–५१७ ) "कू" = श्रीभगवद्भक्तिसंपत्ति से हीम, दरिद्री । "अहो = हे भाइयो ! वार्तिक तिलक । ये श्राचार्य जी महाराज ( भाष्यकारस्वामी ) से प्रार्थना करने को चले; जाके मुखकमल का दर्शन कर सप्रेम सादर साष्टाङ्ग दण्डवत किये; और वे सब बातें निवेदन कीं। आपने आज्ञा की कि "उन अभागे कॅगलों की श्री भगवत प्रसाद का माहात्म्य विदित नहीं; (लो०) “प्रतिमामन्त्रतीर्थेषु भेषजे बैष्णवे गुरौ । यादृशी भावना यस्य, सिद्धि र्भवति तादृशी ॥ " तुम निःशंक जामो निश्चिन्त रहो; क्योंकि जो दिव्य महानुभाव श्रीप्रसाद का अनुपम प्रभाव जानते हैं, बेही सुखदाई शीघ्र कृपा करके पावेंगे”। श्री आचार्य स्वामी ने इतना कहके आकाश की पर देख के फिर भूमि को देखा । तात्पर्य यह कि बैकुण्ठवासी पार्षदों का ध्यान स्मरण करके प्रकाश के ओर देख के मही में पाया- हन किया । फिर कहा कि “जावो श्री बैकुण्ठ निवासी भगवतजन नभमार्ग से निराधार उत्तरके तुम्हारे द्वार होके गृह में पायेंगे ।” 6:00- --००४<noinclude></noinclude> slw9ichm977powy5ufm6868ecjcnudn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७० 250 194134 664357 2026-07-02T16:43:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664357 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>600- 40f" श्रीभक्तमाल सटीक । ४०१ 900 ऐसी प्राज्ञा सुन शिरपर धारण कर साष्टाङ्ग करके अपने गृह में आए। उसी समय श्री बैकुण्ठनिबासी जनों की पंक्ति उन विमुखों के निकट होके श्रीला- लाचार्य जी के गृह में आई । वे भक्त लोग देखके परस्पर कहने लगे कि “हे भाइयो! अभी इन सबों को जाने दो, कुछ कहो मत, फिर जब भोजन करके पपने घर जाने लगें तब पकड़ के रूपपने समीप विठा के अच्छे प्रकार हांसी निन्दा करो" (27) टोका कवित्त । आए देखि पारषद, गयो गिरि भूमि सद, हद करी कृपा यह, जानि निज जन को । पायो लै प्रसाद स्वाद कहि पहलाद भयो, नयो लयो मोद जान्यो सांचो सन्त पन को ॥ विदा है पधारे नभ, मग में सिधारे; विप्र देखत विचारे द्वार, व्यथा भई मन को । गयो अभि मान पनि मन्दिर मगन भए नए दूग लाज; बीनि बीनि लेत नको ॥ ११३ ॥ (६२९-५१६) " सद्” सज्जन, (बीलाल वा जी ) "हृद"= इति वार्तिक तिलक श्रीलालाचार्य जी ने अपने गृह में श्रीभगवतपार्षदों try देख भूमि में गिर के, साष्टाङ्ग दण्डवत किये, पर हाथ जोड़ आप कहने लगे कि “पाप सब ने इस दीन को अपना जन जान के इसके ऊपर निःसीम कृपा की " ।<noinclude></noinclude> ht8n5phgp5gti9odxwd09i8cqlxee7y पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७१ 250 194135 664358 2026-07-02T16:43:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664358 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०२ 108000- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 402 पार्षदों ने प्रसाद लेके पाया ( भोजन किया ), और उसके स्वाद का बखान कर कर श्रीलाला चाय्य जी को बढ़ाही मानन्द दिया; इनने ऐसा यह मोद प्रमोद पाया कि जो अपूर्व था और पहिले कभी भी प्राप्त न हुआ था। तब भली भांति जाना कि सन्तों का प्रण कैसा सच्चा होता है । सर्वज्ञ श्रीपार्षदवृन्द विदा होके आकाशमार्गसे चले ब्राह्मण लोग मग में द्वार पर खड़े खड़े देखते ही रहे । जब जाना कि वे तो पाकाश मार्ग से लौटे चले जा रहे हैं, बैकुण्ड से पाए थे, तब उन सघों के मन में बढ़ाही पश्चाताप हुरुपा; पथ उनका जात्यभिमान गया । और पाखें नीची हुईं, नम्र तथा लज्जित हुए, और श्रीला- लाचार्यजी के गृह में पाके प्रेमानन्द में मग्न भी हुए । अवशिष्ट प्रसाद के कया, जो भूमि में गिरे पड़े थे, 'चुनचुन के पाने लगे ॥ [2] टीका उनको । पाइ लपटाइ अंग धूरि में लुटाए कहैं " करो मन मायो," और दीन बहु भांष्यो है। कही भक्तराज “तुम कृपा में समाज पायी, गायो जो पुरान में रूप नैन चाप्यो है " ॥ छाड़ी उपहास पथ करो निज दास हमें, पूजे हिए पास मन अति अमिठाच्यो है । किये पर- शंस मानो हंस ये परम कोऊ ऐसे जस लाख भांति घर घर राख्थी है ॥ ११४ ॥ (६२९५१५) Go 3600-<noinclude></noinclude> 7t1tvc1cr66c8up4w4vytrbgn8waj2c पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७२ 250 194136 664359 2026-07-02T16:44:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664359 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>403 श्रीभक्तमाल सटीक । ४०३ बार्त्तिक तिलक | वे ब्राह्मण श्रीलालाचार्य जी के चरण कमलों में लपट गए, वहां की घूरि में लोटने लगे, और यों बोले कि "पाप महात्मा हैं जिस प्रकार से हम आपको प्रिय लगें सो वैसा कीजिये, अर्थात् शिष्य करके भ- गवद्भक्त कीजिये" । इसी प्रकार से बहुत सी दीनता पूर्वक बातें कहीं। श्रीभक्तराज (लालाचार्य) जो ने कहा कि " आपही के न आने से तो इस दिव्य समाज की सेवा का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुपा; पतः यापकी कृपा का मैं धन्यवाद करताहू कि जिस्से मैंने उन भ पार्षदों के रूप के दर्शन पाए कि जिनका पुरायों में बखान सुना था । " तब उन विप्रों ने पुनः प्रार्थना की कि "बाप हमारी हँसी तो कीजिये नहीं; बरन 'दया करके हम को अपना दास बना लीजिये। हम सबों के मन की यह पति अभिलाषा पूर्ण कीजिये" । तब श्री लाला- चार्य जी ने सबों को श्रीमंत्र तिलक स्पादिक पंच- संस्कार करके लोक बेद में परमप्रशंसनीय हंसी के समान बेष तथा बिबेक युक्त कर दिया । इत्यादि । इसी प्रकार श्रीलालाचार्य जी के यश, लक्ष विधि के, देश में घर घर सव कोई मन में तथा मुख में भी, रक्वे अर्थात् गान किए ॥ +०<noinclude></noinclude> hqbefztxphuvxilj8irrzf1cs6ac55t पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७३ 250 194137 664360 2026-07-02T16:44:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664360 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>404 २०४ श्री सुधाबिन्दु स्वाद । श्रीश्रुतिप्रज्ञजी । पाप ब्राह्मण थे; लड़कपन सेही बड़े वैरागी तथा नामानुरागी रहे, और अपने मन में वैष्णवों में जाति भेद नहीं रखते थे । आप देशों में विचरके भगव- नाम का उपदेश किया करते तथा भक्ति ही को भारी चार समझते थे। नीलाचल के मार्ग में एक प्रति प्रेमी श्वपच को साष्टाङ्ग करते पाके उठाकर उस्को अपने हृदय में लगा लिया और अपने पट से उस्के की धूरी झाड़ डाली। उसके हाथों में महाप्रसाद था सो लेके सादर पागए। रात भर उस प्रेमी श्वपच को अपने साथ रखके सबेरे प्रतिशय पादर-पूर्वक विदा किया । श्रीजगदीश दर्शन कर, सुयशभाजन रहे, और परधाम को गए || श्रीश्रुतिदेव जी । बहुत सन्तों का समाज साथ में लिये, श्री रामनाम कीर्त्तनपूर्वक विचरते, और सब लोगों को कृतार्थ किया करते थे। एक समय एक अभक्त राजा के नगर में पहुँचे जहां कोई नदी तालाब नहीं, केबल वापी तथा कूएं ही राजबाटिकाइपों में थे । जब साधु लोग उपवन के कूपों में खान करने गए, मालियों ने उनको रोक दिया। सन्त दुखी हो स्वामी जी से कष्ट निवेदन करने लगे । आपने कहा कि विना -9008<noinclude></noinclude> abr8niezn1jqeiuojprm7y39czazsr1 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७४ 250 194138 664361 2026-07-02T16:44:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664361 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>405 1889-00-- श्रीभतमा सटीक | ४०५ स्नानही नामकीर्त्तन कर लो और तब इस नगर को ' छोड़ चलो। यह पाज्ञा सुन इधर सन्त हरिभजन में लगे, उधर कूपों तथा वापियों में जल ही नहीं । मालियों ने जाके राजा से सब वार्ता सुनाई; नरेश ने मन्त्रियों से पूछा; सचिव लोगों ने पूछपाछ बूक- विचार कर निवेदन किया कि "महाराज ! यहां साधु- समाज आया है, सन्तों की ही कृपासे यह जलाभाव - का कष्ट जा सकेगा, इस समाज के मुखिया श्रीश्रुति- देव नाम महात्मा हैं, उन्हीं से प्रार्थना करनी चाहिये” । ऐसाही किया गया । सब प्रजाओं सहित राजा श्रीस्वामी जी के शर- यागत हो कृतार्थ हुए । स्वामीजी महाराज उस देश को हरिभक्त बनाकर दूसरी स्पोर चले। ऐसे ऐसे चरित्र आपके रूपक हैं ॥ श्रीश्रुतिधामजी । परमोदार थे पर भगवत तथा भगवद्भक्तों में भेद बुद्धि रखतेथे; भेष (ऊर्द्ध पुण्ड, कंठी, माला, छाप) की महिमा भली भांति जानते मानते थे । आपके गुणों की गिन्ती कौम कर सके ? एक समय साधुसमाज सहित श्रीप्रयागजी जा स्नान कर त्रिवेणी पर हरि कथा कहरहे थे; एक सन्त ने पूछा कि "महाराज इस संगम पर श्रीसरस्वति जी का नामही मात्र तो सुना जाता है देखने में तो तों ही नहीं" आप यह<noinclude></noinclude> ovhhtwt7b2uxyub4b0v2b9mlf26g5pa पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७५ 250 194139 664362 2026-07-02T16:44:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664362 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>406 400- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । १०६ सुन ध्यान में मग्न हो गए; शीघ्र ही सबों ने देखा कि श्रीस्त गंगाधार, श्रीश्यामयमुनाधार के बीच तेज मय अरुणधार श्रीसरस्वती जी का भी वहीं दर्शनीय है। कर के घासी दौड़के नाम करने लगे। सन्तों ने स्वामी जो से निवेदन कियां; आप भी उठ प्रणाम कर सा- धुपों सहित स्नान करने लगे। ऐसे अपनेक सुयशों के साथ पाप जगत में प्रसिद्ध रहे । श्रीश्रतिउदधिजी । सब सद्गुणों के समुद्र एक दिन श्रीगंगा जी की जाते थे मार्ग में एक राजा की बाटिका में रात्रि- निवास किया। उस रात को राजा के भवन में चोरी हुई; चोरोंने भागके उसी उपवन में आपको ध्यान में पा, एक माला पहिरादी | कोतवाल के भटों ने उन्हें देखा; वे को पकड़ ले गए; राजाने बन्दीघर में भेजदिया, तब शीघ्र ही नरेश सीसकीपीड़ा से व्याकुलहुआ, किसी प्रकार न छूटी, तब सचिव के कहने से राजा त्राहि त्राहि कर आपके चरणों पर गिरा। आप ने तथ आखें खोलीं और सारा समाचार सुना । राजा को पीड़ा-रहित कर, श्री राममन्त्र दे, कृतार्थ किया। कहां तक पापके यश गाए आसकें ॥ ये चारो महात्मा गुरुभाई है। पृष्ट ३१ देखिये ॥ So<noinclude></noinclude> rrxo1v3bvj2oyb65z91dpttnhl2pyr8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७६ 250 194140 664363 2026-07-02T16:44:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664363 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>407 1986-06- श्रीभक्तमाल सटीक । [2] बच्चे श्रीमारग उपदेश कृति श्रवण सुनौं आख्यान शुचि || गुरु गमन कियी पर- देश, शिष्य सुरधुनि दृढ़ाई । इक मंजन इक पान एक हृदय बन्दना कराई ॥ गुरु गंगा में प्रविधि शिष्य का बेगि बु- लाया | बिष्णुपदी भय जान, कमल पत्रन पर धायेो ॥ "पादपद्म" ता दिन प्रगट, सब प्रसन्न मन परम रुचि । श्रीमारग उप- देश कृति श्रवण सुनौ प्राख्यान शुचि 11211() वार्त्तिक तिलक | गुरु और शिष्य (पादपद्म जी) । एक पर श्रीसम्प्रदायवाले भागवत का पवित्र वृत्तान्त सुनिये। इनके गुरु परदेश चले; इनको श्री- में गुरु का भाव दृढ़ रखने के लिये उपदेश दिया; इन श्रीगुरुप्राज्ञा को हृदय में दृढ़ धारण कर लिया । तब कोई शिष्य स्नान किया करें, कोई पान किया करें; परन्तु ये गुरुभक्त जी तो केवल हृदय से ही बन्दन प्र- खाम मात्र करते थे । जब श्रीगुरु जी लाए, शिष्यों से सब बातें सुनीं, तब इनकी भक्तिमहिमा प्रगट क - रने के हेतु श्रीगंगाजी में जलके भीतर जाके वहीं शिष्य 600- 1<noinclude></noinclude> 2c0jxyv1t0xc4xi126zbjwczvf4tmq0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७७ 250 194141 664364 2026-07-02T16:45:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664364 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>go श्रीमतिसुधा बिन्दु स्वाद । .को (इनको) शीघ्र बुलाया; इनने श्रीविष्णुपदी (गंगा) जी के जलपर अपना चरण रखने में संकोच किया; श्रीरामकृपासे जल में कमल के पत्तों पर पांव धरते दौड़ते हुए जा पहुँचे । उसी दिन से आपका नाम " पादपद्म” जी हुपा; सय बड़े प्रसन्न हुए और श्रीगंगा जी में तथा इन महात्मा में सब की भारी श्रद्धा हुई ॥ [[*३] टोका | कवित्त । देवधुनीतीर सी कुटीर, बहु साधु रहैं, रहे गुरुभक्त एक, म्यारी नहिं है स | चले प्रभु गांव “जिनि तजो बलि करौ कही दास सेवा गंगा में ही कैसे हूँ सकै ॥ क्रिया सब कूप करे, विष्णुपदी ध्यान धरै; रोषभरे सन्त श्रेणी भाव नहीं भै सके । आाए ईश जानि दुखमानि सो बखान कियो अनि मन जानि बात अंग कैसे ध्ये सके ॥ ११५ ॥ (६२९-५१४) बाकि तिलक । इनके गुरु की कुटी श्रीगंगा जी के तट पर थी; उस्में बहुत सन्त रहा करते थे साधु सेवा हुपा करती थी । ये बड़े गुरुभक्त थे, पर श्री गुरुचरणकमल से कभी अलग नहीं रह सकते थे। एक समय गुरु महा- राज किसी ग्राम को चले; इनने प्रार्थना की कि "कृपा- मधे ! इस दास को मत छोड़िये में पाप की बलि- हारी जाऊं" । श्रीगुरुमहाराज ने बढ़ाई की पोर पाज्ञा दी कि "तुम यहां ही रहो, भगवद्दासों की सेवा करो, तथा 3000- 408<noinclude></noinclude> 8vvhv8ky678tkilew3fx0mgwpor3dah पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७८ 250 194142 664365 2026-07-02T16:45:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664365 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>408 8600- श्रीभक्तमाल सटीक । ४०९ श्रीगंगा जी को मेरा स्वरूप ही मानो, उनमें गुरु भाव रक्खो" | आप यह प्राज्ञा उल्लंघन नहीं कर सके और मन में विचार किया कि "श्री सुरसरि जी में अपने चरणों का स्परस क्योंकर होने दूं” इसीसे श्रीगंगा जी में स्नान तक भी नहीं करते थे, शरीर की सब क्रिया स्नानादिक कूपजल से ही किया करते थे, और श्री सुरसरि जी को श्रीगुरुरूप मानके प्रणाम और हृदय में ही ध्यान धरते थे । प्रायः सन्त इनपर रोष रखते क्योंकि इनके हृदय के भावको वेलोग पहुंच ( जान ) नहीं सकते थे। जब श्रीगुरुजी आए, तब सब दुखित हो उन सब ने इनके गंगास्नान न करने की वार्ता कही । स्वामीजी बातके मर्मको समझ गए कि इसने सच्चा गुरुभात्र रखकर यह सकोच किया होगा कि श्रीगंगा जो में अपना पावन शरीर कैसे धोऊं पदस्पर्श कैसे करूं ॥ [2] टीका | कवित चले लेके न्हान संग, गंग में प्रवेश कियो, रंग भरि- बोले सी "अंगोछा बेगि ल्याइये” । करत बिचार शोध सागर न वारा पार, गंगा जू प्रगट कह्यो "कंजन पर पाइये” ॥ चले ई अधर पग धरै सो मधुर जाइ प्रभु हाथ दियो, लियो, तीर भीर छाइये । निकसत धाइ चाइ पाइ लपटाइ गए, बड़ो परताप यह निशि दिन गाइये ॥ ११६ ॥ ( ६२९–५१३ ) 8000-<noinclude></noinclude> 5jd0pbe7mxyvaa9xmb36r7o40wy9ota पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४७९ 250 194143 664366 2026-07-02T16:45:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664366 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१० श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । वार्त्तिक तिलक । 410 श्रीगुरुजी इनको साथ लेके, ( इनकीभक्तिमहिमा को प्रगट करने के निमित्त) श्रीगंगा स्नान को चले; श्रीगंगाजल के भीतर गए और अत्यन्त प्रेम में पगके शिष्य की (इनको साझा की कि "मेरी अँगोछा शीघ्र लादो" । ये बड़ेही अपार शोच विचार में पड़े कि इत तो श्रीगंगा जी उत श्रीगुरुजी पोर दोनों ही में इनकी भावभक्ति अपूर्व ठहरी; अपार असमंजस में पड़े । इतने में तुरन्त ही श्रीगंगाजी इनको प्रगट देख पड़ीं और कृपा करके बोलीं कि "यह देखो तुम्हारे पाससे गुरु जी के समीप तक कमल के पत्ते प्रगट हो गए, तुम निस्सन्देह इन्ही पत्तों ही पर पांव रखते हुए खटके चले आओ” । बे- ज्ञानुसार ये पधर पर पर्थात् उन्हीं कमलपत्रों पर पत्र रखते हुए दौड़े और वहां पहुंचके श्रीगुरुकरकंज, अँगोछा दी, पर आपने पानन्द पूर्वक उस्को लिया यह परिचय, यह पाश्चर्य्य, यह गुरुभक्ति माहात्म्य, यह श्रीगंगाजी की कृपा! देखने के लिये तट पर भारी भीड़ एकट्ठी हो गई । जों ही ये तीर पर लौटे, लोग दौड़दौड़के इनके चरणों में उपटलपट गए; और इस महत प्रताप को उस दिनसे सब लोग दिनरात गान करते रहे ॥<noinclude></noinclude> km775yc88nzzz7b7j072x8u8kphztyr पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८० 250 194144 664367 2026-07-02T16:45:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664367 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>411 श्रीभक्तमाल सटीक ४११ 18-6-06- [2] बच् 1 श्रीरामानुज पद्धति प्रताप अवनि मृत अनुसरो ॥ "देवाचारज" द्वितीय महा महिमा "हरिया नंद" । तस्य "राघवानन्द" भए भक्तन का मानंद ॥ पत्रावलम्ब पृथिवी करी व काशी स्थाई | चारि बरन आश्रम सबही का भक्ति दृढ़ाई । तिनके "रामा- नँद" प्रगट, विश्व मंगल जिन्ह वपु धरयो । श्रीरामानुज पद्धति प्रताप अवनि - मृत अनुसस्य ॥ ३० ॥ ( [2] बच्चे । श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यों दुतिय सेतु जग तरन किया ॥ अनन्तानन्द', क- वीर', सुखार, सुरसुरा', पद्मावति' नर- हरि | पीपा, भावानन्द, रैदास, धना" सेना", सुरसुर की" घरहरि ॥ औरौ शिष्य प्रशिष्य एक ते एक उजागर | विश्वमंगल आधार सर्वानंद दशधा के अगर ॥ बहुत काल बपुधारिकै, प्रणत<noinclude></noinclude> 9j7w5cwlw7lh6acm61uxbtt35nj3yqx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८१ 250 194145 664368 2026-07-02T16:45:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664368 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१२ श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 419 8600-- जनन कौं पार दियो । श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यों दुतिय सेतु जग तरन किये। ॥ ३१ ॥ (१) २१३ " करीव करीब, मनीष करके । "करो" किया। "व"और। "अपुचस्पो"=देह घरी, अवतीर्य हुए, प्रगटे, अवतार लिया | "द्वितीय" =अर्थात्, प्रथम महामहिमायुक्त श्री देवाचा (देवा- future), और, द्वितीय महामहिमा से युक्त मो१०८ हरियानन्द स्वामी । वार्त्तिक तिलक | अनन्त श्री रामानुज स्वामी के संप्रदाय का प्रमृत रूपी प्रताप भूमंडल में शिष्य प्रशिष्यादि द्वारा, जीवों के मरणादि दुःखों को नाश करता हुआ अतिशय फैल गया और फैलताही जाता है; तात्पर्य्य यह है कि जो कि श्रीरामानुज स्वामी जी को, प्रथम छप्पे में, “उ- दारसुधानिधि" कह पाए सोई अब दिखाते हैं । स्वामी अनन्तश्री रामानुजजी को " 38 गादियां " जो विरुपात हैं, उनमें मुख्यगादी श्री ६ देवाचार्य ( देवाधिपाचा ) जो को है; आपके अनेक शिष्यों प्रशिष्यों के नाम, ग्रन्थ विस्तृत होने के कारण, प्रगट न करके ग्रन्थकार स्वामी ने इस बच्चे में गुरुपरंपरा में से केवल " महामहिमा युद्ध" दोनों महानुभावों के ही नाम लिले; अर्थात् (१) श्री ६ देवाचाय्य स्वामी जी महाराज, (२) तथा श्री ६ इर्यानन्दाचार्य =प्रबोधानन्दसानन्द), स्वामी जी । सो, बीच के भी शिष्यों प्रशिष्यों के नाम लिखे जाते हैं-<noinclude></noinclude> l28fs89sxpa67q5r1xt3l3476s06m7t पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८२ 250 194146 664369 2026-07-02T16:45:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664369 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>418 1600- श्रीभक्तमाल सटीक | ४१३ -006 श्रीराममंत्र - गुरु-परंपरा में, जो जो बड़े प्रतापी हुए, अब उनके नाम कहते हैं- (लो) लक्ष्मी नाथ समारम्भां नाथयामुन मध्यमाम् । स्मदाचार्य पर्थ्यन्तां वन्दे गुरु परम्पराम् ॥ १ ॥ श्रीरामानुज स्वामी जी के मुख्य दो शिष्य हुए श्रीकुरेश (कुरुतारक, श्रीकुरुकेश) स्वामी जी तथा श्रीगोबिन्दाचार्य्य' जी; * उनके शिष्य श्री पराशर भह जी, तिनके शिष्य श्रीलोका जी उनके शिष्य महा महिमा से युक्त श्रीदे वाचा (देवाधिपा चाय्य) जी; उनके श्रीशैलेशा- 'जी; उनके श्रीबरबर मुनि जी; उनके श्रीपुरु- षोत्तमाचार्य जी; उनके श्री गङ्गाधर' जी; उनके श्री. सदाचा "जी; उनके श्रीरामेश्वराचार्य्य" जी; उनके श्रीद्वारानन्द जी; उनके श्रीदेवानन्द जी; उनके श्री- श्यामानन्द " जी; उनके श्री श्रुतानन्द" जी; उनके श्रीचदानन्द" जी; उनके श्री पूर्णानन्द" जी; उनके श्री श्रियानन्द "जी; और इनके शिष्य महामहिमा से युक्त श्री १०८ हरियानन्द (हर्य्यानन्दाचार्य) स्वामी जी। - * श्रीगोविन्दाचार्य जी प्रथम गृहस्यास्त्रम में श्रीशैलपूर्ण स्वामी के शिष्य ये परन्तु श्रीरामानुजस्वामी जी से ब्रिदस्ट सभ्यास पड्या करके विरक्त शिष्य हुए ।। श्री १०८ अग्र स्वामी जी को "रहस्य जय" की जो संस्कृत टीका १९३५ में श्रीकाशी जी में छपी है तस्से भी यह परम्परा ठीक ठीक मिलती है ॥<noinclude></noinclude> eoox7nms7vv69jkqpnvsa2iwhcx636e पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८३ 250 194147 664370 2026-07-02T16:46:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664370 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>414 श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । १. श्री १०८ स्वामी जी | श्रीकुरेशजी १. | श्रीगोविन्दाचार्यजी ३. श्रीपराशरभजी ४. मौलोकाचार्य जी } १२. श्रीद्वारानन्द जी १३. श्रीदेवानन्दजी १४. श्रीश्यामानन्द जी १५. श्रीश्रुतानन्द जो १६. श्रीचिदानन्द जी ५. श्री देवाधिपाचार्य जी | ११. श्रीपूर्णानन्द जी ६. श्रीशैलेशाचार्यजी 9. श्रीबरवर मुनिजी ८. श्रीपुरुषोत्तमाचार्य जी C. श्रीगङ्गाधर जी १०. श्रीसदाचार्य जी ११. श्रीरामेश्वराचा जी १८. श्री श्रियानन्द जी १९. श्रीहर्यान्द जी २०. श्री १०८ राघवानन्दा- चार्य स्वामी जी २१. अनन्तश्रीभगवान् रा मानन्द जी स्वामी अनन्तश्री रामानन्द जी । (श्लोक) नमपाचार्य्यवर्य्याय रामानन्दाय धी मते । मोक्षमार्गप्रकाशाय चतुर्वर्गप्रदाय च ॥१॥ महामहिमा से युक्त श्री हर्यानन्दाचार्य "स्वामी, उनके शिष्य समस्त भगवदुक्तों के मानदेनेवाले श्री १०८ राघवानन्दाचार्य्य" जी; जो, पहिले, बैध्यावों के वृन्द साथ लेके, भरत खण्ड की संपूर्ण पृथ्वी में विचरके, भगवत विमुखों को जीत, अपने विजयपत्र केवलम्ब में भूमि को करके, काशी जी में स्थिर विराजमान हुए; और चारो वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्री, बैश्य, शूद्र,) तथा चारो श्रमी (ब्रह्मचारी, गृहस्थ, 1886-06- १९४<noinclude></noinclude> b3qyc9m1xq7mpc4v3nyyf1xnu8v7xf2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८४ 250 194148 664371 2026-07-02T16:46:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664371 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>415 600- श्रीभक्तमाल सटीक । ४१५ बानप्रस्थ तपस्वी, संन्यासी) इन सवों को उत्तम उप- देश देकर श्रीराम भक्ति में दृढ़ स्थित कर दिया । इन्ही श्रीराघवानन्द " स्वामी जी के शिष्य, साक्षात् श्रीरामराघव जी आपही, श्रीरामानन्द " रूप से प्रगट हुए, कि जो विश्व (संसार) भर के मङ्गल की मूर्ति ही हैं, अर्थात् सब संसार के जीवों का जिनने मङ्गल किया । इस प्रकार श्री १०८रामानुज की " पद्धति ( शुभमार्ग) का प्रताप, भूमि मण्डल में पमृत रूप हो के फैल रहा और फैलता जाता है । श्रीरामानन्द स्वामी जी ने श्री रघुनाथ जी की नाई, संसार रूपी समुद्र में, जगत के जीवों को उतर जाने के हेतु, दूसरा सेतु (पुल) बांध दिया । तात्पर्य यह है कि जैसा अद्भुत जगत्समुद्र था उसी प्रकार का पद्भुत सेतु भी बनाया। आपके मुख्य शिष्य सोई दृढ़ खंभे हुए, और पौत्रशिष्य, ("प्रशिष्य") प्रपौत्रादिशिष्यगण, सोई इस सेतु के सर्वाङ्ग हुए । " बहुत काल" पर्य्यन्त शरीर को धारण करके, पाप ने " प्रणत" ( शरणागत) जन समूहों को श्रीरामतारक रूपी सेतु पर चढ़ा के, संसार सागर के पार उतार, श्रीरामधाम में निवास दिये ॥ भवसिन्धुसेतु के खंभे रूपीउन मुख्य शिष्यों के नाम- (ज्येष्ठ) श्री अनन्तानन्द'जी; श्रीकबीर जी, श्रीसु-<noinclude></noinclude> ihgayet89lahvdva83kztjywjrfuyqv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८५ 250 194149 664372 2026-07-02T16:46:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664372 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-90988 ४१६ 28600-- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 416 --90993 खानन्द जी, श्रीसुरसुरानन्द जी, श्रीपद्मावती' जी, श्री नरहरियानन्द जी, श्री पीपाजी, श्रीभावानन्द जी, श्रीमदास (श्री दासजी), श्रीधना "जी, श्री सेना "जी, श्री सुरसुरानन्द जी की स्त्री "सुरसरी” "जी । और भी शिष्य अर्थात् श्रीगालबानन्द जी और प्र शिष्य श्री योगानन्द जी, जिन सवों के नाम मी श्रीना- भास्वामी जी आपही लागे कहेंगे; जो श्रीरामप्रेम प्रकाश- युक्त एक से एक अधिक चढ़ बढ़ के हुए। विश्व के मङ्गल करने वाले जो श्रीरामानन्द स्वामी तिन की कृपा का आधार पर के सब "पानन्द" युक्त नामवाले श्रीन- न्तानन्दादि शिष्य, परमानन्दरूपा (दशधा) प्रेमा परा- भक्ति के स्थान, श्रीरामभक्ताग्रगण्य परमप्रवीण हुए ॥ (लो०) राघवानन्द एतस्य रामानन्द स्ततो ऽभवत् । सा- द्वादशशिष्याः स्युः श्रीरामानन्द सद्गुरोः ||१५|| द्वादशादित्य संकाशा संसारतिमिरापहाः । श्रीमदनन्तानन्दस्तु सुरसुरानन्द स्तथा ॥ १६ ॥ नरहरियानन्दस्तु योगानन्द स्तथैवच । सुखा" भाषा ' गालवं च सप्तैते नाम नन्दनाः॥१७॥ कवीर " रमा दासः " सेना " पीपा "धना" स्तथा । पद्मावती१२ तदर्द्ध च षड़ेते च जितेन्द्रियाः॥ १८॥ येषां शिष्यमशिष्यैश्व व्याप्ता भारतभारती ॥ " श्री १०८ अग्रस्वामी कृत "रहस्य श्रय की संस्कृत टीका, (श्री काशी १९३५ की पी) के ये साढ़े चार श्लोक हैं। 16:00-<noinclude></noinclude> 5sdlfiqhjk8w244e1yc0p9q1fqrbc9q पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८६ 250 194150 664373 2026-07-02T16:46:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664373 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-१०० 417 1886-06- श्रीभक्तमाल सटीक । [१] श्रीअनन्तानन्दजी । [ "सिद्ध परमप्रेमी रघुनाथा । सिजू हाथ घरे जिन्हमाथा ॥ " ] ४१७ [२] श्री१०८ सुरसुरानन्दजी [“सन्तप्रसाद प्रभाव विद, प्रथमहि पाए स्वाद । सोइ याहू तन सत करो, महिमा महाप्रसाद ॥ " ] [३] श्रीसुखानन्दजी । [ "आचारण गुरु भक्ति निधाना । निरत मन्त्र मन्त्रार्थ विधामा ॥ " ] [४] श्रीनरहरियानन्द जी । [" रामभक्त कुल कैरव चन्दा " ] [५] श्री पीपा जी ["जगत विदित सियराम पद, पीपा प्रेम प्र ताप | लगी भागवतभुजन महें, जिन्ह की लाई छाप ॥ " ] [६] श्रीकबीरथी । [ "छाके राम नाम रस खादा ॥ " ] [9] श्रीपद्मावति जी । [-] श्रीभावानन्दजी । [“निरत रामसेवा मतिमाना । गूढ़ प्रेम विज्ञान निधाना ॥ " ] [C] श्रीसेनाजी । [ "सदा सन्तसेवा मति पानी | भक्तियोग त अति बड़भागी ॥ " ] [१०] श्रीधना जी । [ "सुमति सन्तसेवा लयलीना । सदाचार गुरु भक्त प्रवोना || " ] [११] श्रीरदास जी | ["रमादास शासन मति दासी । सदा भाग- वत धर्म प्रकासी ॥ निःकिंचन उदार गुरु सेवी । भाविक राम तव को भेवी ॥ " ] [१२] देवी श्रीसुरसरी जी श्रीसुरसुरानन्दजी की स्त्री ["विषयविगत रघुवर रति सानी। गुरपदभक्ता तन मम बानी ॥ परम पुरुष गुनि राम बिहारी। और सबै जग जान्यो नारी " ] [१३] श्रीगालवानन्द जी । ["उपदेशक वेदान्स वित, योगी रतरघुनन्द | " ] यह नाम इस बप्पे में नहीं है ॥ [१४] श्रीयोगानन्द जी । ["योग निधान निरस रघुराई ॥ ] श्रीयोगानन्दजी श्रीअनन्तानन्द जी के शिष्य हैं ॥ 600-<noinclude></noinclude> rw9msgedflvv23ivicqt87o5e2l1vhk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८७ 250 194151 664374 2026-07-02T16:46:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664374 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१८ 600- --909881 श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । गिनती जिस ने | जिस नाम अवतार से मृलोक लिया जन्म समय में ख्यात हैं महीना पक्ष तिथि दिन लग्न नक्षत्र योग १ विधाता श्रीप्रनन्तानन्द कार्त्तिक शुक्ल १५ शनि घन कृत्तिका २ शिवशंभु सुखानन्द वैसाख शुक्ल E शुक्र तुला सतभिषा ३ भ गुरु ग्रुष श्री नारद श्रीसुरसुरानन्द वैसाख कृष्ण ४ | सनत्कुमार नरहरियानन्द वैसाख कृष्ण ३ शुक्र मेष अनुराधा व्यतीपात उत्तरा (S.R. S. B. P . ) ५ मनु पीपा चैत्र शुक्ल १५ बुध धन (फाल्गुणी ६ प्रह्लाद कबीर चैत्र कृष्ण ८ मंगल सिंह मृगसिरा शोभन 600- 418<noinclude></noinclude> qc4a157kkapi9m1nzont07y8kh8ktj6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८८ 250 194152 664375 2026-07-02T16:46:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664375 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>419 श्रीभक्तमाल सटीक । श्रीजनक भावानन्द बैसाख कृष्ण ६ चन्द्र कर्क मूल ८ भीष्म सेना माधव कृष्ण १२ रवि तुला पूर्वा * श्रीयोगा- बलि घना माधव कृष्ण ८ शनि वृश्चिक पूर्वाषाड़ नन्द जी श्री पौत्र १० यमराज [ रमादास ( ( रैदास) चैत्र शुक्ल २ शुक्र मेष चित्रा शिष्य हैं ११ श्रीपद्मा १२ पदमावती सुरसरी चैत्र शक्ल | १३ गुरु कर्के उत्तराफा अर्थात् श्री शन- (१३) शुकदेव गालबानन्द (१४) कपिल योगानन्द* चैत्र कृष्ण १९ सोम धन धनिष्ठा न्तानन्द जी के शिष्य हैं। बेसाख कृष्णा बुध कर्क मूल 28,000- (S. R. S. B.P.) ४१९<noinclude></noinclude> kdkx6wdnf476a0ey2nlu4xmvajwlbex पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४८९ 250 194153 664376 2026-07-02T16:47:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664376 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२० 18000- श्रीमतिसुधाषिन्दु स्वाद । 420 (कवित) प्रगट प्रयाग भाग कश्यप ज्यों भूसुर के सा माघकृष्ण मारतगड से अरामी हैं । काशी-से-प्रकाश में प्रकाश सुखरास किए, बारहो सु शिष्य मानों कला र तेजधामी हैं । कलि-की- कुचाल - निशा खगडे हैं पखंड- तम, दुरिगे भक्त बीर पंथ-घोर यामी हैं। फैल्यो ष घाम, धाम धाम सन्त कंज खिले "मणीरसरङ्ग” रवि रामानन्द स्वामी हैं ॥ १ ॥ स्वामी श्री १०८ रामानन्द जी दयालु श्रीप्रयागराज कश्यप जी के समान भगवद्धर्मयुक्त बड़ भागी कान्य- कुल ब्राह्मण "पुण्यसदन" के गृह में, बिक्रमीय सम्बत् १३५६ के माघ कृष्ण सप्तमी तिथि में, सूर्य के समान सयों के सुखदाता, सात दण्ड दिन चढ़े चित्रा नक्षत्र सिद्ध योग कुम्भ लग्न में गुरुवार को, “श्रीसुशीला देवी" जी से प्रगट हुए । (दो०) चारि सहस शतचारि भी, गत कलिकाल मलीन । तेहि अवसर नर लोक हरि, निवसनहित चित दीन ॥ कलियुग के ४४०० बर्ष गतहो चुकने के पनन्तर-- विक्रमी +९३५६. शाके १२२२ १३००* कलि ४४०० *Dn' W. W. Hunter, M. A. और A. C. Mu- kerji M. A. B. L. ने भी यही लिखा है। + और श्रीत परवीराम जो सोतारामीय ने भी सम्बत् १३५६ ही लिखे हैं । 1000-<noinclude></noinclude> 7lp7fc8n9ndiz9ikjn5a9bedrtgycej पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९० 250 194154 664377 2026-07-02T16:47:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664377 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>421 183600-- श्रीभक्तमाल सटीक । ४२१ (श्लो० ) " रामानन्दमहामुनिस्समभवद्भागेषु रामा-- art (१३५६ ) युक्ते विक्रमवत्सरे घटतनौ माघासिते त्वष्ट्रभे ॥ सप्तम्यां गुरुवासरे युजितथासिद्धी प्रयागा- श्रमाच्छ्रीमदभूसुरराज पुण्यसदनाद्रामावतारः कृती” ॥ (चौ०) विमल सलिल, निर्मल नभ पासा । शुचि सन्तन मन मोद हुलासा ॥ प्रगटे रवि इध करुणा कन्दा सन्तसरोजन प्रदानन्दा ॥ (छ०) पवतरे परेशा मनहु दिनेशा सुत द्विजेश तनुधारी । पूजित शिव- शेषा शुभ उपदेशा तारकमन्त्र प्रचारी ॥ कलिकलुष विनाशी प्रेमप्रकाशी सुखराशी दुखहारी । प्रभुइच्छा- चारी स्ववश विहारी जगजीवन उपकारी ॥ रक्षक श्रुति सेतू सतकुलकेतू बन्दित सदा समानं निगमादि- सुगीतं चरित पुनीतं भवभय शमन निदानं ॥ सेवितवरचरणं चातुरवरणं शरणदकृपानिधानं । प्रद "मणिरसरंग' हिं सियबर संगहिं प्रेमभक्ति बरदानं ॥ (ato) पु बुधिषिमल बढ़े केहि भांती । जसराशि, पाइ पक्षसित राती ॥ पाठ वर्ष के भे मतिवाना । भयो यज्ञ उपवीत विधाना ॥ पाठ वर्ष की अवस्था में विद्या प्रारंभकर चार वर्ष में ही ऐसे पण्डित होगए कि प्रयाग निवासी पण्डित लोग अब आपको अधिक नहीं पढ़ा सकते थे । त बारह वर्ष की अवस्था में प्रभु श्रीकाशी जी पाए । -900<noinclude></noinclude> tolum7if3jqd0ox7daf5hbtinbndcyq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९१ 250 194155 664378 2026-07-02T16:47:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664378 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>600 ४२२ श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 422 (चौ०) तहां वेद बेदान्त विशेषा । सकल किये करतल पवशेषा ॥ आप सन्यासी के शिष्य होके "स्मार्त” रीति से अपने धर्म कर्म में प्रवृत्त हुए । प्रथम प्रापका नाम श्रीरामदत्त ऐसा था; किसी दगडी विद्वान् के समीप रहके ब्रह्मचर्य्यं युक्त विद्या पढ़ते थे ॥ एक दिवस स्वामी श्रीराघवानन्द जी के पास प्राप्त होके प्रणाम किया; पाप कृपा दृष्टि से देख भाषी बार्ता को आन के कहने लगे कि “तुम्हारे शरीर का तो आयुष भी पूर्ण हो चुका पर सभी लों तुम हरि शरणागत न हुए! " । यह सुन, पाके, उन दगडी जी से सब बात आपने कही । दंडी विज्ञ तो थेही उस बात को सत्य विचार के बोले कि "बात तो सत्य है परन्तु उपाय मेरे किये न हो सकेगा तुम उन्ही महा- नुभाव जी के शरणागत होके शरीर की रक्षा करो" । ऐसा हितोपदेश पर के, पाप ने श्रीस्वामीराघवानन्द जी को साष्टाङ्ग प्रणाम कर विनय किया कि “हे प्रभो यह शरीर और आत्मा पापको पर्पण है इस्की दोनों लोक में रक्षा कीजिये" तब श्रीस्वामी जी ने श्रीरामषडक्षर मंत्र पादि पंच संस्कार कर रामानन्द नाम दिया और प्राणायामादिक रीति बता, उतारने की युक्ति भी सिखा के समाधि में स्थित कर दिया; काल पाया देख के चला गया। थोड़ेही काल में झाप समाधिस्थ हो गए यह कुछ बड़ी बड़ाई नहीं है क्योंकि आप 28-0-00-<noinclude></noinclude> dyedrzbcsaswx62w914ypgqneqj634f पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९२ 250 194156 664379 2026-07-02T16:47:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664379 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>423 600- श्रीभक्तमाल सटीक । ४२३ थोड़ेही काल में पाप जो समाधिस्थ हो गए यह कुछ बड़ी बड़ाई नहीं है क्योंकि पाप तो स्वयं प्रभु के पवार ही हैं; परन्तु यह सब लीला है, सो भी उचित ही कुछ काल में पाप समाधि से उतर के श्रीमंत्र जाप गुरु सेवा में तत्पर हुए। श्रीराघवानन्द स्वामी जी महाराज तथा भगवान् रामानन्द जी के परस्पर सत्सङ्ग की शोभा क्या कही जावे; (दो०) "दोउ महान मिलि सी. हहीं, सम बसिष्ठ रघुनाथ । उपमा अपर समुद्र जस, सहित ब्रह्मव पाथ ॥" स्वामी श्री १०८ रामानन्दजीने बहुत तीर्थाटन किया । "श्रीकृष्ण चैतन्य - चिरंजीवी" ("श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु" नहीं) की दया से पष्ट सिद्धि को प्राप्त हुए । (चौ०) जगत गुरू, पाचारज भूपा । रामानन्द राम के रूपा ॥ पाप जब पुनः श्रीगुरु दर्शन को गए तो प्राचारी गुरुभाइयों ने आचार विचार का आग्रह न देख इनको दंड करने के लिये गुरु महाराज से कहा । परन्तु श्रीगुरु जी ने तो आपको यह आज्ञा दी कि "तुम पपना सम्प्रदाय ही अलग प्रचलित करो । " ऐसा किया; सी " रामावत" वा " रामानन्दीय” सम्प्रदाय आपका प्रसिद्ध ही है । ( दो० ) स्वामिहि सेवा वश किये रामानन्द उदार । दै सरवस गुरु राम- पर गवने दशएं द्वार ॥ 1288000-<noinclude></noinclude> enpssbpkcy1k7wof3njjxtuvekwxefz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९३ 250 194157 664380 2026-07-02T16:47:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664380 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२४ SkG00- आप की श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 424 --909881 गुरु सेवा, भजन, साधुगुणा, तेज, प्रताप, देख, और श्रीप्रभु के अवतार जान अपनी सब भजन - संपत्ति सौंप के अपनी इच्छा हो से दशम द्वार से गमन करके कृपालु श्री राधाधानन्द जी श्री- रामधाम में प्राप्त हुए. । तब सूर्य रूपी श्रीरामानन्द जी काशी रूप पाकाश प्रकाशमान, पर पूर्व छप्पे विषे कथित श्रीमन- न्वानन्दादि ध्यापके शिष्य हुए। वेई तेज के स्थान कला शोभित हुईं। इसप्रकार श्रीरामानन्द सूर्य्य ने प्रगट होके कलियुग की कुचालरात्रि को नाश किया तथा प्रबल पाखण्ड रूपी उस रात्रि के अंधकार को भी नाश किया; तब भक्त भगवत-विमुख छुप रहे ॥ और आप के शिष्य प्रशिष्य भागवत बेषधारी dona धूप ( घाम) प्रकाश के सरीखा चारो धामों में स्थान स्थान में भर गए । एवं महात्मा सन्त समूह कमलों के सम विकाशमान हुए। ऐसे सूर्य्य रूपी श्री- रामानन्दस्वामी उदित हुए ॥ (to) ( ० ) " मन्द कलिकाल की कुचाल ते पमन्द पाप फैले पंथ निन्द वेद भक्ति हूं निकन्द के । देखे रघु- नन्द अब सबै जन्तु द्वन्द दले लीन्हे अवतार तब दायक छन्द के ॥ सेतु बिसतारे मंत्र तारक प्रचारे किए जीव भवपारे देह धारक स्वच्छन्द के । सन्तसिंधु चन्द ऐसे 600-<noinclude></noinclude> siejibbtuezzh2erkt1aauqotr8p44i पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९४ 250 194158 664381 2026-07-02T16:48:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664381 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>'425 1986-00- श्रीभक्तमाल सटीक । ४२५ करुणा के कंद "रसरङ्ग मणि" बंद पद स्वामी रामा- नंद के ॥ २ ॥ रामानंद स्वामी से भएन कोई और होने जिनको विदित तीनो लोक में प्रताप है। काम क्रोध लोभ मोह मत्सरादि सुण्डादगढ मर्दन को केशरी ज्यों राजें करिदाप हैं। बिमुख पाखण्डी ध्यान धर्मी तमतोम रषि, अभिमान सागर को कुंभज से पाप हैं। रामभक्ति शालिक्षेत्र पोषिये को बारिद से प्राश्रित प्रपन्नान के एक माई बाप हैं ॥ ३ ॥ # (चौ० ) छायो लोक प्रताप प्रकाशा । कलिकर तब पातक तम नाशा ॥ घोर कुपंध चोर विलखाने । कुमुद कर्मकांडी सकुच्चाने ॥ रामभक्ति सरसीरुह वृन्दा । रवि लखि मे विकशित सानन्दा ॥ (चौ०) सहित तेरही शिष्य परामी । राजत श्री रामानंद स्वामी ॥ शिष्यशिष्य उपशिष्य समेता । शो- भित पूजित कृपानिता । नित प्रति राम कथा सत- संग | कहत, हत जनु दूसरि गंगा ॥ तारत जीवन भरत महेसू | सतनु तरत स्वामी उपदेश ॥ अस प्रभु भगवत रामानन्दा | परम धरमतनु जन सुखकन्दा ॥ हिय विचार किय कृपा निकेतू । महि दिग विजय करन के हेतु ॥ संग शिष्य परशिष्य पनन्ता । तिमि तिहुं सम्प्रदाइ बहुसन्ता ॥ मागे फहरत ध्वजा नि- शाना । तेंहि पर बैठ श्रीर हनुमाना ॥ "जै जै सियाराम” 188600-<noinclude></noinclude> 1i1qk1ncq3lzotubcmvtn565dkt2yoq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९५ 250 194159 664382 2026-07-02T16:48:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664382 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२६ श्रीभक्तिसुघाबिन्दु स्वाद । 426 --909831 धुनिछाई । चले विजय कर शंख बजाई ॥ (दो०) खंडन किये कुपन्थ ये, यथा योग दे दंड । सत मारग पाने तिनहि, करि उपदेश उपखंड ॥ चारिउ वरण प्राश्रम माहीं । कीन्हे "रामभक्त' सबकाहीं ॥ राम मन्त्र मन्त्रार्थ विधाना । यथायोग दोन्हे मतिवाना ॥ यहिविधि करि दिगविजय उदंडा । थापे 'रघुपतिभक्तिपखंडा' ॥ प्रभु जाह हेतु लिये पवतारा । सत्यसन्ध सोइ किये प्रचारा ॥ रामानन्द प्रताप अपारा। को कवि लहे कथन करि पारा ॥ "भारी प्रभाव प्रताप रामानन्द को, को कहिसके ? जो परम प्रभु पवतार शारद वदत जस-जाको जकै । " "श्रीरामरूप पनूप रामानन्द स्वामी हैं सदा । शुचि 1 ज्ञान दायक ध्यान लायक हरन मल माया मदा ॥" (सो०) शारदशसी समान, कीरति रामानन्द की । पा- वन पुण्य महान, नाशनि पातक वृन्द की ॥ ( श्री राम रस रंगमणि ) परमाचार्य स्वामी श्री रामानन्द जी का यह चरित " श्री अगस्त्य संहिता भविष्योत्तरखण्ड में पांच अध्याय से वर्णित है सो श्री काशी कुंज गली के पास " हजारी लाल गवेश प्रसाद" कहां मिलता है, सूर्य्य प्रभाकर शिला यंत्र सं० १९३५ में खपा । उसी से भाषा में "श्रीरा मानन्द यशावली " नामक ग्रन्थ बना है श्रीराम अनन्यसखा, परमहंस श्री ६ सीताशरण जी महाराज ने श्री ५ रामरसरङ्गमणि जी महाराज से " श्रीरामानन्द यशावली" के नाम से भाषाप्रबन्ध कराके खपवाया है, उस्से, तथा सुम्शी श्री ६ तपखीराम जी कृत “रसूज़े मिड्रोवफ़ा " से लेके, संक्षेपतः यह कथा लिखी गई । 3000-<noinclude></noinclude> 7kfdr1mo7dmwszt7kknwnov6v02tz2x पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९६ 250 194160 664383 2026-07-02T16:48:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664383 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>427 श्रीमतमाल सटीक । ४२७ (लो०) नम पाचार्य्यवयाय रामानन्दाय धीमते । मोक्षमार्गप्रकाशाय चतुर्वर्गप्रदाय च ॥ १॥ पाखण्डे न विदूषितास्वविमुखा ज्ञात्वा कलौ बैजनान् । तस्क ल्याण पर कृपा परवशस्साकेतवासी स्वयम् ॥ रामा- नन्दसंज्ञया प्रयजने श्रीपुण्यसका द्विजाजू जातस्तं - विनमामि नारदयुतं श्रीरामचंद्रं हरिम् ॥ २ ॥ श्रीपुण्य- सदनस्तात सुशीला जननी तथा ॥ यस्यासीद्रामानन्द- तं जगद्गुरुं नमाम्यहम् ॥ ३ ॥ (सो०) रामभक्ति दातार, ज्ञान विराग विधायनी । सुनतहि भली प्रकार, सुखद मोह तम हारिनी । (कथा) बहुत काल बपुधारण कीन्हे। भूमहँ भक्ति भाव भर दीन्हे ॥ पापका | परधाम गमन सम्बत गत कलि ईसवी सन विक्रमी १४६७. ४५११ वैसाख शुक्ल तृतीया १४११ पृथ्वी पर आप १११ * वर्ष पर्य्यन्त विराजमान रहे । श्लोक | वेदाङ्केन्दुधरासंख्ये (१९९४) वर्षे वैक्रमराज । श्रीमद्रामानुजाचार्यो ह्यन्तर्धानमगा त्स्वयं ॥१॥ श्रीम- द्विक्रमवत्सरेऽश्वर सवारीशेन्दुसंख्ये (१४६७) घरां । त्य कामांधवमास के सुदितृतीयायांतिधावुज्वलं ॥ धर्मं भा- rai विमुक्तिफलकं विन्यस्यजीवेषु वै । रामानन्दसु - देशिकस्तमगमत्सा के तलोकं परम् ॥२॥ 1886-06-<noinclude></noinclude> 9bwajvyq1ns5zuvhfjda076oqq1w57m पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९७ 250 194161 664384 2026-07-02T16:48:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664384 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३८ श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । " बहुत काल "। जिनका आयु १६ हो वर्ष की अवस्था में पूर्ण हो चुका था सो महामुनि यदि ११९ वर्ष विराजमान रहे तो "बहुत काल" इस्को कहने में शंकाही या? प्रसिद्ध हो है कि आपका समय सिकंदर लोदी (१४४८ ईस्वी) से पूर्व या “बर्थ सप्त शत" जो लिखा है (श्री रघुराज सिंह जो ने,) सोम जानूं कैसे ? १३५६ से ३०० तो २०५६ में होंगे; यह अभी मो सम्बत १९६२ ही है। स्वामी जी को अन्तर्धान हुए सेकड़ों वर्ष बीत चुके। नजामूं उनने 900 किस अभिप्राय से लिखा ? इस झोक से तो १९९ हो (१४६० - १३५६ - १११) बर्ष स्पष्ट है | इसके अतिरिक्त दो और ने भी " १०० वर्ष से ऊपर लिखा है | इतिहासों से ( " १४०० ईसबी” ) सम्बत १४५१ प्रगट है ॥ वह भी इसके समीप मिलता है ॥ (१) श्रीअगस्त संहिता भविष्योत्तरलय की कथा तो प्रसिद्ध है हो ॥ (२) ऐसा भी लिखा है कि “एक कल्प में कलि ४४४७ की भाद्रकृष्णाष्टमी को, श्री १०८ रामानन्द स्वामी श्रीकपिलदेव भगवान् के अवतार, गालवा श्रम के समीप गौड़ ब्राह्मण के पुत्र हो प्रगट हुए; १०८ वर्ष की अवस्था में कलि के ४५५५ वर्ष गत होने पर परधान को सिधारे ॥ " (३) और भविष्य पुराक्ष के "तृतीय प्रतिसर्गपर्व" के चतुर्थखण्ड में लिखा है कि आप श्रीसूर्य्य भगवान के अवतार, 'देवल" मुनि के पुत्र होंगे- भविष्य पुराण में ये (छः) श्लोक पाप के यश में हैं- 66 " इति वारवेर्गाधांवैशाख्यांदेवराट्स्वयम् । प्रत्य क्षं भास्करदेवं ददर्श सहितं सुरैः ॥ १॥ भक्तिनम्रान्सुरान् भगवांस्तिमिरापहः । उवाचवचनंरंम्यं देवकार्य्य परं शुभम् ॥ २ ॥ ममांशात्तनयोभूमी भविष्यतिसुरोत्तम । सूत उवाच ॥ इत्युक्तास्वस्य विवस्य तेजोराशिं समन्ततः। ३ समुत्पाद्यकृतं काश्यांरामानन्दस्ततोभवत् । देवलस्य च विप्रस्य कान्यकुब्जस्यवैसुतः ||४|| वाल्यात्प्रभृतिसज्ञानी 428 •90983<noinclude></noinclude> 77874vzvwjtu0u89ggc9pv97btz2hbg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९८ 250 194162 664385 2026-07-02T16:48:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664385 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>429 188-6-06- श्रीभक्तमाल सटीक 1. रामनामपरायणः । पित्रामात्रायदात्यक्तोराघवं शरणं गतः ॥ ५ ॥ तदातु भगवान्साक्षाञ्चतुर्दशकलो हरिः । सीता- पतिस्तद् दयेनिवासं कृतवान्मुदा ॥ ६ ॥ ४२९ इतितेकथितं धिप्रमित्रदेवांशतीयथा । रामानन्दस्तुवल- वान्हरिभक्ते श्चसंभवः ॥७॥ इति भविष्यपुराणे तृती- प्रतिसर्गपर्वणि सप्तमाध्यायेश्लोकाः ॥ भक्तों से कभी वार्तालाप (बरनू चार-पांखें भी नहीं करते थे, परन्तु इतने पर भी, यदि भक्ति भाव देखते बूते थे चाहे किसी जाति में क्यों न हो तो उस्का बड़ाही आदर करते थे ॥ श्रीकाशीजी में आपकी खड़ाऊं श्रीपंचगंगाघाट पर अभीतक विराजमान हैं ॥ आपने श्रीगंगासागर संगम कपिलदेव स्थान को प्रगट किया जो लुप्त हो गया था । ( दो० ) रामानन्द उदार पति, कलिमल नाशनहार । सेवत भक्ति समेतशुभ भुक्तिमुक्ति दातार । पाचारजवर दिगविजय, जे जन सुनहिँ सप्रेम । विजय विभूति विवेक ते, लहहिं भक्ति युतक्षेम ॥ ( चौ०) पस प्रभु जगपावन बपुधारी । कृपासिन्धु दासन हितकारी ॥ ता ता जन्म दिन माहीं । जन्म महोत्सव रचै उछाहीं ॥ श्रध्यावासी प्रायः श्रीरामानन्दीय हैं ही,<noinclude></noinclude> iwqnecjdnbmfiu2lukwepikou76ermj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४९९ 250 194163 664386 2026-07-02T16:48:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664386 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३० 1986-06- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । नेक जगहों में आपका व्रत तथा उत्सव होताही है, तथापि श्रीसीताराम कृपासे (१) श्रीकनक भवन के परमहंस श्रीसीताशरण जी महाराज, (२) प्रमोदयन- भूषण पण्डित श्रीरामवल्लभाशरण महाराज जी, (३) श्रीरामको जन्मस्थान में, इन तीनों स्थानों में श्रीरामानन्दजन्मोत्सव विशेष करके होता है ॥ श्रीराम श्रीरामानन्दजी जन्म परधाम जन्म परधाम कल (गत ४११८ विक्रमीय १००४ ४२३८ ४४०० ४५११ १९९४ १३५६ १४६७ सम्बत - ईसवीसन १०१७ १९३७ १३०० १४११ कितने वर्ष १२० १११ विराजे १९६२ पर्य्यन्त दद ७६८ * ४९५ कितने वर्ष | 600- दोनों आचायों के बीच अन्तर १६२ वर्ष पृष्ट ४२० तथा ४२७ देखिये ॥ 430<noinclude></noinclude> rd8ra8ltxqc9z32hp7j4vetpv9cu1vn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०० 250 194164 664387 2026-07-02T16:49:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664387 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>431 188600-- १. श्रीमनारायण २. बोलली जी ३. श्रीविष्यकसेन जी सुनु बोशठकोप जी) ५. श्रीवोपदेव जी श्रीभक्तमाल सटीक । १७. श्री शैलेशाचा जो १८. श्रीबरवर मुनि जी १९. श्री पुरुषोत्तमाचाय्य जी ४. श्री पराकुशमुनिप्रथम, (कार- २०. श्रीगंगाधर जी २९. secret of ४३१ ६. श्रीनाथमुनि जी 5. श्रीपुखरीकालजी ८. श्रीराम मिश्र जी ९. श्रीपांकुश मुनिजी (द्वितीय) १०. श्रीयामुनाचार्य जी ११. श्रीमहापूर्णाचा जो १२. श्रीरामानुजाचार्य स्वामी | श्रीकुरेश वा कुरुतारक जी १३. श्रीगोविन्दा जी १४. श्रीपरशरमह जो १५. श्रीलोकाचार्य जी १६. श्रीदेवाचा जी ३२. भगवान् रामानन्द ३३. श्री सुरसुरानन्द जी ३४. श्रीबलियानन्द जी ३५. मोठरिया स्वामी जी ३६. श्रीबिहारी दास जी ३१. श्रीरामदास जी ३८. श्रीविनोदानन्द जो १२. श्रीरामेश्वराचा जी २३. बौद्वारानन्द जी २४. श्रीदेवानन्द जी २५. श्रीश्यामानन्द जी २६. मोनुतानन्द जी २१. चिदानन्द जी २८. बोपूर्णानन्द जी २. श्री श्रियानन्द जी ३०. श्रीहरियानन्द स्वामी ( प्रधानानन्द ) ३१. श्रीराधावानन्दा चा स्वामी जी ३२. भगवान् रामानन्द ॥ ३९. श्रीधरनीदास जी ४० श्रीकरुणानिधान जी ४१. श्रीराम जी ४२. श्रीरामप्रसादीदास जी ४३. श्रीरामसेवकदासजी (परसा ) ४४. स्वामी श्री १०८ रामचरण दास महाराज मौद्गल्य ऋषि जी ॥१॥ [लोक] "छक्ष्मी नाय समारंभां नाथ वासुन मध्यमाम् । अस्मदाचाय पर्यन्तां बन्द गुरु परम्पराम् ॥” दोन सीतारामशरण भगवान् प्रसाद ( ब० ना० सिं० )<noinclude></noinclude> 0vkk9dgwvib3297pr7h9dws08axslac पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०१ 250 194165 664388 2026-07-02T16:49:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664388 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३२ श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । 432 -9098 (१) मुन्शी श्री तुलसी राम जी तथा श्री प्रताप सिंह जी ( और H. H. Wilson आदिक इंग्रेज) ने, श्री१०८ रामानन्द खामोजी को श्री रामा- मुत्र स्वामी जी से "पांचवां" ही लिखा है, अर्थात् “ (१) श्री रामा- मुज स्वामी (२) श्री देवाचार्य जी (३) श्रीहरियानन्द (प्रधानानन्द) जी (४) श्री राघवानन्द जी, और (५) अनन्त श्री रामानन्द स्वामी जी " और वोच के महानुभावों के नामों को उनने छोड़ दिया है । (३) अनन्त श्री रामानन्द भगवान् के जन्म का समय तो अनेक (आठ, नव ग्रन्थों में पाया जाता है; परन्तु आप कितने दिन संसार में वि- राजे? कब परमधाम को गए ? कठिनता यदि है तो इसी के ठहराने में || (४) आप के पिता का नाम, श्री रामानन्द यशावली में "श्री भूरिकमां जी" लिखा है। 'भूरिकर्मा' तथा 'पुष्प सदन" (श्रीअगस्त- संहिता) एक ही बात है ॥ (५) ४१८ में पष्ट की १३ वीं पंक्ति में शंकर के अन्तर्गत, महीन अक्षरों में जो टिप्पनी चार पंक्तियां लिखी गई हैं, “ (४४४७ की, माद्राष्टमी, गोब्राह्मण, १०८ वर्ष, इत्यादि) ” सो जिस पत्रे में से पाया गया त पुस्तक की न तो पूरी प्रति हो हाथ लगी, और न उस पोधो का नाम हो जाना जा सका। (६) श्रीअगस्त संहिता और भविष्य पुराण की कथा की तो इस प्रकार से एकता हो जाती है कि सूर्य्य मंडल के अन्तर श्रीराम जी विराजे हैं ही, (लोक। "सूर्य' मण्डल मध्यस्थं रामं सोता समन्वितम् । नमामि पुखरीकाक्षममेयं गुरु तत्परम्" ॥ १ ॥ इस्से, सूर्य मंडल हो से, जम-हृदय- तिमिर-नाशक श्रीरामांश अवतार हुआ है। और काशी से जन्मस्थान की मित्रता यों नहीं कि श्रीकाशी की में श्रीगुरुशरणागत होने से अपर जन्म ही जानिये क्योंकि ऐसा कहा ही जाता है । अर्थ वि- चार से “देवल" तथा पुण्यसदन (भूरिकर्मा) की एकता भी मानिये । शंका न कीजिये । दोनों ग्रन्थों (श्रीभगस्त संहिता तथा भविष्यपुराण) की कथा एक ही समझिये |<noinclude></noinclude> 21ybis6tcqk7e5z91y0sqyyxfxu23va पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०२ 250 194166 664389 2026-07-02T16:49:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664389 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>433 श्रीभक्तमाल सटीक । ४३३ महामुनि श्रीदेवाधिपाचार्य स्वामी । महामहिमयुक्त श्री देवाचार्य महाराज जी एक स- मय श्रीकाशी यात्रा के मार्ग में किसी ग्राम में एक वृक्ष के समीप दशम स्कन्ध (श्रीभागवत ) कह रहे थे; कथा में “यमलार्जुन' का प्रसंग था; ज्योंही अध्याय पूरा हुआ कि उसीक्षण पास का वृक्ष, किसी प्रतक्ष कारण के बिनाही, अकस्मात गिर पड़ा अररभ्राम ! और साथी समय यह घटना भी हुई कि एक विमान और एक पुरुष सब सन्तों ने देखा; उस म- नुष्य ने पाप के चरण सरोज की बन्दना करके कहा कि मैं बड़ाही पापी, नरक से हो पाके, यही वृक्ष होके, यहां था; इस समय श्री हरि कथा के श्रवण से मैं निष्पाप हो, श्री भगवत कृपा से इस विमान पर चढ़ परधाम की जाता हूं, यह पाप केही दर्शनों का प्रभाव है ॥ श्रीहरियानन्द आचार्य स्वामी । । हरि-पानन्द में सदा छके हुए श्री हरियानन्द जी ने एक समय पुरुषोत्तमपुरि में जो पाषाढ शुक्ल द्वि तीया को रथारूढ़ श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन किये; चलते चलते रथ रुक गया था; खींचे ठेले से हिलता बढ़ता न था । पापने पुकारके कहा कि "सब कोई रथ को छोड़ दो, श्रीजगदीश कृपा से रथ पापही चलेगा" ऐसाही हुआ, सौ पग तक रथ पापही दौड़ा है 188600--<noinclude></noinclude> rq5mrwejo4fi9yv1pp72get4abn5jm8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०३ 250 194167 664390 2026-07-02T16:49:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664390 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३४ -00088 श्रीमतिसुषाबिन्दु स्वाद । गया । जय जय कार ध्वनि छा गई। ऐसे ऐसे इतिहास पाप के यश के रूपनेक हैं ॥ (छ०) चरणकमल बन्दा कृपालु हरियानंद स्वामी । सर्बसु सीताराम रहसि दशधा मनुगामी ॥ बालमीक वर शुद्ध सत्व माधुर्य्य रसालय | दरसी रहसि अनादि पूर्व रसिकन की चाल ॥ नित सदाचार में रसिकता पति पदभुत गति जानिये । जानकि वल्लभ कृपा लहि शिष प्रति शिष्य बखानिये ॥ ( श्रीयुगलप्रिया, रसिक भक्तमाल) आचार्य स्वामी श्री १०८ राघवानन्द जी । 434 कुछ तो आप का प्रताप, स्वामी अनन्तश्री रामानन्द जी के चरित में लिखा ही जा चुका है ( पृष्ट ४१४ ) एक समय एक राजा ने अपने लड़के को शिष्य करने के लिये बहुत प्रार्थना 'कहला भेजी; उसी क्षण और दो जनों की भी प्रार्थना विनय सुनके, कृपासिन्धु जी एकही समय तीनों ठाम तीन रूप से गए। उस दिन तो किसी ने यह भेद न पाया, पर दूसरे दिन सब यात प्रसिद्ध हो हो तो गई | पापके चरित का पार भला कौन पासकता है, कि जिनके शिष्य स्वयं प्रभु (भगवान् रामानन्द) ही हुए<noinclude></noinclude> ndxsuwqe1xd8fs8ly4vkdq7rxkinkuz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०४ 250 194168 664391 2026-07-02T16:49:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664391 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>435 55 श्रीभक्तमाल सटीक । ४३५ (छ०) रसिक राघवानन्द बसें काशी प्रस्थाना। गुरु रूप शिव लये दये रसिकाई ध्याना ॥ काल करालहि हटकि शिष्य किय रामानन्दा । प्रगटी भक्ति अनादि पवध गोपुर स्वच्छन्दा । आचारज को रूप धरि जगत उधारन जतन किय। महिमा महाप्रसाद की प्रगटि रसिक जन सुक्ख दिय ॥ ( श्रीयुगल प्रिया, रसिक भक्तमाल ) (२३) । अनन्तानन्द पद परसिकैं लोक पाल से ते भए ॥ योगानन्द' गयेश' करमचन्द 'अलह' पैहारी' | सारी रामदास' श्रीरंग' अवधि गुण महिमा भारी॥ तिनके नरहरि उदित मुदित मेहा मंगलतन । रघुबर यदुबर गाइ विमल कीरति संच्यो धन ॥ हरि भक्ति सिन्धु बेला रचे पानि पद्मजा सिर दए । अनन्तानन्द पद परसिकै लोकपाल से ते भए ॥ ३२ ॥ (२) "मेहा" पाठन्तर "महा" भी है। "मेह”ने । "बेटा"=मर्यादा; मेरा मावबेरा इति । "पद्मजा"=मीडरलोजी | 1000-<noinclude></noinclude> 1oydympu9a9cp39j4qwap4o59usrdaz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०५ 250 194169 664392 2026-07-02T16:50:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664392 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३६ श्रीमति सुधाविन्दु स्वाद । 476 13300- वार्तिक तिलक | श्री अनन्तानन्द जी । श्रीनन्तानन्द जी महाराज के चरणसरोज के बिमल रज को स्पर्श करके, अर्थात् चरणशरण होके, लोकपालों के सदृश जीवों के लोक परलोक में रक्षक श्रीभक्त ये सब हुए श्री योगानन्द जी'; श्रीगयेशजी'; श्री कर्मचन्द जी ; श्रीपल्ह जी; श्रीपयहारी कृष्णदास जी; श्रीसारीरामदास जी'; श्री श्रीरंग जी; ये सब सद्गुणों के तथा भारीमहिमा के सीमा हुए । तिन्ह के* शिष्य मङ्गल स्वरूप पानन्द के मेघ श्री नरहरि - दास जी प्रगढ़ हुए, जिन्हने, श्रीरघुबर कृपाल जी तथा श्रीयदुबर जी, (दोनों) के सुयश गान करके, निर्मल कीर्त्ति रूपी धन का संचय किया ॥ श्रीपन- न्तानन्द जी ने ये शिष्य ऐसे किये कि जो हरि भक्ति रूपी समुद्र के बेला (मर्य्यादा) ही हुए; और पद्मजा अर्थात् श्रीजानकी जी महारानी ने आपके भजन से प्रसन्नतापूर्वक प्रगट होके श्रीप्रभयकरकमल आपके मस्तक पर रक्खा ॥ ● तिन्ह के अर्थात् श्रीअनन्तानन्दजीमहाराज केशिष्य; और, कोई न महात्मा ऐसा भी लिखते हैं कि श्रीश्रीरंग जी के शिष्य । (कवित्त) “रामानन्द स्वानी जू. के शिष्य श्री अनन्तानन्द, शीतल ड चन्दन से, भक्तन अनन्दकर। सन्तन के मानद, परानंद मगज मन मानसी स्वरूप कवि सरसिमरालवर ॥ अमक लली की कृपापात्र चारुशीला अली, रूप में अभिया मुंजें रंगभूमि खोला पर ऊपर समाधि; तर अमित अगाध नेम सुवा स्रवत, समगत मानों सुधासर ॥” (रसिक भक्तमाल ). + अथवा, यह भी संभव है कि, श्रीमनन्तानन्दजी से "मति सिन्धु- --9098<noinclude></noinclude> 2fh4zbys1853cfp5la5rtw7c0amgpva पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०६ 250 194170 664393 2026-07-02T16:50:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664393 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>437 1600- श्रीमतमाल सटीक 1. ४३७ 600- बेला" नामक कोई ग्रन्थ हो रचा हो । अथवा, श्रीसीताराम जी की भक्ति रूपी अगाधसिन्धु में बिहार करानेवाले बेला अर्थात् बेरा (नाव- बेरा) रूपी ये शिष्य सब हुए । इन महात्माओं से भक्ति की इति है ॥ कहते हैं कि पाप एक बेर संभर प्रदेश में पहुँचे वहां के राजमाली ने झापके साथ के सन्तों को बिही के फल लेने से रोक दिया । दुःखित हो सन्तों ने पाप से कहा; दूसरे दिन बिही एक भी न पाया गया । राजा ने सब वृत्तान्त सुन के कारण जाना । श्रीस्वामी जी के शरणागत हुआ। इस प्रकार से वह सारा देश भगवतभक्त हो गया ॥ श्रीश्रीरंगजी । (2) टीका कवित 1 घोसा एक गांव तहां श्रीरंग सुनांव हुतो, बनिक सरावगी की कथा ले बखानिये । रहतो गुलाम गयी धर्मराज धाम, उहां भयो बड़ो दूत कही “सुनु परे बानिये ! पाए बनिजारे लेन देख तूं दिखावें चैन, बेल शृङ्ग मध्य पैठि मारे पहिचानिये । बिनु हरि भक्ति सब जगत की यही गति, भयो हरि भक्त श्रीपनन्त पद ध्यानिये ॥ ११६ ॥ (६२९-५१३) वार्त्तिक तिलक | जयपुर में 'देवा' नामक एक ग्राम है, वहां प्रथम सरावगी मत के बनिये के घर में जन्म श्रीरङ्गजी का 3100-<noinclude></noinclude> 1ng6jqa0174ui5j75c414ip93lhojzm पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०७ 250 194171 664394 2026-07-02T16:50:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664394 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३८ 18600- श्रीभक्ति सुधाषिन्दुस्वाद । था; इनके श्रीरामभक्त होने की कथा यों है, कि इनके गृह में एक टहलुआ था, वह मरके श्री धर्मराज जी के लोक में एक बड़ा यमदूत हुआ । वह एक दिन इसी देउसा गाव में, यमगज का भेजा आया; और पूर्व परिचय से श्रीरङ्ग के सामने प्रत्यक्ष होके बोला कि “रे बनिया ! सुन, तुझे एक कौतुक दिखाता हूं; देख ये जो बनजारे यहां प्रत्रा- दिक लेने आए हैं, उनमें से एक का प्राण लेने मैं याहूं; सो उसी के बैल की सींग पर बैठ के मैं अभी अभी उस्को मारे डालता हूं, तू देख के समझ लेना और जाना कि श्रीसीताराम जी की भक्ति बिना सब जगत के लोगों की इसी प्रकार की नीच मृत्यु होती है । इस घटना को प्रत्यक्ष देख चुकने पर यदि तुझे हरिकृपा से खेत हो ध्यावे तो श्रीनन्तानन्दस्वामी का शरण लेना ॥ * श्रीरङ्ग जी उस ठिकाने उस समय गये और देखा कि बनजारे को उसी के बैल ने अपनी सींगों से, इन के देखते ही देखते, पेट चीर के मार डाला । यह घटना देख, इनको वस्तुतः भय तथा ज्ञानबेराग्य हुआ; पौर, उपपने कुल के सथ अनाचारों को श्याग के, श्री अनन्तानन्दस्वामी के चरणशरण में रूपा, श्री राममन्त्रादिक पंच संस्कार ग्रहण कर, गृहस्थाश्रम ही में रहके, आप बड़े महात्मा और परम भक्त हो गए ॥ 188000-- -909881 438<noinclude></noinclude> kvhnbf7ya5tuv6l00vtn5anldx0fjsj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०८ 250 194172 664395 2026-07-02T16:50:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664395 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>439 श्रीभक्तमाल सटीक । 83€ (टोरे) टीका कविश । 1 सुतको दिखाई देत भूत, नित सूख्यो जात, पूछें, कही बात, जाइ वाके ठौर सोयो है। आयो निशि मारिबे को धायो यह रोष भयो, “देवो गति मोकों" उन बोलि सुनायो है ॥ " जाति की सोनार पर नारि लगि प्रेत भयों, लयों तेरी शरण में ढूंढि जग पायो है" । दियो चरणामृत ले, कियो दिव्य रूप वाको प्रतिहीं अनूप, सुनो भक्ति भाव गायो है ॥ ११८ ॥ (६२९-५११) वार्त्तिक तिलक | कुछ कालान्तर की बात है कि श्रीरंग जी के पुत्र को एक प्रेत रात में दिखाई देता था; जिसके भय से वह लड़का सूखा जाता था; ध्यापने उससे दुर्बलता का कारण पूछा। लड़के ने बात सब कही । जहां वह पुत्र सोता था वहीं स्वयं पाप भी जा सीए; प्रेत जिस समय झाया करता था अपने उसी समय पर सही तो पहुंचा। आप क्रोध युक्त हो, कोई पायुध लेके, उसे मारने दौड़े। से उस प्रेत ने कहा कि "मुझे आप इस दुष्ट योनि छुड़ा के शुभ गति दीजिये, मैं इसी ग्राम का उपमुक सोनार था, परखी में प्रीति करने से प्रेस हुआ हूं । मैं अपनी गति के लिये संसार में ढूंढ़ता ढूंढ़ता प्रापही को समर्थ जाम के शरणागत हुआ हूं । यह सुमतेही आपने दया करके श्री चरणामृत देके, 8000-<noinclude></noinclude> 2zos3uf145xc7z9jnfy56bh8ccxq7v7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५०९ 250 194173 664396 2026-07-02T16:50:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664396 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४० oe श्रीभक्ति सुधाविन्दुवाद | उस्को उस अधम योनि से छुड़ाके दिव्य रूप कर दिया। आपके पास श्रीपीपा जी भी कृपा करके लाए थे सो कथा श्री पीपाचरित में प्रावेगी ॥ सुनिये, श्रीश्रीरङ्ग जी की भक्ति भाव का प्रत्यन्त अनूप प्रभाव इस प्रकार से गान किया गया है । और आपके चरित्र बहुत हैं पर यहां इतनेही कहे गए ॥ (3) निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास, अन परिहरि पय पानकियो ॥ जाके सिर कर धरयो, तासु र तर नहिँ प्रड्ड्यो । यो पद निर्वान सोक निर्भय करि छड्ड्यो ॥ तेज पुंज बल भजन महा मुनि ऊरधरेता । सेवत चरण सरोज राय राना भुवि जेता । दाहिमा वंश दिनकर उदय, सन्त कमल हि सुख दियो । निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास अन परिहरि पय पान कियो ॥ ३३ ॥ ( "निर्वाण" =मोक्ष, मुक्ति । “निर्वेद" = बेराग्य, विराग । " भूविजेता" = पृथ्वी को जीतनेवाले । “रेता" जिसका बी कभी न गिरे, ब्रह्माह पर चला जावे। पाठान्तर “सोद" (उस्को) पैहारी श्रीकृष्णदास जी । 44°<noinclude></noinclude> 970eqkdmdjtn9tbcxa7mg1ujlomrj2p पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१० 250 194174 664397 2026-07-02T16:50:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664397 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>44% 600- श्रीभक्तमाल सटीक । वार्तिक तिलक | ४४१ •9098 कलियुग में तीव्र वैराग्य-की- सोमा श्रीकृष्णदास जी महाराज अन्न को त्याग के केवल दूध ही पिया करते थे। और योग ज्ञान भक्ति निधान सिह कैसे हुए कि जिस जनके सीस पर करकमल रक्खा, उस्के हाथों के नीचे आपने अपना हाथ नहीं मोड़ा ( प- सारा ) अर्थात् उस्से कभी कुछ न लिया । और उस जन को संसार के सब शोकों से निर्भय ही कर छोड़ा, तथा पन्त में मोक्षपद दिया । तेज के पुंज, श्रीरामभजन के महा बल से युक्त, महामुनि और ऊर्द्धरेता थे। जिनके चरणसरोज की सेवा, पृथ्वी के जीतनेवाले अनेक राजा राना किया करते थे । “दांहिवां ब्राह्मणों” के बंशमें सूर्य्य सम उ- दित होकर कमलरूपी समस्त सन्तों के हृदय को पापने नन्द दिया प्रफुल्लित किया | जोकि आपने सर्वदा पक्ष को त्याग के दुग्ध ही पान किया, अतएव पापकी पयहारी ( पयोहारी) संज्ञा प्रसिद्ध हुई है। जोकि पापने किसी शिष्य से कदापि कुछ न लिया; पर अपने शिष्यों को जीवनमुक्त ही कर दिया, इसीसे टीकाकार श्रीप्रियादास जी ने आदि ही में (पृष्ट ४४, कवित्त ९ में) यह पद लिखा है कि-- "गुरु गुरुताई की सचाई ले दिखाई जहां गाई श्री पहारी जी की रीति रंग भरी है" । •-9001<noinclude></noinclude> nsjx5iyas4rg9ev4ks9wnhcy2pbbtxc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५११ 250 194175 664398 2026-07-02T16:51:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664398 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४२ 10000 श्रीमति सुचाविन्दु स्वाद । (दो०) गुरू तो ऐसा चाहिये शिख सो कडू न लेय। शिष्यहुं ऐसा चाहिये तन मन धन सव देय ॥ १ ॥ (27) टीका कवित जाके शिर कर घट्यो, तातर म पोधो हाथ दीनो बड़ी बर, राजा कुल्हू को जु साखिये । परवत कंदरा में दरशन दीयो पानि दियो भाव साधु हरि सेवा अभिलाखिये || गिरी जो जलेबी धार मांझ ते उठाई बाल भयो हिये शाल बिन परपित चाखिये । लै करि खड़ग ताहि मारन उपाइ कियो, जियो संत पोट, फिरि मोल करि राखिये ॥ ११९ ॥ ( ६२९-५१०) वार्त्तिक तिलक । 442 श्रीपयहारीजी ने जिस शिष्य के माथे पर हाथ रक्खा उसके हाथों के नीचे अपना हाथ कभी न पसारा (न पोड़ा); और बड़ा भारी वर 'भक्ति-मुक्ति' सो दिया; उस्में कुल्हू देश का राजा साक्षी है, कि जिस्को ब्रा- पने पाके परवत के कन्दरे में दर्शन औरराज्य दे, शिष्य कर, भावभक्ति से उस्को पूर्ण कर दिया, कि जिससे श्रीसीताराम जी तथा भक्त सन्तों की सेवा सदा किया करता था; उस्से तृप्त नहीं होता था । वरञ्च सेवाभि- लाथ ही से भरा रहता था । एक समय सन्तों का भण्डारा था; उसी में जिला- बियों का थार श्रीसीतारामजी के मन्दिर में जा रहा था, उसीधार में से दो एक जिलेबी गिर पड़ीं, सो भक्त राजा के छोटे से बालक ने उठा के मुख में डाल लीं है २०५<noinclude></noinclude> ntwa3gsd2u86myyenle4r417c5nooyy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१२ 250 194176 664399 2026-07-02T16:51:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664399 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>443 श्रीमतमाड सटीक | ४४३ राजा को देखतेही हृदय में प्रति सन्ताप हुआ कि यह हमारा सुत होके, बिन भगवदर्पण की हुई जिलाबियां इसने खालीं । इस्से खड्ग लेके उस्को मार डालना चाहा; तब सन्तों ने जाके उस्को मांग के पपना करके, उस्की रक्षा की | फिर सन्तोंने कहा कि यह बालक पथ हमारा हो गया; इस्का मूल्य हम को देके इस्को तुम अपने ही पास रक्खी ॥ (27) for I नृपसुत भक्त बड़ी पथ लीं बिराजमान साधु सम- मान में न दूसरी बखानिये ।. संत बघू गर्भ देखि उभ पनवारे दिये, कही पर्भ इष्ट मेरो ऐसी उर प्रानिये ॥ को भेषधारी सो व्योहारी पग दासिन को कही कृपा करो कहा जानें पर प्रानिये । ऐवै तजिदेषो क्रिया देखि जग बुरी होत जोति बहु दई दाम राम मति सानिये ।। १२० ।। (६२९-५०९) - " पनवारे" - पत्र, पत्तल । "पगदासिम" पलही, पगरखी, जू- तियां । "जोति बहु दुई हृदय में बहुत प्रकाश दिया, बहुत ज्योति दो: बहुत जोति युक्त दाम सुवर्क दिया, जोतने बोने को भूमि तथा- खेती की सामग्रियां दीं। "अबलों अब तक अर्थात् श्रीमियादास जी के समय तक "अर्थ - अर्मक, वाहक ॥ - वार्त्तिक तिलक । कुल्हू के राजा का पुत्र बड़ा भक्त, साधुओं की सेवा सन्मान करने में अद्वितीय "अबतक विराजमान" है --00082<noinclude></noinclude> bhdxf2y90r36izhevga48rbh48g99sm पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१३ 250 194177 664400 2026-07-02T16:51:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664400 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४४ श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । भंडारे में एक गृहस्थाश्रमी सन्त की बधू को गर्भवती देख, उस्को दोहरा पारस (दो पनवारे) देकर, पापने यह कहा कि इस गर्भ में जो बालक है, वह मेरा इष्ट अ र्थात् भगवद्भक्त है, उसके लिये मैं इस दूसरे पत्र के पदार्थ अर्पण करता हूं । कालान्तर में वस्तुतः उस गर्भ से हरिभक्त पुत्र ही हुआ । एक मनुष्य सन्तों का बेष बनाए, पगरखियां ( पहियां) बेचा करता और अति दरिद्रही बना रहता था । भक्त राजा को उस्पर दया गई उस्से बोले कि "आप तो कृपा करके कंटकादि से रक्षा करने के हेतु यह व्यापार करते हैं, परन्तु स्योर जीव इस बात की कैसे जान सकें? सब जगत के लोगों को यह व्य- वहार देखके प्रति अनुचित लगता है, पतः इस कर्म को त्याग दीजिये" । ऐसा कहकर बहुत जोति, भूमि जोतने बोने खेती करने को, (अथवा ) बहुत जोति युक्त दाम सुवर्ण, तथा और द्रव्य देकर फिर कहा कि “श्रीसीताराम जी के चरणों में मन लगा के भजन कीजिये" । वह वैष्णव- वेष धारी उस कर्म को तजकर श्रीरा मजी में लग गया और सन्तों की सेवा सम्मान करने लगा ॥ भक्तराज की दया की जय, श्रीपैहारी जी महाराज के प्रभाव की जय ॥ उस राजा के वंश का राजकुमार ( " नृपत") श्रीप्रियादास जी महाराज के समय ( सम्बत १७६९ ) पर्यन्त विराजमान था । 18600- 444<noinclude></noinclude> ehqdz2wscucf2r3mbdgorocw4efyivr पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१४ 250 194178 664401 2026-07-02T16:51:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664401 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>445 श्रीभक्तमाल सटीक | पुनः, श्रीपैहारी जी ने गलता तथा आमेर के कन- फटे वैष्णवद्रोही- योगियों को अपनी सिद्धता से उस मठ से निकाला- ४४५ रात भर रहने के लिये उस जगह पाप गये थे परन्तु उन बिमुख योगियों ने कहा “यहां से उठ जाव ताप ने अपनी धूनी की पाग कपड़े में बांध ली और दूसरी ठौर जा बैठे, वहीं झाग कपड़े में से रख दी। कपड़े का न जलना देख के योगियों का महंत बाघ बन कर आप पर डपटा । पाप ने कहा "तू कैसा गधा है" तुरंत वह गधा हो गया और अपने बल से मनुष्य न बन सका । और सब योगियों के कान के मुद्रे कानों से निकल २ पाप के पास पहुंच के ढेर लग गये। झामेर का राजा पृथ्वीराज पाप की सेवा में जाकर बड़ी प्रार्थना करने लगा तब झोपने गधे की फिर आदमी बना के प्राज्ञा दी कि इस जगह को तुम सब छोड़ के अलग रहो और लकड़ियां इस धूनी में पहुंचाया करो | उन सबों ने स्वीकार किया और राजा पृथ्वीराज भी श्री पैहारी जी का चेला हो गया; . और तभी से गलता आप की प्रसिद्ध गादी हुई ॥ वन में गऊ पाप से आप दूध श्री पैहारी जी को देती थीं। पाप ने पामेर की एक गणिका को भी चेताया था जिसने परम गति पाई ॥ 1886-00--<noinclude></noinclude> cyxj0b9ytyequ2cc8p0x3n66gwt701j पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१५ 250 194179 664402 2026-07-02T16:51:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664402 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४६ श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । श्रीयोगानन्द जी । आप भी अनन्तानन्द जी के शिष्य थे। पीर महा- मयों ने पाप को सांख्य शास्त्र के कर्त्ता श्री कपिल भगवान का अवतार भी लिखा है इसी से आप यो- गानन्द नाम से प्रख्यात हुये ॥ श्रीगयेश जी । श्री गणेश जी श्री अनन्तानन्द जी के कृपापात्र अर्थात् श्री रामानन्द स्वामी जी के पौत्र शिष्य थे । झाप की भक्ति की प्रशंसा किस से हो सक्ती है । श्री कर्मचन्द जी । श्री अनन्तानन्द जी महाराज के शिष्य श्री कर्म- चंद जी बड़े नामानुरागी साधु सेवी तथा गुरुनिष्ठ थे ॥ श्रील्ह जी । श्रील्ह जी श्री अनन्तानन्द जी के शिष्य थे । आपकी कथा (पां की डाल कुक छाने की, ५४ वें मूल; २४८ वें कवित्त, में) पांगे आवेगी ॥ दूसरे को अल्हू जी, श्री कोल्ह जी के भाई का बचेन, १३९ में मूल में होगा ॥ तथा श्री कर्मचन्दजी के पुत्र श्री दिवाकर जो की श्री सारीरामदास जी । कोई " सारीरामदासजी" एक ही नाम लिखते हैं, 446<noinclude></noinclude> gxmpw9c8neg5yiwplyfrdf0rg875d4w पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१६ 250 194180 664403 2026-07-02T16:51:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664403 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>447 श्रीमाल सटीक | ४४७ 10923 और किसीने "सागरीदास" और "रामदास" दो व्यक्ति कहे हैं, पस्तु पाप श्री अनन्तानन्द जी महाराज के शिष्य ( पृष्ट ४३६) थे । एक समय आप कृपा करके चित्रकूट जी के पास " त्वरी" नाम के ग्रांम में, वहां के लोगों को विशेष करके चेताने गए, क्योंकि उस गांववाले बैष्णवों के-द्रोही थे । एक के द्वारपर आप पहुंचे, उस अभागे ने खड़े भी न रहने दिया; आप नदी तट पर जा ठहरे। उसी दिन वहां के राजा का पुत्र मर गया। जब उस्को लोग नदी तट पर ले गये तो झाप ने उन लोगों से कहा कि "यदि तुम्हारा राजा और ग्रांमबासी लोग आज से वैष्णव सेवा की प्रतिज्ञा करें तो अनन्त शक्ति वाले करुणाकर श्री सीताराम जी से हम इस लड़के को पुर्नजीवित होने की प्रार्थना करें ।” ग्राम वासियों सहित राजा ने सुबुद्धि मन्त्रियों के कहने से वहीं हढ़ प्रतिज्ञा की; तब साधु चरणः मृत (अपना पदतीर्थ) देकर पाप ने उस लड़के को जिला दिया । इस प्रकार से उस प्रदेश को आपने चेता कर हरिभक्त कर दिया । (चौ० ) " सन्तबिटप सरिता गिरि धरनी, परहित हेतु सह की करनी ॥ हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम तुम्हार सेवक उपसुरारी ॥ " सन्त कृपा की जय ॥ १०<noinclude></noinclude> de15oazksoom41ftpsfkwsndvuctbxq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१७ 250 194181 664404 2026-07-02T16:52:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664404 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४८ 26-00-- श्रीमति सुधाविन्दु स्वाद । 448 --9003 ३१ में मूल (पृष्ट ४३५४३६) में श्री अनन्तानन्द जी के शिष्यों के माम कह आए हैं १. श्री योगानन्द जी २. श्रीमए जी ३. श्रीकर्मचन्द जी ४. भीमल्ह जी ५. श्रीहारी कृष्णदास जी ६. श्रीसारीरामदास जी 9. श्री श्रीरंग जी सो, इनकी चर्चा ऊपर हो चुकी. अब श्रीनरहरिदास जी की बार्ता सुनिये। और तब, श्री. बेहारी जी के शिष्यों के नाम इल में मूल में | श्रीनरहरिदास जी । किसी किसी ने श्रीनरहरि दास जी को श्री श्रीरंग जी का शिष्य लिखा है; और कोई कोई पाप को, श्री- अनन्तानन्द जी का पौत्र शिष्य नहीं, वरंच स्वयं श्री अनन्तानन्द जी ही का शिष्य लिखते हैं । किसी का लेख है कि यही महाराज श्रीनरहरिदास जी श्री गोस्वामी तुलसी दास जी के गुरु थे और किसी का मत है कि नहीं, श्री गोस्वामी जी के गुरु श्रीनर- हरिदास जी तो, पर ही थे, वे श्री गोपाल दास की बाराहक्षेत्र बासी के शिष्य थे । पस्तु, श्रीनरहरिदास जी एक समय श्री जगन्नाथ जी के दर्शन को गए, वहां आपने सोचा कि "श्री. ठाकुर जी को यदि साष्टाङ्ग दण्डवत करूं तो दर्शन से उतने समय तक प्रसह्य विक्षेप होगा, " इस्से पाप उलटे हो पड़ रहे; पण्डो ने यह अनाचार देख उनके 3000-<noinclude></noinclude> hlf0g63t6w68moyij32mmiothy5be3j पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१८ 250 194182 664405 2026-07-02T16:52:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664405 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>449 188800- श्रीभक्तमाल सटीक | ४४९ पांव पकड़ घसीट के मन्दिर के बाहर कर दिया । पर, श्री जगन्नाथ जी की कृपा युक्त आज्ञा से सबों आपका बड़ा आदर सम्मान किया । (2) बच्चे । पैहारी परसाद तें, शिष्य सबै भये पार कर ॥ कील्ह', अगर, केवल', चरण", व्रतहठी नरायन' । सूरज', पुरुषा, एथू तिपुर हरि भक्ति परायन ॥ पद्म- नाम ", गोपाल", टेकर, टीला", गदा- धारी", । देवा", हेम", कल्यान ", गंगा " गंगासम नारी ॥ बिष्णु दास", कंन्हर", रंगार, चांदन", सबीरो" गोबिंद पर | पैहारी परसाद तें, शिष्य सबै भये पार ३८ कर ॥ ३४ ॥ ( २ ) २१३ 'गोविँदपर" = श्रीगोबिन्दपरायण, हरिभक वार्त्तिक तिलक । पहारी श्रीकृष्णदास जी के ये सब शिष्य, श्रीगुरु- प्रसाद से, जीवों को संसारसागर से पार उतारनेवाले और श्रीसीतारामभक्ति में परम परायण हुए- -00088<noinclude></noinclude> p0mr710g9rxyivql29xoqh70oknf5yb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५१९ 250 194183 664406 2026-07-02T16:52:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664406 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>• 1588-expo- श्रीभक्ति सुधाबिन्दुस्वाद । १. स्वामी श्रीकीहहृदेव जी २. स्वामी श्री ६ अग्रदेव जो ३. श्री केवल दास जो ४. श्रीचरण दास जी ५. श्री व्रतहठी नारायण जी ६. श्रीसूदास जी 9. श्रीपुरुषा जी (पुरुषोत्तमदास ) श्री दास जी ९. श्रीत्रिपुर दास जी (त्रिपुरहरि १०. श्रीपद्म नामजी ११. श्रीगोपालदास जी १२. श्रीटेकराम जी १३. श्रीटोलाजी १५. श्रीदेवा पडा को 450 १६. श्रीमदास की ११. श्रीकल्याण दास जी १८. स्त्रीशरीर श्रीगंगाबाई जी, श्रीगङ्गाजी के समान; अथवा, श्रीगङ्गा दास जी तथा श्रीगंगादास की स्त्री श्रीगंगा जी के सट्टश 1 १९. श्रधिष्दाजी २०. श्रीकान्हर दास जी २१. श्रीरंगा राम जी १४. श्रीगदाधारी (गदाधरदास जी २२. श्रीचांदन जी न्३. श्रीसबोरो जी ॥ एक महात्मा ने लिखा है कि (२४) श्री गोविन्द दास नाम के भी एक शिष्य श्रीहारी जो के थे ॥ (3) गांगेय मृत्यु गंज्या नहीं, त्यों कील्ह करन नहिं कालबश ॥ रामचरण चिंत- वनि, रहति निशिदिन लौ लागी । सर्ब भूत शिर नमित, सूर, भजनानंद भागी ॥ सांख्य योग मत सुदृढ़ कियो अनुभव हस्तामल । ब्रह्मरंध्र करि गौन भये हरि तन करनी बल ॥ सुमेर - देव - सुत जग 1980.00 6000-<noinclude></noinclude> eb4x3wac5l2dtkcoj7ain7ggcnkadb2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२० 250 194184 664407 2026-07-02T16:52:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664407 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>452 - श्रीभक्तमाल सटीक ४५९ -000 बिदित, भू बिस्तार बिमल यश । गांगेय 8 मृत्यु गंज्या नहीं, त्यों कील्ह करन नहिं कालबश || ३५ || ( "गांगेय" = श्री भीष्म को 1 ४० २१३ ) "गंडयो नहीं" नहीं नाश किया। "योग"= अष्टाङ्ग साधन करके मूढ़ विक्षिप्त घोर शान्त और अनुरोध इन पांची चित्त की वृत्तियों को समेट के, केवल संप्रज्ञात योग में जाके परमात्मा में प्राप्त होके असंप्रज्ञात समाधि में स्थित हो जाना । "सांख्य" शास्त्र- चौबीस तत्वमय प्रकृति को जान के उसे पृथक पुरुष को जांगना । वार्त्तिक तिलक । श्रील्हदेव जी । जैसे श्रीगंगा जी के पुत्र श्रीभीष्म जी को मृत्यु ने अपनी इच्छा से बिनाश नहीं किया, तैसे ही स्वामी श्री कील्ह देव जी को काल अपने वश नहीं कर सका; क्यों- कि पाप की यह दशा थी कि, श्रीराम सच्चिदानन्द जी के चरणकमल के स्मरण चितवन में रात्रि दिन तेल धारात एक रस लय लगी रहा करती थी । सम्पूर्ण प्राणी मात्र का सीस पाप को देख के नमित हो जाता था; आप भी सर्ब प्राणियों में श्री सीताराम जी को अन्तर्यामी जान के सब को सीस नवाते थे; पौर, आप माया मोह के दल को नाश करने में सूरश्रीर सन्त, भजनानन्द के भोक्ता, भाग्यशाली थे । सांख्य शास्त्र तथा योगशास्त्र इन दोनों मतों के सिद्धान्तों का सुदृढ़ पनुभव आप को ऐसा था कि जैसे अपने- 198-0-00-<noinclude></noinclude> fkx9cjqz2b4s4r3h8kkscd2zjzblg9r पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२१ 250 194185 664408 2026-07-02T16:52:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664408 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४५२ 1830-06- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । हाथ में वर्तमान सांवले के फल का यथार्थ ज्ञान होता है। अन्त में अपनी इच्छा ही से सुषुमना मार्ग होकर, ब्रह्मरंध्र बेधके, हरि कृपा से अपनी करनी के चल से श्री रामरूप हो गए; अर्थात् सारूप्यमुक्ति को प्राप्त हुए । श्रीसुमेर देव जी के पुत्र (श्री कील्ह देव जी ) ने सर्व जगत में विख्यात, इस प्रकार का बिमल यश भूमण्डल में फैलाया कि, जैसे श्रीभीष्म देव जी ने दक्षिणायन में शरीर नहीं त्यागा बरंच हरिकृपाश्रिता अपनी इच्छा ही से श्री भगवद धाम को गए; तैसेही, यद्यपि कालसर्प ने पापको तीन बेर काटा, तथापि मृत्यु की तो बात ही क्या है, किंचित बिष मात्र तक न चढ़ा ॥ यद्यपि writeहदेव स्वामी जी विरक्त मे तथापि आपको "सुमेर- देव-सुत" कहने का तात्पर्य्यं यह है, कि इनके सम्बन्ध से उनका नाम कहके, श्री १०८ नामाखामी जी ने श्रीसुमेरदेव जी को भी भक्कमाल के मक्क में गिन्ती किया, सो आगे टीकाकार भगवद्वान जाना भी सुमेरदेव जी का वर्णन करेंहोगे ॥ (ट) टीका | कवित्त । श्री सुमेरदेव पिता सूबे गुजरात हुतें भयो तनु पात, सो बिमान चढ़ि चले हैं। बैठे मधुपुरी कोल्ह मानसिंहराजा ढिग, देखे नभ तात, उठि कही "भले, भले हैं" ॥ पछे नृप "बोले कासेों ?" “कैसे के प्रकास ;" "कही" को हठ परे, सुमि यचरज रहे हैं। मानुस 600- --१०० 452<noinclude></noinclude> je0ic5ao3sdjr06x2zoevb4hj4ppsis पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२२ 250 194186 664409 2026-07-02T16:53:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664409 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>453 श्रीमति धाविन्दु स्वाद । पठाये, सुधि ल्याए सांच, पांच लागी, करी साष्टाङ्ग बात मानी भाग फले हैं ॥ १२१ ॥ (६२९-५०८) " आंच" =ताप । “अवरज रहे हैं' - आवर्य में मिले, आव युक्त हुए, आप को प्राप्त हुए । वार्त्तिक तिलक | श्रीकील्हदेव जी के पिता, श्रीसुमेरदेव जी, सूबे गुजरात के " सूत्रा" (सूवादार) थे; यद्यपि गृहस्थाश्रम ही में रहे, तथापि परम भगवद्भक्त थे सो प्राप वहां ही (गुजरात में ही ) शरीर त्याग कर विमान पर चढ़के श्री रामधाम को पधारे; उस समय श्री की हदेव जी मधुराजी में राजा मानसिंह के पास बैठे थे । पपने पिताजी को विमान पर पाकाश में जाते देख, उठके, प्रणाम कर बोले कि "बहुत अच्छा, भले, पधारिये” यह सुन मानसिंह ने पूछा कि" पाप किस्से बोले ?” आपने उत्तर दिया कि "प्रगट कहने की बात नहीं है" परन्तु राजा ने बड़ी नम्रतापूर्वक बड़ा हठ किया कि "कृपा करके अवश्य सुनाइये” । तब मापने पिता जी के श्रीरामधाम पधारने की सब वार्त्ता कह सुनाई । बड़ा आर्य मान, साँढ़नी पर मनुष्यों को भेज के राजा ने सुधि मँगवाई | गुजरात से लौट के उन लोगों ने कहा कि "हां, सत्य है, उसी दिन उसी क्षण पाप का तन छूटा है" । यह सुन मानसिंह अपनी पप्रतीति का पश्चात्ताप ४५३<noinclude></noinclude> isvpeszc67ar98lwrj19vgydywqgkeq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२३ 250 194187 664410 2026-07-02T16:53:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664410 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>8५8 123006-- श्रीभक्तमाल सटीक । कर, श्रीकील्हदेव जी के समीप गया और उसने सा- टाङ्ग दण्डवत करके यह बिचारा कि ऐसे त्रिकालज्ञ महानुभाव का संग तथा सेवा मुझे प्राप्त है; सो मेरा भाग्य और पूर्व सुकृतों का फल, तथा श्री करु- शाकिर प्रभु की विशेष कृपा है ॥ (ITI) टोका | कवित्त | 454' ऐसे प्रभु छीन नहीं काल के अधीन, बात सुनियें नवीन, चाहें रामसेवा कीजिये । घरी ही पिटारी फूल माला, हाथ डाथो तहां ब्याल कर काट्यो, कह्यो “फेरि काटि लीजिये" ॥ ऐसेही कटायो बार तीनि, हुलसायो हियो, कियो न प्रभाव नेकु रुदा रस पीजिये । करि कैं समाज साधु मध्य यों बिराज, प्रान तजे दशैं द्वार; योगी के सुनि कीजिये ॥ १२२ ॥ ( ६२९-५०७ ) [ नवद्वार १०२ नेत्र, ३३४ कर्या, ५६ नासिका; 9 मुख, ८ मलद्वार, ९ सूत्रद्वार; १० वां “दशैं द्वारा = ब्रह्माण्ड, ब्रह्मरंध्र मस्तक ॥ वार्तिक तिलक । श्रीकील्हदेव जी इस प्रकार परब्रह्म श्री सीतापति प्रभु में लीन रहते थे कि काल आप को अपने प्राधीन करही नहीं सक्ता था | एक समय की यह लोकोत्तर नवीन वार्त्ता सुनिये कि प्रभात में आप श्रीसीताराम जी की पूजा सेवा करने लगे; सो, सुगन्धित पुष्प मा लाओं की पिटारी जो पहिले से वहां रक्खी थी, उस्में 188-6-06-<noinclude></noinclude> al7l3b7tu55uufmd1mb27zqxdlgszje पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२४ 250 194188 664411 2026-07-02T16:53:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664411 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>455 188606-- 183 +OF+ : श्रीभक्तमाल सटीक । एक काला - सर्प शीतलता तथा सुगन्धि के लिये प्रा- बैठा था। आपने जब श्रीप्रभु को स्नान चन्दनादिक अर्पण करके फूल लेने के पर्थ, उस पिटारी में हाथ डाला, तब उस सांपने हाथ में काट लिया; फिर हाथ उसके मुँह के समीप लेजाके पाप बोले कि “फिर काट ले, तेरा विष क्या मुझे चढ़ थोड़े ही सकता है; क्योंकि मेरे तन मन में श्रीसीतारामध्यानामृत व्याप्त है" । इस प्रकार केवल एक क्या बरन आनन्द पूर्वक तीन बेर कटवाया, परन्तु किंचित मात्र भी उस काले सर्प के विष का प्रभाव पापको व्याप्त न हुआ, काहे कि ध्याप तो सदा श्रीगमरूपामृतरसको पान कर मग्न रहते थे ॥ पुन: कालान्तर में जब आपने अपनी इच्छाही से श्रीरामधाम को गमन करना चाहा, तब समस्त सन्त- मण्डली को बुला, श्री सीताराम मन्दिर में समाज बैठा, सतकार पूजन कर, मध्य में बिराजमान हो, दशमद्वार से (ब्रह्माण्ड फोर के) प्राण को त्याग, श्री- रामधाम को प्राप्त हुए | इस बात को देख सुनके योगी लोग सामान, (इस गति से थक के रह गए। ऐसे श्रीरामोपासक की कथा सुन सुन के जगत में जीना योग्य है ॥ श्रीसुमेरदेव जी । श्रीदेव जी श्रीकीरहदेव स्वामी के पिता, बड़े ११. १५५<noinclude></noinclude> 98w0sizvzuj74kng7j4tj9f4fey1p7y पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२५ 250 194189 664412 2026-07-02T16:53:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664412 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४५६ 18000- BG00 श्रीमति सुधाविन्दुवाद | भक्त थे । पाप की कथा १२१ वें कवित्त (पृष्ट ४५३ में लिखी गई है 456 कुल्हू के राजा की कथा श्रीपेहारी जी की कथा के अन्तर्गत (पृष्ट ४४३।४४४ में है । (१३) बच्चे । (श्री) अग्रदास हरिभजन बिन, काल वृथा नहिँ बित्तयो ॥ सदाचार ज्यों सन्त प्राप्त जैसे करि आये । सेवा सुमिरण सावधान, चरण राघव चित लाये ॥ प्रसिध बाग सों प्रीति सुहथ कृत करत निरंतर | रसना निर्मल नाम मनहुँ ब- र्षत धाराधर । (श्री) कृष्णदास कृपा- करि भक्ति दत्त, मन बच क्रम करि अटल दयो । (श्री) ग्रदास हरि भजन बिन, काल वृथा नहिँ बित्तयो ३६ ( स ) "बित्तयो" बिताया, व्यतीत किया। “धाराधर" मेघ, जलद । "सुह्य" स्वहस्त, अपने हाथों से । “दयो" - दिया । स्वामी श्रीदेव जी । श्री १०८ अग्रदास स्वामी जी ने श्रीसीताराम जी के भजन बिना किंचित मात्र भी काल व्यर्थ नहीं बिताया । आप का सदाचार किस प्रकार का था कि जैसा पू- ठु 128600- 300-<noinclude></noinclude> 0hcgm9rzraibxz999hxgogiktlu17nv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२६ 250 194190 664413 2026-07-02T16:53:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664413 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>457 600 श्री भक्तमाल सटीक | ४५७ सन्तों का हुआ करता; और प्रातःकाल से पूर्व के महात्मा लोग जैसे सम्पूर्ण भगवत कर्म कर आए हैं, वैसे ही आप भी मानसी तथा प्रत्यक्ष सेवा पूजा और नाम रूप गुण स्मरण करते हुए अपने चित्त की वृत्ति सावधानता पूर्वक श्रीयुगलसकर के चरण- कमलों में एकरस लगाए रहा करते थे । और जी पापके स्थान के समीप पुष्प फलादि युक्त arfeat थी उस्को "श्री सीताराम बिहारस्थल शोकबन और प्रमोदवन" ही भावना से मानकर उसमें प्रीति करते थे; सो प्रीति आपकी लोकप्रसिद्ध हो गई, क्योंकि पाप निज कर कमलों से ही उस्की सब कृत्य, पर्थात् श्री तुलसी आदि वृक्षों का कोड़ना सींचना सूखे पत्रादिकों का बहाना इत्यादि, निरन्तर किया करते थे; और रसना (जिल्हा) से "श्री सीताराम" निर्मलनाम इस प्रकार से सप्रेम उच्चारण किया करते थे, कि जैसे कोई पली- किकानन्द का मेघ मधुर २ शब्द करके बरसता है । स्वामी श्री १०८ डेजीकी इस प्रकार की बाह्या- तर प्रेमा परा दशा कैसे न हो ? क्यों कि आपके श्रोगुरुदेव पयोहारी श्रीकृष्णदास जी ने कृपा करके, मनवचनकर्म तीनों प्रकार की भक्तिभाव, अपना सर्वस्व देके पटल (e) कर दिया था। श्रीग्रदेव स्वामी जी की अष्टयामीय भावना-रीति-भक्ति की जय ॥ 88 Gob<noinclude></noinclude> l5wekm7jkdxdl9d0khfywg697nsr4lo पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२७ 250 194191 664414 2026-07-02T16:53:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664414 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । (३) टीका | कवित्त | दरशन काज महाराज मानसिंघ आयो, छायी बाग मां बैठे द्वार द्वारपाल हैं। झारिके पतोषा गये बा- हिरले डारिये को, देखी भीरभार, रहे बैठि ये रसाल हैं | पाये देखि नाभा जू ने साष्टांङ्ग करी, ठाढ़े, भरी पर्खे, चले अँशुवनि जाल हैं। राजा मग चाहि, हारि, निकै निहारि नैन, जानी पाप, 'जानी 'दासनिदयाल हैं' ॥ १२२ ॥ (६२९-५०७ ) "आजी" जगत के प्राण श्री जानशिरोमणि प्रभु । वार्तिक तिलक | भए एक समय श्रीपग्रदेव स्वामी के दर्शन करने के लिये (आमेर जयपुर के ) महाराज मानसिंह पाए; उस समय आप बाटिका ही की सेवा में थे; इस्से राजा अपने समाज सहित (बाटिकाही में) गया । घ्पतः द्वारपाल लोग बाटिका के द्वार पर बैठा दिये गए, जिसमें इतर मनुष्यों की भीड़ भीतर न पाने पावे । श्रीग्रदेव स्वामी जी उस क्षण बाटिका के सूखे पत्ते घ्यादि ब हार के फेकने के निमित्त बाहर निकल चुके थे; कूड़े को फेंक के जो देखा तो राजसेवकों की भीड़ भाड़ हो रही है और द्वाररक्षक भी द्वार पर बैठे हैं । पतएव श्रीराम रसिक शिरोमणि स्वामी जी बाहू- रही एक प्राम्रवृक्ष के नीचे बैठके श्री प्रभु की मानसी सेवा ध्यान में मग्न हो गए। विलम्ब देख श्री ६ नाभा जी Boon.. 458<noinclude></noinclude> ggu7wm2vgd2p0ygy66h1ph8bhbcrr63 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२८ 250 194192 664415 2026-07-02T16:54:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664415 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>459 श्रीभक्तमाल सटीक । Ly साष्टाङ्ग दण्डवत कर सन्मुख खड़े हो, पापकी निस्सीम निरभिमानता सरलता तथा प्रेम-मग्नता देख प्रेम से विह्वल हो गए, नेत्रों से प्रेमाश्रु की धारा चलने लगी। उधर राजा पाप के पाने का मार्ग देख देख हारके, पाप ही पाके दोनों महानुभावों की प्रीति की यह विलक्षण दशा अपने नेत्रों से देख, कृतकृत्य हो, उसने यह जाना कि साक्षात् जानशिरोमणि श्रीराम जी ही स्मदादिक दासों पर दयालु हो के “श्रीप्रग्रदेव" रूप से हैं ॥ प्रगट हुए पाप "शृङ्गार रस के प्राचार्य "श्री ग्रहपली” के नाम से प्रसिद्ध हैं। प्राप का अष्टयाम, पापकी "ध्यान मंजरी" आप के कुण्डलिया, पदावली इत्यादि प्रख्यात ही हैं । आप के विशेष प्रभाव आदि में मा- नसी का वर्णन, पृष्ठ ४८५५ में) हो चुका है; और यहां बाटिकाप्रीति प्रसंग कुछ लिखा गया । श्रीस्वामी जी के प्रेम की, प्रशंसा कहां तक हो सकती है जिनके कृपापात्र, श्रीभक्तमाल- जी- के कर्त्ता १०८ नामास्वामी जो हुए ॥ श्री आप को श्रीजानकी जी महारानी ने कृपा करके दर्शन दिया । पाप अपनी इच्छा से तन तज के श्री- साकेत को पधारे ॥ छप्पै । श्री अग्रदेव पव्यगमन पग्र उपासक राम सिथ ॥ अष्टयाम कैङ्क चाह तन मन में धाखो । 1800-<noinclude></noinclude> awio3ia12c0wr1o7u9toacsotq596zk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५२९ 250 194193 664416 2026-07-02T16:54:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664416 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४५० 3600- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 460 2-600- foot भक्तिरस प्रगट गूढ़ प्रभु-तत्व उचारो ॥ “ध्यान- मंजरी, " सरस रसिक मन मोद प्रवाह्यो । सीताराम नन्यभावबिध निर्ब्राह्यो । पूर्वाचारज रीति रस- रङ्गमणी हित दामहिय । श्री अग्रदेव अव्यगूमन ए उपासक राम सिय ॥ १ ॥ ( श्रीरामरसरङ्गमणि जी) स्वामी श्रीक्ष नाभा जी स्वामीश्रीपग्रदेव जी * | पैहारी श्रीकृष्णदासजी श्रीनन्तानन्द जी भगवान् रामानन्द गोस्वामी श्री१०८ नाभा जो महाराज का नाम श्रीनारायणदास जो भी ( पृष्ट ५9 में ) लिखा जा चुका है। आपकी चरचा पृष्ट १९ तथा पृष्ट ५ में भी आई है, एवं ४८ में से ५७ वे पृष्ट पर्य्यन्त आप का वर्णन हो चुका है; और यह भी कि भक्तमाल विक्रमीय सम्बत की ११ वीं शताब्दी में, अर्थात् १६४० और १६८० के बीच में, लिखी गई है। 183 - 900<noinclude></noinclude> fqv42o9j30362sx1ws94p78fyr42kcb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३० 250 194194 664417 2026-07-02T16:54:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664417 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>461 श्रीभक्तमाल सटीक । ४६१ -909881 भगवान् श्रीरामानन्द का समय, ( पृष्ट ४३० में, ) 'पन्द्रहवीं शताब्दी' लिख चुके हैं । " श्रीराधाकृष्णा- दास सम्पादित भक्तनामावली” में भी यही वर्णित है । स्पष्ट है कि स्वामी श्री १०८ प्रग्रदेव जी, वि- क्रमीय सम्बत की सत्रहवीं शताब्दी में बिराजते थे ॥ श्री १०८ नाभास्वामी जी ने, पहिले चारो भागवत सम्प्रदायों के चारो प्राचाय्यों का वर्णन (पृष्ठ ३७५ से ३९५ तक) किया; फिर अपने निज सम्प्रदाय (श्री "श्रीसम्प्र दाय") की बात (पृष्ठ ४९१ में) उठाई; पुनःश्रीगुरु पर- परा का वर्णन, स्वामी पनन्तश्री रामानुज जी से लेके, श्री अनन्तानन्द द्वारा अपने गुरु भगवान् तक, पर्थात् श्री १०८ स्वामी जी पर्य्यन्त (पृष्ट ४५६ से ४५९ तक), गान किया; जय जय जय । जब श्रीगुरु यश गा चुक्रे, तथ पुन: पीछे लौटकर, पब सब से पुराने (कलियुग ३८८९ ) प्राचार्य, श्री शङ्करस्वामीजी का वर्णन करते हैं- (1) कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचा- रज शङ्कर भट ॥ उतशङ्खल प्रज्ञान जितेन ईश्वरवादी । बुद्ध कुतर्की जैन और पाखंड हि आदी ॥ बिमुख निको दियो दण्ड, सेचि सन्मारग आने । सदाचार 8600- --२००४|<noinclude></noinclude> e9jcq2mlqy8xtkzqrw0hur4s47x47q7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३१ 250 194195 664418 2026-07-02T16:54:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664418 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६२ श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । ॥ की सींव विश्व कीरतिहि बखाने || ईश्व रांश अतवार महि, मरजादा मांडी घट | कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचा- रज शङ्कर सुभट ||३७| ( ) T . “अनीश्वर बादी " = वे नास्तिक लोग, कि जो संसार का कर्ता किसी को, ईश्वर नहीं मानते बरन कहते हैं कि स्वयं स्वभावतः सव होता रहता है और विनशता है। "चिखींचकर । "माँड़ी" = वहन किया। 'उत्श्टङ्गलशृङ्गला को उत्पादन करनेवाले । "बुद्ध"=बीच | " 1 श्रीशङ्कराचार्य जी । वार्तिक लिखक । कराल कलियुग में धर्म और अधर्मियों से धर्म अर्थात वर्णधर्म, आश्रम धर्म, तथा भागवत धर्म को पान रक्षण करनेवाले परम सुभट श्रीशङ्कराचार्य जी प्रगट हुए | किस प्रकार से आपने धर्म पालन किया सो सुभटता वर्णन करते हैं कि जितने उतशृङ्खल अर्थात बेदविदित सनातन-धर्म-परम्परा के उठा देने वाले अज्ञानी अनोश्वरवादी थे, पर बुद्धमतावलम्बी तथा कुतर्कों जैनमतवादी एवं पाखण्डपरायण ध्यादिक जितने विमुख थे, तिन सब को यथा योग्य दण्ड देके उन कुमार्गों से खींच सनातन सतमार्ग में (ला के, स्थापित करके) चलाया, इस प्रकार की धर्म -90988 1886-06- सुटता की। 460 -9008<noinclude></noinclude> daiqhz7cygeoleqaewdae11wuvv7qkn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३२ 250 194196 664419 2026-07-02T16:54:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664419 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>463 23000- श्रीभक्तमाल सटीक । ४६३ --90988: 1800- श्रुति - स्मृति-विहित सज्जन- परिगृहीत समीचीन है। पाचरण की सीमा ( मर्यादा ) ही हुए । "ईश्वर" के (शङ्कर जी के) अंशावतार प्रगट होके, बेदधर्ममर्यादा को आपने मंडन किया कि जो फिर घंटे नहीं एक रस बनी रहे । आपकी ऐसी सत्कीर्त्ति सम्पूर्ण विश्व बखान करता है ॥ श्रीशङ्कराचार्यजी (श्रीशङ्करांशावतार) दक्षिण देश में प्रगट हुए । स्मार्त मत रक्षक दण्डी सन्यासी थे । मण्डन मिश्र नामक एक ब्राह्मण जिन को किसी ने श्री ब्रह्मा जी का अंशावतार भी लिखा है, बड़े कर्म- काडी मीमांसामतवादी थे मानो कर्म ही को वह ई- श्वर मानते थे; उनको आपने ( श्रीशंकर स्वामी ने ) शास्त्रार्थ में निरुत्तर कर शिष्य ( भगवत शरणागत ) किया || (दो०) बिनु सतसंग न हरि कथा, तेहि बिनु मोहन भाग । मोह गए बिनु राम पद होय न दृढ़ अनुराग ॥ शिवजी की साप पर बड़ी कृपा थी । आपने प्रायः सब बड़े बड़े देवतों की स्तुतियां लिखीं और बहुत देवों के मन्दिर भी बनवाए। स्मार्त आप को अपना पाचार्य और पद्वैतवादी अपना मानते हैं; निर्गुणमतावलम्बी अपना तथा शैव और शाक्त भी अपना अपना आचार्य प्रापको पुकारते हैं। “शिव विष्णु भक्ति"; " भजगोविन्दं"; "विश्वेशपादाम्बुज दीर्घ 18-06- १२<noinclude></noinclude> k0l30ui452ppwxiyjqnchz93u16av1t पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३३ 250 194197 664420 2026-07-02T16:54:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664420 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६४ 183-6-06- श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । 464 नौका" इत्यादि उपदेश आपही के हैं; “ब्रह्मसूत्रभाष्य” तथा " नृसिंहतापनी भाष्प" यदि आपके प्रख्यात ही हैं। पाप के मुख्य शिष्य चार प्रसिद्ध हैं- जी; । ३. स्वरूपाचार्य्य जी । १. पद्माचार्य्य २. पृथ्वीधराचार्य जी; ३२ ही बर्ष रहे । 8. तोटकाचार्य जी । ऐसा कहते हैं कि आप इस मर्त्यलोक में केवल कलि संवत्सर | विक्रमीय सम्बत ३८८ પ ईसी सन् ७८८ Mr R. C. Datt (आर० सी० दत्त); A. C. Mukerji (ए० से० मुकर्जी) M. A. B. I..; Dr. W. W Hunter ( डाक्टर हन्टर); तथा श्रोत पो राम जी सीतारामीय ने भी ऐसाही लिखा है ॥ "श्रीशङ्कर दिग्विजय" नामक ग्रन्थ में आप का समस्त जीवन च- रित्र है। यह भी कथा उसी की है। अब श्री प्रिया दास जी महाराज को टोका (कवित्तों) पर ध्यान दौजिथे- (ई) टोका | कवित्त । बिमुख समूह लेकें किये सनमुख श्याम, पति- भिराम लीला जग विसतारी है। सेवरा प्रबल बास केवरा ज्यों फैलि रहे; गहे नहीं जाहिँ, बादी शुचि बात धारी है ॥ तजिके शरीर काहू नृप में प्रवेश किया, दियो करि ग्रन्थ, "मोह मुद्गर" सुभारी है । शिष्यनि से कह्यो "कमूं देह में पावेश जानो तब ही water पाय सुनि कीजै न्यारी है ॥ १२४ ॥ (६२९-५०५) "शुचि" = शृङ्गार रस ( अमरकोशे "शृङ्गारः शुचिरुज्जलः" ॥<noinclude></noinclude> no0zaybqh24uowkozz4pd7eziavnaj7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३४ 250 194198 664421 2026-07-02T16:55:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664421 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>465 श्रीभक्तमाल सटीक । वार्त्तिक तिलक । श्रीशङ्कराचार्य जी ने भगवत विमुख (सेवड़ा, बुध, ज्ञानी, बौद्ध, नास्तिक, अनीश्वरवादी, चा- afe, जैन, इत्यादि समूहों की बाद में परास्त करके दंड देके, श्रीमन्नारायण श्याम सुन्दर जी के सन्मुख कर दिया, पर श्रीबदरिकाश्रमादिक भगवदामों के माहात्म्य को प्रसिद्ध कर भगवतस्तोत्रादि “ श्रीविष्णु सहस्त्र नाम माष्य" गीता भाष्यादि पति सुन्दर भग- वत यश लीला को जग में विस्तार किया । उस काल में सेवादिक प्रबल नास्तिक समूह इस प्रकार से लोक में फैले थे कि जैसे बाटिका में फूले केबढ़े की बास फैल जाती है; और बड़े ही विबादी थे, कि वेद aar के ग्रहण में किसी प्रकार से पा नहीं सकते थे । एक समय श्रीशङ्कराचार्य जी से शास्त्रार्थ में और २ विवादों से पराजय होके, प्राप की बाल ब्रह्मचारी जान के “शुचि” पर्थात् शृङ्गार रस (स्त्री पुरुष प्र- सङ्ग) की वार्त्ता का बाद करने लगे । तब पाप उस बात के जान्ने के पर्थ कुछ पवकास लेके किसी राजा ("") के मृतक शरीर में, परकाय प्रवेश सिद्धि के बल से, घुस गए; पर अपने शरीर की रक्षा क- रने की शिष्यों से कह गए। तथा, प्रवेश करने के पूर्व ही एक "मोह मुद्गर" नामक ग्रन्थ बना के शिष्यों 188600- ४६५<noinclude></noinclude> hk30cnawm9snzr1ao8bvla0qla73qe2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३५ 250 194199 664422 2026-07-02T16:55:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664422 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६६ 188600- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 466 100- को पढ़ा के कहे गए कि “कदाचित विषयाशक्त होके नृप देह विषे मेरा ममत्त्व यावेश देखो तो पाके यही ग्रंथ मुझे सुनाना, सुनते ही मैं नृप शरीर से न्यारा होके (तज के) निज देह में चला आऊंगा " (३५) टीका | कवित्त । जानिके प्रवेश तंन शिष्यनें, प्रवेश कियो रावले में देखि सो श्लोक लै उचारयो है। सुनत हि तज्यो तन, निज तन आय लियो, कियो यो प्रनाम दास, पन पूरी पास्यो है ॥ सेवरा हराए बादी; पाए नृप पास, ऊंचे छात पर बैठि एक माया फन्द डाखो है । जल चढ़ आयो, नाव भाव ले दिखायो, कहे "चढ़ी, नहीं बूढ़ी" पाप कौतुक सो धाखो है ॥ १२५ ॥ (६२९-५०४) "राव"राजा का गृह । वार्त्तिक तिलक । श्रीशङ्कराचार्य जी जितने काल की अवधि शिष्यों से कह गए थे सो काल व्यतीत हो गया; तब शिष्य ने जाना कि "जी स्वामी जी ने प्राज्ञा की थी सो काल तो बीत गया, अतएव पब जाना जाता है कि राजा के तन में ममत्व का प्रावेश पाप को कुछ ही गया है; " तब राजा के गृह में जाके शिष्य ने "मोह मुद्गर" के श्लोक उच्चारण करके नृप शरीरस्थ स्वामी जी को सुनाया । सुनते ही पापने नृपतन त्याग के अपने शरीर को ग्रहण कर लिया। शिष्य साष्टांग प्रणाम कर कहने लगे कि "हे स्वामी! जो पन किया था सो 18000-<noinclude></noinclude> en0rtde3w1uv5c657pc70p2jesv1reu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३६ 250 194200 664423 2026-07-02T16:55:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664423 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>467 1886-06- श्रीभक्तमाल सटीक | ४६७ --909881 आपने पूरा किया; आप बोले "तुमने भी मेरी आज्ञा भले पाली ।" श्रीशङ्कराचार्य जी ने उस काम कौतुक बाद को, इस ढंग से समझ के, कुबादी सेवड़ों को बाद में परास्त किया । जब सेवरों ने जाना कि “अब तो हम सब हार गए, राजा शङ्कराचार्य जी हो का मत ग्रहण करेगा, अतः राजाको शङ्कराचार्य सहित माया से मारडालें” तब कुमत करके, निज शिष्यों सहित मायावी सेवढ़ों का गुरू राजा तथा श्रीशङ्कराचार्य जी को लेके ऊंचे छत पर जा बैठा और अपने माया फन्द का प्रयोग किया कि जिस्से चारों ओर से प्रलय कालीन समुद्र सरीखा 'जल छत के समीप तक चढ़ पाया और उसी जल में छत के समीपही माया की एक बहुत बड़ी नौका भी आ पहुंची तब सेवढ़ों के उस गुरू ने राजा से कहा "कि शीघ्र इस नाव पर चढ़ो, नहीं तो डूब जा- झोगे ।” राजा ने भय से चढ़ना चाहा; परन्तु श्रीशङ्क- राचार्य जी ने इस माया कौतुक को अपने मन में मिथ्या ही धारण किया (झूठ समझा ) (ई) टीका | कवित्त । प्रचारज कही यो चढ़ाओ ईनि सेवरानि; राजा ने चढ़ाए; गिरे टुक उड़ि गए हैं। तब तो प्रसन्न नृप, पाव परखी, भाव भयो, कह्यो जोई कस्तो धर्म भागवत BROA<noinclude></noinclude> b77karg0dxy06aecsi3moaxtl38gamv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३७ 250 194201 664424 2026-07-02T16:55:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664424 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६६ 600- लए श्रीभक्ति सुधाबिन्दुस्वाद । 468 9098 हैं ॥ भक्ति ही प्रचार; पाछे मायाबाद डारी दीनो, aar प्रभु कह्यो, किते बिमुख हु भए हैं। ऐसे सो गंभीर सन्त धीर वह रीति जानें, प्रीति ही में साने हरि रूप गुन नए हैं || १२६ ॥ (६२९-५०३) वार्त्तिक तिलक | उस माया जाल के जल में वह माया रूपी मिथ्या नौका देखके राजा चढ़ताही था तभी श्रीशंकराचार्य जी ने राजा को चढ़ने से रोक के कहा कि “पहिले इन सव सेवड़ों को चढ़ाओ” । राजा ने सेवराझों से कहा कि "हां आगे आप सब ही चढ़िये" यह सुन सेवड़ों ने बिचारा कि " जो पब हम इस नौका में नहीं चढ़ते तौभी तो राजा हम सब को मार ही डालेगा"; इस्से वे सब सेवड़े राजा के भय से चढ़े। वह नाव तो दे- खने मात्र की थी ही, भूमि में गिरके सब सेवरे टुकड़े टुकड़े होके मर गए । फिर तो न वह नाव ही रही, न वह जल ही रह गया । तब तो यह सब कौतुक देख राजा अत्यन्त प्रसन्न हो, धन्यबाद पूर्व्वक श्री शंकरस्वामी के चरणों पर गिरा; तथा भक्तिभाव में भर गया । और, आप ने जो उपदेश दिया राजा ने सो ही किया, पर्थात् उसने वेदविहित भागवत धर्म को अपनी प्रजा समेत ग्रहण किया । इस इस प्रकार से श्रीशंकराचार्य्य जी ने प्रथम तो श्री भगवद्भक्ति तथा भागवत धर्म ही का भलीभांति 188-600--<noinclude></noinclude> 51zwsm22ez7kl41utc1org2ejtq816m पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३८ 250 194202 664425 2026-07-02T16:55:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664425 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>183600- 469 600- श्रीभक्तमाल सटीक | प्रचार किया था; परन्तु पीछे कालानुवर्ती कौतुकी प्रभु की प्रेरणा से, अपने मत में स्वयं उन्हीने कुछ मायावाद डाल दिया; कि केवल निर्विशेष पद्वि- ती ब्रह्म ही सत्य है और सब माया है, अर्थात् ईश्वर की भी विद्यामया युक्त कहा और ज्ञान, भक्ति, वेद, मन्त्र, इत्यादिक मोक्ष साधनों को भी केवल विद्या- मायामय बताया, तथा जीव और संसार को अवि- द्यामायामय, और दोनों मायायों को तीनों काल में मिथ्या कहा । तः कितने जीव भगवत से पर भागवतधर्म से विमुख हो गए और होते जाते भी हैं । (यथा, दोहा) ब्रह्मज्ञान बिनु नारि नर कहें न दूसरि बात । कौड़ी लागी लोभ वश करहिं विप्र गुरु घात ॥ " और जो धीर गम्भीर (श्री श्रीधर स्वामी आदि सरीखे) सन्त हैं सो तो श्रीशंकराचार्य जी की प्रथम भक्ति मति रीति को यथार्थ जान के अपने मन को प्रीति ही में सान के नित्य नवीन भगवत रूप गुण लीला में लोलीन हुए हैं तथा होते हैं ॥ इन कथाओं को किसी किसी ने प्रकारान्तर से भी लिखा हैं, परन्तु यहां तो श्री प्रिया दास जी के अक्षरों के अनुसार ही लिखा गया ॥<noinclude></noinclude> 8ubcwp5z8jzt7c9q55alhhuq46k6pnj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५३९ 250 194203 664426 2026-07-02T16:56:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664426 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७० श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । श्रीशंकराचार्य्यजीकृत "मोह मुद्गर के१६ (सोलह ) श्लोकों में से, ये पांच श्लोक- " 470 'का तव कान्ता करतेपुत्रः, संसारोय मतीव विचित्रः । कस्य त्वं वा कुतप्रायातः, तत्त्वं चिन्तय तदिदं भ्रातः ॥३॥ तत्त्वं चिन्तय सततं चित्ते, परिहर चित्तं नश्वरविते । क्षणमिह सज्जन सङ्गतिरेका, भवति भवार्णवतरणे नौका॥६॥ सुरमन्दिरतरु मूल निवासः, शय्या भूतलमजिनं बासः । सर्व परिग्रह भीग त्यागः कस्य सुखं न करोति बिरागः ॥ १०॥ बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणी रक्तः । वृद्धस्तावत् चिन्तामग्नः, परमेब्रह्मणि कोपि न लगूः ॥११॥ यावज्जननं तावन्मरणं, तावज्जननी जठरे शयनम् । इति संसारे स्फुटतर दोषः, कथमिह मानव तव सन्तोष: ? ॥१३॥” (३) । " नामदेव " प्रतिज्ञा निर्बही, ज्यों त्रेता नरहरिदास की || बालदसा "बीठल" पानि जाके, पै पीयौ ॥ मृतक गऊ जि- वाय परचौ असुंरन कौं दीयो ॥ सेज सलिल तें काढ़ि पहिल जैसी ही होती। 6000-<noinclude></noinclude> ro5y60ukrthgcit2cul51yq3cnn8fwn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४० 250 194204 664427 2026-07-02T16:56:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664427 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-90988 471 श्रीभक्तमाल सटीक । ४७१ 909 देवल उलट्यो देखि सकुचि रहे सबही सोती ॥ " पंडुरनाथ” कृत अनुग ज्यों छानि सुकर छाई घास की । नामदेव प्रतिज्ञा निर्बही, ज्यों त्रेता नरहरि दास ant 11 3 11 (4) 1= "सोती, श्रोत्री, वेद पाठी ब्राह्मण । "पानी” = पाणि, कर, हाथ "होती" = थो । बार्तिक तिलक । श्री नामदेव जी । . श्रीभगवदुक्त नामदेवजी की प्रतिज्ञा श्रीहरिकृपा से इस प्रकार से निबही कि जैसे नेता * में श्री नृ- सिंह जी के दास श्री प्रह्लाद जी की (प्रतिज्ञा निबड़ीथी) । * श्री नृसिंहावतार सत्ययुग का कहा जाता है, और श्रीनामा- स्वामी जी ने नेता लिखा, इस्का तात्पर्य यह है कि उस अवतार कृतयुग त्रेता के संध्या में हुआ अतएव त्रेता ही कहा; हिरण्यकशिपु मे बर ही तो मांग लिया था कि 'न सत्ययुग में मरे म त्रेता में' ॥ देखिये, बालावस्था ही की प्रीतिदशा में जिनके हाथों से श्रीविट्ठल भगवान् ने दूध पिया । और मरी हुई गाय की जिला के असुरों (यमन म्लेच्छो) को परीक्षा परची दिया । तथा, उस यमनराज को दी हुई सेज ( पलंग) को जो आपने नदी के जल में डाल दिया था, सो उस जल में से वैसेही पनेक पलंग नि- काल के दिखा दिये । १३<noinclude></noinclude> 3my4yfv8jlcojaj4jnnko8oabhyl7hg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४१ 250 194205 664428 2026-07-02T16:56:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664428 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७२ 600- श्रीभक्ति सुधाबिन्दुस्वाद । 472 909 पर जब पापने मन की दुचिताई के भय से नही कमर में बांध ली थी, उस्को देखके पुजारी पंडों ने पाप का तिरस्कार किया, इससे आप मन्दिर के पीछे जाके भजन गान करने लगे; तब "श्रीपण्डरी नाथ" जी के देवालय का द्वार उलट के पाप ही की ओर हो गया जिसको देखके प्रत्यन्त संकुचाके सब पूजक श्रोत्री लोगोंने श्रीनामदेव जी से विनयकर अपना अपराध क्षमा कराया । पुनः भक्तवत्सल श्रीपंडुरनाथ जी को मापने पनी प्रेमपुंजभक्ति के बल से, पनुग (सेवक) सरीखा कर लिया, यहां तक कि प्रभु ने स्वयं अपने कर क- मलों से पोप का छप्पर छाया ॥ (दो०) "जिन जिन भक्तन प्रीति की, ताके बस भए पनि । सेन होइ नृप टहल किय, नामदेव छाई छानि ॥” (श्री ध्रुवदास जी ) श्रीशिव सम्प्रदाय (विष्णुस्वामी संप्रदाय) में श्री- लक्ष्मण भटजी से और श्रीबल्लभाचार्य जी से पाप पहिले हुए; आपके गुरु श्रीज्ञानदेव जी; शिष्य त्रिलोचन देव; पर पापके नाना श्री बामदेव जी थे । झाप सुकवि थे; पापकी कविता उदासियों के “ग्रन्थ साहिय" में भी संग्रहीत है । यह बात तो प्रसिद्ध ही है कि आप श्रीकबीर जी के समकालीन थे । 0-00- -90988<noinclude></noinclude> exivcng7ommr8u97rekzr53y77d6nfd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४२ 250 194206 664429 2026-07-02T16:56:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664429 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>473 188-600- श्रीभक्तमाल सटीक । ४०३ 9881 कलिसंवत्सर विक्रमीय सम्बत् ईसवी सन् ४५८९ १५४५ १४८८ श्रीराधाकृष्ण जी (काशीनागरीप्रचारिणी सभा ), तथा श्रीतपस्वी राम सीतारामीय जी ने भी ऐसाही लिखा है; और उस समय भारतबर्ष में "बादशाह सिकन्दर लोदी” था ॥ (४२) टीका | कवित्त । छीपा वामदेव हरिदेव जू की भक्त बड़ो, ताकी एक बेटी पतिहीन भई जानिये । द्वादश वरष मांझ भयो तन, कही पिता सेवा सावधान मन नीके करि पानिये ॥ तेरे जे मनोरथ हैं पूरन करन एई जो पै दत्तचित्त के मेरी बात मानिये । करत टहल प्रभु 1. बेगही प्रसन्नभए, कीनी काम बासना सु पोखि जन मानिये ॥ १२७ ॥ (६२९-५०२) "होपा" - बीट यख खापनेवाले (खोपा दरजी नहीं) वार्तिक तिलक | पण्डरपुर (दक्षिण) में, जाति के छीपा, श्रीबाम- देवी श्री हरि जी के परम भक्त हुए; तिनकी एक कन्या थोड़ी पवस्था में विधवा हो गई। जब उस्की प्र स्था बारह वर्ष की हुई, तब उसके पिता श्रीयामदेव जी (श्रीनामदेव जी के नाना) ने कहा कि "श्रीपण्डुर- नाथ (श्रीबलदेव) जी, कि जो मेरे गृह में विराज- 1986-06-<noinclude></noinclude> 0fwvzmx0x4f6121rtlzmyqyjmlvh35d पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४३ 250 194207 664430 2026-07-02T16:56:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664430 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>* 1930-06- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 474 -909-08 मान हैं, इनकी सेवा पूजा सावधान मन लगा के भली भांति से किया कर, तेरे जितने मनोरथ हैं उन सब के पूरे करनेहारे येही प्रभु हैं; परन्तु जो मेरी बात में वि श्वास करके चित्त लगाके प्रेम सहित सेवा करेगी ती" । इस प्रकार पिताका उपदेश सुन, वह बड़ भागिन सप्रेम सेवाटहल दिन रात करने लगी। उस पर शीघ्र ही प्रसन्न हो प्रियतम प्रभु ने प्रति अनूप किशोर रूप से साक्षात् दर्शन दिया, जिन्हे देख उस्को काम बासना हुई । सर्वकामपूरक प्रभु ने उसकी कामना पूर्ण की, यहां तक कि वह गर्भवती हो गई । इस कलि- काल में भी ऐसी अनोखी प्रगट कृपा प्रभु की हुई, इस्को विश्वास पूर्वक मानिये | (दो०) "कलियुग सम नहिं पान युग, जो नर करि विश्वास | गाइ गाइ हरि भक्त यश, भव तरु बिनहि प्रयास ॥ * (ई) टीका | कवित fear की गर्भ; ताकी बात चली ठौर ठौर, दुष्ठ शिरमौरन की भई मन भाइये। चलत चलत वामदेव जू के कान परी, करो निरधार प्रभु पाप अपनाइये ॥ भए जू प्रगट बाल, नाम "नामदेव" घट्यो, कस्तो मन भायो सब सम्पति लुटाइये। दिन दिन बढ़घो, कछु पीर रंग चढ़यो; भक्तिभाव अंग मढ़घो, कढ़घो, रूप सुखदाइये ॥ १२८ ॥ (६२९-५०१) R-600-<noinclude></noinclude> 24g3ozrnti0zo4sjrwt6fk3epfc3031 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४४ 250 194208 664431 2026-07-02T16:56:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664431 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>475 88600- श्रीभक्तमाल सटीक । ४०५ --90988 "कट्पो" = निकला। "करोनिर्धार" - निश्चय निर्णय किया; पुढा । "मढ़यो”- - भड़ा। ढाया, उपेटा । बार्सिक तिलक । कुछ कालान्तर में जब लक्षणों से उनका गर्भ प्र- त्यक्ष जान पड़ने लगा, तब विधवा के गर्भ की वार्त्ता जहां तहां लोग मुहांमुहीं करने लगे, और दुष्टशिरो- नन्दकों की मन भाई बात हुई; क्योंकि वे निन्दा करने के लिये छिद्र ढूंढते ही रहते हैं, सो मिल गया । वार्ता] चलते चलते श्रीभक्त बामदेव जी के कानों तक पहुँची तपने एकान्त में पुत्री से पूछा कि "यह क्या बात है ? ” इन ने, बांछा पूरक-कृपा-युक्त प्रभु के दर्शन देने तथा का अपने को अपना लेने की सत्य सत्य बात, पूरी पूरी कह सुनाई, प्राप (श्रीवामदेवजी) सुनके पति हर्षित हुए। धन्य पाप के भाग्य । प्रसव काल की पूर्णता पर अनूपम बालक प्रगट हुए; श्रीषामदेव जी ने बालक का नाम "नामदेव" रक्खा और मनमाना जन्मोसव कर, घर की सम्पति को लुटाया; जय जय । बालक दिन दिन प्रति बढ़ने लगा; इन में लोक के रंगों से कुछ और ही रंग; ( श्रीरामानुराग रंग ) चढ़ा; और प्रेम भक्तिभाव से लपेटा हुआ प्रति सुख- दाई सुन्दर रूप का प्रकाश निकलने लगा, क्या कहना ॥ (३) टीका | कवित 600- खेलत खेलौना प्रीति रीति सब सेवाही की, पट 14:00 -9098<noinclude></noinclude> 37zzoktppl2szbaz5453r6fe85obdpy पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४५ 250 194209 664432 2026-07-02T16:57:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664432 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ક્ 113200- श्रीभक्तिसुधा बिन्दु स्वाद । पहिराबै, पुनि भोग को लगावहीं। घंटा ले बजायें, नीके के ध्यान मन लावें, त्यों त्यों प्रति सुख पावें, नैन नीर भरि आवहीं || बार बार कहें नामदेव बामदेव जूस "देषो मोहि सेवा मांझ, अतिही सुहावहीं”। "जाऊं एक गाउँ, फिरि पाऊ दिन तीनि मध्य, दूध को पिवावी, मत पीवी, मोहि भावहीं ॥ १२९॥ (६२९ - ५०० ) "सेवा" अर्थावतार भगवत की परिचय - ठाकुर जौ । 476 पूजा जब श्रीवामदेव जी की पांच वर्ष के निकट बाल्या- वस्था हुई तब पाप खेल खेलने लगे; सो और सं- सारी खेल नहीं; किन्तु जैसे अपने नाना जी को करते देखते थे, वैसे ही, प्रीति रीति से सब सेवा पूजाही का खेल खेलते थे । कोई पाषाणादिक की मूर्त्ति क- ल्पित करके उनको स्नान कराके बस्त्र पहिराते, पुष्प चढ़ाते, भोगलगाते, घंटा बजाके धूप पार्ती करते और भली भांति पांखें मूंद के ध्यान में मन लगाते थे; बरंच ध्यान करते समय आपको श्रीप्रभुकृपा संस्कार पूर्व सुख उत्पन्न होता और नेत्रों में प्रेमान- न्द का जल भर पाता था । यथा ( चौ० ) “खेलौं तहां बालकन मीला । करीं सकल रघुनायक लीला ॥ " कुछ कालान्तर में श्रीनामदेव जी श्रीबामदेव जी से बारम्बार कहने लगे कि "नाना जी ! मुझे अपनी सेवा पर्थात् पपने ठाकुर जी, पूजा करने के लिये, 18600- -90988<noinclude></noinclude> 977zynpiw2yod5bxiqzm7t65rmf9sny पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४६ 250 194210 664433 2026-07-02T16:57:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664433 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>477 श्रीभक्तमाल सटीक | ४७७ ५०% दीजिये, मुझको उसमें बड़ाही सुख प्राप्त होगा क्योंकि मुकको सेवा अत्यन्त प्रिय लगती है" । इस प्रकार सचाई सहित प्रति अभिलाषा देख, श्री बामदेव जी एक दिन बोले कि "मुझे तीन दिनों के लिये एक ग्राम को जाना है; सो जब जाऊंगा तब तुम पूजा करना, और दूध ठाकुर जी को पिलाना, परन्तु को भोग लगाए बिना तुम पाप न पीना" । श्रीनामदेव जी ने सुन के कहा कि "हां बहुत अच्छा, यह तो मुझे बहुत ही भला लगता है " ॥ प्रभु (v) टीका | कषित | कौन वह बेर ? जेहिं बेर दिन फेर होय, फेर फेर "वह बेर आइयें ?” माई वह बेर, लै कराही हेरि दूध डा युग सेर मन नीके के बनाइयें ॥ चौपनि के ढेर, लागि निपट पोसेर, दूग आयो नीर घेरि, जिनि गिरे घूटि जाइयें । माता कहे टेरि, “करी बड़ी तैं बेर, पब करो मति फेर" "पजू चितदै पौंटा- इयें ॥ १३० ॥ (६२९—४९९) "बेर बेला, समय "हेरि”=देख भाल के " चोप' प्रेम का चाव "ढेर" = राशि, समूह " निपट "अत्यन्त "अबेर "= विलम्ब " अवसेर ' = चिन्ता "फेर" = फेल, विलम्ब “घूंट जाइये” रोक लूं, रोकलेना चाहिये ॥ बार्तिक तिलक । जब श्रोबामदेव जी पाप को सेवा देके उस ग्राम -- --9098<noinclude></noinclude> 2byk5u2iax2biog4nm9r5gszhlcu43e पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४७ 250 194211 664434 2026-07-02T16:57:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664434 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>Voc Co- श्रीमति सुधाविन्दु स्वाद । 478 को चले गए, तब श्रीनामदेव जी को रात्रि ही से छट- पटी लगी और पाप मन में यह विचारने लगे कि "वह बेला कौन है ? कि जिस बेला में फिर दिन पावे; पौर बारंबार माता से पूछने लगे कि “मां! अभी सेवा का समय नहीं पाया ? ०. होते होते वह प्रभात बेला आगई; झाप उठ के स्नानादिक और पूजा करके, दो सेर दूध देख भाल छान के कड़ाही में छोड़ पोंटने लगे। मन में ऐसी अभिलाषा कर रहे हैं कि "भले प्रकार से दूध को ब- नाॐ" । चित्त में प्रभु प्रेम चाह चीप की पति अधि- कहता है, और पत्यन्त पोसेर अर्थात् चिन्ता भी है कि “मुझ से दूध कैसे उत्तम बने जिसमें प्रभु पीलेवें"। ऐसी चिन्ता करते में नेत्रों में प्रेमजल भर प्राया; तापने उस्को रोका कि कहीं कोई बूंद दूध न टपक पड़े । में माता पुकार के कहने लगीं कि “बेटा ! तूने बड़ा बिलम्ब लगाया, अब अधिक भेल न कर, शीघ्र भोग लगा" । सुनके आप बोले कि "माता ! मैंने चित्त लगा के दूध पटा है इस्से कुछ बिलम्ब हो गया " ॥ (v) टीका । कबित्त । word प्रभु पास, लै कटोरा छविरास, तामैं दूध सो सुबास - मध्य, मिसिरी मिलाइये । हिये मैं हुलास, निज प्रज्ञता को त्रास, ऐपें करें जो पै दास मोहि, महा सुख दाइये ॥ देख्यो मृदु हांस, कोटि-चांदनी को 3600-<noinclude></noinclude> 9y4jt9prwivwo373nrvlaq6yhzxwn7h पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४८ 250 194212 664435 2026-07-02T16:57:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664435 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>479 श्रीभक्तमाल सटीक । भास, कियो भाव को प्रकास, मति पति सरसोइये । याइबे की पास, करि पोट कछु, भरखो स्वास; देखि कै निरास, कह्यो "पीवी जू प्रघाइयै" ॥१३१॥ (६२९-४९६८) " भस्यो खास "स प्रेम चित्र एकाग्र किया ॥ वार्त्तिक तिलक | जब दूध सिद्ध हो गया, तब एक बड़े सुन्दर कटोरे में सुगन्ध द्रव्य तथा मिली मिलाया हुआ वह दूध लेके श्रीनामदेवजी, भगवान् श्रीबिठ्ठलदेवजी के पास चले । हृदय में पती प्रेमानन्द का हुलास और साथ ही साथ अपनी अज्ञता का त्रास भी, अर्थात् यह कि “मुझ से दूध बनाते बना कि नहीं ? प्रभुके योग्य हुआ पियेंगे ? कि नहीं ? अहा ! यदि मुझे अपना दास बनालें और कृपा करके करके सुख पाऊँ ।” । तो मैं सदा सेवा दूध पीलें । तो मैं यही विचार करते, समीप जाके, आापने श्रीप्रभु का श्रीमुख अवलोकन किया। तो देखा कि श्रीविग्रह जी में कोटिन चांदनी के भास के समान मृदु मुस्क्यान प्रगट हो रही है; क्योंकि श्रीनामदेव जी के प्रेमभाव का प्रकाश प्रभु ने अपने विग्रह में प्रगट दिखाया; तब तो नव पनुरागी श्रीनामदेव जी की मति पति ही सरस हो आई । पौर, दूध पान कराने की पांसा से कटोरा आगे रख, किसी वस्त्र का पोट कर, प्रेम सहित स्वांस भर, चित्त एकाग्र कर, अर्पण किया; दूध पीने की प्रार्थना की । ” १४<noinclude></noinclude> 1nfrkuv0umts0mr2d8mda5kzaenvubr पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५४९ 250 194213 664436 2026-07-02T16:57:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664436 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>gco सब दूध श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 480 पुनः पावर्ण वस्त्र को कुछ अलग करके देखा कि अभी तक ज्यों का त्यों ही रक्खा है; तब, कुछ निरास से होके प्रार्थना करने लगे कि “ प्रभो ! पापप्रति पधाके दूध पीजिये जिसमें में भी प्रेमानन्द से पा जाऊं ॥ (vi) टीका | कवित । ऐसें दिन बीते दोय, राखी हिये बात गोय, रह्यो निशि सोय, ऐपै नींद नहीं पावहीं। भयो जसबार, फिरि वैसेंही सुधार लियौ हियी कियौ गाढ़ी, जाय धौ पियो भावहीं ॥ बार बार "पीवो" कहूं; ब तुम पीवी नाहि, आवै भोर नाना; गरे छूरी दे दि- arati | गहि लीयो कर, “जिनिकर ऐसी पीबों मैं" ती पीक लगेई, "नेकु राखी, सदा पावहीं ॥१३२॥ ( ६२९~~४९७ ) " सवार D 'सबेरा, प्रभात, भोर । "गाड़ी हियो” दृढ़ मन । वार्त्तिक तिलक । श्रीनामदेव जी ने बहुत प्रार्थना की परन्तु प्रभु ने दूध नहीं पिया; तब आप भी उपवासही करके रह गए; दूसरे दिन फिर वैसे ही दूध पट, मागे रख विनय किया तब भी प्रभु ने नहींही पिया । दोनों दिन दूध न पीने की बात माता से न कही; भूखेही चुपचाप रात्रि में पड़ रहे; परन्तु नींद किंचित भी नहीं 28000-<noinclude></noinclude> jgxim1walceg0jjisypg7g8uiteqg9b पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५० 250 194214 664437 2026-07-02T16:58:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664437 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>481 8000- श्री भक्तमाल सटीक । माई केवल प्रभु के दूध न पीने की चिन्ता ही सारी रात व्यतीत हुई ॥ तीसरे दिन का प्रातःकाल हुआ; फिर उसी प्रकार से पूजा पादि करके दूध को पौंट, सुधार, प्रभुके कोट, गेला रक्खा; और जो, प्रभु के दूध न पीने के सोच से मन सिथिल हो रहा था, सो दृढ़ करके दीनता युक्त कहने लगे कि "हे प्रभो! दूध पीलीजिये; जिसमें मैं शोक से मुक्त हो पानन्द पाऊं" । इतने पर भी सर्कारने जब दूध नहीं ही पिया, तब तो श्रीनामदेव जी प्रति अधीर हो गए, क्योंकि बाल्यावस्था के मुग्ध मधुर प्रेम विश्वास बस आप ऐसाही समझते थे कि "प्रभु नाना के हाथों से नित्य ही दूध पिया करते हैं " ४८१ पतः परम प्रेम की विलक्षण विहुलता से प्राप कहने लगे कि "मैं बारम्बार सचिनय कहता हूं कि दूध पीजिये पीजिये, पर पाप नहींही पीते; और कल्ह सबेरे नाना प्रावेंगे मुझ से पाप के दूध न पीने का समाचार सुन, मुके पाप की सेवा पूजा से पलग कर ही देंगे; इस्से भला है कि मैं मरही जाऊ" इतना कह तीक्ष्ण छूरी ले, प्रभु को दिखा के, अपने गले पर लगाही तो दी । तो वहीं, भक्तवत्सल कृपासिन्धु विश्वासवर्द्धक प्रभु ने अतीव आतुरता से नामदेव जी का छूरी-युक्त- 1000- --909<noinclude></noinclude> kmsohzjchbdornj3go7y5wmx1l6yr53 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५१ 250 194215 664438 2026-07-02T16:58:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664438 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४८२ श्रीमतिसुचाबिन्दु स्वाद । 48z 8-01- हाथ पकड़ लिया और कहा कि "परे प्रिय बालम ! ऐसा कर; देख मैं दूध पिये लेता हूं”। ऐसा समझा के प्रभु कटोरा हाथ में ले, दूध पीने लगे । जय थोड़ा सा दूध रह गया, तब श्रीनामदेव जी बोले कि "महाराज ! मेरे लिये भी तो कुछ रहने दीजिये; क्योंकि ध्यापका प्रसाद नाना का दिया में सदाही पाता था" ॥ तब कृपा से बिहँस के अपने अधरामृत का प शेष प्रभु ने अपने हाथों से ही नामदेव जी को पिला के भक्ति प्रेमानन्द से तृप्त कर दिया । (लोक) ध्यानेपाठे जपे होमे, ज्ञाने योगे समाधिभिः । विनोपासनया मुक्ति नास्ति सत्यब्रवीमि ते ॥ १ ॥ (३) टीका | कवित्त । मायामदेव पाछें पूछें नामदेवजू सों, दूध को प्रसंग, प्रति रङ्ग भरि भाखियें । “मोसौं न पिछानि, दीन दोय हानि भई; तब मानि डर, प्रान तज्यो चाहीँ, अभिलाषि ॥ पीयो, सुख दीयो, जब नेकु, राखि लीयो, मैं तो जीयो,” सुनि बातें, कही “प्यायो कौन साखियें?” धरयौ, पै नपीयें, पस्यो, प्यायी, सुख पायो नाना, यामें ले दिखायो भक्त बस - रस चाखियै ॥१३३॥ (६२९—४९६) 10-600- " पिवामि पहिचान । "अत्यो अड़े, हठ किया। ' वार्तिक तिलक | जय श्रीवामदेव जी घर आए। और श्रीनामदेव<noinclude></noinclude> tj2an433awn0qkh14lutijpx9knu9bw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५२ 250 194216 664439 2026-07-02T16:58:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664439 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>483 श्रीभक्तमाल सटीक । ४३ जी से पूछने लगे कि “पूजा सेवा नीके करके दूध भोग लगाया करते थे?” ॥ तब श्रीनामदेव जी प्रति प्रेमानन्द रङ्ग में रंगे हुए दूध पिलाने का सारा प्रसंग कहने लगे; कि “नाना! मुझ से ठाकुरजी से जान- पहिचान तो थी ही नहीं, इस्से दो दिन तो बड़ी हानि हुई कि प्रभु ने दूध नहीं ही पिया; तब पाप के भय से मैंने छूरी लेके अपना गला काटना चाहा; सो देखते हो प्रभु ने पति अभिलाख से दूध पान कर मुझे बड़ा सुख दिया; थोड़ा सा मैंने प्रसाद भी मांग लिया; इस भांति प्रभु ने दूध पी पिला के मुझे जिलाया " । यह वार्त्ता सुनके श्रीवामदेव जी बोले कि "दूध पिलाने का साखी कौन है ?” श्रीनामदेव जी ने कहा कि स्वयं ठाकुरजी ही साक्षी हैं कि जिन्होंने पिया है" । नाना ने कहा कि "भला पिलाके मुझे भी तो दिखा दे” । तबश्रीनामदेव जी ने उसी प्रकार से दूध बनाके सामने रख पीने की प्रार्थना की, परन्तु प्रभु ने न पिया। तब आपने अत्यन्त हठ पूर्वक कहा कि " कल्ह तो तुमने पिया पर व्याज नपीके मुके झूठा बनाते हो ? वह छूरी प्रभी मेरे पास क्वी ही है” यह सुन मन्द मुस्क्यान सहित प्रभु ने फिर दूध पी लिया । Rece यह देख श्रीषामदेव जी ने अत्यन्त सुख पाया । 3600-<noinclude></noinclude> ftfidmv6sopkf6guxy9jkb5tq1coq7p पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५३ 250 194217 664440 2026-07-02T16:58:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664440 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्ति सुधाबिन्दुस्वाद । और प्रभु से कहा कि " नाथ ! इस्को अपनी सेवा ही के लिये आपने प्रगट किया है; सो पब इसी से सेवा लिया कीजिये ।" उसी क्षण से श्रीनामदेव जी को सब सेवा पूजा सौंप दी ॥ देखिये ! इस चरित्र में प्रभु ने यह दिखाया कि "हम भक्तों के प्रेम बसही होके भोजनादिक रसों को चखते हैं, तात्पर्य प्रेमही को चखते हैं । " (v) टीका | कवित्त । नृप सो मलेछ, बोलि, कही "मिले साहिब को, दीजिये मिलाय करामात दिखराइये” । “होय करामात तो पैकाहे को कब करें? भरें दिन ऐपे घांटि सन्तन सो' खाइये ॥ ताही के प्रताप पाप इहांलीं बुलायो हमैं;” " दीजिये जिवाय गाय घर चलि जाइये। " दईले जिवाय गाय सहज सुभाय ही मैं, प्रति सुख पाय, पांय पत्री, मन भाइये ॥ १३४ ॥ (६२९—४६५) “ साहिब " = स्वामी प्रभु । " करामात प्रभुता, सिद्धाई, परची, प्रभाव, परीक्षा । "कस:" = प्राप्त करना, समाना ॥ धार्मिक तिलक ॥ 484 श्रीभगवत कृपा से जब श्रीनामदेव जी की प्रीति- प्रतीति-भक्ति-महिमा पति फैली, और सब राजाओं-का- राजा म्लेक्ष (मुसलमान बादशाह) के हां तक भी आप की सिढ़ाई की वार्ता जा पहुंची; तब उसने पापको बुला- के कहा कि "हम सुनते हैं कि पाप साहिब की मिले --00088<noinclude></noinclude> sznmlw8ydyast6tiv7loo5yrqvzl0lk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५४ 250 194218 664441 2026-07-02T16:58:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664441 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>485 श्रीभक्तमाल सटीक । करता ? दिन सो, सन्तों के # (पहुंचे हैं; सो हमको भी मिला दीजिये अथवा अपनी कुछ करामात दिखाइये” । आपने उत्तर दिया कि "यदि मुझ में कोई करामात् ही होती तो मैं अपनी जीविका के हेतु छीपा का काम क्यों भरके परिश्रम से जो कुछ मिलता है साथ बांट खाता हूं; इसी के प्रताप साधु लोग मुझ पर कृपा करके मुझे दरशन देते हैं, इसी से लोगों में मेरी बड़ाई हो रही है, यहां तक कि आप ने भी अपने हां मुझे बुला भेजा है" । से अर्थात् जो यह सुन भूप (बादशाह) ने कहा कि "इस मरी हुई गऊ को जिला दीजिये, बस अपने घर चले जाइये” । नृप का हठ देख के, पापने सहज स्वभाव ही से, पर्थात् एक * विष्णुपद सप्रेम गान करके, गऊ को जिला दिया । ● विनती सुनु जगदीश हमारी । तेरो दास, आस मोहि तेरी, इत करू काम मुरारी ॥ दीनानाथ दोन हूँ टेरत गायहिँ क्यों न जियाओ ? आछे सबै अंग है याके मेरे यश हिँ बढ़ाओ || जो कहीं याके करमहिं में नहिँ जीवन डिस्पो विधाता । तो अब नामदेव आयुष ते होहु तुमहिं प्रभु ! दाता ॥ १ ॥ 1 (लोक) हरिस्मृति प्रमोदेन, रोमाञ्चित तनुर्यदा । नयनानन्दसलिलं मुक्तिदासी भवेत्तदा ॥ १ ॥ यह प्रभाव (करामातू) देख, भूपति (बादशाह) बड़ा- ही प्रसन्न हुआ और सुख पूर्वक सादर प्रापके चरणों पर गिरा ॥<noinclude></noinclude> 124zglih3brgnuaiatakar6x1xywjuu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५५ 250 194219 664442 2026-07-02T16:58:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664442 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४८६ 188600- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । (vi) टीका | कवित्त । 486 “ लेवो देश गांव, जाते मेरो कछु नांव होय," " चाहियै न कडु,” दई सेज मनि मई है । धरि लई सीस, “देउ संग दशग्रीस नर" नाहीं करि पाये, जल- डारि दई है ॥ भूप सुनि चौंकि परयौ, “ ल्यावो फेरि पाए "कहो;" कही " नेकु पानिकै दिखावो कीजे नई है। जल निकासि बहु भांति गहि डारी तट “ली- जिये पिछा नि ” देखि सुधि बुधि गई है ॥१३५॥ (६२९-४९४) "जातें" = जिससे वार्तिक तिलक | पौर कर जोड़ के कहा कि "आप मुझ पर कृपा करके कोई गांव वा देशराज्य लीजिये जिस्से प्राप सरीखे सन्तों की सेवा से मेरा नाम सुयश हो” आप ने उत्तर दिया कि "मुझ को कुछ नहीं चाहिये । (श्लोक) ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति | समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते परम् ॥ १ ॥ दिल्लीपति ने बड़ी प्रार्थना करके एक सुवर्ण रचित मणिजटित सेज (पलंग) दिया कि "इस्पर अपने साहिबू को सयन कराइयेगा । तब श्रीनामदेव जी ने अपनी साधुता सरलता से उस्को छापने ही माथे पर रख लिया । सीस पर रखते देख, यवनाधिप ने प्रार्थना की कि<noinclude></noinclude> sqhjwtq43fi5clea1x1vjvbe31p7o6j पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५६ 250 194220 664443 2026-07-02T16:59:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664443 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>487 श्रीभक्तमाल सटीक | go "मैं दस बीस मनुष्य साथ दिये देता हूं पहुंचा देंगे, प्राप पर्य्यंक को अपने मस्तक पर म रखिये" आपने नकार दिया कि "मुझे मनुष्यों की कुछ भी आवश्यकता नहीं हैं।" और आप अपने स्थान को चल दिये । नृप ने पीछ से कुछ लोग रक्षा के निमित्त भेज ही तो दिये। आप नदी (यमुना तट पाए जहां पति- गाजल था, वहां उस सेज को श्रीप्रभु की अर्पण करके जल में डाल दिया । (चौ० । सब से सो दुर्लभ मुनिराया। रामभक्तिरत, गत मद माया ॥ ) इस कौतुक को देख के उन राजभृत्यों ने (जो पीछे २ रहे थे) शीघ्र लौट के म्लेक्षराज से समाचार कहा; जिसे सुनते ही भपू चौंक पड़ा; और आज्ञा दी कि " नामदेव जी को फिरालामो” । ऊपर (पृष्ट ३७२ की १६ वीं पंक्ति में), “शिष्य त्रिलोचन देव" लिखा गया है; सो भूल और प्रमाद है । ऐसा चाहिये कि "आपके (श्रीनामदेव जी के ) 'गुरुभाई' श्री त्रिलोचनदेव जी " ॥ (२) ऐसा लिखा है कि जब श्रीनामदेव जी की माता ने अपने पिता श्रीवामदेवजी से अपने गर्भ की वार्त्ता पूरी पूरी कहसुनाई, तब उसी दिन स्वप्न में श्रीप्रभु ने भी बामदेव जी से आज्ञा की कि "हां, इस निष्क- लङ्क की सब बातें ठीक हैं, सत्य हैं, तुम कुछ शंका संशय मत करो सुता तुम्हारि सकल गुन खानी" || 000- १५<noinclude></noinclude> ssnmork1xhrct3oqlxthf899rcs01yl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५७ 250 194221 664444 2026-07-02T16:59:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664444 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्ति सुधाविन्दुवाद | सो सुन, पाप लौट आए और पूछा कि "किस- लिये फिर बुलाया ? सो कहो" उसने कहा कि "उस सेज को तनक लाके (सुनारोंको) दिखा दीजिये, क्योंकि वैसाही नया पक बनवाना है" ॥ पाप ने पाके उस जल से वैसे पोर उससे भी चढ़ बढ़ के अपनेक सेज निकाल निकाल तट पर डाल दिये और कहा "लो पहिचान के अपनी ले लो यह प्रभाव देख नरेशकी सुधबुध जातीरही चकित होगया ॥ (vi) टीका | कवित्त । अनि पो पाय, "प्रभु पास तें बचाय लीजे;” "कीजै एक बात कभू साधु न दुखाइये” । लई* यही मानि, “फेरि कीजिये न सुधि मेरी”; “लीजिये गुननि गाय ले ate मन्दिर Mi जाइये” ॥ देखि द्वार भीर, पगदासी afe बांधी धीर; कर सो उछीर करि, चाहें पद गाइये । देखि लोनी बेई, काहू दोनी पांच सात चोट ! कीनी धकाधकी ! रिस मन में न माइये ॥ १३६ ॥ (६२९-४९३) "तीर" = भीड़ नहीं, "घना नहीं, अलग अलग। “कर सौं वीर करि"= हाथों से लोगों को कुछ इधर उधर सरका घोड़ा अवकाश करवे । “रिस" = रोग, क्रोध । • पाठान्तर "लीजे" वार्तिक तिडक यह दूसरा बढ़ाभारी चमत्कार देखके, भूप फिर पर पढ़, हाथ जोड़, प्रार्थना करने लगा कि "पाप ने गऊ भी जिला दी तब भी पाप का प्रभाव 488<noinclude></noinclude> cv4woenwa3zrctq5e0e3301rnw7mrw9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५८ 250 194222 664445 2026-07-02T16:59:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664445 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>489 ३--- श्रीभक्तमाल सटीक । 85€ नजान के मैंने पलंग को देखना चाहा, सो यह मेरा अपराध पाप क्षमा करके अपने प्रभु से मुझे बचा- लीजिये जिसमें वे भी मेरा अपराध क्षमा करदें" श्री- नामदेव जी ने आज्ञा की कि "जो मेरे प्रभु की क्षमा चाहो तो एक बात करना कि कदापि साधु मात्र को दुख मत देना" (दोहा) साधु सताए तीन हानि पर्थ धर्म रु धंस । "टीला” नीके देखिये कौरव, राव, कंस ॥ १ ॥ यह बात उसने मानली । पुनः चलते स मय आप ने यह भी कहा कि " फिर मुभ्कको अ- पने हां न बुलाना और वहां से रूपपने स्थान (पण्ड- रपुर) को चले आए। एक पटक यवनाधिप को छोटा देवर; शेष पलंगों को श्रीयमुना जी में आपने छोड़ दिया ॥ आपने बिचारा कि “प्रथम श्रीपण्डरीनाथ जी के मन्दिर में जा, पाप के गुन गा, तथ गृह को, चलूं" । पाके देखा तो बिटुलदेव जी के द्वार पर लोगों की बड़ी भीड़ है; "यदि पगदासी (पनही) बाहर छोड़ जाऊंगा तो मन में उस्का खटका, दर्शन तथा पदगाने में विक्षेप करेगा; इस्से धीरे से कपड़े में कर, कटि में में बांध, भीतर जा, झांझ हाथों में ले,तब पापने पद गाना चाहा । इतनेही में किसी ने जूती का कोर देख लिया, सो उसने आप को पांच सात चोट लगा, धक्के दे, बाहर<noinclude></noinclude> 8ty0ipc9bcvmymrzpyqxu32cbhted9k पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५५९ 250 194223 664446 2026-07-02T16:59:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664446 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>geo Beoe- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । निकाल दिया । परन्तु आपके क्षमा-साधुता युक्त मन में किंचित भी क्रोध न पाया ॥ (दो०) उमा जे रघुपति चरण रत, विगत काम मद । निज प्रभु मय देखहिँ जगत कासन करहिं विरोध ॥ (ई) टीका । कवित्त । बैठे पिछवारे जाइ "कीनी जू उचित यह, लोनी जो लगाइ चोट, मेरे मन भाइयें । कान देकेँ सुनो चाहत न पोर कछु ठौर मोकों यही; नित नेम पद गाइयें । " सुनत हीं पानिकरि करुना विकल भए फेरचौ द्वार इतै गहि मन्दिर फिराइयें । जेतिक वे सोती मोतीब सी उतरि गई, भई हिये प्रीति, गहे पांव सुखदाइ ॥ १३७ ॥ (६२९-४९२) "आ"पानी, युति, कान्ति, चमक । "ठौर "=ठांव, ठिकाना, स्थान । और जाके, मन्दिर के पीछे बैठ, प्रभु से बिनय करने लगे "हे प्रभो ! यह आपने बहुत ही उचित बात की कि जो मेरे दो चार धौलधक्के लगवा दिये, क्योंकि मैंने अपराध किया ही था; सो दण्ड देके आपने शुद्ध कर लिया; मुझे यह बहुतडी अच्छा लगा । परन्तु पब मेरी प्रार्थना कान लगाके सुनिये; मैं और कुछ नहीं चाहता; केवल यही चाह मुझे है कि नित्य नेम से जो पद गाया करता हूं सो गाने सुनाया करूं क्योंकि आप की शरण छोड़ मुझको दूसरा ठौर-ठि- काना ही नहीं । यही प्रार्थना इस पद में भी है- 490<noinclude></noinclude> 2okk5go8na4jz6j5xtpkmj2ugrny9pt पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६० 250 194224 664447 2026-07-02T16:59:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664447 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>491 श्रीभक्तमाल सटीक । ४९१ 'हीन है जाति मेरी, यादवराव ! कलिमें “मामा” यहाँ काहे को पठाय ॥ पातुरि नाचें, तालपखवाज बार्बे, हमारी भक्ति बीटल काहे को राजे || पांडवप्रभु जू वचन सुनो जे । “नामदेव स्वामी” दरशन दीजे' ॥ इस पद के सुनते ही भक्तवत्सल श्रीकरुणासिंधु प्रभु ने कृपा से विकल हो सम्पूर्ण मन्दिर को नीचे से ( जड़ से ) फेर के उस्का द्वार फिरा के, श्रीनामदेव जी के सन्मुख हो, दर्शन दिये । (उस मन्दिर का द्वार प्र तक दक्षिण मुख है) इस प्रसंग से यह मिश्रण होता है कि जो मूर्ति श्रीवीठलदेव की, मोवामदेव जी ने सेवा के निमित्त अपनी पुत्री ( श्रीनामदेव जी की माता) को तथा श्रीनामदेव जी को दी थी, सो इन्ही प्रधान मूर्ति का atae विग्रह, उनके गृह के आवान्तर में था । के यह प्रतिबिचित्र चरित्र देख, जितने खोली बेदपाठी ist पुजारियों ने घोल धक्के दिये दिलाए थे, तिन सब मुख ऐसे सूख गये कि जैसे मोती का पानी उतर जाय । और सुखदाई श्रीनामदेव जी के विषे पति प्रीति भाव कर, चरणों में पढ़, अपराध की क्षमा कराई । श्रीनामदेव जी की जय ॥ (ई) टीका । कबित्त । sarai घरमांक सांझही अगिनि लागी, बड़ो अनुरागी, रहि गई सोऊ डारियै । कहै "हो नाथ ! सब कीजिये जु अंगीकार, हँसे सुकुमार हरि मोही कों निहारियै ?" ॥ " तुम्हरो भवन पर सकै कीन पाइ 800- 18000-<noinclude></noinclude> k5cr23pi09apo6fffd9wrlm73r0ckru पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६१ 250 194225 664448 2026-07-02T17:00:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664448 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>gee 00- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 1000-- इहां?" भए यो प्रसका छानि छाई प्राप सारिये। पूछें पनि लोग "कीनें छाई हो ? छवाइ लीजे, दोजे जीई मावे"; " तन मन प्राणवारिये” ॥ १३८ ॥ (१२९-४९१) "रह गई" =बचरही । "मोही को निहारोये ? " =क्या तू सब में मुझेही देखता है? सबको सुरुमय हो समझता है? सबकी मेराही रूप ान ? मार्त्तिक तिलक । एक दिन सांझ के समय अचानक ही आपके घर में आग लग गई, आप तो बड़ेही अनुरागी थे पंच- तत्वादि सब को सानुराग भगवत रूपही देखा करते थे, रूपतः जो २ वस्तु उस स्याग से पृथक भी रहगईथी, सो सब भी उठा २ के पाप अग्नि में डाल के प्रार्थना करने लगे कि "हे नाथ ! ये पदार्थ भी अंगीकार कीजिये । " श्री नामदेवजी का ऐसा सर्वात्मकमाथ देख, तथा सप्रेम बचन सुन, सुकुमार - शिरोमणि श्री हरि प्रगट हो, बिहँसके पूछने लगे कि " हे नामदेव ! क्या अग्नि में भी मुझकोही देखते हो ? अर्थात् पग्नि को मी मेरा ही रूप तुम जानते हो ? ” आपने हाथ जोड़ निवेदन किया कि "प्रभो ! यह गृह झाप का है इस्में आप को छोड़ दूसरा कौन उपासकता है ? इस्पर पत्यन्त प्रसन्न होकर रात्रिही भर में सम्पूर्ण गृह का छप्पर आपने पपनेही हाथों से सुन्दर अति विचित्र छादिया । 492<noinclude></noinclude> 489vazi82t0nq372k0uiiuoac1bunxh पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६२ 250 194226 664449 2026-07-02T17:00:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664449 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>28-600- 493 श्रीभक्तमाल सटीक । ४९३ 3008-- सबेरे, लोग छप्पर की सुन्दरता देख २, चकित हो हो, आपसे पूछने लगे कि "यह छप्पर पति सुन्दर किसने छाया है ? जिसने छाया हो उसको बतायो तो हम भी छवालें, जो मांगे सोई छवाई दें । " आपने उत्तर दिया कि “भाइयो ! वह छान छाने- वाला तो रुपए पैसे लेनेवाला नहीं है, किन्तु उस्पर जब पहिलेही तन मन प्राण सर्वस्व न्यौछावर कर दीजिये तब वह ऐसी छावनी छादेता है ॥ (दोहा) प्रभुता को सब कोउ चहे, प्रभु को चह नकोय । तुलसी जो प्रभु को चहै प्रापहि प्रभुता होय ॥ (३) टीका | कवित्त । सुनी और परचे जी पाए न कवित्त मांझ, बांझ भई माता क्यों न ? ज न मति पागी है। हुतो एक साह, तुला दान को उछाह भयो; दयो पुर सबै, रह्यो नाम देव रागी है ॥ "ल्यावो जू बुलाइ” एक दोई तो फिराइ दिये; तीसरे से पाए "कहा कहो ? बड़ भागी है" । "की" जिये जु ककु अंगीकार मेरो भलो होय,” “भयो भलो तेरो, दीजे जो पै पासा लागी है” ॥ १३९ ॥ (६२९-४९०) "रो शेष रहे। "फिराय दिये" कोरेही डोटा दिये । ” अब श्री नामदेव जी के परचे प्रभाव, जी श्रीना- भास्वामी जी के छपे में नहीं कहे गए हैं, सो सुनिये;<noinclude></noinclude> 0coln9mebedgbgcvlq7b9hkamv6e08c पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६३ 250 194227 664450 2026-07-02T17:00:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664450 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । देखिये ऐसे भक्तिभरे श्रीनामदेवचरित्र सुनके श्रीसीता- राम जी में तथा श्रीसीतारामनाम में जिस्की मति प्रेम से नगी, उसकी माता षांझ क्यों न हुई ? इस निज-जौबन- विटप कुठार पुत्र की व्यर्थ ही क्यों उत्पन्न किया ? पण्डरपुर में एक बड़ा साहु ( सेठ) था, उत्साह पूर्बक सोने का तुलादान करके उसने सबको सुवर्ण दिया । परमानुरागी श्रीनामदेव जी ही एक रह गए। आपके पास भी सादर बुलाने को मनुष्य भेजे; परन्तु पापने एक दो बेर तो उनको कोरेही लौटा दिया कि "मुझे नहीं चाहिये” । तीसरी बार बड़ी प्रार्थना पूर्बक उसने बुलाया तो पाप जाके बोले कि "हे बड़भागी सेठ ! कहो क्या कहते हो?” उसने विनय किया कि "आप कृपा करके इस्में से कुछ सुवर्ण अंगीकार कीजिये कि जिसमें मेरा भला हो ।" पापने उत्तर दिया कि "तेरा भला हुआ ही है, क्योंकि तूने सब को दिया । जिस्की यासा लगी हो उस्को दे; पर यदि मुझको भी देने के हेतु तेरी आसा लगीही है तो दे ॥ " (३) टीका | कवित . जाके तुलसी हैं ऐसे तुलसी के पत्र मांझ, लिख्यो आधी राम नाम "यासों तोल दीजिये । “कहा- परिहास करो ? ढरी, है दयाल"; "देखि, होव कैसो ख्याल 494<noinclude></noinclude> 28c24gs2d345evwtdd8h6awzizksszo पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६४ 250 194228 664451 2026-07-02T17:00:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664451 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>495 श्रीभक्तमाल सटीक | PEB याकों, पूरी करी, रीकिये" ॥ ल्यायो एक कांटो, लै चढ़ायो पात सोना संग; भयो बड़ो रंग, समहोत नाहिँ छीजिये । लई सो तराजू जा सों तुले मन पांच सात; जाति पांति ह को धन धस्यो, पेन धीजिये ॥१४०॥ (६२९ - ४८९) बार्तिक तिलक । इतना कह के, श्री तुलसी जी के पत्र में पाधा श्री राम नाम अर्थात् "रा" मात्र लिखके पाप बोले कि " यदि दियाही चाहता है तो इसी भर तौल के दे । " सुम के सेठ ने कहा कि "पाप हँसी क्या करते हैं, इस पत्रहीभर मैं क्या दूँ ? मुझपर दयालु होके कुछ अधिक पङ्गीकार कीजिये । " श्रीनामदेव जी ने उत्तर दिया कि "मैं हँसी नहीं करता, देख तो इस्का कैसा कौतुक होता है; इसभर तौल के तब मैं तुझ पर प्रतिशय प्रसन्न हूंगा " पूरा तो कर, एक तोलने का कांटाला के उसके एक पोर वह तुलसीदल और दूसरी ओर सोना साह ने चढ़ाया; परन्तु बड़ाही रंग मचा कि वह सोना श्रीपत्र के तुल्य न हुआ, बरन घट गया । तदनन्तर, साहु ने एक ऐसी तुला (तराजू) मँगवायी जिसमें पाचसात मन बस्तु तुल सके; पर उस्पर वह श्रीनामपत्र रख के अपने घर भर का स्वर्णादिक सब धन चढ़ाया तब भी श्रीपत्र वाले पल्ले ने भूमि न छोड़ी । 24<noinclude></noinclude> 3nka1maixqwugxg45tsnmbs0qu5fe3v पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६५ 250 194229 664452 2026-07-02T17:00:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664452 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४९६ श्रीभक्तिसुधाषिन्दु स्वाद । 496 -90015 फिर, पपने जातिभाइयों का धन भी मांगमांगके पल्लेपर चढ़ाता गया, तथापि पूर न पड़ा, धन का पहला पतीव हलकाही रहा । उन सब का प्रिय न हुआ ॥ "ख्याल रंग, खेश, कौतुक । "रंग"= ख्याल, खेल, कौतुक, - नाशा । "न चीजिये "प्रिय नहुआ, पूर्वन हुआ, पूरा न पड़ा। “देखि”=देखु । “तराजू (,jiji) "= सुखा । *"जाके तुलसी हैं ऐसे- इसका अर्थ कोई र महात्मा यों करते हैं:- जिस श्रीनामदेव जी के, श्रीतुलसी जी ऐसे इस प्रकार से हैं, सर्वस्व हैं, (जैसा आगे के संघट से प्रत्यक्ष है, ) सो श्रीनामदेव जी ने श्रीतुलसीपत्र पर "रा" लिखाने (श्रीतुलसी जी वैध्याव मात्र के सर्वस्व हैं विशेषतः श्रीनामदेव जी के ॥ ) (21) टीका | कवित्त । • पस्यो सोच भारी, दुःख पावें नर नारी, नामदेव जू बिचारी "एक और काम कीजिये । जिते व्रत दान और स्नान किये तीरथ में करिये संकल्प या पैं जल डारि दीजिये" ॥ करेऊ उपाय, पात पला भूमि गाड़े पांय, रहे वे खिसाय, कह्यो "इतनोई लीजिये" । “लै कैं कहा *करें ? सरबरहू न करें, भक्ति भाव सो ले भरें हिये, मति प्रति भीजिये ॥ १४१ ॥ (६२९ - ४८८ ) Haere": = लजाय । "सरबर" = समता । * पाठान्तर 'कहां घरें ? ” ।<noinclude></noinclude> 2gywa1po0mqy8u0pzq1d63kzwr91321 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६६ 250 194230 664453 2026-07-02T17:00:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664453 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>497 श्रीभक्तमाल सटीक वार्त्तिक तिलक । यह रामनाम युक्त तुलसीपत्र के गौरव मह- कौतुक देख के, सेठ के घर के सब स्त्री-पुरुष- वर्गों को बड़ोही सोच और दुख हुआ कि कैसे पूरा हो । श्रीनामदेव जी ने विचार किया कि “श्रीरामनाम के सामने धनादिकों की तुच्छता तो दिखा ही दी, परन्तु अब यह भी दिखा दूं कि श्रीनाम के आगे सब धर्म कर्म भी हलके (न्यून) ही हैं;” अतः आप ने कहा कि “सुनो एक काम और करो कि तुम लोगों ने जितने व्रत उपवास, तीर्थस्नान, दान, इत्यादि सुकर्म- धर्म किये हों, उन सब को भी संकल्प करके वह जल इस्पर छोड़ दो अर्थात् सब पुराय भी चढ़ादो” । यह उपाय भी किया गया; तथापि श्रीनामपत्र वाला पल्ला भूमि में पांव जमाए ही रहा; यथा (दो०) “भूमि न छोड़त कपि चरण, देखत रिपु मद भाग । कोटि विघ्घू ते सन्त कर-मन जिमि नीति न त्याग ॥ १ ॥ तब तो वे सब पतिं लज्जित संकुचित होके कहने लगे कि “महाराज ! ध्याप इतनाही ले लीजिये" । श्रीनामदेव जी ने उत्तर दिया कि "यह सब धन और पुण्य लेके मैं क्या करूंगा ? क्योंकि तुम सब ने स्पष्ट देखाही कि मेरा धन जो श्री राम नाम है, उसके पा के भी तुल्य ये सब नहीं ठहरे; इस्से श्रीरामनाम और श्रीमती से मैं अपने हृदय को संतुष्ट रक्खता हूं पर रक्लूंगा; किस लिये कि मेरी मत प्रेमभक्ति रस ही<noinclude></noinclude> le7l34tmefiv44h9pl7ytgn4x76rd1n पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६७ 250 194231 664454 2026-07-02T17:01:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664454 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1800-00- श्रीसुधाविन्दु स्वाद । 498 से भीगी है । इस्से तुम लोग भी घनधमीभिमान छोड़ श्रीरामनाम की भक्ति रस में अपनी बुद्धि को भिगाके भव पार हो" । (दो०) “राका रजनी हरि भगति, राम नाम सीइ सोम । पपर नाम उडुगण विमल, घसें भक्त उर व्योम | " (ई) टीका | कवित्त । 1 कियो रूप ब्राह्मन की दूबरो निपट अंग, भयो हिये रंग, व्रत परिचे को लीजियें । भई एकादशी, पन्न मांग " बहुत भूखी," "पाजु तो न देहीं भोर चाही जिती दीजियें " ॥ कस्यो हरु भारी मिलि दीऊ, ताको शोर परयोः समभावे नामदेव याको कहा खीजियें । बीते जाम चारि मरि रहे यों पसारि पांव, भाव पै न जानें दई हत्या नहीं छीजियें ॥ १४२ ॥ (६२९ - ४८७) "परिचै" = परीक्षा, जांच, पर, प्रभाव, चैप्रभुता । "शोर (4)" = झा, कोलाहल, घने शब्द । वार्तिक तिलक | " अब जिस प्रकार स्वयं प्रभु ने एकादशी व्रत का पन श्री नामदेवद्वारा दृढ़ाया, सो पाख्यायिका कहते हैं- प्रभु के हृदय में यह रंग (कौतुक) पाया कि "एका- दशी निष्ठा की परीक्षा लूं; ” इस हेतु अत्यन्त दुर्बल ब्रा- का रूप बना, एकादशी को सबेरेही पा, श्रीनामदेव 'जी से बोले कि "मैं कई दिनों का बहुत ही भूखा हूं, मुक की पन्न दो। " झाप ने उत्तर दिया कि "पाज एकादशी व्रत है, इस्से अपन्न भोजन न दूंगा; कल सबेरे जितना मांगोगे उतना दूंगा.”<noinclude></noinclude> imv1l2jcu4gioa2aswjkqbifniekrc1 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६८ 250 194232 664455 2026-07-02T17:01:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664455 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>499 ! श्रीभक्तमा उ सटीक 4- ब्राह्मण जी ने बड़ा भारी हठ किया कि "मैं पन्न अभी भी लूंगा; झाप ने भी हठ किया कि "वाज, तो मैं पत्र नहीं ही दूंगा"। दोनों के हठ युक्त उत्तर प्रत्युत्तर का बड़ा हल्ला मचा, सुन के बहुत लोग इकट्ठे हो गए; और श्रीनामदेव जी से कहने लगे कि "हम इस मरणप्राय ब्राह्मण पर क्रोध करके क्या कहें ? पर तुम्हें समझाते हैं कि दे दो । तथापि, एकादशी को पन्न देना निषेध जान के, पाप ने नहींही दिया । to चार पहर बीत गए, तब अन्नाभिलाषी भूखे ब्राह्मण देव, पांव फैला के मर गए । लोग पाप के भाव निष्ठा को न जान के, कहने लगे कि "नामदेव को ब्राह्मण ने ब्रह्महत्या दी, इनको छूना न चाहिये, अब यह हत्या छूटनेवाली नहीं है” ॥ (ईई) टीका । कबित रचिकै चिता कों, विप्र गोद लेकै, बैठे जाइ, दियो मुसुकाइ "मैं परीछा लीनी तेरी है । देखि सो सचाई, सुखदाई, मन भाई मेरे " ; भए अन्तर्धान, परे पायँ प्रीति हेरी है ॥ जागरन मांझ, हरि भक्तन को प्यास लगी, गए लेन जल; मेत ध्याति कीनी फेरी है। फेट सें निकासि ताल, गायो पद ततकाल; बड़ेई कृपाल रूपधरी छवि ढेरी हे ॥ १४३ ॥ (६२९ - ४८६) "फेट " == पाटि वधन ब<noinclude></noinclude> swurnvkr07j6ve6yeqygg8bvw4wgpbv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५६९ 250 194233 664456 2026-07-02T17:01:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664456 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५०० 8-006- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 500 -600 वार्तिक तिलक । तदन्तर, श्रीनामदेव जी चिता रच, मृतक विप्रके शरीर को गोद में लेकर चितापर जा बैठे, पर किसी आज्ञाकारी जन से कहा कि "अग्नि लगा दो” तब तो श्री एकादशी पति प्रभु मे मुस्क्याके कहा कि "प्रिय भक्त ! जली मत, तुम्हारे हृदय के शीतल करनेवाले में ही ने तुम्हारी परीक्षा ली है, तुम्हारे व्रत की तथा ब्रह्मण्यता को सचाई देखी, सो मझको बड़ीही प्यारी सुखदाई लगी ।" यह कहके श्रीप्रभु उस चिताही पर से अन्तर्धान हो गए। इस प्रकार, वैष्णवधर्म तथा ब्राह्मण, श्रीतुलसी, श्रीराम नाम, और श्रीप्रभु में नामदेव जी की परमप्रीति देख एवं प्रभु के चरित्रों की विचित्रता विचार, सब लोग जय जय कार कथनपूर्वक श्रीनामदेव जी के चरणों में पड़के प्रशंसा करने लगे । अन्य एकादशी की रात्रि में आप के गृह विषे जागरन उत्सव हो रहा था; उस्में हरिभक्तों को प्यास लंगी, आप स्वयं जलाशय में जल लेने गए, क्योंकि वहां एक बढ़ा प्रेत रहता था इस्से और किसी को म भेजा। सी जब पाप वहां पहुंचे तो कई प्रेतों को साथ लिये वह प्रेत बड़ा भारी विकराल भयंकर रूप धारण कर पाप के सम्मुख झखड़ा हुआ । उस्की देख, मापने उस्में भगवतभाव ही रोपण किया क्योंकि आप की दृष्टि में तो और भाव रहही 1000<noinclude></noinclude> hkzxjpyem33jbham2axlg4mz1i3mcik पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७० 250 194234 664457 2026-07-02T17:01:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664457 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>501 188600- श्रीमतमाल सटीक । ५०१ नहीं गया; इस्से अपने फेट से ताल पर्थात् कांश्यताल (i) वा करताल निकाल के तत्कालही यह पद बनाके सप्रेम गाने लगे ! * • ये आए मेरे लम्वकनाथ ! धरती पांव स्वर्ग लो माचो जोजन भरि भरि हाथ || शिव सनकादिक पार न पायें, तैसे सखा विराजत साथ। नामदेव के स्वामी अन्तर्यामी कीन्हयो मोहिं समाच ॥ १ ॥ सुन्तेही सर्वान्तर्यामी परम कृपालु ने प्रेतरूपों को . बिनाशकरके, परम छविराशि रूप धारण कर दर्शन दिया । निज रूपामृत पिलाके कहा कि "जल ले- जाव | जल लाके आप ने भगवत भक्तों को पिलाया श्रीनामदेव जी की जय ॥ (ई) कप्पय । जयदेव कविनृप चक्कवै: खंड मंडलेश्वर प्रान कवि । प्रचुर भयो तिहुँ लोक गीत गोविन्द उजागर | कोक काव्य नव रस सरस सिंगार को सागर | अष्टपदी अभ्यास करें तिहुँ बुद्ध बढ़ायें। (श्री) राधारमन प्रसन्न सबन निश्चय तह आवैं ॥ संत सरोरुहखंड को " पट्टा" पति सुखजनक रवि । जयदेव कवि नृप चक्कवै खंडमंडलेश्वर मान कवि ॥ ३८ ॥ (<noinclude></noinclude> o3hddvyklwnm9wavk2v1m3ppah41edf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७१ 250 194235 664458 2026-07-02T17:01:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664458 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५०२ 188600- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । "चकवे"- चक्रवर्ती, सातो द्वीप का राजराजेश्वर । "स्वर' नक लस्टों में से एक खरह का महाराज। "मक्लेश्वर" - सौ दो सब कोस के मखल का राजा । "ख" - कदम्ब अर्थात् समूह । “सरोरुह-तरह" - कमल के समूह ॥ वार्तिक तिलक | श्री जयदेव जी । कलियुग में संस्कृत के कवियों में, श्रीजयदेव क विराज, चक्रवर्ती महाराज सरीखा हुए; और, और सब कवि खण्डेश्वर वा मण्डलेश्वर राजाओं के सरिस हैं। उक्त महा-कवि-कृत प्रति उजागर " श्रीगीत गोविन्द” काव्य, देव मनुष्य नाग इन तीनों लोकों में प्रचुर (विख्यात हुपा; कैसा “गीतगोविन्द" है कि, कोक- शास्त्र का, काव्य के सम्पूर्ण अङ्गों का, नवो रसों का, तथा सरस] शृङ्गार का, रत्नाकर समुद्र ही है। suौर, श्रीगीतगोविन्द की अष्टपदियां जो कोई अभ्यास करे (पढ़), उस्की बुद्धि को बढ़ाती है । तथा जो सप्रेम गान करता है तो श्रीराधाबल्लभ जी वहां उसके सुन्ने के लिये प्रसन्न होके प्रगट वा गुप्त रूप से अवश्य ही आते हैं । सन्त रूपी कमल समूहों को सुख उत्पन्न करने वाले, श्रीपद्मावती जी के पति ( श्रीजयदेव जी ) सूर्य्य समान हुए । (2) टीका । कवित्त । किन्दुबिल्लु ग्राम, तामैं भए कविराज राज, भयो 502<noinclude></noinclude> ft0s1v07c48nqfirlq1zlff8dafqb97 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७२ 250 194236 664459 2026-07-02T17:02:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664459 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>503 3000- श्रीभक्तमाल सटीक ! ५०३ रसराज हिये, मन मन चाखियें। दिन दिन प्रति रूख तर जाइ रहें, गहें एक गूदरी, कमंडल को, राखियें ॥ कही देव विप्र सुता जगन्नाथदेव जू को, भयो जब समे, चल्यो दैन प्रभु भाखियै । "रसिक जैदेव नाम मेरोई सरूप, ताहि देवौ ततकाल रूपहो, मेरी कहि सा- खियैं” ॥ ९४४ ॥ (६२९-४८५) " रसराज रसों का राजा ' शृङ्गार रस' ॥ बार्तिक तिलक । कविराज के राजा श्री जयदेव जी पूर्वदेश में " किन्दु बिल्व" नामक ग्राम में "भोजदेव" पिता और "राधा देवी" माता से, ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हुए; सो आपके हृदय में प्रभु संबन्धी रसराज (ट- ङ्गार रस) भरा था, परन्तु उस्का स्वाद मनही मन में लिया करते थे । और विरक्त (वैराग्यवान) कैसे थे कि गृह को त्याग के बन में भी एक वृक्ष तले एकही दिवस रहते थे, दो दिन भी एक के नीचे नहीं; और तनु- क्रिया - निर्वाह के हेतु केवल एक गुदड़ी (कन्या) और एक कमण्डल मात्र रखते थे । उसी काल की वार्ता है कि एक ब्राह्मण श्रीजग- नाथ जी को अपनी कन्या प्रतिज्ञा पूर्वक देने की कह गया; जब वह लड़की अवस्था में उस योग्य हुई, तो उस्को देने के लिये वह विप्र श्रीजगन्नाथ जी के पास लाया; प्रभु की आज्ञा हुई कि "जयदेव जी नामक आश्रय रसिक भक्त मेरेही स्वरूप हैं, सो इसी क्षय १७<noinclude></noinclude> 6je2xxi0jc3mgpi1k06e4bmw3iw1qiv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७३ 250 194237 664460 2026-07-02T17:02:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664460 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>意 18000- श्रीभक्ति सुधाषिन्दु स्वाद । जाके और मेरी आज्ञा उनसे सुनाके, यह अपनी सुता उन्ही को दे दो" । (2) टीका | कवित्त । 