विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.9 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/२५२ 250 45934 665018 561885 2026-07-05T13:36:51Z Koyal Singh 6351 665018 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" /></noinclude>{{rh|२५०| गलगलिया-गलस्कु छारिग्स}} पहाड़ पर गालब स्थान और छह ऋषियोंके आश्रम कह नदी। वॉसतला और गुटिया इन दोनों खालो के मङ्गम कर गण्य हैं। लोग कहा करते है कि इस ग्रामके उत्तर स्थान पर गलघमिया नदीको उत्पत्ति है। उमके बाद कृष्णानदीके गर्भ पर एक मंदिर है और उस जगह नदी दक्षिगा पूर्व दिशा होकर बहती हुई खुलना जिलेके कल्या- के जलमें रुपये पाये जाते हैं। १८७६ ई०को नदीक जल णपुर ग्रामक निकट खोल पेटुआ नदीमें आ गिरी है। सुखाये जाने पर मन्दिरके ऊपरकाभाग प्रकाशित हुआ था गलचा-- अफगानिस्तानमें बदक्सान प्रदेशको अधिवासी जो अंश प्रकाशित हुअा था उमकी लम्बाई तथा चौड़ाई एक जाति। एसा कहा जाता है कि इरानी और हिन्द ६. हाथको होगी। नदीके तौर पर यनमादवीका जातिसे 'गलना' जातिको उत्पत्ति है। एक समय गलचा. मन्दिर है। इसके अतिरिक्त गलगलि ग्राममें और चार के मिरको खोपड़ो परोक्षाक लिये फ्रान्मकै पेरित नगर में छोटे छोटे मन्दिर हैं। १६८८ ई०को महाराष्ट्रांक साथ | भेजी गई थी। वहां पर टीपनाई माहेबने मस्तक जांच लडाईकै समय सम्राट औरंजैव अपना सैन्य सामन्त लेकर कर आर्य के मस्तकके जैसा ठहराया। फरामो उजफ- दमी जगह पर टिक रहे । इटाली देशके परिव्राजक केरा लवी साहबन इन्हें गलचा नामसे अभिनित किया। साहबन इम स्थान पर आकर उनसे मुलाकात को थो। गलक्कल ( हिंस्त्री०) मछलीके अगमा एक भाग। यह गलगलिया (हि. स्त्री०) सिगेही नामको एक चिड़िया। गलफड़े के दोनों ओर कुर्रा अस्थियों का बना हुआ है। गलगाजना (हिं क्रि० ) खुशीसे गरजना, गालबजाना । इस भाग ऊपर लाल मूइयों को झालर लगी रहती है। गलगुच्छा ( पु० ) गलमुच्छा देखो। इसोकं द्वारा जनमें मिली हुई वायुको वह भीतर खोंच गलगुथना (हिं.वि.) दृष्ट पुष्ट मोटा ताजा, जिसका कर मॉम लेती है। बदन खूब भरा और गाल फ ले हों। गलजंदड़ा (हि पु० ) १ मदा माथ रनवाला, गलेका गलगोडिका ( सं० स्त्री०) विषयुक्त जन्तुविशेष, एक हार। २ रूमाल या कपड़े की पट्टी। यहाथी विषेला जानवर। इसके काटनमे दाह, परिताप, खंद चोट या घाव पर बाँधने के लिये रखी जाती है। और शोथ हो जाता है। गलजोड़ (हि० स्त्री०) गलजीत देको । गलग्रह ( मं० पु० ) गलं कण्ठदेशं राहणाति, ग्रह-अच।। समान अच। गलजोत (हि. स्त्री०) १ एक बेलको दमा बेलके गले में व्यञ्जनविशेष, एक प्रकारको पकी हई मछली। २ तिथि लगाकर बांधनकी रस्मी या पगही, गलजोड। २ गले- विशेष, एक तिथिका नाम । का हार । "कसपचे चतुथी च सप्तम्यादि दिनवयम् । गलतंग (हिं० वि०) अचेत, बेसुध, बेखवर । तयोदशो चतुकच पटायेते मलयहाः । गलतंम (हि. पु०) मनुष्य जो कोई मंतति न छोड अर्थात् ज्योतिष के अनुसार साण पक्षको चतुर्थी, सप्तमी, कर मरा हो। २ से मनुष्थकी जायदाद जिसे कोई अष्ठमी, नवमो, त्रयोदशी, अमावश्या, ओर प्रतिपदा, इन मंतति न हो। पाठी तिथियोको गलग्रह कहते हैं। ३ आरम्भक बाद | गलत ( फा०वि०) १ अशुह, भ्रममूलक। २ असत्य, जिसका प्रत्यारम्भ दृष्ट नहीं होता गर्गादि मुनिगण उस- को गलग्रह कहते हैं। ४ कण्ठरोध रोगविशेष । ५ अप- गलतकिया (हि पु० ) गाला के नीचे रखनका रिहाय आपत्ति परित्याग नहीं की जा सकती मा तकिया। मानकर अमिच्छासे जिसका भार लिया जाता और जिस- गलत्कष्ठ (सं० ली.) गलत् रसादिक्षरणशीलं कुष्ठम । में मिमी प्रकारका गुग्ण नहीं हो केवल वैठ कर अवध्वंस रस रक्तादि क्षरणशील कुष्ठविशेष। एक प्रकारका काढ़ करता हो उसे भो गलग्रह कहते हैं। रोग जिससे लेह इत्यादि निकलता है। मलग्राह ( सं० पु.) मकर । गलत्कु छारिरस ( सं० पु० ) गलस्क छरोगको औषध । मलसिया-बङ्गदेशके २४ परगना होकर प्रवाहित एक । पारा, गन्धक, ताम्र, लौह, गुग्गल, चितामूलणर्च,<noinclude></noinclude> 9b994851vz4jdqvb4vkknqvwx3fhdt9 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१३० 250 45948 665031 561751 2026-07-05T17:17:34Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 665031 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१२८'''|'''गजदन्त-मजनी'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> हजारों रुपया होता है। काशी के महाराज ने शिल्पकार से हाथीदांत की एक बग्गी और वाराणसी का एक घाट बनवाया था। महाराज के महल में और भी कितनी ही हाथीदांत की चीजें रखी हैं। गाड़ी पूरी की पूरी हाथीदांत से बनी है। ​ त्रावणकोर के महाराज की हाथीदांत की चीजें बहुत बारीक थीं। इस अंचल में जंगली हाथी बहुत हैं और हाथीदांत भी मिला करता है। त्रावणकोर में आज भी हाथीदांत के नाना प्रकार के द्रव्य प्रस्तुत होते हैं। ब्रह्मदेशवासी (बर्मी लोग) भी हाथीदांत की चीजें बनाने में बड़े होशियार हैं। वे हाथीदांत का ठोस भाग अलग उतार लेते हैं और उसके ऊपर बेल-बूटें बना देते हैं। फिर इन्हीं बेल-बूटों के बीच से भीतर का हाथीदांत खुरच-खुरच कर निकालते हैं। बाहरी बेल-बूटों की सजावट धीरे-धीरे जाली जैसी बन जाती है। इन्हीं छेदों से भीतर औजार डालते हैं। खुरचते-खुरचते जब औजार हाथीदांत के मध्य में पहुँचते हैं, उसे काट करके बुद्धदेव की एक मूर्ति निकाल लेते हैं। बाहर से ही पूरी मूर्ति बन जाती है। हाथीदांत की परतें काटकर उस पर नाना रूप और चित्र अंकित किए जा सकते हैं। दिल्ली ही इस काम की मुख्य जगह है। मुसलमान बादशाहों और नूरजहाँ की प्रतिच्छवि जैसी मूरतें हाथीदांत पर उतार कर रखते हैं। कुछ मुसलमान चित्रकार इसी काम में लगे रहते हैं। ​ यूरोप में अब हाथीदांत जाने लगा है, वहाँ के लोग भी बहुत सा कारूकार्य बनाने लगे हैं। यूनान देश में गजदन्त निर्मित प्राचीन मनुष्य-मूर्ति और पुस्तकें आज भी वर्तमान हैं। फ्रांस देश के पेरिस नगर के पुस्तकालय में ऐसी ही एक पुस्तक रखी है। वह १३३० वर्ष पूर्व निर्मित और लिखित हुई थी। इसके पत्र १५ इंच लंबे और ६ इंच चौड़े हैं। पुस्तक देखने से मालूम होती है कि उस समय के लोग हाथीदांत को फैलाना, पसारना, बढ़ाना या घटाना जानते थे, अब वह कला नहीं रही। थिओफिलास् नामक किसी पुराने विद्वान ने लिखा है कि हाथीदांत को क्षार, नमक, नमक के तेजाब (हाइड्रोक्लोरिक एसिड) और सिरके में भिगो कर रखने से मोम <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जैसा कोमल पड़ जाता है; उस समय इसको मनमाना घटा-बढ़ा सकते हैं। फिर हाथीदांत को केवल सिरके में डाल कर रखने से पहले जैसा कड़ा ही निकल आता है। आजकल लगभग सब जगह हाथीदांत की कदर कम हो गई है। ​ घोटक विशेष: एक प्रकार का जल-जंतु, जिसके मुख के बाहर हाथी के दाँत की तरह दाँत निकले रहते हैं। कुनुल पर्वतों के ऊपर के पर्वत। ​गजदन्तफला (सं० स्त्री०): गजदन्त इव फलमस्याः (बहुव्रीहि समास) ततः टाप्। फल-शाक विशेष, चिचिंडा। ​ गजदन्तमय (सं० त्रि०): गजदन्त + मयट् (विकारार्थे)। गजदन्त निर्मित, जो हाथीदांत का बना हुआ हो। ​गजदान (सं० क्ली०): गजस्य दानं मदः (६ तत्पुरुष)। १. हाथी का मद। प्राचीन आर्य प्राणितत्त्वविदों का मत है कि हाथी की सूंड, कपोल, नाभि और नेत्र से मद निकलता है। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "सम्परिभोगेन गजदानसुगन्धिना।" (रघुवंश)<Br> बाबेरी खसिता पण दथयतथददर (र०४,४५)</poem>}}}} २. हाथी का उत्सर्ग या हाथी का दान। ​ गजद्रुम (सं० पु०): नन्दीवृक्ष, पारस पीपल। ​ गजनवी (फा० वि०): गजनी नगर का रहने वाला, जो गजनी देश में रहता हो। ​ गजनवीपुर: बंग प्रदेश के महमूदाबाद सरकार के अंतर्गत एक महल (परगना)। ​गजनाल (सं० स्त्री०): एक प्रकार की तोप जो प्राचीन समय में हाथियों द्वारा खींची जाती थी। ​ गजनासा (सं० स्त्री०): गजस्य नासा (६ तत्पुरुष)। हाथी की सूंड। ​गजनी: अफगानिस्तान का एक नगर। यह अक्षांश ३३° २४' उ० और देशांतर ६८° १८' पू० में काबुल से ४२.५ कोस दूर गजनी नदी के बाईं ओर समुद्र तल से ७१५० फीट ऊँचे अवस्थित है। शहर चौकोर है। इसके बीच में एक सुदृढ़ दुर्ग बना है। डेढ़ कोस तक चारदीवारी लगी है। यहाँ प्रायः साढ़े तीन हजार घर हैं। निवासियों में अफगान, हज़ारा और कुछ हिन्दू दुकानदार भी हैं। गजनी में कार्तिक मास से फाल्गुन तक बर्फ गिरती है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 2qzem7ergm57fc7pq39bduywirthr9w पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१३१ 250 45956 665035 561752 2026-07-05T18:03:14Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 665035 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||गननी-गजपादप| १२९}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> यह नगर बहुत पुराना है । किसी समय यहां बह तसे लोग रहते और मजेमं अपना गुजर करते थे। गज- मोकी पश्चिम और तरनाक उपत्यकासे मोस्तान नगरी और गावोंका जो ध्व मावशेष मिलता, इसकी प्राचीन दिशानिताका निदर्शन ठहरता है। जैसलमेरका इतिहास पढ़ने से समझ पड़ता कि विक्रमादित्य याविर्भाव से बहत पहले यादव लोग गज- नोसे समरकन्द तक सारे भूभागम राजत्व करते थे | कर्नल टाड मादवने विलायतको रायन एशियाटिक सोसाइटोको हिन्दुधका एक मानचित्र ( नकशा दिया था । उसमे 'गजलि-वन' अर्थात् हाथियोंक जङ्गल नामनिर्दष्ट है कि मतमे हिन्दू राजापनि दी यह नगर बसाया था फिर कोई कोई कहता कि गज नोमेटो सस्कृत शास्त्रोक्त यवनराज रहता था। टलेमिने 'घोजना' (Daala) और किमो कोसने मवल या जल (Sabal or Zabal ) नामसे इसका उल्लेख किया है। ८०६ ई० को पलप्तगीनने बोखारसे पा करके यां ई०को राजधानी लगायो थो। उन्हीं उत्तराधिकारी सव लगीन रहे । इन्हकं पिता सुलतान महमूदने हिन्दु- स्थान जीता था। महमूदके शासनकालको गजनीका राज्य पूर्व को गङ्गा पविम ताइयोस नही, उत्तर पोक्स और दक्षिणको भारतमहासागरकं उपकृन्त तक फैला था । ११५१ ई०को पलाउद्दीन गोरोने गजनी नगर आक्रमण किया। उस समय हजारों बाशिन्दे उनके निष्ठुर अत्याचारसे मारे गये। फिर अरबीका गजनी में राज्यशासन हुआ । ई० १२वीं और १५वीं शताब्दीको तातार लोगोंके दारुण दोरात्मा से गजनो शहर धूलमें मित्त गया था । १८३९ ई० २२ जुलाई घोर १८४९ ई० को भी रंग- रेजोंके अधीन भारत मेनाने गजनी नगर आक्रमण किया। फिर १८८०० को हटिश सेना इस पर परिचालित हुई। अफगानस्तान और भारत पान जानेके लिये स चार बड़ी राहें हैं । नगरकी चारों ओर जमीन खब उपजाऊ है। वहां अङ्ग र तम्बाकू, कपास आदि खूब होती है । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हैं। यह ईसे बनाये गये है। इनकी कारोंगरी बहुत अच्छी है। दोनोंमें एक मोनारं कोई ८४ हांथ ऊ'चा होगा । गजपति ( मं० पु० ) गजस्य पतिः ६ सत् । १ श्रेष्ठ गज बढ़िया हाथो । २ त्यही बहुत बड़ा भाथी। <Small>"जपदियोरपि मम:" (साथ) </small>३ उत्कल और कलिङ्ग देशके राजाश्रीको उपाधि । अन्ध चोर वंही देशके वोड राज गण समय समय पर इम उपाधिको धारण करते रहे । वर्तमान समय में केवल उत्तर सरकारके एक राजा "राजा गजपति राव" की उपाधि से विद्यमान हैं। 8 वह राजा जिसके पास बहुतसे हाथी हां। गजपतिनगर. मन्द्राज प्रदेशक विशाखापत्तन जिलाके अन्तर्गत एक तहमोल । यह अक्षा० १८ ११ तथा १८ ३० उ० और देशा० ८३° ३ एवं ८३ ३२ पू० के मध्य अवस्थित है । इसका क्षेत्रफल ३३३ वर्ग मील है । इसमें २२८ ग्राम लगते हैं । लोकसंख्या प्रायः १३४४५३ है। तहसीलकी समस्त पार्वतीय चीजें यह लाकर बेची जाती है। इस तहसील फोजदारो अदालत, रजिष्टरी ग्राफिम, डाकघर और घोषधालय है। गजपति वीरनारायणदेषु – एक संस्कृत ग्र यह पद्मनाभकं पुत्र तथा कविरत्न पुरुषोत्तममिश्र के शिष्य थे । इन्होंने अलङ्कारचन्द्रिका पोर सङ्गीतनारायच ग्रन्थको रचना को थो । गजपन्या - जैनियों का मिक्षेत्र। यह नासिक शहरसे करीब चार माइल दूरी पर अवस्थित है। यहां प्राधा माइल जंचा एक पर्वत है। जिस पर कि दो गुफा, दो कुण्ड और पहाड़क पत्थर से बना हुई तोर्थं करोंको अनेक मूर्तियां विराजमान हैं। पर्वत पर चढ़नेके लिये सोढ़ी भी बनी हुई है। इस पर्वसमे बलभद्र पादि आठ करोड़ मुनोश्वर मोच गये हैं । <Small>( तार्थ यावा १५.)</small> गजपॉव (हिं० पु० ) अन्तपचोविशेष। इसके पैर लाल, सिर, गरदनु, पीठ और डैने काले तथा शेष अंग सफेद होते हैं । जाड़े के दिनों में यह हिन्दुस्तानके ठरटे मैदान- में चला जाता है। मादा एक बार तीन या चार अंडे देती है । गजपादप (सं० पु० ) गजप्रियः पादपः । स्थालीवृक्ष, वेलिया हो दोनों तर्फ सुलतान महमूदके दो मोमार पीपल। Vol. VI. 33. <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> mv1dekyvqdp5j5xjs4o6vq5e7ye3rin पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१३२ 250 45964 665039 561753 2026-07-05T18:31:00Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 665039 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> गजपास (सं० पु०) महावत, हाथीवान, यह जो हाथी को चलाता हो। गजपिप्पली (सं० स्त्री०) गजपूर्वा, गजप्रिया वा पिप्पली। चव्यीविशेष, एक तरह की पीपर। इसका पर्याय—करिपिप्पली, इभकणा, कपिवल्ली, कपिल्लिका, श्रेयसी, वशिर, गजाव्हा, कोलाहला, इभोष्णा, चव्यन्ना, छिद्रविद्धी, दीर्घग्रन्थी, तेजसी, वंशल और कापिल बेटी है। यह संभोली आकार का एक पौधा है। इसकी पत्तियाँ चौड़ी होती हैं। किनारे पर लहरिया नोकीला कटाव होता है। इसमें दो या तीन पत्ती के बाद एक पतला सोर निकलता है। इसके सिरे पर प्रायः एक इंच की मोटी मंजरी छोटे छोटे फूलों के साथ निकलती है। यही मंजरी सूखने पर औषध के काम में बाजार में बिकती है। इसका गुण–कटु, उष्ण, वातनाशक, स्तनकर्णहर्तिकर तथा वेदना और भ्रमनाशक है। भावप्रकाश के मत से इसके फल का नाम गजपिप्पली है। इसका गुण—कटु, वात, कफनाशक, अग्निहृद्धिकारी, अतिसार, श्वास, कण्ठरोग और कृमिनाशक है। ​ गजपीपर (हिं० स्त्री०) गजपिप्पली देखो। ​ गजपीपल (हिं० स्त्री०) गजपिप्पली देखो। ​ गजपुङ्गव (सं० पु०) बड़ा और सुन्दर हाथी। ​गजपुट (सं० पु०) गजाख्यः पुटः शाकपाथिव<noinclude></noinclude> 3baib885q2rmiofw5k72qzc38rubs8b पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/३७५ 250 46274 665015 665006 2026-07-05T13:22:51Z Arshsultanpuri 6393 /* शोधित */ 665015 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Arshsultanpuri" />{{rh||'''गुटि-गहिकोण्डा'''|'''३७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> दो बार उत्पन हुआ करता है । यहां Actias Sclene Lvepa Ratinku पासाम, श्रीमह, भोट और यव- नामकी दूसरी मी गुटि है। वह पर्वत पर ५००० से हीपमें उत्पन्न होता है। सिवा इसके L. miranda, L. ७००० फुट ऊंचे तक उपजती है। Sikkima और L. Sivalika कई जातीय श्रेणीकी Rombyx Horsfielli पवद्वीपीय है। गुटि भी देख पड़ती है। मन्द्राज प्रान्तमें Bombyx lugubris होता है ।। ___Attacus Attas का कोवा सबसे बड़ा होता है। जापानमें Bombyx Yama mai उपजता है। सिंहल, चोन, ब्रह्म, यवाहीप और भारतमें सर्वत्र उसकी अब इमलेगड़ में भी उसकी खेती है। जापान यह रेशम उत्पत्ति है। ज्यादा कीमती ममझा जाता है। राजपरिवारमें एमके Attacils Cynthin और Atharius ricin को व्यवमायका एकाधिपत्य है। - बङ्गालमें एडो एंडिया या एरण्ड गुटो कहते हैं। Bombyx Pernyi, Actine sinenis, A. 19ne. Attacts Guerini एण्ड गुटोसे आतिम बुद्र seens और A. lolo चार जातियां उत्सर चीनमें मिलती बेठता है। वादेशमें ही वह अधिक परिमाणमे उत्पन होता हैं । एतव्यतीत A. Canningii, A. lunula ____Bombyx Mslitta भारतीय है। इसका कोवा! A. obse:urus, A. Sillhetica, Caligula, Cacharan, अन्यान्य भारतीय गुटियाँसे बड़ा होता है। भारतमें B. C. Simla, C. Thebeta, Neoris, luttonn, N. Amaranensis, fortunatus. sinen-is txtor Shadalla N. Stolickzkana, Orcinara lactea प्रभृति कई भिन्न श्रेणीके रेशमी कोई हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> O. Moorel, (). diaphama, Rhodia ne:wara, Ri- ___(ricula trifen stratra उत्तर पूर्व तथा दक्षिण aca, Zullika, The phila, Bengaleusis, Th. भारत, श्रीष्ट, आसाम, ब्रह्म और यवदीपमें उत्पन्न होता luttoni, Mandarina, religiosa, Sherwilli प्रति है। मिवा इमके C. drepansides भी मिलता है। कई इमरी किस्में हैं। Sulassa lola और Actins Moenar श्रीदेश गुटक ( म० पु.) मत्स्यागड़ी। जात है। गटिका ( स० स्त्रो. ) गुटिरब गटि स्वार्थ कन टाप। ___Antheroen paphin वीरभूममें होता है। उसका १ वटिका, वटी. गोली । २ वर्तलाकार पदार्थ , गोल नाम 'बुधी' है। सिंहल : दक्षिण, उत्तर-पूच' एवं उत्तर चीज।। पविम भारत, वन, विहार, प्रामाम, श्रीहट्ट और यव- गुटिकाननम् ( स० क्ली० ) पवन देवा । होप में भी उसकी उत्पत्ति है। बहुत समयमे इम देशमें गुटिका पात (सं० पु०) गुटिकाया: पातः, ६-तत्। उस कीड़े को रेशम टमरका कपडा बनानको काम है। किमी विषयके निरूपणार्थ गोली निक्षप, किसी चीज Antheroen Pernsi चोन देशीय है। पर निशान कर गोलो फकना। Antheroea Roylii, Antheraea Acitori और गुटिकाहय ( म० पु. लो. ) लवणविशेष, एक प्रकारका Attacus Edwardsi दारजिलिङ्गमें उत्पन्न होते हैं। नमक। A. larissa और Anthero a Java यवदीपज है। गुह (हिं. पु०) समूह, मुगड, दल । ___Antheroen erot tatti पूदिचेरीमें होता है। गुहा (हि पु०) लाक्षाकी बनी चौकोर लड़कियों के खेलने- A. Simla शिमला और दारजिलिङ्ग पर्वतजात है। को गोटी। ___A. Assama आसाममें होता है। आमामी भाषा- गुटिकोण्डा-कृष्णा जिलेके अन्तर्गत दाचिपलीमे । कोस में उसका नाम मूगा है। ___दक्षिणमें अवस्थित एक ग्राम। यहाँ एक अति प्राचीन ___Antheroea मञ्चरियाको गुटि है । फ्रान्सदेशमें शिवालय है। ग्रामके निकट ही एक गुहा है। ऐमा समको खेती होने लगी है। । प्रवाद है कि इस कन्दरामें मुचुकुन्द सोया करते थे। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{rh|'''Vol. VI. 94'''||}}</noinclude> jt2fr9mlq5v8bgvwqrlsnmslxhregag पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१९ 250 75681 665088 664797 2026-07-06T06:34:22Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 665088 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|'''१८'''|'''इटली'''|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} मनोज्ञ, नियत तथा स्वास्थाकर और केन्द्रस्थलमें सविशेष सुखप्रद है। किन्तु दक्षिणकी और उष्णता अधिक रहती और प्रायः अफ़्रीक़ाकी उत्तप्त वायु आनेसे बढ़ जाती है। वसन्त और ग्रीष्म ऋतुमें मलेरियाके प्रकोप-से कितने ही स्थानका स्वास्थ बिगड़ता है। कारण—आबद्ध कच्छ्से जो वायु उठता, वह मारात्मक होता है। पो प्रधान और चिसोन, मैरा, ग्रना, दोरा-रिपारिआ, दोरा बालतिआ, बोरमिदा, तनारो, सेसिआ, तिसिनो, अद्दा, ओग्लिओ, मिनसिश्रओ, देब्बिआ, परमा एवं पनारो शाखा नदी है। उत्तरपश्चिममें आडिज, ब्रेन्ता, पिआव और तगलिआमेन्तो आल्पससे निकल दक्षिणको बहती है। मध्यस्थलको प्रधान नदी ताइवेर भूमध्यसागर में जाकर गिरती है। किन्तु अनेक नदीमें जहाज, चल नहीं सकता। इस अभावको दूर करनेके लिये तिकिनो और मिलनके बीच २८ मोल लम्बो नहर निकलो, जिसमें बड़ोसे बड़ी नाव चलो है। दूसरी नहर एदिज और पोको मिलातो है। उत्तरमें सब मिलाकर ५१० से अधिक नहरें हैं। गार्दा और लागो माम्गिओर वा लोकारनो हुद प्रधान है। लुगानो, कोमो, लेको, इसको, पेरुजिआ, बोलसेना, कास्तेल, गानडोलफो, ब्रस्सिआनो, सेलानो, वारानो और आवार्नी छोटा ह्रद है। विचित्र दृश्य के लिये इनमें कितने हौ हृद प्रशंसनीय हैं। मेग्गिओर परम-सुन्दर और कोमो अत्यन्त चित्ताकर्षक है। द्राक्षा, जितवृक्ष, जम्बीर, न्यग्रोध, तरम्बुज, पिस्ता, सुपारी तथा कितने हो दूसरे फल होते और स्वादु लगते हैं। उत्तर प्रान्तमें दाल, चावल, ज्वार और दूसरे शाक उपजते हैं। लोमबार्डर्डीमें रेशमके कोड़े पालनेको लाखों शहतूतके पेड़ लगाये जाते हैं। पो नदोके मैदानमें सहस्र-सहस्र गो चरा करतो हैं। इटलीका बना पणोर अनोखा होता और पृथिवोके प्रत्येक प्रान्तमें बिकने जाता है। उत्तर जर्मण-सोमान्तके समीप और वेनिस, जिनोभा और तासकेनोमें मरमरपत्थरको खानि है। अपेनाइनसे जराहत, सूर्यकान्त, मशव, शिलास्फटिक, वैदूर्य और अप रत्न निकलता है। उपरोक्त पर्वतमें चार, घनीभूत {{Multicol-break}} आग्नेयोद्वार, गन्धक, बालुका प्रभृति पदार्थ भरा है। ताम्म्र, लोह और फिटकरीको भो खानि है। विभिन्न प्रान्तमें उष्ण तथा शीतल जलके प्रस्त्रवण मिलते हैं। पर्वत और वनमें शूकर, हरिण, हक, विज्जू, बात-प्रमो और अज, आरण्यपशु रहते हैं। आबरुज्जो पर्वतमें वनमार्जार और दक्षिणांशमें शिखायुक्त शल्लको देख पड़ता है। शशक, शृगाल और वन्यपक्षीको कोई कमी नहीं। दक्षिण सागरतटपर अफ्रीका के जलचर पच्तो प्रायः वर्तमान रहते हैं। कहीं कहीं समुद्रमें विद्रुम भो विद्यमान है। नदीमें अनेक प्रकारके मत्स्य तैरते हैं। इटलीमें रेशमका, काम बहुत बनता है। सन और ऊनको चोजु भो तैयार होती है। कितना हो मद्य टपकाया जाता है। फ्रान्स, ग्रेटल्लटेन, ग्रोस और स्विटजलेण्ड के साथ प्रधानतः व्यवसाय चलता है। फ्रान्स के साथ प्रति वर्ष करोडो रुपयेका लेन-देन होता है। अन्न और रूई बाहरसे मंगाते हैं। रेशम, शराव और तेल दूसरी जगह भेजा जाता है। क्षेत्रफल ११०६२३ वर्गमील है। १८०१ ई॰ को मनुष्य-गणनाके अनुसार लोकसंख्या ३२८६५५०४ रही। इटलीमें सैकड़े पोछे ८७०१२% लोग रोमन काथलिक हैं। प्रायः २०००० प्रोटेष्टाण्ट और ४०००० यहूदी निकलेंगे। तीन-चौथायो आदमो लिख-पढ़ नहीं सकते। दश-बोस प्राचीन प्रतिष्ठित विश्व-विद्यालय विद्यमान हैं। प्रायः ५००० मील रेलवे और १५००० मील टेलीग्राफ विस्तृत है। इटलीका प्रान्तोय विभाग यह है,—मोदेना, पार्मा, वेल्लऊनो, पादुआ, रोविगो त्रविसो, ऊदाइन, बेनेज़िश्र, वेरोना, विसेना, आरेजो, झोरेन्स, ग्रोस्सेतो लेधोरन, लुका, पिसा, सोना, अनकोना, अर्कोलो, पिकेनो, बोलोना, फेरारी, कोर्ली, माकेराता, पेसारो, उर्बिनो, रावेना, रोम, तेसमो, एक्किला, बासिलिकाता, कालेष्टधा, कितेरि-ओर, रेग्गिश्रो, काटनज़रो, केपितानाता, मोलिस, नापोली, प्रिन्सिपाती कितरिओर, प्रिन्सिपातो उलते-रिभोर, तेरा दी बरी, तेरा दो लिवोरो, तेरा दो ओत- {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> dxc9sutznjr6dll8szobb9bw7v3rad8 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१ 250 75682 665093 609020 2026-07-06T07:20:04Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 665093 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२०|इटली|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} थे। ९७३ को द्वितीय और ९९६ ई॰ को तृतीय ओटो सिंहासन पर बैठे। १००२ ई॰ को तृतीय ओटोके मरनेपर इवरियाके अधिपति आरडोइन लोम्बार्डीके राजा हुये और १०१५ ई॰ को मर गये। बेनेरियाके हेनरीने अपने वैरो पेवियाको विनष्टकर रोममें सिंहासन पाया था, किन्तु १०२४ ई॰ को पर-लोक गमन किया। बाको इटलीके राजाओंका शासन-समय नीचे लिखते हैं,— {|Width=100% |हेनरी||१०२४ |- |४र्थ हेनरी||१०५६ |- |७म ग्रेगोरी||१०७३ |- |पोपाधिकार||१०७७ |- |लोथर साक्सन||११२५-११३७ |- |कोनण्ण रखावीय||११३८-११५२ |- फ्रेडरिक||११५४ |- |६ष्ठ हेनरी||११८४ |- |२य फडरिक||१२२० |- |कोमण्ड||१२५० |- |कोनराडिन||१२५४ |- |पादरी सुद्ध और‌ जनप्रकोप||१२५८-१३०३ |- |रवार्ट||१३०२ |- |नोन||१३४३ |- |चार्लस||१३८२ |- |लाडिसलाउस||१३८७ |- |२य जोन||१४१४-१४३५ |- |आलफोन्सो||१४५३-१४८२ |- |स्वतन्त्र शासन||१४८२-१४८५ |- |श्य चार्लस||१४६६ |- |१२श लूइ||१५१३ |- |१०म लिओ||१५३० |- |आलेस्मछेओ||१५३७ |- |कोसिनो||१५३७ |- |फरडीनण्ड||१५५७ |- |विकर आमोडेउस||१७१३ |- |श्य एम्मानुएल||१७३० |- |परमाकोन कारलोसकौरानौ||१७३७ |- |२ जोसेफ||१७८०-१७५० |- |लिओपोल्ड||१७३० |} {{Multicol-break}} {|Width=100% |- |प्रजातन्त्र||१७६६ |- |७म पाषस||१८०० |- |नेपोलियान-शासन||१८०२ |- |मूरट||१८०८ |- |आष्ट्रीय अधिकार||१८१५-१८७० |- |इटलीय शासनतन्त्र||१८७१ ई॰से आरम्भ |} ई॰ के १६वें शताब्द पहले इटली देश भीषण युद्ध और स्व-स्व जातीय उन्नतिके लिये स्पेन, फ्रान्स तथा जर्मनी के ग्रहसे प्रायः जनशून्य हो गया था। १५२५ ई॰ को पेवियाके युद्धने जर्मन-सम्त्रात्‌का प्रभुत्व प्रतिष्ठित किया, किन्तु ई॰ के १८वें शताब्दारम्भ अष्ट्रीयाका आतङ्क जम गया। १७८७-८८ ई०को नेपोलियानका विजय होनेसे शासन बदला और कयो वर्षतक इस प्रायद्दीपका अधिकांश फ्रान्सके अधीन रहा। १८१४ ई॰ को सन्धि होनेपर लोम्बार्डी-वेनिशोय प्रान्त अष्ट्रीया और सारदिनिया राज्य तथा गेनोइस प्रदेश सेवायके राज-परिवारने पाया था। लुक्का नव्वाबो बना और तासक-नोको नव्वाबीका पुनरुद्धार हुवा । बोरबोंनोको नेपल्स, पोपको अपने राज्य और इष्ट वंशको मोडेने तथो अन्य प्रान्तका पुनरधिकार मिला था। १८४८ ई॰ को मिलानोसों और वेनिशीयोंने अष्ट्रीयाके विरुद्ध व्यर्थ विप्लव बढ़ाया। १८५८ ई॰को पोडमोण्ट और अष्ट्रोयामें जो युद्ध हुवा, उसमें पोडमोण्ट हार गया। १८६१ ई॰ को पोडमोण्ट-नरेशके अधीन इटली एक राज्य बना था। १८६६ ई॰ को अष्ट्रीयाने नये राज्यके हाथ वेनशिया सौंपा। १८७० ई०को ११ वीं सितम्बर-को इटलीय सेनापति कादोरनाने ६०००० फौजके साथ पोपके अधिक्कत रोमराज्यमें प्रवेश किया था‌। पोपने नाममात्त्र वाधा डालो। अवशेषको रोम इटलीय शासनतन्त्रके अधीन हुवा था। वाटिकान (Vatican) मात्त्र पोपके अधिकारमें रहा। १८७१ ई॰ को २२ वीं जुलायोको राजा विकर एम्मानुएलने जयोल्लाससे सदलबल पहुंच रोम नगरको इटलीको राजधानी बनाया थाः। अर्ध शताब्दको चेष्टाके बाद इटली फिर स्वाधीन हुआ। १८७८ ई॰ की ९वीं जनवरीको विक्टर एम्मानुएल {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> avnzez0purzjtitzf5qssw9mfbl4mqj 665094 665093 2026-07-06T07:23:22Z ममता साव9 2453 665094 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२०|इटली|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} थे। ९७३ को द्वितीय और ९९६ ई॰ को तृतीय ओटो सिंहासन पर बैठे। १००२ ई॰ को तृतीय ओटोके मरनेपर इवरियाके अधिपति आरडोइन लोम्बार्डीके राजा हुये और १०१५ ई॰ को मर गये। बेनेरियाके हेनरीने अपने वैरो पेवियाको विनष्टकर रोममें सिंहासन पाया था, किन्तु १०२४ ई॰ को पर-लोक गमन किया। बाको इटलीके राजाओंका शासन-समय नीचे लिखते हैं,— {|Width=100% |हेनरी||१०२४ |- |४र्थ हेनरी||१०५६ |- |७म ग्रेगोरी||१०७३ |- |पोपाधिकार||१०७७ |- |लोथर साक्सन||११२५-११३७ |- |कोनण्ण रखावीय||११३८-११५२ |- |फ्रेडरिक||११५४ |- |६ष्ठ हेनरी||११८४ |- |२य फडरिक||१२२० |- |कोमण्ड||१२५० |- |कोनराडिन||१२५४ |- |पादरी सुद्ध और‌ जनप्रकोप||१२५८-१३०३ |- |रवार्ट||१३०२ |- |नोन||१३४३ |- |चार्लस||१३८२ |- |लाडिसलाउस||१३८७ |- |२य जोन||१४१४-१४३५ |- |आलफोन्सो||१४५३-१४८२ |- |स्वतन्त्र शासन||१४८२-१४८५ |- |श्य चार्लस||१४६६ |- |१२श लूइ||१५१३ |- |१०म लिओ||१५३० |- |आलेस्मछेओ||१५३७ |- |कोसिनो||१५३७ |- |फरडीनण्ड||१५५७ |- |विकर आमोडेउस||१७१३ |- |श्य एम्मानुएल||१७३० |- |परमाकोन कारलोसकौरानौ||१७३७ |- |२ जोसेफ||१७८०-१७५० |- |लिओपोल्ड||१७३० |} {{Multicol-break}} {|Width=100% |- |प्रजातन्त्र||१७६६ |- |७म पाषस||१८०० |- |नेपोलियान-शासन||१८०२ |- |मूरट||१८०८ |- |आष्ट्रीय अधिकार||१८१५-१८७० |- |इटलीय शासनतन्त्र||१८७१ ई॰से आरम्भ |} ई॰ के १६वें शताब्द पहले इटली देश भीषण युद्ध और स्व-स्व जातीय उन्नतिके लिये स्पेन, फ्रान्स तथा जर्मनी के ग्रहसे प्रायः जनशून्य हो गया था। १५२५ ई॰ को पेवियाके युद्धने जर्मन-सम्त्रात्‌का प्रभुत्व प्रतिष्ठित किया, किन्तु ई॰ के १८वें शताब्दारम्भ अष्ट्रीयाका आतङ्क जम गया। १७८७-८८ ई०को नेपोलियानका विजय होनेसे शासन बदला और कयो वर्षतक इस प्रायद्दीपका अधिकांश फ्रान्सके अधीन रहा। १८१४ ई॰ को सन्धि होनेपर लोम्बार्डी-वेनिशोय प्रान्त अष्ट्रीया और सारदिनिया राज्य तथा गेनोइस प्रदेश सेवायके राज-परिवारने पाया था। लुक्का नव्वाबो बना और तासक-नोको नव्वाबीका पुनरुद्धार हुवा । बोरबोंनोको नेपल्स, पोपको अपने राज्य और इष्ट वंशको मोडेने तथो अन्य प्रान्तका पुनरधिकार मिला था। १८४८ ई॰ को मिलानोसों और वेनिशीयोंने अष्ट्रीयाके विरुद्ध व्यर्थ विप्लव बढ़ाया। १८५८ ई॰को पोडमोण्ट और अष्ट्रोयामें जो युद्ध हुवा, उसमें पोडमोण्ट हार गया। १८६१ ई॰ को पोडमोण्ट-नरेशके अधीन इटली एक राज्य बना था। १८६६ ई॰ को अष्ट्रीयाने नये राज्यके हाथ वेनशिया सौंपा। १८७० ई०को ११ वीं सितम्बर-को इटलीय सेनापति कादोरनाने ६०००० फौजके साथ पोपके अधिक्कत रोमराज्यमें प्रवेश किया था‌। पोपने नाममात्त्र वाधा डालो। अवशेषको रोम इटलीय शासनतन्त्रके अधीन हुवा था। वाटिकान (Vatican) मात्त्र पोपके अधिकारमें रहा। १८७१ ई॰ को २२ वीं जुलायोको राजा विकर एम्मानुएलने जयोल्लाससे सदलबल पहुंच रोम नगरको इटलीको राजधानी बनाया थाः। अर्ध शताब्दको चेष्टाके बाद इटली फिर स्वाधीन हुआ। १८७८ ई॰ की ९वीं जनवरीको विक्टर एम्मानुएल {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> odhcxcxli1t6crgnujqcbjtt0ooluni पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२० 250 75683 665089 609014 2026-07-06T06:50:05Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 665089 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इटली|९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} रांतो, कालतानीसेत्ता, कातानिआ, गिरगेंती, मेस्सिना, पालेर्मों, सिराकुसा, भपानी, जेनोबा, कागलिआरी, सस्मारी अलेस्सन्द्रिआ, वेनेवेन्ता, वेर्गामो, कोमो, क्रमोना, कुनेओ, मानतुआ, मिलन, नोवारा, पेविआ, पिश्रसेनजा, पोर्ती माउरिजिओ, रेग्गियो, एमिलिआ, सोन्द्रियओ, तूरिन और उम्बिआ। नेपिल्स, मिलन, रोम, पालेर्नो, तूरिन, फोरेन्स, जिनोआ, वेनिस, बोलोना, मेस्सिना, लेघोरन, और कातानिया, बड़ा नगर है। इटलीमें यमजीवियोंका वेतन अधिक और खाद्य वस्तुवोंका मूल्य न्यून है। व्यापारके केन्द्र लोमबार्डी और पोडमोण्टमें हड़ताल बहुत पड़ती है। किन्तु कितनी हो सेविङ्गबद्ध, बीमा कम्पनी और परस्पर-साहाय्य-समिति खुलो हैं। को-आपरेशन वा सम्भूय व्यवसायका भी बड़ा वैभव है। उसमें छोटे-छोटे व्यवसायो और कृषक योग देते हैं। अब लोगोंको अधिक व्याज देनेका कष्ट उठाना नहीं पड़ता। पाठशाला सरकारके हाथ है। विनामूल्य शिक्षा मिलती है। सरकार और व्यवसायो पर पाठशालाके व्ययका भार पड़ता है। पढ़े-लिखोंको संख्या दिन दिन बढ़ती जाती है। पुस्तकालय बहुत हैं। हस्तलिखित और बहुमूल्य पुस्तकोंको कोई कमो नहीं। थोड़े दिन हुये, कोई दो सहस्र पुस्तकालय गिने गये थे। स्थानीय इतिहासका अन्वेषण हुवा करता है। शिल्पसम्बन्धीय पुस्तक खरोदनेको करोड़ों रुपए जमा हैं। दरिद्रोंको अन्न-वस्त्र देनेके लिये सार्वजनिक संस्था-यं प्रतिष्ठित हैं। रोगियोंके लिये औषधालय, अना-थोंके लिये निवासस्थान और ललों, लंगडों, बहरों तथा अन्धोंके लिये विद्यालय और विश्रामालय बनाये गये हैं। इटली राज्य एक राजाके अधीन है। वही लोगोंको पदाधिकार देते और पारलियामेण्टको एकत्र कर लेते हैं। अदालतका काम फ्रान्सको तरह चलता है। विचारपतिका वेतन कम है। मुकदमा जल्द नहीं निबटता। {{Multicol-break}} सेनाविभागमें विभिन्न प्रान्तके लोग एकत्र भरतो कर लिये जाते हैं। सिपाही बननेसे कोई इनकार कर नहीं सकता। शान्तिके समय सेनाको संख्या ढायो या तीन और युद्धके समय साढ़े सात लाख रहतो है। स्पोजिया, नेपल्स, वेनिस, तारान्तो और मड्डा लोनाद्दोपमें जङ्गी जहाजोंका अड्डा है। इटलोका आय-व्यय बढ़ते जाता है। सोने, चांदी रूपे और कांसेका सिक्का चलता है। कर अधिक लगता है। {{smaller|इतिहास}}—अतिशय रमणीय देश होने और जलवायु स्वास्थाप्रद रहनेसे पुराकाल उत्तरचे कितने हो लोगोंने इटलोपर आक्रमण किया था। इसोसे नाना प्रकारको भाषाका प्रचार हुआ। रोमक ऐतिहासिकों-के कथनानुसार ई॰ से ३८० वर्ष पहले गालोंका दल रोमनगर मारते-काटते पहुंचा था। रोमकोंने इटली-को जोत अच्छी-अच्छी सड़कें बनवाया। ४७६ ३० को हेरूदलोयोंके राजा श्रओडोआकर रोमुलस को सिंहासनच्युत कर सम्म्राट् बने थे। ४८८ ई॰ को ग्रीक-सम्म्राट् जेनोको आज्ञासे पूर्व गालांके नरेश थिसो-कोरिकने ओडोआकरको हराया और ४८३ ३०को जानसे मार डाला। फिर गालों और यूनानियोंमें ५३८से ५५३ ई० तक खूब युद्ध हुवा था। अन्तको गालोय नृपति टेइगा वेसूविअस् ‌के पास यूनानियोंसे हार गये और यूनानी इटलोके अधिपति बने। ५६८ ई०को लोमबार्डी'ने गालोंको मार भगाया था । ५८०से ६०४ ई० तक ग्रिगोरोने लोमबार्डों को मूर्ति-पूजक बनाया और ७२६ ई० को द्वितीय ग्रिगोरोने रोममें स्वतन्त्र राज्य प्रतिष्ठित किया। ७५६ ई॰ को फान्स-सरदारने इटलीका कितना हो उत्तरांश जोत पोपको सौंप दिया था‌। ७७४ ई॰ को चार्लस अपने खशुर देसोदेरिअस्‌को सिंहासनसे उतार इटलीके सम्म्राट् बने। चार्लस वंशके आठ नरेशोंने इटलोमें राज्य किया था। ८८८ ई॰ को चार्लस दो फत्राट (मोटे) सिंहासन-च्युत हुये। ८६१ ई॰ को इटलीय नृपति द्वितीय बेरेङ्गरने अपना राज्य ओटोको दिया था। चार्लस और ओटोके समय अराजकताकी धूम रही। चारो ओर लूट-मार होनेसे किले बहुत बने {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> a7yeesue7shynuu5gl0o08m36kpbigb 665090 665089 2026-07-06T06:53:04Z ममता साव9 2453 665090 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इटली|१९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} रांतो, कालतानीसेत्ता, कातानिआ, गिरगेंती, मेस्सिना, पालेर्मों, सिराकुसा, भपानी, जेनोबा, कागलिआरी, सस्मारी अलेस्सन्द्रिआ, वेनेवेन्ता, वेर्गामो, कोमो, क्रमोना, कुनेओ, मानतुआ, मिलन, नोवारा, पेविआ, पिअसेनजा, पोर्ती भाउरिजिओ, रेग्गिओ, एमिलिआ, सोन्द्रियओ, तूरिन और उम्बिआ। नेपिल्स, मिलन, रोम, पालेर्नो, तूरिन, फोरेन्स, जिनोआ, वेनिस, बोलोना, मेस्सिना, लेघोरन, और कातानिया, बड़ा नगर है। इटलीमें यमजीवियोंका वेतन अधिक और खाद्य वस्तुवोंका मूल्य न्यून है। व्यापारके केन्द्र लोमबार्डी और पोडमोण्टमें हड़ताल बहुत पड़ती है। किन्तु कितनी हो सेविङ्गबद्ध, बीमा कम्पनी और परस्पर-साहाय्य-समिति खुलो हैं। को-आपरेशन वा सम्भूय व्यवसायका भी बड़ा वैभव है। उसमें छोटे-छोटे व्यवसायो और कृषक योग देते हैं। अब लोगोंको अधिक व्याज देनेका कष्ट उठाना नहीं पड़ता। पाठशाला सरकारके हाथ है। विनामूल्य शिक्षा मिलती है। सरकार और व्यवसायो पर पाठशालाके व्ययका भार पड़ता है। पढ़े-लिखोंको संख्या दिन दिन बढ़ती जाती है। पुस्तकालय बहुत हैं। हस्तलिखित और बहुमूल्य पुस्तकोंको कोई कमो नहीं। थोड़े दिन हुये, कोई दो सहस्र पुस्तकालय गिने गये थे। स्थानीय इतिहासका अन्वेषण हुवा करता है। शिल्पसम्बन्धीय पुस्तक खरोदनेको करोड़ों रुपए जमा हैं। दरिद्रोंको अन्न-वस्त्र देनेके लिये सार्वजनिक संस्था-यं प्रतिष्ठित हैं। रोगियोंके लिये औषधालय, अना-थोंके लिये निवासस्थान और ललों, लंगडों, बहरों तथा अन्धोंके लिये विद्यालय और विश्रामालय बनाये गये हैं। इटली राज्य एक राजाके अधीन है। वही लोगोंको पदाधिकार देते और पारलियामेण्टको एकत्र कर लेते हैं। अदालतका काम फ्रान्सको तरह चलता है। विचारपतिका वेतन कम है। मुकदमा जल्द नहीं निबटता। {{Multicol-break}} सेनाविभागमें विभिन्न प्रान्तके लोग एकत्र भरतो कर लिये जाते हैं। सिपाही बननेसे कोई इनकार कर नहीं सकता। शान्तिके समय सेनाको संख्या ढायो या तीन और युद्धके समय साढ़े सात लाख रहतो है। स्पोजिया, नेपल्स, वेनिस, तारान्तो और मड्डा लोनाद्दोपमें जङ्गी जहाजोंका अड्डा है। इटलोका आय-व्यय बढ़ते जाता है। सोने, चांदी रूपे और कांसेका सिक्का चलता है। कर अधिक लगता है। {{smaller|इतिहास}}—अतिशय रमणीय देश होने और जलवायु स्वास्थाप्रद रहनेसे पुराकाल उत्तरचे कितने हो लोगोंने इटलोपर आक्रमण किया था। इसोसे नाना प्रकारको भाषाका प्रचार हुआ। रोमक ऐतिहासिकों-के कथनानुसार ई॰ से ३८० वर्ष पहले गालोंका दल रोमनगर मारते-काटते पहुंचा था। रोमकोंने इटली-को जोत अच्छी-अच्छी सड़कें बनवाया। ४७६ ३० को हेरूदलोयोंके राजा श्रओडोआकर रोमुलस को सिंहासनच्युत कर सम्म्राट् बने थे। ४८८ ई॰ को ग्रीक-सम्म्राट् जेनोको आज्ञासे पूर्व गालांके नरेश थिसो-कोरिकने ओडोआकरको हराया और ४८३ ३०को जानसे मार डाला। फिर गालों और यूनानियोंमें ५३८से ५५३ ई० तक खूब युद्ध हुवा था। अन्तको गालोय नृपति टेइगा वेसूविअस् ‌के पास यूनानियोंसे हार गये और यूनानी इटलोके अधिपति बने। ५६८ ई०को लोमबार्डी'ने गालोंको मार भगाया था। ५८०से ६०४ ई॰ तक ग्रिगोरोने लोमबार्डों को मूर्ति-पूजक बनाया और ७२६ ई० को द्वितीय ग्रिगोरोने रोममें स्वतन्त्र राज्य प्रतिष्ठित किया। ७५६ ई॰ को फान्स-सरदारने इटलीका कितना हो उत्तरांश जोत पोपको सौंप दिया था‌। ७७४ ई॰ को चार्लस अपने खशुर देसोदेरिअस्‌को सिंहासनसे उतार इटलीके सम्म्राट् बने। चार्लस वंशके आठ नरेशोंने इटलोमें राज्य किया था। ८८८ ई॰ को चार्लस दो फत्राट (मोटे) सिंहासन-च्युत हुये। ८६१ ई॰ को इटलीय नृपति द्वितीय बेरेङ्गरने अपना राज्य ओटोको दिया था। चार्लस और ओटोके समय अराजकताकी धूम रही। चारो ओर लूट-मार होनेसे किले बहुत बने {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 70y9060ednfsa5y8mflgouzuw75eijs पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२३ 250 75685 665107 609043 2026-07-06T08:57:14Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 665107 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२२|इडरहर—इण्डरी|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इडरहर, {{smaller|इंडहर देखो।}}}} {{outdent|इड़स्पति (सं०पु०) विष्णु ।}} {{outdent|इड़हर, {{smaller|इंड़हर देखो।}}}} {{outdent|इड़ा (सं० स्त्री०) इल-क-टाप्, डस्य लत्व वा। १ पृथिवो, जुमोन्‌। २ धेनु, गाय। ३ त्वरा, शिताबী, जल्द। ४ सरस्वती। ५ हविः, अन्न। ६ देवो। ७ दुर्गा। ८ स्तुति, तारीफ‌ ८ यज्ञपात्रविशेष। १० सन्तोष, तसल्लो। ११ भोजन, खुराक। १२ आहुति विशेष। यह आहुति प्रयाज अनुयाजके बीच होती है। इड़ायर चार प्रकारका दूध तैयारकर जलमय पात्रमें डालते और फिर होता और यजमान मिलकर पो जाते हैं। १३ अप्रिय देवता विशेष। यह असोमपा हैं। १४ आकाशदेवत। १५ मनुको कन्या, बुधपत्नी। शतपथब्राह्मण (७।८।१११-१३) में मनुकन्या इड़ाके उत्पत्ति-सम्बन्धपर इस प्रकार गल्प कहा है, -मनुने प्रजासृष्टि करनेके लिये पाकयज्ञका अनुष्ठान किया था। घ्घृत, नवनीत और आमिक्षा जलमें छोड़नेसे संवत्सरके मध्य एक कन्या उत्पन्न हुयो। बालिका सुस्निग्ध जलसे उठो थो। मित्रावरुण निकट आये। उन्होंने प्रश्न किया, तुम कौन हो। जवाब मिला -मनुको कन्या। उन्होंने फिर कहा, - तुम हमारी हो। इड़ाने उत्तर दिया- नहीं, हम अपने जन्म देनेवालेको हो हैं। किन्तु मित्रावरुणने पुनः इनको ओर प्यारसे देखा। यह कुछ उत्तर न दे मनुके समोप जा पहुंचीं । मनुने भी पूछा, तुम कौन हो। इड़ाने कहा,—हम आपको कन्या हुयो, आपके घृत, नवनोत तथा अमिक्षा प्रदानसे निकलो हैं। हमें यज्ञमें अर्पण कीजिये। आपको मनस्कामना पूर्ण होगी। मनुने इड़ाके साथ कठोर यज्ञका अनुष्ठान किया। अन्तको मनु प्रजापति बन गये। इला देखो। १६ वाम-पार्श्वस्थ रक्तवाही नाड़ी। मेरुदण्डके वहिर्भाग वाम तथा दक्षिण पावंपर चन्द्रसूर्यात्मक इड़ा पिङ्गला नामक दो नाड़ी होतो, जो चन्द्र, सूर्य और अग्नि तीनोंका गुण रखती हैं। साधकके पक्ष में इड़ा नाड़ी गङ्गा और पिङ्गला यमुनाका स्वरूपं है। इन दोनो नाड़ीके मध्य सुषुम्णा सरस्वती-जैसो रहती}} {{Multicol-break}} :है। इड़ा पिङ्गला और सुषुम्‌णा तोनो नाड़ीके मिलन-को त्रिवेणो कहते हैं। योगी इस त्रिवेणीके सङ्गमपर स्नानकर सर्वपापसे छूट जाते हैं। प्राणायाममें पूरक करते समय इड़ा नाड़ोसे हो वायुको ऊपर चढ़ाते हैं। जब इड़ा नाड़ीसे स्वर चलता तब प्रत्येक शुभकार्य करनेमें साफल्य मिलता है। सुषुम्णा ब्रह्मनाड़ी है। उसोनें जगत् प्रतिष्ठित है। इड़ा, दूरा और इला तोनो रूप सिद्ध हो सकते हैं। {{outdent|इड़ाचिका (सं॰ स्त्री॰) इड़ेव आचति सूक्ष्म मध्य-भागम्, डड़ा-अच्-खुल्-टाए, अत इत्। १ वरटा, बर। २ गन्धोलो, ककड़ी।}} {{outdent|इड़ाजात (सं॰ पु॰) भूमिज गुग्गुल, जमीन्से पेदा गूगुर ।}} {{outdent|इड़ावत् (वै॰ त्रि॰) १ इड़ा मतुप्। इड़ानाड़ी विशिष्ट, जो इड़ाको रखता हो। २ आनन्दप्रद, फरहत बखुश। ३ आप्यायित, तरोताज़ा बना हुआ । ४ हविः-विशिष्ट ।}} {{outdent|इड़िक, {{smaller|भड़क्क देखो।}}}} {{outdent|इड़िका (सं॰ स्त्री॰) इड़ा स्वार्थे क, इत्वञ्चाकारस्य। पृथिवो, ज़मीन् ।}} {{outdent|इड़िक (सं॰ पु॰) इड़िक् इति कायति शब्दायते, इड़िक्-के-ड। १ वन्ध कागल, जङ्गलो बकरा। २ वानर, बन्दर।}} {{outdent|इड़ोय (सं॰ स्त्री॰) इड़ायां अन्नस्य अदूरदेशः, इड़ा-छ‌ उत्करादिभ्थ्य। पा ४।३।८०। अन्न-सम्बन्धोय, अनाजसे भरा हुआ।}} {{outdent|इड्देवता (सं॰ स्त्री॰) उदकदानको देवो‌}} {{outdent|इडुर (सं॰ पु॰) इच्छति वृषमिति, इष-किप्-इट् वृषस्यन्तातया ब्रियते, इट् व कर्मणि अच्। वृष, छोड़देने लायक सांड़ ।}} {{outdent|इण्ट्रेन्स (अं॰ स्त्री॰ = Entrance) १ प्रवेश, दखल, पैठ। २ प्रवेशाज्ञा, पैठका हुक्म। ३ द्वार, दरवाजा, पौलो । ४ आरम्भ, शुरू । ५ अंगरेज़ो पाठशालाको एक कक्षा, अंगरेज़ी मदरसेका एक दरज।}} {{outdent|इण्डरी (सं॰ स्त्री॰) पक्कान्नविशेष, किसी किस्मके पके अनाजको बनी चीज।।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> lanrl5wmo0y3hihxrcwnegfil5d6j30 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२२ 250 75686 665105 609032 2026-07-06T08:34:00Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 665105 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इटली—इड़}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} (२य) कालग्रासमें पड़े और उनके पुत्र हामबर्ट राजसिंहासनपर बैठे। १८८१ ई०को राजा हामबर्ट अष्ट्रीया-सम्म्राट्‌के आमन्त्रणसे सस्त्रोक वियाना गये थे। २७वीं से ३१वीं अक्तोबरतक अष्ट्रीया-राजधानीमें वह ठहरे। उससे जर्मनी और अष्ट्रीयाके साथ इटलोका सङ्गाव स्थायी हुआ था। १८८२ ई॰ को २०वों मईको तीनों राज्यके मध्य (Triple Alliance) सन्धिपत्र लिखा गया। इस सन्धिपत्रके अनुसार रूस, फ्रन्स या कोई दूसरा राज्य जर्मनी, अष्ट्रीया वा इटलोसे लड़नेपर उक्त तीनो राज्य उसके विरुद्ध अस्त्र धारण करनेपर सम्मत हुये थे। इस सन्धिसे इटलोको राज्यको उन्नति करने और सेना तथा नौ विभागमें बल बढ़ानेका बहुत सुभीता पड़ा है। १८८१ ई॰ के जून मास जर्मन और इटलीय मन्त्रीको चेष्टासे वाणिज्यवृद्धिक अभिप्राय फिर उक्त सन्धिपत्त्र ग्गृहीत हुआ। १८०० ई॰ को २८वों जुलाई-को ब्रेस्को नामक किसी राजद्रोहीने इटलोराज हाम-बर्टको गोलोसे मार डाला। पोछे उनके एकमात्र पुत्त्र श्य विकर एम्मानुएल इटलीके राजा हुये। यह अति शान्तिप्रिय नृपति हैं। इन्होंके समय १८०८ ई॰को २८वीं दिसम्बरका सवेरे पांच बजे अतिहृदय-विदारक भूमिकम्पसे समग्र दक्षिण कलब्रिया और सिसिलीका पूर्वींश विध्वस्त हो गया था। उससे बहुतसे जनपद टूटे और अकेले मसोना नगरमें डेढ़ लाख मनुष्य मरे। १८०३ ई॰ के अक्तोबर मास राजा एम्मानुएल सपत्नीक फ्रान्स-राजधानी पारिस गये थे। उससे दोनो राज्यके मध्य यथेष्ट, सद्भाव स्थापित हुआ। १८०८ ई॰के अक्तोवर मास अष्ट्रीय-सम्म्राट् फ्रान्सिस् जोसेफने बोसनियाको अपने राज्यमें मिला लिया था। इस संवादसे राजा एम्मानुएल और अपरा पर नृपति विचलित हुये। उसो समयसे अष्ट्रीयाक साथ इटलोका मनोमालिन्य बढ़ा। जर्मनी एवं अष्ट्रीयाके साथ रूस, फान्स और इङ्गलेण्ड़के लड़ते भो कुछ दिन इटली-नरेश निरपेक्ष रहे। किन्तु अपनो स्वार्थहानि भयानक रूपसे होते देख १८१५ {{Multicol-break}} ई॰ इटलोको फौज आगे बढ़ी और अष्ट्रीयासे लड़ बैठी। इटलो बड़े बलविक्रमसे आजकल अष्ट्रीयाके साथ युद्ध कर रहा है। {{smaller|राम, पोप, नेपोलियान्, गारिवल्डी, माजिनि, अष्ट्रीया प्रभृति शब्द और विवरण देखो।