विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.10 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk विकिस्रोत:समाज 4 17 665815 663841 2026-07-07T14:31:59Z सौरभ तिवारी 05 49 /* आयोजन */ 665815 wikitext text/x-wiki <center><big>आपका स्वागत है।!</big></center> समाज सदस्यों के पारस्परिक सहयोग के लिए निर्मित पृष्ठ है। यहाँ आप -- अपनी रुचि अनुसार कार्य चुन सकते हैं * अन्य सदस्यों से अपने कार्य में सहायता माँग सकते हैं * दूसरे सदस्यों की सहायता करने के लिये कार्य चुन सकते हैं। * जान सकते हैं कि विकिस्रोत पर इस समय क्या चल रहा है। :'''''नये सदस्य:''' [[ विकिस्रोत:स्वागत|स्वागत है!]] अपनी यात्रा [[विकिस्रोत:स्वशिक्षा|यहाँ से शुरू करें]] और यहाँ [[विकिस्रोत:योगदान|योगदान]] करना सीखें।'' {{*}} '''''खाता नहीं है?''' तो तुरंत [[विशेष:UserLogin|एक खाता बनाएँ।]]।'' आप '''[[सहायता:अनुक्रम|सहायता]]''' संबंधी पृष्ठों को भी देख सकते हैं। '''[[विकिस्रोत:नीतियाँ और दिशानिर्देश|नीति]]''' पृष्ठ पर आप विकिस्रोत से संबंधित नीति-नियम देख सकते हैं। आप कुछ उपयोगी औजारों को '''[[विकिस्रोत:समाज/उपयोगी औज़ार|उपयोगी औज़ार]]''' पृष्ठ पर भी देख सकते हैं। == शोधित करें == इन पुस्तकों की वर्तनी सुधारकर शोधित करने में मदद करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है। {{Special:IndexPages|key=अशोधित पुस्तकें}} == प्रमाणित करें == :इन शोधित किए जा चुके पुस्तकों को प्रमाणित करने में सहयोग करें। यह सूची स्वतः अद्यतित होती है। {{Special:IndexPages|key=शोधित पुस्तकें}} == परापूर्ण करें == :ये पुस्तकें शोधित या प्रमाणित हो चुकी हैं। इन्हें परापूर्ण करने में सहयोग करें। इस सूची में शामिल करने के लिए पुस्तक के अनुक्रम पृष्ठ पर [[:श्रेणी:अपरापूर्ण अनुक्रम]] 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मोटे होते हैं। इसका कारण खुंटी के लिये व्यवहृत होता है। यह आसाम और मधुपुर के जंगलों में अधिकता से पाया जाता है।}} ​{{outdent|गजारोह (सं० पु०) गजारोहित धारुह प्रह हस्तिपाल, पाहत, महावत।}} ​{{outdent|गजाल (हि० पु०) एक प्रकार की मछली।}} ​{{outdent|गणाधन (सं० पु०) गर्ज रज्यते भक्ष्यते श्रम कर्मणि या नातीति शन: गजोऽयनो मस्तको यस्य गजभर, पीपल का पेड़।}} ​{{outdent|गजाशना (सं० स्त्री०) गजाशम-टाप्। १ भाङ्ग, सिद्धि। २ शकीलच, सलई का पेड़। ३ पद्ममूल, कमल कन्द।}} ​{{outdent|गजासुर (सं० पु०) गजाकारोऽसुरः। गनाकृति एक असुर। इसका उपाख्यान, इस तरह है— पूर्व काल में महेश नामक एक अत्यन्त चरित्रवान, विद्यावान और न्यायवान राजा थे। एक दिन राजा महेश बन्धुबान्धव के साथ भ्रमणार्थ बाहर निकले और वहां उन्होंने नारद मुनि को देखा। ऋषि को देख कर राजा ने किसी तरह का सत्कार न किया। इस पर नारद मुनि ने क्रोधित होकर शाप दिया - "नराधम! तुम्हारा जन्म गजयोनि में होगा।" नारद की बात मिथ्या न हुई। थोड़े दिनों के पश्चात् वे गजयोनि में प्राप्त हो गजासुर नाम से विख्यात हुए। इस असुर से देवताओं को कभी कभी अधिक कष्ट भोगना पड़ा था। उसका चर्म शिवजी ने धारण किया है। (स्कन्दपुराण गणेश० १०-५०)}} ​{{outdent|गजासुरईषा (सं० पु०) गजासुरम् ईष्टि दिष्-गिनि। महादेव, शिव। कृत्तिवास देखो।}} ​{{outdent|गजास्य (सं० पु० क्ली०) गजस्य आस्यं मुखमेव अस्मस् बहु० व्री०। १ गणेश। गजस्य आस्यं तत्। २ हाथी का मुख।}} ​{{outdent|गजाह्न (सं० क्ली०) गजसहिता आह्ना यस्य, बहु० व्री०। १ हस्तिनापुर। २ हस्तिनापुर के अन्तर्गत एक प्रदेश जिसका उसे जितामें क्रम विभाग के मध्यस्थान में है। "येति मध्यम (१४२०) हस्तिनापुर""}} ​{{outdent|गजाय (सं० क्ली०) गर्जन सहित यो यस्य, बहु० व्री०। हस्तिनापुर।}} ​{{outdent|गजावा (सं० स्त्री०) गजोपपदा आह्ना यस्याः बहु० व्री०। १ गजपिप्पली, गजपीपर। २ हस्तिनापुरी।}} ​{{outdent|गया (हिं०) बिठाई करनेवालों का लकड़ी का बना हुआ एक यन्त्र। इस पर बिठा हुआ तार उतारा रहता है।}} ​{{outdent|गजी (फा० पु०) एक तरह का मोटा देशी वस्त्र। यह छोटे वर का होता और सस्ते में मिलता है। गाढ़ा, सक्षम।}} ​{{outdent|गजेक्षण (सं० पु०) १ गजचक्षु, हाथी की आँख २ दानव-विशेष, एक राक्षस का नाम।}} ​{{outdent|गजेन्द्र (सं० पु०) गजइन्द्र इव उपमितस० यद्वा गजस्य इन्द्रः, ६-तत्। १ | गजश्रेष्ठ, उत्कृष्ट हाथी। २ गजमुखाधिपति। ऐरावत। "श्रियम् विकसतो विषुर्गजेन्द्र (भाष ३ अगस्त्य, मुनि के शाप से गजयोनि प्राप्त इन्द्रद्युम्न, राजा। भागवत में इनका उपाख्यान इस प्रकार से लिखा है}}<noinclude></noinclude> suf9ecdpwu0iz3mmw6jeqwnrpuk0e5t 666122 665813 2026-07-07T16:00:19Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 666122 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गवारि- गजेन्द्र'''|'''१३३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> हाथी का मस्तक काट ले जा करके शिव मस्तक बालक शरीर में लगा दिया। इस आशा कि शायद कोई आशंका से हाथ का मुंह देख उनकी पूजा न करें, सकल देवताओं ने मिल करके विधान किया था कि गजानन की पूजा न करने में उनकी पूजा भी बिगड़ जाएगी। इससे सब देव देवियों की पूजा से पहले गणेश पूजा करने का नियम हो गया है। ​ स्कन्दपुराण के गणेश खण्ड में इसका उपाख्यान अन्य प्रकार लिखित है- सिन्दूर नामक किसी को देखने पावे तो गर्भ में प्रथम मास को प्रवेश करके गणेश का मस्तक काट डाला था। परन्तु इससे बालक के जीवन का कोई अनिष्ट न हुआ। प्रसव के पीछे नारद ने आकर के बालक ही उसका कारण पूछा था। उसने नारद को सब कथा खोल करके सुना दी। नारद ने उसको समस्तक होने का अनुरोध किया था। बालक ने अपने तेज से ही गजासुर का मस्तक काट अपने स्कन्ध में जोड़ लिया। इसी से उनका नाम गजानन पड़ा है। भाद्रमास की चतुर्थी तिथि को गजानन का जन्मोत्सव होता है। <Small>(स्कन्दपुराण गणेश ११-०) आगे देखो।</small> ​{{outdent|गजारि (सं० पु०) गजस्य अरिः शत्रु, ६-तत्। १ सिंह। २ विशेष एक तरह का मालका पेड़। इसके पत्ते बहुत मोटे होते हैं। इसका कारण खुंटी के लिये व्यवहृत होता है। यह आसाम और मधुपुर के जंगलों में अधिकता से पाया जाता है।}} {{outdent|गजारोह (सं० पु०) गजारोहित धारुह प्रह हस्तिपाल, पाहत, महावत।}} ​{{outdent|गजाल (हि० पु०) एक प्रकार की मछली।}} ​{{outdent|गणाधन (सं० पु०) गर्ज रज्यते भक्ष्यते श्रम कर्मणि या नातीति शन: गजोऽयनो मस्तको यस्य गजभर, पीपल का पेड़।}} ​{{outdent|गजाशना (सं० स्त्री०) गजाशम-टाप्। १ भाङ्ग, सिद्धि। २ शकीलच, सलई का पेड़। ३ पद्ममूल, कमल कन्द।}} ​{{outdent|गजासुर (सं० पु०) गजाकारोऽसुरः। गनाकृति एक असुर। इसका 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level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|१३४| गजेन्द्र – गज्भा}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ​है — पूर्वकालको द्रविड़ देशमें पाण्डुवंशीय इन्द्रद्युम्न नामक कोई प्रबल पराक्रान्त विष्णुभक्त राजा रहे। किसी दिन नरपति एकाग्रचित्त हरिकी आराधना करते थे, उसी समय अगस्त्य मुनि वहां जा पहुंचे। राजाने उनको लक्ष्य न किया, अपनी मानसिक आराधना ही लगे रहे। इस पर मुनिको राग लगा। उन्होंने राजाको पुकार करके कहा था — नराधम तूने ब्राह्मणका अपमान किया है, इसके फलसे कुरोनि प्राप्त होगी। मुनिका वाक्य मिथ्या न निकला, कुछ दिन पीछे ही राजाको हाथीका शरीर धारण करना पड़ा। मृत्यु कालको भी उनकी हरिभक्तिका ह्रास न होनेसे पूर्व जन्मकी सब कथा उन्हें स्मरण रही। नरपति इन्द्र हाथी होकरके वन वन घूमने लगे, दैवात् किसी दिन वह चित्रकूट पर्वत जा पहुंचे थे। इस पर्वतपर वरुणोद्यान नामक एक मनोहर उपवन है। राजाके उसी उपवनमें जा करके स्नान करनेको सरोवर अवगाहन करने पर एक कुम्भीरने उनको आक्रमण किया था। उनके सब सहचर मातङ्ग उनको साहाय्य पहुंचाने लगे और वह भी कुम्भीरसे खूब लड़े, किन्तु किसी क्रमसे उस महान क्रूरको पराजित कर न सके। इन्द्रद्युम्न अन्य उपाय न देख करके विष्णुका स्तव किया था। उनके स्तवसे सन्तुष्ट हो विष्णुने जा करके उनकी रक्षा की। राजा उसी दिन शापसे भी मुक्त हो गये। विष्णुने राजाके प्रति सन्तुष्ट होकरके और एक वर दिया था — तुमने जिस स्तवसे हमें सन्तुष्ट किया है, उसको पढ़नेवाला कोई भी व्यक्ति ऐहिक कीर्ति पायेगा, उसका दुःखप्रदोष दूर हो जावेगा, दुःख उसके पास न पहुंच पावेगा और चरमको वह स्वर्गमें जा करके आनन्द उड़ावेगा। प्रातःकाल उठ करके जो इस... ​ {{outdent|गजेन्द्र (सं० पु०) गजेन्द्र इव कर्णा यस्य। शिव, महादेव।}} {{outdent|गजेन्द्रगढ़ — धारवाड़ जिलामें रोण तालुकका एक शहर। यह अक्षा० १५° ४४' उ० और देशा० ७५° <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ५८' पू० पर कलादगीसे ५१ मील दक्षिण-पूर्वमें अवस्थित है। जनसंख्या प्रायः ८८५३ है। महाबीर शिवाजीने इस स्थान पर गजेन्द्रगढ़ नामका एक दुर्ग निर्माण किया था, इसी कारण इस नगरका नाम गजेन्द्रगढ़ पड़ा। यहां विरूपाक्षदेवका प्राचीन मन्दिर है और नगरके बाहर दुर्गा, रामलिङ्ग, रामसीता और वीरभद्र प्रभृति देवताओंके मन्दिर अवस्थित हैं। गढ़के निकट पहाड़की ओर एक शिवतीर्थ विद्यमान है जहां धर्मार्थी यात्री आकर ठहरते हैं। पहाड़के ऊपर बहुतसे तीर्थ और शिवालय हैं जिनमें से वीरभद्रका मन्दिर और पातालगङ्गा तीर्थ प्रधान हैं। पातालगङ्गाके पार्श्व हीमें नन्दी मूर्ति है, बहुत बंध्या स्त्रियां सन्तानके लिये नन्दीकी पूजा करने आती हैं।}} {{outdent|गजेन्द्रगुरु (सं० पु०) सङ्गीतमें रुद्रतालका एक भेद।}} {{outdent|गजेन्द्रनाथ (सं० पु०) हाथियोंमें श्रेष्ठ।}} {{outdent|गजेन्द्रमोक्षण (सं० क्ली०) १ वामनपुराणके किसी भागकी आख्या। २ महाभारतके किसी भागका नाम।}} {{outdent|गजेन्द्रविक्रम (सं० पु०) गजेन्द्र इव विक्रमो यस्य, बहु०। हस्ति सह पराक्रमी, वह जो हाथी सरीखे बलवान हो।}} {{outdent|गजेर — भरोच जिलाका एक शहर। यह जंबुसरसे लगभग ५ मील उत्तर पूर्वमें अवस्थित है। इसमें १२४४ घर और प्रायः ४०३० मनुष्य वास करते हैं।}} {{outdent|गजेष्टा (सं० स्त्री०) गजानामिष्टा, ६ तत्। भूमिकुष्माण्ड, बिलाइकन्द।}} {{outdent|गज्जल (हिं० पु०) पौर।}} {{outdent|गजोदर (सं० पु०) गजस्य उदरमिवमुदरं यस्य, बहुव्री०। देवविशेष, एक असुरका नाम।}} {{outdent|गजोपकुल्या (सं० स्त्री०) गजप्रिया उपकुल्या पिप्पली, मयूरमध्यपदलो। गजपिप्पली, गजपीपर, बड़ी पीपर।}} {{outdent|गजोष्णा (सं० स्त्री०) गजानां प्रिया जवणा गजपिप्पली, स्त्री। (गजपीपर)।}} {{outdent|गञ्ज (हिं० पु०) १ बुलबुलोंका समूह जो पानी, दूध वा किसी तरल पदार्थमें उत्पन्न हो। गान। २ खजाना, कोश। ३ सम्पत्ति, दौलत, धन।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 7ucqd2d8qjpmsgybl04h0kzpr40ts4u पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१३७ 250 46004 666354 561758 2026-07-07T17:50:48Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 666354 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|१३५|गल्ल-गल्लाम}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|गञ्ज (सं० पु०) गञ्ज - घञ् । १ अवज्ञा, अपमान, अनादर ।}} २ भाण्डागार, कोश, खजाना ३ थान ४ मोह ५ गोशाला, वह स्थान जहां मवेशी रहते हैं।}} ​{{Outdent|गञ्जगदन्त}} बङ्गाल में बारबकाबाद सरकार के अधीन एक महल। <small>(आईन-ए-अकबरी)</small>}} ​{{Outdent|गञ्जभैरव}} बम्बई प्रदेश, अहमदनगर जिला के अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम। यह 'गञ्जीभैरो' नाम से मशहूर है। यहां हेमाडपन्थियों का एक वृहत् शिवमन्दिर और इस के निकट बहुत प्राचीन भग्नावशेष पड़े हैं।}} ​{{Outdent|गञ्ज (सं० वि०) गञ्ज-णिच्-ल्यूट् १ तिरस्कार, निन्दा।}} <Small>"नवे खनगंज मे सर सज प्रत्यर्थि पाथिश्यम्।" (साहित्यद०)</Small> (क्ली०) २ गञ्ज भावे ल्यूट्। तिरस्कार, अनादर, निन्दा। ​{{Outdent|गञ्जवर (सं० पु०)}} कोषाध्यक्ष, खजानची।}} ​{{Outdent|गञ्जाम}} ​{{Outdent|गञ्जा (सं० स्त्री०) गञ्ज-टाप्।}} हाट लगने का स्थान, वह स्थान जहां बाजार लगता हो। २ मद्यभाण्ड, शराब रखने का बर्तन। ३ मदिरागृह, शराब की दुकान। ४ विजया, गाँजा। ५ वह स्थान जहां चावल, धान रखा जाता हो, ठेक। {{Outdent|गञ्जाम}} मन्द्राज प्रदेश का उत्तर जिला। यह बङ्गाल की खाड़ी के किनारे अक्षांश १८° १२' तथा २०° २६' उ० और देशान्तर ८३° २०' एवं ८५° १२' पू० के बीच पड़ता है। इसका क्षेत्रफल ८३०२ वर्ग मील है। 'गञ्जाम' शब्द का अर्थ 'सबका भण्डार' है। देखने में यह तिकोना लगता है। इसके उत्तर उड़ीसा और देशी राज्य, पूर्व में समुद्र और पश्चिम को विशाखापत्तनम जिला है। गञ्जाम का अधिकांश पहाड़ी और पथरीला है परन्तु बीच-बीच में उपत्यका और उपजाऊ मैदान पाए जाते हैं। यह मन्द्राज का सबसे सुहावना जिला है। जङ्गली पहाड़ों और घने पेड़ों की शोभा देखते ही बनती है।}} ​पूर्व घाट पहाड़ गञ्जाम में उत्तर से दक्षिण तक चला गया है। शृङ्गराज और महेन्द्रगिरि की चोटियां समुद्र पृष्ठ से प्रायः ५००० फुट ऊंची हैं। पारलाखेमुंडी के पीछे दक्षिण को देवगिरि ४५३५ फुट तक उठा है। यह पहाड़ गञ्जाम जिले को पहाड़ी और मैदानी दो भागों में बांट देते हैं। पहाड़ी भाग को गञ्जाम की एजेन्सी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भी कहते हैं। यहां के अधिवासी जङ्गली लोग कानून के मुताबिक न चलने से उनका शासन एक विशेष कलेक्टर द्वारा किया जाता है, जो गवर्नर का एजेण्ट कहलाता है। उनके मुकदमों की अपील हाईकोर्ट और सकल गवर्नर को की जाती है। ​ गञ्जाम में नदी कमी नहीं है। परन्तु समुद्र किनारे और कभी-कभी भीतरी भाग में भी जो वर्ष भर तालाब मीठे और खारे पानी से भर जाते हैं, सागरम् कहलाते हैं। इनमें सबसे बड़ी चिलका झील उत्तर सीमा पर अवस्थित है। ​इस जिले की ऋषिकुल्या, वंशधारा और लाङ्गुल्या तीनों प्रधान नदियों से सिंचाई का काम लिया जाता है। यह पूर्व की खाड़ी में जाकर गिरती हैं। महानदी और गोदावरी ऋषिकुल्या की सहायक नदियां हैं। लाङ्गुल्या पर चिकाकोल के पास एक बढ़िया पुल बंधा है। ​ गञ्जाम मन्द्राज प्रदेश का एक आर्द्र प्रदेश है। यहां भालू और लकड़बग्घे साधारणतः देखने को मिलते हैं और भेड़िये, तेंदुए और चीते भी मिलते हैं। पहाड़ों के उतार में कई प्रकार के हरिण और नीलगायें पायी जाती हैं। जङ्गली भैंसे और जङ्गली सूअर बहुत कम हैं। जङ्गली कुत्ते शिकार में आफत डाल देते हैं। गञ्जाम का जलवायु ज्वरप्रद है। यहां जाड़ा बहुत कम पड़ता है और पानी खूब बरसता है। ​ ऐतिहासिक दृष्टि से गञ्जाम प्राचीन कलिङ्ग का एक भाग रहा। परन्तु कभी-कभी वेंगी राज्य इसका दक्षिण प्रान्त दबा लेता था। ई० पूर्व २५० वर्ष पूर्व मौर्य सम्राट अशोक ने इसे विजय किया था। फिर सम्भवतः यह वेंगीवाले आन्ध्र नृपतियों के हाथ लगा। यह दोनों राजवंश बौद्ध रहे। जौगढ़ में अशोक अपना एक राजशासन-पत्र छोड़ गए हैं। ई० तीसरी शताब्दी में आन्ध्र इस प्रान्त से दूरीभूत हुए और कलिङ्ग के गाङ्गराजा उनके स्थान पर आ बैठे। ई० १०वीं शताब्दी के अन्त और ११वीं शताब्दी के आरम्भ में चोलों ने वेंगी और कलिङ्ग के साथ गञ्जाम का भी कुछ भाग जीता था। महाराज राजेन्द्र चोल महेन्द्रगिरि पर अपने विजय के लेख-प्रमाण छोड़ गए हैं। फिर गाङ्ग राजाओं ने ४ शताब्दियों तक वहां शासन किया। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1zk8ehub2m5r9gjtsnum54gjm5yfu2b 666355 666354 2026-07-07T17:57:34Z Avantika Shaw 4732 666355 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गल्ल्-गल्लाम'''|'''१३५}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|गञ्ज (सं० पु०) गञ्ज - घञ् । १ अवज्ञा, अपमान, अनादर ।}} २ भाण्डागार, कोश, खजाना ३ थान ४ मोह ५ गोशाला, वह स्थान जहां मवेशी रहते हैं। ​{{Outdent|गञ्जगदन्त- बङ्गाल में बारबकाबाद सरकार के अधीन एक महल। <small>(आईन-ए-अकबरी)</small>}} ​{{Outdent|गञ्जभैरव}} बम्बई प्रदेश, अहमदनगर जिला के अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम। यह 'गञ्जीभैरो' नाम से मशहूर है। यहां हेमाडपन्थियों का एक वृहत् शिवमन्दिर और इस के निकट बहुत प्राचीन भग्नावशेष पड़े हैं।}} ​{{Outdent|गञ्ज (सं० वि०) गञ्ज-णिच्-ल्यूट् १ तिरस्कार, निन्दा।}} <Small>"नवे खनगंज मे 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महेन्द्रगिरि की चोटियां समुद्र पृष्ठ से प्रायः ५००० फुट ऊंची हैं। पारलाखेमुंडी के पीछे दक्षिण को देवगिरि ४५३५ फुट तक उठा है। यह पहाड़ गञ्जाम जिले को पहाड़ी और मैदानी दो भागों में बांट देते हैं। पहाड़ी भाग को गञ्जाम की एजेन्सी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भी कहते हैं। यहां के अधिवासी जङ्गली लोग कानून के मुताबिक न चलने से उनका शासन एक विशेष कलेक्टर द्वारा किया जाता है, जो गवर्नर का एजेण्ट कहलाता है। उनके मुकदमों की अपील हाईकोर्ट और सकल गवर्नर को की जाती है। ​ गञ्जाम में नदी कमी नहीं है। परन्तु समुद्र किनारे और कभी-कभी भीतरी भाग में भी जो वर्ष भर तालाब मीठे और खारे पानी से भर जाते हैं, सागरम् कहलाते हैं। इनमें सबसे बड़ी चिलका झील उत्तर सीमा पर अवस्थित है। ​इस जिले की ऋषिकुल्या, वंशधारा और लाङ्गुल्या तीनों प्रधान नदियों से सिंचाई का काम लिया जाता है। यह पूर्व की खाड़ी में जाकर गिरती हैं। महानदी और गोदावरी ऋषिकुल्या की सहायक नदियां हैं। लाङ्गुल्या पर चिकाकोल के पास एक बढ़िया पुल बंधा है। ​ गञ्जाम मन्द्राज प्रदेश का एक आर्द्र प्रदेश है। यहां भालू और लकड़बग्घे साधारणतः देखने को मिलते हैं और भेड़िये, तेंदुए और चीते भी मिलते हैं। पहाड़ों के उतार में कई प्रकार के हरिण और नीलगायें पायी जाती हैं। जङ्गली भैंसे और जङ्गली सूअर बहुत कम हैं। जङ्गली कुत्ते शिकार में आफत डाल देते हैं। गञ्जाम का जलवायु ज्वरप्रद है। यहां जाड़ा बहुत कम पड़ता है और पानी खूब बरसता है। ​ ऐतिहासिक दृष्टि से गञ्जाम प्राचीन कलिङ्ग का एक भाग रहा। परन्तु कभी-कभी वेंगी राज्य इसका दक्षिण प्रान्त दबा लेता था। ई० पूर्व २५० वर्ष पूर्व मौर्य सम्राट अशोक ने इसे विजय किया था। फिर सम्भवतः यह वेंगीवाले आन्ध्र नृपतियों के हाथ लगा। यह दोनों राजवंश बौद्ध रहे। जौगढ़ में अशोक अपना एक राजशासन-पत्र छोड़ गए हैं। ई० तीसरी शताब्दी में आन्ध्र इस प्रान्त से दूरीभूत हुए और कलिङ्ग के गाङ्गराजा उनके स्थान पर आ बैठे। ई० १०वीं शताब्दी के अन्त और ११वीं शताब्दी के आरम्भ में चोलों ने वेंगी और कलिङ्ग के साथ गञ्जाम का भी कुछ भाग जीता था। महाराज राजेन्द्र चोल महेन्द्रगिरि पर अपने विजय के लेख-प्रमाण छोड़ गए हैं। फिर गाङ्ग राजाओं ने ४ शताब्दियों तक वहां शासन किया। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1sdd3g12w7885rc8hs8sj0za46wqe7p पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३१ 250 75664 666356 609099 2026-07-07T17:57:48Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666356 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" /></noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इदङ्घार्या (सं॰ स्त्री॰) दुरालभा लता, जवासा।}} {{outdent|इदद्दसु (वै॰ त्रि॰) इसमें और उसमें समृद्ध, इसका और उसका अमीर।}} {{outdent|इदन्तन (सं० त्रि॰) अस्मिन् काले भवः, निपातनात् व्युल् तुट् च। इदानीन्तन, आधुनिक, नया ।}} {{outdent|इदन्ता (सं॰ स्त्री॰) अस्य भावः, इदम्-तल्। अङ्ग-त्यादि द्वारा बतानेका विषय, शिनाख् त, पहुंचाना।}} {{outdent|इदम्प्रकार (सं॰ अव्य॰) इस रीतिसे, ऐसे तौरपर।}} {{outdent|इदम्प्रथम (सं॰ त्रि॰) प्रथमतः कार्यकारी, पहले-पहल काम करनेवाला।}} {{outdent|इदम्मय (सं॰ पु॰) इदम् मयट्। इसके द्वारा प्रस्तुत, नो इससे बना हो।}} {{outdent|इदा (वै॰ अव्य॰) इदम्-दाच् वेदे निपातनात्। इस समय, अव्य॰।}} {{outdent|इदानीं (सं॰ अव्य॰) इदम् दानीम्। दानी'च। पा ५।३।१८ । अधुना, सम्पुति, अब, इस समय।}} {{outdent|इदानीन्तन (सं॰ त्रि॰) वर्तमान, मौजूद, नापायदार।}} {{outdent|इदावत्सर (सं॰ पु॰) इदा इति वत्सरः, शाक-तत्। पांच संवत्सरादिके मध्य एक। स'वत्सर, परिवत्सर, इदावत्सर, अनुवत्सर और उदावत्सर पांच वर्ष होते हैं। संवत्सरमें तिल, परिवत्सरमें यव, इदावत्सरमें अन्न एवं वस्त्र, अनुवत्सरमें धान्य और उदावत्सरमें रौप्य दान करनेसे अधिकतर फल मिलता है। नभोमण्डल सूर्य और चन्द्रमण्डलके साथ जो समग्रकाल विताता, उसमें शुक्ल प्रतिपत्को सूर्यसंक्रान्ति पड़ने और सौर तथा चान्द्रमासका एक-कालीन उपक्रम लगनेसे संवत्सर आता है। फिर सौर मास पड़नेसे वत्सरमें छः दिन बढ़ते और चान्द्र मास आनेसे छः दिन घटते हैं। इसी प्रकार बारह दिनके व्यवधानसे दोनोका अग्र पश्चात् भाव कम हो जाता है। ऐसे ही पांच वत्सर बीतनेपर दो मलमास पड़ते हैं। फिर षष्ठ वत्सर संवत्सर होता है। समकालमें लगने और सौर तथा चान्द्रमासयुक्त रहने-वाले वत्सरकी संवत्सर कहते हैं। सौर तथा चान्द्र-मास आरम्भ होते जिस वत्सर विषम मास आता, वह परिवत्सर कहाता है।}} {{Multicol-break}} {{outdent|इदावत्सरीय (सं॰ त्रि॰) इदा वत्सर-सम्बन्धोय, इदावत्सरवाला।}} {{outdent|इदुवत्सर, इदावत्सर देखो।}} {{outdent|इद्दत (अ॰ स्त्री॰) शास्त्रविहित परोक्षाका समय, कानुनो जांचका वक्त। पतिको मृत्यु होनेपर स्त्रीको दूसरा विवाह करनेके लिये चालीस दिन राह देखना पड़ती है। इसोको इद्दत कहते हैं। इद्दतसे स्त्रोके गर्भ रहने या न रहनेका पता लगता है।}} {{outdent|इद्दतमें बैठना (हिं॰ क्रि॰) एकान्तमें रहना, किसी पुरुषसे न मिलना।}} {{outdent|इड (सं॰ क्ली॰) इन्ध भावे क्त। १ रौद्र, धूप। २ दीप्ति, चमक। ३ आश्चर्य, ताज्जुब। (त्रि॰) ४ निर्मल, साफ‌ ५ दग्ध, जला हुआ। ६ प्रदीप्त, रौशन। ७ आश्चर्यमय, अनोखा। ८ अप्रतिहत, आज़ाद, जो रुका न हो।}} {{c|{{smaller|"तमिङमाराधयितु' सकर्णकैः।”"(माघ)}}}} {{outdent|इद्धमन्यु (सं॰ त्रि॰) क्रुड, गुस्से में आया हुआ, जिसके गुस्सा सुलग उठे।}} {{outdent|इद्दा (सं॰ अव्य॰) प्रकाश्य, खुले तौरपर ।}} {{outdent|इद्धाग्नि (वै॰ वि॰) प्रदीप्त अग्नियुक्त, जिसके आग जले।}} {{outdent|इद्वत्सर, इदावत्सर देखो।}} {{outdent|इइत्सरीय, दावत्सरौव देखो।}} {{outdent|दूध (सं॰ ति॰) प्रदीप्त, चमकता हुआ। यह शब्द समासके अन्तमें आता है, जैसे—अग्नोध।}} {{outdent|इधर (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ अत्र, यहाँ, इस तर्फ, इस राह, इस जगह। २ इहलोकमें, इस दुनियापर। इधर-उधर (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ इतस्ततः, जहां-तहां। २ चारो ओर, सब तर्फ, नीचे ऊपर। ३ दाहने-बाये', आगे-पोछे ।}} {{outdent|दृधरसे उधर करना (हिं॰ क्रि॰) स्थानमें परिवर्तन डालना, सरकाना, बेजगह रख देना।}} {{outdent|इधरसे उधर होना (हिं॰ क्रि॰) १ खो जाना, चल पड़ना, लम्बो लेना। २ स्थानच्युत किया जाना, बेतर-तोबीमें पड़ना। ३ लुढ़कना, उलट जाना।}} {{outdent|इध्म (सं॰ क्ली॰) इध्यतेऽग्निरनेनेति, इन्ध-मक्।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> axnbyf2uyghsydr7sxviqlwxah03gss पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१७७ 250 75668 665810 302964 2026-07-07T14:15:45Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665810 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१७६'''|'''उज्जयिनी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> नीचेसे निकालनेका आदेश दिया। भीमने वैसाही किया था। समस्त वृष बारी बारी निकल गये। शेषमें एक वृष किसीप्रकार आगे न बढ़ा। भीम उसे जैसे ही पकड़नेको चले, वैसे ही वृषरूपी केदारेश्वर भूके मध्य जा छिपे। कुछदिन पोछे वे हिमालय-पर आविर्भूत हुये। उनका मस्तक हिमालय पर पहुंचा, किन्तु देह उज्जयिनी में ही रहा। इस नगरमें असंख्य भैरवकी मूर्तियां और भैरवके मन्दिर विद्यमान हैं। शिप्रा नदीके दक्षिण कूलपर भैरवगढ़ है। आकार अश्व के खुर-जैसा बना है। शिप्राके किनारे-किनारे अधक्रोश विस्तृत गढ़के प्राचीर और बड़े बड़े द्वार खड़े हैं। पश्चिम द्वारसे भैरवगढ़में घुसनेपर वामदिक् एक वृहत् देवालय देख पड़ता है। इसी देवालयमें कालभैरवको मूर्ति प्रतिष्ठित है। मूर्ति बहुत प्राचीन और अपरकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। यहांके लोग कहते हैं―कालभैरव ही उज्ज यिनीकी रक्षा रखते हैं। माधवजी सेंधियाने काल भैरवका मन्दिर बनवा दिया है। उज्जयिनीय दशाश्वमेध घाटके निकट ‘अङ्कपात’ नामक एक तीर्थ है। यह स्थान वैष्णवगणको अति प्रिय है। वैष्णव कहते हैं-यहां कृष्ण और बलराम सान्दीपनी मुनिके पास पढ़ने आये थे। जिस स्थानपर उन्होंने प्रथम अङ्कपात लिखना आरम्भ किया, उसीका नाम लोगोंने ‘अङ्कपात’ रख लिया। अङ्कपातमें विष्णुकी विश्वरूप मूर्ति विद्यमान है। मल्हार राव-किसीके मतसे रङ्गराव अप्पाने अङ्गपातका वर्तमान मन्दिर बनवाया था। अहल्या बाईकी निर्दिष्ट वृत्तिसे यहां प्रत्यह १० ब्राह्मण भोजन करते हैं। यहांसे थोड़ी दूर दामोदर, गोमती, विष्णुसागर प्रभृति कुण्ड विद्यमान हैं। उपरोक्त मंन्दिरादि व्यतीत मङ्गलेखर, सहस्त्र-धनुकेश्वर, दत्तात्रेय, चामुण्डा, सरस्वती प्रभृति देवस्थान भी प्रसिद्ध हैं। अवन्तिखण्ड में २४ माता और ३० देवकी पूजाका उल्लेख है। आजकल केवल लक्ष्मी, सरखती और अन्नपूर्णा मूर्तिकी अर्चना होती है। <small>(नारदीवपुराण सत्तर खण्ड ७८ अ॰ देखिये)</small> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}सरस्वती देवीका मन्दिर अति प्राचीन है। इसमें अनेक मृत्तिकाको मूर्तियां हैं। विक्रमादित्य यहाँ आकर देवीको पूजते थे। उज्जयिनीकी कालियदी देखनेकी चीज़ है। वृन्दावनके कालियदहमें जैसे श्रीकृष्णका मन्दिर, इस कालियदीमें भी वैसे ही देवस्थल दृष्टिगोचर होता है। कालियदीके मध्यस्थलमें द्वीपाकार भूमिखण्डपर जल-प्रासाद विद्यमान है। पहिले इस स्थानपर भी विष्णु-मन्दिर था। ‘मीरात सिकन्दरी’ नामक मुसलमानी इतिहासके मतसे इस जलप्रासादको नसीरुद्दीन्ने बनवाया था। किन्तु देखनेसे सहजमें ही समझ पड़ता है――यह प्रसाद अधिक प्राचीन है। कालिदासने ‘जलयन्त्रमन्दिर’का उल्लेख किया है―― {{x-smaller|{{c|“निशा: शशाद्धक्षतनीलराजयः क्वचिद्विचित्रं जलयन्त्रमन्दिरम्।”}}}} {{right|<small>(ऋतुसंहार १।२)|</small>}} अनुमानसे कालिदासका जलयन्त्रमन्दिर उक्त जलप्रासाद ही है। ऐसा ठहरनसे मानना पड़ेगा-विक्रमादित्यके समय भी यह जलप्रासाद था। सम्भ-वतः राजा विक्रमादित्य ग्रीष्मकालपर जाकर जल-प्रासादमें निवास लेते थे। वही कालिदासने स्व चक्षुसे देख ऋतुसंहारमें लिखा है। आजकल न होते भी मानते हैं, कि पश्चात् जलप्रासादके चारो ओर कितने ही फौवारे छूटते थे। निर्माणकी प्रणाली अति अद्भुत है। जिस द्रव्यादिसे प्रासाद बना है, वह सर्वांशमें उत्कृष्ट है। क्योंकि जलके स्रोतसे उसका चिह्न भी नहीं बिगड़ता। प्राचीरमें सर्वोपरि श्रीकृष्णकी मूर्ति खुदी है। उनके चारो ओर गोपी हस्त जोड़े दण्डाय-मान हैं। दूरसे दृश्य बहुत ही सुन्दर देख पड़ता है। जलप्रासादमें यातायातके लिये पुल बंधा है। पूर्व इस स्थानपर (अवन्तिखण्डीक्त) ब्रह्माकुण्ड था। मालुम पड़ता है-ब्रह्मकुण्डका ही नाम कालियदी पड़ा है। क्योंकि यह नाम अबन्तिखण्डमें नहीं मिलता। किन्तु अबुलफ़ज़ल प्रभृति मुसलमान ऐतिहासिकने कालियदीघी लिखा है। सर टोमस रो जहांगीर बादशाहके साथ यहां आये थे। उज्जयिनीके सिद्धनाथका घाट प्रति मनोरम स्थान <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> jdfw457skhtlzwlenr0ttyiecqky7a9 665811 665810 2026-07-07T14:16:40Z अँजली चौधरी 2439 665811 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१७६'''|'''उज्जयिनी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> नीचेसे निकालनेका आदेश दिया। भीमने वैसाही किया था। समस्त वृष बारी बारी निकल गये। शेषमें एक वृष किसीप्रकार आगे न बढ़ा। भीम उसे जैसे ही पकड़नेको चले, वैसे ही वृषरूपी केदारेश्वर भूके मध्य जा छिपे। कुछदिन पोछे वे हिमालय-पर आविर्भूत हुये। उनका मस्तक हिमालय पर पहुंचा, किन्तु देह उज्जयिनी में ही रहा। इस नगरमें असंख्य भैरवकी मूर्तियां और भैरवके मन्दिर विद्यमान हैं। शिप्रा नदीके दक्षिण कूलपर भैरवगढ़ है। आकार अश्व के खुर-जैसा बना है। शिप्राके किनारे-किनारे अधक्रोश विस्तृत गढ़के प्राचीर और बड़े बड़े द्वार खड़े हैं। पश्चिम द्वारसे भैरवगढ़में घुसनेपर वामदिक् एक वृहत् देवालय देख पड़ता है। इसी देवालयमें कालभैरवको मूर्ति प्रतिष्ठित है। मूर्ति बहुत प्राचीन और अपरकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। यहांके लोग कहते हैं―कालभैरव ही उज्ज यिनीकी रक्षा रखते हैं। माधवजी सेंधियाने काल भैरवका मन्दिर बनवा दिया है। उज्जयिनीय दशाश्वमेध घाटके निकट ‘अङ्कपात’ नामक एक तीर्थ है। यह स्थान वैष्णवगणको अति प्रिय है। वैष्णव कहते हैं-यहां कृष्ण और बलराम सान्दीपनी मुनिके पास पढ़ने आये थे। जिस स्थानपर उन्होंने प्रथम अङ्कपात लिखना आरम्भ किया, उसीका नाम लोगोंने ‘अङ्कपात’ रख लिया। अङ्कपातमें विष्णुकी विश्वरूप मूर्ति विद्यमान है। मल्हार राव-किसीके मतसे रङ्गराव अप्पाने अङ्गपातका वर्तमान मन्दिर बनवाया था। अहल्या बाईकी निर्दिष्ट वृत्तिसे यहां प्रत्यह १० ब्राह्मण भोजन करते हैं। यहांसे थोड़ी दूर दामोदर, गोमती, विष्णुसागर प्रभृति कुण्ड विद्यमान हैं। उपरोक्त मंन्दिरादि व्यतीत मङ्गलेखर, सहस्त्र-धनुकेश्वर, दत्तात्रेय, चामुण्डा, सरस्वती प्रभृति देवस्थान भी प्रसिद्ध हैं। अवन्तिखण्ड में २४ माता और ३० देवकी पूजाका उल्लेख है। आजकल केवल लक्ष्मी, सरखती और अन्नपूर्णा मूर्तिकी अर्चना होती है। <small>(नारदीवपुराण सत्तर खण्ड ७८ अ॰ देखिये)</small> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}सरस्वती देवीका मन्दिर अति प्राचीन है। इसमें अनेक मृत्तिकाको मूर्तियां हैं। विक्रमादित्य यहाँ आकर देवीको पूजते थे। उज्जयिनीकी कालियदी देखनेकी चीज़ है। वृन्दावनके कालियदहमें जैसे श्रीकृष्णका मन्दिर, इस कालियदीमें भी वैसे ही देवस्थल दृष्टिगोचर होता है। कालियदीके मध्यस्थलमें द्वीपाकार भूमिखण्डपर जल-प्रासाद विद्यमान है। पहिले इस स्थानपर भी विष्णु-मन्दिर था। ‘मीरात सिकन्दरी’ नामक मुसलमानी इतिहासके मतसे इस जलप्रासादको नसीरुद्दीन्ने बनवाया था। किन्तु देखनेसे सहजमें ही समझ पड़ता है――यह प्रसाद अधिक प्राचीन है। कालिदासने ‘जलयन्त्रमन्दिर’का उल्लेख किया है―― {{x-smaller|{{c|“निशा: शशाद्धक्षतनीलराजयः क्वचिद्विचित्रं जलयन्त्रमन्दिरम्।”}}}} {{right|<small>(ऋतुसंहार १।२)</small>}} अनुमानसे कालिदासका जलयन्त्रमन्दिर उक्त जलप्रासाद ही है। ऐसा ठहरनसे मानना पड़ेगा-विक्रमादित्यके समय भी यह जलप्रासाद था। सम्भ-वतः राजा विक्रमादित्य ग्रीष्मकालपर जाकर जल-प्रासादमें निवास लेते थे। वही कालिदासने स्व चक्षुसे देख ऋतुसंहारमें लिखा है। आजकल न होते भी मानते हैं, कि पश्चात् जलप्रासादके चारो ओर कितने ही फौवारे छूटते थे। निर्माणकी प्रणाली अति अद्भुत है। जिस द्रव्यादिसे प्रासाद बना है, वह सर्वांशमें उत्कृष्ट है। क्योंकि जलके स्रोतसे उसका चिह्न भी नहीं बिगड़ता। प्राचीरमें सर्वोपरि श्रीकृष्णकी मूर्ति खुदी है। उनके चारो ओर गोपी हस्त जोड़े दण्डाय-मान हैं। दूरसे दृश्य बहुत ही सुन्दर देख पड़ता है। जलप्रासादमें यातायातके लिये पुल बंधा है। पूर्व इस स्थानपर (अवन्तिखण्डीक्त) ब्रह्माकुण्ड था। मालुम पड़ता है-ब्रह्मकुण्डका ही नाम कालियदी पड़ा है। क्योंकि यह नाम अबन्तिखण्डमें नहीं मिलता। किन्तु अबुलफ़ज़ल प्रभृति मुसलमान ऐतिहासिकने कालियदीघी लिखा है। सर टोमस रो जहांगीर बादशाहके साथ यहां आये थे। उज्जयिनीके सिद्धनाथका घाट प्रति मनोरम स्थान <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> pz2fjf9drg3fbnsm4296or60iobr0ed पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२४ 250 75684 665805 609049 2026-07-07T13:57:31Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 665805 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इण्डिया—इतरेतराश्रय|२३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इण्डिया (अं॰ स्त्री॰ = India) भारतवर्ष, हिन्दुस्थान।}} {{outdent|इण्डीन्य (सं॰ पु॰) कुरो, चाकू।}} {{outdent|इण्डु (बै॰ क्ली॰) मुञ्जापत्र, मूंजको चद्दर। कड़ा हो चूल्हे से उतारते समय यह हाथमें लपेट लेनेके काल आता है।}} {{outdent|इण्ये रिका (सं॰ त्रि॰) वटिका, बाटो, भौंरिया।}} {{outdent|इत् (सं॰ त्रि॰) एतोति, इ-किप्। देखते-देखते चला जानेवाला, जो बातको बातमें उड़ जाता हो। व्याकरणका प्रयोग साधनेके लिये जो अक्षर आते ही त्तल जाता, वह इत् कहाता है।}} {{outdent|इत (सं॰ त्रि॰) इक्त। १ गत, गुजरा हुआ, गया-बीता। (क्ली॰) भावे क्यप्। २ गमन, चाल। ३ ज्ञान, समझ। ४ प्राप्ति, याफ़त। (हिं॰ क्रि॰ वि॰) ५ इस ओर, इधर, यहां!}} {{outdent|इतः, {{smaller|तस् देखी।}}}} {{outdent|इतःपर (स॰ अव्य॰) इसके पीछे, इसके बाद, इसपर।}} {{outdent|इत-उत (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ इधर-उधर, जहां-तहां। (पु॰) २ छल फरेब।}} {{outdent|इत ऊति (वै॰ त्रि॰) इस ओरसे लम्बायमान, जो इधरसे फैला या पहुंचा हो। २ भविष्यत्, वर्तमान समयसे अधिक स्थायो, श्रयिन्दा, जो ज़माना-हालसे ज्यादा ठहरता हो।}} {{outdent|इतना (हिं॰ वि॰) एतावत्, इस कदर, इत्ता, इतक।}} {{outdent|इतनो, इतना देखी।}} {{outdent|इतम (सं॰ त्रि॰) अन्य, दूसरा, और।}} {{outdent|इतमाम (अ॰ पु॰) पूर्णता, कमाल, पूरापन।}} {{outdent|इतमोनान् (अ॰ पु॰) १ सन्तोष, आराम, ढारस। २ बन्धक, जमानत ।}} {{outdent|इतमोनान् करना (हिं॰ क्रि॰) विश्वास मानना, खुश रहना।}} {{outdent|इतमोनान् खातिर होना (हिं॰ क्रि॰) सन्तुष्ट रहना, यकीन् रखना।}} {{outdent|इतमोनान् न करना (हिं॰ क्रि॰) सन्देह रखना, यकीन् न लाना।}} {{outdent|इतमीनान् होना (हिं॰ क्रि॰) सन्तुष्ट रहना, खुभो मनाना।}} {{Multicol-break}} {{outdent|इतमोनानी (अ॰ वि॰) विश्वस्त, एतबारी, जिसमें यकौन् रहे।}} {{outdent|इतर (सं॰ त्रि॰) इना कामेन तरति तोयेते, इतं प्राप्त रातीति; इत-रा-क, इ-तू-अप् वा अध्। १ नीच, कमीना। २ अन्य, दूसरा। ३ अवशेष, बाकी।}} {{outdent|इतरजन (सं॰ पु॰) इतरश्चासौ जनश्चति, कर्मधा॰। जन साधारण, आम लोग।}} {{outdent|{{block center|<poem>{{smaller|"कन्या वरयते रूप' माता वित्त' पिता श्रुतम्। बान्धवाः कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरे जनाः॥" (शुक्रनीति)}}</poem>}}}} {{outdent|इतर जाना (हिं॰ क्रि॰) दस्युके विरुद्ध प्रथम हो समाचार पाना, डाकुवोंको खबर पहले हो लगना।}} {{outdent|इतरतः (सं॰ अव्य॰) विभिन्न रीतिसे, दूसरे तौरपर।}} {{outdent|इतरथा (सं॰ अव्य॰) इतर थाल्। {{smaller|प्रकारवचने बाल्। पा ५।३।२३।}} विपरीत, बरक्स, जिदसे।}} {{outdent|इतरविशेष (सं॰ पु॰) इतरस्मात् विशेषः, ५-लत्। अन्य प्रभेद, दूसरा फ़कु।}} {{outdent|इतरा (सं॰ स्त्री॰) ऐतरेयको माता। {{smaller|ऐतरेव देखो।}}}} {{outdent|इतराजी (हिं॰ स्त्री॰) विराध, एतराजु, अनवन।}} {{outdent|इतराना (हिं॰ क्रि॰) अभिमान देखाना, उसक करना, अपनेको बड़ा समझना।}} {{outdent|इतराहट (हिं॰ स्त्री॰) अभिमान, गुरूर, ठसक।}} {{outdent|इसरीफल (हिं॰ पु॰) अवलेह विशेष। इसमें आंवला, धनिया और शहद डालते हैं।}} {{outdent|इतरेतर (सं॰ त्रि॰) इतर इतर निपातनात् दन्दम्। अन्योन्य, सुतफ़रिक, अलग, दो-चार।}} {{outdent|इतरेतरकाव्या (सं॰ स्त्री॰) १ अन्योन्य वासना, मुतफ़रिक खयाल।}} {{outdent|इतरेतख्योग (सं॰ पु॰) ६. तत्। १ परस्पर सम्बन्ध, आपसका ताल्लुक। २ दन्दनामक समास, इसमें पर-स्पर पदार्थका योग रहता है।}} {{outdent|इतरेतराभाव (सं॰ पु॰) अन्योन्याभाव, एकका दूसरेसे न मिलना। घटका पट और पटका घट न होना इतरेतराभाव है। {{smaller|अन्योन्याभाव देखो।}}}} {{outdent|इतरेतराश्रय (सं॰ पु॰) इतरेतर आश्रयति, आ-"श्री-अच्। अन्योन्याश्रयरूप न्यायका दोषविशेष। {{smaller|अन्योन्याश्रय देखो।}}}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 9gg3aqbne9lz2k8hvlyrglf7nz9nt93 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२५ 250 75687 665814 609056 2026-07-07T14:31:58Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 665814 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२४|इतरेद्युस्—इतिहास|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इतरेद्युस् (सं॰ अव्य॰) इतर-ए‌द्यस्। {{smaller|सद्यपञ्चदित्यादिना। या ५।३।२२‌}} अन्य दिन वा समय, दूसरे रोज या वक्त।}} {{outdent|इतरौहां (हिं॰ वि॰) सगर्व, मगरूर, इतरानेवाला।}} {{outdent|इतलाक (अ॰ पु॰) प्रार्थना, अनुसन्धान, अर्ज़, हवाला।}} {{outdent|इतलाक रखना (हिं॰ क्रि॰) लगना, मिलना।}} {{outdent|इतली, {{smaller|इटली देखो।}}}} {{outdent|इतवरी (हिं॰) {{smaller|इत्वरी देखो।}}}} {{outdent|इतवार (हिं॰ पु॰) आदित्यवार, एकशब्दा, एतवार।}} {{outdent|इतश्चतश्च (सं॰ अव्य॰) इतश्च द्वित्वम्। इधर-उधर, इस तर्फ़ उस तर्फ़। {{block center|<poem>{{smaller|"सन्तोषासतृदप्तानां यत् सुखं शान्तचेतसाम्। कुतस्तहनलुब्धानामितचे तच धावताम्॥" (हितोपदेश)}}</poem>}}}} {{outdent|इतस् (सं॰ अव्य॰) इदम् तसिल्। १ इस स्थानसे यहां, इस जगह। २ इहलोकसे, इस दुनियासे।}} {{outdent|इतस्ततः (सं॰ अव्य॰) इदम्-तटु-असिल्। नाना स्थानपर, इधर-उधर, यहां वहां।}} {{outdent|इताति (हिं॰) {{smaller|इतायत देखो।}}}} {{outdent|इताब (अ॰ पु॰) १ क्रोध, गुस्सा। २ निन्दा, मला-मत, झिड़की।}} {{outdent|इताब-खिताब (अ॰ पु॰) क्रोधयुक्त शब्द, गुस्सेको बात।}} {{outdent|इतायत (अ॰ स्त्री॰) अधीनता, मातहतो।}} {{outdent|इतायत करना (हिं॰ क्रि॰) १ आज्ञा मानना, हुक्म बजा लाना। २ आदर देना, झुकना।}} {{outdent|इताली, {{smaller|इटली देखी।}}}} {{outdent|इति (सं॰ अव्य॰) इ-क्तिन्। १ अतएव, इससे। २ इसी हेतु, इसी सबबसे। ३ प्रकाश्य रूपसे, खुले तौर पर। ४ निदर्शनपूर्वक, देख-सुनकर। ५ प्रकार, तरह। ६ अनुकर्षसे, पहली बातके मुवाफिक। ७ समाप्तिमें, पूरा होनेपर। ८ स्वरूप, जैसे। ९ प्रक रणपूर्वक, हिकायतसे। १० सान्निध्यमें, नज़दीक। ११ नियमपूर्वक, कायदेसे। १२ मतमें, रायसे। १३ प्रत्यक्ष, सामने। १४ अवधारणपूर्वक, सोच-समझ-के। १५ व्यवस्थासे, तजवीज़ करके। १६ परामर्श द्वारा, नसीहतसे। १७ मानपूर्वक, इज्जतसे। १८ इसी}} {{Multicol-break}} :प्रकार, इस तरह। ९८ प्रकर्षमें, ज़ोरस। २० उपक्रम-पूर्वक, सिलसिलेमें। प्रक्कत रूपसे इति शब्द कहे या विचारे हुये विषयको बताता और पूर्वगामी शब्दपर प्रभाव डालता है। ब्राह्मणमें यह श्रोताकी समझी हुई रीतिका स्मरण दिलाता है। उद्धत वाक्यमें इससे प्रमाणित होता, पूर्व विषय किसी अन्य लेखक या ग्रन्थकारका कहा है। कभी-कभी इति एक हो विषयके विभिन्न शब्द जोड़ता है। किसी ग्रन्थकारके नाममें लगनेसे यह क्रियाविशेषण हो जाता है। (क्ली॰) भावे क्तिन्। २१ गमन, चाल। २२ ज्ञान, समझ। २३ सुनिविशेष। {{outdent|इतिक (सं॰ त्रि॰) इतं गतिरस्त्यस्येति, ठन्। १ गमन विशिष्ट, चलनेवाला। (५०) २ जातिविशेष।}} {{outdent|इतिकथ (सं॰ त्रि॰) इति इत्यं कथा यस्य, बहुव्री॰। १ अश्रद्धेय, न मानने लायक,। २ नष्ट, बरबाद। अर्थशून्य वाक्यका वक्ता इतिकथ कहाता है।}} {{outdent|इतिकथा (सं॰ स्त्री॰) इति इत्थं कथा। अर्थशून्य कथा, बेहूदी बात।}} {{outdent|इतिकरण (सं॰ क्ली॰) {{smaller|इति शब्द।}}}} {{outdent|इतिकर्तव्य (सं॰ त्रि॰) इति इत्यं कर्तव्यम्, सुप् सुपा समा॰। १ नियमानुसार करने योग्य, कायदेके सुवाफिक किया जानेवाला। (क्ली॰) २ धर्म, फर्ज।}} {{outdent|इतिकर्तव्यता (सं॰ स्त्री॰) इतिकर्तव्यस्य भावः, इति-कर्तव्य-तल्-टाप्। धर्म, फर्जु, वाजिबात्।}} {{outdent|इतिकर्तव्यतामूढ़ (सं॰ त्रि॰) आकुल, गूंगा बना हुआ, जिसे अपना काम विलकुल समझन न पड़े।}} {{outdent|इतिकार्यता, {{smaller|इतिकर्तव्यता देखो।}}}} {{outdent|इतिकृत्यता, {{smaller|इतिकर्तव्यता देखो।}}}} {{outdent|इतिथ (बै॰ वि॰) ऐसा-वसा, एक न एक।}} {{outdent|इतिमात्र (सं॰ त्रि॰) इति स्वार्थे मात्रच्। केवल इतना हो, इससे कम न ज्यादा।}} {{outdent|इतिवत् (सं॰ अव्य॰) एक हो प्रकार, एक हो तरह।}} {{outdent|इतिवृत्त (सं॰ क्ली॰) इत्यं वृत्तम्, सुप्सुपा समा॰। १ पुराणशास्त्र। २ ऐसा हो चरित्र, इसी किस्मका हाल। ३ इतिहास, तवारीख। इतिहास देखो।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 2alulgyl7w5mmw01atv6ea7ncjbv7v4 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२६ 250 75688 665884 609067 2026-07-07T15:20:17Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 665884 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इातश—इातहास|२५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इतिश (सं॰ पु॰) एक ऋषि। इनके गोत्रापत्यको ऐतिशायन कहते हैं।}} {{outdent|इतिह (सं॰ अव्य॰) एवं ह किल, इन्ह-समा॰। पुराणानुसार, निःसन्देह इस प्रकार, हकीकतमें इसी तरह।}} {{Outdent|इतिहास (सं॰ पु॰) इतिह पुगवृत्तं आस्ते अस्मिन्; इतिह-आस-घञ, ६-तत्। पुरावृत्त, प्राचीन आख्यान, तवारीख। पुरावृत्त कथा हो इतिहास है। इसे अष्टा-दश शास्त्रके अन्तर्गत मानते हैं। "ऋग्वे दी यजुर्वेदः साम-वेदोऽधर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः स्वाण्यनुव्याख्या नानि।" (यजुर्वेदीय शतपथब्राह्मण १४।५।४।१०)}} :उपरोक्त ब्राह्मगा और अपगपर प्राचीन ग्रन्थमें इतिहास और पुराण वाक्यका उल्लेख देख अति प्राचीन कालसे इतिहास और पुराण नामके खतन्त्र ग्रन्थकी विद्यमानता समझ पड़ती है। :अथव-संहिता (१५।६।४), और छान्दोग्योपनिषद् (७/१।१) मध्य इतिहासका उल्लेख पाते हैं। छान्दो ग्योपनिषत् तथा कौटिल्यके अर्थशास्त्रमें इतिहास पञ्चमवेद कहकर निर्दिष्ट हुआ है। महाभारतकार कृष्णदे पायनने कहा है— {{block center|<poem>{{smaller|"धर्मार्थकाममोचानामुपदेशसमन्वितम्। पूर्ववृत्तकथा युक्त मितिहासं प्रचचते॥"}}</poem>}} :जिसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका उपदेश एवं पुरावृत्त कथा रहता, वह इतिहास कहाता है। :विष्णुपुराणकी टीकामें (३।४।१०) श्रीधरस्वामीने भी ऐसा और एक प्राचीन वचन उद्दत किये हैं— {{block center|<poem>{{smaller|"आर्यादि बहुव्याख्यान' देवर्षिचरिताश्रयम्। इतिहासमिति प्रोक्त' भविष्याङ्गु तधर्मयुक्॥"}}</poem>}} :ऋषिप्रोक्त बहु व्याख्यान, देवर्षिचरित तथा अद्भुत धर्मकथादि जिसमें हो वह इतिहास है। :महात्मा चाणक्यने निर्देश किया है—"पुराणमितिवृत्त-माख्यायिकीदाहरणं धर्मशास्त्रं अर्थशास्त्रं चेतिहासः।" (कौटिलीय अर्थशास्त्र) :पुराण, इतिवृत्त, आख्यायिका, उदाहरण, धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र यह सब हो इतिहास हैं। :इतिहासमें चतुर्वर्ग फल-लाभकी कथा है; अतएव इतिहास पश्चमवेद श्रुतिमें कोर्तित हुआ और इसी}} {{Multicol-break}} :लिये स्मरणातीत कालसे भारत में इतिहासका समादर भी होता आया। गृह्यसूत्र तथा सन्वादि धर्मशास्त्र में श्राद्धादि पित्टकार्यमें इतिहास और पुराण सुनानेकी जो व्यवस्था लिखी, उसका कारण भी यही है। यथ— :"आयुष्षमतां कथाः कीर्तयन्ती माङ्गल्यानीतिहासपुराणानीव्याख्यापयमानाः।" आश्वलायनग्गृह्यसूत्र ४।५) {{block center|<poem>{{smaller|"खाध्याय' श्रावयेत् पिवे धर्मशास्त्राणि चैवहि। आख्यानानीतिहासांञ्ज पुराणान्यखिलानि च॥" (ननु २।७२)}}</poem>}} :महाभारतमें लिखा है— {{block center|<poem>{{smaller|"आरण्यकश्च वेदेभ्यो ओषधिभ्योऽमृत' यथा। क्रदानासुदधि श्रैष्ठी गोर्वरिष्ठी चतुष्पदां॥ यर्थ तानीतिहासानां तथा भारतमुच्यते। यश्चैनं यावयेच्छाद्ध ब्राह्मणान् पादद्मन्ततः॥ अक्षय्यमन्नपान' वैवितू स्तस्योपतिष्ठते। इतिहासपुराणाभ्यां वेद' ससुपतं हयेत्॥" (आदिपर्व, १२०)}}</poem>}} :अर्थात् वेदोंमें जैसे आरण्यक, ओषधियोंमें अमृत, जलाशयोंमें समुद्र और चतुष्पदोंमें गौ श्रष्ठ है, वैसा हो इतिहासोंमें भारत श्रेष्ठ है। जो व्यक्ति श्राद्धके समय ब्राह्मणसे इस भारतका अन्ततः एक चरण भी सुन पाता उनका दिया अन्नपान पितृलोकमें अक्षय होता है। इतिहास और पुराणोंके द्वारा वेदका हो अर्थ प्रकाशित होता है। :उद्धृत महाभारतीय श्लोकसे जान पड़ता, कि महाभारत हमारा इतिहास है, इसके पूर्व भो बड्डु इतिहास रहा उनमें भारत श्रेष्ठ इतिहास कह परिचित हुआ था। आखलायन-गृह्यसूत्रके (३।४।४) "भारत-महाभारत-धर्माचार्याः" इत्यादि वचनसे मालूम होता है, उस समय 'भारत' और 'महाभारत' नाममें विभिन्न इतिहास प्रचलित था। हम प्रचलित महा-भारतसे भी जान सकते, कि पहले लच श्लोको महाभारत प्रचलित नहीं रहा, महाभारतमें ही है— {{block center|<poem>{{smaller|"चतुर्थिशतिसाहस्री चके भारतसंहितां‌। उपाख्यानैर्विना तावहारत' प्रोच्यते बुधैः॥"}}</poem>}} :व्यासदेवने प्रथम २४००० श्लोकमयी भारत-संहिता बनायी थी। वास्तविक वर्तमान प्रचलित संस्करण-समूहमें उस आदि संहिताकी अनेक कथा रहते भी {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> b1umlh9fpdq7m60spiktbpb2nwytsez पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२७ 250 75689 666020 609070 2026-07-07T15:43:03Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666020 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२६|इतिहास|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} उपाख्यान प्रभृतिके साथ बहुत अवान्तर विषय। प्रविष्ट हो जानेसे आज महाभारतको कितने ही लोग। इतिहास माननेसे हिचकते हैं। किन्तु जिन युरोपीय ऐतिहासिकोंके आदर्शपर हम वर्तमान कालके इतिहासका उपादान मानते, वह जानते हैं,— "* * * *It is evident that Freeman's definition of history as 'past politics' is miserably inadequate. Political events are mere externals. History enters into every phase of activity, and the economic forces which urge society along are as much its subject as the political result. In short the historical spirit of the age has invaded every field." ''Encyclopædia Britannica,'' 11th. Ed. (1911), Vol. XIII, p. 527. 'फीमेनकी यह परिभाषा अतिशय अपर्याप्त आती, कि इतिहासकी गणना 'गत राजनीति' में जाती है। राजनीतिक काण्ड केवल बहिरङ्ग होते हैं। इतिहास व्यापारके प्रत्येक अंशको छूता है। निर्वाहसम्बन्धी बल राजनीतिक फलकी भांति इतिहासका विषय बन जाता है। संक्षेपमें कहनेसे सामयिक इतिहासको शक्तिने प्रत्येक क्षेत्रपर अपना प्रभाव डाला है।' सुतरां पाश्चात्य वर्तमान ऐतिहासिकोंके मतसे महाभारतको भी इतिहास माननेमें कोई आपत्ति न पड़ेगी। हमारे आदि इतिहासके सार महाभारतमें ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिसे स्थावर जङ्गम सकल प्रकार सृष्टि-तत्त्व, देव ऋषि पिट प्रभृति जीवका संक्षिप्त परिचय, भारतके प्राचीन राजवंशका विवरण, दुर्गं नगर तीर्थक्षेत्र प्रभृति समुदाय जीवस्थान, धर्मरहस्य, कामरहस्य, वेदचतुष्टय, योगशास्त्र, विज्ञानशास्त्र, धर्मार्थकाम-विषयक नाना शास्त्र और लोकयात्राविषयक आयुर्वेद धनुर्वेद आलोचित है। कहनेसे क्या! वर्तमान पाश्चात्य इतिहासविद् इतिहासका जैसा व्यापकत्व और विषयनिर्धारण ठहराते, महाभारतरूप भारतके प्राचीन इतिहासमें, वैसा ही आयोजन पाते भी हैं। जो विषय ध्रुव सत्य रहता और प्रत्यक्ष वा परोक्ष प्रमाण द्वारा प्रतिष्ठित होता, वही इतिहास बजता है। इसीसे भगवान् शङ्कराचार्यने इतिहासका प्रामाण्य मान बता दिया है,—{{smaller|"इतिहासपुराणमपि पौरुषेयत्वात् प्रमाणान्तरमूलतामाकाङ्गते।" (शारीरकभाष्य १।३।३२)}} {{Multicol-break}} अर्थात् इतिहास पुराणको भी पौरुषेय समझकर प्रमाणान्तरमूलता वा वेदके बाद गौणप्रमाण मानना पड़ेगा कैसे स्वीकार करेंगे। उत्तरमें शङ्कराचार्यने कहा है,— {{smaller|"इतिहासपुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण सम्भवन् मन्त्रार्थवादमूलत्वात् प्रभवति देवताविग्रहादि प्रपञ्चयितुम्। प्रत्यक्ष मूलमपि सम्भवति। भवति हि अस्माकमप्रत्यचमपि चिरन्तनानां प्रत्यचम्। तथा च व्यासादयो देव ताभिः प्रत्यच्चक्षं व्यवहारनीति अर्थते।"}} अर्थात् इतिहास और पुराण जिस भावसे व्याख्यात हुआ, मन्त्र और अर्थवाद होनेसे वह देवता विग्रहादिके प्रपञ्चनिर्णयमें समर्थ है। इसका प्रत्यक्ष-मूलक होना भी सम्भवपर है। हमारे पच्तमें अप्रत्यच्च रहते भी प्राचीनोंके लिये यह प्रत्यच्च हुआ। इसोसे स्मृतिमें कहा, कि व्यासप्रभृतिने देवताओंके साथ प्रत्यक्षरूपसे व्यवहार किया था। भारतका प्राचीन ऋषिगण समझते, जो प्रत्यक्ष-मूलक वा समसामयिक लोगोके रचित रहता और जिसको मौलिकताके सम्बन्धपर कुछ सन्देह उठने न पाता वही प्रक्कृत इतिहास कहाता था। हमारे महाभारतीय इतिहासको मौलिकता और प्रामाणिकता आजकलकी अवस्था देख विचारनेसे नहीं बनता। उसे भगवान् शङ्कराचार्य ही अच्छी तरह देखा गये हैं। समसामयिकी घटना सम सामयिक मनीषी द्वारा लिपिबद्ध हुयी थी। पुराकालकी सकल विक्षिप्त कथाकी जिसने परवर्ती कालमें एकत्र सङ्कलन किया, उसीने व्यासदेव वा संग्रहकार नाम कमा लिया। हमारे प्राचीन इतिहासका अधिकांश विलुप्त वा विक्कत पड़ जाना अत्यन्त दुःखका विषय है। अतिप्राचीन भारतका विशुद्ध इतिहास ढूंढ निकालना एकप्रकार दुःसाध्य व्यापार हो गया है। इसीसे वर्तमान ऐतिहासिक 'महा-भारत'को इतिहास नहीं समझते‌। तथापि कितनी ही मिलावट रहते और प्रक्षिप्त उपकरण बढ़ते भी भारतवर्षीय पण्डित समाजमें महाभारत इतिहास ही कहाता है। महाभारतीय युगके बाद भी लगातार इतिहास {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 404ff9nbt7evqietex44o0nzosduza6 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८ 250 75690 666183 609075 2026-07-07T16:11:18Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666183 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इातहास|२७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} अपने-अपने राजवंशके चरिताख्यायक वा सूतमाग धादि द्वारा लिपिबद्ध होता था। किन्तु राष्ट्रविप्लवसे वह समुदाय विगड़ गया। हमारे पुराणोंमें राजवंशके प्रसङ्गपर राजगणका नाम और राज्यशासनकाल मात्र मिलता है। विस्तृत इतिहास विलुप्त होते भी हमारे श्राद्धादि कायमें इतिहासपुराण अवश्यपाठ करनेसे अवधारित रहनेपर एककाल वह मिट नहीं सका। इसी कारण पुराणसे प्रकृत ऐतिहासिक युगके क्षीण कङ्गालका सन्धान लगता है। पाश्चात्य पुराविदु बताते, कि मकदुनिया बीर अलेक्सन्दरके समयसे ही प्रक्कत प्रस्तावपर वैज्ञानिक प्रणालीमें भारतीय इतिहास-रचनाकी सूचना पाते हैं। तदनुसार अनेक ही मौर्याधिपत्यकालसे हमारे भारतके प्रक्कत ऐतिहासिक युगका आरम्भ समझते हैं। सम-सामयिक लिपिसे इसका प्रमाण यथेष्ट मिला, कि उस समय वास्तविक पाश्चात्य और प्राच्य जगत्में धारावाहिक इतिहास रचनाका समादर बढ़ा था। बहुतसे लोग सोचते, कि भारत में यवन वा ग्रीक-प्रभावके फल और आदर्शसे ही नाना शिलालेखका उत्‌कीर्ण होना देखते हैं। प्रवादानुसार उपाख्यान वा कल्पनाके हाथसे निष्कृति ले उसी समय प्रकृत घटना खोदी जाने लगी और साथ ही साथ भारतमें विज्ञान सम्मत इतिहासकी भित्ति पड़ी। किन्तु पिपरावेमें एक खोदित शिलालेख निकला है । उसमें शाक्यबुद्धके भस्माधारपर निर्वाणके बाद जो लिखा गया, उससे भारतमें पारसिक वा यवन-प्रभाव-विस्तारके बहुत पहले समसामयिक घटना पत्थरपर खुदनेकी पद्धतिके प्रचारका निदर्शन स्पष्ट हाथ लगा है। अलेक्सन्दरसे बहुत पहले नाना भावमें विभिन्न देशका इतिहास लिखा जाता था। उक्त विषय महापुराण-वर्णित राजवंशके विवरणसे हो प्रमाणित होता। अलेक्सन्दरके समय जिन सकल महात्माओंने भारत आकर यहांकी कथा लिखी उनकी विवरणीसे भी कितनी ही बात चली है। अलेक्सन्दरके तिरोधान बाद ही मेगस्थेनिस दौत्यकार्यपर पाटलि-पुत्रकी राजसभामें उपस्थित रहे। उन्हीं मेगस्थनिस {{Multicol-break}} पर निर्भर कर प्राचीन पुराविद् आरियानने लिखा है,—"डाइओनिसस्से चन्द्रगुप्त पर्यन्त भारतीय राजन्यवर्गने ६०४२ वर्ष राजत्व रखा था । राजाओंकी संख्या एक-सौ तिरपन रही। फिर भी उक्त समयके मध्य तीन बार साधारणतन्त्र चला।"<ref>Arrian's Indica.</ref> इस विवरणीसे अच्छीतरह समझते—जिस समयसे विज्ञानसम्मत ऐतिहासिक युगका सूत्रपात मानते, उससे छः हजार वर्ष पूर्वकाल होते भी धारावाहिक रूपमें भारतका इतिहास लिखा देखते हैं। आजकल उसका अधिकांश विलुप्त है। महाभारत और पुराणमें क्षीण स्मृतिमात्र मिलता है। इसी कारण, महाभारत और पुराण हमारे भारतके प्राचीन इतिहासका अङ्ग समझा जाता है। परदर्तों काल नाना स्थानसे विभिन्न सम्प्रदायके जो शत-शत शिलालेख, ताम्म्रपत्र वा सामयिक इतिवृत्त निकला, उससे भारत पुराणका प्रभाव सुस्पष्ट झलका है। प्रारम्भमें ही कहा इतिहासको व्यापकता अति विशाल और विस्तृत है। स्थावर जङ्गम, जीव-अजीव और मूर्त-अमूर्त क्या—ऐसा कौन पदार्थ होता, जिस का इतिहास नहीं रहता। साहित्य, विज्ञान, दर्शन, तथा शिल्पकलादि सभीका इतिहास विद्यमान है । इसीसे आधुनिक पाश्चात्य ऐतिहासिक डाक्टर जे, टि, सोटओयेलने कहा है,— "History in the wider sense is all that has happened, not merely all the phenomena of human life, but those of the natural world as well. It includes everything that undergoes change; and as modern science has shown that there is nothing absolutely static, therefore the whole universe and every part of it, has its history. * * *Solids are solids no longer. The universe is in motion in every particle of every part, rock and metal merely a transition stage between crystallization and dissolution. This idea of universal activity has in a sense made physics itself a branch of history. It is the same with the other sciences-especially the biological division, where the doctrine of evolution has induced an attitude of mind which is distinctly historical."<ref>''Encyclopacdia Britannica,'' 11th ed Vol. XIII, p. 527.</ref> {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> eogwja1rrmdxbkjnnjtu1a7irpotxs1 666193 666183 2026-07-07T16:13:07Z ममता साव9 2453 666193 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इातहास|२७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} अपने-अपने राजवंशके चरिताख्यायक वा सूतमाग धादि द्वारा लिपिबद्ध होता था। किन्तु राष्ट्रविप्लवसे वह समुदाय विगड़ गया। हमारे पुराणोंमें राजवंशके प्रसङ्गपर राजगणका नाम और राज्यशासनकाल मात्र मिलता है। विस्तृत इतिहास विलुप्त होते भी हमारे श्राद्धादि कायमें इतिहासपुराण अवश्यपाठ करनेसे अवधारित रहनेपर एककाल वह मिट नहीं सका। इसी कारण पुराणसे प्रकृत ऐतिहासिक युगके क्षीण कङ्गालका सन्धान लगता है। पाश्चात्य पुराविदु बताते, कि मकदुनिया बीर अलेक्सन्दरके समयसे ही प्रक्कत प्रस्तावपर वैज्ञानिक प्रणालीमें भारतीय इतिहास-रचनाकी सूचना पाते हैं। तदनुसार अनेक ही मौर्याधिपत्यकालसे हमारे भारतके प्रक्कत ऐतिहासिक युगका आरम्भ समझते हैं। सम-सामयिक लिपिसे इसका प्रमाण यथेष्ट मिला, कि उस समय वास्तविक पाश्चात्य और प्राच्य जगत्में धारावाहिक इतिहास रचनाका समादर बढ़ा था। बहुतसे लोग सोचते, कि भारत में यवन वा ग्रीक-प्रभावके फल और आदर्शसे ही नाना शिलालेखका उत्‌कीर्ण होना देखते हैं। प्रवादानुसार उपाख्यान वा कल्पनाके हाथसे निष्कृति ले उसी समय प्रकृत घटना खोदी जाने लगी और साथ ही साथ भारतमें विज्ञान सम्मत इतिहासकी भित्ति पड़ी। किन्तु पिपरावेमें एक खोदित शिलालेख निकला है । उसमें शाक्यबुद्धके भस्माधारपर निर्वाणके बाद जो लिखा गया, उससे भारतमें पारसिक वा यवन-प्रभाव-विस्तारके बहुत पहले समसामयिक घटना पत्थरपर खुदनेकी पद्धतिके प्रचारका निदर्शन स्पष्ट हाथ लगा है। अलेक्सन्दरसे बहुत पहले नाना भावमें विभिन्न देशका इतिहास लिखा जाता था। उक्त विषय महापुराण-वर्णित राजवंशके विवरणसे हो प्रमाणित होता। अलेक्सन्दरके समय जिन सकल महात्माओंने भारत आकर यहांकी कथा लिखी उनकी विवरणीसे भी कितनी ही बात चली है। अलेक्सन्दरके तिरोधान बाद ही मेगस्थेनिस दौत्यकार्यपर पाटलि-पुत्रकी राजसभामें उपस्थित रहे। उन्हीं मेगस्थनिस {{Multicol-break}} पर निर्भर कर प्राचीन पुराविद् आरियानने लिखा है,—"डाइओनिसस्से चन्द्रगुप्त पर्यन्त भारतीय राजन्यवर्गने ६०४२ वर्ष राजत्व रखा था । राजाओंकी संख्या एक-सौ तिरपन रही। फिर भी उक्त समयके मध्य तीन बार साधारणतन्त्र चला।"<ref>Arrian's Indica.</ref> इस विवरणीसे अच्छीतरह समझते—जिस समयसे विज्ञानसम्मत ऐतिहासिक युगका सूत्रपात मानते, उससे छः हजार वर्ष पूर्वकाल होते भी धारावाहिक रूपमें भारतका इतिहास लिखा देखते हैं। आजकल उसका अधिकांश विलुप्त है। महाभारत और पुराणमें क्षीण स्मृतिमात्र मिलता है। इसी कारण, महाभारत और पुराण हमारे भारतके प्राचीन इतिहासका अङ्ग समझा जाता है। परदर्तों काल नाना स्थानसे विभिन्न सम्प्रदायके जो शत-शत शिलालेख, ताम्म्रपत्र वा सामयिक इतिवृत्त निकला, उससे भारत पुराणका प्रभाव सुस्पष्ट झलका है। प्रारम्भमें ही कहा इतिहासको व्यापकता अति विशाल और विस्तृत है। स्थावर जङ्गम, जीव-अजीव और मूर्त-अमूर्त क्या—ऐसा कौन पदार्थ होता, जिस का इतिहास नहीं रहता। साहित्य, विज्ञान, दर्शन, तथा शिल्पकलादि सभीका इतिहास विद्यमान है । इसीसे आधुनिक पाश्चात्य ऐतिहासिक डाक्टर जे, टि, सोटओयेलने कहा है,— "History in the wider sense is all that has happened, not merely all the phenomena of human life, but those of the natural world as well. It includes everything that undergoes change; and as modern science has shown that there is nothing absolutely static, therefore the whole universe and every part of it, has its history. * * *Solids are solids no longer. The universe is in motion in every particle of every part, rock and metal merely a transition stage between crystallization and dissolution. This idea of universal activity has in a sense made physics itself a branch of history. It is the same with the other sciences-especially the biological division, where the doctrine of evolution has induced an attitude of mind which is distinctly historical."<ref>''Encyclopacdia Britannica,'' 11th ed Vol. XIII, p. 527.</ref> {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> knwt584hr2mpl8792wmjd49thi1x30e पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२९ 250 75691 666344 609086 2026-07-07T16:45:32Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666344 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२८|इतोक—इत्तिला करना|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पाश्चात्य पण्डितोंके मतमें जगत्की अतीत और वर्तमान घटनाकी वर्णन द्वारा साधारणकी उपदेश देना हो इतिहास है। वेकन साहबने दर्शन और काव्यको नीचे डाल इतिहासका प्राधान्य माना है। उनके सतमें इतिहास ही भूतपूर्वं मानव जगत्‌की आन्तरिक और बाह्य वृत्ति समझनेकी मूल स्मृति है। आर्नल्ड साहब समाजकी जीवनीको ही इतिहास कहते हैं— "The general idea of history seems to me to the that it is the biography of a scciety History is to the common life of many, what biography is to the life of an individual." (Arnold's Lectures on history,) इतिहास जगत्के समग्र पदार्थों के परिवर्तनका वर्णन है। केवल मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग-यहांतक, कि जड़ पदार्थ भी अपना-अपना इतिहास रखते हैं। भूतपूर्व राजनीतिको ही इतिहास मानना भूल है। 'इतिह' का 'पुरावृत्त' और 'आस'का अर्थ 'रहता' है। जिस पुस्तकमें किसी वस्तुका पुराना वृत्तान्त रहता, उसे ही मनुष्य इतिहास कहता है। इतिहास लेखकको मित्रकी निन्दा और शत्रु को प्रशंसा करना पड़ती है। क्योंकि इतिहास सच्चा न होनेसे किसी अर्थका नहीं निकलता। चीनीयों, रोमकों, यूनानियों और इसलामीयोंने इतिहास 6 लिखनेमें बड़ा श्रम उठाया है। प्राचीन आर्यसमाज अच्छीतरह समझता— इतिहास क्या होता, उससे कौन लाभ मिलता और वह किस काम आता था। महर्षि कृष्णद्वै पायनने अपनी अमृर्तानस्यन्दिनी भाषामें कहा है,— {{block center|<poem>{{smaller|"इतिहासप्रदीपेन मोहावरणघातिना। लोकगर्भग्गृह कृत्य' यथावत् स'प्रकाशितम्।” (महाभारत १।१।८३)}}</poem>}} अर्थात् इतिहास ही हमारा मोहान्धकार दूर करता और ज्ञानचक्षु खोल देता है। {{outdent|इतीक (सं॰ पु॰) जातिविशेष, एक कौम।}} {{outdent|इतेक, {{smaller|इतना देखो।}}}} {{outdent|इतो, {{smaller|इतना देखो।}}}} {{outdent|इत्कट (सं॰ पु॰) इतं गन्तार' समीपस्थ वा कटति}} {{Multicol-break}} आष्टणीति स्वभिखास्थफलेनेति; इत्-कट्-अच्, ६-तत्। स्वनामख्यात क्षुपविशेष, किसी किस्मका सर। {{outdent|इत्कटा (सं॰ स्त्री॰) सूक्ष्मपत्रिका एवं दौर्धलोहित यष्टिका काष्ठविशेष, किसी किस्मको लकड़ी। इसका पत्त्र छोटा और डण्डल बड़ा तथा लाल होता है। (वाग्भट)}} {{outdent|इत्कर, इत्कट देखो।}} {{outdent|इत्किला (सं॰ स्त्री॰) किल शौक्लेत्र किल-क किला, इत् गतः किलः शौला यश्याः। रोचना नामक सुगन्धि द्रव्य, एक किस्मको खुशबूदार चीज़ ।}} {{outdent|इप्ता, इतना देखो।}} {{outdent|इत्तिफाक (अ॰ पु॰) १ एकदिलो। ३ सङ्ग, साथ। समय, वक्त। २ स्वरैक्य, "इत्तिफाक यड़ी चीज है।" (लोकोक्ति) ४ सम्मति, रजा। ५ समवाय, मेल। ६ पक्ष-पात, साजिश। ७ मैत्री, दोस्ती। ८ दशा, हालत। ९ कार्य, काम। १० अवसर, मौका। इसका बहुवचन इत्तिफाकात् है।}} {{outdent|इत्तिफाक करना (हिं॰ क्रि॰) १ सम्मत होना, मिल-जुलके चलना। २ मैत्रो लगाना, दोस्ती जोड़ना।}} {{outdent|इत्तिफाकन् (अ॰ क्रि॰ वि॰) १ अवसरवश, मौकेसे । दैवयोगसे, एकायेक।}} {{outdent|इत्तिफाक बनना (हिं॰ क्रि॰) आनन्द रहना, बखेड़ा न पड़ना।}} {{outdent|इत्तिफाक, रखना (हिं॰ क्रि॰) शान्तिपूर्वक रहना, दोस्ताना तौरपर चलना।}} {{outdent|इत्तिफाकराय (अ॰ पु॰) सम्मति, मेल-जोल।}} {{outdent|इत्तिफाक होना (हिं॰ क्रि॰) १ सम्मति बैठना, राय पड़ना। २ मिलना, एक-जसा देख पड़ना। ३ मित्र बनना, दोस्तो जुड़ना।}} {{outdent|इत्तिफाकिया, {{smaller|इत्तिफाकी देखो।}}}} {{outdent|इत्तिफाकी (अ॰ वि॰) आकस्मिक, अप्रक्कत, नाग-हानौ, आसमानी।}} {{outdent|इत्तिला (अ॰ त्रि॰) विज्ञापन, वृत्तान्त, मुखबिरी, खुबर, चितावनी।}} {{outdent|इत्तिला करना (हिं॰ क्रि॰) १ निवेदन सुनाना, हवाला देना कहना। २ सूचना निकालना, इश्तेहार देना, जताना ।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> k8pwfp180nvk44oxdj3hzv4wiig63zp पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३० 250 75696 666352 609088 2026-07-07T17:36:49Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666352 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इत्तिलानामा—इदंविद्|२९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इत्तिलानामा (अ॰ पु॰) लिखित आख्यान, तलबी-नामा, दस्तक।}} {{outdent|इत्तिष्हाम (अ॰ पु॰) अपराध, कुसूर, खोट।}} {{outdent|{{smaller|इतना देखो।}}}} {{outdent|इत्यं (सं॰ अव्य॰) इदं प्रकारे थसुः, इदमः इदा-देशः। इस प्रकार, इस तरह, ऐसे, यों।}} {{outdent|दृत्य विध (सं॰ ति॰) ऐसा, ऐसे गुणवाला, जिसमें ऐसे औसाफ रहें।}} {{outdent|इत्यङ्कार (सं॰ अव्य॰) इस रीतिसे, ऐसे तौरपर।}} {{outdent|इत्थमेव (सं॰ ति॰) १ ऐसा हो, इसी हालत में रहनेवाला। (अव्य॰) २ इसोप्रकार, इसीतरह।}} {{outdent|इत्थम्भाव (सं॰ पु॰) इत्थं भावः, ६-तत्; भू प्राप्तौ घञ्। ऐसी अवस्था, यह हालत।}} {{outdent|इत्यम्भूत (सं॰ ति॰) इत्य' कमपि प्रकार भूतः प्राप्तः, इत्यम्-भू प्राप्तौ कर्तरि क्त। ऐसा बना हुआ, जो ऐसो हालतमें पड़ गया हो।}} {{outdent|इत्यशाल (सं॰ पु॰) ज्योतिषीक्त तृतीय योग।‌ जब शीघ्र चलनेवाला ग्रह अंशमें कम पड़ते भी मन्दगामी ग्रहकी देखता, तब इत्थसाल योग होता है। यह शब्द सम्भवतः अरबोके 'इत्तसाल'का अपभ्रंश है।}} {{outdent|इत्या (वै॰ अव्य॰) इदम् थाल् इदादेशः। १ सत्य! बेशक। २ इस प्रकार, इसीतरह।}} {{outdent|इत्थात् (वै॰ अव्य॰) ऐसे, इसप्रकार, यों।}} {{outdent|इत्याधी (वै॰ अव्य॰) इत्या सत्या घीः यस्य, बहुव्री॰। सत्यपरायण, दृढ़बुद्धि, सुधी, सच्चा, खासी समझ रखनेवाला।}} {{outdent|इत्य (सं॰ त्रि॰) इण् कर्मणि क्यप् तुगागमञ्च। १ गमनके योग्य, जाने काबिल, जहां जा सकें। (क्ली॰) भावे क्यप्। २ गमनकार्य, रवानगी।}} {{outdent|इत्यक (सं॰ पु॰) इत्याय कार्यात, इत्य-कै-क। १ गमन, चाल। २ द्वारपाल, दरवान्।}} {{outdent|इत्यर्थं (सं॰ अव्य॰) इस निमित्त, इसलिये।}} {{outdent|इत्या (सं॰ स्त्री॰) इण्-क्यप् तुक्-टाप्। १ शिविका, पालको। २ गमनकार्य, रवानगी। ३ बङ्गाल-प्रान्तके यशोर ज़िलेका एक ग्राम। यहां खजूरका गुड़, चीनी और तम्बाकू तैयार होता है।}} {{Multicol-break}} {{outdent|इत्यादि (सं॰ वि॰) इति आदिः यस्य, बहुत्री॰। यही सकन्छ, यही सब, वर्ग, रह।}} {{outdent|इत्यादिक, {{smaller|इत्यादि देखो।}}}} {{outdent|इत्युक्त (सं॰ स्त्री॰) इति अनेन उक्तम्। इसोप्रकार कथित, ऐसे हो कहा हुआ।}} {{outdent|इत्र (अ॰ पु॰) १ गन्ध द्रव्य, अत्तर। अतर देखो। २ सौरभ, खुशबू।}} {{outdent|इत्र खेंचना (हिं॰ क्रि॰) सौरभ निकालना, खुशबू उतारना।}} {{outdent|इत्रदान अतरदान देखो।}} {{outdent|इत्रफ़रोश (अ॰ पु॰ स्त्री॰) परिमल विक्रेता, अतर बेचनेवाला।}} {{outdent|इत्र लगाना (हिं॰ क्रि॰) परिमल मलना, अतर डालना।}} {{outdent|इत्त्रौफल, {{smaller|इतरीफल देखो।}}}} {{outdent|इत्वन् (सं॰ त्रि॰) इ-कनिप्। गमनकारी, चलने-वाला।}} {{outdent|इत्वर (सं॰ त्रि॰) इ-करप्। १ इच्छामत गमनकारी, मर्जीके मुवाफिक चलनेवाला। २ पथिक, राहगीर। ३ नोच, कमीना। ४ निष्ठुर, बेरहम। ५ षण्ड। ६ नपु ंसक, नामर्द ।}} {{outdent|इत्वरी (सं॰ स्त्री॰) एति परपुरुषं प्राप्नोति, इ-करप्-ङोप। इण् नशजिसर्तिभ्यः करप। पा ४।१।७। असतो स्त्री, छिनाल।}} {{outdent|इदु (वे॰ अव्य॰) केवल, एवं, ठीक, भी। यह शब्द ऋग्वेदमें प्रायः, किन्तु ब्राह्मणमें कभी-कभी आता है!}} {{outdent|इदं (सं॰ ति॰) इन्द कमिन्। १ सम्मुखस्थ, बुद्धिके विषययोग्य, सामने रहनेवाला, यह। (वे॰ अव्य॰) २ इस स्थानको, यहां। ३ इस समय, अब। ४ उस स्थानपर, वहां। ५ इन शब्दोंके साथ।}} {{outdent|इदंयु (सं॰ त्रि॰) इसका अभिलाषी, यह चाहने-वाला।}} {{outdent|इदं रूप (वै॰ त्रि॰) इदं च रूपं च। इस आकार-वाला, जो ऐसी शक्ल रखता हो।}} {{outdent|इदं विदु (सं॰ त्रि॰) इद वेत्ति, इदम् विदु-किप। यह समझनेवाला, जो इसे जानता हो।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> e21h2m42tn07o5hcw2zrwd1rju6tpq7 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१७८ 250 75727 665848 303196 2026-07-07T15:15:13Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 665848 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''उज्जयिनी-उज्जानक'''|'''१९७'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> है। स्थानीय सरोवरमें अनेक आश्चर्य घटना लगी। रहती है। सुनते-सरोवरपर नागकन्धा मध्य मध्य पहुंचती और उपरिभाग नारी तथा निम्नभाग मत्स्यकी मूर्ति-जैसा रखती हैं।<ref>*Journal As. Soc Bengal, Vol. vi. p. 820.</ref> यहां जैनों के भी अनेक मन्दिर देख पड़ते, जिनमें १० श्वेताम्बरी और दिगम्बरी हैं। कितने ही जैनमठ आजकल हिन्दुवोंके अधीन हैं। उनमें जवरेश्वर और जैनभञ्जनीखर ही प्रधान हैं। यहां गुजराती ब्राह्मण अधिक रहते हैं। रामसनेही, दादू, कबीरपन्थी, रामात्, रामानुज प्रभृति सम्पदायके लोग भी विद्यमान हैं। प्रायः प्रति वृक्षके तलपर सतीस्तम्भ खड़ा है। इस प्रस्तरखण्ड देखनेसे ही पहचानते――सतीको कितना मानते कितना जानते हैं। ब्राह्मणक्षत्रियादिके वर्णक्रमसे प्रस्तरपर स्त्री पुरुषकी मूर्ति बनती है। ब्राह्मणके गो और क्षत्रियके परिचयके लिये अश्व प्रभृति अङ्कित होता है। स्थानीय धार्मिक रमणियों सतीस्तम्भको पूजा करती हैं। नगरसे दक्षिण पूर्व दिक् जोग-शहीद नामक एक पर्वत है। लोग कहते-इसीके नीचे राजा विक्रमादित्यक बत्तीस सिंहासन प्रोथित हैं। पर्वत पर चढ़नसे नगरकी प्राकृतिक शोभा देख पड़ती है। राजा विक्रमादित्यके समय उज्जयिनोमें मानयन्त्र रहा। भारतके प्राचीन भौगोलिक उक्त यन्त्र द्वारा उज्जयिनी से ही प्रथम याम्योत्तरवृत्त खींचते थे। अकबरके पितामह बाबरने इस यन्त्र की बात लिखी है। किन्तु आजकल इस यन्त्रका वृत्तान्त कोई बता नहीं सकता। समझ पड़ता-प्राचीन उज्जयिनीक साथ यह भी लुप्त हो गया। फिर आज भी यहां जय-सिंहका मानन्दिर विद्यमान है, किन्तु अवस्था अच्छी नहीं। कौन उसको उद्धार करेगा! <small>जयसिंह देखो।</small> प्रत्नतत्ववितके देखने योग्य भी अनेक वस्तु हैं। यहां ग्रीक, वाह्लिक, शक और देशीय नरपतिमणके समय की प्रचलित प्राचीन मुद्रा मिली हैं। आज भी प्राचीन उज्जयिनीकी वनस्थली ढूंढ़ते ढूढते हीरा, अक़ीक़, स्वर्ण तथा रौप्यमय मुद्रा और स्त्रीगणका अलङ्कार {{Rule|}} {{smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मध्य मध्य हाथ लग जाते हैं। हम समझते-इसीसे लोग उज्जयिनीको ‘रोज़गारका सदाव्रत’ कहते हैं। नगरके पार्श्व पर राजा भर्तृहरिकी गुहा है। उन्होंने संसारत्यागके पश्चात् इसीका आकर आश्रय पकड़ा था। कोई कोई कहता-इसी स्थानपर भर्तृहरिका प्रामाद था। किन्तु यह सम्भव नहीं। गुहा में सीधे खड़े होने पर छतसे शिर टकराता है। तीन दिक् स्तम्भ लगे हैं। उनपर अस्पष्ट मूर्ति खुदी हैं। स्थान स्थान पर शिवलिङ्ग पड़े, जिनमें केदारेश्वर सबसे बड़े हैं। केवल उन्होंकी पूजा होती है। वामदिक् अन्तर्गुहामें असितप्रस्तरकी दो मूर्तियां हैं। एक कुछ ऊपर और दूसरी उसीके नीचे लगी है। यहां लोग कहते ऊपर गोरखनाथ और नीचे उनके शिष्य भर्तृहरि हैं। {{Outdent|उज्जर (हिं॰) उज्ज्वल देखो।}} {{Outdent|उज्जानक-काश्मीरके उत्तरस्थित एक जनपद। आज-कल इसे स्वात कहते हैं। महाभारतके मतसे उज्जानक एक पवित्र तीर्थ है।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“उज्जानक उपस्पृश्य आर्ष्टि सेनस्य चाश्रमे। पिङ्गायाश्वाश्रमे सात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥” (अनुशासन ५।५०)</poem>}}}} पूर्व काल यह जनपद वितस्ता नदीके पश्चिम तटतक विस्तृत था। मार्कण्डेयपुराणमें इसका नाम उज्जिहान लिखा है―― {{x-smaller|{{c|<poem>“वेदमन्त्रा विमाण्डव्या: शाल्वनीपास्तथा शकाः। उज्जिहानस्तथा वत्सा घोषसंख्यास्तथा खशाः॥” (५८।६),</poem>}}}} महाभारतमें कहा है――कार्तिकेय और वशिष्ठने इस स्थानपर शान्ति पायी थी। इसके पीछे कशवान् नामक हद है। उसमें प्रचुर कुशेशय उपजता है। {{Right|<small>(वन १३० अ॰)</small>}} पूर्व समय इस स्थानपर बौद्ध धर्म भी बहुत प्रबल रहा। फाहियान, सुङ्गायन, युअन् चुयङ्ग प्रभृति चीना परिव्राजकोंने देखकर इस स्थानकी बौद्धधर्म-सम्पर्कीय सकल कथा लिखी है। सुङ्गय्न्ने कहा-यह देश उत्तरमें सुंलि पर्वत और दक्षिणमें भारतसे मिलित है। जलवायु उष्ण और मनोरम है। राज्य प्रायः शत क्रोश विस्तृत है। अधिवासी और उपादेय <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 45|1em}}</noinclude> 6zipn0a1oltyi8s1kbsi79hskbg5c00 665857 665848 2026-07-07T15:16:22Z अँजली चौधरी 2439 665857 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उज्जयिनी-उज्जानक'''|'''१९७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> है। स्थानीय सरोवरमें अनेक आश्चर्य घटना लगी। रहती है। सुनते-सरोवरपर नागकन्धा मध्य मध्य पहुंचती और उपरिभाग नारी तथा निम्नभाग मत्स्यकी मूर्ति-जैसा रखती हैं।<ref>*Journal As. Soc Bengal, Vol. vi. p. 820.</ref> यहां जैनों के भी अनेक मन्दिर देख पड़ते, जिनमें १० श्वेताम्बरी और दिगम्बरी हैं। कितने ही जैनमठ आजकल हिन्दुवोंके अधीन हैं। उनमें जवरेश्वर और जैनभञ्जनीखर ही प्रधान हैं। यहां गुजराती ब्राह्मण अधिक रहते हैं। रामसनेही, दादू, कबीरपन्थी, रामात्, रामानुज प्रभृति सम्पदायके लोग भी विद्यमान हैं। प्रायः प्रति वृक्षके तलपर सतीस्तम्भ खड़ा है। इस प्रस्तरखण्ड देखनेसे ही पहचानते――सतीको कितना मानते कितना जानते हैं। ब्राह्मणक्षत्रियादिके वर्णक्रमसे प्रस्तरपर स्त्री पुरुषकी मूर्ति बनती है। ब्राह्मणके गो और क्षत्रियके परिचयके लिये अश्व प्रभृति अङ्कित होता है। स्थानीय धार्मिक रमणियों सतीस्तम्भको पूजा करती हैं। नगरसे दक्षिण पूर्व दिक् जोग-शहीद नामक एक पर्वत है। लोग कहते-इसीके नीचे राजा विक्रमादित्यक बत्तीस सिंहासन प्रोथित हैं। पर्वत पर चढ़नसे नगरकी प्राकृतिक शोभा देख पड़ती है। राजा विक्रमादित्यके समय उज्जयिनोमें मानयन्त्र रहा। भारतके प्राचीन भौगोलिक उक्त यन्त्र द्वारा उज्जयिनी से ही प्रथम याम्योत्तरवृत्त खींचते थे। अकबरके पितामह बाबरने इस यन्त्र की बात लिखी है। किन्तु आजकल इस यन्त्रका वृत्तान्त कोई बता नहीं सकता। समझ पड़ता-प्राचीन उज्जयिनीक साथ यह भी लुप्त हो गया। फिर आज भी यहां जय-सिंहका मानन्दिर विद्यमान है, किन्तु अवस्था अच्छी नहीं। कौन उसको उद्धार करेगा! <small>जयसिंह देखो।</small> प्रत्नतत्ववितके देखने योग्य भी अनेक वस्तु हैं। यहां ग्रीक, वाह्लिक, शक और देशीय नरपतिमणके समय की प्रचलित प्राचीन मुद्रा मिली हैं। आज भी प्राचीन उज्जयिनीकी वनस्थली ढूंढ़ते ढूढते हीरा, अक़ीक़, स्वर्ण तथा रौप्यमय मुद्रा और स्त्रीगणका अलङ्कार {{Rule|}} {{smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मध्य मध्य हाथ लग जाते हैं। हम समझते-इसीसे लोग उज्जयिनीको ‘रोज़गारका सदाव्रत’ कहते हैं। नगरके पार्श्व पर राजा भर्तृहरिकी गुहा है। उन्होंने संसारत्यागके पश्चात् इसीका आकर आश्रय पकड़ा था। कोई कोई कहता-इसी स्थानपर भर्तृहरिका प्रामाद था। किन्तु यह सम्भव नहीं। गुहा में सीधे खड़े होने पर छतसे शिर टकराता है। तीन दिक् स्तम्भ लगे हैं। उनपर अस्पष्ट मूर्ति खुदी हैं। स्थान स्थान पर शिवलिङ्ग पड़े, जिनमें केदारेश्वर सबसे बड़े हैं। केवल उन्होंकी पूजा होती है। वामदिक् अन्तर्गुहामें असितप्रस्तरकी दो मूर्तियां हैं। एक कुछ ऊपर और दूसरी उसीके नीचे लगी है। यहां लोग कहते ऊपर गोरखनाथ और नीचे उनके शिष्य भर्तृहरि हैं। {{Outdent|उज्जर (हिं॰) उज्ज्वल देखो।}} {{Outdent|उज्जानक-काश्मीरके उत्तरस्थित एक जनपद। आज-कल इसे स्वात कहते हैं। महाभारतके मतसे उज्जानक एक पवित्र तीर्थ है।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“उज्जानक उपस्पृश्य आर्ष्टि सेनस्य चाश्रमे। पिङ्गायाश्वाश्रमे सात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥” (अनुशासन ५।५०)</poem>}}}} पूर्व काल यह जनपद वितस्ता नदीके पश्चिम तटतक विस्तृत था। मार्कण्डेयपुराणमें इसका नाम उज्जिहान लिखा है―― {{x-smaller|{{c|<poem>“वेदमन्त्रा विमाण्डव्या: शाल्वनीपास्तथा शकाः। उज्जिहानस्तथा वत्सा घोषसंख्यास्तथा खशाः॥” (५८।६),</poem>}}}} महाभारतमें कहा है――कार्तिकेय और वशिष्ठने इस स्थानपर शान्ति पायी थी। इसके पीछे कशवान् नामक हद है। उसमें प्रचुर कुशेशय उपजता है। {{Right|<small>(वन १३० अ॰)</small>}} पूर्व समय इस स्थानपर बौद्ध धर्म भी बहुत प्रबल रहा। फाहियान, सुङ्गायन, युअन् चुयङ्ग प्रभृति चीना परिव्राजकोंने देखकर इस स्थानकी बौद्धधर्म-सम्पर्कीय सकल कथा लिखी है। सुङ्गय्न्ने कहा-यह देश उत्तरमें सुंलि पर्वत और दक्षिणमें भारतसे मिलित है। जलवायु उष्ण और मनोरम है। राज्य प्रायः शत क्रोश विस्तृत है। अधिवासी और उपादेय <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 45|1em}}</noinclude> 0e5396nrx7crvg9vqyewqa1peodxctt पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१७९ 250 75864 666088 608989 2026-07-07T15:54:22Z अँजली चौधरी 2439 666088 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''१७८'''|'''उज्जानक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> द्रव्य बहुत हैं। भूमि अतिशय उर्वरा है। इसी जगह पलो (विश्वम्भर ) राजाने अपने पुत्रको भिक्षा स्वरूप दे डाला था। फिर बोधिसत्त्वने निज देह व्याघ्रोको खानेके लिये सौंपा। राजा शाकान्नभोजी परम धार्मिक और सायं व प्रातः काल बुद्धदेवकी अर्चना करनेवाले हैं। पूजाके समय नौबत बजती है। मध्याह्न कालमें वे राजकार्य देखते हैं। स्थानीय लोग यथाकाल नदीमें वाण निको नहीं। रोकते। इससे भूमिको उर्वरा शक्ति बढ़ती है। सन्धनासमय सकल मठमें वाद्य बजने और श्रमण- वर्ग बुद्ध देवकी पूजा करने लगते हैं। उज्जानक पहुं चने पर बुद्धदेव प्रथम नागराज मठ गये थे। किन्तु नागराज उनसे कड हो पानी बरसाने लगे। वृष्टिसे बुद्धको सङ्घाटो भौज गयी थी। पानी बन्द होनेसे वे एक पत्थर पर बैठे। इसी जगह उन्होंने अपना कषाय वसन सुखाया था। वह शुष्क कषाय आज भी उस प्रस्तरके निकट पड़ा और बहु काल बीतते भी वैसा ही बना है। बुद्ध के उपवेशन-स्थानपर स्मरणार्थ एक मठ उठा है। राजधानीसे प्रायः पौन ___ कोस उत्तर पर्वतपर बुद्धको पादुकाका चिह्न अङ्कित है। यहां भी मठ उठ गया है। नगरसे उत्तर ताराका | मन्दिर है। यह मन्दिर पतिवृहत और उच्च है। इसमें बौद्ध देवदेवी और उपासकगणको मूर्तियां है। राजधानीसे दक्षिणपूर्व को पाठ दिन चलने पर एक पार्वतीय प्रदेश मिलता है। यहां बुद्ध तपस्या करते थे। इसी स्थानपर उन्होंने क्षुधात व्याघ्रौको अपने | देहका मांस खिलाया था। इस स्थानमें कल्यता उपजता है। राजधानीसे प्रायः ८८ कोस दूर एक तीर्थ है। इसी जगह बुद्धने लिखनेके लिये अपने देहका | चम उतार लिया। इस पवित्र स्थानको रचाके लिये राजा अशोकने एक वृहत् मन्दिर बनवा दिया था। यमन्-चुयङ्गके मतमें हिन्दकुशके दक्षिणस्थ | समस्त पार्वतीय प्रदेश पौर चिवालयसे सिन्धु नदी | पर्यन्त दरद राज्य उन्नानक देश कहाता था। यहराज्य | ___ दर्य प्रस्थमें ५००० लि (प्रायः २१७ क्रोश ) परिमित उच्च' चौर गिरिपुष तथा उपत्यकासे मिलित है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> समतल भूमिपर उपत्यका और जलाशय है! यहां नानाप्रकार वीज पड़ता, किन्तु यथेष्ट शस्य नहीं उप-जता। अङ्गूर और गन्ना विस्तर होता हैं। भूमिसे लौह और स्वर्ण निकलता है। क्षेत्र हलदी लगानेके लिये अति प्रशस्त हैं। शीत ग्रीष्म समान रहता है। वर्षा यथाकाल पड़ती है। अधिवासी मृदुभाषी, लाजुक और चतुर हैं। वे विद्यानुरागी होते भी कार्यतः विद्यासे अलग रहते हैं। सकल ही प्रायः इन्द्रजाल सीखते हैं। अनेक व्यक्ति महायान सम्प्रदाय-मुक्त हैं। हीनयान सम्प्रदाय पांच प्रकारका है――सर्वास्तिवादी, धर्मगुप्त, महीशासक, काश्यपीय और महासाद्धिक। भाषा अधिकांश भारतवर्ष जैसी है। लिखन-प्रणाली भी वैसा ही है। यहाँ ४।५ प्रधान नगर हैं। राजा मङ्गली नगरीमें रहते हैं। यह राजा शाक्य-वंशीय हैं। स्थानीय सुवास्तु (स्वात) नदीके उभय तीरपर प्रायः १४०० सङ्घाराम बने हैं। मङ्गली-नगरीकी चारो दिक् असंख्य बौद्ध कोर्तियां देख पड़ती हैं। हिन्दुवोंके भी १० देवमन्दिर बने हैं। इस प्रदेशमें मैत्रेयबुद्धकी अति प्रकाण्ड मूर्ति रही। फाहियानने लिखा है―― यह मूर्ति बुद्धके निर्वाणसे २८० वर्ष पीछे (अशोकराजके समय) बनी थी। युअन् चुयङ्गने यही मूर्ति १०० फीट ऊंची पायी। फाहियान तथा सुंयन ‘उचङ्ग’ और युअन् चुअङ्ग-ने इस स्थानका नाम ‘उचङ्ग-न’ लिखा है। जुले, कनिहाम् प्रभृति युरोपीयोंने चीना परिव्राजकोक्ता उक्त शब्दका संस्कृत नाम ‘उद्यान’ ठहराया है। किन्तु यह मत भ्रमपूर्ण समझ पड़ता है। क्योंकि उक्त नामका संस्कृत ‘उद्यान’ नहीं――‘उज्जानक’ होना ही अधिक सम्भव है। विशेषतः महाभारत पुराणादि और चीना परिव्राजकके निरूपित स्थानपर उभयमें समधिक ऐक्य रहनेसे सहज ही मानना पड़ता――इनमें कोई भेद नहीं, भिन्न देशमें उच्चारण तथा लिखन-प्रणालीके भेदसे भिन्न आकार बन गया है। स्थानीय पांचकोरा, बिजावर, स्वात और बुनेर प्रदेश प्राचीन उज्जानक राज्य के अन्तर्गत रहा। स्वात देखो। २ महर्षि उतङ्क के आश्रमकी निकटवर्ती एक सु- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> e9snz328fsysrvjvhp3leqkzgbxel4n 666235 666088 2026-07-07T16:20:07Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666235 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१७८'''|'''उज्जानक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> द्रव्य बहुत हैं। भूमि अतिशय उर्वरा है। इसी जगह पलो (विश्वम्भर) राजाने अपने पुत्रको भिक्षा स्वरूप दे डाला था। फिर बोधिसत्त्वने निज देह व्याघ्रोको खानेके लिये सौंपा। राजा शाकान्नभोजी परम धार्मिक और सायं व प्रातः काल बुद्धदेवकी अर्चना करनेवाले हैं। पूजाके समय नौबत बजती है। मध्याह्न कालमें वे राजकार्य देखते हैं। स्थानीय लोग यथाकाल नदीमें वाण आनेको नहीं रोकते। इससे भूमिकी उर्वरा शक्ति बढ़ती है। सन्धयासमय सकल मठमें वाद्य बजने और श्रमण-वर्ग बुद्ध देवकी पूजा करने लगते हैं। उज्जानक पहुंचने पर बुद्धदेव प्रथम नागराज मठ गये थे। किन्तु नागराज उनसे क्रुद्ध हो पानी बरसाने लगे। वृष्टिसे बुद्धकी सङ्घाटी भीज गयी थी। पानी बन्द होनेसे वे एक पत्थर पर बैठे। इसी जगह उन्होंने अपना कषाय वसन सुखाया था। वह शुष्क कषाय आज भी उस प्रस्तरके निकट पड़ा और बहु काल बीतते भी वैसा ही बना है। बुद्ध के उपवेशन-स्थानपर स्मरणार्थ एक मठ उठा है। राजधानीसे प्रायः पौन कोस उत्तर पर्वतपर बुद्धकी पाटुकाका चिह्न अङ्कित है। यहां भी मठ उठ गया है। नगरसे उत्तर ताराका मन्दिर है। यह मन्दिर अतिवृहत् और उच्च है। इसमें बौद्ध देवदेवी और उपासकगणकी मूर्तियां है। राजधानीसे दक्षिणपूर्व को आठ दिन चलने पर एक पार्वतीय प्रदेश मिलता है। यहां बुद्ध तपस्या करते थे। इसी स्थानपर उन्होंने क्षुधार्त व्याघ्रीको अपने देहका मांस खिलाया था। इस स्थानमें कल्यतरु उपजता है। राजधानीसे प्रायः ८।९ कोस दूर एक तीर्थ है। इसी जगह बुद्धने लिखनेके लिये अपने देहका चर्म उतार लिया। इस पवित्र स्थानकी रचाके लिये राजा अशोकने एक वृहत् मन्दिर बनवा दिया था। यूअन्-चुयङ्गके मतमें हिन्दकुशके दक्षिणस्थ समस्त पार्वतीय प्रदेश और चित्रालयसे सिन्धु नदी पर्यन्त दरद राज्य उज्जानक देश कहाता था। यहराज्य दैर्ध्य प्रस्थमें ५००० लि (प्रायः २१७ क्रोश) परिमित और गिरिपुज्ज तथा उपत्यकासे मिलित है। उच्च <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> समतल भूमिपर उपत्यका और जलाशय है! यहां नानाप्रकार वीज पड़ता, किन्तु यथेष्ट शस्य नहीं उप-जता। अङ्गूर और गन्ना विस्तर होता हैं। भूमिसे लौह और स्वर्ण निकलता है। क्षेत्र हलदी लगानेके लिये अति प्रशस्त हैं। शीत ग्रीष्म समान रहता है। वर्षा यथाकाल पड़ती है। अधिवासी मृदुभाषी, लाजुक और चतुर हैं। वे विद्यानुरागी होते भी कार्यतः विद्यासे अलग रहते हैं। सकल ही प्रायः इन्द्रजाल सीखते हैं। अनेक व्यक्ति महायान सम्प्रदाय-मुक्त हैं। हीनयान सम्प्रदाय पांच प्रकारका है――सर्वास्तिवादी, धर्मगुप्त, महीशासक, काश्यपीय और महासाद्धिक। भाषा अधिकांश भारतवर्ष जैसी है। लिखन-प्रणाली भी वैसा ही है। यहाँ ४।५ प्रधान नगर हैं। राजा मङ्गली नगरीमें रहते हैं। यह राजा शाक्य-वंशीय हैं। स्थानीय सुवास्तु (स्वात) नदीके उभय तीरपर प्रायः १४०० सङ्घाराम बने हैं। मङ्गली-नगरीकी चारो दिक् असंख्य बौद्ध कोर्तियां देख पड़ती हैं। हिन्दुवोंके भी १० देवमन्दिर बने हैं। इस प्रदेशमें मैत्रेयबुद्धकी अति प्रकाण्ड मूर्ति रही। फाहियानने लिखा है―― यह मूर्ति बुद्धके निर्वाणसे २८० वर्ष पीछे (अशोकराजके समय) बनी थी। युअन् चुयङ्गने यही मूर्ति १०० फीट ऊंची पायी। फाहियान तथा सुंयन ‘उचङ्ग’ और युअन् चुअङ्ग-ने इस स्थानका नाम ‘उचङ्ग-न’ लिखा है। जुले, कनिहाम् प्रभृति युरोपीयोंने चीना परिव्राजकोक्ता उक्त शब्दका संस्कृत नाम ‘उद्यान’ ठहराया है। किन्तु यह मत भ्रमपूर्ण समझ पड़ता है। क्योंकि उक्त नामका संस्कृत ‘उद्यान’ नहीं――‘उज्जानक’ होना ही अधिक सम्भव है। विशेषतः महाभारत पुराणादि और चीना परिव्राजकके निरूपित स्थानपर उभयमें समधिक ऐक्य रहनेसे सहज ही मानना पड़ता――इनमें कोई भेद नहीं, भिन्न देशमें उच्चारण तथा लिखन-प्रणालीके भेदसे भिन्न आकार बन गया है। स्थानीय पांचकोरा, बिजावर, स्वात और बुनेर प्रदेश प्राचीन उज्जानक राज्य के अन्तर्गत रहा। स्वात देखो। २ महर्षि उतङ्क के आश्रमकी निकटवर्ती एक सु- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> axxmlh2e3ceuvzzdwftd1q9or1brn2t पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१८० 250 75865 666347 608991 2026-07-07T16:54:04Z अँजली चौधरी 2439 666347 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उज्जालक-उज्झटा'''|'''१७९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> विस्तीर्ण बालुकापूर्ण समतल मरुभूमि । (हरिवंश ११ १०) इस मरुस्थलके मध्यसे नलिनी नदी बहती है। (मत्स्यपु० १३३ १०) । उज्जालक, उचानक देखो। उज्जासन (सं० क्लो) उत्-जस्-णिच-ल्य ट् । मारण, वध, कृत्ल, जानका लेना। 'उज्जित्र (सं० त्रि.) उत्-वा-श। आवाणकर्ता, सूचनेवाला। । उज्जिति (सं० स्त्री० ) उत्-जि-क्तिन् । १ उत्कृष्ट जय, गहरी फतेह। २ वाजसनेयसंहिताका मन्त्रविशेष। 'उज्नितिमनुपहतविघ्ने न हवि: खीकरणरूपमुत्कष्ट जयम् । (वेददौपे महौधर) उज्जिहान, उचानक देखो। उज्जिहाना (म० स्त्री० ) एक प्राचीन नगरी। भरत इन्होंने उणादिसूत्रको वृत्ति बनायी थी। वृत्तिमें राजग्गृहसे अयोध्या जाते समय इस नगरीमें पहुंचे प्राचीन कोष और स्थान-स्थानपर प्रमाणरूप प्राचीन थे। उस समय उज्जिहाना प्रियक वृक्षके उपवनसे काव्य उड़त हैं। कह नहीं सकते-उज्वलदत्त किस शोभित रही। समय विद्यमान रहे। किन्तु ११११ ई०को महेश्वरने "तव रम्य बने वासं कृत्वासौ प्राङमुखे ययौ। जो कोष रचा, उसे इन्होंने अपनी वृत्तिमें प्रमाणस्वरूप उद्यानमुजिहानाया: प्रियका यव पादपाः ॥” (रामायण २०७१।१२) रखा है। फिर १४३१ ई०को रायमुकुटने अपनी- उजिहीर्षा (सं० स्त्री० ) ग्रहण करनेको इच्छा, अमरकोषको टोकामें उज्ज्वलदत्तका नाम लिखा । पकड़ लेनेको खाहिश। ऐसा होनेसे समझ पड़ता-सम्भवतः वे ई०के १२वें उन्नीविन (सं०वि०) उत-जीव-णिनि। १ पुनार वा १३वें शताब्द विद्यमान रहे। जी उठनेवाला, जो दो बारा जिन्दा हो गया हो। उज्ज्वलन (सं० लो०) उत्-ज्वल भावे ल्युट । .(पु.) २ काकराज मेघवर्णके सभासद। १ उद्दीप्ति, चमक। २ निर्मलता, सफाई ।। उज्जम्भ (सं० त्रि.) उत्-जृम्भि-घञ्। १ प्रफुल्ल, प्रस्फु- उज्ज्वला (सं० लो०) १ दीप्ति, चमक । २ जगतो. टित, फूला या खिला हुआ। २ उद्घाटित, खुला।। छन्दःका एक भेद। यह बारह अक्षरकी रहती. और उज्जम्भण (सं० क्लो०) उत्-जम्भ भावे ल्यु ट। मुख- दो नगण, एक भगण तथा एक रगण रखती है। विकाश, जमहाई। - २ कुमरिच, लालमिर्च । उज्जम्भित : (सं० त्रि.) उत्-जम्भि-क्त । १ विकसित, उज्ज्वलित (सं० त्रि०) दीप्तिमान, रौशन, चमकने शिगुफ ता, खिला हुआ। २ वेष्टित, घिरा हुआ। वाला, जो झलकाया गया हो। (लो०) ३चेष्टा, कोशिश। ४ उज्जम्भण, जमहाई। उझ-तुदा० पर० सक० सेट् । यह त्याग और उज्जेय (सं० पु०) उत्-जिष् भावे घञ् । १ उन्नति, विराग अर्थमें लगता है। तरक्की, बढ़ती। (त्रि०) भावे अच् । २ उत्कृष्ट | उज्झ (स० पु.) उज्-भ-अच् । त्याग, विस- जययुक्त, जो खू ब जीता हो। जन, छूट, भूल। (मनु १९५६ ) उन्नेषिन् (सं॰ वि॰) उत्-जिष्-णिनि। उत्छष्ट उज्झक (सं० पु.) १ मेघ, बादल। २ तापस, जयशील, खूब फतेह करनेवाला । फ़कौर। उज्जैन-ठव्वयिनी देखो। .. ... उजाटा (सं॰ स्त्री॰) भूम्यामसको, भुई पांवला । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उज्जा (सं॰ त्रि॰) आरोपित-ज्या, कमान् ढीली कर देनेवाला। <small>‘उज्जाधन्दा आरोपित न्यधनुष्काः।’ (कात्यायने-श्रौतस्वभाष्ये कर्काचार्य)</small>}} {{Outdent|उज्ज्वल (सं॰ त्रि॰) उत्-ज्वल्-अच्। १ दीप्तिमान, चमकीला। २ विमल, साफ़। ३ विकाशी, खिला हुआ। ४ ज्वलन्त, जलता हुआ। ५ सुन्दर, ख़ूब-सूरत। (पु॰) ६ शृङ्गाररस, मुहब्बत, प्यार। (क्ली॰) ७ स्वर्ण, सोना। ८ धान्यभेद, एक अनाज।}} {{Outdent|उज्ज्वलता (सं॰ स्त्री॰) १ दीप्ति, चमक। २ सुन्दरता, ख़ूबसूरती।}} {{Outdent|उज्ज्वलत्व (सं॰ क्ली॰) <small>उज्ज्वलता देखो।</small>}} {{Outdent|उज्ज्वलदत्त (सं॰ पु॰) एक विख्यात पण्डित।}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> kclbso4ao3bpzhhlpsq1n5vw391qnw7 666351 666347 2026-07-07T17:31:26Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित 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।।}} {{Outdent|उज्ज्वला (सं॰ क्ली॰) १ दीप्ति, चमक। २ जगती-छन्दःका एक भेद। यह बारह अक्षरकी रहती और दो नगण, एक भगण तथा एक रगण रखती है। २ कुमरिच, लालमिर्च।}} {{Outdent|उज्ज्वलित (सं॰ त्रि॰) दीप्तिमान, रौशन, चमकने वाला, जो झलकाया गया हो।}} {{Outdent|उज्झ्――तुदा॰ पर॰ सक॰ सेट्। यह त्याग और विराग अर्थमें लगता है।}} {{Outdent|उज्झ (सं॰ पु॰) उज्-भ-अच्। त्याग, विस-र्जन, छूट, भूल। <small>(मनु ११।५६)</small>}} {{Outdent|उज्झक (सं॰ पु॰) १ मेघ, बादल। २ तापस, फ़कीर।}} {{Outdent|उज्झटा (सं॰ स्त्री॰) भूम्यामसकी, भुई आंवला।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 23xwze0bsvcx5z8uwk7g7bxexbpfok6 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१८१ 250 75866 666353 608992 2026-07-07T17:48:24Z अँजली चौधरी 2439 666353 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''१८०'''|'''उउभाड़-उज्छ'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> उज्झड़ (हिं० वि०) अत्यन्त जड़, बेवक फ़, जिसे | उजविरासत (अ॰ स्त्री०) अंशदायको आपत्ति, . जरासी भी समझ न रहे। बपौतीको बहस। उज्मन (सं० ली.) उज-झा-त्युट । उझकना (हिं. क्रि०) १ देखनेके लिये पदाग्रपर छोड़ाई। (मिताचरा) खड़े होना, उचककर झांकना। २ अकस्मात् गिर उज्झित (सं० त्रि०) उज्-झा-त । १ त्यक्त, वर्जित, पड़ना, एकायेक ऊपरसे नीचे आना। ३लम्फन छोड़ा हुआ। २ उपशमित, दबाया हुआ, जो राक! करना, कूदना-फांदना। ४ उन्नत होना, ऊंचा पड़ना। दिया गया हो। ५ चकत होना, चौंक उठना! उज्यारा, उजाला देखो उझकुन, उचकन देखी उज्यारो, उनालौ देखो: उझलना (हिं.क्रि.) १ एक पानसे दूसरेमें उडे . उज्यास, उजास देखो। लना, बहाना, धार बांधके डालना, ढालना। २ उन्नत उजर (अ० पु.) १ प्रायत्ति, बहस। २ छल, | होना, बढ़ना, उमड़ उठना। बहाना। "कुकरको उच्च है, चाकरको उच्च नही।" (लोकोक्ति)| उझांकना (हिं० क्रि.) झांकना, उचक उचकक ३ विनय, प्रार्थना, आरज, मिन्नत। देखना। उन,कवी (अ. स्त्री०) प्रबल आपत्ति, जोरदार बहस । उझारी-युक्तप्रान्तके मुरादाबाद जिलेका एक गांव । उच्चकान्नी (अ० स्त्री०) न्यायरूप आपत्ति, कानन यह अक्षा० २८° ३८ ३०“उ० और ट्राधि० ७८° २३ का उज। ५५“पू०पर अवस्थित है। उझारी हंसपुर तहसीलमें उज्जववाही (अ० स्त्री०) १ अन्तेष्टि क्रियामें उप लगती, जो साढ़े ७ मील दक्षिणपूर्व पड़ती है। स्थित हो न सकनेकी प्रार्थना ! २ अनुशोचन, सम्परि पांच मसजिदोंमें मुसलमान-साधु शाह दाऊदका वेदन, मातमपुरसौ। मकबरा भी है। सप्ताह में एक बार बाजार लगता है। उच्चगलती (अ० स्त्री०) भ्रमको आपत्ति, भूलको | उझालना, उझलना देखी। बहस। उझिलना, उझलना देखो। उज्जज़बानी (अ० स्त्री०) वाचिक आपत्ति, बातोंको | उझिला (हिं. स्त्री० ) १ अङ्गप्रलेपार्थ पक्क सांप, बहस। जो सरसों उबटनके लिये उबाली गयी हो। २ क्षेत्रके . उज्जतमहीदी (अ॰ स्त्री०) प्राथमिक आपत्ति, शुरू उच्च स्थानको खोदी हुयी मृत्तिका, जो मट्ठी खेतको. को बहस। ऊंची जगहसे खोदकर निकाली गई हो। इससे उच्चदार (अ. पु०) आपत्ति उठानवाला, जो बहस पास के गड्डे भरे जाते हैं। ३ भोजन विशेष, एक करता हो। खाना। चुवा महुवा और पोस्तका दाना मिलकर उजदारी (अ॰ स्त्री०) १ आपत्तिका उल्लेख, बहसका . उबालनेसे उझिला बनता है। बयान्। २ प्राकसूचन, निषेध, उमानात तजवीज उझीना ( हिं० पु०) अहरा, कौड़ा, जलाने के लिये मुकद्दमको मुरादका एलान्। . सुधार कर रखा हुअा कण्डोंका ढेर। उज्ज,फरेब (अ० स्त्री०) छलकी आपत्ति, धोकेको बहस। उञ्चास, उनचास देखो। उजमाकू,ल (अ० स्त्री०) प्रबल आपत्ति, जो बहस उञ्छ ( स० पु० क्लो०) उछि-घञ् । १ ऋत, शिल्प, माक ल हो। धान्चकणाग्रहण, खोशाचीनी, सिल्लेकी बिनाई। .. उज्जमाज रत (अ० स्त्री०) विनय, प्रार्थना, मिन्नत ।। "शिलोञ्छमप्याददौत विप्रोऽजीवन् यतस्ततः। उज्जमुद्दालेह (अ० स्त्री०) प्रतिवादीको आपत्ति, प्रतिग्रहाच्छिलः ये यांस्ततोऽञ्छः प्रशस्यते ॥” (मनु १०।११२)- बचावको बहस। . . जीविका चला न सकने पर ब्राह्मणको शिलोञ्छ.. <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> tulsil2ic7usnhgzwo9xdrd6u4ca5vt 666359 666353 2026-07-07T19:08:16Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666359 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१८०'''|'''उउभाड़-उज्छ'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उज्झड़ (हिं॰ वि॰) अत्यन्त जड़, बेवक़ूफ़, जिसे ज़रासी भी समझ न रहे।}} {{Outdent|उज्झन (सं॰ क्ली॰) उज्-झ-ल्युट्। विसर्जन छोड़ाई। <small>(मिताचरा)</small>}} {{Outdent|उज्झित (सं॰ त्रि॰) उज्-झ-क्त। १ त्यक्त, वर्जित, छोड़ा हुआ। २ उपशमित, दबाया हुआ, जो रोक दिया गया हो। {{Outdent|उज्यारा, <small>उजाला देखो</small>}} {{Outdent|उज्यारी, <small>उनालौ देखो:</small>}} {{Outdent|उज्यास, <small>}}उजास देखो।</small>}} {{Outdent|उजर (अ॰ पु॰) १ प्रायत्ति, बहस। २ छल, बहाना।<small> “कुकरको उच्च है, चाकरको उच्च नही।” (लोकोक्ति)</small>३ विनय, प्रार्थना, आरज, मिन्नत।}} {{Outdent|उज्रक़वी (अ॰ स्त्री॰) प्रबल आपत्ति, जोरदार बहस।}} {{Outdent|उच्चकानूनी (अ॰ स्त्री॰) न्यायरूप आपत्ति, कानून का उज्र।}} {{Outdent|उज्जख्वाही (अ॰ स्त्री॰) १ अन्तेष्टि क्रियामें उपस्थित हो न सकनेकी प्रार्थना! २ अनुशोचन, सम्परिवेदन, मातमपुरसी।}} {{Outdent|उच्चगलती (अ॰ स्त्री॰) भ्रमकी आपत्ति, भूलकी बहस।}} {{Outdent|उज्जज़बानी (अ॰ स्त्री॰) वाचिक आपत्ति, बातोंकी बहस।}} {{Outdent|उच्चतमहीदी (अ॰ स्त्री॰) प्राथमिक आपत्ति, शुरू की बहस।}} {{Outdent|उच्चदार (अ॰ पु॰) आपत्ति उठानवाला, जो बहस करता हो।}} {{Outdent|उजदारी (अ॰ स्त्री॰) १ आपत्तिका उल्लेख, बहसका बयान्। २ प्राकसूचन, निषेध, उमानात तजवीज मुकद्दमकी मुरादका एलान्। }} {{Outdent|उज्ज़फ़रेब (अ॰ स्त्री॰) छलकी आपत्ति, धोकेकी बहस।}} {{Outdent|उज्रमाकूल (अ॰ स्त्री॰) प्रबल आपत्ति, जो बहस माकल हो।}} {{Outdent|उज्जमाज़रत (अ॰ स्त्री॰) विनय, प्रार्थना, मिन्नत।}} {{Outdent|उज्जमुद्दालैह (अ॰ स्त्री॰) प्रतिवादीकी आपत्ति, बचावको बहस।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उज्रविरासत (अ॰ स्त्री॰) अंशदायकी आपत्ति बपौतीको बहस।}} {{Outdent|उझकना (हिं॰ क्रि॰) १ देखनेके लिये पदाग्रपर खड़े होना, उचककर झांकना। २ अकस्मात् गिर पड़ना, एकायेक ऊपरसे नीचे आना। ३ लम्फन करना, कूदना-फांदना। ४ उन्नत होना, ऊंचा पड़ना। ५ चकत होना, चौंक उठना!}} {{Outdent|<small>उझकुन, उचकन देखो</small>}} {{Outdent|उझलना (हिं॰ क्रि॰) १ एक पात्रसे दूसरेमें उडेलना, बहाना, धार बांधके डालना, ढालना। २ उन्नत होना, बढ़ना, उमड़ उठना।}} {{Outdent|उझांकना (हिं॰ क्रि॰) झांकना, उचक उचकके देखना।}} {{Outdent|उझारी-युक्तप्रान्तके मुरादाबाद ज़िलेका एक गांव। यह अक्षा॰ २८° ३९‘ ३०‘‘ उ॰ और द्राघि॰ ७८° २३° ५५‘‘ पू॰ पर अवस्थित है। उझारी हंसपुर तहसीलमें लगती, जो साढ़े ७ मील दक्षिणपूर्व पड़ती है।}} पांच मसजिदोंमें मुसलमान-साधु शाह दाऊदका मकबरा भी है। सप्ताह में एक बार बाजार लगता है। {{Outdent|उझालना, <small>उझलना देखो।</small>}} {{Outdent|उझिलना, <small>उझलना देखो।</small>}} {{Outdent|उझिलाना (हिं॰ स्त्री॰) १ अङ्गप्रलेपार्थ पक्क सर्षप, जो सरसों उबटनके लिये उबाली गयी हो। २ क्षेत्रके उच्च स्थानको खोदी हुयी मृत्तिका, जो मट्ठी खेतकी ऊंची जगहसे खोदकर निकाली गई हो। इससे पास के गड्डे भरे जाते हैं। ३ भोजन विशेष, एक खाना। चुवा महुवा और पोस्तका दाना मिलकर उबालनेसे उझिला बनता है। }} {{Outdent|उझीना (हिं॰ पु॰) अहरा, कौड़ा, जलाने के लिये सुधार कर रखा हुअा कण्डोंका ढेर।}} {{Outdent|उञ्चास, <small>उनचास देखो।</small>}} {{Outdent|उञ्छ (स॰ पु० क्ली०) उछि-घञ् । १ ऋत, शिल्प, धान्चकणाग्रहण, खोशाचीनी, सिल्लेकी बिनाई।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“शिलोञ्छमप्याददौत विप्रोऽजीवन् यतस्ततः। प्रतिग्रहाच्छिलः श्रेयांस्ततोऽप्युञ्छः प्रशस्यते॥” (मनु १०।११२)-</poem>}}}} जीविका चला न सकने पर ब्राह्मणको शिलोञ्छ <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9b7n3qupjxla3d0jq9w8udwqw75hp47 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१८२ 250 75867 666361 608993 2026-07-07T19:16:13Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666361 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उच्छन-उठतौ'''|'''१८१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> वृत्तिसे निर्वाह करना चाहिये। क्योंकि असत् प्रति-: “मगैवर्तितरीनन्ध मुटजागनभूमिषु ।” (रघु २५२) २ सहमात्र, एक ग्रहसे शिल श्रेष्ठ होता और उसको अपेक्षा भी उच्छ मकान् । वृत्तिका पद अधिक प्रशस्त है। | उटड़पा (हिं. पु.) उटहड़ा, उटड़ा, गाड़ी खड़ी "कुशूलकुम्भीधान्यो वा वैद्यहिकोऽस्तनोऽपि वा । करनेका डण्डा। यह गाड़ीके आगे लगता और जीवदापि शिलोकेन श्रेयानेषां परः परः ॥” (याज्ञवल्क्य १।१२८)। अग्रभागको उठाये रहता है। 'एकैकधान्यादि गुड़कोचयनमुञ्छः ।' (कुल्लू क) उटड़ा, उटड़पा देखो। २ उच्छशील, सौला बीनने वाला। उटारी (हिं. स्त्री०) पहुंटा, चारा काटने की लकड़ो। उन्छन (सं. ली.) उछि-ल्यट। संग्रहकरण, खेतमें उटेव (हिं. पु०) काष्ठखण्ड विशेष, लकड़ीके दो सोले या बाजारमें दानका बीनना। टुकड़े। यह छाजनकी धरनमें लगते हैं। इनपर उन्छवृत्ति (स. स्त्री०) धान्यकणाके संग्रहसे निर्वाह एक गड़ारी रखकर धरन जमाते हैं। . .. सौला बीननेका रोजगार। उट्टा (हिं. पु०) पोटनी। उज छशिल (सं० लो०) उज कञ्च शिलश्चेत्येकव- उठ-भा. पर० सक० सेट। इससे पाघात उपघात द्भावः। उच्छवृत्ति, सिल्ला बीननेका रोजगार। करने या मारने-गिरानका अर्थ निकलती है। "ऋतमुञ्चशिल ज्ञेयममृतं स्वादयाचितम् ।” (मनु ४५) उठंगन (हिं. पु.) १ अवष्टम्भ, पाया, भाड़, उच्छशील (सं० त्रि०) धान्यकणाके संग्रहसे निर्वाह टेकनी, थूनी। करनेवाला, जी सीला बीनकर काम चलाता हो। उठंगना (हिं. क्रि०) १ अवष्टम्भ पकड़ना, टेक उट (सं० पु०) शुष्क तृण, सूखी घास, फस। यह लेना, तकिया लगाना । २ आश्रयमें पड़ जाना, झोपड़े और छप्पर बनाने में लगता है। भरोसे रहना। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उटकना (हिं. क्रि०) १ प्लव लगाना, कुदकना, उठगल (हि० वि०) मन्द, कुन्द, ग उठंगल (हिं० वि०) मन्द, कुन्द, गावदी। मूर्ख उछलना, कूदना। २ अनुमान बांधना, अन्दाज. व्यक्तिको 'उठंगल आदमों और कुशासित राज्यको लगाना। 'उठंगल मुल्क' कहते हैं। उटकनाटक (हिं० वि०) अटुभुत, अनोखा। उठंगवाना (हिं. क्रि०) उठंगनेको आज्ञा देना, उटक्करलैस (हिं० वि०) इच्छानुसारी, मनमाना, उठगानका काम दूसरेसे लेना। ऐसा-वैसा। उठगाना (हिं० क्रि०) अवष्टम्भ देना, टेक पहुं- उटङ्ग (हिं० वि०) १ सङ्कुचित, ऊंचा हो रहने चाना। २ आश्रयमें डालना, भरोसे रखना। कपाट वाला, जो नीचे न पहुंचता हो। १ कुनिमित, जो देनेको 'किवाड़ उठगाना' कहते हैं। . अच्छी तरह कटा छटा न हो। उठक (हिं. स्त्री०) उत्थान, उठान। यह शब्द उटङ्गन (हिं पु०) तृणविशेष, एक घास। यह प्राय: यौगिक पदमें लगता है, जैसे-बैठक-उठक।.. शीतल स्थान और नदौके कछारमें उपजती है।। उठगन, उठंगन देखो। .. .. तीनका रूप रहते भी चार पत्तियां लगती हैं। लोग उठतक (हिं. पु.) १ उड़तक, जोन् या काठोके • शाक बनाकर खाते हैं। हिन्दी में प्रायः गुठवा कहते बीचको गद्दी। इसे रखनेपर पिठलगे घोड़ेको सवारी हैं। उटङ्गन शीतल, लघु और कषाय होता है। इससे देते या माल लादते कष्ट नहीं पड़ता। २ अवष्टम्भ, मल सकता और सबिपात, ज्वर, प्रमेह तथा खास- पाया, टेक। . ... विकार घटता है। ............ . उठत-ब ठत, उठते बैठते देखो। ......... उटज (सं०: पु०) .उटाः तृणपर्णादयस्तेभ्यो जायते, उठती (हिं० वि० ) १ उद्गमनयोल, चढ़ती, बढ़ती जन ड। १ पर्णशाला, घासफूससे. बना. झोपड़ा। २ परिषति-थोल, झुकती, उतरती। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 46|1em}}</noinclude> doyj3yhjvwol6y5lnl16zpqshnhe8wh 666371 666361 2026-07-08T01:15:48Z अँजली चौधरी 2439 666371 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उच्छन-उठतौ'''|'''१८१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> वृत्तिसे निर्वाह करना चाहिये। क्योंकि असत् प्रति-: ग्रहसे शिल श्रेष्ठ होता और उसको अपेक्षा भी उच्छ वृत्तिका पद अधिक प्रशस्त है। | "कुशूलकुम्भीधान्यो वा वैद्यहिकोऽस्तनोऽपि वा । जीवदापि शिलोकेन श्रेयानेषां परः परः ॥” (याज्ञवल्क्य १।१२८)। 'एकैकधान्यादि गुड़कोचयनमुञ्छः ।' (कुल्लू क) २ उच्छशील, सौला बीनने वाला। उन्छन (सं. ली.) उछि-ल्यट। संग्रहकरण, खेतमें सोले या बाजारमें दानका बीनना। उन्छवृत्ति (स. स्त्री०) धान्यकणाके संग्रहसे निर्वाह . .. सौला बीननेका 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और उसको अपेक्षा भी उच्छ वृत्तिका पद अधिक प्रशस्त है। | "कुशूलकुम्भीधान्यो वा वैद्यहिकोऽस्तनोऽपि वा । जीवदापि शिलोकेन श्रेयानेषां परः परः ॥” (याज्ञवल्क्य १।१२८)। 'एकैकधान्यादि गुड़कोचयनमुञ्छः ।' (कुल्लू क) २ उच्छशील, सौला बीनने वाला। उन्छन (सं. ली.) उछि-ल्यट। संग्रहकरण, खेतमें सोले या बाजारमें दानका बीनना। उन्छवृत्ति (स. स्त्री०) धान्यकणाके संग्रहसे निर्वाह . .. सौला बीननेका रोजगार। उज छशिल (सं० लो०) उज कञ्च शिलश्चेत्येकव- द्भावः। उच्छवृत्ति, सिल्ला बीननेका रोजगार। "ऋतमुञ्चशिल ज्ञेयममृतं स्वादयाचितम् ।” (मनु ४५) उच्छशील (सं० त्रि०) धान्यकणाके संग्रहसे निर्वाह करनेवाला, जी सीला बीनकर काम चलाता हो। उट (सं० पु०) शुष्क तृण, सूखी घास, फस। यह झोपड़े और छप्पर बनाने में लगता है। उटकना (हिं. क्रि०) १ प्लव लगाना, कुदकना, उठंगल (हिं० वि०) मन्द, कुन्द, उछलना, कूदना। २ अनुमान बांधना, अन्दाज. लगाना। उटकनाटक (हिं० वि०) अटुभुत, अनोखा। उटक्करलैस (हिं० वि०) इच्छानुसारी, मनमाना, ऐसा-वैसा। उटङ्ग (हिं० वि०) १ सङ्कुचित, ऊंचा हो रहने वाला, जो नीचे न पहुंचता हो। १ कुनिमित, जो अच्छी तरह कटा छटा न हो। उटङ्गन 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{{Outdent|उठंगन (हिं॰ पु॰) १ अवष्टम्भ, पाया, आड़, टेकनी, थूनी।}} {{Outdent|उठंगना (हिं॰ क्रि॰) १ अवष्टम्भ पकड़ना, टेक लेना, तकिया लगाना। २ आश्रयमें पड़ जाना, भरोसे रहना।}} {{Outdent|उठंगल (हिं॰ वि॰) मन्द, कुन्द, गावदी। मूर्ख व्यक्तिको ‘उठंगल आदमी’ और कुशासित राज्यको ‘उठंगल मुल्क’ कहते हैं।}} {{Outdent|उठंगवाना (हिं॰ क्रि॰) उठंगनेको आज्ञा देना, उठगानका काम दूसरेसे लेना।}} {{Outdent|उठंगाना (हिं॰ क्रि॰) अवष्टम्भ देना, टेक पहुंचाना। २ आश्रयमें डालना, भरोसे रखना। कपाट देनेको ‘किवाड़ उठगाना’ कहते हैं।}} {{Outdent|उठक (हिं॰ स्त्री॰) उत्थान, उठान। यह शब्द प्राय: यौगिक पदमें लगता है, जैसे-बैठक-उठक।}} {{Outdent|उठगन, <small>उठंगन देखो।</small>}} {{Outdent|उठतक (हिं॰ प॰.) १ उड़तक, जीन् या काठीके बीचकी गद्दी। इसे रखनेपर पिठलगे घोड़ेको सवारी देते या माल लादते कष्ट नहीं पड़ता। २ अवष्टम्भ, पाया, टेक।}} {{Outdent|उठत-बैठत, <small>उठते बैठते देखो।</small>}} {{Outdent|उठती (हिं॰ वि॰) १ उद्गमनशील, चढ़ती, बढ़ती २ परिषति-शील, झुकती, उतरती।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol 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{{Outdent|उच्छशील (सं॰ त्रि॰) धान्यकणाके संग्रहसे निर्वाह करनेवाला, जो सीला बीनकर काम चलाता हो।}} {{Outdent|उट (सं॰ पु॰) शुष्क तृण, सूखी घास, फूस। यह झोपड़े और छप्पर बनाने में लगता है।}} {{Outdent|उटकना (हिं॰ क्रि॰) १ प्लव लगाना, कुदकना, उछलना, कूदना। २ अनुमान बांधना, अन्दाज लगाना।}} {{Outdent|उटकनाटक (हिं॰ वि॰) अद्रभुत, अनोखा।}} {{Outdent|उटक्करलैस (हिं॰ वि॰) इच्छानुसारी, मनमाना, ऐसा-वैसा।}} {{Outdent|उटङ्ग (हिं॰ वि॰) १ सङ्कुचित, ऊंचा ही रहने-वाला, जो नीचे न पहुंचता हो। १ कुनिर्मित, जो अच्छी तरह कटा छटा न हो।}} {{Outdent|उटङ्गन (हिं॰ पु॰) तृणविशेष, एक घास। यह शीतल स्थान और नदीके कछारमें उपजती है। तीनका रूप रहते भी चार पत्तियां लगती हैं। लोग शाक बनाकर खाते हैं। हिन्दी में प्रायः गुठवा कहते हैं। उटङ्गन शीतल, लघु और कषाय होता है। इससे मल सकता और सबन्नीपात, ज्वर, प्रमेह तथा श्वास विकार घटता है।}} {{Outdent|उटज (सं॰ पु॰) उटाः तृणपर्णादयस्तेभ्यो जायते, जन-ड। १ पर्णशाला, घासफूससे बना झोपड़ा।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :<Small>“मृगैवर्तितरीमन्यमुटजाङ्गनभूमिषु।” (रघु २।५२) २ गृहमात्र, एक मकान्।</small> {{Outdent|उटड़पा (हिं॰ पु॰) उटहड़ा, उटड़ा, गाड़ी खड़ी करनेका डण्डा। यह गाड़ीके आगे लगता और अग्रभागको उठाये रहता है।}} {{Outdent|उटड़ा, <small>उटड़पा देखो।</small>}} {{Outdent|उटारी (हिं॰ स्त्री॰) पहुंटा, चारा काटने की लकड़ी।}} {{Outdent|उटेव (हिं॰ पु॰) काष्ठखण्ड विशेष, लकड़ीके दो टुकड़े। यह छाजनकी धरनमें लगते हैं। इनपर एक गड़ारी रखकर धरन जमाते हैं।}} {{Outdent|उट्टा (हिं॰ पु॰) ओटनी।}} {{Outdent|उठ्–― भ्रा॰ पर॰ सक॰ सेट्। इससे आघात उपघात करने या मारने-गिरानका अर्थ निकलती है।}} {{Outdent|उठंगन (हिं॰ पु॰) १ अवष्टम्भ, पाया, आड़, टेकनी, थूनी।}} {{Outdent|उठंगना (हिं॰ क्रि॰) १ अवष्टम्भ पकड़ना, टेक लेना, तकिया लगाना। २ आश्रयमें पड़ जाना, भरोसे रहना।}} {{Outdent|उठंगल (हिं॰ वि॰) मन्द, कुन्द, गावदी। मूर्ख व्यक्तिको ‘उठंगल आदमी’ और कुशासित राज्यको ‘उठंगल मुल्क’ कहते हैं।}} {{Outdent|उठंगवाना (हिं॰ क्रि॰) उठंगनेको आज्ञा देना, उठगानका काम दूसरेसे लेना।}} {{Outdent|उठंगाना (हिं॰ क्रि॰) अवष्टम्भ देना, टेक पहुंचाना। २ आश्रयमें डालना, भरोसे रखना। कपाट देनेको ‘किवाड़ उठगाना’ 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देनेवाला।<br> <br>उद्वर्हण (सं॰ क्ली॰) उत्-वर्ह-ल्यूट। १ उन्मूलन, उखाड़। २ उत्पाटन, नोचखसोट। ३ उद्धरण, उठाव, बचाव।<br> <br>उद्वहित (सं॰ पु॰) उत्-वर-क्त। उद्धत, उठाया हुआ।<br> <br>उद्दह (सं॰ पु॰) उदूर्ध्व वहति नयति, उत्-वह-अच्। १ पुत्र, बेटा। २ सप्तविध वायुके अन्तर्गत वायुविशेष। यह प्रवहवायु पर रहता है-<br> {{block center|<poem><small> "आवहः प्रवहयैव विवहअ समीरणः। परावहः संवहअ उद्वहअ महावल:॥ तथा परिवहः श्रीमानुत्पातमयशं सिनः। इत्ये ते चभिताः सप्त मारुता गगनेचरा:॥" (हरिवंश २६६ अ॰)</small></poem>}} आवह, प्रवह, विवह, परावह, संवह, उद्दह और परिवह सात उत्पातसूचक क्षुभितवायु हैं। ३ उदान वायु, ग़िज़ा पहुंचानेवाली हवा। ४ विहार, खेल कूद। ५ वर, दूल्हा। ६ गायक, गानेवाला। (त्रि॰) ७ अंशकारक, हिस्सा करनेवाला। ८ प्रधान, खास। ९ वहन करनेवाला, जो ले जाता हो। <br>उद्दहत् (सं॰ त्रि॰) १ आश्रयदाता, जो सहारा लगा रहा हो। २ सम्पन्न, रखनेवाला।<br> <br>उद्दहन (सं॰ क्ली॰) उत्-वह-ल्यु ट्। १ स्कन्धके सहारे वहन, कन्धेपर बोझका ढोना। विवाह, शादी। ३ आनयन, लवाई। ४ आकर्षण, खिंचाव। ५ आरोहण, चड़ाई। ६ अधिकार, कञ्ज दारी।<br> <br>उदहा (सं॰ स्त्री॰) उत्-वह-अच्-टाए। कन्या, बेटी।<br> <br>उहाचन (सं॰ क्ली॰) नाद, चीख, पुकार।<br> <br>उद्दादन (वै॰ क्ली॰) उत-वद-णिन्छ-त्लु ट्। १ ऊंचे स्वरसे आवेदन, बुलन्द आवाज़में फरियाद। <small।>"अष्टैक उदहति दीचितोऽदं ब्राह्मयो दौचितोऽयं ब्राह्मण इति निवेदितमेवेनमेतत् सन्तं देवेभ्यो निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापदित्ययं युमाकैकोऽभूत्त गोपावतेत्ये वैतदाह निष्क त्याह।" (शतपथब्रामण ३।२।१।२९)</small> २ उच्च-वाद्यकरण, जोरसे बाजेका ब़जाना। {{Multicol-break}} उद्दान् (वै॰ त्रि॰) १ उत्कर्षयुक्त, शान्दार। २ उन्नत, ऊँचा। <small>"उहत्वमा प्रवणोतना।" (ऋक् १॥१६॥