विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.9 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१२८ 250 45931 664912 664894 2026-07-04T13:22:32Z Avantika Shaw 4732 664912 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|१२६| गवछावा-गजदन्त}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|गजच्छाया (सं० स्त्री०) गजस्य कश्चित् छाया प्रतिविम्बः; ६-तत्पुरुष।}} १. हाथी की छाया। २. योग विशेष। यह योग श्राद्ध के लिए धन्य माना जाता है। यह उस समय होता है जब त्रयोदशी के दिन चन्द्रमा मघा नक्षत्र में और सूर्य हस्त नक्षत्र में हो। ३. सूर्यग्रहण काल। यह समय श्राद्ध के लिए प्रशस्त है। ​ {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"यन्मेषस्य यदा भानुः शशिनो मघसंयुक्।<br> त्रयोदश्या तु या प्रोक्ता तत् श्राद्धं प्रवरं विदुः॥" (वराह)</poem>}}}} ​ ४-अमावस्या के दिन जिस समय छाया पूर्वमुखी हो, उस काल को 'गजच्छाया' कहते हैं। ​{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "अमावस्या यदा होता छाया या प्राङ्मुखी भवेत्।<br> गजच्छायेति सा प्रोक्ता तत् श्राद्धं प्रवरं विदुः॥" (मलमासतत्त्व)</poem>}}}} ​ {{Outdent|गजढका (सं० स्त्री०) गजोपरिरक्षिता ढका। हाथी के ऊपर एक बड़ा ढाक; हाथी के ऊपर रखा हुआ एक बड़ा ढोल।}} ​{{Outdent|गजट (अं० पु०) १. समाचार पत्र। २. भारतीय सरकार अथवा प्रान्तीय सरकारों द्वारा प्रकाशित सामयिक पत्र (राजपत्र)। इसमें बड़े-बड़े कर्मचारियों की नियुक्ति, नवीन कानूनों के मसौदे और भिन्न-भिन्न सरकारी विभागों के जानने योग्य बातें प्रकाशित की जाती हैं।}} ​ {{Outdent|गजता (सं० स्त्री०) गजानां समूहः; गज+तल्।}} <Small>बलवान था ४|२|४३ शांति छे</small> हस्ति-समूह, हाथियों का झुंड। ​ {{Outdent| गजपुष्पविकसित (सं० स्त्री०) दृष्टि विशेष, इसका दूसरा नाम 'समभगजविकसित' है।}} ​{{Outdent|गजदन्त (सं० पु०) गजस्य दन्त इव दन्तो यस्य, बहुव्रीहि।}} १. मँबिया। २. नागदन्त; चीजें वगैरह रखने के लिए दीवार में लगाए हुए दो खूँटे। ३. दाँत के ऊपर जमने वाला दाँत। ४. गजस्य दन्तः, ६-तत्पुरुष। हाथीदाँत (Ivory)। हाथीदाँत पृथ्वी का बढ़िया और महँगा पदार्थ है। इससे नाना प्रकार की बरतने (उपयोग में लाने) लायक, मनोहर और टिकाऊ चीजें बना करती हैं। हाथियों की ऊपरी चौंध (जबड़े) में और जो दो तीखे दाँत रहते हैं, बड़े होने पर सब उपयोगी गजदन्त बना करते हैं। नीचे के चौके दाँत बढ़ते नहीं, बच्चियों के दाँत भी छोटे ही रहते हैं। पेडू को बाल निकालने या पेड़ काटने में ज़रली <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हाथियों के दाँत बीच-बीच में टूट जाते हैं, इसी से वे बहुत बड़े नहीं हो सकते। एक बार टूटने पर हाथीदाँत फिर भर आते हैं। वह ६ हाथ तक बढ़ते हैं। ऐसे दो दाँत तौल में लगभग ४ मन बैठते हैं। साधारणतः उतने बड़े हाथीदाँत देखने में नहीं पड़ते। १० सेर या १ मन के हाथीदाँत प्रायः देखे जाते हैं। हाथीदाँत तिरछा तोड़ने से भीतर की गोल-गोल रेखाएँ देखने में आती हैं। ​ भारतवर्ष में जो हाथीदाँत होते हैं, उनसे इस देश का काम नहीं चलता। प्रतिवर्ष अफ्रीका से इस देश में हाथीदाँत मँगाए जाते हैं। जो हाथीदाँत भारतवर्ष के कहलाते हैं, वे अधिकांश असम और ब्रह्मदेश (म्यांमार) से आते हैं। कहते हैं कि पूर्वकाल के असम के नागा लोग पहाड़ी गुफाओं से दाँत ला करके जंगल के बाहर रख देते थे और अपने आप जंगल में छिप जाते थे। हिन्दू वणिक (व्यापारी) वहाँ पहुँचकर नागाओं की प्यारी चीजें वहाँ रखकर हाथीदाँत उठा लाते थे। वणिकों के चले जाने पर वन से निकलकर नागा लोग वह सारी चीजें उठा करके घर लाते थे। हिन्दू वणिकों और नागाओं के साथ ऐसे ही व्यवसाय-वाणिज्य चलता था। हिन्दुओं के गाँवों में जा उनसे मिलकर लेन-देन करना नागाओं के धर्म में निषिद्ध है। कह नहीं सकते, यह बात कहाँ तक ठीक है। नागा बहुत थोड़े हाथीदाँत लाया करते हैं। मिश्मी और खामती लोग ही यह द्रव्य अधिक परिमाण में बेचते हैं। प्रतिवर्ष असम से मध्य भारत को १०० मन से भी अधिक हाथीदाँत भेजा जाता है। ​अफ्रीका से प्रतिवर्ष प्रायः ५ हजार मन हाथीदाँत आता है। जंजीबार, मोजाम्बिक और अदन से ही इसकी ज्यादा आमदनी होती है। यह हाथीदाँत पहले बम्बई में आ करके इकट्ठा होता है। फिर उसका कोई खास भाग विलायत भेजते हैं। अवशिष्ट (बचा हुआ भाग) इसी देश के व्यवहार में रहता है। अफ्रीका से बम्बई में जो हाथीदाँत मँगाया जाता है, तौल के हिसाब से बिकता है। बम्बई का सेर २८ रुपये भर है। एक-एक हाथीदाँत ऐसे हैं जिनमें कोई ४ मन बैठता है। उसका मूल्य २५० रु० है। दूसरे देशों को भेजने से पहले हाथीदाँत को काट करके बम्बई के लोग कई भागों मेंं बाँट देते हैं। हाथ दांत का अगला <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 0e8u95vc3ywz653srs4kr8dzhf3p3c1 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१२९ 250 45940 664913 561749 2026-07-04T13:32:28Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 664913 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''मजदन्त'''|'''१२८'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> भाग ठोस होता है। काट करके अलग करने पर उसको 'आकाशाय' कहते हैं। यह विलायत को भेजा जाता है। इससे बिलियार्ड खेलने का गोला बनाते हैं। हाथीदांत का बिचला भाग पोला रहता है, इसका नाम 'चूड़ीदार' है। चूड़ियाँ बनाने का इसका अधिकांश भारत में बिकता है। दांत का मूल भाग विदेश को प्रेरित होता है। ​पोले भाग की एक निकृष्ट जाति भी है। उसको 'चीना आइवरी' कहते हैं। वह चीन देश को भेजा जाता है। हाथीदांत का व्यवसाय दिन-दिन घट रहा है। ५० वर्ष पहले बम्बई नगर में अफ्रीका से कम-से-कम २५,००० जोड़ा हाथीदांत आता था। आजकल उसका आधा भी नहीं मंगाते। अधिकांश हाथीदांत पहले अफ्रीका के मध्यवर्ती स्थान से लाते हैं। फिर वह समुद्र के किनारे जहाजों पर लादा और नाना देशों को भेजा जाता है। ​बहुत पुराने समय से भारतवर्ष में हाथीदांत का कारुकार्य प्रचलित है। बृहत्संहिता के मत में खाट या पलंग बनाने के लिए हाथीदांत जैसी दूसरी चीज़ नहीं होती। वराहमिहिर ने लिखा है कि पलंग के पावे हाथीदांत के बनाने चाहिए। फिर दूसरा भाग लकड़ी से बना करके उसके ऊपर हाथीदांत जड़ देने से भी काम चल सकता है। ​ राजपूताना, पंजाब आदि देशों में हिंदू-मुसलमान सभी जाति की स्त्रियाँ हाथीदांत की चूड़ियाँ पहनती हैं। विवाह के समय कन्या का मामा उसको हाथीदांत की चूड़ियाँ खरीद देता है। सीप की तरह हाथीदांत की चूड़ियों पर भी कई रंग चढ़ाते हैं। फिर इस पर अभ्रक आदि चमकीली चीजें भी लगा देते हैं। बड़े घराने की स्त्रियाँ विवाह के पीछे एक वर्ष तक यह चूड़ियाँ पहने रहती हैं, गरीब दुःखी स्त्रियाँ चिरकाल तक इन्हें नहीं छोड़तीं। राजपूताने की रेलवे से जहाँ जोधपुर जाने की शाखा फटी, उसके पास पाली गाँव में प्रचुर परिमाण से हाथीदांत की चूड़ियाँ बनती हैं। हाथीदांत की चूड़ियाँ नाना प्रकार की होती हैं। परन्तु साधारणतः यह सीप की जैसी चूड़ियाँ दीख पड़ती हैं। ​बम्बई में हाथीदांत नाना भागों में काट करके देश- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> विदेश भेजा जाता है। बढ़ई आरी से हाथीदांत काटते हैं; इसकी मजदूरी वह नहीं पाते। काट में की बुकनी निकलती, वही उनको मिलती है। यह बुरादा वह ग्वालों के हाथ बेच देते हैं। ग्वालों को विश्वास है कि गाय-भैंस को वह बुकनी खिलाने से दूध अधिक होता है। मनुष्य के लिए भी गजदन्त बलकारक औषधों में गिना जाता है। ​इसके बाद हाथीदांत तीन आढ़तों में पहुँचता है। फिर वहाँ से दूसरी जगहों को प्रेरित होता है। इन तीनों आढ़तों का नाम है—पाली, सूरत और अमृतसर। नरिया सम्प्रदाय के मारवाड़ी हाथीदांत का बड़ा व्यवसाय करते हैं। यह जैन धर्मावलम्बी हैं, हाथी काटने से इन्हें महापातक लगता है; इसी से वह अपने आप हाथीदांत नहीं छूते। हाथीदांत को स्पर्श करना, रखना, ढकना, तौलना आदि जो कुछ आवश्यक आता, मुसलमान नौकरों से ही करा लिया जाता है। ​चूड़ियों को छोड़ करके इस देश में हाथीदांत कंघियाँ बनाने में ही अधिक लगता है। कंघियों की बड़ी जगह दिल्ली और अमृतसर है। कंघियाँ बना करके जो हाथीदांत बचता, दूसरे लोग खरीद करके ले जाते हैं। वह उसकी संदूक आदि लकड़ी की चीज़ों पर जड़ देते हैं। मुल्तान, डेराइस्माइल ख़ाँ, होशियारपुर, स्यालकोट, सूरत, बंगलौर, विशाखापत्तनम प्रभृति स्थानों में हाथीदांत से जड़ी लकड़ी की ऐसी ही बहुत सुन्दर चीजें तैयार होती हैं। ​ मुर्शिदाबाद में केवल गजदन्त से प्रस्तुत होने वाले द्रव्य बहुत अच्छे होते हैं। ऐसी अच्छी कारीगरी और कहीं देख नहीं पड़ती। मुर्शिदाबाद के कारीगर हाथीदांत से दुर्गा की मूर्ति, काली की प्रतिमा, हाथी, गाड़ी, मोरपंखी नाव आदि बहुत सी चीजें बनाते हैं। गया, डुमराव, दरभंगा, कटक, रंगपुर, वर्धमान, चरखास, ढाका, पटना आदि स्थानों में भी गजदन्त के द्रव्य मिलते हैं। हाथीदांत के बारीक रेशे उतार करके चामरी तैयार करते हैं। फिर उसे बुन करके चटाई भी बनायी जा सकती है। पहले समय में श्रीहट्ट में हाथीदांत की बहुत सी चटाइयाँ बनती थीं। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> dolar6z8mfve3kbohbruslqbhokfj7d पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/३७५ 250 46274 665006 562021 2026-07-05T11:11:33Z Arshsultanpuri 6393 665006 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh||'''गुटि-गहिकोण्डा'''|'''३७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> दो बार उत्पन हुआ करता है । यहां Actias Sclene Lvepa Ratinku पासाम, श्रीमह, भोट और यव- नामकी दूसरी मी गुटि है। वह पर्वत पर ५००० से हीपमें उत्पन्न होता है। सिवा इसके L. miranda, L. ७००० फुट ऊंचे तक उपजती है। Sikkima और L. Sivalika कई जातीय श्रेणीकी Rombyx Horsfielli पवद्वीपीय है। गुटि भी देख पड़ती है। मन्द्राज प्रान्तमें Bombyx lugubris होता है ।। ___Attacus Attas का कोवा सबसे बड़ा होता है। जापानमें Bombyx Yama mai उपजता है। सिंहल, चोन, ब्रह्म, यवाहीप और भारतमें सर्वत्र उसकी अब इमलेगड़ में भी उसकी खेती है। जापान यह रेशम उत्पत्ति है। ज्यादा कीमती ममझा जाता है। राजपरिवारमें एमके Attacils Cynthin और Atharius ricin को व्यवमायका एकाधिपत्य है। - बङ्गालमें एडो एंडिया या एरण्ड गुटो कहते हैं। Bombyx Pernyi, Actine sinenis, A. 19ne. Attacts Guerini एण्ड गुटोसे आतिम बुद्र seens और A. lolo चार जातियां उत्सर चीनमें मिलती बेठता है। वादेशमें ही वह अधिक परिमाणमे उत्पन होता हैं । एतव्यतीत A. Canningii, A. lunula ____Bombyx Mslitta भारतीय है। इसका कोवा! A. obse:urus, A. Sillhetica, Caligula, Cacharan, अन्यान्य भारतीय गुटियाँसे बड़ा होता है। भारतमें B. C. Simla, C. Thebeta, Neoris, luttonn, N. Amaranensis, fortunatus. sinen-is txtor Shadalla N. Stolickzkana, Orcinara lactea प्रभृति कई भिन्न श्रेणीके रेशमी कोई हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> O. Moorel, (). diaphama, Rhodia ne:wara, Ri- ___(ricula trifen stratra उत्तर पूर्व तथा दक्षिण aca, Zullika, The phila, Bengaleusis, Th. भारत, श्रीष्ट, आसाम, ब्रह्म और यवदीपमें उत्पन्न होता luttoni, Mandarina, religiosa, Sherwilli प्रति है। मिवा इमके C. drepansides भी मिलता है। कई इमरी किस्में हैं। Sulassa lola और Actins Moenar श्रीदेश गुटक ( म० पु.) मत्स्यागड़ी। जात है। गटिका ( स० स्त्रो. ) गुटिरब गटि स्वार्थ कन टाप। ___Antheroen paphin वीरभूममें होता है। उसका १ वटिका, वटी. गोली । २ वर्तलाकार पदार्थ , गोल नाम 'बुधी' है। सिंहल : दक्षिण, उत्तर-पूच' एवं उत्तर चीज।। पविम भारत, वन, विहार, प्रामाम, श्रीहट्ट और यव- गुटिकाननम् ( स० क्ली० ) पवन देवा । होप में भी उसकी उत्पत्ति है। बहुत समयमे इम देशमें गुटिका पात (सं० पु०) गुटिकाया: पातः, ६-तत्। उस कीड़े को रेशम टमरका कपडा बनानको काम है। किमी विषयके निरूपणार्थ गोली निक्षप, किसी चीज Antheroen Pernsi चोन देशीय है। पर निशान कर गोलो फकना। Antheroea Roylii, Antheraea Acitori और गुटिकाहय ( म० पु. लो. ) लवणविशेष, एक प्रकारका Attacus Edwardsi दारजिलिङ्गमें उत्पन्न होते हैं। नमक। A. larissa और Anthero a Java यवदीपज है। गुह (हिं. पु०) समूह, मुगड, दल । ___Antheroen erot tatti पूदिचेरीमें होता है। गुहा (हि पु०) लाक्षाकी बनी चौकोर लड़कियों के खेलने- A. Simla शिमला और दारजिलिङ्ग पर्वतजात है। को गोटी। ___A. Assama आसाममें होता है। आमामी भाषा- गुटिकोण्डा-कृष्णा जिलेके अन्तर्गत दाचिपलीमे । कोस में उसका नाम मूगा है। ___दक्षिणमें अवस्थित एक ग्राम। यहाँ एक अति प्राचीन ___Antheroea मञ्चरियाको गुटि है । फ्रान्सदेशमें शिवालय है। ग्रामके निकट ही एक गुहा है। ऐमा समको खेती होने लगी है। । प्रवाद है कि इस कन्दरामें मुचुकुन्द सोया करते थे। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{rh|'''Vol. VI. 94'''||}}</noinclude> msfma5f3za8qrmdnltd2ges7kjd1dqo पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५३ 250 75842 664916 608965 2026-07-04T14:56:17Z अँजली चौधरी 2439 664916 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''१५२'''|'''उत्तवाक्य-उक्षा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उक्तवाक्य (सं॰ त्रि॰) १ सम्मति दे चुकनेवाला, जो राय । बता चुका हो। (क्लो०) २ पादेश, हुका, कानन्। । उक्तानुक्त (सं० त्रि०) कथित एवं प्रकथित, कहा | और न कहा उक्ति (सं० स्त्री०) वाक्य, निर्देश, जुमला, इजहार, | बयान्। उत्तोपसंहार (सं० पु०) संक्षिप्त वर्णन, मुखफ फ़फ बयान्, थोड़ेमें कही हुई बात। उकत्वा (सं० अव्य.) कथन करके, कहकर। उक्थ (स. क्लो०) १ वाक्य, जुमला, कहावत। २ क्रियासंस्कारमें एक प्रकारका पठन वा उच्चारित | पाठ। उकथ शास्त्रका एक अवयव है। यह प्रायः | परिपाटी निर्माण करता और साम तथा यजुःके | प्रतिकूल चलता है। महद वा वृहद-उक्थ तीन श्रेणियों में पठनकी परिपाटी ढालता है। उक्त तीनो श्रेणियों में अस्मी ऋक रहता, जो अग्निचयनके पीछे मन्त्रपाठमें कही जाती हैं। ४ सामवेदका एक नाम। (पु०) ५ अग्निका एक रूप। उक्थपत्र (वै. वि.) श्लोकोंको पत्रको भांति रखनेवाला। उक्थपात्र (सं० लो०) उक्थ पढ़ते समय चढ़ाया जानेवाला पात्र वा तर्पणोदक । उक्थभृत् (वै० त्रि.) उक्थको समर्पण करने वा| चढ़ानेवाला। उक्थवत् (दै०वि०) उक्थसे मिला हुआ। उक्षतर (सं॰ पु॰) उक्थवर्धन (वै त्रि०) प्रशंसासे प्रसन्न हो अपना | बल बढ़ानेवाला। उक्थवाहस् (वै त्रि.) १ श्लोक समर्पण करनेवाला। | उक्षतरी (सं॰ स्त्री॰) २ श्लोकका समर्पण पानेवाला। उक्थशंसिन् (वै० वि०) १ प्रशंसा करनेवाला । | २ उक्थ पढ़नेवाला। | उक्षवश (वै० पु०) वत्स, बछड़ा, बच्छा । उक्थशस् (पु.) उक्थशस देखो। उक्षवेहत् (वै. पु.) नपुंसक षण्ड, बधिया बैल । उक्थशस (वै० वि०) श्लोक कहनेवाला, जो प्रशंसा | उक्षा (सं॰ पु॰) करता हो। उक्थशास् (स्त्री०) उक्थशस देखो।' . . .:. उकधशष्क (वै० त्रि.) उच्च स्वरसे श्लोक पढ़नेवाला। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उक्थामद (वै॰ क्ली॰) प्रशंसा एवं प्रसन्नता।}} {{Outdent|उक्थार्क (वै॰ क्ली॰) उद्गार एवं भजन।}} {{Outdent|उक्थावी (वै॰ त्रि॰) श्लोकका प्रेमी।}} {{Outdent|उक्थाशास्त्र (वै॰ क्ली॰) पठन एवं प्रशंसा।}} {{Outdent|उक्थिन् (वै॰ त्रि॰) १ श्लोक पढ़नेवाला। २ जिसके साथ प्रशंसा आ जाये वा (क्रियासंस्कारमें) उक्थ रहे।}} {{Outdent|उक्थ्य (वै॰ त्रि॰) १ श्लोक वा प्रशंसा सुनानेवाला, जो प्रशंसा करने में निपुण हो। (पु॰) २ प्रातःकाल और मध्याह्नके यज्ञका तर्पणोदक। ३ एक सोमयज्ञ। ४ प्रार्थना मार्गका एक संस्कार। यह ज्योतिष्टोमका एक भाग है।}} {{Outdent|उक्लेद (सं॰ पु॰) वमि, क़ै।}} {{Outdent|उक्ष्-भ्वादि॰ पर॰ सक॰ सेट्। यह निम्नलिखित अर्थों में आता है―१ आर्द्र करना, २ विन्दु डालना, ३ बिखेरना, ४ परिष्कार करना, ५ अङ्कुरित होना, ६ अपना बल बढ़ाना और ७ बलवान् बनना।}} {{Outdent|उक्ष (सं॰ त्रि॰) १ वृहत, बड़ा। २ शुद्ध, साफ़। इस अर्थमें यह शब्द किसी-कीसी यौगिक पदके पीछे लगता है।}} {{Outdent|उक्षण (सं॰ क्ली॰) उक्ष् भावे ल्युट्। सेचन, प्रोक्षण, छिड़काव। <small>“वशिष्ठमन्त्रोक्षण्जान् प्रभावात्।” (रघु ५।२७)</small>}} {{Outdent|उक्षण्यायन (वै॰ पु॰) उक्षण्य का गोत्रापत्य।}} {{Outdent|उक्षण्यु (वै॰ त्रि॰) उक्षन्की भांति व्यवहार वा कार्य करनेवाला, धनकी वर्षा करनेवालेका अभिलाषी।}} {{Outdent|उक्ष् इति ष्टरच्। <small>वतृसोश्वर्षभेभ्यश्च तनुत्वे। पा ५॥३॥९१। १ छोटा वृष, नन्हां बैल। २ महावृष, बड़ा बैल।</small>}} {{Outdent|उक्षतर-ङीप्। १ छोटी गाय, बछिया। २ वृद्ध गवी, बड़ी गाय।}} {{Outdent|उक्षन्, <small>उचा देखी।</small>}} {{Outdent|उक्ष्- श्वन्-कनिन्। <small>शन् उक्षनित्यादि। उण् १।१५८।</small>१ वृष, बैल, सांड़। २ ऋषभ नामक ओषधि। (त्रि॰) ३ सेचक, सींचनेवाला। <small>“उचा समुद्रो अरुषः सुपर्ण।” (ऋक् ५।४७।३)</small>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 82xzym697k96126854blxvlmzp17iqx 664922 664916 2026-07-04T15:44:33Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664922 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१५२'''|'''उत्तवाक्य-उक्षा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उक्तवाक्य (सं॰ त्रि॰) १ सम्मति दे चुकनेवाला, जो राय बता चुका हो। (क्ली॰) २ आदेश, हुका, क़ानून्।}} {{Outdent|उक्तानुक्त (सं॰ त्रि॰) कथित एवं अकथित, कहा और न कहा}} {{Outdent|उक्ति (सं॰ स्त्री॰) वाक्य, निर्देश, जुमला, इज़हार, बयान्।}} {{Outdent|उत्तोपसंहार (सं॰ पु॰) संक्षिप्त वर्णन, मुखफ़् फ़फ़ बयान्, थोड़ेमें कही हुई बात।}} {{Outdent|उक्त्वा (सं॰ अव्य॰) कथन करके, कहकर।}} {{Outdent|उक्थ (सं॰ क्ली॰) १ वाक्य, जुमला, कहावत २ क्रिया संस्कारमें एक प्रकारका पठन वा उच्चारित पाठ। उक्थ शास्त्रका एक अवयव है। यह प्रायः परिपाटी निर्माण करता और साम तथा यजुःके प्रतिकूल चलता है। महद वा वृहद-उक्थ तीन श्रेणियों में पठनकी परिपाटी ढालता है। उक्त तीनो श्रेणियों में अस्सी ऋक् रहता, जो अग्निचयनके पीछे मन्त्रपाठमें कही जाती हैं। ४ सामवेदका एक नाम। (पु॰) ५ अग्निका एक रूप।}} {{Outdent|उक्थपत्र (वै॰ त्रि॰) श्लोकोंको पत्रकी भांति रखनेवाला।}} {{Outdent|उक्थपात्र (सं॰ क्ली॰) उक्थ पढ़ते समय चढ़ाया जानेवाला पात्र वा तर्पणोदक।}} {{Outdent|उक्थभृत् (वै॰ त्रि॰) उक्थको समर्पण करने वा चढ़ानेवाला।}} {{Outdent|उक्थवत् (वै॰ त्रि॰) उक्थसे मिला हुआ।}} {{Outdent|उक्थवर्धन (वै॰ त्रि॰) प्रशंसासे प्रसन्न हो अपना बल बढ़ानेवाला।}} {{Outdent|उक्थवाहस् (वै॰ त्रि॰) १ श्लोक समर्पण करनेवाला। २ श्लोकका समर्पण पानेवाला।}} {{Outdent|उक्थशंसिन् (वै॰ त्रि॰) १ प्रशंसा करनेवाला। २ उक्थ पढ़नेवाला।}} {{Outdent|उक्थशस् (पु॰) <small>उक्थशस देखो।</small>}} {{Outdent|उक्थशस (वै॰ त्रि॰) श्लोक कहनेवाला, जो प्रशंसा करता हो।}} {{Outdent|उक्थशास् (स्त्री॰) <small>उक्थशस देखो।</small>}} {{Outdent|उक्थशुष्क (वै॰ त्रि॰) उच्च स्वरसे श्लोक पढ़नेवाला।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उक्थामद (वै॰ क्ली॰) प्रशंसा एवं प्रसन्नता।}} {{Outdent|उक्थार्क (वै॰ क्ली॰) उद्गार एवं भजन।}} {{Outdent|उक्थावी (वै॰ त्रि॰) श्लोकका प्रेमी।}} {{Outdent|उक्थाशास्त्र (वै॰ क्ली॰) पठन एवं प्रशंसा।}} {{Outdent|उक्थिन् (वै॰ त्रि॰) १ श्लोक पढ़नेवाला। २ जिसके साथ प्रशंसा आ जाये वा (क्रियासंस्कारमें) उक्थ रहे।}} {{Outdent|उक्थ्य (वै॰ त्रि॰) १ श्लोक वा प्रशंसा सुनानेवाला, जो प्रशंसा करने में निपुण हो। (पु॰) २ प्रातःकाल और मध्याह्नके यज्ञका तर्पणोदक। ३ एक सोमयज्ञ। ४ प्रार्थना मार्गका एक संस्कार। यह ज्योतिष्टोमका एक भाग है।}} {{Outdent|उक्लेद (सं॰ पु॰) वमि, क़ै।}} {{Outdent|उक्ष्-भ्वादि॰ पर॰ सक॰ सेट्। यह निम्नलिखित अर्थों में आता है―१ आर्द्र करना, २ विन्दु डालना, ३ बिखेरना, ४ परिष्कार करना, ५ अङ्कुरित होना, ६ अपना बल बढ़ाना और ७ बलवान् बनना।}} {{Outdent|उक्ष (सं॰ त्रि॰) १ वृहत, बड़ा। २ शुद्ध, साफ़। इस अर्थमें यह शब्द किसी-कीसी यौगिक पदके पीछे लगता है।}} {{Outdent|उक्षण (सं॰ क्ली॰) उक्ष् भावे ल्युट्। सेचन, प्रोक्षण, छिड़काव। <small>“वशिष्ठमन्त्रोक्षण्जान् प्रभावात्।” (रघु ५।२७)</small>}} {{Outdent|उक्षण्यायन (वै॰ पु॰) उक्षण्य का गोत्रापत्य।}} {{Outdent|उक्षण्यु (वै॰ त्रि॰) उक्षन्की भांति व्यवहार वा कार्य करनेवाला, धनकी वर्षा करनेवालेका अभिलाषी।}} {{Outdent|उक्षतर (सं॰ पु॰) उक्ष् इति ष्टरच्। <small> वतृसोश्वर्षभेभ्यश्च तनुत्वे। पा ५॥३॥९१। १ छोटा वृष, नन्हां बैल। २ महावृष, बड़ा बैल।</small>}} {{Outdent|उक्षतरी (सं॰ स्त्री॰) उक्षतर-ङीप्। १ छोटी गाय, बछिया। २ वृद्ध गवी, बड़ी गाय।}} {{Outdent|उक्षन्, <small>उचा देखी।</small>}} {{Outdent|उक्षवश (वै॰ पु॰) वत्स, बछड़ा, बच्छा।}} {{Outdent|उक्षवेहत् (वै॰ पु॰) नपुंसक षण्ड, बधिया बैल।}} {{Outdent|उक्षा (सं॰ पु॰) उक्ष्- श्वन्-कनिन्। <small>शन् उक्षनित्यादि। उण् १।१५८।</small>१ वृष, बैल, सांड़। २ ऋषभ नामक ओषधि। (त्रि॰) ३ सेचक, सींचनेवाला। <small>“उचा समुद्रो अरुषः सुपर्ण।” (ऋक् ५।४७।३)</small>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9n9aw3nle9r9r7vj6495wzreuzogw4w पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५४ 250 75843 664925 608966 2026-07-04T16:32:06Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664925 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उचान्न-उखाड़'''|'''१५३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उक्षान्न (वै॰ त्रि॰) वृषभक्षक, बैलका गोश्त-खानेवाला।}} {{Outdent|उक्षाल (सं॰ त्रि॰) १ त्वरित, फुर्तीला। २ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ कराल, कड़ा। ४ उत्कट, डरावना। (पु॰) ५ वानर, बन्दर।}} {{Outdent|उक्षित (सं॰ त्रि॰) उक्ष-क्त। १ सिक्त, सिंचा या धुला हुआ। २ लिप्त, लगा हुआ। ३ शक्तिशाली, ताक़तवर। ४ वृद्ध, पुराना।}} {{Outdent|उख्-भ्रादि॰ पर॰ सक॰ सेट् धातु। यह गमन अर्थमें आता है।}} {{Outdent|उख (सं॰ त्रि॰) उख्-क। १ गमनकारी, चलने-वाला। उत्-खन्-ड निपातनात् तत्लोपः। २ ऊर्ध्व दिक् खनन करनेवाला। (वै॰ पु॰) ३ पात्र, बरतन। ४ तित्तिरिके एक शिष्यका नाम।}} {{Outdent|उखच्छिद् (वै॰ त्रि॰) पात्र तोड़नेवाला।}} {{Outdent|उखटना (हिं॰ क्रि॰) १ इतस्ततः पद पड़ना, अच्छी तरह चल न सकना, ठोकर खाना, लड़खड़ा जाना। २ थिरकना, धीरे-धीरे चलना। ३ खुटकना,तोड़ लेना।}} {{Outdent|उखड़ना (हिं॰ कि॰) १ निर्मूल होना, उपटना, जड़से टूट जाना। २ निकल पड़ना, अलग होना। ३ टूटना, कटना। ४ छूटना। ५ स्थानच्युत होना, जगह छोड़ना। ६ उद्घाटित होना, खुलना। ७ पतित होना गिरना। ८ बिगड़ना। ९ बन्द होना। १० बेतान गाना। ११ सम्मान खोना, इज्ज़त गंवाना। १२ बेपरवा होना, फ़िक्र न करना। १३ अप्रसन्न होना, बिगड़ पड़ना। १४ हताश होना, दिल टूटना। १५ बदलना। १६ बिखरना।१७ हटना। १८ मिटना। १९ डरना। २० बाहर होना। २१ राह पकड़ना। २२ भागना। २३ सरकना। २४ लोप हो जाना। २५ खुदना। २६ गमन करना। २७ फूट पड़ना। २८ लड़ खड़ाना। २९ हारना। ३० हांपना। ३१ रुकना। तीव्र भाषाको उखड़ी-उखड़ी बातें, मुंह फेर लेनेको उखेड़की लेना और दण्ड देनेको काम उखाड़ना कहते हैं।}} {{Outdent|उखड़वाना (हिं॰ क्रि॰) उखाड़नेको आदेश देना, अन्यके द्वारा उखाड़ने का कार्य कराना।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उखड़ाई (हिं॰ स्त्री॰) उखाड़नेका काम।}} {{Outdent|उखभोज (हिं॰ षु॰) इक्षुवपनोत्सवका विशिष्टान्न-सम्भार, ऊख बोनेकी ज़ियाफ़त। कृषक इक्षु बोनेके प्रथम दिवस यह भोज देते हैं।}} {{Outdent|उखम (हिं॰ पु॰) उष्म, ताप, गरमी, हरारत। (स्त्री॰) उखमा।}} {{Outdent|उखमज (हिं॰ वि॰) १ उष्मज, गर्मीसे पैदा। (पु॰) २ उष्मज जीव, गरमीसे पैदा होनेवाला कीड़ा।}} {{Outdent|उखर (सं॰ क्ली॰) १ क्षारभूमि, रेतीली ज़मीन्। २ क्षारमृत्तिका, शोरा। इसे उषर भी लिखते हैं। (हि॰) ३ लाङ्गलपूजन, हलकी पूजा। यह ऊख बोनेके बाद होता है।}} {{Outdent|उखरज (सं॰ क्ली॰) १ पांशुलवण, शोरा। २ अय-स्कान्त भेद, एक लोहा। ३ लवण, नमक उखरना, <small>उखड़ना देखो।</small>}} {{Outdent|उखराज,<small> उखभोज देखो।</small>}} {{Outdent|उखवैल (सं॰ पु॰) तृणविशेष, एक घास। यह बला, रुचिजनक और पशुके लिये सदा हितकर होता है।<small>(राजनिघण्टु)</small>}} {{Outdent|उखल, <small>उखल देखो।</small>}} {{Outdent|उखलना (हिं॰ क्रि॰) खौलना, गर्म होना।}} {{Outdent|उखली (हिं॰ स्त्री॰) उलूखल, हावन, कूंडी। बङ्गालमें यह पात्र काष्ठमय होता है। मध्यस्थलमें एक हस्तके प्रमाण गड्ढा रखते हैं। इसी गड्ढे में अन्न डाल और भुषलसे भार तुष छुड़ाते हैं। किन्तु हिन्दुस्थानि-योंके घरमें यह पत्थरकी होती, और ज़मीन् में गडी रहती है। <small> “उखलीमें मूंड़ डाल चोटसे क्या डरना।” (लोकोक्ति)</small>}} {{Outdent|उखहाई (हिं॰ स्त्री॰) ऊखकी चुसाई या खवाई।}} {{Outdent|उखा (सं॰ स्त्री॰) १ रन्धनस्थाली, देग, बटलोई। २ चूल्हा। ३ शरीरका अवयव, जिस्मका एक हिस्सा। (हिं॰)<small> उषा देखो।</small>}} {{Outdent|उखाड़ (हिं॰ पु॰) १ उच्छेद, बेखकनी, उखाड़ने का काम। २ मल्लयुद्धका हस्तलाघव, कुश्तीका एक दांव। अपने साथ लड़नेवालेको कमर पकड़ कर ऊपर उठा भूमिपर पटक देनका नाम उखाड़ है। पिशुनता और निन्दाको उखाड़-पछाड़ कहते हैं।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 39|2em}}</noinclude> 89987124xyct5ysvdmmp32kqqpjb28c पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५५ 250 75844 664926 608967 2026-07-04T17:19:06Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664926 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१५४'''|'''उखाड़ना-उगाही'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उखाड़ना (हिं॰ क्रि॰) १ निर्मूल करना, उपाड़ना। २ छिन्नभिन्न करना, तोड़ना। ३ निकालना। ४ स्थान-चुपत करना, हटाना। ५ अलग करना। ६ असन्तुष्ट करना, विष बोना। ७ परिष्कार करना, हांक देना। ८ उलटाना। १० भगाना, बिखेरना।}} {{Outdent|उखाड़् (हिं॰ क्रि॰) निर्मूल करनेवाला, जो उखाड़ डालता हो।}} {{Outdent|उखारना, <small>उखाडना देखो।</small>}} {{Outdent|उखारी (हिं॰ स्त्री॰) इक्षुक्षेत्र, ऊखका खेत।}} {{Outdent|उखाल (हिं॰ पु॰) वमिक्रिया, कै करनेका काम विशूचिका अथवा वमिक्रियाको उखाल-पुखाल कहते हैं।}} {{Outdent|उखालिया (हिं॰ पु॰) उषःकालका खाद्य, नाश्ता, सवेरेका खाना।}} {{Outdent|उखुली (सं॰ स्त्री॰) देवीविशेष, किसी देवताका नाम।}} {{Outdent|उखेड़, <small>उखाड़ देखो।</small>}} {{Outdent|उखेड़ना, <small>उखाड़ना देखो।</small>}} {{Outdent|उखेरना, <small>उखाड़ना देखो।</small>}} {{Outdent|उखेलना (हिं॰ क्रि॰) उल्लेखन करना, तस्वीर उतारना।}} {{Outdent|उख्य (वै॰ त्रि॰) उखायां संस्कृतम्, उखा-यत्। स्थालीपक्क, देगमें पका हुआ। यह शब्द मांसादिका विशेषण है। “उख्यान् हस्तेषु विभ्रतः।” <small>(अथर्व ४।१४।२)</small>}} {{Outdent|उगजोवा (हिं॰ पु॰) एक किस्मकी रंगाई।}} {{Outdent|उंगटना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्घाटन करना, कह देना। २ उपहास करना, हंसी उड़ाना।}} {{Outdent|उगण (वै॰ पु॰) प्रशस्त दलयुक्त, जिसमें बहुत सिपाही रहें।}} {{Outdent|उगदना (हिं॰ क्रि॰) बताना, बोलना, कहना। यह क्रिया दलाली बोलीमें चलती है।}} {{Outdent|उगन्त (हिं॰ क्रि॰) उद्गमन करना, निकलना, देख पड़ना।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“प्राची दिशि शज्ञि उमेत सुहावा। सिय-मुख सरिस निरवि मुख पावा॥” (तुलसी) </poem>}}}} {{Outdent|उगमन (हिं॰ पु॰) पूर्व, मशरक।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उगलना (हिं॰ क्रि॰) १ उदगिलन करना, मेदेसे बाहर निकालना, थूक देना। २ निराकरण करना, निकालना, फेंकना। ३ प्रत्यर्पण करना, वापस देना, फेरना। ईर्ष्या प्रकाश करनेको ज़हर उगलना कहते हैं।}} {{Outdent|उगलवाना, <small>उगलाना देखो।</small>}} {{Outdent|उगलाना (हिं॰ क्रि॰) १ उदगिलन कराना, भेदे या मुंहसे बाहर निकलवाना। ३ प्रत्यर्पण कराना, वापस दिलाना।}} {{Outdent|उगवाना (हिं॰ क्रि॰) उगाना, पैदा कराना, पलाना-पोषाना।}} {{Outdent|उगसाना, <small>उकसाना देखो।</small>}} {{Outdent|उगसारना (हिं॰ क्रि॰) वर्णन करना, कहना, सुनाना।}} {{Outdent|उगहना, <small>उगाहना देखो।</small>}} {{Outdent|उगाना (हिं॰ क्रि॰) १ उपजाना, पैदा करना, निकालना। २ उठाना, देखाना। ३ प्रहारार्थ किसी द्रव्यको तानना, उवाना।}} {{Outdent|उगार (हिं॰ पु॰) १ निष्ठीवन, थूक। २ जल, पानी। जो जल क्रमशः निचुड़कर एकत्र होता, वही उगार कहाता है। ३ निचुड़ा हुआ रङ्ग। ४ कूपसे जल निकाले जानेका काम। जब कूपमें जल कम हो, तब उसे बढ़ानेके लिये उगार किया जाता है।}} {{Outdent|उगाल (हिं॰ पु॰) १ उद्गार, खरवार। २ जीर्ण वस्त्र, पुराना कपड़ा। यह ठगोंकी बोली है।}} {{Outdent|उगालदान् (हिं॰ पु॰) निष्ठीवनपात्र, पीकदान, थूकनेका बरतन।}} {{Outdent|उगाला (हिं॰ पु॰) १ कीटविशेष, एक कीड़ा। यह खड़ी फसलको मारता है। (स्त्री॰) २ आद्र भूमि, तर जमीन्।}} {{Outdent|उगाहना (हिं॰ क्रि॰) उद्ग्रहण करना, वसूल करना।}} {{Outdent|उगाही (हिं॰ क्रि॰) १ उद्ग्रहण, वसूल, पवाई। २ उदगृहीत धन, वसूल किया हुआ रुपया। ३ भूमि-कर, ज़मीन्का लगान। ४ एक प्रकारका आदान-प्रदान, किसी किस्मका लेन-देन। इसमें महाजनको समय-समय पर अपना दिया हुआ रुपया वसूल करना पड़ता है।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> tlzu94dswh2d7ndf9hup8q2tetbpnrw पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५६ 250 75845 664927 608968 2026-07-04T17:56:39Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664927 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उगिलना-उग्रचारिणी'''|'''१५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उगिलना, उगलना देखो। उगिलवाना, उगलवाना देखो। । उगिलाना, उगलाना देखो। उग्गाहा (हिं० पु.) उद्गाथा, गौति, एक प्रकार- का आर्या छन्द। इसके विषममें द्वादश और सम | चरणमें अष्टादश मात्रा होती हैं। जगणका प्रयोग अग्राह्य है। ६ उग्र (सं० पु०) उच्यति क्रोधन सम्बध्यते, उच-रक गश्चान्तादेशः। ऋच्चे न्द्रारव्रजविप्रकुबनुव्रतुरखुरभट्रोग:भेरमेरडक्रशक्त गौरवक्रे रामाला: । उण् ।२८। १ शिव, महादेवको वायु- मूर्ति। २ क्षत्रियके वीर्य और शूद्राके गर्भसे उत्पन्न जातिविशेष । यथा- उग्रगन्धिका, उग्रगन्धा देखो। "चवियात् शूद्रकन्यायां कराचार-विहारवान् । आवशूद्रवपुजन्नुरुग्रो नाम प्रजायते ॥” (मनु १०१६) इस जातिके लोगोंका कार्य गर्तस्थित गोहको मारना और पकड़ना है। ३ पूर्व फाल्गुनी, पूर्वा- षाढ़ा, पूर्व भाद्रपद, मघा और भरणी नक्षत्र । ४ शोभाजन वृक्ष, सहजन। ५ केरलदेश, मलबार। ६ खनामख्यात दानवविशेष। 'वेगवान् केतुमानुयः सोयव्ययो | • महासुरः।' ( हरिवंश आदि ३६३ ५०) ७ धृतराष्ट्र के एक पुत्र । ( भारत पादि ११७ १०) ८ नरेन्द्रादित्य नामक काश्मीर गजक गुरु । ८ विष्णु । (भारत अनु० १४६ १०) (त्रि०)। ! १० उत्कट, मर्म । ११ यष्टि प्रभृति धारण करनेवाला, जो लकड़ी रखता हो। १२ अतिशय दारुण कर्म करनेवाला, जो खूखार काम करता हो। "चिकित्सकस्य मृगयो क रस्थोच्छिष्टभोजिनः । उद्यान्न स्तिकानञ्ज पर्याचान्तमनिद शम् ॥” ( मनु ४।२१२) (को०) १३ वत्सनाभ नामक विष, बच्छनाग। १४ शेवसम्प्रदाय विशेष। इस सम्पदायके लोग बाहु पर डमरु पहनते हैं। १५ तीर्थ विशेष । “उय कनखलव केदार भैरय तथा ।” (रेदाखरू २ अ०) १६ क्रोध, गुस्सा। 'उग्रक (सं० पु.) नागविशेष। उग्रकर्मन् (सं० वि०) उग्रं कर्म यस्य बहुव्री । हिंस्रस्वभाव, बेहरम, कड़ा काम करनेवाला। २ प्रापिहिंसाकारी, मार डालनेवाला। ३ खल, बद- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उग्रकाण्ड (सं॰ पु॰) उग्रं काण्डो यस्य, बहुव्री॰। १ करवेल्लक, करेला। २ काण्डबल्ली, करेलेकी बेल।}} {{Outdent|उग्रगन्ध (सं॰ क्ली॰) उग्रो गन्धो यस्य, बहुव्री॰। १ हिङ्गु, हींग। (पु॰) २ शुक्लरसोन, लहसुन। ३ कट्फलवृक्ष, कायफल। ३ रक्तरसोन, प्याज। ४ अजेक वृक्ष, बबई। ५ चम्मक, चम्पा। (त्रि॰) ६ उत्कट गन्धयुक्त, कड़ी खुशबूवाला।}} {{Outdent|उग्रगन्धा (सं॰ स्त्री॰) उग्रगन्ध स्त्रियां टाप्। १ वन यवानी, अजवायन। २ अजमोदा, अजमोद। ३ बचा, बच। ४ महाभरीवचा, कुलींजन। ५ छिछिका, नक-छिकनी।}} {{Outdent|उग्रगन्धिन् (सं॰ त्रि॰) उत् कट गन्ध विशिष्ट, तीखो खुशबूवाला।}} {{Outdent|उग्रगन्धी, <small>उग्रगन्धा देखो।</small>}} {{Outdent|उग्रचण्डा (सं॰ स्त्री॰) उग्रा चण्डा कोपना स्त्री, कर्मधा॰। १ भगवतीकी एक मूर्ति। आश्विन मासकी कृष्ण-नवमीको कोटि योगिनीके साथ यह अष्टादशभुजा मूर्ति आविर्भूत होती है। यथा,―― {{smaller|<poem>“उग्रचण्डा तु या मूर्तिरष्टादशभुजाऽभवत्। सा नवम्या पुरा कृष्णपक्ष कन्यां गते रवो। प्रादुर्भूता महाभागा योगिनो कोटिभिः सह।” (कालिकापु० ५९-६० अ०)</poem>}} इसी मूर्तिने दक्षका यज्ञ भङ्ग किया था। आषाद मासकी पूर्णिमा तिथिको दक्ष द्वदश वर्षमें निष्पन्न होनेवाला यज्ञ करने लगे थे। इस यज्ञ में सकल ही देवता बुलाये गये। किन्तु दचने कपाल-मालाधारी समझ शिवको और कपालीको पत्नी होनेसे निज कन्धा सतीको भी निमन्त्रण दिया न था। इसीसे सतीने अतिशय क्रोधमें आकर प्राण छोड़ा। देहत्यागके अनन्तर सतीने अपना रूप बदल कोटि योगिनीके साथ उग्रचण्डा मूर्ति बनायी और शिव तथा उनके अनु-चरको ले यज्ञमें धूलि उड़ायी थी।<small> (कालिकापुराण) २ दुर्गाका एक आवरण।</small>}} {{Outdent|उग्रचय (सं॰ पु॰) उत्कट अभिलाष, जोरकी ख़ाहिश, बड़ी चाह।}} {{Outdent|उग्रचारिणी (सं॰ स्त्री॰) दुर्गा देवीका एक नाम।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 93yt6a3kyplm3x8byoxin0ogz1d0aon 664965 664927 2026-07-05T02:37:45Z अँजली चौधरी 2439 664965 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उगिलना-उग्रचारिणी'''|'''१५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उगिलना, <small>उगलना देखो।</small>}} {{Outdent|उगिलवाना, <small>उगलवाना देखो।</small>}} {{Outdent|उगिलाना, <small>उगलाना देखो।</small>}} {{Outdent|उग्गाहा (हिं॰ पु॰) उद्गाथा, गौति, एक प्रकार-का आर्या छन्द। इसके विषममें द्वादश और सम चरणमें अष्टादश मात्रा होती हैं। जगणका प्रयोग अग्राह्य है।}} {{Outdent|उग्र (सं॰ पु॰) उच्यति क्रोधन सम्बध्यते, उच्-रक् गश्चान्तादेशः। <small> ऋज्रेन्द्रारव्रज्रविप्रकुब्रचुव्रक्षुतुरखुरभट्रोग्र:भेररमेरण्डशुक्रशक्त गौरवक्रे रामाला:। उण्।२८।</small>}} १ शिव, महादेवकी वायु-मूर्ति। २ क्षत्रियके वीर्य और शूद्राके गर्भसे उत्पन्न जातिविशेष। यथा―― {{smaller|{{c|<poem>“चत्रियात् शूद्रकन्यायां क्रूराचार-विहारवान्। क्षवशूद्रवपुजन्तुरुग्रो नाम प्रजायते॥” (मनु १०।