}} {{outdent|इटसून (वे॰ क्लो॰) इट-क-श्खि-क्त पृषोदरादित्वात् शस्य सः। शाखामय कट, बेंतको चटाई। "वैतसे इटसूनेउत्तरतोश्वस्यावद्यन्ति।” (शतपयत्राह्मण १३।२।२।१८।) 'इटसून तस्मिन्न व शाखामये कटे।' (हरिखामौ)}} {{outdent|इटालिक (अं० पु० = Italic) वङ्काक्षर, टेढ़े छापेके हफ।}} {{outdent|इटालियन (अं॰ पु॰) १ इलीवासो। २ वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। प्रथमतः इटलोमें बननेसे ही इस वस्त्रको इटालियन कहते हैं। वृक्षत्वक्से इटालियन बनता और खूब चमकदार निकलता है। रङ्ग काला होता है।}} {{outdent|इट्चर (सं॰ पु॰) इष भावे किप्-चर-अच्, दृषा कामेन चरतोति। षण्ड, स्वतन्त्र घूमनेबाला सांड़ ।}} {{outdent|इठलाना (हिं॰ क्रि॰) १ साहङ्कार गमन करना, गु. रूरके साथ चलना। २ अव्यक्त भाषण करना, तुत-लाना, साफ-साफ न बोलना। ३ वक्रोत्तर प्रदान करना, टेढ़े जबाब देना। ४ तिर्यक् सम्भाषण करना, गुस्ताखीके साथ बोलना, उलटी बात बताना। ५ छद्म देखाना, मटियाना, नावाफिक होनेका बहाना करना। ६ विरोध करना, झगड़ा लगाना।}} {{outdent|इठलायो (हिं॰ स्त्री॰) साहङ्कार गमन, ठसकको चाल, इठलाहट।}} {{outdent|इठलाहट, इठलायी देखो।}} {{outdent|इठायो (हिं॰ स्त्री॰) अभिलाष, खाहिश, चाह, प्यार।}} {{outdent|इठिमिका (सं॰ स्त्री) काठक शाखाभेद, यजुर्वेद-को एक शाखा।}} {{outdent|इड़ (सं॰ स्त्री॰) इल्-किप् वा लस्य ङः। १ भूमि, ज़मोन्। २ अन्न, अनाज। ३ वर्षाकाल, बरसात। ४ टतोय प्रयाज। ५ यज्ञाङ्ग। ६ षष्ठ प्रयाज। (वै॰ वि॰) ७ स्तुतियोग्य, तारीफके काबिल।}} {{block center|<poem>{{smaller|"परिधिरस्यग्रिरिड़इडितम्।" (वाजसनेयस॰ २।३) 'इव्यते स्तूयते इतौड़ः स्तुतियोग्यः।' (महौधर)}}</poem>}} {{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. {{gap}}6}}</noinclude> ribbead93zq93ulztb5nnigdub07jg1 665106 665105 2026-07-06T08:36:07Z ममता साव9 2453 665106 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इटली—इड़}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} (२य) कालग्रासमें पड़े और उनके पुत्र हामबर्ट राजसिंहासनपर बैठे। १८८१ ई०को राजा हामबर्ट अष्ट्रीया-सम्म्राट्‌के आमन्त्रणसे सस्त्रोक वियाना गये थे। २७वीं से ३१वीं अक्तोबरतक अष्ट्रीया-राजधानीमें वह ठहरे। उससे जर्मनी और अष्ट्रीयाके साथ इटलोका सङ्गाव स्थायी हुआ था। १८८२ ई॰ को २०वों मईको तीनों राज्यके मध्य (Triple Alliance) सन्धिपत्र लिखा गया। इस सन्धिपत्रके अनुसार रूस, फ्रन्स या कोई दूसरा राज्य जर्मनी, अष्ट्रीया वा इटलोसे लड़नेपर उक्त तीनो राज्य उसके विरुद्ध अस्त्र धारण करनेपर सम्मत हुये थे। इस सन्धिसे इटलोको राज्यको उन्नति करने और सेना तथा नौ विभागमें बल बढ़ानेका बहुत सुभीता पड़ा है। १८८१ ई॰ के जून मास जर्मन और इटलीय मन्त्रीको चेष्टासे वाणिज्यवृद्धिक अभिप्राय फिर उक्त सन्धिपत्त्र ग्गृहीत हुआ। १८०० ई॰ को २८वों जुलाई-को ब्रेस्को नामक किसी राजद्रोहीने इटलोराज हाम-बर्टको गोलोसे मार डाला। पोछे उनके एकमात्र पुत्त्र श्य विकर एम्मानुएल इटलीके राजा हुये। यह अति शान्तिप्रिय नृपति हैं। इन्होंके समय १८०८ ई॰को २८वीं दिसम्बरका सवेरे पांच बजे अतिहृदय-विदारक भूमिकम्पसे समग्र दक्षिण कलब्रिया और सिसिलीका पूर्वींश विध्वस्त हो गया था। उससे बहुतसे जनपद टूटे और अकेले मसोना नगरमें डेढ़ लाख मनुष्य मरे। १८०३ ई॰ के अक्तोबर मास राजा एम्मानुएल सपत्नीक फ्रान्स-राजधानी पारिस गये थे। उससे दोनो राज्यके मध्य यथेष्ट, सद्भाव स्थापित हुआ। १८०८ ई॰के अक्तोवर मास अष्ट्रीय-सम्म्राट् फ्रान्सिस् जोसेफने बोसनियाको अपने राज्यमें मिला लिया था। इस संवादसे राजा एम्मानुएल और अपरा पर नृपति विचलित हुये। उसो समयसे अष्ट्रीयाक साथ इटलोका मनोमालिन्य बढ़ा। जर्मनी एवं अष्ट्रीयाके साथ रूस, फान्स और इङ्गलेण्ड़के लड़ते भो कुछ दिन इटली-नरेश निरपेक्ष रहे। किन्तु अपनो स्वार्थहानि भयानक रूपसे होते देख १८१५ {{Multicol-break}} ई॰ इटलोको फौज आगे बढ़ी और अष्ट्रीयासे लड़ बैठी। इटलो बड़े बलविक्रमसे आजकल अष्ट्रीयाके साथ युद्ध कर रहा है। {{smaller|राम, पोप, नेपोलियान्, गारिवल्डी, माजिनि, अष्ट्रीया प्रभृति शब्द और विवरण देखो।}} {{outdent|इटसून (वे॰ क्लो॰) इट-क-श्खि-क्त पृषोदरादित्वात् शस्य सः। शाखामय कट, बेंतको चटाई। "वैतसे इटसूनेउत्तरतोश्वस्यावद्यन्ति।” (शतपयत्राह्मण १३।२।२।१८।) 'इटसून तस्मिन्न व शाखामये कटे।' (हरिखामौ)}} {{outdent|इटालिक (अं० पु० = Italic) वङ्काक्षर, टेढ़े छापेके हफ।}} {{outdent|इटालियन (अं॰ पु॰) १ इलीवासो। २ वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। प्रथमतः इटलोमें बननेसे ही इस वस्त्रको इटालियन कहते हैं। वृक्षत्वक्से इटालियन बनता और खूब चमकदार निकलता है। रङ्ग काला होता है।}} {{outdent|इट्चर (सं॰ पु॰) इष भावे किप्-चर-अच्, दृषा कामेन चरतोति। षण्ड, स्वतन्त्र घूमनेबाला सांड़ ।}} 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608974 2026-07-05T12:28:28Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665009 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१६०'''|'''उच्चकैः――उच्चय'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :है। अर्थात् तुलाका सूर्य, वृश्चिकका चन्द्र, कर्कटका मङ्गल, मीनका बुध, मकरका वृहस्पति, कन्याका शुक्र और मेषका शनि नीच है। ८ नारिकेलवृक्ष, नारियलका पेड़। ९ सरल देवदारु। {{Outdent|उच्चकैः (सं॰ अव्य॰) उच्चैस्-अकच्। अतिशय उच्च, उन्नत, निहायत बुलन्द। <small>(माघ १।१२)</small>}} {{Outdent|उच्चक्षु (सं॰ त्रि॰) उत्क्षिप्तमुत्पाटि वा चक्षुर्यस्य, प्रादि॰ बहुव्री॰। ऊपरकी ओरको चक्षु रखने-वाला, जो आंख उठाये हो।}} {{Outdent|उच्चध्वज (सं॰ क्ली॰) हृदयमें रहने और मुखपर न आनेवाला हास्य, अन्दरूनी क़हकहा, जो हंसी चेहरेसे नहीं-दिलसे निकलती हो।}} {{Outdent|उच्चङ्गम (सं॰ पु॰) उच्चगामी पक्षी, विहङ्ग, जो चिड़िया ऊंचे उड़ सकती हो। <small>(दिव्यावदान)</small>}} {{Outdent|उच्चट (सं॰ पु॰) वङ्ग, सीस।}} {{Outdent|उच्चटन (सं॰ क्ली॰) उन्मूलन, बरबादी, उजाड़। २ पलायन, दौड, मन्त्र द्वारा किसी व्यक्तिको उसकी वृत्तिसे भगा देनेका काम।}} {{Outdent|उच्चटनीय (सं॰ वि॰) भगाया जानेवाला, जो निकाल देनेके लायक़ हो।}} {{Outdent|उच्चटा (सं॰ स्त्री॰) उत्-चट्-अच्-टाप्। १ गुज्जा, घुंघची। २ भूम्यामलको, भुयिं आंवला। ३ एक प्रकार लशुन, किसी किस्म का लहसन। ४ नागर-मुस्ता, नागरमोथा। ५ रक्त गुञ्जा, लाल घुंघची। ६ तृण विशेष, एक घास (Cyperus Compressus)। इसे निर्विषी, चुडाला, चक्रला, अम्बु पत्रा, जटिला, शुक्रजा और उत्तानक भी कहते हैं। वैद्यकके मतसे उच्चटा स्निग्ध, शीतल, कषाय और अम्ल होती है। इससे पित्त, प्रमेह, दाह, तृष्णा, मूत्रक्वच्छ, मूत्राघात, उन्माद, अपस्मार, रक्तपित्त और वातरक्तकी व्यथा मिट जाती है। उच्चटा छोटे नागपुर, आसाम, लखनऊ और सिंहसके ग्रीष्मप्रधान स्थानोंमें उपजती है। ७ दम्भ, ग़रूर, घमण्ड। ८ चर्चा, तज़किरा, बातचीत। ९ स्वभाव, आदत।}} {{Outdent|उच्चटापत्र ( सं॰ पु॰) क्षुद्र तालीशपत्र, छोटे पनिहा आंवखेका पत्ता। (क्ली॰) २ चिच्चोटक पत्र।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उच्चटाफल (सं॰ क्ली॰) रक्तगुज्जा, लाल घुंघची।}} {{Outdent|उच्चटामूल (सं॰ क्ली॰) चिञ्चोटक मूल, चचेंड़ेकी जड़।}} {{Outdent|उच्चण्ड (सं॰ त्रि॰) उत्-चड-अच्। १ त्वरान्वित, जल्दबाज़, फुरतीला। २ तीब्र, तुन्दख़ू, झला।}} {{Outdent|उच्चतम (सं॰ त्रि॰) अत्यन्त उन्नत, निहायत ऊंचा। (पु॰) सप्तक विशेष। सङ्गीतमें यह तारसे भी ऊंचा पड़ता और केवल बजाने में लगता है।}} {{Outdent|उच्चतर (सं॰ त्रि॰) अपेक्षाकृत उन्नत, ज्यादा ऊंचा।}} {{Outdent|उच्चतरु (सं॰ पु॰) उच्च उन्नतस्तरुः। १ नारिकेल वृक्ष, नारियलका पेड़। २ वट वृक्ष, बरगद का पेड़।}} {{Outdent|उच्चता (नं॰ स्त्री॰) उन्नतावस्था, उचाई।}} {{Outdent|उच्चताल (सं॰ क्ली॰) भोजके समयका नृत्य एवं गीत, ज्या़फ़त में होनेवाला नाच और गाना।}} {{Outdent|उच्चत्त्व (सं॰ क्ली॰)<small> उच्चता देखो।</small>}} {{Outdent|उच्चदेव (सं॰ पु॰) उच्चः प्रधानो देवः। विष्णु, प्रधान देव श्रीकृष्ण।}} {{Outdent|उच्चदेवता (सं॰ स्त्री॰) काल, यमराज।}} {{Outdent|उच्चध्वज (सं॰ क्ली॰) तूषित नामक स्वर्गस्थ बुद्धका नाम।}} {{Outdent|उच्चनीच (सं॰ त्रि॰) १ उत्कृष्ट निकृष्ट, उन्नत-श्रव-नत, भला-बुरा, ऊंचा नीचा।<small> “दृष्टारमुच्चनीचानां कर्मभि र्देहिनां गतिम् ।” (भारत अश्वमेध)</small> (पु०) २ ग्रहगणका उच्च और नीच स्थान। ३ स्वरके आघातका परिवर्तन, आवाजका उतार-चढ़ाव।}} {{Outdent|उच्चन्द्र (सं॰ पु॰) उत् स्वल्प अवशिष्टश्चन्द्रो यत्र, प्रादि॰ बहुव्री॰। निशाका चतुर्थ प्रहर, रात्रिशेष, रातका आखिरी वक्त। रात्रिको जब चन्द्र डूबने लगता, तब यह समय पड़ता है।}} {{Outdent|उच्चपद (सं॰ क्ली॰) सम्मानका पद, उन्नतावस्था, ऊंचा दरंजा।}} {{Outdent|उच्चभाषण (सं॰ क्ली॰) उन्नत कथन, बुलन्द बात, ऊंचा बोल।}} {{Outdent|उच्चभाषिन् (सं॰ त्रि॰) उच्चः स्वरसे बोलनेवाला, जो जोरसे बात करता हो।}} {{Outdent|उच्चय (सं॰ पु॰) उत्-चि-अच्। १ चयन, इकट्ठा करनेका काम। २ परिधान-वस्त्र-ग्रन्थि, पहननेके}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> e9k77hdxvmlv6voccfx7xmrhm5ck2w2 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१६२ 250 75851 665012 608975 2026-07-05T13:14:45Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665012 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उच्चयापचय-उच्चारित'''|'''१६१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :कपड़े की गांठ, इजारबन्द। ३ रचना, बनावट <small>“वाक्यं स्वादयोग्यताकाङ- सत्तियुक्तः पदोश्यः।” (साहित्यदर्पण)</small> ४ संयोजना, मिलाव। ५ समूह, ढेर। ६ त्रिकोणका सम्मुखस्थ पार्स्व, मुसल्लसके सामनेका वाज़ू। {{Outdent|उच्चयापचय (सं॰ पु॰) वृद्धि और ह्रास, घटती बढ़ती, चढ़ा उतरी।}} {{Outdent|उच्चरण (सं॰ क्ली॰) १ ऊपर या बाहर जानेका काम। २ कथन, तलफ़् फुज़। यह कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ और नासिकादिके प्रयत्नसे होता है।}} {{Outdent|उच्चरना (हिं॰ क्रि॰) उच्चरण करना, मुंहसे निकालना, बोलना।}} {{Outdent|उच्चरित (सं॰ त्रि॰) उत्-चट्कर्मणि क्त। १ कीर्तित, कहा या निकाला हुआ। २ उत्थित, उठा या निकला हुआ। (क्ली॰) ३ विष्ठा, मलमूत्र, बराज़, मैला।}} {{Outdent|उच्चल ( सं॰ क्ली॰) उत्-चल-अच्। मन, दिल।}} {{Outdent|उच्चलन (सं॰ क्ली॰) गमन, रवानगी, सरक जानेका काम।}} {{Outdent|उच्चललाटा (सं॰ स्त्री॰) उच्चललाटविशिष्ट स्त्री, ऊंचे मत्थे की औरत।}} {{Outdent|उच्चललाटिका, <small>उच्चललाटा देखो।</small>}} {{Outdent|उच्चलित (सं॰ त्रि॰) ऊपर या बाहर पहुंचा हुआ, जो फटकारा गया हो।}} {{Outdent|उच्चा (वै॰ अव्य॰) उपरि, ऊपर, ऊंचे।}} {{Outdent|उच्चाचक्र (वै॰ त्रि॰) उपरि चक्र युक्त, जिसके उपर घेरा रहे। यह शब्द कूपका विशेषण है।}} {{Outdent|उच्चाट, <small>उच्चाटन देखो।</small>}} {{Outdent|उच्चाटन (सं॰ क्ली॰) उत्-चट्-णिच्-ल्युट्। १ उत्पाटन, स्थापित वा संयोजित वस्तुका पृथक् करण,उखाड़, नोच-खसोट। २ चञ्चल करण, डावांडोल बनानेका काम। ३ षट्कर्मान्तर्गत अभिचार विशेष, एक जादू। इस कार्यकी देवता दुर्गा और तिथि कृष्णाष्टमी वा चतुर्दशी है। शनिवारको साधुके बालोंमें पिरोयी हुई घोड़े के दांतोंकी मालासे जप करते हैं। <small>(शारदातिलक) इन्द्रजाल देखो।</small> ४ उत्कण्ठा, फि़क्र। ५ विवाद, झगड़ा। ६ उत्खातन, अफ़सुर्दा बनानेका काम।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उच्चाटनीय (सं॰ त्रि॰) उत्पाटनयोग्य, उखाड़ डालने के क़ाबिल।}} {{Outdent|उच्चाटित (सं॰ त्रि॰) उत्पाटित, उखाड़ा हुआ, जो निकाला गया हो!}} {{Outdent|उच्चाबुध्न (बै॰ त्रि॰) उपरि तलयुक्त, जिसके पेंदा ऊपर रहे।}} {{Outdent|उच्चार (सं॰ पु॰) १ विष्ठा, बराज़, मैला। स्मृतिमें लिखा है,―― उच्चार, मैथुन, प्रस्राव, दन्तधावन, सान और भोजन छः कार्य करते समय बोलना न चाहिये।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“उच्चारे मैथुने चैव प्रस्त्रावे दन्तधावने। खाने भोजनकाले च षट्सु मौन’ समाचरेत्॥” (स्मृति)</poem>}}}} :२ त्याग, बरखा़स्तगी।३ उच्चारण, कथन, तलफ़् फुज़। {{Outdent|उच्चारक (सं॰ त्रि॰) उच्चार स्वार्थे कन्। उच्चारण-कारी, तलफ़् फुज़, करनेवाला, जो उच्चारण करता हो।}} {{Outdent|उच्चारण (सं॰ क्ली॰) उत्-चर्-णिच्-ल्युट्। कथन, शब्दप्रयोग, तलफ़फुज़, बोलनेका काम। २ स्फुटन-कार्य, मुमकिन्-उल्-समा बनानेका काम, जिससे समझमें आ जाये।}} {{Outdent|उच्चारणज्ञ (सं॰ पु॰) शब्दव्युत्पन्न, ज़बान्दान्, जो तलफ़् फुज़ करने में होशियार हो।}} {{Outdent|उच्चारणस्थान (सं॰ क्ली॰) गलांशविशेष, गलेका एक हिस्सा। इसीसे शब्द निकलता है। कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका, जिह्वामूल और उपध्मा आठ उच्चारणके स्थान होते हैं।}} {{Outdent|उच्चारणार्थ (सं॰ त्रि॰) १ उच्चारणके लिये उच्चयोगी, तलफ़् फुजमें लगनेवाला, जो बोलने के लिये मुफी़द हो। २ उच्चारण के लिये आवश्यक, तलफ् फ़ुज करने में जिसकी जरूरत पड़े। कभी-कभी अतिरिक्त अक्षर लगा लेनेसे उच्चारणमें सरलता आ जाती है।}} {{Outdent|उच्चारणीय (सं॰ त्रि॰) उच्चारण किया जानेवाला जो तलफ़् फुज़ किये जाने का़बिल हो।}} {{Outdent|उच्चारना (हिं॰ क्रि॰) उच्चारण करना, तलफ़् फुज़ निकालना, बोलना।}} {{Outdent|उच्चारित (सं॰ त्रि॰) उच्चार-इतच्। <small>तदस्य सञ्चाते तारकादिभ्य इतच्। पा ५।२।२६।</small> १ उथित, शब्दायित, तलफ़् फुज़}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 41|1em}}</noinclude> je5jvznqudbwez273fhqcrji5smu5ts पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१६३ 250 75852 665013 608976 2026-07-05T13:20:32Z अँजली चौधरी 2439 665013 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''१६२'''|'''उच्चार्य-उच्चैर्घोष'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> किया या कहा हुआ, जो बोला गया हो। २ मूलमूत्र । जातिसे बड़ा होता है। हिन्दुस्थानमें इसे घुरघुरा युक्त, बराज से भरा हुआ। या भोंगर कहते हैं। झौंगर देखो। उच्चार्य (सं० वि०) उत्-चर्-णिच्-त्यप्। १ उच्चारण- महर्षि सुश्रुतके मतमें यह विषाक्त कीट है । इसके योग्य, तलफ फुजके काबिल। (अव्य.) ३ उच्चारण दंशनसे वायुजन्य रोग उपजता है। (सुश्रुत कल्पस्थान) करके, कहकर। उच्चड़ (सं• पु०) उव्रता चड़ा यस्य, डस्य लत्वम् । उच्चार्यमाण (सं०वि०) उच्चारण किया जानेवाला, १वजोधमुख कूर्च, ध्वजके उपरिभागका वस्त्रखण्ड, जो कहा जा रहा हो। अण्डे के ऊपरी हिस्स का फहरानेवाला कपड़ा। उच्चावच (सं० वि०) उदक् उत्कष्टश्च पवाक निकृष्टच्च, २ध्वजके उपरि भागपर बांधा जानेवाला एक निपातनात् साधुः । मयूरव्यंसकादयश्च । पा २।१।७२ । १ विविध, | अलङ्कार, झण्डे के ऊपरी हिस्म का एक गहना। नानाप्रकार, मुख, तलिफ। २ असमान, नाहमवार, उच्चूल, उच्चड़ देखो। जो बराबर न हो। ३ उच्चनीच, भलाबरा। उच्चैः (सं० अव्य०) १ उव्रत-रूपसे, ऊंचे। २ पत्यन्त, उच्चिङ्गट (सं० पु०) १ढणगड़-मत्स्य, किसी किस्मका निहायत, बहुत । ३ उच्च स्वरपूर्वक, बुलन्द आवाजमें । केकड़ा। २ कोपनस्वभाव, गुस्मावर आदमी।३ पतङ्ग- उच्चैःकर (सं० त्रि०) तीक्ष्ण-स्वरित बनानेवाला, जो विशेष, किसी किस्मका घुरघुरा, एक झोंगर। लहजको जोरसे अदा करता हो। उच्चिटिङ्ग (स.पु०) उच्चिटङ्ग, एक भोंगर। यह उच्चैःकुल (सलो०) १ उन्नत वंश, ऊंचा खान्दान। कौड़ा तीन चार प्रकारका होता है। एक जातीय (त्रि०) २ उव्रत वंश-सम्भूत, ऊ'चे खान्दान्वाला। ( Acheta domestica ), नगर, विशेषतः पल्लि- उच्चःशिरस् ( स० त्रि०) उच्चैरुवतं शिरोऽस्य । उबत- ग्राममें ही अधिक रहता है। देखने में कोमल है। मस्तक, महत्तर, ऊंचे दरजेवाला । इसे उष्णस्थानमें रहना अच्छा लगता है। उच्चिटिङ्ग उच्चैःश्रवस् (सं० पु.) १ इन्द्रका घोटक या घोड़ा। ग्रीष्मकालमें निकलता है। शीत पड़ते ही यह निज | समुद्रमन्थनसे इसको उत्पत्ति है। इसका कान खड़ा का पाश्रय लेता है। उष्णता न मिलनेसे | और बोल बड़ा होता है। वर्ण व त है। मुखको उच्चिटिङ्ग मृतवत् पड़ा रहता है। यह निशाचर संख्या सात बताते हैं। (त्रि.)२ बधिर, बहरा, जो होनेसे सन्ध्याके बाद आहार ढूढ़ने निकलता | कम सुनता हो। है। किन्तु ग्राम्य उञ्चिटिङ्गको अपेक्षा वन्य अथवा उच्चैःश्रवस, उच्चैःश्रवस् देखो। क्षेत्रज ( Acheta campestris) बहुत बड़ा और उच्चैश्रवा, उच्चैःश्रवस देखो। देखने में काली रौशनायी-जैसा होता है। यह सात- | उच्चैःस्थान (स.ली.) १ उन्नत स्थान, ऊंची जगह। आठ हाथ नीचे मट्टीमें गत बनाता है। रात्रिकालको| (त्रि.) २ उन्नत पदाधिकारी, ऊंचे दरजे या खान- गर्तके मुखपर बैठ प्रथम पल्प अल्प और पश्चात् | दानवाला । प्रणयिनीके आकर मिल जाने से साथ-साथ उल्लासमें | उच्चैःस्थय ( स० क्लो०) दृढ़ता, मजबूती (चाल प्राण भर बोलता है। इसका स्वर दूरसे मन लगाकर | चलनको)। सुनने पर अति मिष्ट लगता और सङ्गीतको नाना उच्चैःस्वर (सं० पु.) उन्नत शब्द बुलन्द आवाज़। प्रकार ध्वनिका भाव जताता है। एक-एक स्त्री प्रायः (त्रि.) २ उन्नत शब्द निकालनेवाला, जो बुलन्द दो सौ डिम्ब देती है। डिम्ब फूटनेपर बच्चेका पाकार आवाज़ लगाता हो। प्रायः मध्यमवयस्क उच्चिटिङ्गकी तरह रहता है, केवल उच्चैर्घष्ट (म० क्लो०) उच्चस्-घुष् भावे त। महारव, पक्षही नहीं निकलते। शोर, गुलगपाड़ा। एक जातीय दूसरा उच्चिटिङ्गभी है। यह उक्त उभय | उच्च?ष (वै• त्रि.) उव्रत खरको घोषणावाला। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 7cx2pfon42221dm4ehubmetkbz1vryk 665019 665013 2026-07-05T15:17:00Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665019 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१६२'''|'''उच्चार्य-उच्चैर्घोष'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :किया या कहा हुआ, जो बोला गया हो। २ मूलमूत्र। युक्त, बराज़ से भरा हुआ। {{Outdent|उच्चार्य (सं० वि०) उत्-चर्-णिच्-त्यप्। १ उच्चारण- योग्य, तलफ़् फुज़के का़बिल। (अव्य॰) २ उच्चारण करके, कहकर।}} {{Outdent|उच्चार्यमाण (सं॰ त्रि॰) उच्चारण किया जानेवाला, जो कहा जा रहा हो।}} {{Outdent|उच्चावच (सं॰ त्रि॰) उदक् उत्कष्टश्च पवाक निकृष्टच्च, निपातनात् साधुः। मयूरव्यंसकादयय। पा २।१।७२। १ विविध, नानाप्रकार, मुख़् तलिफ। २ असमान, नाहमवार, जो बराबर न हो। ३ उच्चनीच, भलाबुरा।}} {{Outdent|उच्चिङ्गट (सं॰ पु॰) १ तृणगड़-मत्स्य, किसी किस्मका केकड़ा। २ कोपनस्वभाव, गुस्मावर आदमी। ३ पतङ्ग-विशेष, किसी किस्मका घुरघुरा, एक झींगर।}} {{Outdent|उच्चिटिङ्ग (सं॰ पु॰) उच्चिटङ्ग, एक झींगर। यह कीड़ा तीन चार प्रकारका होता है। एक जातीय (Acheta domestica), नगर, विशेषतः पल्लि-ग्राममें ही अधिक रहता है। देखने में कोमल है। इसे उष्णस्थानमें रहना अच्छा लगता है। उच्चिटिङ्ग ग्रीष्मकालमें निकलता है। शीत पड़ते ही यह निज आवासका आश्रय लेता है। उष्णता न मिलनेसे उच्चिटिङ्ग मृतवत् पड़ा रहता है। यह निशाचर होनेसे सन्ध्याके बाद आहार ढूढ़ने निकलता है। किन्तु ग्राम्य उच्चिटिङ्गको अपेक्षा वन्य अथवा क्षेत्रज (Acheta campestris) बहुत बड़ा और देखने में काली रौशनायी-जैसा होता है! यह सात-आठ हाथ नीचे मट्टीमें गर्त बनाता है। रात्रिकालको गर्तके मुखपर बैठ प्रथम पल्प अल्प और पश्चात् प्रणयिनीके आकर मिल जाने से साथ-साथ उल्लासमें प्राण भर बोलता है। इसका स्वर दूरसे मन लगाकर सुनने पर अति मिष्ट लगता और सङ्गीतकी नाना प्रकार ध्वनिका भाव जताता है। एक-एक स्त्री प्रायः दो सौ डिम्ब देती है। डिम्ब फूटनेपर बच्चेका आकार प्रायः मध्यमवयस्क उच्चिटिङ्गकी तरह रहता है, केवल पक्षही नहीं निकलते। एक जातीय दूसरा उच्चिटिङ्गभी है। यह उक्त उभय <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :जातिसे बड़ा होता है। हिन्दुस्थानमें इसे घुरघुरा या झींगर कहते हैं। <small>झींगर देखो।</small> :{{gap}}महर्षि सुश्रुतके मतमें यह विषाक्त कीट है। इसके दंशनसे वायुजन्य रोग उपजता है। <small>(सुश्रुत कल्पस्थान)</small> {{Outdent|उच्चड़ (सं॰ पु॰) उन्नता चड़ा यस्य, डस्य लत्वम्। १ ध्वजोधमुख कूर्च, ध्वजके उपरिभागका वस्त्रखण्ड, अण्डे के ऊपरी हिस्से का फहरानेवाला कपड़ा। २ ध्वजके उपरि भागपर बांधा जानेवाला एक अलङ्कार, झण्डे के ऊपरी हिस्से का एक गहना।}} {{Outdent|उच्चूल, <small>उच्चड़ देखो।</small>}} {{Outdent|उच्चैः (सं॰ अव्य॰) १ उन्नत-रूपसे, ऊंचे। २ अत्यन्त, निहायत, बहुत। ३ उच्च स्वरपूर्वक, बुलन्द आवाजमें।}} {{Outdent|उच्चैःकर (सं॰ त्रि॰) तीक्ष्ण-स्वरित बनानेवाला, जो लहजको ज़ोरसे अदा करता हो।}} {{Outdent|उच्चैःकुल (सं॰ क्ली॰) १ उन्नत वंश, ऊंचा खा़न्दान्। (त्रि॰) २ उन्नत वंश-सम्भूत, ऊंचे खा़न्दान्वाला।}} {{Outdent|उच्चःशिरस् (सं॰ त्रि॰) उच्चैरुन्नतं शिरोऽस्य। उन्नत-मस्तक, महत्तर, ऊंचे दरजेवाला।}} {{Outdent|उच्चैःश्रवस् (सं॰ पु॰) १ इन्द्रका घोटक या घोड़ा। समुद्रमन्थनसे इसकी उत्पत्ति है। इसका कान खड़ा और बोल बड़ा होता है। वर्ण श्वत है। मुखकी संख्या सात बताते हैं। (त्रि॰) २ बधिर, बहरा, जो कम सुनता हो।}} {{Outdent|उच्चैःश्रवस, <small>उच्चैःश्रवस् देखो।</small>}} {{Outdent|उच्चैश्रवा, <small>उच्चैःश्रवस् देखो।</small>}} {{Outdent|उच्चैःस्थान (सं॰ क्ली॰) १ उन्नत स्थान, ऊंची जगह। (त्रि॰) २ उन्नत पदाधिकारी, ऊंचे दरजे या खान-दान्वाला।}} {{Outdent|उच्चैःस्थेय (सं॰ 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उन्नत, निहायत बुलन्द, बहुत ऊंचा। २ अत्यन्त उन्नत स्वरविशिष्ट, बहुत ऊंची आवाज़वाला।}} {{Outdent|उच्चस्तमाम् (सं॰ अव्य॰) १ अत्यन्त उन्नत रूपसे, बहुत ऊंचे। २ उन्नत स्थानपर, बुलन्दीके ऊपर। ३ उन्नत स्वरसे, बुलन्द आवाज़के साथ।}} {{Outdent|उच्चैस्तर (सं॰ त्रि॰) १ अपेक्षाकृत उन्नत, ज्या़दा ऊंचा। २ अधिक स्वराघातयुक्त, जो ज्या़दा ऊंची आवाज़से बोला जाता हो।}} {{Outdent|उच्चैस्तरख (सं॰ क्ली॰) अधिक उन्नत होनेकी स्थिति, ज्या़दा ऊंचा होनेकी हालत।}} {{Outdent|उच्चैस्त्व (सं॰ क्ली॰) उच्चता, बुलन्दी, ऊंचाई।}} {{Outdent|उच्छ्――१ तुदा॰ इदित्॰ पर॰ सक॰ सेट्। यह धान्यकणा ग्रहणका अर्थ रखता है। २ तुदा॰ पर॰ सक॰ सेट्। इससे वन्ध, समागम, अतिक्रस और त्यागका अर्थ निकलता है।}} {{Outdent|उच्छन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-छद्-क्त। नष्ट, बरबाद, उजड़ा।}} {{Outdent|उच्छन्नसन्धि (सं॰ स्त्री॰) सन्धि विशेष, एक सुलह। उत्तम राज्य लेने के बाद किसी राजाके साथ होनेवाली सन्धिको उच्छन्नसन्धि कहते हैं।}} {{Outdent|उच्छय (सं॰ क्ली॰) त्रिकोण का पश्चात् पद, मुसल्लसके पीछेका क़दम।}} {{Outdent|उच्छरना, <small>उछलना देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छल (सं॰ त्रि॰) उत्-शल-अच्। आधार अति क्रमकर ऊर्ध्व को प्लावित होनेवाला, जो अपनी जगह छोड़ ऊपरको उड़ता हो।}} {{Outdent|उच्छलत् (सं॰ त्रि॰) १ ऊपर या दूर उड़नेवाला। २ सामना करनेवाला।}} {{Outdent|उच्छलन (सं॰ क्ली॰) ऊपरका उड़ना, उछाल।}} {{Outdent|उच्छलना, <small>उछलना देखो।</small>}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उच्छलित (सं॰ त्रि॰) उत्-शल्- क्त। उत्क्षिप्त, उत्थित, उछला हुआ, जो ऊपर उड़ गया हो।}} {{Outdent|उच्छव (हिं॰) <small>उत्सव देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छादन (सं॰ 4क्ली॰) उच्छाद्यते मलोऽनेन, उत्-छद्-णिच्-ल्य ट्। १ गन्धद्रव्य द्वारा शरीर मार्जन, खशबुदार चीज़से जिस्मकी सफा़ई। २ आच्छादन, छिपाव, ढंकाई।}} {{Outdent|उच्छाद्य (सं॰ अव्य॰) उतारकर, कपड़े खोलकर।}} {{Outdent|उच्छाल-एक प्राचीन जनपद, गौड़के मध्य अवस्थित ।}} {{Outdent|उच्छास (हिं॰)<small> उच्छास देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छास्त्र (सं॰ त्रि॰) उत् उत्क्रान्तं शास्त्रम्। शास्त्र-विरुद्ध, जो शास्त्रसे मिलता न हो।}} {{Outdent|उच्छास्त्रवर्तिन् (सं॰ त्रि॰) शास्त्रोल्लङ्घनकारी, शास्त्रकी मर्यादाको उल्लङ्घन करनेवाला।}} {{x-smaller|{{c|“न राज्ञः प्रतिगृह्रीयाल्लु व्घस्योच्छास्ववर्तिनः॥” (याज्ञवल्का ११४०)}}}} {{Outdent|उच्छाह (हिं॰) <small>उत्साह देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छिख (सं॰ त्रि॰) उन्नता शिखा यस्य, प्रादि॰ बहुव्री॰। उन्नत-शिखा, चोटी ऊपरको उठाये हुआ। २ ज्वाला ऊपरको लगाये हुआ, जो लपटकी नोक ऊपरको निकाले हो। ३ ज्वलन्त, भभकनेवाला। ३ द्युतिमान्, चमकीला। <small>“माङ्गल्योर्णवलयिनि पुरः पाव-कस्योच्छिखस्य।” (रघु १७।१७)</small> (पु॰) ४ उन्नत शिखा-विशिष्ट एक नाग। <small>(भारत आदि)</small>}} {{Outdent|उच्छिङ्घन (सं॰ क्ली॰) नस्यकी भांति नासिका द्वारा किसी वस्तुको श्वासके साथ खींचनेका कार्य, ख़रराटे मारनेकी हालत। इसे उच्चिङ्घन भी लिखते हैं।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“विध्यते योऽन्य पाश्व ऽच्यास्त'रुध्वा नासिकापुटम्। उच्छिङ्घमेन हर्तव्यो दृष्टिमण्डलजः कफः॥” (सुश्रुत उत्तर १७ अ॰)</poem>}}}} {{Outdent|उच्छित (सं॰ त्रि॰) उत्-शि-क्त। रुड, रुका या घिरा हुआ।}} {{Outdent|उच्छिति (सं॰ स्त्री॰) उत्-छिद् भावे क्तिन् । उच्छेद, विनाश, बरबादी।}} {{Outdent|उच्छिद्य (सं॰ अव्य॰) विनाश करके, काट या मारकर।}} {{Outdent|उच्छिन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-छिद्-क्त । १ समूल उत्-पाटित, तोड़ा या उखाड़ा हुआ। २ नीच, कमीना।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> c7dp3r4a91mbo547lw3ujs8sjmorl93 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१६५ 250 75854 665032 608978 2026-07-05T17:42:05Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665032 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१६४'''|'''उच्छिरस्-उच्छिष्टभोजन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :(पु॰) ३ बहुमूल्य भूमिके देनेसे प्राप्त हुई सन्धि, जो सुलह बेशकी़मत ज़मीन देनेसे मिली हो। {{Outdent|उच्छिरस् (सं॰ त्रि॰) उन्नतं शिरोऽस्य। १ उन्नत शिरःविशिष्ट, महिमान्वित, जो मत्थेको ऊपर उठाये हो। (पु०) २ बौद्धशास्त्रोक्त उरुमुण्ड पर्वत।}} {{Outdent|उच्छिलीन्द्र, <small>उच्छिलीन्द्र देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छिलीन्ध (सं॰ क्ली॰) उद्गतं शिलीन्धम्। गोमय-च्छत्राक, कुलाह-बारान्, कुकरमुत्ता, सांपकी टोपी। वर्षामें यह भूमिको विदारण कर प्रकट होता है।}} {{Outdent|उच्छिष्ट (सं॰ त्रि॰) उत् शिष्यते यत्, उत्-शिष्-क्त। १ भुक्तावशिष्ट, जठा, जो खाते-खाते बचा हो। शास्त्रमें उच्छिष्ट द्रव्य खानेको मना कहा है―}} {{x-smaller|{{c|<poem>“नोच्छिष्टं कस्वचिद्दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा।न चैवात्यशनं कुर्यान्नचोच्छिष्टः क्वचिद व्रजेत्॥” (मनु २।५६) </poem>}}}} {{gap}}उच्छिष्ट किसीको देना, सायं एवं प्रातभॊजन कालके मध्य फिर खाना, अतिशय आहार करना और उच्छिष्ट मुखसे कहीं जाना न चाहिये। भिन्न-भिन्न जातिका उच्छिष्ट छूने अथवा खानेसे प्रायश्चित्त करना पड़ता है- {{x-smaller|{{c|<poem>“अज्ञानाद यस्तु भुञ्जीत शूद्रोच्छिष्टं हिजोत्तमः। विरात्रोपषिवी भूत्वा पञ्चगव्येन शुध्यति॥” (आपस्तम्ब) </poem>}}}} जो ब्राह्मण अज्ञानसे शूद्रका उच्छिष्ट खाता है, वह तीन रात्रि उपवास करने बाद पञ्चगव्यसे शुद्धि पाता है। {{x-smaller|{{c|<poem>“अन्नानां भुक्तशेषस्तु भक्षितो यै र्द्दिजातिभिः। चान्द्रं क्वच्छं तदर्धञ्च क्रमातेषां विशोधनम्॥” (प्रायश्चित्तविपाक)</poem>}}}} द्विजाति अन्नका उच्छिष्ट खानेसे क्रमान्वयमें चान्द्रायण और तप्तकृच्छ अथवा उसका अर्ध प्रायश्चित्त करनेपर शुद्ध होते हैं। {{x-smaller|{{c|<poem>“चण्डालपतितादौनामुच्छिष्टान्नस्य भक्षणे।द्विजः शुद्धोत पराकेण शूद्रः कृच्छो ण शुद्यति॥” (अङ्गिरा)। </poem>}}}} चण्डाल, पतित प्रभृतिका उच्छिष्ट अन्न खानसे ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य पराक् तथा शूद्र कृच्छ द्वारा शुद्ध होता है। जान बुझकर उच्छिष्ट खानेसे दुना प्रायश्चित्त करना पड़ता है। {{x-smaller|{{c|<poem>शूद्रोच्छिष्टाशने मासं पक्षमेकं तथा विशः। क्षत्रियस्य तु सप्ताहं ब्राह्मणस्य तथा दिनम्॥” (शुद्ध १७।४२)। </poem>}}}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}शूद्रका एक मास, वैश्यका एक पक्ष, क्षत्रियका एक सप्ताह और ब्राह्मणका उच्छिष्ट खानेसे एक दिन ब्रत करना पड़ता है। {{x-smaller|{{c|<poem>“श्वशूकरान्ताचण्डालमद्यभाण्डरजस्वला।यद्युच्छिष्टै: स्पृ शेतव कृच्छ सान्तपनं चरेत्॥” (काश्यप)</poem>}}}} कुक्कुर, शूकर, शुद्र, चण्डाल, मद्यभाण्ड और रजस्खलाका उच्छिष्ट छूनेसे कच्छ और सान्तपन द्वारा शुद्ध होना चाहिये। चिकित्साशास्त्र में भी उच्छिष्ट भोजन निषिद्ध कहा है। क्योंकि जो व्यक्ति प्रथम खाके उच्छिष्ट छोड़ता है, उसका संक्रामक रोग उच्छिष्ट खानवालेको भी दबा सकता है। अतएव उच्छिष्ट भोजन न करना ही अच्छा है। २ त्यक्त, छूटा हुआ, जो छोड़ दिया गया हो। ३ अपवित्र, नापाक, जिसके मुंह या हाथ-पर जुठा खाना लगा रहे। (पु॰) ४ मधु, शहद (क्ली॰) ५ दत्तावशिष्ट, बचत, जो देनेसे बचा हो। {{x-smaller|{{c|<poem>“असंस्कृतप्रमौतामां योगिनां कुलयोषिताम्।उच्छिष्ट भागधे यं स्यात् दर्भेषु विकिरश्च यः॥” (ब्रह्मपुराण)</poem>}}}} {{Outdent|उच्छिष्टकल्पना (सं॰ क्ली॰) १ निःसार आविष्कार, वेमजा़ ईज़ाद, बासी बनावट।}} {{Outdent|उच्छिष्टगणपति (सं॰ पु॰) १ उच्छिष्ट व्यक्ति द्वारा पूजित गणेश। जूठे मुंह रहनेवाले लोग इन्हें पूजते है। २ हेरम्ब सम्प्रदाय। इसके मतसे स्त्री और परुष उभय होते हैं। उनके संयोग वियोगमें पाप नहीं लगता। यह शब्द शुद्धगणपतिके विरोध में आता है।}} {{Outdent|उच्छिष्टगणेश (सं॰ पु॰) तन्त्रोक्त गणेशकी मूर्तिका एक भेद। <small>गणेश देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छिष्टचाण्डालिनी (सं॰ स्त्री॰) तन्त्रोक्त मातङ्गी देवीकी एक मूर्ति। <small>मातङ्गी देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छिष्टता (सं॰ स्त्री॰) १ शेष रहजानेको दशा, जिस हालतसे कुछ छूट जाये। २ अपवित्रता, नापाकी, जूठन।}} {{Outdent|उच्छिष्टभोक्ता, <small>उच्छिष्टभोजिन् देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छिष्टभोजन (सं॰ पु॰) १ देव-नैवेद्य-वलिभोजन-कर्ता, जो देवता पर चढ़ा प्रसाद खाता हो। २ अपरके}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1c2qwo34srbxvlphfbqfelavxkrw4jc 665033 665032 2026-07-05T17:44:38Z अँजली चौधरी 2439 665033 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१६४'''|'''उच्छिरस्-उच्छिष्टभोजन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :(पु॰) ३ बहुमूल्य भूमिके देनेसे प्राप्त हुई सन्धि, जो सुलह बेशकी़मत ज़मीन देनेसे मिली हो। {{Outdent|उच्छिरस् (सं॰ त्रि॰) उन्नतं शिरोऽस्य। १ उन्नत शिरःविशिष्ट, महिमान्वित, जो मत्थेको ऊपर उठाये हो। (पु०) २ बौद्धशास्त्रोक्त उरुमुण्ड पर्वत।}} {{Outdent|उच्छिलीन्द्र, <small>उच्छिलीन्द्र देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छिलीन्ध (सं॰ क्ली॰) उद्गतं शिलीन्धम्। गोमय-च्छत्राक, कुलाह-बारान्, कुकरमुत्ता, सांपकी टोपी। वर्षामें यह भूमिको विदारण कर प्रकट होता है।}} {{Outdent|उच्छिष्ट (सं॰ त्रि॰) 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अतएव उच्छिष्ट भोजन न करना ही अच्छा है। २ त्यक्त, छूटा हुआ, जो छोड़ दिया गया हो। ३ अपवित्र, नापाक, जिसके मुंह या हाथ-पर जुठा खाना लगा रहे। (पु॰) ४ मधु, शहद (क्ली॰) ५ दत्तावशिष्ट, बचत, जो देनेसे बचा हो। {{x-smaller|{{c|<poem>“असंस्कृतप्रमौतामां योगिनां कुलयोषिताम्। उच्छिष्ट भागधे यं स्यात् दर्भेषु विकिरश्च यः॥” (ब्रह्मपुराण)</poem>}}}} {{Outdent|उच्छिष्टकल्पना (सं॰ क्ली॰) १ निःसार आविष्कार, वेमजा़ ईज़ाद, बासी बनावट।}} {{Outdent|उच्छिष्टगणपति (सं॰ पु॰) १ उच्छिष्ट व्यक्ति द्वारा पूजित गणेश। जूठे मुंह रहनेवाले लोग इन्हें पूजते है। २ हेरम्ब सम्प्रदाय। इसके मतसे स्त्री और परुष उभय होते हैं। उनके संयोग वियोगमें पाप नहीं लगता। यह शब्द शुद्धगणपतिके विरोध में आता है।}} {{Outdent|उच्छिष्टगणेश (सं॰ पु॰) तन्त्रोक्त गणेशकी मूर्तिका एक भेद। <small>गणेश देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छिष्टचाण्डालिनी (सं॰ स्त्री॰) तन्त्रोक्त मातङ्गी देवीकी एक मूर्ति। <small>मातङ्गी देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छिष्टता (सं॰ स्त्री॰) १ शेष रहजानेको दशा, जिस हालतसे कुछ छूट जाये। २ अपवित्रता, नापाकी, जूठन।}} 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{{x-smaller|{{c|<poem>“चण्डालपतितादौनामुच्छिष्टान्नस्य भक्षणे। द्विजः शुद्धोत पराकेण शूद्रः कृच्छो ण शुद्यति॥” (अङ्गिरा)। </poem>}}}} चण्डाल, पतित प्रभृतिका उच्छिष्ट अन्न खानसे ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य पराक् तथा शूद्र कृच्छ द्वारा शुद्ध होता है। जान बुझकर उच्छिष्ट खानेसे दुना प्रायश्चित्त करना पड़ता है। {{x-smaller|{{c|<poem>शूद्रोच्छिष्टाशने मासं पक्षमेकं तथा विशः। क्षत्रियस्य तु सप्ताहं ब्राह्मणस्य तथा दिनम्॥” (शुद्ध १७।४२)। </poem>}}}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}शूद्रका एक मास, वैश्यका एक पक्ष, क्षत्रियका एक सप्ताह और ब्राह्मणका उच्छिष्ट खानेसे एक दिन ब्रत करना पड़ता है। {{x-smaller|{{c|<poem>“श्वशूकरान्ताचण्डालमद्यभाण्डरजस्वला। यद्युच्छिष्टै: स्पृ शेतव कृच्छ सान्तपनं चरेत्॥” (काश्यप)</poem>}}}} कुक्कुर, शूकर, शुद्र, चण्डाल, मद्यभाण्ड और रजस्खलाका उच्छिष्ट छूनेसे कच्छ और सान्तपन द्वारा शुद्ध होना चाहिये। चिकित्साशास्त्र में भी उच्छिष्ट भोजन निषिद्ध कहा है। क्योंकि जो व्यक्ति प्रथम खाके उच्छिष्ट छोड़ता है, उसका संक्रामक रोग उच्छिष्ट खानवालेको भी दबा सकता है। 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खोपड़ा। "उच्छौष के श्रियै कुर्यात् भद्रकाल्य च पादतः । ब्रह्मवास्तो: पतिभ्यान्तु वास्तुभध्ये वलिं हरेत् ॥” (मनु ३।८९) (पु.) ४ शय्यादोष विशेष, विस्तरका एक ऐब।! "उच्छीष के ससुन्नाई वस्तिः कुर्याच्च मेहनम्।” ( मुश्त) उच्छष्य (सं० वि०) उत्-शिष् निपातनात् सिद्धम् । अवशेषणीय, बचा रखने काबिल, जो बच सकता हो। उच्छष्क (सं० वि०) १ उपरिभागमें शुष्क, मुरझाया | हुआ। “उच्छुकमांसरुधिरत्वचस्नायुनद्धः।" (ललितविस्तर) "उच्छषणं भूमिगतमजिझस्थाशठस्य च । २ सन्तप्त, गर्मागर्म। दासवर्गस्व पिवे भागधेयं प्रचक्षते ॥” (मनु १२४६) उच्छुम (सं० लो०) सम्मम, मोह, घबराहट। उच्छोचन (सं० त्रि०) उत्-शुच्-ल्य ट। ज्वलन्त, उच्छ्ष्म न्, उच्छु म देखो। भभकता हुआ, जो जल रहा हो। उच्छ (हिं० स्त्री०) उच्छास विकार, एक खांसी, उच्छेषण (सं० त्रि. ) उत्-शुष्-णिच-ल्य ट । धांस। खाते-पीते समय किसी द्रव्यके मुंहमें उलट १ सन्तापक, हरारत पैदा करनेवाला। २ जन- आन या पेटमें पहुंचनेसे रुक जानेपर इसका वेग शोषक, सुखा डालनेवाला। “न हि प्रपश्यामि मयापनुद्याद बढ़ता है। उच्च लगनेसे आंखों में आंसू भर आते हैं। यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।” (गीता रा८) प्रायः खाने-पीने में त्वरा करने और मनको एकाग्र न ली . ) भाव ल्य ट। ३ सम्य क शोषण, पूरी युबूसत, रखनसे इसकी उत्पत्ति है। खासौ सुखावट। उच्छड़ा (सं० स्त्री०) रचूड़ देखो। "उच्छीषणं समुद्रस्य पतनं चन्द्रसूर्ययोः।” (रामायण ३३३६।२१) उच्छन (सं० त्रि.) उत्-श्वि-त। १ स्फोत, सूजा या फूला हुआ। २ उन्नत, बुलन्द, ऊंचा। ३ उच्छ- उच्छोषुक (सं० त्रि.) उत्-शुष् बाहुलकात उका। सित, मुखके आन्तरिक श्वाससे दबा हुआ। ४ स्थ ल, ऊध्र्वशोषयुक्ता, मुरझाया हुआ । २ अर्व शोषक, जस्साम, मोटा। सुखा डालनेवाला। उच्छृङ्खल (सं० त्रि०) उद्गतं शृङ्खलं यस्य, बहुव्री०। उच्छ य ( स० पु० ) उत्-श्वि-अच् । १ उच्चता, १ अबाध, खुद-इख तियार, जो किसीको कैदमें न उंचाई। २ उन्नति, तरक्को, बढ़ती। ३ उच्च संख्या, ऊंची अदद। “उच्छ्रयेश गुणितं चितेः फलम्।" ( लीलावती) हो। २ नियमरहित, बेकायदा। उच्छतव्य (सं.वि.) उच्छेद-योग्य, उखड़ने लायक, ४ उद्गमन, उठान। ५ वृक्ष पर्वतादिका उमेध. दरख त पहाड वगैरहका उरूज। ग्रहादिका जिसे कोई बरबाद कर सके। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उच्छेतृ (सं॰ त्रि॰) उत्-छिदु-तृच्। उच्छेदकारक, नाशक, उखाड़ डालनेवाला, जो बरबाद कर देता हो।}} {{Outdent|उच्छेद (सं॰ पु॰) उत्-छिद् भावे धञ्। १ उत्पाटन,}} {{Outdent|उन्मूलन, उखाड़, नोचखसोट। २ विनाश, ध्वंस, बरबादी। <small>“सत्यं भवोच्छेदकरः पिता ते।” (रघु)</small>}} {{Outdent|उच्छेदन (सिं॰ क्ली॰)<small> उच्छेद देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छेदनीय (सं॰ त्रि॰) उत्पाटनयोग्य, उखाड़ने का़बिल, जिसे कोई बरबाद कर सके।}} {{Outdent|उच्छेदिन (सं॰ त्रि॰) उन्मूलनकर, उखाड़ डालने-वाला, जो बरबाद कर देता हो।}} {{Outdent|उच्छेद्य, <small>उच्छे दनीय देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छेष (सं॰ पु॰) उत्-शिष्-घञ्। अवशेष, बचत।}} {{Outdent|उच्छेषण (सं॰ क्ली॰) उत्-शिष्-कर्मणि ल्युट्। उच्छिष्ट, बची हुई चीज़।}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 42|1em}}</noinclude> oyfvdc3d4ku22jlkkozniwr6fh4j54k 665041 665036 2026-07-05T18:58:01Z अँजली चौधरी 2439 665041 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उच्छिष्टभोजिन्-उच्छय'''|'''१६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उच्छिष्टका खानेवाला, जो दूसरेका जूठा खाता हो। (क्ली) ३ अपरके उच्छिष्टका अशन, दूसरेका जूठा खाना।}} {{Outdent|उच्छिष्टभोजिन् (सं॰ त्रि॰) नीच व्यक्तिका भुक्तावशिष्ट!खानेवाला, जो दूसरे का जूठा खाता हो।}} {{Outdent|उच्छिष्टमोदन (सं॰ क्ली॰) उच्छिष्टं मधु तेन मोद्यते। सिक्थ, मोम। <small>मोम देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छीर्षक (सं॰ त्रि॰) उत् ऊर्ध्वस्तं शीर्षं येन, कन्, बहुव्री०। १ उन्नत शिरःयुक्त, ऊंचा सर रखनेवाला। (क्ली॰) २ उपाधान, तकिया। इससे शिर उठा रहता है। ३ मस्तक, शिरःस्थान, खोपड़ा। {{x-smaller|{{c|<poem>“उच्छीर्ष के श्रियै कुर्यात् भद्रकाल्यै च पादतः। ब्रह्मवास्तो: पतिभ्यान्तु वास्तुभध्ये वलिं हरेत्॥” (मनु ३।८९)</poem>}} (पु॰) ४ शय्यादोष विशेष, विस्तरका एक ऐब।! <small>“उच्छीर्ष के ससुन्नाहं वस्तिः कुर्याच्च मेहनम्।” (मुश्रुत)</small>}} {{Outdent|उच्छुष्क (सं॰ त्रि॰) १ उपरिभागमें शुष्क, मुरझाया हुआ। <small>“उच्छुष्कमांसरुधिरत्वचस्नायुनद्धः।” (ललितविस्तर)</small>२ सन्तप्त, गर्मागर्म।}} {{Outdent|उच्छुष्म (सं॰ क्ली॰) सम्मम, मोह, घबराहट।}} {{Outdent|उच्छ्ष्मन्,<small> उच्छुष्म देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छू (हिं॰ स्त्री॰) उच्छास विकार, एक खांसी, धांस। खाते-पीते समय किसी द्रव्यके 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{{Outdent|उच्छिष्टमोदन (सं॰ क्ली॰) उच्छिष्टं मधु तेन मोद्यते। सिक्थ, मोम। <small>मोम देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छीर्षक (सं॰ त्रि॰) उत् ऊर्ध्वस्तं शीर्षं येन, कन्, बहुव्री०। १ उन्नत शिरःयुक्त, ऊंचा सर रखनेवाला। (क्ली॰) २ उपाधान, तकिया। इससे शिर उठा रहता है। ३ मस्तक, शिरःस्थान, खोपड़ा।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“उच्छीर्ष के श्रियै कुर्यात् भद्रकाल्यै च पादतः। ब्रह्मवास्तो: पतिभ्यान्तु वास्तुभध्ये वलिं हरेत्॥” (मनु ३।८९)</poem>}}}} :(पु॰) ४ शय्यादोष विशेष, विस्तरका एक ऐब।! <small>“उच्छीर्ष के ससुन्नाहं वस्तिः कुर्याच्च मेहनम्।” (मुश्रुत)</small> {{Outdent|उच्छुष्क (सं॰ त्रि॰) १ उपरिभागमें शुष्क, मुरझाया हुआ। <small>“उच्छुष्कमांसरुधिरत्वचस्नायुनद्धः।” (ललितविस्तर)</small>२ सन्तप्त, गर्मागर्म।}} {{Outdent|उच्छुष्म (सं॰ क्ली॰) सम्मम, मोह, घबराहट।}} {{Outdent|उच्छ्ष्मन्,<small> उच्छुष्म देखो।</small>}} {{Outdent|उच्छू (हिं॰ स्त्री॰) उच्छास विकार, एक खांसी, धांस। खाते-पीते समय किसी द्रव्यके मुंहमें उलट आने या पेटमें पहुंचनेसे रुक जानेपर इसका वेग बढ़ता है। उच्छू लगनेसे आंखों में आंसू भर आते 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{{Outdent|उच्छङ्क (वै॰ पु॰) जृम्भण, फाजा, जमदाई।}} {{Right|<small>(शतपथब्रा॰ ५।४।१।९)</small>}} {{Outdent|उच्छृसत् (सं॰ त्रि॰) स्थूल निश्वास-विशिष्ट, हांफता हुआ, जो मुशकिलसे सांस लेता हो।}} {{Outdent|उच्छ सन (सं॰ त्रि॰) १ निश्वास लेता हुआ, जो आह भर रहा हो। २ स्थूल निश्वास-विशिष्ट, जो गहरी सांस खींचता हो।}} {{Outdent|उच्छसित (सं॰ त्रि॰) उत्-श्वस्-क्त। १ विकसित, शिगुफ़्ता, खिला हुआ। २ स्फीत, फूला या सूजा हुआ। ३ जीवित, जि़न्दा। ४ उच्छासयुक्त, हांफता हुआ। ५ कम्मित, कांपता हुआ। ६ आश्वासयक्त,}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :भरोसा रखनेवाला। (क्ली॰) ७ उच्छास, हंफ़ी। ८ कम्पन, कंपकंपी। ९ स्फुरण, शिगुफ्ती। {{Outdent|उच्छास (सं॰ पु॰) उत्-श्वस्-घञ्। १ अन्तर्मुख-श्वास, अन्दरको खींची हुई दम। २ आस्वास, भरोसा। ३ विश्लेष, छुटकारा। ४ विकाश, शिगुफ् तगी। ५ स्फीति, सूजन। ६ आकाक्षा, खाहिश। ७ छिद्र, सूराक। ८ प्राणन, ज़िन्दगी। ९ अध्याय, बाब।}} {{Outdent|उच्छासित (सं॰ त्रि॰) १ प्राणहीन, बेदम, जो सांस न लेता हो। २ अधिक, ज्यादा। ३ मुक्त, छूटा हुचा। ४ विभक्त, बंटा हुआ। ५ असंयुक्त, जो मिला न हो।}} {{Outdent|उच्छासिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-श्वम्-णिनि। १ ऊर्ध्व-श्वासयुक्त, हांफनेवाला। २ उद्गत, उठा हुआ। ३ श्वास लेनेवाला, जो दम खींच रहा हो। ४ मरता हुआ, जो दम छोड़ रहा हो। ५ गम्यमान, जानेवाला।}} {{Outdent|उछ्――तुदा॰ इदित् पर॰ सक॰ सेट्। २ तुदा॰ पर॰ सक॰ सेट्। यह बन्ध, समापन और विराम अर्थ में लगता है।}} {{Outdent|उछ――पञ्जाबके भावलपुर राज्य का एक प्राचीन नगर। यह अक्षा॰ २९° १३` उ॰ तथा द्राघि॰ ७१° ९` पू॰ पर पञ्चनदके पूर्व किनारे मूलतानसे ७० मील दूर अव-स्थित है। कहते-उछ वही नगर ठहरा, जो सिकन्दर बादशाहके आदेशसे पञ्जाबमें नदीयोंके सङ्गमपर बना था। रशीद्-उद्-दीन् ने इसे सिन्धके चार प्रधान प्रान्तमें एकको राजधानी बताया है। पीछे उछ मूलतानके स्वतन्त्र राज्यमें मिल गया। कितने ही आवर्तन-परिवर्तनके बाद अकबरने इसे अपने मुग़ल-साम्राज्यमें जोड़ दिया था। अबुलफ़ज़लने इसे मूलतान् सूबेका पृथक् जि़ला लिखा है। आजकल उछध्वंसावशेषका सञ्चय मात्र है। मुसलमानी इति-हासमें इसका विशेष वर्णन भरा है। मुसलमानों के अधिक आदर देखानेसे इसकी प्राचीनता प्रकट होती है। पारसिकोंके जन्द-अवस्था ग्रन्थ में लिखा――किसी समय जेह या सीस्तानसे हरवद माहयार बन्दीदादकी प्रति उचले गये थे।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> jtf23ouvwwtco1g39i0jf0b973tnd0o 665045 665044 2026-07-06T01:10:10Z अँजली चौधरी 2439 665045 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१६६'''|'''उच्छ् यण-उछ'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :उदय, सितारे वगै़रहका नमूद। ७ त्रिकोण का उच्छित पार्श्व, मुसल्लसका खड़ा बाज़। {{Outdent|उच्छ्रयण (सं॰ क्ली॰) उत्-श्रि करणे ल्युट्। १ उन्नति, तरक्की, उठान। (त्रि॰) उत्-श्रि कर्तरि ल्यु। २ उत्कृष्ट, उम्दा, बढ़िया।