११) 'उहत्सूनतेषु।' (सायण)</small> <br>उद्वान (सं॰ पु॰) उत्-वन संभक्ती घञ्। १ उद्यम, रोजगार। २ चुल्ली, चूल्हा। ३ उद्दमन, उगाल, छांट। (त्रि॰) ४ उद्दमित, उगला हुआ।<br> <br>उद्दान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-वम-क्त ।१ उद्दमित, उगला हुआ। (पु॰) उगतं वान्तं मदो यस्मात्। २ निर्मद-गज, जो हाथी मतवाला न हो।<br> <br>उद्दाप (सं॰ पु॰) उत्-वन भावे घञ्। १ उन्मूलन, उखाड़। २ उद्धरण, निकास। ३ मुण्डन, मुड़ाई।<br> <br>उद्दाय (सं॰ पु॰) उत्-वा-घञ्। १ उद्दासन, निकास। २ उपशम, दबाव।<br> {{c|<small>"उद्यायति उदासनं प्राप्नोल्यु पशाम्यप्ति।" (छान्दोग्यमाष्ये शङ्कराचार्य)</small>}} <br>उद्दाष्य (सं॰ त्रि॰) अश्रु बहानेवाला, जो रो रहा हो।<br> <br>उद्दास (सं॰ पु॰) उत्-वस-घञ्। १ स्वस्थानको अतिक्रम कर अस्त होने का काम, अपनी जगहको लांघ कर गुरुब होनेकी बात। (त्रि॰) २ वस्त्र उतारे हुआ, जो कपड़े खोल चुका हो।<br> <br>उहासन (सं॰ क्ली॰) उत्-वस-णिच-त्लु ट। १ संस्कार-भेद। इसमें यजसे पूर्व आसन बिछाया, यन्नपात्र सजाया और वृतादि भराया जाता है। २ रामारण, कत्ल। ३ विसर्जन, छोड़ाई। ४ निष्कासन,निकलाई। उद्दास्य (स॰ अव्य॰) १ विसर्जन करके, छोड़कर। (त्रि॰) उत्-वस-णिच-ख्यप्। २ उद्धरणीय, उठाने काबिल। ३ उत्तोलनयोग्य, चढ़ाने लायक। ४ यज्ञीय पशुके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला।<br> <br>उद्दाह (सं॰ पु॰) उत्-वह घज। विवाह, शादी।<br> {{right|<small>विवाह देखो।</small>}} <br>उदाहकर्मन् (सं॰ त्रि॰) विवाहसंस्कार, शादीका काम।<br> <br>उद्वाहन (सं॰ क्ली॰) उत्-वह-णिच-त्लु ट। १ विवाह, शादी। २ दिवारकर्षितक्षेत्र, दो मरतबा जोता हुआ खेत। ३ उद्दन, उठाव। ४ उद्धारसाधन, छोड़ानेका काम। ५ चिन्ता, फिक्र।<br> <br>उहाहनी (सं॰ स्त्री॰) उदाहन-ङीप। १ वराटक, कौड़ी। २ रज्जु, रस्मी।<br> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 4jqtc12ky53idttp8alb4vzdxsw73r0 665789 665788 2026-07-07T12:33:59Z अनुश्री साव 80 665789 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२७६|उद्वर्धन-उद्दाहनी}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>उद्दर्धन (सं० क्ली०) उत्-वृध्-ल्युट्। १ अन्त-ह्रास, भीतरी हंसी। <small>(विकाणशेष २।२।८७)</small> २ वृद्धतासाधन, बढ़तीका काम। (त्रि॰) ३ वृद्धतासाधक, बढ़ा देनेवाला।<br> <br>उद्वर्हण (सं॰ क्ली॰) उत्-वर्ह-ल्यूट। १ उन्मूलन, उखाड़। २ उत्पाटन, नोचखसोट। ३ उद्धरण, उठाव, बचाव।<br> <br>उद्वहित (सं॰ पु॰) उत्-वर-क्त। उद्धत, उठाया हुआ।<br> <br>उद्दह (सं॰ पु॰) उदूर्ध्व वहति नयति, उत्-वह-अच्। १ पुत्र, बेटा। २ सप्तविध वायुके अन्तर्गत वायुविशेष। यह प्रवहवायु पर रहता है-<br> {{block center|<poem><small> "आवहः प्रवहयैव विवहअ समीरणः। परावहः संवहअ उद्वहअ महावल:॥ तथा परिवहः श्रीमानुत्पातमयशं सिनः। इत्ये ते चभिताः सप्त मारुता गगनेचरा:॥" (हरिवंश २६६ अ॰)</small></poem>}} आवह, प्रवह, विवह, परावह, संवह, उद्दह और परिवह सात उत्पातसूचक क्षुभितवायु हैं। ३ उदान वायु, ग़िज़ा पहुंचानेवाली हवा। ४ विहार, खेल कूद। ५ वर, दूल्हा। ६ गायक, गानेवाला। (त्रि॰) ७ अंशकारक, हिस्सा करनेवाला। ८ प्रधान, खास। ९ वहन करनेवाला, जो ले जाता हो। <br>उद्दहत् (सं॰ त्रि॰) १ आश्रयदाता, जो सहारा लगा रहा हो। २ सम्पन्न, रखनेवाला।<br> <br>उद्दहन (सं॰ क्ली॰) उत्-वह-ल्यु ट्। १ स्कन्धके सहारे वहन, कन्धेपर बोझका ढोना। विवाह, शादी। ३ आनयन, लवाई। ४ आकर्षण, खिंचाव। ५ आरोहण, चड़ाई। ६ अधिकार, कञ्ज दारी।<br> <br>उदहा (सं॰ स्त्री॰) उत्-वह-अच्-टाए। कन्या, बेटी।<br> <br>उहाचन (सं॰ क्ली॰) नाद, चीख, पुकार।<br> <br>उद्दादन (वै॰ क्ली॰) उत-वद-णिन्छ-त्लु ट्। १ ऊंचे स्वरसे आवेदन, बुलन्द आवाज़में फरियाद। <small>"अष्टैक उदहति दीचितोऽदं ब्राह्मयो दौचितोऽयं ब्राह्मण इति निवेदितमेवेनमेतत् सन्तं देवेभ्यो निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापदित्ययं युमाकैकोऽभूत्त गोपावतेत्ये वैतदाह निष्क त्याह।" (शतपथब्रामण ३।२।१।२९)</small> २ उच्च-वाद्यकरण, जोरसे बाजेका ब़जाना। {{Multicol-break}} उद्दान् (वै॰ त्रि॰) १ उत्कर्षयुक्त, शान्दार। २ उन्नत, ऊँचा। <small>"उहत्वमा प्रवणोतना।" (ऋक् १॥१६॥११) 'उहत्सूनतेषु।' (सायण)</small> <br>उद्वान (सं॰ पु॰) उत्-वन संभक्ती घञ्। १ उद्यम, रोजगार। २ चुल्ली, चूल्हा। ३ उद्दमन, उगाल, छांट। (त्रि॰) ४ उद्दमित, उगला हुआ।<br> <br>उद्दान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-वम-क्त ।१ उद्दमित, उगला हुआ। (पु॰) उगतं वान्तं मदो यस्मात्। २ निर्मद-गज, जो हाथी मतवाला न हो।<br> <br>उद्दाप (सं॰ पु॰) उत्-वन भावे घञ्। १ उन्मूलन, उखाड़। २ उद्धरण, निकास। ३ मुण्डन, मुड़ाई।<br> <br>उद्दाय (सं॰ पु॰) उत्-वा-घञ्। १ उद्दासन, निकास। २ उपशम, दबाव।<br> {{c|<small>"उद्यायति उदासनं प्राप्नोल्यु पशाम्यप्ति।" (छान्दोग्यमाष्ये शङ्कराचार्य)</small>}} <br>उद्दाष्य (सं॰ त्रि॰) अश्रु बहानेवाला, जो रो रहा हो।<br> <br>उद्दास (सं॰ पु॰) उत्-वस-घञ्। १ स्वस्थानको अतिक्रम कर अस्त होने का काम, अपनी जगहको लांघ कर गुरुब होनेकी बात। (त्रि॰) २ वस्त्र उतारे हुआ, जो कपड़े खोल चुका हो।<br> <br>उहासन (सं॰ क्ली॰) उत्-वस-णिच-त्लु ट। १ संस्कार-भेद। इसमें यजसे पूर्व आसन बिछाया, यन्नपात्र सजाया और वृतादि भराया जाता है। २ रामारण, 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उपनद और विवाहसम्बन्धीय, भादौके मुताल्लिक। इदमें इसको देखते हैं। इसको देहका सङ्गठन सकल "नोडाहिकेषु मन्त्रेषु विधवावेदम क्वचित् ।” (मनु १६५) जन्तुओंसे भिन्न है। इसका अङ्ग चपटा और अलग अलग उद्दाहित (सं० त्रि.) उत्-वह-णिच-क्त । १ विवाहित रहता है। प्रत्यङ्ग सुदृढ़ होते भी क्षुद्र होते हैं। पैरको शादी किये हुआ। आगमके मतसे कलिकालमें एड़ी अनाच्छादित और तलभाग जालाकारसे संयत आगमको छोड़ अपर शास्त्र के अनुसार उहाहित होने- है। गात्रको लोमावली निविड़ और क्षुद्र होती वाली नारी गर्हित है। २ उत्तोलित, उखाड़ा हुआ। है। तन्मध्य उपरिभागके लोम कोमल और निम्न- उद्दाहिन् (सं० वि०) १ उत्तोलन करनेवाला, जो | भागके अति चिक्कण रहते हैं। चक्षुके पपोटे किञ्चित् उठाता हो। २ विवाहसम्बन्धीय, शादीके मुताल्लिक। सूक्ष्म त्वक्से निर्मित और अधिकतर पक्षीजाति- उद्दाहिनी ( स० त्रि०) उद्दाह-इनि-डोप् । रज्जु, रस्सी । जैसे देख पड़ते हैं। दन्त दृढ़ एवं तीक्ष्ण होते हैं। उद्दाहु (सं० त्रि.) ऊर्ध्व वाहु, हाथ उठाये हुआ। । भारतवर्षमें तीन-चार प्रकारका उहिड़ाल मिलता उहाहुलक, उद्दार देखो। है। परन्तु उन सबमें 'जद' प्राय अधिक देख पड़ता है। उद्विग्न (सं० त्रि.) उत्-विज्-ता, वादित इति नेट। अदबिलावके बाल बादामी या धूसर होते हैं। १चिन्तित, फ़िक्रमन्द। फिर किसीके खेत और किसौके पीत वर्णका धब्बा "नोविनश्वरते धर्म नोनिश्चरते क्रियाम् ।" (भारत पादि) भी पड़ा रहता है। नीचे की ओर लोम पीताभ अथवा २ व्याकुलित, बेचैन । ३ क्षुभित, भौचक्का । रताभ खेत लगते हैं। मुख कितना हो साफ़ होता उद्विग्नचित्त (सं० वि०) दुःखित, अफसुर्दा । है। किसीके कर्णदेशमें नारङ्गीके रङ्गजैसी भाभा उहिजमान (स. त्रि.) भयभीत, घबराया हुआ। [ झलकती है। फिर किसीका समस्तं देह पांशुवर्ण उद्दिड़ाल (सं० पु०) भूचर और जलचर जन्तुविशेष, रहता है। यह पुच्छ समेत प्रायः तीन साढ़े तीन हाथ ज़मीन और पानीमें रहनेवाला एक जानवर। तक लम्बा बैठता है। वासस्थान अत्यञ्च पावत्य निर्भरके ( Lutra) संस्कृत ग्रन्थकारोंने इसके जलविड़ाल, जल निकट प्रस्तर अथवा नदनदीतीर १०।१२ हस्त मृत्ति- मार्जार, जलनकुल इत्यादि नाम लिखे हैं। काके नीचे गमें होता है। यह प्रधानतः मत्स्य वैदिक काल में इस जन्तुको 'उर्दू कहते थे। शुक्ल खाकर जीता; मछली न मिलने पर कोड़े, मकोड़े यजुर्वेदमें लिखा है- या छोटे चिड़ेके पकड़नेस भी काम चला लेता है। "सुपर्णस्ते गन्धर्वाणामपामुद्रोमानाइश्यपो।” (२४।३७) ऊदविलाव पालनेसे हिल जाता है। कितने ही धीवर भिन्न भिन्न देशके शब्दोंसे इस जन्तुवाचक 'उद्र इसे पालते हैं। जब वे जाल लगाते, तब अदविलाव नामका समधिक ऐक्य लक्षित है। यथा-वैदिक आगे पहुंचकर मछलियोंको उसके पास खदेर लाते 'उद्र,हिन्दौ 'जद', डेन्म 'उद्दर' वा 'मोहर', ओलन्दाज है। इससे मछली पकड़ने में सुभौता पड़ता है एवं स्विस तथा जमैन ‘ोत्तर', अंगरेजी ‘ोहर', | सुनने में पाया-किसी आदमौने एक जदबिलाव पाला फान्सीसी 'लुटर', इटलीय 'लोद्र और स्पेनीय, लाटिन । था। वह कुत्तेकी तरह प्रभुको आज्ञा मानता प्रभृति भाषाओं में 'लुट्टा' कहते हैं।* और जलाशयके निकट इङ्गित करते ही मछली उहिड़ाल पृथिवौके प्रायः अधिकांश देशों में रहता | पकड़ लाता। वयस बढ़ने पर जब कुछ उसका है। तन्मध्य भारतवर्षीय उत्तर हिमगिरिसे दक्षिण पराक्रम बढ़ा, तब ग्रामके मध्य किसी घरमें बहुत मछली देखने पर निकालने का अभ्यास पड़ा। काट • मरहठे अलमाचार, तैलङ्गो मौरकुक पर्णत पानीका कुचा, खानेके भयसे गृहस्थ कुछ बोल न सकते थे। इस कनाड़ी नौरनाइ और हिन्दुस्थामी अदविलाव कहते है। वर्तावसे प्रभु क्रमशः अत्यन्त विरक्त हो एकदिन Vol III. 70<noinclude></noinclude> 3ycwknx84bwhyoyjgkia6vucdvvrcqd 666358 666357 2026-07-07T19:03:11Z अनुश्री साव 80 666358 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उद्दाहिक-उद्दिड़ाल|२७७}}</noinclude> <br>उद्दाहिक (सं॰ त्रि॰) उद्दाह: प्रयोजनमस्य, ठक्।<br> <br>विवाहसम्बन्धीय, शादीके मुताल्लिक।<br> {{c|<small>"नोवाहिकेषु मन्त्रषु विधवावेदम' क्वचित् " (मनु ९।६५)</small>}} उद्दाहित (सं॰ त्रि॰) उत्-वह- णिच्-क्त । १ विवाहित, शादी किये हुआ आगमके मतसे कलिकाल में आगमको छोड़ अपर शास्त्र के अनुसार उद्दाहित होने वाली नारी गर्हित है। २ उत्तोलित, उखाड़ा हुआ।<br> <br>उद्दाहिन् (सं॰ त्रि॰) १ उत्तोलन करनेवाला, जो उठाता हो। २ विवाहसम्बन्धीय, शादीके मुतालिक।<br> <br>उद्दहिन् (सं॰ त्रि॰) उदाह-इनि-ङीप्। रज्जु, रस्सी।<br> <br>उद्दाहु (सं॰ त्रि॰) उर्ध्ववाहु, हाथ उठाये हुआ।<br> <br>उद्दाहुलक, <small>उद्दाहु देखो।</small>}} उद्दिग्न (सं॰ त्रि॰) उत्-विज्-क्त विवादित इति नेट्। १ चिन्तित, फ़िक्रमन्द।<br> {{c|<small>"नोनियर ते धर्म' नोरिग्रचरते क्रियाम्।" (भारत आदि)</small>}} {{c|२ व्याकुलित, बेचैन ३ सुमित, भौचक्का।}} उद्दिग्नचित्त (सं॰ त्रि॰) दुःखिन। अफसुर्दा। उमान (स०वि०) भयभीत घबराया हुषा उद्दिदास (सं० पु० ) भूचर और जलचर जन्तुविशेष, ज़मीन और पानीमें रहनेवाला एक जानवर ( Lutra) संस्कृत ग्रन्थकारोंने इसके जलविडाल, जल- मार्जार, जलनकुल इत्यादि नाम लिखे हैं । वैदिक काल इस यजुर्वेद में लिखा है- '' कहते थे “सुपते गन्धर्वाणामपामुद्रोमा नाङश्यपो ।” ( २४ / ३७ ) भित्र भित्र देशके मन्दोंने इस जन्तुवाचक 'उद्र' सचित है। यथावैदिक , नामका समधिक 'उद्र', हिन्दी 'जद', 'उदर' वा 'चोर' घोलन्दाज एवं स्विस तथा जर्मन 'अत्तर', अंगरेजी 'श्रोहर', फान्सोसो 'सुटर', इटलीय 'लो' चोर नोय, काटिन प्रभृति भाषा में 'मुद्रा' कहते हैं। * उडान थियो प्राय: अधिकांश देशोंमें रहता है। समध्य भारतवर्षीय उत्तर हिमगिरि दक्षिण • मरहठे अलमाचार, तेलको मोरकुक अर्थात् पानीका कुचा, कनाड़ी मोरना और हिन्दुस्थानी ऊदविलाव कहते हैं । २०७ सर्वेस्थानके नद, उपनद धर 1 कुमारो अन्तरोप पर्यन्त दमें इसको देखते है। इसको देहका सङ्गठन सकत जन्तुओंसे भिन्न है। इसका अङ्ग चपटा और अलग अलग रहता है होते भी होते हैं पेरको एडो अनाच्छादित और तलभाग जालाकारसे संयत गानको लोमावली निविड और शुद्र होतो तमध्व उपरिभागडे लोम कोमल पर निख भाग अति चिक्कण रहते हैं। चक्षुके पपोटे किञ्चित् सूक्ष्म व निर्मित पर अधिकतर पक्षोजाति- जैसे देख पड़ते हैं । दन्त दृढ़ एवं तीक्ष्ण होते हैं । है है। भारतवर्ष में तोन-चार प्रकारका उडिहाल मिलता है । परन्तु उन सबमें 'जद' प्राय अधिक देख पड़ता है। दविला वाल वादामी या धूसर होते हैं। फिर किसीके खेत और किसीके पोत वर्णका धब्बा भी पड़ा रहता है। नौचेकी ओर लोम पीताभ अथवा रक्ताभ खेत लगते हैं । मुख कितना ही साफ़ होता है । किसीके कर्णदेशमें नारङ्गीके रङ्गजैसी आभा झलकती है। फिर किसीका समस्तं देव पांचव रहता है। यह पुष्य समेत प्राय: सोन साढ़े तीन हाथ तक लम्बा बैठता है। वासस्थान अत्युच्च पार्वत्य निर्भर के निकट प्रस्तर अथवा नदनदोवोर १०।१२ हस्त सृति- काके नीचे गर्तमें होता है। यह प्रधानतः मत्ख खाकर जीता महतो न मिसनेपर कोड़े मकोड़े या छोटे चिड़ेके पकड़ने से भी काम चला लेता है । ऊदविलाव पालने से हिल जाता है। कितने हो धीवर इसे पालते हैं। जब वे जाल लगाते, तब ऊदविलाव आगे 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एवं स्विस तथा जर्मन 'अत्तर', अंगरेजी 'श्रोहर', फान्सोसो 'सुटर', इटलीय 'लो' चोर नोय, काटिन प्रभृति भाषा में 'मुद्रा' कहते हैं। * उडान थियो प्राय: अधिकांश देशोंमें रहता है। समध्य भारतवर्षीय उत्तर हिमगिरि दक्षिण • मरहठे अलमाचार, तेलको मोरकुक अर्थात् पानीका कुचा, कनाड़ी मोरना और हिन्दुस्थानी ऊदविलाव कहते हैं । २०७ सर्वेस्थानके नद, उपनद धर 1 कुमारो अन्तरोप पर्यन्त दमें इसको देखते है। इसको देहका सङ्गठन सकत जन्तुओंसे भिन्न है। इसका अङ्ग चपटा और अलग अलग रहता है होते भी होते हैं पेरको एडो अनाच्छादित और तलभाग जालाकारसे संयत गानको लोमावली निविड और शुद्र होतो तमध्व उपरिभागडे लोम कोमल पर निख भाग अति चिक्कण रहते हैं। चक्षुके पपोटे किञ्चित् सूक्ष्म व निर्मित पर अधिकतर पक्षोजाति- जैसे देख पड़ते हैं । दन्त दृढ़ एवं तीक्ष्ण होते हैं । है है। भारतवर्ष में तोन-चार प्रकारका उडिहाल मिलता है । परन्तु उन सबमें 'जद' प्राय अधिक देख पड़ता है। दविला वाल वादामी या धूसर होते हैं। फिर किसीके खेत और किसीके पोत वर्णका धब्बा भी पड़ा रहता है। नौचेकी ओर लोम पीताभ अथवा रक्ताभ खेत लगते हैं । मुख कितना ही साफ़ होता है । 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बढ़ा, तब ग्रामके मध्य किसी घर में बहुत मक्सी देखने पर निकालने का अभ्यास पड़ा। काट खानेके भय से गृहस्थ कुछ बोल न सकते थे। इस वर्त्ताविसे प्रभु क्रमश: अन्यन्त विरक्त हो एकदिन {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> m6nm1yn3aj3hyt32kpb93nbxdql9uu2 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९९ 250 76103 665806 609177 2026-07-07T14:01:58Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665806 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६८'''|'''उशीनर—उशीरादि पाचन'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उशीनर (सं० पु०) उशीप्रदो वाञ्छाप्रदो नरो यत्र । १ गन्धार देश । २ गन्धार जनपदवासी क्षत्रिय । {{block center|<poem> "द्राविडाश्च कलिङ्गाश्च पुलिन्दाश्चाप्युशीनराः । कोलिसर्पामाहिषकास्तास्ताः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात् ॥" (भारत, अनु ३३।२२) </poem>}} ३ चन्द्रवंशीय एक राजा । यह शिवि राजाके पिता और महामनाके पुत्र थे । इनके चरित सम्बन्धमें कहा है— 'एक समय इन्द्र और अग्निने उशीनरका धर्मबल देखनेके लिये श्येन एवं कपोतकी मूर्त्ति बनाई । और श्येनके भयसे कपोतने राजाके ऊरु देशमें जाकर आश्रय लिया । तब श्येन कहने लगा—अपने भक्ष्य कपोतके आपका आश्रय पकड़नेसे मैं भोजनाभावसे अत्यन्त कातर हो रहा हूं ; अतएव उसे देकर अपना धर्म बचाइये । राजाने उत्तर दिया—इस कपोतने तुम्हारे भयसे घबड़ाकर जो हमारा आश्रय लिया है, इसको छोड़ना हमारा धर्म नहीं, क्योंकि शरणागतका त्याग विप्र, गो और मातृहत्याके तुल्य पातक है । श्येन बोला—आहारके लिये ही सब प्राणी बने और आहारसे ही सब जीव पले हैं; अन्यान्य सकल विषय छोड़ चिरकाल जी सकते हैं, किन्तु आहार न मिलनेसे ही लोग मरते हैं—आहार न पानेसे मेरा प्राण कैसे बचेगा और मेरे मरनेसे स्त्रीपुत्रोंका ठिकाना कहां लगेगा । इसलिये एक कपोतकी रक्षासे बहु प्राणी नष्ट होते हैं । अपर धर्मसे विरोध रखनेवाला धर्म कुधर्म है । इन दोनोंके मध्य गुरु लघु देख उचित कर्त्तव्य निर्द्धारण कीजिये । राजाने कहा—पक्षिन् ! अपनी बातसे धर्मज्ञ समझ पड़ते भी तुम क्यों अधार्मिककी तरह ऐसा अनुरोध कराते हो ? क्षुधा मिटानेके लिये कपोतको छोड़ अपर जो चाहो, कहते ही पावोगे । इसपर श्येनने कपोतकी बराबर राजाका मांस मांगा था । राजाने अविचलित चित्तसे वही मान कपोत परिमित मांस देते देते क्रमसे सब शरीर काट डाला । (भारत वन १३१ अ०) उशीर (सं० पु० क्ली०) वश-ईरन्-कित् । वशः कित् । उण् ४।३१ । सुगन्धिमूलक, खस । </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> संस्कृत पर्याय—अभय, नलद, सेव्य, अमृणाल, जलाशय, लामज्जक, लघु, लय, अवदाह, इष्टकापथ, {{SIC|उषीर|उशीर}}, शृगाल, {{SIC|लघृ|लघु}}, लय, अवदान, इष्टकापथ, इन्द्रगुप्त, जलवास, हरिप्रिय, वीर, वीरण, समगन्धिक, रणप्रिय, वीरतरु, शिशिर, शीतमूलक, वितानमूलक, जलमेद, सुगन्धिक, सुगन्धिमूलक और कछु है । खसका क्षुप ५।६ फीट पर्यन्त बढ़ता है । मूल पीताभ पांशुवर्ण, गन्ध तीव्र और आस्वाद कटु है । यह भारत और ब्रह्मदेशमें उत्पन्न होता है । इसकी जड़को पङ्खे और टट्टीमें लगाते हैं । आजकल इसे युरोपमें कितने ही लोग सुगन्धि द्रव्यकी तरह व्यवहार करते हैं । सबको जलके साथ बांटकर मत्थे पर लगानेसे तरावट आती है । वैद्यकके मतसे उशीर घर्म, दौर्गन्ध्य, दाह, रक्तपित्तका रोग, मोह, भ्रम, ज्वर तथा पित्तको दबाता और सुगन्ध बढ़ाता है । यह शीतल, लघु, तिक्त एवं पाचक है । उशीरक (सं० क्ली०) उशीर स्वार्थे कन् । उशीर देखो । उशीरगिरि (सं० पु०) पर्वत विशेष, मैनाक पहाड़ । उशीरवीज (सं० पु०) १ उशीरका वीज, खसका तुख्म । २ मैनाक पर्वत, हिमालयके उत्तर एक पहाड़ । उशीरस्तम्ब (सं० पु०) खसका गट्ठा । उशीरादिचूर्ण (सं० क्ली०) चूर्ण विशेष, एक बुकनी । उशीर, तगरपादुका, शुण्ठी, काकला, श्वेतचन्दन, रक्तचन्दन, लवङ्ग, पिप्पलीमूल, पिप्पली, एला, नागेश्वर, मुस्तक, यष्टिमधु, कर्पूर, वंशलोचन और तेजःपत्र सबको बराबर ले कूटे-पीसे । फिर समुदाय चूर्णके समान कृष्णा अगुरुका चूर्ण डाल अष्ट गुण शर्करा मिलानेसे यह प्रस्तुत होता है । उशीरादि चूर्ण आधा तोला लेनेसे रक्त वमन, पिपासा और गात्रदाहका वेग मिट जाता है । इस औषधके सेवन बाद दो तोले गूलरका रस डेढ़ तोला चीनी मिलाकर पीना चाहिये । उशीरादि पाचन (सं० क्ली०) पाचन विशेष, एक काढ़ा । उशीर, वाला, मुस्तक, धान्यक, शुण्ठी, वरीक्रान्ता, लोध्र एवं वेणशुण्ठी चार-चार आनीभर ले आध सेर जलमें पकाये । आध पाव जल जलते-जलते बचने पर उतार कर पाचनको छान लेना चाहिये । इसे </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> b786nsfj0w2ut8nlnr3m3dkqs98oeu2 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०० 250 76104 665817 609180 2026-07-07T14:54:09Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665817 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उशीरासव—उषसुत'''|'''३६९'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> पीनेसे अरुचि, अतिशय वेदनायुक्त विबन्ध घर्म्मं, ज्वरातिसार और रक्तातिसार प्रभृति रोग प्रशमित होते हैं । उशीरासव (सं० क्ली०) आसव विशेष, एक दवा । उशीर, वाला, पद्ममूल, गाम्भारीत्वक्, नीलोत्पल, प्रियङ्गु, पद्मकाष्ठ, लोध्र, कुड़, मञ्जिष्ठा, दुरालभा, अर्क, चिरायता, उदुम्बरत्वक्, राठी, क्षेत्र-पापड़ा, पटोलपत्र, काञ्चनत्वक्, अमरूदकी छाल, तथा मोचरस आठ-आठ तोले, द्राक्षा १६० तोले, धायके फूल १२८ तोले, चीनी ढाई सेर, मधु सवा छह सेर और जल आठ सेर किसी नूतन पात्रमें डाल मुंह बांध कर एक महीने रख छोड़े । फिर इस आसवको उपयुक्त मात्रा में सेवन करनेसे रक्तपित्त प्रमेह प्रभृति अनेक रोग विनष्ट होते हैं । इस आसवको रखनेका पात्र प्रथमतः जटामांसी और मरिच चूर्ण द्वारा धूपित कर लेना चाहिये । उशीरिक (सं० पु०) उशीर-ठन् । {{SIC|किसरादिभ्यः|किंशरादिभ्यः}} ठन् । पा ४।४।५३ । १ उशीरका व्यवसायी, खसका रोज़गार करनेवाला । (त्रि०) २ उशीर सम्बन्धीय, खसका बना हुआ । उशीरी (सं० स्त्री०) उशीर स्वार्थे ङीष् । छोटी केशे । इसका संस्कृत पर्याय मिषि, गुञ्जा, अम्लान, नीरज और शर है । यह मधुर एवं शीतल और पित्त, दाह तथा क्षयरोगनाशक है । (राजनिघण्टु) उशेण्य (सं० त्रि०) वश-केन्य । छन्दसि वशेः केन्यकेन्ल्यनः । पा ३।१।८४ । कमनीय, खूब सूरत, चाहाजाने क़ाबिल । "आं ये मातुरुशेण्यो जनिष्ठ ।" (ऋक् २।३।८) उष् (धातु) सक० भ्वा० पर० सेट् । इसका अर्थ दहन और वध करना है । उष (सं० पु०) उष-क । १ क्षारमृत्तिका, खारी मट्टी । २ प्रभात, सबेरा । ३ रात्रिका शेष समय रातका आखिरी वक़्त । ४ कामी, शहवतपरस्त । ५ गुग्गुल, गूगुर । (क्ली०) ६ पांशुज लवण । उषङ्कु (सं० पु०) संहारकर्त्ता महेश्वर । उषण (सं० क्ली०) उष बाहुलकात् क्युन् वा । १ मरिच, मिर्च । २ शुण्ठी, सोंठ । ३ चविक । ४ पिप्पलीमूल, पिपलमूल । </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> उषणा (सं० स्त्री०) उषण-टाप् । १ पिप्पली, पीपर । २ शुण्ठी, सोंठ । ३ चविका । उषणादिचूर्ण (सं० क्ली०) चूर्णविशेष, एक बुकनी । मरिच, पिप्पलीमूल, मुस्तक, अतिविषा, वासकत्वक्, गोक्षुर, बृहती, कण्टकारी, यष्टिमधु, मूर्वामूल, भार्ङ्गी, यष्टिका, मोचा, वंशलोचन और यवक्षार बराबर एक साथ कूट-पीस कपड़ा छान करनेसे यह चूर्ण बनता है । उषणादिचूर्ण एक मासा जलके साथ खानेसे लोहितज्वर, विस्फोटक, रोमान्तिका, जीर्णज्वर, और मसूरिका रोग अच्छा हो जाता है । उषत् (सं० पु०) यदुवंशीय एक राजा । इनके पिताका नाम सुयज्ञ और पुत्रका शिनेयु था । उषती (सं० स्त्री०) उष-शतृ-ङीप् आगमविधेरनित्यत्वात् नुमभावः । अमङ्गलवाक्य, नागवार जुबान्, जिस बातसे दूसरेका दिल दुखे । "यथास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेदुषतीं पापलोक्याम् ।" (भारत, आदि ९१।८०।८) उषद्गु (सं० पु०) यदुवंशीय एक राजा । यह स्वाहि राजाके पुत्र थे । उषद्रथ (सं० पु०) पुरुवंशीय एक राजा । यह तितिक्षुके पुत्र और उशीनरके भ्राता थे । (हरिवंश ३१ अ०) उषप (सं० पु०) ओषतीति, उष दाहे कपन् । उषिकुटिदिकखिजिभ्यः कपन् । उण् ४।१४२ । १ अग्नि, आग । २ सूर्य । ३ चितावृक्ष, चीतका पेड़ । उषर्बुध (सं० त्रि०) प्रत्यूषमें उठनेवाला, जो तड़के जागता हो । उषर्बुध (सं० पु०) उषसि बुध्यते, उषस्-बुध-क । १ अग्नि, आग । "सूर्यस्य रोचनाद्विवान् देवा उषर्बुधः ।" (ऋक् १।१४।९) २ रक्तचिता, लालचीत । ३ बालक, बच्चा । उषस् (सं० क्ली०) ओषति हिनस्त्यन्धकारमिति, उष-असिप्रत्ययः स च कित् । उषः कित् । उण् ४।२३३ । प्रत्युषाकाल, सबेरा, तड़का । "आसीदासन्ननिर्वाणः प्रदीपार्च्चिरिवोषसि ।" (रघु १२।१) उषसी (सं० स्त्री०) उषं दिवसं स्यति विनाशयति, उषसो-क-ङीप् । सन्ध्याकाल, शाम । उषसुत (सं० पु०) पांशुज लवण, लोनी मट्टीका नमक । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> n9agdw2jfgsfkc1729gp60nzt8szgnz पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०१ 250 76105 665840 609181 2026-07-07T15:13:59Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665840 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४००'''|'''उषस्त—उषाकल'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उषस्त (सं० पु०) चाक्रायण ऋषि । "ततो ह्योषस्तश्चाक्रायण उपरराम :" (शतपथब्रा० १४।४।१२) उषस्ति, उषस्त देखो । उषस्य (सं० त्रि०) उषस्-यत् । पाष्टुपिकृष्यशी यत् । पा ४।३।३१ । प्राभातिक, सवेरेवाला । उषा (सं० स्त्री०) उष स्त्रियां टाप् । १ वेदोक्त देवता, वेदकी एक देवी । ऋक् और सामसंहिताके अनेक मन्त्रोंमें इन देवीकी स्तुति की गयी है । ऋक्संहिताके मतसे—यह आकाशकी कन्या (ऋक् १।४८।१६) भग एवं वरुणकी भगिनी (ऋक् १।११३।५) और रात्रिकी बड़ी सहोदर (ऋक् १।१२४।८) हैं । रात्रि और उषा दोनों कई जगह साथ साथ भगिनी कही गयी हैं—"नक्तोषासा, उषसानक्ता" । यह सूर्यकी प्रणयिनी हैं । उषा मनुष्योंका आयु दिन-दिन घटा प्रकाशित होती हैं । वेदसंहितामें जिस भावसे इनको बताया है, उसका उदाहरण नीचे दिया जाता है— {{block center|<poem> "उषा उच्छन्ती समिधाने अग्ना उद्यन्त्सूर्य उर्विया ज्योतिरश्रेत् । अमिनती दैव्यानि व्रतानि प्रमिणती मनुष्या युगानि । ईयुषाणामुपमाश्वतीनामायतीनां प्रथमोषा व्यद्यौत् ॥२ एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि ज्योतिर्वसाना समना पुरस्तात् । ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति ॥३ उषो अदर्शिर्वाघृषो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियांखि । अध्मस्नेव ससती वोधयन्ती शश्वत्तमागात् पुनरेयुषीणाम् ॥४ पूर्वार्द्धे रजसो भानुमर्ज्वा जनिवदक्कत प्रकेतुम् । व्यु प्रथते वितरं वरीयो श्रोभा पृक्ष्णी पिपीतएष्या ॥५" (ऋक् १म०, १२४ सू०) </poem>}} अग्निके समिध् द्वारा जल उठनेसे उषा अन्धकारकी आड़में सूर्योदयकी तरह बहुल ज्योति प्रकाश करती हैं । वह दैवव्रतकी अविघ्नकारिणी और मनुष्यकी आयुःक्षयकारिणी हैं । अतीत तथा नित्य उषा सकलके समान और आगामी उषा सकलके प्रथम रहती हैं । उषाने द्युतिलाभ किया है । उषा स्वर्गकी दुहिता हैं । ज्योतिःद्वारा घिर पूर्व दिक्में क्रमसे वह देख पड़ती हैं । मानो सूर्यका अभिप्राय समझ कर ही वह उनके पथमें घूमती हैं । वह कभी दिशाओंकी हिंसा नहीं करतीं । सूर्यकी तरह वह </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> अपना वक्षः दिखाती रहती हैं । नोधा ऋषिके समान अपना प्रियवस्तु ढूंढ़नेके लिये उषाने भी अपनेको आविष्कार किया है । गृहिणी की तरह उठकर उषा जगत्में सबको जगाती हैं । वह अभिसारिकाओंमें सबसे आगे आती हैं । वह आकाशके पूर्व भागसे निकल दिशाओंको चैतन्य करती हैं । वह जनक-स्थानीय स्वर्ग और पृथिवीके अङ्कमें बैठ दोनोंको भरपूर फैलाती हैं । {{block center|<poem> "सदृशीरद्य सदृशीरिषु श्रो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धामः । अनवद्यास्त्रिंशतं योजनानै कैका क्रतुं परिघन्ति सद्यः ॥" (ऋक् १।१२४।८) </poem>}} जैसी ही आज वैसी ही कल भी वह अनवद्य हैं । प्रतिदिन उषा वरुण एवं सूर्यकी अवस्थितिके स्थानसे ३० योजन आगे रहती हैं । एक एक उषा उदयकाल पर ही गमनागमनरूप कर्म निर्वाह किया करती हैं ।<ref> सायणाचार्यके मतसे सूर्य प्रत्यह ५०५८ योजन अर्थात् एक दण्डमें ७९ योजन चलते हैं । ३० योजन आगे चलने से २ घंटे साढ़े बाईस पल पहले उषाका उदय होता है ।</ref> इन्द्रने ही उषाको उत्पन्न किया है—"यः सूर्यं य उषसं जजान ।" (ऋक् २।१२।७) फिर इन्द्रही उषाको विनष्ट भी करते हैं (ऋक् ४।३०।११) । निघण्टुमें उषाके यह नाम लिखे हैं—विभावरी, सूनरी, भास्वती, ओदती, चित्रामघा, अर्जुनी, वाजिनी, वाजिनीवती, सुन्नावरी, अहना, द्योतना, श्वेत्या, अरुषी, सूनृता, {{SIC|सूनृलावती|सूनृतावती}}, सूनृतावरी । (निघण्टु १।८) पूर्व कालमें ग्रीक और रोमक उषा देवीकी पूजा करते थे । ग्रीक उषादेवीको एओस (Eos) और रोमक अरोरा (Aurora) कहते थे । वह हाइपेरियन एवं थेयरकी कन्या, हिलियन तथा सिलिसकी भगिनी और टिटान अस्त्रियसकी पत्नी थीं । होमरने उषाको दिवादेवी लिखा है । २ प्रत्यूष, सवेरा । ३ बाण राजाकी कन्या और अनिरुद्धकी पत्नी । अनिरुद्ध शब्दमें विस्तृत विवरण देखो । उषाकल (सं० पु०) उषार्या कलः शब्दो यस्य, बहुव्री । कुक्कुट, मुर्ग़ा । {{Reflist}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> dn9wz1zzbonw1ln0d9s7gddesng25pt पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०२ 250 76106 665870 609182 2026-07-07T15:17:58Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665870 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उषापति—उष्ट्र'''|'''४०१'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उषापति (सं० पु०) उषायाः पतिः स्वामी, ६-तत् । अनिरुद्ध । यह कृष्णके पौत्र और प्रद्युम्नके पुत्र थे । उषा और अनिरुद्ध शब्द देखो । उषासानक्ता (सं० स्त्री०) प्रत्यूष एवं रात्रि, सबेरा और अंधेरा । उषित (सं० त्रि०) वस् वा उष-क्त । १ पर्युषित, रात बिताये हुआ । २ दग्ध, जला हुआ । ३ निविष्ट, पहुंचा हुआ । ४ त्वरित, जल्द । उषितङ्गवीन (सं० त्रि०) उषिता अवस्थिता गावो यत्र । गोगणसे खाया हुआ, जहां गावोंने खाया हो । उषीर (सं० पु० क्ली०) उष-कीरच् । उशीर देखो । उषेश (सं० पु०) उषाया ईशः पतिः, ६-तत् । उषाके ईश अनिरुद्ध । {{SIC|उषोदेवल्य|उषोदेवत्य}} (सं० त्रि०) प्रत्युषकालको देवता मानने वाला । उष्ट्र (सं० पु०) उष-ट्रन्-कित् । उषिखनिभ्यां कित् । उण् ४।१६१ । पशुविशेष, ऊंट । संस्कृत पर्याय—क्रमेल, क्रमेलक, मय, महाङ्ग, दीर्घगति, बली, करभ, दासेरक, धूसर, लम्बोष्ठ, वरण, महाजङ्घ, जवी, जाङ्गिक, दीर्घ, शृङ्खलक, महाशृ, महाग्रीव, महानाद, महापृष्ठग, महापृष्ठ, वलिष्ठ, दीर्घजङ्घ, {{SIC|ग्रौवो|ग्रीवो}}, धन्वज, शरभ, कण्टकाशन, भोलि, वङ्कर, अश्मज, मरुहाप, वक्रग्रीव, वासन्त, कुलनाश, कुञ्जनासा, मरुप्रिय, द्विककुत्, दुर्मेलञ्चन, भूतघ्न, दासेर, दीर्घग्रीव और वलिकौर्प है । संस्कृत क्रमेल भिन्न भिन्न भाषाओंके शब्दोंसे मिलता है—जैसे संस्कृत 'क्रमेल', हिब्रू 'गमेल', ग्रीक 'कामिलस्', रोमक 'कमेलस्', इटलीय 'कम्मेलो', स्पेनीय 'कमेलो', जर्मन 'कमौलू', फ्रान्सीसी 'कमु,' (Chameau) अँगरेजी 'कैमेल (Camel) अरबी 'जमेल' । इसके सिवा फारसीका शुतर शब्द धूसर जैसा मालूम पड़ता है । यह अरब, ईरान, दक्षिण तुर्किस्तान, उत्तर-पश्चिम भारत, इजिप्तसे मरितानियातक अफरीका, भूमध्य सागर तथा सिनिगल नदी तीरके मध्यवर्त्ती प्रदेश और कनारी द्वीपमें वास करता है । उष्ट्र तीन जातिके होते हैं—हिगुइन, वेकेती और इलहैरी । हिगुइन सबसे बड़ा होता और १५ मन<br><br>Vol &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 101 </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> तक भार ढोता है । वेकेती हिगुइनसे छोटा पड़ता है । पृष्ठमें ककुदाकृति {{SIC|दा|दो}} कुब रहते हैं । उनके बीच द्रव्यादि रखनेसे किसी दिक् गिर नहीं सकते । ८।९ मन भार लादता है । इलहैरी अपर जातीय उष्ट्रसे खर्व पड़ते भी भारके वहनमें सबकी अपेक्षा पटु है । ऐसा बहुकालव्यापी द्रुतगामी पशु कहीं नहीं । हम जिस परदार घोड़े का गल्प सुनते, उसे द्रुतगति अनुमान करनेसे इलहैरी ही समझते हैं । अरबी कवियोंने इसकी जौभर प्रशंसा की है । इलहैरी आठ दिनमें प्रायः ४५० कोस अफरीकाका दुर्गम मरुपथ तय करता है । उष्ट्र—रोमन्थक कहलाता अर्थात् भुक्त वस्तु उद्गीरणपूर्वक फिर चबाता है । किन्तु दन्तकी संख्याके अनुसार अपर रोमन्थक पशुओंसे इसका लक्षण भिन्न है । अपर रोमन्थक पशुके केवल नीचेकी टङ्गमें छेदन-दन्त जमते, उसके ऊपरी अग्रभागमें नहीं निकलते । परन्तु उष्ट्रके नीचे ऊपर दोनों टङ्ग वह रहा करते हैं । सोलह ऊपर और अट्ठारह नीचे कुल ३४ दांत होते हैं । ऊपरी टङ्गमें २ {{SIC|छक्क|छेदक}}, २ तीक्ष्ण एवं १२ पेषण-दन्त और नीचे ६ {{SIC|छक्क|छेदक}}, २ तीक्ष्ण तथा १० पेषणदन्त होते हैं । ऊपरके {{SIC|छक्क|छेदक}} अधिकांश तीक्ष्ण दन्त-जैसे ही रहते हैं । अपर रोमन्थक पशुओंसे उष्ट्रका दूसरा लक्षण भी भिन्न है । घन और नौकाकार गुल्फके अस्थि (Tarsus) अलग अलग रहते हैं । फिर अपर रोमन्थकोंकी तरह खुर द्विखण्डित नहीं जुड़े होते हैं । प्रायः शशककी तरह छिदे होते हैं । चर्वण कोष्ठक अति दृढ़सी पड़ती और कठोरताके उपयुक्त नहीं जंचती । नासिका वक्र और सङ्कोचनके योग्य लगती है । मस्तक बृहत् होता है । ग्रीवा क्षीण और दीर्घ रहती है । पृष्ठ देश कुब्ज होता है । ऊरु तथा जङ्घाका दैर्घ्य अपरिमित रहता है । पद स्थूल और दो मात्र नख-विशिष्ट होते हैं । पदका तल प्रशस्त रहनेसे मरुके मध्य चलते समय वालुकामें नहीं धंसता । ऊपरका होंठ शशककी तरह होनेसे उष्ट्र वालुकायुक्त अरण्यस्थित कण्टकमय गुल्मादि खा सकता है । नासिका वक्र और सङ्कोचन योग्य रहनेसे यह मरुभूमिमें 'सिमूम' </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> m1vwz35u7anm8vmz6n7ad3vm6mdf33i पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०३ 250 76107 665935 609183 2026-07-07T15:28:49Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 665935 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०२'''|'''उष्ट्र'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> नामक साक्षात् कालान्तक वालुकाका प्रवाह बचा जाता है ! यात्राके कालपर जब 'सिमूम' नामक वायु चलने लगता, तब उष्ट्रसे नीचे उतर मट्टीमें मुंह घुसेड़ रखने पर अति कष्टसे आरोहियोंका प्राण बचता है किन्तु इसका काम सामान्य नासिका सिकोड़नेसे ही बन जाता है । {{center|[[चित्र:हिंदी विश्वकोष भाग ३ (page 403 crop).jpg|350px]]<br><small>उष्ट्र ।</small>}} उष्ट्रकी पाकस्थलीमें बड़ा चमत्कार है । वह अपर सकल जन्तुकी पाकस्थली से भिन्न होती है । पहले वह एक ओखली जैसी समझ पड़ती है ! पश्चात् दिक् दो घर रहते हैं । वह मध्यमें एक कठिन पंक्ति द्वारा विभक्त हैं । यह अंश अवनालीवाले छिद्रपथके दक्षिण पार्श्व से ढकते गया है । इस ओखलीमें जलका पोसरा रहता और आवश्यकता पड़नेसे उष्ट्र फिर जल पी सकता है । किसी किसी अरबी ऐतिहासिकने यहां तक कह दिया है कि जब मुहम्मदने टाबक नगरको यूनानियोंके विपक्षमें गमन किया, तब सैन्यके सामन्तोंने आहार एवं पानीयके अभावसे अत्यन्त विपदमें पड़ अपने अपने ऊंटको मार पाकस्थलीका जल पिया था । (Salis Koran, p. 164.) किन्तु युरोपके वर्त्तमान प्राणितत्त्वविद् उक्त घटना नहीं मानते । इसे वनका कण्टकद्रुम खाना अच्छा लगता है । यथेष्ट आहार न मिलने भी उष्ट्र कातर अथवा भार वहनमें अक्षम नहीं पड़ता । अधिक दिन उपयुक्त आहार न मिलने पर पृष्ठस्थित ककुदके रक्त मांससे प्रतिपालन कार्य सम्पादित होता है । अति पूर्वकालसे उष्ट्र मानवके व्यवहारमें लगता है । अनेक प्रमाण मिलते हैं कि वैदिक समयके </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> आर्य ऊंटपर चढ़ते थे । (ऋक् ८।४६।२२-३१) वह अश्वकी तरह युद्धमें भी इसका व्यवहार करते थे— {{block center|<poem> "यथा अघ उष्ट्रो न दौपरोतधः ।" (ऋक् १।१३८।२) </poem>}} वैदिक समयसे ही (ऋक् ८।५।३७, ८।४६।३१) राजा अश्व गो एवं धनादिकी तरह उष्ट्रदान (भारत, सभा) करते आये हैं । अश्वयान और गोयानकी तरह पूर्वकालमें उष्ट्रयानका भी व्यवहार रहा (मनु ३।२०४) । उस समय ब्राह्मण उष्ट्रयानपर चढ़ न सकते थे । कारण—उष्ट्रयानपर चढ़नेसे ब्राह्मणको पाप लगता है— {{block center|<poem> "उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानन्तु कामतः । स्नात्वा तु विप्रो दिग्वासाः प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥" (मनु ११।२०२) </poem>}} ब्राह्मण यदि अपनी इच्छासे उष्ट्रयान अथवा गर्दभ यानपर चढ़ता, तो विवस्त्र नहा प्राणायाम करनेसे शुद्ध होता है । शास्त्रमें उष्ट्रके मांसका भक्षण निषिद्ध है— {{block center|<poem> "गौधेयश्वाविदुष्ट्रञ्च सर्वे पञ्चनखांस्तथा । अद्यात् कुक्कुटं ग्राम्यं कुर्यात् चान्द्रायणं व्रतम् ॥" (गरुड़संहिता १७२।१) </poem>}} गोह, शल्यी, ऊंट, पांचनखका पशु और मांसाशी गांवका मुर्गा खानेसे संवत्सर व्रतकरना चाहिये । बाइबिलमें भी उष्ट्रका मांस अभक्ष्य-जैसा निर्दिष्ट है—"Because he cheweth the cud, but divideth not the {{SIC|hoop|hoof}}; he is unclean unto you." (Leviticus, xi. 4.) उष्ट्र तुम्हारे पक्षमें अशुचि है । क्योंकि जुगाली चलते भी इसके खुर फटे नहीं होते । अरब देशके कवियोंने इस पशुको 'अरण्यपोत' जैसा वर्णन किया है । उष्ट्र उन्हें प्राणसे अधिक प्रिय है । वह इसके मांस और दुग्धसे जीवन धारण करते हैं । लोमसे वस्त्र बनता और शिविरके प्रस्तुतकरणका उपादान मिलता है । यह वस्त्र उत्तरपश्चिम अञ्चलमें किसी किसी स्थानपर बिकता है । विलायतमें उष्ट्रके लोमसे क़लम तैयार होता है । उष्ट्रका मल अरब देशमें जलानेके काम आता और धूमसे निशादल बन जाता है । वैद्यक मतसे उष्ट्रीका दुग्ध लघु, स्वादु, लवणस्वाद </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> kbhvadz0aq9wwjv7rt1yuaptclcduhj 666345 665935 2026-07-07T16:46:11Z AKTBot 6197 666345 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०२'''|'''उष्ट्र'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> नामक साक्षात् कालान्तक वालुकाका प्रवाह बचा जाता है ! यात्राके कालपर जब 'सिमूम' नामक वायु चलने लगता, तब उष्ट्रसे नीचे उतर मट्टीमें मुंह घुसेड़ रखने पर अति कष्टसे आरोहियोंका प्राण बचता है किन्तु इसका काम सामान्य नासिका सिकोड़नेसे ही बन जाता है।<br> {{c|[[चित्र:हिंदी विश्वकोष भाग ३ (page 403 crop).jpg|200px]]<br><small>उष्ट्र।</small>}} उष्ट्रकी पाकस्थलीमें बड़ा चमत्कार है । वह अपर सकल जन्तुकी पाकस्थली से भिन्न होती है । पहले वह एक ओखली जैसी समझ पड़ती है ! पश्चात् दिक् दो घर रहते हैं । वह मध्यमें एक कठिन पंक्ति द्वारा विभक्त हैं । यह अंश अवनालीवाले छिद्रपथके दक्षिण पार्श्व से ढकते गया है । इस ओखलीमें जलका पोसरा रहता और आवश्यकता पड़नेसे उष्ट्र फिर जल पी सकता है । किसी किसी अरबी ऐतिहासिकने यहां तक कह दिया है कि जब मुहम्मदने टाबक नगरको यूनानियोंके विपक्षमें गमन किया, तब सैन्यके सामन्तोंने आहार एवं पानीयके अभावसे अत्यन्त विपदमें पड़ अपने अपने ऊंटको मार पाकस्थलीका जल पिया था । (Salis Koran, p. 164.) किन्तु युरोपके वर्त्तमान प्राणितत्त्वविद् उक्त घटना नहीं मानते । इसे वनका कण्टकद्रुम खाना अच्छा लगता है । यथेष्ट आहार न मिलने भी उष्ट्र कातर अथवा भार वहनमें अक्षम नहीं पड़ता । अधिक दिन उपयुक्त आहार न मिलने पर पृष्ठस्थित ककुदके रक्त मांससे प्रतिपालन कार्य सम्पादित होता है । अति पूर्वकालसे उष्ट्र मानवके व्यवहारमें लगता है । अनेक प्रमाण मिलते हैं कि वैदिक समयके </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> आर्य ऊंटपर चढ़ते थे । (ऋक् ८।४६।२२-३१) वह अश्वकी तरह युद्धमें भी इसका व्यवहार करते थे— {{block center|<poem> "यथा अघ उष्ट्रो न दौपरोतधः ।" (ऋक् १।१३८।२) </poem>}} वैदिक समयसे ही (ऋक् ८।५।३७, ८।४६।३१) राजा अश्व गो एवं धनादिकी तरह उष्ट्रदान (भारत, सभा) करते आये हैं । अश्वयान और गोयानकी तरह पूर्वकालमें उष्ट्रयानका भी व्यवहार रहा (मनु ३।२०४) । उस समय ब्राह्मण उष्ट्रयानपर चढ़ न सकते थे । कारण—उष्ट्रयानपर चढ़नेसे ब्राह्मणको पाप लगता है— {{block center|<poem> "उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानन्तु कामतः । स्नात्वा तु विप्रो दिग्वासाः प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥" (मनु ११।२०२) </poem>}} ब्राह्मण यदि अपनी इच्छासे उष्ट्रयान अथवा गर्दभ यानपर चढ़ता, तो विवस्त्र नहा प्राणायाम करनेसे शुद्ध होता है । शास्त्रमें उष्ट्रके मांसका भक्षण निषिद्ध है— {{block center|<poem> "गौधेयश्वाविदुष्ट्रञ्च सर्वे पञ्चनखांस्तथा । अद्यात् कुक्कुटं ग्राम्यं कुर्यात् चान्द्रायणं व्रतम् ॥" (गरुड़संहिता १७२।१) </poem>}} गोह, शल्यी, ऊंट, पांचनखका पशु और मांसाशी गांवका मुर्गा खानेसे संवत्सर व्रतकरना चाहिये । बाइबिलमें भी उष्ट्रका मांस अभक्ष्य-जैसा निर्दिष्ट है—"Because he cheweth the cud, but divideth not the {{SIC|hoop|hoof}}; he is unclean unto you." (Leviticus, xi. 4.) उष्ट्र तुम्हारे पक्षमें अशुचि है । क्योंकि जुगाली चलते भी इसके खुर फटे नहीं होते । अरब देशके कवियोंने इस पशुको 'अरण्यपोत' जैसा वर्णन किया है । उष्ट्र उन्हें प्राणसे अधिक प्रिय है । वह इसके मांस और दुग्धसे जीवन धारण करते हैं । लोमसे वस्त्र बनता और शिविरके प्रस्तुतकरणका उपादान मिलता है । यह वस्त्र उत्तरपश्चिम अञ्चलमें किसी किसी स्थानपर बिकता है । विलायतमें उष्ट्रके लोमसे क़लम तैयार होता है । उष्ट्रका मल अरब देशमें जलानेके काम आता और धूमसे निशादल बन जाता है । वैद्यक मतसे उष्ट्रीका दुग्ध लघु, स्वादु, लवणस्वाद </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> hzrr3erhfg2qax4cu12cpev78wn9fzj 666346 666345 2026-07-07T16:47:02Z AKTBot 6197 666346 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०२'''|'''उष्ट्र'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> नामक साक्षात् कालान्तक वालुकाका प्रवाह बचा जाता है ! यात्राके कालपर जब 'सिमूम' नामक वायु चलने लगता, तब उष्ट्रसे नीचे उतर मट्टीमें मुंह घुसेड़ रखने पर अति कष्टसे आरोहियोंका प्राण बचता है किन्तु इसका काम सामान्य नासिका सिकोड़नेसे ही बन जाता है।<br> {{c|[[चित्र:हिंदी विश्वकोष भाग ३ (page 403 crop).jpg|175px]]<br><small>उष्ट्र।</small>}} उष्ट्रकी पाकस्थलीमें बड़ा चमत्कार है । वह अपर सकल जन्तुकी पाकस्थली से भिन्न होती है । पहले वह एक ओखली जैसी समझ पड़ती है ! पश्चात् दिक् दो घर रहते हैं । वह मध्यमें एक कठिन पंक्ति द्वारा विभक्त हैं । यह अंश अवनालीवाले छिद्रपथके दक्षिण पार्श्व से ढकते गया है । इस ओखलीमें जलका पोसरा रहता और आवश्यकता पड़नेसे उष्ट्र फिर जल पी सकता है । किसी किसी अरबी ऐतिहासिकने यहां तक कह दिया है कि जब मुहम्मदने टाबक नगरको यूनानियोंके विपक्षमें गमन किया, तब सैन्यके सामन्तोंने आहार एवं पानीयके अभावसे अत्यन्त विपदमें पड़ अपने अपने ऊंटको मार पाकस्थलीका जल पिया था । (Salis Koran, p. 164.) किन्तु युरोपके वर्त्तमान प्राणितत्त्वविद् उक्त घटना नहीं मानते । इसे वनका कण्टकद्रुम खाना अच्छा लगता है । यथेष्ट आहार न मिलने भी उष्ट्र कातर अथवा भार वहनमें अक्षम नहीं पड़ता । अधिक दिन उपयुक्त आहार न मिलने पर पृष्ठस्थित ककुदके रक्त मांससे प्रतिपालन कार्य सम्पादित होता है । अति पूर्वकालसे उष्ट्र मानवके व्यवहारमें लगता है । अनेक प्रमाण मिलते हैं कि वैदिक समयके </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> आर्य ऊंटपर चढ़ते थे । (ऋक् ८।४६।२२-३१) वह अश्वकी तरह युद्धमें भी इसका व्यवहार करते थे— {{block center|<poem> "यथा अघ उष्ट्रो न दौपरोतधः ।" (ऋक् १।१३८।२) </poem>}} वैदिक समयसे ही (ऋक् ८।५।३७, ८।४६।३१) राजा अश्व गो एवं धनादिकी तरह उष्ट्रदान (भारत, सभा) करते आये हैं । अश्वयान और गोयानकी तरह पूर्वकालमें उष्ट्रयानका भी व्यवहार रहा (मनु ३।२०४) । उस समय ब्राह्मण उष्ट्रयानपर चढ़ न सकते थे । कारण—उष्ट्रयानपर चढ़नेसे ब्राह्मणको पाप लगता है— {{block center|<poem> "उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानन्तु कामतः । स्नात्वा तु विप्रो दिग्वासाः प्राणायामेन शुद्ध्यति ॥" (मनु ११।२०२) </poem>}} ब्राह्मण यदि अपनी इच्छासे उष्ट्रयान अथवा गर्दभ यानपर चढ़ता, तो विवस्त्र नहा प्राणायाम करनेसे शुद्ध होता है । शास्त्रमें उष्ट्रके मांसका भक्षण निषिद्ध है— {{block center|<poem> "गौधेयश्वाविदुष्ट्रञ्च सर्वे पञ्चनखांस्तथा । अद्यात् कुक्कुटं ग्राम्यं कुर्यात् चान्द्रायणं व्रतम् ॥" (गरुड़संहिता १७२।१) </poem>}} गोह, शल्यी, ऊंट, पांचनखका पशु और मांसाशी गांवका मुर्गा खानेसे संवत्सर व्रतकरना चाहिये । बाइबिलमें भी उष्ट्रका मांस अभक्ष्य-जैसा निर्दिष्ट है—"Because he cheweth the cud, but divideth not the {{SIC|hoop|hoof}}; he is unclean unto you." (Leviticus, xi. 4.) उष्ट्र तुम्हारे पक्षमें अशुचि है । क्योंकि जुगाली चलते भी इसके खुर फटे नहीं होते । अरब देशके कवियोंने इस पशुको 'अरण्यपोत' जैसा वर्णन किया है । उष्ट्र उन्हें प्राणसे अधिक प्रिय है । वह इसके मांस और दुग्धसे जीवन धारण करते हैं । लोमसे वस्त्र बनता और शिविरके प्रस्तुतकरणका उपादान मिलता है । यह वस्त्र उत्तरपश्चिम अञ्चलमें किसी किसी स्थानपर बिकता है । विलायतमें उष्ट्रके लोमसे क़लम तैयार होता है । उष्ट्रका मल अरब देशमें जलानेके काम आता और धूमसे निशादल बन जाता है । वैद्यक मतसे उष्ट्रीका दुग्ध लघु, स्वादु, लवणस्वाद </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> mu7npo1co2mbnxvobnbnfmxtp7ay54t पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०४ 250 76108 666362 609184 2026-07-07T23:27:26Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 666362 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उष्ट्रकण्टकभोजनन्याय—उष्ट्रपक्षी'''|'''४०३'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> एवं दीपन होता और कृमि, कुष्ठ, आनाह, शोथ तथा उदररोगको दूर करता है । उष्ट्रीका घृत दीपन और वातश्लेष्मनाशक है ; यह पुराना हो जानेसे कटु हो जाता है। इसको पीनेसे शोथ, विष, कुष्ठ, कृमि, गुल्म और उदररोग नष्ट होता है । उष्ट्रका मूत्र श्वास, कास और अर्शोरोगको मिटानेवाला है । उष्ट्रकण्टकभोजनन्याय (सं० पु०) उष्ट्रके कण्टक भोजनका न्याय, ऊंटके कांटा खानेकी चाल । क्षतसे बहु दुःख सहते भी उष्ट्र कैसे सामान्य भोजनकी दृष्टिसे सुखकी शमी कण्टक खा जाता, वैसेही मनुष्य भी यत्सामान्य सुखके आशयसे बहुतसा सांसारिक दुःख उठाता है । क्षणभङ्गुर सुखके लिये भावी अनन्त दुःखका ध्यान न रखना उष्ट्रकण्टकभोजनन्याय कहलाता है । उष्ट्रकर्ण (सं० पु०) जनपदविशेष : यह सिन्धुनदसे उत्तरस्थित एक म्लेच्छ देश है । यूनानी ऐतिहासिकोंने इसे अष्टकणि ( Astaceni ) कहा है ! उष्ट्रकर्णिक (सं० पु०) १ दक्षिणादिक्स्थ यवन देश । २ उक्त देशके लोग । सहदेवके दिग्विजयवर्णनपर कहा है— {{block center|<poem> "अश्मांस्तुलवधांश्चैव कलिङ्गानूष्ट्रकर्णिकान् ।" (भारत, सभा) </poem>}} उष्ट्रकाण्डी (सं० स्त्री०) उष्ट्र इव काण्डोऽस्य, जातित्वात् ङीष् । पुष्पविशेष, ऊंटकटारी । इसका संस्कृत पर्याय—रक्तपुष्पी, करभकाण्डिका, रक्ता, लोहितपुष्पी, और कर्णपुष्पी है । उष्ट्रकाण्डी तिक्तरस, उष्णवीर्य, रुचिकारक एवं हृद्रोगनाशक होती है । वीज मधुर है । शीतल रस उष्ण करनेसे गुणकारी, वीर्यवर्धक और सन्तर्पणजनक ठहरता है । (राजनिघण्टु) उष्ट्रक्रोशी (सं० त्रि०) उष्ट्रकी भांति शब्द निकालने-वाला, जो ऊंटकी तरह बोलता हो । उष्ट्रगोयुग (सं० क्ली०) उष्ट्रद्वय, ऊंटका जोड़ा । उष्ट्रग्रीव (सं० पु०) भगन्दररोग विशेष । प्रकुपित पित्त द्वारा वायु अधःप्रेरित होता है । वहां उसके ठहरनेसे रक्तवर्ण, सूक्ष्म, उन्नत उष्ट्रग्रीवाकार पिड़का पड़ जाती है । उसमें टपकनेकी तरह वेदना </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> उठती है । फिर प्रतिक्रियासे वह पक जाती है । (सुश्रुत) माधवनिदानमें इसका नाम 'उष्ट्रशिरोधर' लिखा है । भगन्दर देखो । उष्ट्रधूसरपुच्छिका (सं० स्त्री०) उष्ट्रस्य धूसरः पुच्छ इव पुच्छः मञ्जरी यस्याः । कञ्चिकाली, विषुवा । उष्ट्रपक्षी (सं० पु०) द्रुतगामी एक भूचर पक्षी, शुतुर-मुर्ग । (Struthio camelus) इसकी चोंच सीधी, फैली और भीतरको गोल होती है । माथा छोटा और गला लम्बा पड़ता है । दोनों पैर अधिक बृहत् और बलिष्ठ रहते हैं । पैरमें दो-दो तलवे होते हैं । उनमें एक भीतर और एक बाहर लगता है । भीतरी ज्यादा बड़ा और खपड़े जैसा होता है । बाज़ूसे यह उड़ नहीं सकता । किन्तु दौड़नेमें बड़ी सुविधा होती है । बाजू और पूंछमें मुलायम पर रहते हैं । शुतुरमुर्ग अपर सकल पक्षियोंकी अपेक्षा बड़ा ठहरता है । इसलिये 'पक्षिराज' कह सकते हैं । यह चारसे छह हाथतक ऊंचा निकलता है । स्त्रीजाति एककाल प्रायः १० अण्डे देती है । फिर एक-एक अण्डा मुर्ग़ीके २४ अण्डोंके बराबर बैठता है । अधेड़ नरका काला और चिकना तथा मादे या बच्चेका पाख काला अथच कबरा—बीच-बीच सफ़ेद रहता है । बाज़ू और पूंछके बड़े-बड़े पर सफ़ेद होते हैं । बीच बीचमें काले धब्बे देख पड़ते हैं । चक्षु अतिशय तीक्ष्ण और उज्ज्वल रहते हैं । इसे अधिक दूरके द्रव्यादि सहजमें ही दिखायी देते हैं । यह बहुत बलवान् होता है । घटनाक्रमसे आक्र-मण पड़नेपर यह पदके आघातसे व्याघ्रादि जन्तुओंको डरा सकता है । प्रति घण्टे शुतुरमुर्ग २० कोससे अधिक जानेकी शक्ति रखता है । अतिशय झपटनेसे यह सहज ही हाथ नहीं लगता । दक्षिण अफरीकाके लोग शुतुरमुर्गका ही चमड़ा पहन शुतुरमुर्गके आगे पहुंचते हैं । यह उन्हें भी शुतुरमुर्ग समझ नज़दीक आनेसे नहीं रोकता । इसी उपायसे वह निकट जा और विषाक्त तीर चला इसे मार डालते हैं । शुतुरमुर्ग अरब और अफरीकाकी मरुभूमिमें रहता है । इसे शीघ्र तृषा नहीं लगती । दो-चार दिन </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> ryuse01241e6vh8wzp22n0wj854d976 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०५ 250 76109 666363 609185 2026-07-07T23:30:40Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 666363 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०४'''|'''उष्ट्रपादिका—उष्णप्रस्रवण'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> बाद जब तृषार्त्त दिखायी देता, तब मरुभूमिके मध्यसे निकाल यह कलौंटे या खरबूजेका जल पी लेता है । क्षुधा लगने पर {{SIC|जसे|जैसे}} छोटा पक्षी बालका दाना तोड़ तोड़ चुगता, वैसेही शुतुरमुर्ग बड़े बड़े पत्थर, लोहेके टुकड़े, कङ्कड़, कांचके बरतन, तांबेके सिक्के और टूटे जूते निगलने लगता है । अफरीकाके लोग इसके अण्डे खाते हैं । प्राचीन कालसे विलायतमें इसके परका बड़ा आदर है । पालनेसे शुतुरमुर्ग हिल जाता है । किन्तु अपरिचित व्यक्तिको निकट आते देख यह प्रायः आक्रमण करता है । बाइबिलमें शुतुरमुर्गका मांस निषिद्ध ठहरा है । (Leviticus, xi. 16.) उष्ट्रपादिका (सं० स्त्री०) मदनमालिनी, चमेली । उष्ट्रयान (सं० क्ली०) उष्ट्र द्वारा वहन किया जानेवाला यान, ऊंटगाड़ी । उष्ट्रशिरोधर (सं० क्ली०) भगन्दर रोगविशेष । उष्ट्रस्थान (सं० क्ली०) उष्ट्रस्य स्थानम्, ६-तत् । उष्ट्रके आवासका स्थान, ऊंटके रहनेकी जगह । उष्ट्रासिका (सं० स्त्री०) उष्ट्रस्येव आसिका आसनम् । उष्ट्रासन, ऊंटकी तरह बैठनेकी हालत । उष्ट्रिका (सं० स्त्री०) उष्ट्रस्य आक्कृतिरिव आक्कृतिर्यस्याः । १ मृण्मय सुरापात्र विशेष, शराब रखनेकी एक मट्टीका बरतन । उष्ट्रस्य स्त्री, उष्ट्र-कन्-टाप् अत इत्वम् । २ उष्ट्र, ऊंटनी । {{block center|<poem> "भूमैरुच्चिथैर्वितानितोष्ट्रिका :" (माघ १२।१६) </poem>}} उष्ट्री (सं० स्त्री०) उष-ट्रन्-ङीष् । उष्ट्रिका देखो । उष्ण (सं० पु० क्ली०) उष्-नक् । इनृषिविजीव्युषिमजि नक् । उण् ३।१ । १ ग्रीष्म, गरमीका मौसम । २ आतप, धूप । ३ पलाण्डु, प्याज । ४ उषा, जलन । ५ अग्नि, आग । ६ सूर्य, आफ़ताब । ७ नरकविशेष । ८ पित्त, सफ़रा । ९ कौक्षदीपस्थ वर्षविशेष । (त्रि०) १० अशीतल, गर्म । ११ तीव्र तेज़ । १२ अनलस, फुरतीला । वैद्यक मतसे उष्ण वीर्य द्रव्य पित्तप्रकोपकारी, लघु एवं वातश्लेष्मनाशक होता है । उष्णक (सं० त्रि०) उष्णां कार्यं यस्य, उष्ण-कन् । १ {{SIC|चिप्रकारी|क्षिप्रकारी}}, फुरतीला । </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> उष्णकटिबन्ध (सं० पु०) कर्कट क्रान्ति और मकरक्रान्तिके मध्यका स्थान, {{SIC|मिन्तकःहारा|मिन्तकाहारा}}, गर्म खण्ड । यह ४७° प्रशस्त है । उष्णकटिबन्धमें सूर्यकी किरणें सीधी पड़नेसे उष्णता अधिक रहती है । उष्णकर (सं० पु०) उष्णाः करः किरणो यस्य, अथवा उष्णं करोति, उष्ण-कृ-अच् । १ सूर्य, आफ़ताब । (त्रि०) २ उष्णकारी, गर्म करनेवाला, जो गरमी लाता हो । उष्णकाल (सं० पु०) उष्णावासी कालश्च, कर्मधा० । ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम । {{block center|<poem> "तक्रं नैव घृते दद्यात् नोष्णकाले न दुर्बले ।" (सुश्रुत) </poem>}} उष्णग (सं० पु०) ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम । {{block center|<poem> "{{SIC|घित्तं|चित्तं}} रहसि मे भीमा {{SIC|नदीकूष|नदीकूल}}मिवोष्णगः ।" (रामायण ५।२१।२६) </poem>}} उष्णगु (सं० पु०) उष्णाः गौः किरणो यस्य, ओकारस्य ह्रस्वत्वम् । सूर्य, आफ़ताब । उष्णङ्करण (सं० त्रि०) उष्ण करनेवाला, जो गर्म करता हो । उष्णता (सं० स्त्री०) आतप, गरमी । उष्णत्व (सं० क्ली०) उष्णता, गरमी । उष्णदीधिति (सं० पु०) उष्णा दीधितयः किरणा यस्य । सूर्य, आफ़ताब । उष्णनदी (सं० स्त्री०) उष्णा चासौ नदी चेति, नित्यकर्मधारयः । वैतरणी नदी । उष्णप्रस्रवण (सं० क्ली०) तप्तकुण्ड, गर्म पानीका झरना । जिस प्रस्रवणसे उष्ण जल निकलता अथवा जिस स्थानका जल सर्वदा उष्ण रह बहता, उसका नाम उष्णप्रस्रवण पड़ता है । पृथिवीके नाना स्थानोंमें उष्णप्रस्रवण विद्यमान हैं । भारतवर्षमें जो स्थान उष्णप्रस्रवण रहनेसे तीर्थ समझे जाते, उनके नाम नीचे दिये जाते हैं— वीरभूममें वक्रेश्वर नामक पवित्र तीर्थस्थान है । इस पुण्य भूमिमें न्यूनाधिक ८ प्रस्रवण चलते हैं । उनमें सूर्यकुण्ड नामक प्रस्रवण प्रधान है । उष्ण होते भी सूर्यकुण्डके जलसे लतायें उपजा करती हैं । जलके ऊर्ध्व भागमें उपजनेवाली प्रायः हरी और अधो-भागमें होनेवाली अधिक तापके कारण पीली पड़ </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> bvc9yytggmx1bemn4wbebk2xwawdn1v पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०६ 250 76110 666364 609186 2026-07-07T23:33:20Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 666364 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उष्णरश्मि—उष्णीष'''|'''४०५'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> जाती है । उभयको तापमानयन्त्रसे देखने पर १६४° से ८०° पर्यन्त ताप मिलता है । थाना जिलेके भिवन्डी तालुकमें प्रायः १५० उष्ण कुण्ड हैं । उनमें कितने ही थाना जिलेकी वैतरणी नदीके निकट पड़ते हैं । उक्त कुण्ड अतिप्राचीन कालसे तीर्थकी तरह प्रसिद्ध हैं । पिण्डी पर्वतके पास अर्जुनकुण्ड है । उसमें १३° ताप रहता है । कितने ही क्षुद्र क्षुद्र भी उष्णप्रस्रवण हैं । उनके कर्दमसे धूम उठता है । सिन्धु प्रदेशमें अनेक उष्ण प्रस्रवण हैं । उनमें मञ्च ह्रदके निकट भीलगिरिके शिखर देशपर एक अतिशय उत्तम प्रस्रवण है । उसके जलमें हाथ डाल नहीं सकते । सिन्धु प्रदेशके लक्खी नामक ग्राममें तप्त गन्धकके कई प्रस्रवण हैं । पञ्जाबके उत्तरांशमें हिमालय पर्वतके पास पार्वती नदी किनारे मणिकर्ण नामक तीर्थ है । इस पर्वतमय प्रदेशमें अनेक उष्ण प्रस्रवण देख पड़ते हैं । हम समझते हैं, कि वे सकल पवित्र प्रस्रवण ही पूर्वकालमें उष्णोदङ्क नामसे प्रसिद्ध थे । {{block center|<poem> "सप्त ह्रदं च पुष्याक्षां भृगुतुङ्गं च पर्वतम् । उष्णोदङ्कं च कौन्तेय समासाद्य सुसुखमेधते ॥" (भारत, वन १३५ अ०) </poem>}} मणिकर्णके लोग उष्ण प्रस्रवणके तापसे रन्धनकार्य चलाते हैं । उन्हें जलानेके लिये काठका प्रयोजन नहीं पड़ता । काश्मीरके उत्तर लाधक प्रदेशमें अनेक क्षुद्र उष्ण-प्रस्रवण हैं । चट्टग्राममें चन्द्रनाथ गिरिपर सीताकुण्ड नामक एक पवित्र प्रस्रवण है । पूर्वकालसे यह कुण्ड हिन्दुओं और बौद्धोंके पवित्र तीर्थस्थानकी तरह प्रसिद्ध है । इस कुण्डसे धूम निकलता है । उष्णरश्मि (सं० पु०) उष्णा रश्मयोऽस्य, बहुव्री० । १ सूर्य, आफ़ताब । २ अर्कवृक्ष, अकौड़ेका पेड़ । उष्णरुचि, उष्णरश्मि देखो । उष्णवारण (सं० पु०-क्ली०) उष्णां आतपं वारयति, उष्ण-वृ-णिच्-ल्यु । छत्व, छाता । {{block center|<poem> "यदर्धमम्भोरुहमिवोष्णवारणम् ।" (कुमार ५।२२) </poem>}} उष्णवाष्प (सं० पु०) १ तप्तवाष्प, गर्म भाप । २ अश्रु, आंसू । उष्णवीर्य (सं० पु०) {{SIC|उष्णां|उष्णं}} वीर्यं यस्य, १ शिशुमार,<br><br>Vol &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 102 </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> सङ्कुमाछी, सूस । (त्रि०) २ तीक्ष्णवीर्य, गर्म तासीर रखनेवाला । ३ बलवान्, ताक़तवर । उष्णवैताली (सं० स्त्री०) एक देवी । उष्णा (सं० स्त्री०) उष्यते दह्यते यया, उष दहे नक्-टाप् । १ क्षयरोग, तपेदिक़ । २ सन्ताप, गरमी । ३ पित्त, सफ़रा । उष्णांशु (सं० पु०) उष्णा अंशवो यस्य, बहुव्री० । सूर्य, आफ़ताब । उष्णागम (सं० पु०) उष्णः आगमो यत्र । ग्रीष्म-काल, गरमीका मौसम । उष्णाभिगम, उष्णागम देखो । उष्णालु (सं० त्रि०) उष्ण-आलुच् । १ उत्ताप सहन करनेके लिये असमर्थ, जो गरमी बरदाश्त कर न सकता हो । २ आतपक्लान्त, गरमीसे घबराया हुआ । ३ शीतलप्रिय, जिसे ठण्डक अच्छी लगे । {{block center|<poem> "उष्णालुः शिशिरे निषीदति तरोर्मूलावबाले शिखी ।" (विक्रमोर्वशी) </poem>}} उष्णासह (सं० पु०) उष्णं आतपं आसह्यते यत्र, उष्ण-आ-सह-अच् । १ हेमन्तकाल, जाड़ेका मौसम । (त्रि०) २ उत्ताप सह न सकनेवाला, जो गरमी बरदाश्त कर न सकता हो । उष्णिक् (सं० स्त्री०) उत्-स्निह-क्विप् । सप्ताक्षर छन्दो-विशेष, सात अक्षरका एक छन्द । "गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च" (छन्दोमञ्जरी) यह छन्द तीन प्रकारका होता है— मधुमती, कुमारललिता और मदलेखा । उष्णिका (सं० स्त्री०) अल्पमन्नमस्याम्, अन्न अल्पार्थे निपातनात् अन्नशब्दस्य उष्णादेशः, टाप् अत-इत् । यवागु, महेरी । उष्णिमा (सं० पु०) उत्ताप, गरमी । उष्णोदङ्क (सं० क्ली०) उष्णोभूता गङ्गा यत्र । भृगु-पर्वतस्थ तीर्थविशेष । (भारत, वन १३५ अ०) उष्णप्रस्रवण देखो । उष्णीष (सं० पु०-क्ली०) {{SIC|उष्णां|उष्णं}} ईषते हिनस्ति, उष्ण-ईष-क । १ शिरोवेष्टन, पगड़ी, साफ़ा । वैद्यकके मतसे उष्णीषका धारण कान्तिजनक, केशवर्धक, आयुर्वर्धक, धूलि-शीत-उष्ण-निवारक, प्रतिश्याय तथा शिरःशूलप्रशमक और वर्ण-तेज-बल-वर्धक है । २ मुकुट, ताज । ३ चिह्नविशेष । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> ilowtukoog4ixwugecw4pumb7pa0ubu पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०७ 250 76111 666365 609187 2026-07-07T23:41:17Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 666365 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०६'''|'''उष्णीषधारी—उसना'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उष्णीषधारी (सं० पु०) उष्णीषं धरति, उष्णीष-धृ-णिनि । उष्णीष धारण करनेवाला, जो पगड़ी या साफ़ा बांधता हो । उष्णीषी (सं० त्रि०) उष्णीषं अस्त्यस्य, उष्णीष-इनि । १ उष्णीषधारी, पगड़ी या साफ़ा बांधनेवाला । (पु०) २ महादेव । {{block center|<poem> "{{SIC|उष्णोषीव|उष्णीषीव}} सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा ।" (भारत, अनु १४ अ०) </poem>}} उष्णोदक (सं० क्ली०) उष्णञ्च तत् उदकञ्चेति, कर्मधा० । उष्णजल, गर्मपानी । यह अर्द्धावशेष, त्रिपादावशेष, चतुर्थांशावशेष भेदसे अनेक प्रकारका होता है । साधारणतः कुछ काल तपा कर भी उदक व्यवहार किया जाता है । वैद्यकोक्त साधारण उष्णोदक स्रोत-हितकर, कास, ज्वर, विरुद्ध कफ, वात एवं आमका प्रशमक, मेदविनाशी, {{SIC|अम्भुशोषक|अम्बुशोषक}} और वस्तिपरिशोधक है । ग्रीष्ममें अर्द्धावशेष, शरत्कालमें एकांशावशेष, हेमन्त, शीत एवं वसन्तकालमें अर्द्धावशेष और वर्षा-कालमें अष्टमांशावशेष उष्णोदक पीना चाहिये । पादावशेष पित्तविनाशक, अर्द्धावशेष वातप्रशमक और त्रिपादावशेष उष्णोदक कफनाशक है । (भावप्रकाश) दिनको जो तपाया जाता, वह जल रातको गुरु हो जाता है । इसलिये दिनका उष्ण जल रातको व्यवहार नहीं करते । रातको नया जल उष्ण कर काममें लाना चाहिये । उष्ण जलका स्नान भी विशेष उपकार साधक है । किन्तु मस्तकपर उष्णोदक छोड़ना न चाहिये । उससे केश और चक्षुको अपकार पहुंचता है । उष्णोपगम (सं० पु०) उष्ण उपगम्यते अत्र, उष्ण-उप-गम-अप् । ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम । उष्म (सं० पु०) उष-मक् । १ ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम । २ उत्ताप, धूप । ३ तीव्रता, तेज़ी । ४ क्रोध, गुस्सा । ५ श, ष, स और ह चार वर्ण । उष्मक (सं० पु०) उष्म-कन् । ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम । उष्मज (सं० त्रि०) उष्मज, गरमीसे पैदा होनेवाला । (पु०) २ क्षुद्रकीटादि, गरमीसे पैदा होनेवाला कीड़ा । जैसे—मच्छर, खटमल बग़ैरह । </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> उष्मता (सं० स्त्री०) उष्मस्य भावः, उष्म-तल् । उष्णता, गरमी । उष्मपा (सं० पु०) उष्माणं पिबति, उष्म-पा-क्विप् । १ पितृलोक विशेष । २ उष्मपानकारी तपस्विन्विशेष । {{block center|<poem> "सुवासिनो बर्हिषद उष्मपा आज्यपास्तथा ।" (स्मृति) </poem>}} उष्मभास् (सं० पु०) सूर्य, आफ़ताब । उष्मवत् (सं० त्रि०) उष्म-मतुप्, मस्य वः । उष्मविशिष्ट, गर्म । "ज्वरदाहोष्मवतीं तडिम् !" (सुश्रुत) उष्मस्वेद (सं० पु०) उष्मणासौ स्वेदश्चेति, कर्मधा० । उष्मस्वेद, गर्म पसीना । स्वेद देखो । उष्मा (सं० पु०) उष-मनिन् । १ ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम । २ उत्ताप, गरमी । उष्म देखो । उष्मागम (सं० पु०) उष्मा आगम्यते यत्र, आ-गम-अप् । ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम । उष्मान्वित (सं० त्रि०) उत्तेजित, भड़का हुआ । उष्माय (नामधातु) उष्माणमुद्वमति, उष्मन्-क्यङ् । इसका अर्थ उष्मा उद्गमन करना या आग उगलना है । उष्मायण (सं० पु०) ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम । उष्मोपगम, उष्मायण देखो । उष्वल (सं० क्ली०) चारपाईका ढांचा । उस (हिं० सर्व०) तत्, वह । यह शब्द 'वह' का रूपान्तर है । विभक्ति लगनेसे 'वह' के स्थानमें 'उस' आदेश होता है । जैसे—उसने, उसको, उससे, उसका, उसमें, उसपर । 'उस' अन्य पुरुषके एकवचनका रूप है । बहुवचन 'उन' है । उसकन (हिं० पु०) १ उबसन, जूना, बरतन मांजनेका बान या पयाल वग़ैरहका मुट्ठा । २ उभार, उठाव । उसकना, उबसना देखो । उसकाना, उसकारना, उकसाना देखो । उसगन (हिं०) अपशकुन देखो । उसनना (हिं० क्रि०) १ उबालना । २ माड़ना, पानी डालकर गूंधना । उसना (हिं० वि०) उबाला हुआ, गर्म किया हुआ । जिस चावलको पानीमें डाल उबालते और भूसी निकालते, उसे उसना नामसे पुकारते हैं । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> gsglgzlrd78pm1415bk4bdqdppd0l5d पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०८ 250 76112 666366 609188 2026-07-07T23:44:14Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 666366 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उसनाना—उसुवाना'''|'''४०७'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उसनाना (हिं० क्रि०) १ उबलवाना, गर्म करवाना । २ मड़वाना, पानी डलाकर गुंधवाना । उसनौस (हिं०) उष्णीष देखो । उसवा (हिं०) उशवा देखो । उसबुपल्ली—बम्बई प्रान्तके प्राचीन पुष्यराष्ट्र प्रदेशका एक ग्राम । महाराज सिंहवर्माके राज्य पानेसे ११ वत्सर बाद इस ग्रामके अधिवासियोंको एक शासन-पत्र सुनाया गया था । उक्त महाराज सम्भवतः विष्णु-गोप वर्माके बड़े भाई रहे । विष्णुगोप वर्माने ही उक्त संस्कृत शासनपत्र निकाल यह ग्राम विष्णुहार मन्दिर पर उत्सर्ग किया । वह परमभागवत थे । सेनापति विष्णुवर्माने कण्डूकोट ग्राममें विष्णुहारका मन्दिर बनवाया था । उसमा (हिं० पु०) वसमा, उबटन । उसमान (अ० पु०) मुहम्मदके एक सखा या साथी । उसरना (हिं० क्रि०) सरकना, अलग होना । उसरू—युक्तप्रदेशस्थ राज्यविशेष । उसरीड़ी (हिं० स्त्री०) पक्षि विशेष, एक चिड़िया । उसलना, उसरना और उछलना देखो । उसवदात—बम्बई प्रान्तके एक प्राचीन शक नृपति । यह अपने श्वसुर नहपानके (१०० ई०) कोंकन और दाक्षिणात्यमें प्रतिनिधि रहे ! इनके कार्ल और नासिकवाले ताम्रफलकोंमें सोमनाथ पत्तन, भड़ौच, सोपारे और गोवर्द्धनके उत्सर्गकी बात लिखी है । दाहनुकपर इन्होंने एक घाट बनवाया था । सूर्पर-कमें उसवदात द्वारा निर्माण कराये विश्रामालय और भोजनालय थे । नासिकके १० म, १२ श और १४ श शिलालिपिमें लिखा है, कि उसवदातका विवाह चह-रात क्षत्रप नहपानकी दक्षमित्र नाम्नी कन्यासे हुआ था । इनके पिताका नाम दिनीक रहा । यह जातिके शक थे । संस्कृत ऋषभदत्तका अपभ्रंश उसवदात है । इन्होंने तीन सहस्र गोदान किये थे । उत्तर गुजरातमें आबू स्थानके निकट बनालमें सोनेका सोपान उसवदातने दिया । १४ ग्राम ब्राह्मणोंको भेंट चढ़ाये थे । यह प्रति वर्ष लाखों ब्राह्मण खिलानेवाले थे । दक्षिण काठियावाड़के प्रभासक्षेत्रमें इन्होंने आठ स्त्रियां ब्राह्म- </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> णोंको ब्याही थीं । ३२ सहस्र नारियलके पेड़ उसव-दातने पुरोहितोंको सङ्कल्पमें दिये । पुष्कर तीर्थमें जाकर इन्होंने तीन सहस्र गो और एक ग्राम दान किया था । थानेके पास चीवलमें उसवदातने ब्राह्म-णोंको कितना ही दान दिया था । थानेके दशानु ग्राममें इन्होंने ७० सहस्र कार्षापण वा २ सहस्र सुवर्ण ब्राह्म-णोंको बांटे थे । उसवदात निर्मित अम्बिका, पार, दमनगङ्गा, ताप्ती, कावेरी, दाहानु नदियोंके घाटोंपर यात्रियोंको उतराई देना पड़ती न थी । नदियोंके दोनों किनारे विश्राम स्थान और सोपान भी इन्होंने बनवाये । उसवदातने बौद्धोंको भी दान दिया था ! उच्च भारतमें सम्भवतः इन्होंने बौद्ध धर्मका अवलम्बन किया । उषवदत्तके कितने ही शिलाफलक निकले हैं । यह अपने समयके एक कर्ण रहे । उससना (हिं० क्रि०) १ उसरना, सरकना । २ श्वास ग्रहण करना, सांस निकालना । उसांस, उसास देखो । उसाना (हिं० क्रि०) पकोरना, फटकानेके साथ भूसी अलग करना । उसारना (हिं० क्रि०) १ विनाश करना, मिटाना । २ समापन करना, पूरे उतारना । उसारा (हिं० पु०) तृणाच्छादित द्वारप्रकोष्ठ, बरा-मदा, छत्ता । "नोकरको चाकर वाडर मांडीको उसारा ।" (लोकोक्ति) उसालना, उसारना देखो । उसास (हिं० स्त्री०) १ उच्छ्वास, आह । २ श्वास, सांस । उसासना (हिं० क्रि०) १ श्वास ग्रहण करना, सांस लेना । २ उच्छ्वास छोड़ना, आह भरना । उसासी (हिं० स्त्री०) श्वास ग्रहण करनेका समय, दम लेनेका वक़्त । उसिनना, उसनना देखो । उसीजना (हिं० क्रि०) मन्द-मन्द तप्त होना, धीरे-धीरे चुरना । उसौला (हिं०) वसौला देखो । उसौसा (हिं० पु०) १ शीर्षस्थान, सिरहाना । २ उपधान, तकिया । उसुवाना (हिं० क्रि०) सूजना, फूलना । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 2wqvnxonzot5qyeyb8pf0hikguof727 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०९ 250 76113 666367 609189 2026-07-07T23:50:20Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 666367 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०८'''|'''उसूल—उह्र'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> उसूल (अ० पु०) १ मूलतत्त्व, जड़ । २ मत, अक़ीदा । यह शब्द 'अस्ल'का बहुवचन है । उसेना (हिं० क्रि०) पानीमें डाल और आगपर चढ़ा किसी चीज़को मिल न जानेतक पकाना, उबालना । उसेय (हिं० पु०) वेणु विशेष, किसी क़िस्मका बांस । यह खसिया तथा जयंतियाके पर्वत पर उपजता है । उच्चता ५०-६० फीट रहती है । इसके चोंगे बनते, जो अनेक वस्तु रखनेके काममें लगते हैं । उसेर करना (हिं० क्रि०) १ स्मरण रखना, याद न भूलना । २ प्रतीक्षा करना, राह देखना । ३ अप्रसन्न होना, नाराज़, पड़ना । उस्तरा (फा० पु०) क्षुर, छुरा । काले बाल बनानेको उस्तरा लेना और किसीका माल मारनेको कोरे या उलटे उस्तरेसे मूंडना कहते हैं । उस्ता (हिं० पु०) खलीफ़ा, होशियार नाई । उस्ताद (फा० पु०) १ अध्यापक, मास्टर । २ ज्ञानवृद्ध, बड़ी अक़्लका आदमी । "आप उस्ताद आदमी हैं ।" (लोकोक्ति) ३ धूर्त्त, चालाक, बदमाश । ४ गायक, वेश्याका गुरु । (त्रि०) ५ कृतविद्य, जानकार । उस्तादी (फा० स्त्री०) १ कला कौशल, होशियारी, हुनर । २ चातुर्य, चालाकी । ३ अध्यापकका कार्य, मास्टरी । उस्तानी (फा० स्त्री०) १ गुरुपत्नी, उस्तादकी औरत । २ अध्यापिका, पढ़ानेवाली औरत । ३ धूर्त्त स्त्री, चालाक औरत । उस्त्र (सं० पु०) वस्-रक् सम्प्रसारणम् । स्थास्निदश्चिवसिष्कसीति । उण् ४।१६३ । १ वृष, बैल । २ रश्मि, किरण । ३ सूर्य, आफ़ताब । ४ अश्विनौकुमारद्वय । ५ देव । (त्रि०) ६ उषारसम्बन्धीय, सबेरे देख पड़नेवाला । ७ दीप्त, चमकदार । ८ स्वच्छ, साफ़ । ९ उद्गमनकारी, ऊंचा चढ़नेवाला । उस्त्रधन्वन् (सं० त्रि०) दीप्त धनुर्युक्त, चमकीली कमान् वाला । </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> उस्त्रियामन् (सं० त्रि०) प्रातः कालके समय बाहर निकलने वाला । उस्त्रा (सं० स्त्री०) उस्त्र-टाप् । १ गाभी, गाय । २ इन्दुरकर्णी लता, एक बेल । ३ पृथिवी, ज़मीन । उस्त्रि (सं० स्त्री०) वस्-कि । भ्रमणकारिणी, चलनेवाली । उस्त्रिक (वै० पु०) उस्त्र-ठन् । जीर्ण वृष, बुड्ढा बैल । {{block center|<poem> "ये त्वादेवोस्त्रिकं मन्यमानाः पापा भद्रमुपभो यजाः ।" (ऋक् १।१६४।५) </poem>}} उस्त्रिका (सं० स्त्री०) उस्त्रिक-टाप् । अल्पदुग्धवती गाभी, थोड़ा दूध देनेवाली गाय । उस्त्रिय (वै० पु०) उस्त्र स्वार्थे घ । जीर्णवृष, बुड्ढा बैल । {{block center|<poem> "बृहस्पतिरुस्त्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद्वावमती रुदानत् ।" (ऋक् ४।५०।५) </poem>}} उस्त्रिया (वै० स्त्री०) उस्त्रिय-टाप् । गवी, गाय । {{block center|<poem> "आयातमुस्त्रिभृः सुमतिः कल्पमानः संवेषयन् पृथिवीमुस्त्रियाभिः ।" (अथर्व श९।१) </poem>}} उह् (धातु) भ्वादि पर० सक० सेट् । इसका अर्थ पीड़ित करना है । उह (सं० अव्य०) १ सम्बोधन वाचक ए ! अरे ! ओ ! २ निश्चयार्थवाणी—ठीक । दुरुस्त । खूब । उहदा, ओहदा देखो । उहदेदार, ओहदेदार देखो । उहवां, उहां, वहां देखो । उहान (सं० पु०) देशविशेष, एक मुल्क । उहार, ओहार देखो । उहि, वह देखो । उही, वही देखो । उह्य (वै० अव्य०) उह-क्विप् । १ खेदसूचक शब्द विशेष, ओह, अरे, हाय । (त्रि०) २ वाहक, ले जानेवाला । {{block center|<poem> "हिंसाम उह्यत्र उषर्बुधः ।" (ऋक् ४।१५।४) </poem>}} उह्यमान (सं० त्रि०) वह्-शानच् कर्मणि । वहन किया जानेवाला, जो उठाया जाता हो । {{block center|<poem> "यथोह्यमानं खलु भोगभोजिना ।" (नैषध) </poem>}} उह्र (सं० पु०) वह्-रक् सम्प्रसारणम् । वृष, बैल । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 5u1bwvat46f0g5u6vl5qmstt2m129x5 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४१० 250 76114 666368 609191 2026-07-07T23:53:17Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 666368 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|{{xx-larger|'''ऊ'''}}}} <br> {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> ऊ (दीर्घ) संस्कृत तथा हिन्दी स्वरवर्णका षष्ठ अक्षर । इसका उच्चारणस्थान ओठ है । वर्णोद्धार तन्त्रमें लिखा है—ऊकारका रूप ह्रस्व उकारसे प्रायः मिला है । और विशेषता यह है, कि ऊकारके नीचे एक दूसरी वक्र रेखा नीचेकी तरफ अधिक जाती है । समस्त रेखाओंमें यम, अग्नि और वरुण अवस्थित हैं । ऊर्ध्वगत मात्राको लक्ष्मी वा सरस्वती कहते हैं । इसका तन्त्रोक्त नाम—ऊ, कण्टक, रति, शान्ति, क्रोधन, मधुसूदन, कामराज, कुजेश, महेश, वामकर्णक, अर्धीश, भैरव, सूक्ष्म, दीर्घघोणा, सरस्वती, विलासिनी, विघ्नकर्त्ता, लक्ष्मण, रूपकर्षिणी, महाविद्येश्वरी, यष्टा, षगडोभू, और कान्त्यकुब्ज है । २ धातुका अनुबन्ध विशेष । "ऊक्वेत्कः ।" (कवि० द्रु) (अव्य०) वेञ्-क्विप् । १ सम्बोधन—ए ! ओ ! अरे ! २ वाक्यारम्भ—हां ! कहिये ! ३ दया—रहम—राम राम ! ४ रक्षा हिफाज़त—त्राहि त्राहि ! (पु०) अवति रक्षति, अव-क्विप्-ज्वर् । ज्वरत्वरस्त्रिव्यविमवामुपधायाश्च । पा ६।४।२० । ५ महादेव । ६ चन्द्र । ७ रक्षक, मुहाफिज़ । ऊगना (हिं० क्रि०) उदय होना । निकलना । ऊगाबाई (हिं० वि०) निरर्थक, बेफायदा । ऊख, इक्षु और ईख देखो । ऊंग, ऊंघ देखो । ऊंगना (हिं० पु०) पशुरोग विशेष, चौपायोंकी एक बीमारी । इस रोगमें पशु कुछ नहीं खाता-पीता । शरीर शीतल लगता और कान बह चलता है । ऊंगा (हिं० पु०) अपामार्ग, लटजीरा । ऊंगी (स्त्री०) ऊंगा देखो । ऊंच (हिं० स्त्री०) १ निद्रावेश, नींदका दौरा, झपकी । २ शण सूतकी बनी एक गेंड़ुरी । यह<br><br>Vol &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 103 </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> पहिये की धुरीमें लगती है । इससे पहिया सटा रहता और धुरकी कीलको रगड़से कटा नहीं करता । ऊंघन (हिं० स्त्री०) निद्रागम, झपकी । ऊंघना (हिं० क्रि०) निद्रागम होना, आंख झपकाना । ऊंच, ऊंचा, (हिं०) उच्च देखो । ऊंचाई, उच्चता देखो । ऊंचे (हिं०) उच्चकै देखो । ऊंछ (हिं० पु०) राग विशेष । ऊंछना (हिं० क्रि०) बाल झाड़ना, कंघी करना । ऊंट (हिं०) उष्ट्र देखो । ऊंट कटारा (हिं० पु०) उष्ट्रकण्टक क्षुप, एक पौधा । इस झाड़ीमें कांटे होते हैं । पत्र भी दीर्घ एवं कण्टकाकार हैं । शाखा चुभनेवाले तन्तुओंसे युक्त रहती हैं । यह प्रस्तरमय तथा अनुर्वरा भूमिमें उपजता है । उष्ट्रका यह प्रिय खाद्य है । इसका मूल जलमें रगड़ कर देनेसे गर्भिणीको सुखप्रसव होता है । किसी किसीके मतानुसार ऊंटकटारा बलवर्धक भी ठहरता है । ऊंटकटौरा, ऊंटकटारा देखो । ऊंटगाड़ी (हिं० स्त्री०) ऊंटके सहारे चलनेवाली गाड़ी । इसमें प्रायः दो खण्ड होते हैं । रात दिनमें ऊंट गाड़ी ३० कोससे कम नहीं चलती । ऊंटवान् (हिं० पु०) उष्ट्रसञ्चालक, ऊंटको हांकनेवाला । ऊंडा (हिं० पु०) १ पात्र विशेष, एक बरतन । इसमें रुपया पैसा और गहना-गांठ भर भूमिके मध्य गाड़ते हैं । २ तहखाना, चहबच्चा । (वि०) ३ गम्भीर, गहरा । ऊंदर, इन्दुर देखो । ऊंधा, औंधा देखो । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> tw70q2qyiq1gwqv4t59pc5e29pdc670 666369 666368 2026-07-07T23:56:31Z AMAN KUMAR 6475 Break हटाया 666369 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|{{xx-larger|'''ऊ'''}}}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> ऊ (दीर्घ) संस्कृत तथा हिन्दी स्वरवर्णका षष्ठ अक्षर । इसका उच्चारणस्थान ओठ है । वर्णोद्धार तन्त्रमें लिखा है—ऊकारका रूप ह्रस्व उकारसे प्रायः मिला है । और विशेषता यह है, कि ऊकारके नीचे एक दूसरी वक्र रेखा नीचेकी तरफ अधिक जाती है । समस्त रेखाओंमें यम, अग्नि और वरुण अवस्थित हैं । ऊर्ध्वगत मात्राको लक्ष्मी वा सरस्वती कहते हैं । इसका तन्त्रोक्त नाम—ऊ, कण्टक, रति, शान्ति, क्रोधन, मधुसूदन, कामराज, कुजेश, महेश, वामकर्णक, अर्धीश, भैरव, सूक्ष्म, दीर्घघोणा, सरस्वती, विलासिनी, विघ्नकर्त्ता, लक्ष्मण, रूपकर्षिणी, महाविद्येश्वरी, यष्टा, षगडोभू, और कान्त्यकुब्ज है । २ धातुका अनुबन्ध विशेष । "ऊक्वेत्कः ।" (कवि० द्रु) (अव्य०) वेञ्-क्विप् । १ सम्बोधन—ए ! ओ ! अरे ! २ वाक्यारम्भ—हां ! कहिये ! ३ दया—रहम—राम राम ! ४ रक्षा हिफाज़त—त्राहि त्राहि ! (पु०) अवति रक्षति, अव-क्विप्-ज्वर् । ज्वरत्वरस्त्रिव्यविमवामुपधायाश्च । पा ६।४।२० । ५ महादेव । ६ चन्द्र । ७ रक्षक, मुहाफिज़ । ऊगना (हिं० क्रि०) उदय होना । निकलना । ऊगाबाई (हिं० वि०) निरर्थक, बेफायदा । ऊख, इक्षु और ईख देखो । ऊंग, ऊंघ देखो । ऊंगना (हिं० पु०) पशुरोग विशेष, चौपायोंकी एक बीमारी । इस रोगमें पशु कुछ नहीं खाता-पीता । शरीर शीतल लगता और कान बह चलता है । ऊंगा (हिं० पु०) अपामार्ग, लटजीरा । ऊंगी (स्त्री०) ऊंगा देखो । ऊंच (हिं० स्त्री०) १ निद्रावेश, नींदका दौरा, झपकी । २ शण सूतकी बनी एक गेंड़ुरी । यह<br><br>Vol &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 103 </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> पहिये की धुरीमें लगती है । इससे पहिया सटा रहता और धुरकी कीलको रगड़से कटा नहीं करता । ऊंघन (हिं० स्त्री०) निद्रागम, झपकी । ऊंघना (हिं० क्रि०) निद्रागम होना, आंख झपकाना । ऊंच, ऊंचा, (हिं०) उच्च देखो । ऊंचाई, उच्चता देखो । ऊंचे (हिं०) उच्चकै देखो । ऊंछ (हिं० पु०) राग विशेष । ऊंछना (हिं० क्रि०) बाल झाड़ना, कंघी करना । ऊंट (हिं०) उष्ट्र देखो । ऊंट कटारा (हिं० पु०) उष्ट्रकण्टक क्षुप, एक पौधा । इस झाड़ीमें कांटे होते हैं । पत्र भी दीर्घ एवं कण्टकाकार हैं । शाखा चुभनेवाले तन्तुओंसे युक्त रहती हैं । यह प्रस्तरमय तथा अनुर्वरा भूमिमें उपजता है । उष्ट्रका यह प्रिय खाद्य है । इसका मूल जलमें रगड़ कर देनेसे गर्भिणीको सुखप्रसव होता है । किसी किसीके मतानुसार ऊंटकटारा बलवर्धक भी ठहरता है । ऊंटकटौरा, ऊंटकटारा देखो । ऊंटगाड़ी (हिं० स्त्री०) ऊंटके सहारे चलनेवाली गाड़ी । इसमें प्रायः दो खण्ड होते हैं । रात दिनमें ऊंट गाड़ी ३० कोससे कम नहीं चलती । ऊंटवान् (हिं० पु०) उष्ट्रसञ्चालक, ऊंटको हांकनेवाला । ऊंडा (हिं० पु०) १ पात्र विशेष, एक बरतन । इसमें रुपया पैसा और गहना-गांठ भर भूमिके मध्य गाड़ते हैं । २ तहखाना, चहबच्चा । (वि०) ३ गम्भीर, गहरा । ऊंदर, इन्दुर देखो । ऊंधा, औंधा देखो । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 84mb8e2emc6v1vo0lh0aiwm2bm61tro पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४११ 250 76115 666370 609192 2026-07-07T23:59:36Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 666370 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४१०'''|'''ऊंहूं—ऊतला'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> ऊंहूं (हिं० अव्य०) नैव, नहीं, कभी नहीं, हो नहीं सकता । ऊक (हिं० पु०) १ उल्का, शहाब-साक़िब, टूटता तारा । २ अग्नि, आग । (स्त्री०) ३ चूक, किसी बात या कामका भूल जाना । ऊकना (हिं० क्रि०) १ चूकना, भूलना, भ्रममें पड़ना । २ ताप देना, जलाना । ऊख (हिं० स्त्री०) इक्षु, ईख । इक्षु देखो । ऊखम (हिं०) उष्म देखो । ऊखल (हिं० पु०) उदूखल, कांडी, छावन । यह काठ वा प्रस्तरनिर्मित एक गम्भीर पात्र है । इसमें डाल-कर धान आदिकी भूसी मूसलके सहारे निकालते हैं । ऊगना (हिं० क्रि०) जमना, जड़ पकड़ना, अंकुरा फूटना । ऊगरा (हिं० पु०) उष्ण खाद्य, उबला हुआ खाना । ऊगू—युक्तप्रदेशके उनाव ज़िलेका एक नगर । यह समान भूमिपर उनावसे ग्यारह और फ़तेहपुर-चौरासी-से ढाई कोस दूर अवस्थित है । कन्नौजके पंवार राजपूत उग्रसेनने इसे बसाया था । ई० १५ वीं शताब्दी तक उनके वंशज ऊगूमें राज्य करते रहे । पीछे जौनपुरके इब्राहीम शरक़ीने उन्हें एक युद्धमें पछाड़ा था । राजपूतोंका प्रभाव घटने पर कुनबियोंने इसे अपने हाथ किया । ऊगूमें कई मन्दिर बने हैं । राजप्रासाद और न्यायालयका ध्वंसावशेष भी देख पड़ता है । वर्षमें एक बार मेला और सप्ताहमें दो बार बाज़ार लगता है । कहते है—राजपूतोंके समय एक कवि ऊगू गये थे । किन्तु उनका उचित सत्कार न हुआ । उन्होंने उससे अप्रसन्न हो शाप दिया था— {{block center|<poem> "ऊगूके आसपास दारिदकी डौंडी फिरै टोरत चकौड़ी फिरैं लौंडी सरकारकी ।" </poem>}} ऊज (हिं० पु०) उत्पात, बखेड़ा । ऊजड़ (हिं० वि०) जनशून्य, खाली, जो बसा न हो । ऊजर (हिं० वि०) १ उजला, साफ़, जो मैला न हो । २ ऊजड़, वीरान । ऊजरा, ऊजर देखो । </div> {{Multicol-break}} <div style="text-align: justify;"> ऊटना (हिं० क्रि०) १ अभिमान करना, मन बढ़ना । २ विचारना, सोचना, ख़यालमें लाना । ऊटपटांग (हिं० वि०) अंडबंड, वाहियात, खराब । ऊड़ा (हिं० पु०) १ न्यूनता, घटी । २ विनाश, बरबादी । ऊड़ो (हिं० स्त्री०) यन्त्र विशेष, ढरकी । यह जुलाहोंके सेठेमें सटी रहती है । इसपर वह लिपटे सूतको पट्टीमें फिर-फिर लगाते जाते हैं । २ यन्त्र विशेष, एक चरखी । इसपर रेशमके लच्छे डाले और एक तरही परेतोंमें निकाले जाते हैं । ३ डुबकी, गोता । ४ पनडुब्बी । ऊढ़ (सं० त्रि०) वह्-क्त । १ विवाहित, ब्याहा । २ वहन किया हुआ, जो उठाया गया हो । ३ धृत, पकड़ा हुआ । ४ अङ्गीकृत, माना हुआ । {{block center|<poem> "भार्योढं तमवज्ञाय तस्थे सौमित्रेयऽसकौ ।" (भट्टि) </poem>}} ऊढ़कङ्कट (सं० त्रि०) ऊढ़ो धृतः कङ्कटो येन । वर्मयुक्त, सूजा या फूला हुआ । ऊढ़ना (हिं० क्रि०) चिन्तन करना, सोचना, अनुमान लगाना । ऊढ़भार्य (सं० पु०) ऊढ़ा भार्या येन, बहुव्री० । विवाहित, ब्याहा । ऊढ़वयस् (सं० पु०) युवापुरुष, नौजवान् मर्द । ऊढ़ा (सं० स्त्री०) ऊढ़-टाप् । १ भार्या, जोरू । २ विवाहिता कन्या, ब्याही लड़की । ३ नायिका-भेद । जो ब्याही स्त्री निज पतिको छोड़ अन्य पुरुषसे आसक्त रहती, उसे जनता ऊढ़ा नायिका कहती है । ऊढ़ि (सं० स्त्री०) वह्-क्तिन् । १ वहन, ढोवाई । २ विवाह, शादी । ऊर्णीतेजस् (सं० पु०) एक बुद्ध । ऊत (सं० त्रि०) वे-क्त अथवा वयि तन्तुसन्ताने, ऊ-क्त । १ ओतवयन, बुना हुआ । २ ग्रथित, गूंथा हुआ । ३ स्यूत, सीया हुआ । ४ रक्षित, हिफ़ाज़त किया हुआ । ५ विख्यात, मशहूर । (हिं० वि०) ६ पुत्रहीन, जिसके लड़का न रहे । ७ मूर्ख, गंवार । (पु०) ८ भूत प्रेतात्मा । ऊतर (हिं) उत्तर देखो । ऊतला (हिं० वि०) उतावला, जल्दबाज़ । </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> l5q6pcouco6wwyjff28j4r6vonqzoc9 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६४४ 250 76164 665796 609384 2026-07-07T13:08:50Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 665796 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कटुवौजा-कट्टरतैल|६४३}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कटवीजा (सं० स्त्री०) पिप्पली, पीपल। कटु वीरा (सं० स्त्री०) कुमरिच, लाल मिचे। यह अग्निजनक, दाइक और बलास, अजीर्ण, विशूची, व्रण, क्लेद, तन्द्रा, मोह, प्रलाप, स्वरभङ्ग एवं अरोचक नाशक है। कट वीरा सविपात-जड़ीभूत और इतेन्द्रिय मनुष्य को मरने नहीं देती। <Small>(अविसहिता)</small> कट शृङ्गाट, <small>कटुङ्गाल देखो।</small> कट शृङ्गाल (सं० लो०) कट नां शृङ्गाय प्राधान्याय अलति पर्याप्नोति, कट शृङ्ग-अल-अच् । गौरसुवर्ण शाक, एक सब जी। कटु स्रह (सं० पु०) कटु स्तोहा : स्ने हो यस्य,बहु ब्रो०। १ सषप, सरसों। २ खेत सौंप, राई। ३ कट तेल, कड़वा तेल। कटु हुच्ची (सं० स्त्री०) १ कारवेल, करेली। २ कर्कटी, ककड़ी । कटु क्ति (सं० स्त्री०) अप्रियवार्ता, बुरो लगनेवाली बात। कट त्कट (सं० क्लो०) कट घु उत्कटम्, ७ तत्। १ आदर्क, अदरक। २ शुण्ठी, सोठ । कटुत्कटक ( सं० ल्को० ) कटु त्कट संन्चायां कन् । <Small>कटूत्कट देखो।</small> कटु दरी (सं० स्त्री०) ओषधिविशेष । कोंकणमें इसे गोविन्दी कहते हैं। कटु मर (हिं० पु०) वन्योदम्बर, जंगलो गूलर, कट-गूलर। कटु षण (सं० लो०) १ पिप्पलीमूल, पिपरामूल। २ शुण्ठी, सोंठ। ३ पिप्पली, पीपल। कटु षणा (सं० स्त्री०) <small>कटूपण देखो।</small> कटेरी (हिं० स्त्री०) कण्ठकारी, भटकटै या । कटेली (हिं० स्त्री०) कार्यासभेद, किसी किस्को कपास। यह बङ्गालमें अधिक उत्पन्न होती है। कटैया (हिं० स्त्री०) १ कण्टकारी, भटकट या। (पु०) २ छेदन करनेवाला, जो काटता हो। कटैला (हिं० पु०) मूल्यवान् प्रस्तरविशेष, एक बेशकीमत पत्थर। कटोदक (सं० क्लो०) कटाय प्रेताय देवमुदकम् । {{Multicol-break}} प्रेतके उद्देश्यसे होनेवाला तर्पट, जो पानी मुदॆके लिये दिया जाता हो। कटोर (सं० लो० ) कवते वृश्यते निषिच्यते वा भय. द्रव्य यत्र, कट-प्रोलच् रस्य लत्वम्। पावविशेष, बैला, एक बतन। कटोरक, <small>कटोर देखो।</small> कटारा (सं० स्त्रो०) कटार-टाप्। पात्र विशेष, बेला, एक बर्तन। इसका मुंह खुला रहता है। दीवार नोचो और पेंदी चोड़ो पड़ती है। हिन्दीमें यह शब्द पुलि माना गया है। कटोरिया (हिं० स्त्रो०) छोटी कटोरी। कटोरो (हिं० स्त्रो०) १क्षुद्रकटोरक, बेलिया। २ चोलो। ३ तलवारको मूठका जपरी हिस्सा । यह गोल होता है। कटोल (सं० पु०) कटति श्रावृणोति सदाचारं अन्यरसं वा, कट-बोलच । <Small>कपि गडिमछिकटिपटिश्य बोलच् । उप १।६७।</small> १ कटुरस, कड़वाहट, चरपराहट, तल्खी , तुर्थी। २ चण्डाल, कमौना। (वि०) ३ कटु, कड़वा। कटोलवीणा (सं० स्त्री०) कटोलस्य चण्डालस्य वीणा वाद्य विशेषः। चण्डालोंको एक वीणा । कटौवा (हिं० वि०) कटनेवाला, जिसके कट जानेका डर रहे। कटौती (हिं० स्त्री०) काटकर निकाली जाने वाली चीज । जैसे-अनाज बेचते या खेतसे घर उठा ले जाते समय उससे जो कुछ काटकर ब्राह्मण, मजदूर या किसी दूसरे को दिया जाता,वह कटौती कहाता है। कटौनी (हिं० स्त्री०) कटाई, फसल काटनेका काम। कटोसो (हिं० पु०) वेणु विशेष, एक कंटीला बांस । कट्टर (हिं० वि०) १ काट खानेवाला, कटहा। मानता न हो । ३ हठ करनेवाला, जिही, जो दूसरेको सुनता न हो। कट्टरतैल (सं० क्लो०) तैलविशेष, एक तेल । ४ शरा-वक मूर्छित तिलतैलमें २४ शरावक तक और १ {{dhr}}शरावक लवण, शुण्ठी, कुष्ठ, मूमूख, लाक्षा, हरिद्रा<noinclude></noinclude> i1uprgn3fp1jm2f39mepabkc538ya1t पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६४५ 250 76167 666097 609385 2026-07-07T15:55:55Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 666097 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६४४|कट्टहा-कटी|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} तथा मजिष्ठाका कल्क डाल यथाविधि पकानेसे यह तैयार होता है। इसको लगानेसे ज्वर और विदाह। छूट जाता है। <Small>(वैद्यकनिघण्ट)</small> कट्टहा (हिं० पु०) महाब्राह्मण, महापात्र । कट्टा (हिं० वि०) १ स्थूल, मोटा। २ कठोर, कड़ा। (पु०) ३ कोटविशेष, ज'। ४ जबड़ा। कट्टर (सं.पु.) अस्त्रविशेष, कटार। कट्ठा (हिं. पु.) १ मानविशेष, जमीन्की एक नाय। यह पांच हाथ चार अङ्गल बैठती है। एक जरीबमें बीस कट्टे लगते हैं। कोई कोई बिस्वांसोको ही कट्ठा कहते हैं। २ दबका, भट्टी। इसमें धातु गलाते हैं। ३ पावविशेष, एक बर्तन। इससे पन्न नापते हैं। एक कट्टे में प्रायः पांच सेर अब समा जाता है। ४ वृक्षविशेष, एक पेड़। इसका काष्ठ पधिक कठोर होता है। कट तृण (सं० ली०) १ गन्धण, रूसा घास, मिर-चिया गन्ध । २ सुगन्धरोहिषवण, एक खुशबूदार घास। कट फल (सं० पु०) कटति कटतया अन्यरसं पावृणोति, कट-क्विप, बहुव्री०। १ वृक्षविशेष, कायफल। यह कटु, उष्ण, काश-खास-ज्वरघ्न, उग्र दाहकर, रुच्य और मुखरोग-शान्तिकर होता है। <Small>(राजनिघण्ट)</small> २ वार्ताकिवृक्ष, बैंगनका पेड़। ३ कोङ्क्ल । कट् फला (सं० स्त्री०) कट फलमस्याः, बहुव्रो०। १ गान्धारी वृच, खम्भारी। २ वृहत्ती, कटैया। ३ काकमाची, केवैया। ४ वार्ताको, बैंगन। ५ देव दाली, सनैया। ६ मृगैर्वारु, सफेद ककड़ी। कटफलादि (सं० पु०) कषायविशेष, कासरोगका एक काढ़ा। कायफल, रूसा, भार्गी, मुस्तक, धनिया,बच, हर, शृङ्गो, पित्तपापड़ा, सोंठ और सुराताको पानीमें अच्छी तरह गर्म कर हींग तथा मधु मिला पीना चाहिये। इसमें और मधु एक एक माषे डालते हैं। <Small>(चरक)</small> कट फलादिपाचन (सं० लो०) पाचनविशेष, एक अक। यह दीर्घ कालानुबन्धी ज्वरपर चलता है। इसके पीनेसे विदोष, दाह और वृष्णाका वेग घटता है। इसमें कायफल, त्रिफला, देवदार, रक्तचन्दन, परूषक- {{Multicol-break}} फल ( फालसा), कटुकी, पद्मकाष्ठ एवं उशीर १६।१६ रक्तिक तथा वारि २ शरावक पड़ता है। १शरावक शेष रहनेपर इसे चलहेसे उतार व्यवहार करते हैं। {{Right|<small>(भावप्रकाश)</small> कटुङ्ग (सं० पु०) कटु अङ्गमस्य, बहुव्री०। १ तिन्दुक वृक्ष, गाव, तेंदू। २ श्योणाक वृक्ष, अरल, श्योना। ३ टुण्ट क फल, अरलका फत्त। ४ दिलीप नामक एक सूर्यवंशीय राजा।<small>खटाङ्ग देखो।</small> कटुम्बरा (सं० स्त्री०) प्रसारणो, गन्धाली । कटर (सं० क्लो०) कटुति वर्षति रसान्तरम्, कट-ष्वचर ।<small> चित्वर-कत्वर-धोवर-पौवर-मौवर-चीवर-तौवर-नौवर-गहवर कटरम इयराः। उण् ३।१।</small> १ दधिस्नेह, दहीको चिकनई। २ दधिसर, दहीको मलाई। ३ तक्र, मट्ठा । ४ व्यञ्जन, मसाला। कटरतैल (सं०-क्ली०) ज्वररोगका वैद्यकोक्त एक तेल, बुखारका एक तेल। यह खल्प और बृहत् भेदसे विविध बनता है। खल्पकटर तेल तैयार करनेसे ४ सेर तिलतल, (मठा) ४. सेर और सचलखवण, शुण्डो, कुष्ठ, मूर्वामूल, लाक्षा, हरिद्रा तथा मनिष्ठा सबका कल्क १सेर कड़ाहमें डाल पकाया जाता है। इस तेलको मलनेसे शीत और दाहयुक्त ज्वर निवारित होता है। वृहतकटरतल-तिलतैल ४ सेर, शुक्त ४ सेर, काजिक ४ सेर, दधिसर ४ सेर, बिजौरे नौबूका रस ४ सेर पार पिप्पलीचित्रक- मूल, वचा, वासकत्वक, मञ्जिष्ठा, मुस्ता, पिप्पलीमूल, एला, अतीस, रेणुक, शुण्ठी, मरिच, यमानी, द्राक्षा, कण्टकारी, चिरायता, विल्वत्वक, रक्तचन्दन, ब्राह्मण- यष्टिका, अनन्तमूल, हरीतकी, आमलकी, शालपर्णी, मूर्वामूल, जोरक, सप, हिङ्ग, कटकी एवं विडङ्ग समुदायका १ सेर कल्क किसी बरतनमें यथारीति पकानेसे बनता है। यह तेल लगानसे विविध विषम ज्वर छूट जाता है। कटार (सं० पु०) अस्त्रविशेष, कटारी। कटी (सं० स्त्री०) कव्यते कटुरसतया खाद्यते अनु-भूयते वा, कट-उन्-डीप । १ कटुकी, कुटकी। २ कटुकवलो, एक बेल ।<noinclude></noinclude> nf5iwk8lobh124gwo6829p3v630fql8 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६४६ 250 76169 666314 609386 2026-07-07T16:34:02Z अंजली राजभर 4516 666314 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh||कठ-कठफोड़वा|६४५}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कठ (सं० पु०) कठेन प्रोतामधोवे कठशाखामभि-जानाति वा, कठ निर्ण लुक । <Small>कठचरकाल्लूक्। पा।४।३।१०७।</small> १ मुनिविशेष। यह वेदको कठ-शाखाके प्रवर्तक थे। महाभाष्यके मतसे कठ वैशम्पायनके शिष्य रहे। इनकी प्रवर्तित शाखा 'काठक' नामसे प्रसिद्ध है। आजकल इस शाखाकी वेदसंहिता नहीं मिलती। काठक शाखाध्यायी भी ‘कठ' ही कहाते हैं। इनसे सामके कालाप और कौथुमशाखौका संस्रव रहा। रामा-यणमें कठकालाप एकत्र उक्त हुये हैं। “पर कामिव सर्वाभिर्गवां दशशतेन च । ये चमे कठ कालापा बहवो दस मानवाः॥" (अयोध्या ३२।१८) हरदत्त के मतसे कठशाखाका भी वह चादि विद्य-मान है। २ कठशाखाध्यायो। ३ ऋविशेष, एक वैदिक मन्त्र। ४ वरविशेष, एक आवाजु। ५ ब्राह्मण। ६ देवता। ७ उपनिषद् विशेष । "ईशकेनकठप्रमुखमासुक्यवितिरि। (मुनिकोपनिषत् ) ८ दुःख, तकलीफ़। ९ कष्ट, मुसीबत। (हिं० पु०) १० पुरातन वादिनविशेष। कोई पुराना बाजा। यह काष्ठसे बनाया पौर चर्मसे मंढाया जाता है। कठ शब्द समासादिमें पानसे काष्ठनिर्मित और निकृष्ट अर्थ रखता है-जैसे कठपुतली, कठकेला। कटंगर (हिं. वि.) स्थू ल, कठोर, मोटा, कड़ा। कठोर और अव्यवहार्य ट्रव्यको 'काठकठंगर' कहते हैं। कठकालापाः (सं० पु०) कठ और कलापोका सम्प्रदाय। कठकीली (हिं० स्त्री० ) काठकी कील, पच्चड़। कठकेला (हिं० पु०) कदलीविशेष, जंगली केला। विशेष, कठौता। ३ मचषा विशेष, लकड़ोका सन्दूक। कठताल (हिं. स्त्री.) काष्ठवादिवविशेष, लकड़ीका एक बाजा। इसे दोनों हाथसे बजाते हैं। हरेक हाथमें एक-एक जोड़ा कठताल रहती है। कठधत (सं० पु.) यजुर्वेदको कठशाखाका परित्राता कठनेरा (हिं. पु.) वैश्यजातिविशेष, किसी किस्मका बनिया। कठपुतली (हिं. स्त्री०) काष्ठमूर्तिविशेष, लकड़ीको गुड़िया। मुसलमान दो कठपुतलियां ले भौख मांगने निकलते हैं। वह इनको दानों हाथों नचाते और गाना सुनाते हैं। कुछ लोग तारसे पुतलो नचात और गांव-गांव चक्कर लमाते हैं। दूसरेके कहनेपर चलनेवाला भी उसके हाथकी कठपुतली कहाता है। कठफुला (हिं. पु.) छवक नामक उभिद, कुकुर- मुत्ता, छाता। यह लकड़ी पर छाते-जैसा फूलता है। कठफोड़वा (हिं० पु.) पचिविशेष, एक चिड़िया। (Woodpecker ) यह काष्ठको फोड़ फोड़ छेद | बनाता, इसीसे कठफोड़वा कहाता है। कठफोड़वा सैकड़ों प्रकारका होता है। परोंका रंग काला, ___ सफेद, भूरा, जैतूनी, हरा, पीला, गुलेनारी और नारंजी मिला रहता है। रंग-रंगकी धारियां बु'दियां पार नोकें इसके शरीरपर होती हैं। यह पृथिवी पर सिवा मादागास्कर, अष्ट्र लिया, सिलेबस और फोरेसके सब स्थानों में मिलता है। इजिप्तमें कठफोड़वा कभी देख नहीं पड़ा। यह बड़ी लब्जा खाता और इसके स्वभावका पता मनुष्य कठिनतासे पाता है। कठफोड़वा अपना शिकार ढूंढने में खब कठकोपनिषद् (स. स्त्री०) तर्कादिसे पूर्ण एक ध्यान लगाता है। यह वृक्षको सोधी शाखामें अपनी उपनिषद। कडी पार लंबी चोंचसे छेद कर घोंसला बनाता है। कठकोला (हिं० पु.) काष्ठकूट, कठफोड़वा।। घोंसलेका हार वृत्ताकार रहता और एक फुट गहरा कठकोथुमाः (सं० पु० ) कठ और कुथुमोका सम्पदाय। चलता है। यह कोई छह सफेद चमकीले अंडे कठगुलाब (हिं. पु.) पुष्पवृक्षविशेष, जंगली गुलाब। देता है। प्रारम्भके परोंका रंग भद्दा होता है। इसमें क्षुद्र क्षुद्र पुष्प लगते हैं। उनके नीचे कितनी झै धारियां और बुदियां पड़ी कठड़ा (हिं• पु.) १ काठगृह, कठघरा। २ पान रहती हैं। पेड़के कोड़ोको चोंचसे छाल छेद छेद Vol. III. 162.<noinclude></noinclude> iqyu3sqsflmkq4vd1777jkshfjzmufc 666348 666314 2026-07-07T17:14:18Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 666348 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कठ-कठफोड़वा|६४५}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कठ (सं० पु०) कठेन प्रोतामधोवे कठशाखामभि-जानाति वा, कठ निर्ण लुक । <Small>कठचरकाल्लूक्। पा।४।३।१०७।</small> १ मुनिविशेष। यह वेदको कठ-शाखाके प्रवर्तक थे। महाभाष्यके मतसे कठ वैशम्पायनके शिष्य रहे। इनकी प्रवर्तित शाखा 'काठक' नामसे प्रसिद्ध है। आजकल इस शाखाकी वेदसंहिता नहीं मिलती। काठक शाखाध्यायी भी ‘कठ' ही कहाते हैं। इनसे सामके कालाप और कौथुमशाखौका संस्रव रहा। रामा-यणमें कठकालाप एकत्र उक्त हुये हैं। <small>{{Center|<poem>“पर कामिव सर्वाभिर्गवां दशशतेन च । ये चमे कठ कालापा बहवो दस मानवाः॥"</poem>{{right|(अयोध्या ३२।१८)}}</small> हरदत्त के मतसे कठशाखाका भी वह चादि विद्य-मान है। २ कठशाखाध्यायो। ३ ऋविशेष, एक वैदिक मन्त्र। ४ वरविशेष, एक आवाजु। ५ ब्राह्मण। ६ देवता। ७ उपनिषद् विशेष । {{Center|<small>"ईशकेनकठप्रमुखमासुक्यवितिरि। (मुनिकोपनिषत् )</Small> ८ दुःख, तकलीफ़। ९ कष्ट, मुसीबत। (हिं० पु०) १० पुरातन वादिनविशेष। कोई पुराना बाजा। यह काष्ठसे बनाया पौर चर्मसे मंढाया जाता है। कठ शब्द समासादिमें पानसे काष्ठनिर्मित और निकृष्ट अर्थ रखता है-जैसे कठपुतली, कठकेला। कटंगर (हिं. वि.) स्थू ल, कठोर, मोटा, कड़ा। कठोर और अव्यवहार्य ट्रव्यको 'काठकठंगर' कहते हैं। कठकालापाः (सं० पु०) कठ और कलापोका सम्प्रदाय। कठकीली (हिं० स्त्री० ) काठकी कील, पच्चड़। कठकेला (हिं० पु०) कदलीविशेष, जंगली केला। कठकोपनिषद् (सं० स्त्री०) तर्कादिसे पूर्ण एक उपनिषद। कठकोला (हिं० पु०) काष्ठकूट, कठफोड़वा । कठकोथुमाः (सं० पु० ) कठ और कुथुमोका सम्पदाय। कठगुलाब (हि० पु०) पुष्पवृक्षविशेष, जंगली गुलाब। इसमें क्षुद्र क्षुद्र पुष्प लगते हैं। कठड़ा (हिं० पु०) १ काठगृह, कठघरा। २ पात्र- </Small>Vol. III.162.{{gap}}{{gap}} {{Multicol-break}} विशेष, कठौता। ३ मचषा विशेष, लकड़ोका सन्दूक। कठताल (हिं० स्त्री०) काष्ठवादिवविशेष, लकड़ीका एक बाजा। इसे दोनों हाथसे बजाते हैं। हरेक हाथमें एक-एक जोड़ा कठताल रहती है। कठधूर्त (सं० पु०) यजुर्वेदको कठशाखाका परित्राता ब्राह्मण। कठनेरा (हिं० पु०) वैश्यजातिविशेष, किसी किस्मका बनिया। कठपुतली (हिं० स्त्री०) काष्ठमूर्तिविशेष, लकड़ीकी गुड़िया। मुसलमान दो कठपुतलियां ले भौख मांगने निकलते हैं। वह इनको दानों हाथों नचाते और गाना सुनाते हैं। कुछ लोग तारसे पुतलो नचात और गांव-गांव चक्कर लमाते हैं। दूसरेके कहनेपर चलनेवाला भी उसके हाथकी कठपुतली कहाता है। कठफुला (हिं० पु०) छवक नामक उभिद, कुकुर-मुत्ता, छाता। यह लकड़ी पर छाते-जैसा फूलता है। कठफोड़वा (हिं० पु०) पचिविशेष, एक चिड़िया। (Woodpecker ) यह काष्ठको फोड़ फोड़ छेद बनाता, इसीसे कठफोड़वा कहाता है। कठफोड़वा सैकड़ों प्रकारका होता है। परोंका रंग काला, सफेद, भूरा, जैतूनी, हरा, पीला, गुलेनारी और नारंजी मिला रहता है। रंग-रंगकी धारियां बु'दियां पार नोकें इसके शरीरपर होती हैं। यह पृथिवी पर सिवा मादागास्कर, अष्ट्र लिया, सिलेबस और फोरेसके सब स्थानों में मिलता है। इजिप्तमें कठफोड़वा कभी देख नहीं पड़ा। यह बड़ी लब्जा खाता और इसके स्वभावका पता मनुष्य कठिनतासे पाता है। कठफोड़वा अपना शिकार ढूंढने में खब ध्यान लगाता है। यह वृक्षको सोधी शाखामें अपनी कडी पार लंबी चोंचसे छेद कर घोंसला बनाता है। घोंसलेका हार वृत्ताकार रहता और एक फुट गहरा चलता है। यह कोई छह सफेद चमकीले अंडे देता है। प्रारम्भके परोंका रंग भद्दा होता है। उनके नीचे कितनी झै धारियां और बुदियां पड़ी रहती हैं। पेड़के कोड़ोको चोंचसे छाल छेद छेद<noinclude></noinclude> rfxdp0yh6f8y3urj1dep0adha1p2vde 666350 666348 2026-07-07T17:16:16Z अंजली राजभर 4516 666350 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" 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अर्थ रखता है-जैसे कठपुतली, कठकेला। कटंगर (हिं. वि.) स्थू ल, कठोर, मोटा, कड़ा। कठोर और अव्यवहार्य ट्रव्यको 'काठकठंगर' कहते हैं। कठकालापाः (सं० पु०) कठ और कलापोका सम्प्रदाय। कठकीली (हिं० स्त्री० ) काठकी कील, पच्चड़। कठकेला (हिं० पु०) कदलीविशेष, जंगली केला। कठकोपनिषद् (सं० स्त्री०) तर्कादिसे पूर्ण एक उपनिषद। कठकोला (हिं० पु०) काष्ठकूट, कठफोड़वा । कठकोथुमाः (सं० पु० ) कठ और कुथुमोका सम्पदाय। कठगुलाब (हि० पु०) पुष्पवृक्षविशेष, जंगली गुलाब। इसमें क्षुद्र क्षुद्र पुष्प लगते हैं। कठड़ा (हिं० पु०) १ काठगृह, कठघरा। २ पात्र- </Small>Vol. III.162.{{gap}}{{gap}} {{Multicol-break}} विशेष, कठौता। ३ मचषा विशेष, लकड़ोका सन्दूक। कठताल (हिं० स्त्री०) काष्ठवादिवविशेष, लकड़ीका एक बाजा। इसे दोनों हाथसे बजाते हैं। हरेक हाथमें एक-एक जोड़ा कठताल रहती है। कठधूर्त (सं० पु०) यजुर्वेदको कठशाखाका परित्राता ब्राह्मण। कठनेरा (हिं० पु०) वैश्यजातिविशेष, किसी किस्मका बनिया। कठपुतली (हिं० स्त्री०) काष्ठमूर्तिविशेष, लकड़ीकी गुड़िया। मुसलमान दो कठपुतलियां ले भौख मांगने निकलते हैं। वह इनको दानों हाथों नचाते और गाना सुनाते 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छाल छेद छेद<noinclude></noinclude> piq2oenyvqnru6fuv7toi2ya84or34p पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१७ 250 76340 665785 665781 2026-07-07T12:10:33Z आदेश यादव 3609 665785 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|'''८७६'''|'''ऐनस—ऐन्द्रवारुणी'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ऐनस (सं॰ ल्की॰) एन एव स्वार्थे अण्। पाप, गुनाह। ऐना (हिं॰) {{smaller|आईना देखो।}} ऐनापुर—बम्बई प्रान्त के बेलगांव ज़िलेका एक विशाल ग्राम। यह अथनी–कागवाड सड़कपर अथनीसे कोई १३ मील दक्षिण–पश्चिम अवस्थित है। ग्रामसे बाहर दक्षिण ओर एक तालाब के पास मुसलमान–साधु पीर काज़ीकी कब्र है। १६३८ ई॰को फ्रान्सीसी पर्याटक मनङेलस्लो (Mandelaslo) यहां आये थे। उन्होंने‌ एयनाटौर (Eynatour) नाम लिखा है। १७८१ ई॰को कपसान मूर (Captain Moor) महाराष्ट्रोंके सहायक बन टीपू से लड़ने पहुंचे। उनकी वर्णना के अनुसार ऐनापुर में मुसलमान अधिक रहते और अच्छे–अच्छे मकान बने थे। १७४२ ई॰को यह ग्राम दूसरे ७ ग्रामों के साथ अंगरेजों के हाथ लगा। कारण मीराज‌ प्ट्टवर्धन शाखा के प्रतिनिधि गोपालरावने किसी उत्तराधिकारीके व्यतीत स्वर्गगमन किया था। ऐनि—सूर्य के पुत्र। सूर्यवंशको ऐनिवंश भी कहते हैं। ऐनीता—(हि॰ पु॰) मर्क्टको दर्पण देखानेका काम। यह कलन्दरोंकी भाषा है। ऐन—जापानको उत्तर होपवासी एक जाति। पहले यह लोग कूराइल से ये पाये थे। फिर जापान के प्रधान द्वीप पर बस गड्डों में रहनेवाले कोरोपोक गुरुवोंको इन्होंने मार भगाया। किन्तु जापानियोंके दक्षिण तथा चिमसे या पहुचनेपर इन्हें बेज़ में जाकर रहना पड़ा था । यह शराब बहुत पीते और मैले-कुचैले रहते हैं । जापानियोंसे ऐन संबे होते हैं। बाल न बनवाने से इनकी दाढ़ी-मूछ खूब भरी रहती है। स्त्रियां मुंह, हाथ और मत्येपर गोदना गोदाती हैं । वल्कलका वस्त्र पहना जाता है। जाड़े में मृगचर्म धारवकर घरोररचा करते हैं स्त्रो और पुरुष दोनों बाली पहनते हैं लिखना पढ़ना कोई नहीं जानता इनके विश्वासानुसार पृथिवो एक मत्स्य के पृष्ठपर स्थित है। उसके हिलनेसे भूकम्प श्राता है। यह भालूको पूजते हैं। ऐन भोजन करनेसे पहले देवतावको धन्यवाद देते और रोगमें पड़नेसे अग्निका नाम लेते हैं। पहले यह लोग किसी अपराधीको प्राणदण्ड <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> करते न थे। मारना पीटना हो बड़ी सजा रही ।' कोई किसीका वध करनेसे नाक कान काटे जानेका दण्ड पाता था । यह अपरिचित व्यक्तिका बड़ा बादर-- सत्कार करते हैं । ऐनूर मारिनूदो - महिसर राज्यका सरकारी जंगल क्षेत्रफल ३० वर्ग मील है। ऐन्द्रव (सं०] को० ) १ मृगशिरा नक्षत्र । २ चान्द्रायण नामक व्रतविशेष । ३ चान्द्रमास । (त्रि०) ४ चन्द्र-सम्बन्धीय । ऐन्दवो ( सं खो० ) ऐन्दव-डीए। सोमराजी, बाकची.. कालीजोरी । इन्दु-देवता चस्य इन्दु पण् । ० ऐन्द्र (सं० [को०) इन्द्रो देवता अस्य इन्द्र- षण् । १ ज्येष्ठा नक्षत्र | २ मूलविशेष, एक जड़ी। इसे साधारणतः जङ्गली अदरक कहते हैं। संस्कृत पर्याय वनार्द्र का, वनजा और अरण्यजार्द्र का है । यह कटु, पत्र पर रुचि, बल एवं धनिकारक है। (वि.) इन्द्र-सम्बन्धीय ४ इन्द्र के उद्देश्य से आहूत । ( पु० ) ५ इन्द्र के पुत्र जयन्त, अजुन एवं वालि वानर प्रभृति । ६ इन्द्रकृत व्याकरण । ७ दृष्टिका जल । ८ देवसर्षप वृक्ष । ऐन्द्रजालिक (सं० पु० ) इन्द्रजालेन कोड़तोति, इन्द्र जाल-ठक् । १ इन्द्रजालकारक, बाज़ीगर । इसका संस्कृतपर्याय- प्रतीहारक, मायाकारक, कौतिक, मायावी, व्यसक, मायो और मायिक है । (वि) २ इन्द्रजाल सम्बन्धीय, बाज़ीगरोसे सरोकार रखनेवाला । ऐन्द्रतुरीय (सं० क्लो० ) उदकदानविशेष | इसका चतुर्थांश इन्द्रको दिया जाता है। ऐन्द्रद्य ुम्न (सं० तो ० ) इन्द्रद्युम्नमधिकृत्य कृतमाख्या- नम्, इन्द्रव्य स थ । इन्द्रख राजाके वृत्तान्त घटित महाभारतका एक आख्यान । ऐन्द्रयव (सं० पु० ) इन्द्रद, इंदरायन । ऐन्द्रलुप्तिक (सं० त्रि०) इन्द्रलुप्त-ठक् । रोगविशिष्ट, गंजा । ऐन्द्रवायव (सं०वि०) इन्द्रदेव इन्द्र- वायु-अण् । इन्द्र-वायुसम्बन्धीय । ऐन्द्रवारुणी (सं० स्त्री०) इन्द्रवारुणी लता, ककड़ी को बेल इन्द्रलुप्त <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qikqaooajgjqpb0epb4yihfjjil0c6p 665787 665785 2026-07-07T12:19:38Z आदेश यादव 3609 665787 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|'''८७६'''|'''ऐनस—ऐन्द्रवारुणी'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ऐनस (सं॰ ल्की॰) एन एव स्वार्थे अण्। पाप, गुनाह। ऐना (हिं॰) {{smaller|आईना देखो।}} ऐनापुर—बम्बई प्रान्त के बेलगांव ज़िलेका एक विशाल ग्राम। यह अथनी–कागवाड सड़कपर अथनीसे कोई १३ मील दक्षिण–पश्चिम अवस्थित है। ग्रामसे बाहर दक्षिण ओर एक तालाब के पास मुसलमान–साधु पीर काज़ीकी कब्र है। १६३८ ई॰को फ्रान्सीसी पर्याटक मनङेलस्लो (Mandelaslo) यहां आये थे। उन्होंने‌ एयनाटौर (Eynatour) नाम लिखा है। १७८१ ई॰को कपसान मूर (Captain Moor) महाराष्ट्रोंके सहायक बन टीपू से लड़ने पहुंचे। उनकी वर्णना के अनुसार ऐनापुर में मुसलमान अधिक रहते और अच्छे–अच्छे मकान बने थे। १७४२ ई॰को यह ग्राम दूसरे ७ ग्रामों के साथ अंगरेजों के हाथ लगा। कारण मीराज‌ प्ट्टवर्धन शाखा के प्रतिनिधि गोपालरावने किसी उत्तराधिकारीके व्यतीत स्वर्गगमन किया था। ऐनि—सूर्य के पुत्र। सूर्यवंशको ऐनिवंश भी कहते हैं। ऐनीता—(हि॰ पु॰) मर्क्टको दर्पण देखानेका काम। यह कलन्दरोंकी भाषा है। ऐनू—जापानकी उत्तर द्वीपवासी एक जाति। पहले यह लोग कूराइलसे येजू आये थे। फिर जापानके प्रधान द्वीप पर बस गड्डों में रहनेवाले कोरोपोक गुरुवोंको इन्होंने मार भगाया। किन्तु जापानियोंके दक्षिण तथा पश्चिमसे आ पहुचनेपर इन्हें येजू में जाकर रहना पड़ा था। यह शराब बहुत पीते और मैले–कुचैले रहते हैं। जापानियोंसे ऐनू लंबे होते हैं। बाल न बनवानेसे इनकी दाढ़ी–मूछ खूब भरी रहती है। स्त्रियां मुंह, हाथ और मत्थेपर गोदना गोदाती हैं। वल्कलका वस्त्र पहना जाता है। जाड़े में मृगचर्म धारणकर शरीररक्षा करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों बाली पहनते हैं। लिखना–पढ़ना कोई नहीं जानता। इनके विश्वासानुसार पृथिवी एक मत्स्यके पृष्ठपर स्थित है। उसीके हिलनेसे भूकम्प आता है। यह भालूको पूजते हैं। ऐनू भोजन करनेसे पहले देवतावोंको धन्यवाद देते और रोगमें पड़नेसे अग्निका नाम लेते हैं। पहले यह लोग किसी अपराधीको प्राणदण्ड <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> करते न थे। मारना पीटना हो बड़ी सजा रही ।' कोई किसीका वध करनेसे नाक कान काटे जानेका दण्ड पाता था । यह अपरिचित व्यक्तिका बड़ा बादर-- सत्कार करते हैं । ऐनूर मारिनूदो - महिसर राज्यका सरकारी जंगल क्षेत्रफल ३० वर्ग मील है। ऐन्द्रव (सं०] को० ) १ मृगशिरा नक्षत्र । २ चान्द्रायण नामक व्रतविशेष । ३ चान्द्रमास । (त्रि०) ४ चन्द्र-सम्बन्धीय । ऐन्दवो ( सं खो० ) ऐन्दव-डीए। सोमराजी, बाकची.. कालीजोरी । इन्दु-देवता चस्य इन्दु पण् । ० ऐन्द्र (सं० [को०) इन्द्रो देवता अस्य इन्द्र- षण् । १ ज्येष्ठा नक्षत्र | २ मूलविशेष, एक जड़ी। इसे साधारणतः जङ्गली अदरक कहते हैं। संस्कृत पर्याय वनार्द्र का, वनजा और अरण्यजार्द्र का है । यह कटु, पत्र पर रुचि, बल एवं धनिकारक है। (वि.) इन्द्र-सम्बन्धीय ४ इन्द्र के उद्देश्य से आहूत । ( पु० ) ५ इन्द्र के पुत्र जयन्त, अजुन एवं वालि वानर प्रभृति । ६ इन्द्रकृत व्याकरण । ७ दृष्टिका जल । ८ देवसर्षप वृक्ष । ऐन्द्रजालिक (सं० पु० ) इन्द्रजालेन कोड़तोति, इन्द्र जाल-ठक् । १ इन्द्रजालकारक, बाज़ीगर । इसका संस्कृतपर्याय- प्रतीहारक, मायाकारक, कौतिक, मायावी, व्यसक, मायो और मायिक है । (वि) २ इन्द्रजाल सम्बन्धीय, बाज़ीगरोसे सरोकार रखनेवाला । ऐन्द्रतुरीय (सं० क्लो० ) उदकदानविशेष | इसका चतुर्थांश इन्द्रको दिया जाता है। ऐन्द्रद्य ुम्न (सं० तो ० ) इन्द्रद्युम्नमधिकृत्य कृतमाख्या- नम्, इन्द्रव्य स थ । इन्द्रख राजाके वृत्तान्त घटित महाभारतका एक आख्यान । ऐन्द्रयव (सं० पु० ) इन्द्रद, इंदरायन । ऐन्द्रलुप्तिक (सं० त्रि०) इन्द्रलुप्त-ठक् । रोगविशिष्ट, गंजा । ऐन्द्रवायव (सं०वि०) इन्द्रदेव इन्द्र- वायु-अण् । इन्द्र-वायुसम्बन्धीय । ऐन्द्रवारुणी (सं० स्त्री०) 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<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> करते न थे। मारना–पीटना ही बड़ी सज़ा रही।‌ कोई किसीका वध करनेसे नाक कान काटे जानेका दण्ड पाता था। यह अपरिचित व्यक्तिका बड़ा आदर–‌सत्कार करते हैं। ऐनूर मारिगूदी—महिसुर राज्यका सरकारी जंगल।‌ क्षेत्रफल ३० वर्ग मील है। ऐन्दव (सं॰ ल्की॰) इन्दु–देवता अस्य इन्दु–अण्। १ मृगशिरा नक्षत्र। २ चान्द्रायण नामक व्रतविशेष।‌ ३ चान्द्रमास। (त्रि॰) ४ चन्द्र–सम्बन्धीय। ऐन्दवी (सं॰ स्त्री॰) ऐन्दव–डीप्। सोमराजी, बाकची,‌ कालीजीरी। ऐन्द्र (सं॰ ल्की॰) इन्द्रो देवता अस्य इन्द्र–अण्। १ ज्येष्ठा नक्षत्र। २ मूलविशेष, एक जड़ी। इसे साधारणतः जङ्गली अदरक कहते हैं। संस्कृत पर्याय वनार्द्रका, वनजा और अरण्यजार्द्रका है। यह कटु, अम्ल और रुचि, बल एवं अग्निकारक है।‌ {{smaller|राजनिघण्टु}} (त्रि॰) ३ इन्द्र–सम्बन्धीय। ४ इन्द्रके उद्देश्यसे‌ आहूत। (पु॰) ५ इन्द्रके पुत्र जयन्त, अर्जुन एवं‌ वालि वानर प्रभृति। ६ इन्द्रल्कत व्याकरण। ७ वृष्टिका जल। ८ देवसर्षप वृक्ष। ऐन्द्रजालिक (सं० पु० ) इन्द्रजालेन कोड़तोति, इन्द्र जाल-ठक् । १ इन्द्रजालकारक, बाज़ीगर । इसका संस्कृतपर्याय- प्रतीहारक, 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मारिगूदी—महिसुर राज्यका सरकारी जंगल।‌ क्षेत्रफल ३० वर्ग मील है।}} {{Outdent|ऐन्दव (सं॰ ल्की॰) इन्दु–देवता अस्य इन्दु–अण्। १ मृगशिरा नक्षत्र। २ चान्द्रायण नामक व्रतविशेष।‌ ३ चान्द्रमास। (त्रि॰) ४ चन्द्र–सम्बन्धीय।}} {{Outdent|ऐन्दवी (सं॰ स्त्री॰) ऐन्दव–डीप्। सोमराजी, बाकची,‌ कालीजीरी।}} {{Outdent|ऐन्द्र (सं॰ ल्की॰) इन्द्रो देवता अस्य इन्द्र–अण्। १ ज्येष्ठा नक्षत्र। २ मूलविशेष, एक जड़ी। इसे साधारणतः जङ्गली अदरक कहते हैं। संस्कृत पर्याय वनार्द्रका, वनजा और अरण्यजार्द्रका है। यह कटु, अम्ल और रुचि, बल एवं अग्निकारक है।‌ {{smaller|राजनिघण्टु}} (त्रि॰) ३ इन्द्र–सम्बन्धीय। ४ इन्द्रके उद्देश्यसे‌ आहूत। (पु॰) ५ इन्द्रके पुत्र जयन्त, अर्जुन एवं‌ वालि वानर प्रभृति। ६ इन्द्रल्कत व्याकरण। ७ वृष्टिका जल। ८ देवसर्षप वृक्ष।}} {{Outdent|ऐन्द्रजालिक (सं॰ पु॰) इन्द्रजालेन क्रीड़तीति, इन्द्रजाल–ठक्। १ इन्द्रजालकारक, बाज़ीगर। इसका संस्कृत पर्याय—प्रतीहारक, मायाकारक, कौसुतिक,‌ मायावी, व्यसक, मायी और मायिक है। (त्रि) २ इन्द्रजाल–सम्बन्धीय, बाज़ीगरीसे सरोकार रखनेवाला।}} {{Outdent|ऐन्द्रतुरीय (सं॰ ल्की॰) उदकदानविशेष। इसका‌ चतुर्थांश इन्द्रको दिया जाता है।}} {{Outdent|ऐन्द्रद्युम्न (सं॰ ल्की॰) इन्द्रद्युम्नमधिकृत्य कृतमाख्यानम्, इन्द्रद्युम्न–अण्। इन्द्रद्युम्न राजाके वृत्तान्तसे घटित महाभारतका एक आख्यान।}} {{Outdent|ऐन्द्रयव (सं॰ पु॰) इन्द्रयव, इंदरायन।}} {{Outdent|ऐन्द्रलुप्तिक (सं॰ त्रि॰) इन्द्रलुप्त–ठक्।‌ इन्द्रलुप्त रोगविशिष्ट, गंजा।}} {{Outdent|ऐन्द्रवायव (सं॰ त्रि॰) इन्द्रवायु देवते अस्य। इन्द्र–वायु–अण्। इन्द्र–वायुसम्बन्धीय।}} {{Outdent|ऐन्द्रवारुणी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रवारुणी लता, ककड़ी की बेल।