विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.9 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu 252 43318 664879 350456 2026-07-04T03:39:48Z सौरभ तिवारी 05 49 664879 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=हिन्दी विश्वकोष |Language=hi |Volume= |Author= |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor=नगेन्द्रनाथ वसु |Illustrator= |Publisher=नगेन्द्रनाथ वसु |Address=कलकत्ता |Year=1922 |Key= |ISBN= |Source=djvu |Image=2 |Progress=अ |Pages=<pagelist 1=- 2=मुखपृष्ठ 3=1 /> |Volumes={{हिन्दी विश्वकोष संस्करण}} |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} [[श्रेणी:कोश]] [[श्रेणी:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६]] 3qly92q6vozk5i8nm9z0ryscyjfm8ns पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१२७ 250 45922 664893 561747 2026-07-04T08:57:01Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 664893 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गजकुमार मुनि - नमचिभिटो'''|'''१२५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> दीक्षा भयात्तू गजकुमार जबरदस्ती धक्के धक्के घरों- की सती स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करने लगे । एक दिन पांसुल सेठकी स्त्री पर इन्होंने दृष्टि डाली और उसे बिगाड़ भी दिया । सेठको मालुम पड़ते ही वह क्रोधा- ग्निसे जल कर उनके विरुद्ध खड़ा हुआ ; परन्तु राज- कुमारके सामने उस बे चारेकी कुछ भी न चली। इसी प्रकार जो उनके विरुद्ध खड़ा होता था, वह जड़ मूलसे नष्ट हो जाता था एक दिन पुण्योदयसे नेमिनाथ भगवान् द्वारकामें आये। बलभद्र, वासुदेव तथा और भी बहुतसे राजा- महाराजा उनकी पूजाके लिये पहुंचे । उनके साथ गजकुमार भी थे । भगवान्‌का उपदेश हुआ । उपदेशका असर गजकुमार पर खूब ही पड़ा। उन्हें संसारसे घृणा हो गई। अपने किये हुए पापों पर वे बहुत ही पश्चात्ताप करने लगे । उसी समय भगवान्‌के समक्ष उन्होंने दिगम्बरी दीक्षा धारण की और वनमें जा शास्त्र-ध्यानमें लीन हो तप करने लगे । मुनि होनेका हाल जब पांसुल सेठको मालूम पड़ा तब वह क्रोधी अपना बदला लेनेके लिये वनमें पहुंचा और उन ध्यानस्थ गजकुमार मुनिके समस्त मस्तकानी- में लोहेके बड़े बड़े कीलें ठोंक कर चला आया। गज- कुमार मुनि पर उपद्रव तो बड़ा ही दुःसह हुवा; पर वे जैनतत्त्वके पक्के अभ्यासी और विद्वान् थे, इस लिये उन्होंने इस घोर वेदनाको एक कांटे चुभनेके समान भी न समझे बड़ी शान्ति और धीरताके साथ शरीर छोड़ा। यहांसे ये स्वर्गमें गये । ( आराधना कथाकोश ) गजकुंभा ( हिं० पु० ) हाथीका उभरा हुआ मस्तक, हाथीके माथे पर दोनों ओर उठे हुए भाग। गजकुसुम ( सं० पु० ) नागकेशर । गजकुसुमा ( सं० स्त्री० ) नागकेशर । गजकूर्मोशिन ( सं० पु०) भक्ष पुरुषों चन्द्राति, यक्ष-जिनि । गजकृत् । ( शब्दरत्ना०) पक्षिराज गरुड़ने सुधामान गज- कच्छपको भक्षण किया था, इस लिये इसका नाम ‘गज- कूर्मोशित्' पड़ा । <Small>गरुडपदोय पृष्ठ देखो।</small> गजकृष्णा ( सं० स्त्री०) गज एव कृष्णा। गजपिप्पली, बड़ी पीपर। ( रत्नमाला ) <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गजकेसर ( सं० पु० ) नागकेशर, कवावचीनी । गजकेशरी—उड़िसाके केशरीवंशीय एक प्रतापी राजा, वटकेश्वरीके पुत्र । इन्होंने १२ वर्ष राज्य किया था । कलिकाल देखो । गजकेसर ( सं० पु० ) एक प्रकारका धान जो आश्विन महीनेमें तैयार होता है । इसका चावल बहुत दिन तक रहता है । गजकोशित ( सं० पु० ) नृत्यमें एक प्रकारका भाव । गजगति ( सं ० स्त्री० ) १ हाथीकी चाल । २ हाथीकी मन्द चाल ( सुलक्षणा स्त्री हाथीकी मन्द चालकी तरह चलती है ) । ३ रोहिणी, मृगशिरा और आर्द्रा में शुक्रको स्थिति। ४ एक वर्णमाला का वर्णवृत्त । गजगमन ( सं० पु०) हाथीकी तरह मन्द गति, वह जो हाथीकी मन्दगति सरीखे चलता हो । गजगामी ( सं० पु०) हाथीकी चालकी तरह चलनेवाला, मन्द गामी। गजगाह ( हिं० पु० ) हाथीकी भूल, पाखर । गजगोचर ( का० पु० ) गजमोती, गजमुक्ता । गजघण्टा ( सं० स्त्री० ) गजस्य घण्टा-५तत् । १ हाथी- के गलेका घण्टा । २ रङ्गपुर जिलाका एक वाणिज्य- प्रधान नगर । यह अक्षा० २५° ४८' ४५''उ० और देशा० ८८° २०' पू०में अवस्थित है। वहांसे चूना और पाटको रफ्तनी अधिक होती है। गजचक्षुः ( सं० त्रि० ) गजस्येव चक्षुर्यस्य वा गजस्य चक्षुरिव चक्षुर्यस्य इति बहुव्री० । जिसको आंखें हाथी- को आंखोंकी तरह हों, विल्लतचक्षु । गजचर्म ( सं ० पु० ) १ गजका चमड़ा। २ एक प्रकारका रोग, जिसमें शरीरका चर्म गजके चमड़े की तरह मोटा और कड़ा हो जाता है। यह रोग सिर्फ मनुष्य कोको नहीं होता किन्तु घोड़ो को भी होता है । गजचिर्भिट ( सं० पु० ) गजप्रियचिर्भिट:। एक प्रकारका तरबूज । गजचिर्भिटा ( सं० स्त्री० ) गजप्रिया चिर्भिटा, मध्यप० । इन्द्रवारुणी, इन्द्रायन, बड़ी इन्द्रफला । गजचिर्भिटो ( सं० स्त्री० ) गजप्रिया चिर्भिटो, इन्द्र- वारुणी, इन्द्रायन । <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol. VI. 32|1em}}</noinclude> 7ayvb0qt6qwmieny9d98a57ge6vw4rf पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१२८ 250 45931 664894 561748 2026-07-04T10:22:22Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 664894 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|१२६| गवछावा-गजदन्त}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> गजच्छाया (सं० स्त्री०) गजस्य कश्चित् छाया प्रतिविम्बः; ६-तत्पुरुष। १. हाथी की छाया। २. योग विशेष। यह योग श्राद्ध के लिए धन्य माना जाता है। यह उस समय होता है जब त्रयोदशी के दिन चन्द्रमा मघा नक्षत्र में और सूर्य हस्त नक्षत्र में हो। ३. सूर्यग्रहण काल। यह समय श्राद्ध के लिए प्रशस्त है। ​ {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"यन्मेषस्य यदा भानुः शशिनो मघसंयुक्।<br> त्रयोदश्या तु या प्रोक्ता तत् श्राद्धं प्रवरं विदुः॥" (वराह)</poem>}}}} ​ ४-अमावस्या के दिन जिस समय छाया पूर्वमुखी हो, उस काल को 'गजच्छाया' कहते हैं। ​{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "अमावस्या यदा होता छाया या प्राङ्मुखी भवेत्।<br> गजच्छायेति सा प्रोक्ता तत् श्राद्धं प्रवरं विदुः॥" (मलमासतत्त्व)</poem>}}}} ​ गजढका (सं० स्त्री०) गजोपरिरक्षिता ढका। हाथी के ऊपर एक बड़ा ढाक; हाथी के ऊपर रखा हुआ एक बड़ा ढोल। ​गजट (अं० पु०) १. समाचार पत्र। २. भारतीय सरकार अथवा प्रान्तीय सरकारों द्वारा प्रकाशित सामयिक पत्र (राजपत्र)। इसमें बड़े-बड़े कर्मचारियों की नियुक्ति, नवीन कानूनों के मसौदे और भिन्न-भिन्न सरकारी विभागों के जानने योग्य बातें प्रकाशित की जाती हैं। ​ गजता (सं० स्त्री०) गजानां समूहः; गज+तल्। <Small>बलवान था ४|२|४३ शांति छे</small> हस्ति-समूह, हाथियों का झुंड। ​ गजपुष्पविकसित (सं० स्त्री०) दृष्टि विशेष, इसका दूसरा नाम 'समभगजविकसित' है। ​गजदन्त (सं० पु०) गजस्य दन्त इव दन्तो यस्य, बहुव्रीहि। १. मँबिया। २. नागदन्त; चीजें वगैरह रखने के लिए दीवार में लगाए हुए दो खूँटे। ३. दाँत के ऊपर जमने वाला दाँत। ४. गजस्य दन्तः, ६-तत्पुरुष। हाथीदाँत (Ivory)। हाथीदाँत पृथ्वी का बढ़िया और महँगा पदार्थ है। इससे नाना प्रकार की बरतने (उपयोग में लाने) लायक, मनोहर और टिकाऊ चीजें बना करती हैं। हाथियों की ऊपरी चौंध (जबड़े) में और जो दो तीखे दाँत रहते हैं, बड़े होने पर सब उपयोगी गजदन्त बना करते हैं। नीचे के चौके दाँत बढ़ते नहीं, बच्चियों के दाँत भी छोटे ही रहते हैं। पेडू को बाल निकालने या पेड़ काटने में ज़रली <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हाथियों के दाँत बीच-बीच में टूट जाते हैं, इसी से वे बहुत बड़े नहीं हो सकते। एक बार टूटने पर हाथीदाँत फिर भर आते हैं। वह ६ हाथ तक बढ़ते हैं। ऐसे दो दाँत तौल में लगभग ४ मन बैठते हैं। साधारणतः उतने बड़े हाथीदाँत देखने में नहीं पड़ते। १० सेर या १ मन के हाथीदाँत प्रायः देखे जाते हैं। हाथीदाँत तिरछा तोड़ने से भीतर की गोल-गोल रेखाएँ देखने में आती हैं। ​ भारतवर्ष में जो हाथीदाँत होते हैं, उनसे इस देश का काम नहीं चलता। प्रतिवर्ष अफ्रीका से इस देश में हाथीदाँत मँगाए जाते हैं। जो हाथीदाँत भारतवर्ष के कहलाते हैं, वे अधिकांश असम और ब्रह्मदेश (म्यांमार) से आते हैं। कहते हैं कि पूर्वकाल के असम के नागा लोग पहाड़ी गुफाओं से दाँत ला करके जंगल के बाहर रख देते थे और अपने आप जंगल में छिप जाते थे। हिन्दू वणिक (व्यापारी) वहाँ पहुँचकर नागाओं की प्यारी चीजें वहाँ रखकर हाथीदाँत उठा लाते थे। वणिकों के चले जाने पर वन से निकलकर नागा लोग वह सारी चीजें उठा करके घर लाते थे। हिन्दू वणिकों और नागाओं के साथ ऐसे ही व्यवसाय-वाणिज्य चलता था। हिन्दुओं के गाँवों में जा उनसे मिलकर लेन-देन करना नागाओं के धर्म में निषिद्ध है। कह नहीं सकते, यह बात कहाँ तक ठीक है। नागा बहुत थोड़े हाथीदाँत लाया करते हैं। मिश्मी और खामती लोग ही यह द्रव्य अधिक परिमाण में बेचते हैं। प्रतिवर्ष असम से मध्य भारत को १०० मन से भी अधिक हाथीदाँत भेजा जाता है। ​अफ्रीका से प्रतिवर्ष प्रायः ५ हजार मन हाथीदाँत आता है। जंजीबार, मोजाम्बिक और अदन से ही इसकी ज्यादा आमदनी होती है। यह हाथीदाँत पहले बम्बई में आ करके इकट्ठा होता है। फिर उसका कोई खास भाग विलायत भेजते हैं। अवशिष्ट (बचा हुआ भाग) इसी देश के व्यवहार में रहता है। अफ्रीका से बम्बई में जो हाथीदाँत मँगाया जाता है, तौल के हिसाब से बिकता है। बम्बई का सेर २८ रुपये भर है। एक-एक हाथीदाँत ऐसे हैं जिनमें कोई ४ मन बैठता है। उसका मूल्य २५० रु० है। दूसरे देशों को भेजने से पहले हाथीदाँत को काट करके बम्बई के लोग कई भागों मेंं बाँट देते हैं। हाथ दांत का अगला <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> a3yj5dzjpmvb5l8cxi7s2888uz3z4e1 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१४७ 250 75669 664831 302965 2026-07-03T15:58:56Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664831 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१४६'''|'''ईसाई'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> रमणीने अन्यायरूप निर्यातन उठाया है। एक पूर्णगर्भा युवती ज्वलन्त- अनल में डाल दी गयी थी। अग्निमें उनका गर्भ फटनेसे एक नरकुमार निकल पड़ा। एक निकटस्थ व्यक्तिने अग्निसे उस सद्योजात शिशुको उठा लिया, किन्तु निर्दय मजिष्ट्रेटने सद्योजात शिशुको फिर ज्वलन्त अग्निमें जलानका आदेश दिया था। इस तरह गर्भस्थ शिशुतक धर्मकुहकमें भस्मीभूत हुआ। अहो! मानवको प्रकृति कैसी जघन्य है।” बस! उस समय पोपके विरुद्ध जो बोल देता, अनिवार्य मृत्यको वही मोल लेता। १५५८ ई॰ को पोपभक्त इङ्गलेण्डेश्वरीने काण्टर-बरीके प्रधान धर्माचार्य (Archbishop of Canter-bury)को संस्कारका पक्षपाती समझ मरवा डाला। उन्होंने इङ्गलेण्ड की तरह आयरलेण्ड के प्रोटेष्टाण्टको दबाने के लिये भी डाक्टर कोलको पहुंचाया, किन्तु भगवान् ने उन्हें अद्भुत उपायसे बचाया था। रानीका मुहर लगा आज्ञापत्र ले यात्राकालमें नगरपाल डाक्टर से मिलने गये। बात करते करते डाक्टरने अपना छोटा खरीता देखाकर कहा था,――‘इसमें आदेशपत्र रखा है। उससे आयलेंण्डके (प्रोटेष्टाण्ट नामक) विधर्म्मी मारे जायेंगे।’ इस बातको एक प्रोटेष्टाण्ट रमणीने सुन लिया। उसके भ्राता आयर्लेण्डमें ही रहे। जब नगरपाल यथारीति आलापके पीछे चले, तब डाक्टर भी उनकी सम्मानरक्षाके लिये अपने मकान् से नीचे उतरे थे। किन्तु जिस खरीतमें आज्ञापत्र रहा, वह ऊपरवाले कमरे में छूट गया। डाक्ट बापस आ खरीता उठा चले थे। १५५८ ई॰ के अक्तोबर मासकी ७वीं तारीख़को डबलिन नगरमें वे जा पहुंचे। प्रधान प्रधान राजकर्मचारी उन्हें अभ्यर्थनापूर्वक दुर्ग में ले गये। वहां राज्यके सब बड़े आदमी उपस्थित रहे। डाक्टरने उच्चेःस्वरसे वक्तता दे अपने आनेका कारण कहा और रानीकी अनुमतिका पत्र सबको देखाया। उन्होंने रानीके सहकारी प्रतिनिधिको खरीता दिया था। प्रतिनिधिने अपने कार्याध्यक्षसे रानीका अनुमतिपत्र निकाल पढ़नेको कहा। खरीता खुला; किन्तु उसमें रानीका वह पत्र न निकला, ताश <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> और सलाईका ढेर लगा था। विषम समस्या! डाक्टर महाशयका दमाग चकरा गया। सभी अवाक्! फिर डाक्टर अनुमति लेने गये। किन्तु इङ्गलेण्डमें अनुमति मिलने के पीछे ही रानी मरीं। इसप्रकार आयर्लेण्डके प्रोटेष्टाण्टोंने अव्याहति पायी थी। प्रोटेष्टाण्ट कहनेसे प्रधानत: लूथरके मताबलम्बी समझ पड़ते हैं सही, किन्तु सकल स्थानके प्रोटेष्टाण्ट उनका मत नहीं मानते। जेनिवा नगरमें कलबिन नामक एक विख्यात ईसाई अध्यापकने पोपके विरुद्ध जो मत चलाया; स्विजरलेण्ड, फ्रान्स, स्कटलेण्ड प्रभृति स्थानके अनेक प्रोटेष्टागटोंन उसीको अपनाया था। उन्हें कलबिन नामसे भी पुकारते हैं। १५६० ई॰ को इस मतके माननेवाले लोग फ्रान्समें बढ़े। फ्रान्स देशके रोमन काथोलिक विद्रूप बनाकर उन्हें हगोनट (Huguenot) कहते थे। इसीसे उनका नाम हगोनट पड़ गया। स्कटलेण्ड के कलबिनी ईसाइयोंने भी रानी मेरीके उत्पातसे जो कष्ट पाया, उसे बिलकुल लिख कर किसने देखाया था। १५६१ ई॰ को इङ्गलेण्डेश्वरी एलिजाबेथने अंगरेजी फौज भेज पोपभक्त ईसाइयोंके अत्याचारसे प्रोटेष्टापटोंको छुड़ा दिया। उस समय इङ्गलेण्ड, स्कटलेण्ड, आयर्लेण्ड, देनमार्क, स्विडेन, स्विजरलेण्ड, जर्मनी और रोमराज्यके किसी किसी स्थानमें समाजका संस्कार हुआ सही, किन्तु फ्रान्समें बड़ा गड़बड़ पड़ा था। इसकी हयत्ता नहीं-फ्रान्सीसी राजगणके उत्पीड़नसे कितने धर्मात्मा प्रोटेष्टाण्ट मरे। शेषमें १५७२ ई॰ के अगस्त मासकी २४वीं तारीख आयी। ईसाई जगत्का कैसा भयानक दुर्दिन था! भारतके समग्र सिपाही-विद्रोहका इतिहास पढ़कर भी ईसाइयोंका जो हृदय न डिगेगा, वह इस सकल दिनके वृत्तान्तको सुनते ही थर थर कांप उठेगा। एक दिनके इतिहाससे ही यह अति स्पष्ट खिंचा-मानव कैसा पिशाच, धर्मो-म्माद और भयङ्कर, जगतमें साम्प्रदायिक पक्षपात कैसा अनिष्टकर होता है। पाश्चात्य सभ्यजगत्के आदर्श फ्रान्सकी राजधानीमें एक ही दिन सत्तर हज़ार प्रोटेष्टाण्ट ईसाई अति निष्ठुर अत्याचारसे मारे <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 6ip54tvrcg52v73xeuqmtia9v7bs1cx पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१४६ 250 75700 664829 303015 2026-07-03T15:30:25Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664829 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''ईसाई'''|'''१४५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> हो विपक्षवादीगणके ध्वंस में लगे। साक्सनीराज। (Elector of Saxony) और इसके सामन्तराजने (Landgrave of Hesse) ससैन्ध बावरियामें पहुंच सम्राट्का शिविर मारा था। नरके रक्तसे रणक्षेत्र डूबा। उधर साकसनीके डाक मरिस विश्वासघातकतासे खुल-तातका राज्य दबा बैठे थे। इसीसे साकसनीराजको स्वराज्यके अभिमुख घूमना पड़ा। राहमें मरिससे हारनेपर वे पकड़े गये थे। दुर्वत्त मरिस् साकसनीके अधिपति (Elector of Saxony) बने। उनके चातुरी-जालमें पड़ हेसके सामन्तराज भी बंधे थे। इस प्रकार शठकी छलनासे प्रोटेष्टाण्ट समाजके दो अधिनेता निगृहीत हुये। फिर अगस् बर्गमें सभा लगी थी। सम्राट्ने आदेश सुनाया-प्रोटेष्टाण्टोंको आगामी ट्रेण्टकी महासभापर निर्भर होना पड़ेगा। उस समय सभाकी चारो ओर सम्राटके सिपाही खड़े थे। अनेक संभ्रान्त प्रोटेष्टाण्टोंने अपमान और अत्याचारके भयसे सम्राट् का आदेश मान लिया। किन्तु थोड़े ही दिन पीछे जर्मन राज्यमें महामारी फैल गई। इसीसे सम्राट् का आदेश कार्यकर न हुआ। १५५१ ई॰ में फिर सभा लगी! सम्राट्ने बलपूर्वक जर्मन राजगणको ट्रेण्टकी सभामें जानेके लिये कहा। सभामें मरिस् ने प्रस्ताव किया था,―ट्रेण्टकी महा सभामें पोप स्वयं किंवा अपने प्रतिनिधिरूपसे आन सकेंगे। समाज-संस्कारकी पहली निष्पत्ति प्रोटेष्टाण्ट धर्माध्यापकगणके सामने फिर देखी जायेगी। सभा उखड़ने पर प्रोटेष्टाण्ट आत्मरक्षाके लिये कमर कसने लगे। मैलङ्कथन प्रभृति प्रोटेष्टाण्टपण्डित स्व स्व धर्मनैतिक मत और विश्वास लिखनेपर सन्नद्ध हुये। साक् सनीराज मरिस् ने सुना था,―जर्मन-सम्राट् जर्मनीके राजन्यवर्गकी स्वाधीनता छीननेकी चेष्टा कर रहे हैं। उन्होंने इसके प्रतिविधान पर गुप्तभावसे दूत भेज राजगणको उभारा। फ्रान्सके राजाने भी साथ दिया था। १५५२ ई॰ को मिलित सैन्यदलने अकस्मात् इन्सप्रक नगरमें प्रबल वेगसे सम्राटपर आक्रमण मारा। सम्राट् को पूर्वसे विन्दुविसर्ग विदित न रहा, सुतरां अकस्मात् आक्रमणपर हतबुद्धि हो <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> सन्धि करना पड़ी। सम्राट्ने प्रतिज्ञा की थी-रोमक और प्रोटेष्टाण्ट-समाज हमारे प्रासादमें सम-भावसे गृहीत होंगे। अतःपर ब्राडनबर्गके सामन्त-राजकुमार आलबर्टने रोमक-समाजसे युद्धकी ठानी। उनके अत्याचारसे जर्मन राज्यमें हाहाकार उठा था। सैकड़ों रोमन काथोलिकोंका प्राण निकला। ऐसा नहीं, कि केवल उस समय जर्मन राज्यमेंही रक्तका स्रोत बहा था। किन्तु इलेण्ड प्रदेशमें उधर प्रोटेष्टाण्टों पर भी अभावनीय अत्याचार हुआ। उस समय पोपभक्त स्पेनियार्ड हलेण्डके अधिपति रहे। सुनते हैं,――उनके कठोर निर्यातनसे लक्षाधिक प्रोटे-ष्टाण्टोंने अकाल ही कालके कवलमें जीवन विसर्जन दिया। असह्य यन्त्रणासे घबरा हलेण्डवासी युद्दमें डट गये। उससे हलेण्ड़के अनेक स्थान फिर स्वाधीन हुये थे। १५५५ ई॰ के सितम्बर मासकी २५वीं तारीखको जर्मन-सम्राट्ने राज्योंपर शान्ति रखनेलिये अक्सबर्म-में फिर महासभा लगायी। सभामें स्थिर हुआ था――‘प्रजावर्ग में जिसे जिसपर विश्वास रहे,वह उसी समाजसे मिल सकेगा। प्रोटेष्टाण्टोंके साथ रोमक काथोलिकोंका कोई संस्रव न रहेगा। आजसे पोपके कर्मचारी प्रोटेष्टाण्टोंसे कोई बात कह न सकेंगे।’ इतने दिन पीछे निविवाद जर्मन-राज्यमें लूथरका संस्कार (Reformation) चल पड़ा। इसी समय इलेण्डमें भी संस्कारक पर दारुण अत्याचार होता था। रोमकसमाजके किये विषम अत्याचारोंकी कथा सुन अश्रु निकल पड़ते हैं। बहुत काल पहले विक्लिकने प्राण त्याग किया था। मृत्यु के ४४ वर्ष पींछे कबरसे उन्हीं प्रथम संस्कारककी कई अस्थियां उठाकर गोमयकुण्ड में जलाई गई। ८म हेनरीके राजत्वकालमें भी कई प्रोटेष्टाण्ट-पण्डित हुताशनमें दग्ध हुये थे। फिर मेरीके इङ्गलेण्डकी अधोश्वरी बननेसे भी प्रोटेष्टाण्टोंका उत्पीड़न कुछ कम न हुआ! १५६५ ई॰ को इङ्गलेण्डेश्वरीके आदेशसे प्रायः शताधिक प्रोटेष्टाण्ट अनलमें जल मरे, बालक और रमणीगण भी बचाये न बचे। नील साहबने अपने इतिहास में लिखा है,――‘इसवर्षके अत्याचारकी कथा अधिक क्या लिखें! कई शत अबला <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 37|em}}</noinclude> gtm43e5lhe9uze2pnrbvq8srhvhpreh पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१४८ 250 75712 664833 303028 2026-07-03T16:35:09Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664833 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''ईसाई'''|'''१४७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> गये थे। उस समय ९म चार्लस् फ्रान्सके अधिपति थे। उनकी भगिनीसे नेभारके राजाका विवाह होनेवाला था। सैकड़ों प्रोटेष्टाण्ट ईसाई पारिस नगरमें उपस्थित थे। घर-घर आमोदका स्रोत वह रहा था। किन्तु यह क्या आ पड़ा! एक मुइतमें हाहाकार उठा। प्रोटेष्टाण्टोंको अनुरागिणी फ्रान्स राज-भगिनीने विष खाकर प्राण त्याग दिये। दुष्ट रोमन काथोलिकोंने फ्रान्सराज के आदेशसे अकस्मात् घरमें घुस अति नीच भावसे वीरपुरुष नौसेनापति कोलिग्नको मार डाला। शत्रुओंने उनके पूत देह को खण्ड-विखण्ड कर सबके सामने वातायनसे राजपथ पर फेंका। उनका मुण्ड राजमाता और राजाक निकट भेजा गया। हत्याकारियोंने प्रकृत पिशाचका रूप बनाया था। नरके रक्तसे उनका सर्वशरीर रंगा। वर-घरसे आर्तनाद और मर्मभेदी रोदन-निनाद निकला! उच्चपदस्थ शत शत सामन्त और सम्भ्रान्त व्यक्ति हत्याकारीगणके भीषण आघातसे मरने लगे। ऐसा कोई वौर न था, जो अनाथ प्रोटेष्टाण्टों को बचा लेता। वारिस नगरीके प्रत्येक राजपथमें प्रकृत ही रक्तकी नदी बही थी। बालक-बालिका, युवक युवती और वृद्ध वर्षीयसी किसीको निस्तार न मिला। यह भयङ्कर दृश्य अपनी आंखों देख किसी भुक्तभोगी ईसाईने लिखा है,――‘अति भीषण दृश्य देख पड़ा था। परमेश्वर! उस नरकका रूप फिर न देखाये। दुर्वल हृदय यह धारण करने की क्षमता भी नहीं रखता, कि मानव इतना निष्ठुर रक्तपिशाच होता है।हत्या-कारीके तीब्र आघातसे पिता मृत्यु की शय्यापर सोता और पति विपक्षके बन्धनमें पड़ रोता था। उसी पिता और पतिके सामने अबला रमणीको पकड़कर दुर्वृत्तने अत्याचार किया। आंखोंसे देखते माताके हृदयका एकमात्र धन स्तन्यपायी शिशु मारा जाता था। दुर्वृत्तों ने स्तनको काट,उलङ्ग कर और पद पकड़ सुन्दरी रमणियों को राजपथ पर घसीटा। उनके पदा-घातसे अनेक गर्भवती नारियों का मर्भ गिरा था। किसीने आसन्न मृत्य कालमें जो एक घूंट जल मांगा; तो उसी समय किसी निर्दय व्यक्तिने जाकर उसके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मुखमें मूत मारा। किसीका हाथ-पैर और किसीका नाककान काटा था। इसप्रकार निगृहीत शत शत व्यक्तिका आतैनाद उठा। सभ्य बननेवालोंको धिक्कार! क्या यही सभ्यताका चित्र है!<ref>*Comber's History of the Parisian Massacre of St. Bartholomew; Clark's Looking Glass for Persecution प्रभृति ग्रन्थ द्रष्टव्य हैं।</ref> अति अल्प समयमें ही यह संवाद पोपको मिल गया! इसे सुन पोपके आनन्द की सीमा न रही! रोम नगरी उज्ज्वल आलोकमालासे सजी। घर घर नृत्यगीत होने लगा। महामति पोपने घोषणा की―‘आज महोत्सवका दिन है! हमारे विपक्षवादी विधर्म्मो (प्रोटेष्टाण्ट) मारे गये हैं! इसकी अपेक्षा अधिक सुखका संवाद दूसरा कौन हो सकता है। हमारे अधीन जहां जो रहे, इस उत्सवमें आमोद प्रमोद मनाने से न चूके!’ पोपके महाभिषेकका उत्सव हुआ था। ईसाइयों में यह दिन ‘सेण्ट बार्थलम्य’ज डें (St. Bartholomew's day) कहाता है। जर्मनींने इसका नाम ‘ब थोजीट' (Bluthoziet) रखा है। पारिस नगरीकी तरह फ्रान्समें सर्वत्र अनेक दिन तक प्रोटेष्टाण्ट ईसाइयोंपर ऐसा ही अत्याचार रहा था। शेषको फ्रान्सराज १४श लुईके राजत्वकालमें उसने अधिकतर भीषण आकार बनाया! उत्पीड़नकी कथा लिखनेसे व्यक्त नहीं होती। <ref>↑Lewis de Enarolle's Memoirs of the Persecutions ef the Protestants in France द्रष्टव्य है।</ref>सेकड़ों प्रोटेष्टाण्ट गुप्तभावसे देश छोड़ भिन्न राज्य में रहकर प्राण बचा सके थे। १७०५ ई॰ को देनमार्क-राजके साहाय्य से जिगेन बलग (Ziegenbalg) और प्लचु (Plutschaw) नामक लूथरके मतावलम्बी दो ईसाई भारतमें प्रोटेष्टाण्ट-मत चलाने आये। दोनो ही महापण्डित थे। जिगेन-बलग तामिल भाषामें बाइबिलका अनुवाद बनवाने लगे। भारतकी जितनी भाषामें बाइबिलका अनुवाद मिलता, उसमें यही सर्वप्रथम है। जिगेन-बलगके अन्यतम सहचर सुल्ज़ ने (Schultze) १७२५ ई॰ को हिन्दी भाषामें बाइबिल निकाली थी। उनके यत्नसे मन्द्राज, कडेलूर, तञ्जोर प्रभृति नाना {{rule}} {{smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> tbn28nu2y6skndh9yircuqqm7tn9mq0 664834 664833 2026-07-03T16:35:53Z अँजली चौधरी 2439 664834 proofread-page 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रक्तकी नदी बही थी। बालक-बालिका, युवक युवती और वृद्ध वर्षीयसी किसीको निस्तार न मिला। यह भयङ्कर दृश्य अपनी आंखों देख किसी भुक्तभोगी ईसाईने लिखा है,――‘अति भीषण दृश्य देख पड़ा था। परमेश्वर! उस नरकका रूप फिर न देखाये। दुर्वल हृदय यह धारण करने की क्षमता भी नहीं रखता, कि मानव इतना निष्ठुर रक्तपिशाच होता है।हत्या-कारीके तीब्र आघातसे पिता मृत्यु की शय्यापर सोता और पति विपक्षके बन्धनमें पड़ रोता था। उसी पिता और पतिके सामने अबला रमणीको पकड़कर दुर्वृत्तने अत्याचार किया। आंखोंसे देखते माताके हृदयका एकमात्र धन स्तन्यपायी शिशु मारा जाता था। दुर्वृत्तों ने स्तनको काट,उलङ्ग कर और पद पकड़ सुन्दरी रमणियों को राजपथ पर घसीटा। उनके पदा-घातसे अनेक गर्भवती नारियों का मर्भ गिरा था। किसीने आसन्न मृत्य कालमें जो एक घूंट जल मांगा; तो उसी समय किसी निर्दय व्यक्तिने जाकर उसके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मुखमें मूत मारा। किसीका हाथ-पैर और किसीका नाककान काटा था। इसप्रकार निगृहीत शत शत व्यक्तिका आतैनाद उठा। सभ्य बननेवालोंको धिक्कार! क्या यही सभ्यताका चित्र है!<ref>*Comber's History of the Parisian Massacre of St. Bartholomew; Clark's Looking Glass for Persecution प्रभृति ग्रन्थ द्रष्टव्य हैं।</ref> अति अल्प समयमें ही यह संवाद पोपको मिल गया! इसे सुन पोपके आनन्द की सीमा न रही! रोम नगरी उज्ज्वल आलोकमालासे सजी। घर घर नृत्यगीत होने लगा। महामति पोपने घोषणा की―‘आज महोत्सवका दिन है! हमारे विपक्षवादी विधर्म्मो (प्रोटेष्टाण्ट) मारे गये हैं! इसकी अपेक्षा अधिक सुखका संवाद दूसरा कौन हो सकता है। हमारे अधीन जहां जो रहे, इस उत्सवमें आमोद प्रमोद मनाने से न चूके!’ पोपके महाभिषेकका उत्सव हुआ था। ईसाइयों में यह दिन ‘सेण्ट बार्थलम्य’ज डें (St. Bartholomew's day) कहाता है। जर्मनींने इसका नाम ‘ब थोजीट' (Bluthoziet) रखा है। पारिस नगरीकी तरह फ्रान्समें सर्वत्र अनेक दिन तक प्रोटेष्टाण्ट ईसाइयोंपर ऐसा ही अत्याचार रहा था। शेषको फ्रान्सराज १४श लुईके राजत्वकालमें उसने अधिकतर भीषण आकार बनाया! उत्पीड़नकी कथा लिखनेसे व्यक्त नहीं होती। <ref>↑Lewis de Enarolle's Memoirs of the Persecutions ef the Protestants in France द्रष्टव्य है।</ref>सेकड़ों प्रोटेष्टाण्ट गुप्तभावसे देश छोड़ भिन्न राज्य में रहकर प्राण बचा सके थे। १७०५ ई॰ को देनमार्क-राजके साहाय्य से जिगेन बलग (Ziegenbalg) और प्लचु (Plutschaw) नामक लूथरके मतावलम्बी दो ईसाई भारतमें प्रोटेष्टाण्ट-मत चलाने आये। दोनो ही महापण्डित थे। जिगेन-बलग तामिल भाषामें बाइबिलका अनुवाद बनवाने लगे। भारतकी जितनी भाषामें बाइबिलका अनुवाद मिलता, उसमें यही सर्वप्रथम है। जिगेन-बलगके अन्यतम सहचर सुल्ज़ ने (Schultze) १७२५ ई॰ को हिन्दी भाषामें बाइबिल निकाली थी। उनके यत्नसे मन्द्राज, कडेलूर, तञ्जोर प्रभृति नाना {{rule}} {{smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 2qfxfnjsay6qz3fzhfxy2phxjguem4l पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१४९ 250 75725 664839 303191 2026-07-03T17:16:36Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664839 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१४८'''|'''ईसाई-इंहित'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> स्थानों में लूथरका मत चला। अनेक नीचजातिको उन्होंने ईसाई धर्मकी दीक्षा दे दी। किन्तु हिन्दुस्थानमें ईसाई धर्मका आदर बढ़ा न था। क्योंकि नवाबोंके भयसे ईसाई पास न फटके। राज्य कम्पनीके हाथ जाते भी पहले कोई ईसाईधर्म-प्रचारक इस देश में घुसने पाया न था। राजत्वका नियम रहा-कोई युरोपीय कम्पनीके अधिकारमें धर्मप्रचार कर न सकेगा! क्योंकि उससे देशीयगणके धर्मपर आघात पड़ेगा और सकल अधिवासीके बिगड़नेसे राज्य में विस्तर उत्पात उठेगा। १८१३ ई॰ को अंगरेज-सरकार ईसाई धर्मप्रचारक पर सदय हुई। मिसनरियोंको हिन्दुस्थानमें धर्म-प्रचारकरनेका अधिकार मिल गया। उनके अध्यवसायसे अल्प दिन में ही नीच श्रेणीके अनेक हिन्दु स्थानियोंने ईसाई धर्म पकड़ा। शेषको ईसाई-महिला शिक्षाके पीछे अनेक सम्भ्रान्त व्यक्तिके घरमें घुस ईसाई आलोक डालने लगीं। अनेक हिन्दु-स्थानियोंने अपनी प्रकृत जातीयता खो दी। धीरे-धीरे उच्च शिक्षाका स्रोत फूटा। बालफोर साहबने लिखा है――इस उच्च शिक्षाको पाकर फिर कोई ईसाई होना नहीं चाहता। ईसाई भाव रखते भी बहुतसे लोग धर्ममें नास्तिक रहते हैं। १७९४ ई॰ को बंगला मुद्रायन्त्रके प्रवर्तक केरी साहब इस देश में धर्मप्रचार करने आये थे। उन्होंने असाधारण अध्यवसाय एवं सहिष्णुताके गुणसे अनेक विपद आपद सह और सुन्दरवनमें रह असभ्यलोगोंको गुप्त भावसे दीक्षा दी। किन्तु प्रकाश्य भावसे कम्पनीके राज्य में उन्हें आश्रय न मिला था। शेषको हलेण्ड-वासिगणके अधिकृत श्रीरामपुरमें ठिकाना लगा। श्रीरामपुरमें ही मार्समान और वार्ड नामक दो विख्यात पण्डित भारतको नाना भाषाओं के जाननेवाले केरी साहबसे मिल गये। इसी स्थानपर उक्त बापटिष्ट प्रोटेष्टाण्टोके उत्साहसे प्रथम बंगला मुद्रायन्त्र जमा था। १८०० ई॰ के मार्च मासकी १८वीं तारीखको वार्ड साहबने अपने हाथसे प्रथम बंगला अक्षर संवारे। <small>मुद्रायन्त्र, ईसा और पाषात्य दर्शन देखो।</small> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|ईह――भादि॰ आत्म॰ अक॰ सेट् धातु। यह चेष्टा और यत्न अर्थमें आता है। सपूर्वक रहनेसे ईह् सकर्मक है।}} {{Outdent|ईह (सं॰ त्रि॰) सञ्चारक, कोशिश करनेवाला। (पु॰) २ चेष्टा, तदबीर।}} {{Outdent|ईहग (हिं॰ पु॰) इच्छानुसार चलनेवाला, कवि, शायर।}} {{Outdent|ईहमान (सं॰ त्रि॰) चेष्टित, तदबीर लड़ानेवाला।}} {{Outdent|ईहा (सं॰ स्त्री॰) ईह् भावे आ-टाप्। १ उद्यम, कारबार। २ वाञ्छा, ख़ाहिश। ३ चेष्टा, तदबीर।}} {{x-smaller|{{c|“इच्छया जायते काम ईहयार्थो विवर्धते।” (रामायण)}}}} {{Outdent|ईहात: (सं॰ अव्य॰) परिश्रमपूर्वक, जोरसे।}} {{Outdent|ईहामृग (सं॰ पु॰) १ कोक, भेड़िया। पर्यायमें इसे कोक, वृक, अरण्यश्वा आर वनकुक्कर भी कहते हैं। ईहामृगकी आकृति बिलकुल कुत्ते-जैसी होती है। वर्ण पीत और नील अर्थात् पिङ्गल रहता है। यह हरिण प्रभृतिको मार सकता है। २रूपक नाटक विशेष। मृगकी भांति नायकके नायिकाको ढूंढ़ लेनेसे यह नाम पड़ा है। ईहामृग नाटक चार अङ्कसे विशिष्ट होता है। इसमें प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध उभय इतिवृत्त देखाये जाते हैं। ईहामृगमें मनुष्य अथवा देवता नायक और प्रतिनायक दोनो हो सकते हैं। नायक गूढ़भावसे नायिकाको ढूंढ़ता है। नायकको मनुष्य और नायिकाको देवता समझते हैं। नायक उद्दत गुणयुक्त और नायिका क्रड्वभाव सयुक्त रहती है। वलात्कार वा छलना द्वारा भी नायिकासंग्रह लगता है। थोड़ा बहुत शृङ्गाररस होना आवश्यक है। प्रतिनायकको जो क्रोध उपजता, उसे किसी कार्य-च्छलसे निवृत्त करता है। महात्माका वध वर्णनीय है। एक अङ्कमें देवविषय रहता है। दिव्यहेतु युद्ध वर्णन करते हैं। सिवा इसके अन्य दो नायक भी रहते हैं।}} {{Outdent|ईहार्थिन् (सं॰ त्रि॰) किसी वस्तुको चेष्टा रखने-वाला, जो दौलत ढूंढ़ता हो।}} {{Outdent|ईहावृक, <small>ईहामृग देखो।</small>}} {{Outdent|ईहित (सं॰ त्रि॰) ईह्-क्त। १ चेष्टित, कोशिश किया गया। २ अपेक्षित, चाहा गया। (क्ली॰) ३ उद्योग, तदबीर। ४ चरित, चाल।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{rule|8em}}</noinclude> slqx05lq93nzi5nmqgxs1yt1gznqrus पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१४४ 250 75837 664823 664749 2026-07-03T14:25:14Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664823 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''ईसाई'''|'''१४३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पीठ देखायी। पोपने लूथरके विरुद्ध वृषभाक्ङित दण्डनियोग-पत्र भेजा था। किन्तु लूथरने पोपको न मान १५२० ई॰की १६वीं दिसम्बरको विटेम्बर्गके तोरणद्वार पर सबके समक्ष दण्डनियोगका पत्र जला दिया। इसी समय पर स्विजरलेण्डमें कई अनुचर पोपका मुक्तिपत्र (Indulgences) बांटते थे। हिन्दुओंमें जैसे पापका प्रायश्चित्त करनेको अर्थ देकर ब्राह्मण-पण्डितसे व्यवस्थाको लेना पड़ता, वैसे ही रोमक-समाजमें उक्त मुक्तिपत्रका व्यवहार चलता है। उस कालमें अनेक ईसाइयोंको विश्वास था,―इस मुक्ति पत्रको<ref>*इस देशमें जैसे अल्प एवं अधिक पापके अनुसार अर्थ लगाकर प्रायचित्त करना, वैसेही पोपका मुक्तिपत्र खरीदने में विभिन्न मूल्य देना पड़ता था।</ref> खरीदने से हमारे पापका प्रायश्चित्त होगा और पापका दुःख उठाना न पड़ेगा। उस समय स्विजरलेण्डमें जुइङ्गली नामक एक महापण्डित थे। वे मुक्तिपत्रके घोरतर विरोधी बने। लूथरकी तरह वे भी पोपके समाजका बन्धन एककाल ही तोड़ने की चेष्टामें लगे थे। जूरिच, बरन, वेसिल प्रभृति स्थानके लोगोंने उनका मत मान लिया। इधर लूथरने जर्मनीके उच्चपदस्थ व्यक्तिको सम्बोधन कर कहा,―“भ्रातृगण! रोमके विपक्षमें खड़े हो जायो। यही प्रकृत समय है। घर घर क्रूश-युद्धकी बात का ध्यान रहना चाहिये। भयङ्कर रोमक तुर्कमे सभीको खा डाला है। जगत् के धनसे रोमक भाण्डार भर गया है।” लूथरने रोमक-समाजके सात अङ्ग माने न थे। उनके मतसे धर्मकी दीक्षा, ईसाका सशिष्य भोजपर्व और निग्रह स्वीकार, तीन ही ईसाई धर्मके प्रधान अङ्ग हैं। १५२१ ई॰ को ५म चार्लस् जर्मनी में रहे। पोप-पर वे कुछ भक्तिश्रद्धा रखते थे। रोमक-समाजके कर्तृ पक्षगणने लूथरका दोष देखा सम्राट्को भड़काया। सम्राट् समाजसंस्कारके विरोधी बन गये। उन्होंने लूथरके पुस्तकादि ध्वंस करनेको आदेश दिया था। किन्तु राज्यके प्रधान प्रधान सचिव उससे {{rule}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> असम्मत हुये। उनके परामर्शसे वारमस नगर में एक महासभा लगी। इस सभामें जर्मनीके सकल राजा और अध्यापक आ पहुंचे। संस्कारके विरुद्ध कितनी ही बातें निकली थीं। लूथर भी इस सभामें आये। सभाने लूथरसे कहा,―‘तुमने रोमक-समाजके विरुद्ध जो आपत्ति उठायी, वह बहुत ठीक है। इस सुयोगमें परिवर्तन करो। तुम्हारा मङ्गल होगा।’ लूथरने निर्भीक चित्तसे उत्तर दिया,― ‘सच बात कहूंगा। प्राण जाने में कोई क्षति नहीं। मैं ईश्वरके आदेशसे बंधा हूं। मेरे हृदयका बलवान् विश्वास जबतक भ्रान्त प्रमाणित न होगा, तबतक रोमक समाजका गौरव कैसे समझ पड़ेमा!’ उनकी यह बात जर्मनीमें सर्वत्र चल पड़ी। विपक्षने लूथरके प्राण लेने का बीड़ा उठाया था। किन्तु साक्सनी-राज फ्रेडरिकके सत्परामर्श से लूथर कुछ दिन छिपे रहे। उसी समयपर साक्सनीमें सर्वत्र उनका मत सादर माना गया। इङ्गलेण्ड<ref>*कितने ही लोगोंके मतानुसार १३६१ ई॰ को धर्मप्रचारक विक्लिफ (Wicliffe)से इङ्गलेण्डमें समाज संस्कार सूत्रपात हुआ।</ref> और देनमार्कके अधिपति तथा प्रजावर्ग भी समाज-संस्कारके पक्षपाती हुये थे। देनमार्क के राजा लथरका एक शिष्य बुला निज राज्यमें यह नया मत चलाने लगे। १५२२ ई॰ को लूथरने मेलङ्कथन (Melancthon)के साथ बाइबिलके शेषभाग इञ्लोल (New Testament)-को अनुवाद कर छपाया था। अनुवाद देखकर लोग चकराये। उन्होंने समझ लिया-‘पोपके नियमसे ईसा मसीहका मत सम्पूर्ण विभिन्न है। लूथर जो मत चलाते, उसीको यथार्थ ईसाका मत मानते हैं।’ फिर जर्मनीके सत्व्यक्तिने प्रकाश्यरूपसे रोमका धर्मानुशासन छोड़ा था। जर्मनीके कृषकने धर्मके लिये अस्त्र उठाये। जर्मन राज्य में सर्वत्र घोरतर युद्ध चलने लगा। १५२३ ई॰ में फ्रान्स्-राज फ्रान्सिस् की भमिनी मार्गारेटने नूतन मतका पक्ष लिया और फ्रान्स-राजाके नाना स्थानोमें बहुतसे लोगोंने इस मतको ग्रहण किया। फ्रान्सराज प्रथम संस्कारके पक्षपाती {{rule}} {{Multicol-end}}<noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> gur1o65krvxs4cyla30q3ues07z3lla 664824 664823 2026-07-03T14:26:31Z अँजली चौधरी 2439 664824 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" 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इधर लूथरने जर्मनीके उच्चपदस्थ व्यक्तिको सम्बोधन कर कहा,―“भ्रातृगण! रोमके विपक्षमें खड़े हो जायो। यही प्रकृत समय है। घर घर क्रूश-युद्धकी बात का ध्यान रहना चाहिये। भयङ्कर रोमक तुर्कमे सभीको खा डाला है। जगत् के धनसे रोमक भाण्डार भर गया है।” लूथरने रोमक-समाजके सात अङ्ग माने न थे। उनके मतसे धर्मकी दीक्षा, ईसाका सशिष्य भोजपर्व और निग्रह स्वीकार, तीन ही ईसाई धर्मके प्रधान अङ्ग हैं। १५२१ ई॰ को ५म चार्लस् जर्मनी में रहे। पोप-पर वे कुछ भक्तिश्रद्धा रखते थे। रोमक-समाजके कर्तृ पक्षगणने लूथरका दोष देखा सम्राट्को भड़काया। सम्राट् समाजसंस्कारके विरोधी बन गये। उन्होंने लूथरके पुस्तकादि ध्वंस करनेको आदेश दिया था। किन्तु राज्यके प्रधान प्रधान सचिव उससे {{rule}} {{smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> असम्मत हुये। उनके परामर्शसे वारमस नगर में एक महासभा लगी। इस सभामें जर्मनीके सकल राजा और अध्यापक आ पहुंचे। संस्कारके विरुद्ध कितनी ही बातें निकली थीं। लूथर भी इस सभामें आये। सभाने लूथरसे कहा,―‘तुमने रोमक-समाजके विरुद्ध जो आपत्ति उठायी, वह बहुत ठीक है। इस सुयोगमें परिवर्तन करो। तुम्हारा मङ्गल होगा।’ लूथरने निर्भीक चित्तसे उत्तर दिया,― ‘सच बात कहूंगा। प्राण जाने में कोई क्षति नहीं। मैं ईश्वरके आदेशसे बंधा हूं। मेरे हृदयका बलवान् विश्वास जबतक भ्रान्त प्रमाणित न होगा, तबतक रोमक समाजका गौरव कैसे समझ पड़ेमा!’ उनकी यह बात जर्मनीमें सर्वत्र चल पड़ी। विपक्षने लूथरके प्राण लेने का बीड़ा उठाया था। किन्तु साक्सनी-राज फ्रेडरिकके सत्परामर्श से लूथर कुछ दिन छिपे रहे। उसी समयपर साक्सनीमें सर्वत्र उनका मत सादर माना गया। इङ्गलेण्ड<ref>*कितने ही लोगोंके मतानुसार १३६१ ई॰ को धर्मप्रचारक विक्लिफ (Wicliffe)से इङ्गलेण्डमें समाज संस्कार सूत्रपात हुआ।</ref> और देनमार्कके अधिपति तथा प्रजावर्ग भी समाज-संस्कारके पक्षपाती हुये थे। देनमार्क के राजा लथरका एक शिष्य बुला निज राज्यमें यह नया मत चलाने लगे। १५२२ ई॰ को लूथरने मेलङ्कथन (Melancthon)के साथ बाइबिलके शेषभाग इञ्लोल (New Testament)-को अनुवाद कर छपाया था। अनुवाद देखकर लोग चकराये। उन्होंने समझ लिया-‘पोपके नियमसे ईसा मसीहका मत सम्पूर्ण विभिन्न है। लूथर जो मत चलाते, उसीको यथार्थ ईसाका मत मानते हैं।’ फिर जर्मनीके सत्व्यक्तिने प्रकाश्यरूपसे रोमका धर्मानुशासन छोड़ा था। जर्मनीके कृषकने धर्मके लिये अस्त्र उठाये। जर्मन राज्य में सर्वत्र घोरतर युद्ध चलने लगा। १५२३ ई॰ में फ्रान्स्-राज फ्रान्सिस् की भमिनी मार्गारेटने नूतन मतका पक्ष लिया और फ्रान्स-राजाके नाना स्थानोमें बहुतसे लोगोंने इस मतको ग्रहण किया। फ्रान्सराज प्रथम संस्कारके पक्षपाती {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 8ac8m2i2pooa3kx9cbliopo6h8yra6s पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१४५ 250 75838 664828 608960 2026-07-03T14:59:11Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664828 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१४४'''|'''ईसाई'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> रहे, किन्तु शेषको घोर विरोधी बन गये। नूतन मताबलम्बीके प्रति वे घोर अत्याचार करने लगे थे! उस समय अनेक व्यक्तियोंने स्विजरलेण्ड भाग अपने प्राण बचाये। उधर रोमक-समाजमें पूर्व गौरव उद्धार करनेके विशेष यत्न चला और रोमाधि-पतिने संस्कारक मतावलम्बियोंको दबानेके लिये युद्धका डङ्का बजाया। १५२६ ई॰ को स्पायार नगरमें राजनैतिक महासभा लगी। वहां जर्मन-सम्राटके दूत लूथरके कार्यका प्रतिवाद चला संस्कारकको उत्सन्न करने की चेष्टा करने लगे। किन्तु उनको सकल चेष्टा निष्फल गयी। सभाके अधिकांश सभ्योंने संस्कारका पक्ष पकड़ा, किन्तु जर्मन-सम्राट् का मन न भरा, और फिर सभाको आहत किया। पहले जर्मनीके राजाको उन्होंने धर्मका जो अधिकार दिया, वह छीन लिया। सभामें स्थिर हुआ धा――ईसाई समाजकी पूर्वतन रीति नौति एवं पूजापद्धतिके विरुद्ध कोई कुछ कह और किसी प्रकारका संशोधन कर न सकेगा। सम्राट् के इस दारुण आदेशसे जर्मनीके समस्त सम्भ्रान्त व्यक्ति अत्यन्त विरक्त हुये। लूथरके सकल मतावलम्बी मिलकर तीव्र प्रतिवाद करने लगे थे। उस समयपर जो लोग रोमक समाजसे निकल पड़े, वे ही “प्रोटेष्टाण्ट” (Protestant) अर्थात् ‘प्रतिवादी’ नामसे ख्यात हुये। उक्त प्रतिवादके समय पोपभक्त जर्मन-सम्राट् इटली में रहे। जर्मनीके राजन्यवर्गने दूत द्वारा उनसे अनेक दुःखकी बात कहला भेजी थी। किन्तु सम्राट्-ने उसपर भूक्षेप न किया। पोपने भी सम्राट्को यह कह कर भड़काया था,――‘वास्तविक आप ही इस समय ईसाई समाजके रक्षक हैं। सुतरों अपने मतके विरुद्ध उभरनेवालोंको बिलकुल दबा देना चाहिये।’ सम्राट जर्मनी पहुंचे। अगसबर्गमें राजनैतिक सभा लगी थी। सभामें लूथरके सहचर मेलङ्कथनने धीर-गम्भीर भावसे अपना मत और विश्वास प्रकाश किया। पीछे रोमके धर्माध्यापकमण उसके प्रतिवादका यत्न करने लगे। उभय पक्षपर विवाद <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> बढ़ा। सम्राट्ने उसके मिटाने के लिये अनेक यत्न किया, किन्तु कोई फल न हुआ था। पोपके भक्तको सम्माट-का साहाय्य मिला। १९वीं नवम्बरको सम्राटके अधीनस्थ धर्माध्यापकगणके कहनेसे जो आदेश निकला, वह संस्कारकके पक्षपर विशेष अनिष्टकर पड़ा था। संस्कारक दल स्मालकल्द नामक स्थानमें एकत्र हुआ। सकल प्रोटेष्टाण्ट मिल गये। उन्होंने इङ्गलेण्ड और फ्रान्सके भूपतिहयसे साहाय्य मांगा। जर्मन सम्राट्ने सब सुना था। उन्होंने सोचा-अब अस्त्रबलसे सुविधा न रहेगी। १५४२ ई॰ के समय राटिसबरनकी सभामें सम्राट्ने संस्कारकको शान्ति दी थी। सभामें ठहर गया-शीघ्र ही एक सभा लगा सकल विषयका पुङ्खानुपुङ्ख रूपसे विचार किया जायेगा। इतने दिनमें प्रोटेष्टाण्ट समाजकी क्षमता दृढ हो गई थी। १५४२ ई॰ को सभाकी प्रतिज्ञासे पोपने इटलीके ट्रेण्ट नगरमें विराट सभा लगाने का अभिप्राय खोला। रोमक-समाजके प्रधानने अनुमोदन किया था। किन्तु प्रोटेष्टाण्टोंने कहा-पोपके अधिकारभुक्त स्थानमें यह सभा हो नहीं सकती। पोपने प्रोटेष्टाण्टोंसे कहला भेजा,―समाजके संस्कारमें मेरा कुछ भी अमत नहीं, मैं रोमक समाज-के संस्कारका विशेषतः अभिलाषी हूं। संस्कारक उससे थोड़ा शान्त पड़े। पोपने समाजके संस्कारका भार चार कार्डिनालों पर डाला था। किन्तु उनका देखाया हुआ सकल संस्कारविधि अत्यन्त अयौक्तिक और पोप तथा कार्डिनालगणक स्वार्थसे जडित था। उधर जर्मन-सम्राट्ने प्रोटेष्टाण्टोंको ट्रेण्टको सभामें पहुंचनेके लिये अनेक प्रलोभन दिया, किन्तु किसीने कुछ कान न किया। फिर वह असिके बलसे विवादकी मीमांसा करने चले थे। प्रोटेष्टाण्ट समाजके नेतागणने भी आसन्न विपदुसे अपने बचावको अस्त्र उठाया। इसी समय (१५४६ ई॰) महात्मा लूथरने आइसेलबेन नगरमें शान्ति भावसे इहलोक छोड़ा था। इधर लूथरके मृत्युका संवाद, उधर रणभेरीके वाद्यका घोर निनाद! जर्मन-सम्राट् और पोप एकत्र <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> l2qur86ain3705cnz8ennyd6jxb3o0b पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५० 250 75839 664840 608962 2026-07-03T17:56:01Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664840 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उ'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उ――(ह्रस्व उकार)――१ स्वरके मध्य पञ्चमवर्ण। इसके उच्चारणका स्थान ओष्ठ है। <small>ओष्ठनाबुपु। (शिक्षा)</small> ह्रस्व स्वरों में उकार तीसरा है। ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित् भेदमे यह नौ प्रकारका होता है। फिर प्रत्येक अनुनासिक और अननुनासिक रहनेसे इसके अट्ठारह भेद होते हैं। यह स्वयं कुण्डलनी है। उकारका वर्ण चम्पे के फल-जैसा होता है। इसमें पञ्चदेव और पञ्चप्राण रहते हैं। उकार चतुर्वर्गका फल देनेवाला है। <small>(कामधेनुतन्त्र)</small>}} <small>लिखने का नियम</small>――ऊर्ध्व, अधः और मध्यस्थानमें वाम-दिगगामी तीन ऋजुरेखा खींचनेसे यह बनता है। इन रेखावों में अग्नि, वायु और इन्द्र रहते हैं। मात्रामें शक्तिका वास है। <small>(वर्णोद्धारतन्त्र)</small> मातृकान्याससे इसका स्थान दक्षिण कर्ण पड़ता है। उकारको शङ्कार,वर्तलाक्षी, मूत, कल्याण, अमरेश, दक्षकर्ण, षड़् वक्त्र, मोहन, शिव, उग्र, प्रभु, धृति, विष्णु, विश्वकर्मा, महेश्वर, शत्रुघ्न, चटिका, पुष्टि, पञ्चमी, वह्निवासिनी, कामघ्न, कामना, ईश, मोहिनी, विघ्नहत्, मही, उढसू, कुटिला, श्रोत्र, पारद्वीपी, वृष और हर भी कहते हैं। २ भ्वादि॰ आत्म॰ अक॰ अनिट् धातु। यह शब्द करनेके अर्थमें आता है। (अव्य॰) उ-क्विप् तुगभावः। ३ है! ए। सुनिये! ४ कोपप्रकाश! देखेंगे! ५ अनुकम्पा! रहम! बचावो! ६ नियोग, राय! कहिये! ७ पदपूरण! जुमलेका पुराव! ८ कोपयुक्ता कथा! गुस्मे की बात! ८ अङ्गीकार! मज्जूरी! हां! ठीक ! १० प्रश्न! सवाल! क्या! क्यों! ११ वितर्क! बहस! १२ विमर्श, अफ़सोस! हाय! १३ विकल्प, शक! शायद! १४ सम्भावना! इमकान! हो सकता है!<small> “स्त्रियः सतीस्तां उ मे पुंस आहु:।” (ऋक् १।१६४।१६) “उमेति मात्रा तपसो निषिद्धा।”(कुमार)</small> (पु॰) अत्-डु। १५ शिव। १६ त्रास। १७ ब्रह्मा। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उं (हिं॰ अव्य॰) १ क्या! क्यों! २ नहीं! ३ अरे! कारणवश मुख न खुलनेपर वह अव्यय आता है।}} {{Outdent|उंकन (हिं॰) <small>उकुण देखो।</small> {{Outdent|उंकीत (हिं॰ पु॰) रोग विशेष, एक बीमारी। इसमें प्रायः वर्षाकालपर पदकी अङ्गुलि पिडिका पड़ने-से सड़ने लगती हैं।}} {{Outdent|उंखारी (हिं॰ स्त्री॰) इक्षुक्षेत्र, ऊखका खेत।}} {{Outdent|उंगनी (हिं॰ स्त्री॰) गाड़ी ओंगनेका काम, पहि-एमें तेलकी दिवाई। इससे पहिया खुब घूमता है और बेलोंको गाडी खीचने में ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़ता। उंगनी न होनेसे पहिया बिगड़ जाता है। गाड़ीवान् जोतनसे पहले उंगनी कर लिया करते हैं। इसमें प्रायः रेड़ीका तेल लगता है।}} {{Outdent|उंगलाई (हिं॰ स्त्री॰) अङ्गुलि नियोजन, उंगली चलानेका काम।}} {{Outdent|उंगलाना (हिं॰ क्रि॰) अङ्गुलि चलाना, उंगली करना, उंगलीसे इशारा लगाना।}} {{Outdent|उंगली (हिं॰) अङ्गुलि, अङ्गुश्त। <small>अङ्गुलि देखो।</small>}} {{x-smaller|{{c|“पांचो उंगलियां बराबर नहीं।” (लोकोक्ति)}}}} तर्जनीको कलमकी उंगली, मध्यमाको डाइन, अनामिकाको पूजाउंगली और कनिष्ठाको कानकी उंगली, घुंगलिया या चिठली उंगली कहते हैं। {{Outdent|उंगलीकी नोक (हिं॰ स्त्री॰) अङ्गुलिको शिखा, अङ्गुश्तका छोर।}} {{Outdent|उंघाई (हिं॰ स्त्री॰) निद्रा, सुस्ती, झपकी।}} {{Outdent|उंचन (हिं॰ पु॰) १ उदच्चन, ऊपरी खिंचाव। २ अदवान। यह रस्सी- खाटमें नीचेकी ओर रिक्त स्थानमें लगती है और बुनावटको पायतानेसे 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<small>अङ्गुलि देखो।</small>}} {{x-smaller|{{c|“पांचो उंगलियां बराबर नहीं।” (लोकोक्ति)}}}} {{gap}}तर्जनीको कलमकी उंगली, मध्यमाको डाइन, अनामिकाको पूजाउंगली और कनिष्ठाको कानकी उंगली, घुंगलिया या चिठली उंगली कहते हैं। {{Outdent|उंगलीकी नोक (हिं॰ स्त्री॰) अङ्गुलिको शिखा, अङ्गुश्तका छोर।}} {{Outdent|उंघाई (हिं॰ स्त्री॰) निद्रा, सुस्ती, झपकी।}} {{Outdent|उंचन (हिं॰ पु॰) १ उदच्चन, ऊपरी खिंचाव। २ अदवान। यह रस्सी- खाटमें नीचेकी ओर रिक्त स्थानमें लगती है और बुनावटको पायतानेसे मिला खींच देती है। इससे खाटका ढीलापन निकल जाता है।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol. III. 38|2em}}</noinclude> 7949wwjc06q0mzstq8taa2dq507ui2k पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५१ 250 75840 664852 608963 2026-07-04T01:02:32Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664852 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१५०'''|'''उंचना――उक़लैद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|उंचना (हिं॰ क्रि॰) उदञ्चन करना, ऊपर उठाकर खींचना, अदवान तानना।}} {{outdent|उंचनाव (हिं॰ पु॰) वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। यह एक प्रकारका चारखाना होता है।}} {{outdent|उंचाई (हिं॰ स्त्री॰) १ उच्चता, बुलन्दी। २ विशिटता, बड़ाई।}} {{outdent|उंचान (पु॰) <small>ऊंचाई देखो।</small>}} {{outdent|उंचाना (हिं॰ क्रि॰) उच्च बनाना, बुलन्दी बख्शना, ऊंचा करना।}} {{outdent|उंचान (पु॰) <small>ऊंचाई देखो।</small>}} {{outdent|उंचास, <small>ऊंचाई और उनचास देखी।</small>}} {{outdent|उचीनी (हिं॰ स्त्री॰) १ भावी, होनेदार। २ प्रहार, मार।}} {{outdent|उंदरीं (हिं॰ स्त्री॰) गञ्ज, बालखोरा।}} {{outdent|उंदरू (हिं॰) <small>कुन्दुरु देखो।</small>}} {{outdent|उंह (हिं॰ अव्य॰) १ नहीं! दूर हो! २ दुःख! अफ़सोस! हाय!}} {{outdent|उअना (हिं॰) उदय होना, निकलना।}} {{outdent|उआई (हिं॰ स्त्री॰) उदय, निकाल।}} {{outdent|उआना (हिं॰ क्रि॰) १ उदय करना, जगाना। २ प्रहरार्थ उद्यत होना, मारनेको उठना।}} {{outdent|उऋण (हिं॰ वि॰) ऋण न रखनेवाला, जो कर्ज़ दे चुका हो। <small>}}“नतु एहि काटि कुटार कठोरे।</small>}} {{x-smaller|{{c|गुरुहि उऋण होतेउं श्रम थोरे।” (तुलसी)}}}} {{outdent|उकचन (हिं॰ पु॰) मुचुकुन्द पुष्य, मुचकुन्दका फूल।}} {{outdent|उकचना (हिं॰ क्रि॰) १निकल जाना, हटना। २ उचर पड़ना, पर्त छोड़ना। ३ भागना, दूर होना।}} {{outdent|उकटना (हिं॰ क्रि॰) १ उखाड़ना, तोड़ डालना। २ भेद लेना, पूछना। ३ अन्वेषण करना, ढ़ूढ़ना। ४ स्मरण दिलाना, याद कराना। ५ अपमान करना, गाली देना। ६ लुण्ठन करना, डाका डालना, लूटना।}} {{outdent|उकटा (हिं॰ वि॰) १ कृतका, पुनः पुनः स्मरण दिलानेवाला, जो दूसरेको किसी एहसान् को याद कराता हो। <small>“नकटेकी खाये, उकटेकी न खाये।” (लोकोक्ति)</small>}} २ तुच्छ, कमीना, हलका। विगत विषयका पुनः पुनः सविस्तर प्रकाश उकटा-पुराण या उकटा-पेची कहाता है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|उकठना (हिं॰ क्रि॰) शुष्क होना, सूखना।}} {{outdent|उकठा (हिं॰ क्रि॰) शुष्क, सूखा, जो लगा न हो।}} {{outdent|उकठापन (हिं॰ पु॰) शुष्क हो जानेका भाव, सूखनेकी हालत।}} {{outdent|उकड़ (हिं॰ पु॰) मुद्रा विशेष, एक बैठक। इसमें घुटने मुड़ कर तलके भूमिपर जम और चूतड़ एड़ियोंसे लग जाते हैं।}} {{outdent|उकड़ं बठना (हिं॰ क्रि॰) घुटने ऊपर उठाकर एड़ियोंके बल बैठना।}} {{x-smaller|{{c|“काला डालूं लाल निकालूं उकड़ं बैठ पटापट मारू।” (कूटप्रश्र)}}}} {{outdent|उकत (हिं॰) <small>उक्ति देखो।</small>}} {{outdent|उकताना (हिं॰ क्रि॰) १ घृणा करना, थक जाना, ऊब उठना। २ सन्तुष्ट होना, आसूदगी आना, छक जाना। ३ विह्वल होना, घबरा जाना।}} {{outdent|उकताव (हिं॰ पु॰) घृणा, तृप्ति, विह्वलता, नफ़रत, असूदगी, घबराहट।}} {{outdent|उकति (हिं॰) <small>उक्ति देखो।</small>}} {{outdent|उकनाह (सं॰ पु॰) पीत-रक्त-वर्ण घोटक, पीला-लाल घोड़ा।}} {{outdent|उकलक्षेत्र――बदाय जिलेके अन्तर्गत सोरोंका एक प्राचीन नगर।}} {{outdent|उकलना (हिं॰ क्रि॰) पृथक् पड़ना, अलग होना, तह छोड़ना, उधेड़में आना।}} {{outdent|उकलवाना (हिं॰ क्रि॰) पृथक कराना, तह छुड़-वाना, उधड़वाना।}} {{outdent|उकलाई (हिं॰ स्त्री॰) वमन, कै, मिचलाई।}} {{outdent|उकलाना (हिं॰ क्रि॰) १ उकताना, घबराना। २ श्रान्त होना, थकना। ३ अशान्त पड़ना, बेचैन होना। ४ रोगग्रस्त बोध होना, बीमार मालूम पड़ना। ५ वमन करना, ओंकना।}} {{outdent|उकलेसरी (हिं॰ वि॰) उकलेसरसे सम्बन्ध रखने-वाला, उकलेसरका बना हुआ। उकलेसर दक्षिणमें विद्यमान है। जो कागज़ उक्त स्थानपर बनता है, वह भी उकलेसरी ही बजता है।}} {{outdent|उकलैद (Euclid)――ई॰ से पहले तृतीय शताब्दके एक यमानी गणितन्न। इनके जन्म-मृत्यु, मातापिता,}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9a3epdpzhe7frrb34nm013sj4ude80j 664853 664852 2026-07-04T01:03:46Z अँजली चौधरी 2439 664853 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१५०'''|'''उंचना――उक़लैद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|उंचना (हिं॰ क्रि॰) उदञ्चन करना, ऊपर उठाकर खींचना, अदवान तानना।}} {{outdent|उंचनाव (हिं॰ पु॰) वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। यह एक प्रकारका चारखाना होता है।}} {{outdent|उंचाई (हिं॰ स्त्री॰) १ उच्चता, बुलन्दी। २ विशिटता, बड़ाई।}} {{outdent|उंचान (पु॰) <small>ऊंचाई देखो।</small>}} {{outdent|उंचाना (हिं॰ क्रि॰) उच्च बनाना, बुलन्दी बख्शना, ऊंचा करना।}} {{outdent|उंचान (पु॰) <small>ऊंचाई देखो।</small>}} {{outdent|उंचास, <small>ऊंचाई और उनचास देखी।</small>}} {{outdent|उचीनी (हिं॰ स्त्री॰) १ भावी, होनेदार। २ प्रहार, मार।}} 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'उकसाना (हिं. क्रि०) १ उठाना, चढ़ाना, संचा| हालत । करना। २ आगे बढ़ाना, सुलगाना, भड़काना। उक्तनिर्वाह (स.पु.) कथनका पालन, बातका ३ हांकना, चलाना। ४ प्रलोभन दिखाना, बरगलाना, निबाह । हिम्मत देना। ५ हटाना, दूर करना। उत्तेजित | उक्तस्क (सं० लो०) शब्दविशेष, एक लफज़ । करना, उभारना। ७ छेड़ना, जलाना। जिस स्त्रीलिङ्ग शब्दका पुलिङ्ग भी रहता है, वही उकसौंहां (हिं. वि.) उठता हुअा, जो उभर रहा हो। इस नामसे पुकारा जाता है। ऐसे शब्दोंके अर्थ में उकाब (अ० पु०) गरुड़, गृध्र, गोध। इसको दृष्टि सिवा स्त्रीलिङ्ग और पुलिङ्गके दूसरा भेद नहीं बहुत तीव्र होती है। सुनते हैं-उकाब या शार्दूल- पड़ता। जैसे शोभना शब्द उक्तस्क है, किन्तु गङ्गा को छाया पड़नेसे दीनदरिद्र भी राजा बन जाता है। सब्द नहीं। उकारान्त (सं० त्रि०) उकारको अन्तमें रखनेवाला, उक्त प्रत्युक्ल (सं० लो०) वाक्य एवं उत्तर, वार्तालाप, जिसके अखोरमें उ हर्फ रहे। . सवालजवाब, गुफ तगू, कहासुनी, बातचीत। “उकालना, उकेलना देखो। उक्तवत् (सं० वि०) कथन कर चुकनेवाला, जो उकासना, उकसाना देखो। बोला हो। "उकासी (हिं. स्त्री०) १ उद्घाटित होनेको स्थिति, उपज (सं० अव्य.) कथित विषय भिव, कही हुई खुल जानकी हालत। २ उत्सव, छुट्टी, फुरसत। | बातोंको छोड़कर। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उकिड़ना, <small>उकलना देखो।</small> उकिलना, <small>उकलना देखो।</small> उकिलवाना, <small>उकलवाना देखो।</small> उकिसना, <small>उकसमा देखो।</small> {{Outdent|उकीरना (हिं॰ क्रि॰) १ खनन करना, खोदना। २ उखाड़ डालना नोच लेना, ढकेल देना।}} {{Outdent|उकुण (सं॰ पु॰) १ शिर:कीट, जूं, चिल्लड़। २ मत्-कुण, खटमल।}} उकुति (हिं॰) <small>उक्ति देखो।</small> {{Outdent|उकुति-जुगुति (हिं॰) <small>उक्तियुक्ति देखो।</small>}} उकुरु, </small>उकडू देखो।<small> उकुसना, <small>उकसना देखो।</small> {{Outdent|उकेलना (हिं॰ क्रि॰) निकाना, उधेड़ बुन करना, उचाड़ डालना, बकला निकालना।}} {{Outdent|उकेला (हिं॰ वि॰) १ उधेड़ा, उचाड़ा, निकाया। (पु॰) २ कम्बलका बाना।}} {{Outdent|उकौथ (हिं॰) <small>उकौत देखिये।</small>}} {{Outdent|उकौथा (हिं॰) <small>उकौथ देखिये।</small>}} {{Outdent| <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 67s8gwgh15bkgti1npp5xlmfs5009th 664860 664854 2026-07-04T02:04:29Z अँजली चौधरी 2439 664860 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उकवथ―उक्तवर्ज'''|'''१५१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> शिक्षक और आदिनिवासका विषय अज्ञात है।। कोई-कोई इन्हें भूलसे सोक्रतिस के शिष्य मेगारन्सिस समझते हैं। मिथके राजा १म टलेमोके समय (ई से प्रायः ढाई तीन सौ वर्ष पहले) ये विद्यमान 'थे। उकलेदने अलेकज़न्द्रियाको सुप्रसिद्ध गणितपाठ- शाला खोली थी। ये मृदस्वभाव, निश्छल और गणित | . के प्रकृत विद्यार्थियोंपर कपालु रहते थे। ज्यामिति देखी। उकवथ (हिं.) उकौत देखो। उकवां (हिं० कि. वि.) अनुमानसे, अन्दाजन, मोटे हिसाबमें। उकसना (हिं० कि०) १बाहर निकलने की चेष्टा करमा, झगड़ना। २ फूलना, उछलना, फटना, निकल पड़ना। ३ उत्तेजित होना, जोशमें पाना, उभरना। ४ उधड़ आना, टूटने लगना। उकसनि (हिं० स्त्री०) उत्तेजना, उभार, घबराहट, उधेड़, टूट। उकसवाना (हिं० कि०) बाहर निकालनेको चेष्टा कराना, झगड़ाना, निकलवा देना। उकसाई (हिं॰ स्त्री०) निकलवा देनेका काम, | उभराई, निकसाई, हटाई।। "दमडीका बुलबुल टका उकसाई।" (लोकोक्ति) उक्तत्व (सं० लो०) कथनका भाव, कहे जानेको 'उकसाना (हिं. क्रि०) १ उठाना, चढ़ाना, संचा| हालत । करना। २ आगे बढ़ाना, सुलगाना, भड़काना। उक्तनिर्वाह (स.पु.) कथनका पालन, बातका ३ हांकना, चलाना। ४ प्रलोभन दिखाना, बरगलाना, निबाह । हिम्मत देना। ५ हटाना, दूर करना। उत्तेजित | उक्तस्क (सं० लो०) शब्दविशेष, एक लफज़ । करना, उभारना। ७ छेड़ना, जलाना। जिस स्त्रीलिङ्ग शब्दका पुलिङ्ग भी रहता है, वही उकसौंहां (हिं. वि.) उठता हुअा, जो उभर रहा हो। इस नामसे पुकारा जाता है। ऐसे शब्दोंके अर्थ में उकाब (अ० पु०) गरुड़, गृध्र, गोध। इसको दृष्टि सिवा स्त्रीलिङ्ग और पुलिङ्गके दूसरा भेद नहीं बहुत तीव्र होती है। सुनते हैं-उकाब या शार्दूल- पड़ता। जैसे शोभना शब्द उक्तस्क है, किन्तु गङ्गा को छाया पड़नेसे दीनदरिद्र भी राजा बन जाता है। सब्द नहीं। उकारान्त (सं० त्रि०) उकारको अन्तमें रखनेवाला, उक्त प्रत्युक्ल (सं० लो०) वाक्य एवं उत्तर, वार्तालाप, जिसके अखोरमें उ हर्फ रहे। . सवालजवाब, गुफ तगू, कहासुनी, बातचीत। “उकालना, उकेलना देखो। उक्तवत् (सं० वि०) कथन कर चुकनेवाला, जो उकासना, उकसाना देखो। बोला हो। "उकासी (हिं. स्त्री०) १ उद्घाटित होनेको 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<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उकिड़ना, <small>उकलना देखो।</small>}} {{Outdent|उकिलना, <small>उकलना देखो।</small>}} {{Outdent|उकिलवाना, <small>उकलवाना देखो।</small>}} {{Outdent|उकिसना, <small>उकसमा देखो।</small>}} {{Outdent|उकीरना (हिं॰ क्रि॰) १ खनन करना, खोदना। २ उखाड़ डालना नोच लेना, ढकेल देना।}} {{Outdent|उकुण (सं॰ पु॰) १ शिर:कीट, जूं, चिल्लड़। २ मत्-कुण, खटमल।}} {{Outdent|उकुति (हिं॰) <small>उक्ति देखो।</small>}} {{Outdent|उकुति-जुगुति (हिं॰) <small>उक्तियुक्ति देखो।</small>}} {{Outdent|उकुरु, </small>उकडू देखो।<small>}} {{Outdent|उकुसना, <small>उकसना देखो।</small>}} {{Outdent|उकेलना (हिं॰ क्रि॰) निकाना, उधेड़ बुन करना, उचाड़ डालना, बकला निकालना।}} {{Outdent|उकेला (हिं॰ वि॰) १ उधेड़ा, उचाड़ा, निकाया। (पु॰) २ कम्बलका बाना।}} {{Outdent|उकौथ (हिं॰) <small>उकौत देखिये।</small>}} {{Outdent|उकौथा (हिं॰) <small>उकौथ देखिये।</small>}} {{Outdent|उक्त (सं॰ वि॰) १ कथित, कहा हुआ। (क्ली॰) २ शब्द, वाक्य, लफ्ज, जुमला।}} {{Outdent|उक्तत्व (सं॰ क्ली॰) कथनका भाव, कहे जानेकी हालत।}} {{Outdent|उक्तनिर्वाह (सं॰ पु॰) कथनका पालन, बातका निबाह।}} {{Outdent|उक्तपुस्क (सं॰ क्ली॰) शब्दविशेष, एक लफ्ज़। जिस स्त्रीलिङ्ग शब्दका पुलिङ्ग भी रहता है, वही इस नामसे पुकारा जाता है। ऐसे शब्दोंके अर्थ में सिवा स्त्रीलिङ्ग और पुलिङ्गके दूसरा भेद नहीं पड़ता। जैसे शोभना शब्द उक्तपुंस्क है, किन्तु गङ्गा शब्द नहीं।}} {{Outdent|उक्तप्रत्युक्त (सं॰ क्ली॰) वाक्य एवं उत्तर, वार्तालाप, सवालजवाब, गुफ़् तगू, कहासुनी, बातचीत।}} {{Outdent|उक्तवत् (सं॰ वि॰) कथन कर चुकनेवाला, जो बोला हो।}} {{Outdent|उक्तवर्ज (सं॰ अव्य॰) कथित विषय भिन्न, कही हुई बातोंको छोड़कर।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ssnuoinuipxck75zjjqco1mk30muvye 664875 664869 2026-07-04T03:11:32Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664875 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उकवथ―उक्तवर्ज'''|'''१५१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :शिक्षक और आदिनिवासका विषय अज्ञात है। कोई-कोई इन्हें भूलसे सोक्रतिस् के शिष्य मेगारेन्सिस समझते हैं। मिथके राजा १म टलेमीके समय (ई॰ से प्रायः ढ़ाई तीन सौ वर्ष पहले) ये विद्यमान थे। उक़लैदने अलेकज़न्द्रियाको सुप्रसिद्ध गणितपाठ-शाला खोली थी। ये मृदुस्वभाव, निश्छल और गणित के प्रकृत विद्यार्थियोंपर कृपालु रहते थे। <small>ज्यामिति देखी।</small> {{Outdent|उकवथ (हिं॰) <small>उकौत देखो।</small>}} {{Outdent|उकवां (हिं॰ कि॰ वि॰) अनुमानसे, अन्दाज़न, मोटे हिसाबमें।}} {{Outdent|उकसना (हिं॰ कि॰) १बाहर निकलने की चेष्टा करना, झगड़ना। २ फूलना, उछलना, फूटना, निकल पड़ना। ३ उत्तेजित होना, जोशमें आना, उभरना। ४ उधड़ आना, टूटने लगना।}} {{Outdent|उकसनि (हिं॰ स्त्री॰) उत्तेजना, उभार, घबराहट, उधेड़, टूट।}} {{Outdent|उकसवाना (हिं॰ कि॰) बाहर निकालनेकी चेष्टा कराना, झगड़ाना, निकलवा देना।}} {{Outdent|उकसाई (हिं॰ स्त्री॰) निकलवा देनेका काम, उभराई, निकसाई, हटाई।}} {{x-smaller|{{c|“दमडीका बुलबुल टक्ला उकसाई।” (लोकोक्ति) }}}} {{Outdent|उकसाना (हिं॰ क़ि॰) १ उठाना, चढ़ाना, ऊंचा करना। २ आगे बढ़ाना, सुलगाना, भड़काना। ३ हांकना, चलाना। ४ प्रलोभन दिखाना, बरग़लाना, हिम्मत देना। ५ हटाना, दूर करना। ६ 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ऐडविड (स॰ पु॰) १ कुवेर। २ दशरथ राजाके एक पुत्र। ऐडवोकेट (अ॰ पु॰ = Advocate) न्यायालयमें परार्थवक्ता, मुखतार, वकील। ऐडवोकेट–जनरल (अं॰ पु॰ = Advocate–general) हाइकोर्टका बड़ा सरकारी वकील। ऐड़क (स॰ ल्की॰) एड़क एव, स्वार्थे अण्। अस्थि एवं तुच्छ द्रव्यकी भित्ति, हड्डी और कूड़ेकी दीवार। ऐण (सं॰ त्रि॰) एणस्य इदम्, एण-अण्। १ मृगसम्बन्धीय, काले हिरनसे पैदा। ऐणिक (सं॰ त्रि॰) एणं मृगं हन्ति, एण-ठक्। मृगहन्ता, काले हिरनका शिकार करनेवाला। एणीपचन (सं॰ त्रि॰) एणीपचनदेशभवः, एणीपचनअण्। एणीपचन देशीय। {{x-smaller|एणीपचन देखो}}। ऐणेय (सं॰ त्रि॰) एण्या इदम्, एणी–ठञ्। १ कृष्णसार मृगीसे उत्पन, काली हिरनीसे पैदा। (पु॰)२ कृष्णसारमृग, काला हिरन। (ल्की॰) ३ रतिबन्धविशेष। ऐणेयक (स॰ ल्की॰) एलबालुक। ऐण्डिनेय (सं॰ पु॰) वेदकी एक शाखा। ऐतदात्म्य (स॰ ल्की॰) यह पदार्थ वा प्रधानता रखनेका भाव। ऐतरेय (वै॰ पु॰) ऋग्वेदकी एक शाखा। भाष्यकारोंके मतसे महिदास ऐतरेय नामक एक ऋषि <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इस शाखाके प्रवर्तक हैं। छान्दोग्योपनिषद में लिख दिया, कि महिदास ऐतरेयने पूर्णज्ञान लाभ किया था। भाष्यकार शङ्कराचार्य के मतसे 'इतराया अपत्यं ऐतरेयः' अर्थात् इतराके अपत्यको ऐतरेय कहते हैं। सायणाचार्य ने ऐतरेय–ब्राह्मणके भाष्यकी उपक्रमणिकामें महिदास ऐतरेयका परिचय इस प्रकार दिया है— "किसी महर्षि के अनेक पत्नियां रहीं। उनमें एकका नाम इतरा था। उनके महिदास नामक एक पुत्र हुआ। 'अरण्यकाण्डमें' उन्हीं को 'महिदास ऐतरेय' कहा है। महर्षि अपर पत्निवोंको बहुत चहते, किन्तु महिदाससे दूर रहते थे। किसो यज्ञसभामें उन्होंने महिदासकि उपेक्षा कर अपर पुत्र गोद पर बैठा लिये। इतराने अपने पुत्रका म्लानमुख देख कुलदेवता भूमिसे प्रार्थना की थी। उसी समय भूमि- देवता दिव्यमूर्ति धारण कर यज्ञसभामें प्राविभूत हुई। उन्होंने महिदासको दिव्य सिंहासनपर बैठा वर दिया था-तुम सकल पुत्रोंकी अपेक्षा अधिक पण्डित होगे और ऐतरेय ब्राह्मण प्रतिभाषण कर दोगे।" आजकल ऐतरेय-शाखाका ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय-भारण्यक और ऐतरेय उपनिषत् पुस्तक मिलता है। .. ऐतरेयक, ऐतरेयाश्रण देखो। ऐतरेयब्राह्मण (सं० ली.) ऋग्वेदका एक ब्राह्मख । इसमें होताका कार्य निर्दिष्ट है। ऐतरेय ब्राह्मणके ४० अध्याय ८ पञ्चिकामें विभक्त हैं। वैद और ब्राप देखो। ऐतरेयो ( पु.) ऐतरेय-ब्राह्मण पढनेवाला । ऐतरेयोपनिषद् (सं० स्त्री०) ऐतरेय आरण्यकको एक उपनिषत्। ऐतश. (सं० पु.) भृगुवंशीय एक मुनि। इन्होंने ही “ऐतश प्रलाप' नामक वैदिक ग्रन्थ बनाया था। ऐतशायन (स.पु.) ऐतशके सन्तान। ऐतावाड खुर्द-बम्बई प्रान्तके सतारा जिले का एक ग्राम। यह वालवा तहसीलके प्रधान नगर पेठसे दक्षिण ७ मील पड़ता है। मालखेड़के राष्ट्रकूट नृपतिने ब्राह्मणोंको ६७५ शकको रथाष्टमीपर जो भूमिदान किया, उसमें इसका नाम भी दिया है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> awgyteuxp62r9pusxn4ryy290ujeyy8 664838 664837 2026-07-03T17:15:59Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 664838 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|'''४७४'''|'''ऐज़न—ऐतावाड खुर्द'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ऐज़न (अ॰ अव्य॰) तथा, वैसा ही। गणना आदिमें किसी विषयको बार–बार न लिख एकही बार लिखते और उसके नीचे ऐज़न रखते हैं। इससे उक्त विषय बार बार लिखा समझा जाता है। ऐड़ (सं॰ पु॰) एड़ा अस्त्रात्र, एड़ा–अण्। १ एड़ा शब्दयुक्त अध्याय वा अनुवाक। २ इड़ाके पुत्र पुरुरवा। (त्रि॰) ३ बलकारक पदार्थयुक्त। ४ इड़ा शब्दयुक्त। ऐड़क (सं॰ पु॰) 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{{x-smaller|ऐतरेयब्राह्मण देखो}}। ऐतरेयब्राह्मण (स॰ ल्की॰) ऋग्वेदका एक ब्राह्मख। इसमें होताका कार्य निर्दिष्ट है। ऐतरेय ब्राह्मणके ४० अध्याय ८ पञ्चिकामें विभक्त हैं। {{x-smaller|वेद और ब्राह्मख देखो।}} ऐतरेयी (पु॰) ऐतरेय–ब्राह्मण पढनेवाला। ऐतरेयोपनिषद् (स॰ ल्की॰) ऐतरेय आरण्यककी एक उपनिषत्। ऐतश (सं॰ पु॰) भृगुवंशीय एक मुनि। इन्होंने ही 'ऐतश प्रलाप' नामक वैदिक ग्रन्थ बनाया था। ऐतशायन (सं॰ पु॰) ऐतशके सन्तान। ऐतावाड खुर्द—बम्बई प्रान्तके सतारा जिले का एक ग्राम। यह वालवा तहसीलके प्रधान नगर पेठसे दक्षिण ७ मील पड़ता है। मालखेड़के राष्ट्रकूट नृपतिने ब्राह्मणोंको ६७५ शकको रथाष्टमीपर जो भूमिदान किया, उसमें इसका नाम भी दिया है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> lpk4dy4ic9401h3rg7hhhd22oxznr9k पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६३ 250 82727 664844 664769 2026-07-03T18:23:08Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664844 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||अक्षरलिपि|६१}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> जैनियोंके ४थे उपाङ्ग पन्नवणा (प्रज्ञापना)-सूत्रमें पूर्वोक्त अट्ठारह लिपियोंका उल्लेख वर्तमान है। लिपिकरोंके दोषसे विभिन्न पुस्तकोंमें कुछ पाठ- भेद देख पड़ता है। प्रज्ञापनासूत्रके टीकाकार मलय- गिरिने लिखा है— {{blockcenter|{{x-smaller|"ब्राह्मी यवनानीत्यादयो लिपिभेदास्तु सम्प्रदायादवशेषः"}}}} अर्थात् ब्राह्मी, यवनानी इत्यादि अट्ठारह प्रकार- की लिपि विभिन्न सम्प्रदायोंसे उद्भूत हुई है। जैनशास्त्रके मतसे जैनाङ्गसमूह महावीर स्वामी- के समय पहले फैला और वीर-निर्वाणके १६४ वर्ष बाद (सन् ई० से ३६३ वर्ष पहले) पाटलिपुत्रके श्रीसङ्घमें संग्रहीत हुआ। ऐसे स्थलमें कहा जा सकता है, कि सम्राट् अशोकसे पहले भारतमें ब्राह्मी- प्रभृति १८ प्रकारकी लिपि चलती थी। {{blockcenter|{{x-smaller|यवनानी।}}}} यवनानी नाम देख कोई-कोई कहना चाहते हैं, कि मकदूनिया-वीर सिकन्दरके समय इस देशमें यूनानी यवनोंने जो लिपि चलाई वही यवनानी लिपि है। इस यूनानी शब्दका उल्लेख देखकर मोक्षमूलर- प्रभृति कोई-कोई पाश्चात्य अध्यापक अष्टाध्यायीके सूत्र- कार पाणिनिको भी इसी समयका व्यक्ति बताना चाहते हैं। किन्तु पाणिनिसूत्रके वार्त्तिककार और महाभाष्यकारके 'यवनानी' शब्दका लिपि* अर्थ करते भी पाणिनिने कहीं स्पष्टतः यह अर्थ नहीं प्रकाश किया। स्त्रीलिङ्गमें जिन शब्दोंके उत्तर 'आनुक्' होता है, उन्होंने दृष्टान्तकी तरह उन्हीं शब्दोंका उल्लेख किया है— {{Right|(पा० ४।१।४९)}} जो हो, यवनानी शब्दमें आधुनिक सन्देहके करनेका कोई कारण नहीं देखा जाता। यवनों (Ionian) का अभ्युदय बहुत पुराना है। हमने दूसरी जगह दिखाया है, कि सन् ई० से पहलेकी १०वीं शताब्दिमें यवन या योन जातिका पराक्रम सब जगह {{Rule}} {{blockcenter|{{x-smaller|* 'यवनाल्लिप्याम् इति वक्तव्यम्'—वार्त्तिक। दीपौ यवौ यवानी। यवनाल्लिप्याम्। यवनानी लिपिः।—(महाभाष्य ४।१।४९)}}}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> विघोषित हुआ। इससे पहले यवन जातिका अभ्युदय हुआ था। रामायण, महाभारत प्रभृति पुराने संस्कृत ग्रन्थोंमें भी यवन जातिका विशेष उल्लेख वर्तमान है। यवनानी कहनेसे बहुत पुरानी कीलरूपा (Cuneiform) लिपि ही समझी जाती थी। यवन देखो। {{C|{{x-smaller|पुष्करसारी।}}}} समवायाङ्ग और ललितविस्तरमें जिस "पुष्करसारी" लिपिकी बात लिखी है, वह भी भारतकी एक बहुत पुरानी लिपि है। पाणिनिने पुष्करसादीका उल्लेख किया है। {{blockcenter|{{x-smaller|उत्तरकुरुका और गन्धर्वलिपि प्रभृति।}}}} ऐतरेय-ब्राह्मणमें उत्तरकुरु और उत्तरमद्रकी बात लिखी है। ऐतरेय ब्राह्मणसे यह भी मालूम होता है कि, वहाँ वैदिक यागयज्ञ प्रचलित था। याग-यज्ञका निर्धारण करनेके लिये जैसे ज्योतिषका प्रयोजन पड़ता, वैसे ही उसके लिये शुल्व-सूत्र भी जानना आवश्यक है। [शुल्वसूत्र देखो!] इसीलिये अंकलिपि और गणित- लिपि भी उसी प्राचीनकालमें चली थी। गन्धारमें प्रचलित लिपि ही सम्भवतः गन्धर्व लिपि है। कन्धारके साथ बहुत पुराने समयसे ही वैदिक आर्योंका संस्रव रहा है। वहाँकी लिपि भी नितान्त आधुनिक नहीं है। खरोष्ठी-लिपिकी प्रसङ्गमें यह बात पीछे बताई जायगी। {{blockcenter|{{x-smaller|माहेश्वरलिपि।}}}} पाणिनिसूत्रमें जो चौदह प्रत्याहार हैं, उन्हींको वररुचि, पतञ्जलि प्रभृति वैयाकरण शिवसूत्र कहकर मानते हैं। देशमें सर्वसाधारण वैयाकरणोंको विश्वास है, कि महेश्वरने ही सबसे पहले व्याकरण प्रकाशित किया था। वेदाङ्गके अन्तर्गत जो शिक्षा है, उसमें देखा जाता है, कि महेश्वरने ही चौंसठ अक्षर प्रकाशित किये। जो हो, इसमें सन्देह नहीं, कि पाणिनिसे बहुत पहले शिवसूत्र उत्पन्न हुए थे। चीन-परिव्राजक इत्सिङ्गने सन् ई० की ७वीं शताब्दीके अन्तिम भाग- में भारत आ संस्कृत पढ़ी। उन्होंने लिखा है, 'सिद्धि- रस्तु' से आरम्भकर अक्षरमाला-सम्बन्धीय जो महेश्वर- के रचे 'सिद्धान्त' छः वर्षके बालक पहले मुखस्थ <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|१६|1em}}</noinclude> ndtitjb7fqhajgpzhlgzjb2qt10lyhp पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६९ 250 82734 664843 345891 2026-07-03T18:11:30Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664843 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|६६| अक्षरलिपि}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> सकते हैं। यति, स्मृति और सुप्राचीन हिन्दू राजा के अनुशासन उसी ब्राह्मी लिपिमें हो हिखे जाते थे । ऋग्वे दमें दर्शनयोग्य मन्त्रमूर्ति और अक्षरा उलेख है। मिश्र देशमें जैसे एक हो समय चित्रलिपि (Hieroglyphics) और उसकी मङ्केतलिपि (Ilioratic characters) प्रचलित थी, वैदिक आर्यों के बीच भी वैसे हो मन्त्रमूर्तिरूप चित्रलिपि और अक्षरलिपि प्रचलित हुई थी। पापिरस् (Papyrus) नामक पत्रपर जैसे मिश्रको आदि संकेत-लिपि अंकित होती, वैदिककाल में भी वैसे ही भूर्जपत्र, या क्षुरभ्र द्वारा किसी पटपर लिखनेको प्रथा वर्तमान थी। वेदाङ्गके दूसरे शिक्षाग्रंथ में लिखा है,—“शम्भु के मतसे प्राकृत और संस्कृत में यथाक्रम तिरमठ और चौसठ अक्षर प्रसिद्ध है। उनमें स्वर्णाक्षर इक्कीस स्पर्शा क्षर यानी 'क' से 'म' तक वर्गीय अक्षर पच्चीस, याद्यचर यानी य व र ल श ष स ह यह आठ और यम या युग्माक्षर (?) चार हैं। सिवा इनके अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलिय, उपध्मानीय दुःस्पृष्ट, डकार और पल्त; सबको मिला चौसठ अतर होते हैं। 'आत्मा बुद्धिसे मिलकर वचन - रचनाको वासनामें मनको लगाता है; जब मन कायाग्निको आहत करता है। अग्नि वायुको प्रेरण करती है। वायु हृदय देशमें प्रवाहित हो धीरे-धीरे स्वर निकालता है। यह स्वर प्रातः स्नान के साहचर्य से गायत्री छन्द में मध्याह्न के समय कण्ठोति मध्यम विष्टभ्ङन्द- मैं और माया को अत्युच्च शीर्षख जगतीच्छन्दमे' परिणत होता है। वायु क्रमसे उठकर शीर्ष-देशमें अभिहत होता, फिर वहांसे हमें या अक्षर-ममष्टि प्रकाश करता है। यह अचरसमष्टि पांच भागों में विभक्त है। यथा,-खर, काल, स्थान, प्रयत्न और अनुप्रदान अक्ष राभिज्ञोंने उक्त पांच भागों में हो पचर विभागको निर्देश किया है । 'स्वर, तीन तरहके हैं - उदात्त, अनुदात्त और स्वरित । अच् या स्वर विषयमें उक्त तीन खर और इख, दीर्घ और प्लत; यही कालतः नियत या नियमवद हैं। उदात खरसे निषाद और गान्धार, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अनुदात में ऋषभ और धैवत, सन्ति षड्ज, मध्यम और पचम स्वरका उदभवा 'अक्षर-समष्टि उचारण अनेक स्थान पाठ हैं, यथा हृदय, कण्ठ, शिर जितामूल, दन्तममूह, नासिका, ओठ और तालु । उम अक्षरकी प्रसिद्ध आठ गति यह थो' भाव वित्तिम. रेफ, जिह्वामूल और उपध्मा । 'ओ' भाव उकारान्तादि पदमें मंहत मिलता है मही किन्तु ऐसा पद खरान्त हो समझना पड़ेगा। मिवा इसके दूसरी जगह जिम किसी पदमें उमाक्षरको अभिव्यक्ति होती है, उस पदको भी वैसा हो स्वगन्त जानना चाहिये । हकार, पञ्चखर और अन्त्यस्य अगंम मिल जानेमे हृद योत्पन्न और न मिलने कण्ठोत्थित माना जायगा ।' {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "विषयमा प्राकन ने पाकासम्म स्वरा विशतिर काय स्पशांना पा यादवाना बनारश्न यानी अनमारा विमान।। दाम्पष्ट देति विशेयी एका आत्मा का समन्यायान्मन। नः काम मारुतस्तराम चरन मन्द जनवान म प्रातानी सेन्दीयमानम कण्ठे माध्यन्दिनग मागने व मानुगम ના નાનાંચમન ૫ मांदणी मुद्राभिन वनमा 14श सारना वर्णान् जनयत नयां विभाग क स्वरतः कानता स्थानात प्रदान इति उदानानुदात्तस्वरितय नगन्यः । अस्वी दीर्घ प्रतांत फन्नती नि उदाने निषादाराना अपम स्वरितप्रभवा जअष्ट स्थानानि वर्णानामः कटः रसाया। जिद्रामलच दन्ताय नामिकष्टी न तान्न श्रीभावश्च विवृतिश्च षमा रेफ एव च । जालमा च गतिरष्टविष यथोभावप्रसन्धानमुकारादिपरं पदम् । स्वरान्तं तादृशं विद्याद्यदन्यदव्यक्तमुभगः ॥