}} {{smaller|{{c|“उछ्यणानि उत्कष्टानि।” (आश्चलायनगृह्यवृत्ति ४।९) }}}} {{Outdent|उच्छ्रयोपेत (सं॰ त्रि॰) उच्च, बुलन्द, ऊंचा।}} {{Outdent|उच्छ्राय (सं॰ पु॰) उत्-श्रि-घञ्। <small>उदिश्रयतियौति-पूद्रुवः पा ३।३।४९।</small> १ उच्चता, बुलन्दी, ऊंचाई। २ उन्नति, तरक्की, बढ़ती।}} {{Outdent|उच्छ्रायिन् (सं॰ त्रि॰) उन्नत, ऊंचा, उभरा हुआ।}} {{Outdent|उच्छ्रायी (सं॰ स्त्री॰) फलक, तख़् ता, पटरा।}} {{Outdent|उच्छित 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solid black}} दूर ही रहना चाहिये। उद्भिदके मूल द्वारा पीतकी आम और निम्नगको जीर्ण रस कहते हैं। पीत रसके द्वारा उद्भिद् पुष्ट होता है। अक्सिजन, नाइट्रोजन, कारबन और जल व्यतीत उद्भिद्गणको जिस जिस वस्तुका प्रयोजन पड़ता, उस्का मृत्तिकामें रहना आवश्यक है। जब किसी उद्भिद् का विशेष प्रयोजनीय वस्तु क्षेत्र में नहीं रहता, तब उसकी खेतीका करना अनुचित लगता है, क्योंकि कोई फल नहीं मिलता। सकल उद्भिद् मृत्तिकासे एक ही पदार्थ नहीं लेते। प्रत्येक उद्भिदकी ख-ख उपयोगी मृत्तिका होती है। कोई कोई जातीय उद्भिद् केवल रससे नहीं तृप्त होते, कीटादि जीवको भी पकड़ और रगड़ खा डालते हैं। विहार अञ्चलमें मैदान और पहाड़की ढालू जगह पर एक प्रकारका क्षुद्र पेड़ होता है। उसके पत्र क्षुद्र, गोल, ईषद्रक्त, सुन्दर और लम्बित वृन्त द्वारा धृत रहते हैं। जब इन पत्रोंपर कीटादि बैठते, तब एकघण्टे वा अल्पकालके मध्यमें ही सूक्ष्म वस्तु द्वारा स्पष्ट होने बाद उनके केश केन्द्राभिमुख भीतरी दिक्को झुक पढ़ते हैं। अमेरिका देशके भी पेड़ बड़े अनोखे हैं। उनमें कीड़े पकड़ कर खानेका अति सुन्दर कौशल होता है। प्रति पत्रका उपरिभाग एक ग्रन्थि द्वारा पृथक्कृत और किनारा तीक्ष्ण कण्टक द्वारा वेष्टित रहता है। तलपर किसने पो छोटे छोटे कांटे नानादिक् मुड़ जाते हैं। कीड़े पकड़नेके लिये मध्यकी रेखा रक्तवर्ण होती है। यह मनोहर पत्र कीड़ेको बठते ही बन्द होकर मार डालता है। हमारे देशकी पुष्करिणीमें को झांझ पड़ती वह भी एक जातीय मांसाशी वा पतङ्गघातक उ‌द्भिद् ठहरती है। उपास नामक एक प्रकारका विषवृक्ष होता है। सुन पड़ता-वह पशुपक्षी और मानवको भी मार सकता है। {{right|<small>उपास देखो।</small>}} किसी किसी उद्भिद्में अनुभवकी शक्ति भी अधिक रहती,-जैसे लज्जावती लता, सोला, कमरख प्रभृति है। उद्भिद में जो नानाप्रकार वर्ण देख पड़ता, {{Multicol-break}} उसका उत्पादक सूर्य है । सूर्याशुं रक्त, पीत और नील तीन अंशसे विशिष्ट है। ये तीनों एकत्र हो इन्द्रधनुषकी तरह नानाप्रकार वर्ण बनाते हैं। उद्भिद्का भी रक्त एवं पीत पिच्छिल, पीत तथा नील हरित् और नील एवं रक्तके सहयोग से बैंगनी वर्ण होता है। दो एक जातीय उद्भिद् आलोकाभावसे वर्ण विशिष्ट रहते भी संख्या में अति अल्प हैं। प्रकृत रूपये सूर्य ही उद्भिद पर रङ्ग चढ़ाता है। जगत् में नानाप्रकार उद्भिद् विद्यमान हैं । प्रत्ये- कसे किसी न किसी विषय में हमें उपकार पहुंचता है। किन्तु इस स्थलपर उसका परिचय देना अनावश्यक है। उक्त मत वर्तमान युरोपीय उद्भिद्ववेत्तागणका है। अब देखना चाहिये-हमारे इस भारतवर्षमें उद्भिद विद्याकी चर्चा रही या नहीं ? पूर्वतन ऋषि उद्भिद् विद्याको किस प्रकार समझते थे ? प्राचीन काल से सुनि उद्भिद्को स्थावर जीव जैसा मानते आये हैं । छान्दोग्योपनिषद् में कहा है-<small>"तेषां खल्वेषां भूतानां वीण्ये व वीजानि भवन्त्याणजं जीवजनुहिज्जमिति। " (ई।३।१)</small> सकल भूतके मध्य तीन प्रकारका वीज है- अण्डन, जीवन और उद्भिज्ज।<ref>ऐतरेय उपनिषद् के मत से बीज चार प्रकारका होता है - " वीजानौतराणि चेतराणि चाण्डानि च जारूजानि च स्वेदजानि चोडिज्जानि ।" (५।३) </ref> महाभारतमें बताया है- {{block center|<poem> <small>"भित्वा तु पृथिवी' यानि जायन्त कालपर्ययात्। उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि हिजसत्तमाः॥"</small></poem>}} काटके पर्याय से जो पृथिवो भेदकर निकलता, उसका नाम उद्भिज्ज भूत पड़ता है। स्मतिशास्त्र ने उद्भिद जातिको घोषधि, वनस्पति, गुच्छ, गुल्म, ए, प्रतान और बढी कई गोविभव किया है. - “उद्विज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाप्ररोहिणः । श्रीषव्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगरः ॥ अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्म स्मृताः । पुष्पिणः फलिनचे व वृचान्त भयतः मृताः ॥ गुच्छ गुमन्तु विविध तथ व वणजातयः । वोजकाहरु हाय व प्रताना वय एव च ॥ {{rule}}<noinclude></noinclude> 4envbm2nk60ae4ne66frgirwseoxtcz 665011 665008 2026-07-05T12:58:07Z अनुश्री साव 80 665011 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या|२७१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} दूर ही रहना चाहिये। उद्भिदके मूल द्वारा पीतकी आम और निम्नगको जीर्ण रस कहते हैं। पीत रसके द्वारा उद्भिद् पुष्ट होता है। अक्सिजन, नाइट्रोजन, कारबन और जल व्यतीत उद्भिद्गणको जिस जिस वस्तुका प्रयोजन पड़ता, उस्का मृत्तिकामें रहना आवश्यक है। जब किसी उद्भिद् का विशेष प्रयोजनीय वस्तु क्षेत्र में नहीं रहता, तब उसकी खेतीका करना अनुचित लगता है, क्योंकि कोई फल नहीं मिलता। सकल उद्भिद् मृत्तिकासे एक ही पदार्थ नहीं लेते। प्रत्येक उद्भिदकी ख-ख उपयोगी मृत्तिका होती है। कोई कोई जातीय उद्भिद् केवल रससे नहीं तृप्त होते, कीटादि जीवको भी पकड़ और रगड़ खा डालते हैं। विहार अञ्चलमें मैदान और पहाड़की ढालू जगह पर एक प्रकारका क्षुद्र पेड़ होता है। उसके पत्र क्षुद्र, गोल, ईषद्रक्त, सुन्दर और लम्बित वृन्त द्वारा धृत रहते हैं। जब इन पत्रोंपर कीटादि बैठते, तब एकघण्टे वा अल्पकालके मध्यमें ही सूक्ष्म वस्तु द्वारा स्पष्ट होने बाद उनके केश केन्द्राभिमुख भीतरी दिक्को झुक पढ़ते हैं। अमेरिका देशके भी पेड़ बड़े अनोखे हैं। उनमें कीड़े पकड़ कर खानेका अति सुन्दर कौशल होता है। प्रति पत्रका उपरिभाग एक ग्रन्थि द्वारा पृथक्कृत और किनारा तीक्ष्ण कण्टक द्वारा वेष्टित रहता है। तलपर किसने पो छोटे छोटे कांटे नानादिक् मुड़ जाते हैं। कीड़े पकड़नेके लिये मध्यकी रेखा रक्तवर्ण होती है। यह मनोहर पत्र कीड़ेको बठते ही बन्द होकर मार डालता है। हमारे देशकी पुष्करिणीमें को झांझ पड़ती वह भी एक जातीय मांसाशी वा पतङ्गघातक उ‌द्भिद् ठहरती है। उपास नामक एक प्रकारका विषवृक्ष होता है। सुन पड़ता-वह पशुपक्षी और मानवको भी मार सकता है। {{right|<small>उपास देखो।</small>}} किसी किसी उद्भिद्में अनुभवकी शक्ति भी अधिक रहती,-जैसे लज्जावती लता, सोला, कमरख प्रभृति है। उद्भिद में जो नानाप्रकार वर्ण देख पड़ता, {{Multicol-break}} उसका उत्पादक सूर्य है। सूर्याशुं रक्त, पीत और नील तीन अंशसे विशिष्ट है। ये तीनों एकत्र हो इन्द्रधनुषकी तरह नानाप्रकार वर्ण बनाते हैं। उद्भिद्का भी रक्त एवं पीत पिच्छिल, पीत तथा नील हरित् और नील एवं रक्तके सहयोग से बैंगनी वर्ण होता है। दो एक जातीय उद्भिद् आलोकाभावसे वर्ण विशिष्ट रहते भी संख्या में अति अल्प हैं। प्रकृत रूपये सूर्य ही उद्भिद पर रङ्ग चढ़ाता है। जगत् में नानाप्रकार उद्भिद् विद्यमान हैं। प्रत्येकसे किसी न किसी विषय में हमें उपकार पहुंचता है। किन्तु इस स्थलपर उसका परिचय देना अनावश्यक है। उक्त मत वर्तमान युरोपीय उद्भिद्ववेत्तागणका है। अब देखना चाहिये-हमारे इस भारतवर्षमें उद्भिद विद्याकी चर्चा रही या नहीं? पूर्वतन ऋषि उद्भिद् विद्याको किस प्रकार समझते थे? प्राचीन काल से सुनि उद्भिद्को स्थावर जीव जैसा मानते आये हैं। छान्दोग्योपनिषद् में कहा है-<small>"तेषां खल्वेषां भूतानां वीण्ये व वीजानि भवन्त्याणजं जीवजनुहिज्जमिति। " (ई।३।१)</small> सकल भूतके मध्य तीन प्रकारका वीज है-अण्डन, जीवन और उद्भिज्ज।<ref>ऐतरेय उपनिषद् के मत से बीज चार प्रकारका होता है-"वीजानौतराणि चेतराणि चाण्डानि च जारूजानि च स्वेदजानि चोडिज्जानि।" (५।३) </ref> महाभारतमें बताया है- {{block center|<poem> <small>"भित्वा तु पृथिवी' यानि जायन्त कालपर्ययात्। उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि हिजसत्तमाः॥"</small></poem>}} काटके पर्याय से जो पृथिवो भेदकर निकलता, उसका नाम उद्भिज्ज भूत पड़ता है। स्मतिशास्त्र ने उद्भिद जातिको घोषधि, वनस्पति, गुच्छ, गुल्म, ए, प्रतान और बढी कई गोविभव किया है. - “उद्विज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाप्ररोहिणः । श्रीषव्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगरः ॥ अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्म स्मृताः । पुष्पिणः फलिनचे व वृचान्त भयतः मृताः ॥ गुच्छ गुमन्तु विविध तथ व वणजातयः । वोजकाहरु हाय व प्रताना वय एव च ॥ {{rule}}<noinclude></noinclude> 2lx09oi4r6bp8nl4ghcyyptv2cch7t6 665020 665011 2026-07-05T15:22:38Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 665020 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या|२७१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} दूर ही रहना चाहिये। उद्भिदके मूल द्वारा पीतकी आम और निम्नगको जीर्ण रस कहते हैं। पीत रसके द्वारा उद्भिद् पुष्ट होता है। अक्सिजन, नाइट्रोजन, कारबन और जल व्यतीत उद्भिद्गणको जिस जिस वस्तुका प्रयोजन पड़ता, उस्का मृत्तिकामें रहना आवश्यक है। जब किसी उद्भिद् का विशेष प्रयोजनीय वस्तु क्षेत्र में नहीं रहता, तब उसकी खेतीका करना अनुचित लगता है, क्योंकि कोई फल नहीं मिलता। सकल उद्भिद् मृत्तिकासे एक ही पदार्थ नहीं लेते। प्रत्येक उद्भिदकी ख-ख उपयोगी मृत्तिका होती है। कोई कोई जातीय उद्भिद् केवल रससे नहीं तृप्त होते, कीटादि जीवको भी पकड़ और रगड़ खा डालते हैं। विहार अञ्चलमें मैदान और पहाड़की ढालू जगह पर एक प्रकारका क्षुद्र पेड़ होता है। उसके पत्र क्षुद्र, गोल, ईषद्रक्त, सुन्दर और लम्बित वृन्त द्वारा धृत रहते हैं। जब इन पत्रोंपर कीटादि बैठते, तब एकघण्टे वा अल्पकालके मध्यमें ही सूक्ष्म वस्तु द्वारा स्पष्ट होने बाद उनके केश केन्द्राभिमुख भीतरी दिक्को झुक पढ़ते हैं। अमेरिका देशके भी पेड़ बड़े अनोखे हैं। उनमें कीड़े पकड़ कर खानेका अति सुन्दर कौशल होता है। प्रति पत्रका उपरिभाग एक ग्रन्थि द्वारा पृथक्कृत और किनारा तीक्ष्ण कण्टक द्वारा वेष्टित रहता है। तलपर किसने पो छोटे छोटे कांटे नानादिक् मुड़ जाते हैं। कीड़े पकड़नेके लिये मध्यकी रेखा रक्तवर्ण होती है। यह मनोहर पत्र कीड़ेको बैठते ही बन्द होकर मार डालता है। हमारे देशकी पुष्करिणीमें को झांझ पड़ती वह भी एक जातीय मांसाशी वा पतङ्गघातक उ‌द्भिद् ठहरती है। उपास नामक एक प्रकारका विषवृक्ष होता है। सुन पड़ता-वह पशुपक्षी और मानवको भी मार सकता है। {{right|<small>उपास देखो।</small>}} किसी किसी उद्भिद्में अनुभवकी शक्ति भी अधिक रहती,-जैसे लज्जावती लता, सोला, कमरख प्रभृति है। उद्भिद में जो नानाप्रकार वर्ण देख पड़ता, {{Multicol-break}} उसका उत्पादक सूर्य है। सूर्याशुं रक्त, पीत और नील तीन अंशसे विशिष्ट है। ये तीनों एकत्र हो इन्द्रधनुषकी तरह नानाप्रकार वर्ण बनाते हैं। उद्भिद्का भी रक्त एवं पीत पिच्छिल, पीत तथा नील हरित् और नील एवं रक्तके सहयोग से बैंगनी वर्ण होता है। दो एक जातीय उद्भिद् आलोकाभावसे वर्ण विशिष्ट रहते भी संख्या में अति अल्प हैं। प्रकृत रूपये सूर्य ही उद्भिद पर रङ्ग चढ़ाता है। जगत् में नानाप्रकार उद्भिद् विद्यमान हैं। प्रत्येकसे किसी न किसी विषय में हमें उपकार पहुंचता है। किन्तु इस स्थलपर उसका परिचय देना अनावश्यक है। उक्त मत वर्तमान युरोपीय उद्भिद्ववेत्तागणका है। अब देखना चाहिये-हमारे इस भारतवर्षमें उद्भिद विद्याकी चर्चा रही या नहीं? पूर्वतन ऋषि उद्भिद् विद्याको किस प्रकार समझते थे? प्राचीन काल से सुनि उद्भिद्को स्थावर जीव जैसा मानते आये हैं। छान्दोग्योपनिषद् में कहा है-<small>"तेषां खल्वेषां भूतानां वीण्ये व वीजानि भवन्त्याणजं जीवजनुहिज्जमिति। " (ई।३।१)</small> सकल भूतके मध्य तीन प्रकारका वीज है-अण्डन, जीवन और उद्भिज्ज।<ref>ऐतरेय उपनिषद् के मत से बीज चार प्रकारका होता है-"वीजानौतराणि चेतराणि चाण्डानि च जारूजानि च स्वेदजानि चोडिज्जानि।" (५।३) </ref> महाभारतमें बताया है- {{block center|<poem> <small>"भित्वा तु पृथिवी' यानि जायन्त कालपर्ययात्। उद्भिज्जानि च तान्याहुर्भूतानि हिजसत्तमाः॥"</small></poem>}} कालके पर्याय से जो पृथिवी भेदकर निकलता, उसका नाम उद्भिज्ज भूत पड़ता है। स्मृतिशास्त्र ने उद्भिद् जातिको औषधि, वनस्पति, गुच्छ, गुल्म, तृण, प्रतान और वल्ली कई श्रेणीमें विभक्त किया है,- {{block center|<poem><small> "उद्भिज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाणप्ररोहिणः। श्रीषव्यः फलपाकान्ता 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पकड़ और रगड़ खा डालते हैं। विहार अञ्चलमें मैदान और पहाड़की ढालू जगह पर एक प्रकारका क्षुद्र पेड़ होता है। उसके पत्र क्षुद्र, गोल, ईषद्रक्त, सुन्दर और लम्बित वृन्त द्वारा धृत रहते हैं। जब इन पत्रोंपर कीटादि बैठते, तब एकघण्टे वा अल्पकालके मध्यमें ही सूक्ष्म वस्तु द्वारा स्पष्ट होने बाद उनके केश केन्द्राभिमुख भीतरी दिक्को झुक पढ़ते हैं। अमेरिका देशके भी पेड़ बड़े अनोखे हैं। उनमें कीड़े पकड़ कर खानेका अति सुन्दर कौशल होता है। प्रति पत्रका उपरिभाग एक ग्रन्थि द्वारा पृथक्कृत और किनारा तीक्ष्ण कण्टक द्वारा वेष्टित रहता है। तलपर किसने पो छोटे छोटे कांटे नानादिक् मुड़ जाते हैं। कीड़े पकड़नेके लिये मध्यकी रेखा रक्तवर्ण होती है। यह मनोहर पत्र कीड़ेको बैठते ही बन्द होकर मार डालता है। हमारे देशकी पुष्करिणीमें को झांझ पड़ती वह भी एक जातीय मांसाशी वा पतङ्गघातक उ‌द्भिद् ठहरती है। उपास नामक एक प्रकारका विषवृक्ष होता है। सुन पड़ता-वह पशुपक्षी और मानवको भी मार सकता है। {{right|<small>उपास देखो।</small>}} किसी किसी उद्भिद्में अनुभवकी शक्ति भी अधिक रहती,-जैसे लज्जावती लता, सोला, कमरख प्रभृति है। उद्भिद में 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/></noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} २७२ उद्भिद विद्या तमसा बहुरूपेण वैष्टिता कहेतुना! ३ लता और ४ गुल्म। कुछ वौज, कुछ काण्ड और अन्त:स'ज्ञा भवन्ते ते सुखदुःखसमन्विताः" (मनु ११४५-४६) कुछ कन्दसे जन्म लेते हैं। वण और ओषधि नामक समुदय उद्भिद ही स्थावर (जीव) हैं। उनमें वृणान्तर सकल पृथक् जाति जैसे देखाये गये हैं। कितने ही बीज़ और कितने ही रोपित काण्डसे क्योंकि पादप जातिके साथ उनका जन्म मरणादि उपजते हैं। जो बहु पुष्ययुक्त रहते और फल पकने नहीं मिलता। जिनमें पुष्य नहीं खिलता अथच से मरते, उनका नाम ओषधि रखते हैं (जैसे धान फल लगता. उनका नाम वनस्पति है। पुष्य और यव प्रभृति)। जो फल न देते हो फल जाते, वे वन फल उभय देनेवाले द्रुम हैं। प्रसारित और प्रतानित स्पति कहलाते हैं। फलने या फलनेवाले दोनोका लता कहलाते हैं। जो स्तम्बयुक्त रहते अर्थात् बड़ी बड़ी नाम वृक्ष है। गुच्छ (मल्लिकादि) और गुल्म शाखा नहीं रखते, उन्हें गुल्म कहते हैं। जम्ब , चम्पक, (शादि) नानाप्रकारके होते हैं। तृणजाति भी पुनाग, नागकेशर, चिञ्चिनी, कपित्थ, बदरी, विल्व, विविध हैं। प्रतान (लौकी, कुम्हड़ा वर्ग रह) और कुलथी, प्रियङ्ग, पनस, आम्र, मधुक और करमर्द वल्ली (गुडच्यादि) नानाविध हैं। यह बहुरूप कर्मके प्रभृति वीजज हैं। पान, सिन्धुवार और तगर फलपर तमोगुणसे आच्छन्न हैं। इनके अन्तर चैतन्य प्रभृति काण्डज होते हैं। पाटला, दाडिम, प्लक्ष, रहता है। इन्हें सुख और दुःख भो समझ पड़ता है। करवौर, वट, मल्लिका, उदुम्बर तथा कुन्द प्रभृति शार्ङ्गधरने इसप्रकार उद्भिविद्याका परिचय उभयज अर्थात् वौज पार काण्ड दोनोसे उत्पन्न दिया है- हैं। कुङ्कम, पाद्र, रसोन और आलू प्रभृति कन्दज “वनस्पतिद्रुमलतागुल्याः पादपजातयः । हैं। एलापत्र और उत्पलादि वीज एवं कन्द उभयसे वीजात् काखातथा कन्दात् तज्जन्म विविध' विदुः । जन्म लेते हैं। वृशान्यौषधयशव पृथक् जाति: प्रदिश्यते । कृषिशास्त्रके अनुसार उद्भिद् इन कई श्रेणी में बंटे जन्मादिभेदात्तेषां वै पार्थक्यमनुमौयते ॥ हैं-१ अग्रवीज अर्थात् अग्रभाग कलमकर लगाये ते वनस्पतयः प्रोक्ता विना पुष्प : फलन्ति ये । जानेवाले (अपर नाम काण्डज भी रख सकते हैं), ' द्रुमाशान्ये निगदिता: पुण्य : सह फलन्ति ये॥ २ मूलज अर्थात् मूल गाड़नेसे उपजनेवाले (कन्दज), प्रसरन्ति प्रतानैर्यान्ता लता: परिकीर्तिताः । ३ पूर्वयोनि अर्थात् ग्रन्थि गाड़नसे जन्म लेनेवाले (यह वहुस्तन्वाऽविटपिनो ये ते गुखाः प्रकीर्तिताः। काण्डज जातिके अन्तर्गत हैं), ४ स्कन्धज अर्थात् अन्य जम्बु चम्पकपुन्नागनागकेशर चिचिनी। वृक्षके तनेसे निकलनेवाले, ५ वीजरुह अर्थात् वीज कपित्यवदरीवित्वकुम्भकारी प्रियङ्गवः ॥ डालनेसे पनपनेवाले और ६ सन्म छज अर्थात् क्षिति, पनसायमधुकाद्या: करमच वीजजाः । जल, वायु एवं तेजःके परस्पर समवहित आने और ताम्ब लौ सिन्धुवाराश्च तगराद्याश्च काण्डजाः ॥ मृत्तिका पकानसे प्रकाशित होनेवाले। पाटला दाडिमो प्रचकरवीरवटादयः । मनिकोदम्वरौ कुन्दो वौजकाण्डोद्भवा मताः । भारतवर्षीय ऋषिगणने उद्भिदकी जाति, वेणी, कुछ मादरसो नालकाद्याः कन्दसमुद्भवाः । संज्ञा और लक्षणा उक्त संक्षिप्त शब्द द्वारा ही कही एखापवीत्पलादिनी वौजकन्दोद्भवानि हि ॥" है। उन्हें वीज, अङ्कर, मूलादिकी उत्पत्तिका विषय (वृहत्शान धरत पादपविवचा-प्रकरण) पादपजाति* चार प्रकार है-१ वनस्पति, २ द्रुम, शाल्यादयो वौजरहा: सन्म कंजास्त यादयः । स्युनिस्पतिकायस्व घड़ेता मूलनातयः ।" (हेम ।२६६-२६७) ..* “कुरुष्वाद्या भगवौजा मूलजास्त त्पलादयः । भर-'अधिकेन व्यवदेशा भवन्ति । तथाहि लोके चितिजलपवन- पायीनय रखाद्याः स्कन्धनासलकौमुखाः । समवधानजन्माप्या : चित्यपुर इत्यु चति ।' (बाचस्पतिमिय)<noinclude></noinclude> n5cujzi2y3ylue1v8xd3o9d0nfkzzf5 665022 665021 2026-07-05T15:47:39Z अनुश्री साव 80 665022 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२७२|उद्भिद् विद्या}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{block center|<poem><small> तमसा बहुरूपेण वैष्टिता कर्महेतुना! ३ लता और ४ गुल्म। कुछ वौज, कुछ काण्ड और अन्त:संज्ञा भवन्तेयते सुखदुःखसमन्विताः॥" (मनु १।४६-४९)</small></poem>}} कुछ कन्दसे जन्म लेते हैं। वण और ओषधि नामक समुदय उद्भिद ही स्थावर (जीव) हैं। उनमें वृणान्तर सकल पृथक् जाति जैसे देखाये गये हैं। कितने ही बीज़ और कितने ही रोपित काण्डसे क्योंकि पादप जातिके साथ उनका जन्म मरणादि उपजते हैं। जो बहु पुष्ययुक्त रहते और फल पकने नहीं मिलता। जिनमें पुष्य नहीं खिलता अथच से मरते, उनका नाम ओषधि रखते हैं (जैसे धान फल लगता. उनका नाम वनस्पति है। पुष्य और यव प्रभृति)। जो फल न देते हो फल जाते, वे वन फल उभय देनेवाले द्रुम हैं। प्रसारित और प्रतानित स्पति कहलाते हैं। फलने या फलनेवाले दोनोका लता कहलाते हैं। जो स्तम्बयुक्त रहते अर्थात् बड़ी बड़ी नाम वृक्ष है। गुच्छ (मल्लिकादि) और गुल्म शाखा नहीं रखते, उन्हें गुल्म कहते हैं। जम्ब , चम्पक, (शादि) नानाप्रकारके होते हैं। तृणजाति भी पुनाग, नागकेशर, चिञ्चिनी, कपित्थ, बदरी, विल्व, विविध हैं। प्रतान (लौकी, कुम्हड़ा वर्ग रह) और कुलथी, प्रियङ्ग, पनस, आम्र, मधुक और करमर्द वल्ली (गुडच्यादि) नानाविध हैं। यह बहुरूप कर्मके प्रभृति वीजज हैं। पान, सिन्धुवार और तगर फलपर तमोगुणसे आच्छन्न हैं। इनके अन्तर चैतन्य प्रभृति काण्डज होते हैं। पाटला, दाडिम, प्लक्ष, रहता है। इन्हें सुख और दुःख भो समझ पड़ता है। करवौर, वट, मल्लिका, उदुम्बर तथा कुन्द प्रभृति शार्ङ्गधरने इसप्रकार उद्भिविद्याका परिचय उभयज अर्थात् वौज पार काण्ड दोनोसे उत्पन्न दिया है- हैं। कुङ्कम, पाद्र, रसोन और आलू प्रभृति कन्दज “वनस्पतिद्रुमलतागुल्याः पादपजातयः । हैं। एलापत्र और उत्पलादि वीज एवं कन्द उभयसे वीजात् काखातथा कन्दात् तज्जन्म विविध' विदुः । जन्म लेते हैं। वृशान्यौषधयशव पृथक् जाति: प्रदिश्यते । कृषिशास्त्रके अनुसार उद्भिद् इन कई श्रेणी में बंटे जन्मादिभेदात्तेषां वै पार्थक्यमनुमौयते ॥ हैं-१ अग्रवीज अर्थात् अग्रभाग कलमकर लगाये ते वनस्पतयः प्रोक्ता विना पुष्प : फलन्ति ये । जानेवाले (अपर नाम काण्डज भी रख सकते हैं), ' द्रुमाशान्ये निगदिता: पुण्य : सह फलन्ति ये॥ २ मूलज अर्थात् मूल गाड़नेसे उपजनेवाले (कन्दज), प्रसरन्ति प्रतानैर्यान्ता लता: परिकीर्तिताः । ३ पूर्वयोनि अर्थात् ग्रन्थि गाड़नसे जन्म लेनेवाले (यह वहुस्तन्वाऽविटपिनो ये ते गुखाः प्रकीर्तिताः। काण्डज जातिके अन्तर्गत हैं), ४ स्कन्धज अर्थात् अन्य जम्बु चम्पकपुन्नागनागकेशर चिचिनी। वृक्षके तनेसे निकलनेवाले, ५ वीजरुह अर्थात् वीज कपित्यवदरीवित्वकुम्भकारी प्रियङ्गवः ॥ डालनेसे पनपनेवाले और ६ सन्म छज अर्थात् क्षिति, पनसायमधुकाद्या: करमच वीजजाः । जल, वायु एवं तेजःके परस्पर समवहित आने और ताम्ब लौ सिन्धुवाराश्च तगराद्याश्च काण्डजाः ॥ मृत्तिका पकानसे प्रकाशित होनेवाले। पाटला दाडिमो प्रचकरवीरवटादयः । मनिकोदम्वरौ कुन्दो वौजकाण्डोद्भवा मताः । भारतवर्षीय ऋषिगणने उद्भिदकी जाति, वेणी, कुछ मादरसो नालकाद्याः कन्दसमुद्भवाः । संज्ञा और लक्षणा उक्त संक्षिप्त शब्द द्वारा ही कही एखापवीत्पलादिनी वौजकन्दोद्भवानि हि ॥" है। उन्हें वीज, अङ्कर, मूलादिकी उत्पत्तिका विषय (वृहत्शान धरत पादपविवचा-प्रकरण) पादपजाति* चार प्रकार है-१ वनस्पति, २ द्रुम, शाल्यादयो वौजरहा: सन्म कंजास्त यादयः । स्युनिस्पतिकायस्व घड़ेता मूलनातयः ।" (हेम ।२६६-२६७) ..* “कुरुष्वाद्या भगवौजा मूलजास्त त्पलादयः । भर-'अधिकेन व्यवदेशा भवन्ति । तथाहि लोके चितिजलपवन- पायीनय रखाद्याः स्कन्धनासलकौमुखाः । समवधानजन्माप्या : चित्यपुर इत्यु चति ।' (बाचस्पतिमिय)<noinclude></noinclude> 38mnkqhqxpxtbrykiof8nr0i9ifykei 665023 665022 2026-07-05T16:16:48Z अनुश्री साव 80 665023 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२७२|उद्भिद् विद्या}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{block center|<poem><small> तमसा बहुरूपेण वैष्टिता कर्महेतुना। अन्त:संज्ञा भवन्तेयते सुखदुःखसमन्विताः॥" (मनु १।४६-४९)</small></poem>}} समुदय उद्भिदो स्थावर (जीव) हैं। उनमें कितने ही वीज़ और किसने हो रोपित काण्डसे उपजते हैं। जब पुष्पयुक्त रहते और फल पकनेसे मरते, उनका नाम औषधि रखते हैं (जैसे धानयव प्रभृति)। जो फूल न देते हो फल जाते, वे वनस्पति कहलाते हैं। फूलने या फलनेवाले दोनोंका नाम वृक्ष है। गुच्छा (मल्लिकादि) और गुल्म (वंशादि) नानाप्रकार के होते है। तृणजाति भी विविध है। प्रतान (लौकी, कुम्हड़ा वगैरह) और वल्ली (गुड़च्यादि) नानाविध हैं। यह बहुरूप कर्मके फलपर तमोगुण से आच्छन हैं। इनके अन्तर चैतन्य रहता है। इन्हें सुख और दुःख भी समझ पड़ता है। शार्ङ्गधर ने इसप्रकार उद्भिद्विद्याका परिचय दिया है- {{block center|<poem><small> " वनस्पतिद्रुमलतागुल्माः पादपजातयः। वीजात् काण्डत्तथा कन्दात् तज्जन्म विविधं विदुः॥ तृणान्धोषधयश्चैव पृथक् जातिः प्रदिश्यते। जन्मादिभेदात्तेषां वै पार्थकामनुमीयते॥ ●{{gap}}●{{gap}}●{{gap}}● ते वनस्पतयः प्रोक्ता विना पुष्पैः फलन्ति ये। द्रुमाबन्धे निगदिता: पुष्पैः सह फलन्ति ये॥ प्रसरन्ति प्रतानैर्याला लताः परिकौर्तिताः। वहुस्तन्वाऽविटपिनो ये ते गुमाः प्रकौर्तिताः॥ जम्बु चम्पक पुन्नागनागकेशर चिश्चिमी। कपित्थ वदरीविश्वकुम्भकारी प्रियङ्गवः॥ पनसाखमधुकाद्याः करमर्दाच वीजजाः। ताम्बली सिन्धुवाराश्च तगराद्याय काण्डजा:॥ पाटला दाड़िमी प्रचकरवीरवटादयः। मनिकीदुम्बरौ कुन्दो वीजकाण्डोद्भवा मताः॥ कुङ माद्ररसी नालूकाद्याः कन्दसमुङ्गवाः। एखापत्पत्रोलादिनी वीजकन्दोइवानि हि॥"</small></poem>}} <small>{{right|(वृहत्शार्ङ्न घरघृत पादपविवचा-प्रकरण)}}</small> पादपजाति* चार प्रकार है -१ वनस्पति, २ द्रुम, {{rule}} {{block center|<poem><small> "कुरुणटाद्या अरवीजा मूलजास्तू तुपलादयः। पार्थयोनय दूच्छाद्याः स्कन्धनासल्लकौमुखाः॥</small></poem>}} {{Multicol-break}} ३ लता और ४ गुल्म । कुछ वीज, कुछ काण्ड और कुछ कन्दसे जन्म लेते हैं । और पोषधि नामक तृणान्तर सकल पृथक् जाति जैसे देखाये गये हैं । क्योंकि पादप जातिके साथ उनका जन्म मरणादि नहीं मिलता। जिनमें पुष्प नहीं खिलता अथच फल लगता, उनका नाम वनस्पति है । पुष्प और फल उभय देनेवाले हम हैं। प्रसारित चोर प्रतानित लता कहलाते हैं जो साम्य • , रहते अर्थात् बड़ी बड़ी शाखा नहीं रखते, उन्हें गुम कहते हैं। जब चम्पक, पुन्नाग, नागकेशर, चिञ्चिनो, कपित्थ, बदरी, विल्व, कुलयो, प्रियङ्ग, पनस, चाम्र, मधुक और करमर्द प्रभृति योजज हैं। पान, सिन्धुवार और सगर प्रभृति काण्डज होते हैं। पाटला, दाड़िम, प्लच, करवीर, वट, मक्षिका, उदुम्बर तथा कुन्द प्रति उभयज अर्थात् वौज धार काण्ड दोनोसे उत्पन्न हैं कुछ म पाइ रसोन चोर बालू प्रभृति कन्दन है। एलापत्र चोर उत्पादिन एवं कन्द उभयसे जन्म लेते हैं । कृषिशास्त्र के अनुसार उद्भिद इन कई व गोमें बंटे है- योन अर्थात् पथभाग कृतमकर लगाये जानेवाले ( अपर नाम काण्डज भी रख सकते हैं), २ मूलज अर्थात् मूल गाड़नेसे उपजनेवाले (कन्दज), ३ पूर्वयोनि अर्थात् ग्रन्थि गाड़नेसे जन्म लेनेवाले (यह काहन जातिये चन्तर्गत है), ४ स्कन्धज पर्यात अन्य इसके समेसे निकलनेवाले, ५ योजरुड अर्थात् योज डालसे पनपनेवाले और सत् चिति, जल, वायु एवं तेजः के परस्पर समवहित आने और मृत्तिका पकानेसे प्रकाशित होनेवाले ६ 9 भारतवर्षीय ऋषिगणने उद्भिदुको जाति, श्रेणी, संज्ञा और लक्षणा उक्त संक्षिप्त शब्द द्वारा ही कही है। उन्हें दो पर मूलादिको उत्पत्तिका विषय वीज, शायादयो वौजरुहाः सन्म जास्त यादयः । [नस्पतिकायस्य षड़ता मूलनातयः ॥ " ( हेम ४।२६६-१६७ ) 'अधिकेन व्यवदेशा भवन्ति । तथाहि लोके चितिजलपवन-- समवधान जन्माप्यड, र: चित्यडर इत्युच्यते ।' ( वाचस्पति मिश्र ) ७<noinclude></noinclude> 824kdge2nj9t5kenr7nfzoc3z9hrfie 665024 665023 2026-07-05T16:48:14Z अनुश्री साव 80 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पुष्पयुक्त रहते और फल पकनेसे मरते, उनका नाम औषधि रखते हैं (जैसे धानयव प्रभृति)। जो फूल न देते हो फल जाते, वे वनस्पति कहलाते हैं। फूलने या फलनेवाले दोनोंका नाम वृक्ष है। गुच्छा (मल्लिकादि) और गुल्म (वंशादि) नानाप्रकार के होते है। तृणजाति भी विविध है। प्रतान (लौकी, कुम्हड़ा वगैरह) और वल्ली (गुड़च्यादि) नानाविध हैं। यह बहुरूप कर्मके फलपर तमोगुण से आच्छन हैं। इनके अन्तर चैतन्य रहता है। इन्हें सुख और दुःख भी समझ पड़ता है। शार्ङ्गधर ने इसप्रकार उद्भिद्विद्याका परिचय दिया है- {{block center|<poem><small> " वनस्पतिद्रुमलतागुल्माः पादपजातयः। वीजात् काण्डत्तथा कन्दात् तज्जन्म विविधं विदुः॥ तृणान्धोषधयश्चैव पृथक् जातिः प्रदिश्यते। जन्मादिभेदात्तेषां वै पार्थकामनुमीयते॥ ●{{gap}}●{{gap}}●{{gap}}● ते वनस्पतयः प्रोक्ता विना पुष्पैः फलन्ति ये। द्रुमाबन्धे निगदिता: पुष्पैः सह फलन्ति ये॥ प्रसरन्ति प्रतानैर्याला लताः परिकौर्तिताः। वहुस्तन्वाऽविटपिनो ये ते गुमाः प्रकौर्तिताः॥ जम्बु चम्पक पुन्नागनागकेशर चिश्चिमी। कपित्थ वदरीविश्वकुम्भकारी प्रियङ्गवः॥ पनसाखमधुकाद्याः करमर्दाच वीजजाः। ताम्बली सिन्धुवाराश्च तगराद्याय काण्डजा:॥ पाटला दाड़िमी प्रचकरवीरवटादयः। मनिकीदुम्बरौ कुन्दो वीजकाण्डोद्भवा मताः॥ कुङ माद्ररसी नालूकाद्याः कन्दसमुङ्गवाः। एखापत्पत्रोलादिनी वीजकन्दोइवानि हि॥"</small></poem>}} <small>{{right|(वृहत्शार्ङ्न घरघृत पादपविवचा-प्रकरण)}}</small> पादपजाति* चार प्रकार है -१ वनस्पति, २ द्रुम, {{rule}} {{block center|<poem><small> "कुरुणटाद्या अरवीजा मूलजास्तू तुपलादयः। पार्थयोनय दूच्छाद्याः स्कन्धनासल्लकौमुखाः॥</small></poem>}} {{Multicol-break}} ३ लता और ४ गुल्म। कुछ वीज, कुछ काण्ड और कुछ कन्दसे जन्म लेते हैं। तृण और औषधि नामक तृणान्तर सकल पृथक् जाति जैसे देखाये गये हैं। क्योंकि पादप जातिके साथ उनका जन्म मरणादि नहीं मिलता। जिनमें पुष्प नहीं खिलता अथच फल लगता, उनका नाम वनस्पति है। पुष्प और फल उभय देनेवाले द्रुम हैं। प्रसारित और प्रतानित लता कहलाते हैं। जो स्तम्बयुक्त रहते अर्थात् बड़ी बड़ी शाखा नहीं रखते, उन्हें गुल्म कहते हैं। जम्बु चम्पक, पुन्नाग, नागकेशर, चिञ्चिनी, कपित्थ, बदरी, विल्व, कुलथी, प्रियङ्ग, पनस, आम्र, मधुक और करमर्द प्रभृति वीज हैं। पान, सिन्धुवार और तगर प्रभृति काण्डज 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व्यवदेशा भवन्ति। तथाहि लोके चितिजलपवन-समवधानजन्माप्यड, र: चित्यङुर इत्युच्यते।' (वाचस्पति मिश्र)</small><noinclude></noinclude> rp0w4pt0m3ft2el3bu3xadz2qjjebp0 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२७५ 250 75941 665084 304774 2026-07-06T06:18:19Z अनुश्री साव 80 665084 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२७४|उद्मन्-उद्योत}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} उद्मन् (सं॰ क्ली॰) महोर्मि, बहाव । । उद्यमिन् (सं०नि०) तत्पर, मुस्तैद, जो कोशिश उद्य (सं० त्रि०) वद-क्यप् । १ कथनीय, कहे | कर रहा हो। जाने काबिल । (पु०) २ नद, दरया। उद्यान (स० पु. लो०) उत्-या आधार ल्य ट। उद्यत् (सं०.त्रि०) उत्-इन्-शट। १ गमनशील, अर्चा: पुसि च। पा ४४१ । १ आक्रोड़, बाग । २ नि:- चलनेवाला। २ उदयशील, निकलने या उठनेवाला। सरण, निकास। ३ प्रयोजन, मतलब । ४ उद्यम, (पु.) ३ नक्षत्र। ४ किसी पर्वतका नाम। रोजगार, कामकाज। उद्यत (संत्रि .) उत्-यम-ता। उद्यानक (सं० लो०) आराम, बाग । हुआ। २ उत्तोलित, उछाला हुआ। ३ उद्यमित, उद्यानपाल (स० पु०) १ उद्यानरक्षक, माली, काम करनेवाला। ४ तत्पर, मुस्तैद। ५ प्रवृत्त, बागका मुहाफिज़ । २ उद्यानख मो, बागका मालिका लगा हुआ। (लो.) भावे त। ६ उद्यम, काम । उद्यानपालक, उद्यानपाल देखो। ७ अध्याय, बाब। ८ तालभेद। उद्यानरक्षक, उद्यानपाल देखो। उद्यतकामुक (म त्रि.) उत्तोलित धनःयक्त, | उद्यापन (स० पु. लो०) उत्-या-णिच्-त्य ट।१पारम्भ, कमान् खोंचे हुआ। शुरू। २ व्रतसमापन, व्रत पूरा करने का काम । उद्यतगद (स० त्रि०) उग ण मदयुक्त, गुज तान हुआ। उद्यापित (सं० त्रि.) पूर्णोक्त, पूरा किया हुआ। उद्यतशूल ( स० वि०) उत्थापित शूलयुक्त, भाला| उद्याम (सं० पु०) उद्यम्यतेऽनेन, उत्-यम करणे उठाये हुआ। घा वा वृद्धिः। १ उत्तोलन, सौधा खड़ा करनेका उद्यतयुक् (सं० त्रि०) उदकदान करनेको दर्वी | काम। २ रज्जु, रस्सी। उठानेवाला। उद्यांव (स० पु०) उत्-य उपपदे घञ् । उदिश्श्यति- उद्यतायुध (सं. त्रि०) अस्त्र उठाये हुआ, जो यौतिद्भुवः । पा ३।३।४६ । ऊध्व मिश्रण, मिलावट, जोड़जाड़। हथियार ताने हो। उद्यास (वै० 'पु०) उत्-यस-धज । १ उद्यमकर्ता, उद्यति (सं० स्त्री०) उत्-यम भावे तिन् । १ उद्यम, कोशिश करनेवाला । संज्ञायां घज । २ देवता- कोशिश। २ उत्थापन, उठाव । भेद। (वाजसनेयसहिता ३९०११) उद्यन्त (सं०वि०) उन्नायक, उठाने या तरको उद्यक्त (सं० त्रि०) तत्पर, मुस्तैद, ज़ोरसे काम पहुंचानेवाला। करनेवाला। उद्यम (सं० पु०) उत्-यम-घज, न वृद्धिः । १ प्रयास, उद्योग (सं० पु०-लो०) उत्-युज-धज । १ चेष्टा, कोशिश। २ उद्योग, काम। ३ उत्तोलन, उठाव । कोशिश। “जातिरूपवयोवृत्तिविद्यादिभिरहका तः । ४ उत्साह, हौसला। ' शब्दादि विषयोद्योग' कर्मणा मनसा गिरा।" (याज्ञवल्का ॥१५१.) उद्यमन (सं० लो०) उत्-यम-णिच-त्यु ट । १ उत्क्षे- २ प्रायोजन, तैयारो। ३ महाभारतका एक पर्व । पण, उछाल । २ उत्तोलन, चढ़ाव । | उद्योगसमर्थ (सं० त्रि.) चेष्टा करने योग्य, जो उद्यमभङ्ग (स. पु.) १ प्रयासका नाश, कोशि कोशिश लगा सकता हो। शका बिगाड़। २ विराम, ठहराव । उद्योगिन् (सं० त्रि०) उत्-युज्-घिणु न्। १ उद्योग- उद्यमभृत् (सं• त्रि. ) उद्यम करनेवाला, जो | युक्त, कोशिश करनेवाला। २ उत्साही, हौसले- कोशिश लगा रहा हो। मन्द। . उद्यमित (सं० वि०) उत्-यम-णिच-त । १ उत्तो- उद्योजक (सं० वि०) उत्-युज्-खु ल । प्रवर्तक, लित, उठाया हुआ। २ यत्नसे प्रेरित, तदबीरसे काममें लगा देनेवाला। समाया हुमा। | उद्योत, उद्द्योत देखो।<noinclude></noinclude> 84979f5cw352wi9aixl2tp4zq6fdoun 665086 665084 2026-07-06T06:31:21Z अनुश्री साव 80 665086 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२७४|उद्मन्-उद्योत}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उदमन् (सं॰ क्ली॰) महोर्मि, बहाव।<br> <br>उद्य (सं॰ वि॰) वद क्याप् १ कथनीय, कहे जाने काबिल। (पु॰) २ नद, दरया।<br> <br>उद्यत् (सं॰ त्रि॰) उत्-इन् शतृ। १ गमनशील, चलनेवाला। २ उदयशील, निकलने या उठनेवाला। (पु॰) २ नथन ४ किसी पर्वतका नाम।<br> <br>उद्यत (सं॰ त्रि॰) उत्-यम-त। १ उहर्ण, उठाया हुआ। २ उत्तोलित, उकाला हुआ। ३ उद्यमित, काम करनेवाला। ४ तत्पर मुस्तैद। ५ प्रवृत्त, लगा हुआ। (क्ली॰) भावे क्त। ६ उद्यम, काम। ७ अध्याय, बाव। ८ तालभेद।<br> <br>उद्यतकार्मुक (सं॰ त्रि॰) उत्तोलित धनु:युक्त, कमान् खींचे हुआ।<br> <br>उद्यतगद (सं॰ त्रि॰) उद्ग र्ण गदयुक्त, गुर्ज़ ताने हुआ।<br> उद्यशूल (सं० त्रि०) उत्थापित शूलयुक्त, भाला उठाये हुआ। उद्यत (सं० ति० ) उदकदान करनेको दव उठानेवाला । उद्यतायुध (सं० त्रि०) अस्त्र उठाये हुत्रा, जो थियार साने हो । उद्यति (सं० स्त्री०) उत्-यम भावे क्तिन् । १ उद्यम, कोशिश । २ उत्थापन, उठाव । उद्यमिन् (सं० ति० ) तत्पर मुस्तेद, जो कोशिश कर रहा हो । उद्यान (सं० पु० क्लो० ) उत्या आधारे ल्युट् । अर्धर्चा पुसि च। पा २३ | ४ ४१ । १ श्राक्रोड़, बाग । २ नि:- सरण, निकास | २ प्रयोजन, मतलब | ४ उद्यम, रोजगार, कामकाज । ' उद्यान ऋ (सं० क्लो० ) आराम, बाग । उद्यानपाल (सं० पु० ) १ उद्यानरक्षक, माली, बागका मुहाफिज़ | २ उद्यानस्वामी, बागका मालिक । उद्यानपालक, उद्यानपाल देखो । उद्यानरक्षक, उद्यानपाल देखो । उद्यापन (सं० पु० लो०) उत्- या - णिच् - ल्युट् । १ आरम्भ, शुरू। २ व्रतसमापन, व्रत पूरा करने का काम | उद्यापित (सं० ति० ) उद्यापित (सं०बि०) पूर्वोक्षत पूरा किया हुंचा। (सं० पु० ) उद्यम्यतेऽनेन उत्-यम करणे १ उत्तोलन, सीधा खड़ा करनेका उद्या घञ् वा वृद्धिः । काम । २ र रम । उद्या (स०पु० ) उत्-यू उपपदे चत्र । उदयति- यौतिष्पृद्रुषः । पा३श३४८ । ऊर्ध्व मिश्रण, मिलावट, जोड़जाड़ । उद्या (वै० पु० ) उत्-यस- घञ् । १ उद्यमकर्ता, कोशिश करनेवाला । संज्ञायां च । २ देवता- घञ भेद । ( वाजसनेयस हिता २०११ ) उद्यन् (सं०बि०) उबायक, उठाने या तरको उद्यत (सं० ति०) तंत्पर, सुखद, ज़ोरसे काम पहुंचानेवाला । उद्यम (स ं० पु० ) उत्-यम- घञ, न वृद्धिः । १ प्रयास, कोशिश । २ उद्योग, काम । ३ उत्तोलन, उठाव । ४ उत्साह, हौसला । उद्यमन (सं० क्लो०) उत्-यम- णिच् - ल्युट् । १ उत्- पण, उछाल । २ उत्तोलन, चढ़ाव उद्यमभङ्ग (सं० पु०) १ प्रयासका नाश, कोशि शका बिगाड़ । २ विराम, ठहराव । उद्यमभृत् (सं• त्रि. ) उद्यम करनेवाला, जो कोशिश लगा रहा हो । उद्यमित (सं०वि०) उत्-यम- विच-क्त । १ उत्तो- लित, उठाया हुआ । २ यत्न से प्रेरित, तदबीर से लगाया हुआ । : करनेवाला । उद्योग (सं० पु० - क्लो० ) उत्-युज- घञ् । ८ १ चेष्टा, कोमिम। “जातिविद्यादिभिर शब्दादि विषयोद्योग' कर्मणा मनसा गिरा ॥” (याज्ञवल्का २१५१.) २ प्रायोजन, तैयारो । ३ महाभारतका एक पर्व उद्योगसमर्थ (सं० बि०) चेष्टा करने योग्य, जो त्रि०) कोशिश लगा सकता हो । । उद्योगिन् (सं० ति० ) उत्- युज् - धिणुन् । १ उद्योग- युक्त कोशिश करनेवाला २ उत्साही होसले- मन्द । । उद्योजक (सं० बि० ) उत्-युज् -खल् । प्रवर्तक, काममें लगा देनेवाला । उद्योत, उद्योत देखो।<noinclude></noinclude> 0u9no73ccxgagr7u1silukh0073yewz 665099 665086 2026-07-06T08:05:55Z अनुश्री साव 80 665099 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२७४|उद्मन्-उद्योत}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उदमन् (सं॰ क्ली॰) महोर्मि, बहाव।<br> <br>उद्य (सं॰ वि॰) वद क्याप् १ कथनीय, कहे जाने काबिल। (पु॰) २ नद, दरया।<br> <br>उद्यत् (सं॰ त्रि॰) उत्-इन् शतृ। १ गमनशील, चलनेवाला। २ उदयशील, निकलने या उठनेवाला। (पु॰) २ नथन ४ किसी पर्वतका नाम।<br> <br>उद्यत (सं॰ त्रि॰) उत्-यम-त। १ उहर्ण, उठाया हुआ। २ उत्तोलित, उकाला हुआ। ३ उद्यमित, काम करनेवाला। ४ तत्पर मुस्तैद। ५ प्रवृत्त, लगा हुआ। (क्ली॰) भावे क्त। ६ उद्यम, काम। ७ अध्याय, बाव। ८ तालभेद।<br> <br>उद्यतकार्मुक (सं॰ त्रि॰) उत्तोलित धनु:युक्त, कमान् खींचे हुआ।<br> <br>उद्यतगद (सं॰ त्रि॰) उद्ग र्ण गदयुक्त, गुर्ज़ ताने हुआ।<br> <br>उद्यशूल (सं॰ त्रि॰) उत्थापित शूलयुक्त, भाला उठाये हुआ।<br> <br>उद्यतश्रुक् (सं॰ त्रि॰) उदकदान करनेको दवों उठानेवाला।<br> <br>उद्यतायुध (सं॰ त्रि॰) अस्त्र उठाये हुआ, जो हथियार ताने हो।<br> <br>उद्यति (सं॰ स्त्री॰) उत्-यम भावे क्तिन्। १ उद्यम, कोशिश । २ उत्थापन, उठाव ।<br> <br>उद्यन्तृ (सं॰ त्रि॰) उन्नायक, उठाने या तरक्की पहुंचानेवाला।<br> उद्यम (सं॰ पु॰) उत्-यम-घञ्, न वृहि:। अर्धर्चा पुसि च। पा २३ | ४ ४१ । १ श्राक्रोड़, बाग । २ नि:- सरण, निकास | २ प्रयोजन, मतलब | ४ उद्यम, रोजगार, कामकाज । ' उद्यान ऋ (सं० क्लो० ) आराम, बाग । उद्यानपाल (सं० पु० ) १ उद्यानरक्षक, माली, बागका मुहाफिज़ | २ उद्यानस्वामी, बागका मालिक । उद्यानपालक, उद्यानपाल देखो । उद्यानरक्षक, उद्यानपाल देखो । उद्यापन (सं० पु० लो०) उत्- या - णिच् - ल्युट् । १ आरम्भ, शुरू। २ व्रतसमापन, व्रत पूरा करने का काम | उद्यापित (सं० ति० ) उद्यापित (सं०बि०) पूर्वोक्षत पूरा किया हुंचा। (सं० पु० ) उद्यम्यतेऽनेन उत्-यम करणे १ उत्तोलन, सीधा खड़ा करनेका उद्या घञ् वा वृद्धिः । काम । २ र रम । उद्या (स०पु० ) उत्-यू उपपदे चत्र । उदयति- यौतिष्पृद्रुषः । पा३श३४८ । ऊर्ध्व मिश्रण, मिलावट, जोड़जाड़ । उद्या (वै० पु० ) उत्-यस- घञ् । १ उद्यमकर्ता, कोशिश करनेवाला । संज्ञायां च । २ देवता- घञ भेद । ( वाजसनेयस हिता २०११ ) उद्यन् (सं०बि०) उबायक, उठाने या तरको उद्यत (सं० ति०) तंत्पर, सुखद, ज़ोरसे काम पहुंचानेवाला । उद्यम (स ं० पु० ) उत्-यम- घञ, न वृद्धिः । १ प्रयास, कोशिश । २ उद्योग, काम । ३ उत्तोलन, उठाव । ४ उत्साह, हौसला । उद्यमन (सं० क्लो०) उत्-यम- णिच् - ल्युट् । १ उत्- पण, उछाल । २ उत्तोलन, चढ़ाव उद्यमभङ्ग (सं० पु०) १ प्रयासका नाश, कोशि शका बिगाड़ । २ विराम, ठहराव । उद्यमभृत् (सं• त्रि. ) उद्यम करनेवाला, जो कोशिश लगा रहा हो । उद्यमित (सं०वि०) उत्-यम- विच-क्त । १ उत्तो- लित, उठाया हुआ । २ यत्न से प्रेरित, तदबीर से लगाया हुआ । : करनेवाला । उद्योग (सं० पु० - क्लो० ) उत्-युज- घञ् । ८ १ चेष्टा, कोमिम। “जातिविद्यादिभिर शब्दादि विषयोद्योग' कर्मणा मनसा गिरा ॥” (याज्ञवल्का २१५१.) २ प्रायोजन, तैयारो । ३ महाभारतका एक पर्व उद्योगसमर्थ (सं० बि०) चेष्टा करने योग्य, जो त्रि०) कोशिश लगा सकता हो । । उद्योगिन् (सं० ति० ) उत्- युज् - धिणुन् । १ उद्योग- युक्त कोशिश करनेवाला २ उत्साही होसले- मन्द । । उद्योजक (सं० बि० ) उत्-युज् -खल् । प्रवर्तक, काममें लगा देनेवाला । उद्योत, उद्योत देखो।<noinclude></noinclude> th6jh3kt4j3kpxtpk8ddg622k8y9o0c पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२७४ 250 75943 665073 304775 2026-07-06T05:35:02Z अनुश्री साव 80 665073 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या-उद्भ्रान्तक|२७३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} वर्तमान वैज्ञानिकोंकी तरह अवगत था आयु र्वेदोक्त द्रव्यगुण देखनेसे सविशेष जान सकते-किसी किसी विषय में पाश्चात्य तत्वविदोंकी अपेक्षा वे समधिक समझते थे। {{block center|<poem><small> "तब सिक्ता जलैभूं मिरन्तरुष्मविपाचिता। वायुना व्यूह्यमाना तु बीजत्व प्रतिपाद्यते॥ तथा व्यक्तानि वीजानि सं सिक्तान्यन्भसा पुनः। उच्छूनत्वं मृदुत्वश्च मूलभावं प्रयाति च॥ तन्मू लादङु रोत्पत्तिरङ रात् पर्यसम्भवः। पर्यात्मंक ततः काण्डं काणाञ्च प्रसवं पुनः॥" (राघवभट्ट)</small></poem>}} जलसिक्त भूमि अभ्यन्तरस्थ उष्मा द्वारां पच्यमान होती है। फिर परिपाकजनित विकारविशेष जब वायुद्वारा पकड़ा या रगड़ा, तब वह उद्भिदके जन्मका वीज अर्थात् उपादन-कारण समझा जाता है। इसी अव्यक्त वीजसे प्ररोह निकलता है। कभी कभी प्ररोहसे व्यक्त वीज फूट पड़ता है। व्यक्त वीज सकल जससे आर्द्र होनेपर प्रथम फूलने और मृदु तथा कोमल होने लगता है। क्रमसे बही भविष्यद् चरका मूलखरूप बन जाता है। मूलसे अङ्कुर, अङ्कुरसे पत्रका अवयव, पत्रके अवयव से आत्मा वा देहभाग (काण्ड) और देहभागसे प्रसव (पुष्पफलादि) उत्पन्न होता है। सिवा इसके प्राचीन शास्त्र में त्वक्सार, अन्तःसार, निःसार प्रभृति शब्दोंका उलेख रहने से सहज ही मानना पड़ता-ऋषिगणको उद्विका तत्त्व अवश्य अवगत था। कृषिपराशर, द्रव्यगुण प्रभृति प्राचीन ग्रन्थमें उड्भिद्विद्याका सूक्ष्मतत्त्व विद्यमान है। निम्नलिखित वचनसे भी उद्भिद्विद्याका प्राचीन तत्त्व प्रदर्शित होता है- {{block center|<poem><small> "मूलत्वक्सारनिर्यांसनालस्वरसपल्लवाः। चीरा: चीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः॥ पत्राणि गुन्याः कन्दाश्य प्ररोहयोड्भिदी गणः॥" (चरक)</small></poem>}} <br>उद्भिन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-भिद्क्त। १ उत्पन्न, पैदा। २ दलित, तोड़ा हुआ। उत्थित निकला हुआ।<br> उड्भू (सं॰ त्रि॰) स्थायी, पायदार।<br> उद्भूत (सं॰ त्रि॰) १ उत्पन्न पैदा। २ उच्च, ऊंचा। ३ दृश्य, देख पड़नेवाला<br> Vol III{{gap}}{{gap}}69 {{Multicol-break}} उतरूप (सं॰ क्ली॰) दृश्य आकार देख पड़नेवाली सूरत। {{block center|<poem> "उङ्गतरूपं नयनस्य गोधरं द्रव्याणि तद्दन्ति पृथक्त्वसंख्या। वभागसंयोगपरापरत्वं सेद्रवत्वं परिमाणयुक्तम्॥ क्रियाजातीयोगवृत्ती समवायञ्च तादृशम्। गृह्णाति चच्चसम्बन्धादालोकोद्र तरूपयोः॥" (भाषापरिच्छेद)</small></poem>}} उति (सं. श्री. उत्-भू-शिन् १ उत्पत्ति, पैदायश | २ उत्तम विभूति, अच्छो हैसियत । ३ उन्नति, तरक्की, उचाई । उद्भेद (सं० पु० ) उत्-भिद् घञ् । १ भेदके साथ प्रकाश, फोड़कर निकास । N "पुष्पोद' सह किसलयैर्भूषणानां विशेषात् ।" (मेघदूत) २ उदय उठान । ३ स्फूर्ति, शिंगुफतगो । ४ श्रवि- ष्कार, ईजाद ५ रोमाथ, रोंगटोंका खड़ा होना । ६ मेलन, मिलाप । I "गोई द' समासाद्य विरावोपोषितो नरः । " ( भारत वन ८४ अ० ) ७ काव्यालङ्कार विशेष इसमें चतुर्थके साथ गुप्त किये ये विषयका किसी कारण वश प्रकामित होना देखाते हैं । ८ अङ्कुर, किल्ला 1 उद्भेदन (सं० क्लो०) उत्-भिद् भावे । १ प्रका ल्युट् शन, खोलाई । २ निर्झर, झरना । उद्भ्यस ( वे० त्रि० ) जो ऊंचा कर रहा हो । “चतुर्द'ट्रां व्यावदतः कुम्भमुष्कां मुखान् । स्वभ्यता ये चोरसाः । (अथर्व ११२१७ ) नोदात्तो- २ बुद्धिलोप, उभ्रम (सं० पु० ) उत्-भ्रम करणे घञ, पदेशेति न वृद्धिः । १ उद्देग, उभार । बोगी। २ व्याकुलता, बेचैनी । चक्कर ! ५ शिवगण विशेष | ४ ऊर्ध्व भ्रमण, उदभ्रमण (सं० क्लो० ) इतस्ततः गमन, चलफिर । उदयान्त (सं०वि०) उत्-भ्रम १ व्याकुल, बेचैन । २ वान्तियुक्त भूलाभरका बुद्धि, भौचक्का । ४ आघूर्णित, चक्कर लगाता हुआ । ५ व्यस्त, लगा हुत्रा ! ६ उच्छृङ्खल बेकायदा | ( पु० ) ० खड्गादिका सञ्चालन, पटेवाजी, तलवारको फट कार इसमें हस्त ऊपर को उठा खड़ग घुमा पोर शय के प्राघातको बचाते हैं। उदान्तक (को०) वायुमें उत्थान, हवामें उठान<noinclude></noinclude> 6iu82b0naq1mq6w4glh7k1ikeytqqya 665077 665073 2026-07-06T06:05:59Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 665077 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या-उद्भ्रान्तक|२७३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} वर्तमान वैज्ञानिकोंकी तरह अवगत था आयु र्वेदोक्त द्रव्यगुण देखनेसे सविशेष जान सकते-किसी किसी विषय में पाश्चात्य तत्वविदोंकी अपेक्षा वे समधिक समझते थे। {{block center|<poem><small> "तब सिक्ता जलैभूं मिरन्तरुष्मविपाचिता। वायुना व्यूह्यमाना तु बीजत्व प्रतिपाद्यते॥ तथा व्यक्तानि वीजानि 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center|<poem><small> "मूलत्वक्सारनिर्यांसनालस्वरसपल्लवाः। चीरा: चीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः॥ पत्राणि गुन्याः कन्दाश्य प्ररोहयोड्भिदी गणः॥" (चरक)</small></poem>}} <br>उद्भिन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-भिद्क्त। १ उत्पन्न, पैदा। २ दलित, तोड़ा हुआ। उत्थित निकला हुआ।<br> उड्भू (सं॰ त्रि॰) स्थायी, पायदार।<br> उद्भूत (सं॰ त्रि॰) १ उत्पन्न पैदा। २ उच्च, ऊंचा। ३ दृश्य, देख पड़नेवाला<br> Vol{{gap}}III{{gap}}{{gap}}69 {{Multicol-break}} उतरूप (सं॰ क्ली॰) दृश्य आकार देख पड़नेवाली सूरत। {{block center|<poem> "उङ्गतरूपं नयनस्य गोधरं द्रव्याणि तद्दन्ति पृथक्त्वसंख्या। वभागसंयोगपरापरत्वं सेद्रवत्वं परिमाणयुक्तम्॥ क्रियाजातीयोगवृत्ती समवायञ्च तादृशम्। गृह्णाति चच्चसम्बन्धादालोकोद्र तरूपयोः॥" (भाषापरिच्छेद)</small></poem>}} <br>उद्भति (सं॰ स्त्री॰) उत्-भू-क्लिन् १ उत्पत्ति, पैदायश २ उत्तम विभूति, अच्छी हैसियत। ३ उन्नति, तरक्की, उंचाई।<br> उद्भेद (सं॰ पु॰) उत्-भिद् घञ्। १ भेदके साथ प्रकाश, फोड़कर निकास।<br> {{block center|<poem><small> "पुष्पोड्भेद' सह किसलयैर्भूषणानां विशेषात्।" (मेघदूत)</small></poem>}} <br>२ उदय उठान। ३ स्फूर्ति, शिंगुफतगी । ४ आविष्कार, ईजाद ५ रोमाञ्ज, रोंगटोंका खड़ा होना। ६ मेलन, मिलाप।<br> {{block center|<poem><small> "गङ्गोड्भेदं समासाद्य विरावोपोषितो नरः।" (भारत वन ८४ अ॰)</small></poem>}} <br>७ काव्यालङ्कार विशेष। इसमें चतुर्थके साथ गुप्त किये हुये विषयका किसी कारण वश प्रकाशित होना देखाते हैं। ८ अङ्कुर, किल्ला।<br> उद्भेदन (सं॰ क्ली॰) उत्-भिद् भावे ल्युट्। १ प्रका शन, खोलाई । २ निर्झर, झरना ।<br> उद्भ्यस (वे॰ त्रि॰) जो ऊंचा कर रहा हो ।<br> {{block center|<poem><small> "चतुर्दंट्रां व्यावदतः कुम्भमुष्कां असुङ मुखान् । स्वभ्यता ये चोड्हसाः। (अथर्व ११।९।१७)</small></poem>}} <br>उद्भ्रमण (सं॰ क्ली॰) उत्-भ्रम करणे घञ्, नोदात्तोपदेशेति न वृद्धिः। १ उद्वेग, उभार। २ बुद्धिलोप, बेहोशी। ३ व्याकुलता, बेचैनी। ४ ऊर्ध्व भ्रमण, चक्कर! ५ शिवगण विशेष ।<br> उदभ्रमण (सं॰ क्ली॰) इतस्ततः गमन, चलफिर। उदयान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-भ्रमक्त। १ व्याकुल, बेचैन। २ भ्रान्तियुक्त भूलाभटका। ३ हतबुद्धि, भौचक्का। ४ आघूर्णित, चक्कर लगाता हुआ। ५ व्यस्त, लगा हुआ। ६ उच्छृङ्खल बेकायदा। (पु॰) ७ खड्गादिका सञ्चालन, पटेवाजी, तलवारकी फटकार। इसमें हस्त ऊपरको उठा खड़ग घुमा और शत्रुके आघातको बचाते हैं।<br> उद्भ्रान्तक (सं॰ क्ली॰) वायुमें उत्थान, हवामें उठान।<br> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> gufsk556gqiuezz5bmlzmorxalnpugo 665078 665077 2026-07-06T06:07:03Z अनुश्री साव 80 665078 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या-उद्भ्रान्तक|२७३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} वर्तमान वैज्ञानिकोंकी तरह अवगत था आयु र्वेदोक्त द्रव्यगुण देखनेसे सविशेष जान सकते-किसी किसी विषय में पाश्चात्य तत्वविदोंकी अपेक्षा वे समधिक समझते थे। {{block center|<poem><small> "तब सिक्ता जलैभूं मिरन्तरुष्मविपाचिता। वायुना व्यूह्यमाना तु बीजत्व प्रतिपाद्यते॥ तथा व्यक्तानि वीजानि सं सिक्तान्यन्भसा पुनः। उच्छूनत्वं मृदुत्वश्च मूलभावं प्रयाति च॥ तन्मू लादङु रोत्पत्तिरङ रात् पर्यसम्भवः। पर्यात्मंक ततः काण्डं काणाञ्च प्रसवं पुनः॥" (राघवभट्ट)</small></poem>}} जलसिक्त भूमि अभ्यन्तरस्थ उष्मा द्वारां पच्यमान होती है। फिर परिपाकजनित विकारविशेष जब वायुद्वारा पकड़ा या रगड़ा, तब वह उद्भिदके जन्मका वीज अर्थात् उपादन-कारण समझा जाता है। इसी अव्यक्त वीजसे प्ररोह निकलता है। कभी कभी प्ररोहसे व्यक्त वीज फूट पड़ता है। व्यक्त वीज सकल जससे आर्द्र होनेपर प्रथम फूलने और मृदु तथा कोमल होने लगता है। क्रमसे बही भविष्यद् चरका मूलखरूप बन जाता है। मूलसे अङ्कुर, अङ्कुरसे पत्रका अवयव, पत्रके अवयव से आत्मा वा देहभाग (काण्ड) और देहभागसे प्रसव (पुष्पफलादि) उत्पन्न होता है। सिवा इसके प्राचीन शास्त्र में त्वक्सार, अन्तःसार, निःसार प्रभृति शब्दोंका उलेख रहने से सहज ही मानना पड़ता-ऋषिगणको उद्विका तत्त्व अवश्य अवगत था। कृषिपराशर, द्रव्यगुण प्रभृति प्राचीन ग्रन्थमें उड्भिद्विद्याका सूक्ष्मतत्त्व विद्यमान है। निम्नलिखित वचनसे भी उद्भिद्विद्याका प्राचीन तत्त्व प्रदर्शित होता है- {{block center|<poem><small> "मूलत्वक्सारनिर्यांसनालस्वरसपल्लवाः। चीरा: चीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः॥ पत्राणि गुन्याः कन्दाश्य प्ररोहयोड्भिदी गणः॥" (चरक)</small></poem>}} <br>उद्भिन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-भिद्क्त। १ उत्पन्न, पैदा। २ दलित, तोड़ा हुआ। उत्थित निकला हुआ।<br> उड्भू (सं॰ त्रि॰) स्थायी, पायदार।<br> उद्भूत (सं॰ त्रि॰) १ उत्पन्न पैदा। २ उच्च, ऊंचा। ३ दृश्य, देख पड़नेवाला<br> Vol{{gap}}III{{gap}}{{gap}}69 {{Multicol-break}} उतरूप (सं॰ क्ली॰) दृश्य आकार देख पड़नेवाली सूरत। {{block center|<poem> "उङ्गतरूपं नयनस्य गोधरं द्रव्याणि तद्दन्ति पृथक्त्वसंख्या। वभागसंयोगपरापरत्वं सेद्रवत्वं परिमाणयुक्तम्॥ क्रियाजातीयोगवृत्ती समवायञ्च तादृशम्। गृह्णाति चच्चसम्बन्धादालोकोद्र तरूपयोः॥" (भाषापरिच्छेद)</small></poem>}} <br>उद्भति (सं॰ स्त्री॰) उत्-भू-क्लिन् १ उत्पत्ति, पैदायश २ उत्तम विभूति, अच्छी हैसियत। ३ उन्नति, तरक्की, उंचाई।<br> उद्भेद (सं॰ पु॰) उत्-भिद् घञ्। १ भेदके साथ प्रकाश, फोड़कर निकास।<br> {{block center|<poem><small> "पुष्पोड्भेद' सह किसलयैर्भूषणानां विशेषात्।" (मेघदूत)</small></poem>}} <br>२ उदय उठान। ३ स्फूर्ति, शिंगुफतगी । ४ आविष्कार, ईजाद ५ रोमाञ्ज, रोंगटोंका खड़ा होना। ६ मेलन, मिलाप।<br> {{block center|<poem><small> "गङ्गोड्भेदं समासाद्य विरावोपोषितो नरः।" (भारत वन ८४ अ॰)</small></poem>}} <br>७ काव्यालङ्कार विशेष। इसमें चतुर्थके साथ गुप्त किये हुये विषयका किसी कारण वश प्रकाशित होना देखाते हैं। ८ अङ्कुर, किल्ला।<br> उद्भेदन (सं॰ क्ली॰) उत्-भिद् भावे ल्युट्। १ प्रकाशन, खोलाई। २ निर्झर, झरना ।<br> उद्भ्यस (वे॰ त्रि॰) जो ऊंचा कर रहा हो।<br> {{block center|<poem><small> "चतुर्दंट्रां व्यावदतः कुम्भमुष्कां असुङ मुखान्। स्वभ्यता ये चोड्हसाः। (अथर्व ११।९।१७)</small></poem>}} <br>उद्भ्रमण (सं॰ क्ली॰) उत्-भ्रम करणे घञ्, नोदात्तोपदेशेति न वृद्धिः। १ उद्वेग, उभार। २ बुद्धिलोप, बेहोशी। ३ व्याकुलता, बेचैनी। ४ ऊर्ध्व भ्रमण, चक्कर! ५ शिवगण विशेष ।<br> उदभ्रमण (सं॰ क्ली॰) इतस्ततः गमन, चलफिर। उदयान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-भ्रमक्त। १ व्याकुल, बेचैन। २ भ्रान्तियुक्त भूलाभटका। ३ हतबुद्धि, भौचक्का। ४ आघूर्णित, चक्कर लगाता हुआ। ५ व्यस्त, लगा हुआ। ६ उच्छृङ्खल बेकायदा। (पु॰) ७ खड्गादिका सञ्चालन, पटेवाजी, तलवारकी फटकार। इसमें हस्त ऊपरको उठा खड़ग घुमा और शत्रुके आघातको बचाते हैं।<br> उद्भ्रान्तक (सं॰ क्ली॰) वायुमें उत्थान, हवामें उठान।<br> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> sfyi1a25gk50tn83y59x34xneawhbfl 665079 665078 2026-07-06T06:08:00Z अनुश्री साव 80 665079 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या-उद्भ्रान्तक|२७३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} वर्तमान वैज्ञानिकोंकी तरह अवगत था आयु र्वेदोक्त द्रव्यगुण देखनेसे सविशेष जान सकते-किसी किसी विषय में पाश्चात्य तत्वविदोंकी अपेक्षा वे समधिक समझते थे। {{block center|<poem><small> "तब सिक्ता जलैभूं मिरन्तरुष्मविपाचिता। वायुना व्यूह्यमाना तु बीजत्व प्रतिपाद्यते॥ तथा व्यक्तानि वीजानि सं सिक्तान्यन्भसा पुनः। उच्छूनत्वं मृदुत्वश्च मूलभावं प्रयाति च॥ तन्मू लादङु रोत्पत्तिरङ रात् पर्यसम्भवः। पर्यात्मंक ततः काण्डं काणाञ्च प्रसवं पुनः॥" (राघवभट्ट)</small></poem>}} जलसिक्त भूमि अभ्यन्तरस्थ उष्मा द्वारां पच्यमान होती है। फिर परिपाकजनित विकारविशेष जब वायुद्वारा पकड़ा या रगड़ा, तब वह उद्भिदके जन्मका वीज अर्थात् उपादन-कारण समझा जाता है। इसी अव्यक्त वीजसे प्ररोह निकलता है। कभी कभी प्ररोहसे व्यक्त वीज फूट पड़ता है। व्यक्त वीज सकल जससे आर्द्र होनेपर प्रथम फूलने और मृदु तथा कोमल होने लगता है। क्रमसे बही भविष्यद् चरका मूलखरूप बन जाता है। मूलसे अङ्कुर, अङ्कुरसे पत्रका अवयव, पत्रके अवयव से आत्मा वा देहभाग (काण्ड) और देहभागसे प्रसव (पुष्पफलादि) उत्पन्न होता है। सिवा इसके प्राचीन शास्त्र में त्वक्सार, अन्तःसार, निःसार प्रभृति शब्दोंका उलेख रहने से सहज ही मानना पड़ता-ऋषिगणको उद्विका तत्त्व अवश्य अवगत था। कृषिपराशर, द्रव्यगुण प्रभृति प्राचीन ग्रन्थमें उड्भिद्विद्याका सूक्ष्मतत्त्व विद्यमान है। निम्नलिखित वचनसे भी उद्भिद्विद्याका प्राचीन तत्त्व प्रदर्शित होता है- {{block center|<poem><small> "मूलत्वक्सारनिर्यांसनालस्वरसपल्लवाः। चीरा: चीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः॥ पत्राणि गुन्याः कन्दाश्य प्ररोहयोड्भिदी गणः॥" (चरक)</small></poem>}} <br>उद्भिन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-भिद्क्त। १ उत्पन्न, पैदा। २ दलित, तोड़ा हुआ। उत्थित निकला हुआ।<br> उड्भू (सं॰ त्रि॰) स्थायी, पायदार।<br> उद्भूत (सं॰ त्रि॰) १ उत्पन्न पैदा। २ उच्च, ऊंचा। ३ दृश्य, देख पड़नेवाला<br> Vol{{gap}}III{{gap}}{{gap}}69 {{Multicol-break}} उतरूप (सं॰ क्ली॰) दृश्य आकार देख पड़नेवाली सूरत। {{block center|<poem> "उङ्गतरूपं नयनस्य गोधरं द्रव्याणि तद्दन्ति पृथक्त्वसंख्या। वभागसंयोगपरापरत्वं सेद्रवत्वं परिमाणयुक्तम्॥ क्रियाजातीयोगवृत्ती समवायञ्च तादृशम्। गृह्णाति चच्चसम्बन्धादालोकोद्र तरूपयोः॥" (भाषापरिच्छेद)</small></poem>}} <br>उद्भति (सं॰ स्त्री॰) उत्-भू-क्लिन् १ उत्पत्ति, पैदायश २ उत्तम विभूति, अच्छी हैसियत। ३ उन्नति, तरक्की, उंचाई।<br> उद्भेद (सं॰ पु॰) उत्-भिद् घञ्। १ भेदके साथ प्रकाश, फोड़कर निकास।<br> {{block center|<poem><small> "पुष्पोड्भेद' सह किसलयैर्भूषणानां विशेषात्।" (मेघदूत)</small></poem>}} <br>२ उदय उठान। ३ स्फूर्ति, शिंगुफतगी । ४ आविष्कार, ईजाद ५ रोमाञ्ज, रोंगटोंका खड़ा होना। ६ मेलन, मिलाप।<br> {{block center|<poem><small> "गङ्गोड्भेदं समासाद्य विरावोपोषितो नरः।" (भारत वन ८४ अ॰)</small></poem>}} <br>७ काव्यालङ्कार विशेष। इसमें चतुर्थके साथ गुप्त किये हुये विषयका किसी कारण वश प्रकाशित होना देखाते हैं। ८ अङ्कुर, किल्ला।<br> उद्भेदन (सं॰ क्ली॰) उत्-भिद् भावे ल्युट्। १ प्रकाशन, खोलाई। २ निर्झर, झरना ।<br> उद्भ्यस (वे॰ त्रि॰) जो ऊंचा कर रहा हो।<br> {{block center|<poem><small> "चतुर्दंट्रां व्यावदतः कुम्भमुष्कां असुङ मुखान्। स्वभ्यता ये चोड्हसाः। (अथर्व ११।९।१७)</small></poem>}} <br>उद्भ्रमण (सं॰ क्ली॰) उत्-भ्रम करणे घञ्, नोदात्तोपदेशेति न वृद्धिः। १ उद्वेग, उभार। २ बुद्धिलोप, बेहोशी। ३ व्याकुलता, बेचैनी। ४ ऊर्ध्व भ्रमण, चक्कर! ५ शिवगण विशेष ।<br> <br>उदभ्रमण (सं॰ क्ली॰) इतस्ततः गमन, चलफिर। उदयान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-भ्रमक्त। १ व्याकुल, बेचैन। २ भ्रान्तियुक्त भूलाभटका। ३ हतबुद्धि, भौचक्का। ४ आघूर्णित, चक्कर लगाता हुआ। ५ व्यस्त, लगा हुआ। ६ उच्छृङ्खल बेकायदा। (पु॰) ७ खड्गादिका सञ्चालन, पटेवाजी, तलवारकी फटकार। इसमें हस्त ऊपरको उठा खड़ग घुमा और शत्रुके आघातको बचाते हैं।<br> <br>उद्भ्रान्तक (सं॰ क्ली॰) वायुमें उत्थान, हवामें उठान।<br> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 5cyu27mldmvfmrnjlhrp9m314b2iu9l 665081 665079 2026-07-06T06:09:54Z अनुश्री साव 80 665081 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्भिद्विद्या-उद्भ्रान्तक|२७३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} वर्तमान वैज्ञानिकोंकी तरह अवगत था आयु र्वेदोक्त द्रव्यगुण देखनेसे सविशेष जान सकते-किसी किसी विषय में पाश्चात्य तत्वविदोंकी अपेक्षा वे समधिक समझते थे। {{block center|<poem><small> "तब सिक्ता जलैभूं मिरन्तरुष्मविपाचिता। वायुना व्यूह्यमाना तु बीजत्व प्रतिपाद्यते॥ तथा व्यक्तानि वीजानि सं सिक्तान्यन्भसा पुनः। उच्छूनत्वं मृदुत्वश्च मूलभावं प्रयाति च॥ तन्मू लादङु रोत्पत्तिरङ रात् पर्यसम्भवः। पर्यात्मंक ततः काण्डं काणाञ्च प्रसवं पुनः॥" (राघवभट्ट)</small></poem>}} जलसिक्त भूमि अभ्यन्तरस्थ उष्मा द्वारां पच्यमान होती है। फिर परिपाकजनित विकारविशेष जब वायुद्वारा पकड़ा या रगड़ा, तब वह उद्भिदके जन्मका वीज अर्थात् उपादन-कारण समझा जाता है। इसी अव्यक्त वीजसे प्ररोह निकलता है। कभी कभी प्ररोहसे व्यक्त वीज फूट पड़ता है। व्यक्त वीज सकल जससे आर्द्र होनेपर प्रथम फूलने और मृदु तथा कोमल होने लगता है। क्रमसे बही भविष्यद् चरका मूलखरूप बन जाता है। मूलसे अङ्कुर, अङ्कुरसे पत्रका अवयव, पत्रके अवयव से आत्मा वा देहभाग (काण्ड) और देहभागसे प्रसव (पुष्पफलादि) उत्पन्न होता है। सिवा इसके प्राचीन शास्त्र में त्वक्सार, अन्तःसार, निःसार प्रभृति शब्दोंका उलेख रहने से सहज ही मानना पड़ता-ऋषिगणको उद्विका तत्त्व अवश्य अवगत था। कृषिपराशर, द्रव्यगुण प्रभृति प्राचीन ग्रन्थमें उड्भिद्विद्याका सूक्ष्मतत्त्व विद्यमान है। निम्नलिखित वचनसे भी उद्भिद्विद्याका प्राचीन तत्त्व प्रदर्शित होता है- {{block center|<poem><small> "मूलत्वक्सारनिर्यांसनालस्वरसपल्लवाः। चीरा: चीरं फलं पुष्पं भस्म तैलानि कण्टकाः॥ पत्राणि गुन्याः कन्दाश्य प्ररोहयोड्भिदी गणः॥" (चरक)</small></poem>}} <br>उद्भिन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-भिद्क्त। १ उत्पन्न, पैदा। २ दलित, तोड़ा हुआ। उत्थित निकला हुआ।<br> <br>उड्भू (सं॰ त्रि॰) स्थायी, पायदार।<br> <br>उद्भूत (सं॰ त्रि॰) १ उत्पन्न पैदा। २ उच्च, ऊंचा। ३ दृश्य, देख पड़नेवाला<br> Vol{{gap}}III{{gap}}{{gap}}69 {{Multicol-break}} उतरूप (सं॰ क्ली॰) दृश्य आकार देख पड़नेवाली सूरत। {{block center|<poem> "उङ्गतरूपं नयनस्य गोधरं द्रव्याणि तद्दन्ति पृथक्त्वसंख्या। वभागसंयोगपरापरत्वं सेद्रवत्वं परिमाणयुक्तम्॥ क्रियाजातीयोगवृत्ती समवायञ्च तादृशम्। गृह्णाति चच्चसम्बन्धादालोकोद्र तरूपयोः॥" (भाषापरिच्छेद)</small></poem>}} <br>उद्भति (सं॰ स्त्री॰) उत्-भू-क्लिन् १ उत्पत्ति, पैदायश २ उत्तम विभूति, अच्छी हैसियत। ३ उन्नति, तरक्की, 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उदयान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-भ्रमक्त। १ व्याकुल, बेचैन। २ भ्रान्तियुक्त भूलाभटका। ३ हतबुद्धि, भौचक्का। ४ आघूर्णित, चक्कर लगाता हुआ। ५ व्यस्त, लगा हुआ। ६ उच्छृङ्खल बेकायदा। (पु॰) ७ खड्गादिका सञ्चालन, पटेवाजी, तलवारकी फटकार। इसमें हस्त ऊपरको उठा खड़ग घुमा और शत्रुके आघातको बचाते हैं।<br> <br>उद्भ्रान्तक (सं॰ क्ली॰) वायुमें उत्थान, हवामें उठान।<br> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 0y8e1hvvr6vn7iuy6w650b3tuh2iqjq पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९१ 250 76095 665043 609169 2026-07-05T19:09:02Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665043 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६०'''|'''उलटी-रुमाली—उलारा'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} कसरत । मुठसे वक्षःपर मुद्गर आते भी इसमें मुट्ठी नीचे नहीं पड़ती । उलटी-रुमाली (हिं० स्त्री०) मुगदलकी एक कसरत ! इसमें मुगदल आगे को झोंक मारते हैं । उलटी सरसों (हिं० स्त्री०) टेरो, नीचेकी मुंह-वाली कलियोंकी सरसों । इसे अभिचारमें व्यवहार करते हैं । उलटी-सवाई (हिं० स्त्री०) नौ-शृङ्खलाविशेष, जहाजकी एक जञ्जीर । अनीके नीचे सवदरा इसीसे बंधता है । उलटे (हिं० क्रि० वि०) व्युत्क्रमसे, खिलाफ तौरपर । उलडना, उलटना देखो । उलथना, उलटना देखो । उलथा (हिं० पु०) १ अनुवाद, तर्जुमा । २ नृत्यविशेष, किसी किस्मका नाच । इसमें तालपर उछलते जाते हैं । उलथाना, उलटना देखो । उलद (हिं० स्त्री०) उंडेल, गिराव । उलदना (हिं० क्रि०) डालना, गिराना । उलप (सं० पु०) बलते, वल-कप्; सम्प्रसारणम् । १ विस्तीर्ण लता, फैलनेवाली बेल । २ कोमल तृण, मुलायम घास । ३ गुल्म, झाड़ । ४ वल्ली । ५ शर । ६ कलापीके एक शिष्य । उलप्य (वै० पु०) रुद्र विशेष । (शुक्ल यजुः १६।४५) (वि०) २ उलप-सम्बन्धीय, झाड़से सरोकार रखनेवाला । उलफ़त (अ० स्त्री०) १ मैत्री, दोस्ती । २ प्रेम, प्यार । उलमना (हिं० क्रि०) अवलम्बन लेना, झुक पड़ना, लटक जाना । उलरना (हिं० क्रि०) कूदना, फांदना, झपटना । उलरुवा (हिं० पु०) गाड़ीको उलरने न देनेवाली एक लकड़ी । यह पीछेकी ओर लगता है । उललना (हिं० क्रि०) १ गिरना, पड़ना, ढलना । २ उलट पड़ना, पलटा खाना । उलवी (हिं० स्त्री०) १ मत्स्यविशेष, एक मछली । इसके पखसे सरेस निकलता, जिसका व्यापार चलता है । (अ० वि०) २ स्वर्गीय, विहिश्ती । {{Multicol-break}} उलसना (हिं० क्रि०) उल्लसित होना, चमकना । उलहना (हिं० क्रि०) १ अङ्कुरित होना, फूटना, निकलना । २ प्रफुल्लित होना फूल जाना । (पु०) ३ निन्दावाद, शिकायत । उला—बङ्गालके नदिया जिलेका एक गण्डग्राम वा नगर । कहते हैं—उलू वनसे आकीर्ण विस्तृत भूमि आबाद होनेसे ही उला नाम पड़ा है । यहां पहले अनेक कुलीन ब्राह्मण और कायस्थ रहते थे । जल-वायु बहुत अच्छा था, परन्तु पीछे बिगड़ गया । कोई पचहत्तर वर्ष बीते मलेरियाने पदार्पण कर इस नगरको श्मशानतुल्य कर दिया था । यह एक प्राचीन स्थान है । उलाकी चण्डी देवी प्रसिद्ध हैं । प्रतिवर्ष वैशाखी पूर्णिमाको बड़े समारोहसे उनकी पूजा होती है । कितने ही बंगला पुस्तकोंमें इस नगरका उल्लेख है । चण्डीमण्डपका सूक्ष्म शिल्पकार्य देखनेसे बङ्गालके प्राचीन शिल्पनैपुण्यका परिचय मिलता है । इसे वीरनगर भी कहते हैं । कारण—प्रायः सत्तर वर्ष हुए एक बार रातको कितने ही अस्त्रधारी दस्यु किस धनीके घर घुसे थे । किन्तु यहांके लोगोंने वीरत्वप्रकाशपूर्वक उनमें कितनों-हीको हताहत किया । इसीसे तत्कालीन जिल्ला-मजिष्ट्रेट एलियट साहबने 'वीरनगर' नाम रखा था । आजकल यहांके मुख्योपाध्याय बाबू बड़े सात्विक क्रियावान् हैं । प्रतिवर्ष रथयात्रा, स्नान-यात्रा, जगद्धात्रीपूजा प्रभृति उत्सव होते हैं । (हिं० स्त्री०) २ मेमना, भेड़का बच्चा । उलाकांदी—बङ्गाल प्रान्तके मैमनसिंह जिलेका एक नगर । यह मेघना नदीके तीरपर अवस्थित है । लवण और शणका व्यवसाय अधिक होता है । उलाटना, उलटना देखो । उलार (हिं० वि०) पश्चात् दिक्में भारग्रस्त, पीछेकी ओर दबी हुई । यह शब्द गाड़ीका विशेषण है । उलारना (हिं० क्रि०) उत्क्षेप्य करना, ऊपरको फेंकना । उलारा (हिं० पु०) पदविशेष । इसे चौतालके अन्तमें गाते हैं । {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 7v61aff1r2hu7yxh7ldk8cs00mzw3xe 665047 665043 2026-07-06T01:14:49Z AMAN KUMAR 6475 text-align: justify 665047 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६०'''|'''उलटी-रुमाली—उलारा'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> कसरत । मुठसे वक्षःपर मुद्गर आते भी इसमें मुट्ठी नीचे नहीं पड़ती । उलटी-रुमाली (हिं० स्त्री०) मुगदलकी एक कसरत ! इसमें मुगदल आगे को झोंक मारते हैं । उलटी सरसों (हिं० स्त्री०) टेरो, नीचेकी मुंह-वाली कलियोंकी सरसों । इसे अभिचारमें व्यवहार करते हैं । उलटी-सवाई (हिं० स्त्री०) नौ-शृङ्खलाविशेष, जहाजकी एक जञ्जीर । अनीके नीचे सवदरा इसीसे बंधता है । उलटे (हिं० क्रि० वि०) व्युत्क्रमसे, खिलाफ तौरपर । उलडना, उलटना देखो । उलथना, उलटना देखो । उलथा (हिं० पु०) १ अनुवाद, तर्जुमा । २ नृत्यविशेष, किसी किस्मका नाच । इसमें तालपर उछलते जाते हैं । उलथाना, उलटना देखो । उलद (हिं० स्त्री०) उंडेल, गिराव । उलदना (हिं० क्रि०) डालना, गिराना । उलप (सं० पु०) बलते, वल-कप्; सम्प्रसारणम् । १ विस्तीर्ण लता, फैलनेवाली बेल । २ कोमल तृण, मुलायम घास । ३ गुल्म, झाड़ । ४ वल्ली । ५ शर । ६ कलापीके एक शिष्य । उलप्य (वै० पु०) रुद्र विशेष । (शुक्ल यजुः १६।४५) (वि०) २ उलप-सम्बन्धीय, झाड़से सरोकार रखनेवाला । उलफ़त (अ० स्त्री०) १ मैत्री, दोस्ती । २ प्रेम, प्यार । उलमना (हिं० क्रि०) अवलम्बन लेना, झुक पड़ना, लटक जाना । उलरना (हिं० क्रि०) कूदना, फांदना, झपटना । उलरुवा (हिं० पु०) गाड़ीको उलरने न देनेवाली एक लकड़ी । यह पीछेकी ओर लगता है । उललना (हिं० क्रि०) १ गिरना, पड़ना, ढलना । २ उलट पड़ना, पलटा खाना । उलवी (हिं० स्त्री०) १ मत्स्यविशेष, एक मछली । इसके पखसे सरेस निकलता, जिसका व्यापार चलता है । (अ० वि०) २ स्वर्गीय, विहिश्ती । </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> उलसना (हिं० क्रि०) उल्लसित होना, चमकना । उलहना (हिं० क्रि०) १ अङ्कुरित होना, फूटना, निकलना । २ प्रफुल्लित होना फूल जाना । (पु०) ३ निन्दावाद, शिकायत । उला—बङ्गालके नदिया जिलेका एक गण्डग्राम वा नगर । कहते हैं—उलू वनसे आकीर्ण विस्तृत भूमि आबाद होनेसे ही उला नाम पड़ा है । यहां पहले अनेक कुलीन ब्राह्मण और कायस्थ रहते थे । जल-वायु बहुत अच्छा था, परन्तु पीछे बिगड़ गया । कोई पचहत्तर वर्ष बीते मलेरियाने पदार्पण कर इस नगरको श्मशानतुल्य कर दिया था । यह एक प्राचीन स्थान है । उलाकी चण्डी देवी प्रसिद्ध हैं । प्रतिवर्ष वैशाखी पूर्णिमाको बड़े समारोहसे उनकी पूजा होती है । कितने ही बंगला पुस्तकोंमें इस नगरका उल्लेख है । चण्डीमण्डपका सूक्ष्म शिल्पकार्य देखनेसे बङ्गालके प्राचीन शिल्पनैपुण्यका परिचय मिलता है । इसे वीरनगर भी कहते हैं । कारण—प्रायः सत्तर वर्ष हुए एक बार रातको कितने ही अस्त्रधारी दस्यु किस धनीके घर घुसे थे । किन्तु यहांके लोगोंने वीरत्वप्रकाशपूर्वक उनमें कितनों-हीको हताहत किया । इसीसे तत्कालीन जिल्ला-मजिष्ट्रेट एलियट साहबने 'वीरनगर' नाम रखा था । आजकल यहांके मुख्योपाध्याय बाबू बड़े सात्विक क्रियावान् हैं । प्रतिवर्ष रथयात्रा, स्नान-यात्रा, जगद्धात्रीपूजा प्रभृति उत्सव होते हैं । (हिं० स्त्री०) २ मेमना, भेड़का बच्चा । उलाकांदी—बङ्गाल प्रान्तके मैमनसिंह जिलेका एक नगर । यह मेघना नदीके तीरपर अवस्थित है । लवण और शणका व्यवसाय अधिक होता है । उलाटना, उलटना देखो । उलार (हिं० वि०) पश्चात् दिक्में भारग्रस्त, पीछेकी ओर दबी हुई । यह शब्द गाड़ीका विशेषण है । उलारना (हिं० क्रि०) उत्क्षेप्य करना, ऊपरको फेंकना । उलारा (हिं० पु०) पदविशेष । इसे चौतालके अन्तमें गाते हैं । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 0bhgdyxqhcxoj3fumm2515dpw1b25fe पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९२ 250 76096 665046 609170 2026-07-06T01:12:03Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665046 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उलाहना—उलूपी'''|'''३६१'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उलाहना (हिं० पु०) उपालम्भन, शिकवा, शिकायत । उलिचना, उलीचना देखो । उलिन्द (सं० पु०) वल-किन्दः सम्प्रसारणम् । १ कुलिन्द देश । २ शिव । उलोचना (हिं० क्रि०) जलनिक्षेप करना, हाथ या किसी दूसरी चीज़से पानी फेंकना । उलुप (सं० पु०) १ शाखापत्रयुक्त लता, डाल और पत्तीवाली बेल । २ कोमल तृण, मुलायम घास । उलुपी (सं० पु०) शिशुक, सूस । उलुवेड़िया—१ बङ्गाल प्रान्तके हुवड़ा जिलेकी एक तहसील । इसमें उलुवेड़िया, आमता, वाघनान और शामपुर चार थाने लगते हैं । २ हुवड़ा जिलेका एक नगर । यह हुगली नदीके किनारे अक्षा० २२° २८' उ० तथा द्राघि० ८८° ६' १५" पू०पर अवस्थित है । उलुवेड़िया मेदिनीपुरकी राहमें पड़ता है । १६५६ ई० पर्यन्त यह स्थान उड़ीसामें मिला था । उलुम्बा (सं० स्त्री०) यमानी, अजवायन । उलुलि (सं० पु०) उल्-उलिः ध्वनिसूचक शब्द (वाच्य), गुर्राहट । उलूक (सं० पु०) वल-उक् सम्प्रसारणञ्च । उलूकादयश्च । उण् ४।४१ । १ इन्द्र । २ पेचक, उल्लू । ३ उलूखल, ओखली । ४ दुर्योधनका एक दूत । ५ विश्वामित्रके एक पुत्र । ६ एक जनपद । (मार्क०पु० ५८।४०) यह स्थान भारतके उत्तरांशमें अवस्थित है । अर्जुन दिग्विजयके समय यहां आये थे । उस समय वृहन्त इस देशके राजा रहे । (महा० सभा २६ अ०) कहीं इसे उलूत् (महा० भीष्म ६।५२) और कहीं कुलूत (वामनपु० १३।४२) भी कहा है । आजकल इसे कुलु कहते हैं । ज्वालामुखी तीर्थके उत्तर विपाशा तटसे यह जनपद लगता है । इसकी प्राचीन राजधानी नगरकोट थी । वर्त्तमान राजधानी सुलतानपुर है । ७ चट्टग्रामका एक प्राचीन नगर । (भविष्य, ब्रह्मखण्ड १४।२०) ८ जन्तुविशेष । यह लाङ्गूलहीन एकजातीय वानर है । इसका सर्व शरीर काला रहता, केवल चक्षुका भ्रू सफेद पड़ता है । कर्ण अधिकांश मनुष्यकी </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> तरह होते हैं । उलूक सीधा चलता और उभा करता है । यह 'उलक, उलक' बोलनेसे श्रीहट्ट, आसाम प्रभृति अञ्चलोंमें उलूक कहलाता है । बैठनेसे यह एक फीट ऊंचा देख पड़ता है । चींटी और मकड़ी वगैरह इसके खानेकी चीजें हैं । फिर वृक्षका पत्र और उपादेय फल भी इसे अच्छा लगता है । यह शीघ्र फंदेमें नहीं पड़ता । ग्रीष्मकालमें ही यह पकड़ा जाता, क्योंकि उस समय वृक्ष छोड़ भूमिपर सोनेको उतर आता है । वृक्षपर पकड़ा जानेसे आहार-जल छोड़ता और इहसंसारसे मुंह मोड़ता है । किन्तु बच्चे शीघ्र ही हिल जाते हैं । उलूकपाद (सं० पु०) अश्वपादरोग विशेष, घोड़ेके पैरकी एक बीमारी । कूर्चको आवर्त्तन कर जङ्घामें उत्पन्न होनेवाला शोथ उलूकपाद कहलाता है । उलूकयातु (वै० पु०) वेदोक्त असुर विशेष । यह असुर उल्लूकी सूरतमें रहता है । (ऋक् ७।१०४।२२) उलूकाश्रम (सं० पु०) इन्द्रका भवन, इन्द्रके रहनेकी जगह । उलूखल (सं० क्ली०) ऊर्ध्वं खमुलूखं पृषोदरादित्वात् ला-क । १ धान कूटनेका काठ वा पाषाणमय पात्र, खल । २ गुग्गुलु, गुगुल । उलूखलक, उलूखल देखो । उलूखलसन्धि (सं० पु०) कचावकीर्ण दशनसन्धि । उलूखलसुत (वै० पु०) उलूखल द्वारा अभिषुत सोमरस । (ऋक् १।२८।१) उलूखलिक (सं० त्रि०) उलूखलमें कूटा हुआ, जो खलमें साफ़ किया गया हो । उलूट (सं० पु०) जातिविशेष । उलूत (सं० पु०) उलति हिनस्ति यः, उल् बाहुलकात् उतच् । १ अजगर सर्प, बहुत मोटा और बड़ा सांप । २ जनपद विशेष, एक वसती । उलूप, उलुप देखो । उलूपी (सं० पु०) १ शिशुकमत्स्य, सूस । (स्त्री०) २ ऐरावत कुलके कौरव्य नामक नागराजकी कन्या । पाण्डुनन्दन अर्जुन वनवासके समय गङ्गाद्वारके निकट इन नागकन्या द्वारा आकर्षित </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 7ltswx712jm0jwomoy1g3f80skfzll5 665066 665046 2026-07-06T04:14:23Z AMAN KUMAR 6475 SIC साँचे का प्रयोग 665066 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उलाहना—उलूपी'''|'''३६१'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उलाहना (हिं० पु०) उपालम्भन, शिकवा, शिकायत । उलिचना, उलीचना देखो । उलिन्द (सं० पु०) वल-किन्दः सम्प्रसारणम् । १ कुलिन्द देश । २ शिव । उलोचना (हिं० क्रि०) जलनिक्षेप करना, हाथ या किसी दूसरी चीज़से पानी फेंकना । उलुप (सं० पु०) १ शाखापत्रयुक्त लता, डाल और पत्तीवाली बेल । २ कोमल तृण, मुलायम घास ! उलुपी (सं० पु०) शिशुक, सूस । उलुवेड़िया—१ बङ्गाल प्रान्तके हुवड़ा जिलेकी एक तहसील । इसमें उलुवेड़िया, आमता, वाघनान और शामपुर चार थाने लगते हैं । २ हुवड़ा जिलेका एक नगर । यह हुगली नदीके किनारे अक्षा० २२° २८' उ० तथा द्राघि० ८८° ६' १५" पू०पर अवस्थित है । उलुवेड़िया मेदिनीपुरकी राहमें पड़ता है । १५५६ ई० पर्यन्त यह स्थान उड़ीसामें मिला था । उलुम्बा (सं० स्त्री०) 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(सं० पु०) उलति हिनस्ति यः, उल् बाहुलकात् उतच् । १ अजगर सर्प, बहुत मोटा और बड़ा सांप । २ जनपद विशेष, एक वसती । उलूप, उलुप देखो । उलूपी (सं० पु०) १ शिशुकमत्स्य, सूस । (स्त्री०) २ ऐरावत कुलके कौरव्य नामक नागराजकी कन्या । पाण्डुनन्दन अर्जुन वनवासके समय गङ्गाद्वारके निकट इन नागकन्या द्वारा आकर्षित </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> q67v0ra5ba7010gwudr92d9fgarsybr पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९३ 250 76097 665051 609171 2026-07-06T01:39:27Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665051 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६२'''|'''उलेटना—उल्का'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> हो नागलोक पहुंचे थे । वहां उलूपीकी प्रार्थनाके अनुसार उन्होंने विवाह किया । उलूपीने अपनी मनस्कामना सिद्ध होने पर अर्जुनको वर दिया था—तुम समस्त जलचरोंको जीत सकोगे । ( भारत, आदि २१४ अ० ) उसी समय मणिपुरपति अर्जुनपुत्र वभ्रुवाहन पिताके आगमनकी वार्त्ता सुन अभ्यर्थना देने गये । अर्जुनने अपने पुत्रको विना युद्धकी सज्जा आते देख अत्यन्त विरक्त हो विस्तर भर्त्सना बतायी थी । वभ्रुवाहन उससे दुःखित न हुये । किन्तु उलूपीने पास जा उन्हें पितासे लड़नेको भड़काया था । उलूपीकी मायासे वभ्रुवाहनने अर्जुनको मार डाला । फिर उलूपीके दिये दिव्य मणिके प्रभावसे ही वह जिये थे । ( आश्वमेधिक ७८-८० ) कुम्भिरा और त्रिपुराके राजा अपनेको उलूपी और अर्जुनके वंशीय बताते हैं । उलेटना, उलटना देखो । उलेटा, उलटा देखो । उलेड़ना (हिं० क्रि०) उंडेलना, डालना । उलेख (हिं० स्त्री०) १ आह्लाद, खुशी । २ उन्नति, वृद्धि, बाढ़ । (वि०) ३ अविघ्न, बेसमझ । उलैंड़ना, उलेड़ना देखो । उल्का (सं० स्त्री०) ओषति, उष उकारस्य लत्वं क ततः टाप् । मुकवल्कोल्काः । उणा० ४।४२ । १ तेजःपुञ्ज, ज्वाला, खाला, लपट । "उल्का ज्वालादिभावयोः ।" (सुभूति) २ आकाशसे पतित अग्नि, आसमानसे गिरी आग । कितने ही लोग समझते, आकाशसे जो उल्काखण्ड पड़ते, उन्हें टूटा तारा कहते हैं । गणनातीत कालसे इस आकाशमें उत्पात होते आये हैं । फिर अति प्राचीन कालसे इस अभावनीय नैसर्गिक घटनाको देख लोग नानाप्रकार कल्पना भी लगाते रहे हैं । वैदिक ऋषि उल्काको अग्निका अंश जानते (ऋक् १०।६४।४) और उल्काकी उत्पत्ति भी सूर्यसे मानते थे । "अवक्षिपन्नुल्कामिव द्योः ।" (ऋक् १।१६४।४) देशके प्राचीन ज्योतिर्विद्गोंने इसे अष्ट उपग्रहके मध्य गिना है । उपग्रह देखो । उनका मत इस प्रस्तावके उपसंहारकालमें विवृत होगा । युरोपीय वैज्ञानिक ज्योतिर्विद् बहुत दिनसे उल्का </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> का निगूढ़ तत्त्व समझनेके लिये विस्तर यत्न लगा रहे हैं । किन्तु वस्तुतः वह आज भी उल्काका निगूढ़ तत्त्व विशेष रूपसे ढूंढ़ नहीं सके । जो नाना मत चलते, उनका संक्षिप्त विवरण नीचे लिखते हैं— किसीकी समझमें टूटनेवाले नक्षत्र (Shooting stars), अग्निके गोलक (Fire-balls) उपनक्षत्र (Asteroids) प्रभृति दीप्तिमान् वस्तु ही उल्का हैं । पृथिवीके निकट आनेसे वह हमें देख पड़ते हैं । युरोपके प्राचीन ज्योतिर्विद् कहते, कि वायुमण्डलके ऊर्ध्वभागमें नक्षत्र जैसे कितने ही दीप्तिमान् वस्तु समय समय पर देख पड़ते और गगनमार्गमें द्रुत वेगसे चलते ; फिर शीघ्र अन्धकारमें छिपते हैं ! कभी कभी कतिपय बृहदाकार वस्तु भी दृष्टिगोचर हो जाते हैं । वायुकी गतिसे उनमें विपर्यय पड़ता है । कोई अल्प-परिसर पथमें फिरते फिरते उज्ज्वल आलोक एवं धूम छोड़ता, कोई दो-तीन खण्डमें टूटता और कोई गम्भीर गर्जनके साथ फट कर भूमितलपर गिरता है । उल्का पृथिवीपर नानाप्रकारके आकारमें गिरते देख पड़ी है । कभी बिलकुल मेघ न रहते गम्भीर {{center|'''[ यहाँ उल्का का चित्र है ]'''<br><small>आकाशमें उल्का ।</small>}} गर्जनसे उल्कापात हुआ है । कभी निर्मल आकाश पर अल्प समयके मध्य मेघका अन्धकार चढ़ा और भीषण शब्दके साथ प्रस्तर पड़ा है । कभी आकाशमें सहस्र सहस्र सर्पाकारसे झलक गम्भीर गर्जनके साथ उल्का गिरी है । उल्कामें जो प्रस्तर वा लौह रहता है, वह पार्थिव प्रस्तर वा लौहसे नहीं मिलता ! किसी उल्काके लौहमें सैकड़े पीछे ८६ भाग द्रवणीय लौह होता है । कहीं कहीं धातव लौहका अभाव भी रहता है । लौह देखो । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> rjgm050q721vu5rn6zq8pwdd9h1psxk 665068 665051 2026-07-06T04:52:40Z AMAN KUMAR 6475 चित्र तथा SIC सांचे का प्रयोग 665068 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६२'''|'''उलेटना—उल्का'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> हो नागलोक {{SIC|पहुंच घे|पहुंचे}} थे । वहां उलूपीकी प्रार्थनाके अनुसार उन्होंने विवाह किया । उलूपीने अपनी मनस्कामना सिद्ध होने पर अर्जुनको वर दिया था—तुम समस्त जलचरोंको जीत सकोगे । ( भारत, आदि २१४ अ० ) उसी समय मणिपुरपति अर्जुनपुत्र वभ्रुवाहन पिताके आगमनकी वार्त्ता सुन अभ्यर्थना देने गये । अर्जुनने अपने पुत्रको विना युद्धकी सज्जा आते देख अत्यन्त विरक्त हो विस्तर भर्त्सना बतायी थी । वभ्रुवाहन उससे दुःखित न हुये । किन्तु उलूपीने पास जा उन्हें पितासे लड़नेको भड़काया था । उलूपीकी मायासे वभ्रुवाहनने अर्जुनको मार डाला । फिर उलूपीके दिये दिव्य मणिके प्रभावसे ही वह जिये थे । ( आश्वमेधिक ७८-८० ) कुम्भिरा और त्रिपुराके राजा अपनेको उलूपी और अर्जुनके वंशीय बताते हैं । उलेटना, उलटना देखो । उलेटा, उलटा देखो । उलेड़ना (हिं० क्रि०) उंडेलना, डालना । उलेख (हिं० स्त्री०) १ आह्लाद, खुशी । २ उन्नति, वृद्धि, बाढ़ । (वि०) ३ अविघ्न, बेसमझ । उलैंड़ना, उलेड़ना देखो । उल्का (सं० स्त्री०) ओषति, उष उकारस्य लत्वं क ततः टाप् । मुकवल्कोल्काः । उणा० ४।४२ । १ तेजःपुञ्ज, ज्वाला, खाला, लपट । "उल्का ज्वालादिभावयोः ।" (सुभूति) २ आकाशसे पतित अग्नि, आसमानसे गिरी आग । कितने ही लोग समझते, आकाशसे जो उल्काखण्ड पड़ते, उन्हें टूटा तारा कहते हैं । गणनातीत कालसे इस आकाशमें उत्पात होते आये हैं । फिर अति प्राचीन कालसे इस अभावनीय नैसर्गिक घटनाको देख लोग नानाप्रकार कल्पना भी लगाते रहे हैं । वैदिक ऋषि उल्काको अग्निका अंश जानते (ऋक् १०।६४।४) और उल्काकी उत्पत्ति भी सूर्यसे मानते थे । "अवक्षिपन्नुल्कामिव द्योः ।" (ऋक् १।१६४।४) देशके प्राचीन ज्योतिर्विद्गोंने इसे अष्ट उपग्रहके मध्य गिना है । उपग्रह देखो । उनका मत इस प्रस्तावके उपसंहारकालमें विवृत होगा । युरोपीय वैज्ञानिक ज्योतिर्विद् बहुत दिनसे उल्का </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> का निगूढ़ तत्त्व समझनेके लिये विस्तर यत्न लगा रहे हैं । किन्तु वस्तुतः वह आज भी उल्काका निगूढ़ तत्त्व विशेष रूपसे ढूंढ़ नहीं सके । जो नाना मत चलते, उनका संक्षिप्त विवरण नीचे लिखते हैं— किसीकी समझमें टूटनेवाले नक्षत्र (Shooting stars), अग्निके गोलक ({{SIC|Fire-bello|Fire-balls}}) उपनक्षत्र ({{SIC|Astervids|Asteroids}}) प्रभृति दीप्तिमान् वस्तु ही उल्का हैं । पृथिवीके निकट आनेसे वह हमें देख पड़ते हैं । युरोपके प्राचीन ज्योतिर्विद् कहते, कि वायुमण्डलके ऊर्ध्वभागमें नक्षत्र जैसे कितने ही दीप्तिमान् वस्तु समय समय पर देख पड़ते और गगनमार्गमें द्रुत वेगसे चलते ; फिर शीघ्र अन्धकारमें छिपते हैं ! कभी कभी कतिपय बृहदाकार वस्तु भी दृष्टिगोचर हो जाते हैं । वायुकी गतिसे उनमें विपर्यय पड़ता है । कोई अल्प-परिसर पथमें फिरते फिरते उज्ज्वल आलोक एवं धूम छोड़ता, कोई दो-तीन खण्डमें टूटता और कोई गम्भीर गर्जनके साथ फट कर भूमितलपर गिरता है । उल्का पृथिवीपर नानाप्रकारके आकारमें गिरते देख पड़ी है । कभी बिलकुल मेघ न रहते गम्भीर {{center|'''[[File:Hindi Vishwakosh Vol3 Page362 Ulka.jpg|350px]]'''<br><small>आकाशमें उल्का ।</small>}} गर्जनसे उल्कापात हुआ है । कभी निर्मल आकाश पर अल्प समयके मध्य मेघका अन्धकार चढ़ा और भीषण शब्दके साथ प्रस्तर पड़ा है । कभी आकाशमें सहस्र सहस्र सर्पाकारसे झलक गम्भीर गर्जनके साथ उल्का गिरी है । उल्कामें जो प्रस्तर वा लौह रहता है, वह पार्थिव प्रस्तर वा लौहसे नहीं मिलता ! किसी उल्काके लौहमें सैकड़े पीछे ८६ भाग द्रवणीय लौह होता है । कहीं कहीं धातव लौहका अभाव भी रहता है । लौह देखो । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 5nf22g2lj3997facmv17r0cs9wmn45f पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९४ 250 76098 665055 609172 2026-07-06T03:38:54Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665055 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उल्का'''|'''३६३'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उल्काका प्रस्तर कभी क्षुद्राकार कभी बृहदाकार होता है । मङ्गोलियोंके विश्वासानुसार चीन देशके पश्चिमांशमें पोत नदी किनारे जो ४० फीट उच्च पर्वत खड़ा, वह आकाशसे ही टूटकर पड़ा है । उक्त नाना आकारोंमें गिरनेसे युरोपीयोंने प्रथम उल्का सम्बन्धपर चार प्रकारका अनुमान बांधा था । १म—तरल पदार्थसे जैसे धूम उठता, वैसे ही उल्का-सम्बन्धीय द्रव्य भी अतिशय सूक्ष्म आकारमें पृथिवीसे वायुमण्डलके उच्चस्थ मेघपर जा जुटता और रासायनिक क्रियासे मिलकर अपने गुरुत्वके अनुसार नीचे गिरता है । २य—उल्काके सकल प्रस्तर पहले आग्नेय गिरिसें निकल अपनी गतिके अनुसार आकाशमण्डल पर बहु दूर पर्यन्त चढ़ते और अवशेषमें फिर प्रबल वेगसे पृथिवीपर गिर पड़ते हैं । ३य—किसी किसी समय पर चन्द्रमण्डलके आग्नेय गिरिसें इतने वेगमें धातु निकलता, कि पृथिवीके निकट आ लगता और पृथिवीकी शक्तिसे खिंचकर नीचे गिर पड़ता है । ४र्थ—सकल उल्का उपग्रह हैं । यह सूर्यके चारो ओर अपने अपने कक्षमें घूमती हैं । सकल कक्ष पृथिवीके वार्षिक गतिके पथमें वक्र भावसे उत्तीर्ण होते हैं । कभी पृथिवी इन कक्षोंके समान पड़ जाती है । उस समय कक्षके उल्का नामक उपग्रह पृथिवी पर गिरते अथवा पृथिवीके वायुमण्डलमें घुस आकर्षणकी शक्तिके प्रभावसे अवशेषमें भूमिपर आ पहुंचती हैं । उक्त चारो मतोंपर बहुत दिन तक वादविवाद चला था ! अन्तको प्रसिद्ध युरोपीय ज्योतिर्विद् हरशेल साहबने स्थिर किया—सकल तारकाओंके चारो ओर दृष्टिवहिर्भूत अति क्षुद्र क्षुद्र नीहारिका तारा (Nebulæ)की तरह सूर्यके इधर-उधर भी नीहारिकावत् पदार्थ (Nebulous matter) की राशि घिरी है । उल्काप्रस्तर (Nebuloric stone) और तारापात (Shooting stars) नामसे होनेवाला नैसर्गिक काण्ड नीहारिकावत् पदार्थका विकाश मात्र है ।<br><br>Vol &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 99 </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> जब घटनाके क्रमसे भूमण्डल उक्त पदार्थ-राशिके पास पहुंचता, तब वह पृथिवीके चारो ओर घूर्णनशील चन्द्रवत् (Sattelite) समझ पड़ता और पृथिवीके साथ चन्द्रवत् सूर्यके चारो ओर घूम सकता है । वह सुस्पष्ट होते भी चन्द्रवत् सूर्यकी आलोकसे झलक देखनेमें आ जाता है । अनेक उल्का अतिशय क्षुद्र, कतिपय बृहदाकार हैं । पृथिवी ऐसे अनेक सहचरों या चन्द्रोंसे घिरी है । इनमें एक एक इतना बृहत् और कठिन रहता, कि सुस्पष्ट सूर्यका आलोक झलकता है । यह जब पृथिवीके अतिनिकट आता, तब अल्प समयके लिये चर्मचक्षुसे देखा जाता, फिर पृथिवीकी छाया पड़नेसे सम्पूर्ण ग्रहण हो अपना मुण्ड छिपाता है । उसके बाद पेटिट साहबने गणनासे ठहराया— उल्काओंमें एक बृहदाकार प्रस्तर है । वह द्वितीय चन्द्रवत् पृथिवीके साथ घूमता है । उसका कक्ष भूमध्यसे ५००० मील और भूके मध्यभागसे ८००० मील दूर अथवा चन्द्रसे २४ मील समीप है । वह पृथिवीकी चारो ओर १० घण्टे २० मिनटमें एकवार घूमता, अतः प्रतिदिन सात वार पृथिवीकी परिक्रमा देता है । अपने देशके प्राचीन ज्योतिर्विद् श्रीपतिने कहा है । {{block center|<poem> "यासां गतिर्दिवि भवेद् गणितेन गम्या तास्तारकाः सकलखेचरतोऽति दूरे । तिष्ठन्ति या अनियतोदगतयश्च ताराश्चन्द्राधो हि निवसन्ति तदन्वितास्ताः ॥ शीतांशुवज्जलमयाद्यघनात् स्फुरन्ति ताश्चावहप्रवहमारुतसन्निरुद्धाः । पूर्वानिलैः स्तिमितभावमुपागतोऽग्निर्भाराः पतन्ति कुहचिद् गुरुतावशेन ॥"</poem>}} जिनकी आकाशगति गणितशास्त्रसे समझ पड़ती और जिनकी अवस्थिति समस्त गगनचारी ज्योतिष्कोंसे अति दूर लगती, उन्हें विद्वन्मण्डली तारका कहती है । फिर जिनकी गतिका नियम नहीं रहता, उन्हें ज्योतिर्विद् तारा कहता है । वह पीछे पीछे चल चन्द्रके अधोभागमें ठहरती हैं । उनमें चन्द्रकी तरह जल भरा है । वह सूर्यके किरणसे चमक स्फुरित होती हैं । उनका संस्थान आवह और प्रवह दो मारुतोंके सन्निरुद्धमें है । फिर स्तिमित भाव प्राप्त होते ही वह गुरुत्वके कारण पूर्वपवनसे भूमिके किसी स्थलपर गिर पड़ती हैं । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> rdw174osd609fvet47bikgwbqkf4sc5 665069 665055 2026-07-06T04:55:26Z AMAN KUMAR 6475 SIC साँचे का प्रयोग 665069 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उल्का'''|'''३६३'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उल्काका प्रस्तर कभी क्षुद्राकार कभी बृहदाकार होता है । मङ्गोलियोंके विश्वासानुसार चीन देशके पश्चिमांशमें पोत नदी किनारे जो ४० फीट उच्च पर्वत खड़ा, वह आकाशसे ही टूटकर पड़ा है । उक्त नाना आकारोंमें गिरनेसे {{SIC|युरोपीयोंनि|युरोपीयोंने}} प्रथम उल्का सम्बन्धपर चार प्रकारका अनुमान बांधा था । १म—तरल पदार्थसे जैसे धूम उठता, वैसे ही उल्का-सम्बन्धीय द्रव्य भी अतिशय सूक्ष्म आकारमें पृथिवीसे वायुमण्डलके उच्चस्थ मेघपर जा जुटता और रासायनिक क्रियासे मिलकर अपने गुरुत्वके अनुसार नीचे गिरता है । २य—उल्काके सकल प्रस्तर पहले आग्नेय गिरिसे निकल अपनी गतिके अनुसार आकाशमण्डल पर बहु दूर पर्यन्त चढ़ते और अवशेषमें फिर प्रबल वेगसे पृथिवीपर गिर पड़ते हैं । ३य—किसी किसी समय पर चन्द्रमण्डलके आग्नेय गिरिसे इतने वेगमें धातु निकलता, कि पृथिवीके निकट आ लगता और पृथिवीकी शक्तिसे खिंचकर नीचे गिर पड़ता है । ४र्थ—सकल उल्का उपग्रह हैं । यह सूर्यके चारो ओर अपने अपने कक्षमें घूमती हैं । सकल कक्ष पृथिवीके वार्षिक गतिके पथमें वक्र भावसे {{SIC|उत्तीर्णे|उत्तीर्ण}} होते हैं । कभी पृथिवी इन कक्षोंके समान पड़ जाती है । उस समय कक्षके उल्का नामक उपग्रह पृथिवी पर गिरते अथवा पृथिवीके वायुमण्डलमें घुस आकर्षणकी शक्तिके प्रभावसे अवशेषमें भूमिपर आ पहुंचती हैं । उक्त चारो मतोंपर बहुत दिन तक वादविवाद चला था ! अन्तको प्रसिद्ध युरोपीय ज्योतिर्विद् हरशेल साहबने स्थिर किया—सकल तारकाओंके चारो ओर दृष्टिवहिर्भूत अति क्षुद्र क्षुद्र नीहारिका तारा (Nebulæ)की तरह सूर्यके इधर-उधर भी नीहारिकावत् पदार्थ (Nebulous matter) की राशि घिरी है । उल्काप्रस्तर (Nebuloric stone) और तारापात (Shooting stars) नामसे होनेवाला नैसर्गिक काण्ड नीहारिकावत् पदार्थका विकाश मात्र है ।<br><br>Vol &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 99 </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> जब घटनाके क्रमसे भूमण्डल उक्त पदार्थ-राशिके पास पहुंचता, तब वह पृथिवीके चारो ओर घूर्णनशील चन्द्रवत् ({{SIC|Sattelite|Satellite}}) समझ पड़ता और पृथिवीके साथ चन्द्रवत् सूर्यके चारो ओर घूम सकता है । वह सुस्पष्ट होते भी चन्द्रवत् सूर्यकी आलोकसे झलक 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आकाशगति गणितशास्त्रसे समझ पड़ती और जिनकी अवस्थिति समस्त गगनचारी ज्योतिष्कोंसे अति दूर लगती, उन्हें विद्वन्मण्डली तारका कहती है । फिर जिनकी गतिका नियम नहीं रहता, उन्हें ज्योतिर्विद् तारा कहता है । वह पीछे पीछे चल चन्द्रके अधोभागमें ठहरती हैं । उनमें चन्द्रकी तरह जल भरा है । वह सूर्यके किरणसे चमक स्फुरित होती हैं । उनका संस्थान आवह और प्रवह दो मारुतोंके सन्निरुद्धमें है । फिर स्तिमित भाव प्राप्त होते ही वह गुरुत्वके कारण पूर्वपवनसे भूमिके किसी स्थलपर गिर पड़ती हैं । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> cw6azhzr23f8doi6ki92jzb77d8xfi3 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९५ 250 76099 665056 609173 2026-07-06T03:42:21Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665056 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६४'''|'''उल्काग्नि—उल्ब्य'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> वराहमिहिरके मतानुसार—स्वर्गसे शुभफल भोग जो गिर पड़ते, उन्हींके रूपका नाम उल्का रखते हैं । धिष्ण्या, उल्का, अशनि, विद्युत् और तारा पांच भेद हैं । उल्का तथा धिष्ण्याका पन्द्रह, अशनिका पैंतालीस और विद्युत् एवं ताराका फल कुछ दिनमें मिलता है । ताराका चतुर्थांश, धिष्ण्याका अर्द्धांश और विद्युत्, उल्का एवं अशनिका सम्पूर्ण फल है । अशनिकी आकृति चक्राकार है । वह गम्भीर शब्दके साथ मनुष्य, हस्ती, अश्व, मृग, वृक्ष और जन्तु प्रभृति पर गिरती है । विद्युत् कुटिलाकार एवं विस्तृत रहती और सहसा कड़कड़ाहटके साथ गिर जीवोंका विनाश करती है । धिष्ण्या कृश, अल्पपुच्छविशिष्ट, प्रज्वलित अङ्गार-तुल्य और हस्तद्वय परिमित है । तारा एक हस्त प्रमाण, दीर्घाकृति, एवं शुक्ल अथवा ताम्रवर्ण लगती और आकाशमें ऊर्ध्व-अधः वा वक्र-भावसे चलती है । उल्काका शिरोभाग अधिक विस्तृत रहता और गिरनेसे बढ़ चलता है । पुच्छ कृश एवं आकार दीर्घ है । यह उल्का नानाप्रकारकी होती है । (वृहत्संहिता ३३ अ०) कलकत्तेके अजायब घर (Museum) में अनेक उल्काप्रस्तर रखे हैं । उनके मध्य एक १८६१ ई०की १२ वीं मईको गोरखपुरमें मिला था । उसका वज़न दो मनसे अधिक है । सिवा इसके यशोहर, बांकुड़ा, प्रभृति ज़िलोंसे भी बृहत् बृहत् उल्काके प्रस्तर संग्रह किये गये हैं । उल्काके लौहमें अपर धातु मिलानेसे नानाप्रकारके यन्त्रादि बन सकते हैं । सुनते—ईरानके बादशाह और तिब्बतके लामा उल्काके लोहेसे बनी तलवार रखते हैं । उल्काग्नि (सं० पु०) उल्कैवाग्निः । उल्का, आसमानसे टूटनेवाला तारा । उल्काचक्र (सं० क्ली०) १ छिन्नमन्त्रका शुभाशुभज्ञापक चक्रविशेष । "उल्काचक्रं संप्रवक्ष्ये मन्त्रदोषादिनिर्णयम् ।" (रुद्रयामल) २ विघ्न, गड़बड़ । ३ उपद्रव, हलचल । उल्काजिह्व (सं० पु०) उल्केव जिह्वा यस्य । रामायणोक्त प्रसिद्ध राक्षसविशेष । </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> उल्काधारी (सं० त्रि०) मशालची, फलीतेवाला । उल्कापात (सं० पु०) उल्कानां पातः । १ तामस उत्पात विशेष, आसमानसे तारोंका टूटना । २ विघ्न, बुराई । उल्कामत्स्य (सं० पु०) मत्स्यविशेष, सूस । उल्कामाली (सं० पु०) शिवके एक भृत्य । उल्कामुख (सं० पु०) उल्केव मुखं यस्य । १ प्रेतविशेष । "वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात् स्वकाच्च्युतः ।" (मनु १२।७१) २ इक्ष्वाकुके एक वंशज । उल्कामुखी (सं० स्त्री०) शृगाली विशेष, लोमड़ी । इसका पर्याय शृगालिका, लोमालिका, दीप्तजिह्वा और किखि है । उल्कुषी (सं० स्त्री०) उला दाहेन कुषति, कुष-क-ङीष् । १ उल्का, तारेका टूटना । "अशनिरेव प्रथमोऽनुवाकः ह्रादुनिर्द्वितीय उल्कुषी तृतीयः ।" (शतपथब्रा० ११।२।७।२१) 'उल्कुषी उल्का ।' (सायण) २ मशाल, फलीता । उल्कुषीमान् (वै० पु०) उल्काविशिष्ट, तारेके टूटनेसे सरोकार रखनेवाला । "यक्ष प्रापादि शग्म उल्कुषीमान् ।" (अथर्ववेद ४।१७।४) उलटा, उलटा देखो । उलथा, उलथा देखो । उल्ब (सं० क्ली०) उलू-लोङ् क्षेपणे इति साधुः । उणादयश्च । उण् ४।८५ । १ जरायु । २ गर्भवेष्टनचर्म । ३ गर्भ, हमल । "जातमात्रं विशोध्योल्बादानं सैन्धवसर्पिषा ।" (वाग्भट, उत्तरस्थान १ अ०) "गर्भो जरायुणावृतः उल्बं जहाति जन्मनः ।" (शुक्लयजुः १९।७६) उल्बण (सं० त्रि०) उल्-वण्-अच् पृषोदरादित्वात् साधुः । १ प्रबल, ज़ोरावर । २ उद्धट, अक्खड़ । ३ व्याप्त, भरा हुआ । ४ स्फुट, खिला हुआ । "हेतुर्लक्षणसंसर्गाद्व्याध्यनुल्बणलक्षणानि च ।" (माधवनिदान) ५ तीक्ष्ण, तेज़ । ६ प्रकाशित, ज़ाहिर । ७ निर्बाध, बेखटका । "तस्यासीदुल्बणो मार्गः पादपैरिव दन्तिनः ।" (रघु ४।३३) (क्ली०) ८ शरीरस्थित वात अथवा पित्तके प्रकोपका रोग । (पु०) ९ वशिष्ठके एक पुत्र । उल्ब्य (सं० क्ली०) १ शरीरस्थित वातपित्त वा कफका आधिक्य । २ विपद्, आफ़त । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 827n82hu3i783mz0w59n4qz5l7oybw5 665070 665056 2026-07-06T05:02:54Z AMAN KUMAR 6475 SIC साँचे का प्रयोग 665070 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६४'''|'''उल्काग्नि—उल्ब्य'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> वराहमिहिरके मतानुसार—स्वर्गसे शुभफल भोग जो गिर पड़ते, उन्हींके रूपका नाम उल्का रखते हैं । धिष्ण्या, उल्का, अशनि, विद्युत् और तारा पांच भेद हैं । उल्का तथा धिष्ण्याका पन्द्रह, अशनिका पैंतालीस और विद्युत् एवं ताराका फल कुछ दिनमें मिलता है । ताराका चतुर्थांश, धिष्ण्याका अर्द्धांश और विद्युत्, उल्का एवं अशनिका सम्पूर्ण फल है । अशनिकी आकृति चक्राकार है । वह गम्भीर शब्दके साथ मनुष्य, हस्ती, अश्व, गृह, वृक्ष और जन्तु प्रभृति पर गिरती है । विद्युत् कुटिलाकार एवं विस्तृत रहती और सहसा कड़कड़ाहटके साथ गिर जीवोंका विनाश करती है । धिष्ण्या कृश, अल्पपुच्छविशिष्ट, प्रज्वलित अङ्गार-तुल्य और हस्तद्वय परिमित है । तारा एक हस्त प्रमाण, दीर्घाकृति, एवं शुक्ल अथवा ताम्रवर्ण लगती और आकाशमें ऊर्ध्व-अधः वा वक्र-भावसे चलती है । उल्काका शिरोभाग अधिक विस्तृत रहता और गिरनेसे बढ़ चलता है । पुच्छ कृश एवं आकार दीर्घ है । यह उल्का नानाप्रकारकी होती है । (वृहत्संहिता ३३ अ०) कलकत्तेके अजायब घर (Museum) में अनेक उल्काप्रस्तर रखे हैं । उनके मध्य एक १८६१ ई०की १२ वीं मईको गोरखपुरमें मिला था । उसका वज़न दो मनसे अधिक है । सिवा इसके यशोहर, बांकुड़ा, प्रभृति ज़िलोंसे भी बृहत् बृहत् उल्काके प्रस्तर संग्रह किये गये हैं । उल्काके लौहमें अपर धातु मिलानेसे नानाप्रकारके यन्त्रादि बन सकते हैं । सुनते—ईरानके बादशाह और tiब्बतके लामा उल्काके लोहेसे बनी तलवार रखते हैं । उल्काग्नि (सं० पु०) उल्कैवाग्निः । उल्का, आसमानसे टूटनेवाला तारा । उल्काचक्र (सं० क्ली०) १ छिन्नमन्त्रका शुभाशुभज्ञापक चक्रविशेष । "उल्काचक्रं संप्रवक्ष्ये मन्त्रदोषादिनिर्णयम् ।" (रुद्रयामल) २ विघ्न, गड़बड़ । ३ उपद्रव, हलचल । उल्काजिह्व (सं० पु०) उल्केव जिह्वा यस्य । रामायणोक्त प्रसिद्ध राक्षसविशेष । </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> उल्काधारी ({{SIC|सं० वि०|सं० त्रि०}}) मशालची, फलीतेवाला । उल्कापात (सं० पु०) उल्कानां पातः । १ तामस उत्पात विशेष, आसमानसे तारोंका टूटना । २ विघ्न, बुराई । उल्कामत्स्य (सं० पु०) मत्स्यविशेष, सूस । उल्कामाली (सं० पु०) शिवके एक भृत्य । उल्कामुख (सं० पु०) उल्केव मुखं यस्य । १ प्रेतविशेष । "वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात् स्वकाच्च्युतः ।" (मनु १२।७१) २ इक्ष्वाकुके एक वंशज । उल्कामुखी (सं० स्त्री०) शृगाली विशेष, लोमड़ी । इसका पर्याय शृगालिका, लोमालिका, दीप्तजिह्वा और किखि है । उल्कुषी (सं० स्त्री०) उला दाहेन कुषति, कुष-क-ङीष् । १ उल्का, तारेका टूटना । "अशनिरेव प्रथमोऽनुवाकः ह्रादुनिर्द्वितीय उल्कुषी तृतीयः ।" (शतपथब्रा० ११।२।७।२१) 'उल्कुषी उल्का ।' (सायण) २ मशाल, फलीता । उल्कुषीमान् ({{SIC|दै० पु०|वै० पु०}}) उल्काविशिष्ट, तारेके {{SIC|टटनेसे|टूटनेसे}} सरोकार रखनेवाला । "भवेद्यत्र {{SIC|यव|यत्र}} प्रापादि शग्म उल्कुषीमान् ।" (अथर्ववेद ४।१७।४) उलटा, उलटा देखो । उलथा, उलथा देखो । उल्ब (सं० क्ली०) उत्-लोङ् क्षेपणे इति साधुः । उणादयश्च । उण् ४।८५ । १ जरायु । २ गर्भवेष्टनचर्म । ३ गर्भ, हमल । "जातमात्रं विशोध्योल्बादानं सैन्धवसर्पिषा ।" (वाग्भट, उत्तरस्थान १ अ०) "गर्भो जरायुणावृतः उल्बं जहाति जन्मनः ।" (शुक्लयजुः १९।७६) उल्बण (सं० त्रि०) उत्-वण्-अच् पृषोदरादित्वात् साधुः । १ प्रबल, ज़ोरावर । २ उद्धट, अक्खड़ । ३ व्याप्त, भरा हुआ । ४ स्फुट, खिला हुआ । "हेतुर्लक्षणसंसर्गाद्व्याध्यनुल्बणलक्षणानि च ।" (माधवनिदान) ५ तीक्ष्ण, तेज़ । ६ प्रकाशित, ज़ाहिर । ७ निर्बाध, बेखटका । "तस्यासीदुल्बणो मार्गः पादपैरिव दन्तिनः ।" (रघु ४।३३) (क्ली०) ८ शरीरस्थित वात अथवा पित्तके प्रकोपका रोग । (पु०) ९ वशिष्ठके एक पुत्र । उल्ब्य (सं० क्ली०) १ शरीरस्थित वातपित्त वा कफका आधिक्य । २ वियद्, आफ़त । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> go8zwjou50vrcs3l4mv13fsob7uobst पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९६ 250 76100 665057 609174 2026-07-06T03:46:11Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665057 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उल्मुक—उल्लाप्य'''|'''३६५'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उल्मुक (सं० क्ली०) ओषतीति, उषदाहे उल्मुकदर्वीति निपातनात् यस्य लः मुक् प्रत्ययश्च । १ ज्वलदङ्गार, जलती हुई लकड़ी या कोयला । "अन्वाहार्यपचनादुल्मुकमादाय ।" (शतपथब्रा० ६।२।७) २ वृष्णिवंशीय एक राजा । (भारत, सभा ३८।१६) ३ बलरामके एक पुत्र । उल्मुक्य (सं० पु०) उल्मुके भवं यत् । १ अग्नि, आग । "अथ हैक उल्मुक्येम दहन्ति ।" (शतपथब्रा० १२।५।१।१६) (त्रि०) २ अङ्गार-सम्बन्धीय, जलती लकड़ीसे सरोकार रखनेवाला । उल्लङ्कसन (सं० क्ली०) रोमाञ्च, रोंगटोंका खड़ा होना । उल्लग्न (सं० पु०) किसी स्थानविशेषका लग्न । उल्लङ्घन (सं० क्ली०) उत्-लघि-ल्युट् । अतिक्रमण, लंघाई, पार जवाई । उल्लङ्घना, उल्लंघना देखो । उल्लङ्घनीय (सं० त्रि०) अतिक्रमणयोग्य, जो लांघा जानेके काबिल हो । उल्लङ्घित (सं० त्रि०) अतिक्रमण किया हुआ, जो लांघा गया हो । उल्लङ्घितशासन (सं० त्रि०) आज्ञा न माननेवाला, नाफ़रमांबरदार, बलवाई । उल्लङ्घिताध्वन् (सं० त्रि०) मार्गके ऊपरसे गुज़रा हुआ, जो राह पार कर चुका हो । उल्लङ्घ्य (सं० त्रि०) उत्-लघि-यत् । उल्लङ्घनके योग्य, लांघने लायक । उल्लम्फन (सं० क्ली०) उत्-रम्फ-ल्युट् । कूद-फांद, उछाल । उल्लम्बित (सं० त्रि०) दण्डायमान, सीधा, खड़ा । उल्लल (सं० त्रि०) उत्-लल्-अच् । १ बहुलोम-युक्त, मोटे बालोंसे ढका हुआ । २ कम्पायमान, हिलता हुआ, जो कांप रहा हो । उल्ललत् (सं० त्रि०) १ कम्पायमान, हिलता हुआ । २ अनियमित रूपसे चलायमान, जो बेक़ायदे सरक रहा हो । उल्ललित (सं० त्रि०) उत्-लल-क्त । १ उचलित, जो चल चुका हो । २ तरलित, बहता हुआ । ३ कम्पित, कांपनेवाला । उल्लस (सं० त्रि०) १ प्रकाशमान, चमकीला । २ प्रसन्न, </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> खुश । २ वहिर्गमन करनेवाला, जो निकल रहा हो । उल्लसत् (सं० त्रि०) १ क्रीड़ा-वा नृत्य करनेवाला, जो नाचकूद रहा हो । २ दीप्त, चमकीला । ३ स्वेच्छाचारी, मनमौजी । उल्लसता (सं० स्त्री०) १ दीप्ति, चमक । २ प्रसन्नता, खुशी । उल्लसन (सं० क्ली०) उत्-लस-ल्युट् । १ हर्षजनक व्यापार, खुशी पैदा करनेवाला काम । २ रोमाञ्च, रोंगटोंका खड़ा होना । उल्लसनक, उल्लसन देखो । उल्लसित (सं० त्रि०) उत्-लस्-क्त । १ स्फुरित, फड़कने वाला । २ उद्गत, उठा हुआ । ३ आनन्दित, खुश । उल्लसित-हरिण-केतन (सं० त्रि०) जिसके हरिणका झण्डा फहराये । उल्लाघ (सं० त्रि०) उत्-लाघ-क्त निपातनात् । १ नीरोग, जिसके कोई बीमारी न रहे । २ दक्ष, होशियार । ३ शुचि, पाक-साफ़ । ४ हृष्ट, मज़बूत । (पु०) ५ मरिच, मिर्च । उल्लाप (सं० पु०) उत्-लप्-घञ् । १ शोक, अफ़सोस । "उल्लापास्ताः सोढाः कथमपि तदाराधनपरैः ।" (भर्त्तृहरि ३।६) २ उच्चैःस्वरके साथ आह्वान, ज़ोरकी पुकार । उल्लापक, उल्लापिक देखो । उल्लापन (सं० क्ली०) उत्-लप्-णिच्-ल्युट् । १ वृत्ति प्रभृति द्वारा शास्त्रकी प्रकृत व्याख्याका करना, समझा समझा कर कहना । २ खुशामदी बातें, ठकुरसोहाती । उल्लापिक (सं० त्रि०) वर्णन करनेवाला, जो खुशामदकी बातें कहता हो । उल्लापिन् (सं० त्रि०) आह्वान करनेवाला, जो ज़ोरसे पुकार रहा हो । उल्लाप्य (सं० क्ली०) उत्-लप्-णिच्-यत् । प्रेम एवं हास्यविषयक नाटकविशेष । यह स्वर्गीय घटनापर बनता है । सङ्ग्रामका ही वर्णन अधिकांश होता है । हास्य, करुणा प्रभृति रस और सङ्गीतसे उल्लाप्य भरा रहता है । नायक उदात्त गुणविशिष्ट होता है । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 69ckzr0hg69c6llcvi7yfekgkz883hr 665071 665057 2026-07-06T05:08:36Z AMAN KUMAR 6475 SIC साँचे का प्रयोग 665071 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उल्मुक—उल्लाप्य'''|'''३६५'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उल्मुक (सं० क्ली०) ओषतीति, उषदाहे उल्मुकदर्वीति निपातनात् यस्य लः मुक् प्रत्ययश्च । १ ज्वलदङ्गार, जलती हुई लकड़ी या कोयला । "अन्वाहार्यपचनादुल्मुकमादाय ।" (शतपथब्रा० ६।२।७) २ वृष्णिवंशीय एक राजा । {{SIC|भारत, सभा ३८।१६ )|(भारत, सभा ३८।१६)}} ३ बलरामके एक पुत्र । उल्मुक्य (सं० पु०) उल्मुके भवं यत् । १ अग्नि, आग । "अथ हैक उल्मुक्येम दहन्ति ।" (शतपथब्रा० १२।५।१।१६) (त्रि०) २ अङ्गार-सम्बन्धीय, जलती लकड़ीसे सरोकार रखनेवाला । उल्लङ्कसन (सं० क्ली०) रोमाञ्च, रोंगटोंका खड़ा होना । उल्लग्न (सं० पु०) किसी स्थानविशेषका लग्न । उल्लङ्घन (सं० क्ली०) उत्-लघि-ल्युट् । अतिक्रमण, लंघाई, पार जवाई । उल्लङ्घना, उल्लंघना देखो । उल्लङ्घनीय (सं० त्रि०) अतिक्रमणयोग्य, जो लांघा जानेके काबिल हो । उल्लङ्घित (सं० त्रि०) अतिक्रमण किया हुआ, जो लांघा गया हो । उल्लङ्घितशासन (सं० त्रि०) आज्ञा न माननेवाला, नाफ़रमांबरदार, बलवाई । उल्लङ्घिताध्वन् (सं० त्रि०) मार्गके ऊपरसे गुज़रा हुआ, जो राह पार कर चुका हो । उल्लङ्घ्य (सं० त्रि०) उत्-लघि-यत् । उल्लङ्घनके योग्य, लांघने लायक । उल्लम्फन (सं० क्ली०) उत्-रम्फ-ल्युट् । कूद-फांद, उछाल । उल्लम्बित (सं० त्रि०) दण्डायमान, सीधा, खड़ा । उल्लल (सं० त्रि०) उत्-लल्-अच् । १ बहुलोम-युक्त, मोटे बालोंसे ढका हुआ । २ कम्पायमान, हिलता हुआ, जो कांप रहा हो । उल्ललत् (सं० त्रि०) १ कम्पायमान, हिलता हुआ । २ अनियमित रूपसे चलायमान, जो बेक़ायदे सरक रहा हो । उल्ललित (सं० त्रि०) उत्-लल-क्त । १ {{SIC|उचलित|उच्चलित}}, जो चल चुका हो । २ तरलित, बहता हुआ । ३ कम्पित, कांपनेवाला । उल्लस (सं० त्रि०) १ प्रकाशमान, चमकीला । २ प्रसन्न, </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> खुश । {{SIC|२|३}} वहिर्गमन करनेवाला, जो निकल रहा हो । उल्लसत् (सं० त्रि०) १ क्रीड़ा-वा नृत्य करनेवाला, जो नाचकूद रहा हो । २ दीप्त, चमकीला । ३ स्वेच्छाचारी, मनमौजी । उल्लसता (सं० स्त्री०) १ दीप्ति, चमक । २ प्रसन्नता, खुशी । उल्लसन (सं० क्ली०) उत्-लस-ल्युट् । १ हर्षजनक व्यापार, खुशी पैदा करनेवाला काम । २ रोमाञ्च, रोंगटोंका खड़ा होना । उल्लसनक, उल्लसन देखो । उल्लसित (सं० त्रि०) उत्-लस्-क्त । १ स्फुरित, फड़कने वाला । २ उद्गत, उठा हुआ । ३ आनन्दित, खुश । उल्लसित-हरिण-केतन (सं० त्रि०) जिसके हरिणका झण्डा फहराये । उल्लाघ (सं० त्रि०) उत्-लाघ-क्त निपातनात् । १ नीरोग, जिसके कोई बीमारी न रहे । २ दक्ष, होशियार । ३ शुचि, पाक-साफ़ । ४ हृष्ट, मज़बूत । (पु०) ५ मरिच, मिर्च । उल्लाप (सं० पु०) उत्-लप्-घञ् । १ शोक, अफ़सोस । "{{SIC|उल्लापापाः|उल्लापास्ताः}} सोढाः कथमपि तदाराधनपरैः ।" (भर्त्तृहरि ३।६) २ उच्चैःस्वरके साथ आह्वान, ज़ोरकी पुकार । उल्लापक, उल्लापिक देखो । उल्लापन (सं० क्ली०) उत्-लप्-णिच्-ल्युट् । १ वृत्ति प्रभृति द्वारा शास्त्रकी प्रकृत व्याख्याका करना, समझा समझा कर कहना । २ खुशामदी बातें, ठकुरसोहाती । उल्लापिक (सं० त्रि०) वर्णन करनेवाला, जो खुशामदकी बातें कहता हो । उल्लापिन् (सं० त्रि०) आह्वान करनेवाला, जो ज़ोरसे पुकार रहा हो । उल्लाप्य (सं० क्ली०) उत्-लप्-णिच्-यत् । प्रेम एवं हास्यविषयक नाटकविशेष । यह स्वर्गीय घटनापर बनता है । सङ्ग्रामका ही वर्णन अधिकांश होता है । हास्य, करुणा प्रभृति रस और सङ्गीतसे उल्लाप्य भरा रहता है । नायक उदात्त गुणविशिष्ट होता है । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 6zo0ym7t9iebq1kblqe0aauyj5qsn3h पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९७ 250 76101 665076 609175 2026-07-06T06:02:29Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665076 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६६'''|'''उल्लाल—उल्लेख'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> किन्तु अङ्क एक ही लगता है । किसी-किसीके कथनानुसार उल्लाप्यमें तीन अङ्क और इक्कीस शिल्पकाङ्ग पड़ते हैं । उल्लासके मध्य 'देवीमहादेव' नामक संस्कृत ग्रन्थ प्रसिद्ध है । उल्लाल (सं० पु०) छन्दोविशेष । इसके प्रथम एवं तृतीयमें पन्द्रह और द्वितीय तथा चतुर्थ पादमें तेरह मात्रा लगती हैं । उल्लाला (हिं० पु०) छन्दोविशेष । इसके हरएक चरणमें केवल तेरह मात्रा लगती हैं । उल्लास (सं० पु०) उत्-लस्-घञ् । १ ग्रन्थ विशेषका परिच्छेद, किसी किताबका बाब । २ आह्लाद, खुशी । ३ प्रकाश, रोशनी । "सौहित्यवचनोल्लासहासप्रलिभादिकृत ।" (साहित्यदर्पण) ४ उद्गमन, उठान । "नभोविलङ्घिभिः सेनारजोराशिभिरुद्धतैः । सपक्षभूभृदुल्लासमद्धा कुर्वन् शतक्रतोः ॥" (कथासरित् १४।१८) ५ {{SIC|उज्वलता|उज्ज्वलता}}, सफ़ेदी । ६ वृद्धि, बढ़ती । ७ काव्यालङ्कार विशेष । इसमें उपमा वा उपरोधसे किसी विषयको प्रधान बनाते हैं । उल्लासक (सं० त्रि०) आह्लादकारी, जो मज़ा करता हो । उल्लासन (सं० क्ली०) १ नचाने या कुदानेका काम । २ दीप्ति, चमक । उल्लासित (सं० त्रि०) आह्लादित, खुश, जो फूला न समाया हो । उल्लासी (सं० त्रि०) उत्-लस्-णिनि । १ उल्लासयुक्त, खुशी मनानेवाला । २ प्रभावविशिष्ट, चमकदार । ३ आह्लादित, खुश । उल्लिखत् (सं० त्रि०) १ उत्कीर्ण करनेवाला, जो खींच या घसीट रहा हो । २ रेखा खींचनेवाला, जो लकीर निकाल रहा हो । ३ चित्रकारी करनेवाला, जो मुसव्वरी कर रहा हो । ४ वहन करनेवाला, जो उठा रहा हो । उल्लिखित (सं० त्रि०) उत्-लिख-क्त । १ उत्कीर्ण, खुदा हुआ । २ तनुक्कृत, बारीक किया हुआ । "भद्रे वपुर्नोल्लिखितं विभाति ।" (रघु १६।३२) </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> ३ चित्रित, रंगा हुआ । ४ उत्तोलित, उठाया हुआ । ५ पूर्व कहा हुआ, जो पहले बताया जा चुका हो । उल्लिङ्गित (सं० त्रि०) परिचित, पहचाना हुआ, जो समझा जा चुका हो । उल्ली (सं० स्त्री०) पलाण्डु, प्याज़ । उल्लु (सं० त्रि०) उत्-लु-क्विप् । उत्पाटनकारी, उखाड़ डालनेवाला । उल्लुञ्चन (सं० क्ली०) उत्-लुञ्चि-ल्युट् । १ केशोत्पाटन, बालोंको नोच खसोट । २ उन्मूलन, उखाड़ । "पादकेशाग्रककरोल्लुञ्चने च पणान् दश ।" (याज्ञवल्क्य २।२१७) ३ केशकर्त्तन, बालकी कटाई । उल्लुण्डन (सं० क्ली०) उत्-लुठि-ल्युट् । निज अभिप्राय छिपा अन्य प्रकारसे मनोभावका प्रकाश, अपना मतलब छिपा दूसरी तरहसे दिलकी हालतका इज़हार । उल्लुण्ढा (सं० स्त्री०) व्याजस्तुति, बोली-ठोली । उल्लू (सं० त्रि०) १ कर्त्तन करनेवाला, जो काट डालता हो । (हिं० पु०) २ उलूक, घुग्घू । यह पक्षी दिनमें अंधा रहता है । वर्ण धूसर है । शिर वर्त्तुल तथा चञ्चु प्रदीप्त रहता है । उल्लू कई तरहका होता है । किसीके शिर पर शिखा उठी रहती है । फिर किसीके पच्छ पदकी अङ्‌गुलितक पहुंचते हैं । उच्चता ५ इञ्चसे २ फीट पर्यन्त है । चञ्चु कुटिल रहती है । किसीके पच्छ कर्णके समीप ऊपर चढ़ जाते हैं । पच्छ मृदु, किन्तु पद कठोर होते हैं । उल्लू दिनको गुप्त रहता और रात्रिको देख पड़ता है । यह मांसाशी पक्षी है । कीटपतङ्गादिसे अपना जीवन निर्वाह करता है । शब्द बड़ा भयानक है ! उल्लू प्रायः निर्जन स्थानमें निवास करता है । भारतमें इसका शब्द तथा ग्राममें वास अशुभ माना गया है । मांससे उच्चाटनादि प्रयोग किया करते हैं । पृथिवी पर किसी जातिके लोग इसे भक्ष्य नहीं बताते । इसका मांस पित्तल, भ्रान्तिकारक और वातप्रकोपन होता है । ३ मूर्ख, बेसमझ । उल्लेख (सं० पु०) उत्-लिख-घञ् । १ कथन, कहाई । २ खनन, खोदाई । ३ अलङ्कारविशेष । "क्वचिद् भेदाद्ग्रहीतृणां विषयाणां तथा क्वचित् । एकस्यानेकधोल्लेखो यः स उल्लेख उच्यते ।" (साहित्यदर्पण १०म परि०) </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> sveygpeulj4ax11klzcciqbop46xc6l पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९८ 250 76102 665080 609176 2026-07-06T06:09:05Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665080 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उल्लेखन—उशीक्'''|'''३६७'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> अनुभावक और विषयके भेदानुसार एक वस्तुका बहुप्रकार वर्णन आनेसे उल्लेखालङ्कार होता है । ४ वर्णन, बयान । उल्लेखन (सं० क्ली०) १ वमन, कै । २ खनन, खोदाई । "सम्मार्जनोपाञ्जनेन सेकेनोल्लेखनेन च ।<br>गवाञ्च परिवासेन भूमिः शुद्ध्यति पञ्चभिः ॥" (मनु ५।१२४) ३ उच्चारण, तलफ़्फ़ुज़ । "{{SIC|मासपचतिथीनाञ्च|मासपक्षतिथीनाञ्च}} निमित्तानाञ्च सर्वशः ।<br>उल्लेखनन्नकुर्वाणो न तस्य फलभाग् भवेत् ॥" (तिथ्यादितत्त्व) ४ कीर्त्तन, गवाई । ५ निर्देश, देखाई । ६ चित्रकारी, मुसव्वरी । उल्लेखनीय (सं० त्रि०) उल्लेख्य देखो । उल्लेख्य (सं० त्रि०) उत्-लिख-यत् । उल्लेखके योग्य, लिखने लायक । "तदेतत् सिद्धये मन्त्रं दारीशे ल्लक्षं ददामि ते ।" (कथासरित्) उल्लोच (सं० पु०) ऊर्ध्वं लोच्यते, अथवा ऊर्ध्वं लोचति, उत्-लोच-घञ् । चन्द्रातप, तम्बू, चंदोवा । उल्लोप्य (सं० क्ली०) उत्-लुप-यत् । गीतविशेष, एक गाना । उल्लोल (सं० पु०) {{SIC|उल्लोलोति|उल्लोलति}}, उत्-लोल-णिच्-अच् । बृहत्तरङ्ग, बड़ी लहर । उल्ब, उल्ब देखो । उल्बण, उल्बण देखो । उवट—प्रसिद्ध वेदभाष्यकार । इन्होंने शुक्लयजुर्वेदकी काण्वशाखाका भाष्य और ऋग्वेदीय 'शौनकप्रातिशाख्यभाष्य' नामक ग्रन्थ बनाया है । यजुर्वेदभाष्य पढ़नेसे समझते हैं कि उवट वज्रटके पुत्र और आनन्दपुरके अधिवासी थे । यथा— "आनन्दपुरवास्तव्यवज्रटाख्यस्य सूनुना ।<br>मन्त्रभाष्यमिदं कृतञ्च पदवाक्यैः सुनिश्चितैः ॥" किसीके मतानुसार ई० एकादश शताब्दीमें भोजराजके समय यह अवन्तिनगरमें विद्यमान रहे । भविष्यभक्तिमाहात्म्य नामक संस्कृत ग्रन्थमें लिखते हैं कि उवट काश्मीर देशमें रहते और मम्मट तथा कैयटके समसामयिक थे ।<br><br>Vol &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 100 </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> "उवटो मम्मटश्चैव कैयटश्चेति ते त्रयः ।<br>कैयटो भाष्यटीकाकृदुवटो वेदभाष्यकृत् ॥" (भक्तिमा० ३१८ पृ०) सुननेमें आया है कि ऋग्वेदीय शौनकप्रातिशाख्यभाष्य लिखने बाद उवटने ऋग्भाष्य बनाया था । उवना (हिं० क्रि०) उदित होना, निकल आना । उवनि (हिं० स्त्री०) उदय, उठान, निकास । उशङ्कव (सं० पु०) नृपतिविशेष, एक राजा । उशत् (सं० त्रि०) वश-शतृ । आकाङ्क्षाकारी, ख्वाहिशमन्द, चाहनेवाला । उशती (सं० स्त्री०) वश-शतृ-ङीप् सम्प्रसारणम् । १ आकाङ्क्षिणी, चाहनेवाली । २ अमङ्गलवाक्य, बुरी बात । उशधक् (वै० त्रि०) अभिलाष रखने और दहन करने वाला । (सायण) उशना (वै० अव्य०) अभिलाषसे, खुशीमें, जल्द । उशनाः (सं० पु०) वश कान्तौ कनसि ऋह्यादित्वात् सम्प्रसारणम् । वशेः कनसिः । उण् ४।२३७ । दैत्यगुरु शुक्राचार्य । "उशनाचोशनसः पुत्रस्तस्यासीत्सुतराजकः ।" (भारत, आदि) शुक्र देखो । उशवा (अं० पु०) वृक्ष विशेष, एक पेड़ । इसका मूल रक्तशोधक है । खून बिगड़नेसे प्रायः लोग उशवा पीते हैं । उशाना (वै० स्त्री०) वश-चानश् । ताच्छील्यावयोवचनशक्तिषु चानश् । पा ३।२।१२८ । पर्वतजात यज्ञीय ओषधिविशेष, होममें लगनेवाली एक पहाड़ी बूटी । "तदेयोशाना नामौषधिर्जायते ।" (शतपथब्रा० ४।४।१।३) उशिक् (सं० त्रि०) उश्यते, वश-इजिः-कित् । वशः कत् । उण् २।७१ । १ कमनीय, चाहा जाने काबिल, उम्दा । २ मेधावी, होशियार । (निघण्टु ३।१५) (पु०) ३ अग्नि, आग । ४ घृत, घी । (स्त्री०) ५ {{SIC|कच्चिवान्की|कक्षीवान्की}} माता । उशित (सं० त्रि०) अभिलषित, चाहा हुआ । उशी (सं० स्त्री०) वश-ई सम्प्रसारणम् । अभिलाष, ख्वाहिश । उशीक्, उशिक् देखो । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> g3n2caclocvdup5apr5hfo7bzs31nac 665083 665080 2026-07-06T06:12:25Z AMAN KUMAR 6475 श्लोकों की संरचना सुंदर और मानक बनाया 665083 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उल्लेखन—उशीक्'''|'''३६७'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> अनुभावक और विषयके भेदानुसार एक वस्तुका बहुप्रकार वर्णन आनेसे उल्लेखालङ्कार होता है । ४ वर्णन, बयान । उल्लेखन (सं० क्ली०) १ वमन, कै । २ खनन, खोदाई । {{block center|<poem> "सम्मार्जनोपाञ्जनेन सेकेनोल्लेखनेन च । गवाञ्च परिवासेन भूमिः शुद्ध्यति पञ्चभिः ॥" (मनु ५।१२४) </poem>}} ३ उच्चारण, तलफ़्फ़ुज़ । {{block center|<poem> "{{SIC|मासपचतिथीनाञ्च|मासपक्षतिथीनाञ्च}} निमित्तानाञ्च सर्वशः । उल्लेखनन्नकुर्वाणो न तस्य फलभाग् भवेत् ॥" (तिथ्यादितत्त्व) </poem>}} ४ कीर्त्तन, गवाई । ५ निर्देश, देखाई । ६ चित्रकारी, मुसव्वरी । उल्लेखनीय (सं० त्रि०) उल्लेख्य देखो । उल्लेख्य (सं० त्रि०) उत्-लिख-यत् । उल्लेखके योग्य, लिखने लायक । "तदेतत् सिद्धये मन्त्रं दारीशे ल्लक्षं ददामि ते ।" (कथासरित्) उल्लोच (सं० पु०) ऊर्ध्वं लोच्यते, अथवा ऊर्ध्वं लोचति, उत्-लोच-घञ् । चन्द्रातप, तम्बू, चंदोवा । उल्लोप्य (सं० क्ली०) उत्-लुप-यत् । गीतविशेष, एक गाना । उल्लोल (सं० पु०) {{SIC|उल्लोलोति|उल्लोलति}}, उत्-लोल-णिच्-अच् । बृहत्तरङ्ग, बड़ी लहर । उल्ब, उल्ब देखो । उल्बण, उल्बण देखो । उवट—प्रसिद्ध वेदभाष्यकार । इन्होंने शुक्लयजुर्वेदकी काण्वशाखाका भाष्य और ऋग्वेदीय 'शौनकप्रातिशाख्यभाष्य' नामक ग्रन्थ बनाया है । यजुर्वेदभाष्य पढ़नेसे समझते हैं कि उवट वज्रटके पुत्र और आनन्दपुरके अधिवासी थे । यथा— {{block center|<poem> "आनन्दपुरवास्तव्यवज्रटाख्यस्य सूनुना । मन्त्रभाष्यमिदं कृतञ्च पदवाक्यैः सुनिश्चितैः ॥" </poem>}} किसीके मतानुसार ई० एकादश शताब्दीमें भोजराजके समय यह अवन्तिनगरमें विद्यमान रहे । भविष्यभक्तिमाहात्म्य नामक संस्कृत ग्रन्थमें लिखते हैं कि उवट काश्मीर देशमें रहते और मम्मट तथा कैयटके समसामयिक थे ।<br><br>Vol &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 100 </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> {{block center|<poem> "उवटो मम्मटश्चैव कैयटश्चेति ते त्रयः । कैयटो भाष्यटीकाकृदुवटो वेदभाष्यकृत् ॥" (भक्तिमा० ३१८ पृ०) </poem>}} सुननेमें आया है कि ऋग्वेदीय शौनकप्रातिशाख्यभाष्य लिखने बाद उवटने ऋग्भाष्य बनाया था । उवना (हिं० क्रि०) उदित होना, निकल आना । उवनि (हिं० स्त्री०) उदय, उठान, निकास । उशङ्कव (सं० पु०) नृपतिविशेष, एक राजा । उशत् (सं० त्रि०) वश-शतृ । आकाङ्क्षाकारी, ख्वाहिशमन्द, चाहनेवाला । उशती (सं० स्त्री०) वश-शतृ-ङीप् सम्प्रसारणम् । १ आकाङ्क्षिणी, चाहनेवाली । २ अमङ्गलवाक्य, बुरी बात । उशधक् (वै० त्रि०) अभिलाष रखने और दहन करने वाला । (सायण) उशना (वै० अव्य०) अभिलाषसे, खुशीमें, जल्द । उशनाः (सं० पु०) वश कान्तौ कनसि ऋह्यादित्वात् सम्प्रसारणम् । वशेः कनसिः । उण् ४।२३७ । दैत्यगुरु शुक्राचार्य । "उशनाचोशनसः पुत्रस्तस्यासीत्सुतराजकः ।" (भारत, आदि) शुक्र देखो । उशवा (अं० पु०) वृक्ष विशेष, एक पेड़ । इसका मूल रक्तशोधक है । खून बिगड़नेसे प्रायः लोग उशवा पीते हैं । उशाना (वै० स्त्री०) वश-चानश् । ताच्छील्यावयोवचनशक्तिषु चानश् । पा ३।२।१२८ । पर्वतजात यज्ञीय ओषधिविशेष, होममें लगनेवाली एक पहाड़ी बूटी । "तदेयोशाना नामौषधिर्जायते ।" (शतपथब्रा० ४।४।१।३) उशिक् (सं० त्रि०) उश्यते, वश-इजिः-कित् । वशः कत् । उण् २।७१ । १ कमनीय, चाहा जाने काबिल, उम्दा । २ मेधावी, होशियार । (निघण्टु ३।१५) (पु०) ३ अग्नि, आग । ४ घृत, घी । (स्त्री०) ५ {{SIC|कच्चिवान्की|कक्षीवान्की}} माता । उशित (सं० त्रि०) अभिलषित, चाहा हुआ । उशी (सं० स्त्री०) वश-ई सम्प्रसारणम् । अभिलाष, ख्वाहिश । उशीक्, उशिक् देखो । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> hofxr85c2uuyy4pwidujeawp41ildds पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६४१ 250 76157 665072 609381 2026-07-06T05:34:01Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 665072 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६४०|कट कवल्लो-कट ता|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} बबई, गन्धहण, महागन्धरण, राजिका, जंगली बबई, कासमर्द, वनतुलसी, विडङ्ग, कट फल, खेत निसिन्धु, नील निसिन्धु, कुकुरमुत्ते, इन्दुरकर्णी, पाना, ब्राह्मण-यष्ठिका, काकज, काकासा, महानिम्ब ) और सालसारादिगण (साल, पियासाल, खदिर, खेतखदिर,विट खदिर, सुपारी, भूर्जपत्र, मेषशृङ्गो, निन्दुक,चन्दन, रक्तचन्दन, शिशु, शिरीष, बक, धव, अजुन,ताल, करन, छोटे करत, कृष्णागुरु, अगुरु, लता-शास)को कट कवर्ग कहते हैं। कटुकवली (सं० स्त्री०) कट का चासौ वन्नी चेति,कर्मधाः। कटी नाम लताविशेष, कड़वी लौकीकी बेल। यह कटु, शीत एवं रुच्य पाती और कफ,स्वास, तथा राजयक्ष्माको मिटाती है। <Small>(राजनिघण्ट)</small> कट कशर्करा (सं० स्त्री०) पित्तश्लेष्म ज्वर पर एक योग। इसमें एक-एक तोचे कट रोहिणी और शर्करा पडती है। कटुकस्नेह (सं० पु०) सर्षपवृक्ष, सरसोंका पेड़। कटुका (सं० स्त्री०) कटु संज्ञायां कन्-टाप् । १ कटुकी, कुटकी। इसका संस्कृत पर्याय-जननी, सिला,रोहियो, तितरोहिणी, चक्राङ्गी, मत्स्य पित्ता, वकुला,शकुलादनी, सादनी, शतपर्वा, विजाङ्गी, मलभेदिनी,अशोकरीहिणी, कृष्णा, कृष्णभेदी, महौषधी, कटी,अचनी, काण्डकहा, कटु, कटु रोहिणी, कटुक-रोहियो, केदारकदुका, अरिष्टा, पामनी, कटम्बरा,कचुम्भरा और अशोका है। राजवल्लभके मतमें कटुका अति-कट, तिक्त एवं शीतल और पित्त, रक्ता, दाह,कफ, परचि, खास तथा ज्वरनाशक है। २ ताम्बूली, पान। ३ कुलिकक्ष। ४ राजसषेप, राई । ५ कटु-तुम्बी, कड़वी लौकी। कटु काख्या (सं० स्त्री०) कटुकी, कटकी। कटु काद्यलौह ( सं० लो०) शोथके अधिकारका एक वैद्यकोक्त औषध, सूजनको एक दवा। यह कटुकी, विकट, दन्ती, विड़ा, त्रिफला, चित्रक, देव-दाक, त्रिवित् और गजपिप्पली बराबर द्विगुण लौहमें मिलान से बनता है। दुग्धके साथ इसे सेवन करनेपर गोधरीम विनष्ट होता है। <Small>(रसरबाकर)</small> {{Multicol-break}} कटु काटव्य (स को०) कट च तत् काटव्यञ्चेति, कर्मधा०। १ अत्यन्त कर्कश वाक्य, निहायत कड़ी बात। २ गालीगलौज। कट कापाली (सं० स्त्री०) कण्टकपाली वृक्ष, एक पेड़। कट कारोहिणी (सं० स्त्री०) कट की, कुटकी । कट कालाबु (सं० स्त्री०) कट कश्चासौ अलावुश्चेति, कर्मधा। तिक्ततुम्बी, कड़वी लीकी । कट को (सं० स्त्री०) कट खार्थे कन्-डोष् । कटुका,कटुकी । कटुकीग्राम-विहारप्रान्तके चम्पारन जिलेका एक प्राचीन ग्राम। <Small>(भविष्य अन्नखए ४२।८२)</small> कटु कीट (सं० पु०) कट तीक्ष्णः दंशनेन दुःखप्रदः कीटः, कर्मधा। मशक, मच्छड़, डांस। कट काटक (सं० पु०) कट कोट स्वार्थ कन् । मशक,मसा। कट क्वाण (सं० पु०) कट: कर्कश: क्वाण: शब्दो । यस्य, बहुव्री०। टिटिभ पक्षी, टिटिहरी। कट ग्रन्थि (सं० क्लो०) कट स्तोत्रो अन्थिमूल अस्व, बहुव्री०। १ पिप्पलीमूल, पिपरामूल। २ शण्ठी, सौंठ। ३ लशुन, लहसुन। कटु इन्ता (सं० स्त्री०) कट, दूषितं करोति, कटु-क-ड-लुम् पृषोदरादित्वात् तल्-टाप । नित्यकमक्षएवं प्राचारको निठुरता, खराब चाल। कटुचातुर्जातक (सं० ली०) चतुभ्यो जातकं खार्थ अण, कटु च तत् चातुर्जातकच्चेति, कर्मधा। इला- यची, तज, तेजपात और मिर्च का इकट्ठा । कटुच्छद (स० पु०) कटुच्छदं पत्रमस्थ, बहुव्री०। १ तगरवृक्ष, तगरका पेड़। २ सुगन्धाजंक, खु.शबू-दार तुलसी। कटुज (सं० वि० ) पेय पदार्थ की भांति कड़वे द्रव्योंसे प्रस्तुत किया हुआ, जो अर्क की तरह कड़वी चीज़ास बना हो। कटुजीरक (सं० पु०) जीरक, जीरा । कटुता (सं० स्त्रो०) कट-तल-टाप । १ उग्रता,भड़क। २ तीक्ष्य ता, तेजी। ३ अप्रियता, मारानी। ४ कर्कशता, कड़ापन। ५ कड़वाहट ।<noinclude></noinclude> 6qilf5z97hip8hcg9pb7283yc9vvaay 665074 665072 2026-07-06T05:35:05Z अंजली राजभर 4516 665074 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६४०|कटु कवल्ली-कटु ता|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} बबई, गन्धहण, महागन्धरण, राजिका, जंगली बबई, कासमर्द, वनतुलसी, विडङ्ग, कट फल, खेत निसिन्धु, नील निसिन्धु, कुकुरमुत्ते, इन्दुरकर्णी, पाना, ब्राह्मण-यष्ठिका, काकज, काकासा, महानिम्ब ) और सालसारादिगण (साल, पियासाल, खदिर, खेतखदिर,विट खदिर, सुपारी, भूर्जपत्र, मेषशृङ्गो, निन्दुक,चन्दन, रक्तचन्दन, शिशु, शिरीष, बक, धव, अजुन,ताल, करन, छोटे करत, कृष्णागुरु, अगुरु, लता-शास)को कट कवर्ग कहते हैं। कटुकवली (सं० स्त्री०) कट का चासौ वन्नी चेति,कर्मधाः। कटी नाम लताविशेष, कड़वी लौकीकी बेल। यह कटु, शीत एवं रुच्य पाती और कफ,स्वास, तथा राजयक्ष्माको मिटाती है। <Small>(राजनिघण्ट)</small> कट कशर्करा (सं० स्त्री०) पित्तश्लेष्म ज्वर पर एक योग। इसमें एक-एक तोचे कट रोहिणी और शर्करा पडती है। कटुकस्नेह (सं० पु०) सर्षपवृक्ष, सरसोंका पेड़। कटुका (सं० स्त्री०) कटु संज्ञायां कन्-टाप् । १ कटुकी, कुटकी। इसका संस्कृत पर्याय-जननी, सिला,रोहियो, तितरोहिणी, चक्राङ्गी, मत्स्य पित्ता, वकुला,शकुलादनी, सादनी, शतपर्वा, विजाङ्गी, मलभेदिनी,अशोकरीहिणी, कृष्णा, कृष्णभेदी, महौषधी, कटी,अचनी, काण्डकहा, कटु, कटु रोहिणी, कटुक-रोहियो, केदारकदुका, अरिष्टा, पामनी, कटम्बरा,कचुम्भरा और अशोका है। राजवल्लभके मतमें कटुका अति-कट, तिक्त एवं शीतल और पित्त, रक्ता, दाह,कफ, परचि, खास तथा ज्वरनाशक है। २ ताम्बूली, पान। ३ कुलिकक्ष। ४ राजसषेप, राई । ५ कटु-तुम्बी, कड़वी लौकी। कटु काख्या (सं० स्त्री०) कटुकी, कटकी। कटु काद्यलौह ( सं० लो०) शोथके अधिकारका एक वैद्यकोक्त औषध, सूजनको एक दवा। यह कटुकी, विकट, दन्ती, विड़ा, त्रिफला, चित्रक, देव-दाक, त्रिवित् और गजपिप्पली बराबर द्विगुण लौहमें मिलान से बनता है। दुग्धके साथ इसे सेवन करनेपर गोधरीम विनष्ट होता है। <Small>(रसरबाकर)</small> {{Multicol-break}} कटु काटव्य (स को०) कट च तत् काटव्यञ्चेति, कर्मधा०। १ अत्यन्त कर्कश वाक्य, निहायत कड़ी बात। २ गालीगलौज। कट कापाली (सं० स्त्री०) कण्टकपाली वृक्ष, एक पेड़। कट कारोहिणी (सं० स्त्री०) कट की, कुटकी । कट कालाबु (सं० स्त्री०) कट कश्चासौ अलावुश्चेति, कर्मधा। तिक्ततुम्बी, कड़वी लीकी । कट को (सं० स्त्री०) कट खार्थे कन्-डोष् । कटुका,कटुकी । कटुकीग्राम-विहारप्रान्तके चम्पारन जिलेका एक प्राचीन ग्राम। <Small>(भविष्य अन्नखए ४२।८२)</small> कटु कीट (सं० पु०) कट तीक्ष्णः दंशनेन दुःखप्रदः कीटः, कर्मधा। मशक, मच्छड़, डांस। कट काटक (सं० पु०) कट कोट स्वार्थ कन् । मशक,मसा। कट क्वाण (सं० पु०) कट: कर्कश: क्वाण: शब्दो । यस्य, बहुव्री०। टिटिभ पक्षी, टिटिहरी। कट ग्रन्थि (सं० क्लो०) कट स्तोत्रो अन्थिमूल अस्व, बहुव्री०। १ पिप्पलीमूल, पिपरामूल। २ शण्ठी, सौंठ। ३ लशुन, लहसुन। कटु इन्ता (सं० स्त्री०) कट, दूषितं करोति, कटु-क-ड-लुम् पृषोदरादित्वात् तल्-टाप । नित्यकमक्षएवं प्राचारको निठुरता, खराब चाल। कटुचातुर्जातक (सं० ली०) चतुभ्यो जातकं खार्थ अण, कटु च तत् चातुर्जातकच्चेति, कर्मधा। इला- यची, तज, तेजपात और मिर्च का इकट्ठा । कटुच्छद (स० पु०) कटुच्छदं पत्रमस्थ, बहुव्री०। १ तगरवृक्ष, तगरका पेड़। २ सुगन्धाजंक, खु.शबू-दार तुलसी। कटुज (सं० वि० ) पेय पदार्थ की भांति कड़वे द्रव्योंसे प्रस्तुत किया हुआ, जो अर्क की तरह कड़वी चीज़ास बना हो। कटुजीरक (सं० पु०) जीरक, जीरा । कटुता (सं० स्त्रो०) कट-तल-टाप । १ उग्रता,भड़क। २ तीक्ष्य ता, तेजी। ३ अप्रियता, मारानी। ४ कर्कशता, कड़ापन। ५ कड़वाहट ।<noinclude></noinclude> ex952cxb4cr0u41zzumx6wd539i0qf5 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६४२ 250 76159 665113 609382 2026-07-06T11:57:31Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 665113 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कटु तित-कटु पत्रिका| ६४१}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कतिक्त, <small>कटु तिक्तक देखो।</small> कटु तिक्तक (सं० पु०) कट चासौ तिताचे ति, कटु-तिक्त अल्याथै कन्। १किराततितक, चिरायता। २ महाशणवृक्ष, पटसन। ३ शशक्षुप, सनका पेड़। कटु तिक्तका, <small>कटुतितिका देखो।</small> कटु तिक्ता (सं० स्त्री०) विपाके कटुः स्वादे तिता। १ कटु तुम्बी, कड़ु वो लौको। २ कट तुण्डो, कड़वो तरोई। कटु तिक्तिका (सं० स्त्री०) कटुतिक्त स्वार्थ कन्-टाप अत इत्वम्। महाशण, पटसन। २ कटतुम्बो,कड़वी लौकी। कटुतिन्दुक (सं० पु०) कुचेलक, कुचिला। कटुतुणिका (सं० स्त्री०) कटुतुण स्वार्थी कन्-टाप पत इत्वम्। तिक्त-तुण्डो, कड़वो तरोई। यह कटु, तिक्त तथा कफ, वान्ति, विष, अरोचक एवं रक्तपित्तनाशक और रोचन होती है। <Small>(राजनिघण्ट)</small> कटुतुण्डी (सं० स्त्री०) कटु तीव्र तुण्डमस्याः। तिक्ततुण्डी, कड़वी तरोई। इसका संस्कृत पर्याय-तितातुण्डी, तिताख्या और कटका है। <Small>कटु तुहिका देखो। </Small> कटुतुम्बिका, <small>कटु तुम्बो देखो।</small> कटुतुम्बिनी (सं० स्त्री०) तिक्तालाबु, कड़वी लौकी। कटुतुम्बी (सं० स्त्री०) कटुश्चासौ तुम्बी चेति, कर्मधा। तिक्तालाबु, कड़वी लौकी। इसका संस्कृत पर्याय-इक्ष्वाकु, कटुकालाबु, नृपात्मजा, कटुतिक्तिका, कटु-फला, तबिना कट तखिनी, वृहत फला, राजपुत्री, तिक्तवीजा और तुखिका है। राजवल्लभके मतसे कटुतुम्बी कट, तीक्षण, वमनकारक, शोधक, लघुपाक और खास, वायु, कास, शोथ, व्रण, शूकविष, पाण्डु,कमि एवं कफनाशक होती है। <Small>अलावु देखो।</small> कटतैल (सं० क्लो० ) कटु तीक्षण तैलम्, कर्मधा० । सार्षप तैल, कड़वा तेल। भावप्रकाशके मतसे यह अग्निदीपक, कटरस, कटुपाक, लघु, शरीर-वशता- मारक लेखन, उष्णस्पर्श, उष्णवीर्य, तीक्षण, रक्तपित्त- दृषितकर और कफ, मेद, वायु, प्रशोरोग, शिरोरोग,कर्णरोग, कण्ड, कुष्ठ, कृमि, धवल और दुष्टतणनाशक है। राई और सफेद सरसोंका तेल भी इसी प्रकार </Small>Vol. IIL 161{{gap}} {{gap}} {{Multicol-break}} गुणविशिष्ट होता है। विशेषत: उससे मूत्रक्वच्छ रोग लग जाता है। सर्षपतैलके द्वारा आयुर्वेद मतमें अनेक रोगनाशक तेल बनते हैं। इनके बनने से पहले तैलपर मूळपाक लगाना पड़ता है। <Small>कटु रेलमूच्छा देखो ।</small> कटुतैलमूर्छा (सं० स्त्री० ) कड़वे तेलको सुन कराई। अच्छे कड़ाहमें डाल कड़वे तेलको पहले धीमी आंचसे पकाते हैं। फेन मर जानपर चल्हे से उतार उसमें मञ्जिष्ठा, पामलको,हरिद्रा, मुस्ता, विल्वत्वक, दाडिम-त्वक, नागकेशर, कृष्णजीरक, बालक, नलुका एवं विभौतकको क्रम-क्रम पत्थरपर पीस और पानौसे घोल तैलमें छोड़ देना चाहिये। चार सेर तेल बनाने- में २ पल मनिष्ठा सेर जल और दूसरा द्रव्य दो-दो तोले पड़ता है। मूर्छित कट तैल आमके दोषको दूर करता है। कटु वय (सं० क्लो०) कट ना कटुरसानां वयम्, ६-तत् । विकट, तीन कुड़वो चीजोंका इकठा। सोंठ, मिर्च और पीपल एकमें मिलानेसे कट वय प्रस्तुत होता है। वाभटमें लिखा-कट त्रयके सेवनसे स्थ लता, अम्नि-मान्य, खास, कास, श्लोपद और पीनस रोग नष्ट होता है। कटु विक, <small>कटु वय देखो।</small> कटु त्व (सं० क्लो०) कड़वाहट, चरपराहट, झल। कटु दला (सं० स्त्री०) कटदलं पत्र यस्याः, बहुव्री। कटी, ककडी। कटु दुग्धिका (सं० स्त्री०) तितालाब, कडवी लौकी। कटु निष्याव ( सं० पु० ) कट चासौ निष्पाबचेति, कर्मधा० । नदीतीर उत्पन्न एक निष्याव धान्य, दरया किनार होने और पानी में न डूबनेवाला एक अनाज। कटु निष्याव, <small>कटु निष्याव देखो।</small> कटु पत्र (सं० पु०) कटु : तीव्र पत्र यस्थ, बहुव्री। १ पर्पट, पित्तपापडा। २ सितार्जक मोटो तुलसी। कटु पत्रक, <small>कटु पत्र देखो।</small> कटु पत्रिका (सं० स्त्री० ) कटु पत्र यस्याः, कटु पत्र-<noinclude></noinclude> 251mq5oggjq3z8mfpugyh4ftewagafi पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६४० 250 76182 665067 609380 2026-07-06T04:46:02Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 665067 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कटुआ-कटकवर्ग |६३९}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} लेह, स्खेद, लेद तथा मलका नाशक, अबको रुचिका कारक, कण्ड, व्रण एवं कृमिका विनाशक और घनीभूत रसका भित्रकारक बताते हैं। कटुरस सकल स्रोतको आवरण और श्लेष्माको निवारण करता है। कटुरस अधिक परिमाणमें व्यवहार करनेसे शुक्र घटता, ग्लानि, तृष्णा, मूळ, वेदना एवं सूचोवेधवत् पौड़ाका वेग बढ़ता, अवसाद लगता, दौबख्य दौडता,कण्ठ जलता, शरीरपर ताप चढ़ता, बल चीण पड़ता, वायु तथा अस्निके बाहुबसे भ्रम, मद, कम्म एवं भेद चलता और बाहुके पार्श्व में अन्यान्य वायुजन्य विकार उठता है। ९ कटपटोल, कड़वा परवल। १० चम्मकक्ष,चम्पेका पेड़। ११ चीनकपूर, चीना कपूर । १२ कटी-लता। १३ अकक्ष, मदारका पेड़। १६ जलवण-विशेष, एक पनिहा घास। १५ छत्रकविष, छातेका जहर। १६ कुटजतरु, कुटकोका घेड़। १७ राज-सर्वप, बड़ा सरसों। (त्रि०) १८ तिक्त, तोता। १९ कषाय, कसैला। २० विरस, बदज़ायका। २१ परयोकातर, हासिद,दूसरेको शानशौकत देख न सकनेवाला। २२ अप्रिय, नागवार। २३ तीक्ष्ण, तेज़। २४ उष्ण, गर्म। २५ सुरभि, खुशबूदार । २६ दुर्गन्ध, बदबू देनेवाला। २७ कुत्सित, खराब। २८ कटुरसविशिष्ट, कड़वा । कटुआ (हिं० पु० ) कौटविशेष, बांका, एक कीड़ा। यह धानके पड़को काटता है। २ एक सिंचाई। इससे नहरका पानी सोधे खेतमें पहुंचता है। ३ मुसलमान। छिक्का या साढ़ी उतारे दूध के दहीको 'कटुआ दही' कहते हैं। कटुक (सं० स्त्री०) कटना कटुरसानां वयम्, कटु संज्ञायां कन्। १त्रिकट। सोंठ, मिर्च और पीपल तीनोंका नाम कटुक है। २ मरिच, मिर्च । ३ कटुकी, कुटको। (पु०) ४ कटुरस, कड़वापन । ५ पटोल, परवल।.६ सुगन्धितण, खुशबूदार घास । ७ कुटज वृक्ष, कुटकीका पेड़। ८ अर्कवृक्ष मदरका पेड़। ९राजसर्वप, ब्रड़ा. सरसों। १० आद्रक, अद- {{Multicol-break}} रक। ११ लशन, लहसुन। (त्रि०) १२ अप्रिय, नागवार। {{Center|<Small>"दुर्योधन कर्यच कटुकाच नाभाषकाम्।" (मारत, अनुत ७७।१)</Small>}} १३ तीक्ष्ण, कटु, उण, तेज, कड़वा, गर्म । कटकण्टक (सं० पु.) शामलोवृक्ष, सेमरका पेड़। कटुकवय (सं० क्ल.) कटकानां कटुरसानां वयम्, ६-तत् । विकट, तोनों कड़यो चौजें-अर्थात् सोंठ, मिर्च और पीपल । कटुकत्व (सं० लो०) कटकस्य भावः, कटुक-त्व। {{Center|<small>तस्य भावस्व नलो। पा ५।१।१।९।