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> fqsky97w8e28mfjqws9b2y3hvfpjf90 665804 665803 2026-07-07T13:28:10Z आदेश यादव 3609 665804 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|'''४७६'''|'''ऐनस—ऐन्द्रवारुणी'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|ऐनस (सं॰ ल्की॰) एन एव स्वार्थे अण्। पाप, गुनाह।}} {{Outdent|ऐना (हिं॰) {{smaller|आईना देखो।}}}} {{Outdent|ऐनापुर—बम्बई प्रान्त के बेलगांव ज़िलेका एक विशाल ग्राम। यह अथनी–कागवाड सड़कपर अथनीसे कोई १३ मील दक्षिण–पश्चिम अवस्थित है। ग्रामसे बाहर दक्षिण ओर एक तालाब के पास मुसलमान–साधु पीर काज़ीकी कब्र है। १६३९ ई॰को फ्रान्सीसी पर्याटक मनङेलस्लो (Mandelaslo) यहां आये थे। उन्होंने‌ एयनाटौर (Eynatour) नाम लिखा है। १७९१ ई॰को कपसान मूर (Captain Moor) महाराष्ट्रोंके सहायक बन टीपू से लड़ने पहुंचे। उनकी वर्णना के अनुसार ऐनापुर में मुसलमान अधिक रहते और अच्छे–अच्छे मकान बने थे। १८४२ ई॰को यह ग्राम दूसरे ८ ग्रामों के साथ अंगरेजों के हाथ लगा। कारण मीराज‌ प्ट्टवर्धन शाखा के प्रतिनिधि गोपालरावने किसी उत्तराधिकारीके व्यतीत स्वर्गगमन किया था।}} {{Outdent|ऐनि—सूर्य के पुत्र। सूर्यवंशको ऐनिवंश भी कहते हैं।}} {{Outdent|ऐनीता—(हि॰ पु॰) मर्क्टको दर्पण देखानेका काम। यह कलन्दरोंकी भाषा है।}} {{Outdent|ऐनू—जापानकी उत्तर द्वीपवासी एक जाति। पहले यह लोग कूराइलसे येजू आये थे। फिर जापानके प्रधान द्वीप पर बस गड्डों में रहनेवाले कोरोपोक गुरुवोंको इन्होंने मार भगाया। किन्तु जापानियोंके दक्षिण तथा पश्चिमसे आ पहुचनेपर इन्हें येजू में जाकर रहना पड़ा था। यह शराब बहुत पीते और मैले–कुचैले रहते हैं। जापानियोंसे ऐनू लंबे होते हैं। बाल न बनवानेसे इनकी दाढ़ी–मूछ खूब भरी रहती है। स्त्रियां मुंह, हाथ और मत्थेपर गोदना गोदाती हैं। वल्कलका वस्त्र पहना जाता है। जाड़े में मृगचर्म धारणकर शरीररक्षा करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों बाली पहनते हैं। लिखना–पढ़ना कोई नहीं जानता। इनके विश्वासानुसार पृथिवी एक मत्स्यके पृष्ठपर स्थित है। उसीके हिलनेसे भूकम्प आता है। यह भालूको पूजते हैं। ऐनू भोजन करनेसे पहले देवतावोंको धन्यवाद देते और रोगमें पड़नेसे अग्निका नाम लेते हैं। पहले यह लोग किसी अपराधीको प्राणदण्ड}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> करते न थे। मारना–पीटना ही बड़ी सज़ा रही।‌ कोई किसीका वध करनेसे नाक कान काटे जानेका दण्ड पाता था। यह अपरिचित व्यक्तिका बड़ा आदर–‌सत्कार करते हैं। {{Outdent|ऐनूर मारिगूदी—महिसुर राज्यका सरकारी जंगल।‌ क्षेत्रफल ३० वर्ग मील है।}} {{Outdent|ऐन्दव (सं॰ ल्की॰) इन्दु–देवता अस्य इन्दु–अण्। १ मृगशिरा नक्षत्र। २ चान्द्रायण नामक व्रतविशेष।‌ ३ चान्द्रमास। (त्रि॰) ४ चन्द्र–सम्बन्धीय।}} {{Outdent|ऐन्दवी (सं॰ स्त्री॰) ऐन्दव–डीप्। सोमराजी, बाकची,‌ कालीजीरी।}} {{Outdent|ऐन्द्र (सं॰ ल्की॰) इन्द्रो देवता अस्य इन्द्र–अण्। १ ज्येष्ठा नक्षत्र। २ मूलविशेष, एक जड़ी। इसे साधारणतः जङ्गली अदरक कहते हैं। संस्कृत पर्याय वनार्द्रका, वनजा और अरण्यजार्द्रका है। यह कटु, अम्ल और रुचि, बल एवं अग्निकारक है।‌ {{smaller|राजनिघण्टु}} (त्रि॰) ३ इन्द्र–सम्बन्धीय। ४ इन्द्रके उद्देश्यसे‌ आहूत। (पु॰) ५ इन्द्रके पुत्र जयन्त, अर्जुन एवं‌ वालि वानर प्रभृति। ६ इन्द्रल्कत व्याकरण। ७ वृष्टिका जल। ८ देवसर्षप वृक्ष।}} {{Outdent|ऐन्द्रजालिक (सं॰ पु॰) इन्द्रजालेन क्रीड़तीति, इन्द्रजाल–ठक्। १ इन्द्रजालकारक, बाज़ीगर। इसका संस्कृत पर्याय—प्रतीहारक, मायाकारक, कौसुतिक,‌ मायावी, व्यसक, मायी और मायिक है। (त्रि) २ इन्द्रजाल–सम्बन्धीय, बाज़ीगरीसे सरोकार रखनेवाला।}} {{Outdent|ऐन्द्रतुरीय (सं॰ ल्की॰) उदकदानविशेष। इसका‌ चतुर्थांश इन्द्रको दिया जाता है।}} {{Outdent|ऐन्द्रद्युम्न (सं॰ ल्की॰) इन्द्रद्युम्नमधिकृत्य कृतमाख्यानम्, इन्द्रद्युम्न–अण्। इन्द्रद्युम्न राजाके वृत्तान्तसे घटित महाभारतका एक आख्यान।}} {{Outdent|ऐन्द्रयव (सं॰ पु॰) इन्द्रयव, इंदरायन।}} {{Outdent|ऐन्द्रलुप्तिक (सं॰ त्रि॰) इन्द्रलुप्त–ठक्।‌ इन्द्रलुप्त रोगविशिष्ट, गंजा।}} {{Outdent|ऐन्द्रवायव (सं॰ त्रि॰) इन्द्रवायु देवते अस्य। इन्द्र–वायु–अण्। इन्द्र–वायुसम्बन्धीय।}} {{Outdent|ऐन्द्रवारुणी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रवारुणी लता, ककड़ी की बेल।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qa9d3y7coztdfh8g0qyueoxnpilpsl1 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६३ 250 82727 666381 664844 2026-07-08T04:12:01Z सौरभ तिवारी 05 49 /* प्रमाणित */ 666381 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||अक्षरलिपि|६१}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> जैनियोंके ४थे उपाङ्ग पन्नवणा (प्रज्ञापना)-सूत्रमें पूर्वोक्त अट्ठारह लिपियोंका उल्लेख वर्त्तमान है। लिपिकरोंके दोषसे विभिन्न पुस्तकोंमें कुछ पाठ भेद देख पड़ता है। प्रज्ञापनासूत्रके टीकाकार मलयगिरिने लिखा है— {{c|{{smaller|"ब्राह्मी यवनानीत्यादयो लिपिभेदास्तु सम्प्रदायादवशेषः"}}}} अर्थात् ब्राह्मी, यवनानी इत्यादि अट्ठारह प्रकारकी लिपि विभिन्न सम्प्रदायोंसे उद्भूत हुई है। जैनशास्त्रके मतसे जैनाङ्गसमूह महावीर-स्वामीके समय पहले फैला और वीर-निर्व्वाणके १६४ वर्ष बाद (सन् ई॰ से ३६३ वर्ष पहले) पाटलिपुत्रके श्रीसङ्घमें संगृहीत हुआ। ऐसे स्थलमें कहा जा सकता है, कि सम्राट् अशोकसे पहले भारतमें ब्राह्मी प्रभृति १८ प्रकारकी लिपि चलती थी। {{c|{{smaller|यवनानी।}}}} यवनानी नाम देख कोई-कोई कहना चाहते हैं, कि मकदूनिया-वीर सिकन्दरके समय इस देशमें यूनानी यवनोंने जो लिपि चलाई वही यवनानी लिपि है। इस यूनानी शब्दका उल्लेख देखकर मोक्षमूलर प्रभृति कोई-कोई पाश्चात्य अध्यापक अष्टाध्यायीके सूत्रकार पाणिनिको भी इसी समयका व्यक्ति बताया चाहते हैं। किन्तु पाणिनिसूत्रके वार्त्तिककार और महाभाष्यकारके 'यवनानी' शब्दका लिपि<ref>'यवनाल्लिप्याम् इति वक्तव्यम्'—वार्त्तिक। दीषो यवो यवानी। यवनाल्लिप्याम्। यवनानी लिपिः।—(महाभाष्य ४।१।४९ सूत्र में)</ref> अर्थ करते भी पाणिनिने कहीं स्पष्टतः यह अर्थ नहीं प्रकाश किया। स्त्रीलिङ्गमें जिन शब्दोंके उत्तर 'आणुक्' होता है, उन्होंने दृष्टान्तकी तरह उन्हीं शब्दोंका उल्लेख किया है— {{c|{{smaller|"इन्द्रवरुणभवशर्व्व रुद्रमृड़हिमारण्य यव-यवनमातुलमार्य्याणामाणुक्।"}}}} {{Right|(पा॰ ४।१।५९)}} जो हो, यवनानी शब्दमें आधुनिक सन्देहके करनेका कोई कारण नहीं देखा जाता। यवनों (Ionian) का अभ्युदय बहुत पुराना है। हमने दूसरी जगह दिखाया है, कि सन् ई॰ से पहले की १०वीं शताब्दिमें यवन या योन जातिका पराक्रम सब जगह <noinclude>{{rule}}</noinclude> {{smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> विघोषित हुआ। इससे पहले यवन जातिका अभ्युदय हुआ था। रामायण, महाभारत प्रभृति पुराने संस्कृत ग्रन्थोंमें भी यवन जातिका विशेष उल्लेख वर्त्तमान है। यवनानी कहनेसे बहुत पुरानी कीलरूपा (Cuneiform) लिपि ही समझी जाती थी। {{smaller|यवन देखो।}} {{C|{{smaller|पुष्करसारी।}}}} समवायाङ्ग और ललितविस्तरमें जिस "पुष्करसारी" लिपिकी बात लिखी है, वह भी भारतकी एक बहुत पुरानी लिपि है। पाणिनिने पुष्करसादीका उल्लेख किया है। {{c|{{smaller|उत्तरकुरुका और गन्धर्वलिपि प्रभृति।}}}} ऐतरेय-ब्राह्मणमें उत्तरकुरु और उत्तरमद्रकी बात लिखी है। ऐतरेय ब्राह्मणसे यह भी मालूम होता है कि, वहाँ वैदिक यागयज्ञ प्रचलित था। याग-यज्ञको निर्द्धारण करनेके लिये जैसे ज्योतिषका प्रयोजन पड़ता, वैसे ही उसके लिये शुल्व-सूत्र भी जानना आवश्यक है। {{smaller|[शुल्वसूत्र देखो।]}} इसीलिये अङ्कलिपि और गणितलिपि भी उसी प्राचीनकालमें चली थी। गन्धारमें प्रचलित लिपि ही सम्भवतः गन्धर्व्व लिपि है। कन्धारके साथ बहुत पुराने समयसे ही वैदिक आर्य्यों का संस्रव रहा है। वहाँकी लिपि भी नितान्त आधुनिक नहीं है। खरोष्ठी-लिपिकी प्रसङ्गमें यह बात पीछे बताई जायगी। {{c|{{smaller|माहेश्वरलिपि।}}}} पाणिनिसूत्रमें जो चौदह प्रत्याहार हैं, उन्हींको वररुचि, पतञ्जलि प्रभृति वैयाकरण शिवसूत्र कहकर मानते हैं। देशमें सर्वसाधारण वैयाकरणोंको विश्वास है, कि महेश्वरने ही सबसे पहले व्याकरण प्रकाशित किया था। वेदाङ्गके अन्तर्गत जो शिक्षा है, उसमें देखा जाता है, कि महेश्वरने ही चौसठ अक्षर प्रकाशित किये। जो हो, इसमें सन्देह नहीं, कि पाणिनिसे बहुत पहले शिवसूत्र उत्पन्न हुए थे। चीन-परिव्राजक इत‍्सिङ्गने सन् ई॰ की ७वीं शताब्दीके अन्तिम भागमें भारत आ संस्कृत पढ़ी। उन्होंने लिखा है,—'सिद्धिरस्तु' से आरम्भकर अक्षरमाला-सम्बन्धीय जो महेश्वरके रचे 'सिद्धान्त' छः वर्षके बालक पहले मुखस्थ<noinclude>{{Multicol-end}} {{left|१६|1em}}</noinclude> ifmv92x602naojeecs0k10naxjsa4oz पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/६५ 250 82729 666394 664803 2026-07-08T07:39:34Z Shivaniya shaw 4129 666394 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अक्षरलिपि'''|'''६३'''}}   </noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>                       कित हो गये हों। इसके सम्बन्धमें यहाँ दो-एक बातें कहना हम अप्रासङ्गिक नहीं समझते। फिनिक (Phoenician) लोग पुराने यूनानियों और जर्मनजोंके निकट फोनिक या फनिक नामसे परिचित थे। फणिक जातिको आदि बणिक जाति कहा जा सकता है। फणिक और बणिक शब्दमें उच्चारणका कुछ अधिक अलगाव नहीं। सेमेटिक फ = प। ऋग्वेदके बहुतसे स्थानोंमें 'पणि' शब्द लिखा है। ५वें मण्डलवाले ३२ सूक्तके भाष्यमें सायणाचार्यने 'पणि' शब्दका 'बणिक्' अर्थ बताया है। इधर पाणिनि-के उणादि-सूत्रके अनुसार भी 'पण' धातुसे बणिक शब्द निष्पन्न हुआ है; सुतरां पणिक और बणिक एक ही बात है। ऋग्वेदमें पणि लोग गोदुग्ध-व्यवसायी और समृद्धिशाली जातिरूपसे ही परिचित हैं। दूध, दही, और घी बनानेके लिये, उनके पास 'चतुःशृङ्ग' और 'दशयन्त्र उत्स' (ऋक् ६।४४।२४) नामक यन्त्र थे। अङ्गिरा प्रभृति वेदोक्त याज्ञिक उनके घोर शत्रु थे; सदा उनका गोधन छीन लेते थे। इसलिये दोनों दलोंमें घोरतर सङ्ग्राम होता रहता। पणि लोग 'अक्रतु' और 'अयज्ञ' बताये जाकर ऋषियोंके निकट हेय थे। ऋक्संहिता ध्यान देकर पढ़नेसे समझ पड़ेगा कि, वैदिक आर्योंने जब भारतमें प्रवेश किया, तब pणि लोग यहाँ रहते थे। ऋक्संहितासे यह भी मालूम होता है, कि उस समय यहाँके लोग समुद्रयात्रा करते थे। पणि लोग व्यवसाय-वाणिज्यमें लगे रहते (१।३३।३)। कितनों हीके पास बहुत रुपया-पैसा था (४।२५।७)। वे रुपये उधार देते और बुद्धिमान् भी समझे जाते थे। सन् ई० से पहलेकी ५वीं शताब्दीमें हिरोदोतस्‌ने लिखा है,—'फिनिक ही आदि बणिक् बताये जाकर परिचित हैं और वे ईरानकी खाड़ीके किनारे रहते थे।' किसी-किसीने ऐसा भी लिखा है, कि अफगानिस्तान ही उनका आदिवास था।<ref><small> Pococke's India in Greece, p. 218.</small></ref> फिनिक 'केदमस्' (Kedmus) या प्राच्य बताकर अपना परिचय देते थे। यूनानी ऐतिहासिकोंने पूर्व- {{Rule}} {{Smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भारत (मगध) को Prasii या प्राच्य बताकर निर्देश किया है। ऐसे स्थलमें समझ पड़ता है, कि पणि लोगोंका सर्वादिम वास कीकट या मगध था। ऋग्वेद-में भी कीकटका गो-प्राधान्य वर्णित हुआ है।<ref><small> "किं कृण्वन्ति कीकटेषु गावः।" (ऋक् ३।५३।१४)</small></Ref> गो ही पणि लोगोंका सर्वस्वधन था। वैदिक याज्ञिकों-के उत्पीड़न और आक्रमणसे परास्त हो धीरे-धीरे उनमेंसे कोई दाक्षिणात्य, कोई पश्चिमसे होकर पहले अफगानिस्तान, वहाँसे ईरानकी खाड़ीके किनारे, ईरानकी खाड़ीके किनारेसे अरब और वहाँसे अपने सौभाग्यकेन्द्र फिनिसियामें जाकर बसे थे। इसके बाद सभ्यताकी लीलास्थली मिस्र प्रान्त और भूमध्यसागर-पर उनका अधिकार हुआ। अब बात उठती है कि, पणिक (फनिक) लोग जब भारतसे ही युरोप गये हैं, तब युरोपीय फनिकोंसे भार-तीय लिपिकी उत्पत्ति कैसे मानी जाय? हमें विश्वास है, कि सभ्यताकी लीलाभूमि भारतसे ही असम्पूर्ण फिनिक लिपिकी उत्पत्ति हुई होगी। पणिकोंमेंसे जो दाक्षिणात्यको गये, सम्भवतः वही द्राविड़ीय सभ्यताके मूल थे। वे यज्ञविद्वेषी थे और स्थानत्याग-के साथ उनका स्वभाव भी बदल गया था। सम्भवतः परवर्ती समयमें उन्हींकी कोई शाखा राक्षसरूपसे और उनकी ही कोई दूसरी शाखा जङ्गली फल-मूल द्वारा पेट भरनेवाली बताई जाकर "वानर" नामसे प्रसिद्ध होती रही होगी। अति पूर्व कालमें उनकी एक शाखाने मिस्रमें जा और वहाँकी चित्रलिपि तोड़कर कोई पाँच हजार वर्ष पहले सङ्केत-लिपि (Hieratic)-का सूत्रपात किया था। दक्षिण-भारतकी सुप्राचीन बट्टेलेत्तु लिपिके 'अ', 'इ' प्रभृति रूप उसी बहुत पुरानी सङ्केतलिपिके अनुरूप होनेसे कितना ही दाक्षिणात्यका संस्रव सूचित होता है। वाणिज्यका काम चलानेके लिये अधिक लिखने-पढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिये पणिकोंको वैदिक और संस्कृत अक्षरमाला जैसी बहुसंख्यक अक्षरलिपिका प्रयोजन न हुआ। यही कारण है, कि फिनिक अक्षरमालामें बहुत थोड़े अक्षर {{Rule}} {{Smallrefs}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> 45gl7ckff8sk6r32vpionrz9i51ow7d पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/७२ 250 82742 665960 664886 2026-07-07T15:32:58Z सौरभ तिवारी 05 49 /* शोधित नहीं */ 665960 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" /></noinclude>{{c|२। विभिन्न सामयिक ताम्रलखकी अक्षर।}} १ । 𑚢 𑚆 𑚧 𑚦 𑚭 𑚵 𑚟 𑚮 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 २ । 𑚦 𑚫 𑚭 𑚵 𑚟 𑚮 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 ३ । 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚮 । 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 ५ । 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 ६ । ॐ 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 ७ । ॐँ 𑚊 𑚶 𑚟 𑚢 𑚭 𑚌 𑚴 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 𑚟 𑚦 𑚰 𑚟 𑚥 𑚶 ८ । क्य क्रि नृ यो यू छी जू ज्यू टो डे हे ह्रो मो कै दै {{c|२। विभिन्न सामयिक ताम्रलेखकी अक्षरकी विवृति।}} {|width=100% |- | १। || मौर्यलिपि || का खि गु घो चू छी जू ञ्जा टो ठे डु ढो णो नै थै |- | २। || शकलिपि || का खु गु घो चे छि जू ञ्जे टे डा डि तृ |- | ३। || पल्लवलिपि || कु खा गो च्छो जो ञ्च टि ट्ठि डी तू |- | ४। || गुप्तलिपि || कू खा गू घे ङ्गे चि च्छ जा ज्झ ञ्ज टो डि णो ता ध |- | ५। || राष्ट्रकूटलिपि || कू खि गो घा ङ्क चि च्छे जौ र्झ ञ्ज टा डी ण्ड तुः थि |- | ६। || हिन्दुस्थान ९म शताब्द || ॐ को खा गू धू ङ्गा चा छि जैः ञ्ज टाः ष्ठि ड़ो टु गौ ते थैः |- | ७। || " १२श शताब्द || ॐ कु खि ग्र घा ङ्कि चं छे जि झा ञ्जा टाः ठा डा ढे णा तो र्थि |- | ८। || गौड़ीय सेनलिपि || के खे गृ घ ङ्क च च्छ ज झि ञ्च टि ष्ठा ढ ण ति थु दो धां नौ पू |}<noinclude></noinclude> t9sboge1ie088ndcmox98f2339rv9o2 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१८३ 250 83340 665791 346646 2026-07-07T12:41:59Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 665791 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|१७६|अच्}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>पशुके चरवाहे रहे। काल्डिया देशमें भी प्रथम गोपाल हौ ज्योतिषका मर्म समझे थे । यदि ऐसा हुआ है, तो इस बातको भी स्वीकार करना पड़ेगा, कि राशि प्रभृतिका नाम उन्हीं सकल पशुपालकोंने रखा था। उस समय पशुरक्षक सामान्य लोग थे ; राशि प्रभृतिका अच्छा नाम देख-भाल रख न सके । इसी लिये जो सकल द्रव्य वह अष्टप्रहर देखते, हाथमें लेकर घूमते और खाते थे, उन्हींके अनुसार उन्होंने बारह राशिके नाम मिथुन, कर्कट, सिंह, राशि प्रभृतिका नाम रखा। उन्होंने यह रखे हैं,—मेष, वृष, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन । वास्तवमें कोई राशि न तो भेड़ और न सांड़ है और न सिंहको तरह केश ही फुलाये है । आकाशके स्थान-स्थानमें कितने ही तारा पास-पास मिल - जैसे गये हैं । कितनी ही देरतक देखने से वह एक वस्तुके रूपमें देख पड़ते हैं । कोई इसी सकल नक्षत्र-पुष्ञ्जकौ भालूसे तुलना करते, जो जीन वस्तु अच्छी तरह पहचानते, वह उसीके साथ तुलना करते हैं। उस कालके रखवाले जिन सकल वस्तुओंको भली भांति पहचानते थे, उन्हींको देख उन्होंने राशियोंका नाम रखा । किन्तु ज्योतिषको मेष प्रभृति राशिका ठीक चित्र अङ्कित नहीं । ठीक चित्र दिखाने के लिये यदि कोई राशियोंके नामानुसार अविकल छविको चित्रित कर दे, तो वह दूसरी बात है । किन्तु अविकल चित्र बनानेकी प्रथा ही नहीं। राशिको आकृतिका एक-एक प्रकार से सङ्केत है। राशि देखो । यहूदी जैसे जल बतानेकी लहर चित्रित कर दिखाते—और ज्योतिषको कुम्भराशिके स्थलमें भी लहर बना रखते थे, वैसे हो इस देशमें भी, राशिका सङ्केत सिवा मेषवृषादिवाले संक्षिप्त आकारके और कुछ भी नहीं। पहले उनके जो चित्र थे, अब उनमें अनेक परिवर्तन हो गये हैं, इसीसे हम उन्हें पहचान नहीं सकते । इन्हीं सकल विषयोंको आलोचना करनेसे कितना ही विश्वास उत्पन्न होता है, कि लिखनेका कौशल आविष्कृत होनेसे पहले इस देशके लोग भी चित्र भेज दूरके लोगोंसे मनके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भावको प्रकाश करते थे । पौछे सुविधा के निमित्त एक-एक वस्तुके आद्यक्षरसे वर्णमालाके वर्ण की सृष्टि हुई। इसमें कोई आगा-पीछा नहीं, कि अच् वर्ण और हल् वर्णको सृष्टि एककालमें ही हुई थी । किन्तु पहले इतने वर्ण न थे । मनुष्यके गलेका स्वर जितना हो परिष्कृत होने लगा, उतना ही विशुद्ध राग- रागिणीको तान, लय और खरसे सबने गान करना सीखा और नानावणकी सृष्टि होने लगी । अच्के मध्य में पहले आकार मात्र था ; क्योंकि इसका उच्चारण सहज और स्वाभाविक है । सम्पूर्ण रूपसे मुख खोल शब्द करनेसे हो आकार उच्चारित होता है। पीछे क्रमशः मुखके अवकाशको घटाते जानेसे अकार, इकार, उकार प्रभृति अन्य स्वरवर्ण निकलते हैं । फिर, मुखके किसी स्थानको स्पर्श करनेसे हल्वर्ण उच्चारित होते हैं। वर्णका उच्चारण-स्थान और प्रयत्न इसका प्रमाण है । <small> उच्चारण-भ्थान- </small> अ, आ. आ३, क, ख, ग, घ, ङ, ह, और विसर्गका उच्चारणस्थान कण्ठ है । <Small>( अकुहविसर्ज नौयानां कण्ठः । )</small>इ, ई, ई३, च, छ, ज, झ, ञ, और श तालुसे उच्चारित होते हैं ।<Small>( इचुयशानां तालु । )</small>ऋ, ऋ, ऋ३, ट, ठ, ड, ढ, ण, र और ष मूर्द्धासे निकलते हैं ।<Small> (ऋटुरषाणां मूर्द्धा । )</small>। ऌ ॡ३, त, थ, द, ध, न, ल और स दांतसे सम्बन्ध रखते हैं ।<Small>( ऌतुलसानां दन्ताः । )</small> उ, ऊ, ऊ३, प, फ, ब, भ और उपध्मानीय अर्थात् प और फ ओष्ठके हैं । <Small> (उपूपध्मानीयानामोष्ठौ । )</small> ङ, ञ, ण, न और म ख ख वर्ग भिन्न नासिकासे भी उच्चारित हो जाते हैं ।<Small>(ञमङणनानां नासिका च । )</small>ए और ऐका उच्चारण कण्ठ और तालुसे होता है।<Small>(एदैतोः कण्ठतालु ! )</small> ओ और औ कण्ठौष्ठसे निकलते हैं ।<small> (ओदौतोः कण्ठौष्ठम् । )</small> वकार दन्त और ओष्ठसे उच्चारित होता है ।<Small>( वकारस्य दन्तौष्ठम् ।)</small> जिह्वामूलीय अर्थात् क और खका उच्चारणस्थान जिह्वामूल है ।<Small> जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् । )</small> अनुस्वार नासिकासे निकलता है ।<Small>(नासिकाऽनुखारस्य । )</small> <Small>प्रयत्न—</small>इसके बाद प्रयत्नादि नाना प्रकार खरका भी - प्रमाण मिलता है । यथा, प्रयत्न दो प्रकारका <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> d65r6ksw67uqg5joi0c251y9kc6qxpc 665794 665791 2026-07-07T12:54:20Z Shivaniya shaw 4129 665794 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /> {{rh|२७६|अच्}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>पशुके चरवाहे रहे। काल्डिया देशमें भी प्रथम गोपाल हौ ज्योतिषका मर्म समझे थे । यदि ऐसा हुआ है, तो इस बातको भी स्वीकार करना पड़ेगा, कि राशि प्रभृतिका नाम उन्हीं सकल पशुपालकोंने रखा था। उस समय पशुरक्षक सामान्य लोग थे ; राशि प्रभृतिका अच्छा नाम देख-भाल रख न सके । इसी लिये जो सकल द्रव्य वह अष्टप्रहर देखते, हाथमें लेकर घूमते और खाते थे, उन्हींके अनुसार उन्होंने बारह राशिके नाम मिथुन, कर्कट, सिंह, राशि प्रभृतिका नाम रखा। उन्होंने यह रखे हैं,—मेष, वृष, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन । वास्तवमें कोई राशि न तो भेड़ और न सांड़ है और न सिंहको तरह केश ही फुलाये है । आकाशके स्थान-स्थानमें कितने ही तारा पास-पास मिल - जैसे गये हैं । कितनी ही देरतक देखने से वह एक वस्तुके रूपमें देख पड़ते हैं । कोई इसी सकल नक्षत्र-पुष्ञ्जकौ भालूसे तुलना करते, जो जीन वस्तु अच्छी तरह पहचानते, वह उसीके साथ तुलना करते हैं। उस कालके रखवाले जिन सकल वस्तुओंको भली भांति पहचानते थे, उन्हींको देख उन्होंने राशियोंका नाम रखा । किन्तु ज्योतिषको मेष प्रभृति राशिका ठीक चित्र अङ्कित नहीं । ठीक चित्र दिखाने के लिये यदि कोई राशियोंके नामानुसार अविकल छविको चित्रित कर दे, तो वह दूसरी बात है । किन्तु अविकल चित्र बनानेकी प्रथा ही नहीं। राशिको आकृतिका एक-एक प्रकार से सङ्केत है। राशि देखो । यहूदी जैसे जल बतानेकी लहर चित्रित कर दिखाते—और ज्योतिषको कुम्भराशिके स्थलमें भी लहर बना रखते थे, वैसे हो इस देशमें भी, राशिका सङ्केत सिवा मेषवृषादिवाले संक्षिप्त आकारके और कुछ भी नहीं। पहले उनके जो चित्र थे, अब उनमें अनेक परिवर्तन हो गये हैं, इसीसे हम उन्हें पहचान नहीं सकते । इन्हीं सकल विषयोंको आलोचना करनेसे कितना ही विश्वास उत्पन्न होता है, कि लिखनेका कौशल आविष्कृत होनेसे पहले इस देशके लोग भी चित्र भेज दूरके लोगोंसे मनके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भावको प्रकाश करते थे । पौछे सुविधा के निमित्त एक-एक वस्तुके आद्यक्षरसे वर्णमालाके वर्ण की सृष्टि हुई। इसमें कोई आगा-पीछा नहीं, कि अच् वर्ण और हल् वर्णको सृष्टि एककालमें ही हुई थी । किन्तु पहले इतने वर्ण न थे । मनुष्यके गलेका स्वर जितना हो परिष्कृत होने लगा, उतना ही विशुद्ध राग- रागिणीको तान, लय और खरसे सबने गान करना सीखा और नानावणकी सृष्टि होने लगी । अच्के मध्य में पहले आकार मात्र था ; क्योंकि इसका उच्चारण सहज और स्वाभाविक है । सम्पूर्ण रूपसे मुख खोल शब्द करनेसे हो आकार उच्चारित होता है। पीछे क्रमशः मुखके अवकाशको घटाते जानेसे अकार, इकार, उकार प्रभृति अन्य स्वरवर्ण निकलते हैं । फिर, मुखके किसी स्थानको स्पर्श करनेसे हल्वर्ण उच्चारित होते हैं। वर्णका उच्चारण-स्थान और प्रयत्न इसका प्रमाण है । <small> उच्चारण-भ्थान- </small> अ, आ. आ३, क, ख, ग, घ, ङ, ह, और विसर्गका उच्चारणस्थान कण्ठ है । <Small>( अकुहविसर्ज नौयानां कण्ठः । )</small>इ, ई, ई३, च, छ, ज, झ, ञ, और श तालुसे उच्चारित होते हैं ।<Small>( इचुयशानां तालु । )</small>ऋ, ऋ, ऋ३, ट, ठ, ड, ढ, ण, र और ष मूर्द्धासे निकलते हैं ।<Small> (ऋटुरषाणां मूर्द्धा । )</small>। ऌ ॡ३, त, थ, द, ध, न, ल और स दांतसे सम्बन्ध रखते हैं ।<Small>( ऌतुलसानां दन्ताः । )</small> उ, ऊ, ऊ३, प, फ, ब, भ और उपध्मानीय अर्थात् प और फ ओष्ठके हैं । <Small> (उपूपध्मानीयानामोष्ठौ । )</small> ङ, ञ, ण, न और म ख ख वर्ग भिन्न नासिकासे भी उच्चारित हो जाते हैं ।<Small>(ञमङणनानां नासिका च । )</small>ए और ऐका उच्चारण कण्ठ और तालुसे होता है।<Small>(एदैतोः कण्ठतालु ! )</small> ओ और औ कण्ठौष्ठसे निकलते हैं ।<small> (ओदौतोः कण्ठौष्ठम् । )</small> वकार दन्त और ओष्ठसे उच्चारित होता है ।<Small>( वकारस्य दन्तौष्ठम् ।)</small> जिह्वामूलीय अर्थात् क और खका उच्चारणस्थान जिह्वामूल है ।<Small> जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् । )</small> अनुस्वार नासिकासे निकलता है ।<Small>(नासिकाऽनुखारस्य । )</small> <Small>प्रयत्न—</small>इसके बाद प्रयत्नादि नाना प्रकार खरका भी - प्रमाण मिलता है । यथा, प्रयत्न दो प्रकारका <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> bzfvomtpe28qg6ojcbzklmmvm1vihjd 665797 665794 2026-07-07T13:11:10Z Shivaniya shaw 4129 665797 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" /></noinclude>{{rh|'''१७६'''|'''अच्'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>पशुके चरवाहे रहे। काल्डिया देशमें भी प्रथम गोपाल हौ ज्योतिषका मर्म समझे थे । यदि ऐसा हुआ है, तो इस बातको भी स्वीकार करना पड़ेगा, कि राशि प्रभृतिका नाम उन्हीं सकल पशुपालकोंने रखा था। उस समय पशुरक्षक सामान्य लोग थे ; राशि प्रभृतिका अच्छा नाम देख-भाल रख न सके । इसी लिये जो सकल द्रव्य वह अष्टप्रहर देखते, हाथमें लेकर घूमते और खाते थे, उन्हींके अनुसार उन्होंने बारह राशिके नाम मिथुन, कर्कट, सिंह, राशि प्रभृतिका नाम रखा। उन्होंने यह रखे हैं,—मेष, वृष, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन । वास्तवमें कोई राशि न तो भेड़ और न सांड़ है और न सिंहको तरह केश ही फुलाये है । आकाशके स्थान-स्थानमें कितने ही तारा पास-पास मिल - जैसे गये हैं । कितनी ही देरतक देखने से वह एक वस्तुके रूपमें देख पड़ते हैं । कोई इसी सकल नक्षत्र-पुष्ञ्जकौ भालूसे तुलना करते, जो जीन वस्तु अच्छी तरह पहचानते, वह उसीके साथ तुलना करते हैं। उस कालके रखवाले जिन सकल वस्तुओंको भली भांति पहचानते थे, उन्हींको देख उन्होंने राशियोंका नाम रखा । किन्तु ज्योतिषको मेष प्रभृति राशिका ठीक चित्र अङ्कित नहीं । ठीक चित्र दिखाने के लिये यदि कोई राशियोंके नामानुसार अविकल छविको चित्रित कर दे, तो वह दूसरी बात है । किन्तु अविकल चित्र बनानेकी प्रथा ही नहीं। राशिको आकृतिका एक-एक प्रकार से सङ्केत है। राशि देखो । यहूदी जैसे जल बतानेकी लहर चित्रित कर दिखाते—और ज्योतिषको कुम्भराशिके स्थलमें भी लहर बना रखते थे, वैसे हो इस देशमें भी, राशिका सङ्केत सिवा मेषवृषादिवाले संक्षिप्त आकारके और कुछ भी नहीं। पहले उनके जो चित्र थे, अब उनमें अनेक परिवर्तन हो गये हैं, इसीसे हम उन्हें पहचान नहीं सकते । इन्हीं सकल विषयोंको आलोचना करनेसे कितना ही विश्वास उत्पन्न होता है, कि लिखनेका कौशल आविष्कृत होनेसे पहले इस देशके लोग भी चित्र भेज दूरके लोगोंसे मनके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भावको प्रकाश करते थे । पौछे सुविधा के निमित्त एक-एक वस्तुके आद्यक्षरसे वर्णमालाके वर्ण की सृष्टि हुई। इसमें कोई आगा-पीछा नहीं, कि अच् वर्ण और हल् वर्णको सृष्टि एककालमें ही हुई थी । किन्तु पहले इतने वर्ण न थे । मनुष्यके गलेका स्वर जितना हो परिष्कृत होने लगा, उतना ही विशुद्ध राग- रागिणीको तान, लय और खरसे सबने गान करना सीखा और नानावणकी सृष्टि होने लगी । अच्के मध्य में पहले आकार मात्र था ; क्योंकि इसका उच्चारण सहज और स्वाभाविक है । सम्पूर्ण रूपसे मुख खोल शब्द करनेसे हो आकार उच्चारित होता है। पीछे क्रमशः मुखके अवकाशको घटाते जानेसे अकार, इकार, उकार प्रभृति अन्य स्वरवर्ण निकलते हैं । फिर, मुखके किसी स्थानको स्पर्श करनेसे हल्वर्ण उच्चारित होते हैं। वर्णका उच्चारण-स्थान और प्रयत्न इसका प्रमाण है । <small> उच्चारण-भ्थान- </small> अ, आ. आ३, क, ख, ग, घ, ङ, ह, और विसर्गका उच्चारणस्थान कण्ठ है । <Small>( अकुहविसर्ज नौयानां कण्ठः । )</small>इ, ई, ई३, च, छ, ज, झ, ञ, और श तालुसे उच्चारित होते हैं ।<Small>( इचुयशानां तालु । )</small>ऋ, ऋ, ऋ३, ट, ठ, ड, ढ, ण, र और ष मूर्द्धासे निकलते हैं ।<Small> (ऋटुरषाणां मूर्द्धा । )</small>। ऌ ॡ३, त, थ, द, ध, न, ल और स दांतसे सम्बन्ध रखते हैं ।<Small>( ऌतुलसानां दन्ताः । )</small> उ, ऊ, ऊ३, प, फ, ब, भ और उपध्मानीय अर्थात् प और फ ओष्ठके हैं । <Small> (उपूपध्मानीयानामोष्ठौ । )</small> ङ, ञ, ण, न और म ख ख वर्ग भिन्न नासिकासे भी उच्चारित हो जाते हैं ।<Small>(ञमङणनानां नासिका च । )</small>ए और ऐका उच्चारण कण्ठ और तालुसे होता है।<Small>(एदैतोः कण्ठतालु ! )</small> ओ और औ कण्ठौष्ठसे निकलते हैं ।<small> (ओदौतोः कण्ठौष्ठम् । )</small> वकार दन्त और ओष्ठसे उच्चारित होता है ।<Small>( वकारस्य दन्तौष्ठम् ।)</small> जिह्वामूलीय अर्थात् क और खका उच्चारणस्थान जिह्वामूल है ।<Small> जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् । )</small> अनुस्वार नासिकासे निकलता है ।<Small>(नासिकाऽनुखारस्य । )</small> <Small>प्रयत्न—</small>इसके बाद प्रयत्नादि नाना प्रकार खरका भी - प्रमाण मिलता है । यथा, प्रयत्न दो प्रकारका <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> 0oi2rp8fhy16kql73tyef0gju9pxbvb पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१८४ 250 83342 666393 346648 2026-07-08T07:29:36Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 666393 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अच्'''|'''१७७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> है, आभ्यन्तर अर्थात् मुखका, और वाह्य अर्थात् मुखसे बाहर या कण्ठादिका । फिर आभ्यन्तर प्रयत्नके पांच भेद हैं । यथा, -स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, ईषदिव्वृत,विवृत और संकृत। जो वर्ण उच्चारण करनेमें जिह्वाके स्थानको स्पर्श नहीं करता, उसे स्पृष्ट प्रयत्न कहते हैं। स्पर्श वर्ण में स्पृष्ट प्रयत्न होता है। अन्तस्थ वर्णका ईषत्स्पृष्ट अर्थात् किञ्चित् स्पृष्ट प्रयत्न है। उष्ण वर्ण का ईशवित प्रयत्न बताया गया है । अच् अर्थात् स्वरवर्ण का विवृत प्रयत्न है ; वर्ण उच्चारित होनेमें जिह्वाके स्थानको स्पर्श न करनेसे, विवृत प्रयत्न कहाता है। प्रयोग अर्थात् बोलने- चालनेमें हस्व अलंकार संवृत प्रयत्न माना गया है । किन्तु प्रक्रियाकी दशामें अर्थात् किसी विधि द्वारा जहां आकर किया जाता, वहां इसे विद्वत प्रयत्न कहते हैं। ऐसा न करनेसे अकारको सवर्ण संज्ञा फिर किसी प्रकार हो नहीं सकती । यह सकल भेद ले गणना करनेसे वाह्य प्रयत्न ग्यारह प्रकारका होता है। यथा -१ विवार, २ संवार, ३ श्वास, ४ नाद, ५ घोष, ६ अघोष, ७ अल्पप्राण ८ महा- प्राण, उदात्त, १० अनुदात्त, १९ खरित। खर प्रत्याहारके मध्यमें जितने वर्ण हैं ।<small>(ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स, ),</small> उनका विराव, श्वास और अघोष प्रयत्न है। हश् प्रत्याहार के मध्य में जितने वर्ण <small>( ह य व र लञ म ङ ण न झ भ घ ढ ध ज ब ग ड द )</small> । हैं, उनका सराव, नाद एवं घोष प्रयत्न है। वर्णमाला में प्रत्येक वर्गके प्रथम, तृतीय और पञ्चम वर्ण<small>( क च ट त प ग ज ड द ब, ङ ञ ण न म )</small> और यण प्रत्याहारके मध्य में जितने वर्ण</लsmall> ( य र ल व )</small> हैं, उन सबका अल्पप्राण प्रयत्न कहलाता है। प्रत्यक वर्गका द्वितीय और चतुर्थ अक्षर महाप्राण प्रयत्न है ।<small> अल्पप्राण और महाप्राण प्रयत्नका फल, रस और अनुप्रास शब्द में देखो।</small>ककारसे मकार पर्यन्त यावतीय वर्णोंको स्पर्श वर्ण कहते हैं । यण प्रत्याहारके वर्ण अन्तस्थ होते हैं; क्योंकि वर्णमालाके स्पर्श और उष्मवर्ण के मध्य में उन्हें स्थान दिया गया है। शल् प्रत्याहारके भीतर जितने वर्ण <small>( श ष स ह</small> हैं, उन्हें उष्मवर्ण कहा जाता है। अच् प्रत्याहारके {{Left|४५|2em}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> वर्ण स्वर हैं । क और खकी तरह ककार और खकारके पूर्व अर्द्ध विसर्गका चिह्न जिह्वामूलीय है । प और फको तरह पकार और फकारके पूर्व जो अर्द्ध विसर्गका चिह्न रहता, वह उपध्मानीय कहाता है । विशुद्ध स्वरसे वेदको गान करनेके लिये यह सकल स्वरभेद बहुत ही आवश्यक है। इससे स्पष्ट जान पड़ता, कि सङ्गीतविद्याको उन्नति के साथ नाना प्रकार उच्चारणको सृष्टि हुई है। यही भिन्न-भिन्न उच्चारण सहजमें समझा जा सकनेके लिये कहीं एक- एक अक्षर या शब्द के ऊपर एक-एक प्रकार चिह्न दिया गया और कहीं एक-एक वर्णको सृष्टि गई है । प्रथम-प्रथम अच्वर्णके मध्य में एकमात्र आकार था, इसके बाद आकारसे अन्यान्य खरोंको उत्पत्ति हुई। कार्यकारण भावको विचारकर देखनेसे यह बात समझ में आ सकती है । वृक्ष मट्टोसे उत्पन्न होनेके कारण लकड़ी सड़नेपर महो हो जाती है । यदि वह मट्टोसे न उत्पन्न होते, तो लकड़ी भी सड़कर मट्टोमें न मिलती। वर्णमालाके वर्णोंका भी इसी प्रकार नियम देख पड़ता है। नकार और मकार इन दोनो वर्णों के स्थान में अनुस्वार और अनुस्वारके स्थानमें नकार और मकार दोनो ही होते हैं । इसीतरह रकार और सकारके स्थान में विसर्ग और विसर्गके स्थान में रकार और सकार होता है । इसलिये नकार और मकारके साथ - अनुस्वार एवं रेफ और सकारके साथ विसर्गका घनिष्ठ सम्बन्ध मानना पड़ेगा। ऐसा ही आकारके साथ इकार और उकारका भी सम्बन्ध है । संस्कृत शब्दोंके अनेक अकारान्त वर्ण, हिन्दी और प्राकृत भाषा में आकारान्त, इकारान्त और उकारान्त हो जाते हैं । यथा, – अङ्क – आंकड़ा ; चर्म - चमड़ा ; गर्दभ - गधा । इसी तरह अनेक स्थलोंमें अकारके स्थानमें आकार होता है । जैसे,—सज्ञान - सयाना । - शब्द शास्त्रको आलोचना करनेसे स्पष्ट जान पड़ता है, कि केवल कण्ठके खरवैषम्य द्वारा आकारसे <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 2f4tswhbe1zh6wcg1qbw0di54ed7v6c पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१८५ 250 83344 666396 346651 2026-07-08T08:03:48Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 666396 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''१७८'''|'''अच्'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> इ, उ, ए, ऐ, ओ, औ प्रभृति स्वरवर्णो को उत्पत्ति हुई है। जैसे नाना प्रकारके राग बजानेको वाद्य- यन्त्रोंमें कितने ही रोदे और तार लगा उनके नाना स्थान विवेचनापूर्वक दबाने पड़ते, फिर नाना प्रकार के स्वर निकलते ; वैसे ही खर और शब्दों को उच्चारण करनेके लिये अनेक प्रकारके वर्ण आवश्यक होते हैं । इसी कारण सङ्गीतविद्या और भाषाकी उन्नति के साथ नानाविध वर्णों को उत्पत्ति हुई है। स्वरवर्णसे ही स्वर निकलता है, हलवर्णमें कोई स्वर नहीं । संस्कृत और हिन्दीमें यद्यपि इतने अधिक स्वर्ण वर्ण विद्यमान हैं, तथापि हम इस समय दो खरवर्णों के अभावको अनुभव करते हैं । एक अकार, उकार और औकार और एक आकार और इकारका मध्यवर्ती है । जैसे, — भजाई और भया । इस जगह भजाई, या भौजाई – कुछ भी लिखनेसे ठीक उच्चारण नहीं मिलता। किन्तु यह समझा जा सकता है, कि स्वरवर्ण के अभाव में औ का उच्चारण नहीं होता, वह अउ एवं औकारका मध्यवर्ती कोई नये उच्चारण- का स्वरवर्ण है। पुनश्च भैया शब्द भिया, भैया इस प्रकारसे लिखनेपर ठोक उच्चारित नहीं होता ; अथच समझा जा सकता है, कि आकार और इकार का मध्यवर्ती कोई नूतन स्वरवर्ण होना चाहिये ; उसके होनेसे यह सकल शब्द ठोक लिखे जा सकते हैं। इसी तरह मुखका खरवैषम्य होनेसे एक-एक वर्ण का अभाव समझा जा सकता । अभाव मालूम कर सकनेसे हो उसे पूर्ण करनेके लिये नूतन वर्ण की सृष्टि करनी पड़ती है। फिनिशिया भाषा में अलिफ़ तालुसे उच्चारित होता, जो हल् वर्ण जैसा है। किन्तु यूनानी भाषा में अलिफ़ विशुद्ध स्वरवर्ण है। स्वरवर्ण में प्रथमतः आकारकी सृष्टि ही सकल देशोंके बीच हुई थी । सम्पूर्ण रूपसे मुख खोलकर भीतरी तालुादि स्थानोंके स्पर्श भिन्न जो वर्ण उच्चारित होता, वही (आ) आकार है। जिह्वा अथवा ओष्ठ द्वारा वायुपथ जितना सङ्कुचित किया जायगा, उतने ही अन्यान्य <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> स्वरवर्ण उच्चारित होंगे । ओकारका उच्चारण करते समय जिह्वाका निम्नस्थान उठा अलिजिह्वा और जिह्वाका मध्यवर्ती स्थान खाली कर देना पड़ता है । फिर इकार के उच्चारण करते समय जिह्वाका अग्रभाग उच्च कर जिह्वा और तालुका मध्यवर्ती स्थान खाली करना होता है । मोटो बात यह है, कि कण्ठसे ओड पर्यन्त समस्त वायुपथ उत्तम रूपमें खोल देनेपर आकार निकलता है । सुतरां स्पर्शादि प्रतिबन्ध भिन्न जिस वर्ण का उच्चारण किया जाता, वही अच् या स्वर वर्ण है। कोई शब्दन्द्रिय इधर-उधर घुमाने-फिराने और मुखके भीतर अल्प या अधिक प्रतिबन्ध होनेसे हल् वर्ण उच्चारित होता है । इसीसे आकार जैसा विशुद्ध स्वर कोई भी नहीं । क्योंकि इकारका उच्चारण करते समय जिह्वा खड़ी हो प्रायः तालुको स्पर्श करती है । उकार निकालनेमें ओष्ठ कितना हो बन्द रखना चाहिये । इसलिये आकार ही आदिस्वर है । दूसरे अच् वर्ण आकार के रूपान्तर मात्र होते हैं। किसी बिन्दुको दोनो ओर रेखायें खींचनेसे आकारका रूपान्तर स्पष्ट समझा जा सकता है। यथा- आ / \ / \ ए ओ / \ / \ इ उ एक ओर आकारसे क्रमश: मुख सङ्कुचित करते जानेपर प्रथमतः एकार और इसके बाद इकार उच्चारित होता है। इकारके बाद बिना ताल्वादिको स्पर्श किये अन्य स्वरवर्ण फिर नहीं निकलता। दूसरी ओर प्रथमतः आकार के बाद ओकार और इसके बाद उकार उच्चारित होता है । उकारके बाद अन्य स्वर वर्ण फिर नहीं निकलता । तज्जन्य शब्दशास्त्रके प्राचीन इतिहासकी आलोचना करनेसे स्पष्ट मालूम हो सकता है, कि पहले <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ng30tj9rh22dj870vzkpa5xd2no9z3l पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३१२ 250 83600 665807 347013 2026-07-07T14:08:02Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 665807 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>बल्ख आर्यजातिके प्राणियोंका वासस्थान था, सुतरां यह असम्भव नहीं, कि वह्लिकोंके साथ प्राचीन भारत-वासियोंका परिचय रहा हो।<ref>Indische Theorieïn over ed Standenverdeeling, p. 13.</ref> अध्यापक रोथ् अपनी अथर्ववेदीय-आलोचना नामक पुस्तकमें कहा है,—'इसका कितना ही प्रमाण मिलता, कि यह वेद अन्य सकल वेदोंके अन्तमें प्रकाशित हुआ है। ऋग्वेदमें इन्द्र, अश्विनीकुमारद्वय और अन्यान्य देवता जिस-जिस स्थलपर पितृगणकौ मुक्ति के लिये विशेष रूपसे आराधित हुए, अथर्ववेदके चतुर्थ काण्डमें मित्रावरुण उसी-उसी स्थलपर विशिष्ट रूपसे पूजित हैं। जमदग्नि, वशिष्ठ, मेधातिथि, पुरुमोड़ प्रभृति ऋग्वेदके ऋषि इस वेदमें आराध्य हुए हैं। इसतरह स्वीकार किया जा सकता, कि यह ऋग्वेदके कितने ही समय बाद और आधुनिक कालमें प्रकाशित हुआ है। जो हो, लोग यह मानते, कि अथर्ववेद संस्कृत भाषाका अतिप्राचीन ग्रन्थ है।<ref>Abhandlung über den Atharwaveda, p. 12, 22.</ref> किन्तु पण्डितवर रोथ् जो यह बात कहके इस वेदका अप्राचीनत्व प्रमाणित करते, कि ऋग्वेदके ऋषि अथर्व वेदमें पूजित हुए हैं, उसे हम यथार्थ बताके स्वीकार नहीं कर सकते। इस विषयमें कितना ही सन्देह है, कि ऋग्वेदके ऋषियोंने ही ऋग्वेद प्रकाशित किया है। <small>(ऐतरेय आरणक—१ आ २ अ॰ देखो।)</small> फिर भी उन्होंने अथर्व वेदकी परीक्षाकर जो उसका ऋग्वेदके पीछे प्रकाशित होना माना, वह स्वीकार्य है। महात्मा हीग इस वेदको कोई २००० वर्षका पुराना मानते हैं। किन्तु हम इसे इससे भी प्राचीन समझते हैं, क्योंकि पाणिनि मुनि और निरुक्तकार प्राचीन यास्क मुनिने <small>(निरुक्त नेघण्टु क काण्ड ५।५)</small> भी सङ्केतसे इस वेदका उल्लेख किया है। हौग साहब इस वेदके साथ अविस्ता-शास्त्रका सादृश्य दिखा गये हैं। अथर्ववेदकी तरह अविस्ता-शास्त्र में भी मारण, उच्चाटन, स्तम्भन और भैषज्यादि लिखित हैं। <small>(अविस्ता- होम यष्तु ९।१-३२ देखो।)</small> होम-यष्त्में (९।२४।) 'अपां {{Rule}} ऐविष्टिष' अर्थात् जलका आगमन उल्लिखित है। हौगका कहना है, कि यह कई एक साङ्केतिक शब्द अथर्ववेदसे उद्धृत किये गये, जो अथर्ववेदके प्रथम ही भिन्नाकारसे लिखे हैं।<ref>अथर्व वेद १।६।१, और Haug's Essays on the Parsis, 3rd ed. p. 182.</ref>सिवा इसके अविस्ताके कितने ही विषय अथर्ववेदसे मिलते हैं। <small>(अविस्ता शब्दमें समस्त विवरण देखो।)</small> अविस्ता प्राचीन पारसियोंका धर्म्मशास्त्र है। मालूम होता है, कि अविस्ताके साथ अथर्व वेदका ऐक्य रहनेसे कितने ही लोग इसे वेद नहीं मानते। किन्तु इसका कोई प्रकृत कारण नहीं। अथर्व वेदका दूसरा नाम अथर्वाङ्गिरस वेद है, स्थान-स्थानमें केवल आङ्गिरस वेद अर्थात् अङ्गिरा और अङ्गिरा-वंशीय ऋषियोंका वेद बताकर यह लिखा गया है। जो अग्नियाजक अङ्गिरा और आङ्गिरस ऋषि हिन्दू और पारसीक दोनों जातियोंके परम श्रद्धेय और भक्तिभाजन बताये गये हैं, इस आङ्गिरस आख्या द्वारा यह वेद उन्हींसे प्रकाशित हुआ मालूम पड़ता है। पुराणमें इस वेदको अङ्गिराका अपत्य कहा गया है। <small>(भागवत ६।६।१६ देखो।)</small> इस वेदका फिर दूसरा नाम आथर्वणवेद अर्थात् अथर्वा- मतानुयायियोंका वेद है। आविस्तिक आयवन् और वैदिक आथर्वन् शब्द यथाक्रम याजक और वैदिक अग्नियाजकके प्रतिपादक हैं। यह समस्त पर्यालोचना करके देखनेसे प्रकरण विशेषमें आविस्तिक धर्मशास्त्रके साथ आथर्वन् धर्मका कुछ विशेष सम्बन्ध अवश्य ही लक्षित या सम्भावित हुआ करता है। अथर्व वेदमें सब मिलाके तेंतीस देवता हैं। <small>(अथर्वसंहिता १०।७।१३,१०।७।२३,१०।७।२७।)</small> अविस्तामें भी तेंतीस रतु अर्थात् अध्यक्ष अहुरमज़द-स्थापित और जरथुस्त्र-प्रचारित सर्वोत्कृष्ट तत्त्वसमुदाय प्रचलित रखने के लिये नियोजित हैं। <small>(यश्न १।१०।)</small> 'वैदिक-गवेषणा' नामक पुस्तकमें पण्डित सत्यव्रतसामाश्रमिने लिखा है,—'अथर्ववेदको कुरानके अंश बतानेका कारण भी मौजूद है। अथर्ववेदके जिस-जिस अंशमें चिकित्सासम्बन्धीय {{Rule}}<noinclude>{{Left|७७}}</noinclude> n24nfnb4xdoc83zfcpqn7lagvnzbbp9 665808 665807 2026-07-07T14:08:41Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 665808 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>बल्ख आर्यजातिके प्राणियोंका वासस्थान था, सुतरां यह असम्भव नहीं, कि वह्लिकोंके साथ प्राचीन भारत-वासियोंका परिचय रहा हो।<ref>Indische Theorieïn over ed Standenverdeeling, p. 13.</ref> अध्यापक रोथ् अपनी अथर्ववेदीय-आलोचना नामक पुस्तकमें कहा है,—'इसका कितना ही प्रमाण मिलता, कि यह वेद अन्य सकल वेदोंके अन्तमें प्रकाशित हुआ है। ऋग्वेदमें इन्द्र, अश्विनीकुमारद्वय और अन्यान्य देवता जिस-जिस स्थलपर पितृगणकौ मुक्ति के लिये विशेष रूपसे आराधित हुए, अथर्ववेदके चतुर्थ काण्डमें मित्रावरुण उसी-उसी 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है। पुराणमें इस वेदको अङ्गिराका अपत्य कहा गया है। <small>(भागवत ६।६।१६ देखो।)</small> इस वेदका फिर दूसरा नाम आथर्वणवेद अर्थात् अथर्वा- मतानुयायियोंका वेद है। आविस्तिक आयवन् और वैदिक आथर्वन् शब्द यथाक्रम याजक और वैदिक अग्नियाजकके प्रतिपादक हैं। यह समस्त पर्यालोचना करके देखनेसे प्रकरण विशेषमें आविस्तिक धर्मशास्त्रके साथ आथर्वन् धर्मका कुछ विशेष सम्बन्ध अवश्य ही लक्षित या सम्भावित हुआ करता है। अथर्व वेदमें सब मिलाके तेंतीस देवता हैं। <small>(अथर्वसंहिता १०।७।१३,१०।७।२३,१०।७।२७।)</small> अविस्तामें भी तेंतीस रतु अर्थात् अध्यक्ष अहुरमज़द-स्थापित और जरथुस्त्र-प्रचारित सर्वोत्कृष्ट तत्त्वसमुदाय प्रचलित रखने के लिये नियोजित हैं। <small>(यश्न १।१०।)</small> 'वैदिक-गवेषणा' नामक पुस्तकमें पण्डित सत्यव्रतसामाश्रमिने लिखा है,—'अथर्ववेदको कुरानके अंश बतानेका कारण भी मौजूद है। अथर्ववेदके जिस-जिस अंशमें चिकित्सासम्बन्धीय {{Rule}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Left|७७}}</noinclude> h8uqkxe3sjxn6mr7dotxw9rz3ydw7fi 665809 665808 2026-07-07T14:09:55Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 665809 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यावनिक जातिने सीखा था। सागर पारस्थित अनेक उद्भिद और फलफलोंको बात अथर्ववेदमें मिलनेसे इसे लोग यावनिक बता अश्रद्धेय समझते हैं। किन्तु वास्तविक अथववेद कुरानका अंश नहीं। जब कुरान बनाभी न था, जब मुहम्मदका नाम तक सुना न गया था, तभी अथर्व वेदको सृष्टि हो गई थी मालूमपड़ता है, कि अथर्ववेदको कुरानके अंश कहनेकादूसरा कोई कारण हो सकता है; क्योंकि बदावनी नामक एक मुसलमान इतिहासलेखकने अपने'मुन्तख,ब' नामक ग्रन्थमें लिखा है, 'इस वत्सर(सन् १८३ हिजरी या १५७५ ई०) दक्षिण देशसे शेख भावननामक एक शिक्षित ब्राह्मण आये और मुसलमानधर्मसे दीक्षित हुए। उसी समय सम्राट अकबरनेहमें 'अथर्वन्' अनुवाद करनेका आदेश दिया।मिलती हैं, वह वेद, निरुक्त, पाणिनि प्रभृति किसीमिलते हैं। अनुवादके समय ऐसे कितने ही कठिनअंश देख पड़े, जिनका शेख-भावन-जैसे पण्डित भीभावप्रकाश कर न सके। हमने यह बात सम्राट्सकही, उन्होंने शेख फेज़ी और हाजी इब्राहीमकोअनुवाद करनेको अनुमति दी। हाजी इब्राहीमनेइच्छा रहनेपर भी कुछ न लिखा । अथर्वन्केउपदेशों में एक जगह लिखा है, कि इस पुस्तककाकोई न कोई अंश न पड़नेसे कोई भी रक्षा नपायेगा। इस अंशमें पुनः पुनः ‘ला' लिखा गया है, जोहमारे कुरानमें कहे 'अल्लह, इल्लह' इत्यादि जैसा है।शेखने इन अंशोके आधारपर ब्राह्मणों को परास्त कियाथा और वह इस्लाम धर्मग्रहण करनेपर वाध्य हुएथे।' ( मुन्तखबुल तवारीख, २ ख०, २१२ पृ. । अब मालमहोता है, कि अकबर बादशाहके समय अथर्व वेद-कल्पित 'अल्लह, इल्लह' इत्यादि नाम सुनकर अनेकहिन्दू इसे कुरानका अंश समझते थे। फिर इननामोंसे कितने ही मुग्ध होकर कुरानको श्रेष्ठ मानते,इस्लाम धर्मसे दीक्षित होते थे। इसीलिये उस समयसे अथर्ववेद हिन्दुओंको अश्रद्धाका पात्र बन गया। किन्तु सम्भवतः कितनों होने विवेचना करके नहीं देखा है, कि यह शब्द अथर्व वेदमें हैं या नहीं। हमने आजकल के रोथ् और बित्ने द्वारा प्रकाशित समस्त अथर्व वेद पढ़के देखा, किन्तु कही यह सकल शब्द देख न पड़े। (फिर भी चाहे किसी दूसरी शाखामें हो?) केवल दो मन्त्रों में इनका आभासमात्र देख पड़ता है, किन्तु अर्थ अन्यप्रकार है,- "आदलाबुकमेककम् । अलाबुकं निखातकम् ।" २ (अथर्ववेद २०११३२ स०।) आजकल 'अल्ल' नामक एक उपनिषत् प्रचलि है, जिसे कोई-कोई आथर्वण-सूक्त कहा करते हैं। (प्रवकमनन्दिनी ५म भाग १म संख्या, और शब्दकल्पद्रुममें 'अल्ल' शब्द देखो। ) इस क्षुद्र ग्रन्थ में 'अल्ला इल्ले' प्रभृति शब्द आये हैं। फिर भी यदि यह उसी समयके अथर्ववेदका अंश हो, तो उस समयके हिन्दूओंका भ्रम कहना पड़ेगा क्योंकि इस ग्रन्थमें कुरानको जो बातें इस ग्रन्थ के कितने ही धर्मोपदेश इस्लाम धर्मशास्त्रसे प्राचीन ग्रन्थ, यहांतक, कि अथर्व प्रातिशाख्यमें भी नहीं देख पड़ती। विशेषतः इस ग्रन्यके बीच सङ्केत- से अकबर बादशाहका नामतक मिलता है। (चाहे इस शब्दका अर्थ दूसरे ही प्रकार हो।) इन सकल प्रमाणों द्वारा यही स्वीकार किया जाता है, कि य अकबर बादशाहके किसी सभापण्डितका बनाया और अथर्ववेदमें प्रक्षिप्त हो आथर्वण-सूक्त अथवा अल्लोप- निषत् नामको प्राप्त हुआ है। इसका प्रमाण अनावश्यक है, कि मुसलमान धर्ममें दीक्षित करने क लिये समय-समयपर सकल हो मुसलमान बादशाह इसी प्रकार नाना उपायोंको अवलम्बन करते थे। इस प्रकारके कार्य हारा ही क्या अकबर हिन्दूओंके प्रियपात्र बन गये थे ? मालूम होता है, कि वह अपनी सुविधाके लिये ही संस्कृतका साहित्य-भाण्डार माटभाषामें गच्छित रखने के लिये यत्नवान् हु थे। इसमें सरहिन्द-निवासी हाजी इब्राहीमका अनुवाद किया हुआ ब्रह्मवेद अथर्व पारस्य-भाषामें गृहीत किया गया था।* बोध होता है, कि Blochmann's Ain-i-Akbari, p. 105.<noinclude></noinclude> m2jltfdm7ih10qrfcig8tn48revyv9c 665816 665812 2026-07-07T14:32:27Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 665816 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३०६'''|'''अथर्ववेद''''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>प्रस्ताव लिखा है, उसे सिन्धुनद और कास्पिय सागर पारवासी यावनिक जातिने सीखा था। सागर पारस्थित अनेक उद्भिद् और फलफलोंकी बात अथर्ववेदमें मिलनेसे इसे लोग यावनिक बता अश्रद्धेय समझते हैं। किन्तु वास्तविक अथर्ववेद कुरानका अंश नहीं। जब कुरान बना भी न था, जब मुहम्मदका नाम तक सुना न गया था, तभी अथर्व वेदकी सृष्टि हो गई थी।' मालूम पड़ता है, कि अथर्ववेदको कुरानके अंश कहनेका दूसरा कोई कारण हो सकता है; क्योंकि बदावनी नामक एक मुसलमान इतिहासलेखकने अपने 'मुन्तख़ब' नामक ग्रन्थमें लिखा है,—'इस वत्सर <small>(सन् ९८३ हिजरी या १५७५ ई॰)</small> दक्षिण देशसे शेख भावन नामक एक शिक्षित ब्राह्मण आये और मुसलमान धर्मसे दीक्षित हुए। उसी समय सम्राट अकबरने हमें 'अथर्वन्' अनुवाद करनेका आदेश दिया। इस ग्रन्थ के कितने ही धर्मोपदेश इस्लाम धर्मशास्त्रसे मिलती हैं। अनुवादके समय ऐसे कितने ही कठिन अंश देख पड़े, जिनका शेख-भावन-जैसे पण्डित भी भावप्रकाश कर न सके। हमने यह बात सम्राट्से कही, उन्होंने शेख़ फ़ैज़ी और हाजी इब्राहीमको अनुवाद करनेकी अनुमति दी। हाजी इब्राहीमने इच्छा रहनेपर भी कुछ न लिखा। अथर्वन्के उपदेशों में एक जगह लिखा है, कि इस पुस्तकका कोई न कोई अंश न पड़नेसे कोई भी रक्षा न पायेगा। इस अंशमें पुनः-पुनः 'ला' लिखा गया है, जो हमारे कुरानमें कहे 'अल्लह, इल्लह' इत्यादि जैसा है। शेख़ने इन अंशोके आधारपर ब्राह्मणों को परास्त किया था और वह इस्लाम धर्मग्रहण करनेपर वाध्य हुए थे।' <small>(मुन्तख़बुल तवारीख़, २ ख॰, २१२ पृ॰।</small> अब मालूम होता है, कि अकबर बादशाहके समय अथर्व वेद-कल्पित 'अल्लह, इल्लह' इत्यादि नाम सुनकर अनेक हिन्दू इसे कुरानका अंश समझते थे। फिर इन नामोंसे कितने ही मुग्ध होकर कुरानको श्रेष्ठ मानते, इस्लाम धर्मसे दीक्षित होते थे। इसीलिये उस समयसे अथर्ववेद हिन्दुओंकी अश्रद्धाका पात्र बन<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>गया। किन्तु सम्भवतः कितनों होने विवेचना करके नहीं देखा है, कि यह शब्द अथर्व वेदमें हैं या नहीं। हमने आजकल के रोथ् और बित्ने द्वारा प्रकाशित समस्त अथर्व वेद पढ़के देखा, किन्तु कही यह सकल शब्द देख न पड़े। (फिर भी चाहे किसी दूसरी शाखामें हो?) केवल दो मन्त्रों में इनका आभासमात्र देख पड़ता है, किन्तु अर्थ अन्यप्रकार है,- "आदलाबुकमेककम् । अलाबुकं निखातकम् ।" २ (अथर्ववेद २०११३२ स०।) आजकल 'अल्ल' नामक एक उपनिषत् प्रचलि है, जिसे कोई-कोई आथर्वण-सूक्त कहा करते हैं। (प्रवकमनन्दिनी ५म भाग १म संख्या, और शब्दकल्पद्रुममें 'अल्ल' शब्द देखो। ) इस क्षुद्र ग्रन्थ में 'अल्ला इल्ले' प्रभृति शब्द आये हैं। फिर भी यदि यह उसी समयके अथर्ववेदका अंश हो, तो उस समयके हिन्दूओंका भ्रम कहना पड़ेगा क्योंकि इस ग्रन्थमें कुरानको जो बातें प्राचीन ग्रन्थ, यहांतक, कि अथर्व प्रातिशाख्यमें भी नहीं देख पड़ती। विशेषतः इस ग्रन्यके बीच सङ्केत- से अकबर बादशाहका नामतक मिलता है। (चाहे इस शब्दका अर्थ दूसरे ही प्रकार हो।) इन सकल प्रमाणों द्वारा यही स्वीकार किया जाता है, कि य अकबर बादशाहके किसी सभापण्डितका बनाया और अथर्ववेदमें प्रक्षिप्त हो आथर्वण-सूक्त अथवा अल्लोप- निषत् नामको प्राप्त हुआ है। इसका प्रमाण अनावश्यक है, कि मुसलमान धर्ममें दीक्षित करने क लिये समय-समयपर सकल हो मुसलमान बादशाह इसी प्रकार नाना उपायोंको अवलम्बन करते थे। इस प्रकारके कार्य हारा ही क्या अकबर हिन्दूओंके प्रियपात्र बन गये थे ? मालूम होता है, कि वह अपनी सुविधाके लिये ही संस्कृतका साहित्य-भाण्डार माटभाषामें गच्छित रखने के लिये यत्नवान् हु थे। इसमें सरहिन्द-निवासी हाजी इब्राहीमका अनुवाद किया हुआ ब्रह्मवेद अथर्व पारस्य-भाषामें गृहीत किया गया था।* बोध होता है, कि Blochmann's Ain-i-Akbari, p. 105.<noinclude></noinclude> 3g0lu1b86vzuy5jjd4wq4j8x12kpfu4 665821 665816 2026-07-07T15:09:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 665821 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३०६'''|'''अथर्ववेद''''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>प्रस्ताव लिखा है, उसे सिन्धुनद और कास्पिय सागर पारवासी यावनिक जातिने सीखा था। सागर पारस्थित अनेक उद्भिद् और फलफलोंकी बात अथर्ववेदमें मिलनेसे इसे लोग यावनिक बता अश्रद्धेय समझते हैं। किन्तु वास्तविक अथर्ववेद कुरानका अंश नहीं। जब कुरान बना भी न था, जब मुहम्मदका नाम तक सुना न गया था, तभी अथर्व वेदकी सृष्टि हो गई थी।' मालूम पड़ता है, कि अथर्ववेदको कुरानके अंश कहनेका दूसरा कोई कारण हो सकता है; क्योंकि बदावनी नामक एक मुसलमान इतिहासलेखकने अपने 'मुन्तख़ब' नामक ग्रन्थमें लिखा है,—'इस वत्सर <small>(सन् ९८३ हिजरी या १५७५ ई॰)</small> दक्षिण देशसे शेख भावन नामक एक शिक्षित ब्राह्मण आये और मुसलमान धर्मसे दीक्षित हुए। उसी समय सम्राट अकबरने हमें 'अथर्वन्' अनुवाद करनेका आदेश दिया। इस ग्रन्थ के कितने ही धर्मोपदेश इस्लाम धर्मशास्त्रसे मिलती हैं। अनुवादके समय ऐसे कितने ही कठिन अंश देख पड़े, जिनका शेख-भावन-जैसे पण्डित भी भावप्रकाश कर न सके। हमने यह बात सम्राट्से कही, उन्होंने शेख़ फ़ैज़ी और हाजी इब्राहीमको अनुवाद करनेकी अनुमति दी। हाजी इब्राहीमने इच्छा रहनेपर भी कुछ न लिखा। अथर्वन्के उपदेशों में एक जगह लिखा है, कि इस पुस्तकका कोई न कोई अंश न पड़नेसे कोई भी रक्षा न पायेगा। इस अंशमें पुनः-पुनः 'ला' लिखा गया है, जो हमारे कुरानमें कहे 'अल्लह, इल्लह' इत्यादि जैसा है। शेख़ने इन अंशोके आधारपर ब्राह्मणों को परास्त किया था और वह इस्लाम धर्मग्रहण करनेपर वाध्य हुए थे।' <small>(मुन्तख़बुल तवारीख़, २ ख॰, २१२ पृ॰।</small> अब मालूम होता है, कि अकबर बादशाहके समय अथर्व वेद-कल्पित 'अल्लह, इल्लह' इत्यादि नाम सुनकर अनेक हिन्दू इसे कुरानका अंश समझते थे। फिर इन नामोंसे कितने ही मुग्ध होकर कुरानको श्रेष्ठ मानते, इस्लाम धर्मसे दीक्षित होते थे। इसीलिये उस समयसे अथर्ववेद हिन्दुओंकी अश्रद्धाका पात्र बन<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>गया। किन्तु सम्भवतः कितनों हीने विवेचना करके नहीं देखा है, कि यह शब्द अथर्व वेदमें हैं या नहीं। हमने आजकलके रोथ् और ह्वित्ने द्वारा प्रकाशित समस्त अथर्व वेद पढ़के देखा, किन्तु कही यह सकल शब्द देख न पड़े। (फिर भी चाहे किसी दूसरी शाखामें हो?) केवल दो मन्त्रों में इनका आभासमात्र देख पड़ता है, किन्तु अर्थ अन्यप्रकार है,— {{Block center|<poem><small>"आदलाबुकमेककम्। अलाबुकं निखातकम्।" २ (अथर्ववेद २०।१३२ स॰।)</small></poem>}} आजकल 'अल्ल' नामक एक उपनिषत् प्रचलित है, जिसे कोई-कोई आथर्वण-सूक्त कहा करते हैं। <small>(प्रत्रकम्रनन्दिनी ५ म भाग १ म संख्या, और शब्दकल्पद्रुममें 'अल्ल' शब्द देखो।)</small> इस क्षुद्र ग्रन्थ में 'अल्ला इल्ले' प्रभृति शब्द आये हैं। फिर भी यदि यह उसी समयके अथर्ववेदका अंश हो, तो उस समयके हिन्दूओंका भ्रम कहना पड़ेगा। क्योंकि इस ग्रन्थमें कुरानकी जो बातें प्राचीन ग्रन्थ, यहांतक, कि अथर्व प्रातिशाख्यमें भी नहीं देख पड़तीं। विशेषतः इस ग्रन्यके बीच सङ्केतसे अकबर बादशाहका नामतक मिलता है। (चाहे इस शब्दका अर्थ दूसरे ही प्रकार हो।) इन सकल प्रमाणों द्वारा यही स्वीकार किया जाता है, कि य अकबर बादशाहके किसी सभापण्डितका बनाया और अथर्ववेदमें प्रक्षिप्त हो आथर्वण-सूक्त अथवा अल्लोपनिषत् नामको प्राप्त हुआ है। इसका प्रमाण अनावश्यक है, कि मुसलमान धर्ममें दीक्षित करने के लिये समय-समयपर सकल ही मुसलमान बादशाह इसी प्रकार नाना उपायोंको अवलम्बन करते थे। इस प्रकारके कार्य द्वारा ही क्या अकबर हिन्दूओंके प्रियपात्र बन गये थे? मालूम होता है, कि वह अपनी सुविधाके लिये ही संस्कृतका साहित्य-भाण्डार मातृभाषामें गच्छित रखने के लिये यत्नवान् हुए थे। इसमें सरहिन्द-निवासी हाजी इब्राहीमका अनुवाद किया हुआ ब्रह्मवेद अथर्व पारस्य-भाषामें गृहीत किया गया था।<ref>Blochmann's Ain-i-Akbari, p. 105.</ref> बोध होता है, कि {{Rule}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> nhba60lxo45khobqwl9gtxn3x80cwd4 665822 665821 2026-07-07T15:10:09Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 665822 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३०६'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>प्रस्ताव लिखा है, उसे सिन्धुनद और कास्पिय सागर पारवासी यावनिक जातिने सीखा था। सागर पारस्थित अनेक उद्भिद् और फलफलोंकी बात अथर्ववेदमें मिलनेसे इसे लोग यावनिक बता अश्रद्धेय समझते हैं। किन्तु वास्तविक अथर्ववेद कुरानका अंश नहीं। जब कुरान बना भी न था, जब मुहम्मदका नाम तक सुना न गया था, तभी अथर्व वेदकी सृष्टि हो गई थी।' मालूम पड़ता है, कि अथर्ववेदको कुरानके अंश कहनेका दूसरा कोई कारण हो सकता है; क्योंकि बदावनी नामक एक मुसलमान इतिहासलेखकने अपने 'मुन्तख़ब' नामक ग्रन्थमें लिखा है,—'इस वत्सर <small>(सन् ९८३ हिजरी या १५७५ ई॰)</small> दक्षिण देशसे शेख भावन नामक एक शिक्षित ब्राह्मण आये और मुसलमान धर्मसे दीक्षित हुए। उसी समय सम्राट अकबरने हमें 'अथर्वन्' अनुवाद करनेका आदेश दिया। इस ग्रन्थ के कितने ही धर्मोपदेश इस्लाम धर्मशास्त्रसे मिलती हैं। अनुवादके समय ऐसे कितने ही कठिन अंश देख पड़े, जिनका शेख-भावन-जैसे पण्डित भी भावप्रकाश कर न सके। हमने यह बात सम्राट्से कही, उन्होंने शेख़ फ़ैज़ी और हाजी इब्राहीमको अनुवाद करनेकी अनुमति दी। हाजी इब्राहीमने इच्छा रहनेपर भी कुछ न लिखा। अथर्वन्के उपदेशों में एक जगह लिखा है, कि इस पुस्तकका कोई न कोई अंश न पड़नेसे कोई भी रक्षा न पायेगा। इस अंशमें पुनः-पुनः 'ला' लिखा गया है, जो हमारे कुरानमें कहे 'अल्लह, इल्लह' इत्यादि जैसा है। शेख़ने इन अंशोके आधारपर ब्राह्मणों को परास्त किया था और वह इस्लाम धर्मग्रहण करनेपर वाध्य हुए थे।' <small>(मुन्तख़बुल तवारीख़, २ ख॰, २१२ पृ॰।</small> अब मालूम होता है, कि अकबर बादशाहके समय अथर्व वेद-कल्पित 'अल्लह, इल्लह' इत्यादि नाम सुनकर अनेक हिन्दू इसे कुरानका अंश समझते थे। फिर इन नामोंसे कितने ही मुग्ध होकर कुरानको श्रेष्ठ मानते, इस्लाम धर्मसे दीक्षित होते थे। इसीलिये उस समयसे अथर्ववेद हिन्दुओंकी अश्रद्धाका पात्र बन<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>गया। किन्तु सम्भवतः कितनों हीने विवेचना करके नहीं देखा है, कि यह शब्द अथर्व वेदमें हैं या नहीं। हमने आजकलके रोथ् और ह्वित्ने द्वारा प्रकाशित समस्त अथर्व वेद पढ़के देखा, किन्तु कही यह सकल शब्द देख न पड़े। (फिर भी चाहे किसी दूसरी शाखामें हो?) केवल दो मन्त्रों में इनका आभासमात्र देख पड़ता है, किन्तु अर्थ अन्यप्रकार है,— {{Block center|<poem><small>"आदलाबुकमेककम्। अलाबुकं निखातकम्।" २ (अथर्ववेद २०।१३२ स॰।)</small></poem>}} आजकल 'अल्ल' नामक एक उपनिषत् प्रचलित है, जिसे कोई-कोई आथर्वण-सूक्त कहा करते हैं। <small>(प्रत्रकम्रनन्दिनी ५ म भाग १ म संख्या, और शब्दकल्पद्रुममें 'अल्ल' शब्द देखो।)</small> इस क्षुद्र ग्रन्थ में 'अल्ला इल्ले' प्रभृति शब्द आये हैं। फिर भी यदि यह उसी समयके अथर्ववेदका अंश हो, तो उस समयके हिन्दूओंका भ्रम कहना पड़ेगा। क्योंकि इस ग्रन्थमें कुरानकी जो बातें प्राचीन ग्रन्थ, यहांतक, कि अथर्व प्रातिशाख्यमें भी नहीं देख पड़तीं। विशेषतः इस ग्रन्यके बीच सङ्केतसे अकबर बादशाहका नामतक मिलता है। (चाहे इस शब्दका अर्थ दूसरे ही प्रकार हो।) इन सकल प्रमाणों द्वारा यही स्वीकार किया जाता है, कि य अकबर बादशाहके किसी सभापण्डितका बनाया और अथर्ववेदमें प्रक्षिप्त हो आथर्वण-सूक्त अथवा अल्लोपनिषत् नामको प्राप्त हुआ है। इसका प्रमाण अनावश्यक है, कि मुसलमान धर्ममें दीक्षित करने के लिये समय-समयपर सकल ही मुसलमान बादशाह इसी प्रकार नाना उपायोंको अवलम्बन करते थे। इस प्रकारके कार्य द्वारा ही क्या अकबर हिन्दूओंके प्रियपात्र बन गये थे? मालूम होता है, कि वह अपनी सुविधाके लिये ही संस्कृतका साहित्य-भाण्डार मातृभाषामें गच्छित रखने के लिये यत्नवान् हुए थे। इसमें सरहिन्द-निवासी हाजी इब्राहीमका अनुवाद किया हुआ ब्रह्मवेद अथर्व पारस्य-भाषामें गृहीत किया गया था।<ref>Blochmann's Ain-i-Akbari, p. 105.</ref> बोध होता है, कि {{Rule}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bsvoqgl8of4buy8vm658tawb2s1gk0h पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३१४ 250 83602 665863 347015 2026-07-07T15:17:12Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 665863 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> अकबर बादशाहसे पहले अथर्ववेदको कुरानका अंश बता कोई श्रद्धा करता न था । यदि अथर्व वेदका कोई कोई अंश किसी पाश्चात्य धर्मशास्त्र से मिलता हुआ माना जाये, तो वह सिवा पारसियोंवाले धर्म शास्त्र अविस्ताके दूसरा कोई भी ग्रन्थ नहीं । अथर्ववेदका एक प्रातिशाख्य मुद्रित हुआ है । इसमें अन्यान्य काण्डोंके अनेकानेक उदाहरण मिलते हैं, किन्तु आश्चर्यका विषय यह है, कि उन्नीसवें काण्डका एक ही उदाहरण दिया गया है, बीसवें काण्डका कोई उदाहरण नहीं । इसीसे कोई-कोई अनुमान करते हैं, कि यह प्रातिशाख्य लिखे जानेके पश्चात् आधुनिक उन्नीसवां और बीसवां काण्ड अथर्ववेदमें मिला दिया गया है । ऋग्वेदके प्रायः समस्त छन्द अथर्ववेदमें देख पड़ते हैं। इसके चौथे कारण्डवाले इक्कीसवें सूक्त में अङ्गिरा, अगस्ति, जमदग्नि, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, श्यावास्य, वध्यश्व, पुरुमोढ़, विमद, सप्तवधि, भरद्वाज, गविष्ठिर, विश्वामित्र, कुल्स, कक्षिवान् कख, त्रिशोक, काव्य, उशना, गौतम और मुह-इन सकल ऋषियोंके नाम वर्तमान हैं। इनमें से अनेक ऋग्वेदके ऋषि हैं। अथर्ववेदसे भिन्न जो कितने ही मन्त्र हैं, उन्हें आथर्वण कहते हैं; किन्तु यह ठीक नहीं कह सकते, कि वह आथर्वण अथर्ववेदसे विभिन्न हैं या नहीं । पहले बताया जा चुका है, कि सम्प्रति अथर्ववेदको केवल शौनक शाखा मिलती है । किन्तु कोई-कोई कहते हैं, कि पैप्पलाद शाखा भी नष्ट नहीं हुई । अथर्ववेदके सङ्कलनकालमें ब्राह्मणोंको अतिशय प्रति- पत्ति थौ । निम्नलिखित मन्त्र इस विषयके विशिष्ट प्रमाण हैं,— "उत यत् पतयो दश स्त्रिया: पूर्व अब्राह्मणाः । ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत् स एव पतिरेकधा ॥ ८ ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्योश् न वैश्यः । तत् सूर्यः प्रन्ब्रुवन्नेति पञ्चभ्यो मानवेभ्यः ॥” ८ अथर्ववेद, ५ काण्ड १७ सूक्त - फिर दूसरी जगह देखने में आता है, "न ब्राह्मणो हिंसितव्योऽग्निः प्रियतनोरिव । -सोमो हास्य दायाद इन्द्रो अस्याभिशस्तिपाः ॥ ६ ये सहस्रमराजन्नामन् दशशता उत । ते ब्राह्मण गांध तहव्याः पराभवन् ॥ १० गौरव तान् हन्यमाना वैतहव्या अवातिरत् । ये केसरप्रावन्धायाश्वरमाजाम पेचिरन् ॥ ११ अथर्ववेद ५म काण्ड १ सूक्त ! ऋग्वेदमें इन्द्र, सूर्य, अग्नि, अश्विनीकुमार प्रभृति देवताओंको स्तुति और अर्चना की गई है । किन्तु अथर्व वेदमें काल, काम, यम, मृत्य, देव, दानव प्रभृति सबका हो स्तव देख पड़ता है । जगत् में जो है, उसका स्तव किया गया और जो मनसे नया बनाना पड़ता, उसका भी स्तव इसमें वर्त्तमान है, - "नमो देववभो नमो राजवर्धभाः । यो विश्वानां वधास्त भयो मृत्यो नमोस्तु ते ॥ १ नमस्ते अधिवाकाय परावाकाय ते नमः । मुमय मृत्या ते नमो दुर्मत्य त इदं नमः ॥ २ नमस्ते यातुधानेभयो नमले भेषजेभाः । नमस्ते मृत्यो मूलेभो ब्राह्मणेभा इदं नमः अथर्ववेद ६ष्ठ काण्ड १३ सूक्त " ३ ऋग्वेदके ऋषियोंने कहीं भी यातुधान, दुर्मति प्रभृतिको नमस्कार नहीं किया । अथर्ववेद में रोगादि झाड़नेके मन्त्र अधिक देख पड़ते हैं, दूसरे वेदोंमें इतने नहीं । स्वामीको वशीभूत करने, विष झाड़ने, शत्रुको मारने और वन्ध्यानारीको सन्तानोत्पत्तिके मन्त्र अथर्ववेद विद्यमान हैं। उस समयके जो सकल ब्राह्मण क्षत्रियोंका पौरोहित्य करते, उन्हें अथर्ववेद अच्छी तरह पढ़ना पड़ता था । रघुवंश में कालिदासने 'अथर्व निधि' विशेषण लगा वशिष्ठकी गौरववृद्धि की है, - “अथाथर्व निघेस्तस्य विजितारिपुर : पुरः । " कालिदासने यह भी भली भांति प्रकाश कर दिया है, कि वशिष्ठ ऋषिका मन्त्रबल कैसा था, -, " तव मन्त्रकृतो मन्त्र : दूरात् प्रशमितारिभिः ।" - कोई व्यक्ति मृतकल्प होनेसे वह मन्त्र पढ़, उसे झाड़ते थे। उदाहरणार्थ यहां एक मन्त्र लिखा जाता है। किसीको कठिन रोग लगने से ऋषि यह पढ़कर झाड़ते-फू ंकते थे, -<noinclude></noinclude> bgsgclml5693rsyejt374wkfe51k3eh 665922 665863 2026-07-07T15:26:35Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 665922 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> अकबर बादशाहसे पहले अथर्ववेदको कुरानका अंश बता कोई अश्रद्धा करता न था। यदि अथर्व वेदका कोई कोई अंश किसी पाश्चात्य धर्मशास्त्र से मिलता हुआ माना जाये, तो वह सिवा पारसियोंवाले धर्मशास्त्र अविस्ताके दूसरा कोई भी ग्रन्थ नहीं। अथर्ववेदका एक प्रातिशाख्य मुद्रित हुआ है। इसमें अन्यान्य काण्डोंके अनेकानेक उदाहरण मिलते हैं, किन्तु आश्चर्यका विषय यह है, कि उन्नीसवें काण्डका एक ही उदाहरण दिया गया है, बीसवें काण्डका कोई उदाहरण 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१३ सूक्त " ३ ऋग्वेदके ऋषियोंने कहीं भी यातुधान, दुर्मति प्रभृतिको नमस्कार नहीं किया । अथर्ववेद में रोगादि झाड़नेके मन्त्र अधिक देख पड़ते हैं, दूसरे वेदोंमें इतने नहीं । स्वामीको वशीभूत करने, विष झाड़ने, शत्रुको मारने और वन्ध्यानारीको सन्तानोत्पत्तिके मन्त्र अथर्ववेद विद्यमान हैं। उस समयके जो सकल ब्राह्मण क्षत्रियोंका पौरोहित्य करते, उन्हें अथर्ववेद अच्छी तरह पढ़ना पड़ता था । रघुवंश में कालिदासने 'अथर्व निधि' विशेषण लगा वशिष्ठकी गौरववृद्धि की है, - “अथाथर्व निघेस्तस्य विजितारिपुर : पुरः । " कालिदासने यह भी भली भांति प्रकाश कर दिया है, कि वशिष्ठ ऋषिका मन्त्रबल कैसा था, -, " तव मन्त्रकृतो मन्त्र : दूरात् प्रशमितारिभिः ।" - कोई व्यक्ति मृतकल्प होनेसे वह मन्त्र पढ़, उसे झाड़ते थे। उदाहरणार्थ यहां एक मन्त्र लिखा जाता है। किसीको कठिन रोग लगने से ऋषि यह पढ़कर झाड़ते-फू ंकते थे, - <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> tazyl6bkrkqo03irjczq6q0nbcac8k8 665954 665922 2026-07-07T15:31:59Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 665954 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> अकबर बादशाहसे पहले अथर्ववेदको कुरानका अंश बता कोई अश्रद्धा करता न था। यदि अथर्व वेदका कोई कोई अंश किसी पाश्चात्य धर्मशास्त्र से मिलता हुआ माना जाये, तो वह सिवा पारसियोंवाले धर्मशास्त्र अविस्ताके दूसरा कोई भी ग्रन्थ नहीं। अथर्ववेदका एक प्रातिशाख्य मुद्रित हुआ है। इसमें अन्यान्य काण्डोंके अनेकानेक उदाहरण मिलते हैं, किन्तु आश्चर्यका विषय यह है, कि उन्नीसवें काण्डका एक ही उदाहरण दिया गया है, बीसवें काण्डका कोई उदाहरण नहीं। इसीसे कोई-कोई अनुमान करते हैं, कि यह प्रातिशाख्य लिखे जानेके पश्चात् आधुनिक उन्नीसवां और बीसवां काण्ड अथर्ववेदमें मिला दिया गया है। ऋग्वेदके प्रायः समस्त छन्द अथर्ववेदमें देख पड़ते हैं। इसके चौथे कारण्डवाले इक्कीसवें सूक्त में अङ्गिरा, अगस्ति, जमदग्नि, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, श्यावास्य, वध्यश्व, पुरुमीढ़, विमद, सप्तवधि, भरद्वाज, गविष्ठिर, विश्वामित्र, कुल्स, कक्षिवान् कण्व, त्रिशोक, काव्य, उशना, गौतम और मुद्ग-इन सकल ऋषियोंके नाम वर्तमान हैं। इनमें से अनेक ऋग्वेदके ऋषि हैं। अथर्ववेदसे भिन्न जो कितने ही मन्त्र हैं, उन्हें आथर्वण कहते हैं; किन्तु यह ठीक नहीं कह सकते, कि वह आथर्वण अथर्ववेदसे विभिन्न हैं या नहीं। पहले बताया जा चुका है, कि सम्प्रति अथर्ववेदकी केवल शौनक शाखा मिलती है। किन्तु कोई-कोई कहते हैं, कि पैप्पलाद शाखा भी नष्ट नहीं हुई। अथर्ववेदके सङ्कलनकालमें ब्राह्मणोंकी अतिशय प्रति-पत्ति थी। निम्नलिखित मन्त्र इस विषयके विशिष्ट प्रमाण हैं,— {{Block center|<poem><small>"उत यत् पतयो दश स्त्रिया: पूर्वे अब्राह्मणाः। ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत् स एव पतिरेकधा॥ ८ ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो३ न वैश्यः। तत् सूर्यः प्रबुवन्नेति पञ्चभ्यो मानवेभ्राः॥" ९</small></poem>}} {{Right|<small>अथर्ववेद, ५ काण्ड १७ सूक्त</small>}} फिर दूसरी जगह देखने में आता है,— {{Block center|<poem><small>"न ब्राह्मणो हिंसितव्योऽग्निः प्रियतनोरिव। सोमो हास्य दायाद इन्द्रो अस्याभिशस्तिपाः॥ ६</small></poem>}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{Block center|<poem><small>ये सहस्रमराजन्नामन् दशशता उत । ते ब्राह्मण गांध तहव्याः पराभवन् ॥ १० गौरव तान् हन्यमाना वैतहव्या अवातिरत् । ये केसरप्रावन्धायाश्वरमाजाम पेचिरन् ॥ ११</small></poem>}} अथर्ववेद ५म काण्ड १ सूक्त ! ऋग्वेदमें इन्द्र, सूर्य, अग्नि, अश्विनीकुमार प्रभृति देवताओंको स्तुति और अर्चना की गई है । किन्तु अथर्व वेदमें काल, काम, यम, मृत्य, देव, दानव प्रभृति सबका हो स्तव देख पड़ता है । जगत् में जो है, उसका स्तव किया गया और जो मनसे नया बनाना पड़ता, उसका भी स्तव इसमें वर्त्तमान है, - {{Block center|<poem><small>"नमो देववभो नमो राजवर्धभाः । यो विश्वानां वधास्त भयो मृत्यो नमोस्तु ते ॥ १ नमस्ते अधिवाकाय परावाकाय ते नमः । मुमय मृत्या ते नमो दुर्मत्य त इदं नमः ॥ २ नमस्ते यातुधानेभयो नमले भेषजेभाः । नमस्ते मृत्यो मूलेभो ब्राह्मणेभा इदं नमः</small></poem>}} अथर्ववेद ६ष्ठ काण्ड १३ सूक्त " ३ ऋग्वेदके ऋषियोंने कहीं भी यातुधान, दुर्मति प्रभृतिको नमस्कार नहीं किया । अथर्ववेद में रोगादि झाड़नेके मन्त्र अधिक देख पड़ते हैं, दूसरे वेदोंमें इतने नहीं । स्वामीको वशीभूत करने, विष झाड़ने, शत्रुको मारने और वन्ध्यानारीको सन्तानोत्पत्तिके मन्त्र अथर्ववेद विद्यमान हैं। उस समयके जो सकल ब्राह्मण क्षत्रियोंका पौरोहित्य करते, उन्हें अथर्ववेद अच्छी तरह पढ़ना पड़ता था । रघुवंश में कालिदासने 'अथर्व निधि' विशेषण लगा वशिष्ठकी गौरववृद्धि की है, - {{Block center|<poem><small>“अथाथर्व निघेस्तस्य विजितारिपुर : पुरः । "</small></poem>}} कालिदासने यह भी भली भांति प्रकाश कर दिया है, कि वशिष्ठ ऋषिका मन्त्रबल कैसा था, -, {{Block center|<poem><small> तव मन्त्रकृतो मन्त्र : दूरात् प्रशमितारिभिः ।"</small></poem>}} - कोई व्यक्ति मृतकल्प होनेसे वह मन्त्र पढ़, उसे झाड़ते थे। उदाहरणार्थ यहां एक मन्त्र लिखा जाता है। किसीको कठिन रोग लगने से ऋषि यह पढ़कर झाड़ते-फू ंकते थे, - <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> 45e8n8sjkbvicdho8l2ib2l0rggraug 666349 665954 2026-07-07T17:14:25Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार 666349 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> अकबर बादशाहसे पहले अथर्ववेदको कुरानका अंश बता कोई अश्रद्धा करता न था। यदि अथर्व वेदका कोई कोई अंश किसी पाश्चात्य धर्मशास्त्र से मिलता हुआ माना जाये, तो वह सिवा पारसियोंवाले धर्मशास्त्र अविस्ताके दूसरा कोई भी ग्रन्थ नहीं। अथर्ववेदका एक प्रातिशाख्य मुद्रित हुआ है। इसमें अन्यान्य काण्डोंके अनेकानेक उदाहरण मिलते हैं, किन्तु आश्चर्यका विषय यह है, कि उन्नीसवें काण्डका एक ही उदाहरण दिया गया है, बीसवें काण्डका कोई उदाहरण नहीं। इसीसे कोई-कोई अनुमान करते हैं, कि यह प्रातिशाख्य लिखे जानेके पश्चात् आधुनिक उन्नीसवां और बीसवां काण्ड अथर्ववेदमें मिला दिया गया है। ऋग्वेदके प्रायः समस्त छन्द अथर्ववेदमें देख पड़ते हैं। इसके चौथे कारण्डवाले इक्कीसवें सूक्त में अङ्गिरा, अगस्ति, जमदग्नि, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, श्यावास्य, वध्यश्व, पुरुमीढ़, विमद, सप्तवधि, भरद्वाज, गविष्ठिर, विश्वामित्र, कुल्स, कक्षिवान् कण्व, त्रिशोक, काव्य, उशना, गौतम और मुद्ग-इन सकल ऋषियोंके नाम वर्तमान हैं। इनमें से अनेक ऋग्वेदके ऋषि हैं। अथर्ववेदसे भिन्न जो कितने ही मन्त्र हैं, उन्हें आथर्वण कहते हैं; किन्तु यह ठीक नहीं कह सकते, कि वह आथर्वण अथर्ववेदसे विभिन्न हैं या नहीं। पहले बताया जा चुका है, कि सम्प्रति अथर्ववेदकी केवल शौनक शाखा मिलती है। किन्तु कोई-कोई कहते हैं, कि पैप्पलाद शाखा भी नष्ट नहीं हुई। अथर्ववेदके सङ्कलनकालमें ब्राह्मणोंकी अतिशय प्रति-पत्ति थी। निम्नलिखित मन्त्र इस विषयके विशिष्ट प्रमाण हैं,— {{Block center|<poem><small>"उत यत् पतयो दश स्त्रिया: पूर्वे अब्राह्मणाः। ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत् स एव पतिरेकधा॥ ८ ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो३ न वैश्यः। तत् सूर्यः प्रबुवन्नेति पञ्चभ्यो मानवेभ्राः॥" ९</small></poem>}} {{Right|<small>अथर्ववेद, ५ काण्ड १७ सूक्त</small>}} फिर दूसरी जगह देखने में आता है,— {{Block center|<poem><small>"न ब्राह्मणो हिंसितव्योऽग्निः प्रियतनोरिव। सोमो हास्य दायाद इन्द्रो अस्याभिशस्तिपाः॥ ६</small></poem>}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{Block center|<poem><small>{{gap}}*{{gap}}*{{gap}}* ये सहस्रमराजन्नामन् दशशता उत। ते ब्राह्मणस्य गां जग्गा वैतहव्याः पराभवन्॥ १० गौरव तान् हन्यमाना वैतहव्या अवातिरत्। ये के सर प्राबन्धायाश्वरमाजाम पेचिरन्॥" ११</small></poem>}} {{Right|<small>अथर्ववेद ५म काण्ड १ सूक्त।</small>}} ऋग्वेदमें इन्द्र, सूर्य, अग्नि, अश्विनीकुमार प्रभृति देवताओंकी स्तुति और अर्चना की गई है। किन्तु अथर्व वेदमें काल, काम, यम, मृत्य, देव, दानव प्रभृति सबका ही स्तव देख पड़ता है। जगत् में जो है, उसका स्तव किया गया और जो मनसे नया बनाना पड़ता, उसका भी स्तव इसमें वर्त्तमान है,— {{Block center|<poem><small>"नमो देववधेभ्रो नमो राजवर्धभ्राः। अथो विश्वानां वधास्ते भ्रो मृत्यो नमोस्तु ते॥ १ नमस्ते अधिवाकाय परावाकाय ते नमः। सुमत्यै मृत्यो ते नमो दुर्मत्ये त इदं नमः॥ २ नमस्ते यातुधानेभ्रो नमस्ते भेषजेभ्रोः। नमस्ते मृत्यो मूलेभ्रो ब्राह्मणेभ्रो इदं नमः॥ ३</small></poem>}} {{right|<small>अथर्ववेद ६ष्ठ काण्ड १३ सूक्त।</small>}} ऋग्वेदके ऋषियोंने कहीं भी यातुधान, दुर्मति प्रभृतिको नमस्कार नहीं किया। अथर्ववेद में रोगादि झाड़नेके मन्त्र अधिक देख पड़ते हैं, दूसरे वेदोंमें इतने नहीं। स्वामीको वशीभूत करने, विष झाड़ने, शत्रुको मारने और वन्ध्यानारीकी सन्तानोत्पत्तिके मन्त्र अथर्ववेद विद्यमान हैं। उस समयके जो सकल ब्राह्मण क्षत्रियोंका पौरोहित्य करते, उन्हें अथर्ववेद अच्छी तरह पढ़ना पड़ता था। रघुवंशमें कालिदासने 'अथर्व निधि' विशेषण लगा वशिष्ठकी गौरववृद्धि की है, — {{Block center|<poem><small>"अथाथर्व निघेस्तस्य विजितारिपुरः पुरः।"</small></poem>}} कालिदासने यह भी भली भांति प्रकाश कर दिया है, कि वशिष्ठ ऋषिका मन्त्रबल कैसा था,— {{Block center|<poem><small>तव मन्त्रकृतो मन्त्तैः दूरात् प्रशमितारिभिः।"</small></poem>}} कोई व्यक्ति मृतकल्प होनेसे वह मन्त्र पढ़, उसे झाड़ते थे। उदाहरणार्थ यहां एक मन्त्र लिखा जाता है। किसीको कठिन रोग लगने से ऋषि यह पढ़कर झाड़ते-फूंकते थे,— <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> d2i5690j6m21irlfasnmfqqly8a79r0 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३१५ 250 83603 666378 347016 2026-07-08T03:49:17Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 666378 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३०८'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> {{Block center|<poem><small>"आवतस्त आवतः परावतस्त आवतः। इहैव भव मा नु गा मा पूर्वाननु गाः पितृनसुं बध्नामि ते दृढम्॥ १ यत् त्वाभिचेरुः पुरुषः स्वो यदरणी जनः। उन्मोचनप्रमीचने उभे वाचा वदामि ते॥ २ यदु दुद्रोहिय शेपिषे स्त्रिवैः पुंसे अचित्त्या। उन्मो॰ ॥३ बदेनसी मातृकृताच्छेषे पितृकृताच्च यत्। उन्मोचनप्रमोचन उभे वाचा वदामि ते॥ ४ यत् ते माता यत् ते पिता जामिभ्राता च सर्जतः। प्रत्यक् सैवस्व भेषजं जरदष्टिं कृणोमि त्वा॥ ५ इहैधि पुरुष सर्वेण मनसा सह। दूतौ यमस्य मानु गा अधि जीवपुरा इहि॥ ६ अनुहृतः पुनरेहि विद्वानुदयनं पथः। आरोहणमाक्रमणं जीवतो जीवतीयनम्॥ ७ मा विभेर्न भरिष्यसि जरदष्टिं कृणोमि त्वा। निरवीचमहं यक्ष्मङ्गेभ्यो अङ्गज्वरं तव॥" ८ इत्यादि</poem></small>}} {{Right|<small>५म काण्ड ३० सूक्त।</small>}} 'तुम्हारे निकटसे, तुम्हारे निकटसे, तुम्हारे दूरसे (मैं तुमको बुलाताहूं)। इसी जगह रहो। जाओ नहीं, अपने पूर्वपितृपुरुषों के समीप मत जाओ। मैं तुमको दृढ़ रूपसे पकड़कर रखता हूँ। तुम्हारा आत्मीय व्यक्ति किंवा अन्य यदि कोई अभिचार करता रहा हो, तो मैं मन्त्र पढ़कर उसे दूर किये देता हूं। यदि तुमने बेसमझे किसी स्त्री किंवा पुरुषको कष्ट अथवा शाप दिया हो, तो मैं उसे छुड़ा देता हूँ। यदि तुमको पिता या माताके पापसे यह पीड़ा होती हो, तो मैं मन्त्र पढ़कर उसे झाड़े डालता हूं। तुम्हारे पिता, माता, भ्राता, भगिनी आदि जो औषध देते हैं, उसे सेवन करो। मैं तुमको दीर्घजीवी बनाता हूं। हे पुरुष! अपने समस्त मनके साथ इस जगह रहो। दो यमदूतोंके साथ मत जाओ। इस, जीवित मनुष्योंकी पुरीमें रहो। जीवितोंके पथवाले उदयन, आरोहण, अवतरण प्रभृति मनमें विचार, तुमको बुलाने पर लौट आना। कोई डर नहीं, तुम मरोगे नहीं; मैं तुमको दीर्घजीवी कर देता हूं। यक्ष्मारोगसे तुम्हारा शरीर क्षय होता था, उसे मैं झाड़ रहा है।' अविस्ताके किसी-किसी भागमें ऐसे ही मन्त्र सन्नि-वेशित हैं। यहांतक, कि इस वेदके साथ अविस्ताके अन्तर्गत यष्त् और बेन्दीदाद विभागका ऐक्यकर देखनेसे कितनी ही बातोंका सादृश्य देखा जा सकता है। अथर्ववेदके ८वें काण्डवाले १ले सूक्तमें मृत्यु के प्रति लिखा है,— {{Block center|<poem><small>"अन्तकाय मृत्यवे नमः प्राणा अपाना इह ते रमन्ताम्। इहायमस्तु पुरुषः सहासुना सूर्यस्व भाग अमृतस्व लोके॥"</poem></small>}} 'अन्तक मृत्युको नमस्कार है। तुम्हारा प्राण और अपान वायुं इसी जगह रहे। इसी सूर्यपुर और अमृतलोकमें आत्माके साथ यही पुरुष विद्यमान रहे।' अथर्ववेदके ७वें काण्ड के १३ वें सूक्तमें सभा समितिके विषयपर लिखा है,— {{Block center|<poem><small>"सभा च मा समितिश्चावतां प्रजायतेर्दु हितरौ संविदाने। बेना संगच्छा उप मा स शिक्षाच्चारु बदानि पितरः संगतेषु॥ १ विद्म ते सभे नाम नरिष्टा नाम वा असि। ये ते के च सभासदस्त मे सन्तु सवाचसः॥ २ एषामहं समासीनानां वर्चों विज्ञानमा ददे। अस्था: सर्वस्वाः संसदी मामिन्द्र भगिनं कृणु॥ ३ यद वो मनः परागतं यदृ वद्धमिह वेह बा। तद् आव वर्तयामसि मयि वो रमतां मनः॥" ४</poem></small>}} 'सभा और समिति दोनों प्रजापतिकी कन्या हैं। वह हमारी रक्षा करें। जिनके साथ हमारा मिलन होता है, वह हमारे पास आयें। हे पितृगण! उसी लोकसमागमके मध्यमें मैं सत्कथा कहूं। हे सभे! हम तुम्हारा नाम जानते हैं। तुमको सदालाप कहते हैं। सभासद् हमारे साथ बात किया करें। यहां जो बैठे हैं, उनका तेज और ज्ञान हम लेते हैं। हे इन्द्र! इस सभामें सबकी अपेक्षा हमें प्रसिद्ध करो। यदि आपका मन किसी दूसरी जगह जाकर अटक गया हो, किंवा इसी जगह रुक या अन्यत्र रह जाये, तो वह वापस आये और हममें रमण किया करे।' अथर्व वेदके १९वें काण्डवाले ६ठें पुरुषसूक्तमें कहा मया है;— {{Block center|<poem><small>"सहस्रबाहुः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। ::विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ १</poem></small>}}<noinclude></noinclude> rxul4xze6w3nf0nuwkrihv3jd8acj13 666379 666378 2026-07-08T03:50:18Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 666379 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३०८'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> {{Block center|<poem><small>"आवतस्त आवतः परावतस्त आवतः। इहैव भव मा नु गा मा पूर्वाननु गाः पितृनसुं बध्नामि ते दृढम्॥ १ यत् त्वाभिचेरुः पुरुषः स्वो यदरणी जनः। उन्मोचनप्रमीचने उभे वाचा वदामि ते॥ २ यदु दुद्रोहिय शेपिषे स्त्रिवैः पुंसे अचित्त्या। उन्मो॰ ॥३ बदेनसी मातृकृताच्छेषे पितृकृताच्च यत्। उन्मोचनप्रमोचन उभे वाचा वदामि ते॥ ४ यत् ते माता यत् ते पिता जामिभ्राता च सर्जतः। प्रत्यक् सैवस्व भेषजं जरदष्टिं कृणोमि त्वा॥ ५ इहैधि पुरुष सर्वेण मनसा सह। दूतौ यमस्य मानु गा अधि जीवपुरा इहि॥ ६ अनुहृतः पुनरेहि विद्वानुदयनं पथः। आरोहणमाक्रमणं जीवतो जीवतीयनम्॥ ७ मा विभेर्न भरिष्यसि जरदष्टिं कृणोमि त्वा। निरवीचमहं यक्ष्मङ्गेभ्यो अङ्गज्वरं तव॥" ८ इत्यादि</poem></small>}} {{Right|<small>५म काण्ड ३० सूक्त।</small>}} 'तुम्हारे निकटसे, तुम्हारे निकटसे, तुम्हारे दूरसे (मैं तुमको बुलाताहूं)। इसी जगह रहो। जाओ नहीं, अपने पूर्वपितृपुरुषों के समीप मत जाओ। मैं तुमको दृढ़ रूपसे पकड़कर रखता हूँ। तुम्हारा आत्मीय व्यक्ति किंवा अन्य यदि कोई अभिचार करता रहा हो, तो मैं मन्त्र पढ़कर उसे दूर किये देता हूं। यदि तुमने बेसमझे किसी स्त्री किंवा पुरुषको कष्ट अथवा शाप दिया हो, तो मैं उसे छुड़ा देता हूँ। यदि तुमको पिता या माताके पापसे यह पीड़ा होती हो, तो मैं मन्त्र पढ़कर उसे झाड़े डालता हूं। तुम्हारे पिता, माता, भ्राता, भगिनी आदि जो औषध देते हैं, उसे सेवन करो। मैं तुमको दीर्घजीवी बनाता हूं। हे पुरुष! अपने समस्त मनके साथ इस जगह रहो। दो यमदूतोंके साथ मत जाओ। इस, जीवित मनुष्योंकी पुरीमें रहो। जीवितोंके पथवाले उदयन, आरोहण, अवतरण प्रभृति मनमें विचार, तुमको बुलाने पर लौट आना। कोई डर नहीं, तुम मरोगे नहीं; मैं तुमको दीर्घजीवी कर देता हूं। 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व्यक्ति किंवा अन्य यदि कोई अभिचार करता रहा हो, तो मैं मन्त्र पढ़कर उसे दूर किये देता हूं। यदि तुमने बेसमझे किसी स्त्री किंवा पुरुषको कष्ट अथवा शाप दिया हो, तो मैं उसे छुड़ा देता हूँ। यदि तुमको पिता या माताके पापसे यह पीड़ा होती हो, तो मैं मन्त्र पढ़कर उसे झाड़े डालता हूं। तुम्हारे पिता, माता, भ्राता, भगिनी आदि जो औषध देते हैं, उसे सेवन करो। मैं तुमको दीर्घजीवी बनाता हूं। हे पुरुष! अपने समस्त मनके साथ इस जगह रहो। दो यमदूतोंके साथ मत जाओ। इस, जीवित मनुष्योंकी पुरीमें रहो। जीवितोंके पथवाले उदयन, आरोहण, अवतरण प्रभृति मनमें विचार, तुमको बुलाने पर लौट आना। कोई डर नहीं, तुम मरोगे नहीं; मैं तुमको दीर्घजीवी कर देता हूं। यक्ष्मारोगसे तुम्हारा शरीर क्षय होता था, उसे मैं झाड़ रहा है।' अविस्ताके किसी-किसी भागमें ऐसे ही मन्त्र सन्नि-वेशित हैं। यहांतक, कि इस वेदके साथ अविस्ताके<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अन्तर्गत यष्त् और बेन्दीदाद विभागका ऐक्यकर देखनेसे कितनी ही बातोंका सादृश्य देखा जा सकता है। अथर्ववेदके ८वें काण्डवाले १ले सूक्तमें मृत्यु के प्रति लिखा है,— {{Block center|<poem><small>"अन्तकाय मृत्यवे नमः प्राणा अपाना इह ते रमन्ताम्। इहायमस्तु पुरुषः सहासुना सूर्यस्व भाग अमृतस्व लोके॥"</poem></small>}} 'अन्तक मृत्युको नमस्कार है। तुम्हारा प्राण और अपान वायुं इसी जगह रहे। इसी सूर्यपुर और अमृतलोकमें आत्माके साथ यही पुरुष विद्यमान रहे।' अथर्ववेदके ७वें काण्ड के १३ वें सूक्तमें सभा समितिके विषयपर लिखा है,— {{Block center|<poem><small>"सभा च मा समितिश्चावतां प्रजायतेर्दु हितरौ संविदाने। बेना संगच्छा उप मा स शिक्षाच्चारु बदानि पितरः संगतेषु॥ १ विद्म ते सभे नाम नरिष्टा नाम वा असि। ये ते के च सभासदस्त मे सन्तु सवाचसः॥ २ एषामहं समासीनानां वर्चों विज्ञानमा ददे। अस्था: सर्वस्वाः संसदी मामिन्द्र भगिनं कृणु॥ ३ यद वो मनः परागतं यदृ वद्धमिह वेह बा। तद् आव वर्तयामसि मयि वो रमतां मनः॥" ४</poem></small>}} 'सभा और समिति दोनों प्रजापतिकी कन्या हैं। वह हमारी रक्षा करें। जिनके साथ हमारा मिलन होता है, वह हमारे पास आयें। हे पितृगण! उसी लोकसमागमके मध्यमें मैं सत्कथा कहूं। हे सभे! हम तुम्हारा नाम जानते हैं। तुमको सदालाप कहते हैं। सभासद् हमारे साथ बात किया करें। यहां जो बैठे हैं, उनका तेज और ज्ञान हम लेते हैं। हे इन्द्र! इस सभामें सबकी अपेक्षा हमें प्रसिद्ध करो। यदि आपका मन किसी दूसरी जगह जाकर अटक गया हो, किंवा इसी जगह रुक या अन्यत्र रह जाये, तो वह वापस आये और हममें रमण किया करे।' अथर्व वेदके १९वें काण्डवाले ६ठें पुरुषसूक्तमें कहा मया है;— {{Block center|<poem><small>"सहस्रबाहुः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। ::विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ १</poem></small>}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> 6n3a14qi2rfxlb8it8brh5quuy2bpqj पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३१६ 250 83604 666383 347018 2026-07-08T04:33:40Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 666383 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०९'''}}</noinclude>{{Block center|<poem><small>त्रिभिः पह्निर्द्यामरोहत् पादस्वेहाभवत् पुनः। तथा व्यक्रामद्विष्वङ् ङशनानशने अनु॥ २ तावन्ती अस्य महिमानस्ततो ज्यायांश्च पुरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥ ३ पुरुष ए वेदं सर्वं यड्भू तं यच्च भाव्यम्। उतामृतत्वस्वेश्वरी यदन्येनाभवत् सह॥ ४ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा कल्पयन्। मुखं किमस्य किं बाहू किमुरूपादा उच्चे ते॥ ५ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीदबाहू राजन्धोऽभवत्। मध्यं तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥ ६ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत॥ ७ नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्षक द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकां अकल्पयन्॥ ८ विराडग्रे समभवद्विराजी अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥ ९ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वतः। वसन्तो अस्यासौदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥ १० तं यज्ञं प्रावृषा प्रौक्षम् पुरुषं जातमग्रशः। तेन देवा अयजन्त साध्या वसवश्च ये॥ ११ तस्मादश्वा अजायन्त ये च के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥ १२ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥ १३ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम्। पशुं स्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥ १४ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवघ्नन् पुरुषं पशुम्॥ १५ मूर्ध्नो देवस्य बृहतो अंशवः सप्त सप्ततीः। राज्ञः सोमस्याजायन्त जातस्य पुरुषादधि॥" १६</poem></small>}} उपरि-उक्त सूक्त ऋग्वेदसे उद्धृत किया गया है। ऋग्वेदके पाठसे मिलानेपर यह बात स्पष्ट समझ पड़ेगी। तथापि कोई सन्देह नहीं, कि पाठमें कितना ही प्रभेद वर्त्तमान है। ऋग्वेदके १०वें मण्डलवाले ९० सूक्तमें यही सूक्त इस प्रकार लिखा हुआ है,— {{Block center|<poem><small>"सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलं॥ १ पुरुष एवेदं सर्वं बहूतं यच्च भव्यं। उतामृवत्वस्येशानी यदन्नेनातिरीहति॥ २</poem></small>}} {{Block center|<poem><small>एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः। पादोऽस्व विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥ ३ त्रिपादूर्द्ध उदै त्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः। ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि॥ ४ तस्माद्विराड़जायत विराजो अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाड्भू मिमथो पुरः॥ ५ यत् पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसंतो अस्यासीदान्यं ग्रीष्म दूध्मः शरद्धवः॥ ६ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः। तेन देवा अयजंत साध्या ऋषयथ ये॥ ७ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्रां। पशून्तांचक्रे वायव्यानारणान् ग्राम्याश्च ये॥ ८ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि यज्ञिरे। छंदांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥ ९ तस्मादश्वा अजायंत ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥ १० यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्चे ते॥ ११ ब्राह्मणोऽस्व मुखमासीदुबाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्मां शूद्रो अजायत॥ १२ चंद्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिं द्रश्चाग्रिश्च प्राणाद्वायुरजायत॥ १३ नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीर्ष्णों द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकां अकल्पयन्॥ १४ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवघ्नन् पुरुषं पशुं॥ १५ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचंत यत्र पूर्वे साध्याः संति देवाः॥" १६</poem></small>}} 'पुरुषके सहस्र मस्तक, सहस्र चक्षु और सहस्र पद है। वह सकल दिक्स इस भूमिको व्याप्तकर दशाङ्गुल स्थानमें रहते हैं।१। जो कुछ उत्पन्न हुआ और जो होगा—पुरुष ही वह समस्त है वह अमृतत्व के ईश्वर हैं, अन्नसे परिपुष्ट होते हैं।२। उनकी इतनी महिमा है! अतः पुरुषश्रेष्ठ हैं। जगत्के यावत् प्राणी उनका एकपादांश (चौथाई हिस्सा) हैं, और द्युलोकका अमृत उनका त्रिपादांश (पौन हिस्सा) है।३। त्रिपाद उठाकर पुरुष ऊर्द्ध में चढ़ा करते हैं। पुनः उनका एकपाद मर्त्यमें (यहां) रहता है। ऐसा होनेसे वह, क्या<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> sfrn7ljgi8ssna9dh85l7wjzwgcl4vf 666384 666383 2026-07-08T04:35:28Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 666384 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद'''|'''३०९'''}}</noinclude>{{Block center|<poem><small>त्रिभिः पह्निर्द्यामरोहत् पादस्वेहाभवत् पुनः। तथा व्यक्रामद्विष्वङ् ङशनानशने अनु॥ २ तावन्ती अस्य महिमानस्ततो ज्यायांश्च पुरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥ ३ पुरुष ए वेदं सर्वं यड्भू तं यच्च भाव्यम्। उतामृतत्वस्वेश्वरी यदन्येनाभवत् सह॥ ४ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा कल्पयन्। मुखं किमस्य किं बाहू किमुरूपादा उच्चे ते॥ ५ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीदबाहू राजन्धोऽभवत्। मध्यं तदस्य 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तस्मादश्वा अजायंत ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥ १० यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्चे ते॥ ११ ब्राह्मणोऽस्व मुखमासीदुबाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्मां शूद्रो अजायत॥ १२ चंद्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिं द्रश्चाग्रिश्च प्राणाद्वायुरजायत॥ १३ नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीर्ष्णों द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकां अकल्पयन्॥ १४ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवघ्नन् पुरुषं पशुं॥ १५ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचंत यत्र पूर्वे साध्याः संति देवाः॥" १६</poem></small>}} 'पुरुषके सहस्र मस्तक, सहस्र चक्षु और सहस्र पद है। वह सकल दिक्स इस भूमिको व्याप्तकर दशाङ्गुल स्थानमें रहते हैं।१। जो कुछ उत्पन्न हुआ और जो होगा—पुरुष ही वह समस्त है वह अमृतत्व के ईश्वर हैं, अन्नसे परिपुष्ट होते हैं।२। उनकी इतनी महिमा है! अतः पुरुषश्रेष्ठ हैं। जगत्के यावत् प्राणी उनका एकपादांश (चौथाई हिस्सा) हैं, और द्युलोकका अमृत उनका त्रिपादांश (पौन 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पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकां अकल्पयन्॥ ८ विराडग्रे समभवद्विराजी अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥ ९ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वतः। वसन्तो अस्यासौदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥ १० तं यज्ञं प्रावृषा प्रौक्षम् पुरुषं जातमग्रशः। तेन देवा अयजन्त साध्या वसवश्च ये॥ ११ तस्मादश्वा अजायन्त ये च के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥ १२ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥ १३ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम्। पशुं स्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥ १४ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवघ्नन् पुरुषं पशुम्॥ १५ मूर्ध्नो देवस्य बृहतो अंशवः सप्त सप्ततीः। राज्ञः सोमस्याजायन्त जातस्य पुरुषादधि॥" १६</poem></small>}} उपरि-उक्त सूक्त ऋग्वेदसे उद्धृत किया गया है। ऋग्वेदके पाठसे मिलानेपर यह बात स्पष्ट समझ पड़ेगी। तथापि कोई सन्देह नहीं, कि पाठमें कितना ही प्रभेद वर्त्तमान है। ऋग्वेदके १०वें मण्डलवाले ९० सूक्तमें यही सूक्त इस प्रकार लिखा हुआ है,— {{Block 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समभवद्विराजी अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥ ९ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वतः। वसन्तो अस्यासौदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥ १० तं यज्ञं प्रावृषा प्रौक्षम् पुरुषं जातमग्रशः। तेन देवा अयजन्त साध्या वसवश्च ये॥ ११ तस्मादश्वा अजायन्त ये च के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥ १२ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥ १३ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम्। पशुं स्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये॥ १४ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवघ्नन् पुरुषं पशुम्॥ १५ मूर्ध्नो देवस्य बृहतो अंशवः सप्त सप्ततीः। राज्ञः सोमस्याजायन्त जातस्य पुरुषादधि॥" १६</poem></small>}} उपरि-उक्त सूक्त ऋग्वेदसे उद्धृत किया गया है। ऋग्वेदके पाठसे मिलानेपर यह बात स्पष्ट समझ पड़ेगी। तथापि कोई सन्देह नहीं, कि पाठमें कितना ही प्रभेद वर्त्तमान है। ऋग्वेदके १०वें मण्डलवाले ९० सूक्तमें यही सूक्त इस प्रकार लिखा हुआ है,— {{Block center|<poem><small>"सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलं॥ १ पुरुष एवेदं सर्वं बहूतं यच्च भव्यं। उतामृवत्वस्येशानी यदन्नेनातिरीहति॥ २</poem></small>}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{Block center|<poem><small>एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः। पादोऽस्व विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥ ३ त्रिपादूर्द्ध उदै त्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः। ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशने अभि॥ ४ तस्माद्विराड़जायत विराजो अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाड्भू मिमथो पुरः॥ ५ यत् पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसंतो अस्यासीदान्यं ग्रीष्म दूध्मः शरद्धवः॥ ६ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः। तेन देवा अयजंत साध्या ऋषयथ ये॥ ७ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्रां। पशून्तांचक्रे वायव्यानारणान् ग्राम्याश्च ये॥ ८ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि यज्ञिरे। छंदांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥ ९ तस्मादश्वा अजायंत ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥ १० यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्चे ते॥ ११ ब्राह्मणोऽस्व मुखमासीदुबाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्मां शूद्रो अजायत॥ १२ चंद्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिं द्रश्चाग्रिश्च प्राणाद्वायुरजायत॥ १३ नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीर्ष्णों द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकां अकल्पयन्॥ १४ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अवघ्नन् पुरुषं पशुं॥ १५ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचंत यत्र पूर्वे साध्याः संति देवाः॥" १६</poem></small>}} 'पुरुषके सहस्र मस्तक, सहस्र चक्षु और सहस्र पद है। वह सकल दिक्स इस भूमिको व्याप्तकर दशाङ्गुल स्थानमें रहते हैं।१। जो कुछ उत्पन्न हुआ और जो होगा—पुरुष ही वह समस्त है वह अमृतत्व के ईश्वर हैं, अन्नसे परिपुष्ट होते हैं।२। उनकी इतनी महिमा है! अतः पुरुषश्रेष्ठ हैं। जगत्के यावत् प्राणी उनका एकपादांश (चौथाई हिस्सा) हैं, और द्युलोकका अमृत उनका त्रिपादांश (पौन हिस्सा) है।३। त्रिपाद उठाकर पुरुष ऊर्द्ध में चढ़ा करते हैं। पुनः उनका एकपाद मर्त्यमें (यहां) रहता है। ऐसा होनेसे वह, क्या<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> curndzichvmbwq2fzeqsyb2u3z131rm पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३१७ 250 83605 666387 347019 2026-07-08T04:51:38Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 666387 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३१०'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>सजीव और क्या निर्जीव—सकल वस्तुओं में ही व्याप्त हो रहे हैं।४। उनसे विराट्ने जन्म लिया और विराट्से पुरुष उत्पन्न हुए। वह जन्म लेकर पश्चाद् और अग्रवर्त्ती भूमिमें व्याप्त हो गये।५। देवताओं ने जब पुरुषके द्वारा यज्ञ किया, तब वसन्त घृत, ग्रीष्म यज्ञकाष्ठ और शरत् हविः बना था।६। उसी यज्ञमें अग्रजातने पुरुषको कुशके ऊपर वलि चढ़ाया। उनके साथ देवताओंने साध्यों और ऋषियोंको भी वलि दिया था।७। उसी सर्वजन-अधिष्ठित यज्ञमें सदधि घृत और घृत उत्पन्न हुआ। उन्होंने शून्यके जन्तुओं एवं वन्य और ग्राम्य पशुओंकी सृष्टि की।८। उसी सर्वजन-अनुष्ठित यज्ञसे ऋक्, साम, छन्दः उत्पन्न हुए। फिर, उनसे यजुः ने भी जन्मग्रहण किया। (यहां ऋक्, साम, यजुः तीनो वेदोंका नाम नहीं।) ९। उससे अश्व और दो पंक्तिवाले दांतोंके पशु उत्पन्न हुए। उससे गायबैल और गायबैलों से भेड़-बकरे पैदा हुए।१०। जब उन्होंने उस पुरुषका विभाग किया, तब कितने भागों में बांटा था? उनका मुख क्या है? बाहुयुगल क्या है? ऊरुद्वय और पद किसे-किसे कहेंगे? ११। ब्राह्मण उनके मुख थे, राजन्य उनके बाहु बने, वैशा उनके ऊरु और शूद्र उनके पदसे उत्पन्न हुए।१२। उनके मनसे चन्द्र उत्पन्न हुआ, चक्षुसे सूर्यने जन्मग्रहण किया, मुखसे इन्द्र और अग्नि, प्राणसे (प्राणवायु) वायु उत्पन्न हुए।१३। नाभिसे अन्तरीक्ष, मस्तकसे द्युलोक उत्पन्न हुआ। पादद्वयसे भूमि, कर्णसे दिशा निकली। इसीतरह उन्होंने जगत्की सृष्टि की।१४। देवताओंने जब वलि देनेके लिये पुरुषको पशुस्वरूप बनाकर बांधा था, तब उनके लिये अग्निको वेष्टन कर सात समिधा रखी गई थीं और इक्कीस समिधा से यज्ञ किया गया था।१५। देवताओंने यज्ञ द्वारा उनका याजन किया। पहले वही सकल धर्म थे। महिमान्वितोंने स्वर्गको गमन किया, जहां पूर्वतन साध्य और देवता विद्यमान हैं।१६।' ऊपर ऋग्वेद के सूक्तका अविकल अनुवाद कर दिया गया है। <small>(पुरुष और त्रिपाद शब्दका विवरण तत्तत् शब्दमें देखी।)</small> वेदके सङ्कलन-कालमें लाङ्गलादि अर्थात् हलआदिकी पूजा की जाती थी,— {{Block center|<poem><small>"सीते बन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः।" अथर्ववेद ३।१७।८।</poem></small>}} 'हे सुभगे हलकी रेखा! आप अधिष्ठान कीजिये। हम आपको इसलिये वन्दना करते हैं, कि आप प्रसन्न हों और वसुमतीको सुफला बनायें।' {{Left|अन्यत्र,—}] {{Block center|<poem><small>"इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभि रक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्॥” ्अ्थ्अ््अ्थ्अ र्ववेद ३ | १७|४| 'इन्द्र हलको रेखाको ग्रहण करें, पूषा उसको रक्षा करें ; वह पयखिनो हो प्रतिवर्ष हमें शस्य दिये जायें ।' ब्रह्माण्डपुराणमें अथर्ववेदका प्राधान्य प्रतिपादित हुआ है, "वह चोहन्ति वै राष्ट्रमध्वर्युर्नाशयेत् सुतम् । छन्दोगो धनं नाशयेत् तस्मादाथ व णो गुरुः ॥ " 'ववच (ऋग्वेदके पुरोहित) राज्य नष्ट करते, अध्वर्यु ( यजुर्वेद के पुरोहित ) सन्तान नष्ट करते ; छन्दोग ( सामवेद के पुरोहित ) धन नष्ट करते ; इस- लिये आथर्वण ही सब वेदोंसे श्रेष्ठ है ।' “अथर्वा सृजते घोरमहुतं शमयेत् तथा । अथर्वा रचते यज्ञं यज्ञस्य पतिरङ्गिराः ॥ दिव्यान्तरिचभौमानामुत्पातानामनेकधा । शमयिता ब्रह्मवेदज्ञस्तस्माद्दचिणाती भृगुः ॥ ब्रह्मा शमयेन्नाध्वर्युन छन्दोगो न वचः । रचांसि रचति ब्रह्मा ब्रह्मा तस्मादथर्व वित् ॥' ( ब्रह्माण्डपु० ) 'अथर्ववेदी पुरोहित उत्पातको सृष्टि करते और उपद्रवकी शान्ति भी करते हैं । अथर्ववेदो पुरोहित यज्ञ रक्षा करते एवं अङ्गिरा यज्ञके पति हैं । ब्रह्मवेदज्ञ (अथर्ववेदज्ञ) व्यक्ति द्युलोक, अन्तरीक्ष और पृथिवोके नाना प्रकार के उत्पातोंको शान्ति करते हैं । अतः भृगुको दक्षिणदिशामें रखना आवश्यक है । ब्रह्मा हो (अथर्व वेदी) अनिष्टको शान्ति कर सकते :<noinclude></noinclude> 6uop0idsb5vzgzfv4rvbyuafrq4xox7 666388 666387 2026-07-08T04:52:07Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 666388 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३१०'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>सजीव और क्या निर्जीव—सकल वस्तुओं में ही व्याप्त हो रहे हैं।४। उनसे विराट्ने जन्म लिया और विराट्से पुरुष उत्पन्न हुए। वह जन्म लेकर पश्चाद् और अग्रवर्त्ती भूमिमें व्याप्त हो गये।५। देवताओं ने जब पुरुषके द्वारा यज्ञ किया, तब वसन्त घृत, ग्रीष्म यज्ञकाष्ठ और शरत् हविः बना था।६। उसी यज्ञमें अग्रजातने पुरुषको कुशके ऊपर वलि चढ़ाया। उनके साथ देवताओंने साध्यों और ऋषियोंको भी वलि दिया था।७। उसी सर्वजन-अधिष्ठित यज्ञमें सदधि घृत और घृत उत्पन्न हुआ। उन्होंने शून्यके जन्तुओं एवं वन्य और ग्राम्य पशुओंकी सृष्टि की।८। उसी सर्वजन-अनुष्ठित यज्ञसे ऋक्, साम, छन्दः उत्पन्न हुए। फिर, उनसे यजुः ने भी जन्मग्रहण किया। (यहां ऋक्, साम, यजुः तीनो वेदोंका नाम नहीं।) ९। उससे अश्व और दो पंक्तिवाले दांतोंके पशु उत्पन्न हुए। उससे गायबैल और गायबैलों से भेड़-बकरे पैदा हुए।१०। जब उन्होंने उस पुरुषका विभाग किया, तब कितने भागों में बांटा था? उनका मुख क्या है? बाहुयुगल क्या है? ऊरुद्वय और पद किसे-किसे कहेंगे? ११। ब्राह्मण उनके मुख थे, राजन्य उनके बाहु बने, वैशा उनके ऊरु और शूद्र उनके पदसे उत्पन्न हुए।१२। उनके मनसे चन्द्र उत्पन्न हुआ, चक्षुसे सूर्यने जन्मग्रहण किया, मुखसे इन्द्र और अग्नि, प्राणसे (प्राणवायु) वायु उत्पन्न हुए।१३। नाभिसे अन्तरीक्ष, मस्तकसे द्युलोक उत्पन्न हुआ। पादद्वयसे भूमि, कर्णसे दिशा निकली। इसीतरह उन्होंने जगत्की सृष्टि की।१४। देवताओंने जब वलि देनेके लिये पुरुषको पशुस्वरूप बनाकर बांधा था, तब उनके लिये अग्निको वेष्टन कर सात समिधा रखी गई थीं और इक्कीस समिधा से यज्ञ किया गया था।१५। देवताओंने यज्ञ द्वारा उनका याजन किया। पहले वही सकल धर्म थे। महिमान्वितोंने स्वर्गको गमन किया, जहां पूर्वतन साध्य और देवता विद्यमान हैं।१६।' ऊपर ऋग्वेद के सूक्तका अविकल अनुवाद कर दिया गया है। <small>(पुरुष और त्रिपाद शब्दका विवरण तत्तत् शब्दमें देखी।)</small> वेदके सङ्कलन-कालमें लाङ्गलादि अर्थात् हलआदिकी पूजा की जाती थी,— {{Block center|<poem><small>"सीते बन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः।" अथर्ववेद ३।१७।८।</poem></small>}} 'हे सुभगे हलकी रेखा! आप अधिष्ठान कीजिये। हम आपको इसलिये वन्दना करते हैं, कि आप प्रसन्न हों और वसुमतीको सुफला बनायें।' {{Left|अन्यत्र,—}] {{Block center|<poem><small>"इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभि रक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्॥” ्अ्थ्अ््अ्थ््अ्थ्अ््अ्थ्अ्थ्अ््अ्थ््अ्थ्अ््अ्थ्अ््अ्थ्अ्थ्अ््अ्थ््अ्थ्अ््अ र्ववेद ३ | १७|४| 'इन्द्र हलको रेखाको ग्रहण करें, पूषा उसको रक्षा करें ; वह पयखिनो हो प्रतिवर्ष हमें शस्य दिये जायें ।' ब्रह्माण्डपुराणमें अथर्ववेदका प्राधान्य प्रतिपादित हुआ है, "वह चोहन्ति वै राष्ट्रमध्वर्युर्नाशयेत् सुतम् । छन्दोगो धनं नाशयेत् तस्मादाथ व णो गुरुः ॥ " 'ववच (ऋग्वेदके पुरोहित) राज्य नष्ट करते, अध्वर्यु ( यजुर्वेद के पुरोहित ) सन्तान नष्ट करते ; छन्दोग ( सामवेद के पुरोहित ) धन नष्ट करते ; इस- लिये आथर्वण ही सब वेदोंसे श्रेष्ठ है ।' “अथर्वा सृजते घोरमहुतं शमयेत् तथा । अथर्वा रचते यज्ञं यज्ञस्य पतिरङ्गिराः ॥ दिव्यान्तरिचभौमानामुत्पातानामनेकधा । शमयिता ब्रह्मवेदज्ञस्तस्माद्दचिणाती भृगुः ॥ ब्रह्मा शमयेन्नाध्वर्युन छन्दोगो न वचः । रचांसि रचति ब्रह्मा ब्रह्मा तस्मादथर्व वित् ॥' ( ब्रह्माण्डपु० ) 'अथर्ववेदी पुरोहित उत्पातको सृष्टि करते और उपद्रवकी शान्ति भी करते हैं । अथर्ववेदो पुरोहित यज्ञ रक्षा करते एवं अङ्गिरा यज्ञके पति हैं । ब्रह्मवेदज्ञ (अथर्ववेदज्ञ) व्यक्ति द्युलोक, अन्तरीक्ष और पृथिवोके नाना प्रकार के उत्पातोंको शान्ति करते हैं । अतः भृगुको दक्षिणदिशामें रखना आवश्यक है । ब्रह्मा हो (अथर्व वेदी) अनिष्टको शान्ति कर सकते :<noinclude></noinclude> c86y6yecm364ya2eeas4gyjrl29cscm 666389 666388 2026-07-08T05:00:55Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 666389 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३१०'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>सजीव और क्या निर्जीव—सकल वस्तुओं में ही व्याप्त हो रहे हैं।४। उनसे विराट्ने जन्म लिया और विराट्से पुरुष उत्पन्न हुए। वह जन्म लेकर पश्चाद् और अग्रवर्त्ती भूमिमें व्याप्त हो गये।५। देवताओं ने जब पुरुषके द्वारा यज्ञ किया, तब वसन्त घृत, ग्रीष्म यज्ञकाष्ठ और शरत् हविः बना था।६। उसी यज्ञमें अग्रजातने पुरुषको कुशके ऊपर वलि चढ़ाया। उनके साथ देवताओंने साध्यों और ऋषियोंको भी वलि दिया था।७। उसी सर्वजन-अधिष्ठित यज्ञमें सदधि घृत और घृत उत्पन्न हुआ। उन्होंने शून्यके जन्तुओं एवं वन्य और ग्राम्य पशुओंकी सृष्टि की।८। उसी सर्वजन-अनुष्ठित यज्ञसे ऋक्, साम, छन्दः उत्पन्न हुए। फिर, उनसे यजुः ने भी जन्मग्रहण किया। (यहां ऋक्, साम, यजुः तीनो वेदोंका नाम नहीं।) ९। उससे अश्व और दो पंक्तिवाले दांतोंके पशु उत्पन्न हुए। उससे गायबैल और गायबैलों से भेड़-बकरे पैदा हुए।१०। जब उन्होंने उस पुरुषका विभाग किया, तब कितने भागों में बांटा था? उनका मुख क्या है? बाहुयुगल क्या है? ऊरुद्वय और पद किसे-किसे कहेंगे? ११। ब्राह्मण उनके मुख थे, राजन्य उनके बाहु बने, वैशा उनके ऊरु और शूद्र उनके पदसे उत्पन्न हुए।१२। उनके मनसे चन्द्र उत्पन्न हुआ, चक्षुसे सूर्यने जन्मग्रहण किया, मुखसे इन्द्र और अग्नि, प्राणसे (प्राणवायु) वायु उत्पन्न हुए।१३। नाभिसे अन्तरीक्ष, मस्तकसे द्युलोक उत्पन्न हुआ। पादद्वयसे भूमि, कर्णसे दिशा निकली। इसीतरह उन्होंने जगत्की सृष्टि की।१४। देवताओंने जब वलि देनेके लिये पुरुषको पशुस्वरूप बनाकर बांधा था, तब उनके लिये अग्निको वेष्टन कर सात समिधा रखी गई थीं और इक्कीस समिधा से यज्ञ किया गया था।१५। देवताओंने यज्ञ द्वारा उनका याजन किया। पहले वही सकल धर्म थे। महिमान्वितोंने स्वर्गको गमन किया, जहां पूर्वतन साध्य और देवता विद्यमान हैं।१६।' ऊपर ऋग्वेद के सूक्तका अविकल अनुवाद कर दिया गया है। <small>(पुरुष और त्रिपाद शब्दका विवरण तत्तत् शब्दमें देखी।)</small> वेदके सङ्कलन-कालमें लाङ्गलादि अर्थात् हलआदिकी पूजा की जाती थी,— {{Block center|<poem><small>"सीते बन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः।" अथर्ववेद ३।१७।८।</poem></small>}} 'हे सुभगे हलकी रेखा! आप अधिष्ठान कीजिये। हम आपको इसलिये वन्दना करते हैं, कि आप प्रसन्न हों और वसुमतीको सुफला बनायें।' {{Left|अन्यत्र,—}] {{Block center|<poem><small>"इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभि रक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्॥" अथर्ववेद ३।