1 विज तहां, जहां बैठे कविराजराज, "पहो महाराज ! मेरी सुता यह लीजिये” । “कीजिये बिचार, अधिकार, बिसतार जाके, साहि को निहारि, सुकुमारि यह दीजिये" || "जगन्नाथ देव जू की माझा प्रति- पाल करो, ढरो मति घरो हिये; ना तो दोष भीजिये" । "उनिको हजार सोहैं, हमको पहार एक; ताते फिरि जावी, तुम्हें कहा कहि खीजिये" ॥ १४५॥ (३२९ - ४८४) धार्तिक तिलक । श्रीजगन्नाथ जी की आज्ञा सुन, कन्या लिये. हुए ब्राह्मण जहां कबिराजराज श्रीजयदेव जी श्रीप्रभु का स्मरण करते हुए बैठे थे, वहां जाके पाप से प्रार्थना की कि “हे महाराज ! यह अपनी कन्या में पापको पर्पण करता हूं इस्की कर ग्रहण कीजिये" । झाप ने उत्तर दिया कि "आप विचार कीजिये, जिसकी कन्या लेने का अधिकार और गृहस्थाश्रम का विस्तार हो, उसी को यह सुन्दरि कुमारी दीजिये" । ब्राह्मण बोले कि "महाराज ! मैं जो अपनी इच्छा से कन्यादान करता तो विभव विचार अवश्य करता; परन्तु मैं तो श्रीजगन्नाथदेव जी की आज्ञा से आप की कन्या दे रहा हूं, इस्से उनकी आज्ञा को आप भी 504<noinclude></noinclude> bvyx0c17lxbgpsfblic8gd990e6aom3 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७४ 250 194238 664461 2026-07-02T17:02:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664461 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>505 श्रीमतमाल सटीक ५०५ -90983 प्रतिपाल कीजिये; पर कन्या को ग्रहण करना हित मान, अपनी मति में धारण कर, प्रभु की आज्ञा अनु- वर्तन कीजिये, नहीं तो 'प्रभु आज्ञा-भंग' का बड़ा भारी दोष पाप को लगेगा । " इस्पर, श्रीजयदेव जी बोले कि "मैं श्रीजगन्नाथजी की ऐसी माज्ञा पालन करने में समर्थ नहीं हूं । बे प्रभु समर्थ हैं उनकी सहलों (हज़ारों) सुन्दर स्त्रीयां शोभा देती हैं, पर मुझे तो एक ही खी पहाड़ है, अर्थात् जैसे दुर्बल निर्बल मनुष्य को पहाड़ का चढ़ना उतरना लांघना गम होता है, अथवा पहाड़ का उठाना सक्य है, वैसेही मुझको एकही स्त्री का सँ- भाल अतिशय अगम असह्य है, इस्से चलेही जाइये; हम पाप को और क्या रिसाय ॥ (ढ) टोका | कवित्त । पाप यहां से बात कह के सुतासी कहत "तुम बैठि रही याही ठौर, प्राज्ञा सिरमौर मोर्चें नाहीं जाति दारी है"। चल्यो पनखाइ समाइ हारे बानि सी; "मन ! तूं समझ, कहा कीजे ? सोच भारी है !” घोले द्विज बालकोसो' "प्राप ही बिचार करो, धरो हिये ज्ञान, मो पैं जाति न सँभारी है" । बोली कर जोरि “मेरो जोर न चलत कछू, चाहो सोई होहु, यह वारि फेरि डारी है" ॥ १४६ ॥ (६२९-४८३)<noinclude></noinclude> aapsl9gzg1wim5zjk4vtuknho1355cw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७५ 250 194239 664462 2026-07-02T17:02:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664462 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५०६ श्रीभसुधाविन्दु स्वाद । 1 “सिरमौर " - शिरोमणि । "जोर (,,j)" बल । “अनलाइ" - अमर्थ करके, सक्रोध। "वारि फेरिडारी"=न्योछावर हुई । "बालकी." " बालिका कन्या, लड़की । *पाठान्तर ''मेरे"। धार्तिक तिलक । = तब भक्त ब्राह्मण ने अपनी कन्या से कहा कि "तू इसी दौर इन्ही के पास बैठ रह, क्योंकि त्र्यलोक्य शिरोमणि श्रीजगन्नाथ जी की आज्ञा मुझ से टारी नहीं जाती” ऐसा कह, कन्या को बिठला ( बैठाय ), ब्राह्मण कुछ पनखाके चल दिया। आप बहुत प्रकार की वार्ता से ब्राह्मण को समझा के हार गए, परन्तु ब्राह्मण ने नहीं ही माना, पाप की एक न सुनी। पाप अपने चित्त मैं कहने लगे कि “रे सत ! तू समझ, विचार कर, कि पय क्या करना योग्य है ? यह बड़े भारी सोच की वार्ता झा पड़ी! " र, विप्रसुता से बोले कि "तुम अपने पति की योग्यता तथा योगक्षेम निर्वाह पादिक को विचार करो, जैसा करना उचित है वैसा ज्ञान हृदय में धा- रा करो; मेरे पास मत बैठी रहो; क्योंकि तुम्हारा सारसँभार मुझ से नहीं होने का ।" श्रीपवती जी पाप की पूर्व जन्म सम्बन्ध-सो- भाग्यवती तो थी ही, यह सुन, हाथ जोड़, बोलीं कि " नाथ ! मेरा कुछ बल विचार नहीं चलता; पब जो चाहे सो हो, मैं तो पिता के देने से तथा प्रभुप्राज्ञा से, पाप को श्रीजगनाथ ही आन, अथमा नाथ मान, 28000- 306<noinclude></noinclude> 4oz54i4x500asm3y54eroy20vodzz4d पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७६ 250 194240 664463 2026-07-02T17:02:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664463 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>507 श्रीभक्तमाल सटीक । वाप के ऊपर तन मन से न्योछावर हो, पाप की हो चुकी ॥ " (2) टीका | कवित्त जानी जब " भई तिया किया, प्रभु जोर मी पैं, तो पैं एक परी की छाया करि लीजिये" । भई तब छाया, श्याम सेवा पधराइ लई, "नई एक पोथी में बनाऊं" मन कीजिये ॥ भयो जू प्रगट "गीत" सरस " गोविन्द " जू की, मान में प्रसंग "सीस मंडन सो दीजिये" । एही एक पद मुख निकसत सोच पस्यो, घट्यो कैसे जात ? लाल लिख्यो, मति रीझियै ॥ १४७ ॥ (६२९ - ४८२) * " पाठान्तर'' = "को" । "हाय" = बांह, कुटीर, झोपड़ी, यह । "धस्यो कैसे जास?" = किस प्रकार से लिखा जासके ? वार्तिक तिलक | इस प्रकार जब श्री पद्मावती जी से सुबुद्धि-विनय प्रीति पतिव्रत-भरा हुआ उत्तर श्रीजयदेव जी ने सुना, तब जाना कि "यह मेरी पत्नी हुई, क्योंकि श्रीजग- नाथ जी ने मुझ पर पपनी प्रभुता का बल किया, मेरी कुछ नहीं चलने की । इस्से उचित है कि एक झोंपड़ी की छाया कर लूं” ऐसा विचार सज्जनों' से कहकर एक कुटी बनवा ली। प्रय जब छाया हो गई, तब श्रीश्यामसुन्दर जी की मूर्ति सेवा के हेतु पधराली; क्योंकि गृह कुटी में रह<noinclude></noinclude> 7uucbbxtmxw58ndi95701cgtpz95lhr पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७७ 250 194241 664464 2026-07-02T17:02:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664464 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>600 श्रीresurfing स्वाद र के, जो मगवत मूर्ति की पूजा कर मन को भोग ल- गा के प्रसाद नहीं पाते, अपने हो लिये बना के खालेते हैं, वे पाप ही भोजन करते हैं (ऐसा श्रीगीता जो में लिखा है । श्लोक | यज्ञ शिष्टा शिनः संतो मुच्यते सर्व किल्विषैः । भुंजते तेत्वघं पापा ये पचन्त्यात्म कार खाव ॥ ( ३ । १३ ) ॥ हृदय में कुछ काल में श्री प्रभु प्रेरणा से पाप के इच्छा हुई कि "मैं श्री प्रभु चरित्र मय एक नवीन पुस्तक बनाऊं" तथ "श्रीगोविन्द" जो का प्रतिसरस “गीत” अर्थात् “श्रीगीत गोविन्द' प्रगट हुआ । : उस्में जब श्रीराधिका जी के महामान का प्रसङ्ग पाया, तो उस स्थान पर ध्यान भावना में पापको श्याम सुन्दर जी का विनय श्रीप्रिया जी प्रति यह पद स्फुरित हुआ कि "स्मर- गरल खण्डनं मम शिरसि मण्डनं देहि पदपल्लवमुदारम्” (हे प्रिये ! कन्दर्प का विष खंडन करनेवाला और मेरे मस्तक का मण्डन, भू- षण, अपना उदार पदपल्लव मेरे सीस पर रख दीजिये); इसी एक पद के मुख से निकलते हो, श्री जयदेव जी की सोच संकोच हुआ, कि "इस प्रकार का पद पोथी में कैसे लिखूं ?” तब सोच विचार करते खान को चले गए। इसमे में श्रीराधारमण जी ने जयदेव जी के स्वरूप से माके, जयदेव जी की मति में रीझ के, जो पढ़ स्फुरित 508<noinclude></noinclude> i21f5s6rfv9bxju3rhmrai6ur2bt2x4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७९ 250 194242 664465 2026-07-02T17:03:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664465 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>510 3600- ५१० 8600- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । सुखदाई पुस्तक बना, ब्राह्मण पडितों को बुला, पुस्तक देकर, बोला कि "यह वही गीतगोविन्द है इस्को लिख २ के पढ़ो, पर देश देश में प्रसिद्ध करो चलायो । " यह सुन, पण्डितों ने श्रीजयदेव जी कृत गीतगो- विन्द राजा को दिखा के मुस्त्र्याके उत्तर दिया कि "राजन् ! वह गीतगोविन्द तो देखिये यह है, और यह दूसरी किसी ने नई बनाई है, हमारी मति में अत्यन्त भ्रम होता है" । इस्पर, दोनों पुस्तकें श्रीजगनाथ जी के मन्दिर में रख दी गईं। तब प्रभु ने इस राजांवाली पुस्तक को पल फेंक के, 'श्रीजयदेव कृत गीतगोविन्द' को पदिक हार की नाई अपने हृदय में उपटा लिया ॥ (2३) टोका | कवित । परथी सोच भारी, नृप निपट खिसानो भयो, गयो उठि सागर मैं, “बूढ़ों' वही बात है । प्रति पपमान कियो; कियो मैं बखान सोई, गोई जास कैसे ?” सांच लागी गात गात है ॥ प्रज्ञा प्रभु दई "मत बूड़े तूं समुद्र मांझ, दूसरोनग्रन्थ ऐसो, वृथा तनुपात है । द्वादश सुश्लोक लिखि, दीजे सर्ग द्वादश में, ताहि संग चले जाकी ख्याति पात पात है" ॥१४९॥ (६२९ - ४८०)<noinclude></noinclude> kgfot8mfo6r7qer9jwr2pnc70vxkv2i पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८० 250 194243 664466 2026-07-02T17:03:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664466 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>511 श्रीभक्तमाल सटीक । ५११ "पात पात सर्व माहिँ, सब में ॥ वार्तिक तिलक । जब श्रीजगदीश जी ने उस पुस्तक का पादर करके राजा की पोथी का निरादर कर दिया, तब राजा को बड़ा ही शोक हुवा, तथा पति संकुचित गलितमान होकर उठके समुद्र की दिशि चलं दिया; पर मन में यह निश्चय किया कि "पब में समुद्र में डूब के मर जाऊं, सो भला है; क्योंकि जो जयदेव जी ने कहा सोई मैंने बखान किया और प्रभु ने मेरा इस प्रकार का अतिशय अपमान किया; तिसको मैं कैसे छिपाऊं।" इस प्रकार राजा सर्वाङ्ग संतप्त होकर डूबने ही तो लगा । सो देख, भक्तवत्सल करुयााकर श्रीजगन्नाथ जी प्रगट होकर, आज्ञा दी कि "तुम समुद्र में मत डूबो, मैं सत्य सत्य कहता हूं “जयदेव जी के ग्रन्थ स- रीखा खा तुम्हारा तथा और कोई ग्रन्थ है ही नहीं; तुम वृधा ही शरीर त्याग करते हो । एक बात करो कि अपने ग्रन्थ के बारह श्लोक, जिस गीत गोबिन्द की प्रसिद्धता बिराट रूपी वृक्ष के पत्रों पत्रों में है अर्थात् मनुष्यों मनुष्यों में है, उसी में लिख दो; उसी के साथ तुम्हारे भी द्वादश श्लोक चलेंगे (प्रसिद्ध होंगे) । " राजा ने हर्ष पूर्वक प्रभु की पाज्ञा मानकर ऐसाही किया ॥ १८<noinclude></noinclude> o286ba8jptkh1qufroj6icxvq2r1zyf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८२ 250 194244 664467 2026-07-02T17:03:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664467 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>513 श्रीभक्तमाल सटीक । ५१३ जब वह तान तोड़ती थी तब प्रेममादिकता से झूम के " बहुत पच्छा" कहते थे, क्योंकि पद सुनतेही उस समय के विरहाग्नि की सुधि पा जाती थी, अर्थात् बिरहान से संतप्त हो के उस दूती को प्रिया जी के पास आपही ने भेजा था । जब वह कन्या अपने घर को चली गई तब बैंगन के कंटकों से मंगा फाड़ के पाप मन्दिर में पाए और उसी समय पुरुषेत्तमपुरी का राजा दर्शन करने आया; सो फटे हुए वस्त्रों को देख के पंडा से पूछा "क्यों जो ! श्रीजगन्नाथ जी के ये बस्त्र कैसे फटे हैं ? सत्य २ कहा, क्या हुआ है ?” पंडा ने कहा "हम नहीं जानते कि क्या हुआ है ॥ " तब प्रभुही ने जनाया कि "वह माली की कन्या बैंगन की बारी में गाती थी, सेा हम सुनते थे; इस्से aa फट गए हमको वह कथा प्रतिही प्रिय लगी है" तात्पर्य " उसको बुला के गवाओ" । । ऐसी प्रज्ञा सुन के उसी क्षण पालकी पर चढ़ा के उस कन्या को लाए। माके गान और नृत्य करके उसने प्रभु को प्रसन्न किया || (टेमेरे) टीका । कबि । फेरी नृप डौंडी, यह झोंडी बात जानि महा; कही "राजा रंक पढ़ें नीकी ठौर जानि कैं । अक्षर मधुर और 88000<noinclude></noinclude> jyajvn6n4v6nuhu4moimonz15dewgqj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८३ 250 194245 664468 2026-07-02T17:03:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664468 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५१४ श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 514 -90988 मधुर स्वरनि हि स गावैं जब लाल प्यारी ढिग हिले मानिकै ” ॥ सुनि यह रीति एक मुग़ल ने धारि लई, पढ़ें चढ़े घोड़ लागे श्याम रूप ठानिकें। पोथी को प्रताप स्वर्ग गावत हैं देवपापही जु रीझि लिख्यो निज कर पानि ॥ १५१ ॥ "ओंड़ी” - गहिरो, गंभीर (६२९ - ४७८ ) "मुग़ल " वार्तिक तिलक । यवन जाति विशेष । श्री गीतगोविन्द इस प्रकार प्रभु को प्रिय जानकर श्री पुरुषोत्तमपुरी के राजा ने सर्वत्र डौंड़ी (ढढोरा) फिरवा दिया, क्योंकि उक्त ग्रन्थ के गान की बार्ता बड़ी ही गहिरी जानी; और यह पुकार करा दिया कि "राजा हो अथवा रंक हो परन्तु श्री गीतगोबिन्द ar पच्छे ठौर ठिकाने पर पढ़ें पौर मधुरता से अक्षरों 'उच्चारण कर मधुरही स्वर से गान करें, तथा गाते समय अपने मन में ऐसा निश्चय मान ले कि श्रीरा- चिकाश्याम जी मेरे समीप ही में सुन रहे हैं" । राजा की पुकार कराई हुई इस बार्ता का एक मुगलं जाती के यवन ने सुनकर अपने मन में निश्चय कर धर लिया; और, घोड़े पर चढ़ा चला जाता श्रीगीत गोविन्द का पद गान करता था। इसके बिश्वास पर रीझ के श्रीश्यामसुन्दर जी ने अनूप रूप धारण कर पागे पाके दर्शन दिया; तथा संसार सागर से उस्को मुक्त भी कर दिया ॥ 28600-<noinclude></noinclude> ejrhehbke1str9ivvlp9ndomf9tlozz पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८४ 250 194246 664469 2026-07-02T17:04:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664469 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>515 188600- श्रीभक्तमाल सटीक । ५१५ श्रीगीतगोविन्द पुस्तक के प्रताप को स्वर्ग में देव बधू 8 गाम करती हैं क्योंकि जिस्से रोक के स्वयं प्रभु ने निज कर कमल से पूर्वकथित ( "स्मर गरल खण्डनं" इत्यादि) पद लिख दिया । इस्से इस की महिमा जहां तक कही जाय सो सब युक्त ही है ॥ (टेरेरे) टीका | कवित पोथी की तो बात सब कही में सुहात हिये; सुनो और बात जामे पति पधिकाइयें । गांठ में मग चलत मैं ठग मिले, "कहो कहां जात?” “जहां मुहर तुम 'चलि जाइयें ॥ जानि लई बात, खोलि द्रव्य पक- ड्राइ दियो, लियो चाहो जोई जोई सोई मोकों ल्याइयें । दुष्टनि समुझि कही "कीनी ईनी विद्या अहो पावै जी नगर इन्हें बेगि पकराइयें ॥ १५२ ॥ (६२९-४७७) बार्तिक तिलक | श्रीगीतगोविन्द पुस्तक की रचना पोर प्रभु प्रिय होने की, अपने तथा सज्जनों के हृदय की, सुहाती बार्ता तो मैंने संघ कह ही दी; परन्तु श्रीजयदेव जी के चरित्र की और बार्ता सुनिए कि जिसमे उनकी शान्ति सहनशीलता साधुता की अति अधिकाई है । एक समय पाप सम्तसेवा भंडारा के वास्ते पन्न घृतादि सामग्री लेने को द्रव्य मोहर गांठ में बांधे हुए ग्रामान्तर को चले जाते थे देवयोग मार्ग में कई 8000-- --90983<noinclude></noinclude> 9mxfyh54hegkzo0r5roc5x67ak66614 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८५ 250 194247 664470 2026-07-02T17:04:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664470 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५१६ श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । ठग चोर मिल गए; तब आपने पूछा कि "कहाँ जाते हो ?” चोरों ने कहा “जहां तुम जाते हो ।" तब श्रीजयदेव जी ने जान लिया कि " ठगहैं ऐसा न हो कि द्रव्य के हेतु मेरे भजन - सहायक शरीर का घात करें;" इस्से गांठ से छोर (खोल के) सब द्रव्य चोरों को दे दिया । परन्तु दुष्ट इस साधुता को उलटा ही म आपस में कहने लगे कि देखो इसने यह अपनी बुद्धिमानी की है कि अभी द्रव्य दे दूं; जब नगर ग्राम पावै तब इन सबों को शीघ्र पकड़ा दूँ ॥ (३) टीका । कवित | एक कहे “डारी मार, भलो है बिचार यही," एक कहे "मारी मत, धन हाथ आयो है" । “जो पेले पिछान कहूं कीजिये निदान कहा, "हाथ पांव काटि बड़ो गाढ पथरायो है ॥ पायो तहां राजा एक, देखि कै बिबेक भयो, छयो उजियारो, पौ प्रसन्न दरसायो है । बाहिर निकासि मानो चन्द्रमा प्रकाश रासि; पू- यो इतिहास; कह्यो “एसो तनु पायो है” ॥ १५३ ॥ (६२९—४७६) वार्तिक तिलक । ऐसा सुन एक ठग बोला कि जब इसने ऐसी चा- तुरी की है, तो इसकी मारडालना ही अच्छा वि. चार है" यह सुन और ठग कहने लगे कि “मारो 188600- 516<noinclude></noinclude> tdj0bpty1t3qq8ae7ao9tw538pjfhpb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८६ 250 194248 664471 2026-07-02T17:04:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664471 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>517 श्रीभक्तमाल सटीक । ५१७ --9008 मत क्योंकि धन तो हमारे हाथ आही गया थ मार डालने का क्या काम है ? " तब दूसरे दुष्ट बोले कि मला जो कहीं पहिचान के पकड़ा दे तब क्या करोगे ?” इत्यादि कुतर्क कुसंमत करके श्रीजयदेव जी के हाथों तथा पगों को काट कर बड़ेभारी गर्छु में डाल दिया और चले गए । तदनन्तर उस बन में पाके एक राजा ने श्रीजयदेव जी को देखा; उसी क्षण उसके हृदय में ज्ञान उदय हुआ और चमत्कार क्या देखता है कि हाथ पग तो कटे हैं परन्तु पाप के तेज की उजियाली हो रही है पर मुखारबिन्द प्रसन्न है तब राजा ने पाप को गड़हे से निकलवा कर बाहर बैठाल के दर्शन किया मानो अनेक चन्द्रमानों के राशि का प्रकाश हो रहा है । फिर प्राप से हाथ पग कटने का वृत्तान्त पूछा । श्रीजयदेव जी ने कहा कि “मुझे इसी प्रकार का शरीर मिला है ।" इस प्रसंग में कोई महानुभाव इस प्रकार का भाव कहते हैं कि श्रीजगन्नाथ जी ने जो कहा था कि "३- सिक जयदेव मेरोई स्वरूप जानो” सोभी अपने बर्त- मानविग्रह की सदृशता कराके लोक को दिखा के फिर अच्छा कर दिया | (टीई) टीका | कवित । बड़े प्रभाववान, सके को बखान ? उपहो मेरे कोहु 128600- 88600-<noinclude></noinclude> f8def4f3y1rncscjy11a0n6wxjnvvju पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८७ 250 194249 664472 2026-07-02T17:04:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664472 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५१८ 188606- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । भूरि भाग, दरशन कीजिये । पालकी बिठाइलिये, किये सत्र ठूंठ नीके, जीके भाए भए “कछु आज्ञा मोहि दी जिये" || "करो हरि- साधु-सेवा, नाना पकवान मेवा; पावें जोई सन्ततिन्हें देखि देखि भीजिये" । पाए वेई ठग, माला तिलक चिलक किये, किलकि के कहि "बड़े बन्धु लेखि लीजिये " ॥ १५४ ॥ (६२९-४७५) "माला तिलक चिलक किये =करठी माला सिक्षक आदि सन्त भेष बनाए । “भीजिये" = प्रमाशुयुक्तः प्रेम रस में भीगा । वार्तिक तिलक । श्रीजयदेव जी के इस प्रकार गंभीर बचन सुनके राजा अपने मन में बिचारने लगा कि “येतो कोई बड़ ही प्रभावयुक्त कथनीय महानुभाव हैं; मेरे कोई बड़े भाग्य उदय हुए कि मैंने इन के दर्शन पाए" । ऐसा विचार कर आपको पालकी पर बिठा के अपने घर में fear लाया और कटे हुए हाथपगों के ठूठों की लिवा औषधि से पच्छा कराया । 518 फिर, आप के पास पा, प्रणाम कर, राजा बोला कि "हे स्वामी जी ! यह आपका आगमन और हाथ पग का अच्छा हो जाना पति उत्तम हुवा परन्तु मुझको कुछ हितोपदेश तथा प्राज्ञा दीजिए" । राजा बिनय सुन श्रीजयदेव जी ने प्राज्ञा दी कि “दिव्य मन्दिर बनवा के श्रीभगवान की मूर्त्ति पधरापो, स्पोर<noinclude></noinclude> tux1apa8l2kxn2yvrgnaup7cdvm4a7j पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८८ 250 194250 664473 2026-07-02T17:04:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664473 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>519 श्रीभक्तमाल सटीक । BLE नित्य सेवा पूजा मेवा मिठाई भोग अर्पण करो, तथा प्रभु के आगे सन्तशाला बनवा के उसमें प्रति प्रेम से साधु सेवा करो । और जो सन्त पावें तिनका दर्शन करके प्रेमरस में भोंजि जाया करो " । आपकी आज्ञा मस्तक पर धारणकर राजा इसी प्रकार करने लगा n तन, मन, धन, पर्पण पूर्वक राजाकृत सन्तसेवा सुनके, वे सब ठग भी चमाचम-तिलक तथा माला धारण कर साधुवेष बना के आए। श्रीजयदेव जी उम सबों को देखतेही पति प्रीतिहर्षाकुल होके बोले कि “ पाइए २" और समीप के लोगों से कहने लगे कि "ये सब मेरे बड़े गुरुभाई हैं। इन को दर्शन पर प्रणाम करो " ॥ (टेमेरे) टीका | कवित्त । नृपति बुलाइ कही हिये हरि भाय भरे, “ढरे तेरे भाग, पब सेवा फल लीजिये । " गयो ले महल मांझ टहल लगाए लोग, लागे होन भोग; जिय शंका तन छीजिये ॥ मांगें बारबार बिदा; राजा नहीं जान देत; पति कुलाये, कही स्वामी “घन दीजिये" । देकेँ बहु- भांति सो, पठाए संग मानस हूं, "पावो पहुँचाय तब तुम पर रीझियै” ॥ १५५ ॥ ( ६२९– ४७४ ) पाठान्तर "अकुताए” । अति त्वरा को अति शीघ्रता चाही । "मानुस हूं” = मनुज हूं, मनुष्य भी । "ढरे" = आए हैं, पधारे हैं। १८<noinclude></noinclude> a3cr7tmqcgxjnj81gz58ipvlk3114jw पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८९ 250 194251 664474 2026-07-02T17:04:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664474 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५२० श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 520 बार्तिक तिलक | श्रीजयदेव जी ने राजा को बुलवा के कहा कि "हे राजा ! श्रीभगवत के प्रेमभाव से भरे हुए हृदय वाले ये सन्त तुम्हारे भाग्यवस पाज पधारे हैं, पाज तक तुमने जितनी सन्त सेवा की है तिसका फल मय इन की सेवा करके लो ।” पाप की पाज्ञा मान राजा ने प्रतिहर्ष से उन को लेजा कर अपने राजभवन में सबों का पासन निवास दिया; और बहुत मनुष्यों को सेवा टहल में लगा दिया । नित्य नवीन भोग पदार्थ अर्पण करने लगा। तथापि, वे दुष्ट तो पतिही अपराधी थे; इस्से जी में यह शंका हो रही थी कि “जयदेव जी हम सबों की मरवाही डालेंगे" । पतएव सबों का शरीर सूखा जाता था । वे ठग बारंबार बिदा मांगते परंतु भक्त राजा नहीं जाने देता; जब ठग लोग प्रतिही पकुला ए, बड़ी शीघ्रता मँचाई, तब श्राजयदेवजी ने उन की शंका जानकर राजा की आज्ञा दी कि "ये सन्त हैं, रजो- गुणी के हां इतनाही बहुत रहे, अब धन बलादिक देके बिदा कर दो।” आप की पाज्ञा सुन राजा ने रत्न सुबर्ण मुद्रादि बहुत प्रकार का धन दे के बिदा किया, और वह धन ले जाने रक्षा करने के लिये बहुत से मनुष्य साथकर --909)<noinclude></noinclude> pi81cq14lyijppzs2mpqe3xgw9bfmfk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९० 250 194252 664475 2026-07-02T17:05:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664475 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>521 188600-- श्रीभक्तमाल सटीक । ५२१ 183400- उनसे कहा कि "पच्छे प्रकार सन्तों को पहुँचाकर लोगों पर मैं प्रतिही प्रसन्न होकर प्रायोगे तब तुम बहुत द्रव्य दूंगा” ॥ (2) टीका | वित्त । पूछें नृप-नर “कोऊ तुम्हरी न सरबर, जिते लाए साधु ऐसी सेवा नहीं भई है । स्वामी ज स नाती कहाँ ? कहो हम खांइ हहा;” “राखियो दुराइ, यह बात पति नई है । हुते एक ठौर नृप चाकरी मैं, तहां इन किuोई बिगार 'मारिडारो' प्राज्ञा दई है। राखे हम हितू जानि, ले निदान हांथ पावें, वाही के इसान अब हम भरिलाई है" ॥१५६॥ ( ६२९– ४७३ ) "सरवर"= तुल्यता । "इसान" = हड्सानू, उपकार, मलाई । वार्तिक तिलक | इस प्रकार जब चल के मार्ग में आए तब राजा के सेवक लोग उनसे पूछने लगे कि "महाराज ! झाप सबों के समान कोई महात्मा नहीं हैं; क्योंकि यहां जितने सन्त पाए हैं उनमें किसी की भी ऐसी सेवा नहीं हुई; आप कृपा करके कहिए हम लोग प्रति बिनय करके हाहा खाते हैं स्वामी जी से और आप सबों से क्या नाता सम्बंध है ?” यह सुन दुष्ट बोले कि "हम कहते तो हैं परन्तु यह बात बहुत नवीन (प्राचर्यमय) है, इस्से छिपा रखना, कहीं कहना नहीं । प्रथम हम लोग और ये स्वामी जी एकही राजा के चाकर थे;<noinclude></noinclude> 8sdk8891qry1vpsups288l4zrfjle3x पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९१ 250 194253 664476 2026-07-02T17:05:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664476 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५२२ श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 522 8000-- वहां इनने बहुत ही बुरा काम किया था; राजा ने प्राज्ञा दी कि 'इसको मारडालो' तब हम लोगों ने अपना हितू जान के इन के प्राण की रक्षा की, केवल हाथ पग काट के राजा को दिखा दिये थे। उसी उपकार के पलटे में अब हम ने यह सेवा सतकार धन सब ले लिया है" ॥ (20) टीका | कवित् । फाटि गई भूमि, सघठग ये समाइ गए, भए ये च faa दौरि स्वामी जू पै आए हैं। कड़ी जिती बात सुनि गात गात कांपि उठे, हांथ पांव मीर्डे भए ज्यों के त्यों सुहाए हैं । अचिरज दोऊ नृपपास जा प्रकाश किये जिए एक सुनि पाए वाहीठोर धाए हैं। पूछें बारबार सीस पांयनि पै धारि रहे कहिए उधारि कैसे मेरे मन भाए हैं ॥ १५० ॥ ( ६२९४७२) "चारि=प्रगट कर खोलके । वार्तिक तिलक | श्रीजयदेव जी ने इस प्रकार की क्षमा साधुता की; परन्तु दुष्टों के चित्त में एक भी न चढ़ी, उलटे निन्दा युक्तही वचन कहे; इस्से यद्यपि श्री भूमि जी का "सर्व- सहा" नाम है तथापि इन सन्तद्रोहियों की न सहि स- कीं; जितने में ठग थे उतनी भूमि फट गई! दुष्ट रसा- तल को चले गए !! 3000-<noinclude></noinclude> mw4krt5oq1b2feyx9wrxhyguvcfhsaq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९२ 250 194254 664477 2026-07-02T17:05:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664477 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>523 श्रीभक्तमाल सटीक । ५२३ राजा के मनुष्य देख के पतिचकित हुए और दौड़ के स्वामी जी के समीप झा संपूर्ण बृन्तात कह सुनाया । सुन के श्रीजयदेव जो सर्वाङ्ग कंपित होकर हाथ पग मीडने लगे । मीडतेही ध्यापके कर तथा च- रथा सुन्दर ज्यों के त्यों निकल पाए । दुष्टों का भूमि में समाजाना तथा पाप के हस्त पद ज्यों के त्यों हो जाना, ये दोनों पार्थ्य देख राजा के सेवक जनों ने राजा को पा सुनाया; पाप के हाथ पगों का यथार्थ हो जाना सुन कर नृप ऐसा प्रसन्न हुआ कि जैसा मरणप्राय पुरुष अमृत पी के जी उठे, और दौड़कर श्री जयदेव जी के पास पाके चरणों में सीस धर बारंबार पूछने लगा कि "हे महाराज ! मेरे मन भावते पाप के ये हस्त पद कैसे अच्छे हो गए ? और वे लोग भूमि में क्यों समा गए ? इस चरित्र का मर्म खोल के कहिए छुपा करके " ॥ (ii) टीका | कवित । राजा प्रति परि गही, कही सब बात खोलि, निपट अमोल यह सन्तन को बेस है। कैसौ छापकार करें तऊ उपकार करें ढर्रे रीति आपनी ही सरस सुदेस है ॥ साधुता न तजे कमूं जैसे दुष्ट दुष्टता न, यही जानि लीजे मिले रसिक नरेस है । जान्यो जब नांव ठांव |400- --900)<noinclude></noinclude> kl0tv0zybl5apj18twzqfvsw14zgp2w पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९३ 250 194255 664478 2026-07-02T17:05:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664478 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५२४ 1986-06- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । 524 0008 " रहो इहां बलि जांव भयो में सनाथ, प्रेम भक्ति मई देस है” ॥ १५८ ॥ (६२९-४७१) "अरि"न्हठ। "सोहि" - स्पष्ट करके, गुप्त न रख के, प्रगट । मार्तिक तिलक । जब राजा ने, श्रीजयदेव जी के चरणों में सिर घर के पति ही हठ ग्रहण करके, पूछा तब पाप, अपना नाम ग्राम, तथा ठगों की करनी सब बात कहकर, हितोपदेश करने लगे कि “राजन् ! वेत्यन्त अयोग्य सन्तों का वेष बना के पाए, इसी से मैंने उनका अतिशय सतकार कराया; भगव- भक्त को ऐसा ही उचित है, कि कोई कैसेहूं पपकार करे तब भी उसका उपकारही करें, पपनी सरस सुदेश रीति ही से चलें, कभी साधुता को न त्याग करना चाहिए जैसे दुष्ट अपनी दुष्टता कभी नहीं त्याग करता; यह निश्चय जान लो कि इसी प्रकार की साधुता से प्रभु-रसिकनरेश मिलते हैं" ॥ जब श्रीजयदेव जी के कहने से राजा ने जाना कि किन्दु विल्वासी श्रीगीतगोविन्द काव्य के कर्त्ता आप ही हैं, तब तो पति ही प्रेम भाव में भर के प्रार्थना करने लगा कि "हे प्रभो ! मैं आप के ऊपर न्योछावर होता हू; अब पाप श्री पद्मावती जी सहित यहां ही रहिए; मैं सनाथ होऊ; जबसे व्याप विराजे तब से इस नगर तथा देश में भगवद्भक्ति उत्पन्न हुई; पथ उसको बढ़ाइये, पर मुझ पर कृपा कीजिये ॥ "<noinclude></noinclude> i5vlbmjl77xusu5vmp9ic6jm8d6289k पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९४ 250 194256 664479 2026-07-02T17:05:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664479 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>525 600 श्रीभक्तमाल सटीक । (vi) टीका | कवित्त । गयो जा लिवाय व्याय कबिराज राज तिया; किया ले मिलाप पाप रानी ढिग लाइ है । मस्यो एक भाई धाकी, भई यो भोजाई सती, कोऊ पङ्ग काटि, कोऊ कूदि परी घाइ है ॥ सुनतही नृपबधू निपट प्रचंभो भयो इनकैं न भयो फिरि कही समुझाइ है । " प्रीति की न रीति यह बड़ी विपरीत हो खुटै तन जबै प्रिया प्रान छूटि जाइ है " ॥ १५९ ।। (६२९—४७०) वार्तिक तिलक । राजा ने अपनी प्रार्थना श्रीजयदेव जी को पड़ी- कार कराकर किन्दुविल्व से सादर श्रीपद्मावती जी को लाके दोनों मूर्त्ति का मिलाप करा दिया; और भक्तराजा की रानी भी श्रीपद्मावती जी के दर्शन सतसङ्ग को पाया करती थी। एक दिवस कविराज- कान्ता जी के पास रानी बैठी थी उसी समय किसी किंकरी ने सुनाया कि "आप के भाई का शरीर छूट गया; सो पापकी मौजाइयाँ कोई सती होगईं, कोई शस्त्र से अंग काट के मर गई, कोई दौड़कर चित्ता में कूद पड़ीं। " रानी यह सुन, उन सबों के प्रीति पाति- व्रत का परम पमान, विस्मित हुई; पर श्री पद्मावती जी ने इस बात का कुछ पावर्य न किया; किन्तु रानी को समझाकर कहने लगीं कि "यह प्रीति 128600- --90988<noinclude></noinclude> efotgwom3kb3o5cwmoynqyqm3czkqan पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९५ 250 194257 664480 2026-07-02T17:06:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664480 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>88000- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । की रीति नहीं है, शस्त्र से मर जाना, जर जाना, बड़ी विपरीत गति है; प्रीति की रीति तो यह है कि प्रिय पति का शरीर छूटते ही प्रिया के प्राण छूट जायं " ॥ (2) टीका | कवि । "ऐसी एक पाप" कहि, राजा सुँ यूँ बात कही. "लेकें जाओ बाग स्वामी नेकु, देखों प्रीति कों" । " निपट बिचारी बुरी, देत मेरे गरे कुरी, ” तिया हठ मानि करी वैसेही प्रतीति क ॥ पानि कहे " प्राप पाय" कही यही भांति पाय, बैठी ढिग तिया देखि लोटिगई रीति कीं । बोली “भक्तबधू अजू ! वे तो हैं बहुत नीके, तुम कहा पोचक हों पावतिही मीति कों” ॥ १६० ॥ ( ६२९-४६९ ) 66 'आप पाय" आप ने श्री हरिधान पाया । "भोचक हाँ, -अ- चामक, पोसे में । “सुँ" से "यु" "=यों, इस भांति । बार्तिक तिलक | श्रीपद्मावती जी के बचन सुनके भक्त राजा की स्त्री बोल उठी कि “ऐसी प्रेममूर्त्ति तो जगत में एक आप ही हो" ऐसा कहके, फिर उसने राजा से जाके सय वार्ता कही; और साथही यह बात भी, आग्रह पूर्वक, कही, कि " झाप स्वामी जी को बाटिका में सनक लेके जाइये, तो मैं भला इनकी प्रीति देखूं तो” । भक्त राजा ने उत्तर दिया कि “सूने ऐसा विचार बहुत ही बुरा किया है, तू मेरा गला ही काटा चाहती है। 1986-06- 526<noinclude></noinclude> awl9on4cz4w9w1uhdi8zdi3mx7eexvc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९६ 250 194258 664481 2026-07-02T17:06:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664481 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>597 श्रीमतमाल सटीक । कुसंग से कह हानि नहीं हुई ? दुष्टा रानी के हठ पा- ग्रह बस उसके वचन में प्रतीति करके, राजा ने वैसाही किया। उस लिया ने एक टहलनी को सिखा रक्खा था; वह श्रीपद्मावती जी के पास बैठी हुई थी, उसी क्षण वह लौंडी पाकर सिखाई बनाई दुख की रीति से बोली कि "स्वामी जी तो बैकुण्ठ धाम पागए"; यह सुन राजा की स्त्री रोरी कर कुरीति से भूमि में लोट गई । पर, श्रीजयदेव प्रिया जी ने कहा कि "हे भक्तबघू! तुम व्यर्थही धोखे में पढ़ती और भयभीत होती हो, श्री स्वामी जू महाराज तो बहुत पच्छे बिराज रहे हैं” ॥ (2) टीका । कवित्त । भई लाज भारी, पुनि फेरिकै सँवारी दिन बीति गए कोऊ, जब तब वही कोनी हैं। जानि गई 'भक्त धू चाहत परीछा लियो,' कही "अजू पाए"; सुनि तजी देह भीनी है ॥ भयो मुख स्वेत रानी; राजा पाए जानी यह, रथी चिता "जरीं, मति भई मेरी होनी है " । भई सुधिपापक, सुझाए बेगि दौरि इहां; देखि मृत्यु प्राय नृप, कह्यो "मेरी दीनी है" ॥१६९॥ (६२९४६८) वार्तिक तिलक | ५२० जब श्रीपद्मावती जी इस झूठाई को जान गई; तब रानी के मन में घड़ी भारी लज्जा हुई; परन्तु उस दुर्मति को छोड़ा नहीं, कुछ दिन बीते फिर पूर्ववत कपट 236000- --90988<noinclude></noinclude> glarsyzlpdei8nqa2ri8lv7zv0q5j6p पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९७ 250 194259 664482 2026-07-02T17:06:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664482 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५२- --9001 श्रीभक्तिसुधा बिन्दु स्वाद । 528 --90% 88 कार कर ही किया । तब श्रीपद्मावती जी अन गई कि "यह मेरी परीक्षा लिया चाहती है " । इस्से, जब उसके मुख से सुना कि “स्वामी जी श्री- हरि धाम को प्राप्त हुए,” उसी क्षण स्नेह से भोजी हुई निज देह त्याग दी || श्रीपद्मावती जी की यह किक स्वछन्द-मृत्यु देख, रानी का मुख स्वेत हो गया; और राजा पाके यह चरित्र सुन देख बोले कि "मेरी मति नष्ट हो गई इस स्त्री के संग से, इस्से मैं जल जाऊंगा," और चिता रचा कर जलाही चाहता था ॥ यह बार्ता श्रीजयदेव जी सुनतेही दौड़े पाए राजा को देखा कि शोक से मृत्युप्राय हो रहा है । आप का दर्शन कर कहने लगा कि "स्वामी जी ! मेरीही दी हुई मृत्यु से माता जी मरी हैं !!!! (टेरे) टीका | कवि । बोल्यो नृप “जू मोहि जरेई बनत अब, सध उपदेश लेके धूरि मैं मिलायो है" । कह्यो बहु भांति ऐपै पावति न शान्ति किहूं; गाई अष्टपदी, सुर दियो, तन ज्यायो है ॥ लाजनि को मारयो राजा चाहे पप- घात कियी, जियो नहीं जात, "भक्ति लेसहूं न पायो है" । करि समाधान, निज ग्राम पाए “किन्दु बिल्लु,” जैसो कछु सुन्यों यह परचे ले गायो है ॥ वार्तिक तिडक । श्रीजयदेव जी ने राजा को निषेध किया कि “तुम<noinclude></noinclude> dybcag38t9eaumnffalu6dc3n5kqaol पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९८ 250 194260 664483 2026-07-02T17:06:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664483 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>539 श्रीभक्तमाल सटीक । ५२९ जरी मरो मत; " तब राजा बोला कि "पजी महाराज ! मुझे पब जले बिना नहीं बनता क्योकि पाप का समस्त उपदेश लेके मैंने धूल में मिला दिया " । यह सुन श्रीजयदेव जी ने बहुत प्रकार से समझाया त- धापि राजा के हृदय में किसी प्रकार शान्ति नहीं ही आई; तब पाप ज ना कि 'बिना इनके जिवाए राजा नहीं जीवेगा; ' इस्से पाप ने संजीवन मंत्र सम गीतगोविन्द की पष्टपदी गानकर, शरीर में स्वर भर दिया; सुनतेही श्रीपद्मावती जी उठके साथ में आप भी गान करने लगीं । यह चरित्र देख के सब " जयजयकार" करने लगे । इस प्रकार पाप ने अपनी भक्तिभाग्यवती को जिला दिया; तथापि लज्जा के मारे राजा की अपना जीना भला न लगता था, ग्लानि से ऐसा विचारता कि "हाय; मेरे मन में भक्ति का लेश भी न प्राया;" इस्से पात्मघात किया चाहता था, तब श्रीजयदेव जी ने बहुत प्रकार उपदेश देकर उस्की सावधान किया; और आप अपने किन्दुबिल्व ग्राम को चले पाए । श्रीनामास्वामी जी के छप्पे से उपरान्त, श्रीजय देव जी के ये परचे चरित्र चमत्कार जिस प्रकार वृड्ड लोगों से सुना था, तिस भाँति गान किया ॥ 1986-06- (ii) टीका | कवित्त । देवधुनी सोत हो पठारे कोश पाश्रम ; सदाई --<noinclude></noinclude> qhatlwq4jx5n8ok4zptjhptrac0p4ii पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५९९ 250 194261 664484 2026-07-02T17:06:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664484 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>a --909 श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । 550 -9098 स्नान करें, घरै जोग्यताई कौं भयो तन वृद्ध, तऊं छोड़ें नहीं नित्य नेम, प्रेम देखि भारी निशि कही सुखदाई at ॥ " at जिनि ध्यान करो, करो मत हठ ऐसी " मानी नहीं “आऊँ मैं हीं;" "जानों कैसे पाई को " १ । "फूले देखो कंज तब कीजियो प्रतीति मेरी;” भई वही भांति, सेवें पली सुहाई कौं ॥ १६३ ॥ (६२९-४६६) "देव धुनि "= देवसरिता, श्रीगङ्गा जी । “सोत"=स्रोत, धारा । "हो" थी, रही ॥ बार्तिक तिलक । श्रीजयदेव जी राजा के यहां से लाए । श्री- गङ्गा जी की धारा आप के आश्रम से पठारह कोश थी, परन्तु पाप श्री प्रभु कृपा से योगसिद्धि बेग से गमन कर, नित्य हो श्रीगङ्गा स्नान करते थे । जब पाप का शरीर बृद्ध हो गया तब भी नित्य स्नान का नेम नहीं छोड़ा। ऐसा भारी प्रेम नेम देख, श्री- गङ्गा जी को दया लगी; क्योंकि यद्यपि योगावेश से जाते आते थे तो भी शरीर को परिश्रम होता ही था; इसे श्रीगङ्गा जी ने निज सुखदाता श्रीजयदेव जी की रात्रि में आज्ञा दी कि "पब वृद्ध शरीर से नित्य स्नान को मत पावो, इस हठ की छोड़कर ध्यान ही से मेरा स्नान कर लिया करो। " परन्तु याप ने बात मानी नहीं; तेही थे; तब श्रीगङ्गा जी ने कृपा कर कहा कि "तुम्हारे श्रम के निकट की नदी में ही मैं-<noinclude></noinclude> e2o5so4ue6phhsbis3oxlpgaxs7khw2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०० 250 194262 664485 2026-07-02T17:06:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664485 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>533 K600 श्रीभक्तमाल सटीक । जंगी इसी में स्नान किया करो" | आप ने ५३१ --90983 पूछा कि "मैं कैसे जानूं कि आप आई हो ?" श्री गङ्गा जी ने कहा कि "देखो इस में कमल नहीं हैं; पब जब सुन्दर कमल फूले देखना तब मेरे पा जाने की प्र- तीति करना ।" दूसरे दिवस देखें तो दिव्य कमल फूले हैं, जल भी दिव्य गङ्गा जल के तुल्य प्रमल मिष्ट हो गया; तब श्रीजयदेव जी ने जीवनावधि उसी में स्नान पर पान किया। अभी तक किन्दुवित्व ग्राम सुहाई “देई गङ्गा" नाम से प्रसिद्ध हैं। सज्जन लोग श्री गङ्गा तुल्य मानकर सेवन स्नान पान करते हैं ॥ मुन्शी तपस्वीराम जी सीतारामीय ने श्रीजयदेव जी की माता का नाम " श्रीराधा देवी" जी लिखा है, और श्री राधाकृष्ण दास जी की 'भक्तनामावली' ( काशी नागरी प्रचारिणी सभा) में "रामादेवी" है । इनका समय "सन् १०२५ ई० से १०५० ईसवी तक नि- र्णय किया गया है, अर्थात् विक्रमी सम्बत १०८२ तथा ११०० के मध्य ॥ इनका ग्राम किन्दुविल्व, बङ्गाल देश में बीरभूम से प्रायः दस कोस दक्षिण की ओर जयनद के उत्तर था ॥ (दोहा) प्रगट भयो जयदेव मुख, पद्भुत गीतगुविन्द | कह्यो 'महा शृङ्गार रस,' सहित प्रेम मकरन्द ॥ (श्रीध्रुवदास जी ) 14:00-<noinclude></noinclude> lokgc836k2g0c5eznqwqr2b3ijlzvb9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०१ 250 194263 664486 2026-07-02T17:07:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664486 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५३२ श्री सुचाबिन्दु स्वाद । 532 श्रीपद्मावती जी । श्री आज्ञा से जब पिता ने पाप को श्रीजयदेव जी के पास छोड़ दिया, तत्र श्रीपद्मावती जी ने अपने की आपकी दासी जानकर पातिव्रत उसी समय से धारण किया, और श्री जयदे। जी के और और प्रकार से समझाने पर भी पाप की ही सेवा में दृढ़ रहीं। जब श्रीकविराजराजेश्वर जी स्नान को गए प्रभु नेपाप उनके रूप में लाकर श्रीपद्मावती जी की दर्शन दिये, तथ इनके हाथ का भोजन सराह सराह के पाया और वह पद पोथी में (पृष्ठ ५०८) लिख कर चल दिये; धन्य ध य श्रीपदुमात्रती जी । जब दुष्टा रानी (मधू) ने पुनः पुनः परीक्षा ली (पृष्ठ ५२८) पाप ने शरीर छोड़ ही दिया था। पाप की प्रशंसा कहां तक की जा सके । "पद्मावति जयदेव प्रेम बस कीने मोहन” ॥ ( श्री ध्रुवदास जी ) (774) श्रीधर श्री भागीत में, परम-धरम नि- रनै कियौ ॥ तीन-कांड एकत्व सानि, कोड अश बखानत । कर्मठ ज्ञानी सेंचि अर्थको अनरथ* बानत ॥ 'परमहंस- 3400-<noinclude></noinclude> g76bxayxpelh1perxls7gr1az80mwya पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०२ 250 194264 664487 2026-07-02T17:07:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664487 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>533 8000-- श्री भक्तमाल सटोक 1 ५३३ -90988 संहिता' बिदित टीका बिसतारथी । षट- शास्त्रनि अबिरुद्ध बेदसंमतहिँ बिचारयो ॥ "परमानन्द" प्रसाद तें, माधौ सुकर सु- धार - दियौ । श्रीधर श्रीभागीत में, परम धरम निरनै कियौ ॥ ४४० ॥ ""मानत” =बर्खेत । जैसे, कनक हि बान पड़े जिमि दाई । अर्थात् जैसे दहिते कमक में बर्खे चढ़। पुनः जैसे, गाजल अर्थात् गर्जत । "ठानत" पाठ, नवीन कल्पित है ॥ बार्तिक तिलक | श्री श्रीधर स्वामी । श्री श्रीधरजी ने श्रीभागवत ग्रंथ बिषे परम- धर्म (श्रीभगवदुर्म) का यथार्थ निर्णय किया अर्थात् श्री- जी और श्रीशुकजी ने जिस ठिकाने जो भागवदुर्म जिस महत्व तथा जिस आशय से कथन किया था वहां वैसाही स्पष्ट अर्थ करके दिखा दिया । और पन्य टीका (अर्थ) करने वालों ने यथार्थ नहीं कहा। कोई लोग कर्मकाण्ड, उपासना काण्ड, ज्ञान काण्ड, इन तीनों काण्डों को एकही में सान (मिला) के पर्थ बखानते हैं, "क्योंकि वे अज्ञानी हैं,” तीनों का स्वरूप ही नहीं जानते। पर पूर्व मीमांसासक्त कर्मठ अर्थात् कर्मकाण्डी तथा उत्तर-मीमांसासक्त ( वेदान्ती ज्ञानी, जन इस भक्ति ग्रंथ भागवत को, कर्म ज्ञान की दिशि खींच के<noinclude></noinclude> jc2z85mfpai6e7kur7neaue9gktm4ra पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०३ 250 194265 664488 2026-07-02T17:07:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664488 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५३४ 600 श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । अर्थको अनर्थ करके वर्णते हैं। और श्री श्रीधरानन्द जी ने जैसा " पारमहंस - संहिता" यह बिख्यात ग्रन्थ है, वैसाही परमहंसप्रीतिबर्द्धिनी टीका बिस्तारकर बर्णन किया कि जिसमें मीमांसा, बेदान्त, योग, सां- ख्य, न्याय, वैशेषिक, इन छहूं शास्त्रों के विरुद्ध बेद के संमत विचारपूर्वक बखान किया । उस " श्रीमद्भा गवत भावार्थ दीपिका" नामक टीका के प्रारंभ का मङ्गलाचरण यह है “नमः परमहंसास्वादितचरण कमल चिन्मकरन्दाय भक्तजनमानस निवासाय श्री- रामचन्द्राय" । सो इस प्रकार की टीका रचना आप को योग्य ही है, क्योंकि आप के ऊपर गुरु स्वामी "श्री परमानन्द" जी ने प्रति प्रसन्न होकर कृपा की । इसी हेतु से उस टीका को श्रीविन्दुमाधवजी ने स्वयं श्रीकरकमलों से सुधार दिया अर्थात् सर्वोपरि सर्व टीकाओं की शिरोमणि बनाकर स्वीकार किया ॥ (दोहा) “श्रीधरस्वामी तो मनौ, श्रीधर प्रगटे मान । तिलक भागवत को कियो, सब तिलकन पर- मान ॥ १ ॥ (श्री ध्रुवदास जी ) [३] टीका | कवि । पंडित समाज बड़े बड़े भक्तराज जितें, भागवत टीका करि आपस मे रीझिये । भयो ज विचार काशी ཡ་ पुरी विनाशी मांझ, सभा अनुसार जोई सोई लिखि 534<noinclude></noinclude> mbn1lvxp2dfxgqo1hppdiy76txbhdn2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०४ 250 194266 664489 2026-07-02T17:07:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664489 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>535 श्रीभक्तमाल सटीक । दीजिये । ताको तो प्रमान भगवान "बिन्दुमाधी जी" हैं, साधी यही बात धरि मन्दिर मे लीजिये । घरे सब जाय, प्रभु सुकर बनाय दियो, कियो सर्ब- ऊपर लै, चल्यो मत धीजिये ॥ १६४ ॥ (६२९-४६५) बार्तिक तिलक । શ્રી जिस समय श्रीश्रीधर स्वामी जी ने "श्रीभागवत” पर टीका रची, उस समय और बड़े बड़े पंडित भक्तों ने भी इस ग्रन्थ की टीकाएं कीं; और सब के सब अपनी अपनी टीका अन्य टीकाओं से श्रेष्ठ कह कर निज निज मति पर रोक कर आपस में बिवाद करते थे। फिर सब का संमत विचार होकर, प्रलय काल* में भी अविनाशिनी ऐसी श्री काशीपुरी के मध्य इकट्ठे होकर, सब ठीकायों के टीकाकारों ने सभा की कि 'इस सभा के मतानुसार जी टीका उत्तम मध्यम जैसी हो तैसी लिख दीजै । निदान अन्तिम सिद्धान्त यह हुआ कि "इस में महा पंच पंडित भगवान् श्रीषि- न्दुमाधव 'जी हैं, जो टीका पाप अङ्गीकार कर सर्बे परि करें सोई प्रमाण है । अब टीका की श्रेष्ठता जानने के हेतु यही बात साधें, प्रथम सब टीका मं- दिर में रख कर फिर लेलेवें" । ऐसाही किया; मध्यान्ह भीग के पश्चात् प्रभु के आगे सब टीकाएं घर मंदिर के किवाड़ दे, दो मुहूर्त में खोला; तो देखते क्या हैं कि. २१ -<noinclude></noinclude> nrve6pijevbrqskujfc1lrdwl5a42mt पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०५ 250 194267 664490 2026-07-02T17:07:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664490 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५३६ -28-0-00- श्रीभक्तिसुधा बिन्दु स्वाद । "स्वामी श्रीधर जी कृत टीका" श्रीबिन्दु माधवजी निज करकमलों से सब टीकाओं के ऊपर घर कर, ब्रह्मा के भाल में भाग्य लिखने वाले हस्त कंज से उस पर लिख दिया कि "श्री भागवत पर श्रीधरी टोका सबै परि है" । इस प्रकार आपने अङ्गीकार करके सुधार दिया । इसी से श्री श्रीधर जी की टीका चली (फैली) और उस पर सब सज्जनों की मति प्रसन्न हुई || श्रीपरमानन्द जी । स्वामी श्रीपरमानन्द जी श्रीश्रीधरस्वामी के गुरु सन्यासी हैं "परमानन्द प्रसादतें" । " श्री परमानन्द जी +" सुकवि, भजन प्रवीन, शान्त, श्री वृन्दाबन के सन्यासी सर्वस्व त्यागी थे ॥ * "मंगल की राशि परमारथ की खानि काशी विरचि बनाई विधि केशव बसाई है" | "प्रलयहूं काल राखी गूलपाणि शूलपर" | ( प्रमाण कवित्त श्री गोस्वामी कृत | ) "अतिघोजिएमति प्रसन्न हुई । + और भी कई परमानन्द जी हुए हैं। जिनमेंसे, डाक्टर ग्रियर्सन् साहिय ( Dr. G. A. Grierson ) ने अष्टछापवाले को, मोर श्रीराधाकृष्कदास जी ने चार की चरचा की है । 536<noinclude></noinclude> 9sm9376fftlksaddbckwd4fhgoo4mcu पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०६ 250 194268 664491 2026-07-02T17:07:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664491 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-9098 337 537 58600-- श्रीभक्तमाल सटीक । ॥ श्रीः ॥ श्रीबल्वमङ्गल जी । (2) पथ । ५३७ --90988 कृष्णकृपा को पर प्रगट, "बिल्व मंगल" मङ्गल स्वरूप ॥ " करुणामृत" सु कवित्त युक्ति अनुचिष्ट उचारी । रसिक जनन जीवन जु हृदय हारावलि धारी ॥ हरि करायो हाथ बहुरि तहँ लियो कुटाई । “कहा भयो कर छुटै बढौं जी हिय तें जाई " ॥ चिन्तामणि सँग पाय कैं ब्रजबधू केलि बरनी अनूप | कृष्णकृपा की पर प्रगट, “बिल्वमङ्गल” मंगल- स्वरूप ॥ ४१ ॥ (२१२१२५) “पर" - परस्व, सर्वोपरि। “कोपर" = पान विशेष, पराल । "अनुच्चि - तु" = रुचिष्ट नहीं; अमनिया, बाया किसी की नहीं, अनुवाद नहीं। कार्तिक तिलक । श्रीकृष्ण जी के बड़े कृपापात्र तथा परम मङ्गल के स्वरूप श्री " बिल्वमंगल" जी ने श्री "श्री कृष्ण करु- यामृत" नामक ग्रन्थ ऐसा बिरचा है कि जो श्री कृपा की पर मंगल स्वरूप है; जिसमें न किमी कवि की छाया ही है न किसी काव्य का अनुवाद है; वह रसिक 18600-<noinclude></noinclude> ptmp1rv0dafhaci2npp9qt05ow3lybg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०७ 250 194269 664492 2026-07-02T17:08:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664492 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>BE 18400- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 538 188-600- जीवन है; कि जो उस्को हारों की नाई अन्तर हृदय में धारण किये रहते हैं । श्री हरि ने अपना हाथ पकड़ा और फिर (उस देशकाल में) बुड़ा भी लिया तब आपने कहा कि "मेरा कर तो छटकाए जाते हो, परन्तु यद तब कि जब मुझ दुर्बल के हृदय में से भी छटक जासको* । “चिन्तामणि” नाम प्रमदा (वेश्या) के संग से, विषई से विरक्त हो कर पाप ने श्री ब्रज बन की केलि का अनूप वर्णन किया है। बधून इस्तभुरिक्षष्य निर्याविलात् कृष्ण। किमद्भुतम् । हृदयाद् यदि निर्यासि पौरुषं गवयामि ते ॥ दो० बांह कुड़ा जा ही निवल जानि के मोहिं । हृदय में जु बुहारी मर्द नहीं जब तोहिं ॥ (2) टीका | कवित्त । “कृष्णवेना" तीर एक द्विज मतिधीर रहे है गयो अधीर संग "चिन्तामणि' पाइर्के । तजी लोकलाज, हि वाही को जु राज, भयो मिशि दिन काज, वह र घर जाइ ॥ पिता को सराध, नेकु रह्यो मन साधि, दिन शेस में प्रवेश चल्यो प्रति अकुलाइर्के । नदी चढ़ी रही भारी, पैये न पवारी नाव, भाव भयो हियो जियो जात न चिजाइकें ॥ १६५ ॥ (६२९-४६४ ) " अवारी " - अबेर । " भिजाय के" प्रेम में भीग के । बार्तिक तिलक | दक्षिण में "कृष्ण वेणा नदी के तट पर ब्राह्मण कुल में श्री विमंगल जी का जन्म था; प्रथम बड़े मति धीर ये 3000- 900<noinclude></noinclude> 7voy871jnwws8ydtl4rd8dan6tz8y1p पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०८ 250 194270 664493 2026-07-02T17:08:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664493 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>539 1000- श्रीमतमाल सटीक । ५३९ पर चिन्तामणि नाम की एक बेश्यानारी के प्रेम में वह अंतिशय आशक्त थे, यहांतक कि लोक की लाज धैर्य्य इत्यादि खोके दिन रात उसी के घर, जो उस नदी के दूसरी पर था, रहा करते; उनके हृदय में उसीका पूरा पूरा राज्य था। एक दिन पिता के श्रा के कारण जैसे तैसे मन मार के दिनभर तो उसी काव्य में लगे रहे परन्तु दिन के अन्त में बड़ े अधीर होके कुलके उसके घर की ओर चले। सरिता तीर पहुँचे तो देखा कि नदी तो बड़ी चढ़ी हुई है और उस पार जाने की कोई सामा, नाव बेड़ा कुछ नहीं है । अत्यन्त प्रेम भाव में इनका हृदय डूबने लगा । (2)३) टीका | कविस । करत विचार वारि धार में न रहें प्राण, तातें भी धारि मित्र सनमुख जाइयें । परे कूदि नीर, कछु सुधि न शरीर की है, वही एक पीर कब दरसन पाइये ॥ पैयत न पार, तन हारि भयो घूड़िये कीं, मृतक निहारि, मानी नाव मनभाइयें । लगेई किनारे जाय, चले पग धाय चाय, आए, पट लागे, निशि मासे बिहाइ ॥ १६६ ॥ (६२९ – ४६३) बार्तिक तिलक । इनमे विचार किया कि न प्रियाबिरह धार ही में प्राण बच सकते हैं पर न जल घार में ही, इस्से यही<noinclude></noinclude> 7z3wriug4qxgsqvezwxoz1hxensae3i पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६०९ 250 194271 664494 2026-07-02T17:08:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664494 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५०० 1-28006- है श्रीभक्तिसुधाषिन्दु स्वाद | 540 मला है कि प्रेमी के सन्मुख ही प्राण देदूं । इतना मन में ला, नदी में कूदही तो पड़े; शरीर की कुछ सुधि न रही, केवल प्रिया वियोग का दुःख तथा यह उत्क- ठा रह गई कि कब अपने प्रेमी का दर्शन पाऊं। पैरते पैरतं थक के जोंही तन जलमग्न होने पर हुआ, त्यही अकस्मात एक मृतक (मुरदा) को देखके समझे कि प्रेमी ही ने मेरे पर्थ नाव भेज दी है । उस्पर चढ़के दैव इच्छा से पार होके तीर लगे | उतर के प्रेमातुर होके दौड़े, जब चिन्तामणि के द्वार पर पहुँचे, रात आधी से कुछ अधिक वीती धी;पतः पट लगे थे (2) टीका | कवित्त । अजगर घूमि भूमि भूमि को परस कीयो, लि- यो सहारो, चढौ छत पर जाय के । ऊपर किवार लगे, परयो कूदि मांगन मैं, गिरयो, यो गरत राग जागी सोर पायके | दीपक बराइ, जो पै देखे, बिल्व मंगल है, "बड़ोइ मंगल, तूं किया कहा पाय के" । जल सन्हवाय, सूके पट पहिराय, "हाय ! कैसें करि प्रायो जलपार द्वार धाय के ? ” १६७ ॥ (६३९– ४६२) बार्तिक तिलक चिन्ता में थेड़ी, कि इतने में एक लटकी हुई वस्तु पर इनकी दृष्टि पड़ी; वह एक अजगर था जो पृथ्वी के पास तक पहुँच झूल रहा था परन्तु ये प्रति प्रेमान्ध तो थेही, यह समझे कि प्रेमिन ने मेरेही लिये 8600-<noinclude></noinclude> pbh7gydbaumy6yx25d0r4rdr8cvtgco पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१० 250 194272 664495 2026-07-02T17:08:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664495 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>541 श्रीभक्तमाल सटीक । ५४१ --909 रस्सा लटकाय रक्ला है, चटपट पाप उसके सहारे से चढ़के छत पर पहुँच गए । ऊपर किवाड़ लगे देखके ये प्रांगन में धम से कूद पड़े धमाके का शब्द सुन इनकी प्रेमी जाग उठी; लोग दीप जलाके उस्के प्रकाश में जो देखें तो आप हैं श्रीविश्वमंगल महाशय जी । चिन्तामणि किला के बोली कि "हा ! तुम बड़े ही मंगल हो ! तुमने पाके क्या किया ? अस्तु, स्नान करा, सूखे वस्त्र पहिरा, उसने पूछा कि "बता- इये तो पाप नदी पार हुए क्योंकर और ऊपर चढ़े कैसे ? (27) टीका | कवित्त । "नवका पठाई, द्वार लाव लटकाई देखि मेरे मन भाई, मैं तो तबै लई जानिकै" । " चलो देखों पह यह कहा धौं प्रलाप करे " देख्यौ विषधर महा, खीजी अपमान के ॥ " जैसो मन मेरे हाड़ चाम स लगायो, तैसी स्याम सौं लगव तो पै जानियें सयानिकै । मैं भये भार भर्जी युगल किशोर अब, तेरी तुही तो जाने चाहो करौ मन मानि के, ॥१६८॥ (६२९ -- ४६१) वार्तिक । तिलक | इनने उत्तर दिया कि मैंने अभी देखा कि तुम ने मेरे लिये नाव भेज दी है पोर छत से डोरलटका 188600- --१०० 10:00-<noinclude></noinclude> 0ff64lscqj2msdtiy9c15a77ed1nzr2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६११ 250 194273 664496 2026-07-02T17:08:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664496 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५४२ श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । रक्खा है, तो मैंने तभी तुम्हारी प्रीति और कृपा की बिलक्षणता जान ली। वह बोली कि "ये क्या बड़बड़ाते हैं भला लोग देखें तो कि डोर कहां और कैसा है ?" जा के देखें कि वह घड़ा विषधर अजगर है । यह सुन चिन्तामणि कुंझला उठी पोर अपमान तथा क्रोध पूर्बक कहने लगी कि – “मेरे हाड़ धाम में जैसा अनोखा अनुराग किया, यदि श्यामसुन्दर मुरलीधर, शोभासिन्धु, करुणाकर, में लगाते तो तुझा सयानापन था । अब तो तेरी बात तूही जाने, जो चाहे सो कर, पर मैं तो भोर होतेही श्री युगल सर्कार के भजन में चित्त लगाऊंगी ॥ " [21] टोका | वित्त 1 खुल गईं पर्खे प्रभिलाखें रूप माधुरी की चाखें रसरंग श्री उमंग अंग न्यारि यै । बीन ले बजाई गाई बिपिन निकुंज क्रीड़ा भयो सुखपुंज जाये कोटि बिषे मारिये ॥ बीति गई राति प्राप्त चले माप आप hi जू हिये वही जाप दुग नीर भरि डारियै । "साम गिरि" नाम अमिराम गुरु कियो आनि सके को ब- खानि लाल भुवन निहारिये ॥१६९० (६२९ -- ४६० ) 542<noinclude></noinclude> k3f5hrwlv1ja2g3b2bxh6qzb4kz5xdn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१२ 250 194274 664497 2026-07-02T17:09:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664497 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>543 श्रीमतमाल सटीक ५४३ बार्तिक तिलक | श्रीभगवत् कृपा से चिन्तामणि जी के वचनों से श्रीवमङ्गल जी के हृदय की पांखें खुल गईं; श्रीयु- गलसकर के रूप के माधुर्य की अभिलाषा बहुतही बढ़ी, प्रेमरङ्ग में रंग गए; तन मन में अपूर्व बिलक्षण उमंग छागया; चिन्तामणि बीणां बजाके 'श्रीबिहारी जी की वृन्दाबन कुंजकी लीला रूप धाम नाम कीर्तन करने लगी । सुनकर, विश्वमंगल जी ऐसे पानन्द में मन हुए कि जिस्पर करोड़ों विषय के सुख न्यवछा- वर करना चाहिये । इसी प्रकार भगवत् कृपा के अनुभव में अब सारी रात्रि बीत गई, तो भोरे दोनों ही ने अपना अपना रस्ता पकड़ा। श्रीरूप हृदय में धरे, और नाम रटते प्रेमाश्रु बहाते चले । पाके, “सोमगिरि" जी को विश्वमंगल जी ने किया और उनसे उपदेश लिया । गुरु इनके प्रेम का वर्णन किससे हो सके ? आप स- र्वत्र श्री नन्दलाल जी ही को देखते थे— "जहँ तहँ देख लली अरु लालहिं ॥ " [iii] टीका | कवित्त । रहे सो बरस, रस सागर मगन भये, नये नये भोज के श्लोक पढ़ि जीजियें । चले वृन्दाबन, मन कहे कव देखों जाइ, पाइ मग मांक एक ठौर मति भीजियें ॥ २२<noinclude></noinclude> na7n5ni4d202k9wuqrni2o0sv9aggvq पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१३ 250 194275 664498 2026-07-02T17:09:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664498 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५४४ Boob arrying स्वाद । • पस्यौ बड़ो सोर दृग कार के न चाहे काहू, तहां सर तिया न्हाति देखि पांखें रीझियें लगे वाके पाछे फांछ कांछे को न सुधि कळू, गई घर पाछे, रहे द्वार, तन छीजियें ॥ १७० ॥ ( ६२९ - ४५९ ) "कांस काळे की" = भागवत वेष धारण किये की। "वोज"=अमोसा भाव । बार्तिक तिलक । एक बर्ष श्रीगुरु की सेवा में रह के, प्रेमरस सिन्धु में मग्न हुए, कई रसीले रसीले काव्य पढ़े तथा गुरु कृपा से पाप भी अपनेक भाव भरे श्लोक रचना किये; और जीवन का सुख लिया। फिर श्री वृन्दाबन को दर्शन की उत्कण्ठा मन को जैसी बिलक्षण है, कही नहीं जा सकती । ऐसी चटपटी हो रही है कि कब देखूं । मार्ग में एक सरोवर पर पाए । पाप की श्रीप्रभु प्रेमान्माद की दशा में मति मग्न हो गई; अश्रुपाता- दिक सात्विक प्रगट हुए। आपकी यह दशा देख के गांव में बड़ी धूम मची; आप किसी की ओर दृष्टि भी नहीं करते थे; केवल प्रभु के रूप की माधुरी में छके थे ॥ परन्तु माया के कौतुक से, उसी सर में एक अति रूपवती स्त्री को स्नान करते देख उस मृग- लोनी के नयन बाण इनकी पांखों में चुभही तो गये, और ऐसा खटकने लगे कि शेष की भी लज्जा 544<noinclude></noinclude> 9o2optfcclxkzz17g4htwc2pgoepx67 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१४ 250 194276 664499 2026-07-02T17:09:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664499 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>545 58-00- श्रीभक्तमाल सटीक | ५४५ -909 जाती रही; तन मन की सुधि खो, उसके पीछे पीछे लगे, पर उसके द्वार पर जा जमे । “देखन को प्रति याकुल नयना ॥ विरह से तन क्षीण होने लगा । वह सुन्दरी अपने घर में चली गई ॥ (21) टीक | कविरू । ' पायो वाको पति द्वार देखे' भागवत ठाढ़, बड़ी भागवत; पूछो बधू सो जनाइयें । कही जू "पधारी पांव धारो गृह पावन कों, पावन पखारों जल ढारों सीस भाइये” ॥ चले मौन मांझ, मन आरति मिटायबें कौं, गाय की जोई रीति सोई के बताइयें । नारि सो कह्यो “हो तूं सिँगार करि सेवा कीजे, लीजै यौं सुहाग जामैं बेगि प्रभु पाइयें" ॥१७५॥ (६२९ - ४५८ ) “गाइये क" कहने की। बार्तिक तिलक | उस स्त्री का पति कहीं बाहर गया रहा। वह बड़ा हरिभक्त था, घर पाके सन्त को द्वार पर खड़े देख, अपने धन्य भाग समझ, दण्डवत कर, ध्यासन दिया । स्त्री से पूछा तब उसने सारी बात कह सुनाई । उस भक्त ने पाप के पास पाके कहा कि "पाप भीतर पधारिये; मेरे गृह पवित्र होने के हेतु अपने चरण उसमें रखिये। मैं आप के चरण धोके जल सीस पर धारण करके कृतार्थ होऊं" । यह सुन पाप उसके साथ घर में जाके अपने मन की आरति मिटाने के लिये जो कहना था सब बात बता दी । 188-6-06-<noinclude></noinclude> 1cc8ljnu03zsupuck8zsir7qyxg8np6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१५ 250 194277 664500 2026-07-02T17:09:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664500 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५४६ 3000- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । 546 उसने अपनी पतिव्रता स्त्री को आज्ञा दी कि "तुम शृङ्गार करके महात्मा जी की सेवा करो, इस्को परम सुहाग मानकर ऐसी प्रतीति रक्खो कि परम भागवत की निष्कपट सेवा करने से भगवत शीघ्र रोकते मिलते हैं ॥ " (21) टीका | कवित्त । ये सिँगार करि, धार में प्रसाद लेके, ऊंची चित्र- सारी, जहां बैठे अनुरागी हैं। झनक मनक जाइ, जोरि कर ठाढ़ी रही, गही मति देखि देखि नून वृत्ति भागी है | कही युग सूई ल्यावो, ल्याई, दई, लई हाथ, फोरि डारी आंखें, पहा बड़ी ये अभागी हैं। गई पतिपास स्वास भरत न बोलि पावै, बोली, दुख पाय प्राय पांय परे रागी हैं ॥ १७२ ॥ ( ६२९-४५७ ) बार्तिक तिलक | पति की आज्ञा ही को परम धर्म मान, वह सौभा- यवती सज धज बन ठन, श्रीभगवतप्रसाद का थार हाथ में ले, उस ठिकाने चली जहां चित्रसारी युक्त ऊंची पटरी पर विल्वमंगल जी उस्को चाह में बिराजते थे; गहनों के शब्द तथा प्रमदानों के स्वभाविक हाव- भाव युक्त सुन्दरी छाप के पागे पहुँचकर कर जोड़ के खड़ी होगई; पर्थात् विल्वमंगल जी की आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगी । बिल्व मंगलजी की मति जो कामवश बही जाती थी, उस्को विवेकसे ये पकड़कर बारम्बार उस्का रूप देखने लगे; मुख्य प्रभु कृपा और निष्कपट भक्त तथा 100-<noinclude></noinclude> agkfmm234wcfaz0715hdot998vwlltk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१६ 250 194278 664501 2026-07-02T17:09:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664501 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>547 श्रीभक्तमाल सटीक | ५४७ --9001 पतिव्रता खो के दर्शन से, इनकी न्यून (विषय) वृत्ति भागी, निर्मल मति प्राप्त हुई; विचार किया कि इन sura की जड़ येही निगोड़ी छायें हैं। उस सुल- क्षणा से कहा कि "दो सूई लादो” वह ले पाई; इनने शीघ्र ही उन दोनों सूइयों से अपने दोनों नेत्र फोड़ डाले । वह भक्तिवती शोक से स्वांस लेती कांपती डरती अपने पति के पास गई; अतिशय दुःख के साथ टूटे फूटे स्वर से सब वृत्तान्त निवेदन किया; सुनते ही वह नुरागी भड़भागी भी घबराया हुआ दौड़कर आप के चरणों पर आ गिरा ॥ (2) टोका कवित्त । I "कियो अपराध हम, साधु कीं दुखायों", "पहो बड़े तुम साधु हमनाम साधु घट्यो है”। “रहो अजू सेवा करौं" "करी तुम सेवा ऐसी जैसी नहीं काहू मांझ, मेरो मन भयो है” ॥ चले सुख पाइ, दृग भूत से छुटाइ दिये, हिये ही की पांखिन सो ये काम परखो है। बैठे बन मध्य जाइ, भूखे जानि पाप पाइ भोजन कराइ "चलो छाया दिन ढल्यो है ” ॥ १७३ ॥ (६२९४५६) बार्तिक तिलक | व्याकुलता से बोला कि "हम दोनों से बड़ा अपराध हुरुपा; हम से सन्तने दुःख पाया; हम बड़े अभागी हैं !” आस्वासन पूर्वक पापने उत्तर दिया “अहो, तुम वस्तुतः बड़े साधु हो; मैं तो साधु बेषको महा कलंक<noinclude></noinclude> 2fmlbm77xyt05jmm72ux4ev7r71rhl2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१७ 250 194279 664502 2026-07-02T17:09:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664502 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५४= 1986-00- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 548 लगानेवाला बास्तव में बड़ा साधु हूं, साधु का ता केवल नाम मात्र मुझे है”। तब भक्तने विनय किया कि "महाराज ! आप रहिये, में पाप की सेवा पौषधि करूँ" । पापने उत्तर दिया कि “तुमने तो ऐसी सेवा करके मेरा मन हर लिया कि किसीसे ऐसी कहां हो- सकेगी; तुम हरिकृपासे बने रहो, भगवद्भजन तथा सन्तसेवा किया करो” । श्रीबिल्वमंगलजी नेत्र रूपी प्रेतों को अपने शरीर से छुड़ाके, सुख पूर्व्यक श्रीवृ- न्दाबन को चल खड़े हुए। पथ बाहर की आंखों से तो स्थूल भौतिक वस्तु के देखने का काम रहगयाही नहीं, हृदय के नयन से सुखपूर्वक प्रयोजन साधते चलके एक बन के मध्य जा बैठे। श्री बिश्वमंगल जी को भूखे देख, श्री वृन्दा- बनबिहारी जी ने स्वयं पाकर प्रसाद पधाय के कहा कि “दिन ढर चला, संध्या समीप है, छाए में चलो” ॥ (22) टीका । कथित चलेले गहाई कर, छाया घन तरु तर; चाहत छुटायो हाथ छोड़ें कैसे ? नीकी है । क्यों क्यों बल करें त्यो त्यों जतन एक परें, लियोई छुटाइ, गह्यो गाढ़ो, रूप हीको है ॥ ऐसेही करत वृन्दाबन घन पाइ लियो. पियो चाहें रस, सब जग लाग्यो फीको है । भई उतकंठा भारी, पाये श्री बिहारीलाल, मुरली बजाइ के सुकियो भयो जीको है ॥ १७४॥ (६२९ - ४५५) 600<noinclude></noinclude> f5tumbflqdno9vaj3eqd9blujfthp03 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१८ 250 194280 664503 2026-07-02T17:10:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664503 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>० 549 श्रीमाल सटीक | वार्त्तिक तिलक | ५४८ श्री प्रभु करुणाकर भक्त बत्सल जी हाथ पकड़ा के पापको एक घने वृक्ष की सुखद छाया के तले बैठा के अपना कर सरोज आपके हाथ में से छुड़ाने , लगे; पाप भला कैसे छोड़ना चाहते; क्योंकि वह कर कमल अति प्रिय ब्रह्मस्पर्श सुखंद था परन्तु बल कर के छुड़ाके प्रभु अलग होगए । झाप बोले “हाथों में से तो निकलेजातेहो, पर यदि मन में से सरकोगे तो देखूंगा । इसी प्रकार प्रभु के सहारे से वृन्दाबन में पाकर श्री वृन्दावन के कुंज में जमके रहे; संसार फीका लगने लगा; सब ओर से चित की वृत्ति इकट्ठी कर के श्री कृपासे भगवत का प्रेम रस पीना चाहा । "सब के ममता ताग बटोरी । ममपद मनहिँ बांध बट डोरी” ॥ युगल सर्कार के दर्शन की उरकला प्रबल हुई। "राम चरण पंकज जब देखौं । तब यह जन्म सफल करि लेखौं"। श्री बिहारी जी कृपा करके पाए। बंशी की मीठी तान सुनाई; इनके हृदय का भावता मनोरथ पूर्ण किया ॥ (ई) टोका कवित 1 खुल गए नैन ज्यों कमल रबि उदै भए, देखि रूप रासि बाढ़ी कोटि गुनि प्यास है। मुरली मधुर सुर राख्यो मद भरि माना ढरि माया कामन में, पानन में --909<noinclude></noinclude> epvf58azerlxf9nkfego41yoq98ektl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६१९ 250 194281 664504 2026-07-02T17:10:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664504 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५५० श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वादः । भास है ॥ मानिकै प्रताप चिंतामनि मन मांझ भई, “चिंतामनि जैति” दि बोले रसरास है । "करुना मृत" ग्रंथ, हृदै ग्रंथि कौं बिदारि डारे, बांधे रस ग्रंथ पन्थ युगल प्रकास है ॥१७५० (६२९– ४५४) वार्त्तिक तिलक | श्रीबिहारीजीने के मुरली बजाई; उस्की तान सुन, आपने जाना कि यह तो बिहारी लाल के मुख की ही वंश है; इसे स्वरूप माधुरी देखने की अभिलाषा हुई। तब जैसे सूर्योदय से कमल खिल जाते हैं, वैसेही के नयन खुलाए । सामने करुणासागर शोभाराशि भगवान् के दर्शन प्राप्त हर्ष से फूले, पानन्द हृदय में टता नहीं था, दर्शन से भला कब तृप्ति होती है ? छबिसमुद्र का मुखचन्द्र देखते रहने की प्यास कोटि- गुण अधिक बढ़ती चली। श्री वंशी का वह मधुर स्वर सुनकर यानन्द मग्न हो गए, उस श्रवणामृत ने इनके कानों में पहुंच कर इनको मतवाला कर दिया; मुरली ध्वनि की गूंज सदा बनीही रही; और मुखारबिन्द के प्रकाश का कहनाही क्या है । आपने चिन्तामणि के उपदेश का प्रताप जान, मन में गरु तुल्य मान, "जयति चिन्तामणि' यादि शब्द, उच्चारण किये; रसराशि शृङ्गार ग्रन्थ में, जिसका नाम श्रीकृष्णा करुणा मृत" है, पर जो जीव मात्र की हृदय 16:00- 550<noinclude></noinclude> imdkr0qrun1w6wydporw1qzc7sw5ldg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२० 250 194282 664505 2026-07-02T17:10:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664505 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>551 8600- श्रीमतमाल सटीक ग्रन्थि के खोलने के लिये पति पपूर्व है; ऐसी चमत्कृति दिखाई है, कि वह ग्रन्थ श्रीयुगल सर्कार (प्रियाप्रियतम ) के रूपमाधुरी प्रेमरसमें गांठ बांधदेता हैः तथा प्रभुकी प्राप्ति के सुन्दर मार्ग का प्रकाशक ही है । (27) टीका | कवि । चिन्तामनि सुनी " बन मांझ, रूप देख्यो लाल," - गई निहाल, आई नेह नातो जानि के । उठि बहु मान कियो, दियो दूध भात दोना, “दे पठावें नित हरि हितू जनमानि " ॥ लियो कैसें जाइ, "तुम्हें भाय स दियो जो प्रभु, लेहीं नाथ हाथ सौं जो देहैं सनमानि - कैं"। बैठे दोऊ जन, कोऊ पावे नहीं एक कन, रीके श्याम- घन, दोनो दूसरो हूं पनि के ॥ १७६॥ ( ६२९-४५३ ) बार्तिक तिलक | चिन्तामणि जी को यह बिदित हुआ कि "श्री बिल्व मंग पर विशेष कृपा श्री युगल सर्कार की हुई; और श्री ब्रजचन्द्र महाराज के दर्शन पाए हैं"। वह पति हर्ष की प्राप्त हुई, निहाल हो गई, पिछला नेह नाता सुरति कर रूपनेक मनोरथ करती वह भी श्री वृन्दावन आपके पास बड़े भाव से पाई। देखतेही पाप उठखड़े हुए, बड़े पादर भाव से सत्कार किया; श्री युगल सर्कार (ललीलाल) का प्रसाद दूध भात जो कि प्रभु नित्य ही अपना स्नेही जनमान के भेज दिया करते थे, सो दिया । २३<noinclude></noinclude> 39qtkusxpple4csoqh3c3he6nlr5j84 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२१ 250 194283 664506 2026-07-02T17:10:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664506 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५२ 1288000- श्रीभक्तिधाविन्दु स्वाद । -90 इन ने पूछो कि "यह प्रसाद का दोना कहां से कैसे पाया किसने दिया ?” आपने उत्तर दिया कि "स्वयं भगवत कृपा करके अपने कर कमलों से भेज दिया करते हैं" । यह सुनते ही बोल उठी कि “जब वे कृपा करके आपही अपने हाथों से ही देंगे तो लूंगी; ” । नाप पायें न चिन्तामणि पावें, दोना रखा है और दोनों भजन कर रहे हैं । श्री बिल्वमंगल जी की भक्ति भाव तथा श्री चिन्ता- मणि जी का सच्चा पन जान के श्री भाववश भगवान् ने दर्शन दे दूध भात का दूसरा दोना भी कृपा किया ही । कृतकृत्य हो दोनों ने धन्यवाद गुणानुबाद पूर्वक मिलके प्रसाद पाया ॥ पागे क्या कहूं ? प्रेम की जय ! प्रेम प्रिय प्रभु की जय !! परम प्रेमियों की जय !!! श्रीविष्णु पुरी जी । (333) कलि जीव जँजाली कारनै, “बिष्णुपुरी” बड़ निधि राँची || भगवत धर्म उतंग आन धर्म आननन देखा । पीतर पटतर बिगत, निषक ज्यौं कुंदन रेखा ॥ कृष्ण- कृपा कहि बेलि फलित सतसंग दिखायो । कोटि ग्रंथ को अर्थ, तेरह बिरंचन में 600- 552<noinclude></noinclude> 06br63qngb2xywlw866yrrxtkt6d3k7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२२ 250 194284 664507 2026-07-02T17:10:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664507 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>553 श्रीभक्तमाल सटीक । ५५२ गायी ॥ महा समुद्र भागौत तें, “भक्ति- रतन- राजी" रची। कलि जीव जँजाली कारनै, “बिष्णु पुरी” बड़ि निधि राँची ॥४२॥ "पीतर " = पीतल । " निकय" कसोटी (सुनार की) । R - “आनन न देखा”=मुंह न देखा । “राजी” पंक्ति, माला । "आम धर्म आजनम देखा" - अन्य धर्मों का मुंह भी नहीं देखा। "आन घमे आनन देखा=आन ( सपथ ) करके आन [ अन्य ] धन को नहीं देखा। वा अन्य धर्मों को, अपनी मति में आज के [ला के] देखा भी नहीं । "पटतर" - सरिस, उपमा । "विरंचम"=लर, माला की लड़ियां । बार्त्तिक तिलक । श्रीविष्णुपुरी जी ने कलियुग के जंजाल कंकट में उलझे उल हुए, भगवतभक्ति सम्पत्तिहीन दरिद्री, जीवों के उपकारार्ध बहुत बड़ा धन ( महानिधि) संचय किया । श्रीभगवत धर्म (नवधा, प्रेमा, परा मक्तियों) को स धर्मों से ऊंचा जानके वैसाही वर्णन किया; और अन्य धर्मों (वर्ण तथा श्रम के धर्मों) का मुख भी (पान) सपध करके नहीं देखा; किस प्रकार कि जैसे सोनार की कसौटी में पीतल घिसने से उस्का रंगरेखा बित हो जाता है अर्थात् कसोटी किंचित भी ग्रहण नहीं करती, पौर कुन्दन सुवर्ण के रंगरेखा पति चमक युक्त उपट पाते हैं; इसीप्रकार आपकी मति तथा भणि- में भगवतधर्म चकार युक्त चमकता है । 1000-<noinclude></noinclude> h9wxjw019uj14xsty8wjg1rm4q1is0j पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२३ 250 194285 664508 2026-07-02T17:11:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664508 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५५४- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । श्रीकृष्णचन्द्र जी की कृपा रूपिणी बेलि ( लता :) का फल सत्संग को कह दिखाया । उक्तग्रन्थ ("श्रीभक्ति रसूनावली") के तेरह ही बिरं- (माला की लड़ियों) में करोड़ों ग्रन्थों का तात्पर्य संग्रह कर गाया है । श्रीमद् भागवत रूपी मही समुद्र में से निकाल के "भक्तिरत्नावली" भक्ति की माला पानसी rai (श्लोकों) की पूर्व रची है ॥ (2) टोक कवित । जगनाथ क्षेत्र मांझ बैठे महा प्रभु जू षे, चहूं पोर भक्त भूप भीर प्रति छाई है। बेले “बिष्णुपुरी, पुरी काशी मध्य रहे, जाते जानियत मोक्ष चाह नीकी मन पाई है" ॥ लिखी प्रभु चोठी “पापु मणिगण माला एक दीजिए पठाइ, मोहि लागत सुहाई है”। जानि लई यात, निधि भागवत, रत्नदाम दई पठे आदि मुक्ति खादिके बहाई है ॥ १७७॥ (६२९-४५२) वार्तिक तिलक | एक दिन श्रीविष्णुपुरी जी के सतगुरु महाराज श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु जी श्रीजगन्नाथपुरी में भक्त- राजों की भीड़ के मध्य सन्त समाज में विराजमान थे, उन्हीं में से कोई कोई कहने लगे कि “विष्णुपुरी जीने काशी में बास किया है इस्से जान पड़ता है कि मुक्ति की इच्छा भले प्रकार मन में रखते हैं”। महाप्रभु ने सब को समझाया कि ऐसा नहीं है, वह उनमें से जी 554<noinclude></noinclude> ohf5580awpk1pfiiuuwrbb205xgehmo पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२४ 250 194286 664509 2026-07-02T17:11:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664509 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>3000- 555 श्रीभक्तमाल सटीक | हैं कि जो, "मुक्ति निरादरि भक्ति लोभाने” इस प्रकार के अनुरागी हैं। और उन लोगों के समाधानार्थ यह काम किया कि इनको एक पत्र लिखा कि "रत्नों की एक माला भेज दो; मुझे प्रिय लगती है । " पाप ने श्रीमद् भागवत में से रत्न रूपी ५०० श्लोक चुन और संग्रह करके, अपूर्व माला रूपी एक पोथी “भक्तिरत्नावली” नाम रख भेज दी, कि जिसमें रूखी मुक्ति सूखे मोक्ष को तो जढ़से ही खोद के बहा दिया है और भागवत धर्म हरिभक्ति भगवत प्रेम की महिमा तथा ऐसी विलक्षणता प्रकाशित की है कि जिस्की पढ़ते ही सब " साधु साधु” कह उठे । उक्त ग्रन्थ भक्तों के देखने ही योग्य है (2) अपय । "विष्णुस्वामिसंप्रदाइ" दृढ़ "ज्ञानदेव"" गंभीर मति ॥ " नाम " "तिलोचन" शिष्य, सूर शशि सदृश उजागर। गिरा गंग उन- हारि काव्य रचना प्रेमाकर ॥ आचारज, हरिदास, अतुल बल आनंददायन । तेहिँ मारग "बल्लभ” बिदित, पृथुपधति परा- यन ॥ नवधा प्रधान सेवा सुदृढ़, मन बच 8-0-00-<noinclude></noinclude> sqf2itwbn0i2722kft1rjbspcjxhpg8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२५ 250 194287 664510 2026-07-02T17:11:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664510 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-५५६ श्रीभक्तिसुधाषिन्दु स्वाद । 556 क्रम हरि चरन रति । विष्णुस्वामि संप्र- दाइ दृढ़" ज्ञानदेव" गंभीर मति ॥४३॥ (X) वार्तिक तिलक श्रीविष्णुस्वामी सम्प्रदाय में, गम्भीरमति “श्री ज्ञान देव" जी प्रसिद्ध हैं; जिन के शिष्य (१) श्री नामदेव जी पोर ( २ ) श्री तिलोचन जी, सूर्य्य तथा चन्द्र के सरिस उजागर हुए और श्री ज्ञानदेव जी की गिरा (बाणी) श्री गंगा जी की नाई निर्मल और संसार को पवित्र करनेवाली हुई, जिस बाजी से प्रेम की खानि काव्य की रचना कर हरि यश गाया। प्राचार्य (गुरु- वर्ग), तथा हरिभक्तों का, पतुलित बल विश्वास प्राप में था; जिन सबों को पति पामन्ददाता हुए। के हृदय १. श्री ज्ञानदेव जी; २. श्रीनाम देव जी; ३. श्री त्रिलोचन जी; ४. श्री बल्लभाचार्य जी । इसी मार्ग (सम्प्रदाय) में, जगविख्यात, पृथुपद्धति अर्थात् प्रभु पूजन अर्चन में परायण, “श्रीबल्लभाचार्थ्य हुए; कि जिन्होंने नवधा भक्ति ही को प्रधान मान, प्रभु की सेवा में अत्यन्त दृढ़ होकर मन बचन कर्म से श्रीहरिचरणों में प्रीति की। जी" बिष्णुपुरी जी ने भगवत धर्म को अति उतंग मान करके आन धर्मों को नहीं देखा । अथवा, अन्य धर्मों की आन [कानि] रखने की तो बात क्या उनकी ओर देखा भी नहीं । [2] टीका | कवित्त । विष्णुस्वामि सम्प्रदाई बड़ोई गंभीर मति, “ज्ञान- -9008<noinclude></noinclude> hf3ip681ut0k7wxlfy1rus5263o8gj8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२६ 250 194288 664511 2026-07-02T17:11:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664511 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>557 5000- " श्रीभतमाल सटीक ५५७ देव" नाम, ताकी बात सुनि लीजियें । पिता गृहत्याग, पाइ ग्रहण सन्यास कियो, दियो बोलि झूठ “तिया नहीं,” गुरु कीजियें ॥ पाई सुनि बधू पाछें, को। जान्यो मियाबाद, “भुजनि पकरि मेरे संग करि दीजियें " । ल्याई सो लिवाइ, जाति प्रति हों रिसाइ, दियो पंक्ति मैं डार, रहें दूरि, नहीं छीजियें ॥१७८॥ | (६२९ - ४५१) श्रीज्ञानदेवजी । धार्तिक सिलक । fargeवामी सम्प्रदाय में बड़े गम्भीरमति श्री ज्ञान देव जी, उनकी कथा सुनिये। आपके पिता ने अपना घर छोड़ पाके सन्यास ले लिया। पूछने पर गुरुजी सेझूठ कहा था कि "मेरे पत्नी नहीं है, मुझे शिष्य कर ली- जिये" ( क्योंकि स्त्री रहते संन्यासी वैरामो बनाने वाले को बड़ा दोष होता है ) ॥ परन्तु पीछे उनकी स्त्री पहुँची और बिगड़ के कहने लगी कि "हे महाराज ! बलसे हाथ पकड़ के इनको मेरे साथ करही दीजिये", पर पापको अपने साथ घर लेही पाई । जाति के ब्राह्मणों ने अत्यन्त क्रोध करके इन दोनो की पपनी पंगति से निकाल दिया कि "ब मिलने योग्य नहीं हैं, " । इस्से जाति पांति से पृथक रहते थे ॥ (2) टीका | कवित्त | भए पुत्र तीन, तामें मुख्य बड़ो ज्ञानदेव जाकी कृष्ण- 188600- -600-<noinclude></noinclude> se2wa8lgx2hzkrr5dg4xrr75zcd19wn पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२७ 250 194289 664512 2026-07-02T17:11:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664512 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1600- श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । देव जू सें हिये की सचाई है। बेद न पढ़ावे कोऊ कहैं सब "आति गई, " लई करि सभा अहो कहा मन उस ई है ॥ "बिनस्यो ब्रह्मत्व" कही "श्रुति अधिकार नाहिँ,” बोल्यो यें निहारि "पढ़ें भैंसा" ले दिखाई है। देखि मैक्ति भाव, चाव भयो, प्रानि गहैं पांव, कियोई सुभाव बही गही दीनताई है ॥ १७९॥ (६२९---४५०) बार्तिक तिलक । उनके तीन पुत्र हुए जिनमें सब से बड़े श्री ज्ञान- देव जी हैं जिनको श्री भगवतश्चरण में सत्य प्रेम था ( दूसरे " महानदेव' तीसरे “सोपानदेव" ) ॥ जय श्री ज्ञानदेव जी पढ़ने योग्य हुए, तब ब्रा- ह्मणों के पास बेद पढ़ने गए; परन्तु किसीने पढ़ाया नहीं; कारण यह कह के कि "तुम्हारा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है" । श्रीज्ञानदेव जी भगवत विभूति साधु पव- तार तो थे ही, अतः सभा करके इनमे सब ब्राह्मणों से कहा कि " लोगों के मन में हमारी क्या न्यूनता पाई है, क्यों बेद नहीं पढ़ाते ?” ब्राह्मणों ने वही उत्तर दिया कि “तुम्हारे पिता सन्यास लेकर पुनः आय के गृहस्थ हुए इस्से तुम्हारा ब्रह्मत्व नष्ट हो गया, बेद का अधिकार नहीं रहा" । आपने कहा कि " पूर्णब्रह्म श्री भगवान् को मन कर्म बचन से प्रेम जाननेवाला वास्तविक ब्राह्मण मकि केवल वेद पाठी हो; वेद तो एक भैंसा भी पढ़ 558<noinclude></noinclude> 2i5yqkjn7i5y0ngh16e2piuukyoczx0 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२८ 250 194290 664513 2026-07-02T17:11:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664513 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>559 3000 के श्रीमंतमाल सष्टीक । ५५९ सकता है" इतना कह कर जिस्के स्वास से बेद हुए हैं उन श्री युगल सर्कार (ललीलाल) का स्मरण कर, पास एक भैंसे को कि जो संयोग से वहां ही पा गया था, आज्ञा की कि "वेद पढ़ सुना" । वह पशु, शिक्षित ब्राह्मण से भी भली रीति तथा उत्तम मधुर स्वर से स्पष्ट और शुद्ध बेद पढ़ चला। सुनके सबकी बुद्धि चक्कर ई लज्जित हुए, पर भगवत की भक्ति में प्रतीति की; श्री भक्ति महारानी का प्रभाव और प्रताप जाना । श्रीज्ञानदेव जी के चरणों में पढ़कर अपने देह जात्याभिमानको त्याग, आप के शिष्य, तथा अनुमत में स्थित हो, दीनतापूर्व्यक भगवत भक्ति ग्रहण की ॥ श्री त्रिलोचन जी । (2) टीका कवित्त भये उभे शिष्य नाम देव श्री तिलोचन जू, सूर शशि नाई कियो जग में प्रकास है । "नाम" की तो बात सुनाए; सुनो दूसरे की सुनेई बनत भक्त कथा रस रास है | उपजे बनिक कुल सेवे “कुल पच्युत' को ऐपै नहिं बने, एक तिया रहे पास है । दहलू न कोई “साधु मनही की जाति लेत" येहि अभिलाष सदा दासनि को दास है ॥ ९८० ॥ ( ६२९ - ४४९ ) "नाम"श्री नामदेव जी । "अच्युत कुल" = वैधाव | बार्तिक तिलक । श्री ज्ञानदेव जी के दो शिष्य हुए ( १ ) श्री नाम २४ -9008<noinclude></noinclude> kbcq0mmlax1ks8xbr6fgdb9ka11xs9p पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६२९ 250 194291 664514 2026-07-02T17:12:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664514 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६० 1830-00-- श्रीमति सुधाबिन्दु स्वाद । 560 -90988 देव जी र ( २ ) श्री त्रिलोचन जी । सूर्य्य पोर चन्द्र के समान दोनों ने संसार में प्रकाश किया। जिन मेंसे " श्री नामदेव जी " की वार्त्ता तो ऊपर (पृष्ठ ४०१) में कही ही जा चुकी है; दूसरे (श्री त्रिलोचनजी) की भक्ति की कथा ऐसी पूर्ण रस की भरी है कि सुनते ही बनता है; सो सुनिये - आप वैश्य वर्ण में उत्पन्न थे; और "पच्युत कुल” अर्थात वैष्णवों की सेवा किया करते । दोही प्राणी थे, पाप और इनकी धर्मपत्नी; घर में तीसरा कोई न था। आप को साधुसेवा में ऐसा प्रेम था कि सदा यही बड़ी लालसा रहती थी कि 'हरि कृपा से कोई ऐसा नोकर हाथ लगता कि जो सन्तों के मन की बूझ बूझ उनकी रुचि के अनुसार टहल किया करता ; ये हरि- दासों के दास, इसी सोच विचार में रहा करते थे ॥ (टेरेरे) टीका | कवित्त । आए प्रभु, टहलुवा रूप धरि. द्वार पर, फटी एक कामरी पन्हैया टूटी पाय हैं। निकसत पूछें “अहो कहां से पधारे माप ? बाप महतारी और देखिये न गाय हैं ॥ " बाप महतारी मेरे कोऊ नाहिं सांची कहों, गहीं मैं टहल जो मिलत सुभाय है”। “अनमिल बात कौन? दीजिये जनाय वहू, " "पाऊं पांच सात सेर, उठत रिसाय हैं ॥ १८९ ॥ ( ६२९-४४८ ) "लाए हैं कपन किया । 128000--<noinclude></noinclude> iob8ja4dfo7x90lw2oidtlfsqrvvinl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३० 250 194292 664515 2026-07-02T17:12:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664515 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>561 8600- श्रीमाल सटीक | ५६१ वार्त्तिक तिलक । भक्त की नीखी अभिलाषा जान, एक दिन स्वयं प्रभुही एक टहलू के रूप से; कंधे पर फटी कमली घरे पावों में टूटी नही पहिने, भाप के द्वार पर आ ही तो पहुँचे । श्री त्रिलोचन जी ने घर से निकलतेही याप को देख मा बाप घर घ्यादि का प्रश्न किया। आपने उत्तर दिया कि "सच कहता हूं मेरे बाप मां कोई नहीं हैं। जो मुझे रक्खे, और मेरा उस्का स्वभाव मिल जाय, तो मैं सेवा टहल भले प्रकार करता हूं” । श्री तिलोचन जी ने पूछा कि "आपके सुभाष में अनमिल वार्त्ता कौनसी है ? सोभा तो बता दीजिये" । टहलू जी ने उत्तर दिया कि "मैं पांच सात सेर खाता हूं; इसी से जिसके हां रहता हूं सो रिसाय उठता है, ग्लानि मान- ने लगता है; तब में चलही देता हूं ॥ " (212) टीका | कवित्त | "वारि ह बरन की ज रीति सब मेरे हाथ, साथ हू जु हू न चाहों, करों नीके मन लाइ के भक्तन की सेवा सो सौ करत जनम गयो, नयो कछु नांहि, डारे बरस बिताइ के || "अंत्रजामी" नाम मेरी, चेरो भयो तेरी ह्रीं तो, " बोल्यो भक्त "भाव, खायौ निशक रूपघाइ कै।” कामरी पन्हैयां सब नई करि दई, और मीड़ि कै हवायो, तन मेल की छुटाइ के ॥१८२॥ (६२९-४४०) 1880000<noinclude></noinclude> p1cqgyb824wwxs6m33u9hlref3qbqg8 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३१ 250 194293 664516 2026-07-02T17:12:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664516 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६२ kob श्रीभक्तिसुधा बिन्दु स्वाद । बार्त्तिक तिलक | "चारो बर्णों की रीति मैं सब जानता हूं, मेरे हाथों में है, पर पकेलाही सब टहल कर लेता हूं, मन लगाके भली भांति सेवा किया करताहूं; विशेष करके हरि भक्तों सन्तों की सेवा तो करते बरसों क्या बरन् सारा जन्मता, कुछ नई बात नहीं; मेरा नाम “अन्तर्यामी है; मैं पापका बाकर हुध्या । " 562 (दो० ) " चार घरन की चातुरी सरे न मेरी काम । भक्त सेव जी जानई तौ रहु मेरे धाम" || त श्री त्रिलोचन जी ने हर्षित होकर कहा कि “जि- तना चाहो उतना पाके खाइयो, कुछ शंका मत करो" । इनको पच्छी प्रकार से अंग मांजमांज के स्नान कराकर, पगरखी ( पनही ) तथा कमली आदि नई मँगवादी ॥ तब सन्तों का दहल सौंपा ॥ (2३३) टोका कवित बोल्यो घरदासी से, “तूं रहे याकी दासी होइ, देखियो उदासी देत ऐसो नहीं पावनो । खाय सो खवावा, सुख पावो नित नित किये, जियें जग माहिं to मिलि गुन गावनी" || पावत अनेक साधु, भावत टहल हियें, लिये चाव दाबे पाँव, सबनि लड़ा- वनौ । ऐसें ही करत, मास तेरह बितीत भए, गए बात को चलावनी ॥१८३॥ (६२९ - ४४६) बार्तिक तिलक । -28006- स्त्री से कहा कि " तू इस्की दासी सी रहियो, दे-<noinclude></noinclude> 93fysk3bmxtbknkgy2tfvdsp5tndy95 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३२ 250 194294 664517 2026-07-02T17:12:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664517 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>563 1886-06- श्रीभक्तमाल सटीक । ५६३ -90988) खना, उदास होके खाने को देने से यह चला जावेगा और फिर ऐसा सेवक मिलने का नहीं, जितना खाय से खिलाना, सुख पूर्वक नित्यही इसके लिये रोटो क- रना । जब तक हम तुम जियें, तब तक तीनों मिल के साधु सेवा पर भगवत का भजन करें" पस्तु । इस भांति इनके भोजन के विषय में विशेष करके उसे समझा बुझा दिया । अन्तर्यामी ने सन्तों की टहल प्रारम्भ की; साधु तो यहां पहिलेही से पनेक पाया करते थे, पर औरभी अधिक पानेलगे; क्योंकि अन्तर्यामी उन की बड़ी चाव भाव से टहल सेवा करते, चरण चांप- ते; "अन्तर्यामी" अन्तर्यामी ही निकले; जिस्को जो रुचि होती वैसीही करते, जो जहां पुकारते उनके पास वहीं पहुच जाते; इसी रीति से सब सन्तों को लाड़ लड़ाया करते थे; | निदान चारो खूंट में श्री त्रिलोचन जी की साधुसेवा की धूम मच गई। इसी भाँति एक बर्ष से एक महीना अधिक बीत- तेही तनक सी बात चलातेही उसीक्षण "अन्तर्यामी” अन्तर्धान ही हो गए ॥ (233) टीका । कत्ति । एक दिन गईही परोसिनि के भक्तबधू, पूछि लई "हो! काहे क मलीन हैं?" बोली मुसुकाय, “वे टहलुवा 'लिवाय ल्याये, क्यौंहू न पधाय खोट, पीसि 3400- •90988<noinclude></noinclude> qokr4yqz41f6f2mmhjwdd3kgd1b5kmv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३३ 250 194295 664518 2026-07-02T17:12:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664518 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६४ श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । तन छीन है ॥ काहू सौं न कहीं, यह गहीं मन मांझ एरी, तेरी सौं सुनैगी जी पे जात रहे मीन है" । सुनि लई यही नेकु, गए उठि, हुती टेक, दुखहूं रूपनेक जैसे जल बिन मीन है ॥ १८४॥ (६२९-४४५) "भीम" - भिनसारे, प्रभात, सबेरे । “ये" = मेरे पति । वार्तिक तिलक । एकदिन श्री त्रिलोचन जी की घरनी, अपने एक पड़ोसिन के पास गईथी; उसने पूछा कि "परी सखी! तुम दुबली क्यों हुई जाती हो ? “ इसने मुसकाय के उत्तरदिया कि “बहिन ! ये (मेरेस्वामी) एक टहलुवा लाए हैं; वह खोटा पांच सात सेर खाता है तौभी उस्का पेट भरता ही नहीं, उसी के लिये (पाटा पीसते) रोटी करते मैं पिसी जाती हूं । इसी से शरीर दुर्बल हो गया है । परन्तु, बहिन ! यह भेद तुम्ही से कहती हूं, तुम पपने मनही में रखना किसी से कहना नहीं, जो वह सुन पावेगा तो भीनहीं (सवेरे ही) चलदेगा" | फिर क्या था, अन्तर्यामी ने सुना और कर्पूर से उड़ गए। यह तो पहिले ही टेक घराखी थी हीकिं “भोजन करने की निन्दा होतेही मैं मागे ठहरने का नहीं" । अन्तर्यामी के चले जाने से भक्तराज जलहीन मीन की नाई प्रति बिकल हुए । (2+३) टीका कवि | बीते दिन तीनि पन्न जल करि हीन भये, “ऐसो 564<noinclude></noinclude> ss34iccyoc28sqs81m6d0j1fckulv2u पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३४ 250 194296 664519 2026-07-02T17:12:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664519 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>565 Boob- श्रीमंतमाल सटीक | 낙폭낵 1986-06- सी प्रधीन हो फेरि कहाँ पाइयें ? । घड़ी तूं प्रभागी ! बात काहे को कहन लागी ? रागी साधु सेवा में जु कै- जु सेकरि ल्याइयें ? ॥ भई नभ यानी "तुम* खावो पीवो पानी, यह मैंही मति ठानी, मोकौं प्रीति रीति भाइयें । मैं तो हीं अधीन, तेरे घरही में रहीं लीन, जोपैं कही, सदा सेवा करिये काइयें ॥१८॥ (६२९-४४४) *तुम खावो पोवो पानी | पाठान्तर "खाबो अब पीवो पानी” बार्त्तिक तिलक | अन्तर्यामी के बिना, श्री त्रिलोचन जी को पत्र अल बिन तीन दिन व्यतीत होगए; स्त्री से बोले कि "आह ! वैसा प्रबीण सेवक फिर कहां मिलनेका ? अब मैं साधु- सेबा किस प्रकार से करूं ?” अभागिन ! तूने क्यों उस्की बार्त्ता चलाई ? वह साधु सेवा में प्रति अनुरागी था । अब उस्को कहां से कैसे लाऊं ? भक्तराज त्रिलोचन जो काशबाणी हुई कि "तुम प्रसाद पाप्रो जलपान करो उपवास मत करो, यह 'अन्तर्यामी' नामक तुम्हारा टहलू में ही था; और मैं सदा तुम्हारेही पास हूं भी; यदि अब भी तुम्हारी इच्छा हो, तो वैसोही सेवकाई सन्तों की मुझे स्वीकार है; मैं तो सदैव भक्तों ही के अधीन हूं, कहो तो फिर पहुँचूँ ?” (टीई) टीका कवित्त । "कीने हरिदास, मैं तो दास हू न भय नेकु, बड़े उपहांस मुख जगमें दिखाईयें। कहें जन "भक्त” कहा 18000- --909881<noinclude></noinclude> llr420llgy0xk7qkiuve5r3pec1xwz9 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३५ 250 194297 664520 2026-07-02T17:13:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664520 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६६ 18Bape- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु' स्वाद । भक्ति हम करी कहां ? अहो ! अज्ञताई रीति मन में न पायें | उनकी तो बात बनि पावे सब उनहीं सौं होकौं लेत मेरे पौगुन छिपाइयें । आए घर मां मूढ़ मैं न जान सक्यौं! पाप क्यों हूं तॐ घाय पाय लपटाइयै” ॥१८६॥ (१२६-४४३) गुन वार्तिक तिलक | इस प्रकार श्रीप्रभु की पाकाश बानी म जी ग्लानि से बिलाप करने लगे कि सुन त्रिलो "मैं कैसा दास हूं हा ! मुझ से दासत्व भी कुछ न बना ! स्वयं प्रभु दास होके रहे, यह भारी उपहास की बात हो गई, मैं संसार में क्या मुँह दिखाऊ ? लोग मुझे भक्त कहते हैं, धिक्कार मेरी भक्ति को !! ऐसी अज्ञानता मेरी सो प्रभु के मन में भी न पाई । " । सर्कार की बात तो सर्कारही से बनाती है, दूसरे की सामर्थ्य कहां ? शील, स्वभाव, कृपा की बलिजाऊं, पाप तो गुणही को ग्रहण करते हैं, शरणागत के दोषों को छिपाते हैं । घर में पाप कृपा करके इतने दिनों बिराजमान रहे, तब भी मुझ मूढ़ ने न जाना | कैसे पाऊ तो दौड़ कर चरण कमलों में लपट जाऊ । " इसी प्रकार श्रीत्रिलोचन जी ने प्रेम पश्चात्ताप कर, फिर श्री प्रभु की कृपालुता स्वभाव स्मरण पूर्वक भजन पोर सन्त सेवा में जीवन को व्यतीत किया । "तुम कहँ, भरत ! कलंक "यह, हमसब कहँ उपदेश" ॥ भक्त भक्ति भगवन्त की जय ! जय !! जय !!! 566<noinclude></noinclude> dyf7ibze4bxjetlnpgq8g6dqm2ijpvx पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३६ 250 194298 664521 2026-07-02T17:13:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664521 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>567 श्रीमत्क्तमाल सटीक । (21) टीका कवित श्री बल्लभाचय्य जी । हिये में सरूप, सेवा करि अनुराग भरे, ढरे पोर जीवनि की, जीवनि को दीजियें । सोई ले प्रकास घर घर में बिलास कियो, अति ही हुलास, फल नैननि कौं लीजियें ॥ चातुरी पवधि, नेकु पारी न होति कि- हूं, बहूं दिशि नाना राग भोग सुख कीजियें । “बल्लभ जू नाम लियो “पृथु " अभिराम रीति, गोकुल मैं धाम जानिसुनि मन रीझियें ॥१८॥ (६२९ - ४४२) वार्तिक तिलक । ૫૬૦ श्री बल्लाचार्य जी की बात्सल्य रस भरी भक्ति रीति पति पनूप थी । हृदय में प्रभु स्वरूप का ध्यान धरे हुवे अन्तर तथा बाहर में प्रति अनुराग से सेवा पूजा करते थे । ध्यान सेत्रा सुख पाकर पाप पनुग्रह कर और जीवों की ओर ढरे । यह विचार किया कि यह जगतजीवनप्रभु की अमृत संजीवनी भक्ति अपने आश्रित जनों को भी देना चाहिये । सी ऐसा ही किया, कि वह प्रीति रीति शिष्य वर्गों के घर घर में प्रकाशित कर प्रभु के बिलास में हुलास पूर्ण कर दिया । पाप के सदन में, तथा सेवकों के घरों में, प्रभु विग्रह की झांकी कर नेत्र सफल होते थे । सेवा आदिक कृत्यों में पाप चातुरी की अवधि और परम धीर थे; किसी प्रकार से किंचित मी आतुरता छाप से २५ •-909 3-600-<noinclude></noinclude> 27j7t6dj4k48957rii3783dymr31b8g पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३७ 250 194299 664522 2026-07-02T17:13:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664522 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude># 188600- -9098 श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । नहीं होती थी । नानाप्रकार के भोगपदार्थ तथा राग- रागियों से यशलीलागान का मानन्द लिया करते थे । श्रीबल्लभा- चार्य्यजी श्रीलक्ष्मणभह श्रीविष्णुस्वामी जी श्रीनामदेव जी तथा श्रीत्रिलोचन जी शिव जी से ४६ वें श्रीज्ञानदेव जी श्रीज्ञानदेव जी के छप्पय ( पृष्ट ५५५ ) में जो श्री १०८ नाभा स्वामी जी ने "पृथु पद्धति परायण अभि- राम रीति वाले श्रीबल्लभ जी” लिखा, सो उनका श्री- गोकुल में स्थान है । इनको जानके पीर सुयश सुनके मेरा मन इन में रीझ गया है ॥ [2] [ टीका कवित्त ] गोकुल के देखिये की गयी एक साधु सूधी, गोकुल 568<noinclude></noinclude> ojck0vd2w84h0shk8j8q1u3ty0gk6ih पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३८ 250 194300 664523 2026-07-02T17:13:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664523 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>569 BB0-00- श्रीममाल सटीक | ५६६ मगन भयो रीति कछु न्यारियें । छोंकर के वृक्ष पर agar लाइ दियो, कियो जाय दरशन, सुख भयो भारियें || देखे पाह नाहीं प्रभु, फेरि पाप पास पायो चिंता सौ मलीन देखि, कही जा निहारियें। वैसेई सरूप केह; गई सुधि बोल्यो नि, लीजिये पिछानि कह्यौ सेवा नित धारियें ॥ १८८ ॥ ( ६२९ - ४४१ ) " "छोंकर" = क्षेमंकर, सभी का वृक्ष । बाकि तिलक || एक समय एक सरल चित्त वाले सीधे सन्त गोकुल तथा पाप के देखने को गए, वहां की लोकोत्तर प्रेमी- द्दीपक रीति देखके बड़े प्रसन्न हुए, यहांतक कि गोकुल अर्थात् मन सहित सब इन्द्रियां प्रेमानन्द में डूब गईं । श्री शालग्राम ठाकुर जी का बटुपा क्षेमंकरके वृक्ष को डाल पर लटकाकर श्रीबल्लभाचार्य जी के दर्शन का गए। दर्शन करके और भी भारी सुख पाया। जब फिर पाके देखा तो उस डाल में ठाकुर का बटुल्या न पाया; तो आपके पास पाके कह सुनाया। पापने सन्त को चिन्ता से मलीन देखके कहा कि "फिर जाके वहीं देखिये । पत्रके देखें तो ठीक ठीक वैसेही बहुत से ठाकुरबटुए झूल रहे हैं। साधु जी बेसुध होकर पुनः आपके पास आये। तब आपने कहा कि " अपने ठाकुर जी को पहिचान लो नित्य सेवा पूजा करते हैं पर अपने ठाकुर जी को पहिचानते तक नहीं" ! 8000-<noinclude></noinclude> a4efbcbstxv8pxmbh4vj3xk36c9sueg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६३९ 250 194301 664524 2026-07-02T17:13:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664524 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>57° 3600- -9008 8000- ५७० श्रीमतिः सुधाबिन्दु स्वाद । [[ ] टीका | कवित खुलिई प्रांखें प्रभिलाखँ पहिचानि कीजे दाजे जू बताइ मोहिं, पाऊं निज रूप है। कही जावो वाही ठौर देखो प्रेम लेखी हिये, लिये भाव सेवा करो मारग अपनूप है ॥ देखि कै मगन भयो लयो उर धारि हरि नैन भरि पाये जान्यौ भक्ति को स्वरूप है । निशि दिन लग्यो पग्यो जग्यो भाग पूरन हो पूरन चमतकार कृपा पनुरूप है ॥१८e ॥ (६२९—४४०) वार्त्तिक तिलक । साधु fires गई कि यह परचा आपही का हैं; पर चाहा कि पहिचानें; परन्तु पहिचान में न पाए; तब पाप से बिनय किया कि "कृपा करके बता दीजिये जिसमें मैं अपने प्रभु की मूर्त्ति की पाऊँ" । प्रार्थना सुन आपने समझाया कि “प्रेम भाव सहित सेवा किया करो; ठाकुर कहीं, पर तुम कहीं; यह सप्रेम सेवा भक्ति का मार्ग पति घ्पनूप है"। यह कह, प्राज्ञा की कि "उसी ठांव जाओ। पाके, अपने ठाकुरजी पार्क, बड़े सुखी हुए; प्रेम जल आंखों में भर पाया, और भक्ति का स्वरूप जान गए, अपने को धन्य माना । और प्रभु के सेवा अनुराग में तत्पर हो पग गए; पूर्व के उनके पूर्ण भाग्य जगे, क्योंकि श्रीबल्लभाचार्य जी की कृपा से प्रभु की भक्ति का पूर्ण चमत्कार देख लिया || 600- -909<noinclude></noinclude> 0ulci68r75ydqv8rdl6g74l7xi49jem पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४० 250 194302 664525 2026-07-02T17:13:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664525 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>571 88600- श्रीभक्तमाल सटीक । श्रीभक्त दासेभ्यो नमः | श्रीकलियुग के भक्तों की जय ॥ [] कम्पय संत साखि जानें सबै प्रगट प्रेम कलियुग प्रधान ॥ भक्तदास इक भूप श्रवन सीता- हर कीनौं । "मार मार” करि खड़ग बाजि सागर मैं दीनों ॥ नरसिँघ को अनुकरन होइ हिरनाकुस मारौ । वर्हे भयौ दस- रत्थ, राम बिछुरत तन छायौ ॥ कृष्ण दाम बांधे सुने, तिहि छन दीयो प्रान । संत साखि जानें सबै, प्रगट प्रेम कलियुग प्रधान ॥ ४४ ॥ ( "भक्तदास"=श्रीराम भक्त का दास | "भक्तदास' बड़ी संचा अ र्थात् दूसरा नाम ही है। दास्यरसावेशी भक्त || वार्तिक तिलक | इस बात को सब सज्जन जानते हैं, और सन्तजन इसके साक्षी हैं कि कलियुग में प्रगट प्रेम अर्थात् अपने भक्तों की प्रेमभाव प्रत्यक्ष देखने में आया, उसमें ये तीन प्रेमावेशी भक्त परम प्रधान हुए । उन में से (१) दक्षिण देश में श्रीसीताराम जी के दास्यरसा- वेशी भक्त राजा “श्रीकुलशेखरजी' हुए। इनने श्री 188-600- -900<noinclude></noinclude> dwu0u4zyugs1jrzyri5fvb0hnega8li पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४१ 250 194303 664526 2026-07-02T17:14:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664526 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>8000- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु' स्वाद । 57a रामायण जी में श्री सीताहरण कथा श्रवण करते ही महा प्रेमावेश में पग के, सेना सहित खड्ग खीच के "मारी मारी क्षुद्र रावण को” इस प्रकार बीरालाप करते घेोड़े पर चढ़े, दौड़ा के, घोड़े को सागर में डाल दिया । तब प्रेमग्राहक प्रभु ने दरशन देके इन्हे लोटाया ॥ "ढाई अक्षर 'प्रेम' का पढ़ा जो, पण्डित सोइ ॥ (२) श्री नृसिंह भगवान् का अनुकरण (लीला) में एक विशीभक्त नृसिंह जी के रूप बने । उनने हिरण्य- कशिपु बन्नेवाले की मार डाला; वेही फिर लीला में श्री दसरथ महाराज जी रूप बने और श्रीसीताराम बिछोह य अपना शरीर त्याग दिया । (३) "श्री कृष्ण जी को श्री जसोदा जी ने बांधा" ऐसी कथा सुनतेही एक भक्ता "रतिवन्ती बाई" ने तन त्याग दिया । प्रगट है, सबको विदित है, साधु इस्केसाक्षी हैं, कि कलियुग में "प्रेम प्रधान है; कलियुग के प्रेमियोंमें तीन प्रधानमावेशी हैं, इनका प्रेम प्रत्यक्ष सच होगया ॥ (21) टीका | कमिश । • सन्त साखिजानें कलिकालमें प्रगट प्रेम बड़ोई पसत जाके भक्ति में प्रभाव है। हुतो एक भूप राम रूप तत- पर महा, राम ही को लीला गुन सुनें करि भाव है ॥ बि स सुनाये सीताचोरी की न गावै हियी खरो भरि- 30:00-<noinclude></noinclude> qi71eltljylsmyqlloptz00jylp3kl4 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४२ 250 194304 664527 2026-07-02T17:14:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664527 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>573 18600. श्री भक्तमाल सटीक | ५०३ --२००४। पावे, बह जानत सुभाव है। पस्यो द्विज दुखी निज सुन पठाइ दियो जाने न सुनायी भरमायो कियो | ||१९०॥ (६२९~~४३९) घाव है बार्त्तिक तिलक इसके साक्षी साधु हैं कि कलिकाल में प्रेमही प्रगट है क्योंकि इन तीनों का प्रेम प्रगट हो गया। उस्को बड़ा अभागा और गयाही हुआ जाना कि जिस्को इन सन्तों की कथा सुन के भी, श्रीभक्ति जी में - भाव अर्थात् पनादर ही बना रहे । श्री भक्त दास कुलशेखर जी । दक्षिण में एक राजा श्रीरामोपासक श्रीराम रूप में बड़े अनन्य दास्य रसावेशी प्रेमी भक्त थे; श्री जानकीजीवन जी का परत्व उन्हें जैसा चाहिये वैसा था; बड़े भाव से श्री अवध बिहारी जी की लीला श्रीबालमीकीय रामायण कथा सुना करते थे । इनका " कुल शेखर " नाम था, "भक्तदास" नाम से भी प्रसिद्ध थे। जो बिप्र पण्डित उनको कथाश्रवण कराते थे वे इनके पली- किक प्रेम को जानते थे, क्योंकि एक समय परण्य काड की खरदूषण की चढ़ाई की कथा सुनकर राजा आवेश में आ गया, पाप घोड़े पर चढ़ हथियार बांध सेना साथ ले, शीघ्रतम पयान करने की आज्ञा दी । तो चतुर पण्डित ने देशकालानुसार युक्ति से इनको<noinclude></noinclude> k42c2z1zsiv47hbtfannmk0xacrl9rh पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४३ 250 194305 664528 2026-07-02T17:14:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664528 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०४ 188600- श्रीमतिविन्दु स्वाद । 574 9008 पुत्र लोटाया - तस्मात् श्री महारानी जी के चोरी की कथा उनने इन्हें कभी नहीं सुनाई । एक दिन श्री पण्डित जी दुखी हुए, इस्से अपने कथा सुनाने के लिये भेजा । राजा का सुभाव नहीं जानने से उसने श्रीसीता हरण सुनाया; सुनतेही भक्त राजा को यह भ्रम आ गया कि यह इसी समय सत्य हो रहा है। इससे हृदय में घाव सरीखा दुःख हो गया । राज ने लंका की घोर धावा किया ॥ वार्त्तिक तिलक । (22) टीका कवित्त । " मार मार" करि कर खडग निकासि लियो, दियो घोरो सागर में, सेा प्रवेस झाये है। "मारों याहि काल दुष्ट रावन बिहाल करों, पावन को देख सीता" भाव दृग छाया है ॥ जानकी रथन दोऊ दरशन दियो पानि, बोले "बिनमान कियो, नीच फल पायो है ” ॥ सुनि सुख भयो, गयो शोक हृदै दारुन जो, रूप की निहारनि यो फेरि के जिवायो है ॥१९१॥ (६२९—४३८) बार्त्तिक तिलक | खड्ग निकाल " मार मार” कहता, लङ्का की पोर घोड़ा दौड़ाया यहां तक आवेश पाया कि समुद्र में भी घोड़ा ढालही दिया; "दुष्ट रावण को व्यथित कर दूंगा, इसी क्षण मारडालूंगा; अपनीमाता श्रीजानकीजी महारानीके चरणकमलके दरशनकर हामी ले पाऊंगा। --009<noinclude></noinclude> 7kb527gcuum8gtysbboxvo06ns2czix पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४४ 250 194306 664529 2026-07-02T17:14:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664529 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>575 8B-6-06- श्रीभक्तमाल सटीक | ५७५ 1-000- इस प्रकार बीरवाक्य कहते हुवे प्रेम में मग्न और नयनों में प्रेमाश्रु भरे हुए सागर में चले ही जारहे थे- कि उसी क्षण, भक्तप्रणपालक प्रेमनिर्वाहक जम- रक्षक श्रीजानकी जानकीरमण जी श्री लक्ष्मण जी पीर श्रीहनुमदादि कपि सेना समेत पुष्पक विमा- नारूढ़, भक्त के समीप पाकांश में प्रगट हो, दर्शन दे, इन्हें कृतकृत्य कर, बोले कि "हे प्रिय पुत्र ! उस दुष्ट को हमने सपरिवार मारडाला, उसे नीच रावण ने अपनी करनी का फल पाया। तुम चिन्ता मत करो; देखो अपनी माता के दर्शन करो। हम य अपनी राजधानी श्रीअयोध्या जी को जाते हैं, घर जातो " ॥ तुम भी श्री वचनामृत सुनते ही इनके हृदय से दारुण शोक जाता रहा; दर्शन पाके पति कृतार्थ हुए। “मृतक शरीर प्राण जनु पाये ॥ " आप लौट के अपने घर आए । परमावेशी भक्त श्री कुलशेखर जी की जय । "प्रेम कलियुग प्रधान" । "कलिकाल में प्रगट प्रेम" । "कलियुसम युग मान नहि, जो नर करि विश्वास । गाइ राम गुण गा विमल, भव तर बिनहि प्रयास २६ "कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुण्य होयँ, नहिँ पापा ॥”<noinclude></noinclude> 4k9c0rr3e0wzy0ngnl4kof7jy9g33lv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४५ 250 194307 664530 2026-07-02T17:14:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664530 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५७६ 14:00- श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । "कलि केवल रघुपति गुण गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा " ॥ “सुनु व्यालारि, करालकलि, बिनुप्रयास निस्तार" ॥ " कृतयुग, त्रेता, द्वापर, पूजा, मख परु जोग । जो गति होय सो कलिविषे, 'नाम' तें पावहिँ लोग" ॥ "रामनाम जपु जिय सदा सानुराग रे । कलि न विराग जोग जाग तप त्याग रे" " रामहिँ केवलप्रेम पियारा । जानिलेहु जे जाननिहारा" ॥ मिलहिंन रघुपति बिनुपनुरागा । किये योग जप ज्ञान विरागा ॥ " कालधर्म नहिं व्यापहिं तेहीं । रघुपतिचरणप्रीति रति जेही ॥ " और युगों से कलियुग में, कमलनयन श्रीहरि ने जीवों पर विशेष करुणा की है ॥ (21) टीक कवित । । नीलाचल धाम तहां लीला अनुकर्न भयो, नरसिंघ रूप धरि, सांचै मारि डायी है । कोऊ कहें द्वेस, कोउ कहत पावेस, "तौ पे करौ दशरथ"; कियो; माव पूरो पायो है ॥ हुती एक बाई, कृष्ण रूप से लगाई मति, कथा नई, सुत सुमी, कह्यो धारयो है। “बांधे जसु- मति" सुनि और भई गति, करि दई सांची रति, तन तज्यो, मानो वायो है ११९२३ (६२९-४३७ ) 576<noinclude></noinclude> ttj0ger3sd7p8yd48xvvw1nv202guoo पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४६ 250 194308 664531 2026-07-02T17:15:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664531 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>577 3600 श्री भक्तमाल सटीक | धार्तिक तिलक । श्री लीलानुकर्ण भक्त जी । एक समय श्रीनीलाचल धाम में लीला होती थी । इन सत्य प्रेमावेशी भक्त जी को लोगों ने लीला पनु- करण में "श्रीनृसिंह भगवान्" का स्वरूप बनाया; पापने वेश में, जो हिरण्यकशिपु बना था उसको पेट फाड़ के मार ही डाला । सज्जन तो इस्का कारण श्रीनृ- सिंह जी का सच्चा पाबेश बताते थे, पर दुर्जन लोग मारडालने का कारण द्वेष ( बैर भाव ) कहते थे । अन्ततः यहबिचार हुआ कि "इनको श्रीरामलीला श्री दशरथ जी महाराज का अनुकरण स्वरूप बना और देखो कि आवेश होता है वा नहीं" । ऐसा ही किया गया; पापका भाव तो सच्चा था ही, पूरा पड़ा; पर्थात् पावेश में पाकर श्रीप्राणनाथ रघुनाथ के बन यात्रा में विठुरतेही, आपने शरीर को तृण सरीखा त्याग ही तो दिया । सब ने जाना कि भावावेश पूरा था ॥ श्रीरतिवन्ती जी । श्रीरतिवती जी नाम की एक बाई जी वात्स- य निष्ठा से श्रीकृष्णभगवान् में अत्यन्त प्रेम रखती थीं; भगवान् को अपना बेटा जानती और चाहती थीं; कथा सुन्ने का भी नित्य नियम था ।<noinclude></noinclude> sc7bjc8fd2rlxbuzno4v4r81pjccbc5 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४७ 250 194309 664532 2026-07-02T17:15:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664532 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५७८ 1886-06- श्रीभक्तिसुधान्दुि स्वाद । एक दिवस पाप कथामें नहीं गईं, कि उस दिन ऊखलीबन्धन को कथा थी। बालक जी नित्य साथ जाया करता था, लौट कर उसने जब वही कथा याप को सुनाई, तो यह सुन्तेही कि 'परम सुकुमार श्रीकृ चन्द्र जी को माता यशोदा जी ने ऊखल में बांधा है" पापप्रति व्याकुल हुईं, तड़पने लगीं और ही गति हो गई, अर्थात् सच्ची प्रीति से, कोमल अन्त:- करण में प्यारे का इतना दुःख न सहकर प्राण ही श्रीभक्तवत्सल जी महाराज पर न्योछावर कर दिये || भाव इसको कहते हैं ॥ श्रीभक्ति महारानी जी की जय ! जय !! जय !!! तीसरा भाग 578 श्रीसीतारामार्पणम् श्रीहनुमते नमः ( मूल ४९ ) ( पृष्ठ ५०८ ) [ टीका क० १९२] [ ४९+१९२=१४१ ] इति शुभम् ॥<noinclude></noinclude> 64b7ssgddb25cl3etkksvgwdut4ewip पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४८ 250 194310 664533 2026-07-02T17:15:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664533 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>183600-- 1800- भक्तमाल विषयोपक्रमणिका । श्री सीताराम १०००- IX अंक १ ১৯১ 卐 ॥ श्रीहनुमते नमः ॥ भक्तमाल विषयोपक्रमणिका ( सूचीपत्र ) भक्त के नाम (विषय) अथ मंगलाचरण आज्ञा निरूपण । श्री शुकदेव कथा टोका का नाम और स्वरूप वर्सन छन्द पृष्ठ " १-४ ० १ ६० २ ६ श्री भक्ति स्वरूप ( १९ श्टङ्गार) वर्णन ५०३ १-१९ श्री भक्ति पंचरस वर्णन पांचो रसों की व्याख्या के यन्त्र क० ४ १९-२० २१-२६ पंचरस में कुछ वचन ८ पंचरों को पँचरेंगी माला " " २६-३३ क० ५ | ३३-३४ क० ६ ३५०३६ क० ७ ३६-३७ सतसंग प्रभाव वर्बन १० श्री नाभाजी का बर्तन ११ उपक्रमक्षिका ( भूमिका ); समय निर्णय ११ श्री भक्तमाल स्वरूप वर्णन "विना मतनाथ मति रूप अति दूर है" .... " ३७-४१ ०८ ४१-४३ " "<noinclude></noinclude> 2i7cwlkf95fkhkpx141ijatbx0ga7ml पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६४९ 250 194311 664534 2026-07-02T17:15:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664534 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>4 25600- भक्तमाल विषयोपक्रमणिका । १३ सूल मंगलाचरण (भक्त भक्ति भगवंत गुरु ) १४ टीका ( लक्षण; भक्त भक्ति भगवंत गुरु ) १५ मूल दोहा २, (हरिजन यश गान ) १६ मूल दोहा ३, (हरि हरि दास भजन ) १७ सूल दोहा ४ श्रीअग्रदेव आशा १८ आज्ञा समय की टीका १९ भक्तमाल के कप्पे आदि की संख्या २० श्रीनाभा जी की आदि अवस्था वर्णन २१ मूल ५ चौबीस अवतार *** दो० १ ४३-४४ क० ९ ४४-४७ दो० २ ४७ दो० ३ ४७-४८ दो० ४ ४८ क० ९० ४८-४० | क० ११ ५०-५१ - ५१ क० १२ ५१-५६ ... क० १३ ५६-५७ छ० १ ५८-६९ | क० १४ ६२-६३ २२ प्रभु श्री राम चन्द्र जी की चरण रेखाएं, मूल६.... २३ चिन्हों के हेतु,क० १५ से क० १९ तक २४ मूल १ ( द्वादश भक्त प्रधान ) छ० २. ६४-१२ १५१० १२-१८ २५ (१) श्री ब्रह्माजी २६ (१) श्री नारदजी २७ (३) श्री शिवजी क० २० से २२ तक २८ (४) श्री सनकादि चारो भाई २९ (५) श्री कपिल देव जी ३० ( ६ ) श्रीमनुजी ३१ (9) श्री महलादजी ३२ (८) श्री जनकजी ३३ ( ९ ) भीष्म जी ३४ (१०) श्री बलिजी ३५ (११) श्री शुक ३६ (१२) श्री धर्मराजजी ३७ श्री धर्मराज जी के प्रसंग में अजामिल कथा, ** ३० ३१८-८० " 13 ८१ २०१२ ८१-८५ " 44 ८५ " ... ८६ " ८६-८ " 56-60 " ९०-९९ " 37 " क० २३ से २४ तक २३२४ | ३.९५<noinclude></noinclude> rezlvvmmkhdh1owy983kfxiwxgjz46g पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५० 250 194312 664535 2026-07-02T17:15:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664535 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भक्तमाल विषयोपक्रमणिका । ३८ श्री नारायण १६ पारषद्, मूल ३९ बयालीस (४२) हरिवक्षम, मूल XI ६०४ CCI क०५५ ०५ ୯୧ क०२६ १०० ४० श्री लक्ष्मी जी ४१ श्री षोडश पारषद् ४२ श्री गरुड़ जी ४३ श्री हनुमान जी :: ... १०१ १०२ १०२ ९०३ क० २७ १०७ ४४ श्री जाम्बवान जी ... १०७ ४५ श्री सुग्रीव जी १०८ श्री विभीषण जी; क० २० से ३० तक | क०२८ १०८ dag क० ३० ११२ ४७ देवी श्री सवरी जी क० ३१ ११२ ... (क० ३७ १२२ श्री ४८ जटायू जी H क० ३८ १२३ १२५ ४० श्री अम्बरीष जी; आपकी रानी क० ३९ ०५० १४२ ५० श्री विदुर जी क० ५१ १४२ ५१ श्री विदुरानी जी क० ५२ १४५ ५२ श्री सुदामा जी क० ५३ से ५७ तक ५३ श्री चन्द्र हास क० ५८ से क० ६८ तक 特 ५७ ५८ श्री मैत्रे कोषाख़ जी श्री अक्रूर जी श्री चित्रकेतु जी श्री जी श्री ध्रुव जी क० ५३ १४५ क० ५७ १५२ क० ५८ १५३ क०६८ क० ६० " " " *** " --90983<noinclude></noinclude> h2icluqy7qxf3voknv15d440nm1lelb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५१ 250 194313 664536 2026-07-02T17:15:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664536 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XII भक्तमाल विषयोपक्रमणिका । ५० श्री कुन्ती जी ६० श्री द्रौपदी जी ६१ पाण्डव पांचोमाई ६२ | श्री गजेन्द्र जी ६३ ग्राह ६४ प्रार्थना, इत्यादि इति प्रथम भाग || --909893 ** 50 30 . क० ११ क० ७२ C 3 "<noinclude></noinclude> 7exl7b6lzwa539ygu0avx3nbug0elss पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५२ 250 194314 664537 2026-07-02T17:16:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664537 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1-BG00- श्री भक्तमाल सूचीपत्र ( विषयोपक्रमणिका ) xxv. विषय पृष्ठ ५४ श्रीमैत्रेय कोषारव जी ... ५५ श्री अक्रूर जी ५६ *** Ba श्री उद्धव जी ५८ श्री ध्रुव जी " ५९ श्री अर्जुन जी ६० श्रीयुधिष्ठिरादि (पाण्डव ) ६९ श्रीगजेन्द्र *** ६२ ग्राहजी ६३ श्री कुन्ती जी क० ६९ १६८ १७० १७० *** १७२ *** *** १८० १८१ " ” क० ७० १८४ ६४ श्रीद्रौपदी जी क० ७१ १८६ क० ७२ १८९ ६५ मूल १० (जिनके हरि नित उरबसें) छ०६१९३ क०७३ १९४ ६६ श्रीतिदेवजी श्री हुलास्वजी ⭑ १९५ डे ६६ श्रीयोगीश्वर राजा श्री ६९ श्रीमुचुकुन्द जी महाराज श्रीप्रियव्रत जी १९६ जी *** ... १९६ *** ** १९७ ક્ श्री ७२ श्री परीक्षित जी १९९ pee<noinclude></noinclude> 099p9ipobqi067dgybk8x8ehnttxf4x पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५३ 250 194315 664538 2026-07-02T17:16:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664538 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XXVI. श्रीभक्तमालं विषयोपक्रमविका । ७३ श्रीशेष जी श्री श्रीशोक मादि श्रीकौशल्या जी ७५ श्रीप्रचेता ७६ श्रीसतरूपाजी ७७ ७८ श्रीप्रसूतीजी ७९ ८० श्रीपती जी श्रीदेवी जी ८१ *** pee २०० *** २०० २०१ २०१ *** २०२ २०३ २०३ ... २०४ .. श्री सुनीती जी ८२ श्रीमन्दालसा जो श्रीसतीजी ८३ A 2 A 28 यज्ञपत्नी श्रीमधुरानी (चोबाइन) श्रीगोपिका वृन्द मूल ११ (जन्म जन्म सन्त पदकंजरेनु) क०७४ महर्षि श्रीबाल्मीकि जी ८९ दूसरे श्रीषाल्मीकि जी ะ ยะซ २ श्रीप्राचीन श्री सत्यव्रत जी श्रीमिथिलेश जी जी ३ राजाश्रीमीलध्वज जी ६४ श्रीहूण ... २०४ ၃ဝ ... ၃၈ २०८ २११ २१२ २१३ क० ७५ से | २१७ क० ८२ तक २२० २२७ " २२९ २२८ २३०<noinclude></noinclude> 9e4x151fv6enmmekgj2lyc92ildsc02 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५४ 250 194316 664539 2026-07-02T17:16:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664539 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्तमाल विषयोपक्रमणिका । XXVII. ९५ श्री सगरजी " २३१ ९६ श्रीभगीरथ जी २३२ ९७ श्रीरुक्माङ्गद जी क० ८३ २३३ क० ८४ २३५ क०८५ २३६ क० ८६ २३७ श्रीहरिश्चन्द्र जी २३८ १०० श्रसुर १०१ श्रीसुधन्वा जी २४० १०२ राजा श्रीशिवजी २४३ १०३ श्रीभरत जी २४४ १०४ श्रीदधीचि जी २४६ ૧૫ श्रीविन्ध्यावली जी क०८७ २४७ १०६ श्रीमयूरध्वज जी क० से २४९ १०० श्री ताम्रध्वज जी क० ९२ तक २५६ १०८ श्रीमलर्क जी क० ९३ २५६ ११० मूल १२ जे जे हरि मायातरे छ०८ श्रीरन्तिदेवजी २५९ ... क० ९४ २६१ २६२ १११ श्रीगुहनिषाद्राज जी { क० ९५ २६५ क० ९६ २६७ ११२ श्रीऋभु जी " २६९ १९३ श्रीवाकुजी २०१<noinclude></noinclude> 38ybu6guxm37lgqd5an1jabsu8ijd68 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५५ 250 194317 664540 2026-07-02T17:16:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664540 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XXVIII. श्रीrore विषयोपक्रमणिका । 10:00- १९४ श्रीऐल पुरुरवा जी २७१ ११५ श्रीगाधि जी २७२ ११६ महाराज श्रीरघुजी २७२ ११७ श्रीरय जी २७३ १९८ श्रीगय जी २७३ ११९ श्री सतधन्वा जी २७४ १२० श्री उतंक जी २७४ १२१ श्रीदेवल जी F २७४ १२२ श्रीमूर्त (हरिदास) जी ... २७४ १२३ २७४ १२४ श्रीयाति (नाहुष ) जी ... ... २७५ १२५ श्री दिलीप जी २०६ १२६ २७७ २२७ श्रीमान्धाता जी २७८ २२८ श्रीविदेहनिमि जी २७८ Pre श्रीमद्वाज जी २७९ १३० श्रीक्ष २७९ १३९ श्रीजी १३२ श्रीभूरिषेन जी २८० १३३ 138 १३३ १२६ श्रीवैवस्वत मनु की मनु पोर मन्त्रन्तर श्रीशरभङ्ग जी श्री संजय जी P २८० *** २८१ २८३<noinclude></noinclude> 9v3i00xzxddtfmgnut1jvslpzxeh0vl पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५६ 250 194318 664541 2026-07-02T17:16:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664541 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>*600-- १३७ . श्री भक्तमाल सूचीपत्रा श्रीउत्तानपाद जी ११८ श्रीयाज्ञवल्क्य जी १३९ श्रीसमीक जो XXIX. २८४ " 33 २८४ " २८५ १४० श्रीपिप्पलाद जी " २८५ १४९ मूल (तेरहवां) पादत्राणशरण छ २८५ १४२ । श्रीनिमि जी; ९ (नव ) योगेश्वर २८६ १४३) १४४ देवी श्रीजयन्ती जी २८६ १४५ मूल (चौदहवां) पद पराग छ० १० २८० १४६ नवधाभक्ति २८८ १४७ श्री परीक्षित जी १४८ परमहंस श्रीशकदेवजी (पृष्ठ३२०) क्र० ९८ २९० १४९ श्रीप्रह्लाद जी (पृष्ट ८६) क०६९ कव्हर २९३ क०१०० २९५ १५० श्री १०८ हनुमान जी (पृष्ट १०३ ३३४२) २९ १५९ श्री पर्जुनजी; (पृष्ट १७८) १५२ श्रीष्टथुजी (पृष्ट ६१ १९९) २९८ १५३ | श्रीपरजी क०१०१ २९९ क०१०२ ३०१ -000 १५४ श्रीबलि जी (पृष्ठ १) १५५ मूल १५ (पन्द्रहवां ) प्रसाद छ०९९ ३०३ १५६ प्रसादनिष्ठ षोड़श महानुभाव पृ.३०३ ३०४ १५० मूल १६ ध्यानीऋषि मुनिप्रभृति छ०१२ ३०५ १५८ श्री प्रगस्त्य जी ३०६ -<noinclude></noinclude> f5pqap4bd4m16tp6zr1uxwg1w7k7vjb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५७ 250 194319 664542 2026-07-02T17:16:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664542 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XXX. 300- 600- श्रीभक्तमाल विषयोपक्रमणिका १५९ श्री पुलस्त जी ३१० १६० श्री पलड़ जी ३१० १६१ श्री च्यवन जी ३१० १६२ श्री १०८ बशिष्ठ जी ३१२ १६३ श्री सौभरि जी ३१४ १६४ श्री कर्द्दम जी ३१६ १६५ श्री अत्रि जी, श्रीमनुसूया जी ३१७ १६६ श्रीगर्ग जी ३१८ १६७ श्री गौतम जी ३१९ १६८ परमहंस श्रीशुकदेव जी (पृष्ट ५३९२) ३२० १६९ श्री लोमश जी ३२० १७० श्रीऋचीक जी ३२२ १७१ श्री भृगु जी ३२४ १७२ श्री दालभ्य जी ३२५ १७३ श्री अङ्गिरा जी ३२५ GP श्री ऋषिष्टङ्ग जी पृष्ट ३२५ और ३२९ ३२५ १७५ श्री माण्डव्य जी १७६. श्री विश्वामित्र जी श्री दुर्वा १७८ श्री याज्ञवल्क्य जो (पृष्ठ २८४ तथा ३६९) P65 श्री जाबाली जी १८० श्री यमदग्नि जो ३२० ३२८ जी ३३० ३३१ ३३२ ३३२ -90-91<noinclude></noinclude> 296h8jjzq0ni5b82ah1rdty08kjuol7 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५८ 250 194320 664543 2026-07-02T17:17:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664543 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>8800- श्री भक्तमाल सूचीपत्र ! XXX1 १८१ श्रीकश्यप जी ३३३ १८२ श्रीमार्कण्डेय जी ३३३ ३३३ ३३४ जी ३३४ १८३ श्रीमायादर्श जी (पृष्ट ३२०/३३३) श्रीपर्वत जो १८५ श्री पराशर १८६ | ( ८८००० ऋषि); (अठारह पंदुमयूध पकपि) १८७ १८८ १८९ मूल १७ (सत्रह) १८ पुराण छ० १३३३५ श्रीमद्भागवतप्रमुख १८ पुराण ३३६ मूल (अट्ठारहवां) १८ स्मृतियां छ० १४ ३३७ पट्ठारह स्मृतियों के कर्त्ता मूल १९, प्रष्ट सचिव सुमिरन, छ०१५ १९० ३३८ १९९ ३३९ १९२ श्रीरामचन्द्र महाप्रभु सचिव श्री सुमन्त्र ३४० १९३ _मूल २० शुभदृष्टिदृष्टि छ० १६ ३४१ १६४ श्रीरामसहचर वर्ग ३४१ १६५ महाबीर श्रीहनुमानजी (पृष्ठ १०३/२९७) ३४२ १९६ श्री अंगद जी ३४९ १९७ श्रीजाम्बवन्त जी ३५० CE श्रीनल जी/ १९९ श्रीनील जी । ३५१ २०० मूल इक्कीसवां, पादरज, छ० १७ ३५२ २०१ नवोनन्द जी ३५३ २०२ मूलबाईसवां गोपवृन्दपादरज, छ०१८ | ३५५<noinclude></noinclude> 4m7oalk2u3ku5hsc7wdxb9qhlswou55 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६५९ 250 194321 664544 2026-07-02T17:17:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664544 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XXXII. श्रीभक्तमाल सूचीपत्र । 3000- २०३ श्रीयशोदा जी ३५६ २०४ श्रीकीर्त्ति जी; श्रोतृषभानु जी ३५६ २०५ २०६ श्रीसहचरि; ग्वालमंडल ३५६ २०० मूल २३ श्रीकृष्णानुग छ० १९३५० २०८ श्रीब्रजचन्द जी के १६ सखा ३५८ २०९ २१० सप्तद्वीप के भक्त सप्तद्वीप २११ २१२ चौवीसवां मेरे सिरताज छ० २० ३५९ मूल २५ सब भक्त मम भूप छ० २१ ३६० raas (जम्बू द्वीप के भक्त) ३५९ ३६२ २१३ मूल २६ श्रीनारायण दर्शन छपै.२२ ३६३ २१४ २१५ २१६ श्वेतद्वीप भक्त खग जी ( प्रसाद निष्ठ) श्वेत द्वीप भक्त पातीनिष्ठ क० १०५ मूल २७; स्पष्टकुलनाग श्रीभक्त छ० २३ मूल २०+ टोकाकवित्त १०५ - १३२ इति यो भक्तमाल के पूर्वखंड पत् सत्ययुग, त्रेता और द्वापर पर्य्यन्त के भक्तों की सूची समाप्त ॥ क० १०३ | ३६४ क० १०४ ३६६ ३६७ ३६९ श्रोमौद्गल ऋषोवराय नमः ।<noinclude></noinclude> 69pg7r94u8soq1wtr9m8xsaunha9r4s पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६० 250 194322 664545 2026-07-02T17:17:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664545 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1936- श्रीगणेशाय नमः । ॐ नमो भगवते हनुमते श्रीरामदूताय ॥ श्रीमते रामानन्दाय नमः । श्रीभक्तमाल विषयोपक्रमणिका । विषय पृष्ट १ वैष्णव चारो सम्प्रदाय, 1{ मूल २८ ३७५ मूल २९ ३७६ २ श्रीनिम्बादित्य जी, कवित्त १०६ ३७८ ३ गुरु परम्परा वृक्ष ... *** ३८० ४ पनन्तश्री रामानुजाचार्य्य स्वामी, २ (१८९ मूल ३० ३१ ० १०० १०९ (३६२ ५ श्रीविष्णुस्वामी जी *** *** *** ३९३ ६ श्रीमध्वाचार्य जी *** ३९४ चार महन्त *** W मूल ३२ ३६५ श्रीपचा जामात श्रीलालाचार्य जी) मूल ३३ क० ११० से ११४ तक) ९ | श्रीश्रुति प्रज्ञा जी; श्रीश्रुति देव जी face (४०३ ४०४ १० | श्रीश्रुतिधाम जी *** ११ श्रीश्रुति उदधि जी 0000 ૪૫ ४०६<noinclude></noinclude> mqa7gwwh160kwzjy0v2xyercvyx6eub पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६१ 250 194323 664546 2026-07-02T17:17:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664546 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>88600- श्रीभक्तमाल । विषय 900881 3600- पृष्ट १२ गुरुशिष्य श्रीपाद पवन जी, मूल ३४, ४०७ क० ११५ ११६) १३ श्रीगुरु परम्परा मूल ३५ ४११ १४ स्वामी श्री १०८ रामानन्द जी । मूल ३६ १५ श्रीदेवाधिपाचार्य, श्रीहरियानन्दाचार्य्य ४३३ १४१२ ४३२ १६ | श्री राघवानन्द स्वामी *** १७ श्रीनन्तानन्द जी १६ श्री श्रीरंग जी ४३४ मूल ३७ ४३५ क० ११०१११८ ४३७ *** १९ श्रीकृष्णदास पैहारी जी " मूल ३८,४४० क० १९९/१२० (४४५ २० | श्रीयोगानन्द जी, श्रीगएश जी, श्री कर्म चन्द जी, श्रीपतहजी २१ श्रीसारी रामदास जी ** १४६ १४७ २२ श्रीनरहरिदास जी .... .... .... * २३ श्री पहारी जी के शिष्य, मूल ३९, पृष्ट ४४९, २४ श्रीकीहदेव जी मूल ४०, कं० १२९।१२२ ४५० ४५१ ४५४<noinclude></noinclude> 4x7prkgw1cwytxvoxbgonjo94a2cxbj पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६२ 250 194324 664547 2026-07-02T17:17:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664547 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>3 श्रीमतमाल । ३ -90988 विषय पृष्ट २५ श्री सुमेरदेव जी ४५५ २६ श्री १०८ अग्र स्वामी जी मूल ४९ ४५६ क० १२३ श्री १०८ नामा स्वामी जी ४६० २७ श्रीशंकराचार्य जी, मूल ४२, क० १२४ से १२६ तक) श्रीनामदेव जी, मूल ४३, क० १२७ से? २८ और उनकी माता; क० १४३ तक) ૪૬૨ ૭. २९ श्रीजयदेव जी, मूल ४४, क० ९४४ । ५०२ ३० श्रीपद्मावती जी; से क० ९६३ तक) ५३२ ३१ श्री श्रीधर स्वामी, मूल ४५ क० १६४ ५३२ ३२ श्री परमानन्द जी, मूल ४५ ५३६ १६५ ५३७ ३३ श्रीविल्वमंगल जू, मूल ४६ क०१ १७६ ३४ श्रीविष्णु पुरी जी, मूल ४७ क० १७७ ३५ श्री ज्ञानदेव जी, मूल ४८ क० १७८/१७९ ३६ श्री त्रिलोचन जी, मू० ४६ ० १८१८६ १८१८ ३ श्रीबल्लभाचार्य जी, मू४८<noinclude></noinclude> pk03ck1rqf63ttekqr2aq82de12m5kk पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६३ 250 194325 664548 2026-07-02T17:18:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664548 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>188606- 600- ३८ | भक्तदास जी भूप श्रीभक्तमाल । श्रीकुलशेखर जी, मू ४९ क० १९८६ ११९१ ३९ श्रीनृसिंहलीलानुकर्णभक्त मू० ४९ ४० श्री रतिवन्ति बाई जी, मू ४९ क १९२ ( कवित) । "भक्तमाल" ग्रन्थ पन्य जान हरि जानबे को, भा- नको भर्म, कर्म बहु भांति छूटही । सब मत रत भक्ति भाव गाव कहि सत मत अनुसार ते कुमत सब टूटी ॥ मूल को बखान सो कहान “ नाभा जू” स- यान आभा सूपपार पर्थ रंचहू न खूटही । “प्रिया दास" टीका को प्रकास कियो लियो जैसे हाटकालंकार पर कूदन को बूटी ॥१॥ (दोहा) घातक भक्तन को रह्यो, आपर प्रेम प्रचार । 'सुधाबिन्दु' सोइ स्वाति जल, 'स्वाद' लेहु सुखसार ॥ 128000--<noinclude></noinclude> 5oq6jh9u9dvl0anex4a2olc5wd4bely पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६४ 250 194326 664549 2026-07-02T17:18:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664549 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>18000- 188600- श्रीमति धाबिन्दु स्वाद । ॥ श्री मारुतिवीरकला की जय ॥ ΧΙΧ -90988 (दो०) श्रीसियपिय, श्रीभक्ति, गुरु, विप्र, भक्त पदधूरि । बन्द मन बच प्रेम ते, मङ्गलमय मुदमूरि ॥ १ ॥ श्रीमारुति बीरकला - कृपाश्रितों की जय । शुद्धिपत्र (शुद्ध संशोधन ) पृष्ठ | पंक्ति अशुद्ध शुद्ध श्रीवैष्णवनामावली का २ १९ | कृषि ऋषि ३ पथ प्रभु अंब * (छन्द मंजु) (छन्द मंजु) १५ ११ अद्भुदानन्द अद्भुतानन्द १९ 6 टोक कोट ३० ३ और और हिन्दी में ३० ४ | नेमि ने श्रीभक्तमाल का १ चुका हूं चुका हूं, ११ सोधो सोंधी ५,१६ अङ्ग प्रक्षालन पङ्ग पोंछना १३ १३ घरी घरि १४ ६ है है ॥ १५ १२ ताहि ताही १३ नारा नीरा 8000-<noinclude></noinclude> rjeqicbg7vok3rbw2wyg9ctuycwub4i पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६५ 250 194327 664550 2026-07-02T17:18:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664550 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वा.. Goe 6:00 पृष्ट पंक्ति पशुद्ध शुद्ध २० २३ संक्षप संक्षेप २० २३ यन्त्रो यन्त्रों' प्राधृति अधृति वेग आवेश रामस्य क्लिष्ट रामस्याक्लिष्ट ३० येते यत्ते ३० दधीमिह दधीमहि ३० धर्म धीर्भ ३२ ३ नहीं नह माहि माहीं १४ का का, जाल भीं अराधना सात सव हां ho जाल' भी आराधना पान्सो (५०० ) ४८ १२ ५१ १३ दूसरा वतालीस श्री दूसरी बयालीस (४२) ५५ १७ नभभूज नभोभूज ५६ ६ नभमूज नभोभूज ૫૭ ६० ६१ 14:00- श्रद्धा ध्यान्ह मध्यान श्रीअयोध्या बिठूर --900800<noinclude></noinclude> jwda2glx1c6xz0a269ar6un71kqngvr पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६६ 250 194328 664551 2026-07-02T17:18:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664551 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>--१०५ पृष्ट पंक्ति श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । अशुद्ध १० श्रीप्रयोध्या जगधार ६१ द बिठूर ६१ ६३ ६३ १७ भा ६४ ४ शंष ६९ ૭ मथुरा शुद्ध ब्रह्मावर्त्त जगदुद्वार भी शंख बिरजा गुजा ७८ १३,९६ पजामेल १२ ७९ ११,१२ (१२) अजामिल ७ १८ ८२ ६० Co E3 २ ६ w w २२ नामाच्चारण की प्रवाण प्रण धर्म स्वरूप १२ (१२) धर्मस्वरूप नामोच्चारणादि के प्रवीण अन्तर्थ्यांन अन्तर्धान जननि जननी पण पात बात ६४ १८ तारि तोरि ९४ १९ हरि हारे ५ कहि कही ६५ १३ दिया दिया । विष वकसेन विष्वकसेन १०३ ९ स्वय १०१ १२,१३ श्री प्रभु १०५ १६ व मग्न में आश्चर्य में मग्न निज स्वयं १०६ | १० सत 600- सुत XXI<noinclude></noinclude> 24apsskz4o0h0u25aw3oo4ifd00owrh पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६७ 250 194329 664552 2026-07-02T17:18:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664552 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XXI 880-06- पृष्ट पंक्ति श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद अशुद्ध शुद्ध १०६ २४ सानुकल सानुकूल १०८ १९ सुन सुनो १११ १३ किया कियो १२० ३ हमारा हमारी १२२ ६ सुगन्धित सुगन्धि १२२ धन्ध धन्य १२३ ११ रज से परस ते १२५ ३ मन मुख १२५ का की १२६ १६ रीसि ऋषि १२६ १७ खीसि सीख १३७ १५ किया किये १४० २२ निराद रदेख निरादर देख १४९ ३ मेरे मोर १४१६ चीफ चोप १४३ ११ जी भी जी ने भी १४४ १२ ५१ ५२ १४५ गान कुछ गान १४६ १ भाम बाम, १५७ २२ तिल तिलक, १५८ ४ उस्के उस्को १५८ २१ करहि करहि १५९ १० १५९ १५ करि क्योकी करी क्योंकि 1800-<noinclude></noinclude> 53vvfod9yy2g02lun38wc6jzlep8x0z पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६८ 250 194330 664553 2026-07-02T17:18:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664553 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1986-06- पृष्ट | पंक्ति श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । अशुद्ध की थी शुद्ध XXII १६० ६ का था १६० २३ सहचारियों सहचरियाँ १६२ १ दे दई १६२ ३ उभरायो उमरायो (उधरायो) १६६ २३ वाञ्छित वाञ्छा १६७ १४ लीजियें लीजिये १६७ २० १६८ २ लाऊ को लोक श्री १६८ १० १७२ ५ परभीं १७३ १६ १७५ १७ मन्त्र' फल फूल पर भी बहार बाहर मन्त्र" १८० | १३ ख्यात नाम ख्यात १८० | २० ममेरे फुफेरे १८३१६ १६ वानी बानी में<noinclude></noinclude> kbcowdisga4vimdiwsataj3zahigpo3 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६६९ 250 194331 664554 2026-07-02T17:19:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664554 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>XXIV *000 65 श्रीभक्तमाल सटीक | (प्रमाणिका बन्द ) नमामिभक्तमाल को ॥ --90983 पढ़े जो पातिलों बढ़ें सोपर्मतंत लों, दहे अनन्त साल की नमामिभक्तमाल को ॥१॥ कथा करे जो याहिकी व्यथा रहै न ताहिकी, मिले सो रामलाल को नमामि भक्त मालकी ॥२॥ प्रकार नौ की भक्ति जो अंग होत शक्ति सो, कहैगिरा रसाल को नमामिभक्त- माल को ॥३॥ गढे सो अन्य भावहै लहै जो भक्ति दाव है, यही प्रमाण भाल को नमामि भक्तमाल को ॥४॥ भक्त भक्ति को लहे सभक्ति मुक्त है रहै, गिनै सी तुच्छ कालको नमामिभक्तमालको ||५|| करे जो पाठ प्रात में सरे सुकाज गात में, हरै हि कर्म जाल को नमामि भक्तमाल को ॥ ६ ॥ मिलाय दुग्ध तक्रते जुहोत सर्प चक्रते, तथा सुबुद्धि बाल को नमामि भक्तमाल को ||७|| बहूपमा कहीं कहा कहे न पार को लहा, बखान सूर्य्य ख्याल को नमा- मिभक्तमाल को ॥८॥ G00<noinclude></noinclude> lf255ud1y7j2c4ame3i7hiu1pnmbbag पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६७० 250 194332 664555 2026-07-02T17:19:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664555 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>188600- श्रीभक्तमाल शुद्धिपत्र । श्रीगणेशाय नमः | श्रीहनुमते नमः । ॥ श्रीरामानन्दाय नमः ॥ शुद्धि-पत्र (अशुद्धि संशोधन) पृष्ठ पंक्ति पशुद्ध शुद्ध १९६ १३ सोमवंशीबिठूर बिठूर निवासी - निवासी १९९ १० पारमहंसी पारमहंस २०० १८१० सम्प्रदा सम्प्रदाय २०१ २ पंथ में व पंथ में २०३ १६ महँ कछु महँ सो कछु २०७ ३ जिसने जो २०९ २२ हा री तिहारी २१० ५ पैन २१० १५ जात २१२ १४ नीलमोरध्वज २१२ १५ (१९) ताम्रध्वज ਕਰੈ ਜ जीत (सर्वजीत लाल) (१८) श्रीनील जी (१९) श्रीमयूरध्वजजी; श्री ताम्रध्वज जी । २१- १३ बास कहूं बस कहूं २३१ की लाट को लौट २३३ ८४६ ५४६ २३५ ४ ५२९ ६२९ २४२ १७ गिरा गिरिजा -0008<noinclude></noinclude> srina01fwi1blzn2w8rjxw9vfqhnhrc पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६७१ 250 194333 664556 2026-07-02T17:19:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664556 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२ *6000- श्रीभक्तमाल शुद्धिपत्र | GOA- पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध २५३ २ मरि भरि २५७ १७ शवय शक्य २६३ २२ खहर सहस्र २६४ २३ टेरि टेरि ॥ १ ॥ टेरि टेरि । २६५ १ बिबिध बिबुध ၃၀ २३ क्यों २७२ ब्राह्मण २७३ २ होके को ब्राह्मणने होने से २७५ ४ नहुष चन्द्रवंशी नहुष ခု १५ समर्थन समर्पन २९१ १९ aatraavart तथाकई श्लोक दशमस्कन्ध के २९६ ५:६ उठ के उठा के १६ पाईक पाइके १८ ३०१ हरि हारि ३०२ २१ बलि बलिरु ३०७ २ सखी सखी और पूज्य ३१० ११ बाल्मीक बल्मीक ३१ ११५ देवहूति देवहूती ३३० ६ बाढ़ी बढ़ी 18000-<noinclude></noinclude> 26ypw1oawaq808l0u96cpu27aw5sqsd पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६७२ 250 194334 664557 2026-07-02T17:19:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664557 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1886-06- श्रीगणेशायनमः । श्रीहनुमते नमः ॥ श्रीभक्तिसुधाविन्दु स्वाद के तीसरे भाग का शुद्धिपत्र | इस 'शुद्धिपत्र' के अनुसार इस्को पहिले - are, शुद्ध कर लेते जाइये, तब प्रशुद्धिसंशोधन के अनन्तर पुस्तक को पढ़ा कीजिये ॥ पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ३८० श्रीवोपदेवजी ४ श्रीवोपदेवजी ४श्रीशठकोपजी ५ श्रीशठकोप जी (श्रीपiकुशजी प्रथम) श्रीपiकुशमुनि ( श्री यामुनाचार्य्यजी श्रीयामुनाचार्य्यजी ११ महापूर्ण चार्य्य १० श्रीमहापूर्णाचार्य्यजी (श्रीपiकुशजी द्वितीय १२ स्वामी श्रीरामानुज ११ स्वामीश्रीरामानुजजी है।<noinclude></noinclude> 435oonbkmsk5522c2bgz54hflr4v0vv पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६७३ 250 194335 664558 2026-07-02T17:19:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664558 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री भक्तमाल । 100- 1088 पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ४०१ १४ मयो गयो ४०२ १७ लुटाए लुटाइ ४०३ २१ सब कोई सब ने ४०७ २ कृति कृत ४०७ सुरंधुनी ४०९ १८ पर पै ४१४ ८ श्रीर्यानन्द जी श्रीहरियानन्द जी ४३१ ( श्रीप्रधानानन्द जी) स्परांकुश मुनिद्वितिय श्रीया मुनाचार्य जी १० श्री यामुनाचार्य १०श्रीमहापूर्णाचार्य्यजी (श्रीपiकुशजी द्वितीय) | ११ महापूर्णाचार्य्यजी ११ स्वामीश्रीरामानुजजी | १२स्वामीश्रीरामानुज १३ इत्यादि १२ इत्यादि ४३६ २१ स्वानी स्वामी .४३७ १७ मारे मारौं ४३७ १९ ११६६५१३ १९७९ ५१२<noinclude></noinclude> 55two3rzf2u7wvqpp9hl5pnr3t9we7b पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६७४ 250 194336 664559 2026-07-02T17:19:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664559 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>3 3-006- पृष्ठ | पंक्ति | शुद्ध ४५६ ८ प्राप्त श्रीभक्तमाल शुद्धिपत्र | शुद्ध प्रात ४६७ १८ गुरु राज ४६७ २१ यो गुरु, राजा यों ४६८ १ प्रचार; डारी प्रचारि; डारि ४७२ १८ शिष्य ४७३ १३ पोखि जन शिष्य (लघुगुरुभाई पोखी उन ४७९ / १३ 1 ४८२ १ बालम ! ४८२ | १९ ४८७ १४ पृष्ठ ३७२ मुक्तिनास्ति सत्य ' बालक ! पृष्ठ ४७२ ४९१ १३ द्वितय द्वितीय ९८१४ पर चैप्रभुता परचे, प्रभुता ५०१ १७ तिहुँ तेहि ५०१ १८ सबन सुनन ५०७४ तिघा किया, तिया, किया ५१० १५ वही यही ५१४ १ हिले हीले 8600- -90988<noinclude></noinclude> imqq7i6plyv2kei7bsig6cyaouja7dg पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६७५ 250 194337 664560 2026-07-02T17:20:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664560 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-000 श्रीमतमाल शुद्धिपत्र | 98606- पृष्ट पंक्ति पशुद्ध शुद्ध ५१५ ११ चाहो चाहीँ ५१५ २० वास्ते लिये ५१६ १४ बढ़ो घड़े ५१७ २३ कोऊ ५१८ ५ कहि कही ५१८ ६ लेखि लेखि ५२३ २२ मिले मिलै ५२६ १३ पाय पाए ५३३ ૦ ४० ५३३ २१ ज्ञानी, ज्ञानी) ५३६ १ विन्दु माधवजी विन्दुमाधवजी ने लगावे ५४१ १७ लगव ५४२ g कि 卐 188600- 卐<noinclude></noinclude> ttyozpa7aa5q1pjutqcd77h9xnfj7b3 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६७६ 250 194338 664561 2026-07-02T17:20:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664561 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( कवित ) सोयो जोन " सरजू" के पास मै पसारि पग, सो तो मानौ जोग की समाधि सुख स्वै चुक्यौ; जोयो जोन नैन "राम- नैनजलजातजा” को, सो तो ही के नैन मानो ब्रह्म ज्योति ज्वै चुक्यौ ॥ योयो जो " वसिष्ठजा” को प्रेम बीज उर बीच, मानी सो प्रमोद प्रद कल्प- वृक्ष ब्वै चुक्यो; घोयो " रामगंग' मै जो अंग रसरंग- मणी, सो तो जग जनम मरन दाग ध्वै चुवया ॥१॥ लेत मुख नाम “रामगङ्ग” रसरङ्गमणी ! देत सुख संग, भारी भव भीति भूलती । शरद ससी के कल किरने समान तुंग तरल तरंग ताके ताप निरमूलती ॥ परसत पाथ सीतानाथनुराग बाग बेलि रसकेलि उर फैलि फलि फूलती । सरजू के कूल कौन पूछे रिद्धि सिद्धि भुक्ति, मुक्ति, झुण्ड फाउन के कारन में भूलती ॥२॥ (सवैया) कैधा विराट स्त्ररूप सुवृक्ष पै मुक्ति मरालनि फेरि कतार है । पातकशत्रु विनाशकरी, पकि राघव की उधरी तरवार है ॥ के सबको बिनदामहिं पानंद दाइनि रामकृपा की बजार है । की रसरंगमनी अवनी पर सोहति "श्री सरजू सरि” धार है ॥१॥ (श्रीरामरसरङ्गमणि)<noinclude></noinclude> 4bxhm2tjbrxolhefpt6gfd0k1i651r2 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/६७७ 250 194339 664562 2026-07-02T17:20:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664562 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>॥ श्रीहंसकलादेव्यै नमः ॥ ॥ श्रीअयोध्यासरयूभ्यां नमः ॥ । (दो) “परमहंस सीताशरण” राम प्रेम सागार । सन्तशिरोमणि, लाल-प्रिय, नेमी, सहज उदार ॥१॥ हनुमत पदपंकज मधुप, सन्त " गोमती दास ' " । हरिजन धल्लभ सर्व हित, तेजपुंज, तपरास ॥२॥ तजि ईर्षा, तजि मोहमद, तजि मस्सर, तजि काम । उरे घरि सीताराम पढ़, बसत अवधपुर धाम ॥३॥ " रामबल्लभाशरण" शुचि, पण्डित, सन्त, प्रवीन । बिपिन प्रमोद विराजहीं, शोभा नित्य नवीन ॥४॥ मेम-प्रेम. बिज्ञान-सर, विकसित तीनों कंज । इनके पद रंज सीस घर, धन्य ते जन सुखपुंज ॥५॥ " पंडित श्रीशिवराम” “श्रीमणी रामरसरंग" । भक्तमालवक्ता युगल, भक्ति प्रमिय जनु गंग ॥६॥ "श्यामसुन्दरी शरण" जी, रसिक प्रवीण-सिँगार । कनक भवन- सरकार युग, पद रज प्रेम पपार ॥७॥ “युगलविहारिणिशरण ” श्री स्वामी “गङ्गा दास " " । "पंडित रामनारायण, ” विरति प्रेम गुण रास ॥८॥ " रामरत्न पण्डित " " विदित, 'रामकोट' यस बास । 'तुलसी बाड़' के "श्री विश्वेश्वर दास " " ॥ ( दीन सीतारामशरण भगवान् प्रसाद )<noinclude></noinclude> cbelog5kdfcrmox2rokttcftaz81h95 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१० 250 194340 664563 2026-07-02T17:20:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664563 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ५ ) लाभ है। इस उन्नति में संसार के ज्ञान में एक प्रकार का aferय और सौंदर्य प्राप्त हो जायगा । हिंदी भाषा को उच्च शिक्षा का माध्यम बनाने में सहायता देना और कर्त्तव्य-संबंधी प्राचीन सिद्धांतों को हरा भरा करके उनमें जीवन रस का पुनः संचार कर देना, प्रस्तुत पुस्तक के येही दो मुख्य उद्देश्य हैं। लक्ष्य बहुत ऊँचा है। इसे प्राप्त करने में अनेक कठिनाइयाँ हैं। 'प्रांशुलभ्ये फले मोहाद्वाहु- रिष वामनः' वाली कालिदासोक्ति यदि किसी पर लागू होती है, तो मुझ पर ही; तथापि 'अकरणान्मंदकरणं श्रेयः' की सत्यता और उपयोगिता में सुभं अधिकतर विश्वास है । इसी विश्वास के आधार पर मैं इस ग्रंथ का पाठकों के करकमलो में देने का साहस करता हूँ । आशा है कि पाठकगण इसको पढ़कर श्राजमायेंगे और इस विषय में गति प्राप्त कर अपनी नई नई युक्तियों द्वारा प्राचीन विद्या का गौरव स्थापित करने में योग देंगे। इसी में मैं अपना परिश्रम सफल समगा । 'क्लेश फलेन पुनर्नवतां विधत्ते' । प्रस्तुत पुस्तक में मैं ढाल दिए गए हैं। नए और पुराने सिद्धांत एक ही ढाँच वह ढाँचा नवीन पद्धति का है । उसमें नई और पुरानी दोनों ही प्रकार की सामग्री डाली गई है ! aare यह पुस्तक हिंदी जाननेवाले अँगरेजी कालिजों के विद्यार्थियों के भी उपयोग में आ सकती है। अँगरेजी पुस्तकों से इसमें यह एक विशेषता है कि उन पुस्तकों के लेखक भारतवर्ष को भूगोल से उड़ा देते हैं। किसी विषय के पूर्ण ज्ञान होने के लिये यह आवश्यक है कि उस विषय पर सब देशों के सिद्धांत जाने जाँय । भारतीय विद्यार्थियों को भार तीय सिद्धांतों का जानना और भी आवश्यक है। अँगरेजी<noinclude></noinclude> 5q0yv6gv1lx45lnoevleggvmle68191 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११ 250 194341 664564 2026-07-02T17:20:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664564 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ६ ) पुस्तकों में भारतीय सिद्धांतों के न रक्खे जाने का एक यह कारण बतलाया जाता है कि भारतवर्ष में कर्त्तव्य-संबंधी कोई पुस्तक ही नहीं और न यहां पर इन विचारों ने पूरा पूरा विकाश ही पाया है। यह विचार भ्रममूलक है। यह ठीक है कि संस्कृत या हिंदी में कर्त्तव्यशास्त्र नामक कोई विशेष ग्रंथ नहीं है, किंतु कर्त्तव्यसंबंधी अनेक ग्रंथ हैं और वे ऐसे ग्रंथ हैं, जिनके आधार पर एक अत्युत्तम कर्त्तव्य-शास्त्र बन सकता है। यूरोप के लिये विचारों के उदय का जो काल था, वही भारतवर्ष की अवनति का काल था। उस समय भारत- वर्ष का उन्नति क्रम रुक गया था। भारतवर्ष के ग्रंथ प्राचीन पद्धति के अनुकूल सब ही विषयों का भांडार बने रहे। विशेषी- करण ( Specialism ) की उस समय प्रथा न थी । इसका कारण यह था कि, वे किसी एक विषय को अन्य fast में पृथक नहीं समझते थे। उनके विस्तृत धर्म में सब ही विषय आ जाते थे । इसी लिये हमको कर्त्तव्य शास्त्र नामक कोई विशेष ग्रंथ नहीं दिखाई पड़ता है किंतु इससे यह अभिप्राय नहीं कि हमारे देश में इस विषय के विचार ही न थे। प्राचीन यूनान के भी ग्रंथ इसी प्रकार के थे। जब प्लेटो की 'रिपब्लिक' ( Republic) नामक पुस्तक, जिसमें शिक्षा, विज्ञान राजनीति और कर्तव्यशास्त्र संबंधी सभी प्रकार के ज्ञानों का समावेश हो जाता है, कर्तव्य संबंधी साहित्य में उच्च स्थान पाती है, तब श्रीमद्भगवद्गीता को इस कोटि में न रखना एक बड़ी भारी भूल है। आज कल के कर्तव्यशास्त्र संबंधी अंगरेजी ग्रंथ जिन ग्रंथों के आधार पर लिखे गए हैं, वैसे ग्रंथों का हमारे यहां अभाव नहीं, केवल थोड़ी सहृदयता की आवश्यकता है। आशा है कि भविष्य मे<noinclude></noinclude> bowquie6gejkgdbl8y9vdeh77sxehsk पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२ 250 194342 664565 2026-07-02T17:21:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664565 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ७ ) योरोपीय लेखकगण हमारे ग्रंथों को सहृदय दृष्टि से देख कर और उनसे यथोचित लाभ उठा कर अपने ज्ञान की पूर्ति करेंगे। अंत में, उन मित्रों को धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने इस ग्रंथ की रचना में मुझे पूर्ण सहायता दी है। 'कहीं' की ईट कहीं का रोड़ा, भानमती ने कुनवा जोड़ा' यह लोकोक्ति प्रायः सब ही ग्रंथकारों के विषय में, विशेष कर प्रस्तुत पुस्तक में, चरितार्थ होती है। इस ग्रंथ में जिन ग्रंथों की सहायता ली गई है, उन सब के रचयिताओं के प्रति सहृदय कृतशता प्रकाशित करता हुआ इस क्षुद्र पुस्तक को गुणग्राही पाठकों के हस्तकमलों में सौंपता हूँ। आशा है कि सज्जन इस ग्रंथ को अपनाकर मेरा उत्साह बढ़ावेंगे। मैनपुरी वै० शु० १ ० १६७५ } गुलाब राय ।<noinclude></noinclude> flpfp1rswk1y4z1odrys8jh01bubzc3 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३ 250 194343 664566 2026-07-02T17:21:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664566 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२- दूसरा 33 से संबंध ३- तीसरा 53 विषय-सूची । विषय. - पहला अध्याय - कर्त्तव्य-शास्त्र का विषय और उसकी आवश्यकता कर्त्तव्य-शास्त्र का अन्यान्य शास्त्रों कर्त्तव्याकर्त्तव्य संबंधी निर्धारणा - पृष्ठ. ... का विषय ... ४ --चौथा 35 कर्त्तव्याकर्त्तव्य का निर्णायक पाँचवाँ " सुखवाद (Hedonism) १४ २७ ४८ ६-- छठाँ " ७- सातवाँ " उपयोगिता बाद (Utiltarianism) ६५ विकाशात्मक सुखवाद (Evolu tionary Hedonism) ... ८३ = आठवाँ " आत्म-विजय (Self-conquest ) ६६ ६- नवाँ आत्म-प्रतीति (Self-reali- zation) १०७ १० - दसवाँ समाज और कर्त्तव्य पालन ११७ ११- ग्यारहवाँ " कर्त्तव्य परायण जीवन १३३ १२- पहला परिशिष्ट कर्त्तव्य संबंधी रोग, निदान और चिकित्सा १४३ १३- दूसरा " १४- तीखरा " १५ - चौथा १६- पाँचवाँ " सुख ... ## कर्त्तव्य-विकास १५२ 33 कर्त्तव्य संबंधी साहित्य ... १६२ शब्द-सूची ... १६७<noinclude></noinclude> 29hdeeljf9n1anmoltbq226yxplu18k पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४ 250 194344 664567 2026-07-02T17:21:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664567 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कर्त्तव्य - शास्त्र | 2035 पहला अध्याय । कर्त्तव्य-शास्त्र का विषय और उसकी कर्तव्यशास्त्र की व्याख्या! आवश्यकता | प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में क्षण प्रति दास ऐसे सर आते हैं, जब कि उसको 'अच्छा' वा 'बुरा ' इन दो शब्दों में से किसी एक शब्द का प्रयोग करना पड़ता है । छड़ी, टोपी, पुस्तक, कलम, श्रधि, मका, वृक्ष, पर्वत, पशु और मनुष्य तथा उसकी क्रियाएँ सब ही के संबंध में 'अच्छा' या ' बुरा कहा जा सकता है। जब इन दोनों द्रों में से किसी एक का, मनुष्य के आचार अथवा संकल्प- मूलक क्रियाओं के संबंध में प्रयोग किया जाता है, तब ही कर्त्तव्य का विषय उपस्थित हो जाता है । किंतु इससे यह न समझना चाहिए, कि कर्त्तव्य-शास्त्र का विषय अच्छे और बुरे कामों की नामावली प्रस्तुत करना ही है। किसी वस्तु अथवा कार्य का अच्छा बुरा होगा उसके ती निर्णायक अथवा आदर्श के अनुकूल वा प्रतिकूल होने '<noinclude></noinclude> siypvlolaijcrekqetkx99cv8i2ehpi पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५ 250 194345 664568 2026-07-02T17:21:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664568 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २ ] पर निर्भर है। जब कोई मनुष्य यह कहता है, कि उसके हाथ मैं जी लेखनी हैं वह अच्छी नहीं, उस समय उसके पास कोई ऐसी सूची नहीं रक्खी रहती, जिसमें संसार भर की कलमों का विवरण दिया हो और जिसे देख कर वह कह सके कि उसकी लेखनी अच्छी और बुरी कलमों की खानापूरी में कहां स्थान पाती है। यदि उससे पूछा जाय, कि अमुक कलम को क्यों बुरा कहा, तो वह तुरंत उत्तर देगा, कि उससे ठीक नहीं लिखा जाता। उसके इस कथन से इस बात का अवश्य अनुमान होता है किं' 'ठीक लिखा जाना' कलमों की जाँच का कोई आदर्श है, और जो कलमें इस आदर्श के अनुकूल पड़ती हैं, वे ही अच्छी गिनी जाती हैं। इस मापक, निर्णायक अथवा आदर्श का हम को तब ही पता लगता है, जब कि हम 'अच्छे बुरे' के साथ 'क्यों' का प्रश्न उठाते हैं । जब कोई कहे कि 'दान देना अच्छा है' और उसी समय हम इस वाक्य के साथ 'क्यों' का प्रश्न खड़ा कर रे, तब हम को ज्ञात हो जावेगा कि दान को अच्छा कहने में कौन से आदर्श की अनुकूलता ढूँढ़ी गई है। यदि वह कहे कि दान देना अच्छा है, क्योंकि शास्त्री की आशा है, तो हम करे समझना चाहिए कि उस मनुष्य के लिये 'शास्त्र विहित होना' कर्तव्य का आदर्श है । वह और भी उत्तर दे सकता है, जैसे दान देने से आत्म-तुष्टि होती है। इस उत्तर से हम को मानना होगा कि उस मनुष्य के लिये 'आत्मतुष्टि' ही कर्त्तव्य का free है। इसी प्रकार समाज की स्थिति, अधिकांश लोगों का अधिक सुख, ईश्वर की प्रसन्नता, श्रात्मवल सव जीवों को देखना, ये दान को अच्छा बतलाने में कारण समझे जा सकते हैं और इन्हीं अथवा ऐसे ही कारणों में से किसी न<noinclude></noinclude> ay9fnd7y57kqk54u2zkogwyigz4rqlc पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६ 250 194346 664569 2026-07-02T17:21:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664569 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ३ ] किसी को भिन्न भिन्न लोगों ने कर्त्तव्य-शास्त्र का आदर्श माना है। मनुष्य के श्राचारों अथवा क्रियाओं को अच्छा-बुरा कहने में, जो निर्णायक मापक वा आदर्श उपयुक्त होता है, उसे स्थिर करना ही कर्त्तव्य-शास्त्र का विषय है। जिस शास्त्र द्वारा निःश्रेयस अथवा क्रियायों का अंतिम लक्ष्य निश्चित किया जाय, उसे ही कर्त्तव्य-शास्त्र कहते हैं । इस शास्त्र को पढ़कर आचरणों की परीक्षा की कसौटी मिल जायगी। हम यह जान लेंगे कि हमारे लिये परम श्रेय क्या है ? जो हमारे लिये परम श्रेय है, वही केवल ज्ञान से मनुष्य हमारे आचरणों में भले बुरे की जाँच का कर्त्तव्य-परायण निर्णायक बन सकता है, क्योंकि यह सब ही नही होता है। लोग मानेंगे कि जो हमारा परम श्रेय है, उसी के अनुकूल हमारे सब कार्य होने चाहिएँ । कर्तव्य-शास्त्र द्वारा हम को सदसदाचरण परीक्षा में बड़ी सहायता मिल सकती है, किंतु इससे यह न समझा जय कि कर्त्तव्य-शास्त्र में कुछ ऐसे विशेष नियम मिलेंगे, जो मनुष्य को सदाचारी बना सके। वह केवल एक ऐसा नियम निश्चित कर देगा, जिसके द्वारा यह जाना जा सके, कि कौन से आचरण सत् कहे जा सकते हैं और कौन से असत् । कर्त्तव्य-शास्त्र न तो लोगों को सदाचारी बनाने का दावा ही करता है और न वह कोई ऐसा शास्त्र है भी जो मनुष्य को सदाचारी बना सके । सदाचारी बनना मनुष्य की इच्छा और संकल्प पर निर्भर है। अंगरेजी भाषा में एक कहावत है, कि घोड़े को पानी तक तो एक ही आदमी ले जा सकता है, किंतु बीस आदमी भी उसे पानी पिला नहीं सकते । नीति-ग्रंथ मनुष्य को अधिक से अधिक सदाचार का ज्ञान<noinclude></noinclude> novw11c9cpzjbhwoi0put98klipgesx पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७ 250 194347 664570 2026-07-02T17:22:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664570 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ४ J दिला सकते हैं, पर उसे सदाचारी नहीं बना सकते। दुरात्मा से दुरात्मा पुरुष को भी साधारणतः सदाचार का ज्ञान होता है, किंतु क्या वह इस ज्ञान से ही सदाचारी बन सकता है ? इसी तरह पुण्यात्मा पुरुषों को दुराचार का ज्ञान होता है, नो क्या वे बुराई जानने के कारण बुरे कहे जा सकते हैं ? मला वही है, जो भला काम करे। प्लेटो ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है, कि न्यायशील मनुष्य को यह जानना परमावश्यक है, कि चोरी किस किस तरह हो सकती है, अतः न्यायशील मनुष्य एक प्रकार का चोर हुआ ! इसके उसर में यही कहा जावेगा कि जैसे चोर, यह मालूम रहने पर भी कि न्याय क्या है, न्यायशील नहीं कहा जाता है, वैसे ही न्यायशील पुरुष को, चोरी का शान होने के कारण चोर नहीं ठहरा सकते। जो जैसा करता है, वैसा ही कहा जाता है। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक भी कहा है कि कोई पुरुष अच्छा या बुरा नहीं। जिस समय जैसा काम करे, वैसा ही कहा जायगा। वे कहते हैं, कि सोते हुए चित्रकार को हम यह कहले कि वह अच्छा चित्रकार है, किंतु सोते हुए मनुष्य को हम अच्छा नहीं कह सकते, जब तक कि हम सोने को सत्कार्य न मान लें। काम करता हुआ मनुष्य ही नैतिक निर्धारणा का विषय बन सकता है। हम इसको एक प्रकार की अतिशयोक्ति ही कह सकते हैं, यद्यपि इसमें इतनी सचाई ज़रूर है कि आचार संबंधी संसार में केवल शान से काम नहीं चलता । "यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विज्ञान" । इस पर बहुत से लोग ये आपत्तियां उठायेंगे कि कर्त्तव्य- शास्त्र के शान से तो कोई क्रिया- परायण बनता नहीं, और न सब किया-कराया कर्त्तव्य-शास्त्र के पंडित ही होते हैं,<noinclude></noinclude> sw0sh7nhvgsp3wh45fgvthxl2w1utir पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८ 250 194348 664571 2026-07-02T17:22:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664571 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[4] फिर इसे पढ़ने व रटने कन्तव्य-शास्त्र की से क्या लाभ ? नीति के ग्रंथों से हमें जब धर्म और कर्त्तव्याकर्त्तव्य सार्थकता मे निर्णय करने में सहायता मिल जाती है, फिर शकाएँ । एक नए कर्त्तव्य शास्त्र की क्या आवश्यकता है ? तथा कर्त्तव्य पर विचार करते ही कर्त्तव्य में शंकाए होने लगती हैं और धर्मच्युत होने की संभावना रहती है, इससे कर्तव्य के विषय में विचार उठाना ठीक नहीं। इन तीनों प्रश्नों पर एक एक कर के विवेचना की जायगी। प्रायः बहुत से ऐसे अवसर भी श्राते हैं, जब कि बड़े आदमियों को भी कर्त्तव्याकर्त्तव्य निर्णय में किं कर्त्तव्यविमूढ़ हो धनुर्धारी अर्जुन की भाँति कहना पड़ता. पहला शंका का है, कि " पृच्छामि त्वां धर्म संमूढचेताः । " समावान । ऐसे अवसर पर हमको एक ऐसे निर्णायक की आवश्यकता होती है, कि जिसके द्वारा हम किसी आदर्शों अथवा धार्मिक सिद्धांतों के बीच में से एक को निर्धारित कर लें। कर्त्तव्य-शास्त्र ऐसे समय पर हमारी सहायता करता है। कभी कभी हमारे सामने ऐसी समस्याएँ उपस्थित हो जाती हैं, जब कि सत्य बोलने से बड़ा भारी अनर्थ, जैसे दूसरों की हानि इत्यादि होना संभव होता है, और सत्य न बोलने से ' सत्यान्नास्ति परो धर्मः' के विरुद्ध आचरण करना पड़ता है। ऐसे स्थानों में झूठ बोलना या मूक रहना, जो कि एक प्रकार का छिपा हुआ असत्य भाषण ही है, श्रेय माना गया है और 'सत्यान्नास्ति परो धर्मः" इसको उत्सर्ग मान कर हम परोपकार के विषय में अपवाद को स्थान देते हैं। यह बात तब ही ठीक पड़ती है, जब कि हम परोपकार को उश्वतम आदर्श मानते "<noinclude></noinclude> aqi5xvharwriw5ek66b4rnv44u0v0vd पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१९ 250 194349 664572 2026-07-02T17:22:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664572 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६ ] हैं। एक ओर दया और क्षमा की पाटी पढ़ाई जाती है और दूसरी ओर हम को यह उपदेश दिया जाता है कि समाज की स्थिति और आत्म-रक्षा के निमित्त मारनेवाले पर दया न की जाय। Mercy but murders pardoning those that kill. वह दया घातक है जिसके द्वारा घातक को क्षमा दी जाती है। ऐसे अवसर पर किसी बड़े व्यापक नियम को ढूँढ़ना पड़ता है, जैसे कि 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' इत्यादि, जिसके आधार पर हम इन दोनों परस्पर विरोधी सिद्धांतों में उत्सर्ग एवं अपवाद का संबंध स्थिर करते हैं, अर्थात् ऐसी स्थिति, पहले उपदेश की व्याप्ति की सीमा के बाहर ठहरा कर दूसरे उपदेश का आश्रय लेते हैं । अथवा दोनों का यथार्थ मूल्य निर्धारित कर दोनों को अपने कर्त्तव्य में यथोचित स्थान देते हैं। यही माध्य मिक श्रेणी का श्रादर्श श्रेयस्कर होता है । ऐसे दुविधा के अवसर न केवल साधारण आदमियों को ही आते हैं, प्रत्युत महापुरुषों को भी प्राप्त होते रहे हैं। वीर- वर अर्जुन को कुरुक्षेत्र के रणांगण में कर्त्तव्य की बड़ी भारी समस्या उपस्थित हुई थी। एक ओर तो 'युद्धाद्धि श्रेयः - यस्य न विद्यते' और दूसरी ओर ' कुलक्षय कृतं दोषं मित्र द्रोहं च पातकम्' अर्थात् जैसे, युद्ध क्षत्रिय का परम धर्म है, वैसे ही कुलक्षय करना भी बड़ा भारी दोष और पूज्य गुरु लोगों तथा मित्रों का मारना भी भयंकर पाप है। इन्हीं दोनों परस्पर विरुद्ध बातों में संभ्रम होने से - "सीदंति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते ॥ निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ! न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ||<noinclude></noinclude> 4uvouf2d4603tp3syz7mrzl6ihl4kek पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२० 250 194350 664573 2026-07-02T17:22:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664573 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>x [ 9 ] न कांक्षे विजयं कृष्ण ! न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द ! किं भोगेर्जीवितेन वा ॥ x x x गुरून्हत्वा हि महानुभावान्, श्रेयो भोक्तुं भैश्यमपीह लोके । हत्या कामांस्तु गुरुनिहैव, भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥ x x × कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्म संमूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मै शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वा प्रपन्नम् ।। अपने गुरु बंधु fat को रणक्षेत्र में देख कर अर्जुन का मुख सूख जाता है। गात्र शिथिल हो कर तथा शरीर कंपाय- मान हो कर रोम खड़े हो जाते हैं। वह कहता है कि "स्वजनों को मारने में कल्याण नहीं दिखाई पड़ता है। हे गोविंद ! मैंने ऐसी विजय और ऐसा सुख छोड़ा, अब कि जिनके अर्थ में जी रहा हूँ, वेही मेरे हाथ से मारे जायँ ! फिर राज्य तथा भोग और जीवन से क्या लाभ? महात्माजनों एवं गुरु लोगों को न मार कर इस लोक में भीख माँग कर पेट पालना भी श्रेयस्कर है, किंतु अपने से बड़े एवं पूज्य लोगों को, चाहे वे अर्थलोलुप भी क्यों न हो रहे हों, मार कर उनके रुधिर से सने हुए भोजन करना मेरे लिये कल्याण-कारक नहीं ! दीनता से मेरी स्वाभाविक वृत्ति नष्ट हो गई है। मैं अपने धर्म अर्थात् कर्तव्य के विषय में मूढ़ हो रहा हूँ। मैं तुम्हारा शिष्य हूँ । शरणागत हूँ । अतः जिसमें मेरा भला हो, उसे निश्चित करके बतलाइए । " इसी बड़े प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण भगवान् ने भगवद्गीता ऐसा अमूल्य रत्न अर्जुन को दिया है। बड़े आदमियों का मोह भी बड़े फल का देनेवाला होता है। जब अर्जुन को, 'कर्मण्ये-<noinclude></noinclude> tiu9bxzmqcy3cgr6nkn6pyarkh5elte पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२१ 250 194351 664574 2026-07-02T17:22:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664574 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ - ] वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन की शिक्षा दी गई, तब ही उसकी मोह-निवृत्ति हुई। इसी प्रकार संसार में बहुत से छोटे छोटे अर्जुन वर्तमान हैं, जिनको समय समय पर कर्त्तव्य के विषय में मोह प्राप्त हो जाता है। ऐसे ही समय पर कर्त्तव्य-शास्त्र की सार्थकता प्रतीत होने लगती है। जब स्वास्थ्य में कुछ गड़बड़ी पड़ती है, तब ही वैद्य की आवश्यकता होती है। बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें वैद्य की आवश्यकता नहीं, और वैद्य के विद्यमान- होते हुए भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जो उनकी सलाह न लेकर आजन्म रोगी बने रहते हैं। तो क्या इस युक्ति से वैद्यों और चिकित्सा शास्त्र की निष्फलता सिद्ध होगी ? जिनको वैद्यों की ज़रूरत नहीं, उन्हें भी कभी न कभी उनकी शरण में जाना पड़ता है। और जो लोग वैद्यों की अनुमति से लाभ नहीं उठाते, वे भी यदि उनके कहे अनुसार चलें, तो अपने रोग- जनित क्लेश में थोड़ी बहुत कमी कर सकेंगे। यदि वे लोग, जिनका स्वास्थ्य अच्छा है, वैद्यक के सिद्धांतों के अनुकूल अपनी दिनचर्या रक्खेंगे तो वे स्वास्थ्य बिगड़ने की संभावना को कम कर देंगे । यही स्थिति कर्त्तव्य-शास्त्र की है। जो लोग स्वभावतः कर्त्तव्य-परायण हैं, उनको वर्तमान में कर्त्तव्य शास्त्र की आवश्यकता चाहे न भी हो, किंतु जब कभी उनको भविष्य में अर्जुन का सा मोह प्राप्त होगा, तब उन्हें कर्त्तव्या- . कर्त्तव्य की कसौटी की आवश्यकता पड़ेहीगी! जो लोग बिना कर्त्तव्य-शास्त्र के जाने सदाचारी हैं, यदि ऐसे लोग भी अपनी क्रियाओं के आदर्श और मूल सिद्धांत को समझ लें, तो इससे उनको अपने सत्कर्म का गौरव और मूल्य विदित हो जायगा । फिर कर्तव्य में उनकी श्रद्धा भी दृढ़ हो जायगी, जिससे<noinclude></noinclude> cako6t124yk7fm8wcrki3y1uw6ttx96 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२२ 250 194352 664575 2026-07-02T17:22:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664575 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ & ] वे आगे कभी कर्त्तव्यच्युत न होंगे। कर्त्तव्य-शास्त्र द्वारा निश्चित क्रियाओं के अंतिम लक्ष्य को, जो लोग जान बूझ कर अपनी क्रियाओं का लक्ष्य बनाते हैं, उनके नियमित जीवन से, उनकी तथा संसार की उन्नति होने की विशेष संभावना है। जो लोग कर्त्तव्य-शास्त्र के ज्ञाता हो कर भी उसके द्वारा निर्धा- रित नियमों से अपने जीवन को नियमित नहीं बनाते, उनके लिये वे ही दोषी ठहराए जा सकते हैं, कर्त्तव्य-शास्त्र नहीं । जो लोग अपने ज्ञान को अपने जीवन का अंश नहीं बनाते, उनका ज्ञान पूर्ण नहीं समझा जा सकता है। बौद्धमत के एक ग्रंथ में लिखा है कि जो केवल ज्ञान प्राप्त करके सुख की आशा करते हैं, उनकी तुलना उस मनुष्य से की जा सकती है। जो बीज खा कर उसके फल का स्वाद चखना चाहता है । पूर्ण ज्ञान वही है जो क्रिया-परिणामी हो। इससे लोगों को चाहिए कि अपने ज्ञान को अपने जीवन का अंश बनावें । अपनी बुद्धि और संकल्प की एकता करें, तब ही उनका ज्ञान सार्थक हो सकता है। समाधान। हमारे देश में एक से एक उत्तम धार्मिक एवं नैतिक ग्रंथ वर्तमान है। समय समय पर हमको उनकी सहायता भी मिलती रहती है। ऐसे ग्रंथों में अधिकतर दूसरी शंका का विशेष नियम मिलते हैं। कर्त्तव्य-शास्त्र इन विशेष नियमों पर विचार करके ऐसे नियम का अनुसंधान करता है जिसके अंतर्गत ये सब आचार संबंधी नियम आ जायें, और जिस एक सर्व- व्यापी सिद्धांत के आधार पर इन सब नियमों को यथार्थ रूप से समझ कर उनका परस्पर संबंध निश्चय किया जा सके। 'क्यों' और 'कहां तक किसी विशेष नियम का अनुसरण<noinclude></noinclude> siqmfaosx2yrgbdwz4j8p77x1bqw70x पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२३ 250 194353 664576 2026-07-02T17:23:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664576 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१०] ना चाहिए और कौन सा नियम किसका अपवाद होना हिए, ये दोनों बातें तभी ठीक ठीक समझ में आ सकती हैं। कि इन विशेष नियमों का एक अटल, मूल सिद्धांत श्चित हो । उदाहरणार्थ, 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' का नियम की व्याप्ति रखता है। इस नियम को दूसरे शब्दों में महात्मा ने अपने मध्य पथ में लगाया है। अरस्तू (Aristotle) भी यही मत था, कि बीच का मार्ग ही श्रेय है। नता और अधिकता दोनों ही की प्रति वर्जनीय हैं, जैसे 1 धुंध में कूद पड़ने को कोई शूरता नहीं कहता और hare बंद करके घर में बैठने को ही शूरता कहता है। ली बात जिस प्रकार अधिकता की ओर श्रुति है उसी र दूसरी बात न्यूनता की ओर। प्रशंसनीय शूरता इन दोनों तियों के बीच की गिनी जाती है। इसी प्रकार उदारता दि सद्गुणों के विषय में समझ लेना चाहिए। मनुस्मृति सदसत्परीक्षा के चार परिमाण दिए हैं। महाभारत में भी हाजनो येन गतः स पंथाः श्रादि कई परिमाण दिए हैं। भूतहित, लोक-संग्रह आदि निष्काम कर्म ऐसे कई एक मारा धर्म ग्रंथों में माने गए हैं। ये सब परिमाण परम्पर धी नहीं हैं और न इन सब का अभिप्राय पुनरुक्ति मात्र में कर्त्तव्य-शास्त्र इन नियमों पर विवेचना कर इन नियमों में ऐसे नियम की खोज करता है, जिसको कर्तव्याकर्त्तव्य का मारा मान कर सब संकल्प-मूलक क्रियाओं और तत्संबंधी का निर्णय दिया जा सके। इस परिमाण का लक्षण आगे कर बताया जायगा । कर्त्तव्य-शास्त्र द्वारा नीति और धर्म ग्रंथों के मूल तत्व समझने की योग्यता बढ़ेगी । अतः -शास्त्र नीति और धर्म-बाधक नहीं प्रत्युत् साधक ही है।<noinclude></noinclude> e3lbszkfmdwq6sq9ihrnvm0rzsopm2n पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२४ 250 194354 664577 2026-07-02T17:23:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664577 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरी शंका का समाधान तथा शंका की उप- योगिता | [ ११ ] कर्त्तव्य-शास्त्र के पढ़ने से प्रथम कर्त्तव्य-शास्त्र संबंधी नियमों पर विवेचना करने के लिये बहुकाल प्रतिष्ठित नियमों और आचारों पर अवश्य शंका करनी होगी क्योंकि बिना शंका के विवेचना का उदय होना कठिन है। प्लेटो ने कहा है कि (Philosophy begins in doubt ) तत्त्व- ज्ञान का आरंभ शंका ही से होता है। यह ara ठीक है कि तत्वज्ञान का उदय शंका में होता है किंतु उसका अंत विश्वास और निश्चित ज्ञान में होता है। शंकाय भी कई प्रकार की होती हैं। एक तो शंका आलस्य मूलक है। जिस बात को हम करना नहीं चाहते उसकी नैतिक योग्यता में शंका उठा देना है सहज ! ऐसी कोई अच्छी से अच्छी बात नहीं जिसमें शंका के लिये स्थान न हो । धर्म से मुँह फेरने वाले आलसी इस बात का अधिक सहारा लेते हैं। यदि किसी दीन दुखी की सहायता न करनी हुई, तो कह दिया कि वह अपने पूर्व जन्मों का फल भोग रहा है। हम इसका दुःख कम करके ईश्वरेच्छा सफल होने में बाधा डालें ? कर्त्तव्य- पालन से पीछे हटनेवाले लोग ऐसी युक्तियों का आश्रय लेते हैं। जो लोग केवल कर्त्तव्य से बचने के लिये कर्त्तव्य में शंका उठा देते हैं, उनकी शंका सर्वथा गर्हणीय है। कुछ लोगों की शंका केवल विवाद-मूलक है। वे कर्त्तव्य करने न करने में उदासीन रहते हैं, किंतु शंका उठाने में बड़े निपुण होते हैं । ar लोगों की शंका में कोई बुरा भला उद्देश्य नहीं होता, किंतु वे शंका को शंका के ही अर्थ करते हैं। उनका स्वयं मंतव्य कुछ नहीं होता। दूसरों के मत में शंका कर देना ही उनका पग्म धर्म है। प्राचीन यूनान में ऐसे लोगों की सोफिस्ट्स'<noinclude></noinclude> 72d2jq4p72fxwqsb2n8m89xb5ooi86l पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२५ 250 194355 664578 2026-07-02T17:23:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664578 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१२] (Sophists) नाम की एक जाति ही प्रख्यात थी। इस प्रकार की शंका का फल कभी कभी अच्छा हो जाता है, किंतु यह वृथा प्रश्न उठाना किसी रीति से आदरणीय नहीं। तीसरी प्रकार की एक और शंका है, जो श्रद्धामुलक है। यह शंका सच्चे जिज्ञासु की है। सुतरां प्रशस्त भी है। यह शंका केवल शंका करने के अर्थ नहीं उठाई जाती है और न आलस्यवश हो कर्त्तव्य से पराङ्मुख होने के अर्थ, वरन् कर्त्तव्य का सच्चा रहस्य जानने के लिये । इस शंका रूपी खनित्री से यदि कोई पुराने खंडहर गिराए जाते हैं, तो केवल विध्वंस के लिये नहीं, वरन् सदाचार के नवीन भव्य भवन निर्माण करने के लिये । अवस्थाओं की उपस्थिति पर नए नए कर्त्तव्यों का उदय होता है । फिर उसी के साथ प्राचीन श्राचार-पद्धति शंका होने लगती है। किंतु सच्चे जिज्ञासु की शंका निर्मूल नहीं जाती । उस शंका से पुराने श्राचारों की नैतिक योग्यता भली भांति ज्ञात हो जाती है। शंकानि में तप कर चीन-चार पद्धति तप्त कांचन की भांति शुद्ध और धुति- मती बन जाती है । कर्त्तव्य-शास्त्र संबंधी मौलिक एवं व्यापक नियमों की खोज करनेवालों की शंका जिज्ञासु भाव से होनी वाहिए। इस भाव की शंका न तो कर्त्तव्य से बचने के लिये उठाई जाती है और न केवल कोरे विवाद के लिये, वरन् सत्य रूप से कर्त्तव्य का श्रीचरण करने के अर्थ ऐसी शंका का श्राविर्भाव होता है। ऐसी शंका को शास्त्र में जिज्ञासा कहते हैं और इसी जिज्ञासा के प्रभाव से हम लोगों को भगवद्गीता और योगवाशिष्ठ सरीखे ग्रंथ-रत्न प्राप्त हुए हैं इस विवेचना से न तो पुरानी बातों का खंडन ही किया जाता है और न नई बातों का मंडन ही पुरानी और नई बातों<noinclude></noinclude> 58sszhazkzeyb28fbrc1d8kbzfa4o6f पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२६ 250 194356 664579 2026-07-02T17:23:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664579 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १३ ] पर पूर्ण रीति से विवेचना करके एक स्थिर आदर्श के आलोक में उनका यथेष्ट मूल्य निश्चित करना, कर्त्तव्याकर्त्तव्य के जिशा का कार्य होगा । निम्नलिखित श्लोक के अनुकूल आचरण में जो महाकवि कालिदास ने काव्य के विषय में कहा है, कर्त्तव्य का विषय भी घटित होता है। पुराणमित्येव न साधु सर्वे न चापि काव्यं नव मित्यवद्यम् । सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेय बुद्धिः ॥<noinclude></noinclude> 125i3zzp3fueg6r7f0ug9vi53i313ej पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२७ 250 194357 664580 2026-07-02T17:23:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664580 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा अध्याय । कर्त्तव्यशास्त्र का अन्यान्य शास्त्रों से संबंध 1. विश्व का बनानेवाला ईश्वर एक है। उसके अनंत ज्ञान विश्व की एकता है । जैसे मनुष्य के शरीर में कोई अंग ऐसा नहीं है, जिसका शरीर के सभी अंगों से कुछ न कुछ संबंध न हो, वैसे ही संसार में भी ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जसका और पदार्थों के साथ संबंध न हो। इसी प्रकार शान की एकता में सभी शास्त्रों का समन्वय है। कोई भी एक ऐसा वेषय नहीं, जो दूसरे विषयों से कुछ न कुछ संबंध न रखता हो। किसी एक शास्त्र के ज्ञाता बनने के लिये मनुष्य को बहुत ने शास्त्रों का थोड़ा बहुत ज्ञान होना परमावश्यक है । वेद का आता होने के लिये शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और योतिष-शास्त्र के जानने की आवश्यकता मानी गई है। योतिष शास्त्र बिना गणित शास्त्र के नहीं पढ़ा जा सकता एवं बेना रसायन जाने श्रायुर्वेद शास्त्र का पढ़ना कठिन है । कृषि der सीखने के लिये भूगर्भ विद्या, रसायन विद्या, वनस्पति त्र, यंत्र विद्या आदि अनेक विद्याओं की आवश्यकता है। ज्ञान के अंग भी शरीर के अंगों की भांति एक दूसरे पर निर्भर हैं। ऐसा भी कहना अत्युक्त न होगा कि बिना समस्त के पूर्ण ज्ञान हुए एक अंग का भी पूर्ण ज्ञान असंभव । इसीले कोई भी अपने आपको किसी एक शास्त्र किंवा केसी एक विषय का पूर्ण ज्ञाता नहीं कह सकता है। प्रत्येक दार्थ के ज्ञान में अनंत उन्नति के लिये अवकाश है। जैसे<noinclude></noinclude> 2ff5itsdtlgma4yljz9mlxhd3o4ru2a पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२८ 250 194358 664581 2026-07-02T17:23:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664581 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१५] जैसे विश्वविज्ञान में हम उन्नति करते हैं, जैसे जैसे हमारे पूर्व में जाने हुए पदार्थों का संबंध और शास्त्रों का समन्वय अधिक अधिक हमारी समझ में आता है वैसे ही वैसे इस सिद्धांत को मुक्तकंठ से स्वीकार करते हुए भी यह कहना पड़ता है कि ज्ञान की अनंतता और मनुष्य की अल्पज्ञता के कारण फिर भी विशेषीकरण की आवश्यकता है। एकीकरण में हम पदार्थों के अनंत प्रकार के संबंधों में से कुछ मोटे मोटे संबंधों और बड़े बड़े सिद्धांतों का ही वर्णन कर सकते हैं। किसी भी विषय के विशेष विवरण के लिये उसे पृथक करके वर्णन करना आव श्यक है। इस विशेषीकरण ( Specialization) के नियम का आज कल बहुत प्रचार है। प्रत्येक विषय एक स्वतंत्र शास्त्र होता जाता है। उन्नति और विकाश के लिये इसकी बड़ी आवश्यकता है । और मनुष्य की अल्पशता के कारण जब कि कोई भी सर्वज्ञ नहीं है, हम में से जिसका जिस विषय में विशेष अधिकार हो, वह उसी विषय पर विवरण कर सकता है। अतएव विशेषीकरण अनिवार्य है । विशेषी- करण में सब से बड़ा दोष यह है कि बहुधा लोग एकत्त्व की दृष्टि त्याग कर विशेष विषय को पृथक और स्वतंत्र समझने लगते हैं। यह बहुत बड़ी भूल है। विशेषीकरण वर्णन की सुगमता तथा मनुष्य की असर्वशता आदि पूर्व प्रदर्शित कारणों के अनुकूल आदरणीय अवश्य है तथापि वास्तव में कोई विषय स्वतंत्र और पृथक् नहीं है। यदि मनुष्य के अँगूठे के विशेष विवरण के लिये हम उसी के विषय में एक पृथक ग्रंथ लिखें तो कोई हानि नहीं है। उसमें हम उस अँगूठे में जो पदार्थ मिले हुए हैं, विशेष रूप में उनको समझा सकते हैं, परंतु हमको यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि अँगूठा<noinclude></noinclude> 4yqrsxy9q3vlj5p7yo4s3a4yl9t0l99 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/२९ 250 194359 664582 2026-07-02T17:24:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664582 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १६ ] कोई स्वतंत्र और पृथक पदार्थ मानने योग्य नहीं है। इस स्वतंत्र रूप से विशेष वर्णन करने के कारण उसे पृथक् कटे हुए अँगूठे की तरह देखना बहुत बड़ी भूल है। ऐसे ही भ्रम वश कोई लोग कर्त्तव्य-शास्त्र को पृथक् शास्त्र कहने लगते हैं । किंतु यदि सुभीते के लिये हम किसी एक विषय के विचार में अन्य विषयों का ध्यान छोड़ दें तो इससे वह विषय अन्य विषयों से निरपेक्ष नहीं हो सकता । कर्त्तव्य-शास्त्र का, धर्म (Religion), तत्वज्ञान ( Meta- physics) और मनोविज्ञान ( Psychology ) से तो विशेष संबंध है, परंतु और शास्त्रों से भी थोड़ा बहुत मेल है, जिन्हें कोई कर्त्तव्य-शास्त्र का लिखनेवाला अपने ध्यान से नहीं हटा सकता । भिन्न भिन्न शास्त्रों के साथ जो कर्त्तव्य-शास्त्र का संबंध है उस पर क्रमशः विचार किया जायगा । धर्म और कर्तव्य शाख । धर्म का अर्थ धारण करना है, ' धारणाद्धर्म इत्याहुनी- चिणः, जिसे मनुष्य धारण करे, वही धर्म है । किसी मनुष्य के धर्म का पता लग जाने से यह ज्ञात हो जाना है कि वह संसार और अपने जीवन को किस दृष्टि से देखता है, और जिस दृष्टि से यह संसार और अपने जीवन को देखता है उसी के अनुकूल वह अपने आचरणों और व्यवहारों को बनाता है। हान और कर्म हमारे देश में तथा अन्य देशों में धर्म के अंग गने गए हैं। वेद भी शान-कांड और कर्म-कांड में विभक्त केए गए हैं। प्रायः सब ही धर्मों ने इस बात के उत्तर देने का प्रयत्न किया है, कि यह संसार कैसा है ? इस का मूला- र कौन है? उससे इस संसार का क्या क्या संबंध है ? बातों के ज्ञान के अनुकूल ही धार्मिक ग्रंथ संसार में मनुष्य<noinclude></noinclude> bucrwxwiio244o7w6wt71z67mbi7az0 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३० 250 194360 664583 2026-07-02T17:24:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664583 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १७ ] की स्थिति और उसका ईश्वर और मनुष्य के प्रति कर्त्तव्य निश्चित कर देते हैं। धर्म में शान और कर्म दोनों समन्वित हैं। ज्ञान के विभाग पर विशेष रूप से विचार करना तत्त्वज्ञान ( Metaphysics) का विषय हो जाता है, और कर्म के दो विभागों में से ईश्वर के प्रति जो कर्त्तव्य है, वह तो धर्म का मुख्य विषय बन जाता है और जो मनुष्य के प्रति कर्त्तव्य है वह कर्त्तव्य- शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय हो जाता है। इसमें भी इतना भेद है कि धर्मानुकूल जो मनुष्य का मनुष्य के प्रति कर्त्तव्य है, वह भी ईश्वर की आज्ञा पालन करने की इच्छा से होता है और कर्त्तव्य-शास्त्र के अनुकूल मनुष्य के प्रति मनुष्य का कर्तव्य तो वही रहता है, किंतु उसमें ईश्वर की आशा पालन करने की दृष्टि प्रधान नहीं रहती। इसके अतिरिक्त कर्त्तव्य-शास्त्र का धर्म से और भी विशेष संबंध है। अर्थ अपने से ईश्वर और जीव की सत्ता को मानना प्रायः सब ही धर्मो की मूल धारणा है। जिन धर्मों में ईश्वर को नहीं माना है वे धर्म भी कर्त्तव्य का आदर्श प्राप्त करने के ऊँची कोटी की सत्ताओं में विश्वास रखते हैं। यह भी एक प्रकार के ईश्वर में विश्वास है। बिना इस धारणा के माने कर्त्तव्याकर्त्तव्य निष्फल सा मालूम होता है। कुछ लोग कहते हैं कि जब तक कर्त्तव्य-शास्त्र के नियमों को अटल न मानें, तब तक हमारा उनसे बँधना कठिन है। जब कोई नियम अटल नहीं तब उसका मानना न मानना बराबर है। यद्यपि कर्त्तव्याकर्त्तव्य संबंधी विचार, समय समय पर बदलते रहते हैं, तथापि कुछ ऐसे मूल सिद्धांत हैं, जिनको अटल मानना पड़ेगा। ऐसे अटल सिद्धांतों को ईश्वर के ही अटल ज्ञान में स्थान देना पड़ेगा। कुछ तत्त्ववेत्ताओं का यह भी कहना है २<noinclude></noinclude> knk7j25xyt4wc71f2xnazilizluh9f6 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३२ 250 194361 664584 2026-07-02T17:24:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664584 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १६ ] एक प्रकार से तो तत्त्वज्ञान का और सब शास्त्रों से संबंध है ही, क्योंकि सब शास्त्रों के मूल सिद्धांतों की विवेचना तत्त्व- ज्ञान में की जाती है। किंतु कर्त्तव्य-शास्त्र और तस्वशान का घनिष्ठ संबंध है । तत्त्वज्ञान की कल्पनाओं के रदबदल होने से अन्य शास्त्रों में कुछ रदबदल नहीं होती, किंतु कर्त्तव्य-शास्त्र तस्वान और कर्तव्य-शास्त्र का संबंध के नियम तत्त्वज्ञान की कल्पनाओं से इसने स्वाधीन नहीं हैं। उदाहरण लीजिए, गणित शास्त्र का आकाश (Space) से संबंध है । आकाश ही गणित-शास्त्र का विषय है। आकाश की वास्तविक प्रकृति की विवेचना करना तत्त्वज्ञान का काम है। आकाश को सत् माने चाहे कल्पित, चाहें अनादि माने वा सादि किंतु गणित-शास्त्र के नियमों में कुछ भी बाधा न आवेगी: त्रिभुज ( Triangle ) के तीनों को दो सम कोण (Right angles) के बराबर ही रहेंगे, आकाश के सादि होने से घट नहीं जायेंगे और न अनादि होने से बढ़ ही जायँगे। किंतु कर्त्तव्य शास्त्र तत्त्वज्ञान की कल्पनाओं से ऐसा उदासीन नहीं। संसार को सुखमय वा दुखमय मानिए, किंतु जीव को प्रकृति का विकार मानने या न मानने अथवा उसे स्वतंत्र वा परतंत्र मानने से कर्त्तव्य-शास्त्र के मूल आदर्श में बड़ा अंतर पड़ जायगा। किसीने कहा है कि यदि तुम मुझे अपने तत्वज्ञान संबंधी विचार बतला दो तो मैं तुमको तुम्हारे कर्त्तव्य संबंधी विचार बता दूँगा । चार्वाक लोग जो शरीर को ही आत्मा मानते हैं, 'यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् की शिक्षा देते हैं, और जहाँ पर ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म की पाटी पढ़ाई जाती है, वहाँ पर नीचे लिखे हुए लोक के अनुकूल शिक्षा दी जाती है।<noinclude></noinclude> 1orn8mzbamf3htcniaffh2yz5lcou9r पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३३ 250 194362 664585 2026-07-02T17:24:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664585 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[२०] यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति । सर्व भूतेषु चात्मानं ॥ भगवद्गीता | अर्थात् जैसे कि सब संसार को ब्रह्मरूप प्रतिपादन किया है। उसी के अनुकूल यह कर्त्तव्य बतलाया है कि सब प्राणियों को अपनी श्रात्मा में देखना और अपनी आत्मा को सब में देखना अथवा सबको एक दृष्टि से देख कर सर्व-हित-चिंतन करना चाहिए । इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता में सात्विक, राजस और तामस त्रिविध ज्ञान के भेद वर्णन कर उन्हीं के अनुसार कर्म के भी त्रिविध भेद दिखाए हैं। ये भेद इस बात को प्रकाशित करते हैं कि ज्ञान के आदर्श के अनकूल ही कर्त्तव्य का आदर्श बनता है। उपर्युक्त उदाहरणों से पाठकों को विदित हो गया होगा कि कर्त्तव्य-शास्त्र को तत्त्वज्ञान से निरपेक्ष नहीं कह सकते । कर्त्तव्य-शास्त्र का विषय मनुष्य का आचार है। मनोविज्ञान और किंतु मनुष्य के श्राचार उसकी इच्छा संक- कर्त्तव्य-शाल का ल्पादि मानसिक क्रियाओं के फल हैं । कर्त्तव्य- शास्त्र श्राचारों को बाहर की ओर से नहीं संबंध 1 देखता, वरन् भीतर की ओर से देख कर क्रियाओं की प्रेरक मानसिक प्रवृत्तियों की ओर भी ध्यान देता है। मनोविज्ञान इन मानसिक प्रवृत्तियों पर विशेष रूप से विचार करता है। यही कर्त्तव्य-शास्त्र और मनोविज्ञान का संबंध है। किंतु कर्त्तव्य-शास्त्र और मनोविज्ञान की दृष्टि में भेद है। मनोविज्ञान केवल यही बतलाता है कि इच्छा और संकल्प क्या है और इनका पारस्परिक संबंध क्या है ? यहाँ मनोविज्ञान का कार्य पूरा हो जाता है। कर्त्तव्य-शास्त्र श्रीमद्भगवता अध्याय १८ श्लोक २०-२५ ।<noinclude></noinclude> agj7xfv21blzthlvs3ok09pt1m4vjd0 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३४ 250 194363 664586 2026-07-02T17:24:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664586 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २९ ] इसके आगे इनके विषय में अच्छे बुरे का प्रश्न उठाता है। तर्क - शास्त्र, सौंदर्य - विज्ञान ( Aesthetics) और कर्तव्य- शास्त्र तीनों ही मनोविज्ञान से संबंध रखते हैं, किंतु ये तीनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रह कर एक आदर्श निश्चित करते हैं। विचार, भावना और संकल्प मन की तीन मुख्य शक्तियाँ मानी गई हैं। इन तीनों शक्तियों के विषय में एक आदर्श स्थिर करने के लिये एक एक शास्त्र का उदय हुआ है। तर्क-शास्त्र (Logic) सत्यासत्य के विषय में विवेचना करके विचार का आदर्श स्थित करता है। सौंदर्य-विज्ञान ( Aesthetics) भावना विषयक आदर्श निश्चित करता है। कर्त्तव्य-शास्त्र भले और बुरे पर विवेचना करके संकल्प संबंधी आदर्श निश्चित करता है। ये तीनों शास्त्र मनोविज्ञान से संबंध रखते हैं । किंतु ये सब आदर्श की ओर जाने के कारण औचित्य विज्ञान (No:- mative Science) में गिने जाते हैं और मनोविज्ञान को शुद्ध विज्ञान ( Positive Science ) की संज्ञा मिलती है, क्योंकि उसका कार्य शुद्ध वर्णन से है, बर्णन किए हुए पदार्थ की भलाई बुराई से नहीं कर्त्तव्य शास्त्र संकल्प के विषय में मनो- विज्ञान से बढ़ जरूर जाता है, किंतु उससे उदासीन नहीं है। राजनीति और राजनीति और कर्त्तव्य शास्त्र दोनों ही मनुष्यों के पर- स्पर व्यवहारों से संबंध रखते हैं। प्राचीन ग्रंथों में जहाँ पर दोनों ही विषयों का साथ साथ विवरण किया गया है, वहाँ यह संबंध और भी घनिष्ठु दिखाई पड़ता है। सेटो (Plato ) से अपने रिपब्लिक (Republic) नामक ग्रंथ में दोनों ही विषयों का मेल कर दिया है। अरस्तू ने कर्त्तव्य-शास्त्र (Nechomacian Ethics) को अपने राजनैतिक कर्तव्य शास्त्र का संबंध<noinclude></noinclude> 4p2r3ko60dzgsqqg4574th8ikiv3smq पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३५ 250 194364 664587 2026-07-02T17:25:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664587 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २२ ] विज्ञान में परिशिष्ट रूप से लिखा है। हमारे यहाँ भी किसी किसी ग्रंथ में (जैसे, बिदुर नीति ) धर्म और राजनीति को मिला दिया है, और किसी ग्रंथ में (जैसे कणिक नीति) अलग रक्खा है। इसे अलग रखने का यह फल हुआ है कि कुछ लोगों ने दोनों शास्त्रों को एक दूसरे के प्रतिकूल ही मान रक्खा है। कुछ लोगों का ऐसा विश्वास है कि राजनीति के अनुसार धोखा देना, झूठ बोलना निध कम्मों की गणना में नहीं आते। राजनीति के गूढ़ तत्त्व पर विचार करने से यह बात भली भाँति विदित हो जायगी कि राजनीति और कर्त्तव्य-शास्त्र में इतना विरोध नहीं। राजनीति का अंतिम लक्ष्य राज्य ( जिसमें राजा और प्रजा दोनों ही आ जाते हैं) की स्थिति और उत्तरोत्तर वृद्धि है। धर्म अर्थात् कर्त्तव्य के नियमों के विरुद्ध चल कर यह लक्ष्य कदापि सिद्ध नहीं हो सकता। इसी लिये विदुर नीति में कहा है। धर्मेण राज्यं विदेत धर्मेण परिपालयेत् । धर्ममूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते ॥ अर्थात् धर्म से राज्य प्राप्त करे और धर्म से ही उसकी पालना करे, क्योंकि धर्ममूला संपत्ति प्राप्त होने पर न वह घटती है न नष्ट होती है। फिर क्या राजनीति और कर्त्तव्य- शास्त्र में कोई भेद ह नहीं ? अर्थ- शास्त्र की भाँति राजनैतिक विज्ञान भी मनुष्य 'को केवल व्यक्ति रूप से देखता है। कर्त्तव्य-शास्त्र भी मनुष्य को व्यक्ति रूप से देखता है; किंतु उसको कोरा व्यक्ति नहीं मानता । कर्त्तव्य-शास्त्र व्यक्ति को समष्टि के संबंध में देखता हैं। इसी कारण कर्त्तव्य-शास्त्र की दृष्टि विस्तृत मानी जाती है। अर्थशास्त्र और राजनैतिक विज्ञान का दृष्टिकोण संकु<noinclude></noinclude> tvdueh3v5pgcyae59xi468ub4gekwrd पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३६ 250 194365 664588 2026-07-02T17:25:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664588 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २३ ] चित है किंतु इसका यह अभिप्राय नहीं कि ये दोनों शास्त्र कर्त्तव्य - शास्त्र के प्रतिकूल समझे जावें । जैसे समष्टि और व्यष्टि के हित में विशेष भेद नहीं, वैसे ही कर्त्तव्य-शास्त्र, जिस- का कि संबंध समष्टि से है, अर्थ-शास्त्र और राजनैतिक विज्ञान जिनका व्यष्टि से विशेष संबंध है, एक दूसरे के प्रतिकूल नहीं। अर्थशास्त्र उपयोगितावाद पर जाता है, किंतु कर्त्तव्य-शास्त्र उपयोगितावाद के प्रतिकूल नहीं, वरन् उससे ऊँचा है। कर्तव्यशास्त्र का लक्ष्य उपयोगितावाद से ऊँचा जाता है, इस कारण वह उपयोगितावाद के प्रतिकूल नहीं। कर्त्तव्य- शास्त्र और राजनैतिक विज्ञान का एक और बात में भेद किया जाता है। राजनैतिक विज्ञान और अर्थ - शास्त्र मनुष्य की क्रियाओं के बाह्य परिणाम की ओर देखते हैं, आंतरिक भाव की ओर नहीं। यह भेद बहुत अंश तक ठीक है, किंतु इससे इन दोनों शास्त्रों की कर्त्तव्य- शास्त्र से प्रतिकूलता सिद्ध नहीं होती। यह दृष्टि का भेद है। जिस कार्य को राजनीति और अर्थ - शास्त्र उसके बाहिरी परिणामों के आधार पर भला या बुरा कहते हैं, उसी कार्य को कर्त्तव्य-शास्त्र लक्ष्य, संकल्पादि कार्य के आंतरिक प्रेरकों की ओर ध्यान देकर भला या बुरा कहता है । कर्त्तव्य-शास्त्र कार्य के बाहिरी परिणामों से बिल- कुल उदासीन नहीं, किंतु वह बाहिर के साथ भीतर के भावों पर विशेष ध्यान देता है। क्योंकि उसकी दृष्टि में जड़ को ही पुष्ट कारक जल से सींचना श्रेय है। यदि आंतरिक भाव अच्छा नहीं और बाहिर से काम अच्छा हो, तो वह काम अच्छा नहीं कहा जा सकता। मुँह में राम राम, पेट में कसाई के काम। कोई ऊपरी दृष्टि से सदाचारी और भक्त कहा जाय, किंतु वास्तव में वह ऐसा नहीं । क़ानून के दबाव से<noinclude></noinclude> j2862w7nndsk6k7esoc0fqfrb7bdca4 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३७ 250 194366 664589 2026-07-02T17:25:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664589 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २४ ] कोई जुना न खेले, पर वह अपनी तबियत को नहीं बदल सकता। जहाँ कानून का दबाव उठा, फौरन ही जुना खेलने में प्रवृत्त हो जायगा ! फिर क्या राजनीति, अर्थ शास्त्र और सरकारी आईन सव था ही हैं ? नहीं। बाहर का भीतर पर थोड़ा बहुत अवश्य प्रभाव पड़ता है। बहुधा ऐसा भी होता है कि बाहरी रोक के कारण लोगों की रुचि बदल जाती है । इसके सिवाय राजनीति, अर्थशास्त्र और सरकारी आईन से एक और भी लाभ है, कि इनके द्वारा समाज में सुख और शांति की वह अवस्था स्थापित रहती है, जिसके द्वारा कर्त्तव्य- पालन में कठिनाई नहीं पड़ती। जिस समाज में चोरी और जूट मार हो, न कोई राजा हो और न कोई न्यायकर्त्ता, तो उस समाज में कर्त्तव्य पालन ही कठिन पड़ जाय और शायद कर्त्तव्याकर्त्तव्य का भेद जाता रहे, 'जिसकी लाठी, तिसकी भैंस' कर्त्तव्य-शास्त्र का मूल मंत्र बन जाय । राजनीति, अर्थ शास्त्र और राजकीय आईन ये सब कर्त्तव्य शास्त्र के साधक हैं। 1 इतिहास भी कर्त्तव्य शास्त्र के सहायकों में से है । इति- हास द्वारा हम को मनुष्यों के भिन्न भिन्न प्रकार के हित और उनकी रुचियों तथा प्रवृत्तियों का पता लग तिहास और कर्त्तव्य जाता है। कहीं पर हमको अच्छे और बुरे शास्त्र का संबंध कार्यों के भले बुरे परिणाम का भी परिज्ञान हो जाता है। इतिहास द्वारा हमको विकाश का काच मालूम पड़ जाता है और उसी झुकाब पर विचार कर के नुष्य की क्रियाओं के अंतिम लक्ष्य का भी हम अनुमान कर लेते हैं। जो है उसके आधार पर यह भी निश्चित किया जाता है, कि क्या होना चाहिए ? इतिहास, 'मनुष्य की रुचि और तियाँ कैसी हैं ?' इसके आगे नहीं जाता। कर्त्तव्य-शास्त्र<noinclude></noinclude> r2yagpizi0twuk9al991foa53ntreyo पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३८ 250 194367 664590 2026-07-02T17:25:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664590 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २५ ] इतिहास से प्राप्त की हुई सामग्री के आधार पर मनुष्य की रुचि कैसी होनी चाहिए, इस प्रश्न के उत्तर देने का प्रयत्न करता है । कर्त्तव्य-शास्त्र वर्तमान से ऊँचा जाना चाहता है । इसी कारण कर्त्तव्य-शास्त्र को अर्थ शास्त्र, राजनैतिक विज्ञान, इतिहास और भौतिक विज्ञान से पृथक माना है। यह बात सब ही लोग मानते हैं, कि मनुष्य के स्वभाव पर जल, वायु तथा अन्य बहिरावेष्टनों का बड़ा प्रभाव पड़ता है। मनुष्य यदि जड़ जगत के अधीन नहीं, नौतिक विज्ञान और तो उससे स्वतंत्र भी नहीं। भौतिक विज्ञान कर्तव्यशास्त्र का इस जड़ संसार पर विवेचना करने के कारण कर्त्तव्य-शास्त्र से एक दूर का संबंध रखता है। संबंध। भौतिक विज्ञान जड़ संसार को मनुष्य के संबंध में नहीं देखता, वरन् जड़ संसार को ही अपनी गवेषणा का अंतिम लक्ष्य बना लेता है। इसलिये भौतिक विज्ञान और कर्त्तव्य-शास्त्र का संबंध और भी दूर का हो जाता है। जीवन- शास्त्र ( Biology ) नामक भौतिक विज्ञान का अंग कर्त्तव्य- शास्त्र से विशेष संबंध रखता है। किंतु यह भी मनुष्य की आध्यात्मिक श्रेष्ठता की ओर ध्यान न दे कर उसकी पशु, पक्षी और कीट पतंगों के साथ गणना करता है। इन बातों के अतिरिक्त प्राणि-शास्त्र तथा अन्य भौतिक विद्याएँ कर्त्तव्य-शास्त्र से एक और भेद रखती हैं। वह यह है, कि भौतिक विज्ञान का कार्य केवल विवरण करने का है। वह भले बुरे से संबंध नहीं रखता है। भौतिक विज्ञान केवल इतना ही बतलाता है। कि अमुक बात इस प्रकार होती है, किंतु कर्त्तव्य-शास्त्र 'होती है'' से आगे ' होनी चाहिए की ओर जाना चाहता है। यह तर्क - शास्त्र की भाँति श्रौचित्य-विज्ञान (Normative Science)<noinclude></noinclude> duvi2w9lcd1fndo748v3jh1y97dtulm पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३९ 250 194368 664591 2026-07-02T17:25:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664591 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[२६] " की संज्ञा में आता है। मनोविज्ञान वर्णनात्मक होने से भौतिक विज्ञान से समानता रखता है। शुद्ध और औचित्य - विज्ञान पर विचार करते हुए, इस बात पर अवश्य ध्यान रखना चाहिए, कि ' ऐसा होता है इसे बिना जाने 'ऐसा होना चाहिए' नहीं कहा जा सकता। जीवन-शास्त्र की दृष्टि से मनुष्य अपने पूर्ण गौरव को प्राप्त नहीं होता है । यद्यपि यह माना जायगा कि जीवन-शास्त्र की कल्पनाओं के आधार पर कर्त्तव्य-शास्त्र में बहुत उन्नति हुई है, तथापि इन दोनों शास्त्रों की दृष्टि एक नहीं हो सकती। जीवन-शास्त्र के अनुसार मनुष्य प्रकृति का ही एक अंग है और जीवन संबंधी प्राकृ तिक नियमों से बद्ध है, किंतु कर्त्तव्य-शास्त्र के मत से वह, प्रकृति का श्रंग होता हुआ तथा उसके नियमों से बँधा हुआ भी प्रकृति से ऊँचा जाने का यत्न करता है। वह प्राकृतिक नियमों से बँधा हुआ है, किंतु वह उनको भली भाँति समझ कर, उनका लक्ष्य जान लेता है और उसके सिद्ध करने में स्वतंत्रतापूर्वक यत्न करता है। यही भौतिकविज्ञान और कर्त्तव्य-शास्त्र का महत्त्व का भेद है। कर्त्तव्य-शास्त्र का अन्य शास्त्रों से संबंध बतलाने से पाठकों को विदित हो गया होगा कि इस शास्त्र के पढ़ने में अन्यान्य शास्त्रों के जानने की कहाँ तक आवश्यकता है और यह शास्त्र.. उनसे विरोध न करता हुआ, उनसे कितना आगे बढ़ता है।<noinclude></noinclude> pnfwjs6ish8otupnxtpkwkhvgs6lrq2 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४० 250 194369 664592 2026-07-02T17:25:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664592 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा अध्याय । कर्त्तव्याकर्त्तव्य संबंधी निर्धारणा का विषय । मनुष्य के आचार कर्तव्य-शास्त्र के विषय हैं। इस कार्य- कारण रूपी श्रृंखला से बँधे हुए संसार में कोई वस्तु संबंध रहित नहीं है। मनुष्य के आचार भी एक स्थान पाते हैं। इनका उदय आंतरिक कारण। मनुष्य के आंतरिक भावों में होता है और इनका प्रभाव दूर दूर तक जाता है। श्राचार रूपी वृक्ष के मूलतंतु मनुष्य के मानसिक संस्थान में फैले हुए हैं और इसकी शाखाएँ और फल सारे समाज में फैल जाते हैं। आचार वा क्रिया को भला और बुरा उसके बाहरी परिणाम अथवा भीतरी कारणों को देख कर ही कह सकते हैं। किसी काम की भलाई की विवेचना में कौनसी पद्धति उपयुक्त समझी जाय ? इस प्रश्न के उत्तर देने के पूर्व क्रिया के आंतरिक कारणों अथवा संचालकों के विषय में विचार कर लेना असंगत न होगा । मनुष्य का क्रियाओं के बड़े तारतम्य में यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय, तो हमारी क्रियाओं का मूल हमारे संवेदनों (Perceptions ) में मिलेगा। योग- वाशिष्ठ में भी यही माना है- # संवित्स्पंदो मनःस्पंद ऐंद्रियस्पंद एव च । एतानि पुरुषार्थस्य रूपाण्येभ्यः फलोदयः ।। = • प्रकरण २ अध्याय ७ अर्थ संवित्स्पंद आत्मा में पुरुषार्थं और उसके साधन की इच्छा होना; मनःस्पंद पुरुषार्थं साधन की इच्छा का यत्न मन में होना; पेंद्रिय- -<noinclude></noinclude> s7mzbpyz6cfm6e6dsoivo0angvzvehx पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४१ 250 194370 664593 2026-07-02T17:26:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664593 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ R= ] यथा संवेदनं चतस्तत्तत्स्पंदमृच्छति । तथैव कायश्चलति तथैव फलभोक्तृता ॥ प्र. २ स. ७ ॥ सब से पहले हमारे मन में संवेदन प्राप्त होता है। उसके बाद इच्छा और इच्छा के बाद संकल्प संकल्प क्रिया में परिणत हो जाते हैं। उदाहरणतः कोई सुंदर पदार्थ हमारे सामने आया, उसका संवेदन हमारे मन में हुआ । संवेदन होते ही उसके प्राप्त करने की इच्छा हुई। इस इच्छा के साथ निराशादि कई मानसिक विकार उठ खड़े हुए। इन सब को जीत कर पूर्व कामना ने अपने को बलवती सिद्ध कर संकल्प का रूप धारण किया और फिर वही क्रिया हो गई। वस्तु प्राप्ति उसका फल हो गया। उस क्रिया का फल यहीं तक नहीं रहता। वस्तु प्राप्ति के साथही साथ, जो उस कार्य से दूसरों को सुख वा दुःख प्राप्त होता है, वह भी उस क्रिया के फल में ही शामिल है। कर्त्तव्य-शास्त्र के लिये कामनाएँ अथवा वासनाएँ ही क्रियाओं का मूल कारण मानी गई हैं। महात्मा बुद्ध ने भी ऐसा माना है, और इसी से उन्होंने वासना दक्षय का उपदेश दिया है। बृहदारण्य- कोपनिषद् में भी ऐसा कहा है कि 'काममय एवायं पुरुषः • अर्थात् यह पुरुष कामना से बना हुआ है। आगे लिखा है- यथा कामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते ४-४-५. - स्पंद = कर्मेद्रियों की अंगों के संचालनार्थं प्रवृत्ति। ये पुरुषार्थ के रूप हैं और इन्ही मे फल का उदय होता है। साक्षी चेतन में जैसी विषय की स्कूति होती है, वैसा ही मन होता है और मन के इच्छानुसार इंद्रियों की प्रवृत्ति होती है। इंद्रियों के स्पंद (गति) के अनुकूल शरीर को क्रिया होती है और तदनुसार फल सिद्धि होती है।<noinclude></noinclude> pa28m8sdj9a1kchar4fnwn8m8263poz पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४२ 250 194371 664594 2026-07-02T17:26:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664594 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २ ] मनुस्मृति में भी कामना और संकल्प को ही सब क्रियाश्र का मूल माना है। दूसरे अध्याय ( मनुस्मृति ) में लिखा है, कि 'यद्यद्धि कुरुते किंचित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्' अर्थात् जो कुछ भी किया जाता है, वह काम अथवा इच्छा ही की चेष्टा ले होता है अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति के विचार को 'इच्छा' कहने हैं। मान लीजिए, कोई मनुष्य धनहीन है। उसे धन प्राप्त करने का विचार हुआ। वह कहता है, कि हमारे पास धन होता तो अच्छा होता। ऐसे विचार को अभिलाषा (Wish) कहते हैं। जब यह विचार और भी परिणत हो जाता है और क्रियात्मक होने की चेष्टा करता है तब इसे कामना (Desire ) कहते हैं। कामना और स्वाभाविक प्रवृत्तियों (Instinct ) में थोड़ा भेद है। स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ बिना विचार के ही क्रिया में परिणत हो जाती हैं, किंतु कामनाएँ, चाहे उनका उदय विचार में न हो, बिना थोड़े बहुत विचार के संकल्प का रूप धारण कर क्रिया में परिणत नहीं होतीं। किसी वस्तु की कामना करते ही बहुत सी मानसिक क्रियाएँ उपस्थित हो जायेंगी। कभी कभी ऐसा भी होगा कि प्रतिद्वंदिनी कामनाएँ आ खड़ी हो। उस समय विचार का कार्य आरंभ हो जायगा, विचार होते होते जो सब से बलवती इच्छा होगी, अर्थात् जो रच्छा हमारे स्वभाव के अनुकूल होगी, वह अपनी प्रतिद्वंदिनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर संकल्प ( Wi11 ) में परिणत हो जायगी। केवल इतना ही नहीं, इच्छा के साथ थोड़ा बहुत सुख दुःख का भी उदय हो जाता है । इच्छा की पूर्ति में जो भावी सुख होता है, उसका विचार भी सुखदायक होता है। यह सुख भी इच्छा को क्रिया की ओर जाने में बड़ी उत्तेजना देता है। बहुत से लोगों ने इसी बात को देख कर यह कह दिया<noinclude></noinclude> ixzr5878iji0bntmnzs2bld79xrln6i पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४३ 250 194372 664595 2026-07-02T17:26:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664595 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[३०] है कि 'सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः अर्थात् सब प्राणियों की क्रियाएँ सुख के अर्थ होती हैं। इसी सिद्धांत को लेकर सुख वादियों का एक स्वतंत्र मत खड़ा हो गया है। इच्छा का उदय हो जाने पर उस सुख की प्राप्ति होती है, न कि उस सुख के कारण इच्छा का उदय । इच्छा का उदद्य वस्तु के न मिलने के विचार में होता है, न कि उसकी पूर्ति से उत्पन्न होनेवाले सुख में। भूखा मनुष्य भोजन की इच्छा करता है, न कि सुख की। विद्यार्थी विद्या की इच्छा करता है, न कि सुख की । धनलोलुप धन के लिये सब कार्यों में प्रवृत्त होता है, न कि सुख के लिये। यह बात सुख-वाद पर विवेचना करते समय और भी स्पष्ट की जायगी । हमारी नैतिक निर्धारण का विषय मनुष्य का आंतरिक भाव है अथवा उसकी क्रियाओं का बाहरी परिणाम प्रत्येक कार्य किसी न किसी निमित्त वा हेतु से होता है। यही निमित्त हेतु वा उद्देश्य ( Motive ) इच्छा का सच्चा संचालक होता है। जब भूख लगती है और भोजन नहीं मिलता है, तब भूख की निवृत्ति के अर्थ भोजन की इच्छा होती है। क्षुधा की निवृत्ति का जो विचार है, वही भोजनेच्छा का संचालक कहा जा सकता है, न कि निवृत्ति-जन्य सुख ! निमित्त के ही भले या बुरे होने से इच्छा वा संकल्प को भला बुरा कहते हैं। क्रिया के मूल कारणों पर संक्षेपतः विचार हो चुका। अब इस बात पर प्रश्न उठाया जा सकता है; कि हमारी कर्त्तव्याकर्त्तव्य-निधारणा का विषय श्राचारों का बाहरी परिणाम है अथवा आंतरिक कारण ? यूरोप के नीति- विशारद पंडितों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो कार्य के बाहरी परिणाम पर ही उसका धार्मिक मूल निर्धारित करता<noinclude></noinclude> 7po8yjmrc1ldhytu7qcp28jquamraao पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४४ 250 194373 664596 2026-07-02T17:26:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664596 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[३१] हैं। इस संप्रदाय के लोग सुख प्राप्ति को सब क्रियाओं का 'अंतिम लक्ष्य मानते हैं। वे कहते हैं, कि जिस काम से अधि- कांश लोगों को अधिक सुख पहुँचे वही श्रेय है, कर्त्ता का मानसिक भाव चाहे जो कुछ हो, उससे मतलब नहीं। बाहरी परिणाम अच्छा होना चाहिए। वे लोग बाहरी परिणाम से ही आंतरिक भावों की शुद्धता का अनुमान कर लेते हैं। वे सरकारी न्यायालयों की भाँति बाहरी परिणाम ही को देखते हैं। न्यायालयों में तो कभी कभी बड़े मुकद्दमों में कर्त्ता के प्रांत- रिक भावों पर विचार हो जाता है, किंतु ये लोग इन भावो पर इतना भी ध्यान नहीं देते। इन लोगों के मत में, कार्य चाहे जितनी शुभ कामनाओं के साथ किया जाय, यदि उसका परिणाम बुरा है, तो वह कार्य बुरा ही है और यदि कोई कार्य बुरे उद्देश्य से किया जाय, किंतु यदि उसका फल किसी प्रकार से अधिकांश लोगों को लाभ दायक हो जावे तो उसे अच्छा ही कहेंगे। यदि कोई ५०००) रु० समाज के लाभ के लिये खर्च कर डाले, तो उस मनुष्य का कार्य. अच्छा समझा जायगा । चाहे उसने यह रुपया केवल इस अर्थ व्यय किया हो कि उससे लोगों में उसकी वाह वाह हो जाय और उसके कारण लोग उसके किसी कौंसिल में चुने जाने में बाधा न डालें ! जिस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता में दान को सात्विक, राजस, तामस भेदों में विभक्त किया है वैसा भेद सुखवादियों के मत में नहीं है। ये लोग दान देनेवाले के आंतरिक भाव की ओर ध्यान न देकर केवल इसी बात को सोचते हैं कि अमुक दान से लोगों को कितना सुख पहुँचा। इन लोगों के हिसाब से बाइबिल में वर्णित विधवा का दान बहुत ही थोड़ा धार्मिक मूल्य रक्खेगा ! महाभारत के अश्वमेध पर्व में लिखी हुई 1<noinclude></noinclude> nwf3asl2y2nanqv44ndyt2o75vgxnox पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४५ 250 194374 664597 2026-07-02T17:26:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664597 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ३२ ] नकुल की कथा, जिसका भाव यों है, कि युधिष्ठिर के राजसूय यश को, जिसमें सहस्रों मनुष्यों का दरिद्र दूर किया गया थे, एक नेवले ने एक ब्राह्मण के सत्तू दान की श्लाघा करते हुए कुछ भी न समझा था, इन लोगों की दृष्टि में तुच्छ जँचती होगी । ये लोक कर्त्तव्य में भी प्रत्यक्ष वाद को लगाते हुए पूर्वाख्यान के नकुल की बुद्धि की सराहना न करेंगे। हमारे देश में किसी कार्य का धार्मिक मूल्य निश्चित करने में मनुष्य की बुद्धि और उसके तात्कालिक मानसिक भावों पर विशेष रूप से विचार किया जाता है। गीता में श्रीकृष्ण ने दान के त्रिगुणात्मक भेद कर दिए हैं। साधारण श्रेणी के लेखकों ने भी इस बात को माना है कि बाहिरी परिणाम से कुछ प्रयोजन नहीं, आंतरिक भावों के आधार पर ही किसी कार्य को भला या बुरा कह सकते हैं। नीति में कहा है। मनसेव कृतं पापं न शरीरकृतं कृतं । येनैवालिंगता कांता तेनैवालिंगता सुता ॥ अर्थात् पाप मन से ही किया जाता है, न कि शरीर से । क्योंकि जिस शरीर से स्त्री का श्रालिंगन किया जाता है, उसी से पुत्री का भी, किंतु दोनों कार्यों ( श्रालिंगनों ) के मूल कारण अर्थात् आंतरिक भाव एक से नहीं। मन की श्रेष्ठता बौद्ध धर्म में भी मानी गई है। धम्म पद में लिखा है- मनो वनमा धम्मा मनो का मनो मया । -- , मनसा च पवुडेन भासति वा करोति वा ॥ वहतो पदं । ततो न दुःखनमन्वेति चक्क अर्थात् मन पहले जाता है, अर्थात् उसका व्यापार प्रथम है, उसके बाद धर्म अधर्म का आचरण होता है। इसलिये<noinclude></noinclude> exqtkncknfdjkyy7c5ahiibs21h89ge पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४६ 250 194375 664598 2026-07-02T17:26:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664598 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ३३ ] मन ही मुख्य और श्रेष्ठ है । सब धर्मों को मनोमय ही सम- ना चाहिए। कर्त्ता का मन जिस प्रकार शुद्ध या दुष्ट होता है उसी प्रकार उसके वचन और कर्म भी भले या बुरे होते हैं, तथा उसी प्रकार उसे उन कर्मों के फल में सुख या दुःख मिलता है सर्वत्र मन को ही बंधन और मोक्ष का कारण माना है । "मन व मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः " । भाषा में भी कहा है, कि 'मन चंगा तो कठौती में गंगा । मन ही को सब क्रियाओं का मूलाधार माना है। उसकी ही शुद्धता पर क्रिया की शुद्धता मानी गई है। बीज अच्छा होगा, तो वृक्ष और फल दोनों ही अच्छे होंगे। इसीलिये कुंती ने युधिष्ठिर को केवल यही श्राशीर्वादात्मक उपदेश दिया है कि 'मनस्ते महदस्तु । ' यदि कोई मनुष्य किसी भिखारी को एक पैसा देना चाहता है और धोखे में अठन्नी दे देवे तो उसको एक पैसे का ही पुण्य होगा, चाहे भिखारी को आठ श्राने पाने का सुख हुआ हो! कणिक और कृष्ण दोनों ने ही युद्ध का उपदेश दिया, किंतु दोनों के आंतरिक भाव पृथक् पृथक् थे। इसी कारण एक को बुरा कहते हैं और दूसरे को अच्छा। अच्छा और बुरा भाव पर ही निर्भर है। इन बातों से यह न समझना चाहिए, कि बाहिरी परिणाम के लिये कर्त्तव्य-शास्त्र सदा उदासीन ही रहता है। यदि कोई मनुष्य सदा अपनी शुभ काम- नाओं को किसी कमज़ोरी के कारण, सफल करने में असमर्थ रहता हो, तो उसकी शुभ कामनाएँ सराहनीय नहीं समझी जा सकती। उसकी असफलता नैतिक निर्धारणा का विषय बन जायगी। हमारे यहां शास्त्रों में यही माना गया है कि जो बात मन में हो, वह वाणी में आवे और जो वाणी में हो वह कर्म में आवे। इसी लिये किसी काम को पूरा तब ही ३<noinclude></noinclude> kdz6t9mqm8kd0wnkgehf8oejaujsqhz पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४७ 250 194376 664599 2026-07-02T17:27:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664599 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[३४] कहते हैं, जब वह मनसा, वाचा कर्मणा किया जाय। एक अंग की भी कमी रहने से काम पूरा न समझा जायगा । यह बात तो सिद्ध हो चुकी कि मन ही सब काम का आधार है। अब यह प्रश्न बाकी रहा कि पूरा मनुष्य हमारी नैतिक निर्धारया का विषय बनता है। मानसिक व्यापारों से कौन व्यापार विशेष कर नैतिक निर्धा- रखा का विषय होता है? अर्थात् हम अपनी इच्छा वा संकल्प वा विचार अथवा स्वभाव इनमें से किसे उत्तरदायी ठहरावें ? इस बात का उत्तर देना कर्तव्य शास्त्र के लिये एक कठिन समस्या है। हम को यह मानना पड़ेगा कि किसी न किसी में ये सब ही मानसिक व्यवहार हमारे कर्तव्याकर्तव्य संबंधी निर्धारण के विषय बन जाते हैं। इन मानसिक व्यापारों का पारस्परिक संबंध बतला देने पर यह बात और भी स्पष्ट हो जायगी । साधारण रीति से मनुष्य के आचार कर्तव्या कर्तव्य संबंधी निर्धारण के विषय हैं। किंतु आचारों का मूल कामना में है । इस लिये कामना को भी नैतिक निर्धारणा का विषय कहना होगा । कामनाओं पर जो विचार किया जाता है, उस के द्वारा यह निश्चित किया जाता है कि कौन सी कामना के पूर्ण होने की चेष्टा वा प्रयत्न होना चाहिए । इस निश्चय के साथ संकल्प का उदय होता है । इस लिये विचार और संकल्प दोनों ही प्रचार के साथ नैतिक निर्धारणा का विषय बन जाते हैं। कामना, संकल्प और विचार सब ही स्वभाव के अनुकूल होते हैं । स्वभाव और संकल्प दोनों ही एक दूसरे के आश्रित हैं। जैसा स्वभाव होता है, वैसे ही इच्छा और संकल्प होते हैं। और जैसा संकल्प होता है, वैसा ही स्वभाव<noinclude></noinclude> 6ax31yj83kvom7ez7us0ydhzbd2d526 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४८ 250 194377 664600 2026-07-02T17:27:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664600 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २५ ] बनता चला जाता है । मनुष्य का स्वभाव, जो कि पिछली कामनाओं और संकल्पों का संचित संस्कार है, अगली - कामनाओं और संकल्पों का कारण होता है। ये नए संकल्प पुराने स्वभाव को दृढ़ बनाते जाते हैं और कभी कभी वे स्वभाव को थोड़ा बहुत बदल भी देते हैं। जैसे जैसे स्वभाव दृढ़ होता जाता है, वैसे ही मनुष्य के संकल्प उत्तरोत्तर स्वभावानुकूल होते जाते हैं और मनुष्य की स्वतंत्रता भी कम होती है, किंतु मनुष्य स्वभाव के बनाने में स्वतंत्र है और स्वभाव बन जाने पर परतंत्र हो जाता है । यह परतंत्रता स्वतंत्र रीति से ही जैसे जैसे किसी मनुष्य का स्वभाव दृढ़ बनता जाता है वैसे ही उस विषय में उसकी स्वतंत्रता घटती जाती है। कार्य्यं के स्वाभाविक हो जाने पर मनुष्य का उत्तरदायित्व घट नहीं जाता क्योंकि मनुष्य अपना स्वभाव स्वतंत्रतापूर्वक बनाता है। मनुष्य यदि अपने स्वाभाविक काव्यों के लिये उत्तरदायी नहीं किंतु वह अपना स्वभाव बनाने के लिये अवश्य जिम्मेदार है। इसके अतिरिक्त एक और भी बात विचारने योग्य है। किसी का के स्वाभविक वन जाने के कारण उस विषय में मनुष्य को स्वतंत्रता दिल कुल जाती नही रहती। मनुष्य अपने स्वाभाविक काव्यों को रोक सकता है। यह का कठिन अवश्य है किंतु असाध्य नहीं। दृढ़ संकल्प द्वारा हम अपने स्वभाव के प्रतिकूल का भी कर सकते हैं। मनुष्य की स्वतंत्रता पर विचार मनुष्य की स्वतंत्रता का प्रश्न हमारे देश में आवागमन के सिद्धांत के प्रचलित होने के कारण और भी जटिल बन जाता है। इस जन्म के बने हुए स्वभाव से पूर्व जन्म के संस्कार और भी दृढ माने गए हैं। बहुत से लोगों ने पूर्व जन्म के संस्कारों का बल इतना बढ़ा दिया है कि वर्तमान जन्म में मनुष्य की स्वतंत्रता का बिलकुल हो नाश कर दिया है। हम यह अवश्य मानते हैं कि पूर्व जन्म कृत कर्मों के संस्कार इस जन्म मे प्राप्त होते हैं और वे इस जन्म के कर्मों पर प्रभाव डालते हैं किंतु वह मनुष्य की स्वतं- त्रता का समूल नाश नहीं कर देते। यदि ऐसा होता तो बुरे आदमी के उद्धार की संभावना भी समूल नष्ट हो जाती और एक बार गर्त में पढ़ कर चिर काल तक उत्ती अवस्था में पड़ा रहना पड़ता। बड़ी कष्ट कल्पना के साथ भी हम ऐसी बात में विश्वास नही कर सकते। हमको यह न भूलना चाहिए कि संसार में पुरुषार्थ भी कोई पदार्थ<noinclude></noinclude> e9itn63qlkxr7htf363uv3yly23yqct पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५० 250 194378 664601 2026-07-02T17:27:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664601 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ३७ ] नैतिक निर्धारण का विषय बन जाते हैं। मनुष्य के आचार स्वभाव के ही बाहिरी रूप हैं। इसलिये चरित्र भी नैतिक निर्धारणा का विषय बन जाता है। मनुष्य का उद्देश्य भी जो कि सब कार्यो का हेतु वा संचालक है नैतिक निर्धारणा का विषय है। इन सब मानसिक व्यापारों द्वारा मनुष्य का स्वभाव अथवा या कहिए, उसकी श्रात्मा का व्यंजन होता रहता है । इसलिये हम इन व्यापारों को भला या बुरा कहते समय पूरे मनुष्य ही को भला बुरा कहते हैं। मनुष्य को अच्छा बनने के लिये अपने भाव और संकल्प सब ही शुद्ध रखने चाहिएँ । इस संबंध में निम्नलिखित ऋग्वेदांतर्गत आशीर्वचनात्मक अंतिम मंत्र ध्यान देने योग्य है । * समानी वा आकूतिः समाना हृदयानि वः समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति । • अर्थ- हमारा हृदय, मन, भाष और संकल्प सब समान अथ शुद्ध हो जिससे कार्य-साफल्य में बाधा न पड़े।<noinclude></noinclude> ov8ckztel64yu91agf50x1w973767fr पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५१ 250 194379 664602 2026-07-02T17:27:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664602 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा अध्याय | कर्त्तव्या कर्त्तव्य का निर्णायक । पहले अध्याय में कहा जा चुका है कि प्रत्येक मनुष्य को जीवन में ऐसे अवसर आते हैं, कि जब वह कर्त्तव्याकर्त्तव्य के विषय में संदेह को प्राप्त हो, अंधे की भांति दर्शक किसी पथप्रदर्शक का आश्रय लेता फिरता है। 'गहना कर्मणो गतिः । हमारा क्या कर्त्तव्य है इस प्रश्न का उत्तर देना बड़ा ही कठिन है। प्रत्येक मनुष्य को अपनी अपनी अवस्था के अनुकूल निराली निराली कर्त्तव्य-विषयक कठिनाइयां उपस्थित हो जाती हैं। यदि सैनिक गए 'अहिंसा परमो धर्मः' पर चलें तो धर्मोपदेशकों को संसार में रहने के लिये स्थान न मिले ! यदि डाक्टर लोग सदा सत्य ही बोला करें, तो वे न केवल अपने रोजगार से हाथ धो बैठें, वरन बहुत सी हालतों में मनुष्य-हत्या - जन्य पाप के भागी बन जायें ! 'असंतुष्ट द्विजा नष्टश संतुष्टाश्च महीभुजः,' जो बात संन्यासी के लिये अमृत तुल्य हैं, वही बात राजा को विष है। 'सच बोल और हिंसा मत कर', यह सर्वमान्य श्राचार संबंधी नियम बहुत से अवसरों पर काम नहीं देता। फिर यह प्रश्न उठता है कि ऐसे अवसरों पर हम किसे अपना पथ-प्रदर्शक, मानें? इसके उत्तर में कोई कोई तो यह कहेंगे कि हमारे ग्रंथही हमारे कर्त्तव्याकर्त्तव्य के निर्णायक हैं। जहां कर्त्तव्य के विषय में शंका हुई, तुरंत धर्मग्रंथों को खोला और शंका का संतोष- जनक उत्तर मिल गया। और यदि शंका सहज में निवारण न हो सके और यदि शास्त्र भी दो प्रतिकूल धर्मों का प्रतिपादन<noinclude></noinclude> fbdmmdzyd7pxt1wrgg8h9qc4abayt1q पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५२ 250 194380 664603 2026-07-02T17:27:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664603 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ३६ ] करें, तो किसी धर्माधिकारी के पास जाकर उस विषय में उसकी व्यवस्था ले लें। यदि यह भी न हो सके तो 'महाजनो येन गतः स पंथाः ( जिस रास्ते से बड़े आदमी गए हो, वही श्रेय मार्ग मानना चाहिए ) वाले नियम को मान ले। कोई लोग ऐसे हैं, जो इन बाहरी निर्णायकों को न मान कर अपने में ही एक प्रकार की छठीं ज्ञानेद्रिय, 'सदसद्विवेकवती बुद्धि (प्रज्ञा) (Consolener) नाम की मानते हैं। जब कर्तव्य के विषय में शंका हुई, तब इस विशेष इंद्रिय के द्वारा देखने से मालूम हो जाता है कि कौन काम भला है और कौन बुरा। बहुत से लोग इस सदसद्विवेकवती बुद्धि के निर्णयों को ईश्वर-कृत निर्णय मानते हैं। वे लोग कहते हैं कि स्वयं ईश्वर ही हमारी अंतरात्मा द्वारा बोलता है। इस विशेष इंद्रिय में एक और विशेषता है, कि यह आंतरिक न्यायाधीश है और एक विशेष प्रकार की मानसिक पीड़ा देकर जल्लाद का भी काम करती है! बहुत से लोग इस आंतरिक निर्णायक से अंसतुष्ट हो एक ऐसा नियम दृढ़ते हैं, जो प्रत्येक स्थिति में लागू हो सके, वह नियम चाहे स्वतंत्र हो वा परतंत्र किंतु उसको बुद्धि ग्रहण कर सके। वही नियम हमारी क्रियाओं का अंतिम लक्ष्य और कर्तव्याकर्तव्य का अंतिम निर्णायक माना जायगा । अब इन तीनों प्रकार के निर्णायकों पर विशेष रूप से विचार किया जायगा। प्रत्येक देश के कर्तव्याकर्तव्य संबंधी विचारों का ज्ञान धर्मग्रंथों से ही हुआ है । प्राचीन काल में राजकीय आईन भी धर्मग्रंथों धर्मग्रंथ । • के ही आधार पर बनाए जाते थे। धर्म ही मनुष्य के ऐहिक एवं पारलौकिक हित का साधन गिना जाता था। यदि धर्म न होता, तो स्वार्थ की सीमा न रहती । धर्म<noinclude></noinclude> 2ylvzrq076s8gie6tngd9by251pcbyt पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५३ 250 194381 664604 2026-07-02T17:28:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664604 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ४० ] की इतनी महिमा गाते हुए भी यह श्रवश्य कहना पड़ता है, कि धर्म को भी जरा प्राप्त हो जाती है ! काल के बीतने पर खोग धर्म का असली तत्व भूल कर गौण बातों को ही मुख्य मानने लगते हैं। इसका यह फल होता है कि धर्म के नाम पर . बड़े बड़े अत्याचार होने लगते हैं। रीति व्यवहार की बातों को प्रधानता दी जाती है। चोरी करनेवाला और हाथ न धोकर खाने वाला मनुष्य, दोनों एक ही दृष्टि से देखे जाते हैं। समय बीतने पर बहुत सी नई नई बातों का समावेश हो जाता है। कभी कभी एक ही ग्रंथ में प्रतिकूल धर्मों का प्रतिपादन किया जाने लगता है तब उनकी एकवाक्यता करने को और नए ग्रंथ रचे जाते हैं । जब एक देश के निवासियों पर अन्य धर्मावलंबियों का राजनैतिक सम्पर्क होता है, तब एक ही देश मैं दो या तीन प्रतिद्वंदी धर्मों के होने के कारण यह शंका होने लगती है कि कौन सा धर्म सत्य है ? प्रत्येक मनुष्य को अपना धर्म पालन करने का वही नैतिक अधिकार है, जो कि दूसरे को है और जब दो आदमियों के माने हुए धर्म परस्पर विरोधी हो, तब उन दोनों में कौन सा ठीक मार्ग है, इस बात के लिये बुद्धिही का आश्रय लेना पड़ता है। शास्त्र का यथार्थं श्राशय ard के लिये भी बुद्धि का सहारा लेना पड़ता है#, धर्म की ● आगतया गमया बुद्ध्या बच्चनेन प्रशस्यते । महाभारत शांतिपर्व अध्याय १४ इस श्लोकार्थं की टीका इस प्रकार दी गई है। आगतागमवया बुद्ध्या श्रुत्युपगृहीतेन तर्केण सहितं वचनं तेन प्रशस्यते शास्त्रं नान्यतरेण इसमें युक्तियुक्त शाख वचन ही प्रमाण माना जा सकता है इस बात को और भी स्पष्ट किया है। शानमव्यपदिश्यहि यथा नास्ति तथैववत् । तं तथा चित्रमूलेन सन्नोदवितुमर्हसि ॥ इस श्लोक के पूर्वार्ध की नीलकंठी टीका में इस प्रकार व्याख्या दी है। किं<noinclude></noinclude> ni09aq8jw48gklq7tfhlx4zul8m0ux3 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५४ 250 194382 664605 2026-07-02T17:28:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664605 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[४१] बातों का जब तक बुद्धि द्वारा युक्तिपूर्ण निर्णय न हो जावे, तब तक उनमें से विश्वास उठ जाने का भय रहता है। बुद्धि द्वारा "धर्म में शका उपस्थित होती है और बुद्धि द्वारा ही विश्वास में दृढ़ता उत्पन्न होती है। धर्म का आचरण स्वतंत्रतापूर्वक होना चाहिए। जो धार्मिक कार्य उनकी योग्यता में विश्वास रख कर किए जाते हैं, वे ही आत्मा को समुन्नत कर सकते हैं। यह बात शास्त्रों को बुद्धि द्वारा मनद किए बिना प्राप्त नहीं हो सकती । श्रात्मा का पूर्ण विकाश बिना स्वतंत्रता के नहीं हो सकता है। हमारा यह कहना नहीं, कि शास्त्र को तिलां- जलि दे दी जावे ! किंतु जो बात की जाय वह स्वतंत्रता- पूर्वक निश्चयात्मक बुद्धि से की जाय। जो काम बाहिरी दबाव से होता है, चाहे वह दबाव धर्म का हो और चाहे राज्य का, आत्मा के पूर्ण विकाश का बाधक ही है, साधक नहीं। इसी लिये हमारे यहां स्मृति ग्रंथों में श्रुति और स्मृति प्रतिपादित धर्म मानते हुए भी कहा है, कि 'स्वस्यच प्रियमात्मनः' अर्थात् जो अपनी आत्मा को प्रिय लगे, उसको भी धर्म का लक्षण माना है | अपनी आत्मा को प्रिय लगना" यह धर्म का अवश्य एक लक्षण है और प्रायः बहुत से संशयात्मक स्थानों पर काम भी देता है, किंतु यदि कोई केवल 'स्वस्य च प्रियमात्मनः को ही धर्म का एक मात्र लक्षण मान ले, तो हम उससे बिना अपदिश्य दिशोमध्ये स्थितं कोटिद्वस्पशिहानं संशयरूपं तद्यथा नास्ति तचैव व्यर्थमित्य- थे। दोनों ओर झुकनेवाले संशयात्मक शान को व्यर्थ ही बतलाया है। - * छांदोग्योपनिषद में लिखा है " यदेव श्रद्धया चोपनिषदा जुहोति तदेव बोर्यवत्तरं भवति " अर्थात् जो काम विश्वास तथा अविभांत परिश्रम से किया जाता है वही सफल होता है। + वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । चतुविधं प्राहुः साचाद्धर्नस्य लक्षणम् ॥ मनु अध्याय २ श्लोक १२<noinclude></noinclude> p2cdatxnkgh3zej1t29ahatgfxuj2t8 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५५ 250 194383 664606 2026-07-02T17:28:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664606 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ४२ ] इतना पूछे कि वह श्रात्मा का क्या अर्थ लगाता है, उससे सहमत होने के लिये तैयार नहीं। बहुत से लोगों ने विशेषतः यूरोप के सहज शानवादियों ने श्रात्मा की एक विशेष शक्ति को ही पूर्णात्मा की संतुष्टि वा श्रसंतुष्टि को बता देने का अधि- सदसद्विवेक वृद्धि कार दे रक्खा है। वे इस शक्ति को सदसद् विवेकवती बुद्धि ( Conscience ) कहते हैं। फ़ारसी में इस को 'जमीर' कहते हैं। प्रेरणाओं को लोग ईश्वर ही की प्रेरणाएँ मानते हैं। जब लोग किसी काम को करते हुए कहते हैं, कि इसके करने में हमारा दिल गवाही नहीं देता है अथवा हमको स्वयं ही लज्जा आती है, तब उनके कहने का यही अभिप्राय होता है कि उनकी सदसद्विवेकवती बुद्धि उस काम को अच्छा नहीं समझती । महाभारत में कहा भी है, कि 'अपत्रपेत् वा येन न तत्त्कुर्यात् कञ्चन' अर्थात् जिससे लज्जा श्रावे, वह काम कभी नहीं करना चाहिए । बहुत से लोग केवल समाज की निंदा स्तुति को ही धर्माधर्म का एक मात्र निर्णायक बना लेते हैं। सहज-ज्ञानवादी उसी भाव को अपनी आत्मा में लगाकर श्रात्म-तुष्टि ही को धर्म का मुख्य लक्षण मान लेते हैं। साधारण रीति से देखने से यह मत सर्वमान्य सा प्रतीत होता है, किंतु विचार करने पर इस से बड़ी बड़ी आपत्तिां उपस्थित हो जाती हैं। सब से पहले तो यह विचारणीय है कि सदसद्विवेक- सदसदविवेक बुद्धि को बत्ती बुद्धि कोई एक पृथक बुद्धि नहीं मानी निर्णायक मानने में जा सकती। क्या कर्त्तव्य के विषय में विचार करनेवाली बुद्धि सम्पत्ति शास्त्र अथवा राजनीति संबंधी विषय में विचार करनेवाली बुद्धि से J<noinclude></noinclude> mipblu97ccn0rvjnj8lihhfu2il9ywn पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५६ 250 194384 664607 2026-07-02T17:28:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664607 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ४३] पृथक् है ? आज कल का मनोविज्ञान ( Psychology ) कबूतर खाने के समान बुद्धि के विभाग नहीं मानता। बहुत से लोगों को ऐसा अभ्यास चढ़ा होता है, कि सवाल को देखते ही उसका जवाब बता देते हैं, तो क्या हम इस कारण से गणित बुद्धि मान लें ? बड़े बड़े राजनैतिक नेताओं का ऐसा अभ्यास होता है कि वे सहज ही बता देते हैं कि अमुक स्थिति में अमुक कार्य करना पड़ेगा, तो क्या इस कारण एक राजनैतिक बुद्धि भी पृथक् मान ली जावे ? जैसे एक पृथक गणित बुद्धि मानना असंगत दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार विचार करने पर कर्त्तव्य के विषय में सदसद् विवेकती बुद्धि को भी मानना श्रयुक्त मालूम होता है। इस विषय में दूसरी बात ध्यान देने योग्य यह है कि सहज ज्ञान-- वादियों का यह कहना है कि सदसद् का ज्ञान हम को जम्म से ही प्राप्त है और सब लोगों को एकसा है। यह कहां तक अनुभवसिद्ध समझा जा सकता है ? यह बात तो प्रसिद्ध ही है कि 'भिन्न रुचिर्हि लोकः * ! फिर यह देखने में आता ही है कि सब की सदसद्विवेकवती बुद्धि एक सी नहीं । जिम लोगों ने धर्म के नाम पर बड़े बड़े अत्याचार किए उनका दिल उन बातों के करने के लिये अवश्य गवाही देता था । केवल इतना ही नहीं वे लोग उसको धर्म कहते थे। क्या आज कल भी हमारी सदसद्विवेकवती बुद्धि उन कार्यों को लाय समझने में अपनी अनुकूलता प्रकट करेगी ? भारत- वासी एक पक्षी के होते हुए दूसरा विवाह करना इतना निंद्य नहीं समझता, जितना कि योरोपवासी । गोश्तवाने में कसाई को धर्माधर्म का जरा भी विचार नहीं होता। बहुत ● भाग पाग सूरत प्रकृति अवर और विवेक मिले मिलाये ना मिले इंड शहर अनेक || I<noinclude></noinclude> pqez1fxkjz8ue199d8rfwyw69btff2s पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५७ 250 194385 664608 2026-07-02T17:28:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664608 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ a ] से लोगों की जीवनी में ऐसा देखा गया है, कि जिस वान से वे पहले घृणा करते थे, वही बात पीछे बड़े चाव से करने लगे। पुराने यूनान में कमज़ोर बच्चों का मार डालना राज्य का धर्म समझा जाता था, क्या उसकी अब हम निंदनीय न कहेंगे? इन बातों को देखते हुए सहज-ज्ञान-वाद में शंका होने लगती है। बहुत से लोगों का इस विषय में यह कहना है कि आरंभिक सभ्यता में न कोई धर्म था न श्रधर्म, लोग पशुवत् विचरते थे । जब उन्होंने देखा कि समाज की स्थिति बिना कुछ नियम बनाए नहीं रह सकती, तब उन्हें कर्त्तव्याकर्त्तव्य का विचार हुआ। सब लोग अपने अपने स्वार्थ की ओर सहज-शान बाट और देखें, तो उनका स्वार्थ भी नहीं सध सकता। पनुभयन्त्राः । इस लिये लोगों को अपना स्वार्थ कम करना पड़ा, और उनमें दया, उदारता आदि सद्भावों का उदय होता गया। जैसे जैसे काल बीतता गया, येने ही समाज में ये विचार दृढ़ होते गए और परंपरा द्वारा लोगों के मानसिक संस्थान में स्थिर हो गए। फिर ये ही भाव स्वाभाविक समझे जाने लगे। यह दूसरा पक्ष सहज-ज्ञान- वाद से पूरी विपरीतता दिखाता है। यह प्रश्न केवल कर्त्तव्य के विषय में ही नहीं, वरन् सब ही ज्ञान के विषय में है। यह बड़ा झगड़ा है। और इस पुस्तक में नहीं उठाया जा सकता। केवल इतना कह देना पर्याप्त होगा कि इस विपरीत पक्ष में सत्य का अंश तो बहुत है, किंतु हम यह नहीं मान सकते कि धर्माधर्म संबंधी विचारों को किसी सामाजिक अथवा व्यक्ति- गत आवश्यकता को देख कर लोगों ने कोई सभा करके बनाया हो। हमारा यह कहना है, कि कर्त्तव्याकर्त्तव्य संबंधी<noinclude></noinclude> 7nsm5z06ndul8olk37s9r841ok7ep5j पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५८ 250 194386 664609 2026-07-02T17:28:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664609 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[५] विचार आरंभिक काल में आज कल की भांति सुव्यवस्थित नहीं थे, तथापि उनका बीज मनुष्यों में अवश्य था । यह तो मानना ही पड़ेगा कि अपने से बाहिर जाना, अथवा विस्तार को प्राप्त होना आत्मा का गुण है। इस गुण से कर्त्तव्या कर्त्तव्य संबंधी विचारों का उदय होता है। यह गुण केवल धर्माधर्म का मूल नहीं, वरन् सब ही मानवी क्रियाओं का है। कला- कौशल, विज्ञान और तत्त्वज्ञान सब ही इस गुण के विकाश हैं। इन सब बातों में मनुष्य को प्रत्यक्ष वा वर्त्तमान से बाहिर जाना पड़ता है। श्रात्मा सर्वव्यापक होने के कारण व्यक्ति में संकुचित नहीं रह सकती, वह अवश्य विस्तार को प्राप्त होना चाहती है। कला-कौशल, धर्म और विज्ञान सब ही वेदांत प्रतिपादित आत्मैक्य-वाद को पुष्ट करते हैं। आत्मा के अपने से बाहिर जाने में ही कर्त्तव्य-शास्त्र का उदय है । यदि आत्मा में यह गुण सहज न माना जाय, तो अपनी स्थिति और समाज की स्थिति का ही विचार लोगों में किस प्रकार श्राया ? जहां समाज की अथवा व्यक्ति की वर्तमान से आगे स्थिति का विचार आया, वहां पहले से ही कर्त्तव्य शास्त्र का मूल सिद्धांत मान लेना पड़ा। समाज की स्थिति के विचार में कर्त्तव्याकर्त्तव्य का उदय नहीं, वरन् वह विचार इस बात को सूचित करता है कि कर्त्तव्याकर्त्तव्य संबंधी विचार के बीज मनुष्य जाति में आदि काल से वर्त्तमान थे। न तो सहज-ज्ञान-वादियों ही का यह कहना ठीक है कि धर्माधर्म संबंधी विचार मनुष्य में आदि काल से चले आए हैं और न विपरीत पक्ष वालों का यह कहना युक्ति संगत मालूम होता है कि कर्त्तव्याकर्त्तव्य के विचारों का जन्म किसी एक काल के लोगों के आपस में सलाह करने के बाद हुआ है।<noinclude></noinclude> 0knpsrdpnqg2j9q76dwkr113vej2tce पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/५९ 250 194387 664610 2026-07-02T17:29:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664610 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ४६ ] यह कहना सिद्ध ही नहीं हो सकता कि धर्माधर्म के विचार अनुभवजन्य हैं। अनुभव में मनुष्य वर्त्तमान से बाहिर नहीं जा सकते, और धर्म कला-कौशल तथा विज्ञान संबंधी ज्ञान में अवश्य वर्तमान से बाहिर जाना पड़ता है। वैज्ञानिक नियम वर्तमान के आधार पर बनाए जाते हैं, किंतु वे वर्त्तमान को अतीत कर भविष्य पर भी लागू होते हैं । हम को बुरें और भले दोनों ही प्रकार के लोगों का अनुभव होता है । मनुष्य की क्रियाएँ संकुचित हैं, किंतु उसके आदर्श विस्तृत हैं। केवल स्वार्थपूर्ण संकुचित क्रियाओं के श्राधार पर उच्च आदर्श नहीं बनाए जा सकते। हमारे आदर्श हमारी आत्मा के सहधर्मी है। धर्म और कर्त्तव्य के आदर्शो की जड़ आत्मा के गुणों में है। आत्मा सदा वर्त्तमान को अतीत करके विस्तार और व्यापकता की ओर जाकर अपने विस्तार को सारे विश्व में देखने का यत्न करती है। इसी यज्ञ से धर्म, तत्त्वज्ञान, विज्ञान, काव्य और कलाओं का उदय होता है। सदसद्विवेकवती बुद्धि पर विवेचना करते हुए हम कर्त्त- व्याकर्तव्य विषयक ज्ञान के मूल कारण तक पहुंचे गए। इस विवेचना में हम को इस बात का भी क्रियाओं का एक मुख्य दिग्दर्शन हो गया कि हमारा कर्त्तव्याकर्त्तव्य लक्ष्य कर्तव्याकर्तव्य का निर्णय किस प्रकार का होगा। जब कर्त्त- का निर्णयक आत्म- व्याकर्त्तव्य संबंधी विचारों का उदय आत्मा प्रतीति की विस्तृत होने की चेष्टा में है तब हमारा निर्णायक कोई बाहिरी शास्त्र का बताया हुआ नियम नहीं हो सकता। यह नियम आत्म-दत्त होने के कारण मनुष्य की स्वतंत्रता में बाधा न डाल सकेगा। जो धार्मिक नियम ज़बर- दस्ती पालन कराए जाते हैं, वे मनुष्य की स्वतंत्रता के बाधक<noinclude></noinclude> op19o0iq430qj1kg56j5e3arroaivyt पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६० 250 194388 664611 2026-07-02T17:29:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664611 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ४७ ] होने के कारण समाज को यथोचित लाभ नहीं पहुँचा सकते हैं। हमारा नैतिक परिमाण न तो इतना बहिरी होना चाहिए जो हमारी स्वतंत्रता का बाधक हो जाय और न इतना आंतरिक ही जो प्रत्येक मनुष्य के लिये बदलता रहे और हर एक अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाने लगे । यदि प्रत्येक मनुष्य के लिये नैतिक परिणाम अलग होगा, तो उसका उदय आत्मा के विकाश में न होगा, प्रत्युत वह उसके संकुचन को और भी हड़ बना देगा। सब लोगों की आत्माओं के लिये एक सा होने के कारण वह परिमाण आंतरिक रहते हुए भी बाह्य का काम देगा। जो परिमाण सब लोगों के लिये और सब स्थितियों के लिये एकला हो, वह न तो इतना ऊँचा होगा, जिसको कोई कभी प्राप्त ही न कर सके और न इतना नीचा ही, जिसके प्राप्त करने में कुछ कठिनाई ही न हो। ऐसा होने पर मनुष्य समाज में सब प्रयत्नों का अंत हो जायगा। वह लक्ष्य ऐसा होगा, जो कि उत्तरोत्तर निकटवर्ती होता रहे। इन सब बातों के साथ यह मान ही लेना पड़ेगा, कि वह लक्ष्य एक ही होगा, क्योंकि यदि एक से अधिक होगा, तो उसके भी निर्णायक की आवश्यकता पड़ेगी और सारा परिश्रम वृथा हो जायगा । अंततोगत्वा, यह कह देना परमावश्यक है, कि वह परिमाण हमारी आत्मा के लिये ग्राह्य होगा और वह ब्राह्म तब ही बन सकता है, जब उससे हमारी श्रात्मा की किसी आवश्यकता की पूर्ति होती हो। संक्षेप में, हमारा नैतिक परिमाण किसी न किसी किसी प्रकार की आत्म-प्रतीति ही होगा। आत्म-प्रतीति अगले अध्यायों में स्पष्ट हो जायगी।<noinclude></noinclude> 26i4qwjpc3asph3azecqadl04v9xawh पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६१ 250 194389 664612 2026-07-02T17:29:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664612 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पाँचवाँ अध्याय | सुखवाद (Hedonism ) ( साधारण ) हम रात अध्याय के अंत में बतला चुके हैं कि हमारा निश्रेयस, परम पुरुषार्थ अथवा कर्त्तव्य का अंतिम निर्णायक का स्थान किसी न किसी प्रकार का आत्मसंभावन कर्त्तव्यशाम मे मुखबाद अथवा श्रात्म-प्रतीति (Self realization ) होगा । अब प्रश्न यह है कि यह आत्म-संभा- वन किस में हो सकता है। मनोविज्ञान से ज्ञात होता है कि हमारी मानसिक वृत्तियां तीन प्रकार की हैं, पहली प्रवृत्ति को हम भावना शक्ति ( Feeling ) कहेंगे, दूसरी को प्रशा शक्ति (Intellect) और तीसरी को संकल्प शक्ति ( Will ) कहेंगे। ये प्रवृत्तियां कबूतर के खानों की भांति अलग अलग नहीं हैं। संकल्प शक्ति के साथ भावना और प्रज्ञा लगी हुई है। इसी प्रकार एक शक्ति के योग देने से दूसरी और शक्तियां भी काम करने लग जाती हैं किंतु किसी समय कोई वृत्ति प्रधान होती है और किसी समय कोई और इसी कारण वृत्तियों के ये तीन भेद किए गए। कर्त्तव्य-शास्त्र का विशेष संबंध संकल्प से है। संकल्प का अंतिम परिणाम क्रिया है । क्रिया ही किसी न किसी रूप में हमारी नैतिक निर्धारणा का विषय है। इस कारण संकल्प शक्ति को थोड़ी देर के लिये हम अपनी गणना से बाहिर करना चाहते हैं । हमारा आत्म-संभावन बाकी रही हुई दो वृत्तियों के अर्थात्<noinclude></noinclude> l486gpcgau39z1v54h4a0r8dtbtrrw8 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६२ 250 194390 664613 2026-07-02T17:29:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664613 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ 8 ] भावना और प्रशा शक्ति की अनुकूलता में ही हो सकता है। प्रश्न यह है कि सच्चा आत्म-संभावन किस की अनुकूलता में है? इसी प्रश्न के उत्तर देने में कई मत उठ खड़े हुए हैं। कोई कहते हैं कि सुखान्वेषण ही हमारा कर्त्तव्य है। इस मत के लोग भावना को प्रधानता देते हैं। ये लोग सुखवादी (Hedon- ist ) कहलाते हैं। कोई लोग कहते हैं कि सुख से हमको कोई प्रयोजन नहीं। जो कर्त्तव्य है उसको सुख दुख का लोभ छोड़ कर पालन करना चाहिए। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो अपनी इच्छाओं के प्रतिकूल चलने को ही परम पुरुषार्थ मानते हैं। ऐसे लोग बुद्धि अथवा प्रशा को प्रधानता देते हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो भावना और प्रशा दोनों का यथोचित श्रादर कर दोनों ही की तुष्टि में सच्चा आत्म-संभावन समझते हैं। इस अध्याय में तथा इसके आगे के दो अध्यायों में उन्हीं कल्पनाओं का विवरण किया जायगा जो सुख से संबंध रखती हैं । सुख से केवल लौकिक अथवा ऐहिक सुख का अर्थ लेना चाहिए: वैसे तो जो लोग स्वर्गादि सुख की प्राप्ति को अपना लक्ष्य बना कर सत् कार्यों में प्रवृत्त होते हैं उन लोगों की भी गणना सुखवादियों में ही की जा सकती है। सुखवादियों के कई भेद हैं किंतु वे सब लोग एक स्वर से कहते हैं कि " सर्वस्य सुखमीप्सितम् " (महाभारत शांति पर्व [अ०] १३६) अर्थात् सुख की इच्छा सब ही सुनावादियों के मूल. करते हैं । सुख की इच्छा स्वाभाविक है। फिर कर्त्तव्याकर्त्तव्य में क्या भेद रह जायगा ? क्या पंडित और क्या मूर्ख दोनों एक हो जायेंगे ? सुख तो दोनों ही चाहते हैं किंतु भेद इतना ही है कि एक के सिद्धांत | *<noinclude></noinclude> 7nm0p34gb4e0ceyydaryij2ceyyt8fz पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६३ 250 194391 664614 2026-07-02T17:29:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664614 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ 40 ] कार्य श्रल्प सुखवाले होते हैं और दूसरे के अधिक सुखवाले ।' अथवा यों कह लीजिए कि एक अपना ही सुख चाहता है और दूसरा समाज के अधिकांश जनों का अधिक सुख । बस एक विषयासक्त पुरुष और उपयोगितावाद के प्रवर्तक पंडित चर मिल (MI11 ) मैं यही भेद है। अब इन भेदों पर जरा विशेष रूप से विचार करना चाहिए। सुखवादियों के सब ही सम्प्रदाय "दुःखादुद्विजते सर्वः सर्वस्य सुखमीप्सितम्” इसको मनोविज्ञान शास्त्र की पहली स्वयंसिद्ध मानते हैं, किंतु कर्त्तव्य के विषय में उनका मत- भेद है। एक सम्प्रदाय के लोग यह कहते हैं कि हमको अपना ही सुख अभीष्ट है। "आप सुखी तो जग सुखी" । यह लोग अपना सुख प्रधान समझते हैं। “अव्वल स्वेश बादह दरवेश" । इन लोगों का अंतिम लक्ष्य तो व्यक्तिगत सुख है किंतु यदि अपने सुख के साथ दूसरे का भी सुख संपादन हो जाय तो इसको ये लोग बुरा न कहेंगे । इस मत को हम व्यक्तिगत सुख-वाद अथवा संक्षेप से स्वार्थवाद कहेंगे। इस स्वार्थ बाद में कई श्रेणियां हैं दूसरे संप्रदाय के लोग व्यक्ति के सुख की अपेक्षा समाज के सुख की चेष्टा करना अधिक श्रेय समझते हैं। ये लोग संसार में अधिक से अधिक सुख की मात्रा चाहते हैं । “अधिकांश लोगों का अधिक सुख" यही इस संप्रदायवालों का मूल मंत्र है। इसी को उपयोगितावाद (utiltarianism) कहते हैं। विकाशवादियों ने भी इस सिद्धांत को अपने मत के अनुकूल एक नया रूप दे दिया है। स्वार्थवाद- - इस मते के लोग हमारे देश में चार्वाक के नाम से प्रसिद्ध हैं, और प्राचीन यूनान में सिरोनिक्स<noinclude></noinclude> ppjn2lzrkojpza4uhz7p2sxn1qu16pu पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६४ 250 194392 664615 2026-07-02T17:29:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664615 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ५१ ] (Cyrenaics) और ऐपीक्यूरियंस ( Epicureams ) इस मत के माननेवाले हुए हैं। चार्वाकों का कहना है कि जब तक जिओ सुख से जियो, भला बुरा कुछ नहीं, जो कुछ है इसी लोक में है; परलोक आदि सब कल्पना मात्र हैं। उनके मत में कहा है कि" याच जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्। - भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः " अर्थात् 'जब तक जिए सुख से जिए, ऋण करके (भी) घी पीना चाहिए (हमारे देश के स्वार्थवादी भी बड़े सात्त्विक वृत्ति के लोग थेवे बिचारे घी पीकर ही संतुष्ट हो जाते थे उन्होंने “वृतं पिवेत्की वजाय पश्चिमी देशों के स्वार्थवादियों की भांति "सुरां पिवेत्" नहीं लिखा) देह भस्म हो जाने पर फिर लौटना कहां ? यदि इन लोगों से कहा जाय कि संसार में निरा सुख मिलने से रहा, जब मिलेगा तब दुःखमिश्रित ही मिलेगा तो इस युक्ति से इनका उत्साह किंचिमात्र भी नहीं घटता । चार्वाकों का कहना है कि-- त्याज्यं सुखं विषय-संगम-जन्म पुंसां दुःखोपसृष्टमिति मूर्खविचारणैषा । ब्रीहीन् जिहासति सितोत्तमतण्डुलाब्यान् को नाम भोस्तु कणोपहितान् हितार्थी || 'विषयों के संग से पैदा होनेवाला सुख दुःख से मिला हुआ होने के कारण त्याज्य है, ऐसी धारणा मूखों ही की होतो है। भला ऐसा कौन आदमी है जो भुसी से ढके हुए होने के 'कारण उत्तम सफ़ेद चावल वाले धानों को छोड़ देगा। चार्वाकों के सिद्धांत वाल्मीकीय रामायण में जाकालि ऋषि के<noinclude></noinclude> 7ybglclnyunbl9sbwcem3ket0agnhq4 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६५ 250 194393 664616 2026-07-02T17:30:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664616 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ५२] मुख से कहे गए हैं और महाभारतांतर्गत कणिक नीति में स्वार्थवाद पराकाष्ठा को पहुँच गया है। कणिक के मत से स्वहित साधन में दूसरों का चाहे जितना अनहित किया जाय नहीं। उनका कथन है कि दूसरों का मर्मच्छेदन किए विना, दारुण कर्म किए बिना और धोखा दे कर मारे बिना मनुष्य बड़े ऐश्वर्य को नहीं प्राप्त होता । " नाच्छित्वा पर- मर्माणि ना कृत्वा कर्म दारुणम्। नाहत्वा मत्स्यघातीय प्रशोति महतीं श्रियम्” । इस मत के माननेवाले भर्तृहरि के मत से उन मानव राक्षसों में से हैं जो अपने हित के लिये पराया अनर्थ करते हैं " तेऽमी मानवराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नंति ये " । कणिक के सिद्धांत कई बातों में जर्मन पंडित निशी (१८४४- ११००) (Nietzce) से मिलते जुलते हैं। निशी साहेब अपनी आचारपद्धति में दया शांति श्रात्म- त्याग आदि गुणों को स्थान नहीं देते। उनके मत से ये सब गुण अवनति के कारण हैं। शक्ति बढ़ानेवाले संकल्प ही इनके मत में श्रेय समझे जाते है। निशी ने बल को ही स्तुत्य माना है। प्राचीन यूनान में सिरैनिक और ऐपी क्यूरियन ( Cyre- naics and Epicureans ) संप्रदाय के लोगों ने स्वार्थवाद का प्रचार किया था। सिरैनिक संप्रदाय के निनिक और एपी- मुख्य व्यवस्थापक पेरिस्टीपस (Aristipp- क्यूरियंस ! us) सिरीन् ( Cyrene ) नगर में रहते थे, इसी कारण इस संप्रदाय के लोग केवल सुख- वादी थे। ये सुखान्वेषण में आगे पीछे का कुछ विचार नहीं करते थे। ये लोग तात्कालिक सुख के पक्षपाती थे। ये विषयवासना के सुख को बुरा नहीं कहते थे। किसी प्रकार<noinclude></noinclude> ivhxws2ghjbao1943dldvylbd4zmgls पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६६ 250 194394 664617 2026-07-02T17:30:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664617 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ५३ ] से वर्तमान में सुख होना चाहिए आगे जो कुछ होगा सो देखा जायगा । खुदा जाने " । " अब तो आराम से गुज़रती है आकृबत की पीक्यूरियन संप्रदाय के प्रवर्त्तक पेपीक्यूरस ( ३४१- २७० ई० पू० ) भी यही मानते थे कि सुख ही परम पुरुषार्थ है और दुःख ही महापाप है, किंतु इनमें और सिरैनिक संप्रदाय के मुख्य व्यवस्थापक एरिस्टीपस में इतना भेद हैं। कि ये तात्कालिक सुख के पक्षपाती नहीं ये दुःख-परि- णामी सुख के पीछे नहीं दौड़ेंगे और सुख में अंत होनेवाले दुःख को सहर्ष स्वीकार करेंगे। ऐपीक्यूरस के मत में पेंद्रिक सुख के साथ साहित्य और तत्वज्ञान के पठन पाठन से उत्पन्न हुआ सुख भी धेय है। चार्वाक की भांति ये भी भविष्य को नहीं मानते। इसी लिये इनको डैमोक्रिटस ( Democritus ) के निरीश्वर पर मावाद में शरण लेनी पड़ी। ये लोग मृत्यु को दुःख- भय नहीं मानते। इनका कहना है कि जब तक जीते हैं तब तक मौत नहीं और जब मर गए तो कुछ नहीं रहा, फिर दुःख क्रिस को होगा ? परमाणुवाद तथा संवेदनात्मक मनोविज्ञान के आधार पर इनका मत कुछ स्थिरता पा गया । वर्तमान काल में दूसरों के हित को न विचारनेवाले बहुत से मनुष्य होंगे, किंतु ऐसे घोर स्वार्थवाद को युक्तियों द्वारा समर्थन करने का शायद ही किसी को स्वार्थपरायण सुखवाद का साहस पड़ेगा। स्वार्थवाद के कम करने खंडन । में ईसाई मत का यूरोपीय सभ्यता पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा है। स्वार्थवाद और परार्थवाद के बीच की श्रेणी के भी दो एक मत हैं। उनका<noinclude></noinclude> 4hwemhiq4f89u8339b09rqlig4jwlrd पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६७ 250 194395 664618 2026-07-02T17:30:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664618 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ५४ ] विवरण श्रागे दिया जायगा । अब पाठक गए थोड़ी देर के लिये स्वार्थवाद के गुण दोषों पर विचार कर लें 1 स्वार्थवादियों का केवल इतना ही कहना है कि प्रत्येक मनुष्य स्वभावतः अपना हित चाहता है और इसके साथ वे लोग यह भी कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य का हित उसके सुख है, अतः सबके लिये अपना सुख चाहना अभीष्ट है, दूसरे के सुख से कुछ मतलब नहीं, "आप जिये तो जग जिया कुनबा मुये न हानि"। ये लोग व्यक्ति को ही सारे संसार का केंद्र मानते हैं। जो मेरे हित का है वह कर्त्तव्य है और जिससे मेरा हित नहीं उससे मुझे कुछ प्रयोजन नहीं, वह चाहे रहे चाहे जाय। अब जरा विचारिए कि ऐसा स्वार्थवाद युक्ति की कसौटी पर कहां तक ठीक उतरता है। इस मत में सब से पहला तो यही दोष है कि इसमें व्यक्ति को समाज से स्वाधीन माना है । "अपनी अपनी ढपली और अपना अपना राग" । क्या मेरा सुख दूसरे के सुख से बिलकुल पृथक हो सकता है ? | सुख दुःख भी प्लेग की भांति संक्रामक हैं। रोती हुई समाज में यदि कोई एक व्यक्ति हँसता हुआ रहना चाहें तो उसके लिये ऐसी समाज में प्रसन्नमुख होकर रहना असंभव है । इसके साथ यह भी देखना चाहिए कि बहुत से ऐसे सुख हैं जो सामाजिक हैं, अर्थात् उनका उपभोग करने के लिये व्यक्ति को अपने से अतिरिक्त और मनुष्यों की आवश्कता पड़ती है। ऐसे सुखों के लिये व्यक्ति को अपने सुख के साथ दूसरों के सुख का भी साधन करना पड़ता है, और उसको निरे स्वार्थ, बाद से हटना पड़ता है। इसके अतिरिक्त एक और बढ़ी समस्या है जिसको हल करने में व्यक्तिवाद असमर्थ है। यदि यह भी मान लिया जाय कि मुझको अपना ही परमहित<noinclude></noinclude> 8os35052gtk5ap57ak1uj1a5qpfb2j9 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६८ 250 194396 664619 2026-07-02T17:30:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664619 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ५५ ] श्रभीष्ट है, तो हमारे सामने यह प्रश्न उपस्थित होता है कि परमहित किसको कहेंगे। हम परमहित उस ही को कह सकते हैं जो निरपेक्ष हो अर्थात् जो सबके लिये एक सा हो। वह पूर्ण हित नहीं कहा जा सकता जो केवल मेरे ही लिये हित कारक हो; जो हित सबके लिये एकसा हो वही श्रेष्ठ और सर्व- मान्य गिना जायगा जो हित केवल मेरे ही लिये हित है। उसका हित होना स्वयंसिद्धि नहीं सम्भव है कि मैं उसको अपनी मूर्खता के कारण हित समझता होऊं । यदि मैं अपना परम हित चाहता हूं तो मुझे ऐसे हित के लिये यत्नवान होना पड़ेगा जो दूसरों का भी हित हो। ऐसा करने में व्यक्तिवाद को तिलांजलि देनी पड़ती है और यदि ऐसा नहीं करता, तो मैं अपने परम हित का इच्छुक नहीं रहता हूं; फिर भी व्यक्तिवाद से गिरना पड़ा, इधर खाही और उधर कुछ, दोनों ओर से भ्रष्ट हुए "न माया मिली न राम " । इतो भ्रष्ट स्ततो भ्रष्टः । • जिस प्रकार व्यक्तिवाद युक्तियुक्त नहीं ठहरता उसी प्रकार उसके साथ का सुखवाद भी कट जाता है। सुख- वादियों का कहना है कि "सर्वस्य सुखमीप्सितम् किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। हमारी इच्छा या कामना काम्य प दार्थ के लिये होती है, न कि काम्य पदार्थ की प्राप्ति से उत्पन्न होनेवाले सुख के लिये । यदि हमको केवल सुख ही सुख की इच्छा होती तो सुख की कल्पना से ही हमारी तुष्टि का होना संभव था और हम को यह न कहना पड़ता कि "नहीं मनमोदक भूख बुताई" । थोड़ा बहुत सुख तो कामना करते समय काम्य पदार्थ और उसकी प्राप्ति संबंधी भावी सफलता के विचार में मिल जाता है। इस सुख के लिये कोई कामना नहीं करता<noinclude></noinclude> 3m9jzj77cndl1yyuuw96894m0q9map1 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/६९ 250 194397 664620 2026-07-02T17:30:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664620 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ५६ ] और न कोई केवल इसी सुख की प्राप्ति के अर्थ चेष्टा करता है। हमारी चेष्टा वस्तुतः काम्य पदार्थ की प्राप्ति के लिये होती है, सुख प्राप्ति के अर्थ नहीं। काम्य पदार्थ हमेशा ( सुख ) नहीं होता। औदरिक का भी काम्य पदार्थ सुख नहीं, भोजन ही है । काय पदार्थ की प्राप्ति ही हमारी कामनाओं का विषय होती है वह स्वयम् ही मूल अभीष्ट है दूसरे श्रभीष्ट का साधन नहीं। कभी कभी ऐसा भी होता है कि हम दुःख को ही जान चूककर अपना काम्य पदार्थ बनाते हैं, इसलिये “सर्वस्य सुख- मीप्सितम् जैसा देखने में निर्विवाद ज्ञात होता है वैसा वास्तव नहीं है। हम सुख नहीं चाहा करते वरन् सुखपरिणामी पदार्थ हमारी चाह के विषय होते हैं। यही बात हम उद्देश्य अथवा लक्ष्य की व्याख्या करते हुए बतला चुके हैं और आगे भी उपयोगितावाद के संबंध में कहेंगे। व्यक्तिगत सुखवाद के दोनों ही अंगों का खंडन हो चुका। अब हम उपयोगिता याद पर जाने के पूर्व सुखवाद की और कल्पनाओं के ऊपर विवे- न करना चाहते हैं। स्वार्थ सुखवाद की श्रेणियां यह बात ऊपर बता दी गई है कि कोरे स्वार्थवाद से काम नहीं चल सकता। समाज में रह कर दूसरे के हित को ( अथवा सुखवादियों की भाषा में 'सुख' कह लीजिए ) अवश्य अपना अभीष्ट बनाना पड़ता है। समाज संगठन के अर्थ भी स्वार्थ की सीमा बाँधनी पड़ती है । अनियमित स्वार्थ में समाज की स्थिति नहीं रह सकती। संसार में परोपकारी और आत्म- त्यागी मनुष्यों की स्थिति कोरे स्वार्थ-वादियों को अवाक कर देती है। परोपकार को संसार से हटाया नहीं जा सकता। आजकल कलिकाल में भी बड़े बड़े दानवीर वर्तमान हैं। उन<noinclude></noinclude> ovejtmkbqxnd1s77ui86i0em3q67bwf पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७० 250 194398 664621 2026-07-02T17:31:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664621 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ५७ ] सबको उन्मत्त कहकर एक बार संसार से विदा नहीं कर सकते । परोपकार अथवा परहित साधन की कुछ तो व्याख्या अवश्य देनी पड़ेगी। कुछ लोगों ने पदार्थ को स्वार्थमूलक ही मान लिया है। सत्रहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध नीतिवेत्ता हान्स ( Hobbs ) ( १५८८-१६७६ ई०) ने कहा है कि उदारता श्रात्म-प्रीति अथवा श्रात्महित का ही रूपांतर है, दया अपनी संभावित दीन हीन अवस्था पर विचार से उत्पन्न हुआ एक प्रकारका भय है । सब क्रिश्रों का मूल स्वार्थ है। सब कर्मों के साथ स्वहित साधन की कामना लगी हुई है। बृहदारण्यक उपनिषद में एक दूसरे प्रसंग से यही सिद्धांत दिया गया है। और उसके साथ ही साथ उसके काटका भी दिग्दर्शन कर दिया है। "हम अमर कैसे होंगे ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य जी महाराज कहते हैं कि मनुष्य अपने पुत्र से पुत्र के अर्थ प्रीति नहीं करता है, वरन अपने ही लिये। इसी प्रकार उन्होंने संसार के लिये भी कहा है "नवा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवंति, नया अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति" अर्थात् संसार के हित के लिये संसार प्रिय नहीं होता, और जीवधारी लोगों के हित के लिये वे प्रिय नहीं होते हैं वरन अपने हित प्रीति वा सुख के लिये । फिर सब उदाहरणों का सार बताते हुए याज्ञवल्क्य जी कहते हैं " नवा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियम् भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियम् भवति । अर्थात् सब के अर्थ सब नहीं प्रिय होता किंतु आत्मा की प्रीति, हित वा सुख के अर्थ सब प्रिय होता है। याज्ञवल्क्य जी इतना कह कर नहीं ठहर गए। इतना ही उनमें और हाल साहिब में अंतर है। इस बात को प्रीति वा सुख के<noinclude></noinclude> n3yhrg4omdk0qywqtjlbk4wa3kx60qb पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७१ 250 194399 664622 2026-07-02T17:31:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664622 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ५० ] कह कर उन्होंने इसी स्वार्थवाद से परम निश्रेयस का ज्ञान करा दिया है। श्रात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियम् भवति" इसके आगे ही वे कहते हैं "आत्मा अरे वा द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा श्ररे दर्शनेन श्रवणेनः त्या विज्ञाने नेद सर्वं विदितम् " । इस मंत्र में श्रात्मा के ऊपर विचार करने की आज्ञा दी है। आत्मा के यथार्थ ज्ञान से ही कर्त्तव्य एवं सारे संसार का यथार्थ ज्ञान हो जायगा । हान्स साहिब के आत्मा-संबंधी विचार बहुत ऊँचे न थे. इसी कारण वे स्वार्थवाद से ऊँचे न जा सके। उनके आध्या स्मिक विचार प्रकृतिवादियों के से ही हैं। वे सब मानसिक क्रियाओं को शरीर की आंतरिक क्रियाओं की छाया मानते हैं। जो प्रकृतिवादी लोग स्वार्थवाद से ऊँचे गए हैं उन्होंने एक प्रकार से अपने सिद्धांतों का विरोध किया है। हान्स साहिब स्वार्थवादी थे और वे लड़ाई झगड़ा करना मनुष्य का प्राकृ-- तिक गुरु मानते थे। वे शांतिप्रिय थे किंतु उनकी शांति- प्रियता का मूल स्वार्थ ही में था। वे कहते हैं कि स्वार्थ की सीमा बाँधने में ही पूरी रीति से स्वहित साधन हो सकता है। शांति की ही अवस्था में मनुष्य अपना हित साधन करने की आशा कर सकता है और शांति स्वार्थ को संकुचित किए बिना प्राप्त नहीं हो सकती । यही सिद्धांत हान्स साहिब की राज- नीति और समाज शास्त्र का मूलमंत्र है। इसी सिद्धांत पर वे समाज में आईन और नियमों की स्थिति की व्याख्या करते हैं। मैडेवेली साहिब (Mendeville ) का मत इस स्वार्थ- वाद का अंतिम परिणाम है। उनका कहना है कि सारा धर्म राजाओं ने अपने स्वार्थ से बनाया है जिसके कारण प्रजा के शासन में उनको कठिनाई न पड़े। इस मत में हास साहिक<noinclude></noinclude> lsvgj9zem7t5e4gx489somqyj5mo24q पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७२ 250 194400 664623 2026-07-02T17:31:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664623 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[48] के स्वार्थवाद के छिद्र बड़े होकर दिखाई पड़ते हैं । हान्स साहिब का मत कोरे स्वार्थवाद से श्रवश्य अच्छा है। उनके स्वार्थवाद पर चाहे राजनैतिक संस्थाओं के भी ऊँचे ऊँचे महल बन जायें किंतु उनके अनुसार मनुष्य हृदय के उदार भावों की पूर्ण व्याख्या नहीं हो सकती। क्या ऐसे मनुष्य नहीं है जो अपने यश अपयश की परवाह न करते हुए भी दूसरों के लिये अपना सर्वस्व समर्पण कर देने को तैयार रहते. हो ? ऐसे मनुष्यों की मानसिक स्थिति की हाल साहिब क्या व्याख्या देंगे? बहुत से ऐसे अवसर भी प्राते हैं जब कि अपने अर्थसपादन के लिये पदार्थ को साधन बनाने की आवश्य कता नहीं पड़ती। कभी कभी ऐसे अवसर भी आ जाते हैं. जब कि स्वार्थ और परार्थ में झगड़ा पड़ता है। ऐसे समय मैं हाम्स साहिब के मत से स्वार्थ साधन ही श्रेय है। इस बात के मानने में हाब्स साहिब ने संकोच नहीं किया। वास्तव में हान्स साहिब ने मनुष्य के धार्मिक कर्त्तव्य को राजनैतिक नियम और देश के श्राईन के साथ मिला दिया है। जैसा कि आगे दिखलाया जायगा हमारा धार्मिक कर्त्तव्य राजनैतिक नियम और देश के आईन के विरुद्ध नहीं है किंतु उससे उच्च- तर हूँ। हाम्स साहिब ने मनुष्य के उच्च भावों पर चौका लगा दिया है, स्वार्थरहित उदारता को जड़ से उड़ा दिया है। जब निष्प्रयोजन पाप कर्म किए जाते हैं; जब ऐसे लोग वर्त- मान हैं जिनके विषय में महात्मा भतृहरि लिखते हैं कि. “ये तु अंति निरर्थकम् परहितम् ते केन जानीमहे" तब " एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थान् परित्यज्य ये” ऐसे लोगों की निःस्वार्थ परोपकार स्थिति में विश्वास करना क्या अनुचित है ? .<noinclude></noinclude> abxro51gfb0ij7u52dmi3o75y8ebl9a पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७३ 250 194401 664624 2026-07-02T17:31:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664624 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ to ] हाल साहिब का यह भी कथन कि "दया अपनी संभा वितदीन हीन अवस्था पर विचार करने से उत्पन्न हुए भय का रूपांतर है" समझ में नहीं श्राता । यदि हम किसी दरिद्री को केवल इसी अभिप्राय से धन देते हैं कि शायद हम भी इस अवस्था को न प्राप्त हो जायँ और दूसरे लोग हमारी सहायता न करें तो हम को स्वार्थवाद के आधार पर इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि हमारे दरिद्री हो जाने पर दूसरे लोग हमारी श्रवश्य ही सहायता करेंगे। दरिद्री को धन देने से समाज के अन्य लोग अपने ऊपर कोई इस बात का भार नहीं ले लेते कि जब दाता निर्धन हो जायगा तब वे लोग उसकी उदारता का बदला दे देंगे। भावी धनप्राप्ति की आशा से अपने प्रस्तुत धन को खो देना कोई पांडित्य का काम नहीं। कहा भी है कि लप्त्यमान धनावेशात् कृतलब्ध धनव्ययः । त्रिवर्गविषया विशः, समूढ इति कथ्यते ॥ * (पुरुषपरीक्षा) स्वार्थवाद के आधार पर दया वा उदारता की व्याख्या करना बड़ा कठिन है। हाब्स साहिब में स्वार्थवाद की अपेक्षा सुखवाद की मात्रा कम है किंतु उनकी गणना सुखवादियों ही में की जायगी और जो दोष कि सुखवाद में दिखाए जाते हैं वे सब इनके मत पर भी लागू हैं। हास साहिब के मत का खंडन करते हुए यह दिखाया जा चुका है कि परार्थ को स्वार्थ की भाषा में रखना कितना कठिन है। इसी कठिनाई को देखकर कुछ लोगों उभयवाद । ने एक प्रकार के उभयवाद में सहारा लिया है। इन लोगों का कहना है कि स्वार्थ साधनेच्छा ● अर्थभावी धन की आशा से वर्तमान धर्म का व्यय करनेवाला; धर्म, अर्थ, काम को नहीं माननेवाला मूर्ख कहाता है।<noinclude></noinclude> kmc7u526xnufif14a2m1obut25si6j2 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७४ 250 194402 664625 2026-07-02T17:31:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664625 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६९ ] के साथ ही मनुष्य में परार्थ साधन की इच्छा लगी हुई है और साधारणतः स्वार्थ और परार्थ में विरोध भी नहीं होता है। परार्थ में स्वार्थ है और स्वार्थ में परार्थ है। यदि मैं अपना पालन पोषण कर रहा हूं तो मैं एक प्रकार से समाज के ऊपर से अपने भरण पोषण का भार हटा रहा हूं और एक व्यक्ति को उन्नत बना कर उस अंश में समाज की उन्नति कर रहा हूँ, और यदि मैं परार्थ साधन में तत्पर होऊं तो दूसरों के हित के साथ में अपना भी हित कर रहा हूं क्योंकि दूसरे भले बन कर अंत में मुझको किसी न किसी प्रकार का लाभ पहुँचायेंगे । स्वार्थ और परार्थ दोनों ही ठीक हैं, जैसा जिस समय सुमीता पड़ जाय वैसा करना चाहिए। कामंद- कीय नीतिसार में भी एक जगह ऐसा मत प्रतिपादित है । परार्थ देशकालज्ञो, देशे काले च साधयेत् । स्वार्थी च स्वार्थकुशलः, कुशलेनानुकारिणः || # यह साधारण लोगों को नीति है। ऐसे लोगों को भर्तृ- हरि महराज ने भी साधारण मनुष्यों की कोटी में रक्खा है। " सामान्यास्तु परार्थ मुद्यममृतः स्वार्थाविरोधेन ये” अर्थात् सामान्य वे लोग हैं जो बिना अपने हित का विरोध किए हुए दूसरों के हित साधन में सदा तत्पर रहते हैं। सुखवादियों में उभयवाद का समर्थन आज कल के समय में हैनरी सिजबिक ने किया है। यह स्वार्थ और परार्थ साधने की इच्छा दोनों ही को मनुष्य में स्वाभाविक मानते हैं। यदि मनुष्य जीवन डेसिज विक • अर्थ-देश और काल को जाननेवाला विशेष समय या स्थान पर परार्थ को भी साथ और स्वार्थपर मनुष्य स्वार्थ को ही सिद्धी करने का प्रयत्न करे ।'<noinclude></noinclude> r3ffr3lgnd1rms0vxduo2hkcort7a5b पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७५ 250 194403 664626 2026-07-02T17:31:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664626 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६ ] में ऐसे अवसर न होते जब कि स्वार्थ श्रीर परार्थ में झगड़ा होता है, जहाँ कि स्वार्थ त्याग ही द्वारा परार्थ साधन की संभावना होती है और जहां पर बिना आत्म-बलिदान किए देशया समाज का हित साधन नहीं होता, तो शायद उभयवाद सध जाता किंतु ऐसे अवसर श्राने पर उभयवादियों को और . झुक कर उच्च पद से हटना पड़ता है। स्वयं सिजविक साहिब इन विरोधात्मक प्रवृत्तियों की एकता करना कर्तव्य शास्त्र की कठिनतम समस्या मानते हैं और वे इस कठिनाई को दूर करने के अर्थ ईश्वर की सहायता लेते हैं। लेकिन विरोधात्मक पदार्थों को एक करने में ईश्वर भी असमर्थ है, जैसा कि कहा भी है कि “वाधितम वेदाऽपि न बोधयति" विरोधात्मक बात को वेद भी नही समझा सकते हैं। जब यह मान लिया कि प्रत्येक मनुष्य के लिये अपना अधिक से अधिक हित चाहना श्रेय है, फिर उसी के साथ दूसरों का भी हित चाहना श्रेय है यह किस प्रकार हो सकता है। जो लोग अपना अधिक से अधिक हित (सुख) चाहते हैं वे यदि दूसरों का हित चाहेंगे तो स्वार्थवाद में बाधा पड़ जायगी और यदि स्वार्थ- are में बाधा नहीं डालना चाहते तो परार्थवाद नहीं सकता। रामाय स्वस्ति और रावणाय स्वस्ति, दोनों ही एक साथ नहीं कहा जा सकता। इससे यह न समझा जाय कि परार्थ और स्वार्थ में सचमुच ऐसा ही भेद है जैसा भलाई और बुराई में, किंतु इतना भेद अवश्य है कि वह कभी कभी बड़े 'आदमियों को किंकर्तव्यविमूढ़ बना देता है। जिविक साहिब स्वार्थ और परार्थ दोनों का अस्तित्व नैसर्गिक मानते हैं, किंतु यदि उनसे पूछा जाय कि वह अर्थ 'या हित किस में है तो उसके लिये उनके पास एक ही उत्तर है<noinclude></noinclude> 9smoi5w5ja1mz5xmx4s9ebx29xnj4cq पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७६ 250 194404 664627 2026-07-02T17:32:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664627 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६३ ] कि सुख ही परम पुरुषार्थ है। वे केवल सुख ही सब क्रियाओं का मुख्य लक्ष्य मानते हैं, और सब लक्ष्य साधन मात्र हैं । . यदि यह भी मान लिया जाय कि सुख के अतिरिक्त और कुछ भी हमारे इष्ट में शामिल नहीं है तो भी हमको यह श्रवश्य मानना पड़ेगा कि वह दृष्ट सुखदायक होने के कारण ही इट कहलाया । इस बात में वह अपनी सदसद्विवेक बुद्धि को ही प्रमाण मानते हैं। इस कथन की तीनों बातें विचार- रणीय हैं। पहले तो सुख के अतिरिक्त और बहुत से अभीष्ट पदार्थ है जैसे कि ज्ञानप्राप्ति की इच्छा, अथवा सुंदरता में मन होना और फिर केवल सुख को कोई नहीं चाहना, यदि हम को सुख हो और उसके साथ यह ज्ञान न हो कि हम सुखी हैं तो ऐसे सुख को कोई न चाहेगा। यदि सुख को मुख्य अंग माना जाय तो क्या हानि होगी ? इसका उत्तर हम केवल इतना ही देना चाहते हैं कि अंग या भाग पूर्ण से बड़ा नहीं हो सकता और यदि हम किसी एक अंग को ही मुख्य माने तो दूसरे अंग की आवश्यकता ही क्या थी। दूसरे अंग का वर्तमान होना किसी एक अंग के मुख्य न होने का सब से बड़ा प्रमाण है। यदि हमारे इष्ट में सुख के अतिरिक्त और कोई शामिल है तो सुख हमारा इष्ट नहीं, और न हम उसे इष्ट के अंगों ही में श्रेष्ठता दे सकते हैं। वर्तमान शताब्दी में केम्ब्रिज निवासी डाक्टर मेक्टेगर्ट ने ( Motaggert ) सुख को न तो क्रियाओं का लक्ष्य ही माना है और न उसको लक्ष्य का कोई अंश स्वीकार किया है किंतु सुख दुःख को किसी कार्य के धार्मिक मूल्य निर्धारित करने में प्रधान मापक माना है । सुख दुःख का अनुभव सबको एक सा नहीं होता, किसी को<noinclude></noinclude> n0gzokqxm6wmdk66525gkdzpsw33b7a पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७७ 250 194405 664628 2026-07-02T17:32:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664628 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६४ ] अधिक और किसी को कम । जो मापक प्रत्येक मनुष्य के साथ बदले उसका क्या विश्वास ? सदसदविवेकवती बुद्धि पर हम पूर्णतया विश्वास नहीं कर सकते और न हम जन समुदाय के वाक्यों को प्रमाण nine ठीक समते है क्योंकि उन्हों ने अपने मन और अपनी क्रियाओं का पूरी रीति से विश्लेषण नहीं किया है। और यदि हम उनके कहने को प्रमाण भी मान से तो सिजधिक माहिब को विशेष लाभ न होगा। जन समुदाय की नैतिक freiter उनके प्रतिकूल पड़ेगी क्योंकि साधारण लोग सुखों मैं ऊँ नीचे का भेद अवश्य मानते हैं। सिजबिक साहिब यह भेद मानने को तैयार न होंगे, क्योंकि ऐसा करने से उनको सुखवाद से हटना पड़ेगा ।<noinclude></noinclude> 9z5i8z4bvyh9lwv935r1jmz5ehqkewk पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७८ 250 194406 664629 2026-07-02T17:32:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664629 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>वेनथम साहिब कृत उपयोगितावाद की परिभाषा छठां अध्याय । उपयोगिता वाद | (Utiltarianism ) गत अध्याय में स्वार्थ वाद-संबंधी कई प्रकार की कल्प- नाओं का विवेचन हो चुका है । अब देखना चाहिए कि सुखवादियों के परार्थवाद से अथवा उपयोगिता बाइ ( Utiltarianism ) से हमारी कहांतक तुष्टि होती है । 'अधि- कांश लोगों का अधिक सुख' यही उपयो- गिता वाद का मूल मंत्र है । विलायत में इस मत के प्रवर्तक वेनथम (Bentham) और मिल (Mill) हुए हैं। वेनथम साहिब (१७४८-१८३२ ) ने अधिकांश लोगों का अधिक सुख परम पुरुषार्थ माना है। उन्होंने इस बात का कोई प्रमाण नहीं दिया कि अधिकांश लोगों ही का सुख क्यों अभीष्ट है ? उन्होंने केवल अपनी ही मिसाल देकर कहा है कि दूसरों के सुख में ही उनको सुख मालूम होता है। वैसे उन्होंने यह भी मान लिया है कि वास्तव में सुख चाहने से ही काम चलता है। दूसरों का सुख तो ऐसा है कि जैसे खाने मैं खाद बढ़ाने के लिये थोड़ी सी चटनी या मिठाई खा ली जाय ! * वेनथम साहिब सुखों में गुणभेद नहीं मानते, केवल Sympathy is very good for dessert, self-regard slone will serve for diet.<noinclude></noinclude> f8w51hed9h365ah8xae03x5l6ug5386 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/७९ 250 194407 664630 2026-07-02T17:32:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664630 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६६ ] परिमाण भेद ही मानते हैं, अर्थात् जो सुख देर तक रहने- वाले हैं और जिनके साथ कम दुःख लगा हुआ है और देर तक रहने से जिनकी तेजी न घटे, ऐसे सामी और अल्पस्थायी सुखों की चाहिए। वेनथम साहब ने कुछ भीमाने हैं । उसका कारण यह W सुखों को दुःखपरि- अपेक्षा पसंद करना कर्त्तव्य के उत्तेजक है कि दूसरों का सुख चाहना मनुष्य का परम लक्ष्य है, तथापि जब तक उस लक्ष्य की ओर जाने में व्यक्ति को कुछ सुख वा दुःख अथवा भय से न बचना होगा, तब तक वह व्यक्ति शीघ्र दूसरे के सुख की चेष्टा करने में प्रवृत्त न होगा । इस लिये पांच मुख्य उत्तेजक माने गए हैं। पहला प्राकृतिक नियम, जैसे अधिक विषय-भोग में लिप्त होने से स्वास्थ्य बिगड़ने का डर रहता है। दूसरा, राजनैतिक नियम या आइन है, जिसके भय से मनुष्य स्वार्थ को उचित मात्रा से बढ़ने नहीं देता है। तीसरा समाज की निंदा स्तुति, दूसरों का सुख चाहने में समाज से दर और प्रशंसा मिलती है तथा स्वार्थी बनने में निंदा होती है। स्तुति के प्रलोभन और निंदा के भय से मनुष्य पर-हित-साधन में प्रवृत्त होता है। हमारे यहां ऊंचे विचारवाले लोग निंदा की परवा नहीं करते हैं। उनके लिये धर्म करने के लिये धर्म ही की उत्तेजना पर्याप्त है। निष्काम कर्म की दृष्टि से ये सब उतेजक वृथा हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में तुल्य निंदा स्तुति वाले पुरुष को ही भगवान ने अपना प्रिय बताया है । भर्तृहरि महाराज लिखते हैं कि, निंदन्तु नीतिनिपुणा यदि वा सुबन्तु, लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् । 1<noinclude></noinclude> jpjey8g46a9cfwuiomgqrhqjj8qwyad पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८० 250 194408 664631 2026-07-02T17:33:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664631 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६७ ] अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा, न्याय्यात्पथः प्रविचलंति पदं न धीराः ॥* चौथी उत्तेजना धर्म की है। बहुत से अच्छे कार्य ईश्वर की प्रसन्नता के अर्थ अथवा स्वर्ग के लोभ और नरक के भय से किए जाते हैं। पांचवी उत्तेजना आत्म-तुष्टि की मानी गई है। दूसरों को सुख देने से आत्म-तुष्टि और स्वार्थी बनने से आत्मग्लानि पैदा होती है। सुखषादियों ने इन उत्तेजको को तो माना है, किंतु इनके मानने में उनको अपने पक्ष से गिर जाना पड़ता है। इन उत्तेजकों का अस्तित्व ही इस बात का प्रमाण है कि सब को दूसरों का सुख अभीष्ट नहीं है । नथम साहब के सुखवाद का अधिक गुण-दोष-निरूपण न किया जायगा, क्योंकि उपयोगितावाद के सर्वोत्तम व्याख्याता मिल साहब ही है और उनके गुण-दोष-निरूपण में प्रायः सब उपयोगितावादियों के गुण दोष श्रा जायेंगे। - मिल साहब (J. S. Mill – १८०६ - १८७३ ) भी वेनथम लाह की बचनिका को मानते हैं। उनका भी यही कहना है, कि अधिकांश लोगों का अधिक सुख ही हम लोगों का अभीष्ट होना चाहिए। इस बात को मिल साहब निम्नोल्लिखित वाक्यों द्वारा सिद्ध करते हैं। * “इसके लिये कोई कारण नहीं बतलाया जा सकता उपयोगितावाद सिद्ध करने में मिल साहन की युक्ति * अर्थनीति में निपुण मनुष्य निंदा करें वा स्तुति करें, लक्ष्मी रहे चाहे बिलकुल हो कर चली जाय, मृत्यु भाज ही प्राप्त हो अथवा कालान्तर में हो परंतु धीर पुरुष न्यायमार्ग से कभी च्युत नहीं होते । t No reason can be given why the general happiness is desirable, except that each person, so far as be<noinclude></noinclude> ckth3uf85o29w0ulx98v0awpeuy1hwe पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८१ 250 194409 664632 2026-07-02T17:33:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664632 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[६] कि सर्वसाधारण का सुख क्योंकर वांछनीय है, सिवाय इसके कि प्रत्येक मनुष्य अपने सुख की ( जहां तक कि वह उसकी जान में लभ्य दिखाई पड़ता है) इच्छा करता है। जब यह बात मान ली गई, तो इसके अतिरिक्त और किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं । 'प्रत्यक्षे किं प्रमाणम्' । इस बात के सिद्ध करने के लिये जितने प्रमाणों की आवश्यकता है, वे सब ही आ गए हैं। प्रत्येक मनुष्य के लिये उसका सुख ही श्रेय है। अतः सर्वसाधारण का सुख सब ही के लिये श्रेय है " । मिल साहब की युक्ति का खंडन यह युक्ति देखने में बहुत ही सीधी सादी मालूम पड़ती है किंतु जब इसे विचार दृष्टि से देखते हैं, तब श्राश्चर्य होता है, कि तर्कशास्त्र के कर्त्ता पंडितवर मिल ने इतने थोड़े से वाक्यों में इतनी अधिक ता- र्किक भूलें किस प्रकार कर दीं। पहले तो सब लोग केवल सुख की वांछा नहीं करते । 'के अतिरिक्त शानादि बहुत से ऐसे पदार्थ है जो किसी और वस्तु का साधन न होते हुए भी वांछित हैं, और यदि यह भी मान लिया जाय कि सब लोग, सुख ही की घोड़ा करते हैं, तो क्या वांछित और वांछनीय में कोई भेद नहीं ? अंगरेज़ी शब्द Desirable मिल साहब ने एक स्थान पर लुख believes it to be attainable, desires his own happiness. This, however being a fact. we have not only all the proofs which the case admits of, but all which it is Rossible to require, that happiness is good to that person, and the general happiness therefore, a good to the aggre gate of all persons. Utlltarianism.<noinclude></noinclude> npqljmbhcbicoijp2l17jzgo29982vy पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८२ 250 194410 664633 2026-07-02T17:33:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664633 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६६ ] 'वांछित' के अर्थ में और दूसरे स्थान पर 'वांछनीय के अर्थ में लिया है। बहुत से पदार्थ जो वांछित हैं, वांछनीय नहीं । जैसे, परधनहरण बहुतों को वांछित है, किंतु वांछनीय अथवा श्रेयस्कर नहीं समझा जा सकता । अस्तु, यदि थोड़ी देर के लिये यह भी मान लें कि हर एक मनुष्य के लिये उसका सुख वांछनीय है, तो इससे यह किस प्रकार सिद्ध हो सकता है कि सर्वसाधारण का सुख सब के लिये ( व्यक्तितः ) श्रेय है । यह तो इस प्रकार से होगा कि यदि कोई कहे कि हर एक आदमी को भरपेट खाना चाहिए; इस लिये सव श्राद- मियों को ( समष्टि रूप से) भोजन कर लेना चाहिए। अथवा दूसरा उदाहरण लीजिए। यदि किसी फ़ौज में सौ आदमी हैं और प्रत्येक जवान को ६ फुट का होना चाहिए तो क्या इससे यह सिद्ध हो सकता है, कि फौज के हर एक आदमी को ६०० फुट को होना चाहिए। जिस प्रकार हम यह नहीं. मान सकते कि प्रत्येक मनुष्य को ६०० फुट का होना चाहिए, उसी प्रकार हम इस वाक्य से कि हर एक को अपना अपना सुख ईप्सित है, यह अनुमान नहीं कर सकते कि सब लोगों को सव का सुख ईप्सित है। इसमें भूल इस बात से पड़ जाती है, कि एक स्थान में तो 'सव' शब्द का अर्थ विभाजक रीति ( Distributively ) से, और दूसरी जगह समाहार रूप (Collectively ) से लगाया गया है। इस विरोधाभास को अंग्रेजी भाषा में ( Fallacy of Composition ) अर्थात् समाहार संबंधी विरोधाभास कहते हैं। नीचे के लोकद्वय में एक उच्च प्रकार की उपयोगितावाद प्रतिपादित है, किंतु यह उपयोगितावाद आत्मौपम्य के आधार पर सिद्ध किया गया है। इस युक्ति में उपर्युक्त दोष नहीं आते। यह उपयोगितावाद<noinclude></noinclude> rdr5k3bg2x5hnjxl8v4j6l498hgy8eu पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८३ 250 194411 664634 2026-07-02T17:33:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664634 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ७० ] जैसा कि आगे दिखाया जायगा वेदांत प्रतिपादित ऐक्यवाद के ही आधार पर सध सकता है। प्राणा यथात्मनोभीष्ठा भूतानामपि ते तथा । आत्मौपम्येन भूतेषु दया कुर्वन्ति साधवः ॥ प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये । आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ इन श्लोकों में निज आत्मा को ही प्रमाण लेकर सबके साथ दया और उपकार करना बताया है। इस युक्ति के साथ यह अवश्य मानना पड़ेगा कि सब को संसार में स्थित रहने का बराबर अधिकार है। इस बात के लिये कोई बुद्धिमान पुरुष 'ना' नहीं कह सकता। यदि कहे, तो उसको ही संसार मैं स्थित रहने का क्या अधिकार ? जब सब को संसार में स्थित रहने का बराबर अधिकार है, तो किसी को स्थिति में बाधा न डालनी चाहिए । मिल साहिब के उपयोगिता बाद में अन्य दोष ' दूसरे की मिल साहिब के उपयोगितावाद में इन तार्किक भूलों के अतिरिक्त और भी बहुत से दोष हैं। उनमें से केवल दो या तीन ही इस स्थान पर बताए जावेंगे। यदि हम सुख-वादियों के साथ यह भी मान लें कि सुख श्रेय हैं, तो हमें इस बात के मानने का क्या प्रमाण है कि श्रेय के अंतर्गत सुख के अतिरिक्त और कुछ नहीं है? यदि हम यह कहें कि कवि लोग विद्वान होते हैं, तो क्या विद्वानों की संज्ञा में कवियों के अतिरिक्त और कोई सुपठित पुरुष नहीं आ सकते हैं? इसी प्रकार यदि सुख श्रेय है, तो क्या सुख के अतिरिक्त और कुछ श्रेय नहीं ? बहुत से लोग ऐसे हैं जो सुख दुःख का विचार न कर धर्म ही चाहते हैं ।<noinclude></noinclude> ga37r6hkivfnvs9ys7bns1xfla5mr5v पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८४ 250 194412 664635 2026-07-02T17:33:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664635 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १ ] इसके लिये मिल साहब का कहना है, कि पहले पहल तो सुख के अर्थ धर्म किया जाता है, फिर पीछे से भाव- साहचर्य नियम (Law of the association of ideas ) के अनुकूल सुख को छोड़ कर लोग धर्म ही की इच्छा करने लगते हैं। जैसे कोई डाक्टर के कहने से किसी रोग के निवारणार्थ हुक्का पीने लगे और फिर रोग चले जाने पर भी हुक्का पीता ही जाय ! उपयोगितावाद के हिसाब से अधिकांश लोगों का अधिक सुख ही परम श्रेय है। अधिक सुख का क्या अर्थ है ? क्या सुखों की भी जोड़ बाकी हो सकती है ? सुखों का जोड़ सुख नहीं हो सकता। वह जोड़ ही होगा। सुख का अनुभव ही किया जाता है, जोड़ नहीं; और जब सब लोगों का एक सा सुख हो, तो उसका ऋण तथा धन भी किया जाय ! सुख कोई निरपेक्ष पदार्थ नहीं सुख का अनुभव लब को एक ला नहीं होता। जो पदार्थ एक को सुखद होता, है वही दूसरे को दुःखद है। (One man's meat is another man's poison ) जिस बात की हमें इच्छा नहीं, उसके उपलब्ध हो जाने से हम को सुख नहीं हो सकता। नारद जी ने एक समय एक शकर से पूछा था कि वह स्वर्ग को जाना चाहता है या नहीं ? शूकर ने उत्तर में पूछा कि स्वर्ग में विष्ठा मिलेगी या नहीं ? इस उदाहरण से स्पष्ट हो गया कि हम अपने परिमाण से अधिकांश लोगों का सुख नहीं चाह सकते । शायद जिसे हम सुख समझते हो, वह उनके लिये हो ! फिर हम संसार में सुख-मात्रा को कैसे बढ़ा सकेंगे ? भिन्न रुचिवाले लोगों में एक ही पदार्थ सब को सुखदायक दुःख रूप ● जो एक आदमी के लिये भोजन होता है, वह दूसरे के लिये विष होता है।<noinclude></noinclude> k8xy40lt7khnfv56y8edt7peolppyk4 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८५ 250 194413 664636 2026-07-02T17:33:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664636 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ७२ ] नहीं हो सकता। संसार में सुख की मात्रा बढ़ाने के पहले लोगों को सुधार कर उनमें उनके अनुभव करने की क्षमता पैदा करनी चाहिए। आज कल के मनोविज्ञान ने भी इस बात को भली भांति सिद्ध कर दिया है कि सुख हमारी क्रियाओं का लक्ष्य नहीं । यदि ऐसा होता, तो बहुत से कार्य संसार मैं न होते ! बालक प्रथम अपनी माता के स्तनों को मुँह में न लेता, क्योंकि बिना एक बार दूध पिये उसे उसके श्रानंद का ज्ञान कहां से आता? कामना का आवेग हमें कार्य में प्रवृत्त कराता है। बहुत से ऐसे अवसर होते हैं जिनमें कि हम जान बूझ कर दुःख में पड़ना चाहते हैं। यदि यह कहा जाय कि हम भावी सुख के अर्थ थोड़ी देर का दुःख उठाने को तैयार हो जाते हैं, तो इससे इतना तो सिद्ध हो ही गया, कि तात्कालिक सुख प्रत्येक क्रिया का लक्ष्य नहीं। इसके साथ ही. एक प्रश्न उठ सकता है कि यदि सुख की इच्छा स्वाभाविक होने के कारण सुख सब को अभीष्ट है, तब फिर कोई तात्का- लिक सुख को क्यों छोड़े ? कहना पड़ेगा कि बुद्धि ऐसा बतलाती है। फिर भावी सुख के लिये प्रस्तुत सुख का छोड़ना हमारा सुखान्वेषण न होगा, वरन् अपनी बुद्धि का आशा- पालन होगा । तो यदि बुद्धि का अनुकरण करना कर्त्तव्य मान लें तो क्या हानि है । उपयोगितावाद के अनुसार अधिकांश लोगों को अधिकांश सुख की इच्छा करनी चाहिए। इसमें पहले तो यही प्रश्न उठता है कि अधिकांश लोगों की अपेक्षा थोड़े लोगों के सुख का क्यों परित्याग करना चाहिए ? कभी कभी ऐसा होता है कि अधिकांश लोग ही भूल में होते हैं, और उनकी ईप्सित बात की कर देने से अल्प संख्यावाले लोगों को .<noinclude></noinclude> heqg6i2yhyvkg1lg4c29a5y04k6xew5 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८६ 250 194414 664637 2026-07-02T17:34:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664637 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ७३] अन्याय रीति से हानि पहुँच जाती है। एक बात और लीजिए, यदि हम ऐसी कल्पना करें कि एक समाज में केवल १० ही मनुष्य हैं, जिनमें से कि एक मनुष्य की सुख अनुभव करने की शक्ति साधारण लोगों से सदा दसगुनी से भी अधिक बढ़ी हुई है, तो क्या उस एक मनुष्य की तृप्ति करना अच्छा है, अथवा दसौं आदमियों को थोड़ा खुश कर देना अच्छा होगा ? उपयोगिता-वादियों के लिये यह कठिन समस्या होगी। उपयोगितावादी श्रांतरिक भाव की अपेक्षा वाह्य परिणामों की ओर अधिक ध्यान देते हैं। बहुत से ऐसे अवसर श्रा जाते हैं जिनमें कि कोई काम बुरी नियत से किया जाता है, किंतु किसी कारण से वह काम समाज को लाभदायक हो जाता है और कभी कभी होम करते हाथ जल जाता है, अर्थात् काम तो अच्छी नियत से किया जाता है और उसका फल बुरा होता है। उपयोगितावाद के हिसाब से पहला काम दूसरे की अपेक्षा अधिक नैतिक मूल्य रखता है। यह ऊपर बताया जा चुका है कि हमारा कर्त्तव्याकर्त्तव्य-निर्धारणा का विषय हमारा आंतरिक भाव अथवा नियत है, न कि कार्य का परिणाम | किंतु उपयोगिता वादी इस सिद्धांत को नहीं मानते। थम के प्रतिकूल मिल साहब ने सुखों में गुण-भेद मान् है— कुछ ऊंचे दर्जे के और कुछ नीचे दर्जे के । यदि इस भेद का मूल सुख ही की मात्रा है, तो उसको गुण-भेद न कह कर परिणाम-भेद कहना चाहिए और जो यह भेद का मूल सुख के अतिरिक्त कुछ और वस्तु है, तो सुख-वाद को तिलांजलि देनी चाहिए। यदि एक सुख दूसरे सुख की अपेक्षा अधिक वांछनीय है, तो उसमें कुछ विशेषता अवश्य<noinclude></noinclude> 84af6nqh6omt69u19l7eeoace43f2fv पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८७ 250 194415 664638 2026-07-02T17:34:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664638 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ७४ ] है। वह विशेषता ही हमारी कामना का लक्ष्य हो जायगी और सुख गौरा हो जायगा। और यदि सुख को प्रधान मानने हैं, तो सब ही सुख बरावर होंगे! मिल साहब की पुस्तक पढ़ने का सुख और गधे का धूल में लोटने का सुख बरावर ही हो जायँगे ! मिल साहब ने सुखों में भेद कर के सुख के अतिरिक्त एक और ही निर्णायक मान लिया है। वह निर्णायक बुद्धि है। इस दोष-निरूपण से पाठकगण यह न समझ ले कि उपयोगितावाद नितांत भ्रांत एवं अनुपयोगी है । साधारण लोगों के लिये बहुत से अवसरों पर इससे उपयोगिताबाद की अच्छा और कोई कर्तव्याकर्त्तव्य का निर्णायक नहीं मिलता। इसको मान कर बहुत सी कठि उपयोगिता नाइयां दूर हो जाती हैं, किंतु वह सर्वथा श्रेय नहीं। बहुत सी राजनैतिक उन्नतियां उपयोगिता-वाद के ही आधार पर हुई हैं। आज कल भी राजनैतिक आंदोलन करने- वाले उपयोगितावाद का ही श्राश्रय लेते हैं। सर्कारी आइन की भलाई बुराई जांचने में उपयोगितावाद से बड़ी सहायता मिलती है। उपयोगिता-वाद का बाहरी परिणाम प्रायः श्रच्छा ही होता है। पर उपयोगिता-वाद के दोष दूर कर के उसको दृढ़ आधार पर रखना आवश्यक है। उपयोगिता का परिमाण हमारे यहां भी कई स्थानों में लगाया गया है, किंतु जिनके लिये वह लगाया गया था, वे साधारण लोग नहीं थे। श्रीरामचंद्र जी को अयोध्या में लौटा लाने के लिये उपयोगिता- वाद का ही सहारा लिया गया था। उनके वहां चले जाने में अधिकांश लोगों को अवश्य सुख होता, किंतु रामचंद्र ने अपने कर्तव्य के भारतवर्ष में उप- योगिताबाद के उदाहरण<noinclude></noinclude> ay7ltl9m2j3szyuv3vjqi3pnoa7bjex पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८८ 250 194416 664639 2026-07-02T17:34:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664639 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ७५ ] आगे उस उपयोगितावाद को उपयोगी न समझा। रघुवंश के दूसरे सर्ग में सिंह ने महाराज दिलीप को भी उपयोगिता- वादियों की ही युक्ति दी है- एकातपत्रं जगतः प्रभुवं नवं वयः कान्तमिदं वपुश्च । अल्पस्य हेतोर्बहुहातुमिच्छन् विचारमूढ: प्रतिभासि में त्वम् ॥ भूतानुकम्पा तव चेदियं गौरेका भवत् स्वस्तिमती त्वदन्ते । जीवन् पुनः शश्वदुलवेभ्यः प्रजाः प्रजानाथ पितेव पासि ।। महाराज दिलीप ने भी इस उपयोगितावाद की कसौटी को नहीं माना। यद्यपि कर्त्तव्य और उपयोगिता का कोई नैसर्गिक विरोध नहीं है, तथापि हमारा कर्त्तव्य केवल उपयो- गिता से उच्चतर है। बीसवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध तत्ववेत्ता क्रॉची (Croce), जिनका मत अंत में बतलाया जायगा. ऐसा ही कहते हैं। उन्हों ने भी अर्थ ( Economic ) और धर्म (Ethics ) की इसी प्रकार एकता की है। हमारे देश में धर्म, अर्थ और काम तीनों ही को 'त्रिवर्ग' कह कर एक साथ रखा है। उपयोगितावाद से राजनीति और समाज को बड़ा भारी लाभ हुआ किंतु धर्म का परिमाण राजनीति के परिमाण से * अर्थ- हे राजन् ! तुम समस्त पृथ्वी को शासन करनेवाले हो । उमर भी तुम्हारी नई है। शरीर मी तुम्हारा बहुत सुंदर है। अतः थोड़े के अर्थ बहुत का नाश करने की इच्छा रखनेवाले तुम मुझे विचारगूंड मालूम होते हो। यदि तुम भूतदया के ही पक्ष- पाती हो तो तुम्हारे नारा से केवल गौ की रक्षा होगी और यदि जोते रहोगे तो चिरकाल पिता की नाई प्रजा का दुःख हरण करते रहोगे ।<noinclude></noinclude> ktfdquppsn20jvkw74x0p1rh9x9bcj3 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/८९ 250 194417 664640 2026-07-02T17:34:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664640 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>असली तत्त्व [ ७६ ] उपयोगितावाद का कुछ ऊँचा है; वैसे चाहिए तो यही कि राजनै- तिक परिमाण भी धार्मिक परिमाण की बराबर ऊंचा हो जाय । धार्मिक और राजनैतिक परिमाण की समता करने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि धार्मिक परि- मारा घटा दिया जाय, वरन् राजनैतिक परिमाण ही को ऊँचा करना चाहिए। उपयोगितावाद की प्रशंसा इस अर्थ की जाती है कि उसने अधिकांश लोगों के हित की ओर ध्यान दिया, न कि इसलिये कि उसमें सुख को हित माना है। हमारे देश- वासियों ने इसी लिये, उपयोगितावाद में जो मूल्यवान पदार्थ था, उसे नहीं छोड़ा। गीता में 'सर्वभूतहिते रताः' वाक्य श्राया है । सर्व की बड़ी महिमा है। मिल आदि उपयोगिता - वादियों के, वेदांतियों के समान, आत्मा के विषय में विस्तृत विचार न थे। इसी कारण उनको सर्वहित के लिये प्रमाण देने में भूलें करनी पड़ीं। किंतु बड़े आदमी की भूल से भी बड़ी शिक्षा मिल जाती है। यदि ऐसी भूल न की जाती तो उपयोगिता- बाद का वास्तविक तत्व न मालूम होता । हमारे देश के लोगो ने ( विशेष कर वेदांतियों ने) इस सार को पकड़ लिया है। भर्तृहरि जी कहते हैं, 'स्वार्थी यस्य परार्थ एव स प्रमाने कः सतामग्रणीयः श्रर्थात् परार्थ ही जिसका स्वार्थ है वही सब साधु पुरुषों में अग्रगण्य है। किंतु हमारे यहां परार्थ को दूसरे का सुख अथवा अपना सुख नहीं माना है। गीता में सर्वभूतहित चाहना श्रेय बताया है और जहां पर सुख की बात आई है, वहां आध्यात्मिक सुख ही अभिप्रेत है । जब प्राणियों की एकता मान ली, तब स्वार्थ और परार्थ में भेद नहीं रहता और परोपकार भी स्वार्थ की भांति स्वाभाविक हो जाता है। 1<noinclude></noinclude> 7c569v2yadv4v0udq3dmjuyxes66k50 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९० 250 194418 664641 2026-07-02T17:34:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664641 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कृत्यवाद Pragmatism. [99] बीसवीं शताब्दी में कृत्यवाद ( Pragmatism) के कारण उपयोगितावाद की और भी महिमा बढ़ गई। उन लोगों ने उपयोगिता-वाद को तत्थशान में भी लगाया है। उन्होंने उपयोगिता को ही सत्य का निर्णायक माना है। किंतु उन लोगों ने उपयोगिता का अर्थ अधिकांश लोगों का अधिक सुख नहीं माना, वरन् अधिकांश लोगों की चाह की तृप्ति या तुष्टि ( Satisfaction of demands ) को सन्य का निर्णायक माना है । उन लोगों के मत में अधिकांश लोगों की चाह की अधिक से अधिक तृप्ति ही कर्त्तव्या- कर्त्तव्य का निर्णायक है। कृत्यवाद के मुख्य व्याख्याता अमेरिका के सुविख्यात तत्ववेत्ता विलियम जेम्स ( William James) (१८४२ - १६१०) साहिब ने अपनी शिक्षापूर्ण पुस्तक 'बिल टू बिलीव ( Will to believe ) मैं कर्त्तव्या कर्त्तव्य संबंधी तीन प्रश्न उठाए हैं। पहला प्रश्न मनोविज्ञान से संबंध रखता है। वह यह है कि कर्तव्या- कर्त्तव्य बुद्धि नैसर्गिक है अथवा अनुभव प्राप्त ? इस विषय में जेम्स ने उन्हीं लोगों से सहृदयता प्रकाशित की है जो कि कर्त्तव्याकर्त्तव्य बुद्धि को अनुभवप्राप्त मानते हैं । दूसरा प्रश्न तत्वज्ञान संबंधी है। वह प्रश्न कर्त्तव्याकर्तव्य के परिमाण की वास्तविक सत्ता के विषय में है, अर्थात् धर्म की सत्ता मनुष्य समाज से निरपेक्ष कहीं और है या नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर भी पूर्ववत् वे यही देते हैं कि मनुष्य समाज के अतिरिक्त धर्म की कोई स्वाधीन निरपेक्ष वास्तविक सत्ता नहीं है। तीसरा प्रश्न स्वयं निर्णायक अथवा परिमाण ही के विषय में है । कर्त्तव्याकर्त्तव्य का निर्णायक क्या है ? यही<noinclude></noinclude> rjiq4j3se5vi1qhhjnm6ect1fyecuhz पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९१ 250 194419 664642 2026-07-02T17:34:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664642 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>वाह [ G ] कर्त्तव्य-शास्त्र का मुख्य प्रश्न है। इसके संबंध में जेम्स साहब कहते हैं कि यदि हम कर्त्तव्य का भार अपने ऊपर मानते हैं, तो इसके साथ कोई भार रखनेवाला होना चाहिए और वह भार रखनेवाला हमारे ऐसा ही जीता जागता मनुष्य होना चाहिए । अर्थात् यदि एक ओर भार है, तो दूसरी ओर कोई इस बात का चाहनेवाला भी हो कि यह भार पूरा हो । उप- योगितावाद के खंडन में यह बात बताई जा चुकी है कि के बिना सुख नहीं हो सकता। सुख से पहले वाह है। विलियम जेम्स ने इस बात को भली भांति सिद्ध कर ferrer है कि क्रिया और कर्त्तव्य का मूल चाह है। जहां वाह नहीं, वहां कुछ कर्त्तव्याकर्त्तव्य नहीं । भला बुरा कोई निरपेक्ष पदार्थ नहीं। यदि संसार भर में एक ही मनुष्य हो तो उसे अपनी रक्षा के सिवाय और कुछ कर्त्तव्य न रहे, नहीं नहीं, शायद अपनी रक्षा भी उसे बुरी मालूम पड़ने लगे। दूसरों की तथा अपनी चाह के अनुकूल अथवा प्रतिकूल होने से किसी कार्य का धार्मिक मूल्य निर्धारित किया जाता है। वैसे तो जैसी कि कहावत है, कि 'वन में मोर नाचा, किसने जाना ? जिस कार्य की किसी को चाह नहीं, वह न तो बुरा ही है न मला ही । दान देना भला है, किंतु जिसे धन की चाह नहीं, उसको धन देने से क्या लाभ? श्रथवा जाड़ों में बरफ के जल की प्याऊ बिठालने से कौन सा पुराय होगा ? यह बात तो मान ली गई कि कर्त्तव्य किसी न किसी की चाह की तुष्टि में है, किंतु प्रश्न यह है कि किस किस की चाह की तुष्टि की जाय ? चोर तो यह चाहता है, कि मुझे धन मिले और साधु चाहता है कि मेरा धन सुरक्षित रहे। जब दो दल- वाले आपस में लड़ते हैं, तब वे एक दूसरे के नाश करने पर 1<noinclude></noinclude> ap2yj2gtkjnosiiq8z67st9zouvvzf3 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९२ 250 194420 664643 2026-07-02T17:35:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664643 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ] उतारू हो जाते हैं। गाहक मद्दे से मद्दे भाव पर दूसरे से माल को खरीदना चाहता है और बेचनेवाला अधिक लाभ उठाना चाहता है। पुरानी रोशनी के लोग कहते हैं कि देश मैं अकाल, बीमारी और निर्धनता नये श्रादमियों की नई नई चाल ढाल ही के कारण है, इस लिये जहां तक हो सके, नई चालने की यातें बढ़ने न पावें और नई रोशनीवालों का यह ख्याल है कि जितनी जल्दी हो सके जाति पांति के बंधन, पुरानी रीति और रिवाज उठ जायें, नहीं तो भारतवर्ष का उद्धार कदापि नहीं हो सकता। ऐसी अवस्था में कर्त्तव्य-परा- यण तत्ववेत्ता का क्या धर्मं होगा। सब परस्पर विरोधी इच्छाओं की एक साथ तृप्ति नहीं हो सकती । * विलियम जेम्स कहते हैं, कि यह संसार सब की इच्छाओं को पूरी करने के लिये बहुत गरीब है। इसलिये उन इच्छाओं का पूरा करना धर्म है, जिनके पूरे होने से अधिकांश लोगों की इच्छा की तृप्ति हो सके । वेही कार्य श्रेय अथवा कर्त्तव्य समझे जायँ, जिनके द्वारा अधिक से अधिक लोगों की तुष्टि हो सके। कर्त्तव्यशील पुरुष को अपनी इच्छाएँ पेंसी बनानी चाहिएँ, जिनके तृप्त होने से अधिकाधिक लोगों की इच्छा तृप्त होती रहे। पंच Since every thing which is demanded is by that fact a good, must not the guiding principle for ethical philosophy (since all demands conjointly can not be satisied in this poor world) be simply to satisfy as many demands as we can. That act must be the best act, accordingly; which makes for the best whole in the sense of awakening the least sum of dissatisfaction. The will to believe, page.205.<noinclude></noinclude> p6es9ggcgbeokxqf07z05fx2f41607t पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९३ 250 194421 664644 2026-07-02T17:35:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664644 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[0] कहें बिल्ली, तो बिल्ली ही सही ! जेम्स साहब भी इसी न्याय के पक्षपाती हैं। इस मत से कर्त्तव्याकर्त्तव्य के निर्णायक की निरपेक्षता जाती रहती है। जैसे जैसे समाज के लोगों की इच्छाओं और रुचियों में अंतर आता गया, वैसे ही कर्त्तव्य का परिमाण भी बदलता गया । भिन्न भिन्न श्रेणी की समाज के लिये free free कर्त्तव्याकर्त्तव्य के निर्णायक हैं। इतिहास भी इस बात को पुष्ट करता है, कि कर्त्तव्य का परिमाण समय समय पर भिन्न भिन्न देशों में बदलता रहा है। "Rules are made for men and not men for rules sa नियम मनुष्य के लिये बनाए जाते हैं, न कि मनुष्य नियमों के लिये। ग्रीन ( Green ) साहब के उपरोक्त वाक्य को जेम्स साहब ने कर्तव्य परिमाण की सापेक्षता के समर्थन में उल्लिखित किया है। कृत्यवाद के गुण-दोष यह मत मिल के उपयोगितावाद से अधिक युक्तियुक्त है और इसमें बहुत सी कठिनाइयां भी बच गई है, तथापि यह मत दोषम्य नहीं और इसके द्वारा शायद अधिकांश लोगों की तुष्टि ( जो सत्य और कर्त्तव्य की निर्णायक है) न हो सकेगी। सब से पहले तो यह विचारणीय है कि प्रत्येक इच्छा की तृप्ति श्रेय वा इष्ट क्यों है ? यदि कोई बीमार आदमी दवा पी कर खुले बदन हवा में फिरना चाहे तो क्या इस को पूरा करना लाभदायक है ? कहा जायगा कि इस की तृप्ति में बीमार का हित नहीं है। फिर ' हित इट रो इच्छा की पूर्ति यह प्रक्ष दूसरी रीति से भी किया जा सकता है, क्या सब इच्छाओं के पूरे होने का एक सा नैतिक अधिकार है ? क्या चोर और साव की इच्छाएँ एक C "<noinclude></noinclude> 97l04psr06psu7vtj2kuhp03rh5updw पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९४ 250 194422 664645 2026-07-02T17:35:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664645 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १ ] ही धार्मिक मूल्य रखती हैं ? यदि ऐसा नहीं, तो सब या अधिक से अधिक इच्छाओं को तृप्त करने की जेम्स साहब को क्या फिकर पड़ी? और यदि दोनों का धार्मिक मूल्य बराबर है, तो चोर क्यों दंडनीय ठहराया जाय ? क्या केवल इसी लिये, कि उसकी इच्छा से अधिकांश लोगों की इच्छा की तृप्ति न होगी ? इसका संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया कि दूसरों की चाह को पूरा करना क्यों धर्म है ? अपनी चाह की अपेक्षा दूसरे की चाह को क्यों श्रेष्ठता मिल सकती है, विशेष कर जब कि सब की चाहों का नैतिक मूल्य बराबर है ? यदि ऐसी कल्पना की जाय कि संसार में केवल एक ही मनुष्य है और उसके पास एक हीरा है ( जेम्स साहब स्वयं एक और दो मनुष्य वाले संसारों की कल्पना कर चुके हैं ) । अब एक दूसरे मनुष्य की भी उत्पत्ति हो गई और इसने वह हीरा छीन लिया। जेम्स साहब के मतानुसार यह कार्य क्या कहा जायगा ? जहां पर किसी बात के चाहनेवाले दोनों दलों की संख्या बराबर हो, तो क्या उन चाहों की पूर्ति धार्मिक संसार से बाहर हो जायगी ? यदि संसार में अधिक लोगों की चाह की पूर्ति ही श्रेय समझी जाती, तो यहां समाज-सुधार की कहीं गुंजाइश ही न रहती। स्वयं जेम्स साहब भी मानते हैं कि समाज-सुधार में थोड़ा वैषम्य उत्पन्न करने के लिये सुधारक लोग दोषभागी नहीं। मार्टिन लूथर, महात्मा बुद्ध, श्रीशंकराचार्य आदि बड़े बड़े सुधारकों ने थोड़ी बहुत असाम्यता अवश्य फैलाई, अधिकांश लोगों की इच्छा के विरुद्ध किया, तो क्या इन लोगों के कार्य इस धार्मिक परिमाण के अनुसार हलके समझे जायेंगे ? स्वयं ईसा ने भी कहा है कि 'मैं सुलह कराने नहीं आया, लड़ाई कराने को आया हूँ। भाई भाई को अलग<noinclude></noinclude> f95strqxq2aksvw8s7t02icfnf8oszn पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९५ 250 194423 664646 2026-07-02T17:35:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664646 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २ ] करने को आया हूँ' अर्थात् लोगों की चाह में असाम्यता उत्पन्न करने को आया हूँ ।" क्या प्रभु ईसा मसीह भी इस नैतिक परिमाण के अनुकूल दोषी ठहराने योग्य हैं ? इन लोगों को दोषी ठहराने में जेम्स साहब श्रवश्य संकोच करेंगे। इससे सिद्ध होता है कि इच्छाओं की संतुष्टि की संख्या मात्र ही कर्त्तव्य की निर्णायक नहीं, वरन् इच्छाओं में भी ऊंची-नीची, भली-बुरी का भेद है। यह भेद करना बुद्धि का ही काम है। अतः कर्त्तव्य के निर्णायक में बुद्धि को अवश्य स्थान देना पड़ेगा। अगले अध्याय में विकाशवाद ने जो उपयोगिता बाद में परिवर्तन किए हैं, उन पर विवेचना की जायगी।<noinclude></noinclude> 1gjfuq4ujqiqab6l03p66xw6r1vyjfi पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९६ 250 194424 664647 2026-07-02T17:35:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664647 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सातवाँ अध्याय । विकाशात्मक सुखवाद । ( Evolutionary Hedonism ) यद्यपि हमारे देश में + तथा अन्य देशों में विकाशवाद के मूल सिद्धांत पहले से ही बीज रूप से वर्तमान हैं, तथापि उसके नियमों की खोज कर उनको ठीक का विस्तार । विकाशवाद के सिद्धांतों स्वरूप देने की बड़ाई डार्विन साहब (Charles Darvin) (१८०६-१८८२) को ही दी जानी चाहिए। चार्ल्स डार्विन के समय से विकाश की बहुत उन्नति और प्रचार हुआ है। विकाशवाद के सिद्धांतों के आविष्कार में डार्विन साहब के साथ एलफ्रेड रस्सेल वालिस (Alfred Russell Wallace) का नाम आता है । समाज-शास्त्र, अक्षर-विज्ञान, इतिहास, + तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाराः संभूतः आकाशाद्वायुः वायोरग्निः अधेरापः- अद्भ्यः पृथिवी पृथिव्या औषधयः श्रोषधिभ्योऽनं अन्नातः रेतसः पुरुषः । तैतिरीय० - तम आसीत्तमसा गूढ़ मधे प्रकेतं सलिलं सर्वं मा श्वम् । तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासीत् तपसरतन् महिना जायते कम् ॥ ऋग्वेद । आकाशाज्जायते तस्मात्तस्य शब्दं गुणं विदुः । भाकाशातुविकुर्वाणात्सर्वगन्धवहः शुचिः । क्लवाजायते वायुः स वै स्पर्शगुणो मतः ॥ वायोरपि विकुर्वाणाद्विरोचिष्णु तमोनुदम् । ज्योतिपयते भावतद्रूप गुण मुच्यते ॥ ज्योतिषश्च विकुर्वाणादापो रसगुणाः स्मृताः । 'यो गन्धगुणा भूमिरित्येषा सृष्टि रादितः ॥ -- मनुस्मृति अॅ०१<noinclude></noinclude> 0mopt06wtusb4jgibwbsxegystkhg6y पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९७ 250 194425 664648 2026-07-02T17:35:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664648 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ४ ] भूगोल खगोल आदि सच ही में विकाशवाद के सिद्धांत लगाए जाते हैं। अब देखना चाहिए, कि कर्त्तव्यः शास्त्र के सिद्धांतों मैं विकाशवाद के सिद्धांत किस प्रकार लगाए जा सकते हैं ? अथवा उनसे कर्त्तव्य- शास्त्र को क्या सहायता मिल सकती है ? पूर्व सुखवादियों के शेष और उनका सुधार विकाशवादियों ने "किस प्रकार किया । . गत अध्याय में पाठकगण देख चुके हैं कि पूर्व वर्णित सुखवादियों को स्वार्थ और परार्थ के मिलान करने में कितनी कठिनाइयां पड़ीं ? इन सब का मूल कारण व्यक्ति और समाज के घनिष्ठ संबंधों और श्रात्मा के यथार्थ स्वरूप की अनभिशा थी। सुखवादियों की असफलता का कारण यह था कि वे लोग सुख दुःख को निरपेक्ष समझते थे। उनकी दृष्टि में सुख दुःख की जोड़ बाँकी हो सकती थी। वे क्रय-विक्रय का विषय वन गए थे। दूसरे, मनुष्य जीवन का सुख से क्या संबंध है, इस बात की और भले प्रकार से ध्यान नहीं दिया गया। तीसरी बात, जो पहले लोगों के विचार में नहीं आई थी, यह है, कि समाज. स्थिर नहीं। समाज वृक्ष की नाई बढ़ता है। उसके ही साथ लोगों की कर्त्तव्य-पालन की क्षमता बढ़ती जाती है, और उसके साथ ही सुख दुःख का मूल्य भी बढ़ता है। इन सब बातों पर विकाश-वाद से नई झलक पड़ गई । विकाश बाद समाज-संबंधी विचारों में बड़ा परिवर्तन किया है, उसने समाज और व्यक्ति की अन्योन्याधीनता साबित कर उनका पेंडिक संबंध सिद्ध किया है। जिस प्रकार हाथ आंख की स्थिति शरीर की स्थिति पर निर्भर है, उसी प्रकार समाज और व्यक्ति का संबंध है। हमारे यहां भी संसार को वृक्ष तथा ईश्वर को<noinclude></noinclude> o12kafy4nmyf3o3le6tu24kaec2vac9 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९८ 250 194426 664649 2026-07-02T17:36:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664649 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[] उसका मूल कह कर व्यष्टि-समष्टि का तथा ईश्वर का अन्यो- न्यायं संबंध सिद्ध किया गया है (गीता १५-१.) और जो शास्त्रों में ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्' इत्यादि वाक्यों द्वारा चातुर्वर्य की उत्पत्ति बताई है, वहां पर भी ऐंद्रिक संगठने का विचार प्रधान है। इस प्रकार से समाज का संगठन मानने पर स्वार्थ परार्थ की समस्या नहीं रहती । स्वार्थ तब ही तक है, जब तक कि व्यक्तियों को एक दूसरे से मित्र और स्वाधीन माने । सुख को विकाश-वादी लोग समाज में जीवन-वृद्धि अथवा व्यक्ति के स्वास्थ्य का फल और उसका सूचक भी मानते हैं । विकाश-वाद के माननेवाले सुख-वादी हैं, किंतु उनके मत में हमारी कामना का अपरोक्ष लक्ष्य (Immediate end) नहीं। मनुष्य की कामनाओं को अपरोक्ष लक्ष्य व्यक्ति और उसके वहिरावेष्ट्रन (Environment) का सामंजस्य, व्यक्ति का स्वास्थ्य अथवा उसकी कार्य क्षमता है। सुख इन्हीं का फल रूप है। विकाशवादियों के मत से समाज स्थायी नहीं है। समाज की उपमा शरीर वा वृक्ष से दी गई है।' जिस प्रकार शरीर बढ़ता है, उसी प्रकार समाज भी बढ़ता है। बढ़ते हुए समाज मैं लोगों की रुचि और चाह भी बदलती रहती है। उसके अनुकूल मनुष्य के सुख दुःख संबंधी विचार भी बदलते रहते हैं। केवल सुख दुःख को ही कर्त्तव्य का अंतिम निर्णायक न मान कर उसके साथ साथ हम को लोगों की बदलती हुई रुचि और चाह के ऊपर भी ध्यान देना चाहिएं। कर्त्तव्यशास्त्र को जो विकाश-वाद से मदद मिली, वह सामान्य रूप से बता दी गई। अंब हर्बर्ट स्पेंसर (Herbert Speicer)<noinclude></noinclude> hkxceh7igsgi4qbd2ea2no2mbdo278p पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/९९ 250 194427 664650 2026-07-02T17:36:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664650 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[६] तथा लेसली स्टीफन (Leslie Stephen ) के मत का विशेष रूप से निरूपण किया जायगा । स्पेसर साहब (१८२०-१६०३ ) के कर्त्तव्य-शास्त्र संबंधी विचार योरोपीय दर्शन से उल्लेख करके दिए जाते हैं। "जिस आचारण को अच्छा बुरा कह सकते हैं, वही आचार शास्त्र का विषय है। उद्देश्य के अनुरूप हर्बर्ट स्पेसर साहब का मत व्यापार को श्राचार कहते हैं। अपना जीवन, संतान का जीवन और सामाजिक जीवन जिससे पूर्णता को पहुँचे, उस उद्देश्य का पूर्ण करना ही श्राचारशास्त्र का मुख्य लक्षण है। जीवन में सदा भीतरी संबंधों का बाहिरी संबंधों से मिलान होता रहता है, अर्थात् जीवधारी अपने को सदा अपने वहि- रावेटन (Environment) के अनुकूल बनाने का यज्ञ करते रहते हैं। जो कर्म इस अनुकूलता को बढ़ाते हैं, वे अच्छे हैं और जो इसे घटाते हैं, वे बुरे हैं। इस अनुकूलता के बढ़ने से सुख होता है और उसके घटने से दुःख । किसी आचरण की उत्तमता की परीक्षा के लिये यह आवश्यक है, कि उससे अनुष्ठान प्रयुक्त दुःख की अपेक्षा फलीभूत सुख अधिक है वा 'कम "स्वार्थ और परार्थ दोनों पृथक होने से अनर्थ- कारक हैं। दोनों में मेल होने से श्राचार में उन्नति होगी। संव से पहले स्वार्थ प्रयुक्त कलह होती है, फिर प्रत्येक का स्वार्थ परस्पrata देखकर मनुष्य प्रेममय जीवन पसंद करते हैं ।" इसके अतिरिक्त यहाँ पर यह और कह देना उचित "होगा कि स्पेंसर साहब ने कर्तव्य-शास्त्र के सापेक्ष और निरपेक्ष रूप से दो विभाग कर दिए हैं। कर्त्तव्य-शास्त्र की इस व्याख्या से जीवन की बहुत सी +<noinclude></noinclude> f7gzultqbuqd2aimw25j07y0g5wo0d7 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०० 250 194428 664651 2026-07-02T17:36:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664651 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ] उलझी हुई ग्रंथियों के खुलने की संभावना है, किंतु यह मत दोषरहित नहीं । व्यक्ति और बहिरावेष्टन स्पेसर साहब के मत पर विचार की अनुकूलता को बढ़ाना स्पेसर साहब कर्त्तव्य का लक्ष्य मानते हैं। अनुकूलता तीन प्रकार से होती है। एक तो ऊँचे को काट छाँट कर नीचे के बराबर कर देना और एक नीचे को किसी प्रकार बढ़ा कर ऊँचे के बराबर ले आना, और एक और भी रीति है, कि भेद की ओर ध्यान ही न दिया जाय। यदि पहले प्रकार की अनुकूलता स्पेंसर साहब चाहते हैं तो उन्नति की आशा से हाथ ही धो बैठना चाहिए। दूसरे प्रकार की अनुकूलता मानने में भी एक तरह की बाधा आती है। नीचे की खींच खाँच कर अनुकूलता स्थापित हो गई, ( इस अवस्था को स्पेंसर साहब ने सर्वोत्तम माना है। इसी अवस्था मैं निरपेक्ष कर्त्तव्यशास्त्र के नियमों का पालन हो सकता है ) तब फिर क्या उन्नति का काम बंद हो जायगा ? सच तो यह है कि अनुकूलता का न होना ही उद्योग का मूल है। मरने पर संसार और व्यक्ति में कुछ झगड़ा नहीं रह सकता। क्या यही अनुकूलता की दशा वांछनीय है ! फिर जीवन की अधि कता ( More life ) जो स्पेंसर साहब चाहते है वह कहां से श्रावेगी ? यदि स्पेसर साहब तीसरी प्रकार की अनुकूलता मानें, तो भी वह उन्नति से हाथ धो बैठेंगे । इस अवस्था में मनुष्य पत्थर से भी गया बीता हो जायगा। स्पेंसर साहब ने यह भी नहीं बतलाया कि कमी किस ओर है ? व्यक्ति की. ओर, अथवा उसके चारों ओर के समाज तथा तात्कालिक प्राकृतिक अवस्था में ? अपने को दूसरे के अनुकूल बनाना किस का कर्तव्य है ? साधारण मनुष्य नहीं, तो बड़े आदमी<noinclude></noinclude> ee9n7yyrdw7mwdvl0t7g0qj7lflmz3l पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०१ 250 194429 664652 2026-07-02T17:36:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664652 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ == ] araपने इर्द गिर्द के लोगों तथा प्राकृतिक अवस्थाओं से ऊँचे बढ़े हुए होते हैं। प्रत्येक अवस्था में यह मानना ही पड़ेगा कि छोटे को अथवा विकाश की श्रेणी में नीचे को बड़े अथवा ऊपरवाले के अनुकूल बनाना पड़ेगा, नहीं तो उन्नति ही किस बात की ? इस पर यह शंका उत्पन्न सकती है कि वह परिमाण कहां पर है, जिसके अनुसार हम ऊँचे नीचे, छोटे बड़े की निर्धारणा करते हैं ? वह परिमाण अवश्य निरपेक्ष होगा। स्पेसर साहब कहेंगे, कि विकाश की गति को देख कर यह नियम निर्धारित कर लिया गया है कि जो विकाशवाद के नियमों के अनुकूल है, वही ऊँचा है। स्पेंसर साहब को पहले यही मानने का क्या अधिकार है, कि विकाश की गति ठीक ओर जा रही है। उनके हिसाब से तो विकाश किसी जानकार ईश्वर की प्रेरणा का फल नहीं है। केवल इति- फाक की बात है, कि विकाश का झुकाव वर्तमान रीति पर हो गया। यह कौन सा परिमाण है जिसके द्वारा हम ने विकाश की गति को ठीक बताया ? यदि ऐसा कोई परिमाण हैं, तो हम उस ही को क्यों न माने ? स्पेंसर साहब जीवन की अधिक मात्रा चाहते हैं. (incre ase in the length & breadth of life) उसके साथ ही साथ उन्होंने सुख वादियों का आदर्श नहीं छोड़ा * वह . Pleasure somewhere, at sometime; to some being or beings is an inexpungible element in the conception. It is as much a necessary form of moral intuition as space. is a necessary form of intellectual intuition.... . Data of Ethics.<noinclude></noinclude> n3l5eaj8qwqre9lwqpzw1kz4v5r9qyr पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०२ 250 194430 664653 2026-07-02T17:36:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664653 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ 8 ] मानते हैं, कि सुख किसी न किसी प्रकार का, किसी न किसी जीव को, किसी न किसी समय पर श्रेय के विचार से बाहर नहीं माना जा सकता। सुखवादियों की तो भूल पाठकों को पहले ही भली भांति प्रगट हो चुकी है। श्रव यह देखना चाहिए कि सुख का विचार जीवन की अधिकता से कहां तक मेल खा सकता है? सब से पहले तो स्पेंसर साहब को ( यदि वह सुख और जीवन की अधिकता दोनों ही चाहते हैं) एक बड़े विवाद के विषय को, कि जीवन सुखमय है अथवा दुःखमय, निर्विवाद मान लेना पड़ेगा। स्पेंसर साहब का कहना है, कि संसार के सब ही लोग सर्वसुख-वादी (Optimists) या सर्वदुःख-वादी ( Pessimists) हैं, और दोनों ही दल के लोग संसार को भला बुरा सुख के होने न होने पर निर्भर मानते हैं। पहले तो इसी बात में संदेह है कि सब लोगों को दो दलों में बाँट सकते हैं ? अस्तु यदि मान भी लिया जाय, तो इससे केवल इतना ही सिद्ध होता है कि सब लोग सुख चाहते हैं। शायद इससे अधिक स्पेंसर साहब सिद्ध भी नहीं करना चाहते हैं। यदि यह मान लिया जाय कि सब लोग सुख चाहते हैं तो इससे यह सिद्ध होता है कि संसार सुखमय है ? लोग जो चाहते हैं, वह क्या वास्तव में हुआ भी करता है ? हम सर्वदुःख-वादी नहीं, किंतु जैसे स्पेंसर साहब ने सर्व सुख-वाद को स्वयंसिद्ध मान लिया है, उस तरह हम मानने को तैयार नहीं। दूसरी बात इसके साथ यह है कि सुख की मात्रा जीवन के अधिक विकाश की प्राप्त होने से कहां तक बढ़ती है। सभ्यता के बढ़ने से सुख की मात्रा अधिक नहीं बढ़ती । सुख मानसिक अवस्था पर निर्भर है, न कि बाहिरी सामान पर ! क्या आजकल की<noinclude></noinclude> ryximdhn8ypvfqmrfwvmwxt7h5qufv6 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०३ 250 194431 664654 2026-07-02T17:36:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664654 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ 80 ] सभ्यतावाले उन लोगों के सुख की बराबरी कर सकते हैं, जो यन में निर्द्वद्व हो विचरते हैं। सभ्यता से चिंताएँ बढ़ती हैं और चिंताओं से दुःख होता है। स्पेंसर साहब या ती विकाश पाए हुए जीवन ही को अपना लक्ष्य बना ले और या सुख ही को। हम यह नहीं कहते कि दोनों बिल्कुल एक दूसरे के विरुद्ध हैं। यदि वे एक दूसरे के विरुद्ध नहीं, तो एक दूसरे पर निर्भर भी नहीं कि दोनों की बढ़ती घटती साथ साथ होती रहे। सुख की अधिकता वा न्यूनता बाहिरी सामान पर निर्भर नहीं। सुख चाहों की तुष्टि पर निर्भर है। जिसकी अधिक चाहें हैं और उनकी यदि तुष्टि नहीं की तो वह सुखी नहीं कहा जा सकता, और यदि किसी की थोड़ी चाहे हैं और उनकी तुष्टि हो गई, तो वह सुखी है कहा जाता है, कि सिकंदर बादशाह इस लिये रोया था कि उसके लिये और मुल्क फतह करने को नहीं थे और डायोजिनीज़ को, जो कि एक टब में पड़ा रहता था, सिकंदर से भी कुछ मांगना न था। जब सिकंदर ने उसके पास जा कर पूछा, कि कहो आपको कुछ सुझसे चाहना तो नहीं ? डायोजिनीज़ ने केवल इतना ही कहा कि, "मिहरबानी कर के सामने से हट जाइए, धूप आने दीजिए। अब इन दोनो में कौन ज्यादह सुखी था ? यदि केवल सुख ही सुख की ओर ध्यान दिया जाय तो डायोजिनीज़ सिकंदर से ज्यादह सुखी था और बिकाशवाद के हिसाब से सिकंदर का जीवन अधिक विकाश को प्राप्त हो चुका था। स्पेंसर साहब कौन से जीवन के लिये चेष्टा करेंगे ? व देखना चाहिए कि लेज़ली स्टीफ़िन और एलेग्जेंडर (Pro. Alexander) आदि अन्य विकाशवादी पंडितों का<noinclude></noinclude> aud303ti73z3g4akylwwbukd7tzjwpz पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०४ 250 194432 664655 2026-07-02T17:37:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664655 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सरलेली स्टीफन [ a ] कर्त्तव्याकर्त्तव्य के विषय में क्या मत है ? स्पेंसर साहब का नैतिक आदर्श निरपेक्षता की ओर झुकता है। इसी कारण उनको कर्त्तव्य- शास्त्र के निरपेक्ष और सापेक्ष दो भेद मानने पड़े हैं। चे एक ऐसी अवस्था मानते हैं कि जिसमें व्यक्ति और उसके बहिरावेष्टन (Environment) में पूर्ण अनुकूलता स्थापित हो जायगी और किसी प्रकार का नैतिक झगड़ा नहीं रहेगा। सर लेज़ली स्टीफ़िन इस प्रकार का मनोमय भव्य भवन निर्माण नहीं करते, न निरपेक्ष आदर्श को ही सामने रखते हैं। वे स्वास्थ्य और कार्य कौशल ही के विचार से संतुष्ट हो जाते हैं। इनका कहना है कि कर्त्तव्यशास्त्र के नियम यह अवस्था बतलाते हैं जिसमें कि समाज कुशल- पूर्वक रह सके । वह समाज के किसी अंतिम लक्ष्य की विवे- चना नहीं करते, केवल यह चाहते हैं कि समाज का वर्तमान साम्य स्थापित रहे और जहां तक हो सके बढ़ता भी रहे। वे स्पेंसर साहब की भांति अधिक सामंजस्य नहीं खोजते । एलेग्जेंडर साहब का मत भी लगभग ऐसा ही है। किंतु इनके मत में यह विशेषता है कि इन्होंने विकाशवाद के नियमों को मनुष्य की मनोवृत्तियों में घटाया है। समाज और व्यक्ति में परस्परानुकूलता स्थापित करना, प्रोफसर एलेग्जेडर इनका मुख्य उद्देश्य नहीं, किंतु यह महाशय चाहते हैं कि मनुष्य परस्पर विरोधिनी मानसिक वृत्तियों में सामंजस्य स्थापित करे। जो कार्य इस मानसिक साम्य को A moral rule is a statement of a condition of social welfare. (Science of Ethics ).<noinclude></noinclude> qk3rclit0gtope1f5hd11t5p5zilgkw पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०५ 250 194433 664656 2026-07-02T17:37:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664656 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ४२ ] स्थापित करने में सफल हों, वेही श्रेय कहे जा सकते हैं। डारविन साहब द्वारा निर्धारित किया हुआ प्राकृतिक चुनाव का नियम प्रोफेसर ऐलेग्जेंडर ने आचारों में बहुत योग्यता से लगाया है। जिस प्रकार जीवन-संग्राम ( Struggle for existence) में योग्यतम ही अवशेष रहता है, और सब नाश हो जाते हैं, उसी प्रकार उत्तम श्राचार नीचे दर्जे के चारों पर विजय लाभ कर स्थित रहेंगे। आचार संबंधी संसार में सबल और निर्बल व्यक्तियों के झड़गे की जगह आदर्शों की प्रaिsaता होती है, और वेही आदर्श अवशेष रहने पाते हैं, जो समाज के सकुशल रहने में योग देते हैं । आदशों की इस जय-पराजय में मार काट नहीं होती है, और न रुधिर की नदियां बहती हैं । युक्ति और उपयोगिता द्वारा लोगों के मन पर प्रभाव पड़ना ही जयलाभ है। उत्तम श्राचार अपने प्रतिद्वंद्वियों पर जय प्राप्त कर समाज में प्रचार पाकर बढ़ते रहते हैं। इसी रीति से संसार में उत्तमोत्तम श्राचारों की उत्पत्ति और वृद्धि होती आई है। यह श्राचारों की उत्पत्ति hi विवरण बड़ा मनोश और शिक्षापूर्ण है, किंतु इसमें दो एक बातें अवश्य विचारणीय हैं। यदि एलेग्जेंडर साहब ने आचारों की उत्पत्ति ही लिखने के लिये कलम उठाई होती तो शायद वे इतना केह कर कृतकार्य हो जाते, किंतु कर्त्तव्यशास्त्र का विषय This moral order is an adjusted order of conduct, which is based on contending inclinations and establishes an equilibrium between them. Goodness is pothing but an adjustment in the equilibrated whole.<noinclude></noinclude> acuqbhtm0z2w97qg9eqh350ka7podi6 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०६ 250 194434 664657 2026-07-02T17:37:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664657 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ 42 ] जेंडर साहब के केवल श्राचारों की उत्पत्ति ही नहीं है। जब तक मत पर विगर हम को यह मालूम न हो कि उत्तमोत्तम श्राचार की क्या पहिचान है, तब तक इससे . कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता कि उत्तमोत्तम आचार अपते प्रतिद्वंद्वियों पर विजय प्राप्त कर संसार में प्रचार पाते रहते हैं। 'सत्यमेव विजयते' ठीक है, किंतु इसके साथ यह प्रश्न अवश्य उठता है, कि सत्य क्या है ? जिस प्रकार विजय प्राप्ति सत्य का लक्षण नहीं, उसी प्रकार आदशों की प्रतिद्वंद्वता में किसी एक आदर्श का औरों की अपेक्षा अधिक प्रचार पा जाना उसके मुख्य लक्षण को नहीं बताता। क्या कोई आचार उसके अधिक प्रचार के कारण श्रेष्ठ समझा जा सकता है ? या उसके श्रेष्ठ होने के कारण उसका अधिक प्रचार हुआ ? अधिक प्रचार अथवा अपने प्रतिद्वंद्वियों पर विजय प्राप्त करना कोई ठीक कसौटी नहीं। अभी तो संग्राम चल ही रहा है, किस प्रकार कहा जा सकता है कि परोपकार ने स्वार्थ को जीत लिया, अथवा स्वार्थ ने परोपकार पर विजय पाई. ? "हम मानसिक प्रवृत्तियों के सामंजस्य को भी ठीक आदर्श नहीं मान सकते हैं। जब तक हम को यह न ज्ञात हो कि हमारी मानसिक प्रवृत्तियों में कौन सी ऊँची है और कौन सी नीची, तब तक केवल सामंजस्य के आधार पर कर्तव्य, निश्चित नहीं किया जा सकता। बहुत से साधारण लोगों के मन में कोई नैतिक सामंजस्य नहीं स्थापित होता, तो क्या ऐसे पुरुषों के कार्य सराहनीय समझे जा सकते हैं? महाराज दशरथ के मन में श्री रामचंद्र जी को वनवास देते समय असामंजस्य स्थापित हुआ था 1 एक ओर तो यह अंटव 'आदर्श था कि, '<noinclude></noinclude> 82kbejl6xeeu41hjnniqbz6buu6zwih पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०७ 250 194435 664658 2026-07-02T17:37:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664658 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६४ ] "रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाहि बरु वचन न आई ॥