९)</poem>}}}} इस जातिके लोगोंका कार्य गर्तस्थित गोहको मारना और पकड़ना है। ३ पूर्व फाल्गुनी, पूर्वा-षाढ़ा, पूर्व भाद्रपद, मघा और भरणी नक्षत्र। ४ शोभाञ्जन वृक्ष, सहजन। ५ केरलदेश, मलबार। ६ स्वनामख्यात दानवविशेष। <small>‘वेगवान् केतुमानुग्रः सोग्रव्ययो महासुरः।’ (हरिवंश आदि ३६३ अ॰)</small> ७ धृतराष्ट्र के एक पुत्र। <small>(भारत आदि ११७ अ॰)</small> ८ नरेन्द्रादित्य नामक काश्मीर गजक गुरु। ९ विष्णु।<small> (भारत अनु॰ १४९ अ॰)</small> (त्रि०)। १० उत्कट, मर्म । ११ यष्टि प्रभृति धारण करनेवाला, जो लकड़ी रखता हो। १२ अतिशय दारुण कर्म करनेवाला, जो खूंखार काम करता हो। {{smaller|{{c|<poem>“चिकित्सकस्य मृगयो क्र रस्योच्छिष्टभोजिनः। उग्रान्नं मूतिकान्नञ्ज पर्याचान्तमनिर्दशम्॥” (मनु ४।२१२) </poem>}}}} (क्ली॰) १३ वत्सनाभ नामक विष, बच्छनाग। १४ शैवसम्प्रदाय विशेष। इस सम्प्रदायके लोग बाहु पर डमरु पहनते हैं। १५ तीर्थ विशेष।<small> “उग्रं कनखलञ्जैव केदार भैरष तथा ।” (रेदाखण्ड २ अ॰)</small> १६ क्रोध, गुस्सा। {{Outdent|उग्रक (सं॰ पु॰) नागविशेष।}} {{Outdent|उग्रकर्मन् (सं॰ त्रि॰) उग्रं कर्म यस्य बहुव्री॰। हिंस्रस्वभाव, बेहरम, कड़ा काम करनेवाला। २ प्राणिहिंसाकारी, मार डालनेवाला। ३ खल, बद-माश}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उग्रकाण्ड (सं॰ पु॰) उग्रं काण्डो यस्य, बहुव्री॰। १ करवेल्लक, करेला। २ काण्डबल्ली, करेलेकी बेल।}} {{Outdent|उग्रगन्ध (सं॰ क्ली॰) उग्रो गन्धो यस्य, बहुव्री॰। १ हिङ्गु, हींग। (पु॰) २ शुक्लरसोन, लहसुन। ३ कट्फलवृक्ष, कायफल। ३ रक्तरसोन, प्याज। ४ अजेक वृक्ष, बबई। ५ चम्मक, चम्पा। (त्रि॰) ६ उत्कट गन्धयुक्त, कड़ी खुशबूवाला।}} {{Outdent|उग्रगन्धा (सं॰ स्त्री॰) उग्रगन्ध स्त्रियां टाप्। १ वन यवानी, अजवायन। २ अजमोदा, अजमोद। ३ बचा, बच। ४ महाभरीवचा, कुलींजन। ५ छिछिका, नक-छिकनी।}} {{Outdent|<small>उग्रगन्धिका, उग्रगन्धा देखो।</small>}} {{Outdent|उग्रगन्धिन् (सं॰ त्रि॰) उत् कट गन्ध विशिष्ट, तीखो खुशबूवाला।}} {{Outdent|उग्रगन्धी, <small>उग्रगन्धा देखो।</small>}} {{Outdent|उग्रचण्डा (सं॰ स्त्री॰) उग्रा चण्डा कोपना स्त्री, कर्मधा॰। १ भगवतीकी एक मूर्ति। आश्विन मासकी कृष्ण-नवमीको कोटि योगिनीके साथ यह अष्टादशभुजा मूर्ति आविर्भूत होती है। यथा,―― {{smaller|{{c|<poem>“उग्रचण्डा तु या मूर्तिरष्टादशभुजाऽभवत्। सा नवम्या पुरा कृष्णपक्ष कन्यां गते रवो। प्रादुर्भूता महाभागा योगिनो कोटिभिः सह।” (कालिकापु० ५९-६० अ०)</poem>}}}} {{gap}}इसी मूर्तिने दक्षका यज्ञ भङ्ग किया था। आषाद मासकी पूर्णिमा तिथिको दक्ष द्वदश वर्षमें निष्पन्न होनेवाला यज्ञ करने लगे थे। इस यज्ञ में सकल ही देवता बुलाये गये। किन्तु दचने कपाल-मालाधारी समझ शिवको और कपालीको पत्नी होनेसे निज कन्धा सतीको भी निमन्त्रण दिया न था। इसीसे सतीने अतिशय क्रोधमें आकर प्राण छोड़ा। देहत्यागके अनन्तर सतीने अपना रूप बदल कोटि योगिनीके साथ उग्रचण्डा मूर्ति बनायी और शिव तथा उनके अनु-चरको ले यज्ञमें धूलि उड़ायी थी।<small> (कालिकापुराण) २ दुर्गाका एक आवरण।</small>}} {{Outdent|उग्रचय (सं॰ पु॰) उत्कट अभिलाष, जोरकी ख़ाहिश, बड़ी चाह।}} {{Outdent|उग्रचारिणी (सं॰ स्त्री॰) दुर्गा देवीका एक नाम।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 4utotcntp1jge8m7n7kdckitqeoobtb 664966 664965 2026-07-05T02:39:49Z अँजली चौधरी 2439 664966 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यज्ञ में सकल ही देवता बुलाये गये। किन्तु दचने कपाल-मालाधारी समझ शिवको और कपालीको पत्नी होनेसे निज कन्धा सतीको भी निमन्त्रण दिया न था। इसीसे सतीने अतिशय क्रोधमें आकर प्राण छोड़ा। देहत्यागके अनन्तर सतीने अपना रूप बदल कोटि योगिनीके साथ उग्रचण्डा मूर्ति बनायी और शिव तथा उनके अनु-चरको ले यज्ञमें धूलि उड़ायी थी।<small> (कालिकापुराण) २ दुर्गाका एक आवरण।</small> {{Outdent|उग्रचय (सं॰ पु॰) उत्कट अभिलाष, जोरकी ख़ाहिश, बड़ी चाह।}} {{Outdent|उग्रचारिणी (सं॰ स्त्री॰) दुर्गा देवीका एक नाम।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> pvs2wr4432emfb8dfimjd6yusy9snhy 664968 664967 2026-07-05T02:41:53Z अँजली चौधरी 2439 664968 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उगिलना-उग्रचारिणी'''|'''१५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उगिलना, <small>उगलना देखो।</small>}} {{Outdent|उगिलवाना, <small>उगलवाना देखो।</small>}} {{Outdent|उगिलाना, <small>उगलाना देखो।</small>}} {{Outdent|उग्गाहा (हिं॰ 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देहत्यागके अनन्तर सतीने अपना रूप बदल कोटि योगिनीके साथ उग्रचण्डा मूर्ति बनायी और शिव तथा उनके अनु-चरको ले यज्ञमें धूलि उड़ायी थी।<small> (कालिकापुराण) २ दुर्गाका एक आवरण।</small> {{Outdent|उग्रचय (सं॰ पु॰) उत्कट अभिलाष, जोरकी ख़ाहिश, बड़ी चाह।}} {{Outdent|उग्रचारिणी (सं॰ स्त्री॰) दुर्गा देवीका एक नाम।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> m0gk0rhtvdcs8xfbk4s7vw5fjov2imr 664969 664968 2026-07-05T02:42:30Z अँजली चौधरी 2439 664969 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उगिलना-उग्रचारिणी'''|'''१५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उगिलना, <small>उगलना देखो।</small>}} {{Outdent|उगिलवाना, <small>उगलवाना देखो।</small>}} {{Outdent|उगिलाना, <small>उगलाना देखो।</small>}} {{Outdent|उग्गाहा (हिं॰ पु॰) उद्गाथा, गौति, एक प्रकार-का आर्या छन्द। इसके विषममें द्वादश और सम चरणमें अष्टादश मात्रा होती हैं। जगणका प्रयोग अग्राह्य है।}} {{Outdent|उग्र (सं॰ पु॰) उच्यति क्रोधन सम्बध्यते, उच्-रक् गश्चान्तादेशः। <small> ऋज्रेन्द्रारव्रज्रविप्रकु-ब्रचुव्रक्षुतुरखुरभट्रोग्र:भेररमेरण्डशुक्रशक्त गौरवक्रे रामाला:। उण्।२८।</small>}} १ शिव, महादेवकी वायु-मूर्ति। २ क्षत्रियके वीर्य और शूद्राके गर्भसे उत्पन्न जातिविशेष। यथा―― {{smaller|{{c|<poem>“चत्रियात् शूद्रकन्यायां क्रूराचार-विहारवान्। क्षवशूद्रवपुजन्तुरुग्रो नाम प्रजायते॥” (मनु १०।९)</poem>}}}} {{gap}}इस जातिके लोगोंका कार्य गर्तस्थित गोहको मारना और पकड़ना है। ३ पूर्व फाल्गुनी, पूर्वा-षाढ़ा, पूर्व भाद्रपद, मघा और भरणी नक्षत्र। ४ शोभाञ्जन वृक्ष, सहजन। ५ केरलदेश, मलबार। ६ स्वनामख्यात दानवविशेष। <small>‘वेगवान् केतुमानुग्रः सोग्रव्ययो महासुरः।’ (हरिवंश आदि ३६३ अ॰)</small> ७ धृतराष्ट्र के एक पुत्र। <small>(भारत आदि ११७ अ॰)</small> ८ नरेन्द्रादित्य नामक काश्मीर गजक गुरु। ९ विष्णु।<small> (भारत अनु॰ १४९ अ॰)</small> (त्रि०)। १० उत्कट, मर्म । ११ यष्टि प्रभृति धारण करनेवाला, जो लकड़ी रखता हो। १२ अतिशय दारुण कर्म करनेवाला, जो खूंखार काम करता हो। {{smaller|{{c|<poem>“चिकित्सकस्य मृगयो क्र रस्योच्छिष्टभोजिनः। उग्रान्नं मूतिकान्नञ्ज पर्याचान्तमनिर्दशम्॥” (मनु ४।२१२) </poem>}}}} (क्ली॰) १३ वत्सनाभ नामक विष, बच्छनाग। १४ शैवसम्प्रदाय विशेष। इस सम्प्रदायके लोग बाहु पर डमरु पहनते हैं। १५ तीर्थ विशेष।<small> “उग्रं कनखलञ्जैव केदार भैरष तथा ।” (रेदाखण्ड २ अ॰)</small> १६ क्रोध, गुस्सा। {{Outdent|उग्रक (सं॰ पु॰) नागविशेष।}} {{Outdent|उग्रकर्मन् (सं॰ त्रि॰) उग्रं कर्म यस्य बहुव्री॰। हिंस्रस्वभाव, बेहरम, कड़ा काम करनेवाला। २ प्राणिहिंसाकारी, मार डालनेवाला। ३ खल, बद-माश}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उग्रकाण्ड (सं॰ पु॰) उग्रं काण्डो यस्य, बहुव्री॰। १ करवेल्लक, करेला। २ काण्डबल्ली, करेलेकी बेल।}} {{Outdent|उग्रगन्ध (सं॰ क्ली॰) उग्रो गन्धो यस्य, बहुव्री॰। १ हिङ्गु, हींग। (पु॰) २ शुक्लरसोन, लहसुन। ३ कट्फलवृक्ष, कायफल। ३ रक्तरसोन, प्याज। ४ अजेक वृक्ष, बबई। ५ चम्मक, चम्पा। (त्रि॰) ६ उत्कट गन्धयुक्त, कड़ी खुशबूवाला।}} {{Outdent|उग्रगन्धा (सं॰ स्त्री॰) उग्रगन्ध स्त्रियां टाप्। १ वन यवानी, अजवायन। २ अजमोदा, अजमोद। ३ बचा, बच। ४ महाभरीवचा, कुलींजन। ५ छिछिका, नक-छिकनी।}} {{Outdent|उग्रगन्धिका, <small>उग्रगन्धा देखो।</small>}} {{Outdent|उग्रगन्धिन् (सं॰ त्रि॰) उत् कट गन्ध विशिष्ट, तीखो खुशबूवाला।}} {{Outdent|उग्रगन्धी, <small>उग्रगन्धा देखो।</small>}} {{Outdent|उग्रचण्डा (सं॰ स्त्री॰) उग्रा चण्डा कोपना स्त्री, कर्मधा॰। १ भगवतीकी एक मूर्ति। आश्विन मासकी कृष्ण-नवमीको कोटि योगिनीके साथ यह अष्टादशभुजा मूर्ति आविर्भूत होती है। यथा,――}} {{smaller|{{c|<poem>“उग्रचण्डा तु या मूर्तिरष्टादशभुजाऽभवत्। सा नवम्या पुरा कृष्णपक्ष कन्यां गते रवो। प्रादुर्भूता महाभागा योगिनो कोटिभिः सह।” (कालिकापु० ५९-६० अ०)</poem>}}}} {{gap}}इसी मूर्तिने दक्षका यज्ञ भङ्ग किया था। आषाद मासकी पूर्णिमा तिथिको दक्ष द्वदश वर्षमें निष्पन्न होनेवाला यज्ञ करने लगे थे। इस यज्ञ में सकल ही देवता बुलाये गये। किन्तु दचने कपाल-मालाधारी समझ शिवको और कपालीको पत्नी होनेसे निज कन्धा सतीको भी निमन्त्रण दिया न था। इसीसे सतीने अतिशय क्रोधमें आकर प्राण छोड़ा। देहत्यागके अनन्तर सतीने अपना रूप बदल कोटि योगिनीके साथ उग्रचण्डा मूर्ति बनायी और शिव तथा उनके अनु-चरको ले यज्ञमें धूलि उड़ायी थी।<small> (कालिकापुराण) २ दुर्गाका एक आवरण।</small> {{Outdent|उग्रचय (सं॰ पु॰) उत्कट अभिलाष, जोरकी ख़ाहिश, बड़ी चाह।}} {{Outdent|उग्रचारिणी (सं॰ स्त्री॰) दुर्गा देवीका एक नाम।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ryfl3mz7cs5z1phr7ypahq80g8wz1hk पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५७ 250 75846 664928 608969 2026-07-04T17:59:26Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 664928 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१४९'''|'''उग्रजाति-उग्रपुत्र'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> उग्रजाति ( सं० वि० ) नौचवंशसम्भूत, कमीने | पड़ी है। छातीपर सीपका हार लिपटा है। चक्ष खान्दानसे चैदा। उग्र देखो। रता जैसे लाल हैं। उग्रतारा कृष्णवर्ण वस्त्र पहने हैं। उग्रजित् (वै० स्त्री०) एक अप्सरा । ( पर्व ६।११८१) कटिदेशमें व्याघ्रचर्म भूषित है। वामपद शवको उग्रता ( स० स्त्री०) उग्रस्य भावः कर्म वा तल् । छाती और दक्षिण पद सिंहको पीठपर रखा है। १ उग्रभाव, सख्ती, तेजी। २ उग्रकर्म, कड़ा काम । ये देवी स्वयं शवके शरीरको चाटती हैं। . ३ कटुता, कड़वापन। ४ अलङ्कार शास्त्रका कहा उग्रतेजस् (सं० वि०) १ उत्कट शक्तिशाली, खूखार हुआ व्यभिचारी गुणविशेष। अपराधादिके कारण ताकृत रखनेवाला। चित्तमें रूखापन पानेको उग्रता कहते हैं। यह | उग्रतेजा (सं० पु०) १ नागविशेष। २ किसी उग्रता धर्म, शिर:कम्पन, तर्जन, ताड़ना प्रभृति द्वारा बुद्धका नाम। ३ एक देवता। झलकती है। यथा,-. उग्रदंष्ट्र (सं० त्रि०) उत्कट दन्तयुक्त, तीखे दांतों- “शौर्यापराधादिभवः मवेञ्च त्वमुखता। वाला। तब बैदशिरःकम्पः तजनाताडनादयः ।" उग्रदण्ड (सं० त्रि०) १ उत्कट दण्डधारी, मोटा ( साहित्यदर्पण ३ परिच्छेद) सोटा बांधनेवाला। २ निर्दय, बेरहम, कड़ी सजा उग्रतारा (सं० स्त्री०) उग्र-ट-णिच्-अच-टाप । भग देनेवाला। वतीको एक मूर्ति। ये उग्र भयसे भक्तोंको वाण उग्रदर्शन (सं० त्रि.) भयानक, खौफनाक, जिसे देती हैं। उत्पत्तिको कथा इस प्रकार है- देखते डर लगे। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> किसी समय शुम्भ और निशुम्भ देवके यनका भाग उग्रदुहिट (सं० स्त्री० ) उत्कट पुरुषको कन्या, चुरा स्वयं दिक्पाल बन गये थे। इस पर समस्त खूखार आदमौकी बेटी। देवता इन्द्रके साथ इकट्ठे हो हिमालय पहुंचे। वहां उग्रधन्वन् (सं० पु० ) उग्रं धनुर्यस्य, अनङ् समा० । सबने गङ्गावतारके निकट ठहर महामाया भगवतीका शिव। २ इन्द्र। ३ मगधराज नन्दके कनिष्ठ पुत्र । स्तव किया । भगवती देवोंके स्तवसे सन्तुष्ट हुई शकटाल द्वारा ये मगधके राजा हुये। चन्द्रगुप्तने नेपाल- और मतङ्गका स्त्री रूप बना पूछने लगों,-देव! राज पर्वतेश्वरके साहाय्यसे उग्रधन्वाके राज्य छीनने को तुम इस स्थान पर किस स्त्रीको स्तव सुनाते चेष्टा की थी। उससे इन्होंने क्रद्ध हो चन्द्रगुप्तके और इस मतङ्गके आश्रमपर क्यों आते हो? ऐसे भातृगणको मार डाला। पीछे पर्वतेखरसे लड़ते उग्र- कहते ही समय उनके शरीरकोषसे एक देवी निकल धन्वाने प्राण छोड़ा। (व त्रि०) ४ असह्य धनु- कर बोलौं,-'ये देव हमारा ही स्तव करते हैं। शुम्भ विशिष्ट, कड़ी कमान वाला, जिसके धनुसको मार और निशम्भ नामक दो दानव इन्हें बाधा देते हैं। दुश्मन सह न सके। इसीसे देव उनके वध निमित्त यहां पाये हैं।' शरीरसे - “वाहु संध्यं ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता।" (ऋक् १०॥१०॥३) इन देवीके निकलने बाद ही हिमालयमें रहनेवाली उग्रनासिक ( सं त्रि०) दीर्घनासिक, नक्क, बड़ी वह मौरवर्णा मातङ्गी अतिशय कृष्णावर्णा बन नाकवाला। गयौं। ऋषि इन्हींको उग्रतारा कहते हैं। यह उग्रपत्रक (सं० पु.) महानीला, काला भौंरा। मूर्ति चतुर्भुजा, कृष्णवणा और मुण्डमालाधारिणी। उग्रपुत्र (सं० पु०) उग्रस्य शूरस्य पुनः। १शूरका है। दक्षिणके ऊपरी हस्तमें खड़ग तथा नीचेके पुत्र, बहादुर का लड़का। उगपुवः शूरान्वयः।” ( शतपथ- हस्तमें चामर और वामके ऊपरी हस्तमें करपा- ब्राह्मणभाष्य १४६५२) २ शिवके पुत्र कार्तिकेय। ३ गभीर लिका तथा नोचेके हस्तमें खपर है। मस्तक पर जलाशय, गहरा तालाब। “पा उगपुवे जिघांसत।" (ऋक् पाकामभेदी एक जटा लगी और गले में मुण्डमाला ११११) 'उगपुवे उगाः उदुगूर्णा पुवा यस्मिन् तस्मिनुदके' ( सायच्य) <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9u1sykupepynnoy4mpvi6nml744bbsc 664974 664928 2026-07-05T04:28:08Z अँजली चौधरी 2439 664974 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१५६'''|'''उग्रजाति-उग्रपुत्र'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> उग्रजाति ( सं० वि० ) नौचवंशसम्भूत, कमीने | खान्दानसे चैदा। उग्र देखो। उग्रजित् (वै० स्त्री०) एक अप्सरा । ( पर्व ६।११८१) उग्रता ( स० स्त्री०) उग्रस्य भावः कर्म वा तल् । १ उग्रभाव, सख्ती, तेजी। २ उग्रकर्म, कड़ा काम । ३ कटुता, कड़वापन। ४ अलङ्कार शास्त्रका कहा हुआ व्यभिचारी गुणविशेष। अपराधादिके कारण चित्तमें रूखापन पानेको उग्रता कहते हैं। यह | उग्रतेजा (सं० पु०) १ नागविशेष। २ किसी उग्रता धर्म, शिर:कम्पन, तर्जन, ताड़ना प्रभृति द्वारा बुद्धका नाम। ३ एक देवता। झलकती है। यथा,-. उग्रदंष्ट्र (सं० त्रि०) उत्कट दन्तयुक्त, तीखे दांतों- “शौर्यापराधादिभवः मवेञ्च त्वमुखता। वाला। तब बैदशिरःकम्पः तजनाताडनादयः ।" उग्रदण्ड (सं० त्रि०) १ उत्कट दण्डधारी, मोटा ( साहित्यदर्पण ३ परिच्छेद) सोटा बांधनेवाला। २ निर्दय, बेरहम, कड़ी सजा उग्रतारा (सं० स्त्री०) उग्र-ट-णिच्-अच-टाप । भग देनेवाला। वतीको एक मूर्ति। ये उग्र भयसे भक्तोंको वाण उग्रदर्शन (सं० त्रि.) भयानक, खौफनाक, जिसे देती हैं। उत्पत्तिको कथा इस प्रकार है- देखते डर लगे। किसी समय शुम्भ और निशुम्भ देवके यनका भाग उग्रदुहिट (सं० स्त्री० ) उत्कट पुरुषको कन्या, चुरा स्वयं दिक्पाल बन गये थे। इस पर समस्त खूखार आदमौकी बेटी। देवता इन्द्रके साथ इकट्ठे हो हिमालय पहुंचे। वहां उग्रधन्वन् (सं० पु० ) उग्रं धनुर्यस्य, अनङ् समा० । सबने गङ्गावतारके निकट ठहर महामाया भगवतीका शिव। २ इन्द्र। ३ मगधराज नन्दके कनिष्ठ पुत्र । स्तव किया । भगवती देवोंके स्तवसे सन्तुष्ट हुई शकटाल द्वारा ये मगधके राजा हुये। चन्द्रगुप्तने नेपाल- और मतङ्गका स्त्री रूप बना पूछने लगों,-देव! राज पर्वतेश्वरके साहाय्यसे उग्रधन्वाके राज्य छीनने को तुम इस स्थान पर किस स्त्रीको स्तव सुनाते चेष्टा की थी। उससे इन्होंने क्रद्ध हो चन्द्रगुप्तके और इस मतङ्गके आश्रमपर क्यों आते हो? ऐसे भातृगणको मार डाला। पीछे पर्वतेखरसे लड़ते उग्र- कहते ही समय उनके शरीरकोषसे एक देवी निकल धन्वाने प्राण छोड़ा। (व त्रि०) ४ असह्य धनु- कर बोलौं,-'ये देव हमारा ही स्तव करते हैं। शुम्भ विशिष्ट, कड़ी कमान वाला, जिसके धनुसको मार और निशम्भ नामक दो दानव इन्हें बाधा देते हैं। दुश्मन सह न सके। इसीसे देव उनके वध निमित्त यहां पाये हैं।' शरीरसे - “वाहु संध्यं ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता।" (ऋक् १०॥१०॥३) इन देवीके निकलने बाद ही हिमालयमें रहनेवाली उग्रनासिक ( सं त्रि०) दीर्घनासिक, नक्क, बड़ी वह मौरवर्णा मातङ्गी अतिशय कृष्णावर्णा बन नाकवाला। 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कष्णने कंसको मारकर राज्य उग्रसेनके अधीन लड़का रहे। कर दिया। (भागवत ) उग्रबाहु (सं० त्रि०) उत्कट बाहुविशिष्ट, जोर- उग्रसेनज (सं० पु०) उग्रसेनसे उत्पन्न कंस । कंस देखो। दार बाजू रखनेवाला। उग्रसेना (सं० स्त्री०) अक्र रकी स्त्री। (हरिवंश ) उग्रभा (सं० स्त्री०) गोणसवली. एक बेल । उग्रा (सं० स्त्री.) १ धन्याक. धनिया। २ यमानी. उग्रम्पश्य (सं० त्रि.) उग्र-दृश -खश् मुम्। उग्र-, अजवायन। ३ संविदा मञ्जरी, गांजा। ४ वचा, दृष्टि-युक्त, कड़ी नजरवाला, जो सखू तोसे देखता हो। बच। ५ विकिका, नक चिकनी। ६ तीव्रवीय वन्य जन्तु व्याघ्रादि उग्रम्पश्य होते हैं। वस्तु, कड़ी या सख्त चीज़। “उग्रस्पश्याकुलेऽरण्ये ।” (भट्टि) उग्रादित्य आचार्य (सं• पु०) जैनग्रन्थ कल्याणकारक उग्रम्पश्या (सं० स्त्री०) अप्सरा विशेष, एक परी। मेटुके रचयिता। (अथर्वहिता हा११८५१) उग्रादेव (वै० पु० ) एक वदिक ऋषि । (ऋक् २।३६१८); उग्ररेताः (सं० पु०) रुद्र विशेष। (भागवत ) उग्रायुध (स० वि०) १ उत्कट आयुधविशिष्ट, उग्रवीर (सं० त्रि.) शक्तिशाली वीरविशिष्ट, ताकत- सखू त हथियार रखनेवाला। (पु.) २ एक प्राचीन वर सिपाही रखनेवाला। पौरव राजा। इनके पिताका नाम कृत और पुत्रका उग्रवौर्या ( स० क्लो०) १ हिङ्ग, होंग। (त्रि०) नाम क्षेम्य रहा। इन्होंने निज बाहुबलसे नीपवंश २ उत्कट वीर्यविशिष्ट, सखू त ताकत रखनेवाला। और अन्यान्य नृपतिको मार डाला था। कुरुवार उग्रव्यग्र (स.पु.) एक दानवका नाम । भीष्मके पिटवियोगसे कातर होनेपर उग्रायुधने दूत उग्रशक्ति (सं० पु.) एक राजा। ये राजा अमर- हारा कहला भेजा,-'भीष्म ! तुम्हारी जननी गन्ध- शक्तिके पुत्र थे। काली स्त्रीगणके मध्य रत्नखरूप हैं। उन्हें हमको उग्रशासन (सं० त्रि०) श्राज्ञा देने में उत्कट, दे डालो। हम तुम्हें अतुल ऐश्वर्यशाली बना- कड़ा हुकम निकालता हो। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> देंगे। किन्तु भीम उस समय कुछ न बोले। उग्रशेखरा (सं० स्त्री०) उग्रशेखरः अच-टाप । अर्श आदिभ्यी- पिताका अशौच काल वौतने पर उन्होंने घोरतर युद्द ऽच। पा ५।२।१२७। महादेवके मस्तक पर रहनेवाली कर उग्रायुधको मार डाला था। (महाभारत ) गङ्गा। वाध्वगागोन्धिनी गङ्गा हेमवत्य गशे खरा। (विकासशे० २।२।३८) उग्रेश (सं० पु. ) उग्राणां ईशः। . १ शिव ।। उग्रशोक (सं• त्रि.) उत्कट शोकयुक्त, बड़े अफ- २ उग्रका बनवाया एक मन्दिर । सोसमें पड़ा हुआ। उघटना (हिं. क्रि०) १ उद्घाटन करना, खोलना। उग्र-श्रवण-दर्शन (सं० वि०) उत्कट श्रवण एवं | २ उत्कथन करना, कह देना। ३ताल लगाना, सम दर्शनविशिष्ट, जो देखने-सुनने में खौफ़नाक हो। देखाना। ४ विगत विषय बताना, गड़े मुर्दे उखा- उग्रशवस (सं० पु.) १ सौरि, कों राजा । २ त डना। ५ उपहास्य करना, हंसी उड़ाना। निन्दा- राष्ट्र के एक पुत्र। वाद करना, भली-बुरौ सुनाना। उग्रसेन (सं० पु.) १ परीक्षितके एक पुत्र और उघटवाना, उघटाना देखी। जनमेजयके भ्राता। (शतपथब्राह्मण १।५।४।३) २ मथरा उघटा (हिं. वि.) उदघाटन करनेवाला, जो देशके एक राजा। ये पाहुकके पुत्र और कंसके खोल देता हो। पिता थे। इनकी पत्नीका नाम कौँ था । उग्रसेनको उघटाई (हिं. स्त्री०) १ उदघाटन, खोलाई । राज्यच्युत कर कंस वयं सिंहासन पर बैठा था। ' २ सत्कथन, कहाई। .. Vol. III. 40 <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8el5poy7regxxa8ci0cz7ok3cfb7n8k 664997 664929 2026-07-05T10:17:23Z अँजली चौधरी 2439 664997 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उग्रबाहु-उघटाई'''|'''१५७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :(त्रि॰) ४ उत्कट पुत्रविशिष्ट, जिसके ताकतवर लड़का रहे। {{Outdent|उग्रबाहु (सं॰ त्रि॰) उत्कट बाहुविशिष्ट, ज़ोर-दार बाजू रखनेवाला।}} {{Outdent|उग्रभा (सं॰ स्त्री॰) गोणसवल्ली एक बेल।}} {{Outdent|उग्रम्पश्य (सं॰ त्रि॰) उग्र-दृश्-खश् मुम्। उग्र-दृष्टि-युक्त, कड़ी नजरवाला, जो सख् तीसे देखता हो। वन्य जन्तु व्याघ्रादि उग्रम्पश्य होते हैं।}} {{x-smaller|{{c|“उग्रस्पश्याकुलेऽरण्ये।” (भट्टि)}}}} {{Outdent|उग्रम्पश्या (सं॰ स्त्री॰) अप्सरा विशेष, एक परी।<small>(अथर्वरहिता ६।११८।१)</small>}} {{Outdent|उग्ररेताः (सं॰ पु॰) रुद्र विशेष। (भागवत)}} {{Outdent|उग्रवीर (सं॰ त्रि॰) शक्तिशाली वीरविशिष्ट, ताकत-वर सिपाही रखनेवाला।}} {{Outdent|उग्रवीर्या (सं॰ 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किन्तु भीम उस समय कुछ न बोले। पिताका अशौच काल वीतने पर उन्होंने घोरतर युद्ध कर उग्रायुधको मार डाला था। <small>(महाभारत)</small>}} {{Outdent|उग्रेश (सं॰ पु॰) उग्राणां ईशः। १ शिव। २ उग्रका बनवाया एक मन्दिर।}} {{Outdent|उघटना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्घाटन करना, खोलना। २ उत्कथन करना, कह देना। ३ ताल लगाना, सम देखाना। ४ विगत विषय बताना, गड़े मुर्दे उखा-डना। ५ उपहास्य करना, हंसी उड़ाना। ६ निन्दा-वाद करना, भली-बुरी सुनाना।}} {{Outdent|उघटवाना, <small>उघटाना देखी।</small>}} {{Outdent|उघटा (हिं॰ वि॰) उद्घाटन करनेवाला, जो खोल देता हो।}} {{Outdent|उघटाई (हिं॰ स्त्री॰) १ उदघाटन, खोलाई। २ उत्कथन, कहाई।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol. III. 40|2em}}</noinclude> ma5qv8nosb9n9vwwdzdgajwxpgb4aj2 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५९ 250 75848 665002 608971 2026-07-05T11:00:55Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665002 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१५८'''|'''उघटाना-उचथ'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid 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उद्घाटित होना, खुलना, नङ्गा हो जाना।}} {{Outdent|उघड़वाना <small>उघटाना देखी।</small>}} {{Outdent|उघड़ाना, <small>उघटाना देखो।</small>}} {{Outdent|उघन्नी (हिं॰ स्त्री॰) कुञ्चि, किलीद, चाबी, कुञ्जी।}} {{Outdent|उघरना, <small>उघडना देखो।</small>}} {{Outdent|उघरारा (हिं॰ पु॰) १ उद्घाटित स्थान, खुला मदान। (वि॰) २ उद्घाटित, खुला।}} {{Outdent|उघाड़ना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्घाटन करना, खोलना, कपड़ उतार कर फेंक देना। <small>“अपनी टांग उघाडे और आप ही लाजों मरे।” (लोकोक्ति)</small>२ प्रकट करना, बता देना।}} {{Outdent|उघाडी (हिं॰ वि॰) १ नग्न, बरहना, खुली। <small> “नाकै कारण पहनी साड़ी वो ही टांग रही उघाड़ौ।” (लोकोक्ति)</small> २ प्रकट, जाहिर।}} {{Outdent|उघाना (हिं॰ क्रि॰)१ संग्रह करना, इकट्ठा करना, जमा करना। २ कर लगाना, महसूल बांधना। ३ मांगना, वसूल करना।}} {{Outdent|उघाई (हिं॰ स्त्री॰) १ संग्रह, महसूलका वसूल। २ संग्रह किया जानेवाला धन, पावना।}} {{Outdent|उघारना, <small>उघाड़ना देखो।</small>}} {{Outdent|उघेलना, <small>उघाड़ना देखो।</small>}} {{Outdent|उद्धार (सं॰ पु॰) विष्णुके एक सहचरका नाम।}} {{Outdent|उङ्कण (सं॰ पु॰) उत्कुण, खटमल।}} {{Outdent|उङ्कोश (सं॰ पु॰) नूतन नूतन आलाप, आभास, नयी नयी बात, झलक। {{Outdent|उङ्गल (हि॰) <small>अङ्गुल देखो।</small>}} {{Outdent|उच्-दिवा॰ पर॰ सक॰ सेट्। यह समवाय और मिश्रण अर्थमें आता है।}} {{Outdent|उचकन (हिं॰ पु॰) अवष्टम्भ, उठगन, अटकनी, आड़, टेक। इसे नीचे रखनेसे बरतन उलटने नहीं पाता।}} {{Outdent|उचकना (हिं॰ क्रि॰) १ आच्छेद करना, छीन}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :लेना। २ दबाना, जेबमें डालना। ३ ले भागना। ४ पूर्वास्वादन करना,पहले ही मज़ा लेना। ५ उदग्रहण करना, उठाना। ६ अधिक मूल देना, ज्यादा क़ीमत लगाना। ७ वल्गन करना, कूदना, उछलना, फांदना। ८ पदाग्रपर उठना, पञ्जोंके बल खड़ा होना। ९ पलायन करना, भाग जाना। १० सम्भोग करना, मबाशरत लगाना, डौला बनाना। ११ विस्मित होना, चकराना। १२ लालायित होना, ललचाना। {{Outdent|उचकवाना (हिं॰ क्रि॰) उचकनेको आदेश देना, दूसरेसे उचकनेका काम लेना।}} {{Outdent|उचकाना (हिं॰ क्रि॰) पदाग्रपर उठाना, पञ्जों के बल खड़ा करना, भगाना, खेल बनवाना, चकरवाना।}} {{Outdent|उचकैया, <small>उचकौना देखो।</small>}} {{Outdent|उचकौना (हिं॰ वि॰) १ आच्छेदक, छीनने वाला। २ पदाग्रपर उठनेवाला, जो पञ्जोंके बल खड़ा रहता हो।}} {{Outdent|उचक्का (हिं॰ पु॰) वञ्चक, धूर्त, ऐयार, अड़ीमार}} {{Outdent|उचक्कापन (हिं॰ पु॰) हस्तलाघव, छल, नज़र-बन्दी, दगा़बाज़ी, नोचाखसोटी।}} {{Outdent|उचक्कापना, <small>उचक्कापन देखो।</small>}} {{Outdent|उचटना (हिं॰ क्रि॰) १ पृथक् पड़ना, गिरना। २ उत्पतन करना, पलटना, फिरना। ३ वल्गन करना, कूदना। ४ विसर्पण करना, सरकना। ५ अप्रसन्न होना, थक जाना। ६ दुखना, नाखुश होना।}} {{Outdent|उचटवाना (हिं॰ क्रि॰) उचाटनेको आज्ञा देना, उचाटनेका काम दूसरेसे लेना।}} {{Outdent|उचटाई (हिं॰ स्त्री॰) उचाटनेका कार्य या काम।}} {{Outdent|उचटाना (हिं॰ क्रि॰) १ वितरण करना, बांटना अलग करना। २ उत्पतन कराना, पलटाना। ३ विसर्पण करना, सरकाना। ४ घुमाना, फेराना। ५ हताश करना, दिल तोड़ना।}} {{Outdent|उचड़ना, <small>उचटना देखो।</small>}} {{Outdent|उचड़वामना,<small>उचड़वाना देखो।</small>}} {{Outdent|उचड़ाई, <small>उचटाई देखो।</small>}} {{Outdent|उचड़ाना, <small>उचटाना देखो।</small>}} {{Outdent|उचथ (वै॰ क्ली॰) प्रशंसा, तारीफ़। (ऋक् १।७३।१०)}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> nw2o5s4g8zjz8sam4za7l530cbmy94f पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१६० 250 75849 665007 608973 2026-07-05T11:48:31Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665007 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उचथ्य-उच्च'''|'''१५९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उचथ्य(वै॰ त्रि॰) १ प्रशंसनीय, तारीफ़के का़बिल (पु॰) २ अङ्गिराका एक नाम। (ऋक् ८।४६।२८)}} {{Outdent|उचना (हिं॰ क्रि॰) १ उच्च पड़ना, ऊंचा जाना, ऊपरको उठना। २ उच्च करना, ऊपरको उठाना।}} {{Outdent|उचनि (हिं॰ स्त्री॰) उच्च होनेकी दशा, उठान, उभार, उचकाई।}} {{Outdent|उचरंग (हिं॰ पु॰) पतङ्ग, परवाना, कपड़े का कीड़ा।}} {{Outdent|उचरना (हिं॰ क्रि॰) १ उच्चारण करना, ज़बानसे निकालना, बोलना। २ शब्द आना; आवाज़ देना, मुंहसे निकलना। ३ उचड़ना, छूटना।}} {{Outdent|उचरवाना, <small>उचराना देखो।</small>}} {{Outdent|उचराई (हिं॰ स्त्री॰) १ उच्चारण करनेकी दशा, कहाई। २ उचड़ाई।}} {{Outdent|उचराना (हिं॰ क्रि॰) १ उच्चारण कराना, कहलाना। २ उचड़वाना।}} {{Outdent|उचलना, <small>उचरना देखो।</small>}} {{Outdent|उचाट (हिं॰ वि॰) पृथक् किया हुआ, जो टूट गया हो। २ विरक्त, नाखुश, नाराज़। ३ श्रान्त, थकामांदा । ४ खिन्न, बेचैन। ५ हताश, दिलगीर। (स्त्री॰) ६ घृणा, नफरत, अलग होनेकी सख़्त खा़हिश।}} {{Outdent|उचाटन (हिं॰) <small>उच्चाटन देखो।</small>}} {{Outdent|उचाटना (हिं॰ क्रि॰) उच्चाटन करना, उठा देना, भगाना।}} {{Outdent|उचाटी (हिं॰ स्त्री॰) उच्चाटन, उचाट, हटाव।}} {{Outdent|उचाटू (हिं॰ वि॰) उच्चाटन करनेवाला, जो हटा देता हो।}} {{Outdent|उचाड़, <small>उचाट देखो।</small>}} {{Outdent|उचाड़ना, <small>उचठाना देखो।</small>}} {{Outdent|उचाना (हिं॰ क्रि॰) उच्च करना, उठा देना।}} {{Outdent|उचापत (हिं॰ स्त्री॰) १ विश्वास, एतबार, मानता। <small>“वनियेको उचापत और घोड़े की दौड बराबर।”(लोकोक्ति)</small>२ प्रतारणा, फ़रेब, धोकाधड़ी। ३ विश्वास पर आनेवाली चीज़।}} {{Outdent|उचापती (हि॰ वि॰) १ उचापतसे सम्बन्ध रखने}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :वाला, जो उधार लाता हो। (पु॰) २ ऋणी वा उत्त-मर्ण, कर्ज़दार या कर्ज़ दिहन्दा, देनदार या लेनदार। {{Outdent|उचापती लेखा (हिं॰ पु॰) २ आपणपत्र, दुकानका परचा, चलता हिसाब।}} {{Outdent|उचायी, <small>उचाई देखो।</small>}} {{Outdent|उचार (हिं॰) <small>उच्चार देखो</small>}} {{Outdent|उचारक (हिं॰) <small>उच्चारक देखो।</small>}} {{Outdent|उचारन (हिं॰) <small>उच्चारण देखो।</small>}} {{Outdent|उचारना (हिं॰ क्रि॰) १ उच्चारण करना, कहना। २ उच्चाटन करना, उखाड़ देना।}} {{Outdent|उचाल, <small>उचाट देखो।</small>}} {{Outdent|उचालना, <small>उचाटना देखो।</small>}} {{Outdent|उचावा (हिं॰ पु॰) स्वप्नप्रलाप, ख़् वाबकी बकझक।}} {{Outdent|उचित (सं॰ त्रि॰) १ योग्य, कर्तव्य, वाजिब, कर-नेके का़बिल। २ परिचित, अभ्यस्त, जाना-बूझा, जो समझ में आ गया हो। ३ सुखमय, खुशगवार, अच्छा लगनेवाला। ४ साधारण, मामूली। ५ मान्य, मानने लायक़। ६ निक्षिप्त, न्यस्त, रखा हुआ। ७ व्यवस्थित, दुरुस्त, ठीक।}} {{Outdent|उचेड़ना, <small>उचाटना देखो।</small>}} {{Outdent|उचेलना, <small>उचाटना देखो।</small>}} {{Outdent|उचौंहा (हिं॰ वि॰) उठा हुआ, उभरा हुआ, जो ऊंचा पड़ गया हो।}} {{Outdent|उच्च (सं॰ त्रि॰) उच्चिनोतीति, उत्-चि-ड टिलोपः। १ उन्नत, बुलन्द, ऊंचा। २ तुङ्ग, लम्बा। ३ गभीर, गहरा। ४ महास्वन, पुरुशोर, जोरसे बोला जाने-वाला। ५ प्रचण्ड, शदीद, तुन्द। ६ अंश, भाग, हिस्सा। (पु॰) ७ राशिभेद, सैयारेके दायरेकी नोक।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“मेषो वृषो मृग: कन्या कर्कमौनतुलाधराः। भास्करादेर्भवन्ता, च्चा राशयः क्रमशस्विमे॥ स्वोच्चाच्च सप्तमं नौवं प्राग्वदभागैवि निर्दिशेत्। उच्चान्तः सच्चसंज्ञः स्थात् नोचान्ते तु सुनोचकः॥” (ज्योतिस्तत्त्व)</poem>}}}} {{gap}}ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मेषका सूर्य, वृषका चन्द्र, मृगका मङ्गल, कन्याका बुध, कर्कटका वृहस्पति, मीनका शुक्र और तुलाका शनि उच्च होता है। अपने उच्च-स्थानसे सप्तम पहुंचने पर प्रत्येक ग्रह नीचे निकलता <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 2zafjcxnbm7pziymiqfow9moyjcj013 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२६८ 250 75930 664918 303457 2026-07-04T15:25:19Z अनुश्री साव 80 664918 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या|२६७}}</noinclude> शाखाका मुख्यवृत्त ( Pidancle ) और गौण प्रशा- खाका गोषहन्त (Podicele) नाम है। पालिका तथा पुष्पका यथास्थान और यथा क्रमपर सन्निवेश पुष्प- विन्यास ( Inflorescence ) कहलाता है। वृक्षादिका फलोत्पादक अंश हो पुष्प है । वह चार स्तवक और परिवर्तित पदों द्वारा बनता है सबसे बाहिरके दो स्तवक अन्य दो स्तवकोंके चारो तरफ रक्षावरणको तरह लगते हैं । मध्यस्थित दो स्तवक स्त्रीपु जातिका भेदकरानेवाले उदभिद के इन्द्रिय हैं । उद्भिद्का तत्व समझनेवाले इन्हीं दोनोंको प्रधान इन्द्रिय बताते हैं । पुष्पके उपरोक्त चार स्तवक में वहिःस्थको हिरावरण (Calyx) और पन्तःखको अन्तरावरण ( Corolla) कहते हैं अन्तरावरण निकट पुस्त वक वा 'वैशर (Stamen) और उससे दूर ह दह के अन्य भाग पर खीस्तवक या गर्भवेश (Pistil) रहता है। रावण कितने हो परिवर्तित प बनता है, जिनका नाम वहिम्बद (Sepal ) है । वह शरावर खण्ड वा दलको अपेक्षा अधिकतर उत् और सुरक्षित होता है। अन्तरावरण भी कितने हौ पत्र वा पत्रके खण्डों से बनता है। उन्हें पुष्पदल (Petal) कहते अन्तरावरणं वहिरावरण मनोरम लगते भी स्थायी नहीं होता । पुंकेशर अन्तरावरणके मध्य एवं प्रायः सर्वदा पुष्पदलके साथ एकोत्तर क्रम रहने से वहिद पड़ता है। पुष्पदल और वहिश्छदके साथ पत्रका जेसा साहय है, 'बेगर के साथ सा देख नहीं पड़ता। स्वोस्तवक वा गर्भकेशर पुष्प में मेरुदण्डके अन्त्यभागवर रहता है। उसके खण्ड वा पत्रका नाम कर (Capel ) है । शिखामें विन्यस्त और वृन्तहीन पुष्पको मञ्जरी कहते हैं । समस्त पुष्प केवल पुं वा स्त्री जातीय रह- नेसे मन्जरी एक जातीय ( Catkin ) कहलाती है- जैसे शहतूत यदि वह एक बड़े पुष्पोत्पादक पत्रके मध्यमें लिपट जाती है, तो उसे विजातीय (Spadix ) कहते हैं जैसे या विज्ञातोय निवख पुष्प स्त्रो जाति, मध्यस्थ जाति और उपरिस्थ क्लव अर्थात् २६७ उत्पादक गुणसे रहित होते हैं । मुख्य वृन्तका दैर्ध्य असमान रहने से शिखायुक्त रूपको समतालिक ( Corymb ) कहते हैं। पुष्पोत्पादक पत्रके कक्ष मे रहनेवाली अनिर्दिष्ट कलिकासे किसी किसी स्थलपर पुष्प नहीं गोपशिखाका सकल निकलता है। फिर इसमें जो पुष्पोत्पादक पत्र लगता है उससे फल पैदा होता है। ऐसे पर शिखायुक्त मञ्जरी और समतालिक रूप दोनों सरल न हो यौगिक बन जाते हैं। फूलकोबी समतान्तिक रूपमा उदाहरण है । कहीं कहीं कलाकार (Umbel), मतकाकार ( Capitulum ) प्रभृति शिखाके अव्यक्त रूप देख पड़ते हैं। किसी साधारण मस्तकाकार पर स्थित कितने ही पुष्प एक जैसे लगने पर यौगिक कला हैं। फिर उनमें एक एसको पुष्पका- कार वा मस्तकाकार प्रभृति व्यापक पुष्य के उत्पादक पत्र स्तवकका नाम पत्राच्छादन ( Involucre ) है । अबतक फलको को निर्दिष्ट पत्रकासमान पुष्प प्रसव नहीं करती और अपने वृत्त के अन्त्य भाग में केवल एक फूल रखती है, तबतक उसकी संज्ञा निर्दिष्टपुष्प विन्यास है किन्तु यदि पार्श्विक कुसुम लग और उसके भीतरी फूलके फूटने पर नोचे फिर पार्श्विक कुसुम निकले और पुन: पुन: अन्व भागको वृदि रुककर पार्श्व भागलो होतो रहे, तो अनिर्दिष्ट पुष्पविन्यास सदृश उसको भी संज्ञा बहु- शिखान्वित पुष्पविन्यास पड़ती है। मंदारके पेड़को पुष्पित शिखा बिलकुल पत्रके कक्ष में न रहकर - दो वृन्तके मध्य में रहती है । इस प्रकारके पुष्प विन्यासको काक्षिक कहते हैं । प्रधानत: आदर्श पुष्पपत्र की कक्षा से निकलता है। यह पत्र पुष्पोत्पादक पत्र है जब पुष्प के बाहर एक से अधिक पुष्पोत्पादक पत्र स्तवका- कारमें वर्तमान रहते है, तब उसका एक अतिरिक्त हिरावरण वा उपकरण (Epicalyx) देख पड़ता है। जैसे जवाकुसुममें पुष्पोत्पादक पत्र से दक्षिय चोर वाम पाव दल के सम्म ख दो दो बहिम्द रहते हैं । आदर्श पुष्य में सबसे नीचे वहिरावण, उसके ऊपर पन्त-<noinclude></noinclude> o2dvplx8nthl9rcuzapt9w13tj4c9wk 664923 664918 2026-07-04T16:02:47Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 664923 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या|२६७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} शाखाका मुख्यवृत्त (Pidancle) और गौण प्रशाखाका गोणवृन्त (Podicele) नाम है। कलिका तथा पुष्पका यथास्थान और यथा क्रमपर सन्निवेश पुष्पविन्यास (Inflorescence) कहलाता है। वृक्षादिका फलोत्पादक अंश ही पुष्प है। वह चार स्तवक और परिवर्तित पदों द्वारा बनता है सबसे बाहिरके दो स्तवक अन्य दो स्तवकोंके चारो तरफ रक्षावरणकी तरह लगते हैं। मध्यस्थित दो स्तवक स्त्रीपुंजातिका भेदकरानेवाले उदभिद्के इन्द्रिय हैं। उद्भिद्का तत्व समझनेवाले इन्हीं दोनोंको प्रधान इन्द्रिय बताते हैं। पुष्पके उपरोक्त चार स्तवक में वहिःस्थको हिरावरण (Calyx) और अन्तःस्थको अन्तरावरण (Corolla) कहते हैं अन्तरावरण निकट पुंस्तवक वा पुंकेशर (Stamen) और उससे दूर वृन्त दण्ड के अन्त्य भाग पर स्त्रीस्तवक या गर्भवेश (Pistil) रहता है। वहिरावण कितने ही परिवर्तित पत्रोंसे बनता है, जिनका नाम वहिञ्छद (Sepal) है। वह अन्तरावरणके खण्ड वा दलकी अपेक्षा अधिकतर वृहत् और सुसज्जित होता है। अन्तरावरण भी कितने ही पत्र वा पत्रके खण्डों से बनता है। उन्हें पुष्पदल (Petal) कहते अन्तरावरणं वहिरावरणसे मनोरम लगते भी स्थायी नहीं होता। पुंकेशर अन्तरावरणके मध्य एवं प्रायः सर्वदा पुष्पदलके साथ एकोत्तर क्रम रहने से वहिश्छदके पड़ता है। पुष्पदल और वहिश्छदके साथ पत्रका जैसा सादृश्य है, पुंकेशरके के साथ वैसा देख नहीं पड़ता। स्त्रीस्तवक वा गर्भकेशर पुष्प में मेरुदण्डके अन्त्यभागवर रहता है। उसके खण्ड वा पत्रका नाम किञ्जल्क (Capel) है। शिखामें विन्यस्त और वृन्तहीन पुष्पको मञ्जरी कहते हैं। समस्त पुष्प केवल पुं वा स्त्री जातीय रहनेसे मन्जरी एक जातीय (Catkin) कहलाती है-जैसे शहतूत। यदि वह एक बड़े पुष्पोत्पादक पत्रके मध्यमें लिपट जाती है, तो उसे विजातीय (Spadix) कहते हैं जैसे घुइया विजातीय निस्रस्थ पुष्प स्त्री जाति, मध्यस्थ पुंजाति और उपरिस्थ क्लीव अर्थात् {{Multicol-break}} उत्पादक गुणसे रहित होते हैं। मुख्य वृन्तका दैर्ध्य असमान रहने से शिखायुक्त रूपको समतालिक (Corymb) कहते हैं। पुष्पोत्पादक पत्रके कक्ष में रहनेवाली अनिर्दिष्ट कलिकासे किसी किसी स्थलपर पुष्प नहीं-गौण शिखाका सकल निकलता है। फिर इसमें जो पुष्पोत्पादक पत्र लगता है उससे फल पैदा होता है। ऐसे पर शिखायुक्त मञ्जरी और समतालिक रूप दोनों सरल न हो यौगिक बन जाते हैं। फूलकोबी समतान्तिक रूपमा उदाहरण है। कहीं कहीं कलाकार (Umbel), मस्तकाकार (Capitulum) प्रभृति शिखाके अव्यक्त रूप देख पड़ते हैं। किसी साधारण मस्तकाकार पर स्थित कितने ही पुष्प एक जैसे लगने पर यौगिक कला हैं। फिर उनमें एक एसको पुष्पकाकार वा मस्तकाकार प्रभृति व्यावर्तक पुष्प के उत्पादक पत्र स्तवकका नाम पत्राच्छादन (Involucre) है। जबतक फलकी कली अनिर्दिष्ट पत्रकलिकाके समान पुष्प प्रसव नहीं करती और अपने वृत्त के अन्त्य भाग में केवल एक फूल रखती है, तबतक उसकी संज्ञा निर्दिष्टपुष्प विन्यास है किन्तु यदि पार्श्विक कुसुम लग और उसके भीतरी फूलके फूटने पर नीचे फिर पार्श्विक कुसुम निकले और पुन: पुन: अन्त्य भागकी वृद्धि रुककर पार्श्व भागकी होती रहे, तो अनिर्दिष्ट पुष्पविन्यास सदृश उसको भी संज्ञा बहुशिखान्वित पुष्पविन्यास पड़ती है। मंदारके पेड़की पुष्पित शिखा बिलकुल पत्रके कक्ष में न रहकर-दो वृन्तके मध्य में रहती है। इस प्रकारके पुष्प विन्यासको काक्षिक कहते हैं। प्रधानत: आदर्श पुष्पपत्र की कक्षा से निकलता है। यह पत्र पुष्पोत्पादक पत्र है जब पुष्प के बाहर एक से अधिक पुष्पोत्पादक पत्र स्तवकाकारमें वर्तमान रहते है, तब उसका एक अतिरिक्त वहिरावरण वा उपकरण (Epicalyx) देख पड़ता है। जैसे जवाकुसुममें पुष्पोत्पादक पत्र से दक्षिण ओर वांमपार्श्वस्थ दल के सम्मुख दो दो बहिस्कूद रहते हैं। आदर्शपुष्यमें सबसे नीचे वहिरावण, उसके ऊपर अन्त- {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> adsrlbxeq95hfg2n8ivbma7r6pd9ylb पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२६९ 250 75932 664924 303460 2026-07-04T16:30:37Z अनुश्री साव 80 664924 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२६८|उद्भिद्विद्य}}</noinclude>२६८ उद्भिद्विद्य शवरथ, फिर केशर चोर सर्वोपरि गर्भकेशर होता पु है। गर्भकेशर के साथ पु'केशरका जो सम्बन्ध रहता है उसके अनुसार पुष्यका समूह तीन श्रेणीमें बंटता है । १म को अवजात (: Hypogynous ) अर्थात् श्रादर्श रूपविशिष्ट कहते हैं। यह पु केशर पुष्पाधारके ऊपर और गर्भ केशरके नोचे रहता है। चम्पेका नोच डालने पर इसका उदाहरण मिलेगा। द्वितीय पारि जात ( Perigynous) है। इसमें तीन वहिः स्तवक के वर पुष्पाधारपर पूर्व एक नल निकलता है - जैसे गुलाब, इमली प्रभृतिमें। तृसोय का नाम उन्नात (Eypigynous ) है। इसमें उक्त नल गर्भ- केशर से लिपटता और पु केशर गर्भकेशर पर चढ़ा- जैसा देख पड़ता है - जैसे चमरूद और जामुनका फल । जो केशर युक्तदलान्वित अन्तरावरण पर रहते उन्हें दोव्यात (Epipetalous) कहते हैं। केशरके खानानुसार दिपक उदभिद प्रधानतः सोन श्रेणी में विभक्त हैं । १म का श्रवजात और पुष्पा- arre वियुक्त होनेपर चतुर्विशस्तवको ( Thala- miflorae ); श्य का वहिरावरण, अन्तरावरण तथा केशर एकत्र मिल नलाकार रहने एवं केशर उन्नात वा परिजात पड़ने से त्रियुक्त वहिः स्तवको ( Calici- florae) चोर श्य का दबोचात केशर गर्भ केशर के ऊपर वा चार पार्श्व चढ़ने तथा अन्तरावरणयुक्त दल लगने से हियुक्तान्तः स्तवको (Corolliflorae ) नाम है । 