१७।४।</poem></small>}} 'इन्द्र हलकी रेखाको ग्रहण करें, पूषा उसकी रक्षा करें; वह पयस्वनी हो प्रतिवर्ष हमें शस्य दिये जायें।' ब्रह्माण्डपुराणमें अथर्ववेदका प्राधान्य प्रतिपादित हुआ है,— {{Block center|<poem><small>"वह्वृ चो हन्ति वै राष्ट्रमध्वर्युर्नाशयेत् सुतम्। छन्दोगो धनं नाशयेत् तस्मादाथर्व णो गुरुः॥"</poem></small>}} 'वह्वृच (ऋग्वेदके पुरोहित) राज्य नष्ट करते, अध्वर्यु (यजुर्वेद के पुरोहित) सन्तान नष्ट करते; छन्दोग (सामवेदके पुरोहित) धन नष्ट करते; इसलिये आथर्वण ही सब वेदोंसे श्रेष्ठ है।' {{Block center|<poem><small>"अथर्वा सृजते घोरमड्गुते शमयेत् तथा। अथर्वा रचते यज्ञं यज्ञस्य पतिरङ्गिराः॥ दिव्यान्तरिचभौमानामुत्पातानामनेकधा। शमयिता ब्रह्मवेदज्ञस्तस्माद्दचिणाती भृगुः॥ ब्रह्मा शमयेन्नाध्वर्युन छन्दोगो न वह्वृचः। रक्षांसि रक्षति ब्रह्मा ब्रह्मा तस्मादथर्व वित्॥" (ब्रह्माण्डपु॰)</poem></small>}} 'अथर्ववेदी पुरोहित उत्पातकी सृष्टि करते और उपद्रवकी शान्ति भी करते हैं। अथर्ववेदी पुरोहित यज्ञ रक्षा करते एवं अङ्गिरा यज्ञके पति हैं। ब्रह्मवेदज्ञ (अथर्ववेदज्ञ) व्यक्ति द्युलोक, अन्तरीक्ष और पृथिवोके नाना प्रकार के उत्पातोंकी शान्ति करते हैं। अतः भृगुको दक्षिणदिशामें रखना आवश्यक है। ब्रह्मा ही (अथर्व वेदी) अनिष्टकी शान्ति कर सकते<noinclude></noinclude> aud78f0ydyard2zp96eyx23i4t4ez7g 666390 666389 2026-07-08T05:01:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 666390 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३१०'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>सजीव और क्या निर्जीव—सकल वस्तुओं में ही व्याप्त हो रहे हैं।४। उनसे विराट्ने जन्म लिया और विराट्से पुरुष उत्पन्न हुए। वह जन्म लेकर पश्चाद् और अग्रवर्त्ती भूमिमें व्याप्त हो गये।५। देवताओं ने जब पुरुषके द्वारा यज्ञ किया, तब वसन्त घृत, ग्रीष्म यज्ञकाष्ठ और शरत् हविः बना था।६। उसी यज्ञमें अग्रजातने पुरुषको कुशके ऊपर वलि चढ़ाया। उनके साथ देवताओंने साध्यों और ऋषियोंको भी वलि दिया था।७। उसी सर्वजन-अधिष्ठित यज्ञमें सदधि घृत और घृत उत्पन्न हुआ। उन्होंने शून्यके जन्तुओं एवं वन्य और ग्राम्य पशुओंकी सृष्टि की।८। उसी सर्वजन-अनुष्ठित यज्ञसे ऋक्, साम, छन्दः उत्पन्न हुए। फिर, उनसे यजुः ने भी जन्मग्रहण किया। (यहां ऋक्, साम, यजुः तीनो वेदोंका नाम नहीं।) ९। उससे अश्व और दो पंक्तिवाले दांतोंके पशु उत्पन्न हुए। उससे गायबैल और गायबैलों से भेड़-बकरे पैदा हुए।१०। जब उन्होंने उस पुरुषका विभाग किया, तब कितने भागों में बांटा था? उनका मुख क्या है? बाहुयुगल क्या है? ऊरुद्वय और पद किसे-किसे कहेंगे? ११। ब्राह्मण उनके मुख थे, राजन्य उनके बाहु बने, वैशा उनके ऊरु और शूद्र उनके पदसे उत्पन्न हुए।१२। उनके मनसे चन्द्र उत्पन्न हुआ, चक्षुसे सूर्यने जन्मग्रहण किया, मुखसे इन्द्र और अग्नि, प्राणसे (प्राणवायु) वायु उत्पन्न हुए।१३। नाभिसे अन्तरीक्ष, मस्तकसे द्युलोक उत्पन्न हुआ। पादद्वयसे भूमि, कर्णसे दिशा निकली। इसीतरह उन्होंने जगत्की सृष्टि की।१४। देवताओंने जब वलि देनेके लिये पुरुषको पशुस्वरूप बनाकर बांधा था, तब उनके लिये अग्निको वेष्टन कर सात समिधा रखी गई थीं और इक्कीस समिधा से यज्ञ किया गया था।१५। देवताओंने यज्ञ द्वारा उनका याजन किया। पहले वही सकल धर्म थे। महिमान्वितोंने स्वर्गको गमन किया, जहां पूर्वतन साध्य और देवता विद्यमान हैं।१६।' ऊपर ऋग्वेद के सूक्तका अविकल अनुवाद कर दिया गया है। <small>(पुरुष और त्रिपाद शब्दका विवरण तत्तत् शब्दमें देखी।)</small> वेदके सङ्कलन-कालमें लाङ्गलादि अर्थात् हलआदिकी पूजा की जाती थी,— {{Block center|<poem><small>"सीते बन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः।" अथर्ववेद ३।१७।८।</poem></small>}} 'हे सुभगे हलकी रेखा! आप अधिष्ठान कीजिये। हम आपको इसलिये वन्दना करते हैं, कि आप प्रसन्न हों और वसुमतीको सुफला बनायें।' {{Left|अन्यत्र,—}} {{Block center|<poem><small>"इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभि रक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्॥" अथर्ववेद ३।१७।४।</poem></small>}} 'इन्द्र हलकी रेखाको ग्रहण करें, पूषा उसकी रक्षा करें; वह पयस्वनी हो प्रतिवर्ष हमें शस्य दिये जायें।' ब्रह्माण्डपुराणमें अथर्ववेदका प्राधान्य प्रतिपादित हुआ है,— {{Block center|<poem><small>"वह्वृ चो हन्ति वै राष्ट्रमध्वर्युर्नाशयेत् सुतम्। छन्दोगो धनं नाशयेत् तस्मादाथर्व णो गुरुः॥"</poem></small>}} 'वह्वृच (ऋग्वेदके पुरोहित) राज्य नष्ट करते, अध्वर्यु (यजुर्वेद के पुरोहित) सन्तान नष्ट करते; छन्दोग (सामवेदके पुरोहित) धन नष्ट करते; इसलिये आथर्वण ही सब वेदोंसे श्रेष्ठ है।' {{Block center|<poem><small>"अथर्वा सृजते घोरमड्गुते शमयेत् तथा। अथर्वा रचते यज्ञं यज्ञस्य पतिरङ्गिराः॥ दिव्यान्तरिचभौमानामुत्पातानामनेकधा। शमयिता ब्रह्मवेदज्ञस्तस्माद्दचिणाती भृगुः॥ ब्रह्मा शमयेन्नाध्वर्युन छन्दोगो न वह्वृचः। रक्षांसि रक्षति ब्रह्मा ब्रह्मा तस्मादथर्व वित्॥" (ब्रह्माण्डपु॰)</poem></small>}} 'अथर्ववेदी पुरोहित उत्पातकी सृष्टि करते और उपद्रवकी शान्ति भी करते हैं। अथर्ववेदी पुरोहित यज्ञ रक्षा करते एवं अङ्गिरा यज्ञके पति हैं। ब्रह्मवेदज्ञ (अथर्ववेदज्ञ) व्यक्ति द्युलोक, अन्तरीक्ष और पृथिवोके नाना प्रकार के उत्पातोंकी शान्ति करते हैं। अतः भृगुको दक्षिणदिशामें रखना आवश्यक है। ब्रह्मा ही (अथर्व वेदी) अनिष्टकी शान्ति कर सकते <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> p0tpxzrmfqh08yhmfeb26kwd7cg2rmx 666391 666390 2026-07-08T05:02:30Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 666391 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३१०'''|'''अथर्ववेद'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>सजीव और क्या निर्जीव—सकल वस्तुओं में ही व्याप्त हो रहे हैं।४। उनसे विराट्ने जन्म लिया और विराट्से पुरुष उत्पन्न हुए। वह जन्म लेकर पश्चाद् और अग्रवर्त्ती भूमिमें व्याप्त हो गये।५। देवताओं ने जब पुरुषके द्वारा यज्ञ किया, तब वसन्त घृत, ग्रीष्म यज्ञकाष्ठ और शरत् हविः बना था।६। उसी यज्ञमें अग्रजातने पुरुषको कुशके ऊपर वलि चढ़ाया। उनके साथ देवताओंने साध्यों और ऋषियोंको भी वलि दिया था।७। उसी सर्वजन-अधिष्ठित यज्ञमें सदधि घृत और घृत उत्पन्न हुआ। उन्होंने शून्यके जन्तुओं एवं वन्य और ग्राम्य पशुओंकी सृष्टि की।८। उसी सर्वजन-अनुष्ठित यज्ञसे ऋक्, साम, छन्दः उत्पन्न हुए। फिर, उनसे यजुः ने भी जन्मग्रहण किया। (यहां ऋक्, साम, यजुः तीनो वेदोंका नाम नहीं।) ९। उससे अश्व और दो पंक्तिवाले दांतोंके पशु उत्पन्न हुए। उससे गायबैल और गायबैलों से भेड़-बकरे पैदा हुए।१०। जब उन्होंने उस पुरुषका विभाग किया, तब कितने भागों में बांटा था? उनका मुख क्या है? बाहुयुगल क्या है? ऊरुद्वय और पद किसे-किसे कहेंगे? ११। ब्राह्मण उनके मुख थे, राजन्य उनके बाहु बने, वैशा उनके ऊरु और शूद्र उनके पदसे उत्पन्न हुए।१२। उनके मनसे चन्द्र उत्पन्न हुआ, चक्षुसे सूर्यने जन्मग्रहण किया, मुखसे इन्द्र और अग्नि, प्राणसे (प्राणवायु) वायु उत्पन्न हुए।१३। नाभिसे अन्तरीक्ष, मस्तकसे द्युलोक उत्पन्न हुआ। पादद्वयसे भूमि, कर्णसे दिशा निकली। इसीतरह उन्होंने जगत्की सृष्टि की।१४। देवताओंने जब वलि देनेके लिये पुरुषको पशुस्वरूप बनाकर बांधा था, तब उनके लिये अग्निको वेष्टन कर सात समिधा रखी गई थीं और इक्कीस समिधा से यज्ञ किया गया था।१५। देवताओंने यज्ञ द्वारा उनका याजन किया। पहले वही सकल धर्म थे। महिमान्वितोंने स्वर्गको गमन किया, जहां पूर्वतन साध्य और देवता विद्यमान हैं।१६।' ऊपर ऋग्वेद के सूक्तका अविकल अनुवाद कर<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>दिया गया है। <small>(पुरुष और त्रिपाद शब्दका विवरण तत्तत् शब्दमें देखी।)</small> वेदके सङ्कलन-कालमें लाङ्गलादि अर्थात् हलआदिकी पूजा की जाती थी,— {{Block center|<poem><small>"सीते बन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव। यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः।" अथर्ववेद ३।१७।८।</poem></small>}} 'हे सुभगे हलकी रेखा! आप अधिष्ठान कीजिये। हम आपको इसलिये वन्दना करते हैं, कि आप प्रसन्न हों और वसुमतीको सुफला बनायें।' {{Left|अन्यत्र,—}} {{Block center|<poem><small>"इन्द्रः सीतां निगृह्णातु तां पूषाभि रक्षतु। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्॥" अथर्ववेद ३।१७।४।</poem></small>}} 'इन्द्र हलकी रेखाको ग्रहण करें, पूषा उसकी रक्षा करें; वह पयस्वनी हो प्रतिवर्ष हमें शस्य दिये जायें।' ब्रह्माण्डपुराणमें अथर्ववेदका प्राधान्य प्रतिपादित हुआ है,— {{Block center|<poem><small>"वह्वृ चो हन्ति वै राष्ट्रमध्वर्युर्नाशयेत् सुतम्। छन्दोगो धनं नाशयेत् तस्मादाथर्व णो गुरुः॥"</poem></small>}} 'वह्वृच (ऋग्वेदके पुरोहित) राज्य नष्ट करते, अध्वर्यु (यजुर्वेद के पुरोहित) सन्तान नष्ट करते; छन्दोग (सामवेदके पुरोहित) धन नष्ट करते; इसलिये आथर्वण ही सब वेदोंसे श्रेष्ठ है।' {{Block center|<poem><small>"अथर्वा सृजते घोरमड्गुते शमयेत् तथा। अथर्वा रचते यज्ञं यज्ञस्य पतिरङ्गिराः॥ दिव्यान्तरिचभौमानामुत्पातानामनेकधा। शमयिता ब्रह्मवेदज्ञस्तस्माद्दचिणाती भृगुः॥ ब्रह्मा शमयेन्नाध्वर्युन छन्दोगो न वह्वृचः। रक्षांसि रक्षति ब्रह्मा ब्रह्मा तस्मादथर्व वित्॥" (ब्रह्माण्डपु॰)</poem></small>}} 'अथर्ववेदी पुरोहित उत्पातकी सृष्टि करते और उपद्रवकी शान्ति भी करते हैं। अथर्ववेदी पुरोहित यज्ञ रक्षा करते एवं अङ्गिरा यज्ञके पति हैं। ब्रह्मवेदज्ञ (अथर्ववेदज्ञ) व्यक्ति द्युलोक, अन्तरीक्ष और पृथिवोके नाना प्रकार के उत्पातोंकी शान्ति करते हैं। अतः भृगुको दक्षिणदिशामें रखना आवश्यक है। ब्रह्मा ही (अथर्व वेदी) अनिष्टकी शान्ति कर सकते <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8w1hv6s6l7hxgp1htzhydl8wuinberr पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३१८ 250 83606 666395 347020 2026-07-08T08:02:35Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 666395 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अथर्ववेद—अथर्वाण'''|'''३११'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> हैं, अध्वर्यु, छन्दोग किंवा वह्वृच नहीं कर सकते। ब्रह्मा राक्षसोंसे रक्षा कर सकते हैं, अतः अथर्व वेदज्ञ व्यक्ति ही ब्रह्मा हैं।' अथर्ववेद में केवल शूद्र और आर्य—इन्हीं दो श्रेणियोंके लोगोंका विषय निर्दिष्ट हुआ है। <small>(अथर्वसंहिता ४।२०।४,१९।६२।१।)</small> अथर्व वेदके समय ऋषि हिमालय-पर्वतके निकट रहते थे। <small>(अथर्ववेद : १२।१।११, ५।४८।)</small> इस वेद में विधवा-विवाह और एक पति रहते अन्य पतिग्रहणका उल्लेख विद्यमान है। <small>(९।५।२७-२८।)</small> अथर्ववेदमें हिन्दूओंके जिस समयकी कथा लिखी, उससे बोध होता है, कि वह इन्द्रियसुख के स्वाद-ग्रहणमें ही अधिकतर समर्थ थे। इसके अनुसार मरणोत्तरका निवास स्वर्गधाम इन्द्रियसुखका आस्पद बताया गया है। <small>(अथर्ववेद ४।२४।२-४।)</small> इसीसे बार-बार ऋषियोंने कहा है,— 'स्वर्ग' लोकमभि नो नयासि सं जायया सह पुत्रः स्याम ।" अथर्ववेद १२|३|१७| ‘हमें स्वर्गलोक ले चलो, जिसमें हम स्त्रीपुत्र के साथ एकत्र वास कर सकें ।' – एक ओर जैसे स्वर्गलाभके सभी अभिलाषो हैं, वैसे हो दूसरी ओर इस वेदके ऋषि मृत्युभयसे सशङ्कित देख पड़ते हैं। इससे इस वेदमें काल हौ सबसे ऊपर बताया गया है, - "कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राची अजरो भूरिरेताः । तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा ॥ १ कालोभूमिमसृजत काले तपति सूर्य: । काले ह विश्वा भूतानि काले चतुवि पश्यति ॥ ६ काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम् । कालेन सर्वा नन्दन्तयागतेन प्रजा इमाः ॥ ७ १९ काण्ड, ६३ सक्त "काले यज्ञं समैरयन्देव भ्यो भागमक्षितम् । काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिता ॥ ४ काले यमङ्गिरा दिवोऽथर्वा चाधितिष्ठतः । · इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांच लोकान्विष्टतीश्च पख्याः ॥ ५ सर्वो ल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः ॥” ६ १९ काण्ड, ५४ सूक्त । ३११ ऋऋग्वेदमें नरक शब्दका उल्लेख नहीं । किन्तु इस वेदमें वह नारक लोकके नामसे उल्लिखित हुआ है । (१२।४।२८ | ) इस वेद में गोवध निषिद्ध बताया गया है । (१३) अथर्व वेदियोंने ऋक्, साम, यजुः – इस वेदत्रयौके भिन्न-भिन्न ऋत्विककी असीम निन्दाकर स्वसम्प्रदायि- योंकी हौ अद्वितीय और उपयुक्त ऋत्विक् बता प्रशंसा की है। (अथर्व-परिशिष्ट ११२ अध्याय ! ) * अथर्व शिखा (सं० स्त्री० ) अथर्वणः अथर्व वेदस्य शिखा शिर इव, ६- तत् । अथर्वशिखा नामक अथर्व वेदके अन्तर्गत उपनिषद् - विशेष । यह उपनिषत् ब्रह्मतत्त्व प्रतिपादन करनेके कारण अथर्ववेदका शिखाखरूप बताया गया है । अथर्व शिर (सं० पु० ) यज्ञवाली वेदी बनानेको ईंट | अथर्व शिरस् (सं० क्लो० ) अथर्वणः शिरो मस्तक- मिव । अथर्ववेद के अन्तर्गत अथर्वशिरः या अथर्व- शिरस् नामक और ब्रह्मविद्याप्रतिपादक उपनिषद् - विशेष | अथर्वशिरा (सं० स्त्री० ) अथर्ववेदको ऋचा - विशेष । अथर्व हृदय (सं० क्लो० ) परिशिष्ठको एक उपाधि । अथर्वाङ्गिरस् (सं० पु० ) अथर्वाङ्गिरस - वंशका व्यक्ति । अथर्वाङ्गिरस ( स ० पु० ) अथर्वा चाङ्गिराश्च–अच् निपातनात् साधुः । १ अथर्वा और अङ्गिरा ऋषि । २ अथर्व वेद । अथर्ववेदका यह नाम स्वयं अथर्व वेदमें हो देख पड़ता है। कहते, कि इस नामसे अथर्व- वेदके वह प्रधान विषय जान पड़ते, जिनसे औषध और मन्त्र प्रकाशित हुए हैं । अथर्वाण (स ं० क्ली० अथर्ववेदको विधि-विशेष | * इन सब विषयोंका यावत् विवरण वेद ज्ञन्दमें विस्तृत रूपसे लिखा जायेगा,—वैदिक समय में हिन्दूओं का कैसा समाज-बन्धन, धर्मनीति, परलोक में विश्वास, आचार-व्यवहार, मेलमिलाप, परिधेय वस्त्र, अस्त्र-शस्त्र, कृषिकर्म, आमोद-प्रमोद, गृहपालित पशु, वाणिजा और नौका हारा विदेशगमन-प्रथा था । इसके इलावा ऋक्, यजुः और साम शब्दमें भी इन बातोंका कितना ही परिचय मिलेगा । ब्लूफिल्ड साहबका अथर्ववेद सम्बन्धीय पुस्तकमें ( Dr. Bloomfield's Atharvaveda ) और वन्तशब्द में भी अथदेव दका अन्यान्य विवरण देखो ।<noinclude></noinclude> 0a7nn47w4s0rsoyfotjhnkf3xahpeai 666400 666395 2026-07-08T08:27:36Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 666400 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अथर्ववेद—अथर्वाण'''|'''३११'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> हैं, अध्वर्यु, छन्दोग किंवा वह्वृच नहीं कर सकते। ब्रह्मा राक्षसोंसे रक्षा कर सकते हैं, अतः अथर्व वेदज्ञ व्यक्ति ही ब्रह्मा 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सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः। तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा॥ १ कालोभूमिमसृजत काले तपति सूर्यः। काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्वि पश्यति॥ ६ काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम्। कालेन सर्वा नन्दन्तयागतेन प्रजा इमाः॥" ७ {{Right|१९ काण्ड, ६३ सक्त।}} "काले यज्ञं समैरयन्देव भ्यो भागमक्षितम्। काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिता॥ ४ काले यमङ्गिरा दिवोऽथर्वा चाधितिष्ठतः। इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान्विधृतीश्च पख्याः॥ ५ सर्वों ल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः॥" ६</poem>}} {{Right|१९ काण्ड, ५४ सूक्त।}}</small> ऋऋग्वेदमें नरक शब्दका उल्लेख नहीं। किन्तु इस वेदमें वह नारक लोकके नामसे उल्लिखित हुआ है। <small>(१२।४।२९।)</small> इस वेदमें गोवध निषिद्ध बताया गया है। <small>(५।१८।३।)</small> अथर्व वेदियोंने ऋक्, साम, यजुः—इस वेदत्रयीके भिन्न-भिन्न ऋत्विकोंकी असीम निन्दाकर स्वसम्प्रदायियोंकी ही अद्वितीय और उपयुक्त ऋत्विक् बता प्रशंसा की है। <small>(अथर्व-परिशिष्ट ११२ अध्याय।)</small><ref>इन सब विषयोंका यावत् विवरण वेद ज्ञन्दमें विस्तृत रूपसे लिखा जायेगा,—वैदिक समय में हिन्दूओं का कैसा समाज-बन्धन, धर्मनीति, परलोक में विश्वास, आचार-व्यवहार, मेलमिलाप, परिधेय वस्त्र, अस्त्र-शस्त्र, कृषिकर्म्म, आमोद-प्रमोद, गृहपालित पशु, वाणिजा और नौका हारा विदेशगमन-प्रथा था। इसके इलावा ऋक्, यजुः और साम शब्दमें भी इन बातोंका कितना ही परिचय मिलेगा। ब्लूफिल्ड साहबका अथर्ववेद सम्बन्धीय पुस्तकमें (Dr. Bloomfield's Atharvaveda) और तन्त्रशब्द में भी अथदेवदका अन्यान्य विवरण देखो।</ref> अथर्व शिखा (सं॰ स्त्री॰) अथर्वणः अथर्व वेदस्य शिखा शिर इव, ६-तत्। अथर्वशिखा नामक अथर्व वेदके अन्तर्गत उपनिषद्-विशेष। यह उपनिषत् ब्रह्मतत्त्व प्रतिपादन करनेके कारण अथर्ववेदका शिखाखरूप बताया गया है। अथर्व शिर (सं॰ पु॰) यज्ञवाली वेदी बनानेको ईंट। अथर्व शिरस् (सं॰ क्ली॰) अथर्वणः शिरो मस्तक-मिव। अथर्ववेद के अन्तर्गत अथर्वशिरः या अथर्वशिरस् नामक और ब्रह्मविद्याप्रतिपादक उपनिषद्-विशेष। अथर्वशिरा (सं॰ स्त्री॰) अथर्ववेदकी ऋचा-विशेष। अथर्व हृदय (सं॰ क्ली॰) परिशिष्ठकी एक उपाधि। अथर्वाङ्गिरस् (सं॰ पु॰) अथर्वाङ्गिरस्-वंशका व्यक्ति। अथर्वाङ्गिरस (सं॰ पु॰) अथर्वा 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ऋक्, यजुः और साम शब्दमें भी इन बातोंका कितना ही परिचय मिलेगा। ब्लूफिल्ड साहबका अथर्ववेद सम्बन्धीय पुस्तकमें (Dr. Bloomfield's Atharvaveda) और तन्त्रशब्द में भी अथदेवदका अन्यान्य विवरण देखो।</ref> अथर्व शिखा (सं॰ स्त्री॰) अथर्वणः अथर्व वेदस्य शिखा शिर इव, ६-तत्। अथर्वशिखा नामक अथर्व वेदके अन्तर्गत उपनिषद्-विशेष। यह उपनिषत् ब्रह्मतत्त्व प्रतिपादन करनेके कारण अथर्ववेदका शिखाखरूप बताया गया है। अथर्व शिर (सं॰ पु॰) यज्ञवाली वेदी बनानेको ईंट। अथर्व शिरस् (सं॰ क्ली॰) अथर्वणः शिरो मस्तक-मिव। अथर्ववेद के अन्तर्गत अथर्वशिरः या अथर्वशिरस् नामक और ब्रह्मविद्याप्रतिपादक उपनिषद्-विशेष। अथर्वशिरा (सं॰ स्त्री॰) अथर्ववेदकी ऋचा-विशेष। अथर्व हृदय (सं॰ क्ली॰) परिशिष्ठकी एक उपाधि। अथर्वाङ्गिरस् (सं॰ पु॰) अथर्वाङ्गिरस्-वंशका व्यक्ति। अथर्वाङ्गिरस (सं॰ पु॰) अथर्वा चाङ्गिराश्च,—अच् निपातनात् साधुः। १ अथर्वा और अङ्गिरा ऋषि। २ अथर्व वेद। अथर्ववेदका यह नाम स्वयं अथर्व वेदमें ही देख पड़ता है। कहते, कि इस नामसे अथर्ववेदके वह प्रधान विषय जान पड़ते, जिनसे औषध और मन्त्र प्रकाशित हुए हैं। अथर्वाण (सं॰ क्ली॰) अथर्ववेदकी 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<small>(अथर्ववेद ४।२४।२-४।)</small> इसीसे बार-बार ऋषियोंने कहा है,— {{Block center|<poem><small>"स्वर्गं लोकमभि नो नयासि सं जायया सह पुत्रैः स्याम।"</poem></small>}} {{Right|<small>अथर्ववेद १२।३।१७।</small>}} 'हमें स्वर्गलोक ले चलो, जिसमें हम स्त्रीपुत्रके साथ एकत्र वास कर सकें।'—एक ओर जैसे स्वर्गलाभके सभी अभिलाषी हैं, वैसे ही दूसरी ओर इस वेदके ऋषि मृत्युभयसे सशङ्कित देख पड़ते हैं। इससे इस वेदमें काल ही सबसे ऊपर बताया गया है,— {{Block center|<poem><small>"कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः। तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा॥ १ कालोभूमिमसृजत काले तपति सूर्यः। काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्वि पश्यति॥ ६ काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम्। कालेन सर्वा नन्दन्तयागतेन प्रजा इमाः॥" ७ {{Right|१९ काण्ड, ६३ सक्त।}} "काले यज्ञं समैरयन्देव भ्यो भागमक्षितम्। काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिता॥ ४ काले यमङ्गिरा दिवोऽथर्वा चाधितिष्ठतः। इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान्विधृतीश्च पख्याः॥ ५ सर्वों ल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः॥" ६</poem>}} {{Right|१९ काण्ड, ५४ सूक्त।}}</small><noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>ऋऋग्वेदमें नरक शब्दका उल्लेख नहीं। किन्तु इस वेदमें वह नारक लोकके नामसे उल्लिखित हुआ है। <small>(१२।४।२९।)</small> इस वेदमें गोवध निषिद्ध बताया गया है। <small>(५।१८।३।)</small> अथर्व वेदियोंने ऋक्, साम, यजुः—इस वेदत्रयीके भिन्न-भिन्न ऋत्विकोंकी असीम निन्दाकर स्वसम्प्रदायियोंकी ही अद्वितीय और उपयुक्त ऋत्विक् बता प्रशंसा की है। <small>(अथर्व-परिशिष्ट ११२ अध्याय।)</small><ref>इन सब विषयोंका यावत् विवरण वेद ज्ञन्दमें विस्तृत रूपसे लिखा जायेगा,—वैदिक समय में हिन्दूओं का कैसा समाज-बन्धन, धर्मनीति, परलोक में विश्वास, आचार-व्यवहार, मेलमिलाप, परिधेय वस्त्र, अस्त्र-शस्त्र, कृषिकर्म्म, आमोद-प्रमोद, गृहपालित पशु, वाणिजा और नौका हारा विदेशगमन-प्रथा था। इसके इलावा ऋक्, यजुः और साम शब्दमें भी इन बातोंका कितना ही परिचय मिलेगा। ब्लूफिल्ड साहबका अथर्ववेद सम्बन्धीय पुस्तकमें (Dr. Bloomfield's Atharvaveda) और तन्त्रशब्द में भी अथदेवदका अन्यान्य विवरण देखो।</ref> अथर्व शिखा (सं॰ स्त्री॰) अथर्वणः अथर्व वेदस्य शिखा शिर इव, ६-तत्। अथर्वशिखा नामक अथर्व वेदके अन्तर्गत उपनिषद्-विशेष। यह उपनिषत् ब्रह्मतत्त्व प्रतिपादन करनेके कारण अथर्ववेदका शिखाखरूप बताया गया है। अथर्व शिर (सं॰ पु॰) यज्ञवाली वेदी बनानेको ईंट। अथर्व शिरस् (सं॰ क्ली॰) अथर्वणः शिरो मस्तक-मिव। अथर्ववेद के अन्तर्गत अथर्वशिरः या अथर्वशिरस् नामक और ब्रह्मविद्याप्रतिपादक उपनिषद्-विशेष। अथर्वशिरा (सं॰ स्त्री॰) अथर्ववेदकी ऋचा-विशेष। अथर्व हृदय (सं॰ क्ली॰) परिशिष्ठकी एक उपाधि। अथर्वाङ्गिरस् (सं॰ पु॰) अथर्वाङ्गिरस्-वंशका व्यक्ति। अथर्वाङ्गिरस (सं॰ पु॰) अथर्वा चाङ्गिराश्च,—अच् निपातनात् साधुः। १ अथर्वा और अङ्गिरा ऋषि। २ अथर्व वेद। अथर्ववेदका यह नाम स्वयं अथर्व वेदमें ही देख पड़ता है। कहते, कि इस नामसे अथर्ववेदके वह प्रधान विषय जान पड़ते, जिनसे औषध और मन्त्र प्रकाशित हुए हैं। अथर्वाण (सं॰ क्ली॰) अथर्ववेदकी विधि-विशेष। {{Rule}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> jilvrpuquaw10t84gpcwwouh7xbwobp पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३१९ 250 83607 666403 347021 2026-07-08T08:43:02Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 666403 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३१२'''|'''अथर्वाणवित्—अदग्ध'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>अथर्वाणवित् (सं॰ पु॰) अथर्ववेदको विधिका ज्ञाता। अथर्वाधिप (सं॰ पु॰) अथर्वणः वेदस्याधिपः ६- तत्। अथर्ववेदके अधिपति, बुध। मङ्गल सामवेदके और चन्द्रके पुत्र बुध अथर्ववेदके अधिपति हैं। अथर्वी (वै॰ स्त्री॰) न-थर्व-अच्, पृषोदरादित्वात् उलोपः ; गौरादित्वात् ङीष्। १ न चलनेवाली। २ भालेमें छिदी हुई। ३ अग्निसे परिवेष्टित, आगसे | अथ खां - एक कवि, शायर । इनके पिताका नाम: 'अमीर निज़ामुद्दीन रजबी' था । यह बुखारेके रहने वाले थे। आलमगीर बादशाह के समय में यह भारतवर्ष आए थे । | अद्— अदा, पर, सक० अनिट् । १ भक्षण । भ्वा०, ४ हिंसा न करनेवाली । पर०, सक्० सेट् इदित् । २ बन्धन । अदंक (हिं० पु० ) आतङ्क, भय ; डर, खौफ, । अदंड, श्रदण्ड देखो। अदंडनीय, श्रदण्डनीय देखो। घिरौ । अथल ( हिं० पु० ) लगानपर खेती करनेको दो जानेवाली भूमि या ज़मीन । अदंडमान श्रदण्डमान देखो। अदंड्य, श्रदण्डा देखो । दंत, दन्त देखो। १ अस्त होना, डूब जाना, अदंभ, अदम्भ देखो। अदभित्व, पदम्भित्व देखो । अथवना ( हिं० क्रि० ) बैठना । २ छिपना, मिटना । अथवा (सं० अव्य० ) १ पक्षान्तरसे, या, किंवा । अधाई (हिं० स्त्री० ) १ चौपार, चौतरा, बैठक, कमरा ; घर से बाहर मित्रोंसे मिलने-जुलनेका स्थान । २ गाववाले लोगोंके एकत्र बैठ बातचीत और पञ्चा- यत करनेको जगह । ३ घरके सामने उठने-बैठनेका चबूतरा । अथातः (सं० अव्य० ) अब इस समय । अथान, अथाना (हिं० पु० ) अचार | अथाना (हिं० क्रि० ) १ अस्त होना, डूबना । २ थाह पाना, गहराई नापना । अथानन्तरम् (सं० अव्य० ) इसके बाद; अब इस समय में दंष्ट्र (सं० पु० ) न सन्ति दंष्ट्रा दन्ता यस्य, दंश- श्र्न् दंष्ट्रा । तितुव्रतथ सिमुसरकसेषु च । पारा १ विष- हीन सर्प, वह सांप जिसके जहरीले दांत न हों । २ (त्रि०) दन्तहीन । अदक्ष (सं०वि०) दक्ष नहीं, अचतुर; नाका- बिल । अदक्षिण (सं० त्रि०) दक्षिणोऽनुकुल: कुशलश्च ; न दक्षिण, विरोधार्थे नञ् तत् । १ जो अनुकूल न हो, प्रतिकूल, विरुद्ध, खिलाफ । २ दाहना नहीं, बायां । ‘नास्ति दक्षिणा क्रियासमाप्तो यव' । ३ दक्षिणाविहौन, जिस यज्ञमें दक्षिणा न दी जाये । ४ अकुशल, गंवार | अथापि (सं० अव्य० ) इसपर भी, और तो, इस अदक्षिणत्व (सं० क्लो०) १ अनाड़ीपन । २ दक्षिण • लिये, इसतरह | . अधावत् (हिं० वि० ) अस्त, डूबा या बैठा । अथाह (हिं० वि० ) १ बेथाह, अगाध । २ अपार, अनन्त, असीम गूढ़, समझमें न आने योग्य | अथिर (हिं० वि० ) १ अस्थिर, चलता हुआ । २ क्षणभङ्गुर, स्थिर न रहनेवाला । अथो, श्रथ देख | थोर (हिं० वि० ) थोड़ा नहीं, ज्यादा, अधिक अथोवा — अथवा देखो F न देनेकी स्थिति । अदक्षिणीय, अदक्षिण्य (सं० त्रि०) दक्षिणाके अयोग्य, जिसे दक्षिणा दो न जा सके । अदग (हिं० वि० ) १ बेदाग | २ अयपशविहीन । ३ निरपराध, बेगुनाह । ४ स्वच्छ, साफ़ । अदग्ध (सं०वि०) न-दह-त, विधिपूर्वकमग्निना न दग्धं संस्कृतम् । १ शास्त्रविधानानुसार जिसका अग्निसंस्कार न किया गया हो । २ दग्ध नहीं, विना जला हुआ।<noinclude></noinclude> dau0ewuzvwq21ke3p2awgpxnphsy2o1 666404 666403 2026-07-08T09:34:36Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 666404 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३१२'''|'''अथर्वाणवित्—अदग्ध'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>अथर्वाणवित् (सं॰ पु॰) अथर्ववेदको विधिका ज्ञाता। अथर्वाधिप (सं॰ पु॰) अथर्वणः वेदस्याधिपः ६- तत्। अथर्ववेदके अधिपति, बुध। मङ्गल सामवेदके और चन्द्रके पुत्र बुध अथर्ववेदके अधिपति हैं। अथर्वी (वै॰ स्त्री॰) न-थर्व-अच्, पृषोदरादित्वात् उलोपः ; गौरादित्वात् ङीष्। १ न चलनेवाली। २ भालेमें छिदी हुई। ३ अग्निसे परिवेष्टित, आगसे घिरी। ४ हिंसा न करनेवाली। अथल (हिं॰ पु॰) लगानपर खेती करनेको दी जानेवाली भूमि या ज़मीन। अथवना (हिं॰ क्रि॰) १ अस्त होना, डूब जाना, बैठना। २ छिपना, मिटना। अथवा (सं॰ अव्य॰) १ पक्षान्तरसे, या, किंवा। अधाई (हिं॰ स्त्री॰) १ चौपार, चौतरा, बैठक, कमरा ; घर से बाहर मित्रोंसे मिलने-जुलनेका स्थान। २ गाववांले लोगोंके एकत्र बैठ बातचीत और पञ्चायत करनेकी जगह। ३ घरके सामने उठने-बैठनेका चबूतरा। अथातः (सं॰ अव्य॰) अब इस समय। अथान, अथाना (हिं॰ पु॰) अचार। अथाना (हिं॰ क्रि॰) १ अस्त होना, डूबना। २ थाह पाना, गहराई नापना। अथानन्तरम् (सं॰ अव्य॰) इसके बाद; अब, इस समय में। अथापि (सं॰ अव्य॰) इसपर भी, और तो, इसलिये, इसतरह। अधावत् (हिं॰ वि॰) अस्त, डूबा या बैठा। अथाह (हिं॰ वि॰) १ बेथाह, अगाध। २ अपार, अनन्त, असीम गूढ़, समझमें न आने योग्य। अथिर (हिं॰ वि॰) १ अस्थिर, चलता हुआ। २ क्षणभङ्गुर, स्थिर न रहनेवाला। अथातः एक कवि, शायर । इनके पिताका नाम: 'अमीर निज़ामुद्दीन रजबी' था । यह बुखारेके रहने वाले थे। आलमगीर बादशाह के समय में यह भारतवर्ष आए थे । अद्— अदा, पर, सक० अनिट् । १ भक्षण । भ्वा०, पर०, सक्० सेट् इदित् । २ बन्धन । अदंक (हिं० पु० ) आतङ्क, भय ; डर, खौफ, । अदंड, श्रदण्ड देखो। अदंडनीय, श्रदण्डनीय देखो। घिरौ । अदंडमान श्रदण्डमान देखो। अदंड्य, श्रदण्डा देखो । दंत, दन्त देखो। अदंभ, अदम्भ देखो। अदभित्व, पदम्भित्व देखो । दंष्ट्र (सं० पु० ) न सन्ति दंष्ट्रा दन्ता यस्य, दंश- श्र्न् दंष्ट्रा । तितुव्रतथ सिमुसरकसेषु च । पारा १ विष- हीन सर्प, वह सांप जिसके जहरीले दांत न हों । २ (त्रि०) दन्तहीन । अदक्ष (सं०वि०) दक्ष नहीं, अचतुर; नाका- बिल । अदक्षिण (सं० त्रि०) दक्षिणोऽनुकुल: कुशलश्च ; न दक्षिण, विरोधार्थे नञ् तत् । १ जो अनुकूल न हो, प्रतिकूल, विरुद्ध, खिलाफ । २ दाहना नहीं, बायां । ‘नास्ति दक्षिणा क्रियासमाप्तो यव' । ३ दक्षिणाविहौन, जिस यज्ञमें दक्षिणा न दी जाये । ४ अकुशल, गंवार | अदक्षिणत्व (सं० क्लो०) १ अनाड़ीपन । २ दक्षिण • | . | अथो, श्रथ देख | 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अग्निसे परिवेष्टित, आगसे घिरी। ४ हिंसा न करनेवाली। अथल (हिं॰ पु॰) लगानपर खेती करनेको दी जानेवाली भूमि या ज़मीन। अथवना (हिं॰ क्रि॰) १ अस्त होना, डूब जाना, बैठना। २ छिपना, मिटना। अथवा (सं॰ अव्य॰) १ पक्षान्तरसे, या, किंवा। अधाई (हिं॰ स्त्री॰) १ चौपार, चौतरा, बैठक, कमरा ; घर से बाहर मित्रोंसे मिलने-जुलनेका स्थान। २ गाववांले लोगोंके एकत्र बैठ बातचीत और पञ्चायत करनेकी जगह। ३ घरके सामने उठने-बैठनेका चबूतरा। अथातः (सं॰ अव्य॰) अब इस समय। अथान, अथाना (हिं॰ पु॰) अचार। अथाना (हिं॰ क्रि॰) १ अस्त होना, डूबना। २ थाह पाना, गहराई नापना। अथानन्तरम् (सं॰ अव्य॰) इसके बाद; अब, इस समय में। अथापि (सं॰ अव्य॰) इसपर भी, और तो, इसलिये, इसतरह। अधावत् (हिं॰ वि॰) अस्त, डूबा या बैठा। अथाह (हिं॰ वि॰) १ बेथाह, अगाध। २ अपार, अनन्त, असीम गूढ़, समझमें न आने योग्य। अथिर (हिं॰ वि॰) १ अस्थिर, चलता हुआ। २ क्षणभङ्गुर, स्थिर न रहनेवाला। अथो, <small>अथ देख।</small> अथोर (हिं॰ वि॰) थोड़ा नहीं, ज्य़ादा, अधिक। अथोवा—<small>अथवा देख।</small> अथ खां—एक कवि, शायर। इनके पिताका नाम 'अमीर निज़ामुद्दीन रजबी' था। यह बुखारेके रहने वाले थे। आलमगीर बादशाह के समय में यह भारतवर्ष आए थे। अद्—अदा॰, पर॰, सक॰ अनिट्। १ भक्षण। भ्वा॰, पर॰, सक्॰ सेट् इदित्। २ बन्धन। अदंक (हिं॰ पु॰) आतङ्क, भय ; डर, ख़ौफ़। अदंड, <small>अदण्ड देखो।</small> अदंडनीय, <small>अदण्डनीय देखो।</small> अदंडमान, <small>अदण्डमान देखो।</small> अदंड्य, <small>अदण्डा देखो।</small> दंत, दन्त देखो। अदंभ, अदम्भ देखो। अदभित्व, पदम्भित्व देखो । दंष्ट्र (सं० पु० ) न सन्ति दंष्ट्रा दन्ता यस्य, दंश- श्र्न् दंष्ट्रा । तितुव्रतथ सिमुसरकसेषु च । पारा १ विष- हीन सर्प, वह सांप जिसके जहरीले दांत न हों । २ (त्रि०) दन्तहीन । अदक्ष (सं०वि०) दक्ष नहीं, अचतुर; नाका- बिल । अदक्षिण (सं० त्रि०) दक्षिणोऽनुकुल: कुशलश्च ; न दक्षिण, विरोधार्थे नञ् तत् । १ जो अनुकूल न हो, प्रतिकूल, विरुद्ध, खिलाफ । २ दाहना नहीं, बायां । ‘नास्ति दक्षिणा क्रियासमाप्तो यव' । ३ दक्षिणाविहौन, जिस यज्ञमें दक्षिणा न दी जाये । ४ अकुशल, गंवार | अदक्षिणत्व (सं० क्लो०) १ अनाड़ीपन । २ दक्षिण • | . | F न देनेकी स्थिति । अदक्षिणीय, अदक्षिण्य (सं० त्रि०) दक्षिणाके अयोग्य, जिसे दक्षिणा दो न जा सके । अदग (हिं० वि० ) १ बेदाग 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जाना, बैठना। २ छिपना, मिटना। अथवा (सं॰ अव्य॰) १ पक्षान्तरसे, या, किंवा। अधाई (हिं॰ स्त्री॰) १ चौपार, चौतरा, बैठक, कमरा ; घर से बाहर मित्रोंसे मिलने-जुलनेका स्थान। २ गाववांले लोगोंके एकत्र बैठ बातचीत और पञ्चायत करनेकी जगह। ३ घरके सामने उठने-बैठनेका चबूतरा। अथातः (सं॰ अव्य॰) अब इस समय। अथान, अथाना (हिं॰ पु॰) अचार। अथाना (हिं॰ क्रि॰) १ अस्त होना, डूबना। २ थाह पाना, गहराई नापना। अथानन्तरम् (सं॰ अव्य॰) इसके बाद; अब, इस समय में। अथापि (सं॰ अव्य॰) इसपर भी, और तो, इसलिये, इसतरह। अधावत् (हिं॰ वि॰) अस्त, डूबा या बैठा। अथाह (हिं॰ वि॰) १ बेथाह, अगाध। २ अपार, अनन्त, असीम गूढ़, समझमें न आने योग्य। अथिर (हिं॰ वि॰) १ अस्थिर, चलता हुआ। २ क्षणभङ्गुर, स्थिर न रहनेवाला। अथो, <small>अथ देख।</small> अथोर (हिं॰ वि॰) थोड़ा नहीं, ज्य़ादा, अधिक। अथोवा—<small>अथवा देख।</small> अथ खां—एक कवि, शायर। इनके पिताका नाम 'अमीर निज़ामुद्दीन रजबी' था। यह बुखारेके रहने वाले थे। आलमगीर बादशाह के समय में यह भारतवर्ष आए थे। अद्—अदा॰, पर॰, सक॰ अनिट्। १ भक्षण। भ्वा॰, पर॰, सक्॰ सेट् इदित्। २ बन्धन। अदंक (हिं॰ पु॰) आतङ्क, भय ; डर, ख़ौफ़। अदंड, <small>अदण्ड देखो।</small> अदंडनीय, <small>अदण्डनीय देखो।</small> अदंडमान, <small>अदण्डमान देखो।</small> अदंड्य, <small>अदण्डा देखो।</small> अदंत, <small>अदन्त देखो।</small> अदंभ,—<small>अदम्भ देखो।</small> अदभित्व,—<small>अदम्भित्व देखो।</small> अदंष्ट्र (सं॰ पु॰) न सन्ति दंष्ट्रा दन्ता यस्य, दंशष्ट्रन् दंष्ट्रा। <small>तितुत्रतथ सिमुसरकसेषु च। पा ७।२।९।</small> १ विषहीन सर्प, वह सांप जिसके ज़हरीले दांत न हों। २ (त्रि॰) दन्तहीन। अदक्ष (सं॰ वि॰) दक्ष नहीं, अचतुर; नाक़ा-बिल। अदक्षिण (सं॰ त्रि॰) दक्षिणोऽनुकुल: कुशलश्च; न दक्षिणं, विरोधार्थे नञ् तत्। १ जो अनुकूल न हो, प्रतिकूल, विरुद्ध, ख़िलाफ़। २ दाहना नहीं, बायां। <small>'नास्ति दक्षिणा क्रियासमाप्ती यत्र।'</small> ३ दक्षिणाविहीन, जिस यज्ञमें दक्षिणा न दी जाये। ४ अकुशल, गंवार। अदक्षिणत्व (सं॰ क्ली॰) १ अनाड़ीपन। २ दक्षिण न देनेकी स्थिति। अदक्षिणीय, अदक्षिण्य (सं॰ त्रि॰) दक्षिणाके अयोग्य, जिसे दक्षिणा दी न जा सके। अदग (हिं॰ वि॰) १ बेदाग़। २ अयपशविहीन। ३ निरपराध, बेगुनाह। ४ स्वच्छ, साफ़। अदग्ध (सं॰ वि॰) न-दह-क्त, विधिपूर्व कमग्निना न दग्धं संस्कृतम्। १ शास्त्रविधानानुसार जिसका अग्निसंस्कार न किया गया हो। २ दग्ध नहीं, विना जला हुआ।<noinclude></noinclude> pifdgh4igiew67wyb4va99m8ohop2t5 666408 666407 2026-07-08T11:27:53Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 666408 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३१२'''|'''अथर्वाणवित्—अदग्ध'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>अथर्वाणवित् (सं॰ पु॰) अथर्ववेदको विधिका ज्ञाता। अथर्वाधिप (सं॰ पु॰) अथर्वणः वेदस्याधिपः ६- तत्। अथर्ववेदके अधिपति, बुध। मङ्गल सामवेदके और चन्द्रके पुत्र बुध अथर्ववेदके अधिपति हैं। अथर्वी (वै॰ स्त्री॰) न-थर्व-अच्, पृषोदरादित्वात् उलोपः ; गौरादित्वात् ङीष्। १ न चलनेवाली। २ भालेमें छिदी हुई। ३ अग्निसे परिवेष्टित, आगसे घिरी। ४ हिंसा न करनेवाली। अथल (हिं॰ पु॰) लगानपर खेती करनेको दी जानेवाली भूमि या ज़मीन। अथवना (हिं॰ क्रि॰) १ अस्त होना, डूब जाना, बैठना। २ छिपना, मिटना। अथवा (सं॰ अव्य॰) १ पक्षान्तरसे, या, किंवा। अधाई (हिं॰ स्त्री॰) १ चौपार, चौतरा, बैठक, कमरा ; घर से बाहर मित्रोंसे मिलने-जुलनेका स्थान। २ गाववांले लोगोंके एकत्र बैठ बातचीत और पञ्चायत करनेकी जगह। ३ घरके सामने उठने-बैठनेका चबूतरा। अथातः (सं॰ अव्य॰) अब इस समय। अथान, अथाना (हिं॰ पु॰) अचार। अथाना (हिं॰ क्रि॰) १ अस्त होना, डूबना। २ थाह पाना, गहराई नापना। अथानन्तरम् (सं॰ अव्य॰) इसके बाद; अब, इस समय में। अथापि (सं॰ अव्य॰) इसपर भी, और तो, इसलिये, इसतरह। अधावत् (हिं॰ वि॰) अस्त, डूबा या बैठा। अथाह (हिं॰ वि॰) १ बेथाह, अगाध। २ अपार, अनन्त, असीम गूढ़, समझमें न आने योग्य। अथिर (हिं॰ वि॰) १ अस्थिर, चलता हुआ। २ क्षणभङ्गुर, स्थिर न रहनेवाला। अथो, <small>अथ देख।</small> अथोर (हिं॰ वि॰) थोड़ा नहीं, ज्य़ादा, अधिक। अथोवा—<small>अथवा देख।</small> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अथ खां—एक कवि, शायर। इनके पिताका नाम 'अमीर निज़ामुद्दीन रजबी' था। यह बुखारेके रहने वाले थे। आलमगीर बादशाह के समय में यह भारतवर्ष आए थे। अद्—अदा॰, पर॰, सक॰ अनिट्। १ भक्षण। भ्वा॰, पर॰, सक्॰ सेट् इदित्। २ बन्धन। अदंक (हिं॰ पु॰) आतङ्क, भय ; डर, ख़ौफ़। अदंड, <small>अदण्ड देखो।</small> अदंडनीय, <small>अदण्डनीय 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एकत्र बैठ बातचीत और पञ्चायत करनेकी जगह। ३ घरके सामने उठने-बैठनेका चबूतरा। अथातः (सं॰ अव्य॰) अब इस समय। अथान, अथाना (हिं॰ पु॰) अचार। अथाना (हिं॰ क्रि॰) १ अस्त होना, डूबना। २ थाह पाना, गहराई नापना। अथानन्तरम् (सं॰ अव्य॰) इसके बाद; अब, इस समय में। अथापि (सं॰ अव्य॰) इसपर भी, और तो, इसलिये, इसतरह। अधावत् (हिं॰ वि॰) अस्त, डूबा या बैठा। अथाह (हिं॰ वि॰) १ बेथाह, अगाध। २ अपार, अनन्त, असीम गूढ़, समझमें न आने योग्य। अथिर (हिं॰ वि॰) १ अस्थिर, चलता हुआ। २ क्षणभङ्गुर, स्थिर न रहनेवाला। अथो, <small>अथ देख।</small> अथोर (हिं॰ वि॰) थोड़ा नहीं, ज्य़ादा, अधिक। अथोवा—<small>अथवा देख।</small> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अथ खां—एक कवि, शायर। इनके पिताका नाम 'अमीर निज़ामुद्दीन रजबी' था। यह बुखारेके रहने वाले थे। आलमगीर बादशाह के समय में यह भारतवर्ष आए थे। अद्—अदा॰, पर॰, सक॰ अनिट्। १ भक्षण। भ्वा॰, पर॰, सक्॰ सेट् इदित्। २ बन्धन। अदंक (हिं॰ पु॰) आतङ्क, भय ; डर, ख़ौफ़। अदंड, <small>अदण्ड देखो।</small> अदंडनीय, <small>अदण्डनीय देखो।</small> अदंडमान, <small>अदण्डमान देखो।</small> अदंड्य, 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<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> k0ent1f4qn0o91p7p8vvm6inyqlzkg9 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३२० 250 83608 666410 347022 2026-07-08T11:28:45Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 666410 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" /></noinclude>अदण्ड-अदन ३१३ अदण्ड (सं त्रि.) १ दण्डके अयोग्य, सज़ाके पानको इच्छासे दिया जाय। १५-छलीको दिया नाकाविल ; जिसे दण्ड देनेको व्यव्यस्था न हो। हुआ दान। जो व्यक्ति वेद नहीं पाढ़ा, किन्तु २ कररहित, बेमहसूल । ३ इन्दरहित, मनमौजी। अपनेको यदि वेदज्ञ बताकर दान ले, तो ऐसा दान (क्लो०) ४ दण्डका अभाव, सज़ाकी मुआफी। असिद्ध होता है। १६-यागादिके लिये पाई वस्तुका ५ बिना लगानको जमीन, मुाफो। द्यूतादि कुकर्मो में दान। जो व्यक्ति इस प्रकार अदण्डनीय ( स० त्रि० ) अदण्डा, जो दण्ड अवैध दान करता या लेता, शास्त्रकारोंने उसके देनेके योग्य न हो, जिसे सजा देनेका कायदा दण्डविधानको अनुमति दी है,- नहीं। "रटहत्यदत्तं वो लोभात् यादयं प्रयच्छति । अदण्डमान (सं० त्रि.) दण्डके अयोग्य, सजाके अदेय दायको दण्डास्तथा दत्तप्रतीच्छुकः ॥” (मिताक्षरा) नाकाबिल । 'जो अन्याय दान करता और लोभपरतन्त्र होकर अदण्ड्य (स. त्रि.) न-दण्ड-यत्, दण्डं शास्तिं जो वह अन्याय दान लेता है, वह अदेयदानकर्ता नाहति । दण्ड के अयोग्य, जिसे सजा दी न जा सके। और उस दानका ग्रहणेच्छु व्यक्ति दोनो दण्डनीय अदत् (स० त्रि.) दन्तरहित, बेदांत । होते हैं।' अदत्त (सं० पु०) न-दा-क्त ; नञ्-तत् । यत्पुन अदत्तदान (सं. क्लो०) न दिया हुआ दान, रन्यायेन दत्तं तददत्तम् । १ अन्यायसे दिया गया, ज़बरदस्ती या चोरोसे पाई हुई चीज़। जैनशास्त्रा- जो न्यायसे दिया न गया हो। २ न दिया हुआ। चार्यों में कोई इसके तोन और कोई चार भेद बताते ३ विवाहमें न दिया गया। शास्त्रकारोंने सोलह हैं। जैसे,—१ द्रव्यादत्त, २ भावादत्त और ३ द्रव्य- प्रकारके दानको अदत्त बतलाया है। यथा, भावादत्त, एवं १ स्वामी अदत्त, २ जीव अदत्त, ३ १-भयप्रयुक्त दान, जो दान डरसे दिया जाय । तीर्थङ्कर अदत्त और ४ गुरु अदत्त दान । २-क्रोधवशतः दान, क्रोधमें आकर दिया गया दान । अदत्ता (सं० स्त्री०) १ अविवाहिता, जिस लड़की- ३-शोकके समयका दान, जो दान दुःखमें किया गया का विवाह न हुआ हो। (वि.) २ जो न दो हो। ४-उत्कोच, रिशवत। ५–परिहासका दान ; गई हो। जो दान हंसी करके दिया जाय । ६ व्यत्यास दान, अदत्तादायिन् (स• त्रि०) अदत्त-आ-दा-णिनि ; दूसरेसे पाये हुए दानका दान। ७–छलपूर्वक दान, अदत्तमादत्ते, ६-तत् । अदत्त सम्पत्तिका ग्राहक, चोर। धोखका दान। ८-बालक कर्तृक दान, जो दान अदन (सं० त्रि०) अद-अनन् वाहुल । अदनीय, लड़का किसीको दे। सोलह वर्षको अवस्था न खाद्य, खानेके योग्य । होनेसे किसीको भी पैटक सम्पत्तिका अधिकार नहीं। अदत्रया (वै० अव्य.) भेटको भांति नहीं। इसलिये सोलह वर्षसे जिसको अवस्था कम हो, अदत्वा (स अव्य०) न देकर, बिना दिये हुए। उसका दान सिद्ध नहीं होता। -मूढ़ व्यक्ति कर्तृक अदद (अ० पु० ) १ संख्या, शुमार। २ अङ्क, दान; बेवकूफ़का दिया हुआ दान । १०–अखाधौन संख्या लिखनेका चिह्न । व्यक्तिका दान, जो दान स्वाधीन व्यक्ति न दे। अदाच् (वै० त्रि०) असमञ्चतौति (भट्टोजि ), अदम्-अञ्च- ११-पौड़ित व्यक्तिका दान, बीमारका दान। १२- क्विप् = अदस्-अच। विश्वग्दैवयोश्च टैराजतौ वप्रत्यये। पा श६२, प्रदसी- मादक द्रव्यके सेवनसे मत्त हुए व्यक्तिका दान, जो ऽसादु दो मः। पा ८।२।८०, स्थानेऽन्तरतमः। पा १११।५०, अलो- दान मतवाला करे। १३-वातिकादि रोगसे उन्मत्त ऽन्तास्य । पा १।१।५२ । उसको ओर जाता या झुकता हुआ। व्यक्तिका दान, जो दान पागल करे। १४–प्रतिशोध अदन (सं० लो०) अद्-ल्युट भावे । १ भक्षण, पानकी इच्छासे किया हुआ दान, जो दान बदला भोजन, खाना। कर्मणि ल्युट् । २ भक्षणीय द्रव्य, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> nlqf8efgcvbeahx58n8mtisatk3p7f4 666411 666410 2026-07-08T11:30:18Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 666411 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अदण्ड—अदन'''|'''३१३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> अदण्ड ( स त्रि० ) १ दण्ड के अयोग्य, सज़ाके नाकाविल ; जिसे दण्ड देनेकी व्यव्यस्था न हो । २ कररहित, बेमहसूल । ३ इन्दरहित, मनमौजी । ( क्ली० ) ४ दण्डका अभाव, सज़ाको मुत्राफी । ५ बिना लगानको जमीन, मुआफी । अदण्डनीय ( सं० त्रि० ) अदण्डा, जो दण्ड देनेके योग्य न हो, जिसे सजा देनेका कायदा नहीं । अण्डमान (सं० वि० ) नाकाबिल । दण्डके अयोग्य, सज़ा के अण्डा (सं० त्रि०) न दण्ड-यत्, दण्डं शास्तिं नार्हति । दण्डके अयोग्य, जिसे सजा दो न जा सके । अदत् (स ं० त्रि० ) दन्तरहित, वेदांत । अदत्त (सं० पु० ) न-दा-त ; नञ्-तत् । यत्पुन- रन्यायेन दत्तं तददत्तम् । १ अन्याय से दिया गया, जो न्यायसे दिया न गया हो । २ न दिया हुआ । ३ विवाह में न दिया गया । शास्त्रकारोंने सोलह प्रकार के दानको अदत्त बतलाया है । यथा, - १- भयप्रयुक्त दान, जो दान डरसे दिया जाय । २ - क्रोधवशतः दान, क्रोधमें आकर दिया गया दान । ३- शोकके समयका दान, जो दान दुःखमें किया गया हो । ४—उत्कोच, रिशवत । ५ – परिहासका दान ; जो दान हंसी करके दिया जाय । ६—व्यत्यास दान, दूसरेसे पाये हुए दानका दान । ७ – छलपूर्वक दान, धोखेका दान | ८–बालक कर्तृक दान, जो दान लड़का किसीको दे। सोलह वर्षको अवस्था न होनेसे किसीको भी पैतृक सम्पत्तिका अधिकार नहीं । इसलिये सोलह वर्ष से जिसको अवस्था कम हो, उसका दान सिद्ध नहीं होता । - मूढ़ व्यक्ति कर्तृक दान, बेवकूफका दिया हुआ दान । १० – अखाधौन व्यक्तिका दान, जो दान स्वाधीन व्यक्ति न दे। .११ - पीड़ित व्यक्तिका दान, बीमारका दान । १२- मादक द्रव्य के सेवन से मत्त हुए व्यक्तिका दान, जो दान मतवाला करे । १३ – वातिकादि रोगसे उन्मत्त व्यक्तिका दान, जो दान पागल करे । १४ - प्रतिशोध पानेको इच्छा से किया हुआ दान, जो दान बदला ३१३ पानेको इच्छासे दिया जाय । १५ – छलीको दिया हुआ दान । जो व्यक्ति वेद नहीं पाढ़ा, किन्तु अपनेको यदि वेदज्ञ बताकर दान ले, तो ऐसा दान असिद्ध होता है । १६ - यागादिके लिये पाई वस्तुका द्यूतादि कुकर्मो में दान । जो व्यक्ति इस प्रकार अवैध दान करता या लेता, शास्त्रकारोंने उसके दण्डविधानको अनुमति दी है, "गृहत्यदत्तं वो लोभात् यचादेयं प्रयच्छति । अदेय दायको दण्डप्रस्तथा दत्तप्रतीच्छुक: ॥” ( मिताचरा ) 'जो अन्याय दान करता और लोभपरतन्त्र होकर जो वह अन्याय दान लेता है, वह अदेयदानकर्ता और उस दानका ग्रहणेच्छु व्यक्ति दोनो दण्डनीय होते हैं ।' (सं० क्लो० ) न दिया हुआ दान, ज़बरदस्ती या चोरोसे पाई हुई चौज़। जैनशास्त्रा- चार्यों में कोई इसके तोन और कोई चार भेद बताते हैं । जैसे, — १ द्रव्यादत्त, २ भावादत्त और ३ द्रव्य- भावादत्त, एवं १ स्वामी अदत्त, २ जीव अदत्त, ३‍ तीर्थङ्कर अदत्त और ४ गुरु अदत्त दान । अदत्तदान अदत्ता (स ं॰ स्त्री॰ ) १ अविवाहिता, जिस लड़की- का विवाह न हुआ हो । ( वि०) २ जो न दौ गई हो । अदत्तादायिन् (सं० त्रि० ) अदत्त आ-दा- णिनि ; अदत्तमादत्ते, ६-तत् । अदत्त सम्पत्तिका ग्राहक, चोर । अदव (सं० त्रि० ) अद-अत्रन् वाहुल० । अदनीय, खाद्य, खानेके योग्य । अदा (वै० अव्य० ) अदत्वा भेंटकी भांति नहीं । ( सं ० अव्य० ) न देकर, बिना दिये हुए । अदद ( ० पु० ) १ संख्या, शुमार । २ अङ्क, संख्या लिखनेका चिह्न । अदयञ्ञ् (वै० त्रि०) श्रमुमञ्चतीति ( भट्टोजि ), श्रदस्-श्रञ्च- क्विप्=अदस्-अच्। विश्वग्देवयोश्च टेरयुञ्चतौ वप्रत्यये । पादशहर, अदसो - सेर्दा दो मः । पापारा८०, स्थानेऽन्तरतमः । पा१|१|५०, अलो- ऽन्तास्य । पा १।१।५२। उसकी ओर जाता या झुकता हुआ । अदन (सं० क्लो० ) अद-ल्युट् भावे । १ भक्षण, भोजन, खाना । कर्मणि ल्युट् । २ भक्षणीय द्रव्य,<noinclude></noinclude> jd21lzox57dnk92qyvl05jmv3gwsgi5 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/७ 250 101964 666294 367236 2026-07-07T16:30:27Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 666294 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>​{{rh||'''कपिवकत्र-कपिस्थल'''|'''७'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|कपिध्वज (सं० पु०) कपिर्वानरध्वजे यस्येति यद्वा, बहुव्री०। १ देवर्षि नारद। महाभारतमें नारदके वानरमुख होनेपर इस प्रकार लिखा,— किसी समय देवर्षि नारद और उनके भागिनेय पर्वत ऋषि इस लोकमें या मनुष्योंके साथ एकत्र रहनेकी विचार किया। फिर दोनों ऋषियोंने छद्मवेष धारणकर राजा द्रौपदीकी कन्या दमयन्तीके पास पहुँचे थे। (स्वयं) इच्छा वर्तमान नाम रूपसे है। यह मेदिनीपुरके दक्षिणभागमें प्रवाहित होकर सागरमें जा गिरी है। ४ पिशाचोंकी माता। यह यक्षोंकी एक पुरी रही।}} {{outdent|कपिध्वज (सं० पु०) पाश्चात्यकच्छ, धान्यका पेड़।}} {{outdent|कपिञ्जिका, कपिञ्ज देखौ।}} {{outdent|कपिञ्जल (सं० पु०) कपीनां कपिशेण वत वक्षी, मयूरमध्यपदलो। गजपिप्पली, गजयीपर। २ कपिञ्जल, कैथीका पेड़।}} {{outdent|कपितास (सं० पु०) पारिजातवृक्ष, किसी वृक्षके रोपणका पेड़।}} {{outdent|कपिलोचन (सं० क्ली०) मरिच, मिर्च।}} {{outdent|कपिरोचि, कपिरोचन देखो।}} {{outdent|कपिलोग (सं० स्त्री०) वृक्षविशेष्योल, देवांचा वृक्ष।}} {{outdent|कपिवृक्ष (सं० पु०) पारिजातवृक्ष, किसी वृक्षका रोपन।}} {{outdent|कपिश (सं० पु०) कपिः वर्णविशेष्यः; कपिस नाम वा भट्स्या, कपि-श। <Small>सेणपिपल्यादिप्राणिगः मनेवषः। वा श्यस्तम।</small> <Small>५|२|१००|१</Small> श्यामावर्ष, मटमैला रंग। यह कृष्ण एवं पीत उभय वर्ण मिलनेसे बनता है। २ शिवइस नाम मनेद्रय, नोमान। ३ द्वापरसमय, चतुरी अदश। "कस्स न गकाद पविसं नियमत:।" (नाम)}} {{outdent|कपिश (वि०) ६ सच्छिमवर्णयुक्त, मटमैला।}} {{outdent|कपिशा (सं० स्त्री०) जचिम-टापू। १ सुरा, मराव। २ सायमीलता, चमेली। ३ नदीविशेष, एक दरबा। रघुराजा इसी नदीको पारकर उत्कच्च पहुँचे थे। (स्वयं) इच्छा वर्तमान नाम रूपसे है। यह मेदिनीपुरके दक्षिणभागमें प्रवाहित होकर वंगोप- सागरमें जा गिरी है। ४ पिशाचोंकी माता। यह यक्षोंकी एक पुरी रही।}} {{outdent|कपिश्रासन (सं० पु०) कपीनां ध्वजार्थे कपिप्रयुक्तं वा धर्मार्थं वस्त्र, बहुव्री०। मित्र।}} {{outdent|कपिशाचुल (सं० पु०) कपिशाचा: मद्योन्मत्ताप: पिशाच्चा: पुरुष: ६-तत्। पिशाच, शैतान।}} {{outdent|कपिलायन (सं० पु०) १ देवता। २ मद्यविशेष, किसी विल्वाको मराव। यह कपिश दैत्यमें चक्षुरसे बनायी जाती है।}} {{outdent|कपिलिका, कपिलिका देखौ।}} {{outdent|कपिलोवा (सं० स्त्री०) कपिय कार्ये वायुधकालू कंकुच् टाप् च। मद्यविशेष, किसी विल्वाकी मराव।}} {{outdent|कपिशीर्ष (सं० क्ली०) कपीनां प्रियं शीर्ष प्राका- रादीनां चयप्रदेश, मयूरपदवी। प्राकोरादिका अग्रभाग, दौवारका सिरा।}} {{outdent|कपिशीर्षक (सं० क्ली०) कपीनां मौर्य वर्षवत् कायति प्रकाशते, कपिशीर्ष-क-क। १ दिलुच, मित्ररण, ईसुर। २ प्राचीरादिका अग्रभाग, दौवारका सिरा।}} {{outdent|कपिशोर्षानी (सं० स्त्री०) वादिलविशेष, किसी विल्वाका बाला।}} {{outdent|कपिसल (सं० पु०) पक्षिविशेष, वाविप्रय देखौ।}} {{outdent|कपिस्कन्ध (सं० पु०) कपीनां स्कन्ध इव स्कन्धो यस्य, मयूरमध्यपदलो। दानवविशेष। (हरिवंश)}} {{outdent|कपिहस्त (सं० स्त्री०) कपीनां हस्तं पाखासम्, ६-तत्।}}<noinclude></noinclude> 0vhahm2w4bksh7nc2bcur22k1dznyrk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/६२२ 250 102340 666033 367617 2026-07-07T15:45:18Z शीतल सिन्हा 2068 666033 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh||कादिर-कानगीः| ६२५}}</noinclude>काशिपुर-काशिप्रशांदघोष दुर्गका भग्नावशेष जंगलसे भरा है। पूर्वदिक् व्यतीत की थी। १६२७० को उन्होंने एक अंगरेजी पक्ष तीन तरफ खाई है। उत्तरपचिम और दक्षिणपश्चिम faut "The young poet's first attempt" for दोनों दिक् दो स्थानपर दो प्रवेशद्वारका चि वत भारत-इतिहास (History of British India..) माम है। दुर्गसे ४०० हाथ पूर्व ज्वालादेवी वा उन्न को उन्होंने बहुत पच्छी समालोचना परेजीम यिनी देवीका मन्दिर है । छोटे छोटे मन्दिरमें नाग बनायी थी। वह गवरनमेण्ट गजट और एशियाटिक, नाथ भूतेश्वर, मुक्त खर, और यने खरको मूर्ति हैं। जरनल में प्रकाशित हुयी। वह आधुनिक समझ पड़ते हैं। पुरातन मन्दिर प्रायः कालेज छोड़ समसामयिक पत्र में अङ्गारेजौके पक्ष मृत्तिकास्तूप पर निर्मित है। इस प्रकारके अनेक लिखने लगे। उनको देख अङ्गारेज लोग भी मुग्ध हों खूप है। उनमें टुग को उत्तर दिक् प्राचौरके भीतर जाते थे। १८२० और १८३.ई. के मध्य ही उन्होंने अधिकांश पद्य बनाये। उनके "Hindu Festivals" एक प्रकाण्ड स्तूप देख पड़ता है। उसे लोग भीमको गदा' कहते हैं । ज्यालादेवी मन्दिरको पूर्वदिक का नामक अगरेजी काव्य में दशहरा, सुतेकी झांकी, स्तूप रामगिर गोसाई का टीला' कहाता है। जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, कोजागर-पूर्णिमा, श्यामापूजा, अष्टादश यताब्दक शेष भाग नन्दराम नामक कार्तिकपूजा, गमयात्रा, श्रीपञ्चमी, दोलयात्रा और एक व्यक्ति काशिपुरके शासनकर्ता रहे । उसी समय अक्षयतृतीयादिका इतिहास तथा उत्सव वर्णित है। उन्होंने स्वाधीनताका अवलम्बन किया। उनके मृत कप्तान रिचार्डसनने उनको बहुत प्रशसा की है। पुत्र शिवशालके राजत्वकाल काधिपुर अंगरेजोंके पर्मण्ड एलियट नामक किसी अङ्गारेजने “Views अधिकारमें गया। अंगरेजॉने काशिपुरके राजाको from India and China." नामक नुस्तकमें काशि- मजिष्ट्रेटको क्षमता प्रदान कर रखी है प्रसादको अङ्गारेजोंसे भी बढ कर कवि बताया है। : काशिपुरमें एक दातव्य चिकित्सालय है । वह. गद्यमें उन्होंने निम्नलिखित पुस्तक बनाये थे,- सूतका मोटा कपड़ा बनता है, जो स्थानान्तरमें जाकर 1. Memory of Indian Dynasties containing विकता है। ( a )The Scindiah of Gwalior. (b) King of काथिपुर-बङ्गालके २४ परगनेका एक गण्डग्राम। Lucknow. (c) The Holkar of Indore. (d) वह भागीरथीके तौर कक्षकलेके निकट अवस्थित है। The Nawab of Hyrabad. (e) The Giakwar काधिपुरमें गोचागोली बनानेका एक सरकारी कार of Baroda. (f) The Bhonslah of Nagpore. बामा है। भगवती सर्वमहाला तथा चित्रीका (४) The Nawab of Bhopal. मन्दिर भी वहां बना है। 2. Sketches of Runjeet Singh. काशिपुरी (सं• सी.) काशिदेशीयपुरी, मध्यप 3. of King of Oudh. काशी, बानारस। (भारत पनुशा. १५.) 4. On Bengali poetry. काशिप्रसाद धोष-कलकत्ते के एक विख्यात पन्थ 5. On Bengali works and writers. कार | उनके पिताका शिवप्रसाद पौर पितामहका 6. The Vision-a tale. (उपन्यास) नाम तुलसीराम था! ईष्टइण्डिया कम्पनीके अधीन १८४५/४६ को उन्होंने सनांची रह तुलसीरामने प्रचुर अथै उपार्जन किया। Intelligencer " नामक एक बड़ा साप्ताहिक पत्र १८.८ ई. को ५ वी अगस्त को उन्होंने जन्म लिया प्रकाशित किया था। वह स्वयं उसके खलाधिकारी था। १२ वर्षके वयसमें उनको अक्षरपरिचय मात्र हुवा। और सम्पादक रहे । १२ वर्ष तक उक्त पत्र निकलता १८२१ ई० को वह हिन्दू कालेजमें पढ़ने बैठे। किन्तु ३ वर्ष के मध्य ही उन्होंने पच्छो योग्यता प्राप्त रक्षा, किन्तु १८५८ ई० को बलवे के कारण संघाद- पों के विरुष कानून बमजान बन्द हो गया। Vol. IV 157 "The Tinda<noinclude></noinclude> 3dvq7bk40sfuq6zvp5oklfa69chka20 666152 666033 2026-07-07T16:05:31Z शीतल सिन्हा 2068 666152 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh||काशिपुर-काशिप्रशांदघोष| ६२५}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> दुर्गका भग्नावशेष जंगलसे भरा है। पूर्वदिक् व्यतीत तीन तरफ खाई है। उत्तरपचिम और दक्षिणपश्चिम दोनों दिक् दो स्थानपर दो प्रवेशद्वारका चिन्ह वर्तमान है। दुर्गसे ४०० हाथ पूर्व ज्वालादेवी वा उज्ज यिनी देवीका मन्दिर है । छोटे छोटे मन्दिरमें नाग नाथ भूतेश्वर, मुक्तेश्वर और योज्ञेश्वर मूर्ति हैं। भारत-इतिहास की थी। १६२७० को उन्होंने एक अंगरेजी पक्ष faut "The young poet's first attempt" for (History of British India..) को उन्होंने बहुत पच्छी समालोचना परेजीम बनायी थी। वह गवरनमेण्ट गजट और एशियाटिक जरनल में प्रकाशित हुयी। वह आधुनिक समझ पड़ते हैं। पुरातन मन्दिर प्रायः कालेज छोड़ समसामयिक पत्र में अङ्गारेजौके पक्ष मृत्तिकास्तूप पर निर्मित है। इस प्रकारके अनेक लिखने लगे। उनको देख अङ्गारेज लोग भी मुग्ध हों खूप है। उनमें टुग को उत्तर दिक् प्राचौरके भीतर जाते थे। १८२० और १८३.ई. के मध्य ही उन्होंने अधिकांश पद्य बनाये। उनके "Hindu Festivals" एक प्रकाण्ड स्तूप देख पड़ता है। उसे लोग भीमको गदा' कहते हैं । ज्यालादेवी मन्दिरको पूर्वदिक का नामक अगरेजी काव्य में दशहरा, सुतेकी झांकी, स्तूप रामगिर गोसाई का टीला' कहाता है। जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, कोजागर-पूर्णिमा, श्यामापूजा, अष्टादश यताब्दक शेष भाग नन्दराम नामक कार्तिकपूजा, गमयात्रा, श्रीपञ्चमी, दोलयात्रा और एक व्यक्ति काशिपुरके शासनकर्ता रहे । उसी समय अक्षयतृतीयादिका इतिहास तथा उत्सव वर्णित है। उन्होंने स्वाधीनताका अवलम्बन किया। उनके मृत कप्तान रिचार्डसनने उनको बहुत प्रशसा की है। पुत्र शिवशालके राजत्वकाल काधिपुर अंगरेजोंके पर्मण्ड एलियट नामक किसी अङ्गारेजने “Views अधिकारमें गया। अंगरेजॉने काशिपुरके राजाको from India and China." नामक नुस्तकमें काशि- मजिष्ट्रेटको क्षमता प्रदान कर रखी है प्रसादको अङ्गारेजोंसे भी बढ कर कवि बताया है। : काशिपुरमें एक दातव्य चिकित्सालय है । वह. गद्यमें उन्होंने निम्नलिखित पुस्तक बनाये थे,- सूतका मोटा कपड़ा बनता है, जो स्थानान्तरमें जाकर 1. Memory of Indian Dynasties containing विकता है। ( a )The Scindiah of Gwalior. (b) King of काथिपुर-बङ्गालके २४ परगनेका एक गण्डग्राम। Lucknow. (c) The Holkar of Indore. (d) वह भागीरथीके तौर कक्षकलेके निकट अवस्थित है। The Nawab of Hyrabad. (e) The Giakwar काधिपुरमें गोचागोली बनानेका एक सरकारी कार of Baroda. (f) The Bhonslah of Nagpore. बामा है। भगवती सर्वमहाला तथा चित्रीका (४) The Nawab of Bhopal. मन्दिर भी वहां बना है। 2. Sketches of Runjeet Singh. काशिपुरी (सं• सी.) काशिदेशीयपुरी, मध्यप 3. of King of Oudh. काशी, बानारस। (भारत पनुशा. १५.) 4. On Bengali poetry. काशिप्रसाद धोष-कलकत्ते के एक विख्यात पन्थ 5. On Bengali works and writers. कार | उनके पिताका शिवप्रसाद पौर पितामहका 6. The Vision-a tale. (उपन्यास) नाम तुलसीराम था! ईष्टइण्डिया कम्पनीके अधीन १८४५/४६ को उन्होंने सनांची रह तुलसीरामने प्रचुर अथै उपार्जन किया। Intelligencer " नामक एक बड़ा साप्ताहिक पत्र १८.८ ई. को ५ वी अगस्त को उन्होंने जन्म लिया प्रकाशित किया था। वह स्वयं उसके खलाधिकारी था। १२ वर्षके वयसमें उनको अक्षरपरिचय मात्र हुवा। और सम्पादक रहे । १२ वर्ष तक उक्त पत्र निकलता १८२१ ई० को वह हिन्दू कालेजमें पढ़ने बैठे। किन्तु ३ वर्ष के मध्य ही उन्होंने पच्छो योग्यता प्राप्त रक्षा, किन्तु १८५८ ई० को बलवे के कारण संघाद- पों के विरुष कानून बमजान बन्द हो गया। Vol. IV 157 "The Tinda<noinclude></noinclude> rfudv8qn2flrv4knd5e69ifczit13yq 666162 666152 2026-07-07T16:07:20Z शीतल सिन्हा 2068 666162 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh||कादिर-कानगीः| ६२५}}</noinclude>काशिपुर-काशिप्रशांदघोष दुर्गका भग्नावशेष जंगलसे भरा है। पूर्वदिक् व्यतीत की थी। १६२७० को उन्होंने एक अंगरेजी पक्ष तीन तरफ खाई है। उत्तरपचिम और दक्षिणपश्चिम faut "The young poet's first attempt" for दोनों दिक् दो स्थानपर दो प्रवेशद्वारका चि वत भारत-इतिहास (History of British India..) माम है। दुर्गसे ४०० हाथ पूर्व ज्वालादेवी वा उन्न को उन्होंने बहुत पच्छी समालोचना परेजीम यिनी देवीका मन्दिर है । छोटे छोटे मन्दिरमें नाग बनायी थी। वह गवरनमेण्ट गजट और एशियाटिक, नाथ भूतेश्वर, मुक्त खर, और यने खरको मूर्ति हैं। जरनल में प्रकाशित हुयी। वह आधुनिक समझ पड़ते हैं। पुरातन मन्दिर प्रायः कालेज छोड़ समसामयिक पत्र में अङ्गारेजौके पक्ष मृत्तिकास्तूप पर निर्मित है। इस प्रकारके अनेक लिखने लगे। उनको देख अङ्गारेज लोग भी मुग्ध हों खूप है। उनमें टुग को उत्तर दिक् प्राचौरके भीतर जाते थे। १८२० और १८३.ई. के मध्य ही उन्होंने अधिकांश पद्य बनाये। उनके "Hindu Festivals" एक प्रकाण्ड स्तूप देख पड़ता है। उसे लोग भीमको गदा' कहते हैं । ज्यालादेवी मन्दिरको पूर्वदिक का नामक अगरेजी काव्य में दशहरा, सुतेकी झांकी, स्तूप रामगिर गोसाई का टीला' कहाता है। जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, कोजागर-पूर्णिमा, श्यामापूजा, अष्टादश यताब्दक शेष भाग नन्दराम नामक कार्तिकपूजा, गमयात्रा, श्रीपञ्चमी, दोलयात्रा और एक व्यक्ति काशिपुरके शासनकर्ता रहे । उसी समय अक्षयतृतीयादिका इतिहास तथा उत्सव वर्णित है। उन्होंने स्वाधीनताका अवलम्बन किया। उनके मृत कप्तान रिचार्डसनने उनको बहुत प्रशसा की है। पुत्र शिवशालके राजत्वकाल काधिपुर अंगरेजोंके पर्मण्ड एलियट नामक किसी अङ्गारेजने “Views अधिकारमें गया। अंगरेजॉने काशिपुरके राजाको from India and China." नामक नुस्तकमें काशि- मजिष्ट्रेटको क्षमता प्रदान कर रखी है प्रसादको अङ्गारेजोंसे भी बढ कर कवि बताया है। : काशिपुरमें एक दातव्य चिकित्सालय है । वह. गद्यमें उन्होंने निम्नलिखित पुस्तक बनाये थे,- सूतका मोटा कपड़ा बनता है, जो स्थानान्तरमें जाकर 1. Memory of Indian Dynasties containing विकता है। ( a )The Scindiah of Gwalior. (b) King of काथिपुर-बङ्गालके २४ परगनेका एक गण्डग्राम। Lucknow. (c) The Holkar of Indore. (d) वह भागीरथीके तौर कक्षकलेके निकट अवस्थित है। The Nawab of Hyrabad. (e) The Giakwar काधिपुरमें गोचागोली बनानेका एक सरकारी कार of Baroda. (f) The Bhonslah of Nagpore. बामा है। भगवती सर्वमहाला तथा चित्रीका (४) The Nawab of Bhopal. मन्दिर भी वहां बना है। 2. Sketches of Runjeet Singh. काशिपुरी (सं• सी.) काशिदेशीयपुरी, मध्यप 3. of King of Oudh. काशी, बानारस। (भारत पनुशा. १५.) 4. On Bengali poetry. काशिप्रसाद धोष-कलकत्ते के एक विख्यात पन्थ 5. On Bengali works and writers. कार | उनके पिताका शिवप्रसाद पौर पितामहका 6. The Vision-a tale. (उपन्यास) नाम तुलसीराम था! ईष्टइण्डिया कम्पनीके अधीन १८४५/४६ को उन्होंने सनांची रह तुलसीरामने प्रचुर अथै उपार्जन किया। Intelligencer " नामक एक बड़ा साप्ताहिक पत्र १८.८ ई. को ५ वी अगस्त को उन्होंने जन्म लिया प्रकाशित किया था। वह स्वयं उसके खलाधिकारी था। १२ वर्षके वयसमें उनको अक्षरपरिचय मात्र हुवा। और सम्पादक रहे । १२ वर्ष तक उक्त पत्र निकलता १८२१ ई० को वह हिन्दू कालेजमें पढ़ने बैठे। किन्तु ३ वर्ष के मध्य ही उन्होंने पच्छो योग्यता प्राप्त रक्षा, किन्तु १८५८ ई० को बलवे के कारण संघाद- पों के विरुष कानून बमजान बन्द हो गया। Vol. IV 157 "The Tinda<noinclude></noinclude> 3dvq7bk40sfuq6zvp5oklfa69chka20 666199 666162 2026-07-07T16:13:56Z शीतल सिन्हा 2068 666199 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh||कादिर-कानगीः| ६२५}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> दुर्गका भग्नावशेष जंगलसे भरा है। पूर्वदिक् व्यतीत की थी। तीन तरफ खाई है। उत्तरपचिम और दक्षिणपश्चिम दोनों दिक् दो स्थानपर दो प्रवेशद्वारका चि वत माम है। दुर्गसे ४०० हाथ पूर्व ज्वालादेवी वा उन्न यिनी देवीका मन्दिर है । छोटे छोटे मन्दिरमें नाग नाथ भूतेश्वर, मुक्त खर, और यने खरको मूर्ति हैं। नाथ भूतेश्वर, मुक्त खर, और यने खरको मूर्ति हैं। १६२७० को उन्होंने एक अंगरेजी पक्ष faut "The young poet's first attempt" for भारत-इतिहास (History of British India..) को उन्होंने बहुत पच्छी समालोचना परेजीम बनायी थी। वह गवरनमेण्ट गजट और एशियाटिक, जरनल में प्रकाशित हुयी। वह आधुनिक समझ पड़ते हैं। पुरातन मन्दिर प्रायः कालेज छोड़ समसामयिक पत्र में अङ्गारेजौके पक्ष मृत्तिकास्तूप पर निर्मित है। इस प्रकारके अनेक लिखने लगे। उनको देख अङ्गारेज लोग भी मुग्ध हों खूप है। उनमें टुग को उत्तर दिक् प्राचौरके भीतर जाते थे। १८२० और १८३.ई. के मध्य ही उन्होंने अधिकांश पद्य बनाये। उनके "Hindu Festivals" एक प्रकाण्ड स्तूप देख पड़ता है। उसे लोग भीमको गदा' कहते हैं । ज्यालादेवी मन्दिरको पूर्वदिक का नामक अगरेजी काव्य में दशहरा, सुतेकी झांकी, स्तूप रामगिर गोसाई का टीला' कहाता है। जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, कोजागर-पूर्णिमा, श्यामापूजा, अष्टादश यताब्दक शेष भाग नन्दराम नामक कार्तिकपूजा, गमयात्रा, श्रीपञ्चमी, दोलयात्रा और एक व्यक्ति काशिपुरके शासनकर्ता रहे । उसी समय अक्षयतृतीयादिका इतिहास तथा उत्सव वर्णित है। उन्होंने स्वाधीनताका अवलम्बन किया। उनके मृत कप्तान रिचार्डसनने उनको बहुत प्रशसा की है। पुत्र शिवशालके राजत्वकाल काधिपुर अंगरेजोंके पर्मण्ड एलियट नामक किसी अङ्गारेजने “Views अधिकारमें गया। अंगरेजॉने काशिपुरके राजाको from India and China." नामक नुस्तकमें काशि- मजिष्ट्रेटको क्षमता प्रदान कर रखी है प्रसादको अङ्गारेजोंसे भी बढ कर कवि बताया है। : काशिपुरमें एक दातव्य चिकित्सालय है । वह. गद्यमें उन्होंने निम्नलिखित पुस्तक बनाये थे,- सूतका मोटा कपड़ा बनता है, जो स्थानान्तरमें जाकर 1. Memory of Indian Dynasties containing विकता है। ( a )The Scindiah of Gwalior. (b) King of काथिपुर-बङ्गालके २४ परगनेका एक गण्डग्राम। Lucknow. (c) The Holkar of Indore. (d) वह भागीरथीके तौर कक्षकलेके निकट अवस्थित है। The Nawab of Hyrabad. (e) The Giakwar काधिपुरमें गोचागोली बनानेका एक सरकारी कार of Baroda. (f) The Bhonslah of Nagpore. बामा है। भगवती सर्वमहाला तथा चित्रीका (४) The Nawab of Bhopal. मन्दिर भी वहां बना है। 2. Sketches of Runjeet Singh. काशिपुरी (सं• सी.) काशिदेशीयपुरी, मध्यप 3. of King of Oudh. काशी, बानारस। (भारत पनुशा. १५.) 4. On Bengali poetry. काशिप्रसाद धोष-कलकत्ते के एक विख्यात पन्थ 5. On Bengali works and writers. कार | उनके पिताका शिवप्रसाद पौर पितामहका 6. The Vision-a tale. (उपन्यास) नाम तुलसीराम था! ईष्टइण्डिया कम्पनीके अधीन १८४५/४६ को उन्होंने सनांची रह तुलसीरामने प्रचुर अथै उपार्जन किया। Intelligencer " नामक एक बड़ा साप्ताहिक पत्र १८.८ ई. को ५ वी अगस्त को उन्होंने जन्म लिया प्रकाशित किया था। वह स्वयं उसके खलाधिकारी था। १२ वर्षके वयसमें उनको अक्षरपरिचय मात्र हुवा। और सम्पादक रहे । १२ वर्ष तक उक्त पत्र निकलता १८२१ ई० को वह हिन्दू कालेजमें पढ़ने बैठे। किन्तु ३ वर्ष के मध्य ही उन्होंने पच्छो योग्यता प्राप्त रक्षा, किन्तु १८५८ ई० को बलवे के कारण संघाद- पों के विरुष कानून बमजान बन्द हो गया। Vol. IV 157 "The Tinda<noinclude></noinclude> 4qebjiix8k2nm8n0povy6oxe3v8yp6h पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२४९ 250 105302 666406 664753 2026-07-08T09:49:39Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 666406 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{Rh|२५०|कवचपन-कवर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>रका पेड़। ५ त्वक, दारचीनी। ६ भूर्जपत्र, भोज-पत्र ७ नन्दीक्ष, वेलिया पीपर। ८ डिण्डिमवाद्य, डड़्का, नकारा। ९ प्राचीन जातिभेद। <small>कोष देखो।</small><br> <br>कवचपत्र (सं॰ क्ली॰) कवचलेखनसाधनं पत्रमित्र पत्र वल्कलें यस्य, बहुव्री॰। भूर्जपत्र, भोजपत्र।<br> <br>कवचपाश (वै॰ पु॰) कवच व वर्मबन्ध, ज़िरह बांधनेका पट्टा।<br> <small>(अधसंहिता)<br></small> <br>कवचहर (सं॰ पु॰) कवचं हरति येन वयमा, कवच है अच्। १ कवच इरणका उद्यम करनेके उपयुक्त वयस्क बालक, लड़का, बच्चा। (त्रि॰) २ कवचधारी, जिरह पहननेवाला। ३ कवचका यन्त्र धारण करने वाला, जो तावीज पहने हो। ३ कूर्पासकधारी, मिरजाई पहने हुवा।<br> <br>कवचित (संये त्रि॰) कवर्ष सञ्जालमस्थ, अवच इतन्। कवचयुका, जिरह पहने हुवा।<br> <br>कवची (त्रि॰) कवचं अस्त्यस्य, कवच इनि। १ वर्मयुक्त, जिरह पहने हुवा। (पु॰) २ घृतराष्ट्रके एक पुत्र। <small>(महाभारत १।११०११)</small> शिव, महादेव।<br> <br>कवचीयन्त्र (सं॰ क्ली॰) औषधक पाकार्य यन्त्र विशेष, दवा पकानेका एक धाला। किसी दृढ़ काचकूपी (शीशी) का यह बनता है। कूपी न तो अतिइख और अतिदीर्घ रहना चाहिये। पहले इसे कर्द-मात (भीगे) वस्त्रसे अच्छीतरह लपेट पीछे मुदु मृत्तिकाका लेप चढ़ाते हैं। फिर धूममें कूपी सुखायी जाती है। अन्तको इसमें औषध रख मुख बन्द कर देते हैं। इसी प्रकार कठिन और दृढ़ अग्निमें पक्ष सकनेवाली कूपीका नाम कवचीयन्त्र है। <small>(अनेयसं)</small> <br> <br>कवटी (सं॰ स्त्री॰) कौति शब्दायते, कु-अटन ङीम्। कवाट, किवाड़ी।<br> <br>कवड़ (सं॰ पु॰) केन जलेन वलते चलति, क-वल-अच् लड़योरैक्यम्। १ ग्रास, लुकमा, कौर। २ गण्डष,कुल्ला।<br> <br>कवड़ग्रह (सं॰ पु॰) कर्प, २ तोलेकी तौल।<br> <br>कवती (सं॰ स्त्री॰) कशब्द प्रस्त्यस्य, क-मतुप-ङीम् मस्वव:। 'कयानपिन' इत्यादि ऋक्-विशेष, जो ऋचा 'क' से शुरू हो।<br> {{Multicol-break}} <br>कवत् (वै॰ त्रि॰) १. स्वार्थपर, मतलबी। २. मन्द-कर्म, बुरा काम करनेवाला।<br> {{c|<small>"प्रयति न दैवः कवरे।" (ऋग्॰ ७।३२।९)</small>}} <br>कवन (सं॰ क्ली॰) कौति शब्दायते, कु-ल्युट्। १. जन-पानी। (पु॰) २. शुश्रीकि एक पुत्र। <br>कवन (हि॰) कौन देखो।<br> <br>कवन्तक (सं॰ पु॰) व्यक्तिविशेष, किसी आदमी का नाम। पाणिनि ने इनका उल्लेख किया है।<br> <br><small>कवन्ध कवन्ध देखो।</small><br> <br>कवपथ (सं॰ पु॰) कु पथ, को: कवादेश:। पपिच जन्दसि। ण ६।३।१०८। मन्दपथ, बुरा रास्ता।<br> <br>कवयि, कवयी देखो।<br> <br>कवयी (सं॰ स्त्री॰) कात् अलात् वयते गच्छति, क-वय-इन् डोष्। मत्स्यविशेष, सुभा मछली। इसका संस्कृत पर्याय—कविकापुच्छ और चक्रपटो है। (Coius coloius) पन्याय्य मत्स्यकी अपेक्षा यह जलशून्य स्थानमें अधिक क्षण जी सकती है। इसके तालवृक्षपर चढ़नेका प्रवाद सुन पड़ता है। वस्तुतः यह कर्णदेशस्थ कण्टकके सहारे उच्चस्थान पर चढ़ जाती है। फिर भूमिपर भी कवयी बहुत दूर तक चला करती है। बद्राके यमुन और फरिदपुर जिलेम् यह वृत्ताकार देख पड़ती है। वैद्यक मतसे कवयी मधुर, स्निग्ध, कपाय, रुक्ष, वस्य, ईषत्-पित्तकर और वातज्न होती है।<br> <br>कवर (सं॰ पु॰-स्त्री॰) के मस्तके वरं शोभमानत्वात् चेष्टम्। १ केशपाश, जुल्फा। २ कवरी, वनतुलसी। कु-धरम्। कोवरन॰। उप॰। ६। १५४] ३ पाठक, व्याख्यानदाता। ४ लवण, नमक। ५ प्रम्न, खटाई। (त्रि॰) ६ सख, गुश्छेदार। ७ खुचित, जड़ाज। ८ चित्र वर्ण, चितकबरा। {{block center|<poem><small> "दहे वनिनितकलापमरान्धवात्। व्याकीर्ण मालद्वरां कवरी नलना:॥" (नाथ ५। १८)</small></poem>}} <br>कवर (हिं॰) कौर देखो।<br> <br>कवर (अं॰ पु॰=Cover) १ आच्छादन, पोशिश, गिलाफ़। २ कोष, ढकना। ३ लिफाफा, चिट्ठी।<br> <br>४ पट्ठा, दफती।<br> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> nklzuzq6z9mt4xp28aql4j8m6jip4lu पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३७४ 250 105972 666051 664800 2026-07-07T15:48:13Z शीतल सिन्हा 2068 666051 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कादिर-कानगीः| ३७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} मुंशी बनाया था। इनीने एक दीवान् सिखा है। २वजीर खानका उपनाम। यह पागरेके निवासी रहे। पालमगीर और उनके दोनों उत्तराधिकारी इन्हें बहुत ‘चाहते थे। १७२४ ई में इनकी मृत्यु हुई। इन्होंने एक दीवान बनाया है। ३ बदाऊंवाले अब्दुल कादिरका उपनाम। इन्हें लोग कादिरी भी कहते थे। 'कादिर (सं० लो०) खुदिरसार। कादिर अली- एक मुसलमान पोर । प्रायः सन् ५२७ हिजरीको सौजीस्थानमें इन्दाने जन्मग्रहण किया था। उसके पीछे कुसब-उद-दीनके राज्यकालमें यह पजमेर गये। वहां सैयद हुसेन मशीदीकी कन्यासे इनका विवाह हुवा। ६२८ ई० का यह मर गये। १.२७ हिमरीमें नहांगीर बादशाहने इनकी कनके पास एक सुन्दर मसजिद बनवायी थी। इनके स्मरणार्थ टुकड़ा। इसे हलके भागे कूड चौड़ा करनेको बांधते नगरमें भी एक मसजिद है। मोपला मुसलमान कादिर अलीकी बड़ी बहाभक्ति करते है। ११ वां जमाद-उल-अखीर इनके उत्सवका दिन है। कादिरगच-युवप्रान्तके एटा जिलेका एक गांव । यहां कंकड़के बने एक प्राचीन टुगंका ध्वंसावशेष विद्यमान है। कादिरगक्षम अरबी भाषाको एक शिवालिपि निकली थी। उसमें लिखा है, यह सन् ११०४ हिनरीको आलमगौरके राज्यकालमें राजात खानकी दरगाह बनी थी। कादिरशाह-मालवके एक वादशाह। सम्राट् हुमायूने मानवी अधिकार कर अपने अफसरोंके हाथ छोड़ दिया था। किन्तु उनके आगरे वापिस जाते ही पूर्वसन खिक्षनी रान्यके एक पदाधिकारी मुथु खान्ने बारह मास दिलौके पफसरोंसे लड़ नर्मदा और भेलसा, नगरके बीचका समस्त देश अधिकृत किया तथा 'अपना उपाधि कादिरशाह रख लिया। इन्होंने १५४२ ई० तक राज्य चलाया था। पीछे शेरशाइने मानव अधिकार किया और इनके मन्त्री एवं सम्बन्धी राजा खानको राज्य सौंप दिया। कादिरी-१ शाहजहांक ज्येष्ठ पुत्र याहजादे दारा. मिकीका उपनाम । २ बदाके पन्दु सकादिरका उपनाम। (प.सो.)३ चोची। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कादीहाटी-बालके चौबीसपरंगनेका एक नगर।यह अचा. २२ ३८१०. और देशा..'२९४८"पू. पर पवखित है। साधारण लोग इसे कोदिटो कहते हैं। यहां Crispy ५...मादमी रहते विद्यालय पौर डाकघरको छोड़ कादीहाटीमें अनेक सम्भान्त लोगोंके घर भी बने हैं। काट्वेय (सं.पु.) करोरपत्य पुमान्, कट्ठ-ठक । प्रबादिभाय । पा ४१२२ । १ कट्ठ के पुत्र। शेष, अनन्स,वासुकि, तक्षक, भुजङ्गम और कुलिक 'कावेय'कहाते हैं।७ {{Gap}}२ अर्बुद। ३ कसीर। कान (हिं. पु०)१ कर्ण, गोश । कर्प देखो। २ श्रवण-शक्ति, ताकृत। ३ कन्ना, सकड़ीका एक हैं। ४ स्वर्णालङ्कार विशेष, एक गहना। इसे कानमें पहनते हैं। ५ भद्दा काना। ६ कनेव, चारपायीका टेढ़ापन। ७ पर्सगा। ६ रनकदानी, पियाली। (स्त्री.) कानि देखो। कानक (सं० लो) कनकं फलमिव उग्रं फलं पस्तास्य, कनक भण्। १ पालवीज, जायफल । रामवलमके मतानुसार यह तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, सारक पौर उत्-केदकारक है। २ धुस्तूरवील, धतूरेका वीज । (वि.) {{Gap}}३ कनक सम्बन्धीय, सोने का बना हुवा। कानकर्ण (सं• क्लो॰) औषधविशेष, एक दवा।गुडधूम, यवक्षार, विकटु, पाठा, रसाजन, चव्य, त्रिफला, जारित लौह और चित्रक बराबर बरावर कूटपीस कर छाननेमे यह बनता है। इसे मधुके साथ मुखमैं रखनेसे मुखरोग प्रारोग्य होते हैं। (सारकीसदो) कानगी (हिं. पु.) वृक्षविशेष; एक पेड़। यह कीण देशमें होता है। इसका तेल पोला रहता.पौर दवा बनाने तथा जलाने में लगता है।जायफलसे मिलता है। .. "सेषोऽनन्ती वासुधिर वचकच मुजामः । कूर्मय कुखिवयरकावेयाः प्रशोसिवा". {{Rh|||(महामारव ११)}}<noinclude></noinclude> j8egk7nbhx5tp47gffka5sfjfa9bed6 666056 666051 2026-07-07T15:48:57Z शीतल सिन्हा 2068 [[Special:Contributions/शीतल सिन्हा|शीतल सिन्हा]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|वार्ता]]) द्वारा किए गए बदलाव [[Special:Diff/666051|666051]] को पूर्ववत किया 666056 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कादिर-कानगीः| ३७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} मुंशी बनाया था। इनीने एक दीवान् सिखा है। २वजीर खानका उपनाम। यह पागरेके निवासी रहे। पालमगीर और उनके दोनों उत्तराधिकारी इन्हें बहुत ‘चाहते थे। १७२४ ई में इनकी मृत्यु हुई। इन्होंने एक दीवान बनाया है। ३ बदाऊंवाले अब्दुल कादिरका उपनाम। इन्हें लोग कादिरी भी कहते थे। 'कादिर (सं० लो०) खुदिरसार। कादिर अली एक मुसलमान पोर । प्रायः सन् ५२७ हिजरीको सौजीस्थानमें इन्दाने जन्मग्रहण किया था। उसके पीछे कुसब-उद-दीनके राज्यकालमें यह पजमेर गये। वहां सैयद हुसेन मशीदीकी कन्यासे इनका विवाह हुवा। ६२८ ई० का यह मर गये। १.२७ हिमरीमें नहांगीर बादशाहने इनकी कनके पास एक सुन्दर मसजिद बनवायी थी। इनके स्मरणार्थ टुकड़ा। इसे हलके भागे कूड चौड़ा करनेको बांधते नगरमें भी एक मसजिद है। मोपला मुसलमान कादिर अलीकी बड़ी बहाभक्ति करते है। ११ वां जमाद-उल-अखीर इनके उत्सवका दिन है। कादिरगच-युवप्रान्तके एटा जिलेका एक गांव । यहां कंकड़के बने एक प्राचीन टुगंका ध्वंसावशेष विद्यमान है। कादिरगक्षम अरबी भाषाको एक शिवालिपि निकली थी। उसमें लिखा है, यह सन् ११०४ हिनरीको आलमगौरके राज्यकालमें राजात खानकी दरगाह बनी थी। कादिरशाह-मालवके एक वादशाह। सम्राट् हुमायूने मानवी अधिकार कर अपने अफसरोंके हाथ छोड़ दिया था। किन्तु उनके आगरे वापिस जाते ही पूर्वसन खिक्षनी रान्यके एक पदाधिकारी मुथु खान्ने बारह मास दिलौके पफसरोंसे लड़ नर्मदा और भेलसा, नगरके बीचका समस्त देश अधिकृत किया तथा 'अपना उपाधि कादिरशाह रख लिया। इन्होंने १५४२ ई० तक राज्य चलाया था। पीछे शेरशाइने मानव अधिकार किया और इनके मन्त्री एवं सम्बन्धी राजा खानको राज्य सौंप दिया। कादिरी-१ शाहजहांक ज्येष्ठ पुत्र याहजादे दारा. मिकीका उपनाम । २ बदाके पन्दु सकादिरका उपनाम। (प.सो.)३ चोची। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कादीहाटी-बालके चौबीसपरंगनेका एक नगर।यह अचा. २२ ३८१०. और देशा..'२९४८"पू. पर पवखित है। साधारण लोग इसे कोदिटो कहते हैं। यहां Crispy ५...मादमी रहते विद्यालय पौर डाकघरको छोड़ कादीहाटीमें अनेक सम्भान्त लोगोंके घर भी बने हैं। काट्वेय (सं.पु.) करोरपत्य पुमान्, कट्ठ-ठक । प्रबादिभाय । पा ४१२२ । १ कट्ठ के पुत्र। शेष, अनन्स,वासुकि, तक्षक, भुजङ्गम और कुलिक 'कावेय'कहाते हैं।७ {{Gap}}२ अर्बुद। ३ कसीर। कान (हिं. पु०)१ कर्ण, गोश । कर्प देखो। २ श्रवण-शक्ति, ताकृत। ३ कन्ना, सकड़ीका एक हैं। ४ स्वर्णालङ्कार विशेष, एक गहना। इसे कानमें पहनते हैं। ५ भद्दा काना। ६ कनेव, चारपायीका टेढ़ापन। ७ पर्सगा। ६ रनकदानी, पियाली। (स्त्री.) कानि देखो। कानक (सं० लो) कनकं फलमिव उग्रं फलं पस्तास्य, कनक भण्। १ पालवीज, जायफल । रामवलमके मतानुसार यह तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, सारक पौर उत्-केदकारक है। २ धुस्तूरवील, धतूरेका वीज । (वि.) {{Gap}}३ कनक सम्बन्धीय, सोने का बना हुवा। कानकर्ण (सं• क्लो॰) औषधविशेष, एक दवा।गुडधूम, यवक्षार, विकटु, पाठा, रसाजन, चव्य, त्रिफला, जारित लौह और चित्रक बराबर बरावर कूटपीस कर छाननेमे यह बनता है। इसे मधुके साथ मुखमैं रखनेसे मुखरोग प्रारोग्य होते हैं। (सारकीसदो) कानगी (हिं. पु.) वृक्षविशेष; एक पेड़। यह कीण देशमें होता है। इसका तेल पोला रहता.पौर दवा बनाने तथा जलाने में लगता है।जायफलसे मिलता है। .. "सेषोऽनन्ती वासुधिर वचकच मुजामः । कूर्मय कुखिवयरकावेयाः प्रशोसिवा". {{Rh|||(महामारव ११)}}<noinclude></noinclude> ttn1epds8o6q6q09cxf05y0a2pinxwn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३९९ 250 106292 665867 373152 2026-07-07T15:17:44Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665867 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh| ४oo| काफिर-कफिरस्थान}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कारिडोनिया और फिमौके पापुयां मरमांसभुक् है। फिनीहोपके पापुथा पफरीकाके इटेण्टौकी भांति चूड़ाकार केश वांधते हैं, सानोको भांति करोटी (खोपड़ी) प्रशस्त होती है। नवगिनिके पापुया धार्मिकता, गुरुननधि और प्रातिधेयताके लिये विख्यात हैं। प्रायः सकल मलेमि काफिर स्त्रियों के मध्य व्यभिचारदोष देख नहीं पड़ता। काफिरस्थान भारतवर्षको उत्तरपश्चिम सीमा और हिन्दूकुश पर्वतके मध्यका एक प्रदेश। उसको पश्चिम सौमा अफगानस्तानको अनीमाङ्ग नदी है। पूर्वसौमा कुनार नदी हो सकती है। उस स्थानके अधिवासो! काफिर या सियाहपोश कहलाते हैं। १८८३ ई० पहिले कोई अंगरेज उस प्रदेशमें प्रवेश न कर सका था। सुतरां उसके पहले उसका जो विवरण सुनते, उसपर प्रवत पक्षमें आस्था कैसे चा सकते हैं। प्राचीन अंगरन ऐतिहासिकोंने उस स्थानके सम्बन्धमें जो कुछ लिखा, उसका अधिकांश पार्श्ववर्ती सुसचमानोंसे संग्रह किया था। किन्तु अब सुनते समझते कि मुसलमान उस प्रदेशमें सहज ही घुस नहीं सकते या । घुसना पसन्द नहीं करते। कारण काफिरों से उनकी चिर शत्रुता है। कोई काफिर यदि अपने जीवन किसी उपायसे एक भी मुसलमानको मार नहीं सकता, तो वह खजाति, स्वश्रेणी पौर स्ववंशमें अपदार्थ एवंडेय रहता है.। सुतरां इधर उधर मुस समानीसे उस प्रदेश या.उस जातिका विवरण. ठीक ठीक से मिला होगा। वहां सियाहपोश नामक एक जाति रहती है। कोई. कोई सियापीय जातिक सम्बन्धमें कहता कि वह-पारस्थको गवर जातिको भांति. प्राचार-व्यव हार-विशिष्ट किसी परबी जातिसे उत्पन है। कोई उसे पसेकसन्दरके ग्रीक सैन्धकी औरसोत्पत्र बताते हैं। फिर बिसीके अनुमानमें मुसलमानों का मत फैससे पहले भारतवर्षसे जी सोग पर्वतादिमें सनेलो. समतन उनको खियां बागका काम करती है। हत्बमीतम प्रदेशसे निकाले गये, सियाइयोय उनकी एक बाबहुत पर राते हैं। ... काफिरोंकी भाषा साय परबी, फारसा.या तुर्की. <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भाषाका विन्दुमात्र मी सादृश्य नहीं। हां, महतक साय उसको यथेष्ठ धनिष्ठता पाती है। इष्ठी कारक आधुनिक ऐतिहासिक अरवी या अफगानों की भांति उन्हें विलकुल स्वतन्त्र जाति नहीं मानते। वह भारतीय जातिके ही अन्तर्गत है। केवल देशभेदसे शाफिर स्वतन्त्र हो गये हैं। १८८३ ई के पूर्व वहांका जो विवरण मिशा, उससे समझ पड़ा कि उस देशमें कतार, गम्बौर, देख- हुलज, अरनस, इशरम, अमौसीज, पण्डिन, बैंगन प्रभृति जनपद विद्यमान हैं। १८८३ ई०को मिष्टर डबल्यू म नेयार नामक अंगरेज ही सम्भवत: सर्वप्रथम से उस प्रदेशमें जा सके थे। उन्होंने वहांको लोक संस्था अनुमानसै ६ लाख स्थिर को। प्रति ग्राममें १००से ६०० तक लोग रहते हैं। उनके दैनिक पाचार व्यवहार और प्राति : प्रतिके सम्बन्धमें नानारूप विभिन्न मत मिलते हैं। किसी किसीके कथनानुसार सिपाहपोश देखनमें वनिष्ठं, दृढ़गठित एवं साइसौ रहते भी स्वभाव, सम्पूर्ण विपरीत अर्थात् अवस, विलासी तथा सर्वदा मद्यपायी होते हैं। अफगानस्तानमें अनेक पकड़े में काफिर वसते हैं। उनका शरीर दृढ़ समझ पड़ता है। उनमें युरोपीय गठनके लोग ही अधिक हैं। अशाचों और विडालाचोंको भी काई कमी नहीं। उन्हें पासन बांधकर बैठना कठिन उगता है। काफिर कुरसी पर ही सविधासे बैठ सकते हैं। उनकी स्त्रियां रूपवती और बुद्धिमती होती हैं। वर्ण रसोबच खेत है। अनेक कथनानुसार अतिरिक्ष मद्यपान करनेसे वा रक्तवर्ण, हो गये हैं। यदि उनसे पूछा जाय उन्हें कैसा पानाहार अच्छा लगता है, तोवर मौन कर उठेग-प्रतिदिन एक मटका शराब चाहिये। एक मटके में प्राय: पंद्रह और शराब पाती है। मनयारका विवरब पढ़नेसे समझते.कि काफिर- खानके लोग सुपुरष साहसी.पौर अषित्रीयो । प्रायः प्रति सम्या ब-गौतादिमें बीततो है। उनमें पानासह वा पवित्रा<noinclude></noinclude> kauz1qp69d0xbksha7dxoiwmmyfqi57 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४०० 250 106293 665988 373153 2026-07-07T15:37:35Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 665988 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||काफिरस्थान|४०९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} जनित रकपात नहीं होता। मुससमानोंसे इनका सर्पनकुन सम्बन्ध है। एक दूसरेको देखते ही युज किड़ नाता है। अंगरेजों के साथ इनका कोई विवाद नहीं। इनमें दासत्वप्रथा और दासव्यवसाय विद्य मान है। किन्तु समझ पड़ता है कि वह यीघ्र ही छुट जायगा। यह प्रायः बहु विवाह नहीं करते। स्त्रीको व्यभिचार दोषमें सामान्य दण्ड मिलता है, किन्तु पुरुष को बहुतसा गोमेषादि जुर्माना देना पड़ता है। यह शवको सन्दूक बन्द कर रख छोड़ते हैं। एक मात्र अदितीय देवता "इम्ब" (क्या इन्द्र) पूज्य हैं। इसका मन्दिर होता है। उक्त मन्दिरम पवित्र प्रस्तरमूर्ति स्थापित रहती है। पुरोहित पाकर पूजा करते हैं। यह धनुर्वाणधारी हैं। गोमेषादि ही इनका मूल्यवान् वस्तु है। यही निसके पधिक रहता है, यही धनी ठह रता है। इनमें १८ लीग सरदार हैं। यह सोग परस्पर शपथ उठा बन्धुताके सूवमें बंध जाते हैं। किसी के साथ सूत्रको सन्धि टूटनेसे पहले एक तीर मेजा जाता है। या बड़े पतिधि- भत हैं। यदि कोई प्रतिथि इनके धर पाता, तो स्वयं ग्रहकर्ता उसकी परिचर्या उठाता है। फिर यदि कोई दूसरा उस अतिथिको उठा अपने घर ले जाता, तो उभयके मध्य विषम विवाद देखनमें पाता है। यहां तक कि रक्तपात होने लगता है। स्त्रियोंके यथेच्छा. स्वमदमें कुछ वाधा नहीं, अवगुण्ठन नहीं। किन्तु उन पुरुषों के साथ पानभोजन करने कम पाती है। प्रति ग्राममें खियों के प्रसवको खसव भवन रहते हैं। इनके आपसमें विवाद होनेके पीछे मिटते समय विवा दियोंके मध्य एक पादमौ दूसरेका स्तन और दूसरा स्तन चूमनेवालेका मस्तक चुम्बन करता है। इसी प्रकार विवाद मिट जाता है। काफिर अपने सन्तानको विक्रय नहीं करते। किन्तु कष्टमें पड़नेसे प्रतिवासीके सन्तानको चोरीसे. बेच लेते हैं। किसी किसीके कथनानुसार यह व्यापार व्यवहारके मथ गण्य है। इसीसे चिनासके सरदार-विक्रयार्थ. वालक-वालिकायो पर कर लगा देते हैं। किसी मुसलमान.नाति पर युद्ध यात्रा करते समय मितने दिन सक.पायोधन पायादि {{Rh|Vol.| IV. |101}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> निर्धारित नहीं होता, उतने दिन कोई पुरुष अपने घर जाने नहीं पाता। दिवारानि मन्त्रणारटइमें रहना और वहीं पानभोजन भयनादि करना पड़ता है। जिस स्थानमें पाक्रमण करना ठहराते, दिनके समय सब वहीं पहुंच दो दो तीन तीन आदमी झाड़ियों में विप जाते हैं। फिर जैसे ही निकटसे मुसलमान निकलते, वैसेही उनपर टूट मारने लगते हैं। प्रति दिन सन्ध्याकाल स्त्र व कार्यका विवरण बता पामाद प्रमीद करते हैं। मुसलमान भी ऐसे ही काफिरस्थानमें घुस बालक-बालिका चुरा लाते हैं। यह चक्कोमें गेहं, यव प्रभृत्तिको पीस पाटेको रोटी बनाते हैं। रोटीको सोहकटाइ (तवे) पर सेक खाया करते हैं। यह पालित पशुका भी मांस खाते हैं। काफिर एक ही वारमै गला काट पशुहत्या करते हैं। यदि दो हाथ मारनेका प्रयोजन प्रासा, तो वह मांस पवित्र समझ छोड़ दिया जाता है। फिर काफिर वारिजातिके मध्य पारिया श्रेणीको वीला उसे दे देते हैं। यह अंगूरसे शराब बनाते हैं। अंगूरके वर्षभेदसे मद्यका वर्ण दो प्रकार होता है। बालक वर्ष में सकल समय मद्य पीने नहीं पाते। मुगल-सम्राट बाबरने लिखा है कि काफिर अपने गले मद्यपूर्ण "कि" नामक चमड़ेको कुप्पी लटका रखते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह जलके बदले मद्यपान करते हैं। इनका साहाय्य न मिचनेसे काफिरस्थानमें धुसने- को कोई कैसे साहस कर सकता है। काफिरखान देखने में अतिसुन्दर देश है। निविड़ वृक्षमालार्म प्रकृतिका रम्य उपवन समझ पड़ता है। प्रान्त भागमें महावन है। काफिरखान प्रधानतः तीन उपत्यकामि विभक्त है। इन्हीं तीन उपत्व कार्शी यहांको तीन प्रधान जातियों का नाम- शरण दुवा है-रामगन, बैंगन और वासमल। इनमें वैगन, सर्वापचा पराकान्त पौर उनकी उपत्यका भी सर्वापेचा कृत् है। काफिर या सियाइपोश इनका जातीय नाम नहीं। पावर्ती मुसलमान इन्हें इस नामसे अभिहित करते हैं। मुसलमान धर्मपर<noinclude></noinclude> 3tclf2p1xo0oez8oznly8o6efypi64t पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४०१ 250 106294 666078 373154 2026-07-07T15:52:44Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 666078 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४०२|काफिरस्थान-काफी}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} विश्वास न करनेसे ही यह काफिर कहाते हैं। अधिक संख्यावाले वैगन का कृष्ण वर्ण छागचर्मका परिच्छद पहनने से ही सियाहपोम नाम है। इसीसे सबके सब सियाहपोध नामसे पुकारे जाते हैं। रामगत वा बासगल काले चमड़ेका परिच्छद नहीं पहनते। वह उसके बदले सूतके कपड़े को पोथाक बनाते हैं। वह तीनों जातियोंको भाषा स्वतन्त्र है। यह भूत प्रेतमें विश्वास रखते हैं। काफिरोंक मतानुसार जो कुछ दुःख कर मिलता, वह सब भूत प्रेतादिके कारण ही पड़ता है। इनके पानका मद्य मद्यप्रस्तुत प्रणाली के नियमानुसार नहों बनता। वह खालिस अंगूरका ताना रस होता है। परस्पर युद्ध विप्रहादिके पीछे पराजित लोगोंकी स्त्रियां बन्दी बन दासोंकी भांति विकती है। स्त्रियोमें सज्जा, शीलता वा धर्मभाव नहीं देखते। इनके समाजमें उसे विशेष दोष कब गिनते हैं कारण पूर्व ही लिख चुके कि ऐसे दोषमें उभय पक्ष कैसो सामान्य शान्ति रखते हैं। यह अंगरेज अफगान या तुर्क किसीके अधीन नहीं सम्पूर्ण स्वाधीन हैं। सिन्धु और प्रकसम नदीके मध्य इनका प्रमुख प्रताप्र है। हिमालय पर्वतके शेष प्रान्तसे अकसस मदीके तौरवर्ती बदलशान पार्वत्य प्रदेश पर्यन्त और हिन्दूकुश पर्वत- मालामें यह अधिकार रखते हैं। कावुन नदीके उत्पत्ति स्खलपर पड़ने वाले सकल गिरिवन्म भी उन्होंक अधीन है। यह देखने में सुपुरुष होते भी दीर्घच्छन्द महीं। पूनमें दूसरी जो शुद्र शुद्र जाति हैं, उनमें दारानरी जाति प्रपनको ताजा मतावलम्बी और पति प्राचीन सम्पाक (बमघान) नामक स्थानको भाषाके साथ इनकी भाषा और अफमानों के पाकारके साथ इनके पाकारका सौसाह है। सेवया (शिवा)नामक स्थानके वामपाथ में चुगुनी नामक एक जाति है। इसके लोग पपेक्षाहत संख्या में अधिक विशा काफिर इन्हें "निम्बा" प्रर्थात् वयं संकर कहते हैं। क्योंकि यह काफिर <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पौर अफगान उभय जातिको कन्धाका पापियार और काफिरस्थानमै निर्भय प्रवेश करते हैं। यह प्रधानतः पथप्रदर्शक का काम चलाते हैं। कुन्द पर्वतमें ही इनका अधिक वास है । दुगुनो अफगानीको अपेक्षा पुद्रकाय होते हैं। इनकी पावति भी अपेक्षाकृत कोमलतापूर्ण रहती है। यह मुसलमान धर्मावलम्बी है। किन्तु इनमें स्त्रियोंके भवरोधको प्रया नहीं। इस प्रदेशको परत उपत्यका ७३.. फोर दी है। पञ्चलिक च्यालिक नामक गिरिपया दृष्य परम रमणीय है। कुन्द पर्वतके शिखरपर एक क्षुद्र रद है। प्रबादानुसार इसी इदके तीर नूहको नौकाका भग्ना- वशेष प्रक्षरीभूत हो गया था, फिर निम्न उपत्यका उसीसे महके पिताका समाधिस्थत बना है। काफिला (१० पु. ) यात्रियों का समूह, मुमा. फिरोझा मुण्ड। काफिलाके सोग तीर्थ या व्यापार करने मिल-जुलके निकलते हैं। काफी (प. वि.) १ पर्याप्त, पूरा, कम न ज्यादा, मपा वा । (पु.)२ रागविशेष : इममें कोमल गधार लगता है। काफीके कई भेद हैं, काफी काड़ा, काफी टोड़ी, काफी होची इत्यादि। यह राग प्रायः नन्द जल्द गाया जाता है। काफी-(हिं. स्त्री०) कावा, बुन । काफी-( अं० = Coffee ) कहवा, एक प्रकारका लवणं क्षुद्र फल। इसे तोड़, भून कर और बुकनी वना धायकी भांति दूध के साथ बहुतसे लोग प्रत्या पान करते हैं। इसके भित्र भित्र नाम यह हिन्दी{{clear}} कापि, काफि, कावा। गुनरी .बताती है। कव, बुन, काफो। बम्बया बन्द तचेम-कै। दक्षिणी कन, बन्दा महाराष्ट्री कापि कोटार। तामिल कापि मिलु। तलाशी बोन्द बोत्र। परवी समस्त गिरिवर्म में । वुन, कहवा, काफो। ... ... शुद, कापी। DO! ... करनाटी<noinclude></noinclude> 8ihmnug3hwvs1e94498zgvrh8v8v2ih पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४०३ 250 106296 666373 373156 2026-07-08T02:01:54Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 666373 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४०४|काफी}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} सहायक है। काफौकी क्षषिमें बड़ा. यन करना पड़ता है। अतिशय मेध चढ़ना वा प्रतिवेगसे वायु चलना, इसके लिए अशुभ है। जोरसे हवा चलने पर काफीके फूल झड़ जाते हैं और फल नहीं लगते, सुतरां कषक प्रायः पाधे शस्यको क्षति उठाता हैं। अत्यन्त ग्रीम होनेसे वृषके लिये छाया आवश्यक है। -" समुद्रके संपकूलमें काफी अच्छी नहीं होती। है, अफरीका अन्तर्गत वसीमियाके साथ समसूत्रपातसे भारतमें पड़नेवाले स्थानोमें यह भली भांति उपजती अच्छी हैं। पबसौनियामें इसके फलको "बुन" कहते हैं। प्राचीनकालमें मिसर और सिरीयामें यह नाम प्रचलित था। उस समय सिरीयाके रहनेवाले इस वीजको केवे (Cave) कहते थे और पका कर खाते थे। अरबी ग्रन्यादिको पालोचनाके अनुसार शेण शहाबुद्दीन धमानी नामक किसी व्यक्तिने अफरीकाके उपकूलमें काफीका व्यापार देख कर सर्व प्रथम मदनबन्दर में एक दुकान खोली थी। १४७० ई०को वह मर गये। सुतरां १५वीं शताब्दीके मध्यभागमें काफी परवमै पहिले आई। १५७१ ई०को यह यमन, मका, कायरो, दामास्कस, अलेपो और कुनस्तुनियामें फैली थी। १५५४ ई.को कुनस्तुनतनियामें सर्वप्रथम काफीका एक पानागार स्थापित इमा। १५७३ ई०को पलेपो शहरमें रनडल्फ नामक किसी युरोपीयनने इसका प्रथम परिचय पायां । फिर का नहीं सकते कि भारतमें काफी कैसे प्रायो। अनेकोंके कथनानुसार बाबा बूदन नामक एक मुसल. मान सन्यासी मकेसे लौटते समय ७ वीज लेकर महिसर पहुंचे थे। दक्षिण भारतमें उता मतपर बड़ा विश्वास करते हैं। इसीसे उसका समस्त प्रमूलक होना ध्यानमें १५७६ से १५००० तक लिनसोटेन (Jan Huygen van Linschoten ) नामक एक श्रीसन्दाज इस देशमें घूमनेको पाये थे। वह अपने उल्लेख योग्य है। भमत्तान्तमें मसवार पकूलके समस्त उत्पन्न द्रव्योंकी वर्षमा कर गये हैं। किन्तु उसमें काफीका नाम नहीं मिलता। उनी समसामयिक लेखकोंके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पुस्तकमें मिसरियोंके बुन फवका काय खानेको बात देखते हैं। इससे अनुमान होता है कि भारतवर्ष में पाते समय लिनसोटेनने काफीको बात नहीं सुनो। डाकर पोयातिचने विलायतमें "हाउम- अवकामम"के समक्ष साच्य देते समय कहा था कलकत्तेके कम्पनी. वागमें जो काफी होती उसको छोड़ इमने दूसरी..कोई काफी नहीं उसके पौके मिलनेवाला विवरण भी १८वौं शताब्दीका विवरण है। सिंहलम पोर्तगोजाँके है। विशेषतः नीलगिरि उपत्यकामें काफी की उत्पत्ति दौरात्मासे पहले अरवनि इसे प्रथम प्रचार किया था। पूर्व भारतीय होपयग्यो१६९० ई. के पन्तमें गवर्णर वान हुरनने ( Van Hoorne ) परब वपिकोंसे बीज संग्रह कर यवनोपके क्टेविया नगर में लगाये थे। इनसे जो पेड़ उगे उनका एक पौदा इङ्गलैड पहुंचाया गया। फिर इङ्गलैंडके वृक्षोंका एक पौदा १७१८० को सुरिनाम नामक स्थान में पाया था। इसके दश वर्ष पोछे अमष्टरडमके काफीबागसे एक पौटा १४वें लुईको पढौकन दिया गया, फिर उसका पौदा पश्चिम भारतीय दोपपुञ्जमे रोपित हुआ। इसमे नतम महाहीपमें काफोकी खेती फैश पड़ी। अमेरिका और यूरोपको काफी कृषिका मूल यवद्वीप है। किन्तु आजकल अमेरिकाको भांति पृथिवीके दूसरे स्थानमें कहीं काफी नहीं उपजती। अकेले ब्रेनिलम ही पांच करोड़ तीन चाख पौदोसे यन के साथ फल संग्रह किया जाता है। फिर कोष्टारिका, गोयाटिमाचा, वेनजुइना, गोयाना, पेरू, बनिविया, जाम का, किउवा, पोटारिका, अन्यान्य पश्चिम भारतीय होप, अष्ट्रेलियाके मध्य क्विन्सलेण्ड, पूर्वमारतीय दीपावली के मध्य सुमात्रा, बोरनियो, मजयउपदोप, श्यामदेग, सिंगा- पुर प्रति प्रणाली मध्यगत दोपविभाग और फिजी नहीं पाता।होपमें इसकी खेती होती है। वेजिल और यदीपकी भांति प्रावाद जमीन दूसरी जगह नहीं। उसके पीछे प्राबाद नमोन्.भारतवर्ष और सिलदीपको आवाद जमीन उद्देश्य योग्य हैं। पाद देश में इस प्रथाके फैलने से मुसलमान धर्म- याजक काफीपानके विरूह उठे थे। कारण मसजिद और.<noinclude></noinclude> cmyrnfrrokllztw9bf5gbneafgoth91 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४०४ 250 106297 666376 373157 2026-07-08T02:27:51Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 666376 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||काफी| ४०५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} दरगाहको अपेक्षा काफी पानागारमें लोगों की प्रासक्ति चतुर्गुण बढ़ गई थी। पानासक्ति घटानेके लिये इस पर बहुत शुल्क स्थापित हुवा। ग्रेटरटेनमें चायको पहली दुकान खुचनेसे पहिले (१६५७ ई० ) काफी पानागार वना था (१६५२ ई.)। डि, एडवार्डस नामक एक तुर्कस्थानका अंगरेज बणिक् काफी पोनेमे इतना अभ्यस्त हो गया कि, देश जाते समय उसे प्यास्त्रीया रोसी नामक एक ग्रीक नौकर प्रत्यह काफी बना देनेके लिये अपने साथ रखना पड़ा। उसके बन्धुमको भी क्रमशः काफीपानका अभ्यास पड़ गया। अवशेषों बन्धुबान्धवोका नित्य उपद्रव नसह सकनेके कारण उसने रोसोको करनहिलवाले सेण्टमाइकेलके पाली नामक स्थानमें प्रकाश्य रूपसे काफीका पानागार खुनवा दिया। क्रमशः व्यवहार बढ़नसे पानागारोंको संख्या भी बढ़ी। २य चालसने .(१६७५ ई.) नागारों में लोगों की भीड़ देख इसका व्यवहार घटानेको राजादेश विधिवत किया था। फ्रांसमें १६४० ई०को काफीका व्यवहार चला और १६६५ ई०को पारिस नगर में प्रथम पानागार खुला। उसके बाद युरोपमें सर्वत्र इसका व्यवहार बहुत वढ़ा गया था। अवशेषमें १८४० ५०को चायका व्यवसाय और व्यवहार अधिकतर बढ़ जाने से काफीका भादर घटा। ब्रह्मदेशमें काफीकी खेती होती है, पर बीजक्षा प्रभाव है। दिन दिन इसके पीनको चाइ बढ़ रही है। भारतकै दाक्षिणात्यमें काफीकी खेती खूब होती है। १८८३१८४ । ८५ ई०को तीन वर्ष दाक्षिणात्वम प्रायः १८६५०० एकर भूमिपर काफी बोई गई थी। उसमें महिसुरको ८२१०० एकर भूमिम ७११०००० पाउण्ड, मन्द्राजको ५५१०० एकर भूमिम १३१६०००० पाउण्ड, विवाइडशी ४८०० एकर भूमिमै ८२०००० पाउण्ड और कोचीनको २२०० एकर भूमिमें ८३००० पाउण्ड काफी उत्पन्न हुई। इसके सम्बन्धमे बावाबूदनशी बात चिख चुके है.- भारतवर्ष सर्व प्रथम काफी कैसे भाई यौ। मसुिरमें प्रवाद है कि दो शताब्दी हुयी मक्काये चौटते समय {{Rh|Vol.| IV. |102}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> वाकई एक फल और ७ वीज लाये थे। महिसुरमें वह जिस पर्वत शिखरपर रहते थे, आज कन्च लोग उनके नामानुसार उसको "वावा बूदनगिरि कहते हैं। उस शिखर पर उन्होंने अपने कुटौरको वगनमें उन्हों ७वीजांसेवक्ष उपजाये थे। क्रमशः उस पर्वतमें काफीके अनेक वृष हो गये। फिर ६०1७० वर्ष बीतने पर दूसरे भी निकटवर्ती कई स्थानों में इसकी खेतो बढ़ी। शेषको पाज प्रायः ४० वर्षसे अंगरेजोंको इस ओर दृष्टि पड़नेसे काफीकी खेती भदो भांति की जाती है। मि. क्यानन नामक किसी अंगरेजने सर्वप्रथम बाबा- बूदनगिरिक दक्षिण एक ऊंची जमोन् पर. काफी पाई थी। अंगरेजाधिवात देशों के मध्य भारतवर्षम हो सर्वा- पेक्षा उत्तम मुगन्धि काफो बहुपरिमाणसे उत्पन्न होती है। काफीको.पची उपयुक्त नियमसे बना लेनेपर चायको भांति काममें लायी या चाय मिन्तायी जा सकता है। सुमात्रामे पाड़ाङ्ग नामक स्थानके लोग काफीकी पत्ती घायकी भांति बना प्रतिदिन पान करते हैं। चायको भांति इसमें भी नथहर यान्तिनाशक गुण होता है। काफीके फलक छिन्नमें एक प्रकारका तेल रहता है। किन्तु इस तैयके निकालनेकी प्रणाली अभी अब लखित नहीं हुई। अमिरिकामें काफीका अर्क उत्तेजक प्रौरवलकारक पौषधकी भांति काममें आता है। किन्तु इलैंडमें इसका चलन नहीं। मुरासार शरीर में जैसा कार्य उत्पादन करता, यह भी वैसा ही प्रभाव रखता है। काफी चायकी अपेक्षा सारक है। यह कोष्ठवह नहीं करती। फिर भौ.अधिक्ष परिमाणमें काफी पानी दस्त कम उतरता है। टाइफेड न्वरमें फरासी नौसेनाके मध्य रोगीको दो दो घण्टे पोछे दो चम्मच काफी पिला बीच बीच में शरिट या बराण्डी मद्य सेवन कराते हैं। इससे ययेष्ट उपकार होता है। काफी पीनसे फरासीसियोंमें भूत्रस्थलोक अश्मरी रोगना प्रातिशय्य घट गया है। तुर्कस्थान में काफी पीनेसे बातकी पीड़ा. नहीं रही है। तुक प्रत्यह काफी . पोते. है। यही उनका<noinclude></noinclude> 71r0smrkwlflhdvnke6rmusl3ejl4eg पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४०५ 250 106298 666377 373158 2026-07-08T02:49:32Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 666377 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४०६|काफी-कावर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} प्रियतम पानीय है। सविराम ज्वरमें कुनैनकी भांति कच्ची काफी खिलाते हैं। किन्तु इससे उतना फच नहीं होता। भुनी काफोर गलित जीवशरीर वा वृक्षादिका दुर्गन्ध दूर हो जाता और दूषित वायु की संक्रामकताका दोष नहीं पाता है। मन्द्राज और गजामके अस्पतालमें प्रत्यह काफीकी बुकनी जला वायुका दूषित अंथ नए करते हैं। परबांके कथना नुसार काफीम कामिच्छानिवारक गुण है। घरके अांगन या खुले मैदान में काफी जलाने से हवा साफ होती है। उक्त मत अनेक विज्ञ चिकित्सकों अनुमोदित है। इससे अफीमका विष भी नष्ट होता है। चावरियाकी. काफी ( Liberian Coffee ) अफ रोकाके. पश्चिम उपकूल पर लाइवेरिया, पङ्गोला, गोलको, प्रलटो प्रभृति स्थानोंमें उत्पन्न होती है। इसका वृक्ष अरबीके काफी वक्षसे दृढ़ और फन्न तथा पत्र दोघं रहता है। जिस समय काफी वृक्षका हरित् आभा रहती है ( कपूरके दीपकको 'काफी सिंहलमें अनुसन्धान हुआ, उस समय काफीका वृत्तान्त युरोपीयोंने प्रथम जाना । इस श्रेणीको काफीमें शायद पधिक कोड़ा नहीं लगता। लिखकर काफीको खेतीका उपाय बताना कठिन है। कारण प्रपनी पांखों इसकी खेती या वाग न देखने कैसे समझ सकते हैं। अरबी काफीके वध पूर्वमें नानारूप पीड़ा उठ खड़ी होती है। पावहवा और खेती वारोंके दोषसे ही अधिकांश पीड़ा उपजती है। खेतोके दोष, कंकड़से पौदा टूट जाता है। पत्तोम पोली धन निकल जाती है। फिर पत्ती काची पड़ और सिकुड़ जाती है। काफीम कोड़ा और मक्खी लगनेका डर रहता है। इसको छोड़ टिड्डी, चूहा, गितहरी, गीदड़ वगैरह भी इसे बहुत बिगा ड़ते है । शृगालोंके अत्याचारसे जो फल गिर जाते व संग्रह किये जानेपर "शृगाल काफी" (गीदड़ काफी) कहाते हैं। काफी-१ मिर्जा अला उद-दौलाका उपनाम । बादशाह अकवरके समय इनको समृद्धि रही। २ मुरादाबादके एक मुसलमान कवि । इनका यथोचित नाम किफायत <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अली था। इन्होंने 'वहार खुल्द नामक अन्य दिया। काफूर (अ० पु०) कपर, कपूर। कर्पर देखो । काफू र मलिक-दिनोवाले बादशाह प्रथा उद-दोन खिलजीके एक प्रिय कञ्चुकी। इन्हें बादशाहने अपना वज़ीर बनाया था। बादशाह के मरने पर इन्होने एक व्यक्ति ग्वालियर, उनके पुत्र खिजिर खान और यादी खानकी आंखें निकालने मेना था। दारुप रूपमे यह कम सम्पन्न किया गया। फिर काफूर मनिकने बादशाहक कनिष्ठ पुत्र शहाबुद-दोन्को सिंहासन पर का बैठाया और स्वयं राज्यका कार्य चलाया था। किन्तु १३१७ ई के जनवरी मास सम्राटके मरने पर इनका वध हुवा। अलाउद-दोन्के तौसरे लड़के पीछे सिंहासन पर बैठ गये। काफूरी (अ० वि.) १ कपुरजात, कपूरसे बना हुवा। २ कर्पूरवर्ण विशिष्ट, कपूरका रफ रखने- वाला। (पु.) ३ वर्णविशेष, कपूरी रहा। इसमें श्रेणीको समा' कहते हैं। काब .(अ. स्त्री०) पान विशेष, चौना मट्टीको बड़ी रकावी। कार-पारस्य उपसागरके किनारे रहनेवाली एक अरव जाति । उत्तरमें मास्तरसे रामहरमुज और वेवेहनसे हिन्दियन तक यह जाति बसती है। इसकी राजधानी मुहमेरा है। काव लोगोंको वास- भूमिके मध्य बहु शाखाविशिष्ट ताव नदी बहती है। अरबी भौगोलिक इस नदीको दोरक कहते हैं। ई० के १ शताद काबोंने कई अंगरेजी न हाज पाक्रमण किये थे। उसी सूवमें इनसे युद्ध चन पड़ा। फिर अन्नोरना पायाने मुइमेरा नगर अधिकार किया। १८५७ ई से पारस्य युद्धके बाद उता नगर भारत गवरनमेण्टके अधीन हुवा। काबर ( सं० पु. ) कुत्सिती बन्धः को कादेशः पृषोदरादिलात् सिहम् । कुत्सित बन्ध, बुरा फन्दा। काबर (हि. वि. ).१ कवर, कबरा। (पु.) भूमि- विशेष, दोमट, रेत मिली हुई जमीन् । ३ पविविधक, एक जङ्गली मैना।<noinclude></noinclude> qjmdmx9ogrx9evqakcmf7hvfonh3vv2 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४०६ 250 106299 666399 373159 2026-07-08T08:08:58Z Lado Shaw 6039 666399 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh|४०७| काबला- -काबिल खान्}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} काबला (हिं. पु. ) नौरज्जु, जहान का जच्चीर। यह शब्द अंगरजीके केबिल' (Cable )का पपश्चंश है। देवरी कसे जानेवाले बड़े पेच या बालटूको भी 'कावचा कहते हैं। काबा-१ एक जाति। इस जातिके लोग भारतके पश्चिम गुजरातके उत्तरकच्छ उयसागरक उपकूल पर महाराष्ट्र राज्य में रहते थे। पाज कल इनको वात अधिक मुन महीं पड़ती। २ मुसलमानाका एक परिच्छद। यह चपकनको भांति रहता, केवल वक्षस्थल पर अधांश कटता है। इसके भीतर सूतका कपड़ा पहनते है। उस कपड़े पर वक्षस्थलमै जरीका या कोई दूसरा काम रहता है। काके कटे अंशसे वह देख पड़ता है। कावेका व्यवहार पहले बहुत था, किन्तु अब घट गया है। ३ समचतुष्कोण पावति, बरावर चौकोर भक्त । ४ मुसलमानों का एक पवित्र सह। यह परब देशके मका नगर प्रायः चतुष्कोण एक भवन है इसे मुसलमान एक पवित्र तीर्थ मानते हैं। यह उत्तर पथिमसे दक्षिण पूर्व तक २४ हाथ लम्बा, २३ हाथ चौड़ा और २७ हाथ ऊंचा है। पूर्व दिक्को .इसका हार है। हारके निकट रौप्यासन पर कृष्ण- वर्णका एक प्रस्तर रखा है। यात्री मका पहुंचते ही 'हस्तमुख प्रक्षालन वा सानादि कर मसजिदमें जाते हैं। पहले कपणवर्णका प्रस्तर चमपीछे कावाको चारो और प्रदक्षिण लगाना पड़ता है। काबाको दक्षिण रख तीन बार जल्द जलद और चार बार धीरे धीर प्रदक्षिण कर काबाको वाम ओर रखते परिश्रमण शेष करते है। कावाके निकट एक प्रस्तर पर इब्राहीमका पदचिन्ह है। प्रदक्षिणके पोछ यात्री सौ प्रस्तरके निकट ना मन्त्र पढ़ते हैं। उसके पीछे कृष्ण इन्होंने सन वंश निम ल कर दक्षिण चीन जीता था। प्रस्तरको फिर चूम चले पाते हैं। अरबी परिवारवर्गके इसी समय यह उत्तरमें उत्तर महासागरसे दक्षिण में मध्य पुनसन्तानको सत्पन्न होनेके ४० दिन पीछे काबेमें मलका प्रणाली और पूर्वमें कोरियासे पश्चिममें एशिया ले जानेकी प्रथा है। यहां लाकर उस पर मन्त्रादि पढ़े माइनर पर्यन्त समुदय भूखण्डके एकाधिपति थे । दूसरे जाते हैं। उसके पीछे लड़केको धर जाने पर नापित मुगल सम्घाटीको भांति यह अत्याचारोऔर प्रजापोड़क .पाकर गण्डदेशमें छुरेसे चक्षुके कोणसे मुखके कोप 'न थे। सुशासनके गुणसे चीनवासी मात्र इनको प्रशंसा •पर्यन्त समान्तरासमें तीन दाग बना देता है। करते थे। १२८४०को इन्होंने दासोक छोड़ दिया। रस्मा या पति प्राचीन कालसे काबा परमोंका तीर्थ स्थान गिना जाता है। कथनानुसार पादमके समय एक प्रस्तरमूर्ति खर्गसे गिरी थो। क्रमशः इसमें ३६. मूर्ति प्रतिष्ठित हुयीं। मुहम्मद के धर्मप्रचारसे इसका गौरव कितना ही विगड़ गया। भारतमें खलीफा अमरके वंथोय करनाटकके नवाबोंने इस काबेमें चढ़नेके लिये एक स्वर्णसोपान प्रदान किया था। १५२०ई०को काबेका गौरव फिर प्रतिष्ठित हुवा। काबाइज-एक जाति। पारस्य के पूर्व और पश्चिम कुर्द लोग रहते हैं। कबाइज उन्हीं के अन्तर्गत हैं। वावाबशर्करा (सं• स्त्री०) कबाब चीनो। कावासखेल-एक जाति। काश्मोर प्रान्तमें बनके निकट वनौरी लोग रहते हैं। बड़े मनाइयों और वजीसमचतुष्कोणरियों में कावाल खेल होते हैं। इनको तीन पौर पिपाती। इनमें श्रेणी हैं,-मियामी, सेफाली हज़ारों बलवान् योहा पाय नात हैं। १८५० पौर १८५४ई को इन्होंने भारतके प्रान्तभागमें अंगरेजोंका यह अधिकार रहते भी २० बार लूट मार को थो। पंग- रेजोने इन्हें कई बार मारा और घेरा है। काबिज़ (१० वि०) अधिकारप्राप्त, कबजा रखने वाला। काविल (अ० वि०)१ योग्य, लायक । २ विहान, समझदार। काबिल खान ( कबलाई कपान ) एक विख्यात मुगल सम्बाट । यह चवोज खान के प्रपौत्र और तातार राज मतके चाता थे। १२५०ई० को इभाळसल प्राप्त हुवा। यहो चीन राज्य में पुईन बंधक प्रतिष्ठाता थे। १२६०ई०को यह असंख्य दल बच साथ ले चीन राज्यमें से। फिर इन्होंने तातारोको हरा उत्तर चीनपर अधिकार किया था। १२७५ई को<noinclude></noinclude> gfd24spuv4lwwi42ygveu5cfwhyh9he 666412 666399 2026-07-08T11:38:08Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 666412 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४०७| काबला- -काबिल खान्}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} काबला (हिं. पु. ) नौरज्जु, जहान का जच्चीर। यह शब्द अंगरजीके केबिल' (Cable )का पपश्चंश है। देवरी कसे जानेवाले बड़े पेच या बालटूको भी 'कावचा कहते हैं। काबा-१ एक जाति। इस जातिके लोग भारतके पश्चिम गुजरातके उत्तरकच्छ उयसागरक उपकूल पर महाराष्ट्र राज्य में रहते थे। पाज कल इनको वात अधिक मुन महीं पड़ती। २ मुसलमानाका एक परिच्छद। यह चपकनको भांति रहता, केवल वक्षस्थल पर अधांश कटता है। इसके भीतर सूतका कपड़ा पहनते है। उस कपड़े पर वक्षस्थलमै जरीका या कोई दूसरा काम रहता है। काके कटे अंशसे वह देख पड़ता है। कावेका व्यवहार पहले बहुत था, किन्तु अब घट गया है। ३ समचतुष्कोण पावति, बरावर चौकोर भक्त । ४ मुसलमानों का एक पवित्र सह। यह परब देशके मका नगर प्रायः चतुष्कोण एक भवन है इसे मुसलमान एक पवित्र तीर्थ मानते हैं। यह उत्तर पथिमसे दक्षिण पूर्व तक २४ हाथ लम्बा, २३ हाथ चौड़ा और २७ हाथ ऊंचा है। पूर्व दिक्को .इसका हार है। हारके निकट रौप्यासन पर कृष्ण- वर्णका एक प्रस्तर रखा है। यात्री मका पहुंचते ही 'हस्तमुख प्रक्षालन वा सानादि कर मसजिदमें जाते हैं। पहले कपणवर्णका प्रस्तर चमपीछे कावाको चारो और प्रदक्षिण लगाना पड़ता है। काबाको दक्षिण रख तीन बार जल्द जलद और चार बार धीरे धीर प्रदक्षिण कर काबाको वाम ओर रखते परिश्रमण शेष करते है। कावाके निकट एक प्रस्तर पर इब्राहीमका पदचिन्ह है। प्रदक्षिणके पोछ यात्री सौ प्रस्तरके निकट ना मन्त्र पढ़ते हैं। उसके पीछे कृष्ण प्रस्तरको फिर चूम चले पाते हैं। अरबी परिवारवर्गके मध्य पुनसन्तानको सत्पन्न होनेके ४० दिन पीछे काबेमें ले जानेकी प्रथा है। यहां लाकर उस पर मन्त्रादि पढ़े जाते हैं। उसके पीछे लड़केको धर जाने पर नापित पाकर गण्डदेशमें छुरेसे चक्षुके कोणसे मुखके कोप पर्यन्त समान्तरासमें तीन दाग बना देता है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> रस्मा या पति प्राचीन कालसे काबा परमोंका तीर्थ स्थान गिना जाता है। कथनानुसार पादमके समय एक प्रस्तरमूर्ति खर्गसे गिरी थो। क्रमशः इसमें ३६. मूर्ति प्रतिष्ठित हुयीं। मुहम्मद के धर्मप्रचारसे इसका गौरव कितना ही विगड़ गया। भारतमें खलीफा अमरके वंथोय करनाटकके नवाबोंने इस काबेमें चढ़नेके लिये एक स्वर्णसोपान प्रदान किया था। १५२०ई०को काबेका गौरव फिर प्रतिष्ठित हुवा। काबाइज-एक जाति। पारस्य के पूर्व और पश्चिम कुर्द लोग रहते हैं। कबाइज उन्हीं के अन्तर्गत हैं। वावाबशर्करा (सं• स्त्री०) कबाब चीनो। कावासखेल-एक जाति। काश्मोर प्रान्तमें बनके निकट वनौरी लोग रहते हैं। बड़े मनाइयों और वजीसमचतुष्कोणरियों में कावाल खेल होते हैं। इनको तीन पौर पिपाती। इनमें श्रेणी हैं,-मियामी, सेफाली हज़ारों बलवान् योहा पाय नात हैं। १८५० पौर १८५४ई को इन्होंने भारतके प्रान्तभागमें अंगरेजोंका यह अधिकार रहते भी २० बार लूट मार को थो। पंग- रेजोने इन्हें कई बार मारा और घेरा है। काबिज़ (१० वि०) अधिकारप्राप्त, कबजा रखने वाला। काविल (अ० वि०)१ योग्य, लायक । २ विहान, समझदार। काबिल खान ( कबलाई कपान ) एक विख्यात मुगल सम्बाट । यह चवोज खान के प्रपौत्र और तातार राज मतके चाता थे। १२५०ई० को इभाळसल प्राप्त हुवा। यहो चीन राज्य में पुईन बंधक प्रतिष्ठाता थे। १२६०ई०को यह असंख्य दल बच साथ ले चीन राज्यमें से। फिर इन्होंने तातारोको हरा उत्तर चीनपर अधिकार किया था। १२७५ई को इन्होंने सन वंश निम ल कर दक्षिण चीन जीता था। इसी समय यह उत्तरमें उत्तर महासागरसे दक्षिण में मलका प्रणाली और पूर्वमें कोरियासे पश्चिममें एशिया माइनर पर्यन्त समुदय भूखण्डके एकाधिपति थे । दूसरे मुगल सम्घाटीको भांति यह अत्याचारोऔर प्रजापोड़क 'न थे। सुशासनके गुणसे चीनवासी मात्र इनको प्रशंसा करते थे। १२८४०को इन्होंने दासोक छोड़ दिया।