विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.9 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१३३ 250 45972 665116 561754 2026-07-06T14:12:09Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 665116 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{Rh||गजमद-गजवण|१३१}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> गजमद (सं० क्ली०) हाथी का मद। ​ गजमदहरणी (सं० स्त्री०) शिवलिङ्गमलिका, पत्रगुरिया। ​गजमल्ल—कपूरमल्ल का लड़का। इनके पुत्र का नाम कल्याणमल्ल था। ​गजमाचल (सं० पु०-स्त्री०) गजस्य माचं शाठ्यं लुनाति ल्वादेरल्पात् डः। सिंह। स्त्रीलिङ्ग में ङीप् होने से गजमाचली होता है। ​गजमात्र (सं० वि०) गजेन परिमाणमस्य गज-मात्रच्। गजपरिमित, हाथी आकार का। ​गजमुक्ता (सं० स्त्री०) गजे गजकुम्भे जाता मुक्ता। एक प्रकार की मुक्ता वा मोती जो हस्ती के मस्तक में पायी जाती है। प्राचीन आचार्यगण गज, मेघ, वराह, शङ्ख, शूर, सर्प, शुक्ति और वेणु, इन आठ को मुक्ता की उत्पत्ति का स्थान बतलाते हैं। ​ {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>"करीन्द्रजीमूतवराहशङ्खमच्छत्वगुद्भूतितया वंशाः।<br> मुक्ताफलानि प्रथितानि लोके तेषान्तु शक्ताद्भयमेव भूयः।।" {{Right|(कुमार का मल्लिनाथ)}}</poem>}}}} ​ आधुनिक वैज्ञानिक हस्तिकुम्भ से मुक्ता का निकलना स्वीकार नहीं करते, क्योंकि आज तक उन्होंने गजकुम्भ में मुक्ता देखी ही नहीं है। ​ गजमुख (सं० पु० क्ली०) गजस्य मुखं मुखमस्य, बहुव्री०। १ गणेश, गजानन देव। ​ {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"प्रमथाधिपो गजमुखः।" (अमर०)}}}} ​(क्ली०) गजस्य मुखं, ६-तत्। २ हाथी का मुख। ​गजमोचन (सं० पु०) विष्णु भगवान् का एक आकार, जिसे धारण कर उन्होंने गज को ग्राह (मगरमच्छ) से बचाया था। ​ गजमोटन (सं० पु० स्त्री०) गजं मोटयति पीडयति गज-मुट्-णिच् ख्युन्। सिंह। स्त्रीलिङ्ग में ङीप् होने से गजमोटनी शब्द होता है। ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गजरप्रबन्ध (सं० पु०) स्वर और बाजा का मिलान। यह गायन और नृत्य के प्रारम्भ में श्रोताओं के सामने सुनाया जाता है। ​ गजरबजर (हि० पु०) अंडबंड, घालमेल। ​ गजरा (हिं० पु०) १ गाजर के पत्ते, जो चौपायों को खिलाये जाते हैं। २ फूलों की माला। ​गजराज (सं० पु०) बड़ा हाथी। ​गजराज उपाध्याय—बनारस के एक हिन्दी कवि। १८१० ई० को इन्होंने जन्म लिया था। इन्होंने वृत्तहार नामक एक काव्य और एक रामायण को लिखा है। ​गजरी (हिं० स्त्री०) एक प्रकार का आभूषण, जिसे स्त्रियाँ कलाई में पहनती हैं। ​गजरोट (हिं० स्त्री०) गाजर की पत्ती। ​गजल (फा० पु०) एक फारसी और उर्दू में शृङ्गार रस की कविता। इसमें प्रेमियों और प्रेमिका का विरह वर्णित रहता है। ​गजलण्ड (सं० क्ली०) गजस्य लण्डम्, ६-तत्। हाथी का लीद (मद)। ​गजलोल (हिं० पु०) एक तानभेद जिसमें चार लघु मात्रा और अन्त में विराम होता है। ​गजवत् (सं० त्रि०) गजोऽस्त्यस्मिन् गज-मतुप् मस्य वः। गजविशिष्ट, जिसमें हाथी रखा जाता हो। ​ गजवदन (सं० पु० क्ली०) गजस्य वदनं यस्य, बहुव्री०। १ गणेश। गजस्य वदनम्, ६-तत्। २ हाथी का मुख। ​ गजवल्लभा (सं० स्त्री०) गजस्य वल्लभा, ६-तत्। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ed2fe6xn8qnc2q4ubkylu10pvn0jc5f पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१३४ 250 45980 665117 561755 2026-07-06T14:30:52Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 665117 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|१३२| गजशाला-गजानन}}</noinclude>​<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ​गजशाला (सं० स्त्री०) हाथी बाँधने का स्थान, पोल खाना। ​ गजशासन—योगिनीतन्त्रोक्त कामरूप का वायुकोण स्थित पवित्र स्थान। ​<Small>"देशाच्चैव केदाराद् वायव्यां गजशासनः।" (योगिनीतन्त्र, ११ पत्र)</Small> ​ गजशिक्षा (सं० स्त्री०) गजानां शिक्षा, ६-तत्। हाथी चलाने का अभ्यास। ​​<Small>"तथैव गजशिक्षायां नीतिशास्त्रे च पारगः।" (भारत, १२।१०५।१०)</Small> ​ गजशिरः (सं० पु०) गजस्य शिर इव शिरो यस्य, बहुव्री०। १ दैत्यविशेष, एक राक्षस का नाम। (हरिवंशपु० २४० अ०) २ गणेश। ​गजसार—एक जैन ग्रन्थकार, जो धवलचन्द्र के शिष्य थे। ​गजसाह्वय (सं० पु०) गजेन हस्तिनाम्ना नृपेण साह्वयम्। हस्तिनापुर। ​ ​<Small>"निययुः गजसाह्वयात्।" (भारत)</Small> ​ गजस्कन्ध (सं० पु०) गजस्य स्कन्ध इव स्कन्धोऽस्य, बहुव्री०। दैत्यविशेष, एक असुर का नाम। ​ गजही (हिं० स्त्री०) दूध से मक्खन निकालने की एक लकड़ी। इसकी लम्बाई चार-पाँच हाथ की होती है और सिरा चार भागों में चिरा रहता है। ​गजास्य (सं० पु०) १ गजं गजकर्ण च आख्याति, ख्या-क। चक्रमर्द, चकवड़ का पेड़ (राजनि०)। २ गजस्य आस्यमिव आस्यं यस्य, बहुव्री०। गणेश। ३ हस्तिनापुर। ​ गजाग्रणी (सं० पु०) गजानामग्रणीः, ६-तत्। ऐरावत। ​ गजाजीव (सं० पु०) गजैस्तत्पालनादिभिराजीव्यते, जीव-अण्। हस्तिपालक, वह जो हाथी की रक्षा करता हो। ​ गजाण्ड (सं० क्ली०) गजस्याण्डमिव अण्डमस्य, बहुव्री०। पिण्डमूल। ​गजादन (सं० पु०) अश्वत्थवृक्ष, पीपल का पेड़। ​गजादनी (सं० स्त्री०) गजप्रिया, हाथी की प्रिय वनस्पति। ​ गजादिनामा (सं० स्त्री०) गजपति शब्द आदौ यस्य तादृशं नाम यस्याः, बहुव्री०। गजपिप्पली, गजपीपर। ​ ​<Small>"शमनं च गजादिनामा कराञ्जः।" (सुश्रुत, चिकित्सा० १००)</Small> ​ ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गजाध्यक्ष (सं० पु०) गजस्य अध्यक्षः, ६-तत्। जिसके ऊपर हाथी की रक्षा और देख-रेख का भार दिया जाता है, जो हाथी की देखभाल करता हो, गजकर्ता। ​ गजाधर (सं० पु०) <small>गदाधर देखो।</small> ​ गजानन (सं० पु०) गजस्याननमिव आननं यस्य, बहुव्री०। १ गणेश, पार्वती पुत्र। गणेश का गजानन होने की कथा ब्रह्मवैवर्तपुराण के गणेशखण्ड में इस तरह लिखी है— दक्षकन्या सती ने पति की निन्दा से प्राण परित्याग करके जब हिमालय में जन्म लिया, तब महादेव ने उनसे अपना विवाह किया था। विवाह के पीछे दोनों का सम्भोग होने लगा, परन्तु कोई सन्तान न निकली। इससे पार्वती के मन में बड़ा कष्ट हुआ था। किसी दिन महादेव के निकट बैठ करके रोते-रोते वह विकल हो गयीं। महादेव ने अनेक भावना और चिन्ता करके विष्णु की आराधना करने का उनको उपदेश दिया था। पार्वती के विष्णु की आराधना करने पर विष्णु ने सन्तुष्ट हो करके उनको पुत्र का वर प्रदान किया। थोड़े दिन पीछे पार्वती के एक पुत्र हुआ। दम्पती आमोद में मतवाले हो दान करने लगे। स्वर्ग, मर्त्य, पाताल प्रभृति सभी स्थानों में आमोद-प्रमोद मचा था। सब लोग नवजात शिशु को देखने के लिये कैलास जा करके उपस्थित हुए। इसके पीछे शनि भी कैलास पहुँच गये। वह स्त्री के शाप से जिसकी ओर देखते वह नष्ट हो जाता था। शनि महाराज इसी भय से पार्वती नन्दन को देखने न गये। परिशेष को शिव की कथा पर उन्हें घर के भीतर जाना पड़ा। ग्रहराज शनि पार्वती के निकट जा करके अधोवदन (मुँह नीचे किए) खड़े हो गये। पार्वती को यह बात अच्छी न लगी। उन्होंने शनि से बालक को देखने का अनुरोध किया था। शनि ने सब कथा खोल करके कही, परन्तु पार्वती ने वह ग्राह्य न की और हँसी में बात उड़ा दी। अगत्या शनि को बालक देखना ही पड़ा। शनि के दृष्टिमात्र से बालक का मस्तक उड़ गया। पार्वती रो-रो करके आकुल हुई थीं। फिर विष्णु के निकट यह संवाद भेजा गया। विष्णु ने जाते समय देखा कि राह में कोई हाथी पड़ा परम सुख से सोता था, उन्होंने उस... ​<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9f9xa98ac5j9tvpqafy448bqqc537ry पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१७६ 250 75670 665743 302966 2026-07-07T01:07:30Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665743 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उज्जयिनी'''|'''१७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> स्कन्द, मत्स्य, नारसिंह प्रभृति पुराणों में महाकाल-शिवलिङ्गका उल्लेख मिलता है। इसी शिवलिङ्गके कारण उज्जयिनीको पीठस्थान कहते हैं।महाकाल के मन्दिर में दिनरात घृतका प्रदीप जलता है। प्रति सोमवारको मन्दिरके सेवक पञ्चमुखी मुकुट उठा महा समारोहसे कुण्डाभिमुख जाते हैं। उस समय मन्त्र पाठ, वाद्यरव और साधारण कर्तृक जयजयकार हुआ करता है। दोनों पार्श्व से पण्डे मयूर पुच्छका चमर ढालते चलते हैं। कुण्डपर पहुंचनेसे प्रधान पुरोहित मन्चपाठपूर्वक मुकुट धोते हैं। फिर महासमारोहसे मन्दिर में उसे लाके महाकालको पहना देते हैं। उस समय महाकाल कौषय वस्त्र और मणिमाणिक्यादिसे सज भक्तोंकी पूजा लेते हैं। महाकाल-मन्दिरके समस्त कार्यका भार तैलङ्गी ब्राह्मणों और बाहोरी नामके लोगोंपर न्यस्त है। इस लिङ्गका दूसरा नाम अनन्त कल्पेश्वर है। महाकाल शिवका मन्दिर अतिवृहत् है। इस सुन्दर मन्दिरको देखनेसे प्राचीन हिन्द शिल्पिगणके नैपुण्यका कितना ही परिचय मिलता है। देवालयकी रक्षा और महाकालकी सेवाकेलिये अनेक सम्भान्त व्यक्तियोंने वृत्ति वांध दी है। उसमें संधिया प्रायः ३००), देवासके राजा ५०) या ६०), गायकवाड़ १२०) और होलकर ६०) रु॰ मासिक देते हैं। महाकालका मन्दिर बने तीन शत वत्सर हुये। फिरिस्ता नामक मुसलमानी इतिहासमें लिखा है―― यह मन्दिर सोमनाथके समतुल्य है। इसके वृहत् स्वर्णस्तम्भ मणिमाणिक्यसे खचित थे। गर्भग्रहके मध्य एक सामान्य आलोक जला देनेसे असामान्य हीरकमें प्रतिफलित होता है और समस्त मन्दिर मानो सूर्यालोककी भांति चमकने लगता है। असंख्य रत्न राजिपूर्ण मन्दिरकी अनुपम शोभा अब पूर्वमत देख नहीं पड़ती। अलतमास बादशाह समस्त मणिमाणिक्य रत्नादि लूट मन्दिरको विस्तर क्षति पहुंचा गये हैं। उस समय पण्डोंने अशेष यत्न से लिङ्गमूर्तिको गुप्त भावमें दूसरी जगह घटाकर बचाया था। प्रायः गत वत्सर ये समचन्द्र बापू नामक एक व्यक्ति ने मन्दिरको पुनः। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> बनवाया था। आज भी इस मन्दिर का स्वर्णकलस दूरसे यात्रियोंके नयनोंको खींच लेता है। उज्जयिनी में केदारश्वर नामक शिवका एक अपर क्षुद्र मन्दिर है। अवन्तिखण्डके मतमें इस शिवलिङ्गका दर्शन करनेसे महापुण्य मिलता है। लिङ्गकी उत-पत्तिके सम्बन्धमें एक उपाख्यान भी है,――‘किसी समय हिमशृङ्गवासी देवगणने महादेवसे जाकर कहा था――देवदेव! दारुण हिमने हमें बहुत घबरा दिया है। हम चिरदिन उसे सह नहीं सकते। आप वही उपाय करें, जिसमें हम इस दुःखसे दूर रहें।’ उस पर महादेवने हिमालय पुछवा भेजा,―― चिरकाल ऐसा दारुण हिम पड़नेका कारण क्या है?’ हिमालयने प्रार्थनापूर्वक कहा――‘हमारे ऊपर आप आकर रहिये। हम हमेशा आपकी पूजा करेंगे। आठ मास हिमका प्रभाव भी कम पड जायेगा।’ महादेव गिरिशृङ्गपर एक उष्ण कुण्ड के निकट जाकर टिके। वहां योगिऋषि केदारेश्वर नामसे उन्हें पूजने लगे। काल पाकर पृथिवी मानवके पापसे कलुषित हुई। इसलिये देवादिदेव महादेव भी अन्तर्हित हुये। एकदिन कतिपय ऋषि केदारखर दर्शन करने गये थे। किन्तु केदारेश्वरको वहां न देख वे घबराये और रो रो कर आंसू बहाने लगे―‘हाय! हमें हृदयेश्वर कहां देख पड़ेंगे! क्या दयापूर्वक वे हमें दर्शन न देंगे? परमदयालुके व्यतीत हमें कौन शान्ति प्रदान करेगा?’ उसी समय देववाणी हुई―–‘महाकाल वनमें जावो। वहां शिप्रा नदीपर तुम्हें केदारेश्वरका दर्शन मिलेगा।’ अनन्तर ऋषि उल्लासपूर्ण हृदयसे उज्जयिनीको आये थे। वे शिप्रा नदीके तीरपर पहुंच प्रेमभरसे देवादिदेवका स्तव करने लगे। उस समय स्रोतस्वतीके वक्षपर एक शिला उतरा उठी थी। ऋषिगणने उसीको केदारेश्वरका लिङ्ग समझ सादर ले लिया। अनन्तर कुरुपाण्डवके युद्ध में उज्जयिनी पर भी पापने हाथ मारा। केदारेश्वर पुनः छिप गये। भीमने एक ऋषिसे परामर्थ लिया था――अब केदारेखर किसप्रकार मिलेंगे। ऋषिने भीमसे पैर फैलाकर खड़े रहने कौर राज्य समस्त वृष उमके <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 6aonbgu9iuchzmklye2ewbpqqkbx5su पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१ 250 75682 665156 665094 2026-07-06T14:46:58Z ममता साव9 2453 665156 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२०|इटली|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} थे। ९७३ को द्वितीय और ९९६ ई॰ को तृतीय ओटो सिंहासन पर बैठे। १००२ ई॰ को तृतीय ओटोके मरनेपर इवरियाके अधिपति आरडोइन लोम्बार्डीके राजा हुये और १०१५ ई॰ को मर गये। बेनेरियाके हेनरीने अपने वैरो पेवियाको विनष्टकर रोममें सिंहासन पाया था, किन्तु १०२४ ई॰ को पर-लोक गमन किया। बाकी इटलीके राजाओंका शासन-समय नीचे लिखते हैं,— {|Width=100% |हेनरी||१०२४ |- |४र्थ हेनरी||१०५६ |- |७म ग्रेगोरी||१०७३ |- |पोपाधिकार||१०७७ |- |लोथर साक्सन||११२५-११३७ |- |कोनण्ण रखावीय||११३८-११५२ |- |फ्रेडरिक||११५४ |- |६ष्ठ हेनरी||११८४ |- |२य फेड्रिक||१२२० |- |कोमण्ड||१२५० |- |कोनराडिन||१२५४ |- |पादरी सुद्ध और‌ जनप्रकोप||१२५८-१३०३ |- |रवार्ट||१३०२ |- |जोन||१३४३ |- |चार्लस||१३८२ |- |लाडिसलाउस||१३८७ |- |२य जोन||१४१४-१४३५ |- |आलफोन्सो||१४५३-१४८२ |- |स्वतन्त्र शासन||१४८२-१४८५ |- |३य चार्लस||१४६६ |- |१२श लूइ||१५१३ |- |१०म लिओ||१५३० |- |आलेस्मछेओ||१५३७ |- |कोसिनो||१५३७ |- |फरडीनण्ड||१५५७ |- |विकर आमोडेउस||१७१३ |- |श्य एम्मानुएल||१७३० |- |परमाकोन कारलोसकौरानौ||१७३७ |- |२ जोसेफ||१७८०-१७५० |- |लिओपोल्ड||१७३० |} {{Multicol-break}} {|Width=100% |- |प्रजातन्त्र||१७६६ |- |७म पाषस||१८०० |- |नेपोलियान-शासन||१८०२ |- |मूरट||१८०८ |- |आष्ट्रीय अधिकार||१८१५-१८७० |- |इटलीय शासनतन्त्र||१८७१ ई॰से आरम्भ |} ई॰ के १६वें शताब्द पहले इटली देश भीषण युद्ध और स्व-स्व जातीय उन्नतिके लिये स्पेन, फ्रान्स तथा जर्मनी के ग्रहसे प्रायः जनशून्य हो गया था। १५२५ ई॰ को पेवियाके युद्धने जर्मन-सम्त्रात्‌का प्रभुत्व प्रतिष्ठित किया, किन्तु ई॰ के १८वें शताब्दारम्भ अष्ट्रीयाका आतङ्क जम गया। १७८७-८८ ई०को नेपोलियानका विजय होनेसे शासन बदला और कयो वर्षतक इस प्रायद्दीपका अधिकांश फ्रान्सके अधीन रहा। १८१४ ई॰ को सन्धि होनेपर लोम्बार्डी-वेनिशोय प्रान्त अष्ट्रीया और सारदिनिया राज्य तथा गेनोइस प्रदेश सेवायके राज-परिवारने पाया था। लुक्का नव्वाबो बना और तासक-नोको नव्वाबीका पुनरुद्धार हुवा । बोरबोंनोको नेपल्स, पोपको अपने राज्य और इष्ट वंशको मोडेने तथो अन्य प्रान्तका पुनरधिकार मिला था। १८४८ ई॰ को मिलानोसों और वेनिशीयोंने अष्ट्रीयाके विरुद्ध व्यर्थ विप्लव बढ़ाया। १८५८ ई॰को पोडमोण्ट और अष्ट्रोयामें जो युद्ध हुवा, उसमें पोडमोण्ट हार गया। १८६१ ई॰ को पोडमोण्ट-नरेशके अधीन इटली एक राज्य बना था। १८६६ ई॰ को अष्ट्रीयाने नये राज्यके हाथ वेनशिया सौंपा। १८७० ई०को ११ वीं सितम्बर-को इटलीय सेनापति कादोरनाने ६०००० फौजके साथ पोपके अधिक्कत रोमराज्यमें प्रवेश किया था‌। पोपने नाममात्त्र वाधा डालो। अवशेषको रोम इटलीय शासनतन्त्रके अधीन हुवा था। वाटिकान (Vatican) मात्त्र पोपके अधिकारमें रहा। १८७१ ई॰ को २२ वीं जुलायोको राजा विकर एम्मानुएलने जयोल्लाससे सदलबल पहुंच रोम नगरको इटलीको राजधानी बनाया थाः। अर्ध शताब्दको चेष्टाके बाद इटली फिर स्वाधीन हुआ। १८७८ ई॰ की ९वीं जनवरीको विक्टर एम्मानुएल {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> mxiht5bbxe8u4ro7jf0yfz2qd0ojvcl 665175 665156 2026-07-06T14:50:06Z ममता साव9 2453 665175 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२०|इटली|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} थे। ९७३ को द्वितीय और ९९६ ई॰ को तृतीय ओटो सिंहासन पर बैठे। १००२ ई॰ को तृतीय ओटोके मरनेपर इवरियाके अधिपति आरडोइन लोम्बार्डीके राजा हुये और १०१५ ई॰ को मर गये। बेनेरियाके हेनरीने अपने वैरो पेवियाको विनष्टकर रोममें सिंहासन पाया था, किन्तु १०२४ ई॰ को पर-लोक गमन किया। बाकी इटलीके राजाओंका शासन-समय नीचे लिखते हैं,— {|Width=100% |हेनरी||१०२४ |- |४र्थ हेनरी||१०५६ |- |७म ग्रेगोरी||१०७३ |- |पोपाधिकार||१०७७ |- |लोथर साक्सन||११२५-११३७ |- |कोनण्ण रखावीय||११३८-११५२ |- |फ्रेडरिक||११५४ |- |६ष्ठ हेनरी||११८४ |- |२य फेड्रिक||१२२० |- |कोमण्ड||१२५० |- 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ई॰ को सन्धि होनेपर लोम्बार्डी-वेनिशोय प्रान्त अष्ट्रीया और सारदिनिया राज्य तथा गेनोइस प्रदेश सेवायके राज-परिवारने पाया था। लुक्का नव्वाबो बना और तासक-नोको नव्वाबीका पुनरुद्धार हुवा । बोरबोंनोको नेपल्स, पोपको अपने राज्य और इष्ट वंशको मोडेने तथो अन्य प्रान्तका पुनरधिकार मिला था। १८४८ ई॰ को मिलानोसों और वेनिशीयोंने अष्ट्रीयाके विरुद्ध व्यर्थ विप्लव बढ़ाया। १८५८ ई॰को पोडमोण्ट और अष्ट्रोयामें जो युद्ध हुवा, उसमें पोडमोण्ट हार गया। १८६१ ई॰ को पोडमोण्ट-नरेशके अधीन इटली एक राज्य बना था। १८६६ ई॰ को अष्ट्रीयाने नये राज्यके हाथ वेनशिया सौंपा। १८७० ई॰को ११ वीं सितम्बर-को इटलीय सेनापति कादोरनाने ६०००० फौजके साथ पोपके अधिक्कत रोमराज्यमें प्रवेश किया था‌। पोपने नाममात्त्र वाधा डालो। अवशेषको रोम इटलीय शासनतन्त्रके अधीन हुवा था। वाटिकान (Vatican) मात्त्र पोपके अधिकारमें रहा। १८७१ ई॰ को २२ वीं जुलायोको राजा विकर एम्मानुएलने जयोल्लाससे सदलबल पहुंच रोम नगरको इटलीको राजधानी बनाया थाः। अर्ध शताब्दको चेष्टाके बाद इटली फिर स्वाधीन हुआ। १८७८ ई॰ की ९वीं जनवरीको विक्टर एम्मानुएल {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> dhemjhbotim1zojl6azvidmzo2gplzr पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१७५ 250 75701 665742 303016 2026-07-07T00:42:13Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665742 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१७४'''|'''उज्जयिनी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ‘अवन्ती’ कहलाता था। <small>(भारत भीष्म)</small> किन्तु पुराण में उज्जयिनी नाम लिखा है। इसे विशाला और पुष्यकरहिनी भी लिखते हैं। <small>अवन्ती देखिये।</small> पाश्चात्य प्राचीन ऐतिहासिक टलेमी और पेरिप्लास् ने इस शहरका ओजिनि (Ozene) नाम लिखा है। टलेमीका लेख है―― उज्जैन तियास्तनकी राजधानी है।(Ptolemy, Geog. Bk. vii. c. I. 53) ‘तियास्तम’। ‘चष्टन' शब्दकी अपलिपि है। प्राचीन मुद्रा और शिलालिपि द्वारा समझ पड़ा है―― पहले चष्टन नामक एक राजा मालव और धारके निकटस्थ प्रदेशपर राज्य करते थे। <small>शकराजवंश देखो।</small> पेरिप्लास्ने भी लिखा है (भडोंच) बारिगजके पूर्व उज्जैन है। इस नगरमें राजा रहते थे। उज्जैनसे साधारणके व्यवहारको अक़ीक, वर्तन, उत्कष्ट मलमल, रूईका बढ़िया कपड़ा और नानाप्रकार उपादेय द्रव्य आता था। प्राचीन कालमें अनेक राजचक्रवर्ती यहां सिंहासन पर बैठ राजत्व कर गये हैं। किन्तु दुःखका विषय है उनका प्राचीन इतिहास अतिअल्प ही मिलता है। सिंहलियोंके महावंश नामक बौद्ध ग्रन्थ में लिखा है――चन्द्रगुप्तके पौत्र अशोकने अपने पिताके राजप्रतिनिधि रूपसे कुछ कालतक उज्जैनमें राजत्व किया था। अशोकके पिता पाटलिपुत्रके राजा थे (ईसाके ३रा शताब्द पूर्व)। उसके प्रायः शताब्द बीतनेपर (ई॰ से १५७ वर्ष पूर्व) एक बौद्ध यति प्रायः ४०००० शिष्यों के समभिव्याहारमें उज्जयिनीस्थ दक्षिण गिरिमठसे सिंहल द्वीपको गये थे। बहुकाल पीछे राजा विक्रमादित्यको इस नगरीका अधिकार मिला। उनके राजत्व कालमें कालिदास प्रभृति नवरबने उज्जयिनीको चमकाया था। पूर्व कालीन इन्द्रप्रस्थ, हस्तिनापुर प्रभृति प्राचीन नगरोंको भांति विरमारियो भासन चलाते समय इसकी भी――समृधि रही। ई॰ के ७वें शताब्दमें चीना परिव्राजक युअन्-चुअङ्ग उज्जयिनी (उ-जे-जेन्-न) देखने पाये थे। उस समय भी यह नगरी बहुतसे लोगोंकी वासभूमि रही। हिन्दु नृपतिके अधीन हीनयान और महायान <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उभय सम्प्रदायके बौद्ध वसते थे। युअन्-चुयङ्गने उज्जयिनीके निकट ही अशोकराजनिर्मित एक स्तूप देखा था। किन्तु अब वह समृधि कहां! सबकी सब कालके गालमें चली गयी। प्राचीन उज्नयिनी पर्यन्त भूगर्भ में गाढ़ी है। विशाला अपने समस्त रत्न खो दुःखमें सज्जा से अपना मुख देखा न सकी। इसीसे समझ पड़ता है―― वसुन्धराकी गोदमें अन्तर्हित हो गई है। आजकल यह प्राचीन अवन्ती नगरी नहीं। उसीके उत्तर पार्श्व पर बसी एक नूतन नगरीको उज्जयिनी कहते हैं। इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता-प्राचीन अवन्तीको भूमिके मध्य निहित हुये कितना काल बीता। निश्चित भूमिसात् होनेका क्या कारण है? इसके सम्बन्धमें नाना मतभेद देख पड़ते हैं। वर्तमान उज्जयिनीसे दक्षिण वनमें प्राचीन अवन्ती विलुप्त हुयी है। मट्टी खोदते खोदते प्रायः १०।१२ हाथ नीचे आज भी प्राचीन नगरका चिन्ह मिलता है। भूगर्भ में प्रस्तरका बहुत अभङ्ग स्तम्भ गाढ़ा है। इसका भी प्रमाण नहीं मिलता―― वर्तमान नगर किसने बसाया था। अलाउद्दीन खिलजीके समय उज्जयिनी मुसलमानोंके हाथ लगी। १२९५ से १३८९ ई॰ तक इसके शासनका भार एक राज-प्रतिनिधि पर रहा। पोछे वे स्वाधीन हो गये थे। १५३१ ई॰ तक स्वाधीन भावसे राजकार्य चला। उसके बाद गुजरातके नवाब बहादुर शाहने उज्जयिनीपर अधिकार किया था। १५७१ ई॰ को फिर अकबर बादशाहने इसे जीता। १६५८ ई॰ को उज्जयिनीके निकट ही औरंगजेब और दारा दोनों भाईयोंमें घोर-तर युद्ध हुआ था। १७९२ ई॰ को होलकरने इसे ले अनेक स्थान जला दिये। उसके बाद उज्जयिनी से धियाके हाथ गयी थी और उन्होंने परम सुखसे उसका राजत्व भोग किया। उज्जयिनी एक पवित्र तीर्थस्थान है। इसे हिन्दू, बौद्ध, जैन प्रभृति भित्र-भित्र सम्प्रदायने अपना पुण्य-क्षेत्र माना है। स्कन्दपुराणके अवन्तिखण्ड में उज्जयिनी तीर्थका विस्तृत विवरब लिखा है। यहां महाकाल नामक शिवलिङ्ग विद्यमान है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 3q8g0oghnsn8fd9e6wgzg4n30q90xrn पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१६८ 250 75857 665417 608981 2026-07-06T15:32:09Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665417 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उछंग-उछलिया'''|'''१६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उहंग (हिं॰)<small> उत्सङ्ग देखो।</small>}} {{Outdent|उछकना (हिं॰ क्रि॰) विस्मित होना, उझकना, चौंकना, भौचक रह जाना।}} {{Outdent|उछटना, <small>उचटना देखो।</small>}} {{Outdent|उछड़ (उचाड़)――गुजरातमें दायमा राजपूतोंका एक राज्य। यह मैन नदीके परपार गीरीसे देक्षिण अवस्थित और वीरपुर, रेगन, विक्रमपुर तथा उचाड़ चार प्रान्तमें विभक्त है। भूमिपरिमाण २६ वर्गमील है। १८वें ई॰ के शताब्दारम्भ पर स्थानीय नृपति आगर और राजपिपलीने वीरपुरके राजा बाजी दायमाको राज्यकी श्रीवृद्धिमें बड़ा साहाय्य दिया था। इसकी भूमि हलकी और नदी-नालेसे कटी फटी है। ज्वार बहुत उपजती, किन्तु कुछ-कुछ रुई, तेलहन और नदी किनारे तम्बाकू की उपज भी हाथ लग जाती है। राजपिपली ग्राम पार्वत्य और वृक्षादिसे व्याप्त हैं। उनमें अल्प तथा कठोर फसल होती है। महुवा खूब आते हैं। क्षेत्रफल साढ़े १२ वर्गमील है। प्रति वर्ष कोई दश हजार रुपयेकी आमदनी आती है। ३५६) रु॰ गायकवाड़को कर की भांति दिया जाता है। रेगन उचाड़से पश्चिम अकेला ग्राम है। सामने नर्मदा बहती है। अंशभागी तीन हैं। भूमिका परिमाण प्रायः ४ वर्गमील है। वार्षिक आय ५००)रु॰ होता, जिससे ४६१) रु॰ गायकवाड़को करकी तरह दिया जाता है। प्रभु प्रायः रिक्तहस्त ही रहते हैं। स्थानीय भूमि, फसल और जाति उदाड़से मिलती है। ज़मीन्दार साधारण कृषकसे अधिक क्षमता नहीं रखते। भूमि कुछ-कुछ हलकी और काली है। ज्वार और चावलको बहुत बोते हैं। भीलोंका निवास अधिक है। उपरोक्त विभाग लग जानेसे उचाड़की भूमिका परिमाण साढ़े ८ वर्गमील है। बारह ग्राम बसते हैं। वार्षिक आय ९०००) रु॰ है। ८८३) रु॰ गायकवाड़को करस्वरूप देना पड़ता है। अधिवासी कोल हैं। मोटो फ़सल उपजती है।}} {{Outdent|उछड़ना, <small>उछलना देखो।</small>}} {{Outdent|उछरना, <small>उछलना देखो।</small>}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उछलकूद (हिं॰ स्त्री॰) १ प्लतगति, क्रीड़ाकौतुक, दौड़धूप, नाच-तमाशा, हंसी दिल्लगी।}} {{Outdent|उछलना (हिं॰ क्रि॰) १ वलित होना, फलांग मारना, कूदना, फांदना, एक बारगी ही ऊपरको उड़कर नीचे आ जाना। २ सवेग निःसरण करना, फूट निकलना, उबलना, जोरके साथ बाहर आना। ३ आनन्द करना, खुश होना, उछंग लेना।<small>"आये कनागत फूला कांस। बामन उछलें नौ नौ बांस।” (लोकोक्ति)</small>४ क्रोधसे उत्तेजित होना, गुस्से में खूंखार बनना, तड़पना। ५ सम्भोग करना, चढ़ बैठना।}} {{Outdent|उछलवाना,<small> उछलाना देखो।</small>}} {{Outdent|उछलाना (हिं॰ क्रि॰) उछालनेका कार्य कराना, उछलवाना।}} {{Outdent|उछलिया――बम्बई प्रान्त की एक जाति। इस जातिके लोगोंको भामता या गांठचोर भी कहते हैं। पूनाके उछलियोंका वीज तेलगुप्रान्तसे आया समझ पड़ता है। यह टूटी फूटी तेलगु बोलते और अपने नाम दक्षिणी या पूर्वी ढङ्गके रखते हैं। दक्षिणसे बरार, गुजरात और पश्चिम भारतमें उछलिये फैल पड़े हैं। इन्हें मालूम नहीं अपना घर कब छोड़ा था। कुछ लोग कहते, कि वह चार पांच पीढीसे पूनिके आसपास ग्राममें रहते हैं। भामते कहाते भी पूने के उछलिये भामते नहीं। क्योंकि प्रकृत भामते पूर्व अथवा दक्षिण-पूर्वसे नहीं――उत्तरसे आये थे। यह राजपूतांके सन्तान हैं। रूप सुन्दर और प्रसन्नतायुक्त रहता है। चर्म कोमल है। अङ्ग सुडौल और दृढ़ होते हैं। यह कितने ही रूप बना लेते हैं। अपने ही ग्राममें कोई मारवाड़ी बनिया, कोई गुजराती श्रावक वा जैन, कोई ब्राह्मण और कोई राजपूतके वस्त्र पहनता है। यह किसी वेशमें वर्षों बने रहते और उस प्रकारके लोगोंको सैकड़ों कोस घूम ठगा करते हैं। कभी कभी यह अपना झूठा नाम धाम बता उसी जातिके व्यव-सायीकी सेवा में लग जाते हैं। कुछ दिन विश्वासपूर्वक कार्य चला अवसर पाकर बहुत सा ट्रव्य उठा भागते हैं। बड़े बड़े मेलोंमें दो-तीन भामते पहुंचते और स्न्नानके घाटपर जा बैठते हैं। उनमें कोई ब्राह्मण}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> g8zbktc0k9xqgtj5nhokpmdu6ftcrmn पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१६९ 250 75858 665487 608982 2026-07-06T16:02:16Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665487 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१६८'''|'''उछलिया-उछालना'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> कोई यात्रीका रूप बनाता है। फिर मन्त्रपाठ करते। करते वह यात्रियोंके अलङ्कारादिपर दृष्टि रखते और अवसर पाकर भीगा वस्त्र सुखानेको फैला देते हैं। दृष्टि बचा भामते अलङ्कारादिको अण्टीसे दवा रेतमें कुछ दूर पर गाड़ आते हैं। साथी इधर-उधर घूम टहल जाते हैं। यात्री के रोनेधोने पर वह सहानुभूति देखाते हैं। फिर कहने लगते――‘हमने चोरोंको उधर घूमते देखा है। आप को अन्वेषण करना चाहिये।’ लोगोंके उधर जाते ही भामता अलङ्कारादि उखाड़ कर चम्पत होता है। ऐसे मेलों में प्रायः स्त्रियां अपने अलङ्कार गठरीमें बांध कर रख देती और उसीके पास बैठ भोजन करती हैं। उस समय दो भामते उनके पास पहुंच जाते हैं। एक स्त्रियोंके निकट रहता और दूसरा थोड़ी दूरपर विश्राम लेनको बैठता है। स्त्रियोंके दूसरी ओर घूमते ही वह गठरी चोरा रेतमें गाड़ देता है। पकड़े जानेपर भामतेके पास कुछ नहीं निकलता और अदालतसे साफ़ छूट जाता है। पूना नगरमें उछलिये अथवा दक्षिणी भामते भरे पड़े हैं। नगरकी चारो ओर प्रधानत: बादगांव, भाटगांव, करजा, फुगियाबाड़ी, पाबल, बोपुडी, कनेरसर, कोंडवे, मुनढव. तलेगांव और धमारीमें इनका अड्डा है। कुछ सर्वदा पर्यटनपर रहते हैं। इनके गायकवाड़ और जादव दो विभाग हैं। केवल नीच जातिके मांगी, मारों, चमारों, ढोड़ों, बरूदों और तेलियोंको छोड़ उछलिये सब हिन्दू मुसलमान अङ्गीकार करते हैं। इसीसे कितने ही ब्राह्मण, बनिये और सोनार उनमें जा मिले हैं। अन्य जातिवालोंको उछलिया बननेके लिये २०।२५ रुपये देना पड़ता है। याचकके मुख में हरिद्रा तथा शर्करा डालनेसे ही संस्कार बन जाता है। फिर दो एक बड़े बड़े उछलिये साधारण भोजमें बैठ उसके साथ खाते-पीते हैं। बाजा बजता और अतर-पान बंटता है। पूनाके उछलिये काले और तेंलगु वा द्राविड़ जैसे होते हैं। कितना ही मारते-पीटते भी उनके चक्षुसे अश्रु नहीं निकलता। पुरुष शिखा, श्मश्रु गण्डलोम <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> और अलक रखते हैं। दाढ़ीसे सबको घृणा है। तेलगु और मरहठी मिली बोली चलती है। यह सूवर पालते हैं, गोहत्या कभी नहीं करते। विवाहके समय मालपूवा पकता है। उछलिये सेंध फोड़ने या डाका डालनेसे दूर रहते हैं। क्योंकि ऐसा काम करनेसे ये जातिसे निकाल दिये जाते हैं। प्रात:-कालसे सन्ध्यातक धोकेधड़ीमें माल मारना ही इनका प्रधान उद्देश्य है। उछलिये अपने मुखिये पटेलसे पूछ माल मारने जाते और लौटकर रुपयेमें दो आने उसकी भेंट चढ़ाते हैं। चुग़ली करनेसे पञ्चायत कठोर दण्ड देतो है। पुरुष और स्त्री दोनो अलग या मिल-जुलकर माल मारते; किन्तु किसीकी सब चीज़ नहीं चुराते, एक ही आधसे सन्तुष्ट हो जाते हैं। सन्तान उत्पन्न होनेपर सट्बाई देवीको पूजते हैं। चौल कर्ममें भोज देनेका विधान है। विवाहके समय वरका १०।२० और कन्याका वयस ६।७ वत्सर रहता है। वरपक्षसे कन्यापक्षको २००।२५० रुपया दिया जाता है। विवाह के समय रातभर गोंधले नाचते गाते हैं। उछलिये विधवा विवाह और स्त्रीत्याग भी करते हैं। इनमें मृतक जलानकी प्रथा है। तीसरे दिन श्मशानमें भोज होता है। १३ वें दिन मुण्डन और पिण्ड तथा वलिदान करते हैं। {{Outdent|उछहरा (उचहरा)<small> नागोड़ देखो।</small>}} {{Outdent|उछाटना (हिं॰ क्रि॰) उच्चाटन करना, हटाना,भगाना।}} {{Outdent|उछाड़, <small>उछाल देखो।</small>}} {{Outdent|उछार, <small>उछाल देखो।</small>}} {{Outdent|उछाल (हिं॰ स्त्री॰) १ प्लुति, फलांग, कूद-फांद। २ सवेग निःसरण, जो़रका निकास, उबाल। ३ आनन्द, ख़ुशी, उचंग। ४ उत्तेजना, गुस्सा, तड़प । ५ सम्भोग, चड्डी। ६ क़ , वमन, छांट। ७ फेंकफांक। ८ अपमान, बेइज्ज़ती। ९ युद्ध, लड़ाई।}} {{Outdent|उछाल छक्का (हिं॰ स्त्री॰) विलासवसी स्त्री, फा़हिशा, छिनाल। यह अपनी छाती देखाती है।}} {{Outdent|उछालना (हिं॰ क्रि॰) १ उत्क्षेपण करना, फेंकना। “सोना उछालते चले जावो।” (लोकोक्ति) २ वमन या क़ै}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> p40hn9pwzar04ujixd0ym3h99bj8bk6 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१७० 250 75859 665550 608984 2026-07-06T16:42:30Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665550 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उछाला-उजराई'''|'''१६९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :करना, डालना, छांड़ना। ३ अपमान करना, आबरू, उतारना, नामको बट्टा लगाना। ४ युद्ध करना, लड़ना {{Outdent|उछाला (हिं॰ पु॰)<small> उछाल देखो।</small>}} {{Outdent|उछाव (हिं॰ पु॰) उत्साह।}} {{Outdent|उछास (हिं॰) <small>उच्छास देखो।</small>}} {{Outdent|उछाह (हिं॰ पु॰) उत्साह।}} {{Outdent|उछाही (हिं॰ वि॰) उत्साही।}} {{Outdent|उछिन्न (हिं॰) <small>उच्छिन्न देखो।</small>}} {{Outdent|उछिष्ट (हिं॰) <small>उच्छिष्ट देखो।</small>}} {{Outdent|उछीड़ (हिं॰ स्त्री॰) अल्पता, कमी, ओछापन।}} {{Outdent|उछीनना (हिं॰ क्रि॰) उच्छिन्न करना, नोच डालना, उखाड़ना।}} {{Outdent|उछेद (हिं॰) <small>उच्छेद देखो।</small>}} {{Outdent|उछेल, <small>उछाल देखो।</small>}} {{Outdent|उछोर (हिं॰ क्रि॰ वि॰) उस ओर, उस तर्फ़।}} {{Outdent|उज़क――प्राचीन स्वर्ण मुद्रा विशेष। मुसलमानी समयमें इसका चलन था।}} {{Outdent|उजका (हिं॰ पु॰) सन्त्रासन, भुचकाग, चिड़ियोंके उड़ानेका पुतला, काली हण्डी, धोका, डड़ावा। यह तृणपत्रादिसे बनाया और शस्यक्षेत्र में लगाया जाता है। भीषण आकार देखते ही पक्षी भागते हैं! इससे किसी को कुदृष्टि भी क्षेत्रपर नहीं पड़ती।}} {{Outdent|उजट (हिं॰ पु॰) उटज, साधु या मुनिका आश्रम, झोपड़ा। यह घासफूससे बनता है।}} {{Outdent|उजड़ (हिं॰ वि॰) उजड्ड।}} {{Outdent|उजड़ना (हिं॰ क्रि॰) १ समूल नष्ट होना, जड़से उखड़ना, सूख जाना, नोच खसोटमें पड़ना। २ पतन होना, गिरना, बरबादीमें पड़ना, मट्टी हो जाना। ३ अपहत होना, लुटना। ४ जनशून्य होना, खाली पड़ना। ५ अपव्यय होना, खर्चमें लगना, खो जाना। ६ तमोवृत होना, अच्छा न लगना, उदास पड़ना। ७ अत्यन्त उत्सन्न होना, बह जाना, किसी कामका न रहना। ८ शून्य लगना, नाचीज होना, तुच्छ देख पड़ना। ९ भवन छूटना, घरसे बाहर होना, देख न पड़ना। १० विनष्ट होना, मरना। ११ अपमानित होना, इज्ज़त खोना। १२ पति वा स्त्री }} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :छूटना, रांड़ या रंडुवा होना। १३ पतनको प्राप्त होना, गिर पड़ना। {{Outdent|उजड़वाना (हिं॰ क्रि॰) विनष्ट कराना, बरबादीमें डलवाना, उजड़ाना।}} {{Outdent|उजड़वायी (हिं॰ स्त्री॰) विनष्ट करानेकी क्रिया बरबादी में डलानेका काम।}} {{Outdent|उजड़ा (हिं॰ वि॰) १ विनष्ट, शून्य, बरबाद, खाली, जो खराब बन गया हो।<small> “उजड़े घरका बलैंडा।” (लोकोक्ति)</small> (पु॰) २ नाशक, बरबाद करनेवाला, बदमाश। ३ अधम व्यक्ति, कमीना शख़् स।}} {{Outdent|उजड़ा पुजड़ा (हिं॰ वि॰) नष्ट भ्रष्ट, खराबख़स्ता, उखड़ा-पुखड़ा, गया गुजरा, टूटा-फूटा, कटा फटा।}} {{Outdent|उजड़ाई, <small>उजड़वायौ देखो।</small>}} {{Outdent|उजड़ाना, <small>उजड़वाना देखो।</small>}} {{Outdent|उजडड (हिं॰ वि॰) १ नितान्तमूर्ख, बिलकुल वेवकू़फ़, जिसे ज़रा भी समझ न रहे। २ नीचवंशोद्भुत, कमीने खा़न्दान् से पैदा, जो तौर तरीका़ जानता न हो। ३ तुच्छ, कठोर, सख्त, गंवारू। (पु॰) ४ महा-मूर्ख व्यक्ति, जो शख़् स निहायत बेवक़ूफ़ हो। ५ निर्दय मनुष्य, बेरहम शख़् स।}} {{Outdent|उजड्डपन (हिं॰ पु॰) १ मूर्खता, बेवक़ूफ़ी। २ तुच्छता, कठोरता, सख्ती।}} {{Outdent|उज़बक (तु॰ वि॰) १ मूर्ख, बेवक़ूफ़, गंवार। (पु॰) २ तातारियोंकी एक जाति। <small>उज़वेग देखो।</small> उज़बेग-अफगा़न-तुर्कस्तानकी एक शासक जाति। <small>तुर्कस्तान देखो। </small>}} {{Outdent|उजमन (हिं॰ पु॰) भोजके समय अपनेसे वृद्ध स्त्रियोंको दी जानेवाली भेंट।}} {{Outdent|उजरत (अ॰ पु॰) १ पारिश्रमिक, मज़दूरी, कामका दाम। २ शुल्क, किराया।}} {{Outdent|उजरन (हिं॰ स्त्री॰) ध्वंसावशेष, जो चीज़ उजड़नेसे बची हो।}} {{Outdent|उजरना, <small>उजड़ना देखो।</small>}} {{Outdent|उजरा, <small>उजड़ा और उजला देखो।</small>}} {{Outdent|उजराई (हिं॰ स्त्री॰) १ शुक्लता, सफेदी, मोराई। २ निर्मलता, सफाई।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 43|1em}}</noinclude> fh49dacgp1bpd3ektu93volca9xruf8 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१७१ 250 75860 665731 608985 2026-07-06T17:22:40Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665731 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१७०'''|'''उजराना-उजालना'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उजराना (हिं॰ क्रि॰) १ विनष्ट कराना, बरबादीमें डलाना। २ श्वेत कराना, सफेदी दिलाना।}} {{Outdent|उजलत (अ॰ स्त्री॰) शीघ्रता, फुरती, जल्दी।}} {{Outdent|उजलवाना (हिं॰ क्रि॰) उज्ज्वल कराना, चमकवाना।}} {{Outdent|उजला (हिं॰ वि॰) १ उज्ज्वल, चमकीला। २ निर्मल, शफ़् फाफ़, शीशे-जैसा। ३श्वेत, सफेद। ४ पवित्र, पाक, अच्छा। ५ दीप्तिमान, रौशन, होशियार।}} {{Outdent|उजला पादमी (हिं॰ पु॰) १ श्वेत परिच्छद पहनने-वाला मनुष्य, जो आदमी सफे़द कपड़े पहने हो। २ सम्मानित व्यक्ति, इज्जतदार शख़् स। ३ साधारण मनुष्य, मामूली शख़् स। इसी प्रकार श्वेतवस्त्रको ‘उजला-कपड़ा’ और स्वच्छ भवनको ‘उजलाघर’ कहते हैं।}} {{Outdent|उजला कद्दू, (हिं॰ पु॰) अलाबु, गोलकद्दू, लौकी।}} {{Outdent|उजला कनेर (हिं॰ पु॰) श्वेतकरवीर, सफ़ेद कनेर।}} {{Outdent|उजला चन्दन (हिं॰ पु॰) श्वेतचन्दन, सफे़द चन्दन।}} {{Outdent|उजला जामुन (हिं॰ पु॰) सफे़द जामुन।}} {{Outdent|उजलाधतूरा (हिं॰ पु॰) सफ़ेद धतूरा।}} {{Outdent|उजलाभंगरा (हिं॰ पु॰) सफे़द भंगरा।}} {{Outdent|उजली (हिं॰ स्त्री॰) रजकस्त्री, धोबन।}} {{Outdent|उजलीका आजा़र (हिं॰ पु॰) श्वेतप्रदर, सफ़ैदा।}} {{Outdent|उजली काचकूरी (हिं॰ स्त्री॰) सफेद कोंच।}} {{Outdent|उजली तुलसी (हिं॰ स्त्री॰) सफे़द तुलसी।}} {{Outdent|उजलोवरण्――गुजरातकी एक जाति। इस जातिके लोग कालीव्रजवालोंसे पृथक् हैं। किन्तु कोलियों के साथ विवाहादि सम्बन्ध कर लेते हैं। इनमें कुनबी आदि कृषक एवं ब्राह्मण, बनिये, राजपूत, कारीगर और भाट मिलते हैं, जो प्राय: नागरिक रहते हैं। ये स्प्न तिशास्त्रके अनुसार प्राचीन वर्णविभागके पक्षपाती हैं। देवदेवियोंकी पूजा करते हैं। इनमें विधवा विवाह कोई नहीं करता।}} {{Outdent|उजले पानकी जड़ (हिं॰ स्त्री॰) श्वेत ताम्बूलका मूल, सफे़द पानकी जड़।}} {{Outdent|उजवाना (हिं॰ क्रि॰) ढलाना, डलाना, छोड़ाना. खा़ली करवाना।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उजवास (हिं॰ पु॰) युक्ति, तदबीर, चाल, चौकसी।}} {{Outdent|उजहानी――युक्तप्रदेशके बदायूं ज़िलेका एक नगर। यह अक्षा॰ २८° ३०‘ २५‘‘ उ॰ और द्राघि॰ ७९° २‘ २०‘‘ पू॰ पर अवस्थित है। यहां हिन्दू, जैन, मुसलमान् और ईसाई रहते हैं। नगरमें पक्की इमारत और सड़क बनी है। गुड़से चीनी बहुत तैयार की जाती है। नीलका काम भी चलता है। सप्ताह में दो बार मङ्गल और शनिवारको बाजा़र लगता है। थाना, डांकघर, स्कूल और मुसाफि़रखा़ना मौजुद है। कितनी ही सुन्दर मसजिदें खड़ी हैं।}} {{Outdent|उजागर (हिं॰ वि॰) १ दीप्तिमान, चमकीला। २ प्रसिद्ध, मशहर। ३ प्रकाशित, साफ़, जा़हिर।}} {{Outdent|उजाड़ (हिं॰ पु॰) १ विनाश, बरबादी। २ शून्य स्थान, खा़ली जगह। (वि॰) ३ विनष्ट, बरबाद, जो बिगड़ गया हो।}} {{Outdent|उजाड़मुंह (हिं॰ पु॰) हतभाग्य मुख, कमबख़्त चेहरा। <small>‘सर झाड़ मुंह उजाड़’ (लोकोक्ति)</small> इसी प्रकार अलङ्कार-रहित स्त्रीको भी ‘उजाड़ सूरत’ कहते हैं।}} {{Outdent|उजाड़ना (हिं॰ क्रि॰) १ उत्पाटन करना, उखाड़ना, जोत डालना। २ खण्ड करना, तोड़ना, टुकड़े उड़ाना। ३ विनाश करना, खींच लेना, मट्टोमें मिलाना। ४ निष्कासन करना, निकालना। ५ लुण्ठन करना, लूटना, ले भागना । ६ दरिद्र बनाना, तवाह करना, ७ निर्जन करना, वबा फैलाना। ८ आघात करना, चोट मारना}} {{Outdent|उजाड़ू (हिं॰ वि॰) १ मुक्त हस्त, शाहख़र्च, खाने-उड़ानेवाला। २ नाशक, बरबाद करनेवाला, जो लूट लेता या बिगाड़ देता हो।}} {{Outdent|उजान (हिं॰ क्रि॰ वि॰) धाराके प्रतिकूल, दरयाकी ऊपरी ओरको।}} {{Outdent|उजार, <small>उजाड़ देखो।</small>}} {{Outdent|उजारा, <small>उजला ओर उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उजारी (हिं॰ स्त्री॰) क्षेत्रका किश्चित् शस्य, अगऊं खेतका कुछ अनाज। यह देवताके अर्थ प्रथम तोड़ कर अलग रख दी जाती है। <small>उजाली देखो।</small>}} {{Outdent|उजालना (हिं॰ क्रि॰) १ प्रकाशित करना, जलाना।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> r4ytgbem6tmvptm6ux3rdcpmk9oukds पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१७२ 250 75861 665733 608986 2026-07-06T18:08:20Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665733 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उजाला-उज्जयन्त'''|'''१७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :२ प्रकाशित कराना, चमकाना। ३ परिष्कार करना, सफाई लाना, रगड़ना, मांजना। {{Outdent|उजाला (हिं॰ पु॰) १ दिन, धूप, चमक। २ दीप्ति, रौशनो। ३ महिमा, नाम, गहना। ४ एकमात्र पुत्र, एक लौता बेटा।}} {{Outdent|उजाली (हिं॰ स्त्री॰) चन्द्रज्योत्स्ना, चांदनी।}} {{Outdent|उजालेका तारा (हिं॰ पु॰) शुक्र, सवेरेका नक्षत्र।}} {{Outdent|उजास, <small>उजाला देखी।</small>}} {{Outdent|उजियर, <small>उजला देखो।</small>}} {{Outdent|उजियरिया, <small>उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उजियार, <small>उजला और उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उजियारना, <small>उजालना देखो।</small>}} {{Outdent|उजियारा, <small>उजाला और उजला देखो।</small>}} {{Outdent|उजियारी, <small>उजाली देखो।</small>}} {{Outdent|उजियाला, <small>उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उजीता, <small>उजाला और उजला देखो।</small>}} {{Outdent|उजीर (हिं॰ पु॰) वजीर, मन्त्री।}} {{Outdent|उजबा (हिं॰) <small>अजूबा देखो।</small>}} {{Outdent|उजेनी (हिं॰ स्त्री॰) उज्जैन।<small> उज्जयिनी देखो।</small>}} {{Outdent|उजेर,<small> उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उजरा (हिं॰ पु॰) १ नूतन वृषभ, नया बैल। जब-तक बैल गाडी वग़ रहमें जोता नहीं जाता, तब-तक उजैरा कहलाता है। २ उजाला, प्रकाश। (वि॰) ३ उजला, साफ़।}} {{Outdent|उजेला, <small>उजला और उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उज्जन (सं॰ क्ली॰) स्थूल वा बलिष्ठ पड़नेका भाव, जिस हालतमें मोटे या ताक़तवर रहें।}} {{Outdent|उज्जयनी (सं॰ स्त्री॰) अवन्ती। <small>उज्जयिनी देखो।</small>}} {{Outdent|उज्जयन्त――काठियावाड़के अन्तर्गत एक पवित्र पहाड़। इसका वर्तमान नाम गिरनार है। यह जूनागढ़से प्रायः ५ कोस पूर्व पड़ता और अक्षा॰ २१° ३१‘ ३०‘‘ तथा द्राघि॰ ७०° ४२‘ पू॰ पर अवस्थित है। अतिप्राचीन कालसे यह पर्वत हिन्दुवों और जैनोंका पुण्य तीर्थ माना जाता है। महाभारतमें लिखा है――}} {{x-smaller|{{c|<poem>“प्रभासच्चोदधौ तीर्थ त्रिदशानां युधिष्ठिर। तत्र पिण्डारक नाम तापसाचरित शिवम्।</poem>}}}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{x-smaller|{{c|<poem>उज्जयन्तय शिखरी क्षिप्रं सिद्धिको महान्॥ २१ पुण्ये गिरौ मुराष्ट्रेषु मृगपक्षिनिषेविते। उच्चयन्ते श्प्न तप्ताङ्गो नाकपृष्ठे महीयते॥” २३ (वन ८८ अ॰)</poem>}}}} समुद्रतीर सुराष्ट्र के निकट देवगणका प्रभासतीर्थ है। यहां पिण्डारक तीर्थ और आशु सिद्धिदायक उज्जयन्त पर्वत परिलक्षित है। मृग और पक्षियोंसे समाकुल सुराष्ट्र देशके पवित्र उज्जयन्त पर्वतपर तपस्या कर मनुष्य स्वर्गलोकमें पहुंचता है। स्कन्दपुराणके प्रभासखण्डमें कहा है―― {{x-smaller|{{c|<poem>“सोमनाथस्य सान्निध्ये उज्जयन्तो गिरिर्महान्। तस्य पश्चिमभागे तु रैवतक इति स्मृतः। उज्जयन्ते पद गत्वा ततः स्वर्ग निरामयः। ऐरावतपदाक्रान्ता उज्जयन्तो महागिरिः। मुस्त्राव तोयं बहुधा गजपादोड़वं सुचिं। उज्जयन्तं गिरिवरं मैनाकस्य सहोदरम्। सुराष्ट्र देश विख्यातं युगादौ प्रथमस्थितम्।”</poem>}}}} उक्त वचनसे उज्जयन्त गिरिका माहात्मा सूचित होता है। पर्वतके पास ही सुपवित्र वस्त्रापथक्षेत्र है। इस स्थानको भी आजकल गिरनार कहते हैं। स्कन्दपुराणमें लिखा है――भारतवर्षके सकल तीर्थो में प्रभास श्रेष्ठ है। प्रभासतीर्थकी अपेक्षा वस्त्रापथको समधिक पुण्यप्रद बताया है। {{x-smaller|{{c|<poem>“परं देव त्वया पूर्वं प्रभासं कथितं मम। तस्मादप्यधिक प्रोक्तं क्षेत्रं वस्त्रापथं त्वया॥” (प्रभासखण)</poem>}}}} वस्त्रापथ-क्षेत्रको सीमा इस प्रकार निर्दिष्ट है―― {{x-smaller|{{c|<poem>“उत्तरे तु नदी भद्रा पूर्वस्यां योजनद्दयम्। दक्षिणे च वलिस्थानमुज्जयन्ती नदीमनु। अपरस्यां परं नद्योः सङ्गामं वामनात् पुरात्। एतद्दस्त्रापय क्षेत्र भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्। क्षत्रस्य विस्तरो ज्ञे यो योजनानां चतुष्टयम्।” (प्रभासखण्ड)</poem>}}}} उत्तर भद्रानदी, पूर्व एवं दक्षिण दो योजन अवधि विस्तृत वलिस्थान, उसीके पश्चात् उज्जयन्ती नदी और पश्चिम वामनपुरसे उभय नदीके सङ्गम पर्यन्त स्थानमें भुक्तिमुक्तिप्रद वस्त्रापथ-क्षेत्र है। इसका विस्तार चार योजन है। प्रभासखण्ड में वस्त्रापथको उत्पत्तिका इसप्रकार उपाख्यान है―― एक दिन कैलासमें शिव और पार्वती दोनों बैठे थे। पार्वतीने शिवसे पूछा, ――प्रभो! मुझे दयापूर्वक <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> tlfwj2h1rhc6lrwgo9sxhg1ojh0j594 665734 665733 2026-07-06T18:09:56Z अँजली चौधरी 2439 665734 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उजाला-उज्जयन्त'''|'''१७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :२ प्रकाशित कराना, चमकाना। ३ परिष्कार करना, सफाई लाना, रगड़ना, मांजना। {{Outdent|उजाला (हिं॰ पु॰) १ दिन, धूप, चमक। २ दीप्ति, रौशनो। ३ महिमा, नाम, गहना। ४ एकमात्र पुत्र, एक लौता बेटा।}} {{Outdent|उजाली (हिं॰ स्त्री॰) चन्द्रज्योत्स्ना, चांदनी।}} {{Outdent|उजालेका तारा (हिं॰ पु॰) शुक्र, सवेरेका नक्षत्र।}} {{Outdent|उजास, <small>उजाला देखी।</small>}} {{Outdent|उजियर, <small>उजला देखो।</small>}} {{Outdent|उजियरिया, <small>उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उजियार, <small>उजला और उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उजियारना, <small>उजालना देखो।</small>}} {{Outdent|उजियारा, <small>उजाला और उजला देखो।</small>}} {{Outdent|उजियारी, <small>उजाली देखो।</small>}} {{Outdent|उजियाला, <small>उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उजीता, <small>उजाला और उजला देखो।</small>}} {{Outdent|उजीर (हिं॰ पु॰) वजीर, मन्त्री।}} {{Outdent|उजबा (हिं॰) <small>अजूबा देखो।</small>}} {{Outdent|उजेनी (हिं॰ स्त्री॰) उज्जैन।<small> उज्जयिनी देखो।</small>}} {{Outdent|उजेर,<small> उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उजरा (हिं॰ पु॰) १ नूतन वृषभ, नया बैल। जब-तक बैल गाडी वग़ रहमें जोता नहीं जाता, तब-तक उजैरा कहलाता है। २ उजाला, प्रकाश। (वि॰) ३ उजला, साफ़।}} {{Outdent|उजेला, <small>उजला और उजाला देखो।</small>}} {{Outdent|उज्जन (सं॰ क्ली॰) स्थूल वा बलिष्ठ पड़नेका भाव, जिस हालतमें मोटे या ताक़तवर रहें।}} {{Outdent|उज्जयनी (सं॰ स्त्री॰) अवन्ती। <small>उज्जयिनी देखो।</small>}} {{Outdent|उज्जयन्त――काठियावाड़के अन्तर्गत एक पवित्र पहाड़। इसका वर्तमान नाम गिरनार है। यह जूनागढ़से प्रायः ५ कोस पूर्व पड़ता और अक्षा॰ २१° ३१‘ ३०‘‘ तथा द्राघि॰ ७०° ४२‘ पू॰ पर अवस्थित है। अतिप्राचीन कालसे यह पर्वत हिन्दुवों और जैनोंका पुण्य तीर्थ माना जाता है। महाभारतमें लिखा है――}} {{x-smaller|{{c|<poem>“प्रभासच्चोदधौ तीर्थ त्रिदशानां युधिष्ठिर। तत्र पिण्डारक नाम तापसाचरित शिवम्।</poem>}}}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{x-smaller|{{c|<poem>उज्जयन्तय शिखरी क्षिप्रं सिद्धिको महान्॥ २१ पुण्ये गिरौ मुराष्ट्रेषु मृगपक्षिनिषेविते। उच्चयन्ते श्प्न तप्ताङ्गो नाकपृष्ठे महीयते॥” २३ (वन ८८ अ॰)</poem>}}}} {{gap}}समुद्रतीर सुराष्ट्र के निकट देवगणका प्रभासतीर्थ है। यहां पिण्डारक तीर्थ और आशु सिद्धिदायक उज्जयन्त पर्वत परिलक्षित है। मृग और पक्षियोंसे समाकुल सुराष्ट्र देशके पवित्र उज्जयन्त पर्वतपर तपस्या कर मनुष्य स्वर्गलोकमें पहुंचता है। स्कन्दपुराणके प्रभासखण्डमें कहा है―― {{x-smaller|{{c|<poem>“सोमनाथस्य सान्निध्ये उज्जयन्तो गिरिर्महान्। तस्य पश्चिमभागे तु रैवतक इति स्मृतः। उज्जयन्ते पद गत्वा ततः स्वर्ग निरामयः। ऐरावतपदाक्रान्ता उज्जयन्तो महागिरिः। मुस्त्राव तोयं बहुधा गजपादोड़वं सुचिं। उज्जयन्तं गिरिवरं मैनाकस्य सहोदरम्। सुराष्ट्र देश विख्यातं युगादौ प्रथमस्थितम्।”</poem>}}}} उक्त वचनसे उज्जयन्त गिरिका माहात्मा सूचित होता है। पर्वतके पास ही सुपवित्र वस्त्रापथक्षेत्र है। इस स्थानको भी आजकल गिरनार कहते हैं। स्कन्दपुराणमें लिखा है― भारतवर्षके सकल तीर्थो में प्रभास श्रेष्ठ है। प्रभासतीर्थकी अपेक्षा वस्त्रापथको समधिक पुण्यप्रद बताया है। {{x-smaller|{{c|<poem>“परं देव त्वया पूर्वं प्रभासं कथितं मम। तस्मादप्यधिक प्रोक्तं क्षेत्रं वस्त्रापथं त्वया॥” (प्रभासखण)</poem>}}}} वस्त्रापथ-क्षेत्रको सीमा इस प्रकार निर्दिष्ट है―― {{x-smaller|{{c|<poem>“उत्तरे तु नदी भद्रा पूर्वस्यां योजनद्दयम्। दक्षिणे च वलिस्थानमुज्जयन्ती नदीमनु। अपरस्यां परं नद्योः सङ्गामं वामनात् पुरात्। एतद्दस्त्रापय क्षेत्र भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्। क्षत्रस्य विस्तरो ज्ञे यो योजनानां चतुष्टयम्।” (प्रभासखण्ड)</poem>}}}} उत्तर भद्रानदी, पूर्व एवं 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बोलता, कभी कुकर्ममें ऋषि साथ ले उसी नदी तौर गये। पूतनीरा गङ्गामें नहीं जाता और युद्धक्षेत्रमें अकातर आगे पद बढ़ाता, नहा मुनिवरने ध्यान लगाया था। उसी समय राजा वही मुझे रिझाता है। इसी प्रकार कथावार्ता होते भोजने उन्हें देख लिया। दर्शन मात्रसे ही भोज समय ब्रह्मादि देव कैलासमें भा पहुंचे। उनमें राजाके हृदय में भक्ति टपक पड़ी। उन्होंने निकट विष्याने शिवको लक्ष्य कर कहा,-'पाप सर्वदा हो पहुँच निज आश्रम चलनेके लिये मुनिको मनाया था। दैत्यादिको वर देते हैं, जिसके प्रभावसे वे नियत मनुष्य वे भद्र राजाके वाक्यसे सम्मत हो उनके पाश्रम गये। पर अनिष्टाचरण करते और मेरे पालन कार्य में भोजने स्त्रीके साथ मुनिवरको परिचर्या कर पूछा- व्याघात डालते हैं। पृथिवीको अब में पाल नहीं। 'मुनिवर ! मानव संसारके प्रलोभनसे भूल जन्म और सकता। मेरा पद कौन लेगा!' शिवने उत्तर मरणके चक्रमें घमता फिरता है। भगवन् ! आप क्या दिया,-'मैं आशुतोष इं। अल्प सेवासे हो सन्तुष्ट दयापूर्वक बता सकते हैं-कैसे मानव नित्य शान्ति हो जाता है। मेरा यह स्वभाव छट नहीं सकता। का लाभ उठाता है? मुनिने उत्तर दिया-'प्रथिवीपर आपको बुरा लगता है। इसीसे मैं चल देता| गङ्गा प्रभृति अनेक पुण्य तोया नदी और विष्णु एवं इं।' यह कहकर शिव कैलाससे अन्तर्धान हुये। शिवके तीर्थ हैं। निर्दिष्ट समयपर नदीमें स्नान और उस समय पार्वती बोली-'मैं शिवके व्यतीत एक | तीर्थमें देवदर्शन तथा दान करनेसे अशेष पुण्य <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> क्षण भी नहीं ठहर सकती।' पीछे देवता पार्वतीके | मिलता है। किन्तु वस्त्रापथतीर्थ यात्रीको नित्य साथ शिवको ढंढने निकले। उधर शिव वस्त्रापथमें अनन्त सुखमय स्वर्ग देता है। एकदा मैं वस्त्रापथके अपने वस्त्र छोड़ अदृश्य भावसे रहने लगे। पार्वती और दश नको गया था। वहां विष्णु रहते हैं। उन्होंने देवता सब मिलकर ढूढते दृढते वस्त्रापथमें श्रा पहुंचे मुझसे कहा था-सकल तीर्थ दर्शनके निमित्त तथा थे। विष्णु गरुड़से उतर रैवतक पर्वतपर टिके । परिश्रमसे क्या प्रयोजन है। वस्त्रापथमें दामोदर देवका पार्वतीने उज्जयन्त गिरिको चूडापर विश्राम लिया। दर्शन और दामोदरकुण्डमें स्रान करनेसे ही सर्व इसी समय नागराज और गङ्गादि नदीसमूह पाता- तीर्थों का फल मिलजाता है। विष्णु के आदेशानुसार मैं लसे यहीं पाये। देवगण भी निज निज मनोनीत | उसी तीर्थका दर्शन करने जाता है। अनन्तर राजाने स्थान में बैठ गये। पार्वती उज्जयन्त-गिरिके शृङ्गसे शिव पूछा-भगवन् । वस्त्रापथ क्षेत्र कहां है ? वहां स्त्रोत्र गाने लगी थीं। आशुतोष फिर छिप न सके, कौन कौन पर्वत, कौन कौन नदी और कौन कौन वन पार्वतोके स्तवसे सन्तुष्ट हो सर्व के समक्ष देख पड़े। हैं। मुनिने बताया-उस क्षेत्रको चारो दिक समुद्र देवगणने उनसे कैलास चलनेका अनुरोध किया। है। अनेक नगर बने हैं। भवनाथके निकट उज्ज- शिवने कहा, 'मैं कैलास जा सकता है। आप | यन्त पर्वत है। उसके पश्चिम रैवतक विद्यमान है। और पार्वतीको इसी वस्त्रापथमें रहना पड़ेगा। देव- इसी पर्वतके शृङ्गसे स्वर्णरेखा नदी निकली है। गणने वैसा ही किया था। शिव अपना अंश छोड़ पातालसे स्वर्ण रेखाको उत्पत्ति है। शाम्ब, प्रद्युम्न प्रभृति कैलासको चल दिये। उसी समयसे विष्णु रैवतक | यादव सस्त्रीक इस क्षेत्र में रहते हैं। दामोदरके निकट और-पार्वती अम्बा नामसे उन्नयन्त गिरिके शृङ्गपर रैवतक-कुण्ड है ; उसे रेवतीने बनवाया था। इसी अवखित हैं। स्थानपर ब्रह्मकुण्ड नामक दूसरा भी कुण्ड है। वस्त्रापथमाहामाका उपाख्यान इस प्रकार है- । दामोदर इस कुण्ड में नहाने आते हैं। इस क्षेत्र में जो <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> jp5cdhi9dort1hefthnc85624dbi2dm 665738 665735 2026-07-06T18:27:50Z अँजली चौधरी 2439 665738 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१७२'''|'''उज्जयन्त'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> बतलाइये, किस प्रकारके कार्यसे मानव आपको पूजता और कैसे आचरण तथा कैसी उपासनासे सन्तुष्ट करता है। शिवने कहा,-जो जीव नहीं मारता, सर्वदा सत्य वचन बोलता, कभी कुकर्ममें नहीं जाता और युद्धक्षेत्रमें अकातर आगे पद बढ़ाता, वही मुझे रिझाता है। इसी प्रकार कथावार्ता होते समय ब्रह्मादि देव कैलासमें भा पहुंचे। उनमें विष्याने शिवको लक्ष्य कर कहा,-'पाप सर्वदा हो दैत्यादिको वर देते हैं, जिसके प्रभावसे वे नियत मनुष्य पर अनिष्टाचरण करते और मेरे पालन कार्य में व्याघात डालते हैं। पृथिवीको अब में पाल नहीं। 'मुनिवर ! मानव संसारके प्रलोभनसे भूल जन्म और सकता। मेरा पद कौन लेगा!' शिवने उत्तर मरणके चक्रमें घमता फिरता है। भगवन् ! आप क्या दिया,-'मैं आशुतोष इं। अल्प सेवासे हो सन्तुष्ट दयापूर्वक बता सकते हैं-कैसे मानव नित्य शान्ति हो जाता है। मेरा यह स्वभाव छट नहीं सकता। का लाभ उठाता है? मुनिने उत्तर दिया-'प्रथिवीपर आपको बुरा लगता है। इसीसे मैं चल देता| गङ्गा प्रभृति अनेक पुण्य तोया नदी और विष्णु एवं इं।' यह कहकर शिव कैलाससे अन्तर्धान हुये। शिवके तीर्थ हैं। निर्दिष्ट समयपर नदीमें स्नान और उस समय पार्वती बोली-'मैं शिवके व्यतीत एक | तीर्थमें देवदर्शन तथा दान करनेसे अशेष पुण्य <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> क्षण भी नहीं ठहर सकती।' पीछे देवता पार्वतीके | मिलता है। किन्तु वस्त्रापथतीर्थ यात्रीको नित्य साथ शिवको ढंढने निकले। उधर शिव वस्त्रापथमें अनन्त सुखमय स्वर्ग देता है। एकदा मैं वस्त्रापथके अपने वस्त्र छोड़ अदृश्य भावसे रहने लगे। पार्वती और दश नको गया था। वहां विष्णु रहते हैं। उन्होंने देवता सब मिलकर ढूढते दृढते वस्त्रापथमें श्रा पहुंचे मुझसे कहा था-सकल तीर्थ दर्शनके निमित्त तथा थे। विष्णु गरुड़से उतर रैवतक पर्वतपर टिके । परिश्रमसे क्या प्रयोजन है। वस्त्रापथमें दामोदर देवका पार्वतीने उज्जयन्त गिरिको चूडापर विश्राम लिया। दर्शन और दामोदरकुण्डमें स्रान करनेसे ही सर्व इसी समय नागराज और गङ्गादि नदीसमूह पाता- तीर्थों का फल मिलजाता है। विष्णु के आदेशानुसार मैं लसे यहीं पाये। देवगण भी निज निज मनोनीत | उसी तीर्थका दर्शन करने जाता है। अनन्तर राजाने स्थान में बैठ गये। पार्वती उज्जयन्त-गिरिके शृङ्गसे शिव पूछा-भगवन् । वस्त्रापथ क्षेत्र कहां है ? वहां स्त्रोत्र गाने लगी थीं। आशुतोष फिर छिप न सके, कौन कौन पर्वत, कौन कौन नदी और कौन कौन वन पार्वतोके स्तवसे सन्तुष्ट हो सर्व के समक्ष देख पड़े। हैं। मुनिने बताया-उस क्षेत्रको चारो दिक समुद्र देवगणने उनसे कैलास चलनेका अनुरोध किया। है। अनेक नगर बने हैं। भवनाथके निकट उज्ज- शिवने कहा, 'मैं कैलास जा सकता है। आप | यन्त पर्वत है। उसके पश्चिम रैवतक विद्यमान है। और पार्वतीको इसी वस्त्रापथमें रहना पड़ेगा। देव- इसी पर्वतके शृङ्गसे स्वर्णरेखा नदी निकली है। गणने वैसा ही किया था। शिव अपना अंश छोड़ पातालसे स्वर्ण रेखाको उत्पत्ति है। शाम्ब, प्रद्युम्न प्रभृति कैलासको चल दिये। उसी समयसे विष्णु रैवतक | यादव सस्त्रीक इस क्षेत्र में रहते हैं। दामोदरके निकट और-पार्वती अम्बा नामसे उन्नयन्त गिरिके शृङ्गपर रैवतक-कुण्ड है ; उसे रेवतीने बनवाया था। इसी अवखित हैं। स्थानपर ब्रह्मकुण्ड नामक दूसरा भी कुण्ड है। वस्त्रापथमाहामाका उपाख्यान इस प्रकार है- । दामोदर इस कुण्ड में नहाने आते हैं। इस क्षेत्र में जो <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}भोज नामक एक राजा रहे। वे वृद्ध वयसमें पुत्रपर राज्यभार डाल स्त्रीके साथ गङ्गातीर पहुंचे। कुछ दिन पौछे भद्र नामक एक मुनि कतिपय ऋषि साथ ले उसी नदी तौर गये। पूतनीरा गङ्गामें नहा मुनिवरने ध्यान लगाया था। उसी समय राजा भोजने उन्हें देख लिया। दर्शन मात्रसे ही भोज राजाके हृदय में भक्ति टपक पड़ी। उन्होंने निकट पहुँच निज आश्रम चलनेके लिये मुनिको मनाया था। वे भद्र राजाके वाक्यसे सम्मत हो उनके आश्रम गये। भोजने स्त्रीके साथ मुनिवरकी परिचर्या कर पूछा―― <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> rf38rswzs1q8x3dd8ef3d1ydkz6jugj 665740 665738 2026-07-06T19:10:12Z अँजली चौधरी 2439 665740 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१७२'''|'''उज्जयन्त'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> बतलाइये, किस प्रकारके कार्यसे मानव आपको पूजता और कैसे आचरण तथा कैसी उपासनासे सन्तुष्ट करता है। शिवने कहा,―जो जीव नहींं मारता, सर्वदा सत्य वचन बोलता, कभी कुकर्ममें नहीं जाता और युद्धक्षेत्रमें अकातर आगे पद बढ़ाता, वही मुझे रिझाता है। इसी प्रकार कथावार्ता होते समय ब्रह्मादि देव कैलासमें आ पहुंचे। उनमें विष्णु ने शिवको लक्ष्य कर कहा,――‘आप सर्वदा ही दैत्यादिको वर देते हैं, जिसके प्रभावसे वे नियत मनुष्य पर अनिष्टाचरण करते और मेरे पालन कार्य में व्याघात डालते हैं। पृथिवीको अब मैं पाल नहीं सकता। मेरा पद कौन लेगा!’ शिवने उत्तर दिया,――‘मैं आशुतोष हूं। अल्प सेवासे ही सन्तुष्ट हो जाता है। मेरा यह स्वभाव छूट नहीं सकता। आपको बुरा लगता है। इसीसे मैं चल देता हूं।’ यह कहकर शिव कैलाससे अन्तर्धान हुये। उस समय पार्वती बोली――‘मैं शिवके व्यतीत एक क्षण भी नहीं ठहर सकती।’ पीछे देवता पार्वतीके साथ शिवको ढूंढने निकले। उधर शिव वस्त्रापथमें अपने वस्त्र छोड़ अदृश्य भावसे रहने लगे। पार्वती और देवता सब मिलकर ढूंढते ढूंढते वस्त्रापथमें आ पहुंचे थे। विष्णु गरुड़से उतर रैवतक पर्वतपर टिके। पार्वतीने उज्जयन्त गिरिकी चूडापर विश्राम लिया। इसी समय नागराज और गङ्गादि नदीसमूह पातालसे यहीं पाये। देवगण भी निज निज मनोनीत स्थान में बैठ गये। पार्वती उज्जयन्त-गिरिके शृङ्गसे शिव स्त्रोत्र गाने लगी थीं। आशुतोष फिर छिप न सके, पार्वतीके स्तवसे सन्तुष्ट हो सर्व के समक्ष देख पड़े। देवगणने उनसे कैलास चलनेका अनुरोध किया। शिवने कहा,――‘मैं कैलास जा सकता हूं। आप और पार्वतीको इसी वस्त्रापथमें रहना पड़ेगा।’ देव-गणने वैसा ही किया था। शिव अपना अंश छोड़ कैलासको चल दिये। उसी समयसे विष्णु रैवतक और-पार्वती अम्बा नामसे उन्नयन्त गिरिके शृङ्गपर अवस्थित हैं। वस्त्रापथमाहामाका उपाख्यान इस प्रकार है―― <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}भोज नामक एक राजा रहे। वे वृद्ध वयसमें पुत्रपर राज्यभार डाल स्त्रीके साथ गङ्गातीर पहुंचे। कुछ दिन पौछे भद्र नामक एक मुनि कतिपय ऋषि साथ ले उसी नदी तौर गये। पूतनीरा गङ्गामें नहा मुनिवरने ध्यान लगाया था। उसी समय राजा भोजने उन्हें देख लिया। दर्शन मात्रसे ही भोज राजाके हृदय में भक्ति टपक पड़ी। उन्होंने निकट पहुँच निज आश्रम चलनेके लिये मुनिको मनाया था। वे भद्र राजाके वाक्यसे सम्मत हो उनके आश्रम गये। भोजने स्त्रीके साथ मुनिवरकी परिचर्या कर पूछा―― ‘मुनिवर! मानव संसारके प्रलोभनसे भूल जन्म और मरणके चक्रमें घूमता फिरता है। भगवन्! आप क्या दयापूर्वक बता सकते हैं――कैसे मानव नित्य शान्ति का लाभ उठाता है?’ मुनिने उत्तर दिया―– ‘पृथिवीपर गङ्गा प्रभृति अनेक पुण्य तोया नदी और विष्णु एवं शिवके तीर्थ हैं। निर्दिष्ट समयपर नदीमें स्नान और तीर्थमें देवदर्शन तथा दान करनेसे अशेष पुण्य मिलता है। किन्तु वस्त्रापथतीर्थ यात्रीको नित्य अनन्त सुखमय स्वर्ग देता है। एकदा मैं वस्त्रापथके दर्शनको गया था। वहां विष्णु रहते हैं। उन्होंने मुझसे कहा था――सकल तीर्थ दर्शनके निमित्त वृथा परिश्रमसे क्या प्रयोजन है। वस्त्रापथमें दामोदर देवका दर्शन और दामोदरकुण्डमें स्नान करनेसे ही सर्व तीर्थों का फल मिलजाता है। विष्णु के आदेशानुसार मैं उसी तीर्थका दर्शन करने जाता हूं। अनन्तर राजाने पूछा-भगवन्! वस्त्रापथ-क्षेत्र कहां है? वहां कौन कौन पर्वत, कौन कौन नदी और कौन कौन वन हैं। मुनिने बताया-उस क्षेत्रकी चारो दिक् समुद्र है। अनेक नगर बने हैं। भवनाथके निकट उज्ज-यन्त पर्वत है। उसके पश्चिम रैवतक विद्यमान है। इसी पर्वतके शृङ्गसे स्वर्णरेखा नदी निकली है। पातालसे स्वर्ण रेखाको उत्पत्ति है। शाम्ब, प्रद्युम्न प्रभृति यादव सस्त्रीक इस क्षेत्र में रहते हैं। दामोदरके निकट रैवतक-कुण्ड है; उसे रेवतीने बनवाया था। इसी स्थानपर ब्रह्मकुण्ड नामक दूसरा भी कुण्ड है। दामोदर इस कुण्ड में नहाने आते हैं। इस क्षेत्र में जो <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9ufed6q1g67mmpjw637qejpqt4l9v39 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१७४ 250 75863 665736 608988 2026-07-06T18:15:34Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665736 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उज्जयन्त-उज्जयिनी'''|'''१७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> व्यक्ति पत्र प्रस्तरका मन्दिर बनाता है. वह पत्र सहस। नेमिनाथका मन्दिर अति प्राचीन है। खानीय थिला वर्षे निरामय वर्गका वास पाता है। रैवतक लिपिसे समझ पड़ता है-१२७८ ई०को इस मन्दिरका सबिकट दो कोस विस्तत अन्तर्यक्षेत्र है। यह संस्कार हा था। दूसरा भी एक प्रति वृहत् प्राचीन क्षेत्र अधिकतर पुण्यप्रद है। इसके जल में प्राणीका मन्दिर है। उसे वस्तुपाल और तेजोपाल उभय अस्थि गिरनेपर उसी क्षण विलीन होनेसे इसका नाम चाताने बनवाया था। जैनशास्त्रके मतमें इस तीर्थका विलीयक पड़ा है। यहां अनेक संसारमुक्त सबवासी दर्शन करनेसे अक्षय स्वर्ग मिलता है। गिरनार देखो। रहते हैं। भट्र ऐसा कह कर चलते बने। पीछे - पूर्व समय इस उज्जयन्तमें बौह भी तीर्थ करने राजा और रानी वस्त्रापथको गये। वे कार्तिक | आते थे। बौदराज अशोकको शिलालिपि इस गिरि- मासको पूर्णिमाको यहां पहुंचे थे। नहाकर राजाने | पर उतकीर्ण थी। अनुशासनके पत्र पर ग्रीक और भवनाथ और दामोदरका दर्शन किया। उसो | बालहिक राजगणका नाम मिलता है। ई. के ७ वें समय स्वर्गमे रथ पाकर उनके लिये वहां लग गया। शताब्दमें चीन-परिव्राजक युएन-चुयङ्ग इस गिरिको राजा और रानी दोनों स्वजनसह उसपर बैठ निरामय देखने आये थे। उन्होंने इसके विषयमें लिखा है- वर्गको चले गये।" 'उज्जयन्त ( जह-चेन-तो) गिरिपर (बौद्धोंका ) प्रभासखण्ड में वस्त्रापथके देखने योग्य स्थान भी सङ्घाराम है। स्थानीय आश्रमादि पर्वतका पाच वर्णित हैं-वस्त्रापथसे पश्चिम जनविष्क गिरि है। खोदकर बनाये गये हैं। पर्वत वनसे परिपूर्ण है। इस स्थानपर भीमने उनक नामक असुरको मारा था। कई नदी इसके शिखरसे निकली हैं। सिद्ध पाते अनेक शिवलिङ्ग प्रतिष्ठित हैं। तीर्थयात्रीको ‘इस जाते हैं। आत्मज्ञानी ऋषि एकत्र रहते हैं। किन्तु स्थानका कार्य चुका मङ्गलगिरिसे पश्चिम प्रवाहित उक्त परिव्राजकका वर्णित सकाराम. अब देख नहीं 'गङ्गाके स्रोतमें नहाना चाहिये। फिर गङ्गेश्वरकी पड़ता। कहते हैं-७२४ ई में अरबोंने भारतके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पूज श्राहादि करना उचित है। उसके पीछे बारी भीतर घुस उज्जैनको जीता था। यह सम्भवतः उज्जयन्त बारी सिद्धेश्वरसे पश्चिम स्थित इन्द्रेश्वर, और मङ्गल या गिरनारका जूनागढ़वाला पर्वत होगा। किन्तु गिरिसे पश्चिम यक्षवनस्थ यक्षेश्वरीको दर्शन कर पूजने चचनामे में लिखा है-उमैयद अलवलीदके समय का विधान है। पीछे रैवतक पहुंचना चाहिये। (७०५-७१५ ई.) कासिमके पुत्र मुहम्मदने जयपुर यहां रेवती और भीमकुण्डमें नहा दामोदरका दर्शन और उदयपुर विजय किया। इससे मालूम होता करना उचित है। दामोदरके दर्शनान्त भवनाथ आते है-कदाचित् अरब मध्यभारतमें उज्जैनतक बढ़ पाये हैं। वहां मृगी प्रभृतिमें नहा उज्जयन्त गिरिपर चढ़ना थे। क्योंकि राजस्थानमें करनल टडने उज्जैनको चाहिये। पोछे अम्बा देवी, हस्तिपद, रसकूपिका, चित्तौरका एक सूबा बताया है। तप्तकुण्ड, गोमुख, गङ्गा, प्रद्युम्न प्रभृतिके दर्शन बाद | उज्जयिनी-मध्य भारतान्तर्गत मालवप्रान्तको प्राचीन तीर्थयात्रीका कर्तव्य पुण्यकर्मादि होना उचित है। राजधानी। यह शिप्रा नदोके दक्षिणकूल अक्षा. .: जैन भी उज्जयन्तको अपना अतिपवित्र तीर्थ । २३. ११ १०". उ० और द्राधि० ७५.५० ४५ मानते हैं। प्रति वर्ष हजारों जैन यहां तीर्थ करने पू० पर अवस्थित है। हिन्दीमें. लोग उज्जैन आते हैं। तीर्थहरों के अनेक मन्दिर बने हैं। उनमें कहते हैं। आजकल उज्जयिनी म्वालियर राज्यक अधीन है। यहाँसे बहुत अफीम बाहर भेजी अन्त व कर्णकुजसे पूर्व स्वर्णरेखा नदीसे उज्जयन्त गिरि पर्यन्न जाती। विस्तृत है। यहां दामोदर, भवनाथ, विच, खर्यरेखा, ब्रह्मकुण्ड, ब्रह्म- अर, गले वर, कालमेष, इन्द्र बर, रेवतक, उज्जवन्त, रवीण, कुम्भौ- यह एक पति प्राचीन नगरी: और अवन्तिराज्यको र, भीमकुम र भौमिश्रर नोर्थ है। (प्रभास ) | विख्यात राजधानी है।' महाभारत के समय यह शहर <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 44|1em}}</noinclude> qvvc0ldterr2e5ro2ynaqj1qhfgmjlx 665741 665736 2026-07-06T19:52:27Z अँजली चौधरी 2439 665741 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उज्जयन्त-उज्जयिनी'''|'''१७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> व्यक्ति पत्र प्रस्तरका मन्दिर बनाता है, वह पञ्च सहस्त्र। वर्ष निरामय स्वर्ग का वास पाता है। रैवतक के सन्निकट दो कोस विस्तत अन्तर्गृह क्षेत्र है।<ref>*अन्तर्गृह क्षेत्र कर्णकुज्ज से पूर्व स्वर्णरेखा नदीसे उज्जयन्त गिरि पर्यन्त विस्तृत है। यहां दामोदर, भवनाथ, विष्णु, स्वर्ण रेखा, ब्रह्मकुण्ड, ब्रह्मे-श्वर, गड्ंश्वर, कालमेष, इन्द्रश्वर, रेवतक, उज्जवन्त, रेवतीकुण्ड, कुम्भौश्वर, भीमकुछ और भीमिश्वर-तीर्थ है। (प्रभासखण्ड)</ref> यह क्षेत्र अधिकतर पुण्यप्रद है। इसके जल में प्राणीका अस्थि गिरनेपर उसी क्षण विलीन होनेसे इसका नाम विलीयक पड़ा है। यहां अनेक संसारमुक्त सन्नयासी रहते हैं।” भद्र ऐसा कह कर चलते बने। पीछे राजा और रानी वस्त्रापथको गये। वे कार्तिक मासकी पूर्णिमाको यहां पहुंचे थे। नहाकर राजाने भवनाथ और दामोदरका दर्शन किया। उसी समय स्वर्गसे रथ आकर उनके लिये वहां लग गया। राजा और रानी दोनों स्वजनसह उसपर बैठ निरामय स्वर्गको चले गये।” प्रभासखण्ड में वस्त्रापथके देखने योग्य स्थान भी वर्णित हैं-वस्त्रापथसे पश्चिम ऊन्नविष्क गिरि है। इस स्थानपर भीमने उन्नक नामक असुरको मारा था। अनेक शिवलिङ्ग प्रतिष्ठित हैं। तीर्थयात्रीको इस स्थानका कार्य चुका मङ्गलगिरिसे पश्चिम प्रवाहित गङ्गाके स्रोतमें नहाना चाहिये। फिर गङ्गेश्वरकी पूज श्राद्धादि करना उचित है। उसके पीछे बारी बारी सिद्धेश्वरसे पश्चिम स्थित इन्द्रेश्वर, और मङ्गल गिरिसे पश्चिम यक्षवनस्थ यक्षेश्वरीको दर्शन कर पूजने का विधान है। पीछे रैवतक पहुंचना चाहिये। यहां रेवती और भीमकुण्डमें नहा दामोदरका दर्शन करना उचित है। दामोदरके दर्शनान्त भवनाथ आते हैं। वहां मृगी प्रभृतिमें नहा उज्जयन्त गिरिपर चढ़ना चाहिये। पोछे अम्बा देवी, हस्तिपद, रसकूपिका, तप्तकुण्ड, गोमुख, गङ्गा,प्रद्युम्न प्रभृतिके दर्शन बाद तीर्थयात्रीका कर्तव्य पुण्यकर्मादि होना उचित है। जैन भी उज्जयन्तको अपना अतिपवित्र तीर्थ मानते हैं। प्रति वर्ष हजारों जैन यहां तीर्थ करने आते हैं। तीर्थद्धारों के अनेक मन्दिर बने हैं। उनमें {{Rule}} {{Smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :नेमिनाथका मन्दिर अति प्राचीन है। स्वानीय शिला लिपिसे समझ पड़ता है――१२७८ ई॰ को इस मन्दिरका संस्कार हा था। दूसरा भी एक अति वृहत् प्राचीन मन्दिर है। उसे वस्तुपाल और तेजोपाल उभय भ्राता ने बनवाया था। जैनशास्त्रके मतमें इस तीर्थका दर्शन करनेसे अक्षय स्वर्ग मिलता है।<small> गिरनार देखो।</small> :पूर्व समय इस उज्जयन्तमें बौद्ध भी तीर्थ करने आते थे। बौद्धराज अशोककी शिलालिपि इस गिरि-पर उतकीर्ण थी। अनुशासनके पत्र पर ग्रीक और बालहिक राजगणका नाम मिलता है। ई॰ के ७ वें शताब्दमें चीन-परिव्राजक युएन-चुयङ्ग इस गिरिको देखने आये थे। उन्होंने इसके विषयमें लिखा है―― ‘उज्जयन्त (जूह-चेन-तो) गिरिपर (बौद्धोंका) सङ्घाराम है। स्थानीय आश्रमादि पर्वतका पार्श्व खोदकर बनाये गये हैं। पर्वत वनसे परिपूर्ण है। कई नदी इसके शिखरसे निकली हैं। सिद्ध आते जाते हैं। आत्मज्ञानी ऋषि एकत्र रहते हैं।’ किन्तु उक्त परिव्राजकका वर्णित सङ्घराम अब देख नहीं पड़ता। कहते हैं――७२४ ई॰ में अरबोंने भारतके भीतर घुस उज्जैनको जीता था। यह सम्भवतः उज्जयन्त या गिरनारका जूनागढ़वाला पर्वत होगा। किन्तु चचनामे में लिखा है――उमैयद अल् वलीदके समय (७०५-७१५ ई॰) का़सिमके पुत्र मुहम्मदने जयपुर और उदयपुर विजय किया। इससे मालूम होता है――कदाचित् अरब मध्यभारतमें उज्जैनतक बढ़ आये थे। क्योंकि राजस्थानमें करनल टडने उज्जैनको चित्तौरका एक सूबा बताया है। {{Outdent|उज्जयिनी-मध्य भारतान्तर्गत मालवप्रान्तकी प्राचीन राजधानी। यह शिप्रा नदीके दक्षिणकूल अक्षा॰ २३° ११‘ १०‘‘ उ॰ और द्राघि॰ ७५° ५०‘ ४५‘‘ पू॰ पर अवस्थित है। हिन्दीमें लोग उज्जैन कहते हैं। आजकल उज्जयिनी म्वालियर राज्यके अधीन है। यहाँसे बहुत अफीम बाहर भेजी जाती।}} यह एक अति प्राचीन नगरी और अवन्ति राज्यकी विख्यात राजधानी है। महाभारत के समय यह शहर <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 44|1em}}</noinclude> 2lvjdbqq8has86gm0vq2hsfzki9k2jg पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२७६ 250 75951 665338 609071 2026-07-06T15:18:19Z अनुश्री साव 80 665338 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उद्र-उद्वर्तित|२७५}}</noinclude> उद्र (सं॰ पु॰) उन्द क्लेदने रक्। १ जलचर, पानीमें रहनेवाला जानवर। २ उद्दिडाल, ऊदबिलाव। उद्रङ्क, <small>उद्रङ्ग देखो।</small> उद्रङ्ग (सं॰ पु॰) १ नगर प्रतिमार्ग, शहर जानेको राह। २ हरिश्चन्द्रपुर। <small>(विकाहशेष १।२।२४)</small> उद्रथ (सं॰ पु॰) उहतो रथो यस्मात्। १ रथकोल, गाड़ीकी कील। २ तासत्रचूड़ पक्षी, मुर्गा। ३ वृक्ष-विशेष, कुकुरमुत्ता। उद्रपारक (सं॰ पु॰) नागविशेष। <small>(भारत-आदि ५७ अ॰)</small> उद्राव (सं॰ पु॰) उत्-रु-घत्र । १ उच्चध्वनि, बुलन्द शोर। २ पलायन, भागाभागी। उद्राह्व (सं॰ पु॰) रक्तचित्रक, लाल चीत। उद्रिक्त (सं॰ त्रि॰) उत्-रिच-क्क। १ स्फुट, फूटा हुआ। २ स्पष्ट, साफ़। ३ चिह्नित, निशान्दार। उट्रिक्तचित्तता (सं॰ स्त्री॰) १ पानात्ययरोग, शराब-खोरीकी बीमारी। २ मत्तता, मदहोशी। उद्रिन् (सं॰ त्रि॰) जलयुक्त, पानीसे भरा। उद्रुज (सं॰ त्रि॰) भङ्ग, तोड़ ताड़। २. उन्म लन, उखाड़। उद्रेक (सं॰ पु॰) उत्-रिच घञ्। १ वृद्धि, बढ़ती। २ अतिशय, ज़ियादती। ३. उपक्रम, शुरू। ४ काव्यालङ्कारविशेष । इसमें कई वस्तु एकके सम्मुख तुच्छ देखाये जाते हैं। ५ रजोगुण। ६ महानिब। उद्रेकभङ्ग (सं॰ पु॰) आदिमें ही किसी द्रव्यका विषणीकरण, शुरूसे ही किसी चीज का रङ्ग मार देना। उद्रेका (सं॰ स्त्री॰) महानिम्ब। उद्रेकिन् (सं॰ त्रि॰) अधिक, ज्यादा, भरा हुआ। उद्रोधन (सं॰ क्ली॰) उदय, उत्पत्ति, निकास, पैदायश। उद्वेंशीय (सं॰ क्ली॰) सामभेद। <small>(ताड्यमहाब्राह्मण)</small> उद्वत् (सं॰ स्त्री॰) उच्चता, पर्वत, ऊंचाई, पहाड़। उद्दमन (सं॰ क्ली॰) उत्-वम्-ल्य ट्। उहिरण, वान्ति, उलटी, कै। उदयम् (वैत्रि०) उगतं क्यो यस्मात, प्रादि बहुव्री० । अन्नोत्पादक, बलवर्धक, अनाज या ताकत पैदा करनवाला। 'उगतं वयोऽन्न यच्मात् वायोः स उद्दया: वायुः वायुनैव हि धान्यानि निष्पाद्यन्ते ।' ( वाजसनेयभाष्ये महीधर ) उहते (सं॰ पु॰) उत्-वृत-घत्र । १ अतिरिक्त द्रव्य, बची हुई चीज़। २ आधिक्य, बढ़ती। (त्रि॰) ३ अधिक, ज्यादा। ४ उद्दत्त, बचा हा। उहतक (सं॰ त्रि॰)१ उत्थान-कारक, बढ़ानेवाला। २ शरीर शुद्ध करनेवाला,जो जिस्मको मलता या धोता हो। (पु.) ३ गणिताङ्क विशेष, हिसाबको एक अदद। जो अङ्ख क्रियाके अर्थ रखा, वही उहर्तक कहा जाता है। उहतेन (सं० लो०) . उत-वृत-णिच करण ल्यट। १ उत्पतन, चढ़ाव। २ घर्षण, मलाई। ३ विलेपन, चुपड़ाई। उहतेन वात, कफ, मेद एवं अनिलको , हटाकर अङ्गको ठहराता और त्वको प्रसाद पहुं- चाता है। हरिद्रादिसे उद्वर्तन करने पर कण्ड, वैवण्ये ओर रौक्ष्य दूर होता है। इसी प्रकार तिल हारा उद्दतन कण्ड, रोच्य और त्वक्के दोषका नाशन है। ( राजनिघण्ट) ५ शरीर निर्मलीकरण गन्ध ट्रव्यादि, जिस्म साफ करनेवाली खुशबूदार चौज, उबटन । ६ ट्रव्य दारा नेहादि अपहारक कार्य, चीजसे तेल वगैरह छोड़ानेका काम। “यवाश्वगन्धायट्याङ्क तिलचोहर्तनं हितम् । शतावयं श्वगन्धाभ्यां पयस्वैरहजीवनः।" ( सुचत) ७ उल्ल ण्ठन, बातका बनाव। ८ सेवन, इस्तमाल। ८ अङ्गुरोत्पत्ति, किल्लोका फूटना । १० धातुका आकर्षण, तारकशो। ११ पेषण, कुटाई पिसाई । उद्दत्सर (सं० पु.) १ वत्सर, साल। २ उदा. १२ असवृत्त, बुरा चालचलन। वत्सर। उद्दनीय' (सं० त्रि.) उहर्तन-छ। मार्जनीय, “उद्दपन (सलो०) उत्-वप-ल्य ट। १ दान, बख लगाने लायक। शिश। २ उत्तोलन, उठाव । ३ उत्पाटन, उखाड़। उहर्तित (स० वि०) १ उव्रत, जंचा किया हुआ। २ उत्- उहमत (सं० त्रि.) वमन करते हुआ, जो उगल पत्र, पाकर्षित, जो निकला या खिंचा हो। ३ सुगन्धी- . रहा हो। .. कृत, मुक्त्तर किया हुआ, जो महकाया गया हो। तरा<noinclude></noinclude> d4atx5y1szrisvu6nqbuijlq3m0srvx 665486 665338 2026-07-06T15:54:59Z अनुश्री साव 80 665486 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उद्र-उद्वर्तित|२७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उद्र (सं॰ पु॰) उन्द क्लेदने रक्। १ जलचर, पानीमें रहनेवाला जानवर। २ उद्दिडाल, ऊदबिलाव। उद्रङ्क, <small>उद्रङ्ग देखो।</small><br> <br>उद्रङ्ग (सं॰ पु॰) १ नगर प्रतिमार्ग, शहर जानेको राह। २ हरिश्चन्द्रपुर। <small>(विकाहशेष १।२।२४)</small><br> <br>उद्रथ (सं॰ पु॰) उहतो रथो यस्मात्। १ रथकोल, गाड़ीकी कील। २ तासत्रचूड़ पक्षी, मुर्गा। ३ वृक्ष-विशेष, कुकुरमुत्ता।<br> <br>उद्रपारक (सं॰ पु॰) नागविशेष। <small>(भारत-आदि ५७ अ॰)</small><br> <br>उद्राव (सं॰ पु॰) उत्-रु-घत्र। १ उच्चध्वनि, बुलन्द शोर। २ पलायन, भागाभागी।<br> <br>उद्राह्व (सं॰ पु॰) रक्तचित्रक, लाल चीत।<br> <br>उद्रिक्त (सं॰ त्रि॰) उत्-रिच-क्क। १ स्फुट, फूटा हुआ। २ स्पष्ट, साफ़। ३ चिह्नित, निशान्दार।<br> <br>उट्रिक्तचित्तता (सं॰ स्त्री॰) १ पानात्ययरोग, शराब-खोरीकी बीमारी। २ मत्तता, मदहोशी।<br> <br>उद्रिन् (सं॰ त्रि॰) जलयुक्त, पानीसे भरा।<br> <br>उद्रुज (सं॰ त्रि॰) भङ्ग, तोड़ ताड़। २. उन्म लन, उखाड़।<br> <br>उद्रेक (सं॰ पु॰) उत्-रिच घञ्। १ वृद्धि, बढ़ती। २ अतिशय, ज़ियादती। ३. उपक्रम, शुरू।<br> <br>४ काव्यालङ्कारविशेष। इसमें कई वस्तु एकके सम्मुख तुच्छ देखाये जाते हैं। ५ रजोगुण। ६ महानिब।<br> <br>उद्रेकभङ्ग (सं॰ पु॰) आदिमें ही किसी द्रव्यका विषणीकरण, शुरूसे ही किसी चीज का रङ्ग मार देना।<br> <br>उद्रेका (सं॰ स्त्री॰) महानिम्ब।<br> <br>उद्रेकिन् (सं॰ त्रि॰) अधिक, ज्यादा, भरा हुआ।<br> <br>उद्रोधन (सं॰ क्ली॰) उदय, उत्पत्ति, निकास, पैदायश।<br> <br>उद्वेंशीय (सं॰ क्ली॰) सामभेद। <small>(ताड्यमहाब्राह्मण)</small><br> <br>उद्वत् (सं॰ स्त्री॰) उच्चता, पर्वत, ऊंचाई, पहाड़।<br> <br>उद्वत्त्सर (सं॰ पु॰) १ वत्सर, साल। २ उदावत्सर।<br> <br>उद्दपन (सं॰ क्ली॰) उत्-वप-ल्यू ट। १ दान, शिश। २ उत्तोलन, उठाव। ३ उत्पाटन, उखाड़।<br> <br>उद्वमत (सं॰ त्रि॰) वमन करते हुआ, जो उगल रहा हो।<br> {{Multicol-break}} उद्दमन (सं॰ क्ली॰) उत्-वम्-ल्य ट्। उहिरण, वान्ति, उलटी, कै। उदयम् (वैत्रि०) उगतं क्यो यस्मात, प्रादि बहुव्री० । अन्नोत्पादक, बलवर्धक, अनाज या ताकत पैदा करनवाला। 'उगतं वयोऽन्न यच्मात् वायोः स उद्दया: वायुः वायुनैव हि धान्यानि निष्पाद्यन्ते ।' ( वाजसनेयभाष्ये महीधर ) उहते (सं॰ पु॰) उत्-वृत-घत्र । १ अतिरिक्त द्रव्य, बची हुई चीज़। २ आधिक्य, बढ़ती। (त्रि॰) ३ अधिक, ज्यादा। ४ उद्दत्त, बचा हा। उहतक (सं॰ त्रि॰)१ उत्थान-कारक, बढ़ानेवाला। २ शरीर शुद्ध करनेवाला,जो जिस्मको मलता या धोता हो। (पु.) ३ गणिताङ्क विशेष, हिसाबको एक अदद। जो अङ्ख क्रियाके अर्थ रखा, वही उहर्तक कहा जाता है। उहतेन (सं० लो०) . उत-वृत-णिच करण ल्यट। १ उत्पतन, चढ़ाव। २ घर्षण, मलाई। ३ विलेपन, चुपड़ाई। उहतेन वात, कफ, मेद एवं अनिलको , हटाकर अङ्गको ठहराता और त्वको प्रसाद पहुं- चाता है। हरिद्रादिसे उद्वर्तन करने पर कण्ड, वैवण्ये ओर रौक्ष्य दूर होता है। इसी प्रकार तिल हारा उद्दतन कण्ड, रोच्य और त्वक्के दोषका नाशन है। ( राजनिघण्ट) ५ शरीर निर्मलीकरण गन्ध ट्रव्यादि, जिस्म साफ करनेवाली खुशबूदार चौज, उबटन । ६ ट्रव्य दारा नेहादि अपहारक कार्य, चीजसे तेल वगैरह छोड़ानेका काम। “यवाश्वगन्धायट्याङ्क तिलचोहर्तनं हितम् । शतावयं श्वगन्धाभ्यां पयस्वैरहजीवनः।" ( सुचत) ७ उल्ल ण्ठन, बातका बनाव। ८ सेवन, इस्तमाल। ८ अङ्गुरोत्पत्ति, किल्लोका फूटना । १० धातुका आकर्षण, तारकशो। ११ पेषण, कुटाई पिसाई । १२ असवृत्त, बुरा चालचलन। उद्दनीय' (सं० त्रि.) उहर्तन-छ। मार्जनीय, बख- लगाने लायक। उहर्तित (स० वि०) १ उव्रत, जंचा किया हुआ। २ उत्- पत्र, पाकर्षित, जो निकला या खिंचा हो। ३ सुगन्धी- कृत, मुक्त्तर किया हुआ, जो महकाया गया हो। तरा<noinclude></noinclude> owsfsehgekz1z425npqcjz6h8i64n77 665488 665486 2026-07-06T16:24:34Z अनुश्री साव 80 665488 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उद्र-उद्वर्तित|२७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उद्र (सं॰ पु॰) उन्द क्लेदने रक्। १ जलचर, पानीमें रहनेवाला जानवर। २ उद्दिडाल, ऊदबिलाव। उद्रङ्क, <small>उद्रङ्ग देखो।</small><br> <br>उद्रङ्ग (सं॰ पु॰) १ नगर प्रतिमार्ग, शहर जानेको राह। २ हरिश्चन्द्रपुर। <small>(विकाहशेष १।२।२४)</small><br> <br>उद्रथ (सं॰ पु॰) उहतो रथो यस्मात्। १ रथकोल, गाड़ीकी 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उत-वृत-णिच करण ल्यट। १ उत्पतन, चढ़ाव। २ घर्षण, मलाई। ३ विलेपन, चुपड़ाई। उहतेन वात, कफ, मेद एवं अनिलको , हटाकर अङ्गको ठहराता और त्वको प्रसाद पहुं- चाता है। हरिद्रादिसे उद्वर्तन करने पर कण्ड, वैवण्ये ओर रौक्ष्य दूर होता है। इसी प्रकार तिल हारा उद्दतन कण्ड, रोच्य और त्वक्के दोषका नाशन है। ( राजनिघण्ट) ५ शरीर निर्मलीकरण गन्ध ट्रव्यादि, जिस्म साफ करनेवाली खुशबूदार चौज, उबटन । ६ ट्रव्य दारा नेहादि अपहारक कार्य, चीजसे तेल वगैरह छोड़ानेका काम। “यवाश्वगन्धायट्याङ्क तिलचोहर्तनं हितम् । शतावयं श्वगन्धाभ्यां पयस्वैरहजीवनः।" ( सुचत) ७ उल्ल ण्ठन, बातका बनाव। ८ सेवन, इस्तमाल। ८ अङ्गुरोत्पत्ति, किल्लोका फूटना । १० धातुका आकर्षण, तारकशो। ११ पेषण, कुटाई पिसाई । १२ असवृत्त, बुरा चालचलन। उद्दनीय' (सं० त्रि.) उहर्तन-छ। मार्जनीय, बख- लगाने लायक। उहर्तित (स० वि०) १ उव्रत, जंचा किया हुआ। २ उत्- पत्र, पाकर्षित, जो निकला या खिंचा हो। ३ सुगन्धी- कृत, मुक्त्तर किया हुआ, जो महकाया गया हो। तरा<noinclude></noinclude> c8hdhk15fh5ap50t4qomjs9k0hnyewd 665719 665488 2026-07-06T17:15:50Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 665719 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्र-उद्वर्तित|२७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उद्र (सं॰ पु॰) उन्द क्लेदने रक्। १ जलचर, पानीमें रहनेवाला जानवर। २ उद्दिडाल, ऊदबिलाव। उद्रङ्क, <small>उद्रङ्ग देखो।</small><br> <br>उद्रङ्ग (सं॰ पु॰) १ नगर प्रतिमार्ग, शहर जानेको राह। २ हरिश्चन्द्रपुर। <small>(विकाहशेष १।२।२४)</small><br> <br>उद्रथ (सं॰ पु॰) उहतो रथो यस्मात्। १ रथकोल, गाड़ीकी कील। २ तासत्रचूड़ पक्षी, मुर्गा। ३ वृक्ष-विशेष, कुकुरमुत्ता।<br> <br>उद्रपारक (सं॰ पु॰) नागविशेष। <small>(भारत-आदि ५७ अ॰)</small><br> <br>उद्राव (सं॰ पु॰) उत्-रु-घत्र। १ उच्चध्वनि, बुलन्द शोर। २ पलायन, भागाभागी।<br> <br>उद्राह्व (सं॰ पु॰) रक्तचित्रक, लाल चीत।<br> <br>उद्रिक्त (सं॰ त्रि॰) उत्-रिच-क्क। १ स्फुट, फूटा हुआ। २ स्पष्ट, साफ़। ३ चिह्नित, निशान्दार।<br> <br>उट्रिक्तचित्तता (सं॰ स्त्री॰) १ पानात्ययरोग, शराब-खोरीकी बीमारी। २ मत्तता, मदहोशी।<br> <br>उद्रिन् (सं॰ त्रि॰) जलयुक्त, पानीसे भरा।<br> <br>उद्रुज (सं॰ त्रि॰) भङ्ग, तोड़ ताड़। २. उन्म लन, उखाड़।<br> <br>उद्रेक (सं॰ पु॰) उत्-रिच घञ्। १ वृद्धि, बढ़ती। २ अतिशय, ज़ियादती। ३. उपक्रम, शुरू।<br> <br>४ काव्यालङ्कारविशेष। इसमें कई वस्तु एकके सम्मुख तुच्छ देखाये जाते हैं। ५ रजोगुण। ६ महानिब।<br> <br>उद्रेकभङ्ग (सं॰ पु॰) आदिमें ही किसी द्रव्यका विषणीकरण, शुरूसे ही किसी चीज का रङ्ग मार देना।<br> <br>उद्रेका (सं॰ स्त्री॰) महानिम्ब।<br> <br>उद्रेकिन् (सं॰ त्रि॰) अधिक, ज्यादा, भरा हुआ।<br> <br>उद्रोधन (सं॰ क्ली॰) उदय, उत्पत्ति, निकास, पैदायश।<br> <br>उद्वेंशीय (सं॰ क्ली॰) सामभेद। <small>(ताड्यमहाब्राह्मण)</small><br> <br>उद्वत् (सं॰ स्त्री॰) उच्चता, पर्वत, ऊंचाई, पहाड़।<br> <br>उद्वत्त्सर (सं॰ पु॰) १ वत्सर, साल। २ उदावत्सर।<br> <br>उद्दपन (सं॰ क्ली॰) उत्-वप-ल्यू ट। १ दान, शिश। २ उत्तोलन, उठाव। ३ उत्पाटन, उखाड़।<br> <br>उद्वमत (सं॰ त्रि॰) वमन करते हुआ, जो उगल रहा हो।<br> {{Multicol-break}} <br>उद्दमन (सं॰ क्ली॰) उत्-वम्-ल्यु ट्। उद्हरण, वान्ति, उलटी, कै।<br> <br>उदृयम् (वै॰ त्रि॰) उगतं क्यो यस्मात, प्रादि बहुव्री॰। अन्नोत्पादक, बलवर्धक, अनाज या ताक़त पैदा करनेवाला। <small>'उगतं वयोऽन्न यच्मात् वायोः स उद्दया: वायुः वायुनैव हि धान्यानि निष्पाद्यन्ते।' (वाजसनेयभाष्ये महीधर)</small><br> <br>उद्वर्त (सं॰ पु॰) उत्-वृत-घञ्। १ अतिरिक्त द्रव्य, बची हुई चीज़। २ आधिक्य, बढ़ती। (त्रि॰) ३ अधिक, ज्यादा। ४ उद्दत्त, बचा हुआ।<br> <br>उद्वर्तक (सं॰ त्रि॰) १ उत्थान-कारक, बढ़ानेवाला। २ शरीर शुद्ध करनेवाला,जो जिस्मको मलता या धोता हो। (पु॰) ३ गणिताङ्क विशेष, हिसाबको एक अदद। जो अङ्ख क्रियाके अर्थ रखा, वही उहर्तक कहा जाता है।<br> <br>उद्वर्तन (सं॰ क्ली॰) उत्-वृत-णिञ् करण ल्यूट।<br> १ उत्पतन, चढ़ाव। २ घर्षण, मलाई। ३ विलेपन, चुपड़ाई। उहतेन वात, कफ, मेद एवं अनिलको, हटाकर अङ्गको ठहराता और त्वको प्रसाद पहुंचाता है। हरिद्रादिसे उद्वर्तन करने पर कण्ड, वैवण्ये ओर रौक्ष्य दूर होता है। इसी प्रकार तिल हारा उद्दतन कण्ड, रीच्य और त्वक्के दोषका नाशन है। (राजनिघण्ट) ५ शरीर निर्मलीकरण गन्ध द्रव्यादि, जिस्म साफ करनेवाली खुशबूदार चीज, उबटन। ६ ट्रव्य दारा नेहादि अपहारक कार्य, चीजसे तेल वगैरह छोड़ानेका काम।<br> {{block center|<poem><small> "यवाश्वगन्धायट्याङ्क तिलचोहर्तनं हितम्। शतावर्यश्वगन्धाभ्यां पयस्वैरहजीवनै:॥" (सुश्रुत)</small></poem>}} <br>७ उल्लु ण्ठन, बातका बनाव। ८ सेवन, इस्तेमाल। ९ अङ्गुरोत्पत्ति, किल्लोंका फूटना। १० धातुका आकर्षण, तारकशी। ११ पेषण, कुटाई पिसाई। १२ असवृत्त, बुरा चालचलन।<br> <br>उद्दर्तनीय (सं॰ त्रि॰) उहर्तन-छ। मार्जनीय, लगाने लायक।<br> <br>उद्दर्तित (सं॰ त्रि॰) १ उन्नत, जंचा किया हुआ। २ उत्पत्र, आकर्षित, जो निकला या खिंचा हो। ३ सुगन्धीकृत, मुवत्तर किया हुआ, जो महकाया गया हो।<br> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> lk8idq52lsnkd172j7tkmnmaxl037yg पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२७७ 250 75954 665753 609072 2026-07-07T06:48:29Z अनुश्री साव 80 665753 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२७६|उद्वर्धन-उद्दाहनी}}</noinclude> <br>उद्दर्धन (सं० क्ली०) उत्-वृध्-ल्युट्। १ अन्त-ह्रास, भीतरी हंसी। <small>(विकाणशेष २।२।८७)</small> २ वृद्धतासाधन, बढ़तीका काम। (त्रि॰) ३ वृद्धतासाधक, बढ़ा देनेवाला।<br> <br>उद्वर्हण (सं॰ क्ली॰) उत्-वर्ह-ल्यूट। १ उन्मूलन, उखाड़। २ उत्पाटन, नोचखसोट। ३ उद्धरण, उठाव, बचाव।<br> <br>उद्वहित (सं॰ पु॰) उत्-वर-क्त। उद्धत, उठाया हुआ।<br> <br>उद्दह (सं॰ पु॰) उदूर्ध्व वहति नयति, उत्-वह-अच्। १ पुत्र, बेटा। २ सप्तविध वायुके अन्तर्गत वायुविशेष। यह प्रवहवायु पर रहता है-<br> उद्दान् (द्दै॰ त्रि॰) १ उत्कर्षयुक्त, शान्दार। २ उन्नत, ऊँचा। <small>"उहत्वमा प्रवणोतना।" (ऋक् १॥१६॥११) 'उहत्सूनतेषु।' (सायण)</small> उहान (सं० पु०) उत्-वन संभक्ती घञ्। १ उद्यम, रोजगार। २ चुल्लो, ल्हा। ३ उद्दमन, उगाल, छांट । (त्रि.) ४ उद्दमित, उगला हुआ। . उद्दान्त (सं० त्रि.) उत्-वम त ।१ उद्दमित, उगला या हुआ। हुआ। (पु०) उगतं वान्तं मदो यस्मात् । २ निर्मद- गज, जो हाथी मतवाला न हो। उद्दाप (सं० पु०) उत्-वप भावे घञ्। १उन्मलन, उखाड़। २ उद्धरण, निकास । ३ मुण्डन, मुड़ाई। "आवहः प्रवहन व विवहन समीरणः । उद्दाय (सं० पु०) उत्-वा-घञ्। १ उद्दासन, निकास। परावहः स'वह उहहन महावल: ॥ २ उपशम, दबाव। तथा परिवहः श्रीमानुत्पातमयम सिनः। "उद्यायति उदासनं प्राप्नोल्य पशाम्यप्ति।" (छान्दोग्यमाष्ये शङ्कराचार्य) इत्ये ते घभिताः सप्त मारुता गगनेचरा: ॥” (हरिवंश २६६ प्र०) | उद्दाष्य (सं० त्रि.) अश्रु बहानेवाला, जो रो रहा हो। आवह, प्रवह, विवह, परावह, संवह, उद्दह और उद्दास (सं० पु.) उत्-वस-घञ्। १ स्वस्थानको परिवह सात उत्पातसूचक क्षुभितवायु हैं। ३ उदान अतिक्रम कर अस्त होने का काम, अपनी जगहको वायु, गिजा पहुंचानेवाली हवा। ४ विहार, खेल लांघ कर गुरुब होनेको बात। (वि.)२ वस्त्र उतारे कूद। ५ वर, दूल्हा । ६ गायक, गानेवाला। (त्रि.) हुआ, जो कपड़े खोल चुका हो। ७ अंशकारक, हिस्सा करनेवाला। ८ प्रधान, खास । उहासन (सं० लो०) उत्-वस-णिच-त्यु ट । १ संस्कार- ८ वहन करनेवाला, जो ले जाता हो। भेद। इसमें यजसे पूर्व आसन बिछाया, यन्नपात्र उद्दहत् (स'• त्रि.) १ आश्रयदाता, जो सहारा सजाया और वृतादि भराया जाता है। २मारण, लगा रहा हो। २ सम्पन्न, रखनेवाला। कत्ल । ३ विसर्जन, छोड़ाई। ४ निष्कासन,निकलाई। उद्दहन ( स० क्लो०) उत्-वह-ल्यु ट्। १ स्कन्धके उद्दास्य (स० अव्य०) १ विसर्जन करके, छोड़कर। सहार वहन, कन्धेपर बोझका ढोना। विवाह, (त्रि.) उत्-वस-णिच-ख्यप् । २ उद्धरणीय, उठाने शादौ। ३ आनयन, लवाई। ४ पाकर्षण, खिंचाव । काबिल । ३ उत्तोलनयोग्य, चढ़ाने लायक । ४ यज्ञीय ५ आरोहण, चड़ाई। ६ अधिकार, कल दारो। पशुके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला। उदहा (सं० स्त्री०) उत्-वह-अच्-टाए। कन्या, उद्दाह (सं० पु. ) उत्-वह घज । विवाह, शादी। बेटो। विवाह देखो। उहाचन (सं० लो०) नाद, चौख, पुकार। उदाहकर्मन् (सं० वि०) विवाहसंस्कार, शादीका काम । उद्दादन (वै० लो०) उत-वद-णिन्छ-त्यु ट । १ऊंचे उहाहन ( स० लो०) उत्-वह-णिच-त्यु ट । १ विवाह, स्वरसे आवेदन, बुलन्द आवाज़में फरियाद। “अटक शादी। २ दिवारकर्षितक्षेत्र, दो मरतबा जोता हुआ उदहति दौचितोऽदं ब्राह्मयो दौचितोऽयं ब्राह्मण इति निवेदितमेवेनमेतत् खेत। ३ उद्दन, उठाव। ४ उद्धारसाधन, छोड़ानेका सन्त' देवेभ्यो निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापदित्ययं युमाकैकोऽभूत्त काम। ५ चिन्ता, फिक्र। गोपावतेत्ये वैतदाह निष्क त्याह।" (शतपथब्रामण ३।२।१।२६)२ उच्च- उहाहनी (सं. स्त्री.) उदाहन-डीप। १ वराटक, वाद्यकरण, जोरसे बाजका बजाना। । कौड़ी। २ रज्ज, रस्मो। .<noinclude></noinclude> 74hvcjn4wi2u3tulqmpoyyegrlhbd3l 665755 665753 2026-07-07T07:01:56Z अनुश्री साव 80 665755 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२७६|उद्वर्धन-उद्दाहनी}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उद्दर्धन (सं० क्ली०) उत्-वृध्-ल्युट्। १ अन्त-ह्रास, भीतरी हंसी। <small>(विकाणशेष २।२।८७)</small> २ वृद्धतासाधन, बढ़तीका काम। (त्रि॰) ३ वृद्धतासाधक, बढ़ा देनेवाला।<br> <br>उद्वर्हण (सं॰ क्ली॰) उत्-वर्ह-ल्यूट। १ उन्मूलन, उखाड़। २ उत्पाटन, नोचखसोट। ३ उद्धरण, उठाव, बचाव।<br> <br>उद्वहित (सं॰ पु॰) उत्-वर-क्त। उद्धत, उठाया हुआ।<br> <br>उद्दह (सं॰ पु॰) उदूर्ध्व वहति नयति, उत्-वह-अच्। १ पुत्र, बेटा। २ सप्तविध वायुके अन्तर्गत वायुविशेष। यह प्रवहवायु पर रहता है-<br> उद्दान् (द्दै॰ त्रि॰) १ उत्कर्षयुक्त, शान्दार। २ उन्नत, ऊँचा। <small>"उहत्वमा प्रवणोतना।" (ऋक् १॥१६॥११) 'उहत्सूनतेषु।' (सायण)</small> <br>उद्वान (सं॰ पु॰) उत्-वन संभक्ती घञ्। १ उद्यम, रोजगार। २ चुल्ली, चूल्हा। ३ उद्दमन, उगाल, छांट। (त्रि॰) ४ उद्दमित, उगला हुआ।<br> <br>उद्दान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-वम-क्त ।१ उद्दमित, उगला हुआ। (पु॰) उगतं वान्तं मदो यस्मात्। २ निर्मद-गज, जो हाथी मतवाला न हो।<br> उद्दाप (सं० पु०) उत्-वप भावे घञ्। १उन्मलन, उखाड़। २ उद्धरण, निकास । ३ मुण्डन, मुड़ाई। "आवहः प्रवहन व विवहन समीरणः । उद्दाय (सं० पु०) उत्-वा-घञ्। १ उद्दासन, निकास। परावहः स'वह उहहन महावल: ॥ २ उपशम, दबाव। तथा परिवहः श्रीमानुत्पातमयम सिनः। "उद्यायति उदासनं प्राप्नोल्य पशाम्यप्ति।" (छान्दोग्यमाष्ये शङ्कराचार्य) इत्ये ते घभिताः सप्त मारुता गगनेचरा: ॥” (हरिवंश २६६ प्र०) | उद्दाष्य (सं० त्रि.) अश्रु बहानेवाला, जो रो रहा हो। आवह, प्रवह, विवह, परावह, संवह, उद्दह और उद्दास (सं० पु.) उत्-वस-घञ्। १ स्वस्थानको परिवह सात उत्पातसूचक क्षुभितवायु हैं। ३ उदान अतिक्रम कर अस्त होने का काम, अपनी जगहको वायु, गिजा पहुंचानेवाली हवा। ४ विहार, खेल लांघ कर गुरुब होनेको बात। (वि.)२ वस्त्र उतारे कूद। ५ वर, दूल्हा । ६ गायक, गानेवाला। (त्रि.) हुआ, जो कपड़े खोल चुका हो। ७ अंशकारक, हिस्सा करनेवाला। ८ प्रधान, खास । उहासन (सं० लो०) उत्-वस-णिच-त्यु ट । १ संस्कार- ८ वहन करनेवाला, जो ले जाता हो। भेद। इसमें यजसे पूर्व आसन बिछाया, यन्नपात्र उद्दहत् (स'• त्रि.) १ आश्रयदाता, जो सहारा सजाया और वृतादि भराया जाता है। २मारण, लगा रहा हो। २ सम्पन्न, रखनेवाला। कत्ल । ३ विसर्जन, छोड़ाई। ४ निष्कासन,निकलाई। उद्दहन ( स० क्लो०) उत्-वह-ल्यु ट्। १ स्कन्धके उद्दास्य (स० अव्य०) १ विसर्जन करके, छोड़कर। सहार वहन, कन्धेपर बोझका ढोना। विवाह, (त्रि.) उत्-वस-णिच-ख्यप् । २ उद्धरणीय, उठाने शादौ। ३ आनयन, लवाई। ४ पाकर्षण, खिंचाव । काबिल । ३ उत्तोलनयोग्य, चढ़ाने लायक । ४ यज्ञीय ५ आरोहण, चड़ाई। ६ अधिकार, कल दारो। पशुके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला। उदहा (सं० स्त्री०) उत्-वह-अच्-टाए। कन्या, उद्दाह (सं० पु. ) उत्-वह घज । विवाह, शादी। बेटो। विवाह देखो। उहाचन (सं० लो०) नाद, चौख, पुकार। उदाहकर्मन् (सं० वि०) विवाहसंस्कार, शादीका काम । उद्दादन (वै० लो०) उत-वद-णिन्छ-त्यु ट । १ऊंचे उहाहन ( स० लो०) उत्-वह-णिच-त्यु ट । १ विवाह, स्वरसे आवेदन, बुलन्द आवाज़में फरियाद। “अटक शादी। २ दिवारकर्षितक्षेत्र, दो मरतबा जोता हुआ उदहति दौचितोऽदं ब्राह्मयो दौचितोऽयं ब्राह्मण इति निवेदितमेवेनमेतत् खेत। ३ उद्दन, उठाव। ४ उद्धारसाधन, छोड़ानेका सन्त' देवेभ्यो निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापदित्ययं युमाकैकोऽभूत्त काम। ५ चिन्ता, फिक्र। गोपावतेत्ये वैतदाह निष्क त्याह।" (शतपथब्रामण ३।२।१।२६)२ उच्च- उहाहनी (सं. स्त्री.) उदाहन-डीप। १ वराटक, वाद्यकरण, जोरसे बाजका बजाना। । कौड़ी। २ रज्ज, रस्मो। .<noinclude></noinclude> siqpggecderzkddgshn4wk6bpe3p1we 665757 665755 2026-07-07T07:27:48Z अनुश्री साव 80 665757 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२७६|उद्वर्धन-उद्दाहनी}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उद्दर्धन (सं० क्ली०) उत्-वृध्-ल्युट्। १ अन्त-ह्रास, भीतरी हंसी। <small>(विकाणशेष २।२।८७)</small> २ वृद्धतासाधन, बढ़तीका काम। (त्रि॰) ३ वृद्धतासाधक, बढ़ा देनेवाला।<br> <br>उद्वर्हण (सं॰ क्ली॰) उत्-वर्ह-ल्यूट। १ उन्मूलन, उखाड़। २ उत्पाटन, नोचखसोट। ३ उद्धरण, उठाव, बचाव।<br> <br>उद्वहित (सं॰ पु॰) उत्-वर-क्त। उद्धत, उठाया हुआ।<br> <br>उद्दह (सं॰ पु॰) उदूर्ध्व वहति नयति, उत्-वह-अच्। १ पुत्र, बेटा। २ सप्तविध वायुके अन्तर्गत वायुविशेष। यह प्रवहवायु पर रहता है-<br> {{block center|<poem><small> "आवहः प्रवहयैव विवहअ समीरणः। परावहः संवहअ उद्वहअ महावल:॥ तथा परिवहः श्रीमानुत्पातमयशं सिनः। इत्ये ते चभिताः सप्त मारुता गगनेचरा:॥" (हरिवंश २६६ अ॰)</small></poem>}} उद्दान् (द्दै॰ त्रि॰) १ उत्कर्षयुक्त, शान्दार। २ उन्नत, ऊँचा। <small>"उहत्वमा प्रवणोतना।" (ऋक् १॥१६॥११) 'उहत्सूनतेषु।' (सायण)</small> <br>उद्वान (सं॰ पु॰) उत्-वन संभक्ती घञ्। १ उद्यम, रोजगार। २ चुल्ली, चूल्हा। ३ उद्दमन, उगाल, छांट। (त्रि॰) ४ उद्दमित, उगला हुआ।<br> <br>उद्दान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-वम-क्त ।१ उद्दमित, उगला हुआ। (पु॰) उगतं वान्तं मदो यस्मात्। २ निर्मद-गज, जो हाथी मतवाला न हो।<br> उद्दाप (सं० पु०) उत्-वप भावे घञ्। १उन्मलन, उखाड़। २ उद्धरण, निकास । ३ मुण्डन, मुड़ाई। उद्दाय (सं० पु०) उत्-वा-घञ्। १ उद्दासन, निकास। २ उपशम, दबाव। "उद्यायति उदासनं प्राप्नोल्य पशाम्यप्ति।" (छान्दोग्यमाष्ये शङ्कराचार्य) उद्दाष्य (सं० त्रि.) अश्रु बहानेवाला, जो रो रहा हो। आवह, प्रवह, विवह, परावह, संवह, उद्दह और उद्दास (सं० पु.) उत्-वस-घञ्। १ स्वस्थानको परिवह सात उत्पातसूचक क्षुभितवायु हैं। ३ उदान अतिक्रम कर अस्त होने का काम, अपनी जगहको वायु, गिजा पहुंचानेवाली हवा। ४ विहार, खेल लांघ कर गुरुब होनेको बात। (वि.)२ वस्त्र उतारे कूद। ५ वर, दूल्हा । ६ गायक, गानेवाला। (त्रि.) हुआ, जो कपड़े खोल चुका हो। ७ अंशकारक, हिस्सा करनेवाला। ८ प्रधान, खास । उहासन (सं० लो०) उत्-वस-णिच-त्यु ट । १ संस्कार- ८ वहन करनेवाला, जो ले जाता हो। भेद। इसमें यजसे पूर्व आसन बिछाया, यन्नपात्र उद्दहत् (स'• त्रि.) १ आश्रयदाता, जो सहारा सजाया और वृतादि भराया जाता है। २मारण, लगा रहा हो। २ सम्पन्न, रखनेवाला। कत्ल । ३ विसर्जन, छोड़ाई। ४ निष्कासन,निकलाई। उद्दहन ( स० क्लो०) उत्-वह-ल्यु ट्। १ स्कन्धके उद्दास्य (स० अव्य०) १ विसर्जन करके, छोड़कर। सहार वहन, कन्धेपर बोझका ढोना। विवाह, (त्रि.) उत्-वस-णिच-ख्यप् । २ उद्धरणीय, उठाने शादौ। ३ आनयन, लवाई। ४ पाकर्षण, खिंचाव । काबिल । ३ उत्तोलनयोग्य, चढ़ाने लायक । ४ यज्ञीय ५ आरोहण, चड़ाई। ६ अधिकार, कल दारो। पशुके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला। उदहा (सं० स्त्री०) उत्-वह-अच्-टाए। कन्या, उद्दाह (सं० पु. ) उत्-वह घज । विवाह, शादी। बेटो। विवाह देखो। उहाचन (सं० लो०) नाद, चौख, पुकार। उदाहकर्मन् (सं० वि०) विवाहसंस्कार, शादीका काम । उद्दादन (वै० लो०) उत-वद-णिन्छ-त्यु ट । १ऊंचे उहाहन ( स० लो०) उत्-वह-णिच-त्यु ट । १ विवाह, स्वरसे आवेदन, बुलन्द आवाज़में फरियाद। “अटक शादी। २ दिवारकर्षितक्षेत्र, दो मरतबा जोता हुआ उदहति दौचितोऽदं ब्राह्मयो दौचितोऽयं ब्राह्मण इति निवेदितमेवेनमेतत् खेत। ३ उद्दन, उठाव। ४ उद्धारसाधन, छोड़ानेका सन्त' देवेभ्यो निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापदित्ययं युमाकैकोऽभूत्त काम। ५ चिन्ता, फिक्र। गोपावतेत्ये वैतदाह निष्क त्याह।" (शतपथब्रामण ३।२।१।२६)२ उच्च- उहाहनी (सं. स्त्री.) उदाहन-डीप। १ वराटक, वाद्यकरण, जोरसे बाजका बजाना। । कौड़ी। २ रज्ज, रस्मो। .<noinclude></noinclude> jjd5wdd3ek8imhwxn1elfx6ek5kcnsy 665771 665757 2026-07-07T09:44:04Z अनुश्री साव 80 665771 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२७६|उद्वर्धन-उद्दाहनी}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उद्दर्धन (सं० क्ली०) उत्-वृध्-ल्युट्। १ अन्त-ह्रास, भीतरी हंसी। <small>(विकाणशेष २।२।८७)</small> २ वृद्धतासाधन, बढ़तीका काम। (त्रि॰) ३ वृद्धतासाधक, बढ़ा देनेवाला।<br> <br>उद्वर्हण (सं॰ क्ली॰) उत्-वर्ह-ल्यूट। १ उन्मूलन, उखाड़। २ उत्पाटन, नोचखसोट। ३ उद्धरण, उठाव, बचाव।<br> <br>उद्वहित (सं॰ पु॰) उत्-वर-क्त। उद्धत, उठाया हुआ।<br> <br>उद्दह (सं॰ पु॰) उदूर्ध्व वहति नयति, उत्-वह-अच्। १ पुत्र, बेटा। २ सप्तविध वायुके अन्तर्गत वायुविशेष। यह प्रवहवायु पर 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"उद्यायति उदासनं प्राप्नोल्य पशाम्यप्ति।" (छान्दोग्यमाष्ये शङ्कराचार्य) उद्दाष्य (सं० त्रि.) अश्रु बहानेवाला, जो रो रहा हो। उद्दास (सं० पु.) उत्-वस-घञ्। १ स्वस्थानको अतिक्रम कर अस्त होने का काम, अपनी जगहको लांघ कर गुरुब होनेको बात। (वि.)२ वस्त्र उतारे हुआ, जो कपड़े खोल चुका हो। उहासन (सं० लो०) उत्-वस-णिच-त्यु ट । १ संस्कार- भेद। इसमें यजसे पूर्व आसन बिछाया, यन्नपात्र उद्दहत् (स'• त्रि.) १ आश्रयदाता, जो सहारा सजाया और वृतादि भराया जाता है। २मारण, लगा रहा हो। २ सम्पन्न, रखनेवाला। कत्ल । ३ विसर्जन, छोड़ाई। ४ निष्कासन,निकलाई। उद्दहन ( स० क्लो०) उत्-वह-ल्यु ट्। १ स्कन्धके उद्दास्य (स० अव्य०) १ विसर्जन करके, छोड़कर। सहार वहन, कन्धेपर बोझका ढोना। विवाह, (त्रि.) उत्-वस-णिच-ख्यप् । २ उद्धरणीय, उठाने शादौ। ३ आनयन, लवाई। ४ पाकर्षण, खिंचाव । काबिल । ३ उत्तोलनयोग्य, चढ़ाने लायक । ४ यज्ञीय ५ आरोहण, चड़ाई। ६ अधिकार, कल दारो। पशुके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला। उदहा (सं० स्त्री०) उत्-वह-अच्-टाए। कन्या, उद्दाह (सं० पु. ) उत्-वह घज । विवाह, शादी। बेटो। विवाह देखो। उहाचन (सं० लो०) नाद, चौख, पुकार। उदाहकर्मन् (सं० वि०) विवाहसंस्कार, शादीका काम । उद्दादन (वै० लो०) उत-वद-णिन्छ-त्यु ट । १ऊंचे उहाहन ( स० लो०) उत्-वह-णिच-त्यु ट । १ विवाह, स्वरसे आवेदन, बुलन्द आवाज़में फरियाद। “अटक शादी। २ दिवारकर्षितक्षेत्र, दो मरतबा जोता हुआ उदहति दौचितोऽदं ब्राह्मयो दौचितोऽयं ब्राह्मण इति निवेदितमेवेनमेतत् खेत। ३ उद्दन, उठाव। ४ उद्धारसाधन, छोड़ानेका सन्त' देवेभ्यो निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापदित्ययं युमाकैकोऽभूत्त काम। ५ चिन्ता, फिक्र। गोपावतेत्ये वैतदाह निष्क त्याह।" (शतपथब्रामण ३।२।१।२६)२ उच्च- उहाहनी (सं. स्त्री.) उदाहन-डीप। १ वराटक, वाद्यकरण, जोरसे बाजका बजाना। । कौड़ी। २ रज्ज, रस्मो। .<noinclude></noinclude> 40l0wqj2ejnpqc7954qn3fdejs1j6u6 665778 665771 2026-07-07T10:23:11Z अनुश्री साव 80 665778 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२७६|उद्वर्धन-उद्दाहनी}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उद्दर्धन (सं० क्ली०) उत्-वृध्-ल्युट्। १ अन्त-ह्रास, भीतरी हंसी। <small>(विकाणशेष २।२।८७)</small> २ वृद्धतासाधन, बढ़तीका काम। (त्रि॰) ३ वृद्धतासाधक, बढ़ा देनेवाला।<br> <br>उद्वर्हण (सं॰ क्ली॰) उत्-वर्ह-ल्यूट। १ उन्मूलन, उखाड़। २ उत्पाटन, नोचखसोट। ३ उद्धरण, उठाव, बचाव।<br> <br>उद्वहित (सं॰ पु॰) उत्-वर-क्त। उद्धत, उठाया हुआ।<br> <br>उद्दह (सं॰ पु॰) उदूर्ध्व वहति नयति, उत्-वह-अच्। १ पुत्र, बेटा। २ सप्तविध वायुके अन्तर्गत वायुविशेष। यह प्रवहवायु पर रहता है-<br> {{block center|<poem><small> "आवहः प्रवहयैव विवहअ समीरणः। परावहः संवहअ उद्वहअ महावल:॥ तथा परिवहः श्रीमानुत्पातमयशं सिनः। इत्ये ते चभिताः सप्त मारुता गगनेचरा:॥" (हरिवंश २६६ अ॰)</small></poem>}} आवह, प्रवह, विवह, परावह, संवह, उद्दह और परिवह सात उत्पातसूचक क्षुभितवायु हैं। ३ उदान वायु, ग़िज़ा पहुंचानेवाली हवा। ४ विहार, खेल कूद। ५ वर, दूल्हा। ६ गायक, गानेवाला। (त्रि॰) ७ अंशकारक, हिस्सा करनेवाला। ८ प्रधान, खास। ९ वहन करनेवाला, जो ले जाता हो। <br>उद्दहत् (सं॰ त्रि॰) १ आश्रयदाता, जो सहारा लगा रहा हो। २ सम्पन्न, रखनेवाला।<br> <br>उद्दहन (सं॰ क्ली॰) उत्-वह-ल्यु ट्। १ स्कन्धके सहारे वहन, कन्धेपर बोझका ढोना। विवाह, शादी। ३ आनयन, लवाई। ४ आकर्षण, खिंचाव। ५ आरोहण, चड़ाई। ६ अधिकार, कञ्ज दारी।<br> <br>उदहा (सं॰ स्त्री॰) उत्-वह-अच्-टाए। कन्या, बेटी।<br> <br>उहाचन (सं॰ क्ली॰) नाद, चीख, पुकार।<br> <br>उद्दादन (वै॰ क्ली॰) उत-वद-णिन्छ-त्लु ट्। १ ऊंचे उद्दान् (द्दै॰ त्रि॰) १ उत्कर्षयुक्त, शान्दार। २ उन्नत, ऊँचा। <small>"उहत्वमा प्रवणोतना।" (ऋक् १॥१६॥११) 'उहत्सूनतेषु।' (सायण)</small> <br>उद्वान (सं॰ पु॰) उत्-वन संभक्ती घञ्। १ उद्यम, रोजगार। २ चुल्ली, चूल्हा। ३ उद्दमन, उगाल, छांट। (त्रि॰) ४ उद्दमित, उगला हुआ।<br> <br>उद्दान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-वम-क्त ।१ उद्दमित, उगला हुआ। (पु॰) उगतं वान्तं मदो यस्मात्। २ निर्मद-गज, जो हाथी मतवाला न हो।<br> उद्दाप (सं० पु०) उत्-वप भावे घञ्। १उन्मलन, उखाड़। २ उद्धरण, निकास । ३ मुण्डन, मुड़ाई। उद्दाय (सं० पु०) उत्-वा-घञ्। १ उद्दासन, निकास। २ उपशम, दबाव। "उद्यायति उदासनं प्राप्नोल्य पशाम्यप्ति।" (छान्दोग्यमाष्ये शङ्कराचार्य) उद्दाष्य (सं० त्रि.) अश्रु बहानेवाला, जो रो रहा हो। उद्दास (सं० पु.) उत्-वस-घञ्। १ स्वस्थानको अतिक्रम कर अस्त होने का काम, अपनी जगहको लांघ कर गुरुब होनेको बात। (वि.)२ वस्त्र उतारे हुआ, जो कपड़े खोल चुका हो। उहासन (सं० लो०) उत्-वस-णिच-त्यु ट । १ संस्कार- भेद। इसमें यजसे पूर्व आसन बिछाया, यन्नपात्र सजाया और वृतादि भराया जाता है। २मारण, कत्ल । ३ विसर्जन, छोड़ाई। ४ निष्कासन,निकलाई। उद्दास्य (स० अव्य०) १ विसर्जन करके, छोड़कर। (त्रि॰) उत्-वस-णिच-ख्यप् । २ उद्धरणीय, उठाने काबिल । ३ उत्तोलनयोग्य, चढ़ाने लायक । ४ यज्ञीय पशुके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला। उद्दाह (सं० पु. ) उत्-वह घज । विवाह, शादी। विवाह देखो। उदाहकर्मन् (सं० वि०) विवाहसंस्कार, शादीका काम । उहाहन ( स० लो०) उत्-वह-णिच-त्यु ट । १ विवाह, स्वरसे आवेदन, बुलन्द आवाज़में फरियाद। “अटक शादी। २ दिवारकर्षितक्षेत्र, दो मरतबा जोता हुआ उदहति दौचितोऽदं ब्राह्मयो दौचितोऽयं ब्राह्मण इति निवेदितमेवेनमेतत् खेत। ३ उद्दन, उठाव। ४ उद्धारसाधन, छोड़ानेका सन्त' देवेभ्यो निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापदित्ययं युमाकैकोऽभूत्त काम। ५ चिन्ता, फिक्र। गोपावतेत्ये वैतदाह निष्क त्याह।" (शतपथब्रामण ३।२।१।२६)२ उच्च- उहाहनी (सं. स्त्री.) उदाहन-डीप। १ वराटक, वाद्यकरण, जोरसे बाजका बजाना। । कौड़ी। २ रज्ज, रस्मो। .<noinclude></noinclude> nek52cq7hx4lc1ck1dg6vhh0huqtwav पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६४३ 250 76162 665745 609383 2026-07-07T04:01:32Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 665745 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६४२|कटुपनौ-कटुविपाक|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कप्-टाप-अच् इत्वम्। १ कण्टकारी वृक्ष, भटकटै या। <Small>करटकारौ देखो।</small> २ लघु-चुञ्चक्षुप, छोटा बिछुवा। कटुपत्री, <small>कटुपविका देखो।</small> कटपर्णिका (सं० स्त्रो०) क्षोरिणी, खिरनी। इसका संस्कृतपर्याय---हैमवती, हेमक्षोरी, हिमावतो, हेमावा और पोतदुग्धा है। कटपर्णिकाके मूलको चोक कहते हैं। यह रेचन, तिक्त, भेदन एवं उतक्लेशकारी होतो और क्वमि, कण्ड , विष, पानाह, कफ, पित्त, अस्र तथा कुष्ठरोगको खो देती है। कटु पर्णी, <small>कटुपर्णिका देखो।</small> कटु पाक (सं० त्रि०) कट: पाकोऽस्य। १पाकके समय कटु पड़नेवाला, जो पकाते वक्त कड़वा पड़ जाता हो। २ परिपाक होनेसे कट लगनेवाला, जो पकनेसे कड़वा लगता हो। तेज, वायु और आकाश का अधिक गुण रखनेवाला द्रव्य कटु पाक होता है। कटु पाक द्रव्य वायुवर्धक है। <small>(भावप्रकाश)</small> कटु पाको ( सं० वि०) कंट: पाकोऽस्त्यस्य, कटु पाक- इनि। कट पाकयुक्त, हाजमेमें तल्ख बलगम पैदा करनेवाला। <Small>कटुपाक देखो।</small> कटु फल ( सं० पु०) कट फलमस्य,बहुव्री०।१ पटोल, परवल । पटोल देखी। २ ककोलवक्ष, कायफल । ३ तितकर्कटिका, कडवी ककडी। ४ कारवल्लक, करेला। (क्लो०) ५ इन्द्रयव । कटु फला (सं० स्त्री०) कट कफलमस्या, बहुव्री० । १ श्रीवल्लो कण्टकक्षुप, एक कंटीली झाड़ी। २ तिक्ता-साबु, कड़वो लौको। ३ वृहतो, बरियारो। ४ कण्ट-कारी, भटकटैया। ५ चिञ्चोटक, बिछुवा। कटु बदरी (सं० स्त्री०) वृक्षविशेष, खट्टे बेरका पेड़ । २ ग्रामविशेष, एक गांव। कटु भङ्ग (सं० पु०) कटु : एकैकदेश भङ्गश्च यस्य । शुण्ठी, सोंठ। कटु भद्र (सं० क्लो०) कट, अति भद्र हितजनकम् । १ आदर्क, अदरक । २ शण्ठी, सोंठ। कटु भाषी (सं० वि०) कट: कर्कशं भाषते, कटु-भाष-णिनि। कट वाक्य कहनेवाला, जो नागवार बात बोलता हो। {{Multicol-break}} कटुमञ्जरिक (सं० पु०) <small>कटुमञ्चरिका देखो।</small> कटु मञ्जरिका (सं० स्त्री० ) कट स्तीक्षामञ्जरी प्रस्ति अस्याः, कट मञ्जरौ-अच्-डोष संज्ञायां कन् पूर्व- इस्वत्वञ्च। अपामार्ग, लटजोरा। <Small>अपामार्ग देखो।</small> कटुमूल (सं० क्लो०) पिप्पलीमूल, पिपरामूल। कटमोद (सं० लो०) कटुरेव मोदः पक्षोऽस्य, बहुव्रौ। ज्वरादिनाशक एक सुगन्धि द्रव्य, बोखार वगैरह दूर करनेवालो एक खुशबूदार चीज़ या अतर। कटु भरा (सं० स्त्री० ) कट विभर्ति, कट-भृखच्-मुम्-टाप। १ कर्कटो, ककड़ो। २ प्रसारणी, गन्धालो। कटुर (सं० क्लो०) कटति वर्षेति मन्थनेन गुणान्तरं रूपान्तरं वा, कट-उरन् । तक्र, मट्ठा।<small> तक देखो।</small> कटु रव ( सं० पु०) कट: ककैशो रवो ध्वनियस्य, बहुव्री०। भेष, मेंड़क । कटुरा (सं० स्त्री०) भाद्र हरिद्रा, कच्ची हलदी। कटरुणा (सं० स्त्रो०) त्रिवता, निसोत । कटु रोहिणी (सं० स्त्री०) कटु श्चासौ रोहिणी चेति कर्मधा०,कट : सती रोहति, कट -रुह-णिनि-डोप वा। कटु को, कुटको। कटु लता (सं० स्त्रो०) कटु की, कुटको। कटु लिङ्ग-गोंड़ जाति की एक शाखा। इस शाखाके लोग हिन्दुवों को भांति आचार-व्यवहार करते हैं। कटु वर्ग,<small> कटुकवर्ग देखो।</small> कटु वा (हिं: पु० ) १ प्रति दिन किसी विक्र ताके पाससे पानेवाला कोई द्रव्य। जो चीज़ किसी दुकानसे रोज़ रोज़ आती और कीमत पोछे इकट्ठा दी जाती, वह कट वा कहाती है। २ मुसलमान। कटु वार्ताको ( स० स्त्रो०) कट चासो वार्ताको चेति, कर्मधा ०। १ खेतकण्टकारी, सफेद कट या। २ तिक्त-वार्ताको, कड़वा बैंगन। ३ क्षुद्रवहती, छोटा बैंगन । कटु वाष्पिका (सं० स्त्री० ) महाराष्ट्री, पानीपोपर । कटु विपाक ( सं० वि०) कट : कट रसा विपाके यस्य, बहनो०। कट पाक, हाजममें बलगम लानेवाला। कटु-विपाक द्रव्य लघु, वातल, शकन्न और कफपित्त-नायक होता है। <Small>(सुश्रुत)</small><noinclude></noinclude> o9suoofnk90ojf7s6r0qt3bd97t1h65 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१६ 250 76338 665780 665038 2026-07-07T11:11:42Z आदेश यादव 3609 665780 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||'''एतिकायन—ऐनक'''|'''४७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इस विषयका शिलालेख कोल्हापुर राज्यके सामानगढ़ में मिला है। उसमें ऐतावाड़–खुर्द उत्सर्ग को हुई भूमि की उत्तर सोमा बताया गया है। {{outdent|ऐतिकायन (सं॰ पु॰) इतिकस्य ऋषेरपत्यम्, इतिकफक्। इर्तिक ऋषिके सन्तान।}} {{outdent|ऐतिशायन (सं॰ पु॰) इतिशस्य ऋषेरपत्यम्, इतिशफक्। इतिश ऋषिके सन्तान। यह एक संस्कृतके प्राचीन विद्वान थे। मीमांसासूत्र में इनका नाम आया है।}} {{outdent|ऐतिहासिक (सं॰ त्रि॰) इतिहासादागतः इतिहासठक्। १ इतिहास ग्रन्थसे समझ पड़नेवाला, जो तारीखसे मालूम हो। २ इतिहासवेत्ता, तारीखको जननेवाला इतिहासपाठक, तारीख़ पढ़नेवाला।}} {{outdent|ऐतिह्य (सं॰ ल्की॰) इतिह स्वार्थे ञा। अन्तावसथोतिह–भेषजा ञा:। पा ५।४।२३। पारम्पर्य उपदेश, पुरानी‌ नसीचत। जो बात बहुत दिनसे सुननेमें आती वह‌ ऐतिह्य कहाती है।}} {{x-smaller|"ऐतिह्य नाम आप्तोपदेशो वेदादिः।" (चरक)}} पौराणिकोंके मत में ऐतिह्य एक प्रमाण है। वटके वृक्षमें यक्षिणी रहनेका परम्परागत उक्त वाक्य ही ऐतिह्य प्रमाण है। {{outdent|ऐदंयुगीन (सं॰ त्रि॰) अस्मिन् युगे साधुः, इदयुगखञ। इस युगके उपयोगी।}} {{outdent|ऐध् (सं॰ स्त्री॰) अग्निशिखा, लपट।}} {{outdent|ऐध (सं॰ पु॰) {{x-smaller|ऐध् देखो।}}}} {{outdent|ऐन (अ॰ वि॰) १ उपयुक्त दुरुस्त ठीक। २ पूर्ण, पूरा। (हिं॰) {{x-smaller|अयन और एण देखो।}}}} {{outdent|ऐन–उद्–दीन—बीजापुरके एक शेख। इन्होंने 'मुलहक़ात' और 'किताब–उल्–अनवार' नामक दो ग्रन्थ लिखे हैं। उक्त दोनों ग्रन्थोंमें भारत के समग्र मुसलमान–साधुवों का इतिहास है। सुलतान् अला–उद्–दीन हसन बाह्मनीके समय यह विद्यमान रहे।}} {{outdent|ऐन–उल–मुल्क—१ शीराज़के एक अधिवासी। इनका उपाधि हकीम रहा। बादशाह अकबर के समय यह एक उच्च पदपर प्रतिष्ठित थे। इनको कविता बहुत रसीली होती थी। उपनाम 'वफा' रहा। १५८४ ई॰ को हकीम साहब इस दुनियासे चलते बने।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> २ दिल्लीवाले बादशाह सुलतान मुहम्मद शाह तुग़लक़ और सुलतान फीरोज शाहके एक दरबारी। इनका उपाधि ख्वा़जा रहा। इनके बनाये 'तरसील ऐन–उल्–मुल्की' और 'फतेहनामा' नामक दो पुस्तक विद्यमान है। फतेहनामेमें इन्होंने सुलतान अला–उद्–दीन के विजयका वर्णन किया है। ३ वीजापुर–नवाब आदिल शाहके भाई इस्माइलके एक रिसालदार। १५८२ ई॰को बुरहान निज़ाम शाहको हरा आदिलशाहने दक्षिणकी ओर कर्नाटक और मलवार पर आक्रमण मारा था। किन्तु अपने भाई इस्माइलके बलवा करने पर उन्हें पीछे लौटना पड़ा। युद्ध होनेपर मीराजकी फौज इस्माइलसे मिल गई। वेलगांवको भेजी फोज बिना आज्ञाके वीजापुर लौट आयी थी। ऐन–उल्–मुल्क भी अपनी २० हजार फौजके साथ उसमें मिले और राजधानी पर आक्रमण मारने को आगे बढ़े। किन्तु यह युद्धमें मारे गये। १५४२ ई॰को भी इन्होंने वीजापुर घेर लिया था किन्तु विजयनगर नरेशके भाई वेक्ङटाद्रिने इन्हें युद्धमें परास्त किया। यह रातको रण छोड़ अहमदनगर भाग आये थे। वीजापुर में पूर्व पादया–पुरफाटकसे १५०० गज दूर ऐन–उल्–मुल्ककी कब्र बनी है। ४ गुजरातके एक सूबेदार। इनका उपाधि मूलतानी रहा। उलघ खान्के जानेसे गुजरातमें‌ मुसलमानी हुकूमत हिल गई थी। बलवा दबानेको कमाल–उद्–दीनकू भेजे सुधारक खिलजी लड़ाईमें काम आये। किन्तु १३१८ ई॰को ऐन–उल्–मुल्क मूलतानीने बड़ी फौजके साथ पहुंच शान्ति स्थापित की थी। १३०६ ई॰के समय यह मालवेके शासक रहे। उसी समय बम्बई प्रान्तस्थ कनाड़ी जिले़वाले देवगिरिके रामचन्द्र ने उपद्रव उठाया था। अला–उद्–दीन्ने ख्वाजा मलिक काफू़रको एक लाख फौजके साथ दक्षिणात्य दबाने भेजा। राहमें इन्होंने भी अपनी फौज उनकी सहायताके लिये साथ कर दी। {{outdent|ऐनक (हिं॰ स्त्री॰) उपनेत्र, चश्मा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> dytl1gg7q224wwogpzmk7fmhzxfg74n पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१७ 250 76340 665781 609243 2026-07-07T11:25:51Z आदेश यादव 3609 665781 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" /></noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ८७६ ऐनस – ऐन्द्रवारुणी : ऐनस (सं० क्लो. ) एन एव स्वार्थे अण् । पाप, गुनाह । ऐना (हिं०) आईना देखी । ऐनापुर - बम्बई प्रान्त के बेलगांव ज़िलेका एक विशाल ग्राम। यह श्रथनो कागवाड सड़कपर अथनीसे कोई १२ मील दक्षिण-पश्चिम अवस्थित है। ग्रामसेवाहर दक्षिण और एक तालाव के पास मुसलमान साधु पौर कालोको कम है। १६३८ ईको फ्रान्सीसी पर्याटक (Mandelalo) यहां पाये थे। उन्होंने एयनाटौर ( Eynatour ) नाम लिखा है । १७८१ ई-की कपसान सूर (Captain Moor) महाराष्ट्रोंके सहायक बन टोपू से लड़ने पहुंचे । उनको वर्णना के अनुसार ऐनापुर में मुसलमान अधिक रहते और अच्छे अच्छे मकान बने थे । १८४२ ई० को यह ग्राम दूसरे ८ ग्रामों के साथ अंगरेजों के हाथ लगा। कारण मोराण वर्धन शाखा के प्रतिनिधि गोपालरावने किसी उत्तराधिकारीके व्यतीत स्वर्गगमन किया था । ऐन सूर्य के पुत्र सूर्यवंशकी ऐनिरंश भी कहते हैं। ऐमोसा (००) मटकी दर्पण देखानेका काम। यह कलन्दरीको भाषा है। - ऐन- जापानको उत्तर होपवासी एक जाति। पहले यह लोग कूराइल से ये पाये थे। फिर जापान के प्रधान द्वीप पर बस गड्डों में रहनेवाले कोरोपोक गुरुवोंको इन्होंने मार भगाया। किन्तु जापानियोंके दक्षिण तथा चिमसे या पहुचनेपर इन्हें बेज़ में जाकर रहना पड़ा था । यह शराब बहुत पीते और मैले-कुचैले रहते हैं । जापानियोंसे ऐन संबे होते हैं। बाल न बनवाने से इनकी दाढ़ी-मूछ खूब भरी रहती है। स्त्रियां मुंह, हाथ और मत्येपर गोदना गोदाती हैं । वल्कलका वस्त्र पहना जाता है। जाड़े में मृगचर्म धारवकर घरोररचा करते हैं स्त्रो और पुरुष दोनों बाली पहनते हैं लिखना पढ़ना कोई नहीं जानता इनके विश्वासानुसार पृथिवो एक मत्स्य के पृष्ठपर स्थित है। उसके हिलनेसे भूकम्प श्राता है। यह भालूको पूजते हैं। ऐन भोजन करनेसे पहले देवतावको धन्यवाद देते और रोगमें पड़नेसे अग्निका नाम लेते हैं। पहले यह लोग किसी अपराधीको प्राणदण्ड <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> करते न थे। मारना पीटना हो बड़ी सजा रही ।' कोई किसीका वध करनेसे नाक कान काटे जानेका दण्ड पाता था । यह अपरिचित व्यक्तिका बड़ा बादर-- सत्कार करते हैं । ऐनूर मारिनूदो - महिसर राज्यका सरकारी जंगल क्षेत्रफल ३० वर्ग मील है। ऐन्द्रव (सं०] को० ) १ मृगशिरा नक्षत्र । २ चान्द्रायण नामक व्रतविशेष । ३ चान्द्रमास । (त्रि०) ४ चन्द्र-सम्बन्धीय । ऐन्दवो ( सं खो० ) ऐन्दव-डीए। सोमराजी, बाकची.. कालीजोरी । इन्दु-देवता चस्य इन्दु पण् । ० ऐन्द्र (सं० [को०) इन्द्रो देवता अस्य इन्द्र- षण् । १ ज्येष्ठा नक्षत्र | २ मूलविशेष, एक जड़ी। इसे साधारणतः जङ्गली अदरक कहते हैं। संस्कृत पर्याय वनार्द्र का, वनजा और अरण्यजार्द्र का है । यह कटु, पत्र पर रुचि, बल एवं धनिकारक है। (वि.) इन्द्र-सम्बन्धीय ४ इन्द्र के उद्देश्य से आहूत । ( पु० ) ५ इन्द्र के पुत्र जयन्त, अजुन एवं वालि वानर प्रभृति । ६ इन्द्रकृत व्याकरण । ७ दृष्टिका जल । ८ देवसर्षप वृक्ष । ऐन्द्रजालिक (सं० पु० ) इन्द्रजालेन कोड़तोति, इन्द्र जाल-ठक् । १ इन्द्रजालकारक, बाज़ीगर । इसका संस्कृतपर्याय- प्रतीहारक, मायाकारक, कौतिक, मायावी, व्यसक, मायो और मायिक है । (वि) २ इन्द्रजाल सम्बन्धीय, बाज़ीगरोसे सरोकार रखनेवाला । ऐन्द्रतुरीय (सं० क्लो० ) उदकदानविशेष | इसका चतुर्थांश इन्द्रको दिया जाता है। ऐन्द्रद्य ुम्न (सं० तो ० ) इन्द्रद्युम्नमधिकृत्य कृतमाख्या- नम्, इन्द्रव्य स थ । इन्द्रख राजाके वृत्तान्त घटित महाभारतका एक आख्यान । ऐन्द्रयव (सं० पु० ) इन्द्रद, इंदरायन । ऐन्द्रलुप्तिक (सं० त्रि०) इन्द्रलुप्त-ठक् । रोगविशिष्ट, गंजा । ऐन्द्रवायव (सं०वि०) इन्द्रदेव इन्द्र- वायु-अण् । इन्द्र-वायुसम्बन्धीय । ऐन्द्रवारुणी (सं० स्त्री०) इन्द्रवारुणी लता, ककड़ी को बेल इन्द्रलुप्त <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bfxo6sg44yhvvloyk3yh26rqmlzi366 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१७७ 250 83328 665114 346633 2026-07-06T12:33:12Z Shivaniya shaw 4129 665114 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|१७०|अङ्गुलि}}</noinclude>________________ १७० - पर प्रायः अङ्ग ुलिसे मट्टी खोदा करती हैं । हिन्दु- स्थानी स्त्री-परिचयका यह एक प्रधान चित्र बन गया है । वैद्य कहते हैं - रोगोके निकटसे दूत श्रा यद्यपि चिकित्सकके सम्मुख बात करते-करते अङ्ग - लिसे मट्टी काटा करता, तथापि उस रोगोको पीड़ा प्रायः उत्कट हो जाती है। अङ्ग ुल हस्तपदकौ शाखा और अग्रभाग है । मनुष्य के दोनो हाथमें पांच-पांच के हिसाब से दश अङ्ग ुलि हैं, पैरमें भी इसीतरह दश अङ्गलि होती हैं। हाथमें अङ्ग ुलि रहनेके कारण हम इच्छा करनेसे किसी द्रव्यको ग्रहण कर पेड़से एक-एक कर फूल तोड़ ; मट्टीसे चवन्नी, तिल, सरसों प्रभृति क्षुद्र-क्षुद्र द्रव्य चुन सकते हैं। अङ्ग ुलि न रहनेसे अनेक विषयमें हम अकर्मण्य हो जाते । पैरकी अङ्गुलिसे यह सब काम नहीं निकलते । अच्छी तरहसे खड़े होने और स्वच्छन्द घूमनेके लिये विधाताने हमारे पैर में भी अङ्गुलि बनाई हैं । पैरमें अङ्ग ुलि न रहनेसे चलते समय हम लड़खड़ा जाते । <Small>১, कन्वेसे कुहनीतक ऊपरी बाहुको अस्थि ( Humors ) । २, कुहनीसे पहु'चेतक निम्न बाहुवाले बड़े अंगूठेके दिक्की हडडी (Radins)। ७, जिस ओर बड़ी अङ्गुलिके दिक्को हड्डी (Ulna) है । इन दोनो अस्थिके अग्रभागमें ऊर्द्ध मणिबन्ध अर्थात् ऊपरी पहु'चेकी हडडी (Carpal bone) है। इसके बाद निम्न मणिबन्ध अर्थात् नोचेके पहुचेकी हड्डी (Meta-carpal bone) अस्थि है। इसके बाद पर्वको अस्थि (Phalanx) है।</small> अस्थि, मांस, पेशी, स्नायु, शिरा और नाड़ीसे अङ्ग ुलि गठित है । प्रत्येक हाथ और पैर को अङ्ग लि- में चौदह हड्डी होती हैं । जैसे- प्रत्येक कनिष्ठा, अनामिका, मध्यमा और तर्जनीमें तीन अस्थि वर्तमान हैं। अंगूठेमें दो ही पाई जाती हैं। अङ्गुलिको प्रत्येक अस्थिको हम पर्व कहते हैं । अङ्गुलिको अस्थि - परस्पर पेशीसूत्र से गुंथी हैं । अस्थिके जोड़में हवा घुसने से वहांकी अस्थि सड़ जाती है। पेशी ही शरीरका बल है, मांसपेशी से हमारी अङ्गलि और पहुंचा जुड़ा हुआ है, इसीसे हम हाथमें इतना बल देखते हैं । अङ्गुलिमें ऐसी कितनी ही मांसपेशी हैं, यद्दारा वह घुमाई फिराई जा सकती हैं। इसका विवरण हस्त शब्द में देखो । <Small>निम्न बाहुवाले अंगूठेके दिक्की अस्थिका शेषभाग । २, इस ओर में अङ्गुलिके दिक्को अस्थिका शेषभाग । ७, अनुतरि अर्थात् नौका जैसी कुबज अस्थि (Scaphoid) । अर्द्धचन्द्राकार अस्थि (Semi-lumar) । ৫, फलकास्थि (Cuneiform ) अर्थात् देखने में प्रायः तौरके फलक जैसी । ७, चणकास्थि (Pisiform ) अर्थात् चने और मटर जैसी गोल और क्षुद्र । १, विषम चतुर्भुजास्थि (Trapezium) अर्थात् इसके चारी पार्श्ववाले कोने समान्तराल नहीं होते । , अर्द्ध सम चतुर्भुजास्थि । (Trapezoid)। 9, बृहदस्थि (Magnum ) । 10, वक्रास्थि (Onciform) अर्थात् कटियेकौ तरह टेढ़ी । 1), नौचेके पहु'चेकी अस्थिश्रेणी | ১२, अङ्ग ुलिके पर्ववाली प्रथम श्र ेणीको अस्थि । ७ उपरोक्त द्वितीय श्रेणौ । ১8, उपरोक्त तृतीय श्रेणी अ, बृद्धाङ्ग ुष्ठ। ञ, तज नी । मध्यमा । আ, अनामिका । है, कनिष्ठा ।</small> <Small>हम अंगूठे की ओर हाथ घुमाकर अङ्ग ुलि प्रभृति ऊपर उठा और उ'गुलियोंकी और हाथ घुमा अङ्ग ुखि प्रभृति चित कर सकते हैं। उ'गलियो'को ओर हाथ घुमाते समय अधिक जोर देना पड़ता, इसी कारण हम बिना यथेष्ट बल लगाये कल नहीं चला सकते । अंगूठे की</small> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> mkq0eczw2jn7fgjbytit3lsgo6gnawv 665732 665114 2026-07-06T17:54:21Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 665732 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|१७०|अङ्गुलि}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पर प्रायः अङ्ग ुलिसे मट्टी खोदा करती हैं । हिन्दुस्थानी स्त्री-परिचयका यह एक प्रधान चित्र बन गया है । वैद्य कहते हैं - रोगोके निकटसे दूत श्रा यद्यपि चिकित्सकके सम्मुख बात करते-करते अङ्ग - लिसे मट्टी काटा करता, तथापि उस रोगोको पीड़ा प्रायः उत्कट हो जाती है। अङ्ग ुल हस्तपदकौ शाखा और अग्रभाग है । मनुष्य के दोनो हाथमें पांच-पांच के हिसाब से दश अङ्ग ुलि हैं, पैरमें भी इसीतरह दश अङ्गलि होती हैं। हाथमें अङ्ग ुलि रहनेके कारण हम इच्छा करनेसे किसी द्रव्यको ग्रहण कर पेड़से एक-एक कर फूल तोड़ ; मट्टीसे चवन्नी, तिल, सरसों प्रभृति क्षुद्र-क्षुद्र द्रव्य चुन सकते हैं। अङ्ग ुलि न रहनेसे अनेक विषयमें हम अकर्मण्य हो जाते । पैरकी अङ्गुलिसे यह सब काम नहीं निकलते । अच्छी तरहसे खड़े होने और स्वच्छन्द घूमनेके लिये विधाताने हमारे पैर में भी अङ्गुलि बनाई हैं । पैरमें अङ्गुलि न रहनेसे चलते समय हम लड़खड़ा जाते । <Small>১, कन्वेसे कुहनीतक ऊपरी बाहुको अस्थि ( Humors ) । २, कुहनीसे पहु'चेतक निम्न बाहुवाले बड़े अंगूठेके दिक्की हडडी (Radins)। ७, जिस ओर बड़ी अङ्गुलिके दिक्को हड्डी (Ulna) है । इन दोनो अस्थिके अग्रभागमें ऊर्द्ध मणिबन्ध अर्थात् ऊपरी पहु'चेकी हडडी (Carpal bone) है। इसके बाद निम्न मणिबन्ध अर्थात् नोचेके पहुचेकी हड्डी (Meta-carpal bone) अस्थि है। इसके बाद पर्वको अस्थि (Phalanx) है।</small> अस्थि, मांस, पेशी, स्नायु, शिरा और नाड़ीसे अङ्ग ुलि गठित है । प्रत्येक हाथ और पैर को अङ्ग लि- में चौदह हड्डी होती हैं । जैसे- प्रत्येक कनिष्ठा, अनामिका, मध्यमा और तर्जनीमें तीन अस्थि वर्तमान हैं। अंगूठेमें दो ही पाई जाती हैं। अङ्गुलिको प्रत्येक अस्थिको हम पर्व कहते हैं । अङ्गुलिको अस्थि - परस्पर पेशीसूत्र से गुंथी हैं । अस्थिके जोड़में हवा <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> घुसने से वहांकी अस्थि सड़ जाती है। पेशी ही शरीरका बल है, मांसपेशी से हमारी अङ्गलि और पहुंचा जुड़ा हुआ है, इसीसे हम हाथमें इतना बल देखते हैं । अङ्गुलिमें ऐसी कितनी ही मांसपेशी हैं, यद्दारा वह घुमाई फिराई जा सकती हैं। इसका विवरण हस्त शब्द में देखो । <Small>निम्न बाहुवाले अंगूठेके दिक्की अस्थिका शेषभाग । २, इस ओर में अङ्गुलिके दिक्को अस्थिका शेषभाग । ७, अनुतरि अर्थात् नौका जैसी कुबज अस्थि (Scaphoid) । अर्द्धचन्द्राकार अस्थि (Semi-lumar) । ৫, फलकास्थि (Cuneiform ) अर्थात् देखने में प्रायः तौरके फलक जैसी । ७, चणकास्थि (Pisiform ) अर्थात् चने और मटर जैसी गोल और क्षुद्र । १, विषम चतुर्भुजास्थि (Trapezium) अर्थात् इसके चारी पार्श्ववाले कोने समान्तराल नहीं होते । , अर्द्ध सम चतुर्भुजास्थि । (Trapezoid)। 9, बृहदस्थि (Magnum ) । 10, वक्रास्थि (Onciform) अर्थात् कटियेकौ तरह टेढ़ी । 1), नौचेके पहु'चेकी अस्थिश्रेणी | ১२, अङ्ग ुलिके पर्ववाली प्रथम श्र ेणीको अस्थि । ७ उपरोक्त द्वितीय श्रेणौ । ১8, उपरोक्त तृतीय श्रेणी अ, बृद्धाङ्ग ुष्ठ। ञ, तज नी । मध्यमा । আ, अनामिका । है, कनिष्ठा ।</small> <Small>हम अंगूठे की ओर हाथ घुमाकर अङ्ग ुलि प्रभृति ऊपर उठा और उ'गुलियोंकी और हाथ घुमा अङ्गुखि प्रभृति चित कर सकते हैं। उ'गलियो'को ओर हाथ घुमाते समय अधिक जोर देना पड़ता, इसी कारण हम बिना यथेष्ट बल लगाये कल नहीं चला सकते । अंगूठे की</small> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> nxl3szv5icii37mmnh0srjbozqzvjvu पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१७८ 250 83330 665737 346635 2026-07-06T18:16:04Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 665737 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /> {{Rh||अङ्गुलि|१७१}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> <Small>और हाथ घुमाने में इतना ज़ोर नहीं लगता। कुहनीके पास स्थिति- स्थापक मांसपेशी रहती है । जैसे, क और थ है। इस पेशीके द्वारा हाथ चित और पट किया जाता है। मनुष्य भिन्न अन्य कोई जन्तु इसतरह हाथ उलट-पलट नहीं सकता। वानर कितना ही ऐसा कर सकते हैं, किन्तु मनुष्यकी भांति नहीं । गो, मेष प्रभृति अन्यान्य जन्तुके पैर वाले इसी स्थानको बनावट ठीक मनुष्यको कुहनी जैसी होती है, किन्तु 'उनके पैर स्वभावतः पट बने रहते हैं, इच्छा होनेसे वह उन्हें चित नहीं कर सकते ।</small> <Small>हम इच्छा करते ही अङ्गुलि अलग कर, एकमें मिला और मुट्ठी बांध सकते हैं । यह सब काम भी मांसपेशीके द्वारा साधित होते हैं । हाथ के ऊपर तीन स्थिति-स्थापक मांसपेशी हैं। इनमें एक (Radial flexure) बाहसे वृद्धाङ्गुष्ठको और आई है ! दूसरी ( Ulnar flexure ) कनिष्ठा अङ्ग लिकी ओर चली है। तीसरी हथेलीको ओर दौड़ती है। इन सकल मांसपेशी द्वारा हम हाथको कुहनी और पहुचा फैला और सिकोड़ सकते हैं। ऊपरवाली बडी-बड़ी मांसपेशीको शाखा और प्रशाखा अङ्गुलिमे आ मिली हैं, इनके द्वारा अङ्गुलि भी फँलाई और सिकोड़ी जा सकती है [ अङ्गुलिको पेशी, शिरा और नाड़ी प्रभृतिका चित्र हस्त शब्दमें देखो ] । क्र- चिह्नित चित्रमें अङ्गुलिका पेशी-सू आवरण से ढका है ( Sheath of flexure tendons )</small> अङ्गलिमें कितनी ही नाड़ी हैं। हाथकी प्रधान रक्तवहा नाड़ी (Brachial) बाहुके मध्यस्थलसे आकर कुहनीके नीचे दो बड़ी-बड़ी शाखा में विभक्त हुई है । इसकी एक शाखा ( Radial artery ) हाथके ऊपर से बृद्दाङ्गुष्ठको ओर चली गई है । पौड़ाके समय मणिबन्धमें इसी नाड़ोको हम परीक्षा करते हैं। फिर एक शाखा ( Ulnar_artery ) हाथके नीचेसे कनिष्ठा अङ्गुलिको ओर आई है। लद्दाङ्गुष्ठ और कनिष्ठा अङ्गुलिके पाससे यह दोनो धमनी अर्द्धचन्द्राकारमें ( Palmar arch ) गोल बन गई हैं । इनमें अंगूठेके दिक्की नाड़ी मांस भेदी है, हाथके तलमें पेशी से कितना हो नीचे डूबी पड़ी है । उंगलि योंके दिक्की नाड़ी हाथ के तलमें ऊपर-ऊपर आई है, मांसके अधिक भीतर नहीं धंसी । इन दोनो धमनीके गोल घेरेसे पतली-पतली शाखा नाड़ी निकल अङ्गलिको ओर चली आई हैं। हाथके ऊपरी पृष्ठसे भी इन दोनो बड़ी धमनीको शाखा अङ्गुलिकी ओर गई हैं। प्रत्येक अङ्गलिके दोनो पार्श्व में नाड़ी है, “इसीसे अस्त्र-प्रयोगके समय दोनो पार्श्व बचा स्फोटकादि चीरना पड़ते हैं । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अङ्गुलिको शिरा (Veins) भी अनेक हैं। हाथ की दो प्रधान शिरा हैं । एक बाहुसे ऊपर चली आई है । फिर एक शिरा बाहुके नीचे से गई, जो अत्यन्त गंभीर है। इन दो प्रधान शिराकी शाखा- प्रशाखा अङ्गुलिमें जड़ गई हैं । <Small>वायु शब्दमें देखो, कि द्वारा किस प्रकार स्पर्शज्ञान उत्पन्न होता है।</small> अङ्गुलिके अग्रभागमें नख है । नख अस्थिसे नहीं निकलता, इसकी उत्पत्ति चर्मसे होती है। नखके मूलमें सछिद्र मोम जैसा एक प्रकारका मांस होता, जिससे यह बढ़ा करता है । नख सींग-जैसा पदार्थ है, इसका प्रधान उपादान अङ्गार और गन्धक होता है । <Small>अङ्गुलिरोग–</small>अङ्गुलिको पीड़ाके मध्य में बिसहरी ही सचराचर हुआ करती है । अङ्गुलिका अग्रभाग सूज जाता, जो रह-रह तपका करता है । इस यन्त्रणासे रोगी तिलाई काल सुस्थिर नहीं रह सकता । रातको निद्रा नहीं आती । बिसहरी रोग नितान्त सहज नहीं । पहलेसे अच्छी तरह चिकित्सा न होनेपर भीतरको अस्थि पर्यन्त गलकर निकल पड़ती और चिर- कालकौ तरह अङ्गुलि छोटी और विकृत हो जाती है । इस <Small>चिकित्सा – </small>पीड़ाका थोड़ासा सूत्रपात देखकर कदाच कालक्ष्य न करना चाहिये । प्रथमावस्थासे ही भली भांति चिकित्सा करना कर्तव्य है । देशमें बिसहरीके अनेक प्रकार मुष्टियोग हैं। सेमरको कच्ची डालवाली लकड़ी निकाल उसी गड्ढे में अङ्गुलि बन्द करके रखनेसे उपकार होता है । सहिजनका आटा, मोचरस प्रभृति अनेक प्रकार द्रव्यकी कितने ही व्यवस्था करते हैं । मोटी बात यह है, कि अतिरिक्त प्रदाह होनेसे इसमें अवश्य पोब उत्पन्न होती, किसी औषधसे वह निवारण की नहीं जाती। ऐसे समय अस्व-प्रयोग ही एकमात्र उपाय है। <Small>होमिओपेथौ—</small>पीड़ाके प्रथम हो गर्म पानोसे नमक घोल उसमें पुन: पुन: हाथ डुबाता रहे । सेवनके लिये चकमक पत्थरका अर्क (silicea) महौषध है । इसके १२ डाई० को तीन घण्टे अन्तरसे सेवन करे । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9d9apous9jtavkswz6phbs9bakjc05t पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१७९ 250 83331 665739 346636 2026-07-06T18:28:37Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 665739 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|१७२| अङ्गुलि–अङ्गुलिवाण}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इससे उपकार न होनेपर वेदना स्थानमें पुनः पुनः जल डाले और घी मिला अलसीका पुलटिस बांधे । पूय सञ्चित न होनेसे भी अङ्गुलिका सिरा अधिक सूज जानेपर वेदना स्थलमें नश्तर लगाना कर्तव्य है । नश्तर लगाते समय विशेष सतर्क रहे । अङ्गलिके दोनो पार्श्व में नाड़ी हैं, अतएव यह सकल नाड़ी बचा पर्व के मध्यस्थलमें चोर और कदाच पर्व के जोड़पर अस्त्राघात न करे। नश्तर लग जानेसे प्रत्यह दो-तीन बार अलसीका पुलटिस बांधे और सेवनके लिये सिलिकाको व्यवस्था चलाये । एलोपेथी - अङ्गुलिमें प्रयोग करनेको ऊपर जिस प्रकार व्यवस्था लिखो गई, तदनुरूप कार्य करना चाहिये । अङ्गुलिमें सड़ा घाव हो जानेपर भीतरसे सड़ी हड्डौ निकाल डाले । पोछे प्रतिदिन १ भाग कार्बोलिक एसिड और १६ भाग पानी एकत्र मिश्रित कर क्षतस्थान धोये और बोरासिक मरहम लगाये। लौह (५ विन्दु टिङ्कचर ष्टोल, आध छटाक पानी ), काडलिवर आयल, कुनैन, बार्क और एमो - निया - इन सकल द्रव्यको सेवन करना चाहिये । सांसारिक कार्य करनेमें अङ्गुलि हो प्रधान इन्द्रिय है। इसीसे सचराचर अङ्गुलि कट जाती; चाकू, हंसिया, गडांस, कुल्हाड़ी और कलसे अङ्गुलिमें कई तरह चोट पहुंचती है। कटी अङ्गुलिसे अत्यन्त रक्त गिरनेपर तत्क्षणात् भोजा कपड़ा उसपर कसकर बांध दे और हाथ ऊपरको उठाये रहे। चतस्थान में आप हो फाइब्रिन (fibrin) जमकर रक्त बन्द कर देता है । अतएव पहले कटे हुए स्थानमें पानी न डाले ; पानी डालनेसे रक्त नहीं जमने पाता। पनियाले, और अकोड़ेका भी पत्ता रक्त बन्द करनेको उत्कृष्ट औषध है । कालकासुन्दे या पनियालेका पत्ता हुक्क के पानी में बांटकर कटे हुए स्थानपर लगाने से तत्क्षणात् रक्त बन्द हो जाता है । फिटकरी, लोहेका अर्क, बरफ प्रभृति द्रव्य कटे हुए स्थानमें लगा कसकर बांध देनेसे भी रक्त बन्द होता है। दूर्वा घासको प्रयोग करनेसे यही फल उत्पन्न हो सकता । अङ्गुलिको मोटी नाड़ी कट जानेपर <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कभी-कभी इन सकल उपायोंसे रक्त बन्द नहीं हों सकता। ऐसे स्थलमें लोहेका कोई द्रव्य आगमें कुछ गर्म कर, कटे हुए स्थानको दाग देना चाहिये। इससे अविलम्ब ही रक्त बन्द हो जाता है । किसी प्रकार अङ्गुलि कट जानेपर सुचिकित्सक द्वारा चिकित्सा कराना उचित है। कारण, भीतरी हड्डी चूर हो जानेसे अङ्ग ुलिका कियदंश काटकर फेंक देना पड़ता है । ऐसा न करनेसे क्रमशः वह स्थान सड़ा करता उत्पन्न हो जाता है। और अवशेषमें प्राण-संशय अङ्गुलिका अग्रभाग स्नायु-मण्डलसे जड़ा, इसलिये आघात पहुंचने से कभी-कभी धनुष्टङ्कार रोग आ उपस्थित होता है। अङ्ग ुलिमें अधिक आघात न लगने से ऐसे भयका कोई विषय नहीं । शीतल जलमें कपड़ा भिजाकर अङ्ग ुलि बांध दे । नहीं तो, ३० रत्ती सोस् सर्करा ( Plumbic acid ), एक ड्राम अफीमका अरिष्ट और आधसेर शीतल जल एकत्र मिश्रित कर क्षतस्थानपर प्रयोग करे । गेंदा फूलको पखुरोके रस किंवा होमिओपेथी मतके केलिण्डिउलाको जलके साथ आहत स्थानमें प्रयोग करने से कितना ही उपकार होता है । अङ्गुलिग (सं० त्रि०) अङ्गुलिभिः गच्छतीति । अङ्गुलिपर भर देकर चलनेवाला, जो उंगलीपर बोझ डालकर चले । अङ्गुलितोरण (सं० क्लो०) अङ्गुलेः तोरणमिव कृतम् । ललाटपर अर्द्धचन्द्राक्कृति चन्दनका तिलक । चन्दनको खौर जो माथेपर अर्द्धचन्द्राकार लगाई जाती है । अङ्गुलित्र (सं० क्लो० ) अङ्गुलि-त्र-क, ६- तत् । अङ्गुलिका आवरण, उगलोकी हिफाज़त करनेवाली चीज़ । १ लोहे या चमड़ेकौ टोपी जिसे दरज़ी कपड़ा सीते समय पहनते हैं। दरज़ी लोहे या चमड़ेको टोपी अनामिका के ऊपर पहन वस्त्रादि सोते हैं। यह टोपो न रहनेपर बार-बार सूई से अङ्गुलि छिद जाती है । २ दस्ताना । अङ्ग लित्राण (सं० क्लो०) अङ्गुलि-त्र-क्त । संयोगादेरातो धातो- ६खतः । पा ८।२।४३। उंगली बचानेको टोपी, जिसे <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> j8ataig3j0v21p6mbzhlcbgy4d8gh8a पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१८० 250 83334 665746 346639 2026-07-07T05:01:00Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 665746 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||अङ्ग लिपञ्चक–अङ्गीय १७३|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|दरजी कपड़ा सीते समय अनामिकामें इसलिये पहनते जिससे सूई उंगलियोंमें न चुभे। अङ्गुश्ताना।}} {{outdent|अङ्गुलिपञ्चक (सं० पु०) हस्तकौ पञ्च अङ्गुलि, हाथकी पांचो उंगली।}} {{outdent|अङ्गुलिपर्व (सं० पु०) उंगलीका पोर या जोड़।}} {{outdent|अङ्गुलिमुद्रा, अङ्गुलिमुद्रिका (सं० स्त्री०) अङ्गुलि-मुद्रा-क, ६-तत्। नामाङ्कित अङ्गुरीय, नाम खोदी हुई अंगूठी (Seal-ring)। २ अङ्कित भूषण। खोदा हुआ जेवर।}} {{outdent|अङ्गुलिमुख (सं० क्ली०) उंगलीका अग्रभाग।}} {{outdent|अङ्गुलिमोटन (सं० क्ली०) अङ्गुल्याः मोटनं मर्दनं यत्र, बहुव्री०। उंगलीका फोड़ना या चिटकाना।}} {{outdent|अङ्गुलिवेष्टन (सं० क्ली०) दस्ताना, उंगली लपेटनका वस्त्र।}} {{outdent|अङ्गुलिसङ्ग (सं० पु०) उंगलीका साथ।}} {{outdent|अङ्गुलिसङ्गा (सं० स्त्री०) अङ्गुली सङ्गः यस्याः, बहुव्री०। समासैड्डुभिः सङ्गः। पा ८।३।८०। अङ्गुलिमें लेपन करनेका यववाला मांड। उंगलीपर लेप किया जानेवाला यवका मांड।}} {{outdent|अङ्गुलिसंज्ञा (सं० स्त्री०) अङ्गुल्या संज्ञा सङ्केतज्ञापनम्। अङ्गुलिद्वारा इङ्गित, अङ्गुलिसङ्केत, उंगलीका इशारा।}} {{outdent|अङ्गुलिसन्देश (सं० पु०) अङ्गुलि-सम्-दिश-घञ् भावे। अङ्गुलि ध्वनि द्वारा भाव-प्रकाश, उंगली की आवाजसे मतलबका इजहार। २ अङ्गुलिके शब्दसे संह्लादान, उंगलीकी आवाज से बातचीत। ३ चुटकीसे संवाद-ज्ञापन, चुटकीसे खबर देना।}} {{outdent|अङ्गुलिसम्भूत (सं० त्रि०) अङ्गुलि-सम्-भू-क्त, ७-तत्। अङ्गुल्यां सम्भूतः। अङ्गुलिसे जात, उंगलीसे पैदा हुआ। नख, नाखून। {{outdent|अङ्गुलिस्फोटन (सं० क्ली०) अङ्गुल्योः स्फोटनं यत्र, बहुव्री०। उंगलीका चटकना या फोड़ना। आवश्यक न होते भी हाथकी स्वस्तिके लिये अनेक उंगली चटकाया करते हैं। हिन्दुस्तानमें स्त्रियां किसीको अभिसम्पात करते समय उंगली चिटकाकर गालियां देती हैं।}} {{outdent|अङ्गुलि (सं० स्त्री०) अङ्गुलि-ङीप्। उंगली, अङ्गुश्त।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|अङ्गुलिपञ्चक (सं० क्ली०) अङ्गुलीनां पञ्चकं पञ्चसंख्या। संख्यायाः सं ज्ञासङ्घसूत्राध्ययनेषु। पा ५।१।५८। पांचो उंगली, जिन्हें अङ्गुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठ कहते हैं।}} {{outdent|अङ्गुलीय (सं० क्ली०) अङ्गुली-छ। अंगूठी, अङ्गुश्तरी। अङ्गुरीय देखो।}}{{outdent|अङ्गुलीसम्भूत (सं० त्रि०) अङ्गुलीजात, उंगलीसे पैदा; नख, नाखून। {{outdent|अङ्गुल्यादि—अङ्गुलि प्रभृति कतिपय शब्द।}} {{outdent|अङ्गुल्यादेश (सं० पु०) १ उंगली द्वारा बातचीत। २ सङ्केत, इशारा।}} {{outdent|अङ्गुल्यानिर्देश (सं० पु०) १ उंगलियोंका उठाना। २ कलङ्क, बदनामी।}} {{outdent|अङ्गुष्ठ (सं० पु०) अङ्गौ पाणौ तिष्ठतीति; अङ्गु-स्था-क, ६-तत् ७मी वा। <Small>अम्बा म्बोगोभूमि सव्यापविद्विसृकुच्छ कञ्ज मञ्जिष्ठि परमेवहिं दियाग्निभ्यः स्थः। पा ८।३।९७। १</small> वृद्धाङ्गुलि, अंगूठा। २ पैरका बुड्ढा अङ्गुल। ३ अङ्गल परिमाण। (कठ उ० ४।१२)}} {{outdent|अङ्गुष्ठमात्र (सं० त्रि०) अङ्गुष्ठ-मात्रच् परिमाणार्थे। अङ्गुष्ठवाले बृहत् पर्वके परिमित, अंगूठेकी बड़ी गांठ के बराबर। अङ्गुष्ठपरिमाण। (श्वेत० उ० ५।१३)}} {{outdent|अङ्गुष्ठ्य (सं० त्रि०) अङ्गुष्ठ सम्बन्धीय। (कात्या० श्रौ० ७।२।८)}} {{outdent|अङ्गष (सं० पु०) अङ्गि गती—उषन्। १ नकुल, नेवला। २ बाण, तीर।}} {{outdent|अङ्गष्ठा (वै० स्त्री०) अङ्गे स्थिता। (अथर्व० ६।१११।१)}} {{outdent|अङ्ग्य (वै० त्रि०) अङ्गे भव। (ऋक् १।११।१)}} {{outdent|अङ्गीय, आङ्ग्रे—(कनौज ) सन् ई० के १७वें शताब्दीके अनेक महाबल पराक्रान्त समुद्रके डाकू। सन् १६८० से १७४० ई० तक आङ्ग्रे डाकुओंका पश्चिम समुद्रमें बड़ा उपद्रव रहा। सन् १६८८ ई० में कनौजीने बम्बईके पास कुलाबामें अपना अड्डा स्थापित किया और सन् १७१३ ई० में जयनगरपर अपनी विजयवैजयन्ती फहराई सन् १७१३ ई० में इन्होंने अङ्गरेज के जहाज, लूटे, जिसके बदले अङ्गरेज, इनके विजयदुर्गपर टूट पड़े। किन्तु उन्हें हार मान पीछे लौटना हुआ। कोई दो बार इन्हें अङ्गरेजों और पुर्तगालियों की सम्मिलित सेनासे युद्ध करना पड़ा था।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|४४|2em}}</noinclude> g2p6qw63czqp93p5zlvksvcb072dp0d 665747 665746 2026-07-07T05:02:12Z Shivaniya shaw 4129 665747 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किया । अंग्रेज़, फ्रान्सीसी और डेनमार्कवाले इनके प्रतापसे शशव्यस्त हो गये थे । यह इन सकल विदेशियों के जहाज लूट लेते रहे। इनके उत्तराधिकारीका नाम तुलजी आड्गेंन था । सन् १७५४ ई० में बम्बई- गवर्नमेण्ट इनसे भी परास्त हो गई थी । सन् १७५६ ई० में अंगरेजोंने इनका कोई पन्द्रह लाख रुपया लूटा । पीछे जैम्स साहबने सुवर्णदुर्गको अधिकार किया । अङ्घ (वै० क्लो०) पाप । <Small>( वा० स० ४।२७ महौधर )</small> {{Outdent|अङ्घस् (सं० क्लो०) अघि गतौ असुन् । पाप, इज़ाब ।}} {{Outdent|अङ्घारि (सं० पु०) अङ्घस ऋ-इन् । पृषोदरादित्वात् साधु, ६-तत्। १ दीप्ति, वह चीज जो खूब चमके । २ पापनाशक । ३ दिव्य सोमजल ।<Small>(वाज० स० ४ १७)</small>}} {{Outdent|अङ्घि, अंह्नि (सं० पु० ) अघि गतौ इन् करणे । <Small>वङ क्यादयश्च । उण् ८|६६| १६६-१</small> पादः पैर । २ वृक्षमूल, दरख्नुको जड़। ३ छन्दका चतुर्थ भाग, शेरका चौथा हिस्सा ।}} {{Outdent|अङ्किप (सं० पु० ) अङ्किना पिवतीति, अङ्कि - पाक १ वृक्ष, दरख्न । २ लता, बेल ।}} {{Outdent|अङ्घिवल्लिका, अङ्घिवल्ली (सं० स्त्री०) चकोड़ चकोड़िया ।}} {{Outdent|अङ्घिवल्लिका, अङ्घिवल्ली (सं० स्त्री०) चकोड़ वृक्ष, चकोड़िया ।}} {{Outdent|अच्–अविस्पष्ट कथा, गति । भा० उ०, सेट् । }} {{Outdent|अच्–भा०-प०, सक० सेट् ।}} {{Outdent| अच्–१ समस्त स्वर-वर्ण को संज्ञा । २ पाणिनि गृहीत हृदन्त प्रभृतिको अच् प्रत्यय ।}} अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ —यही कई एक वर्ण अच् हैं। बाकी क, ख प्रभृति समस्त वर्ण <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हल् कहाते हैं । संस्कृत भाषामें अच् वर्ण और हल् वर्ण पृथक्-पृथक् गृहित हुए हैं । अन्य भाषा में ऐसा नहीं; सब वर्ण एक ही साथ अब लिखे हैं । सन्देह यही है, कि मनुष्यने पहले किस वर्ण की सृष्टि की थी – अच् या हल् वर्ण को। पहले सुनते हो यह प्रश्न कुछ कठिन मालूम होता ; किन्तु कुछ सोचने-विचारनेसे इस पुरातन बातका कितना हो मर्म समझा जा सकता है । प्रथम- प्रथम मनुष्य लिखना न जानता, बात कर सकता था; वह भी दो वर्ण एक साथ मिला फिर दीर्घच्छन्द में नहीं । देना हो यथेष्ट होता था। दो अक्षर में एक-एक बात कही जाती थी और उसका भी शेष वर्ण हलन्त रहता था । असभ्य आन्दामानवासी इस बातका प्रमाण वह किसी तरह कुछ-कुछ मनका भाव व्यक्त कर सकते हैं; किन्तु अधिक बोलनेकी उन्हें सामर्थ्य नहीं । मनुष्यने पहले बात करना सीखा था । किन्तु दूरके लोगोंसे कथोपकथन नहीं चलता-पत्र लिखना पड़ता है । पत्र लिखनेको अक्षरादि आवश्यक हैं । जब अक्षरको सृष्टि हुई न थी, तब लोग कैसे पत्र लिखते थे ? फिनिशिया के लोग किसोको मनको बात लिखकर भेजनेके लिये पेड़ के पत्ते या बकलेपर कोई चित्र बना देते थे । गो बतानेको गोका चित्र बनाकर भेजा जाता, दर्शनशक्ति समझानेको चक्षु अङ्कित करते थे । प्राचीन फिनिशियावासि- योंके पत्र लिखनेका ऐसा ही सङ्केत था । क्रमसे अङ्घि, पर्णी, अङ्घि, पर्णिका (सं० स्त्री०) चकोड़, और भी संक्षेपमें पत्र लिखने के लिये समस्त गोन अङ्कित कर केवल उसका शिर या शृङ्ग बना दिया जाता था। इसके बाद और भी सुविधा ढूंढते ढूंढते अक्षरको सृष्टि हुई। अनेक अनुमान करते हैं, कि वर्त्तमान एक-एक अक्षरका नाम एक-एक वस्तु के नामपर रखा गया है । हीब्रू भाषाके प्रथम अक्षरका नाम अलिफ् है, जिससे सांड समझा जाता है । दूसरे एक अक्षर गिमेलका अर्थ ऊंट है। मीम्से जलका बोध होता है। फिनिशियावासी और यहदी इस तरह ~~ लहर - जैसा चिह्न बना जलको <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8l9mxufygejyhmrsxv7tzobej4xdap1 665767 665766 2026-07-07T09:10:50Z Shivaniya shaw 4129 665767 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''१७४'''|'''अङ्घ–अच्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इनकी मृत्यु सन् १७३१० में हुई । आङ्ग्रेने कोई एक शताब्दतक मलाबरके समुद्रतटकु लूटा-मारा और भीतरी शहरोंमें भी यह घुस जाते रहे । पीछे महाराष्ट्रदेशके सेना-नायक बन सुवर्णदुर्गके शासनकर्त्ता हुए। किन्तु अधिक दिन इन्हें दूसरेको नौकरी न करना पड़ी। इन्होंने शीघ्र हो स्वाधीन हो महाराष्ट्रोंको समस्त रणतरोको अधिकार और दाक्षिणात्य में अपने आधिपत्यको स्थापन किया । अंग्रेज़, फ्रान्सीसी और डेनमार्कवाले इनके प्रतापसे शशव्यस्त हो गये थे । यह इन सकल विदेशियों के जहाज लूट लेते रहे। इनके उत्तराधिकारीका नाम तुलजी आड्गेंन था । सन् १७५४ ई० में बम्बई- गवर्नमेण्ट इनसे भी परास्त हो गई थी । सन् १७५६ ई० में अंगरेजोंने इनका कोई पन्द्रह लाख रुपया लूटा । पीछे जैम्स साहबने सुवर्णदुर्गको अधिकार किया । अङ्घ (वै० क्लो०) पाप । <Small>( वा० स० ४।२७ महौधर )</small> {{Outdent|अङ्घस् (सं० क्लो०) अघि गतौ असुन् । पाप, इज़ाब ।}} {{Outdent|अङ्घारि (सं० पु०) अङ्घस ऋ-इन् । पृषोदरादित्वात् साधु, ६-तत्। १ दीप्ति, वह चीज जो खूब चमके । २ पापनाशक । ३ दिव्य सोमजल ।<Small>(वाज० स० ४ १७)</small>}} {{Outdent|अङ्घि, अंह्नि (सं० पु० ) अघि गतौ इन् करणे । <Small>वङ क्यादयश्च । उण् ८|६६| १६६-१</small> पादः पैर । २ वृक्षमूल, दरख्नुको जड़। ३ छन्दका चतुर्थ भाग, शेरका चौथा हिस्सा ।}} {{Outdent|अङ्किप (सं० पु० ) अङ्किना पिवतीति, अङ्कि - पाक १ वृक्ष, दरख्न । २ लता, बेल ।}} {{Outdent|अङ्घिवल्लिका, अङ्घिवल्ली (सं० स्त्री०) चकोड़ चकोड़िया ।}} {{Outdent|अङ्घिवल्लिका, अङ्घिवल्ली (सं० स्त्री०) चकोड़ वृक्ष, चकोड़िया ।}} {{Outdent|अच्–अविस्पष्ट कथा, गति । भा० उ०, सेट् । }} {{Outdent|अच्–भा०-प०, सक० सेट् ।}} {{Outdent| अच्–१ समस्त स्वर-वर्ण को संज्ञा । २ पाणिनि गृहीत हृदन्त प्रभृतिको अच् प्रत्यय ।}} अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ —यही कई एक वर्ण अच् हैं। बाकी क, ख प्रभृति समस्त वर्ण <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हल् कहाते हैं । संस्कृत भाषामें अच् वर्ण और हल् वर्ण पृथक्-पृथक् गृहित हुए हैं । अन्य भाषा में ऐसा नहीं; सब वर्ण एक ही साथ अब लिखे हैं । सन्देह यही है, कि मनुष्यने पहले किस वर्ण की सृष्टि की थी – अच् या हल् वर्ण को। पहले सुनते हो यह प्रश्न कुछ कठिन मालूम होता ; किन्तु कुछ सोचने-विचारनेसे इस पुरातन बातका कितना हो मर्म समझा जा सकता है । प्रथम- प्रथम मनुष्य लिखना न जानता, बात कर सकता था; वह भी दो वर्ण एक साथ मिला फिर दीर्घच्छन्द में नहीं । देना हो यथेष्ट होता था। दो अक्षर में एक-एक बात कही जाती थी और उसका भी शेष वर्ण हलन्त रहता था । असभ्य आन्दामानवासी इस बातका प्रमाण वह किसी तरह कुछ-कुछ मनका भाव व्यक्त कर सकते हैं; किन्तु अधिक बोलनेकी उन्हें सामर्थ्य नहीं । मनुष्यने पहले बात करना सीखा था । किन्तु दूरके लोगोंसे कथोपकथन नहीं चलता-पत्र लिखना पड़ता है । पत्र लिखनेको अक्षरादि आवश्यक हैं । जब अक्षरको सृष्टि हुई न थी, तब लोग कैसे पत्र लिखते थे ? फिनिशिया के लोग किसोको मनको बात लिखकर भेजनेके लिये पेड़ के पत्ते या बकलेपर कोई चित्र बना देते थे । गो बतानेको गोका चित्र बनाकर भेजा जाता, दर्शनशक्ति समझानेको चक्षु अङ्कित करते थे । प्राचीन फिनिशियावासि- योंके पत्र 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गया, मालूम होता है, कि उनकी बात मिथ्या नहीं । रञ्जेस और टेलर साहबका मत यह है, कि फिनिशियाके लोगोंने ही पहले लिखनेका कौशल निकाला था; उन्हे देखकर पीछे पृथिवोकी अन्यान्य जातियोंने लिखना सीखा। इसमें घोर भ्रम है । उस समय सकल ही प्राचीन जातियां भारतवर्ष में बाणिज्य करने आती थीं । अरब और मिश्र के रहने- वालोंने ब्राह्मणोंसे गणितशास्त्र सोखा और लिखनेका कौशल भी इसी हिन्दुओंके देशसे विदेशमें जा पहुंचा था। अरबके अधिवासौ इस बातको स्वीकार करते हैं । भारतवर्ष में प्रथम प्रथम चित्र बना पत्र लिखनेको प्रथा थी या नहीं ? अवश्य हौ थी । यदि न होती, तो फिनिशियावासी इस विद्याको कहांसे सीखाते ! अब दिन-दिन इस देशसे पुरानी प्रथाके प्रमाण उठते जाते हैं, इसीसे लोग ऐसो बात कहते, नतुवा पुरातन रौति अभी ढूंढनेसे अनेक प्रमाण मिल सकते हैं। वररुचिको पत्रकौमुदीमें इस बातके अनेक नियम निर्दिष्ट किये गये हैं, कि पूर्वकालके लोग किस प्रणालौसे पत्र लिखते थे । 'पत्रके ऊपर अङ्कुश जैसी एक रेखा खींचे। अङ्कुशके भीतर विन्दु लगा दे। राजाको पत्र लिखनेमें पत्रके ऊर्ध्वमें कुङ्कुमसे एक चन्द्रमण्डल अङ्कित करे । पण्डित और गुरुजन प्रभृतिके पत्र में चन्दनका चिह्न लगाना आवश्यक है । ख़ामौ के पत्र में स्त्री को सिन्दूर का फुटकी डालना चाहिए।" स्वामी स्वोको पत्र लिखनेपर महावरका रङ्ग जमाये । फिर शत्रुको रक्तका चिह्न लगा पत्र लिखना चाहिये ।' यह कुछ दिन पूर्वका संवाद है । जब वररुचि जीवित थे, उसके कुछ आगेसे यह सकल नियम 'चला आता था । किन्तु यह ठीक मालूम हो नहीं सकता, कि इससे भी पहले लोग कैसे लिखते थे । फिर भी, इन सकल चिह्नोंके बनानेको प्रथा देख स्पष्ट <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अनुमान होता है, कि जिस समय हिन्दू लिखना न जानते, उस समय केवल चित्र अङ्कित कर दूर लोगोंको मनको बात लिख भेजते थे । हिन्दुको ऐसा ही अभ्यास भी है, – एक बार कोई रीति चलित होनेसे चिरकाल मानना पड़ती; न मानने से प्रत्यवाय होता है । इसीसे अज्ञानतावशत: किसी काल में लोग जो चित्र अङ्कित कर पत्र लिखते थे, उस दिन पर्यन्त हम उसी पुरातन नियमको मानते रहे- आज भी विवाह के पत्र में, कुछ न हो तो सिन्दूरको फुटको लगा देना पड़ता है । एक दूसरी बात भी है । नागा सन्याल प्रभृति असभ्य जातियां लिखना नहीं जानतीं, पढ़ नहीं सकतीं। दूरके लोगोंको मनको बात कह पहुचानेके लिये उनका एक-एक सङ्केत निर्धारित है । सन्थाल विपद में पड़ने से ग्राम-ग्राम संवाद देनेके निमित्त साल वृक्षको एक डाल भेजते हैं। यह सङ्केत पाते ही सब लोग धनुर्वाण ले दौड़ पड़ते हैं । शत्रुओंको भय दिखानेके लिये नागे एक जली लकड़ी, मिर्च और अस्त्र पहुंचाते हैं। इसका तात्पर्य यह है, कि शत्रुओंका ग्राम जली लकड़ीको तरह दग्ध किया जायेगा और वह अस्त्राघातसे लाल मिर्चकी तरह जलने लगेंगे। इसमें संदेह नहीं, कि आजकल जैसे भारतवर्षको अज्ञ जातिके मध्य में संवादादि भेजने का एक-एक सङ्केत चलता है; आदिम अवस्थामें जब आर्य अज्ञ थे, तब उनके मध्यमें भी ऐसे ही संवाद भेजनेका किसी प्रकार सङ्केत था । प्रथम- प्रथम अनेक देशोंके लोग पशुपालन करते थे। इससे बकरी, भेड़ और गो-वत्सादि चरानेके लिये दिवारात्र उन्हें मैदान, वन, नदीकूल और पर्वतपर घूमना पड़ता था । पर्वतके ऊपरसे उन्हें आकाशमें ग्रहनक्षत्रादिको सकल गति-विधि खूब देखनेको मिलती थी, कि सन्ध्याको कौन तारा उदित होता, आधी रातका कौन नक्षत्र था, सवेरा होनेसे कौन नक्षत्र कहांपर रहता था । इससे सकल हो देशों में ज्योतिष के मन्त्रगुरु <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> t0ahbwhuslmh2c943t2kagqz5lwh8l4 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३०६ 250 83594 665752 665104 2026-07-07T06:40:13Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 665752 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''२९९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude><small>अथर्वणानां चतुर्ऋचेभ्यः स्वाहा।१। पञ्चर्चेभ्यः स्वाहा।२। षड्ऋचेभ्यः स्वाहा।३। सप्तर्चेभ्यः स्वाहा।४। अष्टर्चेभ्यः स्वाहा।५। नवर्चेभ्यः स्वाहा।६। दशर्चेभ्यः स्वाहा।७। एकादशर्चेभ्यः स्वाहा।८। हादशच भ्यः स्वाहा।९। त्रयोदशर्चेभ्यः स्वाहा।१०। चतुर्द्दशर्चेभ्राः स्वाहा।११। पञ्चदशर्चेभ्राः स्वाहा।१२। षोडशर्चेभ्राः स्वाहा।१३। सप्तदशर्चेभ्राः स्वाहा।१४। अष्टादशर्चेभ्राः स्वाहा।१५। एकीन-विंशतिः स्वाहा।१६। विंशतिः स्वाहा।१७। महत्काण्डाय स्वाहा।१८। तृचेभ्रा स्वाहा।१९। एकर्चेभ्राः स्वाहा।२०। क्षुद्रभ्राः स्वाहा।२१। एकद्वृ चेभ्राः स्वाहा।२२। रोहितेभ्राः स्वाहा।२३। सूर्याभ्रां स्वाहा।२४। ब्रात्याभ्रां स्वाहा।२५। प्रजापत्याभ्रां स्वाहा।२६। विषासह्यै स्वाहा।२७। मङ्गलिकेभ्राः स्वाहा।२८। ब्रह्मणे स्वाहा।२९।</small> अथर्व वेदमें भी देखा जाता है, कि प्रथम काण्डके प्रायः सकल सूक्त चार ऋक्से, और द्वितीय काण्डके भी प्रायः सकल सूक्त पांच ऋक्से ग्रथित हैं। इसलिये अथर्व बंशीयोंके मन्त्र लेकर ही अथर्ववेद बना है। <small>(२२ सूक्त)</small> <small>आङ्गिरसानामाद्यैः पञ्चानुवाकैः स्वाहा।१। षष्ठाय स्वाहा।२। सप्तमाष्टमाभ्रां स्वाहा।३। नौलनखेभ्राः स्वाहा।४। हरितेभ्राः स्वाहा।५। क्षुद्रेभ्राः स्वाहा।६। पर्यायिकेभ्राः स्वाहा।७। प्रथमेभ्राः शङ्खेभ्राः स्वाहा।८। द्वितीवभाः शङ्ख भ्राः स्वाहा।। तृतीयेभाः शङ्ख भ्राः स्वाहा ।१०। उपोत्तमभाः स्वाहा । ११ । उत्तमेभाः खाहा। १२ । उत्तरभ्राः स्वाहा । १३ । नषिभाः स्वाहा। १४ । शिखिभाः स्वाहा । १५। गणेभ्राः स्वाहा । १६ । महागणेभाः स्वाहा । १७। अर्वेभाः अगिरोभयो विदगणेभाः स्वाहा । १८। पृथक्सहस्राभवां स्वाहा । १६ । ब्रह्मणे स्वाहा। २० । पूर्व कालसे ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेद हो भक्तिपूर्वक पढ़ते रहे और वेद तीन ही प्रसिद्ध थे। इसीसे व दका दूसरा नाम त्रयी पड़ा है। मनु प्रभृति प्राचीन ग्रन्थों को अनुसन्धान कर देखनेसे ऋगादि तीन वेदोंका हौ आदर अधिक जान पड़ता है,- "अग्निवायुरविभ्यस्तु वयं ब्रह्म सनातनं । दुदोह यज्ञसिद्धार्थमृग्यजु:सामलक्षणम् ॥” मनु १॥२३॥ 'यागादिको सिद्धिके लिये उन्होंने अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और सूर्यसे सामवेद उद्धृत किया।' "वयी वै विद्या ऋचो यजुषि सामानि ।" (शतपथ-ब्राह्मण ४।६।७१) 'ऋक्, यजुः और साम-येही तीन विद्यायें हैं।' "प्रजापतिलौकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् प्राबहदनि पृथिव्या वायुमन्तरीक्षादादित्य दिवः । १ । स एतास्तिखो देवता प्रभातपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबहदग्ने कई चोवायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् । २ । स एतां वर्षों विद्यामभातपत् तस्वास्त प्यमानाया रसान् प्रावहद भूरि- त्य ग भयो भुवरिति यजुभाः वरिति सामभाः ।"३॥ (छान्दोग्योपनिषत् ४।१०) 'प्रजापतिने तीनो लोक उत्तप्त किये थे। उन्ह। तप्यमान तीनो लोकोंसे उन्होंने तीन सार भाग बाहर निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरीक्षसे वायु और ग़लोकसे आदित्य उद्धृत किये गये । इसके बाद उन्होंने इन तीन देवताओंमें फिर ताप पहुंचाया। इन तीनो देवताओंके उत्तप्त होनेसे इनका सारांश उद्धृत किया गया। अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और आदित्यसे सामवेद उपलब्ध हुआ। प्रजापतिने इन तीन विद्याओं में फिर ताप छोड़ा। इस वेदत्रयके उत्तप्त होनेपर ऋक्से भूर्, यजुसे भुवः और साम- वेदसे खर् उत्पन्न हुआ। इस प्रकार अनुसन्धान करनेसे स्पष्ट जान पड़ता है, कि पहले ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेदको ही अध्ययन करते थे प्रस्थानभेद-प्रणेता मधुसूदन सरस्वतीने लिखा है.- "स च प्रयोगवर्यण यज्ञनिर्वाहार्थम् ऋग यजुःसामवेदन भिन्नः । अथर्ववेदस्तु यज्ञानुपयुक्तः शान्तिपौष्टिकाभिचारादि-कर्मप्रतिपादक न अत्यन्त विलक्षण एव ।" 'यज्ञादि सम्पन्न करनेके लिये वेदके, ऋक्, यजुः और साम-यह तीन प्रकारके विभाग किये गये हैं। *** अथर्ववेद यागादिकोंमें तो अनुपयुक्त है, परन्तु शान्ति, पौष्टिक और अभिचार आदिका इसमें अच्छा वर्णन किया गया है। इसलिये यह बड़ा ही *** अद्भुत है।' . । अनेक लोग अनुमान करते हैं, कि अथर्ववेद तो म्लेच्छोंका वेद है ; ब्राह्मण कभी इस वेदका आदर न करते थे। किन्तु यह भ्रान्त सिद्धान्त है। वास्तविक रूपसे यह म्लेच्छोंका वेद नहीं, यह व्रात्यवेद है अब विचारना चाहिये, कि व्रात्य कहनेसे क्या समझा जाता है। मनुने व्रात्यके सम्बन्धमें इस प्रकार अपने मतको प्रकाश किया है,- "आषोडशाद ब्राह्मणस्य साविवी नातिवर्तते । आहाविशात् क्षबोबन्धोराचतुर्विशतेविंशः ॥ अत जई बयोऽप्ये ते यथाकालमसंस्कृ ताः । सावित्रीपतिता वाल्या भवत्यार्यविगर्हिताः ॥” मनु २।२८-३८ । <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bezwlyvb64omw7ydfy9llvmnlhu5sck 665758 665752 2026-07-07T07:28:12Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 665758 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''२९९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude><small>अथर्वणानां चतुर्ऋचेभ्यः स्वाहा।१। पञ्चर्चेभ्यः स्वाहा।२। षड्ऋचेभ्यः स्वाहा।३। सप्तर्चेभ्यः स्वाहा।४। अष्टर्चेभ्यः स्वाहा।५। नवर्चेभ्यः स्वाहा।६। दशर्चेभ्यः स्वाहा।७। एकादशर्चेभ्यः स्वाहा।८। हादशच भ्यः स्वाहा।९। त्रयोदशर्चेभ्यः स्वाहा।१०। चतुर्द्दशर्चेभ्राः स्वाहा।११। पञ्चदशर्चेभ्राः स्वाहा।१२। षोडशर्चेभ्राः स्वाहा।१३। सप्तदशर्चेभ्राः स्वाहा।१४। अष्टादशर्चेभ्राः स्वाहा।१५। एकीन-विंशतिः स्वाहा।१६। 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स्वाहा।१८। पृथक्सहस्राभ्रां स्वाहा।१९। ब्रह्मणे स्वाहा।२०।</small> पूर्व कालसे ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेद ही भक्तिपूर्वक पढ़ते रहे और वेद तीन ही प्रसिद्ध थे। इसीसे वदका दूसरा नाम त्रयी पड़ा है। मनु प्रभृति प्राचीन ग्रन्थों को अनुसन्धान कर देखनेसे ऋगादि तीन वेदोंका ही आदर अधिक जान पड़ता है,— {{Block center|<poem><small>"अग्निवायुरविभ्यस्तु वयं ब्रह्म सनातनं। दुदोह यज्ञसिद्धार्थमृग्यजुःसामलक्षणम्॥" मनु १।२३।</poem></small>}} 'यागादिकी सिद्धिके लिये उन्होंने अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और सूर्यसे सामवेद उद्धृत किया।' <small>"त्रयी वै विद्या ऋचो यजुंषि सामानि।" (शतपथ-ब्राह्मण ४।६।७।१)</small> 'ऋक्, यजुः और साम—येही तीन विद्यायें हैं।' <small>"प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् प्राबृहदग्रिं पृथिव्या वायुमन्तरीक्षादादित्यं दिवः।१। स एतास्तिस्रो देवता अभातपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबृहदग्रेर्ऋचोवायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात्।२।</small> <small>स एतां त्रयीं विद्यामभ्रातपत् तस्वास्त प्यमानाया रसान् प्रावृहद भूरित्य ग्भ्रो भुवरिति यजुर्भाः स्वरिति सामभ्राः।"३। (छान्दीग्योपनिषत् ४।१७)</small> 'प्रजापतिने तीनो लोक उत्तप्त किये थे। उन्ही तप्यमान तीनो लोकोंसे उन्होंने तीन सार भाग बाहर निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरीक्षसे वायु और द्यलोकसे आदित्य उद्धृत किये गये। इसके बाद उन्होंने इन तीन देवताओंमें फिर ताप पहुंचाया। इन तीनो देवताओंके उत्तप्त होनेसे इनका सारांश उद्धृत किया गया। अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और आदित्यसे सामवेद उपलब्ध हुआ। प्रजापतिने इन तीन विद्याओं में फिर ताप छोड़ा। इस वेदत्रयके उत्तप्त होनेपर ऋक्से भूर्, यजुसे भुवः और सामवेदसे खर् उत्पन्न हुआ।' इस प्रकार अनुसन्धान करनेसे स्पष्ट जान पड़ता है, कि पहले ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेदको ही अध्ययन करते थे। प्रस्थानभेद-प्रणेता मधुसूदन सरस्वतीने लिखा है— <small>"स च प्रयोगवर्यण यज्ञनिर्वाहार्थम् ऋग यजुःसामवेदन भिन्नः। ××× अथर्ववेदस्तु यज्ञानुपयुक्तः शान्तिपौष्टिकाभिचारादि-कर्मप्रतिपादकत्वेन अत्यन्त विलक्षण एव।"</small> 'यज्ञादि सम्पन्न करनेके लिये वेदके, ऋक्, यजुः और साम—यह तीन प्रकारके विभाग किये गये हैं। *** अथर्ववेद यागादिकोंमें तो अनुपयुक्त है, परन्तु शान्ति, पौष्टिक और अभिचार आदिका इसमें अच्छा वर्णन किया गया है। इसलिये यह बड़ा ही अद्भुत है।' अनेक लोग अनुमान करते हैं, कि अथर्ववेद तो म्लेच्छोंका वेद है; ब्राह्मण कभी इस वेदका आदर न करते थे। किन्तु यह भ्रान्त सिद्धान्त है। वास्तविक रूपसे यह म्लेच्छोंका वेद नहीं,—यह व्रात्यवेद है अब विचारना चाहिये, कि व्रात्य कहनेसे क्या समझा जाता है। मनुने व्रात्यके सम्बन्धमें इस प्रकार अपने मतको प्रकाश किया है,— {{Block center|<poem><small>"आषोडशाद ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते। आद्वाविंशात् क्षत्रोबन्धोराचतुर्विशतेर्विशः॥ अत ऊर्द्धं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृ ताः। सावित्रीपतिता व्राल्या भवत्यार्यविगर्हिताः॥" मनु २।२८-३९।</poem></small>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8202vel6ldn38abpixgvakq9sqlrn4b 665759 665758 2026-07-07T07:29:26Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम 665759 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''२९९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude><small>अथर्वणानां चतुर्ऋचेभ्यः स्वाहा।१। पञ्चर्चेभ्यः स्वाहा।२। षड्ऋचेभ्यः स्वाहा।३। सप्तर्चेभ्यः स्वाहा।४। अष्टर्चेभ्यः स्वाहा।५। नवर्चेभ्यः स्वाहा।६। दशर्चेभ्यः स्वाहा।७। एकादशर्चेभ्यः स्वाहा।८। हादशच भ्यः स्वाहा।९। त्रयोदशर्चेभ्यः स्वाहा।१०। चतुर्द्दशर्चेभ्राः स्वाहा।११। पञ्चदशर्चेभ्राः स्वाहा।१२। षोडशर्चेभ्राः स्वाहा।१३। सप्तदशर्चेभ्राः स्वाहा।१४। अष्टादशर्चेभ्राः स्वाहा।१५। एकीन-विंशतिः स्वाहा।१६। विंशतिः स्वाहा।१७। महत्काण्डाय स्वाहा।१८। तृचेभ्रा स्वाहा।१९। एकर्चेभ्राः स्वाहा।२०। क्षुद्रभ्राः स्वाहा।२१। एकद्वृ चेभ्राः स्वाहा।२२। रोहितेभ्राः स्वाहा।२३। सूर्याभ्रां स्वाहा।२४। ब्रात्याभ्रां स्वाहा।२५। प्रजापत्याभ्रां स्वाहा।२६। विषासह्यै स्वाहा।२७। मङ्गलिकेभ्राः स्वाहा।२८। ब्रह्मणे स्वाहा।२९।</small> अथर्व वेदमें भी देखा जाता है, कि प्रथम काण्डके प्रायः सकल सूक्त चार ऋक्से, और द्वितीय काण्डके भी प्रायः सकल सूक्त पांच ऋक्से ग्रथित हैं। इसलिये अथर्व बंशीयोंके मन्त्र लेकर ही अथर्ववेद बना है। <small>(२२ सूक्त)</small> <small>आङ्गिरसानामाद्यैः पञ्चानुवाकैः स्वाहा।१। षष्ठाय स्वाहा।२। सप्तमाष्टमाभ्रां स्वाहा।३। नौलनखेभ्राः स्वाहा।४। हरितेभ्राः स्वाहा।५। क्षुद्रेभ्राः स्वाहा।६। पर्यायिकेभ्राः स्वाहा।७। प्रथमेभ्राः शङ्खेभ्राः स्वाहा।८। द्वितीवभ्राः शङ्खेभ्राः स्वाहा।९। तृतीयेभ्राः शङ्खेभ्राः स्वाहा।१०। उपोत्तमेभ्राः स्वाहा।११। उत्तमेभ्राः स्वाहा।१२। उत्तरेभ्राः स्वाहा।१३। ऋषिभ्राः स्वाहा।१४। शिखिभ्राः स्वाहा।१५। गणेभ्राः स्वाहा।१६। महागणेभ्राः स्वाहा।१७। अर्वेभ्राः अङ्गिरोभ्रो विदगणेभ्राः स्वाहा।१८। पृथक्सहस्राभ्रां स्वाहा।१९। ब्रह्मणे स्वाहा।२०।</small> पूर्व कालसे ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेद ही भक्तिपूर्वक पढ़ते रहे और वेद तीन ही प्रसिद्ध थे। इसीसे वदका दूसरा नाम त्रयी पड़ा है। मनु प्रभृति प्राचीन ग्रन्थों को अनुसन्धान कर देखनेसे ऋगादि तीन वेदोंका ही आदर अधिक जान पड़ता है,— {{Block center|<poem><small>"अग्निवायुरविभ्यस्तु वयं ब्रह्म सनातनं। दुदोह यज्ञसिद्धार्थमृग्यजुःसामलक्षणम्॥" मनु १।२३।</poem></small>}} 'यागादिकी सिद्धिके लिये उन्होंने अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और सूर्यसे सामवेद उद्धृत किया।' <small>"त्रयी वै विद्या ऋचो यजुंषि सामानि।" (शतपथ-ब्राह्मण ४।६।७।१)</small> 'ऋक्, यजुः और साम—येही तीन विद्यायें हैं।' <small>"प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् प्राबृहदग्रिं पृथिव्या वायुमन्तरीक्षादादित्यं दिवः।१। स एतास्तिस्रो देवता अभातपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबृहदग्रेर्ऋचोवायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात्।२।</small><noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>स एतां त्रयीं विद्यामभ्रातपत् तस्वास्त प्यमानाया रसान् प्रावृहद भूरित्य ग्भ्रो भुवरिति यजुर्भाः स्वरिति सामभ्राः।"३। (छान्दीग्योपनिषत् ४।१७)</small> 'प्रजापतिने तीनो लोक उत्तप्त किये थे। उन्ही तप्यमान तीनो लोकोंसे उन्होंने तीन सार भाग बाहर निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरीक्षसे वायु और द्यलोकसे आदित्य उद्धृत किये गये। इसके बाद उन्होंने इन तीन देवताओंमें फिर ताप पहुंचाया। इन तीनो देवताओंके उत्तप्त होनेसे इनका सारांश उद्धृत किया गया। अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और आदित्यसे सामवेद उपलब्ध हुआ। प्रजापतिने इन तीन विद्याओं में फिर ताप छोड़ा। इस वेदत्रयके उत्तप्त होनेपर ऋक्से भूर्, यजुसे भुवः और सामवेदसे खर् उत्पन्न हुआ।' इस प्रकार अनुसन्धान करनेसे स्पष्ट जान पड़ता है, कि पहले ब्राह्मण ऋक्, यजुः और साम वेदको ही अध्ययन करते थे। प्रस्थानभेद-प्रणेता मधुसूदन सरस्वतीने लिखा है— <small>"स च प्रयोगवर्यण यज्ञनिर्वाहार्थम् ऋग यजुःसामवेदन भिन्नः। ××× अथर्ववेदस्तु यज्ञानुपयुक्तः शान्तिपौष्टिकाभिचारादि-कर्मप्रतिपादकत्वेन अत्यन्त विलक्षण एव।"</small> 'यज्ञादि सम्पन्न करनेके लिये वेदके, ऋक्, यजुः और साम—यह तीन प्रकारके विभाग किये गये हैं। *** अथर्ववेद यागादिकोंमें तो अनुपयुक्त है, परन्तु शान्ति, पौष्टिक और अभिचार आदिका इसमें अच्छा वर्णन किया गया है। इसलिये यह बड़ा ही अद्भुत है।' अनेक लोग अनुमान करते हैं, कि अथर्ववेद तो म्लेच्छोंका वेद है; ब्राह्मण कभी इस वेदका आदर न करते थे। किन्तु यह भ्रान्त सिद्धान्त है। वास्तविक रूपसे यह म्लेच्छोंका वेद नहीं,—यह व्रात्यवेद है अब विचारना चाहिये, कि व्रात्य कहनेसे क्या समझा जाता है। मनुने व्रात्यके सम्बन्धमें इस प्रकार अपने मतको प्रकाश किया है,— {{Block center|<poem><small>"आषोडशाद ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते। आद्वाविंशात् क्षत्रोबन्धोराचतुर्विशतेर्विशः॥ अत ऊर्द्धं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृ ताः। सावित्रीपतिता व्राल्या भवत्यार्यविगर्हिताः॥" 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प्रभृति प्राचीन ग्रन्थों को अनुसन्धान कर देखनेसे ऋगादि तीन वेदोंका ही आदर अधिक जान पड़ता है,— {{Block center|<poem><small>"अग्निवायुरविभ्यस्तु वयं ब्रह्म सनातनं। दुदोह यज्ञसिद्धार्थमृग्यजुःसामलक्षणम्॥" मनु १।२३।</poem></small>}} 'यागादिकी सिद्धिके लिये उन्होंने अग्निसे ऋग्वेद, वायुसे यजुर्वेद और सूर्यसे सामवेद उद्धृत किया।' <small>"त्रयी वै विद्या ऋचो यजुंषि सामानि।" (शतपथ-ब्राह्मण ४।६।७।१)</small> 'ऋक्, यजुः और साम—येही तीन विद्यायें हैं।' <small>"प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् प्राबृहदग्रिं पृथिव्या वायुमन्तरीक्षादादित्यं दिवः।१। स एतास्तिस्रो देवता अभातपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबृहदग्रेर्ऋचोवायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात्।२।</small><noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>स एतां त्रयीं विद्यामभ्रातपत् तस्वास्त प्यमानाया रसान् प्रावृहद भूरित्य ग्भ्रो भुवरिति यजुर्भाः स्वरिति सामभ्राः।"३। (छान्दीग्योपनिषत् ४।१७)</small> 'प्रजापतिने तीनो लोक उत्तप्त किये थे। उन्ही तप्यमान तीनो लोकोंसे उन्होंने तीन सार भाग बाहर निकाले। पृथिवीसे अग्नि, अन्तरीक्षसे वायु और 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प्रत्येक नक्षत्रका परिमाण १३ अंश, २० कला है। "ऋचं साम यजामह याभ्यां कम्माणि कुर्वते । अब ऊपरके हिसाबमें सन्देह उठता है, कि जो एते सदसि राजतों यज्ञं देवेषु यच्छतः ॥ १ कृत्तिकाके पहलेसे गणनाको प्रारम्भ किया जाता ऋच साम बदनाक्ष हविरोजी बजुवलं । एष मा तस्मान्मा हिंसीत् वेदः पृष्टः शचीपते ॥ २ है, तो साढ़े तीन नक्षत्र निकलते हैं। प्रत्येक अथर्ववेद काण्ड ५४ सूक्त । नक्षत्रका परिमाण १३ अंश २० कला रहनेसे पूरण हम ऋक् और सामवेदको पूजते, जिनके द्वारा हारा साढ़े तीन नक्षत्रोमें ४३ अंश ४० कला होती लोग यज्ञकर्म सम्पन्न करते हैं। जो देवगणके निमित्त हैं। इसके बाद राशिक द्वारा गणना करनेसे यज्ञ करते, उनकी सभामें वह शोभा पाते हैं। जिन मालूम होगा, कि ७२ वर्षमें यदि अयनगति एकअंश सरकती, तो ४३ अंश और ४० कला जानेसे कितने ऋक् और सामकी बात पूछी गई, वह हवि और ओज एवं यजुः बल है। अतएव हे यज्ञपति ! इन वर्ष हुए होंगे ? इस प्रश्न उत्तरमें ३३६० वर्ष आते वेदोंसे पृष्ट होकर मेरी हिंसा न कर डालना।' इस स्थल में ऋक्, यजुः और साम शब्दका वेदके दूसरी बात यह है, कि जो कृत्तिका नक्षत्रके नामसे उल्लेख होनेके कारण स्पष्ट हो बोध होता है, अन्तसे हिसाब लगाया जाये, तो अयनांश साढ़े चार कि इन तीनों वेदोंके संकलनके पश्चात् अथर्व वेद नक्षत्र बढ़ता है। साढ़े चार नक्षत्रका परिमाण संकलित हुआ था। ६० अंश है। इसलिये ऊपरकी तरह राशिक वर्ष निकलते हैं। अतएव अथर्ववेद रोथ् और हिट्ने साहबको मुद्रित पुस्तकमें अथर्व वेदका पहला मन्त्र यह ही है,- संकलित हुए, कोई पांच हजार वर्ष बीते होंगे। "ये विषप्ता: परियन्ति विश्वा रूपाणि विक्षतः। ऊपरके ज्योतिष और त्रिकोणमितिको गणनासे वाचस्पतिवला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥" ३३८३ वर्ष हुए हैं। इस स्थल में सहज उपायको किन्तु ब्राह्मणसर्व स्व-प्रणता हलायुधने अपने ग्रन्थमें गणनासे ३३६० वर्ष निकलते हैं। इसलिये ३३ लिखा है,- वर्षका प्रभेद पड़ जाता है। फिर, कृत्तिकाके अन्तपर "अथर्व व दादिमन्वस्व दध्यङगथर्वण ऋषिरापोदेवता गायवीच्छन्दः सहज उपाय द्वारा गिननेसे ४३२० वर्ष आये हैं। शान्ति करणे विनियोगः । मन्त्रो यथा-शन्नो दैवीरभोष्टय आपी भवन्तु प्रथम उपाय हारा इसे भी गिननेसे कोई ४३५५ वर्ष पीतये । शंयोरभित्र वन्तु नः ॥" निकलेंगे। अर्थात् उनके मतानुसार इसी स्थानसे अथर्व वेदका इसका विशेष प्रमाण मिलता है, कि अथर्ववेद आरम्भ हुआ और यही उसका प्रथम मन्त्र है। रोट ऋक्, यजुः और सामवेदसे पीछे संकलित हुआ था। साहबको मुद्रित पुस्तकमें वह षष्ट सूक्त का प्रथम मन्त्र ऋग्वेदमें अगस्त्य ऋषिवाला कमि झाड़नेका मन्त्र है। तात्पर्य यह है, कि किसी किसी प्राचीन पुस्तकमें विद्यमान है। अथर्व वेदमें भो एक वैसा ही मन्त्र 'ये त्रिषप्ता' और किसी-किसौ में 'शन्नो देवीरभौष्टये इस लिखा है, मन्त्रसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ है। सायणाचार्यने - "अगस्तास्य 'ब्रह्मणा संपिनमाई कमिम् ।” (अथर्ववेद २ काण्ड, अथर्व वेदका भाष्य किया था, किन्तु इस समय वह देखने में नहीं आता। अथर्ववेद पहलेसे सातवें .६ अनुवाक, ३२ सूक्त, ३ ऋक् ।) 'मैं अगस्ता ऋषिके मन्त्र द्वारा सकल कृमि सम्पिष्ट काण्डतक सूक्तको ऋक्-संख्याके अनुसार रखा गया करता है। इसमें सन्देह नहीं, यह मन्त्र ऋग्वेदसे है; अर्थात् प्रथम काण्डके चार, द्वितीय काण्ड के लिया गया है। इसके सिवा अथर्व वेदमें ऋक्, यजुः प्रति सूक्तमें पांच-पांच, तृतीय काण्डके प्रति सूत्र में लगानेसे ४३२० ।<noinclude></noinclude> jz2ke2na2sfse1remebbie2cb1ek0hd 665764 665761 2026-07-07T08:43:53Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 665764 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०३'''}}</noinclude>' <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> दो पूर्ण नक्षत्र और एक तीसरे नक्षत्रका एक पाद मिलानेसे एक राशि बनती है। अर्थात् प्रत्येक नक्षत्रका परिमाण १३ अंश, २० कला है।अब ऊपरके हिसाबमें सन्देह उठता है, कि जोकृत्तिकाके पहलेसे गणनाको प्रारम्भ किया जाताहै, तो साढ़े तीन नक्षत्र निकलते हैं। प्रत्येक नक्षत्रका परिमाण १३ अंश २० कला रहनेसे पूरणहारा साढ़े तीन नक्षत्रोमें ४३ अंश ४० कला होतीहैं। इसके बाद राशिक द्वारा गणना करनेसेमालूम होगा, कि ७२ वर्षमें यदि अयनगति एकअंशसरकती, तो ४३ अंश और ४० कला जानेसे कितने वर्ष हुए होंगे ? इस प्रश्न उत्तरमें ३३६० वर्ष आते हैं। दूसरी बात यह है, कि जो कृत्तिका नक्षत्रकेअन्तसे हिसाब लगाया जाये, तो अयनांश साढ़े चार नक्षत्र बढ़ता है। साढ़े चार नक्षत्रका परिमाण६० अंश है। इसलिये ऊपरकी तरह राशिकलगानेसे ४३२०वर्ष निकलते हैं। अतएव अथर्ववेदसंकलित हुए, कोई पांच हजार वर्ष बीते होंगे।ऊपरके ज्योतिष और त्रिकोणमितिको गणनासे३३८३ वर्ष हुए हैं। इस स्थल में सहज उपायकोगणनासे ३३६० वर्ष निकलते हैं। इसलिये ३३वर्षका प्रभेद पड़ जाता है। फिर, कृत्तिकाके अन्तपर सहज उपाय द्वारा गिननेसे ४३२० वर्ष आये हैं। प्रथम उपाय हारा इसे भी गिननेसे कोई ४३५५ वर्ष निकलेंगे।इसका विशेष प्रमाण मिलता है, कि अथर्ववेद ऋक्, यजुः और सामवेदसे पीछे संकलित हुआ था। ऋग्वेदमें अगस्त्य ऋषिवाला कमि झाड़नेका मन्त्र विद्यमान है। अथर्व वेदमें भो एक वैसा ही मन्त्र लिखा है,"अगस्तास्य 'ब्रह्मणा संपिनमाई कमिम् ।” (अथर्ववेद २ काण्ड, ६ अनुवाक, ३२ सूक्त, ३ ऋक् ।)मैं अगस्ता ऋषिके मन्त्र द्वारा सकल कृमि सम्पिष्ट करता है। इसमें सन्देह नहीं, यह मन्त्र ऋग्वेदसे लिया गया है। इसके सिवा अथर्व वेदमें ऋक्, यजुः <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>और सामवेदका नाम मिलता है। किन्तु इन तीनों वेदों में कहीं भी अथर्ववेदकी बात नहीं उठी है- "ऋचं साम यजामह याभ्यां कम्माणि कुर्वते ।एते सदसि राजतों यज्ञं देवेषु यच्छतः ॥ १ ऋच साम बदनाक्ष हविरोजी बजुवलं ।एष मा तस्मान्मा हिंसीत् वेदः पृष्टः शचीपते ॥ २ अथर्ववेद काण्ड ५४ सूक्त । हम ऋक् और सामवेदको पूजते, जिनके द्वारा लोग यज्ञकर्म सम्पन्न करते हैं। जो देवगणके निमित्त यज्ञ करते, उनकी सभामें वह शोभा पाते हैं। जिन ऋक् और सामकी बात पूछी गई, वह हवि औ ओज एवं यजुः बल है। अतएव हे यज्ञपति ! इन वेदोंसे पृष्ट होकर मेरी हिंसा न कर डालना। इस स्थल में ऋक्, यजुः और साम शब्दका वेदके नामसे उल्लेख होनेके कारण स्पष्ट हो बोध होता है, कि इन तीनों वेदोंके संकलनके पश्चात् अथर्व वेद संकलित हुआ था। रोथ् और हिट्ने साहबको मुद्रित पुस्तकमें अथर्व वेदका पहला मन्त्र यह ही है,- "ये विषप्ता: परियन्ति विश्वा रूपाणि विक्षतः। वाचस्पतिवला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥" किन्तु ब्राह्मणसर्व स्व-प्रणता हलायुधने अपने ग्रन्थमें लिखा है,- "अथर्व व दादिमन्वस्व दध्यङगथर्वण ऋषिरापोदेवता गायवीच्छन्दः शान्ति करणे विनियोगः । मन्त्रो यथा-शन्नो दैवीरभोष्टय आपी भवन्तु पीतये । शंयोरभित्र वन्तु नः ॥" अर्थात् उनके मतानुसार इसी स्थानसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ और यही उसका प्रथम मन्त्र है। रोट साहबको मुद्रित पुस्तकमें वह षष्ट सूक्त का प्रथम मन्त्र है। तात्पर्य यह है, कि किसी किसी प्राचीन पुस्तकमें 'ये त्रिषप्ता' और किसी-किसौ में 'शन्नो देवीरभौष्टये इस मन्त्रसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ है। सायणाचार्यने अथर्व वेदका भाष्य किया था, किन्तु इस समय वह देखने में नहीं आता। अथर्ववेद पहलेसे सातवें काण्डतक सूक्तको ऋक्-संख्याके अनुसार रखा गया है; अर्थात् प्रथम काण्डके चार, द्वितीय काण्ड के प्रति सूक्तमें पांच-पांच, तृतीय काण्डके प्रति सूत्र में<noinclude></noinclude> bhni0j2q6hyixcgfc4o6qbjgn4akbvj 665765 665764 2026-07-07T08:50:49Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 665765 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>दो पूर्ण नक्षत्र और एक तीसरे नक्षत्रका एक पाद मिलानेसे एक राशि बनती है। अर्थात् प्रत्येक नक्षत्रका परिमाण १३ अंश, २० कला है।अब ऊपरके हिसाबमें सन्देह उठता है, कि जो कृत्तिकाके पहलेसे गणनाको आरम्भ किया जाता है, तो साढ़े तीन नक्षत्र निकलते हैं। प्रत्येक नक्षत्रका परिमाण १३ अंश २० कला रहनेसे पूरण द्वारा साढ़े तीन नक्षत्रोमें ४३ अंश ४० कला होती हैं। इसके बाद त्रैराशिक द्वारा गणना करनेसे मालूम होगा, कि ७२ वर्षमें यदि अयनगति एकअंश सरकती, तो ४३ अंश और ४० कला जानेसे कितने वर्ष हुए होंगे? इस प्रश्नके उत्तरमें ३३६० वर्ष आते हैं। दूसरी बात यह है, कि जो कृत्तिका नक्षत्रके अन्तसे हिसाब लगाया जाये, तो अयनांश साढ़े चार नक्षत्र बढ़ता है। साढ़े चार नक्षत्रका परिमाण ६० अंश है। इसलिये ऊपरकी तरह त्रैराशिक लगानेसे ४३२० वर्ष निकलते हैं। अतएव अथर्ववेद संकलित हुए, कोई पांच हजार वर्ष बीते होंगे। ऊपरके ज्योतिष और त्रिकोणमितिकी गणनासे ३३९३ वर्ष हुए हैं। इस स्थल में सहज उपायकी गणनासे ३३६० वर्ष निकलते हैं। इसलिये ३३ वर्षका प्रभेद पड़ जाता है। फिर, कृत्तिकाके अन्तपर सहज उपाय द्वारा गिननेसे ४३२० वर्ष आये हैं। प्रथम उपाय द्वारा इसे भी गिननेसे कोई ४३५५ वर्ष निकलेंगे। इसका विशेष प्रमाण मिलता है, कि अथर्ववेद ऋक्, यजुः और सामवेदसे पीछे संकलित हुआ था। ऋग्वेदमें अगस्त्य ऋषिवाला कृमि झाड़नेका मन्त्र विद्यमान है। अथर्व वेदमें भो एक वैसा ही मन्त्र लिखा है,— <small>"अगस्तास्य ब्रह्मणा संपिनष्माहं कृमिम्।" (अथर्ववेद २ काण्ड, ६ अनुवाक, ३२ सूक्त, ३ ऋक् ।)मैं अगस्ता ऋषिके मन्त्र द्वारा सकल कृमि सम्पिष्ट करता है। इसमें सन्देह नहीं, यह मन्त्र ऋग्वेदसे लिया गया है। इसके सिवा अथर्व वेदमें ऋक्, यजुः <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>और सामवेदका नाम मिलता है। किन्तु इन तीनों वेदों में कहीं भी अथर्ववेदकी बात नहीं उठी है- "ऋचं साम यजामह याभ्यां कम्माणि कुर्वते ।एते सदसि राजतों यज्ञं देवेषु यच्छतः ॥ १ ऋच साम बदनाक्ष हविरोजी बजुवलं ।एष मा तस्मान्मा हिंसीत् वेदः पृष्टः शचीपते ॥ २ अथर्ववेद काण्ड ५४ सूक्त । हम ऋक् और सामवेदको पूजते, जिनके द्वारा लोग यज्ञकर्म सम्पन्न करते हैं। जो देवगणके निमित्त यज्ञ करते, उनकी सभामें वह शोभा पाते हैं। जिन ऋक् और सामकी बात पूछी गई, वह हवि औ ओज एवं यजुः बल है। अतएव हे यज्ञपति ! इन वेदोंसे पृष्ट होकर मेरी हिंसा न कर डालना। इस स्थल में ऋक्, यजुः और साम शब्दका वेदके नामसे उल्लेख होनेके कारण स्पष्ट हो बोध होता है, कि इन तीनों वेदोंके संकलनके पश्चात् अथर्व वेद संकलित हुआ था। रोथ् और हिट्ने साहबको मुद्रित पुस्तकमें अथर्व वेदका पहला मन्त्र यह ही है,- "ये विषप्ता: परियन्ति विश्वा रूपाणि विक्षतः। वाचस्पतिवला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥" किन्तु ब्राह्मणसर्व स्व-प्रणता हलायुधने अपने ग्रन्थमें लिखा है,- "अथर्व व दादिमन्वस्व दध्यङगथर्वण ऋषिरापोदेवता गायवीच्छन्दः शान्ति करणे विनियोगः । मन्त्रो यथा-शन्नो दैवीरभोष्टय आपी भवन्तु पीतये । शंयोरभित्र वन्तु नः ॥" अर्थात् उनके मतानुसार इसी स्थानसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ और यही उसका प्रथम मन्त्र है। रोट साहबको मुद्रित पुस्तकमें वह षष्ट सूक्त का प्रथम मन्त्र है। तात्पर्य यह है, कि किसी किसी प्राचीन पुस्तकमें 'ये त्रिषप्ता' और किसी-किसौ में 'शन्नो देवीरभौष्टये इस मन्त्रसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ है। सायणाचार्यने अथर्व वेदका भाष्य किया था, किन्तु इस समय वह देखने में नहीं आता। अथर्ववेद पहलेसे सातवें काण्डतक सूक्तको ऋक्-संख्याके अनुसार रखा गया है; अर्थात् प्रथम काण्डके चार, द्वितीय काण्ड के प्रति सूक्तमें पांच-पांच, तृतीय काण्डके प्रति सूत्र में<noinclude></noinclude> 6sno0cuvgus5ocudiujfavp1ovfflvb 665772 665765 2026-07-07T09:49:38Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 665772 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid 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वर्ष आये हैं। प्रथम उपाय द्वारा इसे भी गिननेसे कोई ४३५५ वर्ष निकलेंगे। इसका विशेष प्रमाण मिलता है, कि अथर्ववेद ऋक्, यजुः और सामवेदसे पीछे संकलित हुआ था। ऋग्वेदमें अगस्त्य ऋषिवाला कृमि झाड़नेका मन्त्र विद्यमान है। अथर्व वेदमें भो एक वैसा ही मन्त्र लिखा है,— <small>"अगस्तास्य ब्रह्मणा संपिनष्माहं कृमिम्।" (अथर्ववेद २ काण्ड, ६ अनुवाक, ३२ सूक्त, ३ ऋक्।)</small> मैं अगस्ता ऋषिके मन्त्र द्वारा सकल कृमि सम्पिष्ट करता हूँ।' इसमें सन्देह नहीं, यह मन्त्र ऋग्वेदसे लिया गया है। इसके सिवा अथर्व वेदमें ऋक्, यजुः <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>और सामवेदका नाम मिलता है। किन्तु इन तीनों वेदों में कहीं भी अथर्ववेदकी बात नहीं उठी है— {{Block center|<poem><small>"ऋचं साम यजामहे याभ्यां कर्म्माणि कुर्व्वते। एते सदसि राजतों यज्ञं देवेषु यच्छतः॥ १ ऋचं साम यदप्राक्षं हविरोजी यजुर्वलं। एष भा तस्मान्मा हिंसीत् वेदः पृष्टः शचीपते॥" २</small></poem>}} {{Left|<small>अथर्ववेद ७ काण्ड ५४ सूक्त।</small>}} 'हम ऋक् और सामवेदको पूजते, जिनके द्वारा लोग यज्ञकर्म्म सम्पन्न करते हैं। जो देवगणके निमित्त यज्ञ करते, उनकी सभामें वह शोभा पाते हैं। जिन ऋक् और सामकी बात पूछी गई, वह हवि औ ओज एवं यजुः बल है। अतएव हे यज्ञपति! इन वेदोंसे पृष्ट होकर मेरी हिंसा न कर डालना।' इस स्थल में ऋक्, यजुः और साम शब्दका वेदके नामसे उल्लेख होनेके कारण स्पष्ट ही बोध होता है, कि इन तीनों वेदोंके संकलनके पश्चात् अथर्व वेद संकलित हुआ था। रोथ् और ह्विट्ने साहबकी मुद्रित पुस्तकमें अथर्व वेदका पहला मन्त्र यह ही है,— {{Block center|<poem><small>"ये विषप्ता: परियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः। वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे॥" १</small></poem>}} किन्तु ब्राह्मणसर्वस्व-प्रणता हलायुधने अपने ग्रन्थमें लिखा है,— <small>"अथर्व वे दादिमन्त्रस्य दध्यङगथर्वण ऋषिरापोदेवता गायत्रीच्छन्दः शान्ति करणे विनियोगः। मन्त्रो यथा—शन्नो देवीरभोष्टय आपी भवन्तु पीतये। शंयोरभित्रवन्तु नः॥"</small> अर्थात् उनके मतानुसार इसी स्थानसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ और यही उसका प्रथम मन्त्र है। रोथ् साहबकी मुद्रित पुस्तकमें वह षष्ट सूक्त का प्रथम मन्त्र है। तात्पर्य यह है, कि किसी किसी प्राचीन पुस्तकमें 'ये त्रिषप्ता' और किसी-किसी में 'शन्नो देवीरभीष्टये इस मन्त्रसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ है। सायणाचार्यने अथर्व वेदका भाष्य किया था, किन्तु इस समय वह देखने में नहीं आता। अथर्ववेद पहलेसे सातवें काण्डतक सूक्तकी ऋक्-संख्याके अनुसार रखा गया है; अर्थात् प्रथम काण्डके चार, द्वितीय काण्ड के प्रति सूक्तमें पांच-पांच, तृतीय काण्डके प्रति सूक्त में<noinclude></noinclude> p1nl3eof86kod4qttv6xgw5zs9a4n0c 665773 665772 2026-07-07T09:51:25Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 665773 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>दो पूर्ण नक्षत्र और एक तीसरे नक्षत्रका एक पाद मिलानेसे एक राशि बनती है। अर्थात् प्रत्येक नक्षत्रका परिमाण १३ अंश, २० कला है।अब ऊपरके हिसाबमें सन्देह उठता है, कि जो कृत्तिकाके पहलेसे गणनाको आरम्भ किया जाता है, तो साढ़े तीन नक्षत्र निकलते हैं। प्रत्येक नक्षत्रका परिमाण १३ अंश २० कला रहनेसे पूरण द्वारा साढ़े तीन नक्षत्रोमें ४३ अंश ४० कला होती हैं। इसके बाद त्रैराशिक द्वारा गणना करनेसे मालूम होगा, कि ७२ वर्षमें यदि अयनगति एकअंश सरकती, तो ४३ अंश और ४० कला जानेसे कितने वर्ष हुए होंगे? इस प्रश्नके उत्तरमें ३३६० वर्ष आते हैं। दूसरी बात यह है, कि जो कृत्तिका नक्षत्रके अन्तसे हिसाब लगाया जाये, तो अयनांश साढ़े चार नक्षत्र बढ़ता है। साढ़े चार नक्षत्रका परिमाण ६० अंश है। इसलिये ऊपरकी तरह त्रैराशिक लगानेसे ४३२० वर्ष निकलते हैं। अतएव अथर्ववेद संकलित हुए, कोई पांच हजार वर्ष बीते होंगे। ऊपरके ज्योतिष और त्रिकोणमितिकी गणनासे ३३९३ वर्ष हुए हैं। इस स्थल में सहज उपायकी गणनासे ३३६० वर्ष निकलते हैं। इसलिये ३३ वर्षका प्रभेद पड़ जाता है। फिर, कृत्तिकाके अन्तपर सहज उपाय द्वारा गिननेसे ४३२० वर्ष आये हैं। प्रथम उपाय द्वारा इसे भी गिननेसे कोई ४३५५ वर्ष निकलेंगे। इसका विशेष प्रमाण मिलता है, कि अथर्ववेद ऋक्, यजुः और सामवेदसे पीछे संकलित हुआ था। ऋग्वेदमें अगस्त्य ऋषिवाला कृमि झाड़नेका मन्त्र विद्यमान है। अथर्व वेदमें भो एक वैसा ही मन्त्र लिखा है,— <small>"अगस्तास्य ब्रह्मणा संपिनष्माहं कृमिम्।" (अथर्ववेद २ काण्ड, ६ अनुवाक, ३२ सूक्त, ३ ऋक्।)</small> मैं अगस्ता ऋषिके मन्त्र द्वारा सकल कृमि सम्पिष्ट करता हूँ।' इसमें सन्देह नहीं, यह मन्त्र ऋग्वेदसे लिया गया है। इसके सिवा अथर्व वेदमें ऋक्, यजुः <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>और सामवेदका नाम मिलता है। किन्तु इन तीनों वेदों में कहीं भी अथर्ववेदकी बात नहीं उठी है— {{Block center|<poem><small>"ऋचं साम यजामहे याभ्यां कर्म्माणि कुर्व्वते। एते सदसि राजतों यज्ञं देवेषु यच्छतः॥ १ ऋचं साम यदप्राक्षं हविरोजी यजुर्वलं। एष भा तस्मान्मा हिंसीत् वेदः पृष्टः शचीपते॥" २</small></poem>}} {{Left|<small>अथर्ववेद ७ काण्ड ५४ सूक्त।</small>}} 'हम ऋक् और सामवेदको पूजते, जिनके द्वारा लोग यज्ञकर्म्म सम्पन्न करते हैं। जो देवगणके निमित्त यज्ञ करते, उनकी सभामें वह शोभा पाते हैं। जिन ऋक् और सामकी बात पूछी गई, वह हवि औ ओज एवं यजुः बल है। अतएव हे यज्ञपति! इन वेदोंसे पृष्ट होकर मेरी हिंसा न कर डालना।' इस स्थल में ऋक्, यजुः और साम शब्दका वेदके नामसे उल्लेख होनेके कारण स्पष्ट ही बोध होता है, कि इन तीनों वेदोंके संकलनके पश्चात् अथर्व वेद संकलित हुआ था। रोथ् और ह्विट्ने साहबकी मुद्रित पुस्तकमें अथर्व वेदका पहला मन्त्र यह ही है,— {{Block center|<poem><small>"ये विषप्ता: परियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः। वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे॥" १</small></poem>}} किन्तु ब्राह्मणसर्वस्व-प्रणता हलायुधने अपने ग्रन्थमें लिखा है,— <small>"अथर्व वे दादिमन्त्रस्य दध्यङगथर्वण ऋषिरापोदेवता गायत्रीच्छन्दः शान्ति करणे विनियोगः। मन्त्रो यथा—शन्नो देवीरभोष्टय आपी भवन्तु पीतये। शंयोरभित्रवन्तु नः॥"</small> अर्थात् उनके मतानुसार इसी स्थानसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ और यही उसका प्रथम मन्त्र है। रोथ् साहबकी मुद्रित पुस्तकमें वह षष्ट सूक्त का प्रथम मन्त्र है। तात्पर्य यह है, कि किसी किसी प्राचीन पुस्तकमें 'ये त्रिषप्ता' और किसी-किसी में 'शन्नो देवीरभीष्टये इस मन्त्रसे अथर्व वेदका आरम्भ हुआ है। सायणाचार्यने अथर्व वेदका भाष्य किया था, किन्तु इस समय वह देखने में नहीं आता। अथर्ववेद पहलेसे सातवें काण्डतक सूक्तकी ऋक्-संख्याके अनुसार रखा गया है; अर्थात् प्रथम काण्डके चार, द्वितीय काण्ड के प्रति सूक्तमें पांच-पांच, तृतीय काण्डके प्रति सूक्त में<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 6lgr9clk1pbw9navykvvmzsw0fh8rhz पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३११ 250 83599 665775 347012 2026-07-07T10:18:33Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 665775 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३०४'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude> छः छः, चतुर्थ काण्डके प्रति सूक्त में सात-सात और पञ्चम काण्डके प्रति सूक्तमें आठसे लेकर अट्ठारह-तक ऋक् वर्त्तमान हैं। छठे काण्ड के प्रति सूक्त में तीन-तीन ऋक् हैं और सप्तम काण्डके प्रति सूक्तमें एक ही एक ऋक् मिलता है। अष्टम काण्डसे अष्टादश काण्ड पयन्त अनेक बड़-बड़े सूक्त हैं। त्रयोदश काण्डमें रोहित नामक देवताका विवरण दिया गया है। कदाचित् वही सबके सृष्टिकर्त्ता होंगे। उनकी पत्नीका नाम रोहिणी थाः चतुर्दश काण्डमें विवाहकी कथा है। पञ्चदश काण्डमें व्रात्यका बृत्तान्त कहा गया है। षोड़श और सप्तदश काण्डमें विविध विषय संकलित हुआ है। विंश काण्डके अधिकांश स्थलमें इन्द्रदेवकी स्तुति देख पड़ती है। यह स्तुति प्रायः समस्त ऋग्वेदके प्रथम मण्डलसे उद्धृत की गई है। अथर्व वेदका कमसेकम छठवां भाग ऋग्-वेदक मन्त्रोंसे बनाया गया है, जो प्रथम और दशम मण्डलके ही अधिक हैं। अथर्व वेदमें भी पुरुषसूक्त है, किन्तु ऋग्वेदके पुरुषसूक्तसे इसमें पाठका अनेक प्रभेद देख पड़ता है। <small>युरोपीय पण्डितोंका मत,—कोलब्रुक साहब कहते हैं, कि अथर्ववेद-संहितामें २० काण्ड विद्यमान हैं। यह काण्ड अनुवाक्, सूक्त और ऋक्—इन तीन भागोंमें विभक्त हैं। अनुवाक्की एक शतसे और सूक्तकी संख्या साढ़े सात शतसे अधिक है, मन्त्र केवल ६०१५ मिलते हैं। इसमें प्राय ४० प्रपाठक पाये जाते हैं।<ref>Asiatic Researches, Vol. VIII.</ref> शास्त्रदर्शी विलसनके मतसे 'अथर्व' वेदमें गण्य नहीं, वरं यह वेदका क्रोड़पत्रस्वरूप है।<ref>Wilson's Rigveda, Introduction, p. viii.</ref> किन्तु उपनिषदोंको छोड़ अथर्ववेदमें ही लिखा हैं, कि यह चतुर्थ वेद है,— {{Block center|<poem><small>"यस्माट्टको अपातक्षन्ययजुर्यस्मादपाकषन्। सामानि यस्यो लोमान्यधर्वाङ्गिरसो मुखम्। स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः खिदेव सः॥ अथर्व १०।७।२०।</poem></poem>}} 'जिससे लोगोंने ऋक् मन्त्र पृथक् कर लिये हैं, तथा यजुः खींचा है, साम जिसका लोम और {{Rule}} अथर्वाङ्गिरस जिसका मुख है वह स्कम्भ कौन है? यह बात आप हमसे कहिये।' युरोपीय पण्डितोंके मतसे अथर्व वेदका कोई-कोई अंश अतिप्राचीन और कोई-कोई अंश आधुनिक है, जो ऋग्वेदके दशम मण्डल बनने के बाद रचा गया था।<ref>Mr. Whitney's Papers on the Journal of the American Oriental Society, Vol. iii. p. 305ff; iv, p. 155ff ; Max Müller's Anc. Sans. Lit. p. 38, 446ff.</ref> अथर्ववेदका कोई-कोई अंश प्राचीन ऋग्वेदसे मिलता है सही, किन्तु दोनोंका प्राकृतिक भाव विचारकर देखनेसे सम्पूर्ण विभिन्न मालूम देता है। ऋग्वेदके ऋषि प्रकृतिके सौन्दर्यसे विमोहित हैं, किन्तु अथर्ववेदके ऋषि उपदेवोंके भय और उनके भौतिक प्रतापसे अतिशय चिन्तान्वित हैं। उक्त वैलक्षण्य रहते भी यह प्रमाणित हुआ, कि अथर्व-वेदका कोई-कोई अंश अतिप्राचीन है।<ref>Indische Studien, p. 295 : Zwei Vedische Texte iiber Omina und Portenta, p. 345—348.</ref> सुप्रसिद्ध ह्वेटने साहबका कहना है,—'अथर्ववेद ऋग्वेदकी तरह ऐतिहासिक है, किन्तु याज्ञ नहीं। पहले यह वेद अष्टादश काण्डोंमें विभक्त था। इसका षष्ठांश भी छन्दमें न लिखा गया था। अवशिष्ट छन्द अर्थात् एकषष्ठांश ऋक्सूक्त, विशेषतः ऋग्वेदके दशम मण्डलमें देखा जाता है। बाकी सभी अथर्ववेदका अपना अंश है।' ह्वेटने साहबने ऐसे ही प्रमाणित किया है, कि ऋक्संग्रहकालमें अथर्ववेदका अपना अंश विद्यमान न था। अध्यापक केरण (Kern) साहबने अपने भारतवर्षीय श्रेणीविभागप्रणाली नामक ग्रन्थमें लिखा है,—अथर्ववेदका प्रायः अर्द्धांंश ऋग्वेदसे मिलता है, इसलिये अथर्ववेद भी ऋग्वेदकी तरह प्राचीन हो सकता है। केवल अथर्ववेदका अवशिष्ट अंश भाषा, मन्त्र और वर्णनापद्धतिके अनुसार ऋग्वेदकी अपेक्षा अप्राचीन भी माना जा सकता है। ऋग्वदमें वह्लिक शब्दका कोई उल्लेख नहीं, किन्तु इस वेदके स्थान-स्थानमें यह शब्द उल्लिखित हुआ है। <small>अथर्ववेद ५।