9 पुष्पक चार स्तवक रहनेसे सम्प्रण समझा जाता है। प्रथम असम्पर्ण पुष्पमें बहिरावरण एवं अन्तरा- वरण नहीं पड़ता, द्वितीय अन्तरावरणका अभाव रहता और टतीय एक जाति केशरविशिष्ट अथवा उभय केशरका भी कहीं ठिकाना नहीं लगता । केवल केशर विशिष्टको केशरी पोर केवल गर्भ केशर विशिष्ट पुष्पको स्त्रीकेशरी कहते हैं । समस्त पुष्प पुकेशरो किंवा सीकेशरी होनेसे उचका नाम एकसिङ्गभाक ( Diåcious ) है—जैसे ककड़ी और शहतूत | हिरावरचं पर्थात् वच्छिद प्राय: पठ न्तक होते हैं । स्वतन्त्र स्वतन्त्र रहनेसे बहुच्छद 9 सम्पर्ण असम्पर्ण (Polysepalous) चोर सम्म यो वा सम्प यां रूप मिलकर वहिञ्छद नलाकार बनने से वहिरा- वरणको युक्तच्छदक ( Gamo sepalous ) कहते हैं। नलके मुखाग्रसे वियुक्त अंश अङ्ग ( Limb ) कहते है। पुष्प विनाशके बाद बहिरावरण गिर पड़ता ( जेसे अफीमके फूल में ) अथवा जितने दिन किसलय चलता, उतने दिन या कुछ अधिक भी बना रहता है । अन्तरावरण हो पुष्पकी रक्षा रखनेका अन्त:स्तवक है। उसके पत्त्रा- कार इन्द्रियको दल कहते हैं । अन्तरावरणके दल परस्पर मिलने से युक्तदलक ( Mono-petalous ) और वियुक्त रहनेसे बहुदलक ( Poly-petalous ) नाम पड़ता है। अन्तरावरणका नियत रूप पांच प्रकार है - १ नलाकार ( Tabulary ) २ सुरङ्गाकार (Hy- pocrateriform ) ३ चक्राकार ( Rotate ) ४ घण्टा कार (Campanulate ) और ५ धुस्तूराकार ( In- fundibuliform ) फिर अन्नावरणका अनियत रूप तीन प्रकार है -१ षोष्ठाकार (Labiate ). २ छदमाकार ( Personate) और ३ जिह्वाकार (Lingulate) यदि अन्तरावरच वहिरावरको अपेक्षा दीर्घकालस्थायी रहता, तो किसी स्थल पर सत्वर गिर पड़ता है । धुस्त र पुष्पके पुंकेशरका कार्य शेष होनेपर अन्तरावरण और वहिरावरण तिरछा तिरछा पृथक् पड़ कूट जाता है । अन्तरावरण और वहिरावरण एक वर्ष का रहने समवेश (Perianth) कहता है। एकपर्षिक उद्भिद प्रायः ऐसा हो होता है । रक्षक वा प्रधान इन्द्रियविहीन पुष्पको लग्न कहते हैं । फिर समुदय केशरका पुस्तवक (Androceum) और समस्त गर्भकेशरका सोस्तवक (Gynoecium ) नाम है। कैथर दल और गर्भमें रहनेपर दो अंग्र विशिष्ट हो जाते हैं। प्रथम अंश वृन्तके दण्ड जैसा एक नाल है। उसे सूक्ष्म वृन्त वा तन्तु ( Filament ) कहते हैं । फिर प्रति अल्प विस्तृत उसोका अन्त- भाग र कोष वा परामकोष (Anther) कहाता हे पदके इन्त दण्डको भांति अनेक खतपर<noinclude></noinclude> jjp8mf4chy5176zaz91jlzhuhvbrl4k 664930 664924 2026-07-04T18:14:48Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 664930 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२६८|उद्भिद्विद्य}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} रावरण, फिर पुंकेशर और सर्वोपरि गर्भकेशर होता है। गर्भकेशर के साथ पुंकेशरका जो सम्बन्ध रहता है उसके अनुसार पुष्यका समूह तीन श्रेणीमें बंटता है। १म को अवजात (Hypogynous) अर्थात् आदर्श रूपविशिष्ट कहते हैं। यह पुंकेशर पुष्पाधारके ऊपर और गर्भकेशरके नीचे रहता है। चम्पेका फूल नोच डालने पर इसका उदाहरण मिलेगा। द्वितीय पारिजात (Perigynous) है। इसमें तीन वहिः स्तवक के जुड़कर पुष्पाधारपर पहुंचनेसे पूर्व एक नल निकलता है-जैसे गुलाब, इमली प्रभृतिमें। तृतीय का नाम उज्जात (Eypigynous) है। इसमें उक्त नल गर्भकेशर से लिपटता और पुं केशर गर्भकेशर पर चढ़ाजैसा देख पड़ता है-जैसे अमरूद और जामुनका फल। जो केशर युक्तदलान्वित अन्तरावरण पर रहते, उन्हें दलोज्जात (Epipetalous) कहते हैं। केशरके स्थानानुसार द्विपर्णिक उद्भिद् प्रधानतः तीन श्रेणी में विभक्त हैं। १म का अवजात और पुष्पावरणसे वियुक्त होनेपर चतुर्विमुक्तस्तवकी (Thalamiflorae); २य का वहिरावरण, अन्तरावरण तथा केशर एकत्र मिल नलाकार रहने एवं केशर उज्जात वा परिजात पड़ने से त्रियुक्त वहिः स्तवकी ( Caliciflorae) और ३य का दलोज्जात केशर गर्भ केशर के ऊपर वा चार पार्श्व चढ़ने तथा अन्तरावरणयुक्त दल लगनेसे हियुक्तान्तः स्तवकी (Corolliflorae) नाम है। पुष्पक चार स्तवक रहनेसे सम्पूर्ण समझा जाता है। प्रथम असम्पूर्ण पुष्पमें बहिरावरण एवं अन्तरावरण नहीं पड़ता, द्वितीय अन्तरावरणका अभाव रहता और तृतीय एक जाति केशरविशिष्ट अथवा उभय केशरका भी कहीं ठिकाना नहीं लगता। केवल पुंकेशरविशिष्टको केशरी और केवल गर्भ केशर विशिष्ट पुष्पको स्त्रीकेशरी कहते हैं। समस्त पुष्प पुंकेशरी किंवा स्त्रीकेशरी होनेसे वृक्षका नाम एकसिङ्गभाक् (Diaecious) है—जैसे ककड़ी और शहतूत। वहिरावरणके अंश अर्थात् वहिश्छक प्राय: अवृन्तक होते हैं। स्वतन्त्र स्वतन्त्र रहनेसे बहुच्छद {{Multicol-break}} (Polysepalous) और सम्पूर्ण असम्पूर्ण रूप मिलकर वहिञ्छद नलाकार बनने से वहिरावरणको युक्तच्छदक (Gamosepalous) कहते हैं। नलके मुखाग्रसे वियुक्त अंश अङ्ग (Limb) कहते है। पुष्प विनाशके बाद बहिरावरण गिर पड़ता (जेसे अफीमके फूल में) अथवा जितने दिन किसलय चलता, उतने दिन या कुछ अधिक भी बना रहता है। अन्तरावरण ही पुष्पकी रक्षा रखनेका अन्त:स्तवक है। उसके पत्राकार इन्द्रियको दल कहते हैं। अन्तरावरणके दल परस्पर मिलने से युक्तदलक (Monopetalous) और वियुक्त रहनेसे बहुदलक (Polypetalous) नाम पड़ता है। अन्तरावरणका नियत रूप पांच प्रकार है-१ नलाकार (Tabulary) २ सुरङ्गाकार (Hypocrateriform) ३ चक्राकार (Rotate) ४ घण्टा कार (Campanulate) और ५ धुस्तूराकार (Infundibuliform) फिर अन्नावरणका अनियत रूप तीन प्रकार है-१ ओष्ठाकार (Labiate), २ छदमाकार (Personate) और ३ जिह्वाकार (Lingulate)। यदि अन्तरावरच वहिरावरणकी अपेक्षा दीर्घकालस्थायी रहता, तो किसी स्थल पर सत्वर गिर पड़ता है। धुस्तूर पुष्पके पुंकेशरका कार्य शेष होनेपर अन्तरावरण और वहिरावरण तिरछा तिरछा पृथक् पड़ कूट जाता है। अन्तरावरण और वहिरावरण एक वर्ष का रहनेसे समवेश (Perianth) कहता है। एकपर्णिक उद्भिद प्रायः ऐसा ही होता है। रक्षक वा प्रधान इन्द्रियविहीन पुष्पको लग्न कहते हैं। फिर समुदय केशरका पुंस्तवक (Androcoeum) और समस्त गर्भकेशरका सत्रीस्तवक (Gynoecium) नाम है। केशर दल और गर्भमें रहनेपर दो अंशसे विशिष्ट हो जाते हैं। प्रथम अंश वृन्तके दण्ड जैसा एक नाल है। उसे सूक्ष्म वृन्त वा तन्तु (Filament) कहते हैं। फिर अति अल्प विस्तृत उसीका अन्तभाग रेणु कोष वा परागकोष (Anther) कहाता है। पत्रदलके वृन्त दण्डकी भांति अनेक स्थलपर {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> d8pxk2pd18b8y8ay0sxe6yubp2kfv62 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२७० 250 75934 664984 303464 2026-07-05T08:38:14Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 664984 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्भिद् विद्या|२६९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} तन्तु भी परागकोषमें फैल जाता है। पत्रके मध्य पिंजड़े-जैसे इस अंशको योजक (Connective) कहते हैं। पराग नामसे ख्यात रेणू त्पादक परिवर्तित पुष्पके पत्रका नाम केशर है। रेणू परागकोष अभ्यन्तर से निकलता है। अब परागके कोषमें गर्त पड़ता, तब मध्यगत पृथक् बुद् बुद् ग्रन्थन बदलकर रेणु बनता है। पराग नामक रेणु निकालना ही केशरका कार्य है। कारण-गर्भ केशरका मध्यगत बीज वा अण्ड भरनेके लिये पराग प्रयोजनीय है। अतएव पकने पर पराग कोषके फटने से रेणु, निकलता है। परागकोषके फटनेको प्रस्फोटन (Dehiscence) कहते हैं। संख्या में दो बड़े तथा दो छोटे चार रहने से द्विद्वन्दक (Didynamous) और चार बड़े एवं दो छोटे छ: होनेसे केशर त्रिइन्दक (Tetradynamous) कहलाते हैं। सिवा इसके एकत्र एक राशिमें मिल जाने से पारका नाम एकगुच्छ (Monodelphous) पड़ता-जैसे जवाकुसुम रहता है। इसीप्रकार अधिक राशिमें केशर युक्त रहते द्विगुच्छ (Di-adelphous), त्रिगुच्छ (Triadelphous), बहुगुच्छ (polyadelphous) इत्यादि नाम पाते हैं—जैसे एरण्डके पुष्प। पूर्व ही बता चुके-गर्भ केशरके पृथक् पृथक्खण्डको किञ्जल कहते हैं। किञ्जलके नीचे एक गर्त रहता है। उसका नाम अण्डाधार वा डिम्बकोष अथवा बीजकोष (Ovary) है। उसमें नवडिम्ब (Ovule) वा आदिबोज छिपा रहता है। अण्डाधार पर आयसदण्ड (Style) नामक एक लम्बा सूक्ष्म नल लगा होता है। आयसदण्ड के शेष भागपर स्थित चपटे गोलाकार अथवा दीर्घाकार वस्तुको आशय (Stigma) कहते हैं। किञ्जल्क कभी वियुक्त हो जाते है-जैसे चम्पके फूलमें। फिर कभी गर्भकेशरके स्थानपर एक हो किञ्जल्क रहता है। वह निभृत वा विविक्त (Solitary) कहलाता है-जैसे इमलीका फूल। किञ्जल्कके समुदय दैर्ध्य से मध्य पर्शुका तक विपरीत दिक् में विभक्त (बंटा हुआ) एवं संलग्न धार- Vol III. {{c|68}} {{Multicol-break}} द्वारा गठित जो कुछ कठिन कांटे रहते, उन्हें उद्भिदतत्त्ववेत्ता नाड़ी (Placenta) कहते हैं। वही नव कलिका समान छोटे बुदबुद्धिभिष्ट सकल वस्तुओंको पुष्ट और प्रकाशित करते हैं। अण्डाधारके मध्य नाड़ीपर डिम्ब नामक बुद् बुद् विशिष्ट उन्नत वस्तु उत्पन्न होता है बुद् बुद् बढ़नेवर सामान्यतः गोल पड़ जाते हैं। फिर क्रमश: एक वृन्त उन्हें पकड़ लेता है। वृन्त का नाम कौशिकवृन्त (Funiculus) है। गोल एवं वृन्तयुक्त होते समय बुद् बुद् अन्तरावरण तथा वहिरावरण द्वारा वेष्टित रहते हैं। यह आवरणद्दय अल्पांशको छोड़ सर्वांश ढांक लेते हैं। अल्प स्थान ही कौशिकवृन्तसे डिम्बके विपरीत शेषभागमें नल रूप लगता है। इस नल वा हारको कौशिकनली (Micropyle) कहते हैं। वृहिकालपर डिम्बका एक मध्यस्थ बुद् बुद् बहुत बढ़ जाता है। फिर उसका मध्यगत पदार्थ विभक्त हो अनेक क्षुद्र क्षुद्र बुद् बुद् उत्पन्न करता है। अभ्यन्तर के इस बुदुवुदुविशिष्ट कठिन वस्तुका नाम भ्रूणस्थली है। इसमें परागरेणु आने और डिम्बसे मिल जानेपर उद्भिद् भ्रूण (Embryo) उपजता है। परागरेणु की शक्तिसे भ्रूणस्थलीमें भ्रण निकलनेको वीजोत्पादन (Fertilization) कहते हैं। भ्रूण निकल आनेपर डिम्ब फल (Fruit) और गर्भकेशर वीज (Seed) कहलाता है। परागका रेणु पक जानेपर पूर्व वर्णित किसी एक रीतिके अनुसार परागकोष फटनेसे बाहर निकलता है। किसी फूलमें पुंकेशर द्वारा उसी पुष्पस्थ स्त्रीकेशरका संयोग प्रायः नहीं लगता; यदि लग जाता है, तो अच्छा वीज नहीं उपजता। उद्भिद तत्त्वज्ञका यह सिर सिदान्त है-अधिकांश स्थानमें किसी फलमें पुंकेशरद्दारा उसीके गर्भकेशरको ससत्त्वा करना उद्भिद गणका अभिप्रेत वा स्वभावसिद्ध कार्य नहीं। एक पुष्पके परागका अन्य पुष्पके गर्भकेशर में पहुंचने से गर्भाधानका कार्य हो जाता है। यहां प्रश्न उठता-एक पुष्पका रेणु अपर पुष्पमें कैसे पहुंच सकता है? इसका उत्तर यही है-वास्तविक पतन एवं वायु उभय दूतीका कार्य चलाते {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 6icgsm4h5pooiii81l2zinu686e165e 664985 664984 2026-07-05T08:39:58Z अनुश्री साव 80 664985 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्भिद् विद्या|२६९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} तन्तु भी परागकोषमें फैल जाता है। पत्रके मध्य पिंजड़े-जैसे इस अंशको योजक (Connective) कहते हैं। पराग नामसे ख्यात रेणू त्पादक परिवर्तित पुष्पके पत्रका नाम केशर है। रेणू परागकोष अभ्यन्तर से निकलता है। अब परागके कोषमें गर्त पड़ता, तब मध्यगत पृथक् बुद् बुद् ग्रन्थन बदलकर रेणु बनता है। पराग नामक रेणु निकालना ही केशरका कार्य है। कारण-गर्भ केशरका मध्यगत बीज वा अण्ड भरनेके लिये पराग प्रयोजनीय है। अतएव पकने पर पराग कोषके फटने से रेणु, निकलता है। परागकोषके फटनेको प्रस्फोटन (Dehiscence) कहते हैं। संख्या में दो बड़े तथा दो छोटे चार रहने से द्विद्वन्दक (Didynamous) और चार बड़े एवं दो छोटे छ: होनेसे केशर त्रिइन्दक (Tetradynamous) कहलाते हैं। सिवा इसके एकत्र एक राशिमें मिल जाने से पारका नाम एकगुच्छ (Monodelphous) पड़ता-जैसे जवाकुसुम रहता है। इसीप्रकार अधिक राशिमें केशर युक्त रहते द्विगुच्छ (Di-adelphous), त्रिगुच्छ (Triadelphous), बहुगुच्छ (polyadelphous) इत्यादि नाम पाते हैं—जैसे एरण्डके पुष्प। पूर्व ही बता चुके-गर्भ केशरके पृथक् पृथक्खण्डको किञ्जल कहते हैं। किञ्जलके नीचे एक गर्त रहता है। उसका नाम अण्डाधार वा डिम्बकोष अथवा बीजकोष (Ovary) है। उसमें नवडिम्ब (Ovule) वा आदिबोज छिपा रहता है। अण्डाधार पर आयसदण्ड (Style) नामक एक लम्बा सूक्ष्म नल लगा होता है। आयसदण्ड के शेष भागपर स्थित चपटे गोलाकार अथवा दीर्घाकार वस्तुको आशय (Stigma) कहते हैं। किञ्जल्क कभी वियुक्त हो जाते है-जैसे चम्पके फूलमें। फिर कभी गर्भकेशरके स्थानपर एक हो किञ्जल्क रहता है। वह निभृत वा विविक्त (Solitary) कहलाता है-जैसे इमलीका फूल। किञ्जल्कके समुदय दैर्ध्य से मध्य पर्शुका तक विपरीत दिक् में विभक्त (बंटा हुआ) एवं संलग्न धार- {{c|Vol III.68}} {{Multicol-break}} द्वारा गठित जो कुछ कठिन कांटे रहते, उन्हें उद्भिदतत्त्ववेत्ता नाड़ी (Placenta) कहते हैं। वही नव कलिका समान छोटे बुदबुद्धिभिष्ट सकल वस्तुओंको पुष्ट और प्रकाशित करते हैं। अण्डाधारके मध्य नाड़ीपर डिम्ब नामक बुद् बुद् विशिष्ट उन्नत वस्तु उत्पन्न होता है बुद् बुद् बढ़नेवर सामान्यतः गोल पड़ जाते हैं। फिर क्रमश: एक वृन्त उन्हें पकड़ लेता है। वृन्त का नाम कौशिकवृन्त (Funiculus) है। गोल एवं वृन्तयुक्त होते समय बुद् बुद् अन्तरावरण तथा वहिरावरण द्वारा वेष्टित रहते हैं। यह आवरणद्दय अल्पांशको छोड़ सर्वांश ढांक लेते हैं। अल्प स्थान ही कौशिकवृन्तसे डिम्बके विपरीत शेषभागमें नल रूप लगता है। इस नल वा हारको कौशिकनली (Micropyle) कहते हैं। वृहिकालपर डिम्बका एक मध्यस्थ बुद् बुद् बहुत बढ़ जाता है। फिर उसका मध्यगत पदार्थ विभक्त हो अनेक क्षुद्र क्षुद्र बुद् बुद् उत्पन्न करता है। अभ्यन्तर के इस बुदुवुदुविशिष्ट कठिन वस्तुका नाम भ्रूणस्थली है। इसमें परागरेणु आने और डिम्बसे मिल जानेपर उद्भिद् भ्रूण (Embryo) उपजता है। परागरेणु की शक्तिसे भ्रूणस्थलीमें भ्रण निकलनेको वीजोत्पादन (Fertilization) कहते हैं। भ्रूण निकल आनेपर डिम्ब फल (Fruit) और गर्भकेशर वीज (Seed) कहलाता है। परागका रेणु पक जानेपर पूर्व वर्णित किसी एक रीतिके अनुसार परागकोष फटनेसे बाहर निकलता है। किसी फूलमें पुंकेशर द्वारा उसी पुष्पस्थ स्त्रीकेशरका संयोग प्रायः नहीं लगता; यदि लग जाता है, तो अच्छा वीज नहीं उपजता। उद्भिद तत्त्वज्ञका यह सिर सिदान्त है-अधिकांश स्थानमें किसी फलमें पुंकेशरद्दारा उसीके गर्भकेशरको ससत्त्वा करना उद्भिद गणका अभिप्रेत वा स्वभावसिद्ध कार्य नहीं। एक पुष्पके परागका अन्य पुष्पके गर्भकेशर में पहुंचने से गर्भाधानका कार्य हो जाता है। यहां प्रश्न उठता-एक पुष्पका रेणु अपर पुष्पमें कैसे पहुंच सकता है? इसका उत्तर यही है-वास्तविक पतन एवं वायु उभय दूतीका कार्य चलाते {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> aiz2xnmhsws1w6r3xa0rlnig67tw1rx पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२७१ 250 75936 664988 303466 2026-07-05T09:24:36Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 664988 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२७०|उद्भिद्विद्या}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} हैं। वह एक पुष्पके पुं केशरका परागरेणु अपरके गर्भकेशरमें पहुंचाते और रेणुसे गर्भकेशरको मिलाते हैं। यदि पतङ्ग प्रथम स्त्रीपुष्पपर बैठ कर पीछे पुंष्पपरा पहुंचना, तो कोई कोई नहीं निकलता। प्रथम पुंपुष्पपर बैठ पराग आच्छादित होने से पीछे स्त्रीपुष्पपर जानने पतङ्ग अनीत पराग आशयमें डालता है। पराग आशयमें पहनेसे ही बील उत्पन्न होता से है। अनेक स्त्रीपुष्प नहीं फलते अर्थात् पकते पकते वाल्यावस्थामें ही झड़ पड़ते हैं। इसका कारण उन्हें पुंकेशर से पराग न मिलना है। एक एक पतङ्ग एक एक उद्भिद् का भक्त होता है। वह अपने प्रिय पुष्पके पास पहुंच या ऊपर बैठ स्वीय पुरस्कारस्वरूप एक विन्दु मधु ले लेता है। इसी प्रकार प्रफुल्लचित्त पुष्पसे पुष्यान्तरपर घूमते घूमते पतङ्ग परागके रेणुको दूसरे स्थान पहुंचाता और वीज उपजाता है। पुन: पुन: मिलने लिये पुष्प सकल सुरक्षित एवं सुगन्धित होकर अपने मधुके उपहारसे उसे बहलाते रहते हैं। प्राणीतत्वविद् डारूइनके मतसे पके लिये ही पुष्पका विविध वर्ण बनता है। वस्तुतः पुष्प न मिलने पर भी वह अन्य किसी उपायसे जी सकता है। किन्तु पतङ्गका साहाय्य न पानसे उद्भिद्का वीजोत्पादन करना असम्भव है। कहीं कहीं सङ्कर या मिश्रजातीय वृक्ष देख पड़ते हैं। उससे जान पड़ता-पतङ्ग कर्तृक सम्पर्कीय वा समधर्मी उद्भिद रेणु न आने और भिन्न जातीय परागरेणु गर्भकेशरमें लग जाने सङ्कर वृक्ष उपजता है। वह वीजके द्वारा अपना वंश स्थायी रखनेकी चेष्टा नहीं करता, क्योंकि उसका वीज बन्ध्या होता है। अथवा यदि वीज वन्ध्या नहीं निकलता, तो तद्दारा उद्भूत वृक्ष क्रमशः आदि उद्भिद्द्द्दयके एकका आकार पकड़ता है। फलके आवरण तीन है-अन्तरावर्तक (Endocarp) वा आभ्यन्तरीण, मध्यावर्तक (Mesocarp) वा मध्य और बहिरावर्तक (Epidermis) स्तर। उद्भिद के विचारसे इन तीनोंमें आद्द तथा अन्यको किञ्जल्क पत्रका चर्म (pericarp) और मध्य स्तरको बुद्बुद्ग्रन्थन कहते हैं। {{Multicol-break}} सकल फलों के श्रेणीबह्व करनेका उपाय नहीं, क्योकि पृथिवीपर नाना जातीय फल विद्यमान है। अभीतक लोग उसका तल अच्छीतरह ठहरा नहीं सके हैं। फिर भी साधारणत: फलकी श्रेणी पांच रख ली गयी हैं-१ कठिन (Nut), २ नीरस (Capsule), ३ शिम्ब (Pod), ४ निरस्थिक (Berry) और ५ सास्थिक (Drupe) फल। नाड़ीसे अलग बुद्बुद् व्यक्त होनेपर गूदा (Hesperidium) पड़ता है। अनेक स्थलमें खूब पक जानेपर फलकी चतुर्दिक् में एक अतिरिक्त वा तृतीय स्तर लगता है। उसे उपस्तर (Aril) कहते है। वह वीजके नालसे आरम्भ हो कौशिकनली पर्यन्त फैलनेपर उपस्तर (Arilus) और कौशिकनलीसे वृन्तकी दिक बढ़नेपर उपस्तरनल (Arilode) कहलाता है। अब देखना चाहिये-उद्भिद, भोजन, पान और श्वासग्रहण करते हैं या नहीं और यदि करते हैं, तो कैसे। मूल ही उद्भिद्का प्रधान आकर्षकेन्द्रिय है। वही भृत्तिकामें घुस उद्भिद्गणके खाद्दका अधिकांश संग्रह करता है। मूल रसको खींचकाण्ड और पत्र में पहुंचाता है। उद्भिद श्वास लिया करते है। ये दिनको अकसिजन और रात्रिको कारबोनिक छोड़ते हैं। फिर भी एक प्रभेद है- सूर्यालोक में हरित् उद्भिद निज शक्ति द्वारा वायु मण्ललस्थ कारबोनिकका उपादान हटा कारबन रखते हुये अक्सिजन निकालते हैं। दिनको जो कारबोनिक निकलता है, वह समझ नहीं पड़ता। इससे देख याते-उद्भिद् वायुमण्डलको स्वास्थ्य कर अवस्थापर लाते और हमें विशेष उपकार पहुंचाते हैं। क्योंकि वायुमें अधिक परिमाण कारबोनिक रहने से हमारे जीवन में संशय था। उद्भिद श्वास द्वारा वायु लेते और किचित् अक्सिजन रोक कारबोनिक निकाल देते हैं। रात्रिमें यह क्रिया होती है। इसीसे शयनागारमें अनेक उद्भिद रहनेपर स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। संत शाखमें भी उल्लिखित है-<small>'रात्रो च वृक्ष मूलानि दूरतः परिवर्जयेत्।</small> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 5dokeyn0ib7b1lclh03vfczw82f9pmh पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२७२ 250 75938 664989 303468 2026-07-05T09:32:44Z अनुश्री साव 80 664989 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या|२७१}}</noinclude>मूल द्वारा पोतकी दूर हो रहना चाहिये। उद्भिद आम और निम्नगको जीर्ण रस कहते हैं। पीत रसके द्वारा उभट्ट पुष्ट होता है। जिन, नाइ ट्रोजन, कारबन और जल व्यतीत उदुभिदुगणको जिस जिस वस्तुका प्रयोजन घड़ता, उस्का मृत्तिकामें रहना आवश्यक है। जब किसी उमिद का विशेष प्रयो- जनोय वस्तु क्षेत्र में नहीं रहता, तब उसको खेतीका करना अनुचित लगता है, क्योंकि कोई फल नहीं मिलता। उदि सत्तिकासे एक हो पदार्थ नहीं लेते। प्रत्येक उद्भिदको खत उपयोगी मृत्तिका होती है। कोई कोई जातीय उद्भिद केवल रससे नहीं तृप्त होते, कोठादि जोबको भी पकड़ और रगड़ खा डालते हैं । विहार अञ्चलमें मैदान और पहाड़की ढालू जगह पर एक प्रकारका क्षुद्र पेड़ होता है । उसके पत्र क्षुद्र, गोल, ईद्र, सुन्दर और द्वारा धृत रहते हैं। जब इन पत्रोंपर कोटादि बैठते, तब एकघण्टे वाच्यकालके मध्य में हो सूक्ष्म वस्तु दारा स्पृष्ट होने बाद उनके केश केन्द्राभिमुख भोतरी दिल्की भुक पढ़ते हैं। अमेरिका देशके भी पेड़ बड़े धोखे हैं । उनमें कोड़े पकड़ कर खानेका अति सुन्दर कौशल होता है । प्रति पत्रका उपरिभाग एक ग्रन्थि द्वारा पृथक्कृत और किनारा तीक्ष्ण कण्टक द्वारा वेष्टित रहता है । तलपर किसने पो छोटे छोटे कांटे नानादिक मुड़ जाते हैं। कोड़े पकड़नेके लिये मध्यको रेखा होती है। यह मनोहर पत्र कोड़े को रक्तवर्ण' ठते हो बन्द होकर मार डालता है। हमारे देशको पुष्करियो को झांझ पड़तो वह भी एक जातीय मांसाशी वा पातक उ‌द्भिद उरतो है। उपा नामक एक प्रकारका विषवृक्ष होता है। सुन पड़ता- वह पशुपची और मानवको भी मार सकता है । उपास देखो। किसी किसी उड़द अनुभवको गति भी अधिक रहती, - जैसे लज्जावती लता, सोला, कमरख प्रभृति है । उद्भिद में जो नानाप्रकार वर्ण देख पड़ता, २७१ उसका उत्पादक सूर्य है । सूर्या रक्त, पोत और नील तीन अंशसे विशिष्ट है। ये तीनों एकव हो इन्द्रधनुषको तरह नानाप्रकार वर्ण बनाते हैं । उद्भिदका भी रक्त एवं पौत पिच्छिल, पोत तथा नोल हरित् चोर नौल एवं रक्तके सहयोग से बैंगनी वर्ण होता है। दो एक जातीय उद्भिद आलोकाभावसे वर्ण विशिष्ट रहते भी संख्या में अति अल्प हैं । प्रकृत रूपये सूर्य ही उद्भिद पर रङ्ग चढ़ाता है। जगत् में नानाप्रकार उद्भिद् विद्यमान हैं । प्रत्ये- कसे किसी न किसी विषय में उपकार पड़ चता है। किन्तु इस स्थलपर उसका परिचय देना अना- वश्यक है। उ मत वर्तमान युरोपीय उद्भिद्वैतागणका है। देखना चाहिये हमारे इस भारतवर्ष में उद्भिद विद्याको चर्चा रही या नहीं ? पूर्वतन ऋषि उद्भिद् विद्याको किस प्रकार समझते थे ? प्राचीन काल से सुनि उद् भिदको स्थावर जोब जैसा मानते आये हैं । छान्दोग्योपनिषद में का श्री व वीजानि भवन्त्याउन' जीवजनु हिज्जमिति । " ( दाशर ) सकल भूतके मध्य तीन प्रकारका वौज है- अण्डन, जोवन पोर उभिन महाभारतमें बताया है- "भित्वा तु पृथिवी' यानि जायन्त कालपर्ययात् । उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि दिजसत्तमाः ॥” ८ काटके पर्याय से जो पृथिवो भेदकर निकलता, उसका नाम उद्भिज्ज भूत पड़ता है। स्मतिशास्त्र ने उद्भिद जातिको घोषधि, वनस्पति, गुच्छ, गुल्म, ए, प्रतान और बढी कई गोविभव किया है. - “उद्विज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाप्ररोहिणः । श्रीषव्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगरः ॥ अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्म स्मृताः । पुष्पिणः फलिनचे व वृचान्त भयतः मृताः ॥ गुच्छ गुमन्तु विविध तथ व वणजातयः । वोजकाहरु हाय व प्रताना वय एव च ॥ * ऐतरेय उपनिषद् के मत से बीज चार प्रकारका होता है - " वीजानीतराणि चेतराणि चाण्डानि च जायजानि च खेदजानि चोडिज्जानि ।” (५।३)<noinclude></noinclude> rft4g7o8e4vqvefg5z49hoimu1h337u 664992 664989 2026-07-05T09:40:02Z अनुश्री साव 80 664992 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या|२७१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} मूल द्वारा पोतकी दूर हो रहना चाहिये। उद्भिद आम और निम्नगको जीर्ण रस कहते हैं। पीत रसके द्वारा उभट्ट पुष्ट होता है। जिन, नाइ ट्रोजन, कारबन और जल व्यतीत उदुभिदुगणको जिस जिस वस्तुका प्रयोजन घड़ता, उस्का मृत्तिकामें रहना आवश्यक है। जब किसी उमिद का विशेष प्रयो- जनोय वस्तु क्षेत्र में नहीं रहता, तब उसको खेतीका करना अनुचित लगता है, क्योंकि कोई फल नहीं मिलता। उदि सत्तिकासे एक हो पदार्थ नहीं लेते। प्रत्येक उद्भिदको खत उपयोगी मृत्तिका होती है। कोई कोई जातीय उद्भिद केवल रससे नहीं तृप्त होते, कोठादि जोबको भी पकड़ और रगड़ खा डालते हैं । विहार अञ्चलमें मैदान और पहाड़की ढालू जगह पर एक प्रकारका क्षुद्र पेड़ होता है । उसके पत्र क्षुद्र, गोल, ईद्र, सुन्दर और द्वारा धृत रहते हैं। जब इन पत्रोंपर कोटादि बैठते, तब एकघण्टे वाच्यकालके मध्य में हो सूक्ष्म वस्तु दारा स्पृष्ट होने बाद उनके केश केन्द्राभिमुख भोतरी दिल्की भुक पढ़ते हैं। अमेरिका देशके भी पेड़ बड़े धोखे हैं । उनमें कोड़े पकड़ कर खानेका अति सुन्दर कौशल होता है । प्रति पत्रका उपरिभाग एक ग्रन्थि द्वारा पृथक्कृत और किनारा तीक्ष्ण कण्टक द्वारा वेष्टित रहता है । तलपर किसने पो छोटे छोटे कांटे नानादिक मुड़ जाते हैं। कोड़े पकड़नेके लिये मध्यको रेखा होती है। यह मनोहर पत्र कोड़े को रक्तवर्ण' ठते हो बन्द होकर मार डालता है। हमारे देशको पुष्करियो को झांझ पड़तो वह भी एक जातीय मांसाशी वा पातक उ‌द्भिद उरतो है। उपा नामक एक प्रकारका विषवृक्ष होता है। सुन पड़ता- वह पशुपची और मानवको भी मार सकता है । उपास देखो। किसी किसी उड़द अनुभवको गति भी अधिक रहती, - जैसे लज्जावती लता, सोला, कमरख प्रभृति है । उद्भिद में जो नानाप्रकार वर्ण देख पड़ता, २७१ उसका उत्पादक सूर्य है । सूर्या रक्त, पोत और नील तीन अंशसे विशिष्ट है। ये तीनों एकव हो इन्द्रधनुषको तरह नानाप्रकार वर्ण बनाते हैं । उद्भिदका भी रक्त एवं पौत पिच्छिल, पोत तथा नोल हरित् चोर नौल एवं रक्तके सहयोग से बैंगनी वर्ण होता है। दो एक जातीय उद्भिद आलोकाभावसे वर्ण विशिष्ट रहते भी संख्या में अति अल्प हैं । प्रकृत रूपये सूर्य ही उद्भिद पर रङ्ग चढ़ाता है। जगत् में नानाप्रकार उद्भिद् विद्यमान हैं । प्रत्ये- कसे किसी न किसी विषय में उपकार पड़ चता है। किन्तु इस स्थलपर उसका परिचय देना अना- वश्यक है। उ मत वर्तमान युरोपीय उद्भिद्वैतागणका है। देखना चाहिये हमारे इस भारतवर्ष में उद्भिद विद्याको चर्चा रही या नहीं ? पूर्वतन ऋषि उद्भिद् विद्याको किस प्रकार समझते थे ? प्राचीन काल से सुनि उद् भिदको स्थावर जोब जैसा मानते आये हैं । छान्दोग्योपनिषद में का श्री व वीजानि भवन्त्याउन' जीवजनु हिज्जमिति । " ( दाशर ) सकल भूतके मध्य तीन प्रकारका वौज है- अण्डन, जोवन पोर उभिन महाभारतमें बताया है- "भित्वा तु पृथिवी' यानि जायन्त कालपर्ययात् । उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि दिजसत्तमाः ॥” ८ काटके पर्याय से जो पृथिवो भेदकर निकलता, उसका नाम उद्भिज्ज भूत पड़ता है। स्मतिशास्त्र ने उद्भिद जातिको घोषधि, वनस्पति, गुच्छ, गुल्म, ए, प्रतान और बढी कई गोविभव किया है. - “उद्विज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाप्ररोहिणः । श्रीषव्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगरः ॥ अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्म स्मृताः । पुष्पिणः फलिनचे व वृचान्त भयतः मृताः ॥ गुच्छ गुमन्तु विविध तथ व वणजातयः । वोजकाहरु हाय व प्रताना वय एव च ॥ * ऐतरेय उपनिषद् के मत से बीज चार प्रकारका होता है - " वीजानीतराणि चेतराणि चाण्डानि च जायजानि च खेदजानि चोडिज्जानि ।” (५।३)<noinclude></noinclude> 174gjsopdqlen5h9xao5v5eb7kdg9a5 664999 664992 2026-07-05T10:29:52Z अनुश्री साव 80 664999 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या|२७१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} दूर ही रहना चाहिये। उद्भिदके मूल द्वारा पीतकी आम और निम्नगको जीर्ण रस कहते हैं। पीत रसके द्वारा उद्भिद् पुष्ट होता है। अक्सिजन, नाइट्रोजन, कारबन और जल व्यतीत उद्भिद्गणको जिस जिस वस्तुका प्रयोजन पड़ता, उस्का मृत्तिकामें रहना आवश्यक है। जब किसी उद्भिद् का विशेष प्रयोजनीय वस्तु क्षेत्र में नहीं रहता, तब उसकी खेतीका करना अनुचित लगता है, क्योंकि कोई फल नहीं मिलता। सकल उद्भिद् मृत्तिकासे एक ही पदार्थ नहीं लेते। प्रत्येक उद्भिदकी ख-ख उपयोगी मृत्तिका होती है। कोई कोई जातीय उद्भिद् केवल रससे नहीं तृप्त होते, कीटादि जीवको भी पकड़ और रगड़ खा डालते हैं। विहार अञ्चलमें मैदान और पहाड़की ढालू जगह पर एक प्रकारका क्षुद्र पेड़ होता है। उसके पत्र क्षुद्र, गोल, ईषद्रक्त, सुन्दर और लम्बित वृन्त द्वारा धृत रहते हैं। जब इन पत्रोंपर कीटादि बैठते, तब एकघण्टे वा अल्पकालके मध्यमें ही सूक्ष्म वस्तु द्वारा स्पष्ट होने बाद उनके केश केन्द्राभिमुख भीतरी दिक्को झुक पढ़ते हैं। अमेरिका देशके भी पेड़ बड़े अनोखे हैं। उनमें कीड़े पकड़ कर खानेका अति सुन्दर कौशल होता है। प्रति पत्रका उपरिभाग एक ग्रन्थि द्वारा पृथक्कृत और किनारा तीक्ष्ण कण्टक द्वारा वेष्टित रहता है। तलपर किसने पो छोटे छोटे कांटे नानादिक् मुड़ जाते हैं। कीड़े पकड़नेके लिये मध्यकी रेखा रक्तवर्ण होती है। यह मनोहर पत्र कीड़ेको बठते ही बन्द होकर मार डालता है। हमारे देशकी पुष्करिणीमें को झांझ पड़ती वह भी एक जातीय मांसाशी वा पतङ्गघातक उ‌द्भिद् ठहरती है। उपास नामक एक प्रकारका विषवृक्ष होता है। सुन पड़ता-वह पशुपक्षी और मानवको भी मार सकता है। {{right|<small>उपास देखो।</small>}} किसी किसी उद्भिद्में अनुभवकी शक्ति भी अधिक रहती,-जैसे लज्जावती लता, सोला, कमरख प्रभृति है। उद्भिद में जो नानाप्रकार वर्ण देख पड़ता, {{Multicol-break}} उसका उत्पादक सूर्य है । सूर्या रक्त, पोत और नील तीन अंशसे विशिष्ट है। ये तीनों एकव हो इन्द्रधनुषको तरह नानाप्रकार वर्ण बनाते हैं । उद्भिदका भी रक्त एवं पौत पिच्छिल, पोत तथा नोल हरित् चोर नौल एवं रक्तके सहयोग से बैंगनी वर्ण होता है। दो एक जातीय उद्भिद आलोकाभावसे वर्ण विशिष्ट रहते भी संख्या में अति अल्प हैं । प्रकृत रूपये सूर्य ही उद्भिद पर रङ्ग चढ़ाता है। जगत् में नानाप्रकार उद्भिद् विद्यमान हैं । प्रत्ये- कसे किसी न किसी विषय में उपकार पड़ चता है। किन्तु इस स्थलपर उसका परिचय देना अना- वश्यक है। उ मत वर्तमान युरोपीय उद्भिद्वैतागणका है। देखना चाहिये हमारे इस भारतवर्ष में उद्भिद विद्याको चर्चा रही या नहीं ? पूर्वतन ऋषि उद्भिद् विद्याको किस प्रकार समझते थे ? प्राचीन काल से सुनि उद् भिदको स्थावर जोब जैसा मानते आये हैं । छान्दोग्योपनिषद में का श्री व वीजानि भवन्त्याउन' जीवजनु हिज्जमिति । " ( दाशर ) सकल भूतके मध्य तीन प्रकारका वौज है- अण्डन, जोवन पोर उभिन महाभारतमें बताया है- "भित्वा तु पृथिवी' यानि जायन्त कालपर्ययात् । उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि दिजसत्तमाः ॥” ८ काटके पर्याय से जो पृथिवो भेदकर निकलता, उसका नाम उद्भिज्ज भूत पड़ता है। स्मतिशास्त्र ने उद्भिद जातिको घोषधि, वनस्पति, गुच्छ, गुल्म, ए, प्रतान और बढी कई गोविभव किया है. - “उद्विज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाप्ररोहिणः । श्रीषव्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगरः ॥ अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्म स्मृताः । पुष्पिणः फलिनचे व वृचान्त भयतः मृताः ॥ गुच्छ गुमन्तु विविध तथ व वणजातयः । वोजकाहरु हाय व प्रताना वय एव च ॥ * ऐतरेय उपनिषद् के मत से बीज चार प्रकारका होता है - " वीजानीतराणि चेतराणि चाण्डानि च जायजानि च खेदजानि चोडिज्जानि ।” (५।३)<noinclude></noinclude> 91n96l7j36rbqlty2915vjomws5mxia पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६३८ 250 76119 664970 664806 2026-07-05T03:51:27Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 664970 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||<big>कटाहक-कटिया</big>|<big>६३७</big>}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black }} कटाहक (सं० लो०) कटाइ स्वार्थे कन्। भाजन,पान, वर्तन, कड़ाह। कटाय (सं० क्लो०) पद्मकन्द, कमलगट्टा। कटि (सं० पु०-स्त्री.) कव्यते वस्त्रादिना सुध्रियतेऽसौ,कट-हन्। १ शरीरका मध्यदेश, कमर। इसका संस्कृत पर्याय-कट, श्रोविफलक, श्रोणी, ककुयती,श्रोणिफल, कटी, थोणि, कलव, कटोर, काचीपद,और करभ है। सुश्रुतके मतसे कटिदेशमें पांच अस्थि रहते हैं। उनसे गुध, योनि एवं नितम्बदेशमें चार और त्रिक स्थानमें एक अस्थि पाता है। पस्थि -सहातक एक है। अखिको सन्धियां तीन बैठती हैं। उनका नाम तुब्रसेवनौ है। सायु साठ होती हैं। दोनों नितम्बों में पांच-पांचके हिसाबसे दश पेशी हैं। कटिदेशस्थ मम अखिमम कहाता है। उसका नाम कटोक है। तरुण अस्थिके पृष्ठवंश अर्थात् मेरुदण्डके उभय पाव पर पनतिनिय कुकुन्दर नामक दो मर्म पड़ते हैं। उनसे किसी प्रकार शोणित बहनेपर स्पर्श- ज्ञान और शरीरको चेष्टा दोनोंका नाश होता है। नितम्बके ऊपरिभागपर पार्खान्तरसे प्रतिबद्ध नितम्ब नामक ममैहय हैं। उनसे शोणित गिरनेपर प्रधः- काय शुष्क एवं दुर्बल पड़ता और मृत्व पर्यन्त पा पहुंचता है। कटिदेशके अभ्यन्तरस्थ मांस और रक्तविशिष्ट भाशयका नाम मूत्राशय वा वस्ति है। अश्मरी रोग व्यतीत अन्य कारणसे उसको दोनों ओर विध होनेपर सद्यः मृत्य पाता है। एक पाखभेद करनसे मूवसावी व्रण उत्पन्न होता है। वह भी कष्टसाध्य है। कटिदेशमें आठ शिरायें हैं। उनसे क्टिपस्थल और कटिकतरण में चार-चार रहती हैं। २हस्तीका गण्डस्थल, हाथोकी कनपटी। ३देवा-सयका हार, मन्दिरका दरवाजा। ४ कलन, बीवो। ५ काञ्ची, घची। ६ कटोर, कूला। कटिका (सं० स्त्री०) प्रशस्ता कटिरस्थाः, कटि-कन्-टाप । १ अतिसुन्दर कटिदेशयुक्ता स्त्री, जिस पौरतके पतली कमर रहे। २ कटोर, कूला। कटिकुष्ठ (सं० को०) श्रोणीका कुष्ठरोग, कमर-का कोढ़। </Small>Vol. III. 160{{gap}}{{gap}} {{Multicol-break}} कटिकूप (स० लो० ) कटिदेशस्वं कपम्, मध्यपद- लो० पान, वर्तन, कड़ाह। लो। ककुन्दर, मुल्ब, चतड़का गड्डा। कटिजेब (हिं० स्त्री०) करधनी, कमरको खबसूरती बढ़ानवाला जेवर। कटितट (सं० क्लो०) कटिरेव तट स्थानम् । १ कटि- देश, कमर। २ नितम्ब, चतड़। कटिव (सं० ली०) कटिं वायते, कटि-वे-क। १ परिधेय वस्त्र, धोती। २ चन्द्रहार। ३ कटिवर्म, कमरका बखू तर । ४ चक्रात । ५ कमरबंद । {{Center|<small>"मचालगौर 'शितिवासस' स्फुरत् ।<br> विरोटकेरकटिवकायम्:" (भागवत ६९६।३०)</small>}}<br> कटिदेश (सं० लो०) कटिनामक देश अवयवम. मध्यपदलो। योगी, कमर। कटिन् (सं०वि०) कटोऽस्त्वस्थ, कट-इनि। बुवक-<small>ठजिल इत्यादि । पा ३।२।९०। </Small>कटियुक्त, जिसके कमर रहे। कटिमोथ (सं० पु०) कव्याः प्रोधः मांसपिण्डः। नितम्ब, चतड़। इसका संस्कृत पर्याय-स्मिक, पूलक,कटीप्रोध, कटि, प्रोथ और पूल है। कटिबद्ध (सं० वि०) तत्पर, तैयार, कमर बांध हुआ । कटिबन्ध (सं० पु०) १ कमरबंद । २ पृथ्वीका भाग-विशेष, मिनतका, जमीनका एक हिस्सा। यह भौत-लता भार उष्णाताके अनुसार निर्धारित होता है। विहानोंने पूधिवौको पांच कटिबन्धों में बांटा है। कटिभूषण (सं० लो०) कटेभूषणम्, ६-तत् । कटि-देशका अलङ्कार, कमरका गहना। कटिमालिका (सं० स्त्री०) कटी मालेव, कटिमाल-वृद्धिकन् इत्वम्। चन्द्रहार, औरतका कमरबंद। कटिया (हिं॰ स्त्री.) १ हक्काक, नग बनानवाला। यह नग काट छांट कर सुधारता है। २ पशुखाद्य-विशेष, चौपायोंका एक चारा। यह ज्वार मकई जिस पादिके वृक्ष गडांससे टुकड़े-टुकड़े कर बनायो जाता कटिया पहुंटेवर कटती है। अलङ्कारविशेष, एक जे.वर। इसे स्त्रियां मस्तकपर धारण करती हैं। कंटिया, मछलो पकड़नेका एक छोटा काटा।<noinclude></noinclude> 3b7udi2to71koudzdtmizdkm37132hi पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६३९ 250 76151 664983 609378 2026-07-05T08:33:24Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 664983 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६३८|कटियाना-कटु|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कटियाना (हिं० कि०) १ पुलकित होना, रोमाञ्च आना। २ (देह) टूटना, अंगड़ाई आना, सुस्ती लगना। कटियाली (हिं० स्त्री०) भटकटया । कटिरोहक (सं० पु०) कटिंइस्ति-पश्चाद्भागं रोहति, कटि-रूह-खल। हस्तोके पश्चाद् भाग पर आरोहण करने वाला, जो हाथोके पीछे बैठता हो। कटिम (सं० पु०) कटसि लतायां उत्पद्यते, कटिवेलक, करेला। २ रक्तपुनणेवा, लाल पुनरनवा। कटिक्षक (स० पु०) कटिल्ल स्वार्थे कन्। १ कार-वेलक, करेला। २ रक्तपुनणेवा, लाल पुनरनवा। कटिवन्ध (सं० पु०) कटिवैध्यते येन, कटि-वन्ध-अच। कमरबंद, जिससे कमर बंधे। कटिशौर्षक (सं० पु०) कटिः शौर्षमिव, कटिशौर्ष संज्ञायां कन्। कटिदेश, कूला, पुट्ठा । कटिशूल (सं० पु०) कटिस्थः शूलः शूलरोगः, कर्मधा०। कटिदेशस्थ शूलरोग, कमरका दर्द। कफ और वायुसे कटिदेशमें शूलरोग उत्पन्न होता है। एक भाग कुष्ठ और दो भाग हरीतकौका चूर्ण उष्ण जलके साथ सेवन करनेसे कटिशूल मिट जाता है। शूल देखो। कटिशृङ्खला (सं० स्त्री०) 'कव्याः शृङ्खला, ६-तत्। करधनी, कमरमें पहननेका एक जे.वर। इसमें छोटे छोटे धरू लगे रहते हैं। कटिसूत्र (सं० क्लो०) कव्यां धार्य सूत्रम्, मध्यपदलो०। १नारा, औरतोंका कमरबंद। स्मृतिशास्त्रके मतसे केवल कार्पासका सूत्र बांधना निषिद्ध है। २ चन्द्रहार, करधनी।<br> कटी (सं० पु०) कटः गण्डस्थलं प्राशस्त्ये नास्तीति,कट प्रस्त्यर्थ इनि।<small> बुन्छणकठजिलसेनि इत्यादि । पा ४।२।८०</small> । १ हस्ती, हाथो। २ खदिरवक्ष, खैरका पेड़। (स्त्री०) कटि-डाए । <small>षिदोरादिभ्यश्च । पा ४१४१ ।</small> ३ पिप्पली,पोपर। ४ श्रोणि देश, कमर । ५ स्फिक्प्रदेश, चूतड़। कटौकतरुण (सं० क्लो०) नितम्बके गर्त को सन्धिका मर्म, सड़में गड़े के जोड़को नाजुक जगह। कटोकपाल (सं० क्लो० ) कटीफलक, कूला, पुट्ठा। कटीग्रह (सं०को०) कटोगत वातरोग, कमरको बाई। {{Multicol-break}} कटौतल (सं० पु०) कव्यां तलमास्पदमस्य । १ वक्र खड्ग, तिरछी तलवार। २ खड्ड, तलवार । कटोप्रोथ,<small> कटिप्रोष देखो।</small> कटोर (सं० पु०) कव्यते आवियते ऽसौ कव्वते गम्यते ऽनेन वा, कट-इरन्। <small>कश्यपकठिपटिशौटिभा इरन् । उण ४।३०।</small> १ कन्दर, गुफा। २ जघनदेश, पेड़। ३ नितम्ब, चतड़। ४ कटि, कमर। (को०) ५ कटि- फलक, कूला। कटौरक (सं० पु.) कटौर खार्थे संज्ञायां वा कन् । १ जघन, पेड़ । २ कन्दर, पहाड़को खोह। ३ नितम्ब- स्थल, चूतड़। (क्लो०) ४ कटि, कमर।। कटोरा (हिं. पु.) कतीरा। कटोल (हिं. स्त्रो०) कार्पास विशेष, बंगई, किसी किस्मको कपास। कटीला (हिं. वि. ) १ तीक्षा, तेज, पैना, जो काट देता हो। २ प्रभावशाली, पुर-असर, जो उम्दा समझा जाता हो। ३ हृदयग्राहो, दिलकश । ४ कण्टकयुक्त, खारदार। ५ तीक्ष्णाग्र, नोकदार । (पु० ) ६ तीक्ष्णाग्र काष्ठविशेष, एक नोकदार लकड़ी। यह दुग्ध प्रदान करनेवाले पशुके बच्चेको नाक पर बांधा जाता है। इससे वह दृध पी नहींसकते। कारण मुख लगाते हो कटौला पशुके स्तनमें चुभता, जिससे वह उटक पड़ता है। कतौरा । कटु (स लो०) कटति सदाचारमावणोतीति, कट-उम्। १ असत्कार्य, बुरा काम २भूषण, गहना। (स्त्री०) ३ लता, बेल। ४. राजिका, राई । ५ कटुको, कुटको। ६ कटवल्ली, एक बेल । ७ प्रियङ्ग वृक्ष। (पु.) कटति तीक्ष्णतया रसनां मुखं वा प्रायोति यहा कटति वर्षति चक्षुमुखनासिकादिभ्यो जनं द्रावयतीति। ८ षडरसान्यतम रस, कड़वाहट,चरपरापन । वाभटके मतमें कटुरससे जिद्धा चर- परा कर हिलती डुलती, मुखसे लार टपकतो और गण्डहय एवं मुखके मध्य बड़ी जलन उठती है। चरक इसको मुखशोषक, अग्न्य होपक, मुक्त वस्तुका परि-शोधक, नासिका एवं चक्षुका सावकारक, सकल कटीग्रह (सं०को०) कटोगत वातरोग, कमरको बाई।' इन्द्रियका प्रफुल्लजनक, अलसक, शोथ, उदध, अभिष्यन्द,<noinclude></noinclude> 6tsn9iqdkbpbs3xac09u4p6clpnilol पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१६ 250 76338 664915 609242 2026-07-04T14:36:00Z आदेश यादव 3609 664915 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|एतिकायन—ऐनक|४७५|}}</noinclude> इस विषयका शिलालेख कोल्हापुर राज्यके सामानगढ़ में मिला है। उसमें ऐतावाड़–खुर्द उत्सर्ग को हुई भूमि की उत्तर सोमा बताया गया है। ऐतिकायन (सं॰ पु॰) इतिकस्य ऋषेरपत्यम्, इतिकफक्। इर्तिक ऋषिके सन्तान। ऐतिशायन (सं॰ पु॰) इतिशस्य ऋषेरपत्यम्, इतिशफक्। इतिश ऋषिके सन्तान। यह एक संस्कृतके प्राचीन विद्वान थे। मीमांसासूत्र में इनका नाम आया है। ऐतिहासिक (सं॰ त्रि॰) इतिहासादागतः इतिहासठक्। १ इतिहास ग्रन्थसे समझ पड़नेवाला, जो तारीखसे मालूम हो। २ इतिहासवेत्ता, तारीखको जननेवाला इतिहासपाठक, तारीख़ पढ़नेवाला। ऐतिह्य (सं॰ ल्की॰) इतिह स्वार्थे ञा। अन्तावसथोतिह–भेषजा ञा:। पा ५।४।२३। पारम्पर्य उपदेश, पुरानी‌ नसीचत। जो बात बहुत दिनसे सुननेमें आती वह‌ ऐतिह्य कहाती है। {{x-smaller|"ऐतिह्य नाम आप्तोपदेशो वेदादिः।" (चरक)}} पौराणिकोंके मत में ऐतिह्य एक प्रमाण है। वटके वृक्षमें यक्षिणी रहनेका परम्परागत उक्त वाक्य ही ऐतिह्य प्रमाण है। ऐदंयुगीन (सं॰ त्रि॰) अस्मिन् युगे साधुः, इदयुगखञ। इस युगके उपयोगी। ऐध् (सं॰ स्त्री॰) अग्निशिखा, लपट। ऐध (सं॰ पु॰) {{x-smaller|ऐध् देखो।}} २ दिलवाले बादशाह सुलतान मुहम्मद थाह तुग़लक़ और सुलतान फोरोज शाहके एक दरवारी । इनका उपाधि जा रहा। इनके बनाये 'तरसोल ऐन-उल्-मुल्को' और 'फतेहनामा' नामक दो पुस्तक विद्यमान है। फतेहनामें इन्होंने सुलतान चला-उद- दोन के विजयका वर्णन किया है। २ चोलापुर नवाब आदिलशाद भाई इस्माइलके एक रिसालदार । १५८२ ई०को बुरहान निजाम ग्राहको हरा आदिलशाहने दक्षिणको घोर कर्नाटक और मलवार पर आक्रमण मारा था । किन्तु अपने भाई इस्माइल बलवा करने पर उन्हें पोछे लौटना पड़ा। युद्ध होनेपर मोराजको फौज इस्माइल से मिल गई। वेलगांव को बीजापुर लौट पायो यो २० हजार फोजके साथ । भेजो फोज विना आज्ञाक ऐन-उल्- मुल्क भी अपनी ऐन्-उल्-मुल्क उसमें मिले पोर राजधानो दिने पर आक्रमण मारने को आगे बढ़े। किन्तु यह युद्धमें मारे गये । १५४२ ई०का भी इन्होंने वोजापुर घेर लिया था. किन्तु विजयनगर-नरेयके भाई इन्हें हमें परास्त किया । यह रातको रण छोड़ अहमदनगर भाग पाये थे । वीजापुर में पूर्व पादया- पुर-फाटक से १५०० गज दूर ऐन-उल-मुल्कको कम बनी है। ऐन (०वि०) १ उपयुक्त दुरुस्त ठोक २ पूर्ण सुसलमानो हुकूमत हिल गई थी। पूरा। (हिं०) अयन और एप देखो । ऐन-उद्-दोन- बीजापुरके एक शेख । इन्होंने 'मुलहकात' और 'किताब-उल्- अनवार' नामक दो ग्रन्थ लिखे हैं । उक्त दोनों ग्रन्थोंमें भारत के समग्र मुसलमान- साधुवों का इतिहास है। सुलतान् पला-उद-दोन हसन बाह मनीके समय यह विद्यमान रहे । - ऐन-उल-मुल्क – १ शीराज़के एक अधिवासी। इनका उपाधि हकीम रहा । बादशाह अकबर के समय यह एक उच्च पदपर प्रतिष्ठित थे। इनको कविता बहुत रसौल होतो थी । उपनाम 'वफा' रहा। ई० को हकीम साहब इस दुनिया से चलते बने। १५८४ ४ गुजरातके एक सूबेदार इनका उपाधि मूलतानी रहा । उलध खान्के जानेसे गुजरातमें बलवा दबानेको कमाल-उद्-दोन भेजे सुधारक खिलजी चढ़ाई काम आये। किन्तु १२१८ ई० को ऐन-उल-मुल्क मूलतानोन बड़ी फौजके साथ पहुंच शान्ति स्थापित की थी । १३०६ ई० के समय यह मालवेके शासक रहे। उसी समय बम्बई प्रान्तस्थ कनाड़ी जिलेवाले देवगिरिके रामचन्द्र ने उपद्रव उठाया था। पला-उद- दोन्ने ख्वाजा मलिक काफरको एक लाख फौजके साथ दाचिणात्य दबाने भेजा । राहमें इन्होंने भी अपनो फोज उनको सहायता के लिये साथ कर दौ । ऐनक ( हिं० स्वी० ) उपनेत्र, चश्मा।<noinclude></noinclude> tn1fu51ipwteyk4motd4l7b9e9ecd5h पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६१ 250 82724 664971 664744 2026-07-05T04:00:24Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664971 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||अक्षरलिपि|५६}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> युक्तिका समर्थन किसी तरह किया जा नहीं सकता, कि सन् ई० से पहलेकी ८वीं शताब्दीके बाद फिनिक (Phoenician) नामक बणिकोंसे भारतवासियोंने अक्षरज्ञान प्राप्त किया था। सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें शाक्य बुद्धका अभ्युदय हुआ। उनके निर्वाण प्राप्त होनेसे कुछ ही पीछे उनके धर्मोपदेशकी रक्षा करनेके लिये उनके प्रधान-प्रधान शिष्यों ने इकट्ठा हो पहला बौद्धसङ्घ आह्वान किया। फ्रान्सीसी पण्डित फूको (Foucaux) और राजा राजेन्द्रलाल मित्र महाशयने ललितविस्तर-की समालोचनाके समय लिखा था, कि ललितविस्तरमें जो गाथा हैं, वह इसी समय (सन् ई० से पहलेकी ६ठीं शताब्दीमें) बनाई और संग्रह की गई थीं।<ref>Dr. Rajendralal Mitra's Lalita Vistara, Intro. p. 56.</ref> उन गाथाओंमें इस तरह वर्णन किया गया है— {{center|{{smaller|"सा गाथलेखलिखिते गुण अर्थयुक्ता<br>या कन्य ईदृश भवेन्मम तां वरयेथाः।" । (ललितविस्तर १२ अ०)}}}} (शाक्यसिंहने कहा) जो कन्या गाथालेख लिखने और गाथाका अर्थ समझनेमें चतुर होगी, उससे मैं विवाह करूँगा।m कही हुई गाथासे क्या हम नहीं जान सकते, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले इस देशमें लिपिज्ञानकुशला महिलाओंका भी अभाव न था। यह बात सहज ही अनुमेय है, कि ढाई हज़ार वर्ष पहले जहाँ कन्या लिखनेमें निपुण न होनेसे राजकुमारकी पत्नी बननेके योग्य न समझी जाती थी, उस देशके लिये अक्षर-लिपिकी चर्चा कितनी पुरानी है। ललितविस्तरकी गाथामें लिपिशाल<ref>{{Block center|<poem><small>† "शास्त्राणि यानि प्रचरन्ति च देवलोके<br>संख्या लिपिच गणनाऽपि च धातुतन्त्रः।<br>ये शिल्पयोगपृथु लौकिक अप्रमेया-<br>स्तेष्वेषु शिक्षितु पुरा बहुकल्पकोट्यः।<br>किन्तु जनस्य अनुवर्त्तनतां करोति<br>लिपिशालमागतु सुशिक्षितशिक्षणार्थं"॥<br><small>{{right|(ललितविस्तर १० अ०)</small>}}</poem></small>}}</ref>और लिपिशास्त्र<ref>{{Block center|<poem><small>"लोकोत्तरेषु चतुःसत्यपथविधिज्ञो हेतुप्रतीत्यकुशली यथ सम्भवति।<br>यथ चानिरोधक्षयु संस्कृ तसोऽस्तिभावस्तस्मिन् विधिज्ञः किमथो लिपिशास्त्रमात्रे"॥ {{Right|(ललितविस्तर १० अ०)}}</poem></small>}}</ref>का उल्लेख {{Rule|}} {{Smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> होनेसे स्पष्ट मालूम होता है, कि उस पुराने समयमें भी लिपि सिखानेकी पाठशालाएं और नाना देशीय लिपिज्ञानके उपयुक्त लिपि-शास्त्र (Palaeography and Epigraphy) प्रचलित था।<br> {{center|{{smaller|ब्राह्मी आदि लिपियोंका उत्पत्ति-काल।}}}} इस समय यहाँ आलोच्य है, कि जिस प्राचीन कालकी बात चल रही है, उस समय भारतमें कैसे अक्षर प्रचलित थे। पूर्वोक्त ललितविस्तरमें चौंसठ प्रकारकी लिपिका उल्लेख देख पड़ता है। यथा— १ ब्राह्मी, २ खरोष्ठी, ३ पुष्करसारी, ४ अङ्ग, ५ वङ्ग, ६ मगध, ७ माङ्गल्य, ८ मनुष्य, ९ अङ्गुलीय, १० शकारि, ११ ब्रह्मवल्ली, १२ द्राविड़, १३ कनारी, १४ दक्षिण, १५ उग्र, १६ संख्या, १७ अनुलोम, १८ अवधनु, १९ दरद, २० खास्य, २१ चीन, २२ हूण, २३ मध्याक्षरविस्तर, २४ पुष्प, २५ देव, २६ नाग, २७ यक्ष, २८ गन्धर्व, २९ किन्नर, ३० महोरग, ३१ असुर, ३२ गरुड़, ३३ मृगचक्र, ३४ चक्र, ३५ वायुमरुत्, ३६ भौमदेव, ३७ अन्तरीक्षदेव, ३८ उत्तरकुरुद्वीप, ३९ अपरगौड़ादि, ४० पूर्वविदेह, ४१ उत्क्षेप, ४२ निक्षेप, ४३ विक्षेप, ४४ प्रक्षेप, ४५ सागर, ४६ वज्र, ४७ लेख-प्रतिलेख, ४८ अनुद्रुत, ४९ शास्त्रावर्त्त, ५० गणनावर्त्त, ५१ उत्क्षेपावर्त्त, ५२ विक्षेपावर्त्त, ५३ पादलिखित, ५४ द्विरुत्तरपदसन्धि, ५५ दशोत्तरपदसन्धि, ५६ अध्या-हारिणी, ५७ सर्वभूतसंग्रहणी, ५८ विद्यानुलोम, ५९ विमिश्रित, ६० ऋषितपस्तप्ता, ६१ धरणीप्रप्रेक्षण, ६२ सर्वौषधिनिष्यन्दा, ६३ सर्वसारसंग्रहणी और ६४ सर्वभूतरुतग्रहणी। {{Right|(ललितविस्तर १० अ०)}} जिस ललितविस्तरमें पूर्वोक्त लिपिमालाका नाम उद्धृत हुआ है, उसी ग्रंथका चू-फ-लन्ने सन् ६५ ई० के समय चीन-भाषामें अनुवाद किया था।<ref> Beal's Romantic Legend of sakya Buddha introduction</ref>ऐसे स्थलमें मूल ग्रंथके सब जगह फैलने और इसके बाद चीनदेश पहुँचनेमें अल्प समय न लगा होगा। पाश्चात्य और इस देशके राजा राजेन्द्रलाल मित्र-प्रमुख† {{Rule}} {{Smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> l3c42qibm220z3laqjdywnl7l9gj5tf पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६२ 250 82726 664977 663252 2026-07-05T05:32:51Z Shivaniya shaw 4129 664977 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अजीत कुमार तिवारी" />{{rh|६०|अक्षरलिपि}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पण्डितोंने ललितविस्तरको सन् ई० से पहलेकी दूसरी शताब्दिका ग्रन्थ माना है। किन्तु हम इससे भी पुराना समझते हैं। सम्राट् अशोकके यत्नसे जैसे बौद्ध धर्म फैलानेके लिये पश्चिममें यूनान, उत्तरमें मङ्गोलिया, पूर्वमें कम्बोज और दक्षिणमें लङ्कातक धर्माचार्य भेजे गये, वैसे ही सभ्य जगत्के प्रायः सभी स्थानोंसे लोग सम्राट् अशोकके साम्राज्यमें नाना कार्योपलक्ष्यसे बसने लगे थे; हम नहीं समझते, कि इस समय भारतमें नाना विदेशीय संस्रवोंसे जितने प्रकारकी लिपि या अक्षरमाला प्रचलित हुई थी, पहले और किसी समय उतने प्रकारकी लिपि या अक्षरमाला देखनेमें आई हो।<ref>शकाधिप कनिष्कका अधिकार उत्तरमें खुतन, पश्चिममें ईरान और पूर्वमें पूर्ववङ्ग तक फैल गया था सही, किन्तु वे सन् ई० की पहली शताब्दी- में विद्यमान अवश्य थे। यह बात सन् ई० से पहली शताब्दीके चीन-अनु- वादसे प्रमाणित है, कि इससे पहले ललितविस्तर बनाया गया था।</ref> भारतीय बौद्धोंके इसी सुवर्णयुगमें यहाँ जितने प्रकारकी लिपि प्रचलित हुई थी, सम्भवतः ललितविस्तरके बनानेवालोंने उतने प्रकारकी लिपिका उल्लेख किया है। लङ्का, ब्रह्म और श्याम देशवाले बौद्ध ग्रन्थोंके मतसे सन् ई० से ५४३ वर्ष पहले बुद्धदेवका निर्वाण और निर्वाणसे २१८ वर्ष पीछे यानी सन् ई० से ३२५ वर्ष पहले अशोकका साम्राज्याभिषेक कार्य सम्पन्न हुआ था। <Small>[प्रियदर्शी शब्दमें विस्तृत विवरण देखना चाहिये।]</small> इसके बाद अशोककी राजधानीमें ६४ प्रकारकी लिपिका चलना कुछ विचित्र नहीं। इस समयके यूनानी नियर्खस (Nearchus) की विवरणीमें लिखा है, कि भारतवासी रूईके वस्त्र या काग़ज़ पर अक्षरयोजना करते थे। उनसे कुछ समय पीछे यूनान-दूत मेगस्थि- निस् मगधराज्यकी वर्णनाके उपलक्ष्यमें लिख गये हैं, कि भारतवासी १० स्टेडियाम् दूर शाखापथ और उसके अन्तर्वर्ती स्थानकी दूरी बतानेवाला कोसके अंकोंसे युक्त प्रस्तरफलक (mile-stone) रखते थे। पत्थरमें अक्षर-खोदनेकी प्रथा उस समय खूब प्रचलित थी। अशोकके अनुशासन और उससे भी बहुत पहले कपिलवस्तुके निकटवर्ती पिपरावा गांवसे {{Rule}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> आविष्कृत बुद्धदेवके देहावशेषकी रक्षा करनेवाले पत्थर पर खुदी हुई लिपि इस बातकी गवाही देती है। पिपरावा-लिपि देख इस समय दृढ़ विश्वास होता है, कि सन् ई० से पहलेकी छठी शताब्दीसे भी पहले भारतवर्षमें पत्थरपर अक्षर खोदनेकी प्रथा प्रचलित थी। मगधपति जरासन्धकी राजधानी गिरि- व्रजमें जरासन्धकी बैठक और भीम जरासन्धकी रण- रंगकी भूमिपर चित्रलिपि और कौन-सा शिल्पलिपि- के बीचकी लिपि पर्वतगात्रमें उत्कीर्ण रही है। उसके ऊपर बहुत समयसे गो और महिष आदिके आने- जानेकी राह होनेसे वह प्राचीनतर लिपि कितनी ही अस्पष्ट और अबोध्य हो गई है। हमें विश्वास होता है, कि आज तक भारतमें जितने प्रकारकी लिपि आविष्कृत हुई है, उनमें वह मगधलिपि सबसे पुरानी है। कौन कह सकता है, कि वह जरासन्धके समयकी लिपि नहीं है? जो हो, हम समझते हैं, कि २२०0 वर्ष पहले भारतवासी ६४ प्रकारकी लिपि जानते थे। इन ६४ लिपियोंमें कितनी ही सम्राट् अशोकसे भी बहुत पहले भारतमें प्रचलित थीं। जैनियोंके सुप्रसिद्ध "समवायसूत्र" नामक ४थे अङ्गमें लिखा है— "बम्भीए णम अट्ठारसविहे लिक्खविहाणे****** लेक्खं करेड्। जं बम्भीए, जवणाणिया, दोसाउरिया,† खरोट्टिया, पुक्खरसारिया, पायहसा, कत्थइया, गन्धव्विया, आदरसणिणवि, माहेसरणिणवि, दामिलिणिवि, पोलिंदिणिवि।" ब्राह्मी प्रभृति १८ प्रकारकी लेखन प्रक्रियाओंके नाम यह हैं—१ ब्राह्मी, २ यवनानी, ३ दोषौतरिका, ४ खरोष्ट्रिका, ५ पुष्करसारिका, ६ पावर्त्तिका, ७ उत्तरकुरुका, ८ अक्षरपुस्तिका, ९ भोगवइया, १० विक्षेपिका, ११ निक्षेपिका, १२ अङ्ग, १३ गणित, १४ गन्धर्व, १५ आदर्शा, १६ माहेश्वरी, १७ द्राविड़ी और १८ बोलिन्दी (?) लिपि। * * 'खरसारिया'—पाठान्तर। † 'दोसउरिया'—पाठान्तर। ‡ 'भोगवयत्ता'—पाठान्तर। †† 'वयनतिया, निराहत्या, बङ्गगिया, निहत्या'—पाठान्तर। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> gii6hfzfc8yyxtvl3ktv360reaocp7o 664979 664977 2026-07-05T06:09:52Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664979 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''६०'''|'''अक्षरलिपि'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पण्डितोंने ललितविस्तरको सन् ई० से पहलेकी दूसरी शताब्दिका ग्रन्थ माना है। किन्तु हम इससे भी पुराना समझते हैं। सम्राट् अशोकके यत्नसे जैसे बौद्ध धर्म फैलानेके लिये पश्चिममें यूनान, उत्तरमें मङ्गोलिया, पूर्वमें कम्बोज और दक्षिणमें लङ्कातक धर्माचार्य भेजे गये, वैसे ही सभ्य जगत्के प्रायः सभी स्थानोंसे लोग सम्राट् अशोकके साम्राज्यमें नाना कार्योपलक्ष्यसे बसने लगे थे; हम नहीं समझते, कि इस समय भारतमें नाना विदेशीय संस्रवोंसे जितने प्रकारकी लिपि या अक्षरमाला प्रचलित हुई थी, पहले और किसी समय उतने प्रकारकी लिपि या अक्षरमाला देखनेमें आई हो।<ref>शकाधिप कनिष्कका अधिकार उत्तरमें खुतन, पश्चिममें ईरान और पूर्वमें पूर्ववङ्ग तक फैल गया था सही, किन्तु वे सन् ई० की पहली शताब्दी- में विद्यमान अवश्य थे। यह बात सन् ई० से पहली शताब्दीके चीन-अनु- वादसे प्रमाणित है, कि इससे पहले ललितविस्तर बनाया गया था।</ref> भारतीय बौद्धोंके इसी सुवर्णयुगमें यहाँ जितने प्रकारकी लिपि प्रचलित हुई थी, सम्भवतः ललितविस्तरके बनानेवालोंने उतने प्रकारकी लिपिका उल्लेख किया है। लङ्का, ब्रह्म और श्याम देशवाले बौद्ध ग्रन्थोंके मतसे सन् ई० से ५४३ वर्ष पहले बुद्धदेवका निर्वाण और निर्वाणसे २१८ वर्ष पीछे यानी सन् ई० से ३२५ वर्ष पहले अशोकका साम्राज्याभिषेक कार्य सम्पन्न हुआ था। <Small>[प्रियदर्शी शब्दमें विस्तृत विवरण देखना चाहिये।]</small> इसके बाद अशोककी राजधानीमें ६४ प्रकारकी लिपिका चलना कुछ विचित्र नहीं। इस समयके यूनानी नियर्खस (Nearchus) की विवरणीमें लिखा है, कि भारतवासी रूईके वस्त्र या काग़ज़ पर अक्षरयोजना करते थे। उनसे कुछ समय पीछे यूनान-दूत मेगस्थि- निस् मगधराज्यकी वर्णनाके उपलक्ष्यमें लिख गये हैं, कि भारतवासी १० स्टेडियाम् दूर शाखापथ और उसके अन्तर्वर्ती स्थानकी दूरी बतानेवाला कोसके अंकोंसे युक्त प्रस्तरफलक (mile-stone) रखते थे। पत्थरमें अक्षर-खोदनेकी प्रथा उस समय खूब प्रचलित थी। अशोकके अनुशासन और उससे भी बहुत पहले कपिलवस्तुके निकटवर्ती पिपरावा गांवसे {{Rule}} {{Smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> आविष्कृत बुद्धदेवके देहावशेषकी रक्षा करनेवाले पत्थर पर खुदी हुई लिपि इस बातकी गवाही देती है। पिपरावा-लिपि देख इस समय दृढ़ विश्वास होता है, कि सन् ई० से पहलेकी छठी शताब्दीसे भी पहले भारतवर्षमें पत्थरपर अक्षर खोदनेकी प्रथा प्रचलित थी। मगधपति जरासन्धकी राजधानी गिरि- व्रजमें जरासन्धकी बैठक और भीम जरासन्धकी रण- रंगकी भूमिपर चित्रलिपि और कौन-सा शिल्पलिपि- के बीचकी लिपि पर्वतगात्रमें उत्कीर्ण रही है। उसके ऊपर बहुत समयसे गो और महिष आदिके आने- जानेकी राह होनेसे वह प्राचीनतर लिपि कितनी ही अस्पष्ट और अबोध्य हो गई है। हमें विश्वास होता है, कि आज तक भारतमें जितने प्रकारकी लिपि आविष्कृत हुई है, उनमें वह मगधलिपि सबसे पुरानी है। कौन कह सकता है, कि वह जरासन्धके समयकी लिपि नहीं है? जो हो, हम समझते हैं, कि २२०० वर्ष पहले भारतवासी ६४ प्रकारकी लिपि जानते थे। इन ६४ लिपियोंमें कितनी ही सम्राट् अशोकसे भी बहुत पहले भारतमें प्रचलित थीं। जैनियोंके सुप्रसिद्ध सप्राचीन "समवायसूत्र" नामक ४थे अङ्गमें लिखा है— <Small>"बम्भी एण 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/>{{Rh||'''अक्षरलिपि'''|'''७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> लिपि फिनिक लिपिकी अरमीय शाखास निकली है । पण्डितवर बूहलरने कहा है-- 'सक्कराकी शिलालिपि मिलानेसे देख पड़ता है, कि अरमीय 'अलिफ' और खरोष्ठीका 'अ' एक ही जैसा है। इसी तरह अरमोय पेपिरीका 'बेथ्' खरोष्ठी 'व' ; मिश्रके शिलाफलकवाला 'गिमेल' 'ग' ; मेसो- पोटमियाको शिलालिपि और अरमीय पेपिरीका 'दलेथ्' 'द' ; तिमाको अरमोय लिपिका गोलाकार 'हे' ह; तिमाको शिलालिपि और सिसिलीको सत्रप- मुद्राका 'वाव' 'व' ; तिमालिपिका 'ज़ईन' 'ज'; सक्कारा और तिमालिपिका 'चेथ्' 'श'; 'योद', 'य' ; बाबिलोनोय 'काफ़' 'क' ; 'लमेद' ल ; सक्कारा- लिपि और बाबिलोनोय मुहरका 'मीम' 'म' ; सक्कारा, तिमा, असुरीय और बाबिलोनीय शिला- लिपिका ‘नून्’ ‘न’; नवतीय अक्षरमालाका 'समेच' 'स' ; सेमेटिक 'फे' 'फ' ; सेमेटिक 'तसदे' 'च'; सेरापियामाको अरमीय शिलालिपिका 'कोफ' ‘ख’; सक्कारालिपिका 'रेष' 'र' ; प्राचीन असुरीय लिपिका 'तो' 'ठ' ; और सक्कारालिपिका 'तो' 'ट' के बराबर है। इसी तरह बूहलर साहबने यह प्रमाणित करनेकी चेष्टा की है, कि खरोष्ठी लिपिके बीस अक्षर फिनिक या सेमेटिक लिपिसे निकले हैं । पूर्ववर्त्ती पाश्चात्य ऐतिहासिकों में से इस खरोष्ठी लिपिका किसने बक्तो - पाली ( Bactro-Pali ) या इण्डो-पाली और किसीने गान्धारी नाम लिखा है । किन्तु समवायाङ्ग और ललितविस्तर में गन्धर्व्व या गान्धारी लिपिका पृथक् उल्लेख रहते और पालौलिपि- के ब्राह्मोसे अलग होते भी खरोष्ठी एक स्वतन्त्र और प्राचीन लिपि ही समझ पड़ती है । उत्तर-पश्चिमान्तके शाहबाजगढ़ी और मानसेरा प्रभृति स्थानोंसे सम्राट् अशोकको जो दक्षिण से वाममुखी यानी विपर्यस्त 'लिपि निकली, वहीं खरोष्ठी कही जाती है । आश्चर्य- का विषय है, कि हिन्दूकुशके उत्तर बलख (बलिया) तक भी इस लिपिका कोई सन्धान नहीं मिलता । प्राचीन गन्धार राज्य में प्रचलित रहनेसे ही कनिंहमने 'गान्धार-लिपि' नाम रखा है । किन्तु बूहलर, राप्- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> सोन प्रभृति आजकल के सभी पाश्चात्य पुराविदोंने इसे खरोष्ठी हो माना है। किन्तु हम कनिंहम्की भांति इसे “गान्धार” या ललितविस्तरोक्त गन्धर्व्वलिपि कहने- को प्रस्तुत हैं। आर्यावर्त्त में ब्राह्मोलिपिसे जैसे मागधी, अङ्ग, वङ्ग प्रभृति भारतीय लिपिको सृष्टि हुई, उसी तरह पुरानो खरोष्ठी में गन्धर्व्व, किन्नर, दरद, शकारि, खास्य, हूण, यक्ष, असुर ( Assyrian), अर्द्धधनु (Cunei- for!n) ; उत्तरकुरु और उत्तरमद्र (North Median) प्रभृति सुप्राचीन लिपियां परिपुष्ट हुई थीं । खरोष्ठीको इतनी प्राचीन बतानेका क्या कारण है ? प्रत्नतत्त्वविद् कनिंहमने लिखा है - पारसिकोंके आदिधर्मग्रन्थ आवस्तावाले मन्त्र या उसकी गाथायें जरथुस्त्र (Zoroaster ) ने सङ्कलित को थीं । दारअवस विस्तास्प (Darius Hystaspes ) के समय वहो मन्त्र या गाथायें किसी प्रचलित लिपिमें लिखो गई । इसी लिपिने जरथुस्त्र के नामानुसार 'खरोष्ठी' नाम पाया होगा । यह लिपि दक्षिणसे वामदिक्को यानी विपर्य्यस्त क्रमसे लिखी जाती है । प्रत्नतत्त्वविद् कनिंहमके दारअवसवाले समय में खरोष्ठीको सृष्टि लिखनेपर भी हम इस बातको ठीक नहीं बताते ; कारण, लिपितत्त्वविद् बूहलरने जब आप हो मान लिया है, कि अरमोयलिपिसे भी खरोष्ठीके कोई-कोई अक्षर पुराने हैं, तब यह कैसे कहेंगे, कि पारस्यपति दारअवुसके समय और खुष्ठ जन्मसे छः शताब्द पहले खरोष्ठी उत्पन्न हुई थी ? अरब देशके ऐतिहासिक मसूदीने सन् ई० के १० वें शताब्दी में लिखा है, कि जरतुस्त-प्रचारित जन्द अवस्ता १२००० गोचम्र्मपर उन्हीकी उद्भावित अक्षर- लिपिसे लिखी गई थी । भारतीय भविष्यपुराण (ब्राह्मपर्व ) और पारसिक आदिधर्म्म पुस्तक अवस्ताको पढ़नेसे भी मालूम होता है, कि सौरोंके वौच अग्निपूजाप्रवर्त्तक जरशस्त्र या जरथुस्त्र 'मग' 'मगुस' या 'मधुस' नाम से प्रसिद्ध थे । सन् ई०से पहलेके ५वें शताब्द में प्रसिद्ध यूनानो ऐतिहासिक हेरोदोतस् ने लिखा है, कि शाकद्दौपियोंके बीच आरिअस्प (Ariaspa ) ( आर्जव ) शाखाने बहुत <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> rk14ssc8sj5hlnr4b4lst8j56hbf4hb पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७६ 250 82755 664917 345912 2026-07-04T15:13:39Z Shivaniya shaw 4129 664917 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|७२| अक्षरलिपि}}</noinclude>उनका जन्म पूर्वकालमें प्रबल हो असुरोय, मिदीयप्रभृति पुराने राज्य जीते। भविष्यपुराणके मतसे ऋजिया नामके मिरिगो में एक ऋषि हुए थे। उन्हींको कन्याके गर्भ जरशस्त्र ( जरथुस्त्रका) जन्म है। ठीक वैधरूपसे न होनेके कारण वह और उनके वंश - धर पुराणमतसे 'अग्निजात्य'<ref>और उनका पिटकुल अज्ञात रहनेके कारण हेरोदोतसने उनके वंशधरोंको मातृकुलके अरिअस्प या आर्जव (अर्थात् ऋजिवा- के गोवापत्य) बताकर ही प्रकाशित किया। लिदियाके प्रसिद्ध यूनानो पण्डित जानथोस् सन् ई० से ४०० वर्ष पहले ही लिख गये हैं, कि जरथुस्त्र झ्य इसे कोई ६०० वर्ष पहले आविर्भूत हुए थे। चारि- टटल और इउडोक्सास के मतानुसार प्लेटोसे ६००० वर्ष पहले जर मुखका अभ्युदय हुआ था। फिर प्र सिद्ध ऐतिहासिक झिनिने द्रय-युद्ध से ५००० हज़ार वर्ष पहले जरथुस्त्रका आविर्भाव माना। इधर बाबिलोन- के ऐतिहासिक बेरोसस्ने लिखा है, कि जरथुस्त्र किसी समय वाविलोनके अधोम्बर थे; उनके वंशधरोंने यहां सन् ई०के २२०० वर्ष पहलेसे २००० वर्ष पहले तक अधिपत्य किया था। पूर्वोक्त नाना ऐतिहासिकको प्रमाणावलीसे देखते हैं कि पूर्वकालमें कई जरथुस्त हुए थे। जरथुस्त्रके वंशधर भी जरथुस्त्र के नामसे परि- चय देते रहे । चार हज़ार वर्ष से भौ बहुत पहले उ- नका अभ्युदय हुआ था । उन्हींके प्रभावसे शकोंके आदि मित्र-धका अधःपतन हुआ, और अग्निपूजा हो सर्व्वत्र प्रचलित हुई। पहले ही इस बातका आभास दे + "वेदोक्त' विधिमुत्सृज्य यथीहं लङ्घितस्तया । तस्मात् भगः समुत्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ॥ शस्त्र इति वंशको विवर्तन 1 ।" अग्निजात्या मगा प्रोक्ता सोमजात्या द्विजातयः ॥ " (भविष्य १२२००२ - ० ) भविष्यपुराचसे भी मालूम होता है, कि शाकदीप मन आधिपत्य करते थे- “एभिर्दशन्ति भूयिष्ठं तस्मिन् दीपे भगाधिपाः । विद्यानन्तशीचाचारसमन्विताः । (१०००) दिया गया है, कि मग विपरीत भावसे पढ़ते थे। भविष्यपुराण में लिखा है- 'विपरीत क्रममे वेदाध्ययन करनेके कारण इनका नाम 'मग' पड़ा था। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद जैसे ब्राह्मणोंके चार वेद है, वैसेही मगोंक भी इनसे विपरीत चार वेद हैं, जो विद, विश्वरद (या विस्परद), विदाद और आङ्गिरस् नामसे पुकारे जाते हैं।' * भविष्यपुराणको इस युक्तिसे भलीभांति समझ पड़ता है, कि भारतके चार वेद जैसे वामसे दक्षिणको यानी ब्राह्रीलिपिसे लिखे जाते थे, वेमही शाकद्वीपीय मग अपने आदि ग्रन्थ ब्राह्मी लिपिके विपरोत भावसे यानी दाहनी ओरसे बाई ओरको पढ़ते और लिखते थे। इसी पाठविपर्ययसे उनका नाम 'मग' पड़ा। यह 'मग' नाम अवस्ताके प्राचीनांश गाथमं भो मिला है। ऐसे स्थलमें इसमें सन्देह नहीं, कि ४।५ हज़ार वर्ष पहले विपर्यस्तलिपि या खरोष्ठौकी उत्पत्ति हुई थी। प्राचीनतर ऐतिहासिक और इस देश के पौरा णिक प्रायः सभी इस बातका आभास दे गये हैं, कि ४५ हजार वर्ष पहले शाकद्वीप में बाबिलोन, यहां * "विपय्यस्तो न वेदन मगा गायन्तातो मगाः । ऋग्वेदीय बहुर्वेदः सा U ब्रह्मणोक्ता तथा वेदा मगानामपि मन्त्रत ॥ तद विपरीतास्तु तेषां वेदाः प्रकीर्त्तिताः । " (भविष्य १४० अ० ) भविष्यपुराणका प्रमाण देख कोई उसे आधुनिक न समझे बम्बई- से प्रकाशित भविष्यपुराणवाल 'ब्राह्मपथ' सिवा मी पानिक सम झनेके लिये यथेष्ट कारण रहते भी इसमें संदेह है कि ब्राह्मपर्व बहुत पुराना है। यहां तक, किं श्रापस्तम्बधसूत्र (२|२४|५६) में इस भविष्यत्पुराण- का उल्ले ख रहा है। यह धर्म सूत्र अध्यापक बृहलर भतानुसार अन्ततः सन् ई० से पहलेके ५वें शताब्दका है । इस ग्रन्थ में बुद्धप्रभावका निदर्शन न रहने से इसे से शताब्दका भी पूर्ववर्ती बाल करते हैं। इससे भी पहले मूल भविष्य पुराण लिखा गया था ई-से पहले + पूतन यूनानी ऐतिहासिकको वर्णना अनुसार वर्तमान युरोपीय पुराविदोंने फिर किया है, कि वर्तमान तातार एशियारिया मस्कोबौ, क्रिमिया), पोलेख, हुङ्गे रियाका कितना ही अंश. लिथुनिया, जम नौका उत्तरांश, खौडेन, नारवे प्रभृति स्थानों तक पुराना स्किदिया या शाकद्दौप विस्तृत था [ वर जातीय इतिहास, ब्राह्मण काण्ड, ४ घांश ६-९ पृष्ठ द्रष्टव्य है' ]।<noinclude></noinclude> 4dcgxe0wmuv2ljmucm5iq3i71b1zp1d 664981 664917 2026-07-05T08:11:06Z Shivaniya shaw 4129 664981 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|७२| अक्षरलिपि}}</noinclude>उनका जन्म पूर्वकालमें प्रबल हो असुरोय, मिदीयप्रभृति पुराने राज्य जीते। भविष्यपुराणके मतसे ऋजिया नामके मिरिगो में एक ऋषि हुए थे।<ref>{{Block center|<poem><small> "गीव' मिहिरमित्याह व्रतं तु ब्राह्ममुत्तमम् । ऋजिचा नाम धर्मात्मा ऋषिरासीत् पुरानघ</ref></poem></small>}} उन्हींको कन्याके गर्भ जरशस्त्र ( जरथुस्त्रका) जन्म है। ठीक वैधरूपसे न होनेके कारण वह और उनके वंशधर पुराणमतसे 'अग्निजात्य'<ref>{{Block center|<poem><small> "वेदोक्त' विधिमुत्सृज्य यथीहं लङ्घितस्तया ।<br> तस्मात् भगः समुत्पन्नस्तव पुत्रो भविष्यति ॥<br> जरशस्त्र इति ख्याती वंशकीविवर्तन:। ।"<br> अग्निजात्या मगा प्रोक्ता सोमजात्या द्विजातयः ॥ " {{Right|(भविष्य १२२००२ - ० 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हज़ार वर्ष पहले विपर्यस्तलिपि या खरोष्ठौकी उत्पत्ति हुई थी। प्राचीनतर ऐतिहासिक और इस देश के पौरा णिक प्रायः सभी इस बातका आभास दे गये हैं, कि ४५ हजार वर्ष पहले शाकद्वीप में बाबिलोन, यहां भविष्यपुराणका प्रमाण देख कोई उसे आधुनिक न समझे बम्बई- से प्रकाशित भविष्यपुराणवाल 'ब्राह्मपथ' सिवा मी पानिक सम झनेके लिये यथेष्ट कारण रहते भी इसमें संदेह है कि ब्राह्मपर्व बहुत पुराना है। यहां तक, किं आपस्तम्बधसूत्र (२|२४|५६) में इस भविष्यत्पुराण- का उल्ले ख रहा है। यह धर्म सूत्र अध्यापक बृहलर भतानुसार अन्ततः सन् ई० से पहलेके ५वें शताब्दका है । इस ग्रन्थ में बुद्धप्रभावका निदर्शन न रहने से इसे से शताब्दका भी पूर्ववर्ती बाल करते हैं। इससे भी पहले मूल भविष्य पुराण लिखा गया था ई-से पहले पूतन यूनानी ऐतिहासिकको वर्णना अनुसार वर्तमान युरोपीय पुराविदोंने फिर किया है, कि वर्तमान तातार एशियारिया मस्कोबौ, क्रिमिया), पोलेख, हुङ्गे रियाका कितना ही अंश. लिथुनिया, जम नौका उत्तरांश, खौडेन, नारवे प्रभृति स्थानों तक पुराना स्किदिया या शाकद्दौप विस्तृत था [ वर जातीय इतिहास, ब्राह्मण काण्ड, ४ घांश ६-९ पृष्ठ द्रष्टव्य है' 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उनके वंशधरोंको मातृकुलके अरिअस्प या आर्जव (अर्थात् ऋजिवा- के गोवापत्य) बताकर ही प्रकाशित किया। लिदियाके प्रसिद्ध यूनानो पण्डित जानथोस् सन् ई० से ४०० वर्ष पहले ही लिख गये हैं, कि जरथुस्त्र झ्य इसे कोई ६०० वर्ष पहले आविर्भूत हुए थे। परिचय और इउडोक्सास के मतानुसार प्लेटोसे ६००० वर्ष पहले जर मुखका अभ्युदय हुआ था। फिर प्रसिद्ध ऐतिहासिक झिनिने द्रय-युद्ध से ५००० हज़ार वर्ष पहले जरथुस्त्रका आविर्भाव माना। इधर बाबिलोन के ऐतिहासिक बेरोसस्ने लिखा है, कि जरथुस्त्र किसी समय वाविलोनके अधोम्बर थे; उनके वंशधरोंने यहां सन् ई०के २२०० वर्ष पहलेसे २००० वर्ष पहले तक अधिपत्य किया था।<Ref><small> “एभिर्दशन्ति भूयिष्ठं तस्मिन् दीपे भगाधिपाः ।<br> विद्यानन्तशीचाचारसमन्विताः । (१०००)</Ref></small>}} पूर्वोक्त नाना ऐतिहासिकको प्रमाणावलीसे देखते हैं कि पूर्वकालमें कई जरथुस्त हुए थे। जरथुस्त्रके वंशधर भी जरथुस्त्र के नामसे परिचय देते रहे । चार हज़ार वर्ष से भी बहुत पहले उनका अभ्युदय हुआ था । उन्हींके प्रभावसे शकोंके आदि मित्र-धका अधःपतन हुआ, और अग्निपूजा हो सर्व्वत्र प्रचलित हुई। पहले ही इस बातका आभास दे {{Rule}} {{Smallrefs}} भविष्यपुराचसे भी मालूम होता है, कि शाकदीप मन आधिपत्य करते थे- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> दिया गया है, कि मग विपरीत भावसे पढ़ते थे। भविष्यपुराण में लिखा है- 'विपरीत क्रममे वेदाध्ययन करनेके कारण इनका नाम 'मग' पड़ा था। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद जैसे ब्राह्मणोंके चार वेद है, वैसेही मगोंक भी इनसे विपरीत चार वेद हैं, जो विद, विश्वरद (या विस्परद), विदाद और आङ्गिरस् नामसे पुकारे जाते हैं।'<ref>* <small> "विपय्यस्तो न वेदन मगा गायन्तातो मगाः । ऋग्वेदीय बहुर्वेदः सामवेदस्वथर्थवण ।। ब्रह्मणोक्ता तथा वेदा मगानामपि मन्त्रत ॥ तद विपरीतास्तु तेषां वेदाः प्रकीर्त्तिताः । " (भविष्य १४० अ० )</Ref></small>}} भविष्यपुराणको इस युक्तिसे भलीभांति समझ पड़ता है, कि भारतके चार वेद जैसे वामसे दक्षिणको यानी ब्राह्रीलिपिसे लिखे जाते थे, वेमही शाकद्वीपीय मग अपने आदि ग्रन्थ ब्राह्मी लिपिके विपरोत भावसे यानी दाहनी ओरसे बाई ओरको पढ़ते और लिखते थे। इसी पाठविपर्ययसे उनका नाम 'मग' पड़ा। यह 'मग' नाम अवस्ताके प्राचीनांश गाथमं भी मिला है। ऐसे स्थलमें इसमें सन्देह नहीं, कि ४।५ हज़ार वर्ष पहले विपर्यस्तलिपि या खरोष्ठौकी उत्पत्ति हुई थी। प्राचीनतर ऐतिहासिक और इस देश के पौरा णिक प्रायः सभी इस बातका आभास दे गये हैं, कि ४५ हजार वर्ष पहले शाकद्वीप में बाबिलोन, यहां {{Rule}} {{Smallrefs}} <Small>भविष्यपुराणका प्रमाण देख कोई उसे आधुनिक न समझे बम्बई- से प्रकाशित भविष्यपुराणवाल 'ब्राह्मपथ' सिवा मी पानिक सम झनेके लिये यथेष्ट कारण रहते भी इसमें संदेह है कि ब्राह्मपर्व बहुत पुराना है। यहां तक, किं आपस्तम्बधसूत्र (२|२४|५६) में इस भविष्यत्पुराण- का उल्ले ख रहा है। यह धर्म सूत्र अध्यापक बृहलर भतानुसार अन्ततः सन् ई० से पहलेके ५वें शताब्दका है । इस ग्रन्थ में बुद्धप्रभावका निदर्शन न रहने से इसे हम सन् ई०से पहले से ६ ठे शताब्दका भी पूर्ववर्ती ख्याल करते हैं। इससे भी पहले मूल भविष्य पुराण लिखा गया था</small> <Small>पूतन यूनानी ऐतिहासिकको वर्णना अनुसार वर्तमान युरोपीय पुराविदोंने फिर किया है, कि वर्तमान तातार एशियारिया मस्कोबी, क्रिमिया), पोलेख, हुङ्गे रियाका कितना ही अंश. लिथुनिया, जम नौका उत्तरांश, खीडेन, नारवे प्रभृति स्थानों तक पुराना स्किदिया या शाकद्दौप विस्तृत था [ वर जातीय 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किन्तु इससे भी पूर्वकाल बाबिलोनीय लिपि से खरोष्ठी का निदर्शन निकला है और यह बात हम पहले ही कह चुके हैं, कि इससे भी बहुत पहले यहां जरथुस्त्र-वंश आधिपत्य करता था। केवल बाबिलोन की ही बात नहीं, दूसरे स्थानों में भी सन् ई० के ७वें शताब्द से पहले अरमीय लिपि का पुष्टिसाधन न हुआ था। ​ प्रायः सन् ई० से पहले के ७वें शताब्द में फिनिकों की राजशक्ति और उनके वाणिज्य प्रभाव का अवसान होने से फिनिसिया की आदि अक्षरमाला से ही उत्तर-सीरिया में अरमीय लिपि बनाई गई थी। आदि फिनिक लिपि भी दो प्रकार की देख पड़ती है। इन दोनों में जो सबसे पुरानी आविष्कृत हुई, वह सन् ई० से पहले १०वें के अन्त या ११वें शताब्द के आदि में खोदी गई थी। प्राचीन निनेवे-नगरी में कीलरूपा शिल्प-लिपि के साथ प्राचीन फिनिक लिपि उत्कीर्ण देखी जाती है। जो हो, बेरोसास का मत मानते भी हम देखते हैं, कि सृष्ट-जन्म के दो हजार वर्ष से भी पहले जरथुस्त्र के वंशधर असुरीय में राज्य करते थे। किन्तु उसी सुप्राचीन काल में फिनिक लिपि का सन्धान तक नहीं मिलता। मिस्रपति आहमेश की चित्रलिपि में सन् ई० से {{Left|१८|2em}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कोई १४६२ वर्ष पहले हम “फेनेख” नाम से फिनिकों का उल्लेख पाते हैं। इस बात में हम विशेष सन्देह करने का कोई कारण नहीं देखते, कि इस समय से पहले ही यहां फिनिक संस्रव हो गया था। फिर भी विपर्यय या दक्षिण से वाममुखी लिपि की सृष्टि नहीं हुई। इस समय पत्रपट (Papyrus) में अङ्कित सङ्केत-लिपि (Hieratic) के जिन अक्षरों का आभास मिलता है, उनका एक ‘क’ अक्षर, हम पहले ही लिख चुके हैं कि, दाक्षिणात्य के सुप्राचीन बट्टेलेत्तू के अक्षरों में पाया गया है। सलोमन के इतिहास से इसका आभास मिला है, कि भारतीय पणिक सृष्ट-जन्म के कई हज़ार वर्ष पहले से मिस्र प्रभृति स्थानों में वाणिज्य करते रहे थे। कोई-कोई पणिकों ने मिस्र में पहुंच द्राविड़ की सभ्यता का रेखापात किया और उन्हीं के साथ दाक्षिणात्य की अति प्राचीन बट्टेलेत्तू ने सङ्केत लिपि के स्थान को अधिकार किया। इससे पहले मिस्र में केवल चित्रलिपि का ही प्रचलन था। द्राविड़ीय पणिकों के साथ सङ्केत लिपि के इजिप्ट में प्रवेश करने पर उसमें ही पत्रपट (Papyrus) अङ्कित करने की प्रथा चली। जो लोग कहते हैं, कि पाश्चात्य देश से फिनिकों ने जा द्राविड़ में सेमेटिक सभ्यता का बीज बोया, उनसे हमारा मत नहीं मिलता है। ऐसा होते मिस्र में जैसे चित्राक्षर प्रचलित हैं, दाक्षिणात्य में भी वैसे ही चित्राक्षरों का कोई सन्धान हाथ आता। जब यह नहीं, फिर दाक्षिणात्य की बट्टेलेत्तू के 'अ' 'इ' प्रभृति कोई-कोई अक्षरों के साथ मिस्र की सङ्केत लिपि का मेल देख पड़ता और उस समय में चित्राक्षरों का असद्भाव भी न था, तब इस विषय में क्या आश्चर्य है, कि भारतवासियों ने नहीं; मिस्रवासियों ने ही उनसे सुविधाजनक सङ्केत-लिपि ग्रहण की होगी। इस सङ्केत लिपि का ही भिन्नरूप निदर्शन सुप्राचीन बाबिलोन और असुरीय कील लिपि में वर्त्तमान रहा है। केवल मिस्र की ही बात नहीं; वाणिज्य व्यपदेश से फिनिकों ने जरथुस्त्रों के अधिकारमुक्त राज्य में आ विपर्यस्त लिपि का व्यवहार लोगों को सिखाया और फिर यूरोप में पहुंच इसका प्रचार किया होगा। इसी कारण, <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{dhr|}} {{smallrefs}}</noinclude> 3yza747kpcyrqlptj0wntft0npp8z6m 664920 664919 2026-07-04T15:33:35Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664920 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||अक्षरलिपि|७३}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> तक कि, मिस्र के उपकूल पर्यन्त मगाधिपों का आधिपत्य फैल गया था। इसमें सन्देह नहीं, कि उनका आधिपत्य फैलने के साथ पुरानी खरोष्ठी लिपि भी सब जगह चल पड़ी थी। इससे असुरीय (Assyria), बाबिलोन प्रभृति स्थानों की लिपि के साथ खरोष्ठी लिपि का सादृश्य बना रहा है। [भोजक ब्राह्मण देखो।] ​ अब हम समझ सकते हैं, कि अरमीय श्रेणी की फिनिक लिपि से खरोष्ठी का उद्भव नहीं हुआ है। कितनी ही लिपियां जानने वाले आइजाक टेलर ने अपनी “अक्षरमाला” पुस्तक में लिखा है, कि नेबुकादनेजार और नेरिग्लिसार की (सन् ई० से ५६० वर्ष पहले) ईंटों पर ही अरमीय लिपि का स्पष्ट निदर्शन मिलता है । <Ref>​Taylor's Alphabets, Vol. I. p. 247.</ref> किन्तु इससे भी पूर्वकाल बाबिलोनीय लिपि से खरोष्ठी का निदर्शन निकला है और यह बात हम पहले ही कह चुके हैं, कि इससे भी बहुत पहले यहां जरथुस्त्र-वंश आधिपत्य करता था। केवल बाबिलोन की ही बात नहीं, दूसरे स्थानों में भी सन् ई० के ७वें शताब्द से पहले अरमीय लिपि का पुष्टिसाधन न हुआ था।<ref>Taylor's Alphabets, Vol. I. p. 198.</ref> ​ प्रायः सन् ई० से पहले के ७वें शताब्द में फिनिकों की राजशक्ति और उनके वाणिज्य प्रभाव का अवसान होने से फिनिसिया की आदि अक्षरमाला से ही उत्तर-सीरिया में अरमीय लिपि बनाई गई थी। आदि फिनिक लिपि भी दो प्रकार की देख पड़ती है। इन दोनों में जो सबसे पुरानी आविष्कृत हुई, वह सन् ई० से पहले १०वें के अन्त या ११वें शताब्द के आदि में खोदी गई थी।<ref>Taylor's Alphabets, Vol. I. p. 216.<ref> प्राचीन निनेवे-नगरी में कीलरूपा शिल्प-लिपि के साथ प्राचीन फिनिक लिपि उत्कीर्ण देखी जाती है। जो हो, बेरोसास का मत मानते भी हम देखते हैं, कि सृष्ट-जन्म के दो हजार वर्ष से भी पहले जरथुस्त्र के वंशधर असुरीय में राज्य करते थे। किन्तु उसी सुप्राचीन काल में फिनिक लिपि का सन्धान तक नहीं मिलता। मिस्रपति आहमेश की चित्रलिपि में सन् ई० से {{Left|१८|2em}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कोई १४६२ वर्ष पहले हम “फेनेख” नाम से फिनिकों का उल्लेख पाते हैं। इस बात में हम विशेष सन्देह करने का कोई कारण नहीं देखते, कि इस समय से पहले ही यहां फिनिक संस्रव हो गया था। फिर भी विपर्यय या दक्षिण से वाममुखी लिपि की सृष्टि नहीं हुई। इस समय पत्रपट (Papyrus) में अङ्कित सङ्केत-लिपि (Hieratic) के जिन अक्षरों का आभास मिलता है, उनका एक ‘क’ अक्षर, हम पहले ही लिख चुके हैं कि, दाक्षिणात्य के सुप्राचीन बट्टेलेत्तू के अक्षरों में पाया गया है। सलोमन के इतिहास से इसका आभास मिला है, कि भारतीय पणिक सृष्ट-जन्म के कई हज़ार वर्ष पहले से मिस्र प्रभृति स्थानों में वाणिज्य करते रहे थे। कोई-कोई पणिकों ने मिस्र में पहुंच द्राविड़ की सभ्यता का रेखापात किया और उन्हीं के साथ दाक्षिणात्य की अति प्राचीन बट्टेलेत्तू ने सङ्केत लिपि के स्थान को अधिकार किया। इससे पहले मिस्र में केवल चित्रलिपि का ही प्रचलन था। द्राविड़ीय पणिकों के साथ सङ्केत लिपि के इजिप्ट में प्रवेश करने पर उसमें ही पत्रपट (Papyrus) अङ्कित करने की प्रथा चली। जो लोग कहते हैं, कि पाश्चात्य देश से फिनिकों ने जा द्राविड़ में सेमेटिक सभ्यता का बीज बोया, उनसे हमारा मत नहीं मिलता है। ऐसा होते मिस्र में जैसे चित्राक्षर प्रचलित हैं, दाक्षिणात्य में भी वैसे ही चित्राक्षरों का कोई सन्धान हाथ आता। जब यह नहीं, फिर दाक्षिणात्य की बट्टेलेत्तू के 'अ' 'इ' प्रभृति कोई-कोई अक्षरों के साथ मिस्र की सङ्केत लिपि का मेल देख पड़ता और उस समय में चित्राक्षरों का असद्भाव भी न था, तब इस विषय में क्या आश्चर्य है, कि भारतवासियों ने नहीं; मिस्रवासियों ने ही उनसे सुविधाजनक सङ्केत-लिपि ग्रहण की होगी। इस सङ्केत लिपि का ही भिन्नरूप निदर्शन सुप्राचीन बाबिलोन और असुरीय कील लिपि में वर्त्तमान रहा है। केवल मिस्र की ही बात नहीं; वाणिज्य व्यपदेश से फिनिकों ने जरथुस्त्रों के अधिकारमुक्त राज्य में आ विपर्यस्त लिपि का व्यवहार लोगों को सिखाया और फिर यूरोप में पहुंच इसका प्रचार किया होगा। इसी कारण, <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> t8nqickvlo2q7yur9acvlii2pugrkv9 664921 664920 2026-07-04T15:35:41Z Shivaniya shaw 4129 664921 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||अक्षरलिपि|७३}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> तक कि, मिस्र के उपकूल पर्यन्त मगाधिपों का आधिपत्य फैल गया था। इसमें सन्देह नहीं, कि उनका आधिपत्य फैलने के साथ पुरानी खरोष्ठी लिपि भी सब जगह चल पड़ी थी। इससे असुरीय (Assyria), बाबिलोन प्रभृति स्थानों की लिपि के साथ खरोष्ठी लिपि का सादृश्य बना रहा है। [भोजक ब्राह्मण देखो।] ​ अब हम समझ सकते हैं, कि अरमीय श्रेणी की फिनिक लिपि से खरोष्ठी का उद्भव नहीं हुआ है। कितनी ही लिपियां जानने वाले आइजाक टेलर ने अपनी “अक्षरमाला” पुस्तक में लिखा है, कि नेबुकादनेजार और नेरिग्लिसार की (सन् ई० से ५६० वर्ष पहले) ईंटों पर ही अरमीय लिपि का स्पष्ट निदर्शन मिलता है । <Ref>​Taylor's Alphabets, Vol. I. p. 247.</ref> किन्तु इससे भी पूर्वकाल बाबिलोनीय लिपि से खरोष्ठी का निदर्शन निकला है और यह बात हम पहले ही कह चुके हैं, कि इससे भी बहुत पहले यहां जरथुस्त्र-वंश आधिपत्य करता था। केवल बाबिलोन की ही बात नहीं, दूसरे स्थानों में भी सन् ई० के ७वें शताब्द से पहले अरमीय लिपि का पुष्टिसाधन न हुआ था।<ref>Taylor's Alphabets, Vol. I. p. 198.</ref> ​ प्रायः सन् ई० से पहले के ७वें शताब्द में फिनिकों की राजशक्ति और उनके वाणिज्य प्रभाव का अवसान होने से फिनिसिया की आदि अक्षरमाला से ही उत्तर-सीरिया में अरमीय लिपि बनाई गई थी। आदि फिनिक लिपि भी दो प्रकार की देख पड़ती है। इन दोनों में जो सबसे पुरानी आविष्कृत हुई, वह सन् ई० से पहले १०वें के अन्त या ११वें शताब्द के आदि में खोदी गई थी।<ref>Taylor's Alphabets, Vol. I. p. 216.<ref> प्राचीन निनेवे-नगरी में कीलरूपा शिल्प-लिपि के साथ प्राचीन फिनिक लिपि उत्कीर्ण देखी जाती है। जो हो, बेरोसास का मत मानते भी हम देखते हैं, कि सृष्ट-जन्म के दो हजार वर्ष से भी पहले जरथुस्त्र के वंशधर असुरीय में राज्य करते थे। किन्तु उसी सुप्राचीन काल में फिनिक लिपि का सन्धान तक नहीं मिलता। मिस्रपति आहमेश की चित्रलिपि में सन् ई० से {{Rule}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कोई १४६२ वर्ष पहले हम “फेनेख” नाम से फिनिकों का उल्लेख पाते हैं। इस बात में हम विशेष सन्देह करने का कोई कारण नहीं देखते, कि इस समय से पहले ही यहां फिनिक संस्रव हो गया था। फिर भी विपर्यय या दक्षिण से वाममुखी लिपि की सृष्टि नहीं हुई। इस समय पत्रपट (Papyrus) में अङ्कित सङ्केत-लिपि (Hieratic) के जिन अक्षरों का आभास मिलता है, उनका एक ‘क’ अक्षर, हम पहले ही लिख चुके हैं कि, दाक्षिणात्य के सुप्राचीन बट्टेलेत्तू के अक्षरों में पाया गया है। सलोमन के इतिहास से इसका आभास मिला है, कि भारतीय पणिक सृष्ट-जन्म के कई हज़ार वर्ष पहले से मिस्र प्रभृति स्थानों में वाणिज्य करते रहे थे। कोई-कोई पणिकों ने मिस्र में पहुंच द्राविड़ की सभ्यता का रेखापात किया और उन्हीं के साथ दाक्षिणात्य की अति प्राचीन बट्टेलेत्तू ने सङ्केत लिपि के स्थान को अधिकार किया। इससे पहले मिस्र में केवल चित्रलिपि का ही प्रचलन था। द्राविड़ीय पणिकों के साथ सङ्केत लिपि के इजिप्ट में प्रवेश करने पर उसमें ही पत्रपट (Papyrus) अङ्कित करने की प्रथा चली। जो लोग कहते हैं, कि पाश्चात्य देश से फिनिकों ने जा द्राविड़ में सेमेटिक सभ्यता का बीज बोया, उनसे हमारा मत नहीं मिलता है। ऐसा होते मिस्र में जैसे चित्राक्षर प्रचलित हैं, दाक्षिणात्य में भी वैसे ही चित्राक्षरों का कोई सन्धान हाथ आता। जब यह नहीं, फिर दाक्षिणात्य की बट्टेलेत्तू के 'अ' 'इ' प्रभृति कोई-कोई अक्षरों के साथ मिस्र की सङ्केत लिपि का मेल देख पड़ता और उस समय में चित्राक्षरों का असद्भाव भी न था, तब इस विषय में क्या आश्चर्य है, कि भारतवासियों ने नहीं; मिस्रवासियों ने ही उनसे सुविधाजनक सङ्केत-लिपि ग्रहण की होगी। इस सङ्केत लिपि का ही भिन्नरूप निदर्शन सुप्राचीन बाबिलोन और असुरीय कील लिपि में वर्त्तमान रहा है। केवल मिस्र की ही बात नहीं; वाणिज्य व्यपदेश से फिनिकों ने जरथुस्त्रों के अधिकारमुक्त राज्य में आ विपर्यस्त लिपि का व्यवहार लोगों को सिखाया और फिर यूरोप में पहुंच इसका प्रचार किया होगा। इसी कारण, <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{smallrefs}} {{Left|१८|2em}}</noinclude> cvz6eqmaxf2zdjntrvphwirh0u3p4kn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७८ 250 82760 664931 345918 2026-07-04T18:38:21Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664931 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|७४| अक्षरलिपि}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> उन सुप्राचीन यूनानी ऐतिहासिकोंके निकट फिनिक । ही लिपिमाला के प्रवर्त्तक माने गये हैं । वास्तव में उनके अभ्युदयसे बहुत पहले विपर्यस्त या खरोष्ठीलिपि- को उत्पत्ति हुई थी। अब हम समझते हैं, कि ब्राह्मीलिपि जैसे भारत, ब्रह्म लङ्का, और भारत- महासागरीय दीपोंमें प्रचलित पुरानी लिपियोंको जननी, खरोष्ठी भी वैसे 'सब विपर्यस्त लिपियोंको माता है। कहते हैं, कि फिनिकों होने पहले यह लिपि ले जा युरोप में चलाई थी और इसीसे वह यूनानियोंके निकट अक्षरलिपिके उद्भावयिता समझे गये । जैसे मोब और सिदोनमें फिनिकोंको प्रचारित लिपिके परस्पर वाले रूपका कालवशसे पार्थक्य हो गया था, वैसे ही शोककी व्यवहृत खरोष्ठीके साथ उक्त लिपियोंका भी पार्थक्य देखने में आया । जिस तरह स्थान और काल वशसे सेवीय और बोख्तानको सेमेटिकलिपि <ref>फिनिकराज समितिका समितिक या सेनेटिक नामको उत्पत्ति हुई है। इसलिये फिनिक और समितिक दोनो एक ही हैं ।</ref> मो- आब, सिदोन और अरमाको लिपिसे बहुलां में पृथक् हो गई, उसी तरह अशोकको व्यवहृत खरोष्ठीके साथ दूसरे स्थानोंको विपर्यस्त लिपियोंका भी पार्थक्य देखनेमें आता है । टेलर, बूलर प्रभृति लिपितत्त्वविद् एशियामाइनर या अरबको प्राचीन लिपिके साथ अशोकको विपर्यस्तलिपिके सादृश्य-स्थापनमें जो अग्रसर हुए हैं, वह कितनी ही कष्टकल्पना मात्र है, उनका उद्देश्य सिद्ध नहीं होता ।<ref>Taylor's Alphabets, Vol. I. और Indische Pale- graphie. von G. Büühler नामक ग्रन्थ देखना चाहिये ।</ref> दूसरी बात यह है – प्राचीन फिनिकलिपियोंमें बीससे अधिक अक्षर पानेका कोई उपाय नहीं, उन बीस अक्षरों के नाम हैं- अलिफ, बेथ्, गिमेल, दलेथ्, हे, वाव, जईन्, चेथ्, योद्, काफ्, लमेद, मौम्, नून, समेक्, फे, छ’दे, कोफ्, रेष, यिन्, और तो । इन बोस अक्षरोंका उच्चारण ले यथाक्रम से अ, ब ( वर्गीय), ग, द, ह, व (अन्तःस्थ), ज, च, य, क, ल, म, न, स प, क, ख, र, ष, और त या ट यही अक्षर निकल सकते हैं । किन्तु भारतकी उत्तरपश्चिम सीमासे {{Rule}} {{Smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> आविष्कृत और अशोक, यवन,शक और कुषण राजोंके समयमें व्यवहृत खरोष्ठी लिपियों को इकट्ठा करनेसे हमें ३८ अक्षर देख पड़ते हैं; जैसे— {{x-smaller|अ इ उ ए ओ अं क ख ग घ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह}} खरोष्ठो जिस भाषामें पहले व्यवहृत होती थी, उस अवस्ता वाली सुप्राचीन गाथाकी आलोचना करने से आ, ई, ऊ, ऐ, औ यह पांच अक्षर अधिक पाये जाते हैं । सुतरां खरोष्ठीके ४३ अक्षरों में से फनिकोंने अपने-अपने व्यवहारोपयोगी केवल बीस अक्षर ले लिये थे । संस्कृत - शास्त्र में ५० से अधिक अक्षर रहते भी साहित्यिक हिसाब से नहीं, बङ्गालियों का उच्चारण लेनेसे जिस प्रकार इस देश में ३०।३२ अक्षरों से अधिक आवश्यक नहीं माने जाते <small>[ बंगला भाषा देखो। ]</Small> और जिस प्रकार वङ्गलिपि ब्राह्मोलिपि को हो सन्तति है, उसी प्रकार आवस्तिक धर्मशास्त्र में ४४ अक्षरोंका व्यवहार रहते भी फिनिकों के व्यवहार में बीस से अधिक न आये ; किन्तु यह २३ अक्षर आदि खरोष्ठ लिपिको हो सन्तति हैं । अब युरोपीय जिस तरह अपनी-अपनो देश- प्रचलित लिपिको उत्पत्ति मानते हैं, वही विषय आलोच्य है। युरोपीय लिपितत्वविदोंने अक्षरलिपिको सृष्टिसे पहले इस तरह साङ्केतिकलिपिको उत्पत्ति मानी है- {{x-smaller|{{c|अक्षरलिपिके पूर्ववर्त्ती साङ्केतिक चिह्न ।}}}} प्राचीन युगवाली मनुष्यप्रकृति के इतिवृत्तको आलोचना करनेसे स्पष्ट ही हृदयङ्गम होता है, कि मानवजातिको उन्नतिवाले क्रमविकाशके साथ ही साथ लिपि कार्यको आवश्यकता अनुभूत हुई थी । वह एक 'क' चिह्नमात्र अभावमोचन के लिये लिखने लगे। वह विशेष-विशेष कार्य्यानुष्ठान और समय विशेष निर्धारण करने और अनुपस्थिति या जिनके साथ सहजमें साक्षात्कारको सुविधा न थी, उन व्यक्तियोंके निकट भाव विशेष ज्ञापनके लिये साङ्केतिक चिह्नोंका प्रयोजन समझते रहे। उसी आदिम युगके अधिवासी अपने- अपने अस्त्र, शस्त्रादि, अपने-अपने पाले गवादि पशुओं- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> md749wvkmbq1jipyxn3mysx3utimxez पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७९ 250 82761 664993 345919 2026-07-05T09:45:21Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664993 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||अक्षरलिपि|७५}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> को परस्परके स्वाधिकार और स्वातन्त्र्यमें निर्दिष्ट रखने या अपने हाथ से बनाये हुए मृत्पात्रादि या कोई दूसरे द्रव्य सर्वसाधारण से अलग करने के लिये विशेष- विशेष चिह्न व्यवहार करते थे। आज भी भूगर्भनिहत मृत्पात्रोंमें जो विभिन्न चिह्न विद्यमान देखे जाते हैं, उनको आलोचना करनेसे अच्छी तरह समझ पड़ता है, कि सृष्टजन्म से बहुत पहले विभिन्न व्यक्तियों द्वारा वह सब पात्रादि बनाये गये थे, आज भी भिन्न-भिन्न स्थानोंके मृत्पात्रों में उस समयकी भांति कुम्भकारके साङ्केतिक चिन्ह व्यवहार किये जाते हैं। प्राचीनकालमें जो व्यक्ति विशेषके पारस्परिक सम्पत्तिक स्वातन्त्र्यके चिह्न रूपसे गृहीत हुआ था, वर्त्तमान युगमें वही क्रमशः उन्नतिको परिणतिको प्राप्त हो 'ट्रेडमार्क' में पर्यवसित हो गया । सभी लोग जानते हैं, कि हमारे देशकी अज्ञ रमणियां परिधेय वस्त्र या रूमाल आदिमें चिह्नस्वरूप कोनेपर गांठ लगा धोबीको दिया करती हैं । सन्थाल, कोल प्रभृति वर्णज्ञान- वर्जित जातियों के बीच आज भी ऋणग्रहणकार्य्यमें रुपयेको संख्या निरूपण करनेके लिये सूत या रस्मोके टुकड़े में गांठ लगाई जाती है । पूर्व वङ्गके निरक्षर ग्वाले दूध लेने-देनेका हिसाब बांस की चटाई में निशान लगा करते हैं । यह भी कितनी- ही बार देखा गया है, कि यदि कभी हिसाबके रुपये लेने-देने पर अदालत में मुक़द्दमा चला, तो हाकिमने यह सब निशान देख मुकद्दमेका सत्यासत्य स्थिर कर लिया । पाश्चात्य जगत्में भी इसी तरह किसी समय ऋणसंख्याके लिये ग्रन्थचिह्न व्यवहृत होते थे । हेरोदोतासकी ( IV 78 ) विवरणी से मालूम होता है कि, शकाभियान के समय दरायूस्ने ईष्टर नदौको अतिक्रम करके सेतुरक्षक सेनादलके हाथमें बहुतसी गांठों- वाली एक लम्बी रस्मो रख दी और कहा - इसमें जितनी गांठें हैं, उतने दिन तुम इस सेतुकी रक्षा करना और रोज एक एक गांठ खोलते जाना ; यदि अन्तिम गांठ खोलनेके दिन राजा वापस न आयें, तो यूनानी सेतु तोड़ चले जायेंगे । इसका उन्नत प्रकरण पेरू राज्यको कुइपु रस्मीमें <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> देख पड़ता है। वह पहले संख्या गणना कार्य में व्यवहृत होती थी । पीछे कालवश क्रमशः उसको उन्नति साधित हुई । बनानेवाले के कौशल से उसमें ऐतिहासिक घटना, राजविधिप्रशस्ति प्रभृति सङ्केत ग्रथित होते रहे और उसके द्वारा देशसे देशान्तर और राज्यसे राज्यान्तरमें संवाद-प्रेरणको व्यवस्था चलाई गई । उस समय प्रत्येक प्रधान- प्रधान नगर में कुइपुको व्याख्या करनेके लिये एक-एक कर्मचारी नियुक्त किया जाता था । वही कुइ पढ़नेके बाद फिर कुइयुके सहाय से उसमें उत्तर बांध देता था। दुःखका विषय है, कि कुइपुका अपूर्व्व व्याख्याकौशल लुप्त हो गया है । ऐसी हो साङ्केतिक प्रथा किसी दिन चीन, तिब्बत और प्राचीन भूखण्डवासी आदिम लोगोंके बीच फैली हुई थी।<ref><small>Ethnologische Parallelen und Vergleiche, I. p. 184.</ref></small> अष्ट्रेलियाके आदिम अधिवासियों के बीच कुइपुकी भांति कार्यसाधनशील 'दौत्यदण्ड' विद्यमान है । वह एक वृक्षशाखा मात्र है । पत्रलेखक उसके गात्रपर घोंघे- से ( आजकल छुरौके साहाय्य से ) पहले कितनो ही रेखायें बनाते हैं । वर्त्तमान " शार्ट हैण्ड” लेखकी तरह वह रेखायें खतः व्याख्यात नहीं होतीं । वह व्यक्ति- विशेष के मनोभावको स्मृतिपथारूढ़ करनेकी निदर्शन मात्र हैं । लेखक जब वह रेखायें खींचता, तब पास एक दूत या पत्रवाहक खड़ा रहता था । जैसे ही एक रेखा वृक्षशाखापर बनाई जाती, वैसे हो लेखक पत्रवाहकको उस प्रकारके अङ्गनका अभिप्राय और अर्थ बता देता । इसीप्रकार इस दण्डको अङ्कन समाप्त होनेपर पत्र- वाहक हाथमें ले पत्नोद्दिष्ट व्यक्तिके निकट पहुंचता और आप ही एक-एक रेखाको लक्ष्य कर एक-एक भाव- की बात समझाता। उपरोक्त दीपके विकोरिया विभागको विन्मेरा नदी-तौरवासी वोट्जोबल्लूक जाति- में ऐसी ही प्रथासे पत्त्रोंका आदान-प्रदान हुआ करता है। वहां पत्रवाहक एक सरदारके निकटसे अङ्कित दौत्यदण्ड लेकर दूसरेके हाथमें देते और उसे जना न्तिकमें बुलाकर पत्रप्रेरकका नाम सुनाते और पत्रका म बताते हैं । इस दौत्यदण्डको अङ्कित रेखायें या लिपियां यदि दो व्यक्तियोंके बीच निरन्तर चलती रहें, {{Rule}} {{Smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bjxzoc1qsvcybgcdcv80lc5faktu7mr पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/८० 250 82765 664994 345923 2026-07-05T09:57:25Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664994 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|७६| अक्षरलिपि}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> तो वह दोनों दोनों के मनोभाव वाली अंकित रेखाएँ समझ सकते हैं। ​ समयानुसार अनुपस्थित व्यक्ति के पत्र-मर्मज्ञान का अभाव अनुभूत हुआ। किसी स्वतन्त्र प्रथा से साधारण में परस्पर के अभिप्राय परस्पर के स्मृतिपथ पर समारूढ़ करने के लिये कितने ही सङ्केत (Mnemonics) अनुमोदित कर लिये गये। यही वास्तविक अक्षरलिपि की प्राथमिक अवस्था है। इसी से ही परवर्ती समय वाली लिपि की आंशिक गठन संसाधित हुई थी। ​स्मरणातीत काल की मनुष्य प्रकृति के प्रति दृष्टि डालने से पहले हम इस तरह उत्पन्न हुई अर्थव्यञ्जक और मनोभिप्रायज्ञापक दो प्रकार की लिपि का निदर्शन देखते हैं। एक तो, कड़े पत्थर या हड्डी के टुकड़े पर खोदा गया दृश्य वस्तु का चित्र और दूसरा अंकित रेखा का फलित चित्र मात्र है। उसी पौराणिक-युग के मनुष्य समाज ने गुहा आदि खोदकर उनके समतल गात्र में हरिण, महिष और उस युग के पश्वादि की जो प्रतिकृतियाँ उत्कीर्ण कर रखी हैं, वही प्रथमोक्त श्रेणी की बताई जाकर गण्य होती हैं और M. Ed. Piette द्वारा आविष्कृत एरिजन नदीकूल के सचित्र पत्थर (L'Anthropologie, Vol. VII. 344) द्वितीय श्रेणी के अन्तर्भुक्त हैं। यह चित्रित प्रस्तरफलक (Marked pebble) Reindeer-युग के अन्तिम और Neolithic युग के प्रथम स्तर वाले मध्यवर्ती काल में अंकित हुए बताये जाकर गणना की जाती है। ​ यह युगीय पत्थर कोई दो फुट मोटे और लाल और कृष्णवर्ण हैं। इनके मध्य स्थित सच्छिद्र हरिणदन्त (माला के लिये) हैं, विभिन्न जीवदेहास्थि प्रभृति के बीच में इधर-उधर विक्षिप्त जो चिह्नांकित पत्थर के टुकड़े जड़ देख पड़ते हैं, उनकी अक्षरमाला प्रधानतः दो श्रेणी में विभक्त है; – १ संख्याबोधक और श्रेणीबद्ध कितने ही चिह्न और २ सुचित्रित चिह्न (Graphic-symbols)। यह सहज में ही स्वीकार किया जा सकता है, कि इन सब प्रस्तरलिपियों का अर्थ कुछ हो क्यों न हो; किन्तु यह आकस्मिक सम्भूत नहीं हैं। विशेष परीक्षा करके देखने से इनमें से किसी में बिच्छू, कनख <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जूरा या सांप; किसी में वृक्ष, लता, गुल्म और नद्यादि का अस्पष्ट आभास और इसके सिवा अधिकांश पत्थरों में अक्षरमाला के चिह्न सदृश E, I, R, O, A, प्रभृति अक्षर खोदे हुए दृष्टिगत होते हैं। महामति पिको ने उनके बीच नाना प्राच्य देशवासी, फिनिकीय साइप्रास देशवासियों की कई अक्षरमाला और शब्दांश (Syllabaries) और मास दे' आजिल की प्राचीन अक्षरलिपि के नौ अक्षरों का सादृश्य देखा है। अक्षरमाला की ऐसी अवस्था देख उसे अक्षरमाला का आदि या उत्पत्ति निदर्शन बताकर कभी सिद्धान्त नहीं किया जाता; वरं वह प्राचीनकाल के किसी भौतिक-चिह्न या जाति विशेष के निर्धारित साङ्केतिक विवरण का निदर्शन बताकर ही ग्रहण की जा सकती है। कारण आज भी ऑस्ट्रेलिया की पर्व्वतगुहाओं और अमेरिकावासी इण्डियनों के बीच जूए प्रभृति खेलों के ऐसे ही साङ्केतिक चिह्न प्रचलित हैं। ​ प्राचीन भूखण्ड के विभिन्न स्थानों की अपेक्षा नवाविष्कृत अमेरिका भूखण्ड में सबसे पुरानी चित्रलिपि (Picture writing) का आदर्श विद्यमान है। उसने मिस्र और चीन देश की चित्रलिपि से अधिकांश में उत्कर्षता पाई थी, किन्तु मिस्र और चीन की तरह अमेरिका की चित्रलिपि, अक्षर या शब्दव्यञ्जक न निकली। चित्र केवल चित्रित वस्तुओं के ही उद्बोधक रहे। ​ चित्रलिपि को छोड़ अमेरिकावासी संख्यागणनार्थ एक प्रकार की छड़ी से काम लेते थे। उसके साङ्केतिक चिह्न गिनकर वह युद्धाभियान का व्याभिकाल, युद्ध में मारे गये शत्रुओं की संख्या और इसी तरह के परिचयादि व्यक्त कर सकते थे। सिवा इसके उनके बीच में 'बम्पुम्' नामक माला का व्यवहार होता था। उसके सादे दाने सन्धि या शान्तिस्थापन के उद्बोधक, और रङ्गीन दाने युद्धघोषक समझे जाते रहे। सन् १६८२ ई० में लेनी लेनप में सरदारों ने सन्धिस्थापनार्थ विलियम पेन् को विभिन्न वर्णों की जो माला दी थी, उसके मध्यस्थल में सन्धि की उद्बोधक दो मनुष्यमूर्तियाँ परस्पर में एक दूसरे का हाथ पकड़े खड़ी थीं। इसी तरह मेक्सिको-वासियों का फांस चिह्न धैर्य या शान्तिज्ञापक है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> cvsrlbkbcq1colpnqko2k8ieibfubjs 664995 664994 2026-07-05T09:58:40Z Shivaniya shaw 4129 664995 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|७६| अक्षरलिपि}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> तो वह दोनों दोनों के मनोभाव वाली अंकित रेखाएँ समझ सकते हैं। ​ समयानुसार अनुपस्थित व्यक्ति के पत्र-मर्मज्ञान का अभाव अनुभूत हुआ। किसी स्वतन्त्र प्रथा से साधारण में परस्पर के अभिप्राय परस्पर के स्मृतिपथ पर समारूढ़ करने के लिये कितने ही सङ्केत (Mnemonics) अनुमोदित कर लिये गये। यही वास्तविक अक्षरलिपि की प्राथमिक अवस्था है। इसी से ही परवर्ती समय वाली लिपि की आंशिक गठन संसाधित हुई थी। ​स्मरणातीत काल की मनुष्य प्रकृति के प्रति दृष्टि डालने से पहले हम इस तरह उत्पन्न हुई अर्थव्यञ्जक और मनोभिप्रायज्ञापक दो प्रकार की लिपि का निदर्शन देखते हैं। एक तो, कड़े पत्थर या हड्डी के टुकड़े पर खोदा गया दृश्य वस्तु का चित्र और दूसरा अंकित रेखा का फलित चित्र मात्र है। उसी पौराणिक-युग के मनुष्य समाज ने गुहा आदि खोदकर उनके समतल गात्र में हरिण, महिष और उस युग के पश्वादि की जो प्रतिकृतियाँ उत्कीर्ण कर रखी हैं, वही प्रथमोक्त श्रेणी की बताई जाकर गण्य होती हैं और M. Ed. Piette द्वारा आविष्कृत एरिजन नदीकूल के सचित्र पत्थर (L'Anthropologie, Vol. VII. 344) द्वितीय श्रेणी के अन्तर्भुक्त हैं। यह चित्रित प्रस्तरफलक (Marked pebble) Reindeer-युग के अन्तिम और Neolithic युग के प्रथम स्तर वाले मध्यवर्ती काल में अंकित हुए बताये जाकर गणना की जाती है। ​ यह युगीय पत्थर कोई दो फुट मोटे और लाल और कृष्णवर्ण हैं। इनके मध्य स्थित सच्छिद्र हरिणदन्त (माला के लिये) हैं, विभिन्न जीवदेहास्थि प्रभृति के बीच में इधर-उधर विक्षिप्त जो चिह्नांकित पत्थर के टुकड़े जड़ देख पड़ते हैं, उनकी अक्षरमाला प्रधानतः दो श्रेणी में विभक्त है; – १ संख्याबोधक और श्रेणीबद्ध कितने ही चिह्न और २ सुचित्रित चिह्न (Graphic-symbols)। यह सहज में ही स्वीकार किया जा सकता है, कि इन सब प्रस्तरलिपियों का अर्थ कुछ हो क्यों न हो; किन्तु यह आकस्मिक सम्भूत नहीं हैं। विशेष परीक्षा करके देखने से इनमें से किसी में बिच्छू, कनख <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जूरा या सांप; किसी में वृक्ष, लता, गुल्म और नद्यादि का अस्पष्ट आभास और इसके सिवा अधिकांश पत्थरों में अक्षरमाला के चिह्न सदृश E, I, R, O, A, प्रभृति अक्षर खोदे हुए दृष्टिगत होते हैं। महामति पिको ने उनके बीच नाना प्राच्य देशवासी, फिनिकीय साइप्रास देशवासियों की कई अक्षरमाला और शब्दांश (Syllabaries) और मास दे' आजिल की प्राचीन अक्षरलिपि के नौ अक्षरों का सादृश्य देखा है। अक्षरमाला की ऐसी अवस्था देख उसे अक्षरमाला का आदि या उत्पत्ति निदर्शन बताकर कभी सिद्धान्त नहीं किया जाता; वरं वह प्राचीनकाल के किसी भौतिक-चिह्न या जाति विशेष के निर्धारित साङ्केतिक विवरण का निदर्शन बताकर ही ग्रहण की जा सकती है। कारण आज भी ऑस्ट्रेलिया की पर्व्वतगुहाओं और अमेरिकावासी इण्डियनों के बीच जूए प्रभृति खेलों के ऐसे ही साङ्केतिक चिह्न प्रचलित हैं। ​ प्राचीन भूखण्ड के विभिन्न स्थानों की अपेक्षा नवाविष्कृत अमेरिका भूखण्ड में सबसे पुरानी चित्रलिपि (Picture writing) का आदर्श विद्यमान है। उसने मिस्र और चीन देश की चित्रलिपि से अधिकांश में उत्कर्षता पाई थी, किन्तु मिस्र और चीन की तरह अमेरिका की चित्रलिपि, अक्षर या शब्दव्यञ्जक न निकली। चित्र केवल चित्रित वस्तुओं के ही उद्बोधक रहे। ​ चित्रलिपि को छोड़ अमेरिकावासी संख्यागणनार्थ एक प्रकार की छड़ी से काम लेते थे। उसके साङ्केतिक चिह्न गिनकर वह युद्धाभियान का व्याभिकाल, युद्ध में मारे गये शत्रुओं की संख्या और इसी तरह के परिचयादि व्यक्त कर सकते थे। सिवा इसके उनके बीच में 'बम्पुम्' नामक माला का व्यवहार होता था। उसके सादे दाने सन्धि या शान्तिस्थापन के उद्बोधक, और रङ्गीन दाने युद्धघोषक समझे जाते रहे। सन् १६८२ ई० में लेनी लेनप में सरदारों ने सन्धिस्थापनार्थ विलियम पेन् को विभिन्न वर्णों की जो माला दी थी, उसके मध्यस्थल में सन्धि की उद्बोधक दो मनुष्यमूर्तियाँ परस्पर में एक दूसरे का हाथ पकड़े खड़ी थीं। इसी तरह मेक्सिको-वासियों का फांस चिह्न धैर्य या शान्तिज्ञापक है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> n1ihzem3ebmzmigvg75nqrn2jy6i365 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/८१ 250 82768 664996 345927 2026-07-05T10:09:10Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664996 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{rh||अक्षरलिपि|७७}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> है और कैलिफ़ोर्निया के पार्वत्य चित्र में अशुभाक्रान्त प्रतिकृति शोकज्ञापनार्थ उत्कीर्ण हुई है। ​ अमेरिकावासी आदिम जाति के बीच में इस चित्रलिपि का प्राचीनतम आदर्श विद्यमान रहते भी वास्तविक पक्ष से वह क्रमशः उन्नत हो अक्षरमाला में परिणत न हो सका। प्राचीन भूखण्ड के असुरीय, मिस्र और चीन राज्य में सभ्यता फैलने के साथ-साथ चित्रलिपि की यथेष्ट उन्नति साधित और वह काल में शब्द या अक्षरमाला का प्रकृष्ट रूप पाकर वहाँ वाले जनपदवासियों के मनोभाव और अर्थज्ञापन में निर्धारित या अधिकारी हुई। ​ चीन देश में ही सबसे पहले इस चिह्नलिपि से अक्षर या शब्द लिपि की क्रमोन्नति और विकास साधित हुआ था। वहाँ की वर्तमान लिपि का मौलिकावस्था के साथ सामञ्जस्य निर्णय करने के लिये उस आदिम चित्रलिपि का निदर्शन दृष्टिगोचर न होते भी निःसन्देह कहा जा सकता है, कि चीन-देशीय अक्षरलिपि आनुमानिक सन् ई० के ८०० से १००० वर्ष पहले की प्रचलित है। चीन देशीय प्राचीन अभिधान लिखित शाब्दलिपि और वर्तमान अक्षर या शब्दलिपि का वैषम्य देखने से स्पष्ट ही इसकी उन्नति और विकास मालूम हो सकता है। जब वह पत्थर या वैसे ही कड़े पदार्थ पर लौहशलाका से चित्रलिपि बनाते, तब गोलपिण्ड से सूर्य और अर्द्धचन्द्राकार से चन्द्र को दिखाते थे। पीछे जब कागज़, रेशम और वैसी ही किसी कोमल वस्तु पर अक्षरमाला-विन्यास का आवश्यक हुआ, तब वह लौहशलाका के बदले कूची जैसी केवल लेखनी या चित्रतूलिका व्यवहार करने लगे। उसी समय से ही वास्तविक पक्ष पर कूची की खींच द्वारा वैपरीत्य साधित हो अक्षर वर्तमान आकार में रूपान्तरित होते चले आये हैं। ​ चीन-शब्द लिपि से जापानी लिपि ली जाने पर भी वह अनेकांश में संस्कृत हो भिन्नाकृति को प्राप्त हुई है।