</poem>}}}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 79se1qnqrvky8susd0084vmrpudkqaa पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७० 250 82736 664868 345893 2026-07-04T02:23:29Z Shivaniya shaw 4129 664868 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" /></noinclude>अक्षरलिपि पहले तो ६३ या ६४ अक्षर वेदाङ्गमें स्थिर होते, किन्तु वेदमें उनका प्रयोग रहते भी लौकिक भाषा में कितने ही अक्षर छूट जाते हैं । ललितविस्तरसे हम जान सकते हैं, कि बुद्धदेवने केवल ४५ अक्षरलिपिको ही अभ्यास किया था- {{blockcenter|{{x-smaller|"अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ,औ, अं, अः । क ख ग घ च छ ज झ ञ। ट ठ ड ढ ण । त थ द ध न। प फ ब भ म य र व। श ष स ह क्ष । (ललितविस्तर, १० अध्याय)}}}} आश्चर्यका विषय है, कि उक्त अक्षरमालाके बीच उत्तर-भारतमें प्रचलित ऋ ऋ ल ल और दाक्षिणत्यमें प्रचलित ल ल और ल, यह पांच वर्ण एकबारगी ही नहीं हैं। फिर भौ, ललितविस्तरको गाथाके बीच सिवा लुके दूसरे चार अक्षर व्यवहृत हुए हैं। ललितविस्तर में अकारादि अक्षरान्त उक्त ४५ अक्षर- मालका गृहीत हुई हैं। तन्त्रमें ५० मातृका और ४२ भूतलिपि निर्दिष्ट हैं । यथा- {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>““कुण्डली भतसाणामश्रियमुपेयुषी। विधामजननी देवी शब्दब्रह्मवरूपिणी । गुणिता सर्वगावेण कुण्डली परदेवता ।" (सारदातिलक) 'विचत्वारिंशदिति भूतलिपिमन्त्रमयो, पञ्चाशदिति मात्रकालिपिः । (तट्टीका)</poem>}}}} जो हो, उत्तर-भारतके विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न शताब्दियोंके समय जिस प्रकारकी लिपि चलती थी, दूसरे पृष्ठमें उसको तालिका दे दी गई है। मालूम होता है, कि अशोकलिपिसे ही क्रमशः भारतको सब लिपियां परिपुष्ट हुई हैं। प्रज्ञापनासूत्र नामक जैनियोंके उपाङ्गमें लिखा है- {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"जेणं अद्धमगहाए भाषाए भासेन्ति जस्स य नं वम्मी विपवत्तद्रव !”</poem>}}}} यानी जिससे अद्धमागधी भाषा प्रकाश को जाय, वही ब्राह्मोलिपि है। पहले ही कह चुके हैं, कि अशोकसे पहले जब ब्राह्मो प्रभृति अट्ठारह लिपि प्रचलित थीं, तब भी मगधलिपि, अङ्गलिपि प्रभृति नामकरण न हुआ था। {{Rule}} हकारं पञ्चभिर्युक्तमन्तस्थाभिश्च सयुत । औरस्यं तं विजानीयात् कण्डमाहुरसम्भृतम् ॥” (पाणिनीय-शिक्षा) <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उस समय जैन-धर्मशास्त्र भी सुग्राचीन बाझोलिपिमें ही लिखे जाते थे ।मालूम होता है, कि इसीसे पाश्चात्य प्रत्नतत्त्वविदोंने मगधादि स्थानों में प्रचारित अशोक- लिपिको भी ब्राह्मोलिपि कहकर ही माना है। सन् ई०को पञ्चम शताब्दिमें सङ्कलित जैन-धर्म- शास्त्र नन्दोसूत्रके बोच छत्तीस तरहकी लिपिका उल्लेख मिलता है। जैसे-१ हंस, २ भूत, ३ यक्ष, ४ राक्षस, ५ उड्डौ, ६ यावनी, ७ तुरुष्की, ८ कौरी, द्राविड़ी, १० सैन्धवी, ११ मालवी, १२ नड़ी, १३ नागरी, १४ पारसौ, १५ लाटी १६ अनिमित्त, १७ चाणक्यो, और १८ मौलदेवी। तन्दोसूत्रके मतसे यह अट्ठारह लिपि ऋषभदेवके दक्षिण हाथसे प्रकाशित हुई थीं; इन्हें छोड़ दूसरी अट्ठारह प्रकारको लिपिका भी उल्लेख देखा जाता है ; जैसे-१८ लाटी, २० चौड़ी, २१ डाहली, २२ काणडी, २३ गुजरो, २४ सोरठ २५मर- हठो, २६ कोङ्कणो, २७ खुरासानो, २८ मागधी, २८ सैंहली, ३० हाड़ो, ३१ कोरी, ३२ हम्बोरी, ३३ परतोरी, ३४ मसी, ३५ मालवी और ३६ महायोधौ । नन्दीसूत्रके रचना-कालमें यह छत्तीस प्रकारको लिपि भारतके बीच प्रचलित थीं। नन्दीसूत्रके मतसे देश-विशेषके नामानुसार इन सब लिपियों और भाषाओंका नाम रखा गया है। सन् ई०को १२वीं शताब्दिमें शेषकष्णने छः मूल प्राकृत और सत्ताईस अपभ्रंश भाषाओंकी बात लिखी थी। इन सब प्राकृत भाषाओं की तरह उस समय विभिन्न लिपि भी प्रचलित थीं। शेषवष्णको प्राकृतचन्द्रिकामें ऐसे नाम पाये जाते हैं-१ महाराष्ट्री, २ अवन्ती, ३ सौरसेनी, ४ अर्द्धमागधो, ५ वाह्नीको, ६ मागधी, ७ वाचण्ड, ८ लाट, ८ वैदर्भी, १० उप- नागरी, ११ नागरी, १२ वावरी, १३ आवन्त्य, १४ पाञ्चाल, १५ टाक, १६ मालवी, १७ कैकय, १८ गौड़, १८ उड़, २० देव, २१ पाश्चात्य, २२ पाण्ड्य, २३ कौन्तल, २४ सैंहल, २५ कालिङ्गय, २६ प्राच्य, २७ कर्णाटो, २८ काञ्ञ्य, २८ द्राविड़, ३० गोजर, ३१ आभीर, ३२ मध्यदेशीय और ३३ वैडाल। देवनागर देखो।] भारतवर्षमें इस तरहको नाना लिपि चलते भी सब लिपियोंके ठीक रूपको निर्देश करना बहुत कठिन <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> smu91vyh2jsu7idb5dy9nkxdmv5k00q 664881 664868 2026-07-04T05:41:12Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664881 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अक्षरलिपि|'''६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पहले तो ६३ या ६४ अक्षर वेदाङ्गमें स्थिर होते, किन्तु वेदमें उनका प्रयोग रहते भी लौकिक भाषा में कितने ही अक्षर छूट जाते हैं । ललितविस्तरसे हम जान सकते हैं, कि बुद्धदेवने केवल ४५ अक्षरलिपिको ही अभ्यास किया था- {{x-smaller|"अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ,औ, अं, अः ।<br> {{Gap}}क ख ग घ च छ ज झ ञ।<br> {{Gap}}ट ठ ड ढ ण । त थ द ध न।<br> {{Gap}}प फ ब भ म य र व।<br> {{Gap}}श ष स ह क्ष । (ललितविस्तर, १० अध्याय)}} आश्चर्यका विषय है, कि उक्त अक्षरमालाके बीच उत्तर-भारतमें प्रचलित ऋ ऋ ल ल और दाक्षिणत्यमें प्रचलित ल लृ और ल, यह पांच वर्ण एकबारगी ही नहीं हैं। फिर भी, ललितविस्तरकी गाथाके बीच सिवा लुके दूसरे चार अक्षर व्यवहृत हुए हैं। ललितविस्तर में अकारादि अक्षरान्त उक्त ४५ अक्षर- मालका गृहीत हुई हैं। तन्त्रमें ५० मातृका और ४२ भूतलिपि निर्दिष्ट हैं । यथा- {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>““कुण्डली भतसाणामश्रियमुपेयुषी। विधामजननी देवी शब्दब्रह्मवरूपिणी । गुणिता सर्वगावेण कुण्डली परदेवता ।" (सारदातिलक) 'विचत्वारिंशदिति भूतलिपिमन्त्रमयो, पञ्चाशदिति मात्रकालिपिः । (तट्टीका)</poem>}}}} जो हो, उत्तर-भारतके विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न शताब्दियोंके समय जिस प्रकारकी लिपि चलती थी, दूसरे पृष्ठमें उसको तालिका दे दी गई है। मालूम होता है, कि अशोकलिपिसे ही क्रमशः भारतको सब लिपियां परिपुष्ट हुई हैं। प्रज्ञापनासूत्र नामक जैनियोंके उपाङ्गमें लिखा है- {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"जेणं अद्धमगहाए भाषाए भासेन्ति जस्स य नं वम्मी विपवत्तद्रव !”</poem>}}}} यानी जिससे अद्धमागधी भाषा प्रकाश को जाय, वही ब्राह्मोलिपि है। पहले ही कह चुके हैं, कि अशोकसे पहले जब ब्राह्मो प्रभृति अट्ठारह लिपि प्रचलित थीं, तब भी मगधलिपि, अङ्गलिपि प्रभृति नामकरण न हुआ था। {{Rule}} हकारं पञ्चभिर्युक्तमन्तस्थाभिश्च सयुत । औरस्यं तं विजानीयात् कण्डमाहुरसम्भृतम् ॥” (पाणिनीय-शिक्षा) <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उस समय जैन-धर्मशास्त्र भी से सप्राचीन बाझोलिपिमें ही लिखे जाते थे । मालूम होता है, कि इसीसे पाश्चात्य प्रत्नतत्त्वविदोंने मगधादि स्थानों में प्रचारित अशोक- लिपिको भी ब्राह्मोलिपि कहकर ही माना है। सन् ई०को पञ्चम शताब्दिमें सङ्कलित जैन-धर्म- शास्त्र नन्दोसूत्रके बोच छत्तीस तरहकी लिपिका उल्लेख मिलता है। जैसे-१ हंस, २ भूत, ३ यक्ष, ४ राक्षस, ५ उड्डौ, ६ यावनी, ७ तुरुष्की, ८ कौरी, द्राविड़ी, १० सैन्धवी, ११ मालवी, १२ नड़ी, १३ नागरी, १४ पारसौ, १५ लाटी १६ अनिमित्त, १७ चाणक्यो, और १८ मौलदेवी। तन्दोसूत्रके मतसे यह अट्ठारह लिपि ऋषभदेवके दक्षिण हाथसे प्रकाशित हुई थीं; इन्हें छोड़ दूसरी अट्ठारह प्रकारको लिपिका भी उल्लेख देखा जाता है ; जैसे-१८ लाटी, २० चौड़ी, २१ डाहली, २२ काणडी, २३ गुजरो, २४ सोरठ २५मर- हठो, २६ कोङ्कणो, २७ खुरासानो, २८ मागधी, २८ सैंहली, ३० हाड़ो, ३१ कोरी, ३२ हम्बोरी, ३३ परतोरी, ३४ मसी, ३५ मालवी और ३६ महायोधौ । नन्दीसूत्रके रचना-कालमें यह छत्तीस प्रकारको लिपि भारतके बीच प्रचलित थीं। नन्दीसूत्रके मतसे देश-विशेषके नामानुसार इन सब लिपियों और भाषाओंका नाम रखा गया है। सन् ई०को १२वीं शताब्दिमें शेषकष्णने छः मूल प्राकृत और सत्ताईस अपभ्रंश भाषाओंकी बात लिखी थी। इन सब प्राकृत भाषाओं की तरह उस समय विभिन्न लिपि भी प्रचलित थीं। शेषवष्णको प्राकृतचन्द्रिकामें ऐसे नाम पाये जाते हैं-१ महाराष्ट्री, २ अवन्ती, ३ सौरसेनी, ४ अर्द्धमागधो, ५ वाह्नीको, ६ मागधी, ७ वाचण्ड, ८ लाट, ८ वैदर्भी, १० उप- नागरी, ११ नागरी, १२ वावरी, १३ आवन्त्य, १४ पाञ्चाल, १५ टाक, १६ मालवी, १७ कैकय, १८ गौड़, १८ उड़, २० देव, २१ पाश्चात्य, २२ पाण्ड्य, २३ कौन्तल, २४ सैंहल, २५ कालिङ्गय, २६ प्राच्य, २७ कर्णाटो, २८ काञ्ञ्य, २८ द्राविड़, ३० गोजर, ३१ आभीर, ३२ मध्यदेशीय और ३३ वैडाल। देवनागर देखो।] भारतवर्षमें इस तरहको नाना लिपि चलते भी सब लिपियोंके ठीक रूपको निर्देश करना बहुत कठिन <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9mxn6pas1hqmylc8g74yhbgb7yfpoe5 664882 664881 2026-07-04T05:42:34Z Shivaniya shaw 4129 664882 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अक्षरलिपि|'''६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पहले तो ६३ या ६४ अक्षर वेदाङ्गमें स्थिर होते, किन्तु वेदमें उनका प्रयोग रहते भी लौकिक भाषा में कितने ही अक्षर छूट जाते हैं । ललितविस्तरसे हम जान सकते हैं, कि बुद्धदेवने केवल ४५ अक्षरलिपिको ही अभ्यास किया था- {{x-smaller|"अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ,औ, अं, अः ।<br> {{Gap}}क ख ग घ च छ ज झ ञ।<br> {{Gap}}ट ठ ड ढ ण । त थ द ध न।<br> {{Gap}}प फ ब भ म य र व।<br> {{Gap}}श ष स ह क्ष । (ललितविस्तर, १० अध्याय)}} आश्चर्यका विषय है, कि उक्त अक्षरमालाके बीच उत्तर-भारतमें प्रचलित ऋ ऋ ल ल और दाक्षिणत्यमें प्रचलित ल लृ और ल, यह पांच वर्ण एकबारगी ही नहीं हैं। फिर भी, ललितविस्तरकी गाथाके बीच सिवा लुके दूसरे चार अक्षर व्यवहृत हुए हैं। ललितविस्तर में अकारादि अक्षरान्त उक्त ४५ अक्षर- मालका गृहीत हुई हैं। तन्त्रमें ५० मातृका और ४२ भूतलिपि निर्दिष्ट हैं । यथा- {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>““कुण्डली भतसाणामश्रियमुपेयुषी। विधामजननी 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प्रत्नतत्त्वविदोंने मगधादि स्थानों में प्रचारित अशोक- लिपिको भी ब्राह्मोलिपि कहकर ही माना है। सन् ई०को पञ्चम शताब्दिमें सङ्कलित जैन-धर्म- शास्त्र नन्दोसूत्रके बोच छत्तीस तरहकी लिपिका उल्लेख मिलता है। जैसे-१ हंस, २ भूत, ३ यक्ष, ४ राक्षस, ५ उड्डौ, ६ यावनी, ७ तुरुष्की, ८ कौरी, द्राविड़ी, १० सैन्धवी, ११ मालवी, १२ नड़ी, १३ नागरी, १४ पारसौ, १५ लाटी १६ अनिमित्त, १७ चाणक्यो, और १८ मौलदेवी। तन्दोसूत्रके मतसे यह अट्ठारह लिपि ऋषभदेवके दक्षिण हाथसे प्रकाशित हुई थीं; इन्हें छोड़ दूसरी अट्ठारह प्रकारको लिपिका भी उल्लेख देखा जाता है ; जैसे-१८ लाटी, २० चौड़ी, २१ डाहली, २२ काणडी, २३ गुजरो, २४ सोरठ २५मर- हठो, २६ कोङ्कणो, २७ खुरासानो, २८ मागधी, २८ सैंहली, ३० हाड़ो, ३१ कोरी, ३२ हम्बोरी, ३३ परतोरी, ३४ मसी, ३५ मालवी और ३६ महायोधौ । नन्दीसूत्रके रचना-कालमें यह छत्तीस प्रकारको लिपि भारतके बीच प्रचलित थीं। नन्दीसूत्रके मतसे देश-विशेषके नामानुसार इन सब लिपियों और भाषाओंका नाम रखा गया है। सन् ई०को १२वीं शताब्दिमें शेषकष्णने छः मूल प्राकृत और सत्ताईस अपभ्रंश भाषाओंकी बात लिखी थी। इन सब प्राकृत भाषाओं की तरह उस समय विभिन्न लिपि भी प्रचलित थीं। शेषवष्णको प्राकृतचन्द्रिकामें ऐसे नाम पाये जाते हैं-१ महाराष्ट्री, २ अवन्ती, ३ सौरसेनी, ४ अर्द्धमागधो, ५ वाह्नीको, ६ मागधी, ७ वाचण्ड, ८ लाट, ८ वैदर्भी, १० उप- नागरी, ११ नागरी, १२ वावरी, १३ आवन्त्य, १४ पाञ्चाल, १५ टाक, १६ मालवी, १७ कैकय, १८ गौड़, १८ उड़, २० देव, २१ पाश्चात्य, २२ पाण्ड्य, २३ कौन्तल, २४ सैंहल, २५ कालिङ्गय, २६ प्राच्य, २७ कर्णाटो, २८ काञ्ञ्य, २८ द्राविड़, ३० गोजर, ३१ आभीर, ३२ मध्यदेशीय और ३३ वैडाल। देवनागर देखो।] भारतवर्षमें इस तरहको नाना लिपि चलते भी सब लिपियोंके ठीक रूपको निर्देश करना बहुत कठिन <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> pgfw0hynkjhoogmbb1zc4c0gu60f9we पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७१ 250 82739 664883 345896 2026-07-04T06:52:24Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664883 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''६८'''| '''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> है । हम संक्षेपसे इसी बातका परिचय देते हैं, कि भारत के बीच विभिन्न राजवंशके राजत्वकालमें किस वंशको व्यवहृत लिपि कितनी दूर तक प्रचलित थी । {{Block center|<poem><small>मागध-ब्राह्मी या मौर्यलीपि।</poem></small>}} मौर्य सम्राट् अशोक जिस ब्राह्मी लिपिको व्यवहार करते थे, हिमालयको तराईसे सिंहल तक उसी लिपिका निदर्शन निकला है । महावंशसे भी हम जान सकते हैं, कि अशोकका एक पुत्र और एक कन्या दोनो सिंहलमें बौद्धधम्म फैलाने गये थे । उनके साथ मगधको ब्राह्मालिपि भो चलौ गई यौ; उसीका निदर्शन सिंहलमें सन् ई० से पहलेको प्रथम शताब्दि के बीच खोदी गई अभयगामिनको शिलालिपिमें मिला । केवल सिंहल ही क्यों कहें, चीन-समुद्रके तीरवत्तीं कम्बोज और अन्नम् राज्योंसे भी ब्राह्मौलिपिका विकाश दृष्ट होता है । पहले ही लिख दिया है, कि दाक्षिणात्यके कृष्णा जिलेमें भट्टिप्रोलूसे जो द्राविड़ - ब्राह्मौलिपि आविष्कृत हुई है, उसके युक्त-खरींका सामान्य प्रभेद छोड़ दूसरे अक्षरोंके साथ वैसा अलगाव नहीं देख पड़ता । स्थान- भेदके कारण लिपिकरके हाथसे धौरे-धीरे यह अलग हुई जाती थी। पिप्रावेकी सन् ई० से पहलेवाली छठीं शताब्दि- को लिपि और उससे पौछे सन् ई० से पहलेको दूसरी शताब्दि के बीच में खोदी गई नानाघाटींको लिपि, यानी उस समयवाली आर्यावर्त्तको सब लिपियां प्राय एक ही तरह की हैं, – इससे अच्छी तरह जाना जाता है, कि भारतवर्षमें कोई पांच सौ वर्ष तक एक ही लिपि समभावसे चलतो रही थी; पिप्रावेको पूर्णावयव - लिपि देख समझ पड़ेगा, कि उससे पहले भी अन्ततः पांच सौ, यानौ वत्तमान समयसे कोई तीन हज़ार वर्षे पहले भारतमें उसी एक प्रकारको ब्राह्मी लिपिका चलते रहना सम्भवपर है । जो हो, आविष्कृत शिला लिपिको आलोचना कर मनमें आता है, कि प्राचीन लिच्छविवंश, नन्दवंश, मौर्यवंश, चेतवंश और शृङ्गमित्रवंशके राजत्वकालमें प्रायः एक ही प्रकारक ब्राह्मीलिपि चलती थी । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इससे पीछे भारतकी उत्तर-पश्चिम- सीमामें शकाधिपत्य फैलने के साथ जिस ब्राह्मी लिपिका आकार कुछ-कुछ बदलते रहा ; वही ब्राह्मोलिपि इतिहास में ' शकलिपि नामसे गिनो जाना चाहिये । मथुरा, सुराष्ट्र प्रभृति स्थानोंसे शकलिपि आविष्कृत हुई है । इसी समय दाक्षिणात्य में सातवाहन राजवंशको जो लिपि पाई गई, वह जान पड़ता है, कि मौलिपिका हो संस्कार है । नासिक कादम्ब, जुन्नर और जग्गय्यपेटमें अन्ध्रभृत्य और काञ्ची प्रभृति स्थानोंसे पल्लव-राजवंशका जो सब लिपि आविष्कृत हुई हैं, उन सब लिपियोंके अक्षर शकलिपिके अक्षरोंसे मिलते हैं । यह बात दूसरे पृष्ठ में भारतीय ब्राह्मी- लिपिको तालिका देखनेसे हो मालूम होगी, कि इस शकब्राह्मी लिपिसे किस तरह वर्त्तमान उत्तर-भारतीय नागरी और गौड़लिपि उत्पन्न हुई । {{Block center|<poem><small>दाक्षिणात्य लिपि ।</poem></small>}} विन्ध्याद्रिके दक्षिण गुजरात, काठियावाड़ तक जो लिपि प्रचलित हैं, उसको हमने दाक्षिणात्य - लिपि कह कर माना है । पहले जिस द्राविड़ ब्राह्मीलिपिको बात लिखी गई, वह सब दाक्षिणात्य लिपियोंको जननी है। कृष्णा जिलेके भट्टिप्रोलूस आविष्कृत द्राविड़- ब्राह्मीकी बात पहले हमने कह दी है । आर्यावर्त्त में गुप्त और उनके अनुवर्त्ती विभिन्न वंशोंको लिपिके समान दाक्षिणात्य में भी उसी द्राविड़ो लिपिसे वहांके आंध्र, शक, गुप्त, वलभी, गुर्ज्जर, बाकाटक, कादम्ब, प्राच और प्रतोच्य चालुक्य, चेर, चोल, पल्लव, गङ्ग, राष्ट्रकूट, काकतीय, वाण, पाण्ड्य प्रभृति राजवंशोंको विभिन्न समय में व्यवहृत लिपियां क्रमश: परिपुष्ट हुई हैं। जूनागढ़, गिरनार प्रभृति स्थानोंको सन् ई० को १ ली से ३ रो शताब्दि तक वाली शकक्षत्रपलिपि, नासिक, कुड़, जुन्नर, कणेड़ी प्रभृति स्थानोंको सन् ई० को १लासे ३रो शताब्दि तक वाला सातवाहन- लिपि, कृष्णा जिलेके जग्गय्यपेटसे सन् ई० की ३री. शताब्दिमें उत्कीर्ण इक्ष्वाकुराज 'सिरिवार पुरिसदत्त'को अलङ्कृत लिपि, काञ्चपुरसे सन् ई० को ४थी शताब्दिमें खोदी गई पल्लवलिपि, साञ्चो और मन्दसोरस सन् <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> c9nigtvtlaxra1kzqprshmn035doh4d 664884 664883 2026-07-04T06:58:07Z Shivaniya shaw 4129 664884 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''६८'''| '''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> है । हम संक्षेपसे इसी बातका परिचय देते हैं, कि भारत के बीच विभिन्न राजवंशके राजत्वकालमें किस वंशको व्यवहृत लिपि कितनी दूर तक प्रचलित थी । {{Block center|<poem><small>मागध-ब्राह्मी या मौर्यलीपि।</poem></small>}} मौर्य सम्राट् अशोक जिस ब्राह्मी लिपिको व्यवहार करते थे, हिमालयको तराईसे सिंहल तक उसी लिपिका निदर्शन निकला है । महावंशसे भी हम जान सकते हैं, कि अशोकका एक पुत्र और एक कन्या दोनो सिंहलमें बौद्धधर्म फैलाने गये थे । उनके साथ मगधकी ब्राह्मालिपि भी चली गई यौ; उसीका निदर्शन सिंहलमें सन् ई० से पहलेको प्रथम शताब्दि के बीच खोदी गई अभयगामिनको शिलालिपिमें मिला । केवल सिंहल ही क्यों कहें, चीन-समुद्रके तीरवत्तीं कम्बोज और अन्नम् राज्योंसे भी ब्राह्मौलिपिका विकाश दृष्ट होता है । पहले ही लिख दिया है, कि दाक्षिणात्यके कृष्णा जिलेमें भट्टिप्रोलूसे जो द्राविड़ - ब्राह्मौलिपि आविष्कृत हुई है, उसके युक्त-खरींका सामान्य प्रभेद छोड़ दूसरे अक्षरोंके साथ वैसा अलगाव नहीं देख पड़ता । स्थान- भेदके कारण लिपिकरके हाथसे धीरे-धीरे यह अलग हुई जाती थी। पिप्रावेकी सन् ई० से पहलेवाली छठीं शताब्दि- को लिपि और उससे पौछे सन् ई० से पहलेकी दूसरी शताब्दि के बीच में खोदी गई नानाघाटींको लिपि, यानी उस समयवाली आर्यावर्त्तको सब लिपियां प्राय एक ही तरह की हैं, – इससे अच्छी तरह जाना जाता है, कि भारतवर्षमें कोई पांच सौ वर्ष तक एक ही लिपि समभावसे चलती रही थी; पिप्रावेकी पूर्णावयव - लिपि देख समझ पड़ेगा, कि उससे पहले भी अन्ततः पांच सौ, यानौ वत्तमान समयसे कोई तीन हज़ार वर्षे पहले भारतमें उसी एक प्रकारको ब्राह्मी लिपिका चलते रहना सम्भवपर है । जो हो, आविष्कृत शिला लिपिकी आलोचना कर मनमें आता है, कि प्राचीन लिच्छविवंश, नन्दवंश, मौर्यवंश, चेतवंश और शृङ्गमित्रवंशके राजत्वकालमें प्रायः एक ही प्रकारक ब्राह्मीलिपि चलती थी । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इससे पीछे भारतकी उत्तर-पश्चिम- सीमामें शकाधिपत्य फैलने के साथ जिस ब्राह्मी लिपिका आकार कुछ-कुछ बदलते रहा ; वही ब्राह्मोलिपि इतिहास में शकलिपि नामसे गिनी जानी चाहिये । मथुरा, सुराष्ट्र प्रभृति स्थानोंसे शकलिपि आविष्कृत हुई है । इसी समय दाक्षिणात्य में सातवाहन राजवंशको जो लिपि पाई गई, वह जान पड़ता है, कि मौलिपिका हो संस्कार है । नासिक कादम्ब, जुन्नर और जग्गय्यपेटमें अन्ध्रभृत्य और काञ्ची प्रभृति स्थानोंसे पल्लव-राजवंशका जो सब लिपि आविष्कृत हुई हैं, उन सब लिपियोंके अक्षर शकलिपिके अक्षरोंसे मिलते हैं । यह बात दूसरे पृष्ठ में भारतीय ब्राह्मी- लिपिको तालिका देखनेसे ही मालूम होगी, कि इस शकब्राह्मी लिपिसे किस तरह वर्त्तमान उत्तर-भारतीय नागरी और गौड़लिपि उत्पन्न हुई । {{Block center|<poem><small>दाक्षिणात्य लिपि ।</poem></small>}} विन्ध्याद्रिके दक्षिण गुजरात, काठियावाड़ तक जो लिपि प्रचलित हैं, उसको हमने दाक्षिणात्य - लिपि कह कर माना है । पहले जिस द्राविड़ ब्राह्मीलिपिको बात लिखी गई, वह सब दाक्षिणात्य लिपियोंको जननी है। कृष्णा जिलेके भट्टिप्रोलूस आविष्कृत द्राविड़- ब्राह्मीकी बात पहले हमने कह दी है । आर्यावर्त्त में गुप्त और उनके अनुवर्त्ती विभिन्न वंशोंको लिपिके समान दाक्षिणात्य में भी उसी द्राविड़ो लिपिसे वहांके आंध्र, शक, गुप्त, वलभी, गुर्ज्जर, बाकाटक, कादम्ब, प्राच और प्रतोच्य चालुक्य, चेर, चोल, पल्लव, गङ्ग, राष्ट्रकूट, काकतीय, वाण, पाण्ड्य प्रभृति राजवंशोंकी विभिन्न समय में व्यवहृत लिपियां क्रमश: परिपुष्ट हुई हैं। जूनागढ़, गिरनार प्रभृति स्थानोंको सन् ई० को १ ली से ३ रो शताब्दि तक वाली शकक्षत्रपलिपि, नासिक, कुड़, जुन्नर, कणेड़ी प्रभृति स्थानोंको सन् ई० को १लासे ३रो शताब्दि तक वाला सातवाहन- लिपि, कृष्णा जिलेके जग्गय्यपेटसे सन् ई० की ३री. शताब्दिमें उत्कीर्ण इक्ष्वाकुराज 'सिरिवार पुरिसदत्त'को अलङ्कृत लिपि, काञ्चपुरसे सन् ई० को ४थी शताब्दिमें खोदी गई पल्लवलिपि, साञ्चो और मन्दसोरस सन् <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> lgkkkmstwme8g6y5xrlej1wus2hkrxv 664885 664884 2026-07-04T06:59:28Z Shivaniya shaw 4129 664885 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''६८'''|'''अक्षरलिपी''' '''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> है । हम संक्षेपसे इसी बातका परिचय देते हैं, कि भारत के बीच विभिन्न राजवंशके राजत्वकालमें किस वंशको व्यवहृत लिपि कितनी दूर तक प्रचलित थी । {{Block center|<poem><small>मागध-ब्राह्मी या मौर्यलीपि।</poem></small>}} मौर्य सम्राट् अशोक जिस ब्राह्मी लिपिको व्यवहार करते थे, हिमालयको तराईसे सिंहल तक उसी लिपिका निदर्शन निकला है । महावंशसे भी हम जान सकते हैं, कि अशोकका एक पुत्र और एक कन्या दोनो सिंहलमें बौद्धधर्म फैलाने गये थे । उनके साथ मगधकी ब्राह्मालिपि भी चली गई यौ; उसीका निदर्शन सिंहलमें सन् ई० से पहलेको प्रथम शताब्दि के बीच खोदी गई अभयगामिनको शिलालिपिमें मिला । केवल सिंहल ही क्यों कहें, चीन-समुद्रके तीरवत्तीं कम्बोज और अन्नम् राज्योंसे भी ब्राह्मौलिपिका विकाश दृष्ट होता है । पहले ही लिख दिया है, कि दाक्षिणात्यके कृष्णा जिलेमें भट्टिप्रोलूसे जो द्राविड़ - ब्राह्मौलिपि आविष्कृत हुई है, उसके युक्त-खरींका सामान्य प्रभेद छोड़ दूसरे अक्षरोंके साथ वैसा अलगाव नहीं देख पड़ता । स्थान- भेदके कारण लिपिकरके हाथसे धीरे-धीरे यह अलग हुई जाती थी। पिप्रावेकी सन् ई० से पहलेवाली छठीं शताब्दि- को लिपि और उससे पौछे सन् ई० से पहलेकी दूसरी शताब्दि के बीच में खोदी गई नानाघाटींको लिपि, यानी उस समयवाली आर्यावर्त्तको सब लिपियां प्राय एक ही तरह की हैं, – इससे अच्छी तरह जाना जाता है, कि भारतवर्षमें कोई पांच सौ वर्ष तक एक ही लिपि समभावसे चलती रही थी; पिप्रावेकी पूर्णावयव - लिपि देख समझ पड़ेगा, कि उससे पहले भी अन्ततः पांच सौ, यानौ वत्तमान समयसे कोई तीन हज़ार वर्षे पहले भारतमें उसी एक प्रकारको ब्राह्मी लिपिका चलते रहना सम्भवपर है । जो हो, आविष्कृत शिला लिपिकी आलोचना कर मनमें आता है, कि प्राचीन लिच्छविवंश, नन्दवंश, मौर्यवंश, चेतवंश और शृङ्गमित्रवंशके राजत्वकालमें प्रायः एक ही प्रकारक ब्राह्मीलिपि चलती थी । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इससे पीछे भारतकी उत्तर-पश्चिम- सीमामें शकाधिपत्य फैलने के साथ जिस ब्राह्मी लिपिका आकार कुछ-कुछ बदलते रहा ; वही ब्राह्मोलिपि इतिहास में शकलिपि नामसे गिनी जानी चाहिये । मथुरा, सुराष्ट्र प्रभृति स्थानोंसे शकलिपि आविष्कृत हुई है । इसी समय दाक्षिणात्य में सातवाहन राजवंशको जो लिपि पाई गई, वह जान पड़ता है, कि मौलिपिका हो संस्कार है । नासिक कादम्ब, जुन्नर और जग्गय्यपेटमें अन्ध्रभृत्य और काञ्ची प्रभृति स्थानोंसे पल्लव-राजवंशका जो सब लिपि आविष्कृत हुई हैं, उन सब लिपियोंके अक्षर शकलिपिके अक्षरोंसे मिलते हैं । यह बात दूसरे पृष्ठ में भारतीय ब्राह्मी- लिपिको तालिका देखनेसे ही मालूम होगी, कि इस शकब्राह्मी लिपिसे किस तरह वर्त्तमान उत्तर-भारतीय नागरी और गौड़लिपि उत्पन्न हुई । {{Block center|<poem><small>दाक्षिणात्य लिपि ।</poem></small>}} विन्ध्याद्रिके दक्षिण गुजरात, काठियावाड़ तक जो लिपि प्रचलित हैं, उसको हमने दाक्षिणात्य - लिपि कह कर माना है । पहले जिस द्राविड़ ब्राह्मीलिपिको बात लिखी गई, वह सब दाक्षिणात्य लिपियोंको जननी है। कृष्णा जिलेके भट्टिप्रोलूस आविष्कृत द्राविड़- ब्राह्मीकी बात पहले हमने कह दी है । आर्यावर्त्त में गुप्त और उनके अनुवर्त्ती विभिन्न वंशोंको लिपिके समान दाक्षिणात्य में भी उसी द्राविड़ो लिपिसे वहांके आंध्र, शक, गुप्त, वलभी, गुर्ज्जर, बाकाटक, कादम्ब, प्राच और प्रतोच्य चालुक्य, चेर, चोल, पल्लव, गङ्ग, राष्ट्रकूट, काकतीय, वाण, पाण्ड्य प्रभृति राजवंशोंकी विभिन्न समय में व्यवहृत लिपियां क्रमश: परिपुष्ट हुई हैं। जूनागढ़, गिरनार प्रभृति स्थानोंको सन् ई० को १ ली से ३ रो शताब्दि तक वाली शकक्षत्रपलिपि, नासिक, कुड़, जुन्नर, कणेड़ी प्रभृति स्थानोंको सन् ई० को १लासे ३रो शताब्दि तक वाला सातवाहन- लिपि, कृष्णा जिलेके जग्गय्यपेटसे सन् ई० की ३री. शताब्दिमें उत्कीर्ण इक्ष्वाकुराज 'सिरिवार पुरिसदत्त'को अलङ्कृत लिपि, काञ्चपुरसे सन् ई० को ४थी शताब्दिमें खोदी गई पल्लवलिपि, साञ्चो और मन्दसोरस सन् <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> nzk6a44sx3yxn5dsid9hf028pqs0hne पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७२ 250 82742 664886 642061 2026-07-04T07:06:29Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664886 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{c|२। विभिन्न सामयिक ताम्रलखकी अक्षर।}} १ । 𑚢 𑚆 𑚧 𑚦 𑚭 𑚵 𑚟 𑚮 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 २ । 𑚦 𑚫 𑚭 𑚵 𑚟 𑚮 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 ३ । 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚮 । 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 ५ । 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 ६ । ॐ 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 ७ । ॐँ 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 ८ । क्य क्रि नृ यो यू छी जू ज्यू टो डे हे ह्रो मो कै दै {{c|२। विभिन्न सामयिक ताम्रलेखकी अक्षरकी विवृति।}} {|width=100% |- | १। || मौर्यलिपि || का खि गु घो चू छी जू ञ्जा टो ठे डु ढो णो नै थै |- | २। || शकलिपि || का खु गु घो चे छि जू ञ्जे टे डा डि तृ |- | ३। || पल्लवलिपि || कु खा गो च्छो जो ञ्च टि ट्ठि डी तू |- | ४। || गुप्तलिपि || कू खा गू घे ङ्गे चि च्छ जा ज्झ ञ्ज टो डि णो ता ध |- | ५। || राष्ट्रकूटलिपि || कू खि गो घा ङ्क चि च्छे जौ र्झ ञ्ज टा डी ण्ड तुः थि |- | ६। || हिन्दुस्थान ९म शताब्द || ॐ को खा गू धू ङ्गा चा छि जैः ञ्ज टाः ष्ठि ड़ो टु गौ ते थैः |- | ७। || " १२श शताब्द || ॐ कु खि ग्र घा ङ्कि चं छे जि झा ञ्जा टाः ठा डा ढे णा तो र्थि |- | ८। || गौड़ीय सेनलिपि || के खे गृ घ ङ्क च च्छ ज झि ञ्च टि ष्ठा ढ ण ति थु दो धां नौ पू |}<noinclude></noinclude> jf5ccs4s4hfgik6xrdames4pkx7idzs पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७३ 250 82745 664889 345902 2026-07-04T08:03:53Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664889 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||''' अक्षरलिपी''''|'''६९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ईस्वी पूर्व ५वीं और ६ठवीं शताब्दी में चली गुप्तलिपि, बुंदेलखंड और गुजरात से सन् ईस्वी की ६ठवीं और ७वीं शताब्दी के बीच उत्कीर्ण वाकाटक राजवंश की लिपि, नासिक जिले में सन् ईस्वी की ५वीं शताब्दी में उत्कीर्ण कदम्ब राजाओं की लिपि, कर्नाटक और महाराष्ट्र से निकली सन् ईस्वी की ६ठवीं शताब्दी से ८वीं शताब्दी तक वाली प्रतीच्य चालुक्य राजवंश की लिपि, गोदावरी और कृष्णा जिलों में प्राप्त सन् ईस्वी की ७वीं शताब्दी वाली प्राच्य चालुक्य राजाओं की लिपि, कांची और उसके निकटवर्ती स्थानों में आविष्कृत सन् ईस्वी की ५वीं से ७वीं शताब्दी तक वाली पल्लव राजाओं की लिपि, मदुरै से उत्कीर्ण सन् ईस्वी की ७वीं शताब्दी वाली पांड्य (दक्षिण पाण्ड्य) और चेर राजाओं की लिपि, गुजरात और कर्नाटक से आविष्कृत राष्ट्रकूटलिपि और कलिंग से सन् ईस्वी की ५वीं से १३वीं शताब्दी के बीच खोदी गई गंग राजाओं की लिपि उल्लेख योग्य हैं। इन सब विभिन्न लिपियों की आलोचना कर हम अच्छी तरह जान सकते हैं, कि कलिंग की गंगलिपि से आजकल की उड़िया, चालुक्य लिपि से वर्तमान तेलुगु और कन्नड़, और चेर और चोल लिपि से वर्तमान तमिल बनी है। ​ दक्षिणात्य-लिपि तत्ववेत्ता डॉक्टर बूर्नेल (Burnell) साहब ने दक्षिणात्य लिपिमाला को प्रधानतः चार भागों में विभक्त किया है—१ तेलुगु, कन्नड़; २ ग्रन्थ-तमिल; ३ वट्टेलुत्तु और ४ दक्षिणी नागरी। वेङ्गी, प्राच्य और प्रतीच्य चालुक्य और यादवलिपि तेलुगु-कन्नड़ के अंतर्गत हैं, इन्हीं सब लिपियों से प्राचीन और आधुनिक तेलुगु और कन्नड़ लिपि की पुष्टि हुई है। चेर और चोल लिपि ग्रन्थ-तमिल के अंतर्गत हैं, यानी इन्हीं दोनों पुरानी लिपियों से प्राचीन और आधुनिक तमिल, ग्रन्थलिपि और तुलु-मलयालम लिपि उत्पन्न हुई हैं। ​पहले ही कह दिया गया है, कि पुरानी तमिल-लिपि से पहले वट्टेलुत्तु नामक एक प्रकार की खास द्रविड़-लिपि उत्पन्न हुई थी, जो थोड़े ही दिनों में अप्रचलित हो गई। ​{{Block center|<poem><small>वट्टेलुत्तु</poem></small>}} ​वट्टेलुत्तु या वर्तुललिपि का यह नाम इसलिए रखा <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गया होगा, कि यह गोल होती है। यह निश्चय करना एक प्रकार का असंभव है, कि कितने दिन पहले इसकी उत्पत्ति हुई थी। ​डॉक्टर बूर्नेल साहब के मत से यह लिपि अशोक-लिपि से समुद्भूत नहीं। कारण, यह अशोकलिपि के साथ आध्यात्मिक सादृश्य नहीं रखती; संभवतः व्यापारियों के दक्षिणात्य में पहुँचने से पहले यहाँ द्रविड़-लिपियों में चलती थी। उनके मत में, अशोकवाली मौर्यलिपि की तरह यह प्राचीन लिपि भी सेमिटिक लिपि से उद्भूत है। सेनेर मण्डने वट्टेलुत्तु और सास्नीय (पल्लव) लिपि मिलाकर दोनों के अक्षरों में दृष्टि सादृश्य निकाला है। किंतु बहुत दिन बाद की, द्रविड़ी के प्रभाव से धीरे-धीरे चंचल होते रहने के कारण वट्टेलुत्तु का सबसे पुराना रूप प्रकट नहीं होता। ​पहले ही कहा गया है, कि उत्तर-भारत से वणिकों की एक शाखा दक्षिणात्य में जा पड़ी थी, आदि में वही वट्टेलुत्तु लिपि का व्यवहार करती रही; उसने उस अति प्राचीनकाल में किसी के पास से लिपि ग्रहण न की थी। मिस्र में बहुत पुरानी संकेत (Hieratic) लिपि के बीच प्रकार और इकार लिपि के उच्चारणों की संकेत है, उसके साथ वट्टेलुत्तु का सौ सादृश्य रहता है। ऐसे स्थलों में हम सोच सकते हैं, कि द्रविड़भाषी वणिकों की वाणिज्य लिपियों ने सुदूर मिस्र में प्रचारित हो संकेतलिपि का आकार धारण किया था। डॉक्टर टेलर ने दिखाया है, कि वही संकेतलिपि सिदोन, मोआब, थुरमा, सेवीथ, योखान प्रभूति स्थानीय फिनिक या सेमिटिक लिपियों की जननी है। सुतरां द्रविड़ की आदि लिपि को भी हम सुप्राचीन बहुत सी पाश्चात्य-लिपियों की जड़ या सखा कर सकते हैं। ​ सन् ई० वी के पूर्व शताब्दियों के प्रारम्भ में द्रविड़ के हिंदू राजाओं ने सीरियाइयों को जो शासन दिए थे, उनमें भी वट्टेलुत्तु के अक्षर पाए गए हैं, इसी समय से अल्पकाल पीछे सन् ईस्वी के ८वें शताब्दी में चोलराज मदुरै पर अधिकार कर तमिल अक्षर चलाने रहे, इसी... <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|१८|em}}</noinclude> 4i7dkqm0t6pxrp1ktq0s4lcl9067qgt पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७४ 250 82749 664896 345906 2026-07-04T10:40:17Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664896 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''७०'''|'''अक्षरलिपि'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> समय से वट्टेलुत्तु का चलन घट गया। अंत में सन् ईस्वी के १५वें शताब्दी के समय द्रविड़ से यह लिपि एकबारगी ही उठ गई। केवल मालाबार उपकूल में सन् ईस्वी के १७वीं शताब्दी तक हिंदू इस लिपि का व्यवहार करते रहे। इसी समय वट्टेलुत्तु अक्षरों ने भी कुछ विकृत होकर कोलेलेत्तु नाम धारण किया, जिन्हें हिंदू राजा दान-पत्रों में अंकित कर गए थे। तेलिचेरी और निकटवर्ती द्वीपवासी माप्पिला उस दिन तक वट्टेलुत्तु ही अक्षर लिखते-पढ़ते थे, आजकल धर्म की हठ से वे इस लिपि को छोड़ अरबी अक्षर काम में लाते हैं। {{x-smaller|{{c|नन्दी नागरी}}}} ​दाक्षिणात्य (दक्षिण भारत) में जो नागरी लिपि चली थी, वह नन्दीनागरी नाम से प्रसिद्ध हुई। सन् १०३१ ईस्वी में अलबेरूनी ने जिस ‘सिद्धमातृका' लिपि का उल्लेख किया है, उस समय वह लिपि वाराणसी, मध्यदेश और कश्मीर में प्रचलित थी, पीछे वही सन् ईस्वी के ११वीं शताब्दी में दाक्षिणात्य पहुंची। इसी से हमें सन् ईस्वी के ११वीं शताब्दी से पहले दाक्षिणात्य में सिद्धमातृका का व्यवहार नहीं देख पड़ता, सब कुछ १०वीं शताब्दी का परवर्ती है। केवल महाबलिपुरम के शालवन्कुप्पम् नामक गांव के निकटवर्ती अतिरणचण्डेश्वर के मन्दिर में दाक्षिणात्य लिपि के साथ नागरी लिपि देख पड़ती है। देखते ही बोध होता है, कि वह लिपि दाक्षिणात्यवासियों के लिए नहीं, उत्तर-भारतीय तीर्थयात्रियों के उद्देश्य से खोदी गई थी। सन् १३११ ईस्वी में दाक्षिणात्य पर मुसलमानों की चढ़ाई होने और संस्कृत चर्चा की लीलाभूमि विजयनगर को मुसलमानों के कवलित करने से संस्कृत और देशीय साहित्य वाले अधःपतन के साथ यहाँ नागरी का प्रचार भी विरल हो गया। इस समय से पीछे की दाक्षिणात्य में जो नागरी लिपि (हाल-कन्नड़) पोथी और शासनादि मिलते हैं, उनमें लिपि-पद्धति की विकृति और अधोगति ही देख पड़ती है। ​मराठों ने तंजौर को अधिकार में कर यहाँ जो नागरी चलाई थी, वह साधारणतः 'बालबोध' नाम से परिचित है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{blockcenter|{{x-smaller|​ग्रन्थलिपि}}}} ​ दाक्षिणात्य में किसी समय धर्मशास्त्र लिखने में जो लिपि व्यवहृत होती थी, उसी को लोग "ग्रन्थ" बोलते हैं। यह ग्रन्थलिपि दो तरह की होती है। तंजोर प्रदेश के ब्राह्मण जिसका व्यवहार करते हैं, वह कितनी चतुरस्र (चौकोर) है, और अर्काट तथा मद्रास के पास वाले जैन जिसको काम में लाते हैं, वह वर्तुलाकार (गोल) है। दाक्षिणात्य में ब्राह्मणों के अधिकांश धर्मग्रन्थ उक्त ग्रन्थलिपि से ही लिखे गए हैं। दाक्षिणात्य के पश्चिमांश में तुलु-मलयालम नाम से एक दूसरे प्रकार की भी ग्रन्थलिपि बहुत दिनों से प्रचलित है; जो केवल संस्कृत लिखने के समय ही व्यवहृत होती देखी जाती है। ​ फिर, ग्रन्थलिपि से ग्रन्थ-तमिल भिन्न है। ग्रन्थ-तमिल का व्यवहार कृष्णा और गोदावरी के मुहाने के अंचल में ही अधिकांश प्रचलित है। ब्राह्मी​से निकली भारत की वर्तमान लिपियां ​ आजकल भारतवर्ष में नीचे लिखी जो लिपियां प्रचलित हैं, उनका नाम वर्णानुक्रम से लिखा गया है: ​ अरोरा (सिंधु प्रदेश में), असमीया, उड़िया, ओझा (बिहार के ब्राह्मणों में), कन्नाड़ी, कराढ़ी, कायथी, गुजराती, गुरुमुखी (पंजाब में सिखों के बीच), ग्रन्थम् (तमिल ब्राह्मणों के मध्य), तमिल, तुलू (मंगलूर में), तेलुगु, थल (पंजाब के डेराजात में), डोगरी (कश्मीर में), देवनागरी, निमारी (मध्य प्रदेश में), नेपाली, पराची (भेरे में), पहाड़ी (कुमाऊं और गढ़वाल में), बणिया (सिरसा और हिसार में), बंगला, भावलपुरी, बिसाती, बड़िया, मणिपुरी, मलयालम, मराठी, मारवाड़ी, मुल्तानी, मैथिली, मोड़ी, रोरो (पंजाब में), लामावासी, लुन्डो (स्यालकोट में), शराकी या श्रावकी (पश्चिमी बनियों में), सारिका (पंजाब के डेराजात में), सईसी (उत्तर-पश्चिम के भृत्यों में), सिंहली, शिकारपुरी, और सिंधी। इन्हें छोड़ भारत के अनुद्वीपों (आसपास के द्वीपों) में बर्मी, स्यामी (थाई), लाओस, काम्बोज (खमेर), पेगुआन, और यवद्वीप (जावा) और फिलीपींस में भी नाना प्रकार की लिपियां चलती हैं। ​{{blockcenter|{{x-smaller| खरोष्ठीलिपि}}}} ​यूरोपीय पंडितों ने स्थिर किया है, कि खरोष्ठी— <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> s3e7ymwhp8r421ikfqhm28ubwq97sij पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७२ 250 83546 664816 664768 2026-07-03T13:28:45Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664816 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२६६'''|'''अतिशक्र—अतिशयोक्ति'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अतिशक्र(सं॰ त्रि॰) इन्द्रसे बड़ा। अतिशङ्का (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्त भय, अज़हद, खौफ़। अतिशय (सं॰ पु॰) अति-शोङ्-अच्। १ आधिक्य, अतिरेक, बहुतायत, ज़ियादती। वेगातिशय जैसे रूपोंमें अतिशय शब्द विशेष्य और अतिशयसाधु जैसे स्थलोंमें विशेषण होता है। २ काव्यालङ्कार-विशेष, जिसमें किसी वस्तुका होना या न होना लगातार दिखाया जाता है। (त्रि॰) ३ बहुत ज्य़ादा, अधिकसे अधिक। अतिक्रान्तः शयं हस्तम्। ४ हस्ताति-क्रमकारक। अतिक्रम्य शक्तिं (अव्य॰)। ५ शक्त्यतिक्रम। भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ़, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ़, वाढ़, दृढ़, अतिमर्याद, उत्कर्ष, बलवत्, सुष्छु, किमुत, सु, अतीव, अति, हार, व्यापार, समधिक, अतिरिक्त—यह पर्याय हैं। अतिशयन (सं॰ क्ली॰) अति शीङ्-भावे ल्युट्। १ बहुत सोना। २ अतिरेक, अतिशय, कसरत। (त्रि॰) ३ अतिशययुक्त, ज़ियादतीका। अतिशयोक्ति (सं॰ स्त्री॰) अतिशयेन उक्तिः निर्द्दशोऽस्मिन् वर्णने। १ जो बात बहुत बढ़ाकर कही जाय। २ काव्यालङ्कार-विशेष, एक प्रकारका अलङ्कार। साहित्य-दर्पण-प्रणेताने अतिशयोक्ति अलङ्कारका इसतरह लक्षण बताया है— <small>"सिद्धत्वे ऽध्यवसायस्वातिशयोक्तिर्निगद्यते।"