२२। ५, ७, ९ देखो।</small> {{Rule}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> sc0goyna5vuu1gsi4ew6kfvuvnxb97m 665776 665775 2026-07-07T10:19:21Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 665776 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३०४'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude> छः छः, चतुर्थ काण्डके प्रति सूक्त में सात-सात और पञ्चम काण्डके प्रति सूक्तमें आठसे लेकर अट्ठारह-तक ऋक् वर्त्तमान हैं। छठे काण्ड के प्रति सूक्त में तीन-तीन ऋक् हैं और सप्तम काण्डके प्रति सूक्तमें एक ही एक ऋक् मिलता है। अष्टम काण्डसे अष्टादश काण्ड पयन्त अनेक बड़-बड़े सूक्त हैं। त्रयोदश काण्डमें रोहित नामक देवताका विवरण दिया गया है। कदाचित् वही सबके सृष्टिकर्त्ता होंगे। उनकी पत्नीका नाम रोहिणी थाः चतुर्दश काण्डमें विवाहकी कथा है। पञ्चदश काण्डमें व्रात्यका बृत्तान्त कहा गया है। षोड़श और सप्तदश काण्डमें विविध विषय संकलित हुआ है। विंश काण्डके अधिकांश स्थलमें इन्द्रदेवकी स्तुति देख पड़ती है। यह स्तुति प्रायः समस्त ऋग्वेदके प्रथम मण्डलसे उद्धृत की गई है। अथर्व वेदका कमसेकम छठवां भाग ऋग्-वेदक मन्त्रोंसे बनाया गया है, जो प्रथम और दशम मण्डलके ही अधिक हैं। अथर्व वेदमें भी पुरुषसूक्त है, किन्तु ऋग्वेदके पुरुषसूक्तसे इसमें पाठका अनेक प्रभेद देख पड़ता है। <small>युरोपीय पण्डितोंका मत,—कोलब्रुक साहब कहते हैं, कि अथर्ववेद-संहितामें २० काण्ड विद्यमान हैं। यह काण्ड अनुवाक्, सूक्त और ऋक्—इन तीन भागोंमें विभक्त हैं। अनुवाक्की एक शतसे और सूक्तकी संख्या साढ़े सात शतसे अधिक है, मन्त्र केवल ६०१५ मिलते हैं। इसमें प्राय ४० प्रपाठक पाये जाते हैं।<ref>Asiatic Researches, Vol. VIII.</ref> शास्त्रदर्शी विलसनके मतसे 'अथर्व' वेदमें गण्य नहीं, वरं यह वेदका क्रोड़पत्रस्वरूप है।<ref>Wilson's Rigveda, Introduction, p. viii.</ref> किन्तु उपनिषदोंको छोड़ अथर्ववेदमें ही लिखा हैं, कि यह चतुर्थ वेद है,— {{Block center|<poem><small>"यस्माट्टको अपातक्षन्ययजुर्यस्मादपाकषन्। सामानि यस्यो लोमान्यधर्वाङ्गिरसो मुखम्। स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः खिदेव सः॥ अथर्व १०।७।२०।</poem></poem>}} 'जिससे लोगोंने ऋक् मन्त्र पृथक् कर लिये हैं, तथा यजुः खींचा है, साम जिसका लोम और {{Rule}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>'अथर्वाङ्गिरस जिसका मुख है वह स्कम्भ कौन है? यह बात आप हमसे कहिये।' युरोपीय पण्डितोंके मतसे अथर्व वेदका कोई-कोई अंश अतिप्राचीन और कोई-कोई अंश आधुनिक है, जो ऋग्वेदके दशम मण्डल बनने के बाद रचा गया था।<ref>Mr. Whitney's Papers on the Journal of the American Oriental Society, Vol. iii. p. 305ff; iv, p. 155ff ; Max Müller's Anc. Sans. Lit. p. 38, 446ff.</ref> अथर्ववेदका कोई-कोई अंश प्राचीन ऋग्वेदसे मिलता है सही, किन्तु दोनोंका प्राकृतिक भाव विचारकर देखनेसे सम्पूर्ण विभिन्न मालूम देता है। ऋग्वेदके ऋषि प्रकृतिके सौन्दर्यसे विमोहित हैं, किन्तु अथर्ववेदके ऋषि उपदेवोंके भय और उनके भौतिक प्रतापसे अतिशय चिन्तान्वित हैं। उक्त वैलक्षण्य रहते भी यह प्रमाणित हुआ, कि अथर्व-वेदका कोई-कोई अंश अतिप्राचीन है।<ref>Indische Studien, p. 295 : Zwei Vedische Texte iiber Omina und Portenta, p. 345—348.</ref> सुप्रसिद्ध ह्वेटने साहबका कहना है,—'अथर्ववेद ऋग्वेदकी तरह ऐतिहासिक है, किन्तु याज्ञ नहीं। पहले यह वेद अष्टादश काण्डोंमें विभक्त था। इसका षष्ठांश भी छन्दमें न लिखा गया था। अवशिष्ट छन्द अर्थात् एकषष्ठांश ऋक्सूक्त, विशेषतः ऋग्वेदके दशम मण्डलमें देखा जाता है। बाकी सभी अथर्ववेदका अपना अंश है।' ह्वेटने साहबने ऐसे ही प्रमाणित किया है, कि ऋक्संग्रहकालमें अथर्ववेदका अपना अंश विद्यमान न था। अध्यापक केरण (Kern) साहबने अपने भारतवर्षीय श्रेणीविभागप्रणाली नामक ग्रन्थमें लिखा है,—अथर्ववेदका प्रायः अर्द्धांंश ऋग्वेदसे मिलता है, इसलिये अथर्ववेद भी ऋग्वेदकी तरह प्राचीन हो सकता है। केवल अथर्ववेदका अवशिष्ट अंश भाषा, मन्त्र और वर्णनापद्धतिके अनुसार ऋग्वेदकी अपेक्षा अप्राचीन भी माना जा सकता है। ऋग्वदमें वह्लिक शब्दका कोई उल्लेख नहीं, किन्तु इस वेदके स्थान-स्थानमें यह शब्द उल्लिखित हुआ है। <small>अथर्ववेद ५।२२। ५, ७, ९ देखो।</small> {{Rule}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> nuejuxi4ga0zgmp7t4e5p92elh3bdb8 665777 665776 2026-07-07T10:20:15Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 665777 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३०४'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>छः छः, चतुर्थ काण्डके प्रति सूक्त में सात-सात और पञ्चम काण्डके प्रति सूक्तमें आठसे लेकर अट्ठारह-तक ऋक् वर्त्तमान हैं। छठे काण्ड के प्रति सूक्त में तीन-तीन ऋक् हैं और सप्तम काण्डके प्रति सूक्तमें एक ही एक ऋक् मिलता है। अष्टम काण्डसे अष्टादश काण्ड पयन्त अनेक बड़-बड़े सूक्त हैं। त्रयोदश काण्डमें रोहित नामक देवताका विवरण दिया गया है। कदाचित् वही सबके सृष्टिकर्त्ता होंगे। उनकी पत्नीका नाम रोहिणी थाः चतुर्दश काण्डमें विवाहकी कथा है। पञ्चदश काण्डमें व्रात्यका बृत्तान्त कहा गया है। षोड़श और सप्तदश काण्डमें विविध विषय संकलित हुआ है। विंश काण्डके अधिकांश स्थलमें इन्द्रदेवकी स्तुति देख पड़ती है। यह स्तुति प्रायः समस्त ऋग्वेदके प्रथम मण्डलसे उद्धृत की गई है। अथर्व वेदका कमसेकम छठवां भाग ऋग्-वेदक मन्त्रोंसे बनाया गया है, जो प्रथम और दशम मण्डलके ही अधिक हैं। अथर्व वेदमें भी पुरुषसूक्त है, किन्तु ऋग्वेदके पुरुषसूक्तसे इसमें पाठका अनेक प्रभेद देख पड़ता है। <small>युरोपीय पण्डितोंका मत,—कोलब्रुक साहब कहते हैं, कि अथर्ववेद-संहितामें २० काण्ड विद्यमान हैं। यह काण्ड अनुवाक्, सूक्त और ऋक्—इन तीन भागोंमें विभक्त हैं। अनुवाक्की एक शतसे और सूक्तकी संख्या साढ़े सात शतसे अधिक है, मन्त्र केवल ६०१५ मिलते हैं। इसमें प्राय ४० प्रपाठक पाये जाते हैं।<ref>Asiatic Researches, Vol. VIII.</ref> शास्त्रदर्शी विलसनके मतसे 'अथर्व' वेदमें गण्य नहीं, वरं यह वेदका क्रोड़पत्रस्वरूप है।<ref>Wilson's Rigveda, Introduction, p. viii.</ref> किन्तु उपनिषदोंको छोड़ अथर्ववेदमें ही लिखा हैं, कि यह चतुर्थ वेद है,— {{Block center|<poem><small>"यस्माट्टको अपातक्षन्ययजुर्यस्मादपाकषन्। सामानि यस्यो लोमान्यधर्वाङ्गिरसो मुखम्। स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः खिदेव सः॥ अथर्व १०।७।२०।</poem></poem>}} 'जिससे लोगोंने ऋक् मन्त्र पृथक् कर लिये हैं, तथा यजुः खींचा है, साम जिसका लोम और {{Rule}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>'अथर्वाङ्गिरस जिसका मुख है वह स्कम्भ कौन है? यह बात आप हमसे कहिये।' युरोपीय पण्डितोंके मतसे अथर्व वेदका कोई-कोई अंश अतिप्राचीन और कोई-कोई अंश आधुनिक है, जो ऋग्वेदके दशम मण्डल बनने के बाद रचा गया था।<ref>Mr. Whitney's Papers on the Journal of the American Oriental Society, Vol. iii. p. 305ff; iv, p. 155ff ; Max Müller's Anc. 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(ममी.) कापाच-कोष् । कापोट. (पु.- Copper plate.). ताम्रपर २ पटकपासी, कौवारोटी। 2 तांबेको चहर। यह मुद्रणे यथासयमें काम पाता है। इस पर प्रक्षर खोदे जाते है। अक्षरों पर स्वाहो सगा पोंछ डालनेसे खुदें अधरोंके सिवा दूसरा स्थान स्वच्छ निकल पाता है। इसी प्रकार कापरनेट प्रेसपर चढ़ा काग़ज़ छापा जाता है। चिन आदि छापनेको तेनाबसे काम लेते हैं। जिस प्रेसमें कापर- प्लेट छपता है, उसका नाम 'कापरलेट प्रेस पड़ता है। कापा (वै० स्त्री०) कं सुखं प्राप्यते अनया, क-आप- धन-टाप। बन्दियोका प्रात:काचीन स्तुतिपाठ । 'प्रातः प्रबोधकस्य बन्दिनोवायी गया।' (भाष्य) "प्राननीधे जरणेव कापया।" (ऋक् १०४०१३)<noinclude></noinclude> rd60hj0tjlsulh5sthnfo8xd7xah4jf 665749 665748 2026-07-07T05:52:47Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665749 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कान्हर-कापाली| ३६१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} ‘कान्हर (जि. पु.) १ श्रीक्षण। २ कोहको एक सकड़ी। यह कातरके छोरपर लगता और टेढ़ा मेंदा रहता है। इसके दोनों प्रान्त निकल पड़ते हैं। कान्हर कोल्हकी कमरके पास चारों ओर घूमा करता है। कान्हरा-बानड़ा देखो। । काप-बङ्गालके वरिन्द्र ब्राधणोंकी एक कुस। श्रेयौ। ‘कापटव ( सं• पु० ) कापटोर्गोवापत्यम्, कापटू- भण्। कापट ऋषिके वंशीय । ( क्लो. ) कुमितः पटुः तस्य भावः, कापटु भावे पण ।२ निंदित पाटुता, बुरी चालाकी। कापटवक, बापटर देखो। -कापटिक (सं.पु. कपटेन चरति, कपट-ठक । १ छात्र, विद्यार्थी। अन्यका ममंञ, दूसरेका भेद जाननेवाला। ३ प्रतारक, धोकेवाज। कापव्य (सं० लो०) कपटस्य भावः कार्यम्बा, कपट 'यज । १ कपटता, चालाकी। २ प्रतारणा, धोकेका कम। कापड़ी (हि.पु.) जातिविशेष, एक कोम। गुजरातमें ६ पत्रविशेष; एक हथियार। .७ सन्धिभेद, एक कपड़े बेचनेवालों को कापड़ी कहते हैं। कापथ (स'० पु.ली. ) कुन्मितः पन्थाः, कु पथिन्-अच् कीः कादेयः। बापथ्यचयोः । पा ६।३।१०४॥ १ कुक्षित पथ, ख़राब राह। इसका संस्कृत पर्याय-व्यध्व, दुरध्ध, विपथ, कदवा, कुपथ, असत्- पथ पौर कुत्सितवम है। २ उशीर, खस । ३ एक दानव। कापर (हि.पु.) वस्त्र, कपड़ा। कापरगादि-बङ्गात प्रान्तके सिंहभूम जिलेकी एक गिरिमाला। उसका शृङ्ग समुद्रपृष्ठसे १३० फीट ऊंचा है। वह गिरिमाला दक्षिणपूर्वाभिमुख चल , मयूरमालको उत्तर सीमाके मेधाशनि पर्वतसे जा 'मिली है। उसके इतर पत्थर में नांवा निकलता है। कुछ साहब बोम वहां तांबा तैयार करते थे। किन्तु अधिक व्यय सानेसे १८८ ई. को उन्होंने या कार्य छोड़ दिया। कापोट. (पु.- Copper plate.). ताम्रपर <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> तांबेको चहर। यह मुद्रणे यथासयमें काम पाता है। इस पर प्रक्षर खोदे जाते है। अक्षरों पर स्वाहो सगा पोंछ डालनेसे खुदें अधरोंके सिवा दूसरा स्थान स्वच्छ निकल पाता है। इसी प्रकार कापरनेट प्रेसपर चढ़ा काग़ज़ छापा जाता है। चिन आदि छापनेको तेनाबसे काम लेते हैं। जिस प्रेसमें कापर- प्लेट छपता है, उसका नाम 'कापरलेट प्रेस पड़ता है। कापा (वै० स्त्री०) कं सुखं प्राप्यते अनया, क-आप- धन-टाप। बन्दियोका प्रात:काचीन स्तुतिपाठ । 'प्रातः प्रबोधकस्य बन्दिनोवायी गया।' (भाष्य) "प्राननीधे जरणेव कापया।" (ऋक् १०४०१३) कापाटिक (. ली.) कपाटिक एव, कपाटिक स्वाथै अण। क्षुद्र कपाट, छोटा किवाड़ा। कापाल (सं• पु०-क्लो०) कपातमेव, कपास स्वार्थे पण। १ अष्टादश कुष्ठान्तर्गत वातिककुष्ठ, एक कोढ़। (कपाल देखो।) २ करण्ट करता, बायबिडंग। ३ कपालका अस्थि, खोपड़ीको इडो। ४ कर्कटीभेद, कामा एक ककड़ी। ५ किसौ शव सम्प्रदायका अनु गायो। सुनह। इसमें विपक्षो तुल्य स्खल मानते हैं। (वि.) ८ कपाल-सम्बन्धीय, सरके मुतालिक । कापाला- (सं० स्त्रो.) रणविसन्धिका, लाल फूलों का एक पेड़। {{Multicol|line=1px solid black}} (स' पु०-स्त्री.) अहिंसा, कौवाटोटौ। कापालिक (पु.) कपालेन नरकपालेन चरति, कपाल-ठक। १ जातिविशेष, एक कोम। वह वङ्गदेशमें मिलती है। २ वामाचारी, एक तान्त्रिक साधु। वह वमतावलम्बी होते हैं। मांस खाना और मद्य पौना उन्हें अनुचित नहीं मालूम पड़ता! कापालिक अपने हाथमें मनुष्य का कपा रखते और मेरक वा शक्तिको पति अर्पण करते हैं। ३ कुष्ठरोग विशेष, एक तरहका कोढ़। कपालकृष्ठ देखो। कापालिका (म. स्त्री०) वापविशेष, एक बाजा । पर यह मुखझे बजायी जाती थी।.. कापासी . (ममी.) कापाच-कोष् । २ पटकपासी, कौवारोटी।<noinclude></noinclude> fk0lwdtqqhvl24gat66pisd6daaflno 665750 665749 2026-07-07T05:53:34Z Lado Shaw 6039 665750 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कान्हर-कापाली| ३६१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} ‘कान्हर (जि. पु.) १ श्रीक्षण। २ कोहको एक सकड़ी। यह कातरके छोरपर लगता और टेढ़ा मेंदा रहता है। इसके दोनों प्रान्त निकल पड़ते हैं। कान्हर कोल्हकी कमरके पास चारों ओर घूमा करता है। कान्हरा-बानड़ा देखो। । काप-बङ्गालके वरिन्द्र ब्राधणोंकी एक कुस। श्रेयौ। ‘कापटव ( सं• पु० ) कापटोर्गोवापत्यम्, कापटू- भण्। कापट ऋषिके वंशीय । ( क्लो. ) कुमितः पटुः तस्य भावः, कापटु भावे पण ।२ निंदित पाटुता, बुरी चालाकी। कापटवक, बापटर देखो। -कापटिक (सं.पु. कपटेन चरति, कपट-ठक । १ छात्र, विद्यार्थी। अन्यका ममंञ, दूसरेका भेद जाननेवाला। ३ प्रतारक, धोकेवाज। कापव्य (सं० लो०) कपटस्य भावः कार्यम्बा, कपट 'यज । १ कपटता, चालाकी। २ प्रतारणा, धोकेका कम। कापड़ी (हि.पु.) जातिविशेष, एक कोम। गुजरातमें ६ पत्रविशेष; एक हथियार। .७ सन्धिभेद, एक कपड़े बेचनेवालों को कापड़ी कहते हैं। कापथ (स'० पु.ली. ) कुन्मितः पन्थाः, कु पथिन्-अच् कीः कादेयः। बापथ्यचयोः । पा ६।३।१०४॥ १ कुक्षित पथ, ख़राब राह। इसका संस्कृत पर्याय-व्यध्व, दुरध्ध, विपथ, कदवा, कुपथ, असत्- पथ पौर कुत्सितवम है। २ उशीर, खस । ३ एक दानव। कापर (हि.पु.) वस्त्र, कपड़ा। कापरगादि-बङ्गात प्रान्तके सिंहभूम जिलेकी एक गिरिमाला। उसका शृङ्ग समुद्रपृष्ठसे १३० फीट ऊंचा है। वह गिरिमाला दक्षिणपूर्वाभिमुख चल , मयूरमालको उत्तर सीमाके मेधाशनि पर्वतसे जा 'मिली है। उसके इतर पत्थर में नांवा निकलता है। कुछ साहब बोम वहां तांबा तैयार करते थे। किन्तु अधिक व्यय सानेसे १८८ ई. को उन्होंने या कार्य छोड़ दिया। कापोट. (पु.- Copper plate.). ताम्रपर <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> तांबेको चहर। यह मुद्रणे यथासयमें काम पाता है। इस पर प्रक्षर खोदे जाते है। अक्षरों पर स्वाहो सगा पोंछ डालनेसे खुदें अधरोंके सिवा दूसरा स्थान स्वच्छ निकल पाता है। इसी प्रकार कापरनेट प्रेसपर चढ़ा काग़ज़ छापा जाता है। चिन आदि छापनेको तेनाबसे काम लेते हैं। जिस प्रेसमें कापर- प्लेट छपता है, उसका नाम 'कापरलेट प्रेस पड़ता है। कापा (वै० स्त्री०) कं सुखं प्राप्यते अनया, क-आप- धन-टाप। बन्दियोका प्रात:काचीन स्तुतिपाठ । 'प्रातः प्रबोधकस्य बन्दिनोवायी गया।' (भाष्य) "प्राननीधे जरणेव कापया।" (ऋक् १०४०१३) कापाटिक (. ली.) कपाटिक एव, कपाटिक स्वाथै अण। क्षुद्र कपाट, छोटा किवाड़ा। कापाल (सं• पु०-क्लो०) कपातमेव, कपास स्वार्थे पण। १ अष्टादश कुष्ठान्तर्गत वातिककुष्ठ, एक कोढ़। (कपाल देखो।) २ करण्ट करता, बायबिडंग। ३ कपालका अस्थि, खोपड़ीको इडो। ४ कर्कटीभेद, कामा एक ककड़ी। ५ किसौ शव सम्प्रदायका अनु गायो। सुनह। इसमें विपक्षो तुल्य स्खल मानते हैं। (वि.) ८ कपाल-सम्बन्धीय, सरके मुतालिक । कापाला- (सं० स्त्रो.) रणविसन्धिका, लाल फूलों का एक पेड़। {{Multicol|line=1px solid black}} (स' पु०-स्त्री.) अहिंसा, कौवाटोटौ। कापालिक (पु.) कपालेन नरकपालेन चरति, कपाल-ठक। १ जातिविशेष, एक कोम। वह वङ्गदेशमें मिलती है। २ वामाचारी, एक तान्त्रिक साधु। वह वमतावलम्बी होते हैं। मांस खाना और मद्य पौना उन्हें अनुचित नहीं मालूम पड़ता! कापालिक अपने हाथमें मनुष्य का कपा रखते और मेरक वा शक्तिको पति अर्पण करते हैं। ३ कुष्ठरोग विशेष, एक तरहका कोढ़। कपालकृष्ठ देखो। कापालिका (म. स्त्री०) वापविशेष, एक बाजा । पर यह मुखझे बजायी जाती थी।.. कापासी . (ममी.) कापाच-कोष् । २ पटकपासी, कौवारोटी।<noinclude></noinclude> r6tuygr7bnt4u15w66rmofxnny0ilx8 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९१ 250 106274 665744 373134 2026-07-07T02:24:59Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665744 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|३९२|कापाली-कापिशी}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कापासी (स• पु०) कपातं धार्यत्वेन प्रस्ताव, कपाल इनि।१ शिव। २ वासुदेवके एक पुत्र । ३ एक नाति पूर्ववङ्गमें एक प्रकारके जुलाहे रहते हैं। किसीके मसमें खोहारके औरस और वेलीको कन्याके गर्भसे वह सत्यच हुये हैं। फिर कोई मछुवेके पौरस और ब्राणोके गर्भसे कापालियों का जन्म बताता है। वह अपने पूर्वपुरुषोंको युक्तप्रदेशसे पाये कहते हैं। दूसरा प्रवाद यों है-"पादिशूरके समय कापाली शूद्र समझ जाते थे। कान्यकुब्ज देशये पांच बाण और कायस्थ पाये। भादिशूरने कापारियोंसे उनके पैर धोनको कहा। किन्तु कापासियों ने उनका आदेश माना न था। इसीसे गौड़राजने उन्हें समाजको नोच श्रेणीमें गिन खिया।" उनमें अधिकांश वैष्णव है। विवाद शास्त्रानुसार होता है। प्रथम स्त्री वन्ध्या होने तिीय स्त्री ग्रहण कर सक्षते हैं। पानीयको मृत्यु होने पर ३० दिन पायोचक पीछे ३१ वै दिन बाद किया जाता है। कापिक (सं० पु.) कपिरेव ठक् । अगुल्यादिमाठक। .मा... .१ कपि, वानर। (वि०)२ कपिवत् / पाचरण करनेवाला, जो बन्दरकी तरह पेश पाता या देखा जाता। कापिकेक्षण (सं० पु०.) कोकियाच सुप, ताल मखानका पेड़। कापिझल (सं: पु.) कपिछलस्य अपत्यं पुमान्, कपिञ्चत-पण्। कपिञ्चलके पुत्र। कापियादि (सं. पु.) कपिलखान तान्सानि पत्ति, कपिनल-पद-पण-इन्। चातक तथा तित्तिर पचीका मांसभचक, जो पपीहे और तीतरका गोश्त बना हुवा। कापिशाय( • पु.) कापिनसादरपत्वं पुमान, कापियसादि-ख। कुर्मादिभ्यो यः । पा ॥२॥ १५१। कापि- प्रसादिका पुत्र, प्रपोई पौर सोतर गोग्त खान- वासका बेटा। बापित्य (सं• की ) पित्य विकार, कपित्य-प्रम। समय भी कापियो जनपद अनिय राजाके पपीन अनुदापादेय। पा॥ ५॥१... १ कपित्य द्वारा निर्मित बत, केधको चीन। २ कपित्यफस, कैथा। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कापिस्थक (सं० की.) देशविशेष, एक मुका। (न संहिता ) वर्तमान उत्तर भारतके सहिय नामक नगरकी चारो पोरका स्थान 'कापित्यक कलाता है। {{Rh|||सरिय और सामाना देखो।}} कापित (सं० पु.) कपिलेन प्रोक्तं शास्त्र वत्ति पीते वा, कपिल-पण् । १ सांख्ययात्रवेत्ता। कपिलमधि- कृत्य ततो अन्यः। २ कपिच मुनिके मतानुसार लिखित एक उपपुराण । ३ पिङ्गलवर्ण, भूरा रंग! ४ कपिचवर्णाके पुत्र । (नि.) ५ कपिच-सम्बन्धीय । ६.पिङ्गाल, भूरा। कापित्तिक (स.पु.) कपिसिकाया अपत्य पुमान, कपिलिका-प्रण। कपिलवणाके पुत्र। कापिनेय (सं• पु०) कपिलाया अपत्यं पुमान, कपिला टक् । कपिल मुनिके एक शिष्य। कपिसा नानी किसी बाधणीका स्तनपान करनेसे वह 'कापि- लेय' कहाये है। (मारव, शान्ति, २९८ ५.) काविस्य (स' नि.) कपिलेन मित्तम्, कपिल एयः । कपिचनिर्मित, कपिलका बनाया हुवा। कापिवन (सं० को०) दो दिनमें होनेवाचा एक अधीन यंत्र। {{C|"पारिस भवरख वापिवना।" (सात्यायन, शरा)}} कापिश (म. ली.) कपिशा माधवी तत्पुष्पात् जातम्, कपिधा-अण्। १ द्राक्षामद्यविधेष, माधवीके फूलोंको भराव। २ मधमाव, कोई मराव । कापिधायन (सं.ली.) कापिश्या बातम्, कापियो- स्फक्। वापिण्याः सयापा ४ारा १ मब, घराब। २ मधु, शाद। ३ देवता। ४ कापियो जनपदम रहनेवाला। (वि.) ५ द्राचानिर्मित, दासका वापियायनी (म.बी.) द्राचा, दाण। कापियो (स.पी.) प्राचीन जनपदवियेष, एक पुरानी बसती। प्राविनिने पपने सूत्र में उसका उल्लेख किया है। (आय) हिउयनसियाङ्कने इस जनपदका नाम 'किप-पि-विशिषा है। चीन परिखाना रासस प्रमय यहां निम्ब, पायपत, मापारिक, पाहीम यन्त्र खाता हो।<noinclude></noinclude> gh44o3us5lgdsb6snlgj1ycu56ikov1 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९६ 250 106287 665751 373147 2026-07-07T06:37:11Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665751 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||काफिर|३९७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} भांतिनी होती, अधिकतर पापुयावोंसे मिलती है। उनका स्वर परिकार तथा कोमन लगता, किन्तु अनुमासिक रहता है। वह कपास और कपोत्नमें गोदना गोदाते हैं। दक्षिण कण छिदा कर बड़ा छेद रखते हैं और सम्मुखभागमें बालोंका एक गोलाकार गुच्छा छोड़ समस्त मस्तक मुण्डन करते हैं। पेराकके नदीकूलवर्ती सेमात "सेमानित पाय" कहाते हैं। वह समुद्रतीरसे पर्वतको ऊपर तक सकल स्थानमें रहते हैं। किन्तु बुकित वन और पावत्य स्थान भिन्न जसके उपकूलभाग वा नदीतीरको नहीं जाते। फिर "सकि' श्रेणौके लोग पावत्य प्रदेशसे नीचे उतरना कब जानते हैं। केदा.और पराक सेमाङ्गोंकी भाषामें दो शब्दोंके योगन शब्द छोड़ अन्य कोई बड़ी कथा वा समासवाक्य नहीं। जिन सकल स्थानों में सेमात लोग रहते हैं, उनमें मलयनातीय नहीं मिलते। पाया पीके काफिर-शोरिस, मुम्बब शिक्षा वा इन्दना, अदेनारा, सलर, लवटा, रताव, श्रीम्बे, श्रोयेउर, रत्ती, सर्वत्ति, बब्बर, तिमर, तिमरताउत, खाराट, नव कालिडोनिया, नव प्रायलेण्ड, पाटाहायटी पसिनसिया, फिजी, मालकस, नवगिनौ, पोपो, वासन्दा, किंवोप, अम्बयना, सालवत्ती प्रभूति पूर्वाशको दीपा वचौम वास करते हैं। जिन सकल दीपेमि उस नातिक काफिर रहते हैं, उन्हें मायके लीग "तानापापुया" (पाया जातिके वासखाम) कहते हैं।. बाल धू'घर वाले होनसे ही उनका नाम पापुया" पड़ा है। क्योंकि मलय भाषामें टेढ़े वानोको “पुया-पुया कहते है। घुया-मुया शब्दसे पाया शब्द निकला है। उनकी करती है। मागेशनमें पाया जातिके लोग देख प्राकति विलकुश काफिरोसे मिलती है। नासिका प्रशस्त होती है। हाँठ मोटा और बड़ा रहता है। कपाल दवा दुपा होता है। रग मटमैला लगता है। पधिगालकका चतुष्याच सफेद होता है। वह दक्षिणपूर्व एशिया अन्यान्य काफिरोये पूर्णगठित और बलिष्ठ है। पापुया लोग. उसाही, अध्यक्सायो और परिश्रमी होते हैं। उन सब गुणोंसे. विसो समय उनको सभ्य देशम दासकी भांति पधिक बेचते थे औरतीय भी पाहावार से देती थे। उन्त्री {{Rh|Vol.| IV. |100}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मानसिक वृत्ति मयजातिको पपेक्षा होन न रहते मी बहुत चक्षर होती है। इसीसे वह स्वाधीन भावमें रह नहीं सकते। मलयजाति के साथ विवाद में इसी कारण पाया हार जाते हैं। वह नवगिनी तथा उसके निकटवती होपमें समुटुक उपकूलपर वास और अन्यान्य स्थलों में पार्वत्य- प्रदेशपर अवस्थान करते हैं। बहुतसे होपोंमें तो उनकी संख्या विलकुल घट गई है। सिराम पौर गिलोलो द्वीपमें वह कभी कमी मुश्किलसे देख पड़ते हैं। बहुतोका अनुमान है कि, कान पाकर पाया पृथिवीसे उठ जायेंगे, क्योंकि शिकारके भूखे पपेक्षा कृत ताम्रवर्ण जातीय लोग उनको अधिक मारते हैं। किन्तु यह वम है। कारण जहां जहां माजकल युरोपीय सभ्यता फैलती, वहां वहां उन्हें परस्पर दिन दिन. मिलजुल कर रहनेको मिचती जाती है। सिराम और गिलोचो दीपमें रहनेवाले पत्वाधारसे उत्मोडित हो अतिशय भीर बन गये हैं। वह किसी सभ्य मातिक साथ एक दम ही बैठते उठते नहीं। अपरिचित वा भिन्न जासिको लोगोंको देख जंगसमें भाग छिप जाते है। माइसल नामक वृहत् होपमें उस जातिको छोड़ अन्य कोई जाति नहों रहती। केवल उपकूल भागमें एक प्रकारको मिश्र वा सहरजाति देख पड़तों है। उसको भी प्राकृति प्रति उनसे बहुत कुछ मिलती है। उस सझरनाति नाविकतामें विशेष पारदर्थो होसी है यह खुरापीोसे सदय व्यवहार पड़ते हैं। किन्तु उसके निकटवर्ती जेतु दीपमें या बिलकुल नहीं पाये जाते। .. यह भी सुनने में नहीं पाता किसी समय वहां पापुयावांका वास था। नवगिनि, कि, पलं, माइसल, सासवप्ति प्रकृति दीयोंमें उस जातिके लोग रसते है. पौर. वही श्रेणी फिजी दीप तक विस्तृत है। उनके बाल बड़े और बहस टेदे होते हैं। पूर्णवयस्कों के मस्तकपर उसी प्रकारके बास पब बढ़ कर टापौकी मांति बन जाता। उन्हें बेटे 'बार प्रमोक्षगते १.: उनको<noinclude></noinclude> 057iij9bfsx30kds51elscbpag28dui पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९७ 250 106290 665754 373150 2026-07-07T06:54:55Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665754 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|३२८ |बाफिर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} दादी के बाद मी वैसे ही टेढ़े होते हैं। दोनों हाथ, पैर और हासोमें भी कुछ बैसे ही वास रहते हैं। अक्षतामें वह माय जातिको प्रयेला दोध, प्रायः युरोपीयांकी मांति होते है। पदय दीर्घ राते हैं। मुखमा दीर्घाकार, कपास चपटा, नासाछिट्र प्रशस्त, सुखवियर बड़ा और मोठ मोटा तथा भारी होता है। वह वामकाज और बातचीतमें बड़े हड़प्रतिज्ञ होते हैं। वह लोग पिता कर और खूब जोरसे हंस हंस कर तथा उस कूद कर आनन्द प्रयास करते हैं। वर यह हार, नौका और तेजस आदिको खोद कर चित्र बनाते हैं। अपनी अपनी शिशसन्तान पर पापुया बहुत कुह रहते हैं। वह वेपो कभी सामाजिक बन्धनमें पड़ रहन सकेगी। समझमें ऐसा पाता कि काल पाकर युरोपीय सभ्यता फैलनेसे उस पुरमिय जातिका सीप होगा। वह बड़े विवासी होते हैं। हत्काय पाया थातिमें श्रेष्ठ और वनादिमें विख्यात है। उनका विस्तृत स्कन्ध और गमोर वक्षस्थर प्रीतिकर देख पड़ता है। काफिर जातिका साधारण दोष पददयको शीयता और अपूर्णता है। पायुयानों में भी इसका प्रभाव नहीं। स्वाधीन पाया कपड़ा जाति बड़ी प्रतिहिंसापरायण और महतस्वभाव है। नव गिनिके उत्तरपूर्व प्रान्तमें वह रहते हैं। पापुया अपने देशमें अन्य किसी जातिको निरापद वसने नहीं देते। निहायत परेशान करके भी भगानसकनेसे अपना स्थान छोड़ भभ्यन्तरमागमें पार्वत्य प्रदेश पर वह चले जाते हैं। पापया गोदना नहीं गोदात। किन्तु अर, वक्ष और पृष्ठ पर एक प्रकारके प्रलेपसे चमड़े को उभार बह कड़ा कड़ा पावला बना लेना अच्छा समझते हैं।, कभी कभी यक्ष कर पाया उसे एक अंगुल तक ऊंचा उठा देते हैं। शोरिस और नवगिनि प्रति होपों में काफिरो भी बसते हैं। नवनिनिके पाया भित्र भित्र चौक वृत्तिको साध परबर बुद्धमें लिप्त रहते है। इस युपमें विपक्ष पचका मक्षक काटन सबने से कोई पच निरत नहीं होता भवमिनिके काफिर एकबाहमयी प्रतिमाको पापना करते हैं। देवताका नाम "बारवर" हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> प्रतिमा १८ रहती है। प्रत्येक घटनाको वह उस देवताकै निकट प्रकाश करते हैं। उनकी विधवायें खामौके सामं रहती है। प्रन्याय सामों काफिरॉकी अपेचा मवगिनिके पापया सम्य हैं। किन्तु अधिकांय प्रति सामान्य पर्णकुटीरमें रहते हैं और शिकार या स्वभावजात फरमूखसे जीविका निर्वाह करते हैं। उपकूलमागके पापुया अपेक्षाकृत सभ्य है। वह अंचे खम्भोंपर खत्तीको भाति महे घर बांध रहते है। डोरी दीपमें पापुयायोंको "माईफोर" कहते हैं। वर साढ़े तीन हाय दोध होते हैं। जातिमुखम कुचित केयों को माइफोर स्त्रियोंको मासि बढ़ाकर रखते हैं। उन बाचक चारण व अधिक भयानक लगते हैं। पुरुष थिरमें एक कंघी खोस रखते। किन्तु स्त्रियां वैसा नहीं करती। उनकी दाड़ी शोम कुक्षित, कपाल उच्च एवं प्रशस्त, चक्षुइय बड़े, वर्ष काला, नाव चपटी और पोष्ठ मोटे होते हैं। किन्तु दांत विचकुच मोतीको भांति रहते हैं। पुरुष कपिल की भांति एक प्रकारका छोटा कपड़ा पानी का मार" नामक पक्षको छायसे बनता है। उनकी स्त्रियां नीले रंग के सूत्रका वन परिधान करती है। वह घंटने के नीचे नहीं पहुंचता। उत्सवादि का गोदना गोदाते हैं। वह गोदना अधिक दिन नहीं रहता। गोदना गुदाते समय मछली कांटेसे वहां गोदना बनाना चाहते हैं, वहां रख निकाल कर भूषा लगा देते हैं। वह समुद्रगमनमें पतिमय पारदर्थी को होते हैं। नौकाके वासन, सन्तरण और समुद्री डबकी मार समुद्र के गर्भपर कर्मादि करने में उनकी बराबर निपुष और कोई नहीं होता। वह बचको पड़ी खोद अपनी नौका प्रस्तुत करते हैं। मकई, धाम और मिसनसे शूकर मांस भी खा जाते हैं। वह चौर्य- सर्वापेक्षा दुख और खपराध समझते हैं। माइकोर साम्प दोषयनित है। विवाह एक बार होता है। पर दीप बाम खान-पर परिवारमपूर्ण इवाय पोर दुबम निरोग -मान<noinclude></noinclude> t8g248pkzq0rwykmqms7kdce49ks01u पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९८ 250 106291 665756 373151 2026-07-07T07:06:32Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665756 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||काफिर| ३९३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पार पशिनसीय काफिरोकी मध्यवर्ती जाति है। अष्ट्रेलीयांके साथ ही उनकी पाशति प्रति पौर व्यवहारका साहय अधिक है। पुरुष जांध तक तुमको जुनी चटाई या कपड़ा पहनते हैं और दुपट्टा व्यवहार करते हैं। वह क्रोधनखभाव नहीं होते। किन्तु गुरुषों वा स्त्रियोंसे तिरशत होने पर हठात् बिगड़ उठते हैं। स्त्रियां तुनको बुनी चटाईका एक खण्ड सम्म ख और एक खण्ड पचात् दिक् लटका लेती हैं। उनमें कितने ही मुसलमान और कितने ही ईसाई है। प्रोजन्दाजाने अवयना दीपम ईसाई धर्म प्रचार कर देयके प्रायः प्रधान प्रधान लोगोंको ईसाई बना डाला है। पर होपके पापुया अपने अपने गृहको धातुफलक और हस्तिदन्त हारा सनाते है। इस्तीक मर जानेसे वह दन्त संग्रह करते हैं। कि दीपके काफिर मुसलमान होते भी शूकरमांस खाते हैं। उनकी स्त्रियों में भी प्रवरोधप्रथा नहीं। वालक वालिका बड़ी प्रामोदप्रिय होती हैं और पूर्णवयस्क भी प्रायः सकल विषयां में गड़बड़ करते हैं। इस दीपमें दो जातिके लोगोंका वास है। उनमें पापुया नारिकेलका तैल, नौका और काठका गमला बनाते हैं। उनकी बनाई बड़ी बड़ी नावामि २०से ३. टन तक बोझ लाद सकते हैं। उनमें किसी :प्रकारको मुद्राका चलन नहों। समस्त क्रय विक्रय विनिमयसे सम्पन्न होता है। वह पेड़की छाल या स्तका कपड़ा पहनते हैं। वहांको दूसरी जाति वान्दादीय मुसलमानांकी हैं। वह वहांसे भगाये जाने पर यहां पाकर बसे हैं। वह सूतका कपड़ा पहनते हैं। वह मलयनातीय मालूम होते हैं। किन्तु आजकल उa जातिकी. सन्तानपरम्परा परस्पर संमिश्चपसे एक स्वतन्त्र मध्यवर्ती जाति बन गयी है। मेरम दीप. मलकास दीपपुनके मध्य सर्वापेक्षा बात है। वहां गिोटी दोपवास पधिवासियाक साथ पापुयावोंका. प्रति निकट साश्य है। उनके पुरुषवा पूर्ण मठन होता है। विदेश वर्कश रहता है। हियोंबी पाति मधवातिची अपेक्षा <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कर है। उस झोपकै पधिवासी पापुया "प्रासफारों" नामसे स्थात है। वह मशको वाम दिक्के बाल बांधते हैं। बालोंके मध एक अंगुल मोटा सूत्रा रखते हैं। सूजाका अपभाग और पाददेश खाख रंगा रहता है। वह प्रायः नम्न और पलकारवर्जित शेते हैं। केवल पुरुष घास या रूपकी बासी बजुक्षा और पौत या छोटे छोटे एक फरकी मात्रा पहनते हैं। स्त्रियां बात नहीं बांधतौं। किन्तु उस समस्त पनहार वा भी परिधान करती हैं। वह अपेक्षाकृत दीर्घन्द होते हैं। सिलिविस दीपके काफिर मलय दीयवासी और काफिर जातिको मध्यवर्ती श्रेणी समझ पड़ते हैं। वह मलय जासिकी भांति सभ्य होते हैं।उनका नाम " बुगि" है। फिलिपाइन दोप, पथमको भांति वासवाले काफिरों की संख्या अधिक है। परीकावासियोंकी अपेक्षा उनके गावका वर्ण कुछ तरल कश रहता ह। स्पेनीय उन्हें "क्षुद्रशाय काफिर कहते हैं। क्योंकि तीन हाथी पधिक दोध नहीं होते। उनका जातिगत नाम "इटावा पाएटा है। उस दोषपुश्चके पामाग, . निग्रीस, समर, लेयटी, ममवेत, वोहल और जेबू दीपके मध्य उस जातिके लोग देख पड़ते हैं। अन्यान्य हीदीमें विशद इटा श्रेयोके काफिर नहीं मिलते। बेवुद्दीपमें एक भी इटा श्रेणीका काफिर कहां है। गिवि होपके पापुवायों को नाक चपटी होती है। हांठ मोटा, चक्षु कोटरगत और रत. वादामी रहता है। अनेकोंके अनुमानमें नवगिनिको पाया जाति पौर मलय, जातिके मिश्रणसे वह जाति उत्यवाई है। उनके बात भी पापुयामि नहीं मिलते। अष्टे- लिया, नवकालिीडनिया, पिलु. प्रधति होमि जो. सकस पापुया काफिर देख पड़ते, वर पसिनसिय :पापुया काफिरों के संमिश्रणले. उत्पन्नवा मध्यवर्सी वाति ठहरते हैं। मित्रो... होपके - पाया ही पापुया बेबीके काफिरों को पूर्वमूर्ति हैं। पर क्यावामिः गव नीति भोरमवहारमै महोते. विमगिगि नव<noinclude></noinclude> 7s4vilbazx3cezdr5pxf272nef9v5fv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०३ 250 107480 665779 375230 2026-07-07T11:07:29Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 665779 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५०४| कायस्थ}} {{Multicol|line=1px solid black}} कायस्थों को भाखावाका नाम खरे, दूसरे, वङ्गाली, दिल्लीसीमाली और बदायूनी है। क्या हिन्दू-राजत्व क्या मुसलमान-सरकार दोनों समय कायस्थ साधिविग्रहिक वा. राजसभाव लेखकका पदभोग करते थे। इनमें अनेक संस्कृत ग्रन्यकार और सुपण्डित प्राविभूत हुवे। मुसल" मानों के अधिकारमें पश्चिमके वहुतसे कायस्थोंने मैनिक- विभागका भी एच पद पाया था। उनमें प्रकावरके राजस्व सचिव टोडरमल, महाराज नवन्तराय, पटनाके शासनकर्ता राजा रामनारायण प्रमृतिका नाम उखयोग्य है। आजकल भी कायस्य वृटिश गवर्नमेण्टके अधीन क्या शिक्षा विभाग क्या न्याय विभाग (कचहरी-अदालत) सर्वत्र उच्च प्रासन सम्मान नाम करते पाते हैं। धानकन्न द्वादश शाखाका युवा प्रदेशके समस्त कायस्थ एकताके सूत्र में पावर वाल्मीक, गोड़, कुलश्रेष्ट, माधर, निगम, गक्रमेन, होनको चेष्टा करते हैं। युक्तप्रदेशमें प्रायः माढ़े पांच लाख कायस्खों का वास हैं। {{C|राजपूताना।}} राजपूतानेके कायस्य प्रायः अपनेको राजधाना कहते हैं। वृंदीमें माथुर और भटनागर कायस्थोंका वास है । मारवाड़में कायस्थों को 'पञ्चौन्ली ठाकुर' कहा नाता है। राजपूतान में अजमेरी, रामसरी और केकरी तीन श्रेणियां मिलती हैं। उनमें सभी यज्ञसूत्र धारण करते हैं। फिर अखाद्य भोजन करनेवालों का निगम शाखा कायस्य विहारमें अधिक देख नहीं यन्नसूत्र उतार डाला जाता है। पड़ते। सूर्यध्वजोंके पधिदेवता सूर्य माने जाते है।वहां सभी कायस्थ अपनेको जत्रिय बतानके लिये तैयार हैं। उनका पाचार व्यवहार अधिकांश युक्तपदेशके कायस्थों जैसा है। राजपूतानक कायस्थों में बहुतो ने रानहारमें सैनिककृत्तिको भी अवलम्बन किया है। {{C|विहार।}} विहारक कायस्थ अपनेको चित्रगुप्तका प्रकृत वंशधर बताते हैं। उनमें प्रवाद है-सत्ययुगमें जब सब देवता यज करने लगे, तब यम ब्रह्मासै बोल उठे-'पितामह ! इन्द्रादि सकन्न दिक्पान्त हैं। प्रथच उन्हें यन्नादि करनेका समय मिल जाता है। {{Rh|Rajputada Gazetteer.}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> किन्तु हमने ऐसा क्या अपराध किया है कि उस अपने कार्यमारको एक मुहतके निये भी छोड़ नहीं सकते। पाप हमें यन्न करनेका उपाय बता दौनिये। ब्रह्मान यमको उक प्रार्थनार्क अनुमार अपने शरीरमे चित्र- गुप्तको उत्पन्न करके कहा था-'यह महामाग माहाय्य करके तुम्हारे कमेंका अवमरकान्न ठहरा देंगे और सबके कर्माकर्मको वर्णना करेंगे। उसके अनुसार तुम स्वर्ग-नरकादिको व्यवस्था कर सकोगे।' पचिमी कायस्थों की भांति विहारो कायम्यासें मी द्वादश शाखा है। उक्त बादश शाखाबों घादि पुरुष चित्रगुप्त वंशधर थे। विहारी कायस्थ आन भी उपवीत धारण करते हैं। कारण उनके कथना- नुसार चित्रगुप्तने मीपवीत जन्म लिया था। उनको नाम है-अष्ठिाना, अम्बष्ट, श्रीवास्तव, सूर्यध्धन और करण। उक्त दादा गामा वाम अहिठानोंका प्रादिनिधाम जौनपुर है। पटना और विद्युत पक्षसमें अम्बष्ठ गावाके लोग हौ अधिक देख पड़ते हैं। वात्मीक शाखाका प्रादि वाम स्थान अम्बष्ट, श्रीवास्तव और करण एकही हुक्के मे तम्बाकू पिया करते हैं। पम्वष्ठ ब्राह्मणप्रस्तुत अन्न एक जगह बैठकर खा सकते हैं। निगम शाखा कायस्य विहारमें अधिक देख नहीं यन्नसूत्र उतार डाला जाता है। गकसेन, श्रीवास्तव और भटनागर पपनको चित्रगुप्तकी प्रथमा नीका गर्मजात बंग बताते हैं। विहारके गौड़ कायस्पोंको विश्वास है कि बट्टानक सेन राना उन्हींको थेगोके अन्तर्गत रहे। श्रीवामनद शाखाके दो वेणी विमाग हैं-वरे और दूसरे। वर येणोके लोग अन्यान्य श्रीवास्तवो येष्ट होते हैं। वह अपनी 'पांडे बताते हैं। वरे और दूसरे नौमि पाना- हार तथा प्रादान-प्रदान नहीं चलता। कमेन गावाम, मी उसी तरह श्रेणी विभाग है। भार प्रक्रीन परम्मर एक दूसरेका अबव्यञ्चनादि गुजरात है। करण और उनका मायर, मटनागर यहा करते हैं।<noinclude></noinclude> p07vyknsbe9nx2sqascsb2vbniblqs3 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०४ 250 107483 665782 375234 2026-07-07T11:27:15Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 665782 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||कायस्थ| ५०५}} {{Multicol|line=1px solid black}} पूर्वी हादश शाखाके लाला कायस्योंको छोड़ दूसरे कई प्रकारके नीच कायस्थ भी होते हैं। किन्तु या पाप ही पपनको कायस्थ वतात, अपर जातीय वा पूर्वोक्त हादश शाखाके कायस्थ उन्हें कायस्थ कहना नहीं चाहते। सारन जिले के सेवन नगरमें कितने ही दरजी पौर कितने ही ठेकेदार भी कायस्थ-नामसे अर्थात् अपना परिचय देते हैं। किन्तु उनके साथ लाला कायस्थों का कोई संम्रव नहीं। बहुतसे चोग अनुमान माथ र, शकसेन, भटनागर, अम्बष्ठ, श्रीवास्तव्य, कर्ण ग्रहण करनेसे समाजच्युत हो एकबारगी ही भिन्न श्रेणी समझे जाते हैं। कारण प्राज भी जो लाला कायस्थं बंधानुक्रमसे गांवके पटवारी होते आये हैं, बहुत से लोग उनके घर पादान-प्रदान करना नहीं चाहते। पटवारी, कानूनगो, अखौरी, पांडे वा बख्शी उपाधिधारी कायस्थ शतगुण धनी वा सत्- कर्मशाली होते भी सामाजिक मर्यादामें हीन समझे जाते हैं। युक्तप्रदेश और विहारके कायस्थों का धर्मकर्म प्रायः मिलता जुलता किन्तु देशभेदसे पाचारमें भी कुछ प्रमद पड़ गया है। विहारी कायस्थम वैष्णव, शैव, शाक्त, कवीरपन्थी, नानकशाही प्रकृति हुवा करते हैं। उनमें थानों को ही संख्या अधिक है। धाद्वितीयाके दिन वह चित्र. वसन्त श्री कर्ण-वशको श्रेणिसे पांच महाजन आविर्भूत पञ्चमीको दावात कचम पूजते हैं। {{C|बनदेश।}} बङ्गालमें प्रधानतः चार श्रेणियाँके कायस्थोंका वास है। वह स्थानमैदर उत्तरराढ़ीय, दक्षिण-रादोय, पणन और वारेन्द्र कहलाते हैं। उक्त चारो श्रेणियां अपना परिचय चित्रगुप्त-सन्तानके नामसे दिया करती हैं। उत्तरराठीय कुलग्रन्यमें लिखा है- "चित्रगुप्तः क्रियोपतः ममानेषु पूज्यते । सैनी पुवाटकाः प्रथा सर्वसम्पत्तिस युसा: १५ गौडालो माथ रसव शकमेनो भनागरः। पष्टय थीवास्तव्य कोषका उच्च थोक ति समसः विद्यावी मुवि सर्वदः ।। {{Rh|Vol |IV, |127}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> तसवी समुता: पचविता महाजमा:। वाक्यगीय ऽनादिवरः सोमः सौकालिनेन च १८ पुरुषोत्तमो मौहलो विश्वामित्रः सुदर्शनः । कामपेज देवनामा इति ते कथितं मुदा"१९ {{Rh|||(घटक कैयौकी चरसदीय कुलदीपिका)}} क्रियावान् चित्रगुप्त सर्वशास्त्रमें पूजित हुये थे। उनके वंशधर सेनी रहे। इस पृथिवी पर सेनीके सर्व- सम्म तिशाली पाठ सन्तान हुवे। उनका नाम गौड़, करते कि वह वस्तुत: कायस्थ हैं, फिर भी नीच कर्म और उपकर्ण था। पाठोम कर्ण श्रेष्ठ रहे। उसीसे वह इस पृथिवी पर श्रीकर्ण नामसे विख्यात हुवे। उनके वंशम पांच विन मामावोंने नन्भग्रहण किया था। पांघों का नाम वास्यगोत्र पनादिवर, सौकालिन सोम, मौहल्य पुरुषोत्तम, विश्वामित्र सुदर्शन और काश्यप देव रहा। उत्तराठीय कुलाचार्य पचाननको कारिकांमें कहा है- "कगणिमुन्नाः पवित्रा महाजनाः । वाम गौवोऽमादिवरः सीमः सौकालिनता। पुरुषोतमी मीहल्यः विश्वामिवः सुदर्शनः । काप्यपी देवनामा च पति के कथितं सदा। सूर्यगौरवी धनी दत्तदासी महावती। चन्द्रवंगाव: चवो मिनकुले सदनः ।" गुप्तको पूजा करते हैं। श्रीपञ्चमी अर्थात् हुवे। उनमें : वात्स्यगोत्र पनादिवर (सिंह), मौकालिन गोत्र सोम (घोष), मौहत्य गोत्र पुरुषोत्तम (दास), विश्वामन गोत्र सुदर्शन (मित्र ), और काश्यप गोत्र देव (दत्त) थे। दत्त तथा दास सूर्यवंशीय और मित्रकुलमें सुदर्शन · चन्द्र वघीय भी कहलाते हैं। वङ्गजकायस्थकारिकामें लिखते है- "चिवदेवसुतायाष्टी समासन् वै महाशया: । तेषान्तु कल्पयामास कम्पापी बावकर्म च । एकव बहुधा माति गोविर्ण गोवदेवता । तैषां मध्ये प्रवरय एकथितमः स्वः। पुवायामष्टकानाच वर्ष: प्रोविक्षः। सूर्यबजी चन्द्रशसान्द्रा चन्द्रका रविदासी रविरणी रविधीरय गौरकः।<noinclude></noinclude> i56946vkgqet7l0kcktip3fl47mx4ao पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०५ 250 107488 665783 375240 2026-07-07T11:46:16Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 665783 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५०६|कायस्थ}} {{Multicol|line=1px solid black}} प्रति चाष्टमुताः खयानाः कुलानां पतयोऽभवन् । एतेषाच सुमाः सर्वे दवाखाायाच स'शिमाः। घोष: सूरध्वनाब्बासयन्द्रहासावसुतण । रविरवात् गृहश्चैव चन्द्रदेशातु मिवकः । चन्द्रार्धात करणी जास: रविदासाच दत्तकः । मृत्यु नयस्तु गोडाच कप्यन्त ग्रन्थकारकः । दासको नागनाथौ च करणाश्च समुद्भवाः । मृत्य भयसुती नातः देवसेमय पालितः । सिव तथा खाामाः एते पद्धतिकारकाः। मृत्यु भय कुलोमती मित्यानन्दो मृरेश्वरः। तस्यापि शे सनाता: सप्ताशोनिः प्रकीर्तिताः । कुलाचारप्रभेदेन दिसप्तत्यचलामवन् ॥" चित्रगुप्तदेवके पाठ महाशय पुत्र हुवे थे। कश्यपने उनका जातकर्म किया। उनमें एक एकसे फिर बहुवंश (गोत्र ). उत्पन्न हथे। उनके मध्य २१ वश ही प्रधान माने जाते हैं। उक्त एकविथति वंशो में सूर्यध्वन, चन्द्रहास, चन्द्रा, चन्द्रदेशक, रवि- दास, रविरत्न, रविधीर और गौड़क कुलपति गिने गए। उनका सन्ततिवर्ग देशनामसे भी पाख्यात है। सूर्यध्वजसे घोष, चन्द्रहाससे वसु, रविरवसे गुह, चन्द्र देहसे मित्र, चन्द्राधसे करण, ररिदाससे दत्त और गौड़से फिर करणसे नाग, नाथ एवं दास और मृत्यु अयसे देव, सेन, पारित तथा सिंह नामक प्रसिह पतिकारकों ने जन्मलाभ किया। मिथिला पदार्पण करते हुवे अपने साथ मिज अमात्य मृत्यु जयके वशमें नित्यानन्द नामक एक नृपेखर पाविर्भूत हुवे थे। उन्होंके वंशसे ८७ घर कायस्थ निकले। उनमें ७२ घर कुलाचारके प्रभेदसे 'पचला' कहलाते हैं। उत्तरराढीय कायस्थकारिका जिस प्रकार चित्रगुप्तले विभिन्न शाखाके कायस्खोंकी उत्पत्ति वर्णित हुयी है, चित्रगुप्तको पूजा पौर व्रतकथाके मध् भी उसी प्रकार शोकशेस्तो देख पड़ी है- "चिवगुप्मान्वये गावाः शणु तान् कथयामि वै । गोडाखया माथु राय व मडकरपसेनकाः । अहिष्ठाना: श्रीवास्तव शैकसेनास्तव च। कुशलाः सर्वशास्त्रेषु सम्बछाया नराधिप।" उस श्लोक कुलग्रन्यके अनुरूप. हात भी.इस विषयमें घोरतर मतभेद विद्यमान है। बालके किसी किसी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कुलग्रन्वमें सेमक वा सेनीको चित्रगुप्तका भ्राता और चित्रगुप्तव्रतकथा तथा पश्चिमाचलके कायस्थकुल- परिचय-ग्रन्यसमूहमें उनको चित्रगुप्त का पुत्र बताया है। प्राचीन पुराणमें चित्रगुप्तका चार-परिचय न रहने पौर महल्याकामधेनुकृत यमसंहिता तथा युक्ता प्रदेशीय कायस्थोंके . कुलग्रन्यसमूहमें चित्रगुप्तसे विभिन्न श्रेणीके कायस्थों की उत्पत्ति विहत होने पर हमने प्राचीन मतके अनुसार सेनी वा सेनकको चित्र- गुप्तका पुत्र ही माना है। युक्षप्रदेश में विभिन्न श्रेणोक जो सकल कायस्थ मिलते, उनके मध्य श्रीवास्तव, शकसेन, करण, सूर्यध्वज, अम्बष्ठ, रावधाना पौर गौड़ कई श्रेणोके कायस्य बङ्गाल पहुंचे थे। इनके वंशधर विभिन्न स्थानमें इस समय विभिन्न श्रेणीमुक्त हो गये हैं। मुतरां कुलप्रत्यके अनुसार वसु, घोष, मित्र, दत्त, सिंह प्रभृति उपाधिधारी कायस्य भी युक्तपदेशीय श्रीवास्तव प्रभृति विभिन्न शाखाके प्राति होते और युक्तप्रदेश कायस्थाको भांति बालके घोष, वसु, मित्र प्रति विशद कायस्थ वंशधर त्रियवर्णक अन्तर्गत ठहरते है। {{C|मिथिला।}} कर्णाटकबंधीय महाराज नान्यदेव ई० यताब्दको कायस्य कुलभूषण श्रीधर तथा उनके १२ सम्बन्धियोंको लाये थे। वह जब समस्त मिथिलाके अधिपति हुये, तब उनके सचिव श्रीधर और उन १२ कुटुम्बी पन्य उच्च पद पर नियुक्त किये गये और उन्हें खानपीनेके लिये बहुतसे गांव मिले। उस समयसे उक्त कार्यस्थ मिथिसामें ही रहने लगे। उसके पीछे मन्त्रिवर श्रीधर महोदयने अपने बहुतेरे. बन्धु- बान्धवोंको धौर घोर मिथिला बुलाया और उन्हें जीविका दिला करके मिथिलामें ही बसाया था। कायस्थ चार बारको जा कर मिथिलामें बसे । प्रथम बार (जैसा पहले लिख चुके है) श्रीधर और बङ्गकै नातीय इतिहास “राजन्यकाई में वादेशीय वायस्थों का आदिपरिचय और इतिहास द्रष्टा है।<noinclude></noinclude> 1va9yu2ot9q9jr9muo1b5i1b1i6dzte विषयसूची:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf 252 193466 665149 663739 2026-07-06T14:45:57Z अजीत कुमार तिवारी 12 665149 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=उम्मेद सिंह चरित्र |Language=hi |Volume= |Author=लज्जाराम शर्मा |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= 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तिवारी 12 [[Special:Contributions/Ravik02|Ravik02]] ([[User talk:Ravik02|वार्ता]]) के संपादनों को हटाकर [[User:Skirti.codes|Skirti.codes]] के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया 663266 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(६)}} समय तक तक इनकी शक्ति का नाश नहीं हुआ था। यदि ये सब एक हो जाते, यदि सरहटे वीर भी इनके साथी हो जाते और इस तरह की संयुक्त शक्ति से काम लिया जाता तो हिंदुओं का पुराण प्रसिद्ध जमाना फिर भी एक बार आने की आशा हो सकती थी। परंतु इस संसार नाटक के सूत्रधार को यहाँ बात इष्ट नहीं थी। वह जानता था कि हिन्दू इस कार्य के अयोग्य हैं। बस इसीलिये उसने देश के दुर्भाग्यरूपी प्रलयपयोधरों का विनाश करके सचमुच ही सौभाग्य दिवाकर का उदय किया। यदि उसका अनुग्रह न होता तो न मालूम भारतवर्ष की आज दिन क्या दुर्दशा होती। किन्तु उसे अनेक शताब्दियों के असह्य संकट अनंतर इस देश को फिर सुख के दिन दिखलाना था इसलिए इस धर्मभूमि का शासन एक ऐसी जाति को दिया गया जो इस संसार में अपने सुन्याय के लिये विख्यात है। जो लोग उस समय के इतिहास पर दृष्टि दिये बिना भारतवर्ष के ब्रिटिश साम्राज्य पर दोष लगाते हैं वे इस पुस्तक को पढ़कर न्याय दृष्टि से उस जमाने की वर्तमान समय से तुलना करें तब उन्हें भली भाँति विदित हो जायगा कि उस युग की अपेक्षा अंग्रेजों का शासन हमारे लिये कितना सुखकर है। सर्वशक्तिमान् करुणा वरुणालय इस शासनको इस देश में चिरस्थायी करें और इससे राजा प्रजा का कल्याण हो। भगवान् करें श्रीमान् सम्राट् पंचम जार्जका कल्याण हो और उनके सुराज्य में राजा प्रजा सुखी रहें। "उम्मेदसिंह चरित्र" यद्यपि बूँदी राज्य के उद्धारक, हाड़ाक्षत्रियों के कुलकमल दिवाकर महाराज राजा उम्मेदसिंहजी का चरित्र है किन्तु केवल इसीसे मालूम हो जायगा कि मेरी इस उक्ति में कहाँतक सत्यता है। इनके पिता महाराव राजा बुधसिंहजी के बल विक्रमसे जब इस राज्य की वृद्धि हुई तो असाधारण और उनके हाथ से यदि राज्य निकल गया तो यहाँ तक कि एक जगह बैठकर दुःख के दिन बिताने के लिये गाँठकी एक झोंपड़ी भी न रही। उसी खोय हुए राज्य को घोर कष्ट उठाकर, वर्षों के अविश्रान्त परिश्रम से, समरभूमि में तलवार के हाथ दिखाते से, तीन चार युद्धों के अनन्तर इन्होंनें प्राप्त किया। राज्य पाकर इन्होंनें उसे बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित कर इसके भीतरी काँटों को निकाला। राज्य निष्कंटक होजाने के बाद पहले पुत्र को और उनका देहान्त होजाने पर पौत्र को राज्य देकर आप अलग होगये। अलग होकर भारत वर्ष के समस्त तीर्थों की अनेक बार यात्रा की।<noinclude></noinclude> qyyis78ib39790x2kvjksgoi52ly2fs पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२ 250 193475 665137 663374 2026-07-06T14:44:26Z अजीत कुमार तिवारी 12 [[Special:Contributions/Ravik02|Ravik02]] ([[User talk:Ravik02|वार्ता]]) के संपादनों को हटाकर [[User:Skirti.codes|Skirti.codes]] के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया 663269 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(७)}} इस समय भी बूँदी की रक्षा का अटल व्रत इन्होंने हृदय में बना रहा और इसका इन्होंने आजीवन निर्वाह किया। अवकाश पाकर इन्होंने इस नव प्राप्त राज्य को ऐसे सांचे में ढाल दिया जो अबतक प्रत्येक कार्य में देखा जाता है- जिसका पालन किया जाता है। और इनके पूर्वजों के बनाये कितने ही विशाल भवनों के सिवाय बूँदी राज्य में जो कुछ आजतक दिखलाई देता है केवल इन्हीं की बदौलत। बस ऐसे ही राजर्षि का इस पोथी में चरित्र- प्रातःस्मरणीय चरित्र है। इनके सद्गुणों के कारण यही श्री जी साहब कहलाते हैं। इसमें केवल महाराव राव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही चरित्र हो- सो नहीं। यह चार खण्डों में विभक्त है। प्रथम खण्ड में चौहान क्षत्रियों की हाडा शाखा के-बूँदी राज्य के संक्षिप्त इतिहास का दिग्दर्शन, दूसरे में चरित्र नायक के पिता महाराव राजा श्रीबुधसिंहजी का संक्षेप से जीवनचरित्र, तीसरे में उम्मेदसिंहजी की राज्य प्राप्ति से लेकर इनके वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करने तक का हाल और चौथे में उनके राज्य त्याग करने के अनंतर उनका शेष जीवनवृत्त और साथ ही महाराव राजा श्रीअजितसिंहजी तथा महाराव राजा श्रीविष्णुसिंहजी का चरित्र। केवल इतना ही क्यों- इसमें उस समय की और २ अनेक सामयिक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। इस ग्रंथ के लिखते समय मेरा विचार यह था कि इसमें महाराव राजा श्रीउम्मेदसिंहजी का ही चरित्र विस्तार से और आरंभ से लेकर महाराव राजा विष्णुसिंहजी तक का हाल संक्षेप से लिखा जाय। ऐसा करने के अनंतर महाराव राजा रामसिंहजी साहब बहादुर जी. सी. एस. आई., सी. आई. ई. का चरित्र लिखकर बूँदी का इतिहास समाप्त किया जाय। इस उद्देश्य से यह पोथी लिखी गई और राजर्षि रामसिंहजी का चरित्र लेखन अभीतक होनहार की गोद में है। किन्तु अब मेरा विचार बदल गया। इस पुस्तक के प्रथमखण्ड में इस राज्य का संक्षिप्त इतिहास लिखकर मेरा संतोष नहीं हुआ। इस कारण मैंने राव राजा रत्नसिंहजी, राव राजा शत्रुशल्यजी, राव राजा भावसिंहजी और राव राजा अनिरुद्ध सिंहजी का विस्तार से चरित्र लिखकर “पराक्रमी हाडाराव” के नाम से पोथी तैयार की है। और संकल्प यह है कि ठेठ से अबतक का इतिहास ही तैयार कर लिया जाय। इस कामना में सफलता होगी वा नहीं- सो भगवान जानै किन्तु “पराक्रमी हाडाराव” के<noinclude></noinclude> 1zjimu0suu1rfgkjqenjnzwjnaq43gk पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३ 250 193476 665135 663376 2026-07-06T14:44:08Z अजीत कुमार तिवारी 12 [[Special:Contributions/Ravik02|Ravik02]] ([[User talk:Ravik02|वार्ता]]) के संपादनों को हटाकर [[User:Skirti.codes|Skirti.codes]] के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया 663270 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(८)}} प्रकाशित होने से इन दोनों पुस्तकों को मिलाकर पढ़ने में राव राजा रत्नसिंहजी से लेकर महा राव राजा विष्णुसिंहजी तक का पूरा हाल मिल जायगा। प्रथम खंड को संक्षिप्त—परम संक्षिप्त करने से उसमें कितनी ही त्रुटियाँ रहीं होगी सो राम जानै परंतु पृष्ठ १३ में राव सूर्यमल्लजी का तीर से शेर मारना चित्तोड में लिखा गया है किन्तु उन्होंने मारा अपनी ससुराल में था। पृष्ठ २० में राव राजा रत्नसिंहजी का मारा जाना लिखा गया है किन्तु यह मारे नहीं गये मृत्यु से परलोक वासी हुए थे। पृष्ठ २२ में राव राजा शत्रुशल्यजी का तलवार से काम आना लिखागया है किन्तु यह तलवार से नहीं गोली लगने से वीर गति को प्राप्त हुए थे। पृष्ठ ५७ में बूढलुहारी पर जयपुर की नानक पंथी सेना की चढाई लिख दी गई किन्तु जयपुर में सेना दादू पंथियों की है। पृष्ठ २०५ में श्री जी साहब के पौत्र रामसिंहजी लिखेगये हैं किन्तु उनके यह परपोते थे। और पृष्ठ २२१ में विष्णुसिंहजी का शिरपर माला फेेरना छपगया किन्तु माला नहीं यह भाला फेरा करते थे। इसतरह की त्रुटियों के सिवाय मेरे ही दृष्टिदोष से एक बड़ी भारी गलती छपगई। वह यह कि पृष्ठ ४८ से पृष्ठ ९५ तक के ३५ पृष्ठों में संवत् १८०१ से संवत् १८०७ तक की घटनाओं का उल्लेख है परंतु वहाँ भूल से १८०० के बदले १९०० मुद्रित हो गया। इनके अतिरिक्त छापे की भूल से भैंसरोड़ गढका मैसरोड़गढ, उपकार की जगह उपारक, मंथरा के बदले मंथर, होलकर का होलका- इत्यादि छपगया सो जुदा। इस पुस्तक में कई जगह उदयपुर, कोटा, जयपुर और जोधपुर के उस समय के नरेशोंपर, इन्द्रगढ के महाराजा देवसिंहजीपर, राजनीति निपुण जालिम सिंहजी पर और ऐसे ही औरों पर कटाक्ष करता पड़ा है परंतु यह कटाक्ष वास्तव में कटाक्ष नहीं। न्याय दृष्टि से किया गया है। इसका कारण मैं ऊपर लिखचुका हूँ। मैं फिर भी मानताहूँ कि यदि उस समय के नरेश आपसमें लड़मरने की जगह, अपने भाइयों का, नातेदारों का और जाति भाइयों का विनाश करने के बदले मिलकर चलते तो भारतवर्ष की ऐसी दुर्दशा न होती। परंतु उन लोगों ने अपनी राजनीति का- अपनी शक्ति का उपयोग उस व्यक्ति पर किया जिसका राज्य छूट गया था, घर वार छूट गया था और जिसे विपत्ति सागर में पड़कर जंगल में झडबेेरी के फलों पर कालक्षेप करना पडा था। टाड साहब से बढ़कर इसकी गवाही क्या हो? नहीं तो मेरी उन नरेशों पर परम<noinclude></noinclude> 0mo2vx2dlzsisu6gvgxvhz9uwbv3c4o पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४ 250 193477 665130 663377 2026-07-06T14:43:31Z अजीत कुमार तिवारी 12 [[Special:Contributions/Ravik02|Ravik02]] ([[User talk:Ravik02|वार्ता]]) के संपादनों को हटाकर [[User:Skirti.codes|Skirti.codes]] के आखिरी अवतरण को पूर्ववत किया 663271 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Skirti.codes" /></noinclude>{{blockcenter|(९)}} पूज्य बुद्धि है। मैंने उनकी प्रशंसा के समय प्रशंसा और निन्दा के समय निन्दा की है। इसपर भी यदि किसी को आपत्ति मालूम हो तो मैं उनसे क्षमा मांगताहूँ। परमेश्वर की कृपा से ब्रिटिश राज्य की छत्र छाया में सब रजवाड़ों का परस्पर का वैमनस्य जाकर स्नेह की वृद्धि होरही है। अवश्य ही उन लोगों का यह कार्य देश दृष्टि के विचार से और नातेदारी के खयाल से अनुचित था और इसी कारण समय पडने पर उनके लिये- उनकी शक्ति के दुरुपयोग को देखकर कुछ लिखना पडा किन्तु “संतुष्टाश्च महीपतेः” के सिद्धान्त से उनका कार्य अनुचित भी नहीं कहा जासकता। इसी लक्ष्य से जब टाड साहब ने इन्द्रगढवालों का वध करनेपर अथवा महाराणा अडसीजी के मारे जाने पर महाराव राजा उम्मेदसिंहजी की और अनुक्रम से अजितसिंहजी की निन्दा की है तब ऐसे अवसर पर भारतवर्ष में अंगरेजी साम्राज्य के संस्थापक लार्ड क्लाइव और वेरन हेस्टिंग्स के वर्ताव की याद दिलानी पडी है और वह भी इसलिये पडी है कि दुनिया भर के इतिहास में शायद ऐसा कोई भी राज्य का संस्थापक नहीं निकल सकता जिसके चरित्र में इस प्रकार का धब्बा न हो किन्तु जिनका लक्ष्य राज्य संस्थापन है उन्हें समय आपडने पर ऐसे कार्य करने पड़ते हैं। इतना लिखने से पाठक यह न समझ लैं कि मैं इन बातों का अनुमोदक हूँ। जो कार्य भला सो भला और बुरा सो बुरा ही है। इस पुस्तक की रचना बूँदी के सुप्रसिद्ध इतिहास “वंश भास्कर” के रचयिता कवि शिरोमणि सूर्यमल्लजी के उक्त ग्रंथ के आधार पर, सर्व शास्त्र निष्णात, राजकार्य धुरंधर, बूँदी के भूतपूर्व अमात्य पंडित गंगासहायजी के बनाये “वंशप्रकाश” को आगे रखकर राजपूताने के जगत् प्रसिद्ध इतिहास लेखक महामान्य टाड साहब कृत “एनल्स ऐंड एंटीक्विटीज् आफ राजस्थान” का मिलान करके की गई है। इसमें समय २ पर मथुरानिवासी बाबू हरिचरणसिंह चौहान कृत “बूँदी राजचरितावली” का भी आश्रय लिया गया है और कहीं २ जनश्रुति का भी आधार है। इन सबही के लिए मेरा हार्दिक धन्यवाद है। विभक्ति प्रत्यय को मैं सर्व नाम के शामिल और संज्ञा से अलग लिखना पसन्द करताहूँ। इस पुस्तक में भी जहाँ तक बन सका इस तरह का उपयोग किया गया है।<noinclude></noinclude> 79kqk7ohcts8q5tdfnfvfa5dts0oas2 विषयसूची:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf 252 193544 665118 663736 2026-07-06T14:37:45Z अजीत कुमार तिवारी 12 665118 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=महारानी विक्टोरिया का चरित्र |Language=hi |Volume= |Author=लज्जाराम शर्मा |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=श्रीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस |Address=बम्बई |Year=1901 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=य |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} j2uo9q0n1ohzofcziqaf0pyaawvffg9 665119 665118 2026-07-06T14:38:50Z अजीत कुमार तिवारी 12 665119 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=महारानी विक्टोरिया का चरित्र |Language=hi |Volume= |Author=लज्जाराम शर्मा |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=श्रीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस |Address=बम्बई |Year=1901 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=2 |Progress=य |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 1i8ubkp7evwiqrnnphaduinar8lr10a 665713 665119 2026-07-06T17:11:13Z अजीत कुमार तिवारी 12 प्रगति स्तर अद्यतन. 665713 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=महारानी विक्टोरिया का चरित्र |Language=hi |Volume= |Author=लज्जाराम शर्मा |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher=श्रीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस |Address=बम्बई |Year=1901 |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=2 |Progress=अ |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} b3lizxrjjpjakzbciw0qydmegue6e75 विषयसूची:कर्त्तव्य 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[https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ 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६ जुलाई २०२६ (UTC) प्रतियोगिता के शुरुआत हुए तीन दिन हो गये. इस परिधि के एक भी पृष्ठ में काम जारी नहीं हुआ. ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:२२, ७ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:११, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] ttzk06ayhvtyyxoryjam9bwj00k17tq 665763 665762 2026-07-07T08:27:36Z MuskanChaudhary121 6707 /* पुस्तक सूची */ 665763 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) --[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:१९, ६ जुलाई २०२६ (UTC) प्रतियोगिता के शुरुआत हुए तीन दिन हो गये. इस परिधि के एक भी पृष्ठ में काम जारी नहीं हुआ. ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC)[[विशेष:योगदान/&#126;2026-38284-23|&#126;2026-38284-23]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38284-23|वार्ता]]) ०८:३१, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:११, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] m9lmoew5sz6ox0kf9viw4kmw6md9syr 665774 665763 2026-07-07T10:17:52Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* प्रतिभागी */ -ip 665774 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) --[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:१९, ६ जुलाई २०२६ (UTC) प्रतियोगिता के शुरुआत हुए तीन दिन हो गये. इस परिधि के एक भी पृष्ठ में काम जारी नहीं हुआ. ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:११, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] efinqwlgzag2etaeunxc47odi3pieco विकिस्रोत वार्ता:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६ 5 194522 665115 665065 2026-07-06T14:08:38Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता */ उत्तर 665115 wikitext text/x-wiki == शोधित पृष्ठ चित्र जोड़ने और अपलोड करने के संबंध में सहायता == @[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]], @[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]], @[[सदस्य:नीलम|नीलम]] और @[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी मैं इस गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव में पृष्ठों का शोधन कर रहा हूँ। मेरे द्वारा शोधित किए जा रहे एक पृष्ठ (जैसे- हिंदी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) के बीच में एक चित्र आया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि: # मूल पीडीएफ/djvu से इस चित्र को निकालकर विकिमीडिया/विकिस्रोत पर अपलोड करने की सही प्रक्रिया क्या है? # अपलोड करने के बाद उस चित्र को शोधित पृष्ठ के कोड में सही स्थान पर लगाने के लिए किस साँचे या कोड का उपयोग करना चाहिए, ताकि वह पृष्ठ के लेआउट में सही से दिखाई दे? आपके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी। धन्यवाद! [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:३०, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :विकिस्रोत पर आपका स्वागत है। संबंधित चित्र को कॉमन्स पर अपलोड करने के लिए आप [https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Suryakund.png इसे] देख सकते हैं। आपको चित्र अपलोड करते समय उसी लाइसेंस का उपयोग करना है जो संबंधित पुस्तक का है। पृष्ठ में चित्र लगाने के लिए आप [[पृष्ठ:अयोध्या का इतिहास.pdf/२०९|इसे]] देख सकते हैं। चित्र के आकार को नियंत्रित करने के लिए आप 30/50/60px लिखकर देख लें कि कौन सा आकार पृष्ठ के अनुकूल है। संपादन करने के लिए धन्यवाद। प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएँ। [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:५१, ६ जुलाई २०२६ (UTC) ::@[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] जी, मुझे आप "हिंदी विश्वकोष भाग ३" के लिए लाइसेंस बता दें और मैं भी कैसे देख सकता हूं? [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०४:०५, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :::किसी भी पुस्तक का लाइसेंस जानने के लिए उसकी विषयसूची में जाएँ तथा उसके स्रोत की कड़ी (djvu/pdf) को क्लिक करें। वहाँ आपको लाइसेंस दिख जाएगा। विस्तृत जानकारी के लिए पृष्ठ के ऊपर पढ़ें के बगल में "विकिमीडिया कॉमन्स पर देखें" वाली कड़ी को क्लिक करें। [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) १४:०८, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == मूल पुस्तक में परिवर्तन == मूल पुस्तक में अंग्रेज़ी के शब्द गलत छपे थे क्या मैं उन्हें सुधार सकता हूं?(संबंध - हिन्दी विश्वकोष भाग ३ पृष्ठ ३९२) [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ०१:४४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) :हाँ आप सुधार सकते हैं। इस <nowiki>{{SIC|मूल पाठ का शब्द|सही शब्द}}</nowiki> साँचे का प्रयोग करते हुए सुधार कीजिए। एक छोटा सा सुधार कर लीजिए। जिसे आप ६ (6) समझ रहे हैं वो ९ (9) है। —[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०३:५४, ६ जुलाई २०२६ (UTC) livtrajfxt8mytdwqbmm6zdcqazvgim पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१ 250 194523 665120 2026-07-06T14:41:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665120 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२ 250 194524 665121 2026-07-06T14:42:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665121 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीः । श्रीमती महारानी भारतेश्वरी विक्टोरिया का चरित्र. 14001 जिसको “श्रीवेङ्कटेश्वरसमाचार" के संपादक मद्दता पं० लज्जारामजी शर्मा से निर्मित कराय, खेमराज श्रीकृष्णदासने बंबई निज "श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम् प्रेसमें मुदितकर प्रसिद्ध किया. संवत् १९५८, सन् १९०१६० सर्वाधिकार "श्रीवेंकटेश्वर" मेसाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है.<noinclude></noinclude> ehw3e65wq7xo0jt7hn0zvriewkzkjxt पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३ 250 194525 665122 2026-07-06T14:42:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665122 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>DAN SCHALI VIDYANIS al Lib-.. AN... 11677 - L F. ⚫ at Receint - A<noinclude></noinclude> emgcqqtn0ry29931zpjm6qc5yxhwegf पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४ 250 194526 665123 2026-07-06T14:42:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665123 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२) भूमिका । राज्य और भारतवर्ष में जो २ विशेष घटनायें हुई उनका भी इसमें समावेश कि- यागया है। उनमें से कई एक घटनायें ऐसी हैं जो अभीतक पूर्ण रूपपर हिन्दी जानने वालों के दृष्टिगोचर नहीं हुई थीं। भाषा इसकी जहांतक होसका सरल की गई है और मुझे आशा है कि इससे पाठकोंको उपन्यास और इतिहास पढ़ने का संयुक्त आनन्द होगा | महारानी जैसी राजा की उपमा पानेवाली महाशया का चरित्र और सा. ही उनके शासनकी मुख्य २ घटनाओंका संग्रह कर उन्हें यथा स्थान रखने में मुझे कहांतक सफलता हुई है इसका उल्लेख करना मेरा काम नहीं है। प्रथम तो मैं हिन्दी का सुलेखक नहीं, दूसरे विलायत से हज़ारों कोस रहकर एक भारत वासी को ऐसा कार्य संपादन करने में बड़ी कठिनता पडसकतीहै, तीसरे यर । कार्य अधिक काल में होनेका था किन्तु मुझे इसके लिये बहुत थोड़ा अवकाश मिलसकाथा । ऐसीदशामें जो कुछ मुझसे पनसका उसीपर संतोष कर आज यह पोथी हिन्दीरसिकों के समक्ष रखताहूं । इससे पहले जिन पुस्तकों की मैंने रचना की है उनका पाठकोंने आदर किया है इसीकारण इस वृहत्कार्य के करनेका मुझे साहस हुआाहे ॥ मैंने इस पुस्तक को चार भागों में बांटा है। प्रथम में श्रीमतीका चरित्र, दूसरे श्रमितके शासन कालकी विशेष घटनायें, तीसरे में ब्रिटिश राज्य और भारत वर्षकी उनके समयमें जो कुछ उन्नति या परिवर्तन हुआ उसका दिग्दर्शन और नौमें श्रीमान् सम्रार् सप्तम एडवर्ड का चरित्रहै । इनके अतिरिक्त इसमें महारानी का वंशवृक्ष और पुस्तक की शोभा बढानेके लिये २७ सुंदर दर्शनीय चित्रभी लगाये गये हैं । उपन्यासों की रचना और अन्य भाषाकी पुस्तकों के अनुवाद की अपेक्षा इतिहास और चरित्र लिखने का काम कठिन होता है । उपन्यास लिखने में रचयिता की लेखनी जितनी स्वतंत्र होता है उतनी इनमें नहीं होती है। इसकारण संभव है कि बहुत ध्यानपूर्वक लिखने पर भी इसमें कोई त्रुटि रहगईहो । इसके सिवाय समयकी संकीर्णतासे जो त्रुटियां रहसकती हैं उनका संकेत मैं ऊपर करचुकाहूँ इसीकारण इसमें कहीं अशुद्धियां रहगई हैं इसी लिये पुस्तक के अंतमें शद्धिपत्र लगाया गयाहै ॥<noinclude></noinclude> 8ou1e854bxw3q8nx3pkeba4qkvhrpwe पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५ 250 194527 665124 2026-07-06T14:42:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665124 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भूमिका | -0-001- श्रीमती महारानी भारतेश्वरी विक्टोरिया महोदया वास्तवमें महाशया थीं । उनका प्रजापर पूर्ण प्रेमथा और प्रजा उन्हें अन्तःकरणसे चाहती थी। वह प्रजाके सुख दुःखको अपना सुख दुःख समझती थीं और समय २ पर अपने सद्गुणोंसे प्रजा के चित्त में सगुणों को स्थान देने का प्रयत्न किया करती थी । उनके ६३ वर्ष ) के शासन में ब्रिटिश जातिने धन, विद्या, मल और उद्योग में असाधारण | उन्नति की थी और राज्य की वृद्धि होते २ उसे यह उपमा दीजाने लगी कि "महारानीके राज्य में कभी सूर्य का अस्त नहीं होता है"। वह दया की मूर्ति थीं और इसीसे भारतवासी उनका मातासे बढ़कर आदर करते थे। यूरोप, एमेरिका और एसिया खंड के राजा और प्रजा की उनपर पूर्ण पूज्यबुद्धि थी और जिन २ राज्यों की इंग्लैंडसे पीढियों से शत्रुता चली आती है वे भी महारानी की प्रशंसा करते थे । राज्यप्रबंध का उचित संशोधन, दया का संचार और मजापालन के सिवाय उनकी पतिभक्ति अप्रतिमथी और उनका सच्चरित्र भारत वर्ष की उन सती रमणियों के समान था जिनका नाम स्मरण करने से हमें विशेष आनन्द होता है । वह ईसाई धर्मपर जैसे दृढ आस्था रखती थीं उसी तरह भिन्नः २ देश की जुदे २ धर्म मानने वाली मजा को अपने २ धर्म के अनुसार चलते हुए देखकर उन्हें अधिक हर्ष होता था। राज्य प्रबंध का अपने ऊपर भारी बोझा होनेपर भी वह अपने बालकों के आचरण सुधारने और उन्हें योग्य शिक्षा दिलाने में कभी त्रुटि नहीं करती थीं। और इन्हीं कारणों से भारतवासी उन्हें देवी की उपमा दिया करते हैं। ऐसी दयामयी महारानी का विस्तृत चरित्र हिन्दी भाषा में अबतक कोई न था और इस कारण यह इस विषय प्रथम पुस्तक है । मुझे आशा है कि, जो महाशय इसे ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे उन्हें अपूर्व आनन्द होगा । सज्जनों के चरित्रों से जितनी शिक्षा मिलना संभव है वह इस में विद्यमान है । इसमें श्रीमतीके चरित्र के अतिरिक्त इनके शासनकाल में ब्रिटिश<noinclude></noinclude> 6plyxfkt4hgly0nu34t95v6fkrdxiis पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६ 250 194528 665125 2026-07-06T14:42:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665125 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीमती भारतेश्वरी महारानी विक्टोरिया । जन्म १८१९. मृत्यु १९०१.<noinclude></noinclude> oflgzpheisjbsuzbpk4c93hgtsvlgyo पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७ 250 194529 665126 2026-07-06T14:42:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665126 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८ 250 194530 665127 2026-07-06T14:43:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665127 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अनुक्रमणिका । विषय. कर्मचारियों को उत्तेजना और सत्कार .... राजनैतिक कामों में प्रभाव छोटे मोटे चुटकुले श्रीमतीकी सुवर्ण ज्यूथिली श्रीमती की हीरक न्यूबिली नाम का अन्तिम उदाहरण महारानी की अन्तिम धीमारी .... 'महारानीकी मृत्यु और संसार में शोक महारानी की समाधि ( ९ ) पृष्ठांक. १४२ १४६ १४७ .... १५१ १५३ १५५ १५९ भारत वर्ष में शोक और थाइसराय का व्याख्यान महारानी पर भारतकी मजाका प्रेम श्रीमतीको भारतमें स्मारक p श्रीमती को आशीर्वाद ( दूसरा भाग ) श्रीमतीके शासनकी मुख्य घटनायें. प्रथम वर्षकी तीन बातें ONZE ---- ---- .... १६१ .... १६५ १६६ १७३ .... १७४ १७६ १७७ काबुलका प्रथम युद्ध व्यापारकी स्वतंत्रता और पाप्य यंत्र चीनसे लड़ाई, अदनका बंदर और दास व्यापार.... सोमनाथ मंदिरके किंवाड ---- सिंधके अमीरों और ग्वालियर नरेशसे युद्ध कंपनी और लाट साहनकी खटपट सिक्ख युद्ध और कोहनूर हीरा ९ इंग्लैंड में सूरतके नव्या और भारतकी रेल्वे • इंग्लैंडका रूस और फ्रांससे युद्ध .... १ इंग्लैंडकी बृहत् प्रदर्शनी और महादेशका युद्ध १२ ईस्ट इंडिया कंपनीका नवीन पट्टा १३ नागपुरको खालसा और भारतमें तार क्रीमियाका युद्ध कीमियाके युद्धके समय इंग्लैंड की स्थिति .... १७८ **** १७९ .... १८१ ..... १८२ **** १८५ १८६ .... २८७ . १८९ १९० १९१ ---- १९३ ** १९४ १९५ १९७<noinclude></noinclude> b4azdslgrexv9qzlmkya7ae2412v34h पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९ 250 194531 665128 2026-07-06T14:43:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665128 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १० ) महारानी विक्टोरिया चरित्रकी- विषय. पृष्ठांक. अध्याय. १६ रुमकी रक्षा में तीन राज्योंका मेल १७ अवधका खालसा १८ ईरान और चीनसे गवर्नमेंट के युद्ध १९ भारतवर्ष का बलवा .... २० वलवेके विषयमें राज्ञीपतिकी सम्मति ... २१ भारतके नवीन प्रवन्धके विषयमें श्रीमती के विचार २२ श्रीमती का ढिंढोरा .... ..... २३ विलायत और भारत के बीच में तार २४ स्टार आफ इंडियाकी उपाधि और विश्वविद्यालय २५ भारतका भयङ्कर अकाल २६ भारतवर्षका नवीन प्रबन्ध ---- २७ एमेरिकामें युद्ध और सट्टेका व्यापार २८ बंगालमें तूफान २९ एबीसीनियाका युद्ध .... **** ३० ओडीसका अकाल और सुलतानका स्वागत ३१ युद्धके विषय में सम्मति और स्वेजकी नहर ३२ काबुलके अमीरका अंगाल में सत्कार ३३ भारतमें ड्यूक आफ एडिनबरा और नवीन संशोधन ३४ फ्रांस और जर्मनीका संग्राम ३५ लार्ड मेओका खून और मध्य एशियामें रूस ३६ बंगालका दुर्भिक्ष और लार्ड नार्थ ब्रूककी कीर्ति ३७ बड़ोदेके गायकवाड़का पदच्युत होना ३८ भारतवर्षकी मनुष्यगणनायें ३९ श्रीमान प्रिंस आफूवेल्सका भारतवर्ष में स्वागत ४० श्रीमतीको “ महारानी" की पदवी ४१ दिल्लीका राजसी दर्बार ४२ भारतमें आँधी और दुर्भिक्ष ४३ रूस और रूमका अन्तिम संग्राम .... .... **** .... ---- .... **** *** v v v v uu २३ २३ २३ .... २३/ .... ..... २४ .... २४ः ---- **** ---- २४९ ४४ भारतके समाचार पत्रोंकी स्वतन्त्रता ४५ काबुलका अन्तिमयुद्ध और रुसीचाल ४६ अनेक नवीन आविष्कार ४७ पंजाबके गोवधपर बखेड़ा ४८ मिसर में अँगरेजी राज्य **** .... १००० **** .... २४ ---- **** paud २४. **** २५ २५६ २५/<noinclude></noinclude> c4era24s8t0v9rjtn86yl84jadr19yv पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१० 250 194532 665129 2026-07-06T14:43:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665129 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शिवाय. 4 श्रीः । श्रीमती महारानी विक्टोरिया चरित्रकी- अनुक्रमणिका । विषय. (प्रथम भाग ) २ इंग्लैंड और महारानीके माता पिता * महारानी का जन्म ३ बालवय शिक्षा .... .... राजकुमारीका प्रथम नृत्य और सौंदर्य राज्यासनकी आशा **** राज्यारोहणसे पूर्वकी विशेष घटनायें राजा विलियमकी मृत्यु पृष्ठांक .... .... ६ ८ .... .... .... ૧૪ १७ १८ २४ ..... २५ wwww सिंहासनारोहण **** २९ •वाहोत्सव बाहमें भोज शासनारंभ..... गिल्ड हालका दरबार और पहली पार्लियामेंट ज्याभिषेक न गृह का जाल नकुमार एलबर्टसे प्रणय यका प्रकाश लियामेण्टकी सम्मति और राजकुमारका सत्कार हागरात और दम्पति का प्रेम ३६ ३९ .... .... ४२ ५१ .... .... ५३ ५८ ६१ .... ६४ .... .... ६९ .... ७० .... म्पत्यसुख और दंपति पर गोली .... ७२ गर्भा रानी ७५ [जकुमारीका जन्म लोका पदत्याग .... ७६ ৩७<noinclude></noinclude> 6rgak1wa20mm66pjsk1na33r2qhjblb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११ 250 194533 665131 2026-07-06T14:43:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665131 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ८ ) अध्याय. महारानी विक्टोरिया चरित्रकी- २४ युवराजका जन्म .... २५ पुत्रपुत्री की शिक्षा विषय. पृष्ठांक ... **** ७८ ८२ ८४ ८५ २६ इंग्लैंड में हलचल और श्रीमतीका नाच २७ प्राणसंकट.... .... **** २८ फ्रांस और बेलजियमकी यात्रा २९ श्वशुर की मृत्यु ३० फुटकर बातें .... ३१ फ्रांस नरेशका पदच्युतहोना ३२ जन्म मृत्यु और प्रदर्शिनी .... ---- .... ---- ३३ बड़ी २ घटनायें और वेलिंग्टनकी मृत्यु ३४ राजकुमारियोंके विवाह ३५ राजमाताकी मृत्यु और राजकुमारीका बिवाह ३६ दुःखका आरंभ ३८ राज्ञीपतिका शासनान्त ३७ पतिका स्वर्गवास ३९ दुःख दा **** ४० वैधव्यका दुःख ---- .... .... .... .... **** .... .... ४१ युवराजका विवाह और श्रीमतीकी यात्रा ४२ पौत्रका जन्म और शोकयुक्त रानी ४३ युवराजकी बीमारी ४४ अनेक घटनायें ---- **** ४५ महारानीकी संततिकी मृत्यु ४६ महारानीकी संतति ४७ राजपौत्र और पौत्रीके विवाह **** ४८ युवराजका रौप्य विवाह और इम्पीरियल इन्स्टीटयूट ४९ प्रजाम ५० महारानीकी आय ५१ श्रीमतीका दान ५२ समान शोधनकी रुचि और धैर्य ५३ श्रीमतीका परिश्रम ५४ महारानी का स्वभाव .... **** २३३ २३ .... **** www . २३ २४ " २४२ २४६ २४७ २४८ .... २५१ ....... २५२ ...... २५<noinclude></noinclude> 9e8cc3oi66zblnx3hxxt8cb8qszpneo पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२ 250 194534 665132 2026-07-06T14:43:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665132 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(६) विक्टोरिया सप्तक । निजपरधरमको दृढ जग करके ॥ सतिनकी मतिनको पतिनमें दृढकर, भारतभवनन में भूरिभोग भरकै । हन चुराय हाय प्रजाको विहाय रानी, देवलोक कह रिबेको गई फिरकै ॥ ७ ॥ पण्डित - नन्दलालजी शास्त्रिरचित.<noinclude></noinclude> 7zc2pddp0rp65ho95z84er86xzx41n8 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३ 250 194535 665133 2026-07-06T14:43:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665133 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विक्टोरिया सप्तक । (4) साम दान भेद दंड नीतिमैं निपुणनृप, अरिदलदलवेको भये समरत्थ हैं । संधि अरु विग्रहके विग्रहसे रणराजै, जाँके बल देखि भाजैं वीर अतिरत्थ हैं ॥ ऐसे जो भये तो कहा प्रजापोष कीने बिन, राजनकी राजनीति धूरमैं धसत्य हैं । धन्य महारानी विकटोरियाके गुणनमैं, प्रजापशेष गुण जिमि अंगन मैं मत्थ हैं ॥ ४ ॥ कवितासराहिबे को कविजनवृन्द भन्यो, वनितासराहिबेको कामिमति मोटी है । शूरनसराहिको समर सयानें भन्यो, मित्र सराहिबेको विपतिनकोटी है ॥ महारानी विकटोरियाको गुनगन भली, भन्यो तो प्रमान कहा मोरी बुद्धि छोटी है । राजनकी राजनीति रीतिके सराहिबेको, रावरंकप्रजाबानी सुन्दर कसोटी है ॥ ५ ॥ मित्रनसराहे गुनगन ना सराहे जात, शत्रुनसराहे तामै भ्रमकी न ठौर है । निजप्रजाभेट पाये नृपकी अधिकता का, परप्रजाभेट मिले जानो नृपमौर है ॥ निजप्रजारक्षक सो कौन ना नृपनमाहिं, परप्रजारक्षक सो नाहिं ठौर ठौर है । एते गुन महारानी विकटोरिया में जाकी, कोटिन निवाजिबेको लोचनकी कोरहै ॥ ६ ॥ ऐसी गुनगनखानी महारानी जगजानी, सम्वत तिरेसठलौं प्रजापाल करकै । पुस्तनके वैरमेट पूज्य कै लैले भेट,<noinclude></noinclude> 2fn7zkwss0ejv4fqupsuzmf6rga52yf पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४ 250 194536 665134 2026-07-06T14:44:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665134 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विक्टोरिया सप्तक | राजनके राजसों न सरे काज जान जग जगदंब भारतेश्वरी सो औतरी अहो । मातसम पालन न पोषण करत पिता, यौं ही जान जगतकी जननी भई अहो ॥ प्रत्यच्छ प्रमान कहा जाकी प्रजावृद्धि दे अरु भारी भोग देख चौंके कौन ना अदो / महारानी विकटोरिया के गुण भनौं किमि, शेषसो प्रताप जो विधाता ना दियो अहो ॥ १॥ जादिन सिंहासनपै रूढ के आज्ञा कीनी, वाही दिन जुगसी पलट्टि तेज छैगये । रूमशाम चीन अमरीका एशियाके नृप, ज्थनके जूथ के शीघ्र भेट दैगये ॥ पुनि लोकपालन के मध्य खरभरी परथो, भानु कीनी प्रतिज्ञा सो राज त्यागि ना गये । धन्य महारानी तुव राज्यके प्रताप छाये, ईति भीति दुःख नाशि जन सुखी हैगये ॥ २ ॥ महारानीराजत जो कौतुक भयो है भूमि, सो तो नाहिं भयो अरु आगे नाहिं दइगो । नारीतनमध्य जेतो अपगुनगन कह्यो, सो तो गुनगन हैकै छनमाहि छइगो ॥ नारीतन नेक न निहारत जो ज्ञानीगन, बोहू जाके दरशको तरसत रइगो । नारीतननिंदाको जो वेद रु पुरानगन, महारानीराजत सो गाढी नींद स्वइगो ॥ ३ ॥ /<noinclude></noinclude> 495tqdebc4qdqavh2ctbg5c7w5gm8vj पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५ 250 194537 665136 2026-07-06T14:44:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665136 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भूमिका । ( 3 ) इस पुस्तककी रचना करने में " गुजराती" के संपादक मिस्टर इच्छाराम सूर्य- राम देसाई, मिसेज़ ओ. एफ् वाल्टन, मिसेज़ पुतली बाई डी. एच. वाडिया, मिस्टर एल वेलेंटाइन, मिस्टर जी बार्नेट स्मिथ, मिस पुतली बाई जहांगीर कावराजी रचित नरित्रों, 'इन मिमोरी आफ विक्टोरिया ( अवर येश्यस कीन ) आदि पुस्तकों और 'टाइम्स ऑफ इंडिया, पायोनियर, एडवोकेट आफ इंडिया, अमृतबाजार पत्रि- समाचार, गुजराती, केसरी" आदि देशी और (जेटलबोमेन) आदिविलायती समाचार पत्रों और भारतवर्षक इतिहासोंसे आश्रय लिया गयाहै और इस बात के लिये मैं उन सबको धन्यवाद देता हूं । मेरा विशेष धन्यवाद श्रीवेंकटेश्वर समाचार और यन्त्रालय के स्वामी श्रीयुत सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी के लिये है अविन जैसे अल्पज्ञ मनुष्यका आदरकर इस पुस्तकको वनवाने का काम सौंपा और इसे छापकर प्रकाशित किया । उन्हींका इस पुस्तकपर सब प्रकार का स्वत्व है । अंत में मैं अलीगढ़ निवासी पंडित गंगाशंकरजी पचौली (नागर) को भी धन्यवाद देता हूं जिन्हों ने श्रीमती महारानी विक्टोरियाकी सायन और निरयण जन्मकुण्डली लिखकर इसमें प्रकाशित करनेके लिये भनी ।। यदि इस पुस्तकका हिन्दी रसिकोंमें आदर होगा तो मैं अपनेको कृत कृत्य समझंगा ॥ खेतवाड़ी - बंबई. ता० २५ सितम्बर सन् १९०१ ३० बामनद्वादशी सं० १९५८. า हिन्दीका लघुसेवक- महता-लजाराम शर्मा, ( वृंदा निवासी. )<noinclude></noinclude> f3u0skcv975r6ov4aoth114xdd7myk5 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६ 250 194538 665138 2026-07-06T14:44:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665138 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(य. अनुक्रमणिका । विषय. भारत वासियों को स्थानीय प्रबन्ध में अधिकार ( शिक्षा कमीशन) अलबर्ट बिलपर आन्दोलन ( लार्ड रिपनका सत्कार ) ade इसका भारतपर दाँत और अमीरसे भेट (लेडी डफरिनफंड ) आयलैंडमें हलचल ** उडानका युद्ध रादेशमें सर्कारी राज्य ट्रांसवाल इंग्लैंडके युद्ध मिशांतिका उपद्रव भारतवर्ष के देशी रजवाड़े *... .... ---- भारत वर्षकी पश्चिमोत्तर सीमाका युद्ध भारत वर्ष में प्लेग और अकाल पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवधमें हिन्दी द्वितीय भागका परिशिष्ट ( तीसरा भाग ) ( ११ ) पृष्ठकि. २५५ २५६ २५८ ---- २५९ २६१ .... २६३ २६४ २६७ २६८ .... २७० .... २७२ २७५ .... २७६ श्रीमतीके शासन में ब्रिटिश साम्राज्यकी उन्नति । राज्यवृद्धि ( मनुष्य संख्या और व्यापार ) वैज्ञानिक उन्नति और आविष्कार मजाकी दुर्दशासे सुदक्षा विद्या और साहित्यकी उन्नति वाष्प और बिजली 'ब्रिटिश राज्यका विजय भारतवर्षकी उन्नति और परिवर्तन .... अन्य राज्यों से ब्रिटिश शासनकी तुलना **** ( चौथा भाग ) श्रीमान् सम्राट् सप्तम एडवर्डका चरित्र । १ जन्म, विवाह और शिक्षा .... ---- साली से विवाह करनेका बिल और एमेरिकाकी यात्रा ३ श्रीमान्की भीमारी और भारतकी यात्रा ४ यहूदियोंपर दया और गुप्त यात्रा ---- .... ५ श्रीमान्पर माणसंकट और न्यायालय में साक्षी ६ राजध ७ श्रीमान्के गुण और स्वभाव .... २७९ .... २८२ २८४ २८५ २८६ .... २८७ ..... २८८ .... २९४ २९९ .... ३०३ ..... ३०५ ३०७ ३०८ .... ३०९ इति ।<noinclude></noinclude> 92xvfb4jsnrf9evr6ukrkc2x9vs7o0b पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७ 250 194539 665139 2026-07-06T14:44:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665139 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीमती महारानी विक्टोरिया के चरित्रके चित्रों अनुक्रमणिका । संख्या. चित्र. १ महारानीके पिता डयूक आफ़र्केट..... २ महारानीकी माता विक्टोरिया मेरी लहना ३ छः वर्षकी बालिका विक्टोरिया ४ विक्टोरिया की सैर **** FLEE **** ५ महारानीकी शिक्षकासे बात चीत.... ६ राज्य मासिके समाचारपाते समय विक्टोरिया ७ महारानीका शपथलेना ..... ८ महारानी का राज्याभिषेक.... ९ इंग्लैंड राज्यका सिंहासन १० महारानीका मुक्कुट **** ११ महारानीके पति राजकुमार एलर्ट १२ दुलहिन विक्टोरिया १३ छ. वर्षके युवराज १४ डयूक आफू एडिनबरा १५ ड्यूक आफू कनाट **** .... १६ युवराज (मिंस आफवेल्स ) १७ युवराजपत्नी एलेक्जेंड्रिना १८ राजपौत्र ड्यूक आफ याक १९ राजपौत्र वधू २० प्रपौत्र प्रपौत्री समेत महारानी २१ अस्पताल का निरीक्षण .... .... २२ प्रथम ज्यूबिलीके समयका महारानी का चित्र २३ वृद्धा महारानी २४ भारतीय सेवक सहित महारानी २५ श्रीमान् सम्राट् सप्तम एडवर्ड २६ श्रीमती महारानी एलेकू अॅड्रा .... cris www .... इति । - **** पृष्ठांक ९ **** १३ १. १५.. १७. २९. www "<noinclude></noinclude> pyllmz8kf61w94gp4dij8t5h38icqx5 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८ 250 194540 665141 2026-07-06T14:44:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665141 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विद्या थली सा. श्रीमती महारानी विक्टोरियाका चरित्र । पहिला भाग । अध्याय १. इंग्लैंड और महारानीके माता पिता । इंग्लैंडके इतिहासमें केवल दोही राज्य सर्वोत्तम मानेजाते हैं । इन दोनों राज्योंने साधारण स्थितिसे परिवर्तन कर इंग्लैंडको भूमण्डलका एक देदीप्यमान यह बनाया है। रानी एलिजाबेथ और महारानी विक्टोरियाके शासन में इस राज्यकी अमतिम उन्नति देखकर यह कहा जासकता है कि इस इंग्लैंड का प्रारब्ध स्त्री राज्यकर्त्रीक समयमें अधिक चमकता है रानी एलिजाबेथके शासन में शिक्सपिअर स्पेन्सर बेकन और घटले जैसे नररत्नोंके उत्पन्न होनेसे इस राज्यकी 'कीर्तिका डंका यूरोपभर में बाजना आरंभ हुआ था वही कीर्त्ति महारानी चिक्टो- रिया के शासन में भूमण्डलमें उत्कृष्ट रूपकर व्याप्त हो रही है । हेस्टिंग्सकें युद्ध नाडीके डयूक विलियमके इंग्लैंडका जय किये माद केवल छः राजाही महारानीके वयको पहुँचे थे। इंग्लैंडके इतिहासमें केवल दूसरा उपानही एक राजा हुआ था जिसका वय महारानीसे अधिक था। शेष श्रीमतीसे कम उमरमें मृत्युको माप्त हुए और उन्होंने श्रीमतीसे थोड़ेही वर्षे राज्य किया ।<noinclude></noinclude> gbnlo3f9bi8phrk1z3rri9wila72qrd पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९ 250 194541 665142 2026-07-06T14:45:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665142 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । महारानीके पिता ड्यूक आफ् ट । महारानीके पितामह राजा तीसरे ज्यार्ज स्वभावमें बड़े कठोरथे। अपने पुत्रोंके साथ बहुत कड़ाईका बर्ताव करते थे। इनके तीन पुत्र थे। एक राजा चतुर्थ ज्यार्ज, दूसरे राजा चतुर्थ विलियम और तीसरे महारानीके पिता केंटके ड्यूक एडवर्ड । पिताकी कठोरतासे डच्चूक आफू फेंटको युवावस्थामें बड़ी तंगी भोगनी पड़ी थी। पिता तृतीय ज्याने इनके पद और प्रतिष्ठाके योग्य इन्हें द्रव्य नहीं देते थे । इस कारण इन्हें ऋण लेना पड़ा था। महारानीके पिता प्रसिद्ध सैनिक थे । इंग्लैंडकी सेनामें इनकी बड़ी प्रतिष्ठा और दबदबा था । यह स्वभावके सादे और स्वच्छ थे और यद्यपि इनके पिता इनसे अमसन्न थे परंतु वहांकी प्रजाका उनपर बड़ा विश्वास था और इसीकारण सेनामें इनको बड़े २ पद दिये गये थे । अनेक युद्धों में वीरता दिखाकर जब इनका क्य बुढ़ापेके निकट पहुँचा तब इन्होंने विवाह करनेकी इच्छा की। इनकी स्त्री कोई मसिद्ध सुंदरी न थी किन्तु नर्मनी<noinclude></noinclude> amb6vdjct3i61z1gr55qbtfytzlccjj पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२ 250 194542 665143 2026-07-06T14:45:10Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* आवश्यक नहीं */ 665143 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude><noinclude></noinclude> nq2fpctlpggurkzvjlio3eqwj3zgj0v पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२० 250 194543 665144 2026-07-06T14:45:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665144 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग 1 ( ३ ) महारानीकी माता विक्टोरिया मेरी लुइजा ।<noinclude></noinclude> on9bvrjyt9mkna6pw14ctiq6il3x76r पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१ 250 194544 665145 2026-07-06T14:45:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665145 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२ 250 194545 665146 2026-07-06T14:45:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665146 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मथम भाग 1 ( ५ ) के एक छोटे गाँवकी रहनेवाली विधवा राजकुमारी विक्टोरिया मेरी लुईना थी । इनका वालवयमें एक बूढे राजवंशी लिनिजतके राजपुत्र एमिलासे विवाह होगया था । प्रथम विवाहसे इनको दो संतति थीं। दोनों बालकोंकी शिक्षा दीक्षा पर इनका विशेष ध्यान देखकर राजकुमारीकी नम्रता, सहनशीलता, बुद्धि और सगुणोंपर ड्यूक आफ् केंट मोहित होगये । परस्परके कोर्टशिपके अनंतर राज- कुमारी इनसे प्रसन्न तो हुई परंतु रुपयेकी तंगीने इस भावी जोड़ेके संयोगमें बाधा डाली | प्रथम पतिने मरते समय जो अपनी विधवाके लिये पाँचहजार पौंडका वार्षिक नियत कर दिया था उसमें शर्त यह थी कि, यदि कुमारी दूसरा विवाह करले तो यह वार्षिक मन्द कर दिया जाय। इधर डयूक आफ् फेंटके पास पैसेकी संकीर्णता और उधर विवाह करलेनसे, अपनी प्राणप्यारीका पचिहजार पडकी वार्षिक आप बंद होनाना । ये दोनोंही बातें इस प्रेमबद्ध जोड़ी की इच्छा पूर्ण न कर- नेका कारण हुई । बिचारे दोनों अपना मन मारकर चुप होगये || परंतु इंग्लैंड राजा तृतीय ज्यानके बड़े पुत्र चतुर्थ ज्यानेकी कन्या शार्लेट सितान बिना मरगई और इसकारण वहांकी मजाको गादीके वारिसके विषयमें चिन्ता होनेलगी । प्रजाके अनुरोधसे कठोर पिताने राजकुमार एडवर्डके विवाहके लिये छः हजार पौंडका वार्षिक वेतन नियत किया। इस कार्यसे इस भावी जोड़ीके मुरझाये हुए मन फिर लहलहाने लगे । सन् १८१८ के मई मासकी १९ वीं तारीखको सेक्सको के राजा लियोपोल्ड की बहन राजकुमारी विक्टोरिया मेरी कुइना अनेक मासकी उत्कंठा और वियोगके पश्चात् अपने मिय और इच्छित पति केंटके डचूक एडवर्डकी सहधर्मिणी हुई । इनका विवाह जर्मनी में हुआथा और विदेशमें विवाह होने और बाहरही संतान उत्पन्न होनेसे उस मालकका गादीपर स्वत्व नहीं रहता है। इस प्राचीन नियमके अनुसार ये वर वधू इंग्लैंड बुलायेगये। वहां आनेपर इंग्लैंड की राजरीतिके अनुसार इनका फिर विवाह हुआ। परंतु इंग्लैंडमें रहकर अपने पद और प्रतिष्ठाके अनुसार खर्च करनेकी इनमें शक्ति नथी इसलिये लाचार होकर डयूकको अपनी प्रियपत्नी सहित फिर जर्मनी में निवास करना पड़ा। यह स्थान डयूक आफू केंटकी नववधू उचलू के पूर्वपतिका एम्बोर बेल नामक ग्राम में एक महल था यहीं डबे ने गर्भधारण किया । वरवधूका हर्ष गर्भके साथ ही बढ़ने लगा । इंग्लैंडकी प्रजाको अपने भविष्यत् के राजाके अन्मधारण करनेकी आशा हुई । गर्भमाप्तिसे सातवें मासमें ड्यूक अपनी प्रियवधूको लेकर इंग्लैंड आये । इनको अपनी भावी संततिके लिये इतना प्रेम और उत्साह था कि, वह एम्बार बेलके मह- कसे केस्टिंग्टन मासादतक अपनेदी हाथसे गाड़ी हांकते हुए आये ॥<noinclude></noinclude> b3v7z261cos3kly3c7odxc5ucm7zh1n पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३ 250 194546 665147 2026-07-06T14:45:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665147 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अध्याय २. महारानीका जन्म | अप्रेल मासभर लंडनमें सुखपूर्वक निवास करनेके अनन्तर मईकी२४तारीखको सन् १८१९ की वसंत ऋतु शुभ मुहूर्तमें ड्यूक आफ् रोसेक्स, डयूक आफ वेलिंगटन, आर्चबिशप आफू कॅटन घरी ( इंग्लैंडके प्रधानपादरी ) लार्ड लैंसडाउन और ज्यार्न केनिंग के समक्ष दयामयी विक्टोरियाका जन्म हुआ || इनका जन्म ४ बजकर १५ मिनटपर हुआ था। उन दिनोंमें लंडनमें सूर्योदय ३ बजकर ६९ मिनटपर होताथा । लंडनके उत्तर अक्षांश ५१।३२ हैं । जन्मकालके सायन ग्रह और लग्न | र० २ चं० मं० १ ० बु० गु० शु० श० रा० के० प्र० लम दशम. १० ° ५ ८ १० ३ १७ ८ १६ १८ १८ २३ ५ ६ ४० २०३५८ ३९ ३९ ५६ ५६ इनमेंसे अयनांश २२ अथवा ० ११ २६ २८ ४५ ४६ ४० १८ घटाने से निरयण कुंडली मनजातीहै. निरयण पंचांगके अनुसार उस दिन ज्येष्ठ शुक्ल १ सोमवार संवत् १८७६ था । + सायन जन्मलग्न । ल सू६ १२ (13) ५ (२/२) ३२६ सन् १८१९ मई २४ चन्द्रवार ५१/५२ उत्तर अक्षांश) जन्म 22 (23) . गु. १६४५६ ११(२३) दि. १०(23) As (c) (Path)) प्र. २३२० अ. Li स १ "केसरी" मराठी साप्ताहिक समाचार पत्र तारीख १९ जनवरी १९०१ + पचौली गंगाकरजी लिखित ।<noinclude></noinclude> 13mw87awacs60ufv4h0zy6wvkegxq5p पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४ 250 194547 665148 2026-07-06T14:45:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665148 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( 3 ) १२/५४ रा १२ २२।१५ प्रथम भाग | x निरयन जन्मलग्न. ३ ૪ २ નોર્ सू११११ १२३४ १७१५१ १ बु३।३४ शु५०० १०/५७ ५ २२/१५ /१२/५० 市 २०१५ と ५४१५२ ७ ** ११ २२।१५ गु२५।५१ १०१५७ 90 २२/५३ ૨૪ म२।१५ ठीक एक मास के अनंतर २४ जून को महारानी को वापतिस्मा दियागया । विक्टोरियाका जन्म मई मासमें हुआथा । इंग्लैंड में यह मास बड़े आनन्द और स्वास्थ्यका समझा जाता है इसीलिये इनके माता पिताने इनका नाम " मे फ्लावर" अर्थात् मईका पुष्प रक्खा । सबही बालकों के वास्तविक नाम और और प्यार 'के और होते हैं । विक्टोरियाका "मे फ्लावर" नाम लाडका था किन्तु मापतिस्मा "देते समय इनका नाम “ एलेक्जेंड्रिना विक्टोरिया" रक्खा गया । इनके पिता- का विचार यह था कि, अपनी प्यारी पुत्रीका नाम एलिजावेथ रक्खाजाने क्योंकि इंग्लैंड की प्रजा को यह नाम बहुत मिय है । नापतिस्मा देने वाले कंटरनरीके प्रधान पादरीने इनका नाम “एलेक्जेंड्रिना" नियत किया। बालिकाके पिताके 'अधिक अनुरोधसे इस नामके साथ महारानीकी माताका नाम विक्टोरिया और जोड़ा गया। इस कारण श्रीमतीका पूरा नाम “एलेक्जेंड्रिना विक्टोरिया" हुआ । जिस समय श्रीमती तीन मासकी हुई उनके अगस्त महीनेमें डाक्टर जेनर- ने सीतलाका टीका लगाया । इंग्लैंडके राजघरानेंमें टीका लगानेका यह प्रथम अवसर था। * पचौली गंगाशंकरनी लिखित ।<noinclude></noinclude> h1qyubmc1vow5y2yj7ghdzzas7l2do2 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५ 250 194548 665150 2026-07-06T14:46:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665150 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(<) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अध्याय ३. बालवय । जब श्रीमतीका चय छः मासका हुआ उनकी माता उन्हें लेकर डियोन शा- थर परगने के सिड मौथ स्थानमें चलीगई। वहांपर एकदिन यह बालिका दाई- की गोदी में खेलरहीं थीं इतनेहीमें अकस्मात् कमरेकी एक खिड़की का किवाड़ तोड़ कर सनसनाती हुई एक गोली इनके शिरपर पहुंची । श्रीमतीके शासनमें प्रजाका बहुत कुछ उपकार करना भगवान्‌को अभीष्ट था इसलिये ईश्वरने गोलीसे बालिका की रक्षाकी ॥ डचेज् आफू केंटने अपनी प्यारी बेटीको अपने स्तन पिलाकर पालाथा । वह कभी इनकी रक्षाका भार नौकरोंपर नहीं छोड़ती थी । सदा अपनेही पास रखती और मिताहार, सत्यभाषण और नम्रता शिखानेपर बहुत ध्यान देती थी। वह जा- नतीथी कि, नौकरोंके भरोसे रहने में लड़की चिड़चिडी होजायगी इसलिये अपनी पुत्रीको खिलाने पहनानेका काम अपने हाथसे करती थी | दोनों माता पिता विक्टोरिया पर अत्यंत प्रेम रखते थे। एक बार माताने अपने किसी मित्रको लिखाया कि, मेरी पुत्री डेवनशायर की स्वच्छ पवन गुलाब की तरह खिलरही है। वह दिन दिन दृढ और स्वस्थ होती जाती है। इसके चन्द्रकला के समान बढ़नेसे कितनेही लोगोंके हृदयमें कांटासा चुभता है । " ये कितनेही लोग” इस बालिकाके ताऊ ज्यार्ज थे। महारानीके पति एडवर्डने अपने सदाचार और सद्व्यवहारसे प्रजाके मन जीतलिये थे । राजकु -! मार एडवर्ड की प्रियपत्नी डचेजूका भी प्रजा वडा आदर करती थी । जिस स-, मय यह प्यारी बालिका को लेकर बाहर निकलती थी प्रजा "हुर्रे" के पुकारते " अपना हर्ष प्रकट किया करती थी । पिता ड्यूक आफू केंट एकांत वास अधिक चाहता था । दुर्भाग्यने उसके सुखके दिनों को शीघ्रही समाप्त कर दिया। बालिका एक वर्षकी भी न होनेपाई थी इतनेहीमें अकस्मात् मेह बरसा । वृष्टि में महारानी के पिताके कपड़े भीगकर सराबोर होगये । मार्गमें उनको अपनी प्यारी पुत्री दिखाई दी । पुत्री वात्स- ल्यने पिताको अधीर कर दिया । पिता पुत्रीके आमोद प्रमोद में भीगे कपड़े बदलना भूल गये । उस समयकी शर्दी ऐसी बैठी कि, थोड़ेही दिनमें ड्यूक आफू केंट अपनी प्राणप्यारी और 'मईके पुष्पको छोड़कर चल बसे । इंग्लैंडमें बड़ा शोक हुआ । डयूक आफू केंट के सद्गुणोंपर लक्ष्य देकर प्रजाने उनको “प्रजामिय क" की उपाधि दी ॥<noinclude></noinclude> smlzqs6i3a78sf7slip23kdm74lmvfs पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६ 250 194549 665151 2026-07-06T14:46:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665151 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( ९ ) अब बालिका विक्टोरियाकी रक्षाका भार केवल माता पर पड़ा । पतिवियोग से परमदुःखित होकर डचेज सिडमायसे लंडनआई । उसीदिन ( २९ जनवरी को ) अपने पुत्रकी मृत्युके सातवें दिन इंग्लैंड का राजा तृतीय जार्ज अकस्मात् मृत्युवश हुआ। चौथा जार्ज राजा हुआ । राजसिंहासनपर विराजकर राजाने भ्रातृवधूका प्रयोध किया । उभेजने बालिका विक्टोरिया पितृव्य की गोड़ में रख- कर आर्तनाद के साथ आसूं भरी आँखोंसे कहा अच "इस लड़की के पिता आप" ॥ माताने पतिमरण के पश्चात् घरसे बाहर निकलना यन्द करदिया । गवर्ने- मेंटने भी डचेजूसे ऐसाही करनेका अनुरोध किया || २१ जुलाई सन् १८२० को एक व्यक्ति महारानी की मातासे मिलने गया था । उससे डचेजूने कहा कि “ इस बालिका के जन्मसे थोड़ेही मासके अनन्तर इस अज्ञान देशमें मैं पतिविहीन और यह पिता बिना होगई। यहां कोई हमारा मित्र भी न रहा । मुझको अँगरेजी भाषाका अच्छी तरह बोध नहीं है। समय बड़ा टेढ़ा है परंतु मुझे इन बातों की कुछ पर्वाह नहीं है। मैंने कामोंको तिलांगुलि देकर इस लड़की को उत्तम शिक्षा देनेका बोझा अपने ऊपर लिया है" । वालवयसैही इनकी माता इन्हें एक साधारण बालिका की तरह घरके काम काज शिखाने लगीं । ठेठसेही सादे भोजनको टेप डाली | केन्सिंगटन के राजभवनमें सादगीके सिवाय किसी प्रकार का आडंबर न रक्खा गया । उस समय महारानीकी सहेलियों में इनकी बहन (डबेजूके प्रथम पतिकी कन्या) फियोडोरी रहा करती थीं ॥ बालिका विक्टोरियाको पुष्पोंपर बड़ी मीति थी। यह केन्सिंगटन राजप्रासादकी खिड़कियोंके गमलोंको अने हाथसे सींचा करती थीं। विक्टोरिया के बालवय में इंग्लैंड का बाजार आजकलकी तरह खिलौनोंसे भरा हुआ नहीं था । वह घरके खेल खेलनेके अतिरिक्त अपने गधेपर चढ़कर केन्सिंगटनके भागमें फिरा करती थीं और जब कभी उनकाजी उकताता वह मुद्दे यहूदी सर मोसेस मोंटी फ्योरके बगीचेमें जाकर विश्राम लेती थीं ॥ कुमारीकी चौथी वर्षगांठपर राजा चतुर्थ ज्यार्ज ने इनको अपना चित्र भेंट किया था। वह राजकुमारी के साथ बड़ा प्रेम रखते थे और कभी २ इन्हें दायत दियाकरते थे। इनका हास्यवदन और चित्ताकर्षक सौंदर्य देखकर इन्हें सबड़ी लोग खेल खिलाया करतेये । इनपर लोगों का अधिक प्रेम देखकर इन्हें बड़ा आश्रय होता और यह कहतीं कि मुझसे लोगोंका इतना मेम क्यों ?<noinclude></noinclude> 92l6ejbjqqqiopghzlf9wpymczcrfgt पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७ 250 194550 665152 2026-07-06T14:46:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665152 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१०) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । छः वर्षकी बालिका विक्टोरिया । मेरी बहन फियोडोरी को क्यों नहीं खिलाते हैं । एक बार यह गाडी में "बैठकर फिरने जातीं थीं । गाड़ी के एक छोटा टट्टू जुता हुआ था । एक बालक गाड़ी हांकताथा | अकस्मात् एक कुत्ता टट्टूके पैरों में आकर चिपटगया । ट चौंका और बालिका विक्टोरिया सहित गाड़ी उलटगई । संयोगवश एक सैनिक जिसका नाम प्राइवेट मेलोनी था उस जगह उपस्थित था । उसनें, गिरतेही इनको उठालिया और इस कारण बालिका कुचलनेसे बचगई ॥ 1 राजकुमारीकी माताने इनको मितव्ययताकी भलीमकार शिक्षा दी थी एक दिन बालिका खिलौने खरीदने के लिये बाजार में गई थीं । वही जाकर उन्होंने अपने सब भाइयों और बहनों के लिये खिलौने मौल लिये । चलते २ उनी को एक बालककी याद आगई उन्होंने उसके लिये दूकानदार से एक पेटी मांगी। महा-' रानीके साथ में जो आया था उसने कहा कि अब पैसे चुकगये हैं पेटी लेने के पैसे नहीं रहे हैं महारानी सुनकर चुप होगई। दूकानदारने विनयपूर्वक कहा कि, - मैं आपको यह पेटी भेंट करता हूँ परंतु महारानी ने ऐसे अवसरपर उसकी भेंट स्वीकार करना उचित न समझा ॥<noinclude></noinclude> srvyd3wkb04d5xhfgpdcxlqhglkxdy2 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८ 250 194551 665153 2026-07-06T14:46:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665153 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । विक्टोरियाकी सैर । ( ११ )<noinclude></noinclude> bm6zr25zjglbzqiqjhfys8n385q6a35 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९ 250 194552 665154 2026-07-06T14:46:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665154 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३० 250 194553 665155 2026-07-06T14:46:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665155 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( १३ ) श्रीमती जय नौ वर्षकी हुई माता उन्हें साथ लेकर फिरने जाया करती थीं बालिका विक्टोरिया के दर्शन करने लोगोंके झुंड इकट्टे होजाते थे । श्रीमतीके मुखको देखकर लोग आँखोंकी पलकें मारना भूल जाते थे। इनके स्मितहास्य पर सब फिदा थे । बालक उनके पीछे झुंडके झुंड चला करते थे । राजकुमारी बालकोंका घड़ा सत्कार करती और गरीब बच्चोंको कुछ दिया करती थीं। एक दिन एक दीन बालककी टोपी पानी में गिरगई । बच्चा केन्सिंगटन के मार्गमें खड़ा २ रोने लगा। उस समय श्रीमती माताके साथ कहीं जा रही थीं। बालकको रोता देखकर हृदय भर आया। अपनी मातासे नम्रतापूर्वक कहा- " माता, तुमने मुझे खिलौनेके लिये पैसे दिये हैं उनके खिलौने न लेकर मैं जो चाहूँ करसकती हूं ? " माता हँसकर बोली “हाँ " माता स्वीकार करतेही राजकुमारी दौड़ती हुई उस बालक के पास गई और उसके हाथमें दो क्राउन (सिक्का) रखकर चुपचाप माताके पास आ खड़ी हुई। मातासे हँसकर कहा - " क्यों माता मैंने अच्छे खिलौने लिये ना? 11 " राजकुमारी कईबार लंडनके बाज़ार में नाकर दूकानदारों को अपने कार्मेसि हँसाया करती थीं । एकबार किसी जौहरी की दुकानपर जाकर कुछ खरीदने लगीं। इतनेही में एक अपरिचित स्त्री वहां आ खड़ी हुई । स्त्री खड़ी २ सोने की एक कंठीकी ओर ध्यानपूर्वक देखने लगी । उसका चित्त उस कंठीपर गड़गया था परंत कंठी का मूल्य अधिक था । स्त्री विचारी मन मारकर चली गई || विक्टोरिया उसके मन भारनेसे दुःखित और आनन्दित हुई । जौ को कंठी का मूल्य देकर उसे एक डिबियामें बंद करवाया और उसमें चिट्ठी रखकर यह दूकानदार द्वारा उस स्त्रीके पास भेजदी ॥ बालिका पिता डणूक आफू केंटकी सेनामें हेलमैन नामक सिपाही बड़ा बफादार था । डयूक की सेनाने जिस समय उपद्रव किया इस सैनिकने उनकी अच्छी सेवा की थी। डचूक जब इंग्लैंड आया उसने इस सिपाहीको अप -म के पड़ोस में एक झोपड़ा बनवाकर रक्खाथा । खधूक जब मरने लगा. तो अपनी खीसे इस सिपाही और उसके कुटुंबकी रक्षाका अनुरोध करगया था। हेलमैन मरगया । राजकुमारीने उसके रोगी बालककी रक्षाका भार • अपने ऊपर लिया । और राज्यासनपर विराजने पर भी उसे न भूली । एकबार एक पत्र लिखकर उसमें समाश्वासन दियाथा कि "मैं यद्यपि इंग्लैंड की रानी हूं परंतु तुम्हें भूली नहीं हूँ " ॥ .<noinclude></noinclude> 893yfzxwnsn4fanlttz1mrlk0konyba पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१ 250 194554 665157 2026-07-06T14:47:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665157 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अध्याय ४. शिक्षा | जिस समय राजकुमारी का वय छः वर्षका हुआ इंग्लैंडकी पार्लियामेंटने इनकी शिक्षाके लिये ६ हजार पौंड वार्षिक व्यय नियत किया । एक स्त्री और एक पुरुष बालिकाको शिक्षा देने लगे । ईश्वरदत्त विचक्षण बुद्धि और माताके सुसंस्कारों से अल्पकालमें राजकुमारीने फरान्सीसी और जर्मन भाषा अच्छीतरह बोलना सीख लिया । लेटिन और इटालीकी भाषा सीखकर वर- जिल और होरेसके काव्य समझनेकी शक्ति संपादन की । ग्रीक भाषाका अभ्या- सकर हिसाबपर हाथ डाला || राजकुमारीको उत्तम प्रकारकी शिक्षा देनेमें श्री मतीके मामा राजकुमार लियोपो- ल्ड बहुत ध्यानदिया करते थे। विक्टोरिया नित्य जितना सीखती एक पुस्तकमें लिखा जाता था। उसे प्रतिमास माता सुनती और दिन २ विद्यामें अपनी प्यारी कुंमारीकी उन्नति देखकर आनन्दित होतीथीं || श्रीमती बालवयसे ही गानेमें जैसे चतुर थीं वैसेही नाचनेमेंभी बड़ी प्रवीण थीं । इन्होंने तीरंदाजी का अच्छा अभ्यास कियाथा । घोड़ेपर चढ़कर दौड़ानेमें राजकुमारी बहुतही प्रवीण होगई थीं । जिस समय आप स्काट्लैंडकी यात्रा करने गई घोड़े दौड़ाने में अच्छा कौशल दिखलाया था ॥ राजकुमारीके दोनों ताओंके शासनमें इंग्लैंडका दर्बार अनीतिका घर था और इसी कारण यह शंका कीजाती थी कि जो कुछ कालतक इंग्लैंडके राज शि की ऐसी स्थिति रहैगी तो सर्व नाश होजायगा । इस विचारसे बालिका विक्टो - याकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गयाथा और पढ़ लिखकर तैयार होनेतक श्रीमती से उनके राज्यारोहणकी भावी आशा गुप्त रक्खीगई थी। पुराने समयके राजाओं और वादशाहोंके शासनमें राजकुमारों को साधारण बालकोंकी तरह कड़ी शिक्षा देने और पटनेके समय मारपीट करनेके अनेक उदाहरण सुननेमें आते हैं। ही घटना श्रीमतीकै अध्ययनमें हुईथी। एक दिन राजकुमारी केन्सिंगटनके मार्ग में अपनी माताके साथ टहलरहीथीं। इतनेही में एक पाठशालाकी कितनीही - कियां वहां आ निकलीं । लड़कियोंने राजकुमारीसे सलाम किया परंतु प्रमाद से उन्होंने उत्तर न दिया । लडकियां अपने रस्ते चलींगई। यह बात माताको मु लंगी । डचेकूने लड़कियोंके पास नौकर दौड़ाकर उन्हें रोका, राजकुमारीको अपने साथ लेकर उनके पास पहुँची और बेटीसे उनकी सलामका जवान दिलवाया।<noinclude></noinclude> 9b6j8er68dzo78o27g497nb16cz4xco पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२ 250 194555 665158 2026-07-06T14:47:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665158 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | (१५) राजकुमारी की शिक्षाके लिये जो वार्षिक वेतन गवर्नमेंटने नियत किया था उसका बहुतही सँभालके साथ खर्च कियाजाता था । माताने राजकुमारीको दस्ती कारीगरीकी ओर प्रवृत्त किया और जो बालपन वा राजघरानेके बालकों में हठ अथवा यथेच्छ चलनेके दोष होते हैं उनको जड़से उखाड़दिया था । जिस समय राजकुमारी किसी बातमें अन्याय करने का हठ करतीथी माता तुरंत दीनोंके दुःखकी कथा सुनाकर उनके हठका कारण करदिया करती थीं। ब्रिटिश शासनप्रणाली की शिक्षा देनेका काम मिस्टर एमोस नामक व्यक्तिको सौंपा - गयाथा। इसके सिवाय राजमाता अपनी दुलारी पुत्रीको कारखानोंमें लेजाकर मजदूरों और गरीबों की स्थिति दिखलाया करतीथीं। राजकुमारी को निज खर्च के लिये बहुत थोड़ा वेतन दिया जाताथा और उसमेंसे राजमाता वालिकाके हाथसे दानोंको दिलवाकर सुदानकी उनमें टेव डालतींथी ॥ चेने श्रीमतीको मितव्ययता शिखानेके लिये उनके खर्च का स्वतंत्र प्रबंध रक्खाथा । एक दिन विक्टोरिया अपनी माताके साथ किसी दूकानपर गुड़िया खरीदने गई । गुड़ियाका मूल्य छः शिलिंग ठहरा परंतु राजकुमारी अपने मासिक वेतन को खर्च करचुकी थी। उन्होंने मातासे गुड़िया खरीदवा देनेका आग्रह किया परंतु यह बात माता को स्वीकारन हुई। उन्होंने कहा- "बेटी ! तुझे जब आगामि मासका वेतन मिले तब गुड़िया खरीदलेना अभी मैं पैसा न दूंगी।" माताके वचन सुनकर राजकुमारी महीना पूरा होनेके लिये दिन गिननेलगीं। उत्कंठा और आशा में जैसे तैसे महीना पूरा हुआ। वेतन पातेही राजकुमारी गुड़िया लेनेके लिये दूकानदार के पास दौड़ीगई । छः शिलिंग देकर गुड़ियालेनेके बाद कुमारीने गुड़िया कलेजेसे लगाई और बड़े प्यार के साथ उसे लेकर ज्योंही दूकानको सीढ़ियां उत्तरनेलगीं साम- ने से एक भिखारी आता दिखाई दिया। भिखारीने मालिकाको देखकर कुछ मांगने के लिये होंठ फरकाये परंतु लग्ना और डरसे अकचका कर रहगया। भिखारीका दयाजन- क मुख देखकर कुमारीका हृदय भर आया । गुड़ियाका प्यार तुरंत हवाकी तरह गुड़गाया। प्यारके बदले दयाने हृदयमें वास किया । कुमारीने भिखारीसे पूँछा, "तुम क्या चाहते हो?” भिखारी बोला- “राई मुझे अत्यंत भूख लगी है। जो मैं भूसे न मरता होता तो आपसे कभी पैसा न मांगता " - राजकुमारीने मुँह बिगाड़कर कड़ी - "खेद है कि मेरेपास इससमय पैसा नहीं है, होता तो” इतना कहतेही उन्हें कुछ उपाय सूझा। वह दमेपावं दुकानदारके पास गई और उससे कहा-" कृपाकर यह गुड़िया अपने पास रखिये और पैसे मझे दे दीजिये। मैं फिर आकर गड़िया - जाउंगी ।" दूकानदार ने सहर्ष पैसे लौटाकर गुड़ियाँ लेली । राजकुमारी दौड़ी<noinclude></noinclude> ei1haxc35fwagiz3rza2p9sruixrxbd पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३ 250 194556 665159 2026-07-06T14:47:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665159 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१६) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । हुई भिखारी के पास गई और उसके हाथ में चुपचाप छहों शिलिंग रखदियें । भिखारी बालिकाकी दया देखकर भौंचक होगया । उसने आशीर्वाद दिया कि “परमेश्वर तुझे रानी बनाने तबभी तेरी दयाका पूरा बदला नहीं है ।" यह कहकर भिखारी चलता बना। माता पुत्री की दया और सुशिक्षाका उत्तम फल देखकर विस्मित होगई और उन्होंने जानलिया कि यदि परमेश्वर ने इसे इंग्लैंडका राज्य दिया तो यह अवश्य मजाका उपकार करेगी। उसी दिन माताने अपनी दुलारीसे उसकी आशाका संकेत किया और उन्हें इस बातसे अधिक हर्ष हुआ कि, वालिकाने राज्यकी आशासे अपरिचित रहकर योग्य शिक्षा पाई है। जो मैं इसे पहलेसेही बतलादेती तो इसमें ऐसे सबुण आनेकी कभी आशा न थी । श्रीमतीको सुशिक्षा देनेमे केवल उनकी माताहीका ध्यान न था वरन आपकी नानी भी बहुतही दत्तचित्त थी । होम साहिबने श्रीमती के चरित्रमें लिखा है कि रानीको विश्वास है कि, उनमें मस्तिष्क और विचारकी जितनी शक्ति है वह को वर्ग की डचेज (नानी) से प्राप्त हुई है क्यों कि वह बड़ी प्रसिद्ध स्त्री थीं। उनके विचारों में पुरुषोंकीसी हृढ़ता, स्त्रियोंकासा प्रेम, हृदयकी कोमलता और बुद्धि थी ॥ वाल्यावस्थाकी सुशिक्षासे श्रीमतीका विद्याकी और दिन २ अनुराग बढ़तागया और सिंहासनारूढ़ होकर राज्यमबंध करने और विवाहकर घरेलू काम काज करने- पर भी आपने पढ़ना लिखना न छोड़ा। पतिवियोगसे दुःखित होकर जब श्रीमती ने कुछ कालतक इंग्लैंड में वास कियाया उस समयके पत्रों का संग्रहकर उन्होंने उसे पुस्तकाकार छपवायाथा। उसकी सरल और भावपूर्ण भाषा देखकर अंग- रेजी लिखे पढ़े लोगोंको बड़ा आनन्द होता है । भाषाकी सरलता और विचारकी प्रौढ़ताके कारण श्रीमतीकी अँगरेजीकी लोगों में घड़ी मशंसा है और इसी कारण इस प्रकार की भाषाको लोग (फीन्सइंग्लिश) कहने लगे हैं। स्त्रियोंकी भाषा में जिस प्रकारकी अशुद्धियां रहा करती हैं वैसी श्रीमतीके पत्रोंमें नहीं रहतीथीं और श्रीमतीको पत्र लिखनेका बडा अभ्यासथा । नित्यके आवश्यक पत्रोंका नित्य उत्तर देना श्रीमती अपना प्रथम कर्तव्य समझती थीं। आपकी सब संतानोंसे आज्ञाथी कि सप्ताह में एक बार वे उनके नाम अवश्य पत्र लिखाकरें। घरेलू और राजकार्यके आवश्यक पत्रोंके सिवाय भिखारियों और पागलों की भी आपके नाम बहुत चिट्ठि यां आयाकरतीं थी और ऐसा कोई पत्र नहीं आताया जिसका उत्तर न दियाजादय । श्रीमतीके अक्षर बहुत स्वच्छ और पढ़नेयोग्य होतेथे । उनके अक्षरोंमें भ्रामक ता बिलकुल न थी । आपको इतिहास पढ़ने में बड़ा अनुराग था। धर्मके विषय में "बाइबिल" ही आपकी प्यारी पुस्तक थी ॥ -<noinclude></noinclude> 7yj5d8r7em3aj592d39wol15x1upx1b पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४ 250 194557 665160 2026-07-06T14:47:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665160 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( १७ ) श्रीमतीको पढ़ने लिखने में बहुत अभिरुचि थी। इसका उदाहरण सबसे बढ़- कर यह है कि, वृद्धावस्थामें आपने राजकार्यकी झंझट, कुटुंबकी उलझाहट और आप्तवर्गका शोक सहनेपर भी उर्दू पढ़ना सीखाया । इसकार्यके लिये आगरेके एक मुसलमान हाफिज् अबदुलकरीम सी. आई. ई. नियत थे। श्रीमती थोड़ेही कालमें शिक्षा पाकर उर्दू भलीभाँति बोलने लगीथीं और इस बातसे उन्होंने बतला दियाथा कि उनका भारतवर्ष की प्रजापर कितना प्रेम है । श्रीमतीने अपने इंग्लैंड निवास और यात्राकी पुस्तक लिखनेके सिवाय अपने प्रियपतीके चरित्र लिखनेमें सर थियोडोर मार्टिनको बहुत कुछ सहायता दी थी । सुना गया है कि श्रीमतीरचित एक पुस्तक अभी अमुद्रित है। और वह शीघ्रही मकाशित होनेवाली है || अध्याय ५. राजकुमारीका प्रथम नृत्य और सौंदर्य । जिससमय राजकुमारी आठ वर्षकी हुई डयूक आफू यार्कका देहांत होगया । इनका कुमारी विक्टोरिया पर बड़ा स्नेह था इसलिये मा बेटीको पड़ा खेद हुआ । उस समय राजकुमारी यह नहीं जानती थी कि डघूक आफू यार्कके मरने से इंग्लैंड का राज्यासन मेरे एक पीढ़ी निकट आगया है । राजकुमारी की बहन (डचेर आफू केंटके पूर्व पतिकी कन्या ) फियोडोरी का विवाह वीस वर्षके में हो इन लाइलेनवर्गके राजकुमारसे जिसकी उमर केवल ९ वर्षकी थी, हुआ और बहन फियोडोरी के सुसराल चले जानेसे कुमारीको बहुत दुःख हुआ क्योंकि श्रीमतीका इससे परम स्नेह था ॥ सन् १८२८ में पुर्तुगालकी रानी मराया डीग्लोरिया के सम्मान में इंग्लैंड राजा चौथे ब्यार्ज ने एक बाल ( नाच ) दिया। इस समय से पूर्व कुमारी विक्टोरिया पढ़ने लिखने के सिवाय कभी राजदर्नार में नहीं जाने पाती थीं । दमें जाने का यह पहलाड़ी अवसर था। बालिका पुर्तगालकी रानीका ठाट और प्रभाव देखकर दंग होगई । पुर्तुगालकी रानीके वस्त्र जरीके और आभूषण हारे थे किन्तु राजकुमारी विक्टोरिया बहुत सांदे वैशमें थीं । दर्शक लोग दोनोंका नाच देखकर चकित होगये | मंत्रमुग्धकी तरह लोगोंसे वाह २ शामा २ के अतिरिक्त कुछ भी कहते न मनपड़ा। इस समय राजकुमा- रु. प्रथमवार नार्फोक के ड्यूक के पुत्र लार्डफिट्नलन, सेक्स विमरके राजपुत्र<noinclude></noinclude> 79qwhcsl2k6io8ukljdz75mrwhnyulg पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३५ 250 194558 665161 2026-07-06T14:47:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665161 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१८) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । विलियम, तरुण उमराव ईसूर हेजी और नरसीके राजपुरुषों के साथ नृत्य किया । लीइंट नामक ग्रंथकारने " प्राचीन राज्य" नामक पुस्तकमें लिखा है कि, " होनहार रानीके प्रथम दर्शनसे हमे जो आनन्द हुआ था वह मुझे अभीतक ज्यों का त्यों याद है । वह जिस समय आइसवाटरके राजद्वारपर से अपनी समवयस्का सखीको साथ लिये आई उसे आते देखकर हमें बोध हुआ था कि, मानो कोई स्वर्ग की अप्सरा आरही है । उसकी मुखमुद्रा और छवि दर्शकके चित्तको आकर्षित किये बिना नहीं रहती थीं " || रमोंटके एक झोपड़ेमें एक वृद्धा स्त्री रहती थी । उसकी बेटी मिसजेन जिसने “ स्काटके उमराव" नामक पुस्तक बनाई थी। इसी मिसजेनकी माताने बालवयमें राजकुमारीको देखनेका सौभाग्य प्राप्त कियाथा । इसने एक धरू चिठ्ठीमें लिखा है कि- " हमारी माता राजकुमारी चार्लोटको बहुत चाहती थीं। और इसी तरह उनका राजकुमार लियोपोल्ड पर बड़ा प्रेम था। परन्तु राजकुमारी विक्टोरिया कुमारी चार्लोटसे बिलकुल मिलती जुलती है । मेरी माता राजकुमारी विक्टो- रियाका सौंदर्य और असाधारण उत्साह देखकर बहुत हर्षित होती थी । उनके कथकी मेरे हृदयपर अभीतक ज्योंकी त्यों छाप अंकित है । " बाल्यावस्था में राजकुमारीकी लावण्यमयी मूर्ति, मुखपर आनन्दकी झलक हरिणोंकीसी तेजस्वी आँखें और चित्ताकर्षक सम्भाषण तथा बुद्धिकी तीव्रता विषयमें उस समय के ग्रंथकारोंने बड़ी मशंसाकी है परन्तु उन दिनों समाचारपत्रोंमें ऐसी गप्पें उड़ा- करती थीं कि रानी निर्बल है, उनमें चलने फिरनेकी शक्ति नहीं है।" जिससमय ऐसी गप्पें उड़तीथी उसी अवसरपर कुमारी क्रमेण्टके मैदान में गबड्डी लगाया करतीं थीं । जब लोगों को अन्य २ वातोंमें इनकी योग्यता अच्छी तरह चिदित होगई तब एकाएक ऐसी गप्प उड़ना बन्दहुआ और साथही लोगों की भक्ति बढ़ निकली ॥ राजकुमारी फियोडोरीके विवाहसे पूर्व ड्यूक आफू यार्कका देहान्त होचुकाथा इसकारण इस विवाहके पश्चात् जब माता कुमारी विक्टोरियाको लेकर यात्राको गई गावोंके लोगोंने कुमारीको बहुत ध्यानपूर्वक देखकर अधिक आनन्द सम्पादन कियाथा । अध्याय ६. राज्यासनकी आशा । जिससमय राजकुमारी विक्टोरियाका जन्म हुआ इंग्लैंड में श्रीमतीके पिता- मह तृतीय ज्यार्नका राज्य था । एकही वर्षके अनन्तर अर्थात् सन् १८२० में राजा स्वर्गको प्रयाण करगया। उसके बड़े पुत्र चतुर्थ ज्यार्जने सन् १८२० से सन् १८३० तक राज्यकिया । दूसरे भाई चतुर्थ विलियमके राज्यारंभसे,<noinclude></noinclude> 3xnece08j9vvgw2r6ecjpw64p0rkwrm पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३६ 250 194559 665162 2026-07-06T14:47:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665162 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( १९ ) महारानीकी शिक्षकासे बातचीत ।<noinclude></noinclude> 8pjprsivmx3wr5quwr5nhzhcaxdsq3a पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३७ 250 194560 665163 2026-07-06T14:48:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665163 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३८ 250 194561 665164 2026-07-06T14:48:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665164 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | (२१) लोगोंको आशा होगई किं विक्टोरिया किसीदिन इस साम्रान्यकी स्वामिनी होगी परन्तु वृत्तीय ज्यानके सातपुत्र और तीन कन्यायें थीं। दो पुत्र बचपनमें मरगये । राजा चौथा ज्याने अपुत्र मरगया । ड्यूक आफू यार्ककी भी यही दशा हुई और चौथें विलियमके कोई सन्तान न हुई। और बातकी बातमें विक्टोरिया के भाग्यका मैदान खालीकर एक २ करके उनके पूर्वाधिकारी खसकगये । महारानीके पिता ड्यूक आफ् केंटकी मृत्यु और राजा चौथे विलियमके सन्तान नहो- नेसे राजकुमारी विक्टोरियाको जो राज्य मिलनेकी आशा थी यह जयतक पालिका भारह वर्षकी न हुई उनसे छिपा रक्खी गई। इसका तात्पर्य यही था कि, राज- माता, राजा विलियम और इंग्लैंड का मंत्रिमण्डल नानता था कि शिक्षा प्राप्त करनेसे पूर्व अपक वयमें यदि राजकुमारीको अपने सौभाग्य की खबर हो जायगी तो उनका चित्त पढ़ने लिखने और सदाचार ग्रहण करनेमें न लगेगा । इन लोगोंका विचार सच्चा निकला और इसी परामर्शका यह फल राज्यासन पर विराजने बाद संसारके अनेक उपकार करनेमें यह बालिका समर्थ हुई । संसारका उपकार और इंग्लैंडकी उन्नतिके लिये मानो परमेश्वरने राजकुमारीके सौभाग्यके आड़ में अनेक पूर्वाधिकारियोंको पड़दा डालकर उन्हें उत्तम शिक्षा ग्रहण करनेका अवसर दिया था और शासनके योग्य योग्यता संपादन करने बाद एक २ करके उन लोगों को खसका दिया | हुआ कि, निकट आया राजमाताने राज- जय राज्यासन प्राप्त करनेका समय कुमारी की शिक्षका बेरोनेस लीजन को इंग्लैंड के राजघराने की वंशावली दिखाई । राजकुमारीको इस बातकी सूचना देनेके लिये वंशवृक्ष उनकी पुस्तक में रख दिया गया। उन्होंने पुस्तक खोलतेही अचानक उसे देखा और अपनी आशादेके सुखमें मग्न होगई । इस अवसर में श्रीमतीके पास एक दासी आई ! उससे राजकुमारीने पूंछा कि “यदि वर्तमान राजा मेरे ताऊकी मृत्यु- हो जाय तो फिर राजा कौन होगा ?" दासी बोली - "कारेंसके ड्यूक ।" फिर वालिकाने पूंछा - "और उनके बाद ?" दासीने कुमारीको उलझाइट में डालने के लिये कहा कि- "आपके अभी बहुतसे चाचा हैं। " परन्तु उन्होंने वंशावळी दिखा कर सूचित किया कि "यहां तो डचूक आफू क्लारेंस के बाद मेरे पिता है इससे निश्चय होता है कि, मेरे ताऊकी मृत्युके पश्चात् मैं ही इंग्लैंड की रानी होगी ।" दासी चुप होगई। राजमाताने एकाएक हर्षसे. पुत्रीके हृदय<noinclude></noinclude> belzzb0j08uzxtoraal4fipg417uwau पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३९ 250 194562 665165 2026-07-06T14:48:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665165 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२२) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । पर आघात पहुँचनेका डर कर राजकुमारीसे कहा- "बेटी, हमें पिछली बात पर भी ध्यान देना चाहिये। अभी तेरी ताई क्लारेंस की उचश् की उमर अधिक नहीं हुई है । यदि उनके बालक होगा तो तेरा कुछ स्वत्व नहीं रहेगा । परन्तु तू मानले कि, तेरे दोनों ताऊ संतान विना मर जायेंगे और तूही इंग्लैंडकी रानी होगी तो ऐसी दशामें तुझपर जो बोझा पड़ेगा उसका विचार कर और इस राज्यको रन समान देदीप्यमान करने और प्रजाका उपकार करने योग्यहो।" राजकुमारीकी स्त्री शिक्षकाने एक पत्रमें लिखा है कि, राजमाताकी सम्मतिसे उनकी पुस्तकोंमें मैंने इंग्लैंडकी वंशावली रक्खी। दूसरे दिन कुमारीने पुस्तक खोलकर मेरे समक्ष आश्चर्यपूर्वक कहा कि, मैं अब राजगादीके निकट आपहुँ- चीहूं | इसवातसे बहुतेरे मालक घमंड में चूर होनाते हैं परंतु वे नहीं जानते कि, इसमें कितनी चिडवना है। इसमें प्रतिष्ठा बहुत है परंतु नोखिमभी कम नहीं है। मैंने (शिक्षकाने ) कहा कि “आपकी ताई एडीलेड अभी युवती है । मानलो कि उनके संतान हुई तो?" “राजकुमारी वोली अच्छी बात है। इससे बढ़कर मेरे लिये हर्षकी क्या बात है। मैं इस वातसे निराश नहीं होती हूं" || जिस समय राजकुमारीने प्रथम बार वंशवृक्ष देखा उनका वय १२ वर्षकाथा उन्होंने हर्षसे विल होनेके बदले इस बातको जानतेही अपने उत्तरदातृत्वके लिये शिक्षकासे कह दियाथा और उसी दिन उनको यह बोध होगया था कि, “इसीकारण उनकी शिक्षापर इतना ध्यान दियागयाहै। उन्होंने उससे कहा था कि, इस वैभव जबाबदारीका बड़ाभारी बोझा है। मैं अव जान गई हूं कि, इसीलिये मुझे लैटिन् व्याकरण और इंग्लैंडके राज्यप्रबंधकी शिक्षा दी गई है । "होनहार बिरवान के होत चीकनेपात" इस कहावतके अनुसार इंग्लैंड सुम- सिद्ध उपन्यास लेखक सर वाल्टर स्काटने पांचवर्षके वयमें बालिका विक्टोरिया को देखकर कह दिया था कि "इनकी शिक्षा बहुत ध्यानपूर्वक होती है। और इनके ढंगको देखकर मानों कोई देवता इनसे कहरहाहै कि, तुम इंग्लैंडकी रानी होगी" । जिस समय १८ वर्षके वयमें राजकुमारीने यौवनावस्थामें पैर रखा उनका एकान्त वास प्रथमबार भंग किया गया था । उनको वाटोलकी वारंवार शिक्षा दीगई थी क्योंकि राजमाता और गवर्नमेंटको विश्वास था कि ब्रिटिश जातिकी उन्नति करनेवाली यही पुस्तक है । सन् १८३६ के २१ अंगस्तको विंडसर राजभवनमें राजा चौथे विलिम् की वर्षग्रंथि का उत्सव था । उस दिन रविवार था इसलिये उत्सवमें अधिक धूम धाम नहीं की गई थी । राजमहलमें अनुमान सौ मनुष्यों की भीड़ थी। राजा के<noinclude></noinclude> c5n4a9o22ojww65ouhf6wjf5mtgzsdz पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४० 250 194563 665166 2026-07-06T14:48:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665166 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | (२३) एक ओर राजमाता डचेन की बैठक थी। दूसरी ओर उनकी बहनें थीं । कुमारी विक्टोरिया राजसिंहासनके सामने थीं। रानीकी इच्छासे राजाके स्वास्थ्य की मंगल- कामनाके लिये रीतिके अनुसार मद्य विद्यागया राजाने सब लोगोंकी मंगल मार्थना के उत्तरमें कहाकि“मुझको ईश्वरपर पूरा भरोसा है। मैं नौ मास बाद मरजाऊंगा | मेरी मृत्युपर रिजेंसीका प्रबंध न होगा किन्तु (राजकुमारी विक्टोरियाकी ओर इंगित करके ) यही मेरी उत्तराधिकारिणी होगी और उस व्यक्तिके हाथमें मेरा मुकुट न जायगा जो बुरी संगतिमें पढ़ा हुआ है। में बिना आनीकानीके कह हूं कि, उस मनुष्यने मेरा बहुत अपमान किया है परंतु मैं अपनी मातष्ठाके विरुद्ध कोई तीव नहीं करना चाहता हूं। उन बातों में एक यहभी है कि, वह कुमारी जान बूझकर मुझसे अलग रखी गई है। मेरे दर्वारमें इसे सर्वेदा उपस्थित रहना चाहिये था परंतु यह विचारी इस सम्मान से अबतक संचित कीगईथी। आशा है कि, अबसे ऐसा काम न होने पावैगा । मैं इसे जताये देताहूं कि, मैं राजाहूं । मेरे अधिकार की मानरक्षा करना अपना मुख्य कर्तव्य समझताहूं और आगेसे मैं आज्ञा देताहूं कि, राजकुमारी अपना कर्तव्य समझकर मेरे दर्बार में सदा उपस्थित हुआ करे । यद्यपि राजाने यह बात प्रेमपूर्वक कहीथी और इसमें राजकुमारी के भविष्यत् शासनका संकेत भी था परंतु मिस्टर सी बार्नेट स्मिथने अपनी पुस्तकमें लिखा कि, यदि यह व्याख्यान दियाजाना सत्य है तो इससे उससमय बड़ी हल- चल मची होगी। मिस्टर बार्नेटने यह बात ऐतिहासिक यैवाइलके आधारपर लिखा है उनको इस कथनमें संदेह है. परंतु उन्होंने लिखा है, कि, इस वाक्यसे रानीको बहुत दुःख हुआ । राजकुमारी रोपड़ी । समस्त उपस्थित लोग घबराटठे । और उन् आफू फेंटने चुपचाप यहांसे खसकजानेके लिये गाडी मँगवाई । मिस्टर बार्नेट स्मिथका कथन है कि, इसमें अत्युक्ति अधिक है परंतु इतना निश्चय है कि, राजाका स्वभाव बिगड़ गया था और उन्होंने सारी बात राजमाताको इंगित करके कही थी । इस घटना के एक वर्ष पूर्व अर्थात् ३० अगस्त १८३५ को सेंटजेम्सके सर्कारी गिरनेमें कैंटरबरीके प्रधानपादरी के हाथसे विक्टोरिया दीक्षितहुई थी। उससमय राजमाता, राजा रानी एडेलेड और सेक्सविमरके थक तथा डचेजू और कितने ही रामकुटुंब मनुष्य इकट्ठे हुएथे । उक्त पादरीने राजकुमारीको समझा दिया था कि उनपर कितने बड़े पदका बोझा पड़नेवाला है। उस अवसरपर श्रीमतीको राजाधिराज परमेश्वरकी भक्ति और विश्वासपर कार्य करने का उपदेश दियागया था । इस बातसे राजकुमारीके वस्त्र आंशुअस भीगगये और अपनी मात्राके कंधे पर सिर रखकर बहुत देरतक सिंसकारे खाती रहीथी ॥<noinclude></noinclude> rtgfk7x44bo7fnfexmjsuwukpi8f4fu पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४१ 250 194564 665167 2026-07-06T14:48:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665167 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । राजकुमारीके सिद्धान्त और उसमताकी एक बात और भी विदित हुईहै । जिस समय उन्होंने प्रथमवार इंग्लैंडके इतिहासमें वंशवृक्ष देखा वहांकी गादीके लिये अपना निकट स्वत्व देखकर अपनी शिक्षकासे कहा था कि- " मैं अवतक सिंहासनसे जितनी निकट अपनेको समझतीथी उससेभी अधिक निकट निकली। मैं भ्रम अच्छी होगी। अब में जानगई कि, आप मुझे इतना ध्यानपूर्वक क्यों पठा- तीहो । और लैटिन् सिखानेमें आपका इतना परिश्रम क्यों है। अब में सब बातें अच्छी तरह जानगई और में अब अच्छी होगी" || अध्याय ७. राज्यारोहणसे पूर्व की विशेष घटनायें । शिक्षा प्राप्तकर प्रवाससे विशेष अनुभव संपादनकरनेके लिये राजमाताके साथ राजकुमारीको थोड़े कालतक प्रवास कराया गयाथा। जहाँ जहाँ राजकुमारी गई जाने बहुतही हर्ष और हार्दिकप्रेम के साथ श्रीमतीका आदरकिया और अभिनन्द- नपत्र दिये । सन् १८३३ में आइल आफ वाइट्से लौटते समय एडिथस्टोन और नौरिशके मध्य में एक पुरानी नौकाके टुकड़ेसे राजकुमारी का जहाज टकरागया । टकरातेही जहाजका एक भाग टूटगया । संडर नामक पाइंटर राजकु- मारीको तुरंत उठाकर एक और लेगया और इसतरह उनके प्राण । सब साथियों को प्रथम बड़ी चिन्ता हुई और फिर लोगोंने हर्षकी बधाइयां दीं ॥ यात्रा से लौटने पर राजकुमारीको बहुत भयंकर बीमारी भोगनी पड़ी। आरोग्य होनेके अनन्तर वेम्ट मिन्स्टर राबीके एक बड़े जलसेमें राजकुमारी उपस्थित हुई और सन् ८३५ मे उन्होंने एस्कोटमें घुड़दौडकी शर्त और सेनाकी कवायद देखी। जिन दिनों राजकुमारी विक्टोरिया अपनी माता सहित केनसिंगटनके राजमह- में निवास करती थीं सैक्सकोबर्गके ड्यूक अपने दो पुत्र राजकुमार अर्नेस्ट और राजकुमार एलबर्ट सहित यात्रा करते समय राजकुमारी के यहां आकर चार सप्ताहतक पाहुने हुए राजकुमारी को अपने भावी प्राणनाथ के दर्शन का यह पहला अवसर था । आगत पाहुनोंका यहाँ बड़ा स्वागत हुआ । इसी अवसरपर राजकुमारी विक्टोरिया और राजकुमार एलबर्टके हृदय मादरमें परस्परके प्रेमने निवास किया । इसीसमयसे दोनों जानने लगे कि प्रणय क्या वस्तु है, मनहीमन दोनोंके प्रणय की तरंगें उठने लगीं और दोनोंही भावी- सुखके लिये मनहीमन आनन्दसागर में निमन हुए । मनके विचारों और तोर<noinclude></noinclude> gkegwcv89gbyc3m6eynvti9zy6m2vbj पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४२ 250 194565 665168 2026-07-06T14:48:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665168 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथमं भागं ।' (२५) स्परकी ताक झांकके सिवाय इस समय कुछ बातें न हुई और एक मासके तीस दिन एक घड़ीके समान बिताकर दोनों प्राणमिय प्राणप्रियाकी माधुरी मूर्तियां अपने २ हृदयमन्दिरमें निवासकरा वियोगका सुख अनुभव करनेके लिये अलग हुए। इनके मनोंकी टलशाहटकी किसी को खबर न हुई || २४ मई सन् १८३७ ई० को राजकुमारी विक्टोरियाने पूरे अठारह वर्ष व्यतीत कर बाल्यावस्थासे युवावस्थामें पैर रक्खा । अब बालिका विक्टोरिया युवतीवि- क्टोरिया कहलाने लगीं। उस दिन वर्षग्रंथिके हर्षमें केन्सिंगटनका राजप्रासाद इंदु- भी और अन्यान्यनादोंसे गाजउठा । दिनभर अभिनंदनसूचक पत्रों और बधाईकी चिट्टियों से राजभवन भरगया । राजा चौथे विलियमने दो हजारकै मूल्यका एक पायनो बाजा भेंट किया। और यहभी प्रकाशित किया कि, मैं अपने निज खर्चमैसे दश हजार पौंड वार्षिकं दिया करूँगा। परंतु राजकुमारी मेरे मंत्रियोंकी सम्मतिसे कामकरै । राजकुमारीने यह शर्त स्वीकार न की । इस महोत्सबमें लंडनके बडे २ उमराव इकट्ठे हुएथे किन्तु राजा विलियम बीमारीके कारण नहीं आसके। इस दिन लंडन नगरमें घर २ दिवाली हुई और राज्यभर में उत्सव कियागया । इसी अवसरपर लंडन नगरकी सिटी कौन्सिलने राजकुमारीको एक अभिनंदनपत्र भेंट किया । इसे लेकर लंडनके लार्ड मेयर केन्सिंगटनके राजमहलमें आये । पत्रके उत्तर में राजमाताने कहा कि- "राज्यके प्रत्येक पक्षसे हम बिलकुल अलग रहीहैं । मैंने अपनी मियपुत्रीको प्रजाहित और राजधर्म शिखानेमें न्यूनता नहीं रक्खी है । मैंने स्वतंत्र लोगोंका मुख्य कर्तव्य राजकुमारीको भली भाँति समझादिया है । राजकुमारी अब अपनी युवावस्थाको पहुँचगई हैं। मुझे आशा है कि, जो काम इसे दियानायगा उसे यह पूर्ण कुशलतासे संपादनकरेंगी। इसका मुख्य कर्तव्य यही है कि धर्म, ज्ञान और स्वतंत्रता, उद्योग प्रजाकी सम्मति और मजाके हितकी कामना करना” । राजकुमारीने अभिनंदनपत्रके विषयमें परम मधुरस्वर और मृदुहास्यसे कहा कि-" आपके स्नेहका मैं उपकार मानती हूं। मेरी माताने मेरी इच्छा भलीमकार प्रकाशित की है" || अध्याय ८. राजा विलियमकी मृत्यु | सन् १८३०६० में जब राजा चतुर्थ ज्याजका देहान्त हुआ उनके भाई उनक आफू लारेन्स चौथे विलियमके नामसे गादीपर विराजे । राजा विलियमके "<noinclude></noinclude> lapqtmq2oh42rl8m5xw6x938jcwk8z7 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४३ 250 194566 665169 2026-07-06T14:49:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665169 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२६) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । संतान होने की आशा न थी इसलिये कुछ कालके पश्चात् पार्लियामटेंमें राज्यके भावी वारिसके विषय में रिजेंसीविलके नामसे लार्ड लैंडहर्स्टने एक पांडुलिपि उपस्थित की। इसमें यह निश्चय किया गया था कि यदि राजा विलियम बिना संतान मरजाये तो राजकुमारी विक्टोरिया राज्यासनपर बिराजे और उनकी माता उनकी रक्षाको नियत हो। इस पांडु लिपिके पास होने पर राजकुमारीकी शिक्षाके लिये ६ हजार पौंडकी जगह १० हजार पौंड निय- त हुए । राजा विलियम के पट्टाभिषेकके समय राजकुमारी विक्टोरियाको उपस्थित न होने दियाथा । इसबातकी लंडनके समाचारपत्रोंने बहुत निन्दा की और दोषका बोझा राजमाता पर मढा। वे उस समयतक नहीं जानते थे कि, इस अवरोध से देशकेलिये बहुत बड़ा कल्याण होनेवालौह ॥ राजकुमारी विक्टोरियाकी उन्नीसवीं वर्षगाँठके दिन बीमारीके कारण राजा विलियम नाचमें उपस्थित न होसके थे । मईका अंत होनेके साथही राजाकी अ- शक्ति बढ़ाई। उनके शरीरमें श्वास लेनेकाभी बल न रहा । १८ जूनको राजाने राजद्रोहियों का अपराध क्षमा करेनके पत्रों पर हस्ताक्षरकिये। वह दिन वाटलू युद्ध में विजय पानेका था । राजाने डाक्टर चैम्बर्ससे कहा कि, भाई ! आजके विजयी दिवस भरमें फिर जीना चाहता हूं। दूसरे दिन अर्थात् १९ जूनके प्रभातमें राजा जागा और दिनभर ईश्वरप्रार्थना और रानीके संबोधनके अनन्तर स्मरण रक्खो कि "मैं आस्तिक राजाहूं”। कहते हुए रात्रिके दो बजे इस असार संसारको छोड़कर उसने स्वर्ग- का मार्ग लिया । और ऊपर जिस बिलका वर्णन हुआ है उसके अनुसार राजकुमारी' विक्टोरिया उत्तराधिकारिणी हुई ।। राजाकी मृत्युपूर्व हेनोवरका परगना इंग्लैंड के साथ जोड़ दिया गया था और तबसेड़ी इंग्लैंड और हेनोवरका राज्य संयुक्तथा । परंतु हैनवरके राज्य नियमा- नुसार वहांका मुकुट स्त्रीके शिरपर रखनेकी चाल नथी. इसलिये हॅनोवरका राज्य इंग्लैंडसे अलग किया गया और कम्बलैंडके डयूक जान अर्नेस्ट आगस्टसको वहांका राजा बनायागया । हेनोयरकी मनाको ड्यूकके अत्याचारोंका कष्ट हुआ और इंग्लैंड की मजाने समझा कि इस राज्यके अलग होनेसे बहुतसा खर्चेका बोझा टलगया इसकारण उसने हर्ष किया ||<noinclude></noinclude> 4rl5upm3b63svqy1w3ewvpg5qq69man पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४४ 250 194567 665170 2026-07-06T14:49:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665170 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | (२७) अध्याय ९. राज्यप्राप्ति समाचार पाते समय विक्टोरिया का चित्र ।<noinclude></noinclude> bpmjt3yfk9ggvup90pu0jtwegcsel0u पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४५ 250 194568 665171 2026-07-06T14:49:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665171 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४६ 250 194569 665172 2026-07-06T14:49:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665172 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । सिंहासनारोहण | (२९) राजा चतुर्थ विलियमका स्वर्गवास हुआ। २० जूनके प्रातःकालके सूर्योदय के साथही रानी विक्टोरिया, विटिशनाति और भारतवर्षके भाग्यका उदय हुआ । राजाके मरणकी शोकसूचना और रानी विक्टोरियाके सिंहासन प्राप्त करने की बधाई लेकर कैंटरबरीके प्रधान पादरी, लार्ड नैम्बलैन, अर्ल एलवरमैन ओर सर हेनरी हेली फाक्स विंडसर केसलते रात्रिक २॥ बजे चलकर प्रभातके पांच बजते २ केन्सिंगटन महलमें पहुँचे । द्वारपालको जगानेके लिये किंवाडे खटखटाये, घंटा बनाया और पुकार मचाई परंतु द्वारपाल जो सुखकी गाढ निद्रामें सोरहा था न जागा । थोडी देर मार्गमतीक्षा करनेवाद द्वारपाल जागा । उमरायोंका संदेशा लेकर वह भीतर गया और तुरंतही लौटकर कहा कि- " राजकुमारी प्रगाढ निद्रामें मन हैं। इस समय जगानेका हमारा साहस नहीं होता है" । उन्होंने क्रोधके साथ द्वारपाल को समझाया कि-" भैया, राज्यका बहुत आवश्यक काम है । रानीको शीघ्र आकर जगाओ" तुरंतही राजकु- मारी जागीं। और हडबडीमें उठकर रात्रिके वस्त्र पहने हुए, दुशाला लपेटकर, पैरोंमें स्लीपर पहने, कंधेपर बिखरेहुए केशोंसे, मंदगति और आँसूभरी आँखोंस बाहर आई । उमरावोंका संदेशा सुनतेही अकचकागई और रोते २ कहा "आप सब मेरे लिये ईश्वरसे प्रार्थना कीजिये" । यह रुदन पितृव्यके मरण के लिये न था और न राज्य पानेके हर्षके आनन्दाश्रु थे किन्तु अपने ऊपर काम और कर्तव्यका षडाभारी बोझा पडता देखकर उसके पालन करनेकी चिन्ताकी सूचना देते थे। सुनतेही सब लोगोंने रानीके साथ मिलकर एकचित्तसे ईश्वरसे प्रार्थना की । शुभ सूचना और ईश्वरमार्थनाके पश्चात् सरदार बहाँसे विदा हुये ॥ इसके अनन्तर रानी विक्टोरियाने प्रथम कार्य किया। यह कार्य रानीक सचे अंतःकरण और उदारवृत्तिका उत्तम उदाहरण है । रानीने उसी समय मृतराजाकी पत्नी के नाम एक सहानुभूति सूचक पत्र लिखा। उसका अनुवाद लिख- नेकी आवश्यकता नहीं है, किन्तु इतनाही लिखना रानीके सुविचारोंको प्रकट करताहै कि श्रीमतीने उस पत्रमें रानी एडीलेडको एक स्थलपर “श्रीमती इंग्लैंडकी रानी" के नामसे संबोधन किया। इससमय एक मनुष्य खड़ा हुआ रानी विक्टोरियाका पत्र पढ़रहा था। उसने कहा कि अब रानी एडीलेडको इंग्लैंडकी रानी लिखना उचि<noinclude></noinclude> 10tdf3xunrpb0bxozwh1wkd3ruh8t44 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४७ 250 194570 665173 2026-07-06T14:49:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665173 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । 1 त नहीं है क्योंकि इंग्लैंडकी रानी आप हैं । उनके पत्रमें "विधवा रानी" लि- खिये" श्रीमती विक्टोरिया बोलीं- " राम राम इस दुःखिता अवला को सबसे पहले इस कष्टकी याद दिलाना मेरा काम नहीं है । मैं जानती हूँ कि, ऐसाही लिखना चाहिये परंतु मैं उनका हृदय दुखाना नहीं चाहती हूं"। इस चिट्टी में सहा- नुभूति और प्रेमके साथ लिखाया कि " आप अपने शरीरकी रक्षापर अच्छी तरह ध्यानदें और नहाँतक इच्छाहो सुखसे विंडसरके राजमहलमें निवास करें। वह आपका ही हैः ॥ प्रातः काल के नौ बजे इंग्लैंडके प्रधान अमात्य लार्ड मेलबोर्नने रानीके मह में आकर दोघंटेतक राजकीय गुप्तवातों में संभाषण करनेवाद मित्री- कौंसिल जो आजकल केबिनेट ( मंत्रिमंडल ) के नामसे प्रसिद्ध है उसे एकत्रित करने का निवेदन किया । इतिहासवेत्ता कार्लाइलने लिखा है कि “एक तरुणी बालिका जिसने अभीतक संसारका राग रंग नहीं देखा है, जो अभीतक नहीं जानती है कि, राज्यप्रबंध क्या वस्तु है उसने इतनी त्वराः गांभीर्य और उत्साहसे काम किया कि जिससे उस समय और आज के मनुष्यों को आनन्दयुक्त आश्चर्य हुया " रानीने तुरंत उठकर मेलबोर्नकी प्रार्थना को स्वीकार किया और एक सदाके अनुभवी राजपुरुषकी तरह कार्य आरंभ करदिया<noinclude></noinclude> 8q49p3r11qffc64qb1blvwhrg8x03bb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४८ 250 194571 665174 2026-07-06T14:50:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665174 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मथम भाग । महारानीका शपथ लेते समयका चित्र । (३१)<noinclude></noinclude> mshqccisok1gg5kz9w9nnl66swzcfmz पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/४९ 250 194572 665176 2026-07-06T14:50:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665176 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५० 250 194573 665177 2026-07-06T14:50:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665177 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भांग | (३३) २० जूनको दुपहरीमें केन्सिंगटन में मंत्रिमंडल इकट्टा हुआ । मिषीकौंसिल की ओरसे रानी के नामका अभिनंदन पत्र पढ़ाजानेके अनन्तर श्रीमती की ओरका ढिंढोरा जाँचकर सुनाया गया। श्रीमती शुभमुहूर्त्त में सादे शोकवस्त्रोंसे अलंकृत होकर प्रथमचार सिंहासनासीन हुई और विराजतेही मंजुल, स्पष्ट और गंभीर शब्दों में कौंसिलको निम्रलिखित प्रस्ताव पढ़कर सुनाया:-- मेरे मिय ताऊ श्रीमान् राजासाहबकी मृत्युसे प्रजाको बहुत बडा दुःख और शोक हुआहै और इसी कारणसे मुझपर राज्यभार आपड़ा है । यदि मैं यह न जानतीकि इतना बडा काम मुझे ईश्वरकी इच्छासे नहीं सौंपा गया है और सर्वशक्तिमान परमात्मा इस कार्य के संपादन करनेमें मेरी सहायता न करेगा तो इस जोखिम के कामके बोझेसे, जो अकस्मात् मेरे ऊपर आपडा है में दबजाती और साथही मुझे यदि यह विदित न होता कि मजाके कल्याणके लिये उसकी ओरसे आश्रय न मिलेगा। मेरी प्रजाके प्रेम और भक्तिपर तथा पार्लियामेंटकी बुद्धिमानीपर मुझे पूरा भरोसा है । मुझको बहुत बडा लाभ यह हुआ है कि, मैं जिस गादीपर आसीन हुई हूं उसके पूर्वाधिकारी अपनी प्रजा की स्वतंत्रताके स्वत्वोंके लिये बडा गर्व रखतेथे और उनकी मुख्य इच्छा यही थी कि, देशको आर्दन के बंधनोंकी उन्नति ( Amelioration ) करना और प्रजाके सामान्य सुखवर भलीप्रकारसे ध्यानदेना ॥ "मेरी मिय माताकी रक्षामें रहकर मैंने जो उससे मैं सीखगईहूं कि देशकी नीति का किस से क्योंकर प्रेमरखना चाहिये। मैं देशके धर्मका संरक्षण करूँगी सब लोगों को यथेच्छ रीतिपर धर्मका सुखभोगने दूंगी और सब जाति और धर्मवाली मेरी प्रजा हितमें सवप्रकारका श्रम करूंगी" || इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त की है प्रकार आदर करना और उस रानीने जब इस व्याख्यानको समाप्त किया तो फिर धर्मसंबंधी प्रतिज्ञा की और उनके दोनों बचाओंनेभी सौगंद खाये। इसके बाद दोनोंने रानकि पैरों पड़कर उनके हाथका चुंबन किया । रानीने उन दोनोंके सम्मान में उनके हाथ घूमे । और डयूक आफू ससेक्सका आदर करने के लिये सिंहासन पर से खड़ी होगई । रानीके गंभीर भाव और इस समय यथातथ्य कार्य करनेसे ड्यूक आफ वेलिंगटन और पील आदि राजपुरुष चकित होगये । रानीके व्या- ख्यानमें उन्नति ( Amelioration ) शब्दका प्रयोग हुआथा इसपर लार्ड हमने तर्क किया। उनका कहना यह था कि यह शब्द अशुद्ध है । सर राबर्ट पीने उनका यथातथ्य उत्तर दिया। इस प्रश्नोत्तरसे दर्बारमें कुछ हल चल "<noinclude></noinclude> 6v6hrdfnc861o6p2izrnx6jfn2pvck5 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५१ 250 194574 665178 2026-07-06T14:50:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665178 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(३४) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । मचगई परंतु श्रीमतीकै बर्ताव में बिलकुल अंतर न आया । समस्त काम काजमें उन्होंने इतना गांभीर्य दरशाया कि डचूक आफू वेलिंगटनको स्वयं कहना पड़ा कि "मुझको अपनी लडकीकी ओरसे भी इससे अधिक गांभीर्यकी आशा नहीं है" । राजकर्मचारियोंने सरकारी कागजोंपर “एलेक्जेंड्रिना विक्टोरिया” नाम छपवायाथा किन्तु रानीने अपने हस्ताक्षर में केवल “विक्टोरिया” लिखा इसलिये काम काजमें थोडी गड़बड़ मची और उन कागजो की काटछांट करनापट्टी ॥ परमेश्वर की कृपासे २० जूनको सेंटजेम्सके महलमें राजकुमारी विक्टोरि या ग्रेटब्रिटेन और आयलैण्डकी रानीके नामसे प्रतिष्ठित हुई । रानीके दर्शनके 'लिये राजमार्ग लोगों के झुंडोंसे भरगया । घर २ अट्टालिका २ खिड़की २ और गोख २ में स्त्री पुरुष बालक युवा युवती और वृद्धवृद्धाके ठाठ लगगये । वृक्षों- की डालियां और मकान के छप्परोंतकमें लोगोंको बैठनेकी जगह न मिली। आय- लैण्डके राजद्रोही लोगोंकी मुखश्री देदीप्त हुई। उनके चित्तपर से दुविचारोंने पलायन किया और बाघ बकरी एक घाट पानी पीनेकी भावी आशामें लोग परस्परका द्वेष और क्रोध भूलगये । दोबजे तोपखानेसे १०१ तोपोंकी सलामी कीगई । कानकी चैलियां उडाने वाले हर्षनादसे रानीको प्रजाने बधाई दी। ऐसे समय में रानीने लोगोंको दर्शनदिया। यद्यपि उस समय अधिक कामकाजसे श्रीमती थक गईथीं और उनके वस्त्रालंकारभी ताऊकी मृत्युके कारण शोकसूचक और सादेथे परंतु उन श्रम- बिन्दुओं में सौंदर्य और सादगी में शोभाकी झलकथी । दर्शनकरतेही उच्चस्वर से प्रजाने "परमेश्वर रानीकी रक्षाकरो" का जय घोष किया । इस गीतके समाप्त होतेही सर विलियम उडले और डयूक आफू नाफकिने भीडके समक्ष आकर राजा चतुर्थ विलियमके मृत्युसम्वाद और श्रीमती रानी विक्टोरिया के सिंहासनारूढ होनेका ढिंढोरा टचस्यरसे पढ़कर सु- नाया । ढिंढोरा सुनतेही प्रजाने फिर “परमेश्वर रानीकी रक्षाकरो" की गर्जना करी । उस समय रानीकी आँखोंमेंसे आँसुओंकी दो चार बूँदे निकलपडीं ॥ साधारण राजरीतिसे छुट्टीपातेही रानी विक्टोरिया दौडीहुई अपनी मियमा- ताके कमरे में गई और उनकी गोदी में बैठकर आँसूकी नदी बहानेलगीं । माताने नम्रतासे पुत्रीको समझाया तब रानी बोली:- "माता मैं कदाचित् अबभी भरोसा नहीं करतीहूं कि, मैं अब इंग्लैंडकी रानी हो गई हूं परंतु मैं सोचती हूं कि मैं रानी होगई। क्या मैं नहीं हूं” १<noinclude></noinclude> cnzr5ajsv2ej2m2jql3yalofc4iwmoy पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५२ 250 194575 665179 2026-07-06T14:50:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665179 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (३५) माताने उत्तर दिया:-"मेरी प्यारी । तू जातीही है कि तू रानी हो गई है । अभी मैंने जो दृश्य देखा है उसीसे तुझे इसचातका विश्वास होगया होगा" || रानी:-"अम्मा, जबतक मुझको अपने स्वभाव बदलनेकी टेव न पहनावे और आपकी छोटीसी बालिका इस वृहत् राज्यकी वास्तविक स्वामिनी न बने मैं आपसे एक बात मांगे लेती हूं। मेरी प्यारी माता मैं चाहती हूँ कि, आप मुझे अभी दोघंटे तक एकांत रहनेकेलिये छुट्टीदे। "राजमाता इस प्रार्थनाका आशय समझ गई और उसी दिनसे उन्होंने अपनी कन्यासे अलग होनेका आरंभ किया रानीने उस समय माताके बाहर जातेही ईश्वरसे प्रार्थना की ॥ रानी विक्टोरिया के होनहार प्रियतम राजकुमार एलबर्ट उन दिनों वोन नगर में पढ़तेथे । उनके पास यह शुभसंवाद पहुँचा । समाचार पातेही उन्होंने श्रीमती- को एक पत्र लिखा उसका आशय यह है :- २६ जून सन् १९३७ ई० "अब आप यूरोपके एक परम बलाढ्य राज्यकी स्वामिनी हैं। आपके हाथमें लाखों मनुष्योंका सुख दुःख है । परमात्मा आपको इस वृहत् और कठिन कार्य में सहायता दे। मुझे आशा है किं, आपका शासन दीर्घ, हर्षमद और प्रभावशाली होगा। और आपको अपने परिश्रमके बदले में मजाकी ओर से धन्यवाद और प्रेम माप्त होगा" राजकुमारकी इससमय विलक्षण दशा थी। उनके चित्तपर प्रियासे शी- म समालाप करनेकी उत्कंठा बढ़गईथी और वह अनेक प्रकारके सोच विचार में नियमथे किन्तु रानी और राजकुमार के मित्रोंने दोनोंकी आन्तरिक इच्छाका इस समय प्रकाशित होना उचित न समझा । और मित्रोंके परामर्शसे राजकुमार एलबर्ट अपने भाई सहित स्विट्जर लैंड और इटालीकी और चलेगये ॥ रानीके राज्यारंभसेही उनपर प्रजाके मेमका इससे भढ़कर क्या उदाहरण होसकता है कि एकबार किसी राजद्रोही दुष्टने कह दिया कि "इस बालिका रानीको गादीसे उतारकर ड्यूक आफू कम्बरलँडको बिठाओ" इसपर ओकोनलने जोश में आकर उसको इतना डांटा कि, उसके होश उडगये । मिस्टर ओकोनल बोले -"निस युवतीसे इंग्लैंडका राज्यासन अभी शोभित हुआ है उसके प्राण प्रतिष्ठा और शरीर की रक्षाके लिये मैं इसीदम ५ लाख मीर आयलैंडवासी सैनिकोंको इकट्ठे करसकता हूं” ॥ राज्यमातिके साथही साथ प्रजाकी रामीपर भक्ति बढ़ने के अनेक कारणथे । उनमेंसे एक यह भी है कि वह दया करनेमें अमतिमथीं। राज्यमातिके प्रथम वात्सरि क उत्सबके बाद डचूक आफू बेलिंग्टनने एक पत्र एक सैनिकको जिसने कुछ सनासंबंधी अपराध उपस्थित किया उसमें कियाथा फाँसी देनेकी<noinclude></noinclude> puv3lepawsmyf2ernb0tmlxab7d4yfu पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५३ 250 194576 665180 2026-07-06T14:50:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665180 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । उस समय के नियमानुसार आज्ञा माँगी गईथी । रानीने पत्र सुनते ही पूछा:- "क्या इस सैनिक की ओरसे बचाव के कुछ प्रमाण नहीं हैं" ? इसपर वेलिंग्- टनने कहा- "जी हां यह बहुत बुरा मनुष्य है इसे अवश्य दंड मिलना चाहिये" । इसपर रानीने डयूक से आज्ञा की कि "इसपर एकबार फिरभी विचार करलो " ड्यूक बोले- "सरकार, मैं पहलेही प्रार्थना करचुका हूं कि, यह सेना में रखने योग्य नहीं है परंतु कोई २ कहते हैं कि, इसका घरु बर्ताव अच्छा है" । सुन- कर रानीने उस पत्र पर लिखदिया कि “ इसका अपराध क्षमा किया गया " उसी दिनसे पार्लियामेंटने जानलिया कि, रानीकी बडी दयालु प्रकृति है । इस- लिये उसने फाँसी की आज्ञाका कार्य रानीसे लेकर रायल कमीशनको दे दिया || अध्याय १०. शासनारंभ | राजा विलियम लिबरल पक्षका था परंतु इस वातसे सदा डरा करता था कि कहीं प्रजामत बल न पकड. बैठे इसलिये दोनों दलोंसे मिलजुलकर चलता था । उसके समय में मंत्रिमंडलभी लिवरलथा किन्तु राजाके संकीर्ण विचारके कारण सदा मन खोलकर कोई काम नहीं करता था। राज्यपरिवर्तनके साथ ही मंत्रि- मंडलने चमक दिखाई। कन्सर्वेटिव दल नरम होगया क्योंकि रानीकी माता और रानी दोनों लिबरल मतके थे। इससे जो समाचारपत्र लिवरल दलके थे उन्होंने जयघोष किया और प्रतिपक्षी कुढ़ने लगे । प्रधान अमात्य लार्ड मेलबोर्न मध्यस्थ बनकर रानीको अपनी ओर करनेके लिये जगतक कोई माइवेंट सेके- टरी नियत न हो नित्य उन्हें कामकाज समझाने जाया करते, लिबरल और कन्सर्वेटिव के भेददिखाने और समस्त झंझटकी बातें सुझाया करते थे । इनकार्यों के लिये कभी २ उन्हें दिनमें चार पांच बार तक मिलना पडता था । यह बात ड्यूक आफ् वेलिंग्टनको पसंद न थी परंतु लार्ड मेलबोर्नकी चालसे वह कुछ- कर नहीं सकते थे । रानीने सिंहासन पर विराजतेही लार्ड डरहामको जी. सी.वी. की उपाधि दी । यह कार्य उन्होंने माता, शिक्षका और लार्ड मेलबोर्नकी प्रेरणासे किया । लार्ड मेलबोर्न सदा श्रीमतीको अच्छी सलाह दिया करते थे और रानी उनपर बडी दया रखती थीं। उनपर रानीका पूरा भरोसा था परंतु सदा उन्हीं के कहने- के अनुसार नहीं चलतीं थीं किन्तु स्वतंत्रतासे अपनी सम्मति दिया करता थी ।<noinclude></noinclude> c2140sj07t4tohoje35naghrsklx7kj पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५४ 250 194577 665181 2026-07-06T14:51:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665181 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (३७) अवसे श्रीमती वकिंगहामके राजमासादमें रहने लगीं । १३ जुलाईसे - हां रहना आरंभकर ४ दिन पीछे पार्लियामेंट विसर्जन किया । जिस समय वह बकिंगहाम महलसे पार्लियामेंट भवनको गई राजमार्ग में लोगों की भीड़से तिल- धरनेका स्थान न था । प्रजाने रानीकी जयघोषणाकर हर्ष प्रकट किया। - रमें पहुँचते ही उमरायाने झुक २ कर सलाम किया। रानीने आसन लिया और सबलोग खड़े रहे । उस समय श्रीमती श्वेत साटिनका गौन पहने हुएथीं । गार्टर कास कंधे पर लटकता था। मस्तकपर रत्नजटित मुकुट और गले में हीरेका हारथा । सिंहासनपर विराजतेही लार्ड मेलबोर्नने फानमें कहा " लार्ड लोगों को बैठनेकी आज्ञा दीजिये क्योंकि बिना आज्ञा ये बैठेंगे नहीं " रानीने उमरा- बोंसे कहा- " मेरे लाडों बैठो "सब लोगोंके यथा स्थान बैठते ही श्रीमतीने अपना प्रथम व्याख्यान पढ़कर सुनाया। उसका अंतिम वाक्य यह था-"परमे- श्वरकी कृपासे में अपने शिरका बोझा उठासकूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि, वह मेरा सहायक होगा । मैं धार्मिक और सांसारिक कार्योंकी रक्षा करूंगी। बहुत उन्नति करूंगी, सबको समान गिनूंगी और मेरी इस योग्य इच्छाके लिये पार्टी- यामेंट सहायता देगी" वस्तुतः अंत समयतक श्रीमतीने अपने वचनोंका पालन किया और इसीकारणसे उनका दीर्घ शासन काल यशस्वी कहलाया । इस व्याख्यानको उन्होंने बहुतही मधुर और उच्चस्वरसे सुनाया। सुनकर श्रोता- गण दंग होगये । फेनी केम्पल नामक ग्रंथकार जो उस समय उपस्थित था उसने लिखा है कि “जिससमय रानीने व्याख्यानके आरंभ में संबोधन करनेके लिये " मेरे लार्ड और शिष्ट पुरुषो " कहा सभाका सन्नाटा एक ऐसे मृदु और मंजुळ स्वरसे भंग होगया जिसे एकवाद्यकी उपमा दे सकते हैं"। उस समय रानीका सौंदर्य रतिको लज्जित करता था । तुलसीदासजीकी "सुंदरता कहूँ सुन्दर करही । छबि गृह दीपशिखा जनु बरही "चौपाई आँखके सामने नाच रही थी | राज्यासनपर विराजतेही श्रीमतीने लार्ड मेलबोर्न से कहा कि " मुझे अपने पिताका ऋण चुकाना है। मैं इस कार्यको प्रथम करूंगी। यह मेरा पवित्र धर्म है" । यह बात कहते २ ही रानीकी आँखों में आँसू डमडमा आये । कोमल कपोलोंपर जलकी धारा बहने लगी और गला भर आया । ड्यूक आफू फेंट बडे उदार परोपकारी और खर्चील थे । उनको वेतन बहुतही थोडा मिलता था इसकारणसे उनको ऋण होगया था । जगतक श्रीमतीने पिताका ऋण न चुकाया उनके चिलको चैन न हुआ । पिताको ऋण फिटज्<noinclude></noinclude> 4yyrhnkv7bwusvkmhze33f5dauc62ag पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५५ 250 194578 665182 2026-07-06T14:51:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665182 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(३८) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । विलियम और डनडास नामके दो उमरावोंका देना था। रानीने अतिविनीत- भावसे पत्र लिखकर उन्हें धन्यवाद देते समय कहा कि "आप लोगोंने इतने समयतक धैर्ये रक्खा जिसके लिये मैं बहुत उपकृत हूँ" । ऐसाड़ी पत्र उन्होंने पिताके मित्रोंको लिखा था ॥ शासनारंभके पश्चात् अनेक प्रकारकी गप्पें टडने लगीं। कितनेही लोग कहने लगे कि रानी में दम नहीं है । यह अपनी सखी बेरनस्लेनकी सलाइसे चलती हैं और कोई कहता था कि लार्ड मेलबोर्नही उनके पास कर्ता धर्ता हैं । ऐसी गप्पें उड़ने का एक कारण यह मानाजाता है कि, राजा चौथे विलियम के कृपापात्र सरजान कानराय पर रानीका अचानक कोप हुआ । यद्यपि इसका कारण कुछभी प्रकाशित नहीं हुआ परंतु लोगोंने अनुमान किया कि रानीकी सखी बैरनस्लेजसे उसकी शत्रुता थी । कितनेही लोगोंका कथन यह है कि, राजा विलियमने राजमाता डचेज्से भरे दर्बारमें जो कटुवचन कहे थे वे इसीकी प्रेरणासे थे और इसीकारण विक्टोरिया सरजान कानराय पर अम- सन्न हुई । वास्तवमें बात यह है कि, ये गप्पें मिथ्या हैं और सरजान कानराय अपनी इच्छा से ही अलग रहा था । लार्ड मेलबोर्नका रानीपर बहुत बडा प्रभाव था। ग्रेविलने लिखा है कि "रानी- केवल राजकाजमें ही मेलबोर्न पर भरोसा नहीं रखती थीं किन्तु साधारण कामों- भी उनकी सम्मति से चलती थीं" । एकबार किसी व्यक्तिने अपनी पुस्तक रानी के समर्पण करने की इच्छासे आज्ञा मांगी । रानीने कहा कि "मैं विना इस पुस्तकका स्वरूपजाने इसवातको स्वीकार न करूंगी" । और जांचकेलिये पुस्तक मेलबोर्न को देदी । उन्होंने पुस्तक देखकर कह दिया कि "इसका समर्पण स्वीकार करना उचित नहीं है। बस रानीने पुस्तक लौटादी लोग चाहे जो कहैं परंतु इस अध्याय में लिखी हुई घटनाओंसे मेरी समझमें यह सिद्ध नहीं होता है कि, रानी मेलबोर्नके हाथका खिलौना थीं अथवा जैसे उनकी सखी सम्मति देतीं थीं वैसेही चलतीं थीं ॥ एक दिन राजघरानेकी एक प्रतिष्ठित स्त्री रानीसे मिलने आई। उसे नियत समयसे आनेमें कुछ देरी होगई थी। लेडीने श्रीमतीसे क्षमा माँगकर कहा कि "मुझे भय है कि, मैंने आपको बहुत देरतक रोक रक्खा। " रानी बोलीं- " निस्संदेह | दश मिनट और अब मैं चाहती हूं कि ऐसीबात आगेसे कभी न होनेपावे" इतना कहतेड़ी लेडीके होश उड़ गये । घबराहट में उसके कंधेसे शाल गिरगई । रानीने जान लिया कि, मेरे कथनसे इसके चित्तपर आघात पहुँचा है इसलिये उन्होंने 1<noinclude></noinclude> cr4p3fbmbfyjlnajyadfzi513sc6vhl पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५६ 250 194579 665183 2026-07-06T14:51:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665183 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( ३९ ) उसकी शाल अपने हाथसे ठीक करके कहा कि "अस्तु, जो हुआ सो हुआ । अब मुझे आशा है कि, हम अपना काम यथासमय करदेंगे" ।। रानी के शासनके विषयमें जो गप्पें उडरहीथीं उनमें कहाँतक सत्यता है और लार्ड मेलवर्नका उनपर कितना प्रभावथा इसबातका निर्णय है नेकी कोई सामग्री नहीं है। लोग चाहे जितनी गप्प उडाते ये कि, रानी काम करने में अशक्त है और जो कुछ मेलबोर्न करते हैं वही होता है । किन्तु यह विश्वासनीय मार्गसे जाना गया है कि वह जितने पत्र श्रीमतीके समक्ष उपस्थित करतेये उनपर अच्छी तरह मन किये और उनकी देखभाल किये विना श्रीमती कभी हस्ताक्षर नहीं करतीथी । एकबार किसी आवश्यक काग़ज़पर मेलबोर्नने अक्षरकरानेका हठकरने के साथही कहा था कि यह पत्र राज्यके बहुतलाभका है परंतु रानीने स्पष्ट उत्तर देदिया कि चाहे जैसा लाभदायक हो किन्तु जबतक मैं अच्छी तरह समझ न लूंगी अक्षर कदापि न करूंगी" | कुछ भी हो इतना अवश्य है कि, लार्ड मेलबोर्नसे रानीने राजकार्य की बहुत शिक्षापाई थी और यह उनका सबसे अधिक सम्मान करती थी । अध्याय ११. गिल्डहाल का दरबार और पहली पार्लियामेंट । राज्यासनके प्रथम वर्ष में सितंबर की २८ तारीखको विंडसरके मैदान में सेना- की कुवाइद हुई । मैदान दर्शकोंसे भरगया। पैररखने की भी जगह न रही। इससमय रानीने पुरुषोंकीसी सैनिक वरदी पहनकर लोगों को दर्शन दिये। पुरुषके वैशमें स्त्री का सौंदर्य एक अद्भुतमकारका देखपडता है। साडीकी जगह टोपी और गौनके बदले कोट, हाथमें सुंदर सुबुक पंखेके स्थान में शत्रुका मदमर्दनकरनेवाली किरिचको देखकर बोधहोताथा कि, मानों शृंगाररसने विश्वविजयकेलिये वीरता- के चिह्न धारणाकये हैं । सदाके नियमानुसार रानी विक्टोरियाके शासनमें लार्ड मेयरके गिल्डहालवाले दरका पहला अवसर आया ।९ नवंबरको शुभसमयमें रानीने बकिंगहाम महलसे गिल्डहालको प्रयाणकिया। राजमार्गके दोनों ओर दर्शकोंकी भीड़ लगगई। आप चार घोड़ेकी गाडी में सवार थीं। श्रीमतीका गौन उठानेका काम सदरलैंडकी को दियागया था और एलविमोरलके अर्ल गाड़ी हांकते थे । श्रीमतीने पीले रंगके पत्र पहन रखे थे, उनमें रुपहरी तारे चमकते थे और शिरका मुकुट अपनी चमकसे सुंदर केशों को अधिक चमका रहाथा। सवारी निकलतेही गिर-<noinclude></noinclude> hefmykdtzehww1je2a2k5xkgcbqpan2 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५७ 250 194580 665184 2026-07-06T14:51:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665184 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(४०) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । जोंमें घंटानाद हुआ । और लोगोंने उच्चस्वरसे "रानी विक्टोरियाका जय" का हर्षनादकर आकाश व्याप्त किया। हाट बाट, ध्वजा पताका और तोरणोंसे सजायागया था | जगह २ रानीका सुंदर चित्र विराजमान था । लोगों का हर्षनाद सुनतेही रानीने बडे विनीतभाव, हास्यवदन और गंभीर आकृतिसे लोगों से सलाम किया। मार्गमें रानीके स्वागत चिह्न देखकर श्रीमती हर्षित थीं। इतनेही में प्रधान सेनाध्यक्ष डयूक् आफ् वेलिंगटनने शनीके सत्कार में "हुरे २” की गर्जना की। टेम्बल वारपर पहुँचतेही नागरिकोंने आपका स्वागत किया। नगर में प्रवेश करतही एक एल्डरमैन ( पुराध्यक्ष ) विचित्रप्रकारपर थोडेसे गिरगया । हँसीसे भी कहकहा मचगया । चपल सवार लोगोंके चंचल चित्तको शांत करने के लिये ऐसी फुरतीसे घोड़ेपर फिर चढ़ा कि लोग चकित होगये । हँसीकी जगह सन्नाटा छागया । टेम्बल बारके पास आनेपर लार्ड मेयरने लण्डन नगरकी ओरसे तल्वार भेंटकी रानीने तल्वार अपने हाथमें लेकर थोडी देरमें लौटादी । श्रीमतीकी सवारी बडेठाके साथ सेंटपालके गिरजेके निकट पहुँची । क्राइस्ट कालेजके विद्यार्थियोंने श्रीमतीका रथ खडाकर आपके अभिनन्दन पत्र दिया । विद्यार्थियों के मुखसे “ईश्वर रानीकी रक्षा करे" सुनकर रानीने कालेजके प्रिन्सिपालको धन्यवाद दिया। श्रीमतीके गिल्डहालके निकट पहुँचतेही राज- पुरुषोंने स्वागत किया । रानीजी गाड़ीसे उतरकर दर्बारमें गई । सिंहासन पर विराजतेही गीतवाद्य होनेलगे । भोजनारंभ हुआ। कार्मार्थन परगनेकी टिबीनदीमेंसे एक लंगडे मल्लाहने सोलोमन नामकी मछली, जिसकी इंग्लैंड में बडी चाव है भेटके लिये डाकद्वारा भेजी थी और लार्ड मेयरसे निवेदन किया था कि मेरी प्रीतिपूर्वक भेटको श्रीमतीकी टेवलमें स्थान मिलना चाहिये । वही मछली रानीके भोजनमें रक्खी गई । भोजनारंभसे पूर्व सब लोगोंने एक साथ उच्चस्वरसे रानीकी मंगल कामनामें स्वास्थ्यका मद्यपान किया । इस अवसरपर रानीजी एक बात भूल गई । एक व्यक्तिने ऊँचे स्वरसे पुकारकर इस भूलका संशोधन किया । और उसीके कथनानुसार लंडन नगर और लार्ड मेयरकी सलामतीका प्रकाशकर भोजनारंभ कियागया । परंतु नगरकी सलामती- के लिये जो मद्यका प्याला भराया वह एकाएक टूटगया और उसमेंसे मय रानीके शरीरपर गिरगया। लोगों के मन खिन्न होगये । इस भोजनमें चालीस लाख रुपये की रकाबियाँ इकट्ठी हुई थीं । आनन्दपूर्वक भोजन समाप्त हुआ और रात्रिके साढ़ेआठवने रानी विदा हुई । लार्ड मेयर फाटकतक पहुँचाने गये । श्रीमती उनसे हाथ मिलाकर अभ्यर्थनाकेलिये धन्यवाद दिया । जाते-<noinclude></noinclude> rr4npk06km1y0wlv9gwi46bzzk1o051 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५८ 250 194581 665185 2026-07-06T14:51:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665185 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( ४१ ) समय नगरवासियोंने जैसा सत्कार किया था वैसाही लौटतीवार किया । श्रीमंती लार्डमेयर तथा सर जान कोवेनको बेरोनेट, सर मोजिजमॉटशेर और सर जान केरलको नाइटकी पदवी दी । सर् मोजिनसे पहले किसी यहूदीको टच उपा धि नहीं मिली थी इसकारण इनके पदवी पानेसे लोगोंको निश्चय होगया कि श्रीमती ईसाई और यहूदियोंका द्वेष मेटना चाहती हैं | राजकार्यसे छुट्टी पानेपर रानी अपनासमय गान, पुस्तकावलोकन, समाचारपत्र पढ़ने, चित्रकारी करने, घोड़े दौड़ाने और सैर करनेमें बिताती थीं । इटालियन गायनसे श्रीमतीको बढा प्रेम था । चित्रकलामें वह बड़ी प्रवीणा थीं। कभी २ वह अपने संबंधियों और भाई बंधुओंको बुलाकर भोजदिया करती थी। उससमय उन लोगोंसे कहतीं कि " मैं अभी रानी कहलाने योग्य नहींहूं, क्योंकि मेरी उमर कम है " इससमय इनकी उँचाई पांच फुट दो इंच थी परंतु राजरथपर बैठकर बाहर निकलते समय अच्छी लंची दिखलाई देतीं थीं ॥ इसी अवसर में रानी और राजमाताका वध करनेकी धमकी देनेके अपराधमें ज- मैनी निवासी 'स्टवर' नामक व्यक्ति पकड़ागया। यह पागल निकला । ४नवंवरको जय श्रीमती अपनी मातासहित सेंटनेम्सके गर्डकेन वाक स्थानको गाड़ीपर सवार- होकर जारही थीं दूसरे एक व्यक्तिने गाडीके बराबर आकर घूँसा उठाया और बहुतसी गालियाँ देनकैसाथ कहा कि में, तुम और तुम्हारी माको गादीसे उतार दूंगा । यह कहकर भागाजाता था परंतु तुरंतही पकड़ लिया गया। पकड़नेपर विदितहुआ कि, यह जान गुड नामका पागल है || २० नवंबरको श्रीमतीने प्रथमवार पार्लियामेंट खोली । पार्लियामेंट भवन- में जाते समय मार्ग में रानीका बडा सत्कार हुआ। रानीने लार्ड सभाकी गादी- पर विराजकर लार्ड भैंसलरसे अपना प्रतिज्ञापत्र पढ़वाया । इसकेबाद पा लियामेंट में राजकुटुंबके लोगोंके वेतनकी लिस्ट पेश हुई। इसके अनुसार रानीजीको राजकोष से ३८ ॥ लाख रुपया देना निश्चय हुआ । इनमें से भी- जनखके ६ लाख रुपये, घर खर्चके १३१२६००), और कामके लिये १७२५०००) तथा राजमहलकी रक्षाकेलिये १३२००० ) नियत हुए । और फुटकर कामकेलिये ८०४०० ) ठहरे। इस प्रस्तावका मिस्टर जोनेफ़ झमने विरोध किया और कहा कि इतना खर्च करना उचित नहीं है । परंतु उनका विरोध किसीने न माना । राजमाताके खर्चमें भी अस्सी हजार रुपयेकी वृद्धि कीगई ।<noinclude></noinclude> jc8uszn0wwvgavrpyvn1l2kum6tya37 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/५९ 250 194582 665186 2026-07-06T14:51:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665186 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(४२) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । रानी विक्टोरिया अध्याय १२. राज्याभिषेक | सिंहासनारूढ होनेके बाद एकवर्षतक मृतराजाका शौक पालागया । पट्टाभिषेककी तैयारीकेलिये बहुत दिन पहलेसे धूम मच गई । इस शुभ अवसरपर राज्यकर्त्ताका ओष्टचुधन करनेकी वहांक उमरावों में चाल है । लोगोंका अनुमान था कि इससमयकी राज्यकर्त्री स्त्री है इसलिये यह नियम उठा दिया जायगा परंतु यह रीति ज्यों की त्यों बनी रही । इसकार्यमें रानीके चाचा और अन्य सर्दारों की गिनती छःसौके लगभग पहुँचनेवाली थी । इस क्रिया में रानीके शिरको हाथसे छूना और उनके गालका चुंबन कर नाही कार्य था । परंतु अधिक लोगोंने इस कार्यको न किया । रानीका प्रथम सिक्का जिसमें रानी विक्टोरियाका चित्र था १४ जुलाईको प्रथमवार ढालागया । और राजा चौथे विलियमका राजमुकुट बहुत भारी था इसलिये उसे तोडकर नये शिरसे बनाया गया। इस मुकुटमें १ विशाल हीरा, १बडा नीलम, १६ छोटे नीलम ११ पत्रे १२४६ पुखराज १४७ चपटे मणि ४ मोती बडे और२ ३ छोटे मोती जडे गये। राजा पंचम हेनरीने एजिनकोर्ट के रणक्षेत्र में एक वडाहौरा प्राप्त किया था। वही इसके बीच में लगाया गया । राजाका मुकुट सेरका था किन्तु इसका बोझा केवल तीनसेर हुआ । इस मुकुटके बनवाने में कुल १ करोड १२ लाख ७६ हजार रुपया ब्यय हुआ। यह रंडलबिज नाम जौहरी की मार्फत बनायागया था। उन्होंने तैयार करनेबाद जब इसका प्रदर्शन किया तब दर्शकों की बड़ी भीड़ इकट्ठी होगई थी । इस मुकुटकी प्रशंसा में राजकवियोंने काव्य निर्माण किये थे और इस उत्सवपर विशेष प्रकार से पदक राज्यकी ओरसे बाँटे गये थे ।<noinclude></noinclude> 0zwt23j2rjx5k2eiuylmg2qnif4wrtl पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६० 250 194583 665187 2026-07-06T14:52:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665187 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । महारानीका राज्याभिषेक । (४३)<noinclude></noinclude> g1hc12uhj8mul3todt8wnscz2xomzw3 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६१ 250 194584 665188 2026-07-06T14:52:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665188 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६२ 250 194585 665189 2026-07-06T14:52:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665189 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । इंग्लैंड राज्यका सिंहासन । (४५)<noinclude></noinclude> s23kneiddnyx9m3jephgsxf5v9z91pj पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६३ 250 194586 665190 2026-07-06T14:52:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665190 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६४ 250 194587 665191 2026-07-06T14:52:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665191 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । महारानीका मुकुट । (४७) २८ जून सन् १८३८ के सूर्योदयके पूर्वसेही आकाश मेघाच्छन्न होगया णदल इधर उधर दौडकर लंडनकी शोभा इन्द्रलोकवालों को सुनाने लगे। वर्षाकी बूँदोंने आनन्दमें आनन्द बढ़ाया। कोहरे से अंधेरा छागया । लोग उमंगके मारे अंधकार में अपने हर्षका प्रकाश कर काम काजके लिये इधर उधर दौड़ने लगे । गिरनाओं में ईश्वर प्रार्थना आरंभ हुई । नगरके नर नारी सुन्दर वस्त्रालंकारों से सज धज कर तैयार हुए। लोगों के बहुत देरतक टकटकी लगाकर राह देखनेके पश्चात् श्रीमतीकी सवारी बकिंगहाम राजभवन से निकली यूरोपियन राज्योंके प्रतिनिधि नेपोलियनका शत्रु डयूक आफू वेलिंग्टन और ब्रिटिश राज्यके टमराव श्रीमतीकी गाड़ीके पीछे २ चलेते थे । गगनभेदी जयघोषसे लंडन नगरी भरगई । इस सवारीमें राजकुटुंब के लोग, राजमाता, श्रीमती शरीररक्षक और बड़े २ राजकर्मचारी साथ थे। रानीके शिरपर राजचिह्नसहित सुनहरी दंडका छत्र था चारों ओरसे जयध्वनि गूँजरहीथी । बंदीजन साथ २ स्तुतिपाठ करते जाते थे । बडे ठाठके साथ धीरे २ चलती चलाती सवारी दोनों ओर भीड़को फाडती हुई वेस्टमिन्स्टर एबी नामक गिरिनेमें पहुंची उसके पश्चिम द्वारपर एक सुवर्णलेख है जिसमें 'यहां राजवंशियोंको पवित्र राज दंड मिलता है' लिखा है ।<noinclude></noinclude> 6jst7bahpcvtet2uq25chgs93ljht14 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६५ 250 194588 665192 2026-07-06T14:52:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665192 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ४८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । दुपहरके लगभग सवारी गिरिनेमें दाखिल हुई । द्वारपर पहुँचतेही गिरजेका प्रधान राजचिह्न और पादरी बाइबल लेकर आया। वहां पर रानीका पाद- प्रक्षालन हुआ रथमेंसे उतरकर श्रीमती कपड़े बदलने के कमरे में गई। वहां का बडा भव्य मंडप था । बीचमें पाषाणकी एक कुरसी थी। इसके पास एक पाषाणथा । इसी पर प्रथम एडवर्ड राजाके समयसे पट्टाभिषेककी क्रिया होती है राजसिंहासनके इधर उधर अमीर उमरायोंकी कुरसियां थीं मध्याह्नके समय सब लोग अपने २ स्थान पर खड़े रहे । प्रथम अभिषेक स्थलपर वेस्ट मिन्स्टरका पादरी और रानीके प्राइवेट कर्मचारी दाखिलहुए । उनके पीछे लाई मिवि सील, लार्ड प्रेसीडेंट आफ् कौंसिल, आयलैंडके लार्ड चैसलर, यार्क का पादरी, इंग्लैंडका लार्ड चैसलर और कैंटरबरीका प्रधान पादरी था। इनके बाद जुदे २ राजाओंके प्रतिनिधि और राजवंशी आये । रुमका एलची इस चाकच- क्यको देखकर भौंचक होगया । अंतमें ड्यूक आफू वेलिंग्टन तीन पादरियों सहित बाइबल, पात्र और चौकीलेकर आये । रानीजी उससमय सुन- हरी धारीदार गौन पहने हुएथीं । इस गौनको इंग्लैंडके उमराओंको आठ कन्यायें उठायेंथीं श्रीमतीके मंडपमें पहुँचतेही सब लोगोंने खड़े कर झुकर कर सलामें की । फिर गज गति से आप गायकमंडलीका मुजरा सुनती हुई आगेवढीं । गिरनेके विद्यार्थियों ने "जुग जुग जियो विक्टोरिया रानी...." का गीत गाया। नियत स्थानपर पहुँचतेही रानीने घुटने टेककर ईश्वरोपासना की। फिर मुख्य सिंहासन पर बैठनेके बदले आप एक साधारण कुरसीपर बैठीं ॥ अब कार्यका आरंभ हुआ । राज्यके मुख्य २ अधिकारी एक २ करके धर्म- क्रियाके स्थानपर गये । वहां जाकर उन्होंने कहा- " राजपुरुषो, आपको विदित है कि राज्यकी वास्तविक स्वामिनी रानी विक्टोरिया हैं। उनके पवित्र अभि वेकके कार्य में आप इकट्ठे हुएहैं । उसे आप स्वीकार करो" । प्रत्येक व्यक्ति- के कथनके साथही "चिरजीयो विक्टोरिया रानी” और “परमेश्वर विक्टोरिया रानीकी रक्षाकरै" का आनन्द गर्जन होता था । इससमय प्रधान पादरी चारों दिशाओंमें फिर २ कर प्रार्थना करता जाता था । इसीतरह श्रीमतीको भी प्रत्येक वार करना पड़ता था । इससमय बाइबल और जलपात्र लिये पादरी आ पहुँचे । केंटरवर के पादरीने अन्य पादरियोंकेसाथ मिलकर स्तोत्रपाठ किया। और सबने पवित्र जलसे रानीके शिरपर आशीर्वादका अभिषेक किया । रानीजीने<noinclude></noinclude> jnbm3esxh6iq4uv13yq7i428l2iuvjf पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६६ 250 194589 665193 2026-07-06T14:53:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665193 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । प्रत्येक धर्मगुरुको प्रणामकर एक २ सुवर्णमुद्रा भेटकी "निरजीयो विक्टोरिया रानी" ( ४९ ) । सबने मिलकर का गान किया । फिर टसजगह राजचिह्न लायागया । माचीन और नवीन धर्मपुस्तकों से थोडे भजन गायेगये। उन भजनों का आशय यह था कि राजा ईश्वरका अंशावतार है । और इसलिये राजाको न्याय और नीति अनुसार पर्तना चहिये । एक पादरीने मृत राजाके गुणों का गान किया। और उनका अनुकरण करनेका राजकुटुंबको प्रयोध किया। इसके अनंतर राज्य कार्यमें न्याय और सगुणोंका बत्तीय करनेके श्रीमतीको शपथ दियेगये । शपथ देनेसे पूर्व ईसाइयोंकी धर्मपुस्तक में से जितने भजन रानीको सुनायेगये उनको उन्होंने बहुत ध्यानपूर्वक सुना । ताऊ के गुणों का प्रसंग आतेही श्रीमतीका हृदय भर- आया परंतु इससमयपर आंसू गिराना अशुभ समझ, आपन शिर झुका- कर आंसुओं को छिपादिया । प्रार्थना समाप्त होतेही पादर्शने रानीके पास जाकर कहा:- "रानी क्या आप शपथ लेने में प्रसन्न हैं । " रानी" हां मैं राजी हूँ! पादरी-" क्या आप ग्रेट ब्रिटेन और आयलँडकी प्रजाका और इनके अधिकृत राज्यका न्याय और आईनके अनुसार शासन करनेके अंतःकरणसे शपथ खाना चाहती हैं ? " रानी - ( विनीत भावसे)" हां में ऐसाही करनेका मण करती हूँ । पादरी - "क्या आप अपनी शक्ति, बर्ताव और आईनके अनुसार कार्य करने में दयापूर्वक न्याय करेंगी ? " रानी" हां " पादरी - " तब क्या आप अपनी शक्तिके अनुसार ईश्वरके आईन, और प्रोटेस्टेंट धर्मके नियत नियमोंका पालन करेंगी ? और क्या आप पादरियों और गिरजोंकी रक्षा कर उनके स्वत्वोंका पालन करेंगी ? " रानी - (ढतापूर्वक स्पष्टतासे ) -" इन सब बातोंका मैं मणकरती हूं | " इतना होतेही लार्ड चैम्बरलेनने रानीके हस्तकमलमें एक तलवार दी। उसे हाथमें लेकर रानीने बाइबल पर हाथ रखा और प्रधान पादरीको दंडवत भाम कर कहा " यहां पर मैंने अभी जो कुछ कहा है उन वचनों और प्रति- ३<noinclude></noinclude> mfmpe89714jofs8nus8fl8c7xlvlpn9 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६७ 250 194590 665194 2026-07-06T14:53:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665194 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५०) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ज्ञाओंको मैं यथान्याय और सद्बुद्धिसे उचितरीतिपर पालन करूंगी । परमे- श्वर मेरा सहायकहो” । यह कहकर प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर किये। फिर उसका चुंबनकर घुटने टेककर प्रणाम किया और गिरजे के गायकोंने ईश्वरकी स्तुति और रानीकी विजयका गान आरंभ किया ! धर्मकार्यकी समाप्ति होनेपर राजकीय कार्य आरंभहुए। रानीने राजा एडवर्डकी कुरसीपर आसन लिया । चार नाइट आफ गार्टर पदवीवाले सरदारोंने एक सुवर्ण मय के चारोंकोने पकड़कर श्रीमतीपर छायाकी । वेस्टमिन्स्टरके पादरीने एक तेलभरा पात्र उठाकर उसमेंसे सुगंधित तेल एक चमचेमें लिया और उसे श्रीमतीके शिरपर डालकर उसकी आकृति स ( ईसा पैगंबर के फांसी चढने का चिह्न) कीसी बनाकर कहा-"जैसे राजा, पादरी और पैगंबरोंका अभिषेक हुआ था उसीप्रकार से तेरा हुआ है । सोलोमनने जेडोकके राजाका जैसे अभिषेक कियाथा उसी तरहसे पवित्र तेलसे तेरा हुआ है । परमेश्वरने आशीर्वाद देकर इसलोककी रक्षा करनेके लिये तुझको योग्य गिना है । यहां ज्ञ पिता पुत्र और पवित्रात्माके नामसे राज्यकर" इसकेबाद राजमुकुट और राजदंड प्रदान करनेके लिये मंडपमेंसे सात पादरियोंने मिलकर दोनोंको उठाया । मुकुट रानीको पहनायागया । पहनतेही “ईश्वर रानीकी रक्षाकरै" के गानसे गिरजा गूंजरठा । अमीर उमराव और उनकी स्त्रियोंने राजमुकुटके न गरें की। घंटानाद होतेही एक साथ तोपोंकी गर्जना होनेलगी || एक नार्वेनिवासिनी स्त्रीने वहांसे हाथका सहारा देकर रानीको उठाया । श्रीमती अब जाकर मुख्य सिंहासनपर विराजीं । उनके हाथमें प्रथम बायबल और फिर राजदंड रक्खा गया । दंड हाथमें आतेही एक २. करके सब लार्ड लोगोंने श्रीमतीके पास जाकर सदा राजभक्त रहनेके शपथ खाये और रानीके मुकुटपर हाथ लगाय बायबलपर बुर्बन करने बाद अपनी जगहपर आ बैठे । वृद्ध लार्ड रोली अभिवंदनके लिये रानीके पास आते २ गिरनेलगे तब श्रीमतीने सहारादे- उनको उठाया। इसकार्यके समाप्त होतेही गिरजेके गायक लोगोंकों पदक दियेगये । सुंदरगीत और वाद्य मध्यमें नारफाकके डयूकने श्रीमतीके हाथमें दोराजदंड रक्खे अंतमें रानी, प्रधान पादरी ( केंटर वरीके आर्चबिशप ) और लार्डचेंबरलेन को लेकर, मंडपमें गई। मां श्रीमतीको बाइबल सुनायागया। रानीने सोनेकी मुद्रा- ओंसे भरी हुई एकथैली भेटकी । राज्यका असलमुकुट उतारकर अपना नवीन मुकुट शिरपर धारण किया। वहांसे उठकर रानी राजा एडवर्ड के गिरने में गई ।<noinclude></noinclude> mdpkubvvx140sdbuhocty8xsvnlxc2p पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६८ 250 194591 665195 2026-07-06T14:53:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665195 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मथम भाग | (५१) यद्यपि घरावर तीनघंटेके परिश्रमसे श्रीमती थकगईथी परंतु लोगोंके आशीर्वाद और हादसे उन्हें बिलकुल थकावट मालूम न हुई और यह बरावर राजभक्त मजाको सलाम करके उन्हें धन्यवाद देनेमें न हटीं और कार्य समाप्तकर, जिस तरह आई थीं उसी तरह राजमार्ग में होकर पीछी अपने निवास स्थानपर पधारी । मार्ग में रानीका जय जयकार होने लगा । उसी रातको डयूक आफू वेलिंग्टनने एक बाल दिया । नगरमें आतिश- की धूममची। नगर में बडी भव्य रोशनी हुई और कितनेही दिनोंतक जब श्रीमती बाहर निकलती तबड़ी लोग उनपर पुष्पवृष्टि करते रहे । राज्याभिषेकके कार्यमें ६९४२१० || = ) ४ खर्च हुआ। नौये जार्जके समय दशलाख रुपये व्यय हुए थे । रानीसे लोगोंकी भक्ति इतनी पठाई थी कि एक स्काटलैंड वासी मनुष्य श्रीमतीका हस्त जुंपन करने आया और कुंचन करर के श्रीमतीको सताने लगा और जगतक राजकर्मचारीने उसे वहांसे न हटाया वह न डिगा । चार दिनतक हाइड पार्क में मेला हुआ। नगरके नाटक और मेले तमाशे रानीकी आज्ञासे दर्शकोंके लिये विना मूल्य खुले रक्खे गये । राज्यघरमें इसका महोत्सव हुआ । इस उत्सव थोड़काल पीछे एकदिन श्रीमती राजकीय गाडीमें चढ़कर कहींको जारहीं थीं । मार्गही में एक मनुष्य भीडमेंसे निकलकर रानीके मुख पर एक पत्र फेंककर भागा। अपराधी पकड़ लिया गया । और स्वल्पदंडके पश्चात् उसकी छुट्टी हुई । उन दिनोंमें इसमकारकी अनेक घटनायें हुई परंतु उनका यहां उल्लेख करना आवश्यक नहीं है । केवल एकत्रातही ऐसी हुई है जिससे चित्तको हँसी आये बिना नहीं रहती। एक बार श्रीमती हाइड् पार्कके बागमें टहल रही थी । इतने में एक व्यक्ति घोड़ा दौड़ाता हुआ कभी हंसता और कभी तरह २ के संकेत करता हुआ इधर उधर घूमने लगा। कर्नल के- डिशने इसे पकड़कर पुलिस के हवाले किया और वहां उसपर ५ पौंड दंड हुआ और २०० पौंडकी दो जमानतें कीं गई । अध्याय १३. शयन गृहका जाल । पट्टाभिषेककी धूमधाम समाप्त होनेके बाद कुछ कालतक सब काम शांति पूर्वक चलता रहा। एकाएक राज्य प्रबंध में गड़बड़ खड़ी हुई । कैनाडामें युद्धकी संभावना हुई । इंग्लैंडमें असंतोष फैलनेलगा और प्रधान मंडलपरसे मजाका<noinclude></noinclude> bu0nbf1jzef93xlm2gufqzcxt2sgj58 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/६९ 250 194592 665196 2026-07-06T14:53:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665196 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५२) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । उठ गया । इसी अवसरमें लेडी फ्लोरा हेस्टिंग्सके अभियोगकी हलचल मचगई रानीने इस हलचलको मेटने का बहुतेरा प्रयत्न किया परंतु कुछ सिद्धि न हुई । प्रतिकूल पक्षने युवती रानीके कलंक लगानेका प्रयत्न किया । लेडी फ्लोरा का अभियोग जांचने के लिये रानीने मेलबोर्नको नियत किया। जांच करते रही वह स्त्री मरगई और इस कारणसे लार्ड मेलबोर्नपर औरभी संदेह बढ़ गया । रानी विंडसरके राजप्रासादमें निवासकर और वहीं नास्ता लेती थीं। प्रत्येक कामके औरं दिनके ग्यारह बजे लार्ड मेलबोर्न वहां ते थे । दिनके दोबजे लार्ड मेलबोर्नको साथ लेकर थोड़ा दौडाने जाती और लौटने पर बालकों से ठठोल करने और गाने बजाने में समय बिताती थीं। रात्रि- के भोजन के समय लार्ड मेलबोर्न और एमेरिकाके प्रतिनिधि अवश्य उपस्थित रहते थे । रात्रिके ग्यारह बजे सोनेसे पूर्व अपने घरवारकी रिपोर्ट सुनती और देखभालके बाद सुखकी निद्रा लेती थीं ॥ नित्य प्रातःकालके आठवजे उठती कागजोंकी वह स्वयं जांच करतीं आकर आवश्यक काग़ज़ पेश कर यद्यपि लार्ड मेलबोर्नकी सम्मति और वर्त्तावको श्रीमती बहुत पसंद करती थीं और उन्हींके कथनानुसार चलतीं थीं और उनके समान श्रीमतीके लिये कोई उत्तम और न्यायी मंत्री न था परंतु यह बात उनके विरोधियोंको बुरी लगती थीं और इसीलिये वे कहा करते थे कि रानी मेलबोर्न के हाथ की गुडिया है और जिस दिन वह कामसे अलग होंगे रानीको प्रबंध करनेमें बड़ी कठि नता पड़ेगी । केनेडाकै युद्ध और मेलबोर्नपर पार्लियामेंटकी आशंका के कारण पार्लियामेंट में गड़बड़ मच गई। लार्ड मेलबोर्न ने ७ मई सन् १८३९ ई० को इस्तीफा देदिया। श्रीमतीने सर राबर्ट पीलको प्रधान अमात्य बनाया। उसी समय नवीन प्रधानने कहा कि नवीनमंत्रिमंडलपर विश्वास प्रकट करनेकेलिये अपनी कितनीही सहेलियों को पदच्युत करदीजिये । ये सहेलियां लार्ड मेलबोर्न के पक्षकी थीं। इससे बात बढ़ गई । सरराबर्ट पीलने इस विषय में एक चाल कीथी । चाल व्यर्थ गई । उसी दिनसे इस चालका नाम “शयनगृहका जाल ( Bed chamber plot )” प्रसिद्ध होगया । इस चालमें डचूक आफू लिंगट भी संयुक्त थे। इसका नाम " शयनगृहका नाल” इसीकारणसे पडा है कि इसमें रानीकी सखियोंको निकालनका प्रयत्न कियागया था। युवती रानीने किसीकी कुछ न सुनी और जितने २ प्रमाण और तर्क श्रीमती कियेगये उनका आपने यथातथ्य उत्तर दिया। अंतमें श्रीमती ने सर राबर्ट पीलसे स्पष्ट कहदिया कि "मानलो कि आपही पहलेसे मुझे सम्मति और सहायता देनेवाले होते और आपद्दी के पक्षकी सहचरियों मेरे पास रहती<noinclude></noinclude> gl8lhnyprrcgptj5b3551ipj6wqsggt पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७० 250 194593 665197 2026-07-06T14:53:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665197 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मथम भाग | ( ५३ ) तो क्या में उन्हें दूसरे पक्ष कहनेसे निकाल देती। स्मरणरवखो कि मैं लाई मेल- बोर्न के लिये आपको कुछ कहने न दूंगी।" यह बात पुराने मंत्रिमंडलको विदित हुई । वे लोग लाई मेलबोर्नके यहां इकट्टे हुए । इसविषय में श्रीमतीका एकपत्र मेलबोर्नके नाम गया जिसमे लिखाया कि "आप किसी चातका डर न करें। मैं सब बातें शांत चिनसे मुनंगी । आज ये लोग मेरी सखियों को निकलवा देना चाहते हैं। कल्ल मेरी नौकर नियोंको निकालना चाहेंगे | वे लोग मुझे अवोध वालिकाकी तरह सिखाना चाहते हैं । परंतु में उन्हें तलाहूंगी कि मैं इग्लैंड की स्वामीनी हूँ |" मेलबोर्न पत्र पठेतेही उछल पड़े । उहोंने अपने मित्रोंसे कहा कि रानी एलिजावेथसे भी अधिक दृढ और सप्तम हेनरीसे अधिक शक्तिमती हैं।" पालने रामीकी दृढ़ता देखकर नवीनमंत्रिमंडल संगठन करनेका विचार उठा रक्खा | कानोकान नगर में घात फैलतेही रानीकी मुक्तकंठ से प्रशंसा होनेलगी । लिवरल और कंसर्वेटिवदलमें आपसकी लड़ाई मचगई । पीलने फिर सहचारियोंको नहीं वरन कईएकको अलग करनेका अनुरोध किया । रानीने स्पष्ट कहदिया कि में लार्ड मेलबोर्नसे कदापि अलग न होऊंगी, वह मुझे कभी बुरी सम्मति नदेंगे और उनका त्याग मुझसे कभी न हो सकेगा ।" इस विवाद का परिणाम यह हुआ कि पाठके दलने इस्तीफा दिया और मेलबोर्न फिर प्रधान अमात्य हुए । ऐसी दृढता और बुद्धिमानीसे उन्होंने मंत्रिवर्गका दमन कर उनसे विजय पाया। राजकर्मचारियोंमें उनका आतंक फेलगया और प्रजाकी भक्ति दिन २ बढ़ने लगी ॥ अध्याय १४. राजकुमार एलबर्ट से प्रणय । जिस शुभसंवत्सर में रानी विक्टोरियाका जन्महु आथा उसीमें अर्थात् २६ अगस्त सन् १८१९ ई० को सैक्सकोवर्ग और शेल्फल्डिके डयूकके पुत्र राजकुमार एलबर्ट का जन्म हुआ । इनका जन्मस्थान सेसन्यू कोयसे चारमील है। यहां ब्यूक टप्ण कालमें निवास किया करते थे । यह उन सैक्सन लोगोंके वंशधर थे जिन्होंने अपने देशकी स्वतंत्रताको जर्मनीवालोंके आक्रमणसे बचाने में नामकर यूरोप के इतिहासकी वीरमंडली में स्थान पाया था। इनके दो बड़े भाई थे । दुर्भाग्यवश इनके जन्मके पश्चात् इनके पिता माता में परस्परका मनमुटाव होगया जिसका<noinclude></noinclude> qh0wzljnjsd4ltn60qm6ibmbalw8xdc पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७१ 250 194594 665198 2026-07-06T14:54:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665198 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५४) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । परिणाम यह हुआ कि दोनोंने विवाहबंधन तोड़दिया । और इसलिये राजकु- मार एलबर्टको माताका संग त्यागकर पिताके पास रहनापड़ा। यहबाल्यवस्थासे ही को मल, सुंदर, अशक्त और तीक्ष्ण बुद्धिमान् तथा चतुर थे । इनकी दादीने इनका पालन पोषण किया था । छः वर्षकी उमरसे इन्होंने अपनी डायरी लिखना आरंभ करदियाथा । डायरी में एक दिन लिखा कि “आज खेल कूदमें दिन बिताया और बडे भाईको कुश्ती मारी" दूसरे दिन “हारखाई परंतु कल फिर लड़ना " लिखा । राजकुमार चपल और वीर थे । छः वर्षके वयसे इनकी अशक्ति जाती रही थी । एलबर्टकी दादीने बचपनसही इनकेसाथ विक्टोरियाका मेल जोल करादिया था । एलबर्टकी दादी को वर्गकी डचेज् अर्थात् रानी विक्टोरियाकी माता डचेज् आफ्केंट्की माता अर्थात् विक्टोरियाकी नानी थी। तरुण राजकुमार को नानाप्रकारकी शिक्षा दीगई और पंद्रह वर्षकी उमरमें वह बड़े पुरुष गिने जाने लगे । राजकुमार जिस समय बारहवर्षका हुए इनकी दादीका देहांत होगया । इन्होंने साइंस, साहित्य, राजनीति, संगीत, और नानाशास्त्रों में अच्छी योग्यता प्राप्तकर देशाटन किया। हॉलंड, जर्मनी, आस्ट्रिया और इंग्लैंडके प्रवासमे इनकी बुद्धि खिल निकली। बेरन स्टाकमरके साथ इन्होंने इटाली और स्विट- जर लैंडका अवलोकन किया। इससे पूर्व यह बोनगर में पूर्ण शिक्षा समाप्त कर चुके थे। बेलनियमके राजा एलवर्टका विक्टोरियासे विवाह करने की बहुत दिनसे इच्छा रखते थे किन्तु इंग्लैंड के राजा चौथे विलियमने यह बात स्वीकार नहीं की थी । उससमय रानी विक्टोरियासे विवाह करनेके पांच उम्मेदवारथे किन्तु उन्होंने निश्चय कर लिया था कि "जो विवाह करूंगी तो प्यारे एलबर्टसही ॥”<noinclude></noinclude> 4d6r69vyeae0w1ukt9t75b7na4m8k43 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७२ 250 194595 665199 2026-07-06T14:54:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665199 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | महारानीके पति राजकुमार एलबर्ट । ( ५५ )<noinclude></noinclude> jel1ivme9sx8tl60axkzoct9kh5azib पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७३ 250 194596 665200 2026-07-06T14:54:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665200 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७४ 250 194597 665201 2026-07-06T14:54:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665201 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (40) सन् १८३९ ई० के वसंतऋतु में एकदिन राजकुमार आखेट करने गये थे । एरनवर्ग स्थानके अपने कमरे में राजकुमारने लौटते ही अपनी बहन ( फूफीकी (लड़की) विक्टोरिकाया चित्र देखा । जैसे पूर्णिमाका चंद्रमा राहु यसागयाहो, जैसे हरिण मिलिनियोंके गानपर मोहित होगयेहों और निसतरह प्रणय मुखको न जाननेवाले अज्ञान यौवनक पुरुषके चित्तपटलपर प्रथमवार प्रियतमाके दर्शनका संस्कार हुआ हो उसी तरह राजकुमार उस चित्रपटमें रानी विक्टोरियाका मंदर मुसक्यान और मदभरी चितवन देखकर पानी होगये। मंत्रमुग्ध सर्पकी तरह एलबर्ट कभी आँखें बंद करते कभी अंगडाई लेते, कभी लज्जित होते और कभी प्रेमकै अगाधसमुद्र में गोते लेते थे । राजकुमार जिससमय बाहरगये उनके महलमें विक्टोरियाका चित्र नथा । रानी विक्टोरियाकी आज्ञासे सेवकोंने चित्र ऐसे ही ढंगसे अवसर साधकर रक्खा था जिससे थके हुए राजकुमारकी बाहरसे आने में एकाएक दृष्टिपडे। रानीकी युक्तिका मणयमें बहुत कुछ प्रभाव हुआ। सैरसे थके हुए रान- कुमारके चित्त में रानीकी मोहिनीमूर्तिने इसप्रकार निवास करलिया जैसे मूर्तिको हृदय में स्थान देनेके लिये थकाकर उनके शरीरके बंधन ढीले कियेगये हों । चित्रके साथही राजकुमारको रानी विक्टोरियाका एक पत्र मिला । पत्रमें इंग्लैंड जाने- का निमंत्रण पाकर अपने ज्येष्ठ बंधु अर्नेस्ट के साथ इंग्लेंडको प्रयाण किया । और वहां पहुंचकर विंडसरके राजप्रासादमें डेरा दिया ॥ दस समयकी रूपलावण्यता देखकर रानी विक्टोरियाका चित्त एलबर्ट में जावसा । उन्होंने अपने मामा लियोपोल्डको लिखा " एलर्टका सौंदर्य चित्ताकर्षक है । वह परमप्रीतिवर्द्धक और सुंदर है । थोड़े में यही कहना है कि बड़ाही मनमोहन है । " इतना लिखते २ रानीको बोध हुआ कि मेरे हार्दिक विचार अनवसर पर प्रकट हुए आते हैं इस लिये उन्होंने पत्रके अंतमे लिखा कि- " दोनों भाई मिलनसार हैं। दोनो इंग्लैंडमें रहें तो बहुत अच्छाहो । " जबतक लंडनमें राजकुमार एलबर्ट रहे रानी नित्य उनसे मिलाकरतीं थीं । रान माता और लार्ड मेलबोर्नको साथ लेकर दोनों नित्य वायुसेवनको जाते नित्य सायंकालको साथ भोजन करते जर सप्ताहमें तीन बार नाच होता जिनमें रानी अन्य राजपुरुषोंको छोड़कर राजकुमार एलबर्टके साथ नाचतीं । एक दिन रानीनें अप शिरोरत्न भेंट किया । इसे पाकर राजकुमारको मणयका<noinclude></noinclude> iuj6b0lk7qiwwcmpvvut2rl3hvx3xff पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७५ 250 194598 665202 2026-07-06T14:54:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665202 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५८) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । पक्का निश्चयहोगया जबतक राजकुमार इंग्लैंड में रहे रानीने उनके साथ रानी- पने का बर्ताव न किया किन्तु जैसे एक साधारणस्त्रीका साधारण पुरुषके साथ प्रणयहो उसी तरह रानी रहनेलगीं ॥ इस समागम में रानीने राजकुमारको इच्छा की टटोल करनेकेलिये एक- दिन उनसे पूंछा - "आप इंग्लैंडको कैसा चाहते हैं ? " इसके उत्तर में राजकुमा रने कहा - " बहुतही अधिक " एकबार रानीने फिर पूंछा" आप इंग्लैंडमें रहना पसंद करते हैं ? ” यह बात पूंछते समय रानीकी आंखेंनीची, चित्त स्थकित और शरीर में सनसनाहटथी। राजकुमार सुनतेही दंग होगये । प्रेमाकुल होकर उन्होंने कहा - "निः संदेह" - सुनतेही रानी बोली- “तब यहांका निवास करना आपके ही हाथ है" इतना कहकर अपने प्रियतमको नेत्रवाणसे बद्धकर रानी वहांसे सटकगई । प्रणयका आरंभ पुरुषकी ओरसे होता है । पुरुषही स्त्रीका इसकार्यके लिये प्रार्थी होता है किन्तु इस मणयमें विपरीतता हुई । प्रणयके प्रकाशितहोने पूर्व ग्लो- सेस्टरकी डचेज् रानीसे मिलने गई। उससे रानीने कहाकि "मैंही अपनाविचार कल प्रकट करदूंगी" लेडीने रानीकी हँसी की । कहनेलगी- " यह बात स्त्रीजातिके हृदय की गंभीरतांके विरुद्ध है।” रानीबोली-"मैंने इससेभी अधिक निर्बलताका कार्य किया है ।" लेडीने पूंछा - " वहक्या है?" रानी-"यह यही है कि मैंने अपना मन राजकुमार एलबर्टको देदिया है |" अध्याय १५ प्रणयका प्रकाश । १५ अक्टूबर सन् ३९ ई० का प्रभात राजकुमार एलबर्ट केलिये सुप्रभातथा । "राधा तू बढ़ भागिनी कौन तपस्या कीन । तीन लोक जाके वसे ते तेरे आधीन । " कि सी कविके इस मर्म वाक्यकी सत्यता करनेकेलिये राजराजेश्वरी विक्टोरिया राजकु मार एलबर्टको उसदिन अपना प्राणेश्वर बनाना चाहतीं थीं । राजकुमार दुपहरको आखेट से लौटे । महलमें घुसतेही रानीने उनको निमंत्रणदिया। राजकुमार दबे- पार्व रानीके भवन में गये । उस समय रानी अकेली थीं । पियतम प्रियतमाके प्रथम संयोगसमयमें जैसे दोनों अवाकूरहते हैं, जैसे दोनों के हृदयकी बातें<noinclude></noinclude> aenipdgmd65xd6f5z0jpn2wjysy32vm पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७६ 250 194599 665203 2026-07-06T14:54:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665203 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( ५९ ) कंजूसके धनकी तरह बाहर नहीं निकलती उसीतरह परस्पर प्रेमालाप न हुआ । रानीनेही प्रथम प्रेमका बीजडाला था और रानीहां पौदे को उगाने में समर्थहुई । अपने मन की बात प्रकाशितकर रानीने स्त्रीत्व नहीं किन्तु राज्यत्वका शौर्य से- पादनकिया । टूटे फूटे शदों में रानीमे अपनी इच्छा सुनाई। जिस हस्तकमलका पन करनेके लिये बहेर अमीर तरसते और अपनी शोभा समझते हैं, जो शत दंड धारणकर का दमन करने; दुराचारियों को दण्डदेने और सज्जनोंकी रसाके लिये पुरुषके कठोर हस्तसेभी कठोरहे यह अपनी कठोरता कुलिश को मानकर पुष्पसमान फोमलता धारण करता हुआ मियतमके हाथमें जापहुंचा वही हाथ आजएक अपला वास्तवमें बलहीना स्त्रीका हाथ होगया। जिस मस्तकपर राजमुकुट धारण होता है जिसके आगे बड़े राजा महाराजा शिर नमाते हैं वही शिर शरीर की सनसनाहट और हृदय कंपके साथ मियतमके कंधेपर पहुंचा और एक राज- राजेश्वरीने राजकुमारके हृदयमंडलमें निवासकर भूमंडलपर राज्य विस्तृत करने की प्रतिज्ञाके साथही अपने हृदयमंदिरका राज्य राजकुमारको देदिया मानो रानी- के हृदयके साथड़ी ब्रिटिश साम्राज्यके राजकुमार राजा बनगये । यह समय वडा अद्भुत था । जो लोग प्रणयकी कसौटीमें कसेगये हैं उनके अतिरिक्त इस सुखको जानने की शक्ति किसीमें नहीं है । रानीके मियमित्र बेरन स्टाकमोरसे थोडेसमय पूर्व रानीने कहा था कि "अभी कुछ वर्षोंतक मैं विवाह करना नहीं चाहती हूं।" इसमतिज्ञा भंग होनेसे डरते २ रानीने उसे एक पत्र लिखा:-मैं अपने अपराधके लिये आपको क्या लिखूं । कुछ नहीं जानती हूँ । परंतु मुझे आशा है कि आप इसवातको क्षमा करेंगे । एलर्ट मेरा हृदयजीत लिया है। आज प्रातःकाल सन ठहराव होगया है । मुझे निश्चय है कि उनसे मुझे और मुझसे उन्हें अवश्य सुखहोगा।" इसीतरह राजकुमारने अपनी दादीको यह पत्र लिखा:-रानीने मुझको अपने पास एकांत बुलाकर परम प्रीतिपूर्वक कहाकि “आपने मेरा हृदय जीतलिया है। और जो मेरे आप जन्म संगाती बननेमें हानि उठा। बैंतो मैं आपको सुखदेने में तत्पर हूं क्योंकि वह मानती हैं कि मैं उनसे संबंध करनेमें अपने सुखको हानि पहुंचाता हूँ। और उनका कथन यह हुआ कि वह मेरे योग्य नहीं हैं । उनके प्रेम मय संभाषणने मेरे ऊपर जादू करदिया मेरामन पिथलगया । और मैंने अपना आप उनके अर्पण करदिया" रानीने अनेक बार कहा था कि "मेरेलिये मेरे एलबर्टने बहुत हानि उठाइहैं । " यह बात आश्चर्यजनक है। आश्चर्य इसमातका कि एक देशकी स्वामिनीसिन<noinclude></noinclude> 5b4xv5757xq6zskmm6h3fldk1f7djh9 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७७ 250 194600 665204 2026-07-06T14:55:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665204 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(६०) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । मनुष्यका पाणिग्रहण करे उसकी इस विवाहसे हानि क्योंकरहुई । परंतु रानीका कथन यह था कि उन्होंने मेरेलिये अपना घरबार, देश, भाता पिता छोड़कर वि- देशमें निवास किया है । और साथही उनको एक अपरिचित राज्यका बोझा उठाना पड़ा है। इसके सिवाय स्त्रीका संतोषकर उसका समाश्वासन करना अलग है । इससंयोगसे पीछे जितने दिन राजकुमार लंडनमें रहे दोनोंने बहुत ही सुख से काल यापन किया। थोड़े समयके अनन्तर राजकुमारने स्वदेशको गमन किया || लोगों में ऐसी गप्प उड़ी कि रानीने इससंबंधकी बात पहलेसे किसीको नहीं जतलाई यहांतक कि लार्ड मेलबोर्नको भी इसकी खबर नहुई परंतु रानीकी दिन चर्या में लिखा है कि सगाईके प्रथम दिन अर्थात् १४ अक्टूबरको रानीने मेलबोर्नसे कहाथा । मेलबोर्न सुनकर बहुतप्रसन्न हुए और उन्होंने कहाकि" इतना स्मरण रखिये कि स्त्री किसीभी स्थल और स्थितिमें अकेली शोभा नहीं पाती है। आपको इस कार्य से बहुत सुख होगा । " " बेलजियमके राजा इस संबंध में बहुत अनुराग रखते थे। उन्होंने इस बातके समाचार पाने पूर्व रानी विक्टेरियाको लिखा थाकि “जैसे २ आपका इसके साथ सहवास बढ़ता जायगा आप उसको अधिक २ पसंद करने लगेंगीं । एलबर्ट योग्य साथी । उसकी रीति भांति, और रहनसहन ऐसा उत्तम कि कोई भी उससे अलग होना नहीं चाहता । मुझको वह बहुत प्रिय है। उसे अपने पास रख- नेकी बड़ी उत्कंठा है । वह बड़ाखिलाड़ी चतुर और शूर है। वह विना कांटेका गुलाव है । " इसके उत्तरमें रानीने बेलजियमके राजा लियोपोल्डको जो टन- के मामाथे एक पत्र लिखा:- प्रिय मातुल, मेरे हितमें आपका सदाध्यान रहता है इसलिये इसपत्रको पाकर आपको अधिक आनन्दहोगा। मैंने दृढ नि- श्चय कर अपने विचार आज प्रातः एलबर्टसे कहदिये हैं। उन्होंने यह आनन्द दायक समाचार सुनतेही जो प्रेमदर्शाया उससे मुझे बड़ाहर्ष हुआ है । यह योग्य- पति हैं और मुझे आशा है कि मैं बहुत सुख पाऊंगी। एलबर्ट मुझे सबसे अधिक मिहै । और उन्होंने मेरेलिये जो हानि उठाई है उसका मैं बदलादूंगी । यह वृत्तान्त अर्नेस्ट के अतिरिक्त और किसीको विदित न होना चाहिये क्योंकि पार्लियामेंट खुलने पूर्व में इसबातको प्रकाशित नहीं करसकती। लार्ड मेलबो- र्नका मेरे साथ सदाकी तरह स्नेह है। एलबर्टने इस बातको स्वीकार किया है और फरवरी में पार्लियामेंट खुलने पर विवाह स्थिर करूंगी। " इसके उत्तर में मामाने बढी प्रसन्नता प्रकटकी ।<noinclude></noinclude> pmm0vnzm4r344blzffce7kgg0os8iad पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७८ 250 194601 665205 2026-07-06T14:55:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665205 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( ६१ ) जैसे रानी विक्टोरियाको योग्यवर मिलनेका हर्षथा उसी तरह एलबर्ट भी गुण- यती रानीको प्राणेश्वरी पाकर फूले अंग नहीं समाते थे। अपनी मियतमाका वारंवार प्यारी विक्टोरियाके नामसे संबोधन करतेसमय उनके हर्षका ठिकाना नहीं रह- ता था । उन्होंनबैनर स्टाकमोरको लिखाथाकि- "मैं रानीके साथ संबंध करनेसे अपनेको बड़ा भाग्यशाली समझता हूं।" राजकुमार बड़े सज्जन, चतुर, और मना मिथे । थोड़ेही कालके इंग्लैंड निवासमें उन्होंने लोगों के मनजीतलिये । उन्होंने स्वयं कहा था कि अब मैं बड़ा अमीर बनूंगा । आपके सन्मान करनेसे मेरी पदवी बढ़ेगी। उनका दूसरी मातासे यह उल्लेख था कि मैंने अपने जीवन में अनंत जनपर टपकार करना निश्चय किया है। इससे मुझे बहुत कुछ सहायता मिलेगी । " सुखपूर्वक लंडनमें निवास करनेवाद जब १४ नवंबर को राजकुमार एलर्ट अपने भाई सहित विदाहुए तो रानीको पतिवियोगका प्रथमवार असह्यदुःख हुआ। संयोगके अंत में वियोग और सुखके अंतमें दुःख होता है । अनेक समाहतक मियतमसे प्रेमालाप करनेके अनन्तर रानीको पतिवियोगका कष्ट हुआ । पतिके विद्या होते ही उन दोनोंकी आंखोंमें प्रेमाश्रु बहने लगे। न अब उनका खेल कूदमें दिल लगताथा और न उन्हें गाना नाचना सुहाता था। रानीको दिन रात एलर्ट- की और एलबर्टको विक्टोरियाकी लो लगी रहतीथी। एक दूसरेके चित्रोंको निरखकर उनका आलिंगनकर चुंबनकर और चित्रोंसे प्रेमालापकर कालयापन करने लगे । रानीने अपनी ताईको लिखा:- "मेरा प्राणवल्लभ जो दिन रात मेरे समीप रहताथा वह मोहिनी मूर्ति मुझे छोडकर चलदी। यदि मेरे पंख हों तो मैं उसके पास उड़कर पहुंचूं ।" एलबर्टने प्यारीको लिखा- "मुझे अनेक आनन्द दायक वस्तुएँ मिलती हैं परंतु जिसने मेरा मन हरण किया है उसके बिना मुझे चैन नहीं है | इस प्रकारके परस्पर पत्र व्यवहारसे वियोग जनित दुःखको मका- शित कर दोनोंने कालक्षेप किया ॥ अध्याय १६ पार्लियामेंटकी सम्मति और राजकुमारका सत्कार । यद्यपि इंग्लैंड की प्रजा सामानिक मातोंने स्वतंत्र है। स्त्री और पुरुषको बिया- हके लिये किसीकी आज्ञा लेनेकी आवश्यकता नहीं पढ़ती है परंतु राजराजेश्वरी विक्टोरियाको अपना संबंध राजकुमार एलपर्टसे करने पूर्व पार्लियामेंटसे आज्ञा लेनी पड़ी। रानी अपनी माता सहित विंडसर केसलसे चलकर बकिंगहाम<noinclude></noinclude> ob3uxzo1pdbx3sznv14ejbk67o7tgo1 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/७९ 250 194602 665206 2026-07-06T14:55:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665206 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( ६२ ) राजमहलमें आई और २३ नवंबर को अपना मंत्रिमंडल इकट्ठा किया । वहां पर वृद्धपुरुषोंके समक्ष एक युवतीका पतिके विषय में वार्त्तालाप करना स्त्रियोंकी स्वाभाविक लज्जा मियतांके विरुद्धया । रानीकी भी इसी कारणसे थोड़ी देरतक हिम्मत नहुई। पार्लियामेंटकी आज्ञा विना रानी इसकार्यको कर नहीं सकती थीं। प्रियतमका प्रेम उनको आतुर किये डालता था । लज्जाके किंवाड जिह्वाको प्रेम संवाद प्रकाशित करनेसे रोकते थे। अंतमें दबी जवानसे रानीने अपने विचार प्रकट किये। रानी उससमय हीरेअड़ी पहुंची में राजकुमारका चित्र धारणकिये थीं। चित्र पतिक प्रेमकी याद दिलाई। लज्जाको दबाकर नीचा शिर किये हुए कंपित बदनसे रानीने कहा । इस विषय में रानीने स्वयं अपनी दिनचर्या में लिखा है यह लेख रानीके हृदयके भावको प्रकाशित करता है । उसमें लिखा है कि-"मैं ठीक दो बजे सभामें गई। मुझे कुछ खबर नहीं है कि वहां कौन २ था । लार्डमेलबोर्न स- जलनेत्रोंसे मेरी ओर देखरहा था। वह दूर था। थोडेसे में मैंने अपना प्रस्ताब पढ़ सुनाया । उससमय मेरा सर्वांग कांपताथा । परंतु पढ़ने में मैंने किंचित् भी भूलनहीं की । लार्ड कैंसडाउनने कहाकि इसबातको मुद्रित करानाचाहिये। मैं तुरंतही राज भवन छोड़कर चलीगई। इसकार्यमें दो तीन मिनटसे अधिक न लगे होंगे"। रानीका मस्ताब यह था :--" :-"मैंने इससमय आप लोकोंको एककार्यकी सूचना देनेकेलिये जिस- से मेरी प्रजाकी भलाई और मेरे भविष्यत् नावनका घनिष्ट संबंध है, बुलाया है । सेक्सकोबर्ग और गोथाके राजकुमार एलबर्टके पाणिग्रहण करनेका मैंने संकल्प किया है । इस भावी संबंधके लिये मैंने अच्छी तरहसे विचार करलिया है। और मुझे दृढनिश्चय है कि परमेश्वरकी कृपासे इसकार्यमें मुझको धरूबातों में सुख होगा और देशका लाभ होगा । मैंने इस प्रस्तावको आपलोगोंको शीघ्रही सुनादेना उचित समझा है क्योंकि आप लोग एक ऐसे आवश्यक कार्यपर जो मेरे और मेरे- राज्यकेलिये परम आवश्यक है विचार करलें और मुझे भरोसा है कि यह कार्य मेरी मिय प्रजाको स्वीकृत होगा" । इस प्रस्तावके प्रकाशित करने के साथही वह अपनी प्यारी प्रजाको न भूलीं । उन्होंने अपने जेबखर्चसे मेनोर हाल में बंदीगृह मुक्त अनाथ स्त्रियोंकी सहायतामें ५००) रुपया दिया । १६ जनवरी सन् १९४० ई० को राजरीतिके अनुसार श्रीमतीने स्वयं उपस्थित होकर पार्लियामेंट खोली। ऐसा जनरव था कि अपनी चाची हेस होमवर्गकी लैंड- वाइनकी मृत्युके कारण श्रीमती स्वयं उपस्थित न हो सकेंगी परंतु यह बात असत्य हुई । इस विवाहसे मजाको बहुत हर्ष हुआ क्योंकि उसे निश्श्रयथा कि यह संबंध प्रेमका<noinclude></noinclude> bw0gmlhhch1p03k12tptmpqxqrmwb36 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८० 250 194603 665207 2026-07-06T14:55:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665207 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । . (६३.) परिणाम है। राजकीय प्रपंचसे नहीं हुआ है। पार्लियामेंट में रानीका जो इस विषय में व्याख्यान हुआ उसमें यह कहागयाकि "मैंने आप लोगोंको पहले सूचित कर दिया है कि मैं अपना विवाह राजकुमार एलबर्टसे करना निश्चयकरचुकी हूं। ईश्वरसे माना है कि वह इस जोड़ीकी वह बूदी करे और इससे मेरी घरेलू सुख और मजाके लाभका कर्तव्यसाधन करनेकी शक्ति प्रदान करे। पार्लियामेंटद्वारा यह मेरा प्रस्ताव स्वीकृत होनेपर मुझे अतीव हर्ष होगा। मुझपर और मेरे कुटुंबके साथ आप लोगों का स्नेह देखकर मुझे विश्वास है कि आपलोग राजकुमारके पद और राजसिंहासनकी प्रतिष्ठाके योग्य उनके लिये प्रबन्ध करनेमें सहायक होंगे।” पार्लियामेंटने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया । राजकुमार एलबर्टको "हिनूरायल हाईनेस " की उपाधि और ब्रिटिश सेनामें 'फील्डमार्शल' का पद दिया। दोनों सभाओं में राज- कुमारके वार्षिक वेतनके विषयमें २७ जनवरीको बढ़ा विवाद हुआ। लार्ड रसलने ५ लाख रुपया वार्षिक देनेका प्रस्ताव किया । मिस्टर नोज़िफ़ हनूम इस बातके विरोधी हुए । उन्होंने कहा कि “२ लाख १० हजार देना चाहिये क्योंकि एक युवा व्यक्तिको लण्डनमें बसाकर उसे अधिक रुपया देना हानिकारक है ।" परन्तु उनका कथन बहुमतसे अस्वीकार हुआ । और कर्नल सिवथापेकी सम्मति- के अनुसार ३ लाख रुपया वार्षिक का ठहराव हुआ। उस अधिवेशनमें किसीनें यह मन किया कि "यदि राजकुमारको ऋण देना हो तो क्या यह ब्रिटिश कोष- से दिया जायगा ?” लार्ड रशलने कहा कि- " जिससमय राजकुमार युवा- बस्थाको पहुंचे उन्हें अपनी माताकी ओरसे २४०००) रुपये वार्षिककी जागीर मिली थी । रानी विक्टोरिया से सम्बन्धहोने के साथही राजकुमारने टसमेंसे अपने नौकरोंको पेन्शनदेकर नागीर अपने भाईको देदी । इसके सिवाय उन्हें किसी- का देना नहीं है | " राजकुमारकी पदवीके विषयमें पार्लियामेंट में बहुत वादानुवाद हुआ। मंत्रि- मण्डलने श्रीमान्‌को “सिआफ् वेल्स" का पद देना चाहा । परन्तु इसकार्यसे युवराजके स्वत्वोंमें आघात पहुँचनेकी सम्भावना थी। इस कारण रानीने यह बात स्वीकार न की । पार्लियामेंट में पदवीके विषयमें पड़ी हलचल मची । प्राचीन उदाहरण देखनेके लिये पुरानी पोथियां देखीगई । परन्तु कहींपर कुछ पता नं चला । समाने यह कार्य रानीकी इच्छापर छोड़ दिया । रानीने आज्ञादी कि " राजकुमारएलबर्टका दर्जा केवल मुझसे उतरता रहै ।" यह बात सबको स्वीकार हुई। और उसीदिनसे राजदर्बारमें राजकुमारको रानीके निकट स्थान मिला ॥<noinclude></noinclude> eaqhqjeec0sy0n182awa1cq2a5fukz3 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८१ 250 194604 665208 2026-07-06T14:55:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665208 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ६४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अध्याय १७. विवाहोत्सव | विवाह के लिये १० फ़रवरी नियत हुई । ८ को दक्षिण किनारे से एक जहाज़ने आकर लंगर डाला। किनारेपर उतरकर राजकुमारने अपनी प्राणवल्लभाके पास गमन किया। उन्होंने प्रथममेंट में एक बहुमूल्य चूडामणि भेंट किया। प्रेमभरी भेंट पाकर आनन्दकी सीमा न रही। ९ फ़रवरीको रविवार था। राजकुमारने दिनभर रानीके लोगों से मिलने भेटने में बिताया। उनके मेलजोल और सद्व्यवहारसे राज कुटुम्बको बड़ा हर्ष हुआ । रात्रि के ग्यारह बजे अपनी दुलहिनको अंतिम- बार अकेली छोड़कर राजकुमार अपने घर गये । रात्रि दोनोंकी उत्कंठा, हर्ष, भावी सुखके विचार, समागमकी तरंगें और प्रेमसंकल्पोंमें वाती । मातः काल सूर्यके प्रकाश के साथही दोनोंके हृदयकमल विकसित हुए । मंगलकार्य की तैयारियां होने लगी । परिचारिकोंकी दौड धूप मची। प्यारी प्रजा विवाहके समय की राह देखती, नवीन जोड़के दर्शन के लिये घरके कामकाज छोडकर हाट बाट गली चौराहे पर आ बैठी । किसीने हड़बड़ीमें जैसे तैसे अपना काम किया। कोई चूल्हे पर देगची और तवेपर रोटी जलती छोड़कर उठधाई । मार्ग भीड़ से खचाखच भर- गया । रस्ते चलना कठिन हुआ। कई दिन पहलेसे जिनलोगोंने मार्गके मकान खिड़किया पाछतें इसकार्यकेलिये भाडेलली थीं वे इंटकर बैठे । साधा रण स्थितिके लोग इधर उधर ताकझांक करनेलगे । लोगोंकी खचाखच और भीडमें पीठ से पीठ छिलने परभी कुशल इतना ही हुआ कि किसीको कुछभी नोट न आई। डयूक् आफ् नार्फाकने अपनी सेना सजाकर यथास्थान ला खड़ी की । पहले समय में विवाह सायंकाल अथवा रात्रिको हुआ करता था परन्तु इसवार रीति परिवर्तनकर दुपहरका समय नियत कियागया । समयसे पूर्व लग्न मंडप युवक युवतियोंसे भरगया ||<noinclude></noinclude> dawweewtvjhg2nyg50gddg3orirxep8 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८२ 250 194605 665209 2026-07-06T14:55:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665209 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | दुलहिन विक्टोरिया | (६५)<noinclude></noinclude> g1ir7wz84okyqy2qrx5ry3d4obfp5p7 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८३ 250 194606 665210 2026-07-06T14:56:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665210 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८४ 250 194607 665211 2026-07-06T14:56:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665211 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (६७) ठीक सवानारह बजे दूलहराज सजधजकर तैयार हुए। राज महलसे परात विदाहोकर सेंटजेम्सके महलमें गई। दूलहके वस्त्र बिटिशसनाकें फील्डमार्श- ल पदके योग्य थे। साथमें पिता और भाई थे। मंडपमें पहुँचते ही लोगोंने तालियां पीटकर रूमाल हिलाये । मजाका सत्कार पाकर राजकुमार हर्षित हुए। राजकुमार- के गलेमे हारेका हार और छातीपर रानीके दियेहुए दो राजचिह चमकते थे। महल में पहुचने पर सनाने सलामी उतारी और बाजे बजने लगे और लोगोंने "वर राजा बहुत वर्ष जियो " का मंगल नादकिया । इधर दुलहिन विक्टोरिया शृंगार समकर पकिंगहामके महल से विदा हुई । उनके साथ राजमाता और लीजनकी बेरोनेस थीं दुलहिनके कानमें रत्नजटित एरिंग और गलेमें बहुमूल्य हीरेका हार था, हाथमें मोती की चूडियां और शिर पर नारंगी रंगकी टोपी थी। श्वेतसाटिनका गौन था जिसपर १० हजार रुपये की किनारी लगी थी। इस लगेको बनाने में २०० मनुष्य लगे थे और उन्होंने आठ मासमें इसे तैयार कियाया इस गौनकेसाथ दुलहिनका मुखचन्द्र देखकर आकाशका चन्द्रभी गौण भासित हुआ ॥ रायलचैपलमें प्रथम राजकुमार अपने पिता और भाई समेत पहुंचे। उससमय उनका वदनकमल हर्षसे विकसित था। इतनेहीमें उनकी प्रियतमाकी सवारी आई। दुलहिनके साथ राजकुमारी सोकिया मेटिलडा और लार्ड मेलबोर्न थे । लार्डके हाथमें राजसी तलवार थी और राजमाता पीछे २ चलती थीं। बारह सखियोंने रानीका गौन उठारक्खा था। ये सब लार्ड लोगोंकी कन्यायें थीं। समवयस्का षोडशी बालाओंके मध्य में दुलहिन तारागणके बीच चंद्रमाके समान देखपढतीं थीं । उस दिन रायल चैपल भी खूब सजायागया था। विवाहके लिये गिरनेके बीचोबीच मंडप बनायागया था। गिरजा किरमिची मखमलसे मंढा था। मखमलकी किनारें सुनहरी थीं। टेबल पर रंगविरंगी रकामियां सजीथीं। एक ओर पादरियोंके लिये बैठक थीं। मंडपके भाई और चार सुंदर कुरसियां थीं। उनपर ससेक्स और केम्ब्रिजके डचूक राजकुमारी आगस्टा और प्रोसेस्टरकी डचेजूथीं। मध्यभागका एक विशाल सिंहा- सन दुलहिनकेलिये था और उनके पासही राज माताकी कुरसी थी। सामनेकी दो कुरसियोंमेंसे एकपर राजा चौथे विलियमकी रानी और दूसरीपर दूलह राज थे । मंडपके निकट दो कुरसियां बार दुलहिनके लिये अलग थीं। इन्हींपर बैठकर विवाह कियागया था। गिरने की दीवारोंपर राजचिह्न शोभा देरहे थे ।<noinclude></noinclude> qyq4z7unpwyi3jpow162ksio2f2pvgb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८५ 250 194608 665212 2026-07-06T14:56:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665212 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(६८) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | गिरजे में सबलोग यथास्थान जा बैठे। गिरनेकी सजावट वर दुलहिनका ठाट और सहेलियोंके सौंदर्यको देखकर दर्शकोंके चित्त इंद्रसभाकासा सुख अनुभवकर ते थे। कैंटरबरी आर्च बिशपने विवाह आरंभकिया । लंडनका प्रधानपादरी इस कर्मकांडमें सहायक हुआ । वर दुलहिन धीरे २ ईश्वरोपासनामें संयुक्त हुए। ईसाई धर्म के अनुसार कार्य समाप्त होनेपर कैंटरबरीके पादरीने प्रश्न किये। सारा कार्य रानी और राजकुमारके नामपर नहीं किंतु एलबर्ट और विक्टोरियाके नामपर हुआ || कहतेहैं कि विवाहसे पूर्व लंडनमें ऐसी गप्पें उडतीथीं कि रानी यह विवाह रानी बनकर करना चाहती हैं। केंटरवरीके आर्चबिशपने विवाहके पहले दिन उनसे पूँछाकि "क्या आप विवाह क्रियामें कुछ लौटफेर करना चाहतीं हैं। " रानीने कहा" नहीं कुछ नहीं, मैं रानी बनकर विवाह नहीं करतीहूं किन्तु एक साधारण स्त्रीकी तरह और इसकारण धर्मके अनुसार सब प्रकारके मणकरने को तैयार हूं ।" इसीके अनुसार बडे पादरीने विवाहके समय पूंछा - "रानी, आप अपने पतिकी आज्ञा पालन, उनसे प्रेम करना, उनकी सेवा करना, उनके सुख दुःखमें साथ देना, और जीवनपर्यंत उनकी सहचरी रहना स्वीकार करती हैं ।,, करोडों मनुष्योंको अपनी आज्ञाके वशवर्ती करनेवाली प्रभावशालिनी रानीने मृदुस्वरसे कहा "हाँ करूँगी" और स्पष्ट कह दिया कि "मैं अपने पतिका मनहरण करूंगी । " ब्रिटिश राज्यकी नीति अनुसार राजा वा रानी ईश्वर और धर्मके अतिरिक्त किसीका पराधीन नहीं है। चाहे जैसी वहांकी स्त्रियोंमें स्वतंत्रता होनेपर भी स्त्री पतिके अधीन है। अब रानीके पति स्वाधीन होनेपर राज नियमका भंग होताथा और इसी कारण लोगोंको ऐसी आशंका हुईथी। परंतु रानीने अपनेको पतिके अर्पणकरनेमे इंग्लैंड राज्यकी स्वामिनीपनका गर्व नरक्खा । इस बातसे उनकी प्रजावर्ग में अधिक प्रतिष्ठा हुई । बड़े पादरीने पूँछाः—दूलहको दुलहिनका पाणिग्रहण कौन करवावैगा?” । ड्यूक आफू ससेक्स कन्यादान करनेपर तैयार हुए। बडे पादरीने दुलहिनका हाथ पक- ड़कर दूलहके हाथमें दिया । ईसाई धर्मके कितनेही भजन और कर्मकांडके पश्चात् दोनोंसे फिर प्रश्न हुए । रानीने कहा:- प्रीति करूंगी, संबर्द्धन करूंगी और आज्ञा पालन करूंगी। " इस समय इस जोडी की सुंदरता अपूर्व थी। इसी समय बड़े पादरीसे आज्ञा लेकर वरने दुलहिनके हाथमें एक अंगूठी पहनाई । तत्क्षण झंडी फहरातेही किले और पार्कमैंसे तोपोंकी घर घराहट आरंभ हुई । लंडन यावत गिरजाओंके घंटे टनटनाहट करनेलगे | और "चिर्जीवो नववरवधू" का गान आरंभ हुआ । सब लोगोंने आशीर्वाद दिया । और नगरमें जयजयकार - व्याप्त होगया ।<noinclude></noinclude> 4tppv36hll2szoachjipk51400wtlpc पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८६ 250 194609 665213 2026-07-06T14:56:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665213 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( ६९ ) कैंटरबरीके बड़े पादरीने दोनोंको माइनलका उपदेश सुनाया। दोनों राजकुटुंबके लोगोसे मिले । कन्यादान देनेवाले डयूक आफू ससेक्सने दूलहसे मिलकर उनके हाथोंका नुमन किया। अब परवधू अपनी २ कुरसियोंसे उठकर राजा चौथे विलियमकी विधवा रानी ऐडीलेडके पास गये । दूलहने रानीके हस्तचुंबन किये। दोनोंने पाबंदन किये और उन्होंने दोनोंको आशीर्वाद दिया । दोनों परस्पर पाणिग्रहण किये हुए गिरजेके बाहर निकले। राजमार्गपर आतेही प्रजावने रुमाल और टोपियां हिलारकर हर्षनाद किया । आशीर्वाद और स्वागतके शब्दोंसे गगनभेदी शब्द हुआ । और पर बधूको आनन्दमें मम देखकर प्रजा हर्षका ठिकाना न रहा ॥ वरवधू जव राजमहलमें पहुंचे विवाहका प्रतिज्ञापत्र उपस्थित कियागया । राजसिंहासनके कमरे मे जाकर रानीने एलेक्ज़ेड्रिना विक्टोरिया गल्फी और राजकुमारने फ्रांसिस एलबर्ट आगस्टस चार्ले एमेन्युएल व्युसिसी के नामसे हस्ताक्षर किये । इस पत्रपर डकआफूससेक्स और उन्तीस अन्य उमरावाने तथा डक आफू बेलिंगटनने साक्षी की । सेंटजेम्सके राजमहलमें सर्वक्रिया समाप्त होनपर नवजोड़ी बकिंगहाम गई । अध्याय १८ विवाह में भोज । विवाह सकुशल होगया। रात्रिमें बकिंगहाम महल में बहुत बड़ा भोज हुआ । इस दावतमे राजकुटुंब, मंत्रिमंडल, अमीर उमराव और बड़े २ नागरिक इकट्ठे हुए। इस अवसरपर यूरोपियन लोगों में एक रोटी बनाई जाती है जिसे विवाहकी रोटी ( Wedding cake) कहते हैं। इस विवाह में वेडिंग केक अद्भुत मका- रका था । उसका मेरा ९ फुटका था। और उसमें ३ || मन बोझा था। उसका मूल्य १०५०) रुपयेका था। इसकी मोटाई सोलह इंच और ऊंचाई एक फुट थी । केकपर दूलह दुलहिनके चित्र थे। रानी चित्रके नीचे स्वामिभक्त कुत्ता था । कुना स्वामिभक्ति प्रकाशित कर रहाथा। रानीके निकट एक कपोतकी जोड़ी थी । इससे विवाह पश्चात् संसारसुखका अनुभव होता था। कामदेव ( Oupid ) घुटनेपर नही रखकर विवाहकी रजिस्टरी कररहा था और उसीतरहके अनेक सुंदर कामदेव उसका अनुकरण करतेथे । केकके शिरपर श्वेत साटिनके तुरें इष्टमित्रों सजाये और उपस्थित महाशयोंमें वितरण करनेके लिये .<noinclude></noinclude> fdf2lmhavq6x8eh4mcdz1wzt1y53itv पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८७ 250 194610 665214 2026-07-06T14:56:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665214 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ७० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । गये थे । उनके ऊपर V और A के अंगरेजी अक्षर अंकित थे । इनके लिये वही कामदेव खड़े थे । इस केकका गुलाबी और नारंगी रंगथा । इस अवसर पर रानीकी ओरसे एक २ ब्रूच आभूषण सहेलियोंके भेट किया गयाथा । इसकी आकृति एक पक्षीकीसी थी। पक्षीका शरीर हरेपन्नकाथा । नेत्रमें रत्न चमकते थे । पीठ हीरेकी बनी हुई थी। पंजोंमें सुवर्ण झलकता था । शेषभागमें मोती चमकरहे थे । यह आभरण रानीकी विशेष आज्ञास बनायागया था । मो- जन समाप्त होनेवाद सायंकालको सब मिलकर विडंसरके महलमें गये। मुख्यगाडी में वर दुलहिन विराजे । उनके पीछे दूसरी गाडीमे राजकुमारके पिता और भाई सुशोभित थे। नवीन वरवधूको अपने प्रकाशसे प्रकाशित करनेके लिये सूर्यनारायणने बादलमेंसे निकलकर अपनी अस्तमाय किरणोंसे आभूषणोंको चमकाया। दंपतिके सम्मानकेलिये मार्गके मुख्य २ स्थानोंपर रोशनीकीगईथी । ईटन कालेजकी विचित्र शोभा देखकर दर्शकोंके मनहरण होते थे। कालेजके द्वारपर "विक्टोरिया एलबर्टकी जोड़ी चिरजीवी रहो" वाक्य स्वर्णाक्षरोमें दीप्तिमान्था विंडसर केसलमे पहुंचते २ सारानगर तरह २ और रंग २ की रोशनीसे व्याप्तहुआ । उससमय भी दंपति को निहारनेके लिये हाट घाट गली बाजार भीड़से भरगया था लोगोंकी जय ध्वनि मेघगर्जनाको मात करतीथी ॥ ठीक सात बजकर वीसमिनटपर दंपति विंडसर केसलकी हाईस्ट्रीटमे पहुंचे । धीरे२ घंटानाद होनेलगा । लोगोंने जयध्वनिकी और राजकुमारने हाथका सहारा देकर दुलहिनको गाड़ी परसे तारा । रात्रिको राजमाताने १०० जनको भोजन दिया। रानी एडीलेडनें और अन्यान्य उमराओंने अलग २ भोजदि- ये । नाटकमंडलियोंने सेंतमें नाटक देखानेकेलिये नाटक गृह खोलदिये । उस समय लंडन नगर आनन्दपूर्ण था । मानों. आनन्दही शरीरधरकर वहांका शासन करताहो, इसतरह बोध होता था || अध्याय १९. सुहागरात और दम्पतिका प्रेम । अनेक दिनोंके वियोगके अनन्तर दम्पतिका संयोग हुआ । ११ फरवरीकी रात्रिको दोनोंका प्रथमवार एकान्तवास हुआ। दोनों आनन्दप्रमोदमें दिन बितानेलगे । रानीने बेरन स्टाकमोरको पत्र लिखकर अपना आनन्द प्रकट किया । “संसार में राजकुमारसे बढ़कर मुझको कोई प्रिय नहीं है । वही अति-<noinclude></noinclude> 0ivky7u0m4ojnpia95lw8jfrvrl2kxy पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८८ 250 194611 665215 2026-07-06T14:56:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665215 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( ७१ ) निर्मल और परम कुलीनहे । " यह पत्र १२ फरवरीको लिखागया था । इसी- दिन राजमाता राजकुमारके पिता और अनेक राजकुटुंब के लोग दम्पतिसे मिलने आये । सबने दोनोंको विवाहकी बधाई दी । विवाहसे प्रथम मासमें युरोपियन लोग मियतमाको साथलेकर विहारकेलिये विदेश जायाकरते हैं। इसे हनीमून कहते हैं । भारतवासियोंमें इसमकारकी कोई रीति नहीं होती है इसीलिये हमने इसको सुहागरातके नामसे परिलक्षित किया है। नव वरवधूकेलिये सुहागरात आनन्दका प्रथमदिन है ओर युरोपियन लोगोंमें हनीमून प्रथममास है। इनका प्रथममास साधारणलोगोंका सा न था। यह जोड़ी एक मास राज्यकार्यको छोड़कर बाहर नहीं चिचरसकती थी । दोही दिनके बाद दम्पतिको लण्डन आनापड़ा ॥ १८ फरवरीको रानीने बकिंगहामके राजभवनमें सिधारकर पार्लियामेंट खोली । समाने विवाह हर्षमें श्रीमतीको अभिनन्दनपत्र दिया । उसीदिन लण्डन- के पादरी, कार्पोरेशन, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय और स्काटलैंडके गिरजोंकी ओर- के मानपत्र आये । २६ फरवरीको श्रीमतीने अपने प्रियतमको जी. सी. थी, की उपाभिदी और ११वीं लाइट् ड्रैगून सेनाका अध्यक्ष मनाकर उसका नाम "प्रिंस- एलट हुसा" रक्खा || २८ फरवरीको राजकुमारके पिता कोयर्गके ड्यूकने जर्मनीको प्रयाण किया। पितृवियोगसे राजकुमारका हृदय भरआया क्योंकि आज ही से पितासे सदा के- लिये अलग होने का आरम्भथा । पतिको पितृवियोगसे जो दुःख हुआ उसकी आंतरिक पीड़ाका रानोने अपनी 'दिनचर्या' में इस तरह वर्णन किया है । "पतिने मुझसे कहा कि तुम्हारे पिता नहीं है इसलिये तुम मेरे आन्तरिक दुःखको नहीं जानसकती हो । मेरा वालबय बड़ा सुखसे बीता था। अब उनके • पास केवल अर्नेस्टही है। वहीं पिताकी आंखोंका तारा है । परन्तु यदि मैं आजकलकी तरह प्रियतमका प्रेम सम्पादन करनेमें समर्थ होसकूंगी तो मेरा परम सौभाग्य है । ओहो ! मेरे मियपतिकेलिये यह कैसा कठिन समय है । उसने पिता, भाई, मित्र और देशको मेरे केवल मेरेही लिये छोड़ दिया । ईश्वरकी कृपासे मैं सुखी, अपने प्रियपतिको सुखी करनेकेलिये बहुतही सुखी होऊं । जहां तक मुझसे होसकेगा मैं उसे प्रसन्न करूंगी ।" थोड़े काल पीछे जब भाई अर्नेस्ट विदाहोने का अवसर आया। ऐसाही वियोगजनित कष्ट राजकुमा- रको फिर सहना पड़ा | रानीको अपने सुख और पतिके स्वत्व स्थापित करनेके लिये अपनेसे उतरता दर्जा पतिको देकर इस विषयके आज्ञापत्र प्रकाशित करनेके लिये शीघ्रता करनी<noinclude></noinclude> leiok612b3zxi2vsbkxmfwyimfvr9zd पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/८९ 250 194612 665216 2026-07-06T14:57:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665216 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ७२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । पड़ी । आज्ञापत्र प्रकाशित होतेही सब गड़बड़ मिटगई । राजकुमार बडे बुद्धि- मान् और धीर थे। वह रानीको अपनी इच्छानुसार चलाने के बदले उन्हें स्वतंत्र- तासे वर्तनेदेते और आवश्यकता पड़नेपर उचित रीतिसे सम्मति देते थे । उन्होंने अपने पिता के नाम एक पत्र में लिखा था कि मैं विक्टोरियाको यथेच्छ वरतने देता हूं ।" वह अपनी प्रियतमा कार्य निर्वाहके लिये मार्ग निष्कंटक करनेका प्रयत्नकरते । वह कभी राज कार्यका स्वतंत्र बोझा अपने शिरपर न लेते परंतु सामाजिक और निजके कार्येमि कुटुंब के मुखिया, राजनैतिकबातों में गुप्तमंत्री, घरेलू कामों के प्रबंधक और राजबंध में सहायक बनकर सहायता करते थे। यदि हजारों और लाखों में किसी विवाहसे दम्पतिको सुख होता है, दोनो में परस्परकी हार्दिक मीति होती है तो वह विवाह रानी विक्टोरिया और राजकुमार एलबर्टका था ॥ यद्यपि अनेक ग्रंथकारोंने राजकुमार एलबर्टको राज्यप्रबंधके कामोसे अलग बतलाया है और उन्होंने भी अपने पत्र में इसबातका उल्लेख किया है परंतु सन्५२ में जब इंग्लैंड और फांसकी खूब चलरही थी और फारेन आफिसमें कामकी बड़ी धूमथी श्रीमतीने अपने मातुल बेलजियमके राजा लियोपोल्डको लिखाया कि "एलबर्ट दिनर राजनैतिक कामोंके अनुरागी होतेजाते हैं। वह इसकार्यके पूर्ण योग्य हैं। मैं इसे दिन २ नापसंद करतीजाती हूं। हम स्त्रियां शासनकरने के लिये नहीं बनाईगई हैं । यदि हम उत्तम स्त्रियां होना चाहें तो हमें पुरुषोचित कार्यों को छोड़ देना चाहिये । परंतु आवश्यकतापर ऐसे कार्य करने पड़ते हैं । इसी- लिये मुझको करना पडता है ।" राजकुमारने राजनैतिक कामों में वा अन्य विषय में उत्तम सम्मति देकर रानीने यह कहलवालिया था, नहीं २ मजासे यह कहदिया था कि राज्य रानी नहीं किन्तु उनके पति करते हैं । उन्होंने बलवेके समयमें भारतका जो उपकार किया था उसका वर्णन आगामि किसी अध्याय में होगा || अध्याय २०. दम्पत्य सुख और दंपति पर गोली । :: अब कुमारी रानीका गृहराज्य आरंभ हुआ । दंपति आमोद प्रमोदमें काल- यापन करनेलगे । संसार सुखके आरंभके साथही घरके प्रबंध में गड़बड़ मची। नौकर चाकर स्वतंत्र होगये । राजमाता युवती विक्टोरियाको छोड़कर अलग रहनेलगीं। पत्ति एलबर्ट चाहते थे कि रानीके घरका ठीक २ प्रबंध किया जाय । रानीभी उनको सदा अपनी आँखोंपर रखती थी परंतु घरकी अव्यवस्था उन<noinclude></noinclude> mingoieevvjwebdjc50avxqlzlpt2v1 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९० 250 194613 665217 2026-07-06T14:57:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665217 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (७३) के चित्तपर खटकती थी। उनको यह बात यहांतक बुरी लगी कि उन्होंने अपने मित्र लोवेन स्टीनको लिखा कि- "मैं बहुतप्रसन्न और संतुष्टहूं परंतु मैं अपने पदकी रक्षा करने में असमर्थ हूं क्योंकि में केवल पति हूं किन्तु गृहस्वामी नहीं हूँ ।" अब यह बात रानक कानतक पहुंचाई गई तब उन्होंने कहाकि:- "मैंने आत्म समर्पण किया है अर्थात् में अपने पतिके आज्ञापालन और प्रेम तथा सन्मान करनेमें वचनबद्ध हूं। और यह पवित्र प्रण कभी सीमाबद्ध न किया जायगा" । लार्ड नम्बर्लेन और अश्वाध्यक्षके रहनेका राजमहल में स्थान न था । स्टुअर्ट बिलकुल स्वतंत्र था। नौकरोंके आगे उसकी कुछ पारी नहीं चलती थी । सब लोग यथेच्छ काम करते और चाहें जब जाते आते थे। इसी तरह की गड़बड़ बहुत तक चलती रही ॥ पति ईस्टरका त्योहार विंडसरमें किया। वहां पर दंपतिका परम श्रद्धा पूर्वक धर्मसंस्कार हुआ। अपरेल मासमें पैरिसके राजकुटुंब में विवाहथा । इस विवाहपर दंपति चांगये । विवाह पुर्तगालके राजाकी साली विक्टोरियाका था। दुलहिनका राजकुमार एलबर्टसे संबंध था । नवीन दुलहिनका बाल वयमें बहुत कालतक उनके पास निवास रहा था। इनका प्रेम वहनोसेभी बढ़कर था। विवहोत्सवमेंसे लौटकर इंग्लैंड आनेबाद एकदिन दंपति सादा वस्त्र पहने बाहर वायुसेवनको गये थे। मार्ग अकस्मात् बादल चढ़आये । रुमझुम २ मेह बरसने लगा। कहीं छाया का स्थान न मिला। पास रक्षाके लिये छातेभी न थे। इतनेही एकटीन ग्रामीण खीकी झोंपडी देखपडी । दंपति रक्षापानेकी इच्छासे उसमें गये। स्त्री ने इनको पहुँचाना तो नहीं किन्तु अच्छी तरह सत्कार किया। उसने राजा चतुर्थ विलियमकी पुत्री चार्लोट और पुत्र लियोपोल्डकी बहुत प्रशंसा की । दोनों सुनकर प्रसन्न हुए। बहुतवार झोपडीमें रहनेसे जय मेह थमता न देख पड़ा तब दोनों वहांसे अकुलाकर चलदिये । बुढ़ियाने अपना छाता देकर कहा- “भैया शीत्र लौटाना । " दंपति वहांसे विदा हुए किन्तु बुढियाने इनका सादापन देखकर पहचाना नहीं । इसी वर्षके जून मासमें दासव्यापार बन्द कर- नेके लिये एक सभा हुई थी। इसमें प्रथमवार राजकुमारने बड़ा प्रभावोत्पादक व्याख्यान दिया । यही सभा संसारसे दासव्यापारका देनेमें समर्थ हुई और इस विषय में संसारका उपकारकर इंग्लैंडने बड़ानाम पाया || नामतक उठा १० जूनको सायंकालमें बकिंगहामके राजभवन से दंपति वायुसेवनके लिये विदा हुए । दोनों चारघोड़ेकी खुली गाडी में सवार थे। गाड़ी कान्स्टीटयूश्वल ยู<noinclude></noinclude> o7cai8owg17jpabwdymew2i54txj76w पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९१ 250 194614 665218 2026-07-06T14:57:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665218 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(७४) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । पहाड़ीके निकट वाटिका के पास पहुंचतेही एक युवा पुरुषने इनपर गोली दागी। शब्द सुनतेही दोनोंने गाड़ीमेंसे उझककर उधरकी ओर देखा । रानी देखनेके लिये खड़ी होना चाहती थीं परन्तु पतिनें उनका हाथ पकड़कर विठ ला दिया। उस युवाकी पहली गोली रीती जा चुकी थी इसलिये उसने दूसरा वार किया। दर्शक और पुलिस उसकी ओर दौड़े। उसने भागना आरंभ किया परंतु पुलिसने पकड़ लिया। उसका नाम एडवर्ड आक्सफर्ड था और वय उसका १७ वर्षका था । इस आकस्मिक घटनासे रानी बहुत घबरा गई। परंतु लोगोंकी घबराहट और चिन्ता देखकर उनका संतोष करनेके लिये उन्हें सावधान होना पड़ा । रानीको कहीं चोटतो नहीं आई है। इस बातके जाननेकी प्रजाको बड़ी उत्कंठा हुई । भीड़ मेंसे इसीप्रकारकी पुकार उठती देखकर रानी गाड़ी में सब लोगोंको दर्शन देनेके लिये खड़ी होगई। और उच्च परंतु मृदुल स्वरसे कहा:- "ईश्वरकी कृपासे मैं प्रसन्न हूं।" सुनतेही भीड़ में आनन्दका मसार हुआ। वहांसे चलकर दंपति राजमातासे मिले । । माताने हर्षसे पुत्रीका आलिंगन किया। इस घटनासे इंग्लैंड क्या वरन यूरोप भरमें बड़ी हलचल मचगई । राज- कुटुंब, इंग्लैंड के अन्य भद्र पुरुषों और विदेशी राज्योंके प्रतिनिधियोंने बधाईदी । उसदिनसे दंपति विना अंगरक्षकों के कभी अकेले बाहरन निकले । १२ जूनको इस बातके हर्षमें बहुत बड़ा दर्बार हुआ। और जिन लोगोंने इस घटनाके बाद श्रीमतीके दर्शन नहीं किये थे उन्होंने एस्काटकी घुड़ दौड़में दोनोंको निहारकर आनन्द पाया || अपराधी ८ जुलाईको दौरा सिपुर्द हुआ। उसके घरकी तलाशी लेनेपर कितनीही गोलियां और बारूद मिला। और 'तरुण इंग्लैंड' नामकी एक मंड- के कितनेही कागज पत्र मिले। इनमें लिखा था कि सदा इस बके मेंबरोंको तलवार और पिस्तोल लेकर फिरना चाहिये। इसके सिवाय मैंबरोंके नामका पता न चला। अभियोगकी जांचके समय आक्सफर्ड पागल बनगया परंतु जब लार्ड आक्साविजने उसे जेल में जाकर देखा तो वह अच्छा भला पाया गया । उसने पूंछा:- “क्या अभीतक रानी जीती हैं। मैंने अपनी पिस्तोलमें माण नाशक गोली डाली थी ।" उसने स्पष्ट रीतिपर अपराध स्वीकार कर बडे जनके समक्ष इसविषयके पत्रपर हस्ताक्षर कर दिये । परंतु उसकी ओरसे जिन २ लोगोंने साक्षियांदी उनका यह कहना था कि "यह पागल है और इस कुटुंबमें वंश परंपरासे पागल होते आये है। इसका पितानी पागल होकर मरगया था ।" न्यूरीने उसका अपराध स्वीकार कर उसे पागल माना। इसका फैसला यह<noinclude></noinclude> ruql7amcyy91ir4nmfp5ovmgl9s67uu पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९२ 250 194615 665219 2026-07-06T14:57:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665219 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | (७५) हुआ कि "जय रानी यादें तब यह कैदसे छूट सके ।" पैंतीस वर्ष कैद रखनेके बाद इसको देश निकालका दंड दिया गया || अध्याय २१. सगर्भा रानी । विवाह के बाद थोड़ा समय घातकी वातमें निकलगया । अब राज भवनके. नौकर चाकरों और कर्मचारियोंमें कानाफूसीका समय आया किसीने कहा "रानी सगर्भा है,, कोई बोला :- भई परमेश्वर रानीको पुत्रमदान करे तो इंग्लैंड की गादीका वारिस हो । " दिन रात इसीपातकी चर्चा होनेलगी । एकदिन सुभ- वसर साधकर रानीने गृदुहास्यके साथ लज्जित होकर पतिको यह शुभ संवाद सुनाया । पतिको सुनकर बड़ा हर्ष हुआ । वात कानोकान मंत्रिवर्ग में पहुंची। पार्लियामेंट में रिजेंसी बिल उपस्थिहोनेका अवसर आया। इसमें उहान यही हुआ कि "यदि दैवयोगसे ( ईश्वर न करे) रानीकी मृत्यु हो जाय तो युवराज वा राजकुमारीके युवा होने तक रानी पति रिमेंट नियत हो और उन्हींकी आज्ञासे राज्यका शासन हुआ करे ॥” गर्भवती रानीने मधुर भाषण, आनन्दमें प्रमोद और सैरमें नौमास विताये । पतिने सदा अपनी प्रियतमाको आनन्दमें रहनेका उद्देश्य साधन किया । नगरके छोटे २ बालकोंको खेल कूदमें देखकर दोनों अपनी संततिकी बालक्रीडाकी आशा मनमोदकसे सुखानुभव करनेलगे। इस समयभी रानीने राज्यकार्यको न छोड़ा । लार्ड मेलबोर्न पेशी लेकर नित्य नियत समयपर आते और आवश्यक कागलों पर हस्ताक्षर कराकर लेजाया करते थे | पार्लियामेंट में से टोमितके लोग जो आजकल कंसर्वेटिवके नामसे प्रसिद्ध हैं, पहले २ राजकुमारसे घृणा करते थे परंतु उन्होंने अपने साँस सबके मनों को जीत लिया । मेलबोर्न और वेलिंग्टनने रिजेंसी निल उपस्थित होते समय इनकी बड़ी स्तुति की और रानीने राजनीतिका प्रचलित भेद इनके लिये निकाल डाला || राजकुमार एलनके साथ रानीने मथमवार २१ अगस्तको पार्लियामेंट बंदकी। इस मासकी २६ तिथिको रानी पूर्णचयको पहुंची। २८ को रानीके पतिको लंडनकी स्वतंत्रता दीगई । राज्यकी विधिके अनुसार लार्ड चैवनने कहा:- "राजकुमार बड़े सम्मान हैं और यह संदा रानीके सधे भक्त रहेंगे इसलिये इन्हें<noinclude></noinclude> qqc1og76s2q7drtjef1y84wuryzmypn पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९३ 250 194616 665220 2026-07-06T14:57:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665220 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ७६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । नगर की स्वतंत्रता देना योग्य है । "यद्यपि भारत वासियोंकी दृष्टिमें पतिको पनिका भक्त बताना और पत्नीका पतिको सेवक मानकर कार्यकरना अयोग्य है परंतु इस विषयमें रानी पनिहोनेपर भी इंग्लैंड की स्वामिनी थीं और राजकुमार पति होने- परभी रानीके दर्बारमें एक उच्चपदस्थ उमराव थे। उन्होंने लंडन नगरकी स्व- तंत्रता प्राप्तकरते समय कहा कि:-" लंडन नगरकी स्वतंत्रता मिलनेसे मैं परम सम्मानित हुआ हूं । इस अवसरपर आप लोगोंके समक्ष खड़ा रहने में मुझको परमानन्द प्राप्त है। आपने मुझपर बड़ी कृपा की है । संसारके यावत् नगरोंमें लंडनकी शोभा और सम्पत्ति अपार है। आपका साथी (नागरिक) बननेका मुझे बड़ा गर्व है और मैं आप लोगोंका रानीपर भक्ति भाव देखकर बहुत प्रसन्न हुआ हूं”। इसकेबाद वह मियी कौन्सिलके मेंबर नियत हुए। इसकार्यको उन्होंने बहुत- ही चाव और सावधानीसे किया और एक बैरिस्टरको नियतकर अंगरेजी आईनका अध्ययन किया | अध्याय २२. राजकुमारी का जन्म | नवंबर के आरंभ में रानीके लिये सोबकी तैयारियां हुई । प्रसूतिकाल नि- कट आता देखकर रानी विंडसरके किलेसे निकलकर लंडनके बैंकिंगहाम मह- लमें गई । रानीने १३ नवंबरसे उस महलमें निवास किया और २१ तारीख- को राजपुत्रीका दुपहरके १ बजकर ४० मिनटपर जन्म हुआ । उससमय जन्म होनेके कमरेमें राजमाता, पति एलबर्ट, दाइयां और मिसेन लिली उप- स्थित थीं और पासके दीवानखाने में ससेक्सके डयूक, कैंटरबरीके आर्चविशप, लंडनके प्रधानपादरी और लार्डमेलबोर्न आदि अनेक भद्रपुरुष इकट्ठे हुएथे । युवराज के जन्म समय में प्रिवी कौंसिलके यावत् मेंबरोंका वहां उपस्थित रहना आवश्यक था इसलिये मायः सबही लोग वहांआगयेथे जन्मके दश मिनट बाद मेम लिली राजकुमारी को हाथ में उठाकर सब लोगोंको दिखानेके लिये बाहर लाई । कुमारीका शरीर हठ और सुंदरथा । बालकको एक टेवलपर लिटायागया परंतु रो २ कर उसने लोगोंके कान फोड़ दिये । लड़कीको भीतर लेगये और सबलोग वहांसे विदा हुए। तोपोंके फेरोंसे नगर वासियों को विदित होगया कि राजकुमारी का जन्म हुआ है ॥ पतिको भयहुआ कि कहीं नगरवाळके चित्तको युवराजके बदले कन्या<noinclude></noinclude> 7osmkqsu2ahycur7jmujd2h3m4qkuyn पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९४ 250 194617 665221 2026-07-06T14:58:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665221 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मथम भाग | (७७) उत्पन्न होनें से दुःख न हो परंतु रानीने उनसे कहा: या चिन्ता है आपकी चार पुत्र होगा और अपनी ताई की तरह मैं भी बहुत बालकोंकी माता होऊंगी ॥" जिसदिन राजकुमारीका जन्म हुआ उसीदिन जोन्सनामक लड़का वकिंग हामके राजमहल में पकड़ागया । यह लड़का रानीके सोनेके कमरे के पडोस के एक मकान में आरामकुर्सीके नीचे छिपाहुआ था। लोगोंने उससे पूंछा " तू यहां कैसे आ पहुंचा ?" यह बोला :- "पहले की तरह। मैं जब चाहूं यहां आसकता हूं । मैंने अनेक बार एकांत में रानी और उनके पतिको वात चीत करते देखा है । नियमके अनुसार लड़केको कुछ दंड न दियागया। केवल उसे उद्योगशाळा में चालचलन सुधारनेकेलिये भेजदिया | सोबड़के दिनोंमें राजकुमारने प्रियतमाकी घड़ी शुश्रूषा की । रानीने अपनी दिनचर्या में लिखा है कि "यह दिन रात मेरे पास अड़े रहते, मुझे पुस्तकें पढ़कर सुनाते और जो कुछ मैं कहती लिखा करते थे। घड़ी मुझे पलंगपरसे उठाकर आराम कुर्सी पर बैठाते थे और मुझे पहियेदार कुर्सी पर बिठला कर दूसरे कमरे में लेजाते थे । वह कहीं पर होते परन्तु मेरे बुलातेही चलेआया करते थे। उन्होंने इन दिनोंमें मेरी माता समान शुश्रूषा की । उस समय उनसे मढ़कर कोईभी बुद्धिमती, कृपालु न्यायी और उत्तम दाई मेरेपास न थी ॥ इस अवसर में राजकुमार एलर्ट बकिंगहामके नागमें बर्फपर खेलनेसे बीमा रहोगे। रानीने उनकी योग्यसेवाकर पत्निधर्मका पालन किया और तुरंतही राजकुमार आरोग्य होगये ॥ १० फरवरी सन् १८४१३० को बकिंगहाम राजमहलमें राजकुमारी का नामकरण संस्कार हुआ। राजा चौथे विलियमकी विधवा रानी एडीलेड्की सम्मतिके अनुसार राजकुमारीका नाम "विक्टोरिया एडीलड् मेरी ल्यूसा रक्खागया ॥ अध्याय २३. मेलबोर्नका पदत्याग । यूरोपमें युद्धके भयानक बादल छागये। चीनमें संग्राम आरम्भहुआ । स्पेन और पुर्तगालके साथ जहानी खटपट आरंभ हुई। लिनेंटके समुद्रमें भी ऐसाही ढंग दिखाई देने लगा । ऐसे समय में इंग्लैंडकी पार्लियामेंट में गढ़बड़ मची। लिवरल मंत्रिमंडलकी हार हुई। नवीन चुनावमें कंसर्नेटिव दलका विजय हुआ। लार्ड मेलबोंनको अपना पद त्यागना पड़ा। रानीको इसमातसे महुतदुःख हुआ, उनके चित्तका खेद देख कर लार्ड मेलबोर्न ने कहा “आप किसीबातकी चिन्ता<noinclude></noinclude> fkmdvvlprbe8m0umsjrm22sfi8gvbcf पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९५ 250 194618 665222 2026-07-06T14:58:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665222 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ७८) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । न करें। क्योंकि अब मुझसे भी चढ़कर आपको सलाह देनेके लिये आपके पति राजकुमार एलबर्ट मौजूद हैं । यह परमयोग्य सलाहकार हैं। सन् १८३९६० से मैं इनको देखरहा हूँ । चार वर्षकी जांच में मुझे अच्छी तरह मालूम होगया है । " रानीने मंत्रिमंडलक परिवर्तन और मेलबोर्नके पद त्यागपर अपनी दिनचर्या" में लिखा कि "सचे और मिय मित्र, अमात्यके बदलने से मुझे दुःख हुआ । " पार्लियामेंट में सर राबर्ट पील प्रधान अमात्य हुए। इस समय उन्हें शयन गृहको नाल" की तरह किसी तरह चाल वाजीका अवसर न मिला । लार्ड मेलबोर्नक साथही शयन गृहकी सखियोंने इस्तेफा देदिया था । राजकुमार एल वर्टकेलिये सर राबर्ट पीलने लिखाकि, यह न्यायी और विद्वान हैं इसलिये किसी प्रकारकी गड़बड़ न रही। नवीन प्रधानने कारीगरीकी उन्नति की जांच के लिये एक कमीशन नियत किया। इसके सभापति रानीके पति राजकुमार एलबर्ट नियत हुए । इन्होंने इस कमीशनका सभापतित्व पाकर स्वतंत्रतापूर्वक देशहित साधनका प्रयत्न किया और इन्हीकी प्रेरणासे और वेलिंग्टनकी सलाहसे ब्रिटिश सेनामेंसे द्वंद्वयुद्धकी हानिकारक प्रणाली उठगई । यह दोष यूरोप जैसे शिष्ट देशके फांस जैसे सभ्यराज्य में अभीतक विद्यमान है। दो सैनिकों वा राजपुरुषों में किसी विषय में जब खटपट हो जाती है और उसका निपटारा न्यायसे होना संभव नहीं होता है तब दोनों नियत समयपर परस्पर शस्त्र लेकर लड़नेको तैयार होते हैं । इस युद्ध में जो माराजाता वा घायल हो जाता है उसीकी हार समझी जाती है । अध्याय २४. युवराजका जन्म | ९ नवंबर सन् १८४१ ई० को बकिंगहाम राजभवन में आनन्दोत्सबका आरंभ हुआ। दिनके सात बजे राज्यके प्रधान २ कर्मचारी महलमें इकट्ठे हुए। मसब कालकी वेदनासे शीम निवृत्त हो रानीने ठीक ग्यारहबजे पुत्रको जन्म दिया । आनन्द दुंदुभीसे नगरमें युवराजके जन्मकी चर्चा फैलगई। इस हर्षसे नगरमें जय जयकार होगया । पुत्रकी प्रसूतिसे माताको जो कुछ कष्ट हुआ था उससे ददिनमें आरोग्य हुआ। माता पिताके पास बधाईके लिये अनेक अभि- नन्दन पत्र आये ।<noinclude></noinclude> 0zttbk11dz18nyvikqt3w9mjr0v6viv पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९६ 250 194619 665223 2026-07-06T14:58:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665223 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । छः वर्षके युवराज । (७९)<noinclude></noinclude> i3mod48wwket5v6il5b4ckzr3y7zhcg पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९७ 250 194620 665224 2026-07-06T14:58:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665224 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९८ 250 194621 665225 2026-07-06T14:58:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665225 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( 22 ) भाई बहनकी आया बननेकेलिये अनेक संभावित खियां उम्मेदवार हुई । रानीने इसकार्यकेलिये मेम घूमको पसंद किया । दोनों चालकोंका पालन पोषण करनेकेलिये दशहजार पोंड वार्षिक नियत हुआ। माता पिताको असीम हर्ष हुआ। दोनों पुत्र पुत्री पाकर ईश्वरको धन्यवाद देमेलगे। भारतवर्षके राजाओंमे वालवयसे ही राजकुमार राजकुमारी अलग रक्खेजाते हैं इसकारण साधारण गृहस्थोंकी अपेक्षा इनमें संततिस्नेह कमहोता है परंतु इन माता पिताका नेह साधारण गृहस्थोंसे भी कहीं बढ़कर था। दंपतिको जब कभी किसी सगे संबंधी और इष्ट मित्रके नाम पत्र लिखनेका काम पड़ता तवही यह किसी न किसी बहानेसे इन दुधमुहे बालकोंकी माललीलाका अवश्य उल्लेख करते थे । संततिस्नेहका यह एक बढ़िया प्रमाण है । १५ जनवरी सन् १८४२ ई० को राजकुमारका नामकरण संस्कार हुआ। इस उत्सवपर संयुक्त होनेकेलिये मूशियाके राजा जो पीछे जर्मनी सम्राट् होगये ये तीन दिन पहले लंडन आ पहुंचे । उनको इनके धर्म पिताका पद दिया गया । कैंटरबरी के प्रधानपादरीने इनका नाम एडवर्ड रक्खा। एलबर्ट इनके पिता- की ओरसे और एडवर्ड नानाका इस तरह नामाभिषेक हुआ। इस अवसर पर रानीने मुशियांके राजा प्रथम विलियमको गार्टरकी पदवी देकर अपने हाथसे उन्हें पदक पहनाया। सेंट जेम्सके हाथमें रात्रिको भोज हुआ । इसमें केवल अंगूरी शराबकी तीस दरजन घोतलें खर्च हुई । नामकरण संस्कार में कुल वीस लाख रुपया व्यय हुआ || रानीने भूशियाकै राजाका अच्छीतरह आतिष्य किया। विंडसरके राजभवन में दोवार उनके हाथोंका सुवन किया। आतिथ्य सत्कारमें किसीमकारकी न्यूनता न रही। राजा उत्सव समाप्तिके अनंतर अपने देशको विदा हुए ॥ युवावस्था रूप लावण्य, राज्य शासन, पतिसुख और इनके साथही पुत्रपुत्रीके जन्मसे लोग रानीको परमसुखी कहकर हर्षित होने लगे। रानीकाभी दिन २ सुख बढ़ता गया। पतिपनि दिन२ मीति बढ़ी, पुत्रपुत्री की तोतली वाणी सुननेकासी- भाग्यमिला और राज्यकी दिन वृद्धि होनेसे प्रजाके सुख और शांतिसे चारों ओररानी विक्टोरियाका जयजयकार हुआ। मजाकी राजभक्ति बढ़ी और रानीका मनाप्रेम पढ़ने लगा ऐसेही जीवनको धन्य है । जिस समय राजकुमार एक मासके हुए रानीने युवराजको “मिसभाफूवेल्स" की पदवी । इससे पूर्व वह सेक्सनी, कार्नवाल, और रोथसेके डचूक, रिक के अल, रेन्यू अर्ल और आइल्सके लार्ड तथा स्काटलैंडके ग्रेट स्टुअर्ड कह लाते थे। वेल्सको प्रिंस बनाने के समय उनको जो सनद दीगई उसमें लिखागमा कि:- "शीति अनुसार हम इन्हें उक्त जागीरें प्रदान करती हैं। इनके धारण करनेके लिये तलवार, शिरको ये मुकुट, गलीके लिये अंगूठी और शासनकेलिये सुनहरी दंड देती हैं। यह अब यहांका शासन और रक्षा करेगा" |<noinclude></noinclude> hbcdd7wemars7xbbbwtdr69smrmzf7v पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/९९ 250 194622 665226 2026-07-06T14:58:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665226 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ८२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अध्याय २५. पुत्र पुत्री की शिक्षा । बड़ी राजकुमारी और युवराज ( मिन्स आफ्वेल्स) की शिक्षाके विषय में यहां पर लिखना विषयांतर होता है परंतु इनकी शिक्षाके लिये रानीने जैसा कुछ ध्यान दिया है वह आज कलके राजाओं केलिये शिक्षाप्रद है। एक वृहत् राज्यकी स्वामिनी होनेपरभी रानीने अपने प्यारे बालकोंको शिक्षा देनेका कैसा प्रबंध किया था । बहुत बड़े राज्यके राजकुमार होनेपर भी उन्होंने किस कष्टसे शिक्षा पाईथी । यही इस अध्यायका उद्देश्य है | केवल इन्हीं दोनों बालकोंके लिये नहीं किन्तु इनके बाद जो २ बालक हुए उन सबकी शिक्षापर दंपतिका विशेष ध्यान था। वे दोनों संतानको शिक्षा दीक्षा उत्तम प्रकारकी देना राज्यशासनसे भी बढ़कर अपना कर्तव्य समझते थे ! माताने अपनेको आदर्श बनाकर संतानको शिक्षा दी थी। धर्मशिक्षामें उनका विशेष ध्यान रहताथा । राज्यकार्यसे कभी २ अवकाश न मिलनेपर उनको खिन्न होकर कहना पड़ता था कि-"अनेक कामोंमें लगी रहनेसे मैं इनकी शिक्षाके विषयमें मातृधर्मका पूर्ण रीतिपर पालन न करसकी। इस बातका मुझे खेद है । संतानको धार्मिक शिक्षा देनेकेलिये राजकुमार एलबर्टने लिखाया कि -" इन्हें इसमकारकी शिक्षा देना चाहिये जिससे ईश्वरकेलिये इनके हृदयमें पूर्ण आस्था उत्पन्न होकर ये अपने कर्तव्य को समझें । इहलोक और परलोक साधनकेलिये यथार्थ धर्म जानना चाहिये केवल प्रार्थनासे क्या लाभ है। जीवन, उसका उप- योग, मभुज्ञान और मृत्युको अच्छी तरह स्मरण रखना चाहिये।" माता पिताने केवल पुस्तकसंबंधी शिक्षा ही नहीं दी थी किन्तु घरके काम और आज्ञापालन सिखाने पर विशेष ध्यान दिया था । दीनातिदीन मनुष्योंके बालक जैसे मनमें आता है बोलते हैं, चाहे जैसी गालियां देते हैं और माता पिताको मारते और आपस मे लड़ते तथा दिनभर रोयाकरते हैं। बड़े धनवानोंके लडकोंमें इन दुर्गुणोंके सिवाय उद्धतपन और लुचपनका ऐव होताहै परंतु रानीने ठेलही कह दिया था कि "बाल्ट- कोंको बहुतही सादी चाल सिखाने और घरके कामकाजमें निपुण करनेकी मेरी इच्छा है ।" और इसीलिये वह बालकोंको कभी अपनेसे अलग नहीं होने देतीथीं और सदा अपने पतिके साथ आस्वर्नके राजमहलमें इसीलिये निवास करती थीं । युरोपियन लोगोंकी चाल है कि संतानको बालवयसे पाठशालाओ में भेजकर दिनरात वहां ही रखते हैं। वे केवल वर्ष में दो चार बार छुट्टियोंपर घरआकर माता पितासे मिलसकते हैं। इसरीतिसे कुछभी लाभ होताहो परंतु इतनी हानि अवश्य होती है कि माता पिताका पुत्रपर और पुत्रका माता पितासे स्नेह नहीं<noinclude></noinclude> mgjpiyb8x51q5q0mcyuyrs38fdpjq41 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०० 250 194623 665227 2026-07-06T14:59:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665227 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( ८३ ) रहता है और यही विवाह के अनंतर पुत्रके माता पितासे अलग रहनेका कारण है । यहरीति बहुत बुरी है और रानीभी इसके बहुत विरुद्ध थीं । उन्हें सदा अपने नालकों को आंख तले रखकर शिक्षा दिलवाना पसंद था। इसचालसे राज- पुरुष होनेपर भी उनके पुत्रोंमे उद्धसादि दुर्गुणोंके बदले सद्गुणोंने निवास किया है | आस्चर्नके महलके बाग में प्रत्येक बालकको बाग लगानेके लिये अलग २ धर- ती दीगई थी। इसमें धरती खोदना, खाद डालना, पौदा उगाना, सीचना, छांटना और अपने २ भागों में अपनेही हाथसे सुंदर पुष्प और स्वादिष्ट तरकारी उत्पन्न करना सिखाया जाता था। उनकी शिक्षाके लिये राजमहलमें एक छोटा संग्रह- स्थान अलग बनाया गया था। इसमें बालक समुद्र वा नदी किनारे से भिन्न २ वस्तुयें लाकर इकट्ठी करते और पितासे इनके विषयमें ज्ञान प्राप्त करते थे। लड़कोंके लिये एक मढ़ईकी दूकान और लड़कियोंके लिये एक पाकशाळा अलग मनी हुई थी। इनमें लड़कियां नानामकारके पफान मिठाई चटनी मुरब्बे आदि पदार्थ बनाना सीखती थीं और लडकोंको मढ़ईका काम सिखाया जाता था। एक गो- शाला में दूधसे भांति २ के पदार्थ मनानेकी इन्हें अलगही शिक्षा दीजाती थी । माता पिता अवकाश निकालकर मालकोंके साथ खेलमें आनन्द करते परंतु पढ़नेका समय निकट आतेही किसीकी मजाल नहीं थी जो एक मिनट भी अपने शिक्षकों के पास जानेमें विलंब करसके। साधारण धनवान्भी प्रायः अपने बालकोंसे शिक्षकोंको कमदर्जेका गिनते हैं और इसकारण बालकोंपर टनका दबाव नहीं पड़ता है परंतु इसधरमें यह बात न थी । एकवार बालकोंकी शिक्ष- काने रानीसे विनय किया" श्रीमती मेरीमाता बहुत बीमार हैं। मुझे खेद है कि इन बालकोंकी शिक्षाका काम अधविचमें छोड़कर मुझे छुट्टी लेनी पडेगी ।” श्रीमतीने कहा:-" कुछ चिन्ता नहीं, तुम निडर होकर अपनी माताकी सेवा करो । तुम्हारी अनुपस्थिति में बालकोंको पढ़ानेका काम मैं कर- लुंगी । तुम्हारे बदले कोई दूसरी नहीं रक्खी जायगी।" इस विचारीके छुट्टी लेकर घर पहुंचने बाद माताका देहान्त होगया । यह स्त्रीशोकसूचक काले वस्त्र पहने हुए छुट्टी से लौटी। श्रीमतीने इसे दुःखित देखकर बड़ी दया की और हज़ारों काम होनेपर भी उसकी माताका मृत्यु दिवस याद रखकर उसदिन एक काले पाषा- की चूड़ी जिसपर उसकी माताका नाम और मृत्युका दिन खुदाहुआ था उसकी भेंट की। श्रीमतीने अपने बालकोंकी शिक्षाकेलिये कितनेही नियम स्थिर किये थे । उनमेंसे मुख्य ये हैं:-" मालकोंको यथा शक्ति सादगी सिखलाकर सांसारिक कामोंके योग्य करना । उनके अध्ययनमें किसीतरहकी त्रुटि नहो इस प्रकार से उन्हें सदा अपनेपास रखना । और प्रत्येक कार्यमें उन्हें माता पितापर विश्वास करनेकी टॅव डालना । धर्मकी शिक्षा मातासे बढ़कर कोई नहीं देसकता है । י<noinclude></noinclude> o7pqxvsrnhqwsuq23jrjdtg0qhxcplh पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०१ 250 194624 665228 2026-07-06T14:59:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665228 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( ८४ ) श्रीमतीने इस नियमपर बहुतही ध्यान दिया था। ईसाई धर्म की शिक्षा उन्होंने अपने बालकोंको स्वयं दी थी। एकदिन लंडनके आर्च डीक ( पादरी ) ने इन बालकोंकी धर्माभिरुचि देखकर उनकी शिक्षकाकी प्रशंसा की । सुनतेही बाल- कोंने कहा:-" परंतु धर्मज्ञान तो हमें हमारी माता शिखाती हैं। " जब ईश्वर- कृपासे ये बालक बड़े हुए और राजकीय कामकाजसे श्रीमतीको इनकी शि- क्षाकी देख भाल करनेका अवसर कम मिलनेलगा तब उन्हों ने एक बार कहा था:-" मेरे बालकोंको मेरे निकट ईश्वरमार्थना करनेका अवसर न मिला इस बातका मुझे परम खेद रहता है । पुस्तक संबंधी शिक्षा, नीति और धर्मका ज्ञान और गृहस्थीपनेकी शिक्षाके अतिरिक्त श्रीमतीने अपने पुत्रोंको युद्धसंबंधी शिक्षा भली मकारसे दिलवाई थी। और सबके सब पुत्र पौत्र जल और स्थलके युद्धमें पटु शरीरके दृढ़, साहसी वीर और दयालु हैं। अध्याय २६. इंग्लैंड में हलचल और श्रीमतीका नाच । सन् १८४२ ई० में भारत वर्षकी ईस्ट इंडिया कंपनीसे अफगानिस्तानके अमीर की खटपट होगई । ब्रिटिश गवर्नमेंट के उच्चाधिकारी सर एलेक्जेंडर बर्न और सर विलियम भेकनाटन सेनासहित काटेगये । यह दुःखदायक समाचार इंग्लैंड में एकमास पीछे पहुंचा। कंपनी की चाल प्रिंस एलबर्टको पसंद न हुई। सरकारी से- नाके दुबारा काबुलपर चढ़ाई करनेसे विजय हुआ। इसी समय चीनमें युद्ध आरंभ हुआ। और वहांभी अंतमें पिनांगका प्रदेश अंगरेजों के हाथ आया । दोनों ओरके युद्ध समाप्त होतही इंग्लैंड में हलचल मचगई । राज्यका महसूल घटगया । और 'काला' की गड़बड़ आरंभ हुई। इससे दीनोंको अन्न मिलना कठिन होगया। लोगोंकी पुकार सहन न होसकी । मजाको शान्त करने के लिये श्रीमतीने स्वयं उपस्थित होकर ३ फरवरीको सदाकी अपेक्षा अधिक धूमधामसे पार्लियामेंट खोली । इससमय राज्ञीपति प्रिंस एलबर्टभी साथये । श्रीमती मधुर भाषण और सुधारकी आशा देनेसे प्रजा संतुष्ट हुई ॥ इसी वर्ष मार्च में रानी के पति राजकुमार एलबर्टके ज्येष्ठ बंधु राजकुमार अर्नेस्टके विवाहका निमंत्रण आया । श्रीमतीने अपने मामा और श्वशुरको पत्र लिखकर इस कार्यकी बधाई दी । पतिभाईतो विवाहमें जानेको तैयार हुए परंतु इससमय इंग्लैंड का मामला बड़ा बेठव था। रानीको ऐसे समयपर सलाह देनेवाला कोई मनुष्य न था । धातुर लोगोंने स्काटलैंडकी खानों में उपद्रव मचा रक्खा था । लोगों में जोश फैलरहा था और कार्नलाकी गड़बड़ मची हुईथी। इनकारणोंसे वह भाईके विवाह में न जासके ||<noinclude></noinclude> qjrv3100ttg9f0pdq8ia6dxcfp8mono पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०२ 250 194625 665229 2026-07-06T14:59:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665229 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । | (८५) मजाकी स्थिति सुधारने के लिये आईन बनानेके सिवाय जुलाहों और कारीग की रक्षाके लिये श्रीमतीने पुराने ढंगके नाच करने का ठहराव किया । नाच ३ मई सन् १८४२ को हुआ। इंग्लैंडके राजा तीसरे एडवर्डका पार्ट राजकु मार एलबर्टने और रानी फिलीपीका पार्ट रानी विक्टोरियाने लिया । चासर और फाइसरकी पुस्तकों का अवलोकनकर इंग्लैंडके अमीर उमरावने पुराने ढंग के • आभूषण पहने । इस नृत्यके अवसरपर बकिंगहाम राजभवनमे १३ से १८ हजारतक मनुष्य इकट्ठे हुए हज़ारों और लाखोंके वस्त्रालंकारोंसे अमीर उमराव सनेहुए थे। रानी और राज्ञीपतिने इस उत्सबके लिये विशेषमकारकी पोशाक बनवाई । नाव के समय युवकयुवतियोंकी शोभा, परस्परमेम, नृत्यके हावभाव कटाक्ष स्त्रियों के मान और शृंगाररसका यावत् सामग्रीको देखकर रति- नाथ कामदेवको अपने सुखमें स्पर्द्धा होती थी। कविजनोंने इस नृत्य वैभवका वर्णन करनेमें हार खाई। गीत वाद्य और विनोद आमोदने इन्द्रके वैभवका लोगोंको अनुभव कराया। यह नाच "प्लेनटजनेट राजा" के अनुकरणमें हुआथा इस लिये उसी नाम से प्रसिद्ध है। नाच क्याथा मानो उन्नीसवीं शताव्दिक अद्भुत रासथा । नाच में टिकटसे जो आय हुई उसमेंसे खर्च निकालकर जुलाहोंको उसकी चचतसे सहायता दी गई || अध्याय २७. प्राण संकट | जैसे राजाओंकी शक्ति अनंत है वैसेही उनपर कामका बोझाभी अधिक होता है। जैसे राजाओंको सुख अधिक होता है उसी तरह उनके प्राणपर संकटभी अधिक होता है। यूरोपके राजाओं के प्राण भारतवर्षकी अपेक्षा अधिक भयमें रहते है। भारतवर्षकी प्रजा कैसाभी कष्ट सहकर राजाको ईश्वरका अवतार मानती है और यूरोपकी मजा जरासी वातमें रुष्ट होकर राजाके प्राणलेनेपर उतारू होती है। श्रीमती प्राणपरभी इस प्रकारके अनेक गार संकट आगे थे। दो एक अवसरका वर्णन पहले हुआ है । सन् ४२ ई० की ३० मईको श्रीमती सायंकालके समय वायु सेवनकेलिये पथा- री थीं। मार्ग में सात फुटके अंतरसे फ्रांसिस नामक युवाने पिस्तोल मारी। अप- राधी पकड़ लिया गया। उसने इसकार्यका कोई कारण न बतलाया । इसमातसे इंग्लैंड में गढ़ी घमराहट मचगई। इस घटना दोही चार दिन पीछे रानी अपने पति के साथ रविवारकेदिन 'रायलचैपल' नामके गिरजे में प्रार्थनाकेलिये जाने लगीं। भीड़मेंसे एक मनुष्यने बाहर निकलकर रानीपर पिस्तोल ताकी और गोली चलाने का अवसर न देखकर पिस्तोलही गाड़ी में फेंक दी। इस दुर्घटनासे रानीका स्वा- स्थ्य बिगड़ गया। डाक्टरोंने बाहरका फिरना बन्द किया । पतिपनिने प्राण बचने<noinclude></noinclude> 7yi7yw53075c1k6v5p0ynjac2hlwo25 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०३ 250 194626 665230 2026-07-06T14:59:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665230 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ८६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । पर ईश्वरको धन्यवाद दिया। रानी को इसवटनासे भय तो न हुआ किन्तु अकस्मात् ऐसा कार्य होनेसे उनके हृदयमें धक्का लगा और यही बीमारीका कारण हुआ इस घटना से लोगोंने रानीके दृढ विचारोंकी अच्छी तरह जांच करली । अपराधी फ्रांसिसपर दोष प्रमाणितहोकर उसे फांसी दीगई थी परंतु रानीने दयाकर उसे सात वर्षका जेल दिलवाया ॥ इसी वर्ष में तीसरीघटना और हुई । ३ जुलाईको श्रीमती बेलजियमके राजांक साथ गिरजे में जातीथीं। मार्गमें विलियम धान नामक मनुष्यने पिस्तोल चलाना चाहा । वह गोली मारनेसे पहलेही पकड़ लियागया। मार्गमें श्रीमतीको इसबातकी खबर न हुई । महलमें आतेही प्रधान अमात्य सह रावर्ट पालने राज्ञीपतिसे कहा। सुनते ही रानीकी आंखों में आंसू भर आये। सर रावर्ट पीलने पार्लियामेंट में इस प्रकार की घटनायें रोकनेकेलिये एक बिल उपस्थित किया। इसके अनुसार रानी वा अन्य राजपुरुषपर आक्रमण करनेवालेको सातवर्षको देशनिकाल और बेतकी सजा देनेका निश्चय हुआ । परंतु रानीकी आज्ञासे वानको केवल १ ॥ वर्षकी क़ैद हुई || पांच सात वर्षतक इसप्रकारकी कोई बात न हुई। सन् १८४९ ई० में आयलैंड के एक कारीगरने गोली और उसके बाद एक पदच्युत कप्तानने श्रीमती के मुखपर छड़ी मारी । सन् १८७२ ई० में एक पागल लड़केने एक हाथमें पिस्तौल और दूसरे में प्रार्थना पत्रलेकर रानीपर आक्रमण किया। दशवर्ष बाद दूसरे पागलने आपपर गोली मारी। इसके सिवाय आपपर कई प्रकारके संकट आयेथे। उनमें से कईएकका वर्णन पहले हुआ। परंतु ईश्वरने उनकी सदाही रक्षाकी थी। और इस बातसे यह प्रमाणित होता था कि ईश्वरने उनको संसारका उपकार करनेके लिये उत्पन्न कियाथा ॥ अध्याय २८. फ्रांस और बेलजियम की यात्रा । फ्रांस और वेलनियम की यात्रा करने पूर्व श्रीमतीने अपने पतिसहित प्रथम स्काटलैंड और फिर आइलू आफ् वाइट्, डार्ट माउथ, प्राइमौथ और फालमौथ में नौका की सवारीपर सैर की थी । फालमौथसे चेरवर्ग जाते समय मार्ग में एक विशेष बात हुई। इसका वर्णन एक पुस्तक में इसतरह लिखाहै:-" रानी नौकामें ऐसे स्थलपर बैठी थीं जहां होकर मल्लाहोंके आने जानेका मार्ग था । मल्लाहोंसे नाड़े मैं मद्य विना काम न होसका । लार्ड एडोल्फसने श्रीमतीसे कहा कि "आप यहांसे हटकर अन्यत्र जा बैठिये ।” रानीने पूंछा:- "क्यों ? क्या यहां कोई उपद्रव होनेवाला है ? क्या संकट आपढ़ा जो मुझे यहांसे हटातेहो" । लार्ड साहब बोले:- "आपत्ति कुछ नहीं है। महादेोंस मद्यविना काम नहीं होता है। और मद्य इसकोठरी- है ।" रानीने कहाः " मैं हदूंगीतो सही परंतु पहले इनके मद्यकामुझे एक .<noinclude></noinclude> cyyzcokf3hq9ffl6y3ra5me8i8ee1k1 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०४ 250 194627 665231 2026-07-06T14:59:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665231 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (८७) प्याला पिलानेका करारकरो ।” रानीके मार्ग देतेही मल्लाहोंने एक प्याला मद्य लाकर दिया और श्रीमतीने उसे गखकर उसकी प्रशंसाकी मल्लाहोंको इस मात से परम हुर्षहुआ । और रानीकी सादगी की सबने प्रशंसाकी । यह यात्रा सन् १८४३ में हुईथी । एक वर्ष बाद श्रीमतीने २ अगस्तको प्राइमौके टापूसे फ्रांस के राजा फिलिप से मिलने के लिये प्रस्थान किया । इयू के वैदर पर जहाज पहुँचतही फ्रांसनरेश मिलने के लिये आये । उन्होंने रानीके हाथ का कुंपन किया। मंदरपर फांसी- सियोंकी भीड़ इकट्ठी थी। राजा अंगरेज़ी कम बोलसकता था इसलिये एक बार चकरागया फिर जैसे तैसे उसने अपनाभाव अंगरेजीमें प्रकाशित किया । जहानसे उतरतेही फ्रांसीसियोंने रानी के स्वागतमें हर्षनाद किया। फ्रांस नरेशने श्रीमती की बहुत अच्छी तरहसे अभ्यर्थनाकी । फ्रांसीसी लोग रविवारकी छुट्टी कम मानते हैं परंतु अंगरेजों के साथ में उन्होंने रविवारका त्यौहार पाला। दूसरे दिन इनकी बड़ी धूमधाम से दानहुई। एक दिन राजा फिलिप रानी विक्टोरियाके साथ और राज कुमार एलबर्ट फ्रांसीसी रानीके साथ वायु सेवनके लिये गये। चार पांच दिन यहाँ रहकर श्रीमती इंग्लैंडो विदा हुई । फ्रांस से लौटकर इंड आने बाद थोडे दिन विश्राम लेकर दंपतिने वेट- जियमकी यात्रा की । १५ सितंबर को बुजिश पहुंचे। राजा रानीने दंपतिका बहुत सत्कार किया । इस प्रवासमें कोई बात विशेष नहीं हुई || वहांसे लौटकर इंग्लेंडमें दोनोंने केम्ब्रिजका विश्वविद्यालय देखा । राजकुमार एलबर्टको विश्वविद्यालयकी ओरसे एल्. एल्.डीकी पदवी मिली । इसी वर्ष में रानीने सरराब पीके घरपर जाकर उनका सत्कार किया । अध्याय २९. श्वशुरकी मृत्यु । दंपति अपने प्रिय बालकों सहित विंडसरके राजमहलमें सुखसे काल यापन करतेथे | इतनेहीमें श्रीमतीके श्वशुर, रामकुमार एलर्टके पिता डयूक आफू को वर्ग और गोथाकी ६० वर्षकी पकी उमर में मरने की खबर मिली। श्रीमती पतिको पिताकी मृत्युसे बहुत दुःख हुआ। चार वर्षसे उन्होंने पिताके दर्शन नहीं कियेये । अनेक धार मिलनेफा संकल्प किया परंतु किसी न किसी कारणसे न होसका इस संवादको सुनतेही श्रीमतीने बेरन स्टाक्मोरको लिखा कि- "तुम जो यहां होते तो जानसकते कि मेरे माणनाथको कितना दुःख है। वह कहते हैं कि अब मेरे सिवाय उन्हें सुख देनेवाला नहीं है परंतु मैं उनके इस दुःखमें किस कामकी?"<noinclude></noinclude> iwrhyvkl7muiu2h13t3w9v1pjfdjvvo पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०५ 250 194628 665232 2026-07-06T14:59:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665232 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(८८) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । पति के शोक में मियतमाने पूरा साथ दिया । राजकुमारने अपने एक मित्रको लिखा कि- "जो कुछ दुःख पड़ा सो भोगा परंतु मैं अंतसमय में पिताजीकी सेवा करने और उनसे आशीर्वाद लेने के लिये उपस्थित न होसका । यहां मैं, फुफी और विक्टोरिया रोती हैं ।" तुरंतही राजकुमार जर्मनी जानेके लिये तैयार हुए। विवाहसे पश्चात् दंपतिको एकभी दिन अलग रहनेका अवसर नहीं आयाथा । इस आकस्मिक वियोगसे दोनोंको बड़ा कष्ट हुआ । इस वियोगके दिनोंमें दप- तिके परस्पर जो प्रेमभरेपत्र आयेगये उनके पढ़नेकी पाठकोंको इच्छा होगी। परन्तु खेद यह है कि स्थानाभाव उन प्रेमपत्रिकाओंको यहांपर प्रकाशित करनेमें बाधक होता है । प्रियतमाका "कल आपके सांथजहां आमोद प्रमोद किया था वह स्थान आज खाली किन्तु मेरा हृदय आपविना खालीनहीं है। आपमेरे हृदय में निवास करते हैं । " और प्रियतमका खेद कि" "मैं जैसे २ आगे बढ़ता हूं आप मुझसे दूर होती जाती हैं" येही वाक्य उनके हार्दिक प्रेमकी साक्षी देते हैं। पतिवियोगसे रानीको एकदिन एक २ वर्षके बराबर निकलताथा परंतु राजकार्य में संलग्र होनेसे केवल एकान्त के समय वियोग अधिक व्यापताथा । आयलैंड के कितनेही राजद्रोही अपने प्रदेशको इंग्लैंडसे स्वतंत्र करना चाहते थे। डेनियन ओर जान ओकोनेल छः मनुष्यों सहित इस अपराधमें पकड़ेगये । और नवीन पार्लियामेंट खोलते समय सिंहासनकी ओरसे जो व्याख्यान हुआ उससे यह हलचल शांतहुई । पति वियोगके दिनोंमें रानीको गृहमबंधकी याद आई श्रीमती भोजनमें से बचे हुए अत्रका अभीतक दुरुपयोग होताथा । श्रीमतीको यहवात विदित होतेही आपने वह अत्र दान भिखारियों को देनेका प्रबंध करदिया इस अन्नसे प्रतिवर्ष ११३००० मनुष्योंका पालन होनेलगा। इसके सिवाय भोजऔर दावतों पर दीन लोगों को खिलाया जाताथा वह अलगथा । पति के जर्मनी से लौटने बाद जनरल टामथंब नामक एक व्यक्ति आया । यह बौनाथा । इसकी टंचाई डेढ़ फुटथी और उमर तीसवर्षकी थी इसकी हास्य भरी बातें और शरीरकी अद्भुत बनावटको देखकर लोग चकित होगये । इस समय इसका नाच देखने में फ्रांसके राजा फिलिप भी उपस्थित थे । यह ८ अक्टूबरको आये थे। इनसे पहले कोईभी फ्रांसका राजा युद्ध प्रसंगके विना केवल प्रीति वर्धनके लिये इंग्लैंड को नहीं गयाथा। इसी वर्ष में रूसके ज़ार निकोलस इंग्लैंड में श्रीमतीसे मिलने आये और ६ अगस्तको श्रीमतीके द्वितीय पुत्र एलफ्रेड अरनेस्ट एलबर्ट अर्थात् डयूक आफूएडि नमराका जन्महुआ ||<noinclude></noinclude> jgh61h8jlrh4syw7qwpuj9jtr0zvbj3 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०६ 250 194629 665233 2026-07-06T15:00:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665233 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ड्यूक आफ् एडिनबरा । (८९)<noinclude></noinclude> gnme4cq72ngcuzq6a5pnue1q62jg1mp पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०७ 250 194630 665234 2026-07-06T15:00:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665234 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०८ 250 194631 665235 2026-07-06T15:00:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665235 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( ९१ ) अध्याय ३०. फुटकर बातें । इसके बाद रानीको स्काटलैंडकी यात्राका फिर मन हुआ। वहांकी रमणीय ता देखकर श्रीमतीका मन कुब्ध होगया और थोड़ेही वर्षों के बीच में उन्होंने तीनचार यहांकी यात्रा की । दूसरी यात्रा में एकवार श्रीमती ब्लेर एथोलीके गिरने में ईश्वर प्रार्थनाके लिये गई। वह गिरना ईसाई मतमें एपीस्कोपेल पंच का है। श्रीमतीने इस मतके अनुसार यहांपर प्रार्थना नहीं की इसलिये यहाँके लोग बहुत भड़के परंतु रानीने उनको अपने मृदु भाषण से शांत किया । इसी बीच में आपने अपना धसुरालय देखने और उसे मिलनेके लिये जर्म- नीकी यात्राकी। इस यात्रामें मेलिन्स स्थानमें बेलजियमके राजा रानीसे भेट हुई। वोन नामक स्थानमें रानीने अपने पतिके शिक्षकसे मिलकर उनका सत्कार किया और पतिके परम रमणीय स्थानों जो एक उत्तम उपवनमें बने हुए देखकर बड़ा आनन्द किया। यह पतिकी जन्मभूमि थी इसलिये रानीको उसे देखकर बड़ा आनन्द हुआ । इस यात्रामें मूशियाके राजा प्रथम विलियमने इनका बहुत सत्कार किया। दो तीन दिन इधर उधर फिरनेके अनंतर आप की जागीरकी राजधानी कोबर्गको गई । यहाँ राजकुमार अर्नेस्ट, मामा राजा लियोपोल्ड और मामी रानी लुसीसे भेंट हुई। इस जगह पतिके जन्म वाले कमरे में निवास कर दंपतिने अधिक मुखपाया । पिताकी समाधि दर्श- नसे राजकुमार एलर्टको और असुरकी समाधि देखकर रानी विक्टोरियाको मड़ा हर्ष हुआ और दोनोंने जोसे समाधि पूजन किया । यात्रा से लौटने बाद इंग्लैंड में रके व्यापार में बड़ी गड़बड़ मची। आलूकी खेती बिगड़ जानेसे प्रजाको बहुत हानि हुई और अन्न कष्टने 'कार्नला' का फिर खेड़ा खड़ा किया । लार्ड रशल प्रधान अमात्य हुए परंतु उनके कार्य में सफ- लता न हुई इसलिये पील हीको फिर अधिकार मिलगया । २५ जून सन् ४६ को एक राज कुमारीका जन्म हुआ । इनका नाम हेलीना आगस्टा विक्टोरिया रक्खागया । राजकुमार एलबर्टको केम्रिन विश्व विद्यालयने सभापति (चैसलर ) बनाया और इस कारण प्रजाका उनके साथ संबंध और भी हड़ हुआ । अध्याय ३१. फ्रांसनरेशका पदच्युत होना । फांसके राजा लुई फिलिपके साथ श्रीमतीका घरोपाथा परंतु इस बात से दोनों राज्योंका कुछभी संबंध नथा। अब फिलिप राजाने स्पेनके साथ संबंध<noinclude></noinclude> 8i1h5owu91eh3g5v8hbebcyn0bb8plj पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१०९ 250 194632 665236 2026-07-06T15:00:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665236 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( ९२ ) किया । फिलिपके भतीजे डयूक-डी-काडीनसे स्पेनकी रानीकी बहनका संबंध ठहरा । यह बात इंग्लैंडको पसंद न हुई। श्रीमतीको समझानेके लिये रानी एमिली आई। उनका आपने योग्य सत्कार तो किया परंतु स्पष्ट कहदिया कि इस संबंधसे फांस राज्य बहुत भयमें जा पड़ेगा । हठीले फिलिपूने यह बात न मानी और इसका परिणाम यह हुआ कि यूरोपभर में इस बातसे हलचल मचगई । फिलिपू की यह चाल फ्रांसवालोंको पसंद नहुई और इसी कारणसे उसे अपनी रानी सहित फांस छोडकर भागनापड़ा । राजाफिलिपू गुप्त वेश धरकर जानस्मिथ के नामसे लैंड आया । राजाकी दुर्दशा देखकर श्रीमतीको वडादुःख हुआ। आपने उसका बहुत कुछ सत्कार किया और उसकी भूलों वा चालोंके लिये कुछभी कहने का अवसर न आने दिया । इसीतरह फिलिप की जगह दूसरा राजा नियत हुआ उसको भी सहर्ष स्वीकार कर लिया। डचेज्-डी-मोंट पिंसर जिसके कारण यह बखेड़ा हुआथा बहुत दुर्दशाग्रस्त हो गई। उसके शरीर पर एकभी कपड़ा बेफान रहा। इस समय इटाली, स्पेन और आस्ट्रियामें भी बहुत कुछ परिवर्तन हुआ और रानीके मातुल बेलजियम के राजा लियोपोल्ड को पदच्युत करने का प्रयत्न हुआ किन्तु वह बचगये और इसीतरह रानीके जेठ राजकुमार अर्नेस्टकी भी रक्षा हुई ।। इस गड़बड़ के बीच मेंही श्रीमतीने छठे गर्भसे राजकुमारी ल्यूसी केरोलाइ- न एलबर्ट का १३ भई सन् १८४८६० को प्रसन किया। इसी वर्ष में मृत राजा तीसरे ज्यार्ज की कन्या सोफिया का देहान्त होगया जिससे रानीको बहुतखेदहुआ । इंग्लैंड बलवा हो जाने का भयथा । कास लोगोंने उपद्रव खड़ा करदिया । इनकमटैक्स डालने और सेनाका व्यय बढ़ानेसे मना असंतुष्ट होगई । कार्टोस लोग रानीके शासनसे रूठगये । इंग्लैंडमें युद्धकी तैयारी होगई । २ लाखसैनिक नये भरती कियेगये । फूांसके नवीन राजा लुई नेपोलियन ने रानीके शरीर रक्षक बनने की प्रतिज्ञाकी । इससमय आयलैंड में उपद्रव हुआ । उपद्रवियोकें मुखिया पकड़े गये और उनको योग्यदंड दिया गया । ऐसे अवसर पर काम इतना बढ़ गया कि प्रदेश विभाग मेंसे एकवर्ष में २८००० पत्र बाहरगये । श्रीमतीके परिश्रम का यह एक उदाहरण है । कैसा भी संकट पड़ता परंतु श्रीमती कभी घबराती नथी । आपने अपने मातुलको लिखाकि "कैसी भी हलचल मची परंतु मुझको कभी क्षोभ नहीं हुआ। और न मेरे चित्तमें दुर्बलता आई । " सन् १८४८ ई० में फ्रांस में राष्ट्रविव हुआ और इसी लिये वहां तीन दिन तक कतल हुआ। उपद्रव शांति का मुख्य कार्य जनरल केविगनगने किया । इस वर्ष में स्काटलैंड के बाल मोरल महलकी खरीद हुई और लार्ड मेलबोर्न की मृत्यु हुई। इनकी मृत्युसे श्रीमतीको बडा दुःख हुआ। उन्होंने कहा कि “जिसने विशेष बुद्धिमानी और गंभीर विचारोंसे मेरी सहायताकी उसकी मृत्युसे मुझे बड़ा शोक हुआ है ॥"<noinclude></noinclude> nb1ybu3pgyoqexystjd4oti7jnsmfrj पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११० 250 194633 665237 2026-07-06T15:00:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665237 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ड्यूक आफ् कनाटका चित्र | (९३)<noinclude></noinclude> lm59ixul0yp2sv5vzwyhhmzehaf8al4 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१११ 250 194634 665238 2026-07-06T15:00:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665238 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११२ 250 194635 665239 2026-07-06T15:01:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665239 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (९५) अध्याय ३२. जन्म मृत्यु और प्रदर्शिनी । नत्रंघरमें मृत राजा चौथे विलियमकी विधवा रानी एडीलेड बहुत बीमार हुई। श्रीमती उनसे मिलने गई २ दिसंबरको उनकी मृत्यु हुई। इस मातसे श्रीम- तीको बहुत दुःख हुआ क्योंकि यह उन्हें मातासेभी अधिक समझतीथीं ॥ सन् १८५० ई० की पहली मईको रानीके सातवें गर्भसे तीसरे पुत्रका जन्म हुआ उसदिन महारथी वेलिंगटनका जन्म दिन था इसलिये मूशियाके राजा प्रथम विलियम नेपालका नाम "आर्थर विलियम पेट्रिक एलबर्ट" रक्खा । यहीं ढक आफू कनाट हैं। सोवडसे निपट कर एकदिन रानी केबिनके महलमेंसे बाहर फिरने जातीय इतनेहीमें पेट नामक दुष्टने रानीके शिरमें लाठी मारी । अपराधीको सात वर्षका कालापानी हुआ || तीसरे ज्याने राजाके सबसे छोटे पुत्र डचूक आफू केम्ब्रिजकी मृत्युसेभी रानीको बहुत दुःख हुआ और ऐसेही समयमें फांसके पदच्युत राजाकी मृत्युके समाचार मिले । रानीने इन दुःखोंसे विश्राम लेनेके लिये फिर स्काटलैंडकी यात्रा की। यहां के हाइलैंडर लोगोंने श्रीमती स्वागत में डी नदीके उसपार एक भोन किया। रानीकी मंगल कामनाके लिये मद्यपानका अवसर आया परंतु इस कार्यके लिये प्याला न था । सरदार फोर्बसने पैरसे जूता निकालकर उसमें शराब डाला और तुरंत उठाकर ओट लिया। इसकी युक्ति देखकर समस्त दाईलैंडरोंने इसमातका अनुकरण किया । पति एलर्टकी योजनासे लंडनमें एक प्रदर्शिनी पार्लियामेंटने इस प्रस्तावको हर्ष सहित स्वीकार खोलनेका मनसूमा हुआ । किया। मना इस बातसे बहुत प्रसन्न हुई । परंतु प्रबंध होनेसे पूर्वी प्रिंस एलबर्टके सहायक सर राट्र पीलका देहान्त होगया । श्रीमतीने इस कारण प्रदर्शनका काम बन्द रखनेका ठहराव किया परंतु प्रजाका उत्साह और पतिकी इच्छा देखकर अंतमें इस कार्यको स्वीकार कर लिया । हाइड पार्कका रमणीय स्थान इसके लिये पसंद हुआ। सन् १८५१ ई० की १ मईको प्रदर्शिनीका आरंभ हुआ। इसका उत्सव रानीके सिंहासनपर विराननेके उत्सवसे भी बढ़कर था। सात लाख मनुष्य इस मेलेको देखने इकट्ठे हुए । पुलिसके सुमबंधसे किसी प्रकार की दुर्घटना न हुई। इस कार्यके लिये जो क्रिस्टल पॅलेस तैयार हुआ उसमें पचास लाख रुपया व्यय हुआ। प्रद- शिनीका आरंभ १ मईसे होकर ११ अक्टूबरको समाप्तिहुई ।-<noinclude></noinclude> lkqauafstg5269xjtpzdx3laf044bt1 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११३ 250 194636 665240 2026-07-06T15:01:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665240 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ९६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । प्लेट जनेर नामक नृत्यका पहले वर्णन हुआ है उसी तरहके दो नाच श्रीम- तीने प्रदर्शिनीसे निपटने बाद और किये। आपने 'रेस्टोरेशन' नामक प्रथम नाचमें आठ प्रकारसे नृत्यकर अपना नृत्य कौसल दिखलाया । अध्याय ३३. बड़ी २ घटनायें और वेलिंग्टनकी मृत्यु । फांसके नवीन राजा लुई नेपोलियनने, प्रजाके स्वत्य हरणकर रक्तकी नदी बहाने बाद, राज्य भर में अपना आतंक स्थापित कर दिया। इस बातसे फांसका लैंडसे मन मोटा व अधिक होगया परंतु फरांसीसियोंकी चाल वाणी से इंग्लैंडका मंत्रि मंडल उनका कुछ न करसका । सन् ५२ ई० के आरंभ में वे आफू विस्केमें 'रामे- जन' नामक जहाज जलगया। इसमें १६१ मनुष्यथे जिनमें से १४० मृत्युवश हुए। इसी तरह उत्तमाशा अंतरीपके निकट ब्लैकहेड जहाजु नष्ट होनेसे ६३० मनुष्य और २९४ बालक डूबगये। ये सबके सब सैनिकथे। इसी वर्ष में तीसरी दुर्घटना और हुई । बेलवरीका तालाब फटगया। इसमें १०० मनुष्य मरे और हजारों घर नष्ट होगये । इन बातोंसे श्रीमतीको बहुत दुःख हुआ और उन्होंने पत्र लिख २ कर मृत मनुष्योंके कुटुंबको धैर्य दिया और चंदा देकर उनकी सहाय- ताकी । इसी वर्ष में लिनकनइनके एक वैरिस्टर जे नील्ड के मृत्यु लेखके अनुसार उसकी विरासतमें २५ लाख रुपया श्रीमतीको मिला । अधिक श्रमसे श्रमित होकर दंपति स्काटलैंडके बालमोरल महलमें निवास करनेके लिये गये थे । १६ सितंबर के प्रातःकाल समुद्र तटका वायुसेवन करते २ रानीको अकस्मात् भ्रम हुआ कि डयूक आफू बेलिंगटनकी भेट की हुई घड़ी गिरगई । नाकरको तुरंत दोड़ाया। उसने लौटकर खबर दी कि घड़ी तो नहीं गई किन्तु घडीको भेंट करने वाले ड्यूक आफ वेलिंग्टनका स्वर्गवास होगया । सुनतेही दम्पति अकचका गये। रानीने कहा कि " आज इंग्लैंडका- नहीं २ ब्रिटेनका गर्व, कीर्ति, महारथी महापुरुष नहीं रहा। इसके समान न कोई दूसरा हुआ और न होगा।" यह रानीके पिता और बेलजियमके राजाके समान वीरथे । कभी युद्धमें पीठ न दिखाने वाले, प्रामाणिक, यूरोप में परम प्रतिष्ठा- प्राप्त महापुरुषथे । इनका देहान्त थोड़े ही घंटोंकी बीमारीमें होगया । श्रीमतीने स्वयं इसके विषय में लिखा है कि" स्मरणीय योद्धा ड्युक मरनेपरभी उसके सुकार्यों से सदा चिरंजीवी रहेगा । उसमें भूमंडलके सम्मानका समावेशथा। प्रजागणमें वह<noinclude></noinclude> krn7fu8pvr4er6fa573z4oxr7rozatp पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११४ 250 194637 665241 2026-07-06T15:01:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665241 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (९७) सर्वोत्तम था दोनों दल उसका आदर करते थे। राज्यका परममित्र होनपर भी बड़ा सादाथा। उसने सर्वकार्य सादगी, धैर्य और निर्भयतासे किये। इस राज्यको कभी ऐसा राजभक्त महात्मा नहीं मिलेगा। यह सदा सुसम्मति और फठिनताके समय सहायता देने को तैयार रहताया। ऐसा कोई मनुष्य न होगा जिसने उसकी मृत्युपर आंसु न बहायेड़ों " शवको संदूक में रखकर पार्लियामेंटने राजसी ठाट से उसे दफनाने का प्रबंध किया। तैयारीमें एक मास लगा। चार दिन तक का प्रदर्शन कियागया १८ नवंवरको डयूक आफ वेलिंग्टन की सवारी निकली। इंग्लैंड के छोटे बड़े सब अमीरी अतिरिक्त फरासीसी मजाकी ओरसे भी प्रतिनिधि आया। महारथी नेलसनकी समाधिके निकट इसे स्थान दियागया । 1 सन् ५३ के आरंभ में विंडसर केसलके निकट मिस आफ वेल्सके महलका रसोईवर जल उठा। इससे प्राणहानि पिटकुल न हुई। इसी वर्ष अपरेलकी ७ तारीखको रानीके अष्टम संतान से चौथे पुत्रका जन्म हुआ । इस चालक का नाम लियोपोल्ड ज्यार्ज डंकन एलर्ट रक्खागया। इनको उचूक आफ एल- बनीकी उपाधि दीगई। जुलाई मासमें घरभर बीमार होगया । ११ अगस्तको श्रीमतीने जल सेनाकी कृषाइद देखी। इस अवसरपर पूशियाके राजकुमार बटम वर्ग के राजा रानी इंग्लैंड आये। इसी मासके अंतमें डबलिनमें प्रदर्शिनी खोली गई । इस अवसर में रूम रुसमें लड़ाईका आरंभ हुआ। इंग्लैंड और फ्रांसने मका- शित किया कि जो रूस कुछभी रुमके लिये शिर उठायेगा तो फाले समुद्र में हमारे जहाज़ पेसीपोर्ट पर अधिकार करलेंगे। ब्रिटिशमंत्रिमंडल में बरखेड़ा पडा । मना युद्धकी उत्सुक हुई परंतु राजकुमार एलर्ट इस बातके विरोधीये । प्रजाको उन- की सम्मति पसंद न हुई इसलिये लोग उनको बुरा समझने लगे। लिवरल और कंसटिव इलमें परस्पर वैर मढ़गया। राजकुमार एलबर्टने अपने मित्र और रानीके दूरस्थ संबंधी बेरन स्टाफमोरको लिखा कि "लोग रानीको कैद करना और मुझे निकाल देना चाहते हैं क्योंकि वे मुझे राजद्रोही समझने लगे हैं। " इस बातको जानकर श्रीमतीने लार्ड एवनको लिखा कि "स्मरण रखखोकि जो मेरे मियतमको बुरा कहते हैं ये मेरे शत्रु हैं और उनको इस बातका बदला दिया जायगा ।" जनवरी सन् १८५४६० में पार्लियामेंट खुलतेही लार्ड रशल और लार्ड एमडीन प्रधान अमात्यने प्रजाके कथनका खंडन किया। इस बात से सब प्रकारकी शांति होगई । लड़ाईके घिरे हुए बादल बिखरगये और रानीके विवा हके चौदहवें वर्षक उत्सव पर सब प्रकारका आनन्द होगया ।<noinclude></noinclude> d2c6ke1buie0xpjrjduzx0gov7urg4b पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११५ 250 194638 665242 2026-07-06T15:01:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665242 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ९८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अध्याय ३४. राजकुमारियों के विवाह | जर्मनीके नरेश प्रथम विलियम अपने पुत्र फ्रेडरिकके ( जिनका वय २५ वर्ष का था ) विवाह के लिये बड़े उत्सुक थे। श्रीमती रानी और उनके पति राजकुमार एलबर्ट दोनोंकी इच्छा हुई कि पंद्रह वर्ष के वय वाली प्रथम राजकुमारी का विवाह दोनोंकी इच्छासे कियाजाय । अवसर साधकर जर्मनी के युवराज इंग्लैंड आये। दोनों में प्रेमालाप हुआ । युवराजने अपनी इच्छा राजकुमारी को जतलाइ । राजकुमारीने युवराज को वरना स्वीकार किया । २९ सितंबर को रानीने दोनों के संबंधकी वात प्रकाशित की। आपने अपनी दिनचर्या' में लिखा है कि- "हमारी प्यारी विक्टोरिया का संबंध भूशिया के युवराज फ्रेडरिक विलियमसे आज पक्का होगया । २० सितंबर को उसने अपने आपही इच्छा प्रकाशित की । युवराज की टमर युवा और कुमारी की अल्पवय होनेसे हमें प्रथम इस संबंध में हिचर मिचर हुआ । इससे हमने निश्चय किया कि दोनों एक बार फिर इस बातका विचार कर स्थिर करें अथवा दूसरी बार के लिये यह बात उठा रक्खी जाय । परंतु आज दोनों वायु सेवन करने गये उस समय युवराजने राजकुमारी को प्रेम चिह्नमें एक श्वेतमूर्ति भेंटकी । कुमारीने वह लाकर मुझे दिखाई इससे बात पक्कीहोगई और विवाह दृढ हुआ । राजकुमारीका विवाह मार्च में निश्चय हुआ। दो मास पश्चात् दूलह इंग्लैंड आया । इस अवसर में राजकुमारी एक दिन किसी कागज़पर मुहर कर रही थीं। इतनेही में उनके हाथके दस्ताने सुलग उठे। राज कुमारी एलिसने धूल डालकर आग बुझाई । कुमारी बहुत जलगई परंतु उन्होंने धैर्यसे दुःख सहनकर कहाः “माता- को यह बात न जतलाना नहीं तो वह घबड़ा उठेंगी और पिताजीको शीघ्र बुलवाओ ।" थोड़े समय में राजकुमारी आरोग्य होगईं। इसी अवसर में १ अपरेल सन् १८५७ ई० को श्रीमतीके नवम गर्भसे राजकुमारी वियेट्रिसका जन्म हुआ। राजकुमारीका विवाह निकट आनेसे अस्सी हज़ार रुपया वार्षिक और चार लाख रुपये विवाहमें दहेज देनेके लिये नियत हुए। इसी वर्ष में रानीने पति को "प्रिंसकंसर्ट " की उपाधि दी । और इसी वर्ष में भारत वर्ष में बलवा हुआ । जिसके समाचार आगे लिखे गये हैं ||<noinclude></noinclude> rip0ks91yazcc6rxu2gcjivcpf0hfwp पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११६ 250 194639 665243 2026-07-06T15:01:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665243 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (९९) राजकुमारी "विकी" के शुभ विवाहसे लैंड में पड़ा आनन्द हुआ। नगर में धूम धाम मच गई। वरात आनन्दपूर्वक आई । २५ जनवरी सन १८५८६० को विवाहका मुहूर्त स्थिर हुआ। १८ जनवरीकी रात्रिमें राजमहलमें नृत्य हुआ । इसमें दुलहिनने अपना नृत्य कौशल दिखलाया। रानीने इस विवाह में अधिक धूमधाम करना चाहा था इसलिये लंडन नगर में बहुत दिन पहलेसे तैयारियां हुई। २८ जनवरी को ईसाई धर्म और की राजरांतिके अनुसार बड़े ठाटसे विवाह हुआ । २९ को दूलह दुलहिन विदा हुए, रानीने विदा करते समय कुमारी और दामाद का वात्सल्यसे संचन किया। मिय कुमारीके विदा होनेसे दम्पतिको वियोगजनित खेद हुआ । कुछ कालके अनन्तर प्रथम राजकुमारीसे मिलनेके लिये दम्पति जर्मनी गये । मेगडेवर्ग के निकट वाइल्ड पार्कके स्टेशन पर राजपुत्रीने हाथमें कलंगी लिये माता पिताका स्वागत किया। चौदह दिन वहां निवासकर दंपति अपनी मिपुत्रीको यहीं छोड़ लैंड लौट आये। २७ जनवरी सन् ५९ ई० को लंडन में शुभ संवाद सुनाई दिये । सुतेही दंपतिको परमहर्ष हुआ। संवाद ऐसे पैसे नहीं थे । जर्मनी के तारसे राजकुमारी विक्टोरिया ( रानीकी प्रथम कुमारी ) के उक्त तिथिको पुत्र ख़बर थी । यही चालक आजकल जर्मनीके सम्राट् द्वितीय विलियम हैं । होनेकी नवीन वालंटियर सेनाकी २३ जूनको हाइडपार्क कुवाइद हुई । नेशनल राइफल एसोशियेशन में रानीने प्रथम बार बंदूकका फेर किया। इसके बाद २२ सितंवरको जन्मभूमि दर्शन करने राजकुमार एटबर्ट के साथ रानी प्रयाण किया। गोया पहुंचने पर रानीकी द्वितीय सास का देहान्त होगया। इस यात्रामें प्रथम राजकुमारीसे दंपतिकी फिर भेंट हुई। यहां एक भयंकर घटना हुई रानीके पति एकदिन गाड़ी में चढ़कर वायुसेवन को गयेथे अकस्मात् गाढ़ी घोड़े भड़क उठे । घोड़ोंने यथेच्छ भागना आरंभ किया। भागते २ गाड़ी एक छकड़ेसे टकराई। टकरातेही उसका चूर चूर होगया। पति गाड़ी मेंसे कूदकर बचगया किन्तु कोचमैनके बहुत चोट आई। समाचार पातेही रानी काँप उठी । आंखों से आंसू बहने लगे। पतिंक मिलनेपर दोनोंको हर्ष हुआ और कुटुंब सहित ईश्वरकी प्रार्थना की। इस यात्रामें मुसेल्स होते हुए १६ अक्टूबरको विंढ- सर आपहुँच ॥ १] बड़ी राज कुमारीका छोटा नाम.<noinclude></noinclude> l70kh7b9tibvf3a0mf2msjif27yqz4k पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११७ 250 194640 665244 2026-07-06T15:02:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665244 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १०० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । राजकुमारी एलिसके विवाहकी इन दिनों इंग्लैंड में बहुत चर्चा थी। हंसी- डार में स्टैंड के राजकुमार राजकुमारी से विवाह करनेके उम्मेदवार थे । यह दिसं- बर मासमें इंग्लैंड आकर श्रीमती मेहमानहुए। इस विवाह के विषय में श्रीमतीने अपनी " दिनचर्या" में लिखा है कि “दिनका भोजन किये पीछे राजकुमारी एलिस और राजकुमार लुइस अंगीठी के पास बैठकर गुपचुप परन्तु हँस कर बाते करते थे । जब मैं दूसरे कमरेमें गई तब थोड़ी देरमें दोनों मेरे पास आये । एलिसने डरते २कहा कि "मुझे इन कुमारके साथ विवाह करना स्वीकार है । और मैं आपसे आशीर्वाद चाहती हूं । "मैंने उसका हाथ प्रेमसे दबाकर कहा “ बेशक यह बहुत उत्तम है । " इस वार्त्तालापके पश्चात् कामकानसे निपट कर मैं एलिस को साथ लिए हुए एलबर्ट और लुइसके कमरे में गई । लुइस हमसे बहुतप्रीति पूर्वक मिला और उसने मेरे हाथका चुंबन किया। इसके बाद सन् १८६२ ई० में विवाह हुआ। जिसका वर्णन आगामि अध्यायमें है । अध्याय ३५. राजमाताकी मृत्यु और राजकुमारीका विवाह | श्रीमतीकी माता, केंटकी डचेज जिनकी सुशिक्षासे उनमें इतने गुणोंने वास किया, जिनकी योग्य शिक्षाने श्रीमतीको वास्तविक देवी बनाकर संसारका उपकार किया उन्हींको विचहत्तर वर्ष के वयमें बीमारीने घेरा । दिनर शरीरकी शक्ति घटने लगी । सन् १८६१३० के आरंभ में राजमाताका स्वास्थ्य बिगड़ना आरंभ हुआ। मार्च में हाथमें कुछ पीडा आरंभ हुई इसकारण कुछ चीर फाड़ करानी पड़ी । १५ मार्चको दंपतिको खबर मिली कि राजमाता का स्वास्थ्य अधिक बिगड़गया है । कभी २ अचेत होजाती हैं और हिचकियांभी आनेलगी हैं। सुनते ही दोनों दौड़े हुए फूागमोर के महलमें राजमाताके पासगये । श्रीमतीको बाहर छोड़कर राजकुमार एलबर्ट सासके पास कमरे में गये। थोडी देर में बाहर आकर अपनी प्रियतमासे रोनेके सिवाय कुछ न कहा । दंपतिने भीतर जाकर देखा तो राजमाता पलंगपर बैठी हुईथीं । श्रीमतीने प्रणाम कर माता के हाथका चुंबन किया और अपना चुंबन करानेके लिये अपना कोमल कपोल माताके होठोंके लगाया परन्तु माने सुमन न किया । केवल पुत्रीके शिरपर हाथ फेरकर रहगई । माताकी दशा देखकर दोनोंके चित्तपर खटका होगया । श्रीमतीने डाक्टरोंसे पूंछा तो उन्होंने कहा कि अब इनके जीनेकी आशा नहीं है ||<noinclude></noinclude> 1ejdyx54mqmzoz90x5qfcngmk9wzumw पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११८ 250 194641 665245 2026-07-06T15:02:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665245 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( १०१ ) कुछ म' । पूर्व श्रीमतीकै पतिने अपनी पुत्रीको लिखाया कि संसार में मेरे समान कोई सुखी नहीं है क्योंकि मैंने अभीतक किसीकी मृत्यु नहीं देखी है। यही स्थिति रानीकी थी। दम्पतिके असीम सुखमें एकाएक इस दुःखका मोझा आपड़ा श्रीमती अपनी मा के पास टसीतरह लाड प्यारसे रहती थीं जैसे उनका ढंग बालवयथा । आपको प्रथम वारके दुःखने कातर करदिया। रात्रि बड़ी कठि नतासे तारे और घंटे गिनते वाती । प्रभात होतेही पतिने श्रीमतीको बहुत आश्वासन दिया । रानीने माताकी नाडी मंद देखकर कहा "हाय! माता विना- संसार का सुख फीका है ।" इस विषय में श्रीमतीने अपनी "दिनचर्य" में लिखा कि "ते २ मुझे हिचकियां आनेलगीं । मैंने उसके हृदयपर गिरकर अंतिम चकिया। एलबर्ट मुझे दुःखसे युक्त करने को दूसरे कमरेमें लगये। वहां जाकर उन्होंने माताकी अंतिम ख़बर सुनाई। मैंने दौड़कर माताके दर्शनकिये परमेश्वर ! कैसा भयानक दृश्य था ! उसके माणात्माकी निवृत्ति हुई। सब दुःखों का अंत हो गया। मेरी मियमाता ! अब मेरी नहीं रही अब वह चल बसी ।" पतिने जाकर राजमाताका कमरा देखा तो यह बहुत व्यवस्थासे था । एक और केनेरी पक्षी गारहाथा दूसरी ओर टोपीका कसीदा अधूराथा । पति के शौक की सीमा न रही। मरने से पूर्व राजमाताने अपनी मियपुत्री निरिक अपना बारिस किया | नन २५ मार्चको माताकी अंतेष्टि किया हुई । राजमाताको जो दान मिला करतीथी वह अबसे उनकी द्वितीय पुत्री को मिलने लगी। उनके संघ नौकरों कोपेन्दान दीगई और मुख्यपरिचारिका को रानीने अपने पास रखा । "इनकी मृत्यु पर नगर और पार्लियामेंट में बहुत शोक हुआ ॥ राजमाताक शोक की समाप्ति नहीं होने पाई थी इतनेही में राजकुमारी एलिस के विवाह की तैयारी हुई। पार्लियामेंटने तीन लाख रुपये का दहेज और साठ हजार वार्षिक देना निश्चय किया। बरात लंडन आपहुंची। इस उत्सवपर जो मेहमान आये थे उन्होंने श्रीमती का शोक दूर कराया । माताके दुःखमें पुत्रीका विवाहकर दंपतिने अंतिम बार सुखानुभव किया परंतु यह सुख अन अधिक कालतक टिकनेवाला न था । विवाह के अनंतर आयलैंडकी यात्रामें एक दिन अकस्मात् श्रीमती मुखसे निकल गया:-" खेद ! कहीं ऐसानह हमारी यह अंतिम भेट हो!" इस अनायास कथनपर उससमय किसी ने लक्ष न दिया किन्तु बात यह सची निकली ॥<noinclude></noinclude> f13aqpyy7wqszwyt0etsjmuov2tmd9i पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/११९ 250 194642 665246 2026-07-06T15:02:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665246 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १०२ ) महारानी विक्टोरियाका चारत्र । विवाहसे लेकर सन् १८६१ ई० तक बहुतही आनन्दरहा । दम्पतिने सुखके सिवाय दुःखका नामतक भी न जाना । माताही इस सुखकी जन्मदात्री भी उसी ने श्रीमतीको पढ़ा लिखाकर सुखभोगनेके योग्य कियाथा और सच पूछो तो रानी विक्टोरिया का सुख माताके साथही विदा होकर मातृवियोग के दिनसे श्रीमती के दुःखका आरंभ होगया ॥ अध्याय ३६. दुःखका आरंभ | राजमाता की मृत्युसे दुःखका आरंभ होगयाथा। श्रीमतीके जीवन खेत में दुःखका बीज बोदिया गयाथा परंतु जवतक अंकुर उत्पन्न न हुआ उसकी कि सीको चिन्ता न हुई । “सुखस्यानंतरं दुःखं दुःखस्थानंतरं सुखम् । चक्रवत्परि- वर्त्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ॥" इस लोकोक्तिके अनुसार श्रीमती सुखके दिन स्वम होगये अब दुःखकी पारी आई। दम्पतिके यौवन सुख, राज्य लक्ष्मी, प्रभुत्व और संतति सुखमें आनन्द पूर्वक कालयापन करते२सन् १८६१ ई० के अंतिम भागमें एकाएक राज्ञीपति एलबर्टका सास्थ्य बिगड़ा । परंतु उन्होंने इस बातकी कुछ पर्याह नकी । राजकुमार जैसे स्वधर्मे निष्ठ और आस्तिक पुरुषको मृत्युका कुछ डर न हुआ। एक दिन उन्होंने अपनी प्रेमपात्री रानीसे कहा:-- "मुझे जानेका किचिंतूभी लोभ नहीं है। मेरा इच्छित और प्रियवस्तुकी ठीक रक्षा हो सके तो मैं कल मरनेको तैयार हूँ। " उस समय रानीको ऐसे कर्ण कटु वाक्यसे दुःख तो हुआ परंतु पतिका कथन साधारण समझ कर उन्होंने इस पर लक्ष्य न दिया । सैंडहर्स्टकी युद्धशालाका निरीक्षण करनेमें २२ नवंबरको थकावट और वृष्टिसे उनका स्वास्थ्य अधिक बिगड़ गया । शरीरके जोड़ों में पीड़ा होने लगी। इतने हीमें समाचार मिले कि एमेरिका में ब्रिटिश जहाज़ 'ट्री- रेंट' पकड़ लिया गया। सुननेसे चित्तको बहुत धक्का लगा "ट्रीरेंट" धूमपात - वानासे डाक लेकर इंग्लैंड आरहाथा। इसमें सीडन और एसन नामक दो व्यक्ति सवारथे । ये दोनों एमेरिकाके चार्लेसटाउन से भागकर क्यूषा होते हुए यूरोप जातेथे । प्रतिपक्षियोंने इन दोनोंको 'ट्रीट' के अध्यक्ष से मांगा । महान वा- लॉने शरणागत वत्सलताके विचारसे दोनों भगेदुओं को न दिय। बस इसीपर एमेरिकाके “सेंटजेसिटोंटो" जहाज़ने ट्रॉरेंट पकड लिया। इंग्लैंडमें समाचार पहुंचते ही बड़ी हलचल मची। प्रिंस एलबर्टकी सम्मति और प्रयत्नसे वाशिं- गटनके ब्रिटिशदूतके साथ इस विषयकी लिखापढ़ी हुई। इस परिश्रमसे उनके<noinclude></noinclude> sq9g07hghv0w348qhemdekqf44rthow पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२० 250 194643 665247 2026-07-06T15:02:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665247 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मथम भाग । (१०३) स्वास्थ्य में अधिक गढ़बड़ हुई। ज्वर आनेलगा । राजकुमारने श्रीमतीको अ धिक चिन्ताग्रस्त देखकर कहा :- "साधारण बीमारी है। चिन्ता मत करो" परंतु दीवान पामर्स्टन के चित्तपर खटका होगया । बीमारी बढ़ती देखकर सरकारी डाक्टर जेनर और सर जेम्स क्लार्कको इलाज सौंपा गया। उन्होंने आरोग्य होने की आज़ादी परंतु बीमारी दिन २ बढ़ती गई। रोग बढ़ने के साथही रानीकी चिन्ता बढ़ी । ७ दिसंबर की रात उन्हें बहुत बुरेर स्वम आये । स्वममें दो देवताओंने उनको घेर लिया जिससे वह बहुत भय- भीत हुई। ८ दिसंबरको राजकुमार को उस कमरे में से उठाकर दूसरे गृहमें गये। यह कमरा अशुभया । उसमें पहले राजा नीचे ज्यार्ज और चाँ विलियमका देहान्त हो चुका था परंतु पहलेसे इसबातका किसी को विचारनथा । एलबर्ट को आज्ञासे राजकुमारी एलिसने प्यानो बाजेमें भजनगाया। भजन सुनते ही राजकुमारकी आंखों में आँसू भरआये और उन्होंने हाथ जोड़कर परमेश्वरसे पापके मायधिसकी मार्थना की ।। ८ दिसंबर को रविवारथा । रानीने पतिकी मृत्यु के अनन्तर एक मित्रको पत्र लिखाया कि गत रविवार को प्राणनाथ भूमिपर थे उसदिन राजकुमारी एलिसके साथ उन्होंने आनन्दमें समय विताया । पिताके बहने से कुमारीमे भजन गायैये । गानसमाप्त होने पर उन्होंने ईश्वर प्रार्थना की । यद्यपि उन्होंने कुछ कहानहीं किन्तु उनके मुखकी चेष्टा और हाथकी हाल चालसे स्पष्ट मालूम होता था कि उनका समय ईश्वर प्रार्थना में जाता है ।" पिताकी बीमारी में कुमारी एलिसने बहुत सेवाकी । दिन रात उनके पलंग के पास अड़ीरहीं । और किसी न किसी तरह उनका मन बहलाने के लिये प्रयत्न करती रहीं। पिताको उठाने बैठाने, लिटाने और सेवा करनेमें पुत्रीने वहुत परिश्रम किया और इसकारण दंपतिने उनको आशीर्वाद दिया। रविवारके दिन डाक्टरोंने आशा तो न छोड़ी परंतु पादरियोंक मनसे उन्हें ईसाई धर्मकी पुस्तकों में का कुछ भाग “ईश्वराज्ञा" और "दूतवचन" सुनाये। रात्रिको पतिकी दशा रानीको कुछ अच्छी जानपड़ीं। पतिने मृदुहास्यसे" हृदयेश्वरी माणवल्लभा" का संबोधनकर रानीके मुखपर हाथफेरा। इससे रानीके चित्तको विश्रांतिहुई | सोमवारको ज्वरने बलपकड़ा। परंतु डाक्टरों ने आशा छोडी नहीं । रात्रिको उन्होंने रानीके शयन समय उनका भुवनकिया। बुध गुरु और शुक्र को कोई विशेष बात नहीं हुई । शनिवार ता० १४ दिसंबर सन् १८६१३० का प्रातः काल श्रीमती, राजकुटुंब और ब्रिटिशराज्यपर पत्रपात् करनेके लिये उदयहुआ ।<noinclude></noinclude> deh9h6o1xfmi48sqhnnvxkh9spurgrl पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२१ 250 194644 665248 2026-07-06T15:02:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665248 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( १०४ ) दिनभर प्राणपतिकी प्रकृति अच्छी रहनेसे रानीको जो आशा हुई थी वह एक साथ निराशा में बदल गई। डाक्टरको सन्निपातके लक्षण मालूम होगये। डाक्टरका संकेत पाकर रानीके होश उड़ गये । उससमयसे उन्होंने पतिको बिलकुल न छोटा। थोड़ेही कालमें पतिकी दशा अधिक बिगड़ती देखकर श्रीमतीने अपनेको कोसना आरंभकिया 1 उससमय पिताके चरणोंमें युवराज और राजकुमारी हेलेना दोनों बैठेथे । महलमें चिड़िया बोलनेका शब्द तक नहीं था । सब सूनसान था । आंसूकी नदियाँ बहरहीथीं। पौने ग्या रहका समय हुआ । श्वासकी गति मंद होगई। मुखकी आकृति, प्रभाव और सौंदर्य में किसी तरहका अंतर न आया। ऐसे समय में अपनी प्रियपनीको सदा के लिये शोकसागर में डाल ब्रिटिश राज्यके मुकुटका मुकुट, प्यारे संतानके पूज्य- पिता, प्रजाके सच्चे शुभचिन्तक, परोपकारी, विद्वान, बुद्धिमान् वीर संसारसे विदाहुए । उनका शव मरण शय्यापर सोता रहा । रानी और एलिसको मूच्छ आगई । महल में रोना कूटना मचगया । हाय ! कैसा दुःखदायी समय !! अध्याय ३७. पतिका स्वर्गवास | रात्रिके शांतिमय समय में अशांति फैली। निद्रादेवीके वशीभूत नागरिकोंको सेंट- पालके गिरजेके बृहत् घंटने टनाटनके भयानक और हृदयभेदी शब्दसे नगादिया उसीसमयसे लंडनमें हाहाकार मचा। सूर्यके उदय होतेही तारपर तार उड़ने लगे। बातकी बातमें ग्रेटब्रिटेन क्या बरन यूरोप और एमेरिकामें इस शोक संवादने जा प्रवेश किया। ४२ वर्षके वयमें रानी, सुरसुन्दरी विक्टोरिया सधवासे विधवा होगई । २१ वर्षतक अपने बहुमूल्य विचारोंसे जिस महापुरुषने ब्रिटिश साम्राज्यकी सहायताकी थी, जो दयामयी देवीका प्राणनाथ था जिसके लिये यूरोप और एमेरिकाकै यावत् बुद्धिमानों और दोनोंकी पूज्यबुद्धिथी उसके प्राणोंने सदाके लिये प्रयाण कर संसार में से एक रत्न उठादिया । रानी विक्टोरियाके शाशनकी सुकीर्त्ति स्थापन करानेके दोही कारणथे । एक उनकी माता जिन्होंने उनके को- मल अन्तःकरण में समुणोंको स्थानदिया और दूसरे उनके पति राजकुमार एल- बर्ट । प्रौढावस्था में रानीने पतिसे राज्यशासनमें बहुत कुछ सहायताली थी । केवल सहायताही क्यों रानीके नामसे यहीं इंग्लैंडका शासन करते थे। i विंडसरके राजभवनमें रुदनका गगनभेदी शब्द होने लगा। रानीके शोकाश्रुने मजाके हृदय विदीर्ण करडाले । पति वियोगमें भारतकी आदर्श नारियां सती होती हैं। इंग्लैंड की यहचाल नहीं है परन्तु इसमें यह न समझना चाहिये कि वहां की<noinclude></noinclude> 7a955y7b58qhgg7r2j2f6zobersnxkw पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२२ 250 194645 665249 2026-07-06T15:02:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665249 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मथम भाग । (१०५) रमणियों में पतिभक्ति नहीं है। रानी पतिभक्तिकी मानों मूर्तिथीं। मजोषकारके लिये उन्होंने शरीर रक्खा और इसी कारण वह पति सहगामिनी हुई। इतना होनेपर भी उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़गया। पतिकी मृत्युके साथी रानी के लिये चिन्तापढ़ी और मजाने उनको इस शोकका बोझा हलका करनेके लिये विंडसर छोड़नेकी सम्मति दी परंतु एक परम साध्वी रमणीसे ऐसे दुर्घट समय में इस प्रकारका दुःसाहस क्यों कर हो सकता है पतिके मरणका घाव हृदय पर लगतेही श्रीम- ताक पितृवियोगसे पीडित हुए और इसी पीडामें उनको व्यरने आदवाया इसलिये लाचार होकर रानीको आपने जाना पड़ा। राजकुमार एलवर्टकी समाधि राजमाता केंटके निकट तैयार हुई । २३ दिसंबरको राज्ञीपति शपकी सवारी निकाली गई। साथ राज्यके मुख्य २ अधिकारियोंके सिवाय छः घोड़ोंकी गाड़ी में श्रीमतीका राज मुकुट लेकर अर्ल आफू स्पेन्सर और राजदंड, तलवार और टोपी लेकर लार्ड ज्यान लिनोक्स गये । दाय छः घौड़की गाड़ी में रखा गया । शबके साथ मंत्रिमंडल, ड्यूक आफू कनाट, भूशियां युवराज, बेलजियमके राजकुमार, महाराजा दिलीप सिंह आदि अनेक राजपुरुष थे । गिरजे में पहुँचने बाद प्रार्थना हुई। रानी की ओरसे एक हीरक पुष्पोंका हार और तुर्रे भेंट हुए । शवके निकट युवराज आदि पुत्र इकट्ठे हुए । मिनट २ के अनंतर तो चलाकर राजकुमारका राजसी सत्कार हुआ। सब लोगोंक देखते, जाके शोककी अश्रुधारा बहाते राज्ञीपतिका शरीर भूमि समर्पण किया गया । प्रजावर्गने एक स्वरसे उस समय 'सगुणी राजकुमार' के नामसे पुकार कर हृदयका दुःख हलका किया । अध्याय ३८. राज्ञीपतिका शासनान्त | मैंने इस पुस्तक में अब तक राज्ञीपतिको 'राजकुमार' के नामसे लिखा है । यह शब्द उनके नामके साथ अधिक व्याप्त था किन्तु राजकुमार केवल राशी- पात अर्थात् रानी विक्टेरियाक पति ही नहीं थे किन्तु रानीके साथ ही वह ब्रिटिश राज्यके भी स्वामी थे। विवाहसे थोड़े दिन बाद उन्होंने लिखाया कि मैं पतितो हूँ किन्तु गृह स्वामी नहीं हूं। " घरमें अपबंध नौकरोंकी स्वतंत्रता और रानीके प्रबंध में हाथ डालना उचित न समझ कर उन्होंने ऐसा लिखदिया था परंतु थोड़ेही कालमें उनकी प्रियतमाने उनकी यह वृत्ति बदलदी। वह प्रत्येक राजका- में पतिकी सम्मतिसे काम करने लगीं और उन्होंने इस विषयमें अपने मातुल<noinclude></noinclude> jlvec83vtwznq3exq0p5lbi2e8bkm0v पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२३ 250 194646 665250 2026-07-06T15:03:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665250 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१०६) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । को जो पत्र लिखा वही इस बातका प्रमाण है। मातुलके नाम का पत्र प्रिय पाठक अध्याय १९ में पढ़ आये हैं। इसके दो एक प्रमाण नांचे लिखे हैं । इनकी मृत्युसे श्रीमतीने एक बहुमूल्य मंत्री और सहायक तथा प्रजाने सचे और परमार्थी मालिकको खोदिया। सन् १८४७ ई० के जुलाई मासमें बेलजियम नरेश श्रीमती के मातुल राजा लियोपोल्डकी पुत्री के विवाह में कार्यवश श्रीमती नहीं नासकी थीं। उससमय आपने अपने पतिको अपनी जगह भेजकर लिखाया कि- " आपके साथ मेरा स्नेह कितना है इसकी जांच इसीमें समझिये कि मैंने अपने सर्वश्रेष्ठ प्यारे एलबर्ट को आग्रह पूर्वक मेजा । उनकी अनुपस्थिति में मुझे बहुतही दुःखहोता है । इतने अधिक बालवचे होते हुएभी मुझे उनके विना सुहाता नहीं है । उनके बिना मानो मेरे घरका प्रकाशही बुतगया है ।" प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ मिस्टर सी विलने अपनी पुस्तकमें लिखा है कि- "प्रिंस एलबर्ट मानो स्वयं राजा होगये हैं। उन्हें काम करना बहुत पसन्द है । रानी चाहे रानीकी उपाधिधारण करती हैं परन्तु शासनतो वास्तवमें राजकुमार एलर्ट का है। सब प्रकार से वही इंग्लैंड के राजा हैं।” उनकी मृत्युके बाद सक्सनके राजदूतसे भरे दरबार में इंग्लैंडके प्रधान अमात्य मिस्टर डिसराइली ( लार्ड बीकान्स फील्ड) ने स्पष्ट कहा था कि- "प्रिंसएलबर्ट के साथ मानो हमने इंग्लैंड के राजा को समाधि देदी । इस जर्मन राजकुमारने अन्य राजाओंकी अपेक्षा हमारे समक्ष अधिक बुद्धिमानी और उत्साहसे इंग्लैंडका शासन किया था। रानीके वह सदा प्राइवेट सेक्रेटरी और प्रधान अमात्य थे । हमारे कईएक वृद्ध पुरुषोंके जीवन समाप्त होने तक यदि वह जीवित रहते तो कंसवेंटिव राज्यमें स्वतंत्रता के स्वत्व किस प्रकार से भोगे जा सकते हैं उन्हें दिखला देते । और जो युवा पुरुष मंत्रिमंडल में भरतीहुए हैं वे मिसके अनुसार प्रसन्नता पूर्वक चलते ।" सन् ५७ के बलवे के समय उन्होंने भारत का जो उपकार किया था उसका उल्लेख अन्यत्र है | अध्याय ३९. दुःख में दया । संसार में राजपाट पुत्र पौत्र वैभव सब कुछ है परन्तु साध्वी पतिव्रता स्त्रीके लिये पतिसे बढ़कर कुछ नहीं है। बालक बालिकाओंके होते हुए श्रीमती को अल्प कालके लिये पति वियोगसे नो कष्ट हुआथा उसका उदाहरण श्रीमती के गत अध्यायमें प्रकाशित पत्रसे विदित होता है । अब श्रीमतीने सदा के लिये प्राणनाथको विदा कर दिया। इस दुःख का अनुमान ही करसकते हैं जिन्हें इसमकारका दुःख भोगना पड़ा है। उन्होंने एक दूसरे पत्र लिखा था कि<noinclude></noinclude> rurgaw23gsc5dayjebx51ay1w8tchtt पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२४ 250 194647 665251 2026-07-06T15:03:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665251 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मथम भाग । ( १०७ ) "हाय ! अब मुझे केवल 'विक्टोरिया' कहकर पुकारने वाला नही रहा । " टस दुःखके समय श्रीमतीका स्वास्थ्य बहुत बिगड़गया था और उनके जीवन भी संदेह किया जाता था परन्तु जिस समय १६ जनवरी सन् ६२६० को पति मरणके एकही मासवाद उन्हें हाटेली परगनेसे एकभयानक दुर्घटना का संवाद मिला वह अपने दुःखको बिलकुल भूलगई । उसदिन उस परगने की एक कोयले की खानमें एकाएक अनि लगगई। इस बडवानलने २०४ मनुष्योंका स्वाह करदिया । दो सौ चार मनुष्यों के जीते जल जानेकी खबर पाकर श्रीमतीका हृदय विदीर्ण होगया । आपने आस्वन के राजभवनमेंसे खान वालों को तारदिया "कोयले की खानमें जल भरने वाले दीन मनुष्यों के बचनेकी यदि आशा हो तो इससे बढ़कर मुझे कोई हर्ष न होगा। टन दीनोंके लिये मेरा शरीर जलता है ।” श्रीमतीको आशा फलवती न हुई और विचारे दीन मजदूर दम घुट कर मरगये। इसके बाद राजधानीमें इस दुर्घटनापर शोक प्रकाशित करनेके लिये एक महती समाहुई उसके सभापतिके नाम आपने लिखवाया:- " श्रीमती अपने ऊपर भारी कष्ट पड़ने पर भी हार्टलीकी प्राणघातक दुर्घटना पर बहुतही ध्यान देती रही और अंततक उन्हें आशा थी कि दीन मजदूरो में से कितनेही जीवित निकल सकेंगे परन्तु उनकी आशा निरर्थकगई। इसबात से श्रीमतीको बड़ा दुःख हुआ । श्रीमतीने मुझको आज्ञादी है कि दोन विषयाओं और माताओंकी और वह बहुतही सहानुभूति रखती हैं। और अपने ऊपर जो आपत्ति आपड़ी है वह टससे भी बढ़कर इस दुःखको समझती हैं। उनको आशा कि इन लोगोंके संकट टालनेके लिये जो उपाय किये जायगे उनमें संयुक्त होनेसे उन्हें संतोष और हर्षहोगा " यह पत्र श्रीमतीके प्राइवेट सेक्रेटरीकी ओरसे लिखागया था। इसके साथ श्रीमतीने १०० पौंडअपने निजखर्च मेंसे भेजे। इसका इतना प्रभाव पड़ा कि आग में जलकर मरजाने वालेकि कुटुंबकी रक्षाके लिये जो फंड इकट्ठा हुआ उसमें ८१ हजार पौंड आये ॥ अध्याय ४०. वैधव्यका दुःख । कमललोचनी, मृदुभाषिणी रामविक्टोरियाने पतिके स्वर्गवास पीछे शोक व्रत धारण किया। उनका मुखकमल सूर्यास्तसे मुरझा गया, आंखो से जलक स्रोत बहने लगा, प्राणेश विना शरीर पीला पड़गया, मस्तिष्क शून्य होनेसे काम में अव्यवस्था होने लगी, और इसी कारण अपने दुःखसे मजाको दुःखित देखकर उन्होंने अपने शोक परित्यागका संकल्प किया परंतु मेरा प्यारा एलवर्ट" उनके हृदयमें से न हटा ||<noinclude></noinclude> 1waan64g421x24b2e4h24c3wdepcmde पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२५ 250 194648 665252 2026-07-06T15:03:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665252 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१०८) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । पति वियोग में सहानुभूति प्रकाशित करने श्रीमतीकें पास बेलजियमका राजा लियोपोल्ड और जर्मनीके कुमार होलिनलोही आस्वर्न आये । इन्होंने रानीको बहुत कुछ बोधदिया परंतु यह असाधारण कष्ट था। एक दोदिनके समझाने बुझानेसे इसका दुःख दूर होना संभव नथा । दोहीमास बाद युवराजने पूर्व देशकी यात्रा की । अब माताका आश्वासन करनेके लिये उन के पास केवल राज कुमारी एलिस और विट्रिस रहगई। १ जुलाईको किसी प्रकारकी धूमधाम बिना राजकु- मारी एलिसका विवाह करना पड़ा क्योंकि वह घर योग्य होगईथीं और उनके विवाहका समय अब टल नहीं सकताथा | इसवर्षकी १ सितंबरको लेकनमें युवराज ( प्रिंसआफवेल्स ) की अपनी भावी मियतमा डेनमार्कके राजाकी राजकुमारी परमसुंदरी एलेकजेंड्रा से प्रथम भेंट हुई। यहांकी बातचीतमें विवाह निश्रयहुआ || फागमोरके मैदान में समाधि तैयार होजानेपर राज्ञीपति एलबर्टकी अस्थि सेंट ज्यार्जके गिरने से निकालकर समाधिमें लाईगई। यह समाधिस्थल बड़ादर्शनी- यहै । बीचमें मुसलमानोंके मकबरे के ढंगकी समाधि और उसके चारों ओर हरित कुन है | समाधिक भीतर एबर्डीनका संगमर्मर लगाया गया है और उसके ऊपर तांबेकी छतहै। इसके ऊपर सुवर्णका क्रूस चढ़ाया गया है । समार्थिक- ऊपर राजकुमार एलबर्टकी श्वेत पाषाणकी मूर्तिहै। समाधिको देखकर शृंगार प्रिय लोगों के चित्तमें प्रेमका और वैराग्य मिय लोगों के मनपर विरागका चित्र खिंचता है | इससमाधि स्थल में लेटिन भाषाका एक लेख अंकित है । इसमें लिखा है कि- " वियोगिनी विधवा रानी विक्टोरियाने मिय पति प्रिंस एलबर्टके शरीर के यावत् नश्यमान पदार्थ यहां रखवाये । यहीं पर वहभी अन्तमें प्रियपतिके साथ सुखकी निद्रालेगी ॥" एलबर्टके वार्षिक श्राद्धके लगभग सदरलैंडकी डचेज्ने रानीके पास एक बाइविलमेंट में भेजी । यह भेंट इंग्लैंडकी अनेक राजभक्त विधवाओंकी और सेथी । श्रीमतीने भेंट स्वीकारकर डचेजको एक पत्रमें लिखा कि-" राजभक्त विधवाओंकी ओरसे सहानुभूति सूचक पत्रके साथ भेंटपाकर मेरे हृदयमें प्रेम उत्पन्न हुआहै । कृपापूर्वक विधवा रानीकी ओरसे विधवा बहनों को इस सहानु- भूति लिये धन्यवाद दीजिये । यद्यपि इस संसार में अब माणनाथके दर्शन दुर्लभ हैं परंतु मृत्युके अनन्तर सदाकी भेंटका विचार करनेसे मुझे परम संतोषहै । उन् 'अनेक विधवाओं' को ईश्वर शांति और सहायतादे यही चूर्ण हृदया रानीकी हार्दिक मार्थना है।"<noinclude></noinclude> 0tontop7jrd02bhb36u2u3t6gomw0ud पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२६ 250 194649 665253 2026-07-06T15:03:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665253 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । युवराज (प्रिंस आफ्वेल्स ) ( १०९ )<noinclude></noinclude> tgs20eic8uduhjsnv624zla4djmvp38 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२७ 250 194650 665254 2026-07-06T15:03:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665254 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२८ 250 194651 665255 2026-07-06T15:03:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665255 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । युवराजपत्नी एलेक्ज़ेड्रिना । ( १११ )<noinclude></noinclude> tpzu2o91ufzjld59rrrh9h7wf275e44 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१२९ 250 194652 665256 2026-07-06T15:04:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665256 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३० 250 194653 665257 2026-07-06T15:04:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665257 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( ११३ ) अध्याय ४१ : युवराजका विवाह और श्रीमतीकीयात्रा । ७ मार्चको जब श्रीमान् युवराजकी दुलहिन डेनमार्क जैसे दूरदेशसे चलकर लंडनमें आई लंडनही क्या बरन इंग्लैंडभर में हर्षकी दुंदुभी बजने लगी । राजकु- मारी एलेक्जेंड्राके साथ उनके माता पिता भाई और बहन थे । युवराजने राज- कुमारीका स्वागत किया और दोनों साथ २ लंडनमें फिरने के लिये निकले। नगरवासियोंने हर्षगर्जनासे इस भावी जोड़ी का स्वागत किया। रानीने मिलते समय पुत्री के समानप्रेम किया । १० मार्च सन् १८६३ ई० को विवाह स्थिर हुआ। उस दिन सेंटनेम्सके गिर पड़ी धूमधामसे तैयारी हुई। रानी पुत्रका विवाद देखनेके लिये आई तो सही परंतु शोकसूचक वस्त्र पहने हुए आकर विवाहमण्डप से बहुत दूर बैठ गई । विवाहके अनन्तर वरवधू सुहागरातके लिये आस्चर्नमें जाकर बसे । विवाहकी रात्रिमें लण्डन नगर में रोशनी कीगई थी। इसकी शोभा देखनेके लिये बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई इस भीड़में कुचलकर छः मनुष्योंके माण गये । इसी वर्ष में राजकुमारी एलिसके पुत्रका जन्म हुआ । एकान्तवाससे श्रीमतीकै शोकमें न्यूनता न हुई और वारम्वार पतिके स्मरणसे उनका हृदय अधिक दुःखित रहनेलगा इसलिये श्रीमतीने जर्मनी और बेलाने- यमकी यात्राकी । इन्होंने बेलजियमके राजाको साथ लेकर प्रथम पति एलबर्ट की जन्मभूमि ऐसेन्यूको गमन किया । पतिका जन्मस्थान देखतेही रानीको पुरानी बात स्मरण होआई और बहुत देर तक श्रीमती रोती रहीं । ७ सित- परको यात्रा से लौटकर आपने इंग्लैंडके बालमोरल स्थानमें अपनी पूंनीसे पति के स्मारकमै एक स्तम्भ बनवाया। यह स्तम्भ त्रिशंकुकै आकारका बहुआ है । इसपर श्रीमती लिखवायाः- “महाशय और पुण्यशाली अतिवल्लभ राज्ञी- पति एलमटके स्मरणार्थ उनकी विदीर्णहृदया विधवा रानीने बनवाया, अगस्त २१ सन् १८६२६० " || ७ अक्टूबरको राजकुमारी एलिस और हेलेनाको लेकर रानीने स्काटलैंडकी यात्राकी । एलथ नाग्युचेस्क में श्रीमती वायु सेवनके लिये गईथीं। दो मील तक अन्धकारमें चलने बाद गाड़ी एकाएक उलट गई। सवारियां नीचे गिरीं । श्रीमती सुख और हाथ में चोट आई। दोनों घोड़े ईश्वरने सब लोगोंके माण बचाये ॥ उल्टे गिरगये । परंतु<noinclude></noinclude> 2l9m0uq5h4xuoi97llhthjueslp7ohv पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३१ 250 194654 665258 2026-07-06T15:04:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665258 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अध्याय ४२. पौत्रका जन्म और शोक मुक्त रानी । ८ जनवरी सन् १८६४ ई० को युवराज ( प्रिंस आफू वेल्स ) के पुत्रका जन्म हुआ। यह प्रसव अकस्मात् हो पड़ा। जन्म के समय न कोई दाई पास थी और न दासी । सब लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ । श्रीमतीको पौत्र जन्मसे अ- ती हर्ष हुआ । आपने राजकुमारका नाम एलबर्ट विक्टर रक्खा । इसी दिन - से पतिशोक कम हुआ और राजकीय धूम धाम, जो तीन वर्ष तक बन्द रहाथा, फिर प्रचलित हुआ । इसके अनंतर राजकुमारी हेलेनाका राजकुमार क्रिश्चि- यनके साथ विवाह हुआ । अब एकान्त वास छोड़कर श्रीमतीकी इच्छा प्रकाश रूप पर राजकीय काम करनेकी हुई । पतिमरणके अनन्तर पार्लियामेंट संबंधी काम काज श्रीमतीने परोक्ष रीतिसे किया था किन्तु सन् १८६६ ई० की १६ फरवरीको प्रजाका अधिक आग्रह देखकर श्रीमतीने स्वयं पार्लियामेंट खोली। इस समय यह उत्सव सदा- की अपेक्षा अधिक धूम धामसे किया गया किन्तु श्रीमतीने अपने शोकसूचक वस्त्रोंका त्याग न किया । और निसासे डालती हुई सिंहासन पर विराज कर- पुत्र बधूसे हाथ मिलानेके सिवाय किसीसे बात चीत नकी । इस वर्षके अक्टूबर मासमें एबर्डीन नगर में पानीके नल लगानेके लिये जो काम तैयार हुआ उसके उत्सबमें श्रीमती उपस्थित हुई। इस उत्सव पर श्रीमतीने पति वियोगके बाद प्रथम ही व्याख्यान दिया। आपके मुखके सारगर्भित, प्रेम भरे वाक्य सुनकर प्रजाको अधिक हर्ष हुआ । हृदयसे पतिका शोक हलका करनेके लिये श्रीमतीने पतिका चरित्र लिखनेका कार्य लेफ्टिनेंट जनरल सीमेको सौंपाथा । पुस्तक लिखनेका कार्य उन्होंने इसी वर्ष समाप्त किया । श्रीमतीने इसकी रचना में बड़ा उत्साह दिखाया और अ- पने याद की सारी बातें ग्रंथकारको लिखवादीं । स्विट्ज़रलैंडकी यात्रासे लौटकर जब आपने विंडसर महलमें निवास किया तब एक दिन आप वायु सेवन करतीं २ एक घनवासिनी झोंपडमें जा पहुंची। उसके पास बैठकर आपने धर्मका उपदेश दिया। इस घटना से ब्रिटिश प्रजाके हृदय में विश्वास दृढ होगया कि श्रीमती गर्व छोड़कर अमीर गरीबको समान गिनने वालीं । इसीवर्ष में राजकुमारी लुसीका मार्किस आफू कोर्नसे विवाह ठहरा। इसविषयमें श्रीमतीने अपनी दिनचर्या में लिखा है “बाहर से<noinclude></noinclude> 1a0qsibi2e6kig3otu8cy6rog97q3ay पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३२ 250 194655 665259 2026-07-06T15:04:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665259 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( ११५ ) फिरकर जब मैं सातबजे घर पहुंची तब डरती२ सी मेरे पास आई। उसने शिर नीचा किये हुए लज्जित होकर मुझसे कहा कि आज लोनेंने मुझपर बड़ाप्यार दिखलाया और मुझसे विवाहकी बातचीत की। मैंने इस आशासे 'हां' कह दिया कि आप इस बात को स्वीकार करलोगी। " श्रीमतीने इस बातको स्वीकार किया । सन् १८७१ ३० की २१ मार्चको इनका विवाह हुआ। इसके बाद अपरेल मासमें श्रीमतीने राजधानी में फ्रांस के पदच्युत राजा नेपोलियनसे भेंटकर उनका बड़ा सत्कार किया | अध्याय ४३. युवराजकी बीमारी । २५ नवंबर सन् १८७१ ई० को अकस्मात् युवराज (प्रिंसआफूवेल्स) को पर पीडा हुई । राजकुमारी वियट्रिसन भाईकी नही सेवा की । बीमारीकी खबर । पातेही राज्यभर में खलभली मचगई। ८ दिसंगरको रोगने अधिक पळ पकड़ा । प्रजाकी बेचनीका ठिकाना न रहा। घड़ी २ आरोग्य होनेके समाचारोंकी लोग राह देखने लगे । १० दिसंबर को राज्यभरके गिरजों और मन्दिरमेिं ईश्वर प्रार्थना की गई । १४ दिसंबर को रोग औरभी बढ़गया परन्तु फिर ईश्वर कृपासे शनैः २ आरोग्यहुआ और प्रजाकी सहानुभूतिका श्रीमतीने एक विशेष आज्ञापत्र में प्रेम पूर्वक उत्तर दिया । उसमें लिखाया कि:- "मेरे प्राणमिय युवराज ( प्रिंस आफ वेल्स ) की बीमारीमें प्रजाने जैसी सहानुभूति प्रकाशित की है और उसकी आरोग्यता चाहीँ उससे मेरा बड़ा उपकार हुआ। समस्त प्रजा और मेरी मिपुत्रियोंने इस भयानक और दयाजनक स्थिति में जैसी दया युवराज के लिये दिखाई है वह उसके हृदयमें सदा अंकित रहेगी। यह बात नई नहीं है । दशवर्ष पूर्व मेरे चतुर प्राणनाथकी बीमारीके अवसर परभी प्रजाने ऐसीही राज- भक्ति और प्रेम प्रदर्शित किया था। जिसके लिये मैं धन्यवाद देतीहूं। मैं अपने पुत्रकी ओरसे प्रजाका उपकार मानकर आशा करती हूं कि युवराजकी संपूर्ण आरोग्यता के लिये प्रजा ईश्वरसे प्रार्थना करेगी।” युवराजके आरोग्यहोंने पर २७ फरवरीको लंडन में एक त्योहार मनाया गयाथा। उसदिन सेंटपालके गिरजे मैं बड़ी धूमधामसे परमेश्वरकी प्रार्थना कीगई । श्रीमती भी उस समय अपने कुटुम्ब सहित उपस्थित हुई। इस उत्सव पर अनुमान तेरह हज़ार मनुष्योंसे गिरजा खचाखच भरगया था ॥ .<noinclude></noinclude> a2b8jhc73z0c4bcccp06ws390mj698b पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३३ 250 194656 665260 2026-07-06T15:04:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665260 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । दो दिन बाद श्रीमती सायंकालको वायुसेवनके लिये गईथा। लतामण्डपमें से एक लड़का एक हाथमें पत्र और दूसरे में पिस्तोल लेकर निकला । और लपक कर गाड़ी पर चढ़आया । श्रीमती स्थानसे विचलित न हुई। लड़का उसी समय पकड़ लिया गया। उसके पास एक पत्र था जिसमें एक राजद्रोही कैदीको छोड़ देनेकी प्रार्थना थी । इस लड़केका नाम आर्थर ओकोनर था । लड़केको न्याया- लयसे एक वर्षका जेल और बैतका दंड मिला । सन् १८७४ई० की २३ जनवरी को ड्यूक आफू एडिनवरा रूसके सम्राट्की राजपुत्रीसे विवाहकर लण्डन आये । इस वर्ष जून मासमें श्रीमतीने पशु पक्षियोंपर दयाकर उनके कष्ट मिटानेवाली मण्डलीकी ज्यूविली में संयुक्त होकर इस दयामय कार्यकी उत्तेजनादी । इसी वर्ष के अक्टूबर मासमें श्रीमतीके सेवक जान ब्राउनका पिता मरगया । रानी उसके शवसंस्कार में पैदल चलकर स्मशान तक गई । अध्याय ४४. अनेक घटनायें । सन् १८७८ ई० में स्काटलैंडकी यात्रासे लौटने बाद श्रीमतीको टैम्स नदी में वूलविच के निकट दो जहाजोंके टकराकर डूबजानेके समाचार मिल । इसमें छः सौ मनुष्य जलमग्न हो गये । इस घटना से श्रीमतीको बड़ा दुःख हुआ । इस वर्ष में आपने राजकुमारी लुसीके पति मार्किस आफू लार्नको केनेडाका गवर्नर जन- रल बनाया । श्रीमती शासन में राजकुटुम्ब के लोगोंको सेनाके सिवाय प्रबन्ध विभागका उच्चपद देने का यह प्रथम और अन्तिम अवसर था क्योंकि इनके सिवाय कोई राजपुरुष अबतक कहींका गवर्नर अथवा गवर्नर जनरल नहीं हुआ । सन् ७९ ई० की जनवरी में एडवर्ड बेंजामिन नामक पागलने श्रीमतीपर गोली चलाने की धमकी दी। सन् ८२३० की १ मार्चको रोजर मेकलीने विंडसर स्टेशन पर श्रीमतीको गोली मारी। श्रीमती ईश्वर कृपासे बचगई । १४ मार्चको ड्यूक आफू एलवनीका विवाह हुआ। सन् ८३ में अकस्मात् श्रीमती महल में फिरते २ गिर गई। पैर में चोट ऐसी आई जिससे आपको एक वर्ष तक वेदना भो- गनी पड़ी ॥ सन् १८८१ ई० के अपरेल मासमें इंग्लैंडके प्रधान अमात्य राजनीति कुशल लार्ड बीकान्सफील्डका देहान्त हो गया। यह बडे चतुर, विद्वान्, साहसी और सज्जनथे । दीनस्थिति से बढ़ते २ राज्यके दीवान हुएथे । रानीका इनपर बड़ास्नेहथा इस<noinclude></noinclude> 2gh5d7qvymuwnyfb0obrs4xmadcshml पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३४ 250 194657 665261 2026-07-06T15:05:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665261 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मंथम भाग । ( ११७ ) लिये श्रीमतीने इनके स्मारकमें एक स्तंभ बनवाया। इसके शिलालेख में लिखवाया कि- "लार्ड बीकान्सफील्डकी सम्मानिनीया और स्नेही रानी विक्टोरियाने उनक सम्मान में यह स्तंभ खड़ाकिया । यह सत्यभाषी और राजसेवी थे।" सन् ८५ की २३ जुलाईको श्रीमतीकी सबसे छोटी पुत्री कुमारी थियेट्रिसका राजकुमार हेनरी आफू बेटनवर्गसे विवाह हुआ || अध्याय ४५. महारानीकी संततिकी मृत्यु | यद्यपि माता और पतिक मरणसे श्रीमतीको बहुत दुःख हुआथा और यह दुःख श्रीमती साथही गया परंतु सन् १८७८ ई० तक आप अपनी संततिके सुख से सदा सुखी रहती। इसमें श्रीमतीको दुलारी कन्या राजकुमारी एलिसको डोरमेस्टर के राजमहल में संग्रहणीकी बीमारीहुई । साथही न्यरने आधेरा । कुमारी एलिस श्रीमतीकी सत्र संतानोंमें स्वभावकी अच्छी, परिश्रमी और दयालुथी । राजकुटुंबमें किसीके बीमार होतेही वह आगे पड़कर उसकी सेवा कियाकरत और उनकी दयालु प्रकृतिको देखकर लोगोंकी उनपर अधिक पूज्यबुद्धियी । राजकुमारीकी बीमारीसे प्रजाको बहुत चिन्ता हुई। अकस्मात् सन्निपात होगया। प्रलाप में बड़बड़ाने लगीं । और मरने पूर्व कहा कि:-" अय में शान्त निद्रा में दीर्घ कालके लिये शयन करतीं हूं ।” पिताकी मृत्युकी सतरहवीं बरसीको राजकुमारीका देहान्त होगया। इनकी मृत्युसे रानी, राजकुटुंब और मजाको बहुत शोकहुआ । दुःपर दुःख पडता है । पुत्रीकी मृत्युका बाद अभी पुरनेका समय नहीं आया था इतनेही में श्रीमतीपर दूसरी आपत्ति आई । अंतिम पुत्र माताको अधिक मिय होता है । श्रीमतीको डयूक आफ एलबनी पर विशेष प्रीतिथी । वह स्वभावके कोमलथे । शारीरिक बलके कामोंमें वह अधिक परिश्रम करने योग्य न थे। उनको विद्यासे बड़ी मीतिथी । वह एकान्त में रहना अधिक पसंद करते थे। वह साहित्यके बड़े प्रेमी और व्याख्यान उनका बड़ाछटादार होताथा। उनके एकही कन्या थी । इनका नाम एलिसा | सन् १८८४ ई० के मार्चकी२७ तारीख़ को इनके पैर में गहरी चोटआई और दूसरेही दिन केन्स स्थानमें मृत्यु शहुए। यह खबर तारद्वारा राजधा- नीमें पहुंची। माता और पत्निके शोक की सीमा न रही। श्रीमतीने विंडसरसे मयाणकर क्लैमटमें अपनी पुत्रवधूके शोकमें सहानुभूति की । ५ अपरेलको<noinclude></noinclude> 1vklxl23fzc00g9b0whgk37ild01qcx पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३५ 250 194658 665262 2026-07-06T15:05:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665262 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११८ ) महारानी विक्टोरियाका चरिः अष्टे क्रिया हुई । युवराज केन्स जाकर भाईका शव लडन लाय मातान अंतिम बार पुत्रके मुखका गिरने में अवलोकन किया । अश्रुपातसे राजकुटुंब के कपड़े भीग गये थे | महारानीके हृदयपर पुत्रशोकका वचपात् हुआ । मिट्टी में मिट्टी मिल गई || श्रीमती दुःखका यहीं पर अंत नहुआ। सन् १८८८६० के अपेरेलमें एकाएक श्रीमती प्रथम राजकुमारीके पति जर्मनी के सम्राट् श्रीमान फ्रेडरिककी बीमारी के समाचार विदित हुए । श्रीमतीको इसवातसे बड़ी चिन्ता हुई । मई और जून मासमें रोग कम होगया । परन्तु १४ जूनको फिर समाचार मिले कि फेफडोंका शोथ बहुत बढ़ गयाहै । १५ जूनको दिनके ११ बजे श्रीमान्‌का देहान्तहोगया | इस समय इनका वय ५७ वर्षका था। इन्होंने केवल ९९ दिन राज्य किया । इनकी मृत्युके अनंतर इनके बड़े पुत्र सम्राट् द्वितीय विलियमको जर्मनीका राज्य मिला । १८ जूनको पार्लियामेंटकी दोनों सभाओंने मिलकर महारानी विक्टोरिया और उनकी बड़ी राजकुमारी ( मृत सम्राट्की मियपनी ) के साथ बहुतही प्रभावोत्पादक और हृदयद्रावक शब्दोंमें सहानुभूति और शोक प्रकशितं किया । और इस व्याख्यानमें उनके गुणोंका वर्णन किया || श्रीमतीके हृदयपर चौथा आघात उनके मिय पौत्र ड्यूक आफ कोरंसकी मृत्युसे, जो भारतमें प्रिंस एलबर्ट विक्टर के नामसे प्रसिद्ध, पहुंचा। भारतवर्षकी यात्रा में आनन्द प्रमोद और प्रजाके प्रेम और भक्तिका अनुभव प्राप्त करने बाद प्रिंस एलबर्ट विक्टरको विलायत में पहुंचे अधिक काल नहीं होने पायाथा इतनेही में एकाएक उन्हें९ जनवरी सन्९२६० को सरदी लगगई। सरदीने इतना बलपकड़ा कि तुरंतही उन्हें इन्फ्ल्यूऐना हुआ। उन दिनों में इस रोगने राजधानीमें ने के समान मारकता ग्रहण कररक्खी थी। डाक्टर पर डाक्टर आये 'रत्नोंका जतन ' करने के लिये अच्छी तरह उपाय कियागया । खूब दौड़ धूपहुई । परन्तु बीमार होनेसे छठे दिन अर्थात १४ जनवरी को आपने श्रीमतीको, अपने माता पिता, भाई और राजकुटुंबको शोकसागर में डालकर स्वर्गकी यात्राकी। इससे कुछड़ी सप्ताह बाद श्रीमान् का विवाह टेककी राजकुमारीसे होना निश्चय हो चुकाथा परंतु कालने यह अवसर न आने दिया । उनकी मृत्युसे ब्रिटिश साम्रान की संपूर्ण प्रजाको शोक हुआ । भारतकी मजा उनके दर्शन करचुकीथी इसलिये उसे अधिक शोक हुआ और श्रीमतीकै अन्यान्य दुःखोंकी अपेक्षा भारत वासियोंने विशेष रूप पर शोक प्रकाशित किया। राजकुमारकी समाधिके दिन युवराज ( प्रिंस आफू वेल्स) ने एक पत्र प्रकाशित किया:-" ग्रेट ब्रिटेन, आयलैंड,<noinclude></noinclude> ra25n8jl5a4xwk9mvew9f1ln3qf67it पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३६ 250 194659 665263 2026-07-06T15:05:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665263 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. प्रथम भाग । ( ११९ ) उपनिवेशों और भारत वर्षकी श्रीमतीको प्रजाने हमारे प्रिय ज्येष्ठ पुत्रकी मृत्युके समय हम पर जो आपसि पड़ी उसमें सार्वजनिक सहानुभूति प्रकाशित कर हमें उपकृत किया इसलिये हम उसे धन्यवाद देतेहैं। यदि ऐसे भवसरमें सहा- नुभूति से चित्तको विश्राम मिलता हो तो हमारे दुःखित हृदयमें हमारे शोकमें उन- का भागी होना हमें सदा स्मरणीय होगा और यदि संभव होगा तो इस बातका स्मरणही उन्हें अपने मिय राज्यका प्रेम भाजन करेगा।" इसी तरह २७ जन- वरी के लंडन और भारत वर्षके सरकारी गजटमें श्रीमती महारानी एक पत्र प्रकाशित हुआ जिसमें लिखाया कि:-"मुझ पर, मेरे कुटुंब और जातिपर एक मारके सिवाय ऐसी दुःखदायिनी और हृदय विदारक आपदा पहले कभी नहीं आई थीं। इस समय मेरे साम्राज्यके प्रत्येक विभागकी प्रजाने हार्दिक सहानु- भूति और राजभक्ति प्रकाशितकी उसे में स्वीकार करती हूं। मेरा प्रिय पौत्र अचानक कली फूलने पूर्वी अलग होगया । यह बड़ा शिष्ट, होनहार और सर्व मिथा। उसकी मृत्यु दुःखको उसके दुःखिया माता पिता, उसकी प्यारी दुलहिन, और उसकी दादी ईश्वरकी अनिर्वाय इच्छा पर छोड़ती है। लाखों मनुष्योंकी हार्दिक और सभी सहानुभूतिके लिये, जो उन्होंने ऐसे अवसर पर प्रकाशित की में अपनी और अपने बालकोंकी ओरसे, सधे अन्तःकरणसे धन्यवाद देतीहूं । मेरे पौत्रको मैं अपने पुत्रके समान जानती थी और वहभी मुझसे पुत्रकासा वात्स- ल्प रखताया। उसके वियोग में प्रजाकी सहानुभूतिसे मेरे और मेरे कुटुंब दुःखमें बहुत कुछ विश्राम और सहायता मिलेगी । मेरे शासनके अंतिम तीन वर्षमें मुझपर बहुत आपत्तियां आई हैं। चाहे मेरा परिश्रम, चिन्ता, और मेरे पदके अनुसार उत्तर दातृत्व बहुत भारी है परंतु परमेश्वरसे मेरी प्रार्थना है कि वह जबतक मेरा शरीर रहे मेरे देश और साम्राज्यका भला करनेके लिये मुझे शक्ति और स्वास्थ्य प्रदान करें। "- दोही वर्षके बाद राजकुंटुब पर एक आपदा और आई । श्रीमती महा- रानीकी प्रियपुत्री राजकुमारी नियट्रिसके प्रियपति राजकुमार हेनरी आफू बेटन- वर्ग अपनी सेना सहित ६ दिसम्बर सन ९३६० को कुमासी लोगों से युद्ध करने के लिये श्रीमती से विदा हुये, मार्गही में महान 'ब्लोंड' पर केप कोस्ट केसलसे मदीरा जाते हुए उनको एफ्रिकाके माणचाती चरने धर दबाया। दो दिनकी भ्यानक बीमारी में २० जनवरी सन्९४६० को उनका प्रियमाण प्रयाण करगया । २२ जनवरी को तारद्वारा यह शोकजनक सम्बाद लण्डन में पहुँचा। श्रीमती महारानी और उनकी प्रियपुत्रीको इस बातसे बड़ा शोक हुआ । राजकुटुम्बने २३ जनवरीसे ५<noinclude></noinclude> m0k2cwp3voepte5lmrdxis9v6le5juj पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३७ 250 194660 665264 2026-07-06T15:05:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665264 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १२० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । मार्च तक इसका शोक किया । ३ फरवरीको राजकुमार हेनरीका शव इंग्लैंडको लाया गया और वहीं दफनाया गया। इस समयभी महारानीने पौत्रके मृत्युकी तरह प्रजाकी सहानुभूतिका उपकार माना || पांचवर्षतक राज कुटुंब में किसी प्रकारकी आपत्ति न आई। श्रीमती महारानीके अंतिम वर्ष में अर्थात् सन् १९०० ई० में अपने पिताकी जागीर कोवर्ग और गोथामें श्रीमतीके द्वितीयपुत्र ड्यूक आफू एडिनवरात्रा अचानक देहान्त हो- गया। महारानीका जीवन समाप्त होते २ इस आवातने आपको बहुत दुःखित किया और इसके सिवाय ट्रांसवाल युद्धमें एकदौहित्रकी मृत्युका शोक श्रीमतीको अंत समय तक रहा। श्रीमतीकी मृत्युके छः मास बाद सन् १९०१के अगस्त मास में इनकी बड़ी राजकुमारीका देहान्त जर्मनी में होगया || अध्याय ४६. महारानीकी संतति । “बहु कुटुंबी बहु सुखी और बहु कुटुंबी बहुदुःखी " यह कहावत महारानीके विषय में ठीक चरितार्थ होता है। श्रीमती वृहत कुटुंब में पुत्र पौत्र पुत्री पति और माताकी मृत्युसे महारानीको जो शोक हुआ उसका दिग्दर्शन गत अध्यायमें हुआ है श्रीमतीके पुत्र पुत्रियों के जन्म विवाहादिके समाचार इस पुस्तकके भिन्न २ अध्यायों में प्रकाशित होचुके हैं। श्रीमती उदरसे चारपुत्रहुए। युवराज १ ड्यूक आफू एडिनवरा २, डचूक आफू कनाट३ और ड्यूक आफ एलवनी ४ इनमें प्रथमपुत्र आजकल भारतेश्वर श्रीमान् सम्राट् सप्तम एडवर्ड हैं। तृतीयबहुत वर्षोंतक बंबई प्रान्तकी सेना अध्यक्ष रहचुके हैं। द्वितीय और चतुर्थ पुत्रका देहान्त होगया || श्रीमतीकी पांच पुत्रियों में प्रथम राजकुमारी विक्टोरिया आज कलके नर्मन सम्राट् द्वितीय विलियमकी माता थीं । इनके सिवाय चारपुत्रियों में एकका देहान्त होगया । शेष सब विद्यमान हैं। पांचवी कन्या वियेट्रिस विधवा हैं । पांचों कन्या और चारों पुत्रोंके नाम संततिका ब्यौरा विवाहादिका वर्णन इस पुस्तक में वंशवृक्ष छपा है उससे मालूम होगा || श्रीमतीके च पुत्र और पांचपुत्री की कुल ८० संतान में ६६ इससमय विद्यमान हैं। १४ का देहान्त होगया । विद्यमान श्रीमतीके दोपुत्र, ३ कन्यायें, ३ पौत्र, १० पौत्री, ७ दौहित्र, १२ दौहित्री, पौत्र और पौत्रीके पुत्र ३ पुत्री ५ दौहित्री और दौहित्र पुत्र १४ पुत्री ७ हैं ॥<noinclude></noinclude> bnjm9j42jtjvou8t4394q2mxdvcglzf पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३८ 250 194661 665265 2026-07-06T15:05:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665265 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मथम भाग | ( १२१ ) श्रीमतीके बड़े राजकुमार आज कल भारतके सम्राट और ग्रेट ब्रिटेनके राजा सप्तम एडवडें । बड़ी पुत्रीके पुत्र जर्मनीके सम्राट् द्वितीय विलियम हैं । पौत्रीके पुत्र रोमेनियाके भावीराजा राजकुमार केरोल्हें । दौहित्रीको पुत्र मीसको भावीराजा राजकुमार ज्या हैं और दूसरी दौहित्रीकी कन्या राजकुमारी बैंड • अलगी रुसके वर्तम्मन सम्राट जार निकोल्सके पीछे रुसके राज्यासनपर बैठने वाली हैं। इसतरह इस समय श्रीमतीके कुटुंब में पांच राज्यहैं । श्रीमतीकै कुल ८० पुत्र पौत्रादिकोंमेंसे इस समय जो ६६ विद्यमान है, उनमें पुत्री दौहि- कपात और पुत्र पौत्रोंकी पत्रियोंकी गणना नहीं कीगईहै। ईश्वर इस बृहत् कुटुंबको चिरंजीवी करे अध्याय ४७. राजपौत्र और पौत्री के विवाह ! युगराज (सिआफू वेल्स) के द्वितीयपुत्र डयूक आफू यार्क, जिनका नाम राजकुमार व्याजहै, उनके विवाह से श्रीमती शासन में कौटुंबिक अंतिम आनन्द था। डयूक आफ कारेंस से राजकुमारी टेकका विवाह पक्का हुआथा किन्तु विवाह से कुछ सप्ताह पूर्व उनकी अकाल मृत्यु होगई और उन्ही राजकुमारीका संबंध इनसे निश्चय हुआ । यह निवाह ६ जुलाई सन् ९३ को हुआ। विवाहके बाद जिससमय श्रीमान् नवीन दुलहिनको लेकर राजमार्गमें निकले प्रजाको परम हर्ष हुआ। महारानी विक्टोरियाको पति पुत्र पौत्रादिके मरणसे जो दुःख हुआथा उसकी '६ जुलाईको शांतिदुई श्रीमतीके वृहत्जीवनमें आपने अनेकही दुःख और सुख देखे परंतु पौत्रके विवाह से बढ़कर उनके लिये कोई सुख न था। केवल इतना ही नहीं किन्तु श्रीमतीने इस जोडीका फलमी दर्शन कर लिया। श्रीमतीके आगे डयूक आफू यार्कके तीन पुत्र और एक कन्या हुई। श्रीमतीका वह चित्र जो इस अध्या- यमें लगाया गयाहै इस सुखसे दर्शकोंके चित्तको आनन्दित किये बिना नहीं रद्द सकता । यह युद्ध विद्यामै घडी प्रवीण और ब्रिटिश सेनाके एक अध्यक्ष हैं । इनके बड़े पुत्र श्रीमती महारानीके बड़े प्रपौत्र राजकुमार एडवर्ड एलबर्टका जन्म २३ जून सन् १८९४ ई० का है।<noinclude></noinclude> dmfsjz22lmdz6pq9yffd1v979u0rg1o पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१३९ 250 194662 665266 2026-07-06T15:05:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665266 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १२२ ) महारानी विक्टोरिया चरित्र । इसके सिवाय सन् ९६ की जूलाईमें राजकुटुंब में एक और मंगल कार्य हुआ । बकिंगहामके प्राइवेट गिरनेमें युवराज ( प्रिंस आफू वेल्स ) की कुमारी माढका विवाह डेनमार्कक राजकुमार चार्लसके साथ हुआ । दूलहका वय पक्षी- स वर्षका था । यह दुलहिनसे उमरमें दो वर्ष चार मास कम था। दूलह दुलहिन मामा फूफीके भाई बहन हैं। दोनोंहीको बाल वयसे पास खेलनेका काम पड़ाथा । २० जूलाईके शुभ मुहूर्त में महोत्सव हुआ। उस दिन लंडनमें दीपमालिका की गई । विवाह कर दूलह दुलहिनको अपने देश डेनमार्क लेगये । यह<noinclude></noinclude> pef40n6g4fsnvws7ts1rbavf75q6squ पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४० 250 194663 665267 2026-07-06T15:06:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665267 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | राजपौत्र ड्यूक आफू यार्क । ( १२३ )<noinclude></noinclude> 9rgrnxraodwgpa617odt0tlmzowq85e पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४१ 250 194664 665268 2026-07-06T15:06:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665268 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४२ 250 194665 665269 2026-07-06T15:06:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665269 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । राजपौत्र वधू ( १२५ )<noinclude></noinclude> 0jw1ni8qu528zjlolo3mv7nuawcfdvu पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४३ 250 194666 665270 2026-07-06T15:06:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665270 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४४ 250 194667 665271 2026-07-06T15:06:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665271 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | प्रपौत्र प्रपौत्री समेत महारानी । ( १२७ ) राजकुमारी विक्टोरिया आफू पार्क, रामकुमार एलर्ट आफू यार्क राजकुमार हेनरी आफू यार्क महारानी राजकुमार एडवर्ड आफू यॉर्क<noinclude></noinclude> l7lijzc4uxofaf0h08jpbxx45q2tzcw पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४५ 250 194668 665272 2026-07-06T15:06:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665272 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४६ 250 194669 665273 2026-07-06T15:07:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665273 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( १२९ ) अध्याय ४८. युवराजका रौप्य विवाह और इम्पीरियल इन्स्टीट्यूट । यूरोपियन लोगों में विवाहसे पचीस वर्ष बाद रौप्य विवाहके नामसे एक उत्स- व करनेकी चाल है। युवराजके विवाहको १० मार्च सन् ८८ को पचीस वर्ष हुए । यद्यपि जर्मनी सम्राट् श्रीमती महारानीके बढ़े दामाद फ्रेडरिककी मृत्यु का अभी शौक नवीनही था परंतु यह उत्सव किया गया। शोकके कारण उत्स- में विशेष धूम धाम न हुई। मार्लबरो हाउस के जलसे में लंडनकी म्यूनिसिपे- लिटीने युवराज को इम्पीरियल इन्स्टीटयूटका नमूना चाँदी बनवाकर भेट किया। इस उत्सबमें श्रीमती भी उपस्थित हुई । नगरमें उस दिन दिवाली की गई। इसी वर्षकी २१ मार्चको श्रीमतीने इटालीकी । यात्राकी मार्ग में फ्लोरेंस होते हुए आपने इसमें आस्ट्रिया सम्राट्से भेंटकी और पहांसे बर्लिन जाकर दामाद फ्रेडरिकसे ज़ो उस समय तक बीमारये मिलीं। लंडन पहुंचकर सन् ८९ के आरंभ में मटावली लैंड ( एफ्रिका) के राजा लोवेंगुला के दो प्रतिनिधि- योंसे मिलने गाद आपने वसंत ऋतुमें फिर बाल मोरल की कैटेसके भेष में यात्रांके लिये प्रयाणकिया । ७ मार्चसे २७ मार्चतक बियारिजमें निवासकर स्पेन को राजमातासे भेंटकी । इससे पहले इंग्लैंडका राजा या रानी स्पेनको नहीं गयाथा। सन् १८९० ई० में श्रीमतीने फिर चैरंवर्ग होकर एक्सकी यात्राकी || सन् ९३ की १० मईको केन सिंगटनमें श्रीमतीने इम्पीरियल इन्स्टीटयूट खोला । बकिंगहाम से महारानीकी सवारी बड़े ठाटके साथ उक्तस्थानको गई । मार्ग दर्शकोंकी मड़ी भीड़यी। इस नवीन महलके निकट एक मंडप खडाकर उसमें उत्सव किया गयाथा। मंडपमें श्रीमान् इन्दोरनरेश, जोधपुर नरेशके भाई श्रीमान् सर प्रतापसिंहजी और अनेक भारतवासी राजा महाराजा उपस्थित हुएथे । भारत के राजाओंक विलायत गमनका प्रायः यह प्रथमदी अवसर था। महारानीके साथ राजकुटुंनके सब व्यक्ति इकट्ठे हुए थे । इन्स्टीटयूट खोलते समय श्रीमतीने जो व्याख्यान पढ़ा वह उनकी वृद्धावस्था और मंदस्वरके कारण उपस्थित लोगोंके सुनने में नहीं आया। फिर श्रीमतीकी आज्ञासे युवराजने मकानको खोलने की किया की । उत्सव समाप्त होने बाद जब श्रीमती वहांसे चलने लगीं तब चलते २ भारतवासी राजाओंके पास खड़ीं रहकर आपने सबसे हाथ मिलाया और प्रत्येक का कुशलप किया। इसके सिवाय श्रीमतीने कृपाकर देशी राजाओंको राजमासा- दमें पृथक् २ मिलनेकाभी अवसर दिया और उनसे सत्कार पूर्वक बातचीत कर उन्हें प्रसन्न किया ||<noinclude></noinclude> iyvco7gkow3dza8ydtbiod5koqo6x8c पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४७ 250 194670 665274 2026-07-06T15:07:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665274 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १३० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । इसी वर्षकी २६ नवंबरको रूसके ज़ार द्वितीय निकोलससे श्रीमतीकी कुमारी एलिसकी पुत्री एलेक्जेंट्राका विवाह सेंटपीटर्सवर्ग में हुआ। इस हर्षमें महारानी ने राजधानी में उत्सव किया और नवीन जारको ब्रिटिश सेनाका कर्नल बनाया ॥ सन् ९५ की फरवरी में जर्मनीका एलब' नामक जहाज ४०० मनुष्यों सहित लोस्टोफ्टके निकट समुद्र में डूबगया। केवल एकही स्त्री तैर कर बच्ची । उसका नाम मिस वाकरथा । श्रीमतीने उसके मुखसे इस दुर्घटना का वर्णन सुननेके लिये उसे बुलवाया। और ४०० मनुष्योंकी मृत्युकै समयकी हड़बड़ी और दया- जनक स्थिति सुनकर आपका हृदय भरआया। आँखोंमेंसे आँसू बहने लगे || नवंबर में श्रीमतीने इंग्लैंड में पुर्तगालके राजा और वेचुआनालैंडके राजा खामा का स्वागत किया । खामाने श्रीमतीको शेरके चमडेके वस्त्र भेंट किये ॥ सन् ९६ में आपने नाइसके निकट सीमिज का निरीक्षण करनेके लिये यात्रा की । ९ मार्चको श्रीमती सीमिज पहुंचीं । १३ को आपसे आस्ट्रिया के सम्राट् मिलने आये । सीमिनमें कुछ काल पूर्व पहाड़ गिर गया था। इसीको देखने श्रीमती गई थीं। अध्याय ४९. प्रजा प्रेम । महारानी विक्टोरिया का प्रजाके साथ माताके समान प्रेम था और उनकी प्रजा उन्हें इसी भावसे देखती थी। श्रीमती के पति, पुत्री, पुत्र, पौत्र और दामाद की मृत्यपर ब्रिटिश साम्राज्य भर की प्रजाने शोकके आँसू बहायेये । उनके कुटुंबमें ज़रासॉभी किसीके शिर दुखतेही राज्यभर में और विशेषकर भारत वर्ष के मंदिर मसजिद और गिरजों में इनकी मंगल कामनायें ईश्वर प्रार्थना होने लगती थीं । जहां कहीं जा कष्टका थोडासाभी संवाद उनके कानपर पहुंचता उसी समय वह तार वा पत्र द्वारा वहां की स्थितिका अन्वेषण करतीं और जहांतक होसकता अपने पाससे द्रव्य देकर या राजकर्मचारियों से अनुरोध कर सहायता करती । अस्पताल में नारकर युद्धसे लौटे हुए घायलों की देख भाल करना, उन्हें फूलके गुलदस्ते, पुस्तक वा ऐसदी और पदार्थ प्रेम पूर्वक भेंट करना उनकी स्वाभा- चिक वालथी । १४ मई सन् ९८ को आपने नेटली अस्पतालमें चित्रालके चाय- लोको देखकर पुष्प गुच्छ भेंट किया था। और ट्रांसवालसे लौटे हुए वीर घायलों- को भी आप कई बार देखने गईथीं। इस विषयका एक चित्र नीचे लगाया गया है ||<noinclude></noinclude> 7skkderoiyj7bah3xvo08xp7jlpyqje पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४८ 250 194671 665275 2026-07-06T15:07:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665275 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । अस्पतालका निरीक्षण । ( १३१ )<noinclude></noinclude> cfrfu5lipcuf4lih664c6g1iehs438j पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१४९ 250 194672 665276 2026-07-06T15:07:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665276 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५० 250 194673 665277 2026-07-06T15:07:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665277 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भचम भाग | (१३३) राज कुटुंबमे किसीकी मृत्यु होने पर इस विशाल राज्यकी भिन्न २ जातिकी प्रजाकी ओरसे एकतंत्र वा अलग २ नो सहानुभूति प्रकाशित हुई टनपर आपने हार्दिक धन्यवाद दिया था। इन धन्यवाद पत्रोंका अनुवाद पहले दो बार इस पुस्तक में प्रकाशित हुआ । श्रीमतीको इस प्रकारके धन्यवाद पत्र प्रकाशित करनेका कुल ७ बार अवसर पढ़ा था । १ पतिकी मृत्युपर २ युवराजकी बीमारी पर, ३ कुमारी एलिसकी मृत्यु, ४ श्रीमतीपर आक्रमणहोने पर, ५ डचूक आफू एलबनी की मृत्यु पर ६ राजपौत्र विक्टरकी मृत्यु पर और ७ पुत्री वियोट्स और प्रथम राजकुमारी के विधवा होने पर इन सब पत्रोंके प्रकाशित करने का इस लघु पुस्तकमें स्थान नहीं है । श्रीमती पर आक्रमण होने के समय जो मजाकी ओरसे सहानुभूति प्रकाशित हुई। उसके उत्तर में आपके माइवेट सेक्रेटरीने लिखाया कि "श्रीमती इंग्लैंडसे विश्राम लेनेके लिये विदा होने पूर्व सधे अंतःकरणसे प्रकाशित करती हैं कि मेरी सब जाति की मजाकी ओरसे और अन्यदेशौ राज्यों और राजा प्रजाकी ओरसे मेरी आपत्ति पर जो प्रेम, भक्ति और सहानुभूति प्रकाशित हुई उससे मुझे बहुत आनन्द हुआ है। रानी नहीं जानती हैं कि इस धूमधाम के लिये यह क्योंकर और किसतरह पर अपना धन्यवाद और आनन्द नो, उनके चित्तमें हुआ, मकाशित करसकेंगी परन्तु यह वाहती हैं कि सर्वोचसे लेकर दानाति दीनकी सेवामें मेरे अन्तःकरणका बहुतर धन्यवाद पहुंचाया। उनकी यह सदासे इच्छा है कि जहाँतक मुझसे होसके मैं अपने मिय देश की प्रतिष्ठा और वैभव बढाऊं और उन लोगों की उन्नतिका प्रयत्न करूँ जिनपर मैं दीर्घ कालसे शासन करती हूं। और इसीमकार का प्रयन मेरे अंतिम श्वासतक मचलित रहेगी |” अध्याय ५०. 'महारानीकी आय । भारतवर्षके राजामहाराजा राज्यके द्रव्यको अपना समझकर अपने सुख और वैभवके के कामोंमें आजकल व्यय करते हैं और अनेक अवसरपर उनकी दीनमना भूखों मरा करती हैं परन्तु इंग्लैंडकी यह प्रथा नहीं है। वहां राजकोषसे राजाका कुछ प्रयोजन नहीं रहताहै । राज्यकी ओरसे उसके वार्षिक व्ययके लिये वेतन नियत रहताहै और विवाह शादियोंके लिये राज्य उन्हें अलग खर्च देता है मस सीमेंसे खर्च करनेका उन्हें अधिकारहे। राजकोषका द्रव्य प्रजाका समझाना ताहै। श्रीमती महारानी विक्टोरिया के निजखचके लिये भी इसी तरह वेतन नियतथा ।<noinclude></noinclude> lsocb8i71rbz0ax6g13m680sun36sys पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५१ 250 194674 665278 2026-07-06T15:07:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665278 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १३४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । श्रीमतीके प्राइवेट सेक्रेटरीने सन् १८८५ ई० में कहाथा कि महारानीके पास इस समय दश लाख पौंड भी नहींहै। उस वर्षके बाद उनके खर्चको व्यवथा करनेसे वचत बढ़ने लगीथी । परन्तु सन् ८७ ई० की ज्युबिली में श्रीमतीने राजकीय द्रव्यके सिवाय अपने पाससे भी बहुत कुछ रुपया लगायाथा इसकारण आपपर कुछ ऋणहोगयाथा। श्रीमती को ब्रिटिशराज्यसे निज खर्चके लिये ६० हज़ारपौंड, घरेलू कामों के लिये १ लाख ७२ ॥ हज़ार पौंड, नौकरोंके वेतन और पेन्शन के लिये १ लाख ३१ हजार २६० पौंड तथा पुण्यार्थ, इनाम और ईश्वरोपासना के लिये ८ हज़ार ४० पौंड मिला करताथा ॥ इसके सिवाय ८ हजार पौंड श्रीमतीको उनकी माताकी जागीरका मिलताथा | उनके पति का वार्षिक वेतन ३० हज़ारपौंड अलग हीथा । युवराजकी आय इससे अलग और उनको वेतनभी सरकारसे अलग मिळताथा। उनकी वार्षिक आय ५० हजार पौंड थी। श्रीमतीको वृद्धसुनार होवर्डने जिसकी तृतीयज्यार्ज के समय लंडनमें बहुत बड़ी दूकानथी ५ लाख पौंड विरासत में दियाथा । श्रीमतीको अपने पति की मृत्यु के समय ६ लाख पौंड उनके पाससे मिलाया सन् ८१ में उन्होंने ७८ हज़ारपौंडके मूल्यकी एक जागीर खरीदकी थी । इसी तरह उन्होंने आस्चर्नकी जागीरभी मोललीथी । उनकी जागीरमें ३७३७२ एकड़ भूमिथी । इससे २० से २५ हजार पौंड तक वार्षिक आय होतीथी । क्रमोंट उन्दे राज्यकी ओरसे सन् ६६ में इस शर्तपर दियागयाथाकि उनकी मृत्युके पश्चात् उसका खालसा होनाय और उसपर श्रीमतीके वारिसोंका स्वत्वनरहै । ज्युबिली वा अन्याय उत्सवोंपर प्रजावर्ग वा विदेशीराजाओंने श्रीमतीको नो२ पदार्थ भेंट किये उनका मूल्यभी बहुतही बढ़कर है। उनके पास जवाहिरातका बहुत कुछ संग्रहथा । इनका मूल्य हज़ारोंपौंडसे कम नहींीं ॥ अध्याय ५१. श्रीमतीकादान | श्रीमतीके दानका विस्तार पूर्वक लेखानहीं प्रकाशित होसकता है। लोग उनके गुप्तदानके विषय में बहुतही कम जानते हैं। उन्होंने प्रकाश रूपपर जन साधारणके फंडोंमें जितना दियाथा उससेभी बढ़कर उनका गुप्तरीतिपर पुण्यार्थ कामों में व्यय होताथा। कोवर्गमें राज्ञीपतिक गाड़ीसे गिरकर बचनानेपर श्रीमती ने बहकि लोगोंके एक हज़ारपौंड इसलिये दियाथा कि इसके व्याजसे इस घटनाक<noinclude></noinclude> awbj878psqzq2cp7bpdxvrkvz3limx4 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५२ 250 194675 665279 2026-07-06T15:08:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665279 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (234) दिन मतिवर्ष एकउत्सव किया जाया करे । इसमेंसे युवा स्त्री पुरुषों को जो नेक चलनहीं धनोपार्जनके लिये औगार दियेनॉय और लड़कियोंके विवाह में दोन माता पिता की सहायता की जाय । सन् ७७ में आपने १ हजार पौंड देकर हेवुड में यहांकी जाके सुखके लिये एक बाग बनवादियाथा। श्रीमतीने दीन अनाथ और अशक्त जानवरोंपर दयाकरनेवाली मंडलीको १०० पौंडदिया और सन् ९० के क्रिस्टमस (बड़े दिन ) को लंडन के ११६८ वृद्ध स्त्री पुरुषों को जिनका यय ८० से ९० वर्ष तककाथा पालन पोषण के लिये द्रव्य दिया। और यह सदा नियम रक्खा कि राजधानीके हज़ारों अपाहिनों और दोनोंको प्रति वर्ष बड़े दिन पर भोज दिया जाय। जहां कहीं श्रीमती पात्र लिये जाती यह कि छोटे पड़े कर्म वारियोंको जो आपकी सेवामें नियत किये जाते, भरपूर पारितोषिक देतीं और प्रत्येक स्थानके अनाथोंको मुक्त हस्तसे दिया करतीथीं। श्रीमतीकी नागीरके प्रत्येक पालकोंको खिलौना देना आपका साधारण नियम था । कीमिया युद्धका विशेष वर्णन अन्यत्र हुआ है। इस स्थळपर इतना लिखना आवश्यक है कि इस युद्ध में मिस फ्लोरेंस नाइटिंगेलने घायल सिपाहियोंकी युद्ध क्षेत्र में बहुत कुछ सहायता कर माण पर जोखिम उठाईथी। जब वह स्त्री युद्ध- से लौटी तो आपने उसका सत्कार करने के लिये अपने पास बुलाया और उसे एक जवाहर युक्त आभूषण जिसपर “दयालुका आशीर्वाद" ख़ुदा हुआ था. भेट किया । यह एक नमूना है। इसी तरह लोगोंका उत्साह बढ़ानेके लिये श्रीमती दिया करतीं थीं । भारतमै जब २ अकाल पड़ा आपने बड़ी उदारतासे चंदेकी लिस्ट में सबसे प्रथम अपना नाम लिखवाया और हजारों पौंड अपने पाससे दिया ! ट्रांसपाल के युद्ध (सन् १८९९-१९००) में आपने लेडीस्मिथ के किलेमें घिरने वाले अंगरेज और भारत वासियोंको एक २ चाकलेटका शक्स भेंट किया।. एक पारसीने भारतके अकाल पीड़ितोंकी सहायताके लिये अपना वाक्स बेच दिया । उससे बहुतसा द्रव्य आया । अध्याय ५२. समाज शोधन की रुचि और धैर्य । मजाकी स्थिति सुधारनेपर श्रीमतीका बहुत ध्यान था बहू महांतक सकताथा इस कार्य के लिये गुप्त और प्रकट प्रयत्न किया करती थीं। प्रजार्में शिक्षा फैलाना उनका मुख्य उद्देश्य था। डधूक आफू आगोइलका कपने था कि-" इस देशके राजा रानी मनामें शिक्षा फैलानेका प्रयत्न करते हैं। यह<noinclude></noinclude> my9swkl8nfvsu775zqpyiz4ntwce6jt पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५३ 250 194676 665280 2026-07-06T15:08:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665280 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १३६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । उनका कर्तव्य है । श्रीमती सुख और दुःखके समय समान रूपपर इस बातपर ध्यान देती रही हैं । " सन् १८४६ ई० में पतिकी सम्मतिसे आपने सार्वजनिक शिक्षाका इंग्लैंड की प्रजाके लाभार्थ प्रस्ताव किया था। सप्ताह भर में एकदिन धर्म संबंधी शिक्षा के लिये पाठशालाओं में नियत करना उनका मुख्य उद्देश था । वारंवार की रेल्वे दुर्घटना और प्राणघातसे श्रीमतीको निश्रय होगयाकि मेरी नितनी रेल्वे यात्राके समय सुश्रूषा की जाती है उतनाही सर्व साधारणके लिये उपेक्षा होती है । इस बातको जानकर श्रीमतीने एक आज्ञा रेल्वे के प्रबंधकोंके नाम सन् १८६५ ई० में प्रकाशित की । उसका आशय यह था: - "श्रीमतीको आशा है कि जनसे रेल्वे के प्रबंधक ने देशभरकीयात्रा का मार्ग अपने हाथमें ले लिया है और अन्यमार्ग उठगये हैं उन लोगोंका उत्तर दातृत्व कितना बढ़ गया है उसे ये अच्छी तरह जानते होंगे ।" इस आज्ञा का इंग्लैंडकी रेल्वे लाइनोंपर चाहे जैसा प्रभाव पड़ाहो किन्तु भारतके कार्यकर्त्ता लोग इसे बिलकुल नहीं जानते क्योंकि यहांके लोगोंके कष्टकी गुहार श्रीमतीके कान तक नहीं पहुंचती थी। सर्व साधारण में दया और साहस उत्पन्न करनेके लिये श्रीमतीने, आत्म समर्पणकर दूसरे के प्राण बचाने वालोंको देने के लिये विक्टोरिया कास और एलबर्ट मेडल नियत किये थे | यद्यपि 'कंसेट एक्ट' भारत वासियों में सहवास और गर्भाधान संस्कार की प्रणाली के अनुकूल न था परन्तु जब भारतवासी अंगरेनोंने और उनके से स्वभाव वाले देशियों ने श्रीमतीके कान तक देशी स्त्रियों के कष्टकी बात सुनाई तब उन्हों ने इस कार्यके विषयमें इंग्लैंड में जो आन्दोलन हुआ उसमें साथ दिया था और इसी तरह लार्ड डफरिन साहब की मेमके नामपर जो भारत वर्ष में बृहत् उद्योगसे अस्पताल स्थापित हुए उन में भी मुख्य प्रेरणा श्रीमती की थी और जब २ नवीन वाइसराय नियत होकर आने से पूर्व श्रीमतीसे मिलने गये तब ही तब उनकी पत्नियों को उन्होंने इस कार्य पर ध्यान दिलाया था | चाहे प्रकाश रूपपर स्त्रियोंकी स्वतंत्रताके लिये उनके शासनमें कोई विशेष आईन न मनाहो और पार्लियामेंट में मेंवर चुननेका अधिकार स्त्रियोंको देनेके विषयमें भी उक्तसभा अभीतक आनाकानी कर रही है परन्तु इंग्लैंडका वर्त- मान उत्कृष्ट स्त्री स्वातंत्र्य श्रीमतीके शासनका ही परिणाम है। इसमें संदेह नहीं है कि वह स्त्रियोंको स्वतंत्रताकी सीमासे अधिक नहीं बढ़नेदेना चाहती थीं । विवाह<noinclude></noinclude> rye9uazsv4ljexsccmklpe5tel019l7 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५४ 250 194677 665281 2026-07-06T15:08:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665281 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( १३७ ) और एक पनि तथा एकपतिवतको वह बहुतही पवित्र समझती थीं। और राजकुटुंनमें कोईभी पुनर्विवाह न करे ऐसी उनकी इच्छा थी। इस उद्देश्यके पालनके लिये वह कभी ऐसी स्त्री या पुरुषका अपने पास आनाजाना पसंद नहीं करतीथी जो पुनाव- वाह के पक्षपातीहों। थोड़े वर्ष पूर्व एक अमीरकी लड़कीने अपना दूसरा विवाह करना चाहा। एक पतिको छोड़कर दूसरा मरने वालीके साथ उनकी पूरी २ घृणाथी इस- लिये श्रीमतीने उस लेडीको अनेकवार इसकार्यसे वारणकिया परंतु जब उसने म माना तो आपने उसका अपने पास आना जाना बन्द करदिया । और इसी तरह राजकुटुंब और मनावर्गको समान माननेके लिये उन्होंने अपनी एक कन्याका विवाह किसी राजकुटुंब व्यक्तिके बदले साधारण टमरावके लड़केसे कियाथा । इंग्लैंडके राजकुटुंब में पतिकी मृत्युके पीछे दूसरा पति करनेकी चाल । श्रीमती की माता डचे आकंटनेभी प्रथम पतिके मरनेवाद श्रीमतीके पितासे विवाह कियाथा परंतु श्रीमतीने पातिव्रतका पालनकर संसारको दिखला दिया कि सच्चा पति प्रेम ऐसा होता है | सर्वत्रके राजा अपने दुःखको मजाके दुःख से अधिक समझतेंदें और इसीतरहका वर्ताव करनेमें प्रजाको कुछ अनुचितभी नहीं जानपढ़ता है परंतु जब ट्रांसवाल युद्ध (सन् १८९९ - १९००) से इंग्लैंडकी मजाकी ओरसे भेजी हुई सेना विजयपाकर लौटी उसके साथ श्रीमती निमृत्यु की खबर मिलीची । यहशोकसंवाद ऐसाथा कि यदि श्रीमती चाहतीं तो सेनाके स्वागतकी धूम धाम मन्दकर सकती थीं परंतु अपने दुःखको दमाकर प्रजाके सुखमें श्रीमतीने भंग न होने दिया। और इस शोक संवादको उस समय प्रकाशित होने दिया जबकि धूमधाम से सेनाका स्वागत होचुका। इसकार्य करनेसे श्रीमतीने राजा और प्रजामें इसमातका उदाहरण कर दिया कि प्रजाके सुखमें राभाओंको अपना दुःख भूल जाना चाहिये ॥ अध्याय ५३. श्रीमतीका परिश्रम | महारानी परिश्रम करनेमें कभी थकती नहीं थीं। यह आशासे अधिक लोक सेवा और राजकीय कामोंमें समय बिताती थीं। सन् १८४८ ई० के वारहमासमें उन्होंने २८ हजार डिस्पेनोंको पढ़ा और उन पर सम्मति दोथी । यह संख्या<noinclude></noinclude> hgaywficg870lh9h6dxh2wd1g4jw4aa पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५५ 250 194678 665282 2026-07-06T15:08:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665282 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १३८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । विदेशीय विभागके कागज़ोंकी थी किन्तु उपनिवेश विभाग और होम विभागके कागज़ भी इनसे कम नये । सन् ५४ से कागज़ इकट्ठे होते होते उनकी संख्या १६००० होगईथी और इनका फ़ैसला करनेमें श्रीमती पर बहुत बोझा पड़ना संभव था इसलिये सन् ६२ में सेना संबंधी कागजों पर हस्ताक्षर करनेके लिये . पार्लियामेंटने एक कमीशन नियत करनेका प्रस्ताव कियाथा । श्रीमतीके एक सेवक ने उनके चरित्रमें लिखा है कि मैंने" श्रीमतीको कभी विश्राम लेते वा कुछ भी नहीं करते हुए नहीं देखा। " राज्यशासन का बोझा उनके ऊपर पड़तेही वह सोतसे शीघ्र उठने लगीं और अठारह वर्षके वय में इतना भारी बोझा अपने ऊपर झेलकर उन्होंने एक दृढ पुरुषके वरावर परिश्रम किया। इस समय भी उन्होंने प्रातःकालका बायु सेवन नहीं छोड़ा। " इंग्लैंड और विदेश मुख्य २ दैनिक समाचार पत्रोंको पढ़ना और अमात्यों और प्रिवी कौंसिलसे नित्य मिलकर प्रत्येक कागज़ को ध्यान पूर्वक पढ़ना और फिर उसपर हस्ताक्षर करना उनका नित्य नियम था । विवाहके पश्चात् अन्य स्त्री पुरुषोंकी तरह भोग विलासमें पड़नेके बदले उन्हों- न काममें अधिक परिश्रम करना आरंभ किया और राज्ञीपति इसमें सहायक हुए । इसके सिवाय उनके निवास करने के महलोंको भी उन्होंने अपनेही समक्ष देख भालकर अपनी योजनासे बनवाया । राज्ञीपतिको संगीत अधिक प्रियथा इसलिये पतिको प्रसन्न करनेकी इच्छासे उन्हें नित्य इस कार्य में भी समय लगाना पड़ता था। इसके सिवाय "डायरी" में नित्य अपनी दिन- चर्या लिखना और नित्यके आये हुए पत्रोंका नित्य ही उत्तर देना उनका साधा- रण कार्यथा । भारत वर्षके बलवे और क्रीमियाके युद्धके दिनोंमें उनकी चिन्ता- बढ़ाई थी और शासनारंभके कितनेही वर्षोंतक इंग्लैंडके व्यापार और शिल्पकी दशा अच्छी नहीं थी इस कारण बीसों वर्षतक उन्हें नित्यके कामोंके सिवाय इन वातोंपर बहुत ही विचार करना पड़ाथा । बीमारी और यात्राके दिनोंमें भी वह अपना काम नहीं छोड़तीथीं । परंतु धर्म क्रियाओंके लिये श्रीमती रविवार- के दिन कुछ काम नहीं करतीथीं। एक वार शनिवारको आपका एक मंत्री ऐसे समय में कुछ कागज़ लेकर आया जब श्रीमती किसी आमोद प्रमोदके का- ममें लगी हुई थीं। मंत्रीने कहाकि :-“कामतो आवश्यक है परंतु अभी आपके • आनन्दमें में चित्र नहीं डालना चाहता हूं। कल आकर कागज़ सुनादूंगा !" श्री मती बोली :- " नहीं कल धर्म कार्य का दिन है। मैं कल कोई राजकीय कार्य<noinclude></noinclude> hoy2eamz2ha6hh375nf1b20ioa5djzw पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५६ 250 194679 665283 2026-07-06T15:08:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665283 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । न करूंगी । परसों कागज़ देखनेसे सुना दो। " अपना काम छोड़कर और उसपर हस्ताक्षर कर दिये । - (१३९) काममें देर हो जायगी इसलिये मुझे अभी श्रीमतीने उसी समय उस कागजको देखा अध्याय ५४. महरानीका स्वभाव | महारानी विक्टोरिया के सरल स्वभाव, दया, बुद्धिमता और साहसके अनेक किस्से सुने जाते हैं उनको संग्रहकर पृथकू पुस्तकाकारमें छपवाना पाठकों के लिये बहुत मनोरंजक और उपदेशजनक होसकताहै किन्तु इस पुस्तकमें टनको संग्रह करनेसे स्थानाभावका ढरहै। इस कारण दशपांच किस्से इस जगह लिखताहूं ॥ किटीकियर नाम की बुढ़ियापर श्रीमतीकी बड़ी दयाची। यह स्त्री आपके महल के निकट पहाड़ीपर किसी झोपडीमें रहती थी। वहां पुराने ढंगके चरखेसे सूत कातनाही इसका पेशा था । एक दिन श्रीमतीने उसकी झोपडीमें जाकर उसे एक गर्म लहेंगा दिया । स्त्रीने लगेको देखकर कहा:- परमेश्वर तुम्हारी और तुम्हारे मालकोंकी दोनों लोकमें रक्षा करेगा । परमेश्वर तुम्हास पथदर्शक होगा और तुमको सब हानियोंसे बच्चायेगा ।” विचारी बुढ़ियाके सरल हृदयका आशीर्वाद सरल हृदया रानीके लिये बहुतही योग्यथा ॥ श्रीमतीका बालकों से बड़ा प्रेयथा। सन् १८७६६० में आप लंडनके एक अस्पता- लको देखने गई थीं। जिस समय वह अस्पतालका निरीक्षण कररही थीं उनके आनेकी ख़बर एक बीमार लड़की ने सुनी। लड़कीने दाईसे पुकार कर कहा:- "कृपाकर मुझे रानीके दर्शन करा दो, मैं देखते ही अच्छी हो जाऊंगी। " किसीने श्रीमती से लड़की की बात कहदी वह उसी समय उसके पास लौटकर गई और मीठी २ बातोंस लड़की का अच्छी तरह मनोरंजन कर- दिया । उसके हृदयको पीडा मिटगई और इसके द्वारा उसके आरोग्य होनेमें बहुत कुछ सहायता पहुँची ॥ महारानीको प्रजाके साथ दिखावटी प्रेम नहींथा। लोगोंपर माणसंकट हो- नका आधात श्रीमंती हृदयतक पहुँचताया । प्रजाके चित्तसे आपके हृदयका टेलीफोन लगाथा । जिस समय क्रीमियाके घोर संग्राममें हज़ारों अँगरेज सैनि-<noinclude></noinclude> na8s20a3359j2p821017t5ly8vqpdan पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५७ 250 194680 665284 2026-07-06T15:08:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665284 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । कोंका वध वा मृत्यु हुई किसी कार्यसे विंडसर के उनसे कहा कि "आप माता मर जायगी । " श्रीमती सुन २ कर बीमार होगई थीं। प्रधान सेनापति महल में महारानीसे मिलने गये। श्रीमतीके वालकों ने शीघ्र जाकर सैनिकोंकी प्राण रक्षाकरो नहीं तो हमारी जिस समय महारानी बालिका थीं एक दिन राज कुटुंब के लोगों के साथ कहीं जार- हीँथीं। पानी बरसनेके कारण मार्ग में की बड़ होगयाथा । किसीने कहा - " मार्ग बहुत बुरा है। चलने शीघ्रता न करो। नहीं तो गिरजाओगी। " श्रीमती उसके कथनपर ध्यान न देकर " मार्ग बुरा | बुरा करतीं ज्योहीं आगे बढ़ीं धडामसे धरतीपर गिर गई। तब उस मनुष्यने कहा- " मार्गकी बुराई अब मालूम होगई होगी" आप बोली:- "यह बात मुझे जन्मभर स्मरण रहेगी || " श्रीमती सादापनका एक उदाहरण यह है कि, आप सन् १८६८६० में स्काटलैंड के हाईलैंड प्रदेशकी यात्रा करने गई थीं। वहांके एक वनरक्षकने श्रीमतीसे कहा कि “मुझ जैसे दौनमनुष्यके बालकका बपतिस्मा यदि आपदें तो मैं अपना सौभाग्य समझँगा " श्रीमतीने उसका प्रेम देखकर इसबातको स्वीकारकर लिया । हाई- डकी यात्राकी आपने एक पुस्तक प्रकाशित की है उसमें लिखा है कि “जानथा- मसन नामक अरण्यरक्षकके चौबीस दिनके बालकका बपतिस्मा देने में गई । उसके झोंपडेमें खिड़कीके पास एक टेवलपर एक श्वेत कपड़ा बिछाया और उसके ऊपर एक पानी भरा पात्र, बाइबल और बालिकाकी जन्मतिथिका एकपत्र रक्खाथा | मेरेहीनाम पर टस वालिकाका नाम “विक्टोरिया " रक्खागया और मैंने ही उसे बपतिस्मा दिया ||" श्रीमतीको चापलूसी पसंद नहींथी ! वह सदा स्पष्ट संभाषणको अच्छासमझती थीं। उनके पास रहनेवाले मंत्री और यावत् कर्मचारियों को कठिन आज्ञाथी कि, वे श्री मतीसे बातचीत करनेमें कभी चिकनी चुपड़ी बातें न करें। एक बार उन्होंने अपने एक नौकरकी स्त्रीको बुलाकर उससे कह दियाथा कि तुम अपने- पतिको अच्छी तरह समझादना कि वह कभी मुझसे चापहूसी न करे ॥ एक बार श्रीमती विना किसीको साथालये बाहर फिरने चलीं गई। आसपासके बीमारों और अशक्त दीनोंकी संभाल करना उनका नियमथा। चलते एक टेकरी की किसी कुटिया में पहुंची। वहां पर उन्होंने एक वृद्ध पुरुषको खटियापर पड़ा हुआ पाया। श्रीमतीने उससे पूंछा कि क्या तुम्हारे पास कोई मनुष्य सुश्रूषा करने वाला नहींहै" उसने मुँह बिगाड़कर कहाकि " हांनहींहै। जो हैं वे भेड़ें चराने गये हैं<noinclude></noinclude> 9h0dkh7vogh7letwtwt0dl11mlirgon पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५८ 250 194681 665285 2026-07-06T15:09:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665285 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४१ ) मंथम भाग उन्हें आपके दर्शन की बड़ी अभिलाषायी इसलिये वे आपके दर्शनको जायंगे " श्रीमतीने बहुत देर तक उसके पास बैठकर उसका समाश्वासन किया और एक पाठ वाइवलका पढ़कर सुनाया। चलते समय श्रीमतीने उसके हाथमें पांच पौंडका एक नोट रखकर कहा "जब तुम्हारे बालपचे जंगलसे लौटें उनसे कहदेना कि जिस समय तुम रानीके दर्शन करने गये रानी तुम्हारे दर्शन करने आई थी" || एक दिन श्रीमतीके निकट रक्खाहुआ एक लैंप जल टठा । श्रीमतीने खड़ी होकर उसकी बत्ती उत्तारदी। नौकर चाकर जो वहां खड़े थे उनको बडी लग्नाआई और आहुआ । श्रीमतीने कहा-"यदि मैं यह पुकारती कि लैम्प में आगलगगई है। मेरी सहचरियोंमेंसे एक ननी किसी नौकरसे कहती और यह बतीयालेको बुलाता इतनी देर में लैम्प बिलकुल जलजाता। इसलिये मैंने बत्ती उतार देनाही उचित समझा ।" महारानी खर्च करनेमें बड़ी मितव्ययायी काम होजानेपर जो रुपया बचता यह व्यर्थ नहीं खोया जाताथा। कपड़े जो बालकोंके पहनने बाद उतरते वे औरोंके लिये काम आतेथे । सौडानके वीर गार्डन की एक बाइवलथी । यह पुस्तक गार्डन की मृत्युके अनंतर श्रीमतीको भेटहुई। श्रीमतीने टस पुस्तकको हीरेके हारसेभी बहुमूल्य समझकर अपने पास रक्खा । श्रीमतीकी समयपर विशेष दृष्टिथी। यह निर्दिष्ट स्थानपर नियत समयपर पहुंचने के लिये कोचवानको केवल पांच मिनट दिया करतीथीं। महारानी पत्र बहुतही सादे पहनना पसंद करतीथीं। एक बार उनकी ! घुटसालमें एक नये कर्मचारीने एक सादी पोशाक वाली बुढ़ियाका हाथ पकड़कर यह कहते हुए बाहर निकाल दिया कि-“तुम यहांसे बाहर चली जाओ। महारानी इस समय यहां आने वालींहैं। बाहरी मनुष्यको यहां आनेकी आशा नहींहै ।" जय उसे विदित होगया कि उसने श्रीमतीकै साथही ऐसी मूर्खता की है तो यह बहुत घबराया । और डरकेमारे कांपने लगा। महारानीने उसके कामकी प्रशंसा की और उसका डर दूर किया । एमेरिकाकी नाइगरा नदीके इसपार से उसपार रस्सीपर चढ़कर एकमनुष्य चलानाया करताथा। इस खेळसे उसने एमेरिकामै बहुत रुपया कमायाथा। एमेरिकाके खिलाडी लाडकी नकल इंग्लैंड में भी होना आरंभ हुआ। इस खेलमें इंग्लैंड गालोंका नावादिनश्भढ़ने लगा। सन् १८६३ ई० में खिलाड़ीकी आँखोंपर पट्टियां<noinclude></noinclude> fb94kymaiu9ol7jcwvi1bftrq96yewu पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१५९ 250 194682 665286 2026-07-06T15:09:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665286 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( १४२ ) और पैरोंमें बेड़ियां डालकर रस्सीपर चलाने की तैयारी हुई। इसकार्यमें एक स्त्रीने अपने प्राण खो दिये । श्रीमतीको इस घटना की खपूर होते ही उन्होंने लार्ड मेयरको एक पत्र लिखा “आपके द्वारा प्रकाश किये बिना श्रीमतीसे रहा न जायगा कि, वरमिंगहामके एस्टनयार्कमें एक प्राणनाशक घटना होनेसे उनको बहुत दुःख हुआ है । ऐसे जोखमयाले खेलोंमें एक स्त्री की मृत्यु होनेसे उनका चित्त बहुत कातर है। इस बातके बाद भी लोगोंने इस तरह के मेले तमाशे बंद नहीं किये हैं और नये २ खेलका प्रबंध करते जाते हैं यही उनकी बुरीनीतिका उदाहरण है। जो बाग महारानीने अपने पतिके साथ मिलकर प्र- जाके सुखके लिये बनवाया है उसका उपयोग आज पीछे मानुपी नियमोंके विरु- द्ध कामों में न होना चाहिये । महारानी को आशा है कि, भागेसे ऐसा काम न किया जायगा । " अध्याय ५५. कर्मचारियोंको उत्तेजना और सत्कार । श्रीमतीका जैसा प्रजापर प्रेमथा वैसाही सरकारी कर्मचारियों पर था । वह समय पर उनके कामों की प्रशंसा कर उन्हें मजापालन की उत्तेजना दिया करती थीं । जब कभी कोई उच्चपद प्राप्त कर्मचारी वा सेनाध्यक्ष कहीं जाता तब उसे उसके जाने पूर्व आप अपने पास बुलातीं और उसके साथ भोजन कर उसका सत्कार किया करती थीं। सन् ५७ के बलवेमें लखनऊ का विजय करने वाले सर कालिन केम्पबेलको लिखायाकि -" आप और आप के वीर सिपाहियों की शूरता का मुझे बड़ा गर्व है । परंतु आपको मैं एक बातका उलाहना देती हूँ । आपको इतनी संभाल रखना चाहिये कि, अधिक हुड़कर सिपाहियोंके प्राण जो खिममें न डाले जाँय । और न स्वयं भयमें पड़ियो क्योंकि आपका जीवन बहु- मूल्य है । " लार्ड एलनबरो जिस समय भारत वर्षके गवर्नर जनरल थे उनकी ईस्टइंडिया कंपनीसे बहुत तकरार होगई थीं। लार्ड साहब मजाका कल्याण चाहते थे और कंपनीके डाइरेक्टर लोग रुपया और देश । इसविषयमें लार्ड साहबका श्रीमतीसे पत्रव्यवहार हुआ | आपको लाट साहबने लिखाकि भारत वर्षमें जिन २ कठि नताओं को मुझे झेलना पड़ता है और डाइरेक्टरोंकी शत्रुता बढ़ी हुई है उनमें मुझे एकही सहारा था। वह यह कि श्रीमती मेरे ढंगको अच्छी तरह जानगई<noinclude></noinclude> 06hwnsu4f3d1mtkdspgz1rbdccciduo पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६० 250 194683 665287 2026-07-06T15:09:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665287 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( १४३ ) थीं और उनकीही सहायतासे में देश में शांति स्थापित कर सका। यह ऐसी " शांति है जो अबतक इसदेशमें नामको भी नथी । " इसीतरह लार्ड डलहौसी भारतकी गर्वनर जनरली करके विलायतको छोटे तब आपने उनका बड़ा सत्कार किया था। लार्डसाहमने इसविषयमें लिखा है कि-"जिसकृपापूर्ण शब्दोंसे श्रीमती अपने एक नौकर को उसकी सेवा पूर्ण हो- नेपर शाबाशी देती हैं उनसे मेरे हृदयपर बहुत प्रभाव पड़ा है। इसबात पर श्री- मतीको धन्यवाद देने और हर्ष प्रकाशित करनेके लिये मुझे शब्द नहीं मिलते हैं । इस लिये इतनाही कहता हूं कि यह सम्मान मेरे जीवनभरके यावत् सत्कारों और आदरों से बढ़कर | " एक कविका कथन है कि- "नौकरोंके सत्कार्यों से रानी और रानीकी कृपासे नौकर वास्तवमें सौभाग्यशाली हैं।" उनकी कृपा और उत्तेजनासे नौकर उनकी आज्ञाका पालन करने में बहुतही उत्साही रहते थे। क्रीमियाके युद्ध समाप्त होने बाद जनरल सिमसनने अपना पद त्यागदिया । उनका पद सर कोलिन केम्पबेल को देनेके बदले एक नीचे दर्जेके मनुष्यको देदिया। इससे सर कोलिन केम्पवेल अप्रसन्न होगये । और जब फिर लड़ाई आरंभ होनेका अवसर आया उन्हों ने जानेसे स्पष्ट नाहीं करदी। श्रीमतीको यह बात विदितहोतेही आपने उनको अपने पास बुलाया और उदासमुखसे उनका सत्कारकर उन्हें बैठनेको कुरसीदी। उनके समक्ष सब नौकर खड़े रहते थे। किसीको बैठने की आज्ञा नथी। इसके बाद उन्होंने कहा - "आप युद्धपर जानेकी नाहीं करते हो। इसबातसे मुझे बहुत दुःख है ।" यह कहते २ श्रीमतीका जी भर आया। इस बातका केम्पवेल साहब पर बहुत प्रभाव पड़ा । उन्होंने खड़े होकर श्रीमतीसे प्रार्थनाकी:- "आप जैसी कृपालु • स्वामिनीका चित्त मैं कभी दुखाना नहीं चाहताहूं। यदि आप आज्ञादेंगी तो मैं एक साधारण सैनिकके नीचे भी नौकरी करने को तैयारहूं। "रूठे हुए कैम्पबेलके मनजानेसे लोगोंको बड़ा आज हुआ परंतु एक दयालु माताके प्रेमपूर्ण कथन पर माहीं करनेकी किसमें शक्ति होसकतीहै । लार्ड एलेनवरोकी तरह श्रीमतीने पश्चिम एफ्रिका की प्रजाके लाभके लिये सर ज्या की बहुत कुछ सहायता की थी। सरन्यार्ज देशके सच्चे सेवक और श्रीमतीके प्रीति पात्रये । ब्रिटिश राज्यकी मान रक्षाका उन्हें बहुत विचार रह- ताथा। यह न्यूजीलैंडके गवर्नर के पदपर नियत होकर जब पहांगये तो उन्हें मालूम होगया कि पार्लियामेंटने यहां के विषयमें नवीन नियम बनाने में मुलफी है। और इसके प्रचारसे श्रीमतीका वचनभंग होगा | इसमावसे उनकी निन्दाहोगी .<noinclude></noinclude> 5jfi2zxxglaae7a7ibenea3y3bd7qau पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६१ 250 194684 665288 2026-07-06T15:09:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665288 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र ! क्योंकि जंगली लोग यह नहीं जानते हैं कि, आईन बनानेवाली पार्लियामेंट है। इन विचारोंसे उन्होंने उस नियमका प्रचार न कर लिख दियाकि “दशहजार मीलके अंतरपर रहकर पार्लियामेंट जो आईन बनाती है उसमें उसकी अज्ञानता प्रका- शित होती है इसलिये स्थानीय गवर्नरको यह अधिकार होना चाहिये कि वह जिस आईन को अनुचित समझे उसका प्रचार न होनेदे । " इस बातसे पार्लियामेंट सर ज्याने से बहुत अप्रसन्न हुई परन्तु महारानीने उनके साहस और बुद्धिमानी की मशंसाकी || इसी तरह सर ज्याग्रे जब पश्चिम एफ्रिकाके गवर्नर नियत हुए तब उन्होंनें वहां जाकर देखा कि होटेंटोट सैनिकोंको पेन्शन देनेके विषयमें प्रणकर पार्लिया- मेंट उनको तोड़ती है। और इस कारण उन लोगोंमें असंतोष फैलता है । इस बातसे श्रीमतीका अपमान देखकर उनसे रहा न गया । उन्होंने एफ्रिकाकी प्रर्व- ध कारिणी सभासे रुपया लेकर एक ढिंढोरा फेरा और उसमें प्रकाशित कर दियाकि "श्रीमती अपने वीर सैनिकोंको उनके स्वत्वानुसार पेन्शन का द्रव्य देने में प्रसन्न हैं । " अपने २ स्वत्वका द्रव्य मिल जानेसे लोगोंमें शांति स्थापन हुई । पार्लियामेंटने इस बात के लिये सर् ज्यार्ज को बहुत डांटा परंतु श्रीमतीने उनकी बहुत प्रशंसाकी और इस कारण उन्होंने पार्लियामेंटकी डांटकी कुछ भी पर्वाहनकी । इस कार्यके लिये वह सदा किसी प्रकारका पार्लियामेंट के वि- रुद्ध साहस करने पूर्व श्रीमतीकी सम्मति लेलिया करते थे। सर ज्यानं कम्प - लके सुकासे दक्षिण एफ्रिकाकी मजामें महारानीकी दया बढ़ी प्रसिद्ध हो गईथी। जोहानिसबर्ग में सोनेकी खान वाले व्यापारी सोनेका भाव चढ़ाने के लि- ये ऐसी गप्प उडाते थे कि “श्रीमतीका स्वर्गवास होगया है । " वहांकी प्रजा महारानी पर अधिक प्रेम रखतीथी इसलिये इस गप्पको सुनकर खानोंमें काम करने वाले मजदूर काम छोड़कर रोने लगतेथे । सर ज्याने केम्पबेल महारानीकी उत्तेजनासे समयके अनुसार चलकर एक बार भारत का भी टपकार कर चुके हैं। सन ५७ के बलवे के समय देशमें विज- लीका तार नथा और न शीघ्रगामी धूमपोतथे । उस समय आवश्यकता पड़ने पर समयानुसार चलने की गवर्नरोंको आवश्यकता पड़तीथी । बलवेके समय सर ज्यार्जको वहां एक स्टीमर आने की खबर मिली । उस समय भाग्नके मुट्ठी- भर अंगरेजोंकी रक्षा के लिये पार्लियामेंटकी आज्ञा लेनेका अवसर नथा । उन्हों- ने आज्ञा लिये बिना भारत गवर्नमेंट की सहायता के लिये तीन जहान तैयार<noinclude></noinclude> aam6dpkgxf2id59wnvj1mmfzj1zhams पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६२ 250 194685 665289 2026-07-06T15:09:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665289 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( १४५ ) कर उनगर सेना और सामग्री भेजी । इस कार्यके लिये उन्होंने अपनी गाड़ी- के घोड़ेतक देदिये और पैरों फिरने लगे। उसी अवसर पर चीनकी चढ़ाई पर जानेवाली एक स्टीमर यहां आपहुँची। सर व्याजको यद्यपि विलायतकी आज्ञा बिना उस जहाजुके कप्तानसे कुछ कहनेका अधिकार नहीं था किन्तु उन्होंने उस समय पार्लियामेंटको कुछ भी न गिना और जहान को अपने ही अधिकारसे भारतको भेज दिया। इसी सेनाकी सहायतासे सर कोलिन केम्पवेलने लखन- का विजय किया । इस बातपर भी पार्लियामेंटने उनकी अनुचित स्वतंत्रता को अच्छा न समझा किन्तु उन्होंने श्रीमतीकी ओरसे प्रशंसा पाई ॥ आजकल पश्चिम एफ्रिकाकी मजाको महारानीके शासन में शांति पूर्वक रखनेका मंत्रिमंडल मयत्न करता है परंतु यहां वाले इस शासन को अच्छा नहीं समझते और इसीलिये लडते झगडते किन्तु सर ज्याने में चाहते थे कि छोटेर देशोंको नोड़कर उनकी भिन्न प्रजाओं को एक करदेना उत्तम होगा परंतु मंत्रिमंडल इस बातको पसंद नहीं करताथा। मंत्रिमंडल से सर ज्याने की इस विषयमें न पटी और इसीलिये उसने उनको एफ्रिकासे बुलवा लेनेका प्रस्ताव किया। श्रीमतीका सर ज्यागसे स्वतंत्र पत्र व्यवहारथा और उनकी योजनायें सहानुभूति और प्रेरणाभी आपकी थी और श्रीमतीको विश्वास था कि जंगली लोगोंको मुट्टीमें रखने और सुधारनेके लिये सरज्यानका मन उत्तम है। श्रीमती की सरन्यार्ज ग्रेपर कृपा देखकर मंत्रिमंडल को भी भयथा कि वह हमारे कथनसे उन्हें पुलालेना स्वीकार न करेंगी। इस विषयके कागज लेकर जब प्रधान अमात्य श्रीमतीके पास हस्ताक्षर करानेगये तब उनसे आपकी क्या बातें हुई इस घातकी तो किसीको खबर नहीं हुई परंतु इतना सुना गया है कि आप प्रधान अमात्यपर इस बात के लिये बहुत रुष्ट हुई और कहाकि "जिस व्य- किने अपनेको सौंपे हुए कार्यसे अधिक करनेका प्रयत्न कियाहै जो अपने देश और रानी के लिये परिश्रम कर रहाहै और जो रानीका सञ्चासेयकहै उसका अपमान कर पीठा मुलालेना योग्य नहीं है "परंतु राजनियमके अनुसार प्रधान अमात्यके प्रस्तावको अस्वीकार करनेमें पार्लियामेंटको तोड़ना पड़ताथा क्योंकि यह प्रस्ताव बहुमतसे पास हुआ था इसलिये आपने आनाकानीके अनन्तर उसपर हस्ताक्षर कर दिये । हस्ताक्षरतो आग्रह में आकर लार्डडमने करालिये परंतु पीछेसे यह बहुत पछताये और उन्होंने एक मित्रसे कहाकि “आज मेरे हाथसे एक अनुचित कार्यहोपड़ा । इस गवर्नरको पदच्युत करना योग्य नहींथा" ॥ ७ 4<noinclude></noinclude> 4l3fwpcmppohgp75j8p7dwntl9zg34h पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६३ 250 194686 665290 2026-07-06T15:10:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665290 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । 1 यह आज्ञापत्र जिस समय एफ्रिका में पढागया प्रजाको बहुतही दुःख हुआ। वहां बालोंने कहाकि "श्रीमतीने हमपरसे दया हटाली । और हमारे हृदय दुखाडाले" उन लोगोंको इतना कहनेहीसे संतोष नहीं हुआ किन्तु उन्होंने सर ज्यार्जयेको फिर वाइसराय नियत करनेके लिये प्रार्थना पत्र भेजा। आज्ञापातेही वह जहाज पर सवार होकर इंग्लैंड पहुंचे। उनके पहुंचते ही २ उनको फिर लौटनेकी आज्ञाहुई । और लार्ड डरवी का मंत्रिमंडल टूटकर लार्ड पामर्स्टन के दीवान होते ही वह फिर एफ्रिका को बिदाहुए || परलोकवासी महामान्य मिस्टर ग्लैडस्टनपर उनका बड़ा प्रेम और पूज्यबुद्धि थी । १४ मई सन् ९७ को तीन मासकी बीमारी के बाद जब इनका देहान्त हुआ तब आपने बहुत शोक कियाथा। उन्होंने सहानुभूति प्रकाशित करनेके लिये मिस्टर ग्लैडस्टनकी पत्नी के नाम जो पत्र लिखा वही इस बात का प्रमाण है । उसमें लिखाया कि - "आपका पति सदाके लिगे विश्राम करता है किन्तु मेरा हृदय आपके पास है । आज उनको समाधि करनेकी धूमधाम आपके लिये बहुत ही हृदय विदारक होगी । परंतु इस बातसे आपको हर्षित होना चाहिये कि मेरे शासन में उस परम प्रतिष्ठित राजनीतिज्ञ की योग्यता, नेकचलनी और गुणों के लिये प्रजा उसका कितना सम्मान करती है और उसके बियोगसे कितनी दुःखी है। मेरे और मेरे कुटुंबके सुखके लिये वह जैसे दत्तचित्तथे उन्हें मैं सदा सम्मान पूर्वक स्मरणरवरूंगी।" इसीपत्रसे मिस्टर ग्लैडस्टन पर श्रीमती और प्रजाकी पूज्यबुद्धिं भली भांति विदित होता है। मिसर ग्लैडस्टन सर्वप्रिय मनुष्य थे । केवल इंग्लैंड और भारत वर्षमें ही नहीं किन्तु भूमंडल भरमें वह परम बुद्धिमान् और उत्तम समझे जाते थे और शत्रुभी उनकी प्रशंसा करते थे || अध्याय ५६. राजनैतिक कामों में प्रभाव । कुछ काल पूर्व किसी समाचार पत्रमें मिस्टर डबल्यू टी स्टीड का एक लेख मकाशित हुआथा उसमें लिखा कि-" रानी विक्टोरियाका वास्तविक शासन सन् १८६१ ई० में आरंभ हुआ है। राज्ञीपतिकी मृत्युके पश्चात् हमें रानीके शास- न से काम पड़ा है । जबतक वह जीते रहे राजसी आज्ञापत्रों में रानीके हस्ताक्ष- रके सिवाय एक भी शब्द रानीका नहीं लिखा रहताथा किन्तु सबही उनके पति लिखा करते थे । और उनकी मृत्यु के अनन्तर समस्त लेख रानीके हाथ का होता है " ||<noinclude></noinclude> 7ifbv49rlsg36viy0458h7z5a5s7p40 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६४ 250 194687 665291 2026-07-06T15:10:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665291 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथमे भागे । ( १४७ ) सन् १८८५ ई० में मिस्टर ग्लैडस्टनकी और लार्ड सालिस्वरी की परस्पर खटपट बढ़ती देखकर नवीन पार्लियामेंट का संघटन होनेतक आपने राज्यका काम चल नेमें कठिनता पड़ना निश्चय कर लिया तब दोनों को दबाकर ऐसा मेल करा दिया जिससे नवीन संघटन तक किसी तरह की गड़बड़ न पड़ने पाई। रुसके विषय- में जिस प्रकारकी नीतिका इंग्लैंड बहुत कालसे अवलंबन करता आया है उसका लार्ड वीकान्स फील्ड के मरने बाद भंग होने वालाया क्योंकि सवही लोग उस- के विरोधी थे किन्तु श्रीमतीने अपनी ही इच्छासे उस नीतिका परिवर्तन न होने दिया । सन् १८६१ई० में एमेरिकाके प्रजातन्त्र राज्य और सन् १८६४ ई० में जर्मनी के साथ युद्धमें परिणत होनेसे श्रीमतीने बचाकर इंग्लैंड पर का बहुत बड़ा क लंक दूर कियाथा ॥ जब पार्लियामेंट का भंग होकर नवीन संघटनका समय आताहै और लिप- रल और कंसवेंटिव दलमें परस्पर सैंचातान बढ़ जाती है दोनों दलोंको दबाकर ठीक मार्गपर लाने में इंग्लैंड के शासन कर्ताको बुद्धिमानी देखी जाती है। वह समय बड़ा वारीक होता है और आपसकी खचातानमें राज्य और प्रजाको बहुत ही हानि उठाने की संभावना होती है। जब ऐसा अवसर आया श्रीमतीने अपने पूर्ण प्रभावसे लोगोंको ठीक मार्गपर चलाया। सन् १८३९६० में आपकेही प्रभावसे पदच्युत होनेका अवसर आनेपर भी कार्ड मेलबोर्न प्रधान अमात्य रहसके और सन् १८४५ ई० में सर रागस पील कोभी आपनेही प्रधानत्वसे गिरते हुए बचायाथा । उनके सामने दशअमात्य हुए। और पंद्रह बार ऐसा अवसर आया जिसमें बिलकुल मंत्रिमंडलका परिवर्तन होगया ॥ भारत में सन् १८५१६० में जो उपद्रव हुआ उसके आरंभ में लार्ड कैनिंग्ने 'रिपोर्ट करते समय लिखाया कि उपद्रवमें अधिक भयकी संभावना नहीं है परन्तु श्रीमतीने उनके कथनपर विश्वास न किया और प्रथम दिनकी सूचनाहीसे - गदरका काम अधिक गंभीर समझकर मंत्रि मंडलको सचेत कर दिया || अध्याय ५७. छोटे मोटे चुटकुले | पतिकी मृत्यु के बाद कुछ कालतक एकान्त वास करने के अनंतर श्रीमती जो प्रथम बार राजमहल से निकलीं तो नेरली अस्पताल देखने पहुंची । अस्पताल बड़ा लंबा चौड़ा । उसकी गेलेरियां पाच मील लंबी हैं। डाक्टरों ने सोचा कि<noinclude></noinclude> 8lyo1p4t9ae49vi6xd73xggco9nq35t पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६५ 250 194688 665292 2026-07-06T15:10:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665292 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । श्रीमती एकाव गेलरी देखकर थकजायंगी। इसलिये उन्होंने एक गेलेरी देख- चुकने बाद श्रीमतीको लौट नानेका अनुरोध किया परंतु आपने कहा कि "यदि मैं समस्त अस्पताल देखे बिना लौट जाऊंगी तो बहुत से रोगियों की आशा भंग होगी " ॥ ड्यूक आफू यार्क के बालकोंपर आपका बहुत प्रेम था । एकदिन श्रीमतीने अपने प्रपौत्र ( डयूक आफू यार्कके बड़े पुत्र ) एडवर्डको अपने पास बुलाया । लड़का बड़ा दंगईथा श्रीमती भोजनकी सामग्रीमेंसे इथरटधर लोटपोट करने लगा। आपने उसे धमकाकर मेनके नीचे विठलादिया और जब सब तैयारी होगई तो 'पुचकार कर अपने पास भोजन कराया। तबहींसे बालकको "मेनकेनीचे" का नाम लेकर आप चिढ़ाया करतीयों ॥ श्रीमतीको चित्र निकलवानेका बड़ा अनुरागथा । इसकार्यके लिये अलग विभाग नियतथा । समय २ पर आपके चित्र सुदे २ ढंगसे निकालेजाते थे । श्रीमती दीर्घ जीवनमें इतने चित्र निकालेगयेथे कि, उनकी सूची तैयार होने में कई वर्ष लगेथे । आप घर और राज्यके अनेक काम होनेपरभी मायः समय निकालकर इन चित्रों को देखा करतींथीं ॥ आपको दिखावट बिलकुल पसंदनथी । विंडसर केसलके दक्षिणद्वारपर लोहेका फाटक लगा है उसपर किसी कर्मचारीने श्रीमतीकी आज्ञाविना चांदीका गिलट करवादिया । एक दिन अनायास आपकी उसपर दृष्टिपडी। देखकर आपने कहा कि इसको अभी छिलवादो। वस आज्ञा पातेही गिलट छिलवाया गया || श्रीमतीके पास एक स्काटलैंड वासी अनाडीसा नौकर रहताथा। उसका नाम जान मौनया। रानीकी उसपर बड़ी कृपाथी । वह प्रायः श्रीमतीसे कहाकरताथा कि "आप बड़ी कंजूस हैं | आपका लहंगा पुराना होगया। आपका कपड़ा मोटा है....." इसपर श्रीमती बुरा नहीं मानतीथीं और राजकुटुंवके लोग तथा प्रधान मंडल उसे पदच्युत करनेका निवेदन करते तो उसे भी नहीं सुनतीथीं ॥ '<noinclude></noinclude> i10ueaw23m5f4matm9wfw9um09196q9 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६६ 250 194689 665293 2026-07-06T15:10:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665293 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भयम भाग । प्रथमज्यूबिलीके समयका महारानीका चित्र । ( १४९ )<noinclude></noinclude> ld3y8w6ijngekyuc9ywxhb4te4pcp9m पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६७ 250 194690 665294 2026-07-06T15:10:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665294 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६८ 250 194691 665295 2026-07-06T15:10:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665295 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । अध्याय ५८. श्रीमतीकी सुवर्ण ज्युबिली । ( १५१ ) ब्रिटिश साम्राज्य के लिये सन् १८८७ ई० का वर्ष बड़ा हर्षमदथा । इंग्लैंडके राज कर्त्ताओंकी एग्लों सेक्सन जातिमें तीनही राजा पचास या इससे ऊपर वर्षको पहुँचैथे । तृतीय एडवर्ड, तृतीय ज्यार्ज और विक्टोरिया । श्रीमतीके पितामह वृतीय न्यानेकी ज्युबिली सन् १८१० ई० में हुईथी । २१ जूनका शुभ दिवस इस कार्यके लिये नियत किया गयाथा। उसदिन देशभर में कामकाज की छुट्टीची लंडनही क्या वरन् ब्रिटिश साम्रान्यमरके बड़े नगरोंमें और भारतवर्ष में हाटबाट गली घर और द्वार, ध्वजा, पताका और बंदनवारोंसे सुसज्जित कियेगयेथे | लंडनके राजमार्गपरलाखों मनुष्यों की भीड़थी जिससमय श्रीमतीकी सवारी नगर निकली पाने हर्षनाद किया। एकदर्शकने लिखा कि "उस समय प्रनाकाभान्त रिक हर्ष और नगर की शोभा अवर्णनीयथी” सवारी में भारतवर्षके कईएक राजाम- हाराजाभी संयुक्त थे। इनके रंगबिरंगे यत्र और अद्भुत प्रकारके आभूषण लंडनवालोंको विचित्र शोभा दिखा रहे थे। भारतीय राजाओंमेंसे इंदोरके महाराज श्रीमान् शिवाजीराव होलकर, श्रीमान कच्छनरेश, ठाकुरसाहब गोंडल, ठाकुरसाहब लीमडी और ठाकुर साहब मोरवीके सिवाय कूचबिहार के महाराजभी संयुक्त थे। इनके अतिरिक्त ईरानके सुलतान, जापानके राजकुमार कोमास्टू, हवाईकी रानी और बहुतसे पूर्वीयदेशांक राजा महाराजा उपस्थितहुएथे। सेक्सनीके अंधराजा और आस्ट्रियाके युवराजने पधारकर इस उत्सबकी शोभा बढ़ाई थी। धूमधामके साथ श्रीमतीकी सवारी गिरजे में पहुंची। वहां जाकर आपने उस सिंहासनको प्रणामकिया जिसपर प्रथम राजगादी होने का उत्सव किया जाता है। कैंटरबरीके पादरीके ईश्वरोपासना करलेनेके बाद जर्मनी युवराजने आपके हाथका चुंबनकिया। इसकेबाद श्रीमतीके पुत्र और पुत्र- योंको अनुक्रमसे आपने ओष्ठपानकेलिये दिया परंतु उन्होंने रीतिके अनुसार श्रीमतीके हाथचमे । फिर समस्त राजकुटुंबने झुकर कर श्रीमती से सलाम किया। तद्- नंतर भारत के राजाओंका नंबर आया। उनलोगोंसे भी आप बहुत सत्कारपूर्वक मिलीं और एकर करके सब श्रीमतीको सेवामें उपस्थित किये गये। उससमय भारत की देशी सेनाके कई एक अफ़सरभी वहां मौजूदये ॥ उसदिन लंडनमें षडाभव्य प्रकाश कियागयाथा। दूसरे दिन हाइडपार्क में बालकों का मलाया। अनुमान ३० हजार बालक क्रमपूर्वक परेड बनाकर श्रीमतीके सामने<noinclude></noinclude> iq5elddb55pi79mx9zo08w6unpo83sk पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१६९ 250 194692 665296 2026-07-06T15:11:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665296 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १५२ ) महारानी विक्टोरिया चरित्र । से निकले। उसदिन उन्हें सरकारी वाग़में खेल करनेकी पूरी स्वतंत्रताथी । सब वा- लकोंको एक२नारंगी, लड्डू और अन्य खाद्यपदार्थ दिये गये थे। इनके भोज में श्रीमती, युवराज और अन्य राजकुटुंब के लोगभी संयुक्त थे । इस हर्षमें इंग्लैंड, वेल्स, स्काट लैंड और आयलैण्डकी अनुमान ३० लाखस्त्रियोंने इतनेहीपौंड इकट्टेकर श्रीमतीकी भेटकिये। इसद्रव्यकेसाथ स्त्रियोंकी ओरका एक अभिनंदनपत्रथा। इसके सिवाय देश- देशांतरकी प्रजा और राजाओंने असंख्य अभिनंदनपत्र श्रीमतीके पास भेजे थे । उनका उत्तर श्रीमतीने २४ जूनके सरकारी गजटमें इस तरह प्रकाशित करवायाथा:- "बेस्टमिन्स्टर एवीको जाते और वहांसे लौटते समय मैंने और मेरे बाल- कोंने प्रजाकी ओरसे जो आदर पाया उस कृपा, अतीव कृपाके लिये मैं अंत:- करणसे धन्यवाद देतीहूं । लंडन और विंडसर में ज्यूविली पर मेरी जो प्रजाने अभ्यर्थना की है उसका मेरे हृदयपर बहुत प्रभाव पड़ा है । इससे यह निश्चय होगया कि पचास वर्षके मेरे परिश्रम और चिंतासे - ( जिनमें से २२ वर्ष मेरे अधिक हर्षके वीते जिनमें कि मेरे पतिकी छाया और सहायता थी ) जो मैंने कार्य किया उसे प्रजाने जाना है। इस बातसे और मेरे देश और प्रजाके लिये जो मेरा यावत् जीवन कर्तव्य हैं उसके अनुरोधसे अब मुझे अपने काममें और भी उत्तेजना मिली है । मेरा काम मेरी शेष अवस्थामें अधिक कठिन और झंझट युक्त है। इस महोत्सव पर आश्चर्य जनक शांति ( व्यवस्था ) और मेरी करो- ड़ों मजाका शुभ वर्ताव मेरे अधिक हर्षका कारण है । ईश्वर मेरे देशको रक्षित रक्खे और उसे बरकतदे । यही मेरी प्रार्थना है । विक्टोरिया और और आई. " इस उत्सबके हर्षमें लंडनमें कई वार सेनाकी कवायदें हुई। उनमें श्रीम- तीने प्रजाको दर्शन दिये और युवराजकी प्रेरणासे जो इम्पीरियल इन्स्टीट्यूट बनाया गया उसमें भी आप पधारी थीं ॥ उस दिन गुलाब आदि परम सुगंधित और सौरभेय पुष्पोंकी महक लंडनमें विशेष रूपपर व्याप्त हो रही थी । पाठक जानते हैं कि बालपनमें श्रीमतीका नाम " मईका कुसुम" रक्खा गयाथा। इसी कारण गुलावके पुष्पोंका लंडन नगर के हाट, बाट, गली, कूंचे, मकान, छत और खिडकियोंमें ठाठ लगाया गया । वेस्ट मिन्स्टर के मार्गपर ऐसा कोई मकान न था जिसके द्वार और खिडकियों में पुष्पोंके हार, बंदनवार और गुलदस्ते न हों। डिवनशायर हाऊससे नाना रंग- के गुलाबों का हार समुदाय विकाढिली होकर श्रीमतीकी भेंटके लिये भेजा गया था । और राज भवनके फाटक पर चीनी गुलाम के गुलदस्ते रक्खे गयेथे ॥<noinclude></noinclude> 9ivcnh59oobdyf9gr9m0tuxirfxh6r9 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७० 250 194693 665297 2026-07-06T15:11:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665297 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-- मथम भाग | ( -१५३) यह भी सुनने में आया है कि जिस समय महारानीकी सवारी उत्सवकी समा- सिके अनंतर एबीसे लौटी तो आपने वेस्ट मिन्स्टर अस्पताल के पास आते ही कोचवानको आज्ञा देदी कि "थोडीदर हमारी गाढ़ीको अस्पताल की खिड़ कियोंके निकट खड़ी रक्खो ताकि रोगी लोग भी हमारा मुख देखकर अपने दुः खित मनमें समाश्वासन पासकैं ।" इस न्यूबिलीके शुभ अवसर पर एक विशेष घटना हुई थी। इससे श्रीमती के राज्यमें एक देशकी वृद्धि देखने में आती है । वह घटना यही है कि उस दिनसे श्रीमती भारतकी तरह जुलूलैंडकी भी 'महारानी' कहलाने लगीं। यह उत्सव एटशो नामक स्थानमें किया गयाथा। महारानीकी सुवर्ण ज्यूली में हैदरावादके निजामने भारतीय पश्चिमोत्तर सीमाकी रक्षा के लिये तीन वर्षक २० लाख रुपया सरकारके भेंट किया था ॥ वर्ष ग्रंथि और ईसाई उपाधियां वितरण होती हैं वर्षके प्रथम दिन भारत वर्ष और विलायत में जो उनके सिवाय इस उत्सवपर भी पदवियां बांटी गई । भारत वर्षकी मजाको इस प्रकारका उत्सव देखनेका प्रथम ही अवसर पा और वह यह भी नहीं जानती थी कि किसी राजाके राज्यासनपर विराननेके पचासवें वर्ष में कोई उत्सव किया जाता है परंतु श्रीमतीकी मजा प्रीति और या- त्सल्यसे भारत वासियों को विशेष प्रकारका हर्ष हुआ। इस उत्सवको स्मरण रखनेके लिये भारत वर्षके अनेक नगरोंमें स्कूल अस्पताल आदि बनाये गये । उत्सव दिन बड़े २ नगरोंमें रोशनी, सभा और त्योहार किया गया और मजा और देशी राजाओंकी हार्दिक भक्ति देखकर श्रीमती और आपके प्रतिनिधि लार्ड कैंसडाउनने धन्यवाद दिया। वासियोंको जो हर्ष हुआ और जिस शित किया उसके वर्णन करनेकी मेरी इच्छा होने पर भी स्थानाभाव इस का- में बाधा डालता है । इस उत्सव पर विलायतके सिवाय भारत प्रकार उन्होंने अपने हार्दिक हर्षको प्रका- अध्याय ५९. श्रीमतीकी हीरक ज्युबिली । बाकी बात सुवर्ण ज्युबिलीको दशवर्ष निकलकर हीरक न्यूविलीका शुभ अवसर आया । १० जून सन् १८९७० को श्रीमतीके शासनके ६० वर्ष पूर्णहुए। इंग्लैंडकी गादीपर सबसे अधिक कालतक शासन श्रीमतीके दादा तृतीय ज्याने ने कियाथा। बहमी उनसठ वर्षे राज्यकर स्वर्गगामी हुएथे। श्रीमतीके शासनको ६० वर्ष पूर्ण हुए। शासनभी ऐसा वैसा नहीं किन्तु प्रजापालन, राज्यवृद्धि, और<noinclude></noinclude> 5yvxnn3xh9i65ypxvvhvn83kk12f5rb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७१ 250 194694 665298 2026-07-06T15:11:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665298 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(248) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । इंग्लैंड सौभाग्य में अद्वितीय । ऐसे शुभ अवसरपर प्रजाको हर्ष होना साधारण बात है । श्रीमतीने प्रजाको अधिक उत्साहित करनेकी इच्छा से पहलेसे प्रकाशित कर दियाथा कि "मैं लंडन नगरमें अपनी प्रजाकै मुखकमलों का अवलोकन करने और मेरे राज्यके साठ वर्ष सहर्ष समाप्त होनेके हर्षकी बधाई प्रजासे लेनेके लिये राजसी ठाटसे स्वयं जाऊँगी।" इस ठाटको देखनेके लिये केवल ब्रिटिश और भारतवर्ष की प्रजाहीनहीं किन्तु यूरोप, एशिया, एमेरिका और एफ्रिका तकके सैकडों मनुष्य इकट्ठे हुए थे। और भारतवर्ष के अनेक राजा महाराजाओं के अतिरिक्त प्रायः सबही उपनिवेशोंके प्रधान, और सैनिक, कनाड़ा, आस्ट्रेलिया और भारतकी देशी सेनाका कुछभाग, वेस्टइंडीज्, गोल्डकोस्ट और चीनकी सेना तथा प्रायः समस्त विदेशी राज्यों और साम्राज्योंके प्रतिनिधि उन्नीसवीं शताब्दि की सर्वोत्कृष्टा रानीको मंगल वाद देनेके लिये उपस्थितये ॥ श्रीमतीके सिंहासनासीन होनेके बाद लंडनमें ऐसा कोई उत्सव नही हुआया जिसकी इसके साथ तुलना होसकै । इसपर ५० हजारके लगभग सेना इकट्टी हुईथी। श्रीमतीने इस विषय में भारतवर्ष और उपनिवेशोंको एकतार दिया था । उसका आशय यह है :- "मेरे अंतःकरणसे मैं अपनी प्यारी प्रजाको धन्यवाद देतीहूं । परमेश्वर उन्हें प्रसन्न रखखै । " इस तारको पाकर भारत वासियों को जो हर्ष हुआ वह अक- थनीय है | लंडन नगर की शोभा जो भूमंडल भरके नगरोंका राजा गिने जाने योग्ये है इस समय अपूर्व थी । इस समय वह इंद्रपुरी के साथ स्पर्द्धा करता था । श्रीमतीकी सवारी अंगरेज़ी रीतिके अनुसार निकली थी । भारतवर्षकी सनाने इस सवारी में उचस्थान पाया था। इस उत्सव पर अंसख्य सभा, सोसाइटी और राज्योने श्रीमती को बधाई दी थी। और धन पुण्य भी बहुत कुछ किया गया था । इस महोत्सव पर भारतवासियोंने जो हर्ष किया वह सरकार और प्रजाके वित्तमें अभी नवीन । देशभर में अनेक स्कूल, अस्पताल, घंटाघर, पुलै, अनाथा- लय और नानामकारके मजोपकारी कार्य खोलेगयेथे ज्यूबिलीके दिन स्थान २ पर सभायें होकर श्रीमती और भारतगवर्नमेंटको देशीराजा और प्रजाने वधाई दीथी और सरकारने उत्तरमें हार्दिक धन्यवाद दियाथा। उससमय प्रजाने ईश्वरसे प्रार्थनाकी थी कि दशवर्षके अनन्तर तीसरी न्यूविली देखनेका सौभाग्य प्राप्तहो किन्तु प्रजाक आशाफलवती न हुई ।<noinclude></noinclude> aoqcsqc6m23ujl6ow8gicl5yb0gi4ao पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७२ 250 194695 665299 2026-07-06T15:11:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665299 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( १५५) उत्सव कुछदिन बाद लंडनमें एक अपूर्व दृश्यहुआथा । ब्रिटिश जलसेनाकी १६६ जहाजोंकी कुवाइदयी राजकुटुंबके लोग दो रेलभरकर देखनेके लियेगये थे । श्रीमतीभी राजसी ठाटसे गाइद देखने पधारीथीं। इस सेनामें ३० हजारसे ऊपर मनुष्यथे । जहाज़ोंपर बिजलीका प्रकाशया । प्रकाशसे रात्रिका दिन होगया था । कुवाइदके बाद तीसों हजार मनुष्योंने एकस्वरले कहा " महारानीकी जय" तीसहजार मनुष्यों का शब्द गगनभेदी हुआ । मजा और दर्शकोंने हर्षसे आशी- र्वाद दिया || अध्याय ६०. प्रजाप्रेमका अंतिम उदाहरण । सन १८९९६० के मार्ग में श्रीमतीने यूरोप की अंतिम यात्राकी । यद्यपि इंग्लैंड और फ्रांस का बहुत फालसे बद्धवैर चला आता है और सौडानमें जबसे फांसी सियनि इंग्लैंड वालेस हार खाकर नीचादेखा उनका अंगरेजोंपर विशेष डा है परंतु श्रीमतीका वहां बालोंने पैर भूलकर स्वागत किया इसी ..लिये आपने दूसरी बार जानेका विचार किया किन्तु ट्रासवाल युद्धमें फरांसीसियोंके गुप्तरूपपर पोरोंको सहायतादेने और इंग्लैंडको इसबातमें निन्दित समझने की घटना सन् १९००ई० में हुई। इस वर्ष आप फ्रांस होकर इटाली नाना . नाहती थीं और इसकार्य के लिये सन् १९०१ ई० की यंसत ऋतु निश्चित कीगईथी किन्तु इससे पूर्वेही असहन शील फरांसीसियोंने महारानीके चित्रका कई बार अप- मान किया । इसमातकी ख़बर इंग्लैंड पहुंचनेपर फ्रांसका नाना रोकदिया गया । ट्रांसवाल युद्धमें जानेसे पूर्व श्रीमतीने लार्ड रावर्ट्स और सरदार किचनरको अपने पास बुलाया और उनका बहुत सत्कार कर उन्हें इंग्लैंडकी सेनाकी प्राण रक्षा और ब्रिटिशके सुनामको स्थिर रखनेका अनुरोध किया । दोनोंने वहां जाकर बिगड़ी हुई बात वनादी । सैफकिंग, किम्बर्ली और लेडीस्मिथ का छुट- कारा हुआ। और मिटोरिया को विजयकर जब लार्ड रावर्ट्स युद्धक्षेत्र से इंग्लैंड को लौटे तो उनका पहलेसे भी अधिक सम्मान कर उन्हें गार्टर और अर्ल की उपाधिदी । श्रीमती शासनमें यह उपाधि सबसे पीछे दीगई क्योंकि आपकी मृत्युसे पूर्व दूसरे किसीको उपाधिदेने का अवसर नहीं मिला || युद्ध क्षेत्रमें वायल सैनिकों की सुश्रूषा और सेवा करने के लिये वीर इंग्लैंड की अनेक साहसी स्त्रियां ट्रांसवाल जानेको तैयार हुई। आपने विदाहोनेसे पूर्व<noinclude></noinclude> nu155fj6qrp0hjm96p644f7xlb2edku पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७३ 250 194696 665300 2026-07-06T15:11:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665300 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( १५६ ) उनको बुलाया और जब वे विदा हुई तब आपने कहाकि "तुम्हारे सुकार्य, देशसेवा और साहसको देखकर मेरा हृदयभी तुम्हारे साथ जायगा" जबतक आपके स- मयमें ट्रांसवाल के युद्धसे घायल होकर ब्रिटिशसेना लौटती रही आप कई वा- र उन्हें देखने और समाश्वासन करनेके लिये नेटली और ऊलावेचके अस्पतालों को गई। वहां दुःखित सैनिकोंने वृद्धमाताके हाथसे गुलदस्ते पाकर बहुत कुछ आरोग्यता पाई। और लंडन नगर की ओरसे दी हुई वालंटियर सेना जब वहां से लौटी तब श्रीमतीने उसके स्वागत के हर्षमें अपने दौहित्र की मृत्युको एक दिन छिपाकर यह दिखला दिया कि मैं प्रजाके सुख दुःखको अपने सुख दुःखसे अधिक समझती हूं ॥ इंग्लैंड वालोंके ट्रांसवाल के बोरों से युद्ध करने और उन्हें घर बैठे सतानेको आयलैंड वालों ने बहुतही बुरासमझाया और वे प्रकट रूपपर राजद्रोहकी बातें करने लगे । उन लोगोंका को यहां तक भड़काया कि उपद्वय होजाने का सम्भव था किन्तु आयलैंड की सेना संग्राममें बहुत वीरताके साथ लड़रही थी । ऐसे अवसर पर श्रीमतीने स्वर्गवाससे कुछ मास पूर्व आयलैंड जानेका मनसूबा किया । मंत्रियोंने इसकार्नसे आपको रोका परंतु श्रीमती को निश्चय था कि मेरे मुख कमल का अवलोकन करते ही आयलैंड वाले ठंडे पड़ जायेंगे । श्रीमतीने हर्ष पूर्वक आयलैंड की यात्राकी यह यात्रा बहुत वर्षों बादहुईथी । प्रजा माता के मुख कमल के दर्शनकी बड़ी उत्सुकथी । दर्शन करते ही सारे दुःखदर्द और कुत्सित विचारोंको बिलकुल भूलगई और श्रीमतीका बहुतही भक्ति पूर्वक धूमधाम के साथ स्वागत किया। वहांसे चलते समय श्रीमतीने आयलैंडकी प्रजाके नाम एक पत्र लिखा । उसमें लिखा कि " मैं तुम्हारी भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हुई हूँ और आयलैंड की अंतिम यात्रा मुझे सदा स्मरण रहेगी ।" इसपत्र को पाकर वहां वालोंको बहुत हर्ष हुआ ||<noinclude></noinclude> 0latmcg6iwspiqhaufal5fu2tpnplwp पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७४ 250 194697 665301 2026-07-06T15:11:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665301 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( १५७ ) वृद्धा महारानी ।<noinclude></noinclude> lqto2ig989obssn8bs6n3ytzm236bpx पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७५ 250 194698 665302 2026-07-06T15:12:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665302 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७६ 250 194699 665303 2026-07-06T15:12:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665303 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( १५९ ) अध्याय ६१. महारानीकी अंतिम बीमारी । मासठ वर्ष के निरंतर परिश्रम, बृहत् साम्राज्यकी चिन्ता, पुत्र पौत्रादिकों के वियोगका शोक और वृद्धावस्थाके कारण श्रीमतीका शरीर अनुमान एक वर्षसे अस्वस्थथा । अनेक वर्षेसि आपके आंखोंमें पीडा रहा करतीथी । डाक्टरोंको भयया कि कहीं अखें जाती न रहें। एक वर्षसे मंदामि और अशक्ति बढ़ चौथी । इट और विशाल शरीर सूख गया था। महलमें इधर उधर फिरना भी मायः पहिये वाली कुरसी द्वारा होता था। थोड़े मास पूर्व आपने भी लग नेके लिये जब यूरोप यात्राका विचार किया तष डाक्टरोंका माथा उनका था । उन्हें इसी यात्रामें आपके शरीरपतन होनेका भयथा किन्तु उन्होंने आपका हृदय न दुःखानेकी इच्छासे श्रीमतीको धारण नहीं किया था। किसी न किसी बहाने से यूरोपकी यात्रा रोकी गई परन्तु आपने अस्वस्थ शरीरसे ही आयलैंड की यात्राकी । यात्रामें किसी प्रकारका वित न हुआ किन्तु लौटने के बादसे ही स्वास्थ्य अधिक २ विगड़ता गया। डाक्टरोंने काम काज बंदकर एकान्त वासकी सम्मति दी परंतु उस समय तक किसीको यह भय न था कि आप की मृत्यु होनायगी । १९ जनवरी शनिवारको सरकारी गजटम प्रकाशित हुआ कि “गत वर्ष श्रीमतीकी शक्ति बहुत घट गई है। उनके सि को जो अनेक बातोंका फष्ट हुआ है उससे उनके शरीरको रक्तवाहिनी धमनियां निर्मल पड़ गई हैं इसलिये श्रीमती डाक्टरोंने यह उचित समझा है कि आप कामकान छोड़कर विश्रामलें । " इस समाचार को पाते ही लोगोंको चिन्ता उत्पन्न हुई । इस अवसर में श्रीमतीकी भोजनपर रुने और सुधा बिगड़ गई थी। जो लोग गत ८० वर्षसे आपके स्वास्थ्यको देख रहे थे उनको बहुत भय हुआ। क्योंकि वे ना- नते थे कि आपके लिये ये दोनों मातें बहुत भयानक हैं । शरीरकी अशक्ति के कारणही आप लार्ड राबर्ट्स से अधिक देर तक बातचीत नहीं करसकी थीं. । अंतिम वर्ष में ऐसा कोई दिन नहीं जाताथा जब ट्रांसवास युद्धकी चर्चा न हो । युद्ध में वीर अंगरेजोंकी मृत्युसे आपको बहुत खेदहोताथा और सुनते ही श्रीमती की आंखों में से आंसू बहने लगते थे। श्रीमती प्रति रविवार और ईसाइयोंक प्रत्येक त्योहारको गिरने में अवश्य जाया करती थीं। १ जनवरीकी प्रार्थनामें भी आप संयुक्त हुई थीं । १५ जनवरी को आप गधेकी गाड़ी में बैठकर<noinclude></noinclude> ekhtuv9rvflul3j9my1vmru2ji05jer पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७७ 250 194700 665304 2026-07-06T15:12:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665304 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( १६०१ ) आसवर्न के राजमहलके बागमें वायुसेवनके लिये निकली थीं । परंतु २१ जनवरीसे आपकी स्थिति बिलकुल बिगड़ गई। रोगोंके बल पकड़नेसे बेचैनी बढ़ी। गठियाने ओर बांधा । खाना पीना प्रायः बंद होगया। बेचैनी बढ़ गई और पलर पर श्रीमती के लिये भय बढ़ने लगा। श्रीमतीके स्वास्थ्यको प्रजाको सूचना देनेके लिये घंटे २ में विशेषपत्र ( Bulletin ) प्रकाशितहुए और बिजली की चमक की तरह तार द्वारा श्रीमती की भयंकर बीमारीके समाचार ब्रिटिश साम्राज्य क्या वरन दुनिया भर में फैलगये । श्रीमती की चिन्तामें लोगोंने कामकाज कम करदिया । जहांदेखी वहीं इसबात की कानाफूसी होनेलगी । राजभक्तमजाने गिरजे, मंदिर और मसनि- दोंमें जा २ कर श्रीमती की आरोग्यताके लिये ईश्वरसे प्रार्थनायें की । नानीकी बीमारीके समाचार सुनकर जर्मनीसे सम्राट् द्वितीय विलियम दौड़ेहुए लंडन आये । आस्चर्नसे जाकर श्रीमती की मृत्युके पूर्व शनिवारको युवराजने अपने भानने नर्मनसम्राट् का स्वागत किया। वह इस समय नानी की बीमारीमें आयेथे इसलिये उन्होंने स्वागतमें कुछभी धूमधाम न करनेदी । और उतावले चलकर श्रीमती पास जा पहुंचे । श्रीमतीने उनको पहुँचानकर अपने निकट बिठलाया परंतु टूटेफूटे संभाषणके अतिरिक्त अधिक बातचीत नहीं की श्रीमती की अशक्ति और भी पढ़ाई और राजकुटुंब के सब स्त्री पुरुषोंने आपके पास निरंतर रहना आरंभ किया || मंगलवारको मध्याह्नके पश्चात् आस्वर्नमें उपस्थित रहनेवाले मनुष्योंने जान लिया कि समय निकट आपहुंचा है । महलके फाटकपर लोगोंकी बहुत भीड़ इकट्ठी होगई । विशेषता यह थी कि इस भीड़ में देश प्रदेश और परराज्योंके समाचार पत्रों के संवाददाताओं की संख्या अधिकथी । तीन मदरासी जो इंग्लैंडके उत्तरभागमें व्याख्यान देते थे इस समाचारको पाकर महलके फाटकपर पहुंचे और रानीके मुन्शी से बातचीत कर श्रीमतीके अंतिम दर्शन का सौभाग्य प्राप्तकरसके । चार बजे तक लोगोंकी आशा भंग नहीं हुईथी। जो महलके भीतर से आता वह यही कहताथाकि "स्थिति बिगड़ी नहीं है ।" किन्तु एकाएक चार बजे महलमेंसे " जहाज डूबने" का शब्द आया । सुनतेही भीड़ में सन्नाटा छागया। लोगों के पैर थरथराने लगे । हृदय दुःखसे उमड़ आया । इतनेहीमें महलकी पुलिसके अफ़सर मिस्टर चार्लेस फ्रेजरने आकर रोते २ कहा:- "मुझे परम खेद है कि महारानीका साठे छः बजे देहान्त होगया ।"<noinclude></noinclude> 50wnyldyxtr79dqnnxegldzi0s0mne9 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७८ 250 194701 665305 2026-07-06T15:12:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665305 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( १६१ ) इस पात्से भीड़को जो शोक हुआ उसको प्रकाश करनेकी लेखिनी में शकि नहीं है । उसीसमय सरकारी गजटके विशेषपत्र में प्रकाशित हुआ:- आस्वर्न राज प्रासाद २२ जनवरी ६|| बजे, सायंकाळ । श्रीमती रानीका ६ बजे सायंकालको देहांत होगया। उस समय आपके पुत्र पौत्रादिक समस्त राजकुंटुब उपस्थित था" || अध्याय ६२. महारानीको मृत्यु और संसार में शोक । इस ख़बर के पातेही नगरका बाज़ार खटासट बंद होगया। आठ बजेसे पहले २ लंडन जन शून्य दिखाई देने लगा। लोगोंक हृदयमें केवल एक ही बातसे संतोष होता था। वह संतोष असाधारण नहीं था। जिनको अपने आत्मीय सेकिसीकी मृत्यु देखनेका काम पढ़ाहै ये अच्छी तरह जानते हैं कि मरने वाले अंत समयके कष्टको देखकर उसके प्यारोंको कितनी व्याकुळता होती है, अपने परम मिय संबंधी मरनेके समय अपने दुःखको भूलकर वे क्यों कर कहने लगते हैं कि इस कष्टसे तो छूटना अच्छा है। परंतु यह बात श्री- मतीको भोगनी न पड़ी । शरीरकी अशक्ति और किंचित् पीडाके सिवाय आ- पको कुछ दुःख न हुआ । “अनायासेन मरणम् विना दैन्येन जीवनम् । " इस लोकोक्तिके अनुसार एक देवताकी तरह पुण्य पुरुषके समान बिना कष्ट प्राण प्रयाण कर गया । श्रीमतीका शव कई दिनोंतक मृत्यु मंदिरमें रखखागया ... और दीन किसानसे लेकर बड़ेसे बड़े अमीरतकको आकर दर्शन करनेकी वतंत्रता दीगई । और सदाकी तरह उन दिनोंमें भी श्रीमतीके शबके पास भारतवासी सेवकोंका पहरा रहा। इस मृत्युसे ग्रेट ब्रिटेनकी मजाको जो शोक हुआ उसका अनुमान लंडन. नगर के प्रसिद्ध दैनिक समाचार पत्र “टाइम्स" के लेखसे होता है । 'टाइम्स यहांपर बड़ा प्रभावशाली पत्र है। उसकी सम्मति प्रजाकी वास्तविक सम्मति समझी जाती है। उसने लिखा कि यद्यपि लैंड राज्यके नियमोंसे बढ़कर रानीने कभी पैर नहीं रखा किन्तु वह अपने कर्तव्य पालनमें कभी विमुख न रहीं। वह ब्रिटिश जातिकी प्रधान न्यायाधीश बनकर सदा काम करती रहीं और जब कभी.<noinclude></noinclude> sr5a79z47qtvtxev57v94ugroqsa5hg पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१७९ 250 194702 665306 2026-07-06T15:12:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665306 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१६२) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । आवश्यकता हुई उन्होंने अपने राजत्वके पदके अनुसार मंत्रियोंको अनुचित कार्यसे रोकने में त्रुटिनकी । भीतरी और बाहरी बखेड़ोंके समय यदि उनकी नेक चलनी और योग्यता सहायक न होती तो अनेक बार उपद्रव होना संभवथा । यूरोपके राजनैतिक विषयोंमें उनका कितना प्रभाव था । इस बात की साक्षी केवल इतिहास ही दे सकते हैं परंतु हमें इसके बहुत प्रमाण मिले हैं कि जिनमें उन्होंने देश और देशांतर के टंटे बखेड़े मेटने में बहुत सेवाकीथी । वह सेवा इतनी बढ़कर थी कि अब उनके न होनेसे हमारे साम्रा- न्य और हमारी जातिकी स्थिति औरका और हो जायगी। शक्ति, उन्नति, सुख, शांति और मजाकी वृद्धि जो उनके मारब्धसे, उनके दीर्घ जीवनमें प्रजाको प्राप्तहुई वह अनंत है | और इसकारण इतिहासके पृष्ठों पर विक्टोरिया का सुवर्ण जीवन सदा अंकित रहेगा जिनकी मृत्युपर आज हमको परम, परम शोक है ।" यह समाचारपत्रोंकी सम्मति की बानगी है किन्तु इस संवादको पाकर ग्रेटनिटन और आयर्लेण्ड की प्रजाको जो शोक हुआ उसे विलायती पत्रोंने अकथनीय तलाया है। उनका कथन है कि समग्रदेश उससमय शोकसागरमें निमत्र था । इसके चिह्न सर्वत्र दिखलाई देते थे। झंडे आधे झुकादिये गयेथे, लोगोंने काले वस्त्र धारण किये, व्यापार और राजकीय कार्य पूर्ण रूपपर बंद रहा। प्रत्येक नग- रके लाईमेयर, जज और प्रभावशाली पुरुषों की प्रेरणासे महती सभायें एकत्रि- तकर शोक प्रकाशित किया गया और राजकुटुंब की सेवामें सहानुभूतिसूचक तार या पत्र भेजेगये । यही दशा श्रीमतांके बृहत् साम्राज्यके प्रत्येक नगर और ग्राम की थी। यावत् उपनिवेशोंसे इसी प्रकारके समाचार आतेथे । फांस बहुत कालसे इंग्लैंड का कट्टर शत्रु है। ट्रांसवाल युद्धमें इंग्लैंड का अनुचितकार्य मानकर नहांकी प्रजाने महारानी और युवराजके चित्रोंका अपमान कियाथा और लोगों के ऐसे२मलिन विचार देखकरही श्रीमती तथा युवराजने थोड़े मासपूर्व फांसी यात्रा बंद रक्खी थी किन्तु इस दुःखदायिनी घटना के समय एकस्वरसे फरांसीसी लोग श्रीमतीके गुणोंका गान करने लगे। वहांकी गवर्नमेंट की ओरसे विदेशीय विभागके मंत्री एम् डेलकासी और अन्य मंत्रि- वर्ग प्रेसीडेंट बालडेक रौसियोको लेकर ब्रिटिशराजदूतके पासगये और जो न जासके उन्होंने अपने प्रतिनिधि भेजकर मान्यवर मिस्टर माइकल हर्ट ब्रिटिश राजदूतसे शोक प्रकाशित किया। फ्रांसकी प्रजाके विचार पैरिस के प्रभावशाली पत्र 'फिगेरो' से विदित होते हैं। उसने लिखाहै कि - " इस प्रभावशालिनी रानी के साथ ही एक दीर्घ कालीन और वैभव सम्पन्न शासनका अंत होगया और<noinclude></noinclude> fdybkk0v63rxrm40a0jy8wzr4wfgm1e पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८० 250 194703 665307 2026-07-06T15:12:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665307 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. प्रथम भाग | ( १६३ ) एक सद्गुण सम्पन्न व्यक्ति उठगया | रानी विक्टोरिया की मृत्युसे मिटिश सामाज्य की ४० करोड़ प्रजाको ही केवल शोक नहीं हुआ है किन्तु यूरोप और यावत् सभ्य संसार इससमय शोकमें नियम है। संसार में जितनी जातियों की ब्रिटिशके साथ मित्रता है उसमें से फ्रांस को सबसे बढ़कर शोक हुआ है। हम उन्नीसवीं शतान्दिकी परम विभव शालिनी रानीकी समाधिपर प्रतिष्ठा पूर्वक शिर झुकाते हैं और अपने शोकको ब्रिटिश लोगोंके शोक में संयुक्त करतेहैं । अब जिस व्यक्तिने ब्रिटिश सामान्य का शासन अपने हाथ में लिया है वह प्रजामिय, प्रीतिपात्र और मिलनसार मनुष्य हैं। " फरांसीसी पत्रों में “मैटिन " ब्रिटिश नीतिका खंडन करने में बहुत प्रसिद्ध है उसका कथन है कि “विक्टोरिया अब संसार में नहीं है। उनकी वृद्धावस्था, उनके उत्तम कार्य और प्राचीन राजाओंके समान उनके सुशासन की जो प्रतिष्ठा थी उसका अंत आगया। यह कहना अनुचित नहींहै कि उनकी मृत्युसे संसारमें बहुत लौटफेर होगा । और बड़ी २ घटनायें होंगी। विस्मार्ककी मृत्यु इसके सामने कुछ नही है । थोड़े ही दिनों में मालूम हो जायगा कि इस राजसी समाधिने क्या २ करडाला । हम जानते हैं कि ६४ वर्षके राज्यमें ग्रेट ब्रिटेन की बहुत कुछ उन्नति हुई है। " यद्यपि यहसंवाद रूसकी राजधानी सेंट- पीटर्सवर्ग मे २३ जनवरी को ही पहुंचगया था किन्तु प्रकाश उसका दूसरे दिन हुआ था । राज्यके झंडे आधे गिरा दिये गये और सेनाध्यक्ष, मंत्रिगण और राजकुटुंब अनेक लोगोंने ब्रिटिश इतके पास जाकर सहानुभूति प्रकटकी थी । बहांके समाचार पत्रोंने अपने कालमोंके काले पार्डर लगाकर इस शोकको प्रकाशित किया था। और इस मसंगपर कितनेही पेपरों ने श्रीमतीका चित्र भी छपाया । जर्मनी के सब पत्रों ने मुख्य लेखोंमें इंग्लैंड का इतिहास छापा और महारानी का शौक बड़े मतिष्ठित शब्दों में लिखा । यद्यपि उन लेखों में दक्षिण एफ्रिका के युद्ध के विषयमें महारानी के शासनकी निंदाकी गईथी किन्तु उनके लिये बहुत मशंसा थी । और जहां २ पर निंदा की गई यहां अमात्य वर्ग को दोषी बतलाया गयाथा। बर्लिनके सरकारी गजटमें जर्मन सम्राट्की ओरसे आस्वर्नसे २३ जनवरी की लिखी एक आज्ञा मुद्रित हुईथी जिसमें लिखा था कि - "मेरी प्यारी परम प्रतिष्ठित सदास्मरणीया नानी विक्टोरिया ग्रेट ब्रिटेन और आयलैंडकी रानी तथा भारत वर्षकी महारानी का देहान्त होनेसे मुझे और मेरे कुटुंबको परमशोक हुआ। मुझे भरोसा है कि मेरी सेना मेरे इस असह्य कष्ट साथ देगी और इसीलिये मैं आज्ञा देताहूं कि मेरी सेना के<noinclude></noinclude> 258dwxuk97dtwoo3daei6arv6p4kgz6 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८१ 250 194704 665308 2026-07-06T15:13:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665308 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १६४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । समस्त अफसर लोग चौदह दिन तक श्रीमती का शौक पालें । ग्रेट विटेनकी रानीके नामकी जर्मनी में फर्स्टड्रेगन सेनामें तीन सप्ताहतक शोक मनाया जाय और इनमें से प्रथम तीन दिन सेना और सर्व साधारण दफ्तरोंके झंडे आधे झुके रहें ।" वेलजियमके समाचार पत्रों ने काले वार्डरके साथ विशेष पत्र मुद्रित किये । वहां नाटक बंद रक्खेगये, झंडे आधे गिराये गये और प्रजाने बहुत शोक किया। हॉलैंड, इटाली, स्पेन, यूनान, डेनमार्क, आस्ट्रिया और यूरोपके सबही देशों में रूस, फ्रांस और जर्मनी की तरह शोक मानागया । भूशियामें चार सप्ताह, सेक्सको वर्ग में छ: सप्ताह, पुर्तगालमें एकमास, रोमेनियामें दशसप्ताह, सेक्सनीमें तीनसप्ताह - स्पेन में तीन सप्ताह, आस्ट्रिया हँगेरीमें एकमास, मोंटनेग्रोंमें तीनसप्ताह, बलगेरिया में चार सप्ताह, इटाली में दो सप्ताह, बेलजियममें आठ सप्ताह, डेनमार्क में १४ फरवरी तक, बेडनमें तीनसप्ताह, स्वीडन में तीन सप्ताह और रूस में तीनमा सतक राजरीतिपर शोक रहा || यह संवाद जिससमय न्यूयार्क ( एमेरिका ) में पहुंचा सायंकालके ६ ||| बने थे। समाचार पत्रोंक कार्यालयोंके द्वारोंपर उस समय बडीभीड इकट्ठी हो रहीथी। सुनतेही लोगोंने व्यापार बंद करदिया । सरकारी मकानोंके झंडे आधे गिरादिये गये । एमेरिकाकी राजधानी वाशिंगटन में समाचार पातेही ब्रिटिश दूतसे वहां के मंत्रिमंडल सहानुभूति प्रकाशित की। प्रजातंत्र के समस्त मेंबरों की सभा इकट्ठी होकर प्रेसीडेंट मेकिनलीने राजासप्तम एडबर्डको सहानुभूति सूचक तार दिया । इस अवसर में वहां एक घटना हुई । म्यूनिसिपलिटीके " सिटीहाळ " पर जो झंडा उड़रहाथा उसको नगरके लार्डमेयर बेनबिकने न झुकानेदिया । यहांतक कि प्रेसीडेंट मेकिनलीने भी उनको समझाया परंतु उन्होंने यही कहा कि “ एमेरिकाकी गवर्नमेंटने जब हमको बोर जनरल जूपर्टकी मृत्युके समय झंडा न उतारने दिया तो अबभी हम न झुकावेंगे।' इसबातसे लोग उनपर बहुत अमसन्न हुए परंतु उन्होंने अपना हठ न छोड़ा। यह घटना न्यूयार्ककी है। वहां 'ट्रिव्यून' बहुतप्रभावशाली पत्र समझा जाता है । उसने प्रथम पृष्ठपर श्रीमतीका चित्र देकर बहुत विस्तार पूर्वक उनका और नवीन राजाका चरित्र प्रकाशितकि- या और चीनके वाशिंगटन स्थितप्रतिनिधिने उसपत्रको लिखा कि- “ विक्टोरिया बहुतही वृद्धार्थी । उनके दीर्घ जीवनका मैं बहुत आदर करताहूं । ईश्वर उनके अनेक गुणोको जानताया। जो सम्मान माताकी माताओं और पिताओंकी .<noinclude></noinclude> 4s6g1ghgbcvucu5qslnt9h4itaz8hni पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८२ 250 194705 665309 2026-07-06T15:13:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665309 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | ( १६५ ) माताओंका करना चाहिये वही विक्टोरिया रानीके लिये उपयुक्त है। उनके न्याय और सरलताकी इतिहास बेत्ताओंमें बड़ीमतिष्ठा होगी ।" एमेरिकाके समाचार पत्र बडे स्वतंत्र हैं । घहांके प्रेसिडेंटके विषयमें लिखते समयभी कभी दो तीनपृष्ठ से अधिक नहीं लगाते हैं किन्तु प्रभावशाली "ट्रिब्यून" ने सातपृष्ठ में महारानी की प्रशंसा की । अध्याय ६३. महारानीकी समाधि | श्रीमतीका देहान्त २२ जनवरीके सार्यकालको हुआ था किन्तु समाधि क्ष गई २ फरवरी शनिवारको। उनका शव २७ जनवरीको संदूकमें रक्खा गया। उसके ऊपर हीरोंसे जड़ा हुआ श्वत साटिन मंढाथा और उस पर राज सुकुट और श्रीमती पदक जो उनको भिन्न २ राज्योंसे मिले थे रक्खे हुएथे । जव- तक समाधि न हुई लंडन नगरके गिरजोंमें महारानीकी आत्माको शांति मिल नेके लिये प्रजावन प्रार्थनाकी और राज कुटुंबके सब लोग शवके पास बैठ- कर मार्थना करते रहे । ७ फरवरीको आस्वर्नके राज भवनसे महारानीकी स- चारी निकली । उनका संदूक तोपकी गाड़ी में रक्खा गया । उसे आठ घोड़ोंने खचा । संदूक के साथ २ सैनिक वरदीपहने नवीन सम्राट् जर्मन नरेश, डचूकं आफू कनाट रहे और इस अवसर पर फ्रांसका प्रतिनिधि, बेलजियम, यूनान और पुर्तगालकें राजा संयुक्त हुए। जिस समय श्रीमतीको जहाज़पर चढ़ाया या सलामी में उनके वयकी सूचनाके लिये ८१ तोपें चलाई गई। इस समय विदेशी राज्योंके सात सैनिक जहाज़ जिनमें एक फांसका था उपस्थित थे । सब मिलाकर साठ जहाज़ श्रीमतीको नौकाके साथ चलतेये । जहानसे उतार कर शव जिस समय लंडनके गिरनेमें लेजाने के लिये भूमिपर लाया गया उसके आगे सेनाको किये हुए लार्ड रार्बट्स और नवीन सम्राट् जर्मन नरेश तथा वि- देशी राजा पीछे न उस समयका दृश्य बहुतही हृदय द्रावक था । इस अवसर पर स्यामके राजकुमार और सीलोन, हांगकांग मलाया और लाबु- आनके प्रतिनिधि सर सेसिल कीमेंटीभी आपहुंचे थे। श्रीमतीको देखकर मजाका हृदय भर आया। लोगोंकी आंखोमेंसे आंसू बहने लगे और सबहीन प्रकार २ कर महारानीकी प्रशंसाकी । इसके बाद सन्नाटा छागया । लाखों मनुष्यों की भीड़को फाड़ती हुई महारानीकी अंतिम सवारी स्मशान में पहुंचाई<noinclude></noinclude> k7scqb27wds57ottit82tbboslzpt03 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८३ 250 194706 665310 2026-07-06T15:13:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665310 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १६६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | गई । मार्ग में मेमोरियल गिर्जयें प्रार्थना करने बाद जिस समय श्रीमतीका शव फाग मोरमें पहुंचा सेनाने मार्गके दोनों ओर सफ बांधकर अंतिम सलामी ली । इसके अनंतर जो क्रिया हुई वह प्राइवेट थी इसलिये राज कुटुंबके सिं- वाय वहां कोई उपस्थित न हो सका। वहां पहुंचने पर पादरियोंने ईसाई धर्मके अनुसार धार्मिक महारानीकी अंत्येष्टि क्रियाकी । फिर श्रीमतीका शव उनके पतिकी कुवरके निकट रक्खा गया । श्रीमती की आज्ञासे उनकी प्यारी अंगूठी जो साठ वर्ष पूर्व अपने पतिकी ओरसे उन्हें प्रथमभेट मिलीथी उनकी अंगुली में पहनाकर उनके शबके साथ रक्खी गई । यद्यपि यह अंगूठी बहुमूल्य नथी परंतु श्रीमतीका उसपर इतना प्रेमथा कि पांच मिनटका वियोगभी आपको सहन नहीं होता था । इनकी अंत्येष्टिक्रियामें फुल ३५ ॥ हजारपौंडका व्यय कूतागयाहै । और कुबरके ऊपर लैटिन भाषामें इसतरह खुदवायागया:- यहां परमपवित्र, शक्तिमती, और सर्वोच्च रानी विक्टोरिया धर्मकी प्रथम रक्षका, ग्रेट ब्रिटेनकी रानी और भारतवर्षकी महारानी का शरीर रक्खाहै । अध्याय ६४. भारतवर्ष में शोक और वाइसरायका व्याख्यान । श्रीमतीके स्वर्गवाससे तीनदिन पहले जबसे भारतवर्ष में आपकी बीमारीके समाचार पहुंचे छोटेसे लेकर बड़े तकके घरमें यही चर्चा थी। हाट बाट गली दूकान और नहीं देखो वहीं लोग श्रीमतीकी प्रशंसा करते थे। हिन्दू, मुसलमान ईसाई पारसी अपने २ मंदिर, मसजिद, गिरने और अभिमंदिर में इकट्ठे हो २ कर श्रीमतीकी आरोग्यताके लिये प्रार्थना करने लगे । महारानी की भीमारी की चिन्ता, भवि- ष्यत् प्रबंधका विचार और इसी प्रकारकी बातचीत में लोगोंने मनभर कामकरना- छोड़दिया। बड़े नगरोंक दैनिक समाचार पत्राने विलायती तारोंसे श्रीमतीका<noinclude></noinclude> gin4t1uzedvmkwdeuu3r0v6z6y7wj3e पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८४ 250 194707 665311 2026-07-06T15:13:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665311 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग | (१६७) दिन २ बिगडता हुआ स्वास्थ्य सुनाकर मजावर्गको चिन्तामें डुबो रक्खाया इतने ही २३ जनवरीका प्रभात हुआ। प्रथम दिन रात्रिके दो बजेकी आई हुई ख़बर अतिशीघ्रही सब नगरोंमें जहां २ तारचरहे पहुंचगई। अन्यत्र दूसरे तीसरे दिन पहुँची । विना किसी की प्रेरणाके व्यापारियोंने व्यापार बंद किया, दुकानदारों मे दूकानें उठादी और कार्यालयोंमें छुट्टी होगई। जगह २ महारानी की दयाशी- लताकी प्रशंसा और उनकी मृत्युपर खेदके सिवाय किसी तरह की चर्चा रही। जिन लोगोंने कभी श्रीमनीकें दर्शन नहीं कियेथे, जो नवीन शिक्षा न पाकर ब्रिटिश राज्यका प्रबंध पार्लियामेंट और महारानीके विषयमें भी कुछ नहीं जानतेये उन्होंने भी महारानीको सराहा। उनके हृदयमें महारानी की वह दया जो श्रीमती समय २ पर भारतके अपराधियोंके माण मचाकर दिखाया करतीयों, निवास कर रही है। उसीको यादकर दीनभारतवासियोंने आंसू बहाये । पुत्रको माताकी मृत्यु से जैसा कष्ट होता है, छोटे बालक मार्के तनिकदेर हटने पर मा मा कहकर पुकारने लगते हैं, वैसेही अभागे भारतवासी शोकान्वित होगये । जिन लोगोंका पाषाणके समान हृदय था जो दूसरे के दुःखपर हंसा करते थे उन्हों नेभी देश माताकी मृत्युपर शोक से वस्त्र भिगो दिये। इसमें कुछ आश्चर्य नहीं है । वह साक्षात् दयाकी मूर्ति थीं। जबर भारतवासियोंपर कष्ट पडता था ये श्रीमती तक अपनी गुहार पहुंचानेका प्रयत्न करते थे । वे अच्छी तरह जानते थे कि माताके पास प्रार्थना न पहुंचनेही से उनपर विपत्तिहै । श्रीमती समय २ पर अपने प्रेम संभाषणसे भारतवासियोंके मनको प्रशांत करती रहती थीं । एसी माताकी मृत्यु सुनतेही देशव्यापी शोक हुआ। छोटे से लेकर बड़े तकके हृदय में मर्माहतहुआ || शोकही शोककी चर्चा में एक सप्ताह निकलगया । २ फरवरी को महारानी की समाधिका दिन निकट आया । उसदिन प्रजाने अपनी इच्छा से बाज़ार बन्द कर दिया। तेल और लवणभी मिलना कठिन होगया । भारत वर्ष में उस- दिन ऐसा कोई नगर न रहा जहां हड़ताल न हुईहो। पढ़े लिखे लोगों ने मिल- कर स्थान २ पर सभायें की। अपनी इन सभाओं में संयुक्त हुए। मंदिरों, मसजिदों और गिरजों में श्रीमतीकी आत्माको शांति मिलनेके लिये ईश्वरसे . प्रार्थना की गई। उसदिन कलकत्ता और बबईका अपूर्व दृश्य था । कलकत्ते के मैदानमें श्रीमती की मूर्तिके निकट सबही जाति और धर्मके मनुष्य इतने इकट्ठे हुएथे कि पैर रखनेको जगह नहीं मिलती थी । चारों ओरसे “इरि<noinclude></noinclude> 0xgyzd5fvs1fa33stbymn4fl6s24189 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८५ 250 194708 665312 2026-07-06T15:13:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665312 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १६८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । बोल २ " का शब्द गुंजरहा था । अमीर गरीब सबही नंगेपेर हिन्दुओंके धर्मानुसार स्मशान भूमिके योग्य वस्त्र पहने इधर उधर फिरते और भीड़में घुस २ कर मूर्त्तिके दर्शन करनेका प्रयत्न करते थे उसदिन भारतवासी रंगबिरंगे वस्त्र पहनना भूल गये थे। भीड़ में श्वेतके सिवाय और रंग कम दिखाई देताथा। यही दशा बंबई की थी। हजारों वरन् लाखों मनुष्य श्रीमती की मूर्तिके पास इकट्टेथे । लोगोंने अपना हार्दिक प्रेम प्रकाशित करनेके लिये मूर्ति- पर फूलोंक हार चढ़ाये थे। उस दिनको भीडको मूर्तिके पाससे हटाने में पुलिस भी असमर्थ थी । जिस समय गिर से लौटकर बैईके गवर्नर लार्ड नार्थकोट वहां आये प्रजाका आन्तरिक मेम देखकर छक होगये । देशी रजवाड़ोंमें सर्वत्र शोक सूचक सभायें शोकके वस्त्रोंका धारण करना, अंगरेज़ी रीतिके अनुसार तोपें दागना, उत्सबकी बंदी और राजधानियोंमें हड़ताल हुई । जोधपुर नरेशने अपने भाई बेटे और कर्मचारियों सहित देश माताको वास्तविक माता मान- कर हिन्दू धर्मकी रीति अनुसार तालाब पर सूतक निवृत्तिके लिये स्नान कि- या । उस अवसर में मुसलमानोंका कोई धार्मिक त्योहारथा परंतु मुसलमान राजाओंने किसी प्रकार की धमधाम न की ॥ अंगरेज़ अफसरोंने उसदिन गिरजे में स्थानीय अंगरेजों के साथ नमाजें पढ़ीं। बाइसराय और बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर कलकत्ते में और अन्य स्थानीय गवर्नर अपनी राजधानियोंमें राजरीतिपर इस प्रार्थनामें संयुक्तहुए । वाइसराय ने सरकारी कर्मचारियोंको आज्ञादी और अन्य ब्रिटिशमजासे अनुरोध किया कि सबलोग ६ मार्च तक पूरे और १७ अपरेल तक आवे शोक सूचक चिह्न धारण करें। उपाधि वितरणके लिये कलकत्ते में जो राजाओं का एक छोटासा दर्वार होने वालाथा वह बंद रहा और उससमय देशभर में एक साथ शोकके बादल छाये || भारतवासियोंके हृदय में श्रीमतीकी मृत्युसे कितना शौक हुआ उसका अनुमा- न २५ जनवरीके 'पायोनियर' से होता है । उसने लिखाया कि "भारत वर्ष- के सब भागोंसे, हमारे समस्त संवाददाताओंकी ओरसे और अधिक तर उन लोगोंकी ओरसे जिनका कभी हमने नाम तक नहीं सुना है इतने तार आ रहे हैं जिनसे हमारा दफ्तर भरा हुआ है। इस समय देश भरमें शोक छा गया है। इस साम्राज्यने शोक प्रकाशित करनेके लिये गवर्नमेंट के अनुरोधका मार्ग पती- क्षण नहीं किया है किन्तु प्रजाके हृदयमें सच्चा दुःख है और उसी को वह इस<noinclude></noinclude> 1zh3geze72rhqaf8prwrggd9xqerm2y पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८६ 250 194709 665313 2026-07-06T15:14:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665313 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( १६९ ) तरह प्रकाशित कर रही है। " यह संवाद २५ जनवरीका है। भारत पासि- यकि शोककी बानगी 'पायोनियर' जैसे पत्र में प्रकाशित होना ही वास्तविक शो- कका गांभीर्य बतलाये देता है। दूसरा प्रमाण भारत वर्षके वाइसराय लार्ड कर्मन ( पैरन कर्जन आफ केडस्टल ) का व्याख्यान है जो उन्होंने १ फरवरीको भारत गवर्नमेंट की व्यवस्थापक सभामें दिया था उसका सार यह है :- "ग्रेट ब्रिटेनके मुकुटने हमको इस सभा में उपस्थित होकर भारत वासियोंकी भलाई के लिये आईन बनानेकी शक्ति दी है। टस मुकुटको एक शताब्दिक दो तृतीयांश वर्षोंतक धारण करने वाली भली महारानीके लिये जो बहुत वर्षों- तक सुशासन कर मशंसा प्राप्त करनेके बाद सिधार गई हैं कृतज्ञ होनेको आज हम यहां इकट्ठे हुए हैं। ऐसी प्रतिष्ठित बुद्धिमती, पवित्र और निर्दोष रानी ( राजकर्त्री ) ब्रिटिश राज्यमें कभी उत्पन्न नहीं हुई थी। भारत वर्षने भी उन के समान कोमल हृदया, उदार, न्यायी और अपनी यावत् मजाको, चाहे वह किसी जाति और देशकी क्यों महो, पुत्र सम लालन पालन करने वाली महारानीको असंख्य वपॅर्म देखाथा । भारतके देशी राजाओंको ऐसी शुद्ध हृदया महारानीके होनेका गर्वथा और भारतकी यात् मजा उनमें माता और रानीके संयुक्त गुणोंको देखती थी । सरकार के सेवक चाहे जहां नियुक्तहों उनसे आज्ञाथी कि वे प्रजाकी रक्षाकरें और उनके आदर्शपर चलें। भारतवर्ष के शासनमें उन्होंने जो सुकार्य कियेये उनके कहनेका आज अवसर नहीं है। क्या भारतके शासन और संबंध का यावत् उल्लेल, सन् ५८ के प्रसिद्ध डिंडोरे में जो हमारे लिये स्वर्णाक्षर युक्तने- ताहै, नहीं हैं? इतिहासोंमे राजाओंकी मशंसा करने की चालहे। ऐसा हम विगता, न्यायी, पराक्रमी और साधुओंके विषयमें पढते आयें। परंतु इस जगह प्रशंसामें अत्युक्ति का नामतक नहीं है। श्रीमती अपने पतिके लिये उत्तमका विशेषण दिया करतीयों वही उनके लिये उपयुक्त है । यदि उनके राज्यमें कुछ दोष हो वा कभी उनके शासन की निन्दा हुई हो तो उसका कारण श्रीमती नहींथीं। वह सर्वोपरि थीं। उन्होंने प्रत्येक मनुष्यके मनपर अपने गुण अंकित करदियेथे । आजदिन भारत वर्ष में जैसा सचा शोकहै वैसा ब्रिटिश राज्यमें कहीं नहीं है। गत दश दिन में मेरे पास भारतवर्षकी अनेक नातों और अनेक मनुष्योंके इतने तार और ८<noinclude></noinclude> mbr6rqt8stv40e1zyih1vrn4jcgxofz पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८७ 250 194710 665314 2026-07-06T15:14:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665314 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १७० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । पत्र आयें हैं जिनका ढेरसा लगाहुआ है। इस समय भारतवर्ष शोक में डूब रहा है। समाचार पत्रभी इस बात का पूरा प्रमाण है कि लोगोंको हार्दिक दुःखहै। हमें केवल उनकी मृत्युपर खेदही नहीं है वरन गर्व भी है। उनका शासन एक शताब्दिक चार चांश को पहुंचकर अन्य राजाओंके शासन कालसे बढ़ निकलाथा । परम वृद्धावस्थामें अन्त तक वह प्रेम और वृद्धि के लिये सदा युवती के समान काम करती थीं। उन्हें राज्य और मुजा के लिये कोई कार्य करना शेष नहीं रहाया । और न किसी प्रकारके वैभवमें न्यूनताथी । उन्होंने ग्रेट ब्रिटेनके साथ भारत वर्षको जोड़कर उस राज्यको जगत् प्रसिद्ध कर दियाथा । केवल ब्रिटिश राज्य में ही क्यों वरन संसारभरमें यदि कोई व्यक्ति महारानी के समान गुण रखने वाला वीसवीं शताब्दिमें जन्मधारण करे तो संसार का सौभाग्य समझना चाहिये। मैं आज इसी लिये इस कौंसिलमें कुछ काम नकर इसे एक सप्ताह के लिये बन्द करता हूँ ।" श्रीमान्के व्याख्यानसे महारानी विक्टोरियाके सच्चे गुण और भारत पासि- योंके हार्दिक शोक का बोध होता है। भारतवासियोंके लिये वाइसरायके वाक्य एक सनद के समान हैं। उन्होंने सन् ५८ के डिंडोरे को जो अपना नेता बतला याहै वह भी ध्यान देनेयोग्य है । भारतवासियों के शोकपर श्रीमान् नवीन सम्राट् सप्तम एडवर्डने जो धन्यवाददिया उसका उल्लेख इसीपुस्तक के अंतमें उनके चरित्रमें किया गया है ||<noinclude></noinclude> rdpevq2qh3qxadbpadzb4xpba8lwdl7 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८८ 250 194711 665315 2026-07-06T15:14:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665315 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । भारतीय सेवक सहित महारानी । ( १७१ )<noinclude></noinclude> ahh2pd45wbt5hnqtoytckydq40rgjdr पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१८९ 250 194712 665316 2026-07-06T15:14:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665316 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९० 250 194713 665317 2026-07-06T15:14:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665317 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । (१७३) अध्याय ६५. महारानी पर भारतकी प्रजाका प्रेम । जिन महारानीके भारतवासियोंने कभी दर्शन नहीं कियेथे, जो भारतीय में कभी हाथ नहीं डालतीथीं और जिनकी पार्लियामेंट और मंत्रिमंडल में भारतका एक भी प्रतिनिधि नहीं है उनपर भारतवासियोंका इतना प्रेम क्यों- था जिनके स्वर्गवास होनेपर यहां बालोंने इतना शोक क्यों किया और जिन्हें इस देश वाले देवीके समान क्यों समझतेथे १ चरित्रके अंतमें इन बातोंपर भी विचार होना आवश्यक है । इंग्लैंड के राज्यप्रबंधक अनुसार राजाको प्रबंधक भीतरी कामोंमें हाथ डालनेकी सत्ता नहीं है । राजाकी सम्मतिकै मतिकूल यदि पार्लियामेंट और मंत्रिवर्गका काम होतो वह दोनोंको बदल सकता है किन्तु उनके किये हुए काम हाथ नहीं डाल सकता है। भारत प्रबंधका संघटन चिचित्र है। ब्रिटिश उपनिवेशोंके निवासियोंकी पुकार पार्लियामेंट में पहुंचने का मार्ग है किन्तु भारतकी ओरका एक भी प्रतिनिधि नहीं है । इस कारणसे श्री- मतीके कानतक देशकी सच्ची दशा पहुंचाने का कोई उपाय नहीं था। इतना होनेपर भी जो मात आपके श्रवण गोचर होती थी उस पर आप अच्छी तरह विचार कर भारत वासियोंकी सहायता करती थीं। आपने देशियोंपर प्रेम दि- खलाने के लिये उस अवस्थायें, जब भारत वासी स्वर्गको प्रयाण कर जाते हैं और जो जीते हैं वे बिलकुल अशक्त होतेहैं, भारत वर्षको मुख्य भाषा उर्दू जो हिन्दी का एक रुपान्तर है सीखी थी। आपको इस देशपर विशेष प्रकारका प्रेमथा इसीलिये इंग्लैंडमें वहांकी रीति भांति जानने वाले मढ़ियासे बढिया सेवक विद्यमान रहते हुए भी वह अहमदखां और गुलाम मुस्तफा नामक दो सेवक सदा अपने पास रखती थीं। दोनों सेवक श्रीमतीके परम कृपापात्र हैं। श्रीम- ती अधिक अशक्त होगईथीं इसलिये येही आपको उठाने बैठानेका काम कर- तेथे । श्रीमतीकी समाधिसे पूर्व उनकी मरण शय्याका पहरा इन्हींको सौंपा गया था। दोनों सेवक मुसलमान थे। आपके पास कोई हिन्दू नहीं था। इस- का कारण यह नहीं समझना चाहिये कि उनको हिन्दुओंसे घृणार्थी किन्तु वर्ण हिन्दू आपकी सेवा स्वीकार नहीं कर सकते हैं और नीच वर्णका र खना श्रीमतीकी इच्छा और यहांके राज नियमेकेि विरुद्ध था । श्रीमतीने उर्दू आगरा निवासी हाफ़िज़ अब्दुल करीम साहवसे सीखीथी और अपने भारत<noinclude></noinclude> 934khgkeulat07spbsyjjs6163669eb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९१ 250 194714 665318 2026-07-06T15:14:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665318 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १७४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । बासी सेवकों के सिवाय आप राज कुमार डयूक आफू कनाट और उनकी पत्नीसे भी जो बहुत कालतक भारत वर्षमें रहेथे प्रायः उर्दूमें बात चीत किया करती थीं ॥ जब कभी भारतवर्षपर अकाल, देशव्यापी रोग, रेल्वे दुर्घटना और पहाड़ टूट पडने आदिका विपत्ति पड़ती थी श्रीमती दीन दुःखियाओं के लिये सहानुभूति प्रकाश करती और उनकी सहायताके लिये चंदा देनेमें सबसे अग्रणी बनतीथीं इसबात का ताजा प्रमाण सन् १९००० का अकाल और दार्जीलिंगकी दुर्घटना है। श्रीमतीको पति पुत्रोंके मरणका जबर कष्ट सहना पड़ा तब ही तब भारतको प्रजाने आपके दुःखको अपना दुःख समझा और महारानीको " महारानी ” की पदवा मिलने तथा न्यूविली आदिके महोत्सवमें भारतवासियोंके हृदयका सच्चा हर्ष देखकर श्रीमतीको इसदेशकी प्रजाकी भक्तिका निश्चय होगयाथा । वह जानती थीं कि भारतवासी सदासे राजाको ईश्वर का विशेष अंश वा अवतार मानते हैं और सन् ५७ के उपद्रवके बाद जब अंगरेज़ लोगोंके कोपा- नलकी ज्वालामें इंग्लैंड के मंत्रिमंडल की नीतिमे पड़कर भारत वासी भस्महोना चाहते उससमय पतिको सम्मतिसे आपहीने इस देशका धर्म बचाया था । सन् ५८ कार्डिडोरा श्रीमतीकी इच्छासे ही लिखा गया है। यदि उसमें आप उचित परिवर्तन न करती तो न मालूम भारत वर्षकी क्या दशाहोती । इसका वर्णन अन्यत्र हो चुका है इसलिये यहां लिखनेकी आवश्यकता नहीं है । श्रीमतीका सच- रित्र और वयोवृद्ध होनाभी उनपर भारत वासियों की पूज्य बुद्धिका कारण है । श्रीमती भारतमेमकी सबसे बढ़कर साक्षी आपकी "दिनचर्या (डायरी ) " है। इसमें श्रीमती नित्यकी घटना में लिखा करती थीं। यह अभीतक विलायत में प्रकाशित नहीं हुई है। छपने से बडी २ बातें मालूम होंगी ॥ अध्याय ६६. श्रीमतीका भारतमें स्मारक । श्रीमतीके नामपर भारत वर्ष के मुख्य २ नगरोंमें आपकी मूर्ति, कालेन, स्कूल, अस्पताल और अनेक स्मारक इस समय विद्यमान हैं। श्रीमतीकै स्वर्गवास होनेपर इस देशके वाइसराय लार्ड कर्जनने देशभरकी ओरसे एक स्मारक बनानेका संकल्प किया है । यद्यपि सन्९७ और १९०० के लगातार अकालने देशको दार- द्वता के शिरपर पहुंचा दियाहै, इस देशमें जो लोग धनाढचके नामसे प्रसिद्ध हैं बेभी<noinclude></noinclude> euxewvsaiwlt1t3ojrak85hk241ez76 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९२ 250 194715 665319 2026-07-06T15:15:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665319 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम भाग । ( १७५) अकाल और प्लेगसे दीन होने उपरांत अकाल फंड और ट्रांसवाल के युद्धमें धन और मनुष्योंसे बहुत कुछ सरकार की सहायता करचुकेहैं परंतु वे इस समय अपनी दीनता को भूलकर "विक्टोरिया जातीय स्मारक फंड " में मुक्त हस्तसे रुपया दे रहें हैं । इस पुस्तक के प्रैसमें जाने तक इस फंडमें पचास लाखके लगभग रुपया इकट्टा हो चुका है । इस देशके राजा प्रजाने केवल इसी फंडमें रुपया नहीं दिया है परन जातीय स्मारक के सिवाय प्रान्त २ और नगर २ में स्मारक बननेकी ख़ुदी व्यवस्था होरहीं है । अभीतक कोई नहीं कह सकता है कि कहां पर किस ' प्रकार का स्मारक मनाया जायगा || यद्यपि देशके अनेक विद्वान प्रजा और कितनेही ऐंग्लो इंडियन समाचार पत्र ( पायोनियर आदि ) कलकत्ते में एक बृहत् भवन बनवानेके विरोधी और ये चाहतेहैं कि श्रीमती देशियों पर जैसी दया रखतीथी उसके अनुरूप ऐसा स्मारक बनाया जाय जिससे भारतवर्ष की दरिद्रता दूरहो किन्तु लार्ड कर्जनने कलकत्ते के मैदान में एक विशाल भवन बनाना निश्चय किया है इसमें श्रीमती की एक मूर्ति रक्खी जायगी और महलके भीतर भारत वर्षके इतिहाससम्बन्धी अनेक पदार्थ प्रदर्शित होंगे । अभीतक ठीक २ निश्चय तो नहीं है कि इसमें क्या २ होगा किन्तु श्रीमान्ने कलकत्तेक डलहौसी इन्स्टीट्यूट में वक्तृतादेते समय कहा है कि-" विक्टोरिया हालमें बादशाह बाबरके समयसे आजतक जितने वीर मत प्रवर्त्तक, प्रसिद्ध राजा, शूर, देशहितैषी और विद्वान हो चुके हैं उनकी प्रतिमू- तियां रक्खी जायगी। और दार्शनिक, कवि, और ग्रंथकारोंकोभी इसमें स्थान मिलेगा । इसके सिवाय अकबरकी पगड़ी, जहांगीरका बखतर तथा भारतवर्ष की प्राचीन और अर्वाचीन कारीगरीके नमूने भी इसमें स्थान पायेंगे " ॥ अध्याय ६७. श्रीमतीको आशीर्वाद । गत अध्यायमें जिन स्मारक चिह्नोंका वर्णन हुआ है ये नर्मनलुके अगोचर नहीं है किन्तु आपका मुख्यस्मारक भारतके मजाकी हृदयमें विद्यमान है। श्रीमती की दया, श्रीमती सद्गुण और सच्चरित्रने भारतवासियोंके हृदयमें निवास कियाहै । यही स्मारक सबसे मढ़कर है और वही चिरस्थायी है । जिसका<noinclude></noinclude> bnxknl777dpqsd1brsbo1xmqzejutvs पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९३ 250 194716 665320 2026-07-06T15:15:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665320 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १७६) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | संसार में यहै, जिसने जन्मसे लेकर मृत्यु तक अपना जीवन परोपकारमें विताया है, जो अपने दुःखसे प्रजाके दुःख को अधिक समझतीं रहीथीं जिन्होंने शत्रु परभी दयाकर दयाकी मूर्ति खड़ीकी थी, जिनके लिये ब्रिटिश और भारतवर्षकी प्रजाके सिवाय अन्य २ देशोंके लोग भी शोकके आंसू बहाते हैं, जिन्होंने भलाई के सिवाय बुराईका कोई कार्य नहीं किया, जो सदा गृहस्थीके कार्य और विशाल राज्यका बोझा शिरपर होने पर भी ईश्वर भक्ति में दत्तचित्त रहीं, जिन्होंने पतिको ईश्वर जाना उनका स्वर्ग- वास होनेमें संदेह नहीं है । श्रीमतीने इस असार संसारमें अपने कर्तव्यका पूर्णतया पालन कर वृद्धावस्था में स्वर्गका मार्ग लिया है उनका वहां भी आदर है। परमेश्वर उनका सदा आदर करे और वह अनेक युगों तक साथही भारत वासियोंके सुख दुःखकी ईश्वरतक गुहार पहुँचाकर मोक्षपदको प्राप्त हों यह मेरा हार्दिक आशीर्वाद है। केवल मेराही नहीं श्रीमतीकी असंख्य प्रजाका आशीर्वाद है ॥ देवलोक में निवास करनेके श्रीमतीने वृद्धावस्था में स्वर्गको प्रयाणकर ब्रिटिश साम्राज्यके शासन करने के लिये अपने बड़े पुत्रको पूर्ण वयमें संसारका पूरा अनुभव प्राप्तकर श्रीमतीके समान गुण ग्रहण करनेके अनन्तर छोड़ा है। ईश्वर उनको अपने पुत्र पौत्रादि सहित प्रसन्न रक्खे। और उनके शासनमें मजाको अधिक सुख हो । वर्तमान सम्राट् सप्तम एडवर्डका चरित्र इस पुस्तकके अंत में दिया गया है ॥ प्रथमभाग समाप्त |<noinclude></noinclude> d1mxlgm88qaxh343heflzqrdxl3fxpn पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९४ 250 194717 665321 2026-07-06T15:15:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665321 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीः । श्रीमती केशासन की मुख्यघटनायें । भागदूसरा । अध्याय १. प्रथमवर्षकी तीन बातें । श्रीमतीके सिंहासनासीन होने पूर्वसे ही इंग्लैंडमें यहूदियोंको धर्म द्वेषसे गवर्नमेंट की सेवामें बड़े २ पद नहीं दिये जाते थे। श्रीमती के गादी विराजने के चौ दिन मिस्टर मोंटी फ्योर नामक यहूदी लंडन नगरका शेरीफ नियत किया गया । और इसके बाद नवंबर मासमें उसे नाइट की उपाधि दीगई । इस गातने गवर्नमेंट और मजाकी दृष्टिमें प्रमाणित करदिया कि श्रीमतीका शासन परस्पर के धर्म द्वेषको छोड़कर सब जाति और सब देशके लोगोंके साथ समान होगा । इस सिद्धान्त का शासनारंभके साथ जैसे आरंभ हुआ था वैसेही अंत तक निर्वाह हुआ | आपके शासनारंभसे पूर्व इंग्लैंडके राज्य में यह नियम था कि जो मनुष्य जाली कागज़ बनाता था उसे फांसीका दंड दिया जाताथा । यह नियम बहुतही भयंकर था। इंग्लैंड जैसे सम्यदेशमें जिसने संसारमें सभ्यता फैलानेका बहुत कालसे बीड़ा उठा रक्खाथा इस नियमका होना लोगोंकी दृष्टिम बहुत निन्द- नीय समझाजाताथा । इंग्लैंडकी प्रजा इस नियमसे बहुत अमसन्नथी। केवल थोडेसे हठीले कंसरनेटिव लोगों के आग्रहसे यह नियम चलरहा था । राना चौथा विलियम लिनरल होने परभी उन लोगोंके दवावसे कुछ नहीं कह सकता था। श्रीमतीके सिंहासन पर विराजने सत्ताईसवें दिन इस नियमको उठाने क बिल पार्लियामेंट में उपस्थित हुआ। उदारनीति रानीकी हार्दिक उदारताने हठी लोंके चित्तपर ऐसा प्रभाव डाला कि उन्हें यह बात स्वीकार करनी पड़ी। बहुत वादानुवादके पश्चात् नवीन आईन पासहोगया और उसीदिनसे जालसाज़ लोग फांसीपर जाकर प्राणदेनेसे बच गये ॥<noinclude></noinclude> 7p34tqwi2nsz85955iojqxfrdchkd17 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९५ 250 194718 665322 2026-07-06T15:15:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665322 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १७८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । तीसरी बातने संसारका बहुतही उपकार किया। उपकार ऐसा वैसा नहीं जिससे केवल बड़े २ मनुष्यों को या इंग्लैंड की प्रजाकोही लाभ पहुंचाहो। इसकार्यसे मनुष्य मात्रकी स्थिति में एक आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ । कार्य यहथा कि विद्युत शास्त्रके मुख्य आचार्य मिस्टर ह्रीटसन और कूक जो बहुतकालसे इस बातकी शोध में लगे थे, श्रीमती शासनके प्रथम वर्षमें लंडनमें यूस्टन स्कैर मुहल्लेले केमडनतक तार लगाने में समर्थ हो सके। यदि विजलीक वलसे तार लगानेकी क्रिया संसारमें न होती तो आज कल सम्पदेशोंकी जैसी उन्नति देखने में आती है उसका दशव हिस्साभी न होता । श्रीमतीके शासन के प्रथम वर्ष में इस शक्तिका अविष्कार हुआ जिससे मानों यह सूचना मिली कि आपके राज्यमें कलाकौशल्यकी बहुत उन्नति होगी। इस विषयमें भी श्रीमती के शासनने जिन बातोंका आरंभ कियाथा उनको उन्नतिके शिखरपर चढ़ाकर छोड़ा ॥ अध्याय २. काबुलका प्रथम युद्ध | जिससमय श्रीमतीके शासन का आरंभ इंग्लैंड में ऐसे उत्तम प्रकारपर हुआ भारतके शासनने एक भिन्नही मार्ग ग्रहण किया । सुप्रसिद्ध यात्री कप्तान एले क्जेंडर बर्नेस काबुलके अमीर दोस्त मुहम्मदके साथ व्यापार संबंधी काम में संधि करनेके लिये काबुल गया। प्रसिद्ध इतिहास कर्ता और पार्लियामेंटके मेम्बर मिस्टर मंस्टिस मेकार्थी तथा कप्तान बनेंस ने लिखा है कि अमीर दोस्त मुहम्मद ब्रिटिशगवर्नमेंट और प्रजाके साथ मित्रता रखतेथे । उनको ब्रिटिश गवर्न मेंट की इतनी खातिर स्वीकारथी कि यदि कप्तान साहब चाहते तो रुसीदूतको जो उससमय काबुलके दर्बारमें आने वालाथा अपने पास न बुलाकर कहरसेही टरकादेते परंतु विलायत और भारतके अंगरेज़ अधिकारियोंको रूसकी औरसे इतना संदेह होगया था कि उन्होंने अमीर दोस्त मुहम्मद का विलकुल विश्वास न कर उन्हें शत्रु मान लिया। पंजाब केसरी महाराज रणजीतसिंह काबुलके शत्रु और भारत गवर्नमेंटके मित्रथे । अमीरने अंगरेजोंसे कहकर पंजाब नरेशसे मित्रता करना चाहा था परंतु सरकारने उनकी बातपर ध्यान न देकर अमीरसे युद्ध करने का ठहराव किया। मिस्टर जस्टिस मेकार्थी ने लिखा कि इसविषयमें कप्तान बर्नेसने जो सम्मतिदीथी उसे उल्टी तरह पार्लियामेंट में उपस्थित कर उसके कथन का यह आशय समझागयाकि कप्तान काबुलसे युद्ध करना चाहत<noinclude></noinclude> jhezq9gemqqy23nem6p7emk0z0v2ouk पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९६ 250 194719 665323 2026-07-06T15:15:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665323 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग। ( १७९ ) है । भारत वर्ष के गवर्नर जनरल लार्ड आकलैंडने दोस्त मुहम्मद की गायी शाहशुजाको दिलाना निपकिया। शाहशुजा गादीके लिये उम्मेदवार नहीं हुआथा किन्तु सुना है कि उसे गादी देनेकी उत्तेजना दी गई। काबुलके साथ प्रथम युद्धहो शाह शुजा अमीर बनाया गया। उसे वहांकी मजा नहीं चाहती थी इसलिये रक्षाकरनेके लिये सरकारको आठ लाख सेना काबुलमें रखनी पड़ी। अफ़गानिस्तानकी प्रजाने सन् ४१ के नवम्बर में मलवा किया। ब्रिटिश सेना बिलकुल काटडाली । इसपर भारत गवर्नमेंटको फिर सेना भेजकर कावुलियों का दमन करना पड़ा परंतु अंगरेजी सेना अधिक कालतक यहां ठहर न सकी। भारत वर्षके नवीन गवर्नर जनरल लार्ड एलनमरोने १० अक्टूबर सन् १८४२ ई० को एक मंतव्य में यह प्रकाशित किया कि “ काबुलके विषय में पुराने गवर्नरननरलोंकी युक्ति निष्फल हुई । कामुल जैसी स्वतंत्र मजापर उसकी इच्छा के विरुद्ध राजा नियत करना ब्रिटिश नीति के विरुद्ध है इसलिये अफगानिस्तानवाले अपने यहां जिसे अमीर बनाना चाहें वहीं गवर्नमेंट को स्वीकार है । और अंगरेजी सेना काबुलमें न रक्खी जायगी। और प्रकृतिने भारत वर्षकी जो सीमा निर्धारित की है उसी पर गवर्नमें- टको संतोष होगा ॥ " इस युद्धमें सर एलेक्जेंडर बर्ने सर विलियम मैकोनाटन और उनकी समय ४००० सेना काटडाली गई। और इस भयंकर दुर्घटनाकी सुपर देनेके लिये केवल एकही मनुष्य डाक्टर बाइड बचे जो लुढ़कते पुढ़कते नवंबरके चले १३ जनवरीको जलालाबाद पहुंचे | नवीन ठहरायके अनुसार दोस्त मुहम्मदको फिर गादी मिलगई । जनरल पालकने काबुल जाकर मारने काटनेसे जो लोग बचे बचाये थे उनको छुड़ाया और दोस्त मुहम्मद से नवीन ठहराव के अनुसार संधि कर ब्रिटिश गवर्नमेंटका अफ़गानिस्तान में दबदना स्थिर किया || अध्याय ३. व्यापारकी स्वतंत्रता और वाष्पयंत्र । श्रीमती शासनके द्वितीय वर्ष में वाष्पकी सहायता से प्रथम वार " ग्रेटवे- स्टर्न” नामक धूमपोत इंग्लैंडसे चलकर पंद्रहवें दिन एमेरिका पहुँचा। इससे पहले जहानें केवल पालके सहारे से चलाई जातीथी और इस कारण उन्हें भारत के आने में छः मासके लगभग लगते थे । इस सफलतासे, संसार भर<noinclude></noinclude> qalezrn9nn4bnfzulzdy4blf3fp6en3 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९७ 250 194720 665324 2026-07-06T15:15:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665324 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १८० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । में व्यापार की बृहत् उन्नतिका आरंभ हुआ । और इसीके द्वारा युरो- पियन लोगोंने पृथ्वी भरके समुद्रों की यात्रा कर एक पैंडू २ धरतीको भी देखनेसे न छोड़ा || सन् १८१५ ई० में इंग्लैंडकी पार्लिया मेंटने एक ऐसा आईन बनाया था जिसके अनुसार अन्नका भाव प्रत्येक कार्ट पीछे अस्सी शिलिंगका नहो वहाँ तक बाहरका अन्न इंग्लैंडमें नहीं आने दिया जाताथा । यद्यपि पीछेसे इसमें थोड़ा बहुत संशोधन हुआथा किन्तु इस आईनसे दीन लोगोंको महंगीका बहुतही कष्ट भोगना पड़ता था । और कई बार भूखोंके मारे प्राणतक न्योछावर कर डालते थे । इस कष्टसे मजाको बचाने के लिये श्रीमतीके शासनके द्वितीयवर्ष में एक सभा नियत हुई। इसके सभापति पार्लियामेंट के पिताकी उपमा पाने वाले मिस्टर चार्लेस व्हीलर्स हुए। अनेक वर्षोंतक अविश्रांत परिश्रम करने वाद सन् १८४९६० के जनवरी मासकी ३१ तारीखको इन लोगों की सफलता हुई । और ग्यारह वर्ष के परिश्रमसे उन लोगोंने इंग्लैंडमें बाहरसे आनेवाले अन्नका महसूल उठवा दिया। इस नियमके प्रचारसे पूर्व आयलॅंडमें वारंवार अकाल पड़ाकरता था। लोगोको केवल आलूपर निर्वाह करना पड़ता | सरकारने दीनोंको काम देने और चन्दे आदिसे सहायता करनेका बहुत कुछ प्रयत्न किया परंतु कुछ लाभ न हुआ और लाखों मनुष्य वहांसे भागकर एमेरिकामें जानसे । ग्रेटब्रिटेन को उजाड़ करने वाला आईन उठकर जबसे अमति बंध व्यापारकी प्रणालीका प्रचार हुआ तबहीसे वहां के लोगोंकी उन्नतिका आरंभ हुआ || सन् १८३९६० अर्थात् श्रीमतीके शासनके तृतीय वर्षमें भारत वर्षके विषयमें एक बात हुई। दक्षिण एफ्रिकामें बसने वाले अंगरेजों के दवावसे यहां की गवर्न- मेंटने एक नियमका प्रचार किया जिसके अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनीकी सीमाके बाहर काम करने वाले भारतवासी मज़दूरोंको दक्षिण एफ्रिकामें लेजाना बन्द हुआ। इससे दक्षिण एफ्रिकामें व्यापार करने वाले अंगरेजोंको बहुत चिन्ता हुई और पीछेसे यह नियम उठानापड़ा। फिर उनलोगोंने ऐसे नियमोंका प्रचार कर वाया जिनसे आजकलके भारतवासी कुली उपनिवेशों में जाकर ब्रिटिश राज्यमें दासत्व भोगरहें हैं । और कुलियोंको भरती करने वाली डिपोमें अनेक प्रकारके कपटकर दीनों को छलाजाताहै ॥<noinclude></noinclude> cp8x6wasxly6dwjx759yx74e1mnbryd पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९८ 250 194721 665325 2026-07-06T15:16:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665325 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (१८१) अध्याय 8. चीनसे लड़ाई, अदनका बंदर और दास व्यापार । सन् १८३९ ई० में भारतवर्ष से चीन जाने वाली अफीमका वहांक बन्दरोंमें उतरना चीनगवर्नमेंटने बिलकुल बन्द करदिया और उस खेपमें जितनी अफीम गईथी उसे समुद्र में डलवाकर उसका रुपया अंगरेज व्यापारियोंको देदिया और आगेसे अफीम आने का कठिन निषेध किया। इससे पूर्व चीन गवर्नमेंटने एक नोटिस देकर भारत गवर्नमेंटको सूचना देदीथी परंतु ईस्ट इंडिया कम्पनी की आयका अफीम एक मुख्य साधनथी इसलिये कंपनीने उक्त नोटिसकी कुछ पर्वाह न कर फिर अफीम चीनको भेजी जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत गवर्नमेंटने चीनपर चढ़ाई की। युद्धमें चीनकी हार हुई | हांगकांगका बंदर ब्रिटिश गवर्नमेंट के हाथ आया और अन्य पांच बंदरों पर स्वतंत्रातासे अंगरे- जोंका माल उतरने देनेकी बात लाचारीसे चीनको स्वीकार करनी पड़ी। मि- टिश गवर्नमेंटने चीनसे ४५ लाख पौंड दंड लिया और १२ || लाख पौंड व्यापारियों को हर्जानेके दिलाये । इस युद्धसे चाहे भारतके व्यापार को पूरा लाभ हुआ किन्तु चीनकी इच्छा के विरुद्ध हट्टे कट्टे चीनियोंको अफ़ीमची बनाकर उनकी शारीरिक और आर्थिक दुर्दशाका लड़ाईसे आरंभ होगया और सत्य में पढ़कर निर्बल चीन अपनी प्रजाको अफ़ीम खानेके दुराचारसे न रोकसका ॥ अदनका बंदर ब्रिटिश सेनाने इसी वर्ष में विजय किया । यह बंदर व्यापार तथा लहानोंके आवागमनके लिये बहुत ही आवश्यक है । अंगरेजों के विला- यत जानेका अदन एक नाका है। इसमें भारतकी सेना रहकर वहांकी रक्षाकर- ती है और यह की गवर्नमेंट के अधिकार में है। एनकी नहर बनने से विलायत जाने वालोंको मिसरका चकर दिये बिना सीधे जानेका मार्ग खुल गया है और जो मार्ग डेढ मासमें समाप्त होताथा उसमें अब केवल १७ दिन लगते हैं । इस नहर की रक्षा इसी बंदरकी सेनासे होती है । जर्मनी और फूां- सके वारंवार दबाने पर भी अनेक कौसलसे ब्रिटिश गवर्नमेंट मिसरको इस नहरपर अपना आधिपत्य रखने के लिये नहीं छोड़ती क्योंकि नहर हाथमें रहे बिना अंगरेजों से भारत दूर पड़ता है ॥ श्रीमतीका विवाह होने बाद थोड़ेही दिनोंमें आपके पति प्रिंस एलबर्टकी प्रेर णाले संसारसे दास व्यापार बंद करनेके लिये एक सभा स्थापित हुई। इसके<noinclude></noinclude> opou5jj7s2iwq0cgnes4mlmttgujqy1 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/१९९ 250 194722 665326 2026-07-06T15:16:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665326 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १८२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | सभापतिका आसन राज्ञीपतिने स्वीकार किया । इनके प्रयत्नसे अंतमें इंग्लैंड ने दास व्यापार बन्द करा संसारमें नाम पाया || इसी वर्ष में इंग्लैंडने डाक विभाग में बहुत कुछ उन्नतिकी । पहले चिट्ठी और पारसलका महसूल, पहुंचनेका स्थान जितना ही दूर होताथा उतना अधिक लिया जाता था । महसूल लेनेमें पत्रके तौलके सिवाय उसके पृष्ठ की भी गण- ना की जातीथी । चिट्टीका महसूल कमसे कम चार आना था। इसके सिवाय डाक आन कलकी तरह नित्य आती जाती नहीं थी । पार्लियामेंट के सभासद सर रोलैंड हिलके प्रस्तावसे सन् १८४०ई० में १० जनवरीको नवीन नियमका प्रचार हुआ। इसके अनुसार आधे आंडस ( १ तोला ) तोलके पत्रकी एक पेनी लेना निश्चय हुआ। थोड़े कालके अनंतर इस योजनाके अनुसार भारतमें भी थोडा बहुत सुधार हुआ || सन् १८३७३० में बोर लोगोंने नेटाल प्रान्त में निवासकर उसको आवाद किया और वहाँका स्वतंत्र शासन आरंभ कियाथा किन्तु सन् १८४५ ई० में अंगरेज़ोंने बोरोंसे युद्धकर नेटाल उनसे छीन लिया तबसे नेटाल ब्रिटिश गवर्नमेंट के अधिकार में है । अध्याय ५. सोमनाथ के मंदिर के किवाँड़ । काबुलके अमीरके युद्धका चाहे भारत गवर्नमेंट के लिये परिणाम कैसाही हुआ हो परंतु हिन्दुओंके लिये इससे एक प्रकारके हर्षका कारण हुआ । हिन्दू- धर्मसे द्वेष रखनेवाला महमूद गजनवी सोमनाथके मंदिरको तोड़कर उनकी मूर्ति, जवाहरात और सोने चांदीके किवाड़ दक्षिण देशसे गजनीको लेगयाथा। तबसे वे किंवाड़ गजनीमें रक्खे हुए थे। काबुलसे विजयकर दोस्त मुहम्मदको दुबारा वहांकी गादीपर नियत करनेके बाद वहांसे जो सेना भारतको लौटी वह गजनीसे किंवाड़ लेती आई। सन् १०२४६० में महमूद गजनवीने भारतपर चढ़ाई कर यहांकि हजारों मंदिरोंको नष्ट करडाला था । काबुलके इस युद्धसे दश बारह वर्ष पूर्व पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह शाह सुजाको इस शर्त- पर काबुल दिलाना चाहते थे कि वह गादीपर बैठकर सोमनाथके मन्दिरके किंवाड़ भारत वर्षको लौटा दे। यह शर्तें शाद सुलाने स्वीकार नहीं की थी। भारतके गवर्नर जनरल लार्ड एलेन बरोने विचार किया था किये किंवाड़ फीरोनपुरसे सोमनाथ तक. बड़ी धूम धामसे पहुँचाये जावैं जिससे भारत वर्षकी प्रजाका गवर्नमेंट के साथ<noinclude></noinclude> sdvx6ygmmjcepij6g2zg7az14l3ijjy पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०० 250 194723 665327 2026-07-06T15:16:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665327 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (१८३) प्रेम बढ़ेगा । इस कार्यके लिये लाट साहमने देशीराजाओं और प्रजाके नाम एक ढिंढोरा प्रकाशित करनेके विचारमे उसकी पांडु लिपि स्वीकार करनेके लिये इंग्लैंड भेजी थी। उसका आशय यह था :- " हमारी विजयिनी सेना सोमनाथके मन्दिरके किंवाड़ अफगानिस्तानसे लौटा लाई है । उनके बिना गजनी में महमूद गजनवीका मकबरा खंडहर होगया है । आठसौ वर्षके अपमानका बदला अब लिया गया है। सोमनाथ के मंदिरके किंवा आप लोगोंकी हारकी जो अवतक सूचना देते थे ही अब तुम्हारी कीर्तिका विकाश करतेहैं । उनके लौटा लानेसे निश्चय हुआ कि सिंधुनदीके उसपार बसनेवाली प्रजासे आपलोग सैनिक बलमें बड़े चढ़े हैं। सिरहिंद, रजवाडा, मालवा और गुजरात के राजा तथा सर्दारोंको मैं इस युद्ध की सफलता की कीर्तिका चिह्न अर्पण करताहूं आपलोग धूमधामके साथ इन चंदनके किंवाड़ोंको अपने देशसे सोमनाथके नवीन मंदिरतक पहुंचाना । हमारी विजयिनी सेना सतलज नदीके पुलपर किंवाद आप लोगों को नियत तिथि पर सिपुर्द करेगी । तिथि नियत कर उसकी सूचना पीछे से दी जायगी || ब्रिटिश गवर्नमेंट केलिये आप लोगोंके प्रेमपर मैं सदासे विश्वास रखता आया हूं। वह आपके प्यारके लिये कितनी योग्य है इसे आपलोग अच्छीतरद जानते हैं। क्योंकि यह आपके सम्मानको अपना सम्मान समझती है। और अफगानलोगों के आप लोग अधीन थे उस समयको स्मरण दिलाने वाले मन्दिरके किंवाड़ आपको लौटाने में उसने अपनी सेना काममें लगाई है। मेरे (निजके) लिये मुझे इतनाही कहना है कि मेरे लाभ और विचारों को आप लोग अपने लाभऔर विचारोंमें मिलाकर ब्रिटिश सेनाकी इस वीरताके काम परजो हर्ष आप मकाशित करतेहों उसमें मैं संयुक्त होता हूं। इसकार्यसे मेरे देशको और आपके देशको जिसे मैंने अपना अभी घर बनाया है कभी न भूलने योग्य सम्मान प्राप्त हुआहै । हमारे दोनोंके देशोंके संयोगका निर्वाह और संशोधन दोनोंही की उन्नति के लिये आवश्यक है। मैं इसबातपर सदा ध्यान देताहूं। इसी संयोग से भारतपर पहले जो वारंवार संकट पड़ते थे उनका नाश होगा। इसी संयोगसे मिटिशसनाने गुजुनीके खंड- हर और काबुल के बालाहिसार किलेपर अपना झंडा फहरायाथा। परमेश्वरने इससमयतक जैसी मेरी रक्षाकी है वैसीढ़ी वह अबभी करतार है जिससे मैं अपनी शक्ति और अधिकार का योग्य उपयोग कर आप लोगोंकी उन्नति करने और दोनों देशों के संयोग को सदा स्थिर रखनेके लिये दृढ पाये पर लाने में शक्ति- याच होऊ " ॥<noinclude></noinclude> j2psb28xng68fzjev29z14esktnbr0j पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०१ 250 194724 665328 2026-07-06T15:16:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665328 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १८४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । इस प्रस्ताबसे इंग्लैंडमें बड़ी चर्चा हुई । इस बातके लिये गवर्नर जनरलको डांट बतानेके लिये पार्लियामेंटमे इस आशयका प्रस्ताव हुआ कि यह ढंग मूर्ति पूजाको उत्तेजना देने और मुसलमानों को भड़काने वाला है। इसका कारण यही था कि गवर्नर जनरल लार्ड एलनबरोने भूत पूर्व गवर्नर जनरलोंकी योजनाको बिलकुल उलट कर सिंधु नदीको अफ़गानिस्तान की सीमा नियत करना नि- श्र्चय किया था । यह बात भारत की मजाको बहुत पसंद हुई थी । वाइस रायने श्रीमतीकै नाम दिल्लीसे सन् १८४३ ई० की १९ फरवरीको एक प्रार्थना पत्र लिखाया:- "लार्ड एलेनबरो ५ फरवरीको दिल्ली आये। आस पासके समस्त राजा उनसे वहां पर मिले | बीकानेर, अलवर, भरतपुर, कोटा और धौलपुरके राजा तथा टोंक के नव्वावकी सेनाने दिल्लीके किलेके चारों ओर छावनी डाल रक्खी है और कई ओरसे नगरके भीतर भी जा घुसी है । वे अपने साथ बहुतसी सेना, नौकर चाकर कुटुंब और जागीर दारोंको लाये हैं। उनकी संख्या पचास हारसे कम नहीं है ॥ औरंगजेवके शासनके बाद आधीन राजाओंका इतना बड़ा जमघटा यहां कभी नहीं हुआ था । वे लोग सर्कार के सत्कारसे बहुत प्रसन्न हुए हैं । फल लार्ड एलेनबरोने उनको ११ रेजिमेंटकी कवाइद और अठारह तोपें देखने के लिये बुलायाथा । इसे देखकर ये बहुत प्रसन्न हुए थे | सोमनाथ मंदिरके किंवाड़ जो हमारी रक्षामें सिक्ख राज्यके पांचसौ सैनिक दिल्ली लाये हैं उन्हें दिल्लीसे मथुरा और वहांसे आगरेको भरतपुर और अलवर के राज्यों की सेना के जायगी || युद्धके विजय चिह्न लौटानेके लिये भारत वर्षकी प्रजा चारों ओरसे ब्रिटिश गवर्नमेंट को धन्यवाद देने लगी है वह इस कार्यके लिये सरकारका बड़ा उपकार मानती है। इस बातसे मुसलमानोंको बुरा नहीं लगा है। वे इस कार्यका धर्मसे संबंध नहीं मानते हैं किन्तु प्रजाकी एकता समझते हैं। पानीपत नगर में लगभग मुसलमानोंकी ही वस्ती है । हिन्दुओंके मन्दिरोंका नाशकर महमूद गजनवीने वहां पर जो मसजिद बनाई थी वह अबतक विद्यमान है । वहांके लोगोंने इस कार्यके लिये जैसा हर्ष प्रकाशित किया है उससे बढ़कर प्रसन्नता अन्यत्र न बताई जायगी ॥”<noinclude></noinclude> 3je7gyr6z8tb9itakhu70pxydma6dbw पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०२ 250 194725 665329 2026-07-06T15:16:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665329 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (१८५) लार्ड एलेनवरोकी उचित योजनाको पार्लियामेंटने मिथ्याभ्रम पड़- कथनानुसार दिल्लीसे किवाढ न हटाये कर उड़ा दिया और उनके गये । इस बातसे लाट साहबके चित्त को कितना दुःख हुआ होगा इससे वही जानते थे ॥ अध्याय ६. सिंधके अमीरों और ग्वालियर नरेशसे युद्ध । सन् १८४३६० के आरंभ में सिंधके अमीरोंसे संग्राम हुआ। काबुलके ऊपर जो चढ़ाई की गईथी वह उन्हें पसंद न थी और इस कार्य में उन्होंने बाधाभी डाली थी। उनसे ठहराव यह था कि सिंधु नदी के मार्ग से जो. माल लेजाया जावेटसपर अंगरेज कर्मचारियोंकी इच्छासे अधिक थे लोग कर न ले सकें। उन्होंने इस शर्त को तोड़डाला । काबुलके अमीरकी तरह वे भी अपने यहां अंगरेजी एजेंट रखना नहीं चाहते थे परंतु उनकी इच्छा विरुद्ध सरकारने हैदराबादमें एक एजेंट नियत किया । और उसकी रक्षाके लिये सेना रक्खीगई। इसी कारण उन्होंने काबुल की चढ़ाई में कुद्धहोकर बाधा डाली। इस बातसे सरकारने उनके साथ नवीन संधि की । इसका आशय यह था कि राजस्व (ख्रिराज ) के बदले उनसे कुछ भूमिहीजाय, सिंधु नदीमें जितनी अंगरेनी स्टीमरें फिरें उनके लिये कोयला अमीरोंसे लियानाय और सिक्का चलाने में उन्हें स्वतंत्रता रहे। यह बात उनकी दवाकर स्वीकार कराई गई और इस संधिपत्र पर हस्ताक्षर करानेके लिये उनको बाधित कियागया । इसका परिणाम यह हुआ कि सरकारके जिस सेवकने इन लोगोंको दबाकर हस्ताक्षर करायेथे उसके मकानपर संधिपत्र तैयार होनेके दूसरे ही दिन आक्रमण हुआ। युद्धआरंभ होगया। इस लडाईमें थोड़ी हार हो- नेके बाद सरकारका विजयहुआ । अमीरोंको देशनिकालका दंड देकर गवर्न मेंटने सिंथपदेश बईमान्तमें मिला लिया || सिंध अमीरों से युद्ध समाप्त नहीं होने पायाथा कि इतने ही में गवर्नमेंटका ध्यान दूसरी ओर आकर्षित हुआ | ग्वालियरके महाराज दौलतराव संधिया सन् १८२७ ई० में संतति विना मरगयेथे । उनकी गादी एक संबंधीको दीगईथी । यहभी सन् १८४३ई० में वारिस विना मरगया । उसकी विधवा रानीने दूरके संबंधियों से एक पुत्र दत्तक लिया । नवीन महाराजका वय केवल आठ वर्षका था । इसलिये गवर्नमेंटने राज्यप्रबंध के लिये मामा साइम नामक सरदार<noinclude></noinclude> gcicssmtvo8i7e4diy7gwyyph1g8xfg पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०३ 250 194726 665330 2026-07-06T15:17:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665330 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१८६) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । को नियतकिया । यह बात राजमाताको पसंद न हुई और इस कारण मामा साहब को तीनही मास वाद ग्वालियरकी सीमा छोड़कर अंगरेजी राज्यमें भाग जाना पड़ा । उनकी जगह राजमाताने गवर्नमेंटके शत्रु दादा साहब खासगी वालेको नियत किया । यह बात सरकार और ग्वालियर की संधिके विरुद्धथी इसलिये गवर्नर जनरलने दादा साहब खासगी बालाके ग्वालियर छोड़नानेकी आज्ञादी । परंतु इस बातपर ग्वालियर राज्यने विलकुल ध्यान न दिया । और साथी राज्यके कई एक अंगरेजुकर्म- चारियोंको नौकरीसे अलग करदिया | सरकारने इस चाल से क्रुद्ध होकर ग्वालि यर पर सेना भेजी । महाराज पुर और पनीयारके युद्ध में ग्वालियरकी सेनाने हार- खाई। इसका परिणाम यह हुआ कि ग्वालियरके बालक महाराजको ( १ ) अंगरेज़ रेज़ीडेंटकी सम्मतिपर विना शर्त कार्य करना ( २ ) ग्वालियरकी सेना ४० हजारसे घटाकर ९ हजार रखनी और तोपें २०० के बदले ३२ रखनी (३) ग्वालियर में अंगरेजीसेना रखनी और इसका खर्च ग्वालियर राज्यसे लेना और ( ४ ) महाराज जबतक योग्य वयके न हों राज्यका प्रबंध एक कौंसिलसे करवाना और अंगरेज़ रेज़ीडेंटकी इस कार्यमें शर्तोंस संधि करनी पड़ी || अध्याय ७. कंपनी और लाट साहबकी खटपट । सम्मति लेनी इन सिंध और ग्वालियरके युद्धके पश्चात् अधिक काळतक लार्ड एलेनबरो भार- तके गवर्नर जनरलके पद पर न रहसके। ईस्टइंडिया कम्पनीके डाइरेक्टरोंको उनकी यह चाल पसंद न हुई। उन्होंने यह अभिशाप लगाया कि शांति पूर्वक काम करनेके बदले लार्ड एलेनबरोको लड़ाई झगड़े बहुत प्रिय हैं । डाइ- रेक्टरोंने ब्रिटिश गवर्नमेंटकी आज्ञा विना लाट साहबको पदच्युतकर विलायत बुला लेनेकी आज्ञादी । लार्ड एलेनबरो श्रीमतीके कृपापात्र थे। उनकी सहायतासे ही भारत शास- नमें कंपनी को कुछ माल नहीं गिनते थे। उन्होंने अपने बचाव श्रीमतीके नाम एक पत्र भारकपुरसे १४ जुलाई सन् १८४४ ई० को लिखा: “मुझको अपने पदसे अलग करनेके विषयमें कंपनीकी आज्ञा मुझे १५ जूनको मिली । मैंने तुरंतही देशी राजाओंके नाम पत्र भेजकर सूचना देदी कि मेरी बदली होनेसे<noinclude></noinclude> cjrf390t24adl93et7ktwlvve9xd1bl पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०४ 250 194727 665331 2026-07-06T15:17:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665331 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (१८७ ) गवर्नमेंटकी नीतिनें किसी बातकी लौट फेर न होंगी । इस कार्यसे पूर्व ग्वालि- परमें थोड़े कालसे कुछ गड़बड़ मच रही थी । वहां इस बातकी गप्प उड़ रही थी कि मेरे विलायत चले जानेसे दादा साहब खासगी वाले फिर ग्वालि- यरको लालिये जायेंगे । मुझको पदच्युत करनेके विषयमें कंपनीके डाइरे- क्टरोंने जो कारण बतलाये हैं उनका खंडन, मैंने अर्ल आफ रिपनके नाम एक पत्र लिखकर, उसमें कियाहै । प्रार्थना है कि श्रीमती उनको ध्यानपूर्वक पढें । मुझे भारत वर्ष में बड़ी कठिनतासे काम करना पड़ा है और वह काठिन्य डाइरेक्टरोंकी शत्रुतासे और भी बढ़ गया है ।" इस शत्रुताके विषय में सन् १८४३ ई० की १८ जनवरीको उन्होंने श्रीमतीके नाम एक पत्र लिखाया जिसका आशय यह है:- " मेरी सम्मति यह है कि भारतवर्षकी स्थानीय गवर्न- मेंटकी अनुचित और ऊटपटाँग चालसे देशी राजाओंका इस साम्रान्यमें आदर नहीं है। उनके स्वत्व पर आघात किया जाता है और सदा ये भयभीत रहते हैं कि हमारा राज्य छीन लिया नायगा । यदि श्रीमती भारतका शासन कंपनीसे लेकर अपने हाथमें रक्खेंगी तो यह कठिनता दूर होना- यगी और भारतवर्षके राजा महाराजा श्रीमतीके अधीन राना रहने में अपनी शोभा समझेंगे । और इस कार्यसे इस बृहत् प्रजाकी भावी संतान ब्रिटिश गवर्नमेंटको देशकी उन्नतिमें अंतःकरणसे सहायतादेंगी । भारतवर्षका प्रबंध यहांके लोगोंकी इच्छा और वहमके अनुसार, उनका भलाकरने के निश्चयसे किया जायगा और दूरदेशके जिन निवासियोंको ईश्वरने यह बृहत् राज्य सौंपा उनको धनाढ्य बनानेकी इच्छासे न किया जायगा तो आगे जाकर भारतवर्ष की कितनी उन्नति होगी इसवातके कहने में मैं अशक्त " || अध्याय ८. सिक्खयुद्ध और कोहनूर हीरा । सन् १८४४ ई० में लार्ड एलेनवरों के विलायत जाने और उनकी जगह लार्ड हानिके आतेही सिक्खयुद्धका अवसर आया। पंजाब के सरी महाराजा रणजीत सिंहकी मृत्यु के बाद उनकी ६० हजारसेना बेकाबू होगई। उनके मालक पुत्र दली- पसिंह राजाहुए और रानी राज्य प्रबंध करनेलगीं । वह सेनाका वेतन समयपर देनेमें असमर्थ हुई इसलिये सनाने लाहोर लूटने की तैयारी की परन्तु उनको सिक्ख राज्य छोड़कर अंगरेजी राज्य लूटने की सलाह दी गई। इसबात से सिक्सेनाकी<noinclude></noinclude> 8626schh9c06exjq72w4409q6zpymuo पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०५ 250 194728 665332 2026-07-06T15:17:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665332 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १८८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अंगरेज़ी सेनासे लड़ाई हुई और सन् १८४६ ई० में सरकारने लाहोर लेलिया । यह बात गवर्नर जनरलको पसंद न आई और पंजाब प्रान्तपर सिक्खोंके शासन स्थिर रहनेका उन्होंने एक बार फिर अवसर दिया । रानी अपने पुत्र दलीपसिंह के नामसे पंजाबका शासन करती रहीं परन्तु सिक्खसेना ६० हजारके बदले घटाकर २० हजार रक्खी गई और वहाँ अंगरेजी सेनाभी रखनी पड़ी परन्तु इस घातका अधिक दिनतक निर्वाह न हुआ। उसी वर्ष के अंतमें रानीको पदच्युत कर पंजाबराज्य के प्रबंधके लिये आठ सिक्खोंकी एक कौन्सिल नियत हुई और लाहोरके अँगरेज़ रेजीडेंट सर हेमरी लारेन्स उसके अध्यक्ष हुए। इस योजनानेभी बहुत सम- यतक काम न किया । दोवर्षके अनन्तर गवर्नर जनरल लार्ड डलहौसीके समयमें पंजाब में फिर बखेड़ा हुआ। यह बखेड़ा यहाँतक बढ़ाया कि, काबुलका अमीर दोस्तमूहम्मद चढ़कर पेशावर तक चला आया । उसने अटकका मोरना अपने हाथमें लेकर उपद्रवियोंकी सहायता करना आरंभ किया । लाचार होकर ब्रिटिश गवर्नमेंटको पंजावपर फिर चढ़ाई करनी पड़ी। सन् १८४९ ६० के फ़रवरी मासकी २१ तारीख़को गुजरातके निकट युद्धकर विजयपाया । और लार्ड डलहौसीके शासनमें पंजाबका प्रदेश सदाके लिये ब्रिटिश साम्राज्य में मिलालिया गया । तबहीसे पदच्युत महाराजा दलीपसिंह पेन्शन पाकर विलायतमें रहे । पंजाबके साथ स्वर्गवासी पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंहका बहुमूल्य आभूषण भी सरकारके हाथ आया । इनमें जगत् प्रसिद्ध 'कोहनूर' हीरा भी सरकारको मिलगया | इससे बढ़कर हीरा संसार में अभीतक सुनने में नहीं आया है । सन् १८५८ ई० में ईस्ट इंडिया कंपनीने इसे श्रीमतीको भेटकिया । तबसे यह श्रीमती राजमुकुटमें विराजकर अपने प्रकाशसे मुकुटको प्रकाशित कर रहा है। यह हीरा मछली पट्टनके निकट गोदावरी नदीमें किसी मनुष्यको मिलाथा । सन् १३०४ ई० में सुलतान अलाउद्दीनको मालवाके राजाके यहांसे प्राप्तहुआ । उनके कुटुंबके पाससे दिल्लीके प्रथम मुगल सम्राट् बाबरके पास पहुँचा । उन्होंने अपने चरित्रमें लिखा था कि “संसारके दैनिक व्ययका आषा द्रव्य इस हीरे के मूल्यके समान है । सन् १७३९ ई० तक मुगल बादशाहोंके हाथमें रहकर वह ईरामके बादशाह नादिरशाह के यहाँ पहुँचा । जिस समय नादिरशाहने दिल्लीके बादशाह मुहम्मदशाहको परास्तकर यहांका कोष छीना उसमें हीरा न मिला । उसको इस बात से बड़ी निराशा हुई । उसने मुहम्मदशाहकी एक बेगम द्वारा समाचार पाकर दिल्लीका राज्य मुहम्मदशाहको लौटादेनेका ठहराव किया। इस विचारसे उसने दिल्ली में एक दर्वार कर उसमें राज्य मुहम्मदशाहको पीछा<noinclude></noinclude> 6o4hbo9i4sthxv1vo5cagxy0m2n32vb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०६ 250 194729 665333 2026-07-06T15:17:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665333 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (१८९) सौंपते समय परस्पर पगड़ी बदलवलकी मुहम्मदशाहकी पगड़ीके साथही हीरा नादिर शाहके पास चला आया । तमसे यह कुछ कालतक ईरान में रहा। फिर नादिरशाहके वारिसोंने अफ़ग़ानिस्तान में ईरानी बादशाहत स्थापन करने- वाले अहमद शाहको देदिया। उसीको कामुलके अमीरशाह शनासे पंजाब केसरी महाराजा रणजीतसिंहने छीन लिया । और उनकी मृत्युके बाद पंजाब राज्यके साथही वह हीरा विटिश गवर्नमेंट के हाथमें पहुंचा इंग्लैंड पहुंचने वाद उसको घिसकर स्वच्छ और सुडौल करने में आठ हजार पौंड व्यय हुआ। इस कार्यसे हीरे के तौलमें अस्सी केरट अर्थात् १ || तोला २ ॥ रतीके लगभग न्यूनता होगई || अध्याय ९. इंग्लैंड सूरत नव्या और भारतकी रेल्वे । सूरतके नव्बाब सन् १८४४३० में इंग्लैंड गये। इससे पहले भारतवर्षका कोई भी राजा महाराजा विलायत नहीं गया था इस लिये वहां पर इनका बड़ा सत्कार हुआ । इस विषय में "एन्युएल रेजिस्टर" में लिखा है कि २१ जुलाई दिनके १२ बजे सूरतके नव्याच जिस समय चांसरी कोर्ट देखने गये लोगोंकी इतनी भीड़ थी कि खड़े रहने को जगह नहीं मिलती थी। यह कि सरदार और उमरायोंको भीड़में जब नव्याय साहब न देख पड़े तो वे कुरसियों पर खड़े होगये || सन् १८४५ ई० तक भारतमें रेल्वेका नाम नथा। यहां वालोंमें यह कोई नहीं जानता था कि रेलवे किस चिड़ियाको कहते हैं। उस वर्ष भारतमें रेल्वे लाइने मनानेके लिये इंडमें कई एक कम्पनियां खड़ी हुई। इनकी प्रार्थनाओंको स्वीकार करने पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनीने भारतके लाट साहबको ७ मईको एक पत्र लिखा। जिसका भाषान्तर यह है कि-" रेल्वे लाइने उसी जगह बनाना लाभदायक है जहां मनवानेका खर्च और उनके प्रबंध करनेका व्यय निकल सके। डको अनुभवसे विदित हुआ है कि रेल्वे कंपनियोंको अधिक आय मालसे होती है । परंतु इस विषय में भारत वर्षकी स्थिति भिन्न प्रकारकी है। भारत वर्ष धनी और धनाढ्य वस्तीवाला नहीं है। यहाँ निवासी दीन हैं और दूर २ थोड़ी २ संख्या में निवास करते हैं। किन्तु यह प्राकृतिक पदा- थाँसे भरपूर हैं परंतु उन्हें लाने ले जानेके लिये सस्ता और शीघ्र चलनेवाला<noinclude></noinclude> 5gymtbu1zrvl8598sks8rbe2gxjvinr पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०७ 250 194730 665334 2026-07-06T15:17:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665334 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । साधन न होनेसे लाभदायक बाज़ारका वहां अभाव है । इस लिये यह मानना चाहिये कि इस समय रेल्वेकी मुख्य आयका आधार यात्रियों पर न होकर केवल मालपर रहेगा । इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है कि जहां लाइनें खोलनेसे लाभकी संभावना हो वहां प्रचलित करने में सहायता और उत्तेजना देना चाहिये । इस लिये एमेरिकाके दो चतुर और अनुभवी इंजिनियर हमारे दो इंजिनियरोंके साथ भेजे जाते हैं। ये लोग साधारण लंबाईकी एक लाइन तैयार करनेकी जांच करेंगे । उस नांचको आप स्वयं देखें और उसके लिये जो कंपनी खड़ीहो उससे शर्त करनेके विषय में रिपोर्ट करें। " उसी वर्ष में ग्रेट इंडियन पेमाला रेल्वे (जी. आई. पी. ) और ईस्ट इंडियन रेल्वे कम्पनी खड़ी हुई । भारतकी प्रबन्धकारिणी ईस्ट इंडिया कम्पनीने व्याजकी गॅरेंटी देकर उनको ९९ वर्षका पट्टा कर दिया । ईस्ट इंडियन रेल्वे कलकत्तेसे दिल्ली और आगरा तथा नी. आई. पी. रेल्वे बंबई से कल्याण और मेहम तक तैयार हुई । जी. आई. पी. का काम सन् १८५०ई० में आरम्भ होकर सन् ५४ में समाप्त हुआ || अध्याय १०. इंग्लैंड का रूस और फ्रांस से विरोध । सन् १८२९-३० में रूसने रूमकी ईसाई प्रजाकी ओरसे बखेड़ा उठाकर यूनानको रूमसे स्वतंत्र कर दिया था । इस विषयकी जो सन्धि हुई उसमें इंग्लैंड और फ्रांसका संयोग था । सन् १८४७ ई० में एक तुच्छ बातपर इंडने यूनानसे लड़ाई ठानना चाहा । यदि पीछेसे मेल न होगया होता तो उस समय यूरोप में एक भारी संग्राम होनेकी सम्भावना थी । डान पेसिफिको नामक एक पुर्तगाली यहूदीने यूनाम पर ३२ हजार पौंडका दावा किया। ईसाई धर्मके संस्थापक प्रभु ईसामसीहको फँसाकर रोमन लोगोंके हाथमें देनेवाले और उनका बधकरनें में अग्रणी यहूदी जुड़ास इस्केरपटका तिरस्कार करनेके लिये यूनान में प्रतिवर्ष ईस्टर के त्योहारपर उसकी मूर्ति बनाकरं जलादेने की चालथी । सन १८४७ई० में यूनानकी गवर्नमेंटने यह चाल बंद करदी | इससे यूनानी लोगोंने समझ लिया कि उस राज्य में अब यहूदियोंका प्रभाव बढ़ गया है। डान पेसि- फिको उन दिनों एथेन्समें रहता था । यूनानियोंको मालूम था कि वह यहूदी है । उन्होंने अपना धर्मसम्बन्धी चैर लेनके लिये उसके घरवारका नाश कर- दिया। इस कारण उसने यूनानकी गवर्नमेंट पर दावा किया। यूनानने, उसकी<noinclude></noinclude> pd7dv1yczowyfdb9e3ig5h3zxngogc0 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०८ 250 194731 665335 2026-07-06T15:17:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665335 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( १९१ ) . बात न सुनी। यह था तो पुर्तगाली यहूदी किन्तु अंगरेजी प्रजा गिनानाता था। इस बहाने से इंग्लैंड में उपनिवेश विभागके मंत्री लार्ड पामर्स्टनने यूनानसे युद्ध ठान दिया अंगरेजी सेनाने यूनानका समुद्र किनारा घेरनेके विचारसे प्रयाण किया । लार्ड पामर्स्टनको भ्रम था कि यूनानमें जो फरांसीसी दूत रहता है वही इस झगड़ेका मूल है। यूनानने बीच में पड़कर इंग्लैंडसे निपटारा करादेनके लिये फ्रांस और रूससे प्रार्थना करी । और प्राचीन संधिके अनुसार कार्य करनेके लिये दोनोंने इंग्लैंडको समझाया। आरम्भमें लार्ड पामर्स्टनने इस चातको अस्वीकार किया इस कारण फ्रांसने अपना दूत इंग्लैंडसे लौटा लिया । इस बात से यूरोप में भयानक संग्राम होनेका भय हुआ । अंतमें इंग्लैंड संभ- लगया और डान पेसिफिको का झगड़ा यूरोपियन राज्योंके प्रतिनिधियों की पंचा- यतको सौंपना उसने स्वीकार किया। जांच करनेसे विदित हुआ कि डान पेसि फिकोका दावा स्वीकार न करने में यूनानने कोई कार्य अनुचित नहीं किया है क्योंकि उसने हानिसे तीस गुना दावा कियाया । वह बड़ा मूर्ख था। उसने इस दावे एकही पलंगका मूल्य १५० पौंड लिखवायाथा । लार्ड पामर्स्टनकी इस कुचालपर इंग्लैंडकी लार्ड सभामें एक निन्दा सूचक प्रस्ताव भी हुआ || अध्याय ११. 44 इंग्लैंड की वृहत् प्रदर्शनी, और ब्रह्मदेशका युद्ध !. श्रीमती मिय पतिके उद्योग और प्रेरणासे सन् १८५१ ई० में देश विदेशके नाना पदार्थोंकी लंडनमें एक बड़ी भारी मदर्शिनी हुईथी उसके विषयमें इस पुस्तक में लिखा गया है। यह कार्य श्रीमतीके शासनकी मुख्य घटनाओं से था इस लिये यहां पर भी इस विषय में कुछ लिखना आवश्यक है । राज्ञीपति प्रिंस एलबर्ट शिल्प कलाको उत्तेजना देनेवाली सोसाइटी आफ आर्टस " सभा के अध्यक्ष थे। सन् १८४९६० के जूनकी ३० तारीख़को इस भातका ठहराव कर सन् ५० में श्रीमान्की अध्यक्षता में एक कमीशन नियत हुआ। उसी वर्ष लार्ड मेयरके भोजमें प्रिंस महोदयने अपने ललित व्याख्यानमें इस पातकी आवश्यकता दिखाई। उन्होंने कहा कि -" शिल्प और व्यापार में मनुष्य जातिने अबतक कि- तनी उन्नति कीहै इस बातकी ठीक जांच करने और इस कार्यके लिये होनहार उन्नतिके उपाय सोचनेका प्रदर्शनी उत्तम साधन है। " प्रिंसके सीधे और उप- योगी कथन को उस समयके बड़े बड़े लोगोंने उलटा समझा और पार्लिया-<noinclude></noinclude> 1a3n5uoad75bppaw4e001nqzkfjmrtb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२०९ 250 194732 665336 2026-07-06T15:18:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665336 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । मैंट के अनेक मैंबरोंतकने इस बात में संदेह किया कि नाना देश और नातिके लोग इस मेलेमे इकट्ठे होनेसे उपद्रव हो जायगा । उस समयके समाचार पत्र भी इसके विरोधी हुए । उन्हों ने लिखाकि मेला देखनेके बहानेसे देश देशके लुच्चे ल- फंगे इकट्ठे होजायेंगे और उनसे प्रजाकी शांतिका भंग होगा। अधिक उद्योग करने और लोगों को समझाने बुझानेसे भय दूर होगया और इंग्लैंडकी शिल्पो- नतिके लिये इसका बहुत अच्छा परिणाम हुआ । अंगरेज़ व्यापारियों ने भारत गवर्नमेंटसे आग्रह पूर्वक कहाकि ब्रह्मदेशके राजा हमारे व्यापार में विघ्न डालते हैं । सन् १८५२ ई० में भारतके गवर्नर जनरल लार्ड डलहौसीने इस घातकी जांच के लिये एक सैनिक धूम पोत रंगूनको भेजा । मिस्टर कोमोडर लेम्बर्ट ने वहां जाकर आवामें लाटसाहब का पत्र मा- देश के राजा को दिया । राजा ने इसबात पर रंगून के गवर्नर ( सुमा) को पदच्युत कर दिया क्योंकि अंगरेज व्यापारियों ने उसी पर नालिश की थी। इसकी जगह जो नया सूवा नियत हुआ वह इनलोगों को पहलेवाले की अपेक्षा भी अधिक दुःखदायी जान पड़ा। अंत में कोमोडर लैम्बर्टने राजा का एक जहाज़ खालसे कर लिया । इसपर युद्धआरंभ होगया। कलकत्ते में समाचार पहुँच तेही ८ हज़ार सेना विदा हुई। सेना ने आकर रंगून बेसिन और प्रोम को एक २ करके छीन लिया और ब्रह्मी लोगों को उत्तर ब्रह्मा की ओर भागना पड़ा । पेगू के परगने पर सरकारी अधिकार होने बाद लार्डडलहौसी ने ब्रह्मदेश के राजाके विषय में एक नोटिस लिखा कि आया ( ब्रह्मदेश ) का राजा यदि पहले की तरह ब्रिटिश गवर्नमेंट से मित्रता का संबंध प्रचलित न करेगा और पेगूका परगना जो हमने लेलिया है उसे लौटानेका प्रयत्न करैगा तो उसको कठोर दंड दिया जायगा । उसका राज्य छीन लिया जायगा और उसे तथा उसकी संतान को नष्ट भ्रष्टकर देश निकाल देदिया जायगा । इस नोटिस को पानेके अनंतर राजाने किसी प्रकार के संधिपत्र पर हस्ताक्षर तो न किये किन्तु मुखसे यह स्वीकार कर लिया कि जो देश वा स्वत्व अंगरेजों को लेना हो लेलें इसमें मैं हस्ताक्षेप नहीं करूंगा । इरावदी नदी में स्वतन्त्रता से अंगरेजों के व्यापार करने को भी उसने स्वीकार कर लिया। गवर्नर जनरल ने दूसरा नोटि स प्रकाशित कर उसमें लिखा कि" राजा ने संधिपत्र पर हस्ताक्षर तो नहीं किये हैं किन्तु उसके प्रण और शांति के कामों को देखकर युद्ध बंद कियागया है " ||<noinclude></noinclude> ofwwgmzovq3x2u9rut7i3eoogkhi1en पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१० 250 194733 665337 2026-07-06T15:18:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665337 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( १९३ ) अध्याय १२. ईस्टइंडिया कंपनी का नवीन पट्टा । सन् १८५३ ई० में ईस्टइंडिया कम्पनी के पट्टेकी अवधि पूरी होगई । ब्रिटिश गवर्नमेंट ने उसे दूसरी सनद देनेका विचार किया। सर चार्लस उड़ने इस विषय में ३ जून को पार्लियामेंट में एक विक उपस्थित किया। मदरास की नेटिघ एसोशियेशनकी ओर से ईस्टइंडिया कंपनी के विषय में पार्लियामेंट में एक प्रार्थना पत्र गया था । उसमें कंपनी के प्रबंध की निन्दायी । उसमें लिखा था कि कंपनी न्याय का काम ठीक २ नहीं करती है। इसका उत्तर उक्त साइन ने यह दिया कि भारत वर्ष में एक २ आने के लिए झूठे शपथ खानेवाले साक्षियों की बहुतायत है इसलिये न्यायका काम बड़ा कठिन है तथापि यह काम बांसा योग्य होता । प्रजाके काम पर वहां खूब ध्यान दिया जाताहै । १ करोड़ ४० एकड़ भूमि सींचने के योग्य तैयार की गई है । भारत गवर्नमेंटको विशेष आय भूमिकरसे है । लवण और अफीम परभी करलिया जाता है । लवणकर जैसा कठोर पतलाया जाता है वैसा नहीं है। मुसल्मान और देशी राजाओंके शासनके साथ ब्रिटिश राज्यकी तुलना कीनाय तो अंगरेजी राज्य में दासव्यापार, सतीदाह, बालहत्या, नरबलि, तथा लूट खसोट नहीं होती है। किसानबड़े सुखी अन वे जीवनकी आवश्यक वस्तुयें अधिक वर्तने लगे हैं। सन् १८३४-३५ ई० में भारत में ७९ लाख ९३ हजार पौंडका माल बाहरसे आयाया । पंद्रह वर्ष बाद इस आयमें सौ पीछे १४० की वृद्धिहोकर सन् १८४९-५०ई० में १ करोड ७३ लाख १३ हजार पौंड का माल आया । कंपनी अब अपने प्रबंधमें कुछ लौटफेर करना चाहती है। उसने विचार कियाहै कि डाइरेक्टरोंकी संख्या घटाकर ३० की जगह १८ रक्सी जाय और इनमें ६ ऐसे रहें जो दश वर्ष तक भारत में रहकर ब्रिटिश गवर्नमेंटकी सेवा कर आये। सरकारी नौकरीपर अबसे कंपनी किसीको नियत न कर सकेगी किन्तु सिविल सर्विस परीक्षा सव नातिके लिये खुली रक्खी जायगी । नौकरी पाने का स्वत्व गरीब अमीर के लिये समान होगा। सैनिक पदोंकी व्यवस्था मैं तो परिवर्तन न होगा किन्तु बंगालकी गवर्नरी स्वतंत्र नियत की जायगी । आईन बनाने वाली सभामें गवर्नर जनरल दो सभासद अपनी ओर से और प्रत्येक प्रान्तका व्यापारी समाज अपनी ओर का एक २ सभासद् नियत ९<noinclude></noinclude> rxyvkvuoyw93pw4gty7orjv0saurfps पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२११ 250 194734 665339 2026-07-06T15:18:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665339 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । - करेगा । इसके सिवाय हाईकोर्टका चीफ जस्टिस और अन्य जज मिलाकर कुछ १२ सभासद होंगे प्रान्तोंके प्रत्येक नगरमें छोटी कोटें नियत होंगी और देशी- न्यायाधीशोंका वेतन बढ़ाया जायगा । " इसविलके विषय में पार्लियामेंट में बहुत विवाद हुआ | कामन्स सभामें सर ज्यार्ज क्लार्कनें हिन्दुओं की नीतिमत्ताको सराहा । और कहाकि सतरहवीं शताब्दिकी चाल ढाल देखकर भारतके अंगरेज जैसे भारत वासियोंकी निन्दाकरते है वैसीही निन्दाके योग्य उस समयके अंगरेज़ भी थे। मिस्टर फिलिमोर ने कहाकि सन् १८३३६० के प्रतिज्ञापत्र में लिखे जातिभेद विना सब लोगोंको समान गिनने के कार्यपर कंपनी ध्यान नहीं देती है। देशियोंकी निन्दा करने में मिस्टर ( लार्ड ) मेकाल प्रसिद्ध गिने जाते हैं। उन्होंने कहाकि - “देशियोंको भारत वर्षके प्रबंधसे अलग रखने के प्रयत्न में उनकी प्रवृत्तिका भंग कर हम लोग अपने शासन को दृढ वा दीर्घ काल तक चलने योग्य नहीं बना सकेंगे। उन्हें वशमें करनेके लिये अथवा उनपर अधिक काल तक शासन करने का स्वत्व वा अधिकार प्राप्त रखनेके लिये उन्हें अज्ञान रखना मैं कभी अच्छा नहीं समझता हूं" || अध्याय १३. नागपुरका खालसा और भारतमें तार । तीन आविष्कार । सन् १८५३ ई० में गवर्नमेंटनें नागपुर राज्य खालसे करनेका ठहराव किया । वहां राजा राघोजी भोंसला इस वर्ष में अपुत्र मरगये । लार्ड डलहौसी उससमय भारतवर्षके गवर्नर जनरल थे । वह चाहते थे कि शनैः २ समस्तदेशी राज्य खालसे कर लिये जॉय और किसी राजाको गोद लेनेकी सनद नदी जाय । उन्होंने नागपुर के राजाके अपुत्र मरनेसे गादी खाली होतेही अपनी नीतिका पालन किया । और उसीके अनुसार एक आज्ञापत्र प्रकाशितकर नागपुर राज्यको सरकारी राज्यमें मिला लिया । सन् १८५७ ई० में भारतवर्ष में जो उपद्रव हुआ उसके अनेक कारणों मेंसे एक लार्ड डलहोसीकी यह नीति भी मानी जाती है ॥ भारतवर्ष में रेल्वे बनानेका कार्य जिससमय नी. आई. पी. और ईस्ट इंडियन रेल्वे कंपनीने आरंभ किया तबही तारका कार्य आरंभ हुआ था । सन् १८५०-५१ ई० में गवर्नमेंटने प्रथम बंगालमें तारघर स्थापित किये । दूसरे ही वर्ष ६२१९० ) रुपयेके व्ययसे ८३ मील लाइन तैयार हुई। बंबई तथा<noinclude></noinclude> 8pxwrgy6nir7ey959nx5nuf74zj31qv पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१२ 250 194735 665340 2026-07-06T15:18:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665340 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( १९५ ) मदरास प्रान्त में यह कार्य सन् ५४ में हुआ । सन् ६७-६८ में भारतवर्ष में तार विभाग द्वारा ३०२१९१ समाचार आयेगयेथे और उस वर्ष भारतभरमें कुल १३४७३॥ मीळ तारफी लाइन थी ॥ सन् १८४६ में परीक्षाके बाद यह निश्चय हुआ कि सल्फ्यूरिक ईथरके प्रयोगसे रोगी शरीरपर किसी प्रकारकी कठोर चीरफाड करनेपरभी उसे उस का दर्द विदित नही होताहै । और इस दवाको सुंघानेसे रोगी बिलकुल अचेत होजाताहै । इसमातके प्रकाशित होतेही लोगोंके हर्षका ठिकाना नरहा किन्तु इस से भी बढ़कर "क्लोरो फार्म" निकला। इसकी जांच सन् १८४७ ई० में हुई । दोनो पदार्थोंकी तुलना करनेसे नानपड़ा कि ईथरकी अपेक्षा क्लोरोफार्म की थोड़ी मात्रा अचेत अधिक करदेती है, उसका प्रमाण अधिक शीघ्र और पूरा २ होता है, अधिक समय तक टिकता है और उससे रोगीको मलाप नहीं होता है। उसमें खर्च कम होता है और केवल रूमाल पर छींटकर सुचादेनेहींसे मनुष्य अचेत होता है किन्तु ईथर यंत्रकी आवश्यकता होती है || खगोल शास्त्र विषयमें दो बड़े आविष्कार सन् १८४५ और ४६ई० में हुए थे। एस्ट्रिया, नेपच्यून और यूरेनस ग्रहकी शोधहो चुकी थी । इन वर्षोंमें फ्रेंच और जर्मन विद्वानोंने ही बी, एरिस, और छोरा नामक ग्रहों की गति का निश्चय किया । इसी वर्ष में पांच धूमकेतु ग्रहोंकी चाल मालूम हुई। और सन् १८४८ई० में 'मेटिस' सन् ४९ में "हाइनिया बारवनिकडा" सन् ५० में 'पार्सेनोपी' 'विक्टोरिया' और 'इगेरिया' ग्रहका शोध हुआ । इनके सिवाय शनिग्रहके अष्टमं उपग्रह और नेपच्यूनके एक उपग्रहका आविष्कार भी इसी वर्ष में हुआ || ये साल नवीन शोधोके विषयमें बहुत बढ़कर निकले । सन् ४६ और ४७ में रसायन शास्त्रके विषय में तीन बड़े २ आविष्कार हुए। प्रथम शोध 'गनकाटन' बारुदकी, दूसरी काचको झुका वा मरोड़ सकनेकी और तीसरी कागज़की बोतलें वा किंवाड मनाने की । इस शोधके अनुसार पानी भरनेसे कागज़ गळता नहीं है। कागजसे बने हुए पात्र धरतीपर डालनेसे नहीं टूटते हैं और इसपर तुर्रा यह कि पारदर्शक होते हैं । अध्याय १४. कीमियाका युद्ध | सन् १८५४ ई० का वर्ष यूरोपके लिये बड़ा भयानक था । रूम राज्यन्ध अनेक प्रान्तोंमें सौधर्म मानने वाले (रूसवालेके वंशधर ) लोग निवास करते थे।<noinclude></noinclude> nfva1p8b7xdbbkrw2vkvsf6sp712rvt पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१३ 250 194736 665341 2026-07-06T15:18:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665341 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९६) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | उन लोगों के साथ रुमका जैसा बर्ताव था वह रूसको पसंद न था । रूस सम- झता था कि रूमके ईसाइयोंकी रक्षा करनेका काम मेरा है। रुसने इस विष- में रुकी जो निन्दाकी उसे अन्य यूरोपियन राज्योंने सच्चा समझा परंतु उनको संदेह हुआ कि कहीं ऐसी बातके बहानेसे रूस किसीभारी राजनैतिक लाभके लिये चालतो नहीं चलरहा है। इस भयसे उन्होंने रूसकी वातका समर्थन करने के बदले उसकी योजनाको भंग करनेका प्रयत्न किया। रूसकी गवर्नमेंट अल्पकाल में छोटेसे राज्यसे एक बृहत् साम्राज्य बनगया था । यूरोपमें ऐसा जनरच था कि रूस राज्यका संस्थापक पीटर दी ग्रेट आपने वसीयत नाममें लिखगया है कि मेरे उत्तराधिकारियोंको अहांतक बालाटिक समुद्रसे उत्तरकी और और काले समुद्र के किनारे पर दक्षिणकी ओर सीमा स्थापित करनेका अवसर न मिलै चुप न रहना चाहिये । इस कारण बढ़े राज्योंने अनुमान किया कि रूमके विषयमें बखेडा कर रूस उसका कुस्तुनतुनिया और वासजरस लेना चाहता है इस लिये उन्होंने निश्चय किया कि रूमके अमबंधसे रूसको लाभ उठाने देना उचित नहीं है। रूस शनैः २ भारत लेनेकी इच्छासे मध्य एशिया में अपनी सेना बढ़ाता जाता था इस लिये उसकी यह चाल इंग्लैंड को अधिक बुरी लगी। इंग्लैंडने सोचा कि, रूसका विरोध करनेके लिये रूमसे मेल करना चाहिये । और रूस रूमके युद्ध में इंग्लैंडको रुमका साथ देना उचित है। इस विचार में फांसके नवीन सम्राट् नेपोलियन ने साथ दिया । उसने अपने विचार कौशलसे फांसका राज्य प्राप्त किया था और वह जानता था कि aers मैं किसी कार्यसे वहांकी प्रनाको प्रसन्न न करसकूंगा मेरा टिकाव होना कठिन है ॥ ईसाई धर्मके अनेक स्थान रूम राज्यमें थे। इन पर आधिपत्य रखने के विषयमें रूस और फ्रांसका झगड़ा था। इसका निपटारा करानेके लिये फ्रांस इंग्लैंड के संयुक्त हुआ। दोनोने मिलकर रूम की ओरसे रूसके साथ युद्ध नि श्चय किया । दोनोंनें रूपसे कहलाया कि सन् १८२७-२८ में रूसने रूमके साथ जैसा बर्ताव किया था वैसा अब न करने दिया जायगा । हमारे जहान काले समुद्र में जायेंगे। वहां पर यदि कोई रुसी जहाज मिलेगा तो हम उसे सेबस्टोपलकी ओर लौटायेंगे और रूम राज्यपर किसी प्रकारका बलात्कार रुसको न करने देंगे । इस बात से युद्ध उनगया । जर्मनी (भूशिया) और आस्ट्रिया इंग्लैंडके मित्र गिनेजाते थे परंतु इस अवसर पर वे अलग होगये । इंग्लैंडके प्रधानमण्डलमें भी इस विषयमें मतभेद हुआ । लार्ड एवडींन और<noinclude></noinclude> nzmvuo4ppikn4itbsavnkajes2583aw पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१४ 250 194737 665342 2026-07-06T15:19:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665342 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( १९७ ) मिस्टर ग्लैडस्टमने इस युद्धका विरोध किया परंतु इंग्लैंडकी प्रजाका अधिक भाग युद्धमें कीर्ति सम्पादन करनेकी तृष्णासे युद्ध करनेकी सम्मतिमें कार्ड पा मर्स्टनका साथी हुआ। उनकी सम्मति अनुसार १४ सितम्बर सन् १८५४ ई० को युद्धका आरम्भ होगया। और भीषण संग्रामके बाद सन् १८५६ ई० के फरवरी मासमें इसका अन्त हुआ। दोनों ओरकी सेनाओंने बहुत धीरता दिखाई किंतु इंग्लैंड, फ्रांस और रुमकी संयुक्त सेनाके सामने रूसी सेना टिक न सकी। परिणाम यह हुआ कि रूसने सन्धिका मस्ताव किया। इस बातका ठद्दाव करनेके लिये फ्रांसकी राजधानी पैरिस नगर में इंग्लैंड, फ्रांस, रूस, आस्ट्रिया, शिया और साडींनिया (इटाली) राज्यके प्रतिनिधियोंने मिलकर निमलि- खित शर्तें पक्की की - ( १ ) रूमके प्रबन्धमें हाथ डालनेका रूसको दावा न करना चाहिये ( २ ) काले समुद्र पर किसी राज्यका अधिकार नहीं है और वहां छः से अधिक महान रूस न रखसकेगा ( ३ ) डेन्यूब नदी व्यापारके लिये खुली रखनी होगी (४) रूमके मालडेविया और वेल्केयाना मान्त ( रोमे- निया) और सर्वियाके प्रान्तोंको प्रजाशासनका अधिकार देना और सर्वियामें रुमको सेना रखने देना और ( ५ )] परस्परके जीते हुए राज्य जिसके जिसे देदेना होगा" || अध्याय १५. क्रीमियाके युद्धके समय इंग्लैंड की स्थिति । यद्यपि इस अध्यायमें प्रायः उन्हीं बातोंका समावेशहै जिनका वर्णन इस पुस्तकके प्रथम भाग में होना चाहिये था किन्तु क्रीमिया का विषय एकत्र रहनेसे पाठकों के चित्तपर शत अच्छी तरह उससी समझकर यहां पर लिखना उचित समझा गया है । जिस समय क्रीमियाके युद्धमें रूससे विजय पानेकी इच्छासे इंग्लैंडकी सेना उचूक आफू केम्ब्रिजके अधिकारमें विदादुई श्रीमती उसका सत्कार करनेके लिये स्वयं गई थीं। एक ओर युद्धके लिये बड़े २ राज्यों के प्रधान कर्मचारी अपने शिर पचा रहे थे और दूसरी ओर राजाओं में परस्परका मेल मिलाप होता था। इसी बीचमें राज्ञीपति प्रिंसएलबर्ट फ्रांसके नवीन सम्राट् नेपोलियनसे मिलने गये । वहांसे लौटनेपर मालूम हुआ कि अध्यक्षोंकी बेपरवाहीसे ब्रिटिश सेनाके मनुष्य बहुत दुर्दशासे नष्ट होते हैं। गवर्नमेंटने इस भातपर सेनाध्यक्षोंको बहुत थाड़ा और महारानीके जिसमें<noinclude></noinclude> 4s1s6puozfenydjfy08xc1t9ai5y4qh पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१५ 250 194738 665343 2026-07-06T15:19:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665343 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | इतना दुःख हुआ कि वह इस संवादका सुनकर बीमार होगई। मिस फ्लोरेंस नाइटिंगेलने जिसका कुछ वर्णन इस पुस्तकके पूर्व अध्यायों में हुआ है जाकर साहस और परिश्रमसे घायल सैनिकोंकी सेवा सुश्रूषाकर हजारेक प्राण बचाये ॥ ब्रिटिश और फ्रांसकी संयुक्त सेनाकी बहुत हानि होनेपर भी जब रूसने तोपों की मार सहने उपरांत सेबस्टोपलका किला न छोड़ा तव इंग्लैंडको बहुत निराशा हुई और इस बातका विचार करनेके लिये पार्लियामेंट में एक विल उपस्थित हुआ किन्तु उसी समय रूसके सम्राट् दूसरे निकोलसकी अकस्मात् मृत्यु होगई इस लिये क्रीमिया युद्धका शीघ्रही अंत होगया । युद्धसे घायल होकर लौटे हुए सैनिकोंको श्रीमतीने चेथामके अस्पतालमें देखकर उनका समाश्वासन किया | इसी अवसर में फांसके नवीन सम्राट् हुई नयोलियन अपनी रानी सहित श्रीम- तीसे भेट करनेके लिये इंग्लैंड आये। श्रीमतीने उनका बहुत सत्कार किया और सत्कारकी वृद्धिके लिये नेपोलियनने सम्मानपूर्वक श्रीमतीके होठोंका चुंबन किया । इस बात से फांसमें प्रना तंत्रप्रणाली स्थापन करने की इच्छा रखने वाले पक्षको बहुत बुरा लगा और उन्होंने नेपोलियनपर गालियोंका मेह बरसाया । नेपोलियन के सन्मानमें बाट महलमें एक नाच हुआ जिसमें उन्होंने बहुत योग्यता दिखाई। इस विषय में श्रीमती ने अपनी दिनचर्या में लिखा है कि " मैं तीसरे ज्यार्जकी पौत्री इंग्लैंड के कट्टे शत्रु सम्राट् प्रथम नेपोलियनके भतीजे के साथ, वाटरलू के राजभवन में, उस व्यक्ति के साथ जो छः वर्ष तक देश विदेश भटक कर इंग्लैंड का आश्रय ले चुका है नाचूं, इसे ईश्वर की विचित्र लीलाही समझना चा- हिये ।" इस अवसर पर श्रीमती ने सम्राट को नाइट आफ दी गार्टरकी उपाधि प्रदान की । अच्छी तरह दावत चखने बाद जय सम्राट् नेपोलियन फ्रांसको गया श्रीमतीने क्रीमिया के युद्ध में पराक्रम करनेवाले सैनिकों को पदक, पारितोषिक और पदवियोंदीं । इनमें अनेक लूले, लंगड़े, हाथ बिनाके और अंगभंग थे दश और श्रीमती की सेवा में उनकी यह दशा हुई थी इसलिये आपको बहुत दुःख हुआ । आँखों में पानी भरआया। श्रीमती के हाथ से पदक पाकर उन्हें बड़ा संतोष हुआ । थामस टाकविज नामक शरको जिसके दोनों पैर इसयुद्ध मैं कटगये थे आपने अपना शरीर रक्षक ( एडी कैंप ) बनाया ॥ सितंबर मास में सेमलस्टोपल नामक दृढ दुर्ग घोर संग्राम के पश्चात् इंग्लैंड के हाथ आने की जब ख़बर पहुंची प्रजाके हर्ष का ठिकाना न रहा। बालमोरल<noinclude></noinclude> f5d8ad29wd03m032n8sj4560px7dq9l पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१६ 250 194739 665344 2026-07-06T15:19:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665344 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूरसा भाग । ( १९९ ) में निवास करनेवाले लोगों ने एक पहाड़ीपर चढ़कर आग जलाई । श्रीमती अपने महलकी खिड़की में से खड़ी २ इस अद्भुत दृश्यको देखती रहीं । वहकि ग्रामीण लोगोंने उस अभिके पास अद्भुत प्रकारसे नाच किया, गाया, ढोल बजाये और बंदूकों के फेर किये । क्रीमिया से विजय प्राप्त कर लौटीहुई सेना का श्रीमती ने एल्डरशाट में निरीक्षण करते समय कहाः " आज यहांपर एक बृहत् सेना इकट्ठी हुई है। उससे मेरा कथन है कि वह पूर्ण आरोग्यताके साथ लौट आई जिसका मुझे हर्ष है। उसने कष्ट और विपत्ति उदारतापूर्वक सहन की है उसके लिये धन्यवाद देने को मैं बहुत आतुर थी। और जो लोग अपने देश के लिये मृत्यु को प्राप्त हुए हैं उनके लिये में दुःखित हूं। और इसीतरह जिन्हों ने वीरतापूर्वक युद्ध किया है उनके लिये मुझे बड़ा गर्व है। मैं परमेश्वर का उपफार मानती हूं कि अब भयके बादल बिखर गये हैं आपलोगों के यशस्वी कर्म की कीर्ति सदा रहेंगी और मुझे आशा है कि फिर जब कभी आवश्यकता पड़ेगी जिसका मुझे भरोसा है क्रीमियांक युद्ध में आत्मसमर्पण करनेकी तरह फिर भी आप लोग प्रेम पूर्वक देश सेवा करनेके लिये तत्पर होगे ।" इस आज्ञाको सुनकर सेनाने श्रीमतांके लिये एक स्वरसे "ईश्वर श्रीमतीकी रक्षा करे।" इस वाक्यको कहा || अध्याय १६. रूमकी रक्षामें तीन राज्योंका मेल । इस भागके अध्याय १४ में जिस संधिका वर्णन हुआ है उसके सिवाय सन् १८५६ ई० के अपलमें इंग्लैंड, फांस और आस्ट्रियामें रूमके विषयमें एक संधि और हुई थी जिसमें २ शर्तें थीं ( १ ) तीनों राज्य रूम राज्यकी रक्षा- का बोझा अपने ऊपर लेते हैं और (२) पौरसमें ३० मार्चको जो संयुक्त राज्योंका इस विषय में संधिपत्र लिखा गया उसके नियमोंका भंग जो कोई करेगा उससे हमतीनों मिलकर लड़ेंगे। सन् १८७१ ६० तक इस संधिका वर्ताव ठीक २ होता रहा । सन् ५६ ई० की ३० मार्चको सब राज्योंने मिलकर पैरि- समें जो संधि की थी उसमें एक शर्त यह भी थी कि “काले समुद्रको स्वतंत्र गिनना और वहां रूसको भेगजीन तथा छःसे अधिक सैनिक जहाज़ न रखने देना चाहिये” । सन् ७१ ई० में इस संधिका भंग होगया। और प्रकाश रूप पर रूसने कह दिया कि अब हम इस बातके नियम बद्ध नहीं हैं। इस संधिपत्रकी<noinclude></noinclude> 2x2q71f3jwldnwh3hafv4tsyf6lhtec पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१७ 250 194740 665345 2026-07-06T15:19:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665345 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २०० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अनेक शर्तोंको और २ राज्यों ने भंग कर डाला इस लिये केवल हम पर ही इसके निर्वाह का दबाव डालना न चाहिये' । उन दिनों में फ्रांस और जर्मनीका घोर संग्राम हो रहाथा। इस लिये दोनों राज्य इस काममें न वोलसके। इसी तरह इंग्लैंडने भी इन दोनों राज्योंको युद्धसे आना कानी करते देखकर रूससे एका की लड़नेका साहस न किया । आस्ट्रिया बिलकुल ही चुप साध गया । परंतु पैरिसके संधिपत्रकी बात हवामें उड़ाकर चुप रह जानेसे निंदा समझ कर प्रिंस बिस्मार्कने एक चाल खेली। उनकी सूचनाके अनुसार रूसके अनुचित कार्य पर विचार करनेके लिये लंडनमें एक सभा हुई। इसमें बड़े २ राज्योंके प्रतिनिथि इकट्ठेहुए |इन्होंने निश्चय किया कि "रूसने जो मार्ग ग्रहण किया है वह अनुचित नहींहै और उसके विरुद्ध कोई काम न करना चाहिये।" इस बातके प्रकाश होतेही रूसने रूमको दबा लिया और रूस रूमकी लड़ाई में रूमकी हार होनेका इसीसे अवसर आया । केवल इतनाही नहीं किन्तु इस कार्यसे रूस बहुत बढ़गया और यह भी कहा जाता है कि यूनानके विरुद्ध रुमकी ओरसे सब राज्योंने पक्ष किया जिसका कारण भी यही संधिपत्र है | अध्याय १७. अवधका खालसा | सन् १८५६ ई० के फरवरी मासमें अवधके नव्वावका राज्यखालसे कर बाजिद अलीशाहको गवर्नमेंटने पेन्शन देदी । इस कार्यमें नियम विरुद्ध चाल चलनेके कारण सरकार पर जो आक्षेप होता उससे बचनेके लिये भारत वर्षके गवर्नर जन- रल ने एक आज्ञापत्र प्रकाशित किया जिसमें लिखाया. किं" अवधके नव्यावसे जिन वातोंमें संशोधन करनेकी सम्मति दीनातीं है उनपर ध्यान नहीं देतेहैं और उस राज्य में लूट खसोट बहुत होती है । इन कारणोंसे अयोध्याका उपजाऊ प्रदेश नष्ट हुआ जाता है । " गवर्नरजनरलने आरंभ में नव्यावसे ( १ ) अवधकी दीवानी फौजदारी तथा सैनिक सत्ता सदाके लिये अंगरेजी सरकारको देनाहोगा (२) नव्या- नका पद सदा स्थिर रखना और यह पद वंशपरंपरा तक चलने देनाहोगा ( ३ ) नव्या के साथ सम्मानपूर्वक वर्त्तना और लखनऊ के महल तथा दिलखुश और atriपर चागमें केवल नव्यावका अधिकार रहेगा किन्तु मृत्युका दंड देनेकान्हें अधिकार न होगा (४) नव्वाब वाजिद अलीशाहको उनकी प्रतिष्ठाकी रक्षाके लिये बारह लाख रुपये वार्षिक और महलकी रक्षाके लिये तीनलाख रुपया वार्षिक<noinclude></noinclude> rvhyyvbiklv4i38h5e8ilrdblfne38c पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१८ 250 194741 665346 2026-07-06T15:19:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665346 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २०१ ) गवर्नमेंटसे दिया जायगा और (५) उनके उत्तराधिकारियोंको बारह लाख वार्षिक पेन्शनके अतिरिक्त उनके पुत्र कलत्रादिके वेतनका स्वतंत्र प्रबंध किया जायगा इन शर्तोंसि संधि करना चाहाया । इस संधिपत्रपर हस्ताक्षर करने के लिये नब्वायको तीन दिनकी अवधि दीगईथी। अवधि समाप्त होने उपरांत नव्याने संधिपत्र पर हस्ताक्षर नहींकिये। बस इसलिये अपनी आज्ञाके अनुसार गवर्नमेंटने अवध प्रदेशमें खालसा करलिया। नन्वायको वारह लाखकी पेन्शन दी गई जिसे उन्होंने आक्टूबर माससे स्वीकार कर लिया। उस समय सरकारने यहभी प्रकाशित किया कि नव्वाब साहब जब तक जियेंगे उनका नव्या पद बनारहेगा किन्तु उनके पीछेले उनके उत्तराधिकारी इस पदके अधिकारी न होंगे। और न उनके समान वार्षिक पेन्शन उनके उत्तराधिकारियोंको दीनायगी ॥ यह बात अवधकी मजाको पसंद न आई। एकवर्षबाद नाना साहबकी प्रेरणासे जो चलवा हुआ उसमें लखनऊकी सेनाका अधिक भाग बलवा करने में था और अयोध्या ही इस उपद्रका केन्द्रथा नेपालके जंगबहादुरने ९ हजारसेना भेजकर अवधका उपद्रव शांतकिया । और उनकी सहायतासे सरकारने अवधका राज्य फिर मातकिया || अध्याय १८. ईरान और चीनसे गवर्नमेंट के युद्ध । इसी वर्ष में भारतगवर्नमेंटको ईरानराज्यसे लड़ाई करनी पड़ी। ईरामराज्यने हिरातपर चढ़ाई कर सन् १८५५ ई० की २५ आक्टूबर को उसपर अपना अधिकार करलियामा भारत गवर्नमेंट उसकी इसचालको पसंद न करसकी क्योंकि गवर्नमेंट का कथन है कि अफ़गानिस्तान और हिरात पर भारतं वर्न मेंट सिवाय दूसरे किसी का आधिपत्य नहीं है। इस युद्धमें ईरान राज्यकी हार हुई । और उसे लाचार होकर भारत गवर्नमेंटसे संधि करनी पड़ी । ईरानके साथ जो संधिपत्र हुआ उसकी शर्तें ये थीं "हिरात नगर और अफगानि- स्तानकी भूमि पर आधिपत्यका दावा ईरान राज्य छोड़ता है, हिरात और अफगानिस्तानके राजाओंसे करलेने अपने नामपर ख़तना पढ़ाने और अपने सिक्के का वहां प्रचार करनेका दावा उसे अब स्वीकार नहीं है । और स्वीकार करताहै कि अपसे पीछे अफगानिस्तानके स्थानीय कामकाज में न पहूंगा और हिरात तथा अफगानिस्तानको स्वतंत्र गिनूँगा | अबसे अफ़गानिस्तान और हिरात राज्यके झगडोंका निपटार करनेके अंगरेजी सरकारको पंचायत<noinclude></noinclude> g5ukl00jzuy42wdhae1wyahgcvj6q14 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२१९ 250 194742 665347 2026-07-06T15:19:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665347 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(202) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । करना चाहिये ।" इस लेखपर हस्ताक्षर करने बाद अंगरेज़ राजदूतके तेहेरानके पीछे पहुंचने पर पहले अपमानोंके लिये ईरानका क्षमा मांगना ठहरा। सुना गया है कि ईरान शाहनेके अंगरेन दूतके विषयमें अपने प्रधान अमात्यको लिखाया कि-" मिस्टर मरे मूर्ख और पागलहें क्योंकि राज्योंका तक का अपमान करना उसने सीख लिया है । और यह ऐसी मूर्खता करने लगा है " || ईरान युद्धको समाप्ति होतेही चीनपर चढ़ाई करनेका अवसर आया। चीन गवर्नमेंटपर अभिशाप यह लगायागया था कि उसने अंगरेज़ी झंडेका अपमान कियाहै । 'एरो' नामक जहाज़ में ७ अक्टूबर सन् १८५६ ई० को कितनेही चीनी कर्मचारी आये और उस जहाज मेंसे बारह मनुष्योंको पकड़लेगये । जहाज़के मालिक ने उसपर अंगरेज़ी झंडा चढ़ाकर यह प्रकाशित किया कि यह जहाज अंगरेजी है; और चीनने इसका अपमान किया है। इसबातको चीनने न सुना और कहदिया कि "यह अंगरेजी जहाज नहीं है किन्तु चीनी जहाज है । और इसे अंगरेजी झंडा चढ़ानेका अधिकार नहीं है। "मिस्टर जस्टिस मेकार्थी ने अपने इति- हासमें लिखा है कि चीन गवर्नमेंटका कथन सत्यथा। और जहान के मालिकने अपने लाभ के लिये थोड़े समय के लिये कहीं से झंडा प्राप्तकर लियाथा। "परंतु कंटानके बंदरका अंगरेजी दूत बरखे ड़िया था और इसलिये उसने पेकिन स्थित मुख्यदूतको झूठी खबर देकर बहका दिया था। जिस समय इस बातकी ख़बर इंग्लैंड में पहुँची वहांके कितनेही राजनीतिज्ञोंने इस चालकी बहुत निन्दाकी थी परंतु लार्ड पामर्स्टनने एक ऐसा नियम प्रकाशित किया कि "हम सवा झूठे किन्तु अब तो अपनी टेकका निर्वाह करनाही वाहिये।" इस नियमको कितनेही स्वार्थी अगरेजोंने पसन्द किया इसकारण पार्लियामेण्टमें पामर्स्टन के विरोधी न टिकसके। युद्धके अन्त में ब्रिटिश वटा विजय हुआ। पांच बंदर फिर यूरोपियन व्यापारके लिये खोलनेका चीनपर दबाव पड़ा। और ईसाई पादरियोंको चीन राज्यमें धर्मोप- देश करनेकी स्वतन्त्रता मिलगई । इसी स्वतन्त्रता ने अनेक वार चीनमें लाखों ईसाइयोंका नाश करार चीन राज्यको मिट्टी में मिलादिया ॥ अध्याय १९. भारतवर्षका बलवा । कीमियांक युद्ध में हजारों मनुष्योंकेि नष्ट होनेसे खिन्न और विजयले हर्षित इंग्लैंडी प्रजाको जो सन् ५७ के मलयेकी एकाएक खबर मिली । उस वर्षसे<noinclude></noinclude> smya5wfvy4mrxk29h13iygj4f2699i6 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२० 250 194743 665348 2026-07-06T15:20:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665348 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २०३ ) पहले भारतमें श्रीमतीका स्वतन्त्र शासन न था । किन्तु ईस्टइण्डिया कम्पनी राज्य करती थी । भारतके मबन्धपर बिलायतका कुछभी ध्यान न था । पार्लि यामेंटको सेक्रेटरी आफस्टेट निघर चलाते उधर चलती थी। लार्ड डलहौसी की रजवाड़ोंको खालसे करनेकी नीतिने देशमें हलचल मचा रखी थी । सन्र १८५६ ई० में उनके उत्तराधिकारी लार्ड कैनिंगने शांति स्थापन करनेका बहुत कुछ प्रयत्न किया परंतु उनकी कुछ चली नहीं । और सन् १८५७ ई० के मई मासमें भारतवर्ष में वलवेकी भाग एकदम भड़क उठी । इसके कारण अंगरेज़ कर्त्ताओंने जो दिखलाये हैं। उनमेंसे थोड़े ये हैं उनका कथन है कि भारत गवर्नमेंटने बहुत ही अविचार और भूलभरी नीतिका अवलम्बन कियाथा। अफ- गानिस्तानकी चढ़ाई में हारखाना, सिंध, पंजाब और नागपुरका खालसा और अवधको सरकारी राज्यमें मिला देना आदि कामोंसे प्रजाके चित्तपर महुतदी बुरा प्रभावपड़ा। बंगालकी सेनामें अधिक लोग अवधके रहनेवाले थे। ये लोग अवध में सरकारी राज्य स्थापित करनेसे बहुत ही दुःखित होगये थे । सेना और जाके मनमें सरकारकी नीतिपर सन्देह होगया। इस अवसर में गवर्नमेंटने एक नवीन प्रकारकी बंदूक सेना में प्रचलितकी उसका कास हाथसे तोड़नेके बदले दांत से काटना पड़ता था। सिपाहियों को संदेह होगया कि ये कार्टूस गौ और सूअर की चर्बी से बनाये गये हैं और इन्हें दांत से कटवाकर सरकार हिन्दू मुसलमान सैनिकों का धर्म भ्रष्ट करना चाहती है। प्रसिद्ध इतिहास कर्त्ता मिस्टर टाळवाइन हीलरने लिखा है कि-" प्रमादवश कासों में गौ और सुअर की चर्षीका उपयोग हुआ था । सिपाहियों ने अज्ञानवश यह समझ लिया कि, अंगरेज़ लोग जान बूझकर हमारा धर्म भ्रष्ट करना चाहते हैं। दुर्भाग्यसे उनका भ्रम दूरकरने का सैनिक अभ्स- रोंने शीघ्र मयन न किया। इसका परिणाम यह हुआ कि कलकत्ते के निकट बारकपुर की सेना में हलचल मचगई। वहां के सैनिकों ने मकानों में आग लगादी। इसनात से सेनाध्यक्षकों की आँखें सुलगाई और उन्होंने वाले कार्टू सोको बिलकुल बंद करनेकी आज्ञादी । परन्तु आगलग चुकी थी इसलिये सिपा- हियोंने किसीभी प्रकार के कास पर विश्वास न किया | इसके सिवाय यह भी कहा जाता है कि, रेलवे लाइने और तारको देखकर मूर्ख लोगोंने यह संदेह किया कि, सरकार हमें जादूसे पा करना चाहती है। बस कई एक इसमातको भी मलने के अन्य कारणों में से एक समझते हैं ॥<noinclude></noinclude> 6u2nvyiqscdi8q5iqm7wqh9nlajils6 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२१ 250 194744 665349 2026-07-06T15:20:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665349 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २०४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । लकी आग प्रथम मेरठ में भड़की। वहांके बलवाइयों ने अंगरेज अफ्सरों पर गोलीमार कर कितनेही अंगरेजों का बधकरडाला । मेरठकी सेना वहांसे बलवाकर दिल्ली पहुंची। वहां जाकर उसने दिल्ली सम्राट के एक वंशधरको जो सरकार से पेन्शन पाताथा अपना अफ्सर बनाया और उसीको भारतका सम्राट् निश्चित करलिया । भारतके गवर्नर जनरलने चीन जातीहुई अंगरेजी सेनाको उपद्रव की शांतिके लिये रोक लिया। इस सेना के आपहुंचने पूर्व पंजाबके लेफ्टि नेंट गवर्नर सर जान लारेंसने देशी सेनाके शस्त्र छीन लिये और दिल्ली विजयके लिये अपनी विश्वस्तसेना भेजी। सिक्खजैसी चीरजाति जो थोड़ेही वर्ष पूर्व अंगरेजों से लड़चुकी थी गवर्नमेंट की भक्तरहकर तन और मन से सहायक हुई। सिक्ख और यूरोपियन सेनाने बड़ी कठिनता से दिल्ली में शांति स्थापित की | दिल्लीसे चलकर उपद्रव लखनऊ पहुंचा। यह अवधकी राजधानी थी और गवर्नमेंट ने हालही में इसमान्त को लेलिया था इसलिये यहां बड़ी हृदयविदारक घटना हुई । बलवाइयों ने मारकूटकर यूरोपियनोंकी स्त्री पालकों सहित रेजिडें- सीके एक बंद मकान में घेर लिया। इससे भी बढ़कर कानपुर में हुआ। वहां स्त्री बालकों सहित एक सहस्रके लगभग यूरोपियन थे वहांके सरह्यूग व्हीलर सेनापति थे । बिठूर के पदव्युत राजा नाना साहब जिनका गवर्न- भेंटने गोदलेना स्वीकार नहीं कियाथा उनपर सेनापतिका विश्वास था । उनपर भरोसा कर व्हीलर साहब सब यूरोपियनों को लेकर एक अस्पताल में जिसके गिर्द मट्टीकी दीवालथी घुसबैठे। इनके पास पांचसो से अधिक स्त्री वालक और इनसे कम पुरुष थे । नानासाहमने वलवाइयों में मिलकर अस्पताल को घेर लिया । उनकी गोलियोंसे अस्पतालके भीतर यूरोपियन लोगोंकी लाशें बिछगईं।खी बालकोंको खुली हुई धूप में मिट्टीकी दीवारकी शरण लेनी पड़ी। बालवच्चों के सूखे मुख हरे करने के लिये जो लोग अस्पतालके भीतर कुसे पानी लेने गयेथे वे बलवाइयोंकी गोली से मरकर कुएँकी शरण हुए। अंतमें नानासाहबने कह- दिया कि यदि तुम लोग हमारी शरण आकर अस्पताल खाली करदोगे तो हम तुम्हें यहांसे जीवित निकल जाने देंगे। इसबातको यूरोपियमोंने स्वीकार किया और वे एक नौकामें बैठकर गंगानीके उसपार जानेलगे परन्तु उपद्रवियोंने वहां भी उनका पीछा न छोड़ा और गोलियां मार २ कर नावके लोगों को डुबोदिया । जो कुछ स्त्रियां वा बालक बचे बचाये थे उन्हें पकड़कर एक मकान में उनको बुरी तरहसे मार डाला । व्हीलर साहब के साथ के एक हजार मनुष्यों में से अपना दुखड़ा रोनेके लिये केवल चार मनुष्य वचने पाये ॥<noinclude></noinclude> 60y2qpju32nfp569y72ovprhl7iu20n पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२२ 250 194745 665350 2026-07-06T15:20:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665350 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग (२०५ ) इन बातोंको सुनकर भारत और विलायतके यूरोपियन लोगोंका क्रोध बहुत भड़का और वे उचित अनुचितका कुछ विचार न कर बदला लेनेपर उतारुहुए किन्तु उससमय भारतके गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग बड़े शांतचित्त और बुद्धिमान थे । उन्होंने अपने मनमें ठान लिया कि अपराधियों के साथ निरपराध नहीं मारे जाना चाहिये । और उन्हीं के मयत्नसे बखेड़ा अधिक न बढ़ने पाया ॥ धीरे २ मामला सुधरने लगा । भारतके दक्षिण भागमें उससमय शांति थी । अंतमें दिल्लीपर सरकारका फिर झंडा जा फरहराया परन्तु अभीतक लखनऊ में जो अंगरेज घिरे हुए उनकी दशा अच्छी न थी । सर जान लारेंसके भाई सह हेनरी लारेंस उपद्रवियोंके गोलेले मारे जा चुके थे । उन लोगोंके पास खानेको एक दाना न था और ऐसा अवसर आगयाया कि उन्हें लाचार होकर शत्रुकी शरण लेना पड़े । इस अवसर में सहायता के लिये सेना आपहुँची । जनरल बलाकने ४०० सेनासे ५० हजार शत्रुओं का सामना कर बहुत दृढतासे लड़- कर उनके प्राण बचाये । इस कार्य में जनरल औटरमभी सहायक हुए और दोनोंने मिलकर रेजिडेंसीमें घिरे हुए लोगोंके प्राण बचाकर लखनऊका विजय किया । परंतु इस युद्धमें जनरल हैवलाक घायल होकर मर गये। और सर को- for कैम्प बैल भारत के प्रधान सेनाध्यक्ष नियत हुए। इनकी सहायताके लिये विलायतसे बहुत कुछ सेना आपहुँची थी इसलिये शनैः २ उपद्रव शांत हुआ। जिन लोगोंके बलवे में संयुक्त होनेका थोड़ा भी प्रमाण मिला उनको फाँसीपर लटका दिया गया। सैकड़ों मनुष्योंके लटकने और लार्ड कैनिंगके समाश्वासन देनेसे उपद्रव शांत हुआ। नानासाहब न मालूम किधर भाग गये । उपद्र- चियोंका साथ देकर जिस व्यक्ति ( शाह आलम) ने दिल्लीका सम्राट् बनना चाहा था वह कैद किया गया। भारत वर्ष में ईस्ट इंडिया कंपनीकी जगह श्रीम- तीका शासन हुआ और भारत वर्षके लाट साहब और विलायतमें स्टेटसेक्रेटरी कौंसिलकी सम्मति से देशका शासन करने लगे। इस नखेड़ेके समय समस्त देशी राजा सरकारके राजभक्त रहे और नेपालने सहायता की ॥ भारत वर्ष मलवेका विषय इतना बड़ा है कि, उसे मैं इस पुस्तक में विस्तार पूर्वक नहीं लिख सकता हूं। दंग भाषाके एक प्रसिद्ध लेखकने इस विषय में पुस्तक लिखी है । उसका अनुवाद हिन्दीमें हो गया है । आशा है कि वह "श्रीवेंकटेश्वर" यंत्रालय में छपकर शीघ्र प्रकाशित होगी ।<noinclude></noinclude> l1448en6hd5tiok0ntzq1ll2xnbixc4 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२३ 250 194746 665351 2026-07-06T15:20:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665351 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २०६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अध्याय २०. बलवेक विषयमें राज्ञीपतिकी सम्मति । जिस समय वलवेका संवाद इंग्लैंड पहुंचा वहांके लोगोंमें बड़ी हलचल मची। वहांसे भारतकी रक्षाके लिये १० हजार सेना भारतको विदा हुई । दंपतिको इस ससाचारसे बहुत कालतक बेचनी रही और वे दम २ के समाचार गवर्नमेंटसे लेते रहे । उनको विशेष भय इस बातका था कि, बंगालकी समस्त ( अस्सी हज़ार ) सेना उपद्रव न कर उठे परंतु यह बात न हुई और दो लाख उपद्रवि- योंपर अंतमें २४०० अंगरेजी सेनाने विजय किया । श्रीमतीके पति प्रिंस एलबर्टने भारत वर्षके उपद्रव की गर्मागर्मी के समय २७ जुलाई सन् १८५७३० को भूशियाके राजा ( आज कलके जर्मननरेशके दादा ) प्रथम विलियमको एक पत्र लिखा था। उससे विदित होता है कि, दंपति इस उपद्रवका क्या कारण समझते थे और वे राजनीतिमें कितने कुशल थे। उसमें लिखाया कि:- "आपने १७ तिथिके पत्र में भारतवर्षकी गड़बड़के विषयमें संकेत किया है । इस लिये मैं अपने विचार प्रकट करना उचित समझता हूं। मैं यह मानता हूं कि, हमारे भारतशासन के गांभीर्य और उन कारणोंको जिनसे हम उत्तम कहला रहेहैं यूरोपियन लोग बिलकुल अपरिचित हैं ॥ “भारतवासी अपनी स्वतंत्रता रक्षित नहीं रख सकते हैं और न युद्धकरके उसे प्राप्तकर सकते हैं । कुछ कालसे नई २ जातों ने भारतवर्ष पर चढ़ाई कर जय प्राप्त किया है ऐसीरियन ईरानी और सिकंदर के शासनमें यूनानियों ने भारत पर आक्रमण कर वहां वालोंको जीता है तातारी, अरष और अन्य ना- तिने उनपर आक्रमण किया है। नेताओं ने वहां बालोंको अपने दबावमें डालकर उनपर अत्याचार किये हैं परंतु उन्हें जड़ से उखाड़ा नहीं है । और न उन्हें अपने में मिलाया है । इस कारणसे बहकि लोग परस्पर मिले जुले रहने पर भी उनमें एक सामान्य प्रजाके समान एकत्रता नहीं है ॥ "जिन लोगोंका हृदय देशियोंकि जंगली पनसे दुःखके मारे छिद गया है वे यदि देशियों पर चाहे जैसा अत्याचार करें तो भी वे क्षमाके योग्य हैं। कोई भी मनुष्य उनका बचाव करनेमें समर्थ नहीं हो सकता है किन्तु जो लोग अपने घरों में शांतिपूर्वक निवास करते हैं और जिन्हें इस उपद्रवका कुछ भी कष्ट<noinclude></noinclude> jgdke30rjtu99mibg4nx9xxsqgpbymy पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२४ 250 194747 665352 2026-07-06T15:20:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665352 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (2009) उठाना नहीं पड़ा है और यदि उन्हें कुछ सहन भी करना पड़ा है तो केवल द्रव्यसंबंधी हानि, वे ही अधिक हलचल मचारहे हैं। इस कारणसे उत्तम प्रबं- ध करनेके कार्य में मुख्य अपराधियोंको कठोरतम दंड देने बाद भी उन्हीं की ओरसे आक्षेप होनेका भय है ॥ "हिन्दू मुसलमानों में धर्मके विषयमें इतना अंतर है कि उन दोनोंका एक हो जाना असंभव है। स्वयं हिन्दू ही अपने जातिबंधनमें ऐसे जकड़े हुए हैं कि, उनमें भी एका होना कठिन है । भित्र २ जाति एक दूसरे पर अत्याचार न करने पाँवै इस बातकी हम संभाल रखते हैं। न्यायालयों में गरीब अमीरको हम समान भावसे देखते हैं और देशके प्रत्येक भागके प्रत्येक व्यक्ति को किसी प्रकार के संदेह बिना न्याय मिलनेका हम मयन करते हैं। इसके साथही हम प्रजाके भिन्न २ धर्म और सामाजिक नियमों में हस्ताक्षेप नहीं करते हैं। इनकारणोंसे ही हमारा आधिपत्य वहां स्थिर रहसका है। वहां पर अत्याचार बिलकुल नहीं है। मालपर बाहर से आते समय कर नहीं लिया जाता है। भारतवासियों पर केवल लवण करका बोझाथा सोभी उठादिया गया। पुरानी जमीदारियोंसे नकात और व्या- पारसे कंपनी अपना रुपया इकट्ठा करती है ॥ " देशके लाभ और उन्नति के लिये अबतक कुछभी नहीं कियागया है किन्तु पुराने शासकोंने मजाको जो कष्ट दिये थे उन्हें यादकर वह आजकलके राजाको आशीर्वाद देती है अबतक इस बातकी जाँच होना शेष है कि उन लोगों के मुख्य धर्मों और रीतिको देखकर यूरोपियन नीतिके अनुसार उनमें कहांतक संशोधन किया जासकता है अथवा उसका प्रवेश होसकता है ॥ “थोड़े कालसे इन बातोंसे अलग रहनेके नियमका भंग किया गया है। रेल्वे और नहरें बनानेका लग्गा लगाया गया है। पाठशालायें स्थापित हुई हैं, सती होनेकी रीति बंद कीगई है, पुनर्विवाह नियमानुसार मानागया है, जगन्नाथके रथके नीचे मनुष्योंका कुचलना बंद किया गया है। इन कामोंका अर्थ हिन्दु- मैंने ऐसा किया है कि इंग्लैंड उनके धर्मको दबाकर ईसाई मत फैलाना चाहता है। मिनीआ राइफल नामकी बंदूकोंमें कास बिना प्रयास घुसनायें इस अभि- मायसे वर्गीमें डुबोये जाते हैं। इसीसे मामला निगड़गया है । सेनाके चित्तमें इस बातसे विचार होगया है कि उन्हें धर्म भ्रष्ट करनेका प्रयत्न कियाजाता है क्योंकि उनके मुखमें चर्बी या मांस जानेसे वे धर्मभ्रष्ट होते हैं । "भारतवर्षकी सेना में मदरास और मंबईकी सेनासे बंगालकी सेना बढ़ी घड़ी है । ये सैनिक उत्तम जातिके हैं। एक २ बैटालियनमें ४०० ब्राह्मण देखे जातेहैं ।<noinclude></noinclude> q16gxf0ij7bb4l1cuoynnbsqxxjapqk पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२५ 250 194748 665353 2026-07-06T15:20:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665353 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( २०८ ) मध्य शताब्दियों में पोप अथवा जर्मन साम्राज्य की ओरसे जातिच्युत करनेका विषय जिस अर्थका बोधक था वही अर्थ उनमें है । अर्थात् जो लोग जातिभ्रष्ट होनातेंहें उनका सांसारिक और राजकीय वातोंमें मृत्युतुल्यः होना मामाजाता है ! इसकारण बंगालसेनाके उपद्रव करने का हमें कुछ आश्चर्य नहीं है। सरकार के लिये बुरे विचार रखनेवाले मनुष्य उपद्रवियों में मिलगये हैं । किन्तु किसीभी जगह की मजा उनमें संयुक्त नहीं हुई है। वह कहती है कि ब्रिटिश गवर्नमेंट पर प्रजाका संतोष है । ......... इस भय को दूर करने में हम शक्तिमान होंगे और मुझे दृढ निश्चय है कि हम शक्तिमान होंगेही तवही इसका परिणाम कदाचित् अच्छा होगा ।........कंपनी अब स्थिर रहनेमें कदाचित् समर्थ न होसकेगी। इस बात में संदेह है। जीते रहैं गे तो देखें गे" ॥ इसके सिवाय मिस एलबर्टने रानीका ढिंढोरा तैयार करने और उसका संशो- धन करनेमें जो भारतका उपकार किया वह अन्यत्र प्रकाशित है । इस पत्रके पहुंचनेसे जर्मनीके सम्राट् भारत वर्षकी सच्ची स्थिति जाननेमें समर्थ हुए और इसीसे भारतवासियों तथा इंग्लैंडपर जो भांति २ के कलंकोंकी यूरोपमें गप्पें उड़तीं थीं वे बन्द होगई ॥ अध्याय २१. भारतके नवीन प्रबंधके विषयमें श्रीमतीके विचार । अंगरेज़ों का भारतपर क्रोध । उपद्रव शांत होगया । भारतवर्ष की प्रजाके सुखसे निवास करने का समय आया । इंग्लैंडमें उपद्रवके विषयकी चिन्ता मिटी तब भारतके भावी प्रबंधके लिये इंग्लैंडके राजनीति कुशल विद्वानोंके शिर पचानेका अवसर आया। श्रीमतीके पतिको भारत प्रबंधकी द्विविधा पसंद न थी । बलवा समाप्त होतेही मिस्टर डिसरायलीने प्रधान अमात्य लार्ड पामर्स्टनसे बलवेका कारण और प्रबंधके विचारोंकी रिपोर्ट मांगी। और उत्तर न पाकर उन्हों ने २७ जुलाई को सम्मति दी कि 'अवसे भारतका प्रबंध रानीको अपने हाथमें लेना चाहिये । आक्टूबर मासमें लार्ड पामर्स्टनने लिखा कि- " गोलार्द्धके दूसरे भागके एक विशाल प्रदेशपर दो मंत्रिदलोंसे राज्य करनेमें झंझट और कठिनता अधिक है । इनमेंसे एक का आधार पार्लियामेंटपर है और दूसरी केवल व्यापारसेही प्रयोजन रखती है । वह वर्षमें केवल दो तीन बार एकत्रित होता है उससे वर्ष भरकी घटना- ओंको देखते राज्य चलता नहीं दीखताहै। इसलिये मेरी योजना यह है कि, पार्लियामेंट आगामि अधिवेशन में एक बिल उपस्थित कियाजाय जिससे<noinclude></noinclude> ovna4c3qqhdfoc3vozbyjm7wki5wo12 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२६ 250 194749 665354 2026-07-06T15:21:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665354 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २०९ ) वर्तमान प्रबंधको उठाकर भारतको रानी और पार्लियामेंटके सीधे अधिकारमें लिया जाय। इस बातसे कंपनी के संबंधी विरोध करेंगे और पार्लियामेंट के मेंगर भी इसमातपर जोरदेंगे इसलिये कार्य स्थिर करने पूर्व अच्छीतरह विचार होना चाहिये” । लार्डपामर्स्टनने इस चर्चा पर विशेष रूपपर ध्यानदिया और श्रीमती और उनके पतिसे अनेक बार मिलकर इस विषय में वादानुवाद किया । ३ दिसंबर सन् १८५७ ई० को पार्लियामेंट खुली और १७ को लार्ड पामस्टेनका बिल श्रीमतीकी सेवामें उपस्थित किया गया ॥ इस बीच भारतके गवर्नर जनरल लार्ड केनिंगका पत्र २५ सितंबरका लिखा हुआ श्रीमतीकी सेवायें पहुँचा। उसमें लिखा था किः- "जिन लोगोंको अधिक उत्तम उदारण उत्पन्न करना चाहिये उनमें भी पागल पन और अंधा कट देखाजाताहै ऐसी स्थिति हमारे स्वदेशियोंकी देखकर मुझे तजा आती है। एक भी मनुष्य ऐसा विचार करता नहीं दीखता है जो मुख्य उपद्रचि- यों के अतिरिक्त चाळीस पचास हज़ार मनुष्योंको फांसी वा गोलीसे मारडालनेका काम युक्तियुक्त वा उत्तम न समझताहो। जो लोग इस विषय में अधिकतर कहासुनी अथवा लिखापढ़ी करते हैं उन्हें नहीं सूझता है कि भारतवर्ष के प्रबंध तथा सेना विभाग में देशियोंको नौकर रखकर कामलिये बिना और उनपर अधिकांशमें विश्वास रक्खेविना इंग्लैंडके शासकके लिये भारतपर अधिकार रखने अथवा यहां शासन करनेका काम शक्तिसे बाहरहै । प्रजाको सदाभयभीत रखना हानिकर है - इस नियमपर जो लोग लंबे २ लेख लिखने में लगे हुए हैं ये गत आठ मासमें दुर्घटना इतिहास संबंधी पुस्तककी काली पृष्ठोंपर प्रकाश डालनेवाले हिन्दू और मुसलमानों की कृपा और उदारताके असंख्य उदाहरणोंको भूलते हैं । यह बात उन्हें शोभा देनेवाली नहीं है " ॥ इंग्लैंड और भारत वर्षके अंगरेज़ इस देशके हजारों मनुष्योंको फांसी दिला- ना चाहते थे। और इस उपचने उनको इतना उकसा दिया था कि देशका सर्वनाश करनेमें उनका संतोष था । इस कारण लार्ड कैनिंग की सम्मति उनको रुचिकर न हुई इसलिये वे लोग लाट साहब की निन्दा कर उनकी भारत वर्षसे बदली करादेनेकी पुकार उठाने लगे। ऐसे अवसर में श्रीमतीने इस पत्रको पाकर लार्ड कैनिंगके विचारकी मशंसाकी और उनको इसके उत्तरमें एक पत्र लिखा:- यहाँकी प्रजाके अधिक भागकी ओरसे समस्त भारत वर्षकी प्रजा, तथा समग्र देशी सेनापर भेदविना, जो “ईसाइयों की चालका अयोग्य ढंग, बतलाया जाताहै उनके लिये लार्ड केनिंगने खेद और क्रोध प्रकाशित किया उसमें मैं सहानुभूति प्रकाशित करती हूं । परंतु प्रजाका ऐसा ढंग अधिक काल<noinclude></noinclude> 96hfphp8m1x2ybetjhonl4fo7jsqow3 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२७ 250 194750 665355 2026-07-06T15:21:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665355 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( २१० ) तक नहीं रहेगा। निर्दोषस्त्रियों और बालकोंपर जैसा कुछ अत्याचार हुआहै उसके लिये किसीका भी रक्त खांलेविना नहीं रहसकताहै । इस विषयकी चर्चाने यहांकी प्रजा कोषको उत्पन्न कियाहै । ऐसे घृणित काम करने वालोंके लिये कैसाभी कठोर दंडदिया जाय अधिक नहीं है और चाहे जैसा खेद हमारे चित्त को उत्पन्न हो परंतु इसप्रकारके समस्त अपराधियों को कठिन दंड देना चाहिये || "परंतु सामान्य मजा-शांति पूर्वक निवास करने वालों - और जिन परम कृपालु देशियोंने हमारी सहायता की, भागकर छिपने वालों को जिन्होंने आश्रय दियाहै और जिनका बर्ताव विश्वास योग्य और सच्चा रहाहै उन समपर अत्यंतर कृपा करनी चाहिये । उन्हें जानना चाहिये कि किसी भी जाति का तिरस्कार काले रंगका चमड़ा देखकर किया नहीं जाता है। बिलकुल नहीं किया जायगा किन्तु उनकी रानीकी सर्वोत्तम इच्छा उन्हें सुखी, संतुष्ट तथा उन्नति युक्त देखनेकोहे " || भारत वर्षकी मजार केवल इस देशके अंगरेज़ और इंग्लैंडकी मजाकाठी कोप न था किन्तु इसका प्रभाव बहकि मंत्रिमंडलपर भी पडाथा । प्रजाकी इच्छाके प्रवाह में पड़कर इंग्लैंडके मंत्रिमंडलने निश्चय कियाथा कि, भारत वर्षकी प्रजाको बलपूर्वक ईसाई बना लेना चाहिये और सन् १८३३ ई० में पार्लियामेंटने चार्टर नामकी जो सनद भारतवर्षको दीथी उसेभी वे लौटा लेना चाहते थे। इस चार्टरका वही आशयथा जो श्रीमतीकै ढिंढोरेका है । इस विष- यके ढिंढोरेकी पांडुलिपि तैयार कर हस्ताक्षरके लिये श्रीमतीके पास भेजी गईथी। इसको श्रीमतीने बिलकुल नापसंद किया। इस विषयमें आपने पतिकी सम्मतिसे विशेष काम लिया और मंत्रिमंडलके क्रोधको दवानेके साथही उनको अपना कर्तव्य अच्छी तरह समझा दिया। इस वादानुवादके समय लार्ड पाय- स्टेनका दल टूटकर लार्ड डर्बी इंग्लैंडके प्रधान अमात्य हुए थे इसलिये श्रीम- तीकी ओरसे उनके प्राइवेट सेक्रेटरी लाई माम्सपरीने इस पांडु लिपिके संशो- धनके लिये बेबल्स वर्गसे १५ अगस्त सन् १८५८ ई० को एक पत्र उन्हांके नाम लिखा जिसका आशय यह है:- " इस [ भारत वर्ष ] देशका कोई भी निवासी अथवा श्रीमतीकी उस देशमें रहनेवाली असली मजा धर्म, जन्म भूमि, कुल, रंग अथवा इनमें से कोई रखनेसे किसी स्थान पद पा नौकरी पानेके लिये कंपनीके शासन में अयोग्य न समझी जायगी" ॥ यह आईन सन् १८१६ ई० मे पार्लियामेंट के हार्ड और कामन्स हाउसोंने पास किया ॥<noinclude></noinclude> gb5n0rv90drmpkalaopno7hsegzmgso पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२८ 250 194751 665356 2026-07-06T15:21:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665356 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २११ ) “भारतवर्ष में प्रकाशित होनेवाले टिंढोरेकी पांडु लिपिके प्रतिवाद और त्रुटियां आपको समझानेका कार्य श्रीमतीने मुझको सौंपा है। आशा है कि, आप उसे अपनी मौठभाषामें लिखेंगे। इस बातसे श्रीमतीको आनन्द होगा । ढिंढोरेको तैयार करते समय आपको ध्यान रखना चाहिये कि, दश करोडसे भी अधिक एशिया निवासियोंपर स्वतंत्र शासनका आरंभ करने बाद तथा भीतरी भयंकर संग्रामके अनंतर एक स्त्री राजकर्त्री उन लोगोंसे संभाषण करती है । भविष्यत् किन नियमोंपर भारतका प्रबंध किया जायगा उसका स्पष्टीकरण कर उनके साथ आगेको कैसा बर्ताव किया जायगा जिसका इकरार करना है। ऐसे पत्रके लिखने में उदारता, परमार्थ और धर्मसमधी विचारोंको स्वतंत्रता पूर्वक प्रकट करना चाहिये । और भारतवासियोंको अंगरेनी मुकुटकी सत्ता नीचे अंगरेजी मजाके समान गिनकर उन्हें कैसे स्वत्व दिये जायेंगे और इससे उनकी कहांतक उन्नति होगी। यह बात उन्हें समझाना चाहिये " ॥ इससे श्रीमतीके विचार स्पष्ट रूपपर विदितहोगये । संशोधनसे पूर्व नो पांडुलिपि तैयार हुईथी उसमें लिखाया कि "देशीधमों की जड़ काटडालने की सता अंगरेजी सरकारको है। लार्ड माम्सवरीने लिखाकि “ यह बात श्रीमतीको पसंद नहींहै श्रीमती की इच्छा है कि देशीधर्मके विषयमें यह लिखना चाहिये कि श्रीमती अपने धर्मपर बड़ा प्रेम रखती हैं और धर्मसे वह जैसा सुख और संतोष प्राप्त करती हैं उसके कारण वह देशी धर्मपर आघात करनेका यत्न चिलकुल न करेंगी। और यह अपने सेवकोंको सदा इसी तरहका वर्ताव करनेकी आज्ञा देंगी" || असल मसौदे में यह भी बात थी कि " दीनता दूरकरने का भी सरकार प्रयत्न करेगी ।" इसके विषयमें लार्डमाम्सबरीने लिखा कि-" इनशब्दोंसे लेखकका भावार्थ स्पष्ट नहीं होता है इसलिये इसवाक्यको विस्तारपूर्वक लिखनेके साथही उसमें यह भी उल्लेख होना चाहिये कि रेल्वे, तार और नहर आदिकार्य मजाकी उन्नति करने वालें । जिससे वहांके बहमी मनुष्योंके चितका संदेह दूरहा " || अंतमें श्रीमती की इच्छा अनुसार लार्ड डर्बीने पांडुलिपिका संशोधन कर दिया। उसमें इतनी वृद्धि और कीगई कि " श्रीमती अपनी अन्य प्रजाके किये जिसतरह कर्तव्य बद्ध हैं उसी प्रकारके कर्तव्य से अपने को वह भारतवर्ष के लिये भी समझतीदें । हमारी प्रथाकी भलाईकी इस इच्छाके अनुसार पत्तीप करनेकी शक्ति सर्व शक्तिमान परमात्मा हमें और हमारे अधीन कर्मचारियों को मदान करे" ||<noinclude></noinclude> 7tnannafdaqc366jy4fndxiiy10r0bk पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२२९ 250 194752 665357 2026-07-06T15:21:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665357 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २१२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । "अमृतबाजारपत्रिका " को विदित हुआ है कि, इंग्लैंड में भारत के प्रबंधके विषयमें जिस समय हलचल मचरही थी और वहांकी मजा भांति २ की तक कर भारतवासियोंको अधिकतर दवानेकी सम्मति देते थे श्रीमतीको नवंबर को सोते समय अचानक महात्मा ज्यानके दर्शन हुए। उन्होंने महारानीको अनेक तरहपर समझा बुझाकर भारतवर्ष के शासनके विषयमें योग्य सम्मति दी थी। श्रीमतीकी इन महात्माके साथ जो बातचीत हुई उसकी रिपोर्ट मुद्रित होकर मंत्रिमंडलके मेंबरोंको दीगई थी जिसीका फल यह ढिंढोराहै। कुछभी हो इतना अवश्य है कि महारानीने केवल ढिंढोरेका संशोधन करते समयंहा दवावनहीं डालाथा वरन इंग्लैंडके मंत्रिमंडलको वलवेके समय भारतमें गोरी सेना घढ़ाने और इंग्लैंडकी सेना दुगुनी करदेनेकी सम्मति भी दी थी और साथमें ही कहदिया था कि जो यहांकी सेना न बढ़ाकर भारतकी रक्षाके लिये भेजदी जायगी तो इंग्लैंड मैं कोई नया उपद्रव खड़ा हो जायगा । इस आज्ञासे इंग्लैंडको बहुतलाभ हुआ । अध्याय २२. श्रीमतीका ढिंढोरा । गत अध्यायमें जिस टिंढोरेके लिखेनानेके विषयमें इतने वादानुवाद का वर्णन हुआ है वह भारतवासियोंके और विशेषकर हिन्दी पाठकोंके अधिक जानने योग्य है । उसी ढिंढोरेपर भारतवर्षके प्रबंधका आधार है वही देशियोंके लिये सुशासनका पट्टा है । इस कारण उसका अविकल भाषान्तर यहांपर प्रकाशित करना परमावश्यक है । यह डिंढोरा १ नवंबर सन् १८५८ ई० को भारतवर्षके वाइसराय और गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग्ने प्रयागमें प्रजाको सुनाया था और इसका भाषानुवाद भारतवर्ष भरके मुख्य २ नगरोंमें उसीदिन सुनाया गयाथा उसका हिन्दी अनुवाद यह है :- भारतवर्ष के राजा सर्दार और प्रजाके नाम श्रीमती रानी और उनकी कौंसिलका ढिंढोरा । ईश्वरकी कृपासे ग्रेट ब्रिटेन और आयलैंण्डके संयुक्त राज्य और यूरोप, एशिया एफ्रिका, एमेरिका तथा आस्ट्रेलिया और इनके अधीन अन्य उपनिवेशोंकी रानी तथा धर्मकी रक्षका विक्टोरिया ॥<noinclude></noinclude> s47ele75xv49p7otb9wyskamnrfue5b पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३० 250 194753 665358 2026-07-06T15:21:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665358 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२१३ ) . अनेक भारी कारणांस पार्लियामेंट की दोनों सभाओंकी सम्मति और स्वीकार प्राप्तकर भारतवर्षके देशका जो प्रबन्ध अबतक हमारी ओरसे ट्रस्टीके तौरपर मान्यवर ईस्ट इंडिया कम्पनी चलाती थी उसे अबसे हमने अपने हाथमें लेना निश्चय किया है ॥ तथा स्वीकार करती और प्रतिज्ञा सम्मति और स्वीकार करनेसे ऊपर अब इसलिये हम इस लेखद्वारा मकट करती हैं कि, ऊपर लिखी हुई सभाओंकी लिखा मबन्ध हमने अपने हाथ में लिया है और उक्त देशोंकी हमारी समस्त प्रजाको हम आज्ञा देती हैं कि उन्हें सदा शुभचिन्तक ( बफादार ) रहना और हमारी, हमारे बारिसों और प्रतिनिधियोंकी ओर सचा भक्तिभाव रखना और अवसे पीछे हमारी भोरसे हमारे उक्त देशोंका प्रबन्ध करनेके लिये जो व्यक्ति नियतहों उनकी सत्ताका आदर करना चाहिये || हम अपने विश्वासपात्र, प्यारे भाई और मंत्री चार्लस जान पाइकौंट केनिंग की शुभचिन्तकता, चातुर्य और न्यायपर विशेष विश्वास और भरोसा रखकर इस लेखद्वारा हमारे उक्त देशोंके लिये हमारा प्रथम चाइसराय और गवर्नर जनरल 'नियत करती हैं । और हमारे नामपर उन देशोंका प्रबन्ध करने और हमारी ओरसे एक मंत्रीद्वारा समय २ पर जो आज्ञाय वा सूचनायें मिलें उनके आधीन रहकर हमारे नामपर सामान्यतः काम करनेकी सत्ता देती हैं । और मान्यवर ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेवा प्रबन्ध तथा सेना विभागके मिन २ पदोंपर जो लोग इस समय काम करते हैं उन्हें इस लेखद्वारा अपने २ पदों- पर स्थिर करती हैं परंतु उनके भविष्यत्‌का आधार हमारी कृपापर रहेगा और अब से पीछे जो आईन बनाये जायें उनके अधीन रहकर उन्हें चलना पड़ेगा | भारतवर्षके देशी राजाओंको इस लेख द्वारा हम प्रकट करती हैं कि उनके साथ जो कुछ संधियां मान्यवर ईस्ट इंडिया अथवा उसकी आज्ञासे कीगई हैं - उन्हें अथवा जो प्रण उनके साथ किये गयेहों उन्हें हम स्वीकार करती हैं और उन्हीं के अनुसार निरंतर बर्ताव किया जायगा और उन्होंके अनुसार वेभी संधिपत्र के पाबंद रहेंगे ऐसी हम आशा रखती हैं ॥ इस समय हमारे आधीन जितने देश हैं उनका विस्तार बढ़ाना हम नहीं चाहती हैं। और जैसे हम हमारे अधिकृत देशोंपर अथवा हमारे स्वत्यपर किसीको आक्रमण न करने देंगी वैसेही औकि देशपर अथवा स्वत्यपर हस्ताक्षेप करने को हम स्वीकार न करेंगी। देशी राजाओं का स्वत्व प्रतिष्ठा और सम्मानको इम अपने स्वत्व प्रतिष्ठा औरं सम्मानके बराबर समझेंगी । और<noinclude></noinclude> cx8al8wmm9cqmf5hshs42p9b2q0zgaa पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३१ 250 194754 665359 2026-07-06T15:22:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665359 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २१४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । हम चाहती हैं कि वे भी हमारी मनाशांति और सुमबंध से उपार्जित उन्नति और सांसारिक सुधार के फल प्राप्त करें || हमारे भारतीय देशों के निवासियोंके लिये हमारी अन्य प्रजाओं के समान कर्तव्यसे हम अपने तई प्रतिबद्ध समझती हैं । और सर्व शक्तिमान् ईश्वरक आशीवार्दसे उन कर्त्तव्योंको सत्यता और शुद्ध अंतःकरणसे हम पालन करेंगी || ईसाई धर्म की सत्यता पर दृढ विश्वास रख और उस धर्म से मिलते हुए संतोष को मानपूर्वक स्वीकार कर हमारा धर्म हमारी किसीभी मजा को पालन कराने का दबाव डालनेके हमारे स्वत्व अथवा इच्छाका समान रूप पर हम निषेध करती हैं। हम रानी के पद से हमारी इच्छा और हर्ष प्रकट करती हैं कि किसी पर भी उसके धर्मसंबंधी मत अथवा क्रियाके लिये किसी प्रकार पर पक्षपात न होगा अथवा कष्ट न दिया जायगा किन्तु सब लोगों को आईन की रक्षा अथवा अपक्षपाततासे भोगने देना होगा और हमारे आधीनस्थ कर्मचारियों को हम दृढ आज्ञा देती हैं कि, उनको हमारी किसी भी प्रजाके धर्मसंबंधी मत वा क्रिया में हस्ताक्षेप न करना चाहिये यदि कोई करेगा तो हमारी कठिन से कठिन अमस- त्रता का पात्र होगा ॥ - और हम ऐसी आज्ञा देती हैं कि जहां तक होसके किसी भी जाति वा धर्म की हमारी प्रजाओं को उनकी शिक्षा, बुद्धिमता और प्रामाणिकताके कारण वे किसी पदका कार्य योग्य रीतिपर संपादन करने के योग्य हों उनपर उन्हें किसी प्रकारके प्रतिबंध बिमा और पक्षपात रहित होकर नियत करना चाहिये ॥ भारत वर्ष के देशी अपने पूर्व पुरुषों से प्राप्त भूमि के लिये जैसा प्रेम रखते हैं उसे हम जानती हैं और उसका आदर करती हैं। और गवर्नमेंटके उचित स्वत्वके आधीन रहकर उन्हें इस विषयके समग्र स्वत्व भोगनेमें रक्षा मात हो ऐसी हमारी इच्छा है और हम आज्ञा देती हैं कि आईन बनाने तथा प्रबंध करनेमें भारतवर्षके लोगों के वास्तविक स्वत्व और रीतिका योग्य आदर करना चाहिये" || I लोभी मनुष्योंने झूठी खबरेस अपने देशी भाइयोंको ठगकर उनसे खु खुल्ला उपद्रव करा जो दुर्दशा और दुष्टता को उत्पन्न किया है उसके लिये हम बहुत ही खिन्न हुई हैं। उस उपद्रवको रणभूमिमें दबाकर हमारी शक्ति प्रकाशित हुई है । जो लोग पकाने में आगये थे वे शुभचिंतकताके मार्ग<noinclude></noinclude> 5gmrhmq4jc4rriuwaz5oi4t9u52gyy7 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३२ 250 194755 665360 2026-07-06T15:22:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665360 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पर आने के इच्छुक हैं। उनके की हम इच्छा रखती हैं ॥ दूसरा भाग । ( २१५ ) अपराध क्षमाकर उनपर हमारी दया दिखाने रक्त प्रवाह रोकने और हमारे भारत वर्षके राज्यमें शीघ्रतासे शांति स्था- पन करने की इच्छा एक प्रान्त में तो इस समय के पूर्वसे ही हमारे बाइसराय और गवर्नर जनरलने उचित शर्तोंसे गत उपद्रवमें संयुक्त होने वालों और हमारी गटका अपराध करनेवालोंमें से अनेकोंको क्षमा प्रदान करना प्रकाशित किया है और प्रकट किया है कि जिनका अपराध क्षमाके योग्य न होगा उन्हें ही दंड दिया जायगा । हमारे वाइसराय और गवर्नर जनरल के इस कामको हम पसंद और स्वीकार करती हैं और इसके सिवाय नीचे लिखी आज्ञा देती हैं ॥ अंगरेज़ प्रजाके वध करने अथवा वध करनेके कार्यमें साथ देनेके जो अप- राधी हैं या होंगे उनके सिवाय सब लोगों पर हम कृपा दिखलावेंगी । मध करने वालों पर दया करना न्यायके विरुद्ध है । जिन लोगोंने प्रसन्नता पूर्वक शूनियोंको आश्रय दिया है अथवा जिन्होंने उपद्रवियोंके मुखिया बनने अथवा उन्हें भड़कानेका काम किया है उन्होंके मा- णकी रक्षा नहीं की जायगी परंतु उनपर दंड करते समय इस बातपर ध्यान दिया जायगा कि वे किन संयोगोंसे राजद्रोही हुए हैं। और स्वार्थियोंकी फै- लाई हुई झूठी खबरोंसे बहँककर जिनका अपराध किया हुआ प्रमाणित होगा उनके साथ बहुत कुछ रिआयत की जायगी ॥ जिन अन्य लोगोंने सरकारके विरुद्ध शस्त्र उठाये हैं उन्हें किसी तरहकी शर्त विना क्षमा करनेमें हम उनके लिये आना कानी करती हैं और हमारे मुकुट और प्रतिष्ठाके लिये जिन्होंने अपराध किया है उन्हें हम जाने देती हैं शर्त केवल यही है कि वे लोग अपने २ घरोंको लौटकर शांतिकें काम ॥ रानीके पदसे हम अपनी इच्छा प्रकाशित करती हैं कि, यह कृपा तथा क्षमा आगामि १ जनवरीतक में जो इन शर्तों के अनुसार काम करेगा उनपर की जायगी ! ईश्वरके आशीर्वादले देशमें सर्वत्र शांति स्थापित हो तब भारत वर्ष में शांतियुक्त उद्योगोंका प्रचार करने प्रजाका उपयोगी मकानादि बनवाना, तथा सुधार करने और देशका प्रबंध उसमें बसती हुई हमारी समस्त मजाओंके<noinclude></noinclude> mxjmqak4s0gr4pulgzhxh4gh191sul4 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३३ 250 194756 665361 2026-07-06T15:22:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665361 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( २१६ ) लाभके लिये चलाना हम अंतःकरणसे चाहती हैं । उनकी उन्नतिमें हमारा बल है उनके संतोषमें हमारी स्थिरताहै और उनका आनन्दही हमारा उत्तम बदला है । सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर हमारी यह इच्छा पूर्ण करनेमें हमें तथा हमारे अधीन अधिकारियोंको शक्तिप्रदान करे | यह डिंडोरा पढ़ेनाने बाद उसी मासकी ३ तारीखको कलकत्तेसे श्रीमतीको शुभ चिंतकता पूर्ण अभिनन्दन पत्र भेट करनेके लिये एक सभा इकट्ठी हुई । उसमें उपस्थित लोगोंमेंसे एक देशी व्यापारीने जो कुछ कहा उससे श्रीमतीक ढिंढोरेका प्रजापर उत्तम प्रभाव पड़ना विदित होता है । उसने कहा कि-“श्रीम- तीका ढिंढोरा मैंने बहुतही हर्षपूर्वक पढ़ा। उससे मुझे परम आनन्द हुआ है और उसके अंतिम वाक्यसे मेरी आँखों में आसूं भर आये हैं। मैंने अपने जीवन भरमें ऐसा उत्तम लेख देखनेका सौभाग्य प्राप्त नहीं किया है। इसमें बहुतही न्याय और उदारताके नियम प्रकाशित हुए हैं। उसकी मृत्येक पंक्ति दया और न्याय भराहुआ है। हमें उत्तम आशा और धन्यवाद पूर्वक उसका आदर करना योग्य है । श्रीमती जब यह कहती हैं कि तुम्हारी उन्नतिमें हमारा बल है........" तब आप लोगोंको विश्वास रखना चाहिये कि भारतवर्षके भविष्य के लिये उसके बालकोंको बहुत कुछ उत्तेजना प्राप्त करनी हैं और बहुत कुछ आशा बांधनी है । इस भाषासे कौन भाषा अधिक उत्तम, अधिक सुंदर और श्रीमतीके वचनोंको शोभा देने वाली होसकती है ? चलो हम सब मिलकर शुभचिन्तनाके साथ उनके पैरों पढ़ें और बहुतही बड़े धन्यवादके साथ अतिशय बड़े भक्तिभावसे नवीन राज्यका आदर करें ” ॥ अध्याय २३. विलायत और भारत बीचमें तार । एफ्रिकाके सिहाखण्ड में सन् १८५८ ई० को दो सरोवरोंकी खोजकीगई थी। इस वर्षके अगस्त मासकी३ तारीखको कप्तान स्पीक और ग्रांटने विक्टोरिया नियांजा नामक झीलको ढूंढ निकाला। इस झीलका विस्तार सीलोन के टापू से भी अधिक बड़ा है । इसीसे नील नदी को पानी मिलता है । इसी वर्ष में प्रसिद्ध अंगरेज़ यात्री कप्तान बर्टननें 'टेन्गानिका' नामक सरोवर का पता लगाया था। इसमें से कांगो नामक नदी महती है ॥<noinclude></noinclude> exmpxju9kj9l2y054t4zxff9ze9cfi7 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३४ 250 194757 665362 2026-07-06T15:22:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665362 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२१७) सन् १८५८ ई० के अगस्त की १६ तारीख को अटलांटिक महासागर में तार लगाया जाकर उस दिन से इंग्लैंड और एमेरिका में तार संवादका आवा- गमन आरंभ हुआ था । श्रीमती ने इसबातके हर्ष में एमेरिकाके प्रेसिडेंट को प्रथम संवाद भेजकर उन्हें बधाई दी। उसके उत्तरमें प्रेसिडेंट मिस्टर मकानन ने लिखा कि यह विजय युद्ध में विजय प्राप्त करने से भी बढ़कर है। इसबात से केवल इंग्लैंड और एमेरिका में ही हर्ष नहीं हुआ घरन् यूरोप भरके लोग हर्षित हुए थे क्योंकि दो देशों के बीच में इतने अंतर पर तार लगने का यह पहला अवसर था | उस समय तक भारत और विलायत के मध्य में भी तार का संबंध न था । समस्त कामकाज पत्रद्वाराही होता था । सन् १८५९ ई० की २८ मई को विलायत से अदन तक तार तैयार हुआ। प्रथम संवाद श्रीमतीने अदन पोलि टिकेल रेज़िडेंट के नाम भेजा था। इसके अनंतर करांची और मस्कत और मस्कत और अदन के बीच में तार लगाकर विलायत का भारत से सीधा संबंध होगया और जहां विलायत से भारत तक समाचार पहुँचने में कई सप्ताह लगते थे वहां घंटों में काम होने लगा ॥ अध्याय २४. स्टार आफ इंडिया की उपाधि और विश्व विद्यालय । डिंडोरा प्रकाशित होनेके अनन्तर सन् १८५९ ई० के मई मासकी १८ तारीख को श्रीमतीने भारत वर्ष के वाइसराय और गवर्नर जनरलके नाम एक पत्र लिखकर उपद्रव शांत होनेकी बधाई दी थी और वाइसराय तथा अन्य कर्म चारियों के कार्यों की प्रशंसा की थी और देशी राजाओं से मित्रता बढ़ानेके अभीष्ट से इंग्लैंड के "गार्टर" "थिलस और सेंट पेट्रिक" के समान उपाधियाँ नियत करनेके विषयमें बाइसरायकी संगति मांगी थी। इस आज्ञापत्र का उत्तर भारतके वाइसराय लार्ड कनिंगने ४ जुलाई को इसमकार दिया था:- "इस देश में उपाधि के साथ भूमि अथवा रुपया प्रदान करने की चाल है । इसकारण केवळ उपाधिका यहां के लोगों में कुछ मूल्य न होगा। ऐसा मुझे भय है। इसलिये मेरी सम्मति यह है कि, इसप्रकार की उपाधिको श्रीमती भी धारण करें 20<noinclude></noinclude> jb7buj496nd3u2oihbu8n3hui3h92kl पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३५ 250 194758 665363 2026-07-06T15:22:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665363 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २१८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । और इंग्लैंड के अन्य लोगों को भी दीजांवें । इस कार्यसे देशियोंकी दृष्टिमें इसका आदर होगा" || इसी सूचना अनुसार २५ जुलाई सन् १८६१ ई० को “स्टार आफू ई- डिया" की उपाधि स्थापितकर यह आज्ञा दीगई कि जिस दिनसे श्रीमतीनें भारतवर्षका शासन अपने हाथमें लिया है उसी दिन ( १ नवम्बर को ) प्रतिवर्ष यह उपाधि वितरण करना चाहिये । प्रथम बार श्रीमतीने विंडसर केसलमें एक श्रृहत् दर एकत्रितकर अपने हाथसे पंजाबके पदच्युत राजा दलीपसिंह, लार्ड क्लाइड, सर जान लारेंस, जनरल पालक और लार्ड हेरिस को यह उपाधि प्रदान की । भारतवर्ष में शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय जो आजकल देखने में आते हैं वे सन् १८५४ ई० और ५९ के वर्ष में इंग्लैंडकी गवर्नमेंटके आज्ञापत्रोंपर आधार रखते हैं । सन् १८६६ ई० में भारतवर्षके प्रबंधके विषय में पार्लियामेंटको परिचित करनेके लिये एक रिपोर्ट प्रकाशित हुईथी उसमें लिखा है कि सन् १८५४ ई० में ब्रिटिश गवर्नमेंटने निश्चय किया था कि “यूरोपका साहित्य, विज्ञान, विद्या और कलाका प्रसार भारतवर्षके लोगोंके लिये उनके भिन्न २ रोजगारोंमें उपयुक्त होस के इस प्रकारकी सामान्य शिक्षा देनेके लिये पहले की अपेक्षा उत्तम और दृढ़ उपाय करना चाहिये ।" इसमें यहभी सूचना दीगई थी कि “भारतवर्षकी देशी भाषाकी उन्नति करनेके साथही उच्च कक्षाओंमें अंगरेजी भाषाकी शिक्षादी जाय । " पार्लियामेंट की इस भाज्ञाके अनुसार प्रत्येक स्थानीय गवर्नमेंट के अधीन एक २ शिक्षा विभाग स्थापित किया गया। और साथही परीक्षाके लिये इन्स्पेक्टर नियत हुए। लंडन विश्वविद्यालय के नमूने पर मद्रास और बंबई में विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रान्तीय गवर्नमेंट को अधिकार दिया गया । और यह भी निश्चय हुआ कि, योग्य उम्मेदवारोंको परी- क्षाके बाद उपाधियां भी दीनायें। उस समय यह भी ठहराव हुआ कि, परीक्षा- कलकत्ता, में धर्मसंबंधी विषयोंपर मन न किये जायें। और इंग्लैंड की तरह सब धर्मक लोगों को इस कार्य में स्वतंत्रता से शिक्षा दी जाय । सन् १८५९ ई० में इस आज्ञा का कहांतक और किस तरह बर्ताव हुआ है और होता है इस मातकी जांच की गई थी । जांचके पश्चात् आज्ञा दी गई थी कि, साधारण नियमके अनुसार गवर्न- मेंट के प्रबंध तथा सेना विभागसे संबंध न रखने वाले लोगोंको शिक्षाविभाग में नियत किया जाय। विश्व विद्यालयोंके स्थापित करनेसे देशियोंके मनपर किसी तरहका भय उत्पन्न नहीं हुआ तथापि किसी प्रकारकी अनभिज्ञता दूर करनेके<noinclude></noinclude> gduov3gnbqobgih9cz5gg8w9q1k1ugp पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३६ 250 194759 665364 2026-07-06T15:22:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665364 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२१९ ) लिये पेली और बटलर जैसी धर्म संबंधी पुस्तकोंको जो विद्यार्थी प्रसन्नता पूर्वक अध्ययन करना चाहै उसके नंबर सामान्य परीक्षामें न गिनना चाहिये ।" इस नियमके अनुसार सन् १८५८ ६० में प्रथम बार एट्रेंस परीक्षा ली गई थी। प्रयो- जन यह कि श्रीमती भारतका शासन अपने हाथ में लेनेके वर्षसे टच्च शिक्षाका आरंभ हुआ है | अध्याय २५. भारतका भयंकर अकाल । सन् १८६०-६१ ३० भारत वर्षके लिये बहुत बुरा निकला। उस वर्ष इस देशमें भयानक अकाल पड़ा। इससे लाखों मनुष्य मर गये। इस दुर्भिक्षकी दारु- ताके विषय में "एन्युएल रेजिस्टर" में लिखा कि भारत वर्षके पश्चिमोत्तर प्रांतमे भयानक अकाल पड़ा। पेशावरसे कानपुरतक आठसो मीलमें एक बूंद भी पानी न बरसा । धरती लोहे जैसी और आकाश पीतलके समान होगया। १ करोड २० लाख मनुष्योंकी बस्ती वाले २५ हजार वर्गमील भूभागमें दीन स्थितिके मनुष्य भूखसे मर रहे हैं। जिनमें भाग जानेकी शक्ति थी वे हजारों ही भाग गये । और नो रहे हैं वे इतने निर्मल होगये हैं कि उदार लोगों की ओरसे उन्हें जो दिया जाता है उसे खाने की भी उनमें शक्ति नहीं है। मुरदे और मृतप्राय मनुष्य मार्गके इधर उधर पड़े हैं। एक २ ज़िलेमें तीन २ लाख मनुष्य कालका कवर बने हैं। मनुष्यत्व और जातिभेद जाता रहा है। अपने पालकोंको दुःख पाता हुआ देखनेसे दुःखित होकर मातापिता उन्हें मार डालने वा बेचने लगे हैं। मातायें आठ २ आने में अपने प्रिय भचोंको बेच डालती हैं और कई जिलोंमें तो खरीद दारकी जातिका भी विचार नहीं किया जाता है। मुंबई, कलकत्ता, मदरास और पि मोत्तर प्रदेशके बड़े २ नगरोंमें अकाल फंड स्थापित हुए हैं। उनमें उदारताके साथ बहुत कुछ रुपया आया है। और उसको योग्य रीतिपर बांटने का प्रबंध किया गया है। " इस बातकी ख़बर मिलतेही इंग्लैंडमें लार्ड मेयरने २८ मार्च को एक सभा इकट्ठी कर फंड नियत किया था। उसमें १०७५८५ पौंड चंदा इकट्ठा हुआ ।। इस अकालके विषयमें भारत वर्ष पालियामेंट के समक्ष कहा था है । वह कितना कठोर है यह 1 विभाग के स्टेट सेक्रेटरी सर चार्लेस उडने कि-" भारतमें भयानक मात वहां आन कलके अकाल पड़ा अनके भावसे.<noinclude></noinclude> mvmj88blg2y1397r9iax7rx9n54i1fr पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३७ 250 194760 665365 2026-07-06T15:23:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665365 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(330) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | विदित होगी । सन् १८३७-३८ ३० के सालमें भारत वर्षम बहुतही कठिन अकाल पड़ाथा और मनुष्य तथा चौपायोंकी बहुत संख्याका नाश हुआ था तथापि अत्रका भाव गतवर्ष जैसा महँगा नहीं हुआ था। जिन छः जिलोंमें अकाल पड़ा है यहांके भावका पड़ता फैलानेसे साधारण वर्षोंमें अन्नका अधि- कसे अधिक महंगा भाव एक रुपये पीछे साठे चालीस सेर रहताथा किन्तु इस अकालमें एक रूपयेका अन्न नौ सेर मिलता है " ॥ अध्याय २६. भारतवर्षका नवीन प्रबंध | इसी वर्ष में भारत वर्षके नवीन प्रबंधके विषयमें पार्लियामेंटने तीन नवीन आईन बनाये । प्रथम आईन भारत वर्षमें व्यवस्थापक सभायें ( Legislative Council ) स्थापित करनेके विषयमें था। इसमें निश्चय किया गया कि गन- र्नर जनरल की व्यवस्थापक सभाके लिये इस विषयका एक विद्वान् विलायतसे भेजा जाय और वह तथा बाइसरायकी प्रबंधकारिणी सभा ( Executive Council ) के समस्त सभासदोंके अतिरिक्त कमसे कम आधे सभासद ऐसे होना चाहिये जो सरकारी सेवक न हों। देशी उमरावों और सरदारोंकी सहा- यता लेनेके लिये वाइसरायको कभी २ देशके भिन्न २ भागों में सभायें भरनी चाहिये । इसी तरह मदरास और वंबईके गवर्नरोंकी व्यवस्थापक सभाकी व्यवस्था की गई । इसके सिवाय वाइसरायको अधिकार दिया गया था कि वह पंजाब और बंगाल मान्तके लिये भी यदि उचित समझें तो सेक्रेटरी आफू स्टेट- के स्वीकार करने पर व्यवस्थापक सभायें स्थापित कर सकें। पंजाबके लिये सन् १८६१६० में व्यवस्थापक सभा स्वीकार होजाने पर भी गत वर्षसे वहां इस प्रकारकी व्यवस्था हुई है किन्तु पश्चिमोत्तर प्रान्तको यह स्वत्व बहुत वर्ष हुए मिलगया || दूसरे आईनके अनुसार सुप्रीम इसमें यह ठहराया गया कि इस कोर्ट और सदर कोर्ट संयुक्त कर दिये गये । नवीन कोर्टमें पूरे २ अंगरेज़ बैरिस्टर, इतनेही सिविल सर्विस वाले और देशी जन रक्खे जायें। इसके अनुसार सन् १८६२३० में कलकत्ता, मदरास और बंबईकी हाई कोर्टें नियत हुई और इसी नियमके<noinclude></noinclude> 5eu2nd0fp20ie19r0lut5rdu9mc8pfq पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३८ 250 194761 665366 2026-07-06T15:23:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665366 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २२१ ) आधारपर कलकत्ता हाईकोर्ट में प्रथम भार बाबू शंभुनाथ पण्डित देशी जन मि- यत किये गये ॥ तीसरा आईन सिविल सर्विसके विषयमें था। इसमें यह निश्चय हुआ कि सिवि ल सर्विस परीक्षा में पास होनेवालोंके लिये जो पद रक्षित हैं उनके सिवाय बिना परीक्षा बालों से जो लोग योग्य हों उन्हें भी नौकरी देनेका अधिकार भारत गवर्नमेंट के हाथमें रक्खागयाहै " | अध्याय २७. एमेरिकामें युद्ध और सट्टेका व्यापार । एमेरिकाके दक्षिणभागमें लाखों गुलाम अपने मालिकोंके लिये गन्ने औरं ईखेकी खेती किया करते थे। उत्तरभागमें दासव्यापार मन्दहो चुका था और समस्तमजाको स्वतंत्रता देनेवाले मान्त धन और मस्ती में पढ़ते जाते थे और साथही दक्षिणके प्रान्तों में नहीं दासव्यापार होता था मना बिलकुल दीनदशा में थी । दासोंके स्वामी इसलिये सोचने लगे कि यदि अपने दासोंके लेकर पश्चिमके प्रान्तोंमें जा बसें और वहांपर नवीन भूमिपर खेती की नाय तो हमारी स्थिति बहुत कुछ सुधरनाय । परंतु स्वतंत्रताके पक्षपाती मान्तोंने इनके आनेका अवरोध किया और प्रकाशित करदिया कि अभीतक जिन प्रान्तों में दासव्यापार प्रचलित है उनके सिवाय अन्यत्र दासव्यापार मचलित न करने दिया जायगा । दक्षिणवाले इसबातको न समझे और चार वर्षतक उत्तरवालों का दक्षिणमान्तवालोंसे घोर संग्राम होता रहा। पहले अंगरेज़ उत्तर वालों के समर्थक थे किन्तु युद्ध आरंभ होतेही इंग्लैंड में कपड़ोंके कारखानेवालों को एमेरिकाकी रुई मिलना बंद हुआ। और इंग्लैंडके व्यापारियोंने दक्षिण बाकी नानाप्रकारसे सहायता करना आरंभ किया । यहांतक कि उन्होंने दासव्यापारके पक्षपातियोंको सैनिक जहाज तक दिये । इंग्लैंडने युद्धके आरंभ में प्रकाशित करदिया था कि हम दोनोंमेंसे किसी की सहायता न देंगे और इसकारण वहां के व्यापारियोंका यह अनुचित कार्य इंग्लैंडकी प्रतिज्ञाके विरुद्ध था । परंतु उसने अपने नियमोंका भंग करने वालोंको रोकानहीं इस कारण उसे अंतमें तीस लाख पौंड दंडके देने पड़े । युद्धके अंतमें यूनाइटेड स्टेट्सके उत्तर भागवालोंका जय हुआ और उन्होंने दक्षिणका दासव्यापार बन्दकराया उससमय जितने दास थे इन्हें स्वतंत्रता दी |<noinclude></noinclude> 369hokzpfwrxxz7e3vsc84nqry2w8gr पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२३९ 250 194762 665367 2026-07-06T15:23:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665367 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २२२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । इसयुद्ध में एमेरिका की रुई इंग्लैंडमें आना बन्दहुआ । वहांके कपासपर इंग्लैंडके कारखानेवालों और जुलाहोंका आधारथा इसलिये वे लाचारहोगये। कार- खाने प्रचलित रखनेके लिये उनमें आपुसकी चातान चलने लगी और जिसभावपर जिसे जितनी रुई मिले उतनीही वह खरीदने लगा। मिसर और बंबईकी कूड़ा- करकट रुई भी इंग्लैंडमें सोनेके मोल बिकने लगी । बहुतसे व्यापारी इस कार्य से निहाल होगये और थोड़ेही दिनोंमें बंबई में रुपये की चकाचक देख पड़नेलगी। परंतु इसके परिणाममें जो अंधा सट्टा प्रचलित हुआ उसने भारतके व्यापारियों को दरिद्री कर दिया । जिस युद्धको बहुत काल तक चलनेकी दुराशाके पागल- पनमें देशके मूर्खही नहीं किन्तु बुद्धिशाली अंगरेज़कर्मचारी तक भूले थे उनकी बुद्धि ठिकाने आगई। अनेक बैंक और कम्पनियां खड़ी हुई और बंबईकी मजाका नाशकर चलती बनी। बंबईकी गवर्नमेंटने भी उस समय एक अंशमें सट्टा करने वाली कम्पनियोंको उत्तेजना दी थी। इस अधे सट्टेने इतनी हानिके साथ बंबई का कुछ लाभ भी किया। चौपाटीके निकट बंबई बडौदा रेलवेकी सड़क है उस स्थानपर समुद्र था उसमें भरती डालकर धरती बनानेका काम भी इन्ही सट्टे वाली कम्पनियोंके हाथसे हुआ । इसीतरह एलफिन्स्टन सर्कल के निकटके सुंदर और भव्यमहल भी उसी समय बने ॥ अध्याय २८. बंगाल में तूफान । ५ अक्टूबर सन् १८६४ई० को कलकत्ता और उसके आसपास के ग्रामों में भयं- कर तूफान आया । भयानक आँधके साथही हुगलीनदीके दोनों किनारों पर आठ आठ मील तक तीस फुट गहरा पानी भरगया। भारत गवर्नमेंटने इस विषयमें पार्लियामेंटको जो रिपोर्ट की थी उसका सार यह है-“ १०२ पक्के और ४०४९८ कच्चे मकान कलकत्ते में बिलकुल नष्ट होगये। इनके सिवाय अनुमान पांच हजार घरोंको थोड़ी बहुत हानि हुई। अधिक मनुष्योंकी मृत्यु तो सौभाग्य या न हुई किन्तु २ यूरोपियन और ४७ देशी मारे गये। तीन लाख मन लवण नष्ट होनेसे गवर्नमेंट और व्यापारियोंको बहुत हानि हुई । सरकारी मकानोंके उपरांत अन्य गृहोंके नष्ट होनेमें पांच लाख रुपये की अनुमानसे हानि हुई । कल- कत्तेके उत्तर हुगली, कृष्णाघर और अन्य ग्रामों में बहुत हानि हुई किन्तु दक्षिणके जिलोंमें तो हूफानसे कुछभी न बचसका। बड़ेमें २ हज़ार मनुष्य १२ हजार<noinclude></noinclude> k5xpuupxnc9oak75prsrfja89dtmupm पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४० 250 194763 665368 2026-07-06T15:23:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665368 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २२३ ) चौपाये और इतनेही मकानोंका नाश होगया। मेदिनीपुर में २० हजार मनुष्य और ४० हजार चौपाये मारे गये । गुमगढकी मस्तीका पौन भाग नष्ट होगया और तुमलुकके १४०० घरोंमें से केवल २७ बचे । सागरके टापूकी ६ हजार वस्तीमें १४८८ मनुष्य जीते हैं। चौवीस परगने के अन्य भागोंमें. सात आठ हजार मनुष्य और चार पंचमांश चौपाये डूब गये। जो लोग इस आपत्ति से बचे उनके खानेका ठिकानाभी न रहा। कलकत्ते के मंदर में १९५ जहाज खड़े थे जिनमें ५० डूबगये। डायमंड हारबरके निकट एक जहाज डूबनेमें ३१९ मजदूर जलमग्र हुए सेंट हेड्सके निकट एक और जहाज डूबा इसके साथ दो खलासियोंके सिवाय सबके सब टूबगये। भूखे लोगोंके लिये पानी और अन्न पहुंचाने और मुद्दाको गाड़नेका प्रबंध होरहा है । पानीके कुए खोदे जा रहेहैं। खारे तालाब का पानी निकालकर मीठा भरनेका प्रयत्न कियाजारहाहै । दुःखित लोगोंकी सहायताके लिये जो फंड स्थापित हुआहै उसमें ३ लाख रुपया आयाहै । पारसीजातिने इसमें बहुत रुपया दिया है " ॥ इस दुर्घटनाके कुछड़ी दिन बाद १ नवंबर को मछलीपट्टनके सामुद्रिक किना- रेपरभी आंधी से बहुत दुर्दशा हुई। पानीकी रेलमें सेना और पुलिसके ७८ और साधारण प्रजाके ३०५२३ मनुष्य डूबगये । इससे जिन लोगोंको कष्ट हुआ उनकी सहायता के लिये मदरास और बंबई में फंड स्थापित हुआ | अध्याय २९. एबीसीनियाका युद्ध | सन् १८६५ ई० में एबीसीनियाके राजा थियोडोरने इंग्लैंड की मना गिने जानेवाली स्त्री पुरुषों को कैद कर लिया। इनमें मुख्य मसोवायें रहने वाले श्रीम- तीके दूत कप्तान केमेरन उनके सेक्रेटरी, एक सीरियन ईसाई मिस्टर होर्मज़द रस्म लेफ्टिनेन्ट मिडो और डाक्टर को थे । ये लोग ब्रिटिश गवर्नमेंट की सेवा करते हुए कैद किये गये थे । इनके सिवाय कई एक जर्मन पादरी यूरोपियन कारीगर और श्री बालकभी थे। अंगरेजी राजदूत कप्तान केमेरन पर एबिसी- नियाके राजा थियोडोरको संदेह था। यह समझता था कि यह मिसरकी गवर्नमेंटसे मिला हुआ है। थियोडोरने श्रीमतीको एक पत्र लिखकर रूमसे लड़ने में सहायता मांगी थी परंतु किसी कारणसे उस पत्रका उत्तर नहीं दियागया । वात यह थी कि थियोडोर श्रीमतीका पति होनाचाहता था और वह कहता था कि, मैं<noinclude></noinclude> 4zuozdvuv2lwph9cqe19ektdx7v1mig पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४१ 250 194764 665369 2026-07-06T15:23:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665369 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २२४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । मिसरकी रानी शेवाका वंशधरहूं इस लिये यह कार्य अनुचित नहीं है । उसकी इस मूर्खतासे इंग्लैंड को उसपर कोप हुआ। पत्रका उत्तर न पाने से उसने अपनी मानहानि समझी और इस लिये इसबात का पैर लेने के लिये जो अंगरेज़ उसके हाथमें आया उसीको उसने कैद कर दिया । और उनके पैरोंमें बेडियां डालकर उन्हें मगडलाके किलेमें बन्द रखखा । इस वातसे ब्रिटिश गवर्न- भेंट पर बड़ी कठिनता आपड़ी । यदि गवर्नमेंट उसपर चढ़ाई करती तो सबके सब कैदी मारे जाते । इसलिये प्रथम राजाको समझा बुझाकर काम लेने का प्रयत्न कियागया । राजदूत तो पहलेसे कैद था ही अब राजाको समझाने के लिये जो लोग भेजेगये उनको भी उसने जेल में डाल दिया। अंतमें लार्ड स्टे- नलीने उसको लिख भेजा कि, यदि तीनमासके भीतर कैदी न छोड़े जायेंगे तो एबिसीनियाके साथ इंग्लैंडको युद्ध करना पड़ेगा ।" यह पत्र उसके पास पहुँ वा नहीं । अब लड़ाईकी तैयारी कर सरकारने बंबई के प्रधान सेनाध्यक्ष सर राबर्ट नेपियर (लार्डनेपियर आफ मैकडला ) के अधिकार में सेना भेजी । सन् १८६८ ई० के अपरेल में बंबई की सेना मैकडलाके किलेके निकट जा पहुंची। १० अपरेल की लड़ाई में ५०० एविसीनियन मारेगये और इससे तिगुने घायल हुए। इस हानिको देखकर थियोडोर घबराया। उसने अव संधि का प्रस्तावकर कैदियोंको छोड़ने की प्रतिज्ञा की परन्तु स्वयं शरण आनेका नि- षेध किया । यह बात ब्रिटिश सेनाको स्वीकार न हुई । लार्ड नेपियरने किला के लिया । थिथोडोरने शत्रुके हाथ पढ़नेके बदले आत्मघात कर प्राण गँवाये । किलेको नष्टकर सर राबर्ट नेपियर लौट आये। सरकारने इस विजयके उपलक्ष में उनको बैरंन नेपियर आफ मैकडलाकी उपाधि और पेन्शनदी । थियोडोरकी रानी ब्रिटिश सेना में मरगई और उसका सात वर्षे का पुत्र भारत वर्ष में शिक्षाके लिये लायागया । यहांका जल वायु उसके अनुकूल न हुआ इसलिये वह विलायत भेजा गया । वहां जाकर थोड़ेकाल में मरगया । युद्धके पश्चात् सरकारने एवीसी- निया का राज्य ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाना उचित न समझा || अध्याय ३०. ओड़ीसेका अकाल और सुलतानका स्वागत । सन् १८६५-६६ ई० में बंगाल प्रान्तके ओड़ीसा भाग में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। इसकी जांच के लिये गवर्नमेंटने एक कमीशन नियत किया था। इसने<noinclude></noinclude> pcydh1seesdgju8oi90mg4vgcn0o9t2 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४२ 250 194765 665370 2026-07-06T15:23:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665370 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२२५) इस अकालकै मुख्य दो कारण बतलाये । (१) दृष्टिका अभाव और समयपर न होना और ( २ ) बंगालका अधिकतर चावल एशिया आस्ट्रेलियाको ले जानेसे अन्नका भाव महंगा होजाना कमीशनकी गणनाके अनुसार इस दुर्भिस से भूख के मारे ८१४४६९ मनुष्य मरगये और ११६०२८ का कुछ पता न चला । कुल ९२९४९७ मनुष्यों को ओड़ीसा विभागने खोदिया । धनाढय देशि- योंने अकाल पीडितों की रक्षाके लियेएक फंड स्थापित किया जिसमें ६ लाख रुपया इकट्ठाहुआ । इसद्व्यमेंसे १ लाखरुपया अनाथ बालकोंकी रक्षाके लिये अलग रक्खागया । इसवर्ष अकालकी इतनी पीडा सहनेपर भी दूसरे वर्ष गवर्नमेंटने रूपके सुलतान अबदुल अज़ीज का इंग्लैंड में स्वागत कर एक बाल ( नाच ) का खर्च भारतके कोपर डाला। सन् १८६७६० में रूमके मुलतान इंग्लैंड पधारे। इनका स्वागत करने के लिये १२ जुलाईको श्रीमान् प्रिंस आफू वेल्स, मिसरके खेदीव और इंग्लैंड के प्रधान सेनाध्यक्ष मंदरपरगये। रूमी चालके अनुसार उनसे किसीने हाथ न मिलाया किन्तु टोपी उतार कर केवल सलाम कर लिया। सुलतानने अपनी टोपीके हाथ लगाकर उनका सत्कारकिया । वहसि चलकर म्यूनिसिपलिटीका अभिनंदन पत्र लेने बाद वह बडे ठाठके साथ श्रीमतीके महलमें पहुँचे। श्रीमतीने महलके फाटकतक उनका स्वागत किया। सुलतानने उनसे देशी चालसे सलामकी और उनके हाथका सुबन किया। श्रीमतीने सुलतानके युवराजका मुखचूमा । १८ जुलाईको लंडनके कार्पोरेशनने उनको भोजदिया। उसमें सुलतानने अपने आगत स्वागत के लिये धन्यवाद देनेके सिवाय कहा कि यूरोप आनेमें मेरे दोमयी- नम हैं । एक यह उन्नति का स्थान है इस लिये यहांके सुधार और उन्नतिको देखकर अपने देशकी स्थितिसे तुलना करना और दूसरे यूरोप वालोंसे मित्रता की वृद्धि करना । दूसरे दिन भारतीय विभागके स्टेट सेक्रेटरी सह स्टाफ ना कोट ( आजकलके बंगईके गवर्नरके पिता) ने भारतवर्षके खर्च से उन्हें एक बाल दिया । इस जलसे में २६०० मनुष्योंको निमंत्रण दिया गया था । सुलतान बैठे २ नाच देखते रहे और श्रीमान् प्रिंस आफू वेल्स और उनकी बहने बहुत नाचीं ॥ इसी वर्ष में रूसगवर्नमेंटने एमेरिकाके पश्चिमोत्तर में एलास्का उपनिवेश ७२ लाख डालर में एमेरिकाके संयुक्त राज्योंको चदिया। इससे इंग्लैंड और एमे- रिकाके मध्य में बड़ा झगड़ा खड़ा हुआ। इस स्थानके निकट वर्ती समुद्रमें से सील मछली पकड़नेके विषयमें केनाडा ( ब्रिटिशराव्य ) और एमेरिकाके संयुक्त<noinclude></noinclude> klypawpg70gfjbiz8aynx4v396at6kb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४३ 250 194766 665371 2026-07-06T15:24:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665371 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २२६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | राज्यका घोर संग्राम होनेका अवसर आगयाथा परंतु इसका निपटारा विदेशी राज्योंकी पंचायतको सौपागया इस कारण युद्ध होनेकी अनी टलगई || अध्याय ३१. युद्धके विषय में सम्मतिऔर स्वेज़की नहर | सन् १८६८६० में युद्धके विषयमें नवीन नियम स्थिर करनेका यूरोप वालोंने प्रयत्न किया था। इस वर्षके नवंबर मासमें रुसकी राजधानी सेंट पीटर्स वर्ग में वेरिया, बेलजियम, डेनमार्क, इंग्लैंड, फांस, यूनान, हालैंड, इटाली, ईरान, पुर्त गाल, आस्ट्रिया, मूशिया, रूस, स्वीडन, स्विटजरलैंड, रूम और घटेम्बर्ग राज्योंक प्रतिनिधियोंने मिलकर निम्न लिखित संधि पत्रपर हस्ताक्षर किये:-" संशो- धन और उन्नतिपर ध्यान देकर युद्धमें उत्पन्न दुःखोंकी कठोरता कम करनेके जहांतक होसकै प्रयत्न करना चाहिये । युद्धका मुख्य प्रयोजन शत्रुको निर्बल करनेका है इस कार्यके लिये यही बात बहुत है कि शत्रुके जितने मनुष्य युद्ध में अशक्त किये जायँ उन्हें शक्तिहीन करना परंतु जिन उपायोंसे उनके घाव अना- वश्यक बड़े हों अथवा उनकी मृत्युहो ऐसे उपाय इस नियमके प्रतिकूल हैं और मनुष्यत्व के नियमके भी विरुद्ध है। इस कारण नीचे हस्ताक्षर करने वाले अपने२ राज्योंकी ओरसे अधिकार प्राप्तकर स्वीकार करते हैं कि ( १ ) इस लेख पर हस्ताक्षर करनेवाले स्वीकार करते हैं कि उनके मध्य में युद्ध होनेपर जल उठने वाले अथवा जिनसे आग लगठठे ऐसे पदार्थ काममें न लायेंगे । इस नियमका जल और स्थल दोनों सेनाओं में वर्त्ताय होगा ( २ ) इस कमीशनमें जिन २ राज्योंके प्रतिनिधि इकट्ठे नहीं हुए हैं उनको भी निमन्त्रण दिया नाय (३) जब कभी इस लेख पर हस्ताक्षर करनेवालों में से परस्पर युद्धका अवसर औ गा इसका बर्ताव होगा किन्तु जो अक्षर नहीं करेगा उसको वाधित नहीं किया जायगा ( ४ ) जबकभी विद्याकी वृद्धिके साथ युद्ध की सामग्री सुधारने की आव श्यकताहो तब उसका प्रचार करने पूर्व सपको मिलकर विचार करना चाहिये कि यह नवीन पदार्थ मनुष्यत्व के अनुकूल और युद्धकी आवश्यकता के अनुसार है या नहीं ।" इन शर्तों का बर्ताव कुछभी न हुआ और रूसके ज़ार निकोलस के प्रयत्नसे सन् ९८ में हेग् स्थानमें सब राज्योंके प्रतिनिधियों की सभा हुई थी उसमें जो नियम स्थिर हुए थे उनका भी बर्ताव नहीं हुआ |<noinclude></noinclude> kchw0jqm5xdqhf8f0amb8nknr6ea8e4 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४४ 250 194767 665372 2026-07-06T15:24:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665372 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २२७ ) स्पेनकी नहर तैयार करनेका काम सन् १८६९ ई० की १७ नवम्बरको फांसकी पदच्युत रानी यूजिनी, आस्ट्रिया के सम्राट् फ्रांसिस जफ और जर्मनी के युवराज (स्वर्गवासी सम्राट् ) फ्रेडरिक के समक्षे आरम्भ हुआ था। इस नहर की योजना करनेवाला फरांसीसी इंजिनियर डील्सयस था । जिस समय इसने अपने विचार प्रकट किये यूरोपके बड़े २ इंजिनियरोंने उसकी हँसीकी थी। उनका कथन था कि भूमध्यसागर और लालसमुद्रकी सतह बराबर नहीं है इस लिये नहर यदि बनाई जायगी तो उसका टिकाव न होसकेगा । परंतु इसने इनके आक्षेपोंपर कुछ ध्यान न दिया और अन्तमें इसका उद्योग सफल होगया। चार वर्षके कठिन परिश्रमसे यह नहर तैयार हुई थी। इसके बननेसे भारत के व्यापार की बहुत उन्नति हुई। इसका लेखा यह है :- भारतमें माल आया. भारतसे माल गया. रुपया रुपया नहर तैयार होने से पहले सन् १७८२ ९०९४६१६४ ५४५४७७१५ 22 के प्रथम वर्ष में सन् १८७३ १०५५१११३८ ६०३९९९९६ सन् १८७७ १४५६७६४८१ ९२००९८८१ सन् १८८७ २१४९९५८३३ १७२८६९५५६ सन् १८९७ २८४४८१५१६ ३०६९५७५७० अध्याय ३२. काबुलके अमीरका अंबालेमें सत्कार । सन् १८६८-६९ ई० में भारतके इतिहासमें एक विशेष घटना हुई। अमीर दोस्त मुहम्मदकी मृत्युसे अफगानिस्थानमें जो बखेड़े खड़े हुएथे उन्हें अमीर शेर अलीने दमा दिया। इस समय अमीरसे भारत गवर्नमेंट की मित्रता बढ़नेका अ- वसर आया । इस वर्ष अगस्त में अमीर शेर अलीने पंज शहरमें अजीमखांको विजय कर भारत गवर्नमेंटसे मित्रता बढ़ाने के लिये वाइसराय सर जान लारेंस के नाम पत्र लिख भेंट करनेकी इच्छा प्रकाशितकी । और लिखाकि "यदि आप- श्यकता होगी तो मैं ठेठ कलकत्ते तक आने को तैयार हूं। और मुझे रुपये तथा शस्त्र संबंधी सहायता देनेसे मैं सरकारका बड़ा उपकार मानूंगा ।" यह मात<noinclude></noinclude> ngu5nratfqv0x1bz1hmyo22lacaitjt पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४५ 250 194768 665373 2026-07-06T15:24:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665373 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र | ( २२८ ) वाइसरायने स्वीकार करी परंतु अज़ीमखां और अबदुल रहमानखां के काबुलके उत्तर भाग पर चढ़ाई करनेसे उस समय भेंट न होसकी । वाइसरायने प्रसन्न होकर अमीरके पास छः लाख रुपये भेज दिये । इस द्रव्यसे उसने सेना का चढ़ा हुआ वेतन चुका दिया। ४ जनवरी सन् १८६९६० को अजीम और अब्दुल रहमानखां की हारहुई। दोनों भागकर भारत वर्ष में आये परंतु यहां उनको शरण न मिली इस लिये दोनों ईरान चलेगये। वहां जाकर अनी मखां मरगया || इस अवसर में गवर्नर जनरल सर जान लारेंसने अमीर शेर अलीको एक पत्र लिखकर मित्रताकी वृद्धिके लिये उनसे मिलने की इच्छा प्रकटकी और लिखा कि पहले छः लाख रुपये भारत गवर्नमेंटने भेनैथे उनके सिवाय छः लाख और भेजनायेंगे । और इसके बदले में उनसे केवल सत्य मित्रता चाही। उन्होंने श्रीमतीकी आज्ञा लेकर काबुलके साथ नवीन नीति स्थिर करनेके लिये शस्त्र और रुपया देनेका निश्चय किया था। इसबातसे प्रसन्न होकर अमीरने वाइसराय से मिलने की इच्छा प्रकटकी । वाइसरायने इसबातको सहर्ष स्वीकार किया और ३ मार्च सन् १८६९ ६० को अमीर शेरअली अपने पुत्र अब्दुला सहित ब्रिटिश सीमामें प्रविष्ट हुए। और अपने साथियोंको पेशावर छोड़कर वह स्वयं लाहोर में लेफ्टिनेंट गवर्नरसे जा मिले। वहां पांचदिनतक लेफिनेंट गवर्नरने उनका आतिथ्य सत्कार किया फिर वह २६ मार्चको अंबालेमें पहुँचे। दूसरे दिन भारतके वाइस- राय लार्डलारेंससे भेंट हुई। उन्होंने एक बहुत बड़े दबदबेवाले दरबारमें अमीरकी भेंटकी और आठदिन तक अपने यहां उन्हें मेहमान रखकर उनको सेनाकी क वाइद और तरह २ के तमाशे दिखलाये । जो २ उन्नतियां प्रथम बार उनकी भारतमें दृष्टिपड़ी थी उनसे बहुत चकित हुए । २१ अपरेलको ब्रिटिश राज्यसे निकलकर काबुलगये और वहां जाकर उन्होंने अनेक प्रकारके संशोधन किए || अध्याय ३३. भारतमें ड्यूक आफएडिनवरा और नवीन संशोधन । • सन् १८६९-७० ई० में भारत वर्ष में दूसरी आवश्यक बात श्रीमतीके द्वि- तीय पुत्र श्रीमान् डयूक आफ एडिनबर के पधारने में हुई। भारत गवर्नमेंटकी ओरसे इनके शुभागमनके विषयमें जो पार्लियामेंटको रिपोर्ट कीगई उसमें लिखा<noinclude></noinclude> ar84noboz1ttq13qc3xz9db7jkjt8xf पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४६ 250 194769 665374 2026-07-06T15:24:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665374 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २२९ ) दूसरा भाग । है कि-" श्रीमान् डयूक आफ एडिनबराकी भारत यात्रा से दो लाभ हुए हैं । प्रथम यह कि इंग्लैंड राजकुटुम्बके एक रनने भारत साम्राज्य में प्रथमहीबार आगमन किया था और दूसरे यह कि श्रीमतीके पुत्रका आतिथ्य करनेके लिये भारतकी प्रजाने और देशी राजाओंने बहुतही हर्ष पूर्वक उनका सत्कार किया था । कितने ही राजाओंने अपनी हार्दिक भक्ति के प्रमाणमें इनके आगमनका स्मारक चिरस्मरणीय रखनेके लिये पाठशालायें स्थापितकी और शिक्षाकी उन्नतिके लिये छात्रवृत्तियां नियतकी थी" ॥ भारत वर्ष के वाइसराय लार्डमेने सन् १८७२ ई० से सरकारी भूमि करके विषय में नियमों का परिवर्तन कर पार्लियामेंट को लिखाया कि " प्रान्तीय को उनके अधिकृत विभागोंपर स्वतंत्रतासे शासन करने दियाजाय । और उनके निर्वाहके लिये साम्राज्यके भूमिकरमेंसे अमुक द्रव्य प्रतिवर्ष दियाजाया करे और उनको जेल, रजिस्टरी, शिक्षा विभाग, चिकित्सा, छापाखाना, सड़क, पथ- लिकू वर्कस और फुटकर विभागका अधिकार दियानाय । इन विभागो के निर्वाहके लिये अवधको २०६९४८० ) मध्यमान्तको २६१२६३०) मा शको २७५३३२०)बंगालको ११६८५९२०) पश्चिमोत्तर प्रदेशको ६४०७९२०) पंजाबको ५१६२२१०) मदरासको ७३९४८८०) और बबईको ८८०००७५० ) कुल ४६८८७११०) रुपया वार्षिक दियाजाय । सन् ७०-७१ ६० में इन विभागोंके लिये जितना व्यय गिना गया था उसके प्रमाणसे यह द्रव्य कम है और घटाये हुए द्रव्यका जोड ३५००००० ० ) को पहुँचता है। इस घटीको पूर्ण करनेके लिये उनको स्वतंत्रता दी जाती है। इसके लिये वे प्रान्तीयकर डालना चाहे तो डाल सकती है " || सन् १८७०-७१ ई० में भारत गवर्नमेंटने कितनेही नवीन आईन बनाये थे । उनमे दो मुख्यहैं । एक यह कि सिविल सर्विसके बड़े २ पदों पर विनापरीक्षाके देशियोंको भरती करलेनेकी भारत गवर्नमेंटको स्वतंत्रताहै। दूसरा यहथा कि आवश्यकता पड़ने पर गंभीर विषयोंमें गवर्नरजनरल अपनी कौंसिलके बहुमतका कुछ विचार न कर अपनी इच्छासे काम करसकैगा । इनमेंसे प्रथम नियम बहुत वर्षों बाद प्रचलित हुआ। और इसके अनुसार जिन लोगोंको नियत किया गया उनकी योग्यताकी अच्छीतरह जाँच नहीं कीगई और प्रजाने इस मातको पसंद किया तो महुत वर्षेसि यह नियम बिलकुल बंद कर दिया गया ॥<noinclude></noinclude> ecbtyuc46hmfz0osjl48ganrihp5aln पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४७ 250 194770 665375 2026-07-06T15:24:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665375 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २३० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । . अध्याय ३४. फ्रांस और जर्मनीका संग्राम | इसी वर्षमें फ्रांससे जर्मनीका लोमहर्षण संग्राम हुआ । स्पेनकी प्रजाने भूशिया (जर्मनी) के राजा प्रथम विलियमके एक संबंध को अपना राजा बनाना पसंद किया। इसपर फ्रांस के सम्राट्ने प्रतिवाद किया। जर्मन नरेशने उनको प्रसन्न करनेके लिये अपने संबंधीको समझा बुझाकर उससे स्पेनकी गादी की उम्मेदवारी छुड़वादी । इस प्रयत्नसे फूांस नरेशका प्रजामें पूर्ण आदर होना चाहिये था परंतु उन्होंने मैक्सिको पर सेना भेजकर हार खाईयी इस लिये मजा उनसे अप्रसन्न थी और इसी कार णसे वह चाहते थे कि किसी भारी युद्ध में विजय पाकर मजाका मनोरंजन किया जाय। इस विचारसे उन्होंने जर्मन नरेशसे कहलवाया कि आप सदाके लिये इस बातको स्वीकार करलें कि हमारा कोई भी संबंधी स्पेनकी गादीकी उम्मेदवारी न करैगा । यह बात अपमान सूचक थी । भूशियाके प्रधान अमात्य प्रिंस बिस्मार्कको यह बात अपनी इच्छा के अनुसार मिलगई। फ्रांसके सम्राट्का स्वास्थ्य कुछ कालसे बिगड़ गया था। राज्य प्रबंधकी बातों में वह पूरा २ ध्यान नहीं दे सकते थे । उनकी सेना और युद्धविभाग अभिमान और अपनी उत्तम- ताके मिथ्या विचारमें चूर हो रहे थे। इस कारणसे सेनाका प्रबंध बिगड़ रहा था और युद्धकी कोई सामग्री तैयार न थी। फ्रांसके युद्धकी घोषणा देनेके अनंतर उसकी सेना धीरे २ चलकर युद्ध क्षेत्रमें पहुंची। सीमाका उल्लंघन करतेही फ्रेंच सेना अकस्मात् रुक गई। जर्मनीकी युद्धपटु सेना पानीके वाढकी तरह एक दमसे फरांसीसी सेनापर आ टूटी। एकही दिनके युद्धमें परिणाम मालूम होगया । फरांसीसी सेना एक के बाद दूसरी दूसरीके अंनंतर तीसरी इसी तरह लड़ाई हारती गई । फ्रांसके सम्राट्का राजधानीको लौटनेका साहस न हुआ। जर्मनी बालोंके आक्रमणसे देशकी रक्षा करनेके बदले सम्राट्के बचावपर फरांसीसी सेनाने विशेष ध्यान दिया और इस कारण सैदनके मैदानमें फ्रांसवालोंने जर्म- नीसे अंतिम हार खाई फरांसीसी गवर्नमेंट टूटगई । सम्राट्ने शस्त्र डालकर शत्रुकी शरण ली । जर्मन सेनाने फरांसीसी सम्राट्को क़ैदकर लिया। रानी भाग- कर इंग्लैंड चली गई । फ्रांसकी प्रजाने राज्यमें प्रजातंत्र प्रणाली स्थापितकर अमुक वर्षके लिये प्रजा वर्गेमेंसे राजा ( सभापति ) चुननेका अधिकार ग्रहण • किया । और उसी वर्षकी १८ जनवरीको मूशियाके राजा विलियमने पैरिसके<noinclude></noinclude> fozrih5wv0mnbpy6oey4yy3w91db1i6 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४८ 250 194771 665376 2026-07-06T15:25:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665376 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. दूसरा भाग । ( २३१ ) निकट सेलसके महल में जर्मनीके सम्राट्का पद ग्रहण किया। युद्धके बदले में आलस और लारेंसके दो परगने और २० करोड़ पौंड जर्मनीने फांससे दंड किया। युद्धके आरंभ में अंगरेज़ मना जर्मनवालोंके पक्ष में थी परंतु जब जर्मन बालोंने फ्रांससे दंडमें बड़ी कठोरताकी तो उसके विचार विरुद्ध होगये । फांस और जर्मनी के विषय में जिस समय खबरोंके घोड़े दौड़ रहे थे एकाएक ऐसी मात सुनने में आई कि कितनी ही शर्तों के साथ जर्मनी बेलजियम राज्यको फ्रांस में मिला देना चाहती है । इस वातसे इंग्लैंड को बहुत क्रोध आया और उसने दोनों को दबाकर एक ऐसी संधिपर हस्ताक्षर करालिये जिसके अनुसार बेलजियम राज्यकी स्वतंत्रताकी रक्षाके लिये तीनों राज्योंको अपने ऊपर बोझा उठाना पड़ा। फ्रांस जैसे मलाढय राज्यको परास्त करनेमें जर्मनोका हौसला बढ़ता देखकर इंग्लैंड के कितनेही लोग कहने लगे थे कि अपने सम्मानकी रक्षा लिये हमें किसी बड़े राज्यसे युद्ध करना चाहिये । इंगलैंडने बुद्धिकौशलसे दो राज्योंको दबाकर बिना लड़े भिड़े अपना दमदमा बढ़ा लिया !! अध्याय ३५. ओका खून और मध्य एशिया में रूस । सन् १८७२ ई० की फरवरी को भारतवर्षके लिये एक बहुतही शौकजनक घटना हुई । यहाँक माइसराय और गवर्नर जनरल लार्ड मेमो अंडमन टापूके पोर्ट ब्लेर स्थानके कैदियोंको देखनेके लिये गयेथे । वहांपर एक अफ़ग़ानने ८ फरवरीको उनपर आक्रमणकिया। अपराधी श्रीमान्‌को एक प्रार्थना पत्र देना चाहता था परंतु नियमके अनुसार उस अर्जीको सुपरिटेंडेंट द्वाराभेजने की आज्ञादेकर श्रीमान्ने उसे ग्रहण न किया । इसपातसे उसदुष्टको क्रोध भरभाया और अवसर पाकर उसने श्रीमानके प्राण लेडोल। इस घटनासे भारतभर में शोक हुआ । यद्यपि यह सर्वेटिव पक्ष गिने जाते थे परंतु इनके विचार बहुत उदार और प्रजापर विश्वास उत्पन्न करनेवाले थे। इनकी मृत्युसे भारतवर्षने एक योग्य वाइसरायको खोदिया ॥ इसी वर्ष में रूसकी शनैः २ मध्यराशियोंमें वृद्धि देखकर इंग्लैंड में चिन्ताका आरंभ हुआ। पूर्व तुर्किस्तानमें एक मुसलमान राजासे मेल बड़ाकर उसने व्यापार के विषयकी एक संधिद्वारा २० हजार वर्ग मील भूमिका कुलजा नामक जिला उससे लेलिया । इसीतरह रूस और पूर्वकी ओरके उपनिवेशके मध्य में<noinclude></noinclude> kmvnhh05puwpo162wgj56msowtzcfc6 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२४९ 250 194772 665377 2026-07-06T15:25:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665377 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( २३२ ) रेल्वेकी दोहरी लाइन बनवानेका भी रूसने प्रबंध किया। इतने पर ही उसे संतोष न हुआ । उसने खीवा राज्यपर भी दृष्टि डालना आरंभ करदिया । वहांके खानने कितने ही रूसी व्यापारियोंको मारडाला था । और रुसके थोड़े से प्रदेशपर आक्रमण भी कियाथा । इस कारणसे रूसने खीवाको घर दबाया। वीवाके खानको दबकर २० लाख रुबल दंड देना स्वीकार करनापड़ा। जबतक दंडका द्रव्य न चुकजाय खीवाराज्यके शुराहान और कुनग्राड दो मिलोमें रूसी सेनाका खीवाके खर्चसे रहमा निश्चय हुआ। इसके सिवाय खीवाकी सीमा आम्र दर्या ( आक्सस ) तक स्थिर हुई और नदीके दहने किनारेका भूभाग रुसने बुखाराके अमीरको दिलवादिया क्योंकि इस युद्ध में अमीरने उसकी बहुत कुछ सहायताकी थी । रुसकी इच्छासे खीवाराज्यने दास व्यापार बिलकुल ठठादिया । इसके बाद खीवाके पड़ोसमें लुटेरे तुर्कोंपर रूसकी दृष्टि पड़ी । खीबाका बल बढाने के नामपर उसने तुर्कीको दमन करने का निश्चय किया । इसविचार में शीघ्र ही सफलता प्राप्तकर रूसने रवीवाके साथ दूसरा संधिपत्र किया । आमू और सीर नदीका मध्यभाग रुसी राज्य में मिलाने और सीरके दहने किनारेपर किलोंकी माला बनाने का उसने स्वत्य प्राप्त किया। इसके सिवाय उसने खानसे स्वीकार लिया कि मैं उसके अधीन रहूंगा और बिना उसकी आज्ञाके किसीसे संधि विग्रह न करूंगा । इस घटनासे इंग्लैंड में कुछ २ घवराहट मचगई । इंग्लैड और रूसमें इस विषयकी बहुत समयतक लिखा पढ़ी होती रही। उसका परिणाम यह हुआ कि काबुल और रूसकी सीमा इसतरह निर्द्धारित की गई । (१) बदखशा और उसके अधीन वा खान प्रदेश जो पूर्वमें सटीकल ( उसलेक ) से आक्सस और कोकचा नदीके संगमतक चलागया है उसे अफगानिस्तानकी सीमा समझनी ( २ ) अफगान तुर्किस्तान जिसमें कुंजह और वलखतक आगये हैं उसकी उत्तर सीमा आक्सस और कोकचा नदीके संगमसे खोजा सालेहतक गिनना और खोना सालेहके नीचे आक्सस नदीके बाँये किनारे वाले प्रदेशपर काबुलके अमीरको दावा न करना और ( ३ ) अक्सा, सेरीपुल, माइमें जान, शिवर जान और अंडकोईके जिले अफगानिस्तानकी पश्चिमोत्तर सीमा गिने जाना चाहिये इनसे उत्तरके जंगल तुर्क मानों के है |<noinclude></noinclude> 664xreq3ieeb09blr5liys8xd64zgdq पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५० 250 194773 665378 2026-07-06T15:25:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665378 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २३३ ) अध्याय ३६. बंगालका, दुर्भिक्ष और लार्ड नार्थब्रूककी कीर्त्ति । सन् १८७३-७४ ई० में बंगाल प्रान्तमें घोर अकाल पड़ा। इस समय वहांके लेफ्टिनेंट गवर्नर सर ज्यार्ज केम्पवेल थे। उन्होंने सम्मतिदी कि भारतसे बाहर अनका जाना बंद करना, अकालपीडित भागों में बाहरसे अन्न लाना, हो सके जहां २ अत्रका संग्रहकरना सशक्तोंको काम कराकर और अशक्तको बिना काम भोजनदेना नाहिये । वाइसराय लार्ड नार्थतूक अकालकी खबर पातेही दौड़े हुए शिमलेसे कलकते पहुंचे । अन्नका निकासवंद करनेके विषयमें सर न्यार्न केम्पवेलने जो सम्मतिदी थी उसका देशी समाचार पत्रोंने समर्थन किया परंतु यह बात लाई नार्थ ब्रूकको पसंद न हुई। उन्हों ने कहाकि हमारे साधारण ग्राहकोंको मनमानते भावपर अनदेनेकी यदि हमइस समय नाहीं करेंगे तो वे अपने लाभके लिये और कोई मार्ग लेंगे और इससे भविप्यत्में हमारे व्यापारको हानि पहुँ- गी। इस सम्मति पर भारतके प्रसिद्ध संवादपत्रऔर लंडन टाइम्सने विरोध किया। परंतु उससमय भारतके स्टेटसेक्रेटरी कार्डसालिस्बरी थे। उन्होंने लार्डनार्थ चूके कथनका समर्थन किया और इसीके अनुसार कार्य किया गया। सर ज्यार्ज के- म्पबेलकी दूसरी सूचनाको वाइसरायने पसंद किया और इसके लिये अकालं पीडितों की सहायता हेतुसे भारत गवर्नमेंटने ५ लाख टन चावल खरीद किये । इन चावलों को अकाल पीडित भागोंमें ले जानेके लिये १ लाख छकड़े, २ लाख बैल, २ हज़ार ऊंट, २३०० नावें और ९ स्टीमरोंसे काम लिया गया । अकाल पीडितोंकी रक्षा के लिये जो काम खोले गये उनमें काम या बिना काम भोजन पाने वालोंकी संख्या फरवरी मासमें २८७००० थी किन्तु जूनमें यही मढ़कर १७ लाख ७० हजारको पहुंची। इस अकालके लिये गवर्नमेंटका अनुमानसे ६ || करोड़ रुपया व्यय हुआ। अकाल पीडितोंको अन्न पहुंचाने में गर्वमेंटने किसी तरह की त्रुटि न रक्खी। इस घातका प्रमाण यही है कि सर- कारके मँगाये हुए अन्नसे अकाल अंत १ लाख टन चावल मन्च रहे । इग्लैंडकी प्रजाने भारतवर्षके अकाल फंडमें उस समय अनुमान २० लाख रुपया दिया ॥<noinclude></noinclude> pjbpbaugbquamf9d445csx7tkw3gpn6 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५१ 250 194774 665379 2026-07-06T15:25:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665379 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २३४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । अध्याय ३७. astra arecarsar पदच्युत होना । सन् १८७४ ई० में बड़ौदाके गायकबाड़ महाराजा मलहार राव गादसि उतार दिये गये। उनपर मुख्य अपराध यही लगाया गया था कि उन्होंने व- ड़ौदेके रेजिडेंट कर्नल फेरको मरवा डालनेका प्रयत्न किया। इस प्रयत्नका कारण यह बतलाया गया कि लक्ष्मी बाई नामकी एक रूपवती स्त्री को उन्होंने उसके पतिसे छीन कर अपनी रानी बना लिया। उस स्त्रीके जो पुत्र हुआ उसे अपना उत्तराधिकारी बनानेका मलहार रावने निश्चय किया । परंतु "लक्ष्मी वा- ईका पहला पति जीवित था इसलिये उस बालकका गादीपर स्वत्व नहीं है " यह बात कहकर कर्नल फेरने उनकी योजना स्वीकार न की। कर्नल फेर नित्य प्रातःकाल वायुसेवनसे लोटकर एक प्याला शरबत पिया करते थे । एक दिन साह के षटलरने किसीके सिखानेसे उस प्यालेमें संखिया और हीरेका चूर्ण डाल दिया । इसमें महाराजाका संबंध मानकर एक कमीशन द्वारा उनके अ- पराधकी जांच की गई। इस कमीशनमें सर रिचर्ड काउच सर रिचर्ड मीड मि- स्टर फिलिप मेलविल, ग्वालियर और जयपुरके नरेश तथा ग्वालियरके दीवान राजा सर दिनकर राव नियत हुए। महाराजने अपनी रक्षाके लिये विलायतक सुप्रसिद्ध बेरिस्टर सार्जंट बेलंटाइनको बुलाया । २३ फरवरीसे १८ मार्च तक जाँच हुई | कर्मशनके तीनों अंगरेज़ सभासदोंने महाराजा को दोषी और देशी सभासदोंने निर्दोष सिद्ध किया । लार्ड नार्थतूकने अंगरेजोंके कथनको विश्वासनीय मानकर महाराज मलहार राबको पदच्युत किया। इसके साथही उन्होंने एक आज्ञापत्र प्रकाशित कर उसमें लिखा कि " महाराज मलहार रावके वारिसोंका गादीपर कुछ स्वत्व नहीं रहेगा किन्तु प्राचीन सन्धिके अनुसार बड़ौदा राज्य स्थिर रक्खा जायगा । " गत महाराज खंडेरावकी विधवा रानी उस समय विद्यमान थीं। उन्हींको सरकारने दत्तक देनेका अधिकार दिया। उस आज्ञापत्र में यहभी लिखा था कि "महाराज कर्नल फेरको वध करनेके अपराध में पदच्युत नहीं किये गये हैं किन्तु उनके मसिद्ध दुराचार और राज्यकी उन्नति न करनेका उन्हें यह दंड दिया गया है। " आजकलके महाराज श्रीमान् सयाजीराव को श्रीमती जमनाबाईने दत्तक लिया और उनका यह कार्य गवर्नमेंटने स्वीकार किया ॥<noinclude></noinclude> 6nfjeys43wo9bi4g7muwe1hbm3m4e9d पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५२ 250 194775 665380 2026-07-06T15:25:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665380 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २३५ ) अध्याय ३८. भारतवर्षकी मनुष्य गणनायें । श्रीमतीके शासन में भारतवर्षकी तीनवार और उनकी मृत्युके वर्ष में एक बार इस तरह सन् १८७१, सन् १८८१, सन् १८९१ सन् १९० १६० कुल वारवार मनुष्यगणना हुई । सन् १८७१६० में जो गणना हुई उसकी रिपोर्ट सन् ७५ ई० में प्रकाशित हुई थी। इससे पूर्व अगथ, पंजाब और बराड़ मान्तकी गणना तीन चार वर्ष पहले हो चुकी थी इस लिये उस समय ये प्रान्त न गिनेगये। दोनोंगार की गणनाको जोड़कर सरकारने प्रकाशित किया कि भारतवर्षकी गवर्नमेंट के अधिकारमें लाख ४ हजार ४९ वर्गमील धरतीपर १९ करोड ५ लाख ६३ हजार ४८ मनुष्य बसते हैं । देशीरजवाड़ों की गणनाको इसे संयुक्त करनेसे भारतवर्ष में कुल भूमि १४ लाख ५० हजार ७४४ वर्गमील और २६ करोड़ ८८ लाख ३० हजार ९५८ मनुष्य हुए। इनमेंसे सरकारी राज्यमें हिन्दू १४ करोड़ ५ लाख और मुसल्मान ४ करोड़ | लाख । परंतु इसबारकी मनुष्यगणना ठीक नहीं थी इस लिये सरकारने दशवर्ष बाद सन् १८८१६० में फिर गिनतीकी और तबहीसे यह नियम करदिया कि प्रतिदश वर्षमें इस देशकी गणना हुआ करे ॥ सन् १८८९ ई० के वर्ष में जो गणना हुई उसमें काश्मीर और नेपाल सिवाय भारतके समस्त देशी राज्य भी संयुक्त कियेगये इस गणनाके अनुसार भारतवर्ष भरमें २५ करोड ४० लाख मनुष्य हुए। इस संख्या में से२० करोड़ ४० लाख ब्रिटिश राज्यके और ५ करोड़ देशी रजवाड़ों के इस गिनती के समय मेवाड़ और बंबई प्रान्तके भीलोंने शिर उठाकर मनुष्य गणना विभागके कर्मचारियों पर आक्रमण किया था। इसका कारण यह बतलायागया था कि गिनती करनेसे भीलोंके चित्तपर कुछ भ्रम हुआ है किन्तु पछिसे विदित हुआ कि शराबके नवीन आईन ने उन्हें असंतुष्ट कर दिया था ॥ इससे ठीक दशवर्ष बाद सन् १८९१३० की १६ फरवरी को भारत वासियों की फिर गणना हुई। उसके साथ सन् १९०१ की तुलना करने के लिये दोनों वर्षों का लेखा साथ २ लिखा गया है-<noinclude></noinclude> 2dmn42rys87rcrfqw36kned8ecnixa0 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५३ 250 194776 665381 2026-07-06T15:25:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665381 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २३६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ब्रिटिशराज्य । सन् १८९१ सन् १९०१ —घंटे+बढ़े अजमेर मेरवाड़ा आसाम ५४२००० ४७६००० - १२.१७ ५४३३००० ६१२२००० +१२.६७ गंगाल ७१३४६००० ७४७१३००० +४.७२ बराड़ २८९७००० १४९१००० -४९.९ बंबई १५९५७.०० १५३३०००० -३.९३ सिंघ २८७१००० ३२१२००० +११.८८ अदन ४४००० ४१००० - ६.४८ अपर ब्रह्मा ३३६२००० ३८४९००० + १४.४९ लोअर मह्मा ४४०८००० ५३७१००० +२१.८४ मध्यमान्त १०७८४००० ९८४५००० -८.७१ कुर्ग १७३००० १८०००० +४.२८ मदरास ३५६३०००० ३८२०८००० +७.२४ पश्चिमोत्तर प्रदेश ३४२५३००० ३४८१२००० +१.६३ अवध १२६५०००० १२८८४००० +२.४० पंजाब २०८६६००० १२४४९००० +७.५८ बलूचिस्तान ८१०००० ° अंडमन १५००० २४००० +५६.९५ ब्रिटिशराज्यका जोड़ २२१२६६००० २३१०८५००० +४.४४ देशी रजवाड़े । सन् १८९१ सन् १९०१ घंटे+बढे. हैदराबाद ११५३७००० १११७४००० - ३.१४ बड़ौदा २४१५००० १९५०००० -१९.२३ मैसूर ४९४३००० ५५३८००० +१२.० काश्मीर २५४३००० २९०६००० + १४.२४ राजपूताना १२०१६००० ९८४१०००. -१८-१ मध्यभारत १०३१८००० ८५०१००० -१७.५ पंबई ८०५९००० ६८९१००० - १४.४९<noinclude></noinclude> 0um6rilp4cqdxeo17tvci20wq5336qu पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५४ 250 194777 665382 2026-07-06T15:26:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665382 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । मदरास ३७००००० ४१९०००० मध्यमान्त २१६०००० १९३८००० ( २३७) +१३.२३ -८-१९ बंगाल ३२९६००० ३७३५००० + १३.३३ पश्चिमोत्तर प्रदेश ७९२००० ७९९००० +९१ पंजाब ४२६३००० ४४३८००० +४.१२ ब्रह्मदेश १२२८००० रजवाडोंका जोड ६६०५०००० ६३१८१००० -४.३४ भारतवर्षका जोड २८७३१७००० २९४२६६००० ०२.४२ यद्यपि सन् १९०१ की मनुष्य गणना श्रीमती स्वर्गवास के अनन्तर हुईहै । परंतु उससे आपके शासनके अंतिम दश वर्षमें भारतवर्षकी कैसी स्थिति रही, इसका दिग्दर्शन होता है इसकारण यहां लिखी गई है। चारों गणनाओंकी परस्पर तुलना करनेमें पुस्तक बढ़नानेका भय है । आशा है कि पाठक स्वयं इस कार्यका बोझा अपने ऊपर लेंगे || अध्याय ३९. श्रीमान् प्रिंस आफ् वेल्सका भारतवर्ष में स्वागत । विलायती कपड़े पर कर । सन् १८७५ ई० में भारत के इतिहासमें सबसे आवश्यक कार्य श्रीमान् युग- राज के भारत पधारने का हुआ। यह वही महोदय हैं जो अब श्रीमान् सप्तम एडवर्ड के नामसे राज्य करते हैं इनके भारतआनेका संकल्प इंग्लैंडके प्रधान अमात्य मिस्टर डिसरायली ( लार्ड मीकान्सफील्ड ) ने ८ जुलाईको प्रकाशित किया । और इस यात्राके लिये ३ लाख रुपया भारत गवर्नमेंट ख करनेका निश्चय किया और इसके साथही ६लाख रुपये उन्होंने विलायती कोषसे देनेका पार्लियामेंट में प्रस्ताव किया । भारतवर्षपर इसमकारके खर्चका बोझा डालनेके विषयमें प्रोफेसर फासेट और मिस्टर हेन्की विरोधीहुए किन्तु उनकी बात चलीनहीं । ११ अक्टूबर को श्रीमान् 'सेरापीस' धूमपोत द्वारा विलायतसे विदाहोकर पैरिस, इटाली, एथेंस, पौर्टसैद, केरो और अदन होतेहुए ३० नवंबर को मंबई में पहुँचे । मार्ग में श्रीमान्ने माताकी आज्ञानुसार केरो में मिसरके खेदीय को जी. सी. एस. आई. की पदवीदी आपका स्वागत करनेके लिये श्रीमान् गाय- कवाड नरेशके सिवाय और २ कई एक राजाभी मंबई आये थे। भारतवर्ष भर<noinclude></noinclude> gqrgggjz7q7wcw9o8ya3uvbrzm83z3b पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५५ 250 194778 665383 2026-07-06T15:26:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665383 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२३८) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । एक छोरसे दूसरे छोर तक श्रीमान्ने भ्रमण किया। और बड़े २ रजवाडोंमें पधारकर राजाओंसे भेंटकी । श्रीमान सम्मानमें आगरे में एक बढा दर्वार हुआ जिसमें भारतवर्ष के प्रायः सबही छोटे बड़े राजा इकट्ठे हुए । भारतवर्षकी प्रजाको युवराजके मुखकमलके दर्शनसे अत्यानन्द हुआ । और युवराजने इस देशसे विदाहोनेके अनन्तर भारतवर्षके वाइसराय लार्ड नार्थबूकको पत्र लिख कर भारतवासियोंको धन्यवाद दिया । इस विषयमें अधिक बातें इस पुस्तकके अंतमें श्रीमान् सप्तम एडवर्डके चरित्रमें लिखी गई हैं । जिस समय प्रिंस आफू वेल्सके आतिथ्य में भारतवर्ष आनन्द सागर में हिलोरे ले रहाथा उसी समय भारतीय विभागके स्टेट सेक्रेटरी लार्ड सालिस्बरी और भारत के वाइसराय लार्ड नानककी आपस में खटपट खड़ी होगई । और इसका परिणाम यह हुआ कि लार्ड नार्थबूकको अपना पदत्यागना पड़ा । सन् १८७४ ई० की १५ जुलाईको शिमलेकी व्यवस्थापक सभाने व्यापारके पदार्थों पर करडालने की इच्छासे लार्ड सालिस्बराके पास कुछ लिखापढ़ी की थी और उसीके अनुसार ५ अगस्तको कर डालदियाथा। लार्ड सालिस्बरी ने लिखाया कि, भारत वर्षकी आर्थिक दशा अच्छी नहीं है इसलिये विलायती कपड़े और सूतके भारत आनेका कर निकालदेना चाहिये। यह पत्र भारतमें पहुँचने पूर्व ही वाइस- रायने ५ अगस्तको लार्ड सालिस्बरी के नाम एक तारदिया जिसमें लिखा कि महसूल संबंधी वर्तमान नियमोंका संशोधन कर भारतसे बाहर जानेवाले मालका महसूल बिलकुल उठादियागया है और साथही बाहरसे आने वाले भालका महसूल साढ़े सात रुपया सैकड़ा की जगह घटाकर पांचरुपया रक्खा गयाहै । और कपड़े तथा सूतका महसूल ज्योंका त्यों स्थिर रखकर लंबे धागे के तारकी रुईपर महसूल डालागयाहै । इस तारको पातेही लार्ड सालिस्बरी क्रुद्ध होगये और तारद्वारा बाइसरायसे पूंछा कि अधिक आवश्यक और गंभीर विषयों पर आईन बनानेसे पूर्व उनके विषयमें स्टेट सेक्रेटरीसे आज्ञा मांगनेका जो नियम है उसपर अमल क्यों नहीं किया गया। इसके उत्तर में वाइसरायने १६ अगस्तको लिखा कि, व्यापारियोंकी ओरसे इस संशोधनकी बहुत राह देखी जातीथी, कलकेतकी चम्बर आफू कमर्सने दो प्रार्थना पत्र देकर इस विषय में त्वराकी थी, निकास व्यापारके लिये अनुकूल ऋतु आपहुँची थी और बिलायतसे स्वीकार कराकर आईन बनाने में बहुत विलंब लगनेकी संभावना थी और इससे बहुत कुछ हानि होती । इसपर लार्ड सालिस्बरीने उनको दबाकर इस बात पर फिर विचार करनेका अनुरोध किया इसी बातसे असंतुष्ट होकर उन्होंने अपना पद त्याग दिया ||<noinclude></noinclude> mn31fe5e88vsz6jamo1ezs0p7exne80 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५६ 250 194779 665384 2026-07-06T15:26:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665384 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २३९ ) अध्याय ४०. श्रीमतीको 'महारानी' की पदवी । भारतवर्षका शासन रानीके हाथमें आनेके बाद यूरोपमें श्रीमतीकी पदवी के विषय में बहुत कुछ चर्चा हुई। रुसने कहा कि रानीका पद भारतके साथा- रण राजाओंसे बढ़कर नहीं है। अन्य राज्योंसे पत्र व्यवहारमें श्रीमतीके भार- तका शासन हाथमें आने बाद केवल रानीके अतिरिक्त कुछ उपाधि नहीं लिखी जाती थी। इन कारणोंसे इंग्लैंडमें श्रीमतीके पदके विषय में बहुत चर्चा होने लगी। ऐसे अवसर में सन् १८६८६० में ईरानके शाहने एक पत्र लिखा था उस पर बहुत झगड़ा उठा। उस समय यह निश्रय हुआ कि किसी प्रकारसे पदवा के विषयका निपटारा करना चाहिये । परंतु इस कार्यको प्रकाशित करने पूर्व यह संदेह था कि कहीं भारतके राजा इससे अनसन न हो बैठें इसलिये गुप्त परामर्शके बाद श्रीमान् प्रिंस आफू वेल्स भारतके राजाओं की भक्ति और इच्छा जांचनेके लिये भेजे गये । सन् १८७५ ई० में युवराजका भारतमें परम सत्कार हुआ और यहां की प्रजा और राजाओंने शुद्ध अंतःकरणसे उनको भा- यी सम्राट् माना। इससे निश्चय होगया कि श्रीमतीको भारतवर्षकी साम्राज्ञी नाना उचित है। इसी अवसर में रूसके द्वितीय ज़ार निकोलसने मध्य एशि- या सम्राटका पद धारण किया बस इसीपर रानी विक्टोरिया को साम्राज्ञी विक्टोरिया वा महारानी विक्टोरियाका पद देना निश्चय होगया || १७ फरवरी सन् १८७६ ई० को इंग्लैंड के प्रधान अमात्य मिस्टर डिसर- यतीने श्रीमतीको "एम्बेस आफइंडिया" की उपाधि दिलाने के लिये पार्लियामेंट में एक बिल उपस्थित करते समय कहा कि, “श्रीमती पदवी धारण करनेसे भारत की मजा और राजा बहुत प्रसन्न होंगे। यह बात भलीप्रकार प्रमाणित होचुकी है । " इसमातपर पार्लियामेंट में बहुत वादानुवाद हुआ और कितनेही लोग कहने लगे कि, इंग्लैंड के राजनियमानुसार रानी ऐसा पद धारण नहीं कर सकती हैं। इसपर मिस्टर डिसरायलीने उनको यह समझाकर संतुष्ट किया कि “श्रीमती इंग्लैंडकी रानीही रहेंगी । यहांकी महारानी नहीं बनना चाहती हैं। " इस उत्तर को पाकर पार्लियामेंटने इस विषय का आईन पास कर दिया। इसके पश्चात् १ मई को लंडन मिडल सेक्स और एडिनबरोके शेरिफों द्वारा इंग्लैंडमें इसका ढिंढोरा पिटवाया गया। इसमें स्पष्टरूपपर यह नहीं लिखाया कि, श्रीमती केवळ<noinclude></noinclude> 47wdxbsp6l855bcp2mw6zzvuwyg024z पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५७ 250 194780 665385 2026-07-06T15:26:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665385 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २४० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । भारतवर्षकी महारानी और इंग्लैंडकी रानी रहना चाहती हैं इसलिये प्रजायें हलचल मच गई। और पार्लियामेंट में मंत्रि मंडल के विरुद्ध अविश्वासकी प्रार्थना उपस्थित कीगई । इसपर प्रधान अमात्यने उपाधिका प्रयोजन समझाकर प्रजा को प्रसन्न करदिया | श्रीमतीको जो उपाधि देना निश्चयहुआ उसे अंगरेजीमें "एम्मेस आफू इंडिया" कहते हैं। इसका अर्थ यह होता है कि भारतवर्ष के सम्राट्की स्त्री परन्तु इनके विषय में यह बात नहीं थी। इसलिये भारत वर्ष की देश भाषाओंमें इसका ठीक अर्थ क्या किया जायगा ? यह प्रश्न प्रोफेसर मैक्सम्यूलर और सर विलियमम्यूर से पूँछागया । प्रोफेसरने कहा कि “महारानी" ठीक है और म्यूरसाहबने "कैसर हिन्द" ठीक बतलाया | महारानी' की अपेक्षा गवर्नमेंटकी दृष्टिमें 'कैसरहिन्द अधिक प्रभावशाली देखपड़ा इसलिये सकारी कागजों में यही लिखापढ़ा जाता रहा किन्तु साधारण प्रजा अपने प्रियतमको किसी सरल शब्दसे संबोधन करती है और सरल शब्द ही से लोगोंक हृदय पर अधिक प्रभाव उत्पन्न करता है इसलिये भारत वर्ष की प्रायः सबही भाषाओं में “महारानी" शब्द का अनायास प्रचार होगया। " कैसरहिन्द” के दो अर्थ हैं एक भारतवर्ष का सिंह और दूसरा “भारतवर्षका सीजर" । इनमेंसे प्रथम का अर्थ प्रकट है और सीजर रोमन राज्य में सर्वोत्कृष्ट शासक था बस उसीके नाम पर कदाचित् सर विलियम म्पूरने इस पदकी योजनाकी होगी ऐसा अनुमान है । अध्याय ४१. दिल्लीका राजसी दर्बार । श्रीमतीके 'महारानी' पद धारण करने की सूचनाके लिये एक टिंढोरा १ जन- वरी सन् १८७७ ई० को प्रकाशित किया गया था। इस बातका हर्ष प्रका शित करनेके लिये उसदिन दिल्लीमें एक बृहत् और प्रभावशाली दर्बार इकट्ठा हुआ। सौभाग्यमें दुर्भाग्य का चिह्न इतनाही था कि, उस समय देशभरमें भयं- कर अकाल पड़नेका पक्का निश्चय होचुका था इसलिये भारतवर्षके वाइसराय लार्ड लिटनने राजाओं को सूचित करदिया था कि, जिनके राज्यमें अकालका भय अधिकहो उनके उपस्थित होनेकी आवश्यकता नहीं है परंतु देशभरके प्रायः सबही राजा महाराजाओंने इस भयंकर आपत्तिको तिनके समान गिनकर इस राजवैभव और महात्सयमें संयुक्त होना अपनी शोभा और<noinclude></noinclude> f3zlb0j1fp9c7for52v11bgs2vbsnc1 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५८ 250 194781 665386 2026-07-06T15:26:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665386 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२४१) कर्तव्य समझा और अपनी २ सेना, हाथी, घोड़े, राजकुटुम्ब, सर्दार, नागीरदार और टमराव समेत दिल्लीमें इकट्ठे हुए। उस समय दिल्लीकी शोभा राजा युधि- टिरके राजसूय यज्ञका स्मरण दिलाती थी । २३ दिसम्बरको वाइसराय स्पेशल ट्रेनद्वारा दिल्ली पहुँचे । हैदराबाद के निजाम, ग्वालियर, इंदोर, मैसूर, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, बूंदी और कोटा आदि के राजा महाराजाओंने स्टेशनपर आप का स्वागत किया। इसके बाद तीन दिन तक वाइसरायने भित्र २ राजाओंस भेंटकी। इसके अनंतर १ जनवरीको शाही दर्बार हुआ । दर्बारमें एक उच्च सिंहासनपर लार्ड लिटन आसीन हुए। उनके आसपास अपने २ पदके अनुसार अर्द्धचन्द्राकार में राजालोगों को बैठनेका स्थान मिला । इस प्रभावशाली दर्गा- रमें भिन्न २ वस्त्रालंकारों से सुसज्जित राजालोगों के विराजनेके अनंतर लाट साहबने खड़े होकर अंगरेजीमें महारानीका डिंडोरा सुनाया। अगरेजीका व्याख्यान समाप्त होनेबाद नहीं ढिढोरा उर्दू में पढ़ा गया । इतना होतेही १०१ तोपों की सलामी हुई । वाइसरायने अपने व्याख्यान में भारत वर्ष में ब्रिटिशराज्य का संस्थापन, उसकी उन्नति, स्थिर रहनेके कारण, देशी राजाओं और मजाकी राजभक्ति और सर्कारी कर्मचारी और सेनाकी प्रशंसा की और कहा कि इन्हीं कारणों से हम लोगोंको आजका दिन देखना नसीब हुआ है। और श्रीमतीको अपने शासन में देशकी नानाप्रकारसे उन्नति करनाही अभीष्ट है। वाइसरायका व्याख्यान समाप्त होतेही सब लोगोंने खड़े होकर हर्षनाद किया । दिल्लीकी जीनतुल मसजिद और फतेपुरकी मसजिद इस हर्षमें गवर्नमेंट ने मुसलमानों को लौटादी । राजा महाराजाओंके लिये 'इंडियन इम्पाइर' के नाइकी उपाधियां उसी समयसे निकाली गई और यथायोग्य रीति पर इस दरमें सब राजाओंको इस प्रकारकी पदवीसे भूषित किया गया। इस उत्स- के हर्षमें १६००० कैदी बंधमुक्त किये गये ॥ दिल्ली हिन्दू और मुसल्मान राजाओंकी बहुत कालसे राजधानी चली आ ती है इस लिये यह स्थान इस कार्यके लिये अधिक उत्तम समझा गया। इस उत्सव पर अपने २ ठाठ समेत अनुमान ४०० राजा महाराजा इकट्ठे हुएथे । केवल दिल्ली ही में क्यों बरने भारत भर में उस समय अपार हर्ष था। जो लोग इस दर के समय उपस्थित थे उन्होंने आतिशानी और रोशनी की बड़ी प्रशंसा की । ११<noinclude></noinclude> s3kw3alqdssotepsabkont3v5zzpcqm पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२५९ 250 194782 665387 2026-07-06T15:26:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665387 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २४२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | पुराने समय राजसूय यज्ञों में जब राजालोग इकट्ठे होते थे परस्पर स्पर्द्धा और ईर्षाका जन्म होताथा किन्तु इस दर्बारने राजाओंके मध्य प्रेम उत्पन्न किया और वे आपसमें भाई२ की तरह मिले। बहुत वर्षोंमें इसतरह राजाओंके इकट्ठे होने का यह अवसर आया था और आपस में खिंचाखिंची होने की संभावना थी किन्तु, आजकल देशीराजाओं में आपसका जो मेल देखा जाता है उसका जन्म इसी स्थानसे हुआ था । सत्य पूंछो तो ब्रिटिश शासनमें बाघ बकरी एक घाट पानी पीनेका यह दुबार एक नमूनाथा । यह दर रंग बिरंगे वस्त्र, तरह २ की सजावट और नई २ सूरतोंके लिये एक प्रदर्शन था। आश्चर्य- कारक पदार्थों के लिये अजायबखाना था और पुराने ढंगके राजसी ठाठका संग्रहस्थान था । इस उत्सवपर राजामहाराजाओंकी सेना और सरकारी कर्म- चारियों तथा सेनाके अतिरिक्त टीडीदलकी तरह लाखों मनुष्य दर्शक बनकर आये थे। इतनी अभूतपूर्व भीडको स्थान देकर दिल्लीने यह दिखला दियाथा कि, मैं अनादिकाल से भारतवर्षकी राजधानीहूं और अनेक बार ऐसे मैले मेरे घरमें इकट्ठे हो चुके हैं । लाट साहबने उपाधि और पदकके साथ एक २ झंडाभी प्रत्येक महाराजाको दियाथा | इसको प्रदान करतेसमय आप कहते जाते थे कि- "श्रीमती महारानीके भारत वर्षकी साम्राज्ञीकी उपाधि धारण करनेके स्मरण निमित्त यह आपके घरानेके राजचिह्न युक्त झंडा महारानीकी ओरसे आपकी भेंट करताहूं । श्रीमती महारानीको विश्वासहै कि, इस झंडेको उड़ाते समय इंग्लैंडके मुकुटके साथ आपके शुभचिंतक राजवंशका जो दृढ़ सम्बन्ध है उसे और इसीतरह आपका शासन दृढ़ उन्नतिशाली और स्थिर रखनेकी इच्छा नो सरकारी अधिकारी रखते हैं उसे आप स्मरण रक्खें गे। श्रीमती महारांनीकी आज्ञासे इस पदकसे मैं आपका शृंगारवर्द्धन करताहूं । आप इसे वर्षोंतक पहने और आपके कुटुम्ब में इस उत्सवके स्मरणार्थ यह दीर्घ कालतक रक्षित रहे यह मेरा आशीर्वाद है" || अध्याय ४२. भारतमें आँधी और दुर्भिक्ष । सन् ७६-७७ के सालमें जैसे श्रीमतीके महारानीकी उपाधि धारण करने का महोत्सव हुआ उसी तरह देशको दो भयंकर आपदाओंने भी धर दबाया था।<noinclude></noinclude> brlk0nyp6nasjqnc3tl5e49i082lp6c पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६० 250 194783 665388 2026-07-06T15:27:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665388 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>L दूसरा भाग । ( २४३ ) इस वर्ष अक्टूबर मासमें बंगालेकी खाड़ी में भयानक आँधी आई। इस आँधी से बाकरगंज और नोआखालीके मिले तहश नहश होकर २ लाख १५ हजार मनुष्योंके माणगये । उस समय बंगाल में सर रिचार्ड टेम्पल लेफ्टिनेंट गवर्नर थे। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखाया कि “३१ अक्टूबर की रात्रिमें बंगालकी खाड़ी में बहुत भयानक आँधी आई। पवनके वेगसे मास २ फुटकी लहरें उठने लगीं। कितनीही जगहकी तरंगें इससे भी बढ़कर थीं। रात्रिको सोनेके समय आँधीके बिलकुल चिह्न दिखाई नहीं देते थे किन्तु ११ बजेके लगभग एकाएक तूफान ने बलपकड़ा और तुरंत चारोंओरसे रोना पीटना मचगया। इसी समय दोनों निळे जलमग्न होगये । बाकी शीघ्रता में लोग अपने छप्परोंपर भी न चढ़ने पाये। पानीके दमावसे मकान बैठगये। मनुष्यों और नौपायोंकी लाशोंके ढेर लगगये। तीन हजार वर्गमील भूमिमें यह तूफान था। यहाँ १० लाख ६२ हज़ार मनुष्य बसते थे जिनमें चौथाईके लगभग मरगये" | • दूखते चोट और कनौडे भेट ' की कहावतके अनुसार आपत्तिपर आपत्ति आया करती है । इस वर्ष में बंगाल प्रान्तको आँधीसे दुःख सहना पड़ा तब अन्य प्रान्तोंको अकालने आ दमाया । दक्षिण भारत के कईएक जिलों में वृष्टि बिलकुल न हुई । और मदरास बंबई तथा हैदराबाद राज्यमें असमय और आ- वश्यकतासे कम मेह बरसा। इस कारण खेतोंमें एक दानाभी उत्पन्न न हुआ । दिसम्बर मासमें दक्षिण देशका अन्न तिगुना महँगा होगया। ऐसे समय में बंगाल, ब्रह्मदेश, पश्चिमोत्तरमान्त और मध्यदेशमें अनकी न्यूनता न थी और अकालपीड़ित भागों को यथावश्यक अन्न वहांसे मिलसकता था। परन्तु उससमय आनकळकी तरह रेल्वे और सड़कों का उत्तम साधन न था। इस कारण अन्न पहुँचने में बड़ी कठिनता पड़ी परन्तु सरकारने इसका यथाशक्ति अच्छा बंदोवस्त करदिया । अकालके आरंभ में भूखों मरनेपर भी दीन लोगोंने अकाल मोचनके कामे परिश्रम करना और संत में अन लेना स्वीकार न किया किन्तु नवंबर दिसंबर में एकदमसे लाखों ही सहायता के लिये टूट पड़े। अकालकी स्थिति जाननेके लिये गवर्नमेंट ने सर रिचार्ड टेम्पल को नियत किया तो उन्हों ने जांनके पश्चात् रिपोर्टकी कि जिन लोगों में पेट भरनकी शक्ति है वे भी सरकारी सहायतामें आपड़े हैं। इसपर गवर्नमेंट ने छोटे २ काम बन्दकर अकाल पीड़ितों का दैनिक वेतन कम कर दिया। इसप्रकार का उद्योग करने पर भी अपलके अंतमें मदरास में ७ लाख १६ हजार, मैसूर में ६२ हज़ार और बंबई प्रान्त में २ लाख ८७ हज़ार अकाल<noinclude></noinclude> djjabn41xx883p2o4rajagcg789aepg पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६१ 250 194784 665389 2026-07-06T15:27:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665389 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( २४४ ) पीड़ित थे । यह गणना काम करनेवालोंकी थी किन्तु अशक्तोंकी दशा विलकुल खुरी थी। जुलाई के अंतमें मदरासमें ८ लाख ३९ हजार बंबई में १ लाख ६० हज़ार और मैसूर में १ लाख १ हजार अशक्त थे। अकाल मोचनके काम देरसे आरंभ हुए थे । मदरास बंगलोर आदि नगरों में सड़कके दोनों ओर मुरदों के ढेर लगे थे हैजा, अतिसार और भूखसंबंधी रोगोंने लोगों का सर्वनाश करदिया। सरकारी रिपोर्ट से मालूम होता है कि, इस अकाल में १३ लाख मनुष्य कालके कबर बनगये । मृत्यु संख्याकी वृद्धि के साथ जन्म संख्याभी घटगई थी । लंडन के लार्ड मेयरने जो फंड इस कार्यके लिये इकट्ठा किया उसमें लगभग पचास लाख रुपया इकट्ठा हुआ। गवर्नमेंटने इस कार्य में ९|| करोड़ रुपया खर्च किया | इस अकालसे गवर्नमेंटको एक आवश्यक शिक्षा मिली। उसने प्रतिवर्षअकाल की रक्षा के लिये १ || करोड़ रुपया अथवा प्रति दशवर्ष में १५ करोड़ रुपया सरकारी कोष में से अलग करने का ठहराव किया। खर्चमें घटा बढ़ीकर इतना रुपया इकट्ठा नहीं किया जासकता था इसलिये सरकारको विशेषकर डालने की आवश्यकता हुई। इस कार्य को संपादन करने के लिये भारत गवर्नमेंटने मान्ती य गवर्नमेंट को अपने २ कामों में स्वतंत्रता देकर ४० लाख रुपया तो उनसे लिया और शेष में भूमिकर बढाने के सिवाय लाइसेंस टैक्स डालकर रुपया इकट्ठा कराया। यह फंड लार्ड लिटन के समयमें नियत हुआ था । लार्ड रिपन और लार्ड डफरिनने इसमें कुछ हाथ न डाला किन्तु रुपये की भीड़ आ पड़ने पर लार्ड लेंसडौन ने प्रजापर अकाल के लिये कर डालकर इकट्ठा किये हुए द्रव्यसे काबुल और पश्चिमोत्तर सीमाकी लड़ाई में जो गवर्नमेंटका व्यय हुआ था उसकी क्षतिकी पूर्ति करली और अकाल फंड नामको भी न रहा !! अध्याय ४३. रूस और रूमका अंतिम संग्राम | सन् ७७-७८ ई० में रूसका रुमसे अंतिमवार भयंकर युद्ध हुआ । कीमि- याके युद्ध में रूमकी इंग्लैंड और फ्रांसने मिलकर सहायतादी थी इसका रुमपर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। वह इस बातसे बिलकुल निश्चिन्त होगया । उसने राज्यको दृठ करने और प्रजाकी उन्नति करनेका कुछ भी प्रयत्न न किया<noinclude></noinclude> tjne1hdvbwk6mwuisujk3lrpzyegnd1 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६२ 250 194785 665390 2026-07-06T15:27:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665390 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२४५) किन्तु क्रीमियामें हार खानेके दिनसे रुसने धीरे २ अपनी शक्ति बढ़ाना आरंभ किया । और घातकी वातमें उसने इतनी शक्ति उत्पन्न करली कि सन् १८७०- ७१ ई० का संधिपत्र होते समय उसने निर्भय होकर कह दिया कि मैं अनइस बात के लिये धा हुआ नहीं हूं। उसकी शक्ति बढ़ती देखकर कोई भी राज्य उसकी और शिर उठाकर न देखसकी। इसके साथी रूम राज्यमें अनेक घटनायें ऐसी हुई जिनसे दिन २ यह निर्बल पड़ता गया और उसके सहायक राज्योंने भी रुमके लिये उदासीनता ग्रहणकी । सन् १८७५ ई० के जुलाई मासमें घोस. निया और हर्जेगोविना नामक दो रूमी प्रदेशोंमे वलवा होगया । सर्वियाने रुमकी अधीनता छोड़कर स्वतंत्र मार्ग लिया। डेन्यूब नदीकै निकटवर्ती बालेकिया और मोलडेविया मान्त मिलकर रोमेनियाके नामसे अलग राज्य बन बैठा। इस तरह क्रीमिया के युद्धके पश्चात् पैरिसमें जो संधिपत्र परस्परकी सहायताके लिये तैयार हुआ था वह धूलमें मिलगया। बोसनिया और हरज़ेगोविनाके उपद्रवको शांत करनेका प्रयत्न निष्फल गया। रूमके राजनीतिज्ञ कहने लगे कि उपद्र- वियोंको केवल रूसही क्यों परन आस्ट्रिया, सर्विया और मॉटनियोकी प्रजा सहायता दे रही है। उन्होंने इंग्लैंडसे प्रार्थना की कि आस्ट्रियाको दवाकर उप द्रवियोंकी सहायता बंद कराओ। यही बात सर्विया और मोटनिप्रोकी गवर्नमें- टाँसे कही गई। परंतु उपद्रवका वल किसी तरह घटा नहीं। अंतमें यूरोपके पश्चिमी राज्योंने इस बखेड़े में पड़कर निपटारा करानेका निश्चय किया। आस्ट्रियाने एक पत्र रूमके नाम लिखनेकी सम्मतिदी जिसमें उससे कहानांचे कि आपने अपने राज्यको प्रबंध सुधारनेका जो वचन दिया था उसका अभीतक पालन होना तो एक ओर रहा किन्तु दिन २ मबंध बिगड़ता जाता है इस लिये हम रूम मध हस्ताक्षेप करते हैं । ३० दिसंबर सन् १८७५ ई० को इसके अनुसार पत्र तैयार हुआ। इसमें आस्ट्रिया के साथ रूस, और जर्मनीने हस्ताक्षर किये, फ्रांस और इटाली भी इस बातसे प्रसन्न हुए किन्तु इंग्लेंडके मनमें न आई। इंग्लैंडने इसकार्य में इतनी देरीकी कि अंत में इस पत्रपर हस्ताक्षर करनेका स्वयं रुमराज्यने अनुरोध किया। इंग्लैंडके संयुक्त होनेबाद यह पत्र रुमको भेजा गया। रूमने उसके अनुसार नेका प्रण किया परंतु सप्ताहपर सप्ताह बीतने परभी इसकी कुछ कार्यवाही न हुई। अवसर साधकर रूसने, आस्ट्रिया और अर्मनीको मेरणाकी । उसकी सम्मतिसे तीनों राज्योंके प्रतिनिधियोंने पर्लिनमें इकट्ठे होकर उस सूचनाके अनुसार रूमको दबाकर काम कराना निश्चय किया । इस सम्मातिमें इंग्लैंड साथ न दिया। इससे इस पत्रका रुमपर पूरा प्रभावन पड़ा और परिणाम यह हुआ<noinclude></noinclude> dm6pquojebyykxovfxqnsomnj4ia9xb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६३ 250 194786 665391 2026-07-06T15:27:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665391 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २४६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । कि सेलोनिकामें उपद्रव खड़ा होगया। यहांके फरांसीसी और जर्मन राजदूत- मारे गये । इसी तरहका उपद्रव कुस्तुनतुनियामें भी हुआ और उपद्रवियों ने रूमके सुलतान अबदुल अज़ीज़को पदच्युत कर दिया। सुलतान पदच्युत होनेके वाद दो एक दिनमें आत्मघात करके मर गये उनके भतीजे मुरादने केवल तीनही मासराज्य किया। लोगोंने उनको उतारकर हमीदको गादी दी। इसके बाद भी उपद्रव बढ़ता ही गया । वलगेरियाके उपद्रवियोंने स्त्री बालकोंको काटडाला अंगरेजी दूतमिस्टर बेरिंग की रिपोर्टसे जानागया कि १२ हज़ार मनुष्य फिलिपो पुलिस के हाथसे मारे गये हैं। रूम गवर्नमेंटने उपद्रव करनेवाली सेनाको दंड देनेके बदले पदनियां दी । सन् ७६ मे मोंटनियो और सर्वियाने रूमसे खूब युद्ध किया । लड़ाई में दोनोंकी हार देखकर रूसने बीच में पढ़कर युद्ध बंद कराया । इससमय इंग्लैंडने सम्मति दी कि सबराज्योंके रूमस्थित दूतोंको रुमराज्यकी रक्षा और वहांके प्रबंधको सुधारने की योजना करना चाहिये । इसबातको सबने स्वी- कार कर रूमको पत्र लिखा किन्तु वह जानते थे कि कैसाभी दबाव हमारे ऊपर पड़े समयपर हमारी सहायता किये बिना इंग्लैंडकी हानि है इस लिये उसने इस पत्रको सुना अनसुना कर दिया। अंत में रूसने सन् १८७७६० के अपरेलकी २४ तारीखको रुमपर चढ़ाई की, रूसने कुछ सेना रूमको और कुछ रूमके एशिया राज्यको भेजी दोनों राज्यों में भयंकर संग्राम हुआ। रूस समझता था कि रूम आजकल शिथिल पड़गया है परंतु शिथिल रुमने मरते २ भी पराक्रम दिखाकर रूसके दांत खट्टे कर दिये। यह बात यहां तक पहुंची कि एकवार रूसको हारखाकर लौटनेका भयहुआ । परंतु अंतमें कार्स और प्लेबनाके किलोंको रूसने ले लिया । और सन् १८७८ ई० के आरंभ में रूसी सेना इस्तं - बोलके निकट नापहुंची। अंतमें सैनस्टिकानो स्थानमें रूमको लाचार होकर एक प्रतिज्ञा पत्रपर हस्ताक्षर करने पड़े। उसका आशय यह था कि रूम राज्यकी ईसाई प्रजा जिन प्रांतों में निवास करती है वे स्वतंत्र किये जावे, बल गेरियाके नामसे राज्य अलग स्थापित हो और ईजियन समुद्रका एक मंदर उसे दिया जावे। इन शर्तोंको इंग्लैंडने स्वीकार न किया और रूससे रूमकी सहाय- तामें लड़नेके लिये कुस्तुंतुनियाकी ओर सेना भेज दी। इसके सिवाय भार- त वर्षकी कितनी ही सेना मंगवाकर मालटामें तैयार रक्खी। रूस और इंग्लैंड- की मुठभेड़ होने पूर्व जर्मनीके प्रधान अमात्यने बीच बिचाव किया । उन्होंने . कहा कि सैनस्टिकानोके प्रतिज्ञा पत्र पर विचार करनेके लिये बड़े २ राज्योंके<noinclude></noinclude> njai42zura5wd19uamhwlc76aja7i9x पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६४ 250 194787 665392 2026-07-06T15:27:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665392 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२४७ ) प्रतिनिधियोंकी वरलिनमें एक सभा होनी चाहिये। थोड़ी आनाकानीके पश्चात् रूस और इंग्लंडने इस बातको स्वीकार किया। मर्लिनके कान्फरेंसमें लार्ड सालिस्बरीको लेकर मिस्टर डिसरायली इंग्लैंड की ओरसे गये । शर्त ये हुई:- " ( १ ) रोमेनिया, सर्विया और मोंटनियो स्वतंत्र राज्य गिने जायँ (२) बाल कन्सके उत्तर बल्गेरिया अधीन राज्य स्थापित हो ( ३ ) वालकन्सके दक्षिण में पूर्व रुमीलिया नामक नया राज्य नियत किया जाय ( ४ ) यूनान की सीमाके संशोधन किया जाय और रूम तथा यूनानका इस विषय में परस्पर निपटारा न हो सके तो सब राज्य मिलकर फैसलाकरें (५) वास्तीया का शासन आस्ट्रि याको मिले और वही यहांका प्रबंध करे (६) क्रीमिया युद्धके बाद पैरिसमें जो संधि हुई उसके अनुसार रुससे बिसाटेविया लेकर रोमेनियाको देदिया गया था वह अब रुसको मिले और इसके बदले में रूस उसे डैन्यून नदीके टापू और डोवल्ड्सका कुछ भाग देदै ( ७ ) रूम राज्यके अंतर्गत एशिया देशमेंसे आडहान, कारस और वाटूय रूसको मिले और काले समुद्रका एक बंदर भी ? उसे दिया जाय और (८) रूम राज्यकी रक्षाके लिये इंग्लैंड और रुमकी नो गुप्त संधि हुई है उसके अनुसार साइप्रसका टापू इंग्लैंडके पास रहे। इस संधिपत्रके विषयमें पीछेसे एक आश्रर्यजनक रहस्य खुला । इस मातसे इंग्लें- डकी निन्दा हुई । रूमकी और सेना भेजने और भारतसे सेमा मंगानेका कार्य मिस्टर डिसरायलीने केवल दिखावटके लिये किया था किन्तु उन्होंने रूम और रूससे पहले ही गुप्त संधिकर साइमसका टापू के लिया था और बर्लिनकी कान्फरेंस में रूसने जो कुछ पाया उसके विषयमें पहलेहीसे इंग्लैंडका रुससे ठहराव होगया था। इसी कारण रूसने मर्लिनके कान्फरेंसमें संयुक्त होना स्वीकार किया था | अध्याय ४४. भारत के समाचारपत्रोंकी स्वतंत्रता । सन् १८३५ ई० में भारतवर्षक गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेनटिकने भारतवर्ष के समाचारपत्रोंको स्वतंत्रता प्रदानकी थी । सन् १८५८ ई० में लार्ड केनिगने एक वर्षके लिये यह स्वत्वछीन लिया था । सन् ५७ ई० के मलवेके समय भारत वर्ष के देशी अंगरेजोंने बहुतही स्वतंत्र और उत्तेजक लेखलिखे थे ।<noinclude></noinclude> 0tb543as4d3fud9t1kbidpmctk9jhwi पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६५ 250 194788 665393 2026-07-06T15:28:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665393 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २४८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । लार्ड कैनिंगको भय था कि ऐसे उत्तेजक लेखोंके होते हुए भारतवर्षमें शांतिस्था- पन नहो सकेगी इसलिये उन्होंने एक वर्षतक समाचारपत्रोंका मुख बंदरखकर अवधि समाप्त होनेपर फिर उन्हें स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी । सन् १८७८ ई० में लार्ड लिटनने फिर इस आईनको प्रचलित करदिया। इसमें दोबुराइयां थीं। एक जिससमय देशीपत्रोंकी स्वतंत्रता छीनी गई देशमें किसीमकार का उपद्रव न था और दूसरे इस नवीन आईनके अनुसार अंगरेजी पत्रोंकी स्वतंत्रता ज्योंकी त्यों स्थिर रखकर देशीपत्रोंका मुख वन्दकिया गयाथा। इसके विषय में कार्यवाही भी प्रायः अनुचित हुई थी। आईन बनानेसे पूर्व लोगोंको अपने २ मत प्रकाश करनेका समय देनेके बदले १४ मार्च सन् १८७८६० को व्यवस्थापक सभामें इसका चिट्ठा उपस्थित कर गवर्नमेंटने थोड़े ही घंटोमें इसे पास कर दिया । इंग्लैंडके लिबरल दल ने इस आईन की बहुत निन्दाकी और जब मिस्टर ग्लैडस्टन इंग्लैंडके प्रधान अमात्य हुए लार्ड रिपनके शासन में सन् १८८० ई० में यह आईन फिर उठा दिया गया || सन १८९७ ई० में बंबई गवर्नमेंटको देशीसमाचार पत्रोंपरसंदेह हुआ। कई एक पत्र संपादकों को मजाको उत्तेजना देने और असंतोष फैलानेके अपराधमें दंड हुआ और सन् १८९८ ई० में लार्ड एलगिनने भारतीय दंड संग्रह में १२४ अ' कीधारा बढ़ाकर समाचार पत्रोंका मुख आधा बन्दकर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि कईएक पत्रोंने राजनैतिक विषयोंमें लिखना कमकर दिया और कितनेही नरमपड़गये किन्तु ऐंग्लोइंडियन पत्रोंका जैसा ढंग पहले था वैसाही चना रहा। कुछभीहो परंतु इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है कि ब्रिटिशगवर्न- मेंटने भारतवासियों को बोलने लिखने में जो स्वतंत्रता दी है वह उसकी उत्तमताका एक चिह्न है और वर्तमान स्वतंत्रतासे भी यदि कोई इसका दुरुपयोग नकरे तो सरकार और प्रजाका बहुत कुछ कल्याण होसकता है || - अध्याय ४५. काबुलका अंतिम युद्ध और रूसीचाल । अंबालेमें अमीरशेरअलीकी लार्ड सर जान लॉरेंससे भेंटहोने बाद काबुल के साथ कुछ कालतक कोई विशेष मात नहीं हुई थी । सन् १८७८ ई० में कार्ड लिटनको संदेह हुआ कि काबुलके दर में गुप्त प्रपंच प्रवेश होगया है ।<noinclude></noinclude> 1jqh48469hkh491c5sf06besxnw13y4 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६६ 250 194789 665394 2026-07-06T15:28:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665394 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २४९ ) हमारा रोज़डेंट किया तब लार्ड इस लिये उन्होंने अमीर शेरअलीको लिखा कि आपके यहां सदा रखनेकी आज्ञादीजिये। इस पातको अमीरने स्वीकार न लिटनने बहुतसी सेना साथ देकर एकदूतको काबुलमेजा। इसके साथ इतनी सेना भेजी गई जिससे अमीरको निश्चय होगया कि यह दूत नहीं किन्तु चढ़ाई की गई है। २१ सितंबर को पेशावरसे विदा होकर सेनाके काबुलकी सीमापर पहुंचतेही काबुलके एक कर्मचारीने उसे रोक दिया और कहा कि अमीरकी आज्ञा विना मैं न बढ़ने दूंगा। लार्ड लिटनने इस बातसे गनर्नमेंटका अपमान समझकर युद्ध ठान दिया। लड़ाई में अफगानी सेना ब्रिटिश सेनाके सामने न ठहरसकी और थोड़े ही समय में अंगरेजीसेना काबुल पहुंचगई। शेरअली भागगया। उसका पुत्र याकून अली अमीर हुआ । काबुलमें ब्रिटिश गवर्नमेंटका अधिकार होगया । ५ मई सन् १८७९ ई० को कामुलके साथ भारत गवर्नमेंट की नवीन संधि हुई। इसमें यह निश्चय हुआ कि सरकार छः लाख रुपया प्रतिवर्ष काबुलको दे और इसके बदले अमीर अपने राज्यका कुछ भाग सरकारको देदें। ब्रिटिशदूत सदा काबुलमें रहे । अंगरेज लोग अमीरको समय २ पर रुपया शस्त्र और सेना देकर शत्रुसे उसकी रक्षाकरें। इससंधिसे अंगरेज मजाको बहुत हर्ष हुआ। परंतु यह हर्ष अधिक काल तक नठहरसका । अफगानलोगोंने सन् १८४१ ई० की तरह इस समय भी अंगरेजों के साथ कपट किया। ब्रिटिश दूत सर लुईकेनेनही और उनके सायके सब मनुष्य काबुलमें मारेगये। समाचार पातेही ब्रिटिश सेना दौड़ा दौड़से काबुल भेजी गई और २५ दिसंबरको यह वे रॉकटोक काबुळनगरमें था घुसी । इसनमें संयुक्त होने का संदेह में अमीर याकूषखां पकड़कर भारत वर्षमें रक्खे गये । वर्तमान अमीर अबदुल रहमान खां इस अवसर में रूसका आश्रय छोड़कर अफगान तुर्किस्तानमें आगये थे। उनको वहांसे बुलवाकर कहागया कि ब्रिटिश गवर्नमेंट आपको काबुल देकर भारतको लौट जाना चाहती है । यह बात अमीरको स्वीकार हुई और अंतमें सर लिपिल ग्रिफिनने काबुलमें एक दर इकट्ठा कर अबदुल रहमानखांको काबुलका अमीर बनाया। उनसे सर लिपिल ग्रिफिनने स्वीकार कियाकि गवर्नमेंट कामुलमें रेजिडेंट रखनेका आपपर दुबाब न डालेगी और न वह भीतरी प्रबंधों में हाथ डालेगी। केवल केटा तकके भूभागको अपने अधीन रखकर शेष भाग काबुलको दे दिया गया । इस युद्धमें रुपयेका १ शिलिंग आठ पेन्सके हिसाबसे १ करोड ७४ लाख ९८ हजार पोंड व्यय हुआ जिससे ५ लाख पौंड इंग्लैंडने दिया ॥<noinclude></noinclude> gquzy6hq4qqcavol2c1nhkd3h6zdobx पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६७ 250 194790 665395 2026-07-06T15:28:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665395 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२५०) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । रूम और रूसके संग्रामके समय इंग्लैंडने रूमकी सहायताकी थी इस लिये इंग्लैंडपर रूसका अधिक कोप था । काबुलके अमीरके दर्वारमें अंगरेनोंका प्रभाव घटाने की इच्छासे रूसने प्रपंच करना आरम्भ किया। इस प्रपंचका भेद प्रकाश करदेने के लिये अमीर शेरअलीका रूससे जो पत्रव्यवहार रोरहा था उसे छपवादेनेका प्रस्ताव लार्ड लिटनने किया । गवर्नमेंट इस भेदको खोलनेमें रूससे अधिक शत्रुता होनेका भयकर इस बात में आनाकानी करती थी इसलिये इस रहस्यकी केवल तेरह मतियांही छपवाई गई। इनमेंसे छः भारतवर्ष आई और शेष मंत्रिमण्डलमें रक्खी गई। परंतु न मालूम किस तरह विलायतके “ स्टैं- डर्ड " पत्रने इस रहस्यको खोल दिया । इस कार्यसे एक कठिनता उपस्थित हुई । वह यह कि रूसी कर्मचारियोंने अपने ऊपर नोखिम उठाकर ऐसी लिखा- पढ़ीकी थी कि "यूरोपमें बखेड़ा मन जानेका भय है इस लिये रूमकी सहायता के लिये भारतसे गई हुई सेना मालटामें रोकदीनावे। इस वातका रुसवालोंको अधिकार मिलै" इसके साथही काबुल और इंग्लैंडके वीचमें विग्रह करादेनाभी इसमें लिखा हुआ था | इस संधिपत्र में १० शर्त थीं ( १ ) रूस और काबुलकी सदा मित्रता रहै (२) शेरअलीका उत्तराधिकारी अबदुल्लाजान मरगया इस लिये वह जिसे गोदले उसे रूस स्वीकार करे (३) परदेशी शत्रुओंसें काबुलको बचा कर उन्हें निकाल देनेमें रूस काबुलका सहायकहो ( ४ ) इन शर्तोंके बदले में अ मीर रुसकी सम्मति विना किसीसे युद्ध न करे (५) काबुलमें जो घटनाही उसकी दम २ पर रूसको सूचना देती रहे (६) रूसी जनरल काफमैन काबुल में रहे और उनकी इच्छा के अनुसार अमीरको वर्त्तना पड़े ( ७ ) रूस में जो काबुलका व्यापार होता है उसकी रूस रक्षा करे और (८) अफ़ग़ानिस्तानके जिन लोगोंको विद्योपार्जनके लिये अमीर रूसको भेजे उन्हें शिक्षादीजाय- इनके सिवाय दो शर्तोंका विषय विदित नहीं हुआ परंतु इतना निश्चय हुआ कि उनमें काबुल में शांति रखने और पंजाब काबुल को दिलादेनेका रूसने प्रण किया था। भेद खुल जानेसे रूसकी चाल न चली और लार्ड लिटनके इसी प्रकारके संदेहों में काबुलका युद्धकरनेसे जैसी वहां की स्थिति और भारतको क्षतिहुई वह ऊपर प्रकाशित हुई है । इसके बाद काबुलसे कोई युद्ध न हुआ। अमीर अब्दुल रहमानने शनैः ६ कालु- लियोंपर अपना आतंक जमाकर रूस और इंग्लैंडसे मेल कर लिया ||<noinclude></noinclude> itb1zigelin5q5q11gdv6r5eslhmo4v पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६८ 250 194791 665396 2026-07-06T15:28:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665396 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२५१) अध्याय ४६. अनेक नवीन आविष्कार । सन् १८७८ ई० में संसारको चकित करने और मजाका उपकार करनेवाले अनेक नवीन आविष्कार हुए। प्रथम आविष्कार इस वर्ष में टेलीफोन का था । प्रोफेसरबेलेने इस कार्य में सफलता पाकर श्रीमतीको आस्वर्नके राजमहल में इसका तमाशा दिखला दिया। श्रीमतीने प्रथमही बार सर टाम्स और लेडी नाडेल्फ से इसमकारके तारद्वारा बातचीतकी और अपने महलमें बैठकर आपने दूरसे मिसटफील्डका पायनो वाजेपर गानासुना। इस कार्य में सफलता देखकर श्रीमतीने मोफेसरको धन्यवाद दिया और उसी समयसे शनैः २ टेलीफोन दुनियामें फैलगया || दूसरा आविष्कार एमेरिकाके प्रसिद्ध विद्वान मिस्टर एडीसनने किया । यह शोध बिजली प्रकाशकी थी। इससे लोगोंका बढ़ालाभ हुआ। गैस और तेल ● के बिना औषधियोंके योगसे ही बिजली उत्पन्नकर उससे प्रकाश करना इसशोध का उद्देश्य है। इसकार्य में उनको सफलता हुई और अब धीरे २ यूरोप और एमेरिका में मिस्टर एडीसनकी योजनाके अनुसार प्रकाश करनेका काम प्रायः बिजली से लिया जाता है। इन्ही महाशयने तीसरी युक्ति ऐसी निकाली जिसके अनुसार सूर्यका प्रकाश रात्रिके समयभी देख पढ़े। इस युक्ति में एक कागजका टुकड़ा कितनीही औषधियोंकि योगमें डुबोकर उसे सूर्यके प्रकाशमें रक्खा जाता है धूपमें रखनेसे वह टुकड़ा सूर्य की किरणों को चुरालेता है और नम उसे रात्रिके समय अधकारमें रक्खानायै तब उसमेंसे थोड़े समयतक स्वतः प्रकाश होता है। चौथा आविष्कार मिस्टर छूने किया । इन्होंने माइको फोन नामक यंत्र तैयार किया । इसमें यह गुण है कि चाहे जैसा मंद स्वर क्यों न हो इसके द्वारा वह चिल्लाकर बोलनेके समान सुना जाता है। जैसे सूक्ष्मदर्शक यंत्रसे परमाणु भी बड़े दिखाई देते हैं वैसे ही इसमें परम मंदस्वर भारी सुन पड़ता है । उदाहरण के लिये मेज़पर एक आलपीन रखनेमें जो शब्द होता है वह ऐसा मंद है कि उसे कोई भी सुन नहीं सकता है परंतु इस यंत्र के मलसे यही शब्द भारी खटकेके समान सुना जा सकता है । पंचम आविष्कार फोनोग्राफ का हुआ। इसे निकालने वाले भी वहीं प्रोफे- सर एडीसन थे। इस यंत्रके निकट जो कुछ बात श्रीतकी जाती है वा राग<noinclude></noinclude> ql2mlzko1fqmr4n7jtgpih5yxmlwaiu पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२६९ 250 194792 665397 2026-07-06T15:28:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665397 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२५२ ) गाया जाता है वह सुनना चाहें सुन जा सकता है । महारानी विक्टोरियाका चरित्र । यंत्र में भरा रहता है और उसे जब और नहां ले जाकर सकते हैं। मनुष्यक्का स्वर भी इसमें अच्छी तरह पहचाना अध्याय ४७. पंजाब के गोवध पर बखेड़ा । पंजाबके हिन्दू मुसलमानोंमें कुछ कालसे वैमनस्यथा। सन् १८७८ ई० में इ- सने विशेष गंभीर रूप पकड़ा। हिन्दुओंके वित्तको दुःखित नकर गोवध करनेकी सरकारने मुसलमानों को स्वतंत्रता दी। इस बातसे दश वर्ष पूर्वसेही महावल पुरके मुसलमानी राज्यमे हिन्दू मुसलमानोंका इस विषय में बखेड़ा चल रहा था उसीने इस वर्ष उत्तेजना पाई । राज्यके कर्मचारियोंका कथन था कि इस कार्य में हिन्दू अग्रणी थे परंतु इस बातकी सत्यताका कोई प्रमाण नहीं है इतना अवश्य हुआ कि नव्यान साहबको राजधानीमें न पाकर मुसलमानोंने हिन्दुओं पर आक्र- मण किया किन्तु नव्वावने आकर उनको शांत करनेके साथही हिन्दुओंकी रक्षा की। उसी वर्ष मुलतानमें भी हिन्दू मुसलमानोंके गोमांतके विषय में लड़ाई होठठी | वहांके हिन्दू मंदिरोंके मीनारके विषयमें दोनों जातोंकी बहुत कालसे खटपटथी। दोनोंही उसपर अपना २ दावा बतलाते थे। इस अवसर में एक कसाईने सरकारी नियमोंका भंगकर हिन्दुओंका चित्त दुखाने के लिये सरे बाजार गोमांस बेचना आरंभ किया। इसपर हिन्दुओंने न्यायको भिक्षा मांगकर हड़ताल डाली । और एक सभा इकट्ठी कर इस बात के लिये डिपुटी कमिश्नर से प्रार्थनाकी परंतु उन्होंने उनकी कुछभी न सुनी। फिर उन्होंने बाइसराय की सेवामें निवेदन पत्रभेजा परंतु यहांसे उत्तर आने पूर्वही हुल्लड होगया । हिन्दुओंने मसजिदों पर और मुसलमानोंने बाजार पर आक्रमण किया। नगर में आग लगादीगई और जिस मंदिरके विषयमें झगड़ाथा उसे मुसलमानोनें नष्ट करडाला। दोनों पक्षोंकी खूब लड़ाई हुई। अंतमें सरकारीसेनाने आकर शांतिकी । गवर्नरने मंदिरके अभियोगमें हिन्दुओं को झूठा बतलाकर स्थानीय अफसरोंका फैसला महाले रक्खा और झगड़ेका दोष हिन्दुओंपर डालागया || ब्रिटिशराज्यमें हिन्दू मुसलमानोंका परस्पर विरोध होकर लड़ाई होनेका यह पहलाड़ी अवसर था। इसके बाद गोवध आर्दिके विषयमें अनेक जगह अनेक बार<noinclude></noinclude> gydrkpvbf8f8tpik8g4cgtx3szxnfvx पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७० 250 194793 665398 2026-07-06T15:28:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665398 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २५३ ) लड़ाइयां हुई और उनमें प्रायः मुसलमानोंही का पक्ष कियागया किन्तु ये बातें छोटी मोटी हैं। इसविषय में यहां लिखनेका स्थान नहीं है। हिन्दू लोगभी वास्त में गोरक्षा किस प्रकारसे करनाचाहिये इस वातको नहीं जानते हैं और समयका विचार न कर लड़पडते हैं और मुसलमानभी अपने हिन्दूभाइयोंके दुःखकी क़दर नहीं करते हैं । सदोनों हाथों से ताली यजतींहै किन्तु हहै कि गवर्नमेंट की सुनीति और दोनो जातिके मुखियाओं की बुद्धिमानीसे, अब इसप्रकार के बखेड़े नहीं उठते हैं और दोनोंमें प्रेम बढ़ता जाता है ॥ अध्याय ४८. मिसरम अंगरेजी राज्य | सन् १८८२ ई० में मिसरके साथ इंग्लैंडका दृढ संबंध होगया। अरबी पाशा ना- मक ठमराव मिसरराज्य के युद्धविभागका मंत्री हुआ। उसके नियत होतेही बिला- यतके " टाइम्स " संवाद पत्र में मिसरकी स्थितिके विषयमें अरबी पाशाका एक लेख प्रकाशित हुआ। प्रथम यह पत्र कल्पित समझागया था किन्तु पीछेसे इसकी सत्यता सिद्ध होगई । इसमें लिखाया कि " मैं मिसरका वास्तविक प्रतिनिधिहूं । मेरी सेनापर प्रजाका विश्वास है। बड़े २ वेतन पानेवाले अल्प योग्य- ताके यूरोपियन कर्मचारियोंसे मिसर बहुत पीडित है । धनसंबंधी प्रबंधके विषय में यूरोपियन राजनीति कैसी भी क्यों नहीं किन्तु मिसर राज्यके बड़े २ पद मिसरियोंको देना चाहिये। क्योंकि मिसर मिसर वालोंके लिये, यूरोपियन लोगोंके लिये नहीं है. । " इस बातको उसने खेदीवके प्रतिनिधि बनकर प्रकाशित किया इसलिये यूरोपियन राजनीतिज्ञ लोगों में इसपर बड़ा आन्दोलन हुआ । इस प्रश्नके निराकरणके लिये इंग्लैंड और फ्रांसने मिलकर अन्य बड़े २ राज्योंकी सम्मतिले मिसरके खेदीयके नाम एक पत्र भेजा। इसमें लिखागयाकि "हमारे संयुक्त अधिकार रखनेसे मिसरका लाभ, यूरोपमें शांति और मिसरकी देने वालोंसे रक्षा होगी ।" इस बातको खेदीयने स्वीकार किया और मिसरकी प्रजाकी सम्मति नहोनेपर भी रूमके सुलतानने इसका अनुमोदन किया। सुलता- नने मिसरको अपने राज्यका एक भाग मानकर यूरोपियन राज्योंके उसपर हस्ताक्षेप करनेको नापसंद किया। वहकि प्रधान अमात्य शेरिफ पाशा ने सेना- और उसका वेतन बढ़ाकर शांति करनेका प्रयत्न किया किन्तु राजसभाने स्पष्ट कह दिया कि जबतक फ्रांस और इंग्लैंडका संयुक्त अधिकार रहेगा हमसे काम<noinclude></noinclude> pjq7wjq1rhubaxz1zxr7t4pf5rmjep6 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७१ 250 194794 665399 2026-07-06T15:29:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665399 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२५४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । न चल सकेगा । इतना कहकर मिसरकी मंत्रिसभाने अपना पद त्याग दिया और महमूद पाशा अमात्य हुए । इस अवसरमें फ्रांसका प्रधान मंडल टूटगया और इस कारण संयुक्त राज्योंका वल घटा हुआ देखकर मिसरने बल पकड़ा । अरबीपाशाका सुलतानसे मेल था इसलिये खेदीव उसका कुछ कर नहीं सकते थे। राज्यका बाजट फ्रांस और इंग्लैंडकी सम्मतिसे तैयार किया जाता था । अरबी पाशाकी प्रेरणासे वहांकी राजसभाने इस बार दोनों राज्योंसे इस विषय में कुछ पूंछपांछ नकी। दोनोंने इस बातका खुदीवसे कारण पूंछा परंतु इस बातपर भी कुछ ध्यान न दिया गया। इसी अवसरमें अरबी पाशाके वध करनेके प्रयत्नके विष- य (नमालूम ची वा झूठी ) चर्चा हुई। अपराधियों को दंड देनेके विषय में खेदीव और राजसभा का मत भेद होगया । सर एडवर्ड मेलेटकी सम्पतिसे खेदीवने अपराधियोंको दंड देनेका निषेध किया। उसी समयसे खेदीवका राज सभासे विरोध होगया । खुदीवके अधिकारकी रक्षाके लिये इंग्लैंड और फ्रांसने सेना भेजी जो एलेक्जेंड्रिया आपहुंची। संयुक्त सेनाके आनेसे मिसरमें और भी हलचल मचगई । यूरोपियन लोगोंको प्राण रक्षाका भय हुआ । अरबीपाशा और सेनाका बल बढ़ गया। उसने एलेक्जेंड्रियाका किला हढ़कर सामुद्रिक किनारेपर सेना रखदी परंतु इस अवसरमें उसके पक्षवालोंमें फूट पड़गई । वे अरबी पाशा के अधिकार से निकलकर यूरोपियन लोगों और ब्रिटिश दूत मि स्टर कुक्शनको गाड़ी में से नीचे डालकर मारने में तत्पर हुए। इसी तरह उन्हों- ने यूनानके दूत और कई एक अंगरेज़ तथा फ़रांसीसियोंको मारडाला । यूरो- पियन लोग अपने २ प्राण लेकर भागे और व्यापार बंद होगया । अंतमें एड- मिरल सीमोरने अरबीको नोटिस दिया कि “थुद्धकी तैयारी बंदकर तीन दिनमें समस्त किले हमें सौंपदो " परंतु इसपर उसने कुछ भी ध्यान न दिया तक सीमोर साहबने किले पर तोपें दागना आरंभ किया । और फ्रांसने ऐन समयमें सेनासे कुछ सहायता न की । इसका परिणाम यह हुआ कि अकेली अंगरेज़ी सेनाको मिसरी अरबी पाशासे लड़ना पड़ा | अरवी पाशा थोड़ी देर लड़नेके अनंतर सेना सहित भागा। इसके बाद इंग्लैंड और भारत वर्षसे बहुतसी सेना भेजी गई। कई एक लड़ाइयोंके बाद अरबी की हार हुई। और खेदीवने उपद्रवियोंको पकड़ २ कर दंडदेनेका प्रयत्न किया । इस पर गवर्नमेंट प्रसन्न होगई। उसने अरबीको पकड़कर आजीवन सीलोन में कैद किया । और मिसरमें अंगरेजीकी रक्षामें खुदीबका राज्य स्था- पित हुआ । इस बातका लार्ड डफरिनने मिसर जाकर निर्णय किया ॥<noinclude></noinclude> inw77f9b29r7btj7dlem1btytmrwiin पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७२ 250 194795 665400 2026-07-06T15:29:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665400 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २५५ ) एडमिरल सीमोरकी सहायताके लिये इंग्लैंडसे जो सेनागई उसके मुख्य अध्यक्ष जनरल टलजली और उनके सहकारी महारानीके पुत्र श्रीमान् डयूक आफ केनाटये । युद्धमैं उघूकने अनेक बार अच्छी वीरता दिखाई और एकबार जिससमय शत्रुकी सेनाने अंगरेज़ों की रेल्वेट्रेन जलाने के लिये आग लगादी सब आपने सेना और युद्धकी सामग्री बचाने के लिये गाड़ीके अपना कंधालगा- कर उसे नलने से बचाया। इस बात के लिये उनकी बहुत कुछ प्रशंसा हुई और जगतक यह समर भूमिमें रहे श्रीमती उनकी मसन्नताके नित्य तार मंगवाकर बड़े उत्साह के साथ सुनती रहीं और अब २ उनको अपने पुत्रकी वीरताके समा- चार सुनपड़े तबही तब आपने विशेष प्रकारका हर्ष किया। और जिस समय मिसरका विजयकर सेना इंग्लैंडको गई महारानीने उसके अफसरोंको अपने हाथसे तमगे पहनाने । तमगे पहनाते समय जब हयूक आफ केनाटकी पारी आई तब आपने पुत्रस्नेहमें विहलहोकर डयूकका कुंचन करलिया । इधर मिसर विजय होने से वहां के निवासियोंको बहुत हर्षहुआ और उन्होंने मसजिदोंगें नमाज पढ़ते समय कहा कि इंग्लैंडकी रानी न्यायका आदर्श है ॥ अध्याय ४९. भारतवासियोंको स्थानीयप्रबंध में अधिकार । शिक्षा कमीशन | सन् १८८२ ई० में लार्ड रिपनने भारतवासियोंको स्थानीय प्रबंध स्वयं करने का स्वत्व प्रदान किया। भारत गवर्नमेंट के ऊपरसे करनेके लिये प्रान्तीय गवर्नमेंटोंको अपना प्रबंध स्वयं द्रव्य का बोझा कम करनेका जो अधिकार पहले मिल चुका था उसीका यह परिणाम है । इसभीतिका प्रयोजन केवल वही न था कि प्रबंधक सुधार होनाय किन्तु गवर्नमेंटकी इच्छाथी कि भारतवासी अपना प्रबंध आप (Local Self Govrninent) करना सीखें । इस कार्य में सफलता प्राप्त करनेके लिये सरकारने प्रत्येक स्थानकी म्यूनिसिपलिटियोंको नियत कर प्रान्तीय गवर्नमेंट के नियत किये फंडोंका प्रबंध उसको सौंपागया । इसके साथही बढ़ी २ कार्पोरेशनोंको शिक्षा, स्थानादिका निर्माण और इसी प्रकारके अन्य छोटे मोटे कामकी जांच और प्रबंध भी दिया गया । इन सभाओं में मैबरोके वर करनेकी प्रणाली स्थापित हुई । किन्तु मैंवर चुननेका अधिकार सर्वत्रकी म्यूनिसिपलिटियों में<noinclude></noinclude> opwlxny7qozr4j6abpk2ql1acb0r3kz पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७३ 250 194796 665401 2026-07-06T15:29:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665401 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( २५६ ) प्रचलित न कियागया वरन जो इस कार्यके अयोग्य मिले थे उन्हें इस तरहका स्वत्व प्रदान करनेका स्थानीय गवर्नमेंटों को अधिकार मिला । वैवईके गवर्नर सर जेम्स फर्ग्यूसन ने भारत गवर्नमेंटकी इस योजनाका विरोध किया । और कहाकि प्रजा धर्गमेंसे सरकारके, बिना नौकरोंको चुननेका अधिकार देना अनुश्चित है परंतु पीछेसे उन्होंने अपना विरोध बंदकर भारत गवर्नमेंट की योजनाको स्वीकार करलिया || इसी आईनके अनुसार लोकल बोर्डों और म्यूनिसिपलिटियों में प्रजाको प्रति- निधि चुनने का अधिकार मिला है किन्तु इनका सभापति सरकारी हाकिम होता है इस लिये उसकी सम्मति और दबावमें पड़कर देशी मेंबर मजाका वास्तविक लाभ नहीं कर सकते और उपकारके बदले प्रायः इन सभाओंसे अपकार होता है। इसी वर्ष में भारत गवर्नमेंटकी शिक्षा संबंधी नीतिकी जांच करनेके लिये कमीशन नियत हुआ । सन् १८५४ ई० में ईस्ट इंडिया कंपनीने भारतकी प्रजा के लिये जिस प्रकारकी शिक्षा प्रणाली स्थापित की थी उसका वर्ताव कहां- तक होता है इसी बात की जाँच की गई। कमीशनने भिन्न २ प्रान्तोंके देशी और यूरोपियन मिलाकर २० सभासद और सर डबल्यू डबल्यू इंटर सभापति नियत हुए। इस कमीशनने देशका दौराकर रिपोर्टकी किन्तु इससे प्रजाको कुछ भी लाभ न हुआ । इसी वर्ष में पंजाबका विश्वविद्यालय स्थापित हुआ | अध्याय ५०. इलवर्ट बिलपर आन्दोलन । लार्ड रिपनका सत्कार सन् १८८३ ई० में “ दलबर्ट मिल " के विषय में बहुत बड़ा आन्दोलन हुआ इससे केवल भारतवर्ष में ही क्यों बरन यूरोपमें भी बहुत वादानुवाद हुआ। इस मिलका मुख्य उद्देश्य उन फौजदारी अभियोगोंके नियम परिवर्तन करनेका था जिनमें वादी और प्रतिवादी अथवा दोनोंमे से एक यूरोपियन हो। इस पांडुलिपिको बाइसराय लार्ड रिपनकी व्यवस्थापक सभामें उपस्थित करनेवाले मिसर इलबर्टथे इसलिये उन्हीं के नामसे यह प्रसिद्ध है। उन्होंने ३० जनवरीको इस आईनका चिट्ठा व्यवस्थापक सभामें उपस्थित किया । जिसका आशय यह कि प्रान्तीय गवर्नमेंट के साथ परामर्शकर भारत गवर्नमेंटने निश्चय किया है कि यूरोपियन<noinclude></noinclude> r0p093snybrxihga1hhasi2qt3ruvp2 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७४ 250 194797 665402 2026-07-06T15:29:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665402 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २५७ ) • मजाकी जाँच का देशी मैजिस्ट्रेटों को अधिकार न होनेकी जो कलम है उसे निकाल देनेका अब समय आपहुंचा है इस लिये जाति भेद के कारण देशियोंको न्यायसे अलग रखनेका कार्य उठा दिया जावे और केवल यूरोपियन लोगोंको इसकार्यका चार्ज देनेके बदले भिन्न २ आति के लोगोंको अधिकार दिया जावे और देशी वा यूरोपियन जन और मैजिस्ट्रेट जाति भेद बिना अभियोग सुनसकें तथा किसी जिलेका सेशन जज देशी दो और यहां यूरोपियन अपराधी का अभियोग उप- स्थित होनेका अवसर आये तो वह अभियोग दूसरे जिलेको न बदला जावै किन्तु देशी जनही उसकी जांचकरे। सन् १८६०६० तक बेरोकटोक जिले के न्यायाल- योंमें यूरोपियन अपराधियों के अभियोग सुनेजाते थे और नियमानुसार उनपर दंड भी होताथा किन्तु दंड उनके साथ कुछ रियाअत अवश्यथी। सन् १८७२ ई० में जब फौजदारी न्यायालयोंके नियमोंका संशोधन कियागया तो प्रत्येक निल में यूरोपियन लोगों की संख्या बढ़गई थी। इस कारण यूरोपियन जजों और मैजि स्ट्रेटों के समक्ष उपस्थित होनेवाले घटिया अभियोगोंमें ज्यूरकी प्रणाली उठादी गई थी। सन् १८८२ ई० में जातिभेद निकाल देनेका नियम ठठा देने की सूच नाहुई। यह प्रस्ताव एक देशी सभासदकी ओरसे हुआ था किन्तु यात बहुत आ- वश्यक थी इसलिये गवर्नमेंट ने इसपर ध्यान दिया । इसी वर्ष में विलायत की सिविल सर्विस परीक्षा में उत्तीर्ण होनेवाले बाबू पी. एल गुप्त ने बंगालके लेफ्टिनेंट गवर्नरको पत्र लिखा कि जब मैं कलकत्ते की पुलिसकोर्ट का चीफ प्रेसीडेंसी मैजि- स्ट्रेट था तब यूरोपियन अपराधियों के अभियोग सुनसकता था किन्तु मेरी बाहर बदली होतेही मेरा यह अधिकार क्यों जातारहा। इस अर्जीको उचित समझ कर लेफ्टिनेंट गवर्नर सर ऐशली ईडनने मारतगवर्नमेंटसे जातिभेद उठा देनेका अनुरोध किया । और लार्ड रिपनने प्रान्तीय गवर्नमेंटोंकी सम्मति से इसमकारका आईन बनाना चाहा किन्तु यावत् यूरोपियन कर्मचारी इसके विरोधी होगये । इधर देशी इसनियमका संशोधन करनेके पक्षमें हुए यूरोपियन लोगोंफी वाइस- रायपर इतनी अमसन्नता हुई कि उन्होंने लार्ड रिपनके साथ सब प्रकार का व्यवहार बंद कर दिया और जब वह नयंवरमें शिमलेसे कलकत्ते गये तो उन्हों ने प्रकटमें लाटसाहनका अपमान किया। अंगरेज़ वालंटियरेनि उनके महलपर आक्रमण करनेकी धमकी दी किन्तु उन्होंने किसीमकार के विरोधकी परवाह न कर उस विलको आईन बनादिया । परन्तु उनको इसमें थोड़ा संशोधन अवश्य करना पड़ा ||<noinclude></noinclude> bo8wczabem3i5mfl3jh0rqvyp8ddfkf पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७५ 250 194798 665403 2026-07-06T15:29:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665403 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २५८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । म्यूनिसिपलिटियों और लोकल बोर्डेमेिं देशियोंको मेम्बर चुननेका अधिकार देने और इलवर्ट विलमें प्रजाका पक्ष करने आदि अनेक सुकार्योंसे भारतकी देशी प्रजाकी लार्ड रिपनपर भक्ति बढ़ गई और उसने श्रीमान्‌के भारतसे विदाहोते समय आपका असाधारण सम्मान किया। यह सम्मान किसीके दबाव वा अफसरोंकी प्रेरणासे नथा। क्योंकि सरकारी यूरोपियन कर्मचारी “इलबर्ट बिल" के कारण श्रीमान् से अप्रसन्न होगये थे । इस सम्मान से यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि, भारतवर्षकी प्रजा अपने उपकारका सच्चासत्कार करना जानती है। लार्ड रिपनने प्रजाका जैसा उपकार कियाथा उसे देखते हुए देशकीप्रजाने कुछभी अधिक नहीं किया । भारतकी शिल्पोन्नति के लिये उन्होंने देशमें एक प्रदर्शिनी खोलीथी । इनके शासनमें इलवर्ट मिल और म्यूनिसिपलिटियों तथा लोकलबोर्डों में प्रजाको मैंबर चुननेका अधिकार मिलनेके सिवाय लवणकर घटायागया था । यह भारतवर्षके वेतनमें से एक पाईभी अपने कामों में खर्च नहीं करतेथे किन्तु जो कुछ इन्हें मिलता वह धर्मकार्यों में चलानाता और इनका निजखर्च विलायत की जागीरसे होताथा || अध्याय ५१. रूस का भारतपर दांत और अमीरसे भेट । लेडीडफरिन् फंड | रूस भारतवर्षपर बहुत वर्षोंसे दांत गाड़े हुए है। वह इसीलिये शनैः २ मध्य- एशिया में अपना पैर फैलाता जाता है। सन् १८८४ ई० में उसने मर्य और उस- के आस पासका उपजाऊ प्रदेश लेकर गवर्नमेंट के चित्तमें चिन्ता उत्पन्न की थी। वहां तुर्कीने रूससे यह प्रार्थना की थी कि यह प्रदेश हमें दिलवा दो, परंतु यह प्रकट नहीं हुआ कि, परस्पर की लड़ाईसे तुर्क लोग निर्बल पड़कर अपना मबंध स्वयं करने में अशक्त थे इस लिये उन्होंने इस कार्यमें रूससे सहायता मांगी थी अथवा और कोई कारण था। कुछ भी हो परंतु इतना निश्चय है कि, प्रचलित संधिपर कुछ ध्यान न देकर उसने भारत की ओर पैर बढ़ाया। इस विष- यमें पार्लियामेंट में बहुत बादानुवाद हुआ परंतु रूसकी नीतिके विषयमें कुछ भी निर्णय न हो सका । इसी में काबुलके अमीर अबदुल रहमान खसि भारतके वाइसराय लार्ड डफरिनने रावलपिंडी में बहुत ठाठके साथ भेंट की । इस भेंटके समय जो<noinclude></noinclude> 9l9wc3qaixn1hfqd4v3bszvhbh23y2i पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७६ 250 194799 665404 2026-07-06T15:29:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665404 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२५९) दर्बार हुआ उसमें कवाइदके लिये १० हजार सैनिक इकट्ठे हुए थे। जिस समय अमीर लाट साहमसे मिलने भारतवर्ष में आये रुसने अफगान सीमाके न देहपर आक्रमण किया था । अंगरेज़ लोग पंजदेहको काबुल राज्यका एक भाग गिनतेथे । रुसवालोंका कथन था कि, अमीर शेरअलीके शासन में काबुल की जो सीमाथी वही अब भी मानना चाहिये। अफ़ग़ानिस्तान की इसके साथ सीमा निर्धारित करनेके लिये जो कमीशन नियत हुआ था वह इस बातका कुछ भी निपटारा न करसका । रुसकी चालसे इंग्लैंडकी मजा में बहुत हलचल मचगई । और लोगोंने इसबातके फैसलेके लिये यूरोपके बढ़े २ राज्योंकी पंचायत नियत करनेका प्रस्ताव किया। रूसने इसबातको बहुत कुछ आनाकानीके पश्चात् स्वीकार किया । परंतु इसकार्येके सफल होने में अनेक विन डाले । अंगरेज़ोंने कहा कि, यदि रूस, लुलफिकारको छोड़दे तो काबुल पंजदेह देदेगा । रुसने इसमातको स्वीकार तो किया परंतु गुलाफकारके उत्तर ओरके मार्गको अपने अधिकारमें रक्खा। रुसकी चालसे नोटोंके भाव बहुत उत्तरगये । और अंगरेज़ी व्यापारको बढ़ा धक्का पहुँचा ॥ सन् १८८५ ई० में लार्ड डफरिनकी लेडीसादियाने भारतवर्षकी स्त्रियोंकी चिकित्सा और उन्हें डाक्टरी सिखानेके लिये लेडी डफरिन फण्ड स्थापितकर देशीस्त्रियों का बहुत उपकार किया। इस फण्ड में अर्द्ध सरकारी प्रेरणासे देशके राजा महाराजाओंने बहुत रुपया दिया और फण्ड में रुपया देनेवालोंने सरकारसे उपाधियां भी बहुतही पाई ॥ अध्याय ५२. आयर्लेण्डमें हलचल । जिस समय इंग्लैंड और विशेषकर लण्डनमें महारानीकी दुलारी राजकुमारी मीट्रिस विवाहका उत्सव होरहाथा एकाएक आयर्लेण्डमें राजद्रोहियोंके मंडल ने तेजी पकड़ी। वहां उपद्रवियोंको शान्तकरनेके लिये मिस्टर ग्लैडस्टनन 'नेशनल लीग' नामकी प्रभावशालिनी सभाके कईएक मुखियाओंको कैदकर रक्खा था और इनके छुटकारेके विषयमें मिस्टर पार्नकसे सन्धिकी चर्चा होरही थी। इतने में ६ मई सन् १८८२ ई० को मिस्टर ग्लैडस्टनने आयलॅंण्डके जो नवीन कार्ड लेफ्टिनेंट अर्ल स्पेन्सरको नियत किया था उनके डबलिनमें प्रवेशकरने<noinclude></noinclude> drpfomzvuxowtbgm17mydnkvv53zevo पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७७ 250 194800 665405 2026-07-06T15:30:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665405 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २६० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । का अवसर आया । सरकारको आशा थी कि, पार्नल आदिके छुटकारे के लिये आयर्लेण्डवालोंसे जो ठहराव हुआ है उससे और यहांके भूमि सम्बन्धी आईनसे आयलॅण्ड में शांति होजायगी, परंतु उक्त तिथिको डबलिनमें घुसते समय सरकारी बागमें अर्ल स्पेन्सर और उनके साथही लार्ड फ्रेडरिक पर किसी दुष्टने आक्रमण किया । लार्ड फ्रेडरिकने उस दुष्टपर छाता मारा। इतनेही में भीड़मेंसे दो तीन मनुष्य और आटूटे और इन दोनोंको मारकर उसी समय एक गाड़ीमें जो इनके लिये पहलेसे तैयार खड़ी थी बैठकर भागगये। इस समाचारको पातेही इंग्लैंडमें बड़ी हलचल मची। आयर्लेण्ड वालोंका दमनकरनेके लियें पार्लियामेंट के एकही अधिवेशन में एक कठोर आईन पास हुआ। बहुत दिनोंतक पुलिस खोन करती २ हारगई परन्तु अपराधियों का कुछ पता नचला । अंत में आगामि वर्ष की जनवरी में बीस घातक पकड़े गये। उनमें से अधिकांश मजदूर थे किन्तु उनका मुखि- या जिसका नाम जेम्सकेरीथा ठेकेदारी का काम करता था । यह डबलिन म्यू- निसिपलिटीका मेंवरभी था। यह दुष्ट वहां से भागकर कहीं चला न गया था . किन्तु भला आदमी बनकर वहाँका वहां ही बनारहा और उस सभाकी ओर से इसीने लेडीफ्रेडरिक प्रभृतिके साथ सहानुभूति प्रकाशित करनेका प्रस्ताव किया और जब इसने पुलीसके हाथसे अपना किसी तरहसे बचाव न देखा तब इसीने सरकारको अपराधियोंका पता बतला दिया। अनुसंधानके बाद बीस मेंसे पांचपर अपराध प्रमाणित होगया। इनमेंसे तीनको फाँसीहुई और यह दक्षिण एफ्रिका में आमरण निवास करनेके लिये भेज दिया गया। अपराधकर उसका भंडाफोर करने में यही अग्रणी था इसलिये आयलैंड वाले इससे अप्रसन्न थे । इसीकारण ओडोनल नामक मनुष्य इसके पीछे होलिया और मार्ग में जिससमय उसे अवसर मिला इसे मारकर यमसदनको पहुँचा दिया । इस अपराधमें ओ. डोनलको भी फाँसी हुई। न्यायाधीशने उसे फांसीदेने पूर्व अनेक तरहकी उखाड़ पछाड़ से उससे पूँछना चाहा कि तेरा " नेशललीग' से संबंध है बा नहीं परन्तु उसने मरते दम तक इसबातका रहस्य प्रकट न किया ॥ इसीतरहकी दूसरी घटना सन् १८८३ई० में हुई। एमेरिकाकी राजद्रोही मंडली भैंसे ओडोवन रोसा नामक मनुष्यने आयलंडवालोंको सम्मतिदी कि “ इंग्लैंडसे युद्धकर अपनी स्वतंत्रता ग्रहण करो और इसकार्यके लिये लंडनके बड़े २. मकानों को जढ़से उड़ाडालो और जैसेवने तैसे राजधानी निवासियों को कष्ट पहुँचाकर गवर्नमेंट को आयलैंडबालोंको स्वतंत्रता देनेपर बाधित करो।" इसकी सम्मति<noinclude></noinclude> 2hy0uhn8n4ufn5tvnti0w3c1m9yv79n पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७८ 250 194801 665406 2026-07-06T15:30:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665406 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २६१ ) के अनुसार १५ मार्च सन् ८३ को लंडनके गवर्नमेंट बोर्ड और 'टाइम्स' समाचार पत्र के मकानोंको डायना माइटसे उडादेनेका प्रयत्न हुआ। इसमयनमें गवर्नमेंट बोर्ड के चूरमूर होगये किन्तु संयोगवश टाइम्सका आफिस बचगया । इसीलिये सरकारको १९ अप्रैलको केवल २ घंटेकवादानुवाद के अनंतर एक आईन पास करना पड़ा । परन्तु इस आईनसे उपद्रवियोंपर कुछभी प्रभाव नपड़ा और सन् ८३ के अंतमें उन्होंने लंडनकी रेल्वे उडादी । इसघटनायें बिचारे बहुतसे मजदूर मारेगये । और बहुतसे घायल होगये। इसतरह लंडनके घंटाघर और हाउस आफकामन्सके विशाल भवनका कुछ भागभी नष्ट होगया । उपद्रवियोंको, केवल इतनाही करनेसे संतोष न हुआ चरन उन्होंने लंडनके बडे पुल और दूसरे अनेक मकानोंको तोड़नेका यत्न किया और इस यत्नमें उनको तनिक भी विचार न आया कि गेहूं के साथ विचारे घुन पिसे जाते हैं। इन लोगोंके इस दुष्कर्मसे अनेक निरपराध स्त्रीपुरुष और बालकोंको कष्ट भोगना पड़ा। उस समय लंडन में ऐसा कोई मनुष्य न था जिसे मरनेका भयनहो । इंग्लैंडके प्रधान अमात्य मिस्टर ग्लैडस्टन जैसे मजामिय मनुष्यकी माणरक्षाने लिये भी कईएक कान्स्टेबल साथ रखने पड़ते थे। अंतमें वरमिघाममें डाइना माइट वारूद बननेका एक कारखाना और कितनेही अपराधी पकड़े गये । अनुसंधान के पश्चात् कारखाना बंद किया गया और अपराधियोंको जीवनपर्यंत काले पानीका दंड मिला || इसके अनन्तर सन् १८९९ ६० के ट्रांसवाल युद्धके समय आड पालका फिर कोध भडकाथा । परंतु वहाँकी सेनाने सर्कारकी सेवा करनेमें किसीमकार की न्यूनता न की और अंतमें महारानीके आडकी अंतिम यात्रा करनेसे उनके मुखकमलको देखतेही वहांवाले शांत होगये नहींतो उनमेंसे अनेक मनुष्य ट्रांस- वालको सहायता देनेके लिये तैयार थे और इसबालके लिये डबलिन में महुतसी सभायें भी हुईथीं ॥ अध्याय ५३. सौडानका युद्ध । सौडान मिसरके राज्यका एक प्रदेश है। वहांका शासक मुहम्मदअली पाशा था। बरवर डंगोला, खाम, सिनकट और रोहकटमें मिसरकी सेनाकी छावनीथी । एकाएक मिसरके युद्धके थोडेही दिनके अनंतर अर्थात् सन् ८५ ६० के लगभग महदी नामक मनुष्यने शिर उठाया और मुसलमानोंके पैगंबर होनेका दावा<noinclude></noinclude> 9xeidyci3vobucgvnw5923wef69yzny पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२७९ 250 194802 665407 2026-07-06T15:30:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665407 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र | ( २६२ ) किया । मिसरकी गवर्नमेंटने कर्नलहिक्सके अधिकारमें महदीका दमन करनेके लिये सेना भेजी। यह सेना का गेट के निकट विना खाये पीये लड़ती रही। इस सेनामें जनरल गार्डनभी थे। यह वही गार्डन हैं जो पहले चीन राज्यकी सेवा करचुके थे और अब मिसर गवर्नमेंट के यहां नौकर थे । मिसरी सेनाने महदी का दमन किया और गार्डन् वहांके गवर्नर बनायेगये। इन्होंने इसपदको पाकर यह- दीके हाथपैरठीले करने का बहुत कुछ प्रयत्नकिया परंतु इंग्लैंडने इनकी यथेच्छसहा- तानकी इसलियेमहदीने फिर वलपकड़लिया। उससमय उनकेपास ५०० सिपाहीभी न थे और न रुपया था। परंतु वहअपनी बुद्धि और चलसे अपना जैसे तैसे निर्वाह करते रहे ! अंतमें इंग्लैंडकी आंखें खुलगई। गार्डनकी रक्षाके लिये वहांकी प्रजाने भरपूर चंदा दिया परंतु फिरभी सरकारने उसका विश्वास न किया । इसका परिणाम यह हुआ कि बरबर स्थानमें महदीका अधिकार होगया और ३५०० मनुष्य बालक और स्त्रियां बुरी तरहसे मारी गई । शत्रुने खार्तमको घेरकर नगर में भोजनकी सामग्री पहुँचना बन्द कर दिया । इस अवसर में इंग्लैंडमें मछलियों का प्रदर्शन हुआ । उस समय प्रजाने प्रधान अमात्यको सुनार कर गार्डेनकी प्रशंसा और उनकी निन्दाकी अन्तको खार्तुमकी रक्षाके लिये इंग्लैंड से सेना बिदाहुई । इस सेनाको लेकर लार्ड टलजली सौडानको गये। इनके पहुँचने पूर्वही जनरल गार्डन महदीसे बरबरका किला खाली करवा लिया । गार्डनके मित्र कर्नल स्टु- आर्ट जो इनकी सहायताको बुलाये गये थे उनकी नौका धरतीसे भिड़ गई। उस समय वहांके निवासियोंने उन्हें विश्वास देकर सेनाको मिस्टर पावर सहित मार डाला । इससे महदीका साहस बढ़ गया । उसने गार्डनको घेरकर अन्न बिना मारडालने का प्रयत्न किया और सहायताकी सेना पहुँचते २ अपना बल खूब पक्का कर लिया । और खुब वीरता करनेके बाद गार्डन मारा गया। वह यदि चाहता तो भागकर बच सकता था परंतु उसने अपने प्राण बचाकर अपनी जातिवालोंको अमेिं होमना न चाहा। उसने इंग्लैंडकी ढिलाई और उपेक्षासे एक वर्ष तक कष्ट पाकर ब्रिटिशके यशकी रक्षाकी परंतु अन्तमें अकेला गार्डन क्या करसकता था । उसके मारेजानेका इंग्लैंडकी प्रजाको बहुत पश्चाताप हुआ । और उसी समय महारानीने उसकी बहन और भाईको पत्र लिखकर अपना हार्दिक शोक प्रकाशित किया। उन्होंने उस पत्रमें लिखा कि " मुझे इस जातका अधिक खेद है कि मेरे वारम्वार आग्रह करने और ब्रिटिश राज्यके मण करने परभी गार्डनकी सहायताके लिये सेना न भेजीगई। मैं अच्छीतरह जानती<noinclude></noinclude> 4nv8l5z8zakve6c9zh69yotjlrbtxzq पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८० 250 194803 665408 2026-07-06T15:30:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665408 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२६३) हूं कि यह इंग्लैंडपर भारी कलंक है " गार्डन पड़ा धीरथा । इसके बादभी खार्टूम विजय करनेके लिये जो सेना गई थी उसके जब २ विनयकी अनीआई इंग्लैंड के मंत्रिमण्डलने टालबाज़ीमें अवसर खोदिया । अन्तमें महँदीके जनरल ओस्मान डिगमासे एलटेन और नमानीव में अंगरेजी सेनाका युद्धहुआ । परंतु इससमय भी यही दशा हुई। इस अवसरमें कनाडा और आस्ट्रेलियासे सेना आपहुँची और भारतकी सेनाने इन सबके साथ महेंदीका विजय किया। इसके टपलक्ष में महारानीने भारतीय सेनाकै देशी अफसरों को बुलाकर उनका सत्कार किया। यद्यपि सरकारीसेना ने उससमय मेहँदीका विजय कर लिया परंतु सन् ९७३० में फोडा फरांसीसियोंको नीचा दिखाकर जन लार्ड किश्वनरने खात्ममें प्रवेश किया तब गार्डनके मारे जानेका कलंक दूर हुआ । खार्तुममें मिसर का राज्य स्थापित कर इन्होंने इस वर्ष में गार्डनकी वहाँपर कवर बनवाई और मेहंदीकी लाशको कुवरमेंसे निकलवा कर उसे जलवा डाला || अध्याय ५४. ब्रह्मदेश में सर्कारी राज्य । सन् १८५२ ई० में लार्ड डलहौसी गवर्नर जनरलने ब्रह्मदेशके राजा थी- वाका कुछ देश जीतने के अनन्तर उनसे जो संधिकी थी उसका निर्वाह लार्ड डफरिनके शासन तक जैसे तैसे होता रहा। उनके समयमें राजा धीमाके लिये सरकारको विदित हुआ कि वह फरांसीसी और इटाली वालोंसे मेल बढ़ानेका यत्न कर रहे हैं। इसमातका यद्यपि कोई प्रमाण जाननेमें न आया परंतु मुंबई ब्रह्मा ट्रेडिंग कंपनीने सरकारसे निवेदन किया कि थीवा हमारे व्यापारके कामोंमें विघ्न डालकर लकड़ी और चावल आदि पदार्थ हमें यहांसे लाने में माधाडालते हैं और "न खानोंका अन्वेषण करने देते हैं। यह कंपनी विलायतियों की थी। लार्ड ड- फरिन ने राजाको समझाने के लिये सेनाभेनी । राजाने इसपर भी कुछ ध्यान नदिया। इसपर सेनाने चढ़ाई कर बढ़ांकी राजधानी मंडाले और आवा छीन लिया और राजाको पकड़कर भारत में कैदकर दिया। तबहीसे ब्रह्माका राज्य सरकारी राज्यमें मिलाकर पुराने और नये राज्यका एक प्रान्त बनायागया और यहांका शासन एक चीफ कमिश्रर को सौंपागया जो अब मह्मदेशके स्वतंत्र लेफ्टिनेंट गवर्नर हैं । यद्यपि महादेशका विजय सन् १८८६ ई० में ही होगया और लार्ड डफरिनने उसे सरकारी राज्यमें मिला देनेका ढिंढोरा भी<noinclude></noinclude> mewx65kglf3hhys9tn77vrvdfq5m9o2 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८१ 250 194804 665409 2026-07-06T15:30:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665409 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( २६४ ) उसी सन्में पिटवा दिया परंतु वहां चार पांच वर्षतक शांति नहुई । उसराज्य के चोर डाकू लुटेरे और दृष्ट लोगों ने खूब लूटमार मचाई और जैसे बना तैसे सरकारी सेनाको सताकर प्रबंध में विनडालना चाहा परंतु ब्रिटिश नीति और कौशलके सामने उनकी कुछ न चली और अंतको यह प्रदेश भारत के साथ ऐसा सटगया जैसे यह सदासे ही इसका एक अंगहो । शांति करनेके लिये और होनेके अनन्तर गवर्नमेंटने ब्रह्मदेशमें भारतकी प्रजाके समान यहाँ वालोंको स्वत्व प्रदान किये । चीफकोर्ट, स्कूल, कालेज अस्पताल स्थापित किये और रेल्वे बनवाकर उसे भारतके साथ एकमेक कर डाला। थीवाके राज्यकी अव्यवस्थासे ब्रिटिश व्यवस्थाको अच्छी समझ मजाने सुखमाना । जिस समय ब्रह्मदेशके युद्धका व्यय भारतके राजकोष से लेनका सरकारने निश्चय किया इस देशकी शिक्षित प्रजाने इसका घोर प्रतिवादकर इस कार्यके लिये एक पाई देना न चाहा और कहा कि अकारण ब्रह्मदेशको के लेनेमें अन्याय हुआहै और उस देशसे भारतको एकटमें कुछ लाभ भी नहीं है इसलिये हमसे इसका व्यय लेना योग्य नहीं है परंतु सरकारने उस प्रदेशको भारतमें मिलानाही योग्य समझा इसलिये सारा खर्चा इस देशसे लिया गया || अध्याय ५५. ट्रांसवाल इंग्लैंड के युद्ध | सन् १८९६६० का आरंभ होतेही ट्रांसवाल में नया बखेड़ा खड़ा हुआ। जनव- रीको मशोनालैंड के प्रबंधक डाक्टर जेम्सन शस्त्रधारी सेना लेकर ट्रांसवाल राज्य में घुसपड़े | जोहोनिसबर्ग नगरके परदेशी मुखियाओंने डाक्टरको मैफकिं- ग लिखकर भेजा कि ट्रांसवाल राज्यके प्रबंध में गड़बड़ है इसलिये शीघ्रही परदे- शियोंसे ट्रांसवालकी गवर्नमेंटका संग्राम होनेवाला है। उस पत्र में यह भी लिखा था कि युद्धके समय हम लोगों को बाल बच्चों सहित बोर राज्यकी शरण लेनी पड़ेगी । और हमारा माल असबाब नष्ट होजायगा । इस पत्र पर हस्ताक्षर करनेवालोंकी इच्छा यह थी कि, डाक्टर साहब यहां आकर हमारे स्वत्वोंकी रक्षाकरें और इस तरह देशको रक्तकी नदी बहनेसे बचायें। इस कार्य के लिये उन्होंने खर्चेका बोझा अपने ऊपर लिया। इस पत्रको पातेही डाक्टर जेम्सन सातसौ सैनिकों सहित ट्रांसवालको गये। इसपर वह केि प्रेसीडेंट क्रुगरने केप<noinclude></noinclude> ru87fwv8iin1vy7yq9w8zn6yre7hkis पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८२ 250 194805 665410 2026-07-06T15:30:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665410 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग ( २६५ ) डाक्टर जेम्सन आपकी करते हैं। इसके उत्तर में टौनके लार्ड कमिरको पत्र लिखकर उनसे पूंछा कि आज्ञासे हमारे राज्यमें आये हैं अथवा मनमानी उन्होंने लिखा कि मुझे अबतक इस वातकी कुछ ख़बर नहीं है । यहि सत्य है तो इस बातके उत्तरदाता डाक्टर जेम्सनही हैं क्योंकि उन्होंने यह कार्य अपनी इच्छासे किया है। उन्होंने साथही डाक्टरको भी तार दिया परंतु नव इसका उत्तर न आया तब उनको निश्चय होगया कि मार्गके तार काट डाले गये हैं । इस पर उन्होंने प्रेसीडेंट क्रूगरको फिर लिखा कि आप डाक्टरको लो- टादें और किसी तरह की लड़ाई न होने पाँवै । लोग कहते हैं कि लार्ड कमिश्नरका तार डाक्टर जेम्सनके पास पहुंच गया था परंतु उन्होंने उसपर कुछ ध्यान न दिया और लड़ने को उतारू हो गये। बोर सेनाने डाक्टरका सामना कर उसे मार भगाया और क्रूगर्स ढापेमें जाकर घेरलिया । जेम्सन पहले तो बहुत दृढतासे लड़ता रहा परंतु मोहोनिस्वर्गके परदेशियोंकी ओरसे ठहरावके अनुसार जब सहायता न मिलती दीखी तब उसे लाचार होकर अपनी सेना सहित बोरोंकी शरण जानापड़ा। इंग्लैंडमें उपनिवेश विभाग के मंत्री मिस्टर नेम्वरलेनने सर हरक्यूलस रोविन्सनको पत्र लिखकर जेम्सन साहबकी अनीति पर बड़ा खेद प्रकट किया और लिखा कि कैदियोंके साथ वर्ताव अच्छा होना चाहिये । प्रेसीडेंट क्रूगरने आग्रहपूर्वक डाक्टर जेम्सन और उनके साथियोंको कैद कर इंग्लैंड भेजदिया। इस बातके समाचार पातेही मिस्टर चेम्बरलेनने फिर सर हरक्यूलस रोविन्स को तारदिया कि आपने कैदियों को हमें देनेका जो • फैसला किया है उससे महारानीको महा संतोष है। इससे आपकी बड़ी मशंसा है। यह कार्य ट्रांसवाल में शांति स्थापन करनेका है । ब्रिटिश और डच जातिमें परस्पर स्नेह रहना दोनोंके लिये अच्छा है । इसी विषय प्रेसीडेंट क्रूगर और उपनिवेश विभाग मंत्रीके परस्पर बहुत कालतक पत्र व्यवहार होता रहा और इसका परिणाम यह हुआ कि ट्रांसवालमें व्यापार करने वाले यूटलैंडर लोगों के स्वत्वोंके विषय मेसीडेंट क्रूगरने योग्य निपटारा करदिया । इस छोटीसी लड़ाई में डाक्टरकी सेनाके अनुमान सत्तर मनुष्य मारेगये वा घायल हुए । डाक्टर साहबके कैदी बनकर इंग्लैंड पहुंचने के अनन्तर सैनिक न्यायालयने उनके अपराधकी जांचकर उन्हें दोवर्षका कारागार वास दिया और उनके साथियों को भी अपराधके अनुसार कैद रक्खा गया परंतु डाक्टर का स्वास्थ्य बिगड़ गया था. इस लिये उनका अवधि बीतने पूर्वेही छुटकारा होगया ॥ १२<noinclude></noinclude> rsp3lm10y4h2b5ebzehzjcekjw7jewm पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८३ 250 194806 665411 2026-07-06T15:31:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665411 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २६६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । परंतु ट्रांसवालका इंग्लैंडसे इसप्रकारका मेल अधिक कालतक न रहने पाया। दो वर्षके बादही दोनों में परस्परका फिर झगड़ा खड़ा होगया। ट्रांसवालने ब्रिटिश आधिपत्य को अस्वीकार कर वहां व्यापार करने वाले परदेशियोंको चहांकी पार्लियामेंट में मेंबरचुननेका इच्छित स्वत्व न देना चाहा और न खाने खोदने के लिये डाइनामाइट बारुदका लाइसेंस दिया । इसीमकारके अनेक कारणांस इंग्लैंड को ट्रांसवाल पर फिर चढ़ाई करनी पड़ी। इंग्लैंडके उपनिवेश विभागके मंत्री मिस्टर चेम्बरलेन उधरतो प्रेसीडेंट क्रूगरसे संधिका प्रस्ताव कर उन्हें दबाने के लिये युद्धसंबंधी अंतिम पत्र (अल्टीमेटम ) देते और उधर शनैः २ सरकारी सीमापर सेना बढ़ाने लगे। इस कार्यसे ट्रांसवाल राज्यको निश्चय होगया कि अपना वल दृढ कर हमारा देश छीनलेनेके लिये मिस्टर चेम्बरलेन चाल चल रहे हैं । इसलिये प्रेसीडेंट क्रूगरने एकाएक सरकारी सेनाके प्रधान अध्यक्षको २४ घंटे की अवधिका अल्टीमेटम दे दिया। वोरोंसे लड़नेके लिये अंगरेजी सेना थोड़ी थी । इंग्लैंड से सहायता पहुंचने में अभी बहुत देरी थी इसलिये लाचार होकर अंगरे- जी सेनाको ११ अक्टूबर सन् १८९९ ई० को भागकर लेडीस्मिथ, किम्वलीं और मैंफकिंगके किलेमें शरण लेनी पड़ी। बस उसी दिनसे लड़ाई उनगई । भारत. वर्ष, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और कनाड़ासे सेना भरे जहाज़पर जहाज जाने लगे। चाहे अंगरेज लोग उस देशमें बहुत वर्षोंसे आते जाते थे परंतु फिर भी वहां की भूमि इनकी परिचित न थी, बोरोंको अंगुल २ धरती मालूम थी, बोर लड़ने में बड़े कुशल थे और अंगरेजी सेना युद्धशिक्षा में प्रवीण होनेपर भी बहुत अच्छी नथी। इन कारणोंसे बोरोंने अंगरेजी सेनाके दांत खट्टे कर दिये। क़िलेके भीतर जो लोग घिरे हुएथे उन्हें अनके अभावसे घोड़े काट २ कर खाने पड़े और जो सेना उनके छुटकारे के लिये गई थी उसे अनेक जगह और अनेक बार बोरसि हार खाकर अपने हज़ारों मनुष्य खोने पड़े। अंतमें सरकारने भारतके भूतपूर्व प्रधान सेनापति लार्ड राबर्ट्स और जनरल किचनरको बहुतसी सेना सहित भेजा । इनकी योग्य व्यवस्था और थोड़े बोरोंको पराजय करनेके लिये असंख्य अंगरेजी सेना पहुँच जाने बाद तीनों किलोंका छुटकारा हुआ। पैंडर पर लड़ २ कर हारनेके अनन्तर गोरोंने अपने मित्र राज्य ओरेंजफीस्टेट और ट्रांसवा- लकी राजधानी मिटोरियाको छोड़ दिया। लार्ड राबर्टसने उनका राज्य छीनकर वहां विजयी ब्रिटिशका झंडा ना खड़ा किया । घरबार, राज्य और बाल बच्चे छूट जानेपर भी बोरोंने अबतक लड़ना नहीं छोड़ा है और अनुमान है कि ट्रांसवाल तथा ओरंभ फीस्टेटका राज्य अंगरेज़ोंके हाथ आजानेपर भी वहां अनेक वर्षों-<noinclude></noinclude> 2nnnhyq945kz7qjghtb40utnnws3sz8 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८४ 250 194807 665412 2026-07-06T15:31:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665412 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २६७ ) तबही उन्होंने एक तक शांति होना कठिन है । भोर लोग वास्तवमें भर दें। ऐसी जातिका सामना. किया है जिसकी बुद्धि और मलको देखकर आज कल बड़े २ राज्यों के छूटते हैं। परंतु बोरोंकी हठता और वीरताकी संसारमें प्रशंसा है। ये स्वतंत्र हैं और अपनी स्वतंत्रताकी रक्षाके लिये मरते दम तक लड़ने को तैयार हैं। उनके अगुआ मिस्टर क्रूगर देश छोड़कर विदेश चले गये हैं वीर नूवर्ट जैसा प्रसिद्ध सेनापति मरगया है, जनरल कोंजी अपने चार हजार सैनिको सहित सेंट हेलेनाके टापूमें कैद हैं और हज़ारों बार सैनिक मारे गये, चायल हुए वा अंगरेनोंकी कैद तथा शरणमें आचुके हैं परंतु वे लोग अभीतक लड़रहे हैं और फिर भी लड़ेंगे। दोनों राज्य सरकारके हाथमें आगा ने पर भी वहांका युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है। पौने दो वर्षकी लड़ाई का संक्षिप्त २ वृत्तान्त लिखना भी इस पुस्तकमें नहीं बन सकता है। और यह विषय अभीतक पाठकोंकी दृष्टिमें नया बना हुआ है इस लिये मैं इसका वि स्तार करना नहीं चाहताहूं ॥ यद्यपि भारत वर्ष में देशव्यापी अकाल विद्यमान था यहां की भूखी मजाके साठ पैंसठ लाख मनुष्य सरकार की दी हुई रोटियोंसे अपना पेट पालतेथे परंतु अपने स्वामीका संकट देखकर भारतवर्ष अपनादुःख भूलगया। इसने जी खोलकर सेना, द्रव्य और सामग्री देकर सरकारकी सहायताकी | सरकारने इसमातके लिये भारत वर्षकी प्रजा और राजाओंका उपकार माना और लार्ड कर्जन ( वाइसराय ) और लार्ड ज्यार्ज हैमिल्टन ( भारतके स्टेट सेक्रेटरी) ने इस पर अंतःकरण से धन्यवाद दिया और महारानीने राजा प्रजाका बहुत प्रशंसाकी ॥ अध्याय ५६. अशांति का उपद्रव । जिससमय ट्रांसवालमें डाक्टर जेम्सनका बखेड़ा उठरहाथा अशांति में एका एक उपद्रवकी आग भडकी । सन् ९४ ई० में कुमासीका राजा अशांति का राजा बन बैठा था। अवसर पाकर फरांसीसी एजेंटने कुमासी और अशांति फ्रांसका आधिपत्य स्थिर करनेके लिये राजाको महका दिया। इसपर अंगरेजी दूतने राजासे कहा कि जो कुछ युद्धव्ययका रुपया आपपर हमारा लेना है उसे शीम डालो । राजाको अंगरेजोंकी परराज्योंको दबाकर छीनले नेकी नीति पसंद न<noinclude></noinclude> te72q5se55qq1jlzjr32fzeyg6wxqnf पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८५ 250 194808 665413 2026-07-06T15:31:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665413 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २६८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | आई। अंत में बखेड़ा यहांतक बढ़ा कि ३१ दिसंबर सन् १८९५० को राजाके नाम इंग्लैंडने एक अल्टीमेटम भेजकर उसमें लिखाकि हम कुमासी में अपना कमिश्रर नियतकर अशांतिको सरकारी आधिपत्यमें लेना चाहते हैं । उसमें यह भी लिखा गया कि सरकार दासव्यापार को बंद करदेगी और इस राज्यके आस पास पसने वाली जातियोंका दमनभी करेगी। इसपत्रका राजाने कुछभी उत्तर न दिया । इसका परिणाम यह हुआ कि सरकारको सर फ्रांसिस स्काटके अधिकारमें राजासे लड़ने के लिये सेना भेजनी पड़ी। इसयुद्ध में महारानीकी दुलारी पुत्री राजकुमारी विया- ट्रिसके पति राजकुमार हेनरी आफ बेटनवर्गका कुमासी पहुंचनेसे पूर्व ही ज्वरसे मार्ग में देहान्तहोगया । इस दुर्घटनासे महारानीको जो शोक हुआ उसका उल्लेख प्रथमभागमें किया गया है। सर फ्रांसिस स्काटको राजासे बिलकुल युद्ध न करना पड़ा | महारानीकी विजयिनी ध्वजा देखकर राजाके औसान बिगड़गये । राजा मैम्पेने सरकारी समस्त शर्तोंको स्वीकार कर लिया । इसबातसे गोल्ड कोस्टके निवासियोंको हर्षहुआ सर फ्रांसिस स्काट बेधड़क कुमासीमें जा घुसे । इसके अनंतर महारानीके शासनके अन्तिम वर्षमें भी अशांति उत्पन्न हुई थी परंतु इसका परिणाम वही हुआ जो टक्तयुद्धका हुआ था। सरकारी सेनाने वहां जाकर उपद्रवियों का दमन कर दिया। इस युद्धका विषय अभीतक पाठकों के चित्तसे हटा नहीं है। वे लोग ' श्रीवेङ्कटेश्वर समाचार में इस विष- यके साप्ताहिक समाचारों को पढ़ते जाते हैं इसलिये यहाँपर उनका विस्तार नहीं किया गया है ॥ अध्याय ५७. भारतवर्ष के देशी रजवाड़े । विदेशकी विशेष २ घटनाओंको लिखते २ मैं सन् ९९-१९०१६० तक चला आया परंतु सन् १८९१ ६० की एक आवश्यक घटना लिखनेका मुझे समय न मिला। वह यही है कि सन् १८९१ ई० में आसामके निकट मनीपुर नामक सरकारके आश्रित राज्यमें वह कि अमात्य और सेनापति टिकेन्द्रजित् सिंहकी आज्ञासे वहांके रेज़िडेंट और कमिश्नर मिस्टर वेंटिनका पांच अंगरेज़ोंसहित बध हुआ । समाचार पातेही भारतकें बाइसराय लार्ड कैंसडाउनने लेफ्टि नेट के अधिकारमें मनीपुरियों का दमन करनेके लिये थोड़ी सी सेना भेजी ।<noinclude></noinclude> o6b5bzfev888kpfl98cbsbzm73d73xn पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८६ 250 194809 665414 2026-07-06T15:31:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665414 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २६९ ) सेना पहुंचने पूर्वही रेजिडेंट प्रिमटड साहबकी मेम बड़े साहसके साथ मनी- पुरसे प्राण यचाकर भाग गई और सेनाने नाम मात्र की लड़ाईके पश्चात् मनी- पुर लेलिया | सरकारने वहांके राजाको आजन्म कालापानी और सेनापतिको प्राणदंड दिया । और मनीपुरके वर्तमान राजाको जो गत राजाके कुटुंबियोंमें से थे गाढ़ी देकर वहां पर सरकारी एजेंसी नियत करदी । तवहीसे मनीपुरके वर्तमान नरेश अजमेरके मेमोकालेज में अंगरेजी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं ॥ राजपूताना अंतर्गत झालावाड़ के राजा महाराज रामा जालिम सिंहनी बड़े सच्चे, ढ और न्यायी थे। वहांकी प्रजा उनसे प्रसन्न रहती थी। परंतु उनका स्वभाव स्वतंत्र था। वह पोलिटिकेल एमोंटोंसे दयते न थे और मजाके साथ सच्चा न्याय करनेसे उनके कितनेही स्वार्थी कर्मचारी भी अप्रसन्न थे। महारा- नीकी सुवर्ण ज्यूविलीके समय उत्सव न करने आदिका उनपर अपराध लगा- कर सरकारने उन्हें एकवार पदच्युत कर दिया था परंतु उनका ढंग सुधरता देखकर उन्हें फिरभी शासन करनेका अवसर दिया गया। दूसरी बारके शासन में भी उन्होंने उसी नीतिका बर्ताव किया जिसका पहले किया था। इसका फल यह हुआ कि झालावाड़के पोलिटिकेल एजेंट कर्नल गार्डनकी उनसे खटपट होगई । गार्डन साहबके कपनानुसार राजपूतानाके एजेंट गवर्नर जनरल मिस्टर क्रास्थवेट साहबने भारत वर्षके पाइसराय लार्ड एलगिनको उन्हें गादीसे उतार देनेकी सम्मति दी । कार्य इसीके अनुसार हुआ और झालावाड़की मजाकी इच्छा के विरुद्ध उसकी प्रार्थनाओंपर कुछ ध्यान न देकर सरकारने जालिमसिंहजी की स्वल्प पेंशनकर उन्हें काशी भेजदिया । वह यहींपर शांति- पूर्वक अपने दिनकाट रहे हैं। झालावाड़ राज्यके दो हिस्सेकर सरकारने एक तृतीयांश राज्यका स्वामी कुँवर भवानी सिंहनीको जो अब वहांके महाराज रानाहँ करदिया और दो तृतीयांश कोटा राज्यमें मिला दिया । यह वही भाग था जो झालावाड़को कोटेसे मिलाया । इस फैसलेसे सरकारकी कोटा राज्यपर उत्कृष्ट दया और सुनीतिका उदाहरण मिला। राजराना जालिम सिंहनीको गादीसे उतारकर पेन्शन देने की घटना सन् ९६-९७ ई० की है । महारानीके शासनके अंतिम वर्ष भरतपुरके महाराज श्रीरामसिंहनी गादीसे उतारे गये। उनका प्रबंध ठीक न देखकर सरकारने उनसे अधिकार तो पहलेही छीनरक्खा था परंतु विगत वर्ष आबू पहाड़पर उन्होंने बिना अप-<noinclude></noinclude> j5z314fsi3kd7thyrw2i3snrq8494xb पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८७ 250 194810 665415 2026-07-06T15:31:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665415 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २७० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । राध अपने नौकरको गोलीसे मार डाला। बस इसी निमित्तको लेकर सरका- रने उन्हें सदाके लिये भरतपुरकी गादीसे वंचित किया और उनके बालक पुत्रको राजा बनाया II जिस समय भारत वर्षके वाइसराय लार्ड डफरिन थे काश्मीरके महाराज श्रीमान् प्रतापसिंहजी पर यह कलंक लगा था कि वह रूससे सीधा पत्र व्यवहार करते हैं और राज्यका प्रबंध करने में अयोग्यहैं । इनदोनों बातोंका आश्रयले- कर सरकारने उनको भी उसी समय पदच्युत किया परंतु देशी समाचार पत्रों और परमपद प्राप्त मिस्टर ब्रेडलाके घोर प्रतिवाद करनेसे टनपरका कलंक दूर हुआ और वह सच्चे सिद्ध होकर सरकारने कौसिंलकी सहायतासे काश्मीरका शासन करनेकी उनको आज्ञादी और उससमयके वाइसराय लार्ड कैसडाउनने स्वयं काश्मीर जाकर उनको संतुष्ट किया ॥ अध्याय ५८. भारतवर्षकी पश्चिमोत्तर सीमाका युद्ध । अमीर अबदुल रहमानखांके काबुलका स्वामी बननेके अनंतर सरकार की अफ़गानिस्तान के साथ कोई लड़ाई न हुई। यह राज्य इंग्लैंड और रूसके दो बला राज्यों में है इसलिये अमीर अपना कर्तव्य समझते हैं कि दोनों राज्योंको प्रसन्न रखकर अपना मतलब सीधा करना चाहिये। इसी नीतिके अनुसार अमीर साहब चलकर अपनी स्वतंत्रताकी रक्षा कररहे हैं। और इसपर तुर्रा यह कि सके दोनों भागोंके बीच में पड़करभी सुपारीरूपी काबुल अभी तक कटने से बचा हुआ वह उनकी बुद्धि और गौरवका परिणाम है। सीमाप्रान्त पर बखेड़ा न होने देनेके लिये ब्रिटिश गवर्नमेंट उन्हें १२ लाखके बदले १८ लाख रुपये देने लगी है । केवल इतनाही नहीं वरन यह शनैः २ अपने राज्य में शस्त्र और कपड़े आदिके कारखाने खोलकर काबुलकी बहुत कुछ उन्नति कररहे हैं। सन् ९४ ई० में ब्रिटिश गवर्नमेंट का काल राज्यसे अधिक मेल बढ़ाने की इच्छा से अमीर इंग्लैंड बुलाये गये थे। उन्होंने सन् ९५ ई० के आरंभ में अपने छोटे पुत्र नसरुल्लावांको भारत वर्ष होकर इंग्लैंडको भेजा वहाँ उनका बहुत सम्मान हुआ। महारानीने स्वयं उनसे मिलकर उनका सत्कार<noinclude></noinclude> 1ro9ynyzkyz9fxu1o9p6ws40w6ouwwu पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८८ 250 194811 665416 2026-07-06T15:32:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665416 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२७१ ) किया। यह इंग्लैंड जाकर यहांके नाकचचयसे बहुत चकित हुए परंतु इस किसी तरहका परिवर्तन न हुआ और सरकारका बातसे काबुलकी राजनीतिमें संबंध पूर्ववत् मना रहा || सन् १८९५ ई० के अपरेल चित्रालमें लड़ाईकी गर्मागर्मी हुई । यहाँक राजा जी मेहतर के नामसे प्रसिद्ध हैं दो भाई थे । भाईर आपस में लड़मरे। एकको मारकर दूसरा गादीपर बैठा। इस घटनाको देखकर वहांपर अगरेज़ी गवर्नमेंट की ओरसे जो रेज़िडेंट रहताथा घषर टठा । उसके माणकी रक्षाके लिये सरकार को सेना भेजनी पड़ी। नवीन मेहतरने अपने बहनोई उमराखांकी सहायता से चित्रालके किलेमें रेज़िडेंट मिसर विन्सनको बेरलिया रेजिडेंट साहब ने गिने सिक्खों सहित मेहतरकी सेनासे खूबलड़े। इस अवसरमें कर्नल फैली सेना लेकर यहां जापहुंचे और थोडेही समय में मेजर जनरल सर रावर्ट लोन वहांजाकर मेह- तर को परास्त किया । तबसे उमराखां मेहतर नियत हुआ और देश में सब तरहकी शांति होगई ॥ इस युद्धको पूरे दो वर्षभी न होने पाये। इतनेही में सीमामान्तमें फिर युद्ध की आग भड़क उठी। इस बारकी भाग साधारण न थी । पश्चिमोत्तर सीमाकी प्रायः सबही जातियां अंगरेज़ोंके विरुद्धथीं। उन्हें गोरे चमड़ेसे धर्मद्वेष होगया। उस ओर रहनेवाले अंगरेज़ोंके प्राण जोखिममें आपड़े। परिणाम यह हुआ कि सरकारको चारोंओरसेना भेजनापड़ा। सेनापर सेना और कामपर लामलगने से भी अफरीदी चुपनहुए । उन्होंने सामने पढ़कर कोई युद्ध न किया परंतु तकर कर एकर यूरोपियनको मारा। इस चढ़ाई में अंगरेजों की इतनी समा गई जितनी भारतवर्ष के किसी युद्धमें इकट्ठी न हुईथी। सैनिकोंकी कुलसंख्या ८० हजारसे ऊपरथी । इसयुद्ध में अधिकभाग देशी रजवाड़ोंकी सेनाका था। श्रीमान् जोधपुर महाराज के चचा महाराज कर्नल सर प्रतापसिंहजी और श्रीमान् धौलपुरनरेश स्वयंगये और पर पीरोचित कार्य किये। श्रीमान् जयपुर नरेश और श्रीमान् महाराज सेंधियाने रसद और वार घरदारीकी सेना देकर सहायताकी अनेक अंगरेज़ों के मारे जानेके अनन्तर सरकार का विजय हुआ । अफ़रीदियोंके गांव जला देने और उनको इसी तरह तंग करनेके अनन्तर शांति हुई। इस युद्धमें जनरल लाकहार्टका बहुत यश रहा। इस सेवासे प्रसन्न होकर गवर्नमेंटने उनको भारत वर्षका प्रधान सेनाध्यक्ष बनाया और सहायता करनेवाले देशी राजाओं को उपाधियां प्रदान कीं। इस युद्धम अमीर काबुलके लिये संदेह था कि, यह<noinclude></noinclude> sjizu3keab5g4o05wutmp79ytbu3hjf पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२८९ 250 194812 665418 2026-07-06T15:32:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665418 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २७२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । शत्रुको सहायता देते हैं परंतु यह बात किसी तरह प्रमाणित न हुई । इस युद्धके अनंतर पश्चिमोत्तर सीमापर बिलकुल शांति हुई। उस ओरके रहनेवाले जंगली कट्टर मुसलमान यद्यपि अवतक छूट खसोट और मार काटसे उदासीन नहीं हुए हैं परंतु अब सरकारके साथ उनका कोई बखेड़ा नहीं है । यह गवर्नमेंट के प्रतापका कारण है । श्रीमती शासनके एक वर्ष पूर्व भारतवर्ष के वाइसराय लार्ड कर्मनने गवर्नमेंटकी प्रचलित नीतिका कई अंशोंमें परिवर्तन कर सीमामान्तकी प्रजाको सेनामें भरती करना आरंभ कर दिया। इसका यह फल हुआ कि जो पेट न भरनेसे लूट खसोट करतेये वे शांत होगये। मेरी समझमें सीमामान्तकी अशांति गवर्नमेंटके शरीर में दादकी बीमारी है । दाद ही की तरह जब अवसर पाती है भड़क उठती है और जैसे दवा लगानेसे दाद दवतो जाता है परंतु मिटता नहीं है और चाहे न उभर उठता है उसी तरह वह भी है परंतु लार्ड कर्जनकी दयाने अच्छा काम कर दिया । अब बुद्धिमानों को आशा नहीं है कि फिर भी वहांपर उपद्रव खड़ा होगा || अध्याय ५९. भारत वर्ष में प्लेग और अकाल । श्रीमती महारानी विक्टोरियाकी हीरकन्यूबिलीके प्रथम वर्षमें बंबई नगर पर एक नवीन आपदा आई । ज्वर और गांठसे गोली की तरह चटाचट मनुष्य मरने लगे । आरंभ में कोई डाक्टर वैद्य और हकीम इस रोगका निदान न कर सका। डाक्टरों की सम्मति से गवर्नमेंटने प्रजाकी रक्षाके लिये जो प्रयत्न किया वह इस देशकी रीति और प्रजाके स्वभावके अनुकूल न हुआ। रोगीको पकड़कर अस्पताल में और घरवालों वा अडौसी पडौसी को कारंटाइनमें लेजानेकी प्रणालीने दहलका म चा दिया | ज्यों २ नगर में लाशों पर लाशें गिरने लगीं त्यों ही त्यों लोगोंकी भागड़ मच गई। दूसरे वर्ष बंबई के जुलाहे ने मुरदेकी जांच और स्त्रियों की परीक्षासे अप्रसन्न होकर हुल्लड किया परंतु सेनाकी सहायतासे अधिक बखेड़ा न होने पाया। सरकारको जैसे २ प्रजाकी इच्छा और दुःखमालूम होतागया वह इसविषयके आईनको सरल करती गई । और कालके अतिक्रमणके साथ ही देशभरकी प्रजाने सरकारफी शुभेच्छा का आशय समझकर आज्ञा स्वीकार की परंतु लेगने अभीतक शांति ग्रहण नकी। दिन २ भारतवर्ष के सब भागमें फैलता जाताहै । मदरास, पंजाब और बिहार में भी अब जापहुंचा है। बंबई प्रान्त में बंबई, पुना और करांचीको तो इसने अपना घरही<noinclude></noinclude> j231boq5mqm5gkazselg56rirtaxfdx पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९० 250 194813 665419 2026-07-06T15:32:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665419 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । ( २७३ ) बनालियां । छः वर्षके आक्रमणने इसरोगसे भारतवर्षके कई लाख मनुष्यमर- चुके, अनेक घर ऊगड़ होगये और अनेक कुटुंबोंमें पानी देनेवाला तक नरहा । जिसको रोग होता है उसके लिये यमराजने मानो बुलावा भेजदियाहै । सैकड़े पीछे वीसमनुप्यसे अधिक नहीं बनतें हैं । डाक्टरहाफकिनने इसरोगके आक्रम- से बचानेके लिये जो टीकेकी रीति निकाली है उसका मचार दिन २ पठता जाताहै । अव किसीको प्लेग विषयके सरकारी नियमोंकी बिलकुल शिकायत नहीं है। अबभी जहां कहीं छोटा मोटा उपद्रव होता है यहां प्रजाका अविचार और कर्मचारियोंका अत्याचारही कारणहै | सरकारने प्रजाकी भलाईके लिये लेगका प्रबंध किया। डाक्टरोंके मतसे यह रोग संक्रामक है और संक्रामक रोगों में रोगीको चंगे भलोंसे अलग रखना आवश्यक है परंतु यह रीति भारतवर्ष में नई है इसीलिये प्रजाने सरकारका तात्पर्य नसमझकर इसका आरंभ में विरोध कियाथा ॥ संवत् १९३४ ई० के अनन्तर भारतवर्ष में कोई भारी अकाल नहीं पड़ाथा । एकप्रकारसे प्रजा अकाल का दुःख भूलगईथी परंतु संवत् १९५४ (१८९७ ) ने फिर अकालकी याद दिलादी । बईमान्त, पश्चिमोत्तर प्रदेश और राजपूता- नामें दारुणदुर्भिक्षने मजाको भयभीत करदिया । विलायतके लार्ड मेयरने कई पार सहायता देने का उस समयके वाइसराय लार्ड एलगिनसे अनुरोध किया परंतु यह आरंभ में इसको अधिक भयंकर नसमझकर कर्मचारियोंकी रिपोर्टोंक भरोसे रहे । इस शिथिलतायें बहुत मनुष्य भूखके मारे मरगये । परंतु जब उन्हें अकालका ठीक स्वरूप विदित होगया तब उन्होंने अच्छा प्रबंध किया । इस प्रबंध पश्चिमोत्तर प्रदेशके लेफ्टिनेंट गवर्नर सर ऍटोनी मैकडानेलकी अधिक प्रशंसारही। अंत में सरकारने कामसे तथा मिनापरिश्रम अन्नदेकर प्रजाके प्राण बचाये और अनेक देशहितैषियोंने मुक्तहस्तसे इसकार्यके लिये चन्दा दिया। विलायत में भी चंदा होकर बहुतसा रुपया भारतवर्ष में आया और एमेरिकासे मकई प्रथम वार इसी वर्ष में आई ॥ इसके अनन्तर सन् १८९८ ३० का वर्ष सुकालका बीता किन्तु दूसरेही वर्ष सातों यहोंने एक राशिपर इकट्ठे होकर भारतवर्षका नाशकरडाला। संवत् १९५६ के अकालको वास्तव में दुर्भिक्ष कहना चाहिये। इस अकालमें सरकार प्रजा और देशी राजाओंने प्रजाकी रक्षाके लिये जो काम खोले उनपर अधिकसे अधिक ६५ लाख मनुष्योंने भोजन पाया। इनमें जो लोग काम करने योग्य थे उन्होंने तालाम, सड़क और रेलके कामोंमें मिट्टी खोदकर अपना पेट पालन किय<noinclude></noinclude> m0ubj1q6bhp6p11zcskq0y0w257lcyr पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९१ 250 194814 665420 2026-07-06T15:32:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665420 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( १७४ ) और जो इस कार्यमें अयोग्य थे उन्हें संतमें भोजन दिया गया। इस अकालके प्रबंधके लिये इस देशके वाइसराय लार्ड कर्जन पहलेसे तैयार होगये थे । उन्होंने मजा रक्षाका अच्छा प्रबंध किया । और इसके लिये प्रजाने उनको और सर- कारको अंतःकरणसे आशीर्वाद दिया। दोनों अकालों और प्लेगसे इस देशके कितने मनुष्य मरगये इसका कोई लेखा अभीतक प्रकाशित नहीं हुआ है परंतु इसका अनुमान मनुष्यगणनाकी रिपोर्टसे होता है जिनका सार इसी भागके अध्याय ३७ में है । वारंवारके अकालोंके पड़ने और लेगके कष्टसे प्रजा विल- कुल दरिद्री होगई थी और उसे ट्रांसवाल युद्धमें सरकारकी सहायता कर राज भक्तिका पूरा परिचयदेना था इस लिये अकालके कामों में भारतके नाम- धारी धनाढ्य अधिक द्रव्य न लगासके और विलायतकी प्रजा भी ट्रांसवाल युद्धमें लगी हुई थी इस लिये वन्देसे अधिक द्रव्य इकट्ठा न होसका परंतु फिरभी सरकार को बहुत कुछ सहायता मिलगई। इस अकालमें गवर्नमेंट और भारत की मजा के साथ सहानुभूति प्रकाशितकर जर्मनी, एमेरिका आदि देशोंने बहुत सहायताकी । इसमें एमेरिकाकी सहायता बहुत बढ़कर रही वहांकी प्रजाने अन वस्त्र और रुपया देने में बहुत कुछ श्रम किया और चाहे ईसाई मतका देशमें फैलानाही अभीष्ट हो परंतु पादरियोंने भी बहुतसे बालकोंके प्राण बचाये । यद्यपि इस अकालमें देशके अनेक धनाढ्य रुपया लगाने में कुछ उदासीन रहे परंतु ऐसे लोगोंकी भी न्यूनता न रही जिन्होंने तन मन धनसे मजाकी रक्षा की । अकाल और प्लेसे मनुष्यों के मरनेका अनुमान दो बारकी मनुष्य गणनासे हो सकता है परंतु इस अकालमें अकाल पीड़ित भागोंके कई लाख चौपाये नष्ट होगये इनमें अधिक संख्यातो भूखसे मरने वालोंहीकी है परंतु कसाइयों की छूरीसे भी कम न मरे । चौपायोंकी मृत्युसे चमड़ेका व्यापार खूब चमका और इस कार्य करनेवालोंके वारे न्यारे होगये। और इसका फल यह हुआ कि मारवाड़ और गुजरातके किसानोंको बैलोंके अभावसे अपने हाथसे हल कर बैलोंका काम करना पड़ा || सरकारकी रक्षामें जिन ६५ लाख मनुष्योंके नित्य भोजन पानेकी इस अध्यायमें चर्चा है उसमें देशके भिखारियोंकी संख्या नहीं है। उस समय नगरों में वे लोग इतने बढ़ निकले थे कि मार्ग चलना कठिनथा । उनकी चिल्लाहट और दयाजनक स्थिति भले आदमियों के हृदयको विदीर्ण किये डालती थी। सरकारी राज्यमें भूखसे कितने मनुष्य मरगये इसका तो किसीने लेखा प्रकाशित न किया परंतु अकाल पीडित भागों में हैज़ेने हज़ारों मनुष्यों का स्वाहा करडाला 1<noinclude></noinclude> t43riyoi79xrf6m9sv7uj018aqpv81b पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९२ 250 194815 665421 2026-07-06T15:32:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665421 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२७५) सरकार और पादरियोंकी रिपोटोंसे इतना निश्श्रय अवश्य होता है कि कई एक रजवाडोंमें अकालसे प्रजा बहुत मरगई । इससमय लार्ड कर्जनने रुपया उधार देने, योग्य सम्मति देने और अनुभवी कर्मचारी देनेसे देशी रजवाड़ोंकी बहुत सहायता की परंतु फिरभी कई एक रजवाड़ों के प्रबंधकोंकी उपेक्षा और स्वार्थसे गाँव गाँव उजड होगये ॥ अध्याय ६०. पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवधमें हिन्दी । भारतवर्ष भित्र २ मान्तों में जुदी २ प्रान्तीय भाषाओं को सरकारने बहुत कालसे न्यायालयों में स्थान दे रक्खा था परंतु इस देशकी राष्ट्रीय भाषा (हिंदी) की किसी जगह पूंछ गछ न थी। पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध में हिन्दीका मुख्यस्थान होनेपरभी इस लिपि में लिखी हुई अभियाँ यहां के न्यायालयों में नहीं ली जाती थीं । उन प्रान्तोंकी प्रजा बहुत कालसे सरकारसे इसविषयमें प्रार्थना करतीरही परंतु सर एंटोनी मैकडोनल लेफ्टिनेंट गवर्नरसे पहले किसी शासकने उनकी गुहार पर ध्यान न दिया । हिन्दी हितैषिणी "नागरी प्रचारिणी सभा, काशी" के शान्तभावसे प्रयत्न करनेसे हिन्दीकी गुहार श्रीमान्के ध्यानमें आई। आपने १८ अमेल सन् १९००ई को एक आज्ञापत्र प्रकाशित कर उनमान्तों के न्यायालयों में हिन्दीका प्रवेश कर दिया। इस आज्ञाके अनुसार मजाको अधिकार मिलगया कि, वह हिन्दी और उर्दू दोनों लिपियों में से जिसमें चाहे अर्जी, अर्जीदावा आदि कागज पेशकरसके और सम्मन वारंट आदि मजा से संबंध रखने वाले जितने कागजहैं वे सरकारकी ओरसे दोनों ही लिंपियों में दिये नायाकरें । बुद्धिमान् हिन्दू मुसलमानोंने इस आज्ञाको लोकोपकारी समझकर सरकारको धन्यवाद दिया, परंतु जो मुसलमान हठपूर्वक उर्दूका प्रचार रखना चाहते थे उन्होंनें धर्मकी आड़लेकर इसे रोकना चाहा। भात यहां तक पढ़ी कि, लखनऊ में मुसलमानोंकी एक महती सभा होकर बाइसरायसे निवेदन कियागया । उन्होंने इनकी अयुक्त प्रार्थना पर ध्यान न देकर लेफ्टिनेंट गवर्नरकी रायको बहाल रक्खा । और साथही सरकारी कर्मचारियोंको हिन्दी लिपिके साथ हिन्दी भाषा सीखनेकी उत्तेजनादी इसका फल यह हुआ कि अब उन प्रान्तों में जो नवीन कर्मचारी भरती होताहै उसे दोनों भाषाओं की परीक्षा देनी पड़ती है ।<noinclude></noinclude> ncf1ny51j575qu8egvew48y0h94ifuv पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९३ 250 194816 665422 2026-07-06T15:32:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665422 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र | (२७६ ) ऐसे नियम का प्रचार होगया । इस आज्ञा के अनुसार अब न्यायालयों में तो काम उर्दूमें होता ही है क्योंकि यह उन प्रांतोकी राजभाषा है परन्तु मजाकी ओरके यावत् कागज दोनोंमेंसे किसी लिपिमें लिये जाते हैं परन्तु हिन्दी पत्रोंकी भी भाषा उर्दू ही होती है । यह बात हिन्दी के इतिहास में सोनेके अक्षरों से लिखी जाने योग्य है ॥ इसके सिवाय पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवधके लेफ्टिनेंट गवर्नर सर ऐंटोंनी मैकडानेल ने हिन्दी भाषा की प्राचीन पुस्तकों की खोजके लिये उक्त सभाको प्रतिवर्ष आर्थिक सहायता देना आरंभ किया || अध्याय ६१. द्वितीयभागका परिशिष्ट । गत अध्यायों में श्रीमती महारानी के शासनकालकी मुख्य २ घटनाओं का उल्लेख किया गया है । इनके अतिरिक्त सन् १८८५ ई० से उनके शासन के अततककी अनेक घटनायें ऐसी हैं जो समाचारपत्रों के पाठकों के चित्त से अभीतक हटी नहीं हैं। उनके विषयमें यहां विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है । तथापि मैं जहांतक जानताहूं इस अध्याय में उनका यथाशक्ति दिग्दर्शनकर- देना इस भाग को पूर्ण करनेके लिये उचित है । इसी विचार से मैं थोड़ेसे में उन्हें लिखकर इस भागको समाप्त करता हूं || सन् १८८५ ई० से सन् १९०१ई. तककी मुख्य२ घटनाओं से भारत वर्ष के संबंधक जिन बातों का उल्लेख गत अध्यायों में नहीं हुआ उनमें से आवश्यक ये हैं । एक काबुलके अमीर से संधिकर सीमामान्त का निपटारा करना, दूसरी वाइसराय और प्रान्तीय गवर्नमेंटों या लेफ्टिनेंट गवर्नरोंकी व्यवस्थापक सभाओं मैं प्रजाको मैंबर चुनने का स्वत्व प्रदान करना तीसरे उन मेंबरों को बजट और देश के प्रबंध संबंधी अन्य विषयोंपर सम्मति देने और वादानुवाद करनेका स्वत्व मिलना, चौथे देशकी राजभक्त प्रजामें के कुछ भागपर अराजभक्तिका संदेह उत्पन्न होकर देशी समाचारपत्रोंकी स्वतंत्रता को सीमाबद्ध करना, पांचवें असंतोष फैलाने के संदेह में कई एक समाचार पत्रों के छठे देशके पोलिटिकल विषयों में सरकार से स्वत्व मांगने वाले नेशनल कांग्रेस की राजभक्ति और उत्तमताको स्वीकार कर उसके कथनपर सरकार का ध्यान आकर्षित होना इत्यादि इत्यादि ॥ संपादकों को दंड मिलना और<noinclude></noinclude> jrx535h2l5zy43o1docrl78hpcko5pp पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९४ 250 194817 665423 2026-07-06T15:33:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665423 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसरा भाग । (२७७) इसके सिवाय जिन घटनाओं का श्रीमती के राज्यसे किसी न किसी प्रकार का संबंध है और भारतवर्ष में नहीं हुई हैं उनमें सौडानके खलीफा का राज्य नष्ट कर उसे सिरके साथ मिलादेना, उस प्रदेशपर इंग्लैंड और फ्रांसका संयुक्त अधिकार, एफ्रिका के पश्चिम भाग पर फांसके अधिकार को स्वीकार करना, चीन और जापान के युद्ध में चीन का हारकर परिणाम में जापानको फार्मेसा का टापू, रुसको लिया तुंगका द्वीप, बंदर आर्थर, जर्मनीको किआओ चाऊका बंदर इंग्लैंड को थी -दाई बी का बंदर और काओलिनका भूभाग, फांसको कांग चाऊ वामका बंदर और हेनान का टापू दे देना एमेरिका और स्पेन की लड़ाई, रूम और यूनान का युद्ध, जर्मनीका ईरानकी खाड़ीतक रेल बनाना, रूसका ईरानको रुपया उधार दिलवाना और उससे दूसरे राज्यों से ऋण न लेने का करार करवाना, चीनपर यूरोप और एमेरिका के समस्त राज्यों का मिलकर चढ़ाई करना- रूसका चीनसे मंचूरिया लेलेना और चीन में रेल्वे बनाने का स्वत्व प्राप्त करना तिब्बतके लामागुरुका रुससे मेल इत्यादि बातें इस जगह लिखे जाने योग्य हैं ॥ इति ।<noinclude></noinclude> ti7pu29llcs1tpnp0p9p9608abgmo3q पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९५ 250 194818 665424 2026-07-06T15:33:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665424 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दूसराभाग समाप्त |<noinclude></noinclude> 2ckn2i4lhkjczxm76q1x30ffjpt9b70 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९६ 250 194819 665425 2026-07-06T15:33:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665425 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीमतीके शासन में ब्रिटिश साम्राज्यकी उन्नति । 40- तीसरा भाग । अध्याय १. राज्यवृद्धि । मनुष्यसंख्या और व्यापार । श्रीमतीके शासनके दीर्घकालमें ब्रिटिश राज्यका कायापलट होगया । ओ राज्य छोटासा 'राज्य' कहलाता था और जिसकी गणना साधारण राज्यों में थी वह अब साम्राज्य है। अब वह यूरोपके पांच मुख्य राज्यों में गिना जाता है। यद्यपि इस शासनमें देशान्तरोंमें शांति नहीं रही है किन्तु श्रेट ब्रिटेनमें पुराने राज्योंकी तरह एकभी यखेड़ा नहीं बढ़ने पाया । इस कारण यहांकी मनु- प्यगणनामें असाधारण वृद्धि हुई है। बाहर युद्ध और घरकी शांतिही राज्य वृद्धि का कारण है। बिना युद्ध के पर राज्योंसे जय नहीं हो सकता है और बिना विजय पाये राज्य नहीं पढ़ सकता है। इसीलिये किसी कविने कहा है-'असं- तृष्टाद्विजानष्टा संतुष्टाचमहीपतेः"। इस पचनका पालन होना राजाओं को इष्ट होता है। यहां संतोष शब्दकी व्याख्या अमयोजनीय है । " हाथपर हाथ धरे बैठे रहकर प्रयत्न न करना " संतोष नहीं है किन्तु संतोष का अर्थ है-मयत्नके अन्तमें जो फल मिले उसपर प्रसन्न होना || घरकी शांतिसे ब्रिटिश प्रजा बहुत बढ़गई। ग्रेट ब्रिटेन में उसे रहने तकका स्थान नहींमिला तब लाचार होकर उसको माहरका मार्ग लेना पड़ा। देश छोड़कर भारत वर्षमें कोई अंगरेज़ अपना घर नहीं मनाता है, यहां जो कोई रहता है वह केवल परदेशी बनकर रहताहै और रुपया क्रमाकर विलायत चलानाताहै इसलिये भारत वर्षमें विक्टोरिया के शासनारम्भसे अब तकमें यूरोपियन लोगोंकी बस्ती बहुत बढ़ने पर भी ये घर छोड़ने वालोंकी गणनामें नहीं है किन्तु घर छोड़ने वाले वे हैं ation लिये नाड़ा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और एफ्रिकामें जा बसे हैं। विक्टोरिया राज्यमें हजारों लाखों क्या रन करोड़ों अंगरेज़ोंके अनेक<noinclude></noinclude> 9ynzmwkmxzbns3s79wumyyzbvxl762m पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९७ 250 194820 665426 2026-07-06T15:33:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665426 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २८० ) उपनिवेशों को अपना महारानी विक्टोरियाका चरित्र । निवासस्थान बनाने पर भी ग्रेट ब्रिटेनकी मनुष्य गणना बहुत बढ़ीं है । श्रीमती शासनारम्भके तीनही वर्षबाद अर्थात् सन् १८४१६० में इन देशोंकी जिनको अंगरेज लोग मातृभूमि ( Mother Country ) कहते हैं मनुष्यगणना १ करोड ८६ लाख ५६ हजार ४१४ थी किन्तु पचास वर्ष बाद सन् १८९१ ई० में वही संख्या ३ करोड़ ७८ लाख ८० हजार ७६४ को पहुँची । यह संख्या श्रीमतीके शासन समाप्तिके दश वर्ष पूर्वकी है। अंतिम दश वर्षभी बहुत कुछ शांतिपूर्वक व्यतीत हुए हैं यदि इस समयका लेखा उपलब्ध होसके तो उसकी संख्या पाठकों को अधिक चकित करेंगी । यद्यपि यह नहीं बतलाया नासकता है कि ग्रेट ब्रिटेन और आयलैंडके कितने मनुष्य श्रीमती के शासनके ६३ वर्षोंमें विदेश जाकर बसेंदें परंतु इसमें संदेह नहीं है कि उनकी संख्या एक करोड़से किसी अंश कम नहीं है ॥ महारानीके शासन में ब्रिटिश राज्यकी असाधारण उन्नति हुई । यद्यपि भारत पर ब्रिटिश जाति का आधिपत्य पहलेही से स्थापित होचुका था परन्तु कंपनी से इसका अधिकार लेकर इसी समयमें भारत वर्ष ब्रिटिश राज्यमें जोड़ागया। सन् १८५९६० के युद्ध में रेडसीका मार्ग और अदन सरकार के हाथ आया। सन् ४२ मे हांग कांगका टापू और सन् ६० ई० में उसके दूसरे ओर कारीवानका प्रायः द्वीप सरकारको मिला। हांगकांग आजकल दुनिया भरके बंदरों में सर्वोत्तम मानाजाता है । श्रीमती जहाज ठहरने के लिये बंदर हैमिल्टन है जहां से यलोसी जापानके समुद्र और कोरिया जाने आने का मार्ग है। एफ्रिकामें श्रीमती का राज्य बहुत कुछ बढ़ा है। मटावललंड, मशोनालैंड, बेचुआनालैंड, पोडोलैंड, यूगंडा और जंजीबार के निकट फिलियांजरो ब्रिटिश राज्य का एक भाग है । भारतवर्ष में जो २ भाग बढ़ाये गये हैं उनका वर्णन अन्यत्र हुआ है। केनाडा भी इन्हींके समय में ब्रिटिश राज्य में मिलायागया । और इसी तरह अनेक छोटे मोटे टापुओं पर ब्रिटिश झंडा इन्हीके शासन में फहराया। एक विद्वानने गणनाकर निश्चय किया है कि श्रीमती के राज्य में १० हजार टापू ५०० अंतरीप और २००० नदियां हैं। इनका राज्य यूरोप में २, एशिया में १० से अधिक, एफ्रिका में १९ से अधिक, आस्ट्रेलिया में ६० से ऊपर और एमेरिकामें २५से ऊपर प्रति सैकड़ा वर्गमीलपर है। २०० वर्ष पूर्व ब्रिटिशराज्य का क्षेत्रफल मेटनिटेन से १६ गुना अधिक था किन्तु अब ९६ गुना अधिक है। इस राज्य का विस्तार पहले २ करोड़ भीलथा अब बढ़कर १२ करो मील होगया ॥<noinclude></noinclude> as651c0x9nmgvor6r7g2ef37lil08ew पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९८ 250 194821 665427 2026-07-06T15:33:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665427 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा भाग । (२८१ ) मजाकी वृद्धिके साथही इनदेशों का व्यापारभी बढ़नाही चाहिये। इसका अनु- मान करने के दोमार्ग हैं। एक जहाज़ों की वृद्धि और दूसरी रेल्वे । सन् १८३७० में ग्रेटब्रिटेन में २२ लाख ३३ हजार ३०० टन (२८ मनका एक टन होतहि ) बोझा होनेवाले २० हजार ५०० जहाज थे । इनमेंसे ६२४ ही धूमपोत थे शेष सच पालसे चलाये जाने वाले थे। किन्तु अब इसमें असाधारण उन्नतिहुई है । इस समय इस राज्यके पास व्यापारके कामके ३६ हजार जहानहैं । इनमें धूमपोतोंकी संख्या अधिक। इन जहाजों में १ करोड ५ लाख टन पोझा लेजाया जासकतहि । केवल जहाजोंकी उन्नतैिसे ही व्यापारको उन्नतिका पूरा निश्चय नहीं हो सकता है । किन्तु सुइजकी नहर खुलजानेसे बंबईको माल चार मास की जगह पचीस दिनमें आजाता है। मेलबोर्न जाने में अब चालीस दिन लगते हैं और न्यूयार्क ( एमेरिका ) का माल इंग्लैंड ५ या ६ दिनमें पहुँचना- ताहे । जहानों के मार्गमें सुविधा होकर उनकी वृद्धि होने पूर्व इंग्लैंड आदि टापुओंका माल बाहरको १४ करोड़ जाता आता था किन्तु श्रीमतीके शासनकी समाप्तिकें पांच वर्ष पूर्व अर्थात् सन् ९५ ई० में यही व्यापार ७० करोड़ टनका हुआ । १०० वर्षे पूर्व ग्रेट ब्रिटेनमें२ करोड २० लाख पौंडका सूत और कपड़ा तैयार होता था । किन्तु अब १७ करोड़छा कपड़ा बनता है । इन वस्तुओंके बनने- के कारखानेंमिं२०० करोड़ पोंडकी पूंजी लगी हुई है और कमसे कमर करोड़ म- नुप्य काम करते हैं । श्रीमतीकें शासनारंभसे पूर्व सन् १८३५ ई० में विलायत में जितने यंत्र चलाये जाते थे उनमें सब मिलाकर ४१ हजार पोड़ोकी शक्ति थी किन्तु अब (१८९०) में १ करोड़ घोड़ोंकी शक्तिके यंत्र चल रहे हैं। एक घोड़े में १६ मनुष्योंकि बराबर शक्ति मानी जाती है। नेपोलियन के युद्धके समय इंग्लैंड का परदेशोंके साथ व्यापार ७ करोड़ पौंड का था किन्तु अप (१८९०) ई० में ८१ करोड ५० लाख पौंडको पहुंचा। अठारहवीं शताब्दिके अंतमें अंगरेजोका सामुद्रिक व्यापार १८ लाख ५६ हजार टन का था किन्तु अब बढ़ते बढ़ते जितना बढ़ गया है उसकी संख्या ऊपरके वाक्यमें लिखी गई है । महारानीके शासनारम्भमें ग्रेट ब्रिटेनमें केवल छः रेल्वे लाइने थीं। इनमेंसे पांच केवल लण्डन नगर में आवागमन करती थीं। एकही लाइन ऐसी थी जो लण्डनसे ग्रीन विध तक जाती आतीथी । सन् १८५४ ई० में रेल्वेकी वृद्धिहोकर ८ हज़ार ५३ मील रेल्वे लाइन तैयार हुई किन्तु यही संख्या बढ़ते २ सन् १८९५६० में २१ हजार १७४ मीलको पहुँची। सन् ५४ ई० में ११ करोड ११ लाख ८० हजा<noinclude></noinclude> e33v26ryeadj572ozsd4a5fdg8e2ro4 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/२९९ 250 194822 665428 2026-07-06T15:33:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665428 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २८२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । १६५ मनुष्योंने और सन् ९५ ई० में ९२ करोड ९७ लाख ७० हजार ९०९ मनुष्योंने रेल्वेमें यात्राकी ॥ इसके साथ ही खानोंसे भी माल बहुत निकलने लगा है। खानोंके मालमें कोयला मुख्य है। कोयले और लोहेसेही शिल्पकला की उन्नति है । लेखा लगाने से विदित हुआ है कि अंगरेजों के हाथमें जितनी कोयले और लोहेकी खाने सन् ५४ में थीं उनसे उस समय ६ ॥ करोड़ टन कोयला और ३० लाख टन लोहा निकला था। उस संख्याकी सन् ९५६० के साथ तुलना करनेसे आंखें खुलजाती हैं। व्यापारकी वृद्धिका मुख्यमार्ग जानकर इन्होंने दोनों पदार्थोंकी अधिक खोजकी और पचासवर्षके अनन्तर इनको प्रतिवर्ष २० करोड़ टन को यला और ७५ लाख टन लोहा मिलने लगा। किन्तु इस अवसर में अन्य राज्यों में भी लोहा और कोयला बहुत निकलने लगा है इसलिये अब इन लोगोंका व्यापार इस विषय में मंदा हो चला है । यदि दो पदार्थोंका व्यापार मंदा होतो क्या चिन्ताहे परंतु सोना, चांदी और अन्य २ धातुओंने ग्रेट ब्रिटेनके गहरे कर दिये हैं । इंग्लैंडका धन केवल व्यापार की वृद्धिसे ही नहीं बढ़ता है किन्तु सोना, चांदी और हीरे की खानेभी श्रीमतीके शासन में उसके हाथ आई हैं। सोनेकी खाने सन् १८४७३० में कैलिफोर्निया, सन् ५१ ई० में आस्ट्रेलिया और सन् १८६८ ई० में दक्षिण एफ्रिका में प्राप्त हुई हैं। सबही खानोंसे बहुत कुछ सोना निकलनेपर भी सोनके सिक्केका प्रचार होनेसे उसका मूल्य घटा नहीं है किन्तु श्रीमतीके शासन के आरंभ में चांदीका जितना मूल्य था इससमय उसका आधा । इसके कारण यही हैं कि चांदी बहुतायत से निकलने लगींहै और दिन २ चांदी के सिक्केका प्रचार घटता जाताहै । दक्षिण एफ्रिका में पहले पहल हीरा सन् १८६७ ई० में निकलाथा | सबसे इसका व्यापार दिन २ उन्नति करता जाता है । दक्षिण एफ्रिकामें कई बार अंगरेजोंसे युद्ध होनेका एक कारण सोना चांदी और हीरेकी खाने भीहैं। अध्याय २. "वैज्ञानिक उन्नति और आविष्कार । जिस समय श्रीमती सिंहासनासीन हुई इंग्लैंडने साइंस की बहुत कुछ पूंजी इकट्ठी कररक्खी थी परंतु उस समय वह पूंजी केवल वैज्ञानिकोंके हृदयमें निवास करती थी। विक्टोरियाके राज्य में उस पूँजीका व्याज और व्यान काभी व्याज उत्पन्न<noinclude></noinclude> o0mjhj7anfje1pq6qd6sy9tthdbsphd पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०० 250 194823 665429 2026-07-06T15:34:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665429 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा भाग । ( २८३ ) हो गया। इस विद्याने असाधारण उन्नति की। उस समय और इससे पूर्व विज्ञानपर विचार करनेवाले थे किन्तु अथ इंग्लेंडमें हजारों मनुष्य साईसके अनुसार कामकरनेवाले उपस्थित हैं। यह इस विज्ञानकाही मतापहे कि लोग सृष्टि की बनावट जानने लगे हैं, समुद्र में धूमपोत फिर रहे हैं, उसकी गहराई माप की गई है आकाशका मानचित्र तैयार है, मनुष्य पशु पक्षी और वनस्पतिकी जांच होचुकी है । साइंसके बलले सर विलियम कुक और सर नॉलेस व्हीटस्टोनने चुंबकी सुई जिससे तार चलाया जाता है निकाली । इसका आविष्कार सन् ३७ में हुआ था। बिजली के तारका सन् ३८ में प्रचार हुआ। तबहीसे धीरे२ संसारभर में तारका जाल छागया। तारके भाई टेलीफोनके द्वारा अब लण्डन और पेरिस में बातचीत हो सकती है इससे व्यापारियोंको बहुतही लाभ पहुंचा है यद्यपि फोटोग्राफीका आविष्कार विक्टोरिया के शासनसे पहलेही होचुका था किन्तु वर्तमान ढंगकी चित्रविद्या जिससे वातकी बातयें फोटो तैयार होजाता है श्री मतीके शासनही प्रकट हुई है। इसका आरम्भ इंग्लैंडमें मथमवार सन् १८३९ ई० के सितम्बर में हुआ था। फोटोग्राफीसे बढकर भी 'एक्स रेज्' का आश्चर्य है। यह सूर्यकी फिरने हैं जिन्हें यंत्र द्वारा एकत्रितकर उनसे मनुष्यके शरीर के भीतर की हड्डियां और मांस मज्जा रोग इत्यादिका चित्र उतारा जाता है। इस शासन में बिजली और वाष्पने असाधारण उन्नति की है | गा, क्षय और प्लेगके रोगोंकी औषधियां इसीसमय में निकलीं, जंतुविद्या, बिजलीकी शक्तिसे कलें चलाना, कोयलेके बदले केरोसिन तेलका जहाजोंमें ईंधन, आक्सीजन वायुको द्रवीभूत करना, बिना घोडेकी बाइसिकल गाड़ियां तैयार करना आदि इससमय प्रचलित हुआ || महारानीके शासनकालमें लिविंग्स्टन, स्टैमली और बेकरने एफ्रिकाकी पड़ी२ नदियां और झीलोंका पता लगाया। एशिया माइनर में और मिस में भूमिमेंसे एसीरिया और देवीलियन नगरका पता लगा और टेल एनानमें इवाहीम समयका शिलालेख मिला । पहले जिन २ वस्तुओंका आविष्कार होचुका था उनका नये ढंगसे संस्कार हुआ और रेल्वेकी गति पहले से दुगुनीसे अधिक होगई ॥ बिना धुका मारूद और बिना तारका तार श्रीमतीके शासनके अन्तिमकाल के आविष्कार हैं। साइंसने श्रीमतीके शासनमें कितनी उन्नतिकर प्रजाका क्यार उपकार किया है उसका दिग्दर्शन मात्रभी इस अध्यायमें नहीं हो सकता है ।<noinclude></noinclude> 72pc8pxsmrp7lf3afvuuh9hdhcqg2dp पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०१ 250 194824 665430 2026-07-06T15:34:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665430 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २८४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । इस विषय में स्वतंत्र पुस्तक धननेकी आवश्यकता है और वही साधारणके उप- योगी होसकती है । श्रीमतीके शासनमें जो मुख्यर आविष्कार हुए उनके विषय में अन्यत्र लिखा गया है । उसे पढनेसे इसका कुछ २ हाल पाठकोंको विदित होगा || अध्याय ३. प्रजाकी दुर्दशासे सुदशा । श्रीमतीके शासन में इंग्लैंडके आईनका बहुत कुछ सुधार और जातीय कष्ट में न्यूनता हुई है । राज्यके आरम्भ में किसानोंकी बहुत दुर्दशा थी । हज़ारों खेतिहर भूखके मारे मर जाते थे। उनके मुखमलिन और आपत्तिग्रस्त थे । हर जगह असंतोष फैला हुआ था । राजद्रोही लोग राज्यतंत्र प्रणालीको उठाकर प्रजातंत्र राज्य स्थापन करना चाहते थे। वे सब नष्ट होगये । देशमें शांति स्था- पित हुई और प्रजाके हृदयमें राजभक्ति दृढ होगई || इस परिवर्तनसे देशका धन बढ़ा और दुःखदायी नियमोंका संशोधन हुआ ! पहले मिलवाले पांच २ छः २ वर्षकै बालकोंसे दिन रात परिश्रम करवाते थे और उन्हें वेतन बहुत थोड़ा देते थे। श्रीमतीके शासन में यह प्रथा उठगई और पार्लियामेंटने काम करने वालोंके घंटे नियत कर दिये। श्रीमतीका जिस समय शासन आरम्भ हुआ उधार देनेवाला साहूकार अपने रुपयेके लिये असामी को अपने घर में कैद कर रखता था और उसे मनमाना कष्ट देकर अपना रुपया लिया करता था । विक्टोरियाके शासनने दीन प्रजाको इस निर्दयताके चंगुल से बचा लिया। अब कोई भी मनुष्य एक सेकंडके लिये किसीको नहीं रोक सकता है और इंग्लैंड में अपराध बताये बिना स्वयं गवर्नमेंट तक किसीको नहीं पकड़ सकती है । सन् १८३७ ई० तर्क यह नियम था कि यदि कोई मल्लाह ठीक २ काम न करता तो जहाजुका कप्तान उसकी कोड़ोंसे खबर लिया करता था । इनका डर इतना भारी था कि भूखोंके सिवाय और कोई मलाही करना पसंद नहीं करता था। श्रीमतीके शासन में यह नियम उठगया और अब इस कारण अंगरेज़ मल्लाहोंका मुख हर्षित और शरीर दृढ़ दिखाई देता है । इंग्लैंड की यावत् करद प्रजाको पार्लियामेंट में मेम्बर चुननेके लिये 'बोट' देनेका अधिकार है परन्तु इस कार्यकी योग्यता विद्याके बिना नहीं होसकती इसलिये शिक्षा संबंधी आईने पास होकर घर २ पढ़े लिखे करडाले । समाचार पत्रोंपर से कर उठा<noinclude></noinclude> d8bmc8p8jxuitukyw8e1ee9tad5w4lq पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०२ 250 194825 665431 2026-07-06T15:34:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665431 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा भाग । (२८५) लिया, उन्हें अधिक स्वतंत्रता मिली और इससे पुस्तकें और प्रेस सस्ते होगये। जहां तहां पुस्तकालय देख पड़ने लगे। कार्नला' के टठजाने और भरला' के संशोधनसे नाहरका अन्न स्वतंत्रतापूर्वक ग्रेटमिटेन में आनेलगा और इसकेद्वारा लोगों को भरपेट रोटी मिलना नसीब हुआ । डाकमहसूल घटगया। कपड़े सस्ते मिलने लगे । लोगोंको रहनेके स्थान बढ़ियासे बढ़िया मिले और भाड़ा सस्ता होगया पुराने ढंगके व्याज की कढ़ाई घटगई और संगीत विद्या और साहित्यकी उन्नति हुई । इन्हीं कारणोंसे देशका दरिद दूर होगया || अध्याय ४. विद्या और साहित्यकी उन्नति । जिन लोगों को इंग्लैंडके प्राचीन साहित्यके अवलोकनका काम पड़ा और जो विक्टोरिया शासन पूर्व के साहित्य और विद्याओंकी आज कळके साथ तुलना करते हैं वे जानते हैं कि अंगरेज़ीने असाधारण उन्नति की है। जबतक इंग्लैंडके निवासी देश छोड़कर अधिक तर उपनिवेशों और एशिया, एफ्रिका तथा एमेरिका के भिन्न २ स्थानोंमें निवास नहीं करने लगे थे यूरोपकी राजकीय और जातीय भाषा फरांसीसी मानी जाती थी। फरांसीसी भाषा अब भी मधुर और आ- दरणीय समझी जाती है परन्तु इससमय अंगरेजी साहित्य उन्नतिके शिखरपर पहुंचा हुआ है। बिजली की तरह मनुष्य के हृदय में प्रविष्ट होकर उसमें भूमंडल भरको व्याप्त करलिया है। आजदिन अंगरेजी ही भूमंडलकी एक भाषा जिसे अंगरेजीमें (Uniuvrsal language) कहते हैं कहलाने योग्य है । विक्टोरिया राज्यारंभके समय इंगलिश भाषाका भंडार सब विषयोंसे भरपूर नहीं था। अंगरेज़ोंको साहित्य, कला और विज्ञानके लिये अन्य भाषाओंका आश्रयलेना पड़ता था । इस समय संसार में ऐसी कोई विद्या नहीं है जिसके विषयमें अंगरेज़ी में पुस्तक विद्यमान न हो। और वह पुस्तक भी ऐसी वैसी नहीं किन्तु टस विषयके सब असि भरपूर अंगरेजोंने इस शासनमें नवीन पुस्तकोंकी रचनायें जितनी उन्नति की है उतनी ही संस्कृत फारसी अरबी हेमू आदि भाषाओंके उत्तमोत्तम ग्रंथोंका भाषान्तर किया है, उनपर अपने विचार प्रकट किये है, और उनसे सिद्धान्त निकालकर हिन्दीकी हिन्दी बनाई है । संस्कृतके वेद और पुराणोंसे लेकर साधारण किस्से कहानी तकका अंगरेज़ी<noinclude></noinclude> id7zye95wi77iotm4vhuskxur386u78 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०३ 250 194826 665432 2026-07-06T15:34:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665432 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २८६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । भाषान्तर हो चुका है । अंगरेजी भाषान्तरोंको देख २ करही आज कलके नव- शिक्षित भारत वासी अनुमानके घोड़े दौड़ाते हैं ।। 2 जातका कैसा भी मावल्य हो किन्तु वहांके विषयमें "राजाकालस्य कारणम् " यह लोकोक्ति चरितार्थहोती है । श्रीमतीको विद्वानोंकी सहायता, शिक्षाके प्रचार और उत्तेजनाके अतिरिक्त स्वयं पुस्तकोंकी रचना करनेमें अनु- राग था । उन्होंने स्काटलैंडका प्रवास ' और ऐसीही अनेक पुस्तकें बनाई थीं और पतिका चरित्र बनाने में सर थियोडोर मार्टिनको लेख संबंधी सहायता दी थी। उन्हींके समय में इलिजाबेथ, वौनिगू,ज्यार्ज इलियट और चार्लोट वॉटी जैसे लेखक, कालीइल और स्टुअर्ट मिल जैसे साहित्याचार्य, हर्बर्टस्पेंसर जैसे फिलोसोफर, सौथी, वर्डसवर्थ, टेनीसन, आस्टिन बौनिंग, स्विनवर्न और लार्ड लिटन जैसे कवि, रुडयार्ड किपूलिंग जैसे विद्वान, अर्नोल्ड और रस्किनके समान समालोचक, लार्डमेकाले जैसे इतिहास वेत्ता मेकपीस, थेकरी, डिकन्स, किंग्सली, स्टिबिन्सन और मेरेडिथ जैसे उपन्यास लेखक हुए हैं ।। अध्याय ५. ब्रिटिश राज्यका विजय । महारानीके शासन में अंगरेजी राज्यने किस २ राज्यसे युद्धकर विजय पाया है इस बातका निश्चय अन्यत्रके लेखसे होगा । किन्तु उन सब घटनाओंको इकट्ठी करके यहां दिखलानेसे विदित होता है कि श्रीमतीके शासनमें ब्रिटिश राज्यने कितने युद्धनीते हैं । श्रीमतीके शासनमें जल सेनामें असाधारण वृद्धि हुई। इससे पूर्व इंग्लैंडने नल युद्धमें कहीं विजय नहीं पाया था । इनके शासनमें निरंतर विजयहुआ । नील और ट्राफलगरके सिवाय कहीं पर भी विदेशी जलसेना मिटि- श सेनाके सामने टिक न सकी। समोआकी प्रचंड आंधी अनेक जर्मन और एमेरिकन धूमपोतोंको नष्ट कर चुकीथी उसीमेंसे "केलिय” नामक ब्रिटिश नहाज बचआया || विक्टोरिया शासनारंभ में इंग्लैंड के सैनिक जहानोंमेंसे अधिकतर पाल वाले जहान थे। इनमें उन पोतोंकी संख्या अधिक थी जिनको अंगरेजोंने फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, और हॉलैंड वालोंसे छीने थे । किन्तु दिन २ धूमपोतोंकी संख्या बढकर डायमंडव्यूविलाके समय जो कुवाइद हुई उसमें १६६ सैनिक जहाज़ों की<noinclude></noinclude> cak1x2ed52udkaar9tbssapzrifh39p पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०४ 250 194827 665433 2026-07-06T15:34:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665433 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा भाग । (२८७ ) संख्या गिनीगई थी। इनके खड़े होनेमें सातमीळ समुद्र रंधगयाथा। ब्रिटिश जल सनाने केवल अपने मान और देशकी रक्षाही नकी वरन अल्मा, गलकलाबा इंकमैन, सेवस्टापूल ( क्रीमिया ) दिल्ली, लखनऊ और कानपुर में विजयपाया || श्रीमतीके शासनके दूसरे वर्षसे लेकर अवतकमें अंगरेजी सेनाको तीन युद्ध कालमें करने पड़े जिनमें से अंतिम युद्ध में लार्ड राबर्टसने असाधारण विजयपाकर काबुलकी प्रजाके हृदयमें वीरोचित स्थानपाया । अंगरेजीसेना सिक्खों से, चीनि भुटानियों से काफिरों, मायरियों, जुळलोगों बाजोरियों, लुशाइयों, और अनेक पहाड़ी नातों से लड़ी और चित्राल और सीमामान्त के अफरीदियोंसे विजयपाया । ब्रिटिशसेनाके पलसे केनेडाका विजयहुआ और ब्रह्मदेश अंगरेजोंके हाथआया अंगरेजी सनाने दो बार कुमासीको जीतकर मगरलायें अपना झंडा जाजमाया । उसने नाइगर जैसी जंगली जातिको अपने वामें किया, मिसरके उपद्रवियोंका दमनकर और सौडानके खलीफाको परास्त कर एकवार फ्रासको फसौड़ायें नीचा दिखाया । और आमेरडममें अपना झंडा ना उडाया ॥ अंत में ट्रांसवालके युद्ध में जो सन् १८९९ - १९००ई० में हुआ बहुत कुछ कष्टसहने और हज़ारों मनुष्योंको खोने उपरांत लेडीस्मिथ मेफकिंग और किम्बलको बासे छुडाया, बारबोरोंकोंद किया और अंतमे ट्रांसवालसें विन य पाया। और आशा होती है कि यहांका रहासहा नखेड़ा मिटकर कुछ वर्षोंमें शान्ति होजायगी || अध्याय ६. वाष्प और बिजली । श्रीमतीके शासन में प्रजा और राज्यकी उन्नति करनेके काम माफ और बिजलीने बहुत सहायता दी। पूर्व छः सौ वर्ष की अपेक्षा श्रीमतीके शासनके तरेसठ वर्षमें इन दोनों पदार्थेनि अंगरेज़ों की बहुतही सेवाकी । इन दोनोंके द्वारा समय और द्रव्यका बहुत बचाव हुआ। जिस कार्य करनेमें बरसों लगते थे वह अम दिनोंमें हो जाता है। इनसे मार्ग ओछा होगया और अब प्रजा ऐसी स्थि- तिपर जा पहुंची कि एक मनुष्य देशांतरोंमें भ्रमण कर पीढ़ियोंमें जितना अनु- भव प्राप्त नहीं कर सकता था वह दिनोंमें संपादन हो जाता है। यद्यपि धूमपोत लाने पहले भी कुछ २ सफलता प्राप्त हो चुकी थी किन्तु सपसे मथम नहान<noinclude></noinclude> 0deqwm9rjqvl47oe55jz5c9eu3bly7r पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०५ 250 194828 665434 2026-07-06T15:34:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665434 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । .. ( २८८ ) श्रीमती राज्यारंभके वर्ष में ही यूरोपसे एमेरिकाको भेजा गया था। बह जहाज़ बहुत छोटासा था। उसकी लंबाई केवल २१३ फुट और बोझा २३०० टन था किन्तु अब उससे चौगुने पचगुने जहाज़ अटलांटिक जैसे महासागरको पारकर जाते हैं। नौका वाहनकी उन्नतिसे एटलांटिक महासागर साधारण तलैयाके समान होगया। इसके लिये सन् १८४०३० में इंग्लैंडमें केवल ६०० धूम नौकायें थीं किन्तु आज दिन ८५०० से अधिक हैं । जहाजों और रेल्वेकी उन्नति के विषय में इस भागके प्रथम अध्यायमें कुछ लिखा गया है। सन् १८४२ ६० तक श्रीमती एक पैंड भी रेल्वे यात्रा करनेमें असमर्थ थीं और अवडनिसे बाल मोरल जाने में पैंतालीस घंटे लगते थे किन्तु अव५४० मीलकी यात्रा केवल १२ घंटे हो जाती है ॥ यही दशा बिजलीकी है। बिजली तार टेलीफोन, फोनोग्राफू, रोशनी और इसी प्रकारके अनेक आविष्कारोंका अधिक भाग श्रीमतीके शासनसे संबंध रखता है । उन्हीं के राज्यमें बिजलीने यूरोपियन लोगों की भौकरनी की तरह सेवा की है । महान रेल्वे और तारसे यह भूमंडल यूरोपियन लोगोंके लिये विक्टोरियाके ही शासनमें हस्तामलक हुआ है। विक्टोरिया ही के राज्य में इस भूगोलको विद्यार्थियोंके 'भूगोल' की तरह अंगरेजोंने अंगुल २ देख डाला है। और श्रीम- ती समय में ही इस पृथ्वीपर अंगरेज़ों का इतना राज्य फैला है जिसमें सूर्यके अस्त- न होनेकी उपमा दी जाने लगी है ॥ अध्याय ७. भारत वर्षकी उन्नति और परिवर्तन । श्रीमती शासनके तरेसठ वर्षमें भारत वर्षकी कितनी उन्नति अवनति हुई और क्यार परिवर्तन हुआ इस बातका पूरा विवेचन इस एक ही अध्यायमें नहीं हो सकता है। यह कार्य उसी समय सांगोपांग हो सकता है जब कि इस विषयमें एक स्वतंत्र पुस्तक लिखनाया मुझे इस पुस्तक में श्रीमतीके शासनकी सब बातोंका दिग्दर्शन करना है इसलिये इस विषयको यहांपर में विस्तारपूर्वक नहीं लिखसकताहूं । भारत वर्ष में अंगरेजोंका साम्राज्य स्थापित होनेसे पूर्व लूट खसोटका बड़ा जोर था । देशी राजाओंमें परस्पर युद्धका बाज़ार गर्म था। दिल्ली के सिंहासनपर एकको मारकर दूसरा बादशाह बननेकी कामनासे लड़ता झगड़ताथा | जगहर मारकाट होकर मजाके<noinclude></noinclude> bv90utgu9f7amhvyjl0z53qrrt71aee पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०६ 250 194829 665435 2026-07-06T15:35:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665435 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा भाग । ( २८९ ) सुखका कुछ प्रयत्न नहीं किया जाताथा। डाकू लुटेरे और बाहरी आक्रमणसे मजा थर थर कांपती रहती थी। किसीको अपने प्राण, धर्म और धमकी रक्षाका कहींसे सहारा न था । ब्रिटिश शासनसे धीरे २ यह भय जातारहा। जिस शांतिका बीज महारानीके शासनारंभसे पूर्व डाला गया वा ढालाजाने वाला था उससे वृक्ष उत्पन्न होकर पल्लवित और फलित होगया। जहां एक समय एक शस्त्रधारी समुदाय भी शांति पूर्वक यात्रा कर लुटेरों और डाकुओंसे बचनेकी आशा नहीं रखता था यहां अब एक बुठियाभी सोना उछालती चली जानेंगे हिचकती नहीं है । सीमामान्तकी जंगली जातोंसे इस देशकी साधारण प्रजाको जो रात दिन भय बना रहता था वह दूर होगया । पश्चिमोत्तर सीमा प्रदेशकी मजा चाहे जैसी कहर क्यों नहीं और उसे दमन करने में सरकारको कैसा भी कष्ट क्यों न उठाना पड़े परंतु अब किसीकी सामर्थ्य नहीं है कि प्रजाकी और आंख उठाकर देखसके ।। रेल और तार तो एक ओर रहा किन्तु उससमय सड़कका नामभी कोई नहीं जानता था और न यात्रियोंकी सुविधाका कोई उचित प्रबंध था । भारत वर्षे जैसे एकही देशमें बसकर, और एकही धर्मकी अनुयायी होनेपर भी इस देश के एक प्रान्तकी प्रजा दूसरे मान्तके रहन सहन और स्थितिले बिलकुल अन- भिज्ञ थी । उत्तरसे दक्षिण और पश्चिमसे पूर्व भागको जाने में असंख्य रुपया खर्च होने उपरांत कई महीनोंमें अनेक कष्ट सहकर जैसे तैसे यात्रा हो सकती थी । और जो मनुष्य चारों धामोंमें से एकभी यात्राकर आता था वह धन्य समझा जाता था । केवल इतनाही नहीं वरन घरसे निकलते समय मनुष्य अपने घरवालोंको और घरवाले उसे मरा हुआ समझ लेते थे। पहाड़ी अब इमे गिने दिनों में भारतके एक छोर से दूसरे छोर तककी यात्रा निश्चिन्ततांसे कर सकता है । उस समय मनुष्यको घरसे बाहर जाना जितना कठिन था उतनाही: अब हँसी खेल होगया है । उस समय एक प्रान्तकी उपन और कारीगरी पदार्थके लिये दूसरे प्रान्तपाले तरसते थे । उसेही अन वे लोग रेल और डाकके द्वारा घर बैठे पासकते हैं ॥ अंगरेजों के राज्यसे पहले इस देशमें डाकका कोई योग्य प्रबंध न था । ब्रिटिश शासनका आरंभ होकर शांति स्थापन होनेके अनन्तर डाक विभाग स्थापित होनेपर भी देशियोंके लिये किसीमकारका सुविधा न था। आरंभ में डाककी २३<noinclude></noinclude> 92gh7jls7z2npceljiqfg49cy55k9f2 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०७ 250 194830 665436 2026-07-06T15:35:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665436 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र | ( २९० ) चिट्ठियोंपर महसूल मीलके हिसाब से लगता था और मत्येक चिट्टका महसूल आ आनेसे कम न था । महारानीके शासनमें डाक विभागका बिलकुल काया पलट होगया । अव पत्र, पारसल, रजिस्टरी, बीमा, मनीआर्डर और वेल्यूपेविलके प्रचारसे मजाका दुःखदूर होकर सरकार और मजाका बहुत लाभ हुआ और दिन २ इसकी उन्नति करनेका प्रयत्न किया जा रहा है । इसी तरह तार विभागकी उन्नति से भी देशका बहुत उपकार हुआ || हिन्दुओंके आयुर्वेद में स्वास्थ्य रक्षाके जो नियम लिखे हैं वे इस देशवासि- योंकी प्रकृति और जल वायुके अनुकूल हैं परंतु सैकड़ों वर्षोंतक अशांति रहने और शिक्षा कम होनानेसे इस देशकी अधिकांश प्रजाने उनपर ध्यान देना छोड़ दिया था । प्रजाकी धर्मार्थ चिकित्सा करनेका कोई उचित प्रबंध न था । महा- रानीके शासनमें सरकारने इन बातोंपर बहुत ध्यान दिया । संक्रामक और दूसरे रोगोंसे बचानेका प्रयत्न कर स्थान २ पर अस्पताल स्थापित किये । और चाहे इस देशकी प्रजाकी प्रकृति और जल वायु तथा धर्मके डाक्टरी चिकित्सा अनेक अंशों में प्रतिकूल हो परंतु दीनसे लेकर धनवान् तकके लिये स्वतंत्रता से चिकित्सा करवानेका मार्ग खुल गया । प्रजाको अनायास अस्पतालों में दवा मिलनेसे लोगोंने देशी वैद्यकसे उपेक्षा की और इसका यह फल हुआ कि एक योग्य और उपयोगी शास्त्र धीरे २ लोप होता जाता है। और दीनता तथा योग्य भोजन न मिलने और असंयमकी वृद्धिसे लोगोंकी शक्ति घटती जाती है । इसीका यह कारण है कि पहलेकी अपेक्षा अब भारतवासी दृढ कम होते हैं, रोगी होते हैं और जीते कम हैं ॥ ब्रिटिश राज्यके भारतमें स्थापित होनेसे पूर्व यहांपर कपड़ा आदि सब पदार्थ हाथसे मनाये जाते थे । उस समयके कारीगर इस कार्यमें बड़े निपुण थे । इनकी बनाई वस्तुओंसे उस समय केवल देशका कामही नहीं चलता था बरन यहाँका बना माल परदेशों में जाकर बहुत आदर पाता था। अब हाथके कामका स्थान कळोंने लिया । दस्ती कारीगरी धीरे २ नष्टप्राय होगई । देशमें विलायती ढंगपर माल तैयार करनेके लिये कल कारखानोंकी योजना हुई । इस कार्यने भी बहुत शीघ्र उन्नति की और थोडेदी समय में बिलायतके ढंगपर कपड़ा आदि अनेक तरहका सामान भारत वर्ष में बनने लगा । इस कार्यकी यद्यपि वृद्धि होती है परंतु मजाकी ओरसे आश्रय न मिलने और कारखानोंपर टैक्स लगनानेसे अब शिथिल हो गया है । और इसी कारणसे देशीकारीगरी धीरे २ रसातलको चली जा रही है ।<noinclude></noinclude> 9f1xxp375ym5ifr2bsh756y5zl92jsl पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०८ 250 194831 665437 2026-07-06T15:35:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665437 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा भाग । ( २९१ ) साठ वर्ष पहले इस देशमें भूमि बहुत कम जोती बोई जाती थी परंतु उसमें उपजाऊ शक्ति बहुत थी। इस कारण थोड़ी भूमि जोतनेपर भी अन इतना अधिक उत्पन्न होता था कि जिससे केवल भारतवर्षका निर्वाह होने उपरान्त व्यापारियों की खत्तियां भरी रहा करती थीं और अकालके समय वही अन्न सहायता देता था । अब उतना अन्न चप्पा २ जमीन जोतनेपर उत्पन्न होता है । उपजका अधिक भाग विदेशको चला जाता है। इसके साथही अफीम रुई और नीलकी खेती भी बहुत होती है। प्रायः ये तीनोंही पदार्थ परदेशको जाते हैं। और यहींकी रुईसे विलायतमें जो कपड़ा बनता है वह इस देशवालोंके शरीरको ढांकता है । इसके अतिरिक्त देशी कारीगरीके नष्ट होजाने और परदेशी मालके चाकचक्य- पर प्रजाकी रुचि बढ़नेसे दिन २ बाहरका माल यहां आकर अधिक २ विकता है और सौ वर्ष पहले भारतवर्षका बना पदार्थ परदेशके बाज़ारोंमें जितना आदर पाता था उससे कहीं बढ़कर विलायती मालका भारतवर्ष में इस समय आदर है । भारतवर्षके व्यापारी आढ़त और सट्टेमें लगे हुए हैं और देशका व्यापार धीरे २ परदेशियोंके हाथमें चला जाता है। नील और ईसकी खेतीका काम अब यूरो- पियन लोग भारतवर्ष में करने लगे हैं और चायकी खेती भी बहुत होनेलगी है ॥ यद्यपि श्रीमतीके सिंहासन पर विराजने पूर्व इस देशमें शिक्षाविभागका जन्म होगया था और कहीं २ पाठशालायें भी स्थापित हुई थीं परंतु श्रीमतीके शासन में गाँव २ पाठशाला होगई। अंगरेज़ी भाषाने इस देशमें बहुत उन्नतिपाई । देशी भाषाओंने भी थोड़ेही कालमें बहुत कुछ उन्नति कर दिखाई और जहां अंगरेजी वा देशभाषा में पत्र लिखनेके लिये ढूंढने पर कठिनता से मनुष्य मिळता था वहां हजारों लाखों विद्वान देख पढ़ने लगे । विद्वानोंकी वृद्धिले देशकी दशा सुधरनेकी आशा करना चाहिये था परंतु प्रचलित शिक्षामणाली उच्च कक्षामें पहुं- चने पर भी विद्यार्थीको पाठशालाओं में मास्टरी और दफ्तरोंमें झुकीं करनेके सिं- चाय और किसी प्रकारकी शिक्षा नहीं देती है इस लिये देशको इसमकारके विद्वानोंसे ऊब होगई और नानाप्रकारके पेशेवालोंके अपना पेशा छोड़कर अंगरेजी पढनेके कारण पढ़े लिखे मनुष्योंकी बहुतायत होकर विद्वान् सस्ते होगये । किन्तु साथही में ब्रिटिश गवर्नमेंटकी कृपासे देशभाषाओंकी भी बहुत उन्नति हुई और दिन २ होती जाती है। श्रीमतीके शासनमें कई एक विश्व विद्यालय स्थापित होकर विद्योपार्जनकी श्रृंखला गई ॥ पाठशालाओंके स्थापित होने पूर्व संस्कृतका प्रचार देशमें घट गया था। बहुतही थोड़े मनुष्य संस्कृतको पढ़ते थे। परंतु उस समग्रके पढ़ने वालोंमें विद्वान् अधिक<noinclude></noinclude> gp6i184v8hqj7amj0m5u8ngk66cf6ss पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३०९ 250 194832 665438 2026-07-06T15:35:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665438 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ( २९२ ) होते थे। सरकारने अंगरेजी और देश भाषाओंके साथही संस्कृत शिक्षा का भी प्रचार किया परन्तु पाठशालाओंगे इसकी पढ़ाई कमहोनेसे पूर्ण विद्वान होनेके बदले “पल्लवग्राह् पाण्डित्प"को चरितार्थ करनेवाले संस्कृतज्ञ बहुत बढ़गये। और हिन्दी पद्यका यद्यपि बहुत कालसे मचारथा परन्तु वर्तमान स्थितिके पद्यने महारानीके राज्यमे जन्मलेकर ठीक २ उन्नति की और चाहे इसकी अन्यभाषाओंके समान वृद्धि न हुई हो परन्तु दिन २ हिन्दीका झुकाव उन्नतिकी ओर बढ़ता जाता है ॥ देशभाषा, अंगरेज़ी और संस्कृतकी उन्नतिमें मुद्रालय बहुत सहायक हुए । महारानीके शासनके अंतिम भागमें इसदेशकी प्रजाने पुस्तकें मुद्रित करानेके लाभोंको अच्छी तरह जानलिया और भिन्न २ भाषा और विषयके अनेक अच्छे और बुरे ग्रंथ मुद्रित होकर देशियोंकी इस ओर रुचिवड़ी और साथही सर्व साधा- रणको पुस्तकें सस्ती मिलने लगीं। और इसके द्वारा अनेक अलभ्यग्रंथ सुलभ होगये । श्रीमतीके शासनमेंही अंगरेजीके सिवाय देशभाषाओंके सैकड़ों समाचार पत्रोंका जन्म हुआ । और उन्होंने अपनी उन्नति कर राजाकी और प्रजाकी बहुत सेवा की। और अबभी कररहे हैं । मुसलमानों के राज्यमें हिन्दू स्वतंत्रता पूर्वक अपने धर्म संबंधी कार्य नहींकर सकते थे। और उन्हें करोंसे और दयावसे इसकार्यसे रोका जाता था। ब्रिटिशराज्य और विशेष कर महारानीके शासनने इसदेशकी भिन्न २ जातों को अपने धर्म और समाज संबंधी कार्यों में स्वतंत्र कर दिया। और किसीके धर्ममें हस्ताक्षेप न करनेकी नीतिका दृढ़ प्रचारकर सबको अपने २ धर्मकी उन्नति करनेका अवसर दिया । श्रीमतीके राज्यमें हिन्दुओं और मुसलमानों में कई एक नवीनमत स्था- पित हुए और प्राचीन मतवालोंने अपनी २ उन्नतिका प्रयत्न किया । परन्तु पश्चि- मीशिक्षा और नीतिके प्रभाव तथा योग्यशिक्षाके अभावसे प्रजाकी रुचिका अनेक अंशोंमें धर्म तथा सामानिक विषयों में परिवर्तन होगया और शिक्षित लोग अपनी प्राचीन प्रणालीको अनुचित बतलाकर पश्चिम वालोंका अनुकरण करनेपर उतारू हुए। परन्तु साथही में प्राचीन धर्म और रीति से प्रेमरखने वाले लोगों ने और विचार शील यूरोपियनों ने हिन्दू धर्म का महत्व समझाकर उन्हें पश्चिमकी ओर बढ़ने से रोक दिया और इसका फल यह हुआ कि उनकी दृष्टि में शनैः २ हिन्दुओंके धर्म तथा नीति का महत्व सत्यमतीत होनेलगा || हिन्दुओंके घरमें धर्म और नीति शिक्षाका अभाव होनेसे और पाठशालाओं में इसप्रकारकी शिक्षा न पाकर देशियोंके आचरणमें प्रायः अंतर आगया और जो लोग<noinclude></noinclude> 83yi1n5s9ksno5goka71kkntk11odar पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१० 250 194833 665439 2026-07-06T15:35:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665439 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा भाग । ( २९३ ). देशोन्नतिका भार अपने ऊपर लेनेके योग्यये उनमें और उनकी देखा देखी अशि- क्षितों वा अर्द्ध शिक्षितोंमें अंगरेजों के उद्यम, स्वदेशमेम आदि गुणग्रहण करनेके साथी मद्यादि दुर्गुणोंने भी प्रवेश करदिया और धर्मकी कुछ पर्वाह न कर जो लोग विदेश पढ़नेके लिये गयेये उनमें से कईएकने पश्चिमी चाकचक्यसे मोहित होकर मैमों से विवाह किया। इसशासनमें भारतवासियोंके विलायत जानेका फाटक खुटतानाताहै और सैंकड़ों ही मनुष्य वहांसे विद्योपार्जन कर देशके अनेक अंशमं काम आये परंतु भेड़िया घसानने यहांभी भारतका पीछा न छोड़ा। इनलोगों में वैरिस्ट की ओर रुचिबढ़कर इनका बाज़ार सस्ताहोगया । परंतु साथही विलायत न आकर, भारतमें आईन पढ़नेके लिये कालेज खुलनेसे देशी वकीलभी बहुत होगये और कहीं २ इनके बाहुल्पसे ऊबभी देखने में आई || पाठशालाओ में उच्चशिक्षा प्राप्तकरनेसे देशियोंने जानलिया कि ब्रिटिश नीति के अनुसार और महारानी के ढिंढोरे और प्राचीन आईनसे राज्यमधिके फार्मर्मि हमारा कितना स्वत्वहै, प्रबंध सुधरवानेके लिये हमें किसप्रकारका आन्दोलन करना चाहिये और देशोन्नति क्योंकर होसकती है । अनेक वर्षों के आन्दोलन के पश्चात् इसी उद्योगसे भारतवासियोंने नेशनल कांग्रेसकी सृष्टिकी । इससे यद्यपि प्रकृत लाभ न हुआ परंतु सम मान्तेोंकि लोगों में एकता बढ़ी और अनेक अंशों में किसी न किसी प्रकारपर सरकारने उनकी प्रार्थनापर ध्यानदिया। इस देशमें ''लोकल सेल्फ गवर्नमेंट' अर्थात् आत्मशासन प्रणालीका आरंभ हुआ और . देशियोंको प्रबंध और न्याय विभागमें उच्चपद मिलनेलगे । इसके सिवाय एक बहुत बड़ा कार्य यह हुआ कि गवर्नमेंटने आईन बनानेवाली सभाओं में देशी मैंचरोंके चुननेका प्रजाको स्वत्वदिया और समय २ पर देशीलोग प्रबंधकी त्रुटिपर सरकारका ध्यान आकर्षित करनेलगे। यह महारानीके शांतिमय शासनका परिणाम है। इससमय इतना भी लिखना आवश्यकहै कि पश्चिमी शिक्षासे देशि- यो जितना आंदोलन करना सीखा उतना वास्तविक उद्योगपर ब्यान नदिया और देशोन्नतिके लिये सरकारसे प्रार्थना करनेके साथही देशी कारीगरीकी उन्नति और व्यापारकी वृद्धिके लिये जिन कामोंको येलोग स्वयं कर सकते हैं उनपर उपेक्षा करने और सरकार के उत्तेजना वा सहायता न देनेसे देशकी कारीगरी दिन २ नाशहोती जाती है । और इसके साथही सरकारी लगानकी अधिकता, करोंकी वृद्धि, फसलोंके बिगड़ने और देशियोंका खर्च मनानेस दिन २ भारतवर्ष दरिद्री होत जाताहै । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण गतवर्षके अकाल हैं इन बातोंसे निश्चय होगया है कि भारतवर्ष में अन्नका अकाल नहीं किन्तु रुपये<noinclude></noinclude> t5rz95isahbmybre0g8gc1fe54ha30h पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३११ 250 194834 665440 2026-07-06T15:36:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665440 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२९४) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । का अकाल है और यही सुकालके समय महँगी रहनेका कारण है। श्रीमतीके शासनारंभ में अकालके समय अन्नका जो भाव रहताथा वह भी अब सुकालके समय नही रहता है ॥ इन सब बातोंपर ध्यान देनेसे निश्चय होता है कि श्रीमतीके शासनमें देशकी जितनी उन्नति हुई है उतनी अवनति भी हुई है परंतु इसमें अधिक तर दोष देशियोंका है। सरकार की नीति और प्रबंध उन्हें अपने धन, धर्मकी उन्नति कर- नेमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं डालते है और अनेक वर्षों की शांति उन्हें उत्ते- जना देती है कि वे अपनी उन्नतिके लिये सरकार के आईनकी सीमा में रहकर उद्योग करें । यथावश्यक न्यायालयोंके स्थापित होनेसे मजाको अन्याय और अत्याचारियोंसे बचनेका अच्छा अवसर मिलता है और एक दीन मनुष्य बड़ेसे बड़े अधिकारी और धनाड्यपर नालिशकर न्याय पा सकता है परंतु इसके साथ ही लोगों में मुकद्दमे बालीका चसका बढ़ता जाता है। इस समय यह भी लिखना आवश्यक है कि सरकारी सेना और पुलिससे देशकी शांतिकी जैसे रक्षा होती है और यूरोपियन तथा देशी कर्मचारी जिस तरह सुप्रबंध कर मजाका उपकार करते हैं उसी तरह इनके हाथसे अत्याचार भी बहुत होते हैं परंतु जहां तक वन पड़ता है सरकार मजाकी पुकार सुनकर न्याय करनेकी चेष्टा करती है। और समय २ पर इनके अधिकारों के संशोधनका विचार भी किया जाता है । अध्याय ८. अन्य राज्यों से ब्रिटिश शासन की तुलना । बालवयमें महारानी नहीं जानती थीं कि मेरे समयमें ब्रिटिश राज्य यूरोप भरके राज्योंसे अनेक वातोंमें बढ़ जायगा किन्तु ईश्वरको इनके शासनमें ब्रिटिश प्रजाका अपूर्व टपकार और उन्नति करनी स्वीकृत थी। इस अध्यायके विषय पढ़नेसे मालूम होता है कि यह राज्य यूरोपके साम्राज्यों में किस दवदवे और कैसी स्थितिका है । यूरोपके अन्य राज्यों में एक, दो, तीनसे बढ़कर धर्म और जाति लोग नहीं वसते हैं किन्तु महारानीके राज्यमें श्वेत, कृष्ण, पीले भूरे, और लाल रंगके मनुष्य बसते हैं और उनका धर्म ईसाइयोंमें प्रोटेस्टेंट, रामनकेथोलिक, ग्रीक चर्चके सिवाय मुसलमान बौद्ध और मूर्ति पूजक हैं ॥ आजकल ऐसी जन श्रुति होगई है कि महारानीके राज्यमें कभी सूर्य अस्त नहीं होता है। इसका प्रयोजन यही है कि उनका राज्य इस भूमंडलके प्रत्येक अंशमें थोडा और<noinclude></noinclude> qiuxchymet3kcpv5spn5uxl06ixbbfo पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१२ 250 194835 665441 2026-07-06T15:36:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665441 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>राज्य क्षेत्रफल लोकसंख्या इंग्लैंड १२०००००० ३९००००००० रूस ६४४४००० १३००००००० तीसरा भाग । (384) बहुत विद्यमान है । इसकारण जब एक भागमें रात्रि होती है तो दूसरे में अवश्य दिन होता है । ब्रिटिश राज्यकी अन्य राज्योंसे तुलना इस भांति है:- सामुद्रिक व्यापार टन १४०००००० ० प्रति मनुष्य व्यापार ३९० शि० २७ जर्मनी एमेरिकाके ३६५०००० स्वतंत्ररा० फ्रांस २८४०००० ९६०००००० १२३५००० ७००००००० 6000.00 १०० ע ४८००००० १६२ " १२४२००० १५६ " २५००००० इटाली ८७६००० स्विटजरलैंड स्वीडन, नॉर्वे ° २३००००० ऊपरके लेने में नहांकी संख्या उपलब्ध नहोसकी वहां बिन्दी देवी गईहै । सन् १८५० ई० में इंग्लैंड में प्रति सैकडा ५.१३ भिखारी थे किन्तु सन् १८९९ ई० में ५.११ प्रति सैंकड़ा रहगये। जिसतरह वहां दीनता कमहुई है उसी तरह अपराधियोंकी संख्याभी घटी। सन् १८५० ई० में सब मिलकर ४० हज़ार मनुष्योंको जेल हुआथा किन्तु सन् १८९० ई० में १८८७० को लंडन नगरकी बस्ती महारानीके राज्यमें २० लाखसे बढ़कर ४० लाख होगई है | ब्रिटिश राज्यके पास इस समय सब मिलाकर ॥ लाख सैनिकहें। इनमें भारत वर्षके देशी रजवाड़ोंकी यह सेना जो सरकारकी सहायता के लिये दीगईहै और उसकी संख्या ३० हजारके भीतरहे सम्मिलित नहीं की गईहै । भारतवर्ष में कुल गोरी सेना ८० हजार और काली २ || लाखके लगभग है। यूरोपके समराज्योंमें अंगरेज़ोंसे सेना अधिक है। इस बातका दिग्दर्शन नीचे के लेखेसे होताहै ॥ राज्य शांतिके समय युद्धकेसमय सेना भरती करनेकी मलात् आज्ञा होनेसे प्रति वर्ष वृद्धि रूस ९ लाख २५ लाख फांस जर्मनी ५ लाल ९० हजार ४७९२२९ २५ लाख • ३लाख ६० हजार<noinclude></noinclude> 9ku0bqgj80i3ivjst4toihr1jrfajrn पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१३ 250 194836 665442 2026-07-06T15:36:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665442 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २९६ ) आस्ट्रिया महारानी विक्टोरियाका चरित्र । ३ लाख ६० हज़ार १८ लाख ६० हज़ार रूम ७ लाख यूनान २६ हजार आवश्यकता पढनेपर ४० काख समय पढनेपर २० वर्षके ऊपर ४० के भीतरका प्रत्येक मनुष्य सेनामें भरती किया जासकता है । ८२ हज़ार यद्यपि अंगरेज़ी सेना थोड़ी है परंतु इनका चातुर्य अधिक इसलिये किसी राज्यको गवर्नमेंटसे लड़नेका साहस नहीं होता है | अब इंग्लैंड में सेना वृद्धिका विचार होरहा है। संभव है कि थोड़े कालमें वहांकी सेना बढ़जाय ॥ तीसराभाग समाप्त |<noinclude></noinclude> djuwfffwwqsyrztwi0euf5j83pxp583 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१४ 250 194837 665443 2026-07-06T15:36:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665443 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तीसरा भाग । श्रीमतीमहारानी एलेक्जेंड्रा | श्रीमान् सम्राट् सप्तम एडवर्ड । (२९७ )<noinclude></noinclude> mvm7a4z7p3lwxwz1djefj75aiv4lyi2 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१५ 250 194838 665444 2026-07-06T15:36:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665444 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१६ 250 194839 665445 2026-07-06T15:36:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665445 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीगणेशायनमः । श्रीमान् सम्राट् सप्तम एडवर्ड का चरित्र | चौथा भाग । अध्याय १. जन्म, विवाह और शिक्षा । सन् १८४१६० के नवंबर मासकी ९ तारीखको इंग्लैंडके बकिंगहाम राज महल में श्रीमती महारानी विक्टोरिया दूसरे गर्भसे पुत्रका जन्म हुआ। श्रीमती उत्तराधिकारी उत्पन्न होनेके हमें ब्रिटिश और भारतीय प्रजामें आनन्दकी बधाइयां बजने लगीं । देश देशांतर के राजा, प्रजा, अमीर, गरीबने बधाईके तार और पत्र भेजकर राजमहलको भर दिया । ब्रिटिश साम्राज्यके बडे २ नगरोंमें हर्षसूचक सभायें हुई और राज्य भरमें इस बात के निमित्त उत्सव कियागया । संसार में पुत्र मुखके सहा कोई दर्शनीय सुखनहीं है। महलों में सुख भोग करनेवाले राजा और झोंपड़े में निवास करने वाले भिखारीको पुत्रके जन्मसे बराबर मुख होता है। राजा उसका राजसी ठाठसे लालन पालनकर मनको प्रफुल्लित करता है और दीनपुरुष अपनी शक्तिके अनुसार खर्च करके । किन्तु दीनका सुख राजाके सुखसे किसी अंशमें कम नहीं होताहै । ऐसी दशामें मंदि श्रीमती और उनके पतिको पुत्रके जन्मसे सुख हुआ होतो आश्चर्यही क्याहै। परंतु इनका सुख असाधारण था। यह दंपति पुत्र पुत्रीका मुख देखकर हर्षविव्हल होजाते थे। इनके जन्मके पश्चात् दोनों चालकोंके मुख कमल निहारकर ऐसे मग्न होगये थे कि कोई भी इष्ट मित्र और संबंधी के नाम का ऐसा पत्र रीता नहीं जाता था जिसमें इन्होंने अपने इस सुखकी चर्चा न कीहो । इनके जन्मके एक मासवाद श्रीमतीने अपने चाचा बेलजियमके राजा लियोपोल्ड के नामलिखाया कि मेरा प्यारा पुत्र कैसा निकलेगा इसपातके जाननेकी मेरे मनमें सदा उत्कंठा रहती है परन्तु मैं आशा करती हूं कि यह अपने पिताके तुल्य होगा " ||<noinclude></noinclude> i9qkcxrul75adw5ofvkymi6yfi9tq5s पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१७ 250 194840 665446 2026-07-06T15:37:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665446 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३०० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । २५ जनवरी सन् १८४२ ई० को ईसाई धर्मके अनुसार इन्हें राजसी ठाटसे बपतिस्मा दियागया। उस समय राजकुमारके धर्म पिता भूशियाके राजा बनाये गये । नाम करण संस्कारमें इनका नाम श्रीमती की ओरसे एलबर्ट और पिताके नामपर एडवर्ड रखखागया। इसतरह दोनों नामोंको मिलाकर 'एलबर्ट एडवर्ड' संयुक्त नाम हुआ । इनके और इनकी भगिनी ( वर्त्तमान जर्मन सम्राट्की माता ) के लालन पालनका कार्य मिस ब्रोम नामकी एक विदुषीको देकर इसका वेतन दश हजार पौंड वार्षिक नियत किया गया। इंग्लैंडकी राजशतिके अनुसार युवराजका जन्म होते ही यह डचूक आफू कार्नवाल कहलाने लगता है इसलिये यह इस पदवी को तो जन्मके साथ प्राप्त करही चुके थे किन्तु इसदिन इन्हें विंडसरके राजम- हमें बहुत धूमधामके पश्चात् "प्रिंस आफू वेल्स" की पदवी गई। इस उत्सव मैं २० लाख रुपया व्यय हुआ । जबसे ब्रिटिशलोगोंने वेल्सके राजाको परास्त कर वेल्स राज्य इंग्लैंड में मिलाया यहांका युवराज “ प्रिंस आफू वेल्स" कहलाता है । इसी नियमके अनुसार इनको यह पद दियागया । इसके सिवाय सेक्सकोवा गोथाके डचूकका पदभी इसीसमय इनको मिलगया और साठ हज़ार पौंड इनके वार्षिक व्ययकेलिये ब्रिटिशराज्य की ओरसे नियतहुआ । इनके माता पिता इनसे 'घट' अथवा 'प्यारे घर्टी ' कहा करते थे ॥ जब राजकुमार सात वर्ष के हुए इंग्लैंड में इनकी शिक्षाके विषयकी चर्चा होने लगी | इनके पिताने इस बात पर विशेष ध्यान दिया और इनकी शिक्षाके लिये मास्टर नियत करते समय कहा कि- "यह बहुत आवश्यक बात है । ईश्वर इस पर कृपा करे क्योंकि आजकल संसार की उन्नति का आधार राजाकी शिक्षा पर है।" आपके मित्र बैरन स्टाकमोरकी सम्मतिके अनु- सार इनको इस प्रकारकी शिक्षा देना स्थिर हुआ जो इंग्लैंड की भविष्यत् स्थिति के अनुकूल हो । इंग्लैंड की प्रजा इनकी शिक्षा के लिये बहुत उत्कंठित थी । इस सम्मति को उसने पसंद किया और मिस्टर गिब्स, मिस्टर फिशर और मिस्टर टार्वर इनके शिक्षक नियत हुए। इन तीनोंसे विद्याभ्यास करने के सिवाय इन्होंने जर्मनीके कोनिंग्स विंटर में और एडिनबरा, आक्स- फोर्ड तथा केम्ब्रिज में रहकर शिक्षापाई । शिक्षा पाते समय इनके साथ साधारण व्यक्तिके समान वर्ताव किया जाताथा । इसबात को महारानीने स्वयं देखकर बहुत हर्ष प्रकट किया । सन् ६१ ६० में यह केम्ब्रिज विश्व- विद्यालयकी अंडर ग्रेडयुण्ट परीक्षा में उत्तीर्ण हुए और सन् ६८ ई० में<noinclude></noinclude> ngmuiawcrj4j5ieeq23g2m4zklqrsuh पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१८ 250 194841 665447 2026-07-06T15:37:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665447 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भाग । ( ३०१ ) कालेज एडिनबरा 'आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने डी. सी. एल, ट्रिनिटी और डबलिन की यूनिवर्सिटियोने एल्. एल्. डी की और सन् १८७४ ई० में कलकत्ता विश्व विद्यालयने इनको सम्मानार्थ यही पदवी प्रदान की । सन् १८४८ ई० में यह अपने माता पिताके साथ आयलैंड गये। वहांकी प्रजाने इनका बहुत सम्मान किया। वहांसे लौटने पर ३० अक्टूबर सन् १८४९ ई० को यह प्रथम बार अपनी माताकी आज्ञासे एक्सचेंजकी सभामें विराजे । राजसी तौर पर इनकी सवारी निकलनेका यह प्रथमही अवसर था इसलिये लंडनका बाजार इनके दर्शनके लिये भीड़से खचाखच भरगया || सन् १८५१६० में आपको प्रथम वार कार्ड सभामें स्थानमिला। और इनकी बैठक महारानीके पास नियत हुई । सन् ५५ ई० में यह माता पिताके साथ, कीमिया युद्धमें घायल होने वालोंको, देखनेके लिये चेचेरके अस्पतालमें गये। सैनिकों की रक्षा के लिये जो फंड खोलागया उसमें इन्होंने अपना चित्र भेजकर पचपन गिनीका उपहारपाया और वह उपहार इस कार्यमें लगादिया ॥ राज्यप्रबंधकी झंझटोंमें लगे रहने पर भी महारानीका इनकी शिक्षापर बहुत ध्यानथा । वह इनको उत्तम शिक्षा दिलाकर धार्मिक राजा बनाना अपना प्रधान कर्तव्य समझती थीं। इस विषय में श्रीमतीके चरित्रके अध्याय २५ में लिखा गया है । यहां पुनरुक्ति करने की आवश्यकता नहीं है तथापि इतना कहना चाहिये कि एक मार कोई विद्वान् युवराजकी परीक्षाके लिये राजमहलमें गयाथा।' उसने इनको धार्मिक विषयोंमें निपुण पाकर इनके शिक्षकों की प्रशंसाकी यह बात इन्हें असह्य हुई। यह तुरंत बोला उठे कि हमें धार्मिक शिक्षा मास्टरोंने नहीं दो किन्तु यह कार्य माताने कियाहै ।" माताके उपदेशानुसार यह नित्य गिरनेमें जाया करतेये । क्रीमियां युद्धके पश्चात् जब यह फूांस गये तो यहां भी इन्होंने गिरजे प्रार्थनाके लिये जाना न छोड़ा || चौदह वर्ष वयमें इन्होंने इंग्लैंडके पश्चिम भागकी यात्राकी । इसके बाद जर्मनी की यात्रासे छीटकर जब यह आयलैंडगये तब इनकी उमरका अठारहवां वर्ष पूराहोचुका था । माताने इनको उन्नीसवीं वर्षग्रंथिपर एक पत्र लिखा जिसका आदाय यह था कि-" अबसे तुम युवा होगये। अब माता पिताकी रक्षाले अलग हुए। अब तुम अपने कार्य संपादन करनेमें स्वतंत्रहो । आजसेही तुम्हारी पढ़ाई बंदकी गई है । इसका कारण यही है पढ़नेसे कही तुम्हारा मस्तिष्क निर्मल न पड़जाने निर्मल मस्तिष्क वाले पर चाटुकारों (शुशामदियों) का बड़ा प्रभाव पड़ता है । यह बात राजाओंके लिये बहुत हानिकरहै । अब तुम<noinclude></noinclude> n4zcv5p29ah450drzlzbmxwii0x558d पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३१९ 250 194842 665448 2026-07-06T15:37:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665448 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३०२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । स्वतंत्र हो । इससमयसे तुम्हारे ऊपर शिक्षाका दबाव नहीं डाला जायगा । परंतु यथावश्यक मैं और मेरे पति तुम्हें अच्छी और उचित सम्मतिदेने में तैयार रहेंगे।" इसी दिन श्रीमतीने इनको सेनाका अवैतनिक कर्नल नियत किया। महारानीका पत्र पाकर इनकी आंखोंमेंसे आंसू भर आये और उसी पत्रको इन्होंने भविष्यत्के लिये अपना पथदर्शक बनाया। एडिनवरोंमें निवासकर इन्होंने सर लायन फे- रसे इतिहास, शिल्प तथा इटाली, जर्मन और फरांसीसी भाषामें शिक्षा पाई और इसी वर्ष इन्होंने गार्टरके नाइट्की उपाधि धारण कर कर्नल धूससे युद्ध शिक्षा आरंभ की ॥ अपनी उन्नीसवीं वर्षगांठका उत्सव हो जानेके एक मास बाद यह भेष बदल कर बैरन रेंके नामसे गुप्त रीतिपर फ्रांस देशकी यात्रा करने गये। इस यात्रा- में यह रोमके पोपसे मिले और स्पेन तथा पुर्तगाल होकर इंग्लैंडको लौट आये। यहाँ आने बाद इन्होंने पढ़ने और सेनाकी कवाइद सीखने में इतना परिश्रम किया कि इंग्लैंडके समाचार पत्र इनके लिये "अधिक मोझेसे दबा हुआ राज- कुमार" कहने लगे। ऊपर लिखे विषयोंके सिवाय इन्होंने आईन पढ़नेयें और रसायन शास्त्रका अभ्यास करने पर विशेष ध्यान दिया। पढ़नेके साथ ही साथ सप्ताह में तीनवार इन्हें सनामें कवाइद सीखने भी जाना पड़ता था । जब आपका बय विवाह योग्य हुआ, अनेक राज कुमारियां आपसे विवाह करनेकी अभिलाषा करने लगीं परंतु इससे पूर्वही यह डेनमार्क की राजकुमारी एलेक्जेंड्रा का चित्र देखकर उसपर मोहित हो चुकेथे इस लिये इन्होंने किसी और को पसंद न किया । सन् ६१ में जर्मनीकी यात्राके समय आपकी प्राण- प्यारीसे प्रथम बार भेंट हुई। वहांसे हालैंड जेरूसलेम और कुस्तुनतुनियाकी यात्रा कर जब आप बेलजियम गये तो वहां फिर राजकुमारीसे भेंट हुई। इसी भेंट में दोनोंने विवाह करना निश्चय किया। उस अवसर में इनके पिता ( श्रीमतीकै पति) का देहान्त हो चुकाथा इस लिये कुछ कालतक यह बात गुप्त रक्खी गई किन्तु महारानीका शोक छुड़ानेके लिये १० मार्च सन् १८६३३० को विवाह होगया । इनकी प्रियपत्नीका जन्म १ दिसंबर सन् १८४४ ई० का है । सन् ८८६० में आपके विवाहको पूरे पचीस वर्ष होने पर रुपहरी विवाहका उत्सव किया गया। और ईश्वर कृपासे सन् १९१३६० में सुनहरी विवाह होगा । विवाह के पश्चात् पार्लियामेंटने इनको ४० हजार पौंड अधिक और इनकी पत्नीको १० हजार पौंड वार्षिक देनेका ठहराव किया || .