* और दूसरी और पुत्र प्रेम विह्वल करता हुआ उनके मुख से यह कहला रहा था कि, - *"जिये मीन व वारि-विहीना । मणि विनु फणिक जिये दुख दीना || 'कहाँ सुभाव न छल मन माहीं। जीवन मोर राम बिनु नाही ||" ऐसी अवस्था में मानसिक प्रवृत्तियों में घोर संग्राम हो रहा था। पुत्र-प्रेम पर सत्य-परायणता ने विजय पाई, किंतु . पुत्रप्रेम का प्रबल प्रवाह भी दबने वाला न था। उन्हें अपने प्राणों की आहुति देकर मानसिक साम्य स्थापित करना पड़ा। किंतु एक और प्रकार से वह अपना मानसिक साम्य स्थापित कर सकते थे । प्राणों से अधिक पुत्र को न समझ अपने वचन से फिर जाते, कैकेयी को भी आखिर मानना पड़ता । किंतु फिर जगत में वे ऐसी वंदना के योग्य न ठहरते । मानसिक सामंजस्य दोनों ही रीतियों से स्थापित हो सकता है । नीची प्रवृत्तियों के दबाने से भी और उनको ढील दे देने से भी । श्रसामंजस्य तब ही होता है, जब कि दो आदर्श, जिनका नैतिक मूल्य निश्चित नहीं किया जा सकता, सामने उपस्थित हो, अथवा मनुष्य की पाशवी और देवी प्रवृत्तियों में झगड़ा हो रहा हो। ऐसी अवस्था में मनुष्य को सामंजस्य स्थापित करने के लिये यह जानना आवश्यक होता है कि दो आदशों का नैतिक मूल्य किस प्रकार निश्चित किया जाय, अथवा दो प्रवृत्तियों में कौन सी ऊँची है और कौन सी नीची? वैसे तो नीची कोटि के लोगों को कुछ असामंजस्य हीं नहीं होता। इसको सब ही मानेंगे कि उच्च आदर्श को छोड़कर असामंजस्य स्थापित करना श्रेय नहीं। जब हम को ऊँचे और नीचे का अंतिम निर्णायक मिल जायगा, तब भी<noinclude></noinclude> f3i91cu6pot559ry0z3lcecxjs1xcsq पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०८ 250 194436 664659 2026-07-02T17:37:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664659 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६५ ] एक प्रश्न शेष रहेगा, कि ऊँचे की जीत से क्या अर्थ ? क्या मनुष्य की नीची प्रवृत्तियों का समूल नाश करने से अथवा उनकी पुकार की ओर बिल्कुल ध्यान न देने से उच्च आदर्शो की जय हो सकती है ? इस पक्ष पर अगले अध्याय में विवेचना की आयगी । एक दूसरे प्रकार से भी उच्च आदशों की जय हो सकती है। वह यह है कि नीची प्रवृत्तियों की पुकार की ओर भली भांति ध्यान देकर उनको ऊँचा बनाने का यत्न किया जाय । संसार में वही विजयी यश पाता है, जो पराजित पुरुषों का हनन न कर उनको अपनी भांति ऊँचा और सभ्य बना लेता है । वही गुरु सद्गुरु समझा जाता है, जो चेले को अपनी भांति बना लेता है। ऊँचा आदर्श वही है, जो ate प्रवृत्तियों को भी अपने आलोक में ऊँचा बना ले। पुस्तक के अंत में दिखलाया जायगा कि हम अपनी नीच प्रवृत्तियों को भी बिना हनन किए किस प्रकार ऊँचा बना सकते हैं।<noinclude></noinclude> 8vzb0agm0ythjl60o6f8ln2um22q1qk पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१०९ 250 194437 664660 2026-07-02T17:38:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664660 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>आठवाँ अध्याय । आत्म-विजय | (Self-conquest) पिछले तीन अध्यायों में सुखवाद के भिन्न भिन्न भेदों की व्याख्या करते हुए, यह बात बतलाई गई थी कि सुखवादी लोग वांछित को ही वांछनीय समझते हैं। सिनिक्स और स्टोक्स इच्छा के अनुकूल चलने को परम श्रेष मानते हैं। उनके लिये प्रेम ही श्रेय है। इसके विरुद्ध कुछ लोगों का ऐसा सिद्धांत है कि इच्छा वा वासना को मारना ही परम कर्त्तव्य है । ये लोग मन और बुद्धि में लड़ाई करा कर मन के ऊपर विजय प्राप्त करने ही को जीवन का परम पुरुषार्थ मानते हैं। वे 'देहो दुःखं महत्फलं क कर अपने शरीर को नाना प्रकार के दुःख देते हुए इंद्रियों को जीतते हैं। मन को मारना ही इस पक्ष के लोगों का मूल मंत्र है । "मन को ऐसा मारिए, जो टूक ट्रक हो जाय ।" यही सिद्धांत प्राचीन यूनान में सिनिक्स (Cynics ) # लोगों 'द्वारा प्रचार में आया था। इन लोगों के प्रधान आचार्य ने सुख • सुकरात की संप्रदाय के पीछे से दो भेद हो गये। एक संप्रदाय के लोग धर्म (Virtue) के प्रधानता देने लगे। ये लोग सिनिक्स कहलाए । जो लोग सुख को प्रधानता देते थे वे लोग सिरेमिक्स के नाम से प्रख्यात हुए। जिस प्रकार सिरेनिक्स के मत से एपीक्यूशंस के मत का उदय हुआ था उसी प्रकार सिनिक्स लोगों रोक्स का निकास हुआ है। दासोखिनीज (Diozenes) ने सिनिक्स में सब से अधिक ख्याति पाई। सिनिक्स संप्रदाय का आदि प्रवर्तक पॅटिस्बेनीच था ।<noinclude></noinclude> 9qtrevc8ux4aci6polxqb0o375ozqj2 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११० 250 194438 664661 2026-07-02T17:38:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664661 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ६७ ] का इतना तिरस्कार किया, कि उसने एक बार कहा था, कि 'मैं सुखी होने की अपेक्षा पागल होना पसंद करूंगा। इन लोगों ने सुख और कर्त्तव्य का पूर्ण विरोध माना है। इन्हीं सिनिक्स लोगों में से स्टोक्स (Stoics ) * का उदय हुआ । ये लोग भी आत्मविजय के सिद्धांत को माननेवाले हैं। इनका कथन है कि सुख दुःख का विचार न करते हुए बुद्धि के अनुकूल चलना ही परम श्रेय है। बुद्धि के अनुकूल चलने में ये सब प्रकार के ऐहिक ऐश्वयों का तिरस्कार करते थे। बुद्धि को मनोविकारों से दूषित न कर देने के भय से उन पर ध्यान न देते हुए उनको मारने ही के लिये उद्यत रहते थे। ये लोग ज्ञान को ही परम लक्ष्य मानते थे। इन लोगो का मत है कि बुद्धि और ज्ञान का प्राकृ- तिक नियमों में विकाश होता है। प्रकृति में सदा ईश्वरीय ज्ञान का व्यंजन होता रहता है। इसलिये प्राकृतिक नियमों के अनुकूल चलना ही बुद्धिमान पुरुष का कर्त्तव्य है। प्रकृति के अनुकूल चलने में ही बुद्धि की अनुकूलता है । अतएव, प्रकृति के अनुकूल यत्न करना ही इस मत के अनुयायियों को श्रेय है। भारतवर्ष में, इस कर्त्तव्य संबंधी सिद्धांत का मूल उन लोगों के विचार में है, जो सांख्य और वेदांत का तत्व इसमें समझते हैं कि शरीर और मन सब प्राह- तिक वा मायिक हैं और बिना इनके नाश हुए सच्चे मोक्ष-प्रद आत्म-शान का उदय भारतवर्ष में आत्म-विजय का सिद्धांत । " स्टोरकस लोगों का नाम 'स्टोमा' जिसकी अंग्रेजी भाषा में पई (Porch) रुद और हिंदी में दहलीज कहते हैं, पर से पढ़ा है। इसके आदि को (Zen) स्टोध्या में बैठकर उपदेश देने के इसी से इस संप्रदाय (लगभग २४२-२७० पूर्व ई०) के लोगों का नाम स्टोक्स पंदा<noinclude></noinclude> pvtqglfwr6eagd01462q69a6bt38050 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११२ 250 194439 664662 2026-07-02T17:38:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664662 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ 48 ] से अच्छा समझना चाहिए और वह बिना सब प्रकार के कर्मों की श्रृंखला को तोड़े नहीं प्राप्त हो सकता। इसलिये कर्म से विराम ही उनके यहां परम श्रेयस्कर मानना चाहिए । शोपनहोर और बान हार्टमैन जर्मन पंडित शोपनहोर ( Schopenhaur ) (१७- १८६० ) और उनके शिष्य वॉन हार्टमैन (Von Hartman ) (१८४२ - १६०६ ) भी लगभग इसी सिद्धांत को मानते हैं। उनका कहना है कि कोई वासना पूर्ण नहीं होती और एक बासना के पूरे होने के बाद ही तुरंत दूसरी वासना उठ खड़ी होती है । साधारणतः वासनाओं का कभी अंत नहीं ! "भोगान भुक्ता वयमेव भुक्तास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः । वासनाएँ कभी पूरी नहीं होतीं और उसके पूरे न होने के कारण दुःख होता है। इसलिये इसको ही परम लक्ष्य न मान कर ज्ञान से उत्पन्न होनेवाले आनंद को अंतिम लक्ष्य मानते हैं! शोपेनहार ने तो केवल व्यक्तिगत संकल्प के नाश करने को परम श्रेय माना है, किंतु उनके शिष्य वान हार्टमैन ने सारे संसार में क्रिया को स्तब्ध कर देने का यत्न सिखाया है ! यह केवल दुःख से भागना है, दुःख को जीतना नहीं। संकल्प के नाश करने के अतिरिक्त और भी एक यात संभव थी, कि सुख की असफलता दुःख न मानी जाय। इस संबंध में श्री मद्भगवङ्गीता का निम्नलिखित उपदेश मनुष्य को संकल्प- त्याग करने की आपत्ति से बचा देता है, यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः । समः सिद्धो असिद्धौ च कृत्याऽपि न निबध्यते ॥ अर्थ-प्रार्थित लाभ से संतुष्ट रहनेवाला, शीतोष्ण-सुख दुःखादि से अबाधित, मत्सर रहित तथा कार्य साफल्या-<noinclude></noinclude> mn8flcs0hqii77gdbuu1ievpkwpdqfe पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११३ 250 194440 664663 2026-07-02T17:38:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664663 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' [ १०० ] साफल्य में साम्य बुद्धि रखनेवाला मनुष्य कर्म करता हुआ ' भी बंधन को प्राप्त नहीं होता । बौद्धधर्म ने भी एक प्रकार के संन्यास मार्ग का प्रतिपादन किया है, किंतु बौद्ध लोग वासना के त्याग से दुःख की निवृत्ति ही को परम लक्ष्य मानते हैं। इस निषेधा- त्मक लक्ष्य को प्राप्त कर वे लोग किसी भावा- त्मक लक्ष्य की ओर नहीं जाते। भाव को धर्म और हिन्दूधर्म के लक्ष्य में भेद । प्रभाव बनाना ही इनका इति कर्त्तव्य हो जाता है। यह बात तो अवश्य माननी पड़ेगी कि शरीर को दुःख देना बौद्ध धर्म नहीं सिखाता। दुःख दूर करना ही इस धर्म का परम लक्ष्य है। किंतु वे दुःख के दूर करने में 'सुख-दुःख के आधार ही ' का नाश कर देते हैं। न सिर ही रहे, न सिर का दर्द ! न मर्ज़ ही रहे, न मरीज़ ! यह मत सब बौद्धों का नहीं, कुछ का तो अवश्य ही है। महात्मा बुद्ध का कथन है, कि यत्नपूर्वक क्रियाओं के मूल संकल्प का नाश करना चाहिए ही दुःख का अंत हो सकता है। वासना का क्षय कर आवागमन से रहित हो जाना ही परम कर्तव्य है किंतु श्रात्रा- गमन से छुटकारा पाकर जीव की कोई भावात्मक दशा रहती है या नहीं इसके लिये बौद्ध धर्म एक प्रकार के शेय बाद में शरण लेता है। किंतु इनका अज्ञान निषेध की और ही झुका हुआ है। saint at sो तोड़ना बौद्ध धर्म की भाँति हिंदूधर्म का भी अभीष्ट है, किंतु हिंदू लोग केवल आवागमन से छुटकारा पाने को मोक्ष नहीं मानते। उनका लक्ष्य भावात्मक है श्रभावात्मक नहीं। गीता प्रतिपादित निष्काम कर्म, कर्म को नाश किए बिना ही आवागमन की श्रृंखला को तोड़<noinclude></noinclude> j6dgbq10hpveivz29h6vq63wgxwimkr पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११४ 250 194441 664664 2026-07-02T17:38:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664664 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १०१ ] देता है। जन्म का कारण क्या है ? कर्म अथवा फलाशा ? उठना बैठना, साँस लेना, यह सब कर्म ही हैं। किंतु इनके लिये कोई मनुष्य बुरा भला नहीं ठहराया जाता। इसका कारण केवल यही है कि मनुष्य इन कर्मों के लिये कोई फलाशा नहीं रखता । इसी प्रकार निष्काम कर्म भी पाप-पुण्य के फल से छुटा देता है। जो लोग दूसरों को सरकारी आशा से मारते हैं, वे दोषी नहीं ठहराए जाते। इसी तरह जो लोग किसी दूसरे की प्रेरणा से भले काम करते हैं, वे पुण्यात्मा भी नहीं समझे जाते । * निष्काम कर्म का यह अर्थ नहीं कि मनुष्य यंत्रवत् आचरण करने लगे। यंत्रवत् आचरण करने से तो आवागमन के बंधन में ही पड़ा रहना अच्छा है। साम्य बुद्धि से आचरण करने ही में निष्काम कर्म का महत्व समझ में आता है। दुःख और बंधन तय ही होता है, जब कि मनुष्य अपने को धन्य व्यक्तियों से पृथक् समझता है । जहाँ, " अद्वेश सर्वभूतानां मैत्र करुण एव च । निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ " १२/१३ बनकर कार्य किया जाता है, वहाँ न दुःख ही होता है और न कर्मों का बंधन ! सब में जो अपने को देखता है, वह दुःख का भोगनेवाला नहीं सबको श्रात्मौपम्य दृष्टि से देखने ही में साम्य बुद्धि समझी जाती है। ईश्वर सब का कर्त्ता हो कर भी निष्क्रिय समझा जाता है, क्योंकि उसके कार्यों में वैषम्य नहीं होता है। मनुष्य को ईश्वर व आचरण करना निष्काम कर्म का वास्तविक अर्थ यही है कि सद्सद्विविवेकपूर्वक सक्रिया को * स्वार्थ त्याग और 'साम्य बुद्धि से ईश्वरार्थं किया जाय। मनुष्य का सर्वोच्चतम आदर्श ईश्वर है। क्रिया का ईश्वर से संबंध जोड़ना उसको सर्वोच्चतम आदर्श की दृष्टि से देखना है। 'ईश्वर' में व्यष्टि और समष्टि का योग और पूर्ण भविरोध है।<noinclude></noinclude> l2u40htjjx7lmlj0wxogkvp81hr2bpt पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११५ 250 194442 664665 2026-07-02T17:39:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664665 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १०२ ] चाहिए। यह न तो निष्क्रियता ही है और न यंत्रचदाचरण | इस तरह कार्य करना ही मनुष्य के लिये परम श्रेय है। कर्म का त्यागना कायरता ही नहीं, वरन् श्रात्म-हत्या है । वासना- क्षय और इंद्रियनिग्रह ये सब साधन रूप हैं, और इन्हें करना भी परमावश्यक है, तथापि इन्हीं को अंतिम फल न मानते हुए आत्मा के पूर्ण विकाश के लिये यत्न करना चाहिए । कर्त्तव्य परायण जीवन में इंद्रिय निग्रह का बड़ा महत्व है तथापि इंद्रिय निग्रह मात्र ही कर्त्तव्य परायण जीवन नहीं । अर्थात् कर्त्तव्य परायण जीवन का इंद्रिय- आत्मविजय का निग्रह भी एक प्रधान अंग है, किंतु उसके ऐसे ही या इससे भी श्रेष्ठ और भी अंगोपांग है ! सच्चा अ अतः इतने ही में कर्त्तव्य परायणता का संकोच कर डालना बड़ी भारी भूल है । वासना क्षय करना हा यदि परम पुरुषार्थ समझा जाय, तो वासना के नाश करने में भी वासनाओं का अस्तित्व अत्यावश्यक है। शत्रु के स्थित रहने ही में विजेता का गौरव है। संसार को त्याग कर जो मौन हो बैठते हैं, वे भी अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर सकते। जा संसार के लोभायमान दृश्यों से भागते हैं, वे कायर हैं। उन दृश्यों के पुनः उपस्थित हो जाने पर चित्त के चलायमान होजाने की आशंका रहती है। इसी लिये कहा है, कि “ विकार हेतौ सति विकियन्ते येषां न चेतांसि ते एव धीराः" अर्थात् विकार। के हेतु उपस्थित होने पर, जिनके चित्त विकार को प्राप्त नहीं होते, वे ही धीर समझे जाते हैं। इन विचारों के आलोक में पाठकों को आत्म-विजय की उचित सीमा दिखाई पड़ने लगेगी। सत्प्रवृत्तियों को स्थान देने के लिये दुष्प्रवृत्तियों को रोकना पड़ता है। मनोविकारों<noinclude></noinclude> 3acwk72zzy3kme655jtpz9rd8ppdmbo पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११६ 250 194443 664666 2026-07-02T17:39:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664666 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १०३ ] को शुद्ध और नियमित करने के लिये कभी कभी अपने मन के झुकाव के प्रतिकूल जाना पड़ता है, किंतु यह प्रति- कूल जाना मन की शुद्धि के लिये होता है। यदि यह भी मान लिया जाय कि मन को मारना ही परम श्रेय है, तब भी इसके लिये कोई मनुष्य तभी यज्ञवान हो सकता है, जय कि वह बात उसके मन के अनुकूल हो । मन के मारने के लिये भी मन की अनुकूलता चाहिए ! मन को मारना हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए। मन की शुद्धि और सत्कार्यों के प्रति रुचि बढ़ाने में ही हमारी आत्मा के पूर्ण विकाश की संभावना है। कांट के कर्त्तव्य संबंधी विचारों को समझने के लिये उसका तत्वज्ञान जानना श्रावश्यक है। कांट का कथन है कि शुद्ध बुद्धि (Pure reason) द्वारा श्रात्मा और ईश्वर का ज्ञान नहीं कांट हो सकता। उसके मत से हमारा ज्ञान (सिवाय गणित संबंधी ज्ञान के जो कि आकाश से संबंध रखता है) एक तो भिन्नता, पूर्णता, द्रव्यत्य, कारण आदि बुद्धि की १२ संज्ञाओं (Catagories of understanding) तथा काल और आकाश रूपी भीतरी और बाहिरी साँचों के योग का, जो अनिश्चित गुण- रहित ऐंद्रिक विषयों से होता है, फल है। हमारा बुद्धिजन्य ज्ञान एक मिश्रित पदार्थ है। काल, श्राकाश एवं बुद्धि की संज्ञाएँ यही तो शुद्ध हैं, किंतु जो ज्ञान इनके और बाहिरी ऐंद्रिक विषयों के योग से होता है, वह शुद्ध नहीं हम को यह कदापि मालूम नहीं हो सकता कि असली पदार्थ ( चाहे भौतिक हो, चाहे आध्यात्मिक ) का वास्तविक स्वरूप क्या है। जो कुछ ह देखते हैं, मन के रंगीन चश्मे से देखते हैं। चश्मे के बाहर पदार्थ का क्या स्वरूप है, उसके लिये कुछ नहीं कहा जा<noinclude></noinclude> tu4hdyxs2lcjmxpq86qvg6m5imgxi8o पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११७ 250 194444 664667 2026-07-02T17:39:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664667 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १०४ ] सकता। कांट का तत्वज्ञान एक प्रकार के अज्ञेय वाद में ले जाता है। कांट का वास्तविक पदार्थ (The thing in itself) सांख्यवादियों के अव्यक्त प्रधान से मिलता जुलता है। कांट ने अपने शुद्ध बुद्धिजन्य श्रशेय वाद का अपवाद क्रियात्मक बुद्धि (Practical reason) की आवश्यकताओं में किया है। उनके मत से क्रियात्मक बुद्धि, जिसका संबंध कर्तव्यशास्त्र से है, आत्मा और उसकी स्वतंत्रता एवं ईश्वर में विश्वास उत्पन्न कर देती है। कांट ने जो शुद्ध बुद्धि द्वारा असंभव समझा था, उसे क्रियात्मक बुद्धि द्वारा संभव कर दिखाया। यहीं पर कांट के कर्त्तव्यशास्त्र की स्थिति समझ में आती है। कांट के मता- नुसार कर्त्तव्य केवल इसी अर्थ किया जाना चाहिए कि वह कर्त्तव्य है ( Duty for duty's sake ) | कर्त्तव्य में अपनी स्वाभाविक रुचि अथवा सुख का विचार न थाना चाहिए। नहीं तो वह कर्म कर्त्तव्य न रहेगा, क्योंकि स्वाभाविक प्रवृत्ति अथवा रुचि प्रत्येक मनुष्य की एक सी नहीं होती ( ' भिन्न रुचिर्हि लोकः प्रसिद्ध ही है ) और यदि रुचि के अनुकूल ही कर्त्तव्ध रहा, तो वह कर्तव्य परिमाण स्थिर नहीं कर सकता। इस लिये रुचि की अनुकू लता न देख कर सुधी पुरुष को बुद्धि ( जो सब में एक सी है) की अनुकूलता देखनी चाहिए। हमारी स्वतंत्रता इस बात में है कि हम रूचि के प्रतिकूल भी बुद्धि के आदेशों का अनुकरण कर सकते हैं । बुद्धि के आदेशों के अर्थ विधिवाक्यों के लिये कोई स्वार्थ संबंधी कारण नहीं दिया जा सकता। कर्तव्य संबंधी आदेशों में अगर मगर के लिये स्थान नहीं ! इस पर यह प्रश्न होता है कि उस कर्तव्य का आदेश क्या है ? इसके उत्तर में कांट साहब का '<noinclude></noinclude> pwykebt54tp6gyjooeaq89ipo7pwp8g पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११८ 250 194445 664668 2026-07-02T17:39:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664668 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १०५ ] कहना है, कि चूंकि कर्त्तव्य का आदेश ऐसा होना चाहिए, जो सबके लिये एक सा होने के कारण सब को बाँध सके, अतः उस आदेश को निम्नोल्लिखित रूप ही दिया जाना संभव है। Act on a maxim which thou canst will to be universal, अर्थात् ऐसे सिद्धांत पर चलो, जिसे कि तुम सार्वजनिक बना सको । उदाहरणार्थ, यदि चोरी सार्वजनिक बन आय, तो संसार का कार्य बंद हो जाय ! यदि सबही लोग झूठ बोलने लगें, तो कोई किसी की बात न मानेगा। इसलिये चोरी और झूठ बोलना हेय तथा अस्तेय और सत्य धर्म हैं। यह सिद्धांत देखने में तो ठीकसा मालूम पड़ता है, किंतु विचार करने पर इसमें कई दोष दिखाई देते हैं। इस सिद्धांत में अपवादों के लिये कोई स्थान नहीं। यदि हमको किसी के प्राण बचाने के लिये झूठ बोलना पड़े तो क्या हम झूठ बोलने को सार्वजनिक बना सकते हैं? और लीजिए, समाज में यदि कुछ लोग ब्रह्मचारी रहें तो उसे कोई सुधी पुरुष बुरा न कहेगा, किंतु यदि ब्रह्मचर्य सार्वजनिक बना दिया जाय, तो संसार-नाटक की इतिश्री हो जाय ! संतोष अच्छा है, किंतु सार्वजनिक नहीं हो सकता। यदि गीता की तरह कांट साहब कर्त्तव्य में गुण, कर्म और स्वभाव से वैविध्य को मान लेते, तो इतनी कठिनाई न पड़ती । 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः' इत्यादि वाक्यों से गीता में अपनी स्थिति के अनुकूल धर्मो में सापेक्षत्व माना है । उपर्युक्त बातों के अतिरिक्त कांट का सिद्धांत भाव के रूप भावात्मक है । यदि सब लोग दान न दिया करें, अथवा उत्साही न हों, तो भी संसार चला जायगा । इसमें कोई असंभवता नहीं ! उत्साही और दान-शील बनाने के लिये<noinclude></noinclude> 3b4az7qorhk7i8drobjdgw816q1hkxg पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/११९ 250 194446 664669 2026-07-02T17:39:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664669 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१०६ ] कांट के मत से कोई उसेजक नहीं। दान के लिये तो उनके मत में, कोई स्थान ही नहीं हो सकता, क्योंकि सब लोग दान नहीं कर सकते। यदि सब लोग दान करें, तो दान लेगा कौन ? कांट के सिद्धांत में एक और भी दोष है कि उन्होंने मनुष्य की रुचि और स्वाभाविक प्रवृत्तियों को बुद्धि के प्रतिकूल ही मान रक्खा है। यह बात सर्वथा सिद्ध नहीं । सच पूछा जाय तो मनुष्य में दया आदि सद्गुण स्वभाव से ही वर्तमान हैं, और मनुष्य की रुचियों में भी इतना चैविध्य नहीं है, जितना वे समझते हैं। मनुष्य की प्रवृत्तियों में वैविध्य होते हुए भी एकता है । बुद्धि से सत्प्रवृत्तियां और भी दृढ़ बनाई जा सकती हैं मनुष्य, प्रवृत्तियों को बुद्धि को अनुकूल बना कर ही कर्त्तव्यपरायण हो सकता है। कोरी बुद्धि में शक्ति नहीं। शक्ति स्वाभाविक प्रवृत्तियों से ही मिलती है। इसलिये इनका तिरस्कार न करना चाहिए । 1 कांट ने सुख वा श्रनंद की इच्छा को क्रिया का कारण नहीं माना है। किंतु उसको क्रिया का फल रूप माना है। उन्होंने फल के विचार से ही फल के देनेवाले ईश्वर, फल भोग करने- वाले जीव और फल भोगने के लिये जीव का अमरत्व सिद्ध किया है। स्वतंत्रता के विषय में ऊपर ही कहा जा चुभ है, कि हम अपनी रुचि के प्रतिकूल भी बुद्धि का अनुकरण कर सकते हैं। इसी में हमारी स्वतंत्रता है।<noinclude></noinclude> bht3hkzsmosohztw0epf8qnvldbm7zm पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२० 250 194447 664670 2026-07-02T17:39:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664670 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नवाँ अध्याय । आत्म-प्रतीति । (Self-realization ) नत अध्याय में दिखाया जा चुका है, कि जो लोग बुद्धि के अनुकूल चलने को परम कर्त्तव्य मानते हैं, उनकी यह तो श्रवश्य ही मानना पड़ता है कि जब तक हम इस बात को अपनी रुचि के अनुकूल न समझ लें कि बुद्धि के आदेशों पर चलने 'वृद्धि और भावों की अन्योन्याश्रयता में हमारा श्रेय है, तब तक उन आदेशों का. पालन करना कठिन होता है। उपयोगितावाद का विवरण 'देते हुए यह बतलाया गया था कि इस बाद के प्रवर्तक मिल साहब ने सुखों में गुण-भेद माना है। गुण-भेद के मानते. ही बुद्धि की प्रधानता को स्वीकार कर लेना पड़ता है। प्रोफेसर ऐलेग्जेंडर ने बिकाशवाद के सिद्धांत मनुष्य की प्रवृत्तियों में ऊँच नीच के भेद से किए हैं। यह भी बुद्धि का गुप्त रीति से स्वीकार करना है। बिना बुद्धि के हमारे सब कार्य अनिय मित रहेंगे। बुद्धि ही हमारी पथ-प्रदर्शक है। बुद्धि ही हमारी ज्ञान चक्षु है, जिसके बिना हम अंधे बन जाते हैं किंतु केवल बुद्धि से भी काम नहीं चलता, क्योंकि बिना भावों के हम शक्तिहीन हैं। भाव ही हमारी संचालन शक्ति है। बिना -बुद्धि के उस शक्ति के दुरुपयोग होने की आशंका रहती है।<noinclude></noinclude> pv9xi8oam8k9bypsh9drzfhjdx3nhbr पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२१ 250 194448 664671 2026-07-02T17:40:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664671 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १०८ ] किंतु यदि शक्तिहीन हो, तो बुद्धि किसे नियमित करेगी ! हमारे भाव, प्रवृत्ति और शक्ति के दुरुपयोग और सदुपयोग दोनों ही हो सकते हैं। कहा भी है- विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय । खलस्य, साधोर्विपरीतमेतत् शानाय दानाय च रक्षणाय ॥ अर्थात् विद्या, धन और शारीरिक बल तीन बड़ी शक्तियां मानी गई हैं। किंतु उनका भला या बुरा उपयोग दोनों ही होता है । विद्या का दुरुपयोग विवाद और सदुपयोग ज्ञान हैं। इसी प्रकार धन घमंड के लिये भी हो सकता है और दान के लिये भी शारीरिक बल से बुरे आदमी दूसरों के सताने में योग देते हैं और अच्छे आदमी उसी यल से दूसरों की रक्षा करते हैं ! बुद्धि के द्वारा ही इन शक्तियों के सदुपयोग की संभावना है, किंतु ये शक्तियां न हो, तो न ज्ञान ही संभव है और न दान तथा दूसरों की रक्षा ! हमारे मनोविकार भी बुद्धि के योग से लाभदायक बनाए जा सकते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ये सब बातें बुरी समझी जाती हैं, पर बुद्धि द्वारा इनका उचित मात्रा में सेवन करना संसार की स्थिति के लिये परमावश्यक है। यदि काम न रहे, तो पुत्रो- त्पादन न करके पितृ ऋण किस प्रकार दूर हो ? यदि क्रोध न हो, तो अनर्थं दूर करने के लिये कौन हाथ उठावे ? यदि लोभ न हो, तो दान के लिये धन-संचय कौन करे श्रीर मोह के प्रभाव से प्रेम सा पवित्र पदार्थ कहाँ से आवे ? यदि अहंकार न हो, तो स्वाभिमान और स्वावलंबन, जो क्रिया के मुख्य साधक हैं, संसार से उठ जायँ ! आत्म-विजय का अर्थ श्रात्म-हनन नहीं । यदि ऐसा हो<noinclude></noinclude> h926zb4noer5ktvbdes91urb0id4j1j पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२२ 250 194449 664672 2026-07-02T17:40:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664672 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>की रक्षा [ १०६ ] तो जीतनेवाले का ही अस्तित्व कहाँ रहेगा ? उपनिषदों में* जो उदाहरण रथी, सारथी और घोड़ों का सही विजय में पराजित दिया है, उसका ठीक अर्थ यही है कि इंद्रियों को बुद्धि द्वारा नियमित करो, न कि उनको मार डालो। सारथी का काम घोड़ों को ठीक तौर से ले जाना है, न कि उनका हनन करना ! बुद्धिरूपी सारथी का यह काम है कि मन और इंद्रियों के घोड़ों को ठीक राह पर चलावे, न कि उनको मार डाले। * यदि अभ्व ही नहीं, तो सारथी कहाँ, और आत्मा भी पंगु हो जायगी ! यदि हमको अपना उद्धार करना है, तो मन और बुद्धि दोनों को ही उचित स्थान देना चाहिए । यह बात अवश्य है कि हमको बाहरी शासक की आवश्यकता नहीं, किंतु इससे यह न समझ लेना चाहिए कि हमको किसी शासक ही की श्रावश्कयता नहीं। हमारी आत्मा ही शासक है और वही शासित है। गीता में कहा है- ● आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ॥ बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ इंद्रियाणि इयानाहु विपर्यास्तेषु गोचरान् ॥ आत्मेंद्रिय मनोयुक्तं भोक्यातुर्मनीषिणः ॥ + इस संबंध में निम्न श्लोक विचारणीय है- कठ० प्रथमाध्याय ३ वल्ली. यस्त्व विद्यानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः ॥ न स तत्पदमाप्नोति स ५ सारं चाधिगच्छति ॥ यस्तुविशनवा भवति स मनस्कः मदाशुचिः ॥ स तु तत्पदमाप्रोति यस्माद्व भूयो न जायते ॥ विज्ञान सारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ॥ सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ कठ० प्र० ० ७६<noinclude></noinclude> 0cz3has97r8xu36tjbcuhidhn8udazv पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२३ 250 194450 664673 2026-07-02T17:40:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664673 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ११० ] उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ बंधुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनल शत्रुत्व वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ भगवद्गीता ६ । ५६ । अर्थात् अपनी आत्मा का उद्धार आत्मा ही द्वारा करना चाहिए ( इससे यह उपदेश दिया गया कि हम को अपने उद्धार के लिये किसी बाहरी शास्ता की श्रावश्यकता नहीं, अपना उद्धार स्वतंत्रता से करना चाहिए। अपने आप को कभी नीचा व अयोग्य न समझे ( इसमें स्वावलंबन की शिक्षा दी गई है ) आत्मा का श्रात्मा ही बंधु है और आत्मा ही शत्रु है। इसकी व्याख्या आगे श्लोक में की है। जिसने अपनी आत्मा को आत्मा द्वारा जीत लिया है, उसी की श्रात्मा उसकी बंधु हैं, अर्थात जिसने अपनी आत्मा की नीच प्रवृत्तियों को अपनी ही आत्मा के उच्च आदर्शों के अनुकूल बना लिया है, वही अपनी श्रात्मा से उचित लाभ उठा सकता है। इस श्लोक में यह बात ध्यान देने योग्य है, कि जो मानसिक प्रवृ- चियां आत्मा द्वारा पराजित की जायेंगी, उनको भी श्रात्मा की संज्ञा दी है। इससे यह सिद्ध होता है, कि ये प्रवृत्तियां भी श्रात्मा से बाहर नहीं । आध्यात्मिक साम्य को स्थापित करना गीता को भी मान्य है। मन और बुद्धि की परस्परा- नुकूलता में रहनेवाले साम्य को और लोगों * ने भी माना है, किंतु परस्परानुकूलता में इतना दोष अवश्य रहता है कि ऊंचा भी नीचे के अनुकूल बन कर एक प्रकार का साम्य ★ जैसे प्रोफेसर एलेग्जेंडर और सर लेजली स्टीफन<noinclude></noinclude> pxbgfzfyu1uphqat8y5z17stg251a70 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२४ 250 194451 664674 2026-07-02T17:40:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664674 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१११ ] स्थापित कर सकता है। 'जितः' शब्द से यह स्पष्ट है, कि ऊँचा नीचे को अपने अनुकूल बना लेता है। * सच्ची जीत शत्रु के मार डालने में नहीं, वरन् उसे अपने अनुकूल बना लेने में है । शत्रु को अनुकूल बना कर हम अपनी शक्ति को बढ़ा सकते हैं और मार डालने से हम अपनी भावी शक्ति को कम करते हैं। प्राचीन कालिक महापुरुषों के विषय में कहा जाता है कि उनके शत्रुओं का वल उनमें श्रा जाता था । ठीक इसी प्रकार अपनी पराजित प्रवृत्तियों को अपने आदशौ के अनुकूल बना कर उनका बल अपने में ले जाना चाहिए। यही सच्ची श्रात्म द्वारा आत्म-विजय है। प्रवृत्तियों की शक्ति को गीता में भी माना है। लिखा है, कि सब लोग अपनी प्रकृति के अनुकूल चलेते हैं । + यह बात तो आत्मा की बंधुता के विषय में कही गई, अब उसी बात को स्पष्ट करने के लिये मीन साहब (१८३६-१८८२) (TH Green ) का भी मत इससे मिलता जुलता ही है। चीन साहब का कहना है कि हमारी प्रवृत्तियों अंध प्रवृत्तियाँ नहीं, इन मे भी बुद्धि का विकारा हो जहा है। जिन इच्छा और प्रवृतियों मे वृद्धि का कम विकाश है वे नीची है और जिनमे अधिक वे ऊँची है। हमारे धार्मिक जीवन का तत्व इसी में है कि इस बुद्धि के विकास में योग देवे अर्थात ऐसी ही इच्छा के पूरे होने का यत्न करे जिन मे कि बुद्धि का अधिक विकाश हो। बुद्धि ही मनुष्य की मी आत्मा है। इसके अनुकूल हम को अपनी प्रवृद्धियां बनानी चाहिए। ऊँचे की अनुकूलता प्राप्त करने से नीचे का नाश नहीं होता किंतु नीचे में जो गत गुप्त भाव से रहती है वह चे की अनुकूलता प्राप्त करने पर स्पष्ट होकर पूर्व विकाश को प्राप्त होती है। श्रीम माहन के तत्वज्ञान संबंधी विचारों से इन सिद्धांतों का विशेष संबंध है, किंतु उनका यहा पर उल्लेख करना अनुचित होगा। इस स्थान पर इतना ही बता देना पर्याप्त होगी किं ग्रीन साहब ने कांट के सिद्धांतों को मिल के विचारों के आलोक में दुहराया है।" + सदृशं ष्टते स्वस्याः प्रकृतेनवानपि । प्रकृति यांति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥<noinclude></noinclude> fg0s9henscsevs03i2wjdpl1kr7i1xw पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२५ 250 194452 664675 2026-07-02T17:40:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664675 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ११२ ] कहा है कि जो अपनी आत्मा को नहीं पहचानता (अनात्मनः) वह स्वयं अपना शत्रु है। इससे पता चल गया कि आत्म- शान होने ही में अपना परमहित है, और जो कार्य श्रात्मा की पहचान अथवा प्रतीति में योग देते हैं, वे ही श्रेय समझे जायेंगे ! सच्चा आत्म-प्रतीति आत्मा की सच्ची प्रतीति तब ही हो सकती है, जब कि हम उसके पूर्ण विकाश को देख सकें। किसी वस्तु के पूरे विकाश में ही उसकी असलियत दिखाई पड़ती है। लेखक अपने मन को पूर्णतः तब ही समझता है, जब कि वह उसको पुस्तक के रूप में देख लेता है। मनुष्य को आत्मा का पूरा पूरा विकाश उसकी क्रियाओं में होता है। इस लिये क्रियावान् बनना परमा- वश्यक है। यह संसार आत्म-विकाश के लिये क्रिया-स्थल है। आत्म- "शान से क्रियाओं का झुकाव निश्चित होता है, और क्रियाओं द्वारा श्रात्म-शान स्पष्ट हो जाता है। यही आत्मा का विस्तार ज्ञान और क्रिया की स्थिति है। हमारे शास्त्र (विशेषतः वेदांत शास्त्र) श्रात्मा की एकता और व्यापकता को मानते हैं। जो लोग जीवों की भिन्नता मानते हैं वे भी इतना तो अवश्य ही मानते हैं कि सब जीवों मैं एक से गुण हैं, सब में एक सी शक्ति और संभावनाएँ हैं । वे लोग भी कम से कम गुणात्मक एकता मानते हैं। यह एकता और व्यापकता आत्मा की प्रायः सबही क्रियाओं में प्रमाणित होती रहती है। कोई ऐसा मनुष्य नहीं, जो केवल अपनी व्यक्तिता में संकुचित रहता हो । डाकू भी और लोगों को धन और प्राणों से वंचित कर अपने वाल बच्चों के पालन<noinclude></noinclude> r3vg4wsmu2i8njw80mi21z6sl9qii5g पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२६ 250 194453 664676 2026-07-02T17:40:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664676 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ११३ ] पोषण में यत्नवान् होता है। स्वार्थ में ही परार्थ - लाभ लगा हुआ है। सिंह अन्य जंतुओं का भक्षण करता है, किंतु सिंहिनी के प्रति उस क्रूर हिंसक पशु में भी शृंगाररसात्मक भाव का उदय हो जाता है । मानवी आत्मा सदा वर्तमान के संकुचित धेरे को अतीत कर अपने ज्ञान में सारे संसार की एकता कर लेती है । सारा विज्ञान श्रात्म-विस्तार की ओर चेष्टा करने का साक्षी है । कविता, चित्रकारी आदि कलाओं में भी यही बात पाई जाती है। राजनैतिक विद्रोह होने पर भी शान के साम्राज्य में सब प्रतिद्वंदी लोग एक दूसरे का प्रेमपूर्वक आलिंगन करते हैं। विकाश-वाद ने भी इस आत्मैक्य को भौतिक रीति से सिद्ध कर दिया है। समाजशास्त्र ने भी जीवन-शास्त्र ( Biology ) की उपमाएँ लेकर सामाजिक व्यक्तियों में पेंद्रिक संबंध बताया है। जिस प्रकार कोई इंद्रिय शरीर से पृथक् नहीं रह सकती, उसी प्रकार व्यक्ति भी समाज से पृथक नहीं रह सकता। इंद्रियों की पुष्टि में सारे शरीर की पुष्टि है। एक इंद्रिय के दूषित होने से सारा शरीर दूषित होता है। महात्मा तुलसीदास ने भी यह ऐंद्रिक संबंध निम्नलिखित दोहे में भली भांति बतलाया है- मुखिया मुख सो चाहिये, खान पान में एक । पाले पोषै सकल अंग, तुलसी सहित विवेक ॥ - कोई बड़ा आदमी स्वावलंबी होने का अभिमान नहीं कर सकता । सब आदमियों को संस्थाओं का आश्रय लेना पड़ता है। सारे जीवन भर मनुष्य समाज के व्यक्तियों की अन्यो- न्याश्रयता का परिचय देता रहता है। 'खात पांच की लाकड़ी, और एक जने का बोझ' केवल भिखारियों के जीवन में चार- तार्थ नहीं होता, वरन बड़े से बड़े आदमी को सात पांच तो<noinclude></noinclude> 6qza2pjm3y1f8qlo5vsv7pboc74jn75 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२७ 250 194454 664677 2026-07-02T17:41:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664677 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ११४ ] क्या सहस्रों का सहारा लेना पड़ता है। हमारे यहाँ देव- ऋण, पितृऋण और ऋषिऋण इन तीन ऋणों को मान कर बतलाया गया है कि मनुष्य समाज का कितना ऋणी है। सारे समाज के अनुभव से व्यक्ति लाभ उठाता है और व्यक्ति के अनुभव से समाज । इसी सिद्धांत में स्वार्थ और परार्थ की सीमा टूट जाती है। ऐसा ही हाल उन लोगों का है जो आत्मा की एकता में दृढ़ विश्वास रखते हैं। उनके लिये स्वार्थ और परार्थ में भेद नहीं रह जाता। परार्थ ही उनके लिये स्वार्थ हो जाता है। आत्मैक्य वाद का क्रिया मै प्रयोग, सथी आत्म- प्रतीति करना ही परम श्रेयस्कर है। ऊपर की सब बातों से आत्मा की एकता और व्यापकता अवश्य सिद्ध होती है, किंतु इस ज्ञान से अधिक लाभ नहीं, जब तक प्रत्येक मनुष्य इसे अपने अनुभव में प्रत्यक्ष न कर सके। क्रिया में ही ज्ञान की स्पष्टता होती है। यह संसार हमारे आत्म-ज्ञान के लिये प्रयोगशाला है। इसी- लिये नर-शरीर देवताओं के लिये भी दुर्लभ बताया गया है। हमारी सभी श्रात्म-प्रतीति इसी में है कि वेदांत प्रतिपादित श्रात्मैक्य को क्रिया द्वारा अनुभव- सिद्ध करें और अपनी मनोवृत्तियों के शान से सामंजस्य स्थापित कर उनको सशे श्रात्म-परिचय की ओर झुका देवें । जो वृत्तियाँ भेद को बढ़ानेवाली हैं, उनको भेद-साम्य की ओर का दें। भेद में अभेद और नानात्व में एकत्व देखने लगे। जिस बात की ओर श्रात्मा शुप्त रीति से जा रही है, उसको जान कर स्वतंत्रतापूर्वक अपने उद्योग द्वारा उस लक्ष्य के शीघ्र पूरे होने में योग देखें। गीता में उसी को योगी कहा है जो सब प्राणियों के सुख, दुःखों को आत्मौपम्य दृष्टि से देखता है।<noinclude></noinclude> 4i2622xp1hmivxy8s1cntd48twnmrc0 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२८ 250 194455 664678 2026-07-02T17:41:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664678 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ११५ -] आत्मोपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ! सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ i गीता - ६-३२ sannatan में प्रतिपादित 'लोक-संग्रह ' सब भूतौ के हित में रति, सब में ईश्वर को देखना और ईश्वर में सब को देखना उपर्युक्त सिद्धांत को सिद्ध करता है। वेदांत की भित्ति पर सर्वभूतों का हितान्वेषण, लोक-संग्रह और आत्मी- पम्य दृष्टि से सर्व प्राणियों को देखना, ये सब आदर्श खड़े हो सकते हैं। गीता में क्षेत्र का लक्षण बताते हुए कहा है- अविभक्तं विभक्तेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृच यज्ज्ञेयं प्रविष्णु प्रभविष्णु च ॥ अर्थात् वह आत्मा अविभक्त है, किंतु भूतों में विभक्त सी दिखाई पड़ती है । वह भूतों का पोषण करनेवाली, ग्रहण करनेवाली और पैदा करनेवाली है। आत्मा का यह ज्ञान कोरे शब्दों से अनुभवसिद्ध नहीं होता, किंतु सब भूतों के हित में रत रहनेवाले और सबको श्रात्मौपम्य दृष्टि से देखने- वाले ही इस ज्ञान को अपने जीवन में चरितार्थ कर के स आत्मानंद को प्राप्त होते हैं । । इसी आत्मानंद के की योग- * यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मथि पश्यति । + उपनिषदों में भी इस सिद्धांत को प्रमाणित किया है, यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ की + 'अनन्त समतामद परमार्थ स्वर्फ विदुः । मुमुक्षु प्रकरण ७ अध्याय ७ लोक १२ यह आदर्श आत्मा की स्वाभाविक चेष्टा के अनुकूल है केवल इतना ही नहीं, विचार करने पर यह मालूम हो जायगा कि पूर्व विवक्षित इस आदर्श से हो जाती है। आत्मोपम्य दृष्टि से करने में उपयोगितावाद का अधिकांश लोगों का स्थापित सब को देखकर भेद में अक सुख ही सिद्ध नहीं होता,<noinclude></noinclude> 7qmaggct9m004nhtpn0br165s1naroq पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१२९ 250 194456 664679 2026-07-02T17:41:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664679 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[११६ ] वासिष्ठ में अनंत समतानंद के नाम से परम पुरुषार्थ कहा है। विषमता ही दुःख का कारण है। समता दृष्टि से देखने पर दुःख नहीं रहता । सम-दृष्टि से देखने में ही पूर्ण आत्मा का ज्ञान और सच्ची आत्म-प्रतीति होती है। जो कार्य भेद को दूरकर समता में सधी आत्म-प्रतीति करावें वेही श्रेय हैं और वेही कर्त्तव्य कर्म कहे जायेंगे। 'मुगति भुगति किन निकट है tata दूर दिखाइ' इस प्रश्न को उत्तर देते हुए भाषा के आदि कवि चंदबरदाई ने मुनि-मुख से सब को समता-दृष्टि से देखने की महिमा इस प्रकार बतलाई है- - "समदर्शी ते निकट है मुगति भुगति भरपूर । विषम दरस वा नरन तें सदा सरवदा दूरि ॥" वरन् सब भूतों के हित का साधन होता है। इसमें इतनी श्रेष्ठता और है कि इसे बेदांत का दृढ़ आधार मिल जाता है और इसकी पुष्टि के लिये हमको उलटी सीधी युक्तियों को काम में नहीं लाना पड़ता। जीवन शास्त्र प्रतिपादित समान और व्यक्ति का द्रिक संबंध भी इस आदर्श के अनुकूल चलने में और भी दुइ हो जाता है और सेंसर साहिब द्वारा प्रतिपादित व्यष्टि-समष्टि का सामंजस्य भी भेद में अभेद स्थापित करने में सिद्ध होता है। सर लेखली स्टीविंसन का मानसिक सामंजस्य भी सब को आत्मौपम्य दृष्टि से देखने में प्राप्त हो जाता है। कांट के बताए हुए मानसिक प्रवृत्तियों में नीचे की पहचान की भी सहज कसौटी मिल जाती है। जाती है, वे नीची है और जो अभेद की ओर है पालन इस सिद्धांत में हो जाता है और विशेषता जो प्रवृत्तियाँ भेद की ओर से वेही ऊँची है। बुद्धि के आदेश का यह है, कि इसमें सत्कायों के लिये की उत्तेजना रहती है। ग्रीन साहब का भी आदर्श इसके अनुकूल है। संन्यास का भी वास्तविक अर्थ सर्वभूतहित सम्पादन करने में हो आता है। सचा संन्यास कर्म त्या नाही, 'स्वार्थ त्याग' है। हॉन्स और बेन्थम की सिद्धांत में और सिद्धांतों से वह विशेषता है, कि कूलता सिद्ध हो जाती है। ज्ञान से क्रियो का आदर्श स्पष्टता होती है। शाम किया द्वारा ही सिद्ध होता है। कूल भाष्यात्मिक शान का प्रयोग है। कठिनाई भी दूर हो जाती है। इस इसमें ज्ञान और क्रिया की परंपरानु- मिलता है और क्रिया से ज्ञान की यही वैज्ञानिक पद्धति के अनु<noinclude></noinclude> 7p8slnsx8lv5j2hnvsjszfqnymcweka पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३० 250 194457 664680 2026-07-02T17:41:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664680 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मनुष्य की समाज पर निर्भरता दसवां अध्याय | समाज और कर्तव्य पालन । यदि संसार में एक ही मनुष्य होता, तो शरीर रक्षा के श्रतिरिक्त उसका कुछ भी कर्तव्य न था । शायद शरीर-रक्षा भी कर्त्तव्य की कोटि से निकल जाती । जब जीवन का कुछ मूल्य ही न रहा, तब जीवन- धारण करना किस प्रकार कर्त्तव्य कहा जा सकता है ? कट्टर से कट्टर स्वार्थवादी भी समाज की स्थिति चाहते हैं। माना कि हम अकेले रह कर सारे दृश्य-संसार के राजा वन जावें (Monarch of all I survey ), किंतु जब तक कोई हमारा राजत्व स्वीकार करने को न हो, तब तक हम राजा ही कैसे ? जब हम दूसरों को किसी वस्तु के भोग करने से न रोक सकें, तब हमारा अधिकार ही क्या अर्थ रखता है ? उदार-चिस मनुष्य भी निर्जन स्थान में कृपणवत् धन को एकत्र किए बैठा रहेगा। हमारा ऐक्योन्मुख आदर्श भी समाज की अपेक्षा रखता है। दो का ही एकीकरण हो सकता है। भेद में ही अभेद देखा जाता है। अकेला मनुष्य तो एक है ही । उसके लिये एकता की ओर जाना कर्त्तव्य न रहेगा। 'सर्वभूत- हितेरताः' होने के लिये सर्वभूत-स्थिति श्रावश्यक है। हमारे आदेश की पूर्ति समाज में ही रह कर हो सकती है। समष्टि का हित-साधन कर व्यष्टि में समष्टि का भाव उत्पन्न करना समष्टि से बाहर होकर नहीं हो सकता ! हमारी पूर्ण आत्म- प्रतीति, अपनी पूर्ण आत्मा के संबंध में, जिसका व्यंजन सारे<noinclude></noinclude> 8wfwg79php2pd5ww5aeiwrqiimxvya6 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३१ 250 194458 664681 2026-07-02T17:41:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664681 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>समाज में व्यक्ति की स्थिति और उत्तरदायित्व [ ११ ] 1 संसार में हो रहा है, रह कर हो सकती है। समाज से पृथक रहकर हम अपने अदार्श की किस प्रकार पूर्ति कर सकते हैं ? समाज में हमको जो स्थान मिला है उसके उचित कर्त्तव्यों का पालन करने से हम अपने आदर्श की पूर्ति कर सकते हैं समाज में प्रत्येक मनुष्य अपनी विशेष स्थिति रखता है जिस प्रकार किसी मशीन में हर एक पुर्जा मशीन के चलने में योग देता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की स्वस्थानोचित क्रिया कर के संसार के निर्वित्र संचालन में योग देना आवश्यक है। जैसे एक पुर्जे के ख़राब होने से सारी मशीन ख़राब होती है, वैसे ही एक व्यक्ति के धर्मच्युत होने से सारा समाज भ्रष्ट हो जाता है। धर्म च्युत होने से यदि केवल व्यक्ति ही की हानि होती, तो शायद धर्म का पालन न करना इतना दोष पूर्ण न होता। किंतु अब एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है, तब व्यक्ति का धर्म-परायण रहना परमावश्यक हो जाता है और व्यक्ति का उत्तर दायित्व भी बढ़ जाता है । इसी लिये श्रीमद्भग बनीता में श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि, 'स्वधर्मे निधन श्रेयः परधर्मो भयावहः ।" यदि अर्जुन उस समय क्षत्रिय-धर्म को छोड़ कर संन्यास ग्रहण कर लेता तो वह समाज में अधर्म फैलानेवाला वन जाता । अर्जुन को समझाते हुए भगवान ने कहा है, * स्वधर्ममपि चावेक्ष्य नं विकंपितुमर्हसि । * स्वधर्म को देखकर तुमको थर्राने की कोई आवश्यकता नही, क्योंकि चत्रिय के लिये धार्मिक युद्ध से इतर क्या हो सकता है। x x x<noinclude></noinclude> l43a0t3b4lsktth5z7x46h4ge6a3kor पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३२ 250 194459 664682 2026-07-02T17:42:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664682 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१६] यिद युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ अथ चेत्यमिमं धर्म्य ततः स्वधर्मे कीर्ति च वर्णाश्रम धर्म और कर्तव्यू का सापेक्षत्व X .x संग्रामं न करिष्यति । हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ हमारे देश में वर्णाश्रम धर्म द्वारा प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य पहले से ही निश्चित कर दिया गया है। यह बात कहां तक निर्विवाद है इसके लिये हम कुछ न कह कर इतना अवश्य कहेंगे कि, वर्णाश्रम- धर्म कर्तव्य - शास्त्र की बहुत सी श्रावश्यक- ताओं की पूर्ति करता है । प्रत्येक वर्ण और श्रम के भिन्न भिन्न धर्म होने के कारण सब मनुष्यों का एक सा कर्तव्य नहीं रहता । इसका यह अर्थ नहीं कि कर्तव्य का आदर्श बदल जाता है, किंतु समाज में आदर्श की पूर्ति के भिन्न भिन्न साधन होना आवश्यक है । समाज की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति के अर्थ भिन्न भिन्न प्रकार और रुचि के मनुष्य चाहिएँ। इस कारण उनके कर्तव्यों में अवश्य भेद चाहिए। सब का एकसा कर्तव्य नहीं हो सकता। जो ब्राह्मण के लिये कर्तव्य है, वह क्षत्रिय के लिये कर्तव्य है । सब एक लाठी से नहीं हाँके जा सकते। समाज में यदि सब ही लोग मनन-शील बन जायें, तो उसका चलना कठिन हो जाय । वर्ण-विभाग कर के हिंदू धर्म ने कर्तव्य के सापेक्षत्व ( Relativity of Ethics ) को भली भांति दिखलाया है। arita fart कर देने से लोगों के कर्तव्य में बड़ी सुग- मता पड़ गई है। विद्योपार्जन के साथ ही साथ धर्मोपार्जन नहीं यदि तुम धार्मिक युद्ध से मुँह मोड़गे तो धर्म और सुयश से हाथ धोकर पाप के भागी होगे।<noinclude></noinclude> el2br6a8gbmiu33w8vbokgmjggfwtec पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३३ 250 194460 664683 2026-07-02T17:42:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664683 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १२० ] हो सकता और धनोपार्जन के साथ मौन व्रत धारण कर के यम में बैठना नहीं हो सकता । वर्णाश्रम धर्म के यथोचित परिपालन से समाज की अच्छी उन्नति हो सकती है। लोक- संग्रह का भी अर्थ स्थानोचित कर्तव्यों का पालन तथा समाज के धर्म में स्थिति रखना है। समाज में साम्य स्थापित करने के अर्थ किसी काम को कर्तव्य-दृष्टि से करना सच्चा निष्काम कर्म है और इसी में सच्ची आत्म-प्रतीति भी होती है, क्योंकि समाज आत्मा का ही विकाश है। अपना स्वार्थ छोड़ सामाजिक हित के अर्थ कर्म करना 'श्रीकृष्णार्पणमस्तु' का ही अर्थ रखता है, क्योंकि मनुष्य-समाज ईश्वर की सत्ता का श्रेष्ठ व्यंजन है। आत्मा की सत्ता में विश्वास रक्खे । विना समाज की स्थिति चाहना वृथा है। समाज में साम्य किस लिये स्थापित करना चाहिए, इस प्रश्न का उत्तर देना उन लोगों के लिये जो समाज में अपनी आत्मा का प्रकाश देखते हैं, कुछ कठिन नहीं, किंतु जो लोग आत्मसत्ता में विश्वास नहीं करते, उनके लिये सामा- जिक स्थिति वा साम्य एक प्रकार का पाखंड ही है। समाज की स्थिति की चेष्टा किस लिये की जाय ? प्रकृतिवादियों की ओर से यह उत्तर मिलेगा, कि समाज की ही स्थिति में व्यक्ति का पूर्ण लाभ है। ठीक है, मनुष्य की चेतना को मस्तिष्क के परमाणुओं की क्रियाओं का परिणाम माननेवाले लोगों के मत में व्यक्ति की स्थिति का भी कोई लाभ नहीं दिखाई पड़ता । मनुष्य इस संसार की आकस्मिक क्रियार्थी का फल है। इस प्रकृति के विशेष कहते हैं) के जीवित रहने से जाय कि इस विशेष संघात का संघात ( जिसे कि मनुष्य क्या लाभ ? यदि यह कहा मूल्य बहुत बढ़ गया है तो<noinclude></noinclude> p878z5jxio2h7be9uz8ea3isr7xtuw4 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३४ 250 194461 664684 2026-07-02T17:42:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664684 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १२१ ] " ठीक है. किंतु वह मूल्य किस के लिये है और उसका जानने वाला कौन है ? इसका कुछ उत्तर नहीं। हम पहले पता चुके हैं, कि आस्तिकता के दृढ़ आधार पर ही कर्त्तव्य-शास्त्र का भव्य भवन बनाया जा सकता है। जब तक हम श्रात्म- भाव (Personality) के विशेष मूल्य को न मानेंगे तब तक हम संसार में मूल्यों के समझनेवाले को मान कर विज्ञान की संकुचित दृष्टि को विस्तृत न कर सकेंगे। जब तक हम सारे समाज को एक ही ज्ञान स्वरूप सत्ता ( आत्मा ) का विकाश न समझेंगे, तब तक 'सर्वभूतहितेरताः 'समाज में साम्य स्थापित करना, 'समाज की स्थिति बनाए रखना', 'जीवन की मात्रा को बढ़ाना' ये सब वाक्य निरर्थक ही रहेंगे। सामाजिक विकाश और उसकी वर्त्तमान स्थिति भी समाज के आध्यात्मिक आधार होने के साक्षी हैं। समाज में, इतनी ख़राबी होने पर भी, अपने कर्त्तव्य- हमारे आदर्श भीर सामा- पालन की स्वतंत्रता है। मानसिक आदर्श जिक संस्थाएँ के अनुकूल ही हमारा सामाजिक संस्थान भी बनता जा रहा है और हमारी सामा- जिक संस्थाओं के अनुसार हमारे कर्त्तव्य संबंधी विचार दृढ़ होते जाते हैं। दोनों ही एक दूसरे के आश्रय हैं। हमारे देश के अविभक्त कुटुंब, वर्ण-व्यवस्था, आश्रम-धर्म, पाठशालाएँ, उत्सव, रीति-व्यवहार आदि सब ही उपनिषदों द्वारा प्रति- पादित एकात्मवाद की अनुकूलता दिखा रहे हैं। हमारे यहाँ के प्रतिभाशाली तत्ववेत्ताओं ने स्वतंत्र लेखक होने का गौरव अस्वीकार कर अपने को टीकाकारों अथवा भाष्यकारों की नीची कोटि में रखकर ही अपने जीवन को सफल समझा है। गृहस्थाश्रम के धर्म ऐसे रक्खे गए हैं, जिनमें ऐक्य भाष<noinclude></noinclude> jg7rn5s2dtbx7ctgbcisv8eneh34vmz पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३५ 250 194462 664685 2026-07-02T17:42:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664685 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १२२ ] स्वतः ही उत्पन्न होता रहे। यह श्राश्रम बड़ा भारी कर्तव्य- स्थल है। इसीलिये इसकी महिमा भी बहुत है । मनु महान राज ने कहा है- यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः । तथा गृहस्थामाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥ ३ । ७७ यस्मान्योऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम् । गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही ॥ ३ । ७८ ऋषयः पितरो देवा भूतान्यतिथयस्तथा । आशासते कुटुम्बिभ्यस्तेभ्यः कार्ये विजानतः ॥ ३ । ८०० और स्थानों में भी गृहस्थाश्रम की भूरि भूरि प्रशंसा की गई है- न्यायार्जितधनस्तत्वज्ञाननिष्ठोऽतिथिप्रियः | शास्त्रवित्सत्यवादी च गृहस्थोऽपि विमुच्यते ॥ सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता न दुर्भापिणी । सन्मित्रं सुधनं सुयोषिति रतिश्चाज्ञापराः सेवकाः ॥ॐ ● अर्थ --- जिस प्रकार सम जीव-जंतु वायु का श्राश्रय लेकर जीवन निर्वाह करते है, उसी प्रकार इतर सब आश्रम गृहस्थाश्रम के ही सहारे बसते हैं। अन्य तीन वाले लोग गृहस्थ लोगो से ही वह और छान प्राप्त करते हैं, इसलिये गृहस्थ आश्रम और आश्रमो से वहा है। ऋषि, पितर देव, जीवधारी भीर अतिथि सब हो गृहस्थाश्रम का महारा लेते है, इस गृहस्थाश्रमवाले को इनके प्रति अपना धर्म जान कर करना चाहिए । + अर्थ - न्यायपूर्वक धन कमानेवाला, आत्मशान में निष्ठा रखनेवाला, अतिथि- सेवा करनेवाला, शास्त्र को जाननेवाला और निरंतर सत्य बोलनेवाला गृहस्थ भी हो जाता है। अर्थ- -उस गृहस्थाश्रम को धन्य है, जहां आनंददायक गृह है, जहाँ बुद्धिमान पुत्र हैं, जहाँ बी कमाविणी नहीं है, जहाँ अच्छे मित्र हैं, खूब धन है, जहाँ लियों के प्रति प्रेम है, जहाँ नौकर आज्ञाकारी हैं, जहाँ अतिथि सत्कार होता है, जहाँ ईश्वर का पूजनं नित्य होता है, मिठाई आदि भोजन रक्खे रहते हैं, और जहाँ निरंतर ही नों का समागम होता रहता है।<noinclude></noinclude> lccwv9qljwq6hz2irzox64lf88j7sot पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३६ 250 194463 664686 2026-07-02T17:42:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664686 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १९३ ] आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टामपानं रहे। साधोः संगमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥ यदि गृहस्थाश्रम में धन का उपार्जन और दान कर्तव्य माना गया है, तो गृहस्थों का दान स्वीकार करने को और आश्रम भी बना दिए गए हैं। यदि संन्यासियों को धर्मोपदेश देने का भार दिया गया है, तो उनके उपदेश से लाभ उठाने के लिये लोग वर्तमान हैं। यदि संसार की स्थिति बनाए रखना और प्रजोत्पादन करके ऋऋषि ऋण चुकाना धर्म माना गया है, तो उसकी पूर्ति के लिये विवाह की संस्था वर्तमान है। यदि देना धर्म है, तो दान के लेनेवाले भी विद्यमान हैं । यदि समाज का संगठन श्रेय माना गया है, तो उसके लिये राज्य और साम्राज्य वर्तमान हैं। ये सब बातें यह बतलाती हैं कि हमारी सामाजिक संस्थाएँ हमारे श्रदशों के अनुकूल ही बनी हैं और इनके द्वारा हमारे आदर्शों की भली भांति पूर्ति होना संभव है। व्यक्तियों द्वारा यथोचित लाभ न उठाए जाने के कारण बहुत सी संस्थाएँ बिगड़ भी जाती हैं। हम यह मानते हैं कि किसी देश की संस्थाओं का प्रभाव सब मनुष्यों पर एकसा नहीं पड़ता, क्योंकि देखा गया है कि जहां पर बहुत से विवाह करना मना नहीं है, वहां पर भी बहुत से लोग एकपत्नीव्रत को दृढ़तः पाल रहे हैं। और जहां पर कि समाज में एक स्त्री से अधिक रखने की आशा नहीं, वहां पर भी बहुत से लोग इस रिवाज से यथोचित 'लाभ नहीं उठाते। तथापि इस में कुछ संदेह नहीं, कि सामा- जिंक संस्थाएँ हमें कर्तव्य परायण बनाने में बड़ी सहायता देती है, और हमारे आदशों का भौतिक ढांचे की भांति काम करती है।<noinclude></noinclude> ddqtkf22aru8gnqp43bbxaailm839f9 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३७ 250 194464 664687 2026-07-02T17:42:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664687 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १२४ ] जिस प्रकार किसी कार्य को करते करते व्यक्ति का स्वभाव बन जाता है उसी प्रकार सामाजिक संस्थाएँ समाज का स्वभाव है और जिस तरह मनुष्य स्वभाव मामाजिक संस्थाएँ से जाना जाता है, वैसे ही समाज अपनी संस्थाओं द्वारा जाना जाता है। यूनान और धार्मिक उच्चति । देशीय आदर्श वहां की संस्थाओं में वर्तमान थे। हमारे देश के वर्णाश्रम धर्म इस बात को क्याet fair से प्रमाणित कर रहे हैं कि सामाजिक संस्थाएँ मानव जीवन को कहाँ तक बुरा भला बना सकती है । कभी ऐसा भी देखा गया है कि सामाजिक संस्थाएँ समाज के श्रादर्श के अनुकूल नहीं रहतीं। तब ही धर्म का हास होने लगता है। धर्मोद्धार की आवश्यकता पड़ने लगती है, श्रावश्यकता के अनुकूल उनका श्राविर्भाव भी होने लगता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा है कि- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ! अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ समाज के आदर्श को स्पष्ट करना और उससे संस्थाओं की संगति करना ही धर्मोद्धारक का मुख्य कर्तव्य होता है। यह कार्य धर्मोद्धारकों के ही वांटे में नहीं पड़ा, वरन् प्रत्येक छोटे से छोटा मनुष्य भी पूरा धर्मोद्धारक है। इसलिये उस का कर्तव्य है कि समाज के श्रादश की, उसके धर्मों की श्रीर संस्थाओं की एकता करके, और अपने आदर्श को समाज के आदर्श में मिला कर और अन्यान्य आदर्श और संस्थाओं के अनुकूल अपने कर्मों को बना कर समाज में अपनी पू श्रात्म-प्रतीति करे।<noinclude></noinclude> 3h1ldldxhpbjug2jvxbmqavhl2rcxtg पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३८ 250 194465 664688 2026-07-02T17:43:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664688 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सत्य के अत का विस्तार [ १२५ ] ... इस अध्याय की समाप्ति के पूर्व समाज की व्याप्ति पर विचार कर लेना आवश्यक है। यदि समाज का संकुचित अर्थ माना जाय, तो उसकी व्याप्ति किसी विशेष संप्रदाय के लोगों से बाहर नहीं जाती, किंतु उसके निस्तार का अंत नहीं हो सकता। घर से लगा कर मानव जाति तक समाज का घेरा है। क्या हम इस बेरे को और नहीं बढ़ा सकते हैं ? क्या पशु पक्षी और कीट पतंगों को भी हम अपने समाज में सम्मिलित कर सकते हैं ? इसके उत्तर में कहा जायगा कि जिन जीवों का इतना विकाश हुआ है कि वे हमारी गोष्ठी में सम्मिलित किए जय वे उसमें सम्मिलित किए गए हैं। मनुष्य और जानवरों का क्या संग ? समाज के व्यक्तियों में एक दूसरे को सहा- यता देने का पारस्परिक भार रहता है। मनुष्य और पशुओं में पारस्परिक संबंध नहीं हो सकता है, इसलिये उन्हें मनुष्य समाज में स्थान देना असंभव है। इस विषय में एक और भी बाधा उपस्थित हो सकती है, कि समाज में व्यक्तियों का संबंध " होता है और बहुत से जानवरों में व्यक्तित्व स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ता। इन तीनों बाधाओं पर थोड़ा विचार कर लेना आव श्यक है। विकाश की श्रेणी में पशु पक्षी अवश्य नीचा स्थान पाते हैं, किंतु क्या यह बात उनको हमारी दया, अनुकंपा और सहायता से वंचित रखने के लिये ठीक है? यदि विचार- पूर्वक देखा जाय, तो मनुष्य समाज में भी विकाश की कई श्रेणियाँ हैं, किंतु श्राजकल की सभ्यता में सब का जीवन- मूल्य बरावर समझा जाता है । सभ्य मनुष्य के मारने पर भी फांसी होती है और असभ्य, जंगली मनुष्य, पागल वो बालक के मारने पर भी वही दंड दिया जाता है ? क्या यह जीवन-<noinclude></noinclude> 2pk9k1bo7b5m99m2cne97rj2ryjri43 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१३९ 250 194466 664689 2026-07-02T17:43:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664689 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १२६ ] सम्मान ( Respet for life ) मनुष्य-समाज में ही संकुचित रखना चाहिए? क्या अपने विचार में जीवन की श्रृंखला पीछे नहीं हटाई जा सकती ? क्या हम उसी जीवन-श्रृंखला की एक कड़ी नहीं, जिसके कि पशु पक्षी हैं ? क्या जानवरों को जीवित रहने का वहीं नैतिक अधिकार नहीं जो हम लोगों को है ? क्या उनका मूल्य उनके समाज में उतना ही नहीं जितना कि हमारा मूल्य हमारे समाज में है ? दांपत्य- प्रेम तो कहीं कहीं जानवरों में मनुष्यों ही के बराबर देखा गया है। क्या पशु पक्षी कीट पतंग इस विश्व के कार्य विभाग में स्थान नहीं पाते ? क्या विकाश-वाद के मत से जीव-धारी मात्र एक कुटुंब के नहीं हैं ? पशु पक्षी कीट पतंग संसार के कार्य विभाग में अपना अपना काम कर रहे हैं। वृक्षों के फल- वान होने में पक्षी कीट पतंग कहांतक साहाय्य देते हैं, यह - बात किसी विश पुरुष से छिपी नहीं है । हम जिन श्रेणियों द्वारा विकाश को प्राप्त हुए, अब ऊँचे बन कर उनका तिरस्कार करना हमारी उच्चता को शोभा नहीं देता। दूसरी बाधा पर विचार करते हुए हम केवल इतना ही कहेंगे, कि बदले का व्यवहार कानून की दृष्टि में चाहे आवश्यक हो, किंतु धर्म और कर्त्तव्य दृष्टि से यह बाहर है। कर्त्तव्य पालन द्वारा हम को सद्गुण- वृद्धि तथा आत्म-तुष्टि सरीखे मधुरतम फल मिलते हैं। यदि बदले की रीति से देखा जाय, तो भी मनुष्य अपना सिर ऊँचा नहीं कर सकता। पशुओं से जो मनुष्य जाति का उपकार हुआ है, वह हिंसक पशुओं द्वारा पहुँचाई हुई हानि से अधिक है। खैर, इस बात को जाने दीजिए। मनुष्य समाज ने हिंसक पशुओं से बदला लेने में कुछ रख नहीं छोड़ा। केवल इतना ही नहीं वरन और पशु भी, जो मनुष्य जाति<noinclude></noinclude> ei9etgi54sek2kfvcfkv2xf9eeblsve पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४० 250 194467 664690 2026-07-02T17:43:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664690 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१७] की हानि करते हैं, मनुष्य द्वारा उचित दंड पाए बिना नहीं रहते। फिर मनुष्य को क्या अधिकार है कि. वे. निरपराध पशुओं को सतावें ? वे तो बदला ले नहीं सकते । पारस्परिक उपकार का एक प्रकार से प्रश्न भी नहीं उठता। पशु-संसार मनुष्य से उपकार नहीं चाहता, वह तो अभयदान चाहता है। वह सहायता नहीं चाहता, केवल इतना ही चाहता है, कि मनुष्य अपनी हननेच्छा को थोड़ा वश में रक्खे। मनुष्य की उनके प्रति इतनी ही सेवा पर्याप्त है, कि वह उन्हें जीवित रहने दे। वे ऐसी सेवा चाहते हैं, जैसी कि निषाद ने श्रीरामचंद्र को अपनी सेवा बतलाई थी, कि 'यह हमार अति बड़ि सेवकाई । लेहिं न भूषण बसन चुराई'। तीसरी कठिवाई, जो व्यक्तिता के विषय में है, पहली कठिनाई से मिलती जुलती है। व्यक्तिता की भी श्रेणी है। माना कि पशु पक्षियों की व्यक्तिता मनुष्य की भांति स्पष्ट नहीं है और न उनमें मनुष्य का सा आत्म-भाव ( Persona- lity) ही वर्तमान है, किंतु उनमें व्यक्तिता और श्रात्म-भाव किसी न किसी अंश में हैं श्रवश्य। उनकी व्यक्तिता उस पौधे की भांति है, जो थोड़ा ही बढ़ कर रह गया है। यदि जान- ata मनुष्य की ऐसी व्यक्तिता और श्रात्मभाव वर्तमान होता, तो उस अवस्था में वे मनुष्य की बराबरी का ही दावा कर सकते थे। किंतु इस अवस्था में क्या वे जीवन दान की भी आशा नही रख सकते ? के मनुष्य की बराबरी नहीं चाहते, वे मनुष्य की राजनैतिक सभाओं के सदस्य नहीं होना चाहते, जिसके लिये उनकी मानसिक योग्यता पर विचार किया जाय। वे तो जीवधारी हैं, इसीसे केवल जीवित रहने का अधिकार चाहते हैं? इन सब बातों पर विचार करके हम<noinclude></noinclude> lptjw7pt4fhh6nmh8lnblfavpwfppfv पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४१ 250 194468 664691 2026-07-02T17:43:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664691 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १२८ ] अपने समाज की सीमा को प्राणिमात्र तक बढ़ा दें, तो हम अपनी सची श्रात्म-प्रतीति के सच्चे सहायक ही बनेंगे। समाज को इस विस्तृत दृष्टि से देखने के लिये हमको अपने आत्म संबंधी विचारों को भी विस्तार देना होगा। जैसे जैसे हमारे आत्म-संबंधी विचार विस्तृत होते जाते हैं, वैसे ही हमारी श्रात्म-प्रतीति का क्षेत्र बढ़ता जाता है। जो लोग अपनी व्यक्तिता में ही अपनी आत्मा को संकुचित कर देते हैं; उनकी श्रात्म-प्रतीति स्वार्थ साधन में ही होती है। किंतु हम उसे श्री आत्म-प्रतीति नहीं कह सकते। सच्ची आत्म-प्रतीति तब ही हो सकती है, जब हम अपनी श्रात्मा को पूरा विस्तार दे कर समष्टि की आत्मा से मिला दें और समष्टि के हित को अपना हित समझें । यह बात कठिन नहीं है। बहुत से लोग आत्म-कल्याण को देश के हित-साधन में देखते हैं, और बहुत से इससे भी आगे बढ़ कर अपने हित को साम्राज्य के हित में मिला देते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं, जो मनुष्यमात्र का हित और अपना हित एक कर देते हैं। इससे भी एक ऊँची श्रेणी प्राणिमात्र से अपनी एकता करनेवालों की है। हिंदू धर्म-ग्रंथों ने अधिकतर इसी विस्तृत भाव का उपदेश दिया है। स्मृति ग्रंथों में अतिथि सत्कार के साथ जानवरों को भी भाग देना गृहस्थों का धर्म बतलाया है ' सर्वभूतहितेरतः ' ' जीवेषु दयां कुर्वति साधवः निर्वैरः सर्वभूतेषु 'आत्मवत् सर्व भूतेषु यः पश्यति स पश्यति इत्यादि वाक्यों द्वारा कर्तव्य को मनुष्य-समाज से बढ़ा कर प्राणि- मात्र के प्रति कर दिया है । यही पूर्ण आत्म-संभावन वा श्रात्म-प्रतीति है । , . कुछ लोग इस विस्तृत दृष्टि पर यह शंका अवश्य उठावेंगे<noinclude></noinclude> g0hnkzmh4lgbh10lx1w8kao0bn6v8ap पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४२ 250 194469 664692 2026-07-02T17:43:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664692 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. समाज की व्याप्ति बढ़ाने मे संभावित आपत्तियाँ और उनका निरा- चरण । LAJ कि जो लोग अपने दृष्टिकोण को इतना विस्तृत कर देंगे उनको कोई भी पदार्थ स्पष्टतः न दिखाई पड़ेगा। जो लोग सब के हित में तत्पर रहते हैं, वे किसी के भी हित-साधन में सफल नहीं होते कभी कभी ऐसा भी होता है, कि निकटवर्तियों के हित में और मनुष्य मात्र के हित में विरोध पड़ जाता है, और जिनके प्रति हमारा मुख्य कर्त्तव्य है, वे हमारी उदारता से वंचित रह जाते हैं, इस लिये प्राणिमात्र के हित-साधन की इच्छा न करते हुए समाज के एक परिमित भाग का ही हित-साधन श्रेय है। यह शंका क्रियात्मक है। इस शंका से हमारे सिद्धांत के न्याय्य होने में बाधा नहीं पड़ती। कर्तव्य बुद्धि से भी विचार कर लेना चाहिए। इस शंका के उठानेवाले स्वार्थ पर पूर्णतया विजय नहीं प्राप्त कर सकते। व्यवहार में स्वार्थ को जीतना कठिन है, किंतु यह बात 'किसी सिद्धांत की सत्यता में शंका का मूल इस विचार में धर्ती लोग उसके उपकार से है अब इस पर बाधा नहीं डाल सकती। इस कि उपकारी मनुष्य के निकट- लाभ उठाने के अधिकारी हैं। अँग्रेज़ी में एक लोकोक्ति है कि 'Charity begins at homes अर्थात् दान का आरंभ घर से ही होना चाहिए। किंतु इसके ऊपर किसी ने यह भी कहा है 'But it should not end there' अर्थात् उसका अंत घर में ही न हो जाना चाहिए। हमारे कहने का यह मतलब नहीं कि घर के लोग भूखों मरे और बाहरवालों को धन लुटाया जाय, किंतु इतना अवश्य मानना पड़ेगा, कि जो स्वार्थ त्याग, श्रात्म- समर्पण और उदारता के मुख मनुष्यमात्र के लिये उदारता &<noinclude></noinclude> qi93g3wuwzptcby68zop3ftmja2wr2e पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४३ 250 194470 664693 2026-07-02T17:43:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664693 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १३० ] दिखलाने में बढ़ते हैं, वे निकटवर्ती लोगों के साथ दिखाने मैं नहीं बढ़ते । forced लोगों के साथ उपकार करने में एक प्रकार का उदात स्वार्थ लगा रहता है। * वाइबिल में ईसा मसीह ने डाकुओं द्वारा आहत एक मनुष्य का श्राख्यान कहते हुए बतलाया है कि 'तेरा पड़ोसी वही है, जिसके साथ तू उपकार कर सके ।' जब हम अपना स्वार्थ छोड़ कर "वसुधैव कुटुंब- कम्" [" के सिद्धांत को मानने लगेंगे, तब समीप और दूर के लोग बराबर हो जायँगे। यह अवश्य मानना पड़ेगा, कि कोई एक मनुष्य सारे विश्व का उपकार नहीं कर सकता। वह अपने निकटवर्ती लोगों के साथ ही उपकार करेगा। किंतु उपकार करते समय, जिस बुद्धि से कार्य किया जाय, उसमें ही स्वार्थ और परार्थ हो जाता है। जब हम किसी का उप- कार स्वार्थ बुद्धि से करते हैं, तब हम स्वार्थी हैं, किंतु जब स्वार्थ त्याग कर किसी का उपकार करते हैं, तब हम विश्व काही हित साधन करते हैं। जिस मनुष्य का हम उपकार करते हैं, वह विश्व का एक अंग है और अंग अंगी से पृथक नहीं । जो हमारी किसी अँगुली पर मरहम लगावे, तो वह हमारे सारे शरीर की ही सेवा करता है। हम उपकार चाहे जिसके साथ करें किंतु हमारी बुद्धि निस्वार्थ होनी चाहिए। यदि हम निकटवर्ती लोगों के साथ उपकार कर रहे हैं, और कोई ऐसा अवसर था जाय, कि दूर का मनुष्य हमारी सहा- aar की आवश्यकता रखता हो, और उसको सहायता पहुँ- बना संभव भी हो और हम उसकी सहायता न करें, केवल * करत सुलमाचार अध्याय १० । ३०-३७<noinclude></noinclude> kjw6x11svzfigrampgj0tflve8qqvlp पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४४ 250 194471 664694 2026-07-02T17:44:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664694 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १३१ ] इस विचार से, कि उस मनुष्य से हमारा कोई संबंध नहीं, तो हम को विश्व-हित के विरुद्ध जाना होगा। यदि यह कहा जाय कि देश हित और मानव जाति के हित में कभी कभी विरोध पड़ता है, अथवा कुटुंब के हित और समाज के हित में विरोध पड़ता है, तो क्या ऐसी अवस्था में विस्तृत दृष्टि हो श्रेय है ? देखा गया है कि, बहुत से बड़े बड़े आदमियों ने देश- हित के लिये कुटुंब के हित को तिलांजलि दी है। राज- कीय आईन की मान-मर्यादा रखने के लिये अपने पुत्र वा निकटवर्ती कुटुंबियों को प्राणदंड तक दिया है । अपनी रक्षा कुटुंब की रक्षा से है, कुटुंब की रक्षा देश की रक्षा से है. देश की रक्षा मानव-जाति की रक्षा से है और मानव जाति की रक्षा विश्व की स्थिति में हैं। अभी जो देश और मानव- जाति के हित में विरोध पड़ा करता है, उसका कारण यह है कि मानव समाज में अभी भिन्न भिन्न आदर्श वर्तमान है। जैसे जैसे आदर्शों की एकता होती जायगी और जैसे जैसे मनुष्य समाज एक प्रेम-सूत्र में बँधती जायगी, वैसे ही देश-भक्ति और विश्व-प्रेम में विरोध घटता जायगा। मानव-जाति का एक बड़ा साम्राज्य बन जायगा, जिसमें पशु पक्षी आदि भी अपना उचित स्थान पायेंगे। एक नियम बद्ध होने से विरोध घट जाता है। मनुष्य-समाज इस आदर्श की ओर जा रहा है। इस आदर्श की पूर्ति में योग देना प्रत्येक मनुष्य का धर्म है। एक नियम और श्रादर्श में बद्ध समाज में रह कर ही सच्ची आत्म- प्रतीति की संभावना है। जो इस संभावना को वास्तविकता में परिणत करने की चेष्टा करते हैं, वे उस चेष्टा में अपनी आत्म- प्रतीति कर रहे हैं। इस अध्याय में कर्तव्य के स्थल का वर्णन हो चुका। अगले अध्याय में यह बतलाया जायगा कि हमारा<noinclude></noinclude> hbfnz8vp8k3m3uxk8y35531zy4myqg6 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४५ 250 194472 664695 2026-07-02T17:44:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664695 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १३२ J श्रदर्श हमारे सामाजिक धर्मों में किस प्रकार घट सकता है,: और हमको अपने कर्तव्य में किन किन बातों को स्थान देना चाहिए । जब समाज में रह कर और समाज के हित से अपना हित मिला देने ही में श्रात्म-प्रतीति की श्राशा है, तो समाज प्रतिष्ठित धर्मों को अपने आदर्श में घटाना श्रावश्यक है।<noinclude></noinclude> cwi3i3btve9r34fe5hsrmcyhsqve0n3 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४६ 250 194473 664696 2026-07-02T17:44:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664696 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ग्यारहवां अध्याय कर्तव्य परायण जीवन । जो कार्य कि व्यष्टि में समष्टि और भेद में अभेद का ज्ञान कराने में योग देते हैं, वेही कार्य श्रेय हैं और जो भेद को बढ़ानेवाले हैं, वेही हेय हैं। यह सिद्धांत कर्तव्य आदर्श पूति । पालन प्रत्येक देश और अपने मानसिक विकाश आए हैं। सब देशों की का मूल है। इसका काल के लोग अपने के अनुकूल भिन्न भिन्न रीति से करते श्रचार पद्धति एकसी नहीं है यह भेद उन देशों के निवासियों के मानसिक विकाश में भेद होने के कारण होता है। जैसे जैसे ज्ञान बढ़ता है, वैसे ही वैसे मनुष्य-समाज में इस आदर्श को पालन करने की योग्यता प्राप्त होती जाती है। श्रादर्श एक ही रहता है किंतु उसकी पूर्ति के साधन ज्ञान के विकाश एवं भिन्न भिन्न जातियों की मानसिक भौतिक और राजनैतिक अवस्थाओं के अनुकूल बदलते रहते हैं। हमारा आदर्श ऐसा नहीं कि जिसे हम एक साथ प्राप्त कर लें। उसकी उत्तरोत्तर प्राप्ति होती रहती है। जो कार्य इस कार्य की पूर्ति में जितना योग देते हैं उतने ही वे कर्त्तव्य-दृष्टि से श्रेय समझे जाते हैं। किंतु किसी कार्य की नैतिक योग्यता के ऊपर विचार करने से पूर्व हमको कर्त्ता की मानसिक अवस्था और उसकी जातिवालों की रीति रिवाज और सभ्यता उपस्थित हो जायगी। ऐतिहासिक विषयों के समझने में भी हमको इस नियम के ऊपर ध्यान रखना श्रावश्यक है।<noinclude></noinclude> 50gk4tmiod5z26kkfkmh7iagxp4psh5 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४७ 250 194474 664697 2026-07-02T17:44:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664697 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १३४ ] अब यह देखना है कि, हमारे भारतवर्ष में जो आचार पद्धति भिन्न भिन्न ऋषियों ने प्रशस्त की है, वह कहां तक इस आदर्श के अनुकूल पड़ती है। कोई सिद्धांत पूर्णतया तब ही समझ में आता है, जब कि हम यह जान लें, कि वह व्यवहार में किस प्रकार लागू होता है। भारतीय आचार पद्धति । महाभारत के शांति पर्व में सत्य के तेरह रूप बतला कर निनोलिखित श्लोकों में एक अच्छी आचार-पद्धति बतलाई है- सत्यं च समता चैव दमैश्चैव न संशयः । अमात्य क्षमो चैव 'हीस्तितिक्षाऽनसूयता ॥ त्यांगो ध्यानमर्थवं धृति सततं दया । अहिंसां चैव राजेन्द्र ! सत्याकारत्रयोदशः ॥ शान्तिपर्व १६२ । ८,९० ● मनु महाराज ने नीचे के लोक मे धर्म के दश लक्षण बनल है । धृतिः क्षमा दमोऽस्तेय शौचमिन्द्रियनिग्रहः । विद्या मत्यमक्रोधो दशक धर्मलक्षणम् ॥ धर्म के इन लक्षणों के ऊपर विचार करने से ज्ञात होगा कि ये सब लक्षण भी हमारे आदर्श के अनुकूल ही है। इनमे से अधिकांश लक्ष्यों का वर्णन महाभारत के शोको की व्याख्या करमे में आही गया है जो शेष रह गए उनमे स्वयं ही हमार आदर्श की व्याप्ति देख लेंगे। प्लेटो (४२७ - ३४२ ) ने चार मुख्य धर्म अथवा सदगुण (Cardinal Virtures) माने है। उनके नाम ये है दम (Temperence) भरना (Courage) शान (Wisdom) न्याय (Justice)। कुछ लोगो का विचार यह है कि इनमें मं महले तीन हमारे मन की तीनों प्रवृत्तियों से संबंध रखते है और चोथे गुण में सब गुणों का योग हो जाता है। ले ने अपनी Republic नामक पुस्तक में न्याय का वन अच्छा दिया है। ये सब गुण समाज में भी लगाए गए हैं और व्यक्ति में भी समाज के संबंध मे न्याय प्रत्येक जाति के लोगों को स्वस्थानोचित धर्म में चलाना है।<noinclude></noinclude> l8yk1eu5uikonze0tdaimmuu5q3qz7c पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४८ 250 194475 664698 2026-07-02T17:44:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664698 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १३५ ] अर्थात् सत्य, समता, दम, वृथाभिमान का अभाव, क्षमा, लज्जा, तितिक्षा, डाह का न होना, आर्यत्व अथवा दूसरों के प्रति श्रेष्ठ व्यवहार, धीरता, दया और अहिंसा, हे राजेंद्र ! सत्य के ये तेरह रूप हैं। इनमें से पांच धर्म ( दम श्रमा- त्सर्य ही धृति तितिक्षा) का संबंध विशेष करके कर्त्ता से है, बाकी जो शेष रह गए उनका संबंध समाज से है। बहुत से कर्त्तव्यशास्त्र-वेत्ताओं ने धर्म अथवा सद्गुणों (Virtues) के दो विभाग किए हैं। कुछ गुण Self-regarding अर्थात् खसं- बंधी माने गए हैं और कुछ पर-संबंधी Other-regarding माने गए हैं। विचार-दृष्टि से देखने पर यह भेद अनावश्यक प्रतीत होगा। समाज में ऐंद्रिक संबंध होने के कारण खपर के बीच की रेखा मिट सी जाती है। क्या कर्त्ता की धीरता, ही और तितिक्षा से समाज को लाभ नहीं पहुँचता और क्या दया और समता से कर्त्ता की आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती ? अब क्रमशः सत्य के इन रूपों पर विचार किया जायगा । - सब से पहले तो यह विचारने योग्य है कि सत्य को सदा- चरणों की गणना में सब से ऊँचा स्थान क्यों मिला और इन सब आचरणों को सत्य का रूप ही क्यों कहा ? इसका कारण यह है कि सब सत्कर्मों का उदय विचार में होता है। व्यक्ति के संबंध में वह गुण नीची प्रवृत्तियों को बुद्धि के अनकूल बनाने से प्राप्त होता है। अरस्तू (३८४-३२२ ) ने इन गुणों में आत्मगौरव, उदारता, नगवा, मित्रता, सत्य, वाक्पटुता आदि गुणों को जोड़ कर अपनी गुणगणना को तात्कालिक यूनानी समाज के अनकूल बना दिया था इसाई धर्म ने गहरी गुणों की ओर विशेष ध्यान न देते हुए आंतरिक शुद्धि, आशा, अद्धा, दया यादि आंतरिक गुणों की घोर अधिक ध्यान दिया। दिचार करने पर वे गुह हमारे आदर्श में घटाए जाते हैं।. 1<noinclude></noinclude> p6gjy9q05uef29h9gwd5a7h92k1fbcn पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१४९ 250 194476 664699 2026-07-02T17:45:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664699 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १३६ ] और विचारों की एकता अथवा साम्य को ही सत्य कहते हैं। सत्य हमारे आदर्श के अनुकूल ही नहीं, वरन वह उसका रूपांतर ही है। सत्य का अर्थ 'साम्य' है और साम्य ही सव श्राचरणों का मूल है। अब जरा विचारिए कि, सत्य से किस प्रकार भेद में अभेद दिखाई पड़ता है । हम किसी बात को सत्य तच ही कहते हैं, जब कि किसी विषय में सब लोगों का एकसा अनुभव हो अथवा व्यक्ति के त्रिकाल - सिद्ध अनुभव में भेद न हो । सत्य ही भेद का नाशक है सत्य से बढ़ कर भेद और विद्रोह का नाश करनेवाला कोई नहीं। दो प्रतिद्वंदी दल, जो कि लड़ने को खड़े हों, एक दूसरे के साथ चाहे जितना द्रोह रखते हों, किंतु सत्य में उनकी भी एकमनस्कता है। हमारे इस सिद्धांत में सत्य के अपवादों को भी उचित स्थान मिल जायगा। साधारणतया सत्य में अपवादों के लिये स्थान नहीं । 