</small> प्रकृत विषयका अप्राधान्य दिखाके उसके उद्देश्यमें अप्रकृत विषयको निश्चल भावसे स्थापन करनेपर अतिशयोक्ति होती है। यथा, मुखं द्वितीयश्चन्द्रः। मुख तो दूसरा चन्द्र है। इस स्थानमें प्रकृत विषय मुख है, किन्तु मुखको चन्द्र बताके उल्लेख किया गया है। इसीसे ऐसे स्थलमें एकका प्राधान्य और दूसरेका अप्राधान्य प्रतिपन्न होता है। अधःकरण यानी अप्राधान्य और निगरणके सम्बन्धमें अलङ्कारिकोंने एक कारिका लिखी है। यथा- {{Block center|<poem><small> "विषयस्यानुपादानेऽप्युपादानेऽपि सूरयः। अध:करणमावेण निगौर्णत्वं' प्रचक्षते॥"</small></poem>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>प्रकृत विषय निर्द्देश किया या न किया जाय, अधःकरण अर्थात् अप्राधान्य समझ पड़नेसे ही उस विषयका निगरण करना होता है। अतिशयोक्ति अलङ्कार पांच प्रकारका है—१ दो विषयों में भेद रहते भी अभेदकल्पना। २ अभेदविषयों में भेदकल्पना। ३ सम्बन्ध होते भी असम्बन्ध कल्पना। ४ असम्बन्धमें सम्बन्धकल्पना। ५ कार्य और हेतुके पौर्व्वापर्यका अभाव अर्थात् विपर्यय। {{Block center|<poem><small>"भेदैऽप्यभेदः सम्बन्धेऽसम्बन्धस्तविपर्ययौ। पौर्व्वापर्यात्ययः कार्यहतोः सा पञ्चधा ततः॥" (साहित्यद॰)</small></poem>}} १। भेदमें अभेद— {{Block center|<poem><small>"कथमुपरि कलापिन: कलापी विलसति तस्व तलेऽष्टमीन्दुखण्डम्। कुवलययुगल' ततो विलोलं तिलकुसुमं तदध: प्रवालममात्॥"</small></poem>}} {{Block center|<poem><small>मोर पूंछ ऊपर लसत नीचे आठें चन्द। तापर चञ्चल युग कमल फूले आनंद कन्द॥</small></poem>}} क्या ही आश्चर्य्य है! ऊपर मोरकी पूंछ (केश) शोभा पा रही है; उसके नीचे अष्टमीका चन्द्र (ललाट) उदय हुआ है; उसके बाद दो चञ्चल कमल (चक्षु) फूले हैं; उनके नीचे तिलकी कली (नासिका) खिली हुई है; उसके नीचे प्रवाल (ओष्ठ) मनको हरे लेते हैं। इस जगह केशादिके साथ मोरको पूंछ प्रभृतिका पूरा भेद रहते भी अभेद रूपसे वर्णना की गई है। २। अभेदमें भेद— {{Block center|<poem><small>"अन्धदेवाङ्गलावण्यमन्याः सौरभसम्पद.। तस्याः पद्मपलाशाक्ष्रा: सर सत्वमलौकिकम्।"</small></poem>}} उस पद्मपलाशाक्षी कामिनीकी देहमें जैसा लावण्य है, वैसा और कहीं नहीं, वह सौन्दर्य और माधुर्य सभी अलौकिक है। जगत्में जो रूपलावण्यादि देखा जाता, इस जगह उससे कोई विभिन्नता न रहते भी भिन्न रूपसे कल्पना की गई है। {{Block center|<poem><small>राधामें जो-रूप है, वैसी कहुंन दिखात। सकल सराहत रात-दिन, धन्ध अलौकिक मात॥</small></poem>}} ३। सम्बन्धमें असम्बन्ध— <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 5jxwdnvc6gwxbkobjve8df8hnkjge7g पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७३ 250 83547 664819 664773 2026-07-03T14:11:30Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664819 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिशयोक्ति—अतिशायिन्'''|'''२६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Block center|<poem><small>"अस्याः सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्री नु कान्तिप्रदः? सङ्गारकरसः स्वयं नु मदनी मासी नु पुष्याकरः? वेदाभ्यासजड़ः कथं नु विषयव्यावृत्तकोतूहलो निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः?"</poem></small>}} सौन्दर्यदाता चन्द्र क्या इस स्त्रीरत्नके सृष्टिकर्त्ता हैं, अथवा श्रृङ्गाररसके एकमात्र आधार स्वयं कन्दर्पने क्या इसे निर्माण किया है? या पुष्पके आकर चैत्र-मासने अपने हाथसे संवारा है? कारण सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा बहुत वेदाभ्याससे इतने जड़-बुद्धि और विषयसे निवृत्त हो गये हैं, कि उनका फिर विषय-व्यापारसे कौतूहलाक्रान्त हो, ऐसा मनोहर रूप बना सकना सम्भव नहीं। इस जगह प्रजापति ब्रह्माके प्रकृत निर्माण कर्ता होते भी दूसरेके निर्म्माणकर्त्तृत्वकी कल्पना की गई है। {{Block center|<poem><small> रचो अवसि कन्दर्पने, नव राधाकी रूप। विधिना बूढ़े ह्वै परे, ज्ञानकाण्डके कूप॥</poem></small>}} ४। असम्बन्धमें सम्बन्ध— {{Block center|<poem><small>"यदि स्यान्मण्डले सक्तमिन्दोरिन्दीवरद्वयम्। तदोपमौयते तस्या वदनं चारुलोचनं॥"</poem></small>}} तो उस कामिनीके मनोहर नेत्र-द्वय-शोभित मुखसे उसकी तुलना की जा सकती है। {{Block center|<poem><small>होत निशाकरमें कव्हूं, जो युग नील-सरोज। नयन सुशोभित वदनकी, भाषत उपमा खोज॥</poem></small>}} ५। कार्य और कारणके पौर्वापर्यका अभाव। स्वाभाविक नियम यही है, कि आगे कारण विद्यमान रहता, पीछे कार्यकी उत्पत्ति होती है। किन्तु इसका विपर्यय होनेसे अर्थात् जिस जगह आगे कार्य निर्द्दिष्ट होता और पीछे उसका कारण उल्लिखित हुआ करता, उसी जगह कार्य और कारणका अन्यथा करना होता है। इसे छोड़ इस प्रकारसे कहनेपर भी, कभी-कभी अतिशयोक्ति हो जाती है, कि कार्य और कारण दोनो एक ही साथ उत्पन्न हुए हैं। {{Block center|<poem><small>(१) "प्रागेव हरिणाक्षीणां चित्तमुत्कलिकाकुलं। पश्चादुदृभिन्नवकुलरसालमुकुलश्रियः॥"</poem></small>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noincludeपहले ही मृगनयना रमणियोंका चित्त आकुल हो उठा, पीछे वकुल और आम्रके मुकुल प्रकाशित हो शोभा पाने लगे। वकुलादिका पुष्पसौन्दर्य देखने से ही कामिनीयोंका मन चञ्चल होनेकी सम्भावना है। किन्तु इस जगह पहले उनके मनकी व्याकुलतावाली बात कह, पोछे पुष्पसौन्दर्यका विषय उल्लिखित किया गया है। इसलिये इसके द्वारा कार्य और कारणका विपरीत भाव सङ्घटित हुआ है। {{Block center|<poem><small>(२) "सममेव समाक्रान्तं यं हिरदगामिना। तेन सिंहासनं पिवा मण्डलञ्च महीचिताम्॥"</poem></small>}} हस्तौके तुल्य मन्दगामा उन रघुन पैटक सिंहासन और विपक्ष राजमण्डलपर एक ही कालमें आक्रमण किया था। पहले सिंहासनपर अधिरूढ होकर पीछे शत्रुओंका जय करना सम्भव है; किन्तु इस जगह दोनो कार्य एक ही समयमें उल्लिखित हुए हैं। इसलिये यहां भी कार्य-कारणका विपरीत भाव हुआ। अतिशयोक्तिको जगह इव-जैसे, आदि शब्द रहनेसे यदि चन्द्रमण्डलमें दो नौलपद्म लगा दिये जायं, उत्प्रेक्षालङ्कार होता है। अतिशयोपमा (सं॰ स्त्री॰) वह उपमा, जिसमें किसी वस्तुको उपमा दूसरो वस्तु के साथ न दी जा सके। {{Block center|<poem><small>"सब उपमा कवि रहे जुठारी। केहि पटतरिय विदेह कुमारी॥" तुलसौ</poem></small>}} अतिशर्वर (वै॰ क्लो॰) आधीरात, मध्यनिशा। अतिशष्कुलौ (सं॰ स्त्री॰) तिलको रोटी। बहुत बढ़िया, निहायत अतिशस्त (स॰ वि॰) उम्दा। अतिशस्त्र (स॰ त्रि॰) हथियारोंसे बढ़िया। अतिशाक्कर (सं॰ त्रि॰) अतिशक्कर छन्दमें लिख गया या उसके सम्बन्धका। अतिशायन (सं॰ पु॰) अति-शोङ्भावे ल्युट, निपातनादीर्घः। आधिक्य, प्रकर्ष, कसरत। अतिशायिन् (सं॰ त्रि॰) अति-शी-णिनि। अधिक, ज्यादा। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> mkl34zj9k5hg2bfp4gg74vhaner3jph पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७४ 250 83548 664820 664788 2026-07-03T14:18:52Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664820 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२६८'''|'''अतिशारिवा—अतिसान्तपन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अतिशारिवा (सं॰ स्त्री॰) अनन्ता, अनन्तमूल। अतिशीत (सं॰ अव्य॰) १ जाड़ेसे बाहर, जाड़े के बाद ।(पु॰) २ अधिक जाड़ा। अतिशोलन (स॰ पु॰) अभ्यास, महावरा, मश्क, किसी कामका बार-बार विचार। अतिशुक्र, अतिशुक्ल (सं॰ त्रि॰) बहुत उज्ज्वल, निहायत सफेद। अतिशूकज (सं॰ पु॰) गोधूम, गेहूं। अतिशूक (स॰ पु॰) यव, बेभरा। अतिशूद्र (सं॰ पु॰) जिस शूद्रके हाथका पानीब्राह्मण आदि न पीयें, अन्त्यज-कोरी, चमार, धोबी,मेहतर आदि। अतिशृतक्षौर (सं॰ क्लो॰) मावा, खोया। अतिशेष (सं॰ पु॰) अति-शिष-कर्मणि घञ्, अतिशिष्यते। स्वल्पावशिष्ट, जो बहुत थोड़ा बचा हो। अतिशोभन (सं॰ त्रि॰) अति-शुभ-ल्युट। अत्यन्तअतिशोष (सं॰ पु॰) क्षयरोग। शोभायुक्त, श्रेष्ठ, निहायत खूबसूरत । अतिथी (सं॰ वि॰) बहुत सम्पन्न, निहायत आसूदा। अतिश्रेयसो (सं॰ स्त्री॰) उत्तम स्त्रीयोंसे भी उत्तमकल्याण करनेवाली। अतिश्रेष्ठ (स॰ वि॰) सबसे बड़ा, निहायत अफज़ल। अतिश्रेष्ठत्व (सं॰ लो॰) बड़ी बड़ाई, अज़हदसबकत। अतिख (सं॰ वि॰) अतिक्रान्तं खानं टच। अते गुनः ।पा ५४६६। कुत्तेको हरा देनेवाला ; जैसे सूअर, भेड़ियाआदि, वेगवान्, कुत्तेसे तेज, दौड़नेवाला। अतिश्वन् (सं॰ पु॰) अतिशयितः सुन्दरः श्वा। उत्तम कुत्ता।अतिष्कहरौ (स॰ स्त्री॰) लुच्ची स्त्री, आवारा औरत। अतिष्ठत् (स॰ वि०) न टिकनेवाला, नापायदार। अतिष्ठा (सं० स्त्री०) अति-स्था-क्विप, सर्बानतीत्यतिष्ठतौति। सबसे अतीत, वह स्त्री जो सबसे बढ़ी चढ़ी हो। अतिष्ठावत्, अतिष्ठावन् (सं० त्रि०) टिकाऊ, पायदार। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अतिसंस्कृत (संत्रि.) बहुत संस्कार किया गया, निहायत दुरुस्त किया हुआ। अतिसक्ति (सं० त्रि०) बड़ा प्रेम, अजहद मुहब्बत । अतिसक्तिमत् (सं० त्रि.) बहुत लगा हुआ, निहायत मुश्ताक। अतिसय (सं० पु.) बड़ा ढेर, भारी जखोरा। अतिसन्तप्त (सं० त्रि.) बहुत दुःखी, निहायत अफसुर्दा। अतिसन्ध (सं० पु०) वचन या आदेशका अमान्य, शास्त्रको आज्ञाका उल्लङ्घन । अतिसन्धान (सं० पु०) अतिक्रान्तं सन्धानम्। सन्धान- वर्जित, वञ्चना, धोखा, फरेब, जाल । अतिसन्धित (स त्रि.) १ जिसका खूब फैसला हो गया हो। २ ठगा गया। अतिसन्धेय (स. त्रि०) प्रसन्न करने योग्य, फैसला होने काबिल। अतिसन्ध्या (सं० स्त्री०) अतिशयेन सन्ध्या, प्रादि-स।अतिशय सन्ध्याकाल, ठीक सन्ध्याका समय । अतिसमर्थ (सं० त्रि०) बहुत समर्थ, निहायत कामिल । अतिसमीप (सं० त्रि.) बहुत निकट, निहायत नजदीक। अतिसम्पर्क (सं० पु०) बड़ा सहवास । अतिसर (सं• त्रि०). अति-स-अच् । खस्य गतिमतीत्य सरति गच्छति। अतिचारी, अग्रसर, अपनी चालसे बाहर चलनेवाला। अतिसर्ग (सं० पु०) अति-सृज-घञ्। १ दान, उत्सर्ग। (त्रि.) २ सृष्टि-अतिक्रमकारी अतिसज्जन (स'• पु० ) अति-स-ल्य ट। १ विसर्जन २ दान। ३त्याग। ४ नियोग, वध। ५ विप्रलम्भ । ६ अतिशय दान। अतिसव (सं० त्रि०) अतिक्रान्तः सर्वान सबसे अतीत, सबसे आगे निकला हुआ। अतिसाध्वस् (सं० लौ० ) बड़ा डर, भारौ खौफ। अतिसान्तपन (स' क्लो०) १ अतिक्रान्तः सान्तपनम् । अधिकदिनसाध्यत्वात्, अत्यादि-तत्। २ एक व्रत। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> docwft3d2w301my3hrra4itjeerymfl पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७५ 250 83549 664821 664791 2026-07-03T14:22:28Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664821 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसान्द्र—अतिसार'''|'''२६९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> मनुसंहितामें लिखा है, कि जान-बूझकर जातिभ्रंश कर पाप करनेपर सान्तपन व्रत करे, किन्तु यदि यह पाप बिना जाने हो जाय, तो प्राजापत्य व्रत करना चाहिये। यथा- {{Block center|<poem><small> "जातिय शकर कम्म कृत्वान्यतममिच्छया। चरेत् सान्तपनं कच्छ प्राजापत्यमनिच्छया॥१५॥१२५॥</poem></small>}} विष्णुसंहिताके मतसे, पहले दिन गोमूत्र, गोमय यानी गोबर, दूध, दही, घी और कुशोदक सेवन करे;दूसरे दिन उपवास करे। इसौको सान्तपन कहते हैं। यह व्रत तीन बार अभ्यस्त होनेसे हो अति-सान्तपन कहाता है। अतिसान्द्र (सपु.) राजमाष, लोबिया, चौंला। अतिसांवत्सर (सं० त्रि०) एक वर्षके ऊपर, संवत्सरसे अधिक क।अतिसामान्य (सं० पु०) १ वह उक्ति जो कहनेवाले के मतलबसे बाहर निकल जाती है। (त्रि.)२ निहायत मामूली, बहुत सौधा । अतिसाम्या (स. स्त्री०) अत्यन्तं साम्य अधुनाअस्याः बहुव्रौ०। १ मधुयष्टिलता, मौरठौकी बेल ।(लो०) प्रादि-स० । २ अत्यन्त सादृश्य । अतिसायं (सं० अव्य० ) अतिशयितं सायं। अ त्यन्तसायंकाल।अतिसार, अतीसार (स० पु०) रुधिरादिकं अतिशयेन सारयतौति, अति-स-घञ्। सरति अतीव इत्यतिसारः। जो रुधिर आदिको बहुत गिराये, रोग-विशेष, उदरामयरोग, वह बीमारी, जिसमें आँव और खून गिरताहै। अतिसार रोग साधारणतः दो प्रकारका होता है।श्लेष्मातिसार (diarrhea) और दूसरा रक्तातिसार (dysentery)। इसके भिन्न-भिन्न कारण, लक्षणऔर चिकित्सादि इस तरह हैं,-कुपथ्य या गुरुपाक द्रव्य अधिक खाकर, कितनेही लोग पचा नहीं सकते। विशेषतः जिन्हें शारीरिक परिश्रम नहीं करना पड़ता, आठों पहरकेवल एक ही स्थानमें बैठके लिखने-पढ़नेको चर्चाकरनी होती है, या जो स्वभावसे ही आलसी हैं,थोड़ी दूर चलने में जिन्हें कष्ट होता, उनके लियेभारी चीज, खाना मना है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इस बातका ठीक-ठीक कोई उत्तर नहीं, कि कुपथ्य और गुरुपाक द्रव्य अर्थात् भारी चीजें. कौन-कौन हैं। क्यों कि, एक मनुष्यके लिये जो वस्तु कुपथ्य और गुरुपाक है तथा जिसे थोड़ोसी ही खानेपर उसके पौड़ा उत्पन्न हो जाती है, दूसरा वही वस्तु दशगुण खाके अच्छोतरह पचा जाता है। फिर जाड़े में जो चोज, अनायास ही जीर्ण ( हज.म) होती, गर्मी और बरसातमें उसके खानेसे पीड़ा होने लगती है। इससे तो, दैहिक स्वभाव, अभ्यास और जाड़े-गर्मीको कमी-वेशी देख सुपथ्य और कुपथ्य विचारना पड़ता है। प्राय: लडडू, पूड़ी, जलेबी प्रभृति मिठाइयों और पुलाव प्रभृति जिन चीजोंमें घी और मसाला ज्यादा रहता है, उन्हें गुरुपाक कहते हैं। सिवा इसके, जिन चीजोंमें बकला, रेशा और वीज अधिक रहता है, वही कुपथ्य होती हैं। प्याज और लहसुन भी सुपथ्य नहीं। किन्तु युरोपीय पण्डित इन दोनो चीजोंको आग्नेय समझते हैं। भारतवर्ष में गर्मी बहुत पड़ती है, यहां प्याज और लहसुन सुपथ्य नहीं हो सकता। मनुसंहितामें लिखा है,-ऋषियोंने मनुके सन्तान भृगुसे पूछा, कि सत्ययुगमें जब मनुष्यको आयु चार सौ वर्षको लिखी है तब वेदपारग ब्राह्मणोंको अकाल मृत्यु क्यों होती है। भृगुने इसके उत्तरमें खाद्यदोष हो मृत्युका प्रधान कारण बताया। अभक्षा देखो। तथा लहसुनको. दूषित कहा। अपर लिखे हुए कुपथ्यके सिवा और भी अनेक अनिष्टकर ट्रव्य प्रायः सकल हो खाया करते हैं। इसमें बाजारको मिठाई प्रधान है। प्रायः हलवाईको दुकानमें जो खानेको चौजे मिलती हैं, वह विषके बराबर हैं। हलवाई सस्ते घोको क्रय करते हैं, जो कभी स्वास्थ्य के लिये लाभदायक नहीं होता। नारियलका तेल, बकरे और बैलको चर्बी और अण्डौका तेल इस धीमें अधिक परिमाणसे मिला रहता; अधिक क्या बताया जाये. घौमें जो चीज़ खानेकी नहीं, वही पड़ती है। ऐसे हो घौमें मिठाई तय्यार की जाती है। इसके बाद और प्याज <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ilbnuoubqr4vmf1avck7h9ej1gib2yz पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७६ 250 83550 664810 346952 2026-07-03T12:09:53Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664810 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''२७०'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पड़ता है। न बिकनेसे हलवाई बासी चीज नई चौजमें मिला। देते हैं। इसीसे हलवाईवाली दुकानको मिठाई विषके लड्डू सिवा और कुछ भी नहीं। इन सकलद्रव्योंको भोजन करनेसे उदरामय प्रभृति नाना प्रकारके रोग आ उपस्थित होते हैं। सड़ा मत्स्य-मांस अत्यन्त कुपथ्य होता, कभी-कभी मत्स्यके भीतर एक प्रकारका क्षुद्र कौड़ा भी निकल पड़ता है। ऐसा रुग्ण मत्स्य खानेसे लोगोंको उत्कटयौड़ा उत्पन्न हो जाती है। क्या सुस्थ और क्या पीड़ितावस्था, दोनों ही में कभी अधिक भोजन न करे और भोजनके बाद अधिकक्षण न जागे। आहारान्तमें विश्राम लेना कत्तव्य है। विश्राम न लेनेसे प्रायः क्षुधामान्य और अजीर्णरोग आ उपस्थित होता है। आंतमें छोटा किंवा बड़ा कौड़ा रहनेसे भी अतिसार हो सकता है। इसके सिवा दूसरी भी कई एक बातें अतिसार-को कारण गिनी जा सकती हैं। गन्दा पानी पानसे उदरामय रोग उत्पन्न होता है। वर्षाकालमें गांवों के तालाब पानौसे भर जाते हैं। मुंहानेसे पानी पहुंचते समय, मल-मूत्र और अन्यान्य नाना प्रकारके द्रव्य तालाबमें दाखिल होते और पासके तृणादि भी डूबते हैं। पौछे यह सकल द्रव्य सड़ा करते ;इसीसे वर्षाकालका जल अपरिष्कृतावस्थामें पौनेसेज्वर, उदरामय प्रभृति नाना प्रकारको पौड़ायें उत्पन्नहोती हैं। जल देखो।शीत ग्रीष्मादिके समय असावधान रहनेसे उदरामय हो जाता है। ग्रीष्म और शरत्कालमें दिनको रौद्र-धूप लगने और रातको ठण्डी हवामें सोनेसे भी उदरामय उत्पन्न हो सकता है। हठात् धर्म-पसीना रोकनेसे अतिसार उत्पन्न होता है। दांत निकलते समय शिशुओंको उदरामय रोग बहुत सताता है। इसका विवरण दन्तोद्गम शब्दमें देखी।आहारके दोषसे उदरामय निकलनेपर प्रायः रात्रिकालमें ही पीड़ा उपस्थित हुआ करती है। पहले निद्रा नहीं आती, किंवा आनेसे भी शीघ्र टूट जाती है। इसके बाद सारा पेट कड़ा हो कुछ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कुछ फूलता है। पेड़ में मरोर उठतो ओर ऊपरी पेट भारी मालूम पड़ता है। ऐसी अवस्थामें कुछ क्षण रह रोगो वमन करनेका आरम्भ करता है। वमनके साथ भुक्त-ट्रव्य, लार, पित्त और अम्लजल निकल पड़ता है। फिर पुनःपुनः मलत्याग करनेको इच्छा चलती है। अवशेषमें श्लेष्मायुक्त मल निर्गत होता है। रुग्ण शरीर या दुर्बल व्यक्ति होनेसे इस सामान्य उपसर्गसे ही कठिन अतिसार रोग उत्पन्न हो सकता है। साथ ही हैजे का प्रादुर्भाव होनेसे इस अवस्थामें कितनों ही को उसके पञ्जे में पड़ जाना पित्तातिसार (Bilious diarrhoea)-यह अतिसार उष्ण-प्रधान देशमें अलस व्यक्तिको हौ अधिक लगता है। जो अतिरिक्त मद्यपान करते, किंवा अधिक मांस खाते हैं, हमारे देशमें उन सब लोगोंके इस प्रकारके उदरामय हो जानेकौ अधिक सम्भावना है। इसका कारण यही है, कि मांस खानेसे रक्त में अधिक हाइड्रोजन और अङ्गार उत्पन्न होता है। शीतप्रधान देशमें फेफड़ेसे यह सकल बाष्प निकल जाते हैं।किन्तु उष्णप्रधान स्थानमें अलस व्यक्तियोंके फेफड़ेका काम कितना ही कम रहता है, इसौसे हाइड्रोजन और अङ्गार प्रश्वासके साथ यथेष्ट परिमाणमें निकल नहीं सकते। सुतरां इन दोनो बाष्पों द्वारा पित्तवृद्धि होती है। पित्त बढ़ते ही यकृत्में पैत्तिक रताधिक्य उत्पन्न होता और अन्त्रमें भी अधिक परिमाणसे पित्त आ पहुंचता है। इस अवस्थामें कभी-कभी यकत्के मध्यमें फोड़ा हो जाता है।अतएव सामान्य उदरामय होनेसे भी कभी निश्चिन्त न बैठे। पित्तातिसारमें पुनः पुनः अल्प-अल्प पतला हरिद्रा-वर्ण मल निर्गत होता, पेट शूलकी तरह वेदना किया मल निर्गत होनेसे पहले पेटमें मरोर आती है। मलेरिया प्रधान देशमें ऐसे उदरामयके साथ उत्कट स्वल्पविराम ज्वर ( Remittent fever ) रोगीको धर दबाता है। इस अवस्थामें यह जाननेके लिये विज्ञ चिकित्सकोंका भौ शिर चकरा जाता करता है <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> hk23rm0a8442l92y7avlj88trwj5odh 664822 664810 2026-07-03T14:24:28Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664822 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२७०'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> न बिकनेसे हलवाई बासी चीज नई चौजमें मिला। देते हैं। इसीसे हलवाईवाली दुकानको मिठाई विषके लड्डू सिवा और कुछ भी नहीं। इन सकलद्रव्योंको भोजन करनेसे उदरामय प्रभृति नाना प्रकारके रोग आ उपस्थित होते हैं। सड़ा मत्स्य-मांस अत्यन्त कुपथ्य होता, कभी-कभी मत्स्यके भीतर एक प्रकारका क्षुद्र कौड़ा भी निकल पड़ता है। ऐसा रुग्ण मत्स्य खानेसे लोगोंको उत्कटयौड़ा उत्पन्न हो जाती है। क्या सुस्थ और क्या पीड़ितावस्था, दोनों ही में कभी अधिक भोजन न करे और भोजनके बाद अधिकक्षण न जागे। आहारान्तमें विश्राम लेना कत्तव्य है। विश्राम न लेनेसे प्रायः क्षुधामान्य और अजीर्णरोग आ उपस्थित होता है। आंतमें छोटा किंवा बड़ा कौड़ा रहनेसे भी अतिसार हो सकता है। इसके सिवा दूसरी भी कई एक बातें अतिसार-को कारण गिनी जा सकती हैं। गन्दा पानी पानसे उदरामय रोग उत्पन्न होता है। वर्षाकालमें गांवों के तालाब पानौसे भर जाते हैं। मुंहानेसे पानी पहुंचते समय, मल-मूत्र और अन्यान्य नाना प्रकारके द्रव्य तालाबमें दाखिल होते और पासके तृणादि भी डूबते हैं। पौछे यह सकल द्रव्य सड़ा करते ;इसीसे वर्षाकालका जल अपरिष्कृतावस्थामें पौनेसेज्वर, उदरामय प्रभृति नाना प्रकारको पौड़ायें उत्पन्नहोती हैं। जल देखो। शीत ग्रीष्मादिके समय असावधान रहनेसे उदरामय हो जाता है। ग्रीष्म और शरत्कालमें दिनको रौद्र-धूप लगने और रातको ठण्डी हवामें सोनेसे भी उदरामय उत्पन्न हो सकता है। हठात् धर्म-पसीना रोकनेसे अतिसार उत्पन्न होता है। दांत निकलते समय शिशुओंको उदरामय रोग बहुत सताता है। इसका विवरण दन्तोद्गम शब्दमें देखी। आहारके दोषसे उदरामय निकलनेपर प्रायः रात्रिकालमें ही पीड़ा उपस्थित हुआ करती है। पहले निद्रा नहीं आती, किंवा आनेसे भी शीघ्र टूट जाती है। इसके बाद सारा पेट कड़ा हो कुछ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कुछ फूलता है। पेड़ में मरोर उठतो ओर ऊपरी पेट भारी मालूम पड़ता है। ऐसी अवस्थामें कुछ क्षण रह रोगो वमन करनेका आरम्भ करता है। वमनके साथ भुक्त-ट्रव्य, लार, पित्त और अम्लजल निकल पड़ता है। फिर पुनःपुनः मलत्याग करनेको इच्छा चलती है। अवशेषमें श्लेष्मायुक्त मल निर्गत होता है। रुग्ण शरीर या दुर्बल व्यक्ति होनेसे इस सामान्य उपसर्गसे ही कठिन अतिसार रोग उत्पन्न हो सकता है। साथ ही हैजे का प्रादुर्भाव होनेसे इस अवस्थामें कितनों ही को उसके पञ्जे में पड़ जाना पित्तातिसार (Bilious diarrhoea)-यह अतिसार उष्ण-प्रधान देशमें अलस व्यक्तिको हौ अधिक लगता है। जो अतिरिक्त मद्यपान करते, किंवा अधिक मांस खाते हैं, हमारे देशमें उन सब लोगोंके इस प्रकारके उदरामय हो जानेकौ अधिक सम्भावना है। इसका कारण यही है, कि मांस खानेसे रक्त में अधिक हाइड्रोजन और अङ्गार उत्पन्न होता है। शीतप्रधान देशमें फेफड़ेसे यह सकल बाष्प निकल जाते हैं।किन्तु उष्णप्रधान स्थानमें अलस व्यक्तियोंके फेफड़ेका काम कितना ही कम रहता है, इसौसे हाइड्रोजन और अङ्गार प्रश्वासके साथ यथेष्ट परिमाणमें निकल नहीं सकते। सुतरां इन दोनो बाष्पों द्वारा पित्तवृद्धि होती है। पित्त बढ़ते ही यकृत्में पैत्तिक रताधिक्य उत्पन्न होता और अन्त्रमें भी अधिक परिमाणसे पित्त आ पहुंचता है। इस अवस्थामें कभी-कभी यकत्के मध्यमें फोड़ा हो जाता है।अतएव सामान्य उदरामय होनेसे भी कभी निश्चिन्त न बैठे। पित्तातिसारमें पुनः पुनः अल्प-अल्प पतला हरिद्रा-वर्ण मल निर्गत होता, पेट शूलकी तरह वेदना किया मल निर्गत होनेसे पहले पेटमें मरोर आती है। मलेरिया प्रधान देशमें ऐसे उदरामयके साथ उत्कट स्वल्पविराम ज्वर ( Remittent fever ) रोगीको धर दबाता है। इस अवस्थामें यह जाननेके लिये विज्ञ चिकित्सकोंका भौ शिर चकरा जाता करता है <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 756sgykg2tepretpixumcyi6l7yjyw1 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७७ 250 83551 664811 346953 2026-07-03T12:24:06Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664811 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> कि पीड़ा उदरामय, किंवा ज्वर है। ख्यातनामा डाकर गुडिव इस बातको अपने मुंहसे स्वीकार करते हैं, कि ज्वरसंयुक्त रक्तातिसार और उदरामय रोगको ठोक प्रकृति समझने में वह कईबार हार बैठे थे। प्रदाहजनित अतिसार-दो प्रकारका है,-तरुण और पुरातन । तरुण प्रदाहजनित अतिसार (Acute inflamatory diarrhoea) अतिशय उत्कट पौड़ा अन्त्रकी भिक झिल्ली में प्रदाह होनेके कारण यह पौड़ा उत्पन्न होती है। प्रथम सञ्चित मल निर्गत हो जाता, इसके बाद कभी चर्बी जैसा श्लेष्मा एवं गलित मांस-जैसा पदार्थ निकलता है। कभी हरे रंग और कभी कुछ कुछ लाल खूनको छीटें उसमें मिश्रित रहती पेटको वेदना दुःसह हो जाती ; बोध होता, मानो कोई कुरीसे आंत फाड़ता है। रोगी उदरमें हाथ लगाने नहीं देता, वह पैर गोदकी ओर ला पेटको पेशी बचा लेता है। इसके साथ ज्वर, आहारसे अनिच्छा, जिह्वामें मलिनभाव, पिपासा प्रभृति नाना प्रकारके उपसर्ग उत्पन्न हो जाते हैं।असाध्यस्थलमें क्रमशः मलसे बहुत ही सड़ी बदबू निकलती, मलहार फैल जाता, किसीके मुखमें क्षत भी होता , इसके बाद नितान्त दुर्बल हो रोगी प्राणत्याग करता है।पुरातन प्रदाहजनित अतिसार रोगमें रोगी कभी कभी अल्प परिमाणसे पुनः पुनः मलत्याग किया करता है। फिर कभी-कभी अधिक परिमाणसे बड़ी देरमें मल निकलता पहले मल पित्त मिश्रित रहता, क्रमसे खेतवर्ण और जलवत् हो जाता है। कभी-कभी फेनदार और कभी-कभी मल कृष्णवर्ण देख पड़ता है। कोई द्रव्य उदरस्थ होनेसे उसी समय मलत्यागका वेग बढ़ जाता है। परिशेषमें तीसरे पहर अल्प-अल्प ज्वर चढ़ता ; शरीर रूक्ष पड़ जाता, उदरमें वेदना उठती, पेशाब स्वल्प उतरता, नाड़ी क्षीण और वेगवतो चलती, अरुचिका प्रादुर्भाव होता और हस्तपदका अन्तभाग शीतल मालूम होने<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> लगता है। परिणाममें शोथ आ उपस्थित होता है। यह सकल कठिन लक्षण देख पड़नेसे प्रायः सभी रोगी प्राण छोड़ देते हैं। मेदातिसार ( Fatty diarrhoea)-ऐसे उदरामय रोगके लक्षण प्रायः तरुण प्रदाहजनित उदरामयके ही जैसे होते हैं। प्रथम उदरमें वेदना उठती, इसके बाद सञ्चित मल निर्गत हो जाता है। फिर चर्बी और तैल-जैसा पदार्थ निर्गत हुआ करता है। रोगीको एकबारगी हो तैलाक्त द्रव्य न खिलानेसे भो मलको अवस्था परिवर्तित नहीं होती। अनेकोंको ऐसा विश्वास है, किलोम और पेङ्गक्रियास (Penereas) को विकृतिक कारण यह सकल लक्षण उपस्थित हो जाते हैं। दूसरा भी एक प्रकारका अतिसार है, जिसे प्रायः हम सञ्चितग्रहणी कहते हैं। सञ्चितग्रहणी होनेसे अनेक लोग स्वभावसे हो दुर्बल और उद्यमहीन हो जाते हैं। जिस काम में अधिक परिश्रम और अध्यवसाय आवश्यक है, उस कामको वह कर नहीं सकते। अनेकोंको अल्प हो कारणसे भय और मनःकष्ट उपस्थित होता, और स्वभाव चिड़चिड़ा पड़ जाता है। इस प्रकार लक्षणादि रहते भी वह विषयकर्मका निर्वाह करते हैं। सञ्चितग्रहणी रोगमें सकल उदरामय नहीं होता। रोगी विशेष विवेचना-पूर्वक आहारादि करते हैं, मध्य-मध्यमें उदरामय श्रा धमकता है। इसके बाद कोई-कोई रोगी १०। १५ दिन और कोई-कोई दो-तीन मास कष्ट उठाके पुनर्वार आरोग्यको लाभ करते हैं। सञ्चितग्रहणीका लक्षण सर्वत्र समान नहीं। पौड़ाके समय कोई. कोई व्यक्ति कुछ न खानेसे अच्छे रहते, किन्तु सामान्य खाद्य द्रव्य उदरस्थ होते हो पेट दुखता और मलत्यागका वेग बढ़ता है। फिर किसी-किसी रोगीका लक्षण इससे बिलकुल विपरीत होता है। पेट खाली रहनेसे पुन: पुन: अल्प-अल्प मल निर्गत हुआ करता, जो किञ्चित आहार लेते ही रुक जाता है। इस रोगमें मलको अवस्था भी सकल समय एक रूपसे नहीं रहती। कभी आम-मिश्रित, कभी समय <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 0bz3xxj0q3pybdfu3vqk819zjllt164 664825 664811 2026-07-03T14:26:33Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664825 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> कि पीड़ा उदरामय, किंवा ज्वर है। ख्यातनामा डाकर गुडिव इस बातको अपने मुंहसे स्वीकार करते हैं, कि ज्वरसंयुक्त रक्तातिसार और उदरामय रोगको ठोक प्रकृति समझने में वह कईबार हार बैठे थे। प्रदाहजनित अतिसार-दो प्रकारका है,-तरुण और पुरातन । तरुण प्रदाहजनित अतिसार (Acute inflamatory diarrhoea) अतिशय उत्कट पौड़ा अन्त्रकी भिक झिल्ली में प्रदाह होनेके कारण यह पौड़ा उत्पन्न होती है। प्रथम सञ्चित मल निर्गत हो जाता, इसके बाद कभी चर्बी जैसा श्लेष्मा एवं गलित मांस-जैसा पदार्थ निकलता है। कभी हरे रंग और कभी कुछ कुछ लाल खूनको छीटें उसमें मिश्रित रहती पेटको वेदना दुःसह हो जाती ; बोध होता, मानो कोई कुरीसे आंत फाड़ता है। रोगी उदरमें हाथ लगाने नहीं देता, वह पैर गोदकी ओर ला पेटको पेशी बचा लेता है। इसके साथ ज्वर, आहारसे अनिच्छा, जिह्वामें मलिनभाव, पिपासा प्रभृति नाना प्रकारके उपसर्ग उत्पन्न हो जाते हैं।असाध्यस्थलमें क्रमशः मलसे बहुत ही सड़ी बदबू निकलती, मलहार फैल जाता, किसीके मुखमें क्षत भी होता , इसके बाद नितान्त दुर्बल हो रोगी प्राणत्याग करता है। पुरातन प्रदाहजनित अतिसार रोगमें रोगी कभी कभी अल्प परिमाणसे पुनः पुनः मलत्याग किया करता है। फिर कभी-कभी अधिक परिमाणसे बड़ी देरमें मल निकलता पहले मल पित्त मिश्रित रहता, क्रमसे खेतवर्ण और जलवत् हो जाता है। कभी-कभी फेनदार और कभी-कभी मल कृष्णवर्ण देख पड़ता है। कोई द्रव्य उदरस्थ होनेसे उसी समय मलत्यागका वेग बढ़ जाता है। परिशेषमें तीसरे पहर अल्प-अल्प ज्वर चढ़ता ; शरीर रूक्ष पड़ जाता, उदरमें वेदना उठती, पेशाब स्वल्प उतरता, नाड़ी क्षीण और वेगवतो चलती, अरुचिका प्रादुर्भाव होता और हस्तपदका अन्तभाग शीतल मालूम होने<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> लगता है। परिणाममें शोथ आ उपस्थित होता है। यह सकल कठिन लक्षण देख पड़नेसे प्रायः सभी रोगी प्राण छोड़ देते हैं। मेदातिसार ( Fatty diarrhoea)-ऐसे उदरामय रोगके लक्षण प्रायः तरुण प्रदाहजनित उदरामयके ही जैसे होते हैं। प्रथम उदरमें वेदना उठती, इसके बाद सञ्चित मल निर्गत हो जाता है। फिर चर्बी और तैल-जैसा पदार्थ निर्गत हुआ करता है। रोगीको एकबारगी हो तैलाक्त द्रव्य न खिलानेसे भो मलको अवस्था परिवर्तित नहीं होती। अनेकोंको ऐसा विश्वास है, किलोम और पेङ्गक्रियास (Penereas) को विकृतिक कारण यह सकल लक्षण उपस्थित हो जाते हैं। दूसरा भी एक प्रकारका अतिसार है, जिसे प्रायः हम सञ्चितग्रहणी कहते हैं। सञ्चितग्रहणी होनेसे अनेक लोग स्वभावसे हो दुर्बल और उद्यमहीन हो जाते हैं। जिस काम में अधिक परिश्रम और अध्यवसाय आवश्यक है, उस कामको वह कर नहीं सकते। अनेकोंको अल्प हो कारणसे भय और मनःकष्ट उपस्थित होता, और स्वभाव चिड़चिड़ा पड़ जाता है। इस प्रकार लक्षणादि रहते भी वह विषयकर्मका निर्वाह करते हैं। सञ्चितग्रहणी रोगमें सकल उदरामय नहीं होता। रोगी विशेष विवेचना-पूर्वक आहारादि करते हैं, मध्य-मध्यमें उदरामय श्रा धमकता है। इसके बाद कोई-कोई रोगी १०। १५ दिन और कोई-कोई दो-तीन मास कष्ट उठाके पुनर्वार आरोग्यको लाभ करते हैं। सञ्चितग्रहणीका लक्षण सर्वत्र समान नहीं। पौड़ाके समय कोई. कोई व्यक्ति कुछ न खानेसे अच्छे रहते, किन्तु सामान्य खाद्य द्रव्य उदरस्थ होते हो पेट दुखता और मलत्यागका वेग बढ़ता है। फिर किसी-किसी रोगीका लक्षण इससे बिलकुल विपरीत होता है। पेट खाली रहनेसे पुन: पुन: अल्प-अल्प मल निर्गत हुआ करता, जो किञ्चित आहार लेते ही रुक जाता है। इस रोगमें मलको अवस्था भी सकल समय एक रूपसे नहीं रहती। कभी आम-मिश्रित, कभी समय <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 4une3shh4v0frobdernj8ltr3z8payc पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७८ 250 83552 664813 346954 2026-07-03T12:42:31Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 664813 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''२७२'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अल्प रक्त-मिश्रित और कभी पित्त-संयुक्त जल-जैसा पतला मल निकलता है।वैद्यक ग्रन्योंके मतसे अतिसार छः प्रकारका होता है। इन छः श्रेणियोंके मध्यमें भी फिर प्रकार भेद विद्यमान है। प्रधानतः आमातिसार, रक्ताति सार, पित्तातिसार, श्लेष्मातिसार, वातातिसार और प्रवाहिका-यह छः प्रबल गिने गये हैं। इनके सिवा कृमि और शोकादि द्वारा आगन्तुक अतिसार भौ उत्पन्न हो जाता है। हमारे वैद्यकशास्त्र में अतिसार रोगका जो लक्षण, निदान, उत्पत्ति-कारण, भाविफल और औषधादि सम्बन्धीय विषय लिखा गया, वह सकल प्रकारको चिकित्सासे श्रेष्ठ है।अतिसार रोगके यह असाध्य लक्षण हैं,-शरीर-का वर्ण सौसक-धातु जैसा काला पड़ जाना ; मलका वर्ण कभी पक्के जामुनके रस-जैसा, कभी रक्त और आम संयुक्त, कभी हरा और कभौ घी, तेल और चर्बी-जैसारहना ; तृष्णा, दाह, अरुचि, पार्श्वशूल, मलद्वारमें क्षत, मूर्छा, प्रलाप, अज्ञानावस्थामें मलत्याग, क्षीणऔर द्रुत नाड़ी, शीतल हस्तपद, शोथ, अग्निमान्द्य और मांसहीनता। अग्निमान्द्य और देहको मांस हीनता इतने दुरूह लक्षण हैं, कि अन्यान्य उपसर्ग न होते भी यह दोनो सङ्केत मिलते ही, रोगका ठीक फलाफल मालूम किया जा सकता है। इस बातको वैद्य, डाकर, हकीम सभी स्पष्ट स्वीकार करते हैं। हमारे चिकित्सा-शास्त्र में लिखा है,-"अतिसारी राजरोगौ ग्रहणौरीगवानपि ।मांसाग्निबलहीनी यो दुल में तस्य जीवनम् ॥"होमिओपेथी-कुपथ्यको भोजन करनेकेउदरामय होनेसे पलसेटिला, एण्टिमनी क्रुड, इपिकाक और कुचलेका अर्क उत्तम औषध है। अपरिष्कृत जल पीने किंवा अस्वास्थ्यकर स्थानमें रहनेसे जोउदरामय होता, उसपर आर्सेनिकको प्रयोग करना चाहिये। ग्रीष्मकालवाले रौद्रके कारणसे अतिसार होनेपर कपूर, एकोनाइट, डलकामारा, चायना, फसफोरिक एसिड प्रभृति औषधोंसे उपकार होता है।वृद्धवयसके उदरामयमें फसफोरिक एसिड, एण्टिमनी<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>क्रुड एवं नाइट्रिक एसिड विशेष उपयोगी हैं। सञ्चित उदरामयके लिये आर्सेनिक, सलफर, चायना, फस-फोरस, फेरम प्रभृति औषधोंको व्यवस्था करे। वैद्यक-अतिसार रोगमें होमिओपथी और वैद्यक-को चिकित्सा ही अधिक प्रशस्त है। ऐलोपेथीको चिकित्सा उतनी अच्छी नहीं। फिर होमिओपेथौ और वैद्यकको चिकित्साका फलाफल विवेचना-पूर्वक देखनेसे वैद्यक चिकित्साको अपेक्षाकृत श्रेष्ठ कहना पड़ता है। किन्तु चिकित्साके लिये सवैद्य और प्रक्कत औषध होना चाहिये। कठिन अतिसारको चिकित्सा-करने के लिये प्रथम आम और पक्कका लक्षण स्थिर करना आवश्यक है। आम और पक्कंका लक्षण निश्चित न कर औषध देनेसे अनिष्ट हो सकता है। क्योंकि आमातिसारमें लङ्घन कराना एवं पक्कातिसारमें धारक औषध देना उचित इसलिये आमातिसारमें धारक औषध देने और पक्कातिसारमें लङ्घन करानेसे पीड़ा बढ़ सकती है। इन दोनो प्रकारके अतिसारोंका लक्षण स्थिर करना नितान्त सहज है। वैद्यलोग कहते हैं,- आमातिसारको विष्ठा जलमें डालनेसे डूब जाती; फिर पक्कातिसारका पुरीष जलपर तैरज रहता है। किन्तु यह नियम सकल स्थानमें काम नहीं आता। पक्कातिसारका पुरोष भी अधिक तरल, अत्यन्त संघात एवं शीतल और कफदूषित होनेसे जलमें डूब सकता है। कफातिसारमें श्ले माके गुरुत्वसे विष्ठा डूबती है। आमातिसारमें पेटके भीतर गड़-गड़ शब्द होता, एक-एक बार अल्प-अल्प मल निकलता और विष्ठासे अत्यन्त दुर्गन्ध आने लगता है। आमातिसारमें प्रथम धारक औषध न दे। रोगी सबल और उदर मलसे परिपूर्ण होनेपर लङ्घन कराये और आध तोला हरौतकौ-हरड़ तथा पाव तोला छोटी पीपल, दोनोंको पौसके गर्म जलके साथ पिलाये। एतद्वारा बद्ध मल और आम मल निकल- जाता है इसके बाद धान्यपञ्चक अथवा धान्यचतुष्कको व्यवस्था करे। -<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> कारण<noinclude></noinclude> o4v8nj3h364uibyl3b3svdxhmihldzu 664826 664813 2026-07-03T14:28:48Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664826 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२७२'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अल्प रक्त-मिश्रित और कभी पित्त-संयुक्त जल-जैसा पतला मल निकलता है। वैद्यक ग्रन्योंके मतसे अतिसार छः प्रकारका होता है। इन छः श्रेणियोंके मध्यमें भी फिर प्रकार भेद विद्यमान है। प्रधानतः आमातिसार, रक्ताति सार, पित्तातिसार, श्लेष्मातिसार, वातातिसार और प्रवाहिका-यह छः प्रबल गिने गये हैं। इनके सिवा कृमि और शोकादि द्वारा आगन्तुक अतिसार भौ उत्पन्न हो जाता है। हमारे वैद्यकशास्त्र में अतिसार रोगका जो लक्षण, निदान, उत्पत्ति-कारण, भाविफल और औषधादि सम्बन्धीय विषय लिखा गया, वह सकल प्रकारको चिकित्सासे श्रेष्ठ है। अतिसार रोगके यह असाध्य लक्षण हैं,-शरीर-का वर्ण सौसक-धातु जैसा काला पड़ जाना ; मलका वर्ण कभी पक्के जामुनके रस-जैसा, कभी रक्त और आम संयुक्त, कभी हरा और कभौ घी, तेल और चर्बी-जैसारहना ; तृष्णा, दाह, अरुचि, पार्श्वशूल, मलद्वारमें क्षत, मूर्छा, प्रलाप, अज्ञानावस्थामें मलत्याग, क्षीणऔर द्रुत नाड़ी, शीतल हस्तपद, शोथ, अग्निमान्द्य और मांसहीनता। अग्निमान्द्य और देहको मांस हीनता इतने दुरूह लक्षण हैं, कि अन्यान्य उपसर्ग न होते भी यह दोनो सङ्केत मिलते ही, रोगका ठीक फलाफल मालूम किया जा सकता है। इस बातको वैद्य, डाकर, हकीम सभी स्पष्ट स्वीकार करते हैं। हमारे चिकित्सा-शास्त्र में लिखा है,- {{Block center|<poem><small>"अतिसारी राजरोगौ ग्रहणौरीगवानपि। मांसाग्निबलहीनी यो दुल में तस्य जीवनम्॥"