<noinclude></noinclude> ecnyc4fo0lhgk8xow5394bkt384hdtp पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२० 250 194843 665449 2026-07-06T15:37:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665449 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भाग । ( ३०३ ) सन् ६४ ई० में आपके प्रथम पुत्र परलोक वासी ड्यूक आफू कारेंस (सिं एलबर्ट विक्टर) का और दूसरे ही वर्ष डच्चूक आफ यार्क ( प्रिंस ज्यार्ज) का जन्म हुआ इनके सिवाय आपके जितने पुत्र और पुत्रियां हुई उनके नाम वैश वृक्षमें लिखे गये हैं | श्रीमान्के बड़े पुत्र ड्यूक आफ क्लॉरेंसकी मृत्युसे जो शोक हुआ उसका वर्णन महारानीके चरित्रके अध्याय ४५ में किया गया है। और अध्याय ४७ में आपके द्वितीय पुत्र डयूक आफ यार्क ( वर्तमान प्रिंस आफ वेल्स ) के विवाह संततिका वर्णन है । अध्याय २. सालीसे विवाह करनेका विल और एमेरिकाकी यात्रा । ५ फरवरी सन् १८६७ ई० को श्रीमान् पार्लियामेंटकी लार्ड सभायें भरती हुए । इन्होंने लिवरल और कंसवेंटिव दलोंके परस्पर झगड़ोंमें पड़ना उचित न समझकर कभी राज्यपथके काम में सम्मति न दी । और जिस समय जिस दलका मंत्रिमंडळ होता उससे उदासीन रहना और उसके विरुद्ध पक्षके साथ मेल रखना यही अपने भविष्यत्के शासनके लिये उपयोगी समझा किन्तु स्वर्गवासी मिस्टर ग्लैडस्टन पर इनकी बहुतही पूज्य बुद्धि थी । मायः उनके मकानपर जाकर उनसे मिला करते थे । यूरोपियन लोगों में अपने ही कुटुंबकी कन्यासे विवाह करलेनेकी चालतो है परंतु ईसाई धर्मके अनुसार सालीसे विवाह होना दूषित समझा जाता है। इस नालको तोड़कर सालीको विवाहनेकी स्वतंत्रता मिलनेके लिये इंग्लैंडकी प्रजामें आन्दोलन हुआ इसका परिणाम यह हुआ कि इस विषयका एक बिल पार्लियामेंटकी लार्ड सभामें उपस्थित किया गया । उस समय आपने अपने सदाके नियमका भंगकर इस बिलकें अनुकूल सम्मतिदी ॥ विवाहके पांच वर्ष बाद आप सपत्नीक आयलैंड गये। वहांकी प्रजाका प्रेम और विश्वास संपादन करनेके लिये आपने डबलिनके मुहल्लोंमें फिरते समय अपने साथ शरीर रक्षक न रक्खे और दंपति अकेलेही इधर उधर घूमते रहे किन्तु आयलैंड की प्रजाने इंग्लैंड के साथका द्वेष भाव छोड़कर इनके लिये बहुत राजभक्ति दिखाई और इनका बढ़ा सम्मान किया ||<noinclude></noinclude> p4kqn5itrk35d3qry12qf7nkupm8o6g पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२१ 250 194844 665450 2026-07-06T15:37:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665450 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३०४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । कीमिया के संग्राम में केनाडाने एक पैदल रेजिमेंट भरतीकर इंग्लैंडकी सहायता के लिये भेजी थी। इस सेवा के बदले वहां वाले चाहते थे कि एक बार महारानी एमेरिका जाकर उन लोगोंके देशको सम्मानित करें । दूर देशकी यात्रा और मार्गके कष्टका विचारकर जब श्रीमतीने जानेका निषेध किया तो वे लोग प्रार्थी हुए कि हमारे देशका शासन करने के लिये श्रीमतीका कोई पुत्र गवर्नर जनरल नियत किया जाये । यह वातभी अस्वीकृत हुई और उनका संतोष करने के लिये युवराज का भेजना निश्चय हुआ । इन्होंने वहां जाकर सेंट लॉरेंस नदी का पुल अपने हाथसे खोला और ओटावाकी पार्लियामेंट का भवन बनाने के लिये नींव का पत्थर डाला । केनाडामें इनका आशासे अधिक सत्कार हुआ । यह यात्रा सन् ६० ई० में हुई थी । इनके सत्कार का अनुमान सेंट जानके पादरी की मेमके एक पत्रसे होता है जो उसने लेडी हार्ड बिक को लिखाथा । उस पत्रका आशय यह था कि- “ यदि न्यूफौंड लैंडकी तरह सबही उपनिवेशों में इनका सत्कार होगा तो इस दौरे से देशको बहुत कुछ राजनैतिक लाभ होगा। इनके दर्शन से सब ही स्त्री पुरुषों के हृदयमें बहुत आनन्द हुआ है। यहां ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो राजकुमार के वियोग पर आंसू न बहताहो । गवांर मछुए उनको देख कर हर्षसे विह्वल होगये हैं। वे पुकारश्कर यही कहते हैं कि ईश्वर राजकुमारके मुख कमलको सदा प्रफुल्लित रक्खै ” जैसा सत्कार न्यूफौंड लैंडमें हुआ वैसाही सर्वत्र हुआ और एमेरिकाके संयुक्त राज्योंके प्रेसीडेंट मिस्टर बुकेनके अनुरोधसे२ ४न्लाई सन् १८६०६० को आप वहांकी राजधा- नी वाशिंगट्न गये। वहांक नामों में यह बढे २ रईसों और मछु आँकी खियाके साथ नाचे। जिन दिनों यह वाशिंगट्नमें प्रेसीडेंटके यहां मेहमानये उस नगर में एक भयंकर खेळ होता था। इसखेल में एक नट नाइगरानदी के आरपार रस्सा बांधकर पैरोंमें बांस बांध उनके सहारेसे चलकर नदीके दूसरे किनारे पर चला जाताथा। श्रीमान्ने इस भयंकर खेलसे किसी दिन उसके प्राणजानेकी संभावना समझकर उसे इसकार्य से रोका परंतु उसने इनकी सम्मति न मानी और कहाकि यदि आप मेरी पीठ पर चढजावैं तो मैं आपको भी ले जासकता हूं । एमेरिकाके प्रेसीडेंटने इनकी यात्रा के विषयमें महारानीको जो पत्र लिखा उसमें लिखाया कि राजकुमारने हम सब लोगों के मनको जीत लिया है "। फिलेडेल्फिया और न्यूयार्क होकर जब आप इंग्लैंडको रवाना हुए तो मार्गमें इनके जहाज़ पर एक दुर्घटना हुई । इनके लंडन पहुंचने में पिलंग देखकर महारानी और मजा घबड़ाउठी । और<noinclude></noinclude> cfcyf5fy343atzpfvzyn7yg9ye3g5yj पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२२ 250 194845 665451 2026-07-06T15:37:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665451 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भाग । (३०५ ) इनको ढूंढने के लिये लंडनसे कई एक जहाज़भेजेगये । दुर्घटनासे मार्गेमें दिन अधिक लगे इसकारण जहाजमेंका भोजन चुकगया और कुछदिन तक आपको सूखी रोटीपर निर्वाह करनापड़ा । कष्ट उठानेके बाद जब यह इंग्लैंड पहुंचे तब वहां बहुत उत्सव कियागया || इस यात्रा आपने बहुत अनुभव प्राप्त किया । न्यूके सलके डचूकने इस यात्राके विषय में कहा था कि केनाडाकी यात्रासे राजकुमारको बहुत लाभ हुआ । इनका मन और विचार नये सचिमें ढल गये हैं । इन्होंने इस अनुभवकी पाठशालासे अपने स्वभावमें जो परिवर्तन किया है वह माता पिताके लिये सुखद है और इसीसे इनको भविष्यत्के कर्तव्य सूझने लगे हैं । यद्यपि एमेरिका में दो राज्योंके बीच कोई नवीन प्रकारकी संधि नहीं हुई है परंतु इनका आगमन और सत्कारही इंग्लैंड और एमेरिकाकी दोनों जातों में विना लिखा हुआ संधिपत्र है जो मित्रताको सूचित करता है || अध्याय ३. श्रीमान्की बीमारी और भारतकी यात्रा । सन् १८७१ ई० में श्रीमान्को भयंकर ज्वर पीडा हुई। रोग इतना बढ़ गया कि आपके जीनेकी आशा न रही । और ब्रिटिस राज्यमें उस समय ऐसा कोई नगर न रहा जिसमें आपकी आरोग्यताके लिये ईश्वरसे प्रार्थना नकी गई हो । जब आपके आरोग्य होनेकी खबर प्रकाशित हुई देश भरमें आनन्द छागया । प्रमाने अंतःकरणसे महारानीको इस इर्षकी बधाई दी । इस विषय में श्रीमतीके चरित्र के अध्याय ४३ में लिखा गया है। बीमारीसे आरोग्य होने पर जव आपको मजाका असीम प्रेम विदित हुआ तब आपने अधिक प्रजाप्रियता ग्रह- णकी और उसी दिनसे आपके चित्तपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि कभी किसीको आपके विरुद्ध लिखने या कहने का अवसर न आनेदिया और उन्नीसवीं शता व्दिका आप एक नमूना समझे जाने लगे || श्रीमान्की भारतयात्राके संवादका कुछ अंश श्रीमतीके शासनकी मुख्य घटनाओं में अध्याय ३८ में प्रकाशित हुआ है । आप ११ अक्टूबर सन् १८७५३० को लंडनसे विदा होकर पैरिस, एथेन्स, इटाली होते हुए ३० नवंनर को बंबई आये। भारत वर्षके मुख्य २ नगरोंमें आपने भ्रमण किया और अनेक राजाओंकी राजधानियोंमें जाकर उनसे भेंट की । आपके स्वागतमें आगरेमें<noinclude></noinclude> p8sa4oqjdtj1djmttyn90hatiki6sqm पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२३ 250 194846 665452 2026-07-06T15:38:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665452 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३०६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । एक बृहत् दर्बार हुआ । इसमें देश भरके राजा महाराना इकट्ठे हुए | आगरेका ताजमहल देखनेके लिये जिस समय आप पधारे एक यूरोपियनने एक भारत यामीको धक्के देकर निकाल दिया। इस घटनाको देखकर श्रीमान्‌को उस यूरोपियन कर्मचारी पर क्रोध आया और आपने उसे निकट बुलाकर कुछ डांटा । भारत वर्षकी प्रजासे प्रेम बढानेके लिये दो भारतवासी रईसों को जिनमें एक जोधपुर नरेशके चाचा महाराजा सर प्रतापसिंहजी हैं, अपना एडीकैंप (शरीररक्षक) नियत किया । श्रीमान्के स्मारक में पंबईकी गोदी, आगरेमें एक बाज़ार, चनाव नदीका पुल, बनारस में अस्पताल और अनेक नगरों में भिन्न २ प्रकारके मकान घनाये गये । लखनऊकी म्यूनिसिपलिटीने आपको दश हजार रुपयेके मूल्यका एक ताज भेंट किया । काश्मीर नरेशने पांच हजार पौंड दिये। इनको भारत के राजाओंकी ओरसे भेंटमें जो सामान मिला उसका अनुमान इससे हो सकता है कि, उस वर्ष इस कार्यके लिये सब राजाओंने मिलकर २ || लाख पौंडका माल विलायतसे मंगवाया था। जिस समय आप विलायत गये इन्होंने भारत वर्षसे जो २ सामान मिलाथा उसकी एक छोटीसी प्रदर्शिनी कर इंग्लें- डकी प्रजाको दिखलाया । लेखा लगानेसे विदित हुआ है कि देशी राजाओंकी ओरसे पांच लाख पौंड़का माल आपकी भेंट हुआ । यात्राके समय आपने जय- पुर और मैसूर में शिकार खेली। जयपुरके अलका निरीक्षण करते समय एक कैदीने आपसे कहा कि मैंने अबतक तरेसठ मनुष्योंका वध किया है | भारतवर्षकी प्रजा और देशी राजाओंने आपका जैसा सत्कार किया था वैसा ही आपने उस समयके वाइसराय लार्ड नार्थ ब्रूक को एक पत्र लिखकर स्वीकार किया। उस पत्र में लिखाया कि, “महारानीका प्रतिनिधि बनकर मैंने एक विचित्र देशको देखा । श्रीमतीकी प्रजासे गाढ़ा संबंध और प्रेम संपादन करने तथा इस अद्भुत देशको देखने को मेरी बहुत कालसे इच्छा थी। मेरी आशा विचारसे अधिक फलवती हुई। मैंने जो कुछ यहां देखा या सुना है उसे अपने चित्तपर हढतासे अंकित कर मैं यहांसे लौटताहूं। मैंने जो यहां अनुभव प्राप्त किया है वह आगे बहुत उपयोगी होगा । देशी राजा और प्रजाका अत्यंत सत्कार पाकर मुझे परम संतोष हुआ है। यह उनकी राजभक्तिका सथा चिह्न है । ब्रिटिश शासन के लाभोंके विषयमें भारतकी करोड़ों प्रजाका जैसे २ अधिक वि- श्वास होगा वे जानते जायेंगे कि अंगरेज़ लोग भारत की वास्तवमें उन्नति चाहते हैं। भारत वर्षकी देशी सेना देखकर मुझे हर्ष हुआ है। यह सेना हमारे लिये गर्वका स्थल है । सिविल सर्विसवालोंके विषयमें मेरे अच्छे विचार हैं ।<noinclude></noinclude> sbj2o3dqu6pxrbcnndvtx3mnj9v5d84 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२४ 250 194847 665453 2026-07-06T15:38:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665453 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भाग । (३०७ ) ये लोग अपने कर्तव्यका खूब पालन करते हैं। और इनसे मजाकी उन्नति होने- के साथ ही संतोष बढ़ता जाता है । आपने अन्य कर्मचारियों सहित मेरी जो सेवा की है उसे मैं सदा स्मरण रखूंगा।" कलकत्तेसे विदा होते समय आपने भारतवर्षकी सेनाके लिये कहा कि-"मुझे इस धातका गर्व करना चाहिये किं, भारतकी देशी सेना दृढ, साहसी और योग्य है " ॥ श्रीमान् सत्रह सप्ताहकी यात्राके पश्चात् १३ मार्नको बंबईसे विदा होकर कुशलपूर्वक लंडन पहुंच गये ॥ अध्याय ४. यहूदियोंपर दया और गुप्त यात्रा | यूरोपके अन्य राज्योंकी तरह इंग्लैंड भी महारानीके राज्यारंभके कुछ कालपर्यंत यहूदियोंसे द्वेष रखता था । ईसाइयोंका यहूदियों धर्मद्वेष है । इसी कारण उस समय इंग्लैंड में उन्हें बड़े २ पद नहीं दिये जाते थे । श्रीम- तीने इस मथाको उठाकर दोनों को समान कर दिया। श्रीमान्नेभी इस विष- माताका अनुकरण किया। और नगरके बड़े २ धनाढच यहूदियोंके यहां निमंत्रण पानेपर विवाहके समय पधारकर अनेक बार इस सहानुभूतिका परि- चय दिया । और जब २ दोनों दलोंमें द्वेष मढ़ता देखा तबही निर्बल यहूदि- योंके साथ सहानुभूति कर निपटारा करवाया || भूमंडल में ऐसा कोई भी देश नहीं है जहां आपके दो चार मित्र विद्यमान न हों । यात्राके समय नवीन मित्रोंको ढूंढना भी आपका एक उद्देश्य रहता है । आप फरांसीसी जर्मन और इटालीकी भाषा खूब बोल सकते हैं और रूसी भाषा भी जानते हैं। इनका फ्रांसकी राजधानी पेरिस पर अधिक मेमहै । जबर अवसर पाते हैं वहां अवश्य जाया करते हैं। सन् १९०० ई० की महामद- शिनी में आपने पेरिस जाना निश्चय कर लिया था परंतु ट्रांसवालके युद्धसे फ़रांसीसियोंका अंगरेज़ों पर उनदिनोंमें क्रोथ भड़क रहा था और वे लोग श्रीमती और युवराजके चित्रोंका अपमान कर अपना ओछापन बतला रहे थे इस लिये फ्रांसके प्रेसीडेंट मिस्टर लोवेने आपको पत्र लिखकर ऐसे समय में पेरिस आनेसे रोकनेके साथही लिखा कि "यद्यपि फ्रांसकी गय नमेंट आपकी रक्षाका अच्छा प्रबंध कर सकती है परंतु इस अवसर पर आपको आना उचित नहीं है। " बस इस पत्रको पाकर आपने इस यात्राको<noinclude></noinclude> qs2xhuouzcfjx9gt3cd6feqfdmek1yo पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२५ 250 194848 665454 2026-07-06T15:38:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665454 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३०८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । बंद कर दिया । इनका पैरिससे अधिक प्रेम देखकर फ्रांसकी गवर्नमेंटने इनके लिये एक अलगढ़ी सेहून (रेलकी गाड़ी ) बनवाई है जिसमें सात हजार पौंड व्यय हुआ है । फ्रांस और जर्मनीका लोमहर्षण संग्राम समाप्त होने के बाद इनकी यह इच्छा हुई कि वहां जाकर समरभूमिका अवलोकन करें। इस युद्ध में फ़रांसीसियोंकी हार हुई · थी इसलिये प्रकाश्य रूपपर जाने में उनलोगोंके जीव दुखनेकी संभावना थी और इनका फांसपर इतना बढ़कर प्रेम था कि यह उनको दुःखी करना नहीं चाहते थे इसलिये इन्होंने वेष बदलकर सन् ७० ई० में सांडेन का मैदान देखा । रणभूमिको देखकर आप लौटे तो मार्गमें इनके पासका खर्च चुकगया । यद्यपि तार देकर यह इंग्लैंडसे रुपया मँगवा सकते थे परंतु इन्होंने सोचा कि, तारसे हमारा भेद खुल जायगा इसलिये होटलवालेको घड़ी बेचकर उस द्रव्यसे यह लंडन पहुँचे । ऊपर आपकी बीमारी का जो उल्लेख है वह इसी यात्रा से लौटने पर हुई थी। इस बीमारी में इनकी प्रियपत्नीने बहुत कुछ सेवा सुश्रूषा की ।। अध्याय ५. श्रीमानूपर प्राणसंकट और न्यायालय में साक्षी । यूरोपमें राज्यका चाहे जैसा उत्तम प्रबंध हो किन्तु वहांकी मजा भारतकी तरह राजाको ईश्वरका अवतार माननेवाली नहीं है। वहांके लोग बड़े बुद्धिमान् होनेपर भी थोड़ीसी बातमें आत्मघात करने और मनुष्यवध करनेसे नहीं हिचकते हैं | उनलोगों में असहिष्णुता इतनी बढ़कर है कि, राजाके प्राण लेनेपर भी वे लोग उतारू होतेहैं। प्रचलित राजनियमोंसे अप्रसन्न होकर ये न मालूम क्या २ कर डालतें है । इन राजद्रोहियोंके दल भिन्न २ राज्यों में भिन्न २ नामसे प्रसिद्ध है । श्रीमान्पर भी अब तक दोतीन बार आक्रमण होचुके हैं। पिछली बार सन् १९०० ई० में बेलजियम की ओर जाते समय आपपर सिपेडो नामक मनुष्यने गोली चलाई थी । ईश्वरकृपासे गोलीका निशाना चूक गया और अपराधी पकड़ा गया || सन् ७६ ई० में भारत से लौटने बाद इंग्लैंड के मय बनानेवाले एक बड़े कार्यालयकी न्यूबिक्रीका उत्सव था । वह कार्यालय श्रीमानके पिता की प्रेरणा<noinclude></noinclude> ioezitmzxjzl2nu56kfl3gye4gm85ef पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२६ 250 194849 665455 2026-07-06T15:38:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665455 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भाग ।' ( ३०९ ) स्थापित हुआ था इस लिये इन्होंने उसके प्रबंधकोंकी मार्थनापर इस उत्सवका अध्यक्ष बनना स्वीकार किया । यह बात इंग्लैंडकी उस मजाको जो मद्यपान करना समझता अनुचित जानपड़ी। यहांकी दो सौ मद्यपान निवारिणी सभामने श्रीमानसे विनय किया कि "मय देशकी बहुत हानि कर रहा है, किसी प्रकारसे इसका प्रचार कम करना चाहिये परंतु आपके अध्यक्ष बनने से मचको उत्तेजना मिलेगी इसलिये आप यदि इस पदको स्वीकार न करें तो देशका कल्याणहोगा ।" उनकी अर्जियोंके उत्तरमें आपने कहाकि "मैं मद्यको उत्तेजना देनेके अभिप्रायसे इसकार्य में संयुक्त नहीं हुआ किन्तु यह कार्यालय मेरे पिताका स्थापित किया हुआ है इसलिये उसकी सहायता करना मेरा कर्तव्य है " ॥ सन् १८९० ई० में आपको एक बार न्यायालय साक्षीदेनेके लिये नाना- पड़ा । इस अभियोगमें वादी श्रीमान्के मित्र सर विलियम गार्डन फचंगथे। इनपर एक खेलमें ट्राइनवी क्राफ्टमें पांच मनुष्योंने जाल करनेका अभिशाप लगाया था। साक्षीके समय श्रीमान्को लार्ड चीफजस्टिसके पास बैठनेके लिये कुर्सी मिली । हाईकोर्टमेंटसदिन दर्शकोंकी इतनी भीड़ थी कि पैर रखनेको जगह नहीं मिलती थी । आपसे ज्यूररने पूंछा कि "क्या आपने वादीको कभी जाल करते हुए देखा है?" श्रीमान् हँसकर बोले:-"वादी मेरा मित्र है। एक मित्र दूसरे मित्रका जाल कभी नहीं देखसकता है। यह मित्रही क्या जो मित्रके कामोंमें दोष देखे ।" तम 'न्यूररने दूसरा मन किया" आपकी दृष्टिमें वादी अपराधी है या नहीं?" इसके उत्तर में आपने कहा कि अधिक लोगोंकी सम्पतिमें वादी अपराधी है इसलिये उसे दोषीमाने बिना छुटकारा न होगा" यस इस साक्षीपर न्यायालयने प्रतिवादि योंके लाभमें फैसला करदिया ॥ अध्याय ६. राजप्रबंधमें रुचि । सन् ९३ ई० में मियपुत्रके वियोगका दुःख भुलानेके लिये गवर्नमेंटने इनको एक कमीशनका सभासद नियत किया। इंग्लैंडमें मकानोंका किराया बहुत बढ़ा बढ़ा है। इसकारण वहां दीन लोग बहुत कष्ट पाते हैं । यह कमीशन उनको संस्ते भाड़ेपर मकान बनादेनेके विचारके लिये नियत हुआया। • इसका कोई भी अधिवेशन ऐसा न गया जिसमें आप उपस्थित न हुए हों ।<noinclude></noinclude> 77x0hecykvu0520k2i6p4t6loa8q6v8 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२७ 250 194850 665456 2026-07-06T15:38:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665456 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र | केवल इतनाही क्यों बरन आप दीन लोगों की सच्ची स्थिति जानकर कमीशनमें पेश करनेके लिये रात्रिके समय वेष बदल कर घूमते थे । इसीके लगभग लंडनमें एक मदर्शिनी खोलीगई थी । लोगों ने उसके लिये इतनी उदासीनता ग्रहणकी कि अंतमें उसकी सफलतायें संदेह होगया । ऐसे समय में आपने उसका बहुतसा माल खरीद कर लोगोंको उत्तेजित किया । परिणाम यह हुआ कि प्रदर्शिनी गिरते २ संभलगई । लंडनमें इम्पीरियल इन्स्टीट्यूट नामक विशाल भवन जो भारत के द्रव्यसे बना है उसके संस्थापक भी आपही हैं। इसके विषयमें श्रीमतीके चरित्रके अध्याय ४३ में लिखागया है । अफगानिस्तानकी सीमापर जिस समय रूससे भारत गवर्नमेंट के प्रथमवार मुठभेड़ होनेका अवसर आया और दोनों ओरसे युद्धकी तैयारियां होने लगी थीं पल २ में भयानक संग्राम होनेका भय किया जाने लगा था । इसयुद्धका परिणाम भारतवर्ष के लिये बहुतही बुरा था । उससमय माताकी आज्ञा और प्रजाकी प्रार्थनासे आप अपनी पत्नी सहित रूसकी राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग दौड़े गये और वहां जाकर आपने रूसके सम्राट्को और आपकी पत्नीने साम्राज्ञी ( अपनी बहन ) को दबाकर बखेड़ा न बढ़ने दिया । दूसरी घटना जिसमें श्रीमान्के प्रभावसे दो देशों में युद्ध होते २ बन गया एमेरिकाकी है । कुछ वर्ष पूर्व एमेरिका के प्रजातंत्र राज्य और अंगरेजोंके ब्रिटिश ग्वायना नामक प्रदेश की सीमापर देवाग्नि भड़ककर युद्ध होनेका समय आ पहुंचा था। और एमे- रिकाके संयुक्त राज्यकी यह इच्छा थी कि किसी यूरोपियन राज्यको एमेरिकाके छोटेसे छोटे राज्यपर भी चढ़ाई न करने दिया जावै । ऐसे अवसरपर घोर संग्राम होनेकी सम्भावना थी परंतु आपने न्यूयार्कके एक समाचारपत्रको एक तार भेजकर उसे प्रकाशित करवादिया । उस तारको पढ़कर एमेरिकाकी प्रजा ठंडी पड़ गई और उस समय इनकी एमेरिकाकी यात्राने बहुत काम दिया क्योंकि तबहीसे वहां वालोंकी इनपर पूज्यबुद्धि बहुत है | इनको अपने पिताकी तरह आखेट और घुड़दौड़ में बड़ा अनुराग है। पंद्रह वर्षकी उमर में यह राजकुटुम्बके लोगों में बढ़कर शिकारी गिने जाते थे । और घुड़दौड़ में तो इनका इतना प्रेम है कि जिसका कुछ ठिकाना नहीं। इनके घोड़े घुड़दौड़की शर्तोंमें अबतक अनेक बार प्याले जीत चुके हैं। इनको घोड़ेकी परीक्षाका अच्छा अभ्यास है और उनकी नसल सुधारनेपर यह अधिक<noinclude></noinclude> kvhv3bez7fjghriagt59tcli983x7sa पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२८ 250 194851 665457 2026-07-06T15:39:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665457 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चीया भाग । ( ३११ ) यान देते हैं। पशु और पक्षीके पालनकी भी आपको सचै अधिक है। सैडरिंग् हममें इनका जानवर खाना है। इनके पवालयकी गौवें कईबार इंग्लैंडकी मदर्शिनियोंमें पारितोषिक पाचुकी हैं ।। अध्याय ७. श्रीमान् के गुण और स्वभाव | फुटकर बातें । इनको शारीरिक परिश्रमके सबही खेलोंपर अनुराग है । सभाओं में व्या- स्पान देनेका इन्होंने अच्छा अभ्यास कर लिया है। धर्म सम्बन्धी कार्योंके लिये जब कभी भोग वा सभा हो यह अपने हज़ार आवश्यक काम छोड़कर उसमें उपस्थित होते हैं और ऐसी जगह जाने में कभी अपने सुख दुःखका विचार नहीं करते हैं। मित्रोंके साथ इनका बर्ताव बढ़ा स्वच्छ है और छोटेसे लेकर बड़े दर्जेत सबड़ी तरहके इनके मित्र हैं। सैकड़ों क्या हजारोंही दीनोंको इनकी दानशीलता का परिचय है। जिस विषयमें इनकी सम्मतिका मित्रकी सम्मतिसे मेल नहीं होता है वहाँ मित्रोंपर दबाव डालना इन्हें पसंद नहीं है। विवादके समय यह सदा अपनीही सम्मतिपर डढ़ रहकर उसपर अच्छीतरह बहसकरते हैं। अनेक वर्ष बीत जानेपर भी इनके विचारोंका परिवर्तन नहीं होताहै । इन्होंने पूर्वके देशों की यात्रा बहुत की है। यह अनेक कमीशनों के अध्यक्ष बनचुके हैं इसलिये इन को मजाकी स्थिति विदित करनेका बहुत काम पड़ा है। बड़े पुत्र की मृत्युके सिवाय इनको और भी बहुत आपदायें सहनी पड़ी हैं। और सिंहासनपर विरा- जनके अनन्तर इन्होंने जो व्याख्यान दिया उसमें इनका अनुभव टपकता है ॥ श्रीमती पतिकी मृत्युके बाद उनकी ओरसे माय: सर्वसाधारण उत्सर्पोंमें यही प्रतिनिधि वनकर जाया करते थे। लेवी दर्वारों और अन्य उत्सवोंपर अनेकवार यह महारानीके बदले उपस्थिति हुआ करते थे । और इस कार्यमें इन्हें नाना अवसरोंपर अनेकवार व्याख्यान भी देने पड़े थे । फ्रीमेसन नामक गुप्तं धर्मके यह इंग्लैंड बैंडमास्टर (मुखिया) हैं। यह पद इन्हें लार्ड रिपन के भारतमें आनेबाद सन् १८७५ ६० में मिला था इन्हें नाटक देखनेका बहुत अनुराग है और इस लिये नाटकों और अजायबघरोंको इनके द्वारा बहुत टते- जना - मिलती रही है । यह गायनं और फेशनके बड़े अनुरागी हैं । इसकारण<noinclude></noinclude> o05t0k6nh3rekvi50ydedik2c4199mh पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३२९ 250 194852 665458 2026-07-06T15:39:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665458 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३१२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र ! लंडनका रायल म्यूज़िक कालेज इनकी ओरसे बहुत सहायता पाचुका है। इनके फ्रेशनके अनुरागसे इंग्लैंडके दूकानदारोंको बहुत लाभ पहुँचता है और इनकी मियपत्नी जिन नवीन २ प्रकारके वस्त्रों और आभूषणोंको बनवाती हैं उनकी स्त्रियोंमें नकल अधिक होती है ॥ यह काम करने में बड़े दृढ़ और सादे हैं। ब्रिटिश म्यूज़ियम (अजाइबवर ) के यह ट्रस्टी थे इसलिये यह उसका काम काज देखने नित्य जाते और राजसी सत्कार सम्मानकी अपेक्षा न कर निरंतर उसका प्रबन्ध करते और जबतक काम समाप्त न होता वहस नहीं हटते थे इनको सरकारी पदको ( तमगों ) की प्रतिष्ठाका बहुत विचार रहता है। एक दिन एक नाचमें एक षोडशी युवती अपनी छाती पर कुछ चमकीला आभूषण पहनकर आई । नाचते २ श्री- मान की उसपर दृष्टि नापड़ी। आपने उससे पूंछा कि "यह तमगा किसका है ।" वह रमणी डरते २ वोली-" लार्ड का है। उनकी मुझपर बड़ी प्रीति है इस लिये वह मुझे देदिया करते हैं " । आपने उससे कहा कि-" आप इसे खोलकर मुझे देदें । मैं लार्ड से कहूंगा कि यह केवल सोनेका टुकड़ा और हीरे का आ- भूषण ही नहीं है जो सुंदरियों की शोभामें काम आंवे" || जिन दिनों में आप विश्वविद्यालय में पढ़ते थे, किसी मित्रके साथ आप के- मित्र नगर में वायुसेवनके लिये निकले । अकस्मात् मेह बरसने लगा । इन्होंने फल बेंचने वाली एक बुढ़ियासे छाता उधार भांगा । उसने इनको न पह- चानकर कहा कि तुम चाहो तो मैं अपना पुराना छाता तुम्हे देसकती हूं परंतु मैं अपना नया छाता तुमतो क्या बरन राजकुमार (मिन्स आफ वेल्स ) तकको नहीं दूंगी।" दूसरे दिन बुढिया अपना टूटा छाता पीछापाकर भौंचकसी रहगई क्योंकि उसपर जो फीता लगा था उसमें 'युवराजकी सलाम' लिखा हुआ था || श्रीमान्की एमेरिका, भारत और फ्रान्सयात्राका वर्णन पहले हुआ है । यूरो पके वर्तमान राजपुरुषों में इनके समान यात्राके प्रेमी और नहीं हैं । यद्यपि जर्मनी सम्राट् और रूसके ज़ारने भी बहुत समय यात्रामें बिताया है परंतु इनकी यात्रानें अनेक जाति और धर्मके लोगों में परस्पर एकताका धीन बोया है इन्होंने उन्नीस वर्षकी उमरसे यात्रा करना आरम्भ किया था | यूरोप और एमेरिका आदि सभ्य देशोंमें इनके समान प्राणका बीमा कराने वाला दूसरा नहीं है। न्यूयार्ककी एक बीमा कम्पनीका कथन है कि जिस दिन यह न होगे सभ्य देशोंकी समस्त भीमा कम्पनियोंको इनके उत्तराधिकारीको १ करोड़ पौंड देना पड़ेगा । यह संख्या कुछ वर्ष पहले की है। अब बहुत<noinclude></noinclude> lhc3mgxyjr9cvmfcts9nwup4yr3i4w1 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३० 250 194853 665459 2026-07-06T15:39:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665459 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भाग । ( ३१३) चढ़गया। आर्यको बात यह है कि अनुमान २० लाख पौंडसे भी अधिक द्रव्य इन्हें ऐसे लोगोंकी ओरसे विरासत में मिला है जिनका नाम धाम इनको अब तक अविदित है । इनकी प्रजामियताका यह अच्छा उदाहरण है | इनको अतिथि सेवा बड़ी मिय है । जो व्यक्ति इनसे मिलने जाता है यह प्रसन्न होकर लौटता है। उसके सत्कार में दम्पति अपना काम काम छोड़कर लगे रहते हैं और रूप प्रकारके प्रयत्नसे उसे प्रसन्न करते हैं। इनको खेती विद्या पर बड़ा अनुराग है। सेंड्रिगुहाममें ६०० एकड़ भूमिपर यह खेती करवाते थे और कभी २ किसानोंसे यत्र पहनकर उसे देखने जाया करते थे !! नव पांच वर्ष के आपने एक दिन एक कवरपर गीली मिट्टी डाली | यह यात माताके पास पहुँचतेही उन्होंने फटकारा। दूसरे दिन आपने उस कवरके पास जाकर कहा कि "मिस्टर बर्नार्ड ( यह इसी व्यक्तिकी कबर थी ) मुझसे हाथ मिलाओ और क्षमाकरो। माता कहती है कि तू बड़ा गधा है " || एक दिन आप इंग्लैंड कुबेर लार्ड रासनाइल्डसे मातें करते २ मोले कि आप लोगों की स्थिति मुझसे अच्छी है । यदि में लोगोंको हँसता हुआ न देख तो तुरंत समाचारपत्र पुकारने लगेंगे कि युवराज दुःखित है, भकगया है और जो लोग मुझे हँसता देखें तो कहेंगे कि युवराज प्रसन्न है। इसका स्वास्थ्य अच्छा है । मैं किसी तरहके वस्त्र पहनूं उसकी भी पेपरोंमें रिपोर्ट प्रकाशित होगी । प्रयोजन यह कि मेरी हालचाल, मेरा किसीसे संभाषण, सलाम और बातचीतपर समाचार पत्र आँखें गाड़े रहते हैं। यहबात मुझे अच्छी नहीं लगती है इसलिये मैं साधारणस्थितिको पसंद करताहूं ॥ सन् १८९६ ई० में ओक्सकी घुडदौडमें इनका घोड़ा दूसरे नंबर पर था । इसके लिये इन्होंने बहुतेरी शर्तों में प्रथम नंबर पाया है । केवल दो धारकी शर्तोंमिं इन्होंने ६४ हजार पौंड जीतेथे ॥ इंग्लैंडके राज्य में अबतक जितने प्रिंस आफ वेल्स हुए हैं उन सबकी अपेक्षा इन्होंने इस पदका अधिक उपभोग किया है। राज्य पातेही इन्होंने अपना स्वभाव बदला है। जिन इष्ट मित्रकि साथ दिन रात उठन बैठन रहतीथी अब वे आवश्य- कता विना नहीं आने जाने पाते हैं। और जो बुलायेनाते हैं उनसे बातचीत भी राजसी ढंगकी होती है। लार्ड मेरेसफोर्ड आपसे मिलने गयेथे उनका वैसाही श्रीमान मे सत्कार किया जैसा एक नरेश अपने प्रतिष्ठित सेवकका करता है । कहने की अपेक्षा करदिखाना इन्हें अधिक पसंद है । इंग्लैंडके "मैन्चेस्टर गार्डियन ” ने ૧<noinclude></noinclude> nsg6179g004x4444afl89w7ahzei0vt पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३१ 250 194854 665460 2026-07-06T15:39:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665460 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३१४ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । २१ मार्च सन् १९०१ ई० को लिखा है कि श्रीमान्ने एक मित्रसे कहाकि "आप जानते हैं कि मैं व्यावहारिक मनुष्य हूं और कामसेही अपना मतलब रखता हूँ " आप इसमातको सत्यभी कररहे हैं। ट्रांसवाल युद्धके विषय में मंत्रिमंडलके भरोसे न रहकर लार्ड किचनरसे लंबी २ रिपोर्ट मँगाना और उनपर विचार करना इसवातका उदाहरण है || अध्याय ८. श्रीमानके अधिकार और शक्ति । लंडन 'सेंट नेम्स गेनेट' में मिस्टरमी नामक एक व्यक्तिने बहुत ही चित्ताकर्षक लेख प्रकाशित किया था। उसमें लिखा है कि-"इंग्लैंड का राज्य उस प्रकारका है जिसमें प्रजा और राजाका समान अधिकार है । यह बात केवल कहने सुनने की नहीं है किन्तु वास्तव में इसमें प्रजातंत्र का प्रयोग है । एकसौ बीस वर्ष पहले इंग्लैंडकी कामन्स सभामें एक प्रस्ताव हुआ था। उसका आशय यह था कि "राजाका अधिकार बढ़गया और दिन २ बढ़ता जाता है। इसे कम करना चाहिये।" यह उस समयकी बात है नत्र यहां एक पागल राजाका राज्यथा और वह साम्राज्यको नष्ट कररहाथा । सप्तम एडवर्डकी शक्ति घटाने की कामन्स सभाको सत्ता नहीं है क्योंकि यह बात राजाकी शक्ति घटनेपर निर्भर नहीं है जैसी कि उसकी बुद्धिपर हैं । संसारमें यह बड़े आश्चर्य की बात है कि ब्रिटिश साम्राज्य एकहीं विचारपर चलरहा है । वह विचार प्रजातंत्र है। इस आश्चर्यदायिनी वस्तुको किसीने देखा वा सुना नहीं है क्यों कि वास्तवमें यह कोई पदार्थ ही नहीं है । यदि सप्तम एडवर्ड प्रधान अमात्यसे इस प्रजातंत्र के लेखोंकी नकल मांगें तो वह नहीं देसकता है क्योंकि सैकड़ों वर्ष से ब्रिटिश लोगोंके चित्तमें ये विचार भरे रहने के अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है। इसमें ब्रिटिश विचार, ब्रिटिश अनु- भव, आवश्यकता और योग्यताका समावेश है । यदि कोई देवता अपनी अपूर्व शक्तिसे तीस पीढ़ीमें योग्य अंगरेजको तैयार करे तो उसका परिणाम यही ब्रिटिश प्रजातंत्र होगा । यही भद्भुत अवर्णनीय पदार्थ हमारा शासन करता है। राजा इसका एक भाग है जो भी और भागोंकी तरह वर्णन करनेकी शक्तिसे बाहर है। यह कहीं नहीं लिखा है कि राजा क्या २ कर सकता है और क्या नहीं कर सकता। इस बातका आधार कामपर है और कार्यका निर्वाह ठीक हो रहा है। मंत्रिमंडल और पार्लियामेंटके में-<noinclude></noinclude> qq8derei4jjo59mjsucxjcv80z2ndcn पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३२ 250 194855 665461 2026-07-06T15:39:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665461 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भाग । (३१५ ) की शक्तिकी सीमा है किन्तु राजाकी शक्ति असीम है। सप्तम एडवर्ड राज्य नियमोंका भंग किये बिना राज्यको अस्त व्यस्त कर सकते हैं। यदि लार्ड सेल्बोर्न (जलसेना विभागके मंत्री) फलके पत्रोंमें पढ़ें कि राजाने समस्त सैनिक जहाज़ों को बेच डाला तो उन्हें आश्चर्य होगा परंतु इस कार्यसे प्रजा तंत्रा भंग न होगा । वह हमारी समस्त जल सेनापर सर्वोच्च अधिकार रखते हैं और प्रत्येक जहान और तोपको दे सकते हैं। वह चाहें तो समस्त जहा- जोंको किसीकी भेंटकर सकते हैं और लार्ड राबर्टसे लेकर साधारण सैनिक तकको तथा राज्यके सिविलियनको पदच्युत कर सकते हैं। सेनाको नोक- रीसे अलग करना उनके अधिकारमें है । युद्धके समयमें राजा पूर्णाधि- कारी है । यह राज्यके प्रत्येक शक्तिमान् मनुष्यको सेना में भरती होनेपर धाव्य कर सकता है। यह जनरलोंकी आज्ञाओंको लौट सकता है और समस्त जल तथा स्थल सेना पर उसका पूर्णाधिकार है। यह चाहे जिस देशसे युद्धकर सकता है और कैसी भी हानि क्यों न हो जब चाहे संधि करनेका उसे अधिकार है ॥ आइनमें उसकी सबसे अधिक शक्ति है। उसके हाथसे कभी अनुचित कार्य होताही नहीं है । यह गिरजोंका स्वामी है और प्रधान पादरियोंको नियत कर- नेका उसे अधिकार है । आईनके अनुसार यह प्रत्येक न्यायालय में उपस्थित है और वह चाहे जिस अपराधीको बंधमुक्त कर सकता है । यह पार्लियामेंटमें सदाही उपस्थित माना जाता है और दोनों सभाओं के पास किये हुए किसी पिको यह अस्वीकार कर सकता है। वह चाहे जिसको चाहे जैसी उपाधि दे सकता है । किसीको यह अधिकार नहीं है कि उसकी इच्छा के लेनेसे नाहीं करे। वह जिसे मंत्री बनाना चाहे बनानेका उसे विरुद्ध उपाधि अधिकार है । आईन और राजा बिना कोई भी आईन पूर्ण नहीं होता है। वह राज्य, धर्म, सेनाका मुखिया है । यही केवल शीशेका सिक्का चला सकता है। वह चाहे जैसी संधिको तोड़ सकता है। किसी राजदूतको पदच्युत कर सकता है और ब्रिटिश राजदूतोंको यूरोपके किसी राज्यसे मुला सकता है । परंतु राजाकी शक्तिकी भी सीमा है। यह सैनिक धूमपोतोंको बेच सकता है किन्तु प्रजाके द्रव्यसे पार्लियामेंटकी आज्ञाविना एक पाई भी खर्च नहीं कर सकता है। वह किसी नवीन पदको निर्माणकर उसकी फीस नहीं नियतकर सकता है । वह अपराधीका अपराध क्षमा करसकता है परंतु किसीको दंडित<noinclude></noinclude> ldssul7ukufh3rov7n1dgwe08qyk5tg पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३३ 250 194856 665462 2026-07-06T15:39:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665462 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११६ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । नहीं करसकता । आईनके विरुद्ध डिंढोरा फेरनेकी उसमें शक्ति नहीं है । यद्यपि वह प्रत्येक मनुष्यको शस्त्रग्रहण करनेकी आज्ञा देसकता है किन्तु किसी सिवि- लियनको राज्यसे निकालनेकी उसमें शक्ति नहीं है। उसमें मनुष्यका अपराध क्षमा करनेकी शक्ति है परंतु न्यायालयसे दण्ड मिलनेसे पूर्व उसे नहीं छुड़ा सकता है । यद्यपि उसमें किसी जनका फैसला मुलतवी करनेकी शक्ति है किन्तु यह जजके काम में हस्ताक्षेप नहीं करसकता है। रानी एलिज़ाबेथकी तरह किसी मनुष्य को कामन्स सभासे निकाल नहीं सकता है। युद्धके समय राजाकी शक्ति अपरिमित है किन्तु शांति में वह एक इंच भी किसीकी भूमि नहीं छीन सकता है । राज्यभर में वही एक व्यक्ति है जिसमें अपराधीको पकड़ने की शक्ति नहीं है । राजा कोई कार्य अनुश्चित नहीं करता है, वह सब आईन से मुक्तहै इसलिये उसपर कोई चार्ज नहीं लगाया जासकता है। यदि राजाने किसी मनुष्यको पकड़ा और वह निरपराधी प्रमाणित हुआ तो राजाके ऊपर टसे अकारण कैदकरनेकी नालिश नहीं हो सकती है। बस इसीलिये राजा किसीको पकड़ नहीं सकता है ॥ राजाकी अनंत शक्ति हमपर प्रभाव नहीं डालसकती है। हमपर केवल विचारही शासन करता है कोई आईन नहीं करता है। और वह विचार वहीं है जिसे हम बनाते हैं । यह विचार दीर्घकालसे चला आता है और इसीने चालीस करोड़ प्रजाको संयुक्त कर रक्खा है " | अध्याय ९. राज्यासनपर विराजना । श्रीमती महारानी विक्टोरियाके स्वर्गवासका वृत्तान्त उनके चरित्रके अध्याय ६२ में लिखा है । २३ जनवरीको विंडसरसे चलकर दिनके एकबजे दशमिनटपर श्रीमान् युवराज (प्रिंसआफ्वेल्स) की सवारी लंडन पहुंची। विक्टोरिया स्टेशन से बकिंगहाम राजमहलतक भीड़के मारे शरीर छिलताथा। कहीं तिल रखने की जगह नहीं मिलती थी । युवराजको राज्यासनपर विराजने के लिये पधा- रते देखकर प्रजाने नवीन राजाकी जयमनाई। स्टेशन पर उच्चकआफ् आर्गाइल, और मिस्टर बालफोरने आपका स्वागत किया। उनकी गाड़ी में डयूक आफ् यार्क और दूसरी में डयूक आफू कनाट विराजमान थे। जिधर होकर श्रीमान् की सवारी गई प्रजाने टोपियां उतार २ कर आपका जयघोष किया। श्रीमान्<noinclude></noinclude> rgsdv84ch82ijh6veap5vozvm9cj5l3 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३४ 250 194857 665463 2026-07-06T15:40:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665463 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बोया भाग ( ३१७) ने योग्यरीतिपर सब लोगोंकी सलामका उत्तर दिया। श्रीमान्की सवारी भीडकों चीरती हुई जब सेंटजेम्सके महल में पहुंची सनाने आपकी सलामी ली। ि कौंसिल के महलमें अनुमान दोसी मनुष्य निमंत्रित थे। उपस्थित महाशयोंने लेवी दरबारके वस्त्र पहनरक्खे थे और आपका ड्रेस सैनिक था ॥ कौंसिलके प्रेसिडेंट ड्यूक आफू डेवन्शायरको श्रीमतीको मृत्यु और उनके पुत्रकी गादी समानणार सुनाये गये। उन्होंने श्रीमान्के सिंहासनासीन होनेका डिंटोरा पढ़कर सुनाया । इसका आशय आगामि अध्यायमें लिखा गया है । डिंडोरा पट्टा जानेवाद उसपर डयूक आफ यार्क, ढबूक आफू कनाद, राज कुमार क्रिश्चियन, डणूक आफू केम्बिल, फेंटरवरीके प्रधान पादरी, लार्ड स लर और लार्ड मेयरने हस्ताक्षर किये। इस टिंढोरेके अनुसार युवराज प्रिंस आफ वेल्सको इंग्लैंड के राजा एडवर्ड सप्तम और भारत वर्षके सम्रा- टूकी उपाधि मिली । इसके बाद इस ठिटोरेकी सुपर श्रीमानूके पास जो उसी महलके एक अलग कमरे में थे पहुंचाई गई । इस पर श्रीमान्ने शपथ खाये ॥ आपके शपथ खानेके अनन्तर श्रीमान्‌का व्याख्यान जिसका आशय आ गामि अध्यायमें है सुनाया जा चुकनेपर कौंसिलके मेंबरोंके शपथ खानेकी पारी आई। इस कार्यकी समाप्ति हुई तब लोगोंने आपके हाथका चुंगन किया। समस्त कार्यमें एक घंटा लगा । कार्य पूरा हो चुकने बाद राजाकी सवारी सेंट जेम्सके महलसे लौटकर मार्ल मारो हाउसको गई || जो २ कार्य प्रथम दिन सेंट जेम्सके महलमें हुए थे वही दूसरे दिन टैम्पल बार और रायल एक्सचेंज के आफिसमें हुआ। दोनों जगह हर्षके बाजे बजाये गये और मजाने एक स्वरसे पुकारा:- "ईश्वर राजाको चिरंजीवी करे" ॥ लंडनके लार्ड मेयरने इस उत्सवपर उपस्थित महाशयोंको भोजन कराया । मजाकी ओरका प्रतिज्ञापत्र और सम्राट्का हिंदोरा जैसे लंडनमें पढ़ागया उसी तरह श्रीमान्के साम्राज्यके समस्त बड़े २ नगरों में पढ़ा गया और ईसाइयेने श्रीमानकी मंगल कामनाके लिये गिरजोंमें नमागें पढ़ीं ॥ श्रीमान् के पट्टाभिषेकका उत्सव आगामि जून मासमें होनेवाला है। इसके लिये लंडनमें अमीसे तैयारियां होरही हैं प्रबन्ध और कार्यकी व्यवस्था करने को इंग्लैंडके उमरावोंकी एक सभा नियत हुई है। और इस उत्सवपर श्रीमान<noinclude></noinclude> devjajauc6415w0c3v3m60va2mm6o77 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३५ 250 194858 665464 2026-07-06T15:40:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665464 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११८ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । की ओरसे जो आज्ञापत्र प्रजाको सुनाया जानेवाला है उसके संशोधनका विचार होरहा है। ईश्वर इस शुभ अवसरको शीघ्र लाँबे और महाराजका कुशल मंगल घनार यही हमारी प्रार्थना है । यहभी सुनाजाता है कि इस उत्सवपर भारतवर्ष के कई एक राजा महाराजा लंडन जाना चाहते हैं || अध्याय १०. भारत में उत्सव और ढिंढोरा । जिसतरह भारतवर्ष में श्रीमतीमहारानी विक्टोरियाके स्वर्गवास होनेपर शोक हुआ उसीतरह श्रीमान् सप्तम एडवर्ड के सिंहासनासीन होनेका देशव्या- पी हर्ष भी हुआ। भारतके वाइसराय लार्ड कर्जन ने २६ जनवरी को इस वि- यकी सूचना देने के लिये स्टेटसेक्रेटरी लार्ड ज्यार्ज हैमिल्टनको तार दिया था जिसका आशय यह है कि- " श्रीमती महारानीकी मृत्युके सम्वादसे भारत गवर्नमेंट को अतीव शोक हुआ । भारतके प्रत्येक भागके राजा और प्रजाकी ओरसे शोक और दुःखके निरंतर समाचार आरहे हैं। गवर्नमेंट राजा और प्रजा संयुक्त होकर महारानीके लिये शोक करते हैं। उनके लिये यहां के लोगों की इतनी बढ़कर पूज्यबुद्धि है जितनी पहले किसी राजाके लिये नहीं थी । उनपर प्रजाकी भक्ति प्रेमसे मिली हुई है । लोगोंका कथन है कि देशने केवल महारानीको ही नहीं खोया है वरन देशभर की माताका देहान्त होगया है । सब जाति और धर्मकी मजाकी ओरसे मैं आपको इन बातोंके लिये विश्वास दिलाता हूं और श्रीमानके सिंहासनासीन होनेपर सम्मानपूर्वक शुभाशिष देता हूं । " इसतारका उत्तर सेक्रेटरी आफ स्टेटने २९ जनवरी को यह दिया कि " आपने भारतगवर्नमेंट, राजा और प्रजाकी ओरसे मेरे द्वारा श्रीमान् सम्राट् की सेवायें जो तारदिया उसका उत्तर देनेकी श्रीमान् ने मुझे आज्ञा दी है कि आपके तारमें भारतवर्षकी प्रजाकी ओरसे जो प्रेम और राजभक्ति प्रकाशित हुई है उसे मैं स्वीकार करता हूं। उनके दीर्घ काल तकके शासनमें सुकीर्तिका कारण उनकी बुद्धिमता, सुन्याय और प्रजाके सुखके अतिरिक्त और नहीं है। श्रीमती मृत्युपर देशव्यापी शोकको देखकर मेरे हृदयपर बहुत प्रभाव हुआ है । मेरे सिंहासनासीन होनेपर भारतके राजाओं और प्रजावर्ग ने जो मुझे शुभा- शिष दिया उसे मैं अंतःकरण स्वीकार करताहूं और चाहता हूं कि मेरी इच्छा. उनपर प्रकाशित कीनाय । मैंने उनके देशको देखा है और मेरे सिंहासन के<noinclude></noinclude> 2qyxemf4vfbnxabrgs7fwsw8z2kzdxp पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३६ 250 194859 665465 2026-07-06T15:40:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665465 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भागं । ( ३१९ ) लिये उनकी जो भक्ति है उसपर मेरा पूर्ण विश्वास है। उनकी दन्नति और सुख में मेरा सदाध्यान और सम्बन्ध रहेगा" || इसके सिवाय आपके सिंहासनासीन होनेके लिये भारतवर्ष के प्रत्येक नगर मैं सभायें हुई। देशी रजवाडोंम ओर जहां २ सरकारी तोपखाने हैं वहां १०१ तो सलामी की दागी गई । और देशभर में भित्र २ जाति और धर्मके लोगों ने अपने २ नगरोंमें इकट्ठे होकर सार्वजनिक सभायेंकर आपको गवर्नमेंट द्वारा बधाई दी । जिसतरह सिंहासनासीन होनेके दिन लंडनमें डिंडोरा जिसका • वर्णन इस चरित्रके अध्याय ९ में है सुनाया गया था उसीतरह भारत वर्षके प्रधान २ नगरोंमें सुनायागया । चम्पई के टोनहालमें नगर शेरीफ मिस्टर जेम्स मैकडॉनल्डने सीट्रीपर खड़े होकर उच्चस्यरसे प्रथम निम्न लिखित प्रतिज्ञा पत्र सुनाया । "पवित्र और प्रशंसनीय स्मारकको छोड़ जानेवाली हमारी गत साम्राज्ञी रानी विक्टोरियाको सर्वशक्तिमान् जगदीश्वरने अपनी सेवामें आमंत्रित कर लिया । उनके स्वर्गवास होनेसे ग्रेट ब्रिटेन और आयलॅंण्डका राज्य बिलकुल और स्प- त्यानुसार उच्च और शक्तिशाली राजकुमार एलपर्ट एडवर्डको मिला है इसलिये हम इस राज्य के पारलौकिक और इहलौकिक लार्ड श्रीमती स्वर्गवासिनी की मियी कौंसिल, अन्य २ मुख्य गुणवानों और लंडनके नागरिकों तथा लार्डमेयर और एल्डरमेनकी सहायता से एक स्वरसे जिह्वा और हृदयकी संयुक्त प्रेरणासे प्रकाशित करते हैं कि हमारी स्वर्गवासिनी रानीकी, जिनका स्मारक आनन्द दायक है, मृत्युसे सर्वोच्च और परमप्रतापी राजकुमार एलबर्ट एडबर्ड परमेश्वर की कृपासे हमारे राजा सप्तम एडवर्ड हुए हैं। यह ग्रेट ब्रिटेन, और आपके राजा, धर्मके प्रथमरक्षक और भारतवर्ष के सम्राट् हैं। इनकी सत्यता और शुद्धान्तःकरणसे आज्ञापालन करना हम स्वीकार करते हैं । और परमेश्वरसे जिसकी इच्छासे राजा और रानी शासन करते हैं, प्रार्थना करते हैं कि हमारे महाराज सप्तम एडवर्ड हमारे ऊपर आनन्दपूर्वक बहुत वर्षोंतक शासन करते रहें। सेंटनेम्स कोर्ट में हमारे प्रभुके सन् १९०१ ६० की २३ जनवरी को दियागया || इस प्रतिज्ञापत्रको सुनानेके अनन्तर उक्त शरीफने सम्राट्का पिडाः- श्रीमानो, लाडों और भद्रपुरुषो, आजका अवसर बढ़ादुःखदायक है । से अवसरपर संभाषण करनेका मुझे यह प्रथमही अवसर है । मेरी मियमाता,<noinclude></noinclude> 0j43yf42ppho4gtvvx66efrka7tzcoq पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३७ 250 194860 665466 2026-07-06T15:40:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665466 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३२० ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । रानी की मृत्युको आपके समक्ष प्रकाशित करना मेरा प्रथम और शोकजनक कर्तव्य है। मैं जानता हूं कि आप समस्त जाति, और मैं जहांतक सोचता हूं भूमंडलभर इस अमिटहानिपर अंतःकरणसे मेरे साथ सहानुभूति करते हैं । अब मेरे ऊपर जो भारी बोझा आपड़ा है उसके निर्वाह करने में मैं उनके मार्गपर चलनेका प्रयत्न करता रहूंगा । यही मेरा निरंतर उद्देश्य होगा । मैंने दृढ निश्चय कर लिया है कि जबतक मेरे शरीर में प्राण रहेगा में राजनियमोंका पालक प्रजातंत्र राजाहूंगा । और मजाकी भलाई और उसके सुधारके लिये कार्यकरता रहूंगा। मैं सप्तम एडवर्ड के नामसे, जोनाम मेरे पूर्व छः राजा धारणकर चुके हैं प्रकटहोना निश्चय करता हूं। ऐसा करनेमें मैं अपने सदा शोक करने योग्य बृहत् और बुद्धिमान् पिताके, जो सार्वजनिक सम्मतिसे उत्तम कहलाने योग्य थे, नामका मूल्य नहीं घटाता हूँ और चाहता हूं कि उनका नाम सदा स्वतंत्र रहे। अंतमें मैं पार्लियामेंट और ब्रिटिश जातिको विश्वास दिलाताहूं कि वे मेरे कठिन कर्तव्यमें, जो अब मुझको विरासत में मिला है और जिसके लिये मैं जन्मभर के लिये अपनी समस्त शक्ति को संलग्र करता, सहायक होंगे” । इसके सुनाने वाद महारानीकी मृत्युसे जो झंडा गिराया गया था उसपर युनियन जैक ( राजचिह्न ) चढ़ाकर खड़ा करदिया गया। इसके सिवाय भारत वर्षके राजा और प्रजाका समाश्वासन करनेके लिये विंडसर राजमहलसे ४ फरवरी सन् १९०१ ई० को एक पत्र लिखकर प्रकाशित करवाया । उसमें भारत की प्रजाको “मेरी प्रजा " के नामसे संबोधन किया है। उस पत्र में लिखाया कि:- "मेरी प्यारी और प्रेमपूर्वक स्मरण रखने योग्य माताकी मृत्युसे मैं, इस सिंहासनपर, जो मुझे विरासत में मिला है, आसीन हुआ। भारतवर्ष के राजा और प्रजासे मैं सलाम करताहूं और उन्हें विश्वास दिलाता हूं कि मैं उनके आनन्दका इच्छुक हूं । मेरी प्रसिद्ध पूर्वाधिकारिणी भारतवर्षकी प्रथम शासन कर्त्री थी । उन्होंने भारतवर्षका प्रबंध अपने हाथमें लियाथा और उन्होंने महा- रानींकी उपाधि धारण की थी । भारतके विषय में वह बहुतही ध्यान देती रहीं थीं। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि भारत वर्षकी करोड़ों प्रजा इस सिंहासनकी परम भक्त है । दक्षिण एफ्रिकाके युद्धमें देशीरानाओंने और समुद्रपारके देशों में देशी वीर सेनाने महारानीके अंतिम वर्ष में इस भक्तिको प्रमाणित कर दिया है । मैं<noinclude></noinclude> lfkyso2ca67vrs5d56jukylxhjs4qf3 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३८ 250 194861 665467 2026-07-06T15:40:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665467 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भाग । (३२१ ) उन्हींकी आज्ञा जोर इच्छासे भारत के राजा और प्रजाके साथ स्वयं परिचय पाने के लिये भारतका दर्शन कर चुका हूं। यहांपर मेरे चित्तमें भारतके विषयमें जो प्रेम अंकित हुआ है उसे मैं कभी नभूलूंगा और भारतकी भलाई के विषयमें में सदा अपनी माताके समान चलूंगा और उसकी अनूक राजभक्ति और प्रेमका सदा आदर करूँगा | एडवर्ड आर. आई. " अध्याय ११. श्रीमान की उपाधियां और वेतन | सिंहासनासीन होने पूर्व श्रीमान् ग्रेट ब्रिटेन और आयलैंडके संयुक्त राज्यके प्रिंस आफ वेल्स, सेक्सनी डचूक, सेक्सको वर्ग और गोयाके प्रिंस, स्फाट लेंडके बैंड स्टुआर्ड कार्नवाल और रायसीके डाक, चेस्टर, और डबलिनके अर्ल और आइल्सके लाईके अतिरिक्त केजी, के. टी. भी. सी. मी., जी. सी. एस. आई, जी सी. एम्. जी., सी. आई. ई. और पी. ओकी टपाथसे भूषितये । वह श्रीमतीकै शारीरिक एड् डी कैंप, सेनाके फील्ड मार्शल, प्रथम और द्वितीय लाइफ गार्ड सेना तथा रायल हार्स गार्डस्के मुख्य कर्नल, दशम- हसा सेनाके कर्नल, कैम्ब्रिज और आक्स फोर्ड विश्वविद्यालयकी सेनाके कर्नल, मिडलसेक्स सिविलसर्विस कोर, गार्डन हाइलैंडर्स की तीसरी वेटालियन और सदरलैण्ड हाइलैण्ड राइकल वालंटियर्स समाके कर्नल, जलसेनाके एडमिरल हैं। इसके अतिरिक्त नर्मनसेनाके फील्डमार्शल और पांचवीं पामेरेनियन ब्लचर हसासँके मुख्य कर्नल भौंहें । उनको आस्ट्रिया और हंगेरी राज्यने बारहवीं इसा रेजिमेंट के फर्नलकी उपाधिदाहै । इन उपाधियों से प्रिंस, उचूक और श्रीमतीके एड्डी कैंपका पद तो इनके सिंहासनपर विराजनेसे अब इनके लिये नहीं रहा किन्तु और २ पदवियां ज्योंकी त्यों बनी हैं ॥ श्रीमती महारानीको गवर्नमेंटसे कुल वार्षिक वेतन ३ लाख ८५ हज़ारपौंड मिलताथा । इसमें ६० हजार पौंड निनखर्चका १ लाख ३१ हजार २६० पौंड नौकरोंके वेतनका १ लाख ७२ हजार परूखर्चका और १३ हज़ार पौंड दाना- दिके लिये नियत था इसके सिवाय ८ हजार ७४० पौंड अलल हिसाम था । इंग्लैंडकी पार्लियामेंटने पर्तमान सम्राट्को महारानीके वेतनसे १ लाख ८०<noinclude></noinclude> 2f6xu3wzwox076sotz3gtadfele7x6b पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३३९ 250 194862 665468 2026-07-06T15:40:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665468 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३२२ ) महारानी विक्टोरियाका चरित्र । हज़ार पौंड अधिक देना निश्चय किया है । इस हिसाब से सब मिलाकर पौने छः लाख पौंड वार्षिक आपको सरकारसे मिला करैगा । एक यूरोपियन महाशयने "पायोनियर" में प्रस्ताव किया है कि श्रीमान्‌को भारतवर्षके कोष और राजा- ऑसे भी कुछ मिलना चाहिये परंतु अभीतक इसविषयमें गवर्नमेंटकी कुछ सम्मति विदित नहीं हुई । यहभी सुनागयाहै कि श्रीमतीके पास जो भारतवासी सेवक थे उनको योग्य पुरस्कार देकर भारतको लौटा दिया गया है । अध्याय १२. श्रीमान्को आशीर्वाद । श्रीमान् सम्राट् सप्तम एडवर्डका शासनारंभ होगया है । राजरीतिके अनुसार आप सिंहासनपर भी विराजगये हैं किन्तु अभीतक ईसाईधर्मके अनुसार राज्याभिषेकका उत्सव होना शेष है । उसका मुहूर्त्त आगामि जूनमासमें स्थिर हुआ है । ईश्वरसे प्रार्थना है कि यह उत्सव हमें शीघ्र दिखाने । केवल वही उत्सव क्यों बरन श्रीमान्के पौत्रका विवाह और पुत्र पौत्रके संतानकी वृद्धि देख कर हम भारतवासी आपको अंतःकरणसे बधाई दें यह मेरा आशीर्वाद है । ईश्वर आपको अपनी माताके समान दीर्घकालतक शासन करनेकी शक्ति प्रदानकरै और आपके राज्यमें समस्त प्रजा सुखपावै यह मेरी ईश्वरसे प्रार्थना है। आपने भूमंडलके प्रायः समस्त देशोंकी यात्राकी है, समय २ पर राज्य प्रबंधके कामों में संयुक्त होकर और सदा श्रीमतीके शासनको निरीक्षणकर इस कार्यका अनुभव प्राप्त किया है। इस चरित्रको पढ़नेसे विदित होता है कि आ पर्ने माताके समान गुण विद्यमान हैं । संतान माता पिताके स्वभावकी छाया होती है । आप श्रीमतीका दूसरा स्वरूप हैं। आपसे भारतवर्षका अधिक क- ल्याण होनेकी आशा है । श्रीमतीके शासनमें भारतकी प्रजाने बहुत सुख पाया था किन्तु वह कभी इस देशका दर्शन न कर सकी थीं, आप भारत की सैर करचुके हैं, वह सर्वोत्तमा होनेपरभी रखी थीं, आप उनके गुणोंको धारण करनेके अति- रिक्त एक गुण अधिक रखते हैं। वह गुण यही है कि आप पुरुष हैं। स्त्री की अपेक्षा पुरुषका प्रभाव स्वभावसे ही अधिक होता है । आपने अपनी धार्मिक मातासे धर्म संबंधी शिक्षा पाई है और भारतवर्षको धार्मिक शासक ही अभी-<noinclude></noinclude> 1wqm33wn63unsmxsvixcq611bjg8a6a पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४० 250 194863 665469 2026-07-06T15:41:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665469 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौथा भाग । (३२३) ष्ट है । आप धर्म के विषयमें पक्के ईसाई होनेपर भी यहूदियोंपर दयाकर अने- कार प्रकाशित कर चुके हैं कि न्यायमें आपको भिन्न धर्मवालाका आदर है । इन बातोंको देखकर मुझे कहनेका साहस है कि आप जैसे उज्ज्वल सुवर्ण में सुगं- ध मिली है। ईश्वरकी कृपासे अभागे भारत को ऐसा शासन नसीब हुआ है । ईश्वर आपको चिरंजीवी करे । आपके परिवारकी वृद्धि हो और आप दीर्घ कालतक प्रसन्न रहकर देशी विदेशी प्रजाके सुखकी वृद्धि करें और सदा हम लोग नीचे लिखा वाक्य रटते रहें ।। " चिरंजीवी रहो एडवर्ड नृप " ।<noinclude></noinclude> l1s9pmr7z04gbtorfrzs8zb8gcxn13v पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४१ 250 194864 665470 2026-07-06T15:41:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665470 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महारानी विक्टोरियाका चरित्र समाप्त.<noinclude></noinclude> j9rz9f94nqrwdpehhbkfo5ozh7sphx5 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४२ 250 194865 665471 2026-07-06T15:41:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665471 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४३ 250 194866 665472 2026-07-06T15:41:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665472 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४४ 250 194867 665473 2026-07-06T15:41:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665473 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>॥ श्रीः ॥ शुद्धिपत्र | अशुद्ध. शुद्ध. पृष्ठ. पंक्ति, इस बाजना १ चजना १ ७ उन्होंने सबने १ ?? १९ जनवरी २९ जनवरी नोट वापतिस्मा बप्तिस्मा १.५.८ शिखाने सिखाने ८,९,१५,२५ ११-१६,१२,१८ पति पिता ८ चाहताथा चाहते ८ २३ उसके उनके २३ जार्न ज्याने ९ ३,४ आया उसने आये उन्होंन १३ २४ लगा लगे २५ कर गया था कर गये थे २६ मझे मुझे गडिया गुड़िया हो इन लाइलेन वर्ग होइन लाइलेन वर्ग ३१ " १८ १७ मिसनेन मिसनेन थी, ૮ * को पड़दा का परदा २१ १६ जवाबदारी जवावदिही २२ १९ रावी एभी २४ २० करना करे २५ मढा मढ़ा गया था करना कीनाय देना दियाजाय . आट्टालिका अट्टालिका दुषिचारों दुर्विचारों ११<noinclude></noinclude> cha2mrkaj60rd4jrek48q94uxedkxyo पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४५ 250 194868 665474 2026-07-06T15:41:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665474 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(३२६) शुद्धिपत्र | अशुद्ध. शुद्ध. पृष्ठ. पंक्ति. दिखाने दिखाते ३६ २२ आपके आपको ४० १४ श्रीमती श्रीमतीने ३१ चाहिये चाहिये ४९ रानीसे रानीपर ५१ उठ गया विश्वास उठगया ५२ सहचरियों स्वामीनी का हुए शब्दों उठा । वैं तौ आप सहचरियां ३१ स्वामिनी ५३ ८ के हुए शब्दों उठावें तो " १२ ४ २५ आपा सिन S निस " खुले खुलने पर ६० जो दिन रात दिन रात ६१ १८ मेरी मेरे ६३ ४ वाछते वा छतें - ६४ १७ मंढाथा मंढा गया था ६७ २२ वार वर २८ इनके लिये पुरुषोचित रानीने इनको लिये ७० १ पुरुषोचित ७२ १७ रानीसे प्रजासे मनाने , ७२ " दम्पत्य दाम्पत्य कान्स्टीटचावल कान्स्टीट्यूशनल ७३ ३० शयनगृहको जाल शयनगृहकाजाल ७८ ● करेगा करेंगे ८१ ३५ शिखाती सिखाती ८४ ४ पति भाईतो स्थानो पतितो भाईके " २९ स्थानोको ९१ १२<noinclude></noinclude> nzwyr7qt8vmxwiqztb1vvn4os53oage पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४६ 250 194869 665475 2026-07-06T15:42:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665475 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शुद्धिपत्र | पृष्ठ. (३२७) पंक्ति, २६ अशुद्ध. शुद्ध. केम्रिग केम्ब्रिज " पॅलेस पेलेस ९५ २९ मोटा च मोटाय ९६ ८ नाकर नोकर २१ उघुक उघुक २८ वर्षक वर्ष ९७ ३० वालंटियर वालंटियर १८ विलियम विलियम १७ सास्थ्य स्वास्थ्य १०२ १४ स्वाह स्वादा १०७ ६ जलभरने जलमरने כל ९ जळक जळका १८ रहाया रहीथी ११४ ७ हुआ हुई " ८ दौहित्रीको दौहित्रीके १२१ ग्रीसको ग्रीसके ३ पात पति 27 ८ इटालीकी यात्रा इटालीकी मात्रा १२९ ११ रहेगी रहे १३३ २१ महरानी महारानी १३९ ५ मेय आघात प्रेम आधात 33. " १८ ל २७ स से १४३ कम्पबैल कम्पनेल १४४ १८ अपनेको उसे १४५ ૩ घद वह १४६ २० १८५१ १८५७ १४७ २१ नेरली नेटली י २८ खेलकरने खेलने १५२ १ पधारींची पधारी २३<noinclude></noinclude> 2pjh4czqal60txz1o6zx8d9qze9n1eh पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४७ 250 194870 665476 2026-07-06T15:42:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665476 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(३२८) शुद्धिपत्र | अशुद्ध. शुद्ध. पृष्ठ. पंक्ति. लेखिनी लेखनी १६१ छपाया छापाथा १६३ २२ घहां वहां १६५ ३ जवर जब २ १६७ १६ धमधाम धूमधाम १६८ १५ घटनामें घटनायें १७४ के प्रजाकी की प्रजाके १७५ चाहत चाहता १७८ आठ लाख चार हज़ार १७९ मेको नाटन मैकनाटन पैंटूर पैंड १८ सत्व १८१ १६ लौटफेरनहोगी इंग्लैंड में एसोशियेशन लीट फेरनहोगा १८७ इंग्लैंडके १९१ एसोसियेशन १९३ प्रमाण परिणाम १९५ आपने अपने १९६ ረ संवादका संवादको १९८ दश रक्षा में ० २४ रक्षाके लिये १९९ १८ बीबीपरनागमें २०० निपटार करनेके निपटारा करनेको २०१ ३० तेहरान के तेहेरान २०२ ईरानशाहनेके ईरानकेशाहने नो 22 २९ यूरोपियनोंकी यूरोपियनोंको २०४ कारणोंको कारणोंसे १०६ खाले खोले २१० देतेथे देतीथी २१२ उनपर उस पर २१५<noinclude></noinclude> iyztxe24hfqfj21ghae7ewkev98zmyl पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४८ 250 194871 665477 2026-07-06T15:42:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665477 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शुद्धिपत्र । (३२९) पंक्ति. अशुद्ध. शुद्ध. पृष्ठ. करने फरना २९ करने करना 33 ३० लगाकर लगायाजाकर २१७ १३ मेलेकर को लेकर २२१ १३ लिया करालिया २३२ १६ फेपास केनाम २३८ १३ करता है होताहे २४० १४ सकी सका २४५ हमीदको सुलतान अबदुल हमीदको २४६ हस इस २४७ होनेका होनेके २४९ भारत वर्ष भारत वर्षको २५० देतीरहे देतेरहें " १९ गवर्नरने गवर्नर जनरलने २५२ २५ पहाले मिसरम मानट महाल मिसर में बजट … २६ २५३ २५४ अंगरेजीकी अंगरेज़ोंकी " उसको उनको २५५ सुकायों सुकाय २५८ २ ग्लेडस्टनन देते ཝཱབྷཱཝཝཱ ཝཱ ; ग्लैडस्टनने २५९ २५ २६२ २२ कुगर क्रूगर २६४ २८ देने २६६ ८ मिसर मिस्टर २७१ लोनने ११ युद्धम युद्धमें ३० पहले२ पहले २८० २९ करो करोड़ ३०.<noinclude></noinclude> 3d0xz0ig9gw9qtnxvk3ip8vv5fyr3l8 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३४९ 250 194872 665478 2026-07-06T15:42:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665478 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३३० ) शुद्धिपत्र | भशुद्ध. शुद्ध. पृष्ठ. पंक्ति. बोट वोट २८४ २७ Uniuvrsal Universa २८५ १९ विक्टोरिया विक्टोरिया २८६ २६ मगट्टला मगडला २८७ १० चलानेम चलाने में २८ यहा ही वह ही २८९ २१ आ आठ २९० १ होत होता २९३ ३० सेक्सकोग सेक्स को वर्ग ३०० १४ भौ और ३०१ १३ बोला भोल … १९ रेंड्र डू ३०२ प्रिंस आफ वेल्स ड्यूक आफू कार्नवाल ३०३ ७ विल बिल जीव नी ३०८ बुरी बुरा ३०९ ३ कार्य कार्य , उनकी उसकी ३१० २९ यान ध्यान ३११ उपस्थिति उपस्थित " २३ पदको पदकों ३१२ ८ हुआ हुए ३१७ २१ श्रीमती श्रीमतीकी ३१८ २६ से ऐसे ३१९ ३० राइकल जलसेना के राइफल और जलसेना ३२१ १५ " " इति<noinclude></noinclude> gywf62mw39ls0574k6ztrotwn98qw1s पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३५० 250 194873 665479 2026-07-06T15:42:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665479 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>॥ श्रीः ॥ विक्रय्यपुस्तकें- किस्सा-कहानी । की. रु. आ. नाम. सिंहासन बत्तीसी बेताल पचीसी शुकचहरी ---- हातिमताईका किस्सा .... मोहिनीचरित्र ( फिसाना अजायब किस्सा ) त्रियाचरित्र ( कलियुगी स्त्रियोंके अनेक उलचिद और उनसे बचने का उपाय ) aaree ( मागोवहार ) बुद्धिचमत्कार करनेवाला चार योगियोंका वृत्तांत .... वीरवलविनोद २०७ चुटकुले वीरवलका जीवन चरित्र समेत ( उदासीन दशामें भी पढ़ने से पढोगे ) .. गुलबकावली ( कथारसीली विस्तारित अनुवाद ) ०-७ ०-४ ०-६ १-० १-४ ०-१० 0-2 वीरेन्द्र उपन्यास ( वाक्यरचना रोचक है ) शागारशोकोक्ति ( अनूठा दृश्य है ) विचित्रवीचरित्र स्वीकी छळछंदता झगड़ा (पांच झगड़ा शिक्षारूप हैं ) .... ०-१ 0-30 ०-२ कहावत कल्पद्रुम ( अँगरेजी, हिन्दी, गुजराती, संस्कृत, फार्सी, मरठी भाषाओंकी पुरानी कहावतें मुख्य कथाओं समेत ) ठहरो - अर्थात् ( उपदेशदर्पण ) इसमें २०० शिक्षिक लुटकुले हैं.. गुलसनोवर का ( दिलचस्प किस्सा ) चित्तविनोद ( चाहे जैसे उदास चित्तहो इसे पढतेही ऐँसपड़ोगे ) ... राजकुमारीचन्द्रमुखी (उपन्यास) सासपतोहू (गृहचरित्र देखो ) .... बड़ाभाई (सौतेली माताका सत्यानाश ) दवी उपन्यास अनविलाश (देखें. ) ..... **** .... ०-८ only ०-१० १-० only .... ०८ ०-१० १-० daye .... ०-४ .... ....<noinclude></noinclude> c21y0zk3w96dhkdnmlriqr23nmotvge पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३५१ 250 194874 665480 2026-07-06T15:43:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665480 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३३२ ) जाहिरात | * शिवाजी विजय अथवा जीवनप्रभात | पं० बलदेवप्रसाद मिश्रद्वारा अनुवादित | इस ऐतिहासिक उपन्यास को बंगगौरव रवि श्रीमान् सर रमेशचन्द्र दत्त सी. एस्. सी. आई. ई. ने बंगभाषामें लिखा है कि, जो अबतक आठ सात बार छपकर हज़ारों प्रतियाँ हाथों हाथ बिक चुकों और विकती जाती हैं। उस ही का यह भाषानुवाद आपलोगों के लिये तय्यार किया गया है । इस उपन्यास में स्वदेशप्रेम, वीरता, अनुराग, और सनातन धर्मका तो मानो फोटो स्खेंचदिया गया है, कहीं पर वीरोंकी वीरता पढ़ते २ रोमांचहोते हैं, कहींपर स्वदेशप्रेम पर बलिहार होने को जी चाहता है, कहीं पर नायक नायिका का अनुराग देखनेसे आंसुओं का तार बँध जाता है। महाराज शिवाजी का देशानुराग, सनातन धर्ममें प्रेम, रघुनाथकी स्वामिभक्ति, लक्ष्मीका पातिवत, चंद्ररायकी धूर्तता, महाराज शिवाजीकी सेनाका प्रचंडयुद्ध महाराज जयसिंह और महाराज रामसिंह का सौजन्य इत्यादि पढ़कर चिसमें नवरस उदय होजाते हैं । उस समय महाराज शिवाजी को भूषण कविकी उक्तिके साथ यही कहनेको जी चाहता है कि- " दशरथ के जिमि राम भये, वसुद्यौके गोपाल । तिमि प्रगट्यौ है शाहके, श्रीशिवराज भुआल " ॥ विज्ञापनमें इस उपन्यास की प्रशंसा भली भाँति से लिखनेके लिये स्थान नहीं है । वास्तव में इसकी उत्तमता पुस्तक देखनेसेही ज्ञात होगी । इस उपन्यासको पढ़कर अनुवाद कर्ता के पास बहुतसे प्रशंसा पत्र आये हैं उनमें से दो एकको नीचे लिखा जाता है । श्रीमान् १०८ श्रीगोवर्द्धन लालजी गोस्वामी संपादक 'ब्रजवासी' वृंदावन लिखते हैं:- “अनुवाद बहुत अच्छा हुआ, आपको धन्यवाद है" । पं० सम्पत्तिराम जी व्यास सब पोस्ट मास्टर जहाजपुर (मेवाड़ ) से १४ । ९ । ०१ के पत्रमें लिखते हैं कि, "जीवनमभात (शिवाजी विजय) मिला, यद्यपि मेरी देह कई दिनसे रुग्णथी और रात्रिको विशेष कष्ट रहता है, परंतु गतरात्रिको तीन बजे तक इस "जीवन" के कारण यह नहीं ज्ञात हुआ कि कष्ट किसको कहते हैं, इस एक रात्रिके सुखका अनेक धन्यवाद आपको देता हूं, अनुवाद बहुत उत्तम हुआ है। आपके देवी उपन्याससे शेष रात्रि शोकमें कटी था और इस "जीवन" से आनन्दपूर्वक व्यतीत हुई। फिर कोई अच्छा अनुवाद किया जाय तो स्मरण कीजिये" । अब पाठक गण आपही निश्चय करलें कि, यह उपन्यास कैसा मनोहर है। मूल्य डाक व्यय सहित १ ) २०<noinclude></noinclude> 21vosmqk31kr1qnt0udrobrjaqohqo7 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३५२ 250 194875 665481 2026-07-06T15:43:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665481 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नाम. पतिपत्नी संवाद जाहिरान । (३३३) की. रु. आ. 2-0 पिया (प्रथमभाग ) नया ( द्वितीयभाग ) .... लड़ाना महसुन नारायण (ऐतिहासिक उपन्यास ) राजनीति | शुक्रनीति भाषाटीकासहित (राजनीति) शिक भाषाका ( नीति शृंगार, वैराग्य ) चाणक्यनीति भापाटीका दोहासहित जल्द पंचतंत्र मूल .... पंचतंत्र भाषाटीका शिक्षा चातुर्यताकी सीठी .... 0-2 .... ०-२ ०-२ 0-211 १-८ .... १-० ०- ८ १-८ २-० ०४ ०-८ विदुरनीतिहिंदुस्थानी श्रीमहाराज धृतराष्ट्रको विदुरन उपदेश दिया है यक्ष मह विदुरमजागर राजनीति मारवाडीभाषा **** विदुरप्रजागर राजनीति छन्दबद्ध कविता देखनेही योग्य है राजनीति पंचोपाख्यान भाषा 910 thet कुण्डलिया गिरिधर रायकृत ( सामयिक नीति वेदान्त संयुक्त ) अबकी बार दूनी होगई है भाषा-काव्य । .... ०–५ रामरसायन रामायन - रसिकविहारीकृत ४-० रसिकप्रिया सटीक .... .... **** १-४ रामचंद्रिका सटीक कवि केशवदास प्रणीत **** .... २-० विज्ञानगीता केशवदासकृत ( वेदान्त ) ०-१० (अलंकार) वर्णन काव्यनिर्णयभाषा उन्दवद्ध ( भिखारीदासकृत ) मनहरण छन्दोंमें कठिन जगद्विनोद (पद्माकरकृत नायकाभेद ) रसराज ( मतिरामकृत नायकाभेद ) वनविलास पड़ा मोटे अक्षरका टिप्पणीसहित...... .... .... १-४ .... .... ०-६ .... ४-६ **** 8-0<noinclude></noinclude> dmsnuolmqu9h0gqkyrotsh4pnu72l93 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३५३ 250 194876 665482 2026-07-06T15:43:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665482 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २३४ ) नाम. जाहिरात | की. रु. आ. व्रजविलास मध्यम अक्षर टिप्पणी सहित विलायती जिल्द. तथा रफू कागजका मनविलास छोटा अक्षर .... ..... ग्लेज २-० १-८ १-० ब्रजचरित्र (श्रीराधाकृष्णनीकी सर्वलीला सुगम दोहा चौवोलोंमें वर्णित हैं) ३-० प्रेमसागर टाईपका मढा ग्लेज कागजका प्रेमसागर टाईपका बड़ा रफू ..... .... .... .... १-१२ १-४ भक्तमाला रामरसिकावली बढ़ी, रीवाँधिपति महाराज रघुराजसिंहकृत अत्युत्तम छन्दबद्ध जिसमें चारों युगों के भक्तोंकी भिन्न २ कथा हैं और द्वितीयावृत्ति उत्तर चरित्र समेत अत्युत्तम नई छपी है। रामस्वयंवर श्रीमहाराजा रघुरानसिंहकृत ( काव्यदेखने योग्य ) भक्तमाल नामाजीकृत सटीक ( छंदबद्ध ) रुक्मिणीपरिणय - महारान श्रीरघुराजसिंहजूदेव प्रणीत महाभारत भाषा सवलसिंहकृत -तुलसीदासजीकी रामायणकी रीति से दोहा चौपाई में १८ अठारहोंपर्य .... तथा प्रथम भाग ( ३- आदि, सभा, मनपर्व ) ..... तथा द्वितीय भाग ( २ - विराट, उद्योगपर्व ) ... ४-० ४-८ .... १-४ १-८ ३-८ १-० १-० तथा तृतीय भाग ( ८-भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, गदा, सौप्तिक, ऐषिक, स्त्रीपर्व ) तथा चतुर्थ भाग ( ५--शान्ति, अश्वमेध, आश्रमवासिक, मुशल, स्वर्गारोहणपर्व ) .... विजयमुक्तावली ( महाभारतका सूक्ष्मवृत्तांत छंदबद्ध ) अर्जुनगीता भाषा * गजेंद्रमोक्ष भाषा शनिकथा कायस्थकी .... शनिकथा बड़ी पै० रामप्रतापजीकृत .... शनिकथा राघवदासकृत रुक्मिणीमंगलं बड़ा (पद्मभक्तकृत मारवाड़ी भाषा ) हनुमान बाहुक पंचमुखी कवच समेत नासिकेतपुराण भाषा ( स्वर्ग नरकका वर्णन ) नरसी मेहताका मामेरा बड़ा **** ---- 8-0 -0-8 ०-१॥ 9-211 .... ०-३ ०-८ ... १-४ 0-211 ०-६ .... .... ०-५<noinclude></noinclude> gx5wa4jfa7g76snnz93mffsqxxlskf3 पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३५४ 250 194877 665483 2026-07-06T15:43:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665483 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>जाहिरात | (३३५) की. रु. भा. नाम. परिवारका स्वांग ( इश्कचमन ) सूर्यपुराणादि १९१ रत्न अतिउत्तम कागज और जिल्द बंधा सूर्यपुराणादि १९१ रत्न रफू ज्ञानमाला ---- मंगलदीपिका अर्थात् शाखोचार .... .... दम्पतिवाक्यविलास - जिसमें सत्र देशांतरकी यात्रा और धंधे के सुखको पुरुषने मंडन और स्त्रीने खण्डन किया है दोहा कवित्तों से ( सुभाषित ) रसतरंग ज्ञानभक्तिमार्गी अजब रँगीले पद्य कृष्णगढ़ महाराज मणीत दादूरामोदय संस्कृत - दादूपंथी साधुओंको श्यामकामकेलि परमेश्वरशतक भक्तिममोध.. ०-८ ०-२ 0-211 ०-१२ ०-८ .... ०-१० ०-६ ०-२ ०-२ भावपंचाशिका कविवृन्दजीकृत प्रेमातक **** मदनमुखचपेटिका भाषाटीफा .... प्रेमवाटिका भाषा ( रोचक भजन ) हनुमताका छन्द ( वीररसके रोचक कविस ) नाममताप छन्दबद्ध ( श्रीरामनाममाहात्म्य ) ... शृंगारांकुर भाषा- छन्दबद्ध ( रसकाव्य ) १०० कवि विनयके हैं ०-४ Amo ... ०-२ .... .... ०३ 0-211 ०-२ जगन्नाथशतक- इसमें रघुरानसिंह रवधिपतिके बनाये हुए **** नैषधकाव्य मनहरण छन्दोंमें राजा नलदमयन्तीका सम्पूर्ण उदाह- रणों समेत चरित्र .... सुन्दरीतिलक (शृंगाररस के मुदचुदाते हुए कवित्त भारतेन्दु मायू हरिचन्द्र संग्रहीत ) विक्रमविलास ( रोचक छन्दबद्ध ).... मसलानामा (मसलके उदाहरणमें शिक्षा वर्णन ) काव्यसंग्रह (प्राचीन रोचक कवित्त संबैया ) १-० 4444 0-8 .... 0-6 ०-८ ८<noinclude></noinclude> 4ql51jl56824arlygyeh95bs0n1oosa पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३५५ 250 194878 665484 2026-07-06T15:43:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665484 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(३२६) नाम. जाहिरात | काव्यरत्नाकर ( एक २ समस्यायें रोचकतापूर्वक अनेक कवियोंकी चातुरीके कवित्त ) ... आरती संग्रह २९ आरतीका www *** हनुमान साठिका ( हनुमानजीके ओजवर्द्धक ६० कवित्त )..... भाषाभूमण ( नायकाभेद मधुर छंदबद्ध ) अनुरागरस भाषा नारायणस्वामीकृतपद्यों में **** **** प्रेमपुष्प मंजरी अच्छे २ भजन व पंजावदेशके भी पद हैं। कृष्णचरितावली कृष्णकी छोटी २ लीला सुदामाचरित्र अत्युत्तम छंदबद्ध होळीचौताल संग्रह www सुदामाकी बाराखडी द्रौपदीकी धारामासी दुर्गाचालीसी माता पिता पूजनविधि बारामासी संग्रह हरदेवकी बाराखडी कलियुगका चरित्र की. रु. आ. ०-८ 0-311 **** 9-211 ०-२ ०-३ ०-२ ०-४ ---- **** N ०-३ .... wwww ०-४ ०-१ THE ७- १ ०-१ ०-१ 0-211 ०-२ ०-२ छन्दरत्नमाला (मिंगळ ) गोपीवियोगकी बारहखडी ( लालाशालियामकृत दत्तलालकी नशाखण्डनचालीसा ४० कवितों में सब नसोंका खण्डन बाराखडी सहित ) मिलापदर्पण ( मेलमिलाप शिक्षा ) श्राद्धदर्पण ( श्राद्धमण्डन ) ब्रह्मज्ञानदर्पण .... .... सुवामा (उपन्यास) उत्तम रूपक प्रेमपुष्पलता (उत्तमभजन ) पंजाब पंकजपराग (महन्त रघुबीरदासकृत ) .... .... ०-२ .... ०-२ ०-२ .... ०-२ ०-२ ०-४ ०-८ संपूर्ण पुस्तकोंका "बृहत्सूचीपत्र" अलग है देखना हो तो ) ॥ का टिकट भेजकर मँगालीजिये.' मिलने का पता - खेमराज श्रीकृष्णदास, “श्रीवेङ्कटेश्वर” ( स्टीम् ) यन्त्रालय, खेतवाडी - बंबई.<noinclude></noinclude> s7xex7zghqku2g26u7eu7fylhd0xg3g पृष्ठ:1901 महारानी विक्टोरिया का चरित्र हिन्दी PDF.pdf/३५६ 250 194879 665485 2026-07-06T15:43:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665485 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५ 250 194880 665489 2026-07-06T16:29:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665489 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६ 250 194881 665490 2026-07-06T16:29:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665490 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७ 250 194882 665491 2026-07-06T16:29:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665491 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>URGENT PUBLICITY MATERIAL BOOK-POST भारत सरकार सेवा ON INDIA GOVERNMENT SER 180020 अगर पाने वाला न मिले तो कृपया इस पते पर तोटा दे if undelivered please return to विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय सूचना प्रसारण मं D.A.V.P. Mia of Information & Broadcasting 'वो' ब्लक, कस्तूरा गांधी मार्ग, नई दिल्ली। 1525 63020 03003 037 PSS2 PRINCIPAL BANASTHALIA VIDYAPEETH COLLEGE OF EDUCATION BANASTHALI TONK-304002 RAJASTHAN * Block Kasturba Gandhi Marg NEW DELHI-110001<noinclude></noinclude> djluvmqcgxciiebfpmns7hxv6exrr85 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४ 250 194883 665492 2026-07-06T16:30:42Z अजीत कुमार तिवारी 12 /* आवश्यक नहीं */ 665492 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="अजीत कुमार तिवारी" /></noinclude><noinclude></noinclude> nq2fpctlpggurkzvjlio3eqwj3zgj0v पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८ 250 194884 665493 2026-07-06T16:32:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665493 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>॥ श्रीः ॥ बूंदी राज्य के उद्धारक श्रीमान् महा राव राजा उम्मेद सिंह जी साहब बहादुर । जन्म संवत् १७८६, मृत्यु संवत् १८६९-<noinclude></noinclude> mba4ht81xo4rkjteboabrekr7nln2zy पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९ 250 194885 665494 2026-07-06T16:32:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665494 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>BANASTHALI VIDYAH.. 10957 Accessi in No. Date p<noinclude></noinclude> d1sbbwer24cn9a631uccjsgxp13o9aa पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७ 250 194886 665495 2026-07-06T16:32:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665495 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३१ 250 194887 665496 2026-07-06T16:32:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665496 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४ "3 ( १४ ) अध्याय उम्मेदसिंहचरित्र की- विषय ९ चक का विनाश दादानाती में मेल । " श्रीजी साहब के स्वामि भक्त सेवक, अनेक राजाओं ने श्रीजी साहय को अपने २ यहां रखने का आग्रह किया परंतु वह न गये, 23 33 23 2: 27 जयपुर नरेश ने श्रीजी साहब को अपने यहां बुलाया, " जालिमसिंहजी के मंत्री श्रीजी साहब से मिले ... " श्रीजी साहब जयपुर पधारे, जयपुर नरेश ने इन का वडा सत्कार किया, और कहा कि "मैं आपको बूंदी दिलवायूँ ।" " 22 23 23 " 37 2 बूंदी राज्य के प्रधान कर्मचारी श्रीजी साहब से मिलने आये, श्रीजी साहबन विष्णुसिंहजी से मिलकर तलवार दी, विष्णु 'सिंहजी उचित होगये, ... विष्णुसिंहजी ने कुचड़ियों को मारा, ... ... १८७. . 33 १८८ 39 १८९ १९० 22 ... १९१ १९२ १९५ " टाड साहब का मतभेद इसपर ग्रंथ कर्ता की राय, ढाड साहब ने श्रीजी साहब की बहुत प्रशंसा की है, " १० होलकर से मुठभेड 23 33 33 33 22 "लखनऊ के नवाब के अत्याचार, अंगरेजों ने उसे गद्दी से उतार दिया, उस ने जयपुर की शरण ली, अंगरेजों ने पीतल की अशर्फियां देकर उसे जयपुर से लेलिया, " विष्णुसिंहजी का चौथा विवाह " जालिम सिंहजी ने रानाजी से जहाजपुर छीन लिया, "पंजाबी रणजीत सिंह का दौर दौरा,. " दिल्ली को अंबे बादशाह को पेन्शन, "यायन्तराव होल्कर से श्रीजी साहब की मुठभेड, " अंगरेजों के प्रकार की वृद्धि, .... 25 १९६ 23 33 ... १९७ ... 33 ... १९८ "११ श्रीजी साहब का स्वर्गवास, वाडसाहब की भूल "टाइसाहब ने श्रीजी साहब के चरित्र को कलंकित बतलाया है। इस बात का अंत की ओर से खंडन, डाड साहब ने उनकी बहुत है प्रजा की है, 22 ... " श्रीजी साहय के देहान्तपर शोक, ग्रंथ दो की राय से यूटोंका शोक बढकर है, . ... ... ... ... 27 33 -" २०२<noinclude></noinclude> osyc9uptye9vsemceymtlkfnlpx7jnn पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३२ 250 194888 665497 2026-07-06T16:32:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665497 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विषमणिका । (1) सध्याय ४ १२ सिंह का उप 11 : 35 31 11 15 11 " 15 " " " " * निष्णुजी का गांगनां विचार ... 'जयपुर जोधपुर का बुद्ध श्रदयपुर की कृष्णहारी को ... विष्णुधिपुर को राहायता दो एक महीने में विष्णु के दो विष्णु दिजी का आदिवा निकाल दिया "सिंह जी लेलिया दूरी को रोना ने टडकर सभी ... विष्णु सिंह जी से धामा गांगो १३ मंडे हुजुर का क्रम नगरंग से सिं ए १.६ 10 ... ६०९ २१० १९६ "गहा राव राजा राम सिहजी का जन्म, in "साहब में आदिवा " ་་ " " " " " 11 की दिया. 'जार सिंह कोमें ... की यानी विष्णु सिद्ध श्री का पत्राचार 'कमानराम को विष्णु सिंह जीने महायना हो... ... " ५१० " इंडिया कंपनी से बीरंच को पिपि अनुवाद २१७ ४ विष्णु सिंह भी को वोरना, उनका पर गेम दिलाने में तन की बड़ी स्तुति की है और कोरिय छोटे कद देने पर अपनी गुल स्वीकार की है १४ विष्णु सिंह जीका देहान्त जागसिंह को डर कर गारावजी बूंदी आग, कोटा देश को बहुत " 884 ११. श रामशाना परंतु महाराज चिले गये "विष्णु सिंह की के विषय में नाक साहब की राग, उनके शेवानी का कर्ता की ओर नि पुस्तक की रागी । 11 महाराव राजा राम सिंह जी को राज्याभिषेक इति । 3P% ક્ "<noinclude></noinclude> o4wd9qiffpf7pa4jkhwv2qayor3uc51 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३३ 250 194889 665498 2026-07-06T16:33:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665498 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३४ 250 194890 665499 2026-07-06T16:33:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665499 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>॥ श्रीहरिः ॥ उम्मेदसिंह चरित्र प्रथम खंड 83--- वंशपरिचय | अध्याय १. चौहानों और हाडाओं की उत्पत्ति । पाली भाषा के किसी पुराने शिलालेख के आधार पर कर्नल टाड साहेब ने यद्यपि अपने "एनल्स ऐंड एंटीकिटीज आफ राजस्थान " नामक ग्रंथ में अग्निकुल के चारों क्षत्रिय वंशों को तक्षक जाति का वंशधर बतलाकर उनकी उत्पत्ति ईसामसीह से दो सौ वर्ष पूर्व मानी है, परन्तु जब यह उसी जगह टिप्पणी में इनको ईसामसीह से ६५० वर्ष पूर्व पैदा होने वाले जैनियों के तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथजी का समसामयिक बतलाते हैं, तब यह बात ठीक नहीं माम होती । इस के और भी कारण हैं और वे टाड साहब के अनुमान से अधिक प्रबल हैं। चौहान वंश के सुप्रसिद्ध इतिहासलेखक बूँदी के राजकवि कवि- शिरोमणि श्रीयुत सूर्यमलजीने प्राचीन इतिहास ग्रंथों से "वंशभास्कर" के नाम से बूँदी राज्य का जो एक बृहत् इतिहास तैयार किया है उससे स्पष्ट होता है कि चौहानवंश के मूलपुरुष चहुवानजी से लेकर बूँदी के वर्तमान नरेश श्रीमान् महाराव राजा श्रीरघुवीरसिंहजी बहादुरतक २०४ पीढियां हुईहैं । शाख के मत से यदि प्रत्येक पीढीके बीस वर्ष मानकर इसका पर्ता फैलाया जाय तो चहुवानजी के उत्पन्न होने का ठीक समय कलियुग के एक हजार वर्ष निकल ते हैं। यह गणना ठीक है क्योंकि बीस वर्ष की उमरमें आदमी के छडका होजाताहै<noinclude></noinclude> rxeb0yavqylauec21m5fq2iedkreh07 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३७ 250 194891 665500 2026-07-06T16:33:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665500 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | दलगया । यद्यपि राजस्थान के छत्तीस राजकुलों में अनेकों ने बहुत बल विक्रम दिखा कर प्रतिष्ठा पाई है और "लाख तलवार राठौरान" भारतमें प्रसिद्ध है परंतु फिर भी विशेष विचार से सिद्ध होता है कि राजपूतों में वीर चौहान सब से ऊंचा आसन पाने योग्य हैं।" इसी वीरश्रेष्ठकुलके मूलपुरुष चाडवानजी का जन्म वैशाख शुक्ला ३ सोमबारको अर्थात् उस दिन हुआ था जिस दिन अवतार लेकर जमदग्नि के पुत्र भगवान् परशुरामजी ने इफीस बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन कर दिया था। उन्होंने क्षत्रियहीन किया और इन्होंने क्षत्रिय जातिका देशभर में डंका बजा कर वीर चौहानों के पराक्रम से संसार में अपना यश विस्तृत करदिया । इन्होंने देस्योंका, दस्युओं का और वेदविरोधियों का संहार करके दिल्ली में अपना राज्य स्थापित किया । इनके वंशमें यों तो सबही पराक्रमी, सबही धीर, सबही प्रजापालक और सबही धर्मनिष्ट हुए हैं परन्तु मुझे इस समय चौहान वंश का इतिहास नहीं लिखना है। मुझे लिखना है इस वंश में से एक बीरपुंगव का चरित्र और उसे लिखने से पहले में इस कुछ का और इस वंश का परिचय देने के लिये यहां पर कुछ चुने हुए सवही धर्मनिष्ट हुए हैं परन्तु मुझे इस समय चौहान वंश का इतिहास नहीं लिखना है। ये बिना है इस वंश में से एक वीरपंगय का चरित्र और उसे लिखने से<noinclude></noinclude> n5c4w948jo3b2f3leankp6du55svws4 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३८ 250 194892 665501 2026-07-06T16:33:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665501 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौहानों और हाडाओं की उत्पत्ति । (५) वानजी से १४१ पीढ़ी में सोमेश्वरजी नामक सांभर के राजा हुएथे। उनके भरतजी और उरथजी के नाम से दो पुत्र थे । भरथजी के वंश में बीसलदेवजी, आनाजी, पृथ्वीराजजी और हम्मीरंजी प्रभृति वीरवर हुए और उरथजी के नौ पीढ़ी पीछे आंसर का किला बनवानेवाले भोमचंद्रजी, जिनका दूसरा नाम चंद्रसेनजी था, हुए। इन्हींके पुत्र भानुराजजी सुप्र सिद्ध वीरकेसरी हाडा शाखा के मूलपुरुष अस्थिपालजी थे । “वंशभास्कर" के रचयिता कविराजा सूर्यमलजी और "वंशप्रकाश" के रचयिता पंडितवर गंगासहायजी के मत से इन भानुराजजी का जन्म तापी नदी के पास आतेर में संवत् १०८१ में हुआ था। जिस समय यह अपने साथियों सहित जंगल में खेलर हेथे गभीरारंभ नामक राक्षस बालक का वेष बनाये इनमें आकर खेलने लगा और जब एक २ करके सब बालकों को खाचुका तब इसने बालक भानुराजजी पर वार किया । भीषण राक्षस के आक्रमण से बालक मारागया । राक्षस ने बांक का मांस खाया और अपनी समझ में उसका काम समाप्त ही करा परंतु ईश्वर को उसके वंश से संसारका कोई बडा भारी उपकार करना था इसलिये बालक के शरीर में जिस समय प्राण था उसने भगवती जगजननी कुलदेवी आशापुरा की स्तुति की स्तुति के बाद अवश्य ही दुष्ट राक्षस इस बाल- शरीर की हड्डियां छोड़कर चलागया परंतु देवी ने वहां आकर अस्थियों को बटोरा और उसी स्तुति से प्रसन्न होकर अपने कमंडलु के जल के छींटे देकर बालक को जिलाया। उसका नाम तब से अस्थिपाल रक्खा क्योंकि वह अस्थियों द्वारा पालित हुआ था। इस तरह देवी ने अस्थिपालजी को प्राणदान देकर वरदान से उनका प्रताप बढाया, शत्रुओं का दमन करके संसारमें अपना नाम करने की शक्ति दी और उस राक्षस का वध करने के लिये एक बरछी दी। उन्होंने उस बरछी से उस राक्षस का नाश किया। इनके पिता ने आसैर में आशापुरा देवी का मंदिर बनवाया । इन्होंने अनहिलपुर पाटन का कच्छ देश का विजय किया और भुज में तथा हिंगुलाज में देवी का मंदिर बना कर गोदावरी के तट पर अस्थिपालपुर बसाया । हांडा जातिके इतिहासलेखक गोविन्दरामकी "राजावली" के आधार परं टाड साहब ने जो कुछ इस विषय में लिखा है उसका आशय इससे<noinclude></noinclude> b35fc4q6l4pvz0sozngn9d71zo7b8uh पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/३९ 250 194893 665502 2026-07-06T16:33:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665502 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(4) उम्मेदसिंह चरित्र | भिन्न है। उन्होंने अस्थिपालजी का नाम इष्टपाल माना है और उनके मत से इनके पिता का नाम अनुराज था। उनके मत से गजलीबंद अर्थात् कजली पन के राक्षसों ने आसेर और गोलकुंडे पर चढाई की थी। इसे रोकने के काम में गोलकुंडे के रणधीर चौहान इनके सहायक थे। रणधीर ने अपनी लज्जा रखने के लिये "शाका" किया। उसमें इनकी लडकी सरहबाई के सिवाय सब खियां मरगई सरहबाई अपने प्राण बचाने के लिये जंगल में एक पीपल के पेड के नीचे जा छिपी। जिस समय वह भय और भूख के मारे मर रही थी, शत्रु के शस्त्रों से घायल अस्थिपालजी शत्रु का पीछा करते हुए उसी पीपल के पास आये और गिर गये। उस समय अचानक पीपल का वृक्ष फटकर उसमें से आशापुरादेवी प्रकट हुई और उसीकी आज्ञा से अस्थि- पालजी का भग्न शरीर सरहवाई ने जोडा और देवी ने अमृत छींटकर उनको जिला लिया । अस्थियां जोडने से वह जीवित हुए थे इसलिये उनका नाम अस्थिपाल हुआ और हड्डियों से उनके जीवित होने पर उनके वंशधर "हाडा ।" पिटा साहब यह कथा लिखी है परंतु उन्हें अस्थिपालजी के इस तरह जीवित होने और पहले राक्षस के हाथसे उनके मारे जाने पर विश्वास नहीं है । मुसलमानी इतिहासों में महमूद की अनहिलपुर पाटन पर चढाई होने का पता न लगने पर भी उन्होंने गंभीरारंभ को गजलीबंद और गजलीबंदको कजलीयन मानते २ गजनी मानकर महमूद गजनवी का संबंध इस युद्ध से खैच निकाला है । वह कहतेहैं कि सीलोन और पेगू पर चढाई करते हुए महमूद अनहिलपुर पाटन मैं बहुत काल तक ठहरा होगा और उसने गोलकुंडे से रणधीर को निकाल दिया होगा किन्तु इन बातों पर भी टाड साहब का पूरा विश्वास नहीं है। अस्थिपालजी का घातक महमूद को मानने पर भी टाउसाहब ने उनके जीवित होने की कथा पर कुछ राय नहीं दी है। वह एक विदेशी अंगरेज थे । उनका यदि इस बात पर विश्वास न हो तो कोई आश्चर्य नहीं परंतु जिन लोगों ने पश्चिमी शिक्षा पाई है उनमें से अनेक भारतवासी भी ऐसे हैं जिनके हृदय से, जिनके शब्दकोश से श्रद्धा शब्द उठगया है। वे विना तर्क से प्रमाणित किये अपने पिताको भी पिता मानने में हिचकते हैं। उनकी बात निराली है किन्तु श्रद्धा का विषय<noinclude></noinclude> nlafzp51igyexlkbjr6j4nm158qh3ma पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४० 250 194894 665503 2026-07-06T16:33:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665503 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बडा गंभीर है। इसकी अमृत फल देनेवाली है। बूँदी राज्य स्थापन | (७) सिद्धि तर्क से नहीं यह अनुभव से प्राप्त होकर यह गूंगे के गुड की तरह वाणी के अगोचर है । भक्ति इसीका पर्याय है और उपासनामार्ग से चारों पदार्थों को हाथ में आंवले की तरह सामने ला देने वाली यही एक श्रद्धा है जो तर्क को छोडकर श्रद्धा पर श्रद्धा करता है वहीं ईश्वर को पाता है यह हिन्दूधर्म का सिद्धान्त है और संसार के प्रायः सब ही धर्मों का यही निचोड हैं। 1 इन अस्थिपालजी के वंश में हम्मीरजी और गंभीरजी दो वीर पुरुष होगये हैं । ये येही वीरपुंगव हैं जो अंतिम हिन्दू सम्राट् पृथ्वीराजजी के सामंतों में से थे और जो कन्नौज के जयचंद्र राठोड से लडने में वीरगति को प्राप्त हुए थे। इन्होंने पृथ्वीराज से कह दिया था कि- "हे जांगलेश ! तुम अपने प्राणोंकी चिन्ता करो हम तो अपने शरीर जयचंद्र के समरयज्ञ में होम देते- हैं। हमारे घोड़ों की टायें समरभूमि को, समुद्र के जहाज की तरह पोठी कर डालेंगी" । इन्ही के वंशमें मांडलगढ बसानेवाले मंडनजी हुए हैं और इन्हींके वंश में चांहुवानजी से १८१ पीढी में बूँदी में प्रथम बार राज्य स्थापित करनेवाले देवसिंहजी हुए हैं। अध्याय २. बूँदी राज्य स्थापन | बूँदी राज्य के संस्थापक देवसिंहजी के विषय में टाडसाहब का मत बूँदी के इतिहासों से मिलता जुलता है। साहब ने अपनी किताब में लिखा है कि- " इन दिनों हाडाओं का पराक्रम इतना बढगया था कि दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी का भी इनकी ओर ध्यान आकर्षित हुआ । उसके बुलाने से अपने पुत्र हरराजजी को बंबावदे का राज्य देकर अपने छोटे पुत्र समरसिंहजी को लिये हुए दिल्ली पहुँचे। जबतक इनके घोड़े को देख कर बादशाह का जी न चायां ये यहां बने रहे। कहते हैं कि इनके पास घोडा ऐसा था जो जल में टाप डुबोये बिना नदी पार होजाया करताथा। ऐसे अद्भुत घोड़े को देख कर बादशाह के मुहँ में से पानी टपक पडा। देवसिंहजी को यह बात मालूम<noinclude></noinclude> bqrjmm3cqf2hyb8rh16l4g0596mdpgw पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४१ 250 194895 665504 2026-07-06T16:34:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665504 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(<) उम्मेदसिंह चरित्र | होगई थी इसलिये अपने साथियों को दिल्ली से चुपचाप विदा करके आप वहां अकेले रहगये। जब उन्होंने इस तरह अपने को निरापद समझा तब उसी घोड़े पर चढकर बादशाह से सलाम जा किया और कहा:-- “बादशाह सलामत, राजपूत से तीन चीज कभी मत मांगिये । उसका घोडा, उसकी स्त्री और उसकी तलवार" बस इतना कहकर उन्होंने घोडे की बाग ढीली डाली और सब लोगों के देखते २ अदृश्य होगये । बादशाह मुँह ताकता रहगया । किसीसे कुछ करते धरते न बना । जो बात देवसिंहजी ने वादशाह से उस दिन कही थी उसका वीर हाडाओं ने प्राण की बाजी लगाकर सदा निर्वाह किया। उन्होंने मुगल- बादशाहों की बढी स्वामिभक्ति करने पर भी उनको कभी अपने प्यारे घोडे नहीं दिये, कभी अपनी लडकी नहीं दी और कभी शस्त्र छोडकर बादशाहों के दर्जार में न गये। बांदू के नले में देवसिंहजी के वृद्धप्रपितामह के स्थापित किये हुए श्रीके- दारेश्वर के मंदिर के निकट बूँदी नामक ३०० घरों की बस्ती का छोटासा गांव था। यहां अन्य १२ गावों के साथ जैते मीने का राज्य था। इसके दीवान जसराजजी गोलवाल चौहान थे। शुद्ध जैते को राजमद में आकर यहां तक साहस हुआ कि उसने जसराजजी की लडकियां अपने बेटों के लिये मांगी जसराजजी जैते की नौकरी करके उसका सामना करने में असमर्थ थे इस लिये उन्होंने बंबावदा राज्य के स्वामी देवसिंहजी की शरण ली। अर्द्धजंगली मांने समर- भूमिमें जमकर लड़ने में जितने कसे होते हैं मार काट कर भाग जाने में उतने ही पक्के होते हैं। इसलिये यह आशा न थी कि वे देवसिंहजी के सामने खड़े होंगे। इस कारण विवाह के बहाने से मीनों को घेर लेने का ठहराव हुआ और जिस समय जेता अपने बेटों की वरात सजकर आया उसके साथियों सहित मारडाला गया। बस इस तरह संवत् १२९८ की आपाठ कृष्ण ९ को देवसिंहजी का बूँदी में अधिकार होगया । उन्होंने बूँदी गांव को राजधानी बनाया और तब से हाडाशिरोमणि की यहीं राजधानी चली आती है । इन्हींके पौत्र जैतसिंहजी ने कोट्या भील को मारकर कोटा बसाया । टाड साहब ने धोखा देकर मीनोंसे बूँदी छीनने के काम पर देवसिंहजी की निन्दा की है और<noinclude></noinclude> 8ze2lixvi5yjnsq2vh9op6zuz0kt8sb पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४२ 250 194896 665505 2026-07-06T16:34:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665505 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी राज्य स्थापन | (९) यह मैं भी मानता हूँ कि यह धर्म युद्ध नहीं कहला सकता है परंतु जिस कुटिक नीति से अंगरेजों ने बंगाल प्रान्त में अपना आधिपत्य जमाया है उसे देखते हुए यह कुछ नहीं हैं। कहीं के इतिहास ऐसी घटनाओं से खाली नहीं है। टांड साहब कहते हैं कि इसी ग्लानि से कदाचित् राज्य अपने पुत्र को देकर देवसिंह जी ऊमरथूने में जा रहे । मेरी समझ में यह जा अवश्य रहे परंतु इस ग्लानिके लिये नहीं किन्तु हिन्दू धर्म के अनुसार तृतीयाश्रम अर्थात् वानप्रस्थ धर्म का पालन करने के लिये। बूँदी के धराने में देवसिंह जी ने, सुरजन जी ने और इस चरित्र के नायक उम्मेदसिंह जी ने इस धर्म का पालन किया है । देवसिंह जी के पुत्र समरसिंहजी ने जो पराक्रम किये उन्हें विस्तार भय से न लिखने पर भी यहां उनके पुत्र नापाजी के विषय में कुछ लिखे बिना नहीं बन सकता। वह बड़े ही सुस्त थे। उनके देखते २ उनकी आंखों के सामने से शेरगढ का राजा पंवार हरराज "गणगोरि" छीन लेगया और उनसे करते कुछ भी न बन पडा किन्तु उनके पुत्र हामाजी ने पंवार राजा की रानी और "गणगोरि" छीन कर थोडे ही समय में बदला भी लेलिया । केवल इतना ही नहीं किन्तु अपने पिता के घात करने वाले अपने मामा को मार कर भी यह पितृऋण से मुक्त हुए। टाड साहब के मत से हामाजी संवत् १४४० में गद्दी पर विराजे थे। वायदे की गद्दी के मालिक हामाजी के चचेरे चचा हालूजी की वीरता का एक उदाहरण लिख कर मैं अपनी कथा को आगे चलाना चाहता हूँ। हादजी जिस युद्ध में जाकर खड़े होते थे उसमें उनका विजय ही होता था मानो विजय लक्ष्मी- उनके पैरों में बंधी हुई थी इसलिये उन्हें यहां तक हौंसला होगया था कि उन्होंने समरभूमि में प्राण विसर्जन करने का प्रण किया था। इसी को पूरा करने के लिये उन्होंने कवि लोहटजी चारण को अपनी पगडी देकर कह दिया था कि-- "जिस समय हमारी पगड़ी बांधो किसी के आगे शिर न झुकाना ।” बिचारे कविजी बहुत काल तक ऐसा ही करते रहे परन्तु मंडोर के पडिहार हम्मीरजी ने धोखा देकर लोहटजी की पगडी छीन ली और कुत्तेको पहना दी इसलिये हालूजी से युद्ध हुआ और हम्मीरजी संग्राम में हार गये। जब हालूजी से रण भूमि में मरने ● इनके हाथ से चित्तोड के राणा मोज मारे गये थे।<noinclude></noinclude> gg1e4g4vd3caggai45i8k6nggsb4jxm पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४३ 250 194897 665506 2026-07-06T16:34:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665506 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १० ) म्मेदसिंह चरित्र | के प्रण का निर्वाह न हो सका तब उन्होंने ९२ वर्ष की उमरमें अपना शिर काट कर भद्रकाली को चढा दिया। हामाजी के दो पुत्र थे बडे बरसिंहजी बूँदीनरेश और छोटे लाल- सिंहजी गैंडोली के जागीरदार । लालसिंहजी की लडकी का संबन्ध चित्तोड के राना हम्मीरजी के पुत्र खेतलजी से हुआ था। इनकी बरात में बारूजी चारणये जिन्होंने कुछ काल पहले चित्तोड में एक पत्थर की चार हाथवाली मूर्ति निकलने पर रानाजी से कहा था कि यह मूर्ति कहती है कि आपके सिवाय दानी और शूर संसार में नहीं है, धरती पर नहीं है और आकाशपर नहीं है । यदि हो तो मेरा शिर काट डाला जाय क्योंकि उसका एक हाथ धरती की ओर, दूसरा आकाश की ओर तीसरा रानाजी की ओर अर्थात् सामने और चौथा अपने गलेकी ओर था । विवाह के दूसरे दिन मद्य के नशे में वीर चर्चा होते २ ही लालसिंहजी ने इस बात को छेडकर जोश के साथ बारूजी से पूंछा कि-“तुमने ऐसी बनावट क्यों की? क्या उनके समान दानी और शूर दूसरा नहीं है ? तुम मेरा शिर मांगो तो उसे भी देने को तैयार हूँ । एक दामाद को छोडकर जिसका जी चाहे लडने को सामने आजाय इतना होने पर भी तुम न मांगो तो तुम "नालायक" और में न दूँ तो में नालायक । भला मूर्ति पत्थर की है उसका तो शिर क्या काटा जाय परन्तु तुमने झूठी बात बनाई है इसलिये तुम अपना शिर काट डालो ।" इस बात से लज्जित होकर बारूजी ने अपना शिर काट दिया और उसी क्षण युद्ध का आरंभ होकर कई बार बचाने पर भी ससुर के हाथ से दामाद का शरीरांत होगया । युद्ध छिडने से पहले वरसिंहजी और लाल सिंहजी ने दामाद को बहुत समझाया परन्तु उनके हठ और पिता को प्रेरणा से उन्हें मरना पडा । और कंकण बंधे हुए हाथ से डाउसिंहजी की बाईजी अपने पतिपर सती हुई। यह झगडा यहीं समाप्त न हुआ परन्तु जिस समय इस भयंकर घटना की खबर चित्तोड पहुंची तब रानाजी के पुत्र ने प्रण किया कि "बूँदी का सर्वनाश करके भोजन करूँगा" परंतु बूँदी का सर्व नाश ! बूँदी का सर्व नाश क्या गुडियों का खेल था अन्तमें मट्टीकी बूँदी बनाकर उसके नाश से रानाजी की शपथ छुडाना निक्षय हुआ परन्तु यह बात भी सहज न निकली । रानाजी की सेवा में<noinclude></noinclude> 5f0byvbz5x0vtkdiu8lrxvc0v0rr3l9 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४४ 250 194898 665507 2026-07-06T16:34:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665507 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी राज्य स्थापन | (११) रहकर उनकी रोटी से पेट भरने वाले कुंभकरणजी हाडा ने जब तक उनके शरीर में प्राण रहे और जब तक एक भी हाडे की तलवार चलती रही उस मिट्टी की बूँदी की रक्षा की और अपने केवल तीन सो साथियों से चित्तोडी सेना के छके छुड़ा दिये। यह लेख बूँदी के इतिहास का है किन्तु टाडसाहब ने इसका स्वरूप कुछ खोर ही तरह दिखलाया है। उनके कथन का सार यह है कि अलाउद्दीन के धकेसे जब रानाजी को साँस मिला तब उन्होंने अपने फिराऊ जागीरदारों को दमन करना आरंभ किया। यह बूँदी नरेश हामाजी को भी अपना जागीरदार मानते थे इसलिये इनसे चित्तोड आकर नौकरी करनेका दबाव डाला। उन्होंने कहा कि हम रानाजी को बडा मानते हैं, होली दशहरे के त्योहार पर हम चित्तोड जाते भी हैं, हमारे यहाँ राजतिलक का टीका भी यहां से आता है परंतु हम उनके पाद सेवी नहीं है। हम उनकी नौकरी न करेंगे। इस पर रानाजी ने बूँदी पर चढाई की परंतु हार कर उन्हें चित्तोड की शरण लेनी पडी । इसी अपमान की मरम्मत करने के लिये उन्होंने मिट्टी की बूँदी का नाश किया । कुछ भी हो इन्हीं हामाजी के पुत्र बरसिंहजी का बनाया हुआ बूँदी का “तारा- गढ़ किला है। यह किला संवत् १४११ में बना है । बरसिंहजी के पौत्र भांडाजी के समय भारत वर्ष में संवत् ११४२ में बयालीसे के नाम से बढा भारी अकाल पडा था। उस समय उन्होंने अन्न देकर केवल अपनी प्रजा के ही प्राण न बचाये वरन बडे २ राज्यों को इनसे अन की मिक्षा लेनी पडी। इनके छोटे भाई श्यामजी को, जिन्हें बहुत बालकपन में मांडू का बादशाह उठा ले गया था और जो मुसलमान होगये थे इनकी दया से लाभ उठाकर इनका राज्य छीन लेने का अवसर मिला और इस तरह इन्हें अपनी आयु के पिछले दिन माढूंदे में रहकर बिताना पड़ा । इन्हीं टाडसाहब ने भांडाजीके दो भाइयों का श्यामजी का नाम समरकंद था किन्तु मुसलमान होकर समरकंदी और अमरकंदी के नामसे इन पर चढाई करना लिखा है। कुछ भी हो इससे पहले एक बार जब राना कुंभाजी ने बूँदी पर चढाई करी तब उन के शिर की पगडी भांडाजी हाथ आगई थी ।<noinclude></noinclude> tiuyglpvg9kkcmazm44bh5v9unyal5t पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४५ 250 194899 665508 2026-07-06T16:34:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665508 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | टाड साहबने भांडाजी का मांटूदे में मृत्युसे मरना लिखा है किन्तु "वंश- प्रकाश" में लिखा है कि यह मुसलमानों के हाथ से मारे गये। इनके पुत्र नारायणदासजी एक होनहार युवा थे। उन्होंने केवल सात बहादुरों सहित समरकंद के पास जाकर अपनी सलवार से उसका शिर काट डाला । इस तरह इनका बूँदी पर अधिकार होगया । इस जगह भी टाड साहब समर- कंद और अमरकंद दोनों भाइयों का नारायणदासजी के हाथ से मारा जाना बतलाते हैं परन्तु बूँदी के इतिहास के मत से समरकंद गढ़ में मारा गया था और उसका बेटा दाऊद बाजारमें। टाड साहब लिखते हैं कि "नारा- यणदास जी बडे शक्तिसम्पन्न और बहादुर थे । वह उन वीर राजपूतों में से एक थे जो डरका नाम भी नहीं जानते हैं किन्तु अफीम खाने का इनमें ऐब पडगया था। यह एक बार में १३ रुपये भर अफीम खाते थे। ग्रन्थका विस्तार होने पर भी इनकी वीरता के जो दो तीन किस्से टाड साहब ने लिखे हैं उनका यहां सूचन किये बिना में आगे नहीं बढ सकता क्योंकि वे बहुत रोचक भी हैं । जिस समय मांडूके बादशाह ने मेवाड के राना रायमलजी पर चढाई करके रानाजी को बहुत सताया उनकी बुलाहट पाकर नारायणदास जी बूँदी से चित्तोड गये । पहली ही मंजिल में अफीमची नारायणदासजी एक कुए के पास मुँह बाये पडे थे । इनके मुखपर मक्खियां भिनभिना रही थीं। देखकर एक सेंलिन पनिहारी ने कहा- "क्या ऐसों ही से रानाजी मदद माँगते हैं।" अमलदार देखते नहीं हैं किन्तु सुनते बहुत हैं नारायणदासजी ने सुनते ही गर्ज कर कहा- क्या कहा रे रॉड !" इतना कहकर उन्होंने एक छोहे की मोटी छड मरोडकर उसके गले में लपेट दी ।” उन्होंने चुपचाप चित्तोड पहुँच कर बादशाह की सेना पर अचानक ऐसा धावा मारा कि उसके पैर उखड़ गये । मुसलमान गाजर मूली की तरह काट दिये गये और इस तरह रानाजी की रक्षा हुई। रानाजी ने अगवानी करके इनका बहुत सत्कार किया। इस पर रानाजी ने अपनी भतीजी इनको विवाह दी । कहते हैं कि नारायण दास जी ने इनकी दिल्लगी करने पर एक राजपूत को रांना जी के दर्वार में मारडाला था। उन्होंने मांडूके वादशाहं का बहादुर इक्का सवार जो उनसे<noinclude></noinclude> 5r13z98n2bgrmd8dmfrwy7agff4pf8n पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४६ 250 194900 665509 2026-07-06T16:35:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665509 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदीराज्य स्थापन ! (१३) "खिराज" लेने आया था अपनी साँगसे इस तरह मारडाला जिससे एक ही सांग में घोड़ा और सवार दोनों विधगये। एक बार अफीम न मिलने पर नारायण दास जी ने अपनी बाहों में दो साँप भरकर उनके जहर से अफीम का काम निकाल लिया था। इनके ऐसे २ अनेक किस्से प्रसिद्ध हैं। इनके समय में बूँदी राज्य ने बहुत विस्तार पाया था। बूँदी के इतिहास में यह भी लिखा है कि “जब दिल्ली के बादशाहं बाबर ने चितोड पर चढाई की तब भी नारायण दासजी राना जी की सहायता पर थे। बादशाह की सेना अधिक देखकर राना जी ने भागना चाहा तब नारायण दास जी ने कहा कि- "दीवान पदवी जाकर न भागिये ।" इस पर इतना कह कर कि "यह दीवान पदवी आप ही को मुबारिक रहे" - रानाजी चले गये और नारायण दास जी ने फडकर बावर से विजय पाया। तबसे बूँदी नरेश को "दीवान" कहते हैं। टाक साहब कहते हैं कि नारायण दास जी के पुत्र सूर्यमलजी ज... संवत् १९९. 30 में गद्दी पर बैठे थे अपने पिता की तरह बड़े बलवान और साहसी थे । भगवान् रामचन्द्र जी और पृथ्वीराजजी की तरह उनके बाहु घुटनों से नीचे तक थे अर्थात् वह "आजानुबाहु" थे। इनके पिता नारायण दासजी के हाथ से जब से इका सवार मारा गया तब से एक हाथी १ घोडा १ तयार १ शिरपेच और एक कमान प्रति वर्ष राना जी की ओर से बूँदी आया करती थी और जब से नारायण दास जी ने बाबर बादशाहले विजय पाया रानाजी इससे दुगुनी भेजते थे परन्तु रानाजी के कामदार पूर्णमल्ल ने द्वेष करके उन्हें बहकाया और इस वार्षिक भेटको बंद करवा दिया । इस अवसर में सूर्यमलजी अपने ससुराल से लौटते हुए जब चितोड गये और वहां रानाजी के रानी जी अर्थात् सूर्यमलजी की बड़ी साली के कहने से इन्होंने एक सिंहकी शिकार करने में बड़ी बहादुरी दिखलाई तब रानी जी ने अपने पतिते इनकी प्रशंसा की और इस पर पूर्णमल को इनके विरुद्ध रानाजी के कान भरने का बहुत बड़ा अवसर मिला। उसने रानाजी को बहका दिया कि "रानीसाहब का सूर्यमलजी से बुरा संबंध है।" बस यही बात इन दोनों में<noinclude></noinclude> mw3jf91b9xnfiaky3cpse0h7lronp5x पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४७ 250 194901 665510 2026-07-06T16:35:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665510 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४ ) उम्मेदसिंह चरित्र । झगडा खडा होनेकी जड़ है । यह कथन बूँदी के इतिहास का है किन्तु टाई साहब ने इसकी सूरत और ही तरह से बतलाई है। वह कहते हैं कि “जिल समय सूर्यमल्लजी चित्तोड गये उनकी बहन सूजाबाई ने जो रानाजी को विवाही थीं, दोनों के भोजन करते समय कह दिया कि - "मेरा भाई सिंहों की तरह खाता है और मेरे पति बालकों की तरह ।” वस यही बात झगडे की जड हुई । फाल्गुन के महीने में राजपूत अहेर (शिकार) बहुत खेलते हैं। इस उत्सव का नाम अहेडा है । वंदावदा में हाडा वंश की रानी सती होते समय कह गई थी कि जब बूँदी के राव और चित्तोडके राना अहेडे पर इकडे होंगे इस का परिणाम बहुत भयानक होगा। इस सती वाक्य पर ध्यान न देकर अहेडे के समय राना और राव नान्ते में शिकारके लिये इकट्ठे हुए। बूँदी के इतिहास "वंशप्रकाश" में लिखा है कि "पूर्णमल के बहकाये हुए राना रत्न जी ने सूर्यमल जी को मारडालने का कौशल किया । एक दिन वार खाली जाने पर दूसरे दिन हरिणोंके शिकार में उनको अकेला लेखिया । यहां पूर्णमल्ल ने अवसर साथ कर सूर्यमल जी पर तीर मारा । तीर उनके शरीर को वेधकर पार निकल गया उसी समय वह गिरे परन्तु पीछे राना जी के एक आदमी को जो उनके कटारी घूंसदेने की ताक में था उसे अपनी पीठ के जोरसे मार कर गिरे । तुरन्त उन्हें मूर्च्छा आगई। मूर्च्छा आते ही पूर्णमल्ल ने समझ लिया कि यह मरगये इसलिये उसने राना जी को बधाई दी। बधाई का शब्द कानमें पडते ही वीरवर सूर्यमल जी को चेत हुआ और उन्होंने उसी क्षण एक ही तीर से रानाजी के तीन आदमियों को, जिन में एक पूर्णमल भी था और जो कतार बांधे खडे थे मार गिराया। इससे सूर्यमल जी को जब दूसरी बार मूर्च्छा आगई तब राना जी ने पास आकर तलवार चलाई । तलवार का वार खाली गया और इन्होंने रानाजी को घोडे पर से नीचे गिराकर कटारी से उनका पेट फाड डाला। पास ही रानाजी का एक आदमी और था जो इन्हें मरा समझ कर इनके पैर से सोने का लंगर खोल लेना चाहता था इन की लात से भारागया । इस तरह राना जी समेत छः आदमियोंको मारकर बीर पुंगव सूर्यमलजी सुरलोक को सिधार गये ।" यह घटना टाड साहब की किताब से कितने ही अंश<noinclude></noinclude> 18jnlknz6lsog2r7kes4everms99ssq पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४८ 250 194902 665511 2026-07-06T16:35:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665511 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>राज्यकी उन्नति । में कम मिलती है। यह लिखते हैं कि- "जब अपने ऊपर आता हुआ देखा तब उन्होंने (१५) सूर्यमल जी ने पुरबिया का तीर अपने तीर से उसे छोटा दिया। सूर्यमल जी इसके बदले में अपना तीर चढाने भी नहीं पाये थे कि राना जी ने अपना खांडा मार कर उन्हें गिरा दिया। और ज्योंही वह भागने लगे सूर्यमल जी ने कडक कर कहा "तुम भले ही भाग जाओ परन्तु तुमने मेवाड को डुबो दिया ।" जब पुरबिया ने इनको अपने घाव पर शाल लपेटते देखा तब कहा कि- "काम अधूरा हुआ है ।" बस कायर राना ने घायल राव पर एक बार फिर वार किया । इस तरह की निर्लज्जता का काम करने के लिये राना ने ज्योंही हाथ उठाया घायल सिंह की तरह लपक कर राव ने राना जी का कपडा पकड़ कर उन्हें घोडे से गिरा दिया और उनकी छाती पर चढ़ बैठे । उन्होंने फिर एक हाथ से राना का गला पकड और दूसरे से कटार निकाल कर उनके कलेजे में घुसेड दिया। बस वह इस तरह अपने शत्रु की लाश पर गिर कर अपने प्राण खो बैठे। इस बात की खबर जब बूँदी में हुई तब राव की वीर प्रसूमाता वीर कहा--" है ! मारा गया ! परन्तु क्या अकेला ही नहीं क्षत्राणी ने सुन कर इस दूध का पीने वाला अकेला नहीं मर सकता ।" इस तरह कहते ही मातृस्नेह समुद्र सीमा तोड कर बह निकला। माता के स्तनों से जो दूध की धारा निकली उसके गिरने से एक शिला के टुकडे २ होगये। उधर राना जी पर सूर्यमल जी की बहन सुजाबाई | और इधर इनपर इनकी रानी सती हुई। यहां टाड साहबने राना रत्न जी की बहन को सूर्यमल जी की रानी बतलाकर उनका सती होना लिखा है परन्तु बूँदी के इतिहास से बोध होता है कि राव और राना आपस में साढू थे और दोनों श्रीनगर के पंवार राजा सारंग जी की बेटियां थीं। अध्याय ३. राज्यकी उन्नति । राव सूर्यमल जी जितने बहादुर थे उनके पुत्र सुरतानजी उतने ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार की कथा जैसे बूँदी के इतिहास में है पैसे ही<noinclude></noinclude> 5w2kg2nq959yd38olh4gorw15svtu1c पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/४९ 250 194903 665512 2026-07-06T16:35:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665512 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१६) उम्मेद सिंह वरित्र । + ढाड साहब की किताब में वह इस न्यायशील वीर घराने में राजा वेणु के समान थे। जो इन्हें अच्छी ऊपर उपकार करने वाले को सलाह देता उसकी प्रतिष्ठा बिगाडते, अपने मारडालने का मनसूबा करते और टाढ साहब ने यहां तक लिखा है कि अपनी प्रजाकी आंखें निकलवा कर काल भैरव को चढाया करते थे । अन्त में यहां के उमराव और यहां की प्रजा उनके अत्याचारों से तंग आगई और उन्होंने इनके दादा राव नारायण दास जी के भाई नर्वद जी के पौत्र सुरजनजी को चित्तोड से बुलाकर बूँदी का राज्य दिया। सुरजन जी का शासन बूँदी राज्य के लिये बडा लाभ दायक था। उन्होंने बूँदी का उद्धार किया, इसे बढाया और बड़ा काम करके बडा नाम कमाया । टाड साहब स्वीकार करते हैं कि इनके समय से बूँदी राज्य में नये युग का आरंभ होगया । यह ३६ वर्षकी उमर में संवत् १६-११ में गद्दी पर बिराजे। इनके शासन में सुरतान जी के समय का गया हुआ कोटा हाथ आया और रणथंभोर का किला भी इन्हें मिलगया । बादशाह अकबर ने जान झोंक कर चित्तोड गढ अवश्य लेलिया परन्तु फिर भी उसकी लालसा नहीं मिटी थी। उसने रणथंभोर का किला लेने के विचार से उसका घेरा देकर कई दिन लडाई करने पर भी जब विजय न पाया तब सुलह का पैगाम लेकर जयपुर नरेश भगवान दास जी को और उनके पुत्र मानसिंह जी को सुरजन जी के पास भेजा और जलेबदार का वेष बनाकर आप भी उनके साथ गया । कहते हैं कि जयपुर नरेश की ढीली ढाली और सुरजन जी की जोशभरी बातें सुनकर अकबर को जोश आगया । जोश से अकबर पहचान लिया गया और उसका हाथ पकड़ कर सुरजन जी ने अपनी गदी पर विठला लिया । बस फैसला होगया। सुरजन जी ने अकबर से सात परगने लेकर और सात शर्तें लिखवा कर किला संवत् कर दिया। बूँदी के इतिहास में वे सात शर्तें ये हैं:- १६२४ में खाली (१) हम अपनी लडकी बादशाह को न देवें । (२) हमारे रनवास की स्त्रियां नौरोज पर बादशाह के जनाने में न जायें। (३) अटक नदी के पार उतरने का हम पर दबाव न डाला जाय ।<noinclude></noinclude> f6yvosmlmroayix2v8izqqtyx52biwl पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५० 250 194904 665513 2026-07-06T16:35:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665513 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>+ 'राज्यकी उन्नति । (१७) (४) हम बादशाह के आम और खास दर्बारों में शस्त्र बांधकर आ सकें (९) दिल्ली नगर में और छांट कोट तक हमारा मकारा बाजे । :1 (६) हमारे घोड़ों के दाग न छ अर्थात् उनके पुट्टों पर गर्म लोहे के निशान न किये जायें और- (७) हम किसी राजा के अधीन होकर युद्ध में न जायें। टाड साहब कहते हैं कि शर्तें १० हुई थीं। उनके मतसे:- (८) हमसे जजिया न दिया जाय। (९) हमारे पवित्र मंदिरों की प्रतिष्ठा की जाय और (१०) जैसे दिल्ली बादशाह के लिये है पैसे बूँदी हाडाओं के लिये रहे । इस तरह शर्तें दश हुई थीं। रातें सात हुईं पा दश हुई सो में नहीं कह सकत हूँ परन्तु ढाड साहब ने अपनी किताब में रणथंभोर वादशाह को दे देने पर सुरजन जी को विश्वास घात का दोषी ठहराया है और उनके विचार से ये परगने और शर्ते उसकी रिशवत हैं परन्तु उन्हीं के लेख से जब यह स्पष्ट "होता है और बूँदी के इतिहास भी जब इसकी साक्षी देते हैं कि बूँदी वाले के कुटुम्बी सामन्त सिंहजी ने यह किला मुसलमानों से पाया और पाकर उन्होंने सुरजन जी को देदिया फिर जिसके शिर में जरासी भी बुद्धि हे वह क्यों कर मान सकता है कि रणथंभोर का किला रानाजी का यह और उन्हीं के अधीन था। ऐसी दशा में टाड साहब ने इस प्रकार के शब्द लिखने में भूल की है। खैर कुछ भी हो परंतु सुरजन जी ने बादशाह अकबर से ये शर्तें लिखवा कर हाडा कुछ को, उन कलंकों से मुक्त कर लिया जो मुगल बादशाहों को लडकियां देने से जयपुर जोधपुर जैसे बडे २ राज्यों पर लगकर युग युगान्तर तक इतिहास के पृष्ठ काले करते रहेंगे । सुरजन्। " जी ने बादशाह अकबर की आज्ञा से गोंडवाने का बिजय करके राव राजा की ! पदवी पाई, पंजइजारी मनसब पाया और २६ परगने बूँदी के पास और इतने ही काशी के निकट पाये तब से यह बूँदी का अधिकार अपने पुत्र को देकर काशी ही में निवास करने लगे। वहां इनके बनाये राजमन्दिर डाडा बाग, सूर्यकुंड, सुंगर बाग आदि स्थान काशी में तथा कितने ही स्थान<noinclude></noinclude> bohmlgbgy02e7g051z3d1rlof05nbui पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५१ 250 194905 665514 2026-07-06T16:35:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665514 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(?) उम्मेदसिंह चरित्र | मिर्जापुर जिले में अब भी विद्यमान हैं। ढाड साहब लिखते हैं कि "काशीका राज्य पाकर इन्होंने अपनी दयालुता, बुद्धिमानी और उदारता से भारत साम्राज्य और विशेषकर हिन्दू प्रजा को वडा लाभ पहुँचाया, उनकी पुलिस से प्रान्त भर में शान्ति फैलगई, उन्होंने काशी को दर्शनीय कर दिया और उन्होंने बीस घाट और ४४ मंदिर बनवाये"। उनका राज्य काशी में संपत् १६३२ में स्थापित हुआ था और राज मंदिर संवत् १६४१ में बना है । उनका देहान्त संवत् १६४२ में काशी में हुआ । सुरजनी के तीन पुत्र थे। बडे दूदाजी मा भोजजी और तीसरे रायमलजी । दूदाजी का अक्खडपन देख कर बादशाह अकबर उन्हें दूदा लक्कड खां कहा करते थे क्योंकि इन्होंने नाराज होकर वादशाह को सलाम नहीं किया था। भोजजी कुंवर पदे ही में अकबर के पास बडी २ वीरता -- दिखाकर खुब यश छूट चुके थे। उन्होंने बादशाह को सहायता देकर सूरत का बादशाह मारा, उन्होंने अहमद नगर की थीर रमणी चांद सुल्ताना वेगम' को जीतकर वहां भोज बुर्ज बनवाया और उन्होंने ऐसे २ कई पराक्रम दिखाकर बादशाह अकबर से ४ शर्तें और करवाई । ( (१) हमारी सेना के समीप गोबध न होने पायें । (२) हमारी सेना के निकट मूर्तियां न तोडी जांय । (३) वर्षा ऋतु में हम बिना छुट्टी अपने देशको चले जा सकें। और (४) बादशाह की सवारी के समय हम बिना आज्ञा भी घोडे पर चढ सकेँ । जयपुर के महाराज मानसिंह जी बादशाह के खुब मुँह लगे थे। जो उनसे मिलकर न रहता उसकी चुगन्दी करने से भी नहीं चूकते थे। एक दिन उन्होंने इनके सामने ही बादशाह से कहा कि सूरत के बादशाह की पगड़ी का बहुमूल्य हीरा इनके पास है। बादशाह ने भोजजी से जब मांगा तो उन्हों ने कहदिया और कटारी पर हाथ रखकर कह दिया कि-" हीरा तो हमारे पास है परंतु जो बतलाने वाला है उसे समझ लेंगे ।" इस बात से जलकर जब बादशाह की माता का देहान्त हुआ मानसिंह जी ने उन्हें बहकाया कि-" भोजजी यदि डाढी मोंछें मुडवावेंगे तो सब ही राजा मुंडना लेंगे क्योंकि यही बड़े धर्मध्वज हैं। " नादशाह ने इस<noinclude></noinclude> 07ycv8gwr4mhstb262q8786eeagbe80 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५२ 250 194906 665515 2026-07-06T16:36:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665515 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>राज्यकी उन्नति । ( १९ ) बात पर बहुत हट किया परंतु उन्होंने एक बाद भी न दिया । इसपर चढकर बादशाह ने ४६ परगने छीन लिये। बूंदी के इतिहास में बादशाह की माना के मरने पर मोंठ मुंडवाने की घटना का उल्लेख है किन्तु ढाड साहब कहते हैं कि बादशाह की जोधपुर वाली बेगम जोधाबाई की मृत्युपर यह घटना हुई थी । उस समय बादशाह ने सब ही हिन्दू राजाओं को डाढी मोंछें मुडवाने की आज्ञा दी थी और सब लोगों ने मुंडवाई भी थी परंतु बादशाही नाई जब मूंडते २ बूँदी बालों के पैरों पर आये तब उन्होंने उनको पीट कर निकाल दिया । केवल इतना ही क्यों न युद्ध करने को तैयार हो गये। जब इस बात की अकबर को खबर हुई तब वह संमन्दा | इन्हें मनाकर अपने पास लेगया और उसने राजा सुरजन जी की बातें याद करके कहा कि "सुअर खाने वाला हमारी बेगम के लिये डाढी मोठं मुंडवाने का अधिकारी नहीं है।" बस इस बहाने से बादशाह ने इस झगडे कोटा दिया। टाड साहब ने भोजजी की वीरता और उपकारों को भूलने पर अकबर की निन्दा और उनकी खुशामद करके मना लेने पर उसकी स्तुति की है। संवत् १६६४ में भोजजी का देहान्त होने पर उनके पुत्र रात्रराजा रत्नजी दी अधिकारी हुए। टाड साहब ने अपनी किताब में लिखा है कि" वादशाह जहांगीर ने अपने पुत्र पर्वेज को बुरहानपुर का सूबेदार बनाया था परंतु खालची शाहजादे खुर्रमने अपने भाई का अथ कर डाला। खुर्रम जयपुर वालों का दौहित्र था इस कारण दतं राजपूतों का बहुत सहारा था। एक रत्नजी को छोड कर बाईस राजा उसमें मिल गये थे । उसने घुरहा- नपुर लेने के लिये घोर बलवा किया और अकेले रत्नजी ने ही उसे जीत- कर बादशाह का हित साधन किया। इस तरह अवश्य ही बादशाह का हित साधकर अच्छा इनाम पाया परंतु बादशाह को राजपूत राजाओं का चढना पसंद नहीं था इसलिये उसने इस युद्ध में वीरता दिखाने वाले रत्नजी के पुत्र माधवसिंहजी को कोटा अलग देकर हाडौती के टुकडे करडाले । राव राजा रामजीने बागी दर्यायां को पकड़कर नौबन पाई, पीला झंडा पाया और उस झंडे को बादशाह के सामने उडाने का अधिकार पाया। राव राजा रत्नजी<noinclude></noinclude> c9p7reta9uhc4v285i85w30bdr832le पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५३ 250 194907 665516 2026-07-06T16:36:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665516 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २० ) उम्मेदसिंह चरित्र | ने बादशाह से यह प्रण करवा दिया था कि " जहां उनके डेरे हों वहां गो करके भूमि अपवित्र न की जाय। " टाड साहब कहते हैं कि इस प्रण से रात्रराजा ने केवल राजपूत भाइयों ही का दुःख दूर नहीं किया वरन समस्त हिन्दू जाति का उपकार किया । अपने पराक्रम और नेकी का सदा के लिये नाम छोडकर बुरहानपुर के निकट रावराजा रत्नजी मारे गये ।" इस तरह जो बातें इनके विषय में टाडा ने दिखी है अनेक अंशों में बूँदी के इतिहास से मिलती जुलती हैं। केवल दो तीन बडी २ यातों का अंतर है। एक यह कि बुरहान- पुरका चलवा करने के बाद खुर्रम रत्नजी की कैद में आगया कहते हैं कि रावराजा त्नजी के पुत्र हरिसिंह जी ने इसे बहुत कष्ट दिया। यहां तक कि उससे चिमें भरवाई और जब भरने में देरी हुई तब गर्म २ चिमटे से उसे जला दिया। इस बात की खबर पाकर रत्नजी ने शाहजादे खुर्रम को अपने तीसरे उड़के माधवसिंहजी के सिपुर्द किया और उनके बहुत कुछ आदर सत्कार से प्रसन्न होकर जब खुर्रम दिल्ली का बादशाह हुआ तब उसने बूँदी से कोटे को स्वतंत्र करके माधवसिंहजी को वहां का राजा बना दिया। उन्हींके वंशधर गाधाणी हाडा आजकल कोटे के राजा है। यह जनश्रुति है परंतु इतना अ. क्र.स. को बादशाह ने भी कोटे को स्वतंत्र करके माधवसिंहजी को वहां का राजा बना दिया। उन्हींके वंदाधर गाधाणी हाडा आजकल कोटे के राजा हैं। यह जनश्रुति है परंतु इतना<noinclude></noinclude> d71tddozw5m4wob8ppn6gqonpysg0o9 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५४ 250 194908 665517 2026-07-06T16:36:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665517 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पराक्रमकी परिसीमा । ( ११ ) और बूँदी के इतिहास "नरक" में भी लिखा है कि- "राव राजा रत्नजी के बडे पुत्र गोपीनाथजी की एक चंदेरिया ब्राह्मणी से आँख लग गई। एक दिन बंदेरियों ने महाराज कुमार गोपीनाथजी को घेर लिया और राय राजा को खबर दी कि इज्जत बिगाडने वाले चोर को क्या दंड दिया जाय?" राजाजी ने कहा ८८ मृत्यु" और इसपर उन लोगों ने मिलकर गोपीना- थजी को मार डाला । जय इन घटना की खबर रावराजा त्नजी तक पहुँची सब उन्होंने पुत्र को दोपी समतकर पुत्रशोक को कन्जे पर बज्रके समान चुप चाप सह लिया । जवानी के जोश में मनुष्य से ऐसे काम होजाना कोई भारी बात नहीं है परंतु रावराजा रनजी की इस समय जितनी प्रशंसा की जाय थोडी है क्यों कि इन्होंने न्याय को अधिक प्यारा समझकर अपने पुत्र के प्यार को दिया। धन्य ऐसे राजाओं को । अध्याय ४. पराक्रम की परिसीमा । कुमार गोपीनाथजी का पिताकं आगे ही देहान्त हो चुका था इस लिये राव राजा रत्नजी के बाद उनके पौत्र रावराजा शत्रुशल्पजी जो छत्रसालजी .के नामसे प्रसिद्ध हैं गदीपर विराजे । इस समय इनकी उमर २५ वर्ष की थी । शत्रुत्यजी के बारह भाई थे। उनमें पांचका वंश चला और वे पांचों शाखायें पाँचों नामों से पुकारी जाती हैं। रात्रराजा शत्रुशल्पजी जय तक जीते रहे बाद- शाह शाहजहां के आगे एक सूबे के स्वतंत्र अधिकारी रहे । दक्षिण के सूबे में शाहजादा औरंगजेब के अधिकार में जितने युद्ध हुए उनमें शत्रुल्जीने असा- धारण करना दिखाकर दौलताबाद, बीडर, गुलबर्गा आदि पर बादशाह का अधिकार करा दिया। ये अपही दिल्ली के बादशाह के इस तरह पूर्ण कृपा- पात्र होगये थे और ये तनके पूरे भक्त थे परंतु बादशाह शाहजहां को साक्षी गोपाल मानकर उनके के आपस में लड़ते थे। कोई बादशाह को मारकर स्वयं नम्रा बनना चाहता था और कोई उसे केद करके स्वयं मालिक न बैठने की चिन्ता में था । बादसाह और नयको बुरा और शराशिकोह को<noinclude></noinclude> l26qq3l53jo21wajx7gmphm3y3dw2rk पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५५ 250 194909 665518 2026-07-06T16:36:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665518 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(RR) उम्मेदसिंह चरित्र | अच्छा समझता था और इस कारण उसकी रक्षा के लिये ही यह नियत थे । जिस समय धौलपुर में चंबल नदी के किनारे दिल्ली के तख्तके लिये औरंगजेब / की दारा से लड़ाई हुई उन्होंने दारा की सेना निर्बल और औरंगजेब का प्रपंच सबल देखने पर भी शाहजहां की आज्ञा से दारा का साथ दिया। केवल साथ ही न दिया वरन दारा की प्राण रक्षा के लिये उसे लड़ाई के मैदान से भगादिया । समरभूमि में अपनी सेना कम देख कर भी इन्होंने हाथी पर चढकर सेना का कमांड अपने हाथ में लिया, हाथी के गोला लगकर जब वह भागने लगा तब भागते हाथी पर से कूद कर घोडेपर चढे और संवत् १७११ के उस भीषण युद्ध में इन्होंने अपने प्राण शत्रु की तलवार के अर्पण करके वीरगति पाई । जिस समय इनका हाथी इन्हें लेकर भागने लगा इन्होंने गर्जकर कहा कि- "हाथी भलेही भाग जाय परंतु रणभूमि में से मरने तक उसके मालिक का पैर नहीं डिगेगा। " जब दारा भागा तब इन्होंने ललकार कर कहा था कि- "जो भागकर प्राण बचाते हैं उनकी जननी को धिक्कार है। नमक का हक अदा करने के लिये मे अंगद की तरह अपने पैर धरतीपर रोपे देता हूँ। यदि जीता रहा तो जीन विना यहां से कदापि नहीं दूंगा।" टाड साहब कहते हैं कि- "रावान लडाइयां लड़ी थीं। वह अपने असाधारण साहस और शुद्ध नमक हलाली के साथ नाम कमा गये। ऐसे उदाहरण हमें और नहीं मिलते है। " 'इनका जिस जगह धौलपुर में शरीर पडा था वहां रणके चौतरे के नाम से चबूतरे अब भी मौजूद हैं। यह युद्ध वडा भीषण था । लोग कहते हैं कि नींव खोदने पर यहां की मिट्टी अंब भी रक्त में रंगी हुई निकलती है । / शाहजहां के समय में इनका मनसब हफ्त हजारी था । इन्होंने बहुत से परगने इनाम में पाये थे और बूंदी में आदि अनेक अच्छे अच्छे स्थान बनवाये थे। इनके पीछे इनके पुत्र रावराजा भावसिंहजी बूँदी के सिंहासन पर बिराजे । उधर शाहजहां के बाद सब भाइयों का संहार करने वाला क्रूर औरंगजेब तख्त पर बैठा । यह अवश्य ही शत्रुशल्यजी से शत्रुता रखता था और जब उनसे बदला नहीं लेने पाया था तब उसने रात्रराजा भावसिंह जी<noinclude></noinclude> 02kgdlg0xlcvf6jnvsfq7etykbund2a पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५६ 250 194910 665519 2026-07-06T16:36:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665519 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पराक्रमकी परिसीमा । (२३) को दुःख देकर अपनी पामि बुझाना चाहा । उसने अपनी दुष्टता दिखाने के लिये शिवपुर के राजा आत्मारामजी गौडको आज्ञा दी कि भावसिंहजी से बूँदी छीन लो । आत्मारामजी को भी खाइच ने आ घेरा परंतु बूँदी पर चढाई करने में उनके देने पडगये। वीर हाडाओं ने आत्मारामजी को मार भगाया, उनके शिवपुर पर अपना अधिकार कर दिया और इसलिये आत्मारामजी रोते पीटते बादशाह औरंगजेब के पास पहुंचे। इसपर औरंगजेब ने इनको बुला कर इनका सत्कार किया और इन्हें औरंगाबाद की सूबेदारी दी। यहां ही इनका संवत् १७३८ में देहान्त हुआ। वहां इनका वीरता, उदारता और देवी चमत्कारों के कारण इतना बडा नाम है कि लोग इन्हें देवता की तरह पूजकर अजीव अजब काम निकालते हैं। यह टाढ साहब के लेख का सार है किन्तु बूँदी के इतिहास " वंश प्रकाश " में दिखा है कि औरंगजेब ने इनके पिता का बदला लेने के लिये इनका मनसब ढाई हजारी रख कर इनके भाई भगवंतसिंहजी को जुदा राजा बनादिया था । उसने एक बार सत्र राजाओं को बुलाकर कहा कि- "तुम लोग केवल उडकी देकर अलम हो जाते हो सो ठीक नहीं। अब हमारे साथ बैठ कर खाना खाओ। हमारा दीन स्वीकार करो। तुमको दुगुने राज्य दिये जायेंगे ।" इस बात से सबके सत्र घडा उठे किन्तु भावसिंह जी बिलकुल विचलित न हुए । उन्होंने स्पष्ट कहदिया कि " मरना अवश्य है फिर धर्म छोड कर न जियेंगे ।" इसके बाद जयपुर मही राज जयसिंह जी ने बादशाह से कहदिया कि- "यदि आप हमको मुसलमान बना खो गे तो उदयपुर और बूँदी वाले जो अभी आपको लड़की नहीं देते हैं हमें भी न देंगे इसलिये आप पहले इस बातको भावसिंहजी ^से स्वीकार कराओ।" इस बहकावट से बादशाह ने क्रोध में आकर हिन्दुओं के समस्त मंदिर तोडने, मूर्तियां फोडने और मंदिरों के मसाले से मसजिदे बनवाने की आज्ञा दी। इसका जहां तक होसका देश भर में पाउन हुआ भारत वर्ष भर में सैकड़ों जगह हजारों मंदिर मसजिदें बने हुए आज दिन भी दुष्ट औरंगजेब के अत्याचारों को याद कराके हिन्दुओं के हृदय को बनकी तरह टुकडे २ कर रहे हैं परंतु रात्रराजा भावसिंहजीने बूँदी को इस आपत्ति बचा लिया। केशवरायजी के मंदिर का पाटन में एक कलश ही टूटने पाया था<noinclude></noinclude> 7ozigl3cvd9vyy7qwxw4gqr71ps0hjx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५७ 250 194911 665520 2026-07-06T16:36:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665520 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | कि बूँदी की सेना ने बादशाही सेना को मार भगाया । रात्रराजा भावसिंहजी में इतना ही नहीं किया वरन प्राणों की बाजी लगाकर वह एक ऐसा और भी काम कर गये जिसके कारण उनका नाम युगयुगान्तर तक अमर रहेगा । बादशाह औरंगजेब ने संवत् १७२४ की भाद्रपद शुद्धा १० को आज्ञा दी कि- "तुम हिन्दू लोग अपना धर्म नहीं छोडते हो सो अच्छा नहीं करते। कद्र तुम्हारे देवताओं की मूर्तियां न निकल ने दी जायेंगी ।" इस आशाको सुनकर सब राजा जबडा उठे तव भावसिंहजी ने कहा और जोर देकर कहा कि- "जब एक दिन मरना अवश्य है फिर धर्म के लिये मरेंगे ।" इससे और राजाओं को भी साहस हुआ और दूसरे दिन भाद्रपद शुक्रा ११ को जलयात्रा एकादशी के दिन औरंगजेब जैसे हिन्दूदेपी क्रूर और अत्याचारी बादशाह के सामने, मुसलमानों की राजधानी दिल्ली में भगवान् के विमान निकाले गये है इसपर बादशाह ने क्रुद्र होकर विमानों का और मूर्तियों का नाश करने के लिये अपनी सेना भेजी। कहते हैं कि बादशाह की सेना देखकर सब राजाओं ने भावसिंहजी का साथ छोड़ दिया इसीलिये गोकुलिये गोस्वामियों में गोपीनाथजी की गति का नीचे वाला हिस्सा नहीं रखते हैं । कुछ भी हो परंतु बूंदी के इतिहासमें लिखा है कि जब भावसिंहजीको लडने के लिये तैयार दिखा तब औरंगजेब की माता ने उसे समझा कर सेना वहां से हटवा की और शान्तिके साथ हिन्दुओं के विमान निकल गये । इन्हीं कारणों से बूँदी में अबतक भावसिंहजी की दुहाई चलती है और सब दुकानदार उन्हींका नाम लेकर दुकाने खोलते हैं। औरंगाबाद के निकट इनके बसाये हुए भावपुरा गांव में इनका वैशाख कृष्णा ८ को संवत् १७३८ में देहान्त होगया । जोधपुर के महाराज से अप्रसन्न होकर औरंगजेब ने उनकी रानियों को एक बार पकड़ने की आज्ञा दे दी तब उन की रानीजी अर्थात् भावसिंहजी की बहन कर्मवतीजी ने मर्दाने वेश से रणभूमि में बादशाही सेना के खूब दांत खट्टे करके बीरगति प्राप्त करने में अपना नाम अमर करदिया था । इनके बाद इनके भतीजे के पुत्र अनिरुद्ध सिंहजी बूँदी की गद्दी पर बिराजे क्यों कि इनके कोई पुत्र नहीं था । यह संवत् १७३८ में गद्दी पर<noinclude></noinclude> a35zuc9gwfvdniffu57afp3hdyn0ruf पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५८ 250 194912 665521 2026-07-06T16:37:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665521 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पराक्रमकी परिसीमा । (२५) विराज कर बादशाह औरंगजेब के बड़े पापात्र बने। इन्होंने बादशाह की ओर से दक्षिण की उडाइयों में तीन बार विजय पाया। चौथी बार बिजापुर और भागनगर के नरहने तथा मुसलमान औरंगजेब के शाहजादे आजम की बेगम को पकड़ लेगये थे जिसे अकेले अनिरुद्धसिंहजी ने युद्ध में उडकर छुडाने में बड़ा पराक्रम दिखाया और बादशाह से इसके उपलक्ष्य में छः परगने और उसके चढने का गजगौर हाथी पाया। एक बार गणगोर के त्योहार के कारण यह वादशाह की आशा के अनुसार जाटों से उड़ने के लिये शीघ्र न जा सके थे इस कारण वादशाह ने क्रुद्ध होकर रावराजा सुरजनजी की शर्तों के विरुद्ध इन्हें फाल भेजदिया। वहां ही ६ वर्ष रहकर संवत् १७१२ में इनका देहान्त हो गया। टाड साहब कहते हैं कि शाहजादे शाह आलम की सूबेदारी में अनिरुद्धसिंह जी नायब थे। इनकी राजवानी खाहोर थी जहां बादशाह की नौकरी करते करते यह मृत्यु को प्राप्त हुए । चौहानों का इतिहास और हाडाओंका इतिहास दो सो पीढ़ियों का इतिहास है। इसकी जो लिखी हुई अथपा मुद्रित सामग्री मिल सकती है इतिहास तैयार किया बडी भारी पुस्तक वन उससे यदि समय की आवश्यकता के अनुसार योग्य जाय तो कम से कम दो तीन हजार पृष्ठ की एक सकती है। इतनी बडी पोथी का काम इन थोडे से पृष्ठों से जो मैंने इस पुस्तक के प्रथम खंड में "बंशपरिचय" के नामसे लिखा है, नहीं हो सकता है। ऐसी दशा में मैं जानता हूँ कि इस वंश के इतिहास का इन पृष्ठों में दिग्दर्शन -भी भी प्रकार नहीं हो सकता। बस यही विचार कर मैंने जिन २ छोगों का चरित्र अधिक प्रसिद्ध समझा उनकी मोटी मोटी बातें चुनकर लिख दी हैं। इस पर भी इस खंड का बहुत विस्तार होगया। इस पुस्तक में अधिक विस्तार चरित्र नायक के चरित्र का होना चाहिये। इस कारण में एक खंड में उनके पिता का चरित्र लिखकर आगे से महाराष राजा उम्मेदसिंह जी के चरित्र लिखने का प्रयत्न करूंगा। इस अध्याय के अंतमें इतना और लिखना आवश्यक है कि "चौहानों की हाडा शाखा में बूँदी और कोटा-ये दो राज्य हैं और चौहानों में सिरोही भद्रावर के सिवाय मेवाड और मेरवाडे में कई छोटे २ रईस हैं और युक्त प्रदेशमें मैनपुरी के जमीदार हैं।<noinclude></noinclude> q0lyld199b1vcuv5fu3mcvdaf7bp0jm पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/५९ 250 194913 665522 2026-07-06T16:37:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665522 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>द्वितीयखण्ड ! ---- अध्याय १. पिताके पराक्रम । रामराजा अनिन्दसिंहजी का स्वर्ग वास होनेपर केवल १० वर्ष की उमर में उनके पुत्र महाराव राजा बुधसिंहजी का पौष कृष्ण १३ संवत् १७९२ को बूँदी में राज्याभिषेक हुआ। इन्होंने पहला मेवाड, दूसरा आमेर, तीसरा बेधुं चौथा भिनाय पांच बांसवाडा, इसतरह पांच विवाह किये थे और इनसे छः पुत्र और दो कन्यायें पैदा हुई थीं। एक ही वर्ष के बाद बाद- शाह औरंगजेब ने इनको दिल्ली बुलाया और केवल ग्यारह वर्ष की उमर में इन को अपने पुत्र बहादुरशाह शाहआलम के साथ काबुल की लडाई पर भेज दिया। उमर बहुत कम होने पर भी इन्होंने इतनी वीरता दिखाई कि बडे २ लडाकू सरदारों को दोनों अंगुली दबानी पडी । इस पर बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ और टोंक का परगना इन्हें इस बात पर इनाम में मिला। केवल इतना ही नहीं वरन आमेर नरेश विष्णुसिंह जी इनकी वीरता पर इतने मोहित होगये कि उन्होंने इनको अपनी बेटी विवाह दी। इस चढाई में. एक ऐसी घटना हुई जो यहां विशेष रूप पर उल्लेख करने योग्य है। कहते हैं कि जिस समय बुधसिंहजी शाहजादे की दो ड्योढी लांघकर तीसरी में पहुंचे एक मुसलमान सरदार ने जो बहादुरशाह के नाक का बाल था इनसे कुछ दिल्लगी की एक छ यवन की दिल्लगी वीर हाडा युवक क्योंकर सहन कर सकते हैं बस उन्होंने उसी समय कमर से कटारी निकाल उसके पेट में इस तरह स दी कि उसकी आंतें निकल पड़ीं। इस विषय में बूँदीमें एक पथ प्रसिद्ध है वह यह है :-<noinclude></noinclude> 6th6jmev0wh434doh5fpjei4qxdtymh पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६० 250 194914 665523 2026-07-06T16:37:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665523 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पिताके पराक्रम | (२७). "हुल उठी हुरमें हियमें यह बात सुनि त्रास परथो सारी बादशाही के श्वास में, खाग सुतान सबदतन तिनोका घरं आंतन विवेरी मीर मार एक सास में, भोजरतनेस से सवाई कीन्हीं राजाराव बुद्ध अन् वीरता के विलास में अप्सरा अकाश में तमाशे आई ता समें निकारी हाडा जा सके कटारी आमखास में। " यद्यपि शाह आलम का यह कृपापात्र था परंतु इनकी वीरता पर शाहजादा बहुत मोहित था इसलिये उसने इनका कोई अपराध न समझकर इनसे कुछ भी न कहा । काबुल से छौटने पर औरंगजेब ने पुत्र शाहआलम को बहादुर शाह की उपाधि दी। इस घटना से कुछ समय बाद औरंगजेब अपनी नवीन राजधानी औरंगाबाद में बीमार पड़ा। उसके मरने का समय निकट आ पहुंचा और तब वह अपने अत्याचारों, अपने कुकनों पर पछताता हुआ अपने अमीर उमरात्रों और राजा महाराजाओं से कहने लगा- "मेरे बाद मेरे बाद कौन बादशाह होगा ? इस सवाल का मैं क्या जवाब दूं ? इसका जवाब ख़ुदा देगा ? यह उसीके हाथ में है । हां! में चाहता हूँ कि अगर उसकी मर्जी हो तो मेरे प्यारे बेटे बहादुर शाह शाह आम को गड़ी मिले। मगर मुझे शक है, में सवाल करता हूँ कि शाहजादा अजीम अपनी तलवार के जोर से तख्तनशीन होने की कोशिश औरंगजेब का संदेह सच्चा निकला। उसके करेगा । "वान यही हुई । मरते ही दोनों भाइयों में भरतपुर के निकट जाजन के मैदान में उड़ाई ठन गई ढाड साहब लिखते हैं कि" उड़ाई की तैयारी करने के लिये जय बहादुर शाह ने सत्र राजाओं को इकट्ठा किया तब रावराजा बुधसिंह जी ने लडकपन छोडकर अभी जवानी में प्रवेश किया ही था, छोटे भाई जोध सिंह जी की अचानक मृत्यु से इनके कलेजे का घाट अभी सूखा भी न था परंतु कुछ भी हो बीर जाति में, बीर कुडमें जन्म लेकर वीर हाडा कभी ऐसी बातों से विचलित होने वाले न थे। उन्होंने कहा कि--- ''मैं बूँदी के लिये नहीं हूँ। मैं बादशाह के लिये हूँ। मैं वादशाह के लिये उस मैदान ( धोलपुर के मैदान) में लडूंगा जिसमें अनेक वहादुर हाडा बडे पराक्रम के बाद धराशायी हुए हैं। वहीं मेरे पूर्वज शत्रुत्यजी की वीरता क<noinclude></noinclude> rsn8raa5x2ruv8urqwnoa2ze4mjop7d पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६१ 250 194915 665524 2026-07-06T16:37:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665524 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | टंका बज रहा है और उन्ही का अनुसरण करना मेरा कर्त्तव्य है । यदि परमेश्वर ने चाहा तो बादशाह के विजय का यश मुझको प्राप्त होगा ।" अहा ! कितना साहस ! कितनी रजपूती ! सचमुच रावराजा युधसिंहजी की नसनस में यहादुरी भरी हुई थी। उनके ये उस समय के शब्द हैं जब उन की अच्छी तरह भी नहीं भीगीं थीं । जब उन्होंने लड़कपन को छोड़क भी जवानी में पैर ही रक्खा था। पुंगव सिंह जी ने जो कुछ कहा था करके दिखला दिया । धौलपुर के निकट जाजव के मैदान में युद्धका घमसान मच गया । टाड साहब करते हैं कि- "भारत के इतिहास में ऐसा भीषण युद्ध कभी नहीं लिखा गया था । यदि यह संग्राम केवल दिल्ली के सिंहासन के लिये हुआ होता तो आपस में मार काट होकर सदा की तरह शीघ्र ही फैसला हो जाता परंतु यह युद्ध राजपूत वीरों के एक राज्य का दूसरे राज्य से, एक घराने का दूसरे घराने से था । कोटा और दतिया वाले शाहजादे आजम के कृपापात्र थे। ये औरंगजेब की आज्ञा को भूलकर उसके सबै उत्तराधिकारी के विरोधी हुए। दक्षिण की लड़ाइयों में बूँदी वालों और दतिया वालों की 61 एक प्राण दो तन" मित्रता थी। दोनों ने इस जंगनें अपनी मित्रताको शत्रुता में बदल दिया । कोट बांडे रामसिंह जी को हाडाओं का शिरताज नने का था इसलिये यह भी जानव के मैदान में हाडा शिरमोर के सामने होगये । इस उड़ाई से पहले कोटे के रामसिंह जी ने रावराजा बुधसिंह जी से कहलाया था कि- "बहादुर शाह को छोड़कर शाहजादे आजन में श्री मिठो । " परंतु जो अपने वचन का पालन करने को मरने से अच्छा समझते है ये ऐसी बातों में आने वाले थोडे ही हैं। राव राजा बुधसिंह जी ने उत्तर में कहलाया कि- "जिस मैदान में हमारे बडों ने सलवार की धारा में अपने प्राणुका प्रवाह करके स् वास अच्छा समझते है ये ऐसी बातों में आने वाले थोडे ही हैं। राव राजा बुधसिंह जी ने उत्तर में कहलाया कि- "जिस मैदान में हमारे बड़ों ने तलवार की धारा में अपने प्राणका प्रवाह करके स्वर्ग पाया है<noinclude></noinclude> m31s0hdr9zad3b0gygi7r0t30ctgk7b पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६२ 250 194916 665525 2026-07-06T16:37:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665525 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पिताके पराक्रम । (२९) बुन्देला तोप के गोले से उड़ गये और शाहजादा आजम अपने बेटे वेदार अत समेत इसी खडाई में बुधसिंह जी की तलवार खाकर सदा के लिये कमर में सो गया। " बाबू हरिचरण सिंह चौहान ने अपनी "बूँदी “राज चरितावली" में इस अवसर की जो कुछ कविता लिखी है वह पढ़ने योग्य है। वे कवित्त ये हैं-. "जुद्ध माहि जाज के बुद्ध है समुद्र उद्ध आजम के महावीर काटि डारे जाते है कहे दूलह समुद्र वढे श्रोणित के ज़ुग्गिन परतें फिरें जंबुक अजूजासे ॥ एक लीन्हे शीश खाय वेष ईश एकन को एकनकी उपमा निहारी मनु उजा अफ फैलि फैल करमें विराजें मानो माथे मुगउन के तराशे तरबूजा से ॥ १ ॥ "जाडे से में पकरि हजारों मारे हांक धांक, देखो जी तमाशो वीर बूँदी के दीवान को । बारह ही वरस के बजाय छोह छोह कियो, हाडा चडुवान पृथ्वीराज उनमान को ॥ कह रूप सहाय जाको आलम सलाम करें, देखत तमाशो रथ एक गयो मान को है याही विधि अनर अमानो राय शुद्ध सिंह, संजर सों फारि डारचो पिंजर पठान को २ रहत अछा मिटेन धक पीवन की, निपट जुनागी डर का के डरे नहीं है भोजन बनायें नित चोखे खान खानन के, श्रोणित पचायें तऊ उदर भरे नहीं ॥ उगवित आसो सोऊ शुद्ध समर बीच, राजे राव बुधकर विमुख परे नहीं है तेग या तिहारे मतवारे की अचक जोलों, तोठों गजराजन की गजक करे नहीं ||२||” टाड साहब इस बातको स्वीकार करते हैं और बूँदी के इतिहास गवाही दे रहे हैं कि बहादुर शाह को दिल्ली का सिंहासन केवल नवयुषा बुधसिंहजी के पराक्रम से उनके युद्धकौशल से प्राप्त हुआ था और इसलिये उसने इनको रावराजा की जगह यदि महा रावराजा बना दिया और उसने यदि इन्हें चौवन परगने इनाम में दे दिये तो कौन बडा काम किया। इनके इतने बडे अहसान पर यदि बहादुर शाह इन्हें दिल्ली का आधा राज्य मी दे * डालता तो कुछ अधिक नहीं था। अस्तु चौवन परगने पाने पर भी वहा दुर शाह के सिंहासन की रक्षा के लिये बहादुर बुधसिंहजी उस समय दिल्ली छोडकर बूँदी न जा सके। यह संकेत उस समय के लिये है जब बूँदी के बहादुर २ हाडा इस युद्ध में सिंहजी ने काबुल में एक यवन मारा था<noinclude></noinclude> cn563706opmzt3wsjr205bpf1zz0j8x पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६३ 250 194917 665526 2026-07-06T16:38:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665526 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२०) उम्मेदसिंह चरित्र | के लिये खो चुके थे, सेना का अधिक भाग इनके पास दिल्ली में था इस कारण उस समय बूँदी में इतनी सेना नहीं थी जो चौवन परगनों परबु सिंहजी का दखल कर सके । अवश्य ही यहां की थोडीसी सेना ने चपन परगने अपने अधिकार में कर लिये परंतु घोर संग्राम में रक्त के पना बहने पर भी कोटा इनके हाथ न आया। हाथ चाहे न आया परंतु कोटे बालों से, कोटा वाले अपने छुट भैया से पक्की शत्रुता हो गई और यहां के महाराव भीमसिंहजी बुध सिंहजी का उत्कर्ष दबाने के दिये नाना प्रकार के कौशल करने लगे । अध्याय २. पिताका पतन | अवश्य ही महारावराजा बुधसिंहजी ने बहादुर शाह का बड़ा भारी उपकार करके उस की कृपा संपादन की थी परंतु प्रातः काल की छाया की तरह वह कृपा बहुत काल तक न ठहरने पाई । “बुढिया ने पीठ फेरी और चरखे की होगई ढेरी". इस कहावत के अनुसार छुट्टी लेकर बुधसिंहजी के बूँदी को छोटते ही इनके शत्रुओं को इनके बिरुद्ध कान भरने का अवसर मिलगया। अक्सर क्या मिलगया इन्होंने एक अंश में शत्रुओं को स्वयं अवसर दिया। किसी नित्य नाथ नामक कनफटा जोगी के उपदेश से और इन्हीं के पुरोहित राजमुवजी की प्रेरणा से वैष्णव महाराज बाममाग होगये । कहते हैं कि गज- सुम्ब जी ने इनको कई एक चमत्कार भी दिखलाये थे। उसीकी निशानी बूँदी के चौगान में हर्षदा देवी के सामने देवी दर्वाजा है। कुछ भी हो याम सार्गी होनेसे एक ओर जब इनके विचार बिगड गये थे तब दूसरी ओर से प्राणप्रिय भाई जोधसिंहजी की मृत्युका उनके हृदय पर ऐसा धक्का लगा कि इनका वित्त बिल्कुल विचलित हो गया। यह घटना उस समय की नहीं है जय यह बहादुर शाह को दिल्ली दिलाकर बूँदी आये किन्तु जब यह बहादुर शाह को दिल्ली का बादशाह बनाने के उद्योग में जी जान से लगे हमे उसी समय बूँदी में एक भयानक घटना होगई। इनकी अनुपस्थिति में<noinclude></noinclude> 1cfsv4gxv3mzwqn2304dylinb2g3dzt पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६४ 250 194918 665527 2026-07-06T16:38:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665527 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पिताका पतन | (३१) इनके प्रतिनिधि बनकर इनके छोटे भाई चैत्र शुक्र के दिन गणगौरी की खवारी सजाकर जेत सागर तालाब पर पधार कर नाथ में चढे हुए सैर कर रहे थे। उनकी आज्ञा से एक हाथी जटमें डालागया । उसीने एक टक्कर उगाकर उन की नाव उलट दी। उस में जितने आदमी सवार थे ये स गणगौरी समेत डूब गये । उस समय से बूंदी में गणगौरी का त्योहारु बंद होगया। बात पुरानी पडजाने पर भी जब वह बूँदी आये इस घटना का स्मरण करके बिलकुट बिल होगये और सच छो तो येही दो बातें ऐसे बलवान् पराक्रमी राजाके गिराव का कारण हुई। इन बातों से इनका चित्त इतना उखड गया था कि यह राजकाज की बातों की बादशाही आशाओं की और देश की छोटी बड़ी घटनाओं की मिल कुछ सुधि लेना छोड़ बैठे थे। इनके शत्रु जिनका नाम इनके आगे दब गया था और जो इन की असाधारण स्वामिभक्ति देखकर इनपर डाह खाते थे, इन की निन्दा करने लगे, और इन्हें दबाने की चिन्ता करने लगे । केवल इतना ही नहीं वरन इन का रहा सहा मन एक घटना से और भी उखड़ गया। घटना यह हुई कि जिस बहादुर शाह को इन्होंने वादशाह बनाया था वह मरगया और उसकी जगह फर्रुखसियर दिल्ली के सिंहासन पर आरूढ हुआ । वस इस तसे इनका हौंसला टूट गया और इसी कारण उसके बुलाने पर भी यह और राजाओं की तरह दिल्ली न गये । बस अब देर ही क्या थी । कोटा वाले महाराव भीमसिंह जी की प्रेरणा से रूपनगर के राजा राजसिंहजी को नवीन बादशाह के आगे चुगली खाने का अवसर मिला। उन्हों ने बादशाह को वहका दिया कि "महारावराजा बुधसिंह जी आप की आज्ञा का भंग कर के जोधपुर नरेश के मेल से उपद्रव करना चाहते हैं ।" अविचारी बादशाह बस केवल एक ही शत्रु के फान भरने से बहक गया और उसने झट उन्हीं की सलाह से बूंदी का राज्य कोटा के महाराव भीमसिंह जी को दे दिया । अवश्य ही इस अवसर पर बूँदी और कोटा जैसे दो भाइयों का संग्राम भी हुआ और वह भी ऐसे समय में हुआ जब बुधसिंहजी बूँदीमें नहीं थे परंतु मैदान कोडे वालों के हाथ आया और बूँदी में उनका अधिकार होगया । इस<noinclude></noinclude> cgisybrxa33brtf8wsa088l55fslc4h पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६५ 250 194919 665528 2026-07-06T16:38:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665528 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | घटनासे यह न समझना चाहिये कि वुधसिंहजी से सदा के लिये बूँदी छुटाई। नहीं जब फर्रुहसियर को इसका सच्चा भेद मालूम होगया कि इन्हें बहादुर शाह के शोक में बिल देखकर इन के शत्रुओंने मेरे सामने बुधसिंहजी की चुगली खाई है तब उसने अपनी ओर से सेना भेजकर संवत् १७७२ में इम- को फिर बूंदी दिलवादी । रोचक है शत्रुता का जो ऐसे अवसर पर उन्होंने कि उसका सारांश दिये बिना लिखा है कि- "फर्रुखसियर के ars साहब ने बूँदी और कोटे की खाका सैंचा है वह इतना मैं आगे नहीं बढ़ सकता हूँ। समय में बारा के सैयद उसके नाक का बाल बन गये थे। उन्होंने मार काट, क्रूरता और अत्याचारों से सारा साम्राज्य नष्ट भ्रष्ट कर डाला और फर्रुखसियर को सिंहासन से उतार देना चाहा परंतु इस बात को हाडाराव ( बुधसिंह जी ) सहन न कर सके। वह सदा अपने वचन के पक्के थे । उन्होंने दिल्ली के चीक में रक्त के पनाले बहाकर अपने चाचा जेतसिंह जी और अनेक वीर हाडाओं को खोने पर भी उस की उस समय प्राण रक्षा की । किन्तु "जाजय के मैदान में जो शत्रुता हुई थी उसका उस युद्ध में अपने प्राण रामसिंह जी के पुत्र भीम सिंह जी ने निर्वाह किया । बूँदी और कोटे की बिसर्जन करने वाले उन्होंने इन्हीं सैयदों का साथ दिया । शत्रुता की प्रवल अभि से उनका हृदय बिलकुल जलगया था। वह इसी कारण अपने क्षत्रिय स्वभाव को अपने जातीय गुणों को भूलकर बडी क्रूरता से शुधसिंह सी का नाश करने पर उतार हुए । जिस समय इस शत्रुतासे बिल्कुल अनजान होकर राजधानी दिल्ली के फोट के बाहर घोडा फेर रहे थे भीमसिंह जी के साथवालों ने अचानक उनको घेर लिया किन्तु अनेक बहादुरों की लारों धरती पर गिर जाने पर भी उनके साथियों ने इन्हें बचा लिया। इतना होने के बाद वहां से हटकर बुधसिंह जी को अपनी रक्षा करनी पडी । " अवश्य ही बुधसिंह जी अपना मन विक्षिप्त होने पर भी दिल्ली जाकर इस दारह फर्रखसियर को न कर सके थे और उन्होंने इस तरह उसे सैयदों के<noinclude></noinclude> 787xse7lu5n1tj9l63c0o2dgdyt6gul पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६६ 250 194920 665529 2026-07-06T16:38:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665529 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>आमेर से शत्रुता । (३३) आक्रमण से और उनके चक्र से बचाया भी परंतु अंत में वह शत्रुओं के हाथ से मारा गया और इसके बाद सैयदों की दुष्टता से देशभर में अराजकता फैल गई देश भर में गदर मचगया । अपना २ राज्य सँभालने के लिये और २ राजाओं की तरह इस के बाद बुधसिंह जी को भी बूँदी आना पडा । जिस समय बुधसिंह ठहरे हुए थे, कोटे वाले जी बूँदी आने से पहले अपनी ससुराल जयपुर में भीमसिंह जो की जीभ बूँदी लेने के लिये फिर उचाई। उन्होंने फिर बूँदी लेने के लिये चढाई की और केवल एक ही दिन की लड़ाई के बाद बूँदी के कामदार सालिमसिंह जी के भाग जाने भीमसिंह जी ने बूँदी लेली। के अवश्य ही ली परंतु इस बार भी पहले की तरह उनके पास बूँदी अधिक समय तक न ठहर ने पाई । संवत् १७७६ में जब भीमसिंह जी कलीजला से उड़कर मारे गये तब उन्हीं- के कामदार धाभाई ने बूँदी खाली करके फिर बुधसिंह जी की दुहाई फेर दी और भगेडू साहिम सिंह को इस तरह बूँदी का कामदार फिर से बन बैठने का अवसर मिल गया। अध्याय ३. आमेर से शत्रुता । यद्यपि बहनोई बुधसिंह जी का आमेर नरेश जयसिंह जी से बहुत मेल था, ये दोनों साठे बहनोई फर्रुखसियर की रक्षा में साथ थे और इसी कारण दिल्ली से लौटती बार बुधसिंह जी इनके साथ आमेर गये थे परन्तु वहां जाने पर इनका स्नेह धूल में मिलगया । टाडसाहब ने. लिखा है कि:- "जयसिंह जी का विचार बुधसिंह जी से बूँदी छीन लेने का था। इस अवसर पर दिल्ली छौट कर बुधसिंह जी भी आमेर में ठहरे हुए थे। कहते हैं कि आमेर नरेश की जिस बहन का विवाह बुधसिंह जी से हुआ था उसे<noinclude></noinclude> 5cgy044eilr5gtx3rxnob4dj58scdrf पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६७ 250 194921 665530 2026-07-06T16:38:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665530 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३४ ). उम्मेदसिंह चरित्र | पहले बादशाह शाह आलम को विवाह देने का विचार था किन्तु उसी ने इनकी वीरता देखकर यह संबंध बुधसिंह जी के साथ अपनी प्रसन्नता से स्वीकार कर लिया था | बुधसिंह जी की आमेर वाली रानी के कुछ संतान न थी इसलिये उन्होंने पहले गर्भका बहाना करके फिर किसी लड़के को अपना कुमार बतला दिया। इस बात की पक्की खबर बुधसिंह जी को थी ही इसलिये उन्होंने अपनी रानी कछवाही जी के सामने ही इस बात की जय- सिंह जी से शिकायत की शिकायत सुनकर वह बहुत लजित हुई और इसी लिये खंजर निकाल कर अपने पति को मारने पर तैयार होगईं । बुधसिंह जी ने वहां से हटकर अपने प्राण बचाये । " यद्यपि बूँदी राज्य के मुख्य इतिहास लेखक कविराजा सूर्य मल्ल जी ने अपने ग्रंथ "वंशभास्कर'". में रानी कछवाही जी का अपने पतिपर प्रहार करना स्वीकार नहीं किया है परन्तु उनके लेखों से विदित होता है कि उनके बनावटी पुत्र भवानी सिंह जी के विषय में अवश्य उस समय बडा भारी झगडा हुआ था। आमेर नरेश इस झगड़े में बुधसिंह जी को सच्चा समझ कर वहन को फटकारते थे परन्तु - जब कछवाही जी ने अपने भाई पर आक्रमण किया, जब उन्हें मारने को दौडी, जब उनको ( जयसिंह जी को भी असली न बतलाया तब जयसिंह जी को चुप हो जाना पडा था। बूँदी के इतिहास में इन कछवाही जी के शाहआलम के साथ सगाई होने की बात नहीं लिखी है कि इस झगडे का स्वरूप टाड साहब ने जैसा लिखा है परंतु मैंने सुना है उससे भिन्न प्रकार का है। टाड साहब ने लिखा है कि सगाई होगई थी किन्तु असल बात यह है कि जब शाहआलम ने आमेर वालों से खडकी मांगी तब उन्होंने उससे बुधसिंह जी का पहले से संबंध बतलाकर बादशाह की बात टाल्दी और उस समय यह समझ लिया कि इनका बादशाह पर बहुत प्रभाव है और बहुत अहसान है इस कारण इनका नाम सुनते ही बादशाह कुछ न कहेगा । ये टाड साहब के मत से तथा बूँदी के इतिहास के मत से आमेर ( जयपुर ) वालों और बूँदी वालों के आपस में मन मुटाव के कारण है किन्तु टाड साहब ने इस लड़ाई का जो एक और कारण दिया है वह इन सब से प्रवल<noinclude></noinclude> hktl8rnwwvs0089qazoyjim24xncd61 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६८ 250 194922 665531 2026-07-06T16:39:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665531 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>आमेर से शत्रुता | (३५) है और उससे मालूम होता है कि इसी डालच से जयसिंह जीने बूँदी के राज्य का सर्व नाश करने में कुछ उठा नहीं रक्खा। यह कहते हैं कि :- "जयसिंह जी ने जब बुधसिंह जी को निकाल कर बूँदी की कोठरी इन्द्र- गढ के महाराजा को बूँदी नरेश बनाना चाहा तब वहां के नेक (१) देवसिंह जी ने इस बात को स्वीकार नहीं किया। ऐसा होनेपर उन्होंने करवर के जागीर दार सालिम सिंह जी को जो इन दिनों बूँदी के किलेदार थे, वहकाया- इनके आपस में इस तरह का घरेन्द्र झगडा था किन्तु इसका भीतरी रहस्य और है। बात यह है कि माल्या, अजमेर और आगरे के सूबेदार बनकर जयसिंह जी अपने आसपास के राजाओं का दमन करना चाहते थे, मुगलों की घरे खड़ाइयों से भी उन्होंने बहुत कुछ डाम उठाया था और फर्रुखसियर का राज्य जाता रहने से उन्हें अपना मतलब गांटने का अवसर अच्छा मिलगया था इसलिये उन्होंने आमेर आकर अपना दबदबा बढ़ाना आरंभ किया। उन दिनों आमेर का राज्य बहुत छोटा था। उन के जागी- रदार उनसे फिराऊ होगये थे। इस कारण आमेर राज्य की सीमा के पास के परगने छीनकर उन्होंने उन्हें अपनी नौकरी के लिये विवश करने का प्रपंच रचा । लाउलोट, गुंडा, नीमराना, राजोर और बयाना के ठिकाने उनसे बहककर नष्ट भ्रष्ट होरहे थे इसलिये उनसे दवगये । बस इसीपर उन्हें होसिला होगया कि हाडा भी दबाव में आकर हमारे अधीन होजायेंगे। उन्होंने इसी कारण से बुधसिंह जी को गद्दीसे उतारकर अपनी पसंद के किसी जागी- रदार को यहां का राजा बनाना चाहा । " टाड साहब के लेखका यह सार है। इससे स्पष्ट होता है कि घरेलू झगडे को आडमें लेकर अपनी कपट वृत्ति के निर्वाह करने का जयसिंह जीने प्रपंच रचा था। यह जयपुर को बसाने वाले वहीं जयसिंह जी हैं जो बडे धर्मनिष्ठ, बडे पंडित, वडे प्रजापालक और बडे नामी होगये हैं परंतु समय कहलाता है कि जिसमें ऐसे २ गुण होते हैं वे राज्य प्रपच के समय इन यातों को भूल कर और के और हो जाते हैं। ढाड साहब आगे चलकर फिर. कहते हैं कि:-<noinclude></noinclude> ogiwv1uws2r1bzhk60y8b6yqyv20vm2 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/६९ 250 194923 665532 2026-07-06T16:39:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665532 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>.: ( ३६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | "हाडाराव उन दिनों आमेर में रहकर पहुनई का आनंद लूट रहे थे। उन्हें खबर नहीं थी कि उनके लिये उन्हीं के नातेदार किस तरह का प्रपंच रच रहे हैं। अंत में जयसिंह जी ने बुधसिंह जी से कहदिया कि आप सदा आमेर ही में रहकर पांचसौ रुपया नित्य अपने खर्च के लिये हम से लिये जाओ।" बुधसिंहजी कदाचित् इस रहस्य को न समझ सके परन्तु उनके चाचा जैतसिंह जी के भाई. ने इसका भांडा फोड दिया । उन्होंने बूँदी को पत्र लिखकर बेगूं वाली रानी जो को उनके पीहर भेजने का प्रबन्ध किया । वह चुपचाप समस्त हाडाओं को आमेर के कोट के बाहर निकाल लेगये और तब उन्होंने बुधसिंह जी को खबर दी। उनकी नेक सलाह को शिरपर चढाकर बुबसिंहजी बूँदी को चलदिये। " इस तरह वह अपने ३०० बीर हाढाओं को लेकर आमेर से चले आये परंतु पांचोटास में बूँदी की सीमा के निकट जयपुर के पांच उमरावों ने इन्हें घेर लिया। राजपूतों का राजपूतों से घमासान युद्ध हुआ आमेर के पांचों उमरात्र काम आये | ईसरदा, सरवाड (सेवाड) और भुवार (2) में इनकी जो छत्रियां हैं वे हाडा वीरों के पराक्रम की अबतक गवाही देरही हैं। चाचा जी इसा लडाई में मरकर बीरगति को प्राप्त हुए और अब बुधसिंह जी की सेना इतनी कम रहगई कि इन्हें बूँदी जाने के बदले अपनी ससुराल बेगूं (श्रेयूँ ) जाना पडा । इस तरह अपने अनेक नामी २ सरदारों को खोकर जयसिंह जी ने जो बड़ी महंगी सफलता प्राप्त की थी उसी से उन्हें अपना मतलब गांठनेका अवसर मिला और उन्होंने बूँदी के कामदार, करवर के जागीरदार सालि- मसिंह जी के लडके दलेश सिंह जी को अपनी लडकी देकर बूँदी का राव राजा बना दिया । " इस विषय में टाड साहब के लेख का जो सारांश ऊपर दिया गया है वह प्रायः बूँदी के इतिहास से मिलता जुलता है । इस तरह अवश्य ही मुहकमसिंहोत दलेल सिंहजी ने बूँदी का राज्य पाया परन्तु कोटे वाले भी अपना मतलब गांठने से बाज न आये। उन्होंने बूँदी की कोठरियों को छोड़कर बूँदी और कोटे के बीच में चंबल नदी तक अपनी सीमा बनाली । अब स्वामिविद्रोह करके और अपनी कुलपरंपरा को लात मारकर साडिम सिंह जी तो आमेर के चेले वन ही चुके थे उन्होंने भी युधसिंह जी का सामना किया। बुधसिंह जी की असावधानी से उनकी सेना सालिम सिंह जी में<noinclude></noinclude> e0zfa2l5vstj2dp9ofio0vkd4ra4o1z पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७० 250 194924 665533 2026-07-06T16:39:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665533 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी छूटगई । ( ३७ ) जा मिली थी इस कारण उन्हें हार कर बेगूं जाना पडा । और जयसिंह जी ने स्वयं बूँदी आकर संवत् १७८७ में दलेल सिंह जी को बूँदी का राजा बना दिया । बना अवश्य लिया परन्तु २८ गांव बूँदी के लेकर अपने उमरावों को बांट दिये। अध्याय ४. बूँदी छूटगई। उस समय के सिंहासन की बड़ी दुर्दशा थी जिस सिंहासन पर बैठकर अकबर और शाहजहां जैसे बादशाह पचासों वर्ष तक शांति के साथ एक छत्र राज्य करने में समर्थ हुए थे उसी पर भांड की पगडीकी तरह दिन भरमें काई उतरने और कई चढते थे । कविराजा सूर्यमल जी ने लिखा है कि दिल्ली के सिंहासन पर इस अवसर में छः वर्ष में छः बादशाह उए । औरंगजेब के पुत्र शाहआलम बहादुर शाह के मरने पर पर्रुखसियर, उसे मार कर रफीउदौडा, इस के मरने पर और, और के मरने पर और फिर शाहआलम का नाती, फिर शाह मुहम्मद । निदान उस समय दिल्ली की बादशाही डूब गई थी । देश में बिलकुल अराजकता फैलाई थी । "जिसकी लाठी उसकी भैंस" वाली कहावत उस समय चरितार्थ होती थी। प्रजा छुट रही थी। वह गाजर मूली की तरह काटी जाती थी । स्त्रियों के सतीत्व भंग किये जाते थे और अनाथ अग्रढायें, अबोध, निःसहाय बालक पकड २ कर तेटी तंबोली, धुने, जुलाहे जिसके लौंडी गुलाम बनाये जाते थे । शरीर में वल हुआ, जिसे कुछ थोडासा भी साहस हुआ, जो सेना के लिये कुछ भी आदमी बटोर सका वही राजा बन बैठता था। ऐसे समय में जब दिल्ली के साम्राज्य का सत्यानाश हुआ तव असावधानी से बुधसिंह जी भी अपना राज्य खो बैठे तो आचर्य क्या है यूरोप के इतिहास में परम प्रतापी नेपोलियन बोना पार्टी एक समय यूरोप भरको कंपाकर अंतमें अंग्रेजों की कैद में मरने पर वीरों की तरह पूजा जाता है। जो कारण ऊपर लिखे गये हैं वे ऐसे प्रबल है कि उन्हें<noinclude></noinclude> arjf67pin75mnwvj9y3ocf6qhzthl10 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७१ 250 194925 665534 2026-07-06T16:39:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665534 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | देखते हुए बुधसिंह जी के चित्त भ्रम होने का यदि विचार किया जाय तो उन्हें राज्य खोने का सर्वाश में दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। टाड़ साहब की भी यही राय है। वह कहते हैं कि "बुधसिंह जी ने अपना राज्य पाने का कई बार प्रयत्न किया परन्तु वह सफल न हो सके" । कुछ भी हो परन्तु बूँदी के इतिहास इस बात की साक्षी दे रहे हैं कि उनकी जिस रानी ने उन्हें राज्य से उखाड देने का आमेर में कारण उपस्थित किया था वह अंत में एक बार उनकी सहायक हुई। रानी कछवाही जी ने पति का राज्य फिर स्थापित होने के लिये छः लाख रुपये देकर मल्हार राव होलकर को बूँदी पर चढ़ाया। उन दिनों जयसिंह जी और दलेल सिंह जी जयपुर में थे। मरह- ठों की सेना ने यह अच्छा अवसर समझ कर बूँदी घेरखी और बुधसिंह जी का इस तरह एक बार फिर अधिकार होगया परन्तु राज्य से विरक्त, अनेक शोकों के कारण चित्तभ्रम बुधसिंह जी राज्य को न संभाल सके और जयसिंह जी ने फिर दलेलसिंह जी को बूँदी दिव्बादी । जयसिंह जी ने अपने कलुषित मनका केवल इस तरह ही परिचय न दिया वरन राना जी पर दबाव डाल कर बुधसिंह जी को बेगू में भी सुख से नहीं रहने दिया। बेगूं बाले राना जी के अधीन थे इस लिये उनकी जागीर खालसे करने का प्रपंच रचा गया। इस तरह बेगू से तीन कोस पर बाघपुर गांव में बैशाख कृष्ण १ संवत् १७९६ को इनका स्वर्गवास हुआ । यद्यपि यह पहले बडी २ वीरता दिखला कर बादशाह बहादुरशाहको साम्राज्य दिलाने का नाम पाकर पीछे से बडे २ कष्ट सहते हुए स्वर्ग को सिधारे अवश्य ही इनके शासन में बूँदी का राज्य हाडाओं के हाथ से छूट गया था परन्तु ईश्वर को बूँदी में इनके वंश का राज्य रखना इष्ट था इस लिये आषाढ कृष्णा ३० को संवत् १७८६ में बेगूं वाली रानी साहिबा के गर्भ से महाराव राजा श्री उम्मेदसिंह जी का जन्म हुआ । इनका जन्म जयपुर में हुआ था । जिस समय बुधसिंह जी जयपुर में थे इनकी माता भी उनके साथ थी । यही इस चरित्र के नायक हैं, और यही बूँदी राज्य के उद्धार करने वाले होगये हैं। अगले अध्यायों में इन्हींका चरित्र लिखने का यत्न किया जायगा। अभी तक जो कुछ लिखा गया है यह प्रसंगोपात्त दिखा गया है। इनके वंश का दिग्दर्शन कराने के लिये लिखा गया है।<noinclude></noinclude> 31evhx1znwqlcwhvifreskwkrci5h26 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७२ 250 194926 665535 2026-07-06T16:39:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665535 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>4 तृतीय खण्ड | बूँदीका उद्धार | ---46331168310- अध्याय १. जन्म से तेरह वर्ष । जिस समय महाराव राजा उम्मेद सिंह जी का जन्म हुआ इन के पिता का राज्य छूट गया था, नगर छूट गया था, घर छूट गया था और भाई बंधु संग संबंधी छूट गये थे । एक बडे राज्य के स्वामी होने पर भी उनका कुटुम्ब एक दीनातिदीन की तरह मेवाड राज्य के अधीन बेगूं के ठिकाने के आश्रय से अपने घटते दिन पूरे कर रहा था। पिता फिर राज्य पाने, फिर छूट जाने और फिर राज्य पाने के चक्कर में पड़कर नन्नानवें के फेर में पड़े हुए विपत्ति सागर में डूब रहे थे । न पास सेना थी, न हाथी थे और न उतने सेबक ही थे जो एक राजाधिराज के सुखकी सामग्री में अपेक्षित होते हैं । उस समय जयपुर जैसे बडे राज्य के स्वामी जयसिंह जी से शत्रुता होजाने के कारण आदमी २ इनका शत्रु बनगया था। जयसिंह जी से डरकर लोग इनकी सहायता करने में घबडाते थे। इनसे मिलने भेटने में घबडाते थे और इन्हें आश्रय देने में धवडाते थे और तो क्या इनका मनहीं, इनकी बुद्धिही लिये गोते दे रही इनसे दुश्मनी साधकर इन्हें अधिक २ विपत्ति में डालने के थी। ऐसे समय में यदि इनके पुत्र का छाउन पाउन ठीक २ राजकुमारों की तरह न हुआ हो तो आश्चर्य ही क्या है ? परंतु अहा ! काल की गति भी कैसी विचित्र है। जो आज राजा है कछ दरिद्री, जो आज धनी है कल रंक बन जाता है। ये सब कर्म के फेर हैं। इस पर शास्त्रकारों ने ठीक कहा है:- "ब्रह्मा येन कुलावन्नियमितो ब्रह्मांडमाण्डोदरे, विष्णुर्येन दशावतार- गहने क्षिप्तः सदा संकटे रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटने कारितः,<noinclude></noinclude> is15bq0ziavsemld6lo7stbga0wdw17 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७३ 250 194927 665536 2026-07-06T16:40:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665536 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ४० ) उम्मेदसिंह चरित्र | सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्म्मणे " महाराव राजा उम्मेद सिंहजी के बालवय की कथा मुगल बादशाह अकबर के बाल चरित्र से मिलती है। बादशाह हुमायूँ का राज्य छूट जाने से उसने बालपन में जैसे कष्ट उठाये थे वैसे ही कष्टों का इन्हें सामना करना पडा था। उस समय पद अष्ट हुमायूँ की जैसी दुर्दशा थी वैसी ही राज्य भ्रष्ट बुधसिंह जी की थी इस लिये अंत में अकबर का उत्कर्ष देखकर कहना पडता है कि महारावराजा उम्मोद सिंहजी ने असाधारण प्रतिभा से असाधारण काम करके गया हुआ राज्य पाने के लिये ही ऐसे घोर संकट सहे । अकबर का चरित्र याद करके इनकी धीरप्रसू माता अवश्य मन में ढास देते हुए कहती होंगी कि:- "आज हम लोग दुःख के समुद्र में डूब रहे हैं तो क्या चिन्ता है ? जिस 'दिन मेरा लाल बडा होगा हम इस अथाह सागर को अवश्य पार करेंगे ।" इस आशा से मातृस्नेह अवश्य घोर दुःख के समय भी, कष्टों की ज्याला शांत करने के लिये अमृत वर्षा करता होगा। इसी आशा से उम्मेद सिंहजी का परम संकट के समय और विकट विपत्ति के समय लाळन पाटन हुआ । यद्यपि माता चूडावसजी पांडवों के वनवास के समय द्रौपदी की तरह घोर संकट सहने पर भी पति की छत्र छाया में पुत्र का मुख देख कर अपने पहाड के बराबर कष्टों को रजकण के समान समझती थी परंतु विपत्ति पर विपत्ति पड़ना संसार का नियम है। जैसे सोने का मूल्य बढ़ाने के लिये, उसे निर्मल करने के लिये वारंवार तपाकर छाल किया जाता हे पैसे ही माता चावत जी के लाल को भगवान ने सच्चा लाल करने के लिये केवल १० ही वर्ष की उमर में, उस उमर में जिसमें आजकल के लडके अच्छी तरह धोती बांधना भी नहीं जानते हैं पितृसुख से वंचित कर दिया । पितृहीन बालक की विधवा माता के लिये प्राणनाथ के उठ जाने से अब केवल दो कुमार ही जीवनाधार थे। वीर जननी सच्ची क्षत्राणी ने इन से देश का उद्धार और अपने " कुल का उद्धार कराने के लिये ही आजीवन सतीत्व की रक्षा करते हुए विधवा धर्म पालन करते हुए प्राण धारण किया। यदि उनके पुत्र युवा होते, राज्य के स्वामी होते, विपत्ति<noinclude></noinclude> nj5b2znftijsca89vgztzvzs7oixx90 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७४ 250 194928 665537 2026-07-06T16:40:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665537 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदीका उद्धार | ( ४१ ) सागर में डूबते उतराते न होते तो निश्चय ही सती चुंडावत जी पति की चितामें अपना शरीर होम कर उनके साथ ही स्वर्ग को प्रयाण करनी परंतु उन्हें हाडा वंश का और बूँदी राज्य का उद्धार करना इष्ट था इसलिये उनके अंतःकरण ने पति वियोग के घोर संकट के समय, अपना सच्चा छत्र टूट जाने के समय भी ढाढस देकर मन को यत्र की तरह कठोर करके कह दिया:-- "आपला ! यदि आप मुझ अभागिनी अलका को इस विपत्ति सागर में डूबते हुए छोड जाते हैं तो जाइये । स्वर्ग में जाकर सुख से वहां के आनंद. -का अनुभव कीजिये । जो काम आपसे नहीं बनपडा है उसे आपके ही दूसरे शरीर से करवा कर मैं भी आती हूँ। आप के कर्तव्य का पालन कराके मैं फिर आपके दर्शन करूंगी, आपके चरणों में छोडूंगी।" माता ने पति के कर्तव्यों का पुत्र से पालन कराने के लिये शरीर धारण. किया और प्यारे पाठक महाराव राजा उम्मेद सिंह जी के चरित्र में जो कुछ बातें पायेंगे ये सब, सच पूंछो तो माता ही की बदौलत हैं । राज्य के आडंबर और बालक उम्मेद सिंह जी को संवत् १७९६ में परंपरा के अनुसार, अवश्य ही पिता के देहान्त होने के समय उम्मेद सिंह जी के पास जब राज्य के नाम से एक इंच भी धरती नहीं थी फिर राज्याभिषेक क्या ? परंतु धर्म के अनुसार हिन्दुओं की चालने भविष्य में राज्य के अधिकारी होने की आशा नै राज प्रासाद के बदले पर्णकुटियों में, महोत्सव के बदले इने गिने आदमियों में १० वर्ष के का वैशाख शुक्र १३ ( सर्व सिद्धा त्रयोदशी ) राज्याभिषेक किया । राज्याभिषेक हुआ और कुछ स्वधर्म के अनुसार ब्राह्मणों का, चारणों का और स्वामिभक्त सेवकों का सत्कार हुआ। पिता के समय के पैर को भूलकर, बंश के रक्त के जोश खाने से कोटे के महाराव दुर्जनशल्य जी ने टीके का दस्तूर भी भेजा परन्तु इन्हें कुलगुरु के बिना मंत्रदीक्षा कौन दे ? कोटे के महाराव जी ने इस समय पुराने पैर को कुलागत स्नेह में बदल दिया था इसलिये महाराज राजा उम्मेदसिंह जी के कुगुरु वल्लभ संप्रदाय के आचार्य गोस्वामी<noinclude></noinclude> tc654gsvvoiu119k2hb2no6o845wv8n पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७५ 250 194929 665538 2026-07-06T16:40:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665538 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ४२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | गोपीनाथ जी के लिये कोट से आने में किसी तरह की बाधा न थी परंतु किस के घड पर दो माथे हैं जो राज्य से निकाले हुए, पितृ हीन, सहाय हीन और वनवासी बालक को दीक्षा देने के लिये कोटे से बेगू जाकर प्रतापी महाराज जयसिंह जी जैसे राजा से और बूँदी के दलेल - सिंह जी से घेर बसावे, उन के कोपानल की आहुति बने और यह भी किस आशा से बस इस लिये गोस्वामी जी ने दीक्षा देने की साफ नाहीं करदी। उन्होंने कहला दिया कि:- "आज कल चातुर्मास्य के दिन हैं इस लिये कोटा छोड कर कहीं न जाऊंगा ।" इतना सुन कर राजमाता उदास हुई, अपने प्रारब्ध को दोष देने लगी परंतु हताश न हुई । गुरु दीक्षा के बिना कोई भी हिन्दू जब अपने को धर्म कार्य में योग्य नहीं समझता है तब : राज माता अपने प्रिय पुत्र से इतने बड़े कार्य का अनुष्ठान, मंत्रोपदेश बिना कैसे करा सकती थीं। उन्होंने अपने पुत्र पर कोटा नरेश का स्नेह जान उनके द्वारा रामानुज संप्रदाय के विद्वान पंडित बेणीराम जी साठोदरा नागर को लिखवाया कि:- "आप स्वयं पधार कर अथवा अपने पुत्र को भेज कर मेरे चिरंजीवी पुत्र का मंत्रोपदेश करो। आप हमारे कुलगुरु की तरह विषम दृष्टि नहीं है। आपके लिये राजा रंक बराबर हैं। मेरे पुत्र को भी अपने सेवकों में गिनिये। यह कल ही (शीघ्रही ) शत्रुओं को मारकर बूँदी का राज्य लेगा । यदि न भी लिया तो जीवन पर्यन्त आपकी सेवा करेगा ।" इस पर समदर्शी येणीराम जी को दया आई। उनके हृदय में शिष्य की विशुद्ध भक्ति देखकर सच्चे गुरु भाव का संचार हुआ। वे विद्वान थे, महात्मा थे, हर्ष शोक और सुख दुःख को समान मानने वाले थे। वह जयसिंह जी के कोप और दलेहसिंह जी के आतंक से बिलकुल न डरे उन्होंने अपने बडे पुत्र गोविन्दराम जी को एक सहाय हीन, विपत्ति ग्रस्त किन्तु होन- हार बालक को मंत्रदीक्षा देने के लिये बेगूं भेजा । तब ही से उनकी संतान वंश परंपरा से बूँदी नरेश की कुलगुरु होती चली आई है। यह<noinclude></noinclude> n2dbq0y5rf8v26xqdh2fx7u2i8dfkqw पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७६ 250 194930 665539 2026-07-06T16:40:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665539 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदीका उद्धार । (४३) घराना बूँदी में बड़ा सम्मान भाजन माना जाता है। इनके वंशके लोगों में जो राजगुरु होते हैं वे "भट्ट जी महाराज" कहलाते हैं । यद्यपि इस तरह इनकी मंत्र दीक्षा होगई परन्तु शिक्षा का क्या हुआ जिले दीर्घ जीवन में बड़े २ काम करने थे, जिसे हाथी के पेट में से बूँदी निकाल कर वहां नया शासन स्थापित करना था उस की शिक्षा असाधारण होना चाहिये परन्तु यहाँ साधारण की भी सुविधा नहीं थी। न तो आज कलके कर्जनी "कैडेट कोर" की तरह उस समय शस्त्र विद्या सिखाने का प्रबंध था और न विद्यादान के लिये सहसा कोई उत्तम गुरु ही उपलब्ध हो सकता था तो भी इन्होंने माता की प्रेरणा से माताही के निरीक्षण में शिक्षा पाई । अवश्य ही इन्हें स्वामिभक्त, राजभक्त शिक्षक भी मिले ही क्योंकि पांचों अंगुलियां एक सी नहीं होती हैं। जहां सौ बुरे हैं यहां संसार. में पांच भले भी हैं परन्तु सच पूछो तो माता चूंडावतजी ने पिता बन कर इनको सिखाया, पढाया । बूँदी के इतिहास लेखक रचयिता कविकुल कमल दिवाकर कवि राजा सूर्य मलजी ने इनकी शिक्षा का इनकी दिनचर्या का अच्छा खाफा लिखते हैं कि:- CG वंशभास्कर " के अपने ग्रंथ में सैंचा है। वह "गू में अब बूँदीश घोड़े की सवारी सीखते हैं, नीति सीखते हैं, धर्म सीखते हैं, तलवार बाजी में निपुण होते हैं, बंदूक चलाने में निपुण होते हैं और बाण विद्या की शिक्षा पाते हैं। वह शस्त्र विद्या में अपने वित्ते से अधिक अभ्यास कर रहे हैं और उन के मनकी उमंग अपनी सीमा को छोड कर ब्रह्मांड में भी नहीं समाती है। वह प्रातः काल ब्राह्ममुहूर्त में जागकर शौच स्नान से निवृत्त होनेके अनंतर संध्या वंदन करते हैं, गायत्री का १००० जप करते हैं, हरिनाम की माला फेरते हैं। शास्त्र की आज्ञा-- नुसार वर्ष भरमें जितने व्रत होते हैं और जितने उपवास होते हैं उनमें से एक को भी नहीं छोड़ते हैं। उन्हें सदा सचाई से प्रेम है। न वह कभी मूढ़ खुशामदी गधियों का अपने पास फटकना पसंद करते हैं और न मयका संसर्ग ही उनके पास आने पाता है। उन्हों ने इसे उठाकर वैष्णव धर्म बढाया<noinclude></noinclude> r12memjri6a40fisl192o7wh6564ibk पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७७ 250 194931 665540 2026-07-06T16:40:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665540 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ४४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | है । यह नित्य पोडशोपचार से भगवान् का पूजन करते हैं। वह पंच यज्ञ करते हैं । लघु मोजन करते हैं। समय २ पर शिकार खेलते हैं और महाभारत, स्मृतियां, भागवत और वेदादि शास्त्रों का मनन करते हैं। " समझे पाठक ! यह दश बारह वर्ष के बालक का हाल है। यह इनकी शिक्षा का दिग्दर्शन है, किन्तु उनकी शिक्षा का सच्चा परिचय आगे के पृष्ठों से मालूम होगा, क्योंकि आज कल के शिक्षितों की तरह उनके पास बी. ए. वा एम्. ए की सनद न थी जिससे उनकी योग्यता की जांच हो जाय । इस तरह से पितृ हीन होने पर भी चाहे वह होनहार की आशा में अच्छी शिक्षा पा रहे थे परंतु दुष्टों से इनका इतना सा भी सुख न देखा गया। चाहे इनके सद्गुणों को देखकर बड़े २ कर्मचारी, बडे २ शूरवीर उन के पास आकर बिना दाम के नोकर बन गये थे परंतु इनके उत्कर्ष की आशा दौलतसिंह हरदात से न देखी गई। उस ने इन के लघु भ्राता दीपसिंह जी को यहंका कर भाई २ में कलह पैदा कर दिया। माता ने इस दुष्ट को निकाला और फिर कभी इन में खटपट न होने पाये इस लिये छोटे पुत्र को रानाजी के पास रखना चाहा परंतु सदा के बैरी से विपत्ति के समय सहायता की आशा करना और आकाश से दूध दुहना बराबर है। फल कुछ न हुआ । कुछ क्या इसका विपरीत हुआ । जयपुर नरेश जयसिंह जी जैसे कलुपित हृदय को बुधसिंह जी के स्वर्ग पधार जाने पर भी उन के दो बालक कांटे की तरह चुभते थे। वह कदाचित् समझते होंगे कि होनहार उम्मेदसिंह नी जब बड़े होंगे तब कदापि अपने पिता का बदला लेने से न चूकेंगे क्योंकि यह भी राजपूत थे। वह जानते थे कि " पिताका बदला " बनिये के धन की तरह राजपूतों में संतान को धरोहर में, विरासत में मिलता है। राजपूत "पिता के बदले को" गया श्राद्ध की बराबर समझता है। इस कारण उन्हों ने राना जी पर दबाव डाल कर इन्हें बेगूंसे निकलावा दिया छाचार इन्हें कोटे लाना पड़ा। वहां आये अवश्य परंतु "किस की माने सेर सोंठ खाई है " जो इन की खुदा खुट्टी रक्षा कर के जयपुर जैसे प्रबल राज्य से<noinclude></noinclude> j1j0foihj5boatwkfojwql7z0nb1aqp पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७८ 250 194932 665541 2026-07-06T16:40:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665541 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पहली जीत । (४५) वेर ठाने । बस इसी लिये महाराव मधुकरगढ में निवास करावा - दुर्जनशल्य जी ने इन्हें कोटे में न रखकर "वंशभास्कर" में लिखा है कि व्यास दौलतरामजी के प्रयत्न से राना जी ने जब दीपसिंह जी को जागीर न दी तब उन के पुत्र प्रतापसिंह जी ने बलपू- बैंक दिलवाई और उम्मेदसिंह जी के लिये घोडा शस्त्र और आभूषण मेजे, परंतु यह समझ में न आया कि जब दीपसिंह जी ने २१ हजार का पहा पालिया तब वह बड़े भाई के साथ कोटे क्यों गये । परंतु सूर्यमल्ल नेही आगे चलकर इस बात को खोल दिया है। उन के लेख से स्पष्ट होता है कि पिता जगतसिंह जी ने पुत्र प्रतापसिंह जी की ढिठाई से चिढ़कर उन्हें कैद कर दिया था। "इस तरह १० वर्ष की उमर से १३ वर्ष की उमर तक उम्मेद सिंह जी ने कालयापन किया। अध्याय २. कार्यका आरंभ | पहली जीत । जिस समय महाराव राजा उम्मेदसिंह जी बेगूं में थे उनका पहला वि वाह गंगेराट पुर (गैंगराड ) राजा दलपति सिंह जी की कन्या चिम्मन कुंवार जी से हुआ था। यह एक साधारण बात थी इसलिये इसका यदि यहां उल्लेख न किया जाता तो भी कुछ विशेष चिन्ता नहीं थी किन्तु बेगू में एक ऐसी घटना होगई जिस से मालूम होता है कि केवल जयपुर की बदौलत बूँदी का राज्य के बैठने वाले मुहकमसिंहोत हाडा दलेखसिंह जी कैसे कायर थे, कैसे क्रूर थे और सच पूछो तो कैसे हलके थे। मधुरा के राजा दैत्यराज कंस ने जिस तरह भगवान आनंद कंद श्रीकृष्णपर कुबल- यापीड हाथी छोटा था उसी तरह उन्हों ने भी उम्मेदसिंह जी को पिसवा<noinclude></noinclude> cpw426wmdfn6xocqe1l76e1aet802vw पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/७९ 250 194933 665542 2026-07-06T16:41:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665542 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ४६ ) उम्मेद सिंह चरित्र | देना चाहा। परंतु जो दशा वहां उस हाथी की हुई थी वही यहां हुई । उनकी आशा से बूँदी का एक मतवाला हाथी बेगूं लाकर छोड़ दिया गया । उनका इसमें उद्देश्य यही था कि बालक उम्मेद सिंह जी मस्त हाथी का तमाशा देखने जब आयेंगे तब सहज ही में मारडाले जायेंगे। महा- राज का इष्ट देव इस समय वडा सहायक हुआ और उस हाथी के साथ साथ आये हुए बूँदी के दो सरदार अपना मुंह बिगाड कर लौट गये । अवश्य ही इस तरह आगे इनके हाथ से बडे २ काम कराने के लिये भगवान ने इनके प्राण बचा लिये परंतु कुलकलंक दलेल सिंह जी तुम्हारा ओछापन संसार को मालूम होगया। दुनिया में रहकर शत्रुता होने से महात्माओं के सिवाय कोई नहीं बच सकता है परन्तु इस तरह निर्बल शत्रु को धोखा देना नीचता है, कायरता है और सच पूछो तो वीर राज- पूतों की रजपूती इसी में है कि वे पराक्रमी से भी पराक्रमी शत्रु को खल- कार कर मारे । तुमने जैसे लालच से, बहकावट से राज्य के असल अधिकारी का राज्य लेलेने में हाडा कुछ की मर्यादा का भंग किया वैसे ही इस समय कहना पडता है कि ऐसी कायरता दिखाकर अपनी हंसी करवाई । खैर कुछ भी हो परन्तु इस कपट से उम्मेद सिंह जी बाल बाल बच गये । मधुकरगढ में निवास करते समय अपने दुःख के दिन सुख के साथ काटते हुए भी उम्मेद सिंह जी ने अपना धीरज नहीं छोडा था, अपने क्षत्रियोचित कर्म नहीं छोडे थे और बूँदी देने का विचार, बूँदी देने का उद्योग नहीं छोडा था। वह तेरह वर्ष के होने परभी पचीस वर्ष के युवा की तरह दिन रात इसी उधेड़बुन में लगे रहते थे कि किस तरह हाथी का पेट फाड कर बूँदी निकालना चाहिये परन्तु न्योता बडे वर था । महाराज जयसिंह जी जैसे अनुभवी, पराक्रमी, राज्यलोलुप का सामना था । उन दिनों दिल्ली की बादशाहत बिलकुल डूब चुकी थी । माटवे की, अजमेर की और आगरेकी सूबेदारी इन्हीं के पास थी। केवल इतना ही क्यों जयपुरी जय- सिंह जी का उस समय देश भर में दवदवा था। जब इन्द्रादिक देव- ताओं को दैत्यों के आतंक से बचने के लिये गिरिं कंदराओं की शरण लेनी<noinclude></noinclude> 4nw3m02w0h7i99z83y115s3jjcidyjx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८० 250 194934 665543 2026-07-06T16:41:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665543 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पहली जीत । (४७) इनकी दीनता राज्य पड़ी है तब यदि उम्मेदसिंहजी ने चार महीने इस तरह कोटे की शरण में काटे हों तो आर्य क्या है ? परन्तु भगवान दीन दयालु को पर दया आई। देश भर में अपना डंका बजा कर अपना बढाने के लालची, अनेक धर्मकार्यों से और जयपुर बसा कर अपना नाम अमर कर जाने वाले जयसिंह जी को घमंड होगया । अब उन्हों ने समझ लिया कि "संसार में जो कुछ है वह मैं ही हूँ ।" भगवान को किसी का घमंड पसंद नहीं है। जो घमंड करता है यह एक न एक दिन अवश्य गिरता है वह भी गिरे और कवि राजा सूर्यमल जी कहते है कि दुर्व्यसनों में पड कर गिरे । उन्होंने अब मद्यपान की मात्रा दिन दूनी और रात चौगुनी करदी । इस मय राक्षस ने बहुतों के घर वाले हैं, बहुतों को राजा से रंक बनादिया है। इसी तरह जयपुर की दुर्दशा हुई। यहां महाराज जयसिंह जी दिन रात शराब पीकर मस्त रहने से रमणी रमण के आसक्त हुए। इसी काम में आसक्त होनेसे उनके पास नई २ युवतियां, नया नया सामान और नई २ औषधियां उपस्थित होने लगीं । परंतु परिणाम इस प्रकार भोग विलास का बडा ही भयंकर हुआ सूर्यमल जी लिखते हैं कि :-- "इन कूरम नृप रोग विवश हुव देह विकति कमि पुंज परे । मास बहुत यह दुःख सहयो अरु गूद पडल तनु विकृत गरे । इक अंगुल परिमित लंबे कृमि श्यामल पन सय देह धसे । त्वचछोहित पल मैदन खावत अस्थिन अंतर विविध बसे ॥ भस्म तल्प सोबत दुख भाजन नेक न पीडित नींद लहैं । जिमि विकसत तरबूज पक्यो इम विग्रह रंचन गाढ गहूँ ॥ सुप्तहि मूत्र तथा मल मोचन निजकृत दुरितन चिंति करें। अनुज विजय तिव मात सुतादिक मारिय ते सब दिट्ठि परें * ॥ इम अति कष्ट विकल कूरम नृप संचित अघ भर भूरि भन्यो । खख वसु शशि १८०० विक्रम शक इशगत विशद (आश्विन- शुक्र) चतुर्दशि देह राज्यो ।" . कवि राजा जी के शब्दों में जयसिंह जी की मृत्यु की दुःख दायिनी कहानी लिखने के सिवाय में इस विषय में नहीं लिख सकता। मैं जयपुर के. इस कथा का संबंध जयपुर के इतिहास से है। यहां लिखने की आवश्यकता नहीं<noinclude></noinclude> prii1f7g8lqhorbxnvetrjax1jt1z06 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८१ 250 194935 665544 2026-07-06T16:41:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665544 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ४८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | इतिहास से इस घटना की तुलना कर के इस विषय में निर्णय करने की भी आवश्यकता नहीं समझता क्योंकि जब उन बातों का इस चरित्र से संबंध नहीं है। जब यह घटना यहां प्रसंग आपडने पर लिखी गई है तब उसकी विशेष छान बीन करने से मुझे क्या मतलब। परंतु इतना अवश्य है कि जयपुर नरेश महाराज जयसिंहजी का देहान्त होगया । टाड साहब लिखते हैं कि- "जिस समय संवत् १९०० में अपने घराने के बेरी आमेर नरेश की मृत्यु हुई उम्मेद सिंहजी केवल तेरह वर्ष के थे। उन के कानों में ज्यों ही इस घटना की भनक पडी उन्हों ने अपने वीर हाडाभको साथ लेकर पाटन और गैंडोली पर हमला किया और इन दोनो परगनों पर अपना अधिकार कर लिया। जब इस बात की कानों कान खबर प्राचीन हाडाओं तक पहुंची कि बुधसिंह जी के पुत्र अब जागृत हुए हैं सब के सब इकट्ठे हो २ कर उन के झंडे के नीचे आ खड़े हुए और कोटे के दुर्जनशल्यजी ने हाडाओं का शुद्ध रक्त इस तरह उबला देखकर इनकी सहायता की ।" यद्यपि टाड साहब ने इस घटना का उल्लेख नहीं किया है परन्तु बूँदी के इतिहास से मालूम होता है कि महाराव दुर्जनशल्य जी ने महाराव राजा उम्मेदसिंह जी को जो सहायता दी थी वह कोरी सहायता थी। उन्होंने इनके चिर शत्रु जयसिंह जी को मरा जान उम्मेदसिंह जी को सहायता तो दी परंतु सेना की तैयारी के लिये २ लाख रुपये के आभूषण के लिये ! जेवर लेकर उन्हों ने इधर इनके लिये सेना सजाई और उधर बेनीराम नागरे को जयपुर भेज कर जयसिंह जी के पुत्र महाराज ईश्वरी सिंह जी से कहलाया कि- "आप बूँदी उम्मेद सिंहजी को देकर कोटे पर अहसान कीजिये ।" ईश्वरी सिंहजी भी पिता की तरह बूँदी का लालच न छोड़ सके। उन्हों ने उत्तर दिया कि "बूँदी अत्र हाथी के पेट में पहुंच चुकी । अब वह निकल नहीं सकती ।" इसपर वेनीराम को क्रोध आगया । उन्हों ने जयपुर नरेश के आतंक का उनकी शक्ति का और उन के राज्य कर के निडर होकर कह दिया:- वैभत्र का कुछ विचार न<noinclude></noinclude> n3waedk1x4g6gedei2sikzo7oixdlu1 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८२ 250 194936 665545 2026-07-06T16:41:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665545 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"सिंह में इतनी शक्ति है इतना कहकर वह चले आये पहली जीत । (४९) कि वह हाथी का पेट फाड कर निकाल लेगा ।" महाराज मुंह ताकते रह गये । वेनीरामजी के कोटे आते ही दुर्जनशस्य जी ने जोधपुर महाराज से सहायता मांगने के लिये. सेनापति गोविन्दराम नागर को भेजा। परंतु एक बार जयपुर से मार खाये हुए जोधपुर बालोंका उम्मेद सिंहजी को सहायता देनेका साहस न हुआ । उन्हों ने जब गोविन्दराम जी को कोरा उत्तर देदिया तब इन्होंने उम्मेद- सिंहजी की ओर से १ लाख रूपया देना ठहराकर सूबेदार नव्यान फखरु- दौला की सेना बूँदी पर चढ़वाई। उधर से इस तरह सेना की चढाई की खबर पाकर इधर से कोटे की सेना के साथ उम्मेदसिंहजी चढे । शाहपुरे के राजा जी भी इस काम में सहायक हुए। यद्यपि उडाई बहुत भारी हुई और दलेल सिंह जी के भागकर नेनया के किले में जा घुसने से बूँदी में उम्मेद सिंह जी का अधिकार होगया परंतु समय बडा भयानक था । जिस नगर को इनके वडों ने एच २ कर बसाया था, जिस किले को बनवाने में इनके पूर्वजों के परिश्रम की परिसीमा नहीं रही थी, जिसकी रक्षा के लिये अवतक असंख्य हाडाओंका रक्त पात हो चुका था, जहां के बालक, युवा, स्त्री, वृद्ध जी जान से उम्मेदसिंह जी को चाहते थे, जो बूँदी इन्हें प्राण से भी प्यारी थी उसी पर गोले बरसाकर उसी की सेना को गाजर मूली की तरह काटकर अपना अधिकार जमाना पडा। इस घटना से यही सिद्ध होता है कि कुसंग में पढने से सज्जनों को भी कष्ट सहना पडता है। यदि बूँदी दलेल - सिंहजी के हाथ न पडती तो आज उसे ऐसा लोमहर्षण दृश्य- इतना घोर संकट क्यों देखना पडता । परंतु नहीं उस समय उम्मेदसिंह जी को अपनी प्यारी बूँदी पर चढाई कर के अपने प्रिय परिजनों पर अपने प्रिय प्रासाद पर गोले चलाने में बिलकुल भी आना कानी न करनी पडी। उन्हों ने सोचा कि गोह जैसे विषधर जंतुको नष्ट करने के लिये जब पीपल जैसा पेड जला लिये जब अपने ही हाथ से देना पडता है, सर्पदंश से प्राण रक्षा करने के राजपूत अपनी अंगुली काट डालते हैं और परिणाम में बालक की मर्म वेदना छुडाने के लिये जब माता स्वयं अपने प्राणप्रिय भाटक का फोडा चीरते ४ .