<noinclude></noinclude> ar6s758vnijk0fma765l9qw8k8sm80s पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४०७ 250 106300 666413 373160 2026-07-08T11:49:31Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 666413 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४०८|काविलीयत-काबुल}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} काबिलीयत (अ. स्त्री० ).१ योग्यता, लियाकृत, : पहुंच। २ विद्वत्ता; समझदारी। काविस (हिं० पु.) कपिशवणं, एक रंग। इसमें :मट्टीके कच्चे बरतन रत कर पावा लगाने से साल निकल आते पौर चमकीले दिखाते हैं। काविस बनाने में सोंठ, मट्टी, रेह, पामको छाल और बवूल तथा बांसको पत्ती घोच कर डालते हैं। २ मृत्तिकाविशेष, एक मिट्टी। यह रक्तवर्ण होता है। नन्त मिलानेसे इसमें लस आ जाती है। काबी (हिं. स्त्री०) मल्लयुद्दका एक इस्तलाधव, कुश्तीका कोई पेंच । इसमें एक पहलवान् दूसरेके पौछे जा एक हाथसे उसके जांघियेका पिछोटा पकड़ लेता और दूसरे हाथसे पैर खोंच. कर पटक देता है। कावुक (फा० स्त्री० ) कबूतरोंका दरवा। कावुन-१ अफगानस्थानका एक जिला। इसके पश्चिम कोहबाबा, उत्तर हिन्दूकुश पर्वत, उत्तर पूर्व पञ्चसरा नदी, पूर्व मुलेसान पर्वतश्रेणी, दक्षिण सफेदकोह तथा गजनी और पथिम इनारा प्रदेश है। कावुन्तका अधिकांशस्थन्न पर्वतसे परिपूर्ण है। इसकी पनेक उपत्यका उर्वरा हैं। इन उपत्यकावों में वड़े बड़े वृक्ष होते हैं। उनके कड़ी और वरगे बनते हैं। कोहिस्थान पौर कुरममें पच्छा अच्छा काष्ठ उपलता है। कावुलके नानास्थानों में मैके बाग : हैं। कोहदामन और हस्तान्तीफ उपत्यकामें वाग; बहुत हैं। बाग देखने में पति मनोरम है। लोगर और धारवन्द नामक प्रदेशमें पशुचारणका स्थान है। यहां पावादिका आहार भी अधिक मिलता और यहां गई और यव यथेष्ट उत्पन्न होता है। किन्तु उसे केवल दरिद्र लोग व्यवहार करते हैं। सब सम्पन लोग मांस अधिक खाते हैं। गजनीसे नानाविध शस्य यहां पाता है। उत्तर बदख्शान्, जलालाबाद, दो गिरियेणौ मिलनसे कोणकी भांति बननेवाला नामघन पौर कुनारसे चावलको पामदनी होती है। इस जिलेमें स्थान स्थान पर शस्यादि अधिक उपजता , रामयान और इजारसे धो पाता है। यहां द्रव्यादिका महयं नहीं। ग्रीमके समय लोग अधि. कांश खोममें रहते हैं। प्रस्तर और इष्टकनिर्मित <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> घर मी हैं। घरांकी छत भारतवर्षकी भांति सम- तल होती है। गो और मेष ही यहां धन गिना जाता है। उत्तरम. तुर्कस्थान पौर दधिपमें भारतवणे- के साथ वाणिच्य होता है। तुर्कस्थान के पाखका की वाणिज्य अंधिक चलता है। ग्राम छोटे बड़े नाना प्रकारक हैं। एक एक ग्राममें सौ-डेढ़ सौ धरोंकी बसती है। ग्रामके भीतर बीच वीच छोटे किले बर्न है। जल पनेक स्थानों में मिलता है। उपत्यकामें प्रायः बैलगाड़ी चलती है। वहिर्वाणिज्यमें उष्ट्र, प्रवः और अश्वतर व्यंवत होते हैं। तुर्कस्थानमें रूमियोंने शुल्क बढ़ाया था, इस लिये वहांका वापिन्य कुछ घट गया। पहले भारतसे झपड़ा और चाय भेजते थे। किन्तु यह काम भी बन्द हो गया। इससे उसके शुल्ककी आमदनीमें घटी पाई है। काबुलके प्रादेशिक शासनकर्ताको हाकिम कहते हैं। १८८२ ई०को अमौर शेर अली खान्के भाता सरदार अहमद खान यहांक हाकिम घे। कावुन्नका श्राय प्रायः अठारह लाख रुपया है। श्राफगानस्तानके अन्चान्य प्रदेश की अपेक्षा काबुलको सैन्य-संख्या कुछ अधिक है। यहांकी राहें भी खराब नहीं। इसका : वहुत प्रमाण मिन्नता है कि पहले कावुनमें हिन्दू राजावोंका अधिकार घा। २ उल काबुल जिलेका प्रधान नगर। यह पक्षा. ३८.३ उ० एवं देशा० ६८१८ पू. में काबुत और नगर नामक दो नदीके सङ्गमस्थल पर पवस्थित है। कावुन गजनौने ८८, खिलात ए-निचजाईसे २२८ पेशावरसे १८५ मील दूर है। लोकसंख्या डे. साखसे कम है। यहां तापमानयन्त्र ३. डिगरी उतरता और १.५ डिगरी चढ़ता है। कोह ताकतशाह और कोह खोजासफर नामक स्थान ही समतल है। उसी स्थानपर कावुन नगर अवस्थित है। यह चारोदिक् डेढ़ कोससे अधिक न निकलेगा। प्रधान दुर्ग वाताहिसार नगरके दक्षिण पूर्व भागमें खड़ा है। , पहले काबुलको चारो पोर इष्टकका प्राचीर था। किन्तु पात्रमा<noinclude></noinclude> e6oki3zp1jz4mg6bm38bgzh46zdxfg9 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४११ 250 106304 666374 373165 2026-07-08T02:13:15Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 666374 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४१२|कामकला}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कामकला (सं० स्त्री.) कामस्य कला प्रिया, सत्। .१. कामदेवको पनी रति । २ चन्द्रकी षोड़श कसा। ३ तन्त्रोक्लविद्याविशेष। पुण्यानन्द-प्रपौत कामकला. विलास नामक तम्बप्रथम इनका विषय वर्णित है। तन्त्रशास्त्र खभावत: गुध रहनेसे अर्थ स्पष्ट समझ नहीं पड़ता। इस लिये कामकलाविद्याके मूतश्लोक हो सत किये जाते हैं,- "सकसमुबनोदयस्थितिलयमयलीलाविलोकनोद्यातः अन्तलीमविमर्थः पातु महेशः प्रकाशमावततः। सा जयति शनिराधा निजसुखमयनित्यनिरूपमाकारा । भाविघरापरवीनं शिवरूपविमर्शनिसलाद” ॥ स्कुटशिवशक्तिसमागमवीभाइपिणी पराशक्तिः । अणुतररूपानुत्तरविमलिपिलाविप्रा भाति । परशिवा विकरनिकर प्रतिफलति विमर्गदर्पणे विगहे। प्रतिरुचिरुधिरे कुचं चिलमये निविशते महाविन्दुः । चित्तमयोऽईकार: मुव्यवाहार्णसमरसाकारः । शिवशनिमिथ नपिणः कवचीकृतभुवनमगली नपनि । सितगोपविन्दुयुगलं विवितशिवशक्ति सङ्चतप्रारम् । वाग मुष्टिहेतु परस्परानुप्रविष्टविस्पष्टम् । विन्दुरहदारामारविरतन्मिथु नसमरसाकार। काम, कमनीयतया कला दहनेन्दुविग्रही विन्द । इति कामकलाविद्या देवीचक्राक्रमात्मिका सेयम् । विदिता येन स मुली भवति महानिपुरसुन्दरीरुपः। स्म टिनादरुणादिन्दो नदिनया रो रवोऽव्ययः । तमात गगनसमोरणदानोदकमिवर्णसम्भूतिः अथ विशदादपि विन्दोगंगनानिलवशियारिभूमिलनिः । एतत् पच कविकसिनगदिदमण्याद्यनाइपर्यन्तम् ॥ विन्दुधितयं यह दविद्योग परम्परम वहन् । विद्यादेवतयोरविन मेदीयोति वद्य वेदकयोः । वागधी निव्ययुसी परस्परं शशिशिवमयावेती। सृष्टिरिथसिलयभेदी विधा विभक्ती वियौनरूपेण । माता मानं मे विन्दुवयमिन्नवीनरूपाणि । घामवयपौठवयशक्तिवयभेदभावितान्यपि च । तेषु क्रीए लिवितयं तदश भाटकाविश्यम् । इत्य वितयतुरीया तुरीयपीठादिभदिनी विद्या । भन्दपी रूपं रसगधी चेति मूतसूजापि। व्यापकमाद्यं व्यायततरमैय क्रमेण पञ्चदश । पपदशावररूपा स्पा हि मोतिकामिमता । नित्याः शब्दादिगुणप्रभदमिना सथामया व्यापाः । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मित्यावियाकारातिथयः विवक्षिसमरमाकार। दिवसनिशामाता: श्रीवर्याने पि सदस्यौदसाः। अव्यवनविन्दुवबहमटिभेदबिमाविक्षाकारा। पद्विशत् तत्त्वाच्या तत्त्वातीता च कैवटा विद्या। विद्यापि मादृगामा सूक्ष्मा मा विपरसन्ही दैयौ। विद्याम्द्यामश्योरत्यन्तामेदमामनन्याया। या सान्तरोरुपा परामहेगी विमादिता सेव । स्पष्टा पवन्यादिविमानकामा चना यावा। चनस्यापि महेश्या न मेदयो विमाश्यते विबुधः। अमयोः रमाकारा पद मा स्य लम्चयीय मिदार मध्ये 'चक्रश्य स्यात् परामर्य बिन्दुतत्त्वमेवेदम् । छछन तञ्च यदा विकोप्यरुपेय परिणतं चक्रम् ॥ एतत् पश्यन्तादि विसयनिदाम विवीजपं च । वामा नोटा रौद्री चाम्विका अनुत्तरांशमला: युः। इच्छा-भान-क्रियात्यान्ताय वा सोनराम्यवाः। ध्यताव्यसवदध्यमिदमेकादगामपश्यन्ती । एवं कामकलामा विविन्दुतत्ववदरवर्णमयो। सेब विकोणकर्ष याता विगुणस्वरूपिणी माता। एका परा तदन्या यामादियटिमाटरटामा। तेन नवात्मा नाता मावा मा मध्यमानिधानाम्याम् । विविधा हि मध्यमा सा सूक्षस्थ लाकति स्थिका सूमा । नवनादमयी स्थला नववर्गात्मा च मतविम्यारा पाद्या कारणामन्या कार्य बनयोर्यतम्लसो हतोः । संबई महि मैदक्षा दामात मदमौष्ठम् ॥ शप सप वर्गमय तइसको मन्थकोणविस्तारम् । भवको मध्यं यस्मियिहोपदीपिवे दशक " सकायादिनयमिटे दशारचयात्ममा विततम् । कच ट क वर्ग चतुष्टयविनसमविस्पष्टकोपविस्तारम् । एतचऋचतुष्टयमासमेत दशा-परियामः । शादिखरनवक चतुर्दशवर्षमय चतुर्दशारमिदम् ॥ परया पश्यन्यामिव मध्यमया स्य नपरुपिया। एवामिरेकपवागदरामा पोखरीजावा । कादिमिरष्टमिपचिनमष्टान बरवन। स्वरगणाममुदितभवाटदलाम्मौराक्ष सचिन्तयन् । बिन्दुवयमयतेजस्वियविकाराय नानिाचाहि । मविश्ववयमेतत् पञ्चामत्यादि विमावविधान्तिः। क्रमी पदविचपा कमौदयसैन कष्यते रचा। पावरष गुरुपंछियमिदमन्वापदाम्बु जातरम । सेयं परा महमी साकारण परियमेव सदा। तहे शाक्यवानां परिषतिरावदेवता: सर्माः भामौना विन्दुमवे चक्रे सा विपरमहरौ दैयो। कामेश्वरावानिवधा कवया चन्द्रमभितीचमा।<noinclude></noinclude> ceplsfvq0ir2qdts87jdsdb6d2pc36w पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०६ 250 107491 665784 375243 2026-07-07T12:02:33Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 665784 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||कायस्थ|५०७}} {{Multicol|line=1px solid black}} सनक १२ कुटुम्ब पहुंचे थे। फिर दूसरी बार बोस, तीसरी बार तीस पौर चौथो वार प्रमी कायस्थोंको मडली मिथिला ‘गयो। सारांश-कुल ११३ कायस्थ नान्यदेवको समय मिथिलामें जाकर रहे। अपने देशको न लौटने और मिथितामें ही निवास ग्रहण करनेसे वह 'कर्णकायस्थ' नामसे अभिहित 'हुवे। राजा मान्यदेवके वंशज राजा हरिसिंह देवने जब मिथिलास्य च वर्णीको पक्षी बनायो, a कायस्थोंके वंशकी विवेचना करके शुद्धाचरण और 'सच्च पदानुग्रहपके क्रमसे उन्हें श्रेणियों में विभक्त किया। नान्यदेवके साथ गये १३ कायस्थों के वंशधरों ने पनीप्रबन्धके मध्य प्रथम श्रेणीमें स्थान पाया था। द्वितीय श्रेणी में उन २. कायस्खों के वंशज रहे, जो 'बिहुत राज्य मिलने पर बुलाये गये। फिर तीसरी जो दूसरे वृहस्पतिको बरावर वर्णन करनेयोग्य है बारको गये ३० कायस्थो के बंधन द्वतीय यौ और पौर चौघी वारको पहुंचे अवशिष्ट कायस्थसन्तान चतुर्थ श्रेणीभुत दुवे । उक्त कायस्थ मिथिलामें बस जाने पीछे अपने दूसरे भाइयों की भांति स्थानान्तरको नहीं गये। समसामयिक मिला लिपिमें श्रीधर ठाकुर 'क्षत्र- इसी लिये वह पुरानी मिथिलाको सीमाके बाहर नहीं मिन्नते अर्थात् उमौके भीतर रहते हैं। महाराज नान्यदेवके घरानेसे लेकर पोइनवार 'घरानेके मध्य समय तक मिथिलाके कायस्थ 'ठाकुर कहलाते रहे। फिर किसी पोइनवार भूदेव-वंशाव- तंस महानुभावको कायस्यों और ब्राह्मणों की पदवीका सादृश्य प्रसङ्गत लगा। इस लिये उन्होंने गम्भीर विचारापन हो कर कायस्यों को 'ठाकुर' पदयोको बनेकानेक पदवियों में विभक्त किया। नो जिस विषयमें निपुण देख पड़ा, वह उसी पदवौसे विभूषित श्रेणीमुक्त' और 'श्रीकर्ण के कुचानुग कहलाये हैं। हुवा। कायस्यों ने राजोपनीयी होनेसे संहर्ष नामा -प्रकारकी उक्त पदवियों को स्वीकार कर लिया । भाजकलके मैथिक्ष पजियार कहा करते कि कर्णाटकसे मिथिलावासी होने कारण मिथिलाके कायस्थ कर्णकायस्य' कहलाते हैं। परन्तु हमें सम- सामयिक शिवालिपि वा अन्यसे इसके समर्थनका कोई प्रमाण नहीं मिला। उलटे; काटक मान्य <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> देवके “सहयात्री ठाकूर, जो वंशपनी ग्रन्बमें कुलीन कर्णकायस्थों के मध्य सबसे बड़े समझ गये हैं, अपनी पिलालिपिमें 'क्षत्रवतानभानु नामसे परिचित हुवे है। दरभङ्गा जिलेमें नवदी परगनेके बीच पधाडाठाडी नामक एक ग्राम है। उसमें कमन्चादित्य मन्दिरक वसा. वशेषमें एक ट्टी हुई विष्णु की मूर्तिके पादपीठ पर निम्रलिखित शिलालेख उत्कीर्ण है- “यों थोमवायपविजेता गुपरबमहार्णका यत् कोयोक्कलित विश्वं दिलीयो धोषणे वरः। मनिया नस्य मान्यस्य चवबहानभानुना। देवोऽयं कारितः श्रीमान् श्रीधरः श्रीधरेप च" "जिनको कीर्तिसे विश्व उच्छनित अर्थात् व्याप्त है, नो गुणरूप रनके समुद्र है, वही श्रीमान् नान्य- पति विजयी हों। उन्हीं नान्यदेधक मन्त्री वनपद्मका- शंबिय-सूर्यस्वरूप श्रीधरने । उता श्रीधर मामक श्रीमान् देवमूर्ति प्रतिष्ठित की है। वाङ्गासमानु' लिखे गये हैं। ऐसी अवस्था में निःसन्देश वह कायस्य क्षत्रिय और वनवासी रहे। गौड़के सेनवंशीय काट-बात्रिय थे और नान्यदेव उन्हों के भाति थे। रादेशमें गङ्गातीर कांटों का एक प्रधान उपनिवेश रहा। सम्भवतः उसी स्थानसे नान्य. देव और श्रीधर ठाकुर अपने पामोय खंजन ले करके मिथिता जीतनको प्रारी बड़े। बङ्गालके उत्तरराट्रीय कायस्थों के प्राचीन कुलग्रन्थ, उत्तरराढ़ीय कायस्थों के पूर्वपुरुष 'श्री कर्णवंशसम्भूत', श्रीकर्णवंश-वन्देशक प्रसङ्गम उक्त प्राचीन कुम्नपत्रीका प्रमाण उहत हो चुका है। मालूम पड़ता कि राढ़ीय- कायस्थों के आदिपुरुषो को भांति श्रीधरदास और उनके कुटुम्बो 'कर्णकायख' नामसे मैथिल-समाजमें परिचित हुये हैं। बालके कायस्यों की भांति मैथिल कायस्थ समाजमें भो. दास, देव निधि, मक्षिक, साम, चौधरी, रङ्ग प्रत्या<noinclude></noinclude> qg4nws9krnkp11y3r13o32qmxqmhsik पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०७ 250 107493 665786 375245 2026-07-07T12:18:39Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 665786 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{Rh|५०८|कायस्थ}} {{Multicol|line=1px solid black}} प्रचलित हैं। उनका कर्मकाण्ड मैथिल ब्राह्मणों के ही सदृश होता है। किन्तु विवाह, श्राहादिकमें भिन्नता देख पड़ती है। मिथिल कायस्थों में प्राजापत्य विवाह करते हैं। {{C|वडोसा।}} उपाधि विद्यमान है। करण खर, पुरं और चित्रगुप्तके वंशधर बताते हैं। इस बातके समझानेका कोई प्रकष्ट उपाय नहीं-वह किस समय और किस प्रकार जा कर उड़ीसामें रहे। पुरीकी श्रीमन्दिरस्थ मादलापच्ची और अन्यान्य विवरणसे समझ पड़ता कि उन्होंने मगधसे गङ्गवंशीय राजावोंके अभ्युदयसे बहुपूर्व उड़ीसा जा कर पूर्वतन राजावोंके अधीन कर्म स्वीकार किया था। गङ्गवंशीय राजावोंके पूर्व वर्ती कटक, सम्बलपुर प्रभृति स्थानोंसे पाविष्कत सोमवयीय राजावोंके समय उत्कीर्ण ताम्रशासनसे समझते कि कलिङ्गाधिपति जनमेजय, ययाति, महाभवगुप्त प्रकृति राजाके अधीन कायस्थ महा सान्धिविग्रहिकका कार्य करते थे। उनका 'घोष 'दत्त' इत्यादि उपाधि था। उक्त सकल उपाधि मागध वा विहारी कायस्थों में नहीं मिलते। किन्तु वङ्गीय कायस्थींके मध्य वह सकल उपाधि प्रचलित हैं। इससे समझ सकते कि वङ्गदेशसे ही जा कर करपिक कायस्थ उड़ीसामें बसे थे। पानश्ल विशुद्ध करण भी अपनेको बङ्गालका ही कायस्थ बताते हैं। बझाल. सेनके समय कोलीन्य प्रथा ग्रहण न करनेसे उन्हें देश छोड़ उड़ीसा जाना पड़ा। किन्तु हम पहले ही लिख चुके हैं कि बल्लालसेनमे बहु पूर्व उड़ीसा में 'घोंघ और 'दत्त' उपाधिधारी कायस्थ विद्यमान थे। करण कहते कि सबसे पहले उनके ढाई घर रहे। सम्भवत: उनके कथनका उद्देश यह है कि सर्व प्रथम उनको संख्या प्रति अल्पमात्र रही। किये ढाई घरों में एकने. 'आठगई का वर्तमान राजवंश वैष्णवों का एक सम्पदाय है। किया था। वह पूर्वतन उत्कन राजके 'वैवर्ता (व्यवहर्ता-मन्त्री ) रहे। दूसरा घर sidangal hetic Society of Bengal, Vol. XLVI. 177. <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पुरी जिलाम खुर्दाके राजाका दीवान है। करण अवशिष्ट श्राधे धरमें समझ जाते हैं। इस समय तक प्राठगड़के राजाका 'वैवर्तापहनायक व्याऊ. भेदसे अपनेको तीन श्रेणीयाँमें विभक्त करते हैं। उड़ीसाके करण अपनेको विशुद्ध कायस्थ पौर आठगड़-राजवंशीय 'खर' खुर्दाके दीवान-वंशीय 'पुर' और अन्यान्य अपनेको 'व्या श्रेणीका कायस्थ कहते हैं। प्रथमोत दी श्रेणी वतीय यौसे अपनेको विशेष कुलीन प्रकाश करती है। इन्हें उत्कल-प्रचलित सामाजिक रीतिके अनुसार ब्राह्मागोंसे. नीचे और खण्डायतोंसे ऊपर मर्यादा मिलती है। सम्पति करण कायस्थ कटक, पुरी एवं वाले- खर तोन जिला, समस्त गड़जात महानों और गजाम सम्बलपुर प्रभृति स्थानों में वाम करते हैं। भिन्न भिन्न स्थानों में अवस्थिति करनेसे उनका प्राचार-व्यवहार तथा रीति-नाति भी बदल गई है। पुरी तथा कटक पञ्चलके करणारे भद्रख एवं वालेखर अञ्चलके करणोंका विवाह- सम्बन्ध नहीं होता। पुरी और सुर्दा अपञ्चके. करण अपनेको सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। उत्कलीय. करण महान्ति, दास, नायक, मह, पटनायक, कानूनगो और सेनापति प्रभृति उपाधि-भूषित हैं। उनमें काननगी पौर पटनायक उपाधि विशेष. सम्मानसूचक होते हैं। उत्कलीय करणों में कोई चैतन्यभक्त और कोई जगत्रायके अतिवड़ी सम्प्रदाय-मुक्त हैं। चैतन्ध- देवके उड़ीसा जानेसे पान तक उनमें अनेक वैष्णव कवियों ने जन्मग्रहण किया है। उनके मध्य कविवर 'बलराम दास' देशविख्यात हैं। उन्होंने उत्कस पद्यसमन्वित अनेक पौराषिक ग्रन्थ प्रणयन उड़ीसेके बहुतसे खानों में सही करण उनमें कोई गौड़ीय,. कोई पतिबड़ी और कोई रामानन्दी अन्तर्गत है। कभी कमी करणीके साथ वा बरता है। वा श्रेणीक- उनका विवाह हंसी श्रेणी किंवा मन्यमांस नहीं पाते।<noinclude></noinclude> ltel8x1csdyjdg6v5fo8y3k3vw6aqdv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०८ 250 107495 665792 375247 2026-07-07T12:42:55Z Sonu kumar 07 6479 665792 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>{{rh||कायस्थ|५०९}} {{Multicol|line=1px solid black}} मध्यभारत। मन्दाजमें कायस्थों का उपनयन सम्पन्न होता है। मध्यप्रदेशके पूर्वतन अधिवासी कायस्थ प्रपनेको पितामाता अथवा निकट पात्मीयके मरनेसे १२ दिन मात्र अशीच प्रहण करते हैं। पाण्डा राजावों के समय मन्दानके कायख सिंहलदीप गये और सिंहलराज पराक्रम वाहु प्रभृसिसे उन्हें महासन्धिविग्रहिक पद मिले थे मन्द्राजके कायस्थ 'कायस्थल' नामसे परिचित पाज भी वह नाना स्थानों में कुन्नकरणी वा कानन· गोईके पद पर प्रतिष्ठित हैं। वह अपनेको चत्रिय वर्णान्तर्गत बताया करते हैं।* कुम्भकोणम् प्रति कि अंगरको अधिकारके राजकार्य में वह ब्राह्मणों के महामतिबन्दी बन गये हैं। कायखाको १२ श्रेणियों से केवल तीन वाल्मीक, माथुर और भटनागर गुजरातमें मिलते हैं। गुज- रातके दूसरे हिन्दुवों से अपना समाज पृथक रखते मी उनमें परस्पर पादान-प्रदान और पानाहार प्रचलित नौं। के वाल्योक कायस्थ प्रधानतः सूरतमें पाये जाते हैं। कहते है-काठियावाड़के वाला नगरमें प्रायः . १४श शताब्दको कायस्थ जाकर बसे थे। (रासमाला, श) किन्तु दक्षिण गुजरातमें उन्होंने प्राय: ई०१६ शताब्दका अधिवेशन किया, जब गुजरात मुगलसाम्राज्यमें मिस गया सम्राट अकबरके प्रबन्धानुसार सुरतको प्रतिष्ठा "It is not irrelevont, however, to state here that the whole of tha third class, that of the writers, have a distinct strain of Kshatriya - blond, not only in this (Madras) Presidency, but in Upper India, where they are stronger in number as well a9 in infidence." Census Report of British India, 1831, Vol. III, p. Xolx. Wilson's Mackenzie Collections, p. 615. Wilson's Castes, Vol. I. p. 66. बागबमें बाल्मीक मंटनामर मा माघ र परस्पर रोटी बेटीका व्यवहार रखते। कहते है-मुसलमान उन्हें अपने साथ गजरानाले गये थे। (Mal- colmºs Central India, Vol. 11.. P. 166.. <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उनका पौरोहित्य, करते हैं। बादश वर्षके पूर्व ही'मासव कायस्थ और चित्रगुप्तके सन्तान बताते हैं। मुसलमान नवाबोंके पागमनकास : मध्यप्रदेशके अधिकांश ब्राह्मणों ने देश छोड़ दिया था। उस समय मुसलमानों ने कायस्यों को फारसी भाषामें पारदर्शी, कार्य कुचल और चतुर देख नाना. स्थानों पर कानूनगोईका पद प्रदान किया। उनमें जात्यभिमान वा कुसंस्कार नहीं, प्रायः सब लोग लिख पढ़ सकते हैं। वह कहा करते है-'अक्षरों को सृष्टि के साथ साथ कायस्थों की भी सृष्टि हुई है। कई स्थानों में कायस्थ मठाध्यक्ष भी हैं। यहां तक विधाताने लिखने-पढ़ने के लिये ही कायस्थों को बनाया है। इसीसे मध्यप्रदेशके पति सामान्य कायस्थ भी किसी परिचारक कर्ममें नहीं लगे। दासत्व उनमें प्रति हेय कार्य समझा जाता है। गुजरात वह अपना परिचय मसिजीवी क्षत्रियके नामसे दिया करते हैं। १.म या ११२ वर्षके मध्य ही पुत्रका मौली सम्पन्न होता है। मृतके उद्देश वह हादश दिन मात्र अशौच ग्रहण करते हैं। उनकी एक शाखा निजामके राज्यमें जाकर रहने लगी है। वहां उन्होंने हिन्दू और मुसलमान राजावों 'पधिकारमें अपनी कार्यदक्षताके गुपसे कितनी हो जागीर और इमाम पाया है। {{C|मन्द्राज प्रेसिडेंसी।}} मन्द्रान प्रान्तमें भी चित्रगुप्त और घान्द्रसेनीय प्रमु उभय वेषौके कायस्थों का वास है।उनका भाचार-व्यवहार और अनुष्ठानादि अधिकतर महा राष्ट्रीय कायस्था जैसा है। महाराष्ट्रको मांति मन्दाजके ब्राह्मणेने भी अनेक बार कायस्थोके साथ छोड़ाहोड़ी की है। किन्तु महाराष्ट्र देशमें ब्राह्मणों के अधिकारसे कोहणस्थ ब्राह्मणों को जो सुविधा- हुई थी, तैलङ्ग ब्राह्मणों को वह सुविधा चग न सकी। जहां वेदभाष्यकार सायणाचार्य प्रमृतिका भन्मस्थान है, वहां बाजन्यवर्गने कायस्थों को हिनातिके मध्य गिमा । वेदन द्राविड़ ब्राह्मण {{Rh|Vol|IV.| 128}}<noinclude></noinclude> o4tkvu3modu353se8z65atr89oegi6l 665793 665792 2026-07-07T12:47:37Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 665793 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||कायस्थ|५०९}} {{Multicol|line=1px solid black}} मध्यभारत। मन्दाजमें कायस्थों का उपनयन सम्पन्न होता है। मध्यप्रदेशके पूर्वतन अधिवासी कायस्थ प्रपनेको पितामाता अथवा निकट पात्मीयके मरनेसे १२ दिन मात्र अशीच प्रहण करते हैं। पाण्डा राजावों के समय मन्दानके कायख सिंहलदीप गये और सिंहलराज पराक्रम वाहु प्रभृसिसे उन्हें महासन्धिविग्रहिक पद मिले थे मन्द्राजके कायस्थ 'कायस्थल' नामसे परिचित पाज भी वह नाना स्थानों में कुन्नकरणी वा कानन· गोईके पद पर प्रतिष्ठित हैं। वह अपनेको चत्रिय वर्णान्तर्गत बताया करते हैं।* कुम्भकोणम् प्रति कि अंगरको अधिकारके राजकार्य में वह ब्राह्मणों के महामतिबन्दी बन गये हैं। कायखाको १२ श्रेणियों से केवल तीन वाल्मीक, माथुर और भटनागर गुजरातमें मिलते हैं। गुज- रातके दूसरे हिन्दुवों से अपना समाज पृथक रखते मी उनमें परस्पर पादान-प्रदान और पानाहार प्रचलित नौं। के वाल्योक कायस्थ प्रधानतः सूरतमें पाये जाते हैं। कहते है-काठियावाड़के वाला नगरमें प्रायः . १४श शताब्दको कायस्थ जाकर बसे थे। (रासमाला, श) किन्तु दक्षिण गुजरातमें उन्होंने प्राय: ई०१६ शताब्दका अधिवेशन किया, जब गुजरात मुगलसाम्राज्यमें मिस गया सम्राट अकबरके प्रबन्धानुसार सुरतको प्रतिष्ठा "It is not irrelevont, however, to state here that the whole of tha third class, that of the writers, have a distinct strain of Kshatriya - blond, not only in this (Madras) Presidency, but in Upper India, where they are stronger in number as well a9 in infidence." Census Report of British India, 1831, Vol. III, p. Xolx. Wilson's Mackenzie Collections, p. 615. Wilson's Castes, Vol. I. p. 66. बागबमें बाल्मीक मंटनामर मा माघ र परस्पर रोटी बेटीका व्यवहार रखते। कहते है-मुसलमान उन्हें अपने साथ गजरानाले गये थे। (Mal- colmºs Central India, Vol. 11.. P. 166.. <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उनका पौरोहित्य, करते हैं। बादश वर्षके पूर्व ही'मासव कायस्थ और चित्रगुप्तके सन्तान बताते हैं। मुसलमान नवाबोंके पागमनकास : मध्यप्रदेशके अधिकांश ब्राह्मणों ने देश छोड़ दिया था। उस समय मुसलमानों ने कायस्यों को फारसी भाषामें पारदर्शी, कार्य कुचल और चतुर देख नाना. स्थानों पर कानूनगोईका पद प्रदान किया। उनमें जात्यभिमान वा कुसंस्कार नहीं, प्रायः सब लोग लिख पढ़ सकते हैं। वह कहा करते है-'अक्षरों को सृष्टि के साथ साथ कायस्थों की भी सृष्टि हुई है। कई स्थानों में कायस्थ मठाध्यक्ष भी हैं। यहां तक विधाताने लिखने-पढ़ने के लिये ही कायस्थों को बनाया है। इसीसे मध्यप्रदेशके पति सामान्य कायस्थ भी किसी परिचारक कर्ममें नहीं लगे। दासत्व उनमें प्रति हेय कार्य समझा जाता है। गुजरात वह अपना परिचय मसिजीवी क्षत्रियके नामसे दिया करते हैं। १.म या ११२ वर्षके मध्य ही पुत्रका मौली सम्पन्न होता है। मृतके उद्देश वह हादश दिन मात्र अशौच ग्रहण करते हैं। उनकी एक शाखा निजामके राज्यमें जाकर रहने लगी है। वहां उन्होंने हिन्दू और मुसलमान राजावों 'पधिकारमें अपनी कार्यदक्षताके गुपसे कितनी हो जागीर और इमाम पाया है। {{C|मन्द्राज प्रेसिडेंसी।}} मन्द्रान प्रान्तमें भी चित्रगुप्त और घान्द्रसेनीय प्रमु उभय वेषौके कायस्थों का वास है।उनका भाचार-व्यवहार और अनुष्ठानादि अधिकतर महा राष्ट्रीय कायस्था जैसा है। महाराष्ट्रको मांति मन्दाजके ब्राह्मणेने भी अनेक बार कायस्थोके साथ छोड़ाहोड़ी की है। किन्तु महाराष्ट्र देशमें ब्राह्मणों के अधिकारसे कोहणस्थ ब्राह्मणों को जो सुविधा- हुई थी, तैलङ्ग ब्राह्मणों को वह सुविधा चग न सकी। जहां वेदभाष्यकार सायणाचार्य प्रमृतिका भन्मस्थान है, वहां बाजन्यवर्गने कायस्थों को हिनातिके मध्य गिमा । वेदन द्राविड़ ब्राह्मण {{Rh|Vol|IV.| 128}}<noinclude></noinclude> 6eyi0anf3akmgcj45ma8o49z9oe9x7o पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०९ 250 107497 665795 375249 2026-07-07T13:06:37Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 665795 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५१०|कंटित}} {{Multicol|line=1px solid black}} चढ़ी थी। राजकीय लेखक (मुतसदी) नगर पौर निक- रंस जियों के शासक रहे। वह गुजरातवाले सूवे- दारके अधीन न थे, दिल्लीको राजसमासे सीधा सम्बन्ध रखते थे। सूरतके अट्ठाईस विभागों मालगुजारी वही वसूल करते थे। १८८६ ई. तक "अंगरेजी गांवों में और १८८५ ई. तक बड़ोदाके २८ गांवों में प्रधानसः कायस्य ही मजुमदार रहे। उनका पाकार-प्रकार ब्राह्मणों से मिलता है। गुजराती कायस्थों को निराली बैठक मेलकथाला मकान (गृह) है। वहां समवयस्क लोग सन्ध्याको जा कर मिन्नते, हुक्का पीते, धार्मिक गीत सुनते या सुनाते पर आमोद-प्रमोद करते हैं। उन्हें गानेका बड़ा शौक है और उनमें कुछ अच्छे अभिनेता भी हैं। प्रत्येक कुटुम्बको एक अधिष्ठात्री देवी होती हैं। पौदीच्य ब्राधण पौरोहित्य करते हैं। अपने धार्मिक प्रधानों महाराष्ट्रों के अतिरिक्त, जिन्हें विवाहके समय वुन्ताते हैं, बाल्मीक कायस्थ ब्राह्मणों के प्रति विशेष सम्मान प्रदर्शन नहीं करते। दूसरे वैष्णवोंकी अपेक्षा महाराष्ट्रोंसे भी वह न्यून भेदभाव रखते हैं। माथर कायस्थ . अहमदाबाद, बड़ोदा, दभोई, सूरत, राधनपुर और नडिप्रादमें होते हैं। १५७३ १७५० ई. को मुगल-सूबेदारके साथ वह लेखक और दुभासियेकी भांति गुजरात गये थे। ५० वा ३० वर्ष हुवे माथुर मांस भोजन करते थे। किन्तु अब वह निरामिषभोजी हैं। चैत्र और पाखिन मास पूनाके समय माथुर मांस और देशी सुरा देवीको समर्पण किया करते थे। किन्तु गुजरातके ब्राहाणों और वैश्योंसे घनिष्ठ सम्बन्ध होने पर उन्होंने अपनी वह रीति छोड़ दी है। पब मांसके बदले खेत कुमाण्ड और सुराके स्थानमें शरबत चढ़ाते हैं। माधुरी में कोई रामानुजी, कोई वामाचारी और कोई शैव हैं। प्रत्येक भवनमें एक कुलदेवी काली, दुर्गा वा अम्बा रहती हैं। माथुरोंके पूज्वदेव सासनी (बालरूप कण), गणपति वा.महादेव। स्त्री पुरुष दोनों शिव; विच और माता मंदिर दर्शन ! <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> करनेको जाते हैं। संस्कारांदिके समय कुलगुरु पौरोहित्य करते, जो पौदीच्य, यौमासी वा पारापर ब्राण रहते हैं। की साधारण हिन्दू पर्वो के अतिरिक्त मायरों में दूसरे भी कई पुण्यदिन होते हैं। वह कार्तिक शक्ता पौर चैत्र शक्ता हितीयाके दिन चित्रगुप्त पूजन और भगिनी- कर्तृक प्रस्तुत खाद्य मौजन करते हैं। मटनागर कायस्थ अहमदाबाद, बड़ोदा और अल्प- संख्यक सूरतमें देख पड़ते हैं। वाल्मीक और माथुर कायस्थांकी भांति वह भी गुजरातको उत्तर- भारतसे गये, जहां आज भी उनकी संख्या पधिक भटनागर दूसरे कायस्थों को मांति अपनेको चित्रगुप्तका वंशधर बताते हैं। पद्मपुराणमें लिया है कि चित्रगुप्तके १२ पुत्रों में एक पुत्र भट नामक सापके साथ श्रीनगर संस्थापन करने भेने गये है, पोल वही श्रीनगरके शासक हुवे। उन्हींसे भटनागर नाम निकला है। उनमें व्यास और दास दो श्रेणी है। इन दोनो श्रेणियों में व्यास ऊंचे समझ जाते हैं। पहले वह दामों के हाथका बना भोजन ग्रहण न करते थे। व्यास दासों की कन्या ले लेते, परन्तु पपनी कन्या उन्हें कभी नहीं देते। पाक्षति, परिच्छद (पोशाक), भाषा, खाद्य, गृह पौर उपजीविकामें भटनागर, वाल्मीको पौर माथुरों से मिलते हैं। वह वक्षभाचार्य सम्प्रदायभुक्त है। दशहरा पौर कार्तिक शुक्ला द्वितीया उनका विशेष पुण्याह है। दिन चित्रगुप्तके सम्मानार्थ एक गूढ़ छन्द लिखा और तलवारके साथ पूजा जाता है। प्राचार-व्यवहार वाल्मीकों की अपेक्षा मायुरो से पधिक मिलता है। भटनागरोंका पौरोहित्य श्रीगौड़ ब्रामण करते हैं। उनमें कोई चौधरी या मुखिया नहीं होता। {{C|बम्बई प्रान्त}} बन्लाई प्राता बम्बई प्रदेशमें चान्द्रसेनी प्रभु, ध्रुव प्रभु, दमन प्रभु और ब्रह्मचनिय बीके कायस्थ रहते हैं। दाधियात्वमें बीस हजारके पधिक घान्द्रसैनी प्रभुवोका बाम । उनके मय बम्बई प्रान्त के<noinclude></noinclude> ps11b2hdt1e18mokx9fzq1c17hltgh3 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५१० 250 107498 665798 375250 2026-07-07T13:19:05Z Sonu kumar 07 6479 665798 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>{{rh|५११|अवस्था} {{Multicol|line=1px solid black}} अन्तर्गत बार प्रदेश में ही सोग अधिक देख पड़ते । । फिर थाना और कुचागा निखामें भी अधिकांश चान्द्रसेनी प्रभु पाये जाते हैं। कैवस से दोनों 'जिंसोंमें ही वह बारह बारसे कम न होंगे। खास बम्बई, जंजीरा, पूना, सितारा और अन्यान्य स्थानमें भी उनका वास है। चान्द्रसैनी प्रभु कायस्व अयोध्याके क्षत्रियराजा चन्द्रसेनको सन्तति होनेका दावा करते हैं। पुराणके रेणुकामाहामामें लिखा है-“परशरामने सम्मतिदातावोंके भांपत्ति करने पर शिवजौने कहा- क्षत्रिय-संहार को अपनी प्रतिज्ञा पूरण करनेके सिये सहस्रार्जुन और राजा चन्द्रसेनको मार डाला। परन्तु उन्होंने सुना, चन्ट्रसेनको महिषोने दाल्भ्य 'ऋषिका पाश्रय चिया था और वह गर्भवती रहीं। 'परशुराम अपनी प्रतिज्ञा पालन करनेको उल ऋषिके 'निकट जा कर उपस्थित हुवे। ऋोषने परशरामको 'बादर सत्कार कर कहा था-'आप अपने पांगमनका अभिप्राय वतवायिये। पापका प्रमिलाप निश्चय पूर्ण किया जावेगा।' परशुरामने उत्तर दिया कि वह चन्द्रसेनकी महिषीको खोजमें थे। ऋषि अविलम्ब उता महिलाको ले पाये। परशरामने अपने यत्रको सफलतामें प्रसन्न हो ऋषिको मुंहमांगा वर देने कहा था। ऋपिने अप्रसूत वालक मांगा। 'परशुराम उन्हें इस शर्त पर उक्त पुत्र देनको प्रस्तुत हुवे कि उसे और उसके सैन्तानको लेखक वाचकका नाम सोम उपनयनके समय यथाविधि राज रखा गया। उन्हीं मोमराजके पुत्र विखनाथ, महादेव, भानु तथा नक्ष्मीधर और उनके वंशज "कायस्थ-प्रभु' नामसे परिचित हुवे।" पहले मुसलमाननि कायस्यों को कर्ममें लगाया जाते हैं। विधवा-विवाह उनमें प्रचलित नहीं। था। पूनामें मुसलमानो नगर जुबारके निकट, विवाह और शाह पर वह क्षमतासे भी अधिक जंजीराको राजपुरी, थाना जिलेको उत्तरंसीमा पर, व्यय करने में कुण्ठित नहीं होते। उनके मध्य भागवत दामन, बड़ोदा और कल्याणमें कायस्खों के उपनिवेश और वैभव मांस-भोजनसे दूर रहते हैं। शाक्त स्थापित दुवे। दामनवासे वशी राजाके एक कायस्थ अपमेवी 'देवीपुत्र' करते और मद्यमांस पार करते प्रभु प्रधान मन्त्री रहे। गायकवाड़के प्रधान मन्त्री है। देशस्य ब्राह्मण ही उनके गुरु-पुरोहित हैं। रावजी अप्याजी भी कायस्यों के एक . पृष्ठपोषक थे। Sherring's Tribes and Castes, Vol. II. p.182 कखापसेही कायल पानी जिसमें-वाकर फैछ- पड़े and Aithar Steel's Law and Custom of Hindu Cestes, p. 94. शिवाजी (६२) कायस्थ प्रभुवोंसे बहुत प्रीत रहते थे। समय समय पर संतारा,. कोल्हापुर, नागपुर और बड़ोदाकी अदालतों में कायखों ने बड़ा प्राधान्य पाया। पूनाक राव बहादुर रामचन्द्र सखाराम गुप्तके कथनानुसार शिवाजीने एक बार राजस्व विभागके अपने समस्त वाण निकाल करके उनके स्थान पर कायस्थ प्रभुषोंको रखा था। मोरपन्त पिङ्गले और नौलपन्त अपने दो ब्राह्मण 'स्मरण रखिये कि विना विवाद समस्त मुसलमानी स्थान, जो वाद्यों के अधिकारमें थे, छोड़ दिये गये हैं। परन्तु प्रभुयों के अधिकृत स्थाने लेनमें बड़ी मुशकिल पड़ी थी। इनमें एक राजपुरी प्रान भी नहीं ची जा सकी है। बम्बई-प्रान्तके चान्द्रसेनी प्रभु ब्राह्मणों के पीछे ही सामाजिक आसन पति और प्रपनको क्षवियं बंतांत उनमें २५ गोत्र और ४२ उपाधि हैं। उक्त कायस्थ-प्रभुवों का प्राचार-व्यवहार, भावगठन होता है। वह देखने में सुन्दर एवं परिष्कत रहते और परिच्छदादि सम्पूर्ण कोइंग्णव ब्राह्मणों जैसा और मस्तक पर चूड़ा तथा स्कन्ध पर यत्रोपपोत रखते हैं। सकल कायस्थ-प्रभु यजन, अध्ययन और दान विविध वैदिक कर्मके अधिकारी हैं।* दशम वर्षके पूर्व वह पुत्रादिको उपमयन दिया करते है।बनाया जाता, सैनिक नहींब्रह्मचर्य पालित होता है। एतद्भिन्न जातकर्म, नामकरण, कर्णवेध, दन्तोहम, चूड़ाकरण, निष्कामण, सीमन्तोनयन, विवाह, गर्मा- धान, प्राष्टि प्रमृति मकल संस्कार यथाविधि किये<noinclude></noinclude> l3ngf32t4xuy1kynq75t8i66uvhxkwl 665800 665798 2026-07-07T13:23:54Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 665800 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५११|अवस्था} {{Multicol|line=1px solid black}} अन्तर्गत बार प्रदेश में ही सोग अधिक देख पड़ते । । फिर थाना और कुचागा निखामें भी अधिकांश चान्द्रसेनी प्रभु पाये जाते हैं। कैवस से दोनों 'जिंसोंमें ही वह बारह बारसे कम न होंगे। खास बम्बई, जंजीरा, पूना, सितारा और अन्यान्य स्थानमें भी उनका वास है। चान्द्रसैनी प्रभु कायस्व अयोध्याके क्षत्रियराजा चन्द्रसेनको सन्तति होनेका दावा करते हैं। पुराणके रेणुकामाहामामें लिखा है-“परशरामने सम्मतिदातावोंके भांपत्ति करने पर शिवजौने कहा- क्षत्रिय-संहार को अपनी प्रतिज्ञा पूरण करनेके सिये सहस्रार्जुन और राजा चन्द्रसेनको मार डाला। परन्तु उन्होंने सुना, चन्ट्रसेनको महिषोने दाल्भ्य 'ऋषिका पाश्रय चिया था और वह गर्भवती रहीं। 'परशुराम अपनी प्रतिज्ञा पालन करनेको उल ऋषिके 'निकट जा कर उपस्थित हुवे। ऋोषने परशरामको 'बादर सत्कार कर कहा था-'आप अपने पांगमनका अभिप्राय वतवायिये। पापका प्रमिलाप निश्चय पूर्ण किया जावेगा।' परशुरामने उत्तर दिया कि वह चन्द्रसेनकी महिषीको खोजमें थे। ऋषि अविलम्ब उता महिलाको ले पाये। परशरामने अपने यत्रको सफलतामें प्रसन्न हो ऋषिको मुंहमांगा वर देने कहा था। ऋपिने अप्रसूत वालक मांगा। 'परशुराम उन्हें इस शर्त पर उक्त पुत्र देनको प्रस्तुत हुवे कि उसे और उसके सैन्तानको लेखक वाचकका नाम सोम उपनयनके समय यथाविधि राज रखा गया। उन्हीं मोमराजके पुत्र विखनाथ, महादेव, भानु तथा नक्ष्मीधर और उनके वंशज "कायस्थ-प्रभु' नामसे परिचित हुवे।" पहले मुसलमाननि कायस्यों को कर्ममें लगाया था। पूनामें मुसलमानो नगर जुबारके निकट, जंजीराको राजपुरी, थाना जिलेको उत्तरंसीमा पर, दामन, बड़ोदा और कल्याणमें कायस्खों के उपनिवेश स्थापित दुवे। दामनवासे वशी राजाके एक कायस्थ प्रभु प्रधान मन्त्री रहे। गायकवाड़के प्रधान मन्त्री रावजी अप्याजी भी कायस्यों के एक . पृष्ठपोषक थे। कखापसेही कायल पानी जिसमें-वाकर फैछ- पड़े <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हैं।शिवाजी (६२) कायस्थ प्रभुवोंसे बहुत प्रीत रहते थे। समय समय पर संतारा,. कोल्हापुर, नागपुर और बड़ोदाकी अदालतों में कायखों ने बड़ा प्राधान्य पाया। पूनाक राव बहादुर रामचन्द्र सखाराम गुप्तके कथनानुसार शिवाजीने एक बार राजस्व विभागके अपने समस्त वाण निकाल करके उनके स्थान पर कायस्थ प्रभुषोंको रखा था। मोरपन्त पिङ्गले और नौलपन्त अपने दो ब्राह्मण 'स्मरण रखिये कि विना विवाद समस्त मुसलमानी स्थान, जो वाद्यों के अधिकारमें थे, छोड़ दिये गये हैं। परन्तु प्रभुयों के अधिकृत स्थाने लेनमें बड़ी मुशकिल पड़ी थी। इनमें एक राजपुरी प्रान भी नहीं ची जा सकी है। बम्बई-प्रान्तके चान्द्रसेनी प्रभु ब्राह्मणों के पीछे ही सामाजिक आसन पति और प्रपनको क्षवियं बंतांत उनमें २५ गोत्र और ४२ उपाधि हैं। उक्त कायस्थ-प्रभुवों का प्राचार-व्यवहार, भावगठन होता है। वह देखने में सुन्दर एवं परिष्कत रहते और परिच्छदादि सम्पूर्ण कोइंग्णव ब्राह्मणों जैसा और मस्तक पर चूड़ा तथा स्कन्ध पर यत्रोपपोत रखते हैं। सकल कायस्थ-प्रभु यजन, अध्ययन और दान विविध वैदिक कर्मके अधिकारी हैं।* दशम वर्षके पूर्व वह पुत्रादिको उपमयन दिया करते है।बनाया जाता, सैनिक नहींब्रह्मचर्य पालित होता है। एतद्भिन्न जातकर्म, नामकरण, कर्णवेध, दन्तोहम, चूड़ाकरण, निष्कामण, सीमन्तोनयन, विवाह, गर्मा- धान, प्राष्टि प्रमृति मकल संस्कार यथाविधि किये जाते हैं। विधवा-विवाह उनमें प्रचलित नहीं। विवाह और शाह पर वह क्षमतासे भी अधिक व्यय करने में कुण्ठित नहीं होते। उनके मध्य भागवत और वैभव मांस-भोजनसे दूर रहते हैं। शाक्त अपमेवी 'देवीपुत्र' करते और मद्यमांस पार करते है। देशस्य ब्राह्मण ही उनके गुरु-पुरोहित हैं। and Aithar Steel's Law and Custom of Hindu Cestes, p. 94.<noinclude></noinclude> tud1eimk28zuw23kc2qak4tzshby690 665802 665800 2026-07-07T13:24:19Z Sonu kumar 07 6479 665802 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५११|अवस्था}} {{Multicol|line=1px solid black}} अन्तर्गत बार प्रदेश में ही सोग अधिक देख पड़ते । । फिर थाना और कुचागा निखामें भी अधिकांश चान्द्रसेनी प्रभु पाये जाते हैं। कैवस से दोनों 'जिंसोंमें ही वह बारह बारसे कम न होंगे। खास बम्बई, जंजीरा, पूना, सितारा और अन्यान्य स्थानमें भी उनका वास है। चान्द्रसैनी प्रभु कायस्व अयोध्याके क्षत्रियराजा चन्द्रसेनको सन्तति होनेका दावा करते हैं। पुराणके रेणुकामाहामामें लिखा है-“परशरामने सम्मतिदातावोंके भांपत्ति करने पर शिवजौने कहा- क्षत्रिय-संहार को अपनी प्रतिज्ञा पूरण करनेके सिये सहस्रार्जुन और राजा चन्द्रसेनको मार डाला। परन्तु उन्होंने सुना, चन्ट्रसेनको महिषोने दाल्भ्य 'ऋषिका पाश्रय चिया था और वह गर्भवती रहीं। 'परशुराम अपनी प्रतिज्ञा पालन करनेको उल ऋषिके 'निकट जा कर उपस्थित हुवे। ऋोषने परशरामको 'बादर सत्कार कर कहा था-'आप अपने पांगमनका अभिप्राय वतवायिये। पापका प्रमिलाप निश्चय पूर्ण किया जावेगा।' परशुरामने उत्तर दिया कि वह चन्द्रसेनकी महिषीको खोजमें थे। ऋषि अविलम्ब उता महिलाको ले पाये। परशरामने अपने यत्रको सफलतामें प्रसन्न हो ऋषिको मुंहमांगा वर देने कहा था। ऋपिने अप्रसूत वालक मांगा। 'परशुराम उन्हें इस शर्त पर उक्त पुत्र देनको प्रस्तुत हुवे कि उसे और उसके सैन्तानको लेखक वाचकका नाम सोम उपनयनके समय यथाविधि राज रखा गया। उन्हीं मोमराजके पुत्र विखनाथ, महादेव, भानु तथा नक्ष्मीधर और उनके वंशज "कायस्थ-प्रभु' नामसे परिचित हुवे।" पहले मुसलमाननि कायस्यों को कर्ममें लगाया था। पूनामें मुसलमानो नगर जुबारके निकट, जंजीराको राजपुरी, थाना जिलेको उत्तरंसीमा पर, दामन, बड़ोदा और कल्याणमें कायस्खों के उपनिवेश स्थापित दुवे। दामनवासे वशी राजाके एक कायस्थ प्रभु प्रधान मन्त्री रहे। गायकवाड़के प्रधान मन्त्री रावजी अप्याजी भी कायस्यों के एक . पृष्ठपोषक थे। कखापसेही कायल पानी जिसमें-वाकर फैछ- पड़े <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हैं।शिवाजी (६२) कायस्थ प्रभुवोंसे बहुत प्रीत रहते थे। समय समय पर संतारा,. कोल्हापुर, नागपुर और बड़ोदाकी अदालतों में कायखों ने बड़ा प्राधान्य पाया। पूनाक राव बहादुर रामचन्द्र सखाराम गुप्तके कथनानुसार शिवाजीने एक बार राजस्व विभागके अपने समस्त वाण निकाल करके उनके स्थान पर कायस्थ प्रभुषोंको रखा था। मोरपन्त पिङ्गले और नौलपन्त अपने दो ब्राह्मण 'स्मरण रखिये कि विना विवाद समस्त मुसलमानी स्थान, जो वाद्यों के अधिकारमें थे, छोड़ दिये गये हैं। परन्तु प्रभुयों के अधिकृत स्थाने लेनमें बड़ी मुशकिल पड़ी थी। इनमें एक राजपुरी प्रान भी नहीं ची जा सकी है। बम्बई-प्रान्तके चान्द्रसेनी प्रभु ब्राह्मणों के पीछे ही सामाजिक आसन पति और प्रपनको क्षवियं बंतांत उनमें २५ गोत्र और ४२ उपाधि हैं। उक्त कायस्थ-प्रभुवों का प्राचार-व्यवहार, भावगठन होता है। वह देखने में सुन्दर एवं परिष्कत रहते और परिच्छदादि सम्पूर्ण कोइंग्णव ब्राह्मणों जैसा और मस्तक पर चूड़ा तथा स्कन्ध पर यत्रोपपोत रखते हैं। सकल कायस्थ-प्रभु यजन, अध्ययन और दान विविध वैदिक कर्मके अधिकारी हैं।* दशम वर्षके पूर्व वह पुत्रादिको उपमयन दिया करते है।बनाया जाता, सैनिक नहींब्रह्मचर्य पालित होता है। एतद्भिन्न जातकर्म, नामकरण, कर्णवेध, दन्तोहम, चूड़ाकरण, निष्कामण, सीमन्तोनयन, विवाह, गर्मा- धान, प्राष्टि प्रमृति मकल संस्कार यथाविधि किये जाते हैं। विधवा-विवाह उनमें प्रचलित नहीं। विवाह और शाह पर वह क्षमतासे भी अधिक व्यय करने में कुण्ठित नहीं होते। उनके मध्य भागवत और वैभव मांस-भोजनसे दूर रहते हैं। शाक्त अपमेवी 'देवीपुत्र' करते और मद्यमांस पार करते है। देशस्य ब्राह्मण ही उनके गुरु-पुरोहित हैं। and Aithar Steel's Law and Custom of Hindu Cestes, p. 94.<noinclude></noinclude> rvbg3pl9rlt640svncbqmwq2hkvlkn9 सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw 3 166694 666382 662660 2026-07-08T04:23:30Z सौरभ तिवारी 05 49 /* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ नया अनुभाग 666382 wikitext text/x-wiki == Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022 - Result == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |rowspan="2" style="vertical-align: middle; padding: 5px;" | [[File:Special Gold Barnstar.png|100px]] |style="font-size: x-large; padding: 3px 3px 0 3px; height: 1.5em;" | '''Congratulations!!!''' |- |style="vertical-align: middle; padding: 3px;" | Dear {{BASEPAGENAME}}, the results of the [[:meta:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Result|Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022]] have been published. Kindly visit the project page for your position. Congratulations !!! [[:meta:CIS-A2K|The Centre for Internet & Society (CIS-A2K)]] will need to fill out the required information in this [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSea6Doc3sVwu9J60floO0hOCTRvOlwgDAjhxZqX-g4oKzavOA/viewform?usp=sf_link Google form] to send the [[:meta:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Prize|contest awards]] to your address. We assure you that this information will be kept completely [https://wikimediafoundation.org/wiki/Privacy_policy confidential]. Please confirm here just below this message by notifying (<code><nowiki>"I have filled up the form. - ~~~~"</nowiki></code>) us, when you filled up this form. You are requested to complete this form within 10 days. Thank you for your contribution to Wikisource. Hopefully, Wikisource will continue to enrich your active constructive editing in the future. Thanks for your contribution <br/> '''Jayanta (CIS-A2K)''' <br/> ''Wikisource program officer, CIS-A2K'' |} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Talk:Indic_Wikisource_proofread-a-thon_November_2022/Result&oldid=24166580 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> ("I have filled up the form. - [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) १३:५३, ५ दिसम्बर २०२२ (UTC)") ("I have filled up the form. - [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०८:०६, २० मई २०२३ (UTC)") == हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला रजिस्ट्रेशन == नमस्कार, हम आशा करते हैं कि आप सब तंदरुस्त होंगे। आपको सूचित किया जा रहा है कि आज से यानी कि 8 फरवरी 2023 से हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला के रजिस्ट्रेशन ऑपन हो गई है जो 15 फरवरी 2023 तक जारी रहेगी। कृपया अपना कुछ कीमती समय निकाल कर [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSck0SZ_TNpa5j9z3X_IJ8Y4PAIKNxjd3bRPmkeP_s9_vkwp7g/viewform इस फार्म] को ज़रूर भरें। बहुत शुक्रिया --[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १०:३४, ९ फ़रवरी २०२३ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Talk:CIS-A2K/Events/Hindi_Wikisource_Community_skill-building_workshop&oldid=24472896 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Indic Wikisource Proofread-a-thon April 2023 - Result == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |rowspan="2" style="vertical-align: middle; padding: 5px;" | [[File:Special Gold Barnstar.png|100px]] |style="font-size: x-large; padding: 3px 3px 0 3px; height: 1.5em;" | '''Congratulations!!!''' |- |style="vertical-align: middle; padding: 3px;" | Dear {{BASEPAGENAME}}, the results of the [[:meta:Indic Wikisource proofread-a-thon April 2023/Result|Indic Wikisource Proofreadthon April 2023]] have been published. You have stood '''fifth''' in this contest. Congratulations !!! [[:meta:CIS-A2K|The Centre for Internet & Society (CIS-A2K)]] will need to fill out the required information in this [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSeESP_oyaAV628D8RJngqkfJF4O63inoOFb05rORzjUsbAUxQ/viewform Google form] to send the [[:meta:Indic Wikisource proofread-a-thon April 2023/Prize|contest awards]] to your address. We assure you that this information will be kept completely [https://wikimediafoundation.org/wiki/Privacy_policy confidential]. '''There will be a delay in sending the prizes until further notice due to regulatory concerns and ongoing organizational challenges. Because it is difficult to commit at this time, the community will have to wait until further notice. When the situation improves, I will get back to you right away.''' Please confirm here just below this message by notifying (<code><nowiki>"I have filled up the form. - ~~~~"</nowiki></code>) us, when you filled up this form. You are requested to complete this form within 30 days. Thank you for your contribution to Wikisource. Hopefully, Wikisource will continue to enrich your active constructive editing in the future. Thanks for your contribution <br/> '''Jayanta (CIS-A2K)''' <br/> ''Wikisource program officer, CIS-A2K'' |} ("I have filled up the form. - [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०८:१३, २० मई २०२३ (UTC)") == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई 2023 में आपके संपादन == {{PAGENAME}} जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ%3AKabir_Granthavali.pdf%2F७८&diff=576332&oldid=576008 इसे] देखें और इसके अनुसार आगे पृष्ठों में सुधार करें। चूंकि न्यूनतम अर्हता अंक (100) पाने के लिए इस पुस्तक में 60 पन्ने ही शोधित करने हैं तो गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखें। धन्यवाद। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०६:५५, २४ जुलाई २०२३ (UTC) :धन्यवाद सर🙏 [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) १३:३९, २४ जुलाई २०२३ (UTC) == [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023|गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२३]] सूचना == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|100px|left]] <span style="font-size:14pt">बधाई हो! प्रिय {{PAGENAME}}, [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023|गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२३]] के एक हजार से भी अधिक मुश्किल पृष्ठ शोधित करने के अभियान में भाग लेकर इसे सफल बनाने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। आपको उत्कृष्ट शोधक पुरस्कार के लिए चुना गया है। पुरस्कार प्राप्त करने के लिए ८ अगस्त २०२३ तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLScbuTiNx4yx-3F2JpBuPQBZpkOF8dB96fd21tCIe7F_Yn9XJA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] भरकर जमा करें। १५ अगस्त तक आपको पुरस्कार तथा ई-प्रमाण-पत्र भेज दिया जाएगा। पहले सूचना प्रपत्र भर लेने तथा बाद में पुरस्कार कूपन या प्रमाण-प्रपत्र मिलने की सूचना इस संदेश के उत्तर के रूप में अवश्य दें।</span> -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:५९, ६ अगस्त २०२३ (UTC) :{{PAGENAME}} जी, नमस्ते। आयोजकों द्वारा सभी चयनित सदस्यों को ई-उपहार पर्णिका भेज दी गई है। प्रमाण-पत्र के निर्माण में अभी कुछ दिन और लगेंगे। हम प्रमाण-पत्र पर गूगल के लोगो का उपयोग करने के लिए अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया में हैं। आपसे अनुरोद है कि समपादनोत्सव से मिले अपने अनुभव और सीख को [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023/रपट]] पर अपने सदस्य नाम का अनुभाग बनाकर जरूर दर्ज करें। भविष्य के संपादनोत्सवों में भाग लेने के लिए यह अनिवार्य है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:४२, २० अगस्त २०२३ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 सूचना == :आपको संपादनोत्सव में सौ पृष्ठ संपादन करने का लक्ष्य हासिल करने की बधाई! -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १६:१९, २५ फ़रवरी २०२४ (UTC) ::धन्यवाद सर 🙏🥰 [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) १६:२५, २५ फ़रवरी २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 परिणाम == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। ई-मेल पर कूपन द्वारा पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 5 अप्रैल 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfNQpP4Zn6GmQ3XIjDWlQ-KItIqnm-seTMO6PZGcu22lV7fgA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:१५, २२ मार्च २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:५१, ७ सितम्बर २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा उत्कृष्टता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:०७, २९ मार्च २०२५ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १० जनवरी २०२६ (UTC) :प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:५५, २९ जनवरी २०२६ (UTC) == विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए २५ मार्च २०२६ तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdAp7lxMY2nSh5wnsTi8SQOA4vu-0DGi2siReQtMcdictAemg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०१:०५, १८ मार्च २०२६ (UTC) :प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] की पुरस्कार राशी अमेजन कूपन के रूप में भेजी जा चुकी है। कृपया अपना ईमेल जाँच लें। कोई समस्या हो तो मुझे सूचित करें -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:१९, ९ अप्रैल २०२६ (UTC) == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_भाग_1.djvu/६३&diff=prev&oldid=666381 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। इसके साथ ही संपादनोत्सव के दौरान शोधित किए जाने वाले पृष्ठों पर इन गलतियों से बचने का ध्यान रखें। संपादनोत्सव में भाग लेने के लिए धन्यवाद। आप निश्चिंत होकर अपना संपादन कार्य जारी रख सकती हैं। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०४:२३, ८ जुलाई २०२६ (UTC) dacul7rtjqfwhwzu5a7sxezlt97qtco 666392 666382 2026-07-08T05:26:57Z ~2026-38725-16 6726 /* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ उत्तर 666392 wikitext text/x-wiki == Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022 - Result == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |rowspan="2" style="vertical-align: middle; padding: 5px;" | [[File:Special Gold Barnstar.png|100px]] |style="font-size: x-large; padding: 3px 3px 0 3px; height: 1.5em;" | '''Congratulations!!!''' |- |style="vertical-align: middle; padding: 3px;" | Dear {{BASEPAGENAME}}, the results of the [[:meta:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Result|Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022]] have been published. Kindly visit the project page for your position. Congratulations !!! [[:meta:CIS-A2K|The Centre for Internet & Society (CIS-A2K)]] will need to fill out the required information in this [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSea6Doc3sVwu9J60floO0hOCTRvOlwgDAjhxZqX-g4oKzavOA/viewform?usp=sf_link Google form] to send the [[:meta:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Prize|contest awards]] to your address. We assure you that this information will be kept completely [https://wikimediafoundation.org/wiki/Privacy_policy confidential]. Please confirm here just below this message by notifying (<code><nowiki>"I have filled up the form. - ~~~~"</nowiki></code>) us, when you filled up this form. You are requested to complete this form within 10 days. Thank you for your contribution to Wikisource. Hopefully, Wikisource will continue to enrich your active constructive editing in the future. Thanks for your contribution <br/> '''Jayanta (CIS-A2K)''' <br/> ''Wikisource program officer, CIS-A2K'' |} <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Talk:Indic_Wikisource_proofread-a-thon_November_2022/Result&oldid=24166580 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> ("I have filled up the form. - [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) १३:५३, ५ दिसम्बर २०२२ (UTC)") ("I have filled up the form. - [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०८:०६, २० मई २०२३ (UTC)") == हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला रजिस्ट्रेशन == नमस्कार, हम आशा करते हैं कि आप सब तंदरुस्त होंगे। आपको सूचित किया जा रहा है कि आज से यानी कि 8 फरवरी 2023 से हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला के रजिस्ट्रेशन ऑपन हो गई है जो 15 फरवरी 2023 तक जारी रहेगी। कृपया अपना कुछ कीमती समय निकाल कर [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSck0SZ_TNpa5j9z3X_IJ8Y4PAIKNxjd3bRPmkeP_s9_vkwp7g/viewform इस फार्म] को ज़रूर भरें। बहुत शुक्रिया --[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १०:३४, ९ फ़रवरी २०२३ (UTC) <!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Talk:CIS-A2K/Events/Hindi_Wikisource_Community_skill-building_workshop&oldid=24472896 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश --> == Indic Wikisource Proofread-a-thon April 2023 - Result == ''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translating it'' {| style="background-color: #fdffe7; border: 1px solid #fceb92;" |rowspan="2" style="vertical-align: middle; padding: 5px;" | [[File:Special Gold Barnstar.png|100px]] |style="font-size: x-large; padding: 3px 3px 0 3px; height: 1.5em;" | '''Congratulations!!!''' |- |style="vertical-align: middle; padding: 3px;" | Dear {{BASEPAGENAME}}, the results of the [[:meta:Indic Wikisource proofread-a-thon April 2023/Result|Indic Wikisource Proofreadthon April 2023]] have been published. You have stood '''fifth''' in this contest. Congratulations !!! [[:meta:CIS-A2K|The Centre for Internet & Society (CIS-A2K)]] will need to fill out the required information in this [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSeESP_oyaAV628D8RJngqkfJF4O63inoOFb05rORzjUsbAUxQ/viewform Google form] to send the [[:meta:Indic Wikisource proofread-a-thon April 2023/Prize|contest awards]] to your address. We assure you that this information will be kept completely [https://wikimediafoundation.org/wiki/Privacy_policy confidential]. '''There will be a delay in sending the prizes until further notice due to regulatory concerns and ongoing organizational challenges. Because it is difficult to commit at this time, the community will have to wait until further notice. When the situation improves, I will get back to you right away.''' Please confirm here just below this message by notifying (<code><nowiki>"I have filled up the form. - ~~~~"</nowiki></code>) us, when you filled up this form. You are requested to complete this form within 30 days. Thank you for your contribution to Wikisource. Hopefully, Wikisource will continue to enrich your active constructive editing in the future. Thanks for your contribution <br/> '''Jayanta (CIS-A2K)''' <br/> ''Wikisource program officer, CIS-A2K'' |} ("I have filled up the form. - [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ०८:१३, २० मई २०२३ (UTC)") == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई 2023 में आपके संपादन == {{PAGENAME}} जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ%3AKabir_Granthavali.pdf%2F७८&diff=576332&oldid=576008 इसे] देखें और इसके अनुसार आगे पृष्ठों में सुधार करें। चूंकि न्यूनतम अर्हता अंक (100) पाने के लिए इस पुस्तक में 60 पन्ने ही शोधित करने हैं तो गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखें। धन्यवाद। --[[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) ०६:५५, २४ जुलाई २०२३ (UTC) :धन्यवाद सर🙏 [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) १३:३९, २४ जुलाई २०२३ (UTC) == [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023|गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२३]] सूचना == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|100px|left]] <span style="font-size:14pt">बधाई हो! प्रिय {{PAGENAME}}, [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023|गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२३]] के एक हजार से भी अधिक मुश्किल पृष्ठ शोधित करने के अभियान में भाग लेकर इसे सफल बनाने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। आपको उत्कृष्ट शोधक पुरस्कार के लिए चुना गया है। पुरस्कार प्राप्त करने के लिए ८ अगस्त २०२३ तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLScbuTiNx4yx-3F2JpBuPQBZpkOF8dB96fd21tCIe7F_Yn9XJA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] भरकर जमा करें। १५ अगस्त तक आपको पुरस्कार तथा ई-प्रमाण-पत्र भेज दिया जाएगा। पहले सूचना प्रपत्र भर लेने तथा बाद में पुरस्कार कूपन या प्रमाण-प्रपत्र मिलने की सूचना इस संदेश के उत्तर के रूप में अवश्य दें।</span> -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०५:५९, ६ अगस्त २०२३ (UTC) :{{PAGENAME}} जी, नमस्ते। आयोजकों द्वारा सभी चयनित सदस्यों को ई-उपहार पर्णिका भेज दी गई है। प्रमाण-पत्र के निर्माण में अभी कुछ दिन और लगेंगे। हम प्रमाण-पत्र पर गूगल के लोगो का उपयोग करने के लिए अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया में हैं। आपसे अनुरोद है कि समपादनोत्सव से मिले अपने अनुभव और सीख को [[विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई 2023/रपट]] पर अपने सदस्य नाम का अनुभाग बनाकर जरूर दर्ज करें। भविष्य के संपादनोत्सवों में भाग लेने के लिए यह अनिवार्य है। [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:४२, २० अगस्त २०२३ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 सूचना == :आपको संपादनोत्सव में सौ पृष्ठ संपादन करने का लक्ष्य हासिल करने की बधाई! -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १६:१९, २५ फ़रवरी २०२४ (UTC) ::धन्यवाद सर 🙏🥰 [[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) १६:२५, २५ फ़रवरी २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 परिणाम == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। ई-मेल पर कूपन द्वारा पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 5 अप्रैल 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfNQpP4Zn6GmQ3XIjDWlQ-KItIqnm-seTMO6PZGcu22lV7fgA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:१५, २२ मार्च २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:५१, ७ सितम्बर २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा उत्कृष्टता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:०७, २९ मार्च २०२५ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:०१, १० जनवरी २०२६ (UTC) :प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:५५, २९ जनवरी २०२६ (UTC) == विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए २५ मार्च २०२६ तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdAp7lxMY2nSh5wnsTi8SQOA4vu-0DGi2siReQtMcdictAemg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०१:०५, १८ मार्च २०२६ (UTC) :प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] की पुरस्कार राशी अमेजन कूपन के रूप में भेजी जा चुकी है। कृपया अपना ईमेल जाँच लें। कोई समस्या हो तो मुझे सूचित करें -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:१९, ९ अप्रैल २०२६ (UTC) == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_भाग_1.djvu/६३&diff=prev&oldid=666381 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। इसके साथ ही संपादनोत्सव के दौरान शोधित किए जाने वाले पृष्ठों पर इन गलतियों से बचने का ध्यान रखें। संपादनोत्सव में भाग लेने के लिए धन्यवाद। आप निश्चिंत होकर अपना संपादन कार्य जारी रख सकती हैं। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०४:२३, ८ जुलाई २०२६ (UTC) :धन्यवाद [[विशेष:योगदान/&#126;2026-38725-16|&#126;2026-38725-16]] ([[सदस्य वार्ता:&#126;2026-38725-16|वार्ता]]) ०५:२६, ८ जुलाई २०२६ (UTC) f0gnsvenzi7x5r6ivn4uh35rzmcc7gx विषयसूची:2015.349194.Kinar-Desh.pdf 252 193642 666086 663747 2026-07-07T15:53:59Z अजीत कुमार तिवारी 12 666086 proofread-index text/x-wiki {{:MediaWiki:Proofreadpage_index_template |Type=book |Title=किन्नर देश में |Language=hi |Volume= |Author=राहुल सांकृत्यायन |Co-author1= |Co-author2= |Translator= |Co-translator1= |Editor= |Illustrator= |Publisher= |Address= |Year= |Key= |ISBN= |Source=pdf |Image=1 |Progress=अ |Pages=<pagelist /> |Volumes= |Remarks= |Width= |Css= |Header= |Footer= }} 5dm872vwwg7a97cuwmgjfv8sc3lr0u3 विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६ 4 193661 665819 665774 2026-07-07T15:02:46Z सौरभ तिवारी 05 49 /* पुस्तक सूची */ पुस्तक जोड़ा। 665819 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) --[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:१९, ६ जुलाई २०२६ (UTC) प्रतियोगिता के शुरुआत हुए तीन दिन हो गये. इस परिधि के एक भी पृष्ठ में काम जारी नहीं हुआ. ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष अष्टादश भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग अठारह]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ अभिमत से पृष्ठ संख्या १२२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२३ से पृष्ठ संख्या २४६ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४७ से पृष्ठ संख्या ३७० तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७१ से पृष्ठ संख्या ४९४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९५ से पृष्ठ संख्या ६१८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६१९ से पृष्ठ संख्या ७४२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४३ से पृष्ठ संख्या ७६३ तक (कुल ५२ अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:११, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] llz7amlxbzwt1obtpdcwh455ufj847o 666211 665819 2026-07-07T16:16:10Z MuskanChaudhary121 6707 /* पुस्तक सूची */ 666211 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) --[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:१९, ६ जुलाई २०२६ (UTC) प्रतियोगिता के शुरुआत हुए तीन दिन हो गये. इस परिधि के एक भी पृष्ठ में काम जारी नहीं हुआ. ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष अष्टादश भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग अठारह]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ अभिमत से पृष्ठ संख्या १२२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) १६:१६, ७ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२३ से पृष्ठ संख्या २४६ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४७ से पृष्ठ संख्या ३७० तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७१ से पृष्ठ संख्या ४९४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९५ से पृष्ठ संख्या ६१८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६१९ से पृष्ठ संख्या ७४२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४३ से पृष्ठ संख्या ७६३ तक (कुल ५२ अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:११, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] mvjpuajqpa7v6p521ktsmmprzza3eth साँचा:हिन्दी विश्वकोष संस्करण 10 193664 665820 663858 2026-07-07T15:04:37Z सौरभ तिवारी 05 49 665820 wikitext text/x-wiki [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|१]]-[[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|३]]-[[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|४]]-[[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|६]]-[[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष अष्टादश भाग.djvu|१८]]- 3ewqq8m9kfjo7t3zim45td6l7c4onhi 665861 665820 2026-07-07T15:16:58Z AKTBot 6197 +1 665861 wikitext text/x-wiki [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|१]]-[[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग 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/></noinclude>प्रथम संसकरण २००० मूल्य - छ रुपया प्रकाशक :- इण्डिया पब्लिशर्स, ३३३ मोहतशिमगंज, प्रयाग । -मुद्रक :- रामशरण अग्रवाल, प्रगति प्र ेस, ३ अ, ड्रमन्ड रोड, प्रयाग ।<noinclude></noinclude> 4k7qqdiyaerwbsewowbcfrtcktua5oz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२ 250 195117 665824 2026-07-07T15:11:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665824 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>एक-- १. राहुल सांकृत्यायन 1 1<noinclude></noinclude> lflqr60on8t70si1fnc4nglk6ba7b9n पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३ 250 195118 665825 2026-07-07T15:11:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665825 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>GAMB ཀྭ :% ⋅ 7:<noinclude></noinclude> gzhg4xftvlgsbz4xgn3hxf7q71loc1i पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४ 250 195119 665826 2026-07-07T15:11:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665826 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्राकथन "किन्नर-देशमे " ( मई-अगस्त १९४८ ) की यात्राका विवरण होने के साथ हिमालय के इस उपेक्षित भागका परिचय धन्य है । मैने यहाँ नवीन भारतके नवनिर्माणको दृष्टिले वोका वर्णन किया है। प्यारम्भमें ग्रन्थ लिखने का कोई विचार नहीं था, जो बात आई लिखता गया, वही सामग्री य इस प्रत्यके रूप- में आप पा रहे हैं। हो सकता है पूर्वापरको एक देता हो, किन्तु तो भी मैं जो- सकता है कही-कही पुनरुक्ति हो, हो करके लिखनेका गुण यहाँ न दिखलाई समझता हूँ, हिमालय के इस अंचल- के बारेमें बहुतसी ज्ञातव्य वातें यहाँ श्रई हैं । त्रुटियो के लिये मैं अपने को दोषी मानता हूँ, यदि यहाँ कुछ गुण हैं, तो उसके भागी मेरे वे मित्र हैं जिनका नाम स्थान-स्थान पर इस पुस्तकमे श्रया है । प्रयाग ३-११-४८ राहुल सांकृत्यायन<noinclude></noinclude> n3e6gyfdjwktbl5iqax178x7lw9co7e पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५ 250 195120 665827 2026-07-07T15:11:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665827 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६ 250 195121 665828 2026-07-07T15:11:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665828 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१- प्रवेशक २ - रामपुरको ३- रामपुर में ४- किन्नर - देशकी श्रीर विषय-सूत्री ५ - " राजधानी" चिनीको ६ - भोजन छाजन ७-- - घुमक्कड़ोंका समागम ८--जगी तक ६- प्रागैतिहासिक समाधिय 1 " ... १० - तिब्बती सीमातकी श्रोर... ११ -- भारतका सीमात-गाँव १२ - देवता से बातचीत ... : : २ ५ पुष्ट २८ 1 २० ८२ ११८ 21 r 23 F १५० " ... ९७३ " १३- चिनी वापस ... 8 १६३१ १४ -- फिर चिनी में ... ... २०२ " १५-- कोठी देवी महातम ... २२५, १६ -- देवीके चरण में १७ -- देवीका मेला १८- - चिनी से प्रस्थान १६-साङलामें २० -- सराइनको २१- सराहनसे कोटगढ़ २२- यात्राका त २३ - किन्नर देशपर एक ऐतिहासिक दृष्टि २३८ " २५६ , २६४” २७४१ ** ३०० " ... : : २४ - किन्नर गीत २५ - किन्नर भाषा ... ... ३१७ ३३४ " २४६ " 1 ३७२१- ४३२,<noinclude></noinclude> 9vp7zkvuhpd5usvznw9xqto2jf9xson पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७ 250 195122 665829 2026-07-07T15:12:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665829 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चित्र- सूची एक किन्नर देशका 'माप चित्र । दो - राहुल साकृत्यायन | तीन - ( २-४ ) शिमला मे (५) रामपुर ( ६-७ ) रामपुर राजप्रासाद । चार - (८) एक किन्नर गृह (६-११) चिनीगॉव, चिनी देवतांकी प्रतीक्षा (१२-१३) वैद्यराज और तीन भिक्षुणियों, चिनी पाठशाला के लड़के । पांच - (१४) दो घुमक्कड़ (१५) ब्रह्मचारी चैतन्य | छ- (१६) पगी लोहार परिवार (१७) जगी गाँव (१८) जंगका घर (१६) जंगीका एक खडहर (२०) किन्नर की नदी द्रोर्णा (२१) लिप्पा गाँव सात - ( २२-२३) लिप्पा -- शोभायात्रा (२४) लिपा -- मृतक समाधि (२५) लिप्याकी जोतसे (२६) लब्रड-दुर्ग, (२७) स्पू-मूर्तियाँ | प्राठ - (२८ ३२) स्पूकी वृद्धा, स्पेमे पल्दन ल्हामो, नमग्या, तरुणतम' भारतीय, किन्नरी गायिका हिरपोतो सशिष्या, रेजर श्री देवदत्त परिवार । नौ-दो किन्नरियाँ | ' "" г I T 7 दस -- (३४-३५) कोठी में शिवालय और पोथी पट्टिका (३६) पुत्री और नातियो सहितं नैगो सन्तोखदास ( ३७ ) अनाथ किन्नर वालक । ग्यारह -- (३८) चिनी मित्र (३६) कोठीको देवी (४०) किन्नर कोकिलाये (४१) पुत्र पुत्री यमल सहित नेगी ठाकुर सिह ।' वार:- (४२ ४१) चिनी* विद्यार्थी, 'चडिकाकी सवारी, चंडिकाकै लिये -- 1 1 प्रस्तुत, 'चडिका' पधारी, "कटी बलि, लाशोपर मृत्यु प्रतीक्षा ।' तेरह - (४८:४६) प्रतिहार कालीन चतुर्भुजं शिव, निरतका सूर्यमन्दिर । चौदह - (५०) काठी देवीका मन्दिर (५१) कामरूका दुर्ग । पन्द्रह - (१२) संराहन देवीका मन्दिर (५३) साङलाकी सुपमा ! सोलह-- (५४ ५५) साङ्लाका पुल, नर्गिसको नया मन्दिर । (५६-५७) निरतकी सूर्य यदि प्रतिमायें । T सत्रह - (५८) कोटगढ़, डाक्टर बोध 'परिवार में, (२६-६०) तरुण नायर, शिमला नगरी । अट्ठारह- मगोल घुमक्कड़ |<noinclude></noinclude> 3d2yufw7pjxgpcj1uzetrpmw03e9t0k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८ 250 195123 665830 2026-07-07T15:12:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665830 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>'<noinclude></noinclude> a0jrt47lrqhts0h4839s6pywa0d21fz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९ 250 195124 665831 2026-07-07T15:12:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665831 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>IR दे Line A ल विणे बालि grter 6 arth री ड • डुवीलड दिव मी र म टे श ति 6 निन्दल 21<noinclude></noinclude> nmx4hea24qdjhlpvmyi4ohttlxmo21b पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१० 250 195125 665832 2026-07-07T15:12:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665832 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशमें ક્ प्रवेशक 2 2670 किनर या किंपुरुष देवयोनि है। उनके देशी यात्राका हे देवलोक से थाना, फिर पाठकोकी मेरी मम चाचार सन्देह हो सकता है। किन्तु साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि जिस देशमें कनी देवता रहते हैं, वहाँ पीछे पिछड़े ननुप्यनने लगे, चार जो पिछडे मनुष्यों का देश हां, वह फिर देवलोक न बन जाये । किन्नर देशके मेरा यही विचार है, यदि भारत पीछे नहीं हटा, और पीछे हटना सम्भव है, क्योंकि वह मृत्यु घात लगाये हुए हैं, तो यह किन्नर- देश शताब्दी के अन्तमें देव लोक वन के रहेगा | किन्नर - देश हिमाचलका एक रमणीय भाग है, जा तिव्वत (भोट) - की नीमा मतलजकी उपत्यकामे ७० मील नत्रा यार प्राय उतना ही चौडा बना हुआ है। इसकी निम्नतम भूमि २००० फीटसे नीचे नहीं है, और ऊँची वतियों तो ११००० फोटते भी ऊपर वसी हुई हैं । इसका थोड़ा ही ना भाग है, जहाँ मानसून के बादल खुल- कर पैर रखने पाते हैं, नहीं तो अन्यत्र उन्हें फूंक-फूँककर पैर रखना पड़ता है | यदि मेघवृत के यक्ष के दूतको उसकी प्रतीके पास सन्देश ले जाना अवश्य ही पड़ा था, तो उसे इसी रास्ते जाना पड़ा होगा और यदि मत के रसिक पाठकोको किसी कारण इधर थाना पड़े, तो उन्हें धरके दृश्यको देखकर अपने प्रमके व्यर्थ जाने- का पतावा नही होगा । किन्तु अभी में अपने रमिक पाठकको इधर- का निमंत्रण नहीं दूँगा, नहीं तो वह रात भर मुझे कांगे, और कुछ की यसियाका वसोग्य शापसे भी मुक्ति नहीं मिलेगी, चोर वह जीवन भर के शाप देती रहेगी। हा, एताही मार्ग नही कही<noinclude></noinclude> g32j0jc2a83iqcjft7drv7ejssf2hp8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११ 250 195126 665833 2026-07-07T15:12:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665833 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२ किन्नर - देश मे या जाता है, जहाँ पैर कोपने लगता है, और नाचने ऊ देखनेकी हिम्मत नहीं करती । ) किन्नर शब्द ही विगड़कर ग्राजकल कनौर बन गया है। यहां पहुँचने के कई रास्ते थे । प्राचीन कालमे नवसे प्रसिद्ध रास्ता बेहराइन जिलेमें उस जगह से ऊपर चढता था, जहाँ कालमी ( खलनिका. नगरी थी, जिसके नीचे यमुना तटपर अव भी एक शिखापर अशोक के धर्म - लेख खुदे हुए है। ग्राज इस रास्ते नीचे लोग यहाँ नहीं श्रा, किन्तु कनौर के लोग कालमीको भूले नहीं है, श्रव नी जाऊ- ने वह अपनी हजारों भेड़-बकरियो को लेकर वहाँ पहुँचते हैं। जाडोमे किन्नर भूमि वर्फ से ढँक जाती है, उस समय कालसोकी गर्म नि और उसके पहाड़ोकी पत्तियाँ इनकी बड़ी नहायता करती है। यमुना और गंगाकी ऊपरी पार्वत्य घाटियोंसे भी यहाँ पहुॅचा जा सकता है, यद्यपि इन दुर्लभ्य डाँडोको किन्नर लोग ही जाड़ाके लिये पार करने दिखलाई पड़ते हैं । यहाँ श्राने का प्रचलित मार्ग शिरला से कोटगढ होम उपत्यकासे चलता है । रास्तेकी जिन कठिनाइयोका मेने ऊपर कुछ वर्णन किया, उसे देखते हुये मेरा इधर धाना, विशेषकर दूसरी वार थाना बुद्धिमानीका काम नही समझा जायेगा, किन्तु क्या करना है, इसे आदत से मज- दूरी और भाग्यका फेर समझ लीजिये । हिमालयका आकर्षण और गर्मियोंत वचना दोनों ख्याल सिरमे चक्कर मार रहे थे, जब कि मैंने प्रयागराजके १९३ डिग्री तापमान से ३ मईको साढे आठ बजे गाडी चली, और २६ घंटे बाद हम शिमला मे थे । कितना अन्तर, कहाँ तीर्थराजके ग्रॅवेकी तपिश और कहाँ शिमला- की शीतल मन्द समीर । किन्तु यह कितनो भाग्यमे वदी है ? मेरे भाग्यमे भी तो नहीं, जो दस दिन बाद ही शिमला छोड़ खतरेकी मोल लेने के लिए ग्रागे वढना पड़ा । विदाई ली । सवेरे शिप्लामे श्रातिथ्यकेलिये ही श्री लाजपतराय नावर तथा उनकी<noinclude></noinclude> jej8nf61oztvsqq9twg7qip42so0gp8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२ 250 195127 665834 2026-07-07T15:13:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665834 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रवेशय योग्य वहिन तथा हिन्दीकी उदीमान लेमिया कुवारी रजनीका कृतन होना है, बल्कि उसने ग्रागेकी या लिये परिचय श्र पात्र प्रात करने वही सहायताकी । और दूसरे वक्त जिनका होना चाहिए, वह श्री एन मेहता, जिनकी पहली बार नहीं बनना था. मेरी ' कयामीन दिल रही । अनी तो मै उन्हाक घारत हिमाचलप्रदेशन जा रहा था । उन्होंने मेरी यात्राको सुकर बनाने प्रयत्न करा, किन्तु वन्य बनाने लिये तो अभी और सारी श्रम और माता है। वेसे शिमलामे नारकडा तक मोटर और फिर ठारोवर- कोटगत लागे चली थाता है, किन्तु कभी नम शिम पैट्रोल भी हो गई, और नरकडेने श्रागे पैदल चलना दूसरा चारा नहीं रहा। पहाड़ मात्र सभी जगह जहां बम लागे नर्ग मिलती, सामान लेकर चलने वाले चादनी के लिये कठिनाई हो जात हे । २ नाल पहिले जब में रहा था, तो नीचे नौला गॉव पश्चिमी तिब्बतले इसी राले लाट तीन दिन बैठा रहना पद्म । उस चार नंशन गॉयने न रहने दौर मिल रहा था, न और ढोकर मील ऊपर पहुँचाने के लिए श्रादमी | अवकी वार नारक रहने- को डाकवला तो मौजूद था, लेकिन ठहरनेकी नौयत नहीं थाई । रामपुर हाईस्कूल के हेडमास्टर पडित दौलतराम साथ थे, उन्होंने सामान केलिए खच्चर ढ निकाला । यद्यपि पिछले सितम्बर से मने न हिलने-डालने की कमन-सी खाकर जीवनका डायबीटिसके हाथतक सौप दिया, तभी ठाणेवारतक पैदल चलने के लिए तैयार हो गया ! डायटिको मेने निमन्त्रित किया, यह ग्रवशिष्ट जीवन में बहुत बार कहनेका विराय है और में कहूँगा भी। यदि किसीने सचमुच उसके वामे पहिले हृदयगत करा दिया होता, तो मेर जैसे कितने ही बच जाते। यही तो हृदयंगत कराना था, कि पर्यात भोजन पाने वाले श्रादमीको कुछ शारीरिक श्रम, चाहे चलने-फिरने के रूपमें ही<noinclude></noinclude> 4ptjrw8rkviqa467r70onsdtph8yor5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३ 250 195128 665835 2026-07-07T15:13:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665835 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देश में हो, अत्यन्त आवश्यक है, नहीं तो उसका दण्ड है डायबीटिस - पेशावमें चीनी, जरासे घाव और फुसीका भी जहरवादके रूपमें परिणत होना...। अभी तो हिमाचल प्रदेशका नाम भर उज्जीवित हुआ है, और उमे रामपुर, जुब्बल श्रादि इक्कीस रियासत का मिलाकर बनाया गया है । बिलासपुर जैसे कितने ही राजाको प्रजाकी इच्छा दिना ही अपनी अलग खिचडी पकानेको छोड़ दिया गया । भला ४१ लाखकी श्रावादीका प्रान्त कैसे अपनी आर्थिक योजनाय्रांको ठीक चला सकता है ? हिमाचलवासियोको स्वयं इस भूलका सुधार करना होगा। खैर हिमाचल-प्रदेश वननेका लाभ हमें इस यात्रा में हुआ है, इसे स्वीकार न करना कृतघ्नता होगी। हमने समझा था, ठाणेदार (कोटगढ) तक बस लारी पहुॅचा ही देगी, इसलिये रामपुरसे घोड़े नही मगवाये थे, जिससे नारक डेसे पैदल ही चलना पड़ा। शिमला- के दस दिनके निवासमे मैं रोज मील- दो मील चलता फिरता रहा, इसका एक फल तो हुआ, कि चलने में मुझे हिचकिचाहट नहीं हुई। उधर पडित दौलतराम आगे बढ़ गये थे, जिसमे घोड़ोको रामपुर लौट जाने से रोके । मेरे साथ के लिए हरिद्वारके पडा मिल गये, जो इधर अपनी यजमानीमे जा रहे थे । मोटरवसपर तो उन्हें चक्कर थाने लगा था, और मै तो समझने लगा था, कि साल- दो सालके तपेदिक के मरीज हैं, किन्तु तीन घटेके विश्रामके वाद फिर उनका मुह हरा हो गया, और चलनेमें हम लोगोकी गति ४ मील प्रति घटा थी, किन्तु पहिले ही घटे तक, दूसरे घंटे वह 'तीनपर उतर आई । ग्रागे कलई खुलनेही वाली थी, कि सईस घोडा लिए चला थाया, और वाकी तीन मीलकी यात्रा पत-पानी से कट गई। ठाणेदार के डाकवेंगले पर हम सूर्यारत मे पहिलेही पहुँच गये । पंडाजी भोजन छाजन के मुभीते के लिये पगडटीसे उसी शाम<noinclude></noinclude> 9j3wkopjyg382lcrg6zgjrfz6jswuwm पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४ 250 195129 665836 2026-07-07T15:13:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665836 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रामपुरको नौला पहुँच जाना चाहते थे । मेने एवमस्तु कहा। हॉ, नौला वही गॉव है, जिसको शतवार सशत से कह चुका हूँ, चार पडाजी उनी वनियों यजमान घर बडे चावने जा रहे थे, जिसने २२ माल पहले न श्रपने मित्रके पत्रका ख्याल किया, न मेरे परदेशी होने का ढोने वाले ग्राम प्रवन्धकी बात तो अलग, उसने बैठने तक के लिये जगह नहीं दी। दुनियाँने ऐसे विरोधी समागम बहुत देखनेको मिलते हैं। नुके उप बनियेके व्यवहारगे निराश होने की प्रावश्य- कता नहीं थी, क्योंकि मानवताने ऐसे समय अनेक वार मेरी सहायता की है। ठाणेदार मैने डाकबॅगले तक ही सहायताकी आशा की थी, किन्तु यह पुराने परिचित डाक्टर भगवानसिह बौद्ध मिल गये, और नया परिचय हुआ रायसाहव देवीदाससे । उनके नरम गरम बिठुरे खाने मे बहुत मधुर लगे । २ रामपुरको चणादाने १४ सईको सवेरे ६ वजे ही चले | रायसाहिव देवीदास तडकेही पराठे और फल लाये, किंतु व शरीर में पत्थर पचानेत्री शक्तिता थी नहीं, एक समय जरा मी भोजन अधिक होने- पर दूसरे समय हाथ समेटने की जरूरत पड़ती है । रास्ता ७ गील उतराईका था, जिसमे वोड़ेपर चढना न अपने श्रारामके लिए होता, न घोडके लये । सा नौ बजे नीचे नोला पहुँचे, किंतु वहाँ ठहरने की जरूरत नहीं थी । श्रमी सवेरा ही था। हाँ, साहु गोपालचद- की बनाई धर्मशाला देखकर उस दिवगत यात्माका २२ साल पहिले- का अपने साथ रखा व्यवहार याद या गया। पामका खड्ड यहाँ<noinclude></noinclude> mh4o3vqi33aw0i2o3vy3ijyk16mtitj पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५ 250 195130 665837 2026-07-07T15:13:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665837 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देश मे खड्ड छोटी नदी को कहते है- पार हो रामपुरकी तदसालमे दाखिल हं गये । अभी इधरकी नीगाने ढलाईही घड़िया में पट्टी है। फरवरी ( १६४ मे यही खड्ड शिमला जिला और बुशहर रियासत की सीमा रही, किंतु अब खड्ड पार हिमाचल प्रदेश है, और नौला पूर्वी पजाव- मे, धनुपर्का रेखाकी भी अवहेलना करना रावण के लिये मुश्किल हुआ तो वारहों मास वहती इस खडकी सीमाकी अवहेलना कैसे की जा सकती थी ? भारत सरकारने यह तो निश्चय किया, कि एक हिमाचल प्रदेश वनाया जाये, किंतु यह निश्रय नहीं कर पाया, कि उसकी सीमाये स्वाभाविक हो या अग्रेज़ो स्वोकी भांति मनमानी | अभी हिमाचल प्रदेशकी मेडक कुदानकी भाँति अपनी सीमाये रखना पड़ रहा है । खडके पश्चिम पूर्वी पजाव, फिर हिमाचलप्रदेश नें सम्मिलित हुई कितनी ही रियासतोका भूखड, फिर बिलासपुरकी पहाड़ी रियासत, जिसके राजाने अपने को अलग रखना लाभदायक समझा, उनके वाद पंजाबके' पहाडी जिला-ग्रंश, और फिर मंडी की रियासत हिमाचलप्रदेश में या मिली। पश्चिम हिमाचल प्रदेश की सीमा की जो हालत है, वही बात पूर्नमें टेहरी रिवायत और कमायू के जिलो के बारेमें भी है । जान तो पड़ता है, हिमाचलप्रदेशके वन नेपर भी वह ऐसा ही छिन्न विभिन्न रहेगा। राष्ट्रधार यद्यपि जनताका वन पाकर रियासतों को नये टाँचे में ढाल रहे हैं, किन्तु उनकी नज़र राजाश्रोपर अधिक है, नहीं तो विलासपुरको राजाकी क्या नजाल थी, जो वह डेढ़ ईटकी मशीद लग बनाता । खैर, राजा अमर नहीं, अमर जनता है । खड्ड पार हो बाध घटे ही हम निरत पहुँच गयें, जो शिमला से साटवे मीलपर है। नवेरे हम ७२०० फीट की ऊँचाईपर थे, नौला खहुपर =५०० फीटपर, और ग्रव ३६०० फीटसे ऊपर । प्रयागकी ११० की गर्मी इतनी जल्दी तो भूला नहीं जा सकता था, किन्तु<noinclude></noinclude> 1o884ju7gkqprbf5nvyd1o62eqx6nt8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६ 250 195131 665838 2026-07-07T15:13:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665838 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रामपुरको नहीं भी हर लाने घ हाल लिये तो यह स्थान गर्म है, लोग ऐसा कर रहे थे. मानां यहाँ प्राणमुखानेवाली लू चल रही है। रामपुर १२ सील था. चलन छोडेपर पा लिये कोई विश्रापके लिये डाकवराले प्रवन्ध पा । नाहर और गमीं लग रही थी. किन्तु वॅगले के कम या अपना पर किया । कुपीपर बैठेदी नही किंवा पु नहीं तो द्याथर्य कारटेबल सामने श्राये | दूसरा समय होता तो गंगा होता । उन्होंने छावर वाकायत मलाच दी और कहा दीयन चाहे सेवाके लिये भेजा है। अभी हिमाचल रियासत को गॅमालनेवेलिये मुख्य प्रवधाधिकारी (एक्यूटिव फ) नेजा है, किन्तु लोगोको यह नाम लेना थासान नहीं है. इलिये वह उसे पुराने ही नाम ने पुकारते हैं । मैने दीवान साहेवको धन्यवाद देने निपारियोवेलिये कोई सेवा न होनेपर देव कट किया । तिलक इस महीने भी ३६०० फीटके ऊपर कोई फल तैयार हो सकता है. किन्तु लोगोको फलकी तथा बाद ग्रानी है, जब उसका पैगा बनता हो; नहीं तो उन्हें फलको वहीं अनाजका फिक होती है, जिसमें विटामिन भले ही कम हो, किन्तु बिलोरी शक्ति अधिक रहती है। हमारे पास रायसाहिवका दिया पिछले मालका मेव था । खानेके बारेमे पूछने पर मेने छाछ लाने के लिये कह दिया । इस समय यही हल्का भाजन अधिक अनुकूल जान पड़ा ! वॅगलेमें शीशे लगी खिड़कियो के बाहर घनी जाली लगी देखकर कुछ अनकुल मालूम होना था, और यह बात सारे निव्वत-हिन्दुस्तान सड़क डाक वॅगली थी, किन्तु इसका लाभ तब मालूम हुग्रा, जब अगले महीनो- से नक्खियों के झुंड के झुंड याक्रमण करने लगे। मे ममेव छील- कर ग्वानेने ही लगा था, कि ज्वालापुरके पडाजी था पहुँचे, वह हमारी प्रतीक्षा नालामे कर रहे थे, और उस शत सशन घरमे । उन्हें भी दो सेब देकर हाथ जोड़ लिया। पडोमे शिक्षित लोग बहुत बडे रहते हैं,<noinclude></noinclude> j3fl3qfd73g91a7057dvg2ue5553ydl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७ 250 195132 665839 2026-07-07T15:13:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665839 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>15 किन्नर - देशम किन्तु मै उन्हें इसका पात्र नहीं समझता, यद्यपि मुझे अपनी दीर्घकालीन यात्रामे उनके आतिथ्यका उतना लाभ उठाना नहीं पड़ा | एक दिन चर्चा चलने पर एक भद्र महिला ने कहा- "मटन ( कश्मीर ) के पडोकी भलमनसाहत की मे अब प्रशंसा करूँगी, जो यात्रीकी श्राराम बनेमे चौकस किन्तु दनियालिये जरा भी प्राग्रह नहीं करते, परन्तु यही बात गया पीके वारेमे नहीं कही जा सकती ।" हो सकता है. मटन पडे अधिक नद्र होगे, किन्तु हर तीर्थ के पडे यजमानको आरामसे रखनेकी पूरी कोशिश करते हैं, योर सच तो यह है. यदि पोका हस्तावल व न होता, तो काशी जैसे रॉड मौड़-सीढ़ी-सन्यासी वाले तीर्थो न तो अपरिचित और अनुभवहीन यात्रीकी खैरियत न होती । वात्रकी सेवा करनेमें कहाँ के पडे पीछे नहीं रहते, वाकी तो 'लुर नर मुनिकी एही रीती । स्वारथ लाग करे स्व प्रीती ।" ग्राप सेवक भी पेट वाधकर सेवा नहीं करता, आप कैसे प्राशा कर सकते हैं, कि पडे मुँह दोधकर निष्काम सेवा करेगे । रही, गया जैसे पडोकी बात तो यह सिर्फ तीर्थ-स्नान और देवदर्शन ही भर नहीं कराते, उनकी जिम्मेवारी इससे कहीं वही है, उन्हे श्राप के हज़ारो पीढियो- पुराण- पापाण युगके उधर के भी पुरखों को नरकसे निकालना पड़ता है, फिर चापकी जेवपर यदि कुछ करारा हाथ पडता है, तो इसके लिये खीझना नहीं चाहिये । - निरन तलज वाये तटपर है और शतद्र यो पश्चिमवाहिनी है । मैं ता हूँ, चिमनाहिनी होना, उत्तरवाहिनी से कम महत्वका ' नहीं है। नर्मदा और ताही भी पश्चिमवाहिनी हैं और शायद चिरकुमारियायें भी है। हॉ, मतलज के नहीं, कि वह स है । उसकी तो वर्ष नहीं पहुँचती थी । निरत नाम जब मेरे आँखो के सामने से गुजरा, नभीस उसकी विचित्रतार में तरह तरहके तर्क-वितर्क हो रहे थे । निरत या नृत्यका या अर्थ हो सकता है ? "निरत' सुरत क्या तटपर होने का यह ग्र वन भी हमारे पास 1<noinclude></noinclude> 0utwjpxis44xqhmv1yqytdep7dma87u पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८ 250 195133 665841 2026-07-07T15:14:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665841 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>, 1 रामपुरको ε वननेवाला है? शायद किसी और नापाका शब्द होगा। क्या है, कोई साधारण गॉव के लिये इतनी गाथा-पची करनेकी क्या • श्रावश्यकता ? किन्तु २३ घटेने विश्राम बाद जब घोरपर सवार हो हम कुछ आगे बडे पीछे कर नजर दौड़ाई, तो देखा गाँव में एक मन्दिर है, जिनमें दिखाई देना ऊपरी भाग गुन- कालोन शिखरमा है । ऊट-पटोंगसे मालूम होनेवाले नामोमे ऐसी बात कितनी बार देखी जाती है, किन्तु हमें इस पहा इसका सदेह नहीं हुआ था । विना किमोने पूछताछे भी मेरा कान खड़ा हो गया, और तब जब कि यह भी नहीं मालूम कर पाया था, कि यह का मन्दिर | गुनकालीन शिखरके साथ सूर्यका सन्दिर ! मला छटी वी सदीसे पीछे वह कना हो सकता था । किन्तु में गॉव छोडकर श्रागे चला श्राया था. सारे दलबलका लौटाना पसंद नही था। साथ ही लौटकर फिर तो इसी रास्ते याना था । हो, रामपुरम जब सूर्य मन्दिर होने का पता लगा, तो अधीरता बढ गई। इधर के निवासी कनेनोको खुश भी कहते हैं; खश खाछे और कशके शब्द शक से ही उलट पुलटकर वने । सूर्य और सविता की पूजा भारतमें पहिले भी थी, किन्तु सूर्यप्रतिमा और सूर्यमन्दिरका व्यापक प्रचार शकोने ही भारत ग्राकर किया। क्या जाने यहाँ इस मन्दिरम भी पूर्ण या अपूर्ण (सनी) उधारी सूर्यप्रतिमा हो, देख लेना चाहिये था। कुछ नील वढनेवर अपनी भैंसो कोलिये मुस्लिम . जो गूजरनिया मिली। जाडोको नीचे वितकर यह घुमत् महिपाल हिमाचली ऊपरी चगवाहोगी श्रोर जा रहे थे । बातूनी माइन कह रहा था-- हमने पहाडको मुमपान करनेका टान लिया था। सुतल्मान ह ही कितने, किन्तु सव 'हिंदू हो गये । गृजीपर जोर पड़ा - 'हिंदू बनो, नहीं तो पाकिस्तान जाओ ।" उन्होंने कहा--"हम पाकिस्तानकी नहीं जानते हमारी सारी पीढियाँ यही ऊपर नीचे घूमनी बीत गई। जो कहीं मां करेंगे ।" राव हिंदू<noinclude></noinclude> bexg1xk73gyv8g6u4bdhzicxthg7182 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९ 250 195134 665842 2026-07-07T15:14:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665842 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१० किन्नर - देशमे - हो गये | मुझे कहने का उत्साह नहीं हो रहा था, कि अब भी तो उनकी पीढ़ियों मौजूद है । मैं सोच रहा था - ईसापूर्व दूसरी शताब्दी, ग्रायों के सगे भम्वन्धी मतृ शोक उर्दू गोवी कारमाथी पर्वतमाला तक बिखरे थे। एकाएक पोका प्रहार । शको तबू और घोड़ो ने कान्हान् शयद्वीप के पूर्वी भागको हूवेलिये खाली करने लगे वही लोग जिन्हे चीनियांने पीले वाल नीली आँख वाले वानर जैमे लिखा । शक काफिला चला, सत्य- एसिया से कोई कराकारमक दुर्लभ्य रास्नोको पार हुआ, कोई सीस्तान और वलोचिस्तान के वयावानोको आया भारतमे । नर राजा बन राये, सोग, कढफीसिस, कनिष्क, हुविष्क, वासुदेव- हां, वालुदेव ! लेकिन अधिकाश पशुपाल ग्रह भी पशु चराते रहे, आजतक चरा रहे हैं - गद्दी वा सही-लाहुलकी तरफ मेड़े चरा रहे है और गूजर बुशहर और टेहरी में भैसे। गद्दियोंपर जोर नहीं पड़ा वह कनिष्कपौत्र वासुदेवका अनुकरण करते हिंदू हैं और गूजर जाहो में मैदान में उतरते रहे, जोर दबाव पड़ा, उन्होने दाढ़ी रखा ली, किन्तु उनकी जीवन-धारा ध्रुव भावही मध्य एसियाकपार शकद्वीप-जैमी है । हा उन्होंने ग्रपने घाड़ा-भेडोको सांसे बदल लिया, जिससे अधिक घी अधिक दूध अधिक ग्राहार और पैसा । पजावकी श्रागकी लपट पहाड़ी पहुँची -- "हिदू वन जाओ, जीवेलिये हिंदू बनना होगा ।" "जो कहो वहीं, हम जीना चाहते हैं । " खैर, वात दूरतक नहीं गई, क्योंकि मेने उनके शिर और दाढी दोनों को उनके शरीरपर देखा । हिंदुग्रोमें हजारों दांव है, उत्तेजना और दवाव पडनेपर क्षणिक पशुता भी शिकार हो जाते हैं किन्तु हैं वह शातिप्रेमी, “जीनो और जीने दाये माननेवाले, बरसे नहीं वैरसे हृदय जीतने की विचार- परमाननेवाले, मानवता-प्रमी । तिब्बत- हिदुस्तान रोडर जाये, चढाई उतरा कम करके नार्गको स्थायित्व देनेकेलिये काफी प्रयत्न किया गया<noinclude></noinclude> 2lvwmt3uk6s6a0gn6dk3s35rhynovil पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२० 250 195135 665843 2026-07-07T15:14:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665843 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- राज्पुरको ११ इ. किन्तु मुक्त महताजीक नाथ उस दिनकी बातें याद आती थीं । हिमालको समृद्ध बनाने के लिये मोका देश बनाना है, उन सेवोंका जिनका उद्गम हमारे देश से अलग हो गया और जिनकी हमारे देशको वही आवश्यकता है। किन्तु यह फल बकरियो और खच्चरोंपर लादकर रेलतक पहुँचानेन मोतीके माल पड़ेगे, उन्हें कौन खरीदेगा ? सलिये मोटरका सडक बनानी होगी । "बहुत जल्द मे चाहता हूँ atrer rरता निकाल दिया जाये । " हाँ, जीप सर्वमा. अप्रेल मे म प्राचीन वैशाली के खेती- खडहरी मोड़ो- बॉधोपर उसपर चढ़कर उछल कूद ग्राया था । किन्तु यह उत्तुंग पर्वत हैं, खेतो की मेड़े या खाया नहीं है। इस सड़कको जीप लिये बनानी होगी। चौडाई थोड़ी ही बढ़ानी पड़ेगी, हा चढाई और ढालु करनी होगी, पुलोको कुछ और दृढ़ और चौड़ा करना नागा | बड़ी बात नहीं, किन्तु यह जो जगह-जगह कच्चे पहाड़ है. एक जो की वर्षा हुई नहीं, कि लगे टूटकर गिरने । पत्थर गिरने की रोकना कुछ चालान होता, किन्तु यहाँ तो अधिकतर मिट्टी धसक- कर आती है। तो भी यह मनुष्यकी शक्ति के बाहर नहीं, अधिक खर्च करना पड़ेगा, वारवार मरम्मत करनी पड़ेगी। मनुष्यका ही पराध है, जो उसने इन पहाडाको वृक्षवनस्पतिविहीन वना दिया; वृक्षोभी जडे धूमकर निट्टी-पत्थरको थामने केलिये नहीं रह गई । पुरानी भूमीवर पाना व्यर्थ | "देव दुःखमनागतम्" | हिमाचलको सडके देनी होगी, तभी हमे मेवांका देश बनाया जा सकेगा, इसकी नार खनिज संपत्तिते लाभ उठाया जा सकेगा, मालेमाले पहाड़ियों को विद्याविससम्पन्न किया जा सकेगा । , इसी तरह के विचारोंमें हवा में चल रहा था । एकवार घोड़ा बगलकी चट्टानसे टकराया-हल्के ही हड्डी नहीं टूटी, किन्तु कुछ छिल गया । उयावेटिसके रागाकेलिये यह भी कम नहीं और मैं हूँ ग्रमी स्वतंत्र हुये भारतका लेखक नागरिक । तुम चनकर टेकचर<noinclude></noinclude> led4lm49axg2mdelchx4ti5g2szje1u पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१ 250 195136 665844 2026-07-07T15:14:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665844 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२ किन्नर - देश मे 5 . आइडिन लगाना होगा --सोचते श्रागे बह रहा था, कि देखा वीस से साठ वरसके चार मर्द सड़कपर खड़े मतलज पार व्यान देख रहे है। उधर क्या है ? इस प्रश्नका उत्तर तुरन्त किन्नरकंटियोकी मधुर ध्वनिने दिया। दो तीन तरुणियाँ दुर्मर पर्वतपार्श्वपर बार काट रही थी और उनके कठसे गीतकी मधुर ध्वनि निकल रही थी। अभी में पास नही पहुँचा था, कि किन्नरकटियों चुप हो गई और फिर सड़क पर खडे पुरुपोने कानपर हाथ रख गीतके स्वर में उत्तर दिया । सतलज कुछ नीचे थी, घर्घर ध्वनि मंद थी, तो भी बाधक तो थी ही, किन्तु स्वर परले पार पहुँच रहा था जरूर परले पार हंसिया घास पर चल रही थी, किन्तु रधर थे वाटके बटोही, कही जा रहे थे, कि किनारियो की वनिने उन्हे सीच लिया, या शायद उन्होंने ही छेड़ दिया । अब रास्ता भूल गया । सोचते होगे, समय अग्ना है, एक घटा आगे नहीं घटा पीछे पहुॅच लेगे। वह जीवनका रस ले रहे थे | क्या गा रहे थे, नहीं मालूम, किन्तु उसमें उन्हें रस श्रा रहा था, यह उनके चेहरोसे पता लग रहा था। उनके नेहरे मेले और स्वहीन, उनके व गंदे और फटे, उनका जीवन कितना नीरस होता, यदि जीवन में ऐसे कुछ क्षण भी नहीं होते। इन्ही हांको ता हमे बढाना है, मनुष्य के सारे जीवनको रसपूर्ण करना है । किन्तु वह तभी हो सकता है, जब इस पर्वतस्थलांकी काया पलट हो जाये, रत्नगर्भा वसुधरा अपने भीतर को रत्नोको उगलने लगे । अभी रामपुर नहीं थाया था । बाई चोर नदी के पास कुछ बाग और एक असाधारण-सा घर दिखाई पहा । गन्ने तर्तलाया, कुक सावकारने कारखाना बनाया है, तेल, चावल, प्रबल बैठाई है । परले पार कुल्लू है । चारपार जानेके लिये लोहेका तार और खटोला है, किन्तु पर पंजाब है और उरे हिमाचलप्रदेश | सावकारने आगेकी खडसे एक नहरिया निवाली है-थाडी ही दूरमे, खर्च नी अधिक नहीं, उसी पानीस बिजली और उससे यह कारखाना<noinclude></noinclude> qq8xg3x8lwv7i8b0tihs9cyzl34cq0b पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२ 250 195137 665845 2026-07-07T15:14:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665845 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रामपुरको १३ - चल रहा है। एक साधन घाटमी यहाँ विजलोके दीपक जलाने- मे समर्थ। यह सारी पर्वतस्थली व विद्य प्रदीपसे जगमगायेगी ? कव मनुष्य मतलज और उसकी खड्डोकी पार विजनपर प्रभुत्व बात करेंगा ? कव मनुष्य श्राकाश की ओर निराशापूर्ण दृष्टिले देखना द्रोह पार जलराशिको अपने खेतोकी ओर मोड़ेगा । हाँ ग्राज वर्ण नही हो रही थी. खेतो में जा-गेहूं सूख रहे थे । वेवस 'श्रादमी नि मन हो आकाश की ओर देखता न तो क्या करता ? च-बीच मे नाईम बातें करता चलता था । वैसे राज्यके अतवान करने का साहस नहीं होता. किन्तु मैने उसे उत्साहित किया था । उसने सोचा होगा, वा भले आदमी हैं । कभी वह कोई दूसरी बात भी' करता, किन्तु अधिकतर वह कह रहा था, दो मास पहिले- के प्रजासर्प और उसमें अपनी कोली जातिकी बहादुरी के बारेमे । बोली पाडके नवसे अधिक मेहनती सबसे अधिक सताये अछूत, चमार जुलाहा (कोरी ) - नगी सब इकट्ठे । खेत उनमें किसी ही किसी- के पास है. मरे ढोरके चमंडका भी मालिको के पास मालके रूपमे दाम पहुँचाना पड़ता है | बड़ी जातिवालो के घर छोड़ ग्रोसारेकी छायातक उनका प्रवेश निपित है, साधारण पनघट में भी पानी लेनेका उन्हे अधिकार नहीं । मेहनत मजूरीने शिमला श्रादिमे जाकर यदि कुछ पैसा कमाया तो उन्हें कनेनों ( उच्चजातिको ) के मकानों की भाँति शिखरदार छत बनानेका हक नहीं। उसके कहने का भाव था "क्या इस मनुष्य नहीं' | नई दवा दग्ध होनेके लिये हियोतक पहुँच चुकी है । मार्चके उसकी जीभ चल पड़ी तो वारम्वार मनमें पर भी उनके लिये जवानपर का करना और मेरे लिये उसे चुप रखना श्रमभव हो गया। घुमा फिरा कर उसने वह सब बाते कह दी, जो सुके रामपुरने सरकारी पक्षले मालूम हुई, अन्तर यही था, कि उनकी महानुमृति प्रजा और उसके नेता अणुलाल मास्टरकी र तैयार इन गंदी झोप- के बारेमें एकबार जो भयका सचार हो जाने<noinclude></noinclude> j06lxo7r6fc7tn33bz7kcn0iklavmms पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३ 250 195138 665847 2026-07-07T15:15:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665847 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४ किन्नर देशसे थी, यद्यपि उसने सरकारी अफसरोपर दोप देने से बहुत बच वच- करं कहा, किन्तु सरकारी पक्षने गुलाल और उनके महायकको निरा लुच्चा लगा द्वि करना चाहा । मैने सोचा था, डाकबगला रामपुरसे परे होगा, किन्तु यह एका- एक सामने आ गया, और राजधानीसे प्राय. एक मील उरे ही। जब चही राज्यका डाकबगला और अतिथिभवन भी हो, तो उसे सब तरह- से सुंदर और स्वच्छ बनानेका क्यो न प्रयत्न किया गया हो। फलो- फूलो के वागमे सतलजके किनारे यहाँ एकसे अधिक बंगते है। वागमें कुछ उदासी-सी है, न फूलोके सुध लेनेकी फिक, न सकारिया- के लगाने की और विशेष ध्यान जगह सुंदर, कमरे वच्छ और सजे । यही ठहरना होगा सुनकर यद्यपि हम वंगलेमे गये, केमरा वे से उतारकर रखा और कुर्सीपर बैठ भी गये; किन्तु रामपुर वस्ती- का मील भर आगे देखकर मेरा मन विद्रोह कर रहा था । श्राखिर मै तपस्या करने थोड़े ही ग्रायां था, कि यहाँ तपोवनमे एकानवान करता। मुझे आवश्यकता थी जनसंपर्ककी, यहाँकी स्थिति के बारे मे अधिकाधिक जाननेकी, कनौर के मार्ग और चिनीके निवास- के वारे में पता लगानेकी । चलकर यहाँ कितने प्राते, और वह भी कितनी देर ठहरते ? मुझे यदि दिन भर नगरमे ही घूमना था, तो यहाँ रातको सोने केलिये टहरा था क्या ? , वारेमे कहते हुये बत वंगला भी हाजिर है । इसी तरह विचार मेरे दिलमे आ रहे थे, कि दीवानसहिव- के आदमीने. यावर श्रातिथ्योपचार के प्रबंध लाया, यदि चाप चाहे, तो दीवानसाहेवका rant + चाहिये, दो आँखे। मेने तुरत कहा - मुके दीवान- साहेव के साथ ही रहना पसंद होगा, यदि उन्हे कष्ट न हो । श्रादमी- ने बतलाया - उन्हें कष्ट नहीं, परिवार के लोग शिमला गये हुये ह, वह अकेले उस वडे मकान में हैं । मैने अपना संकोच हटाकर दूसरेको सोच मे भले ही डाला<noinclude></noinclude> pikst3alvfshjabmhgvy5h7f5smuq8n पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४ 250 195139 665849 2026-07-07T15:15:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665849 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रामपुरको हो, किन्तु मेरा निश्चय ठीक था। दीगनसादेव सर्दार वलदेव ने अपने उच्चतम विकारी हिमाचलप्रदेश चीफ मिश्र श्री एन्० मी. मेहता के पत्र मे मेरे बारेमे सारे विशेषण 'तमप्प्रत्यय पढ़कर मोचा होगा ऐसे व्यक्तिको कैसे अपनी कुटिया से रवा जाये और किन तरह सेवाकी जाये। शादसीसे कुटियाकी और निमन्त्रण भजन वह पहिले पहिताये तो जरूर होगे, किन्तु वही मिनटो में उन्हें मालूम हो गया होगा, कि उनका प्रतिरि उन घरदे व्यक्ति अधिक भेद नहीं रखता । जरा ही देरमं रूप घुलमिल गये । पहिले बाहरी बातें होती रही । उदार वलदेवसिहके बारेमे पहिले ही इतना कह देना है कि वह बोलने चालने, बर्ताव व्यवहार सनीनेही मद्र पुरुष ह । क्वेटाके रहनेवाले, लाखोकी पैतृक संपत्ति सहल मकानके रूपमें और हजार रुपये वेतनकी सरकारी नौकरी, सुखी परिवार ने दिन बीत रहे थे । श्राई गरन (१६४७) की व श्रोधी, हो गया सारा स्वाहा, हॉ-सारा नहीं परिवारकी जान बच गई सरकारी अफसर होनेते पहिले के ही विमानांमें उड़कर निक्ल थाये, किन्तु न वह राहल, न वह मोटर, न वह निश्चिन्त जीवन | ग्रन् थे ब्ह शरणार्थी । खैर, नौकरी मिल गई, पैर रखने के लिये जगह ना मिल गई । किन्तु वह जीवनभर रहे क्वेटामे, जो दुनिया के मधुरस की खान, दुवे सडेक मासका मडार और यहाँ रामपुरमे रोज ठोटे भी मासका पता नहीं, तरकारियो का अभाव सिर्फ आलू और दाल | वारवार कहते -- ग्रापका कैसे स्वागत करूँ ? स्वागत के लिये वस्तुओं की भी आवश्यक्ता होती है, विशेषकर गृहपतिकी दृष्टिः किन्तु अतिथिकेलिये उससे भी बढकर चीज है गृहपतिके सहृटच दिलकी और वह नीरजीके पास मौजूद था । ', मैंने प्रयाग छोड़नेके बाद सिर्फ एक बार शिमलामे इन्सोलिन् - की नई लगाई थी, नहीं तो पान-मेलिटस्की गोलियोंपर काम चल रहा था । किन्तु " रिपु-हज पावक पाप, इनहिं न गनिये छोट करि ।”<noinclude></noinclude> 2dhrwr2z8p5kahez9dqasaj1bix0lbe पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५ 250 195140 665850 2026-07-07T15:15:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665850 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६ किन्नर - देशमें इजेक्शनका सारा सामान साथ चल रहा था, अब उसे लगाने की फिक्र हुई । मैं स्वयं लगानेकी सोच रहा था, किन्तु बात करने में मालूम हुआ, सर्दार साहेब इस कलाने बहुत निपुण है । उनके पिता ढयावेटिसके रोगी थे, पितृसु पामे उन्होंने यह विद्या सीखी थी । सचमुच ही उनके मुई लगाने में पीड़ाका नाम भी नहीं था । उन्होंने मुई दवा भरी और निश्चित स्थानपर खपसे सई मारी, कडके हजारवे हिस्से मे बेड़ा पार; मस्तिष्कतक सूचना भी न पहुँच पाई, कि छुट्टी | 2 डाक्टर, अध्यापक तथा दूसरे अधिकारियोसे उसी शाम भेट हो गई, किन्तु का समझकर देरतक किसीने वात करना पसंद न किया | अधिक समयतक सर्दारसाहेब के साथ ही बातचीत होती रही, और उससे काफी जानकारी प्राप्त हुई । 1 1 रामपुर में भारतमें रामपुरोंकी संख्या नही है । रियासतोंमें युक्तप्रान्तमे एक और भी रामपुर रियासत है, इसलिये बुशहर रियासत के खतम हो जाने- पर भी इस नगरका परिचय रामपुरबुशहर नामसे दिया जाता रहेगा | रियासत बुशहर ३८०० वर्गमील के क्षेत्रफलकी एक बड़ी रियासत है, यद्यपि श्रावादी एक लाख वारह ही हजार। उसके दो-तिहाई भागसे चिनी तहसील है, जिसकी ग्राबादी तो और भी कम, सिर्फ पैतीस हजार के करीव । रामपुर पहिले हीसे इस राजवशी राज- धानी नहीं था । पहिले कामरू, सराहन, कल्यानपुर मे राजधानी ह चुकी थी। राजवश ऐसा स्थान टूढ रहा था, जहाँ वर्क और आधी- से रक्षा हो । सराहनके ६७१३ फीट की अपेक्षा रामपुरकी ३८७० कीटकी ऊँचाई इसे बर्फसे सुरक्षित रखती थी, साथ ही कहावत है,<noinclude></noinclude> o735ri1f3raakt4pfw8bfmz51vx8vj4 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६ 250 195141 665852 2026-07-07T15:15:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665852 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. रामपुर मे १७ राजाने यहाँ दीपक रखकर देखा, तो वह यहां नारी रात जलता रहा। इसने स्थान ग्रोधी भय से भी सुरक्षित मालूम हुआ, और थाने दो सौ वर्ष कुछ पहले रामपुरको राजधानी बननेश सौभाग्य प्रान हुआ । किन्तु निर्यात स्थान निये सकरी उपत्यका हॉढ़नी पत्री, जिससे यहाँ नगरकेलिये अधिक विस्तारका अवसर नहीं रहा । पहाड़ और मनलजको बीचमे बहुत थोड़ी सी जगह है, जो प्राय भर है। राजधानी बनानेके नमय लोगोकी उतनी दूर तक नही जानकी । पहिला महल एक छोटेते मदिरके रूपमे ग्राज सीजू है, उसीके नामते तो भविष्यको का होगा | अन्तिम राजा दस बहुत कुछ पुराने ढगके व्यक्ति थे। उनके बनाये महल भी भविष्यका मापदंड माना होता, तो ऐसे सकीर्ण या राजधानी न बनवाई गई होती। खैर, व तो रामपुर वन गया है । राज्य गया, राजधानी गई, तो भी एक महत्वपूर्ण नगर तो यहाँ रहे ही गा । महल, स्कूल, सरकारी इमारतो और जननाके घरों- = रूप में जो संपत्ति • ले जाया जा सकता । खड़ी हो गई, उसे तो अन्यत्र उठाकर नही दूसरे दिन ( १५ मई) सवेरे ही निश्चय कर लिया, कि रास्तेकी जानकारी तथा यात्रा के प्रबंधके लिये यहाँ दो दिन और ठहरना है। अगले दिन नगर देखने निकला । २२ साल पहिले के देखे दृश्यका हा सा चित्र भी स्मृतिपटलपर ग्रकित न था। सर्दार साहेब का वराला एक छोर सटकके ऊपर था । नीच उतरने पर पहिले मंदिर मिला, जिसके पान पुगने राजमहल में देवमंदिर है । बौद्ध- नदिने कन्जर पुम्पक- सग्रह है, और ना ही अरबों मन्त्रोंसे भरी टोली शाली "मानी करनेकी मशीन भी पुजारीन अपने पदिग्को दिखलाया। दस कदम आग वढनेपर दूसरी ओर बालिका विद्यालय है, जिनमे कुछ कुशमलिन बम के नीचे शिक्षा कर रही-<noinclude></noinclude> 2ievcdcjpnvijppwveafqmr3aacejsw पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७ 250 195142 665853 2026-07-07T15:15:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665853 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>4 १५ किन्नर - देशम थीं । श्रागे सड़क से नीचे उतरकर गलियों में होते बाजार वाली सड़क- पर गये । सडक ही कहिये, वैसे इस सड़कने कभी किसी पहियेवाली गाड़ीको नही देखा, और आगे भी विना यामूल परिवर्तन किये गाड़ी इधर से गुजर नहीं सकती। हमी सडककी दोनो दूकाने है- अधिकतर नीचे से लाये सौदेकी दूकाने, कुछ तो खाली । शायद मौसमपर कुछ दूकानें और जम जाती होगी। पहाड़में पत्थरकी दीवारे होनी चाहिये, जगलकी लकड़ी सुलभ होने से उसका भी उप- योग होता है, किन्तु उतना नहीं, जितना ऊपर किन्नर देशमे । ७ मैवाजारसे पहिले ऊपर ( पूर्व ) की ओर गया । छोरपर सीडियोसे रास्ता सतलज, तटपर जाता है, किन्तु वहाँ शनद्र - शत वेगवाली धारामे कौन स्नान करनेकी हिम्मत रखता होगा । नीचे वैष्णवका मठ मिला। कभी दरभंगा जिलेका कोई निर्मोही साधु इधर श्रा निकला । “जहाँ बैठ गये बैठ गये," और एक मन्दिर उठ खड़ा हुआ । कुण्ड छोटा सा पहिले ही रहा होगा, उसे पक्का करये ऊपर मंडप भी खड़ा कर दिया । श्राजकल दो मूर्ति " साधु" निवास करते हैं । महत मौजूद न थे, दूसरा एक अनपढ़ साधु वहाँ था, जिसे अपने "करम धरम" की बातें कम मालूम थीं। शायद दोनो ही पहाड़के है. श्रतएव वाहर घूमे फिरे कम अथवा साधुग्रोकी भाषा टकमाली कहलाने के हकदार नहीं है । "साधु जन रमते न भी ले, तो भी एक वार "चारो परिक्रमा तो अवश्य हो जानी चाहिये ।' रमते भले " का अर्थ सदा खूट" ( सारे भारत ) की पंडे साधारण यात्रीका जितना उपकार करते हैं, उसे देखते मुझे वह बुरे नहीं लगते, उसी तरहपर साधुग्रो मठ भी घुमक्कड़ो वह कामके हैं, कमसे कम सारे भारतकी यात्रा तो ग्रादमी इनके बल परविना पैसे कौडीके कर सकता है और वौद्ध साधु हो तो अधिकाश एसियाका द्वार खुला है, हाँ भाषाकी कठिनाई के साथ | मैंने सोचा था, वहीं कुछ मूर्तियो के दर्शन होगे, साधुने दर्शन<noinclude></noinclude> 67zg7uyrro9mf685w9t9edr1pp01pvj पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८ 250 195143 665854 2026-07-07T15:15:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665854 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' . रामपुर मे १६ 'कराना भी चाहा, किन्तु मैने कहा -- खडित मूर्तियां के दर्शनसे हमारे जैसोको पुण्य होता है, यदि खंडित मूर्ति हो तो दिखलायो । किन्तु रामपुर मे कहीं खंडित मूर्ति १ यह तो दीपक जलने के भरोसे नया शहर वसा है | बाजारमे लौटकर और आगे चला। रास्तेकेलिये कुछ चीज़ खरीदनी थी । सोच ही रहा था, कह लिया जाय, कि विद्याधरजी विद्यालंकार मिल गये । कल साधारणता परिचय हुआ था, आज विशेष क्या, रामपुरमे सबसे अधिक सहायक यह सिद्ध हुये, पीछे एक श्रौर मित्रसे पता लगा, कि श्रागन्तुकोपर उनकी ऐसी कृपा होती ही रहती है । यह गुरुकुल कागड़ीके स्नातक हैं, श्रायुर्वेद के स्नातक हैं, किन्तु यहाँ वैद्यकी नहीं, जंगल-विभागकी खजान्चीगीरी करते हैं । कई सालो से यही हैं, वैसे रहनेवाले अमृतसर के है। आटा, चावल, चीनी मसाला आदि खरीदनेका काम संने उनको दिया। श्रागे भांजन बनानेकेलिये वर्तन-भाई भी चाहिये। उन्हें खरीद लिया । फिर बाजार मे चीज़ देखने लगे। वैसे मुझे कुछ गर्म कम्बल जैसी चीज़ भी चाहिये थी, किन्तु मैं समझ रहा था, वह चीज़े तो ऊपरसे चाती है, फिर यहाँ खरीदनेकी क्या जरूरत १ किन्तु यह मेरी गलती थी । यद्यपि, गुदमा, पट्टी कनम्, नुड्नम्, स्पू में वनते हैं, किन्तु उनकी विक्रीका स्थान रामपुर है, जहाँ सालमे दोवार (एकवार कार्तिकम) बड़े मेले लगते हैं। और प्राय यहाँ चीजे उद्गम- स्थान से भी मस्ती मिलती है। जो चीजें नहीं विक पाती, उन्हें लोग यही रख जाते हैं। फिर पशमीनेकी चादरें तो रामपुरमे ही बनती हैं, ऊपर तिब्बतसे तां सिर्फ कच्ची पशम भर आती है । इधर पाँच सालते एक चाकू पल्ले पड़ा था, जा न तरकारी काटने के कामका था, न पेसिल बनानेक, भलामानुस पिंड भी नहीं छोड़ रहा था, कि दूसरा खरीदूँ । रूस, इंग्लैंड सबसे होता वह इस यात्रा में कहीं खो गया । गये चाकू खरीदने । हाथरसका काठकी वेटवाला चाकू जो कभी दा पैसे विक्रेता था, उसका दाम ६ आना और दूसरा 1 . . ·<noinclude></noinclude> b3pbjvhhe8914freoiudu3kew5avo23 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९ 250 195144 665855 2026-07-07T15:16:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665855 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२० "अमली रेतीका चाकू” सवा कोई नहीं पूछता । खैर, चौगुने रुपया खर्च करते समय हिसाब किन्नर - देशम रुपयेका जिसे पहिले चार थाने मे दामके तो अपने राम कायल है, चार थाने का ही लगाते हैं । किन्तु यहाँ ठगने का मामला था, तो भी खरीदना तो था, देखनेकी क्या श्रावश्यकता ? फिर दाम कम दिन सारा इधर उधर घूमने और लागीन पूछता करने में ही ता यह तो यहाँ तक ही मे पता लग गया, कि २२ साल पहिले की स्मृतिपर विश्वास नहीं करना चाहिये । चिनी तहसील के कई प्रादमी मिले । दिवगत महाराजाके निजी सचिव बाबू प्यारेलाल स्वयं उधर के ही है । पता लगा - साग सब्जी का समय तो अभी देरमे श्रायेगा, किन्तु सूखा मॉस मिल जायेगा । सेने कहा 'जय हा किन्नर देशी" | किन्तु आगे मालूम हुआ व सूखे मासकेलिये यह पहिलोसी रुचि नहीं है। सारे सूखे मासको दान करना पड़ा। रास्ता के बारेमें यहीं जो कुछ मालूम हो गया, उमीपर दिल कहने लगा, यदि चिनीको ग्रीष्म-निवास बनाना है, ता प्रतिवर्ष जाड़ो में नीचे उतरनेका ख्याल छोड़ना चाहिये । शामको हाई स्कूल में अध्यापकवर्गने चाय पार्टी दी, जिसमे राज- धानी के सभी अधिकारी और गण्यमान्य सज्जनांसे परिचय प्राप्त करने का अवसर मिला । श्राजकल के जमाने मे थाल भरे लड्ग्रोको देखना कहाँ मुयस्सर ? किन्तु ग्रव भाग्य कहाँ, चीनी मिठाई तो ब्रह्मा ने हरान लिख दी, चाय तक का फीका ही पिया। उस दिन राय कृष्णदासजी हमारे मित्र पडित व्रजमोहनव्यासकी प्रशमा करके कह ' रहे थे उन्होने डायवेटिसको दबोच रखा है । वनारस जाते हैं, ता क्या वहाँकी मिठाई छोडते हैं ? वन अपने हाथ से इन्सोलिन की सूई कोचके लड, अमिरतीपर हाथ साफ करने लगते हैं | अपने रामको ता भी इतनी हिम्मत नहीं और अपने से छोचने का उतना अभ्यास भी नहीं, तो की उसका यह अर्थ नहीं, कि दूरारोको लड्डु,<noinclude></noinclude> aqn2py3cyrjwu0zmk10yzjqvzlsw31q पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३० 250 195145 665856 2026-07-07T15:16:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665856 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>A 1 रामपुर में * खाते देख जीभने पनी टपक रहा था, जीम इतनी बेवकूफ नही है। अतिथिवर्ग के चायपान के बाद स्कूल के लड़कोको मी लड्डु मिले | ऐसे स्कूल अब कहाँ है ? होते तो किसका दिल फिरसे विद्यार्थी बनेका नहीं करता । अन्तमें मुख्य अतिथिको भी भाषण करना जरूरी था । वह कोई सकटका मौठा तो नही है, आखिर कलम घिसने से पहिले ही जीभ चलानेकी विद्या सीखी थी। लेकिन श्रोता पचमेल थे । एक और कितने ही उच्च शिक्षा प्राप्त अधिकारी और धन्यापक थे और दूसरी बार तीनरे-चौथे दर्जे तक के विद्यार्थी भी । किनके लिये क्या कहा जाये, इसीका बड़ा मम जस था । सोचा बच्चो के लिये मिठाई काफी है ही औरोकलिये कुछ कहो । फिर भी कठिनाई दूर नहीं हुई । १८ अगस्त १९४७ के बाद देश दासतासे मुक्त हो गया, राजाका भी राज्य गया और मार्च (१६४८) से अव हिमाचल प्रदेशमे स्वतंत्र नजाका राज्य कायम हो गया। इस बात मे सच्चाई है, इसमे इन्कार नहीं करता, किन्तु यहाँ के लोगोको विश्वास हो तब ना । लोग तो नाम तकको भी बदला नहीं समझते और मुख्य प्रबधाधिकारीको "दीवान साहव" कहते जा रहे हैं। साधारण जनता क्या समझेगी, जबदि सरकारी कर्मचारी भी नही समझते, कि अव यह दूसरी तरह अधिकारी है । ता भी कुछ अपना स्वम सुनाया । हिमाचल प्रदेशमे ग्राम ग्रामने स्कूल खुलेंगे । कोई अनपढ़ नहीं रहेगा। मारा पहाड़ मेवा वागोसे ढँक जायेगा । घर-घर बिजली ' जलेन । मृगर्भमे छिपी धातुये नाहर यायेगी और देश मालामाल हो जायेगा । पर्वतस्थन्नी इधर से उधर दौड़ती मोटरोंके भोंपू गूँजती रहेगी | और वाच वाच में कुछ अपनी यात्रा की भी बाते । अगले दिन १६ मई रविवार था, लेकिन हमारे लिये छुट्टी नहीं । कनौर पर कुछ अधिक लिखना है। वीचमें इतिहास श्राकर उलझ पडेगा, यह उस समय ख्यालम श्राया नहीं था, नहीं तो सरकारी पुराने कागज पत्रों को उलटता चला जी भी सामने ग्राये, देखते चलो 1 J<noinclude></noinclude> hht4kytkfoywitzroe26swbiu5drzrv पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१ 250 195146 665858 2026-07-07T15:16:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665858 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२ किन्नर - देश मे सरदार साहब तो साखाने दिखलाने ले चले। महाराजा पदमसिंह ( मृत्यु १६४७ ई०) के वनवायें नये महलके ही हाते में तोनाखाने के सकान है। महाराजा पुराने विचारोंके आदमी थे, मैंने १९२३ में उनसे बातचीत की थी। सीधे-सादे से आदमी । आश्चर्य है कैसे उन्होने नये ढगका महल बनवाया । किन्तु तोमाखाना श्रव भी प्राचीन संस्कृति का रक्षक था । वही लकड़ी के वखार जैसी छोटी छोटी धेरी कोठरियाँ, वही पुराने ढंग के ताले । तोसाखाने मे चाँदी के कुछ वर्तन थाल, गड़वे, कटोरे, चॅबर, मोर्छल, भाला, वल्लम, कुछ पुरानी साधारण सी तलवारे, गद्दी और मसनदके जरीके खोल थे। नई सरकार चाहती है, बेच कर पैसा बनाये । विधवा राजमाता इसे अपमान कीवात समझती है । हो सकता है, नया बनवाने पर इन चीजोपर अधिक रुपया खर्च हो, किन्तु नीलाम करने पर मरकारके पास चार पाँच हजार से अधिक नहीं जा सकेगा । तोसाखानेके बड़े नामसे शायद ऊपर वाले समझते हैं, कौरव-पाडव वंशकी राजगद्दी, सारे कलियुग भर हीरा-रतन जमा होता रहा, भला यहाँकी निधिका क्या ठिकाना ? किन्तु निधिको देखकर तो मुझे ख्याल आया - नाहक यह ग्रह हैं । यहाँ यदि कोई अधिक मूल्यकी संपत्ति रही होगी, तो अब वह यहाँ नहीं है और कम से कम बड़ी रानीको नहीं मिली। दस पॉच ऐतिहासिक संग्रहालयके उपयोगकी चीजोको लेकर वाकी रानीको दे देना चाहिये । तोसा खाने पर उधर यह हुक्म, दूसरी ओर राजा के खच्चरो घोड़ो पर अलग निगाह । खच्चरोमें जो अच्छे रहे, क्या यह हिमाचल सरकार के श्रानेतक वचे रहे। अच्छे खच्चर पहिले चपत हो चुके । राजमाताने चायकेलिये बुलाया था। बेचारी समाई रानी थी। महाराजा " वृद्धस्य तरुणी भार्या प्राणेभ्यो ऽपि गरीयसी" के अनुसार छोटी रानीके वश मे थे, चद्रवश न सही सूर्यवशकी भी तो यही परंपरा थी। उन्होंने जगम संपत्तिको ही खुलकर छोटी रानी और उनके पुत्रको नही दिया, बल्कि शिमला ग्रादिमें जो अपना मकान था,<noinclude></noinclude> iiqbkupb3g4augxl6ggpw6uyz8ev1zi पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२ 250 195147 665859 2026-07-07T15:16:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665859 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रामपुर मे २३ उसका भी अधिकाश छोटे कुमारके नाम कर दिया। वडी रानी जीवन- में उपेक्षिता रही। राजाने यह भी तो नही सोचा था, कि उनके ख मूढते साल भी नहीं बीतेगा, कि अग्रेजोका डडाकुडा उठ जायेगा, और शहर पने वीसियों सूर्य चन्द्रव शाक्त सोके साथ मिटकर हिमाचल प्रदेश बन जायेगा । यदि यह सोचा होता, तो बड़े कुमार और उनकी माताको पदमसिंह भुलाया न होता । वह इतने कठोर व्यक्ति न थे। सोचा था, बड़ा कुमारतों गद्दीका मालिक है, उसके लिये चिता करनेकी क्या अवश्यकता ? बेचारी राजमाता के आँसू निकल आये, तोमाखाना और खच्चरोकी बाते करते । अभी तो कुछ नगदी रुपया था, जिसमे से बंटकर २०-३० हजार मिल गया था, और किसी तरह काम चल रहा था, किन्तु वह कितने दिनों तक ठहरेगा। एक मृत कुमारकी विधवाको दो सौ रुपया मासिक मिलता था, वह बंद है । वनियोंका उधार होगया है, श्रव कोई कुछ उधार देनेके लिये तैयार नहीं। बुरी दशा है। राजमाता- के सामने उदाहरण नौजूद है, फिर क्यों न घवराहट हो - जव पास के रूपये ख़तम हो जायेंगे, तो यह श्रालीशान महल तो नहीं खिलायेगा । मैंने सान्त्वना दी -- सरकार पेशन (६० हजार, देगी, वह आपके लिये आपके पुत्रके लिये प्रयाप्त होगी। सर्दार साहेवने भी ढारस वधाया । बेचारी नवशिक्षिता तो नहीं है, जो कायदे कानूनकी वात जाने और अपनेही सोचकर धैर्य धरे । लड़काभी श्रमी १३-१४ साल- का वालक है। सौत झगडा मोल लेने को तैयार। राज्य गया किन्तु राजमी रहन सहन दो माममे थांडही वदल सकती है, इसी लिये खर्चका रास्ता बनाही । राजमाता जैसे व्यक्तियोंके साथ सरकारको अधिक उदारता से वर्ताव करना चहिये । आज मार्च - क्रान्तिको वातं कुछ अधिक सुनने को मिली, जिनसे साईसकी बातो की ही पुष्टि हुई। मैन भी उस समय पत्र मे पढा था, बुशहरकी प्रजान विद्रोह कर दिया। गजकी पुलिसने दमन करके दबाना चाहा, किन्तु उमे मुटकी खानी पड़ी, गोलियांने कोई सहायता<noinclude></noinclude> rlcd5u6dovxo8pehh55t0nfjn20526z पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३ 250 195148 665860 2026-07-07T15:16:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665860 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४ किन्नर-देशम नही की ओर गारी पुलिस उसके अफसर और बड़े अधिकारी प्रजा हाथमें वढी हो गये। टहरीकी प्रजा को भी इसी तरह रवेच्छाचारी राजाका मान-मर्दन करते पढकर वडी प्रसन्नता हुई थीं। बुशहरकी खवरने तां मुझे और खुशी हुई, क्योंकि मैं जानता था । बुशर रियासतों के भीतर सबसे पिछड़ा इलाका है । किन्तु वात क्या थी ? प्रजानं राजोके विरुद्ध कही विद्राह नहीं किया था । वात यह हुई । फरवरी (१६४८) में हिमाचनकी रयातनांके राजा प्रजा दिल्लीन जुरे । भारत सरकारकी श्रोरमे कहा गया- प्रजा और राजा दीनांकी भलाई इसी है, कि हिमाचलकी दर्जनो रियासते मिलकर एक प्रातका रूप ले ल । कितनेही राजाांने कुछ इधर-उधर किया निरकुशताका चमका बहुत बुरा होता है । किन्तु वह यह भी जानते थे, कि व उनकी पीठपर उनके प्रतिपालक ग्रोज नहीं है प्रजा जराभी ढील पातेही भूखे मेड़ियेकी भाँति उनपर टूट पडेगी. ओर अभी जा गुजारेके लिये माटी रकग पेशन में मिलनेवाली है, वह भी हवा हो जायेगी, इज्जत सम्मान की बाततो दूर रही । ग्राखिर अता- पहताकर बहुताने भवितव्यता सामने सिर नवाया। हिमाचल प्रदेश बनना पक्का हो गया। हॉ. विलासपुर जैसे कुछ राजाचोको मनमानी तरसे अलग होने व सौका दिया गया, जो सर्वथा अनुचित था । हाल एक मौगोलिक, सरकृतिक और आर्थिक एकाई है, प्रजाकी राय विना जाने सिर्फ राजाचोकी मर्जीपर इस एकाईका भग करना न वर्तमान के लिये अच्छा है, न भविष्य के लिने । सरदार पटेलने रिवाज वारंभ जो रूस लिया है, उसका में प्रशक हूँ । श्रजकी भारत छोड ममय जो न्वाल थी, उसे उन्होंने फल करने में बहुत दूर तक सफलता प्राप्त की। हिन्दु रियासतोके गया नये की स्थापना में दूरदर्शिवा उतना काम नहीं लिया गया। वहा भी जो द्वारा बनाये जाते प्रान्तीय इतिहासका दुहराया गया है, जिनमें हमारे निशिग्य कुछ कम हो. किन्तु राज- नेवाली मानवे<noinclude></noinclude> nish63ep1uxpz5odpvy2ydtvteyf7e6 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४ 250 195149 665862 2026-07-07T15:17:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665862 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रामपुर मे २५ रास्ते मे कठिनाई उत्पन्न होगी । ग्राखिर हिमाचल प्रदेश बनाना था. तो सारे स्वाभाविक हिमाचल प्रदेशको उसके भीतर ग्राना चाहिए था । रियासते तो सारी यानी ही चाहिये. साथही श्रमाड़ा नैनोताल. गढवाल, शिमला तथा कागडेके नारे जिले और होशियारपुर गुरदासपुर जिलोके पहाडी भाग भी इनके अंदर होने चाहिये । खैर, हम बुराहर क्रांति की बात कर रहे थे । कातिके नेता उन समय दिल्ली में थे, जब कि वहाँ रियासतोको नोडकर हिमाचल प्रदेश वनाना पक्का हो रहा था । अव न राजाांके स्वेच्छाकारी शासनका रगत था, न उससे लोहा लेने का । किंतु प्रजामण्डल के कुछ नेता दौड़े-दौड़े रामपुर पहुँचे और महाक्रांति के लिये कटिबद्ध होकर । बुशहर मे प्रजाका राज्य होना चाहिये, प्रजाका मंत्रिमंडल बनना चाहिये - स्मरण रखिये, सारे हिमाचल प्रदेशका नहीं केवल बुशहर का । श्राखिर टेहरीने जिस तरह सफलता पाई, उसी तरह यहाँ भी हो सकता है । सारयर अनुलाल स्कूल के अध्यापक है । बुशहर प्रजा मंडलके एक महान नेता है । उनके उर्वर मस्तिष्क मे ख्याल आया, जरूर अपना मंत्रिमंडल कायम करना चाहिये, महामन्त्री वननेका ऐसा अवसर फिर कहीं हाथ ग्रायेगा ? राजधानी रामपुरमे क्राति लिये सफलताका मौका न देख वह वीन सील चार श्रागे सराहन पहुँचे । खूब जोशीले भड़काने वाले भाग्य हुये उलट दो राजाकी नौकरशाहीको, ना ना राज्य राज्य के अधिकारी तो वही पुरानी टकसाल के यह वह थे. जिन्दगीभर मुसाहिब का पलते रहे, यदि इससे कोई अधिक दात सीता यही कि जरा मी विरोधी आवाज निकले, तो उसे कुचल दो 1 उनको क्या पता, कि भारत वदल गया है, शासनका पुराना नहीं हो सकता । अनुलाल की दिलका बुखार निकाल लेने दो लोगोका - भाओ कि राजाका राज्य अब नहीं रहा, अब है यहां हिमाचल प्रदेश वैसे ही जमे युक्तप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश | यह भी निर्वाचित मेम्वरीका मत्रिमंडल बनकर रहेगा। इतनी मत्थापचा<noinclude></noinclude> 545tez1meyyeidrigb60pjk2skq8nsk पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५ 250 195150 665864 2026-07-07T15:17:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665864 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशमे कौन करे, महानता अनुलालको पकड़ने के लिये पुलीसके जवान भेज दिये गये । लाल गिरिफ्तार हुये । उन्हें ले चले रामपुरकी ओर जनता में उत्तेजना फैली। गौरा गाँव पहुँचते-पहुँचते तीन चार स आदमी जमा हो गये । मास्टरने उन्हे उभारा । जनताने अपने वीरक पुलीसके हाथसे छीन लिया, गिरफ्तार करनेवाले स्वयं गिरफ्तार ह गये । खबर राजधानी में पहुॅची। अगले दिन जज माहब, डी० एम० पी० ए० एस० पी० पुलीस दलके साथ पहुँच गये। लोग अपने नेत को देने को तैयार नही हुये, फिर क्या था, चलायो गोली। गोली चली कुछ लोग घायल हुये, मरा कोई नहीं । गोली खतम होने पर आई अधिकारीवर्ग की सिट्टी गुम हुई। एक अधिकारीने निकलकर लोग से बात की और गोली बंदूक लोगोके हाथो में देकर सब वीरो ने श्रात्म- समर्पण किया । व मास्टर अनूलाल वेताजका राजा था । विजेता मास्टर अपने दलबल के साथ पुलीम और अधिकारिय को बंदी बनाये रामपुरकी ओर चला। प्रजाका राज्य स्थापित हो गया, इसमें किसको सदेह था । कलके तो ग्राज वन्दी 'वनकर चल रही थी। शासक और उनकी पुलीस नौ मील के रास्तेम सार वदियों पर मार पड़ी न नभ्यस्त जनता के लिये बनिये महाजन उन दिन पहाड़ टूट पड़ा । वन्दी रामपुरमें एक सरायमे वन्द किये गये, राज- धान पर विद्रोहियोंका अधिकार, "मास्टर अनूलाल की जे" होन लगी । मास्टरनं जनताको शांत रखा, न नगर में लूट मार होने पाई, यद्यपि उत्तेजित यह विलकुल स्वाभाविक बात थी। शहर के घबड़ाहट के मारे प्राण दिये देते थे । मास्टर अनूलाल को यदि विद्रोह का दोषी ठहराया जाता है, तो उन्हें इस सुरक्षाका श्रेय भी देना चाहिये । किन्तु पुरानी नौकरशाही अपने पुराने मानसिक रोग से मु कैसे हो सकती है ? रामपुर पर क्रातिकारियो के अधिकार, पुलिस और अफसरों के बंद होनेकी खबर सरकार के पास शिमला पहुँची । मुख्य प्रबधाधिकारी<noinclude></noinclude> o9u00039rg8r6hgm8pd8gk98r3o1g8e पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६ 250 195151 665865 2026-07-07T15:17:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665865 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रामपुर मे २७ सीर बलदेव सिंह पंजावी हथियारवद पुलिसके साथ रामपुरकी चार चले । रामपुर पहुॅचनेने पहिलेही प्रजामंडल के सभापति पंडित सत्य- देवजी सर्दारसे मिले। उन्हे लौट जानेके लिये कहा, नहीं तो जनता किसीको जीता न छोड़ेगी। लेकिन पुलिसदल कहाँ रुकनेवाला था ? क्या बुशहरको भारत से स्वतंत्र होने दिया जाता १ जनताने किसी- को नहीं मारा, पुलिसको भी गोली चलाने की जरूरत नहीं पड़ी, यद्यपि मास्टर के आदमी इसे नहीं मानते। वह तो कहते हैं, पुलिसने कई आदमियोको मारकर सतलजमे डाल दिया, उसने एक वलियाको भी मार दिया । तटस्थ श्रादमियोंका कहना है, कोई आदमी-वादमी नही मारा गया, बछिया हल्ला-गुल्ला में पत्थर के गिरने से मर गई । पाकि- स्तानकी पुलिस तो थाई नहीं, फिर वलिया मारनेपर कौन विश्वास करता । तो भी इस वातका विचार काफी किया गया। मास्टर केवढी बंधनमुक्त हुये, और कलके विजेता वंदीखानेम डाल दिये गये । मास्टर नूलाल बुशहरके महामंत्री नहीं हो सके। यह पाँच दिनोंके लिये इतिहान में बुशहरके राजा, ऋतिम राजा हो सकते थे । लेकिन उनके मस्तिष्ककी उर्वरता यहाँ खतम होगई थी, अथवा अनुयायी वहाँ तक न जाते । विद्रोह के अपराधमे सात सालकी सजा उन्हें हुई, किन्तु पीछे छोड दिये गये । मास्टरने जनताको सेवाकी थी। भी तो पहाड़की सबसे पददलित कोली जातिभी उनके पक्ष मे उठ बड़ी हुई। गजपूत कहलानेवाले वडी जातियालोने अपने जातभाईको छूने की हिम्मत नही की। पुलिसका काम समाप्त हो गया था, किन्तु पुराने शासनशास्त्रमे यह पाठ कहाँ पढ़ाया गया था। पुलिसको जगह-जगह अनेत फैलाने के लिये छोड़ दिया गया। लोगांवर त्या- चार हुये, खासकर कोलियों पर बहुत जुल्म हुये ---मेड़वकरियोंके चटकर जानेका ही नही स्त्रियोंपर वलात्कार करनेका भी दीपाशेप किया जाता है । इसतरह बुशहरकी 'क्रांति" श्वा दी गई, और "प्रतिक्राति"<noinclude></noinclude> f6bnwzss3v7pmksuecfbcqnrpnt2wq4 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७ 250 195152 665866 2026-07-07T15:17:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665866 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८ किन्नर - देश मे का पल्ला भारी रहा। यदि क्राति सफल हाती, तो कौन जानता है. तिब्बत सीमा पर भारतसघसे बाहर यह दूसरा राष्ट्र खड़ा होकर राष्ट्रसघकी सदस्यताका उमीदवार न होता । श्राखिर रियासतों के मिटकर भारत सघका एक प्रदेश वन जानेपर इस "कान्ति" और विद्रोही अवश्यकता क्या थी ? अलग राज्यका मंत्री और महामंत्री वननेकेलिये बुशहर में ही यह पाप नहीं किया गया है। टेहरीके मंत्रिगरा भी श्राज इस बातका आग्रह कर रहे हैं, कि उन्हे स्वतंत्र टेहरीका स्वतत्र शानक रहने दिया जाये। किसी बड़े नवे नाया गया. तो मंत्री - महामंत्री क्या सभासचिव बनने की भी सम्भावना तो नहीं रह जाती । ४ किन्नर देश की ओर १७ मईको रामपुर और अपने सहृदय मेज़वान से विदाई लेला । यद्यपि मेरे पास एक ही खच्चरका सामान था, किन्तु पराउने अकेला खच्चर ले जाया नहीं जा सकता, इसलिये सामान के लिये दो खच्चर और सवारी के लिये एक घोड़ेका प्रबन्ध किया गया था । यह कहनेकी श्रावश्यकता नहीं कि ठाणादार से ही नै सरकारी खच्चरो और पोडका व्यवहार कर रहा था । भाडे के भी इधर खच्चर चला करते है किन्तु उनका मिलना कोई निश्चित नहीं रहता । वैसे सरकारी खच्चर पर जितना खर्च आता है, " के खच्चरों पर नहीं श्राता । मैने शाम को ही उससे अविक नावे दिया था, हमे बड़े सवेरे चलना है । धेरे समय से थोड़ी देर बाद घर खाना हो सके । राव और विद्याधरजीने विदाई ली। 1 बागे चलर घोडपर सवार हुआ | थोडा ही थागे गये लगे कि यो कु<noinclude></noinclude> 3rbcug62rjey7z7xwptayyfzjn7k4f1 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८ 250 195153 665868 2026-07-07T15:17:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665868 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर देशकी चोर २६ रुकने और नमकने लगा । नमस्का - शुरू है, श्रागे ठीक हो जायगा । और दूर चले, किन्तु वही रहतार । साथ चलने वाले वोडेयापीठ तो कटी नहीं है? लडकेने पहिले लडके से पूछा- इधर उधर करना वाहा, किन्तु जोर देने पर बोला - हों, पीठ कटी है । श्राखिर रियायती नौकर हरे कि । मेरे एक मित्रकी नगी वहिन एक रियासत की विधवा रानी थी। छोटे भाई के आने पर श्रावभगत क्यो न होती ? चलने समय बहिन रानीने भाईको मिठाई और दूसरी चीज़ा के नाथ एक अच्छा का भी दिया। मला नौकर-चाकरो के रहते रानीलाहव के भाई अपने हाथ से उन चीनोको कैसे उठाकर ले जाते । बाहर चार जब गाडीने भेट रखी गई, तो साफा नदारद । विदा होकर चले आये भाई क्या फिर लौटकर साफेके उडनेकी बात कहने जायेंगे - राज्य के नौकरीको यह बात भली भाँति थी है । और राज्य के श्रतिथियों को ऐसा अनुभव अकार प्राप्त होता है। खैर मुझे तो घोड़ा नेटने मिला नहीं था, औौरन अस्तबल के खासावारको इससे विशेष लाभ हुआ होगा। शायद अच्छा घोड़ा पान के लिये भी अरवल के बड़े साई को रहितेने बख्शीश देनी चाहिये थी, जिससे में अनभिज्ञ था । की पीट पर मै चार दिन पहाड़ोंका पार करते चिनी कैसे पहुँच सता था ? "हुँच नकता, तो भी मेरे पास वह दिल न था । सने घोरेको लडके हवाले करके कहा - इमे तुरन्त अस्वल मे ले जाकर दूसरा धाड़ा बदल ले . म गोरामे प्रतीक्षा करूँगा । वह "हो' वर लाट गया । रुने विश्वास किया कि वोडा वेश्य गोरा ग्रा जायेगा | थोड़ा यागे एक कनीरापुर मिला। मैंने नोचा शायद लड़का तर पारे लांसे बात न करें, इसलिये ने इस पुरुपसे प्यारलालजी के पास संदेश भेजा । कटरी नई बात नहीं। नद्यपि र शरीरमे निर्वग था, और अभी पहा चढाई उनराईज अभ्वारत भी न हो पाया था, तो भी घोडा थाने नवनिश्चिता ने श्रागे चला। तीन साढे तीन<noinclude></noinclude> s9jux5uq3191403rud5miif9b8tm63v पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९ 250 195154 665869 2026-07-07T15:17:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665869 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३० किन्नर - देशमे घटे गौरा डाक गले में पहुँच गया। गौरा रामपुरसे ढाई हजार फीट से अधिक अर्थात् समुद्रतल से ६५१८ फीट ऊँचा है, इसलिये रास्तेम चढाई भी पड़ी। मुझे दोपहरको वहाँ मेरा विश्राम करना था । दा तीन घटेसे घोड़े के भी ग्राजानेकी पूरी उमीद थी । किन्तु वहाँ घोड़ा कहाँ आनेवाला था । श्रागे चिनी तक खच्चर के साथ जाने के लिये दौलतराम या पहुँचे । घोड़े वारेमे पूछने पर बतलाया -- हाँ वह सही सलामत अस्तबल मे पहुँच गया । भुलानेसे क्या लाभ, आाखिर यह तो रियासती श्रातिथ्यका एक अभिन्न अग है। तीन घटेकी प्रतीक्षा काफी थी। आगे अभी १२ मील चलना था, और रास्ता और भी कड़ी चढ़ाई उतराईका | गौरामें घोड़ेकी आशा नहीं थीं । यही गौरा था, जहाँ के कोलियोने मास्टर अनूलालका छुड़ा लिया था, और यही डाकवगला था, जिसमे राजकी पुलिस और अधिकारियोंने शरण ली थी, गोली चलाई थी, और अंत में श्रात्मसमर्पण किया था । १० मीलके रास्ते उतराई या समतल पथपर तो कुछ नहीं मालूम हुआ, हिम्मत भी करने की जरूरत नही पड़ी, किन्तु प्रतिम चार मील कड़ी चढ़ाई के थे। धूप भी तेज़ थी, ऊपरसे डायवेटिस वाले श्रादमीका तालू वैसे ही सदा सूखा रहता है । मत पूछिये इन अन्तिम चार मीलोंने मेरी क्या गत बना दी। वन यही समझिये “केनापि देवेन हृदिस्थितेन यथानुयुक्तोस्मि तथा करोमि " " वाली हालत थी । कष्ट असह्य था, किन्तु हिम्मत छोड़नेकी जानता ही था, विना सराहन पहुँचे शरण नही । वात न थी रास्तेमे बुशहरी नारियॉ डरके किसी मेलेसे खूद बनी ठनी लौट रही थी, कोई गीत भी गा रही थी, किन्तु यहाँ देखने सुननके लिये दिल कहाँ था ? ग्रागे तो चल रहा था, किन्तु हर पाव घटे पर जान पड़ता था, पैरों में नई परी बांधी जा रही है । क्या दिल माननेकेलिये तैयार था, कि ग्राज ७६ वे मीलपर (शिमलासे) पहुँचेंगे। लेकिन आखिर २१ मीलकी यात्रा करके सूर्यास्त के समय सराहनके डाक बंगलेपर पहुँच गये ।<noinclude></noinclude> 75o6lvdcx0jbldu2rwargv96xulsng7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४० 250 195155 665871 2026-07-07T15:18:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665871 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर देशकी श्रीर ३१ वगला वद था । कोई मेला हो और पहाड़ी जवान बहाँसे अनुपस्थित हो, यह क्या कोई होनी बात है ? मालूम हुआा चौकीदार साहेब वहाँ गये हुये है, आज रातको शायद ही लौटे। मेला तो होता है किसी बडे शक्तिशाली देवताका ही । किन्तु उसमे डटकर शराव पीना, नाचना गाना सवसे श्रावश्यक चीज है। आस-पासकी सारी तरुण सौदर्य - राशि जहाँ राशिभूत होती है, फिर "वहाँ नहीं यही बैकु ठा" माननेवाले क्यो वहाँसे पिछड़ेगे । खैर, भंगी अर्थात् कोली बूढा कुछ बीमार था, इसलिये वह मेला न जा सका था, नही ate rahaत हजार फटकी रातको बाहर घासपर बैठना बहुत प्रिय नहीं लगता ।' बूढेने कहीसे कुर्सी पैदा की। पूछताछ करनेपर मेट (चारस) के पास चाभी निकल आई। ग्रव चाहे चौकीदार रातभर मेला करता रहे, हमे पर्वाह नहीं थी । कुछ देर बाद दौलतराम भी खच्चरोंको हाँके ना पहुँचे, किन्तु उनकी मनहूस सूरत देखकर हमारी श्रवस्था बेहतर नही हो सकती थी । जान पड़ता था, वह हमसे भो अधिक थके सौदे हैं। उन्होने जो भी खच्चरोके लिये दाने चारेकी फर्माइश की, देकर पिंड छुड़ाया और प्रति खच्चर रुपयेसे क्या कम खर्च था । । प्रति-दिन दस दोपहरको छाछ भर पिया था, इसलिये भूख तो लगनीही ठहरी, किन्तु इस समचतो थोडा लेट जानेका ख्याल था। नेगी ठाकरसेनका पत्र यहाँ के मिडिल स्कूल के मास्टर साहेवको मिल गया था और मास्टर सोहनलाल पता लगतेही श्राये -- सराहन वस्ती कुछ फर्लाङ्ग ऊपर है । हमतो दौलतरामकी रसोई में शामिल होना चाहते थे, किन्तु मास्टरजीने घरसे भोजन और दूध लानेका श्राग्रह किया। एवमस्तु ! किन्तु हमे सबसे अधिक चिन्ता थी कलकी, यात्राकी अगले दिन पैदल चलनेकी शक्ति नहीं थी । मास्टरसाहबने जितनी जल्दी घोड़ा मिल जानेकी बात की, उसपर मेरा विश्वास नहीं हुया -- पहाड़ी लोग ना करना जानते नहीं, किन्तु हर "हाँ" को पूरा करना उनकी शक्तिके<noinclude></noinclude> b6zzfsqybb3luo70mslqec0dmbpugvi पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१ 250 195156 665872 2026-07-07T15:18:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665872 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशमे ३२ • जाहर है । फिर पूछने पर मास्टर सोहनलालने कहा- पोडा हमारे परिचित बनियेका है । मुझे २२ साल पहिले नोलाचे बनियेके साथका अनुभव याद आ गया, कहीं यहाँ भी वैसा ही न हो । दिल पत्थर करके लोचा - खैर, यहाँ सिरपर छत तो है, साफ युबरा पी० इ० डी० का बंगला, पलग, मेज, कुरसी गोजूद है। सराहनमे व, भोजन मिल 'जायेगा ही, हा वैठे खच्चरोकोभी आदमी के साथ वीस-बाईस रुपये रोज खिलाने पड़ेगे | किन्तु मैं आजकल के रुपयोकी खर्च करते समय पहिले चार से भाग दे दिया करता हूँ. आाखिर १६३६ मे चार चाकी चीज़का ही मूल्य तो आजकल एक रुपया है। खाना लायानेपर मास्टरजीने कहा- बनिया घोड़ा दे देगा । इयों नहीं दे देता, शायद उसका लड़का स्कूल मे मास्टर जीके पास पढ़ता हो। और मास्टरजी के पास नेगी टाकरसेनकी महापडित के बारेमे जवस्त चिट्टी थाई थी । मास्टरजीने कहा- बोडेका किराया नचारतक अर्थात् २३ मीलके लिये २० रुपया माँगता है। वीस यानी ५ रुपये, कोई पर्या नहीं मैने धाडेको ठीक कर देनेके लिए कहा। 1 सराहन ऐसा महत्त्वहीन स्थान नहीं है, कि रातभर डाम्बाले ने रहकर उससे छुट्टी ले ली जाये, लेकिन मुझे फिर इसी रास्ते लौटना था । संगनका सतयुगका इतिहास भी इउनेपर मिलता है। द्वारके अंत में जब श्रीकृष्णचन्द्र मानवकद द्वारिकामे नास कर रहे थे, तो पकाना शोणितपुर था। नहीं प्रचंड-मुजदंड वाणापुरकी राज- धानी थी । यही उसकी कन्या उपाने चित्रलेखाके खीचे चित्रोसे धाने स्वप्नाभिलपि प्रियतम प्रद्युझको पत्र भगवाया था। उसी प्रस्नकी विच्छिन्न परपरा पिछले महाराजा पदमसिंह और उनके वर्तमान चिरजीवी वीरभद्रसिहतक चली आई है। इनसे वार प्राचीन नाम शोणितपुर और वर्तमान नाम सराहन के महत्व के बारेमे कहा जा सकता है ? और प्रमाण चाहिये, तो वह वा दिया है, जो शोणितपुरसे ही विगड कर वना है। वसा<noinclude></noinclude> 8ehrcefmmc7vdqtk0d1zik95avbhzf7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२ 250 195157 665873 2026-07-07T15:18:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665873 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- -T बन्ने ८ एक विन्नर गृह, ६. चिनी गोव (पृष्ट-६६ ) १०-११. चिनी देव प्रतीक्षा १२. वैद्यराज और तीन भिक्षुणियाँ १३. चिनी पाठशाला -<noinclude></noinclude> d929w6wcdb8xhxrphfvai2kvv89u7cc पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३ 250 195158 665874 2026-07-07T15:18:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665874 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चार-- १४. अम्दी घुमक्कड़ (पृष्ट-८५ ) १५ ब्रह्मचारी चैतन्य ( पृष्ट ६१ )<noinclude></noinclude> tbw2zpvq6iduqng6cxp5dr9iyfitrup पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४ 250 195159 665876 2026-07-07T15:18:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665876 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर की चोर 23 व्याकरण अनुसार यह यहाँ पडित प्रवर मूर्खजपादानदमे पूछ ● लीनिये. जो यहाँ से था यही नीचेके, रावी गॉव मे गतयुग की पोथी लेकर नैटे हुये है | हम पोथीको न इनकी हजार पीढ़ी पढ सकी ओर न वह खुद वल्कि वह पोथी तहबर तह काडीने लिस्ट सारे कलियग भी न खुली और यदि रामजी की इच्छा होगी, तो भाग बाग लगनेपर कोयला मनकर ही खुलेगी । सराहन रामपुर से पहिले काही समय बुशहरकी राजधानी रहा, जो पीछे गर्मियो भरके लिये ही श्रीचरणोसे पवित्र होता रहा। यही पेने १९२३ में महाराजा पदमतिह के दर्शन किये थे। उस समय परसे तक टेलीफोन भी था । ग्रव तो टेलीफोन ख़तम हो चुका ई. रास्नेके खने भी बहुतमे लेट गये है, २१ मील लवा तार मुफ्त न रहा है। अधिकारियोको पता नहीं है, कि जल्दी ही उन्हें नचार- नक टेलीफोन नहीं तार पहुँचाना होगा, यदि हिमाचल सरकार के स्व सतलज उपला फलोजी खान' को जाग्रतन परिणत करना है। राजा और उनकी ग्रीसकी राजधानी न तहो, सराहन अच्छा बड़ा गाँव है, और यही सारे बुशहरकी अधीश्वरी भीमाकाली प्रारूप निवास करती हैं। मुझे इन बुशहरियांपर कुझलाहट ग्राती है । हमारे देखते देख गढवाली ग्राधे दर्जन नकली काशी, नकली प्रयाग यहाँतक कि नकली वद्रीनारायण मी बनवाकर मालामाल हो गये - " नकली बद्री- नारायण" यह मे गगातरीके पडोके गुरु वैदिकजीकी बात मानकर कहता हूँ, जिनका कहना था कि असली या आदि वदरी भोट देशमें थोलिङ्ग मम हैं, जिन्हें लामा लोग पूजते है। भीमाकालीके याद्या भगवती होने में मदेह नहीं। कहते है उनके खजानेमे राजा रामचंद्र जो रुपये-पैसे रक्खे हुये है, फिर तो ताके लिए बात पक्की ठहरी । माईके दर्शनका लालसा तो है लौटते समय, लेकिन मुश्किल है कि माईका द्वार मेरे जैसे वज्र नास्तिक तो क्या बुशहर राज्य के बाहर पैदा हुये निपट चास्तिक के लिए भी वद है। . थोर नही लोटने समय चोखटका तो दर्शन हो ३<noinclude></noinclude> p9iefwi00s4f4a4d9or251xyt7y8b4b पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५ 250 195160 665877 2026-07-07T15:18:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665877 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४ किन्नर - देश मे जायेगा और अगरत के सर्वनारायणने कृपा की, तो माईक सदर के चित्रका दर्शन ग्रावर्त के पुण्यवान् प्राणियांक भी हो जायेगा ! खजाने के रामचंद्र रुपयांचे दर्शन की लालसा तो किसीकी भी पूरी न होगी, क्योकि अनुशाही प्रचार के अनुसार भाई के खजाने को तोड़कर सर्दार उसे न जाने कहाँ उठा ले गया । X X " x X मिति १८ मई दिन सगल ईसवी साके १६४८ का ब्राह्ममुहूर्त श्राया : मास्टर सोहनलाल कुछ प्रातराश लेकर पहुँचे, और इस संदेश के भी साथ, कि घोड़ा था रहा है आज ही उसे नचारसे लौटा दीजियेगा । २३ मील पहाड़ी यात्रा थी, किन्तु कल तो मरमरकर मै पैदलही २१ मील चला श्राया था। मास्टर साहबके वर्णनसे वनियेका घोड़ा राजा भोज के कलवाले कठघोड़ेसे कम तेज न था । जलपान किया, दौलतरामको ताकीद करके सवेरे ही रवाना कर दिया, शाम हीको उन्हे दिनकी रोटी गाँठ बा लेनेकेलिये कह दिया था । अपनी रोटी तो आरामसे मिल रही थी. चाहे वाटा सेर सवा सेरका ही हो, किन्तु रास्ते में कनकको पानी के बिना कुलसते देखकर चित्त खिन्न होता था । मेध देवता प्रगन्न नहीं ये और सतलज माई - नही बाबा सतलज, क्योंकि यहाँ बालांने सतलजका नाम मदर रख छोड़ा है- मुफ्त ही इतनी बड़ी जलराशि बहाये लिये जा रही है। सूर्यनारायण उग आये, श्रारागानमे वादलकी कही एक फुटकी भी न थी। थोड़ी देरमे घोना भी ना पहुँचा । कादबरीमे वर्णित इद्रायुधते डील-डौल मे क्या था ? हाँ, पहाड़ी टॉपनोमे अर्थात् उसकी अपनी जातिये वह मवसे वडा घोड़ा था। कहते थे उसे कोई सौदागर चारकसे वेचनेकेलिये लाना, राजा पदमसिंहने अपने लिये खरीदा था, जो पीछेी राजविराजीसे होते व वाणापुरकी राजधानी के वनियेके हाथमे पड़ा, और शायद कुछ समय बाद उसे भाग्यमे लदनी वढी है। मुझे उसके भाग्य<noinclude></noinclude> flkjxueqpv1ymj0du1akshciq48hir4 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६ 250 195161 665878 2026-07-07T15:19:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665878 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर देशकी चोर ३५ अफसोस हुआ। क्या जाने यारकदमे आये चंगेज खाँके श्यामवर्ण घोडेका वह वशज हो और उसकी यह भवितव्यता | यह कहना शायद भूल गया कि चौकीदार साहेब रातको ही मही-सलामत पहुँच गये थे। चलते समय डाकवेगलेका रजिस्टर मँगाया | देखा वह पी० डब्लू डी०का है। अपने राम २२ वर्ष पहिलेकी रमृतिपर गमकते थे, तिब्बत हिंदुस्तान सड़क पर के सारे वॅगले वहाँके जगलोकी तरह पंजावके जंगल विभाग के हैं, और इसी विश्वास जाव चीफकजर्वेटर साहेब से श्राज्ञापत्र सी लाये थे । रजिस्टर में पूछा गया था - श्राज्ञा पत्र १ पंजाब सरकारके एक विभागका आज्ञापत्र तो था, किन्तु चाहिये प्रधान इंजीनियरका | जिस चौकीदारपर हम श्राते समय इतना बौखलाये थे, वह आज्ञापत्र दिखलाने के लिये कह सकता था, और न देनेपर अर्धचंद्र दे सकता था । किन्तु सौभाग्य से सरकारी कायदे-कानून जैन निष्ठुर होते हैं - मैंने उनसे साधारण सेवके नहीं है। समझमे नही आता, दस-पॉच दिन छोडकर इन बहुधन सनादिन वॅगलों को सालभर बंद रखनेसे सरकारने क्या लाभ समझा है ? सरकारी अमरीकी पहिले स्थान सिले ठीक थानापत्र पानेवालोको भी पहिले स्थान दिया जाये; किन्तु खाली वेगलेको साधारण बात्रीकालिये वो नहीं खोल दिया जाये ? मे डाकवेंगल की धर्मशाला बनानेकी विफारिश नहीं करता, वल्कि मैाचा, एक रुपया प्रतिदिन शुल्क बहुत कम हैं, उसे कम से दो नहीं तो तीन कर देना चाहिये । वॅगले और उसके श्रमवाद इतने अच्छे रे, कि ग्रामीको तीन रुपया राज देनेने भी उम्र नहीं होना चाहिये । वन उक्त शुल्कके साथ खाली वेगलेका दर्वा सबके लिये खाल देना चाहिये। भला सोचने की बात है, यदि किन्नर- श्री रम्य पर्वतथतीने खाने रहने का अच्छा प्रबन्ध हा हजारोकी सख्याने पात्र मैदान यहाँ विचरने के लिये श्रायें, तो इसमें यहाँ नियामक लान है या नहीं ? इंगलैंड, स्विटजरलैंड और दूसर<noinclude></noinclude> hs1ln8id4dm3twozsusxk88k49qwwhy पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७ 250 195162 665879 2026-07-07T15:19:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665879 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६ 1 किन्नर - देशमे पश्चिमी देश करोडो रुपया विज्ञापन में खर्चकर सैलानियों को अपने यहाँ आकर जेव खाली करनेका निमंत्रण देते हैं, और यहाँ है एक सरकार जो आनेवाले को भी नकारती है। खैर, हिमाचल सरकारकी भूमिम ढालमानमे मूसलचंद पंजाव सरकारका यह पी० डब्लू० डी० पुगने अग्रेज प्रभुश्रो चरण चिह्नपर चल रहा था। अब अपना जंगल, अपनी सडक, अपना बॅगला हिमाचल सरकार के हाथमें आयेगा, फिर उने चाहिये कि यात्रियां को आनेकेलिये अधिक अधिक सुमीना दे। मैं तो यह भी आशा करता हूँ, कि आगे चलकर हर वॅगले के साथ रसोइया, चाय-टोस्ट और भोजनका भी प्रबंध हो और सौभाग्य से इस भूमिको यदि "सूखी" न बनना पड़े, ता किन्नर देशको वयस्ता उदुवरवर्णा द्राक्षी मदिरा भी अतिथियो केलिये सुलभ होगी । उदु वरवर्णा सुराका नाम शास्त्रोमे पढ़कर मुझे उसके प्रति बहुत 'सम्मान हुआ था, और 'शराव गुल गू" और "ब्लडरेड वाइन वी सुंदर ध्वनियोंसे वह और बढ़ा था । किन्नरमे श्राकर पता लगा, कि वहीं श्वेत द्राक्षी मदिराके सामने रक्ताभाको घटिया समझते हैं । किसीभी काले अगूरके रमको कुछ समय खास वह उदुं वरवर्णा सुरामे परिणत हो जाता है, किन्तु महाश्वेता सुरा मापसे चुवानेपर बनती है, अतएव उसका दाम भी अधिक मान भी अधिक है । किन्नर - देशने इधर कुछ मालोंमे द्राक्षी मदिरा वनाने अधिक प्रगति की है, वैसे द्राक्षा (गूर ) और मंदिरा किन्नर केलिये नई चीज नहीं है । पिछली सदीमें पोवाडी (चिनीके पार) के जागीरदारने अफसोस प्रकट किया था "किन्नर लोग द्राक्षाके वाग की ओरसे उदासीन हो रहे हैं, यहाँ बहुत तरहके अगूर थे, किन्तु व पोयाडीमे सिर्फ अठारह जातिके रह गये हैं ।" नेगी सन्तोखदास ( रोगी) ने यह कथा कहते हुये बतलाया अब पोवाडी मे एक लता भी द्राक्षका नहीं है। तौरसे रख छोड़नेपर किन्नरके मानसून वाद्य इलाकेमे फलांके साथ द्राक्षाने काफो<noinclude></noinclude> ta82also2gkjef7mvumr4b6hlyb1tk9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४८ 250 195163 665880 2026-07-07T15:19:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665880 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर देशकी श्रीर ३७ प्रगति की और उसमे मदिराका मुक्त मार्ग बड़ा सहायक हुआ है । पिछली बार १६२६ मे जब में किन्नरसे गुजरा था, उस समय महाराजा पदमसिंहने अपने राज्यमे मदिरा बन्द कर दी थी ( शायद पीना नही वनाना वन्दकर दिया था, जिसमे लोग सरकारी दूकानांसे खरीद कर पीये), लेकिन कायदा चलने नहीं पाया। लोग चुपचाप बनाकर पीते और राजको अगूटा दिखला देते । पीछे युवराज के मुडन महोत्सबमे राजाने मदिरा के प्रतिरोधको बन्द कर दिया । बतलानेवालोने गभीरता के साथ कहा- यहाँ के देवताओं ने भी बहुत जोर लगाया और राजासे कहा "मदिरा विना हमारा काम नही चलता ।" उधर राजा करीव करीब अपने परिवारका सहार करा चुका था । और कितने दिनांतक डटा रहता ? फिर जिस तरह भगवान् ईसा मसीहरु नायब रोनके पापा, एकलिंगके नायव उदयपुर के राजा, उसी तरह तो भीमाकालीके नायव थे बुशहरके राजा । और भीमाकाली कमसे कम द्वापरसे कनौरके शित्रू ( लाल शराव ) की यादी थी, रांगीसे शिव लानेकेलिये एक परिवारको अव भी जागीर मिली हुई है । पाठकोको मालूम हा, कि यदि मार्गका अच्छा प्रबन्ध और खाने- रहने के अच्छे स्थान वन जाये तो भाग्यवानोको यहाँ "शिबू" उदुंबर- वर्णा किन्नरी दुरा गुलम रहेगी। सिर्फ खय्यामोकी श्रावश्यकता है, की हजारों राही लिये यहा तेयार मिलेंगे । शम्पेन और वरॉडीको मात करनेवाली किन्नरी-मुरा यहाँ मौजूद है। मैं उसके घर में पहुँच गया हूँ, किन्तु भाग्य केलिये क्या किया जाये, पानीमे "मीन प्यासी” कहना चाहिये । इस जन्म तो ब्रह्माने सुरा चखना नहीं लिखा, चोर अगले जन्मपर विश्वास नहीं। म न सही दूसरोका ही रास्ता साफ हो । म चाहता हूँ हिमाचल सरकारका सकल्प पूरा हो, नचारतक मीटर वन जाये, धार मेरा भी स्वप्न पूरा हो, पचीस मीलकी रोपवे (तारगाड़ी) चिनीतक लग जायें। फिर क्या जरूरत होगी बाहर N<noinclude></noinclude> jug0fqqi236oukj0rbguquaocve3zcj पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४९ 250 195164 665881 2026-07-07T15:19:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665881 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८ किन्नर देशम करोड़ो रुपया भेजकर अगूरी शराव मगानेकी, जबकि किन्नरी मुग सारे भारत के लिये मुलभ हो । यह तो मुझे विश्वास है, कि चाहे नारा भारत "सखा" बन जाये, किन्तु किन्नरके देवताओं से उत्प्रेरित यहाँक मनुष्य किन्नर - देशको उसी तरह सूखा नही होने देगे, जिस तरह उन्होने पदमसिंह के कानूनको ताकपर रखकर किया । हो, तो हमे आगे चलना था, और इन्द्रायुध भी ग्राकर तैयार था, इसलिये पाठको को भी प्रतीक्षा कराना अच्छा नही । इन्द्रायुधक प्रशसा मैने या मास्टर रोहनलालने गलत नहीं की। वह वस्तुत सुन्दर, स्वस्थ और बड़े कदका घोड़ा था। घोड़े पर अच्छी चमकी नहीं किन्तु बहुत काठी लगी हुई थी। वैसे घोडेसे मैं उतना डरता नहीं, किन्तु पहाड़ी सड़क पर अड़ियल घोड़ेसे पाला पड़ना अच्छा नहीं है । मैंने थोड़ी देर चढ़नेके वाद समझ लिया, कि इन्द्रायुध लगाम क्या हल्की छड़ी- को भी बर्दाश्त कर लेता है, तीरकी तरह तेज़ तो सुस्त भी नही चलता । घोड़े के साथ साईस भी था, जिसका इन बातपर बहुत जोर था, कि वह वानेयेका नहीं राजाका साईन है, किसी 'कामकेलिये सगहन आया था, वनियेने हाथपैर जोड़ा, इसलिये माथ चल रहा है। वह समभता होगा, उड़ते पछीको यहाँ की बात क्रा मालूम १ मे जानता था, राजके विराज होनेपर न जाने कितने घोड़े साईस ही मालिक के नहीं हुये है, बल्कि भीमाकाली के प्रताप जीनेवाले सारे रात्री गाँव ब्राह्मणांमे भी कुहराम मचा हुआ है, नरकारने देवीके अरमी हजारके खर्चको घटाकर पन्द्रह हजारसे कम वर दिया है । ब्राह्मण देवता जरूर घरपर निराहार पुरश्चरण करते रोगे, उनके लिये इससे अच्छा तो फिरगियोंका राज्य था। अच्छा देवताओ ! कोई पर्दा नहीं, तुम्हारे पास कपड़ेमे लिपटी वह सतयुगी पोथी है, नुनते हैं, उसमें मोना नहीं पारस बनानेकी विधिलिखी है । सराहन पहाड़पर ढलवाँ वसा हुआ है और काफी नीचेतन । यह राजधानी के लायक स्थान है, लेकिन राजा केहरसिंहको न जाने<noinclude></noinclude> 6xkskv5p95opxvuob0j0cvt62f1koac पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५० 250 195165 665882 2026-07-07T15:19:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665882 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर देशकी र ”ן किसने भाग खिला दी, जो राजधाना रामपुर ले गये। ननक बार- और फिर कभी। डेढ़ दा मील चलनेवर एक पर्यंत वाही -- जिसे यहाँ- वाले धार कहते है- के पीछे पहुँचते ही सराहनांचे ओगल हो गया, लेकिन अभी हम किन्नर देशमें नहीं पहुँचे । तीन-एक मील ओर चलना पड़ा, मन्योटीकी धार (पर्वत-वाही ) नाई, और हाँसे हम असली किन्नर - देशमे प्रविष्ट हुये । स्त्रियों ऊण वारी पहने थी। हो, ऊर्ण सारीको ऊनी साड़ी न मान लीजिये, वह काफी लम्बा चौड़ा पतला कम्बल होता है, जिसे स्त्रियाँ दाहिना कंधा खाले कॉटेसे इस प्रकार पहनती है, कि शिरको छोड़कर सारा शरीर टैंक जाता है । यहाँ से नीचे के लोगोको किन्नर लोग कोची कहते हैं। कोची त्रियाँ शिर- नाल बोधी है, किन्तु किन्नरियों अपने पुरुषोकी साँति टोपी लगाती है, जिसके तीन भाग उठे कनपटे जाड़ोमे नीचे गिरकर कन- पका काम देते हैं। रास्ता तिब्बत - हिदुस्तान - नकका था, किन्तु सड़क कैसी थी, इसे इससे तक लीजिये, कि मैंने यहाँ चलकर ते कर लिया, कि यदि fits or afका हेडक्वार्टर बनाना है, तो प्रतिवर्ष नीचे जानेका ख्याल छोड़ना होगा। रास्ता बहुत परिश्रमसे बनाया गया था, इसमें शक नहीं, किन्तु वह कितनी ही जगहोपर कठिन था । यहाँ अधिक वृक्षनकुल थे। पहिलेकी स्मृतिने धोखा देकर समझा रखा था, कि इस नाड़ते कनम् तक श्रादमी लगातार "देवदार जूड़ी मे ही जा सकता है, किन्तु यह धारणा बहुत निराधार थी । कहीं कहीं ठेवद्वार भी थे, मगर सभी जगह नहीं । चौरा के डाकबंगले से कुछ लेना देना न था, साईसके साथ हम आगे बढ़ते गये । इतला गया था, शोलडिङ् खडके पार राता बहुत बुरी तरहसे हुआ है। मेने ना था, शायद वहाँ मुझे और घोड़े दोनो श्रीदर पार ना होगा। रास्ता टूटा जरूर था, किन्तु लोगोने विसे स्वावी नारा बना दिया था। हम मानाने दूकान और ,<noinclude></noinclude> n8twuvjbhof6emnzwf5gjtfijmcmuzm पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५१ 250 195166 665883 2026-07-07T15:20:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665883 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>と。 विनर रेशमे रायके पास पहुँच गये । सयके धुपहले और शायद खटमल ि भरे वरांडेको न पसन्द कर मेने दूकानकी छह पसन्द की । 1 खच्चर और दौलतराम न जाने कितने पीछे छूटे थे, इसलिए उनके या जानेपर ही श्रागे चलना था । बनिया बीमार था । दूकान मे काफी चालू पड़े थे और गुड़की मेलियोपर मक्खियों निभिना रही थीं मेरे खाने खरीदने की वहाँ कोई चीज न थी । पासके कटे खेत में अपनी रावटी डाले ग्यगर खम्पा पडे थे । खम् पूर्वी तिब्बत में चीन सीमावर एक प्रदेश हैं। शायद इनके पूर्वजोमे कुछ किसी समय खम्ने खाना- दोशी करने इधर आये हो, किन्तु श्रव यह न भाषा हीमे खमूके ह न वेपभूपा हमे । शायद इसीलिये इन्हे सिर्फ खम्पा ( खम्वाली ) न चहकर ग्यगर (भारत) - खम्पा भी कहते हैं । इन लोगोका कही घर नही है किन्तु यह भिखमंगे नहीं है । इनका काम है छोटा मोटा मोटा खरीदकर इधर से उधर बेचना | जाड़ोमे ये मंडी, शिमला, हरद्वार और नीचेतक पहुँचते हैं, और गर्मियोमे सतलज और गगानी पाटियोसे पश्चिमी तिब्बत । यह तिब्बती प्रजा है या भारतीय, इसका ठीक से जवाब यह भी नहीं दे सकते। पासमे खम्पा बच्चोको देखकर मैंने उनसे भोटिया भाषामे कुछ कहा, उनके कान खड़े हो गये और यानोंको मालूम हुआ। एक तरुण और उसकी माँ पास थाई । ने जैसे वेषभूषाफे श्रादमीको फरफर व्हासाकी नागरिक भाषामे बात करते देखकर पहिले आश्चर्य हुआ । मैं वृनियेके आदमी से पीनेवाल पानी माँग रहा था । तरुणने कहा – के चाय लाता हूँ । उसे न जाने केने विश्वास हो गया कि मै प्राकृत नहीं मानता हूँगा । यद्यपि गर्मी में चलकर थानेसे मुझे ठंडा पानी अधिक पसंद था. किन्तु तर के सत्कारको ठुकरा नहीं पकता था । तरुण वहुत ही संस्कृत का हुआ, कुछ पढा भी था, भारतकी राजनीतिक प्रगतिकी कुछ मोटी-मोटी 1 भी जानता था। सारनाथ, बोधगया भी एक अधिक वा हो छाया था। चान बनाने चली गयी और ने तस्यसे बातचीत<noinclude></noinclude> s6j7vy1n7i7u75ibs83mxd3wa6wtplg पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५२ 250 195167 665885 2026-07-07T15:20:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665885 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>करने लगा। मेरी दृष्टि ओर जोभ वातमे लगे थे fear देशकी चोर उसके स्वच्छ रवरय प्रसन्न मुॅहार थी, कान लेकिन सन कभी-कभी अतीत की ओर चला जाता था । मेरे मनमे कभी ख्याल उठा था इन्ही भाँति निर्द्व ही गदहा, खच्चर और लिये एक देशसे दूसरे देशमे घूमना । काश मैं वीर वरसका हो जाता फिर इसी तरुण से कहता-लो दोस्त । अव सुझे भी अपने परिवार शामिल कर लो, खानेकेलिये ही नहीं, अपने साथ काम करनेके लिये भी अपने दुख-सुखमे शामिल हानेथे लये थीं, मानें तो हकीकी नाझीदार नहीं बन सकता, किन्तु पत्नी हमारी एक रहेगी और हम पश्चिमी तिब्बतसे मारनतक ही नम विचरेने वल्कि तिब्बतके महामैदानको पार करते सुदूरपूर्व न तक चलेंगे। रास्ते दुर्गम पथ ही नही लाँघना पड़ेगा वल्कि दुधारी अश्वारूढ़ डाकुओ से भी मुकाबला करना पड़ेगा, किन्तु मे तुम्हारे साथ रहूंगा। किन्तु क्या पचपन साल से बीस सालक होनेकी दुनिया में प्राप्त हुई है ? व खन्ण लोग ऊपर की चार जा रहे थे । खानाबदोशी जीवनके बारेमे पूछनेर तरणने चहा-जीवन तो कठिन है, किन्तु उसे छोड़कर 'बराते नहीं बनता । बनेपर की तरहका खान-पानकी सामग्री जमा करना हमारे लिये संभव नहीं होगा । पश्चिमी तिब्बतमे पहुँचते है वहाँ यथेष्ट साथ, नक्खन सुलभ होता है, यहाँ भी आस-पा लगी हा जाते है, अच्छा पहनते है, न ऊधाका लेना न माथा- 1 1 देना । वातामें सच्चाई थी, इससे कोन इन्कार कर सकता था । चातिके निर्जन दयावान ) में चीनी और सिग्रेट कहाँ और रोज-रोज मक्खन माग कहाँ ? तरुण बुद्ध धर्म- का पात्रह्मणोके धर्मका उनने सम्मानकी दृष्टिसे न राही न जाने क से कम्यूनिस्ट पार्टीका नाम भी जानता या प्रश करता था करता था, भोट भी हाकिमी. जानीरथाने जुम्मन होना चाहिये । हमारी बातची देखता था<noinclude></noinclude> 5k7o9cqq8skrbsx1ih4wh2gmdn0qgnl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५३ 250 195168 665886 2026-07-07T15:20:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665886 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देश मे भोट भाषामे हो रही थी, जिसे उसकी माँ भी ध्यानगे गुन रही थी । • कनोरा दूकानदार चारपाईपर पड़ा हमारा मुॅह देख रहा था और शायद एक भद्रवी (शुभ्र कुर्ता-धोतीधारी) पुरुपका भोटियाकी चाय पीते श्रर्य भी कर रहा था । श्राश्रर्य मेरे ही लिये, क्योंकि यद्यपि चिनी तहसील के बाहर के ये कनौरे ब्राहाणां जालमे फॅस चुके हैं, किन्तु लामा लोगोकी मन-शक्ति और निद्वाईसे लाभ उठानेने बाज नहीं आते। यह वस्तुतः रामखुदैयावाले लोग है । दौलतराम कितनी ही देर बाद श्राये सिर दर्द लिए । उन्हें धीरे- धीरे शामत नचारतक पहुँचनेकेलिये कहकर हम आगे चले । अव चढाई थी, धूप सीधे वायेसे पड़ रही थी, जिसमें ग्राड़ करने के लिये वृक्षो- की छाया नहीं थी, वैसे पहाड़ वनस्पतिविहीन न था । चढ़ाई नरम इसीलिये मालूम हो रही थी कि हम दूसरेकी पीठपर थे। चढ़ाई दो मील रही होगी या ज्यादा, उसे पूरा करनेके वाद अब हम अवश्य देवटा- रोके सुन्दर वनमे थे, सारे रास्तेका यह सुन्दरतम भाग था । सारा पर्वत- मात्र तु ग नरल सदाहरित देवदारुनांसे ढका था। बीच बीच मे कुछ गॉव भी मिले । एक सड़क से नीचे पास ही था, जिसमे मन्दिर था । ठारह चीन खूद का सुरा गाँव यही है । इसके पास किसी गुफा में चाखानुरकी सुभार्याने सात बहिन-भाइयाको जन्म दिया था, जिनमे एक यहीका मेशु है, इसके दूसरे दो भाई भावा और चगॉव (ठोलड )- के सेशू है, और सबसे बड़ी बहिन चिनीके पास कोठीकी देवी है, जो नवमे होशियार निकली और जिसने सभी भाई बहिनोको चकमा देकर दाव-नागका सली सार अपने हिरमेमें कर लिया । देवाचे सघन वन में चलन में वडा ग्रानद श्रा रहा था और कोमे उसके मनसे चलने दे रहा था । २३ मीलकी यात्रा पूरी करके साढे पाच बजे हम नचार पहुँचे । नदार पी० डब्ल्यू० डी०का वगला नहीं बल्कि जंगल विभागका बगला है । बगला सडक से कुछ ऊपर है। घूमकर वहाँ पहुॅचे। महावक<noinclude></noinclude> 7fpih57c7gitgt4yx6wiq2ewccpkc0k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५४ 250 195169 665887 2026-07-07T15:20:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665887 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किनर देशकी पोर ४३ कजरवेटर ढिलन महानायके पास, ऊपरसे निट्टी वी, किन्तु उन्हें यह नहीं पता था, कि नै किन दिन पहुँच रहा हॅू। व गला बड़ा और दीतल्ला था. किन्तु जान पडता एकसे अधिक परिवार वहा रहता था, इसलिये भराभरा का मालूम होता था । ढिलन साहब बड़े प्रोमसे मिले । उनकी धर्मपत्नीने भी नमरते करने में सकोच नही किया । श्रभी मुझे यह नहीं पता था, कि ढिलन अपने कालेज ( देहरादून ) के सबसे मेधावा विद्यार्थी थे । वातचीतमे वह तो अनुभव प्राप्त करने के लिये विदेश भी जा चुके मालूम हुआ कि वह है। पंजाबी जानकर मुझे कुछ खेद हुआ, कि शायद उनका परिवार भी पजावके उन अभागे परिवारोंमे है, किन्तु ज्ञात हुआ, वह जलंधर के रहनेवाले' हे । गर्मियो उनन्न उपनर नचार में रहता है, ओर जाड़ो में नीचे फल्लोरमं । चाय पीने के बाद वह हमें वारामे ले गये। अभी फलोंके पकने में काफी देर थी किन्तु निलाम (पेरी) ने हमे खाली लौटने नही दिया । गोभी और दूसरी तरकारियां लगी हुई थी। कुछ महीने बाद यह फल- तरकारी-नान निवास होगा, किन्तु ग्रभी तो चीजो की कमीकी शिकायत थी । . शान हो रही थी. और अभी दौलतरामका पता नहीं । मैंने सामी दोडाया। चिराग वाला जाने लगा, किन्तु दौलतरामका व भी या नहीं । क्रार्दिने बुखारका रास्ता तो नहीं ले लिया ? क्या वह पटाये डाकवेंगलेमे तो नहीं रह गया १ घोड़ेवालेको तीने व मेने दौलतरामको जल्दी थानेको ताकीद तो कर दी थी । मेर पास पड़ा मामूली था जो ७००० फीटही सर्द रात लिये गर्मी नहीं था । ढिलन साहेबने चादर देवी, किन्तु मेरी चिता वह रही थी | तीपरे ब्रदसीको गरता देखनेकेलिये भेजने की बात हो रही थी, उसी समय दिने श्राकर कहा, खच्चर काफी दिन ऊपर जगह पहुँच चुके है, खचरवाला रोटी बना रहा है। ने नाय तर और अपने कांग रहा था - दोलतराम जरूर १०५ "<noinclude></noinclude> iflacb8291ppdcj9ngit32x6xoz0fxm पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५५ 250 195170 665888 2026-07-07T15:20:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665888 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४ निजर-वेशम डिग्री बुखारमे बेहोश होकर कही पड़ रहा, और खच्चर मनमाने किसी ओर चले गये । बॅगला भरा हुआ था, इसलिये मुझे सकोच हो रहा था. मेर नेमे अवश्य पतीका कष्ट होगा। भाजनोपरांत गृहपतिने मंच करते हुये कहा, एक दूसरा कार्टर है, वहाँ रहने में तो कष्ट होगा। लालटेन लिये वह उस मकान मे ले गये । यद्यपि वह डाकबॅगले जमा तो नही था, किन्तु काफी स्वच्छ था । नेवारका, पलंग और मंज भी थी। और क्या चाहिये ? अभी तक ढिन्नन साहेबसे ही बात होती रही, किन्तु यहा वायू श्रमीचट (पगीवाब ) से भेंट हुई। उन्हे भी नेगी टाकुरसेनका पत्र मिल चुका था । ढिलन नाहेवन तो कल के लिये घोड़ा मिलने में भारी सदेह प्रकट किया, लेकिन पर्यावाचून याशा दिलाई | मुझे कलके तीन मीलके चढ़ाईके रास्तेकी चिन्ता थी, बाकी यात आठ मीलकी कोई पर्वा नहीं थी । श्रमीचदने कहा, मै ख्य भी आपके साथ वास्तू के बंगले तक चलूँगा, सौभाग्य से सडक के इंस्पेक्टर वा लक्ष्मीनन्द ग्राज वहीं जायेगा | उड़नीकी चढ़ाईकी वातने कुछ किन्तु पंगीवाचूने उसे हटा दिया और मैं ठहरे हैं, उनका घोडा मिल परेशानी पैदा कर दी थी, रातको इतमीनान से लेट गया। देरतक दिमाग तरह तरह के ख्यालोने हवा रहा । ढिलन साहेवन बतलाया था -- इधर भालू हैं, वह आदमको कम किन्तु गाय, भेट वकरीको मारकर खा जाते हैं। कडोंमे भूरे भालू मी चुने जाते , ज्यादातर काले भालू है, किन्तु ऊपरी है । मेरी धारणा थी, कि सिर्फ बकजीय सफेद भालू ही मछली खाते हैं, जिसे हमारे वगाली भाई भी जल तरोई कहते हैं, नहीं तो बाकी नालू पक्के वेष्णा हात हैं । नहर जगल है | यहाँ कही ग्रामपास में यह परमशात जन्तु रातको घूमता- फिरता तो नहीं, और यदि कहीं स वगलियाको काकी करने आजाये । ननार जंगल के एक बरे विभागका कद्र है, इसलिये यहा दर्जनों कार्डर बने है. फिर जाववान हमारे ही इस तर नरेको खास तौर<noinclude></noinclude> 3d7m25ic832yjnpefopxkvxw85cruy1 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५६ 250 195171 665890 2026-07-07T15:21:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665890 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देश की प्रार とま पवित्र वायुका यो पसन्द करेंगे अन् नीद श्रागडे, जाववान् समने भी नहीं श्राये । १६ मई को सवेरे ही उठे। शोच, मुँह धांधाकर ढिलन साहबके वापीं । नानकी बात मत पूजिये । सप्ताहमे एक बार स्नान से केलने पर्याप्त नमकता हूँ. नहीं तो हिमालय के यदी क्या रहेगा ? बाबू अमीचन्द के साथ नीचे नचारसे तीन मील नीचे वाढवूके पुल तक उतराई ही राई भी कठिन है, जो इस वक्ततक बुरी नहीं थी, किन्तु लौटते उतरने लगे । उतराई, और चढ़ाई वनकर दांत खड्ड करने लगेगी। थोड़ा ही उतरने परं ra पहाड भी नग्नप्राय, नदीपार तो और भी । डाकबगला सतलजके लसे कुछ ऊपर है, और उससे मी पहिले ही खड्ड (नदी) मिली, जिसका पानी नचारसे चिनीतक रोपवे ( तारगाड़ी ) बनानेके समय बिजली बनाने के लिये उपयोगी साबित होगा, यद्यपि हिमपात - क्षेत्रकी खो जाहोमे हिमानी टूटनेका मार्ग वन जाती है, जिससे बचने- लिये पानीको वगल मे ले जाकर वहाँ सुरक्षित जगहमे पावरहौस ( शक्तिभवन ) बनाना होगा । वास्तु बंगले पर कोई घंटे भर में पहुँच गये । श्रव आठ मील और रत थे। सड़क इस्पेक्टर मौजूद और घाडेका मिलना मी निश्चित, इलेये विश्राम करने केलिये काफी समय था । इस्पेक्टर साहबने खाने- केलिये कहा, किन्तु श्रभी कलका ही भोजन पच नहीं पाया था । ठंडा पानी पीना चाहता था, और यहाँ के चश्मे के शीतल मधुर जलको अमृत कहना अत्युक्ति न होगी । बगले के ग्रामपास ऊँची नीची जमीन है। उग्नेसे कुड़कों फलाकी बगिया और तरकारीकी क्यारियों में परिणत किया जा सकता है, किन्तु उसकेलिये शौक और उत्साह किने दो-तीन चूली (बूवानी ) के दरख्त थे, जो अनाथसे मालूम होते थे । चार घंटे विश्राम के वाद चलने का निश्चय हुआ । बाबू लक्ष्मी- नन्द साथ चले और बाबू अमीचन्द लौट गये। थोडी उतराई के<noinclude></noinclude> 0vw8s38fmuxzwevdzk4le1fnn49qe4o पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५७ 250 195172 665891 2026-07-07T15:21:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665891 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>15 किन्नर देशमे नचारसे भी काफी पहिले तैयार हो जाते ह । वगले के बसे तरकारियों- की क्यारियाँ भी दिखाई देती थी, किन्तु कौन सी पुल पार | पड़ने पर ठहर सकते है | की कनीने जगलकी उनने ऊँचे नहीं होते, हो वहाँ जाये । तमे हम टापरी या कूटियापर पहुँचे। यहाँ डाऊ ढोनेवाले ठहरा करते हैं, दूसरे मी आवश्यकता तीन चार कोटरियों है । वादक इनपार उतनी इफरात नहीं है । देवदार भी यहाँ और बहुत रक्षाकी अपेक्षा रखते हैं, तो भी काट दुर्लभ नहीं है. इसलिये यापरी बनानेमे साखचसे काम लिया गया है। टापरी पहुँचनेमे पहिले ही इस्पेक्टर सड़क में लगे अपने कामको देखने लगे, और साईसके नाथ मै घोड़ीपर श्रागे चला । घोड़ी पतली दुबलीमी मालूम हुई, और मुझे डर लगने लगा, कि कही चढ़ाईम धोखा न दे। टापरी साईसने चिलम भरी । चौकीदार कनेत ( राजपून ) था, इसलिये कोली उस- दूरसेाग लेकर अलग ही चिलम पीने लगा । मैने २६ महीने चाद सिगरेटका व्रत लदनमे तोडा था, और फिर ६ महीने के वाद मध्य फरीसे उसके पास नहीं फटकता था। स्प्रिंट ग्रतिथिसेवाका चहुत उपयोगी उपकरण है, किन्तु जो स्वय नहीं पीता, वह सेवा- करने के लिये ढोये नहीं फिर सकता । यदि पीता होता, तो गंदी टापरीमे माईसके चिलम पीनेकेलि ये रुकना नहीं पड़ता । मुझे कुछ प्यास लग याई थी, किन्तु मटमैले पानीका रंग देखते वह भाग गई । अब यहाँ प्रायः ३ मील चढाई ही चढ़ाई थी, और उड़नी में ७५०० फीटपर पहुँचना था । सडक घूमघुमोग्रा थी, जिसके किनारे खेत भी आने लगे । यह चगाँव के खेत थे, जिसके पग्रामड, राजग्राम और टोल कई नाम हैं । यहा कही चादीकी खान बतलाई जाती है, किन्तु न जाने किस युगसे देवनाने बंद कर रखा है। कुछ नफेदसा पत्थर मेरे पास पीछे लाया गया, किन्तु उसमें भारीपन नहीं, यदि चादी होगी भी तो बहुत कम । पग्राम खुद किन्नर देश के सात खुदो (इलाको)- में एक है, राजग्राम इसे इसीलिये कहा गया, कि पहिले यहा कोई<noinclude></noinclude> 6vphtvjd4slui1clgl0f5olu6sxbzz0 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५८ 250 195173 665892 2026-07-07T15:21:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665892 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६-२१. पगी लोहार परिवार ( १०- १०८), जन्गी-गाँव जन्गीका घर जङ्गीका एक हर (१०-११७) २०. किन्नका नदः द्राण।। लिपा गाँव ( पृष्ट १२१)<noinclude></noinclude> jcz70zerboovd2wv59ghym6iq0om3y3 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/५९ 250 195174 665893 2026-07-07T15:21:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665893 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दो किन्नरियों led up. 3<noinclude></noinclude> h77cxwl0wnmympuw4ecitoj14e04m3x पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६० 250 195175 665894 2026-07-07T15:21:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665894 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' किन्नर देशकी श्रीर ४६ राजा या ठाकर रहता था। चगाँव चारगाँवका सक्षेप बतलाया जाता है । खेत वेसे बहुत दूरतक फैले हुये हैं, किन्तु पानी उनके लिये पर्याप्त नही है। पानी सारे ऊपरी किन्नरदेश की समस्या है, जिसे हज़ करने के लिये बड़ी योजना और लाखों रुपयोकी श्रावश्यकता है, जो दस- चुना बसिगुना होकर लौट आयेगा, इसमे सदेह नही, किन्तु ऐसी बहुध साध्य योजनाको हिमालयप्रदेश कैसे पूरा कर सकेगा, जबकि उसके शरीरके बड़े भागको काटकर उसे १० लाखको आवादीका एक जिला रखा दिया गया है। घोड़ी दुबली पतली जरूर थी, किन्तु उसके बारेमे मेरी शंका मूल सावित हुई । वह धीरे धीरे किन्तु दृढ़तापूर्वक ऊपर चढ़ती गई और शामसे बहुत पहिले १२१ वे मीलपर उड़नी 'डाकबंगले पर पहुँच गई। दौलतराम वाड्तूमे रुके नहीं थे, इसलिये यह पहिले ही वहां हुँच चुके थे। पी० डब्लू० डी०का डाकबंगला, दो अच्छे कमरे सब तरहका आराम। पास तो जगलातका था, किन्तु ठहरे विना कारा न था । सवेरेकी चाय और वास्तुकी एक गिलास लस्सी के बाद 1 व यहा भूख लगाये, तो आश्चर्य क्या ? किन्तु वहा तैयार भोजन हा था । मीठे बिस्कुटले पर्हेज और फीसे प्रेम नहीं। दो चम्मच ग्लूकस फाकन से क्या काम चलता ? मेवोंके देशमें आगये थे । सामने की लता खड़ी थी । यद्यपि फलो के पकनेमें अभी देर थी, किन्तु नोचा कोई भूखा फल मिल जायेगा । ढूँढनेपर मेटने न्योजा ( चिलगोजा, लाकर दिया । न्योजाका वृक्ष देवदार जातिका है, किन्तु उसकी छाल सूकर लिपटी रहने की जगह सापकी तरह वरावर केचुल छोड़ती रहती हैं, जिससे उसका तना और शाखाये सफेद या हरीसी बनी रहती है, इनपर ही मोरमुकुट या बड़े कमल गट्टे मा नोकदार पाच छ गुल बड़ा फल लगता है । पक जानेपर फलमेंसे कमलगट्ट की तरह नीतरले पतले और नये लये छिलकेदार दाने निकलते हैं। इन्हें भून लिया जाता है, और छिलका निकालकर खाया जाता है । न्योजामें ४<noinclude></noinclude> jddx7uunbon8mjecosp2vl4no1i70es पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६१ 250 195176 665895 2026-07-07T15:21:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665895 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ܘ܀ किन्नर - देशम दादाम की तरह तेल भरा रहता है, खानेमे भी अच्छा लगता है। किन्नर गरीबोका यह एक बड़ा आधार है, यह कह तो सकते हैं. किन्तु अब महंगा होने से लोग इसे बेच डालने का अधिक त्यान रखते है । न्योजाके वृक्ष हिमालय मे सिर्फ इसी जगह होते हैं, पेशावरके उत्तरके पहाड़ोंमे न्योजाकी दूसरी उद्गम भूमि है । मान्य- अतिथिके प्रति सम्मान प्रदर्शित करते लोग ऊर्णासूत्रमे गंथी न्योजाकी माला गलेमे डालते है | न्योजाके गुण तो बहुत हैं, किन्तु उनके फलोंको चुननेगे आजतक न जाने कितने हजार आदमियोने जान गवाई होगी। वह बागके वृक्ष नहीं दुराराह पर्वती स्वयम्भू पादप हैं, और आदमी चाहता है, किसी वृक्षका फल छूटने न पाये। मेटने न्योजा दिया । छिलकर खाया, चना छिलकर खाने ही जैसा समझिये, किन्तु वहाँ दूसरा काम क्या था ? वॅगले के चौकीदारका कही पता न था, आखिर वह गॉवका रहनेवाला था, उसके और भी घरके काम थे । मेटने चाय ही नहीं रोटी भी बनाकर खिलाई। यहाँ दोनों खच्चरों पर. छ. रुपये घास के लगे और ग्राटा सवा रुपया सेर | एक मिडिल तक पढ़े तरुणने स्कूल और डाकखानाके अभाव की शिकायत की। दस मीलकी चढ़ाई उतराई करके लड़के नदी पार किल्वामे नही पढ़ने जा सकते, चिनी और नचार और भी दूर है ! मैने लड़के को इसके लिये आवेदन-पत्र लिखवा दिया। हिमाचल- प्रदेशमे स्कूल और डाककी बहुत फैलाने की जरूरत है । ५ " राजधानी" चिनीको सवेरे जलपान के बाद रवाना हुये । सबेराका गहरा जलपान अच्छा है, दिन भरकी छुट्टी हो जाती है । श्राज चौदह मील जाना था । उडनीसे निकलते ही मड़क उतराईमे चला । आगे यूलाकी खड्ड<noinclude></noinclude> 2n6ixsdxklthx4gu1h0b4azu8hwx8i7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६२ 250 195177 665896 2026-07-07T15:22:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665896 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"राजधानी" चिनीको ५.१ श्राई, यूला अच्छा खासा गॉव ऊपरकी ओर है, और मील गाँव आगे सड़क से कुछ ऊपर । सड़क के पास जौ काटे जा रहे थे, और ऊपर खेत हरे खड़े थे। रोज चार-पांच मील पैदल चलनेका कुछ त्रत कर लिया. "दूधका जला छाछ, फूंक-फूंक कर" श्राखिर शारीरिक श्रमकी अवहेलना करके ही तो डायवेटिसको बुला दिया था । सड़कसे ऊपर ऊँचे देवदार दिखलाई पड़ते थे । ग्रागे सडक रक्षित वन-खडमे बुमी | जगल-विभागने जरा परिश्रम किया था, वीज वो पौधे लगाये थे ताने से घेर दिया था, जिसमे भेड़ वकरियों घुसकर नवजात पौधोका वर्बाद न कर दे, लोगोपर भी अंकुश रखा गया था, जिसका परिणाम था यह लवा - चौड़ा काफी हरा-भरा जंगल, इस शुष्क भूमिमे भी । चातुले इधर जंगलात विभाग एक तरह जंगल- व्यवसाय नही, जंगल - रक्षाका काम करता है। किसानोको अपनी स्वतंत्रतामें रुकावट कहाँ पसद ? अगर उनकी चलती, तो अबतक यह प्रदेश चटियल पड़ गया होता है । जगल विभागकी प्रारंभिक रिपोटोसे पता लगता है, कि उस समय जंगल जलाकर खेत बनानेका रवाज था, कुछ वर्ष खेती करके उसे छोड़ किसान दूसरा जंगल जलाकर खेत बनाते थे । यह ज्यादा नहीं अस्सी वरम ही पहिलेकी बात है। आदमी भविष्य और अपनी संतानोकी और भी कम पर्वा करता है । इसी रक्षित वनखंड, एकाध और स्थानों तथा नचारके जंगलने , बाईस वर्ष पहिले स्मृतिपर वह प्रभाव डाला था, जिससे मै बरावर कहता फिरता रहा, हिमाचलकी सर्वमुदरी भूमि कनोर है, हिमाचली सबसे दीर्घ देवदारुस्थली यही मतलज उपत्यका है । मी जगलांसे बाहर नही गये थे, कि मेड़ बकरियोंके पैर से लुढ़कते पत्थर थाये। कल ही मालूम हुआ था, कि रोगी से चार मील पहिले रास्ता बहुत टूटा हुआ है। मैं समझा था, यह भी शोलडिड की तरह ही खाली भड़काऊ बात है । किन्तु यह खाली भडकाऊ बात नहीं<noinclude></noinclude> su820affvg9j7kz8bs6abso61os3xb2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६३ 250 195178 665897 2026-07-07T15:22:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665897 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५.२ किन्नर - देश में थी। पिछले जाड़ोमें हिमानी सड़कको बुरी तरह वहा ले गई, और व लोगों में टूटे नाले से वचनेकेलिये भेड़ बकरियां पैरा बने मार्गपर सीधे ऊपर चढ़ना पड़ रहा था-हॉ, सीधे नाके सीध ऊपर- की ओर चढ़ना । उतराई अच्छी होती है, किन्तु यदि बहुत सीधी होती है, तो हम मैदानियोकी नानी मर जाती है । हमे ग्राड़े पैर रखकर चलने की आदत नहीं, इसलिये फिसलकर नीचे लुढ़क पड़नेका डर रहता है | खड़ी चढ़ाई कठिन होती है, जो फेफड़े के लिये भले ही कड़वी हो, किन्तु पैर हमारे जमकर चल सकते है । तो भी यह खतरनाक जगह थी, इसमे संदेह नहीं । ठीकेदार नेगी सतोखदासका कहना था, रास्तेकी जगह कच्ची है । जवतक कूल (नहरिया ) का पानी डालकर वहाँ की मिट्टी वहा न दी जाये, तव तक वहाँ की सड़क पक्की नही हो सकती । अर्थात् लौटते समयतक सडक वननेकी आशा कम ही है। खैर, किसी तरह "राम राम" करके श्रवतक के इस सबमे कठिन रास्तेको पार किया । श्रागे उतराई पडती ही थी, फिर लौटकर बनी सड़क पर थाना था, किन्तु वह उतनी कठिन और दूर तक न थी । उतराईकी सड़कपर दूर निकल जानेपर देखा दौलतरामका कही पता नहीं । कहीं वह पीछे तो नहीं रह गया, कहीं कोई खच्चर तो नहीं लुढ़का, लुढ़कना अचरजकी वात न थी । ग्रागे कुछ लोग चाय बना रहे थे, मालूम हुआ अभी खच्चर -खुच्चर नही गया। रुके, कुछ देर बाद दौलतराम श्राते' दिखाई पडे । उनको सवेरे ही कह दिया था - सीधे चिनीमें कलपा ( जगल विभाग) के वॅगले मे जान | 1 अभी रोगी गाँव नही पहुँचे थे, कि वार्ड चार विचित्र दृश्य दिखाई पड़ा। टीनकीत तोड़ मराड़कर कहीं पड़ी हुई है, कही लकड़ी पत्थरके ढेर | अबकी साल असाधारण हिमपात हुआ । हिम ऊभड़ खाभड़ भूमिको समतल बना रहेर रद्द जमाता तो जाता है, किन्तु भार बहुत अधिक हो जाता है, नीचे ग्राधार हढ नहीं होता, ऊपरसे सूर्यदेवकी किरणे कलेजा छेदने लगती हैं, तो लाख-लाख मन की हिमानी नीचे की<noinclude></noinclude> cx13rphdoc35ehopsxpki7g0s9wown7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६४ 250 195179 665898 2026-07-07T15:22:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665898 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"राजधानी" चिनीको ५.३ र खिसकने लगती है। फिर उसके रास्तेको कौन रोक सकता है ? देवदार के वृक्ष त्राये, हिमानी रौंदते आगे बढ़ी, गाँव श्राये पस्त करती चली, बड़े बड़े चट्टानोतकको कंदुक सदृश उछालती बढी, फिर पी० डब्ल्यू० डी०का मामूली बगला उसके सामने क्या था ? इंजीनियरकी गुस्ताखीका दंड हिमानीने बड़ी क्र रताके साथ दिया था। गॉव बसते हँ सदियां के अनुभव के बाद, उसी जगह जहाँ मालूम हो चुका है, कि यहाँ हिमानी नही ग्राती, हिमानी खड़ो और नालोमे तो बरावर ग्राती रहती है, और वहाँ भला कौन मकान बनानेका दुस्साहस करेगा ? इंजीनियर साहबने खड्डुले परे देवदारु बनके बीच एक अच्छी सी जमीन देखी, देखा वृक्ष भी काफी दिनोंके हैं, अर्थात् तीस सालोंसे हिमानी इधर से नहीं उत्तरी, बस वहाँ सुन्दर बॅगला बना दिया । और आज यह दिशा । यह बॅगला बहुत दिनों पूर्व नहीं बना था । घोड़ेका काम हो गया था, मैने उसे वहाँने लौटा दिया, वैसे आज उसकी सवारीका बहुत कम काम था। टूटी सड़क की खड़ी चढ़ाईपर तो घोडे पर चढा नहीं जा सकता था। एक बजे के करीव रोगी पहुॅचे। रोगी अपने मेवावाग़ों के लिए कनोरकी रानी है और यहाँ के जेलदार नेगी संतोखदास फलों के विशेष | इनका परिवार धनी और शिक्षाले प्रथम परिचित है । इनके बड़े भाई शायद किन्नर के प्रथम ग्रेजुयेट थे । यह स्वयं उडू पढ़े हुये है, दिन्दु बहुत सेधावी शोर व्यवहारकुशल हैं। वरमों राजा पदमसिंह- के ऊँचे दर्वारी भी रहे हैं। श्रव तीन-चार ही मील जाना था और राना भी अच्छा इमलिये मुझे जल्दी नहीं थी । में नेशीका मकान नेपहुँचा। चित्रों जा गॉबसे बाहर नहीं गई है, वह किन्नर भाग छोड़ हिन्दी नहीं सकती, उनकी भाषा हिन्दीसे किन्तु कितनी ही स्त्रियां अपने पतियों या भाइयो के 1 कालिये जाड़ों में नीचे व्हो उन्हें पहाडी हिन्दीने वास्ता पहाड़ों में हो आई भी दूरकी है । साथ मेह मिलती हैं, पडता है; ऐसी स्त्रिया कुछ हिन्दी<noinclude></noinclude> 7rv7orbuwsb0xcrvo5a5zryj1l65889 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६५ 250 195180 665899 2026-07-07T15:22:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665899 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૩૪ किन्नर देशम नमक लेती है। पुरुष तो शायद ही कोई मिले, जो हिन्दी न समझ पाये । नेगी मतोदामका घर गाँवसे नीचे ग्रामदेव नरेनस् (नारायण) के मन्दिर के पास है । मकान नहीं, बॅगला कहना चाहिये, मकान तो थोडा हटकर एक वगल में है । नीचेका तल तो सामान्य है, किन्तु ऊपरी तलकी दो कोठरियो के द्वारा और खिड़कियां शीशे लगे हुये हैं। तिवती ढगकी चाय-चौकी और बैठनेकी गद्दी के साथ मेज़, कुर्सी, पलग और अलमारी भी है, इसीलिये इसे बॅगला मानकर किमी मनचली कवयित्रीने संतोपवासके वॅगले पर कविता भी बना डाली | यहाँ कविता कुछ श्राकर्षक और नवीनता लिये होनी चाहिये, फिर तो वह जंगल की आग की तरह यहाँके स्वच्छ पोडमियों में फैल जायेगी। पता लगते ही नेगीजी श्राये । उनके पास भी नेगी ठाकुर सेनने मेरे बारेमें पत्र भेज दिया था, और वह यह भी जानते थे, 角 मेरी थोककी थोक डाक चिनी डाकखानेमे जमा हो रही है। बैठकेन बैठाया, ग्रेजुयेट दामादको व्याही लडकीकी चाय और भोजन बनाने का आदेश दिया। फिर हमारी बात होनी शुरू हुई। शायद कनौग्वे वारेमें ज्ञातव्य बातोंका जितना ज्ञान उन्हें है, उतना और किमको नहीं । मेवार भी उन्होंने बहुत तज किया है और कई तरह के अगूर लगाये हैं । दूसरे फलो पर भी तजव हुआ है । अंगूरी शरावकेलिये तो रोगी सारे बुशहर मे प्रसिद्ध है, सराहनकी भीमाकाली तो द्वापरान्त से उसकी कदरदान है, और ग्राशा हैं, यदि किसीकी शनिदृष्टि न पड़ी, तो ( उदु वरी मदिरा) और महाश्वेता उसी होगी, जिस तरह पाणिनि दादा के रोगी -लाइन- लालित शित्रू तरह सारे भारत में प्रसिद्ध समय में कपिशा ( काबुल) की गावकी तरह 'रोगी" कापिशेथी, बल्कि मै तो कहूँगा, फ्रासके शम्पेन सर्वश्रेष्ठ द्राक्षी सुराका दूसरा नाम हो जायगा । पाठकोको भ्रम नहीं होना चाहिये, कि इस प्रचारकेलिये रोगीपालोंने मेरी कुछ भेट पूजा<noinclude></noinclude> am0ce55dh8hxu3yfseznsmo705707wf पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६६ 250 195181 665900 2026-07-07T15:22:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665900 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"राजधानी" चिनीको ११ की है, यद्यपि से इससे इन्कार नहीं करता, कि नेगी सतोखदात के यातिथ्यसे मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ । श्राज खच्चर वीस रोगी "ममदर" (सतलज) से तीन हजार फीटसे कम ऊपर नही है, और यहाँ नीचे तक मेवोके वाग लगे हुये है । यहाँके सेवोके वारे मे लेक्चर देनेकी जरूरत नहीं, वस, मेवोको सरते किराये पर रेल (शिमला) तक पहुँचानेका प्रवन्ध हो जाना चाहिये । पया मन किराना पर भी मुश्किल से मिलते है, फिर इतने महगे कलोको नीचे कौन खरीदेगा ? दूसरी जरूरत है, परीक्षण द्वारा अनुकूल जाति फलोको तैयार करना । यहाँ के अगूर बड़े होते हैं - काले सफेद दोनो -- मीठे होते हैं. रस भरे होते हैं, किन्तु गुद्द से शून्य | यह खाने में अच्छे होते है. शर्वत, सिरके और मदिराकेलिये भी उपयुक्त है; किन्तु इन्हे सुखाकर मुनक्का किशमिश नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि सूखने- पर इनमे बीज और चमड़े छिलके भर रह जाते हैं । काबुल कंधारका कोई मेवा नहीं है, जिसे रोगी और उसके पड़ोसी गाव नही पैदा कर नकते, यदि पातक मोटरकी सड़क पहुँच जाये तो कनोर लाखों मन बढ़िया सेवा हर साल भारत के काने कोनेसे पहुँचायेगा । वह अपने ३००० वर्गमील के पहाड़ोंको नीचे से ऊपरत वागोसे ढॉक देगा | नेगी सतोखदाम - मालूम नही नेगी किस भापाका शब्द है । श्चिमी हिमालयने तो प्राय सर्वत्र यह "बाबू साहेब" या रावसाहेव" के अर्थ में सम्मान प्रदर्शन करने, बड़े खान्दानको बतलाने के लिये प्रयुक्त होता है, किन्तु वहाँ भी उसके शब्दार्थको कोई नहीं जानता । पूर्वी युक्तप्रान्त मे नेगी शब्द मे कोई उतना सम्मान नहीं है । व्याह और खुशीक अवसरपर जिन लोगोको कुछ पाने का हक होत उन्हें नेगी या " पवनी" कहते हैं। "नेगी" में नाई, कुम्हार, बढ़ई के बहिन, बहनोई यादि संबंधी तक ग्रा जाते हैं। नेगियो के हकपदका नंग ( दक्षिणा ) कहते हैं। लेकिन वह भी "नेग" किस धातु प्रत्यय ना है, इसे काशीके महावैयाकरण भी नहीं बतला सकते हों, ता<noinclude></noinclude> bdp6z8nj2ruoia954vgozpjvo3dc8cf पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६७ 250 195182 665901 2026-07-07T15:23:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665901 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६ किन्नर देशम नेगी संतोखदास बतला रहे थे, पिछले साल अक्तूवर में वर्षा और व फर्वमे हिम इतना पड़ा, कि सड़क क्या खेत भी कितने ही धमक पड़े, जाड़े के पहिलेकी बोई फसल बर्बाद हो गई, चालूका वीज भी मिलना मुश्किल है। और इस वक्त वर्षा ग्रानेका नाम नहीं ले रही है, जिनसे कोड़े बहुत बढ़ गये हैं । मैने देखा सचमुच यहाँ से चिनी और ग्रा तक के अखरोटोके नवकिरलयोको खाकर कीड़े साफ कर गये है । मैने तो समझा, कि अवके साल भर इन्हे नंगा ही रहना होगा, किन्तु महीने भर बाद देखा, फिर पत्ते आ रहे हैं, और जूनके व्रत तक कितने ही वृक्ष फिरसे हरे पत्तोसे ढक गये थे । मैने नेगीजीको ज्ञान देनेके लिये चखेसे ऊन कातनेकी वात वतलाई । उन्होंने लुधियानेके वने पैसे चलाये जाने वाले लोहेके चर्खेको लाकर रख दिया। कहते थे. श्राजकल दाम बहुत बढ़ गया है, और मिलता भी नहीं । मैंने फलों को रखानेकी बात कहकर कुछ आगे बढ़ना चाहा । उन्होने कहा, हम कुछ फल सुखाते तो जरूर हैं, किन्तु उन्हें सिर्फ धूपके भरोसे । उन्होंने यह भी बतलाया कि कोटगढ़ मे श्रीसत्यानंद स्टोकके यहाँ एक अमेरिकन मशीन देखी थी, जिसमे सेव जल्दीसे हिलता कटता और ग्रांच के सहारे ख्ख भी जाता है। उसे मॅगाने केलिये बहुत कोशिश की, किन्तु नही मिल सकी | नेगीसे बात करनेपर मेने कई बातें उनसे सीखी और 1 हर मुलाकात मे सीखी, मुझे नहीं मालूम, मैने उन्हे क्या नई बात.. चनलाई । | भव्याह भोजन के बाद थोड़ी देर विश्राम किया। फिर नेगीजी पहुँचाने चले | गाँवके देवता ( नगयन ) के मदिरका दिखलाते हुये वाले, वहाँ पहिले हमारे वाप-दादोंकी वनवाई पान्थशाला थी, देवताने कहा कि "हमें दे दो" । क्या करते, दे दिया और पान्यशाला गांव बाहर बना दी । मैं समझता हूँ, देवताने जगद माँग कर बुरा नहीं किया, व पान्यशाला राड़क पर है, जहाँ पथिकोको टहरनेका और भीता है, पानी नी पास है। देवता बहाके मनुष्योंसे बातचीत करते<noinclude></noinclude> rsohi95023ib7cf9vrtt1nixrubknma पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६८ 250 195183 665902 2026-07-07T15:23:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665902 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>• "राजधानी" चिनोको 3 १७ हैं इस पर अन्यत्र कहेगे, इसलिये किसीको आश्रर्य नहीं करना चाहिये । गाव के बाहरसे नेगीजी लौट गये, और मै आगे चला। एक जगह यह भी नाले मे सडक टूटी थी, किन्तु गलातोड़ चढाई उतराई नहीं थी। दो-ढाई मील जाने पर सामने चिनी गाव दिखाई पडा, कोई Q अस्सी एक घरो का बडा गाव | इसे तिब्बती लोग ग्यल् स ( राजधानी ) चिने कहते हैं, जो किसी पुराने कालकी गूज है - चिनीमे तहसील तो १८६३ ई०मे वनी । सारे कनौरमे ऐसा विस्तृत स्थान मिलना मुश्किल है। मतलज तटसे लेकर हजार फीट ऊपर तक और लवाईमे चार- पच मील तक भूमि ढलुवा है. जहा खेत फैले हुये हैं। ऊपरी भाग मे चूली (छोटी हवानी) और बेमी ( छोटा ग्राड़ ) ही अधिक हैं, किन्तु के नीचे दूसरे फल भी है। हम गावकी स्थिति ऐसी है, कि किन्नर के हर अच्छे युग से प्रधानता दी जायेगी । चिनी में १३वा मील पत्थर २३८ फीट पर लगा हुआ है । इतने ऊँचे और भी स्थान है, किन्तु चिनी उनकी अपेक्षा अधिक सर्द है, विशेष कर जाडोमे । इसके ढी कारण है, एक तो अधिक खुला स्थान होने ने यहा हवा अधिक चलती है । दूसरे ने 'कैलाश" की हिमाच्छादित शिखर श्रेणिया है, जिन वर्कने र ह कर हवा इस तरफ लौटती है । कैलास नामले भ्रमे पडने की आवश्यकता नहीं, धर्मों और उनके पुजारियोपेटस ट बहुत पचता है | लोगोने यहाँकी एक चीटी नान केला नान लिया है। इतना ही नहीं इम' कैलाम" की की जाती है, यद्यपि उनका पीछे वाला रास्ता बहुत कठिन हैरानी सात तो उनके लिए हिम्मत भी नहीं कर सकते । ही नोटियो अपेक्षाकृत छोटी किन्तु दूर एक चोटी है, जिने खाली प्रॉखीने देखनेपर कार पिंडी (शिवलिंग) जैसा पत्थर खा दिलाई पत्ता है। वन अब इसके कैलाश होनमें क्या संदेह हा पता है ? भने दूरवीन लगाकर देखा तो वहाँ पत्थर चोटी के बीच<noinclude></noinclude> hoc2p5n8a438t3mw4s4k6vpd4nmpyb1 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/६९ 250 195184 665903 2026-07-07T15:23:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665903 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८ किन्नर - देशमे नहीं बाहरी प्रोर आठ दस हाथकी पत्थर की यावी ही पटिया मालूम हुई । यदि श्रादमी दूरवीनमे पटिया की स्थिति और रूपको देख लेता, तो कभी कैलाशके फेरमे न पडता । नक्त लोग तो यह भी विश्वास करते हैं. यह "शिवलिंग" दिनमें कई रंग बदलता रहता है। यदि विंध्यवासिनी देवी दिनमे तीन रूप बदलती रहती हैं, तो उनके पति यहाँ पर कई रंग वढले, तो क्या अश्चर्य १ डाकमुशी भी मलकी पांच बजे चिनी डाकघरमें पहुॅचे। डाकघर मिडिल स्कूल के पासही है, और स्कूल के ही एक अध्यापक वाबू नारायणसिंह हैं। चिट्ठियों और समाचारपत्र काफी थे । लेकर या र चढाई उतराई करते कलपाके डाकवेंगलेमें पहुॅचे। प्रधान बनपालका थाना-पत्र था, इसलिये मैं यहा ठहरने का पूरा अधिकारी था, और बाईस साल पहिले तो बिना पत्रके भी यहाँ ठहर चुका था । वॅगला प्रासाद जैसा है, इसमे तीन बड़े-बड़े कमरे और दो स्नान कोष्टक है । दौलतराम पहिले ही पहुँच चुके थे । सामान उतारकर रखा जा चुका था । दौलतरामने अगले दिन सवेरे ही जानेकी इच्छा प्रकट की, उन्हे ४४ रुपया इनाम और खच्चरोकी खोराककेलिये दिए और सभी चीज़ोंके सुरक्षित पहुँच जानेकेलिए धन्यवाद भी । भोजनका प्रवन्ध चौकीदार के जिम्मे किया, और उस दिन (२० मई) को वहुत रात तक पत्रों समाचारपत्रों के पारायण में बिताया, एक प्रूफ भी पटना, प्रयाग, शिमला भटकते यहाँ तक पहुँच गया था, यदि प्रसने प्र.फके लौटने भरकी प्रतीक्षा की होगी, तो उसका दिवाला ही निकला नमझिये | खैर, हमने देखकर भेजते हुए अपना धरम पाला | सारी चिट्टियोका जबाव देने के लिए तो एक लिपिक रखना चाहिये, और साथ ही टिकट लिफाफेका काफी बजटमी । पहिले मे प्रत्येक पत्रका उत्तर देना जरूरी समझता था, किन्तु अव यह शक्तिसे वाहरकी बात है। इसलिए एक परिमिति संख्यामें उत्तर देता हूँ । लिखनेवाले भाराज हो<noinclude></noinclude> dfgvy70zj8d2yi085muqjc9r7ttjl5h पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७० 250 195185 665904 2026-07-07T15:23:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665904 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>• राजधानी" चिनीको ' १६ सकते हैं, किन्तु नाराज होने के डरसे श्रादपी शक्तिसे बाहर काम केसे अपने सिरपर ले सकता है ? वैनेडागला बहुत अच्छे स्थानपर देवदारकी हरियाली के बीच है, साथमे सेव नामपाती आदि फली, तरकारियों और फूलोका वाग भी है | गले दिन (२९ सई ) को मुझसे एक मात पूर्व पहुँचे तरुण रेजर देवदत्त शर्माजी भी मिलने आये । उनी दिन उनकी मिलनसारी- का परिचय मिल गया ओर श्रागे तो चिनी निवासमें उनसे और घनिष्ठता हो गई और कितनी ही वार उनकी नवविवाहिता पत्नी कृष्णा घर का स्वादिष्ट भोजन भी प्राप्त हुआ। मुझे चिनाने तीन मात्र रहना था । यद्यपि रहलेकी आना थी, तो भी मे तीन साल बॅगले की दखल करने के लिए तैयार न था, एक कमरे तकनी ने भी श्राने जाने वाले यात्रियों और मुझे भी तर रहता। इसलिए दूसरे दिन शासको अस्पताल के ऊपरवाले बॅग को देख लेनेवर नेने ते कर लिया, कि निवास वहीं होगा । · ' चिनी पहुँचने दूसरेही दिन लामा सोनम् ग्यो या साधु पुण्य- सागर मेरे पास पहुँच गये । श्रानंदजी और दूसरे मित्रांने मुझपे बहुत याह किया था कि किमीको ने साथ ले जाऊँ, किंतु मैने पसद नहीं किया । सुके लिपिक और पाचककी आवश्यकता होगी, यह मै जानता था, किन्तु सोचता था, ऐसे व्यक्ति इधर भी मिल जायेंगे, मैदानका आदमी यहाँ के खान-पान और कष्टो को शायद पसंद न करे । त्राने दिन ही सूखा भैडका माल श्रा पहुॅचा, और पीछे तो जहाँ नहोंने इतना थाया कि मेरा दिल ऊब गया और खानां वद कर दिया। दूसरे दिन पुरसागर ( पुराना नाम किम्मतराय) पहुँच गये, इसे तो यदि मे भाग्य भगवान् पर विश्वास करना तो कह देता, उसने इस पुरुषको मेरे पास भेज दिया। उन्होंने सारी यात्रा के लिये मेरे भोजन छाजन की चिता को दूर कर दिया, पेसे-कौड़ी, चीज वस्त्र सभीसे में पर्चा हो गया।<noinclude></noinclude> svybttpmic14vsb4l0qzbmxrbgwx84h पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७१ 250 195186 665905 2026-07-07T15:23:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665905 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६० किन्नर - देशमे तीसरे दिन (२२ मई) यहाँ के तहसीलदार बाबू मंगलरामजी मिलने आये । वह दौरेपर थे । यहाँका तहसीलदार मालगुजारी ही नही वसूल करता, दीवानी फौजदारीके मुकदमो को भी देखता है। इसके लिये दूर दूर बसे किन्नर के गाँवों घूम घूमकर न्याय वितरण करना ग्रामीणोपर अनुकपा करनी है, इसमें सदेह नहीं । यद्यपि इससे भी अच्छा होगा, ऐसे मुकदमो का अधिकार ग्राम पंचायतोको दे दिया जावे । तहसीलदार साहबको मेरे वारेमे सरकारी पत्र मिल चुका या आने का पता मालूम होनेपर वह एक दिन दौरेको छोड़कर पहुँचे । मेरे सारे निवास काल मे उन्होने वड़ा ध्यान रक्खा, जिसके लिये शब्दों मे कृतज्ञता प्रकट करना संभव नही होगा । रियासतें चाहे छोटी हो 'या बड़ी किन्तु, राजा लोगोंके और ठाठ वाटकी भाँति विभागों अधिकारियों के रखने में भी वह एक दूसरेका कान काटती रही हैं । अस्ती नव्वे हजारकी श्रावादीके रामपुर राज्यमे भी तीन-तीन तहसील- दारियाँ और तहसीलदार, सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस, सहायक सुपरिन्टेन्डेन्ट, लघु जज, महाजज श्रादि अधिकारी वैसे ही भरे हैं, जैसे किसी बड़ी रियामत या वीस लाख आवादीके जिले मे । दूसरी रियास्तने जी पदाधिकारी हैं, वह अपने मे क्यो न हो ? और जिसने राजाको खुशहर दिया, उसे कोई पद मिलना चाहिये, इन विचारोंसे रिवायतो मे आवश्यकता से अधिक पदाधिकारी भर दिये जाते रहे पदाधिकारिन स्वभावतः अयोग्य या परिस्थिति के कारण अयोग्य व्यक्ति भी होने ह और योग्य भी | हिमाचल प्रदेश वन जानेपर कैसे हो 1 - सकता है कि राजा साकी सारी भरती जिदगी भरके लिये वहाल रखी जाये इसलिये नौकरोफी कॅटाई स्वाभाविक थी। तहसीलदार साहब भी चिनि थे । मैं इसके सिवाय और क्या श्राश्वापन दे सकता था, कि योग् व्यक्तियो हॉटेजानेका डर नहीं । सापट्टी मैने उन्हें बालाया, कि हिमाचल सरकार फलोकी उपज बढानेपर अपना सारा यान लगा रही है, और यहां की खनिज सर्पत्तिको निकालकर जनता के जीवनतलको<noinclude></noinclude> q0vm83h3plef1u3d8lo8b2ikleafbbb पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७२ 250 195187 665906 2026-07-07T15:23:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665906 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"राजधानी" चिनीको ६१ ऊँचा उठाना चाहती है। इस काममे आपको पूरी तत्परता दिखलाना चाहिये और अब तक उपजाये जाते मेवो और स्थान-स्थान र प्राप्त - खनिज धातु पात्राणीको जमा करवाकर उनके बारेमे सरकारको सूचित करना चाहिये, जिसमे सरकार अपने काममें जल्दी आगे बढ़ सके । चाच मगलरामजीने मेरी बात स्वीकार की और मेवो और धातुपापापों के नमूनों और कड़ोको वडी तत्परता से जमा कराया । ' उसी दिन (२२ मई ) जाते समय उन्होने थानेदारको ताकीदकर श्री. कि मेरा सामान नये वॅगले में भेजने केलिए आदमी भेज दें । थानेदारने वफादारका कुछ हुक्म दे दिया और वह हुक्म न जाने कितने रास्तों से होते ढोनेवाले आदमियों तक पहुॅचा या न पहुँचा । मैंने शाम नजदीक त्राती देखी और आदमियोका पता नही तो चिता हुई |न्तु मै वे हाथ पैरका' नहीं था, पुण्यसागर भी मेरे पास थे । वह स्कूल के पास लामा मदिरमे गये । वैशाखी पूर्णिमाको बुद्ध जयती के लिए वहाँ जमा लोगोमेसे तीन चार भिक्षुणियों को बुला लाये | वह वेन्दारी आज व्रत रखे हुये थी, उन्होने बौद्ध पंडितको उसके निरास प्रवेश नहायता देने को भी पुण्यका काम समझा और हमारा सामान शामने पहिले ही तीन महीने केलिये निवास वननेवाले बॅगले में पहुँच गया। वर्तमान शताब्दी के यारभमें इन वगलेका ब्रोस्को नामक किसी जर्मन जाति वीरपियन पादरीने बनवाया, सिर्फ अपने पैसे ही नहीं अपन श्रमने भी । धार्मिक सकता हमे इन धर्म प्रचारको की पूर्व मेवा अद्भुत त्यागा समझन नहीं देतो। अस्सी बरस पहिले न्यू (यहाँ ते ४ नील चार ऊपर ) में कुछ ऐसे ही त्यागी पादरियोंन अपना आश्रम बनाया था । वस्तुत सेवामे दधीचिकी भाँति उनमें से यावे वर्जनोने अपनी अस्थियोको सदाकेलिये उभी भूमिको उर्वर बनाने के वास्ते छोड दिया। के बाद ही एक पादरी स्कीने<noinclude></noinclude> o6knhqheo292paemz9wrjmp2ex8f8q8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७३ 250 195188 665907 2026-07-07T15:24:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665907 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६२ किन्नर - देश मे १८६७ मे आकर यहाँ सड़क के किनारे चिनीमे इस स्थानको किसी जमींदारसे खरीदा। सुंदर बाग वगला ( १६०० ) और दूसरे घर बनाये, लड़कोकलिये स्कूल ( १८६६ १६०७ ई०) खोला, लोगोमं शिल्पका प्रचार किया | १३ वर्षमे इस भूमिका सुदर गुसज्जित बाग बंगले के रूपमें परिणत कर क्रूरकी चला गया, उसकी बीवीन भी रोने हुये स्थानको छोड़ा | पीछे पाढरी पीटरने सभाला। किन्तु अंत मे १६१२ मे ६०००) रुपयेमे मुक्ति सेनाके हाथमे बेचकर मोरात्रियन मिशनको उठ जाना पड़ा। इसी समय एमर्सन ( पीछे पंजाब गर्नर) राज्य के प्रवधक हुये । उच्च अग्रेजी अफसर सहायता दिलाने केलिये बड़े उल्लुक थे । मुक्ति सेनाने अस्पताल खोला, फिर राजकी सामिक सहायतापर राजकी ओरसे मकान बनवाकर यहाँ एक अस्पताल खेल दिया गया, एक मुक्ति सैनिक एग्लोइंडियन डाक्टर सेमुयेल (बरफुट) और उनकी बीवी साल भर तक काम करती रही । मुक्तिसेनाने यहाँ ऊन कातने चुनने का स्कूल भी खोला । कुछ सालो तक संस्थाको चलाने की कोशिश की गई, किन्तु वह चल नहीं सकी। प्रथम विश्व युद्धने ही यूरोपपर ऐसी ग्रार्थिक तवाही डाल दी, कि राजाओंके बटुवे छूछे पड़ गये और उनसे पहिलेको भांति दान का स्रोत नहीं वहता था, जिसमे कि दुनिया के कोने कोने मे लगे ऐसे श्राश्रम विरकोको शक्ति जल मिल सके। उधर राज्य प्रध राजा पदमसिंहन संभाल लिया, अग्रेज प्रवन्धक चले गये । श्रतमे (१९१९) मुक्तिसेना पाच हजार रुपयांने वाग व गलेको राज्य के हाथमें बेचकर चली गई। ब्रस्की और पीटरकी स्मृति लोगोके लिये बहुत मधुर रही । मुक्ति सैनिक वाकर, मोर्टिमांरने भी तत्परता से काम किया, किन्तु मुक्ति सेना का बड़ा अवलव था राज्य के अग्रेज़ प्रवन्धक एमर्सन और मिचलन को वेगाकी लकड़ी और दूसरी चीजे खूब मिलती । जैसे ही वह सहायता वद हुई, उन्हें बेच वाचकर हटना पड़ा । वस्तुतः यहाके कामका श्रय स्की और मोरवियन मिशनको है, जो अंग्रेज नही जर्मन थे । वह अग्रेज अधिकारियो और सरकारी मदद काम . 1<noinclude></noinclude> 3aef4lkpam6bm7vg04f62q9adfgd285 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७४ 250 195189 665908 2026-07-07T15:24:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665908 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"राजधानी" चिनीको ६३ नही करते थे, बल्कि यूरोपसे सहायता पाते थे । ब्ररक्की तो स्वय धनाढ्य आदमी था । Q स्की सपतीक स्पूसे आकर यहां दो तीन साल तक तंबूमे रहा । फिर राजा शमशेरसिहकी सहायतासे यह जमीन खरीदी, जो उस समय बहुत ऊभड़-खाभड़ थी, ग्राजसे ४८ साल पहिले (१६०० ) मे यह बगला बनकर तैयार हुआ, जिसमे बैठकर मै इन पक्तियोको लिख रहा हूँ । कितने प्रम और श्रमसे स्त्रीने मिस्री कृपारामको बतला बतलाकर इस बॅगले को तैयार किया होगा । यद्यपि १६१६ के बाद इस बॅग की किसीने उतनी पर्वाह नहीं की, बहुतसे शीशे टूट चुके हैं, वार्निश और प्लास्तरकी ओर उतना ध्यान नहीं, भीतर दीवारकी ' मारिया भर रह गई हैं, बाकी सामान सब विलीन हो चुके है । एक बड़ा युरोपीय ढंग का चूल्हा -- जिसमें पाव रोटी विस्कुट तथा दूसरा भोजन बनता था --४०)मे नीलाम होकर एक किसान के घर में पड़ा हुआ है। बड़ा पियानों न जाने कहा गया ? ईसाका मन्दिर बनाने के लिये जो पत्थर गढ़ कर तैयार किये गये, उनसे तहसील बन गई । स्थानका वैभव कहा है, जिसे स्की दंपतीने अपने स्निग्ध हाथोसे धीरे धीरे तैयार किया था, और अपने पति से पीछे जिसे छोड़ते समय फ्राउ स्की रो पड़ी थी। स्कीने हालैंडसे सेव और नास्पातीकी पौध मॅगाकर लगाई थी, जिनके फलोंको वह नहीं पीछे के लोगोंने खाया। की वनाये बॅगले मे मेरी तरह कितने ही पथिकोंने शरण पाई, और आशा है, हिमाचल सरकार की संपत्ति होकर व इसकी उपेक्षा नही की जायेगी । यहा अस्पतालकी एक अच्छी इमारत है, किन्तु वर्षोंसे डाक्टर नहीं, सारे चिनीकी इतनी बड़ी तहसीलकेलिये डाक्टर न हो, यह शरमकी बात है । वृढ़े कम्पाउन्डर ठाकुरसिंह किसी तरह गाड़ी चलाये जा रहे हैं। ठाकुरसिएन क्रूस्कीको देखा था, वह उनके स्कूल पढ़े थे । मुक्ति सैनिक मोटींमोरनं डोरा डालकर उन्हें ईसाई बनाना चाहा,<noinclude></noinclude> t6ozwczs1ygcn3vedv6wjziva0qi9wh पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७५ 250 195190 665909 2026-07-07T15:24:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665909 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६४ ५. किन्नर देशमे और इसकेलिये वह इन्हे शिमला ले गया। वहा मुक्तनैनिक- सैनिकाने झडे पताकेसे खूब स्वागत भी किया, किन्तु रानमे ठाकुरसिंहको कोई गुरु मिल गया था, जिसने पाठ पढ़ा दिया । ठाकुरासंहने ईसाई बनने के बारेमे कहे जानेपर कहा – मे पिताका - केला पुत्र हूँ, ईसाई वननेपर देश जातिसे निकाल दिया जाऊंगा, इसलिये उनकेलिये दस हजार रुपया मिलना चाहिये ; मुझे विलायत पढ़ने के लिये भेजना चाहिये, और इन सुमुखी मिसोमसे एकके साथ न्याह करने का मौका मिलना चाहिये । मुक्ति सेनाके यहा मुक्ति भले ही टके सेर हो, किन्तु यह शर्तें इतनी सस्ती नहीं थी । ठाकुरसिहले पादरी मोमोर नाराज हो गये । मुक्ति सेना यहा किसीको ईसाई बनाने में सफल नहीं हुई । सूकी भाति अवसर नहीं लेकिन स्की और मोरावियन धर्मप्रचारकोसे ढढोरची मुक्ति- सैनिकोकी तुलना नही की जा सकती । यद्यपि मोरविनोन यहा सास्कृतिक श्रार्थिक जीवन मे सहायता पहुँचाने का पाया, किन्तु उनकी स्मृतियोंको मुलाना कृतन्नता होगी, उन्होने प्रयत्न किया और क्रमसे-कम ब्रूस्कीके सेवों और नास्पातियो (नाखो ) से बहुतोनं अपने यहा कलमे लगाई। पीटरका लगाया अति सुगंधित शतपत्र गुलाव श्रव भी उपेक्षित रहते भी दर्शकको आकर्षित किये बिना और उनके दिल मे टांश पैदा किये बिना नही रहता । पीटर शायद वही विशप पीटर होगे, जिनके दर्शन और फ्राउ पीटरकी केक खानेका मौका मुझे १६३३ ई. में लेह ( लदाख ) मे मिला था । तारीफ तो यह कि यहां दो-दो माली भी लगे हैं, तो भी वागकी इस तरहकी उपेक्षा है | ग्रस्पर्गस्को मालीने खोदकर फेंक दिया और उस जगह फाफड़ा बोया । पीटरके शतदल गुलावके थालेमे न खुर्पी लगती है, न पानीकी वालटी; यह देखकर महृदय दर्शकका हृदय तिलमिला जाता है। गृज़वरीके कुछ ही थाले रह गये हैं, जिनम भी .<noinclude></noinclude> ebw00inqkrtk3l1dyoaecjo3rjlxz53 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७६ 250 195191 665910 2026-07-07T15:24:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665910 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भोजन छाजन ६१ चामरी है, और न व्यान देनेपर एकाध वरसमे उछिन्न होकर रहेगा । हालैंड से मॅगाकर लगाये से वो और नालो ( नासपातियो ) मे वर्णने थाले नहीं बने | वह प्रकृति की दवासे खडे हे । स्कीने बहुत- गूरी वेले लगाई थी सव उच्छिन्न हो गईं, सिर्फ एक घा और गुलाबको झाडीमे बची हुई है। दूसरे कौन कौन तरहके पौधे नष्ट कर दिये गये, सालूम नही । बाग और बॅगलेका एक तरह काई धरोनेवाला नहीं है। कितना ही स्थान खाली है, जिसमे घास भी नहीं उगाई जाती। दिल्ली भाग्य से छीका टूट गया। किसी सेठने हिले साल सन्तान बनाने के लिये कोई त्रुटी लगाकर इसी बागमे जव करना चाहा, गोया इतने अच्छे फूलों का तजव यहाँ लिये तनही था । खेर, बूटी तो जमी नहीं, किन्तु पूछनेपर माली कहना 'क्या करे, साहूकार ने जो जमीनका टीका ले लिया है।" दहमाचल सरकारके राजमे इस वागकी और अधोगति न होगी । स्की कला व तीन मासके लिये मेरा निवास-स्थान हुआ । भोजन - छाजन चिनी इतिहासपर यहां नहीं लिखना है, वह प्रागैतिहासिक काल- जा सकता है, किन्तु उसकी सामग्री सुलभ नहीं, हाँ उसकी भूमिके अन्दर ग्रव भी उनमे से कुछ सुरक्षित जरूर होगी । चिनी गाँव एक नगर वसा है, किन्तु उसके कितने ही कृपकोने अपने अपने घर अपने बिना लिये है। खेती का सबसे बड़ा समाग जगलोसे अलग है, चोर चूली. वर्मा, अखरोटके अतिरिक्त दूसरी तरहके जगली वृक्ष नहीं है | पिछवकी वर्षा र फर्वरीकी हिमदृष्टिने खेतीका मनको जहाँ वह नुकसान भी पहुँचाया, किन्तु एक लाभ हुआ है. के को खूब रानी है, सिचाईसे लोग निश्चिन्त हैं, और पानीकेलिये 1 °<noinclude></noinclude> cwyh0cxlxrzch9ul2gcd52vw3hkr3h5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७७ 250 195192 665911 2026-07-07T15:24:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665911 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६६ किन्नर-देशमे लोगोमे मार-पीट नहीं होती | पाच-पाच छन्छ हजार फीटतक नीचे से ऊपर चले गये खेत मे पानी लगाने के लिए लोग जो-कटी (मशाल- की लकड़ी) लिए रात रात भर भूतोकी भाँति घमते दिखलाई पड़ते है. यह काम स्त्रियोका है | पुरुषाका काम है हलसे खेत जोत देना, नहीं तो बाकी सारा खेतीका काम स्त्रियांका है। वृद्व लिपिक धर्माने तीन स्त्रियों रखी है, उन्हें शराब पीकर निश्चित विचरने की छुट्टी है, मारा घरका काम स्त्रियोने सँभाल लिया है। हाँ, यहा सम्मिलित विवाह प्रथा है, सभी भाइयोकी सम्मिलित पत्नी होती है, जो एकसे अधिक भी हो सकती हैं । धर्मानंद के भाई होते, तो वह भी तीनो पत्नियोमे सम्मिलित होते । स्त्रियों खेती-गृहस्थीकेलिए कितनी उपयोगी हैं, इसके कहनेकी श्रावश्यकता नहीं, लेकिन यह बात सिर्फ बुशहर ही नहीं सारे पहाड़ देखी जाती है। 