'सत्यमेव जयते' प्रायः सब ही स्थलों में बैठता है । सत्य के बाद समता है। यह भी थोड़े बहुत अंतर में सत्य के साथ सत्य के बराबर ही व्यापक धर्म है। समता तो स्वयं अभेद ही है। सत्य, विचार और क्रिया दोनों ही में होता है और समता विशेष कर क्रिया से संबंध लगाती है । क्रिया में समता की बड़ी महिमा है। गीता में पूर्व- वर्णित आदर्श से संगति रखते हुए सब के साथ समता का व्यवहार रखना बतलाया है। कहा है कि-- विद्याविनयसंपन्ने, ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । निचैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ + + विद्वानों, चिनीलों, ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चांडाल को समि देखनेवाले पंडित है। T<noinclude></noinclude> fwzz8ztmi7hl1nzhpg01ioy71j2ph8i पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५० 250 194477 664700 2026-07-02T17:45:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664700 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १३७ १ इससे अधिक और विस्तृत समता की व्याख्या क्या हो सकती है ? समता ही सारी सामाजिक, राजनैतिक श्रीर धार्मिक उन्नति का मूल है। यह आदर्श पूर्व में बहुत प्राचीन काल से लाया गया है। हमारे देश में यह सिद्धांत जितना प्राचीन और जितना विस्तृत रूप से वर्तमान है, वैसा शायद किसी भी देश में न हो। हमारे यहां समता का सिद्धांत पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों तक उपयुक्त किया गया है। यही समता दया, अहिंसा आदि सद्गुणों का मूल है। इस पर दो लोक भी हैं-- प्राणा यथात्मनोऽमीष्ठा भूतानामपि ते तथा । आत्मोपम्येन भूतेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ॥ प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये । आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ।। * जिस प्रकार श्रात्म रक्षा मुझ को प्रिय है उसी प्रकार वह सब के ही लिये प्रिय है। अतएव हमको अपनी आत्म-रक्षा की ऐसी सीमा रखनी चाहिए, जिससे औरों की आत्म-रक्षा में बाधा न पड़े। यही दया और अहिंसा का उद्देश्य है। समता की दृष्टि से सब को देखने में द्वेषाभाव तथा कलह-- शांति हो जाती है। जहाँ मनुष्य को यह विचार होता है कि, शायद मैं भी ऐसी स्थिति में ऐसा कर बैठता वहीं विरोध की शांति और क्षमा का उदय हो जाता है। क्षमा भी समता का ● जिस प्रकार जीवन हमको अभीष्ट है वैसे ही और प्राणियों को भी है, अतः महात्मा पुरुष अपनी तरह समस्त प्राणियों पर भी दया करते हैं। हित अनहित में, सुख दुःख में, दान और प्रशंसा आदि में अपनी स्वतः की वशः को विचार कर काम करनेवाला मनुष्य ही विश्वास योग्य होता है। + इस सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या 'प्रेम-मंदिर धारा से प्राप्य शांति-धर्म में देखिए ,<noinclude></noinclude> q5yq9rt3j7q8vc87x8lr11bxwclb1i3 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५१ 250 194478 664701 2026-07-02T17:45:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664701 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१३] ही रूप है। जो लोग सबको श्रात्म-रूप ही देखते हैं, वे दूसरों को क्षमा करने के लिये सदा तत्पर रहते हैं। जब सब अपने ही रूप हैं, तो प्रति-हिंसा कहाँ ? प्रति-हिंसा तो दूसरे ही के साथ होती है । प्रति-हिंसा न करने को ही क्षमा कहते हैं। समता के साथ दया, अहिंसा और क्षमा सब ही श्र जाते हैं। क्षमा भी प्रति-हिंसा का अभाव होने के कारण अहिंसा का ही रूप है। दम का स्थान ऊपर बताया गया है। प्रवृत्तियों को बुरी ओर से हटा कर ठीक ओर लगाने को ही दुम कहते हैं। दम से स्वार्थ-मूलक प्रवृत्तियों का नाश होता है । तव दम भी अभेदत्व प्राप्त करने में सहायक है। श्रमात्सर्य वृथा अहंकार के अभाव को कहते हैं । वेदांस का सिद्धांत, जिसे कि हम क्रिया में परिणत करना चाहते हैं, अहंकार को तो समूल ही नाश करता है । अभेद-दृष्टि से देखने में दंभ और अहंकार नष्ट हो जाते हैं। अर्थात् लज्जा भी श्रमात्सर्य का दूसरा रूप है। ह्री का ठीक अर्थ अँग्रेज़ी में Modesty - होगा। जब मनुष्य संसार में एकता और व्यक्तियों की अन्योन्याश्रयता का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह अपने किए हुए कर्म की वृथा डींग नहीं मार सकता। उसको अपनी डींग मारने में अवश्य लज्जा आवेगी। ही से ही विनय का उदय होता है। महात्मा तुलसीदास जी ने श्रीरामचंद्र के दान देते समय के विनय का जो वर्णन किया हैं, वह बड़ा शिक्षा-प्रद है । तितिक्षा वा सहनशीलता भी आत्मैकभाव को बढ़ाती है। संसार भर के झगड़े इसी के प्रभाव से होते हैं। जो लोग दूसरों की बात को सहन कर सकते हैं, वे दूसरों को सचमुच दूसरा ही समझते हैं। तितिक्षा द्वारा दूसरे भी अपने बना लिए जाते हैं। जो लोग तब<noinclude></noinclude> 006uvu3rgcj8pudinefvvzc0jnr4zv7 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५२ 250 194479 664702 2026-07-02T17:45:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664702 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१३६ ] दुःख नहीं सह सकते हैं, वे दूसरों का उपकार क्या करेंगे ? दुःख सह कर ही ऐक्य भाव बढ़ता है। अनसूयता डाह के अभाव को कहते हैं। डाह तभी तक है, जब तक भेद है। भेद नाश हो जाने पर डाह रहती ही कहाँ ? त्याग तो अभेद-दृष्टि का स्वाभाविक फल है ही । दान वेदांत की भित्ति पर ही ठहर सकता है। वेदांत की दृष्टि से परार्थ स्वार्थ बन जाता है। इसी का नाम दान अथवा त्याग है। आर्यत्व ( Gentlemanliness) बड़ा ही व्यापक शब्द है। श्रात्मौपम्य दृष्टि से देखने पर सब के साथ व्यवहार में सुष्टुता आ जायगी। धृतिः अथवा धीरता बड़ा उत्तम गुण है इसका अभाव स्वार्थ में है। जब स्वार्थ की मात्रा अधिक हो जाती है, तबही अधीरता प्राप्त होती है। श्री- रता का कारण अल्पज्ञान भी होता है । अभेद दृष्टि से देखने में स्वार्थ और ज्ञान दोनों ही का नाश हो जाता है और "धैर्य का गुण आप से श्राप बढ़ने लगता है । ' ऊपर की आलोचना से पाठकों को विदित हो गया होगा कि सब धर्मों का मूल भेद में अभेद देखना है। किंतु इससे यह नः अनुमान कर लेना चाहिए कि मूल मिक बनने की हाथ आजाने से सब वृक्ष ही मिल जायगा ! बीज के खाने से फल का स्वाद नहीं आता ! आवश्यकता भेद में अभेद का जो सात्विक : शान है, वह जिस प्रकार सब सदाचरणों का कारण है, उसी प्रकार उनका कार्य है। इसीलिये मनुष्य को कर्त्तव्य-परायण जीवन की आवश्यकता है। यह ज्ञान | ऐसा पदार्थ नहीं कि एक साथ गड़े हुए खजाने की तरह हाथ में था जाय और<noinclude></noinclude> knq60smd3z36jhv45w4n3z05yd9m4i7 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५३ 250 194480 664703 2026-07-02T17:45:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664703 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १४० ] एक वार प्राप्त कर लेने पर मनुष्य की इतिकर्त्तव्यता हो जाय। इस ज्ञान की प्राप्ति उत्तरोत्तर होती रहती है। प्रत्येक सत्कार्य इस ज्ञान को बढ़ाता है। ज्ञान अनुभव से ही प्राप्त होता है और अनुभव के लिये क्रिया परमावश्यक है। जो लोग सत्कार्यों के बिना ही ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, वे उसको बिना उचित मूल्य दिए खरीदना चाहते हैं। ज्ञान से सदाचरण और सदाचरण में ज्ञान। इसलिये ज्ञान-जिशासुश्र को क्रिया से उदासीन न होना चाहिए | हमारे जीवन में धर्म और काम का स्थान हमारी क्रियाए मुख्यतः तीन ओर जाती हैं, धर्म (Reli- gion or Ethics ) अर्थ ( Economics ) और काम (Aesthetics) | अब इतना विचार करना अवशेष रहा कि कर्त्तव्य-परायण मनुष्य को अपने जीवन में इनको क्या स्थान देना चाहिए। इसमें “ सर्वमत्यंत गर्हितम् " क नियम पालन करते हुए, यह विचार करना चाहिए कि धर्म में तो व्यक्ति को अप्रधान करके समष्टि की सेवा करनी पड़ती है। अर्थ में समष्टि को अप्रधान बना कर व्यष्टि की सेवा करनी होती हैं और काम में व्यष्टि और समष्टि दोनों ही की दृष्टि रहती है, किंतु व्यष्टि की दृष्टि को प्रधान रखा है। समाज का पेंद्रिक संबंध दिखाते हुए यह बतलाया गया था कि व्यष्टि के हित में समष्टि का हित है और समष्टि के हित में व्यष्टि का जो लोग उचित मात्रा मैं स्वार्थ साधन करते हैं, उनसे व्यष्टि में हानि नहीं पहुँचती, किंतु व्यष्टि अथवा व्यक्ति का पूर्ण हित समष्टि के हित में ही है। इसलिये धर्म का आचारण मुख्य माना है, किंतु अर्थ और काम का धर्म से कोई स्वाभाविक विरोध नहीं। इसी<noinclude></noinclude> lnnt9cmd6sd0fhptufo0mdcomcqysm0 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५४ 250 194481 664704 2026-07-02T17:45:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664704 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १४१ ] लिये, जहां तक ये एक दूसरे के वाचकन हो, वहां तक ये सब ही चेष्टा के विषय हैं। साधारणतया धर्म, अर्थ काम तीनों ही के लिये कर्त्तव्यपरायण मनुष्य को अपने जीवन में उचित स्थान देना चाहिए। किंतु जब तीनों में प्रतिद्वंदता हो, तब धर्म ही को प्रधानता दी जायगी, क्योंकि धर्म की तीनों से अधिक विस्तृत दृष्टि है। वह समष्टि में ही व्यष्टि का हित देखता है। जिस प्रकार साधारणतः समष्टि के हित में विरोध नहीं, वैसे ही धर्म, अर्थ और काम में विरोध नहीं है। जब किसी एक की मात्रा अधिक हो जाती है, तब ही विरोध पड़ता है। इसलिये इस बात को देखते हुए, कि ये तीनों एक दूसरे के विरोधी तो नहीं हैं, तीनों ही का आचरण करना चाहिए। नारद जी ने युधिष्ठिर से कुशल प्रश्न करते हुए यही पूछा है, कि कदाचित् अर्थ से धर्म की हानि तो नहीं होती और धर्म से अर्थ की अथवा दोनों की हानि काम से तो नहीं होती ? कच्चिदर्थेन वा धर्मे धर्मेणार्थमथापि वा । उभौ वा प्रीतिसारेण न कामेन प्रबाधते ॥ सभा ६११८ • मयदा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी ने भी भरत जी से प्रश्न करते हुए धर्म अर्थ और काम सीमों को ही उचित मात्रा में सेवन करने का उपदेश दिया है। दर्थेन वा धर्म धर्मेण वा पुनः । उभौ वा प्रीतिलोभेन कामेन न विवायसे ॥ द व कामं च धर्मच जयतामरः । विभज्य काले कालच सर्वान्वरद सेयसे ॥ वाल्मी० रा० अयोध्याकांड स० १०० लो० ६२, ६३<noinclude></noinclude> 4he4su8nje5cs7w6gvom6ww36nqy2io पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५५ 250 194482 664705 2026-07-02T17:46:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664705 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १४२ ] आदिपर्व में भी इसी सिद्धांत को कहा है; स समं धर्मकामार्थान् सिषेवे सुमनीषिभिः । त्रीणि वात्मसमान्यन्धून्नीर्तिमानिव मानमन् ॥ इस लिये कर्त्तव्यपरायण मनुष्य को अपने जीवन में अर्थ और काम को उचित स्थान देते हुए सदा धर्म का ही आचरण करना चाहिए | ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! + उस राजा ने महषियों के साथ धर्मार्थ काम अर्थात् त्रिवर्गका मा मेवन किया जैसे साक्षात् मूर्तिमान न्यायरूपी अपने तीनों भाइयो का । + . कोची (Croce) ने Philosophy of the Practical मे भी यही मन प्रतिपादन किया है।<noinclude></noinclude> 6844bbqcw8ibxvmt20pb7n7k2bz6oa6 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५६ 250 194483 664706 2026-07-02T17:46:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664706 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पहला परिशिष्ट । कर्तव्य संबंधी रोग, निदान और चिकित्सा । यह चित्रमय जगत गुण और अवगुणों से भरा पड़ा है। इस संसार सागर में जो लोक रत्नों के लिये दुबकी लगाते हैं उनको कभी कभी भयंकर मगर मच्छों का भी सामना करना पड़ता है। शायद इन मगर मच्छों के भय से मोतियों का महत्व अधिक है । यदि कंकड़ों की भांति मोती सड़क पर पड़े मिल जाते, तो वे कंकड़ों के भाव बिकते। मनुष्य को कर्तव्य पालन में अनेक बाधाएँ हैं, पददपपर धर्मच्युत होना पड़ता है। इन्हीं बाधाओं के कारण कर्तव्यपरायण मनुष्य की अधिक प्रशंसा की जाती है। मनुष्य सांसारिक लालचों का सामना करने में बहुत कमजोर है, किंतु वह इस कारण सर्वथा निंद्य और गईणीय नहीं है। बहुत से बड़े आदमी भी मोहवश हो कर्तव्यपथ से विचलित हो जाते हैं। उनका पतन ऊँचे स्थान से होने के कारण बहुत ही भयानक होता है । हमको ऐसे मनुष्यों का धार्मिक मूल्य स्थिर करते समय अपने मापक के व्यवहार करने में सस्ती न करनी चाहिए। हमको यह देखना चाहिए कि अमुक मनुष्य का पतन किस कारण हुआ? उसके गुण दोषों की तुलना करके भी देखना चाहिए कि न्याय का पलड़ा किस ओर झुकता है। जिसने कुछ नहीं किया और बैठे बैठे पाप कमाया, वह उस मनुष्य की अपेक्षा अधिक दोषी है, जिसने कि कुछ अच्छे कार्यों के सम्पादन में भूल से दो एक अपराध किए हो। बहुत से गुणों<noinclude></noinclude> gdofcmqyvjr9wkfcdf8grnwqdtkqdg1 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५७ 250 194484 664707 2026-07-02T17:46:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664707 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दुर्वलता और अर्थ | १४४ ] मैं एक दोष छिप जाता है। कहा भी है कि "एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः । " गुणों के समूह में एक दोष इस प्रकार छिप जाता है, जैसे चंद्रमा की किरणों में उसका ऊपर का चिन्ह । यह बात ठीक है, किंतु दोष छिप ही जाता है, जाता नहीं रहता। साधारण मनुष्य के साथ भी हमको ऐसी ही उदारता का व्यवहार करना योग्य है। किसी मनुष्य को अपनी नैतिक निर्धारण का विषय बनाते हुए यह अवश्य सोच लेना चाहिए कि वह अपनी स्थिति में अन्यथा आचरण करने के कहां तक योग्य था। क्या उसका कुटुंब, उसका समाज, शिक्षा, मानसिक कता उसको अपराधी बनाने में सहा- क नहीं ? जब अच्छे लोगों की अच्छाई उनके समाज और शिक्षा का फल समझी जाती है, तब यह नियम बुरे लोगों की बुराई में क्यों न लगाया जाय ? किंतु जब अच्छे लोग इस सिद्धांत के होते हुए भी प्रशंसा योग्य समझे जाते हैं, तो बुरे आदमी भी निंदास्पद क्यों न गिने जायें ? हमको अपराधी के साथ सहृदयता का व्यवहार अवश्य करना चाहिए, किन्तु उसे दंड से मुक्त कर देना भी श्रेय नहीं । जो अपराध समाज के विरुद्ध होते हैं, उनका दंड समाज, पंचायत, न्यायालय श्रादि संस्थाओं द्वारा दोषी को दिया जाता है। कुछ ऐसे अपराध है, जिनका समाज से विशेष संबंध नहीं, उनकी शुद्धि ईश्वर पर छोड़ दी जाती है। अंग्रेजी भाषा में अपराध (Crime ) और पाप (Sin) में अंतर किया आता है, एक समाज के विरुद्ध और दूसरा ईश्वर की श्राहा के विरुद्ध है। हमारे देश में भी इस बात का थोड़ा अंतर है, किंतु अपराध और पाप के बीच में रेखा खींचना कठिन है ।<noinclude></noinclude> cr1lvxmd441buy67r08m2ou2ctrx5g8 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५८ 250 194485 664708 2026-07-02T17:46:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664708 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १४५] इतना अवश्य है कि, कुछ अपराध ऐसे हैं, जिनका न्यायालय से कोई संबंध नहीं है और जिनकी शुद्धि के लिये धर्म-व्यवस्था देनेवालों का आश्रय लेना पड़ता है। प्राचीन काल में ऐसे अप- राध भी राज्य से दंडनीय समझे जाते थे । अस्तु, जो कुछ भी हो अपराधों की शुद्धि किसी न किसी प्रकार से होनी आवश्यक है। चाहे वह राजकीय दंड से हो, चाहे प्रायश्चित्त द्वारा हो, चाहे पश्चात्ताप श्रथवा क्षमा से । अव तीनों प्रकार की शुद्धियों का थोड़ा बहुत वर्णन कर देना आवश्यक है । राजा के लिये हम अर्थात् दंड देना धर्म बतलाया गया है। रघुवंश में श्रीरामचंद्रजी के पूर्वजों की गुण-गणना करते हुए महाकवि कालिदास ने उनको 'यथापराधदण्डानाम् ' का विशेषण दिया है। गीता में श्रीकृष्ण भगवान् ने कहा है, 'दण्डो दमयतामस्मि' । नीति में भी कहा है-- अदण्ड्यान् दण्डयन्त्राजा दण्ड्यांचैवाप्यदण्डयन् । अयशं महदाप्नोति नरक, चैव गच्छति ॥ दंड से, जिसकी इतनी महिमा है, क्या लाभ है, अथवा यह किस लक्ष्य से दिया जाता है ? योरोपीय श्राईन विज्ञान (Jurisprudence) बेताओं ने दंड के कई लक्ष्य बतलाए हैं। कुछ लोगों का यह विचार है कि दंड बदला लेने के अर्थ है, अर्थात् व्यक्ति की ओर से समाज दोषी से बदला लेता है। दूसरी कल्पना यह है कि दोषी को दंड देकर उसे पाप कर्म में प्रवृत्त न होने देना ही दंड का मुख्य लक्षण है। तीसरी कल्पना यह है कि दंड के भय से लोग बुरे काम करने से बचे रहते हैं। चौथी कल्पना जिसे कि आजकल के बहुत से ● निरपराधियो को दंड देनेवाला और अपराधियों को छोड़ देनेवाला या अपयश ही का पात्र नहीं होता बरम् नरक को प्राप्त होता है । १०<noinclude></noinclude> 7m48ppq4d3c6nocfnehwk3z4g6otrfe पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१५९ 250 194486 664709 2026-07-02T17:46:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664709 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १४६ ] लोग मानते हैं, यह है कि दंड पापी के सुधार के लिये दिया जाता है। हमारे स्मृतिकारों ने। प्रायः सब ही कल्पनाएँ मान ली हैं। वास्तव में सबका मानना ठीक भी है। समाज की स्थिति में ये सब उद्देश्य श्रा जाते हैं। मनु महाराज ने नीचे के श्लोकों में दंड का उद्देश्य बतलाया है-- दंडः शास्ति प्रजाः सर्वा दंड एवाभिरक्षति । दंड: सुतेषु जागर्ति दंडं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ यदि न प्रणयद्राजा दंड दंडयेष्वतंद्रितः । शूले मत्स्यानि वा भक्षन् दुर्बलान्बलवत्तराः ॥ सर्वोजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः । दंडस्य हि भयात्सर्वे जगत् भोगाय कल्पते ॥ दुष्येयुः सर्व वर्णाश्च भिद्येरन्सर्वसेतवः । सर्वलोकप्रकोपश्च भवेइंडस्य विभ्रमात् ॥ मनु । दंड सब प्रजा को नियमित रखता है और दंड से ही सब प्रजा नियमित रहती है। सोते हुओं में दंड ही जागता है और दंड लोगों को धर्म में प्रवृत्त कराता है। इसी लिये विद्वानों ने दंड को धर्म कहा है। यदि राजा आलस्य छोड़ कर लोगों को दंड न देवे तो बलवान् लोग दुर्बलों को इस तरह से खा जायेंगे, जैसे कांटे में मछली भेद कर खा जाते हैं। सब लोग दंड के वश में हैं। ऐसे शुद्धात्मा लोग दुर्लभ हैं, जो धर्म का पालन दंड के भय से नहीं करते ( वरन् श्रात्मतुष्टि के ही करते हैं); दंड के भय से ही सारा संसार अपने कमाए हुए धन का निर्विवाद भोग कर सकता है। दंड के अभाव सब वर्गों के लोग ( अपना यथोचित धर्म पालन न करने के कारण ) दूषित हो जाते हैं। सब शाखों के नियम नष्ट हो जायेंगे और सर्व लोक में उपद्रव की अग्नि धधकने लगेगी।<noinclude></noinclude> 3w8tdsrtbhmeyezrgjhlh6f36nxsgcl पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६० 250 194487 664710 2026-07-02T17:46:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664710 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ २४७] उपर्युक्त श्लोकों के देखने से ज्ञात होता है कि मनु महाराज ने समाज की स्थिति, प्रजा को नियम में बांधना और स्वस्था नोचित धर्म में चलाना ही दंड का मुख्य लक्षण माना है। दोष शुद्धि के लिये दूसरा उपाय प्रायश्चित बतलाया हैं। प्रायश्चित प्रायः उन्हीं अपराधों का होता है, जो विशेष कर धर्म के उस अंग से, जिसे आचार कहते हैं, संबंध रखते हैं। यह एक ड तथा मानसिक पश्चात्ताप है । पश्चाताप भी दोष-शुद्धि का मुख्य उपाय माना गया है। इससे दोषी को क्षमा मिल जाती है। पाप का दंड देना जब न्याय्य माना गया है, तब क्षमा कैसी ? दंड तो केवल इसी लिये दिया आता है, कि अपराधी का सुधार हो जाय और वह फिर आगे अपराध न करे। यदि वही आशय बिना दंड के ही सिद्ध हो जाय, तो दंड की क्या आवश्यकता ? कभी कभी ऐसा होता है, कि क्षमा से जो अपराध की शुद्धि होती है, वह दंड से नहीं । यद्यपि इन विषयों का कर्तव्य-शास्त्र से कोई संबंध नहीं, तथापि इन बातों को ग्रंथ के अंत में बतला देना नितांत असंगत नहीं होगा । कर्तव्य-शास्त्र विवेचनात्मक है और उसका विषय भले बुरे का परिणाम निश्चित करना है। इस बात को मानते हुए भी यह अवश्य कहना पड़ेगा कि विवेचना के साथ क्रिया भी लगी हुई है। भाव के साथ प्रभाव लगा हुआ है, कर्तव्य के साथ अकर्तव्य लगा हुआ है, साधारण के साथ विशेष लगा हुआ है। इसी न्याय से कर्तव्य को बतलाते हुए कर्तव्य संबंधी रोग और उनकी चिकित्सा बता देना संगत ही समझा जायगा ।<noinclude></noinclude> t0986xr3puaj5ksamds6clwsh0q4t0u पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६१ 250 194488 664711 2026-07-02T17:47:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664711 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा परिशिष्ट सुख । संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं, जो सुख से अपरि चित हो। फिर भी 'श्रति परिचयादवज्ञा भवति' न्याय से कोई अपने सुख का लक्षण नहीं बतला सकता। विषय-तत्प- रता भी एक सुख है और इंद्रिय-दमन भी सुख की संज्ञा में है। शारीरिक परिश्रमजन्य खेद से महाया हुआ मनुष्य भी अपने को कर्तव्य परायण समझ सुखी होता है, और भोग. विलास में पड़ा हुआ मनुष्य कर्तव्य को तिलांजलि देता हुआ अपने सुख में ब्रम्हानंद को भी तुच्छ समझता है । संसार- सागर की तरल- तरंगों और भ्रमरों में चक्कर खाता हुआ मनुष्य भी अपने को सुखी समझता है और नीरव एवं निर्जन वन में आसन जमाए बैठा हुआ योगी भी संसार के विषयों को हेय समझता हुआ परमानंद में लीन होता है। ऐसी स्थिति में सुख की परिभाषा देना बड़ा ही कठिन है। जगत् में सुख का रूप चाहे जो कुछ भी हो, उस पर हम ध्यान देते हुए, उसके आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्या.. त्मिक तीन विभाग करेंगे। ये विभाग हमारे शास्त्र सम्मत: भी हैं। इन्हीं को सात्विक, राजस और तामस गुण-विभेद से कहा है। अब स्यूल रीति से इन तीनों पर विचार करते हैं। भौतिक पंचभूतात्मक शरीर ही को सर्वस्व समझ कर की तुष्टि पुष्टि के अर्थ जो क्रियाएँ की जाती हैं, उनके सफलता जन्म सुख को ही शधिभौतिक सुख कहते हैं। देह-<noinclude></noinclude> biynuun60de4uif440zno4vxmlr7bul पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६२ 250 194489 664712 2026-07-02T17:47:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664712 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १४६ ] को ही आत्मा समझनेवाले हमारे देश में चार्वाक और यूनान मैं सिरैनिक और पेपीक्यूरियन श्रधिभौतिक सुख का ही वर्णन करते हैं। भोजन, मैथुन, निद्रा, प्रमाद, ये सभी इस सुख के रूप हैं। विषयों द्वारा जो इंद्रियों पर श्राकर्षण होता है, जिससे कि इंद्रियाँ विषयों में मिल कर सुख की बुद्धि उत्पन्न करती हैं, वह सब सुख आधिभौतिक कोटि का ही है। शुद्ध आधिभौतिक सुख में भूले हुए मनुष्यों के विचार पंचमहाभूतात्मक प्रकृति के आगे नहीं बढ़ते। निरा आधि- भौतिक सुख किसी भी सहृदय मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर सकता । इस कारण यह सुख क्षणिक है और वर्तमान में ऐसा संकुचित रहता है कि उसमें आशा और स्मृति को भी स्थान नहीं मिलता। फिर यह सुख व्यक्तिगत है। इसका सबसे अच्छा प्रमाण यह है कि भौतिक सुखेच्छुक व्यक्तिवाद से ' ऊँचे नहीं जा सके, और जो इससे ऊँचे गए हैं, उनको भौतिक सुख त्याग कर एक प्रकार के श्राधिदैविक सुख में प्रवेश करना पड़ा है। यह सुख विशेष कर वाह्य पदार्थों पर निर्भर है। इसी कारण यह सार्वजनिक नहीं हो सकता। जो अर्थवान पुरुष हैं, वे ही इसका भली भांति श्रनुभव कर सकते हैं और स्व-सुख-संपादन में दूसरों को कष्ट देते हैं; दूसरे नहीं। इन न्यूनताओं के कारण यह वास्तविक सुख के लक्ष्य से च्युत हो जाता है। इन न्यूनताओं को कुछ कुछ आधिदैविक सुख ने दूर किया है। इस सुख के प्राप्त करने के लिये जीव को केवल ऐंद्रिक अभिदैनिक सुख का तिरस्कार कर बाहर से भीतर की श्रीर 11 देखना पड़ता है। यह सुख मन से संबंध रखता है। ● अधिदेव का अर्थ गीता में भी यही किया है 'पुरुष-<noinclude></noinclude> 9t8e99wu3toi3vk4m3ich8cqsu2guer पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६३ 250 194490 664713 2026-07-02T17:47:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664713 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १५० ] दवतम् ' ' जीव-दृष्टि से जिन सुखों को हम भोगते हैं, उनका उदय हमारे मन और बुद्धि से ही होता है, और उनका संबंध जीव की स्वतंत्रता, कल्पनादि मानसिक शक्तियाँ से संबंध रखता है। यह नहीं कि आधिदैविक अवस्था में श्रधिभौतिक सुख रहते ही न हो, किंतु वे सब सुख वर्तमान रहते हुए आधिदैविक में मिल जाते हैं। इतना भेद अवश्य है कि श्राधिभौतिक सुख देह-दृष्टि से देखे जाते हैं और श्राधि- दैविक जीव-दृष्टि से । इस कारण इस दूसरे प्रकार के सुख की व्याप्त कुछ बढ़ जाती है। जिस परोपकार को श्राधि-. भौतिक दृष्टि में कुछ भी स्थान न था उसे आधिदैविक सुख मैं एक उत्तम स्थान मिल जाता है। सामाजिक सुख भी सार्थक दीखने लगते हैं । काल्पनिक सुख वर्तमान सुख से ऊँचा जाये। लगता है। उत्साह और आशा की उमंगें उठने लगती हैं। कर्तव्याकर्तव्य की ओर ध्यान दौड़ने लगता है। जीव मह त्वाकांक्षा में पड़कर सब प्रतिबंधों के ऊपर विजय-लाभ करने का प्रयत्न करने लगता है, श्रद्धा और विश्वास को अपने हृदय में स्थान देकर ईश्वरोपासना द्वारा अपनी संपति Satara का विकाश देखने लगता है। इस अवस्था में मौतिक सुख की संकुचितता अधिकांश में दूर हो जाती है, किंतु जीव का पूर्ण संकोच आध्यात्मिक वाद मैं ही कर दूर होता है। ज्यों ज्यों नानात्व और पृयकत्व की संकुचित बुद्धि घटती है, त्यो त्यों हम में श्रात्म-भाव का विकाश होने लगता है और सारे संसार को एकही श्रात्मा का विकाश आध्यात्मिक । लगते हैं। जैसे नानात्व की धारणा होने से में राग द्वेष आदि की उत्पत्ति होती है, अपने प<noinclude></noinclude> koor275wrbbtdvdw1if27a38j0obxs5 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६४ 250 194491 664714 2026-07-02T17:47:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664714 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १५१] विचार दृढ़ हो जाता है, उसी प्रकार सब प्राणियों में एक अव्यय श्रात्मा को देखने पर ऐक्य बुद्धि के प्रभाव से श्रद्रोह, शांति, सर्वभूतानुकंपा, बंधुत्व आदि सद्गुणों का विकाश होता है। जो काम कि कर्त्तव्य दृष्टि से कठिनता के साथ किए जाते थे, वेही कार्य सुगमता के साथ पूरे होने लगते हैं। कर्तव्य अप्रिय नहीं रहता। परार्थ और स्वार्थ में भेद नहीं रहता' जो आनंद स्वार्थ सिद्धि में होता है वही परार्थ-साधन में होता है । सब का सुख श्रपना सुख हो जाता है और उसी श में हमारे सुख की मात्रा बढ़ जाती है। संसार हमारा कुटुंब बन जाता है और जो सुख कि हमको आत्मीय जनों से मिलने से होता है, वही सुख हमें क्षण प्रति क्षण सब जगत् को श्रमदृष्टि से देखने में होता रहता है। इस आत्मैक्य रूपी ज्ञान को हमें अपनी क्रियायों द्वारा दृढतम बनाना चाहिए । जब हम प्राणी मात्र के साथ समंता का व्यवहार करेंगे, त हमारा शान क्यों न चढ़ता को प्राप्त होगा। उस ज्ञान से जो आनंद हमें प्राप्त होगा वही योगवासिष्ठ में प्रतिपादित अनंत- समतानंद, जिसका कि उल्लेख हमने नवें अध्याय के अंत में किया है, हमारे कर्तव्य का मधुरतम फल होगा। उसी आनंद में हमको उस उच्च, पवित्र श्राध्यात्मिक जीवन के, जिसके कि हम एक तुच्छ व्यंजन हैं, श्रानंद की झलक मिल जायगी ।<noinclude></noinclude> mect5kjk877fs7lgayqez354a8lyztf पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६५ 250 194492 664715 2026-07-02T17:47:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664715 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा परिशिष्ट कर्त्तव्य - विकास | कर्तव्य में अपवाद के लिये स्थान नहीं तथापि सब लोगों के लिये सब काल और दशाओं में एक सा कर्तव्य नहीं हो सकता है। सत्य ऐसे व्यापक धर्म में भी कर्त्तव्य का सापेचल लोगों को संदेह के लिये स्थान रहता है। यदि डाकर रोगी को उसकी वास्तविक अवस्था बतला देवे तो शायद उसको सत्य के पुण्य के बदले मानव हत्या का अपराध अपने सर पर लेना पड़े। किसी दशा में निरंकुशता ही श्रेय समझी जाती है और किसी में दया। यदि हम सभ्य जातियों के परिमाण से असभ्य जातियों के आचार पर दृष्टि डालें तो हम उनको 'मनुष्य भी नहीं कह सकते हैं। पूर्व काल में धर्म के नाम से जितने अत्याचार हुए हैं आजकल उतने अत्याचार आर्थिक लाभ के मंद उद्देश्य से भी नहीं किए जा सकते हैं। जो रोमन केथोलिक और प्रोटेस्टेंट इसाई लोग श्राज परस्पर प्रेम के साथ राजनैतिक और औद्योगिक कार्यों में साथ साथ काम करते हैं उन्हीं के पूर्वज एक दूसरे को जीवित जला देना धर्म समझते थे। हमारे देश में भी संप्रदायों के झगड़े बने रहे हैं और अब मी अवशेष नहीं हुए हैं। गुलामी की प्रथा प्रायः सारे संसार से उठ गई है किंतु ऐसी बहुत कम जातियां हैं जो 1. इस दोष से मुक्त रही हो। जिस काल में गुलामी की प्रथा जारी थी उस काल के नैतिक परिमाण के लिये क्या कहा<noinclude></noinclude> 5nfgt9n1ufoq9tm3kv2ofs8894hb3if पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६६ 250 194493 664716 2026-07-02T17:47:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664716 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१५३ ] दूसरे की हत्या करना बुरा परखी के साथ संभाषण यूरोपीय देशों में परस्त्रियों जावेगा। क्या हम उन लोगों को अपने परिमाणु से नोचा न समकेंगे। पहले जमाने में लोग अपनी मान मर्यादा रखने के लिये जरा सी बात पर मलयुद्ध ( Duel) करने को तैयार हो जाते थे और एक नहीं समझते थे। हमारे देश में करना निंद्य समझा जाता है किंतु के साथ नृत्य करना भी सामाजिक व्यवहार और शिष्टाचार में शामिल है। इन सब बातों को देख बुद्धि भ्रम में पड़ जाती है और लोग कहने लगते हैं कि कर्तव्याकर्तव्य केवल सामा- fre सुभीता है और वास्तव में कर्तव्याकर्तव्य का कोई परिमाण नहीं। क्या यह स्थिति ठीक हैं। यदि कर्त्तव्याकर्त्तव्य का भेद वास्तव में नहीं है तो कर्त्तव्य हमारे लिये करणीय नहीं और कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य कर्म का नैतिक मूल्य बराबर हो जावेगा सापेक्षत्र में निरपेक्षत्व मूल्य बराबर क्या हो जावेगा मूल्य ही न रहेगा। यह बात ठीक है किंतु ऊपर बतलाए हुए भेदों के लिये हम उदासीन नहीं रह सकते। फिर इन भेदों का क्या कारण है। संसार में कोई अचल परिमाण है या नहीं। ये भेद परिमाण के भेद नहीं, ये भेद परिणाम के साधनों में देश काल और सामाजिक उन्नति के भेद से उपस्थित हो जाते हैं। नीच से नीच लोग भी कर्त्तव्य के दर्श का अपने शान और बुद्धि के अनुकूल अनुकरण करने का यज्ञ करते हैं। चोर को भी कर्त्तव्याकर्त्तव्य का थोड़ा बहुत ध्यान रहता ही है। चोर लोग दूसरों की चोरी करें किंतु चोरी के धन वाँटने में उनकी न्याय-बुद्धि का हास नहीं हो जाता। सृच्छकटिक नाटक में शर्विलक चोर<noinclude></noinclude> k2e5c0r33rhv8zttu51efplc0xbm9pa पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६७ 250 194494 664717 2026-07-02T17:48:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664717 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १५४ ] ने कहा है कि मेरी कार्याकार्य्य- विचारणी बुद्धि चौर कर्म में भी सदा स्थित रहती है। वह कहता है। नो मुष्णाम्यां विभूषणवर्ती फुलामिवाहं लतां । विप्रस्य न हरामि काञ्चनमथो यज्ञार्थमभ्युदधृतम् ॥ धाच्युत्सङ्गगत हरामि न तथा वालं धनार्थी कचित् । arisravaरिणी मम मतिवोय्र्येऽपि नित्यं स्थिता ॥ * यह चोर अपने ज्ञान के अनुकूल धर्म से च्युत नहीं होता। यदि इसका ज्ञान और बढ़ा हुआ होता और ब्राह्मण एवं अन्य पुरुषों के धन में भेद न समझता तो शायद चोरी भी न करता । श्रात्मसंयम उसमें था किंतु उसके ज्ञान की कमी के कारण अथवा कामांध होने के कारण उसके आत्मसंयम की मात्रा परिमाण से कम रही। यही नियम प्रायः सब ही अवस्थाओं के धर्मभेदों से लगता है। जैसे जैसे ज्ञान का वि स्तार होता जाता है वैसे ही वैसे कर्तव्य का भी विकाश होता जाता है अथवा यों कह लीजिए कि कर्त्तव्य के परिमाण की ऊँचाई ज्ञान के विस्तार पर निर्भर है। जैसा श्रात्मा संबंधी ज्ञान विस्तृत होगा वैसा ही कर्त्तव्य का परिमाण रहेगा । श्रात्मा में विस्तार का स्वाभाविक गुण है। हम सदा अपने से ऊँचे जाते हैं। यदि ऐसा न होता तो कर्त्तव्य का विकाश ही न होता। जैसे जैसे श्रात्मा का विकाश वा विस्तार होता जाता है वैसे ही वैसे हमारे कर्त्तव्य संबंधी विचार ऊँचे होते जाते हैं। जहां श्रविद्या के कारण आत्मा का विस्तार मैं धनार्थी लेकिन कभी भी मैं फूली हुई खता के समान विभूषनती अमेला के आभूषण नही उतारता माझ का धन नही लेता और न यश के निमित्त जसे दूय स्वर्ण तथा चाय की गोद में गए हुए बालक को भी नहा चुराता चीर कर्म मे मी मेरी काका विचारथी मुद्धि सदा मेरे साथ रहती हैं।<noinclude></noinclude> q0hm1ixthne9swi096jn6g0e8udz0a2 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६८ 250 194495 664718 2026-07-02T17:48:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664718 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१५५ ] घर के घेरे से बाहर नहीं जाता वहां कर्त्तव्यशास्त्र का परिमाण भी स्वार्थवाद से ऊँचा नहीं जाता, किंतु दोनों ही अवस्थाओं में कर्त्तव्य का परिमाण आत्मप्रतीति रहा। कर्त्तव्य का आदर्श एक ही रहता है, उसकी पूर्ति के कई दर्जे रहते हैं। अब प्रश्न यह है कि जब सब लोग अपने ज्ञान के अनुकूल ही अपने कर्तव्य के परिमाण को ऊँचा नीचा रखते हैं तब कोई किसी कार्य के लिये दोषी क्यों ठहराया कर्तव्य के सापेक्षत्व में जाय । इस बात में बहुत कुछ सत्य है और उत्तरदायित्व इसी के आधार पर अपराधी के साथ सहृदयता नेताओ का कर्तव्य का व्यवहार करना बतलाया गया है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं कि कोई अकर्तव्य कर्म करने के लिये दोषी न ठहराया जाय । बहुत से लोग तो सुपठित और ज्ञानवान होने के कारण अपना आदर्श बहुत ऊँचा रखते हैं किंतु वे लोग अपने आदर्श की ओर मुँह भी नहीं करते। उपदेश देने के लिये तो वे देवगुरु बृहस्पति के भी गुरुदेव बन जाते हैं और कर्म करने में नीच से नीच कर्म करते हुए लजा को नहीं प्राप्त होते। ऐसे साक्षर राक्षसों के लिये मनुष्य जाति की घृणा बहुत ही बढ़ जाती है। जितना उतरदायित्व एक ज्ञानवान सुपठित पुरुष का होता है उतना साधारण पुरुष का नहीं होता, किंतु साधारण लोग भी अपने कर्तव्यपालन के भार से नहीं छूट सकते। समाज में रहकर समाज से लाभ उठाते हुए समाज के स्थापित किए हुए नियमों का न पालन करना बड़ा अन्याय है। समाज के साधारण कर्तव्य से सब ही थोड़े बहुत परचित रहते हैं और जो लोग उससे अनभिज्ञ हैं उसके लिये वे ही दोषी हैं। जिस आदर्श तक कि समाज के लोग नहीं पहुँच सके हैं उसके पूरा<noinclude></noinclude> bosbo07l6xrmk8dhls4z4zsv3prd54a पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१६९ 250 194496 664719 2026-07-02T17:48:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664719 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ५६ ] न करने के लिये कोई व्यक्ति उत्तरदायी नहीं । किंतु यदि किसी व्यक्ति का आदर्श उसके ज्ञान के विस्तार के कारण समाज के आदर्श से ऊँचा हो जाय तो वह केवल अपने सुभीते के लिये समाज के नीचे आदर्श के अनकूल आचरण नहीं कर सकता । धार्मिक नेता वा उद्धारक लोगों की यही विशेषता होती है कि वे वर्तमान में रह कर भविष्य को देख लेते हैं। नेता के पीछे चल कर सारी समाज भी उस उथ श्रादर्श को देखने लग जाती है। बड़े आदमियों का उत्तरदायित्व बहु बड़ा होता है। यदि वे किसी प्रकार की उदासीनता या संकल्प शिथिलता के कारण समाज को अपने विस्तृत ज्ञान का लाभ न दें तो वे दोष के भागी हैं। जैसा आचरण श्रेष्ठ जनों का होता है वैसा ही साधारण लोगों का होता है। नेता को अपने उपदेश का पालन पहले आप ही करना पड़ेगा। यह नहीं हो सकता कि बाँधी में हाथ तू डाल और मंत्र में पढ़ें। मंत्र के साथ बाँधी में भी हाथ स्वयं ही डालना होगा। इसके साथ नेता का यह भी धर्म है कि वह समाज की अशा- नता वा अपने शानविस्तार के कारण समाज को नीचा न देखने लगे । नेता समाज से बाहर नहीं। यदि उसको समाज का आधार न मिलता तो वह किसके सहारे अपने उच श्रादर्श को देख सकता। नेता की योग्यता समाज के अनकूल ही हुआ करती है। असभ्य जातियों के धार्मिक नेता का श्रादर्श उच्च शिक्षा प्राप्त समाज के नेता के आदर्श से तुलना नहीं पा सकता है। नेता की समाज के ऊपर निर्भरता का यह सब से बड़ा प्रमाण है। वास्तव में जो बातें कि समाज में गुप्त रीति से वर्तमान होती हैं; वे नेता द्वारा पूर्ण प्रकाश को प्राप्त होती है। यदि ऐसा न होता तो नेता की सुनता ही<noinclude></noinclude> tmh41hml6oouwq6oqq5zx6cvkohchbw पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७० 250 194497 664720 2026-07-02T17:48:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664720 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १५७ ] कौन । नेता समाज का मुख है। समाज में कर्तव्य का विकास इसी प्रकार से होता रहता है । समाज के ज्ञान की वृद्धि क्रमशः होती रहती है। इससे समाज की गति का झुकाव बदलता रहता है। समाज के झुकाव को देख कर नेता उस श्रोर आगे बढ़ पेश्तर से समाज को उस पथ के गुण-दोष बतला देता है । समाज उसी पथ पर चल कर अपने विकास को प्राप्त होती है । कर्तव्य विकास के कई कारण बतलाए गए हैं। कोई कोई कहते हैं कि जीवन संग्राम ( struggle for existence ) कर्तव्य - विकास का कारण है और कोई कहते विकास के कारण हैं कि श्रार्थिक उन्नति कर्तव्य संबंन्धी उन्नति का मूल कारण है। ये सब बातें कर्तव्य विकास मैं योग देती हैं किंतु वे विकास का कारण नहीं । विस्तार का कारण है श्रात्मा की विस्तारोन्मुखी वृत्ति । आत्मा अपने से ऊँची जाने का यक्ष करती है। इसी में सारे विज्ञान और कर्तव्यशास्त्र का मूल है। जो लोग यह कहते हैं कि कर्तव्य का उदय परस्पर के सुभीते में है वे लोग इस बात को भूल जाते हैं कि सुभीते को चाहना, संघर्षण को कम करने की इच्छा करना, समाज को स्थित रखने की अभिलाषा, इन सब बातों का मूल आत्मा में ही है । जीवन-संग्राम द्वारा मनुष्य जाति में धैर्य, सहानुभूति आदि उच्चतम गुणों का विकास हो जाय किंतु जीवन-संग्राम इन गुणों का कारण नहीं। जब तक आत्मा में स्वयं थे गुण वर्तमान न हो तब तक इनकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है। जीवन-संग्राम इन गुणों के विकास का अवसर है, कारण नहीं हो सकता। इसी प्रकार आर्थिक उन्नति भी कर्तव्य विकास का अवसर है, कारण नहीं । श्रात्मा<noinclude></noinclude> ftjpgtauimwzjki9809mf0e4szpi493 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७१ 250 194498 664721 2026-07-02T17:48:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664721 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१५] ही श्रात्मा की उन्नति का कारण है। आत्मा का उद्धार भी आत्मा से ही हो सकता है। क्या संसार उन्नति की यह बात तो मान ली जायगी कि समय के भेद से कर्तव्य में भी भेद पड़ता है। भारतवर्ष में भी युग भेद से धर्म माना है, जो स्मृति सत्युग के लिये प्रमाणित है वह कलयुग में नहीं मान्य है ।। स्मृतियों का युग के हिसाब से इस प्रकार ओर जा रहा है। विवरण दिया है- कृते तु मानवो धर्म्मत्रेतायां गौतमः स्मृतः । द्वापरे शङ्खलिखित कलो पाराशरः स्मृतः ॥ F सत्युग में मनु प्रमाणित है, त्रेता में गौतम, तथा द्वापर में शङ्क लिखित और कलयुग में पाराशर प्रमाणित है। ये सब बातें समयानुकूल कर्तव्य की सापेक्षता बतलाती है किंतु हमारे देश और यूरोपीय देशों में विकास के विषय में मतभेद है। यूरोपीय देशों में विकाश का क्रम उन्नति की श्रोर माना जाता है और हमारे देश में अवनति की ओर माना गया है। हमारे यहां कर्तव्य का आदर्श जो सत्युग में था सो कलयुग मैं नहीं लिखा है कि- कृते सम्भाषणात् पापं त्रेतायाञ्च दर्शनात् । द्वापरे चान्नमादाय कलौ पतति कर्मणा ॥ अभिगम्य कृते दानं त्रेता स्वाय दीयते । द्वापरे याचमानाय सेवया दीयते कलो || सत् युग में सम्भाषण से पाप होता है, त्रेता में देखने से, द्वापर में अन्न लेने से और कलियुग में कर्म से मनुष्य पतित होता है। सत्युग में जाकर दान देते हैं; त्रेता में बुला कर देते हैं,<noinclude></noinclude> ffz4xl1ehpny2s7uo4n1c6ftj8oyefa पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७२ 250 194499 664722 2026-07-02T17:49:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664722 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१६] द्वापर में माँगनेवाले को देते हैं और कलियुग में सेवा करने- बाले को देते हैं । जहाँ कहीं वर्णन आया है वहाँ पर कलियुग में धर्म का ह्रास ही लिखा है। अब प्रश्न यह है कि संसार का क्रम उन्नति की ओर जा रहा है अथवा अवनति की ओर । हमारे देश में संसार का क्रम जो श्रवनति की ओर माना है। उसका एक बड़ा कारण है। हमारे यहाँ कर्त्तव्य के आदर्श का विकास नहीं माना है वरन् पूर्व से ही वेदों और स्मृतियों में दिया हुआ माना है। यह बात किसी श्रंश तक ठीक भी है। हम लोग अपूर्ण हैं, हमको पूर्ण कर्त्तव्य का आदर्श किसी पूर्ण से ही मिलना चाहिए और वह पूर्ण पुरुष परमात्मा है । इसके साथ यह प्रश्न अवश्य है कि वह ज्ञान एक साथ मिल गया अथवा क्रमशः । हमारे देश में यह माना गया है कि यह आदर्श हमको पहले ही से वेदों में मिल गया। जब जब समाज की संकीर्णता के कारण धर्म का ह्रास हो जाता है और जब लोग पहले के दिए हुए समाज के उच्चतम आदर्श का पालन करने में असमर्थ हो जाते हैं तब ही समयानुकूल कर्त्तव्य परि- माण नीचा कर दिया जाता है। यदि विचार कर के देखा जाय तो इसमें बहुत कुछ सार है। समाज के विकास में संकी- ता बढ़ती जाती है। कार्य्यविभाग से भेद हो जाता है और उस भेद में संगठन बढ़ता जाता है । यही स्पेंसर साहिब का विकाश संबंधी विचार है। यह विकाश का नियम सब ही समाज, क्या पूर्वीय और क्या पश्चिमीय में, चरितार्थ होता है, किंतु प्रश्न यह है कि संकीर्णता और भेद में संगठन वास्तव में धर्म का वर्धक होता है या नहीं। इस प्रकार का विकास धर्म का सहायक हो या न हो किंतु इसमें अधर्म के लिये बहुत स्थान है। यूरोप में धनिक-<noinclude></noinclude> qcx308uhku6cfr67wibadvfgvfrhsmj पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७३ 250 194500 664723 2026-07-02T17:49:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664723 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ११० ] ( Capitalists ) और श्रमी ( Labourers) के झगड़े समाज के विकास का फल हैं। इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि विकास में विभाग और संगठन की मात्रा बराबर ही रहे । भारतवर्ष में जातियों के विभाग का कोई अंत नहीं, किंतु इस विभाग में संगठन की भलक बहुत कम दिखाई पड़ती है। उन्नति और अवनति काल का विषय नहीं। सत्- युग में हिरण्यकश्यप सा राक्षस हुआ । त्रेता में रावण हुआ और द्वापर में कंस हुआ। कलियुग में बड़े प्रतापी और सत्य- वादी हो गए हैं। यह बात ठीक है, किंतु वर्तमान भारतवर्ष मैं और बातों की उन्नति होते हुए पहले की अपेक्षा धर्म और कर्त्तव्य का हास ही दिखाई पड़ता है। वास्तव में बात यह है. कि समाज के विकास में यदि मनुष्य सचेत न रहे तो उन्नति के साथ थोड़ी बहुत अवनति अवश्य होती जायगी और वह अवनति इकट्ठी होकर घोर रूप धारण कर लेती है। प्राकृ- तिक विकास और सामाजिक विकास में भेद है। प्राकृतिक 'विकास में विकास को प्राप्त होनेवाले जीवों की स्वतंत्रता · कम रहती है और सामाजिक विकास में मनुष्य ही विकास के नेता हो जाते हैं। हम यदि तृण के समान पानी के बहाव पर निर्भर रहें तो हमारी गति का कुछ ठिकाना नहीं, जिधर की हवा चली उधर ही के हो रहे। कलियुग का कारण केवल काल पर निर्भर रहना है। कलियुग और सत्युग में बहुत अंतर नहीं। कलियुग के बाद ही सत्- युग होता है । हम अपने उद्योग से सत्युग को शीघ्र ही बुला सकते हैं। यदि सत्युग द्वापर और त्रेता में धर्म के हाल की संभावना हो सकती थी और हास के बाद विकास हुआ - तो कलियुग में धर्म के विकास की आशा करना अनुचित नहीं ।<noinclude></noinclude> drkqfndg1d14rbqzsymb8k2ux8t9cua पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७४ 250 194501 664724 2026-07-02T17:49:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664724 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १६९ ] पिछले अधिकरणों में जो कर्त्तव्यविकास का क्रम दिया है वह हर समय लागू हो सकता है। जब कर्त्तव्य का विकास होगा दोशान का विस्तार उसका पूर्वगामी होगा। समाज की संकी-- ता के कारण हमारे आत्मैकशान का वृत्त संकुचित सा दिखाई पड़ता है। इस संकोच का कारण हम ही हैं। हम समाज की संकीर्णता मात्र को ही विकास समझते रहे और अपने विकास की गति स्थित करने में उदासीनता दिखाते रहे। हमारी निष्क्रियता के कारण जो वर्षों की काई जम रही है वह हमारे ज्ञान के विस्तार एवं क्रियोन्मुख होने से दूर हो जायगी और हम शानोद्दीपित कृतयुग के शुभ्रोज्वल कर्मक्षेत्र में प्रवेश करेंगे। ११<noinclude></noinclude> gfkjvi5hzu0fdw7ewhpqg7qkrz2w96n पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७५ 250 194502 664725 2026-07-02T17:49:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664725 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ater परिशिष्ट कर्तव्य संबंधी साहित्य | हिंदू, बौद्ध तथा जैन ग्रंथ । १. श्रीमद्भगवद्गीता शंकरभाष्य सहित । २. बाल गंगाधर तिलककृत गीतारहस्य । ३. महाभारत शांतिपर्व । ४. योगवशिष्ट मुमुक्षुप्रकरण । ५. मनुस्मृति । ' ६. याज्ञवल्क्यस्मृति (मिताक्षरा ) । ७. शुक्रनीति । ८. विदुरनीति । ६. कामंदकीय नीतिसार । १०. भर्तृहरि का नीतिशतक । ११. चाणक्यनीति । १२. कठोपनिषत् । १३. जैमिनिसृत्र । १४. धम्मपद । 15. Hindu System of Moral Science - Kishori Lal Sirear M. A. BL.. 16. Relativiy of Hindu Ethiecs. 17. Advanced text book of Hinduism - Mrs, Besant. 18. Arya Dharma - A. Dharmapala.<noinclude></noinclude> 2z722ukvk1zlk0vnvgogetrk0km21p6 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७६ 250 194503 664726 2026-07-02T17:49:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664726 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ (૬૩ ] 19. Buddhism and Science-Paul Dahlkie. 20. Buddhistic Essays- 33 33 21. The Ethical Problem-Dr. Paul Carus. 22. Practical Path-C. R. Jain. 23. A Study of Jainism-Kannoomal M. A. EARLY GREEK WRITERS. 1. Plato's Republic with Jowett's Introduction and lectures by Richard Lewis Nettleship. Nicomachean Ethics 2 Aristotle INTUITIONAL. 1. Butler, Bishop Joseph-Sermons (1726) Dessertation on Virtue (1729). (Both in Butler's Analogy & Sermons, Bohn's Library. 2. Stewart Dugald-Outlines of moral philo- sophy (1793) 3. Martineau, James-Types of Ethical Theory 2 Vol. 1885. 4. Moores, G. E,-Principia, Ethica 1903. EGOISTIC HEDONISM. 1. Hobbes, Thos.-Elementa Philosophie de cive (1642), De carpore Politico; or the Elements of Law, moral and political (1650), Leviathan (1681) Morley's Library 1885. 2. Mandeville, Bernardde-The fable of the Bees (1714).<noinclude></noinclude> 1oox4cmtfeqh3d00rr8lkrrkmwcvjhf पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७७ 250 194504 664727 2026-07-02T17:49:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664727 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ૨૬૪ ] UTILITARIANISM. 1. Locke, John-Essay concerning the Hu- man Understanding, Book I (1868.) 2. Hume, David-Treatise on Human Nature Books 2 & 3 (1739-40), Enquiry conerning the principles of morals (1751). Works Green & Grose 4 vols. 1882. Essays. Library moral and Political (1742) 1875. 3. Bentham Jeremy-Introduction to the prin ciples of morals and legislation (1789) 1876. 4. Mill, James Analysis of the human mind chaps. XVII, XXIII. (1829) 1878. 5. Bain, Alexander-Mental and moral science (1868). 6. Mill, John Stuart-Utilitarianism (1863). 7. Hodgson-shadworth, H.-Theory of practice 2 vols. 8. Sidgwick, Henry-Methods of Ethics (1874). EVOLUTIONARY ETHICS. 1. Darwin, Charles-Descent of man (1871) 1883 2. Spencer, Herbert-Data of Ethics (1879)1887 3. Stephen, Leslie-Science of Ethics 1882. 4. Alexander Samuel-Moral Order & Progress (1889) 5. Huxley, T. H-Evolution and Ethics.. IDEALISTS. i. Bradley, F. H-Ethical Studies 1876. Appea- rance and Reality 1893.<noinclude></noinclude> tnpwsshilaugcpl58oemo9d8je2vbkt पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७८ 250 194505 664728 2026-07-02T17:50:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664728 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ 4 ] 2. Green, T. H.-Prolegomena to Ethics (1883) 1881. 3. Sorley, W. R.-Ethics of Naturalism 2nd Ed. 1904. 4. Muirhead, S. H.-Elements of ethics 5. Mackenzie, J. S.,-Introduction to Social Philo- sophy, 2nd Ed. 1895. Manual of Ethics 1893. 6. Seth, J.-Ethical Principles 10th Ed. 1908. 7. Wundt, W.-Ethics. English Trans. 1897. 8. Bosanquet, B.-Psychology of the moral self 189 9. Taylor, A. E-Problem of conduct. 1901. 10. Jones, H., Idealism as a practical creed. 1909 11. Dewiey and Tuft-Ethics 1909. 12. Kant. Kant's Theory of Ethics. Abott-Critical- philosophy of Kant,Caird-Philosophy of Kant Watson-Philosophy of Kant explained. HISTORY. 1. Sidgwick, H., Outlines of the history of Ethics (1886) 1888. 2. Albice, E., History of English Utilitaria- nism 1902. GENERAL. 1. Lotze, H., Practical philosophy 1890. 2. Sutherland, A., The origin and growth of moral instinct. 1898. 3. Schiller, F. C. S.-Humanism, 1903.<noinclude></noinclude> 78khisylph942c65vk477yr5n2odcp7 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१७९ 250 194506 664729 2026-07-02T17:50:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664729 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ ૨૬૬ ] 4. Stewart.,J. A., Art, Ethics Encyelo. Brit, 1902. 5 Ladd, G. T., Philosophy of conduct. 1904 6. Dickinson, G. Lowes-The 'meaning of the good. 3rd Ed. 1906. 7. Hobhouse., L. T.,-Morals in Evolution. 1906. 8. Wrester, Mark E.,-Theo rigin and develop- ment of moral ideas. 1908. 9. B. Croce-Philosophy of the practical. Trans- lated by Douglas Ainslie 1913. 10. William James-The will to believe 1897. 11. International Journal of Ethics Dr. Hasting's Encyclopaedia of Religion and Ethics. म्युरहेड साहब की पुस्तक में दी हुई साहित्य-सूची के आधार पर यह साहित्य सूची तैयार की गई है ।<noinclude></noinclude> f15vsivsp2p1t2302iigahyn8zsbunh पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८० 250 194507 664730 2026-07-02T17:50:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664730 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>Viaei परिशिष्ट । शब्द-सूची । (अ) अनसूयता १३६ अभिलाषा (Wish) २६ अर्जुन ५,७,८ अरस्तु (Aristotle) १० अरस्तु का कर्तव्य शास्त्र (Nechomacian Ethics) २९. अर्थ या अर्थ शास्त्र (Economics) ३५, १४०, १४१ अविभक्त कुटुंब १२१ अक्षर विज्ञान (Philology) ८३. अज्ञेय १०३ अहंकार १०८ (आ) श्रईन ५८,५६ आकाश (Space) १६. आत्मा ५०,७०,१०४, १०६, ११०, ११२२११३ आत्म-कल्याण १२० आत्म-भाव (Personality) १२१, १२७ आत्म-प्रतीति (Self-realization ) ४७, ४, १०७, ११२, ११४. १२०, १२, १३२ श्रात्मौपम्य दृष्टि १०२, ११५, आत्मानंद ११५<noinclude></noinclude> s4xu2cxqra6z2r22g1s6580c73ro9c3 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८१ 250 194508 664731 2026-07-02T17:50:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664731 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १६८ ] आत्म-विकाश १९२ श्रात्म. विजय (Self-conquest ) ६६, १०२, १०८ 'आत्म-विस्तार ११३ आत्म-संभावन १८८ आदर्शों की प्रतिद्वंद्वता १२ आंतरिक कारण ३० आवागमन ३५. श्रावागमन की शृंखला १०० आध्यात्मिक साम्य ११० आध्यात्मिक आधार १२१ श्राश्रम धर्म १२१ आस्तिकता १२१ श्रार्यत्व (Gentlemanliness ) १३६ इच्छा २८, २६ इच्छा की पूर्ति ८० इंद्रियां १०६ -इंद्रिय निग्रह ६८, १०२ इतिहास २४ ईसा ८१,०२, १३० ईसाई मत ५३ ईश्वर ४ १०१ ईश्वरार्थं १०१ ईश्वर की सत्ता १८ (3) उपयोगितावाद ५०,६५,७०,७३,७४,७५,७७,१०१<noinclude></noinclude> k75p9layj26s31mtoo3oar2ljhoycun पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८२ 250 194509 664732 2026-07-02T17:50:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664732 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १६६ ] उपनिषद १०४,१२१ उभयवाद ६१,६२, उतेजक (Sanctions) ६६ ऋषि ऋण ११४ ऋग्वेद ३७ एकात्मवाद १२९ एकीकरण ११७ (ॠ) (घ) एपीक्यूरियस (Epicurious) ५१ ऐरस्टीपस (Aristippas ) ५२ एपीक्यूरियन संप्रदाय ५.३ एलफ्रेड रस्सेल वालिस (Alfred Russel Wallace) = एलेग्जेंडर (Professor) ६१,६२, ६३, १०७,११० (ऐ) ऐद्रिक संगठन (ओ) श्रचित्व-विज्ञान २१, २५ (क) कठोपनिषद १०६ कर्मों की श्रृंखला ६६ कणिक ३३ फलाकौशल ४५ कर्तव्य का सोपक्षत्व (Relativity of Ethics ) ११६ कांट (Kant ) १७, १०३, १०४, १०५, १०६<noinclude></noinclude> cbsk1ko78ui7beysstpsc013dwunf9q पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८३ 250 194510 664733 2026-07-02T17:50:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664733 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कामना (Desire ) २४ कामंदकीय नीतिसार ३१ कालिदास १३ कीटपतंग १२५, १२६, कुंती ३३ कृष्ण २३,५२,११८ श्रीकृष्णार्पणमस्तु १२० क्रियात्मक बुद्धि १०, १०४, [ १७० ] कृत्यवाद (Pragmatism) 39 केकई ६४, कोध १०६६- stat (Croce) 94 गणितशास्त्र १८ गीता ६,३१,३२,६६,७६,६६, १०५, १०६, ११०,१११, ११४,११५ श्रीमद्भागवत ११ = १२४, १३६ गृहस्थाश्रम १२१, १२२, १२३ ग्रीन (T. H. Green ) ८०, १११, चाक १४,५०,५१, (च) वाह की तृप्ति (Satisfaction of Demands ) ७७ द दाई, कवि ११६ (छ) छांदोग्योपनिषद ४१ (GT) जमीर (Conscience) ४२ चाखि ऋषि ५१<noinclude></noinclude> 28sll9r28f28n3drzu409cwwar3nh9c पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८४ 250 194511 664734 2026-07-02T17:51:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664734 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १७१ ] जीवनसंग्राम (Struggle for existence) &२ जीवनसम्मान (Respect for life) १२५ जीवनसंख्या १२६ जीवनशास्त्र (Biology) २५, २६, ११३ (ड) डाक्टर मेक्टगर्ट (Metaggert) ६३ डारविन साहब (Charles Darvin) =३ डायोजिनीज (Diogenese) ६० डेटा आफ इथिक्स (Data of Ethics) मम डिलेमा आफ डिटरमिनिज्म (Dilema of determinism) २६ डेमोक्रिटस (Democritus ) ५३ (12) तत्वज्ञान (Metaphysics) १६, १७ तर्कशास्त्र २१,२५ तितिक्षा १३५. तुलसीदासजी १४८ तृष्णा म तृष्णाक्षय ६८ (थ) थर्राना ११ (द) दशरथ 8३ दम १३५ दान ३१ दुःख २८ देव १९४<noinclude></noinclude> 6olxdsz6kk5coa8zy1mqayu8owvpa8h पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८५ 250 194512 664735 2026-07-02T17:51:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664735 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १७२] (ध) धर्म (Religion) १६, ७५, ७७, ११८, १४०, १४१ धम्मपद ३२ धर्म-ग्रंथ १४१ धर्मोद्धारक १२४ धृति १३६ निष्काम कर्म १०१ निरपेक्ष कर्त्तव्यशास्त्र ८७ निर्णायक ७७ नियत (Intention) ७३ नैतिक परिमाण ४७ न्याय ( Justice ) १३४ परतंत्रता ३५ परमाणुवाद ५३ परमहित ५५ परार्थ ६०, ६१, ६८,७६, १३६ परिमाण पशु पक्षी १२५,१२६ (12) (प) परसंबंधी (Other-regarding ) १३५ परार्थवाद ५३ पितृ ऋण १९४ प्रकृति ६७ महाशक्ति (Intellect) =<noinclude></noinclude> df09o9hdhjp0k5c1ck9o4iejbkon5lx पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८६ 250 194513 664736 2026-07-02T17:51:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664736 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १७३] प्राकृतिक चुनाव (Natural Selection ) 82 सेटो ११,२१,११४ बाहरी परिणाम ३०, ३१ बाहरी निर्णायक ३६ बाइबिल ३१, १३० (थ) विशेषीकरण (Specialiazation) ३३ बुद्धि ४१, ७४,६६,६७, १०७, १०८, १०६, ११० बृहदारण्यकोपनिषद २८ बेनथम (Bentham) ६५,६७,७३, ११६ बौद्धधर्म ३२,१००, भर्तृहरि ६१,६६,७६ भावनाशक्ति (Feeling) am (भ) भाव- साहचर्य - नियम ( Law of the association of ideas ) ७१ भौतिक विज्ञान १५ महात्मा बुद्ध १ मध्य पथ १० मनुस्मृति १०,०३ महाभारत ४६,१३४ (म) मनोविज्ञान (Psychology ) १०, २६, ४०, ४३, ४८ मनु महाराज ४१, १२२ मन ६६, १०३, १०६,११० :<noinclude></noinclude> 6gt4gt31m0elh5d9u4fi00w0u8d9k0j पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८७ 250 194514 664737 2026-07-02T17:51:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664737 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मनोविकार १०२ महात्मा तुलसीदास ११३ मध्यम श्रेणी का आदर्श ६ मानसिक विकाश १३३ मानसिक साम्य ४ मार्टिन लूथर ८१ [ १७४ ] मिल साहिब (Mi11) ५०, ६५, ६७, ६५, ७०, ७३,७६, मुख्य धर्म (Cardinal virtues ) १३४ मैडेवेली साहिब (Mendeville) पू याज्ञवल्क्य ५७ युधिष्ठिर ३३ युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ ३२ योगवाशिष्ठ २७, ३६, ११५ राजनीति २२ राजस ३१ राजकीय आईन ३४, १३१ राजनैतिक नियम ५६ राजनैतिक परिमाण ७६ रामचंद्रजी ७४,६३,१२७,१३८ [य] [] रिपबलिक (Republic) २१. १३४ लखा १३५.१३८ [ल] लेसली स्टीफन (Leslie Stephen ) =६, ६०, ६१,११० लोक-संग्रह १२०<noinclude></noinclude> ievd6n6c6jfa8niu1lgq3hybd2orxzl पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८८ 250 194515 664738 2026-07-02T17:51:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664738 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १७५ ] [व] वर्णाश्रम धर्म ११६, १२०, १२४ वर्णव्यवस्था १२१ वेष्टन (Environment) =५ वासना २८,६६ वासनाक्षय २८,१०२ वांछित ६८,६६ वाल्मीकीय रामायण ५१, १४१ यांछनीय ६८,६६ वास्तविक पदार्थ (The thing in itself) १०४ विज्ञान ११३,१२१ विकाश ८३ विदुरनीति २२ विलियम जेम्स (William James ) ३६,७७, ७८, ८० विकाशवाद ८२, ८३, ८४, ५, ८, ११ 'विधिवाक्य २०४ विभाजक रीति (Distributively ) ६६ वृहदारण्यक उपनिषद ५७ वेद ७२ वेदांत शास्त्र ४५,६७, ११२, १३६ हर्टमैन (Vonhartman) aa व्यक्ति =४,११३, १२७ व्यक्तिता १२७,१२८ व्यक्तिवाद ५४,५५ व्यष्टि समष्टि ८५, १०२, ११७,१३३ -<noinclude></noinclude> b1jsyxgjfqscmovbdheb4kw596f77s4 पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१८९ 250 194516 664739 2026-07-02T17:52:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664739 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[१७] [श] शुद्ध विज्ञान (Positive Science) ७१ शुद्ध बुद्धि (Pure Reason) १२, १०३ शूरता (Courage) १३४ श्रीशंकराचार्य ८१ (स) सन्यास ११६,११,१२२ सद्गुरु ६५ समदृष्टि ११६ समतानंद ११५ सर्वभूतहित ११६ सत्य १३५, १३६ समता १३५,१३७ सद्गुण (Virtues ) १३५ सदसद्विवेकवती बुद्धि (Conscience) ३६ समष्टि १०१.११७ सर्वभूतस्थिति ११७ सर्वभूतहिते रताः ११७, १२१, १२८ सर्वसुखवादी (Optimists) & सर्वदुःखवादी (Pessimists) & सांख्य ६७ सांख्यवाद १०४ स्वार्थ- परार्थ ६०, ६१, ११४ स्वार्थत्याग १०१ सामाजिक संस्थाएँ १२३, १२४,<noinclude></noinclude> 047pdezcstv6jnztytpv5gn5wrskmlc पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१९० 250 194517 664740 2026-07-02T17:52:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 664740 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>[ १७७] साम्यबुद्धि १०१ · साइंस आफ इथिक्स (Science of Ethics ) ६१ सिनिक्स (Cynics) ९६, १७ सिकंदर १० 'स्टोक्स (Stoies) ६७ सौंदर्य विज्ञान (Aesthetics) २१ संकल्प (Will) २६, १०० संज्ञाओं (Catagories of understanding ) १०३ स्वसंबंधी सद्गुण (Self-regarding virtues ) १३५ भाविक प्रवृत्तियां ( Instinct ) २९ (ह) हर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) ५, ६, ७, ६, ६०, ६१ हननेच्छा १२७ हित ७६ हेतु वा उद्देश्य ( Motive) ३० हैनरी सिजविक ६१ है और होना चाहिये ( Is & ought to be ) २४ क्षमा १३५, १३८ (च) (ज्ञ) ज्ञान (Knowledge ) १२४, ११५ 31 (Wisdom ) १३४ नोट- इस सम्मिलित नहीं हैं। सूची में भूमिका और परिशिष्टों के शब्द<noinclude></noinclude> ftrl07wzjq2eh3v2vzepecf774v31mn विकिस्रोत:सामुदायिक बैठक/जुलाई २०२६ 4 194518 664751 2026-07-03T01:29:20Z अनिरुद्ध कुमार 25 "{| class="wikitable" | कार्यक्रम || सामुदायिक बैठक/जुलाई २०२६ |- | स्थान || नई दिल्ली |- | तिथि || ३ जुलाई २०२६ |- | आयोजक || हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || दिल्ली के हिंदी विकिस्र..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 664751 wikitext text/x-wiki {| class="wikitable" | कार्यक्रम || सामुदायिक बैठक/जुलाई २०२६ |- | स्थान || नई दिल्ली |- | तिथि || ३ जुलाई २०२६ |- | आयोजक || हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत प्रबंधक, स्थानीय विकिपीडियन एवं हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन के स्वयंसेवक |} हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा विकिपीडिया फाउंडेशन तथा गूगल के सहयोग से दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत के प्रबंधकों और हिंदी विकिस्रोत संपादक एवं नए सदस्यों के लिए एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन ३ जुलाई २०२६ को दिल्ली में होगा। इसका उद्देश्य सामुदायिक संवाद को मजबूत करना तथा आगामी आयोजनों की रणनीतियों पर चर्चा करना है। योग्य सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अपना अनुरोध इस पृष्ठ के वार्ता पृष्ठ पर या संपर्क सूत्रों को ई-मेल लिखकर या वार्ता पृष्ठ पर लिखकर कर सकते हैं। == उद्देश्य == nfdkra1kct7bk2x4tbrfa3lgsmckklu 664752 664751 2026-07-03T01:48:08Z अनिरुद्ध कुमार 25 /* उद्देश्य */ 664752 wikitext text/x-wiki {| class="wikitable" | कार्यक्रम || सामुदायिक बैठक/जुलाई २०२६ |- | स्थान || नई दिल्ली |- | तिथि || ३ जुलाई २०२६ |- | आयोजक || हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत प्रबंधक, स्थानीय विकिपीडियन एवं हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन के स्वयंसेवक |} हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा विकिपीडिया फाउंडेशन तथा गूगल के सहयोग से दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत के प्रबंधकों और हिंदी विकिस्रोत संपादक एवं नए सदस्यों के लिए एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन ३ जुलाई २०२६ को दिल्ली में होगा। इसका उद्देश्य सामुदायिक संवाद को मजबूत करना तथा आगामी आयोजनों की रणनीतियों पर चर्चा करना है। योग्य सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अपना अनुरोध इस पृष्ठ के वार्ता पृष्ठ पर या संपर्क सूत्रों को ई-मेल लिखकर या वार्ता पृष्ठ पर लिखकर कर सकते हैं। == उद्देश्य == * [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]: नियम एवं शोधन प्रशिक्षण * [[|w:hi:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६]]: आयोजन प्रगति, कार्यक्रम रूपरेखा एवं स्वयंसेवक तैयारी * नए टूल और उन्नत प्रबंधन तकनीकों पर ज्ञान साझा करना। * विकिस्रोत के विकास पर सामुदायिक चर्चा और फीडबैक लेना। * दिल्ली के आस-पास के सदस्यों को जोड़कर स्थानीय योगदान को बढ़ावा देना। == रूपरेखा == jj3iamynjjwcs7yhgn8ubneu1ojzh1k 664757 664752 2026-07-03T03:06:24Z अनिरुद्ध कुमार 25 /* रूपरेखा */ 664757 wikitext text/x-wiki {| class="wikitable" | कार्यक्रम || सामुदायिक बैठक/जुलाई २०२६ |- | स्थान || नई दिल्ली |- | तिथि || ३ जुलाई २०२६ |- | आयोजक || हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत प्रबंधक, स्थानीय विकिपीडियन एवं हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन के स्वयंसेवक |} हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा विकिपीडिया फाउंडेशन तथा गूगल के सहयोग से दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत के प्रबंधकों और हिंदी विकिस्रोत संपादक एवं नए सदस्यों के लिए एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन ३ जुलाई २०२६ को दिल्ली में होगा। इसका उद्देश्य सामुदायिक संवाद को मजबूत करना तथा आगामी आयोजनों की रणनीतियों पर चर्चा करना है। योग्य सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अपना अनुरोध इस पृष्ठ के वार्ता पृष्ठ पर या संपर्क सूत्रों को ई-मेल लिखकर या वार्ता पृष्ठ पर लिखकर कर सकते हैं। == उद्देश्य == * [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]: नियम एवं शोधन प्रशिक्षण * [[|w:hi:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६]]: आयोजन प्रगति, कार्यक्रम रूपरेखा एवं स्वयंसेवक तैयारी * नए टूल और उन्नत प्रबंधन तकनीकों पर ज्ञान साझा करना। * विकिस्रोत के विकास पर सामुदायिक चर्चा और फीडबैक लेना। * दिल्ली के आस-पास के सदस्यों को जोड़कर स्थानीय योगदान को बढ़ावा देना। == रूपरेखा == यह कार्यक्रम ३ जुलाई २०२६ को सुबह १०:०० से शाम ४:०० तक आयोजित किया जा रहा है। इसकी गतिविधियों का ब्यौरा नीचे दिया जा रहा है— {| class="wikitable" ! समय !! गतिविधि !! विवरण !! सत्र संयोजक |- | १०:००-१०:३० पूर्वाह्न || पंजीकरण एवं चाय/नाश्ता || प्रतिभागियों का आगमन, पंजीकरण, और अनौपचारिक परिचय। || अनौपचारिक सामूहिक चर्चा |- | १०:३०-११:३० पूर्वाह्न || गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव:नियम, निषेध एवं प्रतिभागिता || अनिरुद्ध कुमार |- | ११:३०-१:०० अपराह्न || पृष्ठ शोधन के नए उपकरण और प्रक्रियाओं पर प्रशिक्षण || नवीनतम शोधन तकनीक || नीलम |- | १:००-२:०० अपराह्न || भोजनावकाश || भोजन एवं प्रबंधकों के बीच अनौपचारिक संवाद || |- | २:००-४:०० अपराह्न || हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन रणनीति || सम्मेलन कार्यक्रमों की रूपरेखा, आयोजन की वर्तमान प्रगति || सामूहिक चर्चा |- | ४:००-५:०० अपराह्न || निष्कर्ष, अगला चरण , चित्र और अल्पाहार || कार्यक्रम निष्कर्ष, आगे के कार्यक्रम पर चर्चा, चित्र लेना तथा अल्पाहार || अनिरुद्ध कुमार |} == प्रतिभागिता नियमावली == rjy52q30veojb6icwhbrc3hij3hmmlk 664758 664757 2026-07-03T03:10:30Z अनिरुद्ध कुमार 25 /* प्रतिभागिता नियमावली */ 664758 wikitext text/x-wiki {| class="wikitable" | कार्यक्रम || सामुदायिक बैठक/जुलाई २०२६ |- | स्थान || नई दिल्ली |- | तिथि || ३ जुलाई २०२६ |- | आयोजक || हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत प्रबंधक, स्थानीय विकिपीडियन एवं हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन के स्वयंसेवक |} हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा विकिपीडिया फाउंडेशन तथा गूगल के सहयोग से दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत के प्रबंधकों और हिंदी विकिस्रोत संपादक एवं नए सदस्यों के लिए एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन ३ जुलाई २०२६ को दिल्ली में होगा। इसका उद्देश्य सामुदायिक संवाद को मजबूत करना तथा आगामी आयोजनों की रणनीतियों पर चर्चा करना है। योग्य सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अपना अनुरोध इस पृष्ठ के वार्ता पृष्ठ पर या संपर्क सूत्रों को ई-मेल लिखकर या वार्ता पृष्ठ पर लिखकर कर सकते हैं। == उद्देश्य == * [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]: नियम एवं शोधन प्रशिक्षण * [[|w:hi:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६]]: आयोजन प्रगति, कार्यक्रम रूपरेखा एवं स्वयंसेवक तैयारी * नए टूल और उन्नत प्रबंधन तकनीकों पर ज्ञान साझा करना। * विकिस्रोत के विकास पर सामुदायिक चर्चा और फीडबैक लेना। * दिल्ली के आस-पास के सदस्यों को जोड़कर स्थानीय योगदान को बढ़ावा देना। == रूपरेखा == यह कार्यक्रम ३ जुलाई २०२६ को सुबह १०:०० से शाम ४:०० तक आयोजित किया जा रहा है। इसकी गतिविधियों का ब्यौरा नीचे दिया जा रहा है— {| class="wikitable" ! समय !! गतिविधि !! विवरण !! सत्र संयोजक |- | १०:००-१०:३० पूर्वाह्न || पंजीकरण एवं चाय/नाश्ता || प्रतिभागियों का आगमन, पंजीकरण, और अनौपचारिक परिचय। || अनौपचारिक सामूहिक चर्चा |- | १०:३०-११:३० पूर्वाह्न || गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव:नियम, निषेध एवं प्रतिभागिता || अनिरुद्ध कुमार |- | ११:३०-१:०० अपराह्न || पृष्ठ शोधन के नए उपकरण और प्रक्रियाओं पर प्रशिक्षण || नवीनतम शोधन तकनीक || नीलम |- | १:००-२:०० अपराह्न || भोजनावकाश || भोजन एवं प्रबंधकों के बीच अनौपचारिक संवाद || |- | २:००-४:०० अपराह्न || हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन रणनीति || सम्मेलन कार्यक्रमों की रूपरेखा, आयोजन की वर्तमान प्रगति || सामूहिक चर्चा |- | ४:००-५:०० अपराह्न || निष्कर्ष, अगला चरण , चित्र और अल्पाहार || कार्यक्रम निष्कर्ष, आगे के कार्यक्रम पर चर्चा, चित्र लेना तथा अल्पाहार || अनिरुद्ध कुमार |} == प्रतिभागिता नियमावली == # बैठक में केवल हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन में शामिल होने वाले दिल्ली के सदस्य शामिल हो सकते हैं। # आयोजकों की पूर्व अनुमति के बिना प्रतिभागियों द्वारा किये गये किसी भी तरह के व्यय का भुगतान नहीं किया जाएगा। # कार्यशाला के सत्रों में सक्रिय रूप से भाग लेना और रचनात्मक सुझाव देना अपेक्षित है। == सुविधाएं == प्रतिभागियों के केवल रेल या बस किराए तथा बैठक के दौरान भोजन का प्रबंध किया जाएगा। उनके ठहरने का कोई प्रबंध नहीं किया जाएगा क्योंकि अन्य सदस्य केवल दिल्ली के ही हो सकते हैं। == प्रतिभागी सूची == बैठक में शामिल होने वाले प्रतिभागी नीचे हस्ताक्षर करें— 8r3aazx8m85nhyjkgjmdx9njtxr50z0 664759 664758 2026-07-03T03:11:14Z अनिरुद्ध कुमार 25 /* प्रतिभागी सूची */ 664759 wikitext text/x-wiki {| class="wikitable" | कार्यक्रम || सामुदायिक बैठक/जुलाई २०२६ |- | स्थान || नई दिल्ली |- | तिथि || ३ जुलाई २०२६ |- | आयोजक || हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप |- | प्रतिभागी || दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत प्रबंधक, स्थानीय विकिपीडियन एवं हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन के स्वयंसेवक |} हिंदी विकिमीडियन्स यूजर ग्रूप द्वारा विकिपीडिया फाउंडेशन तथा गूगल के सहयोग से दिल्ली के हिंदी विकिस्रोत के प्रबंधकों और हिंदी विकिस्रोत संपादक एवं नए सदस्यों के लिए एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन ३ जुलाई २०२६ को दिल्ली में होगा। इसका उद्देश्य सामुदायिक संवाद को मजबूत करना तथा आगामी आयोजनों की रणनीतियों पर चर्चा करना है। योग्य सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए अपना अनुरोध इस पृष्ठ के वार्ता पृष्ठ पर या संपर्क सूत्रों को ई-मेल लिखकर या वार्ता पृष्ठ पर लिखकर कर सकते हैं। == उद्देश्य == * [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६]]: नियम एवं शोधन प्रशिक्षण * [[|w:hi:हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन 2026|हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन २०२६]]: आयोजन प्रगति, कार्यक्रम रूपरेखा एवं स्वयंसेवक तैयारी * नए टूल और उन्नत प्रबंधन तकनीकों पर ज्ञान साझा करना। * विकिस्रोत के विकास पर सामुदायिक चर्चा और फीडबैक लेना। * दिल्ली के आस-पास के सदस्यों को जोड़कर स्थानीय योगदान को बढ़ावा देना। == रूपरेखा == यह कार्यक्रम ३ जुलाई २०२६ को सुबह १०:०० से शाम ४:०० तक आयोजित किया जा रहा है। इसकी गतिविधियों का ब्यौरा नीचे दिया जा रहा है— {| class="wikitable" ! समय !! गतिविधि !! विवरण !! सत्र संयोजक |- | १०:००-१०:३० पूर्वाह्न || पंजीकरण एवं चाय/नाश्ता || प्रतिभागियों का आगमन, पंजीकरण, और अनौपचारिक परिचय। || अनौपचारिक सामूहिक चर्चा |- | १०:३०-११:३० पूर्वाह्न || गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव:नियम, निषेध एवं प्रतिभागिता || अनिरुद्ध कुमार |- | ११:३०-१:०० अपराह्न || पृष्ठ शोधन के नए उपकरण और प्रक्रियाओं पर प्रशिक्षण || नवीनतम शोधन तकनीक || नीलम |- | १:००-२:०० अपराह्न || भोजनावकाश || भोजन एवं प्रबंधकों के बीच अनौपचारिक संवाद || |- | २:००-४:०० अपराह्न || हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन रणनीति || सम्मेलन कार्यक्रमों की रूपरेखा, आयोजन की वर्तमान प्रगति || सामूहिक चर्चा |- | ४:००-५:०० अपराह्न || निष्कर्ष, अगला चरण , चित्र और अल्पाहार || कार्यक्रम निष्कर्ष, आगे के कार्यक्रम पर चर्चा, चित्र लेना तथा अल्पाहार || अनिरुद्ध कुमार |} == प्रतिभागिता नियमावली == # बैठक में केवल हिंदी विकिपीडिया सम्मेलन में शामिल होने वाले दिल्ली के सदस्य शामिल हो सकते हैं। # आयोजकों की पूर्व अनुमति के बिना प्रतिभागियों द्वारा किये गये किसी भी तरह के व्यय का भुगतान नहीं किया जाएगा। # कार्यशाला के सत्रों में सक्रिय रूप से भाग लेना और रचनात्मक सुझाव देना अपेक्षित है। == सुविधाएं == प्रतिभागियों के केवल रेल या बस किराए तथा बैठक के दौरान भोजन का प्रबंध किया जाएगा। उनके ठहरने का कोई प्रबंध नहीं किया जाएगा क्योंकि अन्य सदस्य केवल दिल्ली के ही हो सकते हैं। == प्रतिभागी सूची == बैठक में शामिल होने वाले प्रतिभागी नीचे हस्ताक्षर करें— == रूपरेखा == 1vlu4019ntppvj878k9myimk73v94jh पृष्ठ:2015.343748.Jatibhaskar.pdf/१८ 250 194519 664777 2026-07-03T06:54:31Z नीलम 26 test page 664777 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="नीलम" /></noinclude>अथ जातिमास्करः प्रारभ्यते भाषाटीका संवलितः । दोहा | गौरि गिरा गणपति सुमरि, शम्भुचरण शिर नाय । जातिभास्कर ग्रंथ शुभ, लिखत सुजन सुखदाय || उपोद्घातः । जाति क्या वस्तु है, इस समय इसके विषय में बहुत विवाद चल रहा है, कोई जन्मसे और कोई कर्म जातिका निर्णय करते हैं, परन्तु इसमें यथार्थ निर्णय क्या है, इस विषयको हम वेद, वेदाङ्ग, धर्मशास्त्र, पुराणादिके प्रमाणोंले निर्णय कर सर्वसाधारण के हितके निमित्त प्रकाश करते हैं । जातिशब्द जन् धातुसे क्तिन् प्रत्यय करनेसे बनता है, जिसके अर्थ जन्म और गोत्रके होते हैं । यद्यपि जाति एक प्रकारका छन्द, जाति फल, मालती• वेदकी शाखा आदि कई अर्थों में प्रयुक्त होता है, परन्तु यहां उसका प्रसंग न होनेसे उस विषयका उल्लेख नहीं किया जायगा । व्याकरणके मतसे किसी शव्दके प्रतिपाद्य अर्थको जाति कहते है, वैयाकरण चार प्रकारके शब्द बतलाते हैं, उनमें ही जातिवाचक एक प्रकार है, व्याकरणशास्त्र में जातिका लक्षण इस प्रकार कहा है । आकृतिग्रहणा जातिर्लिङ्गानाञ्च न सर्वभाक् । सकृदाख्यातनिर्ब्राह्या गोत्रञ्च चरणैः सह ॥ १ ॥ जिस आकृतिके द्वारा कोई पहचाना जाय, उसको अर्थात् आकृतिको जाति कहते हैं, मनुष्यकी हाथ पैर आदि विशेष आकृति न जानने पर उसको यह मनुष्य है ऐसा नहीं जाना जा सकता, पर उसकी आकृति जानने पर मनुष्य जातिका बोध होता है, इसी प्रकार भिन्न भिन्न आकृतियोंके जानने पर भिन्न भिन्न जातियोंकी पहचान होती है, मनुष्यको देखकर वृक्ष नहीं कहा जायमा, कारण कि मनुष्यकी और वृक्ष आदिकी आकृति में अन्तर हैं, मान लो कि यदि कोई मनुष्य वृक्षको न जानता हो तो उसको वृक्षकी पहचान निमित्त वृक्ष ही शाखा पत्ते वल्कलादिकी आकृति वताई जायगी जिससे वह व्यक्ति उस भाक- तिके द्वारा वृक्षको पहचान सकेगा. आकृति देखकर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यका बोध नहीं होता इस कारण दूसरा लक्षण करते हैं. लिङ्गानाञ्च न सर्वभाक् । Y जो सम्पूर्ण लिंगोंको न ग्रहण करै अर्थात् सत्र लिंगोंमें जिसका शब्दरूप न हो तात्पर्य यह कि जो तीनों लिंग न हो जैसे ब्राह्मणत्व और ब्राह्मण आदि, इन शब्दों में कोई पुंलिङ्ग और कोई स्त्रीलिंग रूप हैं।<noinclude></noinclude> 676d7i4rm70rj4fw8dc45kfiienc6h7 पृष्ठ:Sahityalochan.pdf/१९ 250 194520 664781 2026-07-03T07:02:23Z नीलम 26 test page 664781 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="नीलम" /></noinclude>( १२ ) वास्तविक आनंद और संतोप तभी हो सकता है जब यह दूसरों को भी संतुष्ट और आनंदित करने तथा विद्यार्थियों का उपकार करने में समर्थ हो । जगन्नियंता जगदीश्वर मेरी यह आशा और प्रार्थना भी पूरी करे। काशी माघ कृ० ७, सं० १६७६ वि० } श्यामसुंदर दास |<noinclude></noinclude> qixys2416nf0r6jnrsn0f57eupyg910 पृष्ठ:Srimad Bhagavad Gita Bhavartha Translation by Gadadhar Singh (1896).pdf/२० 250 194521 664784 2026-07-03T07:07:06Z नीलम 26 test page 664784 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="नीलम" /></noinclude>( c ) चाहे किसी के शरीर में हो परन्तु अवद है फिर भी तुम सब प्राणियों के लिये शोध नहीं कर सक्ते । यदि अपने धर्म को ओर देखो तब भी तुम को विचलित होना नहीं , चाहिये क्योंकि क्षत्रियों को धर्मयुद्ध से श्रष्ट पदार्थ 'दूसरा नहीं है । हे अर्जुन ! वह चची धन्य है जिस को अनायास खुले हुए स्वर्गद्दार की भांति ऐसा युद्ध प्राप्त हो । यदि तुम इस धर्म संग्राम में योग न दो तो अपने धर्म और कीर्ति को तिलांजलि देकर पाप के भागी होगे। लोग तुमारी इस अखड कीर्ति को गायेंगे और माननीय पुरुषों को कोर्ति मृत्यु से अधिक है । महारथी लोग तुम को भय के मारे रण से परान्मुख समभरी और जो लोग अभी तुमारो प्रशंसा करते हैं उनकी आंखों में तुम उतर जावरी । तुमारे वैसे लोग अनेक प्रकार का अपवाद टावे और तुमारी सामर्थ्य की निन्दा करेंगे, भता इससे दुःख की बात और क्या होगी ? हे कौंतेय ! उठो और लड़ो ! यदि मारे जावगे तो स्वर्ग पावोगे और जीते रहोगे तो पृथ्खो का राज्यसुख भोग करोगे । सुख, दुःख, हानि, लाभ, और जय पराजय की सम भाव समझ कर युद्ध में प्रवृत हो तो तुम की पाप नहीं होगा ॥ यह उपदेश तो तुम को सांख्य शास्त्र के अनुसार हुषा अब ज्ञान योग का उपदेश सुनो जिस 'के' प्<noinclude></noinclude> rlc50280lvk6eymoxnzu1y00u8w6480