<noinclude></noinclude> kv0bb1qf7gi0u58g8jswsxp6gxy3tkh पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८३ 250 194937 665546 2026-07-06T16:41:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665546 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ५० ) उम्मेदसिंह चरित्र ! समय का असा कष्ट सहती है फिर बूँदी राज्य के, बूँदी की प्रजा के उप- कार के लिये यदि हम उसपर गोले गोले गोलियों के वार से बूँदी के दागते हैं तो क्या चिन्ता है। उन्होंने किले को जर्जर कर दिया, उन्होंने कुछद्रोही दलेलसिंहजी के साथ देनेवाले हाडाओं की लाशों से, जय- पुरियों की लाशों से जंगल के उन्हों ने अपने कृपाण की तेज तरह काट डाला मानो खेत में धान काटा जा रहा है। इस तरह उम्मेद सिंहजी ने पहली ही बार रणभूमि में तलवार पकड़ कर पहली ही बार विजयश्री लाभ करके अपने कार्य का श्रीगणेश कियां । अनेक जंतुओं को तृप्त किया और धारा से बूँदी के सैनिकों को इस जी जान से कहर शत्रु होने पर भी यद्यपि उम्मेदसिंह जी ऐसे न थे जो शनहीन, शक्तिहीन बेरी को मार डालते, उसे किसी तरह सताते परंतु बूँदी में इनका अधिकार होते २ ही दलेलसिंहजी ने प्राण भय से वहां से भाग कर नैनवां के किले की शरण ली। मार्ग में काटों से, पत्थरों से और कंकडों से उनकी खियों को जो कष्ट हुआ है वह अकथनीय है। उसे वही जान सकता है जो राजप्रासाद में सुख से कालयापन करते २ प्राण लेकर भागता है । जिस समय बूँदी में इस तरह भयानक युद्ध की आग एका एक भमक उठी थी, जिस समय बूँदी को चारों ओर से उम्मेदसिंहजी ने उनके सहायकों ने धेर रक्खा था बूँदी के रक्षक सबाई ईश्वरीसिंहजी अपने महल में पढे २ युवतियों के रमण का आनंद नहीं छूटते थे। उन्हें इस आक्रमण की पहले से खबर लग चुकी थी। वह पहले ही जानते थे कि कोटे के बेनीरामजी नागर हाथी का पेट फाड़कर बूँदी निकालने वाला सिंह बनने का दावा कर गये हैं इसलिये उन्होंने दलेल सिंहजी की सहायता के लिये. शिवदास खत्री को सेनाका सरदार बनाकर बड़े ठाट के साथ सेना भेजी। भेजी अवश्य परंतु दलेल सिंह जी ने इकरार करके उस के भाई राजामल को दश हजार रुपये नहीं दिये थे। वह अपना वचन देकर चूक गये थे इस लिये उसने अपनी उस अधिकृत सेना से उनकी मदद देने का काम न किया। वह<noinclude></noinclude> tcgi94ru3anfkes31ohkxmdibympmbj पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८४ 250 194938 665547 2026-07-06T16:42:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665547 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पहली जीत । ( ५१ ) चढा के गया जिसे ईश्वरी सिंह जी के पिता छीन लिया था । इसी सेना को वरवाडे पर जयसिंह जी ने राजामल से राठोड का शिवदास से जैसा संग्राम हुआ अपने वचन को लेना आपहुंचने से खेर जो कुछ जी का डंका बजने वरवाडे के अधीश शिवसिंह उसके उल्लेख करने की यहां 1 आवश्यकता नहीं है परंतु इसमें संदेह नहीं कि यदि दलेहसिंह जी भंग करने का हल्कापन न दिखलाते तो शिवदास की उम्मेद सिंह जी को बूँदी लेने में कुछ कठिनता पडती । होना था सो होगया । बूंदी में पहली बार उम्मेदसिंह लगा और इसतरह यहां की राजभक्त प्रजा को आशा सच्चा स्वामी हमारे दुःख दूर करके हमें सदा की शांति का सुख प्रदान करेगा परन्तु इस समय प्रजाका सुख अधिक काल तक न टिकने पाया। बूँदी का राज्य लेने में सहायता देकर कोटे वाले दुर्जनशल्प जी लोभ में फंसे हुई कि अब हमारा कि "छालच बुरी बला है।" इस यह बड़े लोग ठीक कह गये हैं भी इसी बढाके शिकार वन नरेश की सहायता करने में 5. गये, अब इन्होंने न सोचा कि हमने बूँदी जो आयास उठाया है, हमने जिस कामके लिये जयपुर जैसे बलाढच राज्य से और बिसाया है और हमने जिस तरह उम्मेदसिंह जी का साथ देकर कुटुंब वात्सल्य दिखलाया है उस पर एक दम पानी फिर जायगा । ये बातें एक साथ ही धूल में मिलजायेंगी । परंतु स्वार्थी पुरुष दोष को. नहीं देखता है। बस इसी तरह उन्होंने इन बातों पर कुछ ध्यान न दिया । उन्होंने इन्होंके २ लाख रुपये से सेना सजाई थी, इस कारण सहायता के काम में नाम पाने के सिवाय उनकी एक पाई भी खर्च नहीं हुई थी परन्तु अहसान के बोझे से दबे हुए उम्मेद सिंह जी से कहा कि- "इस लडाई से हमारा सेनापति गोविन्दराम मारागया है, इस युद्ध में हमारा लाखों रुपया खर्च हुआ है और आपसे बूँदी जयपुर वालों के आगे दबैगी भी नहीं इस कारण केवल छोयचे के परगने पर अपना निर्वाह कीजिये । " यह कहकर लालची दुर्जनशल्य जी ने उम्मेद सिंह जीके पसीना झार<noinclude></noinclude> i2zx8403yp2ivdtv7bxdchq0sp5qvdx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८५ 250 194939 665548 2026-07-06T16:42:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665548 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५२) उम्मेदसिंह चरित्र | परिश्रम से इनके शरीर का रक्त पात करने बाद लिये हुए राज्य में अपना अधिकार जमा लिया। यदि यह इतना ही अन्याय करते तो उपकार के बोझे से दबकर उम्मेद सिंह जी कदाचित् इसे सहन भी कर सकते थे परंतु उन्होंने इनकी प्यारी प्रजा को लूटा, इनके प्रिय परिवार, प्रिय परिजन का धन हरण किया, राज्य की, राजप्रासाद की नामी वस्तुऐं लेली और इसतरह इस बार उम्मेद सिंह जी का सब परिश्रम व्यर्थ गया। इस विषय में दुर्जनशल्य जी की दुर्जनता यहां तक बढ़ कर थी कि शाहपुर के राजा जी से, जो केवल उम्मेद सिंह जी की प्रीति के कारण सहायता देने को आये थे, सहन न होसकी। उन्होंने दुर्जनशल्प जी से स्पष्ट कह दिया कि:- " तुम बडे निर्लज हो । तुम नीति, धर्म का त्याग करके स्नेह पर लात मार कर पराई थाली तकते हो। हमने समझा था कि तुम उम्मेदसिंह जी के ऊपर अपनी छत्र छाया रखोगे इसीलिये हम आयेये । ", यह इतना कहकर चले गये । केवल वह ही न गये महाराव राजा उम्मेदसिंह जी भी जोधपुर नरेश अभय सिंह जी के पास गये । निज 'पराक्रम का हौसला रखकर बूँदी चाहने वाले उम्मेद सिंह जी से राज्य-. लोलुप दुर्जनशल्प जी की ऐसी दुर्जनता कैसे सहन होसकती थी । अब उन्हें कोटे की सहायता लेकर संकोच हुआ, अपना जेवर नष्ट करके दुःख हुआ और कोटां नरेश की ऐसी स्वार्थपरता पर घृणा हुई । यदि कोटे ने उन पर इतना उपकार न किया होता तो यह कदाचित उसी समय दुर्जनशल्य जी को मजा चखा देते क्योंकि यह लड़ाई के समय इनके साथ थे वैसे ही इस कुकर्म के समय भी बूँदी में ही थे । वह दुर्जनशल्य जी पर इसलिये घृणा करके गये कि अब "पराये भरोसे बूँदी लेने का उद्योग न करेंगे। जब लैंगे जब अपने भुज बहसे लेंगे" क्योंकि राजपूत' जाति तलवार का घाव सहसकती है परन्तु अपात्र का अहसान नहीं सहस- कती । दुर्जनशल्य जी ने अपने इस तरह के बर्ताव से सिद्ध कर दिया कि वह एक वीर हाडा पर उपकार करने की योग्यता नहीं रखते हैं। सच्चा उपारक<noinclude></noinclude> izc56z34yndxmkg46ox6kgh3qdytovx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८६ 250 194940 665549 2026-07-06T16:42:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665549 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२ " माता का देहान्त | (५३) यही है जिसे करके उपकारक, उपकृत से कुछ बदला न छे । उसे कभी स्वप्न में भी जतलाये नहीं कि मैंने उपकार किया है। वही सच्चा उपकारी हैं जो उपकार करके संकुचित होता है। दुर्जनशल्प जी जैसे स्वार्थ लोलुप उपकारी नहीं कहला सकते । के र्जन शल्यजी ने बूँदी कार से न रख सके। इस अध्याय ३. माता का देहान्त । चढाई की, महरटों को एक करोड रुपया राना जी से जयपुर ने अपना पिंड छुडाया, जी को कैसे २ कष्ट इस तरह जयपुर नरेश के पादसेवी, उनके हाथ की गुडिया दलेउसिंह जी से बूँदी छूटगई, महाराव राजा उम्मेद सिंह जी कोटे की स्वार्थ परायणता देखकर स्वयं चले गये और दाल भात में मूसलचंद बनकर राज्यलोलुप दु- ली परंतु वह भी इसे बहुत समय तक अपने अधि- बीचमें राना जगत सिंह जी ने जयपुर पर क्यों देकर उनकी सहायता से कैसे मरहटोंके घेरे में पड़कर राना उठाने पडे सो कहने की यहां आवश्यकता नहीं है क्योंकि उन बातों का इस चरित्र से कोई संबंध नहीं परंतु यहां इतना लिखे बिना काम नहीं चलेगा कि जयपुर से लड़ने में कोटेवाले महाराव दुर्जनशल्य जी रानाजी के सहायक थे इस कारण मरहटों की सेना ने ज- जयपुर से लौटते हुए कोटे आकर उसे खूब लूटा। इस काम में ज यपुर वाले ईश्वरीसिंह जी संयुक्त थे। उन्हीं की प्रेरणासे मरहटों ने कोटे पर चढाई की थी और उन्हीं की आज्ञाते भगेडू दलेहसिंहजी कोटे पर च देथे। दोनों ने मिलकर और खूबही बूँदी वाले चखाया। लडाई खूब ही कोठे वालों को खूब ठोका, खूब ही राज्य छूटा उम्मेद सिंह जी के साथ छाउच करने घमासान हुई का मजा लाशों पर छारों पडकर ढेर का ढेर लग गया । रक्त पनाड़े की तरह बहने लगा। घोड़ों की टापों से चूळ ने उठकर सूर्य को ढांक लिया। इस तरह जब आकाश में बादल सा दि T<noinclude></noinclude> mempq11ljh9rohwmadqsjq6koxm3ung पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८७ 250 194941 665551 2026-07-06T16:42:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665551 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>न्द ( ५४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | खाई देने लगा तब तलवारों की चमक बिजली का काम देने लगी । रणभूमि में कहीं मारो ! मारो !! " और कहीं "मरा रे! मरा !! " का शब्द, कहीं तोपों की गरज और कहीं बंदूकों की दनादन कहीं बीरों का हुंकार, कहीं हाथियों की चिंघाड़ और कहीं घोड़ों की हिनहिनाहट के श- ने मिलकर वादल की गरज का समा दिखला दिया। घायल वीरों के लोइसे जो बूँदें पडती थीं ये मानो रक्त की वर्षा थीं। इस संग्राम में मांस- लोलुप पशु पक्षियों की खूब ही बन आई। उन्होंने बरसों की महीनों की भूख थोडे ही समय में मिटाई । मरहटों के सरदार रानाजी सेंधिया का लडका जयाजी इस लड़ाई में मारा गया। इसपर सरदार बहुत कुछ हुआ । उसने ईश्वरी सिंहजी को डांटा उपटा और इसकारण दलेल सिंह जीको लाचार होकर कापरेन पांच गांवों सहित इनकी भेट करना पड़ा । इस लड़ाई में अंत में कोटे की भारी हार हुई। कोटे से ईश्वरी सिंह जी ने और मरह- टों ने मिलकर १६ लाख रुपया दंड लिया और चार लाख रुपया वार्षिक लेना] ठहराया। यह घटना संवत् १८०२ की है। उसी समय मरहटों ने द लेल सिंह जी से पाटन का परगना लेकर होलकर, सैंधिया और श्रीमंत इसतरह तीन भागों में उसे बांटलिया । बूँदी के शेष परगनों पर और राज- धानी बूँदी पर फिर दलेल सींह जी का अधिकार कराकर ईश्वरी सिंह जी जयपुर गये और मरहटे अपने देशको चले गये । जनशल्पजी को उम्मेद इसतरह कोटे के दु- सिंह जीके साथ बुरा बर्ताव करने का अच्छा फल मिलगया । बूँदी लेने से उन्हें जो घमंड होगया था वह रेतीले पत्थ की तरह चकना चूर होकर मिट्टी में मिलगया। जिन दिनों में कोटा इस प्रकारके घोर संकट में पड़ रहा था और जिस समय विपत्ति सागर में पढकर कभी डूबता और कभी उतराता था महाराव राजा उम्मेद सिंह जी को एक और ही विपत्ति का सामना करना 'पडा । वह महाराव दुर्जन शल्य जी से घृणा कर अजमेर चले गये थे। उनकी पितृसमान माता और उनके लघु आता कोटे में पडे २ दिन काट रहे थे। जिन दिनों कोटे में युद्धका घमसान मच रहा था, अचानक 5.<noinclude></noinclude> im96sg398p3307tjca0eyvmdu9906jy पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८८ 250 194942 665552 2026-07-06T16:42:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665552 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>+ माता का देहान्त । (५५) माता मुंडावत जी का देहान्त सही तो छोटे पुत्र ही ने उनका शास्त्र से उम्मेद सिंह जी के इस समय परंतु महाराव राजा । केवल दश वर्ष के बालक अपने बडे पुत्र की अनुपस्थिति में हो गया। अवश्य ही बडे पुत्र न सारा संस्कार कर दिया दुःख का क्या कहना है उम्मेद सिंह जी का लालन पालन करके जिस धीरमलू माता ने पिता के समान शिक्षा, रक्षा की थी, जो पिता की उपस्थिति में और अनुपस्थिति में पिता बनकर धर्म में, राजनीति में छोक व्यवहार में और शक्ष विया में उन्हें चतुर पंडित और दृढ बनाने में समर्थ होसकी थी, जो पति का कर्तव्य पुत्र से पालन करा- कर खोई हुई कीर्ति, खोया हुआ राज्य पुत्रको दिलाने के लिये जीवित रह- कर पति की चितामें अपना शरीर होमकर पति के साथ स्वर्गारोहण करने के महत्पुण्य से वंचित रही थी वही माता, वीर पुरुषों को, अपने पस क्रम से बड़े २ राज्यों के दांत खट्टे कर डालने वाले उम्मेद सिंहजी को गर्भ में धारण करने वाली माता अब संसार में न रही इससे बढकर इन्हें कौन सा दुःख हो सकता है । हाय ! आज माता नहीं है और वह भी किस समय छोड़ कर स्वर्ग में पति से मिलने चली गई जब उम्मेद सिंहजी परम पराक्रम दिखाने पर भी सफल होने पर भी सुफल नहीं हो सके थे। माता गई और पुत्रसे उसका कर्तव्य पालन कराने से पहले ही, पुत्र को बूँदीके सिंहासन पर आसीन देखने से पहले ही चली गई। पुत्र को कर्तव्य दक्ष देखकर, बूंदी के पहले युद्ध में इन की असाधारण वीरता देखकर मानो पति के पास स्वर्ग में यह खबर करने को दौड़ गई कि "अब आपका पुत्र आपके छूटे हुए राज्य देने में जब समर्थ होगया है, जब वह आपके कर्तव्य पाउन की शक्ति रखता है तब मुझे संसार में रहकर आपका वियोग सहने से क्या मतलब है ! बस इसी लिये मैं चली आई। " कुछ भी हो परन्तु इनकी माता का देहान्त ऐसे समय में हुआ जब यह उनके अंत समय में उनकी बीमारी में सेवा करने के लिये मातृचरणों में उपस्थित न थे। मातृ वियोग का इन्हें जितना कष्ट था उससे भी बढकर इन्हें इस बातका दुःख था कि यह उनके स्वर्ग सिधारने के समय उनकी सेवा में<noinclude></noinclude> 8au36nk0xm0ndhzmb4z2veagsarpacv पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/८९ 250 194943 665553 2026-07-06T16:42:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665553 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ५६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | उपस्थित न थे । कच्ची उमर में, राज्यहीन उम्मेदसिंह जी यद्यपि निराधार रहगये थे, यद्यपि अपनी शक्ति, अपने पराक्रम, अपनी तलवार और अपनी बुद्धि के सिवाय, ईश्वर जगदाधार भक्तवत्सल के सिवाय उन्हें अब कहीं से सहारा न था, यद्यपि अब होनहार दुःखों की व्याकुलता के समय धीरज दिलाने वाली, साहस बढाकर राज्य पाने के उद्योग में प्रवृत्रा करनेवाली भरोसा करके बिलकुल विचलित ओर्डदैहिक क्रिया की उनका माता नहीं रही थी परंतु यह इष्टदेव का नहीं हुए । इन्हों ने पुष्कर जी में माता की श्राद्ध किया। इस समय खर्च की तंगी भी कम न थी, अपने शरीर का दो लाख रुपये का जेवर कोटानरेश दुर्जनशल्पजी की दुर्जनता से खो चुके थे। ऐसी अवस्था में, ऐसे कष्ट में भी इनका नियम दृढ रहा, जो शूर हाडा प्राणों की बाजी लगाकर इनके साथ थे पहले उन्हें खिलाकर आप भोजन करते, जो कुछ उनके खाने में आता उसे ही आप खाते । इस समय खाने पीने में राजा प्रजा का स्वामी सेवक का भेद न था। बस यही कारण था कि जिस तरह कुंभठा जाने पर भी सुगंधित पुष्पको भ्रमर नहीं छोड़ते हैं उसी तरह विपत्तिग्रस्त उम्मेदसिंह जी के सगुणों से मुग्ध होकर उनके शूर सामंतों ने उनका साथ न छोडा । इस बात की खबर पाकर मारवाड नरेश अभय सिंहजी उन्हें अपने पास ले आये और सोलह वर्षके नव युवा उम्मेद सिंह जी का उन्होंने बहुत ही सत्कार किया। अजमेर में ही संवत् १८०२ की अक्षय तृतीया को मारवाड के अंतर्गत रास के ठाकुर वखत सिंह जी की कन्या कुन्दन • कुमारी जी से इनका दूसरा विवाह हुआ । विवाह अवश्य होगया परंतु मारवाड नरेश से इनको बूँदी विजय में बिलकुल सहायता न मिली । अपने वीरव्रत का पालन करनेके लिये मातृ शोक में पडे हुए उम्मेद सिंह जी नव वधू के साथ भोग विलास में पडकर अपने कर्तव्य को तिलां- जुलि नहीं देना चाहते थे। उन्हें दिन रात इसी की चिन्ता उगी रहती थी कि बूँदी का उद्धार कैसे करना चाहिये। यह इस बार दूसरे का आश्रय नहीं लेना चाहते थे। इस बार उन्हों ने पक्की ठान ली थी कि " जब लूंगा<noinclude></noinclude> s25dros216bztj9g700tg3puh398o2u पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९० 250 194944 665554 2026-07-06T16:43:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665554 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी में उम्मेद सिंह जी । (५७) तब अपने ही भुज बढसे बूँदी लूँगा । " बस इसी प्रण का निर्वाह करने के लिये उम्मेद सिंह जीवीरव्रत के प्रती होकर अपनी नव वधू को भिनाय में विमाता की सेवा में नियुक्त कर आप बूँदी विजय का प्रयत्न करने लगे। वहां आमेर नरेश जयसिंह जी की भगिनी, बुधसिंह जी की रानी कछवाही जी जिनके कारण उम्मेद सिंह जी के पिता को विपत्ति सागर में डूबना पडाथा, भी थीं, उन्होंने केकयी की तरह अपने पुराने कामों से लज्जित होकर नय पर मधू को हृदय से लगाया और इस तरह अपने पति विरोध की और पति के अप्रिय करने की दहकती हुई आग को. शीतल किया । अध्याय ४. -->9/1600/+ बूँदी में उम्मेद सिंह जी । कोटा विजय करके जयपुर नरेश ईश्वरी सिंह जी दलेल सिंह जी को साथ किये हुए अपनी राजधानी को लौटगये थे। बूँदी की रक्षा, यहाँ का शासन, यहाँ का सब कुछ उनकी ओर से नंदराम खत्री के अधीन था। दलेल सिंहजी का और नंदराम का बूँदी की प्रजा के साथ कैसा बर्ताव था सो जानने का मेरे पास कोई साधन नहीं है परंतु यह बात दिनमणि सूर्य के प्रकाश के समान स्पष्ट है फि बूँदी की प्रजा महाराव राजा उम्मेदसिंहजी को चाहती थी, इन्हें चिरकाल के लिये बूँदी के राजसिंहासन पर आसीन होकर प्रजा पालन करते डए देखने की भगवान् इष्ट देव से प्रार्थना करती थी। यहां तक कि इस राज्य की अर्द्ध बनवासी प्रजा लूट खसोट में परायण हम श्रीमान् की प्रजा होकर रहें। गीने केवल चाहते ही मीने चाहते थे कि नहीं थे बरन समय आपडने पर उन्होंने करके भी दिखा दिया। टाड साहब ने लिखा है कि:- "कोटा विजय कर के ईश्वरी सिंहजी ने उम्मेद सिंहजी पर आक्रमण करने के लिये बूढ लुहारी में नानकपंथियों की सेना जिस समय भेजी थी<noinclude></noinclude> ggbmh61mpyvgwytj4jcdfs83nn9twx3 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९१ 250 194945 665555 2026-07-06T16:43:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665555 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५८) उम्मेदसिंह चरित्र | तो पहाड और जंगल के मालिक मीनाओं ने, चाहे हाडाओं के हाथ से उनका राज्य से स्वामित्व जाताही रहा था परंतु बडा काम दिया था । " इस बूढ लुहारी के संग्राम से टाड साहब का मतलब किस युद्ध से है सो मुझे माइम नहीं हुआ परंतु जिस मैदान की समर घटना का मुझे इस समय वर्णन करना है उसके विषय में टाड साहब लिखते हैं कि:-- "युवा उम्मेद सिंहजी के साहस और उनकी विपत्ति ने मीनाओं का मन जीत लिया था - इतना जीत लिया था कि इनके आते ही पांच हजार धनुर्धारी - तीर कमान लिये हुए इनके लिये इनके शत्रु से लडने को तैयार होगये !- इस सहायता से इस जंगली सेना से इन्होंने बीचडी के मैदान में अपने शत्रु का सामना किया। मीनोंने धावा मारकर शत्रुकी सेना का विध्वंस करडाला और उन्हों ने तलवार हाथ में लेकर बडी निर्दयता के साथ शत्रु को काट डाला। केवल इतना ही क्यों उनका नकारा निशान छीन लिया यद्यपि टाड साहब ने इस लडाई का वर्णन बहुत ही संक्षेप से है परंतु बूँदी के ।" A किया है, दवलाने के . इसका अच्छी तरह परिणाम भी नहीं दिखलाया है और साथ ही संग्राम का हाल लिखकर उन्होंने अपनी कथा का सिलसिला आगे बढा दिया इतिहास में इस युद्ध का विशद रूप पर वर्णन है। इसके अन्त में एक बार बूँदी फिर उम्मेद सिंहजी के हाथ आजाने का उल्लेख है और तब दवलाना के संग्राम का दिग्दर्शन किया गया है। मेरे अनुमान से भी बूँदी का इतिहास इस विषय में विशेष आदरणीय है क्योंकि वीचडी में उम्मेद सिंहजी का विजय होते ही जयपुर से इतनी शीघ्र सकती है कि जिस में इन्हें बूँदी लेनेका अवसर न मिले। सेना नहीं आ कुछ भी हो चलकर अपने इनकी सेवा के लिये इनके लिये, हुए। इनके काले, पीले, सफेद बूँदी के इतिहास में लिखा है कि जब उम्मेद सिंहजी भिनाय से शूर सामंतों सहित हींडोली पहुँचे बारह गावों के मीने झुंड के झुंड तीर से, कमान से, कटारी से, वरछीसे, सजकर समर भूमि में कट मरने के लिये आ खड़े साफों पर धोकडे के पेड की टेनियों की कलंगियां अजब बहार दे रहीं थीं । सांगा के आये, सिलह के आये, गूगा के आये, दामा के आये, देश के.<noinclude></noinclude> o68x61nn33oxlkv2xusncgj14ycrshl पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९२ 250 194946 665556 2026-07-06T16:43:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665556 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी में उम्मेद सिंह जी । (१९) आये, जग्गू के आये और इसी तरह सब कुलों के मीनों का समाज जुटकर रणोत्सव की उमंग में अपने जुटा होंडोली की जाने इन्हें सदाके, अपने होनहार स्वामी के पास आ अपना चिरस्वामी समछ कर सोलह हजार रुपया भेट किया। इस तरह सज धज कर उम्मेद सिंहजी ने बूँदी की ओर कूच किया। धीर भटों को संग्रामका साहस दिलाने के लिये C सींबू " गाया जाने लगा। मारू रागने सैनिकों और सवही लड़ाई के लिये मतवाले बनकर शूर मीने पहुंचे चबाने लगे । की नसें फडका दीं। अपने ही मुहसे अपने इस खबर को पाकर बूँदी से नंदराम खत्री पांच हजार सेना लिये हुए इनसे खडने के लिये निकल कर बीचडीके मैदान में आया। रण भूमि में आते ही दोनों ओर की सेना मिडगई। दोनों ओर से खूब लोह बजने लगा ।. उम्मेद सिंह जी की जितनी ही साहसी और जितनी ही निर्मय और जितनी 'हो प्राणों को तुच्छ समझकर तिनका मानकर लडाई में जल जाने वाली सेना थी बूँदीकी सेना उतनी ही अस्त्र शस्त्रों से सजी हुई थी। अवश्य ही दोनों ओर की संख्या उग भग बराबर होने पर भी बूँदी की सेना के लिये तोपों का बन्दूकों का बहुत कुछ सहारा था, परंतु मीने तीरंदाजों ने बिना बंदूक के, विना तोप के केवल तीरों से बूंदी की तोपें बंद करदों और इस तरह करदी - कि आज कल के युद्धपटु अंगरेजों से भी सुन कर आश्चर्य में पड़े बिना नहीं रहा जा सकता है। बूँदी की सेना के किसी गोलंदाज ने ज्यों हीं तोप चलाने के लिये बसी उठाई कि किसी मीने ऐसा मार दिया कि उसे तोप दागे विना कर अपने प्यारे प्राण यहीं गवाँ देने पड़े मनमें और बत्ती हाथ की हाथ में रह गई सदा के लिये पलायन कर गये। बस इस यारे तरकारी की तरह खचा खच आदमियों के हाथ, पैर, शिर, काट रहीं थीं तब मीनों के तीर बूँदी थालों के शिर, भुज को घडसे अलग करके उनकी आकाश से बातें करा रहे थे। कहीं बरछी चलती थी, कहीं सलवार से तल- ने दूर ही से तान कर एक तीर. भरी भराई तोप को यही छोड तोप दागने की इच्छा मन की- और उसके प्राणपखेरु उडकर तरह जब बूँदी बालों की तल<noinclude></noinclude> f59oh9bjlvleg4dsuaygwakcc4ld795 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९३ 250 194947 665557 2026-07-06T16:43:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665557 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ६० ) उम्मेदसिंह चरित्र | वार की टफ होतीथीं। कहीं द्वंद्व युद्ध में कटारियां शत्रुका पेट फाड २ कर आँत निकाल रही थीं और कहीं घूंसों हीं की मारसे जंगली मीने बूँदी की सेनाका चकना चूर कर रहे थे। कोई पडा २ कराहता था, कोई रोता था, कोई कटकर गिर जाता था और कोई गिरते २ फिर खड़ा होकर दो चार के शिर काट लेता था । बीचडी का मैदान नर रक्त से इस तरह भीग गया जैसे भादों के मेह से धरती तृप्त होती है। जगह २ खून भर गया। कहीं वीरों के हाथ, कहीं पैर, कहीं शिर और कहीं घड पडे २ तड़पने लगे और इस तरह सचमुच युद्ध का घमासान मच गया। बडा ही दारुण सं- आम हुआ। इस समय बहादुर मीनोंने लडकर महाराव राजा उम्मेद सिंहजी के लिये वही काम किया जो रीछ वानरों ने भगवान् रामचन्द्र जी की सेवा में किया था। परंतु जिस तरह भगवान दशरथ नंदन के पराक्रम बिना दुर्दमनीय राक्षस राज नहीं जीता जा सकता था, जिस तरह उस समर में बानरों की सहायता केवल निमित्त थी उसी तरह उम्मेद सिंहजी के और इन शूर सामंतों के पराक्रम बिना इस बार बूँदी में फिर इनका अधिकार होना असंभव था । यह युद्ध के नेता थे, यह तलवार चलाने में थे ये शत्रु सेना को मार काट कर संहार करने में थे । इन्होंके हुंकार पर इन्हीं का "मारो काटो । " शब्द सुनकर, इन्ही की संग्राम भूमिमें गर्जना सुनकर मीने प्राण पन से लड़ते थे। परिणाम यह हुआ कि बूँदी का सेनापति नंदराम खत्री कायरता दिखा कर युद्ध छोड भागा। उसके पीठ दिखाते ही सनाने भागना आरंभ कर दिया। बस इसतरह मैदान उम्मेद सिंहजी के हाथ आया । केवल मैदान ही क्यों इन्होंने अपने शूर सामंतों सहित बेरोक टोक बूँदी खेत्री कायरता "दिखा कर युद्ध छोड भागा। उसके पीठ दिखाते ही सेनाने भागना आरंभ कर दिया। बस इसतरह मैदान उम्मेद सिंहजी के हाथ आया । केवल मैदान ही क्यों इन्होंने अपने शूर सामंतों सहित बेरोक टोक बैदी<noinclude></noinclude> 8ensbqeutqu4rtb55ty4yx5n0k37hsm पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९४ 250 194948 665558 2026-07-06T16:43:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665558 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी में उम्मेद सिंह | (६१) को पत् १९०१ में गद्दी बिराजे। इस तरह दुर्जनशल्प जी की सहा- या बूँदी पाकर उसे छोड देते समय अपने भुज बलसे, अपनी तलवार के जोर से बूँदी देनेका जो प्रण किया था उसका इष्ट देवकी कृपा से इन्होंने निर्वाह किया। वअश्यही इन्होंने इस बार अपनी तलवार के जोर से बूँदी डेली परंतु इनके कुछ शत्रु ईश्वरी सिंहजी इनका उत्कर्ष थोडा ही सह सकते थे। वह अपने पिताकी तरह बूँदी और कोटे को अपने जागीरदार बनाने की जब सनकः में थे तब वह महाराव राजा उम्मेद सिंहजी के बूँदी छेछेने पर कैसे चुप रह सकते थे उन्होंने अपने पाद सेवी दलेल सिंहजी को उकसाया । उन्होंने कहा कि- " जाओ हमारी सेना से बूँदी लेकर उम्मेद सिंह जी को निकाल दो।" परंतु कायर दलेल सिंहजी का केसरी उम्मेद. सिंहजी के सामने पढ़ने का हौसिला न हुआ कुछद्रोहके निमित्त' मकर और कुछनाश का कारण बन कर उनका हृदय दग्ध हो- गया था। वह पहले ही जयपुर नरेश के आगे कठ पुतली थे फिर एक बार के युद्ध में उन्होंने आंखों से उम्मेद सिंह जी का पराक्रम देखा, दुस- री बारके संग्राम में इनकी वीर कथा सुनी वस इसीलिये दलेलसिंह जी हिम्मत हार गये । उन्होंने समझ लिया कि राज्य का आनंद जब जयपुर नरेश लूटते हैं तब में पराक्रमी उम्मेदसिंह जी के सामने पडकर क्यों अपने प्राण खोऊं । बस इसी समझ से उनकी वीरता, उनका रहा सहा साहस पलायन करगया । यह केवल दूसरों के हाथ की गुडिया बने हुए राजा बनने के लोभ में पडकर पहले इधर उधर से बटोर कर यदि कभी लडने का साहस मी करते थे तो अब उम्मेदसिंह जी के डर ने उन्हें बिलकुल बलहीन करदिया । उन्होंने महाराज ईश्वरी सिंहजी से स्पष्ट कह दिया:- "महाराज, मुझे बूँदी नहीं चाहिये में ऐसा राज्य करके भयमें पड़नेते राज्य हीन ही अच्छा हूँ। आप स्वयं बूँदी में अपना राज्य स्थापित कीजिये । मैं बूँदी का दावा छोड़ता हूं । " ईश्वरी सिंहजी इस बात से प्रसन्न हुए वा नहीं सो में नहीं कह सकता परंतु<noinclude></noinclude> d6rje17u6p7z78umv5rehwkr6p8si5s पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९५ 250 194949 665559 2026-07-06T16:44:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665559 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(६२) उम्मेदसिंह चरित्र | उन्होंने दलेल सिंह जी से फारिगखती लिखवा ली। उन्हें केवल नैनवा और करवर जागीर में देकर फिर बूँदी लेने के लिये सेना सजाई । इस बार की चढाई वास्तव में विकट थी। इस बार मानों वालक सूर्य को घेरने के लिये बादलों के दल दल टूट पड़े थे। इस बार मानों वन शार्दूल का विजय करने के लिये हजारों हाथी झुंड बांध कर उसपर चढ दौडे थे । ईश्वरी सिंहजी ने उम्मेदसिंहजी से लड़ने के लिये पचास हजार सेना भेजी और उनका सरदार राजाम और शिवदास खत्री का भाई नारायण दास बनाया। केवल इतना ही क्यों जयपुर राज्य में जितने वीर उमराव थे, जिसने लडाकू सर- दार थे और जितने रण पंडित थे वे सब इनके साथ दे दिये। अवश्य ही ईश्वरी वह लड़ाई के मैदान में सिंह जी ने जब इतनी भारी तैयारी की है तब अपने कलेजे के फफोले फोडेंगे परंतु क्यों साहब आपको चिरंटियों पर पत्थर मारना क्यों सूझा है ? जाने रहो जगह आप गीदड समझ कर मारने को तैयार हुए हो वहां पंचानन केसरी है । यदि आप में शक्ति है तो दिल्ली की मुसलमानों से हिन्दुस्थान छुड़ा कर हिन्दुआनी डंका बादशाहत को । फिरसे बजाओ । अपने भाइयोंके और अपनी जातिके वीर राजपूतों के रक्त से पृथ्वी माता का तर्पण मत करो। इससे आप अपने ही हाथ, अपना ही शिर काट रहे हो। इस तरह जाति द्रोह करके, आपस में काट मार करके राजपूत जातिका हिन्दुओं का सर्व नाश मत करो।" इस तरह कडी २ सुनादेने वाला उस समय ईश्वरी सिंह जी को और उनके पिता जयसिंह जी को कोई न मिला । यदि उस समय वीर मधने और मुसलमानों की सेवा लोलुपताने न घेर लिया दिन हिन्दू जाति निर्जीव न दिखाई देती परंतु दवान् होता है । क्षत्रियों को ईर्षा ने, होता तो आज होनहार वडा<noinclude></noinclude> hab2kq4cesfg0gno9uoikrsknzku9qh पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९६ 250 194950 665560 2026-07-06T16:44:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665560 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>आज महाराव राजा केवल १६ दिन हुए हैं। इत्यादि को बुढा चुके बूँदी छूट गई। अध्याय ५. लोमहर्षण संग्राम | --- बूँदी छूटगई । (६१) उम्मेद सिंहजी को बूँदीके सिंहासन पर विराजे आप इसी अवसर में कोटे से अपने भाई वहन हैं। आपकी रानी भी आपके समीप ही है। उन्नति की, राज्य के सुधार की कि राज्य प्रबंध सुधर कर प्रजा परंतु भगवान को अभी प्रजा का कि उम्मेद सिंह जी शांति से अब आप राज्य रक्षा की, राज्य की चिन्ता करना चाहते हैं। आप चाहते हैं · का कल्याण हो, प्रजा सुख से रहने उगे सुल इष्ट नहीं है, अभी वह नहीं चाहते अपनी राजधानी में बैठकर अपना कर्तव्य पालन कर सकें। अभी वह फिर भी उम्मेद सिंह जी का पराक्रम देखना चाहते हैं। अदृष्ट वादियों के मतसे इसीलिये जयपुर नरेश ईश्वरी सिंह जी ने इस बार बड़े जोर शोर से, धूमधडाके से हूँदी पर चढाई की है। जयपुर के पचरंगी निशान के साथ पचास हजार आधी छाल सेना में वहां के छटे हुए शूर सामन्त- हैं, रण में कभी पीठ न दिखाने वाले बडी वीर हैं, बढे २ मतवाले हाथी हैं, बडी २ तोपें हैं और एक छोम हर्षण संग्राम के लिये जिन २ साम ग्रियों की आवश्यता होती है ये प्रायः सबही हैं। राहु जिस तरह समय पाकर सूर्य चन्द्रमा को ग्रस लेता है उसी तरह उम्मेद सिंह जी को प्रस लेने के लिये जयपुर को इतनी बड़ी तैयारी करनी पडी है। शिकार के लिये चारों ओर से घेर कर वीर सैनिक जिस तरह शार्दूल को गिरि- गुहा में से निकालते हैं उसी तरह जयपुर उम्मेद सिंह जी को घेरना चाहता है। महाराज ईश्वरी सिंह जी अच्छी तरह जानते हैं कि चाहे उम्मेद सिंह जी को बूँदी का राज्य करते अमी इने गिने दिन ही हुए हैं परंतु पराक्रम की और उनकी शूरता की जब लड़कपन ही में धाक पडती है तबही •<noinclude></noinclude> ssksv6o5i5dglh4rfv7qj39xepy31qk पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९७ 250 194951 665561 2026-07-06T16:44:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665561 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ६४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | उन्होंने इतनी बडी सेना जो दिल्ली पर चढाई करने में अपेक्षित थी बूँदी लेने के लिये भेजी क्योंकि यह अच्छी तरह जानते थे कि युद्ध के समय एक २ हाडा में कमसे कम एक २ हाथी के समान वल होजाता है। वह जानते थे कि उम्मेद सिंहजी के आश्रित बूँदीको लेलेना दाल भात का खाना नहीं हैं। उन्हें निश्चय था कि बीर हाडे यदि मारे भी जायंगे तो दश बीस को मारे बिना एक २ हाडा न मरेगा। बस इसी लिये उन्होंने इतनी सेना भेजी । संसार सुख का रस छूटते २ काली घटा ने आकाश के भाद्रपद शुक्ला ७ की रात्रिमें पति पत्नी जिस समय शयन कर रहेथे, जिस समय चन्द्रमा को छिपाकर चारों ओर घोर अंधकार कर रक्खा था, जिस समय आकाश में बादल गरज २ कर पानी की बडी २ बूँदें गिरा रहे थे अचानक दासियोंने, नाजरों ने दौड़ते २ आकर रानी को जगाया । रानी ने उनसे विकट बैरी की चढाई का हाल सुनकर पतिको जगाया और जगाते जगाते कहा मानो गिरि गुहामें सोते हुए सिंह को जगाते २ सिंहनी ने कहा:- " प्राणनाथ ! अब सोते क्यों हैं ? अपने गंड स्थल में गजमुक्ता को धारण करने वाले मतवाले हाथियों का झुंड खाने के लिये बन केसरी ने और मांस शार्दूल लंघन पर लंघन कर रहा है वे ही आरहा है। जिनका मांस नहीं खाया है, जिनके लिये मतवाले मातंग आरहे हैं । आज ही आपकी वीरताकी परीक्षा का समय अनायास प्राप्त हुआ है । नन्हे २ हिरनों के अपराधपर सिंह आंख उघाड कर भी उसी की क्षुधा निवारण करने के लिये गजराजों का जागो नाथ ! जागो जरा आँख उठा कर देखो तो सही हम आज आपकी बहादुरी देखना चाहती हैं। " नहीं देखता है, झुंड आता है । सोते क्यों हो ! . यह सुनकर प्राण नाथ अंगडाई लेते २ जागे । जागे तो सही परंतु जालस्य से उठकर बैठे नहीं। उन्होंने लेटे २ ही कहा:- "चिन्ता क्या है ? दिन तो निकल ने दो प्यारी हाथ " वस तुरन्त ही मुर्गे की बांग सुनकर आप 1 ! फिर देखना मेरे उठे । उठते ही 1<noinclude></noinclude> mhhi21jt70xh4k5ast9ext9pgwmkxym पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९८ 250 194952 665562 2026-07-06T16:44:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665562 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' दी गई। गेना की तैयारी होने लगी। शत्रु की अाई सुनगइन (६५) ही अपने मित्रों और अपने सहायकों के नाम पर गेन दिये थे। चारों ओर नरभीर हाडागण बूंदी में इक होने की नगर के बाहर मैदान में सेना के एक होने के लिये झंडा गाड़ दिया गया। गाई के साथ अपनी गांगनी की ओर प्रिय पत्नी की फोट गंज दिया। आप आप पर सवार हुए। अपने मामा घोड़ों में से पृथ्वीगलजी नाथाका को गूगदान, नगरसिंहजी राठोड की गटराज, मपानीसिंदगी को दिखवार, प्रयागसिंहजी को लग राज महासिंहोस सरदार को शोफ गुल्फगर्थिहोस गर्गादसिंहजी को जयनाथ दिया। बूंदी के सब ही सरदार दो २ तलवारें, दो २ भाग २ तरकरा बांध कर शत्रुओं पर चढ़ने के लिये सिंहनाद करने। इस समय संभाग के लिये गराया बन कर ये लोग सिर ऊंचा पिसे हुए मे लडाई के जोश में आफर इनकी म पी थीं उगंग के गारं गन रहा था। चोपदारों की पुकार से, बंदीजन के गान से, "शी" राग के बजने से घड़ी २ प २ वीरोंका उत्साह बढने लगा | गा राग ने बजर छाके सैनिकों को रणोत्साह में ऐसा गढ़वाला दिया कि बस गाने काटने, उड़ने, लड़ाने के सियाय संसार की राम नामों को भूल गये। बरा उन्हें यदि कुछ याद रहा तो इराना ही कि ईश्वर का नाम, प्राण की बाजी लगाकर विजय पाने की आकांक्षा भीर बुडाओं की प्राचीन वीर कीर्त्ति इनकी सहायता के लिये पारसोली के राव पृथ्वीसिंहजी आये । नरना के अगरसिंहजी राठोड जाये। इनमें से पछे उदयपुर का आश्रय और दूसरे फोट फी सेवा छोडकर चले आये जोधपुर से गजसिंहजी के गर्भवती थी तथापि रण में गुम अमरसिंह जी राठोड आये। इनकी पत्नी अपने हाथ दिखाने के लिये यह चले आये। समवायश मानसिंहगी उदय पुर से जाग । १०० सेना सहित गर्योदसिंदगी जाये। बस इस रा जयपुर की पचास हजार सेना १६ दिन के शासन बाद १२०० श्री सेना जयपुरी सेना के जागे जरासी ५ का सामना करने के लिये बूँदी में रोना तैयार हुईं। अपराही वृद्धी थी, और घंट से गटरका सामना<noinclude></noinclude> r0etz00etbepkv699uqp0298ghj3ho4 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/९९ 250 194953 665563 2026-07-06T16:44:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665563 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(41) उम्मेदसिंह चरित्र | था परंतु वह मटर नहीं किन्तु घडा फोड देने के लिये गोली थी। आगे चलकर पाठकों को मालूम होजायगा कि उसने जयपुरी पचास हजार बीसें के छक्के छुड़ाने में गोली नहीं ! वन का काम दिया । टाड साहब ने लिखा है कि- "जयपुर वालों ने बीचडी के मैदान में अपनी सेना का पराजय सुनकर खत्री नारायण दास के अधिकार में उम्मेद सिंहजी का दमन करने के लिये अठारह हजार सेना भेजी परंतु वीचडी के संग्राम में बहादुर उम्मेदसिंहजी का पराक्रम इन दिनों हाडा वीरों ने सुन लिया था इसलिये उनके झुंड के झुंड इस युवा राजा के झंडे के लिये इस निक्षय से आ उपस्थित हुए कि चाहे प्राण ही जांय तो कुछ पर्वाह नहीं परंतु स्पकुछ रक्षा के लिये लडेंगे। जिस समय शत्रु सेना दबलाने पहुंच गई और जब युद्ध मंचने का सुप्रभात होने में केवल चार ही पहर की देरी रह गई युवा उम्मेदसिंहजी ने सितूर जाकर भगवती महिषासुर मर्दिनी रक्तदंता के आगे साष्टांग प्रणाम करते २ प्रार्थना की:- भगवती, शत्रु का विजय करने की शक्ति दे। मैं आज तेरे चरणों में शपथ खाता हूँ कि या तो वैरियों का विजय करूंगा अथवा मरही जाऊंगा ।" "बस इसी प्रार्थना से ऐसे ही उत्साह भरे शब्दों से और ऐसी ही प्रतिज्ञा से उत्साहित होकर बहादुर हाडे जहांगीर सम्राट् से राव रत्नजी को जो पीला झंडा मिला था उसके नीचे आ जुटे । इन्होंने ज्योंही दबलाने की वाटी पार की शत्रु सेना मैदान में इनका सामना इन हाडाओं के अनेक समुदायों में एक गोल के करने को तैयार थी। मुखिया स्वयं उम्मेद सिंहजी थे । यह स्वयं धात्रा करने में सब से आगे बरछा लिये हुए तैयार थे। इनकी शारीरिक शक्ति का, इनकी नेक नियती का असर बडा भारी था और इसी लिये इन्हों ने शत्रु सेना के दल के दल काटकर मैदान कर)- डाला । यह गोल बांधकर हमला करते थे और तोपों की मार से छिन्न भिन्न होने पर भी इनकी तलवारें खचाखच चलने लगतीं थीं किन्तु प्रत्येक आक्र- मण में इनके वीर से वीर सामंत मारे जाकर वीर गति को प्राप्त इनके मामा पृथ्वीसिंहजी सोखी काम आये । इनके वीर सामंत होते थे । महाराजा<noinclude></noinclude> e5r12vtsj9divqy0xqqtzcosjclas4u पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०० 250 194954 665564 2026-07-06T16:44:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665564 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी छूटगई । (६७) मर्वाद सिंहजी हाडा काम आये और उस समय काम आये जब वह अपना चक्र आमेर के सेनापति नारायण दासजी का सिर काटने को चला रहे थे। तोरण के प्रयाग सिंहजी मारे गये और सब से बढ़कर उम्मेद सिंहजी के प्यारे घोडे के गोडा लगा। ऐसी दशा में युद्ध करके इनके साथियों की, इनके भाईबंधों की पूरी सहायता मिलने पर भी अपनी लिये इनके उमरावों ने इनसे प्रार्थना की- आप हानि करना था इस "महाराज, यदि आपके प्राण बचेंगे तो किसी दिन बूँदी अवश्य हमारी है। आपही मारे जायेंगे तो हमारी सब आशा मरजायंगी ।" टाड साहब के जो वाक्य ऊपर उद्धृत किये गये हैं उन से बूँदी के इतिहास का इतना ही अंतर मालूम होता है कि ढाड साहब ने जयपुर सेना की संख्या जब अठारह हजार मानी है तब बूँदी के इतिहास लेखक पचास हजार मानते हैं। यदि टाड साहब की लिखी हुई संख्या ही ठीक मानली जाय तब भी सेर की मनसे तुलना है। कहां जयपुरकी अठारह हजार सेना और कहां बूँदीको बारह सो। एक बात का और भी अंतर है। ढाड साहब यह संग्राम दबलाने के मैदान में होना मानते हैं और बूँदीवाले अमरपुरा के पास । खैर ! जो कुछ हो परंतु बूँदी के इतिहास में इस संग्राम का दिग्दर्शन इसतरह किया गया है कि जिस समय खत्री नारायणदास ने बूँदी नरेश को देखा एकाएक कछवाही सेना को आशा दी कि बस इन्हें घेरलो । आज्ञा पाते हो बीर कछवाहों ने इनपर हमला किया। दोनो ओरके योद्धा इस तरह आपस में मिलगये जैसे दूध में मिश्री मिलजाती है। सहयारों से तलवारें खटाखट बजने लगीं। छाशों पर लाशें गिरने लगीं। बीरों के शिर कट २ कर कबूतरों की तरह कला बाजी कर २ के धरती पर गिरने लगे। वीर सैनिकों की दोनों हाथों से तलवारें चढ़ने लगीं। अमरपुर का मैदान "दों से भरगया । रक्त की नदी बहने लगीं। दोनों ओर की सेनायें इसके दोनों किनारे बनगईं। सूर्यमलजी के लेख का यह केवल संकेत है। उन्होंने वीरता का वर्णन करते हुए बडे ही ओजवर्द्धक पथ का आश्रय दिया है। वह पौराणिक ढंग का पय है। आज कुछ के लोगों को गद्यमें ऐसी<noinclude></noinclude> rz75c6qj1ue7wm40b82cpaiasr0zeg9 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०१ 250 194955 665565 2026-07-06T16:45:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665565 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(६८) उम्मेदसिंह चरित्र | अपने ही वाणों से पर भी न डिगे। मुंडों को गेंद की अनेकों के शिर रचना कम पसंद है फिर मैं इस विषय को बढाना भी नहीं चाहता। मतलब यही है कि बूँदी की सेना थोडी होने पर भी जयपुर सेना से जान झोंकक- ₹ लडी । जबतक प्रत्येक सैनिक के शरीर में प्राण रहा तबतक लड़ती रही । यदि बूँदी का एक सैनिक मरा तो सामने के दश पांच को मारकर मरा । महाराव राजा उम्मेदसिंहजी अनेक आघातों से घायल होजाने पर भी शत्रु सेना में से न डिगे। उनके प्यारे घोड़े के गोला लगने जिस तरह उन्होंने इस संग्राम में अपने ही हाथ से नर तरह उडादिया, जिस तरह उन्होंने भुज काट डाले, उसे इतिहास के पृष्ठ इस लड़ाई में अपना असाधारण पर भी वहां से न डिगते परंतु उनके साथियों ने भविष्य की आशा के लिये उन्हें वहां न ठहरने दिया । उन्होंने इन को शपथ दिलादिया और इस तरह जयपुर की हजारों सेना को चीरते हुए उम्मेद सिंहजी होनहार के. भरोसे पर ईश्वर के भरोसे पर अपने को डालकर चलेगये । चले अवश्य गये नरेश का अधिकार भी होगया परंतु टाड साहब इस घटना का वर्णन करते हुए अंतमें लिखते हैं उसी वाक्य के बाद लिखते हैं जो ऊपर उद्धृत किया गया है। उनका कथन है कि:- और बूँदी पर जयपुर देखने से मालूम होता है कि उन्होंने पौरुष दिखलाया। वह प्राण देदेने "उम्मेद सिंहजीने अपने साथियों का परामर्श बडे दुःख के साथ स्वीकार किया । इसतरह उडते २ ज्यों ही ये लोग घाटी के पास पहुंचे इन्होंने इन्द्रगढ का रास्ता लिया। अपने प्यारे घोडे को दम लिवाने के लिये ज्योंही यह उस पर से उतरे उसका दम निकल गया । उम्मेदसिंहजी उसके पास बैठकर बहुत रोये । हंजा घोडा उनकी इतनी ही प्रीति के योग्य था। यह इराक घोडा था । बादशाह से महाराव राजा बुधसिंहजी ने इसे पाया था, अनेक बढे २ संग्रामों में यह उनके साथ था। साथ क्या था वीर राजपूत का घोडा जैसा सच्चा साथी होता है वैसा ही सक्षा साथी था। यह युवा हाडा का बनावटी खयाल न था क्योंकि उन्होंने राज्य पाते ही पहला काम यही किया था कि दवाना के मैदान में साथ देनेवाले का यादगार बनवाया।<noinclude></noinclude> slgwwyh0tsbywdvr5cc50gyx5x7samf पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०२ 250 194956 665566 2026-07-06T16:45:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665566 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी छूटगई। (६९) यह यादगार करते हैं। में यदि हाडाओं में रहता इसे फूलों का हार पहनाता ।" बूँदी के चौक में है। प्रत्येक हाडा इसकी बडी प्रतिष्ठा होता तो प्रत्येक सैनिक उत्सव पर इसके बाद ढाड साहब ने बूँदी के मालूम हो जायगा कि उम्मेद सिंहजी ने गोड़ा लगने से टांग टूटजाने पर तीन चार कोश चलकर जब भर चने भी न होने पर यह झडबेरी के बेर खाकर इन्द्रगढ पहुंचे और पैदल चलकर पहुंचे। वहां के जागीरदार ( देवसिंहजी ) नाम के हाडा थे किन्तु हाडा होकर कछवाहों की नौकरी करते थे। इन्होंने उनसे अपने चढने के लिये घोडा मांगा परंतु कुछ शत्रु देवसिंहजीने घोडा देना तो दूर रहा इनसे स्पष्ट कह दिया कि- "बूँदी खोकर क्या अब इन्द्रगढ का नाश करने आये हो ?" वीर क्षत्रिय तलवार का घाद सह सकते हैं किन्तु प्रतिपक्षी का बोड नहीं सह सकते परंतु धीर उम्मेद सिंहजीने इस वचन याण को सहलिया । इसके घाव को मन का मनमें छिपाकर मन ही मन यह कहते हुए चलेगये कि "अच्छा कुल शत्रु किसी दिन तुझसे इस बात का बदला खेलेंगे। अच्छा तैनें अभी जहर खाया है तो कभी इसकी हर भी सहेगा ।" उन्होंने फिर इन्द्रगढ की सीमा में पानी भी न दिया। उन्होंने फिर किसी जंग में अपने साथियों की तलवारों से काम लेने का वचन देकर उनका संतोष करने के बाद उन्हें अपने २. गांव भेजकर आप रामपुर होते हुए मधुकर गढ चले गये। यह इस तरह चलेगये और युद्ध भी थोडे काल के लिये समाप्त होगया परंतु उम्मेद सिंहजी के विक्रम का परिचय देने के लिये कंषि राजा सूर्य मलजी के हुए "वंश भास्कर" में से कुछ पय उद्धृत किये बिना में इस अध्याय को समाप्त करना नहीं चाहता हूँ । इतिहास में जो कुछ लिखा है उसीसे प्यारे घोडे को खोकर क्या किया ! भी हंजा अपने स्वामी को पीठ पर चढाये मरगया तब पास खाने के लिये मुडी उन्होंने लिखा है कि:- लिखे ० वह मूर्ति हैजाकी नहीं है। तीर्थया घोडे की है जो तीर्थ यात्रा में इनके साथ था। उस घोड़े का चबूतरा उसी जगह बनाई, जहां वह मराथा ।<noinclude></noinclude> 6l7euwcwvr9liafb903mld165snskme पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०३ 250 194957 665567 2026-07-06T16:45:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665567 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ७० ) उम्मेदसिंह चरित्र | " रच्यो नृप यों रण पावसरूप, धपायत शत्रुनतें निज धूप, लयो ढिंग जाय नरायनदास, प्रहारन मार रची चहुं पास (१) मरे भट भूपति के शत तीन ३००, भये शत पंचक ५०० घायल खीन, भज्यो गज खत्रियैको उखिभार, भयो- तत्र कुँदि हैं असवार (२) इसे बिच कूरेंम विक्रम आय, दई तरबार घने करि दांय, भयो तिहि हंजक है पदमिन्न, तऊ झपटाय हने अरि तिन (३) भिन्यो यह विक्रम आनि बहोरि, लयो नृप कुरैमको सिर तोरि, यह लखि कूरम "भैरव आनि, जुरवो नृप तें दुलमारस जानि (४) महीपति उप्पर खगै मुमोर्चे, खग्यो कछु पंखुलि पे कटि हंज इच्छट चोट, कढयो कछु पैन रुक्यो नेप नृप की तपकी तरवारि, लयो मिल्यो महतीय, दये शर चारि लगे हय के व दाहिन अर्कै, रुक्यो नहि भारत फारत फोज (७) तहां पुरें पीलपती कोर्चे, करी पुनि घोट, (५) चली वह भैरव भारत मारि, इते बिच कुम्भ चटत चाप (६) लगे नृपके दुवै दारित दंश, रंच तक नृप ओज, चल्यो आर चहुवान, मिरे दुवै थान तथा सुरतान, नरूर ज्यों हरनाथ तृतीया इन्हें नृपं रुकिये गाढ गरीवें, उभै हुवा झारिय खर्गे, करे तिनके शिर भूप अलग्ग तथा सहि नवि की तरकारि, लयो हरनाये को हय मारि ९ घनी इम जैपुर वीरन नारि, करी नृप जोगिनि कंपनें झारि" १ उम्मेदसिंहजी १ तलवार ३ नारायण दास सभी ४ कूदकर ५ और ६ म ( घोटा) ७ विक्रम सिंह कछवाहा ( जयपुर के सरदार ) ८ पेच ( दाय) ९ हंजा थोडा १० भैरव सिंह कछवाहा ( जयपुर के सरदार ) ११ ख १२ मारा | १३ घुसा | १४ कवच १५ घोड़े के कंधे पर १६ उम्मेदसिंहजी का घोडा. १७ मारते को मार दिया १८ कूर्म कछवाहा १९ महतायसिंह कछवाहा | जयपु रके सरदार। २० पटाते हुए। २१ दो। २२ काच फोडकर २३ दाहिने कन्धे पर २४ जयपुर के सरदार । २५ थान सिंह । २६ नरुके सरदार जयपुर के । २७ रोका २८ दृढता से । २९ रुके सरदार ३० जयपुर के सरदार हरनाथ सिंह । ३१ योगिनी ।' विधवा अथवा जोगिनी । १२ शूटियां फोडकर .<noinclude></noinclude> e3iw8u650nn2tp0swnta2df3sgzb333 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०४ 250 194958 665568 2026-07-06T16:45:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665568 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हारने पर भी न हारे । (७१) अध्याय ६. ------ हारने पर भी न हारे। गत अध्याय में ढाड साहब के उल्लेख से और बूँदी के इतिहास से पाठकों को विदित होगया होगा कि जयपुर की कम से कम बीस गुनी सेना का सामना करने में अपना प्यारा घोडा खोकर अपनी सारी सेना कटवाकर अपने बडे २ पराक्रमी सामंतों के नष्ट होने के अनंतर महाराव राजा उम्मेद सिंह जी अवश्य हारे और आगे फिर किसी युद्ध में इसका बदला - लेने के विचार से हारे परन्तु यह उडाई जयपुर के लिये भी बहुत. भारी पड़ी। उसकी सेना नष्टप्राय होगई, उसके वडे २ वीर विक्रम सामंत मारे गये और सच पूछो तो इने गिने हाडाओं के विक्रम से उसकी ऐसी दशा हुई जो कभी भूलने की नहीं है। बस इसी लिये जयपुर नरेश ईश्वरीसिंह जी को उम्मेद सिंह जी पर जो क्रोध हुआ उसे वह न संभाल सके। वह चाहते तो सेना भेज कर इन्हें मधुकरगढ़ में जा सताते परन्तु इस बार उन्होंने एक प्रपंच से इनका दमन करना चाहा क्योंकि यह जानते थे कि उम्मेद सिंह जी इस समय सेना हीन होजाने पर भी शक्ति हीन नहीं हुए हैं और साथ ही इनका बूँदी देने का अभी साहस नहीं टूटा है। यह बुझ जाने पर भी आग की चिनगारी है। जिसतरह आग की एक छोटी सी चिनगारी बडे २ जंगलों को जला डालती उसी तरह यह बूँदी लेने में जयपुर की सेना का विनाश करेंगे इसडिउन्होंने इसबार प्रपंच उंच कर कोटा नरेश दुर्जनशल्य जी को मिलाया। उनसे कहलाया फि "हमें उम्मेद सिंह जी पर दया आती है इस डिये आप उन पर करुणा करके हमारे पैरों पडवादो। हम नित्य दो सो रुपया दिया करेंगे। पढकर उनसे स्वीकार करवादो ।" यदि इन रुपयों को उम्मेदसिंह जी के पास भेजते तो अवश्य ही यह इन्हें लौटा आप बीच में दुर्जनशल्य जी देते और साथ ही दुर्जनशल्य जी पर क्रुद्ध भी होते परन्तु उन्होंने इसीलिये रुपये भेजने<noinclude></noinclude> 6pvn0u7sj5qd6rifei48ywwl7h4an98 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०५ 250 194959 665569 2026-07-06T16:45:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665569 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ७२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | का साहस न करके वह जयपुर से लेकर कई महीने तक अपने खजाने में जमा करते रहे। इस बात से दुर्जन शल्य जी के मन का पतलापन सिद्ध होता है। उन्होंने इस तरह स्वार्थ वश कुछ भी किया परन्तु बूँदी राज वंश के चिर शत्रु मेवाड के रानाजी उम्मेदसिंह जी का यह विक्रम, इनका असीम साहस सुनकर मुग्ध होगये। जब उन्होंने इनके अतुलनीय पराक्रम का संवाद सुना, जब उन्होंने जाना कि संग्राम में गोलों की और तलवारों की गहरी मार पडने पर भी रणभूमि से पीठ न दिखाने वाला इनका प्यारा बोडा मारागया है तब उन्होंने सोने के सामान से सजा हुआ एक बढिया घोडा भेजा, एक बढिया तलवार भेजी और बढिया २ पत्रोंसे संयुक्त एक * शिरोपाव भेजा और कहलाया कि "इसे प्रेम पूर्वक ग्रहण कीजिये । " मैं इस विषय में अधिक नहीं कहना चाहता पाठक स्वयं दुर्जनशल्प जी के वर्ताय की राना जी के वर्ताव से तुलना करके देखले । इनमें दुर्जनशल्य जी एक जुदे राज्य के स्वामी होने पर भी बूँदी के छुट भैया थे और राना जी की बूँदी राज्य के साथ अनेक पीढियों से शत्रुता चली आतीथी । जिस समय महाराव राजा उम्मेदसिंह जी राज्य हीन होकर आगे की चिन्ता में पडे २ रानपुर में अपने दिन बिता रहे थे इनकी कीर्ति, इनका वल विक्रम देश देशांतरों में व्याप्त होरहा था। इनके सद्गुणों से मोहित होकर वीर क्षत्रिय विना मांगे और इच्छा न होने पर भी इन्हें अपनी उडकियां देते थे। ऐसी विपत्ति के समं में घिरा हुआ सिंह जैसे आदरणीय होता है वैसे ही यह भी वीर पुरुषों के सम्मान भाजन थे और इसी कारण इन्हें वरात चढाकर बुलाने के बदले बनेडे के राठोड राजा अपनी कन्या वखत कुमार जी का वनेडे से रानपुर को इस तरह उम्मेद सिंह जी का तीसरा विवाह संवत् शीर्ष शुद्ध ३ को रामपुर में हुआ । ० शिरसे लेकर पैर तक सारे व) + पालकी राम सिंह जी ने डोला भेजा । १९०३ में मार्ग + •<noinclude></noinclude> pbzicnjc0jppmiwuv8rq2d1dkp29voe पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०६ 250 194960 665570 2026-07-06T16:45:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665570 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हारने पर भी न हारे । (७३) तीसरी नववधू पाकर भी उम्मेद सिंह जी विषयासक्त न हुए। इन्होंने अपनी रानी जी को कोटे अपने भाई के पास भेज दिया क्योंकि वह जानते थे भोगविलास में रत हो जाने से अपने कठिन व्रत पालन में और अपनी घोरतपस्या में विघ्न पडेगा । इस प्रकार से जब यह भेज भाज कर निश्चिन्त हुए अकेले हुए तब इन्होंने फिर बूँदी विजय के प्रयास में वडा भारी आयास उठाने का संकल्प किया। इनके संकल्प की जब कोटेके महाराव दुर्जनशल्य जी को खबर हुई तो उन्हों ने केही दो सो रुपये नित्य के लोभसे, जिन्हें यह जयपुर से इनके नाम पर पाते थे, इन्हें रोका। उन्होंने कोयले के प्रति- टिस जागीरदार अजबसिंहजी माधानी को इनके पास भेजकर कहलाया कि- " आप इस प्रकार से राज्य न पासकेंगे । आपको चंबल नदी पार करना भी कठिन होगा। आपने अभी तक ( अच्छी तरह) तलवार का स्वाद नहीं बाखा है आपकी सेना जरासी और जयपुर की शक्ति अपार है सिंहों का अपराध करके यदि खरगोश जीना चाहे तो नहीं जी सक- ता इसलिये हम आपके लिये मरहटों को सहायता पर बुलवाते हैं। " इस पर उम्मेद सिंहजी को चचा * दुर्जनशल्प जीके मीठे वचन का भरो- साहुआ। वास्तव में ये वचन हित से भरे हुए थे, ये महाराव राजा उम्मेदसिंहजी के लिये पथ्य थे इसी लिये उन्होंने कुछ समय के लिये अपने संकल्प को रोक रक्खा परंतु क्या दुर्जन शल्प जी ने इनकी सहा- यता के दिये मरहटों को बुलाने का प्रयत्न किया नहीं और इसीलिये "वंश भास्कर" में दिखा है कि "इनके नाम पर दो सो रुपये नित्य जयपुर- बालों से पाने के डाउच में पडकर इन्होंने रोका । " चाहे यह अनुमान सत्य हो परंतु इसके सिवाय उन्होंने एक वार के अतिरिक्त जिसका वर्णन तीसरे खंड के दूसरे अध्याय में है कभी उम्मेद सिंहजी की सहा- यता न की । जिस सहायताका वर्णन इस खंड के दूसरे अध्याय में किया गया है उसे वहां न बता कर ढाड साहब जयपुरी सेना का अमरपुर के मैदान में * कुटुंब में पीडियों के हिसाब से चाचा<noinclude></noinclude> f3s4wz34wg7fcz0v0xhhwtp6m55tebz पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०७ 250 194961 665571 2026-07-06T16:46:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665571 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(७४) उम्मेद सिंहजी से युद्ध उम्मेदसिंह चरित्र | होकर इनके हार जाने बाद उल्लेख करते हैं। में उन्होंने ऐसा क्यों लिखा है परंतु पूर्वापर विचा मालूम हुआ वही नहीं कह सकता हूँ कि करने से मुझे जो उन्होंने लिखा है कि:-- सिल सिला मैंने ग्रहण किया है। "कोटे के जिन दुर्जनशल्प जी ने ईश्वरीसिंहजी और उनके सहा- यक आप्पा सेंधिया से कोटे की रक्षा में बहुत वीरता दिखाई थी, इसवार सदा की अपेक्षा उम्मेद सिंह जी की सहायता के लिये अधिक कमर कसी कोटा नरेश की सभा के अध्यक्ष और उनके प्रधान सेनापति भाद जो स्वयं युवा हाडा की धीरता पर बहुत उत्तेजित हो चुका था उम्मेद सिंह- जी को उनके पिताका राज्य फिर दिलाने के लिये तलवार लेकर तैयार हुआ। इसके अनुसार कोटे की समस्त सेना इसी भाट के अधिकार में उम्मेदसिंह जी के भाई बंधों और मित्रों के साथ होकर बूँदी लेने को तैयार हुई। निरंतर के अनेक यार के आक्रमण से बूँदी का कोट पहले ही छिन्न भिन्न हो चुका था इस कारण इस बार इन्हें बूँदी लेने में अधिक कठिनता न पडी । तारागढ किले पर मार करने में भाट सरदार पर गोली लगी और यह गोली भी उसकी सेना के किसी दुष्ट के हाथ से उगी। भाट मारा गया परंतु उसपर कपडा डालकर उसकी मृत्यु छिपा दी गई। इन आक्रमण करने वालों ने भारी हमला किया और इसतरह दलेल सिंहजी भागजाने पर सिंह की उम्मेद पूरी होगई । उम्मेद सिंह जी अपने पूर्वजों की गदी पर जा विराजे । दुखेछ सिंहजी ने आमेर जाकर अपने मालिक की शरण ली। जयपुर नरेश ने सनी केश- वदास के अधिकार में बूँदी पर तुरंत ही सेना भेजी और जिस समय उम्मेद सिंह जी अपने राज्य की रक्षा के लिये संमलने भी नहीं पाये थे बूँदी पर फिर ढूंढार का झंडा आ उडा। इस बार खज्जित होकर दलेल सिंहजी ने राज्य देने में कलंक का टीका अपने शिर पर न लगवाया । अत्र उम्मेद सिंह जी फिर कभी मेवाड में और कभी मारवाड में भटकने लगे किन्तु उन्हों ने अपना राज्य पाने के लिये युद्ध करने का संकल्प न त्यागा । "<noinclude></noinclude> 709aoads2sagfhmsu63cr24t7gzuwla पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०८ 250 194962 665572 2026-07-06T16:46:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665572 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदीका उद्धार । (७५) मालूम होता करके इन्हें सवारी का बूँदी के इतिहास में कोटे की भाट के अधिकृत सेना की सहायता ले उम्मेदसिंहजी के बूँदी पाने का उल्लेख नहीं है। खत्री केशवदास के अधिकार में जयपुर की चढाई होकर उम्मेदसिंहजी के हाथ से फिर बूँदी छूटने का वर्णन नहीं है। हां बूँदी के इतिहास से है कि इस घोर संकट के समय भी अमरपुरा युद्धका वर्णन सुनाने वाले एक चारण को इन्होंने बहुत धन दिया अपनी घोडा दिया, मोतीका चौका दिया, हाथों के कड़े दिये, उसके डेरे पर जाकर उसका सम्मान किया और उसे वचन दिया कि जब हम फिर बूँदी के सिंहासन पर बैठेंगे तब तुम्हें हाथी देंगे।" इसके बाद मधुकर गढ़ छोड कर मैसरोडगढ की सीमा पर शिकार खेलते २ फिर बर्गे गये । उन दिनों इस ओर बहुत भारी अकाल पड रहाथा। इन्होंने भी खर्च से तंग आकर अपना दरियाव नामक हाथी अपने पुरोहित दयाराम के साथ बिकने के लिये उदयपुर भेजा। बिना राज्य के वर्षों से यह कष्ट पारहे थे। इनके साथ खर्च भी राजसी था इस कारण इन्हें बहुत तंग आकर " मरता क्या न करता" इस सिद्धान्त के अनुसार गैडोली छुटनी पडी क्योंकि उस समय भारी अकाल था । इन जैसे विपत्ति ग्रस्त को उधार भी मिलना कठिन था। वहां से चल कर रणथम्भोर की सीमा में होकर खंडार में जाबसे । अध्याय ७. बूँदीका उद्धार । जिस समय महाराव राजा उम्मेद सिंहजी इस तरह बूँदी उद्धार की चिन्ता में पड़े हुए दिन काट रहे थे, जिस समय यह सैर शिकार से और शास्त्र चिन्तन से जी बहला कर सदा अपनी इष्ट सिद्धि के लिये भगवदाराधन में लंग रहे थे इनके पुरोहित दयाराम ने जो इनका हाथी बेचने के लिये. "<noinclude></noinclude> 4ynksc0vuyp9c4s4zxdnn9do0zuyory पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१०९ 250 194963 665573 2026-07-06T16:46:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665573 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(७६) उम्मेदसिंह चरित्र | उदयपुर गया हुआ था एक उद्योग किया। उन्हों ने रानाजी को सलाह दी कि आपके भानजे माधव सिंहजी का स्वत्व मारकर ईश्वरी सिंहजी जयपुर के राजा बन बैठे हैं इसलिये उन्हें अपना स्वत्व दिलाने के लिये और महारावराजा उम्मेदसिंह जी को बूँदी दिलाने के लिये जयपुर पर चढाई करना चाहिये । इस बात में शाहपुरे के राजा भी सहमत हुए और होलकर की सहायता से और मरहटा मल्हार राव के पुत्र खंडूजी की मदद से जयपुर पर चढाई की गई। इस युद्ध में उम्मेद सिंहजी भी संयुक्त हुए । राजमहल में लडाई अवश्य ही गहरी हुई पर इस युद्ध में जयपुर वाले हारे नहीं। ईश्वरी सिंहजी विचलित न हुए और इसलिये उम्मेद सिंहजी को लौटकर फिर कोटे के और तरह की सहायता राज्य में मधुकर गढ आजाना पडा । यहाँ प्रसंग आपडने पर लिख देना चाहिये कि कोटे वालों ने चाहे उम्मेद सिंहजी को नदी हो परंतु उन्हों ने अवश्य ही इनके और इन्हें कोटे के राज्य में रहने दिया। उदारता है कुटुम्ब वात्सल्य है, दानाई है। और इसके लिये वह धन्यवाद के योग्य हैं। कुटुम्ब को कोटे में आश्रय दिया यह महाराव दुर्जनशल्य जी की यह उनका प्रशंसनीय कार्य है जयपुर नरेश महाराज ईश्वरीसिंहजी अभी तक जिससे भिडते थे उसीसे जय लाभ करते थे इसलिये अवश्य ही उनके दिन सीधे "थे और साथ ही विजय भी उनके चरणों में लोटती थी परंतु जिस तरह जगत् के जीतनेवाले को भगवान कामदेव ने पुष्पों के बाणों से जीत लिया उसी तरह वीर पुरुषों का शिकार करनेवाले पराक्रमी ईश्वरी सिंहजी एक अवला के नयनों का शिकार बन गये। बात यह हुई कि जिस केशव दास कामदार की बुद्धि से ईश्वरीसिंहजी इतने बडे २ काम करते थे उसी की चुगलियां खा खाकर लोगों ने उनका मन इस से फेर दिया । लोगों ने कहा कि यह माधवसिंहजी को जयपुर और उम्मेद सिंहजी को बूँदी दिलाना चाहता है और इसलिये इस के नाम छिप २ कर चिहियां आतीं जाती हैं । यद्यपि यह बात झूठी निकली परंतु फिर भी ईश्वरी सिंहजी ने उसे अमात्य पद से अलग कर के मरहटों के पास विकालत पर भेज दिया और इस का पद हरगोविन्द नाटानी को दिया। इसे अपना अमाल बनाने में चाहे<noinclude></noinclude> q35e1qmvi6zm713ucctejatgl0jwb83 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११० 250 194964 665574 2026-07-06T16:46:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665574 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी का उद्धार । (७७) आगे के अध्याय से मालूम इसी दिन से उनके पतन का युवती रात्रि में इनके महलों में ईश्वरीसिंहजी का यह मतलब नहो परन्तु उसकी एक युक्ती लडकी पर वह आसक्त होगये । उन्होंने इसे अपने पास बुलाया, अपने पास रक्खा और इस रमणी के रमण में मतवाडे होकर सब काम काज भूल गये । हरगोविन्द ने, उसके पुत्रों ने इसका कैसा बदला लिया और इस कुकर्म से ईश्वरीसिंह जी की राजेश्वरता कैसे नष्ट भ्रष्ट हुई सो होगी परन्तु समझ लेना चाहिये कि यहाँले उनके गिराब का आरंभ हुआ। वह छिपकर आती थी और दिन में अपने घर रहती थी किन्तु इन्हें दिन भर उससे आंखें लड़ाये बिना चैन नहीं पडती थी इसीलिये उन्होंने जयपुर के विशाल राजप्रासाद में एक ऊँचा बुर्ज बनवाया। बस इसके बुर्ज में बैठकर उस युवती से आंखें खड़ाना और रात रखकर उसके साथ रमण करना उनका "बढकर काम था। बाद दिन भर उस भर उसे अपने अंक में राज्य प्रबंध से भी दिल्ली के अस्तप्राय बादशाह से वाईस लाख रुपया दंड देने बाद, जिस समय मरहटों की सेना को लेकर महारराव होलकर जयपुर राज्य के अंतर्गत निवाई नामक गांव में आये उम्मेद सिंहजीने उनसे कहला भेजा कि "बूँदी हमें दिलाओ" इस बात को सुन कर होलकर ने इनको बुलाया । यह सं. १९०५ में चैत्र शुक्ला १२ को गये और उन्होंने इनकी तीन कोश तक पेशवाई ( अगवानी) करके बड़ा सत्कार किया। उन्होंने केवल इतना ही न किया वरन् ईश्वरी सिंहजी से कहलाया और जोर देकर कहलाया कि:-- परन्तु क्या "अब बूँदी उम्मेद सिंहजी के लिये छोडदो । " इनदिनों में चाहे ईश्वरीसिंहजी बहुत ही जोरों पर मरहठों के प्रताप को सह सकते थे, क्या इनके आंतक के आगे उनकी कुछ चल सकती थी जो होकर दिल्ली के बादशाह की नाडी में बोलता था, जिसके आगे बढे २ घबडाते थे उससे ईश्वरीसिंहजी सामना करते कदापि नहीं । हरगिज नहीं बस इसीलिये उन्होंने भगवान की शपथ खाकर कहा कि :--<noinclude></noinclude> bf0mivdapgyboypev30trhc2ilx5w7n पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१११ 250 194965 665575 2026-07-06T16:46:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665575 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ७८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | "में उम्मेद सिंहजी के लिये बूँदी खाली कर दूँगा | आप दक्षिण की ओर कूंच कीजिये । 27 मैं नहीं कह सकता हूं कि होलकर को दक्षिणकी ओर टाल कर ईश्वरीसिंहजी समय ही टालना चाहते थे या नहीं परन्तु ईश्वरी सिंह जी के कथन पर विश्वास करके जब मल्हाररावने दक्षिण जाते समय बूँदी के राज्य में आकर उम्मेदसिंहजी की बूँदी में दुहाई फेरने के लिये अपना कामदार भेजा तत्र बूँदीवाले लडने को तैयार हुए । मल्हारराव यदि चाहते तो यहां की सेना को कुचल कर उसी समय उम्मेद सिंहजी का डंका पिटवा देते परंतु "चोर को मारने के बदले उन्होंने चोर की माको मारना उचित समझा । " उन्होंने इसलिये जयपुर पर चढाई की। इस चढाई में महाराव राजा उम्मेद सिंह जी अपने शूर सामंतों सहित साथ थे और शाहपुरा नरेश साथ थे। इनका डेरा जयपुर के निकट बगल में हुआ और जब ईश्वरी सिंहजी न समझे तब गहरी लडाई ठन- गई । युद्ध के लिये अभी सारी सेना नहीं गई । अभी गये होलकर सेना के नायक गंगाधर भट्ट आठ हजार सेना लेकर सेना की चढाई सुनकर जयपुर की सेगा लड़ाई के मैदान में आई और एक ही धावे में गंगाधर राव के बार ईश्वरी सिंह जी के मन पैर उखड़ गये। इस के भाग जाने पर भी इस में गहरा दगदगा था। इस बार वह समझे थे कि लडाई में इतने बलवांन शत्रु से पार पाना कठिन है इसलिये उन्होंने अपनी सहायता के लिये भरतपुर से सूर्य मलजी जाट को बुलाया। उनसे कहलाया कि:---- "यदि आप न आयेंगे तो हम शत्रु से हार जायं गे ।" परंतु सूर्य मलजी आये और दोनों ओरके बहादुरों ने वडीही बहादुरी दिखाई इस युद्ध का वर्णन बडा ही ओज बर्द्धक है। बूँदी के इतिहास में खूब विस्तार से लिखा हुआ है मल्हाररावकी सेना में इसबार आगे पडकर खडने वाले मरहते थे। उन्हीं वल विक्रम से इसवार विजय हुआ था। अवस्य ही महाराव राजा उम्मेद सिंहजी ने इस युद्ध में भी अमरपुरे के संग्राम की तरह अपने हाथों की सफाई से रण देवी को वीर मुँडोंकी बलि<noinclude></noinclude> d81i5me89sgoezq9g4aerrb8ipbgsc7 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११२ 250 194966 665576 2026-07-06T16:47:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665576 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बूँदी का उद्धार । ( ७९ ) चढाने फसर नहीं रक्खी और साथ ही इन्होंने अपनी गोलियों के ओठों से शत्रु सेनाको भाड चने की तरह भून डाला परंतु इसवार जब वह औरों के साथ चढ़े थे तब इतिहास कर्ता मरहटों के ही यश का गान फरेंगे। मैं इसी विचार से इस विषय को विस्तार नहीं करना चाहता हूँ । इस का परिणाम यह हुआ कि जयपुरकी हार हुई हार हुई और गहरी हार हुई और लाचार होकर ईश्वरी सिंहजीको बूँदी छोडनी पड़ी। उन्होंने मरहठों के दबाव से ही उम्मेद सिंहजी के डेरे पर आकर इन्हें टीका दिया, हाथी, घोडा, सिरोपाव और आभूषण दिये और इसतरह वर्षों का झगडा मिटगया । अमरपुरे के संग्राम के अनंतर उम्मेद सिंहजी ने होडकर की सहायता से बूँदी क्यों कर प्राप्त की, "हाथी के पेटमें से सिंहने" किसतरह फाडकर बूँदी निकाली इसका वर्णन टाडसाहब ने जिस तरह लिखा है उसका यहाँ उल्लेख करके बूँदी के इतिहास की उनके लेखले अब तुलना करना चाहिये । टाड साहब ने लिखा है कि:- "उम्मेदसिंहजी फिर राज्य हीन होकर इधर उधर भटकने लगे। कभी सहायता के लिये मेवाड गये और कभी मारवाड परन्तु इन्होंने अपना राज्य छीन लेनेवाले से संग्राम करने का विचार न छोडा और अपना पैतृक राज्य पाने के लिये यह निरंतर, बे रोक उद्योग करते रहे। इसी विचार से यह विनोदिया (1) गये जहां रानी कछवाही जी इनके पिता की रानी, इनके सब संकटों की जड रहतीं थीं। अब उनके मन में भी घृणा थी और जगत् भी उनसे घृणा करता था। अब समय निकल जाने बाद शोक किया करती थीं कि मैं ही अपने पति के अपने और अपने घराने के नाशका कारण हुई । उम्मेद सिंहजी उनसे जाकर मिले और इस मेट से उनकी आत्म निन्दा का कष्ट और भी बढ गया। उम्मेद सिंह जी के कष्टों ने इनके पराक्रमने और इनकी संग्राम निपुणता ने, गोद लेकर गद्दी का वारिस उनके हृदय में शोक, पक्षाचाप जो कछवाह जी के बनावटी खडके को बनाने की दुष्ट खासा से पैदा हुए थे<noinclude></noinclude> htx1bsrxvzg6d7o9c4qo10u7ajj60c9 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११३ 250 194967 665577 2026-07-06T16:47:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665577 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(८०) उम्मेदसिंह चरित्र | और सहानुभूति जागृत करदी कछवाहीजी ने अपने कार्मों की मरम्मत करने को बुधसिंहजी के पुत्र के लिये दक्षिण से सहायता मांगने को जाने का संकल्प किया। जब वह नर्मदा के लेख गडा हुआ था। जिस पर लिखाया के पार न जावे क्योंकि यह भी सिंधु उन्होंने सभी राजपूतानी होकर उस खंभे के किनारे पहुंची वहां एक शिला- कि कोई भी स्त्री जाति नर्मदा नदी की तरह "अटक" है । टुकडे टुकडे करडाले । उसे नर्मदा में फिकवा दिया। उन्होंने सोचा कि जब जंग नहीं है तब रोकटोक की क्या आवश्यकता है। यह इसतरह चलकर मल्हारराव होलकर के डेरों में पहुंची। भारत वर्ष के एक बहुत प्रभावशाली हिन्दूराजा जयसिंह की बहन लुटेरोंके झुंडके मुखिया गडरिये से प्रार्थी हुई नहीं उन्होंने विपत्ति प्रस्त उम्मेदसिंहजी को बूँदी दिलाने के लिये उसे अपना भाई बनाया। मल्हारराव यद्यपि उबकुल में उत्पन्न नहीं हुए थे परंतु उनमें ऐसे गुण अवश्य थे। उन्होंने कछवाहीजी की सब बातें स्वीकार की । बूँदी के इतिहास में नहीं लिखा है कि इस काम में उच्च कुछ की राज कुमारीका आमेर के होन हार नरेश के साथ संबंध ठहरने में मेवाड के राना ने क्यों कर सहायता दी । उनमें केवल अपने ही नरेश के उत्कर्षका वर्णन है। कुछ भी हो परंतु हमें ( टाड साहबको ) ( होलकर की वीरता पर ध्यान दिये विना ही ) संदेह है कि यदि उन्हें रानाजी से चौसठ लाख रुपये जो उन्होंने ईश्वरीसिंहजी को निकाल कर रानाजी के मानजे माधव सिंहजी को गदीं दिलाने के लिये घूस लेना ठहराये थे न मिलते तो मल्हार राव अपने झुंड को लड़ाई के लिये न चढ़ाते । " 'कुछ भी हो परंतु बूँदी के इतिहास कहते हैं कि कछवाही रानी ने बूँदी छुडाने के लिये सेना भिजवाने के बदले मरहटों को जयपुर पर चढवाया । समय इनके अनुकूल था । ईश्वरी सिंहजी की बदचलनी से उनके शत्रु खडे होगये थे । उन्हीं लोगों ने बूँदी और मेवाड से मिलकर काम करने का अवसर साधा क्योंकि उन शत्रुओंका इनके साथ गुप्त व्यवहार था ।"<noinclude></noinclude> jwd93k1b1fnnwwoosk3kyyfd5i5aun6 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११४ 250 194968 665578 2026-07-06T16:47:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665578 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1 1- बूँदी का उद्धार । (८१) आमेर नरेश ने ज्योंही मरहटों की चढाई की खबर सुनी वह अपनी राजधानी छोडकर रणभूमि में बाहर निकले किन्तु सेना की संख्या उन्हें जितनी बतलाई . जाती थी उतनी न निकली और इस बात की ईश्वरीसिंहजी को उस समय खवर हुई जब वह वगरू के मैदान में आकर घिर गये । उन्हें समय निकल जाने पर विदित हुआ कि धोखा दिया गया है। उन्हें मालूम होगया कि एक दीवान को मार कर दूसरा नियत करने में मैंने जो विश्वास किया है उसका मुझे बदला मिलगया। जयपुर के भाट ईश्वरी सिंहजी के गिराव का कारण इस तरह कहते हैं:- "जब ही छोड़ी ईसरा, राजकरण की आस मंत्री मोटा मारिया, खत्री केशवदास ।" उनके दीवान के पुत्र हरसहाय और गुरुसहाय ने सेना की संख्या झूठ मूठ अधिक बतलादी और कधी सेना से, दुर्बल शक्ति से आक्रमण करने पर > दत्तेजित किया । शत्रु सेना की संख्या अधिक होने पर उसका सामना करना पागलपन है। उन्हें अपने ही एक जागीरदार के दुर्गे की शरण लेनी पडी । दश दिन के घेरे के बाद ईश्वरीसिंहजी केवल बूँदी छोड देने ही पर विवश न हुए बरन उन्हें उम्मेद सिंहजी के राज तिलक करने उपरान्त यह लिख देना पड़ा कि मैं और मेरे उत्तराधिकारी बूँदी से सब तरह स्वत्व छोड़ते हैं ।" बूँदी के इतिहास "वंशभास्कर के आधार पर, ढाड साहब के लेख का भाषान्तर करके इस अध्याय में मैंने जो कुछ लिखा है उसमें से जयपुर के इतिहास संबंधी बातों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे यहाँ प्रसंगवश लिखी गई हैं और उनका इस चरित्र से कुछ संबंध नहीं है किन्तु एक विषय में टाड साहब के मत का "वंशभास्कर" कर्ता के मत से धरती 'आकाश का सा अंतर है। बूँदी के इतिहास कर्ताओं ने लिखा है कि उम्मेद सिंहजी ने स्वयं उद्योग करके मरहटों की सहायता प्राप्त की और टा साहब कहते हैं कि रानी कछवाही जीने होकर को अपना भाई बनाकर जयपुर पर उसकी सेना चढवाई। टाट साहब अपने लेख में जब यूँदी इतिहास का संकेत करते हैं तब मैं मानता हूँ कि उन्हें कहीं से ऐसा<noinclude></noinclude> 31dyjhtg9t3kh1pcostndty79wudlpn पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११५ 250 194969 665579 2026-07-06T16:47:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665579 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ८२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | लेख प्राप्त हुआ होगा परंतु मैं जहां तक जानता हूँ बूँदी के इतिहासों में " वंश- भास्कर" और "वंशप्रकाश" - ये दोनो बहुत प्रामाणिक ग्रंथ हैं और बहुत ही छानवीन के पश्चात् तैयार किये गये हैं इस लिये में इस जगह इन्हीं पर अधिक भरोसा करता हूँ | मरहटों की सेना चढवाने में बूँदी के इतिहासवालों ने रानी कछवाही जी के उद्योग करने की घटना बुधसिंह जी के चरित्र में लिखी है । उसका उल्लेख मैंने इस पुस्तक के दूसरे खंड के चौथे अध्याय में किया है। उस प्रसंग पर टाड साहब ने इस बात का उल्लेख न करके यहां किया है और बूँदी के इतिहास वालोंने यहां न लिखकर वहां लिखा है । इससे अनुमान होता है कि बूँदी के इतिहास के मत से रानी कछवाही जीने मरहटों की सेना चढ़वाने में अपने पति की सहायता की और टाड साहब के मत से उन्होंने पुत्र उम्मेद सिंहजी की सहायता की। इन दोनों में कौन ठीक है और कौन ठीक नहीं है- सो जानने का मेरे पास कोई साधन नहीं इस लिये मैने अनुक्रम से दोनों के मत यथास्थान लिख दिये हैं । दोनों लेखों की तुलना करके पाठक स्वयं विचार करलें ।. कुछ भी हो परंतु दोनों इतिहासों से निश्चय है कि महाराव राजा उम्मेद सिंहजी ने इसबार मरहटों की सहायता से बूँदी प्राप्तकी और स्थिररूप पर प्राप्तकी । इस बार की ली हुई बूँदी फिर कभी उन के हाथ से और उनकी संतान के हाथ से न निकली। इनके पिता के समय में और इन के समय में कुल छः सात बार बूँदी छूटी और इतनी ही बार की गई। इस तरह सब मिलाकर संवत् १७७६ से संवत् १३०५ तक के तीस वर्षों- में छः सात बार बूँदी छूटी। ये ही तीस वर्ष बूँदी राज्य के लिये यहां की प्रजाके लिये और यहां के राजकुल के लिये घोर संकट के थे। जिस समय जयपुर जैसे प्रबल शत्रुका विरोध था, जब जयपुर जैसा बलाढ्य राज्य बुध सिंहजी को और उनके पुत्र को जड़ से उखाड़ कर फेंक देने के लिये इनके पीछे पडा हुआ था तब यह उम्मेद सिंहजी जैसे बहादुर, राज नीति कुशल, शांत पुरुष का ही काम था। यह इसी लिये पैदा हुए थे। गत अभ्यायों में उम्मेद सिंहजी के वक विक्रम का वर्णन हुआ है यह अठारह वर्ष<noinclude></noinclude> dz25wqmw68thuppbkrlsm09k1of5dm4 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११६ 250 194970 665580 2026-07-06T16:47:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665580 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>उम्मेदसिंहजी का राज्याभिषेक । (८३) की उमर तक का है। आजकल राजा और राजकुमार जब इस उमर तक पूरी सी सूरत नहीं संभालते हैं अथवा सूरत संभालने से पहले ही बिगड जाते हैं सब उम्मेद सिंहजी ने तेरह वर्ष की उमर से आरंभ करके अठारह वर्ष की उमर में फेवल पांच वर्ष के घोर परिश्रम से, मारी पराक्रम दिखा कर बूँदी का उद्धार कराया। बीर हाडाओंका फिर झंडा बूँदी पर उड़ाया और सदा के लिये उडाया । अध्याय ८. उम्मेद सिंहजी का राज्याभिषेक । महाराव राजा उम्मेद सिंहजी के बूँदी राज्य शासन का वर्णन आरंभ करने पूर्व मरहटों के दबाव से जयपुर नरेश को जो एक और बात करनी पड़ी थी उसका उल्लेख करना यहां आवश्यक है । महाराज ईश्वरीसिंहजी को बूंदी छोड़ कर लिखावट लिखदेनी पडी, उम्मेदसिंहजी के लिये राज तिलक के निमित्त हाथी घोडे सिरोपाव और आभूषणादि दस्तूर भेजना पडा, स्वयं इनके डेरे पर जाना पडा और "चुगेगी या पकड़ चुगाऊँ " इस कहावत से जो कुछ मल्हाररावजी ने कहा था करना पड़ा। इसतरह सब कुछ हुआ परंतु एक घटना ऐसी हुई जिससे फिर भी, ऐसी दशा में भी ईश्वरी सिंहजी के मन की, लोभ की थाह मिले बिना नहीं रह सकती। उन्होंने "हाथी देकर अंकुश पर झगडा " करने के लिये बूंदी राज्य में से गैंडोली का परगना किसी को देना चाहा। इस जात की जब मल्हाररावजी को खबर हुई तब उन्होंने फिर ईश्वरीसिंहजी को दिवाया। उन्होंने ईश्वरीसिंहजी से स्पष्ट कह दिया और कह कर उन्हें खुप कर दिया:-- "मति बुंदिय देश की शत्रु तुम्हहि मिलेन, कोबिद रहस करार में ठेले हड्ड ठिलेन,<noinclude></noinclude> 9iqq7gngvf731fgphorlq47mkmu768c पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११७ 250 194971 665581 2026-07-06T16:48:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665581 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ८४ ) उम्मेदसिंह चरित्र । बस ईश्वरीसिंहजी ने चुप होकर अपना विचार छोड दिया । उन्होंने बूंदी से अपना थाना उठाने के लिये सरदार भेजे । ईश्वरीसिंहजी ने कार्तिक शुद्धा १२ को बूंदी छोड देनेका करार किया था। उसी के. अनुसार मार्ग में ठहरते ठहराते मल्हाररावजी उम्मेदसिंहजी के साथ बूंदी आये । जिसदिन इनकी सेना दवलाने के पडाब से चली इन्हें अच्छे शकुन हुए। इन सबने नगर के बाहर आकर डेरा दिया । उम्मेदसिंहजीने उस दिन नगर के समस्त ब्राह्मणों को भोजन करवाया । इस ओर जब ब्रह्म भोज होरहा था तब दूसरी ओर जयपुर के सरदार हरनाथ सिंहजी नरूका के साथ मल्हाररावजीने अपना सरदार संतू किला तारागढ खाली कराने के लिये भेजा । अवश्य ही इन्हें अब किला छोड देने में कुछ आना कानी नहीं करना चाहिये था परंतु पराई थाती निगल जाने पर भी छोमी बनिये की पराया माल देने में जैसे छाती फटती है इसी तरह इनकी छाती फटने लगी । किले के सिपाहियोंने कहा कि "हम चढ़ा हुआ वेतन लेकर निकलेंगे।" इस पर मल्हाररायको फिर तोपों पर जंगी चढ़ानी पडी। संतू ने हरनाथ सिंहजी को पकड लिया और इसतरह हाडाओं की विजय पताका बूँदी के किले पर फहराकर तारागढ के किले पर से आकाश के तारों से बातें करने लगी। नगर भर में और राज्य भर में उम्मेदसिंहजी की दुहाई फिरगई । कार्त्तिक शुद्धा त्रयोदशी-उसी सर्व सिद्धा त्रयोदशी को संवत् १९०५ में वेद विधि से महारावराजा उम्मेदसिंहजी का राज्याभि षेक हुआ। देश की प्रथा के अनुसार, कुल की चाल के अनुसार और शास्त्र की विधि के अनुसार जो २ कार्य, जो २ उत्सव एक महाराजाधिराज के राज सिंहा- सन पर विराजते समय होते आये हैं ये सब ही हुए । आज बूँदी में कडा आनंद था, आज यहां की प्रजा, यहां का राज कुछ यहां के राजकर्मचारी फूले अंग नहीं समाते थे । वर्षों तक घोर विपत्ति सहने के बाद भगवान ने इनकी दृष्ट सिद्धि करके आज का शुभ दिन दिखाया था। वास्तव में बूँदी राज्य के लिये वह दिन बहुत ही बढ़कर है। उस दिन प्रतिवर्ष बूँदी में बहुत बडा उत्सव होना चाहिये । जो उत्सव १५६ वर्ष पहले उसदिन हुआ था वही प्रति<noinclude></noinclude> giebba4xlhkz02lwph1e5z0na1sfk5g पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११८ 250 194972 665582 2026-07-06T16:48:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665582 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>उम्मेदसिंहजी का राज्याभिषेक (८५) वर्ष होना चाहिये। उस मंगल दिवस को चिरस्मरणीय रखने के लिये उस दिन प्रति वर्ष कुछ न कुछ उत्सव अवश्य होना चाहिये। उस दिन बूँदी का उद्धार हुआ था। उस दिन नगर वालों ने हाट, वाट गढी कूँचों को, अपने घरों को सजाया था। उस दिन राजा के महलों से लेकर गरीब की झोंपडी तक में आनंद था। राम नारायणदासजी ने जिस जगह राजमहल में समर कंद जैसे वलयान सुवेदार को मारा था वही जगह राज्याभिषेक के लिये तैयार की गई थी । वहीं वेद विधि से होमादि होकर राज्याभिषेक हुआ। शास्त्र की जो विधि हुई उसका वर्णन करके इतिहास के पृष्ठ रंगने से आज कल के लोग प्रसन्न न होंगे इसलिये एक बात लिखकर मैं अपनी लेखनी को आगे चलाऊंगा । यह बात यही कि शास्त्र कार्य के वाद विजयी मल्हाररावजी ने और मित्र शाहपुरानरेश ने महारावराजा उम्मेदसिंहजी के तिलक किया और अपने पूर्वजों के राजसिंहासन पर आसीन होते देखकर इन्हें अंतःकरण से बधाई दी। इनके बाद जिन २ रजवाडों के वकील यहां उपस्थित थे उन्होंने सबने यथाक्रम तिलक किया। सब लोगों ने महारावराजा उम्मेदसिंहजी को नजर की, भ्योछावर की जो उन दिनों यहां मेहमान थे उन सब को दूसरे दिन भोज दिया गया। जिस तरह तिलंक करने में होल्कर, जयपुर नरेश के भाई माधवसिंहजी और शाहपुरानरेश आदि थे वैसे ही प्रेमपूर्वक नजरें करने में भी थे। उम्मेदसिंहजी ने होलकर की कुटुंब सहित पहरावनी की और एक हाथी, दो घोडे तथा सिरोपाव दिया। उन्हें आभूषणों में वही सिर- पेच दिया जो महाराव राजा बुधसिंहजी को बादशाह शाहआलम से मिठाथा ।" उनकी सेना के अफसरों का और उनके सैनिकों का खूब सत्कार किया और इसतरह अपनी उदारता करके सबको लखलूट खर्च से प्रसन्न करदिया । वे सब अपने २ देश को छौट गये । इन्होंने इस तरह केवल महमानों का ही सत्कार न किया वरन अपने साथ के जिन सर्दारों ने, जिन भाई बंधों ने, जिन कर्मचारियों ने और जिन प्रजाजनों ने विपत्ति के समय इनका साथ दिया था उनका इन्होंने जागीरों से, इनामों से, बस्त्रों से, आभूषणों से, घोड़ों से और जो जिस योग्य हुआ उसे वही देकर सत्कार किया। प्रजा में डुगडुगी पिटवादी कि:--<noinclude></noinclude> jwwbeh6hrx3xshjln2z2a46fimistjd पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/११९ 250 194973 665583 2026-07-06T16:48:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665583 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ८६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | "अब कोई किसी को न सताने पावेगा। सब लोग आनंद से रहें । सताने वाले को अवश्य दंड दिया जायगा और सब के जान माल की पूरी रक्षा की जायगी ।" बस इसको सुनकर सब लोग आनंद में मग्न होगये । इसके अनंतर जब सब महमान विदा होगये तब उन्होंने "जय श्रीकृष्ण" की जगह "जय श्रीरंगनाथजी की" कहना, कहलाना प्रचलितकिया । राज्य की मुहर में, कागजों में और जहां २ आवश्यकता थी वहां २ सर्वत्र श्रीरंगनाथजी का नाम लिखा लिखाया जाने लगा। इसका कारण पाठक पहले ही जानचुके हैं। कारण यही है कि विपत्ति के समय जयपुर वालों से डरकर वल्लभ संप्रदाय के आचार्य गोस्वामी गोपीनाथ जी इन्हें मंत्र दीक्षा देने नहीं आये थे और उनके न आने पर इन्होंने रामानुज संप्रदाय की दीक्षा छी थी इसलिये इस प्रकारले इन्होंने उसी का प्रचार किया। तब से बूंदी के सब अनुयायी होते चले आये हैं । इन्होंने केवल इतना ही न किया वरन इनके पूर्वजों के समय में जिन २ लोगों को जितनी २ भूमि दान में मिली थी और उसे इस राज विप्लव के समय दलेल सिंहजी ने अथवा जयपुर बालोंने खालसे कर लिया था उसे फिर देकर हजारों ला ब्राह्मणों से आशीर्वाद लिया। इसमें उन्होंने किसी संप्रदायके, किसी मता- मत के पक्षपात पर बिलकुल ध्यान न दिया । भूमि बालों को खोज २ करके बुला २ करके उन्हें अपनी २ भूमि देदी। उनके हाथसे उनके पिताके हाथ से राज्य छूट जाने के समय शत्रुओं ने जो भूमिदान करदी थी उसे भी खालसे न किया। उनका यह कार्य अधिक प्रशंसा के योग्य है। नरेश इसी संप्रदाय के टाड साहब लिखते हैं कि - "जिस समय बूँदी में राज्याभिषेक का उत्सव हो रहा था जयपुर में दलसिंहजी का देहान्त होगया। वहां उनकी चिता जल गई। राजा ईश्वरीसिंहजी भी इस तरह का अपमान सहकर बहुत दिन न जी सके। जहर देने से उनका देहान्त होगया और इस तरह उनकी मृत्युके साथ जयपुर का बूँदी और फोटा लेने का विचार भी समाप्त हो गया ।"<noinclude></noinclude> ku0h116917l0cx3sqzd25fg6top5m4f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२० 250 194974 665584 2026-07-06T16:48:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665584 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोडे वालोंका प्रपंच । (८७) अध्याय ९ कोटे वालों का प्रद । जिस समय बूँदी में महारावराजा उम्मेदसिंहजी का शासन आरंभ होने से नगर और राज्य में शांतिकांड का बाजा बज रहाथा मारवाद में एक नया कलह खड़ा हुआ वहां के नरेश महाराज अभयसिंहजी का अपने ही भाई बखत सिंहजी से मन मुटाव हो गया। बडे लोग ठीक कहगये हैं कि "दुनिया में भाई के बराबर हितु नहीं है और उसके बराबर कोई शत्रु भी नहीं ।" बस यही दूसरी बात इन भाइयों के विषय में चरितार्थ हुई । अभयसिंहजी के छोटे भाई बसतसिंहजी बादशाही सेना लेकर मारवाढ पर चढ़ आये। छोटे भाई की धृष्टता देखकर बडे भाई घबडा उठे। उन्होंने अकेले सामना करने में अपने को अयोग्य समझा इस कारण महरावराजा उम्मेद सिंहजी को लिखा कि:- "होलकर को सहायता के लिये साथ लेकर इस बात पर होलकर का इनसे पत्राचार हुआ, सलाह हुई और दोनों ही अपनी २ सेना सज कर आप शीघ्र आइये।" दोनों की आपस में सहायता के लिये गये। झगडा निपटाया और इन दोनों ने उन दोनों से मिलकर आपुस का इस तरह दोनों सगे भाई इन दोनों की बदौलत दोनों सेनाओं की मारकाट तथा खून खराबी से बच गये। लडाई सच मुच ही बच गई परंतु इस जगह भी उम्मेदसिंहजी को सहसा अपनी वीरता दिखाने का अवसर मिलगया। घटना इस तरह हो पड़ी कि एक शिवसिंहजी नामक राणावत सरदार इन दिनों इनके पास रहते थे। उन्हों ने किसी समय किसी कारण कान्हायत राजसिंहजी के पिता को मार डाला था। "बाप का वैर" देना राजपूतों को विरासत में मिलता है वीर राजपूत "वापके घातक" को मारने में कदाचित् गया श्राद्ध से भी बढकर कर्तव्य समझते हैं यही राजसिंह जी इस समय मारवाड की सेना में थे। चाहे अपने स्वामी के मित्र की सेना में ही सही परंतु बाप के घातक को देखकर राजसिंहजी का खून उबल उठा।<noinclude></noinclude> f5t6hkv3dck76rx7uza87n205q2g1mc पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२१ 250 194975 665585 2026-07-06T16:48:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665585 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( 66 ) उम्मेदसिंह चरित्र | '' से सुनकर उनका गज को बचाने आये थे उसी उनके शिरपर हत्या सवार होगई और इसी लिये उन्होंने शिवसिंहजी जिस समय महारावराजा के डेरे पर आ रहे थे गोली से मारडाले । “मार कर भाग जाना और खाकर सो रहना" इस नीति के अनुसार अपने पितृघाती का वध करके राजसिंहजी भागे तो सही परंतु भाग कर भी अपने प्राणन बचाने पाये । जिस समय अपने आश्रित और अपने सेवक शिवसिंहजी का बध उम्मेदसिंहजीने सुना आप संध्या वेदन्द्र कर रहे थे। चाहे वह उस समय संध्या करते थे और अचल आसन से ईश्वराराधन करते थे परंतु मित्र का घात आसन डोल उठा । भगवान् हरि जिस तरह ग्राह के ग्रास के लिये स्वर्ग को छोडकर, गरुड को छोड़कर पयादे दौड़ तरह इन्होंने भी पीताम्बर पहने, एक काछ खोले हुए ही, घोड़े पर सवार होकर उसका पीछा किया। पीछा क्या किया यह घोडा फटकारते हुए मारवाड की सेना में जा घुसे। उन्होंने उस समय यह न सोचा कि मैं अकेला हूँ और मारवाडी हजारों हैं। उन्होंने यह न सोचा कि मैं अन शस्त्रों से पूरा २ सज्जित नहीं हूँ। यह बेधडक होकर जा घुसे और उन्होंने भागते हुए राजसिंह का शिर काट लिया । उस समय हजारों होने पर भी मारवाडियों से कुछ करते धरते न बना। चाहे वे लोग इस समय मुँह ताकते रहगये परंतु " पीठ पीछे की जुहार" करने के लिये उम्मेदसिंहजी के लौट आने बाद उन लोगोंने लड़ाई ठान दी । उम्मेदसिंहजी भी ऐसे समय में हटने वाले मनुष्य न थे। इन्होंने भी युद्ध का डंका बजाया । दोनों ओर से जिस समय संग्राम चेतने की अनी पर आगया होलकर ने बीच में पडकर, शांति पाठ करके बचा दिया । इस तरह दोनो का झगडा मिटाकर दोनो अपने २ देश को लौट गये। इनके बाद दोनो भाइयों ने क्या किया सो इस इतिहास से संबंध नहीं रखता है । 1 उम्मेद सिंह जी अपनी सेना सहित बूँदी को छोटे छौटकर उन्होंने चोरों का डकैत्रोंका दमन किया। खुद्दों लफंगों को, चोर उठाईगीरोंको, डकैतों को कडी २ सजा देकर मोम बनादिया । दलसिंहजी के होते हुए भी, जयपुर की सेना होते हुए भी जो लुड़े उफंगे राजाहीन बूँदी समझ<noinclude></noinclude> ixb1jo3ptvt2k86vpa0ud8ba73ac7z7 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२२ 250 194976 665586 2026-07-06T16:48:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665586 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोडे वालों का प्रपंच | (८९) कर दीन प्रजा को सताते थे उन्हें मार कूट कर सीधा कर दिया । उनमें कई एक का अपराध क्षमा करदिया, कई एक को कड़ा दंड दिया और जिस जगह राजनीति के अनुसार जैसा करना उचित था पैसा करके प्रजा को प्रसन्न किया, दुष्टों पर अपना दवदवा जमाया और तीस वर्षकी गई हुई शांति को फिर स्थापित करके अराजकता मेटदी | इस तरह शांति स्थापन करने के लिये अविश्रांत परिश्रम, पसीना झार परिश्रम करते ए गये बीते मन मुटाब को मिटाने के लिये, गई बीती बात को सचमुच गई. बीती कराकर फिर से कोटा बूँदी का पैत्रिक स्नेह दृढ करने के लिये अपने दुःख के साथियों से मिलने भेटने के लिये यह कोटे गये और वहां से मिल मेटकर छौट आये। यद्यपि महाराव दुर्जन शल्य जी ने इनका राजोचित सत्कार किया परंतु उनका मन उम्मेद सिंहजी से प्रसन्न न था, वह इनका उत्कर्ष देखकर राजी नहीं होते थे और भीतर ही भीतर उनका मन जलता था इसलिये उन्होंने एक नया बखेडा खडा करने का प्रपंच रचा । दलसिंहजी तो उनदिनों मर ही चुकेथे। उनके पुत्र कृष्णसिंहजी नैनवां में पड़ेहुए अपने दिन काट रहेथे । दुर्जनशल्पजी ने सचमुच ही सज्जन शल्य बनने के लिये उनको उकसाया । उनके नाम पत्र लिखकर समझाया कि "पडे क्याहो ? जरा सचेत होकर फिर सवार पकड़ो हम तुम्हारी सहायता पर हैं। यदि तुम कायरता छोडकऱ मर्द बनजाओगे तो हम तुम्हें फिर बूँदी दिलायेंगे | तुम्हें बूँदी दिलाने के लिये होलकर क्या उसके भी मालिक पूना नरेश श्रीमन्त नाना जी पेशवा से सहायता लेंगे। " इस पत्र को पाकर जब एक ओर कृष्णसिंहजी की जीभ लपलपाने उगी तब उन्होंने दूसरी ओर श्रीमन्त के दीवान रामचन्द्र को पत्र लिखकर फोडा । उसकी मल्हार शबसे शत्रुता थी। इस आपुस की शत्रुताने, आपुस के द्वेष ने ही मरहटों के साम्राज्य को आकाश में चढा कर रसातल में पहुंचाया है। सच पूछो तो भारतवर्ष भर में अपनी इक डंकी बजाकर बीर मराठे. आपस की फूट से ही गिरे हैं और इतना ही क्यों भारत का सत्यानाश देशका<noinclude></noinclude> bq1f1wp6xvx41dx7w0c7fthxobm54cn पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२३ 250 194977 665587 2026-07-06T16:49:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665587 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(९०) उम्मेदसिंह चरित्र । सर्वनाश इस फूट की बदौलत ही हुआ है। विदेशियों का देशमें राज्य स्थापित करने का मुख्य कारण फ्रूट है। परदेशियों को फूट ही इस देश में अच्छा मेवा मिला है । महाराष दुर्जनशल्यजी ने इसी फूट से लाभ उठाकर एक नया प्रपंच खडा किया। उन्होंने दीवान रामचन्द्र को लिखा कि :- "मल्हारराव आपका शत्रु है। यदि उसका काम उलट कर उसे नीचा दिखाना हो तो एक काम करो। मालिक की दृष्टि से उसे गिराना हो तो एक काम करो । उसने जयपुर को दबा कर उम्मेदसिंहजी को बूँदी दिलाने में बहुत बड़ी भूल की है। यदि आप उनसे छीनकर बूँदी मुझे दिलादो तो केवल में ही नहीं जयपुर क्या सब ही राजा आपके अधीन होजायेंगे। यदि आपको यह कार्य करना इष्ट हो तो उदयपुर नरेश महाराना जगतसिंहजी को भी अपने में मिलालो क्योंकि उनके विना श्रीमंत इस बात को स्वीकार न करेंगे ।" रामचन्द्र इस बात को सुनकर प्रसन्न हुआ । उसने महाराना को मिलाने की कुटिल नीति का समर्थन किया । चाहे फल इसका कुछ भी न हुआ परन्तु उन्होंने जब इस काम में सफलता न पाई तब एक दूसरा उद्योग किया जिसका वर्णन समय पढने पर आगे चल कर किया जायगा । जिस समय इन पर इसतरह के प्रपंच रचे जारहे थे यह अपने राज्य के सुधार करने में जी जान से लगे हुए थे। यह अच्छी तरह जानते थे कि यदि हमसे अपनी प्रजा प्रसन्न होगी, यदि हम से अपने सरदार उमराव राजी होंगे और यदि हमारे राज्य में आंतरिक शांति होगी तो बाहरी आक्रमण हमारा कुछ भी न कर सकेगा। जो काम इस अध्याय में पहले लिखे जा चुके हैं उनका संपादन इसी उद्देश्य से करने के सिवाय राजा प्रजा का एक मन करने के लिये इन्होंने एक काम और किया । इनके चचा जो सिंह जी के साथ चैत्र शु० ३ को गणगौरी के तालाब में डूब जाने से बूँदी में यह स्योहार बंद होगया था। इसके बंद होजाने से दशहरे के सिवाय इस राज्य में ऐसा कोई उत्सव नहीं रहा था जिसपर जुलूस की, ठाटकी, राजसी दबदबे के साथ राजा की सवारी देखकर राजा के उत्सव में अपना उत्साह<noinclude></noinclude> 1xugsf5zbzf58q3y07czg5355a0j3i9 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२४ 250 194978 665588 2026-07-06T16:49:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665588 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोटे बालों का प्रपंच । (९१) संयुक्त करने का प्रजा जनों को अवसर मिले इसलिये इन्होंने जिस वर्ष में इनका राज्य अटल रूपपर स्थापित हुआ उसके कुछ मास वाद अर्थात् संवत् १९०६ में इन्होंने एक नया उत्सव स्थिर किया। उस वर्ष की श्रावण शुद्ध १ और शुरू ४ को इन्होंने तीज माता के नाम से भगवती पार्वती की मूर्ति बनाकर बडे ठाट से निकालना आरंभ किया। इनका स्थिर किया हुआ बूँदी के हाडाओं का यह जातीय त्योहार अब तक प्रचलित है। बूँदी की तीज राजपूताना में बहुत प्रसिद्ध है। उस दिन तीज माता के साय श्रीमान् बूँदीनरेश की सवारी बड़े धूमधाम से निकलती है। बूँदी राज्य की प्रजाके सिवाय दूर २ के लोग देवी के की सवारी देखने आया करते हैं । दर्शन करने और श्रीमान् जय उम्मेद सिंहजी बूँदी में एक नया जातीय त्योहार स्थिर पर चुके तथ उन्होंने दक्षिण यात्रा का संकल्प किया। यह यात्रा दक्षिण प्रान्त के तीर्थ लेवन के लिये थी, होकर मिलने के लिये थी और पूना नरेश श्रीमंत का साक्षात् करने के लिये थी । संवत् १९०६ के भाद्रपद शुक्ल में आपने अपने घु श्राता दीप सिंह जी को और कई एक अच्छे अच्छे शूर सामंतों को साथ लेकर दक्षिण की ओर गमन किया । इन्होंने बेगूं में एक रात्री बसकर उज्जैन में श्राद्धपक्ष भर निवास किया । उसी तीर्थ में पूर्वजों के लिये पिंडदानादि शास्त्र विहित कर्म किये। वहां से चलकर जब यह नवरात्रि का अष्टमी को नर्मदा नदी के किनारे पर पहुंचे तो होलकर के चौकीदारों ने इनसे पार उतरने का कर मांगा। इन्होंने कर वर कुछ न दिया । उनको पिटवाकर उनकी नावें छीनकर यह पार उतर गये। वहां से चलकर यह श्री ओंकारेश्वर के दर्शन को गये। वहां से बुरहानपुर में ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते और विश्वकर्मा की छवि निहारते हुए औरंगाबाद जाकर गोदावरी में नहाये। वहां से होलकर राज्य के बापगांव में पधारे। उस समय वहां मल्हाररावजी तो नहीं ये क्योंकि यह पूना गये थे परंतु उनके पुत्र खंडूजी ने इनका बडा सरकार किया । वडी दूरतक इनकी अगवानी ( पेशवाई) की । यह यहां इस तरह जब कुछ काल तक रह डिये तब मल्हाररावजी भी लौट आये ।<noinclude></noinclude> myrmzthmj1owrlwa6jqqd7opbnu2ieg पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२५ 250 194979 665589 2026-07-06T16:49:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665589 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ९२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | लूटता है, साड- इस तरह जब उम्मेदसिंहजी होलकर से मिलने भेटने में लगे हुए थे तब इनके पास खबर पहुंची कि इनका नियत किया हुआ कामदार हरजन जी. हाडा इन्हीं की प्रजा को सतारहा है। वह प्रजा को कारों पर मिथ्या दोष लगाकर उनका धन हरण करता है, मिलकर प्रणा को लुटवाता है और इस प्रकार से प्रजा का सर्वनाश कर रहा है। सुनते ही इन्हें बड़ा क्षोभ हुआ । इन्होंने उसी चोरोंसे, लुटेरों से और राज्य का भजनेरी के जागीरदार शेरसिंहजी को हरजनजी को घेर लिया । घिरे हुए समय अपने पास के सरदारों में से भेजा। उन्होंने यहां आकर मादे में हरजन जी ने कोटे को पत्र लिख कर महाराव दुर्जनशल्यजी से सहायता मांगी। उधर कोंटेवाले किसी प्रपंच से बूँदी लेने के लिये ललचा रहे थे इसलिये उन्होंने उम्मेदसिंहजी बिना मैदान सूना पाकर अपना मतलब गांठने को हरजन जी की सहायताके लिये सेना भेजी। सेना अवश्य आई. परंतु उसे खाली हाथों लौट जाना पडा क्योंकि शेरसिंहजी ने कोटे की सेना के आने से पहले ही हरजनजी को पकड़ कर तारागढ़ में कैद कर लिया था।- कैद होने से उसका घमंड चूर २ होगया और तब शेरसिंहजी ने सुन्याय से- यहां की दुःखित प्रजा को शांत किया और उसका संतोष किया । इन्हीं हरज़नजी के पुत्र दलेलसिंहजी दक्षिण यात्रा में महारावराजा, उम्मेदसिंहजी के साथ थे। यह वह दलेलसिंहजी न थे जो जयपुर के पादसेवी • होकर बूँदीके राजा बन बैठे थे । उनका इनदिनों देहान्त हो चुका था । किन्तु यह बूँदी के कामदार हरज़नजी के पुत्र थे। पिता के कैद होजाने की जब दक्षिण में इनके पास खबर पहुंची तो इन्होंने एक नया प्रपंच रचना चाहा । इन्होंने उम्मेदसिंहजी से किसी काम के बहाने से दो दिन की छुट्टी- लेली । ले तो ली परंतु यह कहीं गये नहीं । उम्मोदसिंहजी इन्हें अपने साथ लेकर होलकर सहित पूने जाना चाहते थे किन्तु यह उनके साथ गये नहीं । उन्होंने उम्मेदसिंहजी की अनुपस्थिति में दीपसिंहजीको बहकाने का प्रयत्न किया। चाहे उन्होंने इस काम में कोई बात उठा न रक्खी परंतु दीपसिंहजी उनके चंगुल में फसे नहीं । बस इसी कारण दलेलसिंहजी को वहांसे भागकर कोटे में<noinclude></noinclude> czjviz7cyw1u7i4e6j3jmtq6pk615v5 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२६ 250 194980 665590 2026-07-06T16:49:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665590 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोटेवालों का पक्ष | (९३) दुर्जनशल्पजी की शरण लेनी पडी । उसने वहां जाकर दीपसिंहजी को बूँदी का राज्य दिलाने का लालच देकर फोटे बुखाया परंतु उन्होंने अपने ज्येष्ठबंधु उम्मेदसिंहजी की सेवामें वह असल पत्र भेज दिया और इस तरह दलसिंहजी के कुकर्म पर घृणा की । जिस समय उम्मेदसिंहजी मल्हारराव होळकर के साथ पूना गये तो गरहटा सेनापति नानाजी के चचा सदाशिवरावजी ने इनका बडा सत्कार किया, इनकी पेशवाई की और दश दिन तक इन्हें अपने यहां रख कर इनकी ग्रुप पहुनई की। यह वहां से चलकर सितारा गये। वहाँ मरहटों के प्रधान अमात्य नानाजी थे। इन्होंने एक कोरा तक इनकी अगवानी करी। उन दिनों सितारे के राजा साहूजी ( पराक्रमी शिवाजी के भतीजे) का देहान्त हो चुका था इसलिये संभाजी के पुत्र राजारामजी को सितारे का राज मिला। इन्होंने उम्मेदसिंहजी का बहुत सत्कार किया और इन्हें अपना आधा सिंहासन बैठने के लिये दिया । जिस समय उम्मेदसिंहजी दक्षिण यात्रा करके होल्कर से, पेशवा से मिलने भेटने में लगे हुऐ थे कोटे के महाराव दुर्जन शल्यजी अपने प्रपंच से खाली न थे । ऊपर इसी अध्याय में यह लिखा जा चुका है कि उन्होंने पेशवा के अमात्य रामचन्द्र राव को मिलाकर रानाजी की सहायता से बूँदी देने का मनसूबा गांठ रमखा था। इसी मतलब को साधने के लिये उन्होंने उम्मेदसिंहजी को बूँदी में न पाकर अपना वकील उदयपुर भेजा। महाराना जगतसिंहजी यद्यपि बहुत चतुर आदमी थे परंतु इस वर्षा को उच्छेदार बातों में आगये। उन्होंने फोटे वालों की बहकावट से श्रीमन्त पेशवा के नाम पत्र लिखा कि :-- "होलकर ने उम्मेदसिंहजी को बूँदी दिलाने में बड़ी भूल की है। यदि आप बूंदी का राज्य कोटे वालों को दिलायेंगे तो हम सब राजपूताने के राजा आपके आधीन हो जायेंगे ।" इस बात का अवश्य ही श्रीमन्त पर कुछ असर उस समय न हुआ परंतु कोटे वालों की बहकावट से कुलशत्रु दलसिंहजी के पुत्र कृष्णसिंहजी ने राजा<noinclude></noinclude> 3rhj2j9teut8wtaefxic7w09a5o1sdf पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२७ 250 194981 665591 2026-07-06T16:49:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665591 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ९४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | कृष्ण दिना बूँदी पाकर राजधानी पर चढाई की। उन्होंने आकर नगर घेर लिया और गोले बरसा २ कर वह कोटके कंगूरे उड़ाने लगे। उनकी ऐसी ढिठाई देखकर बूँदी के सेनापति संग्रामसिंहजी सोलंखी और मौजीरामजी कायस्थ से न रहा गया। इन्होंने तुरंत ही युद्ध करने के लिये नक्कारे पर चोब दिलवाई | बस देर क्या थी । रण में मरने मारने पर सिपा- हियों को मतवाला करनेवाला जुझाऊ बाजा बजने लगा । सिंहजी को आशा थी कि लड़ाई के समय कोटे से सहायता के लिये सेना आवेगी परन्तु फौज के नाम से जब एक चिडिया भी न आई सब बूँदी की सेना के पहले ही हमले में कृष्णसिंहजी s पैर उखड़ गये। इस घटना के कुछ समय बाद अर्थात् संवत् १९०७ के श्रावण में उम्मेदसिंहजी सितारे से चलकर प्रसन्नताले बूँदी आ पहुंचे । अध्याय १०. होलकर का जयपुरसे संग्राम | जयपुर का रनवास । यद्यपि उदयपुर नरेश ने और फोटा वालोंने बूँदीनरेश के विरुद्ध रामचन्द्रराय को चिट्ठी लिखकर उसे उभारा था परन्तु पीछे उन्हें इस प्रपंच की थाह मालूम होगई इसलिये उन्होंने दयाराम जी पुरोहित को बुलाकर उनसे ठहराव हो जाने के अनंतर महारावराजा उम्मेदसिंहजी के राज्यासन पर विराजने के दस्तूर में हाथी, घोडा, वस्त्र, अलंकार और शस्त्र आदि सामग्री भेजी । केवल इतना ही नहीं धरन उनके पूर्वज महाराना संग्रामसिंहजी की बादशाह बाबर से मांडू के बादशाह से और ऐसे २ प्रबल शत्रुओं से रक्षा करने में नारायणदासजी ने जो मेवाड राज्य पर अहसान किया था उसे स्मरण करके पूर्व प्रथा के अनुसार वर्षगांठ पर दस्तूर भेजना गणगौरी पर, दशहरे पर और नरेश की राव आरंभ करके यूँदी मेवाड का टुटा हुआ संबंध फिर जोड़ दिया।<noinclude></noinclude> 26pl95lmmzngghi6xkvj2n6giw7jmvx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२८ 250 194982 665592 2026-07-06T16:50:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665592 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>होलकर का जयपुर से संग्राम | (९५) इस घटना के बाद भी उम्मेदसिंहजी सुख से बूँदी में बैठने न पाये । पेशा की ओरले भारत विजय करने के लिये निकली हई होलकर और सेंधिया की सेनाओं में से होलकर की सेना ने व नदी के तटपर आन्तर ढाब डाल दिया । इस बार होलकर की सेना के अधिपति मल्हाररावजी के पुत्र संजी थे । घटना संवत् १९०७ के कार्तिक मास की है। चातुर्मा- स्व भर विश्राम लेकर पुराने राजा जैसे देश विजय के लिये चढाई किया करते थे इनकी यात्रा भी इसी प्रकार की थी। अपनी सजी हुई सेना को दिये हुए उम्मेदसिंहजी भी हन खंद्रजी के साथ हुए। आगे aढते हुए जब इनकी सेना ने नैनवा का घेरा देकर तोपें दागना आरंभ किया तब दलेहसिंहजी के पुत्र कृष्णसिंहजी तोपों की मारसे पटा गये। वह यहांतक घडा गये कि अपने रनवास को भी न संभाल सके । वह उधर अपने प्राण लेकर भागे और इधर उम्मेदसिंहजी ने नैनवां के पर- गने भर पर अपना अधिकार करके खोया हुआ हिस्सा फिर प्राप्त कर लिया । से नैनवां करचर और समीधी इन तीनों पर इनका अधिकार होगया । इसवार होकर और सेंधिया श्रीमन्त पेशवा का राज्य बढाने की इच्छा से दिग्विजय करने लिये निकले थे। संधिया के कामों से इस चरित्र का गृह संबंध नहीं है इस लिये उसके विषय में जिसने की आवश्यकता भी नहीं परन्तु होलकर ने उम्मेदसिंह जी सहित जयपुर पर चढाई की कवि राजा सूर्यमल जी कहते हैं कि "महाराज ईश्वरीसिंहजी ने अपने प्रधान अमात्य खत्री केशवदास को मारडाला था। इसी का बैर लेने को होलकर ने इन पर चढाई की " केशवदास के मारने का और ईश्वरीसिंहजी के मरने का जो वर्णन टाड साहब ने किया है उसे मैं पहले लिख चुकाई परन्तु उन्होंने जिस लडाई से इस बात का संबंध बतलाया है कवि राजा सूर्य- मलजी ने उससे नहीं बतलाया। उनके मत से होलकर की जयपुर पर यह दूसरी चढाई थी। खैर कुछ भी हो परन्तु इनके मत से संवत् १९०७ में जब उम्मेदसिंहजी को साथ लेकर मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडूजी जयपुर पर चढे तब इस चढाई से घटाकर ईश्वरीसिंहजी ने उम्मेदसिंहजी को पत्र लिखा कि-'<noinclude></noinclude> 66s9say0a941v1q6vt7h8gruogn7kzs पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१२९ 250 194983 665593 2026-07-06T16:50:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665593 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(९६) उम्मेदसिंह चरित्र | "हम पहले ही आप का राज्य छोड़ चुके हैं। हमने ठहराव के विरुद्ध आपके साथ कोई काम नहीं किया है फिर आपने किस अपराध पर होलकर को क्रुद्ध कर दिया है ? केशवदास ने हमारी आज्ञा का भंग किया इसलिये हमने उसे मरवा डाला है। " इस पत्र को सुनकर इन्होंने होलकरतनय को समझाया परंतु खंडूजी समझे नहीं। उन्होंने दंड लिये बिना वहां से हटना स्वीकार न किया क्योंकि वह भी पूरे राज्यलोलुप थे । अपना राज्य बढाने और अपना कोश भरने के सिवाय न्याय अन्याय से उन्हें कुछ मतलब न था । उम्मेदसिंहजी की न्यायभरी सलाह को फिर वह क्यों मानने लगे । उन्हीं । स्पष्ट कहा दिया कि :- "ईश्वरीसिंहजी ने बिना अपराध मंत्री मारडाला इन्हें घमंड बहुत होगया है इसलिये हम नानाजी की आज्ञा से इनका दर्पदलन करे इनसे दंड लेने आये हैं । मनमांना रुपया लिये बिना यहां से न डिगेंगे ।" उम्मेदसिंहजी ने यही बात ईश्वरीसिंहजी को लिखबादी लिखवा दिया कि :-- "आपने चुगलखोरों के बहकाने से केशवदास को मार कर वडा अनर्थ कर डाला । आपके इस घमंड ने ही आप पर विपत्ति लाने का काम किया। ये लोग आपको मारने नहीं आये हैं। मरहटे धनके लोभी हैं। इस कारण दंडका रुपया देकर इनसे अपना पिंड छुडाओ ।" ईश्वरीसिंहजी ने दंडका रुपया देना पसंद न किया । उन्होंने कहा कि "लडकर मर जायंगे परंतु दंडके नाम पर एक कौडी भी न देंगे ।" अब- श्य ही ईश्वरीसिंहजी लडाई में कच्चे नथे परंतु गत अध्यायों से पाठकों को विदित होगया होगा कि वह दुर्व्यसनों में पड गये थे । वस वही उनके विनाश का कारण हुआ । उन्होंने अपने कामदार हरगोविन्द नाटानी से जिसकी लडकी को उन्होंने अपने गले का हार बना रक्खा था सेना मांगी। नाटानी इस अपमान से पहले ही दुःखित था । उसे अब बदला लेनेका अवसर मिलगयां उसने कहा :-<noinclude></noinclude> 4tfafoplh3ic7mnysz3azitl89dea8l पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३० 250 194984 665594 2026-07-06T16:50:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665594 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>होलकर का जयपुर से संग्राम | (९७) अक्षता, सेना की आप क्यों चिन्ता करते हैं ? दश लाख सेवा जे है। जब चाहे तब ले लीजिये । मरहटे बडे डरपोक होते हैं । पढाई करेंगे तब ही वे लोग डर के मारे आपके पैरों आ पडेंगे। आप आमेर के छमवारी अधीश हैं और वे भिखारी ब्राह्मण के नौकर 1 भीम का टुकडा खाने वाले आप जैसे समर्थ के आगे वाहों की सवार चमकते ही डर जायेंगे ! कहां और कहां अंधेरी रात के जुगनू ! " क्या ठहर सकेंगे आप जेठ के सूर्य हैं इस तरह की बातें बनानेसे जब ईश्वरीसिंहजी धोखे में आगये तब नादानी ने जयपुर की सारी सेना अपने पुत्र हरि नारायण के साथ शेखा- वाटी में किसी बहाने से भेज दी । उसने केवल इतना ही न किया वरन होळकरतनय को सिंहजी सहित खंडूजी ने डाले । जय इस बात की पत्र लिखकर शीघ्र बुलवाया । उम्मेद आकर जयपुर के पास शाना कुंडपर डेरे ईश्वरीसिंहजी को खबर हुई तब उन्होंने नाटानी उस से कहा कि:- को बुलाकर उससे दश खाल सेना मांगी। I "खाओ अपने जेब में से दश लाख सेना में उसी के भरोसे बीस दिन से निथिन्त हूँ। शत्रु पास आ पहुंचा। अब निकालो अपने जेब में से !" इसपर हर गोविन्द ने सूखा सा मुँह बनाकर कहा:- "अन्नदाता, मेरे जेब में तो चूहे लग गये। उन्हीं ने काटकर सारी सेना तितर बितर कर डाली। यह कहकर नाटानी अपने घर भाग गया । अव ईश्वरीसिंहजी अपने कुकर्म पर और नाटानी का भरोसा करने पर पछताये | पछताये अवश्य परंतु अब होडकर जैसे प्रबल शत्रुका सामना करने में वह असमर्थ थे। दंड देकर मान भंग करवाने से, शत्रु के हाथ में पड़कर अपनी दुर्दशा करवाने की अपेक्षा उन्होंने मरजाना ही अच्छा समझा, अपना प्राण रहते हुए अपने राज्य में दूसरों का अधिकार देखने से उन्होंने मरजाना ही अच्छा समझा । इस तरह मरजाना चाहे शास्त्र के अनुसार बडा पाप है, चाहे खौकिक दृष्टि में भी कायरता है क्योंकि वह इतने पर भी तलवार बजाकर निकल सकते थे, रणभूमि में ७<noinclude></noinclude> 29etnpm31id3fqcitvlwvq23bv6llvx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३१ 250 194985 665595 2026-07-06T16:50:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665595 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ९८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | मरकर वीरगति को पा सकते थे, परंतु उन्होंने जो कुछ अच्छा समझा सो समझा । उन्होंने चुपचाप विषपान करके शयन किया और सोते समय बूँदी नरेश को एक पत्र में लिखा:- - "ईश्वर का लेख कमी मिटता नहीं है। केशवदास को जहर का प्याला पिलाकर जैसा किया था वैसा पाडिया ।" दिन निकलने के साथ ही सारे नगर में और शत्रु सेना में खबर फैलाई कि महाराज ईश्वरीसिंहजी ने विप खाकर जान दे डाली। खंडूजी और उम्मेद सिंहजी दोनों जयपुर में गये । पौष कृष्णा ९ संवत् १८०७ को ईश्वरी- सिंहजी मरगये और कृष्णा १० को ये दोनों नगर में गये । होटकर तनय के परामर्श से बूँदी नरेश ने महलों में जाकर प्रबंध किया । सब जगह होलकर की चौकियाँ बैठगई । इसी झमेले में जब ईश्वरीसिंहजी के शत्रु को पढे २ छ पहर होगये तब उनका अंत्येष्टिकर्म करवाया गया। जयपुर के खजाने पर नाला होलकर का पडा था इसलिये उनकी किया के लिये रुपया उसीने दिया । उनका जयनिवास बाग में दाह कर्म हुआ किन्तु हायरे पराधीनता ! एक बडे राज्य के स्वामी को पराई पूँजी के कफन और लकडियों में जलना पडा । भाबी बडी बलवती होती है । सूर्यमलजी कहते हैं कि ईश्वरीजिंहजी के हाथसे एक और भी कुकर्म भारी हुआ था। उन्होंने एक मुसलमान महावत ( फीलवान) पर कृपा करके उसे अपना मंत्री बना दिया था वह पराई स्त्रियोंकी उज्जा लूटकर बडी अनीति किया करता था। एक दिन ईश्वरीसिंहजीने औरोंके नाहीं करने पर भी उस सुसलमान को श्रीगोविन्ददेवजी के मंदिर के भीतर बुलाकर उसके साथ शराब पिया था। कुछ भी हो परंतु ईश्वरीसिंहजी की ईश्वरताका और उनके दबदबे का बुरी तरह अंत हुआ। जैसा करता है वैसा पाता है। "यह खूब सौदा नकद है इस हाथ दे इस हाथ के ।" उन्होंने केवल महावत को ही हाथी पर चढाते २ अपने माथे पर न चढाया वरन ऐसे २ अनेक नीचों को बडे २ पद देकर अपना सर्वनाश किया । एक वेश्या ने इनका सहगमन किया और रानियां और खवासिनें जब महलमें पडी २ पति<noinclude></noinclude> 8o5eeow0sszdpr5xdok8ou4oiy16q6f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३२ 250 194986 665596 2026-07-06T16:50:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665596 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>होलकर का जयपुर से संग्राम । (९९) योग पर से २ कर रोने के गगन भेदी नाद से लोगों के कलेजे फाड २ करडे कर रही थीं खंडूजी को एक कुबुद्धिने आ घेरा । उन्होंने काम पीडित होकर अपनी पापवासना तृप्त करने के लिये कहा:-- "हम सुनते हैं कि जयपुर के महलमें बहुत सुन्दरियां हैं। उनमें से सो होगी उन्हें हम मैंगवाकर उनसे विषय खुख उदेंगे।" खंडुजी की ऐसी नीचता उम्मेदसिंह जी से सहन न हो सकी। वह जिस समय ऐसी असद वेदना से क्रोध में आकर खंडू का शिर काटने के लिये खन उठाकर प्रतिक्षा कर रहे थे कि "हमारे जीते ऐसा काम कभी न होने पायेगा । जयपुर की जो बहू बेटियां हैं ये हमारी ही हैं । आज खंडू ने इन- पर मन चलाया है तो कल हमारी पर भी चलावेगा ।" जयपुर के राज प्रासाद में समस्त रानियों ने, खवासिनों ने और समस्त स्त्रीवर्ग ने बारूद बिछाकर जलजाने का प्रबंध कर दिया। वह अपनी उज्जा और अपना धर्म खोकर अवश्य ही जीना नहीं चाहतीं थीं इस लिये उन्होंने इतना बडा साहस किया । राजदूत रणियों के लिये ऐसा साहस कोई नई बात न थी क्योंकि इतिहास इस बात की गवाही दे रहे हैं कि अनेक राजपूत महिलाओं ने प्राण को तलवार की धार की अनंत ज्वाला में शोंककर, पुरुष वेश से शत्रु सेना को मारकर मरकर स्वधर्म की रक्षा की है, स्वधर्म रक्षा के लिये असंख्य राजपूत रमणियां पति की चिता में जलकर सती हो गई हैं फिर ऐसी मीड के समय मरने की इसतरह तैयारी करना उनके लिये कोई बडी बात न थी। वे मरने को जब तैयार हुई तब नाजिरों ने दौडकर, ईश्वरीसिंहजी के भाई उनके उत्तराधिकारी माधव सिंहजी के वकील ने भागकर और नगर के अच्छे २ साहूकारों ने आकर उम्मेदसिंहजी की शरण ली और इन्हें इस बातपर जैसा फोप हुआ उसे पाठक ऊपर पढ़ चुके हैं। इन्होंने खड्ग हाथ में लिये हुए, मल्हारराव- जीके और खंडूजी के संकोच को बिलकुल तिलांजलि देकर अपने राज्य की, अपने शरीर की और अपने स्वार्थ की कुछ पर्वाह न करके छाल २ आँखों से कडक कर होलकर मल्हाररावजी से कहा:-<noinclude></noinclude> 6mqewr89qiyz20j29v7ri90tv0s527u पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३३ 250 194987 665597 2026-07-06T16:50:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665597 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१००) उम्मेदसिंह चरित्र | “आपको पूना नरेशने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये भेजा है किन्तु आप के पुत्र खंडूजी की बुद्धि भ्रष्ट होगई । वह जयपुर नरेश की रानियों को पकड़कर अपने घर में डालना किया हो और हजार आपने हमारा -हमारी लजा एक है, उनकी और समर भूमि में लाशें पढे बिना वह ऐसा काम कभी नहीं करने पायेंगे हमारी बहन बेटियां यहां के महल में हैं और यहां की हमारे यहां हैं। यदि आप यह कहो किहमने तुम पर अहसान किया है तो अपनी बूँदी लेलो। हमने अधर्म के लिये राज्य नहीं लिया है। आप जानते हैं कि भाई से भी मित्र अधिक होता है । ईश्वरीसिंहजी आपके मित्र थे इसलिये उनकी स्त्रियां खंडू की मातायें हुई। अब देखो खंडू की दुष्टता जो माताओं पर चाहते हैं। हजार जयपुर ने हमारा नाश उपकार किया हो परंतु जयपुर की ओर हमारी इज्जत एक है इसलिये हाडों की मन चलाता है ।" इस तरह की जोश भरी बातें सुन कर मल्हाररावजी के हृदयपर बडा प्रभाव पडा। प्रतिभाशाली के प्रण का प्रभाव पडना कोई बडी बात नहीं है । मल्हाररावजी ने इनके जोश से समझ लिया कि स्वधर्म रक्षा के लिये उम्मेदसिंहजी खंड़जी को माँरेंगे और आप भी मर मिटेंगे इसलिये उन्होंने हँसकर इन्हें अपनी छाती से लगा लिया और खंडूजी को इस खोटे विचार के लिये बहुत कुछ फटकार कर सब को इनको शांत कर दिया। इस तरह उम्मेदसिंहजी के कोप करने से जयपुर के जनाने की इज्जत बचाई और जयपुर राज्य ने और वहां की प्रजाने इस स्वधर्म प्रीति पर, इस हावा- ओंकी टेक पर उम्मेदसिंहजी को बहुत धन्यवाद दिया। होलकर के कहने से इन्होंने महल में जाकर रानियों को, रनवास की स्त्रियों को समझाया, अपनी ओरसे कहलाया कि - "जब तक हमारे घड़ पर शिर रहेगा आपकी ओर कोई अंगुली भी नहीं उठा सकता है ।" पहले होलकर ने पांच करोड रुपये दंडमें मांगे थे परंतु उम्मेदसिंहजी ने जब उन्हें समझाया तब एक करोड से अधिक न लिया और होलकर मल्हाररावजी ने उदयपुर से मसिंहजी को बुलाकर जयपुरका राज्य दिया। राज्य देकर इन<noinclude></noinclude> t5liju8nkec88mv2j7jwvh821mi1jsk पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३४ 250 194988 665598 2026-07-06T16:51:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665598 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>से भी वीस होलकर का जयपुर से संग्राम । दक्षिण की ओर चले ( १०१ ) रुपया लेडिया इसके बाद होलकर अपनी सेना लेकर गये और महारावराजा उम्मेदसिंहजी ने बूँदी पधार प्राचीन रीति के अनुसार जयपुर नरेश माधवसिंहजी के दिये टीका वस्तूर- राज्यासन पाने का दस्तूर भेजा । इसतरह जयपुर के शत्रु की सहायता के दिये जाने पर भी उम्मेदसिंहजी ने जयपुर की रक्षा की, राजपूत रमणियों के धर्म की रक्षा की, खंडूजी को बड़े भारी कुकर्म से और होलकर को बड़ी भारी बदनामी से बचाया । गत अध्यायों में होलकर मल्हाररावजी का बूँदी नरेश पर खूब स्नेह- दिखाया गया है परंतु ढाड साहब इस स्नेह को और इस कृपा को शुद्ध नहीं समझते। उनके विचार से होलकर ने इतनी कृपा दिखाकर अपना मतलव खूब गांठ लिया था। वह लिखते हैं कि "चौदह वर्ष तक इधर उधर भटकने वाद संपत् १८०१ में उम्मेद सिंहजी ने अपने पूर्वजों का राज्य पाया। इस अवसर में एक "हरामखोर " -राजगादी पर बैठा रहा । उडाई झगडों से इसके अच्छे २ रस्न खोगये और इसीके साथ और २ कारणों से अंतमें वह गादी लग भग रुई के ढेर के समान रहगई । होलकर राज्य के संस्थापक मल्हारराव युधसिंहजी की रानी के भाई और उम्मेदसिंहजी के मामू अवश्य बने परंतु उन्होंने अपनी जाति का गुण न छोड़ा। उन्होंने सताये हुए की रक्षा करने के लिये शख ग्रहण नहीं किये जैसा वीर राजपूत जाति में होता है वरन राज्य का एक हिस्सा लेने के लिये । यही उनके भाई वा सामू वनने की उदारता का एक निःसंदेह प्रमाण है । इसीके अनुसार उन्होंने चंबल के किनारे पर पाटन कस्बे और जिले का अधिकार मांगा और पा लिया ।" अपनी पुस्तक में इसतरह का उल्लेख कर के टाड साहव इसी जगह एक टिप्पणी देकर दिखते हैं कि:- "उन दिनों में जब मरहटे देशको विगाढ रहे थे इसतरह के देश विजय की एक संयुक्त पूँजी स्थापित की गई थी। इसी के अनुसार पानी हिस्सों में बांटी गई। एक इनमें से पेशवा का दूसरा संवियों का और<noinclude></noinclude> gm251wek7ceq33jgh1di4251vftcito पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३५ 250 194989 665599 2026-07-06T16:51:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665599 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(POR) उम्मेदसिंह चरित्र | तीसरा होलकर का, परंतु पेशवा का हिस्सा नाम मात्र का था और इस हिस्से को पूना राज्य की सेवा करके होलकर ही लेते थे । सन १८१७ में जब देशभर में शांति स्थापित हुई पाटन का बहुत दिनों से खोया हुआ और बहुमूल्य परगना, बूँदी नरेश को मिलगया। इससे यहां के राजा और प्रजा को बडा हर्ष हुआ ।" इस तरह टाड साहब ने लिखकर अवश्यही होलकर का स्वार्थ दिखलाया है और यह स्वार्थ सच्चा भी हो सकता है परंतु इससे जिस काम में उन्होंने उम्मेद सिंहजी की सहायता की उसके लिये उनकी प्रशंसा न करना नहीं बन सकता है। अध्याय ११. भाईकी बहकावट | देवसिंहजी का वध | संवत् १८०९ में माघ शुक्रा १२ को महारावराजा उम्मेदसिंहजी के महाराज कुमार अजितसिंहजीका जन्म हुआ । इनके जन्म से पहले रानी उदावतजी के लिये गर्भ के अष्टम मास में शास्त्र विधि से राज्य व्यवहार के अनुसार सीमंत का उत्सव किया गया। जन्म होने पर शास्त्र की विधि से और राज्य व्यवहार से उत्सव हुआ । आज बूँदी में हर्ष का पार न रहा। राज्य और राज भक्त प्रजा में आनंद छा गया । साधारण गृहस्थ के पुत्र होने पर उसके माता पिता को और उसके नातेदारों को जो आनंद होता है वह व्यक्ति गत आनंद है क्योंकि उसले देशकी उन्नति अवनति का विशेष संबंध नहीं है किन्तु राजा के पुत्र होने का समस्त प्रजाको आनंद होता है। राजकुमार के जन्म लेने से भारत वर्ष की राजभक्त प्रजा समझती है कि आज हमारा रक्षक, हमारा प्राणदाता पैदा हुआ है। कैसी भी विपत्ति पडने पर वह अपने प्राणों की कुछ पर्वाह न कर हमारे प्राण बचायेगा। बूँदी की प्रजा अनेक वर्षों से घोर संकट सहकर<noinclude></noinclude> orq0uuoa4rur6l89h3o76o7x73uvuj4 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३६ 250 194990 665600 2026-07-06T16:51:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665600 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवसिंहजी का गधा | (१०१) जय टम्मेदसिंहजी के शासन में सुख से रहने लगी थी तब इनके पुत्र होने पर उसे दूमा हर्ष होना चाहिये था और हुआ भी उम्मेदसिंह बडा पुण्य किया । ब्राह्मणों को पुत्रोत्पत्ति के हर्ष में दान दिया, नौकरों को इनाम दिया, चारणों को रायों को माटों को खूब पारितोषिक दिया और सूर्यमल जी लिखते हैं "लाखोंही लुटादिया । जिस वर्ष महाराजकुमार अजितसिंहजी का जन्म हुआ उसी साठ महारावराजा उम्मेदसिंहजी ने अपने लघु बंधु दीपसिंहजी का सावर के राजा शक्तिसिंहजी सकतायत की कन्या से विवाह किया । विवाह किया और दोनों भाई परस्पर बडे ही स्नेह के साथ रहने लगे । एक बार पहले जब यह पूना में थे तब इन्हें लोगों ने बहकाया था परन्तु उस समय यह उनके चंगुल में न फंसे थे इस बार न मालूम क्यों लगये। संवत् १८९० की वैशाख शुक्रा १४ को यह शिकार का बहाना करके बूँदी से कोडे चले गये। वहां के महाराय दुर्जनशल्यजी ने इनका बड़ा सत्कार किया, इन्हें कुंवर पदेके महल में टिकाया और बडा ही प्रेम दिखाया। इनके कोटे जाने की खबर पाकर उम्मेदसिंहजी ने इन्हें समझाने के लिये इन्हें दिवालाने के लिये अपने मुख्य मंत्री को भेजा । उसने बहुत कुछ समझाया बुझाया परन्तु इनके मनको न भाषा | मुख्य मंत्री मन मारकर बूँदी लौट आया। दीपसिंह जी जब इसीतरह कुछ काल कोटे में व्यतीत कर रहे थे तब इन्द्रगढ के महाराजा देवसिंह जी को, जिनका स्वामिद्रोह पाठक पहले पढचुके हैं अपनी कुटिलता की यात्रा बढाकर दूनी चौगुनी करने का अवसर मिला। उन्होंने ठीक अवसर साथ- कर दीपसिंहजी के नाम पत्र लिखा । पत्र में लिखा कि- "भाई के टुकडोंसे पेट क्यों भरते हो? जरा बहादुरी दिखाकर दुनिया में अपना नाम करना हो, यदि बूँदी के राजराजेश्वर वनकर छत्रधारी होना हो, यदि चमरों और मोरछछों से "बढ़े जाओ मिहवन" की पुकार सुनकर अपने को कृतकृत्य करना हो तो मेरे पास शीघ्र चले आओ। आप के भाई का आप पर कुछ भी स्नेह नहीं है और उनकी बिलकुल<noinclude></noinclude> a8mfcokmb179s0rwlw1x2v4j3vz8juh पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३७ 250 194991 665601 2026-07-06T16:51:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665601 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १०४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | मी आप पर कृपा नहीं हैं इसलिये मेरे पास चले आओ। बूँदी का राज्य भोगने के लिये मैं जैसा कहूं वैसा करो। " दीपसिंह जी का मन पहले ही न मालूम क्यों उखड गया था । इस पत्र को पाकर वह आकाश के पुष्प लेने की तरह मृगतृष्णा में फंसे । यह पत्र उनके बोदे मन पर खूब असर कर गया । पत्र पाते ही वह मन मोदक बनाते, मनोराज्य का मिथ्या सुख लूटते, भोग विलास की आशा ही आशा में इन्द्रगढ पहुंचे । वहां जाने पर देवसिंहजी ने उनके कान भरकर खूब पक्का कर दिया । लुहार की धौकनी में जैसी हवा भरी जाती है वैसी ही निकलती है उसी तरह इनके कान में जैसी देवसिंहजी ने फूंक मारी थी वैसी ही बात उनके मुखसे निकलने लगी। वह इन्हींके बहकाये हुए जयपुर गये। वहां के महाराज मात्र सिंहजी ने अपना कामदार भेजकर इनकी पेशवाई की, जब यह महाराज से मिलने गये तब अपने सिंहासन के कोने पर इन्हें बिठाया, इन्हें पचास हजार की जागीर समेत उकडोद नगर दिया और इसतरह बडे सत्कार के साथ रक्खा । परायण बहादुर उम्मेदसिंहजी को भ्रातृस्नेह के कारण उन्हें खेद जानते थे कि ऐसे बंधुविरोध से, इस तरह दीपसिंहजी बडे भाई से, पिता के समान अपने परा- क्रम से राज्य का उद्धार करके दीपसिंहजी को विपत्ति से निकालने वाले बडे भाई से रूठकर इन्हीं का राज्य छीनने की मृगतृष्णा से जयपुर की शरण में चले गये थे परन्तु राजनीति इस बात से बिलकुल भय न था । हां अवश्य था परन्तु वह अच्छी तरह ऐसे लफंगों के बहकाकर प्रपंच रचने से राज्य नहीं जा सकता है। जिस राज्य की अब नीव गहरी लगगई है वह सहसा उखड नहीं सकता है। यह भली भांति जानते थे कि राज्य उखड ने के कारण ये हैं:- "विक्रोशत्यो यस्य राष्ट्रात हियंते दस्युभिः प्रजाः, संपश्यतः सभृत्यस्य मृतः स नतु जीवति ।" जब वह जानते थे कि हमारे राज्य में राजा राज और प्रजा चैन है, जब हमारे राज्य में चोरों से, लुटेरों से प्रजा नहीं सताई जाती है, जब सर्वत्र शांति<noinclude></noinclude> 8z69pvs0a4rstsf9nfcsjwl6lvhqusr पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३८ 250 194992 665602 2026-07-06T16:51:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665602 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवसिंहजी का वध | (१०५) निवान होने से हम औरों की तरह जीते हुए भी मरे नहीं हैं तब हमारा राज्य को जायगा हजार शत्रु खडे होने पर भी, हजार प्रपंच रचे जाने पर हमारी प्रजा हमें जी जान से चाहकर हमारे लिये जान माल देने तथ को तैयार है तब हमारा राज्य क्यों जायगा बस इसीलिये यह इन दिनों राज्य की उन्नति के कामों में, प्रजाके उपकार के कामों में और हिन्दूधर्म की वृद्धि के कामों में लगे हुए थे। इसी कारण बूँदी की सदा बाहरी आक्रमण से और भीतरी अशांति से रक्षा करके यहां की प्रजा में भक्ति रसका पवित्र संचार करने के लिये इन्होंने यहां के राजप्रासाद में संवत् १८११ की जेष्ठ कृष्णा ११ के दिन शुभ मुहूर्त में श्रीरंगनाथजी की स्थापना की । इसी वर्ष कार्तिक शुक्ला पट्टी को खवास गुमानरायजी ऐ खवासीने पुत्र शिवसिंहजी और संवत् १८११ की माघ १२ को रानी उदावतजी से दूसरे महाराज कुमार बहादुर सिंहजी का जन्म हुआ। ये घटनायें उस समय की हैं जब क्रूर सिराजुद्दौला की निर्दयता से १४६ अंगरेज इत्ते की कालकोठरी में दम घुट २ कर मर गये थे, ये उस समय की बातें हैं जब मुसलमानों के राज्य की इतिश्री करके लार्ड क्लाइव ने बंगाल के नवाब सिराजुदौला को प्लासी के मैदान में हराया था । उन बातों के लिखने की यहां आवश्यकता नहीं परंतु जो लोग उस समय के इतिहास से जानकार हैं ये समझ सकते हैं कि महारावराजा उम्मेद- सिंहजी ने देश व्यापी राष्ट्र विश्व के समय भयानक अराजकता के समय अपना राज्यस्थापित किया। भारत के इतिहास के उस समय के का पृष्टों को पढकर यदि कोई उम्मेदसिंह के शासन में उसी समय शांति स्थापन की घटना का इस चरित्र में पाठ करेंगे तो वे लोग समझ जायेंगे कि किस कठिन भयानक समयमें इन्होंने अपने आतंक से अपनी राजनीति से और अपने बुद्धि बल से, अपने व विक्रम से काम निकाल कर सफलता पाई। बस दोनों इतिहासों से इन्हीं ऊपर दो एक घटनाओंका संकेत किया गया है। बातों का परिणाम निकालने के लिये खैर कुछ भी हो बूँदी के इतिहास "वंश भास्कर" और "वंश प्रकाश" में लिखा है कि इस अवसर में महारावराजा उम्मेदसिंहजी जय प्रजापाखन के<noinclude></noinclude> 78obnwxn6eajgjnvpsqg1zvd8wj59wt पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१३९ 250 194993 665603 2026-07-06T16:51:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665603 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १०६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | कामों में दत्त चिच थे तब इन्द्रगढ के जागीरदार देवसिंहजी ने अपनी पहली कुचालोंसे संतुष्ट न होकर कुलद्रोह करते २ पेट न भरने से और अपना मतलब न गंठने से जयपुर में दीपसिंहजी के नाम पत्र लिखा है. उसमें लिखा :----- "अब आपसे डर कर उम्मेदसिंहजी आप को बुलाने के लिये आपके पास अपना अमात्य भेजेंगे परंतु आप उनके मनाये से मत मानना । जरा धीरज रखिये। हमने दक्षिणियों से प्रयत्न किया है। हम आपके लिये पूना नरेश को कुछ रुपया देकर आपको बूँदीका राजा बना देंगे ।" संयोग वश यह चिट्ठी दीपसिंहजी के पास पहुंचने के बदले उम्मेदसिंहजी को मिल गई । उन दिनों दक्षिणियों की सेना बूँदी के पास होकर जयपुर को जारही थी । मल्हाररावजी, रघुनाथरावजी, नानाजी आदि बढे २ मरहटे सरदार उम्मेदसिंहजी पाहुने थे। उस समय हाथ आते ही इन्होंने यह चिही इन लोगोंको दिखलाई। इन्होंने उसे पढकर उम्मेदसिंहजी को सलाह दी कि:-. "अब देवसिंहजी को मारडालना ही अच्छा है। नहीं तो यह कुछ और उपद्रव खडा करके हजारों वीरों को कटवायेंगे ।" ? इस बात को सुनकर वह उस समय संवत् १८१४ में सो चुप होगये परंतु फिर अवसर पाकर जब करवर गये तब इन्द्रगढसे देवसिंहजी और उनके पुत्र दौलतसिंहजी महाराव राजा उम्मेदसिंहजी की सेवा में उप- स्थित हुए। आकर ये लोग बडी चापलूसी की बातें बनाने लगे । देव सिंहजी ने श्रीमान् से निवेदन किया कि:- "आप स्वामिधर्म का खूब पालन करते हैं। हम आपके नौकर हैं। जो कुछ आज्ञा हो करने को तैयार हैं ।" देवसिंहजी की इसतरह कपट भरी बातें सुनकर शांति की मूर्ति उम्मेदसिंह जी अपने क्रोध को न रोक सके । उन्होंने, देवसिंहजी का, दीपसिंहजी के नाम पत्र, जिस पत्रका अभी वर्णन हुआ है मंगवाकर इन्हें दिखलाया । दिखलाकर बोले:-<noinclude></noinclude> 2ayvkc1ekydoklysl6x6rf3s6y89hhn पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४० 250 194994 665604 2026-07-06T16:52:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665604 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवसिंहजी का वध | ( १०७ ) "नयों रे नराधम इसतरह स्वामिद्रोह करके और कुछ नाश करके हमारा यमला है देख तेरी करतूति में कितने वर्षों से तेरे अपराधों- राम नहीं देता था ? तैने उस गाढी भीड समय घोटा न देकर जो जो कटु वाक्य कहे थे उन्हें में भूलगया था क्योंकि तुझ जैसे मेढकों पर शख खाने में मेरी शोभा नहीं है परंतु अब तेरा मरना ही भला है । तू यदि जियेगा तो देशमें, कुलमें, राज्य में और राजाओं में फूट फैलाकर न मालूम कितने सिर कटा देगा ।" बस इतना कहकर उसी क्षण देवसिंहजी का शिर काटलिया । उनके पुत्र ने लड़ने के लिये जत्र तलवार निकाली तो उन्हें कैद करके बूँदी भेज दिया और उसी समय इन्द्रगढ़ में बूँदी नरेश का अधिकार होगया। एक बार बूँदी की सेना के हार जाने बाद दूसरी लड़ाई में विजय होकर तोली में अधिकार हुआ। अणधोरे और ढीपरी में अधिकार हुआ और इन्होंने ढोपरी तथा इन्द्रगढ में किले बनवाये । तीन वर्ष बाद इन्होंने दौतसिंहजी के मरने पर देवसिंहजी के भाई भक्तरामजी को इन्द्रगढ लौटा दिया। ऊपर जो कुछ देवसिंह जी के विषय में दिखागया है वह बूँदी के इतिहास से किन्तु टाड साहब लिखते हैं कि---- "एक बदला लेने के कामले उम्मेद सिंहजी के चरित्रमें दाग - गया। चाहे यह काम बडी बहादुरी, वडी बुद्धिमानी का ही क्यों न हो, चाहे राजपूतों के इतिहासमें निर्दोष ही क्यों न समझा जाय परंतु इन्हें जब राज्य पाये आठ वर्ष बीत चुके थे, जब दवलाना की हार के बाद इन्द्रगढ वाले से निर्दयता का काम बना वह भूल जाने के योग्य था अथवा क्षमा करने के 1. योग्य था, जब एक गुप्त बीत जाने पर भी उसे दंड नहीं दिया गया तब यदि उम्मेदसिंहजी जैसे उदार नरेश ने बदला लेने की नीति परित्याग करके बुद्धिमानी की नीति ग्रहण को होती तो हम प्रसन्न होते किन्तु इस ओछे राजपूत ( देवसिंह ) ने अपने मालिक की आवश्यकताओं पर ध्यान न दिया, उस समय अपने को न धिक्कारा किन्तु उनका मन बहुत<noinclude></noinclude> kc20gbhlp82hujqwlez3s25wz3f2xtu पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४१ 250 194995 665605 2026-07-06T16:52:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665605 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १०८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | हलका था। उसने अपने कर्तव्य पर ध्यान न देकर जिस मनुष्य ( उम्मेदसिंह जी ) को वह एक बार सता चुका था उसे हीं फिर उसकी बडी हिम्मत पर धिक्कारा, उसकी क्षमा शीलता पर घृणा ^की और उसे ऐसे समय में जो बहुत नाजुक था और जिसके लिये क्षमा नहीं की जासकती है फिर सताकर क्रुद्ध कर दिया । उम्मेदसिंहजी ने अपनी बहन की सगाई के लिये जयपुर नरेश माधवसिंहजी के पास नारियल भेजा। उन्होंने इस दस्तूर का राज दर्बार में उस प्रतिष्ठा के साथ स्वागत किया जो राजपूताना की एक अति प्रसिद्ध जाति के लिये उचित है। उन दिनों इन्द्रगढ के देवसिंह जी भी वहां उपस्थित थे। मानसिंह जी ने सम्मान पूर्वक देवसिंह से संकेत करके कहा:- "बुधसिंह जी की बाई की क्या बात ? " " इसपर यदि देवसिंह अपने राजा का हित साधता तो उसके लिये अच्छा अवसर था किन्तु उसने उनकी निन्दा करके अपने मालिक को नाराज कर दिया। थोडे ही समय में उस बाई का विवाह मारवाड नरेश के साथ होजाने से यह सिद्ध होगया कि उसने विलकुल झूठी निंदा की थी परन्तु उस समय नारियल लौट आने से बूँदी का इतना अपमान हुआ था जिसे राजपूत लोग कभी क्षमा नहीं कर सकते हैं। " "संवत् १८१३ में जब उम्मेदसिंहजी बीजासनी माताके दर्शन करने गये तत्र इन्होंने करवर में देवसिंहजी को बुलाकर मारडाला । इस तरह हरामखोरों का और कुछद्रोहियों का उन्होंने मैदान साफ करडाला। मानों इनके धुएं से आकाश भी अपवित्र न होने पाये इसलिये उम्मेदसिंह जी ने इसके टुकडे २ करवा कर तालाब में गिरवा दिया । उसकी जागीर इन्द्रगढ उसके भाई को देदी गई । " " पन्द्रह वर्ष तक प्रबंध की गडबढ में उम्मेदसिंहजी का ध्यान उगा घटना का विचार इनके रहा किन्तु इन सब बातों के होते हुए भी एक हृदय को बेचता रहा। वह यही थी कि केवल परमेश्वर के अधिकार में है छीनकर अपने इन्होंने बदला लेने का काम जो हाथमें लेलिया यद्यपि इस<noinclude></noinclude> lflau9n2yt6jnh8eoz4bdpvr8z8tq1o पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४२ 250 194996 665606 2026-07-06T16:52:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665606 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवसिंहजीका वध | ( १०९ ) के लिये किसी ने चुं तक न की, यद्यपि वह (उम्मेदसिंह जी ) मानते हे द्रोही देवसिंह जी को अपने किये का फल मिलगया। उनकी और वीर आत्मा देश की चाल के अनुसार चाहे इस काम को मिझती हो परंतु उनकी बुद्धि को तब ही संतोष हुआ जब उन्होंने अपना राज्य छोड़कर अपने जीवन के शेष दिन धर्म के कानों के दिये भारत वर्ष भर की लंबी चौडी यात्रा करके, अपने विश्वास के अनु- सार पवित्र देवस्थानों के दर्शन करके यात्रियों के वेश में बिताये ।" टाउ साहब का देख जितने अंश में बूँदी के इतिहास से मिलता जुलता है, जहां थोडा बहुत अंतर है यहां की बातों पर सम्मति देने की मुझे कुछ resent नहीं किन्तु उन्होंने जयपुर की सगाई का वर्णन ऐसा लिखा है जिसका बूँदी के इतिहास में, सूर्यमल्लजी जैसे बिना लाग पेट के सथा दिखने वाडे इतिहास लेखक के लेख में पता नहीं है। फिर मैं नहीं कह सकता कि ढाड साहब ने इस बात को कहां से पा लिया । मेरा जहां तक विचार पहुंचता है यह घटना किसी ऐसे रजवाडे के इतिहास से डीगई है जिसका बूँदी से द्वेप रहा हो क्योंकि यदि यह बात सत्य होती तो उसी समय जयपुर बूँदी का बमशान युद्ध हो जाता, चाहे इस युद्ध में हाडाओं के रक्त की नदी ही क्यों न वह जाती परंतु जिन वीर हाडाओं ने अपनी हानि लाभ का रंचक भी विचार न करके कभी मुसल- मान बादशाहों को बेटी न दी वे कभी, हजार डूब जानेपर भी जय- पुर से ऐसा अपमान सहकर जीते न रहते और जब देवसिंहजी बूँदी के एक छोटे से जागीर दार थे तब वे भी उसी क्षण अपने किये का फल पाते। इसके सिवाय देवसिंहजी का उम्मेदसिंहजी से हजार द्वेष होने पर भी वह हाडा थे ऐसी बात से केवल बूँदी पर ही कलंक नहीं किन्तु उनपर भी कलंक लगता था इसलिये उन जैसे प्रपंची की जीभ से भी ऐसे वाक्य कभी नहीं निकल सकते थे इस कारण में इस घटना को सत्य नहीं मानता हूँ। साहब वहादुर के लेख में एक और बात मेरे जी को खटती है। वह देवसिंहजी का वध करने पर निष्कलंक उम्मेदसिंहजी के मिल<noinclude></noinclude> r2w0itom2ltm5tvol1ci5j4arbld1ae पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४३ 250 194997 665607 2026-07-06T16:52:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665607 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११० ) उम्मेदसिंह चरित्र | चरित्र पर धब्बा मानते हैं। जब निर्दोष ईश्वर है, संसार में उसके सिवाय कोई वे ऐव नहीं है, जब शरद पूर्णिमा का पूर्ण चन्द्रमा भी कलंक से शोभा पाता है तब यदि राज्य के संस्थापक में कोई दोष आगया हो और यदि उसने राजनीति की रक्षा के लिये कोई काम कर डाला हो तो चन्द्रमा के कलंक की तरह वह भी शोभा देनेवाला है। भारत वर्ष में अंगरेजों का राज्य स्थापित करनेवाले कार्ड लाइन और बारन हेस्टिंगस ने कितने कपट किये थे परंतु क्या कोई अंगरेज उनकी चालों को कपट गिनते हैं, उनपर कलंक लगाते हैं अथवा किसी ने उनपर कलंक लगाकर उनके किये हुए काम को उलट दिया है। नहीं उनके प्रपंच की बदौलत देशभर में राज्य स्थापित होगया । उसमें उनका भी दोष नहीं । समय पडने पर राज्य संस्था- पकों को विवश होकर करना पडता है इसलिये यदि उम्मेदसिंहजी ने राज्य की रक्षा के लिये देवसिंहजी को मारडाला हो तो भी कोई दोष नहीं किया । परंतु जब टाड साहब स्वयं जयपुर की घटना को सत्य मानते हैं तब प्रिय पाठक सोचै कि ऐसे कुल द्रोह के लिये क्या दंड था ! जो कुछ हो परंतु इतना निश्चय है कि यदि देवसिंहजी झूठी चापलूसी न करते, यदि दीपसिंह जी वाले पत्र का कपट उम्मेदसिंहजी के आगे न खुला होता तो उन्होंने गाढी भीड के समय घोडा न देने पर जैसे देवसिंहजी का अपराध जाने दिया था उसी तरह फिर भी यह उन्हें दंड न देते परन्तु वह जानते थे कि मेर बुढापा पास है, मुझे पुत्र को राज्य देकर वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करना है, मेरे पीछे से, मेरे समक्ष ही यह दुष्ट नये २ उपद्रव खडे करके खून खराबी करेगा, इस राज्य की जड पक्की न जमने देगा इसलिये देवसिंहजी के झूठ बोलने पर उनका तुरंत शिर काट लिया। शिर अवश्य काट लिया परन्तु उनके भाई को जागीर देदी। उन्होंने इस काम में उसी नीति का पालन किया जो मनीपुर के राजा को दंड देकर एक बालक को गी देने में ब्रिटिश गवर्नमेंट द्वारा काम में लाई गई है। इस घटना से उसमें बडा अंतर है। दोनों की तुलना करके अच्छी बुरी का निर्णय करना पाठकों के हाथ में है ।<noinclude></noinclude> b12b23lz0isuvxx4x6iycfmusg2qtnx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४४ 250 194998 665608 2026-07-06T16:52:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665608 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सेंधिया से बतढाव ( १११ ) अध्याय १२. -- सेंधिया से बतढाव | भाईको क्षमा । संवत् १८१५ में जय जयाजी सेंधिया के पुत्र जनकूजी अपनी वीर बाहिनी (सेना) को लेकर दक्षिण से जयपुर जाते हुए भैंसरोडगढ क्षा पहुंचे तब खबर पाकर महारावराजा उम्मेदसिंहजी उनसे मिलने के लिये गये। वहां जाकर सेंधिया से कहा कि :- "यहाँ से बूँदी बहुत निकट है। वहां चल कर हमारी ओर से पहुनाई स्वीकार कीजिये ।" जब इन दोनों का इस तरह प्रेमालाप हो रहा था तब ही इन्द्रगढ वाले सिंह जी की पत्नी का निवेदन पत्र सेंधिया के नाम पहुंचा । उस चिट्टी को पढ़ कर जनकूजीने उम्मेदसिंहजी पर दवा डाला । इनसे कहा कि:- "आप हमारी सहायता पाकर दुःख कूप से निकले हैं। हमारी सलाह बिना यदि आप कोई काम करेंगे तो उसमें आपका भला न होगा । अब जो अपने राज्य के स्वामी बने रहना है तो उन्हें इन्द्रगढ देदीजिये।" यह सुन उम्मेदसिंहजी को क्रोध आया। वह कोई काम दबकर करना पसंद नहीं करते थे। जयपुर की रानियों पर जब खंडूजी ने अत्या चार करना चाहा तब उन्होंने जिस तरह आंखें दिखाकर स्पष्ट कहदिया था उसी तरह उन्होंने इस बार भी कह दिया। इन्होंने साफ साफ "कह दिया कि:- "हमने इन्द्रगढ के विषय में जो कुछ किया है वह आपके अन्नदाता पेशा से पूछकर किया है। इस पर भी आप बुरा मानते हैं तो आप को अधिकार है। आप को आस के प्रेमपर कुठार चलाकर हित में अहित<noinclude></noinclude> s9881x19agh8ojk9yf7efxz0zyqd8xq पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४५ 250 194999 665609 2026-07-06T16:52:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665609 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११२ ) "करना है तो आप खुशी उम्मेदसिंह चरित्र | बूँदी पर चढाई कीजिये। हम भी हाडा हैं । इस तरह लडाई से डरने वाले नहीं हैं। हम भी रणभूमि में हाथ दिखाने को तैयार हैं। आप निश्चय जानिये | जब तक प्रत्येक हाडा का शिर धड से अलंग न हो जायगा तब तक बूँदी की ओर आप आंख उठाकर भी न देख सकेंगे। हम रण में पीठ दिखाने वाले नहीं हैं ।" यह कहकर उम्मेदसिंहजी बूँदी चले आये । आपुत का विरोध देखकर मल्हाररावजी ने और नाना जी के भाई ने जनकूजी को तथा उम्मेदसिंहजी को समझा दिया। दोनो में इस तरह मेल होगया। दोनों की उड़ाई के लिये तैयारियां योंही रहगई। आगे की घटना का यद्यपि बूँदी के इतिहास से और उम्मेदसिंहजी के चरित्र से विशेष संबंध नहीं है परंतु रणथम्भोर किले का पहले बूँदी के नरेशों से संबंध रहा है, क्योंकि राबराजा सुरजन जी का दिया हुआ ही बाद- शाह अकबर ने यह किला पाया था इसलिये प्रसंग आ पडने पर उसके विषय में यहाँ कुछ लिख देना अनुचित नहीं है। सात वा दश शते लिखवाकर राव राजा सुरजनजी ने जब से यह दुर्ग बादशाह को दिया तब से अबतक इसकी क्या स्थिति रही सो कहने से यहां कुछ मतलब नहीं है परंतु इतना अवश्य है कि रणथंभोर जैसे दुर्गम दुर्ग की अटल कीर्ति सुनकर मरहटों का भी उसे लेने के लिये जी ललचाया । जनकूजी संघिया जब इसी चढाई में जयपुर से दंड लेकर छोटे तो उन्होंने रणथंभोर पर घेरा देदिया । कहते हैं कि तीन वर्ष के घेरे से तीन वर्ष की लडाई से भी यद्यपि किला टूटा नहीं परंतु अब किले वाले चवडा उठे। उन्होंने जयपुर नरेश माधवसिंहजी को लिखा कि--- "कवा बादशाह के नौकर हैं इसलिये हम यह किला आप को दे देंगे। आप तुरंत अपनी सेना भेजकर इसपर अपना पचरंगी झंडा उडालें । हम यहाँ से निकल कर आप के लिये किला खाली कर देंगे, आपका झंडा उडवा देंगे परंतु मरजाने पर भी रणथंभोर में सरहदों को न घुसने देंगे।"<noinclude></noinclude> pbwuchqtyay9amxypl0t869nh1lwysd पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४६ 250 195000 665610 2026-07-06T16:53:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665610 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>या संय ( ११५ ) किये का अपने पूर्वजों के किये का फल मिल गया। इस बात कुछ संबंध नहीं है। प्रसंग गा आपने एवं यहां संकेत किया यदि श्रीमान् महाराव राजा रामसिंहजी जैसे राजा के चलने का तो पाठक उसमें इस बात का विस्तार से वर्णन पायें अध्याय १३. सैनिया से संग्राम | जयपुर में युबराज । समय वडा विचित्र है। यह सिंह को बकरी और बकरी को सिंह वनादेता २ है । यह राजा से रंक और रंक से राजा करदेता है। जो यपुर अवतक मरों से पिटते ? और उन्हें दंड में रुपया देते २ हैरान हो चुका था अनेक बार की चढाई में जिस जयपुर को मरहठों ने छिन्न मिश्र कर डाला था उसे ही समय आने पर शत्रुको दुर्बल देखकर उसका राज्य छीन लेने का सिला हुआ। जयपुर की ऐसी ढिठाई मरहों से सहन न की। उन्होंने इसीलिये जयपुर पर चढाई करने का मनसूबा किया और इसीको सुनकर महाराज माधवसिंहजी धवडाये। उन्होंने चाकर-भयमीत होकर महाराव राजा उम्मेदसिंहजी को लिखा- "यातो मरहठों को समझा बुझाकर उनका कोष निवारण फौजिये अथवा युद्ध के समय हमें सहायता देने के लिये अपनी धीरवाहिनी - ( सेना ) भेज- कर हमपर कृपा कीजिये ।" इस चिट्ठी को पढकर महारावराजा उम्मेदसिंहजी असमंजस में पडे या नहीं सो नहीं कहा जासकता है परंतु यह विचार में पडे होतो कुछ आर्य नहीं क्योंकि एक ओर से मरहठे जब इनके उपकारक मित्र थे तब दूसरी ओर माधवसिंहजी इनके सगे थे, सजातीय थे और स्नेही थे। इस कारण इनके मनको दुविधा हुई होतो कुछ आचर्य नहीं परंतु इतिहासों में इस बात का उल्लेख नहीं है। कुछमी हो "वंशमास्कर" में सूर्यमल जी ने लिखा है<noinclude></noinclude> au426ao4p3hc4gxh9fkaeprvbad1m2k पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४७ 250 195001 665611 2026-07-06T16:53:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665611 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | कि इस खबर को सुनकर महागाव राजा उम्मेदसिंहजी ने संवत् १८१८ में अपने पाटवी महाराजकुमार अजितसिंहजी के साथ पांच हजार सेना जयपुर की सहायता के लिये भेजी। इस चढाई के समय महाराजकुमार का वय यद्यपि केवल नौ वर्ष का था, यद्यपि यह निरे बालक थे परंतु शूरवीर पिता के पुत्र थे, पराक्रमी हाडावंश के कुलकम थे, शक्ष विद्या सीख चुके थे और बहुत कम उमर होनेपर भी संग्राम में तलवार चलाने के उल्लुक थे । इनके पिता भी चाहते थे कि यह बीर बालक युद्ध निपुण बनकर अपना कर्तव्य पालन करना सीखे अभी से राजकाज की उलझन में पडकर तैयार होजाय क्योंकि वह जानते थे कि विपत्ति ही उन्नति का लार्ग बतलाने वाली है। एक बालक महाराजकुमार, प्राण से भी बढकर प्यारे पाटवी को भेजने पर उम्मेदसिंहजी के क्षत्रियोचित, हाडो- चित साहस की माधवसिंहजीने बहुत सी स्तुति की। नियम न होने पर भी वह जयपुर के महलों से मोती डूंगरी तक पेशवाई के लिये आये । इनका सदा के नियम को छोड़कर असाधारण सत्कार किया । इन्हें अपने ही पास "" महलों में टिकाया । उन्होंने बातचीत में, सेर शिकार में और युद्धकला में जब २ इन्हें टटोला, जब २ इनकी जांच की तब ही तय सिंह शावक की तरह इनका पराक्रम निकला माधवसिंहजी को बालक कुमार की वीरता पर साहस पर बड़ा आक्षर्य हुआ। उन्होंने अपने सिंहासन पर अपने सामने इन्हें बिटलाया। जब इसतरह के परस्पर प्रेम बढ़ाने वाले तव से यह वहां बहुत समय तक रहलिये तब बूँदी के पुरोहित दयारामजीने अवसर साध कर महाराज से कहा उनके प्रयत्न का फल अच्छा हुआ और आमेनरेश जयसिंहजी ने महाराव राजा बुधसिंहजी से जो पत्र लिखवा दियाथा वहीं महाराज माधवसिंहजी ने लौटा दिया। केवल इतना ही नहीं वरन महाराजकुमार अजितसिंहजी के डेरोंपर जाकर उन्होंने एक हाथी, दो घोड, दो सिरोपाय, और एक आभूषण दिया और लिख दिया कि बूँदी नरेश का जयपुर में जो सरकार होता है उसका आधा महाराज कुमार का अबले हुआ करेगा। जैसे जयपुर नरेश बूँदीनरेश की पेशवाई एक कोस तक<noinclude></noinclude> 4scu460zqacqjz90bjx5pt8u2re9l99 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४८ 250 195002 665612 2026-07-06T16:53:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665612 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सेंधिया से संग्राम | ( ११७ ) करते हैं तो महाराज कुमार की आधे कोस तक करेंगे। मराठों की कढाई उस बार रुक गई थी इसलिये पूर्ण सत्कार के साथ, बडे आमोद प्रमोद के साथ और बड़े ही स्नेह के साथ इनको जयपुर से विदा किया और एक प्रतिष्ठित सरदार को इन्हें पहुंचाने के लिये भेजा खुशी २ विदा होकर उसी वर्ष की माघ शुद्ध ५ को पूज्य पिता के दर्शन पाकर प्रसन्न हुए। इस विषय में इस तरह यह यहां से बूँदी पहुँच कर, अपने बूँदी के इतिहास में भी कुछ २ मत मेद है। कविराजा सूर्यमलजी ने जब इस घटना का वर्णन मरहठों की चढाईके समय किया है तब पंडित गंगासहाय जी ने "वंश- प्रकाश" में इसका उल्लेख जयपुर पर जाटों की चढाई के समय किया है। संवत् १८१९ में जय महाराज स धवसिंहजी किसी कार्य से रणर्थ- मर गये थे तब उन्होंने महारात्र राजा उम्मेदसिंहजी को परस्पर मित्र क्षा की वृद्धि करने की इच्छा से मिलने के लिये बुलाया। यह गये और दोनों नरेशों में खूब प्रेम बढा। जिस समय दोनो नरेश इसतरह आपुस का हेलमेल बढा रहे थे इनकी महारानी अदावनजी का स्वर्गवास डोगया। ईडर नरेश की राजकुमारी इनकी दूसरी सनी जी का पहले संवत् १८०६ में और तीसरी रानीजीका संवत् १८१० में देहांत होनी चुका था इसलिये श्री विहीन, गृहिणी विहीन होकर यह अवश्य चिन्तित हुए परन्तु महाराव राजा उम्मेदसिंहजी संसारका खुस छूटने के लिये, विषयासक होनेके लिये और भोगविलास में पड़े रहने के लिये पैदा नहीं हुए थे, । अवश्यही उन्होंने बिना मांगे मिलने पर कुलरीतिके अनु सार राजधर्म के अनुसार तीन विवाह किये परन्तु उन्हें न तो सुख भोगने का अवसर ही मिला और न उन्होंने विषय रत होना चाहा क्योंकि वह बूँदीका उदार करने के लिये, देशविव के समय अपना राज्य स्थिर कर के नाम पैदा करने के लिये पैदा हुए थे। वह विपयी नहीं थे किन्तु कर्तव् स थे। उन्होंने मापन से लेकर बुढापे तक अपने कर्तव्य का पाउन किया है अबतक उनके शरीर में प्राण रहा, उनका एक दिन भी ऐसा न गया जिस में उन्होंने अपना कर्तव्य धर्म न पाठन किया हो। यह बात इस चरित्र के .<noinclude></noinclude> l4unxrpoje0qbjrbmiq924hlcsdfhsn पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१४९ 250 195003 665613 2026-07-06T16:53:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665613 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ११८ ) उम्मेदसिंह चरित्र । गत पृष्ठों और आगामी पृष्ठोंसे पाठकों को भलीभांति विदित होजायगी । रणथंभोर में गृहिणी मरण का संवाद पाकर उम्मेदसिंह जी बूँदी आये। इसी वर्ष में इनकी खवास जी के एक पुत्र और हुआ । इसी वर्ष में जब यह अपने प्रजा पालन के कर्तव्य में लगकर गृहिणी बियोग के दुःख को मुखा रहे थे सेंधिया की मारवाड़ नरेश से लड़ाई ठन गई। जैसे जयपुर नरेश ने सहायता मांगी थी वैसे ही जोधपुर नरेश विजयसिंहजी ने इनको अपनी सहायता के लिये बुलाया । बुलाहट पाकर यह गये सही पर मारवाड नरेश सेंधिया के आगे ठहरने का साहस न कर सके। यद्यपि महाराज इनका बहुत कुछ आदर किया और दूर तक पेशवाई की परन्तु सेंधिया को आठ लाख रूपया देकर मेल कर लिया। सेंधिया इस तरह मारवाड से दंड लेकर जयपुर पर चढ गया और उम्मेदसिंह जी बूँदी चले आये । यह चले तो आये परन्तु इस यात्रा में जोध पुर नरेश के चाचा ईडर नरेश की कन्या उदयकुमारि को फिर व्याह लाये । इस तरह तीन रानियों का स्वर्गवास होने पर इनका चौथा बि- बाह आषाढ शुक्रा ९ को संवत् १८१९ में हुआ । कोटा नरेश दुर्जनशस्य जी के मरने से इतने वर्ष यद्यपि कोटा वाले इन से छेडछाड करने से चुप थे परंतु अब महाराव छिबरसिंह जी को फिर बूँदी से विरोध करने का अवसर मिला। जिस समय महाजी संधिया जयपुर राज्य को छूटते २ मोजाद में आ पहुंचे कोटा नरेश ने अपने सचिव अक्षयराम कायस्थ को भेजकर मरठों को बहकाया | उनसे कह छाया कि:- "आप चाहे उम्मेदसिंह जी को अपना मित्र समझते हों परन्तु वह आप के मित्र नहीं हैं। यदि मित्र होते तो आप के विरुद्ध होकर मारवाड नरेश की सहायता के लिये क्यों जाते। इस लिये आप उन पर चढाई कीजिये 5 इस तरह महाजी को बहकाने में चाहे कोटे बालों का यही उद्देश्य था कि. बूँदी हमें मिलजाय। इसी उद्देश्य से उनके पिताने नाना प्रपंच रचे थे<noinclude></noinclude> j2yaldvznvgxeq6pvx7v5zg81ba0vgc पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५० 250 195004 665614 2026-07-06T16:53:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665614 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सेंधिया से संग्राम। ( ११९ ) और इसी उद्देश्य से उन्हों ने यह बखेड़ा खड़ा किया। परिणाम पर दृष्टि न देकर बात का मर्म न जान कर संघिया कोटे वालों की बहकावट में आगये । उन्होंने उम्मेदसिंह जी के बिना बूँदी को खाली पाकर चहाई की जिस समय इनके पास यह खबर जोधपुर में पहुंची यह दौडते हुए बूँदी आये और इनके आते ही लढाई छिडगई । बूँदी की सहायता के लिये जयपुर से और शाहपुरे से सेना आई संधिया की सहायता पर स्वयं कोटा नरेश थे। दोनों ओर से खूब तोपों की भरमार हुई। यद्यपि हालही उम्मेद- सिंह जी भारवाड नरेश की सहायता के लिये स्वयं गये थे परन्तु विजयसिंहजी नें सेविया के करते इस समय सहायता के नाम पर एक सिपाही भी न भेजा । संवत् १८१९ को मात्र कृष्णा १३ से इस भीषण युद्धका आरंभ हुआ। संग्राम इतना भारी था कि वीररसमत्त महारावराजा को दिन रात, आठ पहर चौसठ घडी कमर खोलने का अवसर नहीं मिलता था । बूँदी की तोपों और यहां की बंदूकों ने मरहठी सेना को छिन्न भिन्न कर दिया और मरहठी घेरे को विदारण कर डाला। अब महाजी सेंधिया ने समझ लिया कि हजार शिर पटकने पर भी बूँदी का तोडना लोहे के चने चबा- ना है। बूँदी विजय का साहस करके अपनी उपार्जित विजयकीर्ति को मटिया मेल कर डालना है इसलिये उन्होंने उम्मेदसिंह जी को पत्र लिखा उसमें लिखा कि :- "हमने कोटा नरेश के बहकाने से व्यर्थ ही आपसे झगडा बढाया । व्यर्थ ही संग्राम किया । अब आप यहां पधार कर हम से मिलिये। हमने बूँदी लेने का और आपसे युद्ध करने का क्षुद्र साहस छोड दिया ।" जब यह पत्र उम्मेदसिंह जी के पास पहुंचा तो पहले वह बहुत ही विचार में पढे । उन्हें संदेह हुआ कि कहीं धोखा न दिया जाय परन्तु यह तलवार बहादुर थे, एकवार जयपुर की सेना में से गोलों की आग में सेना को काई की तरह फाडते हुए लंगडे घोडे से निकल गये थे इसलिये उन्होंने समझ लिया कि यदि धोखा भी होगा तो तलवार के बल से दश वीस को मारकर सेंधिया के घेरे में से निकल जायेंगे। बस इसी भरोसे पर उन्होंने नगर<noinclude></noinclude> crhm987d4pbb2vaim7hr6rod4k1mdwc पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५१ 250 195005 665615 2026-07-06T16:54:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665615 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १२० ) उम्मेदसिंह चरित्र | से निकलकर सेंधिया से मिलने का साहस किया। उन्होंने चलते समय यहां के किलेदार भगवंतसिंहजी से कहा:- "हम सेंधिया से मिलने जाते हैं। यद्यपि हमें अपने मारे जानेका कुछ भय नहीं है क्योंकि संग्राम में मरने से राजपूतको स्वर्ग मिलता है परंतु जो हम मारे ही जांय तो जबतक तुम्हारे शरीर में प्राण रहे तबतक शत्रु बूँदी न लेने पाये। मरने से पहले शत्रुको नगर में घुसने न देना । यही हमारी आशा है ।" इस तरह की आज्ञा देकर उम्मेदसिंहजी अपनी तलवार के भरोसे, अपनी शक्ति के भरोसे और अपने इष्टदेव के भरोसे शत्रु सेना में निर्भय होकर घुस गये। सेंधिया ने इनके आगमन की खबर पाकर इनकी उचित स्थान तक पेशवाई की। इन्होंने उनसे कहा कि :--- "क्या हमपर चढाई करके संधि को तोडने आये हो ? क्या अपनी अपने स्वामी की संधि के टुकडे कर डाटने से ही आपका भला होगा ।" सुनकर सेंधिया लज्जित हुए। उन्होंने फिर कहा कि :- "हम कोटे वालों की बहकावट में आगये थे ।" इस तरह थोडी बहुत सुख सुख होने बाद दोनों में खूब मित्रता का संवाद हुआ। बूँदी की ओरसे जो रुपया देना था वह संधिया को देदिया गया और उन्होंने अपनी सेनाका कूच किया। कोटे वाले इस बात से छग्जित होकर अक्षयराम कायस्थ सहित कोटे चले गये। इसी वर्ष अर्थात् संवत् १८१९ की चैत्र कृष्णा ८ को चौथी रानीजी के गर्म से तीसरे महाराज कुमार सरदारसिंहजी का जन्म हुआ । जोन- पुर नरेश इस संग्राममें बूँदी नरेश के सहायक न होकर कृतप्नता के दोष से कलंकित हुए थे। इस कलंक के काले टीके को अपने ललाट पर से पोंछ डालने के लिये महाराज विजयसिंहजी ने इनके भाई दीपसिंहजी से ईडर नरेश की छोटी कन्या का संवत् १८२१ की फाल्गुन शुक्ला ३ को विवाह कर दिया। उम्मेदसिंहजी की बहन का विवाह जोधपुर नरेश से हुआ। यह विवाह संवत् १८२० की पैशाख शुक्छा १ को हुआ था।<noinclude></noinclude> flwkw1kgfvr2sh5q3l69byauy94jd4q पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५२ 250 195006 665616 2026-07-06T16:54:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665616 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दियों का दमन । ( १२१ ) 7 अध्याय १४. ----- उपद्रवियों का दमन । जयपुर पर आट | जब तक महाराव राजा उम्मेदसिंहजी ने बूँदी का राज्य किया भगवान ने उन्हें कभी कल से न बैठने दिया । अपनी बुद्ध से और तलवार से ज्यों २ यह उपद्रव शांत करते गये नये २ बखेडे खडे होते गये। उस समय केवल बूँदी में ही बखेडे नहीं उठते थे बरन सारा भारत वर्ष खेडों से भरा हुआ था । उम्मेदसिंहजी के शासन का अंतिम समय यही है जब मुसलमान बादशाह, नगाव, सूबेदार मनियामेक होकर मट्टी के खिलौने बन गये थे, मरहठों के प्रतापका उगता हुआ सूर्य उगते २ ही अस्त हो चला था और पुर्तगालों की फरांसीसियों की अंगरेजों से कटा कटी होने ' पर भी अंगरेजों का प्रताप रषि ऊंचे की ओर बढ रहा था। इति- हास पढने वाले उस समय की देश व्यापी अराजकता को राष्ट्रविश्व को जानते हैं। यह वही समय है जब देश भर में गार काट छुट खसोट का बाजार गर्म था एक का राज्य दूसरा और दूसरे का तीसरा छीनता था । ऐसे ही समय में, जब और २ राजा अपना २ राज्य सो रहे थे उम्मेदसिंहजी ने अपना खोया हुआ राज्य स्थापित किया। यही इनकी वीरताका, और नीति निपुणता का प्रमाण है। उस अराजकता के समय बूँदी की शांत प्रजा ने अपने राजा को शास्त्र के अनुसार ईश्वर का स्वरूप मानकर कोई उपद्रव न किया किन्तु बूँदी को सीमा के निकट मेवाड राज्य के जो जागीरदार थे उन्होंने इस राज्य में आ २ कर छूट खसोट करना आरंभ करदिया। मेवाड से इन दिनों चाहे जैसा मेल होने पर भी प्रजापालक उम्मेदसिंहजी अपनी प्राण समान महा की ऐसी पीड़ा का सहन क सकते थे, उन्होंने तुरंत ही अपनी सेना मेजकर सवारों के मारे मेवाडी लुटेरों को व्याकुल कर दिया और उन्हें पकड़वा कर बूँदी मंगवा लिया।<noinclude></noinclude> 6lly10ylfxklqwti2b6z0twps816niq पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५३ 250 195007 665617 2026-07-06T16:54:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665617 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(PRE) उम्मेदसिंह चरित्र | टहला के, मंगला के, रिटहरा के और ऐसे ही अनेक मेवाडी जागीरदार 'जब कैद होगये तब मांगटला के कान्हावत ठाकुर की दाढी मोंछ मुंड- वाली इसका कारण यही था कि इसने किसी समय यह कहा था कि "उम्मेदसिंहजी मेरी जागीर को जितनी भूमि में पैर रख उतनी दान करदूँ । इस घटना की जब उदयपुर के महाराना अडसी खबर हुई तब उन्होंने इन लोगों को छुडाने के लिये अपना मंत्री भेजा । महाराना साहिब की शिफारिश से इन्होंने मेवाडी कान्हायत सरदारों को दंड का रुपया लेकर छोडदिया ! ( आरसिंह ) जी को हिन्दी के नामी विद्वान पंडित प्रतापनारायण मिश्रने राजाओं की चिन्ता के विषय में एक जगह अच्छा लिखा है। उन्होंने लिखा है कि:- " राजभार जिहिंके कर मांही, कबहु निचित होत वह नाहीं ! चिन्ता राज बढावन फेरी, आठों जाम रहति उर घेरी- 1 रहे सुखित नित प्रजा हमारी, है यह सोच और हू भारी । जदपि छ सिर धूप बचाये, पे कर भारहु अधिक जनावै । तिमि नृप धर्महुकी गति अहई, सुख रहे चित चिंतहु रहई । जाचक जन निज अभिमत पाई, तजि सब सोच सुचित है जाई । पेमहिपाल लोक हितकारी, एकहु पल नहिं रहत सुखारी । जाहि जगत चिंता दिन राती सो निचित केहि छिन केहि भांती । " इस तरह मेवाड वालों का उपद्रव शांत होगया और मेवाड में से झीझोला, बीखरन और ग्राकरा के जागीरदार बूँदी के अधीन होगये परन्तु अब सैराड के जंगली सीनों को लूट खसोट करने की सूक्षी । अवश्य ही एक बार ये मीने बूँदी लेने के काम में उम्मेदसिंह जी के सहायता के उपलक्ष्य में उनका सत्कार भी हो. चुका था परन्तु यह जाति, स्वभाव से ही शांति के साथ बसने वाली नहीं है । लूट खसोट और चोरी डाके इसकी स्वाभाविक जीविका है । सुनार यदि अपने नारीदारों के जेवर में से चोरी करना छोड़ दे तो यह जाति भी अपने काम में अपना पराया समझ ने की। बस इसीलिये इन्होंने लुट सहायक हुए थे और इस<noinclude></noinclude> n5xzoovprwiws3fli9dzgwknnphkkyt पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५४ 250 195008 665618 2026-07-06T16:54:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665618 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1 उपद्रवियों का दमन । ( १२३) आरंभ करदी चाहे अपने आत्मीय ही क्यों न हों, चाहे अपने पुत्र हीं-. क्यों न हो परन्तु न्यायी राजा, प्रजा के सताने वाले को अवश्य- दंड देता है। बस इसी न्याय से, इसी नीति से उम्मेदसिंहजी ने अपनी सेना भेजी। मीनों ने अपने स्वामी की सेना का मेट से आदर करने के बदले सलदार से सत्कार हरिणा में खेडे में, लुहारी में, गैडोली में दोनों ओर से खूब ही तलवारों की खचाखच हुई मालों किया की मार हुई, तीरों की बौछार हुई और अंतमें ९०० मीने मारे जाने पर उनका मन हुआ। यह लडाई संवत् १८२२ की शरद् धातुके आगमन में हुई। इस तरह से यद्यपि इन्होंने मेवाडों का और मीनों का दमन करके राज्य में शांति स्थापित करदी थी, और बाहरी आक्रमण की शांति के साथ २ ही इन्होंने एक २ करके भीतरी कांटे भी निकाल दिये थे परन्तु अभी इन्हें एक कांटा और निकालना था । पगारों के जागीरदार उद्योग सिंह जी नाथावत पहले दलेहसिंहजी से और फिर बूँदी की अधीनता छोडकर बूँदी पर चढाई करते समय महाजी संघिया से जा मिले थे। यह भी बागी हो कर छुट खसोट करते थे। इस कारण उम्मेदसिंह जी ने पगारी की जागीर संवत् १८०३ में इनके चाचा सिंह जी को देदी। उद्योगसिंह जी बूँदी के सैनिक की तलवार से बीच बाजार में मारे गये। संवत् १८२३ में होल्कर मल्हार राव जी मरगये । इन्दौर की गादी इनके नाती मालराव जी को मिली बूँदी से इनके लिये टीके का दस्तूर मेजा गया परन्तु यह इन्दौर की गदी विशेष दिन न भोगने पाये संवत् १८२४ में इनके मरने पर तक्कूजी ( तुकोजी ) इनके उत्तराधिकारी हुए। इतना खिखने का प्रयोजन यही है कि अब होलकर का जमाना बिलकुल पलट गया था जब मरहठों का स्थिति बिगड गई थी उठाया। जब संवत् १८२४ में उम्मेदसिंह जी ने तब भरतपुर के जाटोंने शिर भाई का और पुत्रका विवाह कर छुट्टी पाई और जब इन्होंने अपना बांसवाडे वाली माता की क्रिया करके छुट्टी पाई तब जगपुर से जाटोंकी छटाई छिन गई। जाट जमान<noinclude></noinclude> oajx8zzsvj0lhwq8e08pniy9oldrbtr पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५५ 250 195009 665619 2026-07-06T16:54:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665619 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | जी के आतंक से दुखित होकर उनके भाई नाहरसिंहजी ने जयपुर की शरण ली थी। उनकी रूपवती पत्नी को अपनी जोरू बनाने के लिये जब जवाहरसिंह जी ने अत्याचार किया तब वह भाग कर जयपुर आगये। महा- राज माधवसिंहजी ने उन्हें निवाई जागीर में देकर उन्हें आश्वासन दिया । वह इस तरह जयपुर के आश्रय से अवश्य ही कुछ काल तक अपने दिन बिताते रहे परन्तु उनको काल ने शीघ्र ही आ घेरा। जब वह मरगये तब जवाहरमल जी ने उसी रमणी को लेने के लिये जयपुर पर दबाव डाला। माधवसिंह जी वास्तव में दबाव में आगये। उन्होंने विवश होकर उस जाटनी को भरतपुर भेज देना चाहा । निःसहाय अबला उसी तरह भय- लीत होगई जैसे कपिला गाय सिंहके पंजे में फंसने से घबडाकर कांपती है। उसने हाथ जोडकर, झोलियां बिछा कर आंखों से आंसूभर कर रोते २ कहा:- "महाराज, मुझ अबला को उस दुष्ट के पास न भेजिये । वह मुझे अपने घर में डाल कर जो बना देगा। मैं सती हूं । श्रीमान् वहां भेज कर मेरा सतीत्व न बिगाड़ो । आप महाराजाधिराज हैं। एक अवला के धर्म की यदि आपसे रक्षा न हो सकी तो आप किस के महाराज ? आपने राजा होकर क्या किया ? आपने यदि सती की रक्षा न की तो आपने बीर क्षत्राणी को क्यों उजाया में आपकी गौ हूं में अनाथ विधवा आप की शरण आई हूँ । आप जानते है शरणागत को त्यागने का कितना भारी पाप है. आपही के पूर्वज भगवान रामचन्द्रजी ने कहा है- " शरणागत क जे तनहिं निज अनहित अनुमानि ते नर पामर पापमय, तिनहिं विठोकत हानि" महाराज इस वाक्यको याद करके मेरे त्याग करने में मंहा पापी न अनिये। मुझे त्यागकर संसार में आप मुंह दिखाने योग्य न रहेंगे। में अनाथ विधवा हूँ। मेरा इस संसार में कोई नहीं है। मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपकी कारण आई हूँ ।" पत्थर को पसीजा देने वाली कठोर हृदय को पिघला देनेवाली उस अनाथ अवड़ा की करुणा भरी वाणी सुनकर महाराज का हृदय अवश्य ही उस समय पसीज गया, और उस समय उन्होंने जाट को सूखा उत्तर भी देदिया<noinclude></noinclude> 0l6yqahr4nb1z3aj30ofw1dypxp1e4n पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५६ 250 195010 665620 2026-07-06T16:54:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665620 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>उपद्रवियों का दमन । ( १२५ परंतु अंतमें उनका दुर्बल कलेजा जवाहरमल जाट का कोप न संभाल सका। जवाहरमल जाटने जोश में आकर जवाब दिया फि:- "मेरी मौजाई को, क्या आप अपने घरमें डालना चाहते हैं? समझे रहना इसका फड आर के लिये अच्छा न होगा ।" इस बात को सुनकर महाराज छवटा उठे। यह जाटकी एक ही घुड की से अपनी शरणागत वत्सलता भूल गये। यद्यपि उन्होंने उस जाटनी को निकाल दिया परंतु साथ ही उसका प्राण भी निकल गया । जाटनी अपने दुष्ट देवर के पास न गई किन्तु उसका प्राण अपने सतीत्व की रक्षा के लिये स्वर्ग को प्रयाण कर गया उस जाटनी को धन्य है जिसने विष खाकर भी अपना धर्म बचाया परंतु महाराज आपके धर्म के लिये मैं क्या कहूं इतिहास पढने वाले कहते होंगे, इस चरित्र को पढनेवाले कहेंगे कि आपने एक अनाथ विधवा को अपने शरणसे, अपने आश्रय से निकालकर उसी बातको सत्य कर दिया जो जाटनीने आपसे कही थी। आपने क्षत्रिय धर्म को, राज धर्म को लात नारकर स्वार्थके लिये, एक अदना आट से डरकर जो कुछ करना था सो किया परंतु फिर भी आप उस आटके कोप से न बच सके । जवाहर मण्डने जयपुर पर चढाई करने के लिये अपनी सेना सजाई । इस बात को जानकर मारवाड नरेश प्रसन्न हुए। वह पुष्कर में जाट को बुलाकर उससे मिले । उन्होंने जराहरमल का क्षत्रिय नरेशों के बराबर सम्मान किया और इसी तरह करने के लिये जयपुर नरेश को लिखा परंतु महाराज माधवसिंहजी इस बात को स्वीकार न कर सके। उन्होंने कोरा उत्तर देदिया और बस इसीपर जाट जयपुर युद्ध का. घमसान म गया । संग्राम में खूब ही तलवारों की खचाखच हुई और दोनो ओर के बडे २ बलीविक्रम कटके काम 'झोंककर जाटों का विनाश । आये वाहों ने इस लड़ाई में जान किया। यदि जवाहरमल की रक्षा के लिये उसकी सेना का समरू (?) फिरंगी न होता तो उसका प्राण बचना कठिन था परंतु भरतपुर के जाट राजा को उस ने दिया | इस लड़ाई में जयपुर की जीत हुई। जीता जागता भरतपुर पहुँचा जीत हो वा हार हो जिस बाल<noinclude></noinclude> ldmqyixk0lfdpiizupytjkwmmlzj8jz पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५७ 250 195011 665621 2026-07-06T16:55:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665621 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१२६) उम्मेदसिंह चरित्र | इस चरित्र से विशेष संबंध नहीं है उसे बढाकर मुझे विषयांतर में नहीं जाना है परंतु इतना वर्णन एक ही प्रयोजन से किया गया है और एक ही बात के लिये इस युद्ध का इस चरित्र से संबंध था। बात यही थी कि महा- राव राजा उम्मेदसिंहजी ने पहले की तरह इस लडाई में भी अपने पाटवी महाराज कुमार अजितसिंहजी को जयपुर की सहायता के लिये भेजा था। सचमुच ही महाराजकुमार इसबार युद्ध के लिये बिलकुल सजकर आये थे और आप अपना रणपांडित्य दिखाने को आतुर थे परंतु महाराज माधवसिंहजी ने इनकी उमर कम समझ कर इन्हें उडाई के मैदान में न जाने दिया। इन्हें अपने महलों में बड़े सरकार से रक्खा, इन्हें खूब सैर शिकार कराई, इनके साथ हाथियों पर बैठकर वसंतपंचमी के स्वच -होली खेली और अंत में दयाराम पुरोहित से कहा कि साय के राजाकी लड़की को गोद लेकर हम उसके साथ महाराजकुमारका विषांह करेंगे। यद्यपि दयारामने इस बात को स्वीकार न किया परंतु उन्होंने अपने नी ओर से इनका खूब आतिथ्य किया । इस तरह रहते २ जब जयपुर नरेश आधरसिंहजी का संवत् १८२५ की चैत्र शुद्धा ११ को देहान्त होगया तब उनके पुत्र पृथ्वीसिंहजी के गद्दी बैठाने बाद राजसी सम्मान अहण करके यह बूँदी पधार आये। जाट जयपुर का युद्ध जिसका वर्णन ऊपर हुआ है संवत् १८२४ के हेमंत ऋतु में हुआ । इसके बाद संवत् १८२५ की वैशाख शुक्रा १० को महाराज कुमार अजितसिंह जी का कृष्णगढ नरेश बहादुरसिंहजी की कन्या सूर्यकुमार जी से विवाह हुआ। इसके सिवाय बूँदीके कुमरोंके, माई के पुत्र के जो विवाह इस वर्ष में हुए उनके लिखने की यहां आवश्यकता नहीं है। इसी वर्ष में जब तुकोजी होळकर का इस ओर दौरा हुआ तब उम्मेद सिंह जी ने उनके लिये टीके का दस्तूर भेजा । इस वर्ष में समय पाकर द . दबाये जीने फिर उठ खड़े हुए। उन्होंने फिर बूँदीराज्य की प्रजा को छूट खसोट से सताना आरंभ किया। दो बार युद्ध में मेजकर भी महाराण राजा उम्मेदसिंहजी अपने पाटवी महाराज कुमार की तलवार के हाथ न देख<noinclude></noinclude> 4uzk8dslikkc58w80nvbx3zvicd142s पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५८ 250 195012 665622 2026-07-06T16:55:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665622 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री भी साक्ष्य का राज्य स्थान | (११० ) रुके थे। उन्हें अभी मालूम नहीं हुआ था कि इनमें पराक्रमक कितना मी है इस लिये इसबार उन्होंने आशा फि:- "खालजी, तुमही जाओ। तुमही इन दुष्टों का दमन करके अपनी प्रजा का दुःख दूर करो। अब हमारा बुढापा पास है। अब तुम्हें अपनी प्रजाका रंजन करके उसके आशीर्वाद से सुख पाना है। हम अपनी आंखोंसे देख कि तुम कैसे हो इसीलिये तुम्हें सवार के हाथ दिखाने का अवसर देते हैं। " पिताकी आज्ञा को माथे चढाकर अजितसिंह जी गये और बारह खेडों के मीनों को घेरकर उनको सहस नहस कर उनके बडे २ मुखियाओं को वरुड लाये। इसके बाद इनके दोनों छोटे महाराजकुमार बहादुरसिंह जी और सरदारसिंहजी का गर्गराट (गँगराट ) में विवाह हुआ। । ये विवाह संवत् १८१५ की माघ शुक्र १ को हुए इन्होंने महाराज कुमार बहादुर सिंहजी को गोठडा और महाराज कुमार सरदारसिंहजी को दुगारी जागीर में दी। इनमें से तीन पीढी बाद गोठडे वाले का कुछ नष्ट होगया। अध्याय १५. श्री जी साहब का राज्य त्याग । पुत्र को राज्य । में पहले एक बार नहीं अनेक बार लिख चुका हूँ कि महाराव राजा उम्मेद सिंहजी केवल बूँदी राज्य का उद्धार करने के लिये पैदा हुए थे। वह पिता के हाथ से खोई हुई बूँदी में नीति से और तलवार से हाडों का फि "राज्य स्थापित करके उसे चिरस्थायी करने के लिये पैदा हुए थे। इस भाग के गत पृष्ठों को पढकर पाठकों ने भलीभांति जान लिया होगा कि उम्मेदसिंहजी ने घोर संकट सहकर, विषय सुख को लातों से कर एक पराक्रमी पुरुष की तरह अपनी माता की प्रविशा पालन की, अपना कर्तव्य पालन<noinclude></noinclude> 0sevoyinb0c5jv8jk9cxead7cm4cpfp पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१५९ 250 195013 665623 2026-07-06T16:55:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665623 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १२८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | में किया और सिंह बनकर, हाथियों का मस्तक विदारण करने वाले केसरी बन कर जयपुर जैसे मतवाले मातंग का पेट फाड कर बूँदी निकाली । इस कुछ सबही राजा बहादुरं हुए, सवहीं अपने २ सय के अनुसार नान करके दुनिया को दिखला गये कि बीर हाडा ऐसे होते हैं परंतु उनमें भी बूँदी में 'राज्य का संस्थापन करने वाले देवसिंदरी राज्य का विदा करने वाले सुरजन की स्वामिभक्ति के लिये अपनी तलवार से सैकडों के शिर काट कर अटड़कीर्ति के साथ रणशय्या में सोने वाले शत्रुशल्यजी, धर्म के लिये बादशाह को तिनके के समान समझने वाले भावसिंहजी बूँदी राज्यका उद्धार करके फिर हाडाओं का राज्य स्थापित करने वाले उम्मेदसिंहजी और बूँदी राज्य को सुधार ने वाले राजर्षि रामसिंहजी के समान कोई नहीं हुए, बूँदी में क्या और २ रजवाडों में नहीं हुए। इनमें से और सब नरेशों का थोडा बहुत चरित्र पाठक इस पोथी में पढचुके । महाराव राजा रामसिंहजी का बिमल चरित्र तैयार करने की यदि भगवान ने मुझे शक्ति दी, अवसर दिया और उमर दी तो पाठक देखेंगे। महाराव राजा उम्मेः सिंहजी अपना कर्तव्य पालन करके हाडा जाति की - अटलकीर्ति स्थापित करने थे लिये पैदा हुए थे । यह मुनि दुर्लभ राजपद पाकर भोग विलास में, राजमद में मतवाले बनकर " तप से राज्य और राज्य से नरक" पाने के लिये पैदा नहीं हुए थे। उन्होंने तेरह वर्ष की उमर से लेकर अब तक एक भी दिन विश्राम नहीं लिया। वह अब तक सोते जागते खाते पीते दिनरात युद्ध कौशल से शत्रु का दमन करने में, राजनीति से शत्रु को दबाकर अपना मसलन गांठने में, ईश्वरभक्ति से देवी सहायता प्राप्त करने में और बाहरी भीतरी कांटों को निकाल कर राज्य को निष्कंटक बनाने के विचार में लगे रहते थे। जब उन्होंने समझ लिया कि अब बूँदी राज्य बाहरी शत्रुओं से बिकुछ रक्षित है, जब वह जान गये कि अब भीतरी कांटा एक भी नहीं रहा है, जब उन्हें विदित होगया कि प्रजा, परिजन, बंधु बांधव, उमराय, कर्मचारी समही राज भक्त हैं, सबही महाराज कुमार को वी जान से चाहते हैं और जब उन्होंने अपने पक्षे अनुभव से निश्चय कर<noinclude></noinclude> s7s475czvo00j2ggcbwiukgt82e3up3 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६० 250 195014 665624 2026-07-06T16:55:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665624 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री जी साहब का राज्य त्याग । ( १२९ ) लिया कि पाटवी महाराज कुमार विद्या में, बुद्धि में और शक्ति में राज्य- शासन करने के योग्य होगये है तब उन्होंने बड़े कष्ट से उपार्जित किये हुए राज्य का शासन इसतरह छोड़ दिया जिस तरह हाथी गढे की लाला फूलों की माला छोडदेता है। आजकल हजारों मनुष्य ऐसे होते हैं "जिनको बुढापे के कारण यमराज बुखारहा है, जिनके लिये मसानों में एफ- डियां पहुंच चुकी हैं और जिनका शरीर बुढापे की बीमारी से घोर कष्ट सह हा है ये भी संसार के झंझटों से अलग होनेका नाम सुनते ही सो पत्थर देकर मारने को दौडते हैं परंतु युवा उम्मेदसिंहजी ने बचपन से जवानी तक घोर कष्ट सहकर शिर सांटे की खेलकर राज्य स्थापित किया और जब राज्य सुख भोगने का समय आया तब उससे संबंध तिनके की तरह सोड डाटा कवि राजा सूर्यमल जी लिखते हैं कि:--- "जाके काम विपचि बिताई बहु कष्ट सहि, द्वे द्वे दिन मांहि मेटि जाठर दुसह दाह । मरन विचारि मारि मारि तरपारि झारि झंडे पचरंग जंग मंडे चहुबान नाह । जैपुरको जीति नीति दुर्लभ दिखाई सव, भूपन दिखाई भूप आदि रजती राह श्रीजिते शहर बूँदी अष्टमै उम्मेद मनु, कासी जान छीनी तनुकासी जान छीनी वाह ॥" सचमुच | सूर्यमलजी का दिखना यथार्थ है। उम्मेदसिंहजी ने जिस बूंदी को दो दो दिनकी भूख सहकर, तटबारे झाडकर, जयपुर का पेट विदारकर वीर राजाओं को पूरी रजपूती दिखाकर पाया था उसे तिनके.. समान जानकर छोडदिया। क्यों पाठको, आप लोगोंने प्राचीन, कुराण प्रसिद्ध राजाओं के सिवाय ऐसा त्याग किसी में देखा है ? पदापि नहीं । पाठक यह न समझें कि महाराव राजा उम्मेदसिंहजी ने जिस समय छोड़ा उस समय उनकी उमर सौं वर्ष की होगी, अस्सी वर्ष की होगी-- १ उम्मेद सिंहजी का उपनाम २ आठवें मनु काशी ४ तिनके के समान ९<noinclude></noinclude> 9oixq34l42i0hksc7qan3fyxxrgd9wb पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६१ 250 195015 665625 2026-07-06T16:55:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665625 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १३० ) उम्मेदसिंह चरित्र | नहीं तो कम से कम साठ वर्ष की तो अवश्य होगी । नहीं २ उन्होंने राजपाट छोड़कर जिस समय धर्मशास्त्र के अनुसार दो आश्रमों का कर्त्तव्य पालन करने के अनंतर तीसरा वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया उनकी उमर केवल ४० वर्ष १० महीने १२ दिन की थी। उनका जन्म संवत् १७८६ की आषाढी अमावस्या को हुआ था और उन्होंने वैशाख शुक्ला १२ संवत् १८२७ को राज्य छोड़ दिया । 3 इस वर्ष में जब वह अपने कर्तव्य से निश्चिन्त हुए तब ही उन्हें राज सुख से विराग हुआ। वह डरने वाले, झिझकने वाले, आना कानी करने वाले मनुष्य न थे। जो विचारा, जो बात बुद्धिके कांटे में ठीक उतर गई और जिसे उन्होंने अपना कर्तव्य समझ लिया उसे जानपर खेलकर किया और जब तक वह काम पूरा न हुआ बराबर उसके पीछे लगे रहे। अपना कर्तव्य पालन करने में सुख को और प्राण को न्योछावर कर देना ही उनका दृढव्रत था, यही उनका नियम था और जब उन्होंने सोचा कि अब बूँदी उद्धार के कर्तव्य से तुरंत राजपाट छोडकर भगवद्भक्ति करने के लिये तीर्थ यात्रा करनेमें धानप्रस्थ आश्रम का सेवन करने में उनका मन जा लगा और बस इसी लिये उन्होंने उक्त तिथि को शुभ उन देखकर अपने पाटवी महाराजकुमार अजितसिंहजी को राज्य दे दिया। जिस समय इन्हें राज्य दिया गया इनकी उमर केवल १७ वर्ष की थी। यही उनका धर्म था । छुट्टी मिली है तब ही यद्यपि महाराज कुमार अजितसिंह जी पिता की शिक्षा से, उनके अनु- भव से, उनकी आंखें देखकर पक्छे होगये थे । परंतु अभी वह बहुत कम उमर थे। कम उमर अवश्य थे परंतु जिनको अनुभवी पिताने अच्छा समझ लिया यह किसी काम में कम न थे। वह यद्यपि कम न थे परंतु- प्रजा को अनुभवी महाराज के वियोग का बहुत दुःख हुआ । अहा ! वह भी समय बूँदी के लिये बडा विचित्र था। एक ओर महारावराजा उम्मेद- सिंहजी जब "सब तज और हर मज" के विचार से भक्तिरस का आनंद लेने के<noinclude></noinclude> kilal5arjb60pckhmvwuma9t3mo8p3f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६२ 250 195016 665626 2026-07-06T16:56:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665626 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री जी साहब का राज्य त्याग । ( १३१ ) लिये धर्मोत्साह में मझ हो रहे थे तब दूसरी ओर से सरदारों के, उमरावों के, कर्म- चारियों के, प्रजा के मुख फीके, पीछे पडगये थे । भगवान दशरथ नंदन राम- चन्द्रजी के कुश को राज्य देकर स्वर्ग पधारने के समय अयोध्या की जो दशा भी वही दशा इस समय बूँदी की थी। सर्वव्यापी रामचन्द्रजी सदेह स्वर्ग पधार ने पर भी जैसे घट २ में सदा सब के हृदय में वास करते हैं उसी तरह देह धारण करनेपर भी उम्मेदसिंह जी जीवन्मुक्त थे । आज महाराज के हृदय में हर्ष हे महाराज कुमार के हृदयमें राज्य पाने का हर्ष और कर्तव्य पाउन की चिन्ता है। आज अंतःपुर में शोक है परिजन परिवार में शोक है और प्रजा में शोक है। अवश्य ही आज बूँदी में मूर्तिमान् शोक विराजमान है, और साथ ही उम्मेद- सिंहजी को उनका परिवार, उनकी प्रजा, उनके परिकर राज्य त्यागने ले निषेध करते हैं परंतु उन्होंने जो दृढसंकल्प किया है वह अमिट है । अनि- वार्य है और इसी लिये महाराजकुमार अजितसिंहजी को राज्य देने का नगर में और राजमहल में उत्सव हो रहा है। महारावराजा उम्मेद- सिंह जी जैसे प्रतापी नरेश की प्रतिमा के आगे, उनकी उत्कट इच्छा होने से लोगों ने अपना शोक कंजूस के धन की तरह अपने ही मन में छिपा रखा है। आज सब लोग राज तिलक के काम काज में लगे हुए हैं नियत समय पर भरे दरबार में राज पुरोहित शींतूरामजी ने, प्यारे राजकुमार अजितसिंहजी को पिताके समक्ष ही महाराव राजा बनाने के लिये तिलक किया शास्त्र विधि से राज्याभिषेक किया व्यास मानिकरामजीने तिलक किया और तब महारावराजा उम्मेदसिंहजी ने पुत्र को तिलक करके अपनी कमर की तलवार खोलकर पुत्र की. कमर में बांधते हुए अपने ही हाथसे अपने पुत्र को महाराव राजा बना- दिया । मानो राज्यपद का चार्ज देदिया। राज्य के उच्च से उच्च कर्म- वारी राजा की आज्ञा से दूसरे को चार्ज देते हैं परंतु इन्होंने अपनी इच्छा उ-ईश्वर की प्रेरणा से चार्ज दिया। चार्ज देते स्या कहा सो इतिहास में लिखा नहीं है परंतु उन्होंने यह अवश्य कहा होगा कि:- समय उन्होंने प्रिय पुत्र मेरी कल्पना कहती है कि<noinclude></noinclude> 0go9o9nfql7is7i03h55uynz0j0swdw पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६३ 250 195017 665627 2026-07-06T16:56:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665627 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १३२ ) उम्मेदसिंह चरित्र ! "प्यारे पुत्र, हम ने जो कुछ विचारा उसे पार उतार दिया। हमने अपना कर्तव्य पालकर छुट्टी पाई। हमने जो कुछ किया है उसका निवा- हना तुम्हारे हाथ है। हम ने कष्ट सहकर जो कुछ पाया है उसकी रक्षा करो अपनी प्रजा का पालन करो और सुख से रहो। यही हमारा आशीर्वाद है । ईश्वर, भगवान इष्टदेव रंगनाथ जी तुम्हें अपने कर्तव्य पालन की शक्ति देकर चिरंजीवी करें। देखो हमने बड़े २ परिश्रम उठाकर, अपने रक्त की बूँदों से जिस बूँदी का सिंचन किया है उसकी रक्षा करने से, प्रजा को सुख देने से, अपने प्राण जाने पर भी मुँह न मोडना । यही हाडा जाति का व्रत है। अपनी जाति के, अपने कुछ के इस कठिन व्रत का पालन करना ही तुम्हारी तपस्या है। हम इस तपस्या को पूरी करके अब दूसरी ( ईश्वरको पाकर जीवन्मुक्त होने की ) तपस्या का लगा लगाते हैं । अब तुम आज से, अभी से इसी समय से राज्य रक्षा की; प्रजा पालन की कठिनतर तपस्या में प्रवृत्त हो। देखो, अपने कुछ धर्म का निर्वाह करके प्राणों की बाजी लगाने से, शरीर सुख को लातों से कुचलने ही में सच्चा हाडापन है, सचा राज पद है।" ये बातें उम्मेदसिंहजी के अंतःकरण ने उनके अनुभवी मनने अवश्य कही होंगी और होनहार युवा महाराज ने भक्तिपूर्वक शिर झुकाकर माथे चढाया होगा । जब उम्मेदसिंह जी अपनी तलवार पुत्र को बंधाकर उन्हें राज्य का चार्ज दे चुके राव इन्द्रगढ के जागीरदार भक्तरामजी ने, खातोली के जागीरदार रत्नसिंहजी ने, वयन के मालुमसिंहजी ने, खेड़ाके भगवंत.. सिंह जी ने, अतिरदे के दुर्गसिंहजी ने, जजावर के गजसिंहजी ने, धोवडे के भवानी सिंहजी ने और इसतरह सबही सरदार उमरावों ने, बढे २ राज कर्मचारियोंने घोडे और सिरोपाव नजर किये । नजरें हुईं, न्योछा- वर हुई । इनाम दिये गये और राजा के सिंहासन पर बैठने के समय जो २ उत्सव होता है सो सब हुआ । इस खबर को पाकर राजपूताना भर में, समस्त रजवाडों में कहीं हर्प, कहीं शोक और सर्वत्र आश्चर्य छागया । आचर्य की बात ही थी !<noinclude></noinclude> 52efi55wkv2ce3i03r3su1q7qq6cu6k पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६४ 250 195018 665628 2026-07-06T16:56:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665628 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री जी साहब का राज्य त्याग । (१३३) उन्होंने घोर कलियुगमें तृतीय आश्रम का आश्रय लेकर एक अनहोना काम करदेने में बढे २ त्यागी योगियों को मात करदिया और विशेष आर्य इसी बात का हुआ कि प्राणोंपर खेलकर जिस राज्य को पाया था उसे तिनके की तरह छोड़ दिया। इस बात की सूचना होते ही उदयपुर से, जयपुर से जोधपुर से कोटे से करौली से, बीकानेर से नेपध देश से, नर वर से, कृष्णगढ से और शिवपुर से टीके के दस्तूर में हाथी, घोडे, सिरो- पाव और आभूषण आये। पूना नरेश ने होलकर ने, संधिया ने भी टीके का दस्तूर भेजा । उसी दिन से सिंह जी और सरदार सिंह जी को अजितसिंह जी के छोटे भाई बहादुर- महाराजा की पदवी मिली और महाराव राजा उम्मेदसिंहजी बूँदी में समस्त रजवाडों में और भारतवर्ष में श्री जीं के नाम से प्रसिद्ध हुए। सूर्यमलजी ने इनका नाम श्रीजित डिला है और वास्तव में इन्होंने श्री उदमी को जीत लिया था क्योंकि यदि जीता न होता तो यह ऐसी राज्य श्री को सहज ही छोड़ने में समर्थ न होते । खैर कुछ भी हो टाडसाहब ने इस घटना के बाद से इनका श्री जी नाम लिखकर संबोधन किया है और बूंदी की प्रजा श्री जी साहब कहती हैं! इस घटना का ढाड साहब ने अपने ग्रंथ में कुछ विस्तार नहीं किया है। वह लिखते हैं कि- " संपत् १८२७ में युवराज पद देने का उत्सव होकर उम्मेदसिंह- जी का राजनैतिक अस्तित्व समाप्त हो गया। उनकी एक मूर्ति बनाकर चिता पर उसका दाह किया गया। अजितसिंह जी ने अपने बाल और अपने गलमुच्छे उतरवाये । रनवास में रोना कूटना मच गया । जैसे मृतक के लिये १२ दिनतक शोक किया जाता है वैसे उम्मेदसिंहजी की मृत्यु मानकर " मातमं" किया गया। बारह दिन के बाद राज- तिलक हुआ और तब से अजितसिंह जी बूँदी के समस्त हादाओं के "अधीश हुए ।" अवश्य ही टाडसाहब ने यह बात किसी लेख के आधार पर लिखी होगी क्योंकि उन जैसे नामी इतिहास लेखक सहसा कल्पना के घोडे नहीं दौडा सकते हैं परंतु बूँदी के जो नामी २ इतिहास ग्रंथ मेरे देखने में आये .<noinclude></noinclude> 473inic8a7dm9zsp0n6w8sfsoha65s2 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६५ 250 195019 665629 2026-07-06T16:56:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665629 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१३४) उम्मेदसिंह चरित्र | हैं उनमें यह बात नहीं है। धर्म की रूढि से भी यह बात असंभव है क्योंकि न तो वानप्रस्थ आश्रम के आरंभ में ऐसा बर्ताव किया जाता है और करने की परिपाटी है। न राजकुमार को युवराज पद देते समय ऐसा यदि उनका कहना सत्य भी हो तो इस में दो भूलें हुई हैं। एक जहां मैंने उनके वाक्य के आरंभ में "युवराज" लिखा है वहां यह अंगरेजी ग्रंथ में जुगराज लिल गये हैं। यद्यपि यह भूल एक अंग्रेज के संकृत शब्द समझने में उसका उधारण करने में हो सकती है परंतु उन्होंने जब अजित- सिंह जी के गलसुच्छों का मुंडन होना लिखा है तब उनकी उमर केवल १७ । वर्ष की थी। इस वय में गलमुच्छे तो क्या आदमी के अच्छी तरह मोंछें भी नहीं आतीं हैं। उस समय अजितसिंह जी के मोछों की रेखें बंधती थीं। ऐसा उनके पुराने चित्रों से मालूम होता है। इस भूल को देखते हुए कहा जा सकता है कि यदि उन्होंने इस घटना की कल्पना न की हो तो जिसने उन्हें ऐसी खबर दी उसने अवश्य कल्पना की होगी । खैर कुछ भी हो। जिस समय श्री जी साहब ने राज्य छोडा अच्छे २ नामी दश सरदार अनी बनी के समय प्राण झोंक देने वाले वीर क्षत्रिय अपने साथ रक्खे और बूँदी के ईशान कोण में डेढ कोश पर केदारेश्वर महादेव के निकट बाणगंगा के तट पर एक महल में अपना निवास रक्खा। अपने खर्च के लिये बडीदिये का परगना अलग करके इसी समय से राज्यले अपना संबन्ध छोडदिया और ऐसा छोड़ा कि बूँदी नरेश को गाढी भीड के समय दो चार बार सहायता देने के सिवाय कभी उसकी ओर आंख उठा कर भी नहीं देखा । छोड़ने पर भी किस तरह राज्य की रक्षा की, सहायता की, राज्य छोडकर क्योंकर उन्होंने अपने धर्म का अपने आश्रम का निर्वाह किया सो इस पुस्तक का श्री जी साहब ने राज्य विपत्ति के समय किस तरह चौथा खंड पढने से मालूम होगा। इस ग्रहण करने से पहले की दो एक बातें एक इसे समाप्त करूँगा । खंड में उनके वानप्रस्थ आश्रम अलग अध्याय में लिख कर मैं<noinclude></noinclude> nkf91tsd2jdyixv8n6fi98kb5yr3bja पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६६ 250 195020 665630 2026-07-06T16:56:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665630 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>टाट साहब कहते हैं शादी के उस पुण्यस्थान में परिशिष्ट अध्याय १६. परिशिष्ट । ( १३५ ) कि- "राज्य छोडने के बाद श्री जी ने इस निवास किया जो पठार के प्रथम नरेश को आरोग्य करने में जायूकासा काम देगया था, जो एक गंगाके नामसे प्रसिद्ध है और जहां केदारनाथ हैं। इसी जगह श्रीजी ने बीर यात्रा करके अनेक प्रान्तोंके फूट और फड छा २ कर इकट्ठे किये थे ।" उनका यह संकेत उसी स्थानसे है जिसका वर्णन गत अध्याय में होचुका है । अब इस अध्याय में दोही बातें लिखनी है। एक उन्होंने कितने विवाह किये और उनसे क्या २ संतान हुई और दूसरे उनके समय में बूंदी में कितने बडे २ मकान या महल मन्दिर इत्यादि बनाये गये । श्रीजी साहब के विवाहों का और उनकी संतानोंका कुछ२ वर्णन इस खंड के गत अध्यायों में प्रसंगवश हो चुका है परंतु यहां एक स्थान में लिख देने से पाठकों को अच्छी तरह मालूम हो जायगा कि उनके कितनी प्रजा हुई। उनका पहला विवाह गर्गराटपुर ( गंगराड) नरेश शाळा दलपतसिंहजी की रानया चिमन कुमारजी से, दूसरा रास नरेश वखतसिंहजी की सुता कुंदन कुमरी जी से, तीसरा ईडर नरेश के चाचा रामसिंहजी की दुहिता बखत कुमारजी से और चौथा ईडर नरेश की कन्या उदय कुमारजी से हुआ । यही चौथा विवाह जोधपुर नरेश विजय सिंहजी ने इनको बुलावाकर अपनी कृतग्नता दवाने के लिये कराया था। इस तरह इनके महारानी झाली जी, दूसरी रानी उदावतजी और तीसरी तथा चौथी राठोड जी कह- छाती थीं। सब से पहले तीसरी रानी के पुत्र हुआ था परंतु नाम पहले ही उसका नाश होगया इस कारण दूसरी रानी उदावत जीके बड़े पुत्र महा- राज कुमार अजितसिंहजी ही इनके पाटवी कुँवर हुए। इनके सहोदर भाई बहादुरसिंहजी और चौथी रानी के दो पुत्र हुए। इनमें एक सरदार-<noinclude></noinclude> 7k6kvcevsy5tytxkn9o5trf7hrfvxa4 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६७ 250 195021 665631 2026-07-06T16:56:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665631 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १३६ ) उम्मेदसिंह चरित्र ! सिंहजी और दूसरे त्रिलोक सिंहजी हुए । इनमें से त्रिलोक सिंहजी का शीघ्र ही मरण होगया। श्रीजी साहबके पांच पुत्रोंमेंसे केवल तीन विद्य- मान रहे जिनमें बडे महाराज कुमार अजितसिंहजी राज्यके अधिकारी हुए दूसरे महाराज कुमार बहादुर सिंहजी को गोठडा और तीसरे सरदार सिंहजी को हुगारी जागीर में मिली । श्रीजी साहब ने चार विवाह करने के सिवाय दो खवासिनें भी कीथीं। इनमें पहली खवास रूपरसराय जी और दूसरी गुमानराय जी थीं। कदाचित् रूपरस रायजी के कुछ संतान न हुई किन्तु गुमान रायजी के दो कुँबर और दो बाई जी हुई। इनके पहले कुँवर का नाम शिवसिंहजी और दूसरेका नाम संग्रामसिंहजी था। इनकी बड़ी कुमार का नाम अनिरुद्ध कुमार और छोटी का ब्रज कुमार रक्खा गया। बडी का ) विवाह जयसिंहजी से और छोटी का जैतसिंहजी से हुआ। बड़ी के राज सिंहादि- सात पुत्र और छोटी के नवलसिंहजी एक हुए। श्रीजी साहब के भाई दीप- सिंहजी के छः विवाह हुए और इनसे एक एक पुत्र और दो कन्यायें उत्पन्न हुईं। इस जगह दीपसिंहजी की संतानोंका वर्णन करने की आवश्यकता नहीं - हैं और न बहादुर सिंहजी, सरदार सिंहजी की प्रजा का हाल लिखना अपेक्षित है। हां महाराव राजा अजितसिंहजी के विवाहों और संतानों के विषयमें कुछ लिखना है सो चौथे खंड में प्रसंगोपात लिखा जायगा प्रसंगोपात्त कहने से मेरा प्रयोजन यही है कि मुझे इस पुस्तक में उम्मेदसिंहजी के उत्तराधिकारियों का चरित्र लिखना नहीं है। में उनके चरित्रों में से उतना ही अंश यहां लिखना चाहता हूं जिसका संबंध कुछ न कुछ श्रीजी साहबसे है। अस्तु इन पंक्तियों से पाठकों को विदित होगया होगा कि उम्मेदसिंहजी को दिनरात झंझटों में फंसे रहने से संसार सुख का समय न मिलने पर भी उन्हें विषय सुख लूटने की इच्छा न होने पर भी उनके जितने पुत्र, जितने राज कुमार, जितनी राजकुमारियां हुई उतने आज कल के राजाओं की स्थिति देखते हुए विशेष है । अवस्य ही इस कुछ में कभी, - ईश्वर की कृपासे औरस पुत्रोंका अभाव नहीं हुआ है और अब भी न होगा परंतु यह इसीका फल था कि श्रीजी साहब जितेन्द्रिय थे कर्तव्य दक्ष थे और विषयी न थे। विषय के संतति का अभाव रहता है । यदि उम्मेद<noinclude></noinclude> i2p3mkvv7ob4fjk9hhm4wqpxcz3a6fx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६८ 250 195022 665632 2026-07-06T16:57:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665632 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट । ( १३० ) सिंहजी जितेन्द्रिय न होते, वह विषय होते तो उनके इतनी संतान न होती- यह कदापि बूँदी का उद्धार न कर सकते और न इतना नाम पासकते । अनेक शंशों में, युद्धों में राज्यस्थापन में, राज्यकी नये सिरे से श्रृंखला " चने में देश भरका, भारत वर्षका दौरा करने में लगे रहकर बूंदी राज्यको चिरस्थायी करने के साथ ही उम्मेदसिंहजी कितने ही महल मंदिर वनवाने में भी अपना नाम अमर कर गये हैं। बूँदी का महल, बूँदीका किला जो आज दिन दर्शकों के सामने विशालाकार होकर खडा हुआ अपने आतंक से लोगोंपर प्रभाव डाल रहा है, अपनी सुंदरतासे दर्शकों के मन को रोहित कर रहा है वह अनेक नरेशों की रचना है किन्तु इतिहास इस यात की साक्षी दे रहे हैं कि इस विषय में जितना बडा काम रावराजा शत्रुशल्य जी के समय में हुआ है जितना अधिक काम महारावराजा उम्मेदसिंहजी के अधिकार में हुआ है उतना कभी, किसी नरेश के समय में नहीं हुआ। और इसमें विशेषता यह कि अपने जीवन भर दोनों ही अधिक इंटों में फंसे रहे, दोनों ने ही दुनियां के बडे २ चढ़ाव उतार देखें । रावराजा शत्रु शल्यजी का बनाया बूंदी के गढ़ में छत्र महल है जो इस गढ का शिर कहलाने की योग्यता रखता है और उम्मेदसिंहजी के बनवाये हुए मकान ये हैं जिनके नाम नीचे लिखे जाते हैं। श्रीजी साहब ने बूँदी के गढ़में दो मंदिर बनवाकर उनमें श्रीरंगनाथजी की और श्री आनंदवन जी की स्थापना की । इन्होंने चित्रशाला बनवाकर उस समय की चित्र विद्या का उसे ठीक आदर्श बना दिया। महल के भीतर ही पहाड़ की तरहटी में धरती से कई सौ फुट ऊंचा रंगवि. लास नामक बाग बनवाकर उसमें महल, किले में टांका, गणेशघाटी, राजमहल से दक्षिण नीमका रावछा, कुएका वडा बनवाया। गुलाव बावडी के पास तीरथिया घोडे की प्रतिमा स्थापित की। तीसरे आश्रम में केदारेश्वर महादेव के निकट वास करने के लिये देव विलास नामक बाग और शिकार बुर्ज नामले महल बनवाये । वही गुलाब बाडी बनवाकर शिकार बुर्ज के पास कुंडोंकी रम्प शिवस्थापना की इसीके उत्तर में शीश<noinclude></noinclude> ij4vgsmxmvkefsls34z6tw0ldpo7g0s पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१६९ 250 195023 665633 2026-07-06T16:57:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665633 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १३८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | शोभा को बढ़ाने के लिये श्री हनुमानजी की स्थापना की । इन की खवास:" रूपरस रायजी ने केदारेश्वर के निकट रूपविलास बाग बनवाया । बेगूं में पिता बुधसिंहजी का चौंरा बनवाया। बूँदी के चारों ओर शिकार- खेलने के लिये शिकार बुर्ज बनवाये । भीमलत में शिकार खेलने का स्थान बनवाया । इन्होंने किले में कलाधारीजी का मंदिर बनवाया और मोती महल के पास कुलदेवी श्री आशा पुराजी का मंदिर बनवाया । यदि इन सब मकानों की कीमत का अनुमान किया जाय तो बडा आश्चर्य होता है । जिस समय उम्मेदसिंहजी लाखों रुपया लडाई के कामों में खर्च करते थे, जब लाखों ही रुपया उनका बूँदी के उद्धार में खर्च हुआ उन्होंने छाखों ही इस काम में लगा दिया। उन्होंने जबतक राज्य नहीं पाया लाखों रुपये का जेवर बेचकर काम निकाला। बस इसीलिये कहना पडता है कि जो लोग जेवरों से धन की हानि समझते हैं और जो लोग जेवरों की निन्दा करते हैं वे देखें कि जेवर विपत्ति के समय कैसा बढकर काम दे जाते हैं। राजा लोग केवल शोभा ही के लिये आभूषण नहीं पहनते हैं बरन जेवर उनके लिये विपत्ति के साथी हैं । अब इस खंड में कोई बात लिखने योग्य न रही। उम्मेदसिंहजी के चरित्र का जो शेष अंश है वह आगे के भाग में लिखा जायगा । वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करने के अनंतर उन्होंने जो २ काम किये उनका वर्णन उस भाग में होगा । एक क्षत्रिय कुमार जिस तरह ब्रह्मचर्य का पालन करता है पैसा उन्होंने वेंगू में रहने के दिनों में किया। उनका गृहस्थाश्रम लडाई झगडों में बूंदी लेने में और यहां राज्य स्थापन करने में बीता। ये बातें- पाठकों को इस भाग से अच्छी तरह विदित होगई और उनके तीसरे आश्रम का हाल चौथे खंडसे मालूम हो जायगा । 