</poem></small>}} होमिओपेथी-कुपथ्यको भोजन करनेकेउदरामय होनेसे पलसेटिला, एण्टिमनी क्रुड, इपिकाक और कुचलेका अर्क उत्तम औषध है। अपरिष्कृत जल पीने किंवा अस्वास्थ्यकर स्थानमें रहनेसे जोउदरामय होता, उसपर आर्सेनिकको प्रयोग करना चाहिये। ग्रीष्मकालवाले रौद्रके कारणसे अतिसार होनेपर कपूर, एकोनाइट, डलकामारा, चायना, फसफोरिक एसिड प्रभृति औषधोंसे उपकार होता है।वृद्धवयसके उदरामयमें फसफोरिक एसिड, एण्टिमनी<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>क्रुड एवं नाइट्रिक एसिड विशेष उपयोगी हैं। सञ्चित उदरामयके लिये आर्सेनिक, सलफर, चायना, फस-फोरस, फेरम प्रभृति औषधोंको व्यवस्था करे। वैद्यक-अतिसार रोगमें होमिओपथी और वैद्यक-को चिकित्सा ही अधिक प्रशस्त है। ऐलोपेथीको चिकित्सा उतनी अच्छी नहीं। फिर होमिओपेथौ और वैद्यकको चिकित्साका फलाफल विवेचना-पूर्वक देखनेसे वैद्यक चिकित्साको अपेक्षाकृत श्रेष्ठ कहना पड़ता है। किन्तु चिकित्साके लिये सवैद्य और प्रक्कत औषध होना चाहिये। कठिन अतिसारको चिकित्सा-करने के लिये प्रथम आम और पक्कका लक्षण स्थिर करना आवश्यक है। आम और पक्कंका लक्षण निश्चित न कर औषध देनेसे अनिष्ट हो सकता है। क्योंकि आमातिसारमें लङ्घन कराना एवं पक्कातिसारमें धारक औषध देना उचित इसलिये आमातिसारमें धारक औषध देने और पक्कातिसारमें लङ्घन करानेसे पीड़ा बढ़ सकती है। इन दोनो प्रकारके अतिसारोंका लक्षण स्थिर करना नितान्त सहज है। वैद्यलोग कहते हैं,- आमातिसारको विष्ठा जलमें डालनेसे डूब जाती; फिर पक्कातिसारका पुरीष जलपर तैरज रहता है। किन्तु यह नियम सकल स्थानमें काम नहीं आता। पक्कातिसारका पुरोष भी अधिक तरल, अत्यन्त संघात एवं शीतल और कफदूषित होनेसे जलमें डूब सकता है। कफातिसारमें श्ले माके गुरुत्वसे विष्ठा डूबती है। आमातिसारमें पेटके भीतर गड़-गड़ शब्द होता, एक-एक बार अल्प-अल्प मल निकलता और विष्ठासे अत्यन्त दुर्गन्ध आने लगता है। आमातिसारमें प्रथम धारक औषध न दे। रोगी सबल और उदर मलसे परिपूर्ण होनेपर लङ्घन कराये और आध तोला हरौतकौ-हरड़ तथा पाव तोला छोटी पीपल, दोनोंको पौसके गर्म जलके साथ पिलाये। एतद्वारा बद्ध मल और आम मल निकल- जाता है इसके बाद धान्यपञ्चक अथवा धान्यचतुष्कको व्यवस्था करे। -<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> gvlm49uvbhncj0thsdspl0qi5i7dyjf पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७९ 250 83553 664845 346955 2026-07-04T00:13:13Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 664845 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> धनिया, सोंठ, नागरमोथा, नेत्रबाला, सुखाये हुए बेलकी गिरी—यह समस्त मिलित औषध दो तोले आधसेर जलमें पकाये और आधपाव रह जानेपर उतार ले। पीछे तीन मासे शहद डालकर इस काढ़ेको सेवन करे। इसका नाम धान्यपञ्चक है। पैत्तिकातिसारमें सोंठको छोड़ बाक़ी चार ही चीज़ोंसे काढ़ा तय्यार करे। इसका नाम धान्यचतुष्क है। यह काढ़े पेटकी मरोड़ और वद्ध आमको नष्ट करते हैं। अजवायन, लवङ्ग, नागरमोथा और पित्तपापड़ा एक-एक तोले ले आध सेर पानीमें अल्प सिद्ध करे। इस औषधका जल बीच-बीचमें पिलानेसे उदरकी वेदना और आम नष्ट होता है। चिकित्साकी प्रथमावस्था में ही यह निश्चित करना कर्त्तव्य है, कि पेटमें कृमि हैं या नहीं। क्योंकि कृमि रहनेसे, पहले उनका प्रतीकार होना चाहिये। कृमि निर्गत न होनेपर अमृत भक्षणसे भी आरोग्य प्राप्त करनेकी सम्भावना नहीं। सर्व्वत्र कृमिके लक्षण स्पष्ट रूपसे प्रकाशित नहीं होते। किन्तु अनेक स्थलोंमें ही यह कई एक उपसर्ग प्रायः विद्यमान रहते हैं,—मलहारका सुरसुराना, मुखसे खारा पानी निकलना और दुर्गन्ध आना, नाक बहना, रातको सुनिद्रा न पड़ना, और सो जानेसे दांत पीसना। यह सकल लक्षण वर्त्तमान होनेसे अन्त्र में कृमि रहनेकी सम्भावना है। विड़ङ्ग, पलाश-पापड़ा, अनरसके पत्तेका रस और इन्द्रयव कृमियोंके उत्कृष्ट औषध हैं। इनमें कोई भी एक औषध सेवन करानेसे पेटके कृमि निर्गत हो सकते हैं। रोगीके उदरका वद्धमल और दुष्टरस निर्गत होने तथा शरीर शुष्क और दुर्बल हो जानेसे अल्प-अल्प लघुपथ्य और धारक औषधकी व्यवस्था करे। ऐसी अवस्थामें नीचे लिखे चूर्णों से कोई एक चूर्ण खिलाया जा सकता है,— <small>नागरादिचूर्ण</small>—सोंठ, अतीस, नागरमोथा, धाय-फल, इन्द्रयवका बकला, इन्द्रयव, पाठा, बेलगिरी, कुटकी—यह समस्त द्रव्य बराबर-बराबर ले अच्छी तरह पीस डाले। इस चूर्णका अनुपान चावल-धुला और मधु है। इससे ग्रहणी, मलमें रक्तके विन्दु निकलना और पित्तदोष प्रभृति रोग नष्ट होते हैं। <small>वृहदृगङ्गाधरचूर्ण</small>—बेलसोंठ, सिंघाड़े और अनारके पत्ते, अतीस, नागरमोथा, शालवृक्षका सफ़ेद बुरादा, धायके फूल, कालीमिर्च, पीपल, सोंठ, दारुहलदी, चिरायता, नीम, जामनका बकला, रसाञ्जन, इन्द्रयव, आकनादि, वराक्रान्ता, बाला, मोचरस, सिड्विपत्र, भृङ्गराज—यह सब चीजें बराबर-बराबर और सबके बराबर इन्द्रयवके मूलका बकला अच्छी तरह पीस कर चूर्ण बनाये। इसकी मात्रा एक माशे है। इसे बकरीके दूध, शहद या चावलवाले मांडके साथ खाना चाहिये। ग्रहणीके साथ ज्वर, मलका नाना प्रकार वर्ण, पाण्डुरोग प्रभृति होनेसे यह औषध बड़ा उपकार करता है। <small>जीरकादिचूर्ण</small>—जीरा, फुलाया हुआ सुहागा, नागर-मोथा, आकनादि, बेलसोंठ, धनिया, बाला, पित्त-पापड़ा, अनारके फलका और इन्द्रयवके मूलका बकला, वराक्रान्ता, धायके फूल, त्रिकटु—सोंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, मोचरस, इन्द्रयव, अभ्र, गन्धक, पारद,—इन सब चीजोंका चूर्ण बराबर-बराबर और सबके बराबर जायफल ले अच्छी तरह पीस डाले। इस चूर्ण का अनुपान मधु है। इसे सेवन करनेसे उत्कट ग्रहणी रोग छूट जाता है। नीचे इस रोगके दूसरे औषध भी लिखे जाते हैं— <small>ग्रहणी-मिहिर-तैल</small>—चार सेर तिलके तेलको पहले विधिपूर्वक मूर्च्छित कर ले। <small>तैल मूर्च्छित करनेकी प्रक्रिया मूर्च्छा शब्दमें देखो।</small> फिर कल्कद्रव्य—धनिया, धायके फूल, लोधकाष्ठ, वराक्रान्ता, अतीस, हर, खसकी जड़, नागरमोथा, नेत्रबाला, मोचरस, रसोत (दारुहलदीका सत), बेलगिरी, नीलोत्पल, तेजपात, नागेश्वर, पद्मकेशर, गुर्च, इन्द्रयव, श्यामालता, पद्मकाष्ठ, कुटकी, तगरपादुका, जटामांसी, दालचीनी, कसेरू, पुनर्नवा तथा आम, जामुन, कदम्ब और इन्द्रयवका बकला, अजवायन,<noinclude></noinclude> 3v8abiry5yhy6zthm792mx4r3lz32s6 664846 664845 2026-07-04T00:14:02Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664846 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> धनिया, सोंठ, नागरमोथा, नेत्रबाला, सुखाये हुए बेलकी गिरी—यह समस्त मिलित औषध दो तोले आधसेर जलमें पकाये और आधपाव रह जानेपर उतार ले। पीछे तीन मासे शहद डालकर इस काढ़ेको सेवन करे। इसका नाम धान्यपञ्चक है। 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अतीस, नागरमोथा, शालवृक्षका सफ़ेद बुरादा, धायके फूल, कालीमिर्च, पीपल, सोंठ, दारुहलदी, चिरायता, नीम, जामनका बकला, रसाञ्जन, इन्द्रयव, आकनादि, वराक्रान्ता, बाला, मोचरस, सिड्विपत्र, भृङ्गराज—यह सब चीजें बराबर-बराबर और सबके बराबर इन्द्रयवके मूलका बकला अच्छी तरह पीस कर चूर्ण बनाये। इसकी मात्रा एक माशे है। इसे बकरीके दूध, शहद या चावलवाले मांडके साथ खाना चाहिये। ग्रहणीके साथ ज्वर, मलका नाना प्रकार वर्ण, पाण्डुरोग प्रभृति होनेसे यह औषध बड़ा उपकार करता है। <small>जीरकादिचूर्ण</small>—जीरा, फुलाया हुआ सुहागा, नागर-मोथा, आकनादि, बेलसोंठ, धनिया, बाला, पित्त-पापड़ा, अनारके फलका और इन्द्रयवके मूलका बकला, वराक्रान्ता, धायके फूल, त्रिकटु—सोंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, मोचरस, इन्द्रयव, अभ्र, गन्धक, पारद,—इन सब चीजोंका चूर्ण बराबर-बराबर और सबके बराबर जायफल ले अच्छी तरह पीस डाले। इस चूर्ण का अनुपान मधु है। इसे सेवन करनेसे उत्कट ग्रहणी रोग छूट जाता है। नीचे इस रोगके दूसरे औषध भी लिखे जाते हैं— <small>ग्रहणी-मिहिर-तैल</small>—चार सेर तिलके तेलको पहले विधिपूर्वक मूर्च्छित कर ले। <small>तैल मूर्च्छित करनेकी प्रक्रिया मूर्च्छा शब्दमें देखो।</small> फिर कल्कद्रव्य—धनिया, धायके फूल, लोधकाष्ठ, वराक्रान्ता, अतीस, हर, खसकी जड़, नागरमोथा, नेत्रबाला, मोचरस, रसोत (दारुहलदीका सत), बेलगिरी, नीलोत्पल, तेजपात, नागेश्वर, पद्मकेशर, गुर्च, इन्द्रयव, श्यामालता, पद्मकाष्ठ, कुटकी, तगरपादुका, जटामांसी, दालचीनी, कसेरू, पुनर्नवा तथा आम, जामुन, कदम्ब और इन्द्रयवका बकला, अजवायन, <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Dhr|}} {{Left|4em|६९}}</noinclude> q5y4h2stqzf52mepb2mpm1ivwnpaf42 664848 664847 2026-07-04T00:15:39Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664848 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> धनिया, सोंठ, नागरमोथा, नेत्रबाला, सुखाये हुए बेलकी गिरी—यह समस्त मिलित औषध दो तोले आधसेर जलमें पकाये और आधपाव रह जानेपर उतार ले। पीछे तीन मासे शहद डालकर इस काढ़ेको सेवन करे। इसका नाम धान्यपञ्चक है। पैत्तिकातिसारमें सोंठको छोड़ बाक़ी चार ही चीज़ोंसे काढ़ा तय्यार करे। इसका नाम धान्यचतुष्क है। यह काढ़े पेटकी मरोड़ और वद्ध आमको नष्ट करते हैं। अजवायन, लवङ्ग, नागरमोथा और पित्तपापड़ा एक-एक तोले ले आध सेर पानीमें अल्प सिद्ध करे। इस औषधका जल बीच-बीचमें पिलानेसे उदरकी वेदना और आम नष्ट होता है। चिकित्साकी प्रथमावस्था में ही यह निश्चित करना कर्त्तव्य है, कि पेटमें कृमि हैं या नहीं। क्योंकि कृमि रहनेसे, पहले उनका प्रतीकार होना चाहिये। कृमि निर्गत न होनेपर अमृत भक्षणसे भी आरोग्य प्राप्त करनेकी सम्भावना नहीं। सर्व्वत्र कृमिके लक्षण स्पष्ट रूपसे प्रकाशित नहीं होते। किन्तु अनेक स्थलोंमें ही यह कई एक उपसर्ग प्रायः विद्यमान रहते हैं,—मलहारका सुरसुराना, मुखसे खारा पानी निकलना और दुर्गन्ध आना, नाक बहना, रातको सुनिद्रा न पड़ना, और सो जानेसे दांत पीसना। यह सकल लक्षण वर्त्तमान होनेसे अन्त्र में कृमि रहनेकी सम्भावना है। विड़ङ्ग, पलाश-पापड़ा, अनरसके पत्तेका रस और इन्द्रयव कृमियोंके उत्कृष्ट औषध हैं। इनमें कोई भी एक औषध सेवन करानेसे पेटके कृमि निर्गत हो सकते हैं। रोगीके उदरका वद्धमल और दुष्टरस निर्गत होने तथा शरीर शुष्क और दुर्बल हो जानेसे अल्प-अल्प लघुपथ्य और धारक औषधकी व्यवस्था करे। ऐसी अवस्थामें नीचे लिखे चूर्णों से कोई एक चूर्ण खिलाया जा सकता है,— <small>नागरादिचूर्ण</small>—सोंठ, अतीस, नागरमोथा, धाय-फल, इन्द्रयवका बकला, इन्द्रयव, पाठा, बेलगिरी,<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कुटकी—यह समस्त द्रव्य बराबर-बराबर ले अच्छी तरह पीस डाले। इस चूर्णका अनुपान चावल-धुला और मधु है। इससे ग्रहणी, मलमें रक्तके विन्दु निकलना और पित्तदोष प्रभृति रोग नष्ट होते हैं। <small>वृहदृगङ्गाधरचूर्ण</small>—बेलसोंठ, सिंघाड़े और अनारके पत्ते, अतीस, नागरमोथा, शालवृक्षका सफ़ेद बुरादा, धायके फूल, कालीमिर्च, पीपल, सोंठ, दारुहलदी, चिरायता, नीम, जामनका बकला, रसाञ्जन, इन्द्रयव, आकनादि, वराक्रान्ता, बाला, मोचरस, सिड्विपत्र, भृङ्गराज—यह सब चीजें बराबर-बराबर और सबके बराबर इन्द्रयवके मूलका बकला अच्छी तरह पीस कर चूर्ण बनाये। इसकी मात्रा एक माशे है। इसे बकरीके दूध, शहद या चावलवाले मांडके साथ खाना चाहिये। ग्रहणीके साथ ज्वर, मलका नाना प्रकार वर्ण, पाण्डुरोग प्रभृति होनेसे यह औषध बड़ा उपकार करता है। <small>जीरकादिचूर्ण</small>—जीरा, फुलाया हुआ सुहागा, नागर-मोथा, आकनादि, बेलसोंठ, धनिया, बाला, पित्त-पापड़ा, अनारके फलका और इन्द्रयवके मूलका बकला, वराक्रान्ता, धायके फूल, त्रिकटु—सोंठ, मिर्च, पीपल, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, मोचरस, इन्द्रयव, अभ्र, गन्धक, पारद,—इन सब चीजोंका चूर्ण बराबर-बराबर और सबके बराबर जायफल ले अच्छी तरह पीस डाले। इस चूर्ण का अनुपान मधु है। इसे सेवन करनेसे उत्कट ग्रहणी रोग छूट जाता है। नीचे इस रोगके दूसरे औषध भी लिखे जाते हैं— <small>ग्रहणी-मिहिर-तैल</small>—चार सेर तिलके तेलको पहले विधिपूर्वक मूर्च्छित कर ले। <small>तैल मूर्च्छित करनेकी प्रक्रिया मूर्च्छा शब्दमें देखो।</small> फिर कल्कद्रव्य—धनिया, धायके फूल, लोधकाष्ठ, वराक्रान्ता, अतीस, हर, खसकी जड़, नागरमोथा, नेत्रबाला, मोचरस, रसोत (दारुहलदीका सत), बेलगिरी, नीलोत्पल, तेजपात, नागेश्वर, पद्मकेशर, गुर्च, इन्द्रयव, श्यामालता, पद्मकाष्ठ, कुटकी, तगरपादुका, जटामांसी, दालचीनी, कसेरू, पुनर्नवा तथा आम, जामुन, कदम्ब और इन्द्रयवका बकला, अजवायन, <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Dhr|}} {{Left|६९}}</noinclude> kyoq8xsf3kwhj4wjn1ugq4qatiiwbip पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२८० 250 83554 664849 346956 2026-07-04T00:25:36Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664849 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''२७४'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude> और जौरा, प्रत्येक दो-दो तोले ले। काढ़ेके लिये १२ सेरइन्द्रयवका बकला ६४ सेर पानी में उबाले और १६ सेर पानी बाकी रहनेसे नीचे उतार ले। पहलेमूर्च्छित तैलमें इन्द्रयवका क्वाथ डाल दे। सात दिन बाद फिर उसमें दहीका मठा छोड़े। एक सप्ताह बाद आठ सेर पानीके साथ उपरि उक्त कल्कद्रव्य सिद्ध करे ; निर्जल हो जानेसे नीचे उतार ले। यह सिद्ध किया हुआ तैल आठ दिन तक कल्क समेत किसी पात्रमें धरा रहने दे पीछे इसे कपड़ेसे छानकेबोतल में भर रखे । यह तैल अनेक प्रकारसे प्रस्तुत करते हैं। इसे सर्वाङ्गमें मर्दन करनेसे कठिन ग्रहणीमें भी विलक्षण उपकार हो जाता है। प्राणेश्वररस-गन्धक, अभ्न, और पारद प्रत्येक चार-चार माशे ले। सज्जीखार, फुलाया हुआ सुहागा,शोरा, पञ्चलवण, त्रिफला, त्रिकट, इन्द्रयव, जीरा, स्याहजीरा, चितामूल, यमानी, हींग, बायबिड़ङ्ग और पित्तपापड़ा प्रत्येक एक-एक माशे डाले। फिर इन सब चीजोंको एकमें पीस माशे-माशेको वटी बनाये। इस रसका अनुपान मधु और पानका रस है। औषध सेवनके पीछे उष्ण जलको पान कर। अत्यन्त कठिन ज्वरातिसार, त्रिदोषज ग्रहणी प्रभृति उपसर्गों में यह विलक्षण फलप्रद होता है।कामेश्वरमोदक-अच, कायफल, कूट, असगंध, गुर्च, मेथी, मोचरस, भूमिकुष्माण्ड, कालौमुसली, गोखरू, कुलखाड़े के वीज, केलेकी जड़, शतावर, यमानी, उड़द, तिल, धनिया, कचर, गन्धमात्रा, मैनफल, जायफल, सैन्धव, ब्राह्मणयष्टिका, काकड़ासींगो,त्रिकटु, जीरा, स्याहजीरा, चौतामूल, दाल चीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नागेश्वर, पुनर्नवा, गजपीपल, दाख, सेमरका मुसला, नेत्रबाला, कोंचके वीज-यह सब द्रव्य प्रत्येक एक-एक तोले संग्रह करे और सूक्ष्म पौस तथा छानके रख ले। बनाये। जब लडडू बनाने योग्य दो-तीन तारको चाशनी बन जाये, तब पिसे हुए सब औषधोंका चूर्ण डालके मिला दे और चूल्हे से नीचे उतार ले। चाशनी अतीव शीतल होनेसे घी तथा शहद भी मिलाये और लड्डू बांधे। यह मोदक ग्रहणी रोगमें बड़ा उपकार करता है। जौरकादि-मोदक, मेधीमोदक, अग्निकुमार-मोदक, अग्निकुमाररस, ग्रहणीकपाटरस, ग्रहणी- गजेन्द्रवटिका, वैद्यनाथवटिका, कनकप्रभावटी प्रभृति औषध अतिसारादि रोगों में विलक्षण फल दिखाते हैं। एलोपेथी-चिकित्सा-गुरुतर आहारके बाद उदरामय उपस्थित होनेसे १५ किंवा २० ग्रेन इपिकाक चूर्ण ईषत् उष्ण जलके साथ सेवन करानेसे ही पीड़ा शान्त हो सकती है। किन्तु दुर्बल व्यक्तिको वमन कराना उचित नहीं। वमनके बाद पेटमें सञ्चित-मल रहनेपर मृदु-विरेचक औषधका प्रयोग करनेसे अच्छा फल होता है। अण्डौका तेल सवा तोले और अफीमका अरिष्ट सात बूंद थोड़ेसे अदरकके रस में अच्छी तरह मिलाकर सेवन करानेसे उदरवेदना, आंतका भारोपन प्रभृति कष्ट दूर हो जाते हैं। किन्तु निकटमें हैजा फूटने किंवा रोगी दुर्बल होनेसे विरे-चक औषधको व्यवस्था करना ठीक नहीं। अन्त्र-परिष्कार होनेसे निम्नलिखित औषधको व्यवस्था करे-रेवाचोनीका अक १० बूंद, सोडा बाईका २० ग्रेन और पीपरमेण्टका जल आध छटांक एकमें मिला २४ घण्टेके अनन्तर सेवन करे। उदरमें अत्यन्त वेदना होनेसे उक्त औषधको प्रत्येक मात्राके साथ ४ बूंद अफीमका अरिष्ट मिला दे। शिशुओंके पक्षमें अफीम निषिद्ध है। पेटके अधिक दुखनेपर तारपोन-पोछे उक्त सब औषध-द्रव्योंसे द्विगुण चीनौको चाशनी तेलके साथ गर्म पानीसे सेंके। पुनः पुनः जलवत् अधिक मल निर्गत होनेसे धारक औषध देना योग्य है। खदिरका अरिष्ट २०बूंद, काईनोका अरिष्ट ३० बंद, सुगन्ध खड़ियेका चूर्ण १० रत्ती, गंदेका मांड़ सवा तोले और पीपरमेण्टका जल सवा तोले-इन सब द्रव्योंको एकत्र मिश्रितकर इसी तरह एक-एक मात्रा औषध ६ घण्टेके अनन्तर सेवन करे। सन्धमाके बाद ७ बूंद अफीमका अरिष्ट खानेसे धारक होता और सुनिद्रा भी आ सकती है। रोगी दुर्बल होनेसे अल्प मात्रामें <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bbgsjbrpoubyzta1qp9zusl8at0xp6z 664850 664849 2026-07-04T00:40:50Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 664850 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''२७४'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> और जीरा, प्रत्येक दो-दो तोले ले। काढ़ेके लिये १२ सेर इन्द्रयवका बकला ६४ सेर पानी में उबाले और १६ सेर पानी बाक़ी रहनेसे नीचे उतार ले। पहले मूर्च्छित तैलमें इन्द्रयवका क्वाथ डाल दे। सात दिन बाद फिर उसमें दहीका मठा छोड़े। एक सप्ताह बाद आठ सेर पानीके साथ उपरि उक्त कल्कद्रव्य सिद्ध करे; निर्जल हो जानेसे नीचे उतार ले। यह सिद्ध किया हुआ तैल आठ दिन तक कल्क समेत किसी पात्रमें धरा रहने दे पीछे इसे कपड़ेसे छानके बोतल में भर रखे। यह तैल अनेक प्रकारसे प्रस्तुत करते हैं। इसे सर्व्वाङ्गमें मर्दन करनेसे कठिन ग्रहणीमें भी विलक्षण उपकार हो जाता है। <small>प्राणेश्वररस</small>—गन्धक, अभ्र, और पारद प्रत्येक चार-चार माशे ले। सज्जीखार, फुलाया हुआ सुहागा, शोरा, पञ्चलवण, त्रिफला, त्रिकट, इन्द्रयव, जीरा, स्याहजीरा, चितामूल, यमानी, हींग, बायबिड़ङ्ग और पित्तपापड़ा प्रत्येक एक-एक माशे डाले। फिर इन सब चीज़ोंको एकमें पीस माशे-माशेकी वटी बनाये। इस रसका अनुपान मधु और पानका रस है। औषध सेवनके पीछे उष्ण जलको पान कर। अत्यन्त कठिन ज्वरातिसार, त्रिदोषज ग्रहणी प्रभृति उपसर्गों में यह विलक्षण फलप्रद होता है। <small>कामेश्वरमोदक</small>—अभ्र, कायफल, कूट, असगंध, गुर्च, मेथी, मोचरस, भूमिकुष्माण्ड, कालीमुसली, गोखरू, कुलखाड़े के वीज, केलेकी जड़, शतावर, यमानी, उड़द, तिल, धनिया, कचर, गन्धमात्रा, मैनफल, जायफल, सैन्धव, ब्राह्मणयष्टिका, काकड़ासींगी, त्रिकटु, जीरा, स्याहजीरा, चीतामूल, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नागेश्वर, पुनर्नवा, गजपीपल, दाख, सेमरका मुसला, नेत्रबाला, कोंचके वीज—यह सब द्रव्य प्रत्येक एक-एक तोले संग्रह करे और सूक्ष्म पीस तथा छानके रख ले। पीछे उक्त सब औषध-द्रव्योंसे द्विगुण चीनी की चाशनी बनाये। जब लडडू बनाने योग्य दो-तीन तारकी चाशनी बन जाये, तब पिसे हुए सब औषधोंका चूर्ण डालके मिला दे और चूल्हे से नीचे उतार ले। चाशनी अतीव शीतल होनेसे घी तथा शहद भी मिलाये और लड्डू बांधे। यह मोदक ग्रहणी रोगमें बड़ा उपकार करता है। जीरकादि-मोदक, मेथीमोदक, अग्निकुमार-मोदक, अग्निकुमाररस, ग्रहणीकपाटरस, ग्रहणी-गजेन्द्रवटिका, वैद्यनाथवटिका, कनकप्रभावटी प्रभृति औषध अतिसारादि रोगों में विलक्षण फल दिखाते हैं। <small>एलोपेथी-चिकित्सा</small>—गुरुतर आहारके बाद उदरामय उपस्थित होनेसे १५ किंवा २० ग्रेन इपिकाक चूर्ण ईषत् उष्ण जलके साथ सेवन करानेसे ही पीड़ा शान्त हो सकती है। किन्तु दुर्बल व्यक्तिको वमन कराना उचित नहीं। वमनके बाद पेटमें सञ्चितमल रहनेपर मृदु-विरेचक औषधका प्रयोग करनेसे अच्छा फल होता है। अण्डीका तेल सवा तोले और अफीमका अरिष्ट सात बूंद थोड़ेसे अदरकके रस में अच्छी तरह मिलाकर सेवन करानेसे उदरवेदना, आंतका भारीपन प्रभृति कष्ट दूर हो जाते हैं। किन्तु निकटमें हैजा फूटने किंवा रोगी दुर्बल होनेसे विरेचक औषधकी व्यवस्था करना ठीक नहीं। अन्त्र-परिष्कार होनेसे निम्नलिखित औषधकी व्यवस्था करे—रेवाचीनीका अर्कं १० बूंद, सोडा बाईकार्ब २० ग्रेन और पीपरमेण्टका जल आध छटांक एकमें मिला ३/४ घण्टेके अनन्तर सेवन करे। उदरमें अत्यन्त वेदना होनेसे उक्त औषधकी प्रत्येक मात्राके साथ ४ बूंद अफीमका अरिष्ट मिला दे। शिशुओंके पक्षमें अफीम निषिद्ध है। पेटके अधिक दुखनेपर तारपीन-तेलके साथ गर्म पानीसे सेंके। पुनः-पुनः जलवत् अधिक मल निर्गत होनेसे धारक औषध देना योग्य है। खदिरका अरिष्ट २० बूंद, काईनोका अरिष्ट ३० बूंद, सुगन्ध खड़ियेका चूर्ण १० रत्ती, गंदेका मांड़ सवा तोले और पीपरमेण्टका जल सवा तोले—इन सब द्रव्योंको एकत्र मिश्रितकर इसी तरह एक-एक मात्रा औषध ६ घण्टेके अनन्तर सेवन करे। सन्धमाके बाद ७ बूंद अफीमका अरिष्ट खानेसे धारक होता और सुनिद्रा भी आ सकती है। रोगी दुर्बल होनेसे अल्प मात्रामें <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> s5tf0lj67pqnre0kcm6nbxtnpcjjpp9 664851 664850 2026-07-04T00:41:43Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 664851 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२७४'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> और जीरा, प्रत्येक दो-दो तोले ले। काढ़ेके लिये १२ सेर इन्द्रयवका बकला ६४ सेर पानी में उबाले और १६ सेर पानी बाक़ी रहनेसे नीचे उतार ले। पहले मूर्च्छित तैलमें इन्द्रयवका क्वाथ डाल दे। सात दिन बाद फिर उसमें दहीका मठा छोड़े। एक सप्ताह बाद आठ सेर पानीके साथ उपरि उक्त कल्कद्रव्य सिद्ध करे; निर्जल हो जानेसे नीचे उतार ले। यह सिद्ध किया हुआ तैल आठ दिन तक कल्क समेत किसी पात्रमें धरा रहने दे पीछे इसे कपड़ेसे छानके बोतल में भर रखे। यह तैल अनेक प्रकारसे प्रस्तुत करते हैं। इसे सर्व्वाङ्गमें मर्दन करनेसे कठिन ग्रहणीमें भी विलक्षण उपकार हो जाता है। <small>प्राणेश्वररस</small>—गन्धक, अभ्र, और पारद प्रत्येक चार-चार माशे ले। सज्जीखार, फुलाया हुआ सुहागा, शोरा, पञ्चलवण, त्रिफला, त्रिकट, इन्द्रयव, जीरा, स्याहजीरा, चितामूल, यमानी, हींग, बायबिड़ङ्ग और पित्तपापड़ा प्रत्येक एक-एक माशे डाले। फिर इन सब चीज़ोंको 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अग्निकुमाररस, ग्रहणीकपाटरस, ग्रहणी-गजेन्द्रवटिका, वैद्यनाथवटिका, कनकप्रभावटी प्रभृति औषध अतिसारादि रोगों में विलक्षण फल दिखाते हैं। <small>एलोपेथी-चिकित्सा</small>—गुरुतर आहारके बाद उदरामय उपस्थित होनेसे १५ किंवा २० ग्रेन इपिकाक चूर्ण ईषत् उष्ण जलके साथ सेवन करानेसे ही पीड़ा शान्त हो सकती है। किन्तु दुर्बल व्यक्तिको वमन कराना उचित नहीं। वमनके बाद पेटमें सञ्चितमल रहनेपर मृदु-विरेचक औषधका प्रयोग करनेसे अच्छा फल होता है। अण्डीका तेल सवा तोले और अफीमका अरिष्ट सात बूंद थोड़ेसे अदरकके रस में अच्छी तरह मिलाकर सेवन करानेसे उदरवेदना, आंतका भारीपन प्रभृति कष्ट दूर हो जाते हैं। किन्तु निकटमें हैजा फूटने किंवा रोगी दुर्बल होनेसे विरेचक औषधकी व्यवस्था करना ठीक नहीं। अन्त्र-परिष्कार होनेसे निम्नलिखित औषधकी व्यवस्था करे—रेवाचीनीका अर्कं १० बूंद, सोडा बाईकार्ब २० ग्रेन और पीपरमेण्टका जल आध छटांक एकमें मिला ३/४ घण्टेके अनन्तर सेवन करे। उदरमें अत्यन्त वेदना होनेसे उक्त औषधकी प्रत्येक मात्राके साथ ४ बूंद अफीमका अरिष्ट मिला दे। शिशुओंके पक्षमें अफीम निषिद्ध है। पेटके अधिक दुखनेपर तारपीन-तेलके साथ गर्म पानीसे सेंके। पुनः-पुनः जलवत् अधिक मल निर्गत होनेसे धारक औषध देना योग्य है। खदिरका अरिष्ट २० बूंद, काईनोका अरिष्ट ३० बूंद, सुगन्ध खड़ियेका चूर्ण १० रत्ती, गंदेका मांड़ सवा तोले और पीपरमेण्टका जल सवा तोले—इन सब द्रव्योंको एकत्र मिश्रितकर इसी तरह एक-एक मात्रा औषध ६ घण्टेके अनन्तर सेवन करे। सन्धमाके बाद ७ बूंद अफीमका अरिष्ट खानेसे धारक होता और सुनिद्रा भी आ सकती है। रोगी दुर्बल होनेसे अल्प मात्रामें <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> f7i2ehzlujipttve47t6v2abu6wvfg4 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२८२ 250 83555 664859 346957 2026-07-04T01:56:28Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664859 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७५'''}}</noinclude> पुरातन पोर्टको प्रत्यह तीन-चार बार पान करे। कष्टकर है, इससे अत्यन्त वर्षा होनेपर वह सिवा इसके मांसका शोरबा, एक भाग चूनेवाले कुटीरमें बैठ और उसो शुष्क मांसको दग्धकर सड़ी जलके साथ नौ भाग बकरीका दूध मिलाकर ले। हुई शराबके साथ खाते हैं। फिर किसी-किसी वनमें पहलेसे पेटमें दुःसह वेदना एवं मट्ठी-जैसा मल वर्षाके समय चारो दिक् पानी में डूब जाते और निर्गत होनेपर पारदका व्यवहार करना उचित है। हरिण तथा शशक उच्च भूमिपर जाकर आश्रय हाइडार्ज कम क्रिटा १, विसमथ ३, इपिकाक १ लेते हैं। असभ्य लोग उस समय उन्हें अनायास वध और सुगन्ध खड़िया १० रत्ती-इन सब चौजोंको करते हैं। वर्षाकालमें आकाश प्रायः मेघोसे आच्छन एकमें मिलाके एक पुड़िया बनाये। रातको ऐसी ही रहता है, इसी कारणसे मांस सुखानेकी सुविधा नहीं दो पुड़ियोंको सेवन करना चाहिये। पौड़ा पुरातना होती। सुतरां, कितने ही वनवासी अधिक शिकार वस्थामें पहुंचनेसे अल्प-अल्प अनुत्तेजक एवं लौहघटित मारनेसे मांसमें हलदी और नमक लगा और अल्प औषध देना आवश्यक है। दग्धकर रख लेते हैं। इसतरह कुखाद्य भोजनके अफोमका अरिष्ट ७ बूंद, फेरम टारट्रेटम ३ ग्रेन कारणसे ही उनका रक्तामाशय रोग इतना प्रबल और दालचीनीका जल आध छटांक-यह सब द्रव्य देख पड़ता है। युरोपके लोग भारतवर्षमें आके एकत्र मिश्रित कर ऐसी ही एक-एक मात्रा औषध पहले यहांके जलवायुपर विशेष दृष्टि नहीं डालते। प्रत्यह तीन बार सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें वह विलायतमें जिस परिमाणसे मांसादि भोजन हमारे देशका बेल एक महौषध समझा जाता है। करते, यहां भी उसी परिमाणसे अपर्याप्त आहार भीतर प्रचुर गूदा उत्पन्न हो जानेसे, बेलको वीज करते रहते ; इसी कारणसे अन्तमें उत्कट आमाशय सहित गोल-गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये । प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। Madras Hygiene ८ भाग बेल और १ भाग सोंठ एकत्र जलमें सिद्ध कर देखो। (उबाल ) उत्तम रूपसे घोंट डाले। फिर इसी रक्तातिसारके अन्यान्य कितने हो कारण श्लेष्माति- मांडको कपड़ेसे छान थोड़ेसे खजूरवाले गुड़के साथ सार जैसे हैं। युरोपीय चिकित्सक ऐसा अनुमान रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर करते हैं, कि दुर्गन्ध स्थान किंवा अन्य किसी खजूर-गुड़के साथ खानेसे भी उपकार होता है। कारणसे एक प्रकारका विष उत्पन्न होता है। वही - रक्तातिसार या रक्तामाशय-पूर्वकालमें पोड़ा विष मनुष्य के शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही पृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस विष बृहत् अन्त्रवाली श्लैष्मिक झिल्लोको ग्रन्थिसे समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसी उत्पन्न होता है। रोगसे अधिक नहीं डरते ; किन्तु रक्तामाशयसे सभी हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिसाब लगानेपर, प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक सैकड़े पीछे अस्मी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राणत्याग हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शोतका बोध करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। शुष्क मत्स्य-मांसका भोजन और अपरिमित सुरापान आहारके बाद पीड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसे स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस अवस्थामें पर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण जिह्वा शुष्क, मध्यस्थल खेतवर्ण लेपयुक्त और चारों प्रभृति वन्य पशुओंको मार उनका मांस सुखाकर किनार रक्तवर्ण हो जाते हैं। किसौ किसी स्थलमें रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार मारना रोगीको कम्प या ज्वरका बोध नहीं होता। किन्तु <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> hf77okile04e7eb53w42dapl1nir85q 664861 664859 2026-07-04T02:08:02Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664861 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पुरातन पोर्टको प्रत्यह तीन-चार बार पान करे। सिवा इसके मांसका शोरबा, एक भाग चूनेवालेजलके साथ नौ भाग बकरीका दूध मिलाकर ले। पहलेसे पेटमें दुःसह वेदना एवं मट्ठी-जैसा मल निर्गत होनेपर पारदका व्यवहार करना उचित है। हाइडार्ज कम क्रिटा १, विसमथ ३, इपिकाक १ और सुगन्ध खड़िया १० रत्ती-इन सब चौजोंको एकमें मिलाके एक पुड़िया बनाये। रातको ऐसी ही दो पुड़ियोंको सेवन करना चाहिये। पौड़ा पुरातना वस्थामें पहुंचनेसे अल्प-अल्प अनुत्तेजक एवं लौहघटित औषध देना आवश्यक है।अफोमका अरिष्ट ७ बूंद, फेरम टारट्रेटम ३ ग्रेन और दालचीनीका जल आध छटांक-यह सब द्रव्य एकत्र मिश्रित कर ऐसी ही एक-एक मात्रा औषध प्रत्यह तीन बार सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें हमारे देशका बेल एक महौषध समझा जाता है। भीतर प्रचुर गूदा उत्पन्न हो जानेसे, बेलको वीज सहित गोल-गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये । ८ भाग बेल और १ भाग सोंठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल ) उत्तम रूपसे घोंट डाले। फिर इसी मांडको कपड़ेसे छान थोड़ेसे खजूरवाले गुड़के रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़के साथ खानेसे भी उपकार होता है। रक्तातिसार या रक्तामाशय-पूर्वकालमें पोड़ापृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसीरोगसे अधिक नहीं डरते ; किन्तु रक्तामाशयसे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिसाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्मी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राणत्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्स्य-मांसका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसेपर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुओंको मार उनका मांस सुखाकर रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार मारना कष्टकर है, इससे अत्यन्त वर्षा होनेपर वह कुटीरमें बैठ और उसो शुष्क मांसको दग्धकर सड़ी हुई शराबके साथ खाते हैं। फिर किसी-किसी वनमें वर्षाके समय चारो दिक् पानी में डूब जाते और हरिण तथा शशक उच्च भूमिपर जाकर आश्रय लेते हैं। असभ्य लोग उस समय उन्हें अनायास वध करते हैं। वर्षाकालमें आकाश प्रायः मेघोसे आच्छन रहता है, इसी कारणसे मांस सुखानेकी सुविधा नहीं होती। सुतरां, कितने ही वनवासी अधिक शिकार मारनेसे मांसमें हलदी और नमक लगा और अल्प दग्धकर रख लेते हैं। इसतरह कुखाद्य भोजनके कारणसे ही उनका रक्तामाशय रोग इतना प्रबल देख पड़ता है। युरोपके लोग भारतवर्षमें आके पहले यहांके जलवायुपर विशेष दृष्टि नहीं डालते। वह विलायतमें जिस परिमाणसे मांसादि भोजन करते, यहां भी उसी परिमाणसे अपर्याप्त आहार करते रहते ; इसी कारणसे अन्तमें उत्कट आमाशय प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। Madras Hygieneदेखो।रक्तातिसारके अन्यान्य कितने हो कारण श्लेष्माति-साथ सार जैसे हैं। युरोपीय चिकित्सक ऐसा अनुमान करते हैं, कि दुर्गन्ध स्थान किंवा अन्य किसी कारणसे एक प्रकारका विष उत्पन्न होता है। वही विष मनुष्य के शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही विष बृहत् अन्त्रवाली श्लैष्मिक झिल्लोको ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है। हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शोतका बोध होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। आहारके बाद पीड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस 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जल आध छटांक-यह सब द्रव्य एकत्र मिश्रित कर ऐसी ही एक-एक मात्रा औषध प्रत्यह तीन बार सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें हमारे देशका बेल एक महौषध समझा जाता है। भीतर प्रचुर गूदा उत्पन्न हो जानेसे, बेलको वीज सहित गोल-गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये । ८ भाग बेल और १ भाग सोंठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल ) उत्तम रूपसे घोंट डाले। फिर इसी मांडको कपड़ेसे छान थोड़ेसे खजूरवाले गुड़के रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़के साथ खानेसे भी उपकार होता है। रक्तातिसार या रक्तामाशय-पूर्वकालमें पोड़ापृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसीरोगसे अधिक नहीं डरते ; किन्तु रक्तामाशयसे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिसाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्मी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राणत्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्स्य-मांसका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसेपर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुओंको मार उनका मांस सुखाकर रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार 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विष मनुष्य के शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही विष बृहत् अन्त्रवाली श्लैष्मिक झिल्लोको ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है। हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शोतका बोध होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। आहारके बाद पीड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस अवस्थामें जिह्वा शुष्क, मध्यस्थल खेतवर्ण लेपयुक्त और चारों किनार रक्तवर्ण हो जाते हैं। किसौ किसी स्थलमें रोगीको कम्प या ज्वरका बोध नहीं होता। किन्तु <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> nlq9tk18fviu2aouxwtcrhlk52lebgp 664863 664862 2026-07-04T02:11:54Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664863 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पुरातन पोर्टको प्रत्यह तीन-चार बार पान करे। सिवा इसके मांसका शोरबा, एक भाग चूनेवाले जलके साथ नौ भाग बकरीका दूध मिलाकर ले। पहलेसे पेटमें दुःमह वेदना एवं मट्ठी-जैसा मल निर्गत होनेपर पारदका व्यवहार करना उचित है। हाइडार्ज कम क्रिटा १, विसमथ ३, इपिकाक १ और सुगन्ध खड़िया १० रत्ती—इन सब चीज़ोंको एकमें मिलाके एक पुड़िया बनाये। रातको ऐसी ही दो पुड़ियोंको सेवन करना चाहिये। पीड़ा पुरातना वस्थामें पहुंचनेसे अल्प-अल्प अनुत्तेजक एवं लोहघटित औषध देना आवश्यक है। अफोमका अरिष्ट ७ बंद, फ़ेरम टारट्रेटम ३ ग्रेन और दालचीनीका जल आध छटांक—यह सब द्रव्य एकत्र मिश्रित कर एसी ही एक-एक मात्रा औषध प्रत्यह तीन बार सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें हमारे देशका बेल एक महोषध समझा जाता है। भीतर प्रचुर गृदा उत्पन्न हो जानसे, बेलको वीज सहित गोल गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये। ८ भाग बेल और १ भाग सांठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल) उत्तम रुपमे घोंट डाले। फिर इसी मांडको कपड़े से छान थोड़ेमे खजूरवाले गुड़के साथ रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़क साथ खानेसे भी उपकार होता है। <small>रक्तातिमार या रक्तामाशय</small>—पूर्वकालमें यह पीड़ा पृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसी रोगसे अधिक नहीं डरते; किन्तु रक्तामाशयमे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिमाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्सी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राण त्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्म्य-मांमका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसे पर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुओं के मार उनका मांस सुखाकर रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार मारना<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कष्टकर है, इससे अत्यन्त वर्षा होनेपर वह कुटीरमें बैठ और उसी शुष्क मांसको दग्धकर सड़ी हुई शराबके साथ खाते हैं। फिर किसी-किसी वनमें वर्षा के समय चारो दिक् पानी में डूब जाते और हरिण तथा शशक उच्च भूमिपर जाकर आश्रय लेते हैं। असभ्य लोग उस समय उन्हें अनायास वध करते हैं। वर्षाकालमें आकाश प्रायः मेघोसे आच्छन्न रहता है, इसी कारणसे मांस सुखानेकी सुविधा नहीं होती। सुतरां, कितने ही वनवासी अधिक शिकार मारनेसे मांसमें हलदी और नमक लगा और अल्प दग्धकर रख लेते हैं। इसतरह कुखाद्य भोजनके कारणसे ही उनका रक्तामाशय रोग इतना प्रबल देख पड़ता है। युरोपके लोग भारतवर्ष में आके पहले यहांके जलवायुपर विशेष दृष्टि नहीं डालते। वह विलायतमें जिस परिमाणसे मांसादि भोजन करते, यहां भी उसी परिमाणसे अपर्याप्त आहार करते रहते; इसी कारणसे अन्तमें उत्कट आमाशय प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। <small>Madras Hygiene देखो।