<ref><small>See Taylor's The Alphabet, I, p. 34. २० ३३.</ref></small>इस जातीय लिपि वाले अक्षरों के सिवा जापान में संस्कृत अक्षरमाला की वह लिपि भी विद्यमान है, जो सन् {{Rule}} {{Smallrefs}} {{Left|२०|2em}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ई० के ५ वें शताब्द के समय भारत में प्रचलित थी। वहाँ के बौद्ध सम्बन्धीय कितने ही ग्रन्थ संस्कृत अक्षरों में लिखे हैं। ​ मिस्र की अक्षरलिपि ही सम्भवतः पाश्चात्य जगत् में सबसे पुरानी समझी जाती है। वहाँ चित्रलिपि (Hieroglyphics) का ही एक समय विशेष प्रचलन था, जिसका सम्यक् विवरण वहाँ के उत्कीर्ण फलकादि देखने से समझ पड़ता है। चीन के लोग जब वस्तु-विशेष को चित्रलिपि के द्वारा बताने के बदले शब्द लिपि के उद्भावन में सचेष्ट हुए, तब उन्होंने शब्दानुसार द्रव्य-विशेष के कई चिह्न सामञ्जस्य मान लिये थे; जिससे आदिम चित्र वाली लिपि के आंशिक चित्र मिटे और मूलतः वह विलुप्त हो गई। ​ भाषाविद् प्राचीन भूखण्ड की इन तीन विस्तृत चित्रलिपियों के उत्पत्ति निर्णय में कहा करते हैं, कि किसी समय यह मध्य एशियाखण्डवासी जाति के बीच फैली थीं। कोई-कोई कहते हैं, कि चीन वाले बाबिलोन से क्रमशः पूर्वाभिमुख आकर वर्तमान चीन-साम्राज्य में बस गये हैं। फिर, किसी-किसी की धारणा है, कि इउफ्रेटीस-प्रवाहित उपत्यकाभूमि में पहले मिस्र की सभ्यता फैली थी यानी प्राचीन आर्य (हिन्दुओं) की तरह इउफ्रेटीस तीरवासी जनस्रोत सेमेटिक अभियान में लिप्त हो राज्य से राज्यान्तर में सभ्यता फैलाते-फैलाते मिस्र राज्य में आ अपना प्रभुत्व जमाया था। मिस्र के यह लोग पुरानी सोमाली जाति की दूसरी एक शाखा के सिवा और कुछ भी नहीं हैं। ​ मिस्र के प्राचीन इतिवृत्त की आलोचना करने से मालूम होता है, कि बहुत समय तक असुरियों के साथ मिस्र वालों का राजनैतिक संघर्ष चला था; किन्तु उस युद्ध में लिप्त होकर ही वह क्रमशः पश्चिमाभिमुख उपनीत हुए और स्थान-स्थान में अपनी जन्मभूमि की प्रचलित चित्राक्षरमाला फैला दी। वास्तविक पक्ष में मिस्र की यह साङ्केतिक लिपि प्रथा (Hieratic writing) नील नदी के उपत्यका देश में भली भाँति पीढ़ी न हुई; अथवा जिस प्राचीन चित्रलिपि (Pictographic <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> g5ckx7w8fr21eo34b62eadvm0b6mq8e पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/८२ 250 82771 664998 345931 2026-07-05T10:23:09Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 664998 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|७८|अक्षरलिपी}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> System) असुरीय और उसके समीपवर्ती स्थानों की कीललिपि क्रमशः पीढ़ी हुई, उससे मिस्र की यह सङ्केतलिपि ऊँची या नीची धारा में अनुसृत हुई मानी नहीं जा सकती। चीनवासियों की तरह मिस्रवासी भी उसी उद्देश्य से स्वतः प्रवृत्त हो (चित्रलिपि से) अक्षरमाला के निर्धारण में आगे बढ़े। उन्होंने भी वस्तुविशेष की आकृति और वस्तुगत भाव सादृश्य के ऊपर निर्भर कर और उन चित्रों के आकार निकाल एक-एक वर्णशब्द-रूप अक्षर को निर्णय किया था; पीछे इसी से एक प्रकार यूरोप की प्रचलित भाषाएँ जैसे आक्षरिक हैं, मिस्र की भाषा वैसे कभी आक्षरिक न हुई। कारण, प्राचीन मिस्रवासी स्वभाव से ही आत्मगौरव-रक्षणशील और चित्रविद्याविशारद थे। वह स्वकीय इस शोभावर्द्धक और सौष्ठवशाली चित्रलिपि के ही पक्षपाती रह इसके बदले अक्षरमाला-चिह्न-व्यवहार-वासना को विलक्षण क्षति का विषय ही समझते रहे। इसीकारणसे वह चीनवासियोंकी तरह अक्षर- मालाके सम्बन्ध में विशेष कोई उन्नति कर न सके। वह परस्परके संयोगको लक्ष्यकर वही शब्द जिस वस्तु, पशु, पक्षी या मनुष्य के उद्योतक शब्दको बताता था, उस वस्तु के द्वारा ही भाषालिपि लिख जाते थे । जैसे जलका भाव प्रकट करनेमें इस चिह्न द्वारा तरङ्गायित जलपृष्ठ बनाते और प्यासको बात कहने में जलका चिह्न बनाकर उसकी ओर एक गोवत्स दौड़ानेसे काम चल जाता था । युद्धका हाल बताने में एक हाथमें ढाल और दूसरेमें बर्छा या तलवार लिये वीरमूर्त्ति नाना पड़ती थी । इन सब चित्रलिपियोंके बोचमें परस्पर सम्बन्ध निर्देशार्थं उन्होंने कितने ही चिह्न व्यवहार किये। डाकर आइजाक टेलरका कहना है, कि सब अक्षरमूलक (Alphabetic symbol) चिह्नोंमें हौ वर्त्तमान अङ्गरेज़ी अक्षरमालाका वो प्रसुप्त था, समय पाकर वही प्रबुद्ध और प्रकाशित हो गया है। साधारण लोगों को अवगतिके लिये नीचे इस बातका एक दृष्टान्त दिया गया है, कि इस हायरोग्लि- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> फ़िक चित्रलिपिसे किस तरह मिश्रराज में हिराटिक- लिपि चल पड़ी थी। अङ्गरेज़ी अक्षरको उत्पत्ति दिखाते पाश्चात्य भाषाविद् कहते हैं कि मिश्रको प्राचीन भाषामें उल्लूका नाम मूलक है । पहली चित्रलिपिके अनुसार उल्लू पक्षो या उसी वस्तुको धारणा (as a idiogram) दिखाने में उल्लूको हो तस्वीर बनाई गई थी। पीछे वह उल्लू शब्दार्थ ( Phonograms) के बोधकरूपसे व्यवहृत हुई । शेषोक्त अथ से उसके शब्द- रूपको परिणति संघटित होती और शब्दानुसार उसमें 'उ' मिलकर Mn" पद बनता है । प्राचीन हायरोग्लि- फिक्वाला उल्लूका चित्र प्रस्तराङ्गनके बदले जब पापिरास् (Papyrus) पत्र में लिखा जाने लगा, तब तलिपि या घसीट लिखनेके लिये सुस्पष्ट उल्ल्को आकृति न बनाई जाकर स्थलतः उसके चारो पार्श्वको रेखा हो लिखी गई । पीछे लेखके तारतम्यानुसार धीरे-धीरे आदि उल्लूका चित्र लुप्त हुआ और पद और पृष्ठ विहीन उल्लूको रेखाको तरह वह अङ्गरेज़ी हस्तलिखित जेड् या संस्कृत “ द” वर्ण जैसी आकृतिमें लिखा गया । सेमेटिक लिपिमें भी वह क्रमशः विकृत होते आया। फिर, सेमेटिक अक्षर- मालाके प्रति लक्ष्य करनेसे देखा जाता है, कि उक्त अक्षर मानो मिश्रको सङ्केतलिपि ( IIieratic) से लिये गये हैं । मोबाइट् प्रस्तरफलक में सेमेटिक अक्षरसे जो सुप्राचीन शिलाफलक उत्कीर्ण हैं, उनमें m अक्षरको जगह wj अक्षर अङ्कित मिलता है । उसके साथ मिश्र वालो सङ्केतलिपिके m अक्षरका कितना ही सादृश्य विद्यमान है । इसलिये लोग कल्पना करते हैं, कि मोआबाइट् अक्षरसे प्राचीन युनानका wj अक्षर उत्पन्न हुआ है । उसके परवर्ती समय में परि- वर्त्तन-नियम द्वारा यूनानी भाषाका M या m अक्षर निकला था । इसके बाद यूनानोलिपिने इटलीमें उपनिवेश स्थापित किया। उन्हीं यूनानियोंके संस्पर्शमें आकर रोमकोंने अक्षरमालाका Roman capital M ले लिया था। उसी रोमक अक्षरसे सुन्दर आकृति के अङ्गरेज़ी m अक्षरकी उत्पत्ति हुई । मिश्रकी सङ्केतलिपि में व्यञ्जन और अर्द्धव्यञ्जन <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ia3s74lv10zumb4bpf2koel6rkt8d2h पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७२ 250 83546 664972 664816 2026-07-05T04:09:54Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 664972 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२६६'''|'''अतिशक्र—अतिशयोक्ति'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|अतिशक्र(सं॰ त्रि॰) इन्द्रसे बड़ा।}} {{outdent|अतिशङ्का (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्त भय, अज़हद, खौफ़।}} {{outdent|अतिशय (सं॰ पु॰) अति-शीङ्-अच्। १ आधिक्य, अतिरेक, बहुतायत, ज़ियादती। वेगातिशय जैसे रूपोंमें अतिशय शब्द विशेष्य और अतिशयसाधु जैसे स्थलोंमें विशेषण होता है। २ काव्यालङ्कार-विशेष, जिसमें किसी वस्तुका होना या न होना लगातार दिखाया जाता है। (त्रि॰) ३ बहुत ज्य़ादा, अधिकसे अधिक। अतिक्रान्तः शयं हस्तम्। ४ हस्ताति-क्रमकारक। अतिक्रम्य शक्तिं (अव्य॰)। ५ शक्त्यतिक्रम। भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ़, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ़, वाढ़, दृढ़, अतिमर्याद, उत्कर्ष, बलवत्, सुष्ठु, किमुत, सु, अतीव, अति, द्वार, व्यापार, समधिक, अतिरिक्त—यह पर्याय हैं।}} {{outdent|अतिशयन (सं॰ क्ली॰) अति शीङ्-भावे ल्युट्। १ बहुत सोना। २ अतिरेक, अतिशय, कसरत। (त्रि॰) ३ अतिशययुक्त, ज़ियादतीका।}} {{outdent|अतिशयोक्ति (सं॰ स्त्री॰) अतिशयेन उक्तिः निर्द्दशोऽस्मिन् वर्णने। १ जो बात बहुत बढ़ाकर कही जाय। २ काव्यालङ्कार-विशेष, एक प्रकारका अलङ्कार। साहित्य-दर्पण-प्रणेताने अतिशयोक्ति अलङ्कारका इसतरह लक्षण बताया है— <small>"सिद्धत्वे ऽध्यवसायस्वातिशयोक्तिर्निगद्यते।"</small> प्रकृत विषयका अप्राधान्य दिखाके उसके उद्देश्यमें अप्रकृत विषयको निश्चल भावसे स्थापन करनेपर अतिशयोक्ति होती है। यथा, मुखं द्वितीयश्चन्द्रः। मुख तो दूसरा चन्द्र है। इस स्थानमें प्रकृत विषय मुख है, किन्तु मुखको चन्द्र बताके उल्लेख किया गया है। इसीसे ऐसे स्थलमें एकका प्राधान्य और दूसरेका अप्राधान्य प्रतिपन्न होता है। अधःकरण यानी अप्राधान्य और निगरणके सम्बन्धमें अलङ्कारिकोंने एक कारिका लिखी है। यथा— {{Block center|<poem><small> "विषयस्यानुपादानेऽप्युपादानेऽपि सूरयः। अधःकरणमावेण निगीर्णत्वं प्रचक्षते॥"</small></poem>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>प्रकृत विषय निर्द्देश किया या न किया जाय, अधःकरण अर्थात् अप्राधान्य समझ पड़नेसे ही उस विषयका निगरण करना होता है। अतिशयोक्ति अलङ्कार पांच प्रकारका है—१ दो विषयों में भेद रहते भी अभेदकल्पना। २ अभेदविषयों में भेदकल्पना। ३ सम्बन्ध होते भी असम्बन्ध कल्पना। ४ असम्बन्धमें सम्बन्धकल्पना। ५ कार्य और हेतुके पौर्व्वापर्यका अभाव अर्थात् विपर्यय। {{Block center|<poem><small>"भेदेऽप्यभेदः सम्बन्धेऽसम्बन्धस्तद्विपर्य्ययौ। पौर्व्वापर्यात्ययः कार्यहतोः सा पञ्चधा ततः॥" (साहित्यद॰)</small></poem>}} १। भेदमें अभेद— {{Block center|<poem><small>"कथमुपरि कलापिनः कलापी विलसति तस्व तलेऽष्टमीन्दुखण्डम्। कुवलययुगलं ततो विलोलं तिलकुसुमं तदधः प्रवालममात्॥"</small></poem>}} {{Block center|<poem><small>मोर पूंछ ऊपर लसत नीचे आठें चन्द। तापर चञ्चल युग कमल फूले आनंद कन्द॥</small></poem>}} क्या ही आश्चर्य्य है! ऊपर मोरकी पूंछ (केश) शोभा पा रही है; उसके नीचे अष्टमीका चन्द्र (ललाट) उदय हुआ है; उसके बाद दो चञ्चल कमल (चक्षु) फूले हैं; उनके नीचे तिलकी कली (नासिका) खिली हुई है; उसके नीचे प्रवाल (ओष्ठ) मनको हरे लेते हैं। इस जगह केशादिके साथ मोरको पूंछ प्रभृतिका पूरा भेद रहते भी अभेद रूपसे वर्णना की गई है। २। अभेदमें भेद— {{Block center|<poem><small>"अन्धदेवाङ्गलावण्यमन्याः सौरभसम्पद। तस्याः पद्मपलाशाक्ष्राः सर सत्वमलौकिकम्।"</small></poem>}} उस पद्मपलाशाक्षी कामिनीकी देहमें जैसा लावण्य है, वैसा और कहीं नहीं, वह सौन्दर्य और माधुर्य सभी अलौकिक है। जगत्में जो रूपलावण्यादि देखा जाता, इस जगह उससे कोई विभिन्नता न रहते भी भिन्न रूपसे कल्पना की गई है। {{Block center|<poem><small>राधामें जो रूप है, वैसी कहुंन दिखात। सकल सराहत रात-दिन, धन्ध अलौकिक मात॥</small></poem>}} ३। सम्बन्धमें असम्बन्ध— <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> lyskwrqkacz59d5kdxshdytke943nuq 664973 664972 2026-07-05T04:10:19Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664973 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२६६'''|'''अतिशक्र—अतिशयोक्ति'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|अतिशक्र(सं॰ त्रि॰) इन्द्रसे बड़ा।}} {{outdent|अतिशङ्का (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्त भय, अज़हद, खौफ़।}} {{outdent|अतिशय (सं॰ पु॰) अति-शीङ्-अच्। १ आधिक्य, अतिरेक, बहुतायत, ज़ियादती। वेगातिशय जैसे रूपोंमें अतिशय शब्द विशेष्य और अतिशयसाधु जैसे स्थलोंमें विशेषण होता है। २ काव्यालङ्कार-विशेष, जिसमें किसी वस्तुका होना या न होना लगातार दिखाया जाता है। (त्रि॰) ३ बहुत ज्य़ादा, अधिकसे अधिक। अतिक्रान्तः शयं हस्तम्। ४ हस्ताति-क्रमकारक। अतिक्रम्य शक्तिं (अव्य॰)। ५ शक्त्यतिक्रम। भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ़, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ़, वाढ़, दृढ़, अतिमर्याद, उत्कर्ष, बलवत्, सुष्ठु, किमुत, सु, अतीव, अति, द्वार, व्यापार, समधिक, अतिरिक्त—यह पर्याय हैं।}} {{outdent|अतिशयन (सं॰ क्ली॰) अति शीङ्-भावे ल्युट्। १ बहुत सोना। २ अतिरेक, अतिशय, कसरत। (त्रि॰) ३ अतिशययुक्त, ज़ियादतीका।}} {{outdent|अतिशयोक्ति (सं॰ स्त्री॰) अतिशयेन उक्तिः निर्द्दशोऽस्मिन् वर्णने। १ जो बात बहुत बढ़ाकर कही जाय। २ काव्यालङ्कार-विशेष, एक प्रकारका अलङ्कार।}} साहित्य-दर्पण-प्रणेताने अतिशयोक्ति अलङ्कारका इसतरह लक्षण बताया है— <small>"सिद्धत्वे ऽध्यवसायस्वातिशयोक्तिर्निगद्यते।"</small> प्रकृत विषयका अप्राधान्य दिखाके उसके उद्देश्यमें अप्रकृत विषयको निश्चल भावसे स्थापन करनेपर अतिशयोक्ति होती है। यथा, मुखं द्वितीयश्चन्द्रः। मुख तो दूसरा चन्द्र है। इस स्थानमें प्रकृत विषय मुख है, किन्तु मुखको चन्द्र बताके उल्लेख किया गया है। इसीसे ऐसे स्थलमें एकका प्राधान्य और दूसरेका अप्राधान्य प्रतिपन्न होता है। अधःकरण यानी अप्राधान्य और निगरणके सम्बन्धमें अलङ्कारिकोंने एक कारिका लिखी है। यथा— {{Block center|<poem><small> "विषयस्यानुपादानेऽप्युपादानेऽपि सूरयः। अधःकरणमावेण निगीर्णत्वं प्रचक्षते॥"</small></poem>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>प्रकृत विषय निर्द्देश किया या न किया जाय, अधःकरण अर्थात् अप्राधान्य समझ पड़नेसे ही उस विषयका निगरण करना होता है। अतिशयोक्ति अलङ्कार पांच प्रकारका है—१ दो विषयों में भेद रहते भी अभेदकल्पना। २ अभेदविषयों में भेदकल्पना। ३ सम्बन्ध होते भी असम्बन्ध कल्पना। ४ असम्बन्धमें सम्बन्धकल्पना। ५ कार्य और हेतुके पौर्व्वापर्यका अभाव अर्थात् विपर्यय। {{Block center|<poem><small>"भेदेऽप्यभेदः सम्बन्धेऽसम्बन्धस्तद्विपर्य्ययौ। पौर्व्वापर्यात्ययः कार्यहतोः सा पञ्चधा ततः॥" (साहित्यद॰)</small></poem>}} १। भेदमें अभेद— {{Block center|<poem><small>"कथमुपरि कलापिनः कलापी विलसति तस्व तलेऽष्टमीन्दुखण्डम्। कुवलययुगलं ततो विलोलं तिलकुसुमं तदधः प्रवालममात्॥"</small></poem>}} {{Block center|<poem><small>मोर पूंछ ऊपर लसत नीचे आठें चन्द। तापर चञ्चल युग कमल फूले आनंद कन्द॥</small></poem>}} क्या ही आश्चर्य्य है! ऊपर मोरकी पूंछ (केश) शोभा पा रही है; उसके नीचे अष्टमीका चन्द्र (ललाट) उदय हुआ है; उसके बाद दो चञ्चल कमल (चक्षु) फूले हैं; उनके नीचे तिलकी कली (नासिका) खिली हुई है; उसके नीचे प्रवाल (ओष्ठ) मनको हरे लेते हैं। इस जगह केशादिके साथ मोरको पूंछ प्रभृतिका पूरा भेद रहते भी अभेद रूपसे वर्णना की गई है। २। अभेदमें भेद— {{Block center|<poem><small>"अन्धदेवाङ्गलावण्यमन्याः सौरभसम्पद। तस्याः पद्मपलाशाक्ष्राः सर सत्वमलौकिकम्।"</small></poem>}} उस पद्मपलाशाक्षी कामिनीकी देहमें जैसा लावण्य है, वैसा और कहीं नहीं, वह सौन्दर्य और माधुर्य सभी अलौकिक है। जगत्में जो रूपलावण्यादि देखा जाता, इस जगह उससे कोई विभिन्नता न रहते भी भिन्न रूपसे कल्पना की गई है। {{Block center|<poem><small>राधामें जो रूप है, वैसी कहुंन दिखात। सकल सराहत रात-दिन, धन्ध अलौकिक मात॥</small></poem>}} ३। सम्बन्धमें असम्बन्ध— <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> tjvguzx5c5y31ukhwzj64nts3wvtavq पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२७३ 250 83547 664975 664819 2026-07-05T04:31:06Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664975 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिशयोक्ति—अतिशायिन्'''|'''२६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Block center|<poem><small>"अस्याः सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्री नु कान्तिप्रदः? शङ्गारैकरसः स्वयं नु मदनी मासी नु पुष्याकरः? वेदाभ्यासजड़ः कथं नु विषयव्यावृत्तकोतूहलो निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः?"</poem></small>}} सौन्दर्यदाता चन्द्र क्या इस स्त्रीरत्नके सृष्टिकर्त्ता हैं, अथवा श्रृङ्गाररसके एकमात्र आधार स्वयं कन्दर्पने क्या इसे निर्म्माण किया है? या पुष्पके आकर चैत्र-मासने अपने हाथसे संवारा है? कारण सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा बहुत वेदाभ्याससे इतने जड़-बुद्धि और विषयसे निवृत्त हो गये हैं, कि उनका फिर विषय-व्यापारसे कौतूहलाक्रान्त हो, ऐसा मनोहर रूप बना सकना सम्भव नहीं। इस जगह प्रजापति ब्रह्माके प्रकृत निर्म्माण कर्त्ता होते भी दूसरेके निर्म्माणकर्त्तृत्वकी कल्पना की गई है। {{Block center|<poem><small>रचो अवसि कन्दर्पने, नव राधाको रूप। विधिना बूढ़े ह्वै परे, ज्ञानकाण्डके कूप॥</poem></small>}} ४। असम्बन्धमें सम्बन्ध— {{Block center|<poem><small>"यदि स्यान्मण्डले सक्तमिन्दोरिन्दीवरद्वयम्। तदोपमौयते तस्या वदनं चारुलोचनं॥"</poem></small>}} यदि चन्द्रमण्डलमें दो नील पद्म लगा दिये जायं, तो उस कामिनीके मनोहर नेत्र-द्वय-शोभित मुखसे उसकी तुलना की जा सकती है। {{Block center|<poem><small>होत निशाकरमें कहूं, जो युग नील-सरोज। नयन सुशोभित वदनकी, भाषत उपमा खोज॥</poem></small>}} ५। कार्य और कारणके पौर्वापर्यका अभाव। स्वाभाविक नियम यही है, कि आगे कारण विद्यमान रहता, पीछे कार्यकी उत्पत्ति होती है। किन्तु इसका विपर्यय होनेसे अर्थात् जिस जगह आगे कार्य निर्द्दिष्ट होता और पीछे उसका कारण उल्लिखित हुआ करता, उसी जगह कार्य और कारणका अन्यथा करना होता है। इसे छोड़ इस प्रकारसे कहनेपर भी, कभी-कभी अतिशयोक्ति हो जाती है, कि कार्य और कारण दोनो एक ही साथ उत्पन्न हुए हैं। {{Block center|<poem><small>(१) "प्रागेव हरिणाक्षीणां चित्तमुत्कलिकाकुलं। पश्चादुदृभिन्नवकुलरसालमुकुलश्रियः॥"</poem></small>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noincludeपहले ही मृगनयना रमणियोंका चित्त आकुल हो उठा, पीछे वकुल और आम्रके मुकुल प्रकाशित हो शोभा पाने लगे। वकुलादिका पुष्पसौन्दर्य देखने से ही कामिनीयोंका मन चञ्चल होनेकी सम्भावना है। किन्तु इस जगह पहले उनके मनकी व्याकुलतावाली बात कह, पीछे पुष्पसौन्दर्यका विषय उल्लिखित किया गया है। इसलिये इसके द्वारा कार्य और कारणका विपरीत भाव सङ्घटित हुआ है। {{Block center|<poem><small>(२) "सममेव समाक्रान्तं हयं हिरदगामिना। तेन सिंहासनं पित्रां मण्डलञ्च महीक्षिताम्॥"</poem></small>}} हस्तीके तुल्य मन्दगामा उन रघुने पैतृक सिंहासन और विपक्ष राजमण्डलपर एक ही कालमें आक्रमण किया था। पहले सिंहासनपर अधिरूढ़ होकर पीछे शत्रुओंका जय करना सम्भव है; किन्तु इस जगह दोनो कार्य एक ही समयमें उल्लिखित हुए हैं। इसलिये यहां भी कार्य-कारणका विपरीत भाव हुआ। अतिशयोक्तिकी जगह इव-जैसे, आदि शब्द रहनेसे यदि उत्प्रेक्षालङ्कार होता है। अतिशयोपमा (सं॰ स्त्री॰) वह उपमा, जिसमें किसी वस्तुकी उपमा दूसरी वस्तुके साथ न दी जा सके। {{Block center|<poem><small>"सब उपमा कवि रहे जुठारी। केहि पटतरिय विदेह कुमारी॥" तुलसी॰</poem></small>}} अतिशर्वर (वै॰ क्ली॰) आधीरात, मध्यनिशा। अतिशष्कुली (सं॰ स्त्री॰) तिलकी रोटी। अतिशस्त्र (सं॰ त्रि॰) बहुत बढ़िया, निहायत उम्दा। अतिशस्त्र (सं॰ त्रि॰) हथियारोंसे बढ़िया। अतिशाक्कर (सं॰ त्रि॰) अतिशक्कर छन्दमें लिख गया या उसके सम्बन्धका। अतिशायन (सं॰ पु॰) अति-शोङ्-भावे ल्युट्, निपातनाद्दीर्घः। आधिक्य, प्रकर्ष, कसरत। अतिशायिन् (सं॰ त्रि॰) अति-शी-णिनि। अधिक, ज्य़ादा। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> dlu8gkyk00q97abvpe4v7moabvctrgy 664976 664975 2026-07-05T04:33:45Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664976 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिशयोक्ति—अतिशायिन्'''|'''२६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Block center|<poem><small>"अस्याः सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्री नु कान्तिप्रदः? शङ्गारैकरसः स्वयं नु मदनी मासी नु पुष्याकरः? वेदाभ्यासजड़ः कथं नु विषयव्यावृत्तकोतूहलो निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः?"</poem></small>}} सौन्दर्यदाता चन्द्र क्या इस स्त्रीरत्नके सृष्टिकर्त्ता हैं, अथवा श्रृङ्गाररसके एकमात्र आधार स्वयं कन्दर्पने क्या इसे निर्म्माण किया है? या पुष्पके आकर चैत्र-मासने अपने हाथसे संवारा है? कारण सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा बहुत वेदाभ्याससे इतने जड़-बुद्धि और विषयसे निवृत्त हो गये हैं, कि उनका फिर विषय-व्यापारसे कौतूहलाक्रान्त हो, ऐसा मनोहर रूप बना सकना सम्भव नहीं। इस जगह प्रजापति ब्रह्माके प्रकृत निर्म्माण कर्त्ता होते भी दूसरेके निर्म्माणकर्त्तृत्वकी कल्पना की गई है। {{Block center|<poem><small>रचो अवसि कन्दर्पने, नव राधाको रूप। विधिना बूढ़े ह्वै परे, ज्ञानकाण्डके कूप॥</poem></small>}} ४। असम्बन्धमें सम्बन्ध— {{Block center|<poem><small>"यदि स्यान्मण्डले सक्तमिन्दोरिन्दीवरद्वयम्। तदोपमौयते तस्या वदनं चारुलोचनं॥"</poem></small>}} यदि चन्द्रमण्डलमें दो नील पद्म लगा दिये जायं, तो उस कामिनीके मनोहर नेत्र-द्वय-शोभित मुखसे उसकी तुलना की जा सकती है। {{Block center|<poem><small>होत निशाकरमें कहूं, जो युग नील-सरोज। नयन सुशोभित वदनकी, भाषत उपमा खोज॥</poem></small>}} ५। कार्य और कारणके पौर्वापर्यका अभाव। स्वाभाविक नियम यही है, कि आगे कारण विद्यमान रहता, पीछे कार्यकी उत्पत्ति होती है। किन्तु इसका विपर्यय होनेसे अर्थात् जिस जगह आगे कार्य निर्द्दिष्ट होता और पीछे उसका कारण उल्लिखित हुआ करता, उसी जगह कार्य और कारणका अन्यथा करना होता है। इसे छोड़ इस प्रकारसे कहनेपर भी, कभी-कभी अतिशयोक्ति हो जाती है, कि कार्य और कारण दोनो एक ही साथ उत्पन्न हुए हैं। {{Block center|<poem><small>(१) "प्रागेव हरिणाक्षीणां चित्तमुत्कलिकाकुलं। पश्चादुदृभिन्नवकुलरसालमुकुलश्रियः॥"</poem></small>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noincludeपहले ही मृगनयना रमणियोंका चित्त आकुल हो उठा, पीछे वकुल और आम्रके मुकुल प्रकाशित हो शोभा पाने लगे। वकुलादिका पुष्पसौन्दर्य देखने से ही कामिनीयोंका मन चञ्चल होनेकी सम्भावना है। किन्तु इस जगह पहले उनके मनकी व्याकुलतावाली बात कह, पीछे पुष्पसौन्दर्यका विषय उल्लिखित किया गया है। इसलिये इसके द्वारा कार्य और कारणका विपरीत भाव सङ्घटित हुआ है। {{Block center|<poem><small>(२) "सममेव समाक्रान्तं हयं हिरदगामिना। तेन सिंहासनं पित्रां मण्डलञ्च महीक्षिताम्॥"</poem></small>}} हस्तीके तुल्य मन्दगामा उन रघुने पैतृक सिंहासन और विपक्ष राजमण्डलपर एक ही कालमें आक्रमण किया था। पहले सिंहासनपर अधिरूढ़ होकर पीछे शत्रुओंका जय करना सम्भव है; किन्तु इस जगह दोनो कार्य एक ही समयमें उल्लिखित हुए हैं। इसलिये यहां भी कार्य-कारणका विपरीत भाव हुआ। अतिशयोक्तिकी जगह इव-जैसे, आदि शब्द रहनेसे यदि उत्प्रेक्षालङ्कार होता है। {{outdent|अतिशयोपमा (सं॰ स्त्री॰) वह उपमा, जिसमें किसी वस्तुकी उपमा दूसरी वस्तुके साथ न दी जा सके।}} {{Block center|<poem><small>"सब उपमा कवि रहे जुठारी। केहि पटतरिय विदेह कुमारी॥" तुलसी॰</poem></small>}} {{outdent|अतिशर्वर (वै॰ क्ली॰) आधीरात, मध्यनिशा।}} {{outdent|अतिशष्कुली (सं॰ स्त्री॰) तिलकी रोटी।}} {{outdent|अतिशस्त्र (सं॰ त्रि॰) बहुत बढ़िया, निहायत उम्दा।}} {{outdent|अतिशस्त्र (सं॰ त्रि॰) हथियारोंसे बढ़िया।}} {{outdent|अतिशाक्कर (सं॰ त्रि॰) अतिशक्कर छन्दमें लिख गया या उसके सम्बन्धका।}} {{outdent|अतिशायन (सं॰ पु॰) अति-शोङ्-भावे ल्युट्, निपातनाद्दीर्घः। आधिक्य, प्रकर्ष, कसरत।}} {{outdent|अतिशायिन् (सं॰ त्रि॰) अति-शी-णिनि। अधिक, ज्य़ादा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qcg9f1rt8zle5qi2s6n9bs4twurixl4 664978 664976 2026-07-05T05:39:03Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 664978 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अतिशयोक्ति—अतिशायिन्'''|'''२६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Block center|<poem><small>"अस्याः सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्री नु कान्तिप्रदः? शङ्गारैकरसः स्वयं नु मदनी मासी नु पुष्याकरः? वेदाभ्यासजड़ः कथं नु विषयव्यावृत्तकोतूहलो निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः?"</poem></small>}} सौन्दर्यदाता चन्द्र क्या इस स्त्रीरत्नके सृष्टिकर्त्ता हैं, अथवा श्रृङ्गाररसके एकमात्र आधार स्वयं कन्दर्पने क्या इसे निर्म्माण किया है? या पुष्पके आकर चैत्र-मासने अपने हाथसे संवारा है? कारण सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा बहुत वेदाभ्याससे इतने जड़-बुद्धि और विषयसे निवृत्त हो गये हैं, कि उनका फिर विषय-व्यापारसे कौतूहलाक्रान्त हो, ऐसा मनोहर रूप बना सकना सम्भव नहीं। इस जगह प्रजापति ब्रह्माके प्रकृत निर्म्माण कर्त्ता होते भी दूसरेके निर्म्माणकर्त्तृत्वकी कल्पना की गई है। {{Block center|<poem><small>रचो अवसि कन्दर्पने, नव राधाको रूप। विधिना बूढ़े ह्वै परे, ज्ञानकाण्डके कूप॥</poem></small>}} ४। असम्बन्धमें सम्बन्ध— {{Block center|<poem><small>"यदि स्यान्मण्डले सक्तमिन्दोरिन्दीवरद्वयम्। तदोपमौयते तस्या वदनं चारुलोचनं॥"</poem></small>}} यदि चन्द्रमण्डलमें दो नील पद्म लगा दिये जायं, तो उस कामिनीके मनोहर नेत्र-द्वय-शोभित मुखसे उसकी तुलना की जा सकती है। {{Block center|<poem><small>होत निशाकरमें कहूं, जो युग नील-सरोज। नयन सुशोभित वदनकी, भाषत उपमा खोज॥</poem></small>}} ५। कार्य और कारणके पौर्वापर्यका अभाव। स्वाभाविक नियम यही है, कि आगे कारण विद्यमान रहता, पीछे कार्यकी उत्पत्ति होती है। किन्तु इसका विपर्यय होनेसे अर्थात् जिस जगह आगे कार्य निर्द्दिष्ट होता और पीछे उसका कारण उल्लिखित हुआ करता, उसी जगह कार्य और कारणका अन्यथा करना होता है। इसे छोड़ इस प्रकारसे कहनेपर भी, कभी-कभी अतिशयोक्ति हो जाती है, कि कार्य और कारण दोनो एक ही साथ उत्पन्न हुए हैं। {{Block center|<poem><small>(१) "प्रागेव हरिणाक्षीणां चित्तमुत्कलिकाकुलं। पश्चादुदृभिन्नवकुलरसालमुकुलश्रियः॥"</poem></small>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>पहले ही मृगनयना रमणियोंका चित्त आकुल हो उठा, पीछे वकुल और आम्रके मुकुल प्रकाशित हो शोभा पाने लगे। वकुलादिका पुष्पसौन्दर्य देखने से ही कामिनीयोंका मन चञ्चल होनेकी सम्भावना है। किन्तु इस जगह पहले उनके मनकी व्याकुलतावाली बात कह, पीछे पुष्पसौन्दर्यका विषय उल्लिखित किया गया है। इसलिये इसके द्वारा कार्य और कारणका विपरीत भाव सङ्घटित हुआ है। {{Block center|<poem><small>(२) "सममेव समाक्रान्तं हयं हिरदगामिना। तेन सिंहासनं पित्रां मण्डलञ्च महीक्षिताम्॥"</poem></small>}} हस्तीके तुल्य मन्दगामा उन रघुने पैतृक सिंहासन और विपक्ष राजमण्डलपर एक ही कालमें आक्रमण किया था। पहले सिंहासनपर अधिरूढ़ होकर पीछे शत्रुओंका जय करना सम्भव है; किन्तु इस जगह दोनो कार्य एक ही समयमें उल्लिखित हुए हैं। इसलिये यहां भी कार्य-कारणका विपरीत भाव हुआ। अतिशयोक्तिकी जगह इव-जैसे, आदि शब्द रहनेसे यदि उत्प्रेक्षालङ्कार होता है। {{outdent|अतिशयोपमा (सं॰ स्त्री॰) वह उपमा, जिसमें किसी वस्तुकी उपमा दूसरी वस्तुके साथ न दी जा सके।}} {{Block center|<poem><small>"सब उपमा कवि रहे जुठारी। केहि पटतरिय विदेह कुमारी॥" तुलसी॰</poem></small>}} {{outdent|अतिशर्वर (वै॰ क्ली॰) आधीरात, मध्यनिशा।}} {{outdent|अतिशष्कुली (सं॰ स्त्री॰) तिलकी रोटी।}} {{outdent|अतिशस्त्र (सं॰ त्रि॰) बहुत बढ़िया, निहायत उम्दा।}} {{outdent|अतिशस्त्र (सं॰ त्रि॰) हथियारोंसे बढ़िया।}} {{outdent|अतिशाक्कर (सं॰ त्रि॰) अतिशक्कर छन्दमें लिख गया या उसके सम्बन्धका।}} {{outdent|अतिशायन (सं॰ पु॰) अति-शोङ्-भावे ल्युट्, निपातनाद्दीर्घः। आधिक्य, प्रकर्ष, कसरत।}} {{outdent|अतिशायिन् (सं॰ त्रि॰) अति-शी-णिनि। अधिक, ज्य़ादा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9p51vzw4r45fc8ve5ih34sbdilbcfj6 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३०३ 250 83591 664905 664903 2026-07-04T12:05:41Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 664905 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२६९'''|'''अथर्व—अथर्वभूत'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> पथिक, मुसाफ़िर जो बराबर चलता रहे। २ भाले जैसी नोकीली वस्तु। ३ वह पदार्थ जिससे भालेकी नोक जैसे अङ्कर फूटें। अथर्व (सं॰ पु॰) ब्रह्मार्क ज्येष्ठपुत्र, जिनको उन्होंने ब्रह्मविद्या बताई थी। अथर्वण (सं॰ पु॰) अथर्वन्-अच्, पृषोदरादित्वात् न टेर्लोपः। शिव, जिन्हें अथर्वमुनि-प्रोक्त विद्या ज्ञात है। अथर्वणि (सं॰ पु॰) अथर्वा तदुक्तशास्त्रादौ कुशलः, अथर्वन्-इस्। १ अथर्ववेदज्ञ ब्राह्मण, अथर्ववेदको जाननेवाला ब्राह्मण। २ पुरोहित। अथर्व न् (सं॰ पु॰) अथ-ऋ-वनिप्, शक॰। अथर्वा नामक ऋषि। मुण्डक उपनिषद्के आरम्भमें लिखा है, कि अथर्वा ब्रह्माके ज्येष्ठ पुत्र थे,— {{Block center|<poem><small> "ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्त्र कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता। स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठ पुवाय प्राह॥ १ अथवणे बां प्रवर्दत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम्। स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम्॥" २</poem></small>}} देवताओंके मध्यमें पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुए थे। वह इस विश्वके कर्ता और रक्षक रहे। उन्होंने अपने ज्येष्ठपुत्र अथर्वाको सकल विद्याओंकी मूल ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया। ब्रह्माने अथर्वाको जो सिखाया था, अथर्वाने उसे अङ्गिराके निकट प्रकाश कर दिया। फिर अङ्गिराने भरद्वाज-वंशोद्भव सत्य वाहको वही विद्या बताई। वही श्रेष्ठ विद्या सत्य वाहने अङ्गिरसको पड़ाई थी। ऋग्वेद प्रभृति प्राचीन पुस्तकें देखनेसे ऐसी प्रतीति होती है, कि अथर्वाने पहले अग्निकी सृष्टि और आर्यों में सबसे आगे यज्ञादि क्रिया प्रवर्त्तित की थी। {{Block center|<poem><small> "अग्निर्जाती अथर्वणा विददिश्वानि कान्या। भुवद्दू तो विवश्वतो।"</poem></small>}} {{Left|<small>ऋम्वेद १०।२२।५।</small> अथर्वाने अग्निको उत्पन्न किया था, जो सब विद्या जानते रहे। वह विवस्वतके दूत बने थे। {{Block center|<poem><small> "अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदग्रे।" (वाजसनेय संहिता)</poem></small>}} हे अग्नि! अथर्वाने आपको पहले उत्पन्न किया था।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>शतपथ-ब्राह्मणमें लिखा है, कि दध्यञ्च नामक एक ऋषि अथर्वाके पुत्र थे,— {{Block center|<poem><small> “्त््त्त्््त््त्त् मुत्वा दध्यनृषिः पुत्र इधै अथर्वणः ।" अथर्वाके पुत्र दध्यञ्च ऋषिने आपको ( अग्निको) प्रज्वलित किया था। अथर्ववेदमें अथर्वा और वरुणके सम्बन्धपर एक उपाख्यान लिखा है। वरुणने अथर्वाको एक विचित्र नित्यवत्सा धेनु दी थी। पृनि धेनु वरुणेन दत्तामथर्वणे मुयां नित्यवत्माम्। कुछ दिन बाद वरुणने वही धेनु बापस लेनेका यत्न किया। अथर्व वेद-१४ देखो। अन्तमें अथर्वाने वरुणदेवसे कहा, 'हम परस्पर बन्धु और एक ही वंशमें उत्पन्न हुए हैं।' इसी उपाख्यानको देख कोई-कोई अनुमान करते हैं, कि वशिष्ठ और अथर्वा ऋषि एक ही व्यक्ति थे, एवं वरुण और विश्वामित्र ये दोनो भी कोई पृथक् व्यक्ति नहीं थे। ऐसा अनुमान करनेका कारण यह है, कि महाभारत और रामायणको एक कथामें लिखा है-विश्वामित्र वशिष्ठको धेनु बलपूर्वक लेने आये थे। इसके लिये महाविरोध उपस्थित हुआ। इसके सिवा कुल- विवरण देखनेसे भी दोनो एक ही वंशसे उत्पन्न प्रमाणित होते हैं। जो हो, दोनो उपाख्यानोंमें सादृश्य रहनसे अथर्वा और वशिष्ठ एक व्यक्ति नहीं हो सकते। इस बातका कोई विशेष प्रमाण भी नहीं मिलता है। यह शब्द एकवचनमें वैदिक पुरोहितोंके प्रधान और बहुवचनमें अथर्व न्के वंशका बोधक है। अथर्व न्के वंशज अश्वत्थोंको दानस्तुतिमें वर्णित हैं और समय-विशेषपर दूधमें मधु डालके इनके पौनकी बात भी वेदमें लिखी है। तैत्तिरीय ब्राह्मणके अनुसार जो गौ असमयमें गर्भपात करे, वह अथर्वनीको हौ द जाना चाहिये। इनके अग्नि, दध्यञ्च, भिषज्, बृहद्दिव और कवन्ध-यह कई एक पुत्र थे। अथर्वनी (हिं० पु०) अथर्वन्वाला आचार्य जो कर्मकाण्ड या यज्ञ कराये, पुरोहितं । अथर्वभूत ( सं० पु.). बारह महर्षियोंको उपाधि। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 03av2fxdj186byl8pt7gpbi09q4avu5 664907 664905 2026-07-04T12:13:59Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 664907 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२६९'''|'''अथर्व—अथर्वभूत'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> पथिक, मुसाफ़िर जो बराबर चलता रहे। २ भाले जैसी नोकीली वस्तु। ३ वह पदार्थ जिससे भालेकी नोक जैसे अङ्कर फूटें। अथर्व (सं॰ 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भरद्वाज-वंशोद्भव सत्य वाहको वही विद्या बताई। वही श्रेष्ठ विद्या सत्य वाहने अङ्गिरसको पड़ाई थी। ऋग्वेद प्रभृति प्राचीन पुस्तकें देखनेसे ऐसी प्रतीति होती है, कि अथर्वाने पहले अग्निकी सृष्टि और आर्यों में सबसे आगे यज्ञादि क्रिया प्रवर्त्तित की थी। {{Block center|<poem><small> "अग्निर्जाती अथर्वणा विददिश्वानि कान्या। भुवद्दू तो विवश्वतो।"</poem></small>}} {{Left|<small>ऋम्वेद १०।२२।५।</small> अथर्वाने अग्निको उत्पन्न किया था, जो सब विद्या जानते रहे। वह विवस्वतके दूत बने थे। {{Block center|<poem><small> "अथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदग्रे।" (वाजसनेय संहिता)</poem></small>}} हे अग्नि! अथर्वाने आपको पहले उत्पन्न किया था।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>शतपथ-ब्राह्मणमें लिखा है, कि दध्यञ्च नामक एक ऋषि अथर्वाके पुत्र थे,— {{Block center|<poem><small> "तमुत्वा दध्यन्नृषिः पुत्र इधे अथर्वणः।"</poem></small>}} अथर्वाके पुत्र दध्यञ्च ऋषिने आपको (अग्निको) प्रज्वलित किया था। अथर्ववेदमें अथर्वा और वरुणके सम्बन्धपर एक उपाख्यान लिखा है। वरुणने अथर्वाको एक विचित्र नित्यवत्सा धेनु दी थी। <small>पृश्रिं धेनुं वरुणेन दत्तामथर्वणे सुदुघां नित्यवत्माम्।</small> कुछ दिन बाद वरुणने वही धेनु बापस लेनेका यत्न किया। <small>अथर्व वेद—१४ देखो।</small> अन्तमें अथर्वाने वरुणदेवसे कहा,—'हम परस्पर बन्धु और एक ही वंशमें उत्पन्न हुए हैं।' इसी उपाख्यानको देख कोई-कोई अनुमान करते हैं, कि वशिष्ठ और अथर्वा ऋषि एक ही व्यक्ति थे, एवं वरुण और विश्वामित्र ये दोनो भी कोई पृथक् व्यक्ति नहीं थे। ऐसा अनुमान करनेका कारण यह है, कि महाभारत और रामायणको एक कथामें लिखा है—विश्वामित्र वशिष्ठकी धेनु बलपूर्व्वक लेने आये थे। इसके लिये महाविरोध उपस्थित हुआ। इसके सिवा कुल-विवरण देखनेसे भी दोनो एक ही वंशसे उत्पन्न प्रमाणित होते हैं। जो हो, दोनो उपाख्यानोंमें सादृश्य रहनसे अथर्वा और वशिष्ठ एक व्यक्ति नहीं हो सकते। इस बातका कोई विशेष प्रमाण भी नहीं मिलता है। यह शब्द एकवचनमें वैदिक पुरोहितोंके प्रधान, और बहुवचनमें अथर्वन्के वंशका बोधक है। अथर्वन्के वंशज अश्वत्थोंकी दानस्तुतिमें वर्णित हैं और समय-विशेषपर दूधमें मधु डालके इनके पीनकी बात भी वेदमें लिखी है। तैत्तिरीय ब्राह्मणके अनुसार जो गौ असमयमें गर्भपात करे, वह अथर्वनोंको ही दी जाना चाहिये। इनके अग्नि, दध्यञ्च, भिषज्, बृहद्दिव और कवन्ध—यह कई एक पुत्र थे। अथर्वनी (हिं॰ पु॰) अथर्वन्वाला आचार्य जो कर्मकाण्ड या यज्ञ कराये, पुरोहितं। अथर्वभूत (सं॰ पु॰) बारह महर्षियोंकी उपाधि। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> sao6fe7s3tnchomx8er9hi05xab3kxp 664908 664907 2026-07-04T12:16:53Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 664908 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२६९'''|'''अथर्व—अथर्वभूत'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> पथिक, मुसाफ़िर जो बराबर चलता रहे। २ भाले जैसी नोकीली वस्तु। ३ वह पदार्थ जिससे भालेकी नोक जैसे अङ्कर फूटें। {{outdent|अथर्व (सं॰ पु॰) ब्रह्मार्क ज्येष्ठपुत्र, जिनको उन्होंने ब्रह्मविद्या बताई थी।}} {{outdent|अथर्वण (सं॰ पु॰) अथर्वन्-अच्, पृषोदरादित्वात् न टेर्लोपः। शिव, जिन्हें अथर्वमुनि-प्रोक्त विद्या ज्ञात है।}} {{outdent|अथर्वणि (सं॰ पु॰) अथर्वा तदुक्तशास्त्रादौ कुशलः, अथर्वन्-इस्। १ अथर्ववेदज्ञ ब्राह्मण, 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अनुमान करते हैं, कि वशिष्ठ और अथर्वा ऋषि एक ही व्यक्ति थे, एवं वरुण और विश्वामित्र ये दोनो भी कोई पृथक् व्यक्ति नहीं थे। ऐसा अनुमान करनेका कारण यह है, कि महाभारत और रामायणको एक कथामें लिखा है—विश्वामित्र वशिष्ठकी धेनु बलपूर्व्वक लेने आये थे। इसके लिये महाविरोध उपस्थित हुआ। इसके सिवा कुल-विवरण देखनेसे भी दोनो एक ही वंशसे उत्पन्न प्रमाणित होते हैं। जो हो, दोनो उपाख्यानोंमें सादृश्य रहनसे अथर्वा और वशिष्ठ एक व्यक्ति नहीं हो सकते। इस बातका कोई विशेष प्रमाण भी नहीं मिलता है। यह शब्द एकवचनमें वैदिक पुरोहितोंके प्रधान, और बहुवचनमें अथर्वन्के वंशका बोधक है। अथर्वन्के वंशज अश्वत्थोंकी दानस्तुतिमें वर्णित हैं और समय-विशेषपर दूधमें मधु डालके इनके पीनकी बात भी वेदमें लिखी है। तैत्तिरीय ब्राह्मणके अनुसार जो गौ असमयमें गर्भपात करे, वह अथर्वनोंको ही दी जाना चाहिये। इनके अग्नि, दध्यञ्च, भिषज्, बृहद्दिव और कवन्ध—यह कई एक पुत्र थे। {{outdent|अथर्वनी (हिं॰ पु॰) अथर्वन्वाला आचार्य जो कर्मकाण्ड या यज्ञ कराये, पुरोहितं।}} {{outdent|अथर्वभूत (सं॰ पु॰) बारह महर्षियोंकी उपाधि।}} 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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|२| कपिल}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> "भक्ति स्वतः नष्ट नहीं होती, वेदविहित कर्म में प्रवृत्ति लगने से उत्पन्न हो जाती है। ऐसी भक्ति होने पर क्रमशः सुख भी मिलता है जो ईश्वर को बालकवत् प्रिय, पुत्रवत् स्नेहपात्र, सखा सा विश्वासभाजन, गुरु की भांति उपदेष्टा, बन्धु की तरह हितकारी और देव पूज्य समझता है; अर्थात् जो सर्वतोभाव से भगवान का भजन करता है, उसका काल कुछ बिगाड़ नहीं सकता। "प्रतिलोम बुद्धिविशिष्ट आत्मा ही पुरुष है। वह पुरुष अनादि, निर्गुण और प्रकृति से भिन्न है। पुरुष केवल साक्षीस्वरूप होता है। वह स्वयं प्रकाश पाता है और यह विश्व उसके साथ मिलजुलकर प्रकाशित हो जाता है। वही पुरुष अपने निकट विष्णु की शक्तिरूपा अव्यक्तगुणमयी प्रकृति को लीलावश पहुँचने पर भावनाक्रम से ग्रहण कर लेता है। प्रकृति अपने गुणों से समानरूप विचित्र प्रजा की सृष्टि करती है। जिसमें अविशेष और विशेष का आश्रय प्रधान पाता है, वही प्रकृति कहलाती है। फिर प्रधान त्रिगुण रहता है, अतएव अव्यक्त अर्थात् अकार्य ठहरता है। सुतरां वह न तो महत्तत्त्व और न जीवनस्वरूप नित्य अर्थात् जीव की ही प्रकृति है। प्रधान कार्यस्वरूप चतुर्विंशति पदार्थ हैं। यथा—भूमि, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश पंचमहाभूत; गन्धतन्मात्र, रसतन्मात्र, रूपतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र तथा शब्दतन्मात्र पंचतन्मात्र; चक्षु, कर्ण, जिह्वा, घ्राण, त्वक्, वाक्, पाणि, पाद, पायु एवं उपस्थ दस इन्द्रिय; मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त चार अन्तरिन्द्रिय। अन्तःकरण के अन्तरिन्द्रिय उच्चरते भी वृत्ति मिटने से उसमें चार प्रकार का भेद पड़ जाता है। यह चतुर्विंशति तत्त्व सगुण ब्रह्म के सन्निवेश का स्थान हैं। एतद्भिन्न काल पञ्चविंश तत्त्व है। "निष्काम धर्म, निर्मल मन, भक्तियोग, तत्त्व-दर्शिज्ञान, प्रबल वैराग्य, तपोयुक्त योग एवं दीर्घ समाधि द्वारा पुरुष की प्रकृति क्रमशः काष्ठ की भाँति अग्नि में जलकर भस्म की तरह विनष्ट हो सकती है। प्रकृति यदि एक बार नष्ट हो जाए, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> फिर उभरने नहीं पाती। उस समय पुरुष समझता है—इसका भोग समाप्त हो गया। पुरुष जब जन्म-जन्मान्तर से अध्यात्मरत होकर ब्रह्मलोक प्राप्ति के लिए भी वैराग्य पाता है और भगवान के प्रति ऐकान्तिक भक्तिमान बनता है, तब वह कैवल्यधाम में देहातिरिक्त सदाश्रयस्वरूप परमानन्द पाता है। फिर सिद्धिरूपी नाथ हो जाने से आनन्दलाभ कर पुनरपि उसको लौटना नहीं पड़ता। आत्मज्ञान के बल से सकल मिथ्या ज्ञान विनष्ट हो जाता है। कपिल मुनि ने अपने सांख्यसूत्र में भी दिखाया है—वस्तुमान सत् है अर्थात् किसी वस्तु का उत्पत्ति किंवा विनाश नहीं। वस्तु का आविर्भाव होने से हम देख पाते हैं और तिरोभाव होने से उसके लिये असत् कहा जाता है। आविर्भाव से पूर्व भी वस्तु की सत्ता स्वीकार करनी पड़ती है। ऐसा न मानने पर एकमात्र उपादान से सकल कार्य उत्पन्न हो सकते हैं। असत्कार्यवादियों के मत में उपादान मृत्तिका के साथ घट के सम्बन्ध की भाँति पट का भी सम्बन्ध नहीं लगता। सम्बन्ध न रहते भी जैसे मृत्तिका से घट बनता है, वैसे पट भी बन सकता है। किन्तु उत्पत्ति के पूर्व कार्य को सत् स्वीकार करने से मृत्तिका से पट की उत्पत्ति की आपत्ति पड़ नहीं सकती, क्योंकि मृत्तिका से पट का कोई सम्बन्ध नहीं। जिसके साथ जिसका कोई विशिष्ट सम्बन्ध नहीं रहता, उससे वह उपजता नहीं! घट के साथ उत्पत्ति से पूर्व भी मृत्तिका का सम्बन्ध होता है, इससे मृत्तिका से घट बन जाता है। यदि उत्पत्ति से पूर्व कार्य असत् ठहरे, तो मृत्तिका रूप सत्कारण के साथ असत् घटरूप कार्य का सम्बन्ध बन न सके। सुतरां सत्कार्यवादियों के मत में घटसंसर्गशून्य मृत्तिका से घटोत्पत्ति होने की भाँति सम्बन्धशून्य मृत्तिका से पट की उत्पत्ति क्यों नहीं होती? और पटोत्पत्ति न होने की भाँति घट भी कैसे बन सकता है? दोनों विषय सत्कार्यवाद के स्थापन की प्रधानतम युक्ति हैं।" <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> e84gc9j6l350wqgb62ltuvgsvo0p4nc पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३ 250 101960 664910 367231 2026-07-04T12:30:25Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 664910 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||कपिल|३}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> आशंका कैसे पा सकती है—उत्पत्ति से पूर्व कार्य को सता स्वीकार करते उत्पत्ति से पूर्व कार्य का प्रत्यक्ष क्यों नहीं होता! कारण महर्षि कपिल के मतानुसार कार्य मात्र उत्पत्ति से पहले कारण में भव्यावस्था के डिम्बस्थित सर्प की भाँति अवस्थान करता है। डिम्ब से निकलने के पहले जैसे सर्प देख नहीं पड़ता, वैसे ही कारण से अभिव्यक्त होने के पहले कार्य भी दृष्टि में नहीं चढ़ता। पदार्थों की संख्या ठहराने से ही इनका बनाया दर्शनसूत्र सांख्य कहलाता है। सांख्य देखो। कपिल के कई पच्चीसों पदार्थ यह हैं—१ महत्तत्त्व, २ अहंकार, ३ मन, ४ शब्दतन्मात्र, ५ स्पर्श तन्मात्र, ६ रूपतन्मात्र, ७ रसतन्मात्र, ८ गन्धतन्मात्र, ९ चक्षुः, १० कर्ण, ११ नासिका, १२ जिह्वा, १३ त्वक्, १४ वाक्, १५ पाणि, १६ पाद, १७ पायु, १८ उपस्थ, १९ आकाश, २० वायु, २१ तेजः, २२ जल, २३ क्षिति, २४ आत्मा और २५ प्रकृति। कार्यकारिता रहित सत्त्व, रजः और तमः त्रिगुण को प्रकृति कहते हैं। इस प्रकृति का प्रथम कार्य बुद्धिसत्त्व है। बुद्धितत्त्व ही महत्तत्त्व कहलाता है। बुद्धितत्त्व से अहंकार और अहंकार से शब्द प्रकृति तन्मात्र तथा चक्षुः प्रकृति इन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है। फिर पंचतन्मात्र से पञ्चमहाभूत निकले हैं। अर्थात् शब्दतन्मात्र से आकाश, स्पर्श से वायु, रूप से तेज, रस से जल और गन्ध से पृथिवी की उत्पत्ति है। आत्मा नित्य स्वप्रकाश और निर्विकार है। सुख-दुःख प्रभृति कुछ भी उसे स्पर्श नहीं करता। जब अन्तःकरण के बुद्धितत्त्व का सुख एवं दुःखाकार भाव उठता, तब अन्तःकरण के साथ आत्मा का अभेद ज्ञान लगने से अन्तःकरण का सुख तथा दुःखादि आत्मा में मालूम पड़ता है। किसी वृक्ष में भ्रम पड़ने से मनुष्य का हस्त-मस्तकादि दिखायी देने की भाँति अभेद ज्ञान से अन्तःकरण का धर्म सुखदुःखादि आत्मा में झलकता है। कपिल ने तीन प्रमाण माने हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। इन्द्रिय से जो भान पाता, उसका करण प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाता है। घटादि विषय के साथ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इन्द्रिय का सम्बन्ध लगने से अन्तःकरण में विषयाकार परिणाम उत्पन्न होता है। वह परिणाम अत्यन्त निर्मल रहता है। फिर उसमें स्वप्रकाश आत्मा प्रतिबिम्बित होने से सकल विषय अनुभव करता है। व्याप्तिज्ञान के लिये ज्ञान को अनुमिति कहते हैं। अनुमिति का करण ही अनुमान प्रमाण है। जो हेतु साध्य का अव्यभिचारी रहता (साध्यशून्य स्थान नहीं होता), उसी में साध्य के सामानाधिकरण्य (साध्याधिकरण में उसी हेतु के अस्तित्व) को व्याप्ति कहते हैं। फिर साधन किये जाने वाले का नाम साध्य है। जैसे "पर्वतो वह्निमान् धूमात्" अर्थात् 'धूम से पर्वत वह्निमान् है' स्थान पर पर्वत में साधन किये जाने से वह साध्य ठहरता है। जिसके द्वारा साध्य का साधन करते, उसी को हेतु कहते हैं। जैसे धूम है। कारण धूम देखकर ही पर्वत में वह्नि का साधन किया जाता है। वह्निशून्य स्थान में धूम नहीं रहता। किन्तु वह्नि के अधिकरण में धूम का अस्तित्व होता है। अतएव इस धूम में वह्नि की व्याप्ति पड़ते कोई विरोध नहीं पाता। शब्द से होने वाले ज्ञान के करण को ही शब्दप्रमाण कहते हैं। कपिल वेदान्ती की भाँति एक जीववादी नहीं। इनके कथनानुसार सकल का एक जीवात्मा मानने से राम को सुख मिलने पर श्याम भी उसे अनुभव कर सकता है। नैयायिकादि की भाँति सांख्य पण्डित आत्मा में दुःख और सुख का होना नहीं मानते। वह विषय में ही सुख और दुःख स्वीकार करते हैं। यदि विषय में सुख एवं दुःख न रहता, तो अभिलषित विषय मिलते ही सुख और अनभिलषित विषय से दुःख न पड़ता। अभिलषित विषय में सत्त्वगुण के उद्भव से सुख और रजोगुण के उद्भव से दुःख होता है। कपिल ने सांख्यसूत्र में वेद का प्राधान्य स्वीकार किया है। किन्तु ईश्वर का अस्तित्व इन्होंने नहीं माना। सांख्यसूत्र के मत से अस्तित्व मानने पर ईश्वर को जगत् का कर्ता कहना पड़ेगा। ऐसा होने से विषम सृष्टिकारी ईश्वर मनुष्य की भाँति पक्षपाती ठहरता है। किसी मत से ईश्वर के लिये एक को सुखी और दूसरे को दुःखी करना उचित नहीं। क्योंकि noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> cjlntez185sfqougzve6nsrgn7z46ku पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४ 250 101961 664911 367232 2026-07-04T13:14:42Z Sweta rani Gupta 6713 664911 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बैजनाथ चौधरी" /></noinclude>{{rh|८| कपिलक-कपिललौह}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ईश्वर सक सके निकट समान है। अयस्कान्त मणि में चेतन सम्बन्ध न रहते भी लौह आकर्षण करने वाली प्रवृत्तिको भाँति चैतन्यमय ईश्वर अचेतन प्रकृतिको सृष्टि रचने में लग सकता है। कपिल के कथनानुसार जब अन्तःकरण प्रकृति में लीन हो जाता, तब पुरुष मुक्ति पाता है। अन्तःकरण बना रहने से पुरुष को मुक्ति नहीं मिलती। कपिल के ही कोपानल में सगर राजा का वंश ध्वंस हुआ था। कोई सगर-नाशक कपिल को स्वतन्त्र बताता है। १७ ब्राह्मण-सम्प्रदायविशेष। यह अपने को कपिल वंशोद्भव बताते हैं। सूरत, भड़ौच और जम्बूसर में कपिल ब्राह्मण रहते हैं। कपिलक (सं० वि०)** कप-घुरच् स्वार्थे क, रस्य-लः। १ कम्पान्वित, काँपने वाला। २ कपिल, भूरा, तामड़ा। *(पुं०)* ३ पिङ्गलवर्ण, भूरा रंग। कपिलदेव-नर्मदा और महीसागर का मध्यवर्ती तट-कूल। स्कन्दपुराणोक्त रेवाखण्ड के मत से यह अति पुण्यस्थल है। सूर्य,सूरज| कपिलगणिका (सं० स्त्री०)कपिलगङ्गा, कामरूप की एक नदी। (कालिकापु० ८३।१४६) इसका वर्तमान नाम कपिली है। कपिलच्छाया (सं० स्त्री०)मृगनाभि, कस्तूरी, मुश्क। कपिलता (सं० स्त्री०)१ शूकशिम्बी, केवांच। २ भूरापन। कपिलदेव (सं० पुं०)किसी स्मृतिशास्त्र के प्रणेता। कपिलद्युति (सं० पुं०) कापिला रक्ता पिङ्गलवर्णा वा द्युतिर्यस्य, बहुव्री०। सूर्य, सूरज। कपिलद्राक्षा (सं० स्त्री०)कपिला कपिलवर्णा द्राक्षा, कर्मधा०। कपिलवर्ण बृहद् द्राक्षाविशेष, एक बड़ा और तामड़ा अँगूर। इसका संस्कृत पर्याय- द्रोणिका, अक्षा, गोस्तनी, कपिलफला, अमृतरसा, दीर्घफला, मधुवल्ली, मधुफला, मधूली, हरिता, क्षारधारा, सुफला, मृद्वी, हिमोत्तरा, पथिका, हेमवती, शतवीर्या और काश्मीरी है। यह मधुर, शीतल, वृष्य तथा मदहर्षद और दाह, शूल, ज्वर, श्वास, तृष्णा एवं छर्दि (वमनवेग) निवारक होती है। (राजनिघण्ट) <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कपिलदामोदर-संस्कृत के एक प्राचीन कवि। {{Right|(सुभाषितावली)}} कपिलद्रुम (सं० पुं०) कपिलाः कपिलवर्णा द्रुमाः मध्यपदलो०। काङ्क्षीनाम सुगन्धकाष्ठ, एक खुशबूदार लकड़ी। कपिलद्वीप-एक पवित्र तीर्थ। यहाँ भगवान् की अनन्तमूर्ति विराजती है। कपिलाधारा (सं० स्त्री०) कपिलानां धारा दुग्धधारा श्वेतशुद्धा धारा यस्याः कपिलानां दुग्धधाराभिः सम्भूता निर्मला धारा यस्याः इति वा, आकारस्य ह्रस्वत्वम्। <Small>छन्दसो यत्त्वम्। पा ६।३।१०९। १ गङ्गा।</small>तीर्थ २ सौधविशेष। (काव्य० ६३।१०) ३ कपिला गाय के दुग्ध की धारा। कपिलफला (सं० स्त्री०) कपिलं फलमस्याः, वहुव्री०। कपिलद्राक्षा, अँगूर। कपिलमत (सं० क्ली०) कपिलस्य मुनेर्मतम्, ६-तत्। कपिलमुनि वा सांख्यदर्शन का मत। कपिलासंगम देवी। कपिलमुनि (सं० पुं०) बङ्गाल प्रान्त के खुलना जिले का एक ग्राम। यह कपोताक्ष (कवदका) नदी के तट पर अवस्थित है। पूर्वकाल में कपिल नामक किसी साधु ने यहाँ कपिलेश्वरी देवमूर्ति स्थापन की थी, उन्हीं के नामानुसार यह स्थान कपिलमुनि कहाया। चैत्र मास में वारुणी के दिन कपिलेश्वरी देवी का महोत्सव होता है। फिर उसी समय मेला भी लगा करता है। वारुणी को यहाँ कपोताक्ष नदी में स्नान और देवीदर्शन करने से अशेष पुण्य मिलता है। इसके उपलक्ष्य में नाना स्थानों से तीर्थयात्री आते हैं। जाफर अली नामक निवासी मुसलमान पीर की यहाँ सुन्दर मसजिद बनी है। यह ग्राम अक्षां० २२.४१ उ० और देशां० ८९.२१ पू० पर पड़ता है। कपिलभट्ट-संस्कृत के एक प्राचीन कवि। (सुभाषितावली) कपिललिङ्ग-लिङ्गविशेष। यह मेघना नदी के पूर्व तट से प्रायः दो हजार हाथ दूर नरयास के निकट अवस्थित है। (म० अनसूया १४) कपिललोह (क्ली०) पीतल, पीतन। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1hd4up26mi4vsww4uplkee7rn754ajx पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५ 250 101962 664914 367234 2026-07-04T13:42:01Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 664914 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{Rh||कपिलवस्तु -कपिलाक्षौ| ५}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> कपिलवस्तु (सं० लो०) प्राचीन नगरविशेष। यह शाक्य-राजाओं की राजधानी रहा। शाक्यसिंह ने यहीं जन्मग्रहण किया था। बौद्धग्रन्थ पढ़ने से समझ पड़ता—बुद्धदेव के समय कपिलवस्तु में विस्तर व्यक्तियों का वास रहा। सुन्दर राजप्रासाद, मनोहर उद्यान और असंख्य सुरम्य हर्म्य स्थान स्थान पर शोभित थे। फिर यहाँ नाना देशीय लोग आते-जाते रहे। < Small>शाक्य देखो।</small> प्रसिद्ध चीन-परिव्राजक फ़ाहियान और ह्वेन सियङ्ग कपिलवस्तु देखने आये थे। उन्होंने आनुपूर्वी से "ची-लो-इ" और "कि-पि-ली-फ-व-ति" नाम पर इस स्थान का उल्लेख किया है। ह्वेन सियङ्ग की वर्णना से समझते कपिलवस्तु एक क्षुद्रराज्य और परिमाण का फल प्रायः ६०० मील (४००० लि) है। उभय परिव्राजकों के समय कपिलवस्तु की अवस्था नितान्त शोचनीय हो गयी थी। पूर्व जो-जो स्थान समृद्धिशाली रहे, वही उनको जनमानवशून्य मरुप्राय देख पड़े। यहाँ तक, कि उस समय शाक्य-राजधानी कपिलवस्तु नगर की पूर्वी छटा देखने में आती न थी। नगर का प्राचीन इष्टकनिर्मित प्रासाद टूटा-फूटा पड़ा रहा। उसके निकट हीनयान मतावलम्बियों का एक संघाराम था। सिवा इसके हिन्दुओं के दो मन्दिर भी रहे। प्रासाद के मध्यस्थल में शुद्धोदन राजा की प्रस्तरमूर्ति थी। उससे थोड़ी दूर पर बुद्धजननी मायादेवी का अन्तःपुर रहा। फिर नगर के इधर उधर अनेक स्तूप देख पड़ते थे। वर्तमान फैजाबाद से घर्घरा एवं गण्डकी नदी के मध्यवर्ती स्थान और दोनों नदी के सङ्गम पर्यन्त चीनपरिव्राजक-वर्णित कपिलवस्तु राज्य समझ पड़ता है। फैजाबाद से २५ मील उत्तर-पूर्व अवस्थित बस्ती जिला के अन्तर्गत मन्सूर परगने का सामोल भुइला स्थान ही प्राचीन कपिलवस्तु नगर माना गया है। आजकल सब लोग उसे 'भुइला ताल' कहते हैं। <Small>(Cunningham's Arch. Survey of India, Vol. XII, P. 83-172.)</small> कपिलशिंशपा (सं० स्त्री०) कपिला पिङ्गलवर्णा एक Vol IV 2 <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> शिंशपा, कर्मधा०। शिंशपा वृक्षविशेष, भूरी सीसम। इसका संस्कृत पर्याय—कपिला, पीता, सारिणी, कपिलाक्षी, भस्मगर्भा और कुशिंशपा है। राजनिघण्टु के मत से यह तिक्त एवं शीतवीर्य और आमवात, पित्त, ज्वर, वमन तथा हिक्कानाशक है। कापिलसंहिता (सं० स्त्री०) एक उपपुराण। इसमें उत्कल देश के तीर्थों का माहात्म्य वर्णित है। कपिलमति (सं० स्त्री०) कपिलप्रणेता स्मृतिः, मध्यपदलोपी। सांख्य शास्त्र। वेद के अर्थ का अनुभव रहने और मुनिप्रणीत ठहरने से सांख्यशास्त्र का स्मृतित्व माना जाता है। <Small>"कपिलमतेरनाप्तोक्तत्वदोषमाशङ्कयाह स्मृत्युन्तरानवकाशदोषात् सांख्यमतं प्रत्याख्यातम्।" 'स्मृत्यनवकाशदोष इत्यादि सांख्य' (सांख्यसूत्रभाष्य)</small> कपिला (सं० स्त्री०) कपिलो वर्णो ऽस्यास्ति, कपिल अर्शादित्वात् अच-टाप्। १ पुण्डरीक नामक दिग्गज की पत्नी। २ भस्मगर्भा शिंशपावृक्ष, भूरी सीसम। ३ रेणुका नामक गन्धद्रव्य, एक खुशबूदार चीज़। ४ स्वर्णवर्णा गाय। ५ दक्षकन्या। ६ सिंहकन्या। ७ कामधेनु। ८ शिंशपा, सीसम। ९ राजरीति, किसी किस्म का पीतल। १० कामरूपस्थ नदीविशेष। (कालिकापु० ८५ अ०) ११ मध्यप्रदेश के अन्तर्गत एक नदी। यह नर्मदा नदी से मिल गयी है। <Small>"आपगा कपिला नाम व्यूष्टा नर्षि देवसः।<br> नर्मदा सङ्गमस्तत्र रुद्रावर्तः प्रकीर्तितः" (रेवाखण्ड १०)</small> कपिला और नर्मदा नदी का सङ्गमस्थान रुद्रावर्त कहलाता है। रेवाखण्ड के मत में यहाँ स्नानध्यानपूर्वक महेश्वर की पूजा करने पर अक्षय स्वर्ग लाभ होता है। १२ तीर्थविशेष। १३ श्यामलता। १४ विशाल देश का एक ग्राम। (भ० ब्रह्मखण्ड ४८।९) १५ निर्विषजलायुका, १६ कृच्छ्रसाध्य लूताभेद, मुश्किल से आराम होने वाली मकड़ी। १७ कपिलवर्णा, भूरी। कपिलाक्षी (सं० स्त्री०) कपिलं कपिलवर्णं अक्षि व पुष्यं यस्याः। १ मृगैर्वारु, किसी किस्म का सफेद हिरन। इसकी आँखें भूरी होती हैं। २ कपिलशिंशपा, भूरी सीसम। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 061jj50f3atl1g8mwt5qkydwm8c7u4e पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८४ 250 106257 664964 373116 2026-07-05T01:08:42Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664964 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कान्सलौह-कान्ति| ३८५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} घृतकुमारीके रस में दो प्रहर घाट सामके पाव छोटौ बोटी गोसी बना रखना चाहिये। फिर यह मोलियां दोपहर एरडपत्र दारा पाच्छादित रखनेसे उष्ण हो जायेंगी। उस समय इन्हें धान्यराशिके मध्य तीन दिन तक रख चूर्ण कर लेते हैं। यह चूर्ण कपड़ेसे छान जसमें डालनेसे उतरा पायेगा। कातलोह (संक्ती.) कान्स मनोरम सौहम, कर्मधा। कान्तलौर, ईसपात। कान्तलो देखो। कासा (सं० स्त्री०) काम्यते प्रसौ, कम-पिच--टाम्। १ पत्री, बीवी। २ सुन्दर स्त्री, खूबसरत औरत। ३ प्रियङ्ग, एक खुशबूदार वैत । ४ स्थूलैला, बड़ी इलायची। ५ रेणुका, बान। नागरमुस्ता, नागर ७ विसन्धिपुष्प वृक्ष, एक फलदार पेड़। ८खेत दूर्वा, सफेद दूच । ८ वाराहीकन्द, एक डा। १. पाकायवी, एक वेत। ११ मूषिकपर्णी, एक बूटी। कासार-विहार प्रान्तके सुजफ्फरपुर जिले का एक ग्राम। यह मुजफ्फरपुरसे ४ कोस दूर पक्षा० २६ १५.३० पौर देशा० ८५.२.३०पू० पर अवस्थित है। यह नीलका व्यवसाय अधिक होता है। कान्ताहि दोहद (सं• पु०) कान्ताया पहिणा धरण. स्पर्थन दोहदा पुष्पोद्गमी यस्थ, बहुव्री। प्रशाक बच। कामाचरणदोहद, पयोक देखो। शान्तायस (सं० लो०) प्रय एव, पायसम नाथे पण; कान्तं पायसम, कर्मधा०। १ तुम्बक लौह, सा २ मिकनातीस। २ कान्तीह, एक तरडका चोहा। कान्तार (सं० पु.ली.) कस्य सुखस्त्र पन्त ऋच्छति गच्छति कान्ता मनोज तिवा, वान्त-ऋ-अण् । १ वन, जल। २ पद्मविशेष, किसी किस्यका कंवल । ३ कोविदार इच, कचनारका पेड़। ४ वंश, बांस । ५ महावन, बड़ा जङ्गल । । दुर्गम-पथ, मुश्किल राहा ७ गते, गा।छिद्र, छेदार दुर्भिक्ष, कहत। १. पारग्वधव, अमलतासका पेड़। ११ौप सर्गिक रोग, छोटी बीमारी। १२ साधारण पन अख। . ११रले विशेष, कतीरा। -भावप्रकाशके मसमे यह {{Rh|Vol.|IV,| 97}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गुरु, सारक पौर शरीरको स्थसता, अक्र तया मेमा-वधिकारक। काम्सारक (सं० पु.) कान्तार खायें कन्। रहो.र. विशेष, कतीरा। कान्तारग (सं० वि०) कान्तार गच्छति, कान्तार- गम-ड। वनको गमन करनेवाला, मो जङ्गलको नाता हो। कान्तारपथ (सं. पु.) कासारात: पन्याः, मध्य-पदली। बनमार्ग, जङ्गली राह। कान्तारपथिक (सं० वि०) कान्तारपर्थन पाहतम्, कान्तार पथ-ढन ! पावप्रकरणे पारिनालस्थववाधार पदादुपसखानम्। पा 0000-वार्तिक । १ वनपथद्वारा मोथा। पाहत, जङ्गली राहसे लाया दुवा।२ वनपथसे गमन-कारी, जावो राह जानेवाला। कान्तारवासिनी (सं० स्त्री०) कान्तार वासोऽस्तास्वाः,कान्तर-वास इनि-डीए। १ दुर्गा। २ वनवासिनी जयमें रहनेवाली औरत। कान्तारि (सं० पु.) वाचारो देखो। कान्तारिका, वाचारी देखो। कान्तारी (सं० स्त्री.) कान्तार डीप् । १मधिका मक्खी। मषिका देखो। २ विशेष, कान्सार (सं.पु.) विशेष, कतौरा. कान्तासक (सं० पु.) नन्दोतव, एक पेड़ । कान्ति (सं. स्त्री०) कम् भाव बिन्। १दीप्ति, चमक । २ भोभा, खूबसूरती। इसका संस्कृत पर्याय-योभा, धुति, दीप्ति, कवि, सभा, मासा, भा पौर पमिख्या है।३ नो-शोभा, औरतकी खबसूरती । पयौवनवासिव भोमायराभूषणम् । योमा मौला मय कान्तिमन्मवाप्यायिका द्युतिः" । (साडिव्वइपंच ) रूप तथा. यौवनके लालित्वं पौर पखारादिसे होनेवाले सौन्दर्य की शोमा कहते हैं। यही थोमा काम चेष्टा विशिष्ट रहनेसे 'कांति' कहाती है।.४ इच्छा, खाबिया ५ कामपनि विशेष। ६ दुगा। ७ गङ्गा । चन्द्रको एक कचार चन्द्र की एक स्त्री। वाराही. कन्ह एकया। महामनवृष, खोबानका पेड़।<noinclude></noinclude> 7d647jpj5v3d4xov6zqmb80spvwfru4 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८५ 250 106260 664980 373119 2026-07-05T07:56:00Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 664980 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कान्तिक-कान्दाहार|३८६}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} क्रान्तिक (सं• को०) कान्त्या कान्ति पाख्यया कार्यात् । श्राद्धयते, कान्ति-के-क । कान्तलौड़, एक लोहा। कान्तिकर (सं० लो०) कान्तिं करोति, बान्तिम-ख। कान्तिवर्धक, खूबसूरती बढ़ानेवाला । कान्तिद (सं० लो०) कान्ति यति नाथयति कान्ति- दा-क । १ पित्त, सफर, जर्द-भाव। त, घो। (नि.) कांति ददाति, कांति-दा-क। २ शोभावर्धक, खूब- सूरती बढ़ानेवाला। कांतिदा (सं०स्त्री०) कांतिद-टाप् । सोमराजी, बकुची। कांतिदायक (सं०क्लो०) कांतिं ददाति, कानि-दा-खुल। -१ कालीयक, चन्दनक्ष। (त्रि.) २ शोभादायक, रौनकबखध। कान्तिनगरी (सं० स्त्री० ) काञ्चीनगरी, काजीवरम् । कान्तिपुर (सं० लो०) १ नेपालकै अन्तर्गत एक नगर । आजकल नेपालको राजधानी काठमांडू है। पहले उसोको कान्तिपुर सहते थे। नेपालके राजाओंको वंशावली देखनेसे मालूम होता है कि, राजा लक्ष्मीनरसिंह मलने नेपानी-संवत् १५ (१५८५ ई०)को गोरक्षनाथको पूनाके, लिये एक वृहत् काष्ठमण्डप बनाया था। सदनन्तर कान्तिपुरका नाम काठमांडू पड़ गया। स्कन्दपुराणके कुमारिका- खण्डमें लिखा है, कि कान्तिपुरमें नव नप ग्राम थे। २ग्वालियर राज्यका एक नगर। उसका वर्तमान नाम काटवार है। पश्चिन् नदी के तौर वह पवस्थित ।प्रभासखण्डके मतसे वहां जनप्रिय नामक.देव विराजते हैं। कान्तिभृत् (सं.वि. ) कान्तिं विभति, कान्ति भू. विप। १ कान्तिविशिष्ट, रौनकदार । (पु.)२चन्द्र, चांदा। कान्तिमतीकाचीपुरके चोल राजा सोमेश्वरको कन्या और पांघराज उग्रयांद्यको पट्टमहिषी। . कांतिमत्ता. (सं. स्त्री०) कांतिमतो भावः कांतिमत्- तल्टाप् । कांतिविशिष्टता.. रौनकदारी। कांतिमान् (सं. पु०.) कांति: प्रशस्येन प्रस्त्यस्य, विषभेद, कांति-मतप ।।१ चन्द्र, चांद । २कामदेव । (वि) ३ कांतियुख, रौनकदार। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कातिवक्ष (सं० पु. ) महासजवध, लोबानका पेड़। कांतिहर (सं० वि०) कांति हरति नाशयति, कांति- हु-ख । कांतिनाशक, रौनक घटानेवाला। कांतीनगरी (सं० स्त्रो०) कान्तिपुर देखो। कांतोत्याड़ा (सं० स्त्री० ) छन्दोविशेष। इसमें बारह बारह माताके चार चरण होते हैं। कांतोली (सं० स्त्री० ) कुष्माण्डको सुरा, कुम्हड़े की शराब। कान्यक (सं० वि०) वणु नदसमीपस्थ कन्यात् जातः, कन्या-वुक । वर्षानुन् । या ४।२।१३। वर्गु नद समीपस्थ कन्यानात, वर्णनदौके पासको एक जगहका। कांधक्य : ( सं०. पु० ) कन्यकस्य ऋपः गोवापत्यम, कन्यक-यञ्। कन्यक ऋषिके वंशीय। कान्यक्यायन (सं० १०) कन्धकस्य ऋषेः गोवापत्यम् कन्थक-य-फा । कन्धक ऋषिके वंशीय। कान्थिक (सं० त्रि०) कन्यायां जातः, कन्या-ठक । कन्यायाठक ४॥ २।१२। कन्याजात, कथरी में पैदा हुवा। / कान्द . ( सं० वि० ) कन्दस्य इदम्, कन्द-प्रण। १ कन्द-सम्बन्धीय, इलेके मुतालिक । २ कन्दजात, डलेसे पैदा । (लो) ३ पक्काबविशेष, एक मिठाई। कान्दप . ( सं० पु. ) कन्दपस्य अपत्यं पुमान, कन्दप-अन् । १ कन्दपके पुत्र, पनिरुद्ध। (नि.) २ कन्दप-सम्बन्धीय। कान्दपिक (सं० लो०) मन्दाय कन्दपवये प्रयो- जनमस्य, कन्दप ढक । वाजीकरण, ताकत बढ़ाने- वाली चीज़। : कान्दव (सं० को०) कन्दो संखतं भच्यम्, कन्दु-प्रण । पिष्टकादि भोज्य वस्तु, राटी पूरीको तरह कड़ाहो या तवे पर भूनी या.सेको हुई खानेको चीज़ । कोंदविक (सं० वि०) कांदवं पखं अस्य, कांदव-ठक् । सदस्ख पचाम् । १. पिष्टकविक्रेता, पूरी मिठाई बेचनेवाला। (पु.) २ बाई, कंदोई। कांदाविष (म को• ) कांदविष छांदलात् दोघ। किसी तरहका जहर। कान्दाहार. (कंधार), अफगानस्तानका एक प्रदेय । एटर प्रति पाचात्य परिहतोंक मतये, सभार .<noinclude></noinclude> pc9k9wo1wqfe2y0d1wi1euoj24buhyu पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०० 250 107473 664982 375223 2026-07-05T08:26:09Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 664982 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||कायस्थ|५०१}} {{Multicol|line=1px solid black}} है। उनसे अयोध्या, काशी, इसाहापाद, मिर्जापुर, गोरखपुर, प्रकृति स्थानिमि ही लोग बहुत रहते हैं। भटनागर-अपनेको चित्रगुप्तके पुत्र चित्रका सन्तान बताते हैं। उनमें कोई कहता कि पूर्वकाल भट नदीक तौर रहनेसे ही उस नाम पड़ा है। फिर किसीके मतमें महमूद गजनवी, तैमूर और हुमायके पुत्र कामरानने दुर्ग अधिकार करनेके लिये भटनगरमें प्राणपणसे युद्ध किया था। ससी इतिहास प्रसिद्ध करते हैं। भटनगरमें जी लोग रहे, वह भटनागर नामसे विख्यात हुवे। उनमें दो श्रेणी हैं-भटनागर कदीम या पुराने और गौड़कायस्थी में मिल ननिवाले भटनागरी। यसेन-'सखिसेना से ही अपने नामको उत्पत्ति बताते हैं। उनके पूर्वपुरुषोंने वीरत्व दिखा श्रीनगरके श्रीवास्तव्य राजावोंसे उक्त उपाधि पाया था। प्रवात प्रस्तावसे जिन्होंने शक राजावोंके सेनाविभागमें तिल दिखाया, उन्हींका वंश 'शकसन' कहाया। प्राचीन शिलाम्मिपि शक्सेननातीय कायस्थ ठक्कर नाम लिखा है। यकसेनों में भी सुरे' और 'दूसरे दो कुन्न हैं। प्रवादा नुसार उक्त थेगोंके सोमदत्त नामक कोई व्यक्ति कुपके कोषाध्यक्ष थे। शकसैन कहते कि उन्हीं कुशने प्रीत हो सोमदत्तको खर अर्थात् सत् सम्बोधन किया था। उनके वंशधर इसीसे 'खरे' कहे जाते हैं। दूसरा गल्प भी है-अकबरके पिता हुमायूं जब ईरान भाग गये, पड़ता कि भारतके पश्चिमांश, अम्बष्ठ नामक एक तब उनके साथ कितने ही शकसेन मी रहे। ईरानमें उन्होंने १६ वर्ष व्यतीत किये। लौटने पर भारत वर्षके शकसैन उनके साथ भोजन करनेको सम्मत न हुवे। इसी प्रकार ईरानसे प्रत्यागत शकसेन और उनके वंशधर दूसरे' अर्थात् हेय समझे गये। शकचेन अपनेको चित्रगुप्त-पुत्र मतिमान्का वंशधर अम्बष्ट बताते हैं। उनका प्रषिक वास इटावा जिले में है। कन्नौज राना जयचन्द्र के मरने पर शकसेन समर सिंहके अधीन इटावेमें जा कर बसे थे। उनके पादिः पुरुष पुष्करदास और निर्मलदासने समरसिंहक निकर जागीरमें कई गांव और चौधरी पदको लाभ किया। उनके वंशधर समरसिंहके समयसे अंगरेजी Vol. IV, 126 <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अधिकार पर्यन्त पुरुषानुक्रममें इटावेशी कानूनगोई करते रहे। इटावक उक्त शकसेन कायस्थ वंशमें ही प्रसिद्ध वीर राजा नवलरायने जन्म लिया था। वह फरुखाबादवाले बङ्गम-मदाबके वजीर और प्रधान सेनापति रहे। उन्होंने अनेक स्थानमें युद्ध कर जो वीरत्व टिखाया, वह प्रशंसनीय कहाया है। इटावेके भाट आज भी राजा नवसरायकी वीरगाथा गाया करते हैं। अष्ठिान-अपना परिचय चित्रगुप्तपुत्र विश्व- भानुके नामसे दिया करते हैं। अहिठाम नाम कैसे बना है? उसके सम्बन्धमें एक गल्प सुनते हैं- वाराणसी में बनार नामक एक विख्यात राजा रहे। उन्हें उक्त श्रेणीक पूर्वपुरुषोंने अष्टप्रकार मुक्ताका उपहार दिया था। उससे अष्टान (पहिठान) नाम चल पड़ा। उनमें पूर्वी और पश्चिमी दो भेदं हैं। पूर्वी जौनपुर तथा उसके निकटवर्ती स्थान और पधिमी लखनऊ एवं उसके पासपास वास करते हैं। उभय श्रेणियों में पान-भोजन प्रचलित नहीं। अन्वष्ठ-अपनेको चित्रगुप्तके पुत्र हिमवानका. वंशधर बताते हैं। प्रवाद है उनके पूर्व पुरुष गिरनार पर्वत पर जा कर रहे और वहां पम्बादेवोकी पूजा करने पर 'पम्बष्ठ' नामसे परिचित हुवे। स्कन्द. पुराणीय साट्रिखण्ड और विष्णुपुराणसे समझ जनपद रहा। बहुत सम्भव है कि उसी स्थानके अधिवासी कायस्थ पम्बह नामसे ख्यात हुये। ग्रीक (यनामो ) ऐतिहासिक पारियानने उनका नाम अम्बष्ठो ( Ambastae) लिखा है। अम्बष्ट बहुतमे, बङ्गालमें भी जा कर रहने लगे हैं। सत प्रदेशक कायस्थोंका आचार-व्यवहार माहमणों से मिलता है। Home's Memorandum on the Castes of Eta, p. 87. Journ. As. Soc. Bengal, Vol. XI-VIII, pt. L p. 50-66. नवनायका विस्तृत विवरण द्रष्टव्य है।