</small>}} कटुता, चरपराहट, कड़वापन। कटकन्द (सं० लो ०) कटः कन्दो मूत्रमस्य । १ मूलक, मूली। (पु०) २ शिशुवृक्ष, सहोंजन का पेड़। ३ बाईक, अदरक। ४ लशन, लहसुन। कटकन्दरी (सं० स्त्री०) आषधि विशेष, एक जड़ी-बूटी। कोङ्कनमें इसे गोविन्दो कहते हैं। कट-कन्दुरिका उष्ण, तिक्त और वात एवं कफ तथा विसूची प्रादि मिटानेवाली है। <Small>(वैद्यकनिधए)</small> कटुकफल (सं० लो०) कटक फचमस्थ, बहुव्रो । ककोलक, सौतलचीनी। कटकभक्षी (सं० पु०) एक गोत्रप्रवर ऋषि । कटुकरन (सं० पु०) करन । कटुकरस (सं० पु०) षडरसों में एक पन्यतम रस, चरपराहट, कड़वापन। कटकरोहिणी (स० स्त्री०) कटका' सती रोहति, कटुक-रुह-णिनि। कटकी, कुटकी । कटकवर्ग (सं० पु०) कटक द्रव्य समूह, कड़यो चौजोंका टेर। शिशु, मधुशिशु, मूलक, लशुन, सुमुख, (सफेद तुलसी), सित (सौंफ), कुष्ठ, देवदारु, सोमराजीके वोज, शङ्खपुष्पों, गुग्गुल, मुस्तक, लात लिका, शुकनासा एवं पोलु, प्रकृति पिप्यत्यादि (पिप्पली, पिप्यत्तीमून, चञ्य, चित्रकमून, शुढी, मरिच, गजपिप्पली, रेणुक, एला, यमानो, रन्द्रयव, प्रवृक्ष, जोरक, सर्षप, महानिम्ब, मदनफल, हिड्नु, ब्राह्मणयष्ठिका, मूर्वामूल, पतोस, वचा, विडङ्ग कटुको ), सुरसादि ( तुलसो, श्वेततुलसो, गन्धपलाश,<noinclude></noinclude> i1fddlyhrgwtlj2i38ljhlacx1q5h9u पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१६ 250 76338 665027 664915 2026-07-05T16:54:22Z आदेश यादव 3609 665027 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh||एतिकायन—ऐनक|४७५}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इस विषयका शिलालेख कोल्हापुर राज्यके सामानगढ़ में मिला है। उसमें ऐतावाड़–खुर्द उत्सर्ग को हुई भूमि की उत्तर सोमा बताया गया है। ऐतिकायन (सं॰ पु॰) इतिकस्य ऋषेरपत्यम्, इतिकफक्। इर्तिक ऋषिके सन्तान। ऐतिशायन (सं॰ पु॰) इतिशस्य ऋषेरपत्यम्, इतिशफक्। इतिश ऋषिके सन्तान। यह एक संस्कृतके प्राचीन विद्वान थे। मीमांसासूत्र में इनका नाम आया है। ऐतिहासिक (सं॰ त्रि॰) इतिहासादागतः इतिहासठक्। १ इतिहास ग्रन्थसे समझ पड़नेवाला, जो तारीखसे मालूम हो। २ इतिहासवेत्ता, तारीखको जननेवाला इतिहासपाठक, तारीख़ पढ़नेवाला। ऐतिह्य (सं॰ ल्की॰) इतिह स्वार्थे ञा। अन्तावसथोतिह–भेषजा ञा:। पा ५।४।२३। पारम्पर्य उपदेश, पुरानी‌ नसीचत। जो बात बहुत दिनसे सुननेमें आती वह‌ ऐतिह्य कहाती है। {{x-smaller|"ऐतिह्य नाम आप्तोपदेशो वेदादिः।" (चरक)}} पौराणिकोंके मत में ऐतिह्य एक प्रमाण है। वटके वृक्षमें यक्षिणी रहनेका परम्परागत उक्त वाक्य ही ऐतिह्य प्रमाण है। ऐदंयुगीन (सं॰ त्रि॰) अस्मिन् युगे साधुः, इदयुगखञ। इस युगके उपयोगी। ऐध् (सं॰ स्त्री॰) अग्निशिखा, लपट। ऐध (सं॰ पु॰) {{x-smaller|ऐध् देखो।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> २ दिलवाले बादशाह सुलतान मुहम्मद थाह तुग़लक़ और सुलतान फोरोज शाहके एक दरवारी । इनका उपाधि जा रहा। इनके बनाये 'तरसोल ऐन-उल्-मुल्को' और 'फतेहनामा' नामक दो पुस्तक विद्यमान है। फतेहनामें इन्होंने सुलतान चला-उद- दोन के विजयका वर्णन किया है। २ चोलापुर नवाब आदिलशाद भाई इस्माइलके एक रिसालदार । १५८२ ई०को बुरहान निजाम ग्राहको हरा आदिलशाहने दक्षिणको घोर कर्नाटक और मलवार पर आक्रमण मारा था । किन्तु अपने भाई इस्माइल बलवा करने पर उन्हें पोछे लौटना पड़ा। युद्ध होनेपर मोराजको फौज इस्माइल से मिल गई। वेलगांव को बीजापुर लौट पायो यो २० हजार फोजके साथ । भेजो फोज विना आज्ञाक ऐन-उल्- मुल्क भी अपनी ऐन्-उल्-मुल्क उसमें मिले पोर राजधानो दिने पर आक्रमण मारने को आगे बढ़े। किन्तु यह युद्धमें मारे गये । १५४२ ई०का भी इन्होंने वोजापुर घेर लिया था. किन्तु विजयनगर-नरेयके भाई इन्हें हमें परास्त किया । यह रातको रण छोड़ अहमदनगर भाग पाये थे । वीजापुर में पूर्व पादया- पुर-फाटक से १५०० गज दूर ऐन-उल-मुल्कको कम बनी है। ऐन (०वि०) १ उपयुक्त दुरुस्त ठोक २ पूर्ण सुसलमानो हुकूमत हिल गई थी। पूरा। (हिं०) अयन और एप देखो । ऐन-उद्-दोन- बीजापुरके एक शेख । इन्होंने 'मुलहकात' और 'किताब-उल्- अनवार' नामक दो ग्रन्थ लिखे हैं । उक्त दोनों ग्रन्थोंमें भारत के समग्र मुसलमान- साधुवों का इतिहास है। सुलतान् पला-उद-दोन हसन बाह मनीके समय यह विद्यमान रहे । - ऐन-उल-मुल्क – १ शीराज़के एक अधिवासी। इनका उपाधि हकीम रहा । बादशाह अकबर के समय यह एक उच्च पदपर प्रतिष्ठित थे। इनको कविता बहुत रसौल होतो थी । उपनाम 'वफा' रहा। ई० को हकीम साहब इस दुनिया से चलते बने। १५८४ ४ गुजरातके एक सूबेदार इनका उपाधि मूलतानी रहा । उलध खान्के जानेसे गुजरातमें बलवा दबानेको कमाल-उद्-दोन भेजे सुधारक खिलजी चढ़ाई काम आये। किन्तु १२१८ ई० को ऐन-उल-मुल्क मूलतानोन बड़ी फौजके साथ पहुंच शान्ति स्थापित की थी । १३०६ ई० के समय यह मालवेके शासक रहे। उसी समय बम्बई प्रान्तस्थ कनाड़ी जिलेवाले देवगिरिके रामचन्द्र ने उपद्रव उठाया था। पला-उद- दोन्ने ख्वाजा मलिक काफरको एक लाख फौजके साथ दाचिणात्य दबाने भेजा । राहमें इन्होंने भी अपनो फोज उनको सहायता के लिये साथ कर दौ । ऐनक ( हिं० स्वी० ) उपनेत्र, चश्मा। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> h9j0vkn3i1eixf4z9t6gwhw9zi0dj24 665030 665027 2026-07-05T17:05:57Z आदेश यादव 3609 665030 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh||एतिकायन—ऐनक|४७५}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इस विषयका शिलालेख कोल्हापुर राज्यके सामानगढ़ में मिला है। उसमें ऐतावाड़–खुर्द उत्सर्ग को हुई भूमि की उत्तर सोमा बताया गया है। ऐतिकायन (सं॰ पु॰) इतिकस्य ऋषेरपत्यम्, इतिकफक्। इर्तिक ऋषिके सन्तान। ऐतिशायन (सं॰ पु॰) इतिशस्य ऋषेरपत्यम्, इतिशफक्। इतिश ऋषिके सन्तान। यह एक संस्कृतके प्राचीन विद्वान थे। मीमांसासूत्र में इनका नाम आया है। ऐतिहासिक (सं॰ त्रि॰) इतिहासादागतः इतिहासठक्। १ इतिहास ग्रन्थसे समझ पड़नेवाला, जो तारीखसे मालूम हो। २ इतिहासवेत्ता, तारीखको जननेवाला इतिहासपाठक, तारीख़ पढ़नेवाला। ऐतिह्य (सं॰ ल्की॰) इतिह स्वार्थे ञा। अन्तावसथोतिह–भेषजा ञा:। पा ५।४।२३। पारम्पर्य उपदेश, पुरानी‌ नसीचत। जो बात बहुत दिनसे सुननेमें आती वह‌ ऐतिह्य कहाती है। {{x-smaller|"ऐतिह्य नाम आप्तोपदेशो वेदादिः।" (चरक)}} पौराणिकोंके मत में ऐतिह्य एक प्रमाण है। वटके वृक्षमें यक्षिणी रहनेका परम्परागत उक्त वाक्य ही ऐतिह्य प्रमाण है। ऐदंयुगीन (सं॰ त्रि॰) अस्मिन् युगे साधुः, इदयुगखञ। इस युगके उपयोगी। ऐध् (सं॰ स्त्री॰) अग्निशिखा, लपट। ऐध (सं॰ पु॰) {{x-smaller|ऐध् देखो।}} ऐन (अ॰ वि॰) १ उपयुक्त दुरुस्त ठीक। २ पूर्ण, पूरा। (हिं॰) {{x-smaller|अयन और एण देखो।}} ऐन–उद्–दीन—बीजापुरके एक शेख। इन्होंने 'मुलहक़ात' और 'किताब–उल्–अनवार' नामक दो ग्रन्थ लिखे हैं। उक्त दोनों ग्रन्थोंमें भारत के समग्र मुसलमान–साधुवों का इतिहास है। सुलतान् अला–उद्–दीन हसन बाह्मनीके समय यह विद्यमान रहे। ऐन–उल–मुल्क—१ शीराज़के एक अधिवासी। इनका उपाधि हकीम रहा। बादशाह अकबर के समय यह एक उच्च पदपर प्रतिष्ठित थे। इनको कविता बहुत रसीली होती थी। उपनाम 'वफा' रहा। १५८४ ई॰ को हकीम साहब इस दुनियासे चलते बने। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> २ दिलवाले बादशाह सुलतान मुहम्मद थाह तुग़लक़ और सुलतान फोरोज शाहके एक दरवारी । इनका उपाधि जा रहा। इनके बनाये 'तरसोल ऐन-उल्-मुल्को' और 'फतेहनामा' नामक दो पुस्तक विद्यमान है। फतेहनामें इन्होंने सुलतान चला-उद- दोन के विजयका वर्णन किया है। २ चोलापुर नवाब आदिलशाद भाई इस्माइलके एक रिसालदार । १५८२ ई०को बुरहान निजाम ग्राहको हरा आदिलशाहने दक्षिणको घोर कर्नाटक और मलवार पर आक्रमण मारा था । किन्तु अपने भाई इस्माइल बलवा करने पर उन्हें पोछे लौटना पड़ा। युद्ध होनेपर मोराजको फौज इस्माइल से मिल गई। वेलगांव को बीजापुर लौट पायो यो २० हजार फोजके साथ । भेजो फोज विना आज्ञाक ऐन-उल्- मुल्क भी अपनी ऐन्-उल्-मुल्क उसमें मिले पोर राजधानो दिने पर आक्रमण मारने को आगे बढ़े। किन्तु यह युद्धमें मारे गये । १५४२ ई०का भी इन्होंने वोजापुर घेर लिया था. किन्तु विजयनगर-नरेयके भाई इन्हें हमें परास्त किया । यह रातको रण छोड़ अहमदनगर भाग पाये थे । वीजापुर में पूर्व पादया- पुर-फाटक से १५०० गज दूर ऐन-उल-मुल्कको कम बनी है। - ४ गुजरातके एक सूबेदार इनका उपाधि मूलतानी रहा । उलध खान्के जानेसे गुजरातमें सुसलमानो हुकूमत हिल गई थी। बलवा दबानेको कमाल-उद्-दोन भेजे सुधारक खिलजी चढ़ाई काम आये। किन्तु १२१८ ई० को ऐन-उल-मुल्क मूलतानोन बड़ी फौजके साथ पहुंच शान्ति स्थापित की थी । १३०६ ई० के समय यह मालवेके शासक रहे। उसी समय बम्बई प्रान्तस्थ कनाड़ी जिलेवाले देवगिरिके रामचन्द्र ने उपद्रव उठाया था। पला-उद- दोन्ने ख्वाजा मलिक काफरको एक लाख फौजके साथ दाचिणात्य दबाने भेजा । राहमें इन्होंने भी अपनो फोज उनको सहायता के लिये साथ कर दी। ऐनक ( हिं० स्वी० ) उपनेत्र, चश्मा। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qpv8ysstkb9laxg54hwqs3w0dokp9gq 665038 665030 2026-07-05T18:24:58Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 665038 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||एतिकायन—ऐनक|४७५}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इस विषयका शिलालेख कोल्हापुर राज्यके सामानगढ़ में मिला है। उसमें ऐतावाड़–खुर्द उत्सर्ग को हुई भूमि की उत्तर सोमा बताया गया है। ऐतिकायन (सं॰ पु॰) इतिकस्य ऋषेरपत्यम्, इतिकफक्। इर्तिक ऋषिके सन्तान। ऐतिशायन (सं॰ पु॰) इतिशस्य ऋषेरपत्यम्, इतिशफक्। इतिश ऋषिके सन्तान। यह एक संस्कृतके प्राचीन विद्वान थे। मीमांसासूत्र में इनका नाम आया है। ऐतिहासिक (सं॰ त्रि॰) इतिहासादागतः इतिहासठक्। १ इतिहास ग्रन्थसे समझ पड़नेवाला, जो तारीखसे मालूम हो। २ इतिहासवेत्ता, तारीखको जननेवाला इतिहासपाठक, तारीख़ पढ़नेवाला। ऐतिह्य (सं॰ ल्की॰) इतिह स्वार्थे ञा। अन्तावसथोतिह–भेषजा ञा:। पा ५।४।२३। पारम्पर्य उपदेश, पुरानी‌ नसीचत। जो बात बहुत दिनसे सुननेमें आती वह‌ ऐतिह्य कहाती है। {{x-smaller|"ऐतिह्य नाम आप्तोपदेशो वेदादिः।" (चरक)}} पौराणिकोंके मत में ऐतिह्य एक प्रमाण है। वटके वृक्षमें यक्षिणी रहनेका परम्परागत उक्त वाक्य ही ऐतिह्य प्रमाण है। ऐदंयुगीन (सं॰ त्रि॰) अस्मिन् युगे साधुः, इदयुगखञ। इस युगके उपयोगी। ऐध् (सं॰ स्त्री॰) अग्निशिखा, लपट। ऐध (सं॰ पु॰) {{x-smaller|ऐध् देखो।}} ऐन (अ॰ वि॰) १ उपयुक्त 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इस्माइलसे मिल गई। वेलगांवको भेजी फोज बिना आज्ञाके वीजापुर लौट आयी थी। ऐन–उल्–मुल्क भी अपनी २० हजार फौजके साथ उसमें मिले और राजधानी पर आक्रमण मारने को आगे बढ़े। किन्तु यह युद्धमें मारे गये। १५४२ ई॰को भी इन्होंने वीजापुर घेर लिया था किन्तु विजयनगर नरेशके भाई वेक्ङटाद्रिने इन्हें युद्धमें परास्त किया। यह रातको रण छोड़ अहमदनगर भाग आये थे। वीजापुर में पूर्व पादया–पुरफाटकसे १५०० गज दूर ऐन–उल्–मुल्ककी कब्र बनी है। ४ गुजरातके एक सूबेदार। इनका उपाधि मूलतानी रहा। उलघ खान्के जानेसे गुजरातमें‌ मुसलमानी हुकूमत हिल गई थी। बलवा दबानेको कमाल–उद्–दीनकू भेजे सुधारक खिलजी लड़ाईमें काम आये। किन्तु १३१८ ई॰को ऐन–उल्–मुल्क मूलतानीने बड़ी फौजके साथ पहुंच शान्ति स्थापित की थी। १३०६ ई॰के समय यह मालवेके शासक रहे। उसी समय बम्बई प्रान्तस्थ कनाड़ी जिले़वाले देवगिरिके रामचन्द्र ने उपद्रव उठाया था। अला–उद्–दीन्ने ख्वाजा मलिक काफू़रको एक लाख फौजके साथ दक्षिणात्य दबाने भेजा। राहमें इन्होंने भी अपनी फौज उनकी सहायताके लिये साथ कर दी। ऐनक ( हिं॰ स्त्री॰) उपनेत्र, चश्मा। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> s0ejcmaw0tyw65hhqf1xtdysrl4xtuc पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/८३ 250 82774 665016 345934 2026-07-05T13:23:52Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 665016 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||अक्षरलिपि|७९}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अक्षरका प्राधान्य रहनेसे मिश्रकी धातुयें साधारणतः तीन अक्षरोंसे बनी हैं, जसके सम्बन्ध में चीनभाषाके साथ मिश्र भाषाका बहुत हो मिला-जुला लगाव है । टलेमी वंशके अधिकार तक सुप्राचीन मिशूराज्य में सङ्तके लिपिका ही प्रचलन रहा था। पीछे कुछ सुविधा- जनक और सहजलेख यूनानी - अक्षरमालाका प्रचलन होनेसे वह एकबारगी ही लुप्त हो गई सन् १८०२ ई० में आकेरब्लाद् नामक किसी सूइडने मिश्र वाली अक्षरमाला के उद्धारकी चेष्टा की, इस समय ग्रोटफेण्डने ईरान राज्यान्तर्गत कितने ही कौलफलकोंका पाठोडारकर अपना प्रथम उद्यम साधारण लोगोंके गोचरार्थ प्रकाशित किया था। इसके बाद कम्पोलियो और टमासइयां विशेष अध्यवसाय के साथ मिश्र भाषाकी आलोचना करते रहे। उन्होंने कितनी हो गवेषणाके पोछे, रोजेटेको प्रस्तरलिपिके साहाय्य से प्राचीन भाषाके उद्धारका पथ सुगम कर दिया और ग्रोटफेण्ड और सर हेनरी रलिन्सनने सन् ई०से ५१६ वर्ष पहले दरायूस-विस्तास्य द्वारा उत्कीर्ण कोलफलकका पाठोद्घारकर कौलफलक पाठको यथेष्ठ सुविधा की । कोल लिपिके पाठोद्दार से प्रकृत पक्ष में ईरानियोंके पवित्र धर्मग्रन्थ अवस्ताशास्त्रपाठकी भी विस्तर सुविधा हुई । कारण, कोललिपि और अवस्ता - को भाषाका परस्पर में विशेष नैकट्यसम्बन्ध है । जब प्राचीन ईरान- लिपिका पाठोद्दार हो गया, तब सुसान और बाबिलोनिया वाली समान्तराल स्तम्भश्र णोकी गात्रोत्कीर्ण लिपिके पाठको आशा बंधी । परवर्त्तिकाल के बीच एशिया माइनर के नाना स्थानों में कोल लिपि आविष्कत होनेसे उक्त भाषालोचनाका पथ कितना ही सुगम हुआ और निनिभे और बाबिलोन- को ध्वस्त स्तुपराशिके अभ्यन्तरनिहित मृतफलकों का पाठोद्दार होनेसे यू.टिस उपत्यकाका इतिवृत्त सजीव बन गया । आकेदियान भाषामें कानको “पौ” कहते हैं । कोलाकारलिपिमें “पौ” लिखते हुए जिस भाव से कोलक (1) विन्यस्त होते हैं, उसके साथ बँगला “প” हिब्रू “पौ,” अङ्गरेज़ी P. और संस्कृत 'प' का विशेष सादृश्य है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> असुरोय और बाबिलोनीयसे यह कोलाकार लिपि विभिन्न देशोंमें विस्तृत हुई । किन्तु उस समय अपरा- पर जातियोंमें दूसरी एक भाषा प्रचलित थी । वह, कोललिपिको उत्पादक सुमारीय जाति या उसके विजेता सेमितिक बाबिलोनीयोंको भाषासे सम्पूर्ण विभिन्न है। एशिया के विभिन्न स्थानों, विशेषतः ईजि- यन सागरस्थित द्वीपोंमें भी इस भाषा के कई सौ शिलाफलक विद्यमान हैं । इस भाषाका नाम है हिटा- इट् (Hittite)। इसका लिपिकौशल प्रथमावस्थाको चित्रलिपिसे सम्भूत होते भी आक्षरिक परिणतिमें यह बाबिलोनीय लिपिसे सम्पूर्ण स्वतन्त्र है । कितनी हो चेष्टाके पीछे, इस भाषाको फलकलिपिका पाठोद्दार कार्य आरम्भ हुआ सही, किन्तु अभो उसकी प्रकृष्ट पन्या निर्धारित नहीं हुई है । पुराने समय पिलोपेनिज् से एक यूनानियोंका उपनिवेश साइप्रास द्वीपमें जाकर बसा । वह जिस भाषा में बात करते थे, वह अधिकांश में आर्केडिय भाषाके अनुरूप है । समग्र यूनानी जातिके बीच यह शाखा अक्षरमालामें लिखना न जानती थी; इसने एशिया- वासियोंके संस्रवमें पड़कर ध्वन्यात्मक अक्षरलिपिका भी अनुसरण किया था । विख्यात ईरानयुद्धक अवसानमें साइप्रास् द्वीप यूनान -राजके अधीन हुआ और यूनानी उपनिवेशिकोंने स्वजातीयोंका संस्रव पाया तो सही, किन्तु वह मूल यूनानियोंको अभ्यस्त अक्षरलिपि ग्रहण न कर अपनी पूर्वतन शब्द लिपिको ही व्यवहार करते रहे । अब ब्रिटिश अजाइब घरवाले अध्यक्ष्यों के यत्न से साइप्रास द्दोपके ध्वस्त स्तूपोंका खननकार्य आरम्भ हुआ है। भूगर्भको ढूंढते ढूंढते उसके बीचसे सन् ई॰से पहलेकें ४ थे शताब्दका उत्कीर्ण एक शिला- फलक निकला। इस फलक में ड्रेयिट और पार्शि- फोनके उद्देश्यसे उत्सर्गीकृत व्यापारांश, यूनानी अक्षरमाला और उसके नीचेको घटना शब्द लिपिमें उत्कीर्ण है। इसको यूनानी अक्षरमाला वाली प्रणालीको बाईं ओरसे आरम्भ कर क्रमशः दाहने आना होता है, किन्तु शब्दलिपिको प्रथा इससे <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> o7cmkovvqj6rmbypjko99l0d2cpsckk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/८४ 250 82777 665054 345937 2026-07-06T03:17:30Z Shivaniya shaw 4129 665054 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|८०| अक्षरलिपि}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> सम्पूर्ण विपरीत यानी वर्त्तमान अरबी या फ़ारसी- की तरह दाहनेसे बायेंको है । इस शब्द लिपि- में पांच स्वराक्षरके चिह्न हैं, किन्तु ह्रस्व या दीर्घ स्वरके पार्थक्य निर्णयको सुविधा और व्यञ्जन अक्षरों में जिह्वामूलीय, तालव्य या अनुनासिकादियोंके उच्चारण- निर्धारणका उपाय नहीं है । <Small>पाश्चात्य 'अक्षरमालाकी उत्पत्ति ।</small> गभोर गवेषणा के साथ साइप्रीय अक्षरमालाको आलोचना करते-करते स्वतः मनमें अक्षरमालाका उत्पत्ति-प्रसङ्ग आकर समुदित होता है। पाश्चात्य पण्डितोंको विश्वास है, कि यह अक्षरमाला, फिनिसिया और यूनानसे पहले भूमध्यसागरोपकूलवर्त्ती देशीं और पीछे वहांसे दूरवर्ती जनपद समूहों में परि व्याप्त हुई थी। सन् १८५६ ई० के समय इमानुएल डिरूजने Academie des Inscriptions सभामें लिपितत्त्वका जो अभिमत प्रकाशित किया, उसमें उन्होंने मिश्र वाली हायरोग्लिफिक या चित्रलिपिकी अभिशप्त या कुत्सित आकृतिसे ही फणिक् अक्षर- मालाको उत्पत्ति मानी है । वह इन दोनो अक्षर- 'मालाओंके सामञ्जस्य - साधनकालमें उभय भाषागत कितने ही अक्षरोंका अपूर्व वैषम्य अवधारित कर गये हैं। सन् १८७७ ई० में अध्यापक डिके (Deecke) ने इमानुएल रूजका मत काटकर कहा था, कि 'अपेक्षाकृत परवर्त्ति कालको विकृत असुरीय कील- लिपिसे सेमेटिक अक्षरमालाको उत्पत्ति है और फणिक् भाषा भी उसी असुरीय अक्षरमालाके निकट ऋणी है। किन्तु इस विषय में प्रमाणका अभाव है। यदि प्रमाण मिले, तो अवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा, कि फणिक् अक्षरमालाको वर्त्तमान निर्धारित युगको अपेक्षा और भी सहस्राधिक 'वर्षकी प्राचोन बताकर ग्रहण करना और अक्षर माला के इतिहासमें कोई युगान्तर साधित होगा । फिर, मिश्रके ध्वस्तस्तूपोंको ढूंढते ढूंढते अध्यापक फिण्डार्स पिटीर्ने सन् १९०० ई० में आबिडोस् नगर वाले राजसमाधिस्तम्भके बीच जो लिपि (Sym " bols like alphabetic characters) उत्कीण देखी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जाती, वह प्राचीन हायरोग्लिफिक् और चिह्न लिपिके संयोगसे उत्पन्न है। मिश्र राज्यवाले इतिहासोक्त प्रथम राजवंशके राजत्वकाल से भी पहले या सन् ई० के. ६००० से १२०० वर्ष पहले तक यह चिह्न लिपि अबाध रूपसे मिश्र राज्य में प्रचलित रहो । सन् ई० से पहलेके ८वें शताब्दी से पूर्व्वयुग के उत्कीर्ण क्रीट- दीप वाले शिलाफलक में भी इस चित्रलिपिका निदर्शन विद्यमान है। इसके द्वारा भी परवर्त्ती मिश्रभाषाको वर्ण मालासे फिनिकों द्वारा वर्ण लिपिकी परिपुष्टि सम्बन्धीय पूर्व्वसिद्धान्तित मौमांसा हो अप्रतिपन्न होती है। सन् १८०० ई०में क्रौट द्वीपवाले भूगर्भके भीतर मिष्टर इभान्सने जो सकल लिपिपूर्ण मृत्फलक पाये थे, उनको लिपि मिश्रको चित्रलिपिके अनुरूप ही है । उसके ८२ चित्रोंमें ६ मनुष्य या उनको प्रतिकृति ; १७ अस्त्राकृति यन्त्र और बाजे, गृह, गृहांश या रन्धनके पात्रादि ; ३ सामुद्रिक जोव-चित्र ; १७ पशु और पक्षोमूर्त्ति ; ८ वृक्ष और गुल्मादि ६ ग्रह- नक्षत्रादि ; एक भौगोलक चित्र ; ८ ज्यामितिमूलक चित्र और १२ दूसरे चिह्न थे । आज भी आविष्कृत नहीं हुआ, कि यह बारह कौन अक्षर थे । साधारण लोगोंको धारणा है, कि नोसस (Knosss) वाले सुविख्यात प्रासादकै ध्वस्तस्तूपमें जो फलक मिला, वह माइकिनि sोपके आदिम अधिवासियोंका खोदा है । इभान्सको इस मृत्फलकके पढ़नेसे समझ पड़ा, कि यहांके अधिवासी माइकिनिवाले विजेटदलके अधीन रहे थे । माइकिनोयोंके यहां नवागत होते भी, उनकी लिपि अपेक्षाकृत प्राचीन थी । क्योंकि आज भी आविडास्से निकले फलकमें माइकिनोय लिपिको जो प्रतिकृति विद्यमान है, वह, इसमें सन्देह नहीं कि, मिश्रवाले प्रथम राजवंशके पूर्व्ववर्त्ती समयको मृत्पात्रस्थ चित्रलिपिसे पुरानी नहीं तो, उसकी समसामयिक है हो । यह अभी सुस्पष्ट रूप से समझ नहीं पड़ा है, कि इस लिपि-प्रथाके वर्ण आक्षरिक "या शाब्दिक हैं। एक समय इस द्वीप से भ्यतास्रोत कारिया और <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ecqgrw45ifhsepwszn6reeeiileate8 665092 665054 2026-07-06T07:18:17Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 665092 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|८०| अक्षरलिपि}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> सम्पूर्ण विपरीत यानी वर्त्तमान अरबी या फ़ारसी- की तरह दाहनेसे बायेंको है । इस शब्द लिपि- में पांच स्वराक्षरके चिह्न हैं, किन्तु ह्रस्व या दीर्घ स्वरके पार्थक्य निर्णयको सुविधा और व्यञ्जन अक्षरों में जिह्वामूलीय, तालव्य या अनुनासिकादियोंके उच्चारण- निर्धारणका उपाय नहीं है । <Small>पाश्चात्य 'अक्षरमालाकी उत्पत्ति ।</small> गंभीर गवेषणा के साथ साइप्रीय अक्षरमालाको आलोचना करते-करते स्वतः मनमें अक्षरमालाका उत्पत्ति-प्रसङ्ग आकर समुदित होता है। पाश्चात्य पण्डितोंको विश्वास है, कि यह अक्षरमाला, फिनिसिया और यूनानसे पहले भूमध्यसागरोपकूलवर्त्ती देशीं और पीछे वहांसे दूरवर्ती जनपद समूहों में परि व्याप्त हुई थी। सन् १८५६ ई० के समय इमानुएल डिरूजने Academie des Inscriptions सभामें लिपितत्त्वका जो अभिमत प्रकाशित किया, उसमें उन्होंने मिश्र वाली हायरोग्लिफिक या चित्रलिपिकी अभिशप्त या कुत्सित आकृतिसे ही फणिक् अक्षर- मालाको उत्पत्ति मानी है । वह इन दोनो अक्षर- 'मालाओंके सामञ्जस्य - साधनकालमें उभय भाषागत कितने ही अक्षरोंका अपूर्व वैषम्य अवधारित कर गये हैं। सन् १८७७ ई० में अध्यापक डिके (Deecke) ने इमानुएल रूजका मत काटकर कहा था, कि 'अपेक्षाकृत परवर्त्ति कालको विकृत असुरीय कील- लिपिसे सेमेटिक अक्षरमालाको उत्पत्ति है और फणिक् भाषा भी उसी असुरीय अक्षरमालाके निकट ऋणी है। किन्तु इस विषय में प्रमाणका अभाव है। यदि प्रमाण मिले, तो अवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा, कि फणिक् अक्षरमालाको वर्त्तमान निर्धारित युगको अपेक्षा और भी सहस्राधिक 'वर्षकी प्राचोन बताकर ग्रहण करना और अक्षर माला के इतिहासमें कोई युगान्तर साधित होगा । फिर, मिश्रके ध्वस्तस्तूपोंको ढूंढते ढूंढते अध्यापक फिण्डार्स पिटीर्ने सन् १९०० ई० में आबिडोस् नगर वाले राजसमाधिस्तम्भके बीच जो लिपि (Sym " bols like alphabetic characters) उत्कीण देखी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जाती, वह प्राचीन हायरोग्लिफिक् और चिह्न लिपिके संयोगसे उत्पन्न है। मिश्र राज्यवाले इतिहासोक्त प्रथम राजवंशके राजत्वकाल से भी पहले या सन् ई० के. ६००० से १२०० वर्ष पहले तक यह चिह्न लिपि अबाध रूपसे मिश्र राज्य में प्रचलित रहो । सन् ई० से पहलेके ८वें शताब्दी से पूर्व्वयुग के उत्कीर्ण क्रीटदीप वाले शिलाफलक में भी इस चित्रलिपिका निदर्शन विद्यमान है। इसके द्वारा भी परवर्त्ती मिश्रभाषाको वर्ण मालासे फिनिकों द्वारा वर्ण लिपिकी परिपुष्टि सम्बन्धीय पूर्व्वसिद्धान्तित मौमांसा हो अप्रतिपन्न होती है। सन् १८०० ई०में क्रौट द्वीपवाले भूगर्भके भीतर मिष्टर इभान्सने जो सकल लिपिपूर्ण मृत्फलक पाये थे, उनको लिपि मिश्रको चित्रलिपिके अनुरूप ही है । उसके ८२ चित्रोंमें ६ मनुष्य या उनको प्रतिकृति ; १७ अस्त्राकृति यन्त्र और बाजे, गृह, गृहांश या रन्धनके पात्रादि ; ३ सामुद्रिक 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2026-07-06T09:24:53Z Shivaniya shaw 4129 665108 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अक्षरलिपि'''|'''८१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> लाइसियाको प्रवाहित हुआ था। कारियावालोंके क्रीटसे एशियाके उपकूलमें पहुंच उपनिवेश स्थापित करते भी उनकी भाषा और लिपिके साथ कौनास (Caunus)-वासियोंकी लिपिका कितना ही सादृश्य देख पड़ता है। नोससके फलकपाठसे अनुमान होता है, कि कारीय और माइकिनीय लोग परस्परमें निकट सम्बन्धयुक्त और कारीय और लाइसीय लोग भी परस्परमें विशेष भाव-संश्लिष्ट हैं, किन्तु दुःखका विषय है, कि उनका भाषागत सादृश्य स्वतन्त्र है। वह आदिमें इन्दो-युरोपीय केन्द्रसम्भूत ही समझा नहीं जाता। पक्षान्तरसे फ्रिजीय भाषामें उत्कीर्ण फलकादिपर यूनानी लिपिका यथेष्ट सादृश्य देख पड़ता है। उपरोक्त तीनो भाषाके उत्कीर्ण शिलाफलकोंमें एक भी सन् ई॰ से पहलेके ६ ठें शताब्दका परवर्त्ती नहीं। एशिया-माइनर (विशेषतः लाइसिया)-वासियोंकी कथित भाषाके साथ यूनानी-भाषाका कितना ही शब्द-वैषम्य लक्षित होता है। इसके द्वारा प्रतीयमान है, कि यूनानी अक्षरोंसे इस भाषाके वर्ण-चिन्ह बहुत कुछ स्वतन्त्र हैं। कितने ही लोग ऐसा भी अनुमान करते हैं, कि रोडस् द्वीपकी डोरिया लिपिके साथ यूनानी अक्षर मिल जानसे इस अक्षरमालाकी उत्पत्ति हुई है। ऊपर जिस मोआबाइट प्रस्तरफलकका विवरण दिया गया है, वह निःसन्देह खृष्टजन्मसे ८९५ वर्ष पूर्ववर्त्ती समयका उत्कीर्ण बताया जा सकता है। यह मोआब भाषा और इसके वर्णचिह्न, आक्षरिक परिपुष्टिके कीर्त्तिस्तम्भ माने जानेपर भी, समग्र-युरोप-के अक्षरचिह्नकी विस्तारकर्त्ता फनिक-भाषासे पृथक् हैं। सन् १८७६ ई॰ में साइप्रास् द्वीपसे जो ब्रोञ्ज-धातु का बना पात्र पाया गया, वह सिदोनीयराज हिरमके भृत्य द्वारा बाल्लेबेनोनके उद्देश्यसे उत्सर्गीकृत हुआ था। उसमें जो लिपि खोदी हुई है, वह फनिकलिपिका प्राचीनतम निदर्शन है। कोई उसको मोआबाइट् फलकसे पूर्ववर्त्ती और कोई परवर्त्ती मानता है। ऊपर अक्षरलिपिको उत्पत्ति, परिणति या उसके {{Left|२१|2em}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> विस्तार-प्रसङ्गमें जो कुछ लिखा गया है, उससे कोई पाश्चात्य पण्डित भी यह मीमांसा कर न सका, कि किस लिपिसे पाश्चात्य अक्षरलिपि ली गई थी। पाश्चात्य पण्डितोंकी धारणा है, कि फनिक अक्षरमाला ही युरोपीय समग्र अक्षरमालाका आदि है। अध्यापक पिटर गाइलने लिखा है,— <Small>"Whenever the Symbols originated, it was to the Phoenicians that the Western world owed its Alphabets, as is clear (1) from the forms of the letter themselves; (2) from the names which the Greeks gave to them; (3) from the Greek traditon of their origin."</small> सन् १८९६ ई॰ में खेरा द्वीपसे कई प्राचीन शिला-लिपि आविष्कृत हुई थीं। पण्डितवर Freiherr Hiller Von Gartringen ने उनका पाठोद्धारकर दिखाया, कि प्राचीन यूनानी अक्षरमालाके साथ फनिक अक्षरमालाका यथेष्ट सादृश्य रहा था। जो हो, इस फनिकजातीय बणिक् समिति द्वारा पश्चिम-युरोप खण्ड और भूमध्यसागरके तीरवर्त्ती प्रदेशमें अक्षरमालाके विस्तारकल्पसे मानवजातिकी विशेष उन्नति और ऐतिहासिक परिणति साधित हुई। अदम्य उत्साह और अध्यवसायसे इसी फनिक जातिने अति प्राचीनकालमें ही मिश्रराजवासियोंके साथ बाणिज्य-सम्बन्ध फैला दिया था। इसी समय इन्होंने बाणिज्यके प्रयोजनीयतानुसार मिश्रकी लिपिप्रथा कितने ही परिमाणसे बदल डाली। ऐसे स्थलमें यही स्वीकार किया जा सकता है, कि यह अपने देशमें ही रह जटिल चित्रलिपिका वर्ज्जन करना सीखे और इन्होंने अन्यान्य सङ्केत-चिह्न अपनी अक्षरमालामें सन्निविष्ट कर लिये थे। किन्तु वास्तविक पक्षसे यह ठीक निर्णीत करना दुःसाध्य है, कि फनिक् सम्पदायने मिश्रकी सङ्केतलिपि और उसके उच्चारित स्वरादि ग्रहण किये थे या नहीं, अथवा उसने मिश्रकी सङ्केतलिपि ग्रहणकर उसमें अपनी अक्षरसंयोजना की थी या नहीं। फिर भी, स्वीकार किये जानेपर केवल यही कहा जा सकता है, कि साङ्केतिक और उसके अनुरूप शब्द फनिकोंसे उद्भावित होना कुछ विचित्र नहीं। दूसरी यह बात भी ठीक है, कि फनिक अक्षरमालामें जो सब नाम <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> s7ac5h6wnx0r1jf4cdjuwoxijswf4gj पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/८७ 250 82796 665109 642714 2026-07-06T09:28:26Z Shivaniya shaw 4129 665109 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अक्षरलिपि'''|'''८३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> मानतः सन् ई॰ से पांच सौ वर्ष पहले पापिरास् पत्र-पटमें जैसी सब अरमीय लिपियां लिखी गई थीं, वैसी ही अक्षरमाला सन् ई॰ से २०० वर्ष पहले तक बनी रही। इसी समय मिश्रदेशमें पारस्यराजका प्रभाव अप्रतिहत था। ऐसी वक्राकृति या वसीट अरमीयलिपिके साथ असुरीय कीलफलककी पार्श्वस्थ और चुम्बकांश लिखित लिपिका बहुत कुछ सौसादृश्य है। अरमीय लिपि जल्द-जल्द और घसीटकर लिखनेसे क्रमश: गोलभावको धारण करती है ; कारण फनिकलिपिमें अक्षरोंकी नोकें साधारणतः समान हैं। अपनी नोंके गोल होनेसे अरमीय अक्षर, क्रमश: चतुष्क हिब्रू-अक्षरोंमें परिणत हुए और फिर धीरे-धीरे Palmyra को अलङ्कृत लिपि (Ornamental writing) का विकाश देखनेमें आया। अरब जातिके नवतीयोंमें पहले यह अरमीय अक्षरलिपि प्रचलित थी। इसके अक्षरोंके अंश अल्प परिवर्त्तनसे ही वर्त्तमान अरबी अक्षरोंमें रूपान्तरित हो जाते हैं। उत्तर-पूर्व्व अरब-देशके तिमावाले मन्दिर स्तम्भमें इस श्रेणीकी लिपि विद्यमान है, जो सन् ई॰ से पहलेके ५ वें शताब्दसे भी पहले खोदी गई थी। इस लिपिमें प्राचीन अरमीय लिपिके कितने ही अंश हैं। इससे परवर्त्ती समयकी कितनी ही नवतीय शिलालिपियां आविष्कृत हुई हैं। समयके तारतम्यानुसारसे इन फलकलिपियोंमें यथेष्ट परिवर्त्तन हो गया है। चार्लेस डौटी, हुबार और इउटिङ्ग प्रभृति पण्डितोंने विशेष गवेषणाके साथ इन फलकोंका पाठोद्वारकर उसी लिपिमालाके अक्षरोंका क्रमविकाश दिखानेको एक तालिका उद्धृत की है। यह शिला-फलक प्रधानतः सन् ई॰ से पहले ७५ और ९ वर्षके बीचमें खोदे गये थे। इसके लिपिपर्य्योयको अनुसरण करनेसे सहजमें ही वर्त्तमान अरबी लिपिका अक्षर-विन्यास अनुभूत किया जा सकता है। अरब देशमें किउफिक और नषकी नामकी दो प्रकारवाली अक्षरमालाका व्यवहार था। शिलालिपि और मुद्रादिमें साधारणतः प्रथमोक्त लिपि ही व्यवहृत हुई थी, इसी कारण साधारण कार्य्यमें वह, असुविधा- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जनक बोध होनेसे छोड़ी गई और साधारण लिपिमें अपेक्षाकृत घसीटके टुकड़ोंकी अक्षरमाला गृहीत हुई यह शोषोक्त नषकी लिपि ही वर्त्तमान अरबीलिपिकी जननी है। सीरियाके उत्तरवासी खृष्टानोंमें एष्ट्राङ्गालिया नामकी दूसरी एक अरमीयलिपिका प्रचलन है। नेष्टोरीय मिशनरी दल इस लिपिको मध्य-एशियामें ले गया था, पीछे वह क्रमसे तुर्कस्थानसे मञ्चूरिया तक सुदीर्घ जनपदवासियोंके लिपिरूपसे परिगणित हुई। उपरोक्त लिपिको छोड़ अरब देशके दक्षिण स्थित यमन प्रदेशमें और एक तरहकी लिपि प्रचलित थी। उसके अक्षर दक्षिण सेमेटिक या इथिओप्रिक नामसे परिचित हैं। व्याकरण और वाक्यविन्यासके क्रम- निर्णयसे इन सब दक्षिण सेमेटिक लिपियोंके भी सेवीय और माइनीय नामक दो विभाग बनाये गये हैं। अन्यान्य शिलालिपियोंको भांति, यह सेवीय लिपि भी दक्षिणसे क्रमशः वाम ओरको बढ़कर लिखी जाती थी, किन्तु कितनी ही इथिओप्रिक फलक-लिपियोंमें वामसे चलकर दक्षिण ओरको लिखते-पढ़ते हैं। यह आज भी निर्णीत नहीं है,<ref><small>लिप्सिउसका कहना है, कि इस इथियोपिक अक्षरमालाका अधिकांश प्राचीन भारतीय लिपिसे लिया गया है।</small></ref>कि किस समय दक्षिण अरबमें सेवीय और माइनीय लिपिका प्रादुर्भाव हुआ और किस समयमें चिरन्तन प्रसिद्ध दक्षिणसे वामको लिपिअङ्कणरूप सेमेटिक प्रथा वर्जनकर उससे विपरीत यानी वामसे दक्षिणाभिमुखी इथिओपिक प्रथा प्रवर्त्तित हुई। भारतीय खरोष्ठीलिपिकी तरह ईरानी, अरबी, सेमेटिक, साइप्रिय, लेटिन, फिनिक प्रभृति सभी पाश्चात्य भाषाओंकी ही लिपिप्रणाली दक्षिणसे वाममुखी थी। सन् ई॰ से पहले के ८वें शताब्दमें उत्कीर्ण डिपिलनकी सुबृहत् पात्रोपरिस्थ प्राचीन आर्टिकलिपि, किउरीयसे प्राप्त साइप्रीय फलकलिपि और उसके निम्नस्थ यूनानी समवर्ग और प्रिनेष्ठीवाले गोल्ड फाइविउलेके उपरस्थ प्राचीन लेटिनलिपि प्रभृति दक्षिणसे वाममुखी लिपिका निदर्शन हैं। {{Right|<small>[संख्यालिपि, स्वर, देवनागरी प्रभृति शब्द देखो।]</small>}} {{Rule}} {{Smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 6ctbkbuht9nwmrah7altzg8w5as92x6 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/८८ 250 82800 665110 345963 2026-07-06T10:27:08Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित नहीं */ 665110 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{rh|​८४ | ३री तालिका की विवृति | [ अक्षरलिपी ]}}</noinclude>________________ 20 by b = २६ ठ ठा ठाठ 0 ~ 24. 82 ४००-५०० नुः ३ तालिकाको विति [ A a by ㄞˋ M M 2 외의 A 2 8 इ इ इ A $ 9 ہو b 县 गट गो ग चौच चि 印 थोथाथ घुथा थं 魚豆书A नृना न दु दू द x ྴ བ ས ༀ ལ ཤྲ ལྱཱ སྠ ལ फ बोबो भु भा भ भूभा मा म म मा मा य या यो यु ये ययय रिं ररा रु रोरररु ल ल ल लु ला ल व वी व वि व वां व बो वे व ल मि 百可5 या 액 出品 奥 sq. 160 2 F 。 b 丝鸟<noinclude></noinclude> 1sgdbaj8l6ps87dk6uyy0ggsf6x25hr पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/९५ 250 82823 665111 345990 2026-07-06T11:01:55Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 665111 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||अक्षरशः -अक्षि|८९}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अक्षरशः (सं० अव्य०) अक्षर-शस् वीप्सायां [पा ५।४।४३] । अक्षर-अक्षर। समस्त। निश्शेष। बिलकुल। ​ अक्षरशत्रु (सं० पु०) मूर्ख। निरक्षर। अनपढ़। नाख़्वांदा। अक्षरसंस्थान (सं० क्ली०) ६-तत्। लिपि। लेख। लिखावट। इबारत। ​ अक्षरेखा (सं० स्त्री०) धुरी की रेखा। वह रेखा जो किसी वर्त्तुल (गोलाकार) पदार्थ के भीतर केन्द्र से होती हुई दोनों पृष्ठों पर लम्बवत् गिरे। निरक्षरेखा के उत्तर-दक्षिण समदूरवर्ती कितनी ही रेखाएं, जो गोले के पूर्व-पश्चिम मण्डलाकार चित्रित होती हैं। (Lines of Latitude) अक्षरोटी, अखरोटी (हिं० स्त्री०)। १ वर्णमाला। लेख। लिपि का ढंग। २ अछरौटी। ३ सितार पर बोल बजाने या निकालने की क्रिया। ​ अक्षवत् (सं० त्रि०) अक्ष-मतुप्। पासों का खेल। ​ अक्षवती (सं० स्त्री०) अक्ष मतुप् मस्य वत्त्वम्। जुआ। द्यूतक्रीड़ा। चौसर। अक्षवाट (सं० पु०) अक्षाणां वाटः वासस्थानम्। १ अड्डा। जुआघर। २ अखाड़ा। कुश्ती की जगह। ३ पाली, जहां तीतर-बटेर आदि लड़ते हैं। ४ बिसात। ​ अक्षविद् (सं० वि०) अक्ष-विद्-क्विप् अक्षं वेत्ति। १ जुआ में निपुण। २ अर्थशास्त्रज्ञ। विद्या का पण्डित। ३ व्यवहार- ​ अक्षविद्या (सं० स्त्री०) १ पासा खेलने की विद्या। २ व्यवहारशास्त्र। ​ अक्षवृत्त (सं० क्ली०) अक्ष राशिचक्ररूपं वृत्तम्। १ जुआड़खाना। २ राशिचक्र का गोलाकार क्षेत्र। (Parallels of Latitude) निरक्षरेखा के समान्तराल और निरक्षरेखा से क्रमशः दस-दस अंश के (Degree) अन्तर वाले वृत्त। ३ जुआड़ी। अक्षशौण्ड (सं० पु०) अक्षेषु पाशकक्रीड़ायां शौण्डः कुशलः; ७-तत्। पासों के खेल में पण्डित। अक्षस् (ऑक्सस), आमू-तातार देश की एक नदी। यह भारतवर्ष और ईरान देश के बीच में स्थित बेलूर पहाड़ से निकली और बुखारा के उत्तर-पश्चिम कोने में बहती हुई अराल (ओराल) ह्रद के दक्षिण भाग से जाकर मिली है। इसकी ६०० कोस लम्बाई है। ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अक्षसूत्र (सं० क्ली०) अक्षस्य जपमालायाः सूत्रम्। ६-तत्। रुद्राक्ष की माला। जपमाला। अक्षसेन — भारतवर्ष का एक प्राचीन राजा, जिसका उल्लेख मैत्रायण्युपनिषद् में है। अक्षहन् (सं० त्रि०) अन्धा। नेत्रहीन। नाबीना। अक्षहृदय (सं० क्ली०) अक्षविद्यारहस्य। पासा खेलने का कौशल। जुए की चालाकी। अक्षांश (सं० पु०) परस्पर स्थानों की दूरी और नगर, नदी, पहाड़ प्रभृति का ठीक स्थान निर्दिष्ट करने के लिए विषुवद् रेखा से उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम गोलक के ३६० भाग किये गये हैं। इन भागों में एक-एक का नाम अक्षांश है। अक्षाग्रकीलक (सं० क्ली०) अक्षस्य चक्रस्य कीलकम्। ६-तत्। पहिया बंधा रखने का कीला। धुरी। अक्षानह (सं० क्ली०) अक्षे रथचक्रे आते बध्यते। आ-नह-क्विप् <small>[नहो धः। पा ८।२।३४]। </Small>पहिया बंधा रखने का डंडा। अक्षान्ति (सं० स्त्री०/त्रि०) न क्षम-क्तिन्, नञ्-तत्। ईर्ष्या। जलन। अक्षारलवण (सं० त्रि०) न-क्षारलवण, नञ्-तत्। १ सैन्धव, सामुद्रिक लवण, जो खारा न हो। २ हविष्य द्रव्य, जैसे – दूध, घी, आतप तण्डुल (अरवा चावल) इत्यादि। अक्षावपन (सं० क्ली०) अक्ष-आ-वप्-ल्यूट्। पासा फेंकने का आधार, पासा फेंकने का बर्तन या पट। अक्षावली (सं० स्त्री०) अक्षाणां रुद्राक्षाणां आवली श्रेणी, ६-तत्। जपमाला। रुद्राक्ष की माला। अक्षावाप (सं० त्रि०) अक्ष-आ-वप्-अण्। अक्षान् आवपति क्षिपतीति। उप-तत्। द्यूतकारक। पासा फेंकने वाला, जुआड़ी। अक्षि (सं० क्ली०) अश-क्सि। आंख, नेत्र, चक्षु, लोचन, दर्शनेन्द्रिय। समास करने में अक्षि शब्द अजन्त हो जाता है; जैसे – प्रत्यक्ष, समक्ष, परोक्ष। अक्षि — बम्बई प्रेसिडेंसी के अंतर्गत कुलाबा जिले की अलीबाग तहसील का एक प्रसिद्ध ग्राम। इस स्थान के बाग या उद्यान चिरप्रसिद्ध हैं। यहां दो देव- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ruhe5ey7ruxf0o3kbts50caaxpa3yer 665112 665111 2026-07-06T11:03:16Z Shivaniya shaw 4129 665112 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||अक्षरशः -अक्षि|८९}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अक्षरशः (सं० अव्य०) अक्षर-शस् वीप्सायां [पा ५।४।४३] । अक्षर-अक्षर। समस्त। निश्शेष। बिलकुल। ​ अक्षरशत्रु (सं० पु०) मूर्ख। निरक्षर। अनपढ़। नाख़्वांदा। अक्षरसंस्थान (सं० क्ली०) ६-तत्। लिपि। लेख। लिखावट। इबारत। ​ अक्षरेखा (सं० स्त्री०) धुरी की रेखा। वह रेखा जो किसी वर्त्तुल (गोलाकार) 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पाशकक्रीड़ायां शौण्डः कुशलः; ७-तत्। पासों के खेल में पण्डित। अक्षस् (ऑक्सस), आमू-तातार देश की एक नदी। यह भारतवर्ष और ईरान देश के बीच में स्थित बेलूर पहाड़ से निकली और बुखारा के उत्तर-पश्चिम कोने में बहती हुई अराल (ओराल) ह्रद के दक्षिण भाग से जाकर मिली है। इसकी ६०० कोस लम्बाई है। {{left|२३|2em}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अक्षसूत्र (सं० क्ली०) अक्षस्य जपमालायाः सूत्रम्। ६-तत्। रुद्राक्ष की माला। जपमाला। अक्षसेन — भारतवर्ष का एक प्राचीन राजा, जिसका उल्लेख मैत्रायण्युपनिषद् में है। अक्षहन् (सं० त्रि०) अन्धा। नेत्रहीन। नाबीना। अक्षहृदय (सं० क्ली०) अक्षविद्यारहस्य। पासा खेलने का कौशल। जुए की चालाकी। अक्षांश (सं० पु०) परस्पर स्थानों की दूरी और नगर, नदी, पहाड़ प्रभृति का ठीक स्थान निर्दिष्ट करने के लिए विषुवद् रेखा से उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम गोलक के ३६० भाग किये गये हैं। इन भागों में एक-एक का नाम अक्षांश है। अक्षाग्रकीलक (सं० क्ली०) अक्षस्य चक्रस्य कीलकम्। ६-तत्। पहिया बंधा रखने का कीला। धुरी। अक्षानह (सं० क्ली०) अक्षे रथचक्रे आते बध्यते। आ-नह-क्विप् <small>[नहो धः। पा 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2026-07-06T01:24:30Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 665048 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववत्—अथर्ववेद'''|'''२९७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> अथर्ववत् (स० अव्य०) अथर्वन् या उनके वंशजोंको भांति।अथर्व विद् (सं० पु०) अथर्व वेदको जाननेवाला ब्राह्मगा।अथर्ववेद (सं० पु.) कर्मधा। चतुर्थ वेद। मार्कण्डेय-पुराणमें लिखा है, कि अथर्व वेद ब्रह्माके उत्तर-मुखसे उत्पन्न हुआ था। यह वेद भ्रमर और अञ्जन जैसा कृष्णवर्ण है, तथा घोराघोर स्वरूप और शान्ति एवं अभिचारिकादि प्रक्रियाओंसे परिपूर्ण है। कहते हैं, कि ऋक्, यजुः और साम–इन तीन वेदोंका कोई-कोई अंश ले तथा कितने ही नये विषयसंलग्न कर अथर्वा ऋषिने इस वेदका प्रचार किया।भागवतके मतानुसार ब्रह्माके दक्षिण और विष्णु-पुराणके मतानुसार ब्रह्माके उत्तर मुखसे अथर्ववेदनिकला है। (भागवत ३।१२।३७, विष्णु पुराण १।५1५५)विष्णुपुराणमें एक जगह लिखा है,-एक आसीयजुर्वेदस्त चतुर्दा व्यकल्पयत् ।चातुहीचमभूयमिस्ते न यज्ञमथाकरीत् ॥ ११आवयव यजुभिंस्तु ऋग भि)व तथा मुनिः ।श्रीमाव' सामभिचक ब्रह्मत्वञ्चाप्यथर्व भिः ॥ १२ततः स ऋचमुहृत्य ऋग्वेदं कृतवान् मुनिः ।यजूंषि च यजुर्व द सामवेदञ्च सामभिः ॥ १३राजस्वथव व दन सर्वकर्माणि स प्रभुः ।कारयामास मैव य ब्रह्मत्वञ्च यथास्थिति ॥” १४ (३ अंश, ४ अध्याय ।)पहले यजुर्वेद अर्थात् आध्वयंव-क्रियाप्रधान वेद एक प्रकारका था। वेदव्यासने इस यजुःप्रधान वेदके चार भाग बनाये, जिससे चातुर्होत्र स्थापित हुआ। उन्होंने उसके द्वारा यज्ञानुष्ठानकी विधि निर्धारितको। इस चातुर्होत्रमें उन्होंने यजुर्वेद द्वारा आध्वर्यव, ऋग्वेद द्वारा होत्र, सामवेद हारा औहात्र और अथर्ववेद द्वारा यथाविधान ब्रह्मत्व स्थापन किया, और क्षत्रियोंके शान्तिपुष्टि प्रभृति समुदाय दैवकर्म इस अथर्ववेद हारा ही कराये।'यह बड़े ही आक्षेपका विषय है, कि जिस वेदकोविष्णुपुराण इतना माननीय समझता और जिसवेदमें ब्रह्मत्व प्रतिपादित हुआ है, उसी अथर्ववेदको इस देशके वेदज्ञानविहीन पण्डित कुरानका अंशमात्र मानते हैं। वह इस वैदको जितना आधुनिक समझते, वास्तविक यह उतना आधुनिक नहीं। यह सत्य है, कि किसी-किसी पुराण और अमरकोष-जैसे ग्रन्थमैं भी तीन वेदोंके सिवा चौथेका उल्लेख नहीं पाया जाता। (अमरकोष-१।१।४।४ देखो।) किन्तु प्राचीन उपनिषत्, स्म ति, रामायण, महा-भारत और कितने ही पुराणों में भी अथर्वाङ्गिरस या अथर्व वेद उल्लिखित हुआ है।* "श्रुतौरथर्वाङ्गिरसौ कुर्यादित्यविचारयन्। वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्धादरीन् दिजः ॥" मनु ११॥३३ । "अथर्ववेदमन्त्र व देवेन्द्र समपूजयेत् (अङ्गिराः)॥ ततस्तु भगवानिन्द्रः प्रहृष्टः समपद्यते वरच प्रददौ तस्म अथर्वाङ्गिरसे तदा ॥ अथर्वाङ्गिरसोनामवेदेऽस्मिन् वै भविष्यति । उदाहरणमतद्धि यज्ञभागञ्च लपस्वसे ॥" महाभारत उद्योगपर्व-१७०। (अङ्गिरा ऋषिने ) अथर्व वेदोक्त मन्त्रपाठपूर्वक देवेन्द्रकी पूजा की। उस दर्शनसे भगवान् इन्द्रने सन्तुष्ट और हृष्ट हो वर दिया कि उनका अथर्वाङ्गि-रस नाम वेदमें प्रसिद्ध और उन्हें सर्वत्र यज्ञभाग प्राप्त होगा। "मेदसा तर्पयेद्देवानथर्वाङ्गिरस: पठन्। पितृच मधुसपिया॑मन्वहं शक्तितो चिजः ॥" याज्ञवल्का १४४ । "द ववलप्रवत्ता ये देवद्रोहादभिशस्तका अथर्वकृता उपसर्गकताच (व्याधयः)।" सुश्रुत-सूच । इसके सिवा-'पाथर्वणिकस्येकलीपश्च' ४।३।१३३, 'कपि- बोधादाङ्गिरसे' ४।१।१०७, 'दाण्डिनायनहास्तिनायनाथर्वणिक० ६।४।१७४ इत्यादि पाणिनिसूत्रों द्वारा क्या बोधनहीं हो सकता कि पाणिनिसे भी पहले अथर्ववेद विद्यमान था ? इन्हीं सकल प्रमाणों द्वारा हम स्वीकार करते हैं, कि अथव वेद अति प्राचीन है। ब्रह्माण्डपुराणमें लिखा है- "अथर्वाणं विधा कृत्वा सुमन्तुरददद बिजाः कवन्धाय पुनः कृतन स च विद्याद्यथाक्रमम् ॥ ५१ छान्दोग्योपनिषत् ३।४।१-२, तैत्तिरीयोपनिषत् २।३, बृहदारण्यक २४।१०, २०४।१२. शतपथब्राह्मण ११॥५॥२७, १४।६।१०६ प्रभृति ।<noinclude></noinclude> 572zrcdcrfmw4dqdnba7xdg02fjkb7t 665061 665048 2026-07-06T04:01:07Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार, वर्तनी सुधार 665061 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववत्—अथर्ववेद'''|'''२९७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> अथर्ववत् (सं॰ अव्य॰) अथर्वन् या उनके वंशजोंकी भांति। अथर्व विद् (सं॰ पु॰) अथर्व वेदको जाननेवाला ब्राह्मगा। अथर्ववेद (सं॰ पु॰) कर्मधा॰। चतुर्थ वेद। मार्कण्डेय-पुराणमें लिखा है, कि अथर्व वेद ब्रह्माके उत्तर-मुखसे उत्पन्न हुआ था। यह वेद भ्रमर और अञ्जन जैसा कृष्णवर्ण है, तथा घोराघोर स्वरूप और शान्ति एवं अभिचारिकादि प्रक्रियाओंसे परिपूर्ण है। कहते हैं, कि ऋक्, यजुः और साम—इन तीन वेदोंका कोई-कोई अंश ले तथा कितने ही नये विषय संलग्न कर अथर्वा ऋषिने इस वेदका प्रचार किया।भागवतके मतानुसार ब्रह्माके दक्षिण और विष्णु-पुराणके मतानुसार ब्रह्माके उत्तर मुखसे अथर्ववेद निकला है। <small>(भागवत ३।१२।३७, विष्णु पुराण १।५।५५।)</small> विष्णुपुराणमें एक जगह लिखा है,— {{Block center|<poem><small>"एक आसीदृयजुर्वेदस्तं चतुर्द्धा व्यकल्पयत्। चातुर्हीचमभूद्यम्मिंस्तेन यज्ञमथाकरीत्॥ ११ आव्वर्यवं यजुभिंस्तु ऋग् भिर्हीत्रं तथा मुनिः। औट्गात्रं सामभिश्र्चके ब्रह्मत्वञ्चाप्यथर्व भिः॥ १२ ततः स ऋचमुहृत्य ऋग्वेदं कृतवान् मुनिः। यजूंषि च यजुर्वदं सामवेदञ्च सामभिः॥ १३ राज्ञस्त्वथर्व वे देन सर्व्वकर्म्माणि स प्रभुः। कारयामास मैत्रेय ब्रह्मत्वञ्च यथास्थिति॥" १४ (३ अंश, ४ अध्याय।)</small></poem> 'पहले यजुर्वेद अर्थात् आध्वर्यव-क्रियाप्रधान वेद एक प्रकारका था। वेदव्यासने इस यजुःप्रधान वेदके चार भाग बनाये, जिससे चातुर्होत्र स्थापित हुआ। उन्होंने उसके द्वारा यज्ञानुष्ठानकी विधि निर्ड्वारित की। इस चातुर्होत्रमें उन्होंने यजुर्वेद द्वारा आध्वर्यव, ऋग्वेद द्वारा होत्र, सामवेद द्वारा औद्गात्र और अथर्ववेद द्वारा यथाविधान ब्रह्मत्व स्थापन किया, और क्षत्रियोंके शान्तिपुष्टि प्रभृति समुदाय दैवकर्म इस अथर्ववेद हारा ही कराये।' यह बड़े ही आक्षेपका विषय है, कि जिस वेदको विष्णुपुराण इतना माननीय समझता और जिस वेदमें ब्रह्मत्व प्रतिपादित हुआ है, उसी अथर्ववेदको इस देशके वेदज्ञानविहीन पण्डित कुरानका अंशमात्र मानते हैं। वह इस वेदको जितना आधुनिक समझते, वास्तविक यह उतना आधुनिक नहीं। यह सत्य है, कि किसी-किसी पुराण और अमरकोष-जैसे ग्रन्थमें भी तीन वेदोंके सिवा चौथेका उल्लेख नहीं पाया जाता। <small>(अमरकोष—१।१।४।४ देखो।)</small> किन्तु प्राचीन उपनिषत्, स्मृति, रामायण, महा-भारत और कितने ही पुराणों में भी अथर्वाङ्गिरस या अथर्व वेद उल्लिखित हुआ है।<ref><small>छान्दोग्योपनिषत् ३।४।१-२, तैत्तिरीयोपनिषत् २।३, बृहदारण्यक २।४।१०, २।४।१२, शतपथब्राह्मण ११।५।३।७, १४।६।१०।६ प्रभृति।</small></ref> {{Block center|<poem><small>"श्रुतीरथर्वाङ्गिरसी कुर्यादित्यविचारयन्। वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्धादरीन् द्विजः॥" मनु ११।३३। "अथर्ववेदमन्त्रैश्र्च देवेन्द्रं समपूजयेत् (अङ्गिराः)॥ ततस्तु भगवानिन्द्रः प्रहृष्टः समपद्यत॥ वरञ्च प्रददौ तस्मै अथर्वाङ्गिरसे तदा॥ अथर्वाङ्गिरसोनामवेदेऽस्मिन् वै भविष्यति। उदाहरणमेतद्धि यज्ञभागञ्च लप्स्वसे॥"</poem></small> {{Right|<small>महाभारत उद्योगपर्व—१७ अ॰।</small>}} (अङ्गिरा ऋषिने) अथर्व वेदोक्त मन्त्रपाठपूर्वक देवेन्द्रकी पूजा की। उस दर्शनसे भगवान् इन्द्रने सन्तुष्ट और हृष्ट हो वर दिया कि उनका अथर्वाङ्गि-रस नाम वेदमें प्रसिद्ध और उन्हें सर्वत्र यज्ञभाग प्राप्त होगा। {{Block center|<poem><small>"मेदसा तर्पयेद्देवानथर्वाङ्गिरसः पठन्। पितृंश्र्च मधुसर्पिर्म्यामन्वहं शक्तितो द्विजः॥" याज्ञवल्का १।४४।</poem></small> <small>"दैवबलप्रवत्ता ये देवद्रोहादभिशस्तका अथर्वकृता उपसर्गकृताश्र्चः (व्याधयः)।" सुश्रुत—सूच।</small> इसके सिवा—<small>'आथर्वणिकस्येकलीपश्च' ४।३।१३३, 'कपि- बोधादाङ्गिरसे' ४।१।१०७, 'दाण्डिनायनहास्तिनायनाथर्वणिक॰ ६।४।१७४</small> इत्यादि पाणिनिसूत्रों द्वारा क्या बोधनहीं हो सकता कि पाणिनिसे भी पहले अथर्ववेद विद्यमान था? इन्हीं सकल प्रमाणों द्वारा हम स्वीकार करते हैं, कि अथव वेद अति प्राचीन है। ब्रह्माण्डपुराणमें लिखा है— {{Block center|<poem><small>"अथर्वाणं द्विधा कृत्वा सुमन्तुरददद द्विजाः। कवन्धाय पुनः कृत्स्रं स च विद्याद्यथाक्रमम्॥ ५१</poem></small> {{Rule}}<noinclude>{{Left|७५}}</noinclude> kov1vnqhsa90vwsx3wik98ddk8wp2xa 665062 665061 2026-07-06T04:01:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 665062 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववत्—अथर्ववेद'''|'''२९७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> अथर्ववत् (सं॰ अव्य॰) अथर्वन् या उनके वंशजोंकी भांति। अथर्व विद् (सं॰ पु॰) अथर्व वेदको जाननेवाला ब्राह्मगा। अथर्ववेद (सं॰ पु॰) कर्मधा॰। चतुर्थ वेद। मार्कण्डेय-पुराणमें लिखा है, कि अथर्व वेद ब्रह्माके उत्तर-मुखसे उत्पन्न हुआ था। यह वेद भ्रमर और अञ्जन जैसा कृष्णवर्ण है, तथा घोराघोर स्वरूप और शान्ति एवं अभिचारिकादि प्रक्रियाओंसे परिपूर्ण है। कहते हैं, कि ऋक्, यजुः और साम—इन तीन वेदोंका कोई-कोई अंश ले तथा कितने ही नये विषय संलग्न कर अथर्वा ऋषिने इस वेदका प्रचार किया।भागवतके मतानुसार ब्रह्माके दक्षिण और विष्णु-पुराणके मतानुसार ब्रह्माके उत्तर मुखसे अथर्ववेद निकला है। <small>(भागवत ३।१२।३७, विष्णु पुराण १।५।५५।)</small> विष्णुपुराणमें एक जगह लिखा है,— {{Block center|<poem><small>"एक आसीदृयजुर्वेदस्तं चतुर्द्धा व्यकल्पयत्। चातुर्हीचमभूद्यम्मिंस्तेन यज्ञमथाकरीत्॥ ११ आव्वर्यवं यजुभिंस्तु ऋग् भिर्हीत्रं तथा मुनिः। औट्गात्रं सामभिश्र्चके ब्रह्मत्वञ्चाप्यथर्व भिः॥ १२ ततः स ऋचमुहृत्य ऋग्वेदं कृतवान् मुनिः। यजूंषि च यजुर्वदं सामवेदञ्च सामभिः॥ १३ राज्ञस्त्वथर्व वे देन सर्व्वकर्म्माणि स प्रभुः। कारयामास मैत्रेय ब्रह्मत्वञ्च यथास्थिति॥" १४ (३ अंश, ४ अध्याय।)</small></poem>}} 'पहले यजुर्वेद अर्थात् आध्वर्यव-क्रियाप्रधान वेद एक प्रकारका था। वेदव्यासने इस यजुःप्रधान वेदके चार भाग बनाये, जिससे चातुर्होत्र स्थापित हुआ। उन्होंने उसके द्वारा यज्ञानुष्ठानकी विधि निर्ड्वारित की। इस चातुर्होत्रमें उन्होंने यजुर्वेद द्वारा आध्वर्यव, ऋग्वेद द्वारा होत्र, सामवेद द्वारा औद्गात्र और अथर्ववेद द्वारा यथाविधान ब्रह्मत्व स्थापन किया, और क्षत्रियोंके शान्तिपुष्टि प्रभृति समुदाय दैवकर्म इस अथर्ववेद हारा ही कराये।' यह बड़े ही आक्षेपका विषय है, कि जिस वेदको विष्णुपुराण इतना माननीय समझता और जिस वेदमें ब्रह्मत्व प्रतिपादित हुआ है, उसी अथर्ववेदको इस देशके वेदज्ञानविहीन पण्डित कुरानका अंशमात्र मानते हैं। वह इस वेदको जितना आधुनिक समझते, वास्तविक यह उतना आधुनिक नहीं। यह सत्य है, कि किसी-किसी पुराण और अमरकोष-जैसे ग्रन्थमें भी तीन वेदोंके सिवा चौथेका उल्लेख नहीं पाया जाता। <small>(अमरकोष—१।१।४।४ देखो।)</small> किन्तु प्राचीन उपनिषत्, स्मृति, रामायण, महा-भारत और कितने ही पुराणों में भी अथर्वाङ्गिरस या अथर्व वेद उल्लिखित हुआ है।<ref><small>छान्दोग्योपनिषत् ३।४।१-२, तैत्तिरीयोपनिषत् २।३, बृहदारण्यक २।४।१०, २।४।१२, शतपथब्राह्मण ११।५।३।७, १४।६।१०।६ प्रभृति।</small></ref> {{Block center|<poem><small>"श्रुतीरथर्वाङ्गिरसी कुर्यादित्यविचारयन्। वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्धादरीन् द्विजः॥" मनु ११।३३। "अथर्ववेदमन्त्रैश्र्च देवेन्द्रं समपूजयेत् (अङ्गिराः)॥ ततस्तु भगवानिन्द्रः प्रहृष्टः समपद्यत॥ वरञ्च प्रददौ तस्मै अथर्वाङ्गिरसे तदा॥ अथर्वाङ्गिरसोनामवेदेऽस्मिन् वै भविष्यति। 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यह सत्य है, कि किसी-किसी पुराण और अमरकोष-जैसे ग्रन्थमें भी तीन वेदोंके सिवा चौथेका उल्लेख नहीं पाया जाता। <small>(अमरकोष—१।१।४।४ देखो।)</small> किन्तु प्राचीन उपनिषत्, स्मृति, रामायण, महा-भारत और कितने ही पुराणों में भी अथर्वाङ्गिरस या अथर्व वेद उल्लिखित हुआ है।<ref><small>छान्दोग्योपनिषत् ३।४।१-२, तैत्तिरीयोपनिषत् २।३, बृहदारण्यक २।४।१०, २।४।१२, शतपथब्राह्मण ११।५।३।७, १४।६।१०।६ प्रभृति।</small></ref> {{Block center|<poem><small>"श्रुतीरथर्वाङ्गिरसी कुर्यादित्यविचारयन्। वाक्शस्त्रं वै ब्राह्मणस्य तेन हन्धादरीन् द्विजः॥" मनु ११।३३। "अथर्ववेदमन्त्रैश्र्च देवेन्द्रं समपूजयेत् (अङ्गिराः)॥ ततस्तु भगवानिन्द्रः प्रहृष्टः समपद्यत॥ वरञ्च प्रददौ तस्मै अथर्वाङ्गिरसे तदा॥ अथर्वाङ्गिरसोनामवेदेऽस्मिन् वै भविष्यति। उदाहरणमेतद्धि यज्ञभागञ्च लप्स्वसे॥"</poem></small>}} {{Right|<small>महाभारत उद्योगपर्व—१७ अ॰।</small>}} (अङ्गिरा ऋषिने) अथर्व वेदोक्त मन्त्रपाठपूर्वक देवेन्द्रकी पूजा की। उस दर्शनसे भगवान् इन्द्रने सन्तुष्ट और हृष्ट हो वर दिया कि उनका अथर्वाङ्गि-रस नाम वेदमें प्रसिद्ध और उन्हें सर्वत्र यज्ञभाग प्राप्त होगा। {{Block center|<poem><small>"मेदसा तर्पयेद्देवानथर्वाङ्गिरसः पठन्। पितृंश्र्च मधुसर्पिर्म्यामन्वहं शक्तितो द्विजः॥" याज्ञवल्का १।४४।</poem></small>}} <small>"दैवबलप्रवत्ता ये देवद्रोहादभिशस्तका अथर्वकृता उपसर्गकृताश्र्चः (व्याधयः)।" सुश्रुत—सूच।</small> इसके सिवा—<small>'आथर्वणिकस्येकलीपश्च' ४।३।१३३, 'कपि- बोधादाङ्गिरसे' ४।१।१०७, 'दाण्डिनायनहास्तिनायनाथर्वणिक॰ ६।४।१७४</small> इत्यादि पाणिनिसूत्रों द्वारा क्या बोधनहीं हो सकता कि पाणिनिसे भी पहले अथर्ववेद विद्यमान था? इन्हीं सकल प्रमाणों द्वारा हम स्वीकार करते हैं, कि अथव वेद अति प्राचीन है। ब्रह्माण्डपुराणमें लिखा है— {{Block center|<poem><small>"अथर्वाणं द्विधा कृत्वा सुमन्तुरददद द्विजाः। कवन्धाय पुनः कृत्स्रं स च विद्याद्यथाक्रमम्॥ ५१</poem></small>}} {{Rule}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Left|७५}}</noinclude> 3npicy70m8lq2vr7ivok75de6n7gqjo पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३०५ 250 83593 665097 347006 2026-07-06T08:05:06Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 665097 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२९८'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> {{Block center|<poem><small> कबञ्चस्तु द्विधा कृत्वा पव्यायैकं पुनर्द दौ। द्वितीयं वेदस्पशीय स चतुर्द्वाकरीत् पुनः॥ ५२ मोदो ब्रह्मवलश्चैव पिप्पलादस्तथैव च। शौक्कायनिश्च धर्मज्ञयतुर्थस्तपनः स्मृतः। बेदस्पर्शस्य चत्वारः शिष्वास्त्वे ते दृढवताः॥ ५३ पुनश्च विविधंं विद्धि पथ्यानां भेदमुत्तमम्। जाजलिः कुसुदादिश्च तृतोय: शौनक: स्मृ तः॥ ५४ शौनकस्तु द्विधा कृत्वा ददावे कन्तु वभ्रवे। द्वितीयां संहितां धीमान् सैन्धवायनसंज्ञिते॥ ५५ सैन्धवो मुञ्चकेशाय भिन्ना सा च विधा पुनः। नक्षत्रकल्पो वैतानस्तृतीयः संहिताविधिः॥ ५६ चतुर्थोऽङ्गिरसः कल्पो शान्तिकल्पश्च पञ्चमः। श्रेष्ठस्वथर्व णेह्येते संहितानां विकल्पना:॥ ५७ षटशः कृत्वा मयाप्युक्तं पुराणमृषिसत्तमाः। {{Gap}}×{{gap}}×{{gap}}× ऋचामयर्वणां पञ्चसहस्राणि विनिश्चयः। सहस्रमन्यद्विज्ञेयमृषिभिर्विशतिं विना॥ ७५ एतदङ्गिरसा प्रोक्तं तेषामारण्यकं पुनः। इति संख्या प्रसंख्याता शाखाभेदास्तथैव च॥" ७३ (६५ अ॰)</poem></small>}} अग्निपुराणमें इसतरह लिखा गया है,— {{Block center|<poem><small>"सुमन्तुर्जाजलिश्चैव श्लोकायनिरथर्वके॥ ८ शीनकः पिप्पलादश्च मुञ्जकेशादवोऽपरे। मन्त्राणामयुतं षष्टिण्तञ्चोपनिषच्छतम्॥" ९ (२७१ अ॰)</poem></small>}} उक्त पुराणसकलका भावार्थ यह है,—महर्षि सुमन्तुने अथर्ववेद दो भागोंमें विभक्तकर कवन्ध नामक शिष्यको पढ़ाया। कवन्धने अथर्ववेद दो भागों में बांटके पथ्य और वेदस्पर्श या देवदर्श नामक दो शिष्योंको दिया। वेदस्पर्शने फिर चार भाग बना मोद, ब्रह्मबल या ब्रह्मबलि, पिप्पलाद और शौक्कायणि या शौक्तायणि या श्लोकायनिको यह दान किया। पथ्यने फिर तीन भाग कर जाजलि, कुमुदादि और शौनकको संहिता दे दी। शौनकने अधीत संहिता दो भागोंमें बांटी और उनमें एक शाखा वभ्रु को और एक शाखा सैन्धवायनको पढ़ायी। सैन्धव अर्थात् सैन्धवायनशिष्य और मुञ्जकेश अर्थात् वधु के शिष्यने अपनी-अपनी संहिता दो-दो शाखाओं में विभक्त की नक्षत्रकल्प, वैतान या वेदकल्प, संहिताकल्प, आङ्गिरः या आङ्गिरसकल्प और शान्तिकल्प—यह पांच अंश संहितासमुदायमें विकल्पक और अथर्व वेदमें श्रेष्ठ हैं। ब्रह्माण्डपुराणके मतसे अथर्ववेदमें ५००० ऋक् और २० ऋषि हैं, जिन्हें अङ्गिरसने बनाया है। अग्निपुराणके मतसे इसके षष्टि-सहस्राधिक अयुत मन्त्र और एकशत उपनिषत् हैं। अथर्व वेदका प्रकृत नाम 'अथर्वाङ्गिरस' है। इस अथर्वाङ्गिरस शब्दके संक्षेपमें उल्लेख करनेको लोग 'अथर्व वेद' कहते हैं। इस समय यही विवेचना करके देखना आवश्यक है, कि अथर्व शब्दका क्या अर्थ है? ऋग्वेदमें अथर्व शब्दके अनेक प्रयोग देख पड़ते हैं। इन सब स्थलोंके भाष्यमें सायणाचार्यन अथर्व शब्दका अर्थ प्रायः ऋषि लिखा है। हौग् साहब कहते हैं, कि अथर्व शब्दका अर्थ ज़िन्द आविश्ताके अनुसार—'अग्नि-पुरोहित' होता है। अथर्व वेदमें भी अनेक स्थलोंपर अथर्व शब्दका उल्लेख मिलता है— <small>"अजीजनो हि वरुण स्वधावन् अथर्वाणं पितरं देववन्धु।"</small> 'हे स्वधावन् वरुण! देववन्धु पिता अथर्वाको, आपने उत्पन्न किया है।' इसके द्वारा स्पष्ट ही समझ पड़ता, कि अथर्वा किसी ऋषि विशेषका नाम है। अथर्वन् शब्दमें भी प्रमाण दे दिया गया है, कि अथर्वा नामक ऋषि आदिपुरुष ब्रह्मा ज्येष्ठ पुत्र थे। अङ्गिरा भी एक प्रधान ऋषि रहे। ऋगादि सकल ही वेदोंमें अङ्गिरस् नामका उल्लेख विद्यमान है। जान पड़ता है, कि अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिके वंशधरोंने ही अथर्वाङ्गिरस संहिता अर्थात् अथर्व- वेदका सङ्कलन किया था। किसी-किसी विद्वान्के मतसे भृगुवंशीयोंने इस वेदके अनेक मन्त्रोंकी रचना की है। नीचे अथर्ववेदके १९ वें काण्डसे २३ वां और २४ वां सूक्त उद्धृत किया गया है। उसकी पढ़नेसे मालूम हो सकता है, कि पहले अथर्वा और अङ्गिरा वशीयोंके अनेक मन्त्र थे, जिन सम्पूर्ण मन्त्रों के एकत्र सङ्कलनसे अथर्ववेदकी उत्पत्ति हुई। अथर्ववंशीयगण जिस प्रणालीसे मन्त्र रखते, वेदमें वही प्रणाली पाई जाती है। केवल अङ्गिरसोंके मन्त्र मिला देनेको स्थान-स्थानमें अन्य प्रणालीका अवलम्बन किया गया है।<noinclude></noinclude> mveu844pele7j8t2eu7t8b7nerhkqfz 665100 665097 2026-07-06T08:06:21Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 665100 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२९८'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> {{Block center|<poem><small> कबञ्चस्तु द्विधा कृत्वा पव्यायैकं पुनर्द दौ। द्वितीयं वेदस्पशीय स चतुर्द्वाकरीत् पुनः॥ ५२ मोदो ब्रह्मवलश्चैव पिप्पलादस्तथैव च। शौक्कायनिश्च धर्मज्ञयतुर्थस्तपनः स्मृतः। बेदस्पर्शस्य चत्वारः शिष्वास्त्वे ते दृढवताः॥ ५३ पुनश्च विविधंं विद्धि पथ्यानां भेदमुत्तमम्। जाजलिः कुसुदादिश्च तृतोय: शौनक: स्मृ तः॥ ५४ शौनकस्तु द्विधा कृत्वा ददावे कन्तु वभ्रवे। द्वितीयां संहितां धीमान् सैन्धवायनसंज्ञिते॥ ५५ सैन्धवो मुञ्चकेशाय भिन्ना सा च विधा पुनः। नक्षत्रकल्पो वैतानस्तृतीयः संहिताविधिः॥ ५६ चतुर्थोऽङ्गिरसः कल्पो शान्तिकल्पश्च पञ्चमः। श्रेष्ठस्वथर्व णेह्येते संहितानां विकल्पना:॥ ५७ षटशः कृत्वा मयाप्युक्तं पुराणमृषिसत्तमाः। {{Gap}}×{{gap}}×{{gap}}× ऋचामयर्वणां पञ्चसहस्राणि विनिश्चयः। सहस्रमन्यद्विज्ञेयमृषिभिर्विशतिं विना॥ ७५ एतदङ्गिरसा प्रोक्तं तेषामारण्यकं पुनः। इति संख्या प्रसंख्याता शाखाभेदास्तथैव च॥" ७३ (६५ अ॰)</poem></small>}} अग्निपुराणमें इसतरह लिखा गया है,— {{Block center|<poem><small>"सुमन्तुर्जाजलिश्चैव श्लोकायनिरथर्वके॥ ८ शीनकः पिप्पलादश्च मुञ्जकेशादवोऽपरे। मन्त्राणामयुतं षष्टिण्तञ्चोपनिषच्छतम्॥" ९ (२७१ अ॰)</poem></small>}} उक्त पुराणसकलका भावार्थ यह है,—महर्षि सुमन्तुने अथर्ववेद दो भागोंमें विभक्तकर कवन्ध नामक शिष्यको पढ़ाया। कवन्धने अथर्ववेद दो भागों में बांटके पथ्य और वेदस्पर्श या देवदर्श नामक दो शिष्योंको दिया। वेदस्पर्शने फिर चार भाग बना मोद, ब्रह्मबल या ब्रह्मबलि, पिप्पलाद और शौक्कायणि या शौक्तायणि या श्लोकायनिको यह दान किया। पथ्यने फिर तीन भाग कर जाजलि, कुमुदादि और शौनकको संहिता दे दी। शौनकने अधीत संहिता दो भागोंमें बांटी और उनमें एक शाखा वभ्रु को और एक शाखा सैन्धवायनको पढ़ायी। सैन्धव अर्थात् सैन्धवायनशिष्य और मुञ्जकेश अर्थात् वधु के शिष्यने अपनी-अपनी संहिता दो-दो शाखाओं में विभक्त की नक्षत्रकल्प, वैतान या वेदकल्प, संहिताकल्प, आङ्गिरः या आङ्गिरसकल्प और शान्तिकल्प—यह पांच अंश संहितासमुदायमें विकल्पक<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>और अथर्व वेदमें श्रेष्ठ हैं। ब्रह्माण्डपुराणके मतसे अथर्ववेदमें ५००० ऋक् और २० ऋषि हैं, जिन्हें अङ्गिरसने बनाया है। अग्निपुराणके मतसे इसके षष्टि-सहस्राधिक अयुत मन्त्र और एकशत उपनिषत् हैं। अथर्व वेदका प्रकृत नाम 'अथर्वाङ्गिरस' है। इस अथर्वाङ्गिरस शब्दके संक्षेपमें उल्लेख करनेको लोग 'अथर्व वेद' कहते हैं। इस समय यही विवेचना करके देखना आवश्यक है, कि अथर्व शब्दका क्या अर्थ है? ऋग्वेदमें अथर्व शब्दके अनेक प्रयोग देख पड़ते हैं। इन सब स्थलोंके भाष्यमें सायणाचार्यन अथर्व शब्दका अर्थ प्रायः ऋषि लिखा है। हौग् साहब कहते हैं, कि अथर्व शब्दका अर्थ ज़िन्द आविश्ताके अनुसार—'अग्नि-पुरोहित' होता है। अथर्व वेदमें भी अनेक स्थलोंपर अथर्व शब्दका उल्लेख मिलता है— <small>"अजीजनो हि वरुण स्वधावन् अथर्वाणं पितरं देववन्धु।"</small> 'हे स्वधावन् वरुण! देववन्धु पिता अथर्वाको, आपने उत्पन्न किया है।' इसके द्वारा स्पष्ट ही समझ पड़ता, कि अथर्वा किसी ऋषि विशेषका नाम है। अथर्वन् शब्दमें भी प्रमाण दे दिया गया है, कि अथर्वा नामक ऋषि आदिपुरुष ब्रह्मा ज्येष्ठ पुत्र थे। अङ्गिरा भी एक प्रधान ऋषि रहे। ऋगादि सकल ही वेदोंमें अङ्गिरस् नामका उल्लेख विद्यमान है। जान पड़ता है, कि अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिके वंशधरोंने ही अथर्वाङ्गिरस संहिता अर्थात् अथर्व- वेदका सङ्कलन किया था। किसी-किसी विद्वान्के मतसे भृगुवंशीयोंने इस वेदके अनेक मन्त्रोंकी रचना की है। नीचे अथर्ववेदके १९ वें काण्डसे २३ वां और २४ वां सूक्त उद्धृत किया गया है। उसकी पढ़नेसे मालूम हो सकता है, कि पहले अथर्वा और अङ्गिरा वशीयोंके अनेक मन्त्र थे, जिन सम्पूर्ण मन्त्रों के एकत्र सङ्कलनसे अथर्ववेदकी उत्पत्ति हुई। अथर्ववंशीयगण जिस प्रणालीसे मन्त्र रखते, वेदमें वही प्रणाली पाई जाती है। केवल अङ्गिरसोंके मन्त्र मिला देनेको स्थान-स्थानमें अन्य प्रणालीका अवलम्बन किया गया है।<noinclude></noinclude> lbi15ihbn1jabdmc2hr5o9vx2oegsdj 665101 665100 2026-07-06T08:06:54Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 665101 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''२९८'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> {{Block center|<poem><small> कबञ्चस्तु द्विधा कृत्वा पव्यायैकं पुनर्द दौ। द्वितीयं वेदस्पशीय स चतुर्द्वाकरीत् पुनः॥ ५२ मोदो ब्रह्मवलश्चैव पिप्पलादस्तथैव च। शौक्कायनिश्च धर्मज्ञयतुर्थस्तपनः स्मृतः। बेदस्पर्शस्य चत्वारः शिष्वास्त्वे ते दृढवताः॥ ५३ पुनश्च विविधंं विद्धि पथ्यानां भेदमुत्तमम्। जाजलिः कुसुदादिश्च तृतोय: शौनक: स्मृ तः॥ ५४ शौनकस्तु द्विधा कृत्वा ददावे कन्तु वभ्रवे। द्वितीयां संहितां धीमान् 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जाजलि, कुमुदादि और शौनकको संहिता दे दी। शौनकने अधीत संहिता दो भागोंमें बांटी और उनमें एक शाखा वभ्रु को और एक शाखा सैन्धवायनको पढ़ायी। सैन्धव अर्थात् सैन्धवायनशिष्य और मुञ्जकेश अर्थात् वधु के शिष्यने अपनी-अपनी संहिता दो-दो शाखाओं में विभक्त की नक्षत्रकल्प, वैतान या वेदकल्प, संहिताकल्प, आङ्गिरः या आङ्गिरसकल्प और शान्तिकल्प—यह पांच अंश संहितासमुदायमें विकल्पक<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>और अथर्व वेदमें श्रेष्ठ हैं। ब्रह्माण्डपुराणके मतसे अथर्ववेदमें ५००० ऋक् और २० ऋषि हैं, जिन्हें अङ्गिरसने बनाया है। अग्निपुराणके मतसे इसके षष्टि-सहस्राधिक अयुत मन्त्र और एकशत उपनिषत् हैं। अथर्व वेदका प्रकृत नाम 'अथर्वाङ्गिरस' है। इस अथर्वाङ्गिरस शब्दके संक्षेपमें उल्लेख करनेको लोग 'अथर्व वेद' कहते हैं। इस समय यही विवेचना करके देखना आवश्यक है, कि अथर्व शब्दका क्या अर्थ है? ऋग्वेदमें अथर्व शब्दके अनेक प्रयोग देख पड़ते हैं। इन सब स्थलोंके भाष्यमें सायणाचार्यन अथर्व शब्दका अर्थ प्रायः ऋषि लिखा है। हौग् साहब कहते हैं, कि अथर्व शब्दका अर्थ ज़िन्द आविश्ताके अनुसार—'अग्नि-पुरोहित' होता है। अथर्व वेदमें भी अनेक स्थलोंपर अथर्व शब्दका उल्लेख मिलता है— <small>"अजीजनो हि वरुण स्वधावन् अथर्वाणं पितरं देववन्धु।"</small> 'हे स्वधावन् वरुण! देववन्धु पिता अथर्वाको, आपने उत्पन्न किया है।' इसके द्वारा स्पष्ट ही समझ पड़ता, कि अथर्वा किसी ऋषि विशेषका नाम है। अथर्वन् शब्दमें भी प्रमाण दे दिया गया है, कि अथर्वा नामक ऋषि आदिपुरुष ब्रह्मा ज्येष्ठ पुत्र थे। अङ्गिरा भी एक प्रधान ऋषि रहे। ऋगादि सकल ही वेदोंमें अङ्गिरस् नामका उल्लेख विद्यमान है। जान पड़ता है, कि अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिके वंशधरोंने ही अथर्वाङ्गिरस संहिता अर्थात् अथर्व- वेदका सङ्कलन किया था। किसी-किसी विद्वान्के मतसे भृगुवंशीयोंने इस वेदके अनेक मन्त्रोंकी रचना की है। नीचे अथर्ववेदके १९ वें काण्डसे २३ वां और २४ वां सूक्त उद्धृत किया गया है। उसकी पढ़नेसे मालूम हो सकता है, कि पहले अथर्वा और अङ्गिरा वशीयोंके अनेक मन्त्र थे, जिन सम्पूर्ण मन्त्रों के एकत्र सङ्कलनसे अथर्ववेदकी उत्पत्ति हुई। अथर्ववंशीयगण जिस प्रणालीसे मन्त्र रखते, वेदमें वही प्रणाली पाई जाती है। केवल अङ्गिरसोंके मन्त्र मिला देनेको स्थान-स्थानमें अन्य प्रणालीका अवलम्बन किया गया है। 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नक्षत्रकल्प, वैतान या वेदकल्प, संहिताकल्प, आङ्गिरः या आङ्गिरसकल्प और शान्तिकल्प—यह पांच अंश संहितासमुदायमें विकल्पक<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>और अथर्व वेदमें श्रेष्ठ हैं। ब्रह्माण्डपुराणके मतसे अथर्ववेदमें ५००० ऋक् और २० ऋषि हैं, जिन्हें अङ्गिरसने बनाया है। अग्निपुराणके मतसे इसके षष्टि-सहस्राधिक अयुत मन्त्र और एकशत उपनिषत् हैं। अथर्व वेदका प्रकृत नाम 'अथर्वाङ्गिरस' है। इस अथर्वाङ्गिरस शब्दके संक्षेपमें उल्लेख करनेको लोग 'अथर्व वेद' कहते हैं। इस समय यही विवेचना करके देखना आवश्यक है, कि अथर्व शब्दका क्या अर्थ है? ऋग्वेदमें अथर्व शब्दके अनेक प्रयोग देख पड़ते हैं। इन सब स्थलोंके भाष्यमें सायणाचार्यन अथर्व शब्दका अर्थ प्रायः ऋषि लिखा है। हौग् साहब कहते हैं, कि अथर्व शब्दका अर्थ ज़िन्द आविश्ताके अनुसार—'अग्नि-पुरोहित' होता है। अथर्व वेदमें भी अनेक स्थलोंपर अथर्व शब्दका उल्लेख मिलता है— <small>"अजीजनो हि वरुण स्वधावन् अथर्वाणं पितरं देववन्धु।"</small> 'हे स्वधावन् वरुण! देववन्धु पिता अथर्वाको, आपने उत्पन्न किया है।' इसके द्वारा स्पष्ट ही समझ पड़ता, कि अथर्वा किसी ऋषि विशेषका नाम है। अथर्वन् शब्दमें भी प्रमाण दे दिया गया है, कि अथर्वा नामक ऋषि आदिपुरुष ब्रह्मा ज्येष्ठ पुत्र थे। अङ्गिरा भी एक प्रधान ऋषि रहे। ऋगादि सकल ही वेदोंमें अङ्गिरस् नामका उल्लेख विद्यमान है। जान पड़ता है, कि अथर्वा और अङ्गिरा ऋषिके वंशधरोंने ही अथर्वाङ्गिरस संहिता अर्थात् अथर्व- वेदका सङ्कलन किया था। किसी-किसी विद्वान्के मतसे भृगुवंशीयोंने इस वेदके अनेक मन्त्रोंकी रचना की है। नीचे अथर्ववेदके १९ वें काण्डसे २३ वां और २४ वां सूक्त उद्धृत किया गया है। उसकी पढ़नेसे मालूम हो सकता है, कि पहले अथर्वा और अङ्गिरा वशीयोंके अनेक मन्त्र थे, जिन सम्पूर्ण मन्त्रों के एकत्र सङ्कलनसे अथर्ववेदकी उत्पत्ति हुई। अथर्ववंशीयगण जिस प्रणालीसे मन्त्र रखते, वेदमें वही प्रणाली पाई जाती है। केवल अङ्गिरसोंके मन्त्र मिला देनेको स्थान-स्थानमें अन्य प्रणालीका अवलम्बन किया गया है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> hne59olgrij5w66tbhsr1g3rji3fa5m पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३०६ 250 83594 665104 347007 2026-07-06T08:24:35Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 665104 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''२९९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>अथर्वणानां चतुभ्यः स्वाहा ।।। पञ्चच भ्यः स्वाहा । २। षड्कचेभ्यः स्वाहा । ३। सप्तर्चेभ्यः स्वाहा । ४ । अष्टच भ्यः स्वाहा। ५ । नवभ्य : स्वाहा । । दश भ्यः स्वाहा । ७। एकादश भ्य: स्वाहा । ८ । हादशच भ्यः स्वाहा ।। बयोदश भ्यः स्वाहा। १०। चतुई शचे भाः स्वाहा । ११ । पञ्चदशचे भाः स्वाहा । १२ । षोडशचे भा: स्वाहा । १३ । सप्तदशच भाः स्वाहा । १४ । अष्टादश भाः स्वाहा। १५ । एकीन- विंशतिः स्वाहा । १६ । विशतिः स्वाहा । १७ महत्काण्डाय खाहा ।१८। उभाः स्वाहा । १६ । एक भाः स्वाहा। २० । क्षुद्र भाः खाहा । २१। एक चैभाः स्वाहा । २२ । रोहितभाः स्वाहा । २३ । मूर्याभवां स्वाहा । २४ । ब्रात्याभवां स्वाहा । २५ । प्रजापत्याभयां स्वाहा । २६ । विषासय स्वाहा । २७ । मङ्गलि केभाः स्वाहा । २८ । ब्रह्मणे स्वाहा । २६ । अथर्व वेदमें भी देखा जाता है, कि प्रथम काण्डके प्रायः सकल सूक्त चार ऋक्से, और द्वितीय काण्डके भी प्रायः सकल सूक्त पांच ऋक्से ग्रथित हैं। इस- लिये अथर्व बंशीयोंके मन्त्र लेकर हो अथर्ववेद "बना है। (२२ सूक्त) आङ्गिरसानामाद्यः पञ्चानुवाक: स्वाहा । १ । षष्ठाय स्वाहा।। समाष्टमाभयां वाहा।३। नौलनखभाः स्वाहा। ४। हरितेभाः स्वाहा ।५। क्षुद्रभाः खाहा हा पर्यायिकभाः खाहा ७ प्रथमेभाः शङ्ख भाः स्वाहा । ८ । हितीवभाः शङ्ख भाः स्वाहा।। तृतीयेभाः शङ्ख भाः स्वाहा ।१०। उपोत्तमभाः स्वाहा । ११ । उत्तमेभाः खाहा। १२ । उत्तरभाः स्वाहा । १३ । नषिभाः स्वाहा। १४ । शिखिभाः स्वाहा । १५। गणेभाः स्वाहा । १६ । महागणेभाः स्वाहा । १७। अर्वेभाः अगिरोभयो विदगणेभाः स्वाहा । १८। पृथक्सहस्राभवां स्वाहा । १६ । ब्रह्मणे स्वाहा। २० । पूर्व कालसे ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेद हो भक्तिपूर्वक पढ़ते रहे और वेद तीन ही प्रसिद्ध थे। इसीसे व दका दूसरा नाम त्रयी पड़ा है। मनु प्रभृति प्राचीन ग्रन्थों को अनुसन्धान कर देखनेसे ऋगादि तीन वेदोंका हौ आदर अधिक जान पड़ता है,- "अग्निवायुरविभ्यस्तु वयं ब्रह्म सनातनं । दुदोह यज्ञसिद्धार्थमृग्यजु:सामलक्षणम् ॥” मनु १॥२३॥ 'यागादिको सिद्धिके लिये उन्होंने अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और सूर्यसे सामवेद उद्धृत किया।' "वयी वै विद्या ऋचो यजुषि सामानि ।" (शतपथ-ब्राह्मण ४।६।७१) 'ऋक्, यजुः और साम-येही तीन विद्यायें हैं।' "प्रजापतिलौकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् प्राबहदनि पृथिव्या वायुमन्तरीक्षादादित्य दिवः । १ । स एतास्तिखो देवता प्रभातपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबहदग्ने कई चोवायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् । २ । स एतां वर्षों विद्यामभातपत् तस्वास्त प्यमानाया रसान् प्रावहद भूरि- त्य ग भयो भुवरिति यजुभाः वरिति सामभाः ।"३॥ (छान्दोग्योपनिषत् ४।१०) 'प्रजापतिने तीनो लोक उत्तप्त किये थे। उन्ह। तप्यमान तीनो लोकोंसे उन्होंने तीन सार भाग बाहर निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरीक्षसे वायु और ग़लोकसे आदित्य उद्धृत किये गये । इसके बाद उन्होंने इन तीन देवताओंमें फिर ताप पहुंचाया। इन तीनो देवताओंके उत्तप्त होनेसे इनका सारांश उद्धृत किया गया। अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और आदित्यसे सामवेद उपलब्ध हुआ। प्रजापतिने इन तीन विद्याओं में फिर ताप छोड़ा। इस वेदत्रयके उत्तप्त होनेपर ऋक्से भूर्, यजुसे भुवः और साम- वेदसे खर् उत्पन्न हुआ। इस प्रकार अनुसन्धान करनेसे स्पष्ट जान पड़ता है, कि पहले ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेदको ही अध्ययन करते थे प्रस्थानभेद-प्रणेता मधुसूदन सरस्वतीने लिखा है.- "स च प्रयोगवर्यण यज्ञनिर्वाहार्थम् ऋग यजुःसामवेदन भिन्नः । अथर्ववेदस्तु यज्ञानुपयुक्तः शान्तिपौष्टिकाभिचारादि-कर्मप्रतिपादक न अत्यन्त विलक्षण एव ।" 'यज्ञादि सम्पन्न करनेके लिये वेदके, ऋक्, यजुः और साम-यह तीन प्रकारके विभाग किये गये हैं। *** अथर्ववेद यागादिकोंमें तो अनुपयुक्त है, परन्तु शान्ति, पौष्टिक और अभिचार आदिका इसमें अच्छा वर्णन किया गया है। इसलिये यह बड़ा ही *** अद्भुत है।' . । अनेक लोग अनुमान करते हैं, कि अथर्ववेद तो म्लेच्छोंका वेद है ; ब्राह्मण कभी इस वेदका आदर न करते थे। किन्तु यह भ्रान्त सिद्धान्त है। वास्तविक रूपसे यह म्लेच्छोंका वेद नहीं, यह व्रात्यवेद है अब विचारना चाहिये, कि व्रात्य कहनेसे क्या समझा जाता है। मनुने व्रात्यके सम्बन्धमें इस प्रकार अपने मतको प्रकाश किया है,- "आषोडशाद ब्राह्मणस्य साविवी नातिवर्तते । आहाविशात् क्षबोबन्धोराचतुर्विशतेविंशः ॥ अत जई बयोऽप्ये ते यथाकालमसंस्कृ ताः । सावित्रीपतिता वाल्या भवत्यार्यविगर्हिताः ॥” मनु २।२८-३८ ।<noinclude></noinclude> dta1k726na2y45maamye5d7y0ogtcob पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/६ 250 101963 665028 367235 2026-07-05T16:55:21Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 665028 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|६| कपिलाचार्य-कपिल्लिका}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> कपिलाचार्य (सं० पु०) कपिलः कपिलनामा प्राचार्यः, कर्मधा०। १ कपिलऋषि। २ विष्णु। "महर्षि: कपिलाचार्यः सम्भूतो मेदिनीपतिः।" (विष्णुस०) कपिलाजन (सं० पु०)कपिलं अञ्जनं यत्र, बहुव्री०। शिव, महादेव। कपिलातीर्थ (सं० क्ली०) तीर्थ विशेष। इस तीर्थ में ब्रह्मचारी रह स्नान और पितृलोक तथा देवताओं की अर्चना करने से सहस्र कपिला गोदान का फल मिलता है। <Small>(भारत ८४।४५)<small/> कपिलादान (सं० क्ली०) कपिलाया दानम्, ६-तत्। कपिलागोदान। मत्स्यपुराण में कपिला के दान का यह मन्त्र लिखा है— <Small>"कपिले सर्वभूतानां पूजनीयासि रोहिणि। सर्वदेवमयी यस्मात् अतः शान्ति प्रयच्छ मे।।"<small/> घण्टा, चामर, किङ्किणी, दिव्य वस्त्र एवं हेमदर्पण भूषित, पयस्विनी, सुशीला, तरुणा और वत्सयुक्ता कपिला देना चाहिये। इस दान से स्वर्गलाभ होता है। कपिलाधिका (सं० स्त्री०) तैन्तपिपीलिका, तेलचट्टा। कपिलापुर—दक्षिणापथ का एक नगर। (रेवाखण्ड १०।६) यह सम्भवतः नर्मदा किनारे अवस्थित है। कपिलार्जक (सं० पु०)कपिलवर्ण-तुलसीविशेष, भूरी तुलसी का पेड़। कपिलावट (सं० पु०)कपिलया कृतोऽवटः। तीर्थविशेष। <Small>(भारत, वन ८४।२८)<small/> कपिलावर्त—बम्बई प्रान्त के भड़ौच जिले में नर्मदा और कपिला नदी का सङ्गमस्थान। स्कन्दपुराण के रेवाखण्ड में इसका नाम रुद्रावर्त लिखा है। कपिलाश्व (सं० पु०) कपिलाः कपिलवर्णा अश्वा यस्य, बहुव्री०। १ इन्द्र! २ एक राजा। ३ सूर्यवंशीय कुवलयाश्व के पुत्र। कपिलासङ्गम—कपिला और नर्मदा नदी के सङ्गम का स्थान। यहाँ स्नान करने से अशेष फल लाभ होता है। इसके निकट अनेक पवित्र तीर्थ हैं। (रेवाखण्ड १३।५०) यह बम्बई प्रान्त वाले वर्तमान भड़ौच जिले के अन्तर्गत है। कपिलाहद (सं० पु०) तीर्थ विशेष। <Small>(भारत, वन ८४।१०)<small/> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कपिलिका (सं० स्त्री०)कपिला संज्ञायां कन्-टाप, अत इत्त्वम्। १ शतपदीभेद, किसी किस्म की कनसलाई। <Small>"शतपद्यस्तु परुषा कपिला चित्रा कपिलिका पोतिका रक्ता श्वेता अग्निप्रभा इत्यष्ट।" (सुश्रुत)<Small/> २ पिपीलिकाविशेष, एक छोटी चींटी। कपिली—नदीविशेष, एक दरिया। इसका प्राचीन नाम कपिला वा कपिलागङ्गा है। कपिलोकृत (सं० वि०) अकपिलं कापिलं कृतम्, कपिल प्रभृति तद्भावे च्वि-कृ-क्त। कपिल बनाया हुआ, जो भूरा किया गया हो। कपिलेन्द्रदेव—उत्कल के एक राजा। बाल्यकाल में यह किसी ब्राह्मण के मवेशी चराते थे। फिर इन्होंने उत्कलराज नेत्रवासुदेव के निकट जा नौकरी की। कार्यदक्षता गुण से यह नेत्रवासुदेव के अत्यन्त प्रियपात्र बन गये। वासुदेव के मरने पर इन्होंने अपने साहस बल से उत्कल का राजसिंहासन पाया था। इनके राजत्व का काल २७ वर्ष (१४५२-१४७० ई०) था। कपिलेश (सं० क्ली०)- कपिलेन प्रतिष्ठापित ईशलिङ्गम्, मध्यपदलोपी। काशीस्थित शिवलिङ्गविशेष। "कपिलस्य महालिङ्गं कपिलेन प्रतिष्ठितम्। मुच्यन्ते कपयोऽप्यस्य दर्शनात् किं पुनः नराः।।" (काशीखण्ड) कपिलेश्वर—१ एक प्राचीन नगर। २ मद्रास प्रान्त वाले गोदावरी जिले की रामचन्द्रपुर तहसील का एक ग्राम। यह अक्षां०-१६°४६' उ० और देशा०-८१°५७' पू० पर अवस्थित है। यहाँ की लोकसंख्या, पाँच हजार से अधिक है। कपिलोमफला (सं० स्त्री०)-कपीनां लोम इव लोमावृतं फलं यस्याः, बहुव्री०। कपिकच्छु, केवांच। कपिळोमा (सं० स्त्री०)-कपीनां लोम इव लोममञ्जरी यस्याः, बहुव्री०। रेणुका नामक गन्धद्रव्य, एक खुशबूदार बीज। कपिलोह (सं० क्ली०)-कपिवत् पिङ्गलं लोहम्। १ पित्तल, पीतल। २ राजरीति, बढ़िया पीतल। पीतल देखो। कपिलक (सं० पु०) कम्पिल्लक, नारङ्गी का चूरन। कपिलिका (वै० स्त्री०)-कपिवर्णा वल्लिका, पृषोदरादित्वात् साधु। १ पित्तल, पीतल। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 67dcp15b53b3cg8gdksi09bayfl98ex पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८६ 250 106263 665010 373122 2026-07-05T12:34:05Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665010 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|| कान्दाहार|३८७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} अलेकसन्दर या सिकन्दर शब्दका : पप है। मकदूनियाके प्रसिह वीर अलेकसन्दर (सिकन्दर )ने अपने नामसे वहां एक नगर- स्थापित किया था। 'किन्तु यह बात समीचीन नहीं जान पड़ती। ऋग्वेद, (१२१२६७) एवं अथर्ववेद (२२२॥१४ )में गन्धारि और ऐतरेयब्राह्मण (३४), शतपथब्राह्मण (८1१।४।१०), छान्दोग्योपनिषत् (६।१४।१), पथर्व परिशिष्ट (५६), रामायण (४४२२४,महाभारत, हरिवंश तथा पाणिनिसूत्र में गन्धार वा गान्धार जनयदका उल्लेख है। महाभारत, विष्णुपुराण और वराहमिहिरको वृहत्संहिताके अनुसार वह जनपद सिन्धुनदके पथिम अवस्थित जान पड़ता है। "महिमधि रोमया गन्धारोपामिवाविका ।" (चक् ॥१३६०) :हम गान्धार देशीय पीकी भांति चोमपूर्णा और पूर्णावयवा है। पान भी अफगानस्थानमें लोमय मेष देख पड़ता है। एतव्यतीत :ऋक्संहिताम गान्धारदेशीय कुमा नदीका उल्लेख है। जिस समय अलेकसन्दरका गमन उस पञ्चचमें हुवा, इस उसकी तीनों और समतल क्षेत्र और चौथी और 'कोफेस'.. लिखा है। आजकच उसे कावुल कहते हैं। '. उप प्रमाण द्वारा समझ सकते हैं कि अलेकसन्दरके पानसे वहुपूर्व संस्कृत शास्त्रमें गान्धार कहानेवाले राज्यका ही पपन्नश कान्दाहार है। कान्दाहार प्रदेश आजकल पूर्वकालको भांति विस्तीर्ण नहीं है। फिर भी चीनपरिव्राजक फाहियान, मुङ्ग्युन और युएन-चुयाङ्कः प्रतिके समय वह जनपद. वर्तमान पैशावर और .कान्त तक विस्त त था। गान्धार देखो। वर्तमान कान्दाहार प्रदेश खिलात-ए-घिल्लनाईके ५ कोस दक्षिणसे लेकर उत्तरमें हजारा प्रदेश, दक्षिण, बलचिस्तानके सीमान्त और पथिमम इसमन्द तक विस्तृत है।.. इस प्रदेशमें पाहमकसूद, गुलको, खुकरेज और गानते नामक कर गिरिमार है। फिर इसमन्द, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> तरनक, परगन्दाब, दोरी, प्रगप्तान पोर कदमाई नदी प्रवाहित है। प्रधान मगर-कान्दाहार, फरा, खिलात-ए-धिर- जाई और मारूफ हैं! वहां करीब चार लाख पादमी उन्हींके नामानुसार उहा नगरका भी नामकरण हुआ। रहते हैं। उनमें अधिकांथ दुरानो जाति है। फारसी और घिनजाई जातिको भी कमी नहीं। प्राय प्रायः २१ लाख रुपये है। २ अफगानस्तानके अन्तर्गत कान्दाहार प्रदेशका प्रधान नगर। वह पक्षा. ३१.३७३० पोर देशा ६५४३. पू. पर परगन्दाच तथा तरनक नदीके मध्य काबुलसे ३८० मील दक्षिणपूर्व अवस्थित है। वर्तमान कन्चार नगर बहुत अधिक दिनका निर्मित नहीं है। आधुनिक नगर अरगन्दाब नदीको ऋक्संहितामें लिखा है, वाम दिक, पर प्रवखित है। किन्तु वह विलकुद तौरवर्ती नहीं। नदी और नगरके मध्य एक. पर्वत श्रेणी है। उस पर्वतमालाके मय एक स्थानमें विच्छेद रहनेसे लदीतौरके साथ नगरका संयोग हो गया है। प्राचीन कान्दाहार नगर वर्तमान नगरसे ४ मोल पथिम चेचजिनाक पर्वतके मून. पर अवस्थित था।उच्च समयके यूनानियांने उक्त नदीका नाम 'कोफेन' और दुरारोह पर्वत था। इसोर चोग उसे अजेय समझते थे। किन्तु नादिर शाइने बहुत दिन अवरोधके पीछे नगर. अधिकार कर वह विश्वास दूर किया। फिर प्राचीन नगरसे दक्षिणपूर्व दो मोल दूर चतुर्दिक पर्वत वनादिशून्य परिष्कृत समतल भूमि पर दूसरा नगर निर्मित हुवा और उसका नाम नादिराबाद रखा गया। किन्तु.अहमदशाह अबदालीने नादिरावादको भी गिरा कर १७४१ ई. में वर्तमान कान्दाहार नगर स्थापन किया था। प्राचीन कान्दाहारका वहुविस्तृत ध्वंसावशेष देख कर विस्मित होना पड़ता है। प्राचीन कालावधि, कान्दाहार नगर विख्यात वाणिज्य केन्द्र गिना जाता था। उस नगरमें हेरात, गोर, सौस्तानः ( पारस्य ), कावुल पोर भारतयं पांच बड़ी बड़ी राह:गाई है। फिर उन सकन स्थानोंका पस्य -शंके बाजार में पहुंचाता:ौर. विशता है। वह पहले. अलेकसन्दरके और पीछे को मैनापति<noinclude></noinclude> j1pdqqi81vuufct1a30oba1p1ctkh3f पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८७ 250 106265 665014 373124 2026-07-05T13:21:47Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665014 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कान्दाहार|३८८}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} सिमिकरके अधीन रहा। • उस समयका इतिहास विशेष नहीं मिलता। उसके पीछे पारद और सामान 'गीयोंने उसे अपने अधीन किया। किन्तु उनके समयका भी विवरण विदित नहीं। फिर हिजरी सनकी प्रथमावस्था में समरमान धर्मप्रचारक मुहम्मदके 'वंशधर वहाँ पाये। ८६५१० को याकूब बिन-लिस नामक 'साफोरी'देशक प्रतिष्ठासाने उस पर अधिकार सासामबंशीयोंने उनके साथ उसे फिर गज़नबी वंशीयोंने सासानीको कान्दाहारसे भगाया था। पोछे गोरी वशीयोंने गज नबियों को खदेड़ वहाँ अपना अधिकार जमाया। उनके अनन्तर कान्दाहार सेवजुकीयोंके हाथ लगा। अवशेष, ११५३ १ को तुर्को ने कान्दाहार पहुंच नगर अधिकार किया था। फिर कई वर्ष पीछे वह गयास्-उद्दीन मुहम्मद गोरोके इस्तगत दुवा। १२१० ई० को खौरिनमके सुलतान अलाउद्दीन मुहम्मदने वह स्थान पधिकार किया था। १२२२ ई० को उनके पुत्र जहागीर खानने उन्हें वहांसे निकाल भगाया। फिर मलिक कुतर्वधीयोंके हाथ जवानगीर मक्षिक कुर्तीय स्थानीय सरदारोंसे हार और नगर .छोड़ भाग गये। अवशेषमें १३८८ ई. को तैमूरनाने सरदारोंके हाथसे कान्दाहार होना था। १४६८ ई० तक वहां तैमूर के वंशीयोंका अधिकार रक्षा। फिर अबू सैयदके मरनेसे कान्दाहार और कतिपय पाख. वर्ती स्थान स्वाधीन हो गये। १५१९१० को मादिरशाने दश साख फौजके साथ १८ मास भवरोध कर कान्दाहार जोता। १८३४ को <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भाना कान्दाहार पर चढ़े, किन्तु परास्त हो डौट पड़े। फिर सादोजाइयोंने उसे जीतनेको पेटा को यो। १८५० को भायजा फिर पंगरेजोंबा साहाय्य ले कान्दाहारमें घुसे। उन्होंने सिन्धु नदीके तौरवी सैन्यसाहाय्यसे २०वौं अपरेलको उमे नीता पौर नगरमध्यस्थ पहमदयाइके समाधिमन्दिर ८वी मईको राजपद पर अभिषेक पाया! उसके पौछ उनका सैन्यदन्न समुदाय अफगानस्थान अधिकार छीन लिया।करनेके लिये काबुल और गजनोकी ओर अग्रसर हुआ। सैन्यका कुछ अंश कान्दाहारमें शुजाके पास रह गया था। उसी समय दुरानियोंने विद्रोही हो सादीनाई जातीय अकबर खान और सफदरजाके अधीन कान्दाहार आक्रमण किया। पक्ष में १८४३ ई० को नाना युधविषादिके पीछे सफदर जाने उसे मोता यो। किन्तु पति अब दिन यौछ. ही कारनदिन खानने उन्हें वहांसे भगा दिया। कोनदिव प्रति अत्याचारी था। १८५५ ई. की कोहनदिच खानको मृत्यु दुई। उनके पुत्रः सुहम्मद सादिकने पित्यक सम्पत्तिको लूट लिया- खान्के उत्तराधिकारी दूरीभूत हुये। और पिय रहीमदिन खान पर अत्याचार शिया,. इसीसे सोमदिन खानने अफगानस्थानके प्रमोर दोस्तमुहम्मदको साहाय्य भेजनेको लिखा था। दोख- मुहम्मद खानने जा नगर अधिकार किया और अपने पुत्र गुलाम हेदरको शासनकर्ताक पद पर रख दिया। गुलाम हैदरकै पोछे थेर पत्ती प्रथम कान्दाहारके भारतके शासनकर्ता रहे, फिर वह काबुल चले गये। उन्होंने मुगल राज्यस्थापयिता बाबरने शाहवेग नामक अपने धाता पमौन खानको कावुनसे भासनकर्ता स्वाधीन रानाको हरा उसे भारतके राज्यमें मिला बना वहां भेना था। पमीन चान्ने शेर.पोक लिया। कुछ दिन यौछे पारसिकों (ईरानियों) ने विका पत्र धारण किये और १५६५० को बाज- वह स्थान अधिकार किया। इसी प्रकार एक बार वालके युइमें मारे गये। अमीनके कनिष्ठ मुहम्मद पारस्य (ईरान) और दूसरी बार भारतको प्रधानता भरीफने एक बार तथा पेश की, पाविरोधको बीकार करते करते कान्दाहारको राजसभी कुछ अधीनता स्वीकार की। अजीम खान नामक र पीक वैचित्रेय भाताने विद्रोही बन १८६५.. दिन स्थिर रही। अवशेषमें १५२.ई. को फिर ईरानियोनि से अधिकार किया था। १५१७१० को को खिसाति-ए-घिसजाई नामक स्थान पर सोको रा दिया। उसके पोछे और पसौके पुत्र याकूब. खान्ने विवराय उडार किया। ..<noinclude></noinclude> 5rn82fdlr6qmibg9e1imtfkxhkehnyw 665017 665014 2026-07-05T13:25:03Z Lado Shaw 6039 665017 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कान्दाहार|३८८}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} सिमिकरके अधीन रहा। • उस समयका इतिहास विशेष नहीं मिलता। उसके पीछे पारद और सामान 'गीयोंने उसे अपने अधीन किया। किन्तु उनके समयका भी विवरण विदित नहीं। फिर हिजरी सनकी प्रथमावस्था में समरमान धर्मप्रचारक मुहम्मदके 'वंशधर वहाँ पाये। ८६५१० को याकूब बिन-लिस नामक 'साफोरी'देशक प्रतिष्ठासाने उस पर अधिकार सासामबंशीयोंने उनके साथ उसे फिर गज़नबी वंशीयोंने सासानीको कान्दाहारसे भगाया था। पोछे गोरी वशीयोंने गज नबियों को खदेड़ वहाँ अपना अधिकार जमाया। उनके अनन्तर कान्दाहार सेवजुकीयोंके हाथ लगा। अवशेष, ११५३ १ को तुर्को ने कान्दाहार पहुंच नगर अधिकार किया था। फिर कई वर्ष पीछे वह गयास्-उद्दीन मुहम्मद गोरोके इस्तगत दुवा। १२१० ई० को खौरिनमके सुलतान अलाउद्दीन मुहम्मदने वह स्थान पधिकार किया था। १२२२ ई० को उनके पुत्र जहागीर खानने उन्हें वहांसे निकाल भगाया। फिर मलिक कुतर्वधीयोंके हाथ जवानगीर मक्षिक कुर्तीय स्थानीय सरदारोंसे हार और नगर .छोड़ भाग गये। अवशेषमें १३८८ ई. को तैमूरनाने सरदारोंके हाथसे कान्दाहार होना था। १४६८ ई० तक वहां तैमूर के वंशीयोंका अधिकार रक्षा। फिर अबू सैयदके मरनेसे कान्दाहार और कतिपय पाख. वर्ती स्थान स्वाधीन हो गये। १५१९१० को भाना कान्दाहार पर चढ़े, किन्तु परास्त हो डौट पड़े। फिर सादोजाइयोंने उसे जीतनेको पेटा को यो। १८५० को भायजा फिर पंगरेजोंबा साहाय्य ले कान्दाहारमें घुसे। उन्होंने सिन्धु नदीके तौरवी सैन्यसाहाय्यसे २०वौं अपरेलको उमे नीता पौर नगरमध्यस्थ पहमदयाइके समाधिमन्दिर ८वी मईको राजपद पर अभिषेक पाया! उसके पौछ उनका सैन्यदन्न समुदाय अफगानस्थान अधिकार यौछ. ही कारनदिन खानने उन्हें वहांसे भगा दिया। कोनदिव प्रति अत्याचारी था। १८५५ ई. की कोहनदिच खानको मृत्यु दुई। उनके पुत्रः सुहम्मद सादिकने पित्यक सम्पत्तिको लूट लिया- खान्के उत्तराधिकारी दूरीभूत हुये। और पिय रहीमदिन खान पर अत्याचार शिया,. इसीसे सोमदिन खानने अफगानस्थानके प्रमोरछीन लिया।करनेके लिये काबुल और गजनोकी ओर अग्रसर हुआ। सैन्यका कुछ अंश कान्दाहारमें शुजाके पास रह गया था। उसी समय दुरानियोंने विद्रोही हो सादीनाई जातीय अकबर खान और सफदरजाके अधीन कान्दाहार आक्रमण किया। पक्ष में १८४३ ई० को नाना युधविषादिके पीछे सफदर जाने उसे मोता यो। किन्तु पति अब दिन दोस्तमुहम्मदको साहाय्य भेजनेको लिखा था। दोख- मुहम्मद खानने जा नगर अधिकार किया और अपने पुत्र गुलाम हेदरको शासनकर्ताक पद पर रख दिया। गुलाम हैदरकै पोछे थेर पत्ती प्रथम कान्दाहारके भारतके शासनकर्ता रहे, फिर वह काबुल चले गये। उन्होंने मादिरशाने दश साख फौजके साथ १८ मास भवरोध कर कान्दाहार जोता। १८३४ को <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मुगल राज्यस्थापयिता बाबरने शाहवेग नामक अपने धाता पमौन खानको कावुनसे भासनकर्ता स्वाधीन रानाको हरा उसे भारतके राज्यमें मिला बना वहां भेना था। पमीन चान्ने शेर.