</small> रक्तातिसारके अन्यान्य कितने ही कारण श्लेष्मातिसार जैसे हैं। युरोपीय चिकित्सक ऐसा अनुमान करते हैं, कि दुर्गन्ध स्थान किंवा अन्य किसी कारणसे एक प्रकारका विष उत्पन्न होता है। वही विष मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही विष बृहत् अन्तवाली श्लैष्मिक झिल्लीकी ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है। हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शीतका बोध होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। आहारके बाद पीड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस अवस्थामें जिह्वा शुष्क, मध्यस्थल श्वेतवर्ण लेपयुक्त और चारों किनारे रक्तवर्ण हो जाते हैं। किसी-किसी स्थलमें 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सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें हमारे देशका बेल एक महोषध समझा जाता है। भीतर प्रचुर गृदा उत्पन्न हो जानसे, बेलको वीज सहित गोल गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये। ८ भाग बेल और १ भाग सांठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल) उत्तम रुपमे घोंट डाले। फिर इसी मांडको कपड़े से छान थोड़ेमे खजूरवाले गुड़के साथ रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़क साथ खानेसे भी उपकार होता है। <small>रक्तातिमार या रक्तामाशय</small>—पूर्वकालमें यह पीड़ा पृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसी रोगसे अधिक नहीं डरते; किन्तु रक्तामाशयमे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिमाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्सी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राण त्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्म्य-मांमका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसे पर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुओं के मार उनका मांस सुखाकर रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार मारना<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कष्टकर है, 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पीछे वही विष बृहत् अन्तवाली श्लैष्मिक झिल्लीकी ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है। हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शीतका बोध होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। आहारके बाद पीड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस अवस्थामें जिह्वा शुष्क, मध्यस्थल श्वेतवर्ण लेपयुक्त और चारों किनारे रक्तवर्ण हो जाते हैं। किसी-किसी स्थलमें रोगीको कम्प या ज्वरका बोध नहीं होता। किन्तु <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1qqe3k22rzqznvnhrtxrvzo7h48oubg 664865 664864 2026-07-04T02:13:36Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664865 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>पुरातन पोर्टको प्रत्यह तीन-चार बार पान करे। सिवा इसके मांसका शोरबा, एक भाग चूनेवाले जलके साथ नौ भाग बकरीका दूध मिलाकर ले। पहलेसे पेटमें दुःमह वेदना एवं मट्ठी-जैसा मल निर्गत होनेपर पारदका व्यवहार करना उचित है। हाइडार्ज कम क्रिटा १, विसमथ ३, इपिकाक १ और सुगन्ध खड़िया १० रत्ती—इन सब चीज़ोंको एकमें मिलाके एक पुड़िया बनाये। रातको ऐसी ही दो पुड़ियोंको सेवन करना चाहिये। पीड़ा पुरातना वस्थामें पहुंचनेसे अल्प-अल्प अनुत्तेजक एवं लोहघटित औषध देना आवश्यक है। अफोमका अरिष्ट ७ बंद, फ़ेरम टारट्रेटम ३ ग्रेन और दालचीनीका जल आध छटांक—यह सब द्रव्य एकत्र मिश्रित कर एसी ही एक-एक मात्रा औषध प्रत्यह तीन बार सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें हमारे देशका बेल एक महोषध समझा जाता है। भीतर प्रचुर गृदा उत्पन्न हो जानसे, बेलको वीज सहित गोल गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये। ८ भाग बेल और १ भाग सांठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल) उत्तम रुपमे घोंट डाले। फिर इसी मांडको कपड़े से छान थोड़ेमे खजूरवाले गुड़के साथ रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़क साथ खानेसे भी उपकार होता है। <small>रक्तातिमार या रक्तामाशय</small>—पूर्वकालमें यह पीड़ा पृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसी रोगसे अधिक नहीं डरते; किन्तु रक्तामाशयमे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिमाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्सी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राण त्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्म्य-मांमका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसे पर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुओं के मार उनका मांस सुखाकर रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार मारना<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कष्टकर है, इससे अत्यन्त वर्षा होनेपर वह कुटीरमें बैठ और उसी शुष्क मांसको दग्धकर सड़ी हुई शराबके साथ खाते हैं। फिर किसी-किसी वनमें वर्षा के समय चारो दिक् पानी में डूब जाते और हरिण तथा शशक उच्च भूमिपर जाकर आश्रय लेते हैं। असभ्य लोग उस समय उन्हें अनायास वध करते हैं। वर्षाकालमें आकाश प्रायः मेघोसे आच्छन्न रहता है, इसी कारणसे मांस सुखानेकी सुविधा नहीं होती। सुतरां, कितने ही वनवासी अधिक शिकार मारनेसे मांसमें हलदी और नमक लगा और अल्प दग्धकर रख लेते हैं। इसतरह कुखाद्य भोजनके कारणसे ही उनका रक्तामाशय रोग इतना प्रबल देख पड़ता है। युरोपके लोग भारतवर्ष में आके पहले यहांके जलवायुपर विशेष दृष्टि नहीं डालते। वह विलायतमें जिस परिमाणसे मांसादि भोजन करते, यहां भी उसी परिमाणसे अपर्याप्त आहार करते रहते; इसी कारणसे अन्तमें उत्कट आमाशय प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। <small>Madras Hygiene देखो।</small> रक्तातिसारके अन्यान्य कितने ही कारण श्लेष्मातिसार जैसे हैं। युरोपीय चिकित्सक ऐसा अनुमान करते हैं, कि दुर्गन्ध स्थान किंवा अन्य किसी कारणसे एक प्रकारका विष उत्पन्न होता है। वही विष मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही विष बृहत् अन्तवाली श्लैष्मिक झिल्लीकी ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है। हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शीतका बोध होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। आहारके बाद पीड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस अवस्थामें जिह्वा शुष्क, मध्यस्थल श्वेतवर्ण लेपयुक्त और चारों किनारे रक्तवर्ण हो जाते हैं। किसी-किसी स्थलमें रोगीको कम्प या ज्वरका बोध नहीं होता। किन्तु <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bs0zfyu0ozlflkzb3swji05qw966moa पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२८१ 250 83556 664856 346958 2026-07-04T01:37:35Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664856 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पुरातन पोर्टको प्रत्यह तोन-चार बार पान करे।सिवा इसके मांसका शोरबा, एक भाग चनेवाले जलके साथ नौ भाग बकरोका दूध मिलाकर ले। पहलेसे पेटमें दुःमह वेदना एवं मट्ठी-जैसा मल निर्गत होनेपर पारदका व्यवहार करना उचित है। हाइडा कम क्रिटा १, विममथ ३, इपिकाक १ और सुगन्ध खड़िया १० रत्ती-इन सब चीजोंको एकमें मिलाकै एक पुड़िया बनाये। रातको ऐसी ही दो पुड़ियोंको सेवन करना चाहिये। पीड़ा पुरातना वस्थामें पहुंचनेसे अल्प-अल्प अनुत्तेजक एवं लोहघटित औषध देना आवश्यक है।अफोमका अरिष्ट ७ बंद, फेरम टारट्रेटम ३ ग्रेन और दालचीनीका जल आध छटांक -यह सब द्रव्य एकत्र मिश्रित कर एसो हो एक-एक मात्रा औषध प्रत्यह तीन बार सेवन करे । जोग उदरामय रोगमें हमारे देशका बेन एक महोषध ममझा जाता है। भीतर प्रचुर गृदा उत्पन्न हो जानसे, बेलको वीज सहित गोन गान्न टुकड़े कर छायाम सुखाये। ८ भाग बेन और १ भाग मांठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल ) उत्तम रुपमै घोट डाले। फिर इसीमांडको कपड़ेमै छान थोड़ेमै खजूरवाले गुड़के साथ रोगीको खिलाये। मिवा इमर्क ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़क माथ खानमै भी उपकार होता है। रत्नातिमार या रतामागध --पूर्वकालमें यह पोड़ापृथिवीपर मर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। समय भी वनवासी एवं अमभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसो रोगसे अधिक नहीं डरते ; किन्तु रक्तामाशयमे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थून रौतिम हिमाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्सी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राण त्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्म्य-मांमका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसे पर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुीको मार उनका मांस सुखाकररख छोड़ते हैं। दृष्टिके समय शिकार मारना कष्टकर है इससे अत्यन्त वर्षा होनेपर वह कुटीरमें बैठ और उसो शुष्क मांसको दग्धकर सड़ी हुई शराबके साथ खाते हैं। फिर किसी-किसी वनमें वर्षा के समय चारो दिक् पानी में डूब जाते और हरिण तथा शशक उच्च भूमिपर जाकर आश्रय लेते हैं। असभ्य लोग उस समय उन्हें अनायास वध करते हैं। वर्षाकालमें आकाश प्रायः मेघोसे आच्छन्न रहता है, इसी कारणसे मांस सुखानेकी सुविधा नहीं होती। सुतरां, कितने ही वनवासी अधिक शिकार मारनेसे मांसमें हलदी और नमक लगा और अल्प दग्धकर रख लेते हैं। इसतरह कुखाद्य भोजनके कारणसे ही उनका रक्तामाशय रोग इतना प्रबल देख पड़ता है। युरोपके लोग भारतवर्ष में आके पहले यहांके जलवायुपर विशेष दृष्टि नहीं डालते। वह विलायतमें जिस परिमाणसे मांसादि भोजन करते, यहां भी उसी परिमाणसे अपर्याप्त आहार करते रहते ; इसी कारणसे अन्तमें उत्कट आमाशय प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। Madras Hygiene देखो। रक्तातिसारके अन्यान्य कितने हो कारण श्लेष्माति- सार जैसे हैं। युरोपीय चिकित्सक ऐसा अनुमान करते हैं, कि दुर्गन्ध स्थान किंवा अन्य किसी कारणसे एक प्रकारका विष उत्पन्न होता है। वही विष मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही विष बृहत् अन्ववाली श्लैष्मिक झिल्लीको ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है। हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शोतका बोध होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। आहारके बाद पौड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस अवस्थामें जिह्वा शुष्क, मध्यस्थल खेतवर्ण लेपयुक्त और चारों किनारे रक्तवर्ण हो जाते हैं। किसी-किसी स्थलमें रोगीको कम्य या ज्वरका बोध नहीं होता। किन्तु<noinclude></noinclude> g1w3uwb8j260xrh3x8kuwxkyrn4lp8q 664857 664856 2026-07-04T01:54:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 664857 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पुरातन पोर्टको प्रत्यह तीन-चार बार पान करे। सिवा इसके मांसका शोरबा, एक भाग चूनेवाले जलके साथ नौ भाग बकरीका दूध मिलाकर ले। पहलेसे पेटमें दुःमह वेदना एवं मट्ठी-जैसा मल निर्गत होनेपर पारदका व्यवहार करना उचित है। हाइडार्ज कम क्रिटा १, विसमथ ३, इपिकाक १ और सुगन्ध खड़िया १० रत्ती—इन सब चीज़ोंको एकमें मिलाके एक पुड़िया बनाये। रातको ऐसी ही दो पुड़ियोंको सेवन करना चाहिये। पीड़ा पुरातना वस्थामें पहुंचनेसे अल्प-अल्प अनुत्तेजक एवं लोहघटित औषध देना आवश्यक है। अफोमका अरिष्ट ७ बंद, फ़ेरम टारट्रेटम ३ ग्रेन और दालचीनीका जल आध छटांक—यह सब द्रव्य एकत्र मिश्रित कर एसी ही एक-एक मात्रा औषध प्रत्यह तीन बार सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें हमारे देशका बेल एक महोषध समझा जाता है। भीतर प्रचुर गृदा उत्पन्न हो जानसे, बेलको वीज सहित गोल गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये। ८ भाग बेल और १ भाग सांठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल) उत्तम रुपमे घोंट डाले। फिर इसी मांडको कपड़े से छान थोड़ेमे खजूरवाले गुड़के साथ रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़क साथ खानेसे भी उपकार होता है। <small>रक्तातिमार या रक्तामाशय</small>—पूर्वकालमें यह पीड़ा पृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसी रोगसे अधिक नहीं डरते; किन्तु रक्तामाशयमे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिमाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्सी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राण त्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्म्य-मांमका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसे पर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुओं के मार उनका मांस सुखाकर रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार मारना<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कष्टकर है, इससे अत्यन्त वर्षा होनेपर वह कुटीरमें बैठ और उसी शुष्क मांसको दग्धकर सड़ी हुई शराबके साथ खाते हैं। फिर किसी-किसी वनमें वर्षा के समय चारो दिक् पानी में डूब जाते और हरिण तथा शशक उच्च भूमिपर जाकर आश्रय लेते हैं। असभ्य लोग उस समय उन्हें अनायास वध करते हैं। वर्षाकालमें आकाश प्रायः मेघोसे आच्छन्न रहता है, इसी कारणसे मांस सुखानेकी सुविधा नहीं होती। सुतरां, कितने ही वनवासी अधिक शिकार मारनेसे मांसमें हलदी और नमक लगा और अल्प दग्धकर रख लेते हैं। इसतरह कुखाद्य भोजनके कारणसे ही उनका रक्तामाशय रोग इतना प्रबल देख पड़ता है। युरोपके लोग भारतवर्ष में आके पहले यहांके जलवायुपर विशेष दृष्टि नहीं डालते। वह विलायतमें जिस परिमाणसे मांसादि भोजन करते, यहां भी उसी परिमाणसे अपर्याप्त आहार करते रहते; इसी कारणसे अन्तमें उत्कट आमाशय प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। <small>Madras Hygiene देखो।</small> रक्तातिसारके अन्यान्य कितने ही कारण श्लेष्मातिसार जैसे हैं। युरोपीय चिकित्सक ऐसा अनुमान करते हैं, कि दुर्गन्ध स्थान किंवा अन्य किसी कारणसे एक प्रकारका विष उत्पन्न होता है। वही विष मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही विष बृहत् अन्तवाली श्लैष्मिक झिल्लीकी ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है। हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ करता है। पहले अल्प-अल्प शीतका बोध होता, कहीं-कहीं प्रबल कम्प भी देख पड़ता है। आहारके बाद पीड़ाका सूत्रपात होनेसे अनेक स्थलोंमें रोगी वमन कर डालता है। इस अवस्थामें जिह्वा शुष्क, मध्यस्थल श्वेतवर्ण लेपयुक्त और चारों किनारे रक्तवर्ण हो जाते हैं। किसी-किसी स्थलमें रोगीको कम्प या ज्वरका बोध नहीं होता। किन्तु<noinclude></noinclude> hws4kfahsfvuof3gav9h9309hmd3s8s 664858 664857 2026-07-04T01:55:23Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 664858 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिसार'''|'''२७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पुरातन पोर्टको प्रत्यह तीन-चार बार पान करे। सिवा इसके मांसका शोरबा, एक भाग चूनेवाले जलके साथ नौ भाग बकरीका दूध मिलाकर ले। पहलेसे पेटमें दुःमह वेदना एवं मट्ठी-जैसा मल निर्गत होनेपर पारदका व्यवहार करना उचित है। हाइडार्ज कम क्रिटा १, विसमथ ३, इपिकाक १ और सुगन्ध खड़िया १० रत्ती—इन सब चीज़ोंको एकमें मिलाके एक पुड़िया बनाये। रातको ऐसी ही दो पुड़ियोंको सेवन करना चाहिये। पीड़ा पुरातना वस्थामें पहुंचनेसे अल्प-अल्प अनुत्तेजक एवं लोहघटित औषध देना आवश्यक है। अफोमका अरिष्ट ७ बंद, फ़ेरम टारट्रेटम ३ ग्रेन और दालचीनीका जल आध छटांक—यह सब द्रव्य एकत्र मिश्रित कर एसी ही एक-एक मात्रा औषध प्रत्यह तीन बार सेवन करे। जीर्ण उदरामय रोगमें हमारे देशका बेल एक महोषध समझा जाता है। भीतर प्रचुर गृदा उत्पन्न हो जानसे, बेलको वीज सहित गोल गोल टुकड़े कर छायामें सुखाये। ८ भाग बेल और १ भाग सांठ एकत्र जलमें सिद्ध कर (उबाल) उत्तम रुपमे घोंट डाले। फिर इसी मांडको कपड़े से छान थोड़ेमे खजूरवाले गुड़के साथ रोगीको खिलाये। सिवा इसके ताज़ा बेल भूनकर खजूर-गुड़क साथ खानेसे भी उपकार होता है। <small>रक्तातिमार या रक्तामाशय</small>—पूर्वकालमें यह पीड़ा पृथिवीपर सर्वत्र ही अधिक विद्यमान थी। इस समय भी वनवासी एवं असभ्य लोग इस व्याधिसे अत्यन्त कष्ट पाते हैं। वह ज्वर या अन्य किसी रोगसे अधिक नहीं डरते; किन्तु रक्तामाशयमे सभी भयभीत हो जाते हैं। स्थूल रीतिमें हिमाब लगानेपर, सैकड़े पीछे अस्सी असभ्य लोग रक्तामाशयसे प्राण त्याग करते हैं। इसीसे स्पष्ट समझ पड़ता, कि गलित और शुष्क मत्म्य-मांमका भोजन और अपरिमित सुरापान इस रोगका प्रधान कारण है। एक जातीय ऐसे पर्वतवासी लोग हैं, जो शीतकालमें वानर, हरिण प्रभृति वन्य पशुओं के मार उनका मांस सुखाकर रख छोड़ते हैं। वृष्टिके समय शिकार मारना<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कष्टकर है, इससे अत्यन्त वर्षा होनेपर वह कुटीरमें बैठ और उसी शुष्क मांसको दग्धकर सड़ी हुई शराबके साथ खाते हैं। फिर किसी-किसी वनमें वर्षा के समय चारो दिक् पानी में डूब जाते और हरिण तथा शशक उच्च भूमिपर जाकर आश्रय लेते हैं। असभ्य लोग उस समय उन्हें अनायास वध करते हैं। वर्षाकालमें आकाश प्रायः मेघोसे आच्छन्न रहता है, इसी कारणसे मांस सुखानेकी सुविधा नहीं होती। सुतरां, कितने ही वनवासी अधिक शिकार मारनेसे मांसमें हलदी और नमक लगा और अल्प दग्धकर रख लेते हैं। इसतरह कुखाद्य भोजनके कारणसे ही उनका रक्तामाशय रोग इतना प्रबल देख पड़ता है। युरोपके लोग भारतवर्ष में आके पहले यहांके जलवायुपर विशेष दृष्टि नहीं डालते। वह विलायतमें जिस परिमाणसे मांसादि भोजन करते, यहां भी उसी परिमाणसे अपर्याप्त आहार करते रहते; इसी कारणसे अन्तमें उत्कट आमाशय प्रभृति रोग उत्पन्न हो जाते हैं। <small>Madras Hygiene देखो।</small> रक्तातिसारके अन्यान्य कितने ही कारण श्लेष्मातिसार जैसे हैं। युरोपीय चिकित्सक ऐसा अनुमान करते हैं, कि दुर्गन्ध स्थान किंवा अन्य किसी कारणसे एक प्रकारका विष उत्पन्न होता है। वही विष मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। पीछे वही विष बृहत् अन्तवाली श्लैष्मिक झिल्लीकी ग्रन्थिसे शरीरके बाहर निकलता, जिससे रक्तामाशय रोग उत्पन्न होता है। हिन्दुस्थानमें जहां मलेरिया ज्वरका अत्यन्त प्रादुर्भाव देख पड़ता, रक्तामाशय रोग वहीं अधिक हुआ 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वेगके बाद किञ्चित आम और रक्त निकल आता है। उस समय रोगी अपनेको कुछ सुख समझता है। किन्तु क्षणकालके मध्यमें हो फिर वेग बढ़ता और पेटमें वेदना होने लगती है। कहीं तो, विरेचनके साथ प्रथम-प्रथम मल मिश्रित रहता है। इसके बाद कभी अल्प मल निकलता ; कभी मलका सम्पर्कमात्र भी नहीं रहता; केवल श्लेष्मा और रक्त निर्गत होता है। कहीं-कहीं मारी गई बकरीकासा ताज़ा खून निकल पड़ता है। प्रबल पौड़ामें सर्वाङ्ग उष्ण, नाड़ी वेगवती, मुखमण्डल मलिन और अत्यन्त ग्लानियुक्त हो जाता है। सरला- न्त्रमें अत्यन्त प्रदाह होनेसे रोगी पेशाब नहीं कर सकता, कितने ही कष्टसे केवल दो-एक विन्दु मूत्र उतरता है। इस अवस्थामें रोग शान्त न होने- से क्रमशः दिवारात्रिके मध्यमें ५० । ६० बार मल निर्गत हो जाता है। रोगी एकबार मलत्याग करनेको बैठनेसे फिर उठना नहीं चाहता। वह उदरको वेदना और अतिशय वेगके कारणसे सर्वदा ही व्याकुल रहता है। पीछे उदर अल्प या अधिक स्फौत होनेसे सरलान्त्रमें क्षत उत्पन्न होता ; इसलिये उदरसे गलित पदार्थ भी बाहर निकल आता है। धौर-धौर नाड़ी क्षीण, मुखमें क्षत, हस्तपदादि शीतल, सर्वाङ्गमें सड़ा दुर्गन्ध, प्रलाप प्रभृति उपसर्गों- के बाद रोगीको मृत्यु होती है। किसी-किसी स्थलमें अन्तकाल पर्यन्त ज्ञानका कुछ भी वैलक्षण्य देख नहीं पड़ता। ऐसा भी देखा गया है, कि समस्त इन्द्रियोंके अवश होने और शरीरमें केवल जीवात्माके रह जानेपर भी रोगी ज्ञानसे बात करता रहता, वाक्यमें कुछ भी जड़ता नहीं आती। इसीसे प्रवाद है, कि इष्टदेवताका नाम लेते-लेते सज्ञानमें मृत्यु होनेके लिये पूर्वकालके ऋषियोंने अतिसार रोगको ईश्वरसे कामना कर लिया था। इस समय एक विशेष सतर्कता आवश्यक है। रक्तामाशयको सामान्य व्याधि बता हमारे देशक कितने ही लोग पहले निश्चिन्त रहते हैं। पीड़ा उत्कट न हो जानेसे झाड़-फूकपर हो प्रायः अनेक लोग भरोसा रखते हैं। कितनों हीको विश्वास है, कि हिन्दुस्थानमें अनेक प्रकार अवधूत मतके टोटके तथा झाड़-फूंकवाले औषधोंसे नाना प्रकार कठिन रोगोंका निवारण होता है। किन्तु इसपर भी, अन्न लोगोंके हाथमें प्राणसमर्पण करना कर्त्तव्य नहीं। विशेषतः रक्तामाशय उपस्थित होनेसे यक्वत्को कोई न कोई पौड़ा उठ खड़े होनेको सम्भावना रहती है। इसलिये पहलेसे ही सुचिकित्सकके हाथमें चिकित्साका भार अर्पण करना चाहिये। अवधूत और जड़ी-बूंटौको चिकित्सा-सामान्य प्रकारका रक्तातिसार कितने ही सहज उपायौंसे निवारण होता है। सूरतके पत्ते थूकके साथ दोनो हाथोंके नीचे मर्दन करनेसे तीन घण्टेमें सामान्य रक्तामाशयका वेग और रक्त रुक जाता है। आयापानवाले पत्तेके रसको सेवन करनेसे सहज आमाशयका निवारण होता है। सोंठ, अजवायन, जीरा, जायफल, कनशुरकी जड़ और इन्द्रयवके बकलेका क्वाथ ही रक्तातिसारका प्रधान औषध है। इसमें इन्द्रयववाले बकलेके क्वाथको छोड़ दूसरी चीजें किसी कामकी नहीं। फिर भी, इन्द्रयवका बकला कषाय और कटु होता, किसी आग्नेय द्रव्यके साथ सेवन न करनेसे वह पेटकोचपेटकर पकड़ सकता है; इसौसे सोंठ प्रभृति द्रव्य उसमें मिलाना आवश्यक है। अजवायन १३॥, जौरा ६॥, सोंठ ३१, जायफल १॥ और कनशरको जड़ २॥ रत्ती कूट-पौसके एक पुड़िया बनाये। इसके बाद डेढ़ सेर इन्द्रयवका बकला एक सेर जलमें उबाले, जब आध सेर जल रह जाये, तब उसे नीचे उतार ले। प्रत्यह सवेरे आध पाव इस क्वाथमें एक पुड़िया बांटके डाले और कुछ<noinclude></noinclude> ev79a3sbpdg4zsdaasphwil1ibjdpnk 664867 664866 2026-07-04T02:23:05Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664867 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" 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से क्रमशः दिवारात्रिके मध्यमें ५० । ६० बार मल निर्गत हो जाता है। रोगी एकबार मलत्याग करनेको बैठनेसे फिर उठना नहीं चाहता। वह उदरको वेदना और अतिशय वेगके कारणसे सर्वदा ही व्याकुल रहता है। पीछे उदर अल्प या अधिक स्फौत होनेसे सरलान्त्रमें क्षत उत्पन्न होता ; इसलिये उदरसे गलित पदार्थ भी बाहर निकल आता है। धौर-धौर नाड़ी क्षीण, मुखमें क्षत, हस्तपदादि शीतल, सर्वाङ्गमें सड़ा दुर्गन्ध, प्रलाप प्रभृति उपसर्गों- के बाद रोगीको मृत्यु होती है। किसी-किसी स्थलमें अन्तकाल पर्यन्त ज्ञानका कुछ भी वैलक्षण्य देख नहीं पड़ता। ऐसा भी देखा गया है, कि समस्त इन्द्रियोंके अवश होने और शरीरमें केवल जीवात्माके रह जानेपर भी रोगी ज्ञानसे बात करता रहता, वाक्यमें कुछ भी जड़ता नहीं आती। इसीसे प्रवाद <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>है, कि इष्टदेवताका नाम लेते-लेते सज्ञानमें मृत्यु होनेके लिये पूर्वकालके ऋषियोंने अतिसार रोगको ईश्वरसे कामना कर लिया था। इस समय एक विशेष सतर्कता आवश्यक है। रक्तामाशयको सामान्य व्याधि बता हमारे देशक कितने ही लोग पहले निश्चिन्त रहते हैं। पीड़ा उत्कट न हो जानेसे झाड़-फूकपर हो प्रायः अनेक लोग भरोसा रखते हैं। कितनों हीको विश्वास है, कि हिन्दुस्थानमें अनेक प्रकार अवधूत मतके टोटके तथा झाड़-फूंकवाले औषधोंसे नाना प्रकार कठिन रोगोंका निवारण होता है। किन्तु इसपर भी, अन्न लोगोंके हाथमें प्राणसमर्पण करना कर्त्तव्य नहीं। विशेषतः रक्तामाशय उपस्थित होनेसे यक्वत्को कोई न कोई पौड़ा उठ खड़े होनेको सम्भावना रहती है। इसलिये पहलेसे ही सुचिकित्सकके हाथमें चिकित्साका भार अर्पण करना चाहिये। अवधूत और जड़ी-बूंटौको चिकित्सा-सामान्य प्रकारका रक्तातिसार कितने ही सहज उपायौंसे निवारण होता है। सूरतके पत्ते थूकके साथ दोनो हाथोंके नीचे मर्दन करनेसे तीन घण्टेमें सामान्य रक्तामाशयका वेग और रक्त रुक जाता है। आयापानवाले पत्तेके रसको सेवन करनेसे सहज आमाशयका निवारण होता है। सोंठ, अजवायन, जीरा, जायफल, कनशुरकी जड़ और इन्द्रयवके बकलेका क्वाथ ही रक्तातिसारका प्रधान औषध है। इसमें इन्द्रयववाले बकलेके क्वाथको छोड़ दूसरी चीजें किसी कामकी नहीं। फिर भी, इन्द्रयवका बकला कषाय और कटु होता, किसी आग्नेय द्रव्यके साथ सेवन न करनेसे वह पेटकोचपेटकर पकड़ सकता है; इसौसे सोंठ प्रभृति द्रव्य उसमें मिलाना आवश्यक है। अजवायन १३॥, जौरा ६॥, सोंठ ३१, जायफल १॥ और कनशरको जड़ २॥ रत्ती कूट-पौसके एक पुड़िया बनाये। इसके बाद डेढ़ सेर इन्द्रयवका बकला एक सेर जलमें उबाले, जब आध सेर जल रह जाये, तब उसे नीचे उतार ले। प्रत्यह सवेरे आध पाव इस क्वाथमें एक पुड़िया बांटके डाले और कुछ<noinclude></noinclude> i8dj8h7yiodnckaazmi5wovn0vc1ciw 664870 664867 2026-07-04T02:41:29Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 664870 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२७६'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>उदरके भीतर मरोड़ उठा करती और मध्य-मध्यमें सारा पेट दुखने लगता है। मलहारमें अल्प ज्वाला और वेग मालूम पड़ता है। रोगी मलत्याग करने दौड़ता, किन्तु अधिक मल नहीं निकलता। पेटकी वेदना और उसका वेग विचारकर देखनेसे जाना जाता है, कि बहुत मल निकलेगा। किन्तु वास्तविक अनेक स्थलमें कुछ भी मल निःसरण नहीं होता। अनेकक्षण वेगके बाद किञ्चित आम और रक्त निकल आता है। उस समय रोगी अपनेको कुछ सुस्थ समझता है। किन्तु क्षणकालके मध्यमें ही फिर वेग बढ़ता और पेटमें वेदना होने लगती है। कहीं तो, विरेचनके साथ प्रथम-प्रथम मल मिश्रित रहता है। इसके बाद कभी अल्प मल निकलता; कभी मलका सम्पर्कमात्र भी नहीं रहता; केवल श्लेष्मा और रक्त निर्गत होता है। कहीं-कहीं मारी गई बकरीकासा ताज़ा खून निकल पड़ता है। प्रबल पीड़ामें सर्व्वाङ्ग उष्ण, नाड़ी वेगवती, मुखमण्डल मलिन और अत्यन्त ग्लानियुक्त हो जाता है। सरलान्त्रमें अत्यन्त प्रदाह होनेसे रोगी पेशाब नहीं कर सकता, कितने ही कष्टसे केवल दो-एक विन्दु मूत्र उतरता है। इस अवस्थामें रोग शान्त न होनेसे क्रमशः दिवारात्रिके मध्यमें ५० । ६० बार मल निर्गत हो जाता है। रोगी एकबार मलत्याग करनेको बैठनेसे फिर उठना नहीं चाहता। वह उदरकी वेदना और अतिशय वेगके कारणसे सर्वदा ही व्याकुल रहता है। पीछे उदर अल्प या अधिक स्फीत होनेसे सरलान्त्रमें क्षत उत्पन्न होता; इसलिये उदरसे गलित पदार्थ भी बाहर निकल आता है। धीरे-धीरे नाड़ी क्षीण, मुखमें क्षत, हस्तपदादि शीतल, सर्व्वाङ्गमें सड़ा दुर्गन्ध, प्रलाप प्रभृति उपसर्गोंके बाद रोगीकी मृत्यु होती है। किसी-किसी स्थलमें अन्तकाल पर्यन्त ज्ञानका कुछ भी वैलक्षण्य देख नहीं पड़ता। ऐसा भी देखा गया है, कि समस्त इन्द्रियोंके अवश 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करनेसे तीन घण्टेमें सामान्य रक्तामाशयका वेग और रक्त रुक जाता है। आयापानवाले पत्तेके रसको सेवन करनेसे सहज आमाशयका निवारण होता है। सोंठ, अजवायन, जीरा, जायफल, कनशुरकी जड़ और इन्द्रयवके बकलेका क्वाथ ही रक्तातिसारका प्रधान औषध है। इसमें इन्द्रयववाले बकलेके क्वाथको छोड़ दूसरी चीज़ें किसी कामकी नहीं। फिर भी, इन्द्रयवका बकला कषाय और कटु होता, किसी आग्नेय द्रव्यके साथ सेवन न करनेसे वह पेटकोचपेटकर पकड़ सकता है; इसौसे सोंठ प्रभृति द्रव्य उसमें मिलाना आवश्यक है। अजवायन १३॥, जौरा ६॥, सोंठ ३१, जायफल १॥ और कनशरको जड़ २॥ रत्ती कूट-पौसके एक पुड़िया बनाये। इसके बाद डेढ़ सेर इन्द्रयवका बकला एक सेर जलमें उबाले, जब आध सेर जल रह जाये, तब उसे नीचे उतार ले। प्रत्यह सवेरे आध पाव इस क्वाथमें एक पुड़िया बांटके डाले और कुछ <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> n8t4rd9ef67ac7psr0yeteg4r5fqqpw 664871 664870 2026-07-04T02:48:57Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 664871 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" 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होनेसे क्रमशः दिवारात्रिके मध्यमें ५० । ६० बार मल निर्गत हो जाता है। रोगी एकबार मलत्याग करनेको बैठनेसे फिर उठना नहीं चाहता। वह उदरकी वेदना और अतिशय वेगके कारणसे सर्वदा ही व्याकुल रहता है। पीछे उदर अल्प या अधिक स्फीत होनेसे सरलान्त्रमें क्षत उत्पन्न होता; इसलिये उदरसे गलित पदार्थ भी बाहर निकल आता है। धीरे-धीरे नाड़ी क्षीण, मुखमें क्षत, हस्तपदादि शीतल, सर्व्वाङ्गमें सड़ा दुर्गन्ध, प्रलाप प्रभृति उपसर्गोंके बाद रोगीकी मृत्यु होती है। किसी-किसी स्थलमें अन्तकाल पर्यन्त ज्ञानका कुछ भी वैलक्षण्य देख नहीं पड़ता। ऐसा भी देखा गया है, कि समस्त इन्द्रियोंके अवश होने और शरीरमें केवल जीवात्माके रह जानेपर भी रोगी ज्ञानसे बात करता रहता, वाक्यमें कुछ भी जड़ता नहीं आती। इसीसे प्रवाद <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>है, कि इष्टदेवताका नाम लेते-लेते सज्ञानमें मृत्यु होनेके लिये पूर्व्वकालके ऋषियोंने अतिसार रोगको ईश्वरसे कामना कर लिया था। इस समय एक विशेष सतर्कता आवश्यक है। रक्तामाशयको सामान्य व्याधि बता हमारे देशके कितने ही लोग पहले निश्चिन्त रहते हैं। पीड़ा उत्कट न हो जानेसे झाड़-फूंकपर ही प्रायः अनेक लोग भरोसा रखते हैं। कितनीं हीको विश्वास है, कि हिन्दुस्थानमें अनेक प्रकार अवधूत मतके टोटके तथा झाड़-फूँकवाले औषधोंसे नाना प्रकार कठिन रोगोंका निवारण होता है। किन्तु इसपर भी, अज्ञ लोगोंके हाथमें प्राणसमर्पण करना कर्त्तव्य नहीं। विशेषतः रक्तामाशय उपस्थित होनेसे यक्वत्की कोई न कोई पीड़ा उठ खड़े होनेकी सम्भावना रहती है। इसलिये पहलेसे ही सुचिकित्सकके हाथमें चिकित्साका भार अर्पण करना चाहिये। <small>अवधूत और जड़ी-बूँटीकी चिकित्सा</small>—सामान्य प्रकारका रक्तातिसार कितने ही सहज उपायोंसे निवारण होता है। सूरतके पत्ते थूकके साथ दोनो हाथोंके नीचे मर्दन करनेसे तीन घण्टेमें सामान्य रक्तामाशयका वेग और रक्त रुक जाता है। आयापानवाले पत्तेके रसको सेवन करनेसे सहज आमाशयका निवारण होता है। सोंठ, अजवायन, जीरा, जायफल, कनशुरकी जड़ और इन्द्रयवके बकलेका क्वाथ ही रक्तातिसारका प्रधान औषध है। इसमें इन्द्रयववाले बकलेके क्वाथको छोड़ दूसरी चीज़ें किसी कामकी नहीं। फिर भी, इन्द्रयवका बकला कषाय और कटु होता, किसी आग्नेय द्रव्यके साथ सेवन न करनेसे वह पेटको चपेटकर पकड़ सकता है; इसीसे सोंठ प्रभृति द्रव्य उसमें मिलाना आवश्यक है। अजवायन १३॥, जीरा ६॥, सोंठ ३।, जायफल १॥ और कनशरकी जड़ २॥ रत्ती कूट-पीसके एक पुड़िया बनाये। इसके बाद डेढ़ सेर इन्द्रयवका बकला एक सेर जलमें उबाले, जब आध सेर जल रह जाये, तब उसे नीचे उतार ले। प्रत्यह सवेरे आध पाव इस क्वाथमें एक पुड़िया बांटके डाले और कुछ <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ozq040hits9jdyx27rqynraan4djzqm 664872 664871 2026-07-04T02:49:09Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ 664872 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२७६'''|'''अतिसार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>उदरके भीतर मरोड़ उठा करती और मध्य-मध्यमें सारा पेट दुखने लगता है। मलहारमें अल्प ज्वाला और वेग मालूम पड़ता है। रोगी मलत्याग करने दौड़ता, किन्तु अधिक मल नहीं निकलता। पेटकी वेदना और उसका वेग विचारकर देखनेसे जाना जाता है, कि बहुत मल निकलेगा। किन्तु वास्तविक अनेक स्थलमें कुछ भी मल निःसरण नहीं होता। अनेकक्षण वेगके बाद किञ्चित आम और रक्त निकल आता है। उस समय रोगी अपनेको कुछ सुस्थ समझता है। किन्तु क्षणकालके मध्यमें ही फिर वेग बढ़ता और पेटमें वेदना होने लगती है। कहीं तो, विरेचनके साथ प्रथम-प्रथम मल मिश्रित रहता है। इसके बाद कभी अल्प मल निकलता; कभी मलका सम्पर्कमात्र भी नहीं रहता; केवल श्लेष्मा और रक्त निर्गत होता है। कहीं-कहीं मारी गई बकरीकासा ताज़ा खून निकल पड़ता है। प्रबल पीड़ामें सर्व्वाङ्ग उष्ण, नाड़ी वेगवती, मुखमण्डल मलिन और अत्यन्त ग्लानियुक्त हो जाता है। सरलान्त्रमें अत्यन्त प्रदाह होनेसे रोगी पेशाब नहीं कर सकता, कितने ही कष्टसे केवल दो-एक विन्दु मूत्र उतरता है। इस अवस्थामें रोग शान्त न होनेसे क्रमशः दिवारात्रिके मध्यमें ५० । ६० बार मल निर्गत हो जाता है। रोगी एकबार मलत्याग करनेको बैठनेसे फिर उठना नहीं चाहता। वह उदरकी वेदना और अतिशय वेगके कारणसे सर्वदा ही व्याकुल रहता है। पीछे उदर अल्प या अधिक स्फीत होनेसे सरलान्त्रमें क्षत उत्पन्न होता; इसलिये उदरसे गलित पदार्थ भी बाहर निकल आता है। धीरे-धीरे नाड़ी क्षीण, मुखमें क्षत, हस्तपदादि शीतल, सर्व्वाङ्गमें सड़ा दुर्गन्ध, प्रलाप प्रभृति उपसर्गोंके बाद रोगीकी मृत्यु होती है। किसी-किसी स्थलमें अन्तकाल पर्यन्त ज्ञानका 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सहज उपायोंसे निवारण होता है। सूरतके पत्ते थूकके साथ दोनो हाथोंके नीचे मर्दन करनेसे तीन घण्टेमें सामान्य रक्तामाशयका वेग और रक्त रुक जाता है। आयापानवाले पत्तेके रसको सेवन करनेसे सहज आमाशयका निवारण होता है। सोंठ, अजवायन, जीरा, जायफल, कनशुरकी जड़ और इन्द्रयवके बकलेका क्वाथ ही रक्तातिसारका प्रधान औषध है। इसमें इन्द्रयववाले बकलेके क्वाथको छोड़ दूसरी चीज़ें किसी कामकी नहीं। फिर भी, इन्द्रयवका बकला कषाय और कटु होता, किसी आग्नेय द्रव्यके साथ सेवन न करनेसे वह पेटको चपेटकर पकड़ सकता है; इसीसे सोंठ प्रभृति द्रव्य उसमें मिलाना आवश्यक है। अजवायन १३॥, जीरा ६॥, सोंठ ३।, जायफल १॥ और कनशरकी जड़ २॥ रत्ती कूट-पीसके एक पुड़िया बनाये। इसके बाद डेढ़ सेर इन्द्रयवका बकला एक सेर जलमें उबाले, जब आध सेर जल रह जाये, तब उसे नीचे उतार ले। प्रत्यह सवेरे आध पाव इस क्वाथमें एक पुड़िया बांटके डाले और कुछ <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> iqv18mm2hvb1mzot5d2pezu3k1ea6tk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३०१ 250 83589 664873 346993 2026-07-04T03:02:19Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664873 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२९४'''|'''अत्रिगुण—अत्रिसंहिता'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> सप्तर्षि मघानक्षत्र, चार वत्सर अवस्थान करते हैं। ऐसा होनेसे सप्तर्षियोंका अवस्थान-काल कोई ५००० वत्सर पूर्व होता है। इसलिये उसी समयमें अत्रि-ऋषिका आविर्भाव काल सम्भव जान पड़ता है। सप्तर्षि देखी। अत्रिगुण (स० त्रि०) १ जो त्रिगुणसे सम्बन्ध न रखे ; सत्त्व, रजः और तमः-इन तीनो गुणोंसे अलग। (क्लो०) २ त्रिगुण-भिन्न अन्य वस्तु, तीन गुणोंको छोड़ कोई दूसरी चीज़। अत्रिचतुरह (सं० पु०) यज्ञविशेष, एक प्रकारका याग। अत्रिज (सं० पु.) अत्रिसे उत्पन्न, अत्रिके लड़के चन्द्र, दत्तात्रेय और दुर्वासा। अत्रिजात (स• पु०) अत्रेर्नेत्रात् जातः, जन-क्त, ५ तत्। चन्द्र, चांद। चन्द्र महर्षि अत्रिके चक्षुसे उत्पन्न हुए थे। अत्रिग्ज (सं० पु.) अत्रे शो नेत्रात् जायते, जन-ड । चन्द्र, चांद। अत्रिन् (सं० पु.) १ भक्षक, खानेवाला। २ भूत, साया। ३ राक्षस, आदमखोर । अत्रिनेत्रज अत्रिनेत्रप्रभव अत्रिनेत्रप्रसूत -अविहग्ज देखो। अत्रिनेत्रभू अत्रिप्रिया (सं० स्त्री०) अत्रिकी स्त्री और कर्दम मुनिको कन्या अनुसूया । अत्रिभारहाजिका (सं० स्त्री०) अत्रिभारद्वाज-वुन् ; अत्रिभारहाजवंशयोः मैथुनम्। इन्दाहुन् वरमेथुनिकयो । पा ४।३।१२५॥ अत्रि और भरद्वाज वंशजात स्त्रीपुरुषोंका मिलन, अत्रिभारद्वाजी विवाह ; अत्रि और भारद्वाज खान्दानको शादी। अत्रिसंहिता (सं० स्त्री०) अत्रिणा प्रणीता संहिता स्मृतिः। अत्रि ऋषि-प्रणीत संहिताविशेष, अत्रि ऋषिकी बनाई संहिता। इसमें प्रधान ज्ञातव्य विषय यह बताये गये हैं,-चार वर्णों को कर्मवृत्ति, राजधर्म, शोधन और स्नानविधि, शौचादि लक्षण, इष्टापूर्त्तवर्णन, यमनियमादि, प्रायश्चित्तविधि, अशौचनिर्णय, चान्द्रा- यणादि विधि, वव्रतविधि, षड्भिक्षुकनिर्णय, महा-पातकादिनिरूपण, नारौशुद्धि, आकरशुद्धि, प्राणायाम- लक्षण, दानविधि, श्राद्धीयब्राह्मण-निरूपण, श्राद्धफल इत्यादि। इस संहितामें शङ्ख, आपस्तम्ब, शातातप, यम और मनुसंहिताका उल्लेख पाया जाता है। क्या यह समस्त धर्मशास्त्र रचित होनेके बाद अत्रिसंहिता बनी थी? इसको हम ठीक तौरसे कह नहीं सकते। कारण, मन्वादिको अपेक्षा प्राचीन ग्रन्थ गृह्यसूत्रमें भी आत्रेय संहिताका नाम विद्यमान है। मनुने भो एक जगह कहा है,–'अत्रि और उतथ्यपुत्रके मतसे जो व्यक्ति शूद्रासे विवाह करता, वह अपने इस कार्य द्वारा पतित हो जाता है।' मनु ३।१। याज्ञवल्कासंहिता और अग्निपुराणमें भी अत्रि धर्मशास्त्रकर्ता बताये गये हैं,- "मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्क्यो हारीतोऽबियमोऽङ्गिराः ।" अग्निपु० १६२।१। फिर आजकल जो अत्रिसंहिता मिलती, वह क्या उक्त मन्वादिको अपेक्षा प्राचीन है ? कभी नहीं। इसका कोई-कोई अंश उनकी अपेक्षा प्राचीन हो सकता है। प्रथमतः मनुके वचनसे अत्रिका जो मत मिलता, वह उसमें प्रकाशित नहीं, जिसे हम अत्रिसंहिता कहते हैं। द्वितीयत: इस अत्रिसंहितामें मन्वादिका मत उद्धृत हुआ है और कितनी ही अप्राचीन कथायें भी देख पड़ती हैं, "वेद विहीनाथ पठन्ति शास्त्र शास्त्रेण होनाश्च पुराणपाठाः । पुराणहीनाः कृषिणोभवन्ति अष्टास्ततो भागवता भवन्ति ॥" इस श्लोकमें पुराणों के नाम रहनेसे यही प्रमाणित होता, कि अत्रिसंहिता पुराणों के बाद बनी थी। सिवा इसके इस संहितामें 'म्लेच्छोंके' नाम भौ खूब लिखे हैं। इस संहिताके कितने ही स्थलोंमें आया है,- "भगवानविरब्रवीत्” अर्थात् भगवान् अत्रिने कहा था। यदि महर्षि अत्रि इसके प्रणेता होते, तो कभी ऐसा न<noinclude></noinclude> 76y8n63mxsr857nzsqu52zd4kcl0bqs 664874 664873 2026-07-04T03:03:09Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664874 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२९४'''|'''अत्रिगुण—अत्रिसंहिता'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> सप्तर्षि मघानक्षत्र, चार वत्सर अवस्थान करते हैं। ऐसा होनेसे सप्तर्षियोंका अवस्थान-काल कोई ५००० वत्सर पूर्व होता है। इसलिये उसी समयमें अत्रि-ऋषिका आविर्भाव काल सम्भव जान पड़ता है। सप्तर्षि देखी। अत्रिगुण (स० त्रि०) १ जो त्रिगुणसे सम्बन्ध न रखे ; सत्त्व, रजः और तमः-इन तीनो गुणोंसे अलग। (क्लो०) २ त्रिगुण-भिन्न अन्य वस्तु, तीन गुणोंको छोड़ कोई दूसरी चीज़। अत्रिचतुरह (सं० पु०) यज्ञविशेष, एक प्रकारका याग। अत्रिज (सं० पु.) अत्रिसे उत्पन्न, अत्रिके लड़के चन्द्र, दत्तात्रेय और दुर्वासा। अत्रिजात (स• पु०) अत्रेर्नेत्रात् जातः, जन-क्त, ५ तत्। चन्द्र, चांद। चन्द्र महर्षि अत्रिके चक्षुसे उत्पन्न हुए थे। अत्रिग्ज (सं० पु.) अत्रे शो नेत्रात् जायते, जन-ड । चन्द्र, चांद। अत्रिन् (सं० पु.) १ भक्षक, खानेवाला। २ भूत, साया। ३ राक्षस, आदमखोर । अत्रिनेत्रज अत्रिनेत्रप्रभव अत्रिनेत्रप्रसूत -अविहग्ज देखो। अत्रिनेत्रभू अत्रिप्रिया (सं० स्त्री०) अत्रिकी स्त्री और कर्दम मुनिको कन्या अनुसूया । अत्रिभारहाजिका (सं० स्त्री०) अत्रिभारद्वाज-वुन् ; अत्रिभारहाजवंशयोः मैथुनम्। इन्दाहुन् वरमेथुनिकयो । पा ४।३।१२५॥ अत्रि और भरद्वाज वंशजात स्त्रीपुरुषोंका मिलन, अत्रिभारद्वाजी विवाह ; अत्रि और भारद्वाज खान्दानको शादी। अत्रिसंहिता (सं० स्त्री०) अत्रिणा प्रणीता संहिता स्मृतिः। अत्रि ऋषि-प्रणीत संहिताविशेष, अत्रि ऋषिकी बनाई संहिता। इसमें प्रधान ज्ञातव्य विषय यह बताये गये हैं,-चार वर्णों को कर्मवृत्ति, राजधर्म, शोधन और स्नानविधि, शौचादि लक्षण, इष्टापूर्त्तवर्णन,<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>यमनियमादि, प्रायश्चित्तविधि, अशौचनिर्णय, चान्द्रा- यणादि विधि, वव्रतविधि, षड्भिक्षुकनिर्णय, महा-पातकादिनिरूपण, नारौशुद्धि, आकरशुद्धि, प्राणायाम- लक्षण, दानविधि, श्राद्धीयब्राह्मण-निरूपण, श्राद्धफल इत्यादि। इस संहितामें शङ्ख, आपस्तम्ब, शातातप, यम और मनुसंहिताका उल्लेख पाया जाता है। क्या यह समस्त धर्मशास्त्र रचित होनेके बाद अत्रिसंहिता बनी थी? इसको हम ठीक तौरसे कह नहीं सकते। कारण, मन्वादिको अपेक्षा प्राचीन ग्रन्थ गृह्यसूत्रमें भी आत्रेय संहिताका नाम विद्यमान है। मनुने भो एक जगह कहा है,–'अत्रि और उतथ्यपुत्रके मतसे जो व्यक्ति शूद्रासे विवाह करता, वह अपने इस कार्य द्वारा पतित हो जाता है।' मनु ३।१। याज्ञवल्कासंहिता और अग्निपुराणमें भी अत्रि धर्मशास्त्रकर्ता बताये गये हैं,- "मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्क्यो हारीतोऽबियमोऽङ्गिराः ।" अग्निपु० १६२।१। फिर आजकल जो अत्रिसंहिता मिलती, वह क्या उक्त मन्वादिको अपेक्षा प्राचीन है ? कभी नहीं। इसका कोई-कोई अंश उनकी अपेक्षा प्राचीन हो सकता है। प्रथमतः मनुके वचनसे अत्रिका जो मत मिलता, वह उसमें प्रकाशित नहीं, जिसे हम अत्रिसंहिता कहते हैं। द्वितीयत: इस अत्रिसंहितामें मन्वादिका मत उद्धृत हुआ है और कितनी ही अप्राचीन कथायें भी देख पड़ती हैं, "वेद विहीनाथ पठन्ति शास्त्र शास्त्रेण होनाश्च पुराणपाठाः । पुराणहीनाः कृषिणोभवन्ति अष्टास्ततो भागवता भवन्ति ॥" इस श्लोकमें पुराणों के नाम रहनेसे यही प्रमाणित होता, कि अत्रिसंहिता पुराणों के बाद बनी थी। सिवा इसके इस संहितामें 'म्लेच्छोंके' नाम भौ खूब लिखे हैं। इस संहिताके कितने ही स्थलोंमें आया है,- "भगवानविरब्रवीत्” अर्थात् भगवान् अत्रिने कहा था। यदि महर्षि अत्रि इसके प्रणेता होते, तो कभी ऐसा न<noinclude></noinclude> 8e9sx5hmatm6xpsl2exh3gv40j2mrm6 664876 664874 2026-07-04T03:29:34Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664876 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२९४'''|'''अत्रिगुण—अत्रिसंहिता'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>सप्तर्षि मघानक्षत्र में चार वत्सर अवस्थान करते हैं। ऐसा होनेसे सप्तर्षियोंका अवस्थान-काल कोई ५००० वत्सर पूर्व होता है। इसलिये उसी समयमें अत्रि-ऋषिका आविर्भाव काल सम्भव जान पड़ता है। <small>सप्तर्षि देखी।</small> अत्रिगुण (सं॰ त्रि॰) १ जो त्रिगुणसे सम्बन्ध न रखे; सत्त्व, रजः और तमः—इन तीनो गुणोंसे अलग। (क्ली॰) २ त्रिगुण-भिन्न अन्य वस्तु, तीन गुणोंको छोड़ कोई दूसरी चीज़। अत्रिचतुरह (सं॰ पु॰) यज्ञविशेष, एक प्रकारका याग। अत्रिज (सं॰ 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इष्टापूर्त्तवर्णन,<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>यमनियमादि, प्रायश्चित्तविधि, अशौचनिर्णय, चान्द्रायणादि विधि, वज्रव्रतविधि, षड्भिक्षुकनिर्णय, महा-पातकादिनिरूपण, नारीशुद्धि, आकरशुद्धि, प्राणायाम-लक्षण, दानविधि, श्राद्धीयब्राह्मण-निरूपण, श्राद्धफल इत्यादि। इस संहितामें शङ्ख, आपस्तम्ब, शातातप, यम और मनुसंहिताका उल्लेख पाया जाता है। क्या यह समस्त धर्मशास्त्र रचित होनेके बाद अत्रिसंहिता बनी थी? इसको हम ठीक तौरसे कह नहीं सकते। कारण, मन्वादिकी अपेक्षा प्राचीन ग्रन्थ गृह्यसूत्रमें भी आत्रेय संहिताका नाम विद्यमान है। मनुने भी एक जगह कहा है,—'अत्रि और उतथ्यपुत्रके मतसे जो व्यक्ति शूद्रासे विवाह करता, वह अपने इस कार्य द्वारा पतित हो जाता है।' <small>मनु ३।१६।</small> याज्ञवल्कासंहिता और अग्निपुराणमें भी अत्रि धर्मशास्त्रकर्ता बताये गये हैं,— {{Block center|<poem><small> "मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्क्यो हारीतोऽबियमोऽङ्गिराः।" अग्निपु॰ १६२।१।</poem></small>}} फिर आजकल जो अत्रिसंहिता मिलती, वह क्या उक्त मन्वादिकी अपेक्षा प्राचीन है? कभी नहीं। इसका कोई-कोई अंश उनकी अपेक्षा प्राचीन हो सकता है। प्रथमतः मनुके वचनसे अत्रिका जो मत मिलता, वह उसमें प्रकाशित नहीं, जिसे हम अत्रिसंहिता कहते हैं। द्वितीयत: इस अत्रिसंहितामें मन्वादिका मत उद्धृत हुआ है और कितनी ही अप्राचीन कथायें भी देख पड़ती हैं,— {{Block center|<poem><small>"वेदैर्विहीनाथ पठन्ति शास्त्रं शास्त्रेण हीनाश्च पुराणपाठाः। पुराणहीनाः कृषिणोभवन्ति भष्टास्ततो भागवता भवन्ति॥"</poem></small>}} इस श्लोकमें पुराणों के नाम रहनेसे यही प्रमाणित होता, कि अत्रिसंहिता पुराणों के बाद बनी थी। सिवा इसके इस संहितामें 'म्लेच्छोंके' नाम भी खूब लिखे हैं। इस संहिताके कितने ही स्थलोंमें आया है,—<small>"भगवानत्रिरब्रवीत्" अर्थात् भगवान् अत्रिने कहा था। यदि महर्षि अत्रि इसके प्रणेता होते, तो कभी ऐसा न<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> svzl2vhqnfhvxnfttqliqem797u5yl7 664877 664876 2026-07-04T03:35:38Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664877 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२९४'''|'''अत्रिगुण—अत्रिसंहिता'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>सप्तर्षि मघानक्षत्र में चार वत्सर अवस्थान करते हैं। ऐसा होनेसे सप्तर्षियोंका अवस्थान-काल कोई ५००० वत्सर पूर्व होता है। इसलिये उसी समयमें अत्रि-ऋषिका आविर्भाव काल सम्भव जान पड़ता है। <small>सप्तर्षि देखी।</small> {{outdent|अत्रिगुण (सं॰ त्रि॰) १ जो त्रिगुणसे सम्बन्ध न रखे; सत्त्व, रजः और तमः—इन तीनो गुणोंसे अलग। (क्ली॰) २ त्रिगुण-भिन्न अन्य वस्तु, तीन गुणोंको छोड़ कोई दूसरी चीज़।}} {{outdent|अत्रिचतुरह (सं॰ पु॰) यज्ञविशेष, एक प्रकारका याग।}} {{outdent|अत्रिज (सं॰ पु॰) अत्रिसे उत्पन्न, अत्रिके लड़के चन्द्र, दत्तात्रेय और दुर्वासा।}} {{outdent|अत्रिजात (सं॰ पु॰) अत्रेर्नेत्रात् जातः, जन-क्त, ५ तत्। चन्द्र, चांद। चन्द्र महर्षि अत्रिके चक्षुसे उत्पन्न हुए थे।}} {{outdent|अत्रिदृग्ज (सं॰ पु॰) अत्रेर्दृशो नेत्रात् जायते, जन-ड। चन्द्र, चांद।}} {{outdent|अत्रिन् (सं॰ पु॰) १ भक्षक, खानेवाला। २ भूत, साया। ३ राक्षस, आदमखोर।}} {{outdent|अत्रिनेत्रज}} {{outdent|अत्रिनेत्रप्रभव}} {{outdent|अत्रिनेत्रप्रसूत}} {{outdent|अत्रिनेत्रभू}} <small>अत्रिदृग्ज देखो।</small> 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कारण, मन्वादिकी अपेक्षा प्राचीन ग्रन्थ गृह्यसूत्रमें भी आत्रेय संहिताका नाम विद्यमान है। मनुने भी एक जगह कहा है,—'अत्रि और उतथ्यपुत्रके मतसे जो व्यक्ति शूद्रासे विवाह करता, वह अपने इस कार्य द्वारा पतित हो जाता है।' <small>मनु ३।१६।</small> याज्ञवल्कासंहिता और अग्निपुराणमें भी अत्रि धर्मशास्त्रकर्ता बताये गये हैं,— {{Block center|<poem><small> "मनुर्विष्णुर्याज्ञवल्क्यो हारीतोऽबियमोऽङ्गिराः।" अग्निपु॰ १६२।१।</poem></small>}} फिर आजकल जो अत्रिसंहिता मिलती, वह क्या उक्त मन्वादिकी अपेक्षा प्राचीन है? कभी नहीं। इसका कोई-कोई अंश उनकी अपेक्षा प्राचीन हो सकता है। प्रथमतः मनुके वचनसे अत्रिका जो मत मिलता, वह उसमें प्रकाशित नहीं, जिसे हम अत्रिसंहिता कहते हैं। द्वितीयत: इस अत्रिसंहितामें मन्वादिका मत उद्धृत हुआ है और कितनी ही अप्राचीन कथायें भी देख पड़ती हैं,— {{Block center|<poem><small>"वेदैर्विहीनाथ पठन्ति शास्त्रं शास्त्रेण हीनाश्च पुराणपाठाः। पुराणहीनाः कृषिणोभवन्ति भष्टास्ततो भागवता भवन्ति॥"</poem></small>}} इस श्लोकमें पुराणों के नाम रहनेसे यही प्रमाणित होता, कि अत्रिसंहिता पुराणों के बाद 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proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अविस्थान-अथर्य'''|'''२९५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> लिखते। अतएव इसमें कोई सन्देह नहों, कि आज कलको अत्रिसंहिता किसी दूसरे व्यक्तिको बनाई है। इसमें अत्रिका मत अधिक परिमाणसे सन्निवेशित है। म्म ति देखो।अत्रिस्थान-श्वेतगिरिस्थ जनपद-विशेष। यहां के लोग अत्रिदेवको पूजा करते थे।अत्रिस्म ति-अविसंहिता देखो।अत्रय-आवेय देखो।अत्र गुण्य (स' लौ०) सत्त्व, रजः और तमः-इन तीनो गुणोंका विनाश । सांख्यवादी इस स्थितिको मोक्ष कहते हैं।अत्र व (स अव्य.) इसी स्थानमें, इसी जगह । अत्वच् (सं० त्रि०) चौरहित, जिसमें चमड़ा न हो। अत्वरा (सं० स्त्रो०) शीव्रताको अनुपस्थिति, धैर्य ; इस्तकलाल ।अत्सरुक (सं० पु०) नास्ति सरुरिव मुष्टिवन्धन स्थानं यस्य। खड्ग जैसा, जिसमें मुठिया न हो यज्ञीय पात्रविशेष,-चम्मच, हाथा आदि।अथ, अथो (स. अव्य०) अर्थ चु• अदन्त-ड पृषो- दरादित्वात् रलोपः । १इस समय, अब,. उससमय। २ सिवा, अलावा; अतिरिक्त, भिन्न। ४ किञ्चित्-किञ्चित्, कुछ-कुछ। ५ निःसन्देह, बेशक । ६ किन्तु, परन्तु ; लेकिन, मगर। ७ वरं, वरना; नहीं तो। ८ क्या । ८ किसतरह। १० या । ११ पूरे तौरसे। १२ फिर। इस शब्दसे अनन्तर, प्रारम्भ, प्रश्न, कास्य, अधिकार, संशय, पक्षान्तर, विकल्प,समुच्चय और मङ्गलादि अर्थ निकलते हैं।"मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्न कास्न्येष्वथो अथ।" (अमर) अनन्तर-विवक्षुमाणेनाहृतः पार्थनाथ विषम्म रम् । अर्थात् इसके'बाद ( इन्ट्रका संवाद सुनकर ) यज्ञाभिलाषी युधिष्ठिर कर्तृक निमन्त्रित मुरारि इत्यादि । खानं कृत्वाऽथ भुत्रोत । अर्थात् सान करनेके अनन्तर भोजन करे।आरम्भ-अथ लिङ्गानुशासनं लिख्यते । अर्थात् लिङ्गानुशासन 'लिखना अब आरम्भ किया जाता है।प्रश्न-अथ किमिद तावत्-यह सब फिर क्या है? अथ वक्त समर्थोऽसि ? क्या तुम बोल सकते हो? का स्वा-अथ धातून बम: ? अर्थात् समस्त धातुओंका विषय कहते हैं ? अधिकार-किसी विषयके पहले अथ सन्धिः, अथ समाम: इत्यादि लिखा रहनेसे उसका अधिकार अर्थात् उत्तरोत्तर सम्बन्ध समझा जायेगा। जैसे-अथ सन्धिः अर्थात् सन्धिका अधिकार करके यह प्रबन्ध लिखा जाता है। संशव-शब्दी नित्यः अथानित्यः ? अर्थात् शब्द नित्य है या पक्षान्तर-अथ चैत्त्वमिमं धर्म्य संग्रामं न करिष्यसि। फिर यदि तुम यह धर्मयुद्ध न करोगे । समुच्चय-भौमोऽथार्जुनः । भीम और अर्जुन । मङ्गल-अथातो ब्रह्मजिज्ञासा । अर्थात् मङ्गलाचरणपूर्वक ब्रह्मक जाननकी इच्छा। अथऊ (हिं० पु.) सन्ध्यासे पहले होनेवाल भोजन, जो खाना शाम होनेसे पहले खाया जाये। अथक (हिं० वि०) न थकनेवाला, परिश्रमी। अथकिं (सं० अव्य.) १ हां, यही तो, ठीक है, २ फिर कैसे । ३ और क्या । अथकिमु (सं० अव्य०) १ कितनी अधिकतासे २ इतने परिमाणसे। अथच (सं० अव्य०) और भी, फिर, इसतरह। अथतु (सं• अव्य.) किन्तु, मगर ; विपक्षमें । अथमना (हिं० क्रि०) न थमना, न ठहरना । अस्तमन देखो। अथरा (हिं० पु०) रंगरेज़ोंके कपड़ा रंगने, सुना- रॉके मानिक रेतने, जुलाहोंके सूत भिगोने और ताने में लेई लगानका बरतन । अथरि, अथ (वे. स्त्री०) १ नोकदार अङ्गार या अग्निशिखा। २ भालेको नोक । ३ अङ्गुलि, उंगली। ४ हस्ती, हाथी। इस शब्दका प्रयोग केवल ऋग्वेदमें देख पड़ता और इसका अर्थ सन्दिग्ध है। (हिं. स्त्री०) ५ हलका अथरा। ६ हांडी या घड़ा थापौसे पौटनेको कंभारका बरतन । ७-दही जमानेका कूडा। अथर्य (वै० पु.) १ लगातार चला जानेवाला खू.ब समझे।<noinclude></noinclude> 782wnlvtk449e1qalihixv88keukin7 664897 664895 2026-07-04T10:49:34Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664897 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अविस्थान-अथर्य'''|'''२९५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> लिखते। अतएव इसमें कोई सन्देह नहीं, कि आज कलकी अत्रिसंहिता किसी दूसरे व्यक्तिकी बनाई है। इसमें अत्रिका मत अधिक परिमाणसे सन्निवेशित है। <small>स्मृति देखो।</small> अत्रिस्थान—श्वेतगिरिस्थ जनपद-विशेष। यहां के लोग अत्रिदेवकी पूजा करते थे। अत्रिस्मृति—<small>अविसंहिता देखो।</small> अत्रेय—<small>आवेय देखो।</small> अत्रै गुण्य (सं॰ ली॰) सत्त्व, रजः और तमः—इन तीनो गुणोंका विनाश। सांख्यवादी इस स्थितिको मोक्ष कहते हैं। अत्रैव (सं॰ अव्य॰) इसी स्थानमें, इसी जगह। अत्वच् (सं॰ त्रि॰) चर्म्मरहित, जिसमें चमड़ा न हो। अत्वरा (सं॰ स्त्री॰) शीघ्रताकी अनुपस्थिति, धैर्य ; इस्तक़लाल। अत्सरुक (सं॰ पु॰) नास्ति त्सरुरिव मुष्टिवन्धन स्थानं यस्य। खड्ग़ जैसा, जिसमें मुठिया न हो यज्ञीय पात्रविशेष,—चम्मच, हाथा आदि। अथ, अथो (स॰ अव्य॰) अर्थ चु॰ अदन्त-ड पृषोदरादित्वात् रलोपः। १ इस समय, अब, उस समय। २ सिवा, अलावा; अतिरिक्त, भिन्न। ४ किञ्चित्-किञ्चित्, कुछ-कुछ। ५ निःसन्देह, बेशक। ६ किन्तु, परन्तु; लेकिन, मगर। ७ वरं, वरना; नहीं तो। ८ क्या। ९ किसतरह। १० या। ११ पूरे तौरसे। १२ फिर। इस शब्दसे अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न, कार्त्स्य, अधिकार, संशय, पक्षान्तर, विकल्प, समुच्चय और मङ्गलादि अर्थ निकलते हैं। {{Block center|<poem><small> "मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्न कार्त्स्येष्वथो अथ।"</poem></small> <small>अनन्तर—विवक्षुमाणेनाहृतः पार्थेनाथ हिषम्मु रम्।</small> अर्थात् इसके बाद (इन्ट्रका संवाद सुनकर) यज्ञाभिलाषी युधिष्ठिर कर्त्तृक निमन्त्रित मुरारि इत्यादि। <small>स्नानं कृत्वाऽथ भुञ्चोत। अर्थात् स्नान करनेके अनन्तर भोजन करे। <small>आरम्भ—अथ लिङ्गानुशासनं लिख्यते।</small> अर्थात् लिङ्गानुशासन लिखना अब आरम्भ किया जाता है। <small>प्रश्न—अथ किमिदं तावत्</small>—यह सब फिर क्या है? <small>अथ वक्तं समर्थोऽसि?</small> क्या तुम बोल सकते हो?<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>कार्त्सा—अथ धातून् बूम:?</small> अर्थात् समस्त धातुओंका विषय कहते हैं ? अधिकार-किसी विषयके पहले अथ सन्धिः, अथ 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चर्म्मरहित, जिसमें चमड़ा न हो। अत्वरा (सं॰ स्त्री॰) शीघ्रताकी अनुपस्थिति, धैर्य ; इस्तक़लाल। अत्सरुक (सं॰ पु॰) नास्ति त्सरुरिव मुष्टिवन्धन स्थानं यस्य। खड्ग़ जैसा, जिसमें मुठिया न हो यज्ञीय पात्रविशेष,—चम्मच, हाथा आदि। अथ, अथो (स॰ अव्य॰) अर्थ चु॰ अदन्त-ड पृषोदरादित्वात् रलोपः। १ इस समय, अब, उस समय। २ सिवा, अलावा; अतिरिक्त, भिन्न। ४ किञ्चित्-किञ्चित्, कुछ-कुछ। ५ निःसन्देह, बेशक। ६ किन्तु, परन्तु; लेकिन, मगर। ७ वरं, वरना; नहीं तो। ८ क्या। ९ किसतरह। १० या। ११ पूरे तौरसे। १२ फिर। इस शब्दसे अनन्तर, आरम्भ, प्रश्न, कार्त्स्य, अधिकार, संशय, पक्षान्तर, विकल्प, समुच्चय और मङ्गलादि अर्थ निकलते हैं। {{Block center|<poem><small> "मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्न कार्त्स्येष्वथो अथ।"</poem></small>}} <small>अनन्तर—विवक्षुमाणेनाहृतः पार्थेनाथ हिषम्मु रम्।</small> अर्थात् इसके बाद (इन्ट्रका संवाद सुनकर) यज्ञाभिलाषी युधिष्ठिर कर्त्तृक निमन्त्रित मुरारि इत्यादि। <small>स्नानं कृत्वाऽथ भुञ्चोत। अर्थात् स्नान करनेके अनन्तर भोजन करे। <small>आरम्भ—अथ लिङ्गानुशासनं लिख्यते।</small> अर्थात् लिङ्गानुशासन लिखना अब आरम्भ 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(सं॰ अव्य॰) १ कितनी अधिकतासे २ इतने परिमाणसे। अथच (सं॰ अव्य॰) और भी, फिर, इसतरह। अथतु (सं॰ अव्य॰) किन्तु, मगर; विपक्षमें। अथमना (हिं॰ क्रि॰) न थमना, न ठहरना। {{Right|<small>अस्तमन देखो।</small>}} अथरा (हिं॰ पु॰) रंगरेज़ोंके कपड़ा रंगने, सुनारोके मानिक रेतने, जुलाहोंके सूत भिगोने और तानेमें लेई लगानका बरतन। अथरि, अथरी (वै॰ स्त्री॰) १ नोकदार अङ्गार या अग्निशिखा। २ भालेकी नोक। ३ अङ्गुलि, उंगली। ४ हस्ती, हाथी। इस शब्दका प्रयोग केवल ऋग्वेदमें देख पड़ता और इसका अर्थ सन्दिग्ध है। (हिं॰ स्त्री॰) ५ हलका अथरा। ६ हांडी या घड़ा थापीसे पीटनेको कुंभारका बरतन। ७ दही जमानेका कूंडा। अथर्य (वै॰ पु॰) १ लगातार चला जानेवाला<noinclude></noinclude> b2xlra7v9azigqt9x4r3j1ds2gvplt0 664899 664898 2026-07-04T11:18:35Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 664899 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अविस्थान-अथर्य'''|'''२९५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> लिखते। अतएव इसमें कोई सन्देह नहीं, कि आज 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<small>पक्षान्तर—अय चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।</small> फिर यदि तुम यह धर्म्मयुद्ध न करोगे। <small>समुच्चय—भौमोऽथार्जुनः।</small> भीम और अर्जुन। <small>मङ्गल—अवातो ब्रह्मजिज्ञासा।</small> अर्थात् मङ्गलाचरणपूर्वक ब्रह्मके जाननकी इच्छा। अथऊ (हिं॰ पु॰) सन्ध्यासे पहले होनेवाल भोजन, जो खाना शाम होनेसे पहले खाया जाये। अथक (हिं॰ वि॰) न थकनेवाला, परिश्रमी। अथकिं (सं॰ अव्य॰) १ हां, यही तो, ठीक है, ख़ूब समझे। २ फिर कैसे। ३ और क्या। अथकिमु (सं॰ अव्य॰) १ कितनी अधिकतासे २ इतने परिमाणसे। अथच (सं॰ अव्य॰) और भी, फिर, इसतरह। अथतु (सं॰ अव्य॰) किन्तु, मगर; विपक्षमें। अथमना (हिं॰ क्रि॰) न थमना, न ठहरना। {{Right|<small>अस्तमन देखो।</small>}} अथरा (हिं॰ पु॰) रंगरेज़ोंके कपड़ा रंगने, सुनारोके मानिक रेतने, जुलाहोंके सूत भिगोने और तानेमें लेई लगानका बरतन। अथरि, अथरी (वै॰ स्त्री॰) १ नोकदार अङ्गार या अग्निशिखा। २ भालेकी नोक। ३ अङ्गुलि, उंगली। ४ हस्ती, हाथी। इस शब्दका प्रयोग केवल ऋग्वेदमें देख पड़ता और इसका अर्थ सन्दिग्ध है। (हिं॰ स्त्री॰) ५ हलका अथरा। ६ हांडी या घड़ा थापीसे पीटनेको कुंभारका बरतन। ७ 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लिखना अब आरम्भ किया जाता है। <small>प्रश्न—अथ किमिदं तावत्</small>—यह सब फिर क्या है? <small>अथ वक्तं समर्थोऽसि?</small> क्या तुम बोल सकते हो?<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>कार्त्सा—अथ धातून् बूम:?</small> अर्थात् समस्त धातुओंका विषय कहते हैं? <small>अधिकार</small>—किसी विषयके पहले <small>अथ सन्धिः, अथ समास:</small> इत्यादि लिखा रहनेसे उसका अधिकार अर्थात् उत्तरोत्तर सम्बन्ध समझा जायेगा। जैसे—<small>अथ सन्धिः</small> अर्थात् सन्धिका अधिकार करके यह प्रबन्ध लिखा जाता है। <small>संशय—शब्दो नित्यः अथानित्यः?</small> अर्थात् शब्द नित्य है या अनित्य? <small>पक्षान्तर—अय चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।</small> फिर यदि तुम यह धर्म्मयुद्ध न करोगे। <small>समुच्चय—भौमोऽथार्जुनः।</small> भीम और अर्जुन। <small>मङ्गल—अवातो ब्रह्मजिज्ञासा।</small> अर्थात् मङ्गलाचरणपूर्वक ब्रह्मके जाननकी इच्छा। {{outdent|अथऊ (हिं॰ पु॰) सन्ध्यासे पहले होनेवाल भोजन, जो खाना शाम होनेसे पहले खाया जाये।}} {{outdent|अथक (हिं॰ वि॰) न थकनेवाला, परिश्रमी।}} {{outdent|अथकिं (सं॰ अव्य॰) १ हां, यही तो, 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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२६६'''|'''अथर्व—अथर्वभूत'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> २ भाले पथिक, मुसाफिर जो बराबर चलता रहे। शतपथ ब्राह्मणमें लिखा है, कि दध्यञ्च नामक जैसौ नोकीली वस्तु। ३ वह पदार्थ जिससे भालेको एक ऋषि अथर्वाके पुत्र थे,- नोक जैसे अङ्कर फूट। “तमुत्वा दध्यनृषिः पुत्र इधै अथर्वणः ।" अथवे (स० पु० ब्रह्मार्क ज्येष्ठपुत्र, जिनको उन्होंने अथर्वाके पुत्र दध्यञ्च ऋषिने आपको ( अग्निको) ब्रह्मविद्या बताई थी। प्रज्वलित किया था। अथर्वण (सं० पु० ) अथर्वन्-अच्, पृषोदरादित्वात् न अथर्ववेदमें अथर्वा और वरुणके सम्बन्धपर एक टेर्लोपः। शिव, जिन्हें अथर्वमुनि-प्रोक्त विद्या ज्ञात है। उपाख्यान लिखा है। वरुणने अथर्वाको एक विचित्र अथर्वणि (सं० पु०) अथर्वा तदुक्तशास्त्रादौ कुशलः, नित्यवत्सा धेनु दी थी। पृनि धेनु वरुणेन दत्तामथर्वणे अथर्वन्-इस्। १ अथर्ववेदज्ञ ब्राह्मण, अथर्ववेदको मुयां नित्यवत्माम्। कुछ दिन बाद वरुणने वही धेनु जाननेवाला ब्राह्मण। २ पुरोहित । बापस लेनेका यत्न किया। अथर्व वेद-१४ देखो। अथर्व न् (सं० पु०) अथ-ऋ-वनिप्, शक । अथवा अन्तमें अथर्वाने वरुणदेवसे कहा, 'हम परस्पर बन्धु नामक ऋषि। मुण्डक उपनिषद्के प्रारम्भमें लिखा और एक ही वंशमें उत्पन्न हुए हैं।' इसी उपाख्यान- है, कि अथर्वा ब्रह्माके ज्येष्ठ पुत्र थे,- को देख कोई-कोई अनुमान करते हैं, कि वशिष्ठ ""ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्त्र कर्ता भुवनस्य गोप्ता । और अथर्वा ऋषि एक ही व्यक्ति थे, एवं वरुण और म ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठ पुवाय प्राह ॥ १' विश्वामित्र ये दोनो भी कोई पृथक् व्यक्ति नहीं थे। अथवणे बां प्रवर्दत ब्रह्माया तां पुरोवाचाभिरे ब्रह्मविद्याम् । ऐसा अनुमान करनेका कारण यह है, कि महाभारत म भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥" २ और रामायणको एक कथामें लिखा है-विश्वामित्र देवताओंके मध्यमें पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुए थे। वशिष्ठको धेनु बलपूर्वक लेने आये थे। इसके लिये वह इस विश्वके कर्ता और रक्षक रहे। उन्होंने महाविरोध उपस्थित हुआ। इसके सिवा कुल- अपने ज्य ठपुत्र अथर्वाको सकल विद्याओंको मूल विवरण देखनेसे भी दोनो एक ही वंशसे उत्पन्न ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया। ब्रह्माने अथर्वाको जो प्रमाणित होते हैं। जो हो, दोनो उपाख्यानोंमें सिखाया था, अथर्वाने उसे अङ्गिराके निकट प्रकाश सादृश्य रहनसे अथर्वा और वशिष्ठ एक व्यक्ति नहीं कर दिया। फिर अङ्गिराने भरवाज-वंशोद्भव सत्व हो सकते। इस बातका कोई विशेष प्रमाण भी नहीं वाहको वही विद्या बताई। वही श्रेष्ठ विद्या सत्य मिलता है। वाहने अङ्गिरसको पड़ाई थी। यह शब्द एकवचनमें वैदिक पुरोहितोंके प्रधान, ऋग्वेद प्रभृति प्राचीन पुस्तकें देखनेसे ऐसी प्रतीति और बहुवचनमें अथर्व न्के वंशका बोधक है। होती है, कि अथर्वाने पहले अग्निको सृष्टि और अथर्व न्के वंशज अश्वत्थोंको दानस्तुतिमें वर्णित हैं और आर्यों में सबसे आगे यज्ञादि क्रिया प्रवर्तित समय-विशेषपर दूधमें मधु डालके इनके पौनकी बात की थी। भी वेदमें लिखी है। तैत्तिरीय ब्राह्मणके अनुसार जो "अग्निर्जाती अथर्वणा विददिश्वानि कान्या। भुवढू तो विवश्वतो।' गौ असमयमें गर्भपात करे, वह अथर्वनीको हौ दी जाना चाहिये। इनके अग्नि, दध्यञ्च, भिषज्, बृहद्दिव अथर्वाने अग्निको उत्पन्न किया था, जो सब और कवन्ध-यह कई एक पुत्र थे। विद्या जानते रहे। वह विवस्वतके दूत बने थे। अथर्वनी (हिं० पु०) अथर्वन्वाला आचार्य जो अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदने ।" . ( वाजसनेय संहिता.) कर्मकाण्ड या यज्ञ कराये, पुरोहितं । हे अग्नि ! अथर्वाने आपको पहले उत्पन्न अथर्वभूत ( सं० पु.). बारह महर्षियोंको किया था। उपाधि। कृम्वेद १०।२२१५ <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> d835q0m6e6lj33fi8710hc4nasa81so 664903 664901 2026-07-04T11:51:00Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 664903 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२६९'''|'''अथर्व—अथर्वभूत'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> पथिक, मुसाफिर जो बराबर चलता रहे। २ भालेजैसौ नोकीली वस्तु। ३ वह पदार्थ जिससे भालेको नोक जैसे अङ्कर फूट। अथवे (स० पु० ब्रह्मार्क ज्येष्ठपुत्र, जिनको उन्होंने ब्रह्मविद्या बताई थी।अथर्वण (सं० पु० ) अथर्वन्-अच्, पृषोदरादित्वात् नटेर्लोपः। शिव, जिन्हें अथर्वमुनि-प्रोक्त विद्या ज्ञात है। अथर्वणि (सं० पु०) अथर्वा तदुक्तशास्त्रादौ कुशलः, अथर्वन्-इस्। १ अथर्ववेदज्ञ ब्राह्मण, अथर्ववेदको जाननेवाला ब्राह्मण। २ पुरोहित ।अथर्व न् (सं० पु०) अथ-ऋ-वनिप्, शक । अथवा नामक ऋषि। मुण्डक उपनिषद्के प्रारम्भमें लिखा है, कि अथर्वा ब्रह्माके ज्येष्ठ पुत्र थे,-"ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्त्र कर्ता भुवनस्य गोप्ता ।म ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठ पुवाय प्राह ॥ १' अथवणे बां प्रवर्दत ब्रह्माया तां पुरोवाचाभिरे ब्रह्मविद्याम् ।म भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥" २देवताओंके मध्यमें पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुए थे। वह इस विश्वके कर्ता और रक्षक रहे। उन्होंने अपने ज्य ठपुत्र अथर्वाको सकल विद्याओंको मूल ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया। ब्रह्माने अथर्वाको जो सिखाया था, अथर्वाने उसे अङ्गिराके निकट प्रकाश कर दिया। फिर अङ्गिराने भरवाज-वंशोद्भव सत्व वाहको वही विद्या बताई। वही श्रेष्ठ विद्या सत्य वाहने अङ्गिरसको पड़ाई थी।ऋग्वेद प्रभृति प्राचीन पुस्तकें देखनेसे ऐसी प्रतीति होती है, कि अथर्वाने पहले अग्निको सृष्टि और आर्यों में सबसे आगे यज्ञादि क्रिया प्रवर्तित की थी।"अग्निर्जाती अथर्वणा विददिश्वानि कान्या। भुवढू तो विवश्वतो।' कृम्वेद १०।२२१५अथर्वाने अग्निको उत्पन्न किया था, जो सबविद्या जानते रहे। वह विवस्वतके दूत बने थे।अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदने ।" . ( वाजसनेय संहिता.)हे अग्नि ! अथर्वाने आपको पहले उत्पन्न किया था। शतपथ ब्राह्मणमें लिखा है, कि दध्यञ्च नामक एक ऋषि अथर्वाके पुत्र थे,- “तमुत्वा दध्यनृषिः पुत्र इधै अथर्वणः ।" अथर्वाके पुत्र दध्यञ्च ऋषिने आपको ( अग्निको) प्रज्वलित किया था। अथर्ववेदमें अथर्वा और वरुणके सम्बन्धपर एक उपाख्यान लिखा है। वरुणने अथर्वाको एक विचित्र नित्यवत्सा धेनु दी थी। पृनि धेनु वरुणेन दत्तामथर्वणे मुयां नित्यवत्माम्। कुछ दिन बाद वरुणने वही धेनु बापस लेनेका यत्न किया। अथर्व वेद-१४ देखो। अन्तमें अथर्वाने वरुणदेवसे कहा, 'हम परस्पर बन्धु और एक ही वंशमें उत्पन्न हुए हैं।' इसी उपाख्यानको देख कोई-कोई अनुमान करते हैं, कि वशिष्ठ और अथर्वा ऋषि एक ही व्यक्ति थे, एवं वरुण और विश्वामित्र ये दोनो भी कोई पृथक् व्यक्ति नहीं थे। ऐसा अनुमान करनेका कारण यह है, कि महाभारत और रामायणको एक कथामें लिखा है-विश्वामित्र वशिष्ठको धेनु बलपूर्वक लेने आये थे। इसके लिये महाविरोध उपस्थित हुआ। इसके सिवा कुल- विवरण देखनेसे भी दोनो एक ही वंशसे उत्पन्न प्रमाणित होते हैं। जो हो, दोनो उपाख्यानोंमें सादृश्य रहनसे अथर्वा और वशिष्ठ एक व्यक्ति नहीं हो सकते। इस बातका कोई विशेष प्रमाण भी नहीं मिलता है। यह शब्द एकवचनमें वैदिक पुरोहितोंके प्रधान और बहुवचनमें अथर्व न्के वंशका बोधक है। अथर्व न्के वंशज अश्वत्थोंको दानस्तुतिमें वर्णित हैं और समय-विशेषपर दूधमें मधु डालके इनके पौनकी बात भी वेदमें लिखी है। तैत्तिरीय ब्राह्मणके अनुसार जो गौ असमयमें गर्भपात करे, वह अथर्वनीको हौ द जाना चाहिये। इनके अग्नि, दध्यञ्च, भिषज्, बृहद्दिव और कवन्ध-यह कई एक पुत्र थे। अथर्वनी (हिं० पु०) अथर्वन्वाला आचार्य जो कर्मकाण्ड या यज्ञ कराये, पुरोहितं । अथर्वभूत ( सं० पु.). बारह महर्षियोंको उपाधि। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> b1o08h0g7uflqdvekekuw53yryjw7pw पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/१ 250 101958 664835 367229 2026-07-03T16:49:06Z ~2026-38004-84 6714 664835 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बैजनाथ चौधरी" /></noinclude><center>{{xx-larger|हिन्दी}}</center> <center>{{xxxx-larger|<big>'''विश्वकोष'''</big>}}</center> {{rule|6em}} {{C|( चतुर्थ भांग )}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> कपिल (सं०वि०) कम् - इलच् पादेशच । यमेः पय । १।१४। १ पिङ्गतवर्ण, भूरा, तामड़ा, मटमैला । (पु० ) २ अग्नि, भग। ३ वर्णविशेष, मटमैला रंग । ४ कुक्कर, कुत्ता। ५ शिलारस, लोवान्। ६ महादेव ।।७ विष्णु। ८ सर्पविशेष, एक सांप। 2 दानव- विशेष, एक राक्षस । १० वरुणच एक पेड़ । ११ पित्तल, पोतल । १२ मूषिकभेद, किसी किस्मका चूहा। इसके काटने से व्रणकोध, स्वर और ग्रन्थ्युद्भव होता है। (त) १२ कुशद्वीपका पर्वतविशेष, एक (भाग ५/२०/१५) १२ सूर्य, आफताब | १४ वितथके पुत्र । १५ वसुदेवके पुत्र । नराचोके गर्भ से यह उत्पत्र हुये थे । १६ सुनिविशेष। धूमके पिताका नाम कदम और माताका नाम देवहूति रहा। इन्होंने सांख्यदर्शन बनाया है। सांख्याचार्यं कपिच एक अति प्राचीन ऋषि थे । वेदके उपनिषद्भागमें इनका नाम मिलता है। यह सिहर्षियों में सर्वश्रेष्ठ रहे। इससे भगवान्ने गोतामें कहा है- {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"या चित्ररथः सिद्धानां कपिखी सुनिः ।” (गौता १०/२४)</poem>}}}} हम गन्धर्वो में चित्ररथ और सिद्धोंमें कपिल सुनि हैं। {{Rule}} *"ऋषि प्रसूतं कपिसं यस्तमये भानविभर्ति ।" (देवावर ३२) प्रसूत कपिल पिदिने सर्व पोषय थिया । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भागवतमें लिखते - कपिन्त भगवान्का पञ्चम अवतार रहे। उन्होंने महायोगी कदंसके औरस पौर देवहतिके गर्भ से जन्म लिया था। उनके जन्मकात आकाशमें वर्णशौन्त मेघसे नानाविध वाद्य वने, गन्धर्व नाचने लगे, अप्परोंने घानन्दगीत आरम्भ किये, पक्षियों द्वारा पुष्प बरसाये गये और दिक्, जल एवं सर्वप्राणके मन प्रसन्न हुये। स्वयं ब्रह्मा कम आश्रम आये थे । उन्होंने कदमको पोर देखकर कहा- हे सुने ! तुम्हारे यह बालक साक्षात् ईश्वर हैं। यह सिद्दोंके अधीश्वर हो जायेंगे और सांख्याचार्य कक पूनित हो जगत्में 'कपिल' नाम पायेंगे।' इन्होंने ज्ञानसाधन सांख्यशास्त्र- उपदेश करनेको हो यह अवतार लिया है। कपिल ने अपने पिता कर्दम चौर माता देव- इतिको ज्ञान उपदेश किया था । देवद्दतिने स्त्री होते भी पुत्रखे तत्त्वकथा सुन झाग और मोक्ष पाया । भागवत में देवहतिके उपदेशच्छतसे कपिलबाट क सांख्यमत वर्णित है, -- " नी सकने इन्द्रिय प्रकाशात्मक रहते और लिनके द्वारा शब्द पद उनके मनुभवते. भगवान के प्रति उनकी 'निष्कामा भागवतो जिये वह मुझसे ति भी ते एके वितु इन्द्रिय <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> lzoochi7v756aglfwh8nbcuh3uq1ke1 664836 664835 2026-07-03T16:53:28Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 664836 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude><center>{{xx-larger|हिन्दी}}</center> <center>{{xxxx-larger|<big>'''विश्वकोष'''</big>}}</center> {{rule|6em}} {{C|( चतुर्थ भांग )}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> कपिल (सं०वि०) कम् - इलच् पादेशच । यमेः पय । १।१४। १ पिङ्गतवर्ण, भूरा, तामड़ा, मटमैला । (पु० ) २ अग्नि, भग। ३ वर्णविशेष, मटमैला रंग । ४ कुक्कर, कुत्ता। ५ शिलारस, लोवान्। ६ महादेव ।।७ विष्णु। ८ सर्पविशेष, एक सांप। 2 दानव- विशेष, एक राक्षस । १० वरुणच एक पेड़ । ११ पित्तल, पोतल । १२ मूषिकभेद, किसी किस्मका चूहा। इसके काटने से व्रणकोध, स्वर और ग्रन्थ्युद्भव होता है। (त) १२ कुशद्वीपका पर्वतविशेष, एक (भाग ५/२०/१५) १२ सूर्य, आफताब | १४ वितथके पुत्र । १५ वसुदेवके पुत्र । नराचोके गर्भ से यह उत्पत्र हुये थे । १६ सुनिविशेष। धूमके पिताका नाम कदम और माताका नाम देवहूति रहा। इन्होंने सांख्यदर्शन बनाया है। सांख्याचार्यं कपिच एक अति प्राचीन ऋषि थे । वेदके उपनिषद्भागमें इनका नाम मिलता है। यह सिहर्षियों में सर्वश्रेष्ठ रहे। इससे भगवान्ने गोतामें कहा है- {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"या चित्ररथः सिद्धानां कपिखी सुनिः ।” (गौता १०/२४)</poem>}}}} हम गन्धर्वो में चित्ररथ और सिद्धोंमें कपिल सुनि हैं। {{Rule}} *"ऋषि प्रसूतं कपिसं यस्तमये भानविभर्ति ।" (देवावर ३२) प्रसूत कपिल पिदिने सर्व पोषय थिया । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भागवतमें लिखते - कपिन्त भगवान्का पञ्चम अवतार रहे। उन्होंने महायोगी कदंसके औरस पौर देवहतिके गर्भ से जन्म लिया था। उनके जन्मकात आकाशमें वर्णशौन्त मेघसे नानाविध वाद्य वने, गन्धर्व नाचने लगे, अप्परोंने घानन्दगीत आरम्भ किये, पक्षियों द्वारा पुष्प बरसाये गये और दिक्, जल एवं सर्वप्राणके मन प्रसन्न हुये। स्वयं ब्रह्मा कम आश्रम आये थे । उन्होंने कदमको पोर देखकर कहा- हे सुने ! तुम्हारे यह बालक साक्षात् ईश्वर हैं। यह सिद्दोंके अधीश्वर हो जायेंगे और सांख्याचार्य कक पूनित हो जगत्में 'कपिल' नाम पायेंगे।' इन्होंने ज्ञानसाधन सांख्यशास्त्र- उपदेश करनेको हो यह अवतार लिया है। कपिल ने अपने पिता कर्दम चौर माता देव- इतिको ज्ञान उपदेश किया था । देवद्दतिने स्त्री होते भी पुत्रखे तत्त्वकथा सुन झाग और मोक्ष पाया । भागवत में देवहतिके उपदेशच्छतसे कपिलबाट क सांख्यमत वर्णित है, -- " नी सकने इन्द्रिय प्रकाशात्मक रहते और लिनके द्वारा शब्द पद उनके मनुभवते. भगवान के प्रति उनकी 'निष्कामा भागवतो जिये वह मुझसे ति भी ते एके वितु इन्द्रिय <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> oky8vv9jrczbingiweot2e6mdhnlbrk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७७ 250 106239 664812 373098 2026-07-03T12:28:45Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664812 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|३७८| कानपुर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} बिरहोरमें ५१४३ पौर अकबरपुरमें ६३४८ नांगोंका वास है। कानपुर नगर गङ्गानदीके दक्षिण कूल पर प्रव- स्थित है। प्रयागके विवेणीसङ्गमसे १३० मोच ऊपर यह नगर पड़ता है। युक्तपदेशमें कानपुर चतुर्थ नगर है। समुद्रपष्ठसे यह ५०० फीट ऊपर है। निवास (छावनी ), अदालत, टेशन इत्यादि विद्यमान हैं। सेनानिवास और अदालत गङ्गा किनारे है। पूर्वा शमें देशीय पखागेही सेनानिवास और कवायद परड़की जमीन है। कवायद परड़की नमोनसे पशिम युरोपीय पदातिको वारीक और सेण्टजान गिरना है। इसके मध्य गङ्गा किनारे मेमोरियल गिरजा है (यह १८५७ ई को सिपाही-विद्रोहके स्मरणार्थ बना था)। नगरके उत्तरांशमें साधारण कवायदपरड़को जमीन है इसके सम्मुख गङ्गातीर म्युनिसिपल गार्डन है। इस उद्यानमें एक कूप था। आज कल उसी कूप पर एक स्तम्भ बनाया और उसकी चारों और प्राचीरका घेरा लगाया गया है। इस स्तम्भ पर एक वर्गविद्याधरीको मूर्ति है। स्तम्भके गावमें अंगरेजीसे लिखा है- "विठूरके विद्रोही नाना धुन्धुपन्यके दलने १८५७ ईको १५वौं जुलाईको इसी स्थानके निकट अनेक युरोपियों विशेषतः युरोपीय स्त्रियों और शिशवोंको अन्यायरूपसे मार इस कूप में डाल दिया था इस उद्यानको रक्षा के लिये गवरनमेण्टका वार्षिक ५००००/ रु. खर्च होता है। उस विद्रोहमें जो निहस हुये, वह इसी उद्यानके दक्षिण और पश्चिमांशमें गड़े हैं। कानपुर नगर प्राचीन नहीं। इस लिये यहां दर्शनीय अष्टालिका, प्रासाद पौर मन्दिरादि कम है। १७६४१० को बकसर और १७६५ ई०को कोड़े के युद्दमें शुजा-उद-दौला (अवधक नवाबवजीर) परा- जित होनेपर यह नगर बना। नवाब अंगरेजोसे सन्धि कर फतेहगढ़ और कानपुर में सैन्य रखने पर खोजत इये थे। १७७८ को वर्तमान स्थान नवाधिनत स्थानको प्रान्तसीमाके सेनानिवासको निरूपित होनेसे इस नगरको नीव पड़ी। १८०१ १०को अंगरेजोने अवधके नवाबसे इसको चारो ओरका स्थान पाया था। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उस समयसे कानपुर एक जिया और प्रधान नगर गिना जाता है। १८५७ के सिपाही विद्रोहको छोड़ दूसरी कोई ऐतिहासिक घटना या नहीं हुई। मुसलमानोंके अधीन यह जिला पनेक परगनौम विभक्त था। उस समय कानपुर इलाहाबाद और यहां सेना प्रागरेमे लगता था। ११८४० को सारव उद्-दोन गोरीने दोवाव अधिकार किया, उसीके साथ कानपुर भी उनके हाथ लगा। औरंगजेबके समय यहां दो एक सामान्य मपनि वनों यो। मुगच सबाटोको दुर्दशाके समय १७२६ ई०को यह अंश महाराष्ट्रोंके अधिकारमें गया। प्रवधके नवाबसे सन्धि होने पोछ अंगरेजी सेनाने प्रथमतः बेलगांव (विश्वग्राम) और फिर कानपरमें श्रावस्थान किया। सिपाहीविद्रोहके समय कई दिन तक समस्त जिलेमें विद्रोहानच जला था। मेरठमें विद्रोह भारम्भ रक्षाका भार सौंपा गया । जुनमासके प्रथम यहां चारो पोर किले और गड्ढे बना समस्त यूरोपीय बैठे थे। ठौं जूनको कानपुरका देशीय द्वितीय पधारोही दन्त तथा प्रथम पदातिदलने बिगड़ ने तोड़ा, धनागार लटा और पाफिस भादिको गिरा डाला। उसके पीछे विद्रोही दिल्लीक अभिमुख चले गये। उसी समय ५३ एवं' ५४ संख्यक सैन्धदर विद्रोही हुवा। नानासाहवने विद्रोहियोंसे मिन उनके साहाय्यसे यूरोपियों के आवास पाक्रमणपूर्वक तीन सप्ताइ अव- रोध किये थे। वैवीगारदसे अंगरेज (कैवलं सात सौ या एक हजार ही लोग हांगे ) धूपमें खड़े हो चड़ने शेषको अधिकांश अंगरेज मारे गये। बिद्रोही उन्हें परास्त कर उन्मत्त भावसे स्त्रियां और शिशवोंको भी मारने लगे। २५ो जूनको नानासाहबने तावशिष्ट अंगरेजीको रचा करनेमें प्रतिश्रुत हो सबको लेकर कानपुरके सतीचौराघाटमें नौका पर बैठाया था।नौका इलाहाबादको खुननेके पहले तोरस विद्रोही सिपाही गोली चला पारोहियोंको गिराने बगे। दी नौकाबौने भागनेको चेष्टा को थी। किन्तु सिपाहियोंने<noinclude></noinclude> m946c7whceqggy16u8qlq1fz3t69x21 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७८ 250 106241 664814 373100 2026-07-03T13:08:13Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664814 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कानपुर-कानाड़ा| ३०८}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} दोनों किनारसे गोली चला एकको डुबा दिया। यहांसे कई लोग कूद फांद विवरामपुर भाग गये थे। सिपा हियोंने वहसि भी ४ भादमी छोड़ सबको पकड़ मार 'डाला। नौकामें जिसनी स्त्रियां और शिशु थे, सब सवादाको कोठीमें पाबद्ध किये गये। पौछे जब कान पुरक बहिर्देश हाबलकको सीपका प्रथम शब्द सुना, तब सिपाहियोंने उक्त सकल स्त्रियों और शिशवोंको टुकड़े टुकड़े उड़ा दिया था। प्रायः दो सौ प्राणी विनष्ट हुये होंगे; जहां यह व्यापार हुवा, वहां मेमो 'रियल कूप और स्तम्भ बना है। १५ वौं जुताईको हाबसकने पातु नदीके तौर और पवार, युद्धकिया था। उसके दूसरे ही दिन कानपुर पधिक्कत हो गया। २७वों नवम्बरको ग्वालियर और अवधके विद्रो हियोंने आपसमें मिल कानपुर थाक्रमणपूर्वक नगर पधिकार किया था। दूसरे दिन. सन्ध्याकाच लार्ड क्लाइउने प्रा फिर भाक्रमण किया औरठी दिसम्बर को विद्रोहियोंको नगरसे भगा उनका तोप रहकता सद छीन लिया। जनरल वीयालपोसने अकबरपुर, रसूलाबाद और डेरापुर उद्दार किया था। १८५८०के मई मास कालपी उदार होनेसे कानपुर, शान्ति स्थापित हुई। कानफरेन्स (अ.. स्त्री० Conference) १ समाज, मजलिस। २मन्त्रणा, सलाह। कानलक (सं० वि०) कमल-बुज । कनल नामक व्यक्ति द्वारा निर्मित, कनलका बनाया हुवा। कानष्टे बिल (अ.पु. Constable) दण्डधर, चौकी .दार, पुलिसका सिपाही। पुलिसके जमादारको 'हेड कानष्टेबिन' कहते हैं। काना (हिं. वि०) १ काण, एक मांखवाला। २ ममि कोटादि द्वारा विदारित, कोड़ा.लगा. हुवा। हैं। ३ वक्र, टेढ़ा, जो बराबर न हो। (पु.) ४ाकारको मात्रा (1)। यह व्यञ्जनवर्ण में लगता है। कानाकानी (हिं. स्त्रो..) गुप्तकथन, कानाफूसी। कानाटीटी (हिं. सी) णविशेष, एक घास। सानाड़ा-दाक्षिणात्यके पधिस उपकूलका एक प्रदेश। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इसके उत्तर बम्बई प्रान्सका बेलगांव जिला,. दक्षिण मन्द्राज प्रदेशका मलवार जिला, पूर्व बम्बई प्रान्तका धारवाड़ लिखा, महिसुर राज्य एवं कुर्ग, पश्चिम परव- सागर तथा भारत महासागर और उत्तरपश्चिम कोष गोया प्रदेश है। प्रेसिडन्धी विभागके समय कानाड़ा दो भागमें बांटा गया था। उससे उत्तरांश बम्बई प्रेसिडेन्मी और दक्षिांश मन्द्राज प्रेसिडेन्सीक विभागमें पड़ा। उत्तर कानाड़ा अचा० १३ ५३ एवं १५३२ उ० पौर देवा. ७४४ तथा. ७५५ के मध्य अवस्थित है। उसका प्रधान नगर और बन्दर करबर है। उत्तर कानाड़ाके मध्य पश्चिमघाट पर्वतका सह्याद्रिखण्ड उत्तरदक्षिण विस्तृत है। उसकी उच्चता २५०० से ३... फीट तक है। सन्मादि उभय पाच भूमिको एक दिक् उच्च, पोर अपर दिक् निम्न है। उच्च भूभागका नाम बालाघाट है। परि.माण प्रायः ३.१० वर्गसौल है। अनेक क्षुट्ट और वृहत् नदियों का मुखभाग रहनेसे उपकूल भागशी रेखा बहुत छिन मित्र हो गई है। (नदीका मुखप्रशस्त होनेसे ) समुद्रको खाड़ी देशके मध्य दूरतक विस्तृत है। उपकूतके उत्तरपश्चिम कोण करबर अन्तरीप है। समुद्रतीरको भूमि प्राय: वालुकामय है,बीच बीच पहाड़ भी हैं। भागे नारियनके पड़से भरा जंगल और उसके भागे प्रशस्त धान्य क्षेत्र है।उप निम्नभूमिका विस्तार कहौं १५ मोलसे अधिक नहीं। फिर कहों कहों वह ५ही मोल पड़ता है।उसी भूभागके पाखं प्राय:, ३००१४०० फीट उच्च पर्वत है। पर्वतमालाके मध्य - हजार फीट ऊंचे जंगलसे भरे शिखर भी खड़े हैं। शिखरों में बीच बीच उत्तम कर्षित धान्यक्षेत्र और उद्यानयोभित अहालिका बालाघाटको उयनाज जमीन् २५०० फीट तक ऊंची है। : नदीतौरवर्ती कुछ स्थानोंको छोड़ यह जंगलसे भरी और गिरी है। नदीके तौर सामान्य ग्राम और क्षुद्र शस्यक्षेत्र वर्तमान है। सह्याद्रिके उभय पाच नदी हैं।पश्चिम मुख परद-सागर और कुछ पूर्व मुख. वनोप-<noinclude></noinclude> p3tiotljnbb8qj5fb5dgrk1soslhn3r पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७९ 250 106243 664818 373102 2026-07-03T13:58:27Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664818 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|५८०|कानाड़ा}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} सागरमें जा गिरी हैं। पूर्वाशको नदीमें तुङ्गभद्राको उपनदी वर्धा उल्लेखयोग्य है। पश्चिमांशको नदीमें उत्तर कालीनदी, बीचों बीच गङ्गावली एवं तद्रि और दक्षिण शिरावती प्रसिद्ध हैं। शिरावतीका जलराधि होनावाड़ नगरके ३५ मील अपर ४२५- फोट उच्च पर्वतसे भीषणवेगमें गिरता है। . वही विख्यात गारसप्पा प्रपात है। पर्वतमें अधिकांश ग्रेनाइट पत्थर है। फिर अनेकोंके मूलदेश में लेटिराइट है। करवर और होनावाड़के निकट पावत्य प्रदेशसे लेटिराइट - प्रस्तर संग्रहीत हो गृहादिके निर्माणमें लगता है। उक्त प्रदेशके स्थान स्थान पर लोहखनि है। कुमपतासे १८ मौल दूर जान उपत्यकामे चूनेका पत्थर मिलता है। : उत्तर कानाड़ाके वनविभागमें सकल प्रकार हक्ष उत्पन्न होते हैं। उनमें सागवन, पियासाल प्रभृति पधिक देख पड़ते हैं। वहां गवरनमेंटके वनविभागसे लकड़ी कटती है। कृषौको वनसे विना व्यय जसाने के लिये काठ, खादके लिये पत्ता और सह निर्माणके लिये वांस, खूटा वगैरह मिल जाता है। पहले उत्तर कानाडेको लकड़ी गुजरात और बम्बई जाकर बिकती थी। आजकल उसे चनेको करबर ले जाते हैं। दक्षिण कानाड़ा पक्षा० १२ ४.एवं १३° ५८ उ.और देशा० ७४.३४ तया ७५° ४५ पू०के मध्य 'अवस्थित है। वह मन्द्राज प्रेसिडेन्सीमें लगता है। प्रधान नगर मङ्गलूर (मंगरोल या बंगलोर) है। उक्त प्रदेशका प्राकृतिक दृश्य अति सुन्दर है। नंदी अनेक होनेसे क्षेत्र शस्यपूर्ण रहता है। वन नाना वृक्षादिसे भरा है। नारियलके बाग वगैरह काफी हैं। उसके उपकूलभागमें (विस्तारमै ५ से १५ मोल तक) उत्तर दक्षिण सब जगह लोग रहते हैं। पावादी कुछ घनी है। भूभाग लेटराइट प्रस्तरसे पूर्ण और समुद्रपृष्ठ पर ४०७ से १०० फीट तक उच्च है। उसके पागे ही पथिमघाटको बुद्र शिखरमाला है। जमाताबादका पर्वत ( वेलतंगडोके निकट) और गर्दभकर्ण पर्वत सर्वापेक्षा विख्यात है। नहीं <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> प्रदेश में पश्चिम घाट ३००० से ३०.. फीट तक ऊंचा है। पूर्वाधर्म उसीको एक प्रकारको सीमा मान सकते हैं। उसमें अनेक गिरिवन हैं। उनमें सम्पनी, अण्डबी, चरमादी, हैदरगदी या दुसेनगदी, मंजराबाद तथा कलूर प्रभृति कुर्ग और महिसुरके मध्य प्रवस्थित हैं। मंगलोरसे उस गिरिपथ तक शक्टगमनोपयोगी मार्ग है । दक्षिण-कानाड़े को कोई नदी १०० मीत्तसे अधिक विस्तृत नहीं। फिर सब नदियां पश्चिम घाटसे निकली हैं। उनके मध्य ग्रीष्मकालकी भी अनकों में नौका. गमन कर सकती है। नदियों में नेत्रवती, गुरपुर, गोली और चन्द्रगिरि वा पयखनी ही प्रधान है। कारकल नामक स्थान में एक क्षुद्र पौर सुन्दर इद है। फिर कुण्डपुरमें निर्मल जलका अपेक्षाकृत वृहत् इद.भरा है। वहां मृत्तिकाके सुन्दर दू दि बनते हैं। बहुतसे लोग कलमें उस मृत्तिकासे गण और ईट तैयार करते हैं। फिर वहां चीनी मट्टीको भांति एक प्रकारको खवर्ण उज्ज्वल मसूप मृत्तिका भी मिलती. है। मिजार नामक स्थानमें स्वणं, सबमराय एवं कैम्फन नामक स्थानमें दाडिम-वीजाकार क्षुद्र पुनक- मणि और उदिपी तथा उघारंगड़ी तालुकके मध्य लौहकी.खनि है। लोहा निकालनेका काई प्रबन्ध नहीं। दक्षिण कानाड़ेको अधिकांश भूमि अधिवासियोंके. अधिकारमें है। गवरनमेण्ट के अधीन केवल पचिम- घाटको निकटवर्ती वनभूमिका कुछ अंश है। Sa. वनमें नाना प्रकार काछवश, एचा, बन्य पारारोट.. खदिर, दालचीनी, (काल पौर वेल ), गोंद, राल और तरह तरहका रंग उपजता है । मधु, मोम और अन्यान्य द्रव्यादि पहाड़ी लोग (मलयकुदो) संग्रह करते हैं। वहां प्रतिवर्ष प्रायः डेढ़ लाखका चन्दनतेल बनकर बाहर जाता 1 महिमरसे चन्दन काठ प्राता है। किन्तु उसका तेल केवल दक्षिण कानाडामें ही बनाया जाता है। असलमें तो कानाड़ा नामका कोई स्वतंत्र देश,<noinclude></noinclude> 98530bpg2mu7z1txhchkzjduipb4jg6 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८० 250 106245 664827 373104 2026-07-03T14:44:45Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664827 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कानाड़ा-कानिष्ठिक|३८१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} नहीं है। पहले उसकी चतु:सीमा बता चुके हैं। उसके दक्षिणके कितने ही अंशका नाम मलयालम् ' (मलय) है। फिर मध्यांश तुलुब और उत्तरका कुक अंश कर्णाट कहाता है। अनेकोंके कथनानुसार कानाड़ा कर्णाट देशका नामान्तर है। किन्तु यह बात ठीक नहीं। कर्णाट देखो। दक्षिण कानाड़ेके उदीपो परगनेका उत्तर पर्यन्त भूभाग प्राचीन केरल राज्यके अन्तर्गत है। कहा जाता है कि परशुराम क्षत्रियविनाशके पीछे पाण्डा राजावाने जा उस स्थान पर अधिकार किया था। १२५२० तक पाण्डधरान प्रवन रहे। फिर १३३८ई०को वह विजय- नगरराजके अधिकारमें गया। १५६८०को तालि- कोटके युद्ध में विजयनगररानका पराक्रम खर्व हुवा पौर बदनरके सरदारने स्वाधीनता पा बदनर राज्य स्थापन किया। उन्होंने कानाड़े के इनर नामक नौलेश्वर पर्यन्त अधिकार किया था। पीछे चेरकल राजके साथ ईष्टइण्डिया कम्पनीका बन्दोवस्त हुवा। उस समय सत प्रदेश शक्रराज्य कानाड़ाके नामसे लिखा जाता था। कानाडाका उत्तरांश तलुब प्रदेशक अन्तर्गत रहा। १६१से ७१४ ६० तक वह कदम्ब राजापोंके अधिकारमें था। कदव देखो। फिर ७१४से १३३५ई. तक कानाड़ेका उत्तरांश बन्नालवंशके अधीन रहा। बबाल देखो १७६३ई० को हैदरमलौने बदनूरक अधिकार काल कानाड़ाके मध्य मङ्गलोर वासवुर लेने के पीछे मलवार जानेवाली बात। और समस्त जिला अधिकार किया। दो वर्ष पछि अंगरेज सेन्चने इनर और मङ्गलोर जा छुड़ाया था। किन्तु अल्प दिन पीछे ही टीपू सुलतानने पुनरधिकार ' किया। उसके पीछे १९८३-८४ई को टीपूसे अंग रेनोंका दक्षिण कानाड़ेमें महायुद्ध हुवा। अवशेष १७६१ई० को वह सम्पूर्ण रूपसे अंगरेजोंके अधिकारमें पहुंच गया। १८३८ई०को कुर्गराजके साच्यग्रहण के समय अमर और सुलिय प्रदेशके लोगोंनि ख ख प्रदेश अंग रेज राज्यभुक्ता करनेको प्रार्थना की थी। १८३७६०को दृटिशराज उनके प्रस्ताव पर स्वीकृत हुए। समग्र {{Rh|Vol.| 96| IV.}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मगनिस जिला दक्षिण कानाड़ाके पुत्तुर विभागसे मिलाया गया। उसी वर्ष कल्याणाप्पा सुबराय नामक किसी सरदारने कुगैराशके पतनसे अंगरेजोंके विरुद्ध अस्त्र धारण किया। पुत्तुरसे मङ्गलोर पर्यन्त विद्रोह फैला था। उसके पीछे विद्रोही शासित होने पर कानाड़ा प्रदेश दो भागों में बंट बम्बई और मन्द्राज प्रेसीडेन्सी में मिल गया। दक्षिण कानाड़ाका प्रधान नगर मङ्गलोर, बन्तवाल और उदीपी है। उसमें प्रधानतः हिन्दू, पोर्तगीज, फरासीसी, अरब और अनाय लोग रहते हैं। हिन्दुवों में ब्राह्मणोको संख्या अधिक है। वह और कोड-पी नामक दो समाजोंमें विभक्त हैं। द्राविड़ोंसे उद्भूत ब्राह्मण शिवली कहाते हैं। उन्ध देशके अरब मोपला कहाते है। अनार्य स्थानसे लोगोमें मलयकुदिराइ प्रधान हैं। वह जिस प्रणाली कृषिकार्य करते, उसे 'कुमारी' प्रणाली कहते हैं। उत्तर कानाड़ाके मध्य हिन्दुवों में सुपारीके व्यव- सायो हारिक ब्राह्मण ही विख्यात हैं। मुसलमानों में नाविक अरब बपिकों के प्रतिनिधि कहाते हैं। किन्तु वह अल्प संख्यक मिलते हैं। अफरीकासे पानीत पोर्तगीजोंकी कत दासियोंके गर्भजात मुसलमान सौदी नाम आख्यात हैं। उनकी श्रावति इस समय भी बहुत कुछ काफिरोंसे मिलती है। कानाफूसी (हिं० स्त्री०) गुप्तकथन, धोरसे कही जानेवाली बात। कानाबाती (हिं. स्त्री०) १ गुप्तकथन, कानाफसी। २ बालक इंसानका एक कार्य। वालकके कर्ण में कानाबाती कानावाती कू' कहते 'कू' शब्द जोरसे बोलते हैं। इससे बालक हंसने लगता है। कानावेज (हिं. पु०) वस्त्र विशेष, एक कपड़ा। यह सौंकियेसे मिलता-जुलता रहता है। कानि (हिंस्त्री०) १ मर्यादा, इज्जत । २ शिक्षा, सीख। कानिद (हिं० पु० ) बांसको कमची। इससे खरादते समय हीरा पन्ना दवाया जाता है। कानिष्ठिक (सं० लो०) कनिष्ठिका इव, कनिष्ठिका. पण् । शर्करादिमीऽण् । पा ५॥ ३॥1601.कनिष्ठिका सदृश्य।<noinclude></noinclude> 41pgcplohovzgguf54w5uid2de5yibv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८१ 250 106249 664887 373108 2026-07-04T07:38:15Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664887 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|३८२| कांनिष्ठिनेय-कान्त}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कानिष्ठिनेय (सं० पु.) कनिष्ठाया अपत्य पुमान्, कनिष्ठा-ढब इन आदेशथ । कल्याधादीनामिनछ । पा ४ । १ । १२६ । कनिष्ठाका पुत्र । कानी (हिं. स्त्री०) १ एक चक्षुवाली स्त्री, जिस औरतके एक ही आंख रहे। २ कनिष्ठा, सबसे छोटी हाथ की उंगली। कानीत (सं• पु०) कनीतस्य अपत्यं पुमान् । कनीत नामक ऋषिके पुत्र, पृथुप्रवा। कानीन (सं० पु.) कन्यायाः जातः, कन्या-अगा कनीन, प्रादेशश्च । कन्याया: कनीनच। पा४१।११६। १ अविवाहिता कन्याका पुत्र, वेव्याही लड़कीका लड़का। २ कर्ण राना।३ व्यासदेव । ४ पग्निवेश्य । ५ लोध्रवक्ष, लोध। (वि.) चक्षुके लिये हितकर, भाखको पुतलीको फायदा पहुंचानवाला औषध । कानीयस (सं० त्रि.) कनीयसः इदम् । कनिष्ठ- सम्बन्धीय, शुमारमें कम। कानन (अ० पु०) व्यवस्था, पाईन, मुल्ला में अमन चैन रखने का कायदा। कानूनगो (प. पु.) राजस्व विभागका एक कर्म चारी, कोई माली अफसर। यह पटवारियां के कागज देखता भालता है। कानूनगो दो प्रकारका है गिरदावर और रजिष्ट्रार । गिरदावर घूम घूम पट वारियों का काम देखा करता है। रजिष्ट्रारको दफतरमें पटवारियों के पुराने कागज़ पहुंचाये जाते हैं। कानूनगोई (अस्त्री० ) कान नगोका काम या प्रोहदा। सुसलमानोंके राजत्वकालमें जो राज कर्मचारी भूसम्पत्तिके ज्ञातव्य विषय नवाबके निकट पहुंचाते, वही यह पद पाते थे। पाईन-अकबरी पढ़नेसे समक्ष पड़ता है कि उस समय प्रत्येक सरकारमें एक कानूनगो और उसके अधीन प्रत्येक महलमें एक पटवारी रहता था। चतुःसीमा, विभाग, विक्रय पौर हस्तान्तरकरण प्रकृति भूसम्पत्ति-सम्बन्धीय कोई कार्य आवश्यक पानसे पहले काननगोसे कहना या उसके प्रादेश ले कार्य करना पड़ता था। भूमिसम्मकीय किसी विषयपर तर्क उठने कानूनगो मीमांसा कर देता था। काननदां (फा• पु.) १ व्यवस्था समझानेवासा, जो <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कानून जानता हो। २ व्यवस्था झाड़नेवासा, बो कानन छांटता हो। काननिया ( हिं.) कानूनदां देखी। कानूनी (अ० वि० ) १ व्यवस्था जाननेवाचा, जो कानून समझता हो । २ व्यवस्था सम्बन्धोय, कानून के मुतालिक। ३ नियमानुकूल, कायदेके मुताबिक, । ४ हठी, हुन्नती। कान म-पञ्जावक कुनावर उपविभागका प्रधान नगर। यह समुद्रतल से 2३०० फीट ऊंचे पर्वत पर अक्षा. ३१४१० पौर देशा• ७८ ३० पू० में अवस्थित एक प्रसिद्ध बौद्ध मठ है। उसमें भोटदेशीय विस्तर बौधग्रन्य संरक्षित है। कानूम लाधकवाले प्रधान लामाके अधीन है। कम्बलका व्यवसाय प्रधिक चलता है। कान्त (सं० पु. लो०) कनते दीप्यते, कन कर्तरि । १ कुखुम, रोरी।२ कान्ततौड़, एक होता। ३ श्रीक्षण। ४ चन्द्र, चांद। ५ खामो, खाविन्द । ६ चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त और अयस्कान्त मणि, आतथी शीशा.वगैरह । ७ नन्दोरक्ष, एक पेड़। ८ वसन्त ऋतु, मोसम बहार विष्णु। १० शिव । ११ कार्तिकेय। १२ कामदेव । १३ चक्रवाक, चकवा। १४ वर्षा, बरसात। १५ हिन्नलच, एक पेड़। १६ प्रियतम, प्यारा । (त्रि ) १७ मनोरम, खूबसूरत । १८ अभि- लषित, चाहा हुवा । कान्त-युक्त प्रदेशके शाहजहांपुर जिले का एक गण्ड- ग्राम (कसबा )। यह शाहजहांपुर शहरसे साढ़े चार कोस दक्षिण जलालाबादको राह किनारे अक्षा. २७°४८ २०७० और देशा०७४' 82°४५ पू० पर अवस्थित है। यह नगर अति प्राचीन है। शाहजहांपुर वसनेमे पहले कान्त अत्यन्त समृचिथासो था। प्राचीन पट्टा- .लिका और दुर्गादिके व सावशिष्ट स्तूप प्रभृति देखनेसे इसका कितना ही पूर्व परिचय मिलता है। आजकल यहां पुलिसका थाना, डाकखाना और सराय मौजूद है। यह जनपद महाभारतोत 'कान्ति' (मोच दार )समझ पड़ता है।और पायात्य भौगोलिक टलेमि-वर्णित किडिया'<noinclude></noinclude> apxhwdp4yw8qwynjsolkijp3ntvfqyw पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८२ 250 106251 664888 373110 2026-07-04T07:58:18Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664888 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कान्तता-कान्तनगर| ३८३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कान्तता (सं० स्त्री०) कान्तस्य भावः कान्त-तल टाए । १ सौन्दर्य, खूबसूरती। २ स्वामित्व, खाविन्दी। कान्तत्व (संली.) कान्तस्य भावः, कान्त-त्व । १ मनोहारिता, खूबसूरती। २ खामित्व, खाविन्दौ । शान्तनगर-बङ्गाल प्रदेशके दीनानपुर जिलेका एक गण्डग्राम (कसबा)। यह बीरगन थाने में लगता है। दौनाजपुर शहरसे कान्तनगर ६ कोस दूर है। दुर्गादिके वंसावशेषसे स्पष्ट समझ पड़ता कि उक्त स्थान किसी समय विशेष समृद्धिशाली था। ‘अनेक लोगों के विश्वासानुसार स्तुपाकार ध्वंसावशेष कान्तनगरका कान्त-मन्दिर अति प्रसिद्ध है। ऐसा सुन्दर और विचित्र सन्दिर वङ्गन्देशमें दूसरा नही। राजा प्राणनाथ दिलसे कान्त नामक विष्णुविग्रह चाये थे। उत कान्तविग्रह प्रतिष्ठा करने के लिये ही सुप्रसिद्ध कान्तमन्दिर बना । १७०४ ई०को इस -मन्दिरका निर्माण कार्य लगा और कोई १०२४०को -यह महत् कार्य सुसम्पन्न हुवा था। राजा प्राणनाथने <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> विराटराज्य का दुर्ग रहा। वह उक्त दुर्गमें वास भी करवे थे। पाण्डव अज्ञातवासके समय यहां पाये थे। कान्तनगरको चारो ओर पड़े हुए विस्तीर्ण भूभाग- का नाम उत्तर-गोग्टह है। प्रवादानुसार कान्तनगरको धापा नदीके पूर्वतौर और कचाई नदीके उभय तीर विराटरानका गोधन चरता था। उक्त गोचारण. भूमि किसी समय अत्युच्च प्राकारसे वेष्टित थी। आज- कल वृक्ष लतादिसे उता सकच स्थान ढक गया है, इसीसे उस प्राचीन -प्राकारका चिह पर्यन्त पा नहीं सकते। {{C|'''कान्त मन्दिर'''}} इस मन्दिरके निर्माणार्थ -लाखों रुपये खर्च किये। यह मन्दिर बङ्गाच देशके स्वपति और शिल्यो लोगोंका गौरवप्रकायक है। यहांक अधिवासी कहा करते है कि दीनाजपुरका पधिकांश स्थान ही प्राचीन मत्वदेश है। किन्तु महामारतादि पढ़नेपर किसी क्रमसे उस अचवमें मत्स्यदेशका प्रवस्थान मिनि हो नहीं सकता। मतदेय वा विराटराज्य युक्तप्रदेश है।<noinclude></noinclude> lo57onegyoebp6ovc1936rcmnj7v9ss पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८३ 250 106254 664902 373113 2026-07-04T11:40:55Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664902 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|३८४|कान्तपक्षी -कान्तलोह}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कान्तनगरका यह पवित्र देवमन्दिर देखनेसे . समझ पड़ता है, कि अंगरेजों के पानसे पहले बालके दीन शिल्पयों ने स्थापत्य और शिल्प विद्याम कितना उन्नतिलाभ किया था। यह नवरत्न मन्दिर है। मन्दिरको चूनाके विष्णुचक्रसे पाददेश पर्यन्त सुगठित मुचित्रित और कारकार्य-सुशोभित है। इस मन्दिरमें विलकुल पत्थरका लगाव नहीं, भित्तिसे चूड़ा पर्यन्त समस्त इष्टक-निर्मित है । मन्दिरके गानम इष्टक खोद बहुसंख्यक देवदेवी मूर्ति-गठित हैं। देवदेवीको मूर्ति देखनेसे यह भी समझ सकते हैं कि प्रायः दो सौ वर्ष पूर्व बङ्गाल देशमै रीति, पचति और वस्त्रादि कैसे प्रचलित थे। हम कह सकते हैं कि ऐसा इष्टकनिर्मित था। ११९५ई० के पौषमासमें कान्तबाबूका मृत्यु हुवा। एवं इष्टकखीदित कारकार्यविशिष्ट मन्दिर दूसरा कहीं नहीं है। कान्तनगरसे थोड़ी दूर सनका नामक स्थान है। प्रवादानुसार विख्यात वणिक् चांदसौदागरने वहां मट्टीका एक किला बनवाया था। कान्तलक (सं० पु) कान्तस्य कार्तिकेयस्य पक्षी, ६-तत, यहा कान्तः मनोहर: पक्षी ऽस्यास्ति, कान्त- यक्ष इनि। मयूर, मोर। कान्तपाषाण (सं० पु०) चुम्बक नामक प्रस्तर, सङ्ग लक मिकनातीस। यह शीत, लेखन (खुजली पैदा करनेवाला) और विषदोष, मेद, पाण्डु, क्षय, कण्डु, माह तथा मूळनाशक है। (वैदा निघण्ट) इसके शोधनका विधि यह है-कान्तपाषाणको पीस महिषी- विशेष, एक लोहा । कान्तलोह उसोको कहते, जिसके दुग्ध तथा गव्य रातमें पकाते हैं। पका कर यह सवण 'चार और शोभाञ्जनमें डाला जाता है। फिर दोला. यन्त्र में महिषीक्षीरादिसे दो बार पकाते हैं। अन्तको अम्मरससे रौद्रमें एक दिन भावना दी जाती है। {{Rh|||(रसेन्द्रसारसंग्रह) }} कान्तपुष्प (संपु०) कान्तानि मनोरमाणि पुष्पाण्यस्य, वहुनी। कोविदारवक्ष, लाल कचनार । कान्तबाबू-कासिमबाजार राज परिवारक प्रतिष्ठाता। इनका प्रकृत नाम कृष्णकान्त नन्दी था। जातिके यह तेली थे। प्रथम कान्तबाबू सामान्य मोदीका व्यवसाय करते थे। इसीसे अनेक लोग इन्हें 'कान्तमादी करते <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हैं। वारन हेष्टिङ्गसके कासिमबानारमें ईष्टइण्डिया कम्पनीके अधीन कर्म करते शीराज-उद-दोलान वहांके अंगरेजोंको पकड़ वध करनेका प्रदेश निकाला था। उसीघोर संकटके समय इन्होंने वारेनहेष्टिमसको अपनी दुकानमें निरापद स्थान पर बैठा मरनेसे बचाया। फिर हेटिङ्गस गवरनर जनरल होकर पाये। किन्तु वह कान्त बाबूका महा उपकार भूले नथे। प्रथमत:: उन्होंने इन्हें अपना दीवान बनाया। कुछ दिन पीछे कान्त बाबूने कम्पनीसे गाजीपुर और आजम गढ़ निलेके अन्तर्गत (दूहा विहार) परगना जागौर पाया। इनके. पुत्र लोकनाथ को भी राजा बहादुरका उपाधि मिचा यह हेष्टिङ्गसका दाहना हाथ थे। कान्तबावूके द्वारा ही उनका सब काम चलता था। प्रयोजन होनेसे यह उनको रुपये उधार लाकर देते थे। हेष्टिङ्गसके साथ हो साथ कान्तवावू रहते थे। एक बार देटिङ्गसने इनके लिये काशीको राजमाताको भी डांटा डपटा था। (बान्तवाकै परिव सम्बधर्म Bereridge's The Trial of Nanda kumar, p. 294-45, 967-401. देखो। कान्तलक (सं० पु.) कान्त लक्यते पाखाद्यते, कान्त-घनर्थे कः। १ नन्दोक्ष, एक पेड़। २ तुक्ष,तुनका पेड़। कान्तलोह (सं० क्लो०) कान्त चौह श्रेष्ठत्वात् कमनीयं लोहम्। १ अयस्कान्त, ईस्मात । २ सौ पात्र में जल रख कर तैलविन्दु डालनेसे तेल इतस्ततः न चले, जिसके स्पर्शसे हिङ्ग, खीय गन्ध परित्याग करे, नीमका काथ भी जिसमें मधुर आवाद है, जिसमें दुग्ध पकानसे वालुकाराशिको भांति जमे और जिसके पात्रमें चना भिगानेसे कष्णवर्ण देख पड़े। इस लोहसे वैद्यशास्त्रोक्त अनेक भौषध प्रस्तुत होते हैं। औषध प्रयोग करने के लिये जारण मारण प्रकृति कई कार्य प्राक्यक हैं। लौशब्द देखो। इसके निरुत्यीकरणसम्बन्ध पर रमेन्द्रसारसंग्रहमें ऐसा उपदेश लिखा है,-"शव पारद.१ भाग, गन्धक २ भाग, और उभयक समपरिमाण खौपचूर्ण एकक<noinclude></noinclude> p64gzp3b3k32869ecpussf1q5yzlze0 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४९८ 250 107467 664830 375217 2026-07-03T15:43:03Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 664830 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||कायस्थ| ४९९}} {{Multicol|line=1px solid black}} देशमें पाये थे। अतएव वङ्गीय कायस्थसमाजका- हिवाचार लक्ष्य कर गत १३२१ सालके १८ पाषाढको संस्कृत कालेजके अध्यक्ष महामहोपाध्याय डा.सतीशचन्द्र विद्याभूषण सभापतित्वमें सकल पध्या पकांकी एक विचारसभा हुयी। इस समाम संस्कत कालेनके टोल-विमागमें बङ्गीय कायस्थ छात्रों के वेद पध्ययनका अधिकारसूचक सम्मतिपत्र प्रदत्त और वेदान्त पदानके लिये कायस्थ छाव गृहीत दुवे । चदेशीय दूसरे जो सकच प्रधान प्रधान अध्यापक हैं, उन्होंने इदानीन्तनकाच धनदेशीय कायस्थोंके पवियत्व पार उपनयन सम्बन्धमें व्यवस्था दी है। वणदेशीय कायस्थ-समासे प्रकाथित व्यवस्थापनमें उन सफल अध्यापकों के नाम मुद्रित हुवे हैं। केवल व्यवस्थापक रहे। ब्रह्माके ध्यानस्थ होनेसे सहस्र वत्सर ध्यानमें पण्डित ही नहीं, परमहंसकल्प साधु महामा भी इस स्थानकी कायस्थ जातिका क्षत्रियवर्ण मानते हैं। कहनेसे क्या-काश्मोरके उत्तरप्रान्तवासी श्रीश्रीनारद बाबा बासानन्द स्वामी महाराज वनको कायस्यजातिको पानान कर उसका क्षत्रियवर्णव और उपवीत ग्रहणको आवश्यकता घोषणा कर गये हैं। १५ वर्ष हुवे उन्होंने स्वयं दचिपरादीय कुसीन कायस्थ वृह श्रीयुक्त विहारी. साल वसु महाशयको उपवीत दान कर बक 'कायस्थोंको सम्मानित किया है। कुछ दिन हुवे वारेन्ट्र कायख अध्यापक हेमचन्द्र सरकार महाशय दूसरेके उपकारको तत्पर रहोगे, २ तुम अपने और बङ्गज कायस्य हेमचन्द्र घोषराय पुरोके शहर मठके प्रधान पाचार्यके निकटसे उपवीत संस्कार पाया था। स्वामी विवेकानन्द कायस्थ थे। वह अपनी आतिको विशद पत्रियको भांति प्रचार कर गये हैं। सुतरां सामालिक बङ्गीय चित्रगुप्तवंशीय कायस्थ नि:सन्देश द्विजवर्ण है, यह कहना होवृथा है। {{C|युवपदय।}} पञ्चावके परिमप्रान्तमे विहारके पूर्व प्रान्त पर्यन्त सर्वत्र कायस्थ रहते हैं। वह सभी अपनेको चित्रगुप्तका वशधर बताते और अपनी उत्पत्तिकै सम्बन्धमें भविष्य पुराण तथा पद्मपुराणके उपाख्यान सुनाते हैं। इसकी छोड़ उनके उत्पत्ति सम्बन्ध पर सुखप्रदेशमें भिन्न सिखित प्रवाद भी प्रचलित है:- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> सबसे पहले यमपुर, १३ यम राजख करते थे। उन १३ सोगोंमें शेष यमका नाम चित्र रहा। उस समय किसी स्थानमें इसी एक नामके सीन व्यक्ति थे। उनमें एक राजा, एक ब्राह्मण और एक नापित था। राजाको काल पूरा होने पर ले जाने के लिये यमदूत पा पहुंचा। दूसने ममक्रममे राजाको छोड़ बाण यमयीघ्र ही यह भ्रम समझ सके थे। विधा भी यह संवाद सुन कर बहुत ही दुःखित हुये। ब्रह्मा इस लिये चिन्तित हो ध्यानस्थ हो गये, जिसमें वैसा फिर न हो सके। उस समय भी यौन सम्बन्धसे जीवको उत्पत्ति होती न थी। देवताके दुग्धरी जीव बनते वोत गये। पीछे ब्रह्माने देखा कि उनके निकट एक श्यामवर्ण पुरुष उपस्थित था। उसके हाथमें मसि- पान पौर लेखनी थी। ब्रह्माने कहा--तुम हमारी कायासे उत्पन्न और उसी कायामें स्थित हो। इस लिये तुम्हारा नाम 'कायस्य है। इसके पीछे भी ब्रह्मा बोच उठे-'तुम गुप्तभावसे हमारे शरीरमें रहे हो। इस लिये हमने तुम्हारा नाम चित्रगुप्त रखा है।' चित्रगुप्त कोटनगर ना कर देवी चण्डिकाको पूजा करने लगे। चण्डीने सन्तुष्ट ही उन्हें तीन वर दिये थे-१ तुम कार्यमें दृढ़चेता होये और ३ तुम बहुत दिन जीवोगे। उल वर प्रदान कर देवी पन्तहित हुयीं। फिर ब्रह्माने चित्रगुप्तको यमपुरीका भार सौंपा और यौन सृष्टि प्रारम्भ करनेको पादेश दिया था। सूर्य, विष्णु, देवी भगवती, शिव तथा गणेश उनके उपास और ब्रह्मा इष्टदेव हुवे। देवताओं ने जब सुना-प्रव मानसी सृष्टि न होगी, सब धर्मधर्मा ऋषिने अपनी कन्या इरावतीके साथ चित्रगुप्तका विवाह कर देना चाहा। सूर्य के पुत्र मनुने मी पपनी सुन्दरी कन्या मुदक्षिणाके साथ चित्रगुप्तका विवाह करनेको प्राग्रह प्रकाश किया था। ब्रयाने दोनों की प्रार्थना -मान इसी प्रकार चित्रगुप्तने दो कन्यायों का पाणि- रहण किया। इरावतीके गर्भसे चित्रगुप्तके ८ पुत्र<noinclude></noinclude> ta0vtqwe6pa3h53v4fzm878dw7z05cw पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४९९ 250 107470 664832 375220 2026-07-03T16:13:20Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 664832 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५००| कायस्थ}} {{Multicol|line=1px solid black}} उत्पन्न हुवे-चाक, सुचारु, चित्राच, मतिमान. चित्रचार, परुण और असीन्द्रिय। फिर मुदक्षिणाके गर्भसे भानु, विभानु, विश्वमान और वीर्यभानु चार पुत्रने जन्म लिया। ब्रह्माने चित्रगुप्तके वंशको वधि होते देख एक दिन पानन्दसे कहा था-'हमने अपने वाहुसे मृत्युलोकके अधीम्बर रूपमें क्षत्रियों की सृष्टि की है। हमारी इच्छा है कि तुम्हारे पुत्र भी क्षत्रियो। उस समय चित्रगुप्त बोल उठे- 'अधिकांश राना मरकगामी शंगे। इम नहीं चाहते कि हमारे पुर्वाक पदृष्टमें भी वही दुर्धटना पा पड़े। ' हमारी प्रार्थना है कि पाप उनके लिये कोई दूसरी व्यवस्था कर दीजिये। अनि इंस कर उत्तर दिया- 'अच्छा, आपके पुत्र सिके बदले लेखनी धारण करेंगे। चार जन्म वह इसी यमलोकमें रहेंगे। उसके पीछे इच्छा करनेसे वह देवलोक में धास कर सकेंगे। अनन्तर चित्रगुप्तके सन्तान इहलोक पा श्रीवास्तवोंमें दो भाखा है-एर और 'माधुर' नाम गण्य हुवे। सुचारु गौड़में जा कर रहने लगे और उसीसे 'गौड़ कई गये। चित्र मह नदीके कूल पर जा कर रहनेसे 'भहनागरिक' नामसे गण्य दुवे। भानु 'श्रीवास' नामक स्थानमें ना कर रहे और 'श्रीवास्तव' नाससे ख्यात दुवे। हिमवान् देवी अम्बाको आराधना करनेमे 'अम्बष्ट', मतिमान् अपनी सही पथात् भार्याके साथ चलनेसे 'सखिसेन' और विभानु 'सूरसेन देशमें जाकर रहने से'सूर्यध्वज'* कहे गये। यहां नरन्तोक विस्तार कर उन्होंने वर्ग- लोककी गमन किया। यह समझ नहीं पड़ता कि ऐतिहासिकों 'दृष्टिमें उक्त उपाख्यानका विशेष मूस्य है। फिर भी चित्रगुप्तके पुत्रोंकी भांति जिन कई लोगांका नाम लिखा गया है, परिमाचलस्थ कायस्थोंके मध्य कोई कोई श्रेणी पपनेको उक्त किसी न किसी व्यक्तिका वंशधर बसाती है। यहादेव कायस्यों का एक विवरण पहला-कामधेनु-भूत निकी इस बातका प्रभाव मिलता है। कास्योंका यर ममा ताकि श्रीगाया मी See Origin and States of the Kajasthao, published by Hargorinda Babays, xh, p. 13. ! ** <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पाजकल युक्तपदेयके कायस्य प्रधानसं: १२ वीम विमा है- श्रीवास्तव्य वा ओशस्तव, २ भटनागर, ३ अकसेन, ४ अम्बष्ट वा पमष्ठ, ५ पैठान वा पहान, ६ वाल्मीक, ७ माथुर, ८ सूर्यध्वन, ८ इन्चेह, १०करण, १९ गौड़ और १२ निगम। सिवा इसके नाव जिलेके नामसे 'उनाई एक पृथक शाखा है। यौवासा वा श्रीवास्तव कायस्थ-अपनेको चित्रगुप्तके. पुत्र भानुका बंधधर बताते हैं। उनके पूर्व- पुरुष काश्मीरके श्रीनगरमें राजस्व करते थे। उसोये श्रीवास्तव्य' पाख्या हो गयो। उक्त कथा मी थीवास्तव कहा करते हैं। फिर किसीके मतमें यौवक्र विष्णुके उपासकोंको श्रीवास्तव कहते हैं। किन्तु कोई कोई युरोपीय पुराविद अवध प्रदेशस्य गोंडा जिलेकी श्रावस्ती नगरोसे श्रीवास्तव नामको उत्पत्ति बताता है। किन्तु भेष दोनों मत कल्पनामूलक समम पड़ते हैं। गये। उक्त बार लोगों में चार मथुरा गये और दूसर। खर शाखा ही सत् वा श्रेष्ठ मानी जाती है। दूसर सम्मानमें बहुत छोटे हैं। एक प्रवाद -अयोध्या में जाकर जी बसे, वही 'खर' वा श्रेष्ठ और जो अन्य खानमें जा कर रहे, वह दूसर हैं। फिर किसी किसीके कथनानुसार पहले इस प्रकार दो याखाये नथौं। सम्राट अकबरके ही समयसे उन दोनाको दृष्टि हुयी है। उस समय एक व्यक्तिले प्रति घृणाके साध रानप्रदत्त उपहार त्याग किया था। उनका नाम 1 'अखोगे प्रधान धर्मपरायण हुवा। मांसपर्थ न करने की प्रखोरी नाम हो सकता है। इलाहावादी और फतेहपुरी श्रीवास्तयों में निपो. सवान और और बुद्धि प्रदान नामक दो कुल देख पड़ते हैं। युक्तप्रदेश में श्रीवास्तवोंकीकी संस्था अधिक * कारण युभमदेव माना स्थानोंसे जो सबसौन शिक्षानिमि पावित्रत यो है, उनमें श्रीकानन्य नाम को मिलता है। श्रीवझ' भएका 'श्रावती' कमी यह शब्द निया की नहीं सकता। बसपारको राश कि काश्मीरमें गाबाद यून हैं।<noinclude></noinclude> epm51laewmziz6az2ncl8putcu95g61 विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६ 4 193661 664815 664809 2026-07-03T13:22:31Z Ranju Rajbhar 6454 /* प्रतिभागी */ 664815 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले 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४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] ca64r4ish3rcglyv1vwo5owlconc3f3 664817 664815 2026-07-03T13:28:52Z Ranju Rajbhar 6454 /* पुस्तक सूची */ 664817 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] lswg3uk9fvehppq1pa01r8cwru1lfp8 664855 664817 2026-07-04T01:23:50Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* प्रतिभागी */ 664855 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] ooe7nbehc3teyeuoqcmioapzaa1il64 664880 664855 2026-07-04T03:48:22Z सौरभ तिवारी 05 49 /* पुस्तक सूची */ पुस्तक जोड़ी। 664880 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] fq85kefzenvh7hnzfihji1cwpvyhrci 664890 664880 2026-07-04T08:31:14Z ~2026-38284-23 6717 /* प्रतिभागी */ 664890 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] bk1csulnkuj0gwjz1k6wi32rz77g0yw 664891 664890 2026-07-04T08:33:19Z Avantika Shaw 4732 /* प्रतिभागी */ 664891 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] cjosjasbx4ve8uhs89keovniiaeb8ei 664892 664891 2026-07-04T08:37:32Z Avantika Shaw 4732 /* पुस्तक सूची */ 664892 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल 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पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] log0rpa6jtisphi6du1con2intfmyy6