1<noinclude></noinclude> tufwnjqye8hs588x6tz1elyjkl4rk7g पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७० 250 195024 665634 2026-07-06T16:57:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665634 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चतुर्थ खंड । श्रीजी साहब का तीसरा आश्रम अध्याय १. --- पूर्व देशों की यात्रा | बीलहटे का झगडा | प्यारे पाटवी पुत्रको पाटदेने पश्चात् प्रतापी प्रजेश ने प्रिय पत्नी के परा मर्श से पृथ्वी पर्यटन के पूर्व प्रण का पाउन करने को पत्नी पास रखकर पुष्कर के लिये प्रयाण किया। पुष्कर में पढे पण्डितों के पवित्र पांडित्य से प्रेम करके पिता, पितामहादि को पिण्ड दिये पवित्र पुष्कर को प्रणाम करके परमात्मा को प्रसन्न किया। पाप मोचन करके प्राणियों को परम गति देने वाले पुष्कर के दानपात्र द्विजों को दान दक्षिणा देने में दातारी दिखाकर देवदर्शन से, दीन दुःखियाओं पर दया करने से देश २ में अपनी दान शूरता का दिग्दर्शन करा दिया । इस राज दम्पती के पुष्कर में पधार कर श्राद्ध करने और ब्राह्मणों को हजारों रुपया दान करने की जब कृष्णगढ नरेश को खबर हुई तब महाराज वहादुरसिंह जी इन्हें अपनी राजधानी में बेजाकर कृतकृत्य होने के लिये दौडे आये। उन्होंने इन जैसे राजर्षि को अपनी राजधानी में पधराकर अपने को धन्य माना। इनका आतिथ्य सत्कार किया और जितना बूँदी नरेश का करना चाहिये उससे कहीं बढकर किया क्योंकि अब यह केवल राजाहीन थे वरन राज्य त्यागकर राजर्षि की पदवी के योग्य हुए थे वहीं इनसे उदयपुर के महाराना असी (अरिसिंह) जी मिले। वहां से चलकर नासरदे में जयपुर के प्रधान सेनाध्यक्ष रामसिंह जी का आतिथ्य ग्रहण करने के अनंतर श्रीजी साहब ने बूंदी पधार कर अपने आश्रम में निवास किया । वैशाख मास में आपने<noinclude></noinclude> q0gx6i9ylvfa8ywgbqgootsqttk7i9z पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७१ 250 195025 665635 2026-07-06T16:57:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665635 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४० ) उम्मेदसिंह चरित्र | राज्य त्यागा था और उसी वर्ष के श्रावण मास में यह यात्रा की घटना संव १८२७ की है। इस यात्रा में कोई बात उल्लेख योग्य न हुई और न इस वर्ष में ही कोई घटना लिखने योग्य हुई परंतु इनके राज्य छोड देने से अजित सिंहजी के पराक्रम का पूरा परिचय न पाकर खैराड़ के मीनों ने फिर शिर उठाया था इस लिये अजितसिंहजी ने सेना भेजकर इन्हें फि दमन किया। केवल अठारह वर्ष की उमर में अपनी रजपूती के गहरे हाथ दिखाकर मीनों के बारह गांव खुटवा लिये, उनसे दंड में भरपूर रुपया लिया और उनके शस्त्र छीनकर उनसे लिखवा लिया कि “अब से हम लोग, चोरी न करेंगे, लूट खसोट न करेंगे, डाके न डालेंगे और गोवध न करेंगे ।" इतना लिखवाकर उन्हें खेती के कामों में लगाया। इसी वर्ष में अजितसिंह जी के महाराज कुमार प्रतापसिंहजी का जन्म होने से श्रीजी साहब ने पौत्र का मुख देखकर ईश्वर को धन्यवाद दिया । अवश्य ही महाराव राजा अजितसिंहजी ने इस बार मीनाओं को खूब दंड देकर फिर कभी शिर उठाने के योग्य नहीं रक्खा था परंतु ये फिर कभी शिर न उठाने पायें और फिर उनके लिये खून खरावी न करनी पडे इसलिये जहां पर इन लोगों का जमघट्ट था उस जगह के निकट एक किला बनाने की आवश्यकता पडी | किला बनाना अवश्य ही चाहिये परन्तु जो स्थान इस काम के लिये उपयोगी समझा गया वह मेवाड राज्य में था । इन्हों ने मुठमर्दी करके मेवाड राज्य के बीलहटा गाव किला बनवा लिया। इस अवसर में जब यह बांसवाडे विवाह करने गये थे तब मैदान खाली पाकर जहाजपुर के रानावत राजपूतों ने बीलड्डे पर चढाई की। चाहे इन दिनों श्रीजी साहब राज्य छोड़ चुके थे, और तीसरे आश्रम पालन करने के लिये उन्हें शस्त्र पकडने की आवश्यकता न थी परंतु वान- प्रस्थ आश्रम से भी बढकर उन्हें बूँदी की रक्षा प्यारी थी। जीते जी कभी बूँदीका एक बाल भी बांका होना उन्हें सहा नहीं था। राज्य छोडने पर भी, गृहस्थाश्रम छोडने पर भी यद्यपि रजपूती वाना उन्होंने नहीं छोडा था, यद्यपि उनके शस्त्र अब गो ब्राह्मण की, दीन दुखियाकी रक्षाके सिवाय और<noinclude></noinclude> 73ke1qsyd2pi2dt0u5cokhnsqsrg475 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७२ 250 195026 665636 2026-07-06T16:57:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665636 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पूर्व देशों की यात्रा | ( १४१ ) में आने के लिये नहीं थे परंतु बूँदी की रक्षा उनके लिये गो ब्राह्मण की से थी प्योंकि यह उनका अटल व्रत था। बस इसी लिये होंने फिर अपना बाना याद किया। उन्होंने सेना सजाकर कलर कसकर खोकी हुई तलवार फिर बांधकर बीहटे की रक्षा के लिये तैयारी की। न्होंने सेना चढाकर रानावतोंको कत किया। इसतरह उनका विनाश कर के यह फिर अपने आश्रम में आ विराजे। जब रानावतों से विजय होगया पासवाडे से अपना विवराह कर के अजितसिंहजी अपनी नई दुख- हेन सहित संवत् १८९८ के जेष्ठमासमें बूँदी आपहुंचे । "वंश प्रकाश" में पंडित गंगासहायजी लिखते हैं कि "अजित सिंहजीने वीलहटे में किला बनने की आवश्यकता समझकर रानाजीको लिखा कि आप इस जगह किला नवाओ। जबतक यहाँ अच्छा किया न बनेगा मीनोंका सदा के लिये दमन न दोगा। इस कारण यातो आप किला बनवाइये अथवा हम बनायेंगे" इसका उत्तर रानाजीने जब कुछ न दिया तब इन्होंने किला बनाकर यहां अपनी ओर से किछेदार रख दिया । इससे स्पष्ट है कि किला बनवाने में इनका कुछ विशेष दोष न था परंतु इसपर जो घटना हुई वह पाठकों को समय पढनेपर कुछ आगे चलकर विदित होगी। महारावराजा अजित सिंहजीके जिन महाराज कुमार का जन्म हुआ पा उनका इसी वर्ष में देहान्त होगया । पीत्र की मृत्युसे श्रीजी साहब को चाहे जितना दुःख हुआ हो परंतु इसलिये नहीं किन्तु पृथ्वी पर्यटन के पूर्व प्रण को याद करके इन्होंने अपनी पत्नी समेत संवत् १८९८ को आश्विन १० विजय दशमी को पूर्वके देशोंकी यात्राके लिये बूंदी से प्राण किया। आप यहां से चलकर केशवरायजी की पाटन में सुवर्ण और भूमिका दान करने के अनंतर इन्द्रगढ़ होते हुए ब्रज की ओर धारे। यहां श्री गिरिराज के दर्शन से, मथुरा की यात्रा से, वृंदावन के दर्शन से और ब्रज की परिक्रमा से अपने को कृतार्थ कर खूब दान पुण्य करते हुए राज दम्पती कडा मानिकपुर होकर उन्होंने मुंडन कराया, उपोषण किया, दान किया, प्रयाग पहुंचे । प्रयाग में आद्ध किया और इस<noinclude></noinclude> 2bzw5k3o6xjqhuvmex7cuqeh72gq4dj पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७३ 250 195027 665637 2026-07-06T16:57:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665637 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | तरह मन भरकर तीर्थ सेवन किया। जिस समय ये प्रयाग में थे काशी नरेश चेतसिंह जी के पास इनके आगमन की खबर पहुंची। वह स्वयं आकर इन्हें काशी लेगये । ये वहां राजमंदिर में कुछ काल बिताने बाद आगे बढे । इस विषय में आगे बढने पूर्व बीलइटे की खबर लिखना आवश्यक है । यद्यपि राज्य छोड देने के बाद इस बात से श्रीजीसाहब का कोई विशेष संबंध न रहा परंतु उनके संबंध का थोडा उल्लेख इस विषय में ऊपर हुआ है आगे जब २ काम पडेगा फिर लिखा जायगा इस कारण विषयान्तर होने पर भी बूँदी उदयपुरके मन मुटाव होने की घटना का इस चरित्र में विस्तार से वर्णन करना पडेगा। बीलहट्टे में किला बनाने बाद, रानावतों को मार भगाने बाद रानाजी को चेत हुआ । उन्होंने उस समय अजितसिंहजी के पत्र का उत्तर न दिया था परंतु अब लिखा कि :- "आपने बीलहटा बलपूर्वक छीन लिया सो उचित नहीं किया । अव यातो उसे लौटा दीजिये अथवा अपने छोटे भाई को हमारे यहां भेज दीजिये । हम उन्हें एक लाख रुपये की जागीर देंगे और साथ ही वीटा भी देदेंगे ।" इस पत्र को पाकर अजितसिंहजी ने अपनी ओर से यात बढाना उचित न समझा इसलिये अपने भाई बहादुरसिंह जी को उदयपुर भेज दिया । महाराना अडसी जीने अपने चाचा अर्जुनसिंहजी को इनकी पेशवाई के पट्टा दिया परंतु अपने प्रणके लिये भेजा । इन्हें एक लाख रुपये का अनुसार बीलहटा न दिया । उधर काशी से प्रयाण करके श्रीजीसाहब ने गया श्राद्ध किया, भगवान भूतभावन वैद्यनाथ महादेव के दर्शन करके आप बर्दवान गये । यहां के राजा ने इनका खूब आतिथ्य सत्कार किया। यहां से चलकर जब ये बालेश्वर बंदर पहुँचे तब मरहठा राज्य के सिपाहियों ने कर मांगकर इनसे लडाई ठान दी। उन्हें मार कूट कर ये वैतरणी नाभि गया, कटक होते हुए जगदीश पुरीमें पहुंचे। इन्होंने भगवान के दर्शन किये । मार्कण्डेयजी के आश्रम में इन्द्रद्युम्न श्राद्ध किया । समुद्र में<noinclude></noinclude> 8vg7w3horzzq1nzds6gpb5weo390ne6 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७४ 250 195028 665638 2026-07-06T16:58:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665638 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पूर्व देशों की यात्रा । ( १४३ ) नान किया। यहां से श्वेत गंगा में स्नान कर अठारह नावे होते हुए राम- गढ़ आये। वहां के राजा ने भी इनका बडा सत्कार किया । वह स्वयं इनसे मिलने को आये। यहांसे चलकर काशी में भगवती भागीरथी के स्नान तथा विश्वनाथ के दर्शन करने के अनन्तर मिर्जापुर के पास विव्यवासिनी देवी के दर्शन कर ये प्रयाग राज होते हुए चित्रकूट चले गये। वहां से यह ओर 1 गंगाजल से स्नान कराया और पुष्कर पधार आये। इस अवसर में भगवान गये झांसी गये और नरवर गये। नरवर नरेश रामसिंहजी कछवाहा ने नकी खूब मेहमानदारी की और एक तोप इनके भेट की वहां से चलकर शवराय जी की पाटन में दर्शन कर संवत् १८२९ की कार्तिक शुक्ला ११ को एक वर्ष और एक मास तक यात्रा कर के राज दम्पती बूँदी आगये । बूँदी में कुछ दिन रहकर श्रीजी साहब बेगूं अपनी मातामही के पास ये। वहां इन्हों ने उनको अजमेर कृष्णगढ होते हुए हूँदी की कृपासे इन्होंने फिर पौत्रका सुख देखा । संवत् १८२९ की पौप कृष्णा ११ को बांसवाडा वाली रानीजी से महारावराजा अजित- सिंहजी के दूसरे पुत्र विष्णुसिंह जी का जन्म हुआ । इनका इस चरित्र से दहुत संबंध है सो पाठकों को समय समय पर मालूम होजायगा चिरंजीवी क्षेत्र का जन्म होनेपर एक बडी भारी यात्रासे लौटने के हमें इन्होंने भगवती पतितपावनी भागीरथी के निमित्त वह उत्सव किया जिसे राजपूताना वाले "गंगोज" कहते हैं। इस उत्सव पर श्रीजी साहब ने समस्त हाडाओं को अस्थिपालजी के समस्त वंशवालों को, कोटा नरेश को आदिलेकर सव हाडाओं को बुलाया और उनका सत्कार करके पहरावनी दी । इसी वर्ष अर्थात् संवत् १८२९ के फाल्गुन में जब महाराना अडसी जी अपने राज्य का दौरा करते हुए बूँदी की सीमा के निकट आपहुँचे तब उन्होंने अपने हाथ से पत्र लिखकर श्रीजी साहब के नाम भेजा । उसका शिय यह था कि- " आप राजर्षि हैं। अब आपको किसी बातकी इच्छा नहीं है क्योंकि आपने जो कुछ चाहा कर लिया। हम आपके सेवक हैं, आप जैसे राज- .<noinclude></noinclude> o63vf3p1vu9abt8g32g10kqv3325qnh पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७५ 250 195029 665639 2026-07-06T16:58:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665639 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | र्षि के दर्शन करने की हमारी इच्छा है। हमें आशा है कि यहां पधार कर आप दर्शन देंगे ।" इस पत्र को पाकर श्रीजी साहब को बडा हर्ष हुआ। वह स्वयं शंकर गढ के मुकाम पर रानाजी से मिले । राना अरिसिंहजी उनकी पेशवाई के लिये आये और उन्हें अपने डेरे पर दिवाले गये । वहां उन्होंने इनसे अपने सिंहासन पर बैठने का बहुत आग्रह किया परंतु इन्होंनें बडे विनीत होकर यही उत्तर दिया:- "आपने जो कृपापूर्वक मेरा सम्मान किया है उसे मैं माथे चढाता परंतु में त्यागी हूँ। में राज्य छोडचुका हूं इसलिये राजसिंहासन पर बैठ नहीं सकता हूँ ।" यह कहकर आप उदयपुर नरेश की राजगदीके सामने अलग आसन पर विराजे । दोनों में आमोद प्रमोदकी और राजनीति की बहुत बातें हुई । श्रीजी साहब ने अपने विशाल अनुभव का उन्हें उपदेश दिया । बातों- ही बातों में महाराना साहब ने श्रीजी साहब से कहा:- "आप बीलहटा छोड दीजिये ।" यह बोले- जब राज्य छोड़ चुका हूँ तब इस विषय में आपको कुछ उत्तर नहीं देसकता हूँ । आप बूँदी नरेश को लिखिये परंतु मेरी राय यह है कि आप उसके बदले दूसरा गांव ले लीजिये । उसे अपने अधिकार में रक्खे बिना बूँदी वाले मीनों का दमन नहीं कर सकते हैं। अथवा उसका मूल्य जो चाहें ले लीजिये ।" यह कहकर इधर उधर की बातें करने बाद मिल भेंटकर दोनों ओर कां प्रेम बढाते हुए श्रीजी साहब बूँदी लौट आये। यहां आकर उन्होंने अपने पुत्र को समझाया कि:-- "रानाजी से जाकर मिलो और बीउहटे के विषय में उनसे झगडा. निवटा ।" इस परामर्शसे और इस आज्ञा से जब अजितसिंहजी जानेका विचार कर रहेथे तब ही उदयपुर नरेश का भेजा हुआ यहांका मंत्री अमरचंद यहां आया । वह जातिका ब्राह्मण था । वह बूँदी नरेश को उदयपुर नरेश के<noinclude></noinclude> 2mrwb158aho64ym06k3c7eq4ukh02ta पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७६ 250 195030 665640 2026-07-06T16:58:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665640 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पूर्व देशों की यात्रा । ( १४५) पास परा लेजाने के लिये आया था। यह एक बार राजकुमार प्रताप सिंहजी के साथ महाराना जगत् सिंहजी की आज्ञा से कैद रह चुका था। यह भाव का बडा चिडचिडा था, 'वडा घमंडी था । इसने बूँदी नरेश को संत्रा में उपस्थित होकर उनसे शंकरगढ पधारने की प्रार्थना करने के बदले राजनीति और राजाओं के दर्जे को भूलकर इनसे कहलाया कि:- "घमंड छोड़कर सथूर तक मेरी पेशवाई के लिये आओ ।" उसकी ढिठाई सुनकर युवा महाराज के कोपानल में घी की आहुति डी और बारूद में मानों आगकी चिनगारी जा पड़ी। उन्होंने सुनते ही युवा मुगराज की तरह गर्जकर आज्ञादी । कहलाया कि:- "क्योंरे कायर, सिंहों की समता कर के गीदड की तरह अपनी जीहत कराना चाहता है ।" यह आज्ञा सुनकर उसे भी क्रोध आगया । उसने कहा:- 6 अच्छा देख देंगे।" यह सोचकर बूँदी के कामदार की ओर से पेशवाई बिना ही यह पालकी पर चढ कर आया। उसकी अगवानी के लिये कामदार तो क्या कोई भी न मेजा गया। वह तलवार बन्दूक से जिरह बखतर से, सज धज कर बहादुर सिपाहियों को लिये हुए आया और दरवार में आकर ऐसी जगह जा बैठा जो उस के दर्जे से कहीं बढ कर थी । ऐसे घमण्डी आदमी के लिये खडे होकर सम्मान करने की अजितसिंहजी की इच्छा न थी परन्तु उस का निरादर उदयपुर नरेश का निरादर था इसलिये उन्होंने खडे होकर उसे ताजीम दी । ताजीम अवश्य दी परन्तु उन का संकेत पाकरे उपोढ़ी के दारोगा ने अमरचन्दसे पहले कहा कि :- C अपनी नियत जगह पर जाकर बैठो।" जब उसने न माना तब दारोगा ने उस का हाथ पकड़ कर वहां से बाद अमरचन्द्र के उठा उस की नियत जगह पर जा बिठाया । इस "ढिठाई में आकर अजितसिंहजी से कहा:- १०<noinclude></noinclude> cpgmjum4y27diig94u03x4u3zdprfca पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७७ 250 195031 665641 2026-07-06T16:58:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665641 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | "बीहटा छोटा कर महाराना साहब की सेवा करो नहीं तो बहादुर लिंथी मुसलमान तुम्हारे केश एकड कर तुम्हारा राजापन भुला देगा । " सचमुच ही ऐसे कटु वचन एक बहादुर हाडाके हृदय को वैध कर पार निकल गये । अवश्य ही उस समय उसके शिर पर उसकी मृत्यु नाचने लगी क्योंकि कोई भी वीर पुरुष शत्रु का शख सह सकता है परन्तु उस का वचन नहीं सह सकता इसलिये उसके घड से शिर अलग होने में कुछ देरी नहीं थी परन्तु युवा होने पर भी अजितसिंहजी नीति निपुण थे। वह जानते थे कि इस की ढिठाई का बदला देने में मेवाड से मित्रता बिगड जायगी । मेंढक को मार डालने में सिंह की शोभा नहीं है। इस दिये जहर का सा घूंट पीकर महाराव राजा अजितसिंहजी रहगये परन्तु इस सहनशीलता का परिणाम बहुत कडुबा हुआ जैसा हुआ पैसा आगे चलकर मालूम हो जायगा । प्रयोजन यह कि ऐसा कहकर वह यहां से चला गया। गत अध्यायमें जिस तो बहुत आया था परन्तु प्रार्थना की कि :- अध्याय २. रानाजी का वध | घटना का वर्णन है उससे अजितसिंहजी को जोश बूँदी के सरदारों ने और यहां के कर्मचारियों ने " इसमें अमरचन्द के चिडचिडापन का दोष है। यह इसी के घमंड का कारण है। यदि महारामा अडसीजी इस की खबर पायेंगे तो उसे अवश्य धमकायेंगे । वह वडे सज्जन हैं। उन से अवश्य मिलना चाहिये।" इस परामर्श से चिसको संतोष देकर महाराव राजा अजितसिंहजी - रामाजी से मिलने के लिये पधारे। इनका आगमन सुनकर अडसीजी अगवानी के लिये आये। दोनों नरेशों का और दोनों ओर के उमरावों का, दोनों ओर से आनंद के साथ समागम हुआ । यह मिले अवश्य परंतु मिलने<noinclude></noinclude> he3nisq5oqi3g715s3hv6v3jei1ki6g पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७८ 250 195032 665642 2026-07-06T16:58:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665642 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रानाजी का बध । ( १४७ ) के समय राजाओं के परस्पर न्यौछावर करने की जो चाक है उसका अजित- सिंहजी ने अमर चंदकी चाल से दुःखित होकर बर्ताव में किया । यह दात संत् १८२९ की फाल्गुन शु १ की है। दूसरे दिन महाराना साहब बूँदी नरेश से मिलने आये। इन्होंने राजरीति से उनका सत्कार किया । 'तीसरी भेंट में महाराना साहब, बूँदी नरेश और दीवान अमर चन्द्र का एकान्त में वार्तालाप हुआ। रानाजी ने पांच सौ रुपया रोकडी और मिठाई भेजी । रानाजी की रानीजी ने अर्थात अजितसिंहजी की साखी ने इनके लिये मिठाई के साथ पांच सौ रुपये भेजे । इस एकान्त परामर्श में बूँदीनरेश के साथ सीहोर के जागीरदार माधानी मगवन्तसिंहजी, इन्द्रगढ़ के जागीरदार भक्तरामजी और व्यास गोपाळ रामजी थे। इस गुप्त सभा में क्या हुआ तो आगे देखा जायगा किन्तु रानाजी ने राजरीति के अनुसार बूँदी नरेश को हाथी, घोडा, सिरोपाव और आभूषण देकर सत्कार किया और दूसरे दिन अजितसिंहजी बूँदी नरेश ने शनाजी को बुलाकर इसी तरह राजरीति से उनका सत्कार किया है 'यहां तक दोनों में खूब प्रेम पर्द्धन हुआ, खूब राजव्यवहार हुआ। यहां तक कोई मन मुटाबकी बात न हुई । इसके बाद महाराना साहब ने महारावराजा साहब के पास अपना दूत मेजकर कहलाया कि:- "वे के स्वामी चूडावत मेचसिंहजी, शंकर गढ के स्वामी, अमर गढ के मालिक कान्हायत कोजू रामजी और जलंधरी के स्वामी, ये चारोंही आपके पक्ष से निर्भय होकर हमें नहीं मानते हैं इसलिये इन्हें पकड़कर हमारे पास भेज दीजिये | हमारे आधीन कर दीजिये ।" इसके उतर में अजितसिंहजी ने कह लाया:- "बेगूं के स्वामी सवाई मेघसिंहजी का आप अपराध क्षमा कर दीजिये चूडावतों ने हमारे ऊपर बहुत उपकार किये हैं उनसे मेल कर खोजिये । हम बीचमें पढकर उन्हें बलपूर्वक आप के पास ले आयेंगे। शंकर गढ और अमर हमारी शरण आचुके हैं इस कारण हम उन दोनों की हानि नहीं<noinclude></noinclude> rb8c2s8inpz0240fmx20fulvlofevit पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१७९ 250 195033 665643 2026-07-06T16:59:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665643 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १४८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | कर सकते हैं। आप की यदि इच्छा हो तो उन्हें युद्ध में जीत लीजिये। अव रहे जलंधरीवाले सो उनसे हमारा कुछ लगाव नहीं। आप उन्हें पकड़ने 1 के लिये सेना भेज दीजिये उसके साथ हमारा कोतवाल केशवराम जाकर उन्हें हमारे यहां से निकाल देगा । " इस बातको सुनकर रानाजी ने जलंधरी पर सेना भेजी और बूँदी के कोत- वाल ने साथ जाकर वहां के जागीरदार को निकाल दिया। गढ में रानाजी का अधिकार हो गया। इस के अनंतर रामाजी बिना पूछे ही शंकर गढ के इलाके में चले गये और उन्हों ने मार्ग में खैरुणा गांव जलाकर अमर गढ के इलाके में जा प्रवेश किया। इसपर अजितसिंहजी अमर गढ नहीं जाना चाहते थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि:- जब रानाजी हमें बिना सूचना दिये ही चले गये तब हम क्या उन के नौकर हैं जो उन से मिलने के लिये वहां तक जाये । " परंतु बूँदी के उमरायों और कर्मचारियों ने जब बहुत आग्रह किया तब इच्छा न रहने पर भी उन लोगों की बात माननी पडी। यहां जाकर इन्होंने रानाजी से कहलाया कि "में आज ही बूँदी जाता हूँ । इस पर रामाजी ने उत्तर दिया कि - "हमने दूत भेजकर आज जो काम कह लाया है उसे करके जाइये ।" और अमरचन्द्र द्वारा यह कहला भेजा कि:- "बीहटगांव हमारी नजर करदो तब बूँदी जाओ।" इस पर क्रोध बहुत आनेपर भी उसे रोककर अजितसिंहजी बोले:- " वहां तो मैने चोरों को दबाने के लिये किला बनवा लिया। मैने उसके कोट की नीम में अपने हाथ से बडे २ पत्थर डाले हैं इसलिये क्षमा कीजिये । हम आपकी प्रीति चाहते हैं इसलिये या तो उससे दूने मूल्य का और गांव ले लीजिये और नहीं तो उस गांव के लिये प्रतिवर्ष कुछ रुपया ले लिया कीजिये । इस उचित बात को दोनों राज्यों में प्रेम बढाने वाली संधिको यह बात इस समय ऐसी की ऐसी ही रह गई किन्तु संगत स्वीकार न किया।<noinclude></noinclude> glpkz6kkap9f49b8y95cpf7okq8ap4n पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८० 250 195034 665644 2026-07-06T16:59:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665644 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>7 रामाजी का बध । ( १४९ ) १८२९ की चैत्र कृष्ण १ के दिन गडा हुआ विष उबल पड़ा। उस दिन दिन के ग्यारह बजे के लगभग दोनों राजा मिलकर खरगोश का शिकार खेल ने गये। दोनो ने एक २ शशक मारा। जिस समय शिकार से लौटकर दोनों अपने २ डेरों पर आने लगे अजित सिंहजीने रानाजी से फिर कहा कि:- "मैं कलही यहां से बूँदी चला जाऊँगा इसलिये जो कुछ आपको कहना हो स्पष्ट कहकर जाइये। „ यदि रानाजी के मन में मेल न होता तो इस समय उन्हें समक्ष में वीह के मामले का निबटारा करलेना चाहिये था । कर्मचारियों का डाटा हुआ मैल समक्ष की बात चीन से सहज में बुलाता है । इस कारण यदि रानाजी अजितसिंहजी के कथन पर खूब विचार करके इस समय ठहराय कर खेते तो बखेडा न घढता बढाहुआ झगडा निपट जाता परंतु उन्होंने इनकी बात का कुछ उत्तर न दिया । यदि यह उत्तर में "हाँ" के वदले "ना" कह देते तो उन्हें अधिकार था परंतु उत्तर न देकर अपमान किया। वीर क्षत्रिय बहादुर हाडा फूल की तरह तलवार के घाव सह सकता है परंतु तिल मात्र भी अपमान नहीं सह सकता है किन्तु क्रोध के मारे इनके हृदय में प्रचंड अधि की भयंकर ज्वाला उठने लगी । ज्वाला उठने पर भी इन्होंने अपने मन को रोका परंतु रानाजी ने- "यदि हमारे कहने से नहीं देते हो तो शस्त्रधारी सिंधी मुसलमानों के जोर से देना - "यह कहकर उसे उभारा और इतने ही में रानाजी के एक नौकर ने कटु वचन कह कर उस अभि को खूब भडका दिया । उसने कहा:- अगले दिन तुम कैसे जा सकोगे। क्या उदयपुरके नरेश को तुम दुर्बल समझते हो ? क्या कभी इनके नौकर सिंधी मुसलमानों को नहीं देखा है जब उन जैसे डरावने यत्रमों से तू घिर जायगा तब हे कायर हाडा तू" इसके आगे उसने जो कुछ कहा सो लिखने योग्य नहीं है। उसके ऐसे वचन आणों के हृदय में उगते ही अजितसिंहजी क्रोध से कांपने लगे, उनके<noinclude></noinclude> bzufahnqmzmub05p5ftnkwcels3h4yd पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८१ 250 195035 665645 2026-07-06T16:59:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665645 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १५० ) उम्मेदसिंह चरित्र | होठ थरथराने लगे और भुजायें फड़कने लगीं । ऐसे समय में रामाजी को चाहिये था कि उस पाजी को-एकनरेश से कटुबचन कहने वाले को डाटते, फटकारते और दंड देते परंतु जब उनकी इस काम में सम्मति होगी, जब वह एक तुच्छ नौकर के द्वारा ऐसी बुरी बात कहलाना चाहते होंगे तब ही उन्होंने उससे कुछ न कहा । यस अजितसिंहजी ने समझलिया कि इनकी भी इसमें सम्मति है। केवल इतना ही नहीं वरन रानाजी अजित सिंहजी से सुजरे का शिष्टाचार किये बिना, इनके मुजरे पर - शिर पर हाथ लगाने पर ध्यान दिये बिना चलदिये । ऐसे समय में कौन ऐसाबीर पुरुष है, कौन ऐसा बहादुर राजपूत है जो अपना अपमान करनेवाले को जीता छोडदे, उसे मारकर अपना कलेजा ठंडा करने के बदले उसे विना पुरस्कार ही जाने दे ! अंगरेजों के प्रौढ प्रताप से चाहे अब समय नहीं रहा और सर्वत्र शान्ति विराजमान है परंतु तब शत्रुको मारकर बदला लेनेका काल था । बस इसी लिये अजितसिंहजी अपने घोडे को ऐड देकर जाते हुए रानाजीके आगे बढे और बढकर उनके एक ही माला ऐसा मारा कि उनका मुर्दा प्राण रहित हो कर धरती में लोट गया। इसके अनंतर रानाजी का शिर काटने के लिये इन्होंने तलवार चलाई परंतु उनके एक चोपदार ने दोनों हाथों के जोर से इनके हाथ पर छड़ी मारदी। इससे तलवार तिरछी होकर उनका माथा वचगया। अवश्य ही इससे उनके हाथ पर चोट आई और इनकी तलवार छूटगई परंतु इनके सामंतों के हाथ से उदय पुर के तीन सरदार सारे जाने बाद इन्होंने रानाजी के शरीर में से अपना वरछा निकाल लिया । इसके बाद वहां क्या हुआ सो लिखनेकी आवश्यकता नहीं है परंतु इतना सुना गया है कि रानाजी के साथ जो रानियां सती हुई उन्होंने 'अजितसिंहजी को शाप दिया। कुछ भी हो परंतु इस तरह बूँदी नरेशों के हाथसे अबतक चार रानाओं का बध हुआ । जैसे:- "हामे मोकल मारियो खेत लाल खुमान | सूजे रतन पछाडियो अजमल अडसी रान" ॥<noinclude></noinclude> a64ys9k6q646uuksua5e53dbe3npsb5 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८२ 250 195036 665646 2026-07-06T16:59:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665646 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रानाजी का वध | ( १५१ ) महाराव राजा अजितसिंहजी जब वहां से बूँदी आकर पितासे मिले तंब श्री. जो साहब ने इस काम की निन्दा की । पुत्र से अच्छा नहीं कहा और इस तरह उनके बढते हुए मन को रोका। इस प्रकार से ऊपर जो कुछ लिखा गया है वह बूँदी के इतिहास का सार है परंतु ढाड साहब ने इस बात को कुछ और ही तरह खिखा है। यहां मैं उनके मतका उल्लेख कर दोनों ओर के इतिहास की तुलना करना चाहता हूं। टाउसाहब लिखते हैं कि:- CG 'एक भारी दुर्घटना जिसका मेवाड और हाडौती की सीमा के इतिहास से धना संबंध है यहां उल्लेख करने योग्य है। बावदा में सैंकड़ों वर्ष पूर्व संता ने तो भविष्यवाणी कही थी कि " राव और राना को अहेडे के अवसर पर इकडे न होना चाहिये। इसका परिणाम मृत्यु होगा। यही सत्य होगई। हम जो कुछ यहां लिख रहे हैं इस तरह की मृत्युकी चौथी घटना है। " "बीलहटे की झोपडियां जिनमें कुछ आमों के सिवाय और कुछ पैदा नहीं होता था और जहां थोड़े से मीने निवास करते थे इस वे ही इस झगडे की जड हैं। बूँदी नरेश ने शायद इसे अपने राज्य में मिला लेने के लिये यहां एक किला इस कारण से ताकि लुटेरों का दमन हो सके । ये लोग अपने शों की प्रेरणा से इस जगह अपने स्वामी के स्वत्व में बनवाया और उसमें सेना रक्खी असन्तुष्ट मेवाड नरे- बूँदी का अनधिकार प्रवेश मानते थे। इसी कारण रामाजी ने अपने उमरायों सहित और सिंधी सैनिकों को लेकर इस झगडे की जगह को प्रयाण किया और वहांसे बूँदी नरेश अजितसिंहजी को अपने लशकर में बुलवाया। यह आये और रानाजी उनके रंगढंग से ऐसे प्रसन्न होगये कि बीहटे के झगडे को बिलकुल भूल गये। इस अवसर में वसन्तऋतु आ पहुंची। फाल्गुन का महीना था । गौरी के आगे सुअर का बलिदान करके नया वर्ष आरम्भ करना 'आवश्यक हुआ। युवा हाडा ने रानाजी की ओर के सत्कार के बदले बूँदी राज्य में अहेडे पर उन्हें बुलाया। सीसोदिया नरेश ने इस निमंत्रण को स्वीकार करके सदा की चाल के अनुसार अपने उमरावों में हरी पगडियां<noinclude></noinclude> oi3fsa54dwfsbwxcq3ohewixtoqafbl पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८३ 250 195037 665647 2026-07-06T16:59:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665647 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १५२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | और हरे दुपट्टे बांटे। इस तरह वह नियत तिथी को बड़े ठाठ के साथ घोडों की सवारी में मानते पहुंचे। " राजत्यागी राव इन दिनों थे। उन्होंने ज्योंही इस शिकार के भेजकर अपने पुत्र से कहलाया कि " बदरीनारायण की यात्रा से लौट आये. मनसूबे को सुना एक खास हरकारा "सती के शाप से सावधान रहना ।" इसका अजितसिंहजी ने उत्तर दिया कि - "ऐसी कायर बातों से न्योता पीछा नहीं किया जा सकता।" सबेरा होतेही रामाजी युवाराव की मित्रता से आनंदित होकर मैदान में गये। किन्तु इससे पहले ही दिन रात्रि के समय मेवाड के मंत्री ने बूँदी नरेश की सेवा में उपस्थित होकर इनसे बहुत ही अपमानसूचक शब्दों में कहा था कि- " या तो बीहटा दे दो नहीं तो हम सिंधी सेना भेज कर आप को कैद कर लेंगे। आप यहां राजा साहब की आज्ञा के नौकर हो आप योंही घमंड करते हो ।" बस यही अपमान बूँदी नरेश के हृदय में दिन भर चक्कर लगाता रहा । और जब शिकार का काम समाप्त होगया और रानाजी से छुट्टी लेने का अवसर आया उनके मनमें एका एक इस अपमान की बात याद आगई और याद आते ही बदला लेने का उन्हों ने पक्का ठहराव किया। रानाजी इस बात को नहीं जानते थे इस लिये उन्होंने अपने युवा मित्र को मुसकरा कर जाने की अनुमति दी और फिर शीघ्र मिलने की आशा दिखलाई। अमी इनका विचार पक्का नहीं हुआ था--अभी इनका मनसूबा अधूरा था इसलिये इस तरह का बर्ताव देख कर यह शिशक गये और उनसे मुजरा करके वहाँ से विदा होगये । परन्तु थोडे से कदम जाते ही मानों इन के मन में बजा आई हो इस तरह इन्होंने अपनी बदला लेने की शक्ति को बटोर कर रानाजी पर आक्रमण किया और उनपर भाला मार ही दिया !. इनका निशाना ऐसा अचूक लगा कि भाठा रानाजी के शरीर को फोड * टाड साहब ने यह घटना न मालूम नानते की किस आधार पर बताई है। यह बात मेवाड राज्य की है जैसे यह इस बात में भूले हैं वैसे भूल के आधार पर अपनी राय देने में भूले हो तो आश्रय क्या है !<noinclude></noinclude> 4k36qmpzajx8c8l059sg3rd4kgpfkur पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८४ 250 195038 665648 2026-07-06T16:59:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665648 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>" रानाजी का वध | (१५३ ) . घर घोडे की गर्दन में जा सका। रामाजी इन्हें अपना मित्र समझते थे । इस लिये इसके सिवाय कुछ न कहने पाये कि ऐ हाडा आपने यह क्या किया " फिर इन्द्रगढ महाराजा ने अपनी तलवार से उन का काम कर डाटा हाडारावजी ने इस काम से अपनी बडाई समझ कर उन- कछत्र छीन लिया और उसे बूँदी के महल में जा खड़ा किया। अपने धराने में ऐसी घातकता देख कर राज्य त्यागी उम्मेदसिंहजी घबडा गये "" इस काम पर फिटकार है" कह कर फिर अपने पुत्र को और उन्होंने आंख उठा कर भी नहीं देखा । " " रानाजी और बूँदी नरेश आपस में साहू २ थे। दोनों का कृष्णगढ रेश की कन्याओं से विवाह हुआ था । यद्यपि रानाजी को उनकी रानी ने नसे सावधान रहने के लिये पहले से कह दिया था परंतु साहू के नाते ले ऐसे संदेह को स्वीकार न किया। पहले दो राजाओं की मृत्यु से पुराना बैर बराबर होगया था और अब शत्रुता का कोई कारण उपस्थित न था । इस कमवस्त दुर्घटना के पहले दिन मेवाडके मंत्री की ओर की दावत में सबने साथ २ मित्रता सहित भोजन किया था परन्तु इस घटना का लगाव इस राय से मिलता हुआ है कि इस काम में मेवाड के उमरावों का इशारा था क्योंकि वे अपने अत्याचारी राना से घृणा करते थे । और इस बदला लेने की आग सुलगाने वाले मेवाडी मंत्री को धमकी के सिवाय और प्रमाण भी इसके लिये कम नहीं है। जिस समय माले की मार हुई एक साधारण चोबदार के सिवाय मेवाड के किसी उमराव ने न तो बूँदी नरेश को रोका और न उनका पीछा किया। केवल उसीने अपने मालिक को बचाने की योग्यता दिखलाई। इसके विरुद्ध मेवाड के सब ही बहादुर मानो मले से डर गये हों। इस तरह भाग गये और अपने डेरे और महाराना की- • अपने मालिक की लाश तक को छोड़ भागे । " " अपने स्वामी के लिये अन्तिम रस्म करने का अब एक ही काम शेष रह गया। उनकी रानी ने बहुमूल्य चिता चुनवाई और इस<noinclude></noinclude> s57mwfjvp5bjcb6kbz8w2whlplp28fn पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८५ 250 195039 665649 2026-07-06T17:00:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665649 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १५४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | तरह अज्ञात संसार में उनके साथ जाने को तैयार हुई । लाश अपने हाथों- में लेकर उसने अपने पति को घात करने वाले को कहा यदि यह घटना स्वार्थ से हुई है तो घातक भी हरण बन जायगा और जो यह पुराना बदला लेने उसे शाप से मुक्त करती हूँ। जिस पेड़ के नीचे के शाप दिया। उसने इसका ऐसा ही उदा- सुविचार से हो तो मैं चिता तैयार हुई थी उस की एक डाली इस बात की गवाही देने के लिये उसी समय गिरगई और " तुरन्त ही वीलहटा का आकाश चिता के धुएं से सफेद होगया । इस अध्याय में बूँदी के इतिहास के आधार पर जो कुछ लिखा गया है। उसे पाठकों ने पढ़ा और टाडे साहब का लेख भी उन्होंने अच्छी तरह देख लिया। अब दोनों के मिलान करने का काम है। यह काम जररा डेढा है। पाठकों की भिन्न २ रुचि से जुदा २ ही परिणाम निकलेगा। ऐसी दशा में इस विषय में विशेष लिखने की आवश्यकता नहीं है तथापि चरित्र लेखक की स्थिति में मुझे अपने कर्तव्य के अनुरोध से लिखना पडता है।.. दोनों लेखों में छोटी मोटी बातों का जो अन्तर है उनपर विचार करने से कुछ प्रयोजन नहीं है किन्तु बूँदी के इतिहास के मत से रानाजी के सेवकों ने परोक्ष में अजितसिंहजी का अपमान किया, उनके समक्ष इनसे ऐसी कठोर बातें कहीं तिन्हे पढ़ कर अब भी रोंगटे खड़े होते हैं परन्तु रानाजी ने इस धृष्टता पर अपने नौकरों को कुछ दंड से रोका नहीं और न उस समय अजितसिंहजी का सन्तोष क्या इन का मुजरा न झेलकर, इनकी प्रार्थना ओर देखे बिना ही वह चल दिये। ऐसी समझ लिया हो कि ये लोग रानाजी की अथवा रामाजी आप मीठे बनकर इनके द्वारा हैं तो इसमें अजितसिंह जी का दोष नहीं है । में जहां तक जानता हूँ ऐसा समझने में भूल नहीं की । टाड साहव भी अपनी किताब में इस बात को मानते हैं कि अजितसिंहजी से रानाजीके मन्त्री ने कह वचन कहे परन्तु उनके मत से उसने राताजी को मरवाने के लिये न दिया उन्हें कहने संतोष किया न लुनकर इनकी दशा में यदि अर्जितसिंहजी ने इच्छा से ऐसी ढिठाई करते हैं हमारा अपमान करवाते<noinclude></noinclude> 8kppoarw8zu7muzcmv0x63rknew0vz6 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८६ 250 195040 665650 2026-07-06T17:00:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665650 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शनाजी का बध । (१५५) उन्हें भडकाया था, मेवाडी उमरावों का इस में इशारा था क्योंकि उनका लगाव न होता तो वे अपने मालिक की लाश छोड़कर भाग न ते परन्तु बूँदी के इतिहास से यह बात ठीक नहीं मालूम होती । कवि-- रजा सूर्याजी बिलकुल बेलाग आदमी थे । उन्हों ने "वंशभास्कर जय बूँदीवालों के दोषों की जगह दोष और गुणों की जगह गुण खलाये है तब ऐसी स्थिति में उन का कथन असत्य नहीं होसकता । यह कथन भी मुख्य बातके डिये नहीं किन्तु एक साधारण के लिये । खिलते हैं कि "मेवाडी सरदार दौलतसिंहजी और शम्भूसिंहजी छड र मारे गये और इस लिये अपने स्वामी के साथ स्वर्ग को सिधारे । " उससे स्पष्ट है कि मेवाड़ी सरदारों का बूँदीवालों से मेल न यह केवल यही नहीं वरन यदि मेल होता तो रानाजी की छाश लेने के दिये अमरचन्द्र सेना लेकर बूँदीवालों से न लड़ता । ऐसी दशा में. रही बात ठीक है कि बहुत नम्रता करने पर भी रानाजी ने बीलहटे का फैसला न किया, अपने सामने अपने हलके नौकर के मुख से अजितसिंहजी का अपमान होने दिया और उन्होंने स्वयं सुजरा न किया। ये बातें एक वीर और युवा नरेश के हृदय पर कोप उत्पन्न करने के लिये कम नहीं हैं । अब केवल दो बातों पर विचार करना है। एक यह कि ढाड, साहब के मत से अजितसिंहजी ने रानाजी के क्रोध दिलाये बिना उन्हें मार डाला और दूसरे सत्ती की वाणी सत्य हुई। इससे दूसरे के विषय में कुछ अधिक कहना नहीं है क्यों कि जिस विश्वास से यहां रानाजी का वध हुआ उसी विश्वास से रावराजा सूर्यमलजी के हाथ से राजा रतनसिंहजी मारे गये थे। हां पहले के लिये केवल एक बात कहनी है वह यही कि टाट साहब भले ही रानाजी का क्रोध दिलाना न मानें परन्तु जब उन सामने अजितसिंहजी से कटु वचन कहे गये और वह चुपचाप सुनते रहे उन्ही का क्रोध दिलाना था । अस्तु यदि इन्होंने जिस समय अजितसिंहजी से कटु वचन कहे उसी समय न मार कर पीछे ते मारा हो जय भी समय की अनुकूलता प्रतिकूलता पर इन्हें अवश्य विचार करन<noinclude></noinclude> giqa8g33wshvfh0mp5glk12tc6699a0 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८७ 250 195041 665651 2026-07-06T17:00:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665651 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १५६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | चाहिये था। खैर जो कुछ समय पर होना था सो होगया । अब पुरान लकीर पीटना अच्छा नहीं । अब भगवान की कृपा से अंगरेजों के सुरागई. में सबही राजाओं का परस्पर प्रेम है, सवही में प्रेम बढता जाता । और सवही का स्नेह बढता रहना चाहिये । परमेश्वर देशी नरेशों का परस्प मेल बढा कर राज्यों की उन्नति और प्रजा का कल्याण करे और साथ ही ब्रिटिश साम्राज्य के सुशासन के सहायक हों। अध्याय ३. ---18-- पुत्र का परलोक | संवत् १८३० की वैशाखी पूर्णिमा का दिन बूँदी के लिये बडाही भया- नक निकला। उस दिन सूर्यनारायण संसार का अन्धकार दूर करने के लिये । नहीं उगे थे। उस दिन उन्होंने अन्धेरा दूर करने के बदले बूँदी के आकाश को शोक संताप के डरावने वादलों से ढांक दिया। उस दिन गर्मी की लिये सुरराज इन्द्र ने अपनी लेकर रंक तक की आंखों से लूओं से प्राणियों का कलेजा ठंढा करने के मेघावली से मेह नहीं बरसाया किन्तु राजा से लगी । उस दिन आकाश -आंसुओं की धारा नदी के प्रवाह की तरह बहने के बादल गरजते न थे किन्तु खियों के रूदन का गगन भेदी आर्तनाद उलटा -आकाश को जा रहा था। उस दिन धोछे दुपहर बिजलियां चमकने के बदले शव के साथ की मशालें बिजली की तरह कलेजे को दहलाये डालती थीं। हाय ! उस दिन का दृश्य बडा ही हृदय विदारक था। उस दिन की घटना का लेख इतिहास में पढकर उससे मन की कल्पना शक्ति जो आंखों के सामने - दृश्य खडा करती है वह वडा भयानक है। हाय वह समय बडा ही भयंकर था जब राज भक्त प्रजा के कानों में यह खबर पहुंची कि :-- "आज लाखों का पाउने वाला लाखों को बिलबिलाते हुये छोडकर चल बसा। "<noinclude></noinclude> o33w4voq4jyapdurvmse5qih7d4sna2 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८८ 250 195042 665652 2026-07-06T17:00:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665652 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पुत्र का परलोक । ( १५७ ) इस घटना से रनवास में रोना कूटना मच गया, राजकुटुंब में हाथ २ मच ई और प्रजा " त्राहि भगवान त्राहि । " पुकारने-चिल्लाने लगी। है उस दिन हुआ क्या हुआ यही कि रामाजी को मारकर बूँदी डौटने के खुद ही महारावराजा अजितसिंहजी को शीतला निकली । शीतला देवी कहलाकर पूजी जाती है । जिसे भोले भारतवासी माता हकर वंदन करते हैं यह सच मुच ही देवी होने पर भी अपने उदर से पैदा ने वाले बच्चोंको खाजाने के लिये काली नागिन है। वही कालीनागिन' उनका ग्रास कर लेनेके साथ इनकी रानियों का सुख लूट लेंगई। सके माता पिता को शोकसागर में डालकर चलदी और उनकी प्यारी जा को एक नन्हे से बच्चे का हाथ थंभाकर चढ़ी गई। प्रतिवर्ष हजारों नन्हे २ मलकों का बलिदान लेकर देवी शीतला हजारों माता पिता को पुत्रहीन, तान हीन कर डालती है परंतु इस बार उसने लाखों का पाठने वाला उठा लिया। लोग कहते हैं कि-- CC लाख मरियो परंतु लाखों का पालने वाला न गरियो । " हाय ! हाय !! बडा अनर्थ होगया । इनकी ग्यारह रानियों की अपना जीवनाधार - जीवन सर्वत्र स्वामी उठजाने के समय क्या दशा हुई होगी। इस दुःख को इस प्राणान्त कष्ट को या तो भगवान ही जानता है और या वे अनाधिनी अलायें जानती हैं जिनका सुख पति के साथ ही सदा के लिये लुट जाता है। टाड साहब कहते हैं कि मेवाडी सती का शाप सवा हुआ। 'सचा हो वा झूठा। जो कुछ होना था होगया परंतु इनकी ग्यारह रानियों में से एक रानी और कई एक खवासों में से एक खवास-इनकी सह गामिनी हुई। पति का परलोक होते ही जिन रानियों का पतिप्रेम उनके साथ ले जाने की शक्ति नहीं रखता था ये रोई, चिलाई, मूर्छित हुई और अपने हाथों से अपना कलेजा पीटकर रह गई परंतु झलाय राजाजी की कन्या रानी शृंगार सुन्दरीजी ने वहीं शृंगार किये हुए, उन्हीं आभूषणों से सजधजकर हंसते २ पनि के विमान के साथ स्मशान भूमि तक उसी तरह यात्रा की जैसे दुलहिन दुलह के पीछे चलती है !<noinclude></noinclude> 8phgtos00ts56ew65i2vf5erm5yqu7o पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१८९ 250 195043 665653 2026-07-06T17:00:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665653 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १५८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | वह आज शोक संताप को, लोक उज्जा को, संसार के सुख को हाथ जोड स्वर्गका सुख लूटने के लिये पति के साथ होगईं। दोनो ही ने पति को चिन में बैठकर पतिका मस्तक अपने गोद में लिये हुए आनंद ध्वनि के साथ- 'सती माता की जय की धर्म ध्वनि सुनकर पति लोक को प्रया किया । धन्य हिन्दू नारी, धन्य $6 " राज नारी, तुम स्त्री जाति में रत्न हो इस करा कलिकाल में भी तुम पूजी जाती हो । ' अवश्य में राज कुटुम्ब का, प्रजा का दुःख दिखाने में कई पृष्ठ रंग गया परंतु पुत्रशोक में, प्यारे युवा पुत्र को राज्य के स्वामी पुत्रको खोकर राजत्यागी श्रीजी साहब की इस समय क्या दशा हुई होगी। बूँदी के इतिहास में इसका विस्तार नहीं है। टाड साहब ने भी इस विषय में कुछ नहीं लिखा है इस लिये मैं अधिक क्या लिखूं परंतु इतना अवश्य है कि जब पुत्रशोक में महाराजा दशरथ सरीखे राजर्षिने प्राण त्याग दिया था, भाई के मूर्च्छित होने पर नर नाथ रामचन्द्रजी नर लीला दिखाने के लिये जब शोक बिद्दल हो गये थे, तब राज्य त्याग देने पर भी, गृहस्थाश्रम छोडकर वनवासी बनने पर श्री यदि श्रीजी साहब को असीम शोक हुआ हो तो आश्चर्य क्या है परंतु उन्होंने अपने त दुःखको इस तरह छिपालिया जिसतरह कृपण अपने धनको छिपाता है। वह बडे २ खोमहर्षण संग्रामों में जैसे तलवारों के घाव सहकर भी एक पांच पीछे नहीं हटे थे वैसे ही उन्होंने इस देवी वज्र को सहलिया । यह कर्तव्यदक्ष थे। वह इस असार संसार में अपना कर्तव्यपालन करने को पैदा हुए थे। जो अपना कर्तव्य पालने को जन्म लेते हैं उनके लिये हुई शोक समान है। भला यह तो एक शांतिका समय था किन्तु भयानक समर में यदि इनके सामने ही किसी शत्रुकी तलवार इनके प्यारे पुत्र का शिर काट लेती तो क्या यह इस शोक सागर में डूबकर रण भूमिसे मुंह मोडते । कदापि नहीं! बीर क्षत्रिय, वहादुर हाडा ऐसे नहीं हैं वे प्राण जाने। पर भी पीठ नहीं दिखाते हैं। कट मरने पर भी रणभूमि में उनका शव उलटा नहीं गिरता है तांकि शत्रु उनकी पीठ देख सकें । बस जब रणभूमि में वीर क्षत्रियों को, वहादुर हाडाओं की ऐसी स्थिति है तब कार्य क्षेत्र में श्री जी<noinclude></noinclude> gikwkafx46srwrd0pvvn7jb9xnx81zh पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९० 250 195044 665654 2026-07-06T17:00:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665654 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पुत्र का परलोक | (१५९) साहब कैसे विचलित होते ! वह यदि इस समय बढाजाते और पुत्र शोकसे होजाते तो उनकी प्यारी बूँदी की रक्षा कौन करता? उन्हें बून्दी बितनी प्यारी थी उतनी प्यारी रानियां नहीं थीं, पुत्र नहीं थे, परिवार नहीं था, पर नही था और यहां तक कि प्राणभी नहीं थे। यदि उन्हें प्राण प्यारे होते से उनकी कायरता बूँदी में आज हाडाओं की विजय पताका उडाने न देती । परिवार को, परिजनों २० वर्ष की उमर के हाडा कायर कहलाने से पहले ही मरजाना अच्छा समझते हैं। त्रय जाति में हाडाल में "कायर" की गाली है बस इस लिये मेद सिंहजी जैसे रणभूमि में कभी कायर न कहलाये ऐसे ही कार्य क्षेत्र में उन्होंने कायरता का कलंक न फटकने दिया। वह इसीलिये कालके भयानक वज्रको उसी तरह सहगये जैसे पवनकुमार हनुमानजी राक्षस रायण का घूंसा सहगये थे। उन्होंने इस शोक को मनका मनमें छिपा + अपनी प्रिय पत्नी को, पुत्रवधुओं को, पुत्रों को, हे और प्रजा को आश्वासन दिया और केवल की बूँदी नरेश की अंतिम क्रिया करवाई। "वंशमास्कर" और "वंशप्रकाश" से विदित जितसिंहजी बडे मीर थे। टाइसाहब भी इस बात की साक्षी देते हैं। बूँदी के हास में तो यहां तक लिखा है कि वह श्रीजी साहबके जमाये हुए राज्यको हृत बढाते परंतु जो बात चली गई उस के लिये शोक करना वृथा है । होना था सो होगया । पुत्र की अन्त्येष्टिक्रिया होने के बाद श्रीजी साहब को पारी बूँदी की रक्षा की चिन्ता पडी । अवश्य ही उस समय उनकी वैसी ई दशा होगई जैसी माता मरजाने पर प्रिय पौत्र का पालन करने वाली नदी की होती है । वह राज्य छोड़ चुके थे और गृहस्थाश्रम छोड चुके थे रंतु अब उन्हें इस त्याग को भी छोड़ना पड़ा। जब वह राजपाट जेडकर तृतीयाश्रम में प्रवेश करचुके थे तब यद्यपि अब छत्र धारण नहीं कर होता है कि स्वर्गवासी ते थे, अब उनपर चंचर मोरछक नहीं डुलाये जासकते थे और न अब वह हासन पर विराज सकते थे बस इस लिये उन्होंने केवल साढ़े चार जीने की उमर के पौत्र विष्णुसिंहजी को नरेश बनाया ।<noinclude></noinclude> mdlm4gfpvsc1fdeoxtngb6npqub0ofy पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९१ 250 195045 665655 2026-07-06T17:01:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665655 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १६० ) उम्मेदसिंह चरित्र | अध्याय ४. यात्रा का दिग्दर्शन | 44 टाड राजस्थान " से । पुत्र को राज्य देकर श्रीजी साहब कहलाने के समय से पौत्र को राजा बनाने के समय तक उम्मेदसिंहजी ने जो २ काम किये उनका वर्णन बूँदी के इतिहास से लेकर गत अध्यायों में लिखा गया अब देखना चाहिये कि टाड साहब ने इनकी यात्रा का किस ढंग से वर्णन किया है । यही बात इस अध्याय में लिखी जायगी। कथा का सिलसिला ठीक मिला देने के लिये इस विषय का कुछ हिस्सा जो टाड साहब की पोथी से पहले उद्धृत किया जा चुका है उसे यहां फिर दुहराने की आवश्यकता है, बस इसी लिये यहां उसका उल्लेख करना पडा है। पाठकगण, कृपाकर पुनरुक्ति दोष के लिये मुझे क्षमा करें । ढाड साहब ने लिखा है कि:- "राज्य त्यागी उम्मेदसिंहजी श्री जी की पदवी पाकर अपना जीवन एकान्त में बिताने के लिये उस पुण्यभूमि में जा बसे जहां की पहाड़ी बादी केदारनाथ के नाम से प्रसिद्ध है जो पठार के प्रथम नरेश को जादू की तरह आरोग्य करके पवित्र कहलाई है और जहां गंगा के नाम से एक सोता नामांकित है । इस जगह इस युद्धप्रिय यात्री ने देश देशान्तर के अनेक देशों के असंख्य फूल और फल पैदा करने वाले वृक्ष ला लाकर लगादिये। ये वृक्ष चाहे बर्फ से ढंके हुए हिमालय की पैदायश थे, चाहे विषुवत रेखा के निकट समुद्र के किनारे पर उत्पन्न होनेवाले थे। * टाड साइन लिखते हैं कि राजा कोलन गंगाजी के किनारे केदारेश्वर की यात्रा के लिये साष्टांग प्रणाम करते २ जाते हुए वहीं कुष्ठ रोग से, इस सोते में, बाणग में स्नान करके आरोग्य होगये थे। भगवान् केदारनाथ जी ने राजा को उसी समय पठार का अर्थात् मध्य भारत का नरेश बनाया था।<noinclude></noinclude> a6b34dvtql30vy121vvp5yxfobdgwcx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९२ 250 195046 665656 2026-07-06T17:01:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665656 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- यात्रा का दिग्दर्शन | ( १६१) परंतु श्रीजी के आनंद की उस समय सीमा न रही जब यह परदेशी वनस्पति बूँदी के चट्टानों में उगकर फूल फल देने लगी। शरीर को झुलसा देने वाली गर्मी में, उनकी कुटीर के पास इस राजर्षि के हाथ से तिब्बती अनन्नास और मलाका की बेत को उगा देख उन्हें भी आश्चर्य हुए बिना न रहा होगा, क्योंकि वह स्वयं नहीं जानते थे कि इन पेड़ों का किस तरह का स्वभाव है। "जब उम्मेदसिंहजी ने हाडाओं के राजदंड का त्याग किया उन्हें निय था कि केवल एकान्त जीवन से ही शांति मिलेगी, केवल यही संतोष प्राप्त करेगा और उनके लिये तथा उनके सुख के लिये इसी को आव- यकता है किन्तु अपने लिये यात्रा की तैयारी में साथी चुनते हुए उन्होंने अपने कुलाभिमान को, अपने दर्जे को छोडा नहीं क्योंकि उनके त्याग में बुद्धि की कायरता को लिये हुए उदासी नहीं थी, उनके त्याग में आग्रह लिये हुए | विचार की दुर्बलता न थी। उनके ये ही ऊंचे विचार जो उन्हें विरासत मिले थे उनके साथ रहे और जहां २ वह साधु महात्माओं के दर्शन करके उनसे उपदेश प्राप्त करने के लिये गये वहां २ उनके साथ ही बने रहे। उन्होंने अपने राज्य के इतिहासों में तथा और राज्यों के इतिहासों में पढ़ाया' कि- "यह राजवैभव मोक्ष से वंचित रखने के लिये अच्छा खासा फंदा है और वही आदमी सच्चा सुख प्राप्त करता है जो समय आनेपर उसे छोड छाडकर अलग होजाता है और स्वर्ग सुखके लिये शांति का मार्ग अवलंबन करता है।" किन्तु अपने विचार और आचार का अनुगमन करके उन्होंने जान लिया कि संसार की विचित्रता में, केवल कन्या कुमारी के निकट रामेश्वर की खाड़ी में गढजाने से, अथवा केवळ गंगाजी में गोते लगाने से हो भला न होगा। बस इसी लिये उन्होंने उन समस्ततीयों के अवलोकन करने का पका मनसूबा कर दिया जो हिन्दूजाति के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित हैं और जो यात्रा ही यात्रा में जीवन बिताने वाले लोगों के भी दर्शन में नहीं आसकते हैं । उनके इस मनसूबे पर उनकी यात्राप्रियता दे समें उन्होंने परवरिश पाई थी खूब असर डाला और जब उन्हें विदित होगया के न केवल शाखों से और मजहब से ही काम चलेगा तब उन्होंने यात्रा की कटि- ११<noinclude></noinclude> 8yq4flmmk4kmpxwecc34n9th4ztxmmy पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९३ 250 195047 665657 2026-07-06T17:01:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665657 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १६२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | नताओं में घुस पढने का सच्चा संकल्प किया । इसीसे उनके हृदय को शांति मिली और यही उनके मानसिक दुःखों को दूर करनेकी महौषधि निक ली । इसीके अनुसार यह राजसी साधु साधुओं के भेष में यात्रा करने के बदले शनों से सज्जित होकर यात्रा करने को निकल पडे । इसमें भी उनके लिये इन्द्रियदमन था । केवल दिखावट नहीं थी क्योंकि वह अपने शरीर पर उस समय के प्रचलित सब ही शस्त्रों को, प्रत्येक शस्त्र को धारण करते थे। इनमें इतना वोशा होता था कि जिसे आज कल के गये बीते जमाने में दो राजपूत भी अच्छी तरह नहीं उठा सकते हैं। वह राई से भरा हुआ अंगरखा पहनते थे जिसे तलवार नहीं काट सकती है। यह बंदूक रखते थे, माला रखते थे, तलवार रखते थे, कटार रखते थे और छुरियों का समूह रखते थे, चमडे की थैली रेखते थे, सिंगी रखते थे । उनके पास एक फरसा था, एक बरही थी एक गलोड थी, एक आसां ++ " था और धनुष के साथ बाणों से भरा हुआ भाया था। और यह प्रमाणित होगया है कि जिस समय उनकी उमर सप्तवर्ष को पहुँच जाने से इधर उधर भटकने में ही उनकी दाढी श्वेत होगई थी उनके शरीर में इतनी सामर्थ्य थी कि वह अपनी ढाल में अपने इन्ही सब शस्त्रोंको रखकर केवल एक हाथ से उठा ही नहीं लेते थे किन्तु कुछ पलतक उन्हें लेकर उस + हाथको उठाये भी रखते थे ।" १ इसे राजपूताने में देवडी कहते हैं जिस में जल भरते हैं। १++ वह शस्त्र श्रीजी साहब का ही आविष्कार है। यह बरछे की सूरत का होता है। इसकी भाल चुरे की सी चोंडी होती है और उसके नीचे नीचे की ओर मुडेहुए लोहे के द टुकडे होते हैं। शत्रु के शरीर में घुसेट कर पीछा निकालते समय उसकी अति खिच आती है। एक कविने कहा है कि:- "सब आयुध ईश्वर रचे ब्रह्मा रच्यो सुवेद । परशुराम परसो रच्यो आसो रच्यो उमेद । " ३ कहते हैं कि एकवार जालिमसिंहजी अपने सामने दो पहलवानों के हाथों में शेर पंजे पहनवा कर लड़ा रहे थे। दोनों के शरीर नखों से छिन्न भिन्न होगये थे। संयोग से यहां उम्मेदसिंहजी भी आ निकले । उनके आगे जालिम सिंहजी इन पहलवानों की प्रशंसा करने लगे। उम्मेदसिंहजीने कहा कि इस काम में न इनकी---<noinclude></noinclude> adcd8hc3zkpq1s6wz85mzz9fnd45to7 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९४ 250 195048 665658 2026-07-06T17:01:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665658 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्रा का दिग्दर्शन | ( १६३) "अपने कुल बहादुर राजपूतों की छोटी सी सेना लेकर उन्होंने अनेक वर्षों तक बडी मुसतक यात्रा करके प्रत्येक देश छानडाला। यह गंगाजी निकलने के सोते गंगोत्री से लेकर रामेश्वर तक गये । उन्होंने अराकान जाकर सीताजी के तप्तकुंडों से लेकर, उडीसा के जगन्नाथजी से लेकर हिन्दुओं की दुनिया के अंत तक यात्रा की हिन्दू धर्म के अनुसार जहां तक जाने की सीमा है वहां २ तक जाकर उम्मेदसिंहजीने प्रत्येक पवित्र का प्रत्येक आश्रर्य दायक स्थान का और प्रत्येक विद्यापीठ का अवलोक- न किया। और जब कभी यह अपने पैतृक स्थान को छोटे केवल उनके कुलवा- कों ने ही उनका आदर न किया वरन रजवाड़ों के प्रत्येक राजा ने प्रत्येक राजपूत ने उनकी अभ्यर्थना की, क्योंकि वे लोग समझते थे कि मार्ग में चलते गीर्थ हमारे यहां निवास करने से यदि इस राजर्षि का पवित्र चरण हमारे स्थान में पड़ेगा तो हमारा वर पवित्र होजायगा । वह देवता समझे जाते थे । जानकारी का खजाना जिसे उनके अनुभव ने इकट्ठा किया था इतना बढ़कर था कि उनकी प्रत्येक बात का आदर होता था और उनका हर एक शब्द लि खा जाता था। वह जिस समय विद्यमान थे उनकी कितनी प्रशंसा की जा ती थी उसका बडकर प्रमाण यह है कि अब तक भी प्रत्येक हाडा उन्हें बडे पूज्यभाव से स्मरण करता है। उनलोगों के लिये श्रीजी का वाक्य हीं आईन था और उनके चरित्र के जितने किस्से प्रचलित हैं उन्हें अब भी होग बडा पवित्र समझते हैं। लगभग उनकी अंतिम यात्रा सिंधु नदीके मुहाने पर उसके बीच में हिंगलाज की भयानक अनि देवी तक हुई थी, जो मकरान के किनारे पर है और जो हिन्दुओं की सीमा के पार है। ज्यों ही वह द्वारका को छोटे कावा जाति के जंगली लोगोंने उनका रास्ता -वीरता है और न आपके लिये ऐसा पासक तमाशा कराना योग्य है। यदि वीरता खना हो तो इनसे मेरी ढाल उठाओ ढाल उठाने का दोनों पहलवानोंने प्रयत्न 'केया परंतु न उठायके। तब से लजित होकर जालिम सिंहलीने ऐसा पालक तमाशा कराना छोडदिया ।<noinclude></noinclude> lk8g50yrxym27g0pxr80isihdvjk58c पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९५ 250 195049 665659 2026-07-06T17:01:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665659 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. ( १६४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | रोक लिया। यह एक लुटेरी जाति है जो उस देश में बसती है । किन्तु इस वृद्ध वीर ने अपने अस्थि मांस की शक्ति के साथ धर्म की शक्ति को मिलाकर बडी ही वीरता के साथ अपनी रक्षा की और उन्हें मारकर उनसे खूब विजय-- पाया । उन्होंने कावाओं के सर्दार को कैद कर लिया और जब उसने यह प्रण कर लिया कि हम लोग अब से फिर द्वारका के यात्रियों को कभी न सतावेंगे तब छोडा । " 'उम्मेदसिंहजी की वीरयात्रा एक दुःखद् घटना से रुक गई । उनके पुत्र की मृत्यु होजाने से उन्हें अपने पौत्र की शिक्षा के लिये फिर राजधानी में कुछ काल तक निवास करना पडा ।" श्रीजी साहब की प्रशंसा में टाडसाहब ने जो कुछ लिखा है उससे बढकर में क्या लिख सकता हूँ। टाडसाहब सच सुच ही उनके भाट बनगये हैं । इससे मेरा मतलब यह नहीं है कि उन्हों ने इस लेख में कुछ भी अत्युक्ति की है । उनके लेख में अतिशयोक्ति का देश नहीं है । वह सथे लेखक थे, राजपूताने के इतिहास की नसनस से अभिज्ञ थे । उन्होंने जो कुछ इस विषय में लिखा है केवल बूँदी के इतिहास से नहीं किन्तु सब रजवाडों के इतिहासों से मिलान करके दिखा है क्योंकि यदि उन्होंने ऐसा न किया होता तो उन जैसे गंभीर और प्रामाणिक विद्वान् की लेखनी से ऐसा कदापि न लिखाजाता कि उस "समय के सब ही राजा श्रीजीसाहब के पधारने से अपने घर को पवित्र सम झते थे। अस्तु इस चरित्र में टाडसाहब के उल्लेख से पाठकोंने जान लिया होगा कि वह सच्चे राजर्षि थे । उन्होंने राज्य के झंझट से बचने के लिये दुनिया से किनारा नहीं किया था और न उन्हें आज कल के कितने ही ढोंगी साधुओं की तरह भगुवां कपडे पहन कर दुनिया की आंखों में धूल डालना पसंद था। वह दिखलागये कि यदि किसी राजा को राज्य से विरक्ति हो तो इस 'तरह करना चाहिये। पुराणों में लिखे हुए राजाओं की बात जाने दीजिये परंतु राजपूताने के भारतवर्षके इति हासों को अथ से लेकर इतितक देख जाइये और फिर कहिये उनके सिवाय कौन राजा ऐसा हुआ है जिसने शत्रु के पेट में से राज्य नि-<noinclude></noinclude> l7i3fhthoirn1cu9z3qute80r3p7yrf पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९६ 250 195050 665660 2026-07-06T17:01:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665660 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्रा का दिग्दर्शन | ( १६५ ) काल कर पसीने के बदले अपने शरीरका रक्त बहाने वाले परिश्रमसे प्राप्त किया हुआ राज्य सुख भोगने के समय तिनके की तरह त्याग दिया और फिर राजसी छाट के साथ भारतवर्ष भर का कोना २ छानकर साधु महात्माओं का दर्शन कि- चा, उनसे उपदेश ग्रहण किया और अच्छे २ पदार्थों का बूंदी में संग्रह किया। यदि उनका ऐसा विशाल अनुभव कहीं लिखा गया हो तो आज कलके नरे- शों के लिये मनुस्मृति को बराबर काम दे सकता है और आजकल के राजा- ओं का पथदर्शक बन सकता है। केवल राजाओं के लिये ही उनका अनुभव प्यारी से प्यारी वस्तु नहीं है किन्तु बडे २ अंगरेज उससे बडा २ लाम उठा सकते हैं। यह देश प्रबंध के लिये एक अच्छा मसाला है। उनके संग्रह किये हुए वृक्षों का अबतक कुछ अंश "देवविास" बाग में विद्यमान है । उन्होंने केवल देश देशांतर के वृक्षों का ही संग्रह नहीं किया था वरन उनक उपार्जन कियाहुआ एक प्याला बूँदी नरेश के पास है। उसके गुण अद्भुत हैं। वह सचमुच जादू से भरा हुआ है। जो काम अपना शिर खपादेने के यादवों के परिश्रम से भी बडेर नामी डाक्टर नहीं कर सकते, जो काम ठीक तौर पर आयुर्वेद में नहीं है और यूनानी हिकमत में नहीं है यह उस प्याडे में है। कैसे भी विषधर सर्प ने किसी आदमी को काटा हो, किसी पर किसी तरह का विष चढ गया हो उस प्याले में डाला हुआ पानी उसे पिला देने से उसका विष तुरंत उतर जाता है। इसतरह वह • प्याला हजारों आदमियोंको काल के गाल में से निकलाता है। उसका जल अब भी बूंदी में गरीब से लेकर अमीर तक के लिये खुशप्य है। उसके जल से मरीहुई सोंगें शहर की कोतवाली रक्खी रहती हैं और राज्य के बड़े बड़े गावों में रक्सी रहती हैं और जलपीते ही रोगीपर जादूका सा असर करती हैं। उनके संग्रह किये हुए पदार्थों में यह में एक प्याला ही नहीं है ऐसी २ अनेक वस्तुयें हैं जिन में जादू के समान गुण है। कोई भी डाक्टर, कोई भी बैद्य, कोई भी हकीम अबतक कहने में समर्थ नहीं हुए हैं कि इनमें ऐसा गुण क्यों है ? टाटसाहब की पुस्तक से इस अध्याय में जो वाक्य उद्धृत किये गये हैं उनसे मालूम होता है कि द्वारका के निकट कायाओं से युद्ध कर के उनका दमन करने की<noinclude></noinclude> 513r0dfy9hu8kmzis61qid1q4ezadz2 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९७ 250 195051 665661 2026-07-06T17:02:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665661 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १६६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | घटना महारावराजा श्रीविष्णुसिंगजी के शासन से पूर्वकी है परंतु बूँदी के इतिहास से विदित होता है कि यह घटना पीछे की है। खैर कुछ भी हो। यहां यह प्रसंग आ पडने पर लिखी गई है और फिर भी यथा स्थान इसका संकेत करदिया जायगा । श्रीजी साहब के उन शस्त्रों का संग्रह बूँदी राजके सिलह खाने में हैं सच मुच ही उन्हें देखकर बडा आश्चर्य होता है। उन्हें एक ढाल में रखने पर वढा अचंभा होता है । यही मनमें आता है कि जिसे आजकल के दो धीर नहीं उठा सकते उसे वह अकेले कैसे उठाते होंगे। सच मुचं ही वे शस्त्र पूजनीय हैं । जैसे देवताओं को वंदना की जाय वैसे ही उनका आदर है। धार्मिक हिन्दू एक साधारण लकड़ी को तीथों में साथ रखकर जब बड़े आदर की वस्तु संमझने हैं तब ये शस्त्र एक महात्मा के हैं और देशभर के समस्त तीथों में हो आये हैं। इनका इतना आदर कियाजाय तो आश्चर्य क्या है? अध्याय ५. पौत्र को राज्य । द्वारका की यात्रा । यह पहले लिखा जा चुका है कि श्रीजी साहबने युवा पुत्रके, (महाराव राजा अजितसिंहजी के) सुरलोक को प्रयाणकर जाने से बालक पौत्र को राज्य दिया । वह जब एक बार राजपाट छोड़ चुके थे और जब वह अपना उपार्जित राज्य अपने पुत्र को दे चुके थे तब वह पुत्र के राज्य को पौत्रके अधिकार को क्यों कर ग्रहण कर सकते थे इस लिये उन्होंने गोद में खेलने वाले, जरासे, चार-साढे चार महीने के बालक पौत्र को राज्य दिया। उन्होंने उसी विधि से पौत्र को बूँदी के महारावराजा बनाया जैसे पुत्र को बनाया था केवल अंतर इतना ही था कि अजितसिंहजी जिस समय सिंहासन पर विराजे अपने आप एक वीर क्षत्रिय के वेश में थे और जब महारा राजा विष्णुसिंहजी बूँदी नरेश बनाये गये तब वह सेवकों की गोद में थे, तब उन्हें खबर नहीं थी कि "मैं आज राजा बनाया जारहा हूँ। आज मुझ पर बडी भारी जिम्मेवरी का काम डाला जारहा है।" खैर कुछ भी हो ज्येष्ठः<noinclude></noinclude> 2n9a59p8uf9y6q2a6craxfmvrn15kcm पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९८ 250 195052 665662 2026-07-06T17:02:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665662 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्रा का दिग्दर्शन | ( १६७ ) छष्णा ११ सोमवार को संवत् १८२० में श्रीजी साहबने साढ़े चार मास की उमर के पौत्र विष्णुसिंहजी को राज्य दिया । शास्त्र विधि के सब कम्मी के सिवाय अपने हाथ से पौत्र के मस्तक पर राजतिलक किया । जो हर्ष, जो उत्सव, अजितसिंहजी के राज्याभिषेक के समय हुआ था वही बालक विष्णु सिंहजी के लिये हुआ। श्रीजी साहब धाभाई सुखरामजी को पौत्र का अमात्य बनाकर आप पौत्र की शिक्षा दीक्षा का और राज्य के निरीक्षण का काम करते हुए यहां निवास करने लगे। राज्य छोडदेने पर भी, संसार छोड देने. पर भी और बूँदी पालन के दृढव्रत के प्रती होकर उसी तरह रहने लगे जैसे दूधमुंहे बालक की माता मरजाने से दादी को उसका पालन पोषण करना पडता है। अवश्य ही वह इसतरह बूँदी के प्रेम में पौत्र के स्नेह में फँसकर कुछ काल के लिये तीर्थयात्रा करना छोड़ बैठे परंतु फिर भी राज मदसे, राज्य प्रपंचों से उसी तरह अलग भी रहे जिस तरह जल में रहकर और जलही में जन्म लेकर भी कमल जल से अलग रहता है। उम्मेदसिंहजी राज्य के कामकाज से अलग थे और इस बात को सारे रजवाडें जानते थे इसीलिये रानाजी को बूँदी से फिर छेडछाड करने का साहस हुआ उन्होंने इसबार बीलहटे के लिये बूँदी से मिड पडने की हिम्मत न की किन्तु महाजी सेंधिया से सहायता की। उनके पास वकील भेजकर कहलाया कि-" बूँदीवालों ने हमारे पिता अरिसिंहजी को मारकर उनका घोड़ा और बीड- इटा छीन लिया। आप हमें दोनों बून्दी से दिलवा दीजिये || " केवल इतना ही न कहलाया वरन बेगू पर चढाई करने के लिये कुछ व्य देकर महाजी की सेना इधर बुलाई। संघिया ने नैनवां आकर धामाई सुखरामजी को पत्र faखा और उसमें महाराना हमीरसिंहजी को उनके पिता का घोड़ा और वोटा छोटादेने की सलाह दी। दू मुंहे बालक नरेश के समय में सेंधिया जैसे प्रबल शत्रु से सामना करना उचितं- न समझ कर एक हलकी बात के लिये शांति का मंग करना अनुचित जानकर पुराने झगडे को और गडे पत्थर को उखाड़ने में कुछ लाभ न समझ कर धाभाई<noinclude></noinclude> 8m1pc9rhn7jdwc1hjxqi4rfd7ks1qrk पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/१९९ 250 195053 665663 2026-07-06T17:02:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665663 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १६८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | जीने राना अरिसिंह जी का घोड़ा और वीलहटा ग्राम राना हम्मीरसिंह- जी को लौटा दिया । वास्तव में यह कार्य समय के अनुसार हुआ । धाभाई जी ने बुद्धिमानी की और श्रीजी साहब ने भी ऐसी सलाह देकर उ चित ही किया क्योंकि पहले से ही रानाजी से उलझकर बीलहटा छीन लेने का कार्य उन्हें पसंद नहीं आया था। यदि वह इस समय इस काम के लिये रोकटोक करते तो उन्हें केवल रानाजी पर ही नहीं वरन सेंधिया पर श उठाना पडता, शांति का भंग करना पडता और उनके बूँदी रक्षा के व्रत में तथा सेंधिया की मित्रता में विन पडता । यद्यपि बूँदी वालोंने सेंधिया से मित्रता रखने के लिये वीटहटा देदिया था परंतु अपने चिर उपकारक बेगूं वालों की सहायता करने में वे आना कानी न करसके । उन्होंने समझ लिया कि बीहटा देने में यदि कुछ हानि है तो केवल अपनी है किन्तु बेगू जैसे मित्र राज्य की, सदासर्वदा, बडा भारी उपकार करते रहने वाले राज्य की गाढी भीड के समय सहायता न करना कृतनता है, मित्र द्रोह है और पाप है। बस इस लिये उन्होंने वेगूकी सहायता के लिये बूँदी से सेना भेजी। रानाजी से युद्ध का खर्चा पाकर महाजी सेंधिया ने वेगूं पर चढाई की। बेगू बालों की वीरता और बूँदी की सहायता देखकर अकेले रानाजी, अकेली मेवाड से भिडने का साहस न करसकी। सेंधिया की सेना ने बेगू को घेर कर लड़ाई की । बेगूवालों ने भी अपनी शक्ति भर लडने में कसर न की परंतु जब महा- जी की सेना को आगे कट मरने के सिवाय कोई उपाय न देखा तब इ लाख रुपया दंड देकर मेल करलिया। इस तरह मेवाड का बेगू से झगडा समाप्त हुए पीछे बूँदी की सेना राजधानी को लौट आई। जिस समय सेना डौटकर चली आई श्रीजी साहबने बूँदी राज्य के सरदारा उमराव, सेठ साहूकार, कर्मचारी इकट्ठे करके उनसे कहा:- " धाभाई सुखराम तुम्हारे स्वामी अजितसिंह के समय से राज्य का अमात्य - है। इसे ही अभी अपना स्वामी समझो क्योंकि तुम्हारा स्वामी अभी निरा बालक है।<noinclude></noinclude> hoeu0adve6fci0xsk6cy6k6an3zcplv पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२०० 250 195054 665664 2026-07-06T17:02:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665664 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्रा का दिग्दर्शन | (१६९ ) भी दूध मुँहा बालक है। जब तुम्हारा स्वामी कहीं जाये तब भवानी और भगवंतसिंहजी इसके साथ रहें और इसके चाचा वहादुर सिंहजी -इसके आगे रहे। " श्रीजी साहब इस तरह राज्य का भार धाभाई सुखरामजी पर डालकर ही निश्चिन्त न हुए। उन्हें खटका था कि महाराव राजा विष्णुसिंहजी को निरा बालक समझ कर कोटानरेश पहले की तरह फिर मालिक म वन बैठें। यह शिशु पौत्र का राज्य निष्कंटक किये बिना अपनी यात्रा का कार्य प्रारंभ नहीं करसकते थे। यद्यपि बीलहटे का झगडा निपट जाने से उन्हें अब मेवाड की ओर अधिक चिन्ता न थी परंतु पडौसी कोटा जय समय पाये सब वार कर सकता था इसलिये उन्होंने बूँदी का कोटे से बडे भाई का छोटे भाई से और एक पडोसी का दूसरे पडोसी से मेल करादेना ही आवश्यक समझा । सफ-- उता उनकी जूतियों की दासी थी। वह जहां हाथ डालते सफलता उनके सामने हाथ बांधे खड़ी रहती थी। वह जैसे युद्धमें विग्रह में निपुण थे वैसे ही राजनी- त में भी दक्ष थे। फल इच्छा के अनुसार हुआ। कोटानरेश के नाक का बाल कोटे के कर्ताधर्ता विधाता, कोटे के दीवान, झालावाड राज्य के मूल पुरुष झाला जालिमसिंहजी इस काम में सहायक हुए। दोनो राज्यों के सरदार आये गये। दोनो ओर से खूब आतिथ्यसत्कार हुआ। दोनो में मेल हुआ और इसतरह सदा का झगडा मिटकर दोनो राज्य भाई २ होगये । यह दिन दोनों के लिये बडा शुभ था क्योंकि बंधुविरोध से बढकर दुनिया में कोई बुराई नहीं है। हर्ष है कि तब से वरावर स्नेह चला आता है। इसी अवसर में संवत् १९३१ की कार्तिकी पूर्णिमा को श्रीजी साहब की रानीजी राठोडजी का स्वर्गवास होगया। पत्नी के स्वर्गवास से पति ने अकेले होकर अब अपने को और भी संसार में अकेला समझ लिया। थोडा सा बंधन जो शेष रहगया था सो मी अब टटगया और बूँदी के राज्य को भीतरी उपद्रव से और बाहरी आक्रमण से निष्कंटक समझकर, राज्य का भार विश्वास पात्र धाभाई और सरदारों के भरोसे छोड़कर इसी वर्ष के मार्गशीर्ष कृष्ण में<noinclude></noinclude> j599c5bm0p3246iw6r2jtjomyth9e6z पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२०१ 250 195055 665665 2026-07-06T17:02:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665665 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१७० ) उम्मेदसिंह चरित्र | अर्थात् प्रियपत्नी की अंत्येष्टि क्रिया समाप्त होते ही द्वारका को प्रयाण किया । यह घटना उस समय की है जब लखनऊ के नवाब आसिफुद्दौला को.. वीर रहेछों ने बहुत तंग कर रक्खा था। नव्याय का उनके मारे नाकों दम आगया था और इसीलिये उन्हें अंगरेजों की शरण लेनी पडी थी। इस बात का श्रीजी साहब के चरित्र से कुछ भी संबंध नहीं है परंतु "वंश भास्कर'' के आधार पर इस इतिहास प्रसिद्ध घटना का मैने यहां इसलिये उल्लेख किया है कि पाठकों को समय का ज्ञान होजाय । रुहेलों के त्रास से बचने के लिये अंगरेजों को नव्या ने काशी का परगना देदिया और कदाचित् तब ही से उस प्रान्त में अंग्रेज जाति का पैर जमकर भगवान वामनावतार के पैर की तरह बढता २ प्रान्त भर में फैल गया । कांशी का परगना अंग्रेजों को मिलजाने से बूँदी राज्य का उनसे पहला संबंध वहीं हुआ, क्योंकि वहाँ पर बूँदीनरेश के पूर्वज रावराजा सुर्ज नजी के बनाये अनेक स्थान हैं। द्वारका के लिये बूँदी से प्रयाण करके श्रीजीसाहब पुष्कर में खान करते हुए मारवाड की सीमा में होकर जिस समय पधारते थे वहां के मंत्रियोंने इनका मार्ग रोक लिया । इनसे बहुत कुछ विनती करके जोधपुर लिया लेगये जोधपुर नरेश ने इनकी पेशवाई की, इनकी खूब अभ्यर्थना की और कुछ दिन वहां रक्खा। वहांसे चलकर बाबगांव पहुंचे। यहां के राजा गजसिंहजी ने इनके दो घोडे नजर किये । मारवाड की सीमा का उल्लंघन कर गुजरात होते हुए श्रीजी साहब मौरवी राज्य में पहुंचे। यहां के जाडेचानरेश बाघसिंहजी ने इनका बहुत सत्कार किया तथा घोडा ओर शस्त्र भेट किये। इन्होंने एक बरछी रखकर औरों को लौटा दिया। वहां से आगे बढ़ने पर राजकोट के नरेश कुंमसिंहजी ने पेशवाई करके इनकी नजर न्योछावर की । इन्होंने नजर लौटाकर जुनागढ को प्रयाण किया । जूनागढ से हनुमत धारा होकर, अंबाजी के दर्शन करते, ओघड पादुका को परसते, आत्रेय कुंड में आचमन करते गिरनार पर चढे । लोगों में प्रसिद्ध है कि:- "गंगा न्हाया न गोमती, चढा न गिरि गिरनार । बनजारे के बैल ज्यों, गया जमारा हार। "<noinclude></noinclude> 8axvjlaksl8i4dvkj1ih22anpuxj88s पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२१ 250 195056 665666 2026-07-06T17:03:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665666 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९० ) उम्मेदसिंह चरित्र ! जिस समय आपकी सवारी बूँदी राज्य में घुसी यहां के अमात्य और यहां के सरदार आप के दर्शन करने के लिये सामने आये। उनमें विष्णुसिंहजी को बहकाकर शालाजी में मिले रहने और बूँदी का अनिष्ट करने वाले नाथावत कृष्ण सिंहजी भी थे। उनसे श्री जी साहब ने कहा:- "मैंने सुना है कि तुम विवाह करने वाले हो परन्तु मेरी राय में तुम अभी शादी मत करो। तुम्हारी उमर कम है ।" श्रीजी साहब के इस कथन का मर्म चाहे कृष्णसिंहजी समझे हों वा न समझे हो परन्तु आप का आशय यही था कि- "यदि शादी करोगे तो तुम्हारी स्त्री को विधवा होना पडेगा क्योंकि तुम्हारी उमर कम है अर्थात् तुम शीघ्र मारे जाओगे ।" इतना कहकर समस्त आगत मनुष्यों का अपनी बातों से संतोष कर अच्छे उपदेश देकर श्रीजी साहबने उनको विदा किया। उन्हें विदा करके आप कुछ दिन तक केदारेश्वर महादेव के निकट अपने आश्रम में रहे। एक दिन लाग पाकर आप अचानक श्रीरंगनाथजी के दर्शन करनेके लिये महलों में पधारे। यहां जाकर पौत्र से मिले मिलते ही आपने बिजली की चमक की तरह 1 तलवार हाथ में तुरत ही सलवार निकाल ली। नंगी लेकर वीर राजर्षि के पराक्रमी क्षत्रिय के वेश में अपने तेज से, अपने प्रताप से पौत्र की आंखों में चकाचौंध डालते हुए सिंह गर्जन स्वर से कडकर पौत्र से कहा और उनके हाथ में अपनी नंगी तलवार देते हुए कहा:- " बेटा, यह तलवार ले । यदि तू मुझ से संतुष्ट नहीं है तो इसी तल- शिर काट ले । प्यारे नाती के हाथ से खूब बूढ़ा हो चार से अभी अपने हाथ से मेरा सरने में मेरी शोभा है। मैं अब किये थे और जो २ मेरी कामनायें थीं वे अब मुझे जी कर क्या करना है गया। मैंने जो २ संकल्प सब भगवान ने पूरी कर दीं। इसलिये इसी तडवार से तू मुझे सार डा। मैं तेरे हाथ से आत्मज के आत्मज के हाथ से मरकर सीधा स्वर्ग को जाऊँगा किन्तु बेटा हे हाडाकुछ तिलक हे जीवन सर्वस्व । इन कुत्तों के हाथ से मुझे न मरवा । "<noinclude></noinclude> p3x3rouiub72znx864hvy2dr8kvu078 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२२ 250 195057 665667 2026-07-06T17:03:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665667 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1 दादा नाती में मेल । ( १९१ ) एक तेजस्वी महात्मा के एक प्रतापी धीर के और अपने प्राणदाता दादा के मुख से ऐसे पचन सुनते ही विष्णुसिंहजी लज्जित होकर धरती कोदने को यह इतने शर्मागये कि उनले एक शब्द भी मुख से निकालते न बना। इतना कह कर श्रीजी साहब तो अपना खश दिये अपने आश्रम को चले गये परंतु विष्णुसिंहजी पर उनके इस कथनका बहुत असर हुआ । अब उन्होंने समझ लिया कि इन दुष्टों ने मुझे धोखा देकर पितामहके पूज्य चरणों मुझसे भारी पाए करवाया। उन्होंने इस बात पर अपने आप को बहुत धिकारा। उन्होंने दादा का अपमान अपने अपमान से भी बहुत बढकर समझा और उन दुष्टों को अपने किये का फल चलाकर इस पाप से छुटकारा राने के लिये दादा को अपमान से निवृत्त करके इस पापका प्रायश्चित्त करने के लिये "वापका बैर" देने की यहीं क्षत्रियों को पुरानी चालका स्मरण किया। चाहे धर्मशास्त्रों में शत्रु पर दया करने की हजार आज्ञा हो परंतु "बाप का वर" को बाद क्षत्रियों की नस २ में भरी है, वे गयाजी जाकर पितरों के लिये पिंडदान करने से भी बढकर "बाप के बैर" का बदला लेना समझते हैं। इस समय केवल इस तरह का बदला ही न था वरन विष्णुसिंहजी दादा के उन वाक्यों पर खूब ध्यान देकर निश्चय करने से जान गये कि इन दुष्टों को आरे बिना मैं अब निष्कंटक राज्य न कर सकूंगा क्योंकि ये लोग राज्य प्रबंधकी नस २ में घुस गये हैं इस लिये उन्होंने पूज्य पितामह के पवित्र चरणों का वल पाय कृष्णसिंहजी का शिर राज प्रासाद के रंगविकास बाग में काट लिया और इनके चाचा मनोहरसिंहजी ज्यों ही भाग कर जाने लगे उन्हें सीढ़ियों में जाकर भाले से पिरो दिया । इस तरह श्रीजी साहब ने पहिले से कृष्णसिंहजी को विवाह करने का निषेध किया था यह बात सत्य हुई। बूदी के इतिहास से लेकर इस घटना का यहां उल्लेख करने वाद टाड साहब की किताब का कुछ अंश उद्धृत करने में अवश्य ही पुन रुक्ति होगी परंतु साहब के वाक्य रोचक हैं। दोनों ओर की बात लिख देने से पाठकगण दोनों के मतों की तुलना कर सकेंगे इस लिये इस विषय में टाड<noinclude></noinclude> jozhofdfwmpv4qroneh9t1ahe1d4c8q पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२३ 250 195058 665668 2026-07-06T17:03:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665668 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | साहब ने जो कुछ लिखा है उसका भावार्थ मैं नीचे लिख देना आवश्यक समझता हूँ । टाड साहब लिखते हैं कि- "राजपूती स्वभाव की अस्थिरता अथवा उनके राज्य शासन की अपूर्ण ता का यह एक और उदाहरण है कि बुढापे की उमर में जब श्रीजी ने इन्द्रिय दमन के साथ, संयम के साथ जीवन बिता कर संसार का त्याग करने में दृढता प्राप्त कर ली तब यह पूजनीय वीर अपने ही पौत्र के अविश्वास का पात्र बना । लुच्चे लफंगे लोगों ने जिन्हें राजसिंहासन के निकट एक बुद्धि की साक्षात् मूर्ति के उपस्थित रहनेसे भय था श्रीजी के बूँदी लौटने का निषेध कराकर उनका अपमान करने की हिम्मत दिखलाई और उनसे कहलाया कि " बनारस में पड़े रहो और वहीं रहकर मिठाई खाओ और बैठे २ राम राम जपो " वहां से लौटने पर जिस 1 हरकारे ने उन्हें नये शहर में जाकर आज्ञा सुनाई उसने आज्ञा में कहा कि आपकी हट्टियां आपके पुरखाओं के अस्थिमें संयुक्त न की जायगी किन्तु उनको । उस समय इतना आदर था और अनेक यात्राओं को करके वह इतने पवि- त्र समझेजाते थे कि ज्यों ही इसबात की आस पास के राजा महाराजाओं को खबर हुई त्यों ही वे सब के सब अपने यहां श्रीजी को लिया लेजाने के लिये एक दूसरे से बहावदी करने लगे xx श्रीजी की जवानी के दिनों की वीरता ने और उनके बुढापे की प्रशंसनीय धर्मनिष्ठाने जयपुर नरेश प्रतापसिंह जी के मन पर उनकी जाति वालों के मन की अपेक्षा एक जुदे ही प्रकार का असर डाला जैसे पुत्र वा नौकर पत्र दिखता है वैसे ही उन्होंने श्रीजी को लिखा कि "मैं आपके दर्शन करना चाहता । और आपको जयपुर लाने की मेरी इच्छा है। " कछवाहों के पुष्प की ऐसी शिष्टता देखकर श्रीजी ने उनके आगमन का सत्कार पाने से तो निषेध किया किन्तु उनका निमंत्रण स्वीकार किया । प्रतापसिंहजी ने श्रीजी की बड़े आदर के साथ पेश- थाई की और बहादुर नेक महाराज ने इस घटना से राज्य च्युत श्रीजी का इतना अपमान समझा कि उन्होंने इनसे कहा:- * राजाओं के श्मशान में न जलाये जाभोगे । xx एकने कहा मैं लेजाऊंगा, दूसरे ने कहा में।<noinclude></noinclude> 6o2ujcfullpmcl7xdhwi0pahb5nimu0 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२४ 250 195059 665669 2026-07-06T17:03:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665669 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दादा नाती में मेल | (१९३) हो तो मैं स्वयं "यदि आपको दुनियादारी के कामों की कुछ भी इच्छा आमेर की समस्त सेना के साथ चलकर बूँदी और कोटे के राज सिंहासन पर आपको बिठा दूंगा । " GE इस पर श्रीजी का उत्तर बहुत ही उदारता से निकला । उन्होंने कहा कि - " ये दोनों ही मेरे हैं। एक मेरा भतीजा है और दूसरा मेरा नाती । " इस अवसर पर फोटेवाले जालिम सिंहजी बिच- भैया बनकर बूँदी आये । उन्होंने विष्णुसिंहजी के विचारों का हलकापन दिखलाते हुए आपस में मेल करादेने की पूरी शक्ति के साथ लालाजी पंडित को वृद्ध नरेश के बूंदी दिवालाने के लिये भेजा। दोनों की भेंटें बैसी ही हुई जैसी होने की आशा थी। इस तरह चालाक धोखेबाजों द्वारा वहकाये हुए युवा राजा की उस पूजनीय नरेश से, जिसने संतान स्नेह के सिवाय समस्त बुरे स्वभावों का दमन कर लिया था, खुलाकात हुई। जिस समय बहादुर यात्री ने अपनी तलवार देकर यह कहा कि- "वेढे, इस तखवार को ले और यदि तैने समझ लिया हो कि मैंने तेरे साथ कोई बुरा सक किया है तो तूही इससे मेरी गर्दन काटले किन्तु इन कमीनों से मेरी बदनामी न करवा" -- सब की आंखों में से आंसू निकल पडे । युवा नरेश दहाडे मार २ कर रोने लगे। मानो रोकर क्षमा मांगते हों। इस तरह युवा राजा के पास के चापलूसों की हार देखकर पंडित को और जातिमसिंहजी को संतोष हुआ। किन्तु उम्मेदसिंहजी ने राजमहल में जानेका निषेध किया । " छोटी मोटी बातों को तो जाने दीजिये, उनमें यदि एक के लेख का दूसरे से अंतर हो तो कुछ हानि नहीं परंतु बूँदी के इतिहास से टाउ साहब के लेख में एक बड़ी भारी बातका अंतर है। यह अंतर इतना बडा है जितना दिन रातका अंतर होता है। टाड साहब के लेख से विदित होता है. कि दादा नाती में मेल जाखिमसिंहजी ने कराया । वह दोंनो का मेल कराने के लिये स्वयं बूँदी आये और उन्हीके सामने सारी कार्यवाही हुई किन्तु जब बूँदी के इतिहास के मत से जालिमसिंहजी ही इस झगडे की १३<noinclude></noinclude> afuzz0xq8d7cnrcei01jd7oy9cbcz8k पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२५ 250 195060 665670 2026-07-06T17:03:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665670 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | जड़ थे, विष्णुसिंहजी को बहकाकर बूँदी में जालिमसिंहजी का दवदवा चढाने वाले लोग उनमें मिले हुए थे, जब बुँदी के समय शालाओं के रहने के चिह्न विद्यमान हैं, घटना के देखने वाले आज से पचास वर्ष पूर्व सुनने वाले आज दिन हैं तब टाउ साहब के थे महलों में अवतक उस जब उस समय की और उनकी कही हुई बातें लेख पर कौन बालक विश्वास करसकता है। इसमें उनका दोष नहीं है क्योंकि जहांतक उनसे बन सका उन्होंने निश्चय करके लिखा है किन्तु बूँदी में एक बात और भी 1 प्रसिद्ध है। जिससे सिद्ध होता है कि इसकी जड झाला ही थे। लोग कहते हैं कि शालाओं ने विष्णुसिंहजी को यहां तक दबा लिया था कि वे लोग बूँदी के राजप्रासाद की वढिया चित्रशाला में रोटियां करके उस महल को बिगाडा करते थे एक बार यात्रा में से लौटते समय उम्मेदसिंहजी ने यह खबर मार्ग में लुनी । यह कूंच दर कूंच चलकर चुपचाप केदारेश्वर के अपने आश्रम में आ विराजे । चहां से ठीक दुपहर के समय जो झालाओं के रोटी करने का था अपने दो- सो तीन सो साथियों को लेकर दबे पांव श्रीजी साहब महल में चले आये "और डंडे मारकर झालाजी के सब सिपाहियों को निकाल पौत्र का नगर में और महल में अधिकार कर दिया। यदि यह बात असत्य भी हो क्योंकि जब इतिहास में इसका देख नहीं है तब इसके विषय में संदेह है तो भी उस है समय झालाओं का बूंदी में जो चक्र चला था उसके अनेक चि अभीतक विद्यमान हैं। इससे निश्चय होता है कि जाक्रिमसिंहजी उन लोगों से मिले हुए थे, इस विषय में टाड साहब की भूल है और बूँदी का इतिहास सच्चा है। यदि टाड साहब के लेखानुसार दादा नाती के मेल के समय जालिम सिंहजी उपस्थित भी थे और यदि उन्होंने दोनों के मेल कराने का प्रयत्न सी किया हो तो केवल राजप्रपंच के विचार से तथा राजनीति के अनुरोध से अपना दोष छिपाने के लिये क्योंकि वह राजनीति के पेचों में खूब समझते थे । उन्होंने पेच ही पेच में कोटे को दबाकर और आस पास के रजवाडों को दबाकर झालावाड राज्यस्थापन करने की नींव डाली और ऐसी<noinclude></noinclude> c83nb6s6tw9ik5k4jk3ddbk5l0epbyx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२६ 250 195061 665671 2026-07-06T17:03:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665671 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>होलकरसे सुठभेड़ | ( १९५ ) दशा में यदि उन्होंने अपनी लडकी देकर दामाद विष्णुसिंहजी को भी ऐसे ही मन से अपने पेच में लिया तो आश्चर्य क्या है ! कुछ भी हो बूँदी के इति हाल और ढाड साहब के लेख का सारांश मैंने इकट्ठा कर दिया। दोनों में से सत्यासत्य का निर्णय पाठक स्वयं करते । अध्याय १० होलकर से मुठभेड | बूँदी के इतिहास से और इस चरित्र से कुछ संबंध न होने पर भी कवि- राजा सूर्यमजी ने "वंशभास्कर" में लखनऊ की नव्याबी के विपय में दो बातें ऐसी लिखी हैं जो कदाचित् अभीतक उस ओर के इतिहास जानने बालों के सुनने में न आई होंगी। प्रसंग पाकर मैं उन बातों को यहां प्रकाश कर देना आवश्यक समझता हूँ। उनके लिखने से मालूम होता है कि नऊ के नवाब आसिफुद्दौला के गरने पर उनका पोष्यपुत्र बजीर अली- जब सिंहासन पर बैठा तो बडी अनीति करने लगा । उसे नगर में जितनी सुंदरी रमणियां मिलीं उन्हें पकड़ा २ कर उनके साथ बलात्कार किया और उनका सतीत्व नष्ट किया। उसकी दुष्टता इतने ही पर समाप्त न हुई। उसने अपने प्रतिपालक पिता आसिफुद्दौला की बेगम पर भी हाथ चलाया। उसके साथ भी अपना काला मुंह किया। उसका यह अमा- नुपी कर्म, उसकी ऐसी नीचता और उसकी परम पामरता अंगरेजों से लहम न हो सकी इसलिये उन्होंने वजीर अली को सिंहासन से उबार सभा- दत अली को व्याव बना दिया। अब वजीर अटी लखनऊ में ठहर न सका। उसने अपने पुत्र कत्र समेत वहां से भागकर जयपुर में प्रताप सिंहजी की शरण ली। इन्होंने उसे रक्खा भी परंतु अंगरेजों ने धोखे से पीतलकी अशर्फियां जयपुर नरेश को देकर वजीरअली उनसे डेलिया । सूर्यमजी के लेखसे विदित होता है कि यह घटना संवत् १८९३ वंशभास्कर में ऐसा ही लिखा है।<noinclude></noinclude> c1d7ffobioq10cetwjkhomqwiqnmv8z पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२७ 250 195062 665672 2026-07-06T17:04:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665672 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | की है किन्तु उन्होंने ये बातें किसी ग्रंथ के आधार पर किसी पक्के प्रमाण से नहीं लिखी हैं । उन्होंने इनका केवल जन श्रुति के आधार पर उल्लेख किया है इसलिये नहीं कहा, जासकता है कि ये घटनायें कहां तक सत्य हैं। | महाराव राजा विष्णुसिंहजी के पहली महारानी राठोडजी से जिन महाराज कुमार इन्द्रसिंहजी का जन्म हुआ था उनका बहुत ही कम उमर में संवत् १८५९ में एक देहान्त होगया । उन्ही की दूसरी रानी जानजी से महाराज कुमार का फिर जन्म हुआ परंतु इनका नाम से पहले ही नाश होगया । इसके अनंतर संवत् १८९७ की आषाढ शुक्ला ६ सोमवार को इन्होंने अपना चौथा विवाह शिवपुर नरेश किशोरसिंहजी की कन्या और राधिकादासजी की बहन अजब कुंवरजी के साथ किया । जिन दिनों की ये घटनायें हैं, जिन दिनों शालाओंके चक्र से छूटकर महा- राव राजा विष्णुसिंहजी निष्कंटक राज्य कर रहे थे, जिन दिनों अति वृद्धताः के कारण श्रीजी साहब अपनी यात्रा प्रियता से मुँह मोडकर अपने आश्रम में बैठे २ शास्त्र चिन्तन में गोविन्द भजन में शेष दिन विता रहे थे उन दिनों भारत वर्ष में "जिसकी छाठी उसकी भैंस" वाली कहावत चरितार्थ होरही थी । जालिमसिंहजी अपने बुद्धिवल से अपने दबदबे से बूँदीपर श्रीजी साहब के होते हुए अपना काबू न चलता देख मेवाड पर . हाथ फेंकने लगे थे उन्होंने एक युद्धमें मेवाड को हराकर जहाजपुर ले लिया था । लाहोर में महाराज रणजीतसिंह का दौर दौरा था । उन्होंने पंजाबी राजाओं को दवा लिया था, जंबू को दवालिया था और काबु को जीत कर उसकी पसलियां ढीली कर डाली थीं उस समय अवश्य ही आपु- स की सैंचातान ले राजपूताना के राजपूत नरेशों की प्रतिमा मंद होगई थी किन्तु यशवन्त राव होलकर अपना राज्य बढाने में लगे थे। अंगरेजों के बीर जनरल वेलेजली ने यशवंत राव से न डर पेशवाओंसे बुन्देल खंड ले लिया था । उन्होंने उसवारी के डीघ के और दिल्ली के जंग में सें- धिया को परास्त कर संवत् १८१९ में दिल्ली और आगरा छीन लिया था<noinclude></noinclude> et9ib528kignca64toi72m70q114shw पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२८ 250 195063 665673 2026-07-06T17:04:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665673 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>होलकर से मुठभेड़ | ( १९७ ) और भोंसला से ओडीसा के दिया था। उन्होंने अपनी केवल पांच हजार सेना से सेविया और भोंसला की तीस हजार सेना का घमंड चकनाचूर कर डाला था। उसी वर्ष में अंगरेजों ने दिल्ली के नाम मात्र के बादशाह शाहआदम को एक लाख रूपया पेन्शन देकर दिल्ली से पूर्व के समुद्र किनारे तक अपना राज्य स्थापित कर दिया था। संवत् १८६०- २९ में जब एक ही वर्ष में श्रीजी साहब का जयपुर के प्रतापसिंहजी का और जोधपुर के भीमसिंहजी का परलोक हुआ अंगरेजों को केवल होलकर और रणजीतसिंहजी को परास्त करना शेष रहगया । सामयिक घटनाओंकर सतरह दिग्दर्शन कराकर उस समय की दशा का ठीक २ बोध करा देने के 'सेवाय इन बातों का यहां विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है हां एक ड़ी बात यहां उल्लेख करने योग्य है यह यही कि जिस यशवन्त राव होलकर के मारे अंगरेज लोग भी घबडाते थे और जिस होटकर के लिये लोग अबतक कहते हैं कि :- "यशवन्त राय होलकर के मरते अंगरेजों को बन राई " उसीसे एक बार श्रीजी साहब की मुठभेड होगई। बात यह हुई कि जिस समय यशवन्तराबजी होलकर की सेना जयपुर को जीतती हुई स्वदेशको छोटने के लिये बूँदी पहुँची महाराव राजा विष्णुसिंहजी ने संदेह से नगर के फाटक बंद करा दिये और इसी अवसर में कोटपर से किसी मूर्ख ने यशवन्त रावजी की सेनापर गोली दाग दी। इस कारण उन्होंने समझ लिया कि बूँदीवाले हमसे उड़ना चाहते हैं वह उस समय श्रीजी साहब के दर्शन करने के लिये केदारेश्वर उनके आश्रम को जारहे थे उन्होंने तुरंत आज्ञा देदी कि "बूँदी को लूटलो" और उनकी आज्ञा से नगर के बाहर पुरानी बूँदी की छूट खसोट करना भी आरंभ कर दिया परंतु जब इस बात की खबर श्रीजी साहब के कानों तक पहुंची तब वह तुरंत होलकर के पास गये। दोनों के मिलने मेटने के अनंतर श्री जी साहब की जब यह उचित अभ्यर्थना कर चुके तब यशवन्त रावजी ने श्रीजी साहब के आगे विष्णुसिंहजी की शिकायत की। उत्तर में श्रीजी साहब बोले:-<noinclude></noinclude> lsk2qexcre6rq5tlyfuheut27t9bcbg पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२२९ 250 195064 665674 2026-07-06T17:04:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665674 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( १९८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | 'मल्हार रावजी के वंश में आप कुपूत हुए क्योंकि आप बूँदी पर हमला करने लगे हो और मेरे वंश में विष्णुसिंह कुपूत हुआ जिसने आप पर संदेह करके फाटक बंद कर लिये । परंतु जाने रहिये । यदि आप बूँदी को जीत भी लेंगे तो यह जीत आप को बडी मंहगी पडेगी क्योंकि इस समय बूँदी में बहादुर राजपूतोंका अच्छा जम घटा है । इसके सिवाय इस राज्य पर. आपलोगों ने जो उपकार किये हैं वे सब मिट्टी में मिल जायगे । " इस बात को सुनकर यशवन्त रावजी लज्जित हुए और यहां से अपने डेरेडंडे उठाकर चल दिये। इस घटना से पाठकों को मालूम होगया होगा- के श्रीजी साहब अति वृद्ध होजाने पर भी बडे साहसी थे। जिन यशु- वन्तरावजी के आतंक से देशभर कांपता था उन्ही से वह कुपूत कहने में न चूके और अपनी प्रतिभा का और अपने तेज का प्रभाव डालकर उन्हें कायल. करदिया यदि कोई दूसरा होता तो अवश्य ही यशवन्तरावजी विष्णुसिंहजी के बर्ताव को इस बातका साथी समझकर और भी रुष्ट होते परंतु वह इस समय श्रीजी साहबके आतंक में आगये । उस समय यशवन्त रावजी का.. कैसा दवदवा था सो कविराजा सूर्यमलजी के नीचे लिखे पद्यसे मालूम. होगा । वह लिखते हैं कि:- " प्राची के समुद्र तैं लगाइ सीमा दिल्ली पुर कोश शत सप्तकों कंपनी यो राज्य करि, हाकिम पुरातन सत्रे इहां के गंजे हंत, एक जशवन्त राव मान्यो बरजोर अरि, जह सिख दूजो रणजीत सो इतोन जब, बढन लग्यो ही जो मही तिय नवीन वरि, जित्वर अजेय अब धन सबन जान्यो, जे भये अधीन दीन अंतर विरोध जारे। "<noinclude></noinclude> 8n3303uf2k7tvu1c2osb5jcmfoz07wd पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३० 250 195065 665675 2026-07-06T17:04:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665675 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>टाड साहब की भूल । ( १९९ इस से अंगरेजों के दौर दौरे का तो अच्छी तरह बोध होता ही है किन्तु यह भी स्पष्ट होता है कि और २ राजा आपस के शेर से जलकर जों के अधीन होगये थे। एक यशवन्तरावजी और दूसरे रणजीतसिंहजी ही उस समय अंग्रेजों के शत्रु थे। उनमें भी उस समय तक रणजीतसिंहजी उसने नहीं बढे थे। तब तक केवल यशवंतरावजी का ही आतंक विशेष था अध्याय ११ श्रीजी साहबका स्वर्गवास । ढाडसाहब की भूल । बूँदी के इतिहास से श्रीजी साहबके स्वर्गवास होने का वृत्तान्त.. लिखने से पूर्व बाइसाहबने जो इस विषय में लिखा है उसका आशप में यहां लिखता हूँ । साहव लिखते हैं कि:- 'दादा नाती का मेल होने बाद साठ वर्षतक श्रीजी जीवित रहे। उस समय उन्होंने कह दिया था कि मैं अब जीते जी महलों में न जाऊंग परंतु ( उनकी बीमारी के समय ) उनके नाती ने उनसे प्रार्थना की कि आप अपने पुरखाओं के महल में पधार कर शरीर छोडिये । मनुष्य जाति के स्वाभाविक स्नेह के विवश होकर श्रीजी साहब मरते समय अपने पौत्र को प्रार्थना को ढाल न सके। उन्हें सुखपाल में बिछा कर महल में गये और वहीं उसी रात को उनका देहावसान हुआ। इस तरह से संवत् १८६० में उम्मेदसिंहजी की अनेक स्थिति में परिवर्तन होनेवाली जीवन- लीला समाप्त होगई। उनके जीवन का सूर्य लडाई झगडे के घने बादलों में उदय हुआ था, उदय होते ही उसने खूब जोरशोर दिखलाया किन्तु उसके मन्याकाश में पहुँचते २ ही उसके देदीप्यमान प्रकाश को एक खून ने धुंधला. कर दिया और उसका उतार एकान्त और शोक के साथ हुआ । "तेरह वर्ष की उमर में जब उम्मेदसिंहजी ने हाडाओं के शिर मोर बनकर पाटन और गैंडोली पर अपना अधिकार किया था तब से साठ वर्ष निकल गये । अवश्य ही वह हाडोती में बडी प्रतिष्ठा के साथ 1<noinclude></noinclude> j12u8oxrk47qblua9zxwcpudjrdtwf4 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३१ 250 195066 665676 2026-07-06T17:04:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665676 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २०० ) उम्मेदसिंह चरित्र | वडे पूज्यभाव से याद किये जाते हैं परंतु यदि बदला लेने का दाग उनके चरित्र पर न लगता तो वह राजपूत राजाओं में एक अच्छा नमूना निकलते । परंतु हमें इन राजाओं की नेकी का इसके स्वभाव का यूरोपियन विचार से मिलान न करना चाहिये क्योंकि इन्हें दबाने वाले बहुत कम होते हैं और इसलिये इन्हें ऐसे काम मिलती है। करने की उत्तेजना इस लेख में टाडसाहब ने फिर वही राग गाया है जिसे वह एक बार पहले इन्द्रगढ वाले देवसिंहजी के वध के समय गा चुके हैं। उन्होंने इस घटना को लेकर श्रीजी साहब का विमल चरित्र चाहे कलंकित समझा है परंतु यह किये कुटुम्बी होकर इनकी और जैसे यह आ श्रीजी साहब ने कोई अनु- उनकी भूल है। देवसिंहजी ने उम्मेदसिंहजी के तथा बूँदी राज्य की हानि में जैसे २ कुकार्य स्तीन के सांप निकले उस पर ध्यान देने से चित कार्य नहीं किया । यदि यह देवसिंहजी को इस तरह मारने के बदले सेना चढाकर मारते तो एक दो के बदले एक दो हजार आदमियों का खून होता, यदि वह वानप्रस्थ बनने से पहले इन्द्रगढवाले को न मार लेते तो उनके पुत्र पौत्र सुख से राज्य न करसकते । ऐसी दशा में श्रीजी साहब ने जो कुछ किया ठीक ही किया और देवसिंहजी के अपराधों पर दृष्टि डालते हुए उन्हें जो दंड मिला वह आवश्यकता से अधिक न था । यदि उम्मेद- सिंहजी का हृदय कलंकित होता तो वह अवश्य मोहकम सिंहोत दलेल सिंहजी जैसे हरामखोरों की दी हुई जीविका छीन लेते परंतु उन्होंने ऐसा न किया - वह बडे उदार थे। उन्होंने शत्रु की दान की हुई जीविका ज्योंकी त्यों बहाल रक्खी। खैर इतना होने पर भी टाड साहब श्री जी साहब के बिमल चरित्र में कलंक का धन्या समझें तो वह शरद पूर्णिमा के चंद्रमा में मृगांक है। टाड साहब इस बात को यूरोपियन दृष्टिले नहीं देखना चाहते हैं । यह अच्छी बात है । जिस देश की घटना हो उसे वहां की स्थिति पर नजर डाल कर ही राय देना चाहिये। यूरोपियन लोगों में चाहे जो पुरुष सैकडों आद- मियों के बीच में किसी परिचित स्त्री का चुंबन कर सकता है। वे लोग<noinclude></noinclude> ntopig9ecsxvpft6sgcluqtp8hvn9br पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३२ 250 195067 665677 2026-07-06T17:04:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665677 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>टाडसाहब की भूल । ( २०१ ) स चाल को दुरा नहीं समझते हैं किन्तु भारतवासियों की दृष्टि में ह स्पष्ट व्यभिचार है । ऐसी दशा में देशी आंख से बिछा- स्टो चाल को देखना अच्छा न होगा। यदि टाड साहव इस घटना- को अंगरेजी आंख से भी देखें तो भारतवर्ष में राज्य स्थापित करने के समय लार्डलाईब ने और वारेन हेस्टिंग्सने कैसे २ कार्य किये उन्हें भी देखना चाहिये । खैर इन बातों से कुछ मतलब नहीं । टाउ साहब ने इनको अच्छे राजाओं का नमूना बतलाया है और यह तव में ये भी ऐसे ही । टाड साहब ने इनकी असाधारण प्रशंसा कर बड़े धन्यवाद का काम किया है। वह बड़े बेलाग और अनुभवी लेखक थे। उन्होंने ला सुना वैसा लिखा और उसीपर अनुमान बाँधा है । महाराव राजा उम्मेदसिंहजी ने पिता का खोया हुआ राज्य अपनी वार के बल से अपनी बुद्धि की शक्ति से, अपनी राजनीति के पेचों से और अपने शरीर का रक्त बहाकर संपादन किया । खोया हुआ राज्य लेकर उन्ले मीतरी और बाहरी शत्रुओं से निष्कंटक किया, निष्कंटक करके राज्य सुख भोगने के समय, सांसारिक सुख भोगने के बदले पुत्रको राज्य देकर इससे इस तरह अलग होगये जैसे उमर मर तक बडे परिश्रम से कमा ये धन को कोई एक दिन में दान कर दे । राज्य छोडकर तीर्थ यात्रा करने में, भगवत् स्मरण करने में मी वह बूँदी को न भूले और जबतक जिये तबतक उन्हों ने बूँदी की रक्षा से बढकर धन न समझा, स्त्री न समझी, संतान न समझी और कुछ न समझा। टाड साहब कहते हैं कि उनका अंतिम समय रंज में बीता परंतु उन्हीं के लेख में और बूंदी के इतिहास में कहीं पर एक अक्षर भी ऐसा नहीं मिलता है जिससे सिद्ध हो कि उन्हें राज्य छोड- देने का अथवा इन्द्रगढ की घटना का किंचित् भी दुःख था । अवश्य ही "रने से पहले राज्य छोडदेने का अधिकार त्याग देने का अनेक पश्चिमी लोगों को कष्ट होसका है क्योंकि उनके समाज में तीसरे आश्रम और चौथे आश्रम का नाम तक नहीं है। वे लोग अस्सी पचासी वर्ष के हो जानेपर भी, मरते दम तक मी, पेन्शन देने पर भी बाह्य प्रपंच में और राज्य प्रपंच में पढें<noinclude></noinclude> mos6i5w72llwxgorw5ebta3dullrk1c पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३३ 250 195068 665678 2026-07-06T17:05:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665678 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २०२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | रहतें हैं इस लिये टाड साहब यदि ऐसा मान बैठें तो उनको अधिकार परंतु भारतवासियों के लिये यह नई बात नहीं है । हिन्दुओं के इति हासों में, पुराणों में एक नहीं एक सो एक उदाहरण ऐसे निकलेंगे जिन में तीसरे आश्रम में, बुढापे में पुत्र को राज्य देकर राजाओं ने वनवास किया है, तप किया है। श्रीजी साहब का भी उस समय के अनुसार तप था और साधुओं के वेश में रहकर तप करने की अपेक्षा टाड साहब ने भी तीर्थ यात्रा का तप बढकर माना है । श्रीजी साहब का देहान्त ७५ वर्ष ४ मास १९ दिन की उमर में हुआ था । बहु, जन्म से लेकर मरण पर्यन्त अपना कर्तव्य पालन करते रहे, उनके कर्तव्य में लेश मात्र भी शेष न रहा और इस कारण उनके लिये, उनकी मृत्यु के लिये शोक न करना चाहिये। यही लोगों की चाल है। जब कोई बूढा आदमी मरजाता है तब लोग ऐसा ही कहा करते हैं, किसी २ जाति में तो बूढे के मरने पर हर्ष किया जाता है । ब्रहार्षि वशिष्ठजी ने चक्रवर्ती राजा दशरथ के स्वर्गवास होने पर रामभक्त भरत से यही कहा है:- चौपाई - " तात विचार करहु मन मांहीं, शोच योग दशरथ नृप नाहीं । शोचिय विप्र जो वेद विहीना, तजि निज धर्म विषय लवलीना । शोचिय नृपहि जो नीति न जाना, जेहिं न प्रजा प्रिय प्राण समाना शोचिय वैश्य कृपण धनवान्, जोन अतिथि शिव भक्ति सुजानू । शोचिय शुद्ध विप्र अपमानी, मुखर मान प्रिय ज्ञान गुमानी । शोधिय पुनि पतिबंधक नारी, कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी । शोचिय बटु निजत्रत परिहरई, जो नहिं गुरु आयसु अनुसरई । दोहा - शोचिय गृही जो मोहवश, करें धर्मपथ त्याग । शोचिय यती प्रपंचरत, विगत विवेक विराग ॥. चौपाई - बैखानस सोइ शोचन योगू, तप विहाय जेहिं भावे भोगू शोचिय पिशुन अकारण क्रोधी, जननि जनक गुरु बंधु विरोधी । सब विधि शोधिय पर अपकारी, निजतनु पोषक निर्दय भारी ।<noinclude></noinclude> nquwmvjnfn84s2zcrd8k0chs3h13zfd पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३४ 250 195069 665679 2026-07-06T17:05:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665679 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>टाडसाहब की भूल । (२०३ ) शोचिय लोभ निरत रत कामी, सुर श्रुति निन्दक पर धन स्वामी । शोचनीय सबही विधि सोई, जो न छांडि छल हरिजन होई । " ऊपर की कविता जो महात्मा तुलसी दासजी की रामायण से उद्धृत की ॥ है उस से मालूम होता है कि श्रीजी साहब की मृत्यु शोचनीय नहीं श्री क्योंकि उनके चरित्र में ऐसी कोई बात नहीं है जो इनके विरुद्ध हो । होंने कभी कोई कार्य वेद विरुद्ध-क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध न किया । राजनीति इतनी अधिक जानते थे जितनी कदाचित् उस समय के और राजा कम जानते होंगे। उन्होंने सदा प्राण से भी बढकर मजा को लकर उसका पालन किया और प्रजा की उनपर भक्ति इसीलिये अटल बनी उन्होंने गृहस्थाश्रम में रहकर कभी वर्णाश्रम धर्म का त्याग नहीं लिया और उन्होंने वैखानस होकर कभी तपले मुँह न मोडा । उन्होंने कभी अकारण क्रोध न किया। उन्होंने कमी माता पिता और गुरु बंधु का विरोध न किया। उनके हाथ से कभी दूसरे का अपकार न हुआ। उन्होंने कमी लोभ न किया और वह कभी भोग विलास में-राजमद में न फँसे । उन्होंने उस समय के और राजाओं की तरह कमी पराया धन तथा पराई दारा का हरण किया। वह अपना कर्तव्य पालन करते हुए सदा ईश्वरभक्ति में दृढ़ रहे इन कारणों से श्रीजी साहब का देहान्त शोचनीय नहीं था परन्तु मेरी समझ में यह बात नहीं है। मेरी राय में युवा मनुष्य के मरने पर जितना शोक किया जाता है उतना या उससे अधिक बूढे की मृत्यु पर होना चाहिये । किसी मनुष्य की मृत्युपर जो शोक किया जाता है उसमें थोडा बहुत स्वार्थ अव- एय होता है। युवा के देहान्त पर शोक इसलिये करना होता है कि वह यदि जीता तो अमुक काम करता, हमें उससे अमुक सुख होता और उसके मरने 13 हमें अमुक दुःख हुआ किन्तु बूढे का शोक इससे बढकर होता है । उसके मरने से अनुभव का विशाल खजाना खुट जाता है, उपढ़ें- श का दिवाला निकल जाता है और रक्षा का छत्र टूट जाता है। श्रीजी साहबके स्वर्गवास होने से उनके पौत्र को उनकी प्रजा को और उनके<noinclude></noinclude> npue0nrpcj11bzzx09irl7rqitytu4t पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३५ 250 195070 665680 2026-07-06T17:05:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665680 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २०४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | परिवार को येही प्रबल हानियां हुई। उनकी मृत्यु से बूँदी का उद्धारक चला गया । जिस ने जयपुर जैसे बलवान् हाथी का पेट फाडकर बूँदी निकाल लेने का काम किया था वही प्राक्रमी सिंह परलोक को प्रयाण करगया । उम्मेदसिंहजी मरे अवश्य परन्तु अपना नाम अमर छोड सरे । पंडित पर गंगासहायजी ने "वंशप्रकाश" में बहुत ठीक लिखा है कि "इस वंश में यह सबसे बढकर हुए।" इनका देहान्त अवश्य हो गया किन्तु इनके चलाये हुए नियम अबतक ज्योंके त्यों विद्यमान हैं । इन्हों ने नये सिरे से राज्यस्थापन करके बूँदी को नये साँचे में ढाला था । यही सांचा अबतक है। उन्होंने जिस तरह की पगड़ी बाँधने का प्रचार किया था उसी तरह की पगडी (पेटा) यहां के नरेश, राज कुटुंब धारण करते हैं। टाड साहब ने श्रीजी साहब के स्वर्गवास की घटना का जिस तरह वर्णन किया है उसे में इस अध्याय के आरम्भ में लिख चुका हूँ अब उसी बातको कविराजा सूर्यमजी के "बंशमास्कर" से लेकर लिखता हूँ। ऐसा करने से यद्यपि यहां थोडासा पुनरुक्ति का दोष आ जायगा परंतु एक दोनों का अन्तर पाठ- को को विदित होगा और दूसरी जो बातें उसमें रहगई हैं उनका भी यहां उल्लेख हो सकेगा। बूँदी के इतिहास में लिखा है कि संवत् १८६१ में जब श्रीजी साहब का रोग असाध्य होगया तब विष्णुसिंहजी उन्हें केदारेश्वर ले महलों में ले आये। यदि उन्हें चेत होता तो बहन आते । महलों में पधारने के अनंतर दो दिन तक यह जीवित रहे । मार्गशीर्ष कृष्णा ४ को उनका शरीर छूट गया। विष्णुसिंहजी ने शास्त्रविधि से उनकी अंत्येष्टि क्रिया करने में खूब दान पुण्य किया । उन दिनों इस प्रान्त में दारुण दुर्भिक्ष था इस कारण दूर २ के लोगों के झुंड के झुंड द्वादशाह के दिन उलट पडे । विष्णु- सिंहजी ने सत्र को भोजन कराकर संतुष्ट किया और भोजन की जो सामग्री वच रही थी उसे दूसरे दिन अकाल पीडितों में छुटा दिया । इस तरह उनकी उत्तर क्रिया समाप्त हो गई। 1<noinclude></noinclude> 4or6vvzr94nhnistmy6es91nf1ac3bf पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३६ 250 195071 665681 2026-07-06T17:05:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665681 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बलवन्तसिंहजी का उपद्रव । (304) जिसका इस लोक में यश है, जिसका जीवन धर्म में और कर्तव्य पाउन बीता है उसे परलोक में भी अवश्य सुख मिलता है । लोग कहते हैं. कि यह कलियुग नहीं करयुग है। यहां "इस हाथ के उस हाथ दे का हिसाब है। इस न्याय से यदि परलोक में भी उन्हें सुख मिठा हो तो माश्वर्य क्या है । वह सचमुच नर रत थे । यह सच मुच हाडाओके. सूर्य थे। वह सचमुच ही शरीर छोड़कर स्वर्ग को गये परंतु अपना ० छोडगये । उनकी कीर्ति अमर है और उनका चरित्र आजकल की प्रजा के उपदेश लेने योग्य है। उनके चरित्र को सामने रख कर समय के अनुसार थोडी बातों का परिवर्तन करने के सिवाय उचित कामों में उनका अनुकरण करें तो आजकल के राजा वास्तव में अच्छे जाओं का नमूना बन सकते हैं। उनके पीछे उन्हीं के पौत्र महाराव राजा श्रीरामसिंहजी बहादुर : जी. सी. एस्. आई. सी. आई. ई. भी वैसे ही होगये हैं। उनका चरित्र भी पुस्तकाकार में यदि प्रकाश किया जाय तो पाठकों का बडा उपकार हो सकता है। अध्याय १२. बलवन्तसिंहजी का उपद्रव । इस चरित्र के नायक महाराव राजा उम्मेदसिंहजी की जीवन लीला समाप्त होने के साथ ही यह पुस्तक भी समाप्त होनी चाहिये थी क्यों कि इसका नाम ही "उम्मेदसिंहचरित्र " है परंतु उनके चरित्र के साथ हो इस पोथी में उनके पूर्वजों का संक्षेप से इतिहास है, उनके पिता का चरित्र है, उनके पुत्रका चरित्र है और उनके पौत्रके चरित्र का भी अबतक बहुत हिस्सा दिखा जा चुका है। ऐसी दशामें उनके न देकर इसको पूरा कर देनेसे श्रीजी साहब के पौत्र अधूरा रह जायगा और बूँदीका इतिहास स्वर्गवास होने का विष्णुसिंहजी का चरित्र भी अधूरा रहेगा इस<noinclude></noinclude> 1uepxhnfyfoi3242rn4wzbi32eatddf पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३७ 250 195072 665682 2026-07-06T17:05:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665682 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २०६ ) उम्मेदसिंह चरित्र । कारण विष्णुसिंहजी के चरित्र का शेष भाग इन अध्यायों में लिखकर मैं पुस्तक को पूरा करना चाहता हूँ ताकि यदि ईश्वर शक्ति देकर राजर्षि राम- सिंहजी का चरित्र लिखने में मुझे समर्थ करे तो दो महानुभाव नरेशों के विस्तृत चरित्रों के साथ संक्षेप से बूँदी राज्य का सारा इतिहास आजाय । जिस वर्ष श्रीजी साहब का स्वर्गवास हुआ उसीके फाल्गुन मास की शुरू द्वितीयाको विष्णुसिंहजी ने अपना पांच विवाह किया । विवाह लिये आप को बारात सजाकर कहीं बाहर न जाना पड़ा क्योंकि आपके श्वशुर - माटी रत्नसिंहजी अपनी कन्या लाड कुँवारेजी को बूँदी आकर ही परना गये इस चाल को राजपूत लोगों में "सामाडोल” कहते हैं । इसका मतलब यही है कि दूलह वरात चढकर दुलहिन के गांव न जाय बरन दुखहिन का पिता दुल- हिन को साथ लाकर दूलह के यहां ही उसकी शादी करजाय । राजपूताना के नरेश आपुस में हटों में से युद्ध करते २ पहले ही निर्बल उडते झगडते, मुसलमानों और मर- पडगये थे परन्तु इन वर्षो एक नया बखेडा खडा हुआ । उदयपुर के महाराना भीम- "सिंहजी ने अपनी कन्या कृष्ण कुमारी की सगाई जोधपुर नरेश भीमसिंह- जी से कर दी थी । विवाह से पहले ही घरका देहान्त होगया । तब रानाजी ने अपनी कन्या का संबंध जयपुर नरेश जगतसिंहजी से ठहराया । इस तरह जब जयपुर में शिवाह की तैयारी होनेलगी तब जोधपुर नरेश के उत्तराधिकारी ने कहा कि "मांग हमारी है। जांघ जाने पर मांग न जाये।" इस कहावत के अनुसार हम मरेंगे और मारेंगे परंतु लडकी जयपुर न विवाह ने देंगे। "इस बात पर जयपुर जोधपुर में विवाह के बदले बुद्ध की तैयारी होगई सब महाराना साहब ने लडकी के लिये दिप योग करके इस खून खराबी को बचाया। बंगाली पुस्तक के आश्रय से हिन्दी में "कृष्ण कुमारी" नाम की जो पोथी बनी है उसका मूल यही है। पंडित गंगासहायजी " वंशप्रकाश " में लिखते हैं कि- "संवत् १८९९ में जब जयपुर नरेश जगतसिंहजी और जोधपुर महाराज मानसिंहजी से<noinclude></noinclude> aq77qwkihtfbzzrc32ky2sk2djj96nn पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३८ 250 195073 665683 2026-07-06T17:05:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665683 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बलवन्तसिंहजी का उपद्रव । ( २०७ ) छड़ाई ठन गई तब बूँदी नरेश विष्णुसिंहजी ने इन दोनों से कहलाया - " हमारे कहने से लडाई बंद कीजिये । यदि आप लोग स्वीकार हरें तो में दोनों में मेल कराने के लिये स्वयं आऊँ । इसका उत्तर जगत् सहजी ने यों दिया कि "हम आपके कहने से लडाई बंद करते हैं परंतु नसिंहजी की ओर से उनके उमरावों को यह संदेह होगया है यह उन लोगों को बिगाडा चाहते हैं " बात यह सत्य भी और इसी लिये मानसिंहजी के उमराव जगतसिंहजी में जा मिले । अष्णुसिंहजी की सलाह को भूखदार जगतसिंहजी जब लड़ने को यार हुए तब बूँदी नरेश ने मानसिंहजी को ही सहायता के लिये दो जार सेना भेजना उचित समझा। इनकी सेना अवश्य गई परंतु उमरा- व के निकल जाने से मानसिंहजी निर्बल पडगये थे इसलिये जयपुर की ना के सामने उनके पैर न टिक सके । मानसिंहजी भागने लगे तब बूँदी की सेना के अफसरों ने उनसे प्रार्थना की कि - " यदि हमें आज्ञा हो तो हम लड़ने को तैयार हैं। हमारे होते हुए आपका हटजाना अच्छा नहीं। हम बिना लडे लौटेंगे तो बूँदी सरकार में हमारी निन्दा होगी । परंतु मानसिंहजी अपने उखडे हुए पैरों को न जमा सके । यह भाग निकले और इसलिये बूँदी की सेना डोट आई । era महाराव राजा विष्णुसिंहजी के पांच विवाह हो चुके थे । अब इन्हों ने एक ही महीने में दो शादियां और कर लीं। संवत् १८६६ में इनका छठा विवाह राणावत ( सीसोदिया ) अमानसिंहजी की बाई मां- कुँवरजी से फाल्गुन कृष्ण ६ को और उसी पखवाडे में सातवां विवाह कृष्णा ११ को सीसोदिया भावतसिंहजी की कन्या नन्दकुँवरजी से हुआ। दोनों रानि- लोके ढोले आये। एक का विवाह बूँदी में और दूसरीका नैनवां में हुआ । इस रह सात विवाह होजानेपर भी आपने आठवां और किया। आपका आठवां विवाह इनसे ठीक नौ महीने बाद मार्गशिर कृष्ण २ को संवत् १८६४ में कृष्णगढ में कृष्णगढ नरेश प्रतापसिंहजी की कन्या और कल्याण- सिंहजी की बहन से हुआ। पहले सात विवाहों में जितनी सन्तानें हुई थीं उनमें से<noinclude></noinclude> 1hykhm0gxtnczeual5e00ef4yy2vhg7 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२३९ 250 195074 665684 2026-07-06T17:06:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665684 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २०८ ) उम्मेदसिंह चरित्र | कोई बच्चा नहीं | आठवें विवाह से श्रीमान् महाराव राजा रामसिंहजी का जन्म हुआ। जिस का वृत्तान्त आगे चलकर लिखा जायगा। इनका नाम अमान कुंवरजी था । इस अवसर में अंगरेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रतापादित्य बढते २ मध्याकाश को पहुंचने लगा । पहले लिखा जा चुका है कि और तब राजा महाराजाओं के परास्त हो जानेपर और पस्त हो जाने पर केवल दो ही की ओर से अंग्रेजों को खटका था । एक लाहोर नरेश महाराजा रणजीतसिंह और दूसरे यशवन्तराव होलकर । संवत् १८६४ में रणजीतसिंहजी को लुधियाने के जंग में जनरल अक्टरलोनी से तंग आकर अंगरेजों से संधि करनी पड़ी और संवत् १८६७ में यशवन्तराव का देहान्त होगया । सूर्यमल्लजी कहते हैं कि भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट् पृथ्वीराजजी के बाद इस देश में यशवन्त राव जैसा कोई वीर न हुआ । अवश्य ही इनके मरने से कितने ही अंशमें अंग्रेज लोग निष्कंटक होगये परंतु उस समय तक भी सेंधिया का दबदबा कुछ कम न था । उसने शिवपुर नरेश राधिकादासजी को गद्दी से उतार उनका राज्य छीन लिया और उन्हें केवल एक लाख रुपया वार्षिक आयका बडौदा देकर राघवगढ और नर वर के राज्य भी दबा लिये । जिस अवसर में देशभर में अराजकता फैल रही थी, "जिस की छाठी उस की भैंस" के न्याय से प्रबल निर्बलों को मारकर अपने २ राज्य वढा रहे थे यदि विष्णुसिंहजी अपना राज्य न बढा सके तो न सही परन्तु उन्होंने अपने राज्यकी एक इश्व धरती भी न जाने दी । यह बात कुछ कम नहीं है परन्तु बाहरी आक्रमणों से बचकर निष्कंटक रहनेवाले नरेश के लिये उनकी ही आस्तीन में एक सांप और पैदा हो गया । गोठडा के जागीरदार बहादुरसिंहजी के पुत्र, त्रिष्णुसिंहजी के सगे चचेरे भाई बलवन्तसिंहजी वास्तव में बडे बहादुर थे उस देश विश्व के समय यदि यह जोर दिखाते तो टोंक के नव्याव अमीर अली की तरह कहीं न कहीं अपना छोटा मोठा राज्य बना देते परन्तु शक्ति में और बल में बहादुर होने पर भी<noinclude></noinclude> hv740zvaha8k0ny8owjva0som6vayth पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४० 250 195075 665685 2026-07-06T17:06:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665685 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बलवन्तसिंहजी का उपद्रष । इसच मुच कायर निकले। उन्होंने बूँदी राज्य की ( २०९ ) सीमा के बाहर कर अपने पराक्रम से राज्य लेने के बदले अपने स्वामी से, अपने अन्न: तसे ग्रोह किया और अपने ही फुलपर कुठार चढाने की कायरता वह मेरा का बीशोलियां और मांडलगढ तथा जयपुर का नगर लेकर से निकाले जाने बाद और सर्फ बढ़ने का साहस न करसके इसलिये पर बलवन्तसिंहजी ने अपने अन्नदाता स्वामी विष्णुसिंहजी के राज्य का #वां लेने के लिये जी ललचाया। उनकी इस खोटी वासना में वहां का एक कंदार साथी हुआ और इस तरह उन्होंने स्वामिद्रोह करके और कुटुंब 1. के नैनों में अपना अधिकार संवत् १८६७ में कर लिया । इस बात की र सुनकर विष्णुसिंहजी को वडा क्रोध आया । संग्राम में हाथ दिखाने के उनकी नसें फड़क उठीं और उनके मन में जोश की तरंगें उठ उठ बाहर निकलने लगीं। इस बात से उनके सुभटों ने उन्हें रोका। उन्होंने संवेदन किया कि:- "हुनर के पधारने की फोन आवश्यकता है? पतसिंहजी का ब कर उन्हें पकड खानेके लिये तो हम लोग ही बहुत हैं ।" उन लोगों की प्रार्थना स्वीकार करके विष्णुसिंहजी स्वयं न गये किन्तु अपनी सेना के मुख्य २ सरदार, यडे २ जागीरदार सेना लेकर नैनवा पर पढे । जिस समय इनकी सेना नैनवां पर चढ़ी उससे पूर्व ही बलवन्त सिंहजी ने भजनेरी वाले शंकर सहजी के मेल से किले में घुसकर वहाँक द्विदार धाभाई गुमान को छहसे मारडाला था। इस तरह बवन्त सिंहजीने लिया में अपना पूरा २ दवदवा जमालिया था और इसी कारण बूँदी की सेना चार महीने के घेरे में नैनवां लेने का अवसर मिला। कार्तिकी अमावास्या से ल्गुन कृष्ण १ तक खूब खडाई हुई। इस समय कृष्णगढ आदि कई एक वाडों ने भी सहायता भेजी। अंत में बलवन्तसिंहजी नेनवां से निकाल | ये गये । वहांसे निकाल देनेवाद वह बूँदीके राज्यमें लूट खसोट करने , डाके डालने लगे परंतु फिर न मालूम किसतरह उनके मन को ज्जा आई। वह स्वयं विष्णुसिंहजी की सेवामें उपस्थित हुए और जद १४<noinclude></noinclude> ppyd3ez0ixlhribhojt8zn9ey11n5f5 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४१ 250 195076 665686 2026-07-06T17:06:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665686 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २१० ) 'उम्मेदसिंह चरित्र उन्होंने आकर अपने अपराधों के लिये क्षमा मांगी तब भाई का अपराध जान श्रीमान् ने उन्हें क्षमा दी। इसी वर्ष में गणगौरी के दूसरे दिन अर्थात चैत्र शुक्र ४ को श्रीमान् के तीसरे पुत्र बलदेव सिंहजी का जन्म हुआ किन्तु यह भी अपने दो भाइयों की तरह बच्चे नहीं । अध्याय १३. बडे हुजूरका जन्म | अंगरेजों से संधि | इस तरह तीन महाराज कुपारों के बाद आठ पत्नियों के पति पुत्र हीन होकर अधिक समय तक दुःख से दिन न बिताने पाये। भगवान श्रीरंगनाथ- जी ने और उनके इष्टदेव रामभक्त हनुमानजी ने उनकी सुनी। आठ पनि यों में आठवीं रानीजी साहब श्री जोधपुरीजी ( कृष्णगढबाली ) के गर्भ से संवत् १८६८ की पौष शुद्धा १ बुधवार को एक पुत्ररत्न का जन्म हुआ । शास्त्रकारोंने लिखा है:- "गुणिगणगणनारम्भे न पतति कठिनी सुसंभ्रमावस्य तस्याम्बा यदि सुतिनी यद वंश्पाकी दृशी भवति ।" वास्तव में यह पुत्रों में रस्म था, मनुष्यों में. जत्न था और राजाओं में रत्न था । जो मनुष्य संसार में जन्म लेकर अपनी मलाई से, अपने गुणों से अपना नाम न अमर कर जाये वह माता के यौवन रूपी वृक्षके लिये सचमुच ही कुठार है। इस छोकोक्ति के अनुसार वही माता सच्ची पुत्रवती है जिसके पुत्र ने दुनियां में आकर गुणवानों के नामों की गणना करते समय अपना नाम उनमें गिनवाया । वही पुरुष संसार में धन्य है जिसने गुणवानों में नाम पाया। यदि बुरे मनुष्यों की माता पुत्रवती कहलाये तो यया किसे कहें ? केवल यही नहीं सची पुत्रवती तो यह है जो इस श्लोक को चरितार्थ करसके । जैसे:- .<noinclude></noinclude> s6v6lkvy42d68ulf6acroo0n80xhlo4 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४२ 250 195077 665687 2026-07-06T17:06:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665687 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बड़े हुजूर का जन्म | "आदी कवीनां गणनाप्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्टित कालिदासा अभ्यस्य तत्तुल्य फमेरभावादनामिका सार्थवती बभूव ।" (२११) वल इसतरह गुणवानों की गणना में अपने नाम को छोटी अंगुलीपर असम देकर वास्तव में महाराव राजा रामसिंहजी राजर्षि की उपमा पाने में समर्थ हुए और जिस माता के उदरसे आप उत्पन्न हुए उसने अपने उर को, अपने कुछको पवित्र किया। बस इन्हीं महाराजाधिराज को दिन जन्म हुआ था। ऐसे पुत्ररत्न के नररत्न के उत्पन्न होनेसे, ऐसे समय में प्रसव होनेसे, जब पिता तीन पुत्रोंको खोकर दुःखित होगये थे को, माताओं को, परिजनों को, परिवार को और प्रजा को जो हर्ष हुआ सका कहना ही क्या ? नगर में राज्य में आनंद छागया । राजा के महाराज कुमार होनेसे केवल राज परिवार कोही हर्ष नहीं हुआ वरन "लाखों का रहने वाला पैदा होने से प्रजाके घर २ में बधाइयां बजने पिताने मन खोलकर, वित्त विसारकर उत्सव किया, दान किया, झाम दिया और इस तरह आनंद सागर बढ २ कर हिलोरें लेने लगा। मैं पहले दिख आया हूँ कि महाराजा उम्मेदसिंहजी बूँदीका उद्धार परने को पैदा हुए थे और अब दिखता हूँ कि उनके परपोते महाराव राजा रामसिंहजी बूँदी का सुधार करने को। उन्होंने बूँदी को शत्रुओं के ऐसे निकाल कर पिता का खोया हुआ राज्य फिरसे स्थापित किया और झोंने उस राज्य की उन्नति करके, उसका सुवार करके अपने यशका विस्तार डिश । उनका चरित्र पाठक इस पुस्तक में पढचुके और इनका चरित्र नकाकार में प्रकाशित होना अभी होनहार की गोदी में है । १ यही वर्तमान बूँदीनरेश श्रीमान् महाराय राजा सर रघुवीरसिंहजी जी. सी. आई. डी. सी. बी. ओ. के. सी. एस. आई के पिता थे। बूँदीकी प्रजा इन्हें बडे इ अथवा बडे दरवार कहती है।<noinclude></noinclude> irowlj4ifpwotqo3a7qhoqk772fryrd पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४३ 250 195078 665688 2026-07-06T17:06:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665688 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २१२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | इन महाराज का जन्म बहुत ही अच्छे मुहूर्त में हुआ था। इनके जन्मसे. बहुत ही थोडे अर्से बाद बूँदी राज्यकी ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि हुई । बंगाल में अपनी इकडंकी बजाकर और युक्त प्रदेश में अपना राज्यस्था | पित कर लेने पर भी अभी तक अंगरेजों की ईस्टइण्डिया कंपनी बनिया कंपनी बनी हुई थी परंतु अब संवत् १८६९ में इन्होंने देशी रजवाड को अपने अधीन करने का संकल्प कर राजापन ग्रहण किया । संवत् १८७० में नेपालने शिर उठाकर नगर कोट तक लिया था । अँगरेजोंने उससे दांत तोड लड़ाई कर काली नदीके पार कर दिया। पेशवर को पेन्शन देकर बिठूर में रख दिया और नागपुर नरेश भोंसला ने भी भयभीत होकर जोधपुर की शरण ली। ऐसे समय में अंगरेजों ने लाग पाकर राजपुताने के रजवाडों में प्रवेश किया । भारतवर्ष के गवर्नर जनरल मार्किस आफ् हेस्टिंगस ने संवत् १८७४ में “टाइ राजस्थान" के रचयिता कर्नल जेम्स टाड साहब को जिनका इस पुस्तक में सैंकडों जगा नाम आया है रजवाडों से संधि करने के लिये भेजा। किस रजवाडे से किस तर कब २ संधि हुई सो यहां लिखने की आवश्यकता नहीं है परंतु बूँदी के छुटभैया कोटेवालों ने और वहांके दीवान जालिमसिंहजी ने जाजपुर आदि जो परगना मेवाड से छीन लिया था उसे टाड साहब ने मेवाडवालों को ( उदयपुर के महाराना साहब को ) दिलवा दिया । साहब बहादुर ने इस तरह के सुन्याय से जाजपुरका परगना अवश्य ही मेवाड को दिलवा दिया परंतु झाला जालिमसिंहजी अंगरेजों के शिर पर हाथ फेरने से भी न चूके। बूँदी के प्रतिनिधियों के टाड साहब के पास पहुंचने में देरी होने से जालिम- सिंहजी का जोर चटगया । उन्होंने धोखा देकर संधिपत्र में ( अह नामें में ) इन्द्रगढ, बलबन खातोली, आंतरदा करवाढ, प्रसोद, पीपलदा आदि ठिकानों को जो तब तक बूँदीके आश्रित थे, बूँदीनरेश की सेवा करते थे और इन्हें कर देते थे कोटे के अधीन करवा लिये। जालिमसिंहजी इन जागीरदारों को और इन कोठरियों को बहकाकर कोटे से फिर जागीरें<noinclude></noinclude> 99ys0o5wy4323gbqebmyb25gmk9vh74 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४४ 250 195079 665689 2026-07-06T17:07:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665689 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बडे हुजूर का जन्म | (२१३) बाई, बूँदीकी अपेक्षा उनका सरकार बढ़ाया और इसतरह की बातोंसे उन्हें अपने वश करलिया। परंतु अंत में साहब के निकट जालिमसिंह- डी का कट गया फिर यह बहुत पछताये। यह बात उन्होंने धनी किताब में लिखी है सो आगे चलकर माइम होगी। वह पछताये परंतु "अब पछताये का होत है जब चिडिया चुग गई खेत" जब लिख चुके थे तब अपने फैसले को न बदल सके। खैर जो कुछ ना था सो हो चुका परंतु भारतवर्ष में अंगरेजों का प्रताप बढ़ता देख कर ले ही श्रीजी साहबने अपने पौत्र विष्णुसिंहजी को इन्दसे संधि करने की डाह देदी थी। उनकी सलाह से संवत् १८४३ से ही टामस सरों से होम फर्नल मेन और गवर्नर जनरल मि. मकफर्सन आदि लफ विष्णुसिंहजी का पत्राचार होने लगा था । संवत् १८६१ सुकंदरे के पास अनहार नदी के किनारे अंगरेज सेनानायक मान- नन के साथ जब होलकर की सेना का सामना हुआ तय बूँदीकी ओरसे सरदार और सेना उनकी सहायता के लिये जाचुकी थी, इस सेना ने अच्छी सहायता देकर कर्नल मानसन से प्रशंसा पाई थी। फिर आवश्यकता रखने पर कर्नल डेफ ( डाईटेक ) और डंकन साहब को सर बराही- दी थी और होटकर तथा सेंधिया की सेनाका मार्ग भी रोका था । इसलिये बूँदी नरेश संधि होनेले पूर्वमी अवश्य ही ब्रिटिश सरकार के शुभचिंतक थे किन्तु ब्रिटिश गवर्नमेंट के साथ, (ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ ) बूँदी नरेशकी संधि संवत् १८७४ की माथ शुक्ला ५ ( बसंत पंचमी) के शुभ मुहूर्त में हुई। उस संधिपत्र में ( अहद नाने में ) लिखा है कि:- "यह संधि माननीय अंगरेजी ईस्टइंडिया कंपनी और बूँदी नरेश महाराव राजा विष्णुसिंहजी के बीच हुई। श्रीमान् परमोदार गवर्नर जनरल मार्किस आफू हेस्टिक्स के. जी. से पूरे अधिकार पाकर कान ( फिर कर्नल ) जेम्स टाडने माननीय कंपनी की ओरसे और नरेश से पूरे अधिकार पाकर -नकी भोरसे बहुरा तुलारामने संधि की ।"<noinclude></noinclude> s7eonp6iaxltp5p6q5c067d7r3ll6kd पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४५ 250 195080 665690 2026-07-06T17:07:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665690 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २१४ ) उम्मेदसिंह चरित्र | "प्रथम नियम - एक ओरसे ब्रिटिश गवर्नमेंट और दूसरी ओरसे बूँदी नरेश, उनके वारिस और उत्तराधिकारी के परस्पर सदा मित्रता रहेगी, मेल रहेगा और एक का लाभ दूसरे का और दूसरे का लाभ एकका समझा जायगा ।" " दूसरा नियम- ब्रिटिश गवर्नमेंट बूँदी नरेश के राज्यकी रक्षा का भार अपने ऊपर देती है ।" "तीसरा नियम- बूँदी नरेश सदाके डिये ब्रिटिश गवर्नमेंट का बडप्पन स्वीकार करते हैं और सदा उसके सहायक रहेंगे। वह किसी पर चढाई न करेंगे । ब्रिटिश गवर्नमेंट की राय बिना वह किसी दूसरे से मेल न करेंगे। यदि संयोग वश किसीसे झगडा खडा होजाय तो वह ब्रिटिश गवर्नमेंट के पास फैसले के लिये भेज दिया जायगा । राजा अपने राज्यके स्वतंत्र अधि- कारी हैं उसमें अंगरेजों का अधिकार न घुसने दिया जायगा ।" "चौथा नियम- ब्रिटिश गवर्नमेंट स्वेच्छा से राजा और उनके उत्तरा- धिकारियों को वह खिराज जो राजा, होलकर महाराजा को दिया करते थे और जो अब होलकर से ब्रिटिश गवर्नमेंटने लेलिया है छोड़ देती है । और नक्शा नंबर १ के अनुसार ब्रिटिश गवर्नमेंट बूँदी राज्यका वह भाग जो उस राज्य के भीतर होलकर के अधिकार में था बूँदी राज्यको देदेती है ।" "पांचवां नियम- राजा जो खिराज और आमदनी नकशा नम्बर २ के अनुसार अबतक महाराजा सेंधिया को दिया करते थे उसे ब्रिटिश गवर्नमेंट को देनेकी प्रतिज्ञा करते हैं ।" "छठा नियम-बूँदी नरेश अपनी शक्तिके अनुसार ब्रिटिश गवर्नमेंट को आवश्यकता पडने पर अपनी सेना देंगे ।" साँसबाँ नियम - यह सात नियमोंकी संधि बूँदी में ते हुई और इसपर कप्तान जेम्स टाड तथा बहुरा तुलाराम ने हस्ताक्षर किये तथा मुहरें कीं आजसे एक महीने के भीतर परमोदार गवर्नर जनरल और बुँदीके महाराक राजाके तसदीक करने पर यह अमल में लाई जायगी ।"<noinclude></noinclude> esvq8hvoqvmp9hhhwtatna18p3kht3l पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४६ 250 195081 665691 2026-07-06T17:07:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665691 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>4 3 बडे हुजूर का जन्म | (२१५) "यह बूँदी में १० फरवरी सन् १८१८ को अर्थात् ४ रवी उस्सानी उन् १२१३ हिजरी और विक्रमादित्य के संवत् १८७४ को माघ १ को खीगई ।" इस तरह अंगरेजी सरकार और बूंदी राज्यके बीच में बूँदी नगर में संधि हुई । कोठरियां कोटे में चली जाने पर बडा खेद किया । मेरे ना लिखने बाद उन्होंने महाराव राजा विष्णुसिंहजी के विषय में, इस संधिके में, कोठरियों के विषय में जो कुछ अपनी किताब में लिखा है उसका वार्थ भी यहां लिखदेना आवश्यक है। वह लिखते हैं कि:- ( "उम्मेद सिंहजी का देहान्त हुआ) उस जमाने में अभागे (९) मानसन श्री सेना प्रथमवार राजपूतों के और विशेष कर बूँदीके बड़े शत्रु होलकर या दमन करनेके लिये इन प्रान्तों में पहुंची थी। हम नहीं जानते हैं कि उस समय बूढे नरेश जीवित थे या नहीं और उन्होंने उस नीति के छिपे जिसका अंगरेजोंने धन्यवाद पूर्वक बदला देदिया सलाह दीथी या नहीं किन्तु जो कुछ बूँदी के लिये किया गया नरेश के बीर उसके जंगलों (वीरराज्य ) को देखते हुए बहुत कम हुआ। हमारी सेना की चढाई पर नहीं जब कि हमारा झंडा सफलता के लिये फहराता हो वरन माम सन की सेना तुच्छता के साथ भागने के अवसर पर राजा ने अपनी शक्ति अधिक मानसन की सहायता दी और उस समय अपने सुखका और पने छामका किंचित भी विचार न किया। परंतु हम नहीं जानते हैं कि इस कृपाका उस समय कुछ बदला दिया गया । अथवा उस जमाने | कायर नीति से इसपर ध्यान ही नहीं दिया गया। परंतु इतना ही कहना बहुत है कि सन् १८१७ में जब हमने इस प्रान्त की अंधाधुंध मेटने के लिये राजपूतों से हथियार पकडकर हमारा साथ देनेकी सहायता मांगी तब इस काम में संयुक्त होने में बूँदी सबसे बढकर निकली। उसे होना भी ऐसा ही चाहिये था क्योंकि उससे पहले राजधानी के भीतर बूँदी के शंडेके साथ मरहटों का झंडा उडता था और राज्यकी आय<noinclude></noinclude> a23aous4u1kyb7eojbsde3pvlrgbvym पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४७ 250 195082 665692 2026-07-06T17:07:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665692 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२१६ ) उम्मेदसिंह चरित्र | -इतनी कम थी जिससे राजा की शारीरिक रक्षा का खर्चा भी कठिनता से निकल सकता था ! यह विशेष कर इसलिये हुआ कि हमने सन् १८०४ में बूँदी छोड़ दी । सन् १८१७ के संग्राम में जो हमारी इच्छा थी वही बूँदी की थी। हमने बूँदी से अपनी इच्छाके अनुसार काम लिया। बूँदी के नरेश और वहांकी सेना हमारी आज्ञा पालन करने में लड़ाई भर सलवार लेकर तैयार रही। और जब सब ओरसे हमारा विजय होकर शान्ति स्थापित हुई हम महाराव राजा बिष्णुसिंहजी को भूले नहीं । जो परगने आधी शताब्दी से होल्कर के अधिकार में थे और उसका विजय करनेसे जिनपर हमारा स्वस्थ होगया था वे किसी तरह की शर्त किये बिना बूँदीको लौटा दिये गये। इसी तरहसे जो परगने पहले सेंधिया के अधिकार में थे उनकी दशवर्ष की आयका परता फैलाकर नियत रुपया हमारे द्वारा (संधिया को ) देनेकी शर्तिपर बूँदीवालों को छोटा देनेका हमने प्रबंध कर दिया। इन बातों पर राजाने जो अहसान माना वह उनके इन प्रभावशाली शब्दोंसे प्रकट होता है :-- "मैं केवल बातें बनाने वाला आदमी नहीं हूँ किन्तु मेरा शिर आपका ही है। जब चाहे ले लीजिये ।" "राजा का यह वाक्य केवल हमारा सत्कार करनेही के लिये नहीं था । यदि हम उनकी सचाई की जांच करते तो राजा हमारे लिये अपनी जान अवश्य झोंक देते और जिन हाडाओंने उनका नमक खाया था सब अपनी अपनी जान अपने मालिक की आज्ञा पर दे डालते। तो भी बूँदीपर हमारे द्वारा बहुत कुछ दामोंकी दृष्टि हुई और उनका नरेश पर असर भी बहुत हुआ किन्तु उनकी एक हानि भी होगई । कोटवाले बूढे जालिमसिंहने संधि करनेके लिये बूँदी से पहले अपना मतलब गांठ कर अपने हस्ताक्षर में फिश्यीय सरकार अंग्रेज ( अंगरेज गवर्नमेंट का ताबेदार ) लिख दिया और इस तरह इन्द्रगढ, वलवन, आंतरदा और खातोली ये बूँदी की मुख्ये कोठरियां बूँदी से उन्होंने अपने अधिकार में डेली । 1<noinclude></noinclude> 4yzofkok4j1kcovgyxpij6qucg0ksm7 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४८ 250 195083 665693 2026-07-06T17:07:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665693 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बडे हुजूर का जन्म | ( २१७ ) "उदार (स्वतंत्र ) और बहादुर रावराजा को इस गहरा रंज हुआ। उन्होंने कहा कि- "मेरे पर काट डाले गये" यह व्यवस्था अच्छी नहीं है और न्याय और राजनैतिक पेत्रों से इसका सुधार होना चाहिये और चाहिये कि भारतवर्ष का यह छोटासा चित्ताकर्षक और लायक (योग्य) राज्य उससे उचित न्याय प्राप्त करै ।" उक्त वाक्यके अंत में एक चिन्ह देकर टाडसाइवने यहां अपनी किताब में नीचे अपनी ही ओरसे एक टिप्पणी दी है। उसका आशय यह है कि- "सन् १८१७ में इस ग्रंथके रचयिता ही को बूँदीके साथ संधि करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था। इन जंगलोंका जो मुझे पहलेसे ज्ञान था उससे बूँदीके लाभमें कोई क्षति न हुई । मैंने उन साधारण सिद्धान्तोंपर जो युद्ध आरंभ होनेके समय हमारी होनहार राजनीति के लिये स्थिर हुए, बूंदी के साथ संधि करने का भारं अपने ऊपर लिया । ये साधारण सिद्धान्त यही थे कि राजपूताना की भूमि में मरहटों की एक फुट भी धरती न रहे, वे चंबल से पश्चिम की ओर बिलकुल न रहने पायें और इसीलिये मैंने पाटण और दूसरा इखाका जो इस प्रकार का था सदाके लिये बूँदी में मिलादिया ।" टाड साहब फिर अपनी किताब में लिखते हैं कि- "हमने जो ध्यान बूँदीके उामोंपर दिया था उसका फल होगया क्योंकि जब सब ही राज्यों में किसी न किसी तरह पर अपनी २ शक्तिकी रक्षा करने में गडबड वा कष्ट रहा तब बूँदी ने चुपचाप, शनैः २ फलने फूलने की ओर उन्नति की । वह अपनी स्वतंत्रता का सुख भोगती रही और उस पर किसी तरह हस्तक्षेप न हुआ ।" जैसे पाठक पहलेसे बूँदीके करते आये हैं येते उन्होंने यहां होगा कि टाइसाहब बूँदीके बडे दिला देनेमें उनकी जो भूलहुई भी इतिहास से, टाडसाहब के लेखका निलान कर लिया। उन्हें इससे मालूम होगया शुभचिन्तक थे। वृंदीकी कोटरियां फोटेको अथवा उन्होंने जो जाटिमसिंहजी से धोखा खाया उसे स्पष्ट स्वीकार किया है। यह उनकी उदारता है। महाराव राजा<noinclude></noinclude> 93b9z67mv20rwlhme395nfwc4mac1ox पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२४९ 250 195084 665694 2026-07-06T17:07:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665694 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२१८) उम्मेदसिंह चरित्र | विष्णुसिंहजी ने उस समय जो गवर्नमेंट की जी जानसे सहायता की थी उसे भी टाड साहबने अच्छे शब्दों में स्वीकार किया है और उनकी वीरता पर तो साहब लट्टू होगये हैं। उनके हाथसे बूँदीकी कोठरियां कोटे में चली जाने की जो भूख होगई उसे सुधारने का भी उन्होंने अपनी किताब में उचित संकेत किया है। यह उनकी उदारता है। आज के ऐसे अंग्रेज कम होते हैं जो इस तरह अपनी भूल स्वीकार करलें । आदमी ठंडाई में अपना शिर कटा सकता है परन्तु भूल स्वीकार करना उससे भी कठिन काम है । बडी वीरता है । अध्याय १४. महाराव राजा विष्णुसिंहजी का देहान्त । जिस समय टाडसाहब ने कोटे को और जालिमसिंहजी को दबाकर जहाज- पुर आदि परगने कोटे से मेवाड को दिलवादिये तब जालिमासहजी ने बूँदी के राज्य में लूट मचाकर दामाद को सताने में अपने श्वसुरपन का परिचय दिया । उन्होंने कोटा नरेश महाराव उम्मेदसिंहजी को इतना तंग किया- इतना काबू में कर लिया कि उन्होंने जिस तरह महारावजी को नचाया वैसे ही वह नाचे । वह केवल देवता की मूर्तिकी तरह राजसिंहासन पर बैठे रहते किन्तु राज्य केवल झालाजी करते थे । उम्मेदसिंहजी के मरने के बाद उनके पुत्र किशोरसिंहजी को कोटे का महाराव बनाया तो सही परंतु उन्हें भी जालिमसिंहजीने बहुत तंग किया। उस समय कोटे की क्या दशा थी सो लिखने की यहां आवश्यकता नहीं है परंतु झालाजी के सताने से, उनके उरसे तंग आकर महाराव किशोरसिंहजी कोटेसे बिना सवारी और बिना नौकर अकेले ही पैदल भागकर बूँदी आगये । विष्णुसिंहजी को उनके आगमन की खबर हुई तब उन्होंने दो कोस तक महारावजी के सामने जाकर उनकी पेशवाई की। उन्हें बड़े सरकार से अपने महलों में अपने ही पास रक्खा और उनसे कहा:-<noinclude></noinclude> 0yxkrut00keieg9d4azte3024mepxic पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५० 250 195085 665695 2026-07-06T17:08:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665695 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महाराव राजा विष्णुसिंहजी का देहान्त । ( २१९ ) "भाई साहब आप क्यों घबडाते हैं ? यह घर आपका ही है। यहाँ प्रसन्नता से रहिये | आप निश्चय जानिये कि जहां धर्म है वहां अंतमें जय अवश्य होजाता है। आप चिन्ता न कीजिये। अंग्रेजों की सहायता लेकर कोटेसे झाले निकाल दिये जायेंगे । यदि अवसर हुआ तो उन्हें मार डालेंगे और नहीं तो उन्हें इस तरह कीड़े देंगे जिस तरह गाडी सांप को की कर कीडा बना देता है। फोटा आपका है और अवश्य ही आपको मिलेगा । में, मेरा राज्य, मेरा खजाना और मेरी सेना आपकी सहाय ता करनेके लिये तैयार है किन्तु त्वरा न कीजिये। "उतावळा सो वादा " उतावल से काम बिगड़ जायगा । जरा धैर्य पकडिये । घबडाइये मत ।" इस तरह विष्णुसिंहजी ने किशोरसिंहजी को बहुतेरा समझाया, बुझाया, बहुतेरा ढाढस दिलाया और अपने तन मन धनसे सहायता करनेका प्रण किया किन्तु घबडाये हुए महारावजी बूँदी न ठहर सके। वह यहां अपने लिये उचित सामग्री लेकर दिल्ली चले गये। इसके बाद उनका क्या हुआ सो कहने की यहाँ आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसका संबंध कोटे के इतिहास से है। यह घटना संवत् १८७७ की है। T अब महाराव राजा विष्णुसिंहजी के चारे में कोई ऐसी विशेष बात नहीं रही जो यहां दिखने योग्य हो। इनका देहान्त संवत् १८७८ की आषाढ शुका १५ को होगया । यह संवत् १८२९ में साढे चार मास, की उमर में बूँदी के सिंहासन पर विराजे थे और संवत् १८७८ में इनक शरीर छूटा इसलिये उनकी उमर ४८ वर्ष से कुछ ऊपर हुई और लगभग इतने ही वर्ष इन्होंने बूँदीका राज्य किया। यों तो इनके आठ विवाह से पांच पुत्र और एक कन्या हुई थी परंतु जिस समय इनका देहान्त हुआ इनके केवल दो महाराज कुमार विद्यमान थे । एक बडे रामसिंहजी जिनका वय इस समय ९ ॥ वर्षका था और दूसरे इनसे कुछ छोटे गोपाल सिंहजी | महाराव राजा त्रिष्णुसिंहजी की खवासोंमेंसे एक के महाराजा विनयसिंहजी हुए जो बहुत वर्षोंतक जीवित रहे ।<noinclude></noinclude> skv61btqoann8mn4bhziaguwtg2geuf पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५१ 250 195086 665696 2026-07-06T17:08:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665696 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २२० ) उम्मेदसिंह चरित्र | महाराव राजा विष्णुसिंहजी को हनुमानजी का इष्ट था इसलिये उन्होंने नगर से पश्चिम की ओर बजांग विछास बाग बनवाने की नींव डाली । राज प्रासाद में इन्होंने छत्र महल के उत्तर की ओर अखाडा बनवाकर हनुमानजी की स्थापना की। तारागढ़ किले में दो जीवरखे नामक स्थान, चांवड ( चामुंडा ) ' दर्बाजे से लेकर महलों तक और भैरव दर्वाजे से लेकर निर्भय बुर्जतक कोट, वडकी र बास, गोपाल बुर्ज, सुख महल और नैनवां में गुमान सागर तालाब बनवाया । इनके कृष्णगढवाली रानीजी साहवाने बूँदीने दक्षिणमें धर्मशाला बनवाकर उसमें हनुमानजी पराये और वहां गरीबों को खानेके लिये मिछने का प्रबंध किया। इनकी खवास सुंदर शोभाभीने सुंदर घाट वनवाया। महाराव राजा विष्णुसिंहजी के विषय में टाड साहबने जो कुछ लिखा है उसे यहां उद्धृत कर मैं अब इस पुस्तक को समाप्त करूंगा । वह लिखते हैं कि:- J उन्हें अपने राज्य की स्वतंत्रता मिलने ( अंगरेजों के साथ संधि होजाने ) से पीछे महाराव राजा केवल चार वर्षतक जीवित रहे । तब उन्हें हैजा इस दुनिया से उठा लेगया। उनके अंत समय की बीमारी में, जो दृढ चित्त और दृढ शरीर काभी दिल तोड़ डाला करती है, वह शांत और स्थिर रहे। उन्होंने अपनी रानियों से कह दिया कि कोई भी हमारी चितानें अपने प्राण विसर्जन न करो। उन्होंने अपने पुत्र और उत्तराधिकारी को ब्रिटिश गवर्नमेंट के प्रतिनिधि की रक्षा में छोड़कर युवावस्था ही में परलोक को प्रयाण किया ।" "विष्णुसिंहजी का चरित्र थोडे ही शब्दों में लिखा जा सकता है। यह ईमानदार थे और उनकी नस नस में रजपूती मरी हुई थी। उनकी बाहरी बातें चिकनी चुपडी न होनेपर भी उनका हृदय उद्दार था और उनके विचार दृढ थे। उनकी समझ में किसी तरह की कसर न थी। वह अपने काम काजका अच्छा ज्ञान रखते थे। जब मरहटों ने धीरे २ उनके राज्यकी • आय घडा की और उनकी शक्तिको चारों ओर से घेर लिया<noinclude></noinclude> sd5lh5l6qbf0cel93ribjnd6j2ld1i6 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५२ 250 195087 665697 2026-07-06T17:08:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665697 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महाराव राजा विष्णुसिंहजी का देहान्त । ( २२१ ) उन्होंने शिकार खेलने से, जो राजपूतों के योग्य खेल है, जी बहलाया । वह सिंहकी गुफा में घुसपडते और जब तक उनके राजाको मार न देते तब तक यहां न हटते। उन्होंने इसी तरह की शिकार अपने योग्य समझी थी। उन्होंने अपने ही हाथों से एकलो से ऊपर सिंहों का शिकार किया था. इनके सिवाय बहुत से बधेरे मारे और कितने रीछ उनके माले की शिकार हुए सो गिनती नहीं। यह काम भयसे खाली न निकला और साथही यह परिश्रम आनन्द वर्द्धक भी था। उनकी एक हड्डी इसी काममें टूटगई और इससे वह सदा के लिये लंगडे होगये। पहले वह साधारण कदसे कम थे किन्तु अब उनकी लंबाई और भी कम होगई परन्तु जब वह थोडे पर सवार होकर अपने सिर पर माला फेरते थे तब वीरता और प्रताप विष्णुसिंहजी में टपकने लगते थे। यदि हम उनकी शक्तिको अपने कामने छाते तो यह हमारी सहायता में वैसाही काम देते जैसा उनके पुरखाओंने जहाँगीर अथवा शाह आलम के लिये दिया था। वह अपने छोटेसे राज्यके शासन करनेमें स्वतंत्र थे। वह समझते थे कि शासितों से अपना सम्मान कराने के लिये मयही एक आवश्यक उपाय है और विशेष कर अपने राज्य शासन के कामों में सेवा करनेवाले नोकरों को तो भयभीत रखनाही चाहिये और यदि बूँदीफे लेखोंपर भरोसा किया जाय तो उनके अमात्य अथवा खजानची साथ उनका वर्ताच बाहरवालों के लिये हास्यास्पद हो सकता है। राजाके पास एक फंड था। उनकी अपने दीवान से आज्ञाथी कि नित्य सौ रुपये के हिसाब से उसमें जमा करता रहे। यह इस काम के लिये यदि किसी तरह का उन करता तो नहीं सुनाजाता था और "इन्द्रजित" की धमकी उसके शिरपर सवार रहती थी । "इन्द्रको जीतनेवाला" कोई देवता न था किन्तु मनुष्य के जूतेसे बड़े आकारका एक जूता था। यह एक खूंटी पर लटका रहता था जहां पूर्व देशके राजा अपना राजदंड लटकाया करते हैं किन्तु यह जूता उनके बडे २ आदमियोंके लिये था और यह अप- राधी मंत्रियों को सुधारने की सामग्री थी।" .<noinclude></noinclude> p3nez9eem8105763wpm3sbtjjbecx6k पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५३ 250 195088 665698 2026-07-06T17:08:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665698 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २२२ ) उम्मेदसिंह चरित्र | इसतरह टाsसाने महाराव राजा विष्णुसिंहजी की प्रशंसा में उनकी - वीरता के विषय में, उन्होंने गवर्नमेंट की सेवा के लिये जो अपनी शक्ति अर्पण कर रक्खी थी उसके लिये जो कुछ लिखा है उसपर मुझे कुछ नहीं कहना है। क्योंकि साहब ने जो कुछ लिखा है सब ठीक है और यही बूँदी के इतिहास का निचोड है। ऐसी दशा में यहां के इतिहास का उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है परंतु टाड साहब के लेखमें से मुझे यहां केवल दो बातों के लिये विचार करना है । एक यह कि उन्होंने विष्णुसिंहजी का सरहदों से बिल- कुल दबजाना लिखा है और दूसरे उन्होंने "इन्द्रजित्" जतेका उदाहरण देकर यह दिखलाया है कि वह बड़े कठोर थे। जिस तरह उन्होंने मरहठों के दबाव के विषय में यहां लिखा है उसी तरह एकवार पहले भी लिखा है परंतु न तो उन्होंने कहीं पर इस बातका स्वरूप दिखलाया है, न कहीं बूँदी के इतिहासों में इस बातका पता है और न बूँदी के लोग इस बातको जानते कहते हैं । ऐसी दशामें मैं नहीं कह सकता कि बूँदी की राजधानी में भरहठों का झंडा उड़ने की बात कहाँतक सत्य है। टा साहब सहसा अनहोनी बात लिखने वाले मनुष्य न थे परंतु इसके साथ ही वह अपने कथन का प्रमाण देते तो उसपर विश्वास किया जासकता था। हां उन्होंने पहले केशवराय को पाटन के हिस्सोंके विषय में लिखा सो ठीक है परंतु पाटन में बूँदी, होलकर और संधिया तीन राज्योंका बराबर हिस्सा होने से यह सिद्ध नहीं होसकता है कि बूँदी राजधानीमें मरह- टोंका झंडा उडता था और विष्णुसिंहजी नाममात्र के राजा रहगये थे जिन्हें गवर्नमेंट की राजभक्ति करने के बदले में अंग्रेजोंने राज्य दिलवाया। यदि विष्णुसिंहजी सरहदों से दबगये होते तो ढाड साहब ही के लेख के अनुसार कर्नल मानसन को सहायता देकर होळकर का सामना कैसे करसकते इन बातोंसे निश्चय होता है कि जैसे बूँदी की कोठरियाँ कोटेको दिलाने में साहबने धोखा खाया पैसेही ऐसा लिखने में वह भूलेहें अथवा उन्होंने गवर्नमेंट का बूँदी राज्यपर अधिक अहसान जताने के लिये<noinclude></noinclude> t8wy7joj5ifdu8cimqp2szfgilud8rc पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५४ 250 195089 665699 2026-07-06T17:08:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665699 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>महाराव राज विष्णुसिंहजी का देहान्त । ( २२३ ) इस तरह लिख दिया है। उनके लेखमें दूसरी बात विष्णुसिंहजी की कठो रता के विषय में है। बूँदीके इतिहास लेखक कवि राजा सूर्यमल जी स्वतंत्र पासभी नहीं फटकने पाती थी। ऐसी दशा में यदि पुरुष थे। खुशामद उनके विष्णुसिंहजी कठोर होते वह अवश्य ही इस यातको प्रकाश करने से न चूकते किन्तु उन्होंने न तो कहीं विष्णुसिंहजी की कठोरता का संकेत किया है और न " इन्द्रजित्" जूते वाली घटना का उनके ग्रंथ में उल्लेख है। इतने परभी यदि वह किसी अंशमें कठोर भी हों तो यह बात समय के अनुसार अनुचित नहीं है । मेरा बनाया काबुल के अमीर अब्दुर्रहमा- नख का चरित्र जिन लोगोंने पढा है ये अवश्य स्वीकार किये बिना न रहेंगे कि अब्दुर्रहमान खां की कठोर प्रकृतिने ही काबुल की सिंहके समान खुरुवार, भयानक प्रजा को यो बना दिया था। जिस समय विष्णुसिंहजी इस राज्य के शासक थे भारतवर्ष भर में अराजकता फैल रही थी। हाथ को हाथ खाता था। खूब लूट खसोट होती थी, डाके पड़ते थे और जिस तरह खुदीके प्रधान कर्मचारियों ने शालाओं से मिलकर आस्तीन के सांप की सरह राज्यका नाश किया उसी तरह रजवाड़ों के कर्मचारी और राज्यों से मेल रखकर रजवाडों का सर्वनाश कर रहे थे ऐसी दशामें यदि विष्णु सिंहजी कठोर न होते तो ढाड साहब को यह लिखनेका समय न मिलता कि- "जब और राज्योंमें किसी न किसी तरह अपनी २ शक्ति की रक्षा करने में गडबड और कष्ट था तब बूँदीने चुपचाप शनैः २ फलने फूलने की और उन्नति की ।" अवश्य ही प्रजा जैसी प्रेमके वशीभूत होती है वैसी भयके नहीं परंतु "भय बिन होत न प्रीति" इस लोकोक्ति के अनुसार कहीं २ भय भी प्रेमका पिता हो पड़ता है। महाराव राजा उम्मेदसिंहजी ने बडे २ पराक्रमी शत्रुओं के पेट से, तलवार के बल से, भारी २ लडाइयां लडकर पसीने के बदले अपने शरीर का रक्त बहाकर बूँदी ली और अपने कर्म- चारियों को, प्रजाको कमी भयसे और कमी प्रेमसे दबाकर विष्णुसिंहजी ने शांति स्थापित की । और इनके बाद महाराव राजा रामसिंहजीने अपने<noinclude></noinclude> 8kq5wfvxxtm4e3br2r66u24qomer1d0 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५५ 250 195090 665700 2026-07-06T17:08:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665700 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २२४ ) उम्मेदसिंह चरित्र । सुन्यायते, अपने सद्गुणोंसे और अपनी दयासे प्रजाको इतना वश में करलिया कि वह इन्हें ईश्वर का अवतार समझने लगी । महाराव राजा विष्णुसिंहजी के स्वर्गवास होनेकी घटना प्रकाशित करके में अब इस पुस्तक को समाप्त करता हूँ क्योंकि आगे महाराव राजा उम्मेद- सिंहजी के चरित्र से कुछ संबंध नहीं रहा । इस ग्रंथ में मुख्य रूपपर श्रीजी साहब का विस्तृत चरित्र और गौण रीति से बूँदी का ठेठसे इतिहास लिखा गया है। यदि भगवान ने शक्ति दी, यदि शरीर विद्यमान रहा और इस तरह यदि अवकाश मिला तो मैं महाराव राजा रामसिंहजी का जय चरित्र लिखूंगा तब पाठक इस ग्रंथके यादका इतिहास उसमें पायेंगे। ये बातें सर्व शक्तिमान परमेश्वर के अधीन हैं। महाराव राजा रामसिंहजी का चरित्र बहुत रोचक है और बड़ा उपदेश पूर्ण है क्योंकि बूँदीकी प्रजा उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा करती है। ब्रिटिश गवर्नमेंट उनका बडा आदर करती थी अंग्रेज कर्मचारी उनका वडा संकोच रखते थे, देशी राजाओं की उनपर बडी पूज्य वृद्धि थी और इसलिये वह सर्व प्रिय थे। उनके ७८ वर्ष के जीवन में, उनके ६८ वर्षके शासन में बूँदी राज्यकी कितनी उन्नति हुई, उन्होंने सनातनधर्म की, विद्या की, संस्कृत की कितनी सेवा की और प्रजा का कितना उपकार किया सो सब उनके चरित्र से मालूम होगा । उससे सर्व साधारण को विदित हो जायगा कि क्योंकर यह राजर्षि कहलाने योग्य थे । इति । पुस्तक मिखनेक ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस - बम्बई.<noinclude></noinclude> 47y4rwkw5t1lfy4x5nw6x34uiwicanz पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५६ 250 195091 665701 2026-07-06T17:09:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665701 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>। ऋय्य पुस्तकें - ( भाषाइतिहास- ग्रन्थाः ) । 1 नाम. अध्यात्मरामायण- केवल भाषामात्र, सुन्दर जिल्द भी अभ्यास प्रकार अव्याज्ञान और भक्ति प्रप्त अमूल्य होनेपर भी दाम थोडा रखता है ज "स्था रफ कागज... को० ६० अ० इसके होती है । २-० GOLD १-१२ २-८० ०-१२ ०-८ अध्यात्मरामायण- गुलाबसिंहकृत पचात्मक माया..... अब्दुर्रहमानखाँ - फाटके समीरका ओजवर्द्धक जीवनचरित्र जानन्दमठ. इतिहास गुरुखा उसा ओजवर्द्धक सिक्खोंका पूर्ण इतिहास ) इसमें गुरु नानकलाहवले लेकर दशों बादशाहीतकका जीवनचरित्र मलीप्रकार वर्णित है..... औरंगजेबनामा- अर्थात् मुगलसम्राट् महीउद्दीन मोहम्मद श्री गजेय आलमगीरवादशाहका सचित्र इतिहास प्रथम भाग " तथा द्वितीय भाग ... जापानका उदय उत्साह और एकतापूर्वक उद्योग करनेसे मनुष्य असाध्य कार्य भी शीघ्र फरसक्ता है किन्तु प्रत्येक वातमें विद्या- हीकी मुख्यता मानी गई है। जापानियोंने उक्त उपायों दृढता तथा दया, धैर्य और राजमतिले आशातीत जो उन्नति की उन्हीं बातोंका संग्रह इस पुस्तकमें है..... जैमिनीय अश्वमेध - भाषा- परममनोर दोरा चौरई छन्दबद्ध भाषा अतीव मनोहर है ग्लेज कागज " तथा २फ कागज ** ... २-० 3-0 0-8 8-0 १-१२ १-८<noinclude></noinclude> 8lrh14srvv8m1n7b36nzr7k3mtfdx4q पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५७ 250 195092 665702 2026-07-06T17:09:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665702 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( २ ) नाम. जाहिरात | की० रु० आ० नेपालका इतिहास - भाषा में स्व० पं० वलदेवप्रसाद मिश्र रचित.. बुद्धका जीवनचरित्र स्वामी परमानन्दजी लिखित. भारत भ्रमण - पांचों खण्ड सम्पूर्ण- भारतसारभावा-रफ कागज भूलोकरहस्य- .... ०-८ ० - ८ .... <-o १-१२ **** ०-२ मदनकोष - अर्थात् जीवनचरित्रस्तोत्र- इसमें नामोंके अकारादि क्रमके संसार के १००० महानुभावों के उत्तमोत्तम चरित्र संस्कृत, हिन्दी, फारसी, इंग्रेजी आदि पुस्तकों के आशय से लिखेगये हैं. १-८ महाराणा पशमकाश - "मलसीसर " ठाकुर भूरसिंह संगृहीत. रामाश्वमेध - केवल मापावार्तिक. मनोहर जिल्द बँधी. शेखावत १-४ ..... २-० २-० ०-१२ दोहा, चौपाई, रामाश्वमेव भाषापयमें- देवारामजीकृत - इसमें, छन्दरामायण के अनुसार वर्णित हैं अवश्य लीजिये रामाश्वमेध - मापापथमें छोटा .... ... राजस्थान इतिहास प्रथम भाग - अर्थात् कर्नल जेम्सटाउन- गीत- अंग्रेजी भाषानुवाद पूर्वभाग स्वर्गीय पं० बलदेवप्रसाद मिश्रकृत | सुन्दर कागज और विलायती कपडेकी जिल्द जिस- पर सोनेके अक्षर चकाचौंध करदेते हैं. राजस्थानइतिहास - दूसरा भाग - जिसमें - जोधपुर, बीकानेर जैसल ....१०-० मेर, जैनूर, शेखावाटी, बूँदी और फोटाका इतिहास है ...१०-० वाल्लीकीय रामायण - केवल भाषा दो जिल्दों में " तथा रफका..... ... १०-० ९-० स्वपुरुषार्थ-वेदालाल शर्माकृत | इसमें अनेक दृष्टान्तोंसे पुरुषार्थकी श्रेष्ठता तथा अंग्रेज, मुसल्मान आदि सज्जनोंको प्राचीन देखोंसे शिल्पापार आदिमें भारतको सर्वोच्चता भलीभाँति वर्णित है ०-८<noinclude></noinclude> f52z8ht97kd4ue0wjzar28i5y2xt1mx पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५८ 250 195093 665703 2026-07-06T17:09:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665703 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नाम. जाहिरात | (३) की० ६०० ददेशसेवा - वर्तमान समय में स्वदेशीका चारों ओर वडा आन्दोलन होरहा है इस कारण इसको अवश्य संग्रह कर इसले डाभ उठाइये SEAR भापाकाव्यादि-ग्रन्थाः अजिरविहार- छन्दबद्ध उत्तम पढने योग्य ) इसमें नन्दनन्दम आनन्दकन्द बालीला सामिलाप कृष्णविनय, भगवद्विनय, सुरसरिविजय, शंकरविनय, हनुमद्विनया दिहै..... 8-0 **** 0-l अनेक ग्रह भाषा इसके पढनेले सर्वशास्त्रका सिद्धान्त जाना जाता है. ...... अग्रवालों की उत्पत्ति-आधभानेकी टिकट भेजनेसे अप्रवाल माइ योंको बिना मूल्य भेजी जाती है. २-० अग्रवालवैश्योत्कर्ष - शेखावाटीभूषण पं० हीरालालजी संगृहीत .... ० १ ॥ अनुरागप्रकाश. अष्टयाममानसी ध्यान अर्थात् श्रीराम-जानकी, श्रीकृष्णादि इष्टदे बातोंके दिनरात मानसीमाका ७३ दोहोंगें दिग्दर्शन आश्रदीपिका. आनन्दवहार- प्रथमभाग आतिशवाजी ...... .... [...] उपाचरित्र मापा - उर्दू के रसीले शेरोव गजलों में बना है। कर्मयोग-प्रथममाग-श्रीयुत पं० ज्वालादत्त शर्मद्वारा लिखित | इसमें जो लोग केवल देववर भरोसा रखकर कर्तव्यकर्मसे विमुख होते हैं उनको कर्तव्यकर्म करनेसे कैसा सुख प्राप्त होता है इसका व्याख्यानरूपसे चित्र दिखाया गया है द्वितीयभाग उपरहा है ०-१० ०-१ 0-211 ०-१ 0-311 ०-४ 0-2<noinclude></noinclude> caavr26bq01oayrkzucc34qvqcqyqe7 पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२५९ 250 195094 665704 2026-07-06T17:09:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665704 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ४ ) नाम. जाहिरात | की० ए० भा० कहावत कल्पद्रुम - (हिन्दी, गुजराती, अंग्रेजी, फारसी, उर्दू और मराठी कहावतों का संग्रह ) कान्यकुब्जवंशावली अर्थात् कान्यकुम्ज ब्राह्मणोंका वंशवर्णन जिसमें विश्वा प्रवर भी अक्कीवार डाला गया है ... कान्यकुब्ज ब्राह्मणोंकी - प्राचीन तथा अर्वाचीन अवस्थाओंका वर्णन श्रीयुत पं गंगाप्रसाद अग्निहोत्री लिखित काव्यनिर्णय-भाषा-छन्दबद्ध भिखारीदासकृत ) मनहरण ... छन्दोंमें कठिन अलंकार वर्णन है..... काव्यरत्नाकर इसमें समस्यापूर्ति अपूर्व हैं. काव्य- प्रथमभाग। इसमें पट् ऋतुवर्णन, विहारसमय का वर्णन अतिकलित पद्योंका अनूठा संग्रह है. कामधेनु एक गोमक्कद्वारा लिखित, खैरासाकी बारामासी. 2-0 0-9 १-२ ... ०-८ श्रीराधाकृष्णजी के ० - ८ 0-111 = 111-0 गोपीगीत- कुमावनी पापा- बालविधवा गोपीदेवी के स्वका अद्भुत आशय ११॥ गोविनय, -211 गोविनती. गौका चित्र यह दर्शनीय तथा को वमें मढाके घरमें रखने योग्य है. ० ॥ चौताल चन्द्रिका. संपूर्ण पुस्तकोंका " सूचीपत्र" अलग मँगालीजिये | 0-8 पुस्तक मिटने का ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-बबई.<noinclude></noinclude> ef0t5yp5wtw2l1sd5tpkg0xrkwe1w1y पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२६० 250 195095 665705 2026-07-06T17:09:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665705 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>RENT PUBLY MEME Lib BOOK-FEST my true teni ON INDIA GOVERNMENT SERVICE at sun D.A.7. fornitlen Broede Wa Gaudhl Map NEW DELHI-110091 14304 11 71 INCIAL AVAJTHAL VIDYT JA VIGYAN HEYPLAY:<noinclude></noinclude> bfocuiqtfr30mheh8cyzgyradhgagef पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२६१ 250 195096 665706 2026-07-06T17:10:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665706 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२६२ 250 195097 665707 2026-07-06T17:10:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665707 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२६३ 250 195098 665708 2026-07-06T17:10:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665708 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>DUE DATE CENTRAL LIBRARY BANASTHALI VIDYAPITH Acc. No. 1. Books may be retained for a period not exceeding Fourteen days. 2. Dog earing the pages of a book marking or writing therein with ink or pencil, tearing and taking out its pages or otherwise damaging it will constitute an injury to a book. 3. Any such injury to a book is a serious offence; Unless a borrower points out the injury at the time of borrowing the book and gets the imperfection slip pasted he shall be required. to replace the book or pay its price. Help to keep the book fresh and clean<noinclude></noinclude> dar24so2pcynych67ihyj456s3bb2ek पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२६४ 250 195099 665709 2026-07-06T17:10:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665709 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२६५ 250 195100 665710 2026-07-06T17:10:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665710 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>Lata Entered 4 JUL 2005 V2. +6 A<noinclude></noinclude> jzm75clg7d3elm31467qm4n5aqxfskp पृष्ठ:1913 Ummed Singh Charitra Hindi PDF.pdf/२६६ 250 195101 665712 2026-07-06T17:10:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665712 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/४९ 250 195102 665714 2026-07-06T17:13:15Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "[ ३६ ] खरीदी जाती है। इसी लिये स्वभाव एवं स्वाभाविक कार्य भी है। पुरुषार्थं द्वारा पूर्वजन्माजित संस्कार धोए जा सकते हैं और उनके स्थान में उत्तमो- 'तम नवीन संस्कार जमा..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665714 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>[ ३६ ] खरीदी जाती है। इसी लिये स्वभाव एवं स्वाभाविक कार्य भी है। पुरुषार्थं द्वारा पूर्वजन्माजित संस्कार धोए जा सकते हैं और उनके स्थान में उत्तमो- 'तम नवीन संस्कार जमाए जा सकते हैं। इस बात को योगवाशिष्ठ के दूसरे प्रकरण में बहुत उत्तमता के साथ बतलाया है- दो हुडाविव युध्ये पुरुषार्थों समासमौ । प्राकृतचैहिकचैव शाम्यत्यत्राऽल्पवीर्यवान् ॥ दोषः शम्यत्यसंदेहं प्राकृनोद्यतनैर्गुणैः । दृष्टांतोऽत्र स्तनस्य दोषस्याद्यगुणैः क्षयः ॥ ऊपर के श्लोको ने कहा है कि पूर्व जन्म और इस जन्म के पुरुषार्थ दो ढोकी भोति लगते हैं। जो अधिक बलवान् होता है वह दूसरे को शांत कर देता है। जिन प्रकार कल की बदपरहेजी से उत्पन्न हुए अजीर्णादि दोष आज की सेवन की हुई औषधियो और नियमित भोजन से पच जाते है उसी प्रकार पिछले संस्कार अगले पुरुषार्थ मे शांत हो जाते है। यदि मनुष्य की स्वतंत्रता न मानी जाय तो सारे शास्त्र निष्फल हो जायेंगे। यदि मनुष्य परतंत्र है तो वह अपने कर्मों के लिये उत्तरदायी नहीं। सारे शास्त्र और धर्म के प्रवर्तक लोग मनुष्य की स्वतंत्रता रूपी भिति पर ही उपदेशों के भव्य भवन निर्माण करते हैं। जो स्वतंत्र नहीं उसको काव्योकार्य का उपदेश वृथा है। उसके लिये तो सब ही कर्म कर्तव्य की श्रेणी में आ जायेंगे और अच्छे बुरे का मंत्र न रहेगा। इस युक्ति को योगवाशिष्ठ मे इस प्रकार दिया है- - किवा शास्त्रोपदेशेन मूकोऽयं पुरुषः किल । मंचाने तु देवेन किं कस्योपदिश्यते ॥ जब मनुष्य मूक और अकर्ता है तब शास्त्र के उपदेश हा मे क्या जब देव हा सकता है। उपदेश करनेवाले ही कां ही क्या लाभ जब कर्ता अन्यथा करने के सब को चलाता है तब कौन किसको उपदेश दे उपदेश देने का क्या अधिकार ? और उपदेश से लिये असमर्थ है। अमेरिका के प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता विलियम जेम्स ने डिलेमा आफ डिटर मिनिज्म (Dilema of Determinism ) नामक एक लेख में इसी प्रकार की एक युक्ति बड़े विस्तार मे दी है। मनुष्य की स्वतंत्रता को मानना कर्त्तव्य-शास्त्र के लिये परमावश्यक है। केवल तना ही नहीं, स्वतंत्रता के माने बिना मनुष्य के उद्धार की कोई संभावना नहा । गीता में श्रीकृष्ण भगवान् ने कहा है- 'उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्" ॥<noinclude></noinclude> izzpihatm200wwctk8ab0mr66umam7c पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/३१ 250 195103 665715 2026-07-06T17:13:33Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "[१८] कि ईश्वर की सता को माने बिना, यह नहीं समझ में आता कि पाशवी प्रवृत्ति प्रधान मनुष्यों ने अपने क्षुद्र मन से ऐसे उच्च दैवी आदर्श कहाँ से निकाल लिए? जर्मन तत्त्ववेत्त..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665715 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>[१८] कि ईश्वर की सता को माने बिना, यह नहीं समझ में आता कि पाशवी प्रवृत्ति प्रधान मनुष्यों ने अपने क्षुद्र मन से ऐसे उच्च दैवी आदर्श कहाँ से निकाल लिए? जर्मन तत्त्ववेत्ता कांद (Kant) ने तो शुद्धबुद्धि (Pure reason) से ईश्वर की सप्ता को प्रसिद्ध माना है, किंतु कर्त्तव्य-शास्त्र की आवश्यकताओं को देख कर क्रियात्मक बुद्धि (Practical reason) से ईश्वर की सत्ता मानी है। शुद्ध बुद्धि द्वारा ईश्वर की सत्ता को प्रसिद्ध मानने में हम सहमत नहीं, तथापि हम इस बात का अवश्य मानते हैं कि कांट ने क्रियात्मक बुद्धि द्वारा ईश्वर की सत्ता को सिद्ध कर धर्म और कर्त्तव्य-शास्त्र का घनिष्ट संबंध दिखा दिया है। जिस प्रकार ईश्वर की सत्ता मानना कर्तव्य- शास्त्र को एक प्रकार की पूर्णता दे देता है, उसी प्रकार जीव की सत्ता और अमरत्व माने बिना कर्त्तव्य-शास्त्र निराधार ला प्रतीत होता है। जब जीव ही नहीं, तब कर्त्ता कौन ? श्रीर कर्त्ता नहीं, तो उत्तरदायित्त्व ही नहीं ? जड़ पदार्थों को कोई दोषी नहीं ठहराता । कर्त्ता होकर यदि वह नाश हो जाय तब तो ' यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् का ही मत सिद्ध होता है, कर्त्तव्याकर्त्तव्य कुछ नहीं रहता, सरकारी कानून ही कर्त्तव्या- कर्त्तव्य का निर्णायक बन जाता है। कर्त्तव्याकर्तव्य की कठि नाई को देख कर क्रियात्मक बुद्धि द्वारा ईश्वर की सत्ता की भाँति जीव की सत्ता और श्रमरत्व को कांट ने माना है । हमारा यह करना नहीं कि ईश्वर और जीव के माने बिना कोई कर्त्तव्य- परायण हो ही नहीं सकता, किंतु हम यह बात अवश्य मानते हैं कि कर्त्तव्य में जो दृढ़ता ईश्वर और जीव के मानने से प्राप्त होती है, वह बिना माने नहीं सकती। यही धर्म और कर्त्तव्य-शास्त्र का संबंध है।<noinclude></noinclude> 9m2n72kydix9ucc5x9qtoizlgnijyhc पृष्ठ:कर्त्तव्य शास्त्र.pdf/१११ 250 195104 665716 2026-07-06T17:13:50Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "[ &= ] नहीं हो सकता। जहां यह विश्वास हो जाय कि शरीर और मन आत्म-ज्ञान के बाधक हैं, वहां पर यह स्वाभाविक ही है कि इनके नाश करने का यत्न किया जाय। बहुत से लोग तो आत्म-ज्ञान का लक..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665716 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>[ &= ] नहीं हो सकता। जहां यह विश्वास हो जाय कि शरीर और मन आत्म-ज्ञान के बाधक हैं, वहां पर यह स्वाभाविक ही है कि इनके नाश करने का यत्न किया जाय। बहुत से लोग तो आत्म-ज्ञान का लक्ष्य छोड़कर शरीर को दुःख देना ही परम कर्त्तव्य मान बैठते हैं। ये लोग कर्मत्यागी नहीं कहे जा सकते, क्योंकि ये साधन को ही साध्य मान लेते हैं, अर्थात् इंद्रियनिग्रह के मूल लक्ष्य को भूलकर शरीर नाश ही लक्ष्य बना लेते हैं। वानमान्ध्य परम कव्य नही हो सकता संन्यासी लोग शान को परमगति मानकर कर्मत्याग करते हैं। यद्यपि यह बात विचारणीय है कि ज्ञान और कर्म का कहां तक विरोध है, तथापि संन्यासियों ने कर्म के त्याग का कारण तृष्णा में रक्खा है। तृष्णा- जय में ही दुःख की आत्यंतिक निवृत्ति है ! ऐसा मत महाभारत में भी माना है, " योऽसौ 'प्राणांतिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् " श्रर्थात् जो प्राणांतिक रोग तृष्णा है, उसे छोड़ने में ही सुख है। यह बात ठीक है कि वासना दुःख का मूल है, किंतु इसके साथ यह अवश्य मानना पड़ेगा कि तृष्णा ही सब कर्मों की चालन-शक्ति है, और जबतक सब कर्म दुखमय न मान लिए जायँ तब तक तुष्णा का समूल नाश करना श्रेय नहीं समझा जा सकता। बौद्धधर्म में भी वासना क्षय को ही परम पुरुषार्थ माना है। इसके साथ यह बात समझ में नहीं आती कि वासना क्षय को परम कर्त्तव्य मानते हुए बौद्धधर्मा- वलंबियों का व्यवहार में परार्थवाद कहांतक संगत समझा जायगा ! कहीं पर इसी कठिनाई को देख कर ही बौद्ध ग्रंथों मैं यह लिखा गया है, कि अपने निर्वाण को सब परोपकारों<noinclude></noinclude> pstv5zmrfv1osgaukg3r2g73dxwl98v पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/७२ 250 195105 665718 2026-07-06T17:15:35Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "1600- श्रीभक्तमाल सटीक । निवेदन कर चुकाहूं, पतएव पुष्टता से कहने में प्रागई; सज्जन विचारमान इस्को क्षमा करेंगे | यदि इसको नित्यशः कोई पढ़े सुनेगा तो अवश्यमेव उस्का अंतः..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665718 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>1600- श्रीभक्तमाल सटीक । निवेदन कर चुकाहूं, पतएव पुष्टता से कहने में प्रागई; सज्जन विचारमान इस्को क्षमा करेंगे | यदि इसको नित्यशः कोई पढ़े सुनेगा तो अवश्यमेव उस्का अंतः करण श्री हरि भक्ति महारानीजी की कृपा से निःस- देह सरस हो प्रावेगा ॥ ऐसी टीका की है ( गाई है) और इसका नाम " भक्तिरसबोधिनी" है ॥ श्रीभक्ति स्वरूप | कवित्त | 'श्रद्धा' ई (ही) फुलेल औ उबटनौ 'श्रवण कथा मैल अभिमान, अंगअंग नि छुड़ाइये । 'मनन' सुनीर, पन्हवाइ अंगुछाइ 'दया', 'नवनि' वसन, 'पन' सोधो, लैलगाइये ॥ अभरन 'नाम हरि 'साधुसेवा' कर्णफूल, 'मानसी' सुनध, 'संग अंजन, बनाइये । " भक्ति महारानी" कौ सिँगार चारू, बीरी 'चाह, रहे जो निहारि लहे लाल प्यारी, गाइये ॥ ३ ॥ वार्त्तिक । निम्न लिखित सुसिँगार श्री भक्ति महारानीजी के जानिये । जो इन्हें निरखता रहता है उसको श्री प्रिया प्रियतम (श्रीराम प्रिया सीताजी तथा श्रीमज्जन- कनन्दिनी प्राणवल्लभ रामचन्द्रजी) कृपा करके आ मिलते हैं। ऐसा सब वेद पुराण शास्त्रादि में गाया हुआ है ॥ 000-<noinclude></noinclude> t25h8co8ni3yjloh9xqauqf6zvgu83a पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१२८ 250 195106 665720 2026-07-06T17:15:52Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "63 83600- B000- भक्ति सुधास्वाद तिलक । " “सबही अवतारों को भाव पूर्वक पूर्ण मानना श्री पग्रदेव स्वामी जी की ऐसी जो मन भावती रीति सो मेरे हृदय में मनोहर हार के सरिस बसे ॥ प्रेम एक..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665720 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>63 83600- B000- भक्ति सुधास्वाद तिलक । " “सबही अवतारों को भाव पूर्वक पूर्ण मानना श्री पग्रदेव स्वामी जी की ऐसी जो मन भावती रीति सो मेरे हृदय में मनोहर हार के सरिस बसे ॥ प्रेम एक ऐसा पनुपम और अनोखा पदार्थ है कि वह जात पांत का कदापि विचार न करके तड़ितवत जिसपर पड़ता है लोक परलोक के झगड़ों से उस्को बुड़ाही के छोड़ता है। जोकि इस ग्रन्थ में जगदोद्धा- रक निषाद शुपचादि महानुभावों के विमल पवित्र चरित, कि जिनको देख सुनकर कर्म काण्ड के बड़े २ भिमानी नाकसकोड़ते और दातों तले उङ्गली दबाते चले आए हैं, वर्णन किये हैं; इसीसे ग्रन्थ कर्ताने भूभार उतारने वाले पर भक्तों के सुख देने हारे भगवत के भी शूकरादि विलक्षण स्वरूपों की वन्दना रूपी मंगलाचरण पहिले किया है । जी में पाया था कि चौबीसो अवतारों की संक्षेप लाभ यहां लिख; परन्तु विस्तार के भय से छोड़ दिया, न बढ़ाया ॥ (दो०) दुइ बनचर, दुइ बारिचर, चार विप्र दो राउ तुलसी ! दश यश गाइके, भवसागर तरि जाउ ॥ ६३<noinclude></noinclude> 92zygg777wxp2qpupxhj5regqgp3dtb पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३४ 250 195107 665721 2026-07-06T17:16:11Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "Go- 69 भक्ति सुधास्वाद तिलक । | गिनती नाम रंग ध्यान का विशेष फल कावतार २१ चामर धवल हिय में प्रकाश हयग्रीव २२ शुक्ल दया, बुद्धि, ध्यान कल्कि २३ नर गौर भक्ति, शान्ति, सत्व गुण..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665721 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>Go- 69 भक्ति सुधास्वाद तिलक । | गिनती नाम रंग ध्यान का विशेष फल कावतार २१ चामर धवल हिय में प्रकाश हयग्रीव २२ शुक्ल दया, बुद्धि, ध्यान कल्कि २३ नर गौर भक्ति, शान्ति, सत्व गुण दत्तात्रेय तड़ित, २४ जयमाल विचित्र उत्सव - अथ वाम चरण सरोज के चिन्ह । १ सरयू स्वेत भक्ति २ गोपद स्वेत, लाल भवसिंधु लंघन वृजा गंगा इत्यादि कामधेनु, पृथु. ३ भूमि पीत, लाल क्षमा कमठावतार सुनहरा, 20 ४ कलश स्वत भक्ति, जोवन मुक्ति अमृत ५ पताका fafar ६ जम्बुफल श्याम बिमलता चारो पदार्थ गरुड़जी. व्यासजी ७ अर्ज चन्द्र धवल भक्ति, शान्ति, प्रकाश वामन भगवान v . शंख स्वेत, गुलाबी जय, बुद्धि वेद, हंस, दत्त, शंख ९ षटकोण लाल, सफेद यन्त्र, षटविकाराभाव कार्त्तिकेय १० तीनकोन लाल यन्त्र, योग हयनीक परशुराम ११ गढ़ा श्याम जय महाकाली, गदा १२ जीव दीप सा जीव १३ विन्दु पीत सर्वपुरुषार्थ सूर्य माया १४ शक्ति पीलीगुलाबी श्री सुन्दर मूलप्रकृति, शारदा, महामाया 000 •90988<noinclude></noinclude> qx4tyy43diq57ip7c4csxgswc8zwyul पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/१३५ 250 195108 665722 2026-07-06T17:16:26Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "BG00- १६ त्रिबली हरा, लाल, धवल १७ मीन १८ पूर्णचन्द्र धवल श्रीभक्तमाल सटीक । रेखाओं के उनके रंग ध्यान से लाभ विशेष नाम १५ सुधाकुंड स्वेत लाल ढ गिनती रूपासा मङ्गलार्थ, शुभ श..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665722 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>BG00- १६ त्रिबली हरा, लाल, धवल १७ मीन १८ पूर्णचन्द्र धवल श्रीभक्तमाल सटीक । रेखाओं के उनके रंग ध्यान से लाभ विशेष नाम १५ सुधाकुंड स्वेत लाल ढ गिनती रूपासा मङ्गलार्थ, शुभ शकुन 70 --9098 उस चिन्ह के अमृत रत्न ऋषभ . शोभा वामन सरलता. शान्ति, चन्द्र प्रकाश १९ वीणा पोत, रक्षा, स्वेत यशगान श्रीनारद जी २० वंशी विचित्र श्रीकृष्णजी की वंशी हरा, पीला, २१ धनुष लाल यमवशगान्तं शाङ्ग, पिनाक, &c. २२ तूणीर विचित्र सप्त भूमि ज्ञान परशु राम २३ हंस स्वेत, गुलाबी विवेक, ज्ञान हंसावतार २४ चन्द्रिका सर्वरंगमय तड़ितवत् अकथ प्रभाव तालिसो चिन्हों में से २४ चौबीस चिन्ह दोनों चरणकमलों में बिराजमान हैं ॥ पौर, जो २४ रेखाएं श्री जनक किशोरी महारानी जी के बाम पदकंज में हैं, सोई २४ चिन्ह श्री प्राणबल्लभ जी के दक्षिण चरण सरोज में हैं। तथा जो २४ रेखा श्री जनक लली महारानी जी के बाएं चरणारबिंद में हैं, सोई २४ चिन्ह श्री प्राणप्रियतम के दाहिने पदपा में हैं ॥ यह मनस्थ रखना चाहिए । 600-<noinclude></noinclude> gnwh8bdbf76ih5me6aq1qx9lf8yo8eo पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२६९ 250 195109 665723 2026-07-06T17:16:45Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "२०४ 500- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । श्रीसुनीती जी । "ध्रुव हरि भक्त भएउ सुत जासू ।” ये महारानी, महाराज उत्तानपाद की धर्म पत्नी, भक्तराज श्रीध्रुव जोकीमाता हैं, जिनने अपन..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665723 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>२०४ 500- श्रीमतिसुधाबिन्दु स्वाद । श्रीसुनीती जी । "ध्रुव हरि भक्त भएउ सुत जासू ।” ये महारानी, महाराज उत्तानपाद की धर्म पत्नी, भक्तराज श्रीध्रुव जोकीमाता हैं, जिनने अपने प्रियपुत्र ( श्रीध्रुवजी ) को पांच वर्ष की अवस्था में हरि भजन परायण कर दिया ।। " छोड़ि भवन बन गवन कीजिये । रघुपति पद रति रंग भीजिये ॥ श्रीहरि संकट काटनहारे । टूज न रक्षक और तिहारे" ॥ “हरिभरोस करि कियो न मोहू । पंच बर्ष बालक तजि छोहू ॥ चढ़ि विमान सुन्दर सुखछाई । गइ बैकुंठ निसान बजाई ॥ ध्रुवहु लख्यो निज नैन उठाई। गथन करत आगू निज माई ॥ " पुत्रवती युवती जग सोई । रघुपति भक्तजासु सुत होई ॥ श्रीमन्दालसा जी । श्री सीताराम कृपा से श्री मन्दालसा जी ने ऐसा पन किया कि “ जौन जीव मम गर्भहिँ झाबे । सो पुनि जन्म मरण नहिँ पावै । भगवद्भक्त होके पावागवन से 204 छूट जाय " आपने अपने पिता से यह बिनय किया कि "यदि मेरा विवाह कीजिये तो ऐसे पुरुष से कीजिये कि जो 'दूसरी स्त्री के पास नहीं जाने की प्रतिज्ञा करले " ॥ इसी के अनुसार झाप का बिबाह राजा रति- ध्वज (प्रतर्दन) से हुआ श्री मन्दालसा कथा श्री प्रियादासजी पागे चल के कहेंगे ॥ 188 GOO<noinclude></noinclude> qimhcfr4gxc8jafzqbkw7ewaiv4chik पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/२९४ 250 195110 665724 2026-07-06T17:17:17Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "129 श्रीभक्तमाल सटीक । २२९ -90081 विलक्षण रीति से कि जब क्रमशः घट, हूद, पोर सर में भी नहीं छटा तब उसे समुद्र में पहुँचा दिया | वहाँ पाप दशलाख योजन लंबे हो गये और उसके सातवें दिन..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665724 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>129 श्रीभक्तमाल सटीक । २२९ -90081 विलक्षण रीति से कि जब क्रमशः घट, हूद, पोर सर में भी नहीं छटा तब उसे समुद्र में पहुँचा दिया | वहाँ पाप दशलाख योजन लंबे हो गये और उसके सातवें दिन प्रलय हुआ। मीन भगवान् की पाज्ञापौर उपदेश से, एक पलौकिक नौका पर, सप्तर्षि इत्यादिपौर झोष- धियों समेत राजा चढ़े । मत्स्य भगवान् ने अपने शृङ्ग में उस नौका को वासुकीनाग से बँधवालिया और उस महा जलार्णव में राजा को उनके साथियों सहित बचा लिया । यही, राजा सत्यव्रत की संक्षिप्त कथा है ॥ "केशव ! घृत मीनशरीर; जय जगदीश हरे !" (२) एक दूसरे " श्री सत्यव्रत जी " रघुवंशी " श्री श्रीरमणि जी " थे जिनके नाम "पन्नदाता" पादि भी थे ॥ श्री मिथिलेश जी । श्री मिथिलेश " निमि " जी महाराज की चर्चा श्री ग्रन्थकार स्वामी जी लागे चलके, नवें छप्पे ( तेरहवें मूल ) में करेंगे; और श्री मिथिलेश जनक जी महाराज की कथा, पृष्ठ ८९९० में हो चुकी है ॥ राजा श्री नील जी । राजा श्री नील जी श्री नर्मदा तट माहिष्मती में रहते थे। उनके पुत्र प्रवीर ने श्री अर्जुन जी के यज्ञ के घोड़े को बांध रक्खा; पर लड़ाई में वह हार के अपने पिता नील राजा के पास भाग गया। श्री नील जी ने अपने जामाता पावक देव को स्मरण किया ISRO.<noinclude></noinclude> fitk9r32t6w55tm955spwjx8ad8iy1o पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४३९ 250 195111 665725 2026-07-06T17:17:46Z AKTBot 6197 /* आवश्यक नहीं */ 665725 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="0" user="AKTBot" /></noinclude><noinclude></noinclude> g33zsd2k4ue2vue469b95wdg182xnmf पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४४० 250 195112 665726 2026-07-06T17:18:03Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "373 A श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । ३७३ अ 980- ॥ श्रीः ॥ ॐ नमो भगवते हनुमते श्रीरामदूताय । श्रीभक्तमाल । सत्ययुग, त्रेता, द्वापर पर्य्यन्त- मूल दोहे (सत्रह में से ) .... मूल छप्प..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665726 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>373 A श्रीभक्तिसुधाबिन्दु स्वाद । ३७३ अ 980- ॥ श्रीः ॥ ॐ नमो भगवते हनुमते श्रीरामदूताय । श्रीभक्तमाल । सत्ययुग, त्रेता, द्वापर पर्य्यन्त- मूल दोहे (सत्रह में से ) .... मूल छप्पे (९६५ में सें ) मूल ( १७+१९५+१=२१३ में से ) ... टीका | कवित्त ( ६२९ में से ) ८४२ ( = २१३ + ६२९) में से भक्त (पौने तीन सौ ) न्योछावर पृष्ट फर्मा "** ... *** ... ... ... २३ २७ १०५ *** १३२ २७५ ( सवादोरुपए ) २) ३७३ ४७ ... Registered Under Act XXV of 1867: ( Office of the Registrar & Superintendent, Govt. Book Depot. U. P., Allahabad)- (1.) No. 682 Dated the 1st July 1905. (11.) No. 1468 Dated tho 6th December 1904. (कलियुग भक्तावली प्रारम्भ, पृष्ट ३७५ वें से) श्रीअयोध्याजी, गहन, सम्बत १९६९ C. P. Press, Benares. 18-4000.<noinclude></noinclude> 5dd688ikbn8pmdymueu1xc3fw8wbbn5 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/४५० 250 195113 665727 2026-07-06T17:18:20Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "381 श्रीभक्तमाल सटीक । स्वामी श्री रामानुज जी । (2) बच्चे । । सम्प्रदाइ शिरोमणि “सिन्धुजा" रच्यो भक्ति वित्तान ॥ " विष्वकसेन" मुनिवर्य्य, सुपुनि "सठकोप" प्रनीता । "वोपदेव"..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665727 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>381 श्रीभक्तमाल सटीक । स्वामी श्री रामानुज जी । (2) बच्चे । । सम्प्रदाइ शिरोमणि “सिन्धुजा" रच्यो भक्ति वित्तान ॥ " विष्वकसेन" मुनिवर्य्य, सुपुनि "सठकोप" प्रनीता । "वोपदेव" भागवत लुप्त उधो नवनीता ॥ मङ्गल मुनि "श्रीनाथ" "पुण्डरीकाक्ष" परम जस । " राम मिश्र " रस रासि; प्रगट पर- ताप " पर कुस" | " यामुन"," मुनि “रा मानुज" तिमिर हरन उदय भान । स- प्रदाइ शिरोमणि सिन्धुजा रच्यो भक्ति वित्तान ॥ २५ ॥ ( (५) बच्चे । सहस्र ग्रस्य उपदेश करि, जगत उधारन जतन कियो || गोपुर है आरूढ़, ऊंच स्वर, मन्त्र उचारयो । सूते नर परे जागि, बहतरि श्रवणनि धारयो ॥ तित- नेई गुरुदेव पधति भई न्यारी न्यारी । कुरु- ३८१<noinclude></noinclude> 1pqih5e2t6yjjlqe6lh1ocm1vu3l9m6 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५७८ 250 195114 665728 2026-07-06T17:18:40Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "509 श्रीमतमाल सटीक हुआ था वही पद पुस्तक में छापही लिख दिया ॥ ५०० -909 पुनः जय जयदेव जी स्नान करके लाए और पुस्तक में वह पद लिखा देखा, तब पद्मावती जी से पूछा कि " यह पद किसने लिख..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665728 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>509 श्रीमतमाल सटीक हुआ था वही पद पुस्तक में छापही लिख दिया ॥ ५०० -909 पुनः जय जयदेव जी स्नान करके लाए और पुस्तक में वह पद लिखा देखा, तब पद्मावती जी से पूछा कि " यह पद किसने लिख दिया?" उनने कहा अभी अभी आपही तो पाके लिख गये हैं " जयदेव जी ने कहा कि "मैं ने तो नहीं लिखा" तब यह नि कि प्रभु पापही लिख गए हैं ॥ हुवा (३) टीका | कवित । नीलाचल धाम तामैं पंडित नृपति एक, करी यही नाम घरि पोथी सुख दाइये । द्विजमि बुलाइ कही " वही है, प्रसिद्ध करो, लिखि लिखि पढ़ी देश देशनि चलाइये” ॥ घोले मुसिकाइ विप्र क्षिप्र सो दिखाइ दई "नई यह कोऊ मति पति भरमाइयै” । घरी दोऊ मंदिर are देव जू के दीनी यह डारि, वह हार लप- टाइये ॥ १४८ ॥ (६२९-४८१) वार्तिक तिलक | जय श्री " गीतगोविन्द " जी बन के पूर्ण हो गए पर प्रभु अनुग्रहीत जान सब कोई पढ़ने गाने लगे, सब इस्की देखके श्रीजगनाथ धाम का राजा जो पण्डित था, सो उसने भी यही (गोतगोविन्द) नाम रख के दूसरा एक<noinclude></noinclude> 38ix53sofijy4tlr9a8xloo4p5f1241 पृष्ठ:Bhakta Mala of Nabhadas Ayodhya Edition (1905).pdf/५८१ 250 195115 665729 2026-07-06T17:18:59Z AKTBot 6197 /* अशोधित */ "५१२ 600- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 512 (v) टीका | कवित्त । सुता एक माली की जु बैंगन-की-बारी मांझ तोरे, " बनमाली" गावे कथा सर्ग पांच की । डोलें जगनाथ पावें, काछें पङ्ग मिहीं मँ..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 665729 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>५१२ 600- श्रीभक्ति सुधाबिन्दु स्वाद । 512 (v) टीका | कवित्त । सुता एक माली की जु बैंगन-की-बारी मांझ तोरे, " बनमाली" गावे कथा सर्ग पांच की । डोलें जगनाथ पावें, काछें पङ्ग मिहीं मँगा, "पाछे" कहि घूमैं सुधि बिरहांच की ॥ फट्यो पट देखि नृप पूछी 66 . 'हो भयो कहा ?" "जानत न हम'; "पथ कही घात सांच की" । प्रभु ही जनाई "मन भाई मेरे वही गाथा" ल्याए वही बालकी की पालकी में नांच की ॥ १५० ॥ (६२९—४७९) "बिरहांच" बिरह को आंच, बिरहाग्नि ताप | "मांच की"- नृत्य किया । वार्तिक तिलक | एक दिन एक माली की कन्या बैंगन ( भांठा) की बारी में बैंगन सोढ़ती हुई श्रीगीतगोबिन्द के पंचम सर्ग की कथा का यह पद गाती थी "न कुरु नितम्बिनि गमन बिलम्बनमनुसर तं हृदयेशम् ॥ धीरसमीरे यमु- नातीरे बसति बने बनमाली” (अर्थ दूती श्रीराधिका जी से कहती है कि हे नितम्बिनि ! अब गमन में बिलम्ब मत करो; उन प्राणप्रिय के समीप चलो । वे बनमाली बनविषे यमुना कूल में धीर समीर कुंज में बसते हैं ।) इसी पद को सुनते हुए उस माली की सुता के पीछे पीछे श्रीजगन्नाथ जी निज अंग कीना मंगा (जामा) पहिने फिरते डोलते थे; औौर 58600--<noinclude></noinclude> dvyor6wi1vomgbveh2finrgrxy5uafa