<noinclude></noinclude> 6aapn0z3dihsg2bj55kh025vzu2pszp पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०१ 250 107475 664987 375225 2026-07-05T09:06:11Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 664987 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५०२|कायस्थ}} {{Multicol|line=1px solid black}} बानोक कायस्य-चित्रगुप्तपुत्र विभानु वा वीरभानुके सन्सान कहाते हैं। विभानुके तपस्याकान शरीर में वल्मीक उत्पन्न हुवा था। उसीसे उन्हाँ पीर उनक वंशधरोनि 'वाल्मीक' नाम पाया। उनमें तीन श्रेणी हैं। बम्बईसे शनिवाले 'बम्बैया', कच्चसे आनेवाले 'कच्छो', और सुराष्ट्रने अनिवारी 'सौरठी' कहाते हैं। वाल्मीकोंमें कुछ कुछ दाक्षिणात्यका आचार-व्यवहार भी प्रचलित है। माथ र-कायस्थोंका नाम मथुराक वाससे पड़ा है। वह अपनेको चित्रगुप्तके पुत्र चारुका दंशधर बताते हैं। उनमें भी तीन श्रेणियां देख पड़ती हैं -दह नवी, कच्छी और नचौली। दिल्ली में रहने 'देहलवी', कच्छमें रहनेवाले 'कच्छी और यधपुर में रहनेवाले 'लचौली' नामसे परिचित हैं। लचौलियों को यचौकी भी कहते हैं। उनके कथनानुसार यावर वा मरुदेशमें पूर्वकालको पञ्चनामक एक राजा थे। उन्होंसे पञ्चौली नाम निकना है। फिर किसीके मतमें पच्चाल देशः 'पञ्चानी' वना है। सूर्यध्वन-अपना परिचय चित्रगुप्तपुत्र विभानु के नाम उनका कहना है कि इक्ष्वाकुवंशीय राजा वगराज्य सूरसेनने यन्जकाल विभानुको साहाय्य करनेसे 'सूर्य ध्वज' उपाधि दिया था। उनका प्राचार-व्यवहार कुछ कुछ ब्राह्मणोंसे मिलता है। कुलगेट-कायस्थ चित्रगुप्तपुत्र पतीन्द्रियके सन्तान हैं। उता श्रेणीके कायस्थ कहा करते कि जितेन्द्रिय नामसे देते हैं। वनइन जब बवान पहुंचे, तब (अतीन्द्रिय) परमधार्मिक रहे। वह प्रति वर्ष अपने भाइयांका बुताकर उनके पैर धो देते थे। उनका ‘काल पूरा होने पर यमदूतोंने जा कर पूछा-'क्या पाप अव स्वर्ग जाना चाहते हैं। जितेन्द्रियने उत्तर अन्तर्गत निजामाबाद, भदोई, कोलो, धापी और दिया कि वह अविलम्व खर्ग जाना चाहते थे। उसी समय स्वर्गसे विमान उतर पड़ा। जितेन्द्रिय विमान पर चढ़ कर अग्निलोक पहुंचे। अग्निसोकरी प्रजा- पतिलोक होते हुए ब्रह्मलोकमें जाकर उन्होंने अनन्त मुखभोग किया । पपना , कुन्त उज्ज्वल करनेसे ही उनके बंधधरोंने 'कुलश्रेष्ठं- उपाधि पाया <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> है। उनमें 'वरखेग' और 'इवेग दो श्रेणियां है। उक्त दोनो श्रेणियों में पानाहार प्रचलित नहीं। करप-कहते कि नर्मदानीर बानि नामक एक ग्राम है। उसी ग्राममें उनके पूष्पुरुषोंके वाम करनेसे 'करण' नाम पड़ा है। उनमें भी दो श्रेणियां हैं-गयावान और लिरहतिया। गयाम गयावाल पौर बिहुनसे निरनिया गाग्वाका नाम- करण हुवा है। करण शाम्य प्रायः उड़ोमामें ही रहते हैं। गौड़-कायस्य नाम गोड़देशत्री प्राचीन राजधानी गोड़से निकन्ना है। वह करने कि उनके पूर्व पुरुष भगदत्त कुरुक्षेत्रके महामसर, निहत हुए थे। गौड़कायस्थों में ही कालरेन वा कामसेन नामक एक राजकुमार रहे। कायनों में आज भी उनकी पूजा होती है। कायस्व-कन्याके विचार-कान प्रदीप कन्जनसे एक मूर्ति प्रहित की जाती है। उमौकी कान- सेनको मूर्ति मान लोग पूजा करते हैं। गौड़कायस्थ कहते और उनके कुरसीनामे में भी रहते कि गौड़ाधिप सेनरान उक्त कायस्थवंशीय ही । मुहम्मद- वखतियार तुर्कने कौशसक्रम नम्बमनियाके निकट अधिकार किया था। मोसे अनेक गौड़.. कायस्थ युतप्रदेश भाग गये। हिमालयस्य मुखेत, मन्दी प्रमृति स्थानके राजा आज मी प्रपनको गौड़- राजवंशीय बताते हैं। प्रकत प्रस्तावमें गौड़कायस्ववंशीय होते भी प्राजकन्न वह अपना परिचय गौड़राजपूत वहांक कायस्थ-राजा पोर जमीन्दार उनके अच्छे सहायक हुवे। उनके पुत्र नसोर-उद-दौन्न गोडसे बहुसंख्यक कायस्खोंशो दुनाकर इनाहाबाद सूबेके विरियाकोट प्रमृति स्थनों में कानूनगोईका पद प्रदान किया था। उनके सभी वंशधर गौड़कायस्थ मह- ज्ञात हैं। Elliot's Races of the X. 15. P. ed. by Besses, TO), II. p. 107; Sir Lepen Griffin's Panjab Rajahs : ani Crook's Tribes and Castes o tine X, W. P. 7. IIL P 192<noinclude></noinclude> agtpiwjxrgdnj8300zytolw8l7fxirf पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०२ 250 107477 664990 375227 2026-07-05T09:34:43Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 664990 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||कायस्थ| ५०३}} {{Multicol|line=1px solid black}} वहां भटनागरोंने गौड़ोसे पहले ही मुसनमानी सरकारके अधीन कार्य को स्वीकार किया था। फिर “मुसलमानोंके संसवसे गौड़कायस्थ मी उनमें मिल गये। भटनागर वाममार्गी रहे। उस . समय उनके साथ सम्मिलित होने पर गौड़कायस्थ भी वाममार्गी बन गए और भैरवीचक्रमें पूजा करने लगे। गौड़कायस्थों ने जब भटनागरांका पाहार करने के लिये निमन्त्रण दिया, तब भटनागग'ने तो उनके घर जा कर खा लिया, किन्तु पौके जब भटमागगेन गौड़कायस्थोंको अपने घर खाने पीने : निए वुन्ताया, सब बहुत थोड़े लोगोंको छोड़ कर अधिकांय गौड़ोंने निमन्त्रणमें जानेसे अपना मुंह छिपाया; फिर जिन लोगोंने भटमागरोंके घरमें जा कर खाया था, उन्हें समाजच्यु त मी ठहराया। इससे भटनागर बहुत चिढ़े थे। उस समय दिल्लीमें नसौर-उद-दीन् समाद रहे। गौड़ और भटनागर उभय श्रेणोके कायस्थ उनके अधीन कर्म करते थे। दिल्लोके भटनागरों ने जब सुना कि उनके ज्ञातिकुटुम्बके धर गौड़कायस्थोंने पाहार किया न था, तब उन्होंने गोडोके घर खाने. वाले सकम्त भटनागरों को समाजच्य त कर दिया। बात ठहर गयो-गौड़ जितने दिन उनके घरमें न खायेंगे, उतने दिन वह भी समानमें मिलाये न आयेंगे। इस पर समाजच्युत भटनागरोंने मुसलमान-सम्राटके निकट नालिश को घो। सम्राटको गौड़कायस्थों के अन्याय आचरणका परिचय मिला। उन्होंने दिल्ली में रहने वाले गौड़ों और भटनागरों को एकत्र आहार करनेके लिये आदेश दिया था। उस समय वाध्य हो दिल्लीवासी अनेक गौड़ों ने भटनागरों के घर जा कर खा लिया। किन्तु कई गौड़ भटनागरों के घर जा कर खानेके दिलो छोड़ कर चले गए। उनमें एक पूर्णगर्भा रमणी रहीं। किसी ब्राह्मणशे घर पाश्रय लेने पर उनके एक चेष्टासे ४थ श्रेणो भी दक्ष में मिन.गयो। पुत्र उत्पन्न हुवा। बड़ा होने पर उसके साथ ब्राह्मणने अपनी कन्याका विवाह कर दिया था। अपरापर गौड़ बदायूं जिलेमें जा कर रहने लगे। भटनागरों के घरमें भोजन करनेवाले गौड़कायस्थ गौड़भटनागरी गामसे ख्यात हुये। मो बदायू भाग <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गये थे, दिल्ली के भटनागरों ने उनके भो त्तान्त सम्राटसे कह दिये। बादशाहने उन्हें पकड़ वुलाने के लिये पादमी मेने थे। उस समय उन्होंने ब्राह्मणों का पाश्रय लिया। राजपुरुष मब पकड़ने के लिये पहुंचे, तब ब्राह्मणों ने उन्हें अपना आत्माय बताया था। किन्तु उससे राजपुरुषां का विश्वास न हुवा । समय ब्राह्मणों को गौड़कायस्था के साथ एक पात्र में खाना पड़ा। इसी प्रकार गौड़ कायस्थ वहां बच गये। अभियुक्तों को निकाल न सकने पर बादशाहने विरक्त हो भटनागरों का आवेदन अपाच किया था। उसीक साथ दूसरे भटनागराने भो उन्हें समानयत कर दिया। उक्त. समाजच्य त भटनागर गौड़भटनागर और दूसरे (गौड़ों का पत्र ग्रहण न करनेवाले) विशुद्ध भट- नागर समझ गये। इसी प्रकार गौड़कायस्थ चार बङ्गालक सीमान्तपर निजामाब.द, जौनपुर..प्रति स्थानों में कानूनगोईका पद भाग करते थे। रय भटनागरों के घर खानेवाले, श्य ब्राह्मणों के घर आश्रय लेनेवाले और ४थं ब्राह्मणग्टहमें पुत्रप्रसव कारिणी रमणोको समान में मिला लेनेवाले हैं। उक्त चारो श्रेणियोंमे पहले पादानप्रदान बन्द रहा। फिर बदाय के गौड़ निजामाबादमें जा कर रहे और बदायूंक ब्राह्मण उनके पुरोहित बने । गौड़ोंने श्य श्रेणीवानों के मिलनेको २य श्रेणौके चेष्ठा की. थी। पहले काई निकला। अवशेषको बदायूं के ब्राह्मणों को चेष्टासे होड़ाहोड़ो मिट गई। यहां कि उभय श्रेणियों में विवाह के समय आदान-प्रदान भयसे चलने लगा। किन्तु ४र्थ श्रेणो बहुदिन कन्यादान करनेको सम्मत न हुई। अवशेषको श्य सेयोको उक्त तीनों श्रेणियों को कुलमें होन समझ उतने दिन अलग रही थी। अन्ततः जंब उसने देख कि तीन श्रेणियां परस्पर मिली हैं, तब वह भी क्रम क्रम सवमें मिलकर एक हो गयो। बाज कल चारो श्रेणियोंम पादान-प्रदान चलता है। गौड़-<noinclude></noinclude> q4k9mqmp87xlg5dmmw4e8m22xexse7m पृष्ठ:आल्हखण्ड.pdf/४ 250 151447 664932 464250 2026-07-04T20:08:38Z Avimaarak 6718 /* शोधित */ 664932 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>== {{larger|'''अथ आल्हखण्ड ॥'''}}{{larger| == === {{larger|'''संयोगिनि स्वयम्बर'''}} === पृथीराज और जयचन्द का युद्ध वर्णन ॥ === सिंहावलोकनछन्द ॥ === बन्दत तोहिं सदा गणनायक जासु कृपा दुख दारिद नाशै। नाशै दारिद दोष सबै उर अन्तर आतमज्ञान प्रकाशै ॥ प्रकाशै आतमज्ञान जबै तब दुःख सबै जगको सुखभाशै । भाशै सुखको दुख सत्य जबै ललिते न तबै यमराजौ फाँशै १ ==== सुमिरन ।। ==== कौरव पाण्डव दोउ दल जूझे करिकै कुरुक्षेत्र मैदान ।। सोई जनमे सब दुनिया में आल्हा ऊदन आदि महान १ जिनकी कीरति घर घर फैली छैलिकै लीन जगतको छाय॥ को यश बरणै तिन क्षत्रिन कै हमरे बूत कही ना जाय २ जैसे थाल्हा रणशूरन को आल्हा ऊदन दीन गड़ाय ।। तैसे छापा सब गुणियन हित मुंशी साहब दीन बढ़ाय ३<noinclude></noinclude> 0xgtgvcbfuw76mqohy49hrp6xnoj6gl 664933 664932 2026-07-04T20:10:37Z Avimaarak 6718 664933 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>== {{larger|'''अथ आल्हखण्ड ॥'''}} == === {{larger|'''संयोगिनि स्वयम्बर'''}} === पृथीराज और जयचन्द का युद्ध वर्णन ॥ === सिंहावलोकनछन्द ॥ === बन्दत तोहिं सदा गणनायक जासु कृपा दुख दारिद नाशै।<br> नाशै दारिद दोष सबै उर अन्तर आतमज्ञान प्रकाशै ॥<br> प्रकाशै आतमज्ञान जबै तब दुःख सबै जगको सुखभाशै ।<br> भाशै सुखको दुख सत्य जबै ललिते न तबै यमराजौ फाँशै १<br> ==== सुमिरन ।। ==== कौरव पाण्डव दोउ दल जूझे करिकै कुरुक्षेत्र मैदान ।।<br> सोई जनमे सब दुनिया में आल्हा ऊदन आदि महान १<br> जिनकी कीरति घर घर फैली छैलिकै लीन जगतको छाय॥<br> को यश बरणै तिन क्षत्रिन कै हमरे बूत कही ना जाय २<br> जैसे थाल्हा रणशूरन को आल्हा ऊदन दीन गड़ाय ।।<br> तैसे छापा सब गुणियन हित मुंशी साहब दीन बढ़ाय ३<br><noinclude></noinclude> 4lu0ad7zam4y8xlpuxe0gz1erug9dy3 664934 664933 2026-07-04T20:16:40Z Avimaarak 6718 664934 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>{{centre|== {{larger|'''अथ आल्हखण्ड ॥'''}} ==}}<br> {larger|'''संयोगिनि स्वयम्बर'''}} === पृथीराज और जयचन्द का युद्ध बर्णन ॥ === सिंहावलोकनछन्द ॥ === बन्दत तोहिं सदा गणनायक जासु कृपा दुख दारिद नाशै।<br> नाशै दारिद दोष सबै उर अन्तर आतमज्ञान प्रकाशै ॥<br> प्रकाशै आतमज्ञान जबै तब दुःख सबै जगको सुखभाशै ।<br> भाशै सुखको दुख सत्य जबै ललिते न तबै यमराजौ फाँशै १<br> ==== सुमिरन ।। ====<br> कौरव पाण्डव दोउ दल जूझे करिकै कुरुक्षेत्र मैदान ।।<br> सोई जनमे सब दुनिया में आल्हा ऊदन आदि महान १<br> जिनकी कीरति घर घर फैली छैलिकै लीन जगतको छाय॥<br> को यश बरणै तिन क्षत्रिन कै हमरे बूत कही ना जाय २<br> जैसे थाल्हा रणशूरन को आल्हा ऊदन दीन गड़ाय ।।<br> तैसे छापा सब गुणियन हित मुंशी साहब दीन बढ़ाय ३<br><noinclude></noinclude> putb2ewvk29k5yok76m4phtuwm3tgd0 664935 664934 2026-07-04T20:17:33Z Avimaarak 6718 664935 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>== {{larger|'''अथ आल्हखण्ड ॥'''}} ==<br> {larger|'''संयोगिनि स्वयम्बर'''}} === पृथीराज और जयचन्द का युद्ध बर्णन ॥ === सिंहावलोकनछन्द ॥ === बन्दत तोहिं सदा गणनायक जासु कृपा दुख दारिद नाशै।<br> नाशै दारिद दोष सबै उर अन्तर आतमज्ञान प्रकाशै ॥<br> प्रकाशै आतमज्ञान जबै तब दुःख सबै जगको सुखभाशै ।<br> भाशै सुखको दुख सत्य जबै ललिते न तबै यमराजौ फाँशै १<br> सुमिरन ।।<br> कौरव पाण्डव दोउ दल जूझे करिकै कुरुक्षेत्र मैदान ।।<br> सोई जनमे सब दुनिया में आल्हा ऊदन आदि महान १<br> जिनकी कीरति घर घर फैली छैलिकै लीन जगतको छाय॥<br> को यश बरणै तिन क्षत्रिन कै हमरे बूत कही ना जाय २<br> जैसे थाल्हा रणशूरन को आल्हा ऊदन दीन गड़ाय ।।<br> तैसे छापा सब गुणियन हित मुंशी साहब दीन बढ़ाय ३<br><noinclude></noinclude> sq1zfuowf0cew6kvlb6rg5mwl5a7b3v 664936 664935 2026-07-04T20:20:18Z Avimaarak 6718 664936 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude> === अथ आल्हखण्ड ===<br> ==== संयोगिनि स्वयम्बर ==== पृथीराज और जयचन्द का युद्ध बर्णन ॥ ==== सिंहावलोकनछन्द ॥ ====<br> बन्दत तोहिं सदा गणनायक जासु कृपा दुख दारिद नाशै।<br> नाशै दारिद दोष सबै उर अन्तर आतमज्ञान प्रकाशै ॥<br> प्रकाशै आतमज्ञान जबै तब दुःख सबै जगको सुखभाशै ।<br> भाशै सुखको दुख सत्य जबै ललिते न तबै यमराजौ फाँशै १<br> ==== सुमिरन ।। ====<br> कौरव पाण्डव दोउ दल जूझे करिकै कुरुक्षेत्र मैदान ।।<br> सोई जनमे सब दुनिया में आल्हा ऊदन आदि महान १<br> जिनकी कीरति घर घर फैली छैलिकै लीन जगतको छाय॥<br> को यश बरणै तिन क्षत्रिन कै हमरे बूत कही ना जाय २<br> जैसे थाल्हा रणशूरन को आल्हा ऊदन दीन गड़ाय ।।<br> तैसे छापा सब गुणियन हित मुंशी साहब दीन बढ़ाय ३<br><noinclude></noinclude> 68u1vx51gc4cqvqn94acnqfnbk9xkcw पृष्ठ:आल्हखण्ड.pdf/४१ 250 151491 664937 464312 2026-07-04T20:22:35Z Avimaarak 6718 /* शोधित */ 664937 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude><noinclude></noinclude> ib9vf1xk5qjicmlbpb3imlm1cejfrx6 पृष्ठ:आल्हखण्ड.pdf/४२ 250 151492 664938 464313 2026-07-04T20:26:42Z Avimaarak 6718 /* शोधित */ 664938 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>अथ आल्हखण्ड॥ महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन॥ सवैया॥ काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ।। स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ।। दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १ सुमिरन ॥ कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ जासों करूँ आल्ह को गान १ नहीं आसरा निजभुजबलको है यहु आल्हा सिंधु अपार ।। डगमग डगमग नैया होवै माता तुही लगावै पार २ रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ जबलग रहे परीक्षित यार ३ अब बृद्धाई अति छाई है गाई जाय नहीं सो यार ।।<noinclude></noinclude> 3fvn72rbfkgg5ddxe922ux9s9ruywrr 664939 664938 2026-07-04T20:28:12Z Avimaarak 6718 664939 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>'''अथ आल्हखण्ड॥'''<br> '''महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन॥'''<br> '''सवैया॥'''<br> काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ।। स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ।। दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १<br> '''सुमिरन ॥'''<br> कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ जासों करूँ आल्ह को गान १ नहीं आसरा निजभुजबलको है यहु आल्हा सिंधु अपार ।। डगमग डगमग नैया होवै माता तुही लगावै पार २ रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ जबलग रहे परीक्षित यार ३ अब बृद्धाई अति छाई है गाई जाय नहीं सो यार ।।<noinclude></noinclude> dcmf81blhk9ofp2aj114x9612xz3aqe 664940 664939 2026-07-04T20:33:02Z Avimaarak 6718 664940 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>'''अथ आल्हखण्ड॥'''<br> '''महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन॥'''<br> '''सवैया॥'''<br> {| class="sortable" |+ कैप्शन का टेक्स्ट |-काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । | उदाहरण |-मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ।। | उदाहरण |-स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ।। | उदाहरण |-दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १ | उदाहरण |}<br> '''सुमिरन ॥'''<br> कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ जासों करूँ आल्ह को गान १ नहीं आसरा निजभुजबलको है यहु आल्हा सिंधु अपार ।। डगमग डगमग नैया होवै माता तुही लगावै पार २ रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ जबलग रहे परीक्षित यार ३ अब बृद्धाई अति छाई है गाई जाय नहीं सो यार ।।<noinclude></noinclude> ms7hn1awcoi3qpt96muquhz0wu6pbpp 664941 664940 2026-07-04T20:33:59Z Avimaarak 6718 664941 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>'''अथ आल्हखण्ड॥'''<br> '''महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन॥'''<br> '''सवैया॥'''<br> {| class="sortable" |+ कैप्शन का टेक्स्ट |- | काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । |- | मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ।। |- | स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ।। |- | दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १ |}<br> '''सुमिरन ॥'''<br> कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ जासों करूँ आल्ह को गान १ नहीं आसरा निजभुजबलको है यहु आल्हा सिंधु अपार ।। डगमग डगमग नैया होवै माता तुही लगावै पार २ रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ जबलग रहे परीक्षित यार ३ अब बृद्धाई अति छाई है गाई जाय नहीं सो यार ।।<noinclude></noinclude> eihar7e6kkmfzow8d8x285fdf02my12 664942 664941 2026-07-04T20:39:09Z Avimaarak 6718 664942 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>'''अथ आल्हखण्ड॥'''<br> '''महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन॥'''<br> {| class="sortable" |+ '''सवैया॥''' |- | काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । |- | मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ।। |- | स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ।। |- | दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १ |}<br> {| |+ '''सुमिरन ॥''' |- | कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि || भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ |- | बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ || जासों करूँ आल्ह को गान १ |- | नहीं आसरा निजभुजबलको || है यहु आल्हा सिंधु अपार ।। |- | डगमग डगमग नैया होवै || माता तुही लगावै पार २ |- | रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ || त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ |- | बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ || जबलग रहे परीक्षित यार ३ |- | अब बृद्धाई अति छाई है || गाई जाय नहीं सो यार ।। |}<noinclude></noinclude> a2h331bs4bgs70yjyhooy6ppcxwaamk 664943 664942 2026-07-04T21:00:47Z Avimaarak 6718 664943 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" 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Avimaarak 6718 664944 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude><gallery> https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:STK-20260705-WA0000_Original.jpg </gallery> <br> {| |+ {{larger|'''अथ आल्हखण्ड॥'''}} |- | {{larger|महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन॥}} |} {| class="sortable" |+ '''सवैया॥''' |- | काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । |- | मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ।। |- | स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ।। |- | दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १ |}<br> {| |+ '''सुमिरन ॥''' |- | कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि || भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ |- | बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ || जासों करूँ आल्ह को गान १ |- | नहीं आसरा निजभुजबलको || है यहु आल्हा सिंधु अपार ।। |- | डगमग डगमग नैया होवै || माता तुही लगावै पार २ |- | रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ || त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ |- | बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ || जबलग रहे परीक्षित यार ३ |- | अब बृद्धाई अति छाई है || 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रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ || त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ |- | बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ || जबलग रहे परीक्षित यार ३ |- | अब बृद्धाई अति छाई है || गाई जाय नहीं सो यार ।। |}<noinclude></noinclude> mbialayauke4a4ts03z9rean0ikx2yw 664946 664945 2026-07-04T21:07:58Z Avimaarak 6718 664946 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude><math display="inline"><gallery> https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:STK-20260705-WA0000_Original.jpg </gallery> <br> {| |+ {{larger| '''अथ आल्हखण्ड॥'''}} |- | {{larger| महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन॥}} |} {| class="sortable" |+ '''सवैया॥''' |- | काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । |- | मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ।। |- | स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ।। |- | दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १ |}<br> {| |+ '''सुमिरन ॥''' |- | कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि || भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ |- | बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ || जासों करूँ आल्ह को गान १ |- | नहीं आसरा निजभुजबलको || है यहु आल्हा सिंधु अपार ।। |- | डगमग डगमग नैया होवै || माता तुही लगावै पार २ |- | रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ || त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ |- | बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ || जबलग रहे परीक्षित यार ३ |- | अब बृद्धाई अति छाई है || गाई जाय नहीं सो यार ।। |}<noinclude></noinclude> jw8hcdimkqxhceeg1re1n53lkjcgyuc 664947 664946 2026-07-04T21:12:49Z Avimaarak 6718 664947 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude> {| |+ {{larger| '''अथ आल्हखण्ड॥'''}} |- | {{larger| महोबे का प्रथमयुद्धवर्णन॥}} |} {| class="sortable" |+ '''सवैया॥''' |- | काको मैं ध्यावों मनावों सदा तुमको तजिकै सुनिये रघुनाथा । |- | मेरे तो एक तुम्हीं प्रभुजी अब काह बनाय लिखों बहुगाथा ।। |- | स्वारथ साथ सबै नरदेत न देत कोऊ परमारथ साथा ।। |- | दीन पुकार करै ललिते प्रभु बेगिकरो जनजानि सनाथा १ |}<br> {| |+ '''सुमिरन ॥''' |- | कण्ठ में बैठो तुम कण्ठेश्वरि || भुजबल बैठिजाउ हनुमान ॥ |- | बैठु शारदा मोरि जिह्वा माँ || जासों करूँ आल्ह को गान १ |- | नहीं आसरा निजभुजबलको || है यहु आल्हा सिंधु अपार ।। |- | डगमग डगमग नैया होवै || माता तुही लगावै पार २ |- | रह्यों प्रतापी मैं सतयुग माँ || त्रेता रह्यों बहुत बरियार ॥ |- | बड़ी बड़ाई भै द्वापर माँ || जबलग रहे परीक्षित यार ३ |- | अब बृद्धाई अति छाई है || गाई जाय नहीं सो यार ।। |}<noinclude></noinclude> 31hyaj1yy70hsg1evy73itcznvn6qr9 पृष्ठ:आल्हखण्ड.pdf/५४ 250 151504 664948 464325 2026-07-04T21:25:19Z Avimaarak 6718 /* शोधित */ 664948 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>{| |+ '''अथ आल्हखण्ड ॥''' |- | '''माड़ो का युद्ध वर्णन॥''' |} {| |+ '''सवैया॥''' |- | श्वेतस्वरूप अनूपमनूप नहीं कोउ रूप कहौं ज्यहि गाई। |- | आप समान हो आपहि रूप स्वरूप के भूप गिरीश जमाई ॥ |- | बैल बुढ़ान कि शूल हिरान भयो कछु आन कि आनहि भाई। |- | पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं त्यहि चोर सदाई १ |- | काम औ क्रोध औ लोभौ मोहहु लूटत हैं नितही दुखदाई। |- | राव न रंक कि शंक करैं निरशंक फिरें सबके उर जाई ।। |- | चार में मार अपार बली जो छली छलि देश गयो सब खाई। |- | पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं त्यहि चोर सदाई २ |} {| |+ '''सुमिरन ।''' |- | नित प्रति ध्यावै जो सुर्यन को || होवै जौन बिसूरै काज ।। |- | सूर्य्य महातम जो क्वउ गावै || ताकी बनी रहै जग लाज १ |- | प्रातःकाल उदय पूरब दिशि || पश्चिम अस्त शाम को जान॥ |- | देय अंजली जल सुर्य्यन को || तापर खुशी होयँ भगवान २ |}<noinclude></noinclude> dxebbbsv5fp95gw6wrf70nqgg2vgs36 664951 664948 2026-07-04T21:39:34Z Avimaarak 6718 664951 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>{| |+ {{c|'''अथ आल्हखण्ड ॥'''}} |- | '''माड़ो का युद्ध वर्णन॥''' |} {| |+ '''सवैया॥''' |- | श्वेतस्वरूप अनूपमनूप नहीं कोउ रूप कहौं ज्यहि गाई। |- | आप समान हो आपहि रूप स्वरूप के भूप गिरीश जमाई ॥ |- | बैल बुढ़ान कि शूल हिरान भयो कछु आन कि आनहि भाई। |- | पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं त्यहि चोर सदाई १ |- | काम औ क्रोध औ लोभौ मोहहु लूटत हैं नितही दुखदाई। |- | राव न रंक कि शंक करैं निरशंक फिरें सबके उर जाई ।। |- | चार में मार अपार बली जो छली छलि देश गयो सब खाई। |- | पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं त्यहि चोर सदाई २ |} {| |+ '''सुमिरन ।''' |- | नित प्रति ध्यावै जो सुर्यन को || होवै जौन बिसूरै काज ।। |- | सूर्य्य महातम जो क्वउ गावै || ताकी बनी रहै जग लाज १ |- | प्रातःकाल उदय पूरब दिशि || पश्चिम अस्त शाम को जान॥ |- | देय अंजली जल सुर्य्यन को || तापर खुशी होयँ भगवान २ |}<noinclude></noinclude> iofo37lvvsf8bnpfhxge4r17sxdelji 664952 664951 2026-07-04T21:40:37Z Avimaarak 6718 664952 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>{{c|'''अथ आल्हखण्ड ॥'''}} {{c|'''माड़ो का युद्ध वर्णन॥'''}} {| |+ '''सवैया॥''' |- | श्वेतस्वरूप अनूपमनूप नहीं कोउ रूप कहौं ज्यहि गाई। |- | आप समान हो आपहि रूप स्वरूप के भूप गिरीश जमाई ॥ |- | बैल बुढ़ान कि शूल हिरान भयो कछु आन कि आनहि भाई। |- | पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं त्यहि चोर सदाई १ |- | काम औ क्रोध औ लोभौ मोहहु लूटत हैं नितही दुखदाई। |- | राव न रंक कि शंक करैं निरशंक फिरें सबके उर जाई ।। |- | चार में मार अपार बली जो छली छलि देश गयो सब खाई। |- | पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं 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{| |+ '''सुमिरन ।''' |- | नित प्रति ध्यावै जो सुर्यन को || होवै जौन बिसूरै काज ।। |- | सूर्य्य महातम जो क्वउ गावै || ताकी बनी रहै जग लाज १ |- | प्रातःकाल उदय पूरब दिशि || पश्चिम अस्त शाम को जान॥ |- | देय अंजली जल सुर्य्यन को || तापर खुशी होयँ भगवान २ |}<noinclude></noinclude> gknvznw1rabg93z7lprgyh5lqcs1z6u 664954 664953 2026-07-04T21:42:10Z Avimaarak 6718 664954 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avimaarak" /></noinclude>{{c|'''अथ आल्हखण्ड ॥'''}} {{c|'''माड़ो का युद्ध वर्णन॥'''}} {{c|{| |+ '''सवैया॥''' |- | श्वेतस्वरूप अनूपमनूप नहीं कोउ रूप कहौं ज्यहि गाई। |- | आप समान हो आपहि रूप स्वरूप के भूप गिरीश जमाई ॥ |- | बैल बुढ़ान कि शूल हिरान भयो कछु आन कि आनहि भाई। |- | पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं त्यहि चोर सदाई १ |- | काम औ क्रोध औ लोभौ मोहहु लूटत हैं नितही दुखदाई। |- | राव न रंक कि शंक करैं निरशंक फिरें सबके उर जाई ।। |- | चार में मार अपार बली जो छली छलि देश गयो सब खाई। |- | पापी लस्यो ललिते शरणागत लूटत हैं त्यहि चोर सदाई २ |}}} {| |+ '''सुमिरन ।''' |- 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250 151812 664962 464644 2026-07-04T22:13:46Z Avimaarak 6718 664962 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>3. आल्हखण्ड । ६१६ जो नहिं अनुचितकरुदुनिया में तौनहिंहोयसजायहिराज ११८ इन रजधानी में रहिकै मैं कबहुँनकष्ट सहा क्यहुकाल । पिता पितामह औ मोसंयुत कबहुँनपश्यनविपतिकेजाल ११६ चोर छिनारन बदमासन की पिंडरी थहर थहर थर्राय ।। मोछा टेवें सज्जन बैठे नहिंकमसातलकभन्नाय१२० यह सब गावत हैं सज्जन मन नित प्रति बना रहै यह राज ।। जीवें रानी महरानी ई जिनवलसुजनमुखीसवसाज १२१ इनअसिमाता अब मिलिहैं ना यह मन नित्त लीन ठहराय ।। मिलें प्रवन्धो असकर्ता ना जसकछुआजकाल्हदिखलायँ१२२ यही कथा अब पूरण करिक ललिते करत मंगलाचार ॥ करों वन्दना मैं तुलसी की हुलसीजासु काव्यसंसार १२३ ज्यहि अवलोकन के करतखन मनके छूटि जात सब ताप ।। सोई प्यारी तुलसी गाथा ललितेकीनबहुतदिनजाप १ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ।। तारागण सब चमकन लागे सन्तनधुनी दीन परचाय १२५ पूरि तरंग यहाँ सों द्वैगै तव पद सुमिरि भवानीकन्त । राम रमा मिलि दर्शन देव इच्छायही मोरिभगवन्त १२६ {{c|<small> इति श्रीलखनऊनिवासि(सी,आई,ई)मुशीनवलकिशोरात्मज बाबूमयागनारायण<br> जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पॅडरीकलांनिवासि मिश्र<br> बंशोद्भव बुध कृपाशङ्करमनु पण्डितललिताप्रसादकृत वेलासत्ती<br> व्याख्यावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥<\small>}} जासतीअर्थावतर्वआल्हखण्डसमाप्तशुभमस्तु । इति ॥<noinclude></noinclude> oqvj0e64ch98p9mojfnpksoenv1yxuw 664963 664962 2026-07-04T22:14:36Z Avimaarak 6718 664963 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अनुश्री साव" /></noinclude>3. आल्हखण्ड । ६१६ जो नहिं अनुचितकरुदुनिया में तौनहिंहोयसजायहिराज ११८ इन रजधानी में रहिकै मैं कबहुँनकष्ट सहा क्यहुकाल । पिता पितामह औ मोसंयुत कबहुँनपश्यनविपतिकेजाल ११६ चोर छिनारन बदमासन की पिंडरी थहर थहर थर्राय ।। मोछा टेवें सज्जन बैठे नहिंकमसातलकभन्नाय१२० यह सब गावत हैं सज्जन मन नित प्रति बना रहै यह राज ।। जीवें रानी महरानी ई जिनवलसुजनमुखीसवसाज १२१ इनअसिमाता अब मिलिहैं ना यह मन नित्त लीन ठहराय ।। मिलें प्रवन्धो असकर्ता ना जसकछुआजकाल्हदिखलायँ१२२ यही कथा अब पूरण करिक ललिते करत मंगलाचार ॥ करों वन्दना मैं तुलसी की हुलसीजासु काव्यसंसार १२३ ज्यहि अवलोकन के करतखन मनके छूटि जात सब ताप ।। सोई प्यारी तुलसी गाथा ललितेकीनबहुतदिनजाप १ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ।। तारागण सब चमकन लागे सन्तनधुनी दीन परचाय १२५ पूरि तरंग यहाँ सों द्वैगै तव पद सुमिरि भवानीकन्त । राम रमा मिलि दर्शन देव इच्छायही मोरिभगवन्त १२६ {{c|<small> इति श्रीलखनऊनिवासि(सी,आई,ई)मुशीनवलकिशोरात्मज बाबूमयागनारायण<br> जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पॅडरीकलांनिवासि मिश्र<br> बंशोद्भव बुध कृपाशङ्करमनु पण्डितललिताप्रसादकृत वेलासत्ती<br> व्याख्यावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥}} जासतीअर्थावतर्वआल्हखण्डसमाप्तशुभमस्तु । इति ॥<noinclude></noinclude> 6b9fv9a7fyx54iajlmeez6ij7eo1sqo पृष्ठ:आल्हखण्ड.pdf/४५५ 250 151988 664959 636474 2026-07-04T22:03:04Z Avimaarak 6718 /* प्रमाणित */ 664959 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Avimaarak" />{{rh|३०|आल्हखण्ड। ४५४}}</noinclude>{{block center|<poem>ऊदन ऊदन के गुहरावै कहँ तुम गये फनाफरराय १२४ लाउ शारदा यहि समया मा आल्हा केर लहुरवा भाय॥ बिना इकेले बघऊदन के डोला कौन छुड़ाई जाय १२५ सदा भवानी ज्यहि दाहिनहैं ज्यहिघर सिद्धिकरैं गन्नेश॥ पारस पत्थर ज्यहिके घर मा पूरित विभो सदा धन्नेश १२६ भई सहायी शारद मायी ऊदन आयगये त्यहिकाल॥ हाथ जोरिकै योगी बोले लाला देशराजके लाल १२७ भिक्षा पावैं जो मैया हम तौ अब हरद्वार को जायँ॥ इतना सुनिकै मल्हना रोई बोली आरत बैन सुनाय १२८ रही न ईजति अब मोहबे की पलकी लीन चौंड़िया आय॥ जायकै पहुँचा पँच बिरवातर हा दैयागति कही न जाय १२९ बिना बेंदुला के चढ़वैया नैया कौन लगैहै पार॥ चीरिकै धरती ऊदन आवो ईजति राखिलउ यहिवार १३० इतना सुनिकै ऊदन योगी घोड़ा तुरत दीन रपटाय॥ जायकै पहुँचा पँच बिरवातर यहु रणवाघु लहुरवाभाय १३१ चौंड़ा दीख्यो जब ऊदन का सम्मुख हाथी दीन बढ़ाय॥ औ ललकारा फिरि योगी का काहे प्राण गवाँवो आय १३२ इतना सुनिकै ऊदन योगी गरूई हाँक दीन ललकार॥ डोला धरिदे चन्द्रावलि का चौंड़ामानुकही यहि वार १३३ धोखे योगी के भूले ना अवहीं योग देउँ दिखलाय॥ एँड़ लगाई फिरि बेंदुल के हाथी उपर पहूँचा जाय १३४ ढाल कि औझड़ ऊदन मारी चौंड़ा गयो मूर्च्छाखाय॥ लैकै ढोला चन्दावलि का मल्हनापास दीनरखवाय १३५ देवा ठाकुर ते फिरि बोले अव तुम रहो यहाँपर भाय॥</poem>}}<noinclude></noinclude> 2r8au7xrl9d1c834odik8ey26gnt13k 664960 664959 2026-07-04T22:03:35Z Avimaarak 6718 664960 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Avimaarak" />{{rh|३०|आल्हखण्ड। ४५४}}</noinclude>{{block center|<poem>ऊदन ऊदन कै गुहरावै कहँ तुम गये फनाफरराय १२४ लाउ शारदा यहि समया मा आल्हा केर लहुरवा भाय॥ बिना इकेले बघऊदन के डोला कौन छुड़ाई जाय १२५ सदा भवानी ज्यहि दाहिनहैं ज्यहिघर सिद्धिकरैं गन्नेश॥ पारस पत्थर ज्यहिके घर मा पूरित विभो सदा धन्नेश १२६ भई सहायी शारद मायी ऊदन आयगये त्यहिकाल॥ हाथ जोरिकै योगी बोले लाला देशराजके लाल १२७ भिक्षा पावैं जो मैया हम तौ अब हरद्वार को जायँ॥ इतना सुनिकै मल्हना रोई बोली आरत बैन सुनाय १२८ रही न ईजति अब मोहबे की पलकी लीन चौंड़िया आय॥ जायकै पहुँचा पँच बिरवातर हा दैयागति कही न जाय १२९ बिना बेंदुला के चढ़वैया नैया कौन लगैहै पार॥ चीरिकै धरती ऊदन आवो ईजति राखिलउ यहिवार १३० इतना सुनिकै ऊदन योगी घोड़ा तुरत दीन रपटाय॥ जायकै पहुँचा पँच बिरवातर यहु रणवाघु लहुरवाभाय १३१ चौंड़ा दीख्यो जब ऊदन का सम्मुख हाथी दीन बढ़ाय॥ औ ललकारा फिरि योगी का काहे प्राण गवाँवो आय १३२ इतना सुनिकै ऊदन योगी गरूई हाँक दीन ललकार॥ डोला धरिदे चन्द्रावलि का चौंड़ामानुकही यहि वार १३३ धोखे योगी के भूले ना अवहीं योग देउँ दिखलाय॥ एँड़ लगाई फिरि बेंदुल के हाथी उपर पहूँचा जाय १३४ ढाल कि औझड़ ऊदन मारी चौंड़ा गयो मूर्च्छाखाय॥ लैकै ढोला चन्दावलि का मल्हनापास दीनरखवाय १३५ देवा ठाकुर ते फिरि बोले अव तुम रहो यहाँपर भाय॥</poem>}}<noinclude></noinclude> qlmhe405inigi9mqvhfzo0v79l5h485 664961 664960 2026-07-04T22:07:40Z Avimaarak 6718 664961 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="Avimaarak" />{{rh|३०|आल्हखण्ड। ४५४}}</noinclude>{{block center|<poem>ऊदन ऊदन कै गुहरावै कहँ तुम गये फनाफरराय १२४ लाउ शारदा यहि समया मा आल्हा केर लहुरवा भाय॥ बिना इकेले बघऊदन के डोला कौन छुड़ाई जाय १२५ सदा भवानी ज्यहि दाहिनहैं ज्यहिघर सिद्धिकरैं गन्नेश॥ पारस पत्थर ज्यहिके घर मा पूरित विभो सदा धन्नेश १२६ भई सहायी शारद मायी ऊदन आयगये त्यहिकाल॥ हाथ जोरिकै योगी बोले लाला देशराजके लाल १२७ भिक्षा पावैं जो मैया हम तौ अब हरद्वार को जायँ॥ इतना सुनिकै 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{{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 39wak5suh4k254n62v66myoc02a0a6y 665001 665000 2026-07-05T10:35:19Z Koyal Singh 6351 /* प्रतिभागी */ 665001 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] b8u1hdp7qwlkb18z4e2s05ng1f63obg 665004 665001 2026-07-05T11:01:46Z Arshsultanpuri 6393 /* पुस्तक सूची */ 665004 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य 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