पोक लिया। कुछ दिन यौछे पारसिकों (ईरानियों) ने विका पत्र धारण किये और १५६५० को बाज- वह स्थान अधिकार किया। इसी प्रकार एक बार वालके युइमें मारे गये। अमीनके कनिष्ठ मुहम्मद पारस्य (ईरान) और दूसरी बार भारतको प्रधानता भरीफने एक बार तथा पेश की, पाविरोधको बीकार करते करते कान्दाहारको राजसभी कुछ अधीनता स्वीकार की। अजीम खान नामक र पीक वैचित्रेय भाताने विद्रोही बन १८६५.. दिन स्थिर रही। अवशेषमें १५२.ई. को फिर ईरानियोनि से अधिकार किया था। १५१७१० को को खिसाति-ए-घिसजाई नामक स्थान पर सोको रा दिया। उसके पोछे और पसौके पुत्र याकूब. खान्ने विवराय उडार किया। ..<noinclude></noinclude> 0sv7v87q32njbinzsinfve71tlzaoya पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८८ 250 106267 665075 373126 2026-07-06T05:52:49Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665075 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कान्दाहार| ३८९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} उसी समय अफगानस्थानमांध पङ्गलेण्डका मनोमालिन्य बढ़ने के कारण १८७८०को केटासे सर डोनाल्ड टुयाने एकदल सैन्य ले अफगानस्थान राज्यमें प्रवेश किया। सैफ-उद-दीन नामक सेनापतिने तखतौकुछ नामक स्थानमें उन्हें रोका था। किन्तु व हार गये। १८७९.ई. की कान्दाहार गरनोंके तोप छीन ली। अयूब फिर हिरातको भागे। किन्तु अधीन हुआ। शेर पलोके मरने पीछे याकूब खान्ने गण्डमक नामक स्थानमें अंगरेजीसे सन्धि को थो। उससे युद्धादि बंद हो गया। सन्धिके पनुसार कान्दाहार छोड़ पिशिममें जाने के लिये अंगरनीको पदिय मिला। उसी बीचमें सर लुई कैभागनारी कावुलके दरवारमें सदल मिहत हुये। सुतरा बगरेजीने फिर कान्दा. हार अधिकार किया और कान्दाहारकी रचाके लिये खिसात-ए-घिसजाई नामक स्थान भी ले लिया। •१८८०१०कोबम्बईसे मेजर जनरल प्रिमरोजके पहुंचने पर सर टुयाट ससैन्य तौटे थे। सरदार शेर पली खान् अंगरेजों के अधीन कान्दाहारके 'वाखौं नियुक्त हुये। सरदार मुहम्मद अयूब खानने उससे बिगह युधधोषणा की थी। अंगरेज सेनानी वागने पथमें बाधा डाली। किन्तु उनका सैन्यदर एकबारगी ही मारा गया। अयूब खान् कान्दाहारका पथ मुक्का पापग्रसर हुये। उसी बीच प्रवदुर रहमान खान गरेज गवर्णमेण्टके साथ प्रबन्ध कर पमीर बन बैठे उसमे पहले सर राबर्टस कान्दाहारके सहारकी नूतन सैन्य से पागे बड़े थे। सर राबर्टसके पहुंचने पर बाबावाची काटाल और गण्डी-मूला-साहबदाद नामक स्थान परबके साथ भीषण युद्ध हुपा। युद्धमें अयूबका सर्वख गया था। उनका सैन्य, थिविर, तोप, बन्दूक, बारूद, सब सामान् दुधमनके हाथ लगा। अवशेषमे १८८१ ई० को पपरेत मास कान्दाहार प्रदेश में शान्ति स्थापन कर सर.रावर्ट केटा लौट पाये। फिर पमोर पबद उर-रामानने मुहम्मद शाम खान नामक किसी षोड़शवर्षीय बालकको सरदार समस-उद-दोन सान्के पधीन कान्दाहारका.भासनकर्ता नियुश किया। {{Rh|Vol.| IV, |98}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अयुव खान् हिरातमें भाग कर रहे थे। वहां वह जमोदी जातिके अधिपति स्त्रीय खसुरको मार स्वयं अधिनेता बने पौर अमीरके विरुद्ध अग्रसर हुये। उन्होंने पाड़ा कुरन नामक स्थानमें प्रमोरके सैन्यको हरा कर कान्दाहार दखल किया था। फिर प्रमौरने वयं सैन्य के साथ भागे बढ़ धीरे धीरे अयूवको रसद पौर सरदार अबदुल कुडूस खानने उसी बीच हिरात लिये.अयूबको अधिकार कर लिया था। इस लिये.अयूबको पारस्य- रानके शरणागत हो वास करना पड़ा। इसके बाद प्रमोरने गुलाम हैदर खान्के अधीन ७... शिक्षित सैन्य भेन कान्दाहारको रक्षा की। १८८२ ई०को सरदार नर मुहम्मद खान शासन कार्यमें नियुक्त हुये। कान्दाहार नगर देखनेमें पायताकार और साढ़े सौन मौस विस्तृत है। उसके चारो भोर. उपरोध पौर गड़े हैं। मण्ड (गढ़ा) २४ फोट गभीर है। उपरोध और गतके पीछे रौद्रदग्ध मृण्मय. प्राचीर है। उसमें इष्टक वा प्रस्तर नहीं लगा। उसे रौद्र में सुखा पत्थरको तरह कड़ा बना दिया है।वह पश्चिम टिक, १८६७ गज, पूर्वमें १५१० गम, दक्षिणमें १३४५ गज और उत्तरमें ११५४ गन खम्बा है। नगर में फाटक हैं। पूर्वको बारदुरानो तथा काबुस हार दधिषको धिकारपुर द्वार पचिमको हेरात एवं तोपखामा हार और असरको ईदगाह द्वार है। कहो हारीसे नगरको बड़ी राहें गयो । मध्यस्यसमें शिकारपुर हार और बाबुत हारको राह महा मिलो है, वहां चारसु मसजिद खड़ी है। उसके गुम्बनका व्यास ५. गन है। राई ४० गज चौड़ी है। शहरके उत्तर किया है। उसीके निकट तोपखानेका मैदान है। मैदानके पश्चिम अहमदशाह दुरागीको कवर है। वह पति उच्च प्रहासिका है। नगरके प्रत्येक हार और प्रत्येक मार्गमे उसका गुम्बन देख पड़ता है। उसकी चारो पोर अहमदयाके वंशधरोकी दूसरी भो छोटी शेटौ ११ कबरे है। कान्दाहारका : वाणिज्य विवाद ईरानियांक<noinclude></noinclude> nr7e2t550xekumgted3vf3y2wmiahca पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३८९ 250 106270 665087 373129 2026-07-06T06:32:04Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665087 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|३९.| कान्दाहारी वेगम, कान्हमो}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} हाथ है। कान्दाहारने रेशम और जनके कपड़े बहुस बनते हैं। लाखको खेती भी अधिक होती है। मैवाकी कोई कमी नहीं। शुष्क फल यहांका प्रधान खाद्य है। कान्दाहारी वेगम-बादशाह शाहजहानको प्रथमा महिषो। वह पारस्यराज इस्माइल शाह (म) के वंशोद्भव सुलतान मिर्जाशफीको कन्या चौं। सम्राट् पकवरने पारस्यरान शाह पब्बासको कान्दाहारका शासनमार सौंपा था। किन्तु उन्होंने वह कार्य सुलतान हुसेन मिर्जाके हस्त अर्पण किया। हुसेन मिर्जाके मरने पर उनके पुत्र मुजफ्फर हुसेनको कान्दाहारका शासनभार मिला था। वह १५८२ ई० को तीन भ्राता साथ ले प्रश्वरको सभामें पहुंचे। अकबरने उनको सम्बर्धना कर पांच हजारीका पद और सम्भल नामक स्थान जागीर दी थी। कान्दा- 'हारी वेगम उनकी भगिनी थौं। १६१० ई. को इन सुन्दरी रमणोके साथ युवराज खुरम (शाहजहान्) का विवाह हुमा । - भागरके कंधारीबाग़ नामक उद्याममें कान्दाहारी बेगमको समाधि दिया गया। उनका समाधिमन्दिर अति सुन्दर है। आजकल वह भरतपुररानके अधिकारमें है। कांदि-बङ्गाल प्रान्तके मुर्शिदाबाद जिलेका उपविभाग। उसका परिमाणफल ३८८ वर्ग मील है। उसमें कांदि, भरतपुर पौर खड़गांव तीन थाने लगते हैं। वीरभूमसे मयूराशी नदी जाकर जहां मुर्शिदाबाद जिलेमें घुसी है वहीं कांदि नगरी बसी हैं। पायकपाड़ेके राजाओंका वहां आदिवास है। उक्त राजवंशके आदिपुरुष गङ्गा गोविन्द सिंहने कान्दिमें हो जन्म लिया था। उन्होंने २० लाख रुपये लगा अपनी माताका बाह किया। और अभ्यागतोंको ब्राह्मण वाहकों को डाक बैठा हाथों हाथ जगनाथसे ताज़ा प्रसाद मंगा खिला दिया। कान्दिगभूत (सं०नि०) कां दिशं गच्छामि, इत्या- कुखीभूतः, कान्दिश-भूता। १ पलायित, दूदे राजन न पानवाया, भगोड़ा। २ भोत, डरा हुवा । "सबपरित भयानमात् विमुक्ती नामवस्तदा ।" बान्दिग्भूतो नौविताओं प्रद्रावोगरा दिगम्।" (भारत, शान्ति, १०)}, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कान्दिशीक (सं० पु.) 'कां दिशं यामि' इत्येवं वादिनो .. ठक प्रत्य येन. पृषोदरादित्वात् सिई। यदवा कदि वैलव्ये भावे इन्, कन्दि वैलव्यं ; शौक सेचने भावे धन, थोकः पश्रुपात: ; कन्दिय शोकय तौ विद्यते अस्य कदिशीक प्रण। भय देखकर पला- उनकारी, डासे भगनेवाला। कान्दू ( काण्डु ) बङ्गाल पौर विहार प्रान्तवासी एक जाति कहीं कहीं उसे भड़मूना, भुरजी आदि. भी कहते हैं। शस्यकण्डन ही इस जातिको प्रधान कान्यकुम ( सं० ली.) कन्याः कुनाः यन, कन्यकुनउप जीविका थी। स्वार्थ अण्। १ देशविशेष, एकमुल्क। हिन्दी में इसे कनौज कहते है। संस्कृत पर्याय-महोदय, कन्याकुन गाधिपुर, कौश और कुथस्थल है। रामायणमें चिखा है कि राजर्षि कुमनामके औरस और कृताची अप्सराके गर्भसे १०० कन्याओंने जन्म लिया था। उनका रूप. यौवन देख वायुदेव कामातुर हुये। किन्तु विना पिताको प्राजाके कन्याने उनसे सहवास करना खोकार न किया। इसपर वायुदेवने उन्हें माप दे कुबड़ी बना दिया। पिताने प्रसन्न हो अपनी कन्यायका विवाह कम्पिक्ष नगरकै राना ब्रह्मदत्तसे किया था। उनके स्म से कन्यव को कुलता मिट गई। २ ब्राह्मण जातिविशेष ।कनौजिया देखो। कान्यकुक्षी । (सं० स्त्री.) कान्यकुन-डीए। कान्यकुन देशको स्वी। कान्यना (सं० स्त्री० ) कात् जलात् अन्यम्मिन् जायते क-पन्य-जन्-ड-टा। नतीनामक गबद्रव्य, एक खुशबूदार चीज। कान्ह (हि.पु.) बोलण। कामहा देखी।कान्हड़ा कानडी (हि) कांटो देखो। कान्हम (हि० पु. ) छष्णवण भूमि, काली मिट्टी की जमीन । यह भड़ोंचको पोर होती है। इसमें कपास बहुत उपजती पौर पनपती है। काममी (हि.सी.) कर्पामविशेष, एक कपास। यह भड़ोंचकी ओर . काहम भूमिमें उपवती है।<noinclude></noinclude> eqdtqivsf29sqpacolbs4cuckuhvcbn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९२ 250 106278 665103 373138 2026-07-06T08:24:24Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665103 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कापिथेय -कापोतवनक| ३ चजकुटी}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} देवोपासक और बहुत बौद्ध वास करते थे। उसका विस्तार ४... लि (करीब ३३३ कोस) था। (Beal's Buddhist Record I,: 54:58 देखो) पासात्व प्राचीन भौगोलिक टलेमिने उसका नाम 'कपिशा', लिनिने 'कपिशिन्' और सलिनासने 'कफसा' लिखा है। कनिहाम साहबके मतसे उक्त प्राचीन जनपद काफरस्थान घोरबन्ध और पञ्चभिर पर्यन्त विस्त था। चौन-परिव्राजकको वर्णनासे समझ पड़ा, कि वर्तमान बन्नू ( पाणिनि-कथित वणु) उपत्यका प्रदेश अवधि कापिथी क्षत्रिय रानाका अधिकार रहा। लिनिने उसको राजधानी 'कपिस्मा' बतायो है। उसका वर्तमान नाम कुसान अथवा भोपियान है। कापिशेय (सं० पु. ) कपिशाया अपत्य पुमान्, कपिधा ढक्। पिशाच, शैतान्। कापिष्ठल (स• पु०) कपिष्ठम्नस्य इदम्, कपिष्ठल-प्रण। १ प्राचीन जनपद विशेष, एक पुरानी वसती। बहन- संहितामै वह 'कापिस्थन' नामसे उक्त है। फिर प्राचीन ग्रीक भौगोलिक एरियानने इसे 'क्याम्बिस्थलों लिखा है। वह पञ्जाबके अन्तर्गत कुरुक्षेत्रका कपिसम्बन्धीय, मध्यवर्ती है। वर्तमान नाम कइथल है। वहां अझनामन्दिर प्रसिद्ध है। २ गोवभेद । {{Rh|||(स्वान्दे नागर १०१२२) }} कापिष्ठलि (सं० पु०) कपिष्ठलस्य गोत्रापत्यम्, कपिष्ठल-दूज। कपिठल ऋषिके वंशीय । कापी (स. स्त्री.) १ नदी विशेष, कोई दरिया। स्त्रीविशेष, एक तरहकी औरत। कापी (4. स्त्री-Copy ) १ प्रतिलेख, नक्षल । ७कपोस- यह शब्द अंगरेजी Copyका पपबंध है। (हि.) २ गजाग, घिरनी। कापी-राइट (पु०-Copy right) मुद्रणस्वामित्व, इक, तसनीफ या मुसत्रिफो। उक्त स्वत्व राजविधिक अनुसार प्रत्यकार वा प्रकाशकको मिलता हैं। विना अनुमति लिये दूसरा व्यक्ति किसी अन्यकार वा प्रकायककी कोई पुखक रुपा नहीं सकता। कापु-मन्द्रान प्रान्तको एक जाति। उसे स्थान- {{Rh|Vol,| IV.| 99}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> विशेषमें कापत, रेडडो या नायडू भी कहते है। नेलूर, कदपा, करनूल और समस्त तैला देशमें बापु सोग रहते हैं। उनकी उपजीविका प्रधानतः क्वषिकार्य ही है। किन्तु कोई कोई व्यवसाय भी चलाते हैं। वह चतुर, साहसी और कार्यक्षम होते हैं। कांपु जाति १३ शाखामें विभक्षा हैं। १ पारे, २ कानिदे, ४ देसरि, ५ नेरातु, ६ पण्डा, त ७ पाकानटी, ८ पेदाकान्ति, ८ पटे, १० मोटाति, ११ रचु, १३ येराप और १३ रेलामा कापलु । बापुरुष (स' पु०) कुः पुरुषः कोः कादेशः । विभाषा पुरुषे । पा। शानिन्दित पुरुष, खराब आदमी। कापुरुषता (सं० स्त्रो०) कापुरुषख भावः, कापुरुष-तल । १ निन्दित पुरुषका कार्य, खराब आदमौका काम । २ मोरता, निकम्मापन। कापुरुषत्व (सं० ली.) कापुरुष-ब (तस्य मावस्खमली। पा। ॥१६) निन्दित पुरुषका कार्य । कापुरुषता देखो। कापुरुष्य (सं• लो०) कापुरुषस्य भावः, कापुरुष थन । कापुरुषता, निकम्मापन। कापय (सं० वि०) कर्भावः कार्यम्वा, कपि-टक् । बन्दरके मुतालिक। २ अधिरा ऋषिके वंशमें उत्पन्न। (पु.) ३ शौनक ऋषि । (ली.) ४ वानर जाति, बन्दरीको कोम। ५ वानरके कार्य, बन्दरको चाल। कापोत (संयुलो०) कपोतानां समूहः, कपोत-अण् । १ कपोतसमूह, कबूतरों का झुण्ड । २ सौवीरानन, सुरमा ३ सनिधार, मनीखार। ४ रुचक लवण, काता नमक। ५ कपीत वर्ण, भूरारङ्ग (वि.) ६ कपोत-सम्बन्धीय, कबूतरके मुताजिक, भूरा। कायोतक (सं.वि.) कपोताः सन्ति अस्याम कपोत छ-कुक् च तत्र भवः अण् कस्य लुक् । कपोतविशिष्ट अरविंद, कबूतरोंसे भरे मुल्कको रहनेवासा । कापोसपाक्य (सं० पु.) कपोतानां पाक: डिम्बः, तस्य समूहः, कपोतपाक एव। कपोतके डिम्ब, कबूतरोंके अंडीका समूह । २ कपोतपाकीका राना। 1 कायोतवक्रक ( सं. पु. ) कयोतवा, एक यूटो। वर्णविशिष्ट, भूरा।<noinclude></noinclude> spzku62ip6jtdsvgmewobtg2vm52w0g पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९३ 250 106280 665096 373140 2026-07-06T07:56:29Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665096 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||काफिर|३९४}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} बापोतासन (सं. ली. ) कपोतं तत् अननन्नेति, कर्मधा । मौवीराचन, सरमा। कापोति (सं.वि.) कपोतस्य इदम्, कपोत-इन् । कपोत सम्बन्धीय, कबूतरके मुताल्तिक । काप्य (सं० पु.) कपेर्गोवापत्यम् कपि-धब् । १ कपि ऋषिके वंशीय, भारिस। २ वानर बंशीय, वन्दरसे पैदा होनेवासा । (लो०) ३ पाप, गुनाह । काप्यकर (#० पु.) कुत्सितं पाप्यं काय पापं करोति, काप्य-क-ट। १ खक्कत पाप प्रकाश करनेवाला, जा अपना किया हुमा गुनाह कह डालता हो। (त्रि.) २ पापकारक, गुनाहगार। काप्यकार (सं० पु०) काप्य करोति, काप्य-क-प्रण। १ पाप करके प्रकाश करनवान्ता, जो गुनाह करके कह डालता हो। २ पापको स्वीकृति, गुनाहको तसलीम। ३पापकारक, गुनाहगार । काप्यायनी (सं० स्त्री०) कपेगावापत्यम्, कपि-यज । फक्-डीए । कपिवंशीया, कपिके वंशको औरत । काफरी (हि. स्त्री.) किसी किस्मका मिर्चा। इसका श्राकार चपटा गीत और वर्ष पीत होता है। काफल (सं० पु.) कुत्सितं फलं यस्य, कोः कादेशः कटफल वृक्ष, कायफक्ष। काफ़िया (अ.पु. ) अनुप्रास, तुक । अनुप्रास जोड़नेको काफियाबन्दो कहते हैं। काफिर (फा० वि०) १ मूर्तिपूजक, बुतपरस्त । २ नास्तिक, ईखरको न माननेवाला।३ निर्देश, ४ दुष्ट, पाजी। ५ काफिरस्तानका रहने- वाला। (पु.) ६ अफरीका का एक मुल्क । काफिर-एक नाति। अफरीकाके दक्षिणस्थ काफ- रिया नामक स्थानके अधिवासी ही काफिर हैं। किन्तु सूदानके दक्षिणदिग्वों समुदाय अफरोवावासी भी उसी नामसे पुकारे जाते हैं। आजकल अधिकांश स्थानों में वह देख पड़ते हैं। भारतवर्ष में भी काफिर हैं। उन्हें साधारणतः वशी कहते हैं। या सिर कर नहीं सकते काफिर किस समय कैसे इस देश में प्राप'चे थे। फिर भी पनुमान पाता, जिस समय परबके साथ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भारतका वहिर्वाणिज्य रहा, उसी समय परबोंके साथ काफिरोंका यहां भगमन वा। अफगानों, मुगक्षों और तुकोंके साथ भी अनेक पाये हैं। काफिर यहां पा और क्रमशः विशेष प्रश्रय पा शेषको किसी किसी स्थानमें राजा तक हो गये हैं। पानकल उत्तर कनाईके दाण्डिली जिलेके पार्वत्य प्रदेशमें काफिरोंका वास अधिक है। बम्बई उपत्रके जंजीरा नामक स्थानमें 'हवों या "सौदी जातीय राजा है। वह राजवंश प्रवसोनियाके काफिरोसे उतपन्न है। खुष्टीय १८ शताव्द पर्यन्त पबसीनियाके काफिर भारत-उपकूलमें जलदस्य का व्यवसाय उठा निकटवर्ती सागरमें घमा करते थे। खुष्टीय १५श और १६ शताब्दको विजयपुर में पादिर शाहो तथा निजामयाहो वंश राजत्व करता था। उसके अधोग काफिर पुररची सैन्यशेणोमें नियुक्त रहे। सिन्धु प्रदेश, तानपुरके प्रमौर एक दर काफिरोंका सैन्य रखते हैं। कर्णाटकके नवाबके पास भी काफिर दास रहते हैं। कर्णाट केसास और मकरान नामक स्थानमें बहुत काफिर है। फिर निजाम राज्यमें निजामके नियमित सैन्यके मध्य उनकी संख्या कु पधिक है। भारतके अन्य प्रदेशोंमें भी मुसलमानोंके साध काफिर फैन पड़े। पहले मुसलमान नवाबोंक अधीन वह पुररची मैन्यदनमें नियुक्त रहते थे। नगगदिकी शांति रक्षा उनके हाथमें यो। उनको रमणियां भी नवाबोंके अन्तःपुरमें दासी थीं। नवाबों अनुकरणसे हिन्दू जमीन्दार और राजा पुररचाको काफिर नियुक्त करते थे। बोध होता कि काफिरों को बड़े विखामी, प्रभुभक्त और बलिष्ट समझ कर ही उस कायका भार दिया जाता था। पूर्व-भारतीय दीपपुत्र और दक्षिण एशियाके अन्यान्य स्वनमें भी काफिरों का वास है। काफिर वांक उपनिवेशी नहीं। वह सकल स्थान उनको आदिम वास- भूमि है। उस स्थान अफरीकाके काफिरोको वासभूमि- के साथ समसूत्रपातमें रहनसे उन दोनोंके मध्य देवगत पार्थक्यके सिवा अन्य कोई विभिनता देखनी पड़ती। इससे दोनों खानोंके योग काफिर माने जाते हैं।<noinclude></noinclude> ase1j08flpc3a1ashzzspqy6v6vkk5j पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९४ 250 106282 665095 373142 2026-07-06T07:25:37Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665095 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||काफिर| ३३५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} टोमिक पुस्तकपाठसे समझ पड़ता कि उन्हें उनका विवरण प्रात था। उनके "परिया खेरसनेसास" "यावाइस इङ्गिउलि" और "घिपोपिस इकथिपो. अनि में सुमात्रा, यवदीप एवं नव गिनीकी पपूया जातिका विवरण भरा है। उसे रामायणोक्त राक्षस जाति अनुमान करते हैं। प्राचीनकाल भारतवर्षके दाक्षिणात्यमें वाणिज्य करनेको मिसरीय वणिकों के साथ पफरीकाकै पूर्वा- पलवाले शेग भरत और अफरीका उभय स्थानीसे यहां भाते थे। पाचात्य ऐतिहासीक मतमें वैसा व्यवसायवाणिज्य प्राय: तीन हजार वर्ष रहा। उस समय यही नहीं कि B सकट देयोंके लोग केवल पण ले पोतारोहण द्वारा इस देश में भावे और क्रय विनय कर वन्दरसे चले जाते थे, किन्तु अनेक वधिकरूपसे इस देशमें रहने भी उगते थे। उक्त सकल स्थायौ वणिक सिंहस्थ में "मुसरजाति और दाक्षि णात्य "मोपना" वा "सबाई नामसे ख्यात हुए। किसी किसौके कथनानुसार दाक्षिणात्यमें पार्योंका अधिकार विस्तृत होने यहिले हो काफिर रहने लगे थे। उस मत समर्थनके लिये बताते हैं,- "दाक्षिणात्यके पधिवासियोंसे पायनातिका जितना पार्थक्य प्राजकर देख पड़ता है, उतना भारतमें किसी दूसरे स्थानपर नहीं मिलता। फिर दाक्षिणात्यकी सकल भाषा संस्कृतसे सम्मण भिन्न है। दाक्षिणा अधिवासियोंमें कितनी होका आकतिगत सौसादृश्य अधिकांश देशनियोकी भांति, कितनी होका समितीय ईरानियों को भांति, कितनों होका अशियोंकी भांति और कितनी होका मलय पपूयोंकी भांति है। फिर निन्नवेशके लोगोमें अधिकांशको आकति अफरीकावासियां मिलती है। उक्त लोगांके मतानुसार विन्ध्य एवं घाटपर्वतक पूर्व मान्तवर्ती असभ्यजातिको भाकति पधिकतर उत्तर भारतीय आर्यजातिको आकतिसे मौसादृष्य रखती है। किन्तु घाटपर्वतके पश्चिमाञ्चलवासी मलय दोषको जाकून जातिकी भांति बोते हैं। बाकून जातियों के साथ अफरीकावासियों का अधिक भादृश्य है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पूर्व भारतीय होपावनी में प्रधानतः चार जातिका वास है-(१) विमलय जाति, (२) मलय सप- दोषवासी खकार काफिर या समाजाति, (३) फिलिपाइन होपकी मुद्राकार काफिर जाति और (8) नवगिनीको इत्काय काफिर या पयूया जाति। एतद्धिव नवगिनी और मलयदीपक मध्यवर्ती कई डीपोंमें उनकी मध्यवर्ती एक जातिके लोग देख पड़ते हैं। उन्हें मलयको काफिर नाति कह सकते हैं। सिलिविस और लम्बस वोपके पूर्व जो सकल होपरे, उनके अधिवासी साधारणत: अष्ट्रेलियावासियोंकी भांति होते है। पार्थक्य देख अनेक लोग पनु- मान करते हैं कि एशियाके दक्षिणांथके साथ पूर्व भारतीय होपपुलके पश्चिमभागय होप पति प्राचीन कालमें संलग्न थे पौर कालक्रममें प्राकृतिक परि- वर्तनसे विछिन ही गये। अफरोकामें जितने काफिर रहते हैं, अनुमानतः उनकी संख्या दो करो ड़से अधिक नहीं। इस पूरी संख्या में काफिरियावासी काफिर और इटेण्ट भी रख लिये गये हैं। लोहितसागरके पूर्वकूल, पारस्योपसागरके तौर पौर मलय उपद्दीपर्म काफिरों की संख्या अधिकसे अधिस ५० लाख होगी। किन्तु बडोपसागरके आदामान दोपसे पूर्व दिक्की होपावली में जिन जिन जातीय लोगों को साधारणतः काफिर कहते हैं, उनके मध्यमें न्यनकल्पमे ११ प्राकतिगत यो-विभाग हैं। उन १२ श्रेणीगत पार्थक्यों को देख भात होता है- उनमें कितने ही साढ़े तीन हाथ या चार हाय तक और कितने ही साढ़े चार हाथ तक लम्बे निकचते हैं। यह पमुमान कैवज डागोंक पाकविरत सोसाय पर निर्मर नही कर- वा। सनावा, वौरनिषौ, यव, वालि पादि दोषको परस्पर मध्यवर्ती प्रणालो और एशिवाके प्रधान भूखएको मध्यवर्ती प्रपामो कहीं मौ १५० । २००भावसे पक्षिक गमोर नहीं। किन्तु सिलिविस दीपके पूर्वी भकी प्रगानी और समुदाय अनेक स्वयमें ४०० बायको अपेक्षा भी गौर है। एतद्भिन एगियाके दचियांश उत्पन्न फल मूलाचादि पारध जन्तु और प्राचीन मंसावशेषादिवसाय इन सबल बोपोंके कसम विपयोंका सम्परादेव देख सकता हैं।<noinclude></noinclude> e88wwkj3hbu2d37auffxtldg7x8rswn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९५ 250 106285 665091 373145 2026-07-06T07:04:46Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665091 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|३९६|काफिर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} हमके मध्य में प्रपेचात कई विख्यात श्रेणियोंकी करते हैं। पान्दामान दोपके मीनकपी काफिर-मालूम पड़ता है कि मनुष्य श्रेणीमें उनको अपेक्षा असभ्य जाति दूसरी कम मिलेगी। धनके वासस्थानको स्थिरता नहीं, परिधेय वस्त्रादि नहीं और उन्हें यह भी ज्ञान नहीं जीविकाके लिये किस प्रकार कार्य करना पड़ेगा। मौनकपी लोगोंके साथ मिलना तो चाइते हैं, किन्तु पनिटप्रिय होते हैं। नरमास नहीं खाते भी वह शूकरमांस, मत्य प्रभृति भक्षण करते हैं। मौनकपी जङ्गली फल एवं मूल तोड़कर और झील तथा पुष्करिणौसे मत्स्य पकड़कर खा जाते हैं। वह धनुर्वाण ले वन वन और पुष्करिणी पुष्करिणी घूमते फिरते हैं। बाँसको खपाचसे मछली पकड़नेका कांटा वह लोग । बना लेते हैं। वह वस्त्र नहीं रखते और न रहने कोई लना नहीं करते। मौनकयो क्षुद्रकाय होते हैं। उनका मस्तक छोटा पौर तालु चपटा रहता है। वह अपना सर्वाङ्गकांचसे खरोंच खरांचकर शरीरको शोभा सम्पादन करते हैं। बामन्त तथा कण्ठमूलसे मणि वन्ध एवं कटिदेश पर्यन्त अङ्गको चारो ओर गोलाकार खरीचके दागोंसे मीनकपी प्रति विश्री और भयानक लगते हैं। किन्तु वह उसीको अपनी प्रधान शोभा समझते हैं। किसी विषय पर सन्तोष प्रकट करते समय मोनकपी दक्षिण इस्तमें तालुंके निम्न भागपर धीरे धीरे दन्ताधात कर बाम स्कन्धेपर एक थप्पड़ लगाते हैं। सईस घोड़ेका बदन मलते वक जैसे उपक देते हैं, वैसे ही शब्द निकाल वह चुम्मा लेते हैं। परस्पर कथोप कथन करते समय मौनकपी ऐसा गड़बड़ उच्चारण करते हैं, मानो चं चं कर ही मनोभाव प्रकाश करते हों। किन्तु वास्तवमें यह बात ठीक नहीं। उड़ियों की भांति उनकी उच्चारण प्रणाली प्रति द्रुत और अस्पष्ट होती है। उनको नाचना बहुत पच्छा लगता है। नाचते समय यह दोनों हात मस्तकको भोर उठा सङ्गीतके तास ताल पर कूदते फांदते हैं। फिर नृत्यमें कभी मीनकपी मस्तक घुमाते और कभी समस्त मरोर सम्मुखकी ओर भुका चाते हैं। इस प्रकार मौनकपी सङ्गीत और <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> नृत्यके ताल ताल पर मामारुप भाभी किया करते हैं। मां, विला-भान्दामात दीपके पूर्व मतय उप-होपके अन्तर्गत केदा, पेराक, पाहा और विज्ञानु प्रदेशमें जो काफिर रहते हैं, उन्हें मचयके लोग "ममा तथा "बिला करते हैं। उनका व कृष्ण, केय मण- सदृश और गठनादि अफरीकावासियोंकी भांति खर्वा- कार होता है। पूर्णवयस्क पुरुषको उच्चता तीन जायसे अधिक नहीं बैठती। उनके भी निर्दिष्ट वासस्थान और वषिकार्यका अभाव है। उनमें अधिकांश धूम धूम कर वनका उत्पन्नादि संग्रह करते हैं और उसे ही मचय- जातीयोंके निकट व्यवहार्य द्रव्यादि बदलते हैं। वह शिकार मारते और शिकारमें पाये पशु-पक्षी वा उसका चर्म पालकादि विनिमय कर खाद्यादि लाते हैं। में क्रियान नदीको उपनदी इमानके तौरवर्ती स्थानमें "मेमां बुकित्" नामक येणोके काफिर रहते हैं। वह पूर्णवयसमें सवा तीन हाथ होते हैं। उनका मस्तक क्षुद्र, मस्तकका सम्मुखभाग कुछ कोणाकार बच्च, और पवादभाम वतुंलाकार तथा मध्यांपकी अपेक्षा प्रशस्त होता है। मलयजातीोसे सेमा बुकितीका मुखमण्डन साधारणतः अप्रशस्त, धदेश उन, नयनकोटर प्रति गम्भीर, नासिका नोची और छोटी एवं नासिकाका अग्रभाग सूक्ष्म तथा उठा हुआ होता है। पांखका परदा पीला, पक्ष्म धन-दीर्घ-कुचित, हनुदेश एवं मुखविवर प्रशस्त और होठ मोटा तथा छोटा रहता है। भू तथा नासिकाके अग्रभाग पौर हिदको उच्चता समान होती है। उनका उदर बात रहते भी शरीर अपेक्षाकृत धीव सगता है। यह वानरको भांति उदरको घटा बढ़ा सकते हैं। गावका धर्म साधारणतः कोमल और चिक्य होता है। निशानुको सीमाङ्ग नामक श्रेयी केदादियों की भांति- कुछ तरलवर्ण है। वह लोग सेमा बुकितोंकी भांति- मसूण घोर कष्णवर्ण नहीं होते। उनके बाल जनसे नहीं मिलते, टेदे टेढ़े और घटोत्कची भांति कंधे रहते हैं। माड़वारियोंकी भांति खूब धनी मोटो.मूह रहती है। मस्तकको बनावट मखयों या काफिरोंकोः<noinclude></noinclude> 2a4i686ff4dwnncht46cqixkhg2ole8 विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६ 4 193661 665037 665004 2026-07-05T18:21:18Z AMAN KUMAR 6475 /* प्रतिभागी */ नामांकन 665037 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ 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१०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 7717pi9g60uyje69uvummb3gks61u4q 665040 665037 2026-07-05T18:44:03Z AMAN KUMAR 6475 /* पुस्तक सूची */ पुस्तक की पृष्ठ-परिधि का चुनाव किया 665040 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC)[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] ku3itpfdo0p2sp3sib2lx0hu96p14q8 665082 665040 2026-07-06T06:11:06Z ममता साव9 2453 /* प्रतिभागी */ 665082 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य 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— संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] iagl7zg678diyv70d7k7uw71em0yw2m 665085 665082 2026-07-06T06:20:20Z ममता साव9 2453 /* पुस्तक सूची */ 665085 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) --[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:१९, ६ जुलाई २०२६ (UTC) प्रतियोगिता के शुरुआत हुए तीन दिन हो गये. इस परिधि के एक भी पृष्ठ में काम जारी नहीं हुआ. ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:११, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] m9lmoew5sz6ox0kf9viw4kmw6md9syr विकिस्रोत वार्ता:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६ 5 194522 665049 2026-07-06T01:30:16Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता */ नया अनुभाग 665049 wikitext text/x-wiki == शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता == @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]], @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]], @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] और @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी मैं इस गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव में पृष्ठों का शोधन कर रहा हूँ। मेरे द्वारा शोधित किए जा रहे एक पृष्ठ (जैसे- हिंदी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) के बीच में एक चित्र आया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि: १. मूल पीडीएफ/djvu से इस चित्र को निकालकर विकिमीडिया/विकिस्रोत पर अपलोड करने की सही प्रक्रिया क्या है? २. अपलोड करने के बाद उस चित्र को शोधित पृष्ठ के कोड में सही स्थान पर लगाने के लिए किस साँचे या कोड का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह पृष्ठ के लेआउट में सही से दिखाई दे? आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३०, ६ जुलाई २०२६ (UTC) 2j2glyxlgfmct7c6fhs0h4rgyhc6u2n 665050 665049 2026-07-06T01:31:29Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता */ संरचना सुधारें 665050 wikitext text/x-wiki == शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता == @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]], @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]], @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] और @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी मैं इस गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव में पृष्ठों का शोधन कर रहा हूँ। मेरे द्वारा शोधित किए जा रहे एक पृष्ठ (जैसे- हिंदी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) के बीच में एक चित्र आया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि: # मूल पीडीएफ/djvu से इस चित्र को निकालकर विकिमीडिया/विकिस्रोत पर अपलोड करने की सही प्रक्रिया क्या है? # अपलोड करने के बाद उस चित्र को शोधित पृष्ठ के कोड में सही स्थान पर लगाने के लिए किस साँचे या कोड का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह पृष्ठ के लेआउट में सही से दिखाई दे? आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३०, ६ जुलाई २०२६ (UTC) 8dip7plvgan8rw2z0whg5qytjt5d95c 665052 665050 2026-07-06T01:44:51Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता */ प्रश्न 665052 wikitext text/x-wiki == शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता == @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]], @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]], @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] और @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी मैं इस गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव में पृष्ठों का शोधन कर रहा हूँ। मेरे द्वारा शोधित किए जा रहे एक पृष्ठ (जैसे- हिंदी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) के बीच में एक चित्र आया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि: # मूल पीडीएफ/djvu से इस चित्र को निकालकर विकिमीडिया/विकिस्रोत पर अपलोड करने की सही प्रक्रिया क्या है? # अपलोड करने के बाद उस चित्र को शोधित पृष्ठ के कोड में सही स्थान पर लगाने के लिए किस साँचे या कोड का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह पृष्ठ के लेआउट में सही से दिखाई दे? आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३०, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == मूल पुस्तक में परिवर्तन == मूल पुस्तक में अंग्रेज़ी के शब्द गलत छपे थे क्या मैं उन्हें सुधार सकता हूं? [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:४४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) pq727t5njp82v9a0xd933aexe26nwwm 665053 665052 2026-07-06T01:46:00Z AMAN KUMAR 6475 /* मूल पुस्तक में परिवर्तन */ सम्बन्ध जोड़ा 665053 wikitext text/x-wiki == शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता == @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]], @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]], @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] और @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी मैं इस गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव में पृष्ठों का शोधन कर रहा हूँ। मेरे द्वारा शोधित किए जा रहे एक पृष्ठ (जैसे- हिंदी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) के बीच में एक चित्र आया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि: # मूल पीडीएफ/djvu से इस चित्र को निकालकर विकिमीडिया/विकिस्रोत पर अपलोड करने की सही प्रक्रिया क्या है? # अपलोड करने के बाद उस चित्र को शोधित पृष्ठ के कोड में सही स्थान पर लगाने के लिए किस साँचे या कोड का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह पृष्ठ के लेआउट में सही से दिखाई दे? आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३०, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == मूल पुस्तक में परिवर्तन == मूल पुस्तक में अंग्रेज़ी के शब्द गलत छपे थे क्या मैं उन्हें सुधार सकता हूं?(संबंध - हिन्दी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:४४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) 8um300vit32komdl8jj968ayo117nm9 665058 665053 2026-07-06T03:51:49Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता */ उत्तर 665058 wikitext text/x-wiki == शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता == @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]], @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]], @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] और @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी मैं इस गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव में पृष्ठों का शोधन कर रहा हूँ। मेरे द्वारा शोधित किए जा रहे एक पृष्ठ (जैसे- हिंदी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) के बीच में एक चित्र आया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि: # मूल पीडीएफ/djvu से इस चित्र को निकालकर विकिमीडिया/विकिस्रोत पर अपलोड करने की सही प्रक्रिया क्या है? # अपलोड करने के बाद उस चित्र को शोधित पृष्ठ के कोड में सही स्थान पर लगाने के लिए किस साँचे या कोड का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह पृष्ठ के लेआउट में सही से दिखाई दे? आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३०, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :विकिस्रोत पर आपका स्वागत है। संबंधित चित्र को कॉमन्स पर अपलोड करने के लिए आप [https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Suryakund.png इसे] देख सकते हैं। आपको चित्र अपलोड करते समय उसी लाइसेंस का उपयोग करना है जो संबंधित पुस्तक का है। पृष्ठ में चित्र लगाने के लिए आप [[पृष्ठ:अयोध्या का इतिहास.pdf/२०९|इसे]] देख सकते हैं। चित्र के आकार को नियंत्रित करने के लिए आप 30/50/60px लिखकर देख लें कि कौन सा आकार पृष्ठ के अनुकूल है। संपादन करने के लिए धन्यवाद। प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएँ। [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:५१, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == मूल पुस्तक में परिवर्तन == मूल पुस्तक में अंग्रेज़ी के शब्द गलत छपे थे क्या मैं उन्हें सुधार सकता हूं?(संबंध - हिन्दी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:४४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) l09agzjp1tydqvsbjtqehisyk42xeuk 665059 665058 2026-07-06T03:54:40Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* मूल पुस्तक में परिवर्तन */ उत्तर 665059 wikitext text/x-wiki == शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता == @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]], @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]], @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] और @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी मैं इस गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव में पृष्ठों का शोधन कर रहा हूँ। मेरे द्वारा शोधित किए जा रहे एक पृष्ठ (जैसे- हिंदी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) के बीच में एक चित्र आया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि: # मूल पीडीएफ/djvu से इस चित्र को निकालकर विकिमीडिया/विकिस्रोत पर अपलोड करने की सही प्रक्रिया क्या है? # अपलोड करने के बाद उस चित्र को शोधित पृष्ठ के कोड में सही स्थान पर लगाने के लिए किस साँचे या कोड का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह पृष्ठ के लेआउट में सही से दिखाई दे? आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३०, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :विकिस्रोत पर आपका स्वागत है। संबंधित चित्र को कॉमन्स पर अपलोड करने के लिए आप [https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Suryakund.png इसे] देख सकते हैं। आपको चित्र अपलोड करते समय उसी लाइसेंस का उपयोग करना है जो संबंधित पुस्तक का है। पृष्ठ में चित्र लगाने के लिए आप [[पृष्ठ:अयोध्या का इतिहास.pdf/२०९|इसे]] देख सकते हैं। चित्र के आकार को नियंत्रित करने के लिए आप 30/50/60px लिखकर देख लें कि कौन सा आकार पृष्ठ के अनुकूल है। संपादन करने के लिए धन्यवाद। प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएँ। [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:५१, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == मूल पुस्तक में परिवर्तन == मूल पुस्तक में अंग्रेज़ी के शब्द गलत छपे थे क्या मैं उन्हें सुधार सकता हूं?(संबंध - हिन्दी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:४४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :हाँ आप सुधार सकते हैं। इस <nowiki>{{SIC|मूल पाठ का शब्द|सही शब्द}}</nowiki> साँचे का प्रयोग करते हुए सुधार कीजिए। [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:५४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) 7j847ejp8if2djznwa7y1x3x0jqh1q8 665060 665059 2026-07-06T03:58:25Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* मूल पुस्तक में परिवर्तन */ 665060 wikitext text/x-wiki == शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता == @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]], @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]], @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] और @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी मैं इस गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव में पृष्ठों का शोधन कर रहा हूँ। मेरे द्वारा शोधित किए जा रहे एक पृष्ठ (जैसे- हिंदी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) के बीच में एक चित्र आया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि: # मूल पीडीएफ/djvu से इस चित्र को निकालकर विकिमीडिया/विकिस्रोत पर अपलोड करने की सही प्रक्रिया क्या है? # अपलोड करने के बाद उस चित्र को शोधित पृष्ठ के कोड में सही स्थान पर लगाने के लिए किस साँचे या कोड का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह पृष्ठ के लेआउट में सही से दिखाई दे? आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३०, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :विकिस्रोत पर आपका स्वागत है। संबंधित चित्र को कॉमन्स पर अपलोड करने के लिए आप [https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Suryakund.png इसे] देख सकते हैं। आपको चित्र अपलोड करते समय उसी लाइसेंस का उपयोग करना है जो संबंधित पुस्तक का है। पृष्ठ में चित्र लगाने के लिए आप [[पृष्ठ:अयोध्या का इतिहास.pdf/२०९|इसे]] देख सकते हैं। चित्र के आकार को नियंत्रित करने के लिए आप 30/50/60px लिखकर देख लें कि कौन सा आकार पृष्ठ के अनुकूल है। संपादन करने के लिए धन्यवाद। प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएँ। [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:५१, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == मूल पुस्तक में परिवर्तन == मूल पुस्तक में अंग्रेज़ी के शब्द गलत छपे थे क्या मैं उन्हें सुधार सकता हूं?(संबंध - हिन्दी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:४४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :हाँ आप सुधार सकते हैं। इस <nowiki>{{SIC|मूल पाठ का शब्द|सही शब्द}}</nowiki> साँचे का प्रयोग करते हुए सुधार कीजिए। एक छोटा सा सुधार कर लीजिए। जिसे आप ६ (6) समझ रहे हैं वो ९ (9) है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:५४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) qv9a1m0v6qmzoojq0pv8mhzoemajo74 665065 665060 2026-07-06T04:05:37Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता */ उत्तर 665065 wikitext text/x-wiki == शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता == @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]], @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]], @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] और @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी मैं इस गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव में पृष्ठों का शोधन कर रहा हूँ। मेरे द्वारा शोधित किए जा रहे एक पृष्ठ (जैसे- हिंदी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) के बीच में एक चित्र आया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि: # मूल पीडीएफ/djvu से इस चित्र को निकालकर विकिमीडिया/विकिस्रोत पर अपलोड करने की सही प्रक्रिया क्या है? # अपलोड करने के बाद उस चित्र को शोधित पृष्ठ के कोड में सही स्थान पर लगाने के लिए किस साँचे या कोड का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह पृष्ठ के लेआउट में सही से दिखाई दे? आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३०, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :विकिस्रोत पर आपका स्वागत है। संबंधित चित्र को कॉमन्स पर अपलोड करने के लिए आप [https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Suryakund.png इसे] देख सकते हैं। आपको चित्र अपलोड करते समय उसी लाइसेंस का उपयोग करना है जो संबंधित पुस्तक का है। पृष्ठ में चित्र लगाने के लिए आप [[पृष्ठ:अयोध्या का इतिहास.pdf/२०९|इसे]] देख सकते हैं। चित्र के आकार को नियंत्रित करने के लिए आप 30/50/60px लिखकर देख लें कि कौन सा आकार पृष्ठ के अनुकूल है। संपादन करने के लिए धन्यवाद। प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएँ। [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:५१, ६ जुलाई २०२६ (UTC) ::@[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी, मुझे आप "हिंदी विश्वकोष भाग ३" के लिए लाइसेंस बता दें और मैं भी कैसे देख सकता हूं? [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:०५, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == मूल पुस्तक में परिवर्तन == मूल पुस्तक में अंग्रेज़ी के शब्द गलत छपे थे क्या मैं उन्हें सुधार सकता हूं?(संबंध - हिन्दी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:४४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :हाँ आप सुधार सकते हैं। इस <nowiki>{{SIC|मूल पाठ का शब्द|सही शब्द}}</nowiki> साँचे का प्रयोग करते हुए सुधार कीजिए। एक छोटा सा सुधार कर लीजिए। जिसे आप ६ (6) समझ रहे हैं वो ९ (9) है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:५४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) 8xkrnmu38liqgs09jia479pvi4jr41j