1 . खेतोमे वने स्थायी घरोके, अतिरिक्त किसानोने फसल की रखवाली का काम करने के लिए मीलो दूर साधारण से छोटे छोटे घर बना लिए है, जिन्हें "डोगरी" कहते है । कभी कभी खेतोमे काम करनेवाली स्त्रिया इन्ही डोगरियोमं रह जाती है । कडे (ऊपरी पर्वत भाग) की डोरिया बहुतसी प्रेम गीतोका वेपय वन गई है, विवाहिता पोड- शिया के लिए राधा कृष्णका सह अभिनय किन्नर नमाजमे बुरा नहीं समझा जाता चिनी गाव एक पुराने दुर्गके पास बसा है। दुर्ग भी ग्रास- पाकी भूमिसे कुछ ऊँची एक पहाडी टेकरीपर था। इसका व्यस यागसे जला था। मकान और दीवारोंका अधिकाश भाग उस समय भी इमारतोंकी माति काठका रहा हागा । याग लगनेपर खाडय 'हका दृश्य उपस्थित हुआ होगा । श्राज भा गढ़म खोदने पर कोयला, जले पत्थर मिलते हैं । दुर्ग बहुत वडा नहीं था। उसके एक भागको समतल करके वहा १६११ ई० में स्कूल बनाया गया, जिसमे आजकल श्राटवी श्रेणी तक की पढाई होती है । चिनीम हाई स्कूलकी बड़ी<noinclude></noinclude> psbq01dyfqbk3bonkq1exjhg0u5vw1e पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७८ 250 195193 665912 2026-07-07T15:24:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665912 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>है। पड़ता और बहु के शो पर जाना पड़ता सोना जात है। है। चीनी और भोज चादी जग से जाना जाये, यह तब हुई थी. जब राजा राज्य था पर निगाf- स्कूल सप्न नही देखा जा सका था। स्कूलकारा योग-उपान के साथ रानी में निपेश नहीं था । चिनी गावगे भी कना औरत (स ), बढ़ई यो कालो रहा है। करव ग्रहापे उम कुलीन हैं, जो द्रव सपने राजपूत कहते है । बढ़ई जाहीर नार, रज्जाप, पाषाण-शिनोनयन काम है। पानी न चलने पर भी नकी चिलम चल जाती है। गार्मिक रानी लिमी जे कुरा नदी । चिनीको पानीका साजरा कशा तानाके पाक के देखने ही आप नमक । कालिया है। कालियाका कार्य चमार, मना, गोत्री, धावा, कोसी पेशा है। रामरी गद श्रीर इन्हें परम गरीनीही बितानी पड़ती। चास जना एमा उसे नाव लावा माया क उसी तरहका एनबीसन पथरकट बना भी काया दोनो ट्राई से दूर कालीका मा मन या और नरमानम अँगली की दादी लगा दीनार बागवा रांगे बुबाको प्यारादी संगी नारंग गह प्र तान् स तंत्र तीन प्रामीन गन्ना ग<noinclude></noinclude> 0y3wex8gfnmn0iq8an6892o49jfiktv पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/७९ 250 195194 665913 2026-07-07T15:25:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665913 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६८ किन्नर - देश में रहते हैं, हम तो उनका अछूतपन हटाना चाहते है, किन्तु गदगी छोडे तव तो ।" गोया ब्रह्मानं ही उन्हे जन्मसे गढा बनाया है। उनके पान खेत नहीं होने दिया गया, शरीरकी कठिन नेनतके मिया कोई जीवनका साधन नहीं रहने दिया, कमाकर यदि चार पैसे किसीने पैदा कर लिया, तो भी वह ऊंची जातिबालों जैमा घर नहीं बना सकता, न अच्छे कपडे पहन सकता, उसे बडी जाति के घर को छूने तक की इजाजत नही, न विद्याके पास फटकने का मौका। हर तरह से अपना- नित लालित करके रखा गया, फिर यदि गये रहते हैं, तो उनपर यह । जवर्दस्ती लादी गंदगी उनकी उसी स्थिति बनाये रखनेका कारण मानी जाने लगी । कैसा प्रच्छा न्याय, या अत्याचार कायम रखने का वहाना ? कनोर के लिए इतना कहूंगा कि यहाका कोली-भगी मेरा सामान उठाकर कलपासे यहा लाया, किन्तु इसे किमीने बुरा नहीं माना | चिनीके कोलियोके घर और कूचे बहुत गंदे है, इसमे श्राश्चर्य- की क्या जरूरत ? लेकिन क्या हिमाचलप्रदेश आगे भी उन्हें इ स्थिति मे रखेगा ? यह सैकड़ों मानव क्या आगे भी ऐसी नारकीन जिन्दगी विताने के लिये मजबूर किये जावेगे ? X ✗ X × किन्नर देवताका देश है, अल कारिक नहीं सीधी भावामें । देवता प्रकाशके प्राणी कहे गये हैं, किन्तु मैं समझता हूँ वह घोर अधकार के चासी ह् । जव तक मनुष्य के हृदयमे घार ग्रज्ञान न हो, देव लोग वहीं बहरना नहीं चाहते । कल (२३ गई) दो मील नीचे कोठीकी देवीका मेला था । देवी देवताओ के लिए हर महीने मेला या भोज होता रहना है । कहीं कहीं तो मेले के समय देवताके भडारसे शराबी सदा- व्रत भी दी जाती है, नहीं दी जाये, तो भी देवताग्रोस मेला शराव के बिना कैसे हो सकता है ? देवतायाने शराववदी हटाने के लिए राजाको मजबूर किया, उसके कुलकको नष्ट कर देना चाहा। मेले के दूसरे दिन एक आदमीको बुरी तरह शिर फुड़वाकर<noinclude></noinclude> ack8f865voe4058g8kggw7k98lq8o55 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८० 250 195195 665914 2026-07-07T15:25:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665914 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मांजन छात्रन -- ६६ अस्पताल -- बिना डाक्टर के अस्पताल मे श्राये देखा । "डाक्टर" ठाकुरसिंहने वतलाया, हर मेले के दिन दो-चारकी यही हालत होती है, देवता शराव और वलि वद करनेकी वाततक सुनने को तैयार नहीं । देवता वहा बात करते हैं या इशारेसे अपना भाव प्रकट कर देते हैं। बात वह नाली (ग्रोक्स) के मुंह से करते हैं । देवताओ की वात- चीतकी बात फिर कभी, मैंने सोचा, देवीको मनानेका कोई रास्ता निकालना चाहिए। पता लगा, देवी कारी है, उनका कोई दोस्त है, किंतु वह पति के तौरपर नहीं । चिरकौमार्य क्रोधकी मात्राको वढा देता है, इसलिये मैने कोटकी देवीके व्याहका प्रस्ताव किया। कुछ सजनोंने हम विचारको पद भी किया है। डायवेटिसको दबोच रखनेवाले मेरे मित्र पंडित ब्रजमोहन व्यापका बतलाया नुसखा, रोज ४-५ मील टहलना है । मैने २४ मईले उनपर अमल करना शुरू किया, और अव नियमसे सवेरे चाय पीने के बाद तिब्बत - हिन्दुस्तान - सड़कपर यहासे फर्लाङ्ग ऊपर १९४६ मीलत जाने बाने लगा। नहीं कह सकता, अभी दुश्मन दबोचा गया या नहीं। दबोचे जानेका अर्थ है पंक्रिया ग्रंथिका फिरसे काम करने लगना, जिनसे जठराग्निमें फिरसे तीव्रता याना । यद्यपि मूत्र- परीक्षा शहरका पता नहीं है, किन्तु हो सकता है, परीक्षाका माला ( वेनडिकमोलूशन ) खराब हो गया हो, क्योंकि जठराग्निकी मंदता हमरत मेरी आवाज निकलने लगती है । हटी नहीं है, बुद्ध के बतलाये नुस्खे “भोजन मात्रचता" को शब्दश. मानने पर ही काम चलता दिखलाई पड़ रहा है। सचमुच, "ते हि नो विना गताः" कहकर मुँहले का पत्थरतक पेटमें जाकर हजम हो जाता था, और कहा एक चातकी कमी वेशी खट्टी-मीठी डकार आने लगती है ? पहाड़का पानी भारी होता है, इसमें सदेह नहीं । संकटमोचनवाले वावाने भी की बात कह रखी है "लागे श्रति पहाड़कर पानी", किन्तु यह पतेी बात चित्रकूट और तराईके बरसाती पानीकेलिये है । आखिर<noinclude></noinclude> sr9cxxaskzck83rze0fjpr38s3xhy8v पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८१ 250 195196 665915 2026-07-07T15:25:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665915 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' ७० विन्नर-देशमे पहले भी तो पहाड़का पानी र पीते रहे, और सूख लगती रहीं । खैर पचपनसालाका भी ध्यान रखना होगा । और खाना ? किन्नरदेश विशेषकर वाडतूसे ऊपरका भूभाग पानी- केलिये ही सूखा देश नहीं है, बल्कि अन्न भी यहाँ पति होता है । anitatue readi-ढोकर नीचे से ऊपर लाना यात्र ही नहीं हो रहा है, बल्कि शायद नदियोसे यहाँ वोझा ढोनेवाले पशु नीचे वि पशम और ऊन पहुँचा अनाज उठाये लौटते रहे है । ग्राज कल इसका अपवाद है, विलायती वडी मटर, जिसे यहा के गावो लोग शिमला पहुँचाते हैं । कहते हैं, वहा इसका अच्छा दाम लगता है । अच्छा दाम नही लगता, तो २० रुपया मनकी ढुलाईवाले रास्ते वह शिमला कैसे पहुँचती ? काश, यह हरी मटर भी मिलती । मई-जून 'तो साग-सब्जियां के कालका दिन रहा। वृस्की बागमे बधू बहुत उगे थे, और वत्थू भी लाल कलगीवाले वधू, छूतेतक नही, कहते हैं इसके खाने में सूज़ाक हो सागरमे कहा - " रामका नाम लो, तुम रोज उने । किन्तु वहां लोग उसे जाता है। मैने पुरान बनाया करो", किन्तु एक बार कहनेका प्रभाव दो-चार बारतक ही रहता। हालांकि क लोग वत्थूका पूरा वायकाट नही किये हुए हैं, नहीं तो यहा बत्थू वाका- यदा खेतोमे क्यो जाये जाते ? मरमा (लालभाग ) के बड़े बड़े पत्तोंका देखकर मुँह से लार टपकती है, लेकिन ये लोग पत्तीकेलिये उसे नहीं बोते, बोते हैं उसके दानेके लिये, जिसे रोटी और भातकी शकलमे खाते हैं । हरे मरसेकी खेती भी इसीलिए करते है । इसका नाम उन्होंने बदलकर तुलसी रख दिया है । " तुलसी महरानी, विदा महरानी" गरीबांकी श्राधार हैं। ऐसे कई नाम यहा उलट-पलट गये है, कई खाद्य वस्तुये श्रखाद्य और अखाद्य खाद्य हो गई हैं। फाफड वा , फाफडा ( वकव्हीट) ग्रोगला कहा जाता है, और फाफडा उसीका छोटा भाई है। कोद्रा भी है, किन्तु वह हमारे यहाका कोदो नही मंडुआ (रागी) हैं। गेहूं, जौ, मटर जैसे हमारे परिचित अनाजों के पतिरिक्त यहां नंगा<noinclude></noinclude> bfhcno27paomf185yjm2xilw6lmnpff पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८२ 250 195197 665916 2026-07-07T15:25:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665916 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भोजन छाजन ७१ (बिना छिल्का) जो भी होता है, किन्तु चिनीसे दूर रमे । उसके लिये कुछ अधिक ऊंचाई या ठडककी जरूरत होती है । अनाजोकी पर्याप्त किस्मे यहाँ होती है। टहलते समय मक्का भी एक खेतमे उगा देखा, ग्रव ( १३ जुलाई ) तो उसमे वाले भी फूटी है किन्तु पुण्यसागरका कहना था कि वह पूरा पकता नहीं। व सिर्फ वेली रह गई द्राक्षालता भी वही राय है। शायद मेरे रहने एक जाये, नहीं तो दूसरे तो मधुरा मृडीका का श्रास्वाद लेंगे ही। स्कीकी लगाई तथा वज्रकर वारेमे तहसीलदार साहेवका ( = श्रगरत ) तक कहीं गूर जहा तक साग-सब्जीका सवाल था, मई-जनमे उनका वड़ा ठाला था। वैसे श्रनेके दिन ही एक जाघ भेडका सूखा मास भगवानने भेज दिया था, उखे मारासे तो भडार कभी खाली नहीं रहा । कभी कभी तो, इतनी या जाती कि लडकोमे वाट देनेके लिये पुण्यसागरको ताकीद करनी पड़ती | माल भरके सूखे चिमटे मास के लिये न मेरे पास, न पुण्य- नागरके ही पास पाचनशक्ति थी । पुण्यसागर चालीस सालसे ऊपरके = गये हैं और उन्हें दिमाग और धातुकी निर्बलताकी शिकायत है. तो भी चतुर दिणीकी तरह वह हर चीजको जोगाके रखना चाहते "क काले फलदायक: ।" मैं भी उनके काममे दखल नहीं देता, हिन्दु पानी मारी रखे पुराने मानकी गंध उतनी प्रिय नही चगती। जातक मनका सवाल था, तेगनराज मास, बरावर खुट रहा किन्तु मूसा अनुयायी तो भगवान के भेजे स्वर्गीय भजन 'मन्ना " T सी बराबर खाते खाते ऊब गये थे । कुछ दिनों बाद नेगी संतोल दासने या मन थालू भेज दिया, जिसने पत रख ली। जव हम लोग दो साहकी यात्रा में गये, तो चालू श्राध श्राध वित्ता के अंकुर दे चुके थे। हमने पुण्यार्थ या सदुपयोग के लिये उससे कुछको लेकर एक क्यारी वां डाली। पीछे सड़क इस्पेक्टर श्रीलक्ष्मीनन्दने वतलाया, कुरोसे वाद कोई कमी नहीं आती। खैर तब तक उरेपरे बतेश नाग याने लगा. कभी नेगी नतोखदाम भेव देने, कमी यूलाके 3<noinclude></noinclude> 1n4pr4aikuvtmzdw3oui2j7n57vhf98 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८३ 250 195198 665917 2026-07-07T15:25:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665917 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७२ किन्नर - देशमे नम्बरदार | रेजरसाहेव शर्माजीकी कृपासे कई विटामिनकी खान हरे सागो और मटरकी फलियांकी कमी नही रही । मक्कावाले खेतमं तां आजकल कद्द ू ( काशीफल ) के रखणिस पुष्प भी खिले थे । एक दिन हमारे रास्ते में कद्दू की एक नरम नरम लता पत्रसहित पड़ी थी । मै भी बहुत हाडियोका भात खाये हुए हूँ, वगाली वधुश्री माति चाहता था, लताको उठा लूं, सागकी कमीचे कारण नहीं, बल्कि खाद्य अपव्यय से द्रवित होकर; किन्तु पंचतत्रके कपोतरा नकी भाति पुण्यसागर ने कहा "यहाँ निर्जन वनमें इसका उद्गम कहा " अर्थात् कद्दू की लताका उद्गमस्थान तिव्वत - हिंदुस्तान सड़क नहीं हो सकती जरूर दाल मे कुछ काला है। और सचमुच ही लता के पत्ताको सरकानेपर वहीं और भी कुछ चीजे दिखलाई पड़ी । पुण्यसागर ने कहा- यह देखिये भस्मकी रोटी भी है। हॉ, सचमुच भस्मकी रोटी मडवा (रागी)- के लिट्टकी तरह वहाँ रखी थी। यह भूत भगानेका 'अमोध रामवाण है। मै नहीं जानता पुरा सागरकी क्या राय थी, किन्तु पुन तो समझ रहे थे, भूत कभी ऐसा मूर्ख नहीं हो सकता, कि भस्मकी रोटी के पीछे घरवालीको छोड़कर तिब्वत-हिन्दुस्तान रोडपर मीलो दूर भूख मरने श्राये । पीछे पुण्यसागर भी मेरी राय से सहमत मालूम पडे । दो सेर पक्का साग इस प्रकार अकारथ गया, मुझे तो सिर्फ इसका क सोस था, बदवख्त लामाने भस्मकी रोटीपर देवदारकी हरी पत्तियो का प्रयोग क्यो नही वतला दिया, यदि भूतको भस्मकी रोटी और अन्नकी रोटीको पहिचान नहीं, तो उसे देवदार और कद्दू के हरे पत्तो क्या पहिचान होती ? मई-जून मे चिनीमे ही सागका ठाला क्यों बर्फ तो वहाँ मलमे ही खतम हो जाती है, होना चाहिये ? चाखिर कितने ही साग और लाल मूलियाँ - जो बाईस दिनमे तैयार हो जाती है - तो इतने समय- मे तैयार हो सकती हैं। “यहाँ के लोगो को शौक नहीं", रेजरसाहेब थारा बेट्टा जीवे, यापकी वात बिल्कुल ठीक, बेटा नहीं है, होगा तो, व्याह-<noinclude></noinclude> qfthkzehaftza6xs4k9tw8cutmvab6k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८४ 250 195199 665918 2026-07-07T15:26:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665918 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भोजन छाजन ७६ के ७ महीने ही बाद किसको वेटा हुआ है । यहाँवालोको क्या भारत मे कही गाँववालोको साग तरकारियोका उतना शौक नहीं, वह कहते सिर्फ बगभूमिका ख्याल संकोच में डालता है । यहाँ वाले तो कोई चन्न पा जाये, ता उसीकेलिये खुदा मियाँका हजार शुक्रिया अदा करे, और चूली को उन्हे प्रदान करके घटघट वासी मिट्टी वि नासी बहुत बहुत शुक्रिया बगल भी कर रहे हैं। फलोमे चूलो है, जो यहाँ हर गाँव है. गरीब खेतमे भी दो चार वृक्ष उसके जरूर खड़े रहते है । जाड़ेका संवल जब खतम हो जाता है, और किन्नर दपति खाद्य- केलिये तिलमिलाने लगता है, उस समय यही फलराज है, जो गज- की टेर सुननेवाले भगवानकी तरह सबसे पहिले उनके पास पहुँचता है। जून तक नीचे-नीचे ( नेवलमे ) चूली के फल पककर सुन- हले बनने लगते है । जितने दिन बीतते जाते हैं, वह पहाड़पर नीचे- से ऊपर की ओर धावा करने लगते हैं। चूली एक तरहकी छाटी खूबानी है । पकनेपर इसका स्वाद मीठा, किसी-किसीका कुछ मासा भी होता है । इसकी गुठली वादामकी भाँति तेल से भरी होती है, किन्तु खाने प्राय कड़वी हुआ करती है, हॉ, तेल निकालने- पर कडवाहट नही रहनी, उसे तो श्राप वादामका तेल कह सकते है । चूली है भी वादामकी सहोदरा भगिनी । चूली जव ग्रभी कच्ची होती है, नभीसे लोग उसपर अपना दाँत साफ करने लगते हैं। सबकी वात में नहीं कहता, किन्तु हमारे चौबेमें तो जंगली पांदीनेके साथ उसकी चटनी बरावर बनती रही। पककर पीली पड़ जानेपर तो गरीवीके परमे बधावा बजने लगता है । और मेरी यार फलती भी इतनी है कि तोबा तांबा, लोग लुगाइयाँ टोकरे - टोकरे भरकर पीट पर ढोती रहती है, और वह घटनेका नाम नहीं लेती। श्राजकल सड़क- पर टहलने के लिये जाते समय दो मील दूर नीचेकी र तेलगी मरोकी छताका पीला-पीला देखकर मै पुण्यसागर से पूछने जा रहा था - तेलगी देववान' सुवर्णकी वर्षा तो नहीं की । किन्तु तुरन्त ख्याल . '<noinclude></noinclude> p8ru38mum2d3k3czkf949ip29xtw2dd पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८५ 250 195200 665919 2026-07-07T15:26:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665919 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७८ किन्नर - देशम श्रागमा-चूली देवी जा किन्नरदेशमे पधारी हैं। वह चूलांक कल छत पर सूखने केलिये फेलाये हुये थे । पुरयसागरनं मुँह उदास कर कहा- हमारे या यह सुभीता नहीं, वहीं वर्षा बहुत होती रहती है। हमारे यहाँ लोग खान े से बची चूलीका कही जमाकर देते हे, कुछ दिनोंगे सड जाती है, फिर करने पर ले जाकर उसे धोधाकर गुठली अलग कर लेते है, जिसका खाद्य तेल निकाला जाता है । यह पौष्टिक खाद्यका अपव्यय है । "उसका शराब क्यों नहीं निकालते, कि अनाज वचता," इसका उत्तर उन्हें यह छोड़कर दूसरा नहीं सूझा कि खाद्य नहीं हैं, यहा ऊपरी किन्नरमे पकी ताजी चूलीपर लड़के- बच्चे दिन-रात लगे रहते हैं, हर समय के भोजन में उसकी सबसे अधिक मात्रा रहती है, मैंने भी दो चार दिन परीक्षा करनी चाही, किन्तु फिर मन ऊब गया । अच्छा तो यह मेरी बात नहीं, किन्नर -किन रियो- की बात है । रोज के खाने के अतिरिक्त मेनां चूली घरकी गमतल मिट्टीकी छतो पर डाल दी जाती है, जो कभी धूपमे सूखती कभी फुहारमें तर होती, अन्त मे सुख-साखके कुछ चिचुक जाती है, जिसे जमा करके लोग वखार भर लेते है । यह उनके जीवनका सबसे बडा सवल है। ताजी चूलीको खाली खा सकते है, कुछ श्राटा मीठा डाल- कर लपसी बना सकते हैं, किन्तु सूखी चूली उबालकर लपसीके रूप ही- मे अधिकतर खाई जाती है, वैसे कभी कभी पकि अपने इस पाथेय- की किसी पत्थरके पास तोड़कर सूखे भी खाते देखे जाते हैं, कडवी गुठली तो खाली नहीं खाई जा सकती, किन्तु किसी किसी चूली की गुठली मीठी भी होती है । चूली इन पहाड़ोका प्राण है. इसमें किसको शक है, और वह यहाकी श्रादिवासिनी है, अरण्यकाके तौर पर न सही, ग्राम्याके तौरपर ही सही । चूलीके आसपास ही चालूचा पकने लगता है, किन्तु यह शायद क्या है ही विदेशी ग्लेच्छ । होता मीठा है, किन्तु वह उतना उपकारी नहीं है, यद्यपि फलनेमें चूलीम भी निर्लज, चूलीं तो एकाध डाल नहीं,<noinclude></noinclude> lnpyb51l8kal72vqm9wyb2funllv7uv पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८६ 250 195201 665920 2026-07-07T15:26:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665920 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भोजन छाजन ७५ भी किसी किमी साल छोड़ जाती है, किन्तु चालूचा एक डालको भी नहीं । इसकी गुठली छोटी, शुष्क और तेलविहीन होती है । गुलाकर तो रख सकते हैं, किन्तु अभी यह उतनी सख्या में बागो- में देखे नहीं जाते । गिलास ( चेरी ) पकनेमे चूलीसे पीछे नही है, किन्तु शुद्ध पश्चिमी म्लेच्छ फल है, जिसे तुरन्त तुरन्त ही खाकर खतम करना पड़ता है। इसे तो आप कही कही विरले शौकोनोंके ही बागोमे देख सकते हैं। वैसे बादाम, बाहू, अगूर, आदि दर्जन के करीव और भी मेवे यहाँ होने लगे हैं, और देवताओ के पूरे विरोध तपसः किन्तु यहां समय नहीं, सभी फलो और उनके गुण- गुण गिनानेका | अखरोट ( अक्षोट ) रवदेशी मेवा है, और 'तपुरा' से चूलीके बाद यह सबसे अधिक लगाया भी जाता है, शायद इस मूलाधान भी हिमालय से ही कही रहा, सोवियत् भी उear सेकड़ो मीलका स्वाभाविक तो जगल है. किन्तु अखरोटको यहाँ केलिये नकते | उसकी गुठली भर खाई जा उतना उपकारी नही सकती है। अखरोटकी कीड़ा नहीं खाता, उस- भारतकी सबसे अच्छी लकड़ी है। उसे पच्छे बारीक बेलबूटे बनाये जा सकते हैं, वार्निश लगाये नोकियाने फर्नीचर के सौद के बारेमे क्या कहना ? किन्तु ये गुण गोके किस कानके ? के बाद दूसरा स्वदेशी और चूलीके बाद सबसे अधिक लो पल है, मी आडूकी परमपरम महोदरा भगिनी । यह जुलाई के है । भी पकी वेमी खाई नही, किन्तु कहते है मीठी हती है। सुखाकर भी रखते हैं किन्तु वेमीका उपयोग चूलीकी माने खाके तौरपर उतना नहीं होता, जितना तीर्थ सेवन के लिये । "तीर्थ पशुचोकी भापाने गगा-यमुना या काशी- प्रयागको कहते हैं । वीर कोलोकी भारामे सुरासुंदरीका यह पुल्लिंग नाम है, "पण" | "नवन" का अर्थ भाषा मे है "चुवाना" भभका से<noinclude></noinclude> 307yjc88o1bss5o4k03hl24qzjb6ecl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८७ 250 195202 665921 2026-07-07T15:26:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665921 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७८ किन्नर-देशम और तीन चौथाई चावल, कहते हैं, अभी तक बचा हुआ है। वहीं हालत यहाँ लाई पाच सेर चीनीकी भी है। मैन उन्हे सजग कर दिया है, कि यहासे कोई खाद्य चरतु लौटकर रामपुर नदी जा सकती । मैन रामपुरमे मदर माहव के मुँह से डायवेटिस बालों के लिए मधुकी छूट और दूसरे माहात्म्य बड़ी श्रद्धा से मुनं थे। वहीं मथु सन्चय करने की कोशिश की, और श्री विद्याधर विद्यालकारकी कृपा डेढ सेर पक्का शुद्ध मधु मिल भी गया । में रारते भर उसका सेवन करता रहा और यहा कर तो राजापुरके राजवैद्य पडत मोहनलाल पांडे भेजी दवाओं के साथ और भी उसकी अनिवार्यता हो गई। मथुर चाड़ा हाथ पड़ने लगा, वह कितने दिनों टिकती, मैन े इधर मधुप- केलिये वास्तों से कहा । कर्पूरेश्वेत मधुकी किन्नर - देश में बड़ी महिना है, किन्तु मेरे दुर्भाग्य से पिछले जाडोम जो अति हिमपात हुआ था उसन े मधुमक्षिका वशपर आफतका पहाड़ ढा दिया, उनकी बडी मख्या नष्ट हो गई । सर्वथा वंशोच्छेद नहीं हुआ है, इसलिए बागे आनेवाले मधुप्रं मियोको निराश होनेकी पावश्यकता नहीं। त्र्यकाल वस्तुत शंकरवर्णा मधुका है, रक्ताभा या पाइर शहद का नहीं | तीन साल पुरानी एक छटाक श्वेतमधु डाक्टर ठाकुर सिंहने एकबार ढी थी और एकवार तहसीलदार साहेबने कापाव कही पैदा की थी । वम इतना ही भर, किन्तु, पाण्डरवर्णा शहक तो कुछ ही दिनों में “भरि भरि भार कहारन थाना” वाली बात हो गई । फिर एक चार वर्तनकी कमी पड़ी. और दूसरी ओर स्नेहकी - पाखि "अति सर्वत्र वर्जयेत्" कहा गया है । श्रागे मधु-सचय रोक दिया गया। पीछे तांगम्या पैदा हुई, कही इस मधुको ढोकर रामपुर- शिला प्रयाग तो नही पहुँचाना होगा। चीनी और गुटसे भी मरती होनेने सार्य दोपको सभावना नहीं हैं, किन्तु स्थान छोड़ने फिर पनपने लगेगा। स्नाराम से - मधुमे स्नेहा विश्वा न जाने ना<noinclude></noinclude> 1v5hvvjopuws3jm8jd3qaqjufw3n1ab पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८८ 250 195203 665923 2026-07-07T15:26:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665923 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भोजन छाजन 1 ७६ गंधाता है शिरिका सत्त और मोम भी गिली हुई है ।" कुछ नमक में इनसे सहमत हूँ । किन्नर पण सतजुगी ढंगसे होता है। दीवारोमे प्राधा भाग काका होता है, उसी सूक्ष्म छिद्र साथ दरवा बना दिया जाता है। जाहोमे दरवेने भीतर रहती है, फूलके मौसम में बाहर भी कुत्ता लगाती है। घरवाले मालमे दो बार मधु संचय करते है । धुन देते मक्खिय दरवेके भीतर चली जाती है। छत्तको तोड़कर निचोड़ लेते है, जिसमे मक्खियाँ चाहे न निचुड़ती हो, किन्तु उनको और नीमकी निचुड़ने की संभावना तो अवश्य है । खेर, कुछ भी हा हम कौन one है, कावकार कौन अपने से छूटे ह सो रहे थे, कैसे बुकी यहीं समाप्त करके चला जाये । पुण्य- सागरकी भी दिमाग लाने के लिये कहा, किन्तु अन्तमें युक्ति पुनको ही की. "काम कामका सिखलाता है" की कहावत के अनुसार गुना योगला (फार्करे ) का चिलटा ( चीला ) अच्छा होता है, सुना पहिले भी चुका हूँ, तिब्बत और रूम दोनोंने उसे अपनी राष्ट्रीय गन्ना लिया है। चिराटाका नाम आते ही याद आये गेहूँ के मीठे नीले फिर क्या था, पुवारको मधुमत्र चिलटा बनाने के लिने कर दिया. अब वह प्रतिदिन चिलटे विनमसे बना रहे हं, स्वादिष्ट श्रीसह दानिकान्या भी नहीं, यह गर्दार साहेब बतला चुके हैं । श्राशा है प्रधानने पहिले सचित मधु टिकाने लग जायेगा, यांदे नीचे सरने जागृत हुना, ता चिनीका डाकखाना और यहाँ के परिचित दोन द ही है, कट्रोलता जमाने उमपर कट्रोल लगने- यासीन नहीं मधु ती दौड़ती पने पास चली आयेगी । ने पालने और नधु निकालने की आधुनिक विधि जब लोगोंको तन्हाई. उन्होंने कहा "मधु भवन कैसे बनता है और मधुनिचोड़क वा मिलेग यह प्रश्न हिमाचल सरकारने करना चाहिये -- म<noinclude></noinclude> fhc2jxuat3hn7p3vpobhd5o3n8xu61s पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/८९ 250 195204 665924 2026-07-07T15:26:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665924 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशमें समझता हूँ, मेरा यह उत्तर माकूल माना जायेगा । लकड़ी नहीं मिट्टी या उससे भी सरते पत्थरके मोल हो, वहीं मधुमयन बनाना कौन मुश्किल ? यहाके निवासी और उनसे भी पर जब सरकार मेवा-वाग बढानेपर कटिवद्ध है, तो फलोकी का कमी रहेगी? क्यों न फिर "मधु अरति सिधव. " वाला देश यह बन जाये ? दूध-दही-मक्खनकी समस्या यहाँ कटिंग-सी मालूम हुई और अन्तत रही । लोगांका उस तरफ ध्यान नहीं मालूम होता है । चूली के तेलपर निर्वाह करते लाग कमसे कम चीनका प्रयोग करते हैं । भेड़-बकरी के दूधमे अपुन कोसो भागते हैं. न भी भागत ता भी वह सुलभ न होता । छेरी-भेड़ी न देखी, वहाँकी गाये देख ली । होती तो सभी श्यामा, "जेहि जसु वेद-पुरानन नावा लेकिन दूध सीप भर | रेजर शर्माजीने सत्तर-अस्तीम एक श्याना सरादी है, जो डेढ़ प्याला दूध देती है । वह मुझसे एक ही नाम बाद पहुॅचे। नौकरों बतला दिया, यहाँ की गाये वम इतना ही दूध देती है । और उन्हाने पियाला भर दूधवाली गाय खरीद ली। नेर भर दूध देनेवाली गायकी बात कर रहा था, -- दूसरा नौकर उनसे किन्तु मुझे विश्वास नहीं पड़ता, यह मुट्ठी भरकी कामधेन्वा इतनी उदार होगी। हॉ, याक (चमरी) सॉड़ और गायकी सकरी नसल जरूर अधिक दूध देती है । एक बार दो सेर ढाई सेर दूध और मक्खन मे हरियानेको भैमको मात करनेवाली । किन्तु सकरी नसल - जोभो - की वहाँ बहुत कमी है । चमरकेलिये यहाँ उपर्युक्त ठंडी जगह भी नहीं है। जब- तक खरीदकर लांग लाते है, क्योंकि इन छेरी- भेड़ी जैसी गायां से हल जोतने लायक बैल प्राप्त करनेका कोई दूसरा उपाय नहीं । लेकिन चमरको गमियोमे ऊपरी कहमें रखनेकी ही जरूरत नहीं पड़ती, • वल्कि लम्बे वालोंके काट देनेपर भी उन्हें कीडोसे बचाना पड़ता है । कहते हैं कीड़े चमड़े के भीतर पड़ जाते है । इस कठिन समस्यापर चिंता प्रकट करने शरड के महानिद्धका कहा कोई पर्वाह नहीं,<noinclude></noinclude> gfsl1rn3kmycnl2sm2ohot6yl4gxm8y पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९० 250 195205 665925 2026-07-07T15:27:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665925 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>i राप है। न भोजन छाजन ८१ tate प्रयोगपतिधानमे मैने इन्हीं की तरह की मुट्ठी भरको पहाड़ी गायक शाहीवाल के सॉडसे छ मासमे अपनेसे दुगुनी बछिया पेढे। करते देखा है. बन हिमाचल सरकारकी कृपादृष्टि चाहिये, यहाँ हवाई श्रावन जाना चाहिये, फिर हरियाना ओर शाहीवाल सॉड़ वरेलाम ठेकी गायकीर्यदान देगे, और इनको मारी दाम देकर मरनेकेलिये चानेवाले चमरीकी जरूरत नहीं होगी । वस्तुतः घी- दूधमा गायकी कमी और उनकी निकृष्ट जातिके कारण है, जिसे विज्ञान हटा सकता है, और विज्ञानको यहाँ श्रानेसे कौन रोक नगता है ? हमे श्रागे फलों और द्राक्षी सुराके साथ किन्नर से दूध और मधुकी नदियाँ बहानेकी श्राशा रखनी चाहिये । 1 / feet at जगह है। मईके अन्तिम सप्ताहमे तो एक कवल में सही नहीं समाती थी, अर्थात् यहाँ प्रयागके माघ-पूस जैसी सर्दी थी मुझे "डाक्टर से पट्ट लेना पड़ा और कोलीको नया पट्ट बुनने के- लिये कहना पड़ा, किन्तु जूनके ग्रन्नमे ऊपरकी यात्रा से लौटनेपर सर्दी एक लकी रह गई । मैंने रामपुरमे पशमीनेकी चादर, पट्ट ू, दमा नही लेना चाहा, मोचा इनके घर में तो जा ही रहा हूँ । यहाँ आनेपर पता लगा, पशमीना मले इधर से जाना हो, किन्तु उसका मृत और चादरे नमपुरमे ही तैयार होती हैं। गुदमे कनम्, मुङ-नम्, और मे बनते है। पट्टू ( ऊनी चादरे ) यहाँ भी तैयार होता है, किन्तु यह सब चीजें लोग लोई "कलिये तैयार करते हैं । लोई (मेला) रामपुर ने मालदीन वार होतो है, जेठकी लोई सोर २४ बैसाखसे शुरू होनी है इसके प्रतिरिक्तमोर कार्तिक और सौर पूसमे दो लोइयों | दमे दही लोई (मेला ) कार्तिकमे होती है, जिसके जिये विसर लोग महीनो कपड़ा तैयार रहती है. खेत वाला होते हैं, रहती है, न नग्न पति-स्थलीमे - करते हैं । उस समय फसल कट रास्तेमे ऊन अभी बर्फ पड़ी कर रहा है। इस ब्लोई में परि वर्ग या रामपुर पहुँचती हैं। अपना माल<noinclude></noinclude> qn1uyata7opbdqox81thwy33pctnqby पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९१ 250 195206 665926 2026-07-07T15:27:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665926 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८२ किन्नर - देश मे वेचनेकेलिये और नीचे से ग्राये मालको खरीदने के लिये | कहते थे, कभी कभी गुदमा, पट्ट, पट्टी रामपुरमें इतने सरते मिलते है, जितने सुनम् और रपूमे भी नही । यह तो वाजार भावपर निर्भर करता है. माल अधिक, खरीदार कम, और ऊपरसे विक्र ेता अपने मालको लाट- कर घर लौटनेकेलिये तैयार नही, फिर तो दाम गिरना जरूरी ठहरा। रामपुरमे पशमीनेकी चादर प्राप्य होनेसे मैने श्रीविद्याधरको दो चादरों- के लिये लिखा । साधारण मोटी एकपलिया साठ रुपये, वारीकएकप- लिया नव्ये रुपयेतक, दाम अधिक नही मालूम हुआ । लिख दिया पंडित दौलतरामजी के श्राते समय उनके हाथसे भेज दें । सदीं अधिक होनेके समय तो कोई नहीं आई। जुलाईमे एक चादर विद्याधर- जीने भी डाक से भेज दी और दो पंडित दौलतरामजीने भी । सोच रहा हूँ, क्या अब मुझे चादरोका व्यापार शुरू कर देना चाहिये । मैने ही तो दोनों मित्रोंको उन्हीं दो चादरोकेलिये लिखा था । इसी तरहकी गलतियों और हुई । मै अपना पता - " डाकघर चिनी, द्वारा शिम्ला” लिखता रहा । यारोंने समझा चिनी कही शिम्लेकी ओर पास में है, एक से अधिक तार मेरे पास पहुँचे, और कुछ तो किसी सभा सम्मेलनका सभापतित्व करनेके लिये भी । उन्हे क्या पता, कि मैं दुर्गम पहाड़ीको पार करते शिमला से १३८वे मोल पॉचवे फलीगपर बैठा हूँ । इतना ही नही, मैने मुजफ्फरपुर ( बिहार ) बाबू दिग्विजय नारायणसिंहका लीचियाँ भेजने केलिये लिख दिया, सोचा डाकसे सात- आठ दिनमें ग्रा जायेंगी। रामपुरतक रोज और वहाँसे चिनो हर दूसरे दिन डाक थाती है । ग्राठ दिनमें लीचियाँ खराब नहीं होगी । मुझे क्या मालूम, चिट्ठी पहुँचनेतक लीचियाँ खतम हो जायेगी । दिग्विजय वाचूने समझा, पूछापेखी करना खामखाहकी बात है, तव तक कही मालदहा (लॅगड़ा) का भी समय न चला जाये । उन्होंने भट टोकरी.भरवा आठ रुपये किराया भी दे रेलसें शिम्लाको पार्सल कर दिया, और विटी यहाँ मेरे पास भेज दी । बिल्टी मेरे पास सही<noinclude></noinclude> 8krlgxtqiokf4g26i127ypixibdkp3d पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९२ 250 195207 665927 2026-07-07T15:27:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665927 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' घुमक्कडका समागम जब कि हिमाचल सलामत और शायद आठ दिनमे पहुँच गई। और लॅगड़ा १ शिम्ला स्टेशन के पार्सल घरमे । मै तो वतेरा देवता- पित्तर मनाता रहा, कि कोई चोरी कर ले, आाखिर मुजफ्फरपरी लॅगड़े किसी काम तो ग्रा जाये ? बिन्दी कुमारी रजनीनायर को भेज दी, यद्यपि डरते-डरते, कही वह न समझ ले कि संडे लॅगड़ेको मेरे नत्थे थोपा गया । खैरः जहाँ समझने-समझानेकी इतनी गलतियों हुई, वहाँ एक और सही 1 किन्नरके यात्रियोंको खान-पान गरम वन्त्रकी चिन्ता नही करनी चाहिये । काम तो मेरा १६४८ मे भी चल गया, सरकारकी स्थापना हुये चार महीने भी नहीं हुये, फिर आगे आते- बालोबेलिये क्या चिन्ता ? उनकेलिये मै भी चारो ओर दर्वाजे खटखटा रहा हूँ। “उनकेलिये” इसलिये कहता हूँ, कि यद्यपि मै अपने दोस्ताले कहकर आया था और नाथमे कुछ रुपये भी लाया था. कि सालमे मात मासकेलिये यहाँ अपना स्थायी वाम बनाकर लौदूँगा ! लेकिन रामपुर पहुँचते-पहुँचते मालूम हुआ, स्थायी वास तभी बनाया जा सकता है जब साल-साल नीचे लौटने का इरादा छोड़ दिया जाये । यहाँ पहुँचनेपर तो साफ दिखलाई देने लगा, कि चिनी मेरा स्थायी निवान नहीं हो सकती, जवतक मोटर इसके पातक न जाये । "जो इच्छा करिहौ मन माहीं । हरि प्रदार कछु दुरलभ नाहा ।" हरिप्रताप नही हिमाचलसरकार - प्रताप सही ' ene एकाध दिन पुन तो फिर छानेकी बहुत शाके साथ चिनी नहीं छोड़ेगे, देखे धागे क्या होता है। ७ घुमक्कड़ का समागम चपनेको went are goes कह सकता हूँ । १६०७ (१४ साल की प्रायु) से घुमक्कड़ी अस्थायी थी, किन्तु १९०६ में<noinclude></noinclude> h60ujxvoa2fwrlxqoui59uogcturt40 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९३ 250 195208 665928 2026-07-07T15:27:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665928 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८४ किन्नर - देश मे घुमक्कड़ी लिया, तो पाँच वर्ष जबर्दस्ती जेल में वद रहने समयको छोड़कर आजतक वराबर घुमक्कड़ी करता रहा। पाँच साल जबर्दस्ती वद रहने के भी गिने जाये, तो भी ३४ साल घुमक्कड़ी-धर्मकी सेवा की है, श्रव १६ साल लग जानेपर मुझे पेशन लेने का पूरा अधिकार | किन्तु जिसने एकवार घुमक्कड़-धर्मको अपना लिया, उन पेन्शन कहीं, विश्राम कहाँ ? ग्राखिरमे यह हड्डियाँ पक्कडी करते ही कही बिखर जायेगी। मैं चाहता हूँ अपने देश के सभी तरणीको घुमक्कड़ बना दूँ। मुझे जान पड़ता है, "श्रथाता घुमक्कड़ जिज्ञासा" कहते घुमक्कड़ शास्त्र मुझे लिखना ही पड़ेगा । अव भी मेरी यात्राश्रीको पढ़कर कितने ही माता-पिताओ को अपने सपूतांसे वंचित होना पड़ा होगा, किन्तु अवतो मै खुलेयाम घुमक्कड़ धर्मका प्रचार करना चाहता हूँ, और हजारों माता-पिताओंका शाप और बानुचोकी वर्ण या श्री अपने ऊपर लेना चाहता हूँ । तुमक्कड़ धर्म मुझे प्राणोते प्यारा है। भला उसका प्रचार करना मेरा सबसे बडा कर्त्तव्य क्यो नहीं दरोगा मैं समझता हॅू जातियोके उत्थानमे घुमक्कड़ोका तबसे हमारे वतन देशको भी यदि महान् बनना है, तो उसे हजारो वुमक पैदा करने होगे, हाँ, जैसेतैसे घुमक्कड़ोसे इस महान् उद्देश्य 1 बडा हाथ है, पूर्ति होना मैं नहीं जानता, और न हर घूमनेवाले याचक या अयाचकको ने घुमक्कड़ कहता हूँ । घुमं वनने ने लिये कुछ साधनो की आवश्यकता है, उन साधनो को प्राप्त करनेपर ही ग्रासी घुमक्कड़ बननेका अधिकारी वन सकता है, वह निशित रेकी वापर चल सकता है । खैर, साधन, अधिकार, उद्देश्य घुमक्कड़-शास्त्रकी बाते हैं, जिनपर मैं यहाँ लेखनी नहीं चला रहा हूँ, उन्हें में फिर लिखूँगा और श्राशा है नातिचिरेण । सक्षेप यही कह सकता हूँ, कि सच्चा घुमक्कड़ सर्वसाधन- सपन्न हो नी तपश्चर्या से लेखक, कवि या चित्रकार के रूपमें अपनी सेवाये मानव समाज के सामने उपस्थित करता है। कच्चा युगक्कद्र-धर्म, जाति, देश-काल सारी मीमायोंसे मुक्त होता है, वह सच्चे अर्थो में<noinclude></noinclude> 6h2zfrllus4gpm1bbnjtjrh9dt8trit पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९४ 250 195209 665929 2026-07-07T15:27:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665929 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>घुमक्कड़ोका रागागम ८५ मानवता प्रेमीका उपासक होता है । वह दुनियासे लेता कम और देता विक है । एक घुमक्कड़ किसी दूसरे घुमक्कड़से जब मिलता है, तो उसमें उसी मात्रामे आत्मीयता बढी दीख पडती है, जितनी मात्रामे कि घुमक्कडी साधना मे वह ऊपर पहुँच चुका है। कोई कोई घुमक्कड़ी धर्मकी साधना 'स्वत सुखाय' करते हैं, किन्तु मै उन्हे निम्न श्रेणीका. घुमक्कड' कहना हूँ । इसका यह अर्थ नहीं, कि मै उनकी कठिन यात्रा और दुर्भर तपश्चर्यात्रोको हेय दृष्टिसे देखता हूँ। वह अपने मूक श्राचरण या वार्तालापसे नये घुमक्कड़ोकेलिये क्षेत्र पैदा करते हैं, आखिर अन नानाने अपनी यात्राकथा से ही मेरे हृदय मे घुमक्कडी काकुर पैदा किया, जिसमे कितने ही अपठित या अल्पपठित घुमक्कडाने जलसिंचन किया। इस यात्रामे भी मुझे कुछ घुमक्कड़ मिले हैं, जिनका परिचय - पाठकोसे कराये बिना मै आगे नहीं बढ़ सकता। एक-एक घुमक्कडके परिचन के लिये एक-एक पोथी चाहिए, जिसके लिए न मेरे पास अवसर है, न मैने उतनी सामग्री एकत्रित बा। जिन उसको बारेमें से यहाँ लिखने जा रहा हूँ, उनका गी-विभाजन नहीं करना चाहता, उसे पाठक खुद कर लें । --- श्रमी घुमक्कड़ - श्रमदो ल्हासासे उत्तर दो मास के रास्तेपर कोनर और कान्स् प्रदेशमे एक इलाका है । अम्दो-जाति यद्यपि नागोर जाति तिब्बती जातिकी ही अंग है, किन्तु वह तिब्बती लोग बहुत पहले सभ्यतामें दाखिल हुई । उसकी मुख्य भूमि पीत-नदी (हाटी) के बड़े चौकोर चक्कर से पश्चिम थी, जिसे चीनीं लोग हि या मिया कहते। इनकी राजधानी एकवार तुम्हान् | श्राधुनिक [नि हिया ) रहीं । पूर्वी चिन् यश तगृती (अग्न्द्रो) के राज्यको खाम कर दिया, विश्वश राज्य करने लगा। इसी समय पट पाहिशन धनी भारत यात्रा में (३१७-४२० ई०) ने और फिर वहाँपर ३६६ ई० में महान् चीनी इधर से गुजरा। तगृत् फिर<noinclude></noinclude> 2hb57re98n5varvtv3s2lowr2bd0mqn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९५ 250 195210 665930 2026-07-07T15:28:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665930 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>A किन्नर - देश मे पाँचवी टीमें रवतन्त्र होगये । ग्यारहवी सदी ( १०४३ ई० ) में चेन् युयेन् इनका सम्राट् था । वारहवी सदी के ग्रन्तमे, तगृत राज्य कंम, सान्सी और श्रदु (हार हो वक्रता के पान ) के उत्तरी नगरतिक फैला था । ततो विगि हान्का जबर्दस्त मुकाबिला किया, जिसके प्रतिशोध- चिगिने बहुत करतापूर्वक इनका दमन किया । पुरानी राजधानी ह्रान्से रूसी शोध को को कितने ही बौद्ध ग्रन्थ तंगूतो की थोर लिखित सामग्री मिली है। यही पुराने तगूत् या " हेवा" श्राज डोके नामसे प्रसिद्ध हैं। चौदहवी - पन्द्रहवी नदीमें इस जातिने चोख पा तिज जैसे महान् विद्वान और सुधारकको जन्म दिया। आज तिव्वतमे उसीके अनुयायी ( गेलुकपा ) धर्म और शासन के नायक है । - 3 यद्यपि तिब्वत मे डेपुङ्, सेरा, गन्दन और टशील्हुन्यो जैसे महान् विद्यापीठ हैं, जिनमेसे प्रत्येकमे तीन हजारमे सात हजारतक भिक्षु रहते हैं, किन्तु वह विद्यामे अम्दोके जोनी तथा मूके बिहारी का मुकाविना नही कर सकते। मेरी चारो तिव्वत यात्राओके सुपरिचित डेपुङ् ( ल्हासा ) के गेशे- शेरव और टशील्हुन्पो के सम्लोगेशे विद्वत्ता द्वितीय थे, और विद्वत्ताके लिये ही उन्हे मध्य तिब्बत में ला- कर रखा गया था । मेरी दो तिब्बत यात्रात्रो के साथी गेशे गेदुन्- छे फेल ( संघधर्मवर्धन ) एक सर्वतोमुखी प्रतिभाके आदर्शवादी स्वतन्त्रचेता विद्वान् थे-या हैं कहूँ। वह तर्क और दर्शनके विद्वान तो थे ही, साथ ही तिब्बती साहित्यका उनका ज्ञान बहुत व्यापक था । वह एक अच्छे चित्रकार और उसमे भी वडे कवि थे । भारतमे बारह तेरह साल रहने के बाद जब वह स्वदेश लौट रहे थे, तो उन्हे उनके स्वतन्त्र विचारांकेलिये पकड़कर जेल में डाल दिया गया, जहाँ दो साल से यह अद्भुत प्रतिभाशाली पुरुष सड़ रहा है । यह कोई ग्रा स्मिक वात नहीं थी, कि तिब्बतकी यात्रामे मेरी जिन पंडितों से बनि- ष्ठता हुई, वह या तो ग्रन्दा (तगुत) थे या मंगोल ।<noinclude></noinclude> 4lkpq8q2ulf02c3zw75zul6n96ll9nw पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९६ 250 195211 665931 2026-07-07T15:28:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665931 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>घुमक्कड़ोका समागम ८७ अम्दी लामा, जिनसे चिनीमें आकर सुलाकात हुई, उसी पुरातन तंगुत् जाति है । वह अस्पतालकी एक कोठरीमे ठहरे हुये । अस्पताल कई मालांसे बिना डाक्टरका है । कपौडर हर किसीस गड़ा मोल लेने को तैयार नहीं, इसलिये अस्पताल छात्रावासका भी और धर्मशालाका भी काम देता है, उसका श्रागन गढहो और घोड़ो- बनेका स्थान है । इसी पताली मरायमे दो घुमक्कड़ चाकर ठहरे। उन्हे किसीसे मेरा पता लगा, श्राये मिलने । श्रमदा छोडे उन्हें बीम साल के करीब हो गये । कुछ साल ल्हासाके पासके ठमे पढ़ते रहे, किन्तु उनमें उनका मन नहीं लगा । फिर सङ्-रिम्पोछे ( हिमवन्त महाराज, कैलाश ) के दर्शन के लिये आये वहाँ किसी योगी लामाने उन्हें अपनी तरफ खीचा और छ-सात साल से वह इधर की विचर रहे हैं। अभी रखालसर ( मन्डी ) तोर्थका दर्शन करके लौट रहे थे । कुछ ग्यगू-खम्पा रारतेमे मिले, जिन्हे सामान दे आगे बढ़ श्राये । खम्पाकी स्त्री प्रसव के बाद बीमार पड गई, जिससे वह समय- नही पहुँच सके | मुझे नही बतलाया, किन्तु पुण्यसागरसे कुछ धन्न उधार मांगा। मैंने सुना, तो उन्हें मुक्ताहन्त हा महायता करने- केलिये कह दिया। लेकिन दूसरे दिन खम्मा लोग श्रागये, अम्दी बचे चावलको लोटाना नहीं भूले, चपि उधारके लौटाने- की बातको मैने रवीकार नही किया । कहाँ है हाव्हो ( पीत नदी), केहीं कीकोनारे (नील-सरोवर ) और न्यू ? और यह व्यक्ति हमारी भाषा भी नहीं जानता, किन्तु भारत के बहुत से नागमे घूम आया है, सिंहल है, और अब वर्मा जानेकी बात कर रहा था । (लंका भी हो ग्राया उसके लिये पृथ्वीका चारो खूद जगीरीमे है। दूसरे दिन हम टहलते समय दो घुम के यजमानके डेरेपर गये, देखा हमारा पूर्व परिचित खम्पा तरुण श्री वही है । वह भला बिना चाय पिलाये कैसे छोड़ता अम्दो परि- वाजता लिये पाठ कर रहे थे, अपनी व्यवहार बुद्धिसे कुछ दवा<noinclude></noinclude> hxj26wc3capo8uixb16arbpm5hh4asl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९७ 250 195212 665932 2026-07-07T15:28:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665932 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशम और रोगोपचारकी वात भी बतला रहे थे। वह अपने देशभाई गेशे धर्म-वर्धनको पहिले ही से जानते थे । बतलाया, तिब्बत में श्राजकल अन्धाधुन्ध चल रही है। मानसरोवर में डाकुने अड्डा जमा लिया है | ल्हासा मठके गुन्डोंका राज्य है । सेराके एक मंगोल निश्चय ही मेरे मित्र गेशे तन्दर ) शांत रहनेकेलिये कहनेपर उनके क्रोध के शिकार हुये । भोट-रिजेट रेडि लामाको भी उन्होंने मार डाला | गेशे धर्मवर्धन यह कहने के लिये जेल में डाल दिये गये, कि वह यहाँ भी शासन प्रजाहित सामने होने की बात करते थे । फिर उन्होने भारत में युद्ध, लदाखपर सकट ही नही वर्मा लङ्का और जागनतककी वातें पूछी। यद्यपि वह आदर्श श्र ेणीक्ने घुमक्कड़ नहीं है, अर्थात् अपने अनुभव और अपनी आँखो से देखी बातोंको दूसरोको साक्षात्कार नहीं करा सकृते; किन्तु उनके साहस और कष्टसहिष्णु जीवनकी कौन दाद नही देगा ? 1 मगोल घुमक्कड़ - वाह्य मगोलिया ( राजधानी उर्गा, आधुनिक उलानवातोर) के निवासियो को खलखा मगोल कहते हैं । यद्यपि मंगोलिया सोवियत् सघके भीतर नहीं है, किन्तु उसने सोवियत् आर्थिक राजनीतिक व्यवस्थाको स्थानीय परिवर्तन के साथ स्वीकार किया है । १६१८-२० ई० से ही वहाँ नये समाजकी रचना होने लगी । लेकिन उससे पहिले ही हमारे घुमक्कड़ अपने देशको छोड़ चुके थे । सुदूर मंगोलियासे। छ महीनेकी कठिन यात्रा; मरुभूमि तथा हिमाच्छादित पर्वतका उल्लघन, डाकुधां के संघर्ष से गुजरकर मध्यतिव्वतमे पहुँ- चना ठट्ठा नहीं हैं; इसीलिये वाह्य मंगोलिया, बुर्यत् मंगोलिया ( चैकाल सरोवर) और खेलर ( अन्तर मंगोलिया ) तथा अस्त्राखान से जो मंगोल भिक्षु ल्हासा पहुँचते, वह अधिकाश लगनवाले विद्यार्थी साबित होते | हमारे घुमक्कड उनके अपवाद थे, और हमारी प्रथम यात्राके साथी मंगोल सुमतिप्रज्ञकी भाति निरक्षर भट्टाचार्य न होते भी विद्यासे ·<noinclude></noinclude> lncfovaptcdic7jv14qao3trif6l5oq पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९८ 250 195213 665933 2026-07-07T15:28:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665933 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>घुमक्कड़ोका समागम विशेष रुचि नहीं रखते थे । वर्षो ल्हासाकी गुम्पा (मठ) मे रह तीन साल ग्योंचीके पान किसी जगह एकात ध्यानमे विताया, अव संगी लिया लौटने की न सावना है न इच्छा ही, इसलिये वह विचरने जीवन विज्ञा देनेका निश्चय रखने है । भारत के बोद्ध तोथोंका यह पहिला भ्रमण है, किन्तु इसे प्रारम्भ ही समझिये । तिब्बत के लोग भी गर्मियो भारत में रहने मे घवडाते हैं, फिर निवेरिया के चलने वसी मंगोलिया के निवासियो के बारेमें क्या कहना है ? जाड़ोमे घूमते वह अमृतसर पहुँचे, उस समय वहा मारकाट चल रही थी। मारकाटवालोने तो उन्हे नहीं पूछा इनका चेहरा और लाल वस्त्र इस वातके प्रमाण थे, कि वह रामदेवाने दूर हैं। हाँ, पुलीसने जरूर गिरफ्तार करके दो-तीन दिन बंद रखा, समझा रूसी बोलशेविक है। रंग ज्यादा साफ और अधिक लाल था लेकिन मंगोल श्राखे और शमश्र हीन सुह कही छिपे रह सकते हैं ? दो तीन दिन बाद पुलीसने छोड़ दिया । इतनेपर भी उनकी सहानुभूति पाकिस्तान के साथ नहीं है, क्रोकि भारत उनकी धर्मभूमि है, उनमें मंगोलियाका सांस्कृतिक सम्बन्ध है । उनसे रहामा अपने मित्रो वारेमे भी कितनी ही वर्ति मालूम हुई। मेरे मित्र गेशे तन्दर उनके देशभाई थे । वह पहिली ही यात्रासे मेरे मित्र बन गये थे । वह भी इन्हीं की भाति खलखा भूमि ( बाह्य मालिश ) की क्रान्तिले पहिले छोड़कर तिब्बत चले थाये थे । पहिले हर साल मगाल सार्थ तीर्थयात्रा करने व्हाया श्राता। उनके हाथ सोना भेजने, जिनसे मटांके मंगोल विद्यार्थी नुखपूर्वक विद्यान्ययन करते । क्रान्तिके बाद वह ग्रामदनी वन्द हो गई, किन्तु मंगोल मेहनती विद्या में इसलिये नहायता मिल जाती थी । गेशे तन्दर रेटट् लाना ( पीछे मा रिजेंट ) के उस समय भी गुरु थे । समयारी पक्ष उस साल १६ "हार" (डाक्टर) उपाधि- प्राप्त करनेवाली वह रर्वप्रथम आये थे । सबसे अन्तिमवार नेरी चतुर्थ नियात्रा' समय मिले थे । वह .<noinclude></noinclude> 533ki2c56zf25i988c24nb1pv0lmq13 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/९९ 250 195214 665934 2026-07-07T15:28:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665934 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६० किन्नर - देशम लौटना चाहते थे । किन्तु उनका पार मगोलिया के प्रति उस समय मचूरिया से लौटकर फिर तिब्वत जा रहे थे कलकत्ता कलि- पोके रास्ते । वह राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, विद्याव्यसन ही उनके जीवनका ध्येय था, तो भी उनके हृदय में अपनी मातृभूमिका प्रम था, और नवीन मगोलियाके वह प्रशासक थे । इस लिये लामाग्री के बीस वरसके विरोधी प्रोपेगंडा के बाद भी वह स्वदेश मन्चूरिया और मंगोलियाकी सीमापर पहुँचे भी, करना उन्हे सम्भव नही मालूम हुआ । यदि नवीन सहानुभूतिका जरा भी सकेत पाते, तो जापानी उन्हे अपनी जेलमे रख देते, और जापानसे जरासा भी सम्पर्क सिद्ध होनेपर मंगोल भी उसी तरह स्वागत करते । बेचारे हताश होकर लौटे रहे थे। खलखाभूमि के देखने की सम्भावना नहीं थी। शेष जीवन तिब्बतमे ही बीतनेको था, वह नौ साल से अधिकका नहीं हुआ। वह इधर सेरा महाविहार के • एक खन्पो ( श्राचार्य ) बना दिये गये थे । यह बड़े सम्मानका पद था । सेराके पाच हजार भिक्षुत्रोंके चार प्रधान आचायोमे एक का पट प्राप्त करना भारी गौरवकी वात थी। लेकिन साथ ही यह सेराकेलिये भी गौरव की बात थी, जो उसे गेशे तन्दर जैसा आचार्य मिला था । किन्तु व तिब्बत के यह विहार विद्या और विद्वानोंके निवास स्थान नही गुन्डोके डेरे वन गये हैं। वहाँ विद्याव्यसनियोकी नहीं रक्तगणि राक्षसोका बोलवाला है। रेडिट लामा रिजेंट होकर सबको प्रसन्न कैसे कर सकते थे ? उन्होंने इनके हाथ अपने प्राण खोये, गुन्डोको शात करनेका विफल प्रयत्न करते गेशे तन्दरने भी अपनी भविष्य की उमगोको मदा के लिए कुर्बान किया । 1 गोल घुमक्कड़ यह भी मालूम हुआ कि गेशे धर्मवर्धनको इनलिए पकड़ा गया, कि उन्होने मगोलियाकी श्राधुनिक व्यवस्थाकी प्रशसा की । गेशे धर्मवर्धनने "धर्म्मपद" ही नहीं "गीता" और " ग्रभिज्ञानशाकुन्तल” का सुंदर पद्यबद्ध अनुवाद किया है। इस पुरुषसे तिब्बती साहित्यको बहुत ग्राशा थी, किन्तु आज वह रहा सामे<noinclude></noinclude> 6uta766gatozb63i9ycv4ae21uqruxn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०० 250 195215 665936 2026-07-07T15:28:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665936 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>घुमक्कडका समागम ६१ चन्द्र है। मंगल मक्कड़ के कथनानुसार उन्हें जेलमे नहीं नगर में चन्द रखा गया है। उन्होने वतनाया, कि रेडिडकी हत्या के बाद पुका कोई टूटा रिजेट बनाया गया है। जिसके बाद कुन्देलि लामा रिजेंद्र हानेकी सभावना है। ल्हासामे बहुतसे लामा और विद्वान् तलवार के घाट उतारे गये हैं, बहुत से गद्दीधारी लामा गले मे काट मारे वढीका जीवन बिता रहे हैं। यह सब हे प्रभुताके लिये । दलाई लामा गभी १४ सालका वच्चा है, अभी उससे प्रभुताकाक्षियोंको नहीं है । किन्तु क्या तिब्बत ऐसे ही रहेगा ? तिब्बत के भाग्यका पीला चीनकी रणभूमिमं ही रहा है । ३- लचारी चैतन्य - जब मैंने ब्रह्मचारीके साहसका खान किया. तो रेंजर शर्माने कहा- दया वहीं जो पंगीमें एक स्त्रीके पीछे पागल हो गया । मैने कहा - श्राप तो सनातनी है, पागल क्या ब्रह्मा और शिवजी नहीं हुये ? सरकृतकी सूक्ति है :- विश्वामित्रपराशरप्रभृतयां वाताम्बुपर्णाशना, ' ते पिस्त्रीमुख कर्जे मुललित दृष्टचैव मोहगतनाः । शान्यन्न सघृत पयोदधियुत ये मुजते मानवा, मिन्द्रियनिग्रह यदि भवेद् विन्ध्यस्तरेत् सागरम् || फिर जो विश्वामित्र, पराशर श्रादि जो हवा-पानी-पत्ता खानेवाले थे, वह भी के सुललित मुखपकजको देखकर मुग्ध हो गये। श्रादमी दूध दही नहित शालीके भात खाते हैं, शिनिग्रह हो जाये, तो कहना चाहिये विध्य हा है। यदि उनकी समुद्र में तैर कहते हुये मैंने बतलाया, उक्त दोपके होते भी यात्री के साहस- श्री महिमा नहीं ण्ट स्कती । चैतन्य जन्म मोड़ा जिले में कहीं पर वर्ष पहिले वाण और उनकी श्राधी श्रायु घुमक्कड़ीमें<noinclude></noinclude> jzm978av30588tlyjtll1l7060zk7it पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०१ 250 195216 665937 2026-07-07T15:29:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665937 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. ૨ किन्नर-टेशन वीत चुकी है। उन्होंने अपना भ्रमण क्षेत्र काश्मर, लाख, मानसरोवर, नेपाल लेते सारे हिमालयका बनाया, और कठिन से कठिन रास्तोको 'चाल डाला । कह रहे थे, १५-१६ साल पहिले मै जुब्बल के पहाड़ो में घूम रहा था, एक दूकानदार ने बड़ी खातिर को । भोजन कराने के लिये उसकी तरुणी कन्याने हाथ-मुँह धुलावा, साथ • खाने के लिये बैठी । उसकी मॉने हम दोनोको साथ बैठाकर भोजन कराया । रातमे एक कोठरीमें रख दिया गया । मैने संयम किया । दूसरे दिन गृहपतिने घर जमाई वननेका प्रस्ताव किया । इन्कार करने- पर रोक रक्खा । फिर चाकर अपना निश्चय वतलाऊँगा - यह कहकर चला आया । यह पथकी प्रथम वाधा थी । ब्रह्मचारीने अधिक समय चम्बा, कुल्लू, जुब्बल जैसे खुले यौन-सम्बन्धके प्रदेशों में ही बिताया है । उच्च श्रेणी के घुमक्कड़ो के लिये और योग्यताओं के साथ “चोरी नारी मिच्छा | और घुमक्कड़ - इच्छा" इस ब्रह्मवाक्यका पालन करना • श्रावश्यक है - "नारी" से बन्धन बननेवाली नारीका अभिप्राय है। किन्तु ब्रह्मचारी से यह श्राशा नहीं की जा सकती, कि वह इस वाक्य का पालन करेंगे ! उनका ब्रह्मचर्य का ढोग भी उनके दो घंटे की समाधि लगाने की बात जैश ही यात्राके सबलका एक अंग है। वह अपने कथनानुसार एक वार मूत्रकृच्छ्रके शिकार हो चुके हैं, हॉ अधिक योगा- भ्यासके कारण | यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, उनकी विचरण भूमि ही ऐसी है, जहाँ मूत्रकृच्छ्र उपदेशका ग्रॉकडा ७५ सैकड़ा से कम कोई ही कोई बतलाता है। इसमे इन लोगोका दोष नहीं, दोप हे अधिक सभ्य कहलाये जाने वाले नीचे के लोगो और गोरोका, जिन्होने इनकी सामाजिक स्वच्छन्दताका अनुचित लाभ उठाया। अपने यहाँ तो यौनप्रतिबन्ध के मारे वेश्यावृत्ति मात्र ही यौन- सदाचार पालनका एक मात्र साधन बना दिया, और वेश्वाये रतिज रोगका खुला प्रनाद अपने भक्तोंको वॉटती हैं । उसीका लेकर हमारे मारे पहाड़ो में पहुँचे और यहाँके मुक्त सम्बन्ध वातावरण में उनका लगाया विश्वा एकसे दा<noinclude></noinclude> hoslls4u0jumrb8xik2us5nkoakz3a1 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०२ 250 195217 665938 2026-07-07T15:29:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665938 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तुमक्कड़ों का समागम ६३ दोसे चार, चारसे सोलह होते आज सारे पहाडमे फैल गया है। श्रव आप ही बतलाइये, गरीव पहाड़ियांको ब्राज इस दशामे पहुँचा देनेका प्रहार हो रहा है पक, तथा रुपा : दीप किपपर है ? इसका परिणाम पागलपन और stoer भयकर जिसका साकार रूप हमीकेश जनमूलाकी पडे कोटी-कोहिनो की पल्टन के रूप मे दिखलाई दे बनने की चाकाक्षा रखनेवालोके मार्ग में यह बहा खतरा है, इसीलिए मुझे यह बात विशेष तोरसे यहाँ लिखनी पड़ी ! सरकारकलिये रतिजरोग कितनी बडी समस्या है, इसे स्वयं समझिये | सिलिन और दूसरी ऐसी रामवाण औषधियाँ निकल आई है, जिस चन्नमूत्रकच्छुको चुटकी बजाते बजाते भगा देते हैं; किन्तु एक हिमान्चलको हो रतिजरोग निर्मुक्त करनेके लिये करोड़ा वाली दवाइयां चाहिये, ग्रह डालर कहाँसे आयेगे ? रोगमोचन वी दो नवता है, जब अपने उपयोगकी पेन्सलीन हम खुद तैयार करे । ब्रह्मचारी कश्मीरने नेपाल के पहाड़ोको अगुल गुल छाने हुये यह बहना तिशयोक्ति नहीं है । और ऐसे रास्तो से, जिन्हे एसार अधिकाश पाठयोका शरीर सिहरने लगेगा। कश्मीर से दाल होते जनवर पहुँचना और वो भी परम बेसरोसामान के साथ, ऐसी बेसीन नहीं है। जपथ जा जाकर पहाड़ोररके सरोवरी ग्लेशियरो पाके नरस्यारथल और नये तीथका श्राविष्कार सीन नहीं है । वह यूला खड्ड (नदी) के ऊपर के डाड़े पर के गरीब और पायी तपत्याची बाते कर रहे थे। वहाँ एक कुएडमे विष्णु देवी कृतियाँ है । मैंने समझ लिया, यदि इनकी और उनकी सत्तर प्रतिशत वातांकों में ऐसे ही काट देता है, तो भाग लोकितेश्वर मजुश्री दज्रनारिकी त्रिमूर्ति होगी । एक पुरानी गुम्वामे उक्त तीनों मृतियों राम, मजेने पूजी जा रही है। यह मालूम है, नक्क<noinclude></noinclude> ccl6v7dbk7oot1oeb7s19habjg2v2jq पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०३ 250 195218 665939 2026-07-07T15:29:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665939 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૬૪ किन्नर-देशम भाव प्रधान होते हैं, उन्हे लिंगभेद करने की फुर्सत कहा ? मेने कहा- इन छोटे सरोवरोके तीर्थ प्रचलित नहीं होगे, मानसरोवर काफी है । यदि श्राविष्कार करना ही है, तो जानो लाहुल (कुल्लू) के परले पार लदाख के रास्तेपर । वहाँ एक नगे पर्वतकी जड़से मोटी मोटी सह धाराये निकल रही है, जिनको हिन्दू ग्रासानीसे तीर्थ मान सकते हैं । यद्यपि वहाँ पहुँचनेकेलिये कुल्लूसे दो जबर्दस्त जीते पार करनी पड़ेगी, जिनमे एकके पासका पर्यंत तो जान पड़ता है, विशाल कयेकी तरह सरक रहा है, और हर समय उसपर से पत्थर गिरते रहते हैं । किन्तु कठिनाईको हमारी विमान कम्पनियोके स्वामी धर्मात्मा से हल कर सकते हैं । वहॉ फोलक-डंडामे काफी मैदानी जगह है, जहाँ थोडे ने परिश्रम से छोटे पत्थरोको हटाकर हवाई मैदान बनाया जा सकता है ! वल्कि आजकल तो शायद हमारे सैनिक विमान उसी श्राकाशसे ह रोज जा रहे हैं । ब्रह्मचारी मेरी बातको इतना व्यानते सुन रहे थे, मानो वह कल ही वहाँ जाकर किसी तीर्थराजका झंडा गाड़ देगे । मैने एक बार उस नाम तीर्थका महातम एक सिख तीर्थ-यात्रीको भी बतलाया था, जो गंगोत्रीकी और गुरु गोविन्दसिंहकी तपोभूमिको हूढ़ रहे थे | कही ब्रह्मचारीके जानेसे पहिले ही फोलकडडाका नाम तीर्थ गोविन्द तीर्थ न वन जाये ? ब्रह्मचारीके नेपाली गुरु चबामें रहते हैं, जहाँ उनकी सिद्धाई की बड़ी ख्याति है । चम्बा तो उनकेलिये घर-सा ही ठहरा। “पर्यटन विविधान लोकान् " तीन वर्ष पहिले वह किन्नर देशमे पहुँचे । लदाख, स्पिती, मानसरोवरकी अनेक यात्राओ के सपर्कसे वह तिब्बती भापाका कामचलाउ ज्ञान रखते हैं, उनके प्रतिद्वंद्वी घुमक्कड मोनं-रौला के पास वह ज्ञान नही हैं। साथ ही शक्ति उपासक होनेसे बौद्ध लामात्रो- के प्रति ब्रह्मचारी बहुत उदार है, और लोगोको भक्त श्राचारी वैष्णव वनानेकी नही भेद-बुद्धिकी शिक्षा देते हैं । माई के प्रसाद (मदिरा) के माईकी भाँति ही अनन्य भक्त है, और दिनमें जितनी बार मिल जाये.<noinclude></noinclude> 62asuls95kz8mrka9n4tz5ilxzf15d2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०४ 250 195219 665940 2026-07-07T15:29:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665940 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>" घुमक्कड़ोका समागम ६५ "अधिकाधिक फल' मानते हैं । किन्तु माससे वैसा ही सख्त पहेंज रखते हैं, जैना नाईके प्रमाद के साथ माईके सामने साष्टांग दण्डवत् करने वाले कितने ही गुजराती- मारवाडी सेठो को कहते है "शुद्धि” (मास) लेवन करनेपर माई हाथसे काटे बकरेकामास मांगेगी, अभी तो मैं नारियल या कूष्माकी दलि देकर छुट्टी ले लेता हूँ ।" मै ब्रह्मचारीकी इस वातपर विश्वास करता हूँ । ब्रह्मचारीकी श्रायु चालीसके ग्रास- पान है, शिर पर तैलाक्त दीर्घकेश और मुँहपर लम्बी दाढी रखते हैं, दोनोमे अभी सफेदीका रपर्श नहीं हुआ है। तीन वर्ष पहिले कैलाश से विचरने यह यहा पे छ सील श्रागे पगी गॉव मे पहुँच गये। दो चार दिन ठहरे | लोगोमे श्रद्धा देखी, निश्चय किया, यही योग-समाधि लगानी चाहिये। जानते थे, तिब्बतके लामा तीन साल और कोई कोई तो जन्म भर लिय गुफामे बंद हो जाते हैं, भक्त लोग उनके खानपान- को एक छिद्र ने खाया करते है । ब्रह्मचारीने तीन सालकी प्रतिज्ञा ली । पीने ६१० फीट की ऊँचाईपर है, ब्रह्मचारीने उससे भी तीन हजार फीट ऊपर के स्थानको चुना, जहाँ पहुँचने मे पहिले वृक्ष- कटिबन्ध समान हो जाता है । भक्तांने वहाँ उनकेलिये सात कोठरियोका घर बना दिया । ऋषिकुल तैयार हो गया ब्रह्मचारीने यही नाम अपने समाधि-मन्दिरको दे रखा है। उस स्थानपर बर्फ की बात क्या पूछनी ? चार पाँच मारा तो ऋषिकुल वर्फ से ढका रहता है। लेकिन योगीको चिन्ता करनेकी श्रावश्यकता नही, ऋषिकुलमें लगि गज ही नहीं खान-पानसे (हाँ, पान जरूरी ठहरा, क्योंकि 'एक बार भी पान न मिलने पर ब्रह्मचारीका पेट दर्द करने लगता है ) भटार हर वक्त नरा रहता है। पंगीमे तपस्या समाधि शुरू हुई, दो माल होने होते उधर इन्द्रका श्रासन डगमगाने लगा। वह अपनी चादसे मज था । जो हथियार उसने विश्वामित्र और दूसरे हर्पियो पर प्रयुक्त किया, उमीको उसने ब्रह्मचारीपर छोड़ा। यह" कोई टिन नही था। ब्रह्मचारीने लामाद्योकी तरह एक छिद्र छोड़कर 1 - (<noinclude></noinclude> a1s9262fjww8p50xyk8iyqv379j61fs पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०५ 250 195220 665941 2026-07-07T15:29:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665941 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>28 किन्नर - देशम अपनी गुफाका द्वार वन्द नहीं कर लिया था । भक्त जन सत्सगके लिये श्रया ही करते थे, और अकसर माईका प्रसाद लेकर जाते । भक्तिनोंका निवेश भी वाव था, बल्कि ब्रह्मचारी के प्रतिही मोने रौला के कथनानुसार तो वह छोकरियो के गानेपर हारमोनियम वजाबा करते थे । खैर, इन्हीं छोकरियोमे एक इन्द्रके हाथका हथियार बनी, ब्रह्मचारी पुराने ऋपियो के पद चिह्न पर चलने के लिये मजबूर हो गये । "ग्रह भैरव. व भैरवी" हो गया । भैरवी हफ्ता-दस दिन ऋषिकुल में अहोरात्र रह गई । ब्रह्मचारीने समझा, लोग इसे सिद्धाईका एक श समझकर चुप हो जायेगे, किन्तु यह उनकी गलती थी । ब्रह्मचारी कोठीकी चडिका- माईके अनन्य भक्त थे, वहाँ याते जाते रहते थे । कानाफूसी हो रही थी। एक दिन सभा जुटी थी, वहा ब्रह्मचारी भी थे, लड़कीका बाप भी था और दूसरे लोग भी । प्रसन छिड़ा हुआ था । वापने भरी सभामें कहा- “मैं ब्रह्मचारीको देता हूँ।” कन्यादान मिल गया, समाये, किन्तु पिताको यह अधिकार नहीं था । अपनी लड़कीको ब्रहाचारी फूले नहीं लड़कीका दान एक वार वह दूसरे के हाथमें कर चुका था, और किन्नरोकी प्रथाके अनुसार नगद गिनवाकर । पहिले दामादने लड़की पाने की कोशिश की, मामला आगे बढ़ते देख पिताको भी अकल ग्राई, किन्तु व लड़की नहा मानती थी, वह ऋॠषिके चरणोकी दासी वन गई थी, पिने उसका ज्ञाननेत्र खोल दिया था। मामला अदालत मे पहुँचा । ऋषि तहसीलदारकी अदालत मे गये, मौने-रौला के अनुसार हथकड़ी डालकर ' पकड़ मॅगाया गया । खैर, किन्नरकी प्रथाके अनुसार धनीके लगे धन ( वीस रुपये ) देकर उन्हें छुट्टी मिल गई । अव भी पीके सारे भगत ऋषिकुलसे वागी नहीं हो गये हैं, विवेकी पुरुष हर जगह होते हैं, किन्तु ब्रहाचारीका मन उचट गया है । आज ऋषिकुल सूना है। महीने भर के भीतर ही उन्होने ' .<noinclude></noinclude> 81hzajop8hvmf5zygmf3fapui07gjet पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०६ 250 195221 665942 2026-07-07T15:30:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665942 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>डीका समागम 63 मैरीका पितृकुल में भेज दिया । ३०-३१ मईको वह मुझमे मिले ।,, समय तीर्थ श्राविष्कार की बात उन्होंने की थी । १९ जुलाई को फिर आये | कह रहे थे 'पाडवतीर्थ या मन्दिर बनानेका प्रबन्ध कर चारा हूँ । ब्राजकल आदमी नहीं मिल रहे हैं । अव केलाश क्रिपा करने जा रहा हूँ ।" सच्चे कैलाशकी नहीं, झूठे कैलाशी, जा मेरे से इन समय भी दिखलाई दे रहा है। परिणा- कमसे कम एक चौथाई मार्ग तो अवश्य वकरियांको ही पसन्द श्रा ता है। परिक्रमा केलिये जाते वह यहांसे फिर पट्टी गये। मैं उनसे यह कहना भूल गया "मङ्गोल घुमक्कड़की भाँति तुम भी अपनी रवीका साथ ले जाओ ।" कहता भी तो मज़ाक के तौरपर ही, क्योंकि कितीका मकड़-पथसे च्युत करना बडा पाप है । मङ्गोल घुमक्कड़ शक्तिसम्पन्न हो गया है, किन्तु यदि घुमक्कड़ दिव्याशा मात्र सी उसके भीतर है तो उसे "त्यक्त्वा चान्द्रायण चरेत् " का पावद होना होगा । ४ -- सोनेराला - माने शैला यह उसका नाम नही है, लेकिन ये लोगोने उसे यही नाम दे रखा है। वस्ना उपत्यकाके ऐतिहासिक धन कमवा किन्नर बाबाने मोने कहते हैं, और रौला साबु- प्रकारका तर निगम स्थल के कारण उनका यह नाम पड़ा । माने-रालाका परका नान है रविलाल । उनका जन्म १६०६ सना नेपाल के पूर्वी भाग धनकुटा जिले में किन्तु दार्जिलिना के म हुआ था। २१ पालनक घरमे रहे “श्रीनामानीधं । वाप पढे नाम । वीथीका दस काम था। फिर परदेश जानेवा निरहुआ। गायक लाग बर्मामें नोकरी करते थे, माने-राला भी चन निलम ना करते रहे। मालूम हुद्या, शान-रियासत हे कुछ देश भाश्यारे नाम वहाँ पहुँच गये। वहाँ जमीन वादनेकेलिये टन शर्त पर मिल जाती थी, नशा राजा । बहुत लोग नाग्य-परीक्षा कर रहे 15<noinclude></noinclude> i3tg24cfacndmt519kdmilnqxhbjbd9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०७ 250 195222 665943 2026-07-07T15:30:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665943 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>$ हद 1 किन्नर - देश में थे । मोने- रौलाके कथनानुसार उनके सामने एक आदमीको लाखका नीलम मिला, एक ग्रादमीने पद्रह हजारका रतन पाया, किन्तु पैसा हाथमें बाते ही डाकू मारकर उसे छीन ले गये । ऐसे खून ग्राम थे, कुछ लोग खोदकर भाग्य- परीक्षा करते, और कुछ बुरा तलवार चलाकर । मोने-रौला और उसके साथी परीक्षा में सफल रहे, किन्तु पाच मासमे सफलता स्वीकार कर लेना क्या पुरुसका काम है ? शायद उसी समय हो गये ख़ूनने भी हिम्मत पस्त कर दी। बहुमूल धातु- पत्थरोकी खानोमे सारे ससारमे यही सनातन धर्म मालूम होता है । अमेरिकाकी कलेफोर्नियाँ, अष्ट्रेलियाकी विक्टोरियाकी सोनेकी खानोकी भी यही बात रही है । दूर क्यो जाइये, हिमाचल-प्रदेश के पड़ोस में जम्मू-काश्मीरकी नीलमकी खानोंमें भी ऐसा ही खतरा कुछ उलटे रूपमें देखा जाता है । वहाँ नीलमकी खानोके नातिदूर कूटका जगल भी है। कूट सुगन्धित द्रव्य है, जिसके एक भारका सौ सवा रूपया धरा समझिये | आस-पास के पहाड़ी लोग नीलमकी लूट करने जाया करते थे, और शायद अब भी जाते हैं । नीलम हाथ लगा तो हज़ारोंका वारा न्यारा, नहीं तो कूट चुराकर सौ सवासौ बना लेना मामूली बात थी । हमारे दोस्त पुण्यसागर चम्बामे पाच सालतक धुनी रमाये रहे और हर साल नीलम - लूट के लिये जाया करते, किन्तु हाथ श्राता कूट । नीलमके लुटेरे लाहुल और चम्बाके प्रचलित दुर्गम मार्गों से खान के पास पहुँचते, कही जगलमे पाँच पाँच सात सात मिलकर डेरा डालते, रातको नीलम खानपर पहुॅच ते । नीलम - खानपर कहाँ पहुँचते ? वहाँ तो काश्मीर सरकारकी ओरसे सशस्त्र पहरा पडता, कुत्त भी इसी काम के लिए रक्खे हुये थे । खान खोदकर फेंके पत्थर और मिट्टीकी ढेर जो खानसे सैकड़ों गज नीचेतक फेकी पड़ी रहती थी, वस इसीको टटोलना नीलम चोरोंका काम था । इसमे क्या हर था, यदि काश्मीर सरकार शान- रियासत की भाति दस सैकडापर लोगोको भाग्य परीक्षाकी थाज्ञा दे देती । नीलमचोरी के शहीद ग्रन<noinclude></noinclude> ny5dxfrbaiszf93a3bsu5509ux9x5ku पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०८ 250 195223 665944 2026-07-07T15:30:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665944 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>घुमक्का समागम . हट गिनत बतलाये जाते है । पुण्यसागर तो ही रलामत बच प्रादे कुशी करने पर उन्हें भागना पड़ा । वासी खड्डके एक भूतपूर्व नीराज भी कानेके रुपमे भौजूद है। , नाने रोला न्नवारण व्यक्ति नहीं थे, जो नौकरी रुपन वटारते रहते । उनके पास जब दा ढाई सौ तो उन्होंने मानेने मनीपुर के रारते लौटना चाहा वर्मा करते एक एक रुपया हो गया. यह एक बार सफल होने के लिये पगडीका रास्ता पकड़ना भौतको सिरपर बुलाना था । लेकन कोने-रौलाने १६२८ मे वहीं सस्ता लिया । कही कह गेको नरनागो के देशमे दिनमं जगलमे सोना र रातको चलना पहा । में एक दिन वह मनीपुर पहुँच ही गये । विना पानकेसनप पहुंचना था। रोला मीधे जाकर मन्त्री पालादागये, सन्त्री दार्जिलिङ्गके रहनेवाले थे, उन्होने उन्हें नोकर रखवा दिया | वेला गारखा सिपाहियांकी रोटी बनाने लगे. किन्तु भाय बाद उन्हे पेटकी भारी वीमारी लगी । लोग निराश हो गये, वेदाने पातके ढाई रुपयांको किसके पास भेजने- केर पूत्र । शैलाने कहा- मेरे शरीर देना और रूपाकी दान- पुरन में लगा देना | रौलाकी दक्षिणी वापर पहुँचकर सिंहापर जानेमे ब्रह्मपुत्र प्रवाहित कर भी क्षर · भेद नहीं था, घरमा याने सीखे हुए ढरापर सीमित था । लेकिन लारना में वकी लगाते ही चगा होने लगे । उनक श्रादथों पर ही व े साल मनीपुरमें रहे। "हा विश्वान होत चीकने पात", शीशी रौला में धीरे-धीरे बुम- कृति होने लगा । नात साल उन्होंने कभी नौकरी बना घूमने लगाया । भोगनेकी उनकी यादत नहीं थी, मी वादत नहीं जहाँ तक उनका वचन है। किन्तु रौलाके प्रदि परीका करना है. वह पत्थरमेने पैना निकालना जानता है। लाने भी स्वीकार किया, कि एक बार महाराज पदमसिह<noinclude></noinclude> eyv6sztcqgazkcyierypq4w2xm37sp0 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१०९ 250 195224 665945 2026-07-07T15:30:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665945 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०२ किन्नर - देश में " खवचन है "न वर्णा न वन्श्रमाचार धर्मा | और यदि सचमुच डीके पूर्ण अनुकूल धर्म स्वीकार करना चाहते हैं तो वह है बौद्धधर्म, जो देश-काल-व्यक्तिके विविध परितत्र्यसे मुक्त कर देता है. साथ ही विश्वके वहुत वत्रे भाग में ग्रहष्ट परिचिनेकी भारी सख्या श्री प्रदान करता है । ' खैर, रौलाने एकसौग्यारह नवग्वाले घरमे भी व निकृष्ट कारीका बाना लगाकार भूल वी इ में सदेह नहीं किन्तु घुमक्कड़ हर परिस्थिति मे अपने लिये रास्ता निकाल लेता है, यह मत सिद्धान्त है । चुना च रोला हो किसी के हाथका सीजन पाने में कोई एक- नाज नही । रौलाने एक से अधिक बार सैनुवध तयाचा, पूर्व में मुदिया- परशुरामकुडसे द्वारिकातक ही पहुँच पाये, अर्थात् भारत सीमापार नही कर सके । हिमाल न मे पैदा हुये पले रोजाका प्र खास आकर्षण हे । चेला होकर रौला सालभर त दिने गुल्के मठमे कैंकर्य करते रहे, यही अक्षरसे परिचय हुआ । निर्फ एक ग्यान्ह जगा लेने भर से तो काम नहीं चल सक्ता, कुछ पाठपूजामी आ- है । रौलाने र पढे, और लगे गीता, रामायण, दुखवावर, - प्रेमसागर पर हाथ साफ करने । गीता-नहरूनामका पाठ तो खैर वह . पुण्यार्थ करते है, किन्तु वर्षो 'करत प्रत अभ्यास" अब वह भाला- • ग्रन्थ समझ लेते हैं, हिन्दी खूब बोल लेते हैं। देखना हो, कि कैसे हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है, तां सैलानी देख ले । नेपालके एक पहाड़ी कोने में पैदा हुये रोलाने न उतनी बता प्राप्त कर ली है, कि वह "स्वान्त सुखाय रोला रघुनाथ गाथा" ही नहीं पढ लेते, बल्कि मीने (कास) से शिग्य शिष्याओ को "तुखसागर" "प्रमदागर"- का पाठ भी पढाते हैं । एक साल एक जगह टिक जाना गैलाके लिये बहुत था, १३.३५ में रौला द्रविड देशसे उत्तरकी ओर चले, फिर बदरी नागाव, ज्ञान-<noinclude></noinclude> 3ns192vq01h11t8n0xq3mhc3eywcajk पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११० 250 195225 665946 2026-07-07T15:30:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665946 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>घुमक्कड़ोका समागम १०३ नारीवर होते नेशन काठमाड श्राग पूर्वस जनकपुर निकल गये । वहाँ से फिर लौटे तो मुक्तिनारायण ते माल ( २६३७) गगोत्री होते और उधर लोटकर किन्नरदेश जा ( नेपाल - तिवसीमा ) पहुँचे । मानसरोवर दूसरी वार गये, निकले। तबसे किन्नर रौलाके घुमक्कडी क्षेत्रकी केन्द्र -भूमि वन गया, और जैसा कि श्रारम्भसे मैने लिखा, उनका नाम ही मोने-रौला पड़ गया । किन्नर भूमि रह गये । यहाँ रौलाको पहाड वह चार साल लगातार डाडांके फादने के गाय एक और व्यसन लग गया, वह था गावो के लड़कों के लिए स्कूल बोलना । रोलाने काम, सोरट्, ग्याबुद्द, हड्गो ग्रादिमं स्कूल ले। कई नापक नहीं मिला, तो खुद पढ़ाने लग गए । यहाँ कुछ वर्ण रियायतने हिन्दोको राजभाषा मान ली थी, नहीं तो उर्दू - जमाने में गैलाका काम ग्रामान न होता । राजभाषा मान लेनेपर बाज हिमाचल सरकार के दुवारा हिन्दीको राजनाना घोषित कर देने पर चिनी तहसील और धानेके सारे काम उर्दू में ही हो रहे हैं, स्कूल में भी दूसरी श्रं शीसे उर्दू अनिवार्य पढाई जाती है, हालांकि नो बालक को अपने अधकचरे उर्दू -ज्ञानके उपयोगका कभी मौका नहीं मिलेगा | रोला के स्कूल खोलने का ढंग है - चॅदेमे रुपया जमाकर उसका वेतन देय यापकको बैठा देना, उधर जगलविभागने . । साप कभी खुद भी पीटपर पत्थर उठा स्कूलका मान उठाने में लग जाना । गोसे श्रदूरदर्शी भले ही अधिक हो किन्तु वेशर्म उतने पिक नहीं हो कि वह नाधुको अपन गांवकेलिए इतना काम करते देख लाख सूदकर चल देते । छ छ ट आठ महीने में रौलाने स्कूल स्पीकृत करवा लिए । रौला पहिले सिर्फ दूधाधारी थे। शायद भास भूत-वाला हाल भी काम कर रहा था। महाराज पदमसिंह- अपने पास तुलवार उसे अन्न भोजन करनेपर राजी किया | अपने पिरले नाल निमोनियाने मग्गायन हो जानेपर रौलाने- भोजन खाना शुरू किया चार मानतक किन्नर में<noinclude></noinclude> q53jv4xy81edn8u27mlrbx9vwjftlvz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१११ 250 195226 665947 2026-07-07T15:30:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665947 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०४ किन्नर देश मे हकर वह हरिद्वारके मेले मे गए ( १६४१ ; फिर जगन्नाथतक जा पलटकर हरिद्वार, लाहौर और बदरीनारायण जा पहुँचे (१६४२ ) । बहासे थोड़ा नीचे उतर नीतीघाटीकी ओर तपोवन ( नानपानी ) में एक वर्ष तक तप करते रहे। फिर वहाँसे मानसरोवर ( १६४ ) लौटकर शिकी होते सराहन पहुॅचे। मोरके लोगांको रौलाके थाने क पता लगा, वह दौड़े दौड़े सराहन पहुँचे, उन्हें स्कूल चाहिए था । रौलाने जाकर वहाँ स्कूल खोल दिया, और छ मास बाद उसे स्वीकृत भी करवा दिया। १६४५ मे रौला फिर निकले और अवके बम्बई होते त्रियाँकुर- तकका धावा मारा । लौटने पर हब्गो ( १९४६ ), ग्यावोड (१६४७ ) - मे भी अपनी ओर से स्कूल खोलकर मजूर कराये। रौला किन्नर देशमे स्कूल खोलने वाला वावाके तौरपर प्रसिद्ध हो गया है। रौलाने पाच वार मानसरोवर की यात्राकी है, दो वार और भी गये, किन्तु बीमारी के कारण वहाँ तक नही पहुँच सके । पाचो वार वह अपनी पीठ पर गुड पत्तू चाय वॉधकर गये, भोटिया लोगोके हाथका कन्नजल न ग्रहण कर अपना सत्तू चाय घोलते गये और आये। कितनी ही वार निर्जन वयावानमे अकेले चल पड़े। एक वार रास्ता भूल गये | भटकने रहे, ग्रन्नमे समझ लिया, अब मरनेके अतिरिक्त कोई चारा नही । मौत से डरना रौलाके शास्त्र मे नही लिखा है, लेकिन साहन छोडने को भी वह ठीक नहीं समझते। वह एक पहाड़पर चढ गये, वहाँसे कोई मनुष्यावास दिखाई पड़ा, और वह वहाँ पहुँच गये । मान- सरोवरका इलाका इधर कितनेही सालोमे डाकुओ द्वारा उत्पीडित हो रहा है। रौलाको एकसे अधिक बार उनसे मिलनेका मौका मिला है । एक बार वह मानसरोवरकी परिक्रमाने जा रहे थे । देखा, एक वैरागी- को डाकुओ ने एक कधेसे कमरतक काटकर दो टूक कर दिया है. और दूसरा सिसक मिमककर दम तोड़ रहा है । रौला के पहुँचते ही डाकू .<noinclude></noinclude> qa7s2jeetlzhu95xrx8rgjno8f9gxbh पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११२ 250 195227 665948 2026-07-07T15:31:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665948 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>geet डोका समारास १०५. उसपर टूट पथ । रौलाने अपना सारा सामान उनके सामने पटक दिया ओर इशारे कहा- "ला हो तो ।' कुत्राने नत्तू घोर पह ( ऊनी चादर ) कर उसे छोड़ दिया । याने दूसरे डाकुमा घेरा । उन्हें उसने हमारेसे वतलाया "पीछे डाकुत्रांने सब छीन लिया ।" और गर्दनको मने झुकाकर संकेत किया, 'लो काट लो । " कुत्रांने छोड़ दिया । लुट पर भी रौलाकी लगोटीमें सौ रुपये धे थे । मौलाका देवता भी कभी कभी हाथी क्षात्कार हुआ है। एक और पेरकी भाँति लाल-लाल हाथ पैर प्रकट होने लगे, पैला डर गये । मानसरोवर बारवर नुमानजीको कर रहे थे। , यात्रा राह- मूल वेले वह एक गुफामे ठिटरे पड़े थे। चारों ओर- मे निराश थे नते थे, भूख या डाकू काम तमाम कर देंगे । इसी समय श्रावाज थाई "टाया नही, कोई ग्रनिष्ट नही होगा ।" रौला दूधर-उधर देखने लगे, किन्तु वहाँ कोई नहीं दिखलाई पड़ा । यहाँ raha कौन हिन्दी में बाल रहा है। भय दूर होनेकी जगह और बटने लगा, जिसपर फिर वही श्रावाज ग्राई । बसी तरह एक बार या मैला निराश होंगे भरे मानसोरवर के मैदान मे एक जगह तक चोदनी थी। इसी समय एक आदमी उनके पास था खरा संगम । रोल ने “ौन है' कहकर पुकारा, किन्तु कोई जान नहीं। राला रोच रहे थे "मारना चाहता है तो मार ले, पैने क्या नाम " लेकिन तीसरी बार पुकारने - पर मूर्ति पर चली गई । मांगे। बहना है एक साधा मेरोलाने अनेक दैवी चमत्कार देखे । उनका और बहुत रहते हैं । पिटले लड़कीपर देवता श्राया । दोनों हाथों की किशोर मिर्च- पायानेका नेक<noinclude></noinclude> d0np9gj47q85b6daridfc4aem7jtyop पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११३ 250 195228 665949 2026-07-07T15:31:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665949 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. २०६ किन्नर - देशमे c तैयारी करनेपर देवता वालने लिये तैयार हो गया। हा, पहिले उसने अंगुली वाघते समय वडी आपत्ति की ! देवता शुद्ध हिन्दी फरफर वोल रहा था, हालांकि तरुणी हिन्दी विल्कुल नहीं जानती थी; यही नही उसने कांग्रेसके नेताथांके नाम बतलाये, और यह भी कि अमुक दिन अग्रेजोका राज्य उठ जायेगा । सभी वातें सच निकली। किन्नरदेश ऐसी भूमि है, जहा ग्राकर सभी व्यक्ति देवविश्वासी होकर लौटते हैं, छोड़ दीजिये मेरे जैसे ग्रभागोकी, जो कहते हैं—मै तो तब विश्वास करूँ, जब देवता बतलावे चिनीके ठाकरकी तलवार वर्तन- अंगूठी या कोई ऐसी जगह बतला दे, जहासे प्राप्त वस्तुसे तत्का- लीन इतिहासपर प्रकाश पड़े, अथवा कोई लुन तस्कृत ग्रन्थ बोलकर लिखा दे, किन्तु हो ऐसा ग्रन्थ जिसका अनुवाद भोटभाषा में मौजूद है | मौ-रौलाने देशमें भी देवताओ की करामाते देखी हैं, किन्तु उनको वत्पा- उपत्यकामे देवता बहुत दिखलाई पड़ने हैं । रौला लड़को-लड़कियो के स्कूल खं लने ही से सतुष्ट नहीं है, बल्कि सनातन वैष्णवधर्म के प्रचार में वह सतत प्रयत्नशील रहते हैं, इसके लिये तह-रुखिनो को प्र ेम- सागर, सुखसागर पढ़ाया करते है । कीर्तन के वह बड़े प्रचारक हैं, और एक बार तो डर लगा, कही वह कीर्तनवाला रौला न बन जाये । एक वार वह अपनी गुफामें पढ़ा रहे थे, कि एकाएक एक पोडशी अचेत 'होकर गिर पड़ी । रौचा घवड़ा गये - हे भगवान् | यह क्या वला आई | मालूम हुआ पोडशीपर देवता आ गया -पोडशियों श्रोर प्रौढ़ा ही देवता अपने अवतरणको सीमित रखते हैं। खैर, दोनों हाथोकी मध्यमा गुलिया वॉधी गई, गदा-कड़वा धुनों देनेकी तैयारी की गई । “मारके मारे भूत पराये" भूतने बोलना शुरू किया । रौलाने हनुमानजीको आधी दूर तक ही सिद्ध करके छोड़ दिया, नहीं तो बस्पार पाले लोग लुगाइयांका वह दूसरी तरह भी बहुत उपकार कर सकते थे । रौला एक साहसी यात्री हैं, अपने पुरुषार्थ मे उन्होने किन्नरवाली-<noinclude></noinclude> tsq2dx598kml3xnogtv39cs255nbdal पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११४ 250 195229 665951 2026-07-07T15:31:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665951 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>जगात क १०७ किया है। शिनाका कमी व उनके हक पूरी तोर- का से खुलने नहीं देती | (5) जंगीतक १३ जूनको ग्रस चिनी पहुॅचे चाबीस ही दिन हुये थे, कि ऊपर चलका निश्रय करना पडा, यद्यपि श्रमी वहा वर्षाने भीगने का टर नहीं है, तो भी बाले पहिले ही निवसे सीमातातक हो त्राने की आवश्यकता थी। सोचा, जब जाना ही है, तो हो थाना करिये। दासान यात्राका प्रवन्ध करके वाद भी ध्यान रहे, कि सुके कम न हो। इसे वर भी उधर ही जा रहे थे, किन्तु उन्हें अपना सरकारी काम करते जाना था, इसलिये उनका और क्या साथ मेरे साथ थे पुण्यसागर । एक वैद्यने बहुत जोर देकर कहा था—''हम यापकी सेवाम चलगे, " किन्तु जो चौवीसों पत्रे नसे. उसे अग्नी वात पूरा करनेका व्यान कहाँ- मेगा? - एक दिन पूर्व ही पोड़ा बगले पड़ाव के लिये मँगा लिया नया किन्तु अगला पड़ाव ६ मील श्रागे पङ्गतिकका ही चार पाच मील गंज तो टहलना टहरा । मैंने घांडेको नहीं नदीयां (वास) पर भेजा और हम दोनों चल है, धनील पहेले ग्राथ मीज पीछे देवदान्वनने कर जाता है। चलते चलत दूर हम खट्टने पहुँचे। यहाँ कुछ दूर उतराई हो मगम है, जिनमें दूसरे के पुलको<noinclude></noinclude> 41wm4uddbxsrqztvts5aeo7dazipcx2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११५ 250 195230 665952 2026-07-07T15:31:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665952 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०८ किभर देश मे हिमानी वहा ले गई । अस्थायी पुल वन गया है। हिमानी प्र लाखो टन वर्फका कारवा होता है, जो महादानवकी भाति जोरकी गर्जना करते चलता है । उसके मार्ग वृक्ष चरचर टूटने, शिताये नत फूटती काडकी दूरतक सूचना देती हैं । उनमे भी जबर्दस्त होता है हिमानीपातके श्रागे ग्रागे चलता सभा बात, मन- दस-मनकी चीजोको फूँकसे तिनकेकी भाति उड़ाता चलता है। मत किसीका घर किसीका गाव हिमानीके मार्ग पड़े। ग्राम तौर रे हिमानीके अपने निश्चित मार्ग होते है, अर्थात् बड़े-बड़े नाले और खड, जिनके खोदने मे हिमानीका भी काफी हाथ होता है। जिस माल हिमवृष्ट अधिक होती है, पहाड़ोंसे टूटे लाखो करोडो उनके वर्कका काफिला मनमाना रास्ता बना लेता है, कितनी ही भयानक आता जाती है, और यदि कहीं सोयेमे काफिला श्रा पडा, तो लोगोकी भागने की भी फुर्सत नहीं मिलती। पिछले साल कई बड़े-बड़े ग्लेशिनर और कुछ तो नई जगहों पर थाये । पगी खड्डका हिम-प्रवाह था तो भारी, किन्तु खड्ड भी बहुत चौड़ी है । उसे वन सड़क के पुल और कुछ पनचक्कियों (घराटों) को ही बंत करनेका मोका मिला । अव घराटो- में कितने ही तैयार होकर चल रहे हैं। एक लोहार परिवार अपना गट बनाने में लगा था, काम अभी शुरू हो हुआ था, किन्तु लौटने समय वह करीव करीव तैयार हो चुका था । 'लोटार भ्रातृदय, ि लित पत्नी, एक सयानी लडकी और एक लड़का जान पडता था, घर सूना करके चले बाए थे। साथ ही सोनारीके सारे हथियार हथभाथी आदि भी मौजूद थे। हमने थोड़ी देर वहा विश्राम किया, छोटे भाईको कानकी चादीकी वालियाँ बनात देखा । यहा कामे दमदम वी ate वालियोंका गुच्छा लटकाया जाता है। कान भला क्या उन्हें समाल रुकते वालियाँ मृत पिरो वालीके सहारे लटकता रहती हैं। , खड्ड पारकर चढ़ाई थी। पी सारे घर एक ही जगह नहीं है<noinclude></noinclude> ph3a217c1kbdx07auwjeuqcj6x3eshh पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११६ 250 195231 665953 2026-07-07T15:31:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665953 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>जगत २०६ डाक- बहुला गले के ऊपर है -झला क्या इसे प्रासाद कहना चार बहुन र देवदारकी धरन इतनी टीज जान नहना है, बनानेवालो ने नार वर्षका ख्याल - के होना है। बने था श्रधोशा गई । वङ्गला साफ- राममि है। चौकीटारका द पीड़ हो गये की कीदारी करते। इसके बाकी थी। तरकारने जमीन नातवाने मे दाम नहीं लूंगा, बस चोकीदारी रहे । २०३२ ये सानिक घर बैठे कम धातु नहीं है, और फिर г के 1 - जज नहीं, महाने में कहीं दो-एक भूले- या जाते हैं । हो जिन समय हिमाचल प्रदेशके इस सेवा उपज प्रधान हो जायेगा, श्रौ उनके यातायात के लिए कटर की नजदीक चली छायेगी, तो इधर सेलानी बताने लगेगे उपनय इस वगलेका सदुपयोग है। | चादर लेका बलवा, फिर सोज और वयालूका जव फटी ऊँचाई के स्वच्छ वायु- ये खीजादीना चाहेगा। पञ्जनियर साहब अभी ऊपर गये थे । उन्हे लिये यहां तक छाये सड़क इन्सपेक्टरं नहर थे। चोकोदारने दौड़-धूपकर कही से हा सहाजनकी इच्छा नहीं थी, फलां के पकने में काफी देर बदले गये । गतं पड़ाव के लिये गद्दा मिल गया, ..लिये भारी वा नहा रही। प्रति वंगारूकी प्रतिमील जल महनाईके दिनोंमें पति नहीं दीनाना प्रते मील कर देना चाहिये। लेकिंन 'पहन है,कुछ परवशता भी अवश्य केटावर को हर तभी बुलाया नवीन लिये स्थायी नौकर<noinclude></noinclude> 3ua8enrfvuhdfavw54jzu9jq4oz7ml8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११७ 250 195232 665955 2026-07-07T15:32:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665955 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११० किन्नर - देशमे रखे, जैसे कि डाक विभागने रख रक्खे हैं । इसकेलिये स्थायी कुलियोकी आवश्यकता होगी। वेगास यहाँ अधिकतर सियाँ होती है। सभी कार्य- में आप यहाँ स्त्रियोको ही जुटी पायेंगे । खेत मे पुरुपका काम है ह चला देना भर, नहीं तो कुदालका काम स्त्रियाँ करती है. निकाई, कटाई, ढुलाई सभी उन्ही के जिम्मे है | सभी भाइयोकी सम्मिलित पत्री होती है, इसका यह अर्थ नहीं कि यहाँ बहुपलिता नहीं है । एवमे अधिक पतियाँ वहुत लोगोने रक्खी है। पति लोग कहते हैं- क्या करे घरका काम नहीं चलता । डाक्टर ठाकुरसिंहकी दो ही पत्तियाँ हैं । एक पत्नी घरपर रहती है और दूसरी अस्पतालपर साथ मे । अस्पतालबा पीने दो जुड़वा कन्याये जना । वह रहे थे --"यदि इनमें से एक लड़का होता ? यह घरका काम क्या करेगी ।" उनका यह कहना गलत था । किन्नरमे पुरुष स्त्रीके बरावर काम कहीं नहीं करता। सारी गिरस्ती स्त्रीपर रहती है। धर्मानन्द पहिले तहसील लिपिक ( मुहर्रिर ) थे, व बहुत बूढ़े हैं । शरीरमे हड्डियाँ-हड्डियाँ हैं, जातक धोया नही जाता, और वही अवस्था उन्हे देखकर कोई विश्वास भी कर सकता है, मेहरी । एक कूटे एक पीसे एक भाँग रगरी ।" 'जाती, किन्तु दोपहर बाद घरमानन्द शायद कभी ही नशे में झूमते न मिले । नीचे गॉव लेकर तीन मील ऊपर कडे तकके खेतों का सारा काम तीनों वीवियों करती हैं । तव भी डाक्टर ठाकुरसिहको शिका- त ! हाँ लड़कियोंके दूसरेके घरमे जानेका डर है, किन्तु उनकी भी दवा अपने हाथ मे है, भिक्षुणी (चोमो) बना दो, और हर घरमें एकाध भिक्षुणी देखी जाती हैं। लड़के और क्या पुरुपारथ करेंगे ? वदनका कपड़ा फट हाथ-मुँहकी है । भला कि “धरमानन्दकी तीन भाँग तो नहीं रगड़ी हम चलने को हुये। मेटने कहा - "घोडा ना गया है, किन्तु उनका किराया १ लामा करमापाने रारं तकका पाँच रुपया दिया था, आपके लिये एक रुपया छोड़ देगे, चार रुपया दे दे ।" २३ मीलका बीस रुपया में एक बार दे चुका हूँ, इसलिए नाव नीलका चार<noinclude></noinclude> 6f0kcx0qu5g21vhrtsq2ylm1gypleyi पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११८ 250 195233 665956 2026-07-07T15:32:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665956 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>जगावक रुपया बहुत बात नहीं थी किन्तु उसके एहसान जनानेका ढग मुझे बुरा लगा | महा - "मुझे घोडा नही चाहिये ।" सुन लिया था. राता बहुत कठिन नहीं है । चले श्रागे राता के दो मील की रहा। छोड़ पहुँचने पहुँचते बहुत थक गये। रार ऊंचाई शिमला १९९६ मीलपर है। फिर बना है। कई मकान तो गांव ८६०० फीटक गांव कुछ साल पहिले जल दूरसे देखने पर महाप्रासाद जैने जान पड़ते ह । चिनीकी भाँति यहा मी पडाव नहीं है, न डाक- गला हा । उनेक लिये जगल-विभाग या पा० डब्लू० डी० के साधारण पर है | हमारा सामान और नाथ चलनेवाला तहसीलका पहा जगलातक घर मे पहुँच चुके थे, यद्यपि पी० डब्लू. डीके सर उससे अधिक नये और साफ थे। घर हवा चल रही थी. जिससे नदी अधिक गरम हवाकी, खामकर जाडी ग्राम शिकायत शाम वा चुकी थी मालूम होती थी ।. रहती है । जगल. विभाग कुछ अधिक यान रखता होगा, यह आशा थी किन्तु घरकी एक धरन किसी समय भी किसी यात्री के सिरपर गिर सकती है । मालूम होता है, जबतक धरन गिर नहीं जायेगी, तवतक मरम्मत करनेका नाम नहीं लिया जायेगा । आखिर नारतीय परिपाटी भी यही ता है। सरकारी सरकार सहायता प्राम यात्रियों के आराम के लिये कनौर- में और शायद सार बुशहर खाज है, कि उनके आते ही मेट (चारम) खाली पानीका प्रबन्ध करे, गांववाले वारी वारीसे एक आदमी- बानी करने के लिये दें। यह पद नेवा अनिच्छापूर्वक ली जाती रे जो बिहारी जमीदारियोके खाजको बाद दिलाती है। यह खाज होने होंगे और जितनी जल्दी टूट जाये, उतना ही अच्छा । यद्यपि पर यात्रा करनी और कठिन हो जायेगी। किन्तु<noinclude></noinclude> 63py16ao1xajldtaeub4o7ik3t2hz13 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/११९ 250 195234 665957 2026-07-07T15:32:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665957 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११२ किन्नर-देशमं लोगोके कप्टोका भी हसे यान देना ही होगा । कुछ फर तो अपने साथ बहुत-सा सामान माग फल रखने की जालीदार मदुके और नारा घर लेकर चलते हैं, जिनके लिये पंद्रह-वीप बंगाल लेने पड़ते हैं । वेगरूका तीन ग्राने प्रति मील तो जरूर हो जाना चाहिये जिसमे लोग अनावश्यक सामानको साथ न ले चले । पुण्यसागर साथ थे, वह श्रावश्यकता के बारेमे जानते थे और खाना ठीक समयपर तैयार कर देते थे । बेगारुके बारेमे मैने कह दिया था --- हिसाव से श्रमिक दिया करो और फुटकर पेश लौटाया गत करो । रार पराना गाँव है, भोटभाषी इसे 'शा" के नाम पुकारते हैं । यहाँके हर गाँव के ऐसे दो-दो तीन-तीन नाम होते हैं और अग्रेजी नक्शे तथा कागज पत्र मे विगड़कर सबसे प्रवाछनीय नाम लिखे मिलते हैं । भौगोलिक स्थानों के बही नाम स्वीकार किये जाने चाहिये, जो स्थानाय नापाके हां, दूसरी जगह के रहनेवालोको क्या अधिकार है, कि नामोक "बदल दे। यहां किन्नर - देशके मुद्रित नामोको उनके स्थानीय नाम से . खिलाकर देखिये ( स्थानोंके तिब्वती नाम भी ऐतिहासिक महत्व के है, इसलिये हम यहाँ उन्हे भो दे रहे हैं ) - तिब्बतीय स्थानीय (हमस्कद् जैमा) 25 लिखितनाम हम्स्कद ' रगोरी रड-गोर मुरा ग्रोस्नम् पौडा पावड् " कगीस की-ग्रास्नम् 2 निचार नल- चे पानवी पानब् पान " भावा ," कटगॉव ग्रामढ़ क्रवा वे 77 27<noinclude></noinclude> it7zaqzqi4dif4q6ezr9rtq3t1ce4qa पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२० 250 195235 665958 2026-07-07T15:32:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665958 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११४ किन्नर - देशम लिखितनाम हमस्कद रकूचम् रकू-छम् तिब्बतीय रकू-छम् स्थानीय हमुस्कद जैसा मेवर मै वर् मे वर् " बारङ् वार प्वारी पोर् पूर्वणी पुन्-नम् रिस्-पा रिस्-पा वा-रखू पोर् पुन्नम् रिव्-दङ् " " " ठगी ठ-द शाद 27 मोरड् रिंग- नम् पू स्पू स्पू स्वव्-नमग्या खवनम् - ग्या खबू-नमग्या पुरिढ़ (कनम् ) ह० जै० ग्याव ग्याबुङ् ग्याबु " तखि-लश्-कोलङ् " 33 सुन्नम् सुन्नम् सुङ्-नम् सुन्नम् रोपा रोपा ह० जै० श्याम् श्वासो श्य-पा " लवङ् लव्-ग्ड क्यप्-पा कनम् क-नम् क-नम् ני دو स्पिलो "" लिप्पा लित्पा लितिङ सर जंगी ६० जै० fer "मू अकूपा राहू -पंगी तेलगी कोठी<noinclude></noinclude> d925mnegkar0nxteo1ye4g7ssa1qfwi पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२१ 250 195236 665959 2026-07-07T15:32:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665959 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दुनी हुने fait चिते लिखितनाम हमस्ऋद् ख्वागी जगीतक १११ तिव्वतीय स्थानीय ह० जे० ग्वल्-स-चिन् " स्वारगी वारि " रोगी गंगे " यूला यूला دو मीरु मिर-थि (मि थि) " " उदनी उरने ( उ ) " " टा-लड " चगाव i " चीज देखने में नहीं एक पत्थरको रिन्छेन्- जड- बनाया | गाँव- जीवित रहा, तो पुराना गोव होनेपर भी रारने कोई पुरानी यानी । लाग पुरान चिन्हांके बारेमें पूछने पर गांव के नीचे बतलाते है। मतलज पार रिव्वामे महान् भाषान्तरकार पोत्नभद्र ग्यारहवी सदी ) ने एक सुन्दर विहार वाल के मनसे पाप वा, और सोचा, यदि यह भिक्षु और ऐसे बिहार बनायेगा, इसलिये इसका काम यही चाहिये । मद्रका मालूम हो गया, हथियार लाने का वहाना करके वह छत पर पहुँच गया, और वहान जो छलाँग मारी, तो सतलज इन पार रामे जा कूदा। ग्राज भी उस पत्थर पर विग्ने जगह वटा वना है, भला इससे ऐतिहासिक होनेवा क्या प्रमाण चाहिये ? तमाम कर देना महान भाषान्तरकार के बढ़कर उक्त घटनाके या सिद्ध रहते है, जिनमें छोटा तो निलने नहीं आया, किन्तु प्रमले निलने थापे । वह कई सालतक तितके खम् प्रदेशमेानाधि, तन्मन्त्र सीखते रहे। लोटकर अपने गाँव - महानद्ध प्रादर्श नरकृत शिक्षित नालून हुये, उनका कहना थापटक लाग बौद्ध धर्मका नाम नी नही जानते थे, मेरे दादाने<noinclude></noinclude> 0h8c92hvdfyvs3xav13x0fi9chb01yk पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२२ 250 195237 665961 2026-07-07T15:32:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665961 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११४ किन्नर - देशमें लिखितनाम हमस्कट तिब्बतीय स्थानीय रक्चम् रक्-छम् रक्-छम् हमूद जैसा मेवर मै-वर् मेर 33 वार वारद वा-रड् " प्यारी पोर् ं पोर् " पूर्वणी पुन्-नम् रिस-पा रिस् पा पुन्-नम् रिव्-दङ् 29 وو ठगी ठ-हो शाद 33 मोरड् रिंग- नम् पू स्पू स्पू पुरिड (कनम् ) व्-नम्ग्या खवनम् - ग्या खव्-नम्ग्या ह० जै० ग्याव ग्याबुङ् स्याङ् " तखिङ्-रूश्-कोलङ् " 33 सुन्नम् मुन्नम् सु-नम् सुन्नम् रोपा रोपा ६० जै०- श्यास् श्वासो श्यप्पा 33 लव- रड क्यप्-पा , कनम् क-नम् क- नम् دو स्पिली पिल्-पा लिप्पा लित्पा लिद् लितिङ असर असर अ-छ- र ह० जै० जंगी ज ग्यडू-पा ज-रम् अकूपा अकूपा अकूपा अकूपा राष्ट्र रार शा ह० जै० -पंगी प-हू प तेलगी तेले कोठो कोश-टिड - पे " हमुकद् वत् ). ह० जे०<noinclude></noinclude> bimc3f675xsfh7bz0txoyhwkqoo9om0 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२३ 250 195238 665962 2026-07-07T15:33:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665962 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>जगीतक ११२ लिखितनाम हमस्कद तिव्वतीय स्थानीय ख्वागी खड् ६० जै० दुनी ने " चिनी चिने ग्वल-स-चिन् " वारगी " रोगी रोगे " यूला चूला मीर " 93 उदन " " चगाव " " पां } मिर्-थि (मि-थि) उरने ( उ ) ठान्तड देखने में नही एक पत्थरको पुराना गाव होनेपर नी रार मे कोई पुरानी चीज वानी | लाग पुराने चिह्नांके बारेमें पूछने पर गांव के नीचे बतलाते है । मतलज पार रिव्वामे महान् भाषान्तरकार रिन्- छेन्- जड- रत्नमद्र ग्यारहवी सदी ) ने एक सुन्दर विहार बनाया। गाँव- वाली के नवमे पाप बा, और सोचा, यदि वह भिक्षु जीवित रहा, तो और ऐसे बिहार बनायेगा, इसलिये इसका काम यहीं तमाम कर देना चाहिये। मद्रका मालूम हो गया, हथियार लानेका बहाना करके वह छतपर पहुँच गया, और वहाँने जो छलांग मारी. तो सतलज इस पार राजा कूदा। याज भी उन पत्थरपर महान् भाषान्तरकार के तिने जगह गढ़ा बना है, भला इससे बढकर उक्त घटनाके ऐतिहानिका क्या प्रमाण चाहिये ? गोदा सिद्धहते हैं, जिनमें छोटा तो मिलने नहीं आया, किन्तु न मिलने आये । वह वई नालक तिब्बतके खम् प्रदेशने साधि, तत्र-मन्त्र सीखते रहे। लौटकर अपने गाँव श्राद्ध श्रादमा नरकृत शिक्षित मालूम हुये, उनका कहना कलंग बौद्ध धर्मका नाम नी नहीं जानते थे, मेरे दादाने<noinclude></noinclude> fg55t4gvb6bm8ev9pdduau763bd5hm7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२४ 250 195239 665963 2026-07-07T15:33:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665963 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९६ ' किन्नर - देशमे श्राकर यहां धर्मकी स्थापना की। यह वारणा त्रान्त है। यद्यपि इसने सदेह नहीं कि उनके दादा गाँव मे गुरुकी तरह माने जाते थे । दूसरे दिन गाँवमे गये । तीन पीढ़ी पहले सारा गाँव ग्रागसे जल गया था, और उसे फिर से बनाया गया, उसी समय बिहार (बौद्ध- मन्दिर) का भी पुनर्निर्माण हुआ । प्रस्थान करते समय सोचा, जरा गाँव के देवता के मंदिर को भी देख ले। देवताका मदिर भी श्रागकी लपटसे नहीं बच सका था, फिर ऐसे देवता के प्रति क्या श्रद्वा हा सकती थी ! देवताके हातेमें जब घूम रहा था, उसी समय पैर जरा श्रघट पड़ा और कोई नम ति हो गई । चलने में दर्द होने लगा । देवता जरूर मुस्करा रहा होगा -लो और देवताओं में श्रद्धाहीन वनो । किन्तु जब कोई कच्चा गोटयाँ हो, तव न बातमें श्रावे। हाँ, पहिले रास्ता ममतलसा जानकर मेरा विचार हुआ था, पैदल ही जगी जानेका किन्तु अव असमंजस में पड़ गया । कहीं रास्तेमे ही नाव न डूबने लगे। इसी बीच तहसीलदार साहवका पत्र आ गया। उन्होंने पगी मे श्राकर मेरे पैदल जाने की खबर सुनी, नम्बरदारके नाम ताकीदी पत्र लिखा । बूढ़ा नम्बरदार अच्छा श्रादमी था । उसका घोड़ा भी अच्छा था, उधर देवताने पैर को बेकार- सा बना ही दिया था, लाचार घोड़ा लेना पड़ा । कूपा गाँव चुका था । याजकी यात्रा सिर्फ सात मीलकी थी। रास्ते के अधिकाश भागम देवदार और उससे भी अधिक न्यौज़ारे वृक्ष थे । फसल और वाग अच्छे थे। दो तीन मील जानेपर रास्तेसे डेढ मील नीचे दिखाई पड़ा । ग्रपाकी करुण कहानी मैं पहिले ही सुन रास्ते से अपनी आँखों देखा । वागके वृक्ष सूख चुके हैं, खेत परती पड़े हैं । कूपाका जलस्रोत सूख गया है। घर अब भी भव्य अट्टालिकासे दीखते थे, लोग भी सूत भर धारसे शाम सवेरे आनेवाले जलसे तथा अपनी भेड़ बकरियो की लदाईपर पूर्वजोका घर छोडना नहीं चाहते, किन्तु कितने दिनांक १<noinclude></noinclude> j04r4shirau0v0s2zi9zebpuhhtzy7v पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२५ 250 195240 665964 2026-07-07T15:33:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665964 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>जगीतक १७ ' पार करती छाया है । रास्ता पहाड़ के ऊपरी भाग से चल रहा था, किन्तु इतना समतल था कि कही घोड़ेने उतरना नहीं पड़ा । श्रागे सतलज एकदम बाई ओर घूम गई है, यहाँ सड़क भी एक पहाड़ी बाही ( धार ) को है । फिर जगीतक न्यांजो - देवदारोकी शीतल- स्निग्ध डाक गला भी देवदार वृक्षोने ढँका है । वगला अच्छा है, किन्तु अव वह शिकारी साहबोका नहीं रहा, इसलिये उपेक्षासे भी देखा जाने लगा है। यदि न्यान नहीं दिया गया, तो कुछ सालोमे खराब हो जायेगा। बल्कि बगले के साथ के मकान श्रमी गिरने लगे हैं, और बाव तो प्रा. सारे बगलोमे नष्ट-भ्रष्ट हो रहे हे । यद्यपि चौकी- दाराकी माकून तनखाह है, किन्तु उन्हे अपने घरके कामसे ही जान पड़ता है, फुर्सत नहीं। हम दोपहरको पहुँचे थे । चपरासी इन्तिजाम करनेके लिये पहले ही ग्राया था। किन्तु मालूम हुआ, वह वेगा- स्याकाळ लिये दिये जंगलातके क्वार्टर में चला गया है । पुण्यसागरने दौड़ धूप की, फिर चौकीदार थाया और बगला खुला 1 चाकीदार ने होशियार तथा अच्छा ग्रादमी है। उसे किसी तरह मनक लग गई कि किन्नर देशी श्रभिवृद्धि चाहता हूँ, और ऊपर सरन बारमे लिख नो रहा हूँ । उसने हर चीजको दिख- ताना चाहा । शानको इसके लिये जगी गाँवमे जाना पड़ा । जगीकी भूमि उर्वर है, वहाँ जितने सेत और बाग है उनसे कई गुने दरवार हाते हैं, यदि पानीकी कमी दूर हो जाये । १६१ ३० ने वाया, जितने एक बड़ा चश्मा लुत तर पानी बहुत कन ह गया । हितने ही खेत छोड़ देन पं 5 लोले जाडेकी निष्टिसे चश्मे में पानी श्रादा है, नहीं तो गाववालांची बिपता और बढ़ी राजापत्रमा ४५ फीट बर्फ हर माल भाडे ही राधा- हमारी जमीन बहुत अच्छी ८१ देवदाजाने जगलते का है, यहां कभी .<noinclude></noinclude> fiyrjqpyo2et4zmhesj4erj1710tusu पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२६ 250 195241 665965 2026-07-07T15:33:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665965 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११८ किन्नर - देश मे हिमानी ( ग्लेशियर ) नहीं याती, लेकिन पानीकेलिये क्या किया जाये ?" पानी बिना पा उजड़ रहा है, रार और जगीकी अवस्था वहाँ तक नही पहुँची है, किन्तु कष्ट बहुत है । मेने गाँव मे कई घरोको खाली देखा, कुछ तो गिर रहे हैं, उनकी धरने नंगी लटक रही है। देवनाका सुन्दर मन्दिर कितने ही वर्षों पूर्व बहुत साथमे बनवाया गया था, किन्तु व उससे उदासी वरस रही थी। दो-तिहाई कोली गॉव छोड़कर भाग गये, कनेतोके भी दर्जनसे ऊपर परिवार कुल्लू, चम्बा, टिहरी, जम्मू में चले गये । और यह वह स्थान है, जहाँ के अखरोट, खूबानी, चूली, वेमी, नासपाती, सेव, अगूर, चालूचा आदि फल बहुत मीठे होते हैं, और आजसे दस वीस ने अधिक पैदा किये जा सकते हैं । कभी यहाँके लोग अपने यहाँके अंगूरोको लेकर चिनी में अनाज वदलने के लिये जाया करते थे । मैन अव भी वागोमे अगूरी वेले' देखी । “देवता क्यो नही कुछ करता " - पूछने पर चौकीदारने कहा- वह असमर्थ है | चौकीदार के कथनानुसार लिप्पाकी खडसे नहर लाई जा सकती है, जिससे अकपाका भी उद्धार किया जा सकता है, रार की भी समृद्धि बढ़ाई जा सकती है। किन्तु यह छोटा काम नहीं है, जिसे कि गाँववाले कर सके । P जगी सतलजसे काफी ऊँचाईपर है । यहाँसे सामने नदीपार मोरङ् गॉव और उसके नीचे वहाँका दुर्गा है । कह रहे थे, इसे पाडवो- ने बनाया । वह " समंदर" की धारको फेर देना चाहते थे, किन्तु सफल नहीं हुये । पहाड़से ग्राये गहरे नालेको एक टेकरीको घेरते देखकर यह कल्पना उठी होगी । लकडी-पत्थरका "पाडवोका किला" इसी टेकरीपर बना है । 1 जंगी ग्राम अवश्य पुराना होगा, किन्तु कोई पुरातन सामग्री नहीं मिलती। कुछ दूर एक निर्जनसी गुफा मे मिट्टी के वन छोटे-छोटे पूजा-स्तूप मिले हैं। चौकीदारन ऐसे चार पूजामंडल दिखलाये, जिनमें दोमे<noinclude></noinclude> 94g5a1e52kmgkfbj0vrxnm1erttn7t9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२७ 250 195242 665966 2026-07-07T15:33:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665966 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रागैतिहासिक समाधियाँ ११६ कुटिलाक्षर में लेख था -- एक धारणी और दूसरा “ये धर्मा हेतु प्रभवा...।' टीमें भोटिया ग्रक्षर थे, जिनमेसे एकमे भोटाक्षरमे "ये धर्मा..." था, जान पड़ता है, वहाँ पासमे कोई बौद्ध विहार था । कुटिलाक्षर ग्यारहवी नदीमे व्यवहृत होता था, अतः इन पूजामडलोका साँचा कमसे कम ग्यारहवी सदी में बनाया गया होगा। इन पुरातन गाँव के गर्भ मे न जाने क्या क्या सामग्री छिपी हुई है । किन्तु, उनकी प्राप्ति और सुरक्षा तो तभी हो सकती है, जब यहाँ लक्ष्मी और सरस्वतीका निवास हो । ε प्रागैतिहासिक समाधियाँ वर्जित है । और. पगडंडी पकड़ने व नियम सा बन गया था, कि सवेरे दूध-रोटी खाकर पड़ाव शेयपि जातिनियोंके अनुसार यात्रापर दूध वाजता दम विश्व हिन्दुस्तान सड़क छोड़ वह रहेन। तीन मीलतक सड़कने जाकर लिया बडकी उतराईसे पहिले रासा बाते ऊपर की ओर चला । यहाँवाले इते रास्ता बले ही कई एस वो भी नहीं कह सकते, यह ठीक जपय काड़ी बनेनानस मिली थी. चडाईका प्रन नालूम नहीं हो रहा किन्तु नाही जग लोगों कहते रहनेपर नी से उतर जाता; पार्दिने परका द बेहतर है। सचमुच नीधी चढ़ाई कभी जितने घोड़ीका पर जरा-सा चूका, तो डा। तो बीई बात नहीं, तु जो कही बुज-चरहना पड़ा तो भचनुच कान्ति क्या<noinclude></noinclude> hfu28xzh1d8hbgf3rh3eca81c0mzxwd पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२८ 250 195243 665968 2026-07-07T15:34:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665968 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. १२० किन्नर - देशमे जब चिड़ियाँ चुग गई खेत ।" वाइस साल पहिले लदाखसे लौटत समय सुड्नम् और फिर कनम्मे किसीने लिम्पाके जोतिसी देवारामले भेंट करनेकेलिये कहा था, किन्तु रास्तेके बारेमे जो ज्ञान प्राप्त हुआ, उसके कारण मैने लिया जानेका नाम नहीं लिया, हालांकि हेमिस् लामाने जोतिसी के लिये एक अच्छा परिचय-पत्र दिया था, और उस समय तिब्बत और वौद्धधर्मके बारेमें मेरे पास जो ज्ञान था, लामा देवाराम से मिलने पर मुझे बहुत लाभ होता । सोचने लगा, शायद उस समय मै आजसे अधिक बुद्धिमान था । मै इस दुस्साहस के लिये किसीको दोषी भी नही ठहरा सकता था, क्योंकि मैने स्वयं यह ग्राफत मोल ली थी । कहावत सुनी थी, प्रसव के समय हर एक स्त्री फिर संतान न पैदा करने की शपथ खाती है, किन्तु फिर उसी संकटको निमंत्रित करती है, आदमी दूसरेके तजुर्वेसे लाभ नहीं उठाता, और स्वयं भी फिर फिर तजुर्वा करना चाहता है । . मैने पछताते हुये उस दिनकी दैनंदिनीमे लिखा था "इधर कोई पुरानी चीजकी प्राशा न थी, न मिली", किन्तु दूसरे ही दिन ( १६ - जून ) " न मिली” लिखना गलत साबित हुआ। दो मील या अधिक चलनेके वाद उतराई आई । रास्ता एक पानीकी धारकी श्रीर मुड़ा । यहाँ जगीवालोके खेत थे। पानीका सुभीता हो और खेतकी सीढ़ियों बन सकती हो, तो कौन पहाड़ी किसान जमीनको छोड़ सकता है ? देखा, कुछ किसान ग्राकर खेत वोनेकी तैयारी कर रहे थे । यहाँ देर से बर्फ पिघलती है, और ओगला या फाफड़ाकी एक फसल ही हो सकती है। पिछले सालकी अतिवृष्टि और अतिहिमपातने खेतो की कही कही धसका दिया था, जिसके लिये किसानो को "सीटियां " फिरसे बाँधनी पड़ रही थी । वर्फ प्रवाहने कही कहीं वृक्षोको तोड़कर ढवेल दिया था, किसान देवदार की लकड़ियोको खेतो में जला रहे थे । हम लोग जरा देरकेलिये देवदारकी छायामे सुस्ताने लगे । वर्फका पिघला पानी बहुत शीतल था, किन्तु यहाँ कुछ गर्मी भी मालूम हो<noinclude></noinclude> pvnura21scn79dmhly6q8ny1n0rxpzt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१२९ 250 195244 665969 2026-07-07T15:34:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665969 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रागैतिहासिक समाधियाँ १.२१ सूखी खड्ड मिली । और उसने देवदार के विश्वास किया जा रही थी । ग्लुकोसकी थोड़ी फर्का मारकर दो कंटोरी जल पिया । आगे घोडीका जरूरत न समझ लौटा दिया, जरूरत पड़नेपर लिप्पाके एक तरुणी बोड़ी साथ चल रही थी । रास्ता अधिकतर उतराईका रहा, और कठिनाई में काई अंतर नहीं । श्रागे एक पिछले डेक हिसने इस रास्तेमें रेला किया था, बड़े वृक्षकी कैसी त बनाई थी, उसे देखकर ही सकता था। बहुत कम लेटकर अपनी जगहनर थे, नहीं तो कितने ही उखकर बनते हुये कहते कहीं पहुँच गये थे। वैसे होता तो वृक्षों केलिये जनन-विभाग चिनेरी विनती करनी पड़ती, किन्तु गिरे सूखे वृद्ध गाववाला होते है | इतने वृक्ष गिरे थे, कि सारा लिप्पा दानही जस्ता था | कम साधनवाले लोगाने तो एक एक दो दो पर दीवार कर लिया, किन्तु कनोरके सबसे धनी जेलदार यशीलालने दर्जनों जाकी अपने टायने किया था। अन्तने एक पर्वनवादी का पार करते ही लिप्पा सामने दिखाई पा से उतरा यहाँ नीधी थी, एक नही फिर छोटी नदी पारकर गोमे पहुचा । यत्रते एक नहीं दो-दो चपरासी एक दिन आगे पहुंचे थे, किन्तु किसीको कल नहीं चाई, कि बागे ही रचना देवी, ज्योदि जालभएमा कोही कर रहे थे, उसे दहा कर गई श्री. जगलातही कुटिनका रास्ता था, खटनल- फिनिश या रहा दहरने के लिये हमे गोटाता | पुरनागर पता लेने नीचे जी जब से " आप एक चादनी के साथ नाव- गोपा दे दें। वारण बुदने पंजा एक: उतने को हुआ है। और वह हो धारा-<noinclude></noinclude> ec74rmilho2qsonjg8c0x5wd1yf2mmc पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३० 250 195245 665970 2026-07-07T15:34:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665970 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२२ किन्नर - देशमे पर एक अच्छा पुल है, उसे पारकर सरायसे मकान के मामनेसे होत स्तूपसे द्वारके भीतरसे पार हो छोटी धाराको पार हुये। छोटी धारा- पर कितनी ही पनचक्कियां लगी हुई है । लामा सोनम् डुब्बा पहिले ही पुल के पास पहुँच गये थे। दूसरी धारा पार करते ही लिप्पा के खेत और गाँव शुरू होते ह । हमारे ठहरनेका प्रवव गुवा (बिहार) में हुआ था, और वह आधे पहाड़की ऊँचाईपर था । यदि पैदल चलकर वहाँ श्रातिथ्य स्वीकार करना होता, तो निश्चय हो वह बहुत मधुर नहीं लगता । ऊपर जाने के लिये घाड़को सामने रखते लामाने कहा--- जरा चढ़ाई है, घोड़ेपर चले। इससे अच्छी बात क्या हो सकती थी ? लिप्पामें पानी की इफ्रात है, कमसे कम इस महीने या इस वर्ष मे तो जरूर ; क्योकि पिछली साल मेघदेवता बहुत उदार रहे। बाहर तो नहीं किन्तु गाँव के भीतर घुसकर जब ऊपरकी ओर बढ़ने लगे, तो डर लग रहा था, घोड़ी लुढ़ककर सवारकोलिये दिये नीचे क्यो नही जाती । किन्तु, यहाँके बच्चोकी भाँति वछेड़े भी इन्हीं रास्तोपर तो खेला करते हैं । लिप्पावाले मानो गौरीशंकर श्रभियान के लिये अपने बच्चो को तैयार किया करते हैं, नहीं तो इतनी खड़ी पगडडियाँ नहीं रखते । खैर, आसपास घर थे, घोड़ोंके पैरोपर भी मेरा विश्वास वढता जा रहा था, इसलिये ठेठ गुवाके द्वारतक मैं सवार होकर पहुँचा । गुवाको लामा देवारामने बनवाया, अथवा पिता-पुत्र ने मिलकर उसे पूर्णताको पहुँचाया । देवारामका नाम सारे तिब्बतमें मशहूर है। सोनम डुव्ाका जन्म हुआ, स्त्री मर गई, तो देवाराम 'विरागी हो तिब्वत भाग गये। वहाँ कई नाल रहे, उन्होने जोतिसकी पढ़ाई खास तौर से की। घर लौटे, किन्तु फिर व्याह नहीं किया । तिब्बतमे पहिले भी पचाग वना करते थे । व्हासाका राजजोतिनी एक ओर पचागके एक-एक पृउको तैयार करता, दूसरी ओर बढई उसे अखरोटकी लकड़ीपर उलटा खोदता जाता। पचाग खोदकर तैयार हो जानेपर लकड़ीसे जितनी कापियां छापनी होती छाप ली जाती ।<noinclude></noinclude> 5lrzrtfno8j8n795fxn4psyfa0cc31q पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३१ 250 195246 665971 2026-07-07T15:34:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665971 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रागैतिहासिक समाधिना १२३ खोटी लकड़ी एक साल ही काम आती । यदि साठ वर्षतक प्रतीक्षा करने को मिलना, तो जरूर उससे फिर काम लिया जा सकता, किन्तु वहाँ पीढी दर पीढीके जोतिसी कहाँ है । देवारामने सोचा, क्यो न समय के काशीके लियोमे मोटिया पंचाग तैयार कर मैं एक पंचाग निकालू । उन्होंने अपने उपचागको देखा था। उन्होंने नया लियोमें छपाना शुरू किया। व्हाना के छपे पचागने लगता था हाथका बना महँगा कागज, लकीपर खुदा महगा ब्लाक ओर लियो था मन्ना । हो, देवाराम अपनी इच्छानुसारी सरुनामें पचागोको जब चाहे तब नहीं छप सकते थे; उन्हें दिल्ली या किसी दूसरे शहर समे एक ही वार पूरी संख्या जवाना पड़ता था, चाहे उनम कुछ न मी विके । किन्तु साथ ही उनका पंचाग सस्ता था | वह आवे दामपर हावाले पचागन कहाँ अधिक अच्छा पचाग देने लगे । प्रचार बहुत जल्द वह गया। मलमें ग्राहकाकी दिक्कत नहीं थी, दिक्कत था उनके पास पहुँचान की. क्योंकि नोट देशमें डाकघर दो ही चार जगह है, और वह मा विश्व ननीय नहीं है । देवारामने अपने ग्रादमियों राग निलगोडी कलिम्पोद् दाने पचागोका व्हावा. टशोलुप, ग्याची यदि पहुंचाया। उन्होंने काफी पेसा कमाना । चाज उन्हें मरे कई किन्तु उनका वो उनके लड़के सोनम डुवया निकाल । पहिले पचानका दान बारह जाना था, अब दो रुपया दोग है। बारने इससे कहीं बडे पंचाग निहाई दामपर निरजाग शायद इतने छोटे तथा माँगे पंचाग कौन पदनाम प्रतिगिता तब नदा, जब के कोई देवाराम नासाका दल मी चार हजार प्रतियाँ नई प्रवेश दो से बिना है। आदतीने जति लामा (धर्मपुर नापे। उन्होंने पैनानी उहे लालच नहीं थी। उन्होंने<noinclude></noinclude> cfrrnb12ttk9lc9scg8p0wqm73f0p2m पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३२ 250 195247 665972 2026-07-07T15:34:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665972 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२४ विनर देशमें . गुवा बनाना शुरू किया, किन्तु उसे अपने जीवनमे नहीं पूरा कर सके । पुत्र चाहे पिताकी योग्यता न रखता हो, किन्तु पिताके श्रारभ किये कामको पूरा करने या जारी रखनेकेलिये उतनी योग्यताक आवश्यकता भी नही है। हॉ, उनमे श्रद्वा बैनीही है। यि भोट भाषा-भाषी नहीं है, न पढ़नेकेलिये नोट देश गये, किन्तु वह भोटापा खूब जानते हैं। पिताने वे गांव के ऊपर जमीन बरावर करके गुवा बनाना शुरू किया। गुरुवामे परिक्रमा के साथ दो बडे-बडे जुड़वा मन्दिर हैं, जिसमें एक बुद्ध शाक्य मुनिका, और दूसरे श्रागे आनेवाले बुद्ध मैत्रेयका है। मैत्रेय के मन्दिरके भीतर ही भारतीय ग्रन्थोके दोनो विशाल संग्रहो - कंजूर, तंजूर के रखने के लिये सुन्दर पुस्तकाधानियाँ भी बनाकर रखी गई हैं । क ा चुका है वह नरके पुराने ब्लाकका दु:पाठ्य नहीं, बल्कि ल्हासाका नया गय है । ल्हासा से भारतीय रेलों द्वारा शिमला और वहां से ढाई ढाई सेरकी १०३ पोथियोको यहाँ लानेमे काफी श्रम और वन अय हुआ होगा । तंजूर में २३५ पोथियों है, उसके लिये ५ हजार खर्च हो चुका है, और वह चीन सीमा पर अवस्थित तेर्गी गु वासे मध्य- विचत पहुँच चुका है। लेकिन लिप्पा पहुँचने मे अभी और समय और धन लगेगा। यदि रास्ता चाहते, तो आसानी से नरथङका कचूर-तजुर मॅगा लेते, लेकिन वह सिर्फ पूजा 'करने भरके लिये होते, उन्हे पढ़ा नहीं जा सकता था, एन- लिये समझदार पिता-पुत्रोने दोनो सग्रहो के सर्वश्रेष्ठ छापे मँगवाये । वैसे व्हासाका नया कजूर गुपाठ्य और अधिक सुन्दर भी है। गलती में पड़ गया और जददीके कारण पहिली यात्राने लहा से लौटते समय नरथडके कजूर-तजुरको साथ लाया। पड़ता रहा था और पीच रहा था, कैसे तेर्गीके कज्र- तजुरको लाया जाये। दूसरी यात्रा तेगी हा कंज़र मिल गया । मैने ग्राव देखा न ताव, ल्हासा उधार या लेकर उसे खरीद लिया। पटना पहुँचनेपर बहुतेरी कोशिश का युनिवर्सिटी वालोगेडिया, अधिकारियों के पारे W<noinclude></noinclude> 5alatid02hikxei7logtfwms20vikdw पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३३ 250 195248 665973 2026-07-07T15:34:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665973 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रागैतिहासिक समाधियाँ - १२१ बालजीने भी काशिश को, किन्तु डेढ़ हजार रुपये न मिले। "धोवी वसि के का करे दीनवर के गाँव में मैंने कलकत्ता विश्वविद्यालयको लिखा ! रतनको फोन पारखी छोड़ता है, वहाँसे दौड़े दौड़े डाक्टर प्रवावचद्र वागची ग्राये । खैर, उसके कलकत्ता पहुँच जानेसे मुझे फसोस नही हुआ, वहा उनके उपयोग करनेवाले तो है। किसी समय विद्यालयो मे शिगमखि हमारे नालन्दा- विक्रमशिला के बिहार आज कहाँ छ ? तिनलाई पुस्तकों में नरथका कजूर-तंजूर - ही सालीत विहार ग्रनुसधान सभा (पटना) में पड़ा रहा। अंत में उसी तरह उतावलेपन के साथ रंगून विश्वविद्यालय मे शोध कजूर-तंजूर मॅगा देनकेलिये कहा । मने लिख दिया यहाँ तैयार है, किन्तु यदि सुपा चाहते है, तो कुछ समय प्रतीक्षा कीजिये । तुरन्त भेज देनेका आर हुआ। मेरी वा बला टली, कसोस यही हो रहा था, कि क्यो न कुछ साल पहले यह बात हुई सस्य वाद व्हा एका नवश कनूर वनकर तैयार हुआ, लिया फिर कुछ की प्रती नाके वाद तेर्गी का तजूर भी मिल गया । दोनो महान् सग्रह - जिनमें दल हजारसे अधिक भारतीय ग्रन्थोके अनुवाद हो पचानवे सकड़ा एसे प्रथ हैं, जिनके मूल भारतीय भाषा- सेलुन हो चुके है-अब पटना सग्रहालय में मौजूद है। हाँ, अभी पटनाने एनके उपयोग करनेवाले विद्वानोको नहीं पैदा किया, नलिने प्रयत्न किया । लामा देवाराम के पुत्रने भी मेरे जैसे दोनो किया है। । खैर रुपये गये। कुछ ही मैंने तुरन्त मँगा के मदिरमें व्हराया गया। मंदिर काफी जापान चित करने और लजाने में काफी कला- परिचय दिया गया है। मूर्तियों, थालमारियाँ सुन्दर हैं, विविधिता लाना सोनम डुब्याने कला और परपराका बहुत ये वह स्वन सारनाथ ( बनारन ) गये । वहाँ नारे। चित्रहारीके नित्तिचित्रोको .<noinclude></noinclude> 3pnsqaumezm4mal6e3ei0sks33pb2sn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३४ 250 195249 665974 2026-07-07T15:35:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665974 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२६ किन्नर - देशम देखा, उनकी तस्वीरे प्राप्त की। फिर लौटकर लदाखचे एक कुशल चित्रकारसे उन्हें चित्रित कराया । तिब्बती कला ग्रव बहुत रूढिग्रस्त हो गई है, किन्तु इस चित्रकारने काफी मफलतापूर्वक सारनाथ के चित्रोको अंकित किया है। दिन भर तो मुझे अच्छा ही अच्छा लगा, किन्तु रातको जव पितुश्रोने शरीरमे ग्राग लगानी शुरू की, तो नी कहाँ ? और फिर भी अगले दिन भी यहाँ से ग्रासन हटाना मेरे हाथमें न था । लामाने मध्यान्ह भोजन अपने घर ले जाकर करावा, जी गुबासे और ऊपर था । लामाकी दो स्त्रियाँ हैं, जो सख्या बहुन अधिक नहीं है । जव पहिली से पुत्र-लाभ नहीं हुत्रा, तो दूसरीको व्याहा, लामा देवारामका वंश तो आगे चलाना था। सोनम् इवग्या साठसे ऊपर के हैं. उनका लड़का चिनीमे मिडलमे पढ रहा है । खाना खा ही चुका था, कि वाजेकी श्रावाज और गीतका स्वर कानोमे श्राया । पूछने पर मालूम हुआ, आज कंजुरकी शोभायात्रा है । छतपरसे झाका, तो देखा गाँवके नरनारी पीठपर एक एक पोथी कंजूरकी रखे, वाजे और गीत के साथ सारे गांवकी परिक्रमा कर रहे है, सनातन धर्म और आर्यसमाज के प्रचार के यौवन के समय वेदभगवान्- की सवारी निकलती थी, किन्तु उस समय भी इतनी श्रद्धा नही देखी थी, कि लोग अपनी अपनी पीठ पर एक एक वेद लादे नगर-यात्रा कर रहे हो। और यहाँ कंजूरकी एक एक पोथी देवदारकी मोटी दुहरी पट्टिकाश्रमे वधी तीन पंसेरीसे क्या कम होगी, लोग उसे उठाये चल रहे थे । इस शोभायात्राको इसलिये किया जा रहा था, कि गाँवमें रातविरात घुसाई अलाय बलाय भाग जाये । महाक्रान्ति से रूस में भी बाइबलकी शोभा यात्रा निकाली जाती थी, जब ग्रामीण देखते थे कि मेघ पानी देनेमे हीला-हवाला कर रहे हैं। बुखारामे जब वोलशेविकों का भारी खतरा हो गया, तो मुल्ला लोगोने "सही दुखरी" ( इस्लामिक स्मृति ) को पीठपर लादकर नगर परिक्रमा की, समझा गया इसके बाद नगरपर आक्रमण करनेवाले लाल नास्तिको "<noinclude></noinclude> s8e9lo6d3f3twceewnn2mgeebwu216c पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३५ 250 195250 665975 2026-07-07T15:35:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665975 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रागैतिहासिक समाधिना १२७ के गोल-गोलों और उनसे भी शक्तिशाली वचन गोलोका कोई असर नही होगा । न कोठेने जल्दी जल्दी उतरकर नीचे आया, क्योंकि यात्राको नजदीक देखना चाहता था । गुरुंबा पहुँचते-पहुँचते वहाँ से बहुत से ग्रामी बाहर निकल चुके थे, किन्तु श्रव भी वहां दस-वीस मौजूद थे । उनमें अधिकाश तरुण-तरुणियों थी, शायद उन्हीं में श्रद्धा अधिक थी । पायपर बांझा लिये गाने-बजाते चलना ऐसी सीधी चढाईवाले सरनेमें उन्ही की बात थी । नव खूव वने उने थे, मेला था । एका प्रौढवयस्क स्त्रीशनलानुमा पुरानी टोपी पहिने थी, शमलेवाले पुरुष तो एकाध ही मैलेम दिखलाई पडे । और सभी स्त्री-पुरुषोके सिर- परापीनुमा कनपटी उलटा कनटोप था, जिसकी मेखलामे लाल मलमल चमक रहा था। सभीकी टोपियोंके उलटे कनपटोमे सफेद फूल के गुच्छे भी लटके हुये थे । किन्नर किन्नरियाँ फुलके बड़े शौकीन दो फूल माजूद हा और फूलोका गुच्छा उनकी टोपियों न लगा हो, यह नहीं कता । मेरे कहनेपर लाग गये, मैने शोना पानिया फाटा लिये | मालूम हुआ, मेला बोडी देरमे कजूर देवा- पर लगगा । बसे कजूर तो न शुवानें भी था, किन्तु पुराना छन्।उड् नीचे गानसे बाहर था। यह श्रच्छा ही किया था, नदी दाल पनि जब गावमें ग्राग लगी, तो कजरन्व्हास बात गया होना, ककी पोनिया नृतीय तोकी गावते भले ही नगा सतीश, किन्तु वह चागले प्रपनी रक्षा नहीं कर सकती । शाळा हाकी और चले | दो जगह गॉवकी दीपानाला रास्ता था। एक जगह तो नेने हिम्मतसे काम लिंग, दिनु दूरी जगह लाजशरल छोड़ पैरोकी मदद के लिये हाथाको नाना टुक्रा । अब नालुम हुआ, अज पथके अभियानिक जाते है। लोग शिक्षा हो, तस्कृति पूरी मात्राने हो, जदिका विहा कि एक नए सौ एवेरेस्ट्र<noinclude></noinclude> olabvt3zyp5ef29swh5qzo0yehubzj3 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३६ 250 195251 665976 2026-07-07T15:35:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665976 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- १२८ किन्नर - देशमे विजयकी जयमाला हमारे देश के गले में पड़ी रखी समझो । कजूर व्हाखङ्की सारी छत सजे धजे नरनारियां से भरी थी, बाहर बगल के आगन मे टाई हाथ ऊँचे बेचोके ऊपर १०३ पवित्र थी। अभी उसके एक कोनेमे दस एक ' पोथियोंकी कुल्ली सजाई हुई तरुण नाच रहे थे, वह कुछ गा भी रहे थे। पास मे बैटी वढने वव डफको और कोली ढोल और मुँह बाजोको बजा रहे थे । किन्तु अभी नाच जमी नहीं थी। खैर, मेरे विचारसे तो वह अन्ततक नहीं जमी । यदि किन्नर लोगोका यही नाच है, जिसे मैने देखा, तो कहना पड़ेगा, उनमें नृत्यकलाका कभी प्रवेश हुआ ही नहीं। जान पड़ता था, तरुण डर रहे थे, कि कही पेटका पानी न हिल जाये । नृत्यका अर्थ है, कलापूर्ण व्यायाम - कठिन व्यायाम, और यहाँ व्यायाम कहाँ था ? थोड़ी दस्तक खड़ा होकर देखता रहा, आग्रह हुआ मैं चलकर छतपर कुरसीके ऊपर बैठूं । कुछ लोग प्रसाद वॉट रहे थे- जरूर मै कुछ देर से पहुँचा था, और यज्ञारंभको नहीं देख सका । कंजूर ल्हाखडका ( देवालय ) हो या कोई ल्हाखङ्, और उसमें कोई जमीन जायदाद न हो, यह कैसे हो सकता है, क्योंकि व्हाखडके साल में पर्व दिन आते हैं, उस समय भक्तोंमे प्रसाद बाँटना पड़ता है । नीचे की तरह किन्नरके देवता सिर्फ "ल" ग्रक्षर नहीं जानते, उनके कोशमें "" अक्षर बहुत है, तभी तो पर्व दिनमे धरके भीतर किसीका रह जाना मुश्किल है। प्रसाद था सत्तूका अाधाव पावका लड्डू ( गोला ), कलछी भर-भर मदिरा । मदिरा काफी कड़ी जान पड़ती थी, क्योंकि सभी- की अाँखे लाल थी । वही बात स्त्रियो के बारेमे नही कही जा सकती थी । अधिकाश पुरुष इधर-उधर चलते लुढ़क पड़ते थे, जमीन तिछी दीवार -सी खड़ी थी, वेकाबू गिरते नहीं तो क्या करते ! स्त्रियां, जान पड़ता है, चरणामृत भर पान करती थी, उन्होंने अपनी शालीनताकी बड़ी कठोरता के साथ रक्षा की थी, अपवाद थो वाजा<noinclude></noinclude> d9wouj9f8chyh1pq9oqqubcr7a4hojb पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३७ 250 195252 665977 2026-07-07T15:35:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665977 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>2 זה היה<noinclude></noinclude> 9nnljmobastnak6fq1b644uts7z4yzp पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३८ 250 195253 665978 2026-07-07T15:35:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665978 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तनम भारता श्री देवदत्त शर्माचा. म ३० तामा पुरुषसागर और लेखक<noinclude></noinclude> t1rhbfecnsm2un7obdkiapy9q3mh6tz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१३९ 250 195254 665979 2026-07-07T15:36:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665979 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>3 प्रागैतिहासिक समाधियां १२६. बजाने वाली कुछ बाढ़िने (बढइने ), किंतु वह भी लुढ़क कर लोगो को हतने का मौका नहीं दे रही थीं। यह कहनेकी श्रावश्कता नहीं कि लोगो ने बाल-बच्चों के साथ घरसे निकल आने में बहुत भूल नही की थी, क्योंकि इवर के भोले-भाले लोगों में यदि किसीके घरमें चोर घुमता, तो भी उसे घर में एक सूत भी जेवर हाथ न श्राता । सभी स्त्रिया चादी के जेवरोंसे लदी थीं। कानोसे पाव पाव भर चांदीकी बालियों के गुच्छक, कधेमे जंजीरे यार मालाये, बांये कधेके नीचे दोस ( पहाडी ऊनी माडी ) को समेट कर बांधनेवाले हथेली भरके त्रिन मयूर चित्रक शोभा दे रहे थे। पीठपर लटकते पतली रस्सी की तरह चटे केशोंके लवे फुंदने पॅहुँलीके पास तक लटक रहे थे। फुदने कतर लाल तके थे, किन्तु कुछ में चादीके घुंघरु बाधे हुये ये । माडीका चुनाव निरिया मध्य-देशिकाकी भाति श्रागे नही पीछे रखतीं हैं और काली साड़ीके इस छोरको बुननेमें नी सारी कला और सारे रंगको खर्च कर देते है । छत पर बहुतसी सम्भ्रान्तकुलीन महिलाये भी थी । जेलदारके बरकी महिलायें चादीको बालियों के शुच्छको की जगह एक-एक बनने या दस शुद्ध सोनेकी बालियाँ पहने हुये थीं, उनका गला भी सफेद नही पीला या चार नाकका एक नथुना चवन्नीभर चोड़े गोल स्वर्ण भूपसे ढका या । साथ ही उससे नाक तोले भरकी झुलनी रही थी या नहीं, इसे नही कह सकता । सोनेके ग्राभूषण ने ताकि पता लग सकता है, और दुनिया कोन सा ऐस देश जहा दूसरा प्रदशन न किया जाता हो । जेलदारवी महिलाओोंने कुछ और भी भेद थे। मृत जेलदार और उनके भी पिता के समय तिरभाषी कनेती की लडकिया लिया करते थे । सुनका वो सारा दमाचल किनरो देश था । अव भी वहाके निवासियों मेरिनर है, चाहे वह भाषा कोई भी बोलता हो । हा, हम निनामासीदास के नजदीक पहुँचते जाते हैं, याखी और चेहरों पर ते<noinclude></noinclude> 2pzkj87fqxtaudbh18yem4p8cuxiu3q पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४० 250 195255 665980 2026-07-07T15:36:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665980 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३० किन्नर - देशमे भोट-रक्त अधिक उछलता दिखलाई पड़ता है। कनमूके नम्बरदारन कहा था -- किन्नरोके भाटिया या काची ( पहाड़ी हिन्दी भाषाभाषी ) के साथ ब्याह से हुई सतान बहुत सुन्दर होती है। मुझे इसका कोई ज्वलन्त उदाहरण नहीं दीख पडा । हा, जेलदारकी, त्रियोंम और पुरुषो के मुखपर दूरसे भी मगोल मुखमुद्राकी छाप नहीं थी, हालाकि यहां मंगोल की हल्की रेखा रखनेवाले दर्जनों नरनारी मौजूद थे । लिप्पा खड्ड (किरड - खड्ड) लिपा-गंगा कहना चाहिये - ऊपर चार दिन के रास्ते से श्राती है, जिससे श्रागे जात टपकर श्राप स्पिती पहुँच सकते , हैं, जहाँ शुद्ध भोटभाषा-भाषी लोग रहते हैं । लोग बडे ध्यानसे नाच देख रहे थे, यह नहीं कहा जा सकता, यद्यपि मैं जरूर अपने सामनेकी हर चीजको व्यानसे देख रहा था ! एक जगह दो-तीन स्त्रिया डफ पीट रही थीं, उनके पास एक दर्जन 3 रक्तमुख तरूण बड़े इतमीनानसे छोटे चकरमे नाच नहीं टहल रहे थे | पाथियोकी छल्ली की दूसरी ओर लामा सानम् डुवग्या निम्न आसनपर बैठे कंजूरकी एक पोथी रखे बैठे थे, और नरनारी बालवृद्ध उनके सामने जा थालीम पैसा डाले या बिना डाले शिर नवाते लामा उनके शिरसे कजूरकी पोथी छुवा देते । छतपर बोतले खनक रही थी. कितने लोग सिर्फ प्रसादकी मदिरा से सतुष्ट नहीं थे, वह तो उनके गले भी सोचने के लिये पर्याप्त नहीं थी । मदिरा बनाने और पीनेकी यहाँ छूट है । १६२१ मे जब प्रथम स्वराजकी गूंज भारत के कोने-कोने में हुई थी, उस समय गाजीपुर के एक करके सैदपूरके मठ के महात्माने श्रागमें गां लगा रखा था। कहते थे - "महात्माजीने सरकारी दूकान से खरीदकर पीने को मना कर दिया है, इसीलिये अपने रामने यही शंकरकी बूटी लगा रखी है ।" बस यहां भी समझिये, वही महात्माजी के प्रथम सदेशकी गूंज आज अठाईस साल बाद भी आ रही है । हा, यह जगी और नीचे की भाति द्राक्षावलय-भूमि नहीं है, इसीलिये न बॅगूरी लाल शिबू बन सकती है, नहीं उसकी चुबाई सुरा किन्तु उससे कोई ।<noinclude></noinclude> tcf6aqp5gkdzexsg8o110dhq315iv0w पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४१ 250 195256 665981 2026-07-07T15:36:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665981 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- प्रागैतिहासिक समाधियां १३१ फर्क नहीं आता, जब कि यहाके स्थानीय और परस्थानीय पारखियों के अनुसार बेमी (छोटे श्राडू) की मुग अंगूरीका भी मुह मारती है । - कुछ भद्रजन मुझने जरा चखनेका आग्रह कर रहे थे, किन्तु मुझे पिंड छुड़ानेने विकत नही हुई। हा, पुरानसागरके पीछे लोग बहुत पढे, भगवानका प्रसाद जो था- क्रिम भगवानका ? ' कजूर - बुद्ध के बचन का प्रसाद ! तोबा तोबा " बुद्ध वचनने तो बल्कि सर्वभक्षी होनेपर भी गरमपानसे सदा के लिये विरत रहने में मेरी बडी सहायता की। किंतु उन मुल्लों में नहीं है, कि पराई सम्पत्तिको देखकर ईर्ष्या कैमरे जलाना करू | मालूम नहीं पुनसागरने चरणामृत की बूट लेकर पुवाजन किया या नहीं । हा, वह महीने भरने प्रतिदिन दो घंटे मेरे नास्तिकवचनको सुन पर रहे थे, किंतु साथ ही उनसे शाम सवेरे घट म गुनगुनाना कम नहीं हुआ, इसलिये मुझे संदेह था, कि उनपर उन वचनों कोई असर हुआ है। न असर हुआ हो, तो मुझे उसका जगभी पछतावा नहीं होगा, क्योंकि म श्रार्यमा नदेशक पंडित भादिद नहीं हूँ । नशेने या ग्रसर किया, श्रग्बाई के तस्योकी संख्या बढी । स्थान बलानी त चल के पीछे काफी नीचे चलेगये. परेशानी परंपरा में मानते धार या अवकारका के गीत बायके नहीं रहे, ता सनद रस। जब वार नमस्कार करनेवाले पानी के कान T चढ़ गये थे। उन्हें उसके नोटो के फुले उठते ही नर-नारियो 1 1 1 पहुँचाना शुरू किया। म स्कुल खती था । भीम हो, र<noinclude></noinclude> k0mm3o0bxatya6ecgcbflvo8qjsz6zz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४२ 250 195257 665982 2026-07-07T15:36:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665982 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३२ किन्नर - देश मे नरनारियींनी मंडलिक (वृत्त) टता जा रही था । बाजे अन मडाल- का बीचमे आकर कुछ अधिक तलरतासे कितु एकही तानमे बन रहे थे । मंडलिका मे याची दर्जन भिक्षुणिया ( चोमा ) भी शामिल थीं। मंडलिका (कायड) या गोलपॅक्ति स्त्री-पुरुषोंकी एक थी, हा स्त्रिया उसके एक भागमे थी और पुरुष दूसरे भागने । मंडलिकाने श्रानेवाले नरनारियोंने अपने हाथोंको एक दूसरेके हाथोंम दे रखा था, नवागन्तुक भी ग्राकर हाथ छुडा अपना हाथ थमा वहां शामिल हो जाते । चाजा अब जरूर कुछ जोरसे बज रहा था, किंतु मै जैसे खुलकर होते नृत्य के देखने की प्रतीक्षा कर रहा था, उसका वहा कही पता न था । लोग हाथमें हाथ दिये ग्रागे पीछे टहल रहे थे । कुछू तरुणने जेलदार पत्नी ar भी साग्रह नृत्य का निमंत्रण दिया, किंतु न जाने क्यों उन्होने उसे स्वीकार नहीं किया । मेरी उपस्थिति तो वहा बाधक नहीं थी ? मै तुरा मे तो सम्मिलित नहीं हो सकता था, क्योंकि उसका विरोधी - जहा तक मित पानका संबंध है - होते हुये भी मै अपने जीवन मद्यपान वितिके रेकार्डको कायम रखना चाहता हूँ, उसी तरह जैसे मेरे मित्र मदत यादं अपनी जीवन घासाहारिता को; किंतु यदि कही नृत्य जानता होता, जिसका कि मुझे आजीवन अफसोस रहेगा, तो मैं अखाड़े मे कूदने से बाज न श्राता और बीच में रोककर भी ग्रहोर नृत्यके दो हाथ दिखा रहता । तरुण पाठकोंसे, जिनमे घुमक्कडीका चीज गर्भित है, मेरा श्राग्रह है, कि वह नृत्य सीखना न भूले, नहीं तो पर्यटन के आधे रखते वंचित होकर वह श्राजीवन मेरी भाति पछताते रहेंगे, , यहांकी नृत्यकला के वरमरूपको देख लिया, अत्त-अचल के पीछे धधकती श्रागकी लालीका व पता नहीं था, और चारों ओर अंधकार अपने राज्यका बिस्तार करनेमे लगा हुआ था । मैने पुण्यसागर से कहा- "चलो रोटी-पानीको भी देखना है ।" सुफल सत्यके उपलक्ष्यमे होता महोत्सव भी आधी रात जाते जाते समाप्त हुआ । अत्रके ग्रामवासियों को अपने नृत्योत्सव में अधिक ग्रानद आया होगा, इसमें संदेह नहीं; क्यो<noinclude></noinclude> cz39snxrt2vrzz0obi38uuowgq9gwax पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४३ 250 195258 665983 2026-07-07T15:36:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665983 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रागैतिहासिक समाधियां १३३ कि इधर दो तीन वर्षो से वृष्टि और हिमपात कम हो रहा था, जिससे छोटी खड्ड (नदी) का पानी जल्दी सूख जाता था । पानीके अभाव में चलियों (हानियों) के कितने ही वृक्ष सूख चले थे । अत्रकी सालकी सुदृष्टि र मुतके कारण अब वृक्ष फिर हरे हो चले थे, फिर लोगों का हृदय क्यों न हरा होता ? यद्यपि लिपाके साधारण परिदर्शनसे अधिककी श्राशा न थी, किन्तु मुझे यहा से कनम् जाते समय थाई पगडंडीसे भी कठोर मार्ग से जाना था, इसलिये, जोहो एक दिन और जान बचे, वही गनीमत सोचकर एक दिन और यहीं रहनेका निश्चय किया अगला दिन ( १६ जून) बहुत महत्त्वपूर्ण दिवस सि हुआ। उसी दिन सुके किनर देशमें प्राम् बौद्ध या प्रागू मोटकालीन मृतक समाधिया मिर्ती, जिनका कुछ वर्णन दूसरे प्रकरण में आया है । मुझे ऐसी समाधियों- के कामे शनेक बारेमे कहीं पढने का मौका नहीं मिला था । मैं समता हैं, किसी दूसरे ने भी इनके होने का पता नहीं दिया है। दूसरे दिन दोपटक लामाले गुझके बारेमे बात हो रही थी । लामाने कहा "नेश नन्गी भाई ऊपर - गावके सबसे ऊपरी घर के पास - गुवा बनाके लिये भूमि तैयार कर रहा था। वहा हड्डिया निकल आई।" मेरे गये कैसी रडिया ? “वहां सछे रोम्खड ( मुसलमान 2) वेलाकी है।' यहा सछे (मुसलमान) का " हड्डियों के साननतेने नहीं निकलते नैने पूछा । "हडियोके सवर्तन जरूर निपलते है।" ने गुमान पत्र हर्गिज नहीं। मेरे करनेपर लामाने देवीदीन 'डुला दिया। वर्तन कई मिले थे, २०, २५ वर्षकी नवसारी 7 हाँ याद थी। मैने दालने निकली मृतक महुआ, एक आदम के सेट ने कुछ साल के उनके खेत पर पहुँचे तो पाने<noinclude></noinclude> q5wg7p5k55tenw3qh88kd59thp2i39j पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४४ 250 195259 665984 2026-07-07T15:36:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665984 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३४ किन्नर - देश मे उससे भी पीछे की क निकली मालूम हुई। खेनके मालिक पनीगमने पाच छ साल पहिले सारे निचले गॉवके जल जाने पर अपने खेत मे घर चनाना शुरू किया | वहा एक बडी मृतक ममानि निकल आई। कुदाल साथ लिये मुझे घरमे स्थानके देखनेके लिये ग्राग्रह करते देख पंजीराम डरे, कही उनके घर मे कुदाल न चलने लगे । उन्होंने खेत के ऊपरी भागको --- जिसके पास हम लड़े थे - दिखलाने हुये कहा, एक मास पहिले यहा खेतकी मेंड ( दीवार ) ठीक करते समय कब निकली थी। वहां खुदाई हुई | हड्डी निकली भी । पजीगमने पेसेका ग्रागन देख एक कासेका कटोरा, मिठीका एक मद्य कुलुन भी इसी चत्रले निकला बनलाते दे दिया । हड्डी ऊपरकी कलके पानी के पडनेसे सह गई थी, इसलिये उसे लाया नही जा सकता । श्रथी खोपडीते पता लगा, खेडी - कपाल है, आज कलके किन्नर गोज-कपाल चोर मध्यपाल होते हैं, जिसका अर्थ है भोट ( मंगोलिया ) रहाका अविक संमिश्रण। मालूम हुआ, उस समय लिपाके लोगोमे मगोल रक्तका ममिश्रण नहीं हुआ था, अर्थात् ईसाकी सातवी सदी के उत्तरार्धमे भोट साम्राज्य के पश्चिममे विस्तारके प्रारम्भ या गहिलेकी यह समाधि थी । मुर्दे के साथ भोजन और मद्य रखने से यह भी स्पष्ट है, कि इन लोगो पर भी बौद्ध धर्म या नव्य हिन्दू धर्मके कर्म-सिद्वान्तका प्रभाव नहीं पडा था । ऐतिहासिक निष्कर्ष पर अन्यत्र लिख चुका हूँ, इसलिये उसे यहा दुहरानेकी श्राव- श्यकता नहीं । ऐसी समानिया क्नम्, स्प और भोट-सीमा पर स्थित नग्या गांव तक ही नहीं बल्कि, सुडानम, पंगी और कामरु (aer उपत्यका) तक मिलती हैं । सुनम के जेलदार तारामने बतलाया, कि वह किसी किसी कंकाल के साथ ग्राभूपण भी मिलते हैं। समाधियो में मिट्टी के बर्तन अधिक मिलते हैं, क्योकि अधिकाश मुर्दे गरीवीके होते हैं। पंजी मने यद्यपि छोटी कनसे निकले कह कर दोनो वर्तन दिये थे, किन्तु मुझे सन्देह है, कि इस साधारणती कामे कासेका इतना सुन्दर चढ़ा कटारा मिलता, और उससे दस गज हट कर एक बडी कामे<noinclude></noinclude> hsi6zvouso5igvio3bqcl2vzx6ttn6z पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४५ 250 195260 665985 2026-07-07T15:37:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665985 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रागैतिहासिक समाधियां १३५ जिसमे नीचे उतरने के लिये चार-पांच पत्थरकी खुड्डिया लगी हो कुछ भी न निकले। दूसरे दिन जेलदार बॅसीलालने कहा- मैं खुद कम देखने गण था, उसमे चीजें जरूर निकली थीं। मैं समझता हूँ, यह कटारा बडी है। और चीजें क्या मिली, इसे पंजीराम जाने । सम्भव है, उन चीनका पीरामने लोहारको देकर गलवा दिया। अस्तु, किसी नामन्ती समावि निलनेपर उसमें ग्राभूषण, सिक्का जैसी चीजें भी मिलेंगी, जिनसे उस समय के इतिहास पर चार गेशनी पड सकेंगी। लिपा यह वि श्रर मोटभाषा लिद कहते हैं । प्राचीन की है। आज मात्र एक खडी टाके पहाडकी जइसे करता है। ग्राज वहा घरोकी सख्या माने कम है, पुराने रात्री चार वी, सारेपा () खडके किनारे के परपत्यवहुत चुनाई पाई जाती है, जो किसी समय खेत थे। पर देवदार वृक्षोंकी पुरानी जड़े मिलनी हैं, अर्थात् त के थे। पर पीके पत्रके चके भी केमिना से पश्चिम ट्रीटी पदा पर एक दुर्गा, जो भाग यस अनिया है। + - 1 पारकर बडी लुके बायें जल गया । श्रागतो किन्नर या उपयोग से नी जरूर पुरानी कामी भी श्रामने परी दीपक निकी खुद की का सिती बाले नवविवेक 1 से ही नव न दे। लिज भले ही परसे तलने पुनते है। गाने पूर्व याने ad करके डॉ पार कर की उन यह एक मर<noinclude></noinclude> exvyt7dudlad02pkyngymxiup16j1p0 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४६ 250 195261 665986 2026-07-07T15:37:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665986 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३६ किन्नर - देशमे स्थान था । लिप्पा खहुके ऊपरकी ओर चलकर डाडेको पार करके आदमी स्पिती पहुँचता है, जहांके डाकुग्रो की बातें अब भी लोगों को याद है । यहा से चार-पांच मील पर अवस्थित असर गांव के लोग मूलतः स्पितीके बतलाये जाते हैं, खाली जगह देखकर वह लियावालों से भूमि ले यहां बस गये । लिप्पासे तीन-चार दिनमें आदमी स्पिती पहुँच सकता है । लिप्पासे एक रास्ता सीधा सुङ्नम जाता है, जिससे एक दिनमें वहां पहुँच सकते हैं, किन्तु रास्ता बहुत कठिन और सीधी ढाका है। जेलदार बशीलाल बीमार थे, इसलिए मिलने न आ सके ये । पहिले ही दिन शाम को उन्होंने भोजन के लिये निमंत्रण दिया था। मैंने प्रस्थान के दिन आनेके लिये कहला भेजा था । चलने के दिन (२७ जून) सामान बेगार पर भेज पुण्यसागरके साथ मैं जेलदार के घर पहुँचा । गांव आग इन्हीके घर से लगी थी। कोठे पर देव मन्दिर था । पुजारी जोकठी (दीप काष्ठ) बालकर मन्दिर मे गया था। जोकठीको वही फेक कर वह नीचे जा से रहा । आधी रातको होश आया, तो वह दौड़ा- दौडा ऊपर पहुँचा । भीतर धुंआ भर गया था । पुजारीने दर्वाजा खोल दिया । बाहर हवा तेज थी, खोलनेके साथ ही वह जोरसे भीतर बुसी प्रज्वलित हो उठा। पुस्तोके धनी पचासों वर्षसे सूखा देवदार काष्ट जेलदारका घर ही नहीं बल्कि सारा निचला गांव जलकर भस्म हो गया । नेपाल तराईके गांवो मे इस तरह बहुधा ग्राग लग जाया करती है । वहाके मकान ज्यादातर फुसके हुआ करते हैं। पुराने समयमे जगलोकी अधिकता से नीचेके नगर और गाव अधिकांश लकड़ीके हुआ करते । पाटलीपुत्र ( पटना ) के लिये बुद्धने कहा था, उसके तीन शत्रु होगे, आग, पानी और आपसी फूट । राजगृह नगरमे तो आपकी बला इतनी बढ़ी हुई थी, कि राजाने नियम बना दिया, जिसके घरमै अर्थात जिसकी सावधानी से ग्राग पहिले शुरू होगी, उसे नगरसे निकल पर्वताकार के बाहर दक्खिन और जाकर बसना होगा । सयोग से ग्राम<noinclude></noinclude> 75p4wiag3y7e81otcg36zovbzyo3r78 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४७ 250 195262 665987 2026-07-07T15:37:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665987 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रागैतिहासिक समाधिया १३७ राजमहल मे ही पहिले लगी । नियम पालन करते राजाने बाहर निकल कर अपना नया महल और दुर्ग बनाया, जो पीछे नये राजगृह के नामसे दूसरा शहर ही चल गया । जेलदार के यहां वैसा कोई नियम नहीं था । जलकर खाक हो जाने पर लोगोंने फिर अपनी पुरानी जगहों पर घर बना लिया । लकड़ी मुफ्त और इक्रातसे मौजूद थी, सिर्फ श्रमकी आवश्यकता थी । चारपाच वर्ष के भीतरही सारे घर बन गये । जेलदारका मकान दूरसे आलीशान मालूम होता है, यद्यपि वही बात भीतरसे नहीं देखी जाती, किन्तु उसे खराब नहीं कह सकते । घरकी छतें बहुत ऊँची नहीं हैं, खिडकिया कम और छोटी हैं, वही बात कोठरियोंकी भी है । किन्तु, यह भी स्मरण रखना चाहिये कि 8 हजार फीटकी सर्दी और हवासे जाटोंमे उन्हें मुकाबला करना पड़ता है । जेलदार हमें ऊपरी कोठे परके बैठकेपर ले गये। यह बैठकेका बैठका और देवालयमा देवालय है । सजावट तिब्बती ढगकी, और बेटने के लिये मोटे और चायके प्याले यादिके रखने के लिये सुचित्रित छोटी चोणि चोपचिया ) रखी थीं । गद्दीके ग्रासन पर चीनी नीम वालीन विद्या या बैठकर बात होने लगी और नमक मरुनी पेण्टिक तिब्बती चात्र भी या पहुँची। चीनी सुंदरला की दिल्ली टमसे गंगा जमुनी देवी और टकनके साथ यी है, जलदार वसीलाला घर सारे विवरका सन्ते बनी बुत है। इसी परिचय हा ऊँची चादीकी मूर्ति सुनहले हनी, दानवीरेट भी मानी (मंत्र के यत्र ) ते मिल रहा चाक लेनेसे पीले थे। मंदिर की पुराग है, कि जलते घरते बहुत कम सामान निकाल पाये थे। उनका पुराना है। मैने पुराने सजपत्र देखना ध गये थे। जसका केनेवाले में से चलने सोच रहा था,<noinclude></noinclude> ew5ei1krrvxq0eyu9obk6v243dsdb4k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४८ 250 195263 665989 2026-07-07T15:37:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665989 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३६ किन्नर - देशमे स्थान था। लिप्पा खडुके ऊपरकी ओर चलकर डाडेको पार करके आदमी स्पिती पहुँचता है, जहांके डाकुग्रो की बातें अब भी लोगों का याद है । यहां से चार पांच मील पर अवस्थित असरङ गावके लोग मूलतः स्पितीके बतलाये जाते हैं, खाली जगह देखकर वह लिप्पावालों से भूमि ले यहां बस गये । लिप्पासे तीन-चार दिनमें आदमी स्पिती पहुँच सकता है। लिप्पासे एक रास्ता सीधा सुङ्नम जाता है, जिससे एक दिनमें वहा पहुँच सकते हैं, किन्तु रास्ता बहुत कठिन और सीधी चढाई का है । चलने के दिन (१७ जून) जेलदार बंशीलाल चीमार थे, इसलिए मिलने न आ सके थे । पहिलेही दिन शाम को उन्होंने भोजन के लिये निमंत्रण दिया था। मैंने प्रस्थान के दिन आनेके लिये कहला भेजा था । सामान बेगार पर भेज पुण्यसागरके साथ मै जेलदार के घर पहुँचा । गांव आग इन्हीके घर से लगी थी। कोठे पर देव मन्दिर था। पुजारी जोकठी (दीप काष्ठ) बालकर मन्दिरमे गया था। जोकठीको वही फेक कर वह नीचे जा से रहा । आधी रातको होश आया, तो वह दौड़ा- दौडा ऊपर पहुँचा । भीतर धुंग्रा भर गया था। पुजारीने दर्वाजा खोल दिया । बाहर हवा तेज थी, खोलनेके साथ ही वह जोरसे भीतर घुसी पचासों वर्षसे सूखा देवदार काष्ट प्रज्वलित हो उठा। पुस्तोके धनो जेलदारका घर ही नहीं बल्कि सारा निचला गाव जलकर भस्म हो गया । नेपाल तराईके गांवोंमे इस तरह बहुधा ग्राग लग जाया करती है । वहाके मकान ज्यादातर फुसके हुआ करते हैं। पुराने समयमे जगलोकी अधिकता से नीचे के नगर और गांव अधिकांश लकडीके हुआ करते । पाटलीपुत्र ( पटना ) के लिये बुद्धने कहा था, उसके तीन शत्रु होगे, श्राग, पानी और आपसी फूट । राजगृह नगरमे तो आागकी बला इतनो बढ़ी हुई थी, कि राजाने नियम बना दिया, जिसके घर अर्थात जिसकी असावधानीसे याग पहिले शुरू होगी, उसे नगरसे निकल पर्वतप्राकारके बाहर दक्खिन और जाकर बसना होगा । सयोगसे ग्राम<noinclude></noinclude> jk8v5ouxw4rjvopzbnw584m1ig4qyq5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१४९ 250 195264 665990 2026-07-07T15:37:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665990 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रागैतिहासिक समाधिया १३७- राजमहल मे ही पहिले लगी । नियम पालन करते राजाने बाहर निकल कर अपना नया महल और दुर्ग बनाया, जो पीछे नये राजगृह के नाम से दूसरा शहर ही बस गया । जेलदार के यहां वैसा कोई नियम नहीं था । जलकर खाक हो जाने पर लोगोंने फिर अपनी पुरानी जगहों पर घर बना लिया । लकडी मुफ्त और इक्रातसे मौजूद थी, सिर्फ श्रमकी आवश्यकता थी । चार-पांच वर्ष के भीतरही सारे घर बन गये । जेलदारका मकान दूरसे आलीशान मालूम होता है, यद्यपि वही बात भीतरसे नहीं देखी जाती, किन्तु उसे खराब नहीं कह सकते । घरकी छतें बहुत ऊँची नहीं' हैं, खिडकियां क्म और छोटी हैं, वही बात कोठरियोंकी भी है । किन्तु, यह भी स्मरण रखना चाहिये कि 8 हजार फीटकी सर्दी और हवासे जामे उन्हें मुकाबिला करना पड़ता है । , जेलदार हमे ऊपरी कोठे परके बैठ केपर ले गये। यह बैठकेका बैठका और देवालयका देवालय है । सजावट तिब्बती ढगकी, और बैठनेके लिये मोटे गद्दे और सामने चायके प्याले यादिके रखनेके लिये सुचित्रित छोटी चौकिया ( चोकचिया ) रखी थीं । गद्दीके आसन पर चीनी ढगका तिब्बतमे बना नफीस कालीन बिछा था | बैठकर बात होने लगी और नमक मक्खन मे बनी 'पौष्टिक तिब्बती चाय भी या पहुँची। चीनी सुन्दर प्याला भी तिव्वती ढंगसे गंगा जमुनी बैठकी और ढक्कन के साथ था। वह चुका है, जेलदार बंसीलालवा घर सारे विन्नरका सबसे धनी कुल है। इसका परिचय पौन-पौन हाथ ऊँची चांदीकी मूर्तिया सुनहले छत्र, चाकी डेढ हाथ ऊँची मानी (मत्र जापके यत्र ) से मिल रहा था। उनकी मा और बीके कान और कठ सोने से पीले थे। मदिरकी सब पुरानी चीजें नहीं हैं, क्योंकि जलते घरसे बहुत कम सामान निकाल पाये थे | उनका खानदान पुराना है । मैने पुराने कागज पत्र देखना चाहा, विन्तु वह स्वद्यागमे दग्ध हो गये थे । जेलदार बिना भोजन कराये कहा जाने देनेवाले थे, यद्यपि मै चायमे तने सत्तृकी दो तीन 'पडियो को खाकर चलनेकी सोच रहा था, .<noinclude></noinclude> 4o3vkinow6mnhyvell5l20bs8ydlcki पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५० 250 195265 665991 2026-07-07T15:38:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665991 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>" १३८ किन्नर देश मे कितु उधर पूडी, हलवा, तरकारी बन रही थी। नीलालजी मा की चोरसे पहाडी हिन्दी, भाषाभाषी क्षेत्रके हैं। उनकी पत्नी भी किन्नरी नहीं कोचीकी हैं। इसका प्रभाव भोजनके ऊपर भी था। चीनी के लिये अभिशप्त होने पर भी मैं हलवेका अछूता नहीं छोड सकता था । चंसीलाल तीन भाई हैं, चौथा पहिले मर गया । स्वयं सातवें दर्जे तक पढे हैं, मंझला आठवे दर्जे तक, सबसे छोटा नवीं श्रेणीम रानपुग्ने पढ रहा है। अभी तीनो भाइयोको कोई पुत्र नहीं है, सबका पाडय विवाह है, इसे कहने की आवश्यकता नहीं । यदि यह प्रथा बरने नानी न होती, तो इतनी पीढ़ियों तक खेत धन-मकान बॅटकर वह भी मावारण किसान रह गये होते | A ( १० ) तिब्बती सीमांतकी ओर घड़ी तो शिम्ला बनने गई थी, इसलिये ठीक-ठीक नहीं कह सकता, शायद जेलदार के घर मे निकलते निकलते नौ बज गया था । श्रव फिर जपथ सामने था, और थाये रात्तेसे अधिक लम्बा अधिक ऊँचा, " न श्रायेसे भय खाओ, सामने आये साहसके साथ मुकाबिला करो" सिद्धान्तको मानते हुये मै घोड़े पर सवार हुआ । घोडा भलेमान था, अजपथमे जैसे तैसे वेढे पर सवारी नही की जा सकती । यदि कमजोर हुना और बैठने लगा, तो वहा बैठने की जगह नहीं, वह फुटबालकी 'भाति येवल लुढ़क भर सकता है, यदि सबल और चपल दुआ, तो भी खैरियत नहीं । घोडा दोनो नही था । यहा से बड़ेवाले के चातिरिक्त और भी आदमी साथ जा रहे थे। रास्ता लिपा-गगा (किरड खड्ड ) के वाये किन्तु तसे दूर और ऊपर की ओर जा रहा था । कुछ मील चल कर रास्ते में लियावालोकी खेती पडी । कुछ फसल हरी और कुछ बोई जा रही थी, वहा सर्वव्यापिका चूतीके और कुछ दूसरे फल 'वृक्ष भी थे । किंतु यहा फलो पर अधिक व्यान नही था । व्यान तो नही<noinclude></noinclude> f0zmvw7x9nkfymoxg87mriwgw13ymtw पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५१ 250 195266 665992 2026-07-07T15:38:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665992 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तिब्बती सीमातकी थोर १३६. भी अधिक नहीं था । किन्नर भूमि प्रकृति की ओरसे मेवोंकी भूमि बनाई गयी है। प्रयास से कोटा कानुलके सारे फल यहा लग जाते हैं, इसलिये लगा दिये जाते हैं, किन्नर लोग सुरा देवीके अनन्य उपसाक हूँ, और यह कहना पड़ेगा, कि सुरा बनाने में नित नये तज लासानी । करने में भी तज के लिये पूर्ण स्वतन्त्रता देकर सरकार भी कम श्रेय भागी नही है | किन्नरने सारे अन्न और फलोकी सुरा भभकेसे खींचकर देखी है | फल पानी डालकर रख दिये जाते हैं । जत्र खमीर उठकर उबलने लगता है, तो चखकर देखते हैं, कि नशा यावा या नहीं, फिर भभकेसे भाप बनाकर उसका थर्क खीच लेते हैं। उसे बत्ती में डुबो कर जलाने से जलने लगता है। डाक्टर ठाकुर सिंह बातूनी मालीकी शिकायत कर रहे थे- वही माली जिसे देख कर पता नहीं लगता कि वह कार्यारुढ़ माली है या पेशनप्रात । ठाकुरसिंह के पास परार साल के दो-ढाई मन सूखे से नाखाती यत्र भी मौजूद हैं, जिनका उपयोग सुरा बनाने में ही होता है। उन्होने घडा बैठा रखा था । उफान थाने पर उक्त मालीको चखने के लिये दिया । माली उन ग्रादमियों में हैं, जिनका नशा टिलियाने नदी अपने पेटमें रहता है; कह दिया- खूब नशा है खूब स्वाद है। ठाकुरसिंह वैसे तो नियम से प्रतिसायं सुराभगवतीका सेवन करते हैं, और "मोरी" की शराब पूरी एक बोतल भी अपर्याप्त होती है, किंतु चूक गये। मालीकी बातपर विश्वासकरके मभका लगा दिया । सुरा ग्रासूत हो गई, चखा तो मालूम हुग्रा, पूरी तैयार नहीं है । होशियार भी कभी कभी धोखा खा जाते हैं। खैर, किन्नरोके सुराके तज ने चारपाच ही साल पूर्व वेमी (छोटा श्राइ ) शामिल हुई और ग्राज पाके पारखी उसे शरावांकी रानी कहते है । वेमीका सम्मान अव बहुत बढ़ चला है। चूली ( खूनानी) की सुराका तजव उससे पीछे हुआ है, और वह भी सफल, यद्यपि गुण में वह सबसे पीछे है। अब तो किनर कह रहे हैं, कि घर-जंगली सभी किस्म के फलोंकी शराब<noinclude></noinclude> 4fce9cevinj1d7effm45c6f70tyo8o2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५२ 250 195267 665993 2026-07-07T15:38:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665993 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४० किन्नर - देश मे निकाली जा सकती है, फल सिर्फ जहरीला नहीं होना चाहिये। मैंने तो कहा फल और अनाजको तो तुम ले ही चुके, न्योजा और देवदारके काष्टों पर भी क्यों न तज कर डालो-काष्टका छोटा छोटा काट कर या श्रारेके चीरे चूरनका पानीमें डाल खमीर तैय्यार करो और फिर भभकेसे खींच लो । देखें, बीन तो डाल दिया है, क्या जाने अंकुर निकल आये। मेरे इस नुस्खे का यही अर्थ है, कि हमारो मन अनाज और मेवा कहीं इस तरह बच पाये तो अच्छा - - इस रास्ते कनम् आठ-नौ मीलसे अधिक दूर नहीं है, किन्तु कान तो लडकपनकी कहावत गूंज रही थी- 'बरस दिनके रास्ते जाना, छ महीने के रास्ते नहीं ।' रास्तेमें कई स्थानों पर अनगढ़ पत्थरोंकी सीढ़िया थीं, जहां प्रायः मैं घोडी से उतर जाता, यद्यपि साथी कह रहे थे कोई हर्ज नहीं। मै चढ़ाईमे भी काफी पैदल चला, तो भी घोड़ीने वडी सहायता की। अन्त मे जोत पर पहुँचे, जे ग्यारह हजार फीटसे कम न होगी। वहांसे दूसरी ओर नीचे दूर लनड और कनम् दिखलाई दे रहें थे। इधर पर्वत गात्रपर देवदार जातीय वृक्ष अधिक थे। जरा देर बिआम करके फिर चले । श्रव घोडीका काम नहीं था, किंतु आदमी ल से लौटने वाले थे । मनोरम देवदार-स्थली थी, किंतु पानीकी बूँद भी कहीं दिखलाई नही पडती थी। कुछ महीने पूर्व वहा से चाये- गये पथिको के जलाये चूल्हों के कोयले और राख पडी थी । उस वक्त यहांकी बर्फ पिघल रही होगी, और पानी सुलभ रहा होगा। जूडी छांहमे बस पानीकी ही लालसा थी, किंतु उसके लिये काफी उतरना पड़ा, तब तक वृक्ष लुप्त हो चुके थे, और खड्ड में जाकर पीने के लिये पानी मिला। इससे पूर्व ही हिमानी-प्रपातकी बंस-लीलाकी साखी बहुतसे टूटे उखडे गिरे वृक्ष दे रहे थे। आगे लनड का सतमहला दुर्ग श्राया । लडका शब्दार्थ है लामा महल या राजमहल, किन्तु यहां यह नाम दुर्गका नही गॉवका है । लामामहल या लामाका प्रसिद्ध '<noinclude></noinclude> gsoa4oyed649qf51mysmgd60jzdakgt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५३ 250 195268 665994 2026-07-07T15:38:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665994 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तिब्बती सीमांतकी ओर १४१ लोग यह नहीं बतला सकते, यहां के लोगोकी स्मृति बहुत अर्थात रामपुरके राजाका मठ यहां कभी रहा हो, इसका तो पता नही; हाँ, यह दुर्गं श्रवश्य राजमहल हानेका सबूत देता है। दुर्ग ऊँचा काफी है, किन्तु उसकी लम्बाई-चौडाई बीस-पचीस हाथसे अधिक नहीं है। इसकी दीवारे गढ़े पत्थरों और देवदार के सुबड बल्लो से चिनी गई है। हर तीन चार पत्थरकी पटियोंके बाद लकड़ी है। दीवारोंमे कुछ कुछ दूर पर सातो खडोंमें छोटे छोटे जुडवा कान छिद्र ( जोडे गवाक्ष ) हैं, जिनसे दुर्गस्थ श्रादमी तीर या पत्थर फेकते रहे होगे। कि दुर्गको किसने बनाया । इस बात दुर्बल है । बूढे करते हैं-राजाका है, राज्यकी श्रोरसे जो इसकी मरम्मत होती आ रही है। अब वह भी बन्द है और सातवा तल ढंद-मंड होने लगा है। पूछने पर बतलाया गया, ऊपर नथुन् ग्यल्प देता रहता है, किन्तु उसकी मूर्ति, यदि नहीं है।' दुर्ग के उपयोग के बारेमे कहा जाता है, जब भोटिया लुटेरे श्राते, तो लोग वरोको छोड दुर्ग बन्द हो जाते और भीतरसे तीर और पत्थर 'छोडते | यह विश्वासकी बात नहीं है । भोटिया लुटेरेकी बात ही क्यों उन समय किन्नर लुटेरों की भी कमी नहीं थी । नाका ( हड रड ) का एक आदमी तिब्बती लूटसे ही धनी हो गया था, उसे मरे अधिक दिन नहीं हुये । वह किन्नर तदसोको अभियान के लिये भरती करता, उन्हें हथियार देता, खर्च-चर्च देता, फिर बदले मे लूट कर लाये मालमे से घर बैठे एक चोथाई वॅटा लेता । वैमाही तिब्बत और स्पितीवाले नी करते होगे । मुझे तो जान पड़ता है, यह दुर्ग 'ठाकग्स्' के जमाने की यादगार है । यदि यह वही मूल इमारत नहीं, तो उसीका संस्कृत रूप है । फिर वही प्रश्न- 'टाकरस्' के वशंज व कहाँ हैं ? हर जगह पुराने राजवंशों यहाँ ही क्यों उनका अत्यत्ताभाव ? लाहुल (कुल्लू) में ठाकरोंके वशंज मौजूद हैं, ग्राजभी वह ठाकर कहे जाते हैं, फिर किलर ही में इसका अपवाद क्यों ? चाहे लनङ में की दरिद्र संताने देखी जाती हैं,<noinclude></noinclude> a0nwq9kzjaa28fbwc91owalovwzxyq0 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५४ 250 195269 665995 2026-07-07T15:38:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665995 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>" १४२ किन्नर-देश मे ठाकरवंश न हो, किन्तु उससे दो-ढाई मील नीचे सीलमि श्रवभी एक ठाकर परिवार है । सुन्नम् जेलदार तो ग्यारामके कथनानुसार वर्तमान परिवार ठाकर वंशज नहीं, बल्कि ठाकुरके बरका वासी है। जो भी है, वर्तमान परिवार से पूर्व वहा ठाकरके होने का तो पता लगता है, किन्तु चिनी, तड लिड, चंगाव आदि ठाकरोका तो नाम तक नहीं मिलता । , लनड के सबसे पुराने खान्दानके बारेमे पूछने पर ग्रोम - सिड परिवारका पता लगा, जो निस्संतान हो गया है। किन्नरमे हर घरका नाम होता है, वैसे ही जैसे तिब्बतमे, किन्तु कितनी ही बार लोगो बहुपतिकता धर्मं प्रत्याख्यान किया, जिसमे उस घरसे हुये - का नाम एक मिलता है । दुर्गके पास ग्राम देवताका पत्थरका मंदिर है । किन्नरमे देवताओ के मंदिर अधिकारा की छत और काट मिश्रित दीवारवाले होते हैं, यहांका देवता एकं शू इसका अपवाद रखता है । मदिरसे नीचे के मकान मे एक तरुण था, जिसे चीनी पोशाक पहना दी जाती, तो चाङ कैशकभी उसे पहचान न पाता । उसे इशारेसे पान श्रनेके लिये कहा । तरुण मेट्रिक तक पढ़ा था । उसने बुलाने पर बुरा नही माना, मै भी क्षमाप्रार्थी हुआ । उसने भी लडके इतिहास पर कोई प्रकाश नहीं डाला। लवड गाव बडा है । साठ कनैत द काली और पाच लोहार परिवार रहते हैं। काफी खेत है, किन्तु सत्र के पास नही, काली-बढई अधिक्तर हायकी मेहनत पर गुजारा करते हैं । दूसरों की भी समृद्धि खेती अनिरिक्त भटके व्यापार पर है। इनकी भेट नकरिया चारेकी कमी के कारण जाडेसे नीचे चली जाती है - कनौरकी एक लाख भेड बकरियोमे दो विदाईकी यही हालत है। तरुण की शिक्षा भी उपयोग बस गर्नियोंमे तिगत व्यापार और जाडोमे नीचे भेड बकरी की चराईमे होता है। एक दिन कामका एक तरुण चिनीम रास्ते मे मिला था, वह मेट्रिक पास, ट्रेनिंग पास, पोट- मास्टरीका काम सीखे था, किन्तु नौकरी छोड़ रहता था | कहता था-"२२ रुपया मासमें कैसे अपनी डीके साथ गुजर-बसर हो ।<noinclude></noinclude> 6c2pgjcotr22xth8i750712y8t6h2wt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५५ 250 195270 665996 2026-07-07T15:38:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665996 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तिब्बती सीमांतकी ओर १४३ कहा, मुझे अपने गावके स्कूलमे रख दो, कि मैं कुछ घरका भी काम करके गुजारा कर सकू, किन्तु उसे भी स्वीकार नही किया गया, लाचार हो इस्तीफा देना पडा ।" ऐसे तरुणीने शिक्षा प्राप्त कर अपना और अपने देशका क्या उपकार किया ? किन्तु इसके लिये उनको दोषी नहीं ठहराया जा सकता, आाखिर पेट बाधकर कौन काम कर सकता है ? 1 दुर्गते नीचे गाव मे गये । चश्मेके नीचे कुंड और ऊपर गणेश जी महाराजकी मूर्ती चंकित देखी। ब्राह्मण धर्मका लामा धर्म को पछाडनेका प्रवास | आगे खेतो के किनारे-किनारे उतरते हुये फिर हिन्दुस्तान - तिब्बत- सड़क पर पहुँच गये, जो कनम् खडुमे ऊपरकी ओर जा रही थी । खड्डका पुल गिर-सा रहा था, इसलिये उसकी बगल मे अस्थायी पुल बना दिया गया था। पुल पार कर हम कनम्की सीमामे खेतो के किनारे किनारे कुछ दूर चढाई चढकर गावसे पहिले ही पी० डब्लू० डी० डाकबगले मे पहुँच गये । चपरासी पहिले ही पहुँच चुका था । बगलेके चौकीदार है गावके नम्बरदार और कनौर के बड़े धनिकोंम से एक। उनके बड़े भाई सडक-इन्सपेक्टर बाबू वेलीराम से १९२६ मे मेरा परिचय हुआ था । बेलीराम की मृत्यु कई साल पहिले हो गई। उनके भाई नम्बरदार घरमे थे । उनका लड़का बॅगले मे मिला, और मेरे आते ही बॅगले मे ठहरनेका पास मागा | कही चुका हूँ, "सारे वॅगले जंगल विभाग के है", मुझे यह भ्रमहो गया था, और पंजाबकी पी० डब्लू० डी० से पास नहीं लिया । मैने कहा पास नहीं है । न जाने क्यो तरुण चौकीदार- पुत्रने बंगला खोलनेमे रकावट नहीं पैदा की। कनम् महत्वपूर्ण स्थान है, मैने उसे अच्छी तरह देखने का काम लौटते समय के लिये रखा, इसलिये उसके बारेमें कुछ और लिखना भी तब तकके लिये स्थगित करता हूँ । १८ जूनको दिन चढाने पर हम आगे चले । कनम् सतलजकी भारासे बहुत ऊपर बना है, और सडक • उससे भी ऊपर होकर जाती है। कितनी ही दूर तक सड़न और ऊपर की ओर चली, यद्यपि इसके<noinclude></noinclude> 41nyq94ouoijrxzjx4ocrziptwi7ipx पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५६ 250 195271 665997 2026-07-07T15:39:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665997 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-२४४ किन्नर - देश मे लिये श्यासो खड्डुमे उसे बहुत उतराई पार करनी पडी, किन्तु बीचके एक सूखे नाले मे सडककेलिये ठोस जमीन पानेकेलिये ऐसा करना जरूरी था । नालेसे आगे रास्ता अच्छा रहा । श्यासे पुल पर पहुँचने से पहिले के दो मील घुम-घुमा उतराईके थे । धूप तेज थी । कनम् ६४७० फीट ऊँचाई पर है, और उतराईसे पहिलेकी सडक अधिकतर १०,००० फीट पर जाती है, किन्तु धूप असा मालूम हो रही थी, में पछता रहा था, क्यों हैट साथ लाकर शिमला छोड द्याया । पिछली यात्रा मे श्यासेा खडसे यागे तित्र्चत-हिन्दुस्तान सड़क नहीं गई थी। खड्डका नया लोहेका पुल भी पीछे बना । श्रागे स्पू और नमूग्या तक सडक १६२७ मे बनी। किन्तु अभी हमे स्पूकी ओर जाना नही था | मै तो पहिले स्पू और नम्ग्र्या ही जाना चाहता था, हिन्दु पुण्यसागरने 'कह दिया, "स्पूके लिये बेगार और घोडा सीधे नही मिलेगा”, यद्यपि यह बात गलत थी। कहने पर वह मिल सकते थे, यदि मैं उस दिन स्पूकी ओर चला गया होता, तो लौटती बार सुडनम् सडक खराब कर देती है, जरूर चला जाता। खैर, हम पुल पार हो ऊपरकी कोर मुड़े | नही ग्रामीण रास्ता था । जाडोंकी वर्फ रात्तोको यहाके लोगों के लिये तो कोई बात नहीं, वह तो - ऐसे रास्ते को दुर्गम -नही कहते, जहा चकरीका बच्चा चला जाता है। भाग्य कह लीजिये या तहसीलदार साहेब का तुरन्त होने वाला दौरा कारण था, जिसमे दो तीन गांवोंके नरनारी-अधिकतर नारिया सड़क बनाने मे लगे थे। पत्थर नीचे लुढकाये जा रहे थे, और रास्तेको पाटपूटकर हाथभर चौडा बनाया जा रहा था। ऊपर श्यासेो तक रास्ता ठीक हो चुका था । हमे दो ही एक फर्लांग बिना बने रास्ते से चलना पडा । आगे दो मील श्यासो गावमे 'पहुँचने तक चढाई ही चढाई थी, किन्तु भयकर नहीं । वैसे कनके बाद ही से पहाड़ोंसे वृक्ष लुप्त होने नग्नताका राज्य-तिब्बतका दृश्य -- था । हा, कहीं ऊरकी ओर पद्म, न्योजा या देवदार के लगे थे, किन्तु यक्ष तो परलेपार के पर्वत पर कहीं- कुशगात्र वृक्ष दिखलाई<noinclude></noinclude> 6f6h1wp5ww2f2tlehr9f8ecpus3a87p पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५७ 250 195272 665998 2026-07-07T15:39:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665998 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तिब्बती सीमांतकी और १४५ usd थे । से अधिक मार्गको पैदल पारकर घोड़ेपर सवार हो दोपहर होते-होते हम श्वासों गाव में पहुँचे । और लकडीकी कमीका प्रभाव घरोंपर दिखलाई पड़ रहा था, वहां लकडियोंकी जगह अधिकतर अनगढ पत्थर दिखलाई पड रहे थे । तहसीली चपरासी पिछले ही दिन यहा पहुँच चुका था, किन्तु वह बीस बरसका होने पर भी १४ बरसका छोकरा मालूम होता था, उसके रहने न रहने से कोई अन्तर नहीं पड़ता था । जब सडक स्पूनमग्या नहीं गयी थी, तो यहा डाकबंगला था । चंगलेका सामान लकडी और दवजे-खिडकिया उठकर नमग्या चलीं गई, किन्तु दो तीन कोठरियों का एक घर अव भी मौजूद है । उसकी अवस्था देखनेते जान पड़ता है, उसे गिरनेके लिये छोड दिया गया है । बोंमे लोग अपनी भेड बकरिया उसके भीतर बांधते है, चारों चोर दगीका राज्य, वर्षो से मरम्मत नहीं हुई । आाखिर ऐसी इमारत बनवाने में चारपाच हजार रुपया खर्च होगा, कई समृद्ध गावोंका रास्ता इधर से ता है, जिनमे सुनम अपने गुदमी, पट्टों और पट्टियोंके लिये ही नहीं रोके लिये भी सदियोंते प्रसिद्ध रहा और ग्रागे हिमाचल के प्रान होने पर नहाके उद्योगपरायण लोगोंकी मेहनत से वह फिर महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण करेगा । फिर ऐसे सरकारी मकानकी उपयोगिता दोन इन्कारी हो सकता है ? श्वासो चाहे दम ही घरोंका गान हो, सेगाव, जिने कार्य शिक्षा के समय स्कूलकी आवश्यकता रोगी, फिर इन ब घरकी उपेक्षा क्यों ? हम गावसे बाहर उनकानके जन कूल (कुला ) के किनारे छामे बैठ गये । वेगार पहिले बन्ने काये थे । घोडा र वेगा यहांसे बोटने वाले थे। मालूम हुआ, ऊपरसे याया वाडा तैयार है, और बेगारु नी। मिलनेवाले घटेका चुन मालूम हो गया होता, तो चार मील और कनम् वाले ले जाकर हम सुनम् पहुँच जाते, किन्तु जान पड़ता है मुडनम के लोग जितना मेरे चानेकेलिये उत्सुक थे, वहांका देवता १० .<noinclude></noinclude> o9u9oi0bk9b5moembffr03xfia25qp4 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५८ 250 195273 665999 2026-07-07T15:39:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 665999 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४६ किन्नर - देश में उतना ही बाधा के लिये उतारू था । बेगारीका मजूरी दी गई। वेगाव अधिकतर काली होते है, यद्यपि इसका यह अर्थ नहीं, कि कलेत बेगार नहीं करते। वह होती भी हैं अधिकतर स्त्रिया । दोनों बेगारू कोली वे, एक षोडशी और एक पुरुष । किन्नरियोका कण्ठ चाहे जितना सुन्दर- मधुर हो, किन्तु यहा सौदर्यकी बहुत कमी है, और यहा थी, एक कोली (अछूत ) दुहिता, जिसे मैं सारे किन्नरी जनपद-कल्याणी था । उसका रंग गोरा, नाक उन्नत, चेहरा संतुलित, आखे बड़ी श्रो पतले थे। ऐसे ही रत्नोंके लिये ब्राह्मण महर्षियों फतवा दिया था - " स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि " | बेगार गये, हमारे लिये छाछ आया, गर्मीमे वह और मधुर लगा | थोडी देर विश्रामके बाद हम सुड्नमकी और चले । तुड्नम् चारही मील था. सोचा दो घटेमे वहां होगे। गांव के पासकी छोटी खडके पार हुये, चढाई शुरू हुई | घोड़ा लाया गया । पहिले पहिल उत्तपर चढ़ना था, इसलिये अच्छी जगहमे ही चढ़ना मैंने पंसद किया। पीठपर सवार होते ही वोडा कूदने लगा। भला ऐसे घोड़ेपर बिना मरम्मत किये रास्ते मे चढना क्या श्रात्महत्या से कम था ? लोगोंने घोड़ेका पकड़ा और मै सहीसलामत नीचे उतर श्राया । तै किया, पैदल चलनेका । चढ़ाई ही चढाई और कठिन सीधी चढ़ाई, धूप सामनेकी, थकावट अलग। ऊपर से लौटते समय सीधी उतराईका ख्याल, सबने मिलकर दिमाग में खिचड़ी पकानी शुरू की -- सुडनममे क्या घरा है, एक बार तो तुम वहां हो भी श्राये हो, व्यर्थ की बला मोल लेनी कहाकी बुद्धिमानी ? एक मील तक खिचडी पकती रही । बेगास आगे बढते जा रहे थे, निर्णय देरतक रोका नहीं जा सकता था। पुण्यसागर बहुत दूर नही थे, उन्हें पुकार कर कहा - "सुडनम यात्रा स्थगित, बेगारुओं का श्यासो लौटने के लिये कहो, एक बात ।" ने पीछे लौट पड़ा। रास्ता कठिन जरूर था, किन्तु लिम्पाके यागे पीछेत राजा भी<noinclude></noinclude> cufv6lcldfhxeum7grauui1x4ssj28b पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१५९ 250 195274 666000 2026-07-07T15:39:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666000 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तिब्बती सीमांतकी चोर १४७ तो इससे अच्छा न था, यदि कई कारण एकत्रित न हो गये होते, डनम् पहुँच जाता। खैर, अत्रतो लौट पड़ा था । गावके पास पहुँचकर प्रतीक्षा करने लगा | साथवाले भी आगये । श्यासो- त्रिस्ट (श्वासे - वजीर) का घर वडा था, उसकी छत भी चौडी थी, मैंने वा डेरा देना पसंद किया, किन्तु तब तक चपरासी और गांवके मेट ( चारस् ) ने एक कुटिया मे ले जाकर डेरा गिरा दिया। श्वासा दस घरका छोटा गांव ही नहीं है, बल्कि उसकी सूरतते दरिद्रता बरसती है, जिसका मलिनता से चोली-दामन का साथ है। मलिनता तो खैर उतनी असह्य वस्तु नही थी, आखिर मैं कई बार तिब्बतकी मार खा चुका हूँ, किन्तु मलिनता जहां हो, हो नही सकता वहा पिल्लू-खटमल प्रचुर परिमाणमे न हो, दोनोंकी मारक पुन श्राजतक वर्दाश्त नहीं कर सके—कायरता कह लीजिये । यहा जितने साथी थे, जान पड़ता है, सभी पिस्सू खटमल जाति के दलाल थे । मैने पुण्यसागरसे कहा -विस्टकी छत के पास डेरा लगवात्रो, जिसमे दुश्मनोंके श्राक्रमण के समय रातको छत पर भागा जा सके । - श्यासो--श्यातेा विस्ट भी बीस साल पहिले तक बहुत धनाढ्य परिवार था। किसी समय नन्ताराम के पुत्र इन्दरदासका जमाना चमका हुआ था। वह पढे-लिखे होशियार आदमी थे। पढ़े-लिखेका अर्थ अग्रेजी कारसी पढा लिखा नही समझिये, सौ साल पहिले मामूली टॉक् (गुप्त लिपिसे निकलो पहाडों की पुरानी लिपि ) लिखपढ लेना भी विद्याका और समझा जाता था । उस समय बुशहर-राज्यके हर इलाके मे विस्ट या वजीर होते थे, जिनका वचन यशके लोगोके जिये कानून था । ग्रामदनीका क्या पूछना है " कारसे तिब्बतका व्यापार भी था । इन्द्रदासने खूब सम्पत्ति पैदाकी, श्यात खडके गावोम ही नहीं डाडेगार हड रेट में भी । सुनते और ऊपर ग्यानोङ गावमे तो रामपुर के तलालीन राजप्रासादको भी मात करनेवाला मकान बनवा चहा देवटाका दुख नहीं है । इन्दरदासक्त समय बहुत ऐशजैश में बीता, राजदर्वारमे सम्मान और प्रजा मे व था। उनके पुत्र चरनदामने घरवी लक्ष्मीका चतुर र यद्यपि<noinclude></noinclude> q4ndb0pd8hqizksey5p6qg3mt1h7nkc पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६० 250 195275 666001 2026-07-07T15:39:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666001 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४८८ किन्नर-देश मे बेताज बादशाह का जमाना यत्र लद चुका था, और चिनीकी तहसील- दारीने विस्ट और " मुखियों" के अधिकार छीन लिये थे । चरनदासके चार पुत्र हुये, जिसमें दो मर चुके हैं, दो पागल हूँ, संसारचद ग्याचोड के 'महल' मे रहता है, और अमरनाथ अपनी मा और सम्म लित पत्नी के साथ यहां श्यासो में बापदादों के घरमे । यद्यपि श्या सोमे लकड़ीका ठाला है, किन्तु इन्दरदास के जमाने का मकान है, इसलिये काफी बड़ा है। हवेली के पास कई बखार, बाहरी कोठरिया भी हैं । छतके पास उसीके समतल तीन कोठरियोंवाले बाहिर घरके सारेमे हमने आसन लगवाया । यद्यपि श्रहीन घरमें आगंतुको अधिकतर ठहरने की संभावना नही था, जिसका अर्थ या ि खटमलों की भी कम संभावना; क्योंकि वह यहा उपवास पर तो रह नही सकते थे। तो भी हमने मोका श्राजाने पर कुमार भाग निकलने की सोच- कर वहा डेरा दिया था--" असेची सदा सुखी ।" सामान रख दिया गया । पुण्यसागर खाना बनाने में लगे । दिन काफी था। मैं छतार गया । देखा चरनदास-पुत्र त्रिस्ट अमरनाथ नीचे दुनल्ते के ग्रांगनमे खड़े है। बात जान पड़ा, कुछ पढ़ेलिले श्रादमी है। नीचे उतरे, विस्टका पारिवारिक मंदिर देखना था । पुराने खानदानोंमें पुरानी चीजें जमा हो जाती है, उन्हें देखनेके एगालसे । विस्टने द्वार खोल दिया। मिट्टी-पीतल के देवी-देवताश्रोते कोठरी भरी पडी थी और तेज़-मैत- गंदगीका कोई ठिकाना नहीं । कुछ तिब्वती पुस्तकें भी थी। किन्तु कोई महत्व रखने वाली चीज हमे दिखलाई नहीं पडी । श्रमरनाथमे उससमन • कल्लापन (पागलपन) नही था, प्रकृतिस्थ की तरह बात कर रहे थे, ल, कभी कभी वेपर्वाहीकी हंसी इस देते थे, जो अविकतर अपने दुर्दिनो की बातचीत के समय ही । कह रहे थे, मेरा भाई ग्याचोड मे 'कल्ला' हो गया हे । सबसे झगड़ता है | मेरे से भी झगड़ता है । यहा नहीं चातान स्त्री ( दोनों की सम्मिलित पत्नी) को ही मानता है। नौकर भी कोई उसके पास नहीं टिकता | खाना ? अपने बनाता है । ( अमरनाथ सबसे छोटे<noinclude></noinclude> pbkwu054q358clbgy4tlvoh503coz42 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६१ 250 195276 666002 2026-07-07T15:39:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666002 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तिच्ती सीमांतकी ओर १४६ ४८ सालके हैं, संसारचन्द पचपन के करीब है ) । खेत परती पड़े हैं, बड़े बड़े खेत। लोगों को जोतने नहीं देता है । भल्ला है न, समझाने से भी नहीं समझता । कहता है - जोतने वाले कब्जा कर लेंगे। चूलियोके वृक्ष सूख रहे -- हैं । महल ( जिसे इन्दरदासने राजाकी देई कन्या - व्याह कर लाने के लिये बनाया था ) जाड़ोमे छतसे वर्फ न फेकने और वर्षामे मिट्टी न डालने से टूट रहा है। दीवार मजबूत है, इसलिये अभी टिका हुआ है। अमरनाथ अपनी बात भी बतला रहे थे। जमीन तो काफी है, किंतु जोतनेवाले देना नही चाहते । दूरकी जमीनोंपर पटवारीको दे दिवाकर लोगोने कब्जा भी कर लिया है । यद्यपि अमरनाथ कभी कभी प्रकृतिस्थ भी हो जाते है, और पत्नी तथा माता तो सर्वथा प्रकृतिस्थ हैं, तो भी साधनो के प्रभावसे घर यहा भी बेमरम्मत है । गावकी बडुमे इस साल बहुत हिमवृष्टसे काफी बाढ आई थी। पिछले कई सालो से हिम और वर्षाके कम पडने से पानी सूख जाता, जिससे खेती नष्ट हो जाती रही, कितने फलदार वृक्षभी सूख गये । पत्नी और माता यहा देख-भाल करके किसी तरह गुजारा भरका अनाज जमा कर लेती रही। इस परिवारको गुजारा भर ही तो चाहिये | उसके आगे पीछे है कौन ? पत्नी पचास के करीब पहुँच गई। है । पागलों के परिवार मे सतान न हो, यही अच्छा, पागलोंकी संख्या बढ़ाने से लाभ ' इ दरदास के वंशका चिराग बुकनेवाला है, उसके लिये शोक और सवेदना प्रकट करने की आवश्यकता नहीं; किंतु इन जीवित प्राणियों के प्रति साहनुभूति है। यानी स्वाभाविक है । अमरनाथ जाडेमें पासके खडुमे होकर जाते ग्लेनियरकी निष्ठुरताके बारेमे कहते हुये हँस पड़े -- "इसे क्या मजा मिलता है, जो छत परके तीन स्तूपांको ढकेलकर गिरा देता है" । छत पर जाता है क्या ? "नहीं, छतपर नहीं आता, याता तो घर थोडेही बचता । ग्लेसियर दहा बाधकर चलता है, उसके श्रागे श्रागे प्रचंड हवा चलनी है, उसने इस साल छतके (पूजा) स्तूपों को गिरा दिया ।" बिस्ट परिवारकी सहयोगिनी एक गूंगी (लाटी ) - बहिरी है, जो कुरुपताकी प्रतियोगिता मे शायद मारे किन्नर देश में प्रथम श्रायेगी, किंतु - . ,<noinclude></noinclude> 9deo4l8pugbazp2guegwkts20t2ip77 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६२ 250 195277 666003 2026-07-07T15:40:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666003 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५० किन्नर-देशम वह इस स्तोन्मुख परिवारके लिये भारी अवलब है। वह रहनेवाली पार हरड की है, किंतु कई सालो से इस परिवार की बन गई है। मोटा-मोटा खाना, फटा पुराना कपड़ा बस और क्या चाहिये ? श्रायु उसकी भी मिस्ट- पत्नी के समान है । ( ११ ) भारतका सीमांती गाँव - शाम को ही मालूम हो गया था, बारीका हफ्ता बीत गया, कल के लिये बेगारू यहासे नही, सुंड नम और आगे आयेंगे। चार पांच मील दूरके वेगा और घोड़ेकी श्राशा दोपहरसे पहिले क्या पूरी हो सकती थी । मैने बहुत जोर लगाया, कि इसी गांव के वेगारु चले चले, आखिर कलं भी तो वह तुङनम जा रहे थे ? किंतु नियम-निर्मुक्त होके बेगार कौन करनेके लिये तैय्यार ? वस्तुतः इसे वेगार भी नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि दस मील स्पू तक पहुँचाने के लिये उन्हे सवा-सवा रुपये मजूरी मिलती । बेगारकी प्रतीक्षा मे दोपहर तक यहां ठहर कर फिर धूपमे दस मील दौड़नेके लिये मै तैयार नहीं था । १६ जूनको सवेरे ही मै चल पडा । पुण्यसागर और चपरासीको कह दिया, कि बेगारुके थाने पर वह रवाना होवे; घोडा श्राये तो यही से लौटा दे । सुनम निवासी जेलदार तोच याराम मिलने पर अफसोस प्रकट करते हुये कह रहे थे, कि हम लोग बडी लालसा से प्रतीक्षा कर रहे थे । तस्थाराम २६ साल पहिले सुडनम, डाडेके पार अपनी खेती (हडगो) मे मुझे मिले थे। मैं तो भूल गया था, उन्हे याद था । किन्तु सवेरे के समय ठडे ठडेम मै नीचे उतरने लगा । श्यासो- पुल तक पहुँचने में देर नहीं लगी । व १६२७ मे बनी सड़क पर चल रहा था । तिब्बत - हिन्दुस्तान - सड़कका सबसे पिछला भाग होनेसे इजीनियर लाला<noinclude></noinclude> hreynqqso4ieruile8o6y5ajdsegj58 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६३ 250 195278 666004 2026-07-07T15:40:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666004 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमाती गाव १५१ रामचन्द्र ने इसे बहुत 'कौशल से बनाया, चढाई उतराईको बहुत विक होने नहीं दिया । सड़क नदीसे बहुत ऊँचे उठने नही पाती । कुछ दूर जाने पर सड़क रेगिस्तान के एक क्षुद्र खडसे जाती दिखलाई पडी । मैने समझा बालू ऊपरके पहाङसे गिरा होगा, किन्तु पीछे मालूम हुआ, यह पवन देवताका काम है । जो लाख मन बालू कहींसे उठाकर यहा ला धरते हैं। बालू हटाया जाता है, और वह फिर यहां घर दिया जाता है । और आगे बढने पर पी डब्लू डीके एस-डी-प्रो- ( उपविभागीय अधिकारी ) इजीनियर कपूरसाहेब सदलबल आ रहे ये । इनके साथ श्रोवर्सियर, सडक-इंसपेक्टर के अतिरिक्त एक दो और भद्र पुरुष थे। बेगार बीससे क्या कम होगे । चिनीमें सडक पर उनसे मेट हो चुकी थी । नमस्या तक अपने वार्षिक दौरेको पूरा करके वह वापस लौट रहे थे । साहेब सलामी कुराल- प्रश्न हुआ । कनके चौकीदारकी बात याद करके कहा - मै पी डब्लू डीका पास नहीं ला ना । उन्होने कहा—पासतो मुख्यकार्यकारी इंजीनियर देते हैं, किन्तु ने बगलेके चौकीदारों को कह दूँगा । आगे चलने पर जाडोंमे लुढककर बाई लाखो मनकी हिमानी रास्ते मे मिली । मिट्टी मिली वर्फपर पत्थरोंके टुकडे पडे थे, जिसपर आदमियों और पशुनोने रास्ता बनाया था। नीचे गलित जल बह रहा श, किंतु जारी दिमराशिको गलने के लिये अभी कई हफ्ते चाहिये थे । कुछ ही दिनो पहिले वह हिमानी कई पशुचोकी वलि ले चुकी है। एक खयर तो उसी आदमीका मरा, जिसने लौटती बार मेरे लिये कनम् तक न किराया किया था। ऐसे स्थानोंके लिये रास्ता तुरंत बनाने का खतरेकी जगहभी मौजूद नहीं न्धायी मजूर हैं, किंतु वह हर समय ऐसे रहते । हिमानी किनारे गलकर हर रोज छोरोपर तीनचार हाथ सीधे वटे हो जाते हैं, जिन्हें टलॅनग करनेकी जरूरत होती है। कभी किनारे नादरसे दृट किन्तु भीतरते गलकर पोले हो गये रहते हैं। ऐसे ही समय बेचारे auratलेने अपने एक खच्चर-वारपांच नौ रुपयेके '<noinclude></noinclude> lg1ctb3tnswx48wl8y45v8gbeiq56mq पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६४ 250 195279 666005 2026-07-07T15:40:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666005 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५२ किन्नर - देश में 'माल - को खोया। ऐसी हिमानी ग्रादमीके लिये भी खतरनाक हैं, न जाने कहां वह गलकर पोली हो गई हो, और थानके पैर पड़ते ही वह लिये दिये चार पोरिसा नीचे ले जाये, फिर तबतक केलिये हिम-समावि, जब तक हिमानी गलकर श्रापके शवको पथिकोंके देखने लायक न बना दे | रास्ता था ही, खतरा तो जीवन मे पग पगपर है ही; किन्तु यहा तो एक पूरा काफिला आध ही घण्टा पहिले यहां से गुजरा था। मैं अकेले रास्ता नाप रहा था; और साथ ही पासके नंगे रंगविरगे पहाड़ो और उनके भिन्न-भिन्न कोणपर पढ़े स्तरोको देखते 'मनमे ग्रफसोत कर रहा था यहां विश्व इतिहासकी पोथी खुली है, लेकिन मेरे लिये "अंधे के सामने रोना " । पोथीं में कुछ नाम मैने जरूर पढ़े थे, किन्तु सोदाहरण परिचय विना सांइसकी पोथीका पाठ किस काम का ? सोच रहा था --- पर्यटकके लिये भूगर्भ शास्त्रका साधारण परिचय अत्यावश्यक है । " विद्या अनन्त है जीवन सान्त" इसे मै उचित बहाना नहीं मानता । स्पू भी पहाडी के ग्राडमें था, यहीं सड़क समन्दर (सतलज)- तर लोड कर बांई ओर मुडी । युगो पूर्व, जब अभी मानवका पृथ्वी पर कहीं पता नहीं था, तब यहा ग्लेशियर रहा होगा --- सदा चलता ग्लेशियर, उसने लाखो वर्षमे खोद-खोद कर इस पहाड़ी भूमिके दो पावोंको खड़ोंने परिणत कर उसे पर्वत से अलग सा कर दिया । मैं नीचेकी चौड़ी गहरी सूखी खड्डमें अरबों छोटे बडे पाषाण- खंडों को देखते चल रहा था। वहा एक आदमी सीधे उतरता नदी तट के पास के खेतोकी र जा रहा था, दूसरी ओर एक लोमडी-शंकित चकित निरुद्ददेश्य सी काया काटती जा रही थी । लोमड़ी - मुलायम-मूल्यवान् खालवाली लोमड़ी । · चक्कर काटती किन्तु समतल पर चलती सड़कने पहाड़ी और पर्वन श्रेणीके मिलन-स्थान पर पहुँचाया । वहा पापाणपुज 'और झडियोका होना श्रावश्यक था, क्योकि यह प्रर्वत स्कंध पर सडकका सबसे ऊँचा स्थान था। यहां खड़े होकर मैने स्पूको देखा। वहाँ पहुँचने में दो मील करीव और रास्ता नापना पड़ा, कुछ बढाईके साथ भी। दोपहर करी<noinclude></noinclude> 9rk78nlhbvdjbepoorzeb44fm474bml पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६५ 250 195280 666006 2026-07-07T15:40:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666006 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमांती गाव १५३ मै स्पू डाकबंगले मे पहुँचा । रास्ते भर ग्राज मेघने छाया कर रखी थी। स्पू ( खुन्नू --- फुग् ) --स्पू विशाल गाव है । सबसे विशेषता यह है, कि यहींसे भोट भाषा शुरु होतीं है, यद्यपि ऊपरी कनोरके लोगो और यहा वालोंके चेहरेमे जमीन-आसमानका भेद नहीं है । वस्तुतः यह भी उसी प्राचीन किन्नर (शू) बशके हैं, भोट प्रभाव और रक्तकी अधिक्तासे इन्होंने सदियो पूर्व किन्नर-भाषा बिल्कुल छोड़ दी। यहां भी भोट साम्राज्य विस्तार के पूर्व लोग वैसे ही अपने मुर्दोंको आहार और मद्यके साथ कों गाड़ते थे, जैसे किन्नर देश के अन्य स्थानों में । भोट- भाषाका इतना जबदस्त प्रभाव यहा आकर बसनेवाले कोलियों और लोहारों पर भी पड़ा है। कनोरमे अन्यत्र से आकर पीढ़ियोंसे बसगये तथा पाच या दस सैकडेकी संख्या मे होने पर भी, ये लोग घरमे अपनी भाषा बोलते हैं. जो कि हिन्दीकी बहिन है । किन्तु यहाके कोली दूसरोंकी भांति भोट भाषा बोलते हैं, यद्यपि उनके चेहरे पर शायद ही कभी मोट-मुख- मुद्राकी छाप देखी जाती है । यहाँ मेरे लिये भाषाकी समस्या हल होगई व्यक्तियोंसे ही मै बात चीत दुभाषियाके बिना काम थी । जहा दूसरी जगह पढेलिखे या नीचे गये कर सकता था, स्त्रियचच्चोसे बोलनेपर तो नहीं चल सकता था, वहा त्पूमे किसीसे दिल खोलकर भोट भाषा मे बात करना आसान था । पुरुष पोशाक में सनातनधर्मी नहीं हुया करते, किन्तु स्त्रिय अवश्य प्राचीनता-पक्षपातिनी होती हैं। यहांकी जियोकी पोशाक किन्नरियो से सर्वथा भिन्न है । यह दाहू ( पहाडी साडी ) की जगह लम्बा कुर्ता और पायजामा पहिनती हैं, टोपी भी इनकी उलटे कनटेोपकी नहीं बल्कि सीधे तौरसे गोल होती है, कान के पास लटकता भरण भी भिन्न प्रकारका प्राचीन श्राभरण तो पूरी तौरसे अब कुछ जाता है। होता है। टोपी और वृद्धाश्रमे ही पाया बगलेपर पहुँचने पर सबसे पहिले चौकीदारको पैदा करना था ।<noinclude></noinclude> bw6pkh25vrtd7j5hsbj58xcmwhtw3j8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६६ 250 195281 666007 2026-07-07T15:40:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666007 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५४ किन्नर - देश मे - सौभाग्य से इंजीनियर महाशयका दल याज दी गया था, इस लिये चमड़े वाली आराम कुर्सी बराडेंम पड़ी थी, बैठने की दिक्कत न थी । भूख अवश्य मालूम हो रही थी, किन्तु उसकेलिये पुण्यसागरके जाने तक की प्रतीक्षा करनी थी । बंगला चूलियो के बागमे बना है, किन्तु चूलियां खट्टी और कच्ची थीं । स्पू६२०० फीटकी ऊंचाईपर बसा है, र्थात उतनी ही ऊंचाई पर जितनीकी चिनी, किन्तु कहते हैं, यह चिनीसे गरम है | यहाँ हवा कम चलती अथवा चिनीके पास सदा हिमाच्छादित शिखरों जैसे पर्वतका प्रभाव यहाँ की सदों को कम करता है । इधर उधर घूमकर देखने पर कोई आदमी मिला, जिसे मैने चौकीदार को बुलाने के लिये भेज दिया, और स्वयं एक-दो कच्ची चूलियो मुंह खट्टा करके कुर्सी पर बैठ गया । स्का डाकबंगला १६१३ में बना था अर्थात उस समय, जब कि अभी यहाँ तक सड़क थानेमे १४ वर्षकी देर थी। बंगलेसे ३५-३६ वर्ष पहिले यहाँ मोरावियन मिश्नरी रेल्लप-दम्पती पहुँच गये थे । यही दोनो यहाँ नही मरे, बल्कि ग्राधे दर्जन दूसरे युरोपीय मिनरी भी यही मरे, उनकी अस्तंगतसी समाधियोके गाधिक अक्षरवाले पत्थर अब भी घर हातेमे दिखलाई पडते हैं, लेकिन वह अब गॉवके नवरदासी सरति है । नजाने कब यह उत्कीर्ण पाषाण उसी तरह लुप्त हो जायेंगे, जिस तरह कि कभी यहां खडा गिरजा । क्या मोरावियन मिश्ररियोकी चौमुखी सेवाका यही प्रतिफल होना चाहिये, कि उनका कोई पदचिह्न तक यहा न रहने पावे | उन्होंने यहां स्कूल खोला था, जिसमे पढ़े कुछ व्यक्ति अब भी यहा मौजूद है—यहांका चौकीदार नमस्थल रिड - एक हैं | वह शिक्षा के साथ बहुत कर्तव्य परायण व्यक्ति हैं। बहुत कम डा बंगले इतनी अच्छी हालत में दिखलाई पडते है । मिशन १६१३ तक रहा, तब तक यहां डाकघर भी रहा, और उन्हीकी उपस्थितिने कि ग्रहा कला बनवाने की प्रेरणा दी। यहाके मिश्ररी जर्मन थे आज भी लोगोंके पान उनकी कोई कोई ' पुस्तके मौजूद हैं। पादरी<noinclude></noinclude> qjxemr8dtuhd7acfe3ft4406yahuawh पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६७ 250 195282 666008 2026-07-07T15:41:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666008 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमांती गाव १३५ बढईका मार्कस एक कुशल बढई घे, उन्होने बहुत से श्रादमियों काम सिखलाया । चौकीदार नमग्यल छेरिडने कृतज्ञता प्रदर्शन करते हुये कहा उनकी कृपासे हमारे गाँवमे बढई के काम जानने वालोंकी कमी नहीं है । उन्होने स्वेटर और मोजा बनाना सिखलाया, जो ग्राज भी चल रहा है। उन्होने ही सेव नासपाती यादि फलांके बाग लगाये, यद्यपि मैा नागों का लोगोंने और ग्रागे नही बढाया, किन्तु अब भी उनके लगाये वृक्ष यहा मौजूद हैं, विशेषकर मार्कस्के बनाये विशाल बंगले के आगनके खेव बहुत स्वादिष्ट बतलाये जाते हैं । मार्कस्का बगला राज्यकी संपत्ति है, अर्थात् हिमाचल सरकार उसकी मालिक है, किन्तु वह बहुत ही उपेक्षित अवस्थामे है, और अपनी सुपुष्ट स्थूल धरनों तथा सुदृढ दीवारों के भरोसे खड़ा है । किवाडों और खिड़कियोके शीशे fair टूट चुके है। फर्श पर बिछे चौकोर पत्थर भी उखडनेवाले हैं । मार्कस के बगलेके बढे बढे कमरोंमे एक मिडिल स्कूल खोला, जा सकता है, जिसकी दूर भविष्यमे आवश्यकता पडेगी, किन्तु तत्र तक शायद यह बगला नष्टप्राय हो जायेगा, और फिर सरकार बीस हजार लगा कर भी ऐसा बंगला नहीं बना सकेगी । कृतज्ञता और कृत- विता मानव उत्तम गुण हैं, मोरावियन मिश्ररियोने बहुत प्रेमसे इस हुये गावमे दो पीढीतक काम किया, इस लिये उनकी मधुर स्मृतिको बायम रखना भी हमारा कर्तव्य है । सोचिये तो सुदूर जर्मनी से ये लोग यहा आकर अपना सारा जीवन दे, रेत पर पदचिन्हकी भांति मिट गये । 7 चौकीदार नम ग्यल छेरिड के थाने में थोड़ी ही देर हुई। उन्होंने दाद भी पैदा किया, और फिर और चीजोंके जुटाने में लग गये । मेट चाया, और दाइ (वेगार नोकर) ले श्राया । हलमंदी (कोली- मुखिया) इधनका प्रव करने गया - हलमदी नेत्रहीन था, किन्तु गले पर ग्रन्दाले चल पिर तक्ता था। उसके भाई श्री रियो पदार योग्य बनाया, और वह ग्राज कई वर्षो से थलिन को भोटभाषा<noinclude></noinclude> 3zkn3zdkfr0ub14muz0ow96obq5ui9y पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६८ 250 195283 666009 2026-07-07T15:41:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666009 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५६ किन्नर - देश मे का एक मात्र समाचारपत्र कलिम्पोड से निकाल रहे हैं । जान पड़ता है, श्वासो में वेगास उतनी देर करके नहीं आये। उनसे सामान उठवाकर चपरासीका साथ छोड़ पुग्यसागर जल्दी जल्दी चल पड़े और मेरे स्पू पहुॅचनेसे ढाई-तीन घंटे बाद वह भी या पहुँचे । नमग्यल छेरिड - विजय दीर्घायु चपरासीका पूरा नाम था, जिसे सक्षित करके हम विजय या नम्रग्यल कह सकते हैं । विजबकी मातृभाषा भोटिया है, अतः भाटिया तो पढ लिख सकते ही हैं, साथ ही वह उर्दू भी जानते हैं । साठसे ऊपरकी अवस्था होनेसे वह उर्दू के युगमें पैदा हुये थे । वह बोद्ध ही नहीं बौद्ध लामा भी हैं। डुक्पा सम्प्रदायवाले गृहत्य लामाको भिक्षु लामासे कम नहीं मानते। यही नहीं उनके चोटीके लामा भी रिंग जिन- मा (विद्याधरी) या छग्-ग्या छन् मो महामुद्रा (के उसमे त्री) रत्नका परिगृह सिद्धि के लिये अनिवार्य समझते हैं । पाठक इसे भोटियोंकी घृणित प्रथा न समझ लें, इसलिये यह कह देना आवश्यक है, कि इसकी बुनियाद । भारतमे सरहपा ( आठवीं सदी), शवरपा, घंटापा, जलधरपा ( आदिनाथ ), मीनपा, गोरखपा आदि चौरासी सिद्धोने रखी, जो सभी स्थायी या अस्थायी रूपमे " महामुदरी” के उपासक थे | यह कहने की आवश्यकता नहीं, कि महामुद्राका महात्म्य शाक्त हिन्दुओं में भी कम नही है । विजय स्पूके शिक्षित और बहुश्रुत व्यक्ति हैं । उन्होने अपने केशो सचमुच धूपमे नही सुखाये -- वस्तुतः उनके बाल अभी बहुत थोडे ही सफेद हैं, जो मंगोल रक्तकी अधिकताका परिचायक है | उनका बचपन मोरावियन पादरियोंके प्रोजके जमाने में बीता । उस वक्त तो अवश्य ही उन्हें इन छीपा (नास्तिकों ) की बहुतसी बातें बुरी लगती रही होगी; बल्कि अब भी वह विचार सर्वथा बदले नहीं हैं । वह जानते थे, कि मै बौद्ध हूँ; इसलिये पहिले बड़े उत्साह से कह रहे थे - पादरियोने कुछ कोली- लोहार-घर इसाई बना लिये थे, जिन्हें हमने फिर बौद्ध बना लिया और उनको उनकी जातिमे मिला दिया, एक वालती जातिका मुसल्मान ईसाई हो गया था, उसकी जातिका कोई न होनेसे वह अब भी अलग<noinclude></noinclude> q9whe2unqw0lz70emdm4llyrd5wjw28 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१६९ 250 195284 666010 2026-07-07T15:41:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666010 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमांती गाव १५७ है, किंतु रखता है. हमारे ही विचारो को । जब उन्हे यह मालूम हुआ कि मैं पक्षपातांध बौद्ध नहीं हूँ, मै मोरावियन पादरियां के शिक्षा ज्ञान- शिल्प-प्रसार कार्यका प्रशंसक हूँ, तो उन्होने कहने के ढंगको बदल दिया, और कभी-कभी तो वह भी उनके कार्यों और तपस्या पर विचार करते श्रद्र हो जाते । 5 हम लोग दो घंटा दिन रहते ही गॉवकी कुछ दर्शनीय चीजोंको देखने निकले । लोचवा -ल्हखड नज़दीक ही था । लोचवा - भाषान्तरकार ----से अभिप्राय महान् भाषान्तरकार रत्नभद्र (रिन्-छेन- नड्पा ग्यारहवी सदी ) से है । इस ल्हाखङ ( मंदिर ) को उसीका बनाया बतलाया जाता है । मूर्तियों पुरानी हैं, इसमें संदेह नही । लोचवाकी जन्मभूमि शिपकी के पास यहाँ से दो दिन के ही रास्ते पर है । उसका निवास अधिकतर यो लिड और स्पु रङ मे रहा, जो भी तिब्बत के इसी अचलमे हैं । लोचनाका कार्यक्षेत्र भी इधरही रहा, और स्पू एक महत्वपूर्ण स्थान है । इसे भोटके लोग कभी कभी खुन्न-फुग्-- कन्नौरका चंचल या मुख-भी कहते हैं । यहासे लोचवा कई बार गुजरा काश्मीर पढ़ने इसी रास्ते से गया होरा, लौटा भी इसी रास्ते, दुबारा काश्मीर यात्रा भी इसी रास्ते हुई होगी । इसीलिये यहां लोचवाने मंदिर बनवा दिया हो, या लोगोके बनवाये मंदिरकी प्रतिष्ठा कर दी हो, यह अविश्वसनीय नही है । मंदिर छोटा सा है, और दीवारो और छतोको तो हर्गिज लोचवाकालीन नहीं कहा जा सकता । मदिरमें अपने दोनो प्रधान शिष्यो सारिपुत्र और मौद्गल्यायनके साथ शाक्य मुनिकी मृत्तिका मूर्ति है । थोडा नीचे हटकर रखे बोधि-सत्व अवलोकितेश्वर (मिट्टी) और सामने दूसरी ओर एक काष्ठकी बीधिसत्त्व मूर्ति है । अवलोकितेश्वरको लोगोंने माँ तारा बना रखा है। मैने कहा — देखो यह स्पष्ट अवलोकितेश्वरकी मूर्ति है, इसमे स्तन नहीं, और वाये वद्स्थलपर मृग-लाइन है । विजयने देखकर तुरत स्वीकार किया -- मृगमुख ग्रवलेोकितेश्वरका लाछन जो वहां मौजूद या । अष्टसाहसिका प्रज्ञापारमिता ( भोट भाषा ) की एक हस्तलिखित प्रति भी यहां है, जिसके पहिलेके पृष्टोंमें कई<noinclude></noinclude> qgbdwujxdmxz5gufepbaimf0eolvyfz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७० 250 195285 666011 2026-07-07T15:41:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666011 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५८ किन्नर - देशमे भारतीय कलम के मालूम होते हैं, उसके लिये ग्यारहवी बारहवी सदी के होनेकी श्रवश्यकता नहीं, इधरके पहाडोंमें भारतीय कलम बहुत पीछे तक प्रचलित रही । मोरावियन मिशनके घरों और अवशेषों को देखते गांवके फेरड गङखाटोले ( मुख्य-ग्राम ) से बाहर खेतोंमे निकले । वहा समतल भूमिपर मंदिर देखकर पूछा, तो मालुम हुआ, यहा ढोड, र्थात करोड़ों मंत्रोंसे भरी घुमानेवाली ढोल है । मानी या ढोड जुरकी प्रथा तिब्बतमे पन्द्रहवी सदी के बाद आरम्भ हुई, और यहा तो और भी और केन्द्रीय स्थान पर इस मदिरकी स्थिति पीछे किन्तु समतल भूमि कह रही थी, कि यहा पहिले भी जरूर पुराना मंदिर रहा होगा । "नहीं नवा है" कहकर मना करते रहने पर भी मै कुछ मंदिरमे गया । गर्भ- मंदिर मे थर छिनके हुना, बड़े भाई बड़ी भक्तिसे घुमा श्रांखे चली गई, अब इसी तरह विजय लामाने कहा - "कहान विश्वास नही हुआ । मै मानीके एक बडी मानी थी, जिसे श्री रहे थे । कह रहे थे --- बूढा धर्म करते दिन बिता रहा हॅू। यहां सिर्फ 'मानी है”। मुझे अब भी पीछे गया | वहां दो बोधिसत्व मूर्तियां थी; रिक्त स्थान था जहा तीसरी भी मूर्ति रही होगी । मूर्ति की बनावट पुरानी थी । मूलतः यह मंदिर स वोधिसत्व शाक्यमुनिका था अथवा रिगसुम गोन्पा ( वोधिसत्त्वत्रय अवलोकितेश्वर, मजुश्री और वज्रपाणि) का, पीछे मानी का मूल्य लामाओंके बाजारमे बढा ( ग्राखिर यहा एक बार ढाल घुमानेसे उसमे लिखकर रखे ग्रथों मंत्रोके जापका पुण्य हो जाता है) इसलिये मूल प्रतिमाओं को पीछे डालकर ग्रागे बडी मानी खड़ी कर दी गई। विजयको जरूर विश्वास हुआ होगा, कि उन्होने अपने बाल धूप मे ही सुखाये हैं, क्योंकि वह भी लोकधारणा के शिकार होकर इसी गांवमे साठ सालसे रहते भी न लोचना-ल्हखङ के अवलोकितेश्वर को पहचान सके, न दोङ जुर ल्हखडकी मूल मूर्तियोंका पता पा सके थे । यहाक मूर्तियां पुरानी हैं, तो भी कलाकी दृष्टिसे उत्कृष्ट नहीं है ।<noinclude></noinclude> af7bnja1z7heytk1sq5al7fihomr7p5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७१ 250 195286 666012 2026-07-07T15:41:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666012 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमांती गाव १५६ स्पूका ग्यारहवी सदी तक पहुँचाने के लिये यह दोनो ल्हाख पर्याप्त हैं । किन्तु त्पू उससे भी पुराना है यह भी लिप्पाकी भांति बर्तनोंवाली मृतक समाधियां बहुत जगह निकलती है। अकस्मात खोदाई करते समय निकलनेवाली कोका फर्माइशी तोरसे तो निकाला नहीं जा सकता बहुत पछतांछ करनेपर एक दूसरे डुक्पा लामाने कत्रते निकले एक मिट्टी के बर्तनको लाकर रख दिया, वह बनावटमें लिम्न जैन सुन्दर नहीं है । ' अगले दिन ( २० जून ) के गांवके कुछ और स्थानो में घूमनेका निश्चय हुआ था । स्पू गाव कई टोलोमे बसा हुआ है । डाकबंगले के ऊपर चोमोलिड (भट्टारिका या रानी द्वीप ) है । सबसे ऊपर पहाडी पर सम्-तन्-लिड है, जहा डुक्पा गुना है। मुख्य ग्राम फोरङ् गङ -खा है । उत्तसे नीचे दौड - जुर मदिरते श्रागे वर-छो है, और सबसे नीचे वाला टोला स्तोछा । इनके अतिरिक्त एक टोला खडके पार डाक बंगले आनेवाली सडकके नीचे है। हम पहिले सम्-तन्- लिड ( समावि द्वीप ) मे गये । यहां डुक्पा सम्प्रदानकी पुरानी गुवा बतलाई गई थी, इस लिये पुरानी चीज देखनेके प्रलोभनमे गये । श्रव यह गुम् (मठ) नहीं घर है। पिछले साधुने व्याह कर लिया, उसके कच्चे- बच्चे चत्र यहाँ रहते हैं । मठोंके साधुग्रो ( हिन्दू, बौद्ध, ईसाई चाहे कोई भी धर्म हो ) के ग्राचरण यौनसंबंध-नियंत्रण के कारण जितने कुत्सित होते हैं, उत्ते देनकर ख्वाल याता, है, परिवाजकता के साथ यौन-स्वतंत्रता देदी जाये; पिन्तु जब ऐसा होनेसे बच्चेकचेवाले मठोंकी दुर्दशा देखने में आती है, तो वह श्रपि श्राकर्षक नहीं मालूम होती । तिब्बतने तो लुड (ग्याची -- ल्हासा मार्ग के पान ) मठमे यौन-वातत्र्य का प्रयोग करके देख लिया, वह सफल नहीं रहा। रामुड्के परिव्राजकको स्वतंत्रता मिली । सतान पैदा होने लगी । प्रत्येक लडका परिव्राजक और प्रत्येक लड़की परिहाजिक बना दी जाने लगी? ( आज भी यही प्रथा है ) । बटने इन परिपरिमाजियांग एक गाव बस गया ।<noinclude></noinclude> le8v29i9rt6qt1nv7r82d7xsr9ufcih पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७२ 250 195287 666013 2026-07-07T15:41:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666013 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६० किन्नर - देश मे मठकी संपत्ति-खेत- जीविका के लिये अपर्याप्त हो गये । साधारण गृहस्थके- लिये रालुका आकर्षण घट गया और पूजाकी ग्रामदनी बन्द हो गई। हां, यौनस्वातत्रयके साथ रालुङ्वालोने यदि संताननिग्रहका अनिवार्य नियम बनाया होता, तो उनकी संपत्ति पर्याप्त न होने पानी, और नहीं पूजा की ग्रामदनी बन्द होती । लडके बच्चे थे, छतपर एक थीं। मंदिर या गुंत्राके नवीन नवीन हो। यहां कुछ मूर्तियां - हम डुकपा-गुत्रामें पहुँचे । घरमे कोठरी थी, यही मदिरका काम दे रही छानेका यह अर्थ नहीं, कि मूर्तिया भी नातिनवीन नातिप्राचीन थीं। ऐसी पीतल की दो मूर्तियां गोम्नो ( देवता ), गोम्बों ल्हर्जे ( मिला- रेस्पा के शिष्य ) — और लकडीकी बुद्ध और दूसरी दो मूर्तियो के फोटो लिये । खच्चरपर चढ़ी एक लक पल्दन - ल्हामोकी मूर्ति भी अच्छी थी । गुम्बासे उतरकर खेतो हे ते गावमे पहुॅचे। पट्टियों और बनियानो के बारेमे कहने पर तिनीही दिखाई गयीं । पादरियोंकी सिखानी स्त्रियोने बनियान बुनने को आगे बढाया है । यह उनके लिये ग्रासान है। यहा के लोगोको चलते-चलते सून कातनेका अभ्यास तो पहिले ही से था, अत्र वह चलते-चलते बनियान नो बुन लेतीं हैं । गावसे निकल दोड - जुर मंदिर होते वर्छ। टोलेमं गये । यहा भूतपूर्व नबरदार देवीचन्दका घर है। रुपये के बारेमे गोलमाल करने के इल्जाम में नंबरदारी से अलग कर दिये गये हैं। आदमी समझदार हैं। उन्होंने बतलाया था, कि उनके पास पुरानी मूर्तिया और पुके है। मैं देखना चाहता था, यद्यपि उनकी शतप्रतिशत बातपर विश्वाव करना संभव नहीं था । तूचीके साथ वह पश्चिमी तिब्बतमे घूमे थे । कह रहे थे—तूचीको वहां बहुत से प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ मिले थे, जिनके चित्रोको निकालकर भार कम करनेके ख्यालसे उन्होने ग्रन्थोको जलादिया । मुझे इस बात पर विश्वास नहीं होता था, चाहे ग्रन्थ कितना ही सुलभ हो, किन्तु प्राचीन प्रतिका मूल्य अपना अलग होता है | देवीचन्द मुझे<noinclude></noinclude> ade4vpsv65rql6eutpaxaf200r1pkaq पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७३ 250 195288 666014 2026-07-07T15:42:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666014 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमांती गाव १६१ ढ़ने बंगले गये हुये थे, इसलिये उनकी चीजे नहीं देख सका । उनके धरके पासही बस्तीके बीच एक खाली जगह थी, जहा कभी दोनडुत्र फोटाङ (सिद्धार्थ-प्रासाद ) नामका दोतल्ला दुर्गे था । इमारत पुरानी थी, मरम्मत करानी पड़ती थी । किसी तहसीलदारने कुछ साल पहले उसे तुडवाकर उसके पत्थरोसे फोरङ- खामें एक पायशाला बनवा दी । गाव के लोगी से बात करनेका यहां खुला अवसर था । स्त्री-पुरुष किसी के साथ बात करनेमे भाषाकी कठिनाई नहीं थी । हम यहां भारत के सबसे पिछड़े पहाडी भागमे थे । यहा के लोगोको अभी पता नही, कि - अंगरेजोका राज्य नहीं रहा। उनके लिये रामपुरका राजा भी अभी ज्यो का त्यो है - यूढा राजा मर गया, नवा राजा लडका है। हिमाचल प्रदेशका इन्हे क्या पता? वह पूछते हैं जब अगरेजका राज्य नहीं है, तो अंगरेज राजाकी तस्वीर नोट पर क्यों है ? नोटसे उन्हे हर वक्त काम पडता है, इसलिये वह जार्ज बादशाहकी तस्वीर देखते रहते हैं । यह भ्रम तो चिनीके पढे लिखे लिपिको (क्लों ) को भी हो गया, जब ऊपरसे बादशाह के जन्मदिवस मनाने की हिदायत श्रायी । वस्तुतः इगलैण्डका बादशाह हिन्दुस्तान के लिये इंगलैण्डके शासनका प्रतीक है, इस भाव बारीक व्याख्या से नहीं हटाया जा सकता । यहांसे चारपाच दिनके रास्ते पर गन्नोकने गर्मियोंमे भारत सरकारका व्यापर दून जाया करता है, जिसे "टिश ट्रेड एवं?" कहा जाता रहा । विजय उसे आज भी उसी नामले पुकारते हैं। मिशनरिये रानेके समय यहा डाकघर था, उन्होंने स्कूल भी खोला था, जिसका अभी मौजूद है। उनके जाने पर दोनो ऋन्द गरे । ॐ मात्र हुये तिने स्कूल फिरसे खोला, किंतु विद्याविकी शान पर उसे तोड दिया गया । व्याज जाने की वस्ती केई एनपर विचार नहीं के लोग नदि ६१ क्यों कम हुये, दिया गया। नई और का (ती) हिन्दी शब्द नहीं<noinclude></noinclude> ox15f7omdf8px21pgrovdp1lo22j0ed पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७४ 250 195289 666015 2026-07-07T15:42:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666015 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६२ किन्नर - देशमे हैं। शुरू ही से हिन्दी ग्रारभ करनेपर उनके लिये बडी कठिनाई हो जाती है, ऊपरसे पिछड़ेपन के कारण यह लोग विद्याके महत्वको नहीं समझते। जब तक इन बातोका ध्यान नहीं रखा जायगा, स्कूल यहा सफल नहीं हो सकते। यहांके स्कूलोंकी पहिली दोनो श्रेणियोंमें केवल तिब्बती भाषामे पढाई होनी चाहिये । चालीसाकी तरहकी पुस्तके यह लोग भी धर्मके ख्याल से ( हनुमान भोट भाषामे भूतभगाने या पुरा कमाने के लिये पढते हैं) यह तिब्बती पढना चाहेगे अपनी भाषा होनेसे सरलता के कारण भी वह पहिले दो साल की सबसे कडी मञ्जिलको पार कर जायेगे । फिर तीसरी श्रेणीमे ग्राप' तिचती भाषाके साथ हिन्दी रख दीजिये, काम बन जायेगा । मैने चीफ कमिश्नर ( श्री एनसी मेहता ) को इसके बारेमे लिखा था, और उन्होने इसके चिलको स्वीकार किया, किन्तु अभी न जाने का यहां स्कूल खुलेगा | यहाके स्कूलको तोड कर हड गोमे ले गये । वह भी तिब्बती भाषा-भाषी इलाके ( हड-रङ ) मे है । इन्सपेक्टर साहेव कह रहे थे, वहा वाले स्कूल नही चाहते । फिर लडके कहासे श्रायेंगे । तोड दीजिये उसे भी वह तो पढनेकी कठिनाई या अपनी वेवकूफीसे स्कूल नहीं चाहते, और शुवा वाले अपने मतलब से चाहते है, कि खन्वा ( भोटिये) अनपढ मूर्ख जपाट बने रहे। हडरड का इलाका स्पू – नम्ग्र्या और सुनम के पहाडो उस पार स्पिती तक फैला हुआ है। यही नहीं, स्पू-नमग्यासे रह स्पिती हेाते लाहुल, लदाख और जांस्कर तकका सारा भूभाग तिब्बती- भाषा-भाषी है, जिसमे जास्कर चोर लदाख तो काश्मीर के अंदर है और उनकी समस्या दूसरी है । किन्तु बाकीको पंजाब और हिमाचल मे नाटका क्या मतलब ? खैर, अभी हडरड की बात कह रहा था । भाषा स्पू और हडरड एक है, किन्तु स्पू वालोको ग्राधी शताब्दी तक मारा वियन मिशनरियों के संपर्कने थानेका मौका मिला और फिर यह तिब्बत के चणिक-पयपर है, इस तरह यहाके लोग उतने पिछडे नही, डडवाले। जितनेकी "<noinclude></noinclude> e8w6pyq8xpwbbvejc5xsl228zrmka7r पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७५ 250 195290 666016 2026-07-07T15:42:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666016 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमाती गाव १६२ हड रड के गा । त्रिलकुल अलग-अलग है। वहाँ ज्ञान और भोलापन बहुत है । टीका रघुनाथ सिहने १८८७ ई० में बुशहर राज्यकी - सर्वे कराई | देखा यदि, हड रड वालो की रक्षा नही की गई, तो शूबावाले ( सुडनम् लिप्पा ग्रादिके किन्नर ) उनके सारे खेतोको खरीद लेंगे । इन लोगोका तरीका था कर्जा देना - विशेषकर अनाज के रूपमे चौर उनका हरसाल ज्योडा-सवाई करके मूल बनाते आगे बढ़ाना, फिर खेत खरीद लेना । खेत खरीदने का यही सबूत था, कि ऋणी अपने महाजन के सिरसे तेल लगा दे । टीका रघुनाथने कानून बना दिया, कि सर्वेके बादसे ने खेतों की बिक्री नहीं हो सकती । श्राज आधी सदी हो गई इस नियमको बने, किन्तु इससे वस्तुतः हडरड वालोकी विपदा नहीं ली। हावा वाले खेत खरीद नहीं सके, किन्तु सारे अच्छे-अच्छे खेत बन्धकके रूपमे अव शूत्रानालोंके हाथों में है । वह खेत रेहन लिखवाकर अनाजका मनहुंडा करके उन्हीं को जातनेको दे देते हैं । जहां किन्नरके दूसरे भाग प्रति (कच्चा) बीचा मनहुँडा दो मन होता है, वहा हर वाले अपने महाजनको ६ मन बीघा देते हैं । शतके महाजन तिब्बतके व्यापारी भी है, न इस अनाज मे से कुछ तिब्बतमे ऊन खरीदने के लिये लेते हैं- परलेपार तिब्बत है । और कुछ वह यही डेवढा- सवाई पर दे देत है। रिले पचास साल के कागजको लेकर देखा जाये, तो मालूम पड़ेगा, किस तरह इन महाजनोने एडएट वालोको लूटा है । रेहनका यहा दरता वेत्र नहीं होता, उसे तहसीलदार ऋणीसे पूछकर कागज पर लिख देते हैं । डड वाले नये भी खेत बनाते रहे हैं, किन्तु त सबको महाजन के हाथमे रेहन करने के सिवाय चारा नही । कर्जपर जीना फिर भविन धकारपूर्ण नहीं होगा तो क्या होगा ? हिमाचल प्रदेश बन गया है, इसका पता डडवालोको नहीं है? हॉ, उनके महाजन अभी ऊपर कोशिश लगा रहे हैं, कि हड रहा मे भी जमीनकी विक्रीका विवार होना चाहिये, क्योकि वह तो अब रियासत नहीं नारतका भिन्न है। ये खून चूसनेवाले महाजन एक ओर तो हिमाचल '<noinclude></noinclude> 7twauj997avy8eyv5yezramsmh17i10 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७६ 250 195291 666017 2026-07-07T15:42:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666017 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६४ किन्नर - देश में सरकार पर प्रभाव डाल रहे हैं-धनही नहीं उनमें शिक्षा भी अधिक है, इस लिये हर जगह पहुँच सकते हैं। दूसरी और वह चाहते हैं. कि हङरङ के एक ही गांव हङयोमे जो स्कूल है, वह भी टूट जाये; जिसमें उनके ये भुकद दास झुलकर सांस न लेने पावे । वाके सूदखो के सहभागी कुछ हङ रङिये भी हैं। क्या भारतने प्रजाके राज्यात यही अर्थ होता है, जो हङरङ मे देखा जा रहा है ? भारत के अत्यन्त पिछने इस इलाकेकेलिये करना क्या चाहिये ? शिक्षा के बारेमें मै कह चुका - निम्न प्रारंभिक शिक्षा केवल भोटिया भाषामे हो, ऊच प्रारंभिक मे हिन्दी भी सम्मिलित कर दी जाये । सरकारका जान लेना चाहिये, कि महाजन हड रङ में शिक्षा प्रसारक सफल नहीं होने देंगे, और इसीलिये इन महाजनो के पिल्लुश्रोको हड ड मे अध्यापक नही बनना चाहिये । तिब्बती भाषाकी पाठ्य पुस्तकोकी कोई कठिनाई नहीं है । मेरी बनायी वर्णमाला और चार पाठ्य-पुस्तके तथा व्याकरण लदाखमे पढ़ायी जाती हैं, उनसे यहां भी काम लिया जा सकता है, या उसी ढंग पर दूसरी पुस्तकें तैय्यार की जा सकतीं हैं । वह रामपुरमें जा पिछले पचास और वृद्धि क जमा करे । पूछकर पता लगायें, कि कज लोगोके हाथसे निकलते गये । "उनकी अवस्था देखकर दा दूसरी समस्या खेत बधकी की है। इसके लिये सरकारको एक ऐसे विशेष अधिकारी जाच करनेकेलिये नियुक्त करना चाहिये, जिसपर महाजन प्रभाव न डाल सके । पहिले साल के कागज़ो को देखकर कर्ज की रकम फिर हरड में जाकर लोगोंसे पूछ किस तरह चढा और कैसे कैसे खेत तहसीलदार मंगतरामजी कह रहे थे ग्राती है, भूमि अनाज के लिये अत्यत उर्वर है, किंतु वह भूखे पेट फटे चीडोंमे घूमते फिरते हैं, इसेमी वह महाजनकी दया सकते है" । अन्तमें इस खून चुसाईका व्रत करना ही होगा, जिसके लिये बेहतर है, कि दससाल पहिले के वध कोको उनको श्राजतक मिल चुके धन चुकल<noinclude></noinclude> pfadi15z493vi3t0eszabzoo9ijlns1 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७७ 250 195292 666018 2026-07-07T15:42:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666018 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमाती गाव १६५ समझ लिया जाये, किन्तु हड्ड नहीं हिमाचल के दूसरे इलाकों के मन- हॅडे दर पर, सो भी फसल होने पर ही । सरकारको इस ओर शीघ्र पग उठाना चाहिये, नहीं तो बाहरकी हवा उधर भी लगेगी, और वही झगड़े वहाँ भी पैदा होंगे, जो पासने विदेशी राज्य (तिब्बत) होनेसे बहुत कर रूप धारण करेगे । बाहरकी हवा, नहीं भीतरकी हवा भी जल्दी असर करेगी। दा मास पहिले २१ सालसे अधिक आयुवाले स्त्री पुरुषोंका नाम लिखकर मतदाता- सूची तैयार करनेकेलिये उपरसे हुकुम प्राया था, । तहसीलदा एकदो बातें साफ मालूम नहीं हुई । श्राखिर रियासत में निर्वाचन और मतदाता की बात कौन समझता है ? खास करके अपराधके कारण मता- धिकार से वंचित होने की बात उन्हे नही समझमे आई। उन्होने रामपुर लिखा, किन्तु वासे कोई उत्तर ही नही आया, अस्पष्ट शब्दावलीके स्पष्ट करने की बात अलग। उन्होने फिर और रि लिखा, किन्तु कोई जवान नहीं | और आज्ञानें लिखा था, हर पक्षमे सूची बनाने की प्रगति की सूचना देते रहा। मैंने एक दिन पूछा- आपके यहा मतदाता सूची न रही है या नहीं ? उन्होंने सारी बात बतलाई। मैंने कहा- आपकी चिया रामपुरमे सड़ती होगी, क्योकि उनके लिये भी यह “कानूनी वाइन्ट' समझना महाकठिन होगा। उधर हिमाचल सरकार समझती होगी, कि सब जगह सूची बन रही है। निश्चित तिथिके करीब पूछा जायगा । रामपुरवाले ग्राशा भेज देनेकी बात कहके छुट्टी लेलेंगे । श्राप नाहक योन्न सत्रित होगे । अपराधके कारण मताधिकार से वंचित करनेका काम न्यायालयका है | आपके यहाँ न किसीको मताधिकार था, न किसी वा न्यायालयाने उराते बंचित किया । आप हर गावमं अगले साल २१ वर्णने अधिक होनेवाले सी-पुरुषोंकी सूची बनवा डालिये, बस पागल और उन आदमियो का नाम न लिखवाइये, जो गांव के निवासी नहीं हैं ।" खैर, दो मास तक तहसील मे सडने के बाद आज्ञापत्र कार्य रूप परिणत होनेके लिये पटवारियो और मरदारों के पास भेजा गया । ★<noinclude></noinclude> lmi5cyd82j21oxdgh41w33awwz6u7cl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७८ 250 195293 666019 2026-07-07T15:43:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666019 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६६' किन्नर - देश मे म चिनगारी खुली हवामे चाई, देखिये क्या गुल खिलता है ? कही-कहीं लालबुझक्कड़ और कहीं-कहीं खून चूसक सुनायेंगे - हुम् ! २१ साल से देशी के पुरुष ? पलटन में भरती करके लडाईपर भेजने के लिये । और २१ साल से अधिककी स्त्रियां ? "उन्हें नी छीन ले जायेंगे, हमारे यहा जो लडकी ५०) रुपयेमे चिकती ( व्यादी जाती ), हे उसके सौ तो नीचे जानेपर आसानी से लग सकते हैं।" फिर बोलाहल, और देवता के पास चाहि चाहि । किंतु जनतंत्री भारत तो डरकर इसे छोड़ नहीं सकता | आपको समझना ही पडेगा, कि म शासक ऊपर भगवानकी थोरसे हमारे ऊपर शासन करनेकेलिये नहीं श्रभ्येगे ! पचायती राज्यके शासक पच होते हैं, जिन्हें बनाना जनतास काम है । तुम लोगोको पंच चुनना है इसीलिये यह सूची वन । सहताब्दियो चन्द अधेरी कोठरियोको प्रकाश के ग्रानेमे कौन रोक सकता है ? फिर वह अपने खून चूसकोको समझेगे, और उनके बोमको सहन नहीं कर सकेंगे । इसलिये बेहतर यही है, कि पीढियोंके पाप तुरंत काट दिया जाये । 4 - नमुग्या-पहिले तो जान पड़ता था, शायद भारत के अतिम गाव नमग्यामे जानेका मौका न मिले। घोडा मिलनेमे भी दिक्कत है। रही थी, किन्तु हमारे संकलाने तहसीलदार साहेब का पत्र सहायक हो गया, उन्होंने नवरदारको घोद्रेका प्रबंध करनेकी ताकीद की थी। तहसील- दार साहेबने अपने तबेकार बूढे चपरासी देवूरामको भेजा, साथही मे डाक भी लाई । डाक प्रत्येक पत्रका उत्तर देना कहा संभव है, और हिंदी भाषा-भाषीका पत्र यदि अगरेजीमें चाया, तो मेरा जम ग्रासान हो जाता है, मै उत्तर देनेसे बच जाता हूँ । अगले दिन (२८ जून) को हमने नमृग्याका राजा लिया | नम्म्या यहासे आठ मील ( शिमला से १६४ वे. मील) पर है। गील डेट<noinclude></noinclude> skqbsxdlw6c9ydr0tcgblexnxhb9h9y पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१७९ 250 195294 666021 2026-07-07T15:43:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666021 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमाती गाव १६७ मील बगलेवाली कसे होकर हम फिर मुख्य सडकपर था गये । पहाड बही नगे मादरजाद, हा, "समदर" के परलेपार कही एकाध पद्म- . वृक्ष कृशगात्र से दिखाई पड़ते थे। ढाई-तीन मील तक रास्ता अधिकतर नीचेकी ओर चला। आगे १६५ फीट लम्बा लोहेका भूला-पुल खिला । पुलपार डुबलिङ (सिद्ध द्वीप ) गावके खेत थे, यद्यपि गाव हासे काफी ऊपर है । बलिगसे और ( नदीके बहावकी ओर ) हटकर डबलिड गाय हैं, इसीलिये साधारण तौर से लोग इसे डलिङ हुन्- लिड कह दिया करते हैं । नम्यामे डुबलिङके किसी उपासक (भगत) केलिये लिखी गई एक पुस्तक देखी, जिसपर सतलज के लिये लङ छेन छू अर्थात् ज ( ख ) नदी लिखा था। ऋपियो के भूगोल के अनुसार मादन और हिमवान पर्वतोंके बीच अनवततसर ( मानमरोवर ) है, जिसकी चारो ओर चार प्रकारके दुख हैं, जिनमे से गंगा गोमुख से निकलती है, और गजमुखसे भी एक नदी निकलती है, जो यही सतलज है । 3 - पुलसे आगे कुछ दूर तक साधारण रास्ता है, फिर अधिकतर चढाई श्राती है, जिसका व्रत उस मोड पर होता है, जहां पहुँचने पर जब गाय दिखलाई पडता है । खबसे मील-डे मीलपर नम्म्या श्राता है। नदी इसके चारो गाव छोटे छोटे हैं। डुबलिड - डबलड २५ वर खच्च् ८ घर, लम्मा ३० घर, और नमग्यासे पार टशीगड, ६ घरका गाव हैं । नम्र साधारण हरा भरा गाव जान पडा । यह इसके खातोकी - A रानवडे पौबीसे मलूम हो रही थी, डाकबगंला तो चुली- रोटके वृक्षों में छिपा हुआ है। त्पू भी नंगे पहाड़ी के बीच खेतों और बागोसन गांव है, किंतु नम्म्या जैसी हरियाली वहां ही गलूम हुई। हरियाली और अफ बंगलेने इतना ग्राकुष्ट कर लिया, कि दिल चाहता, दो चार दिन यहीं रहा जाये । दूध, ग्राटा मिलनेमे कोई दिक्कत नहीं थी, किंतु साग फल भी दुर्लभ थे । नमग्ण ६८०० फीटफी ऊँचाई पर बना है, इसलिये यह न समझिये<noinclude></noinclude> n3b8ue1lke0bgb48pvnh92emhypviqt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८० 250 195295 666022 2026-07-07T15:43:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666022 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६८ किन्नर- देशमे ' कि वहां चूली खरोट छेत्र और फल नहीं मिलेंगे । नमस्याम वादाम १, अखरोट १२, चूली २००, ग्राडू है, वेमी १७, पालू के अतिरक्त गूरकी भी २२ वेलें हैं; यदि सितम्बर में आप पहुँचे, ते फलोका दुख नहीं रहेगा । डबलिड मे भी छ अंगूर और १० ग्राइके वृक्ष है। हॉ, ये गांव मेरावियन मिशनके केन्द्र स्यूके समान फलोंके बारेमे सौभाग्यवान् नहीं है, जहां कि साधारण फलोके अतिरिक्त श्राडू ३१, सेव २४, नासपाती १०, अंगूर २८ और आलूचाके १८ वृक्ष हैं । आज वहाके मेवोंके बाहर जानेका कोई रास्ता नहीं । नम्रग्यासे शिम्ला भेजनेपर रुपया सेर भाडा लग जायेगा | जब हम यहां श्राधुनिक यातायातका विकास कर देगे, तो नम्रग्यातककी भूमि मेवोकी खान बन जायेगी। खबके सामने परतेपारसे एक नदी आकर सतलजमे मिलती है, यह स्पिती नदी है । वैसे स्पिती पहुॅचनेके कई रास्ते हैं, लदाखसे रूपसू होकर एक, मनाली (कुल्लू) से दो जोतोको पारकर दूसरा, वाडतू से भावा जात पारकर तीसरा, लिम्पाखडसे जात पार हो चौथा, श्यासोखडसे जात पार हो पांचवां । किंतु यह स्पिती नदी ही है, जिसके किनारे बिना जात पार किये स्पिती पहुॅचा जा सकता है । रास्ता सालके अधिकांश भाग खुला भी रह सकता है, लेकिन तत्र जब कि मुह पर के खड़े पहाड़ोंको जारूदसे तोड़कर सड़क बना दी जाये। इसे बनाना ही पढ़ेगा, इसके विना हडरड इलाकेका यातायाता ठीक नहीं हो सकता। हडर के अतिम गांव सुमराके परले पार तो स्थितीका पहला गांव है । ग्राजकल हङरड जानेकेलिये सुड नम से जोत पारकर सुडनम हडगो पहुँचा जाता है, नहीं तो रास्ता यहीं नमृग्यासे है । नमुग्यासे दे मील ( शिमला से १६६वे मील) पर भारत-तिब्बत की सीमा एक सूखा नाला है, वैसे तिब्बतके व्यापारियोंके लाभकेलिये शिपकी तक (७,८- मील और आगे) सड़क बना दी गई। सीमासे इधर ही पुलसे सतलज पार हा नम ग्यासे तीन मील पर टशीगड है। टशीगड की सीधी चढाई ही मैदानी आदमीकी हिम्मत तोड़ देगी, और यदि मालूम हो कि श्रा<noinclude></noinclude> oj6y0l343tgnayo14nfwkoy7s5w6sst पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८१ 250 195296 666023 2026-07-07T15:43:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666023 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भारतका सीमाती गांव १६६ महापर्वत पारकर के ही हडरड के प्रथम गांव नाकोमे पहुँचा जा सकता है, तो किसको आगे बढ़ने की हिम्मत होगी ? मै २२ साल पहिले ऊपरसे आहा था, तो भी जन नाकोके नीचे लोहेके केले तारपर रत्मीके सहारे स्थिती नदी पार करनेकेलिये कहा गया, तो प्राण निकलने लगा था, किंतु क्या करता; पीछे लदाख लौटकर भारत श्राना आसान न था | कहा जाता है, एक बार स्पिती तक सड़क बनानेकेलिये कोई योजना भी बनी थी। नमस्याके खेत और बाग खडके इस पार हैं, और गांव उस पार | गांव के नजदीक बहुत कम खेत है, इसीलिये नगे पहाड़ों की जड़ में वह बडा सुखासा मालूम होता है । किन्तु, लोगोंने शताब्दियोंके तजर्वेसे देख लिया है, कि वह स्थान हिमानी प्रपातले सुरक्षित है । शताब्दियों नहीं सहस्राब्दियांका तज कहना चाहिये, क्योंकि लिप्पा-कनम श्रादिकी भांति यहां भी बर्तनवाली को मिलती हैं। भोजन और विश्रामके बाद बूढे चौकीदारके साथ हम गाव चले । रास्ते में ही नालकों की पल्टन मिली, न जाने किस तरफ वह कूच कर रही थी । स्वतंत्र भारत के प्रतिम गावके तरुणतम नागरिकोंके फोटो लेने लोभको मै सवरण नहीं कर सका । फिर हम गाव मे गये । श्रगकी लाने इन गावको भी न छोडा, हालाकि नगे पहाडे के कारण यहां लक्डीके उपयोग उतनी उदारता नहीं दिखलाई जा सकती । ग्राठ-नौ सालकी बात है । उस समय सोवियत किर्गिजिस्तानके रक्तचूसक चौर उनके लग्गू भग्गू, सोवियत शासनके उन्मूलनके लिये अन्तिम शक्ति लगा, इस्थानिक जेहाद के नामपर हजारो स्त्रीचच्वोके खूनसे हाथ रग, कडी गावोकी जला कर भी अशरण हो भागे और वेरास्तेके रास्तों से ● चीनी तुर्किस्तान होते तिब्बतमे घुसे। उन्होने तिब्बतके कई गावो को लय कई प्राचीन मटोंको जलाकर क्षार किया, फिर वह शिपकी की र ने लगे । विनारोंसे लैस इन " कजाको" का मुकाबिला निर्धन<noinclude></noinclude> 9bt820cfe97dzm29t5huujuavr79kod पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८२ 250 195297 666024 2026-07-07T15:43:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666024 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७० किन्नर देश में निर्बल ग्रामीण कैसे करते ? लानाकी सरकार दूर ल्हासाने थी, जहा दूत दोडानेके लिये भी दो मासकी जरूरत थी । तिव्वतके इलाके के भी बहुतसे नरनारी भागकर नमग्यामे ग्राये हुये थे-- ग्राखिर वे एक खून एक धर्मके भाई थे । कजाकोको इस दुर्गम रास्ते से थाना कठिन मालूम हुआ। अखिर में ये भी नहीं, और लदाख की ओर मुड़ गये। वहा कश्मीरकी सेनाको हथियार दे शरण- भिक्षा मागी, कुछ दिनों कश्मीर मे र अन्तमें हजारा जिलामे वसकर व पाकिस्तान के नागरिक बन गये । उनकी संख्या हजारसे अधिक थी । कजाको प्रहारसे तो नम्रग्या बच गया किंतु उसी समय किमी की असावधानी से आग लग गई। बहाके पवनका क्या पूछना, जब चलता है, तो उनचासो भाइयो के साथ । नमग्याके सारे वर उसके बाद के बने हैं । उस समय हमारी सरकारके पुनर्वास विभागकी तरह दत्करते उत्कर कागज दौडाने वह दिन नही बिता सकते थे । जाडा सिरपर, १० हजार फीट ऊपरकी सर्दी और वर्फको वह उसी तरह सह कर जोते नहीं बच सकते थे, जिस तरह हमारे शरणार्थी थाजकी बरसात में बिता रहे है। ऐसे खाडवदाहोमे नजाने कितनी पुस्तकें, कितनी मूर्तिया कितने चित्र- पट नजाने कितनी बार भस्मशात हुये होगे। तब भी एक घरकी देव- कोठरी में कुछ मूर्तिया और पुस्तके देखनेको मिली। चौकीदार ने मृतक समातियो और उनके बर्तनो की बात बतलाई, तो हम भाग्य- परीक्षा के लिये गावके ऊपरी कोने पर सडकसे कुछ ऊपर गये, किन्तु खाली हाथ लौटे। रातको 'शात बंगलेमे पिस्सू खटमल रहित चारपाई पर सोये साये में सोच रहा था । ईसाकी सातवीं सदीका मध्य ( ६४०-५० ई ) प्रथम भोट- सम्राट सोड चन्- गम्नोकी खूँखार वर घुमंतुयों की सेना पहुॅची शिपकी पार | नम्रग्या का यह तिब्बती नाम तब न रहा होगा । इस गात्रके वासी वडा गये होंगे । उस समय उनके भाईबन्द शिपकी पार रहे होगे, अभी वहां तिब्बती भाषा नहीं पहुँची थी। उनसे उन्ह ने भी सुना होगा, किकैसे दानवोंसे इन्हें पाला पडने वाला है। किंतु साथ ही पीछे आनेवाले -<noinclude></noinclude> 24y731n0bxufg53s375gpb51r53x9p2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८३ 250 195298 666025 2026-07-07T15:43:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666025 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>: भारतका सीमाती गांव ' १७१ चिगिसहानकी की भांति स्त्रोड चन् भी संदेस पहुँचाता रहा होगा- ' श्राशा स्वीकार करनेवाले को अभयदान" | मालूम नहीं प्राचीन नम्ग्या बालोंने भागना पसंद किया होगा, या श्राज्ञा स्वीकार करना । खैर, कभी तो आज्ञा स्वीकार करनी ही पड़ी होगी, क्योकि इन ठंडे पहाडो लोग नीचेकी गमीसे घबराते थे, चोर सोङ ननकी सेनाने गिलगित तक लारे हिमालयको जीत लिया था। फिर जगह-जगह सैनिक चौकियां और अपत्नीक भोट-सैनिको के लिये स्त्रियोकी माग, फिर बौद्ध देवताओ और धर्म के प्रचार लिये भोट-भितु श्राये । शताब्दिया बीत गईं, नभया का पुराना क्या नाम था, यह भी भूल गया । कत्रमे सोनेवाले आपसमे जे भाषा में बोलते थे, वह भी अब यहा नहीं रही । अब वह अपनेको नोट-भाषा बोलने भोट-धर्म मानते पाते है । क्या यह बात सिर्फ नमस्वामे ही हुई । सारी दुनियाने मानव-जातिका यही इतिहास है । वह स्थावर वनस्पति नही जंगम प्राणी है । घूमना उसका धर्म रहा । जिसने वर्मको छोड़ा, वह कूप-मक बना, और भवितव्यता के सामने शिर सुदाम गवन् पुत्रा भारतके प्रतिम गावको देख चुका, उसकी हरियाली तिब्धतसे जानेवाली के दिलमे अवश्य कौतूहल पेटा करेगी। जब वह डाकबंगलेको देखेंगे, तो नमकेंगे कि आदमीके रहने केलिये कैसा स्थान होना चाहिये । किंतु भारतीय नागरिको के घरको देखकर समझ जायेंगे, वह बंगला तो किरगियोने नवाया था, इसमे भारतका क्या है ? हमे इस गावक पलना है, सीमा के इलाके हरड को बदलना हे । यहा ग्रज्ञान है, किंतु जाति-मेद प्राछूतका भयंकर कोड नहीं है, इनका धर्मभी अपने बनली र उच्चतम याचार र दर्शनका प्रतिपादक है । ज्ञानमय प्रदीप बनाने की आवश्यक्ता है । मैंने बडी बहीं आशायें यांची थी, सोचा था, स्वतन्त्र भारतका यह पहिला वर्ष है, इस अवश्य इस रयान दिया जायेगा । स्कूल-इंस्पेक्टर ने बतलाना, चिनी तरकीलने सिर्फ एक स्कूल इस साल खोला जायेगा और वह<noinclude></noinclude> 7k025ul5waeyr4gunxb7rj49f9i5r0m पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८४ 250 195299 666026 2026-07-07T15:44:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666026 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. १७२ किन्नर-देश मे उधर रिव्नामें रहेगा | हडरड मे हा गोका टिमटिमाता स्कूल डगमगा रहा है | स्वतंत्रताकी उपामे ही हरड में वेस्बुन तो नहीं हो जायेगा ? मैने सोचा था, उपेक्षित हिमाचलके इस इलाकेमे कमसेकम पाच स्कूल और तीन डाकखाने तो तुरन्त खुलें - ( २ ) नम्म्या ( ३० घर ), खत्र (८) घर, टशीगङ (६ घर ), डब्लिड डुब्लिड (२५ घर ) के लिये एक स्कूल एक डाकवर नम्यामें, जहांसे पश्चिमी तिब्बतवाले भी ल्हासाकेलिये अपनी डाक नेजा करेंगे। ( २ ) नाको और मनलिड के १०० वरोके लिये नाकोमें एक स्कूल और एक डाकबर, ( ३ ) चाओ ( - १०० घर ), शेलकर ( १५ घर ) के और सुमरा ( ३५ वर ) के लिये एक स्कूल और डाकघर, यहासे स्पितीका प्रथम गांव लारी २० मील पर है, यह डाकघर स्पितीके सबसे नजदीक और सुगम होगा। ( ४ ) हङगामें स्कूल है ही जो अपने २० घरोंके अतिरिक्त लियेके २० तथा चूलिङ के १० घरोके लिये भी काम दे सकता है । ( ५ ) स्मे फिर स्कूल और डाकघर खोलने की आवश्यकता है । ' । मालूम हुई । लौटने के वरमे पूजा पाठ करते ३० साल देश छोडे २२ जूनको नौ बजे मै लौटकर स्पू पहुँच गया, घोड़ेका उपयोग केवल नदी पार होकर ही किया । पुण्यसागर और बेगार पीछे आये । २३, २४ जूनको स्पूमें ही चितानेका निश्चय हुआ । स्पूमे वर्षां सिर्फ १५ इंच होती है, किंतु जगह मुझे आकर्षक दिन मंगोल घुमकते बात हुई । वह किसीके ये जीविका का कोई रास्ता तो होना चाहिये हुश्रा | डेपुड ( ल्हासा ) सालसे सिद्धचर्या में लगे हैं। उनसे ल्हासाके मित्रो के बारेमे मालुम हुआ । गेशे तन्दरकी हत्याकी खबर सुनकर चित्त बहुत खिन्न हुआ । घुमक्कड अकेले सिद्धचर्या नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनके साथ योगिनी भी है, यह पुण्यसागरने पोछे बतलाया । भारतको गर्मीका प्रसाद की ही बार मिल गया था, और दोनोंका सारा शरीर फुसिमोसे भर गया था। तो भी वह अभी भारत जानेका इरादा रखते हैं । मे तेईस चौबीस साल बिताकर पाच छ<noinclude></noinclude> rq4mkpo4ue5l17i9n9nay9o3jcb05k8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८५ 250 195300 666027 2026-07-07T15:44:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666027 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवतासे बातचीत ( १२ ) देवता से बातचीत स्पूसे २५ जूनको प्रस्थान किया । बेगार पर चलते तो श्यासो- खड्ड पर उसे १७३ १६ मीलका रास्ता था । वैसे बदलना पढता । स्पूके खच्चर वालेने की घोडा पांच रुपया प्रतिपडाव तथा बैठनेकी आधी मजूरी मांगी, जो बिल्कुल वाजिब थी । ने तो सोच रहा था, यदि लौटते समय मिलता, तो ठाणेदार तक ले चलता । श्वाताके पुल तक पैदल ही ग्राया । रास्तेका ग्लेसियर कुछ गला था, किंतु अब भी बहुत था । सडक वाले मजूर वहा मौजूद थे, नहीं तो हमारे खच्चर वालेको एक खच्चर या घोडा इस साल और नलि देनी पडती । इधर धूप तेज मिली, शरीर जल रहा था और जब कनम् डाकबॅगले पर पहुँचे, तो जान पडता था लूमें सेना रहे हैं । लेकिन यहा लू कहा ? वस्तुत नगे सिरने काम बिगाड़ दिया था । यहा पहुँचने के बाद बूंदाबांदी होने लगी, वर्षा नहीं वर्षा तो चिनीमे दी देखनेको मिली। उस दिन वेनीरामके भाई नंबरदार अगरजीत से- जो बगलेके चौकीदार भी है-बातचीत होती रही, और कहीं न जा सके । अगला सारा दिन कनम् देखने के लिये था । प्रस्नम्, कम्, सुड नम्, पुन् नम् ( पर्वणी ), स्गि-नम् (मोरड ) जेसे गावके नाम अन्तमें नम्" का आना कोई विशेष अर्थ रखना है, किन्तु ( भाषा) में "नन्' का अर्थ है बानी या खराव जिस प नहीं बैठता नम् बरें कहा जाता है, यहा गन्तेन पर 'क' कर लिखा निला, इसलिये इसका नानपरा । 'नम" का अर्ध पुरानी भाषामे गांव गालूम होता काना कोई तुम, करड =लानो, 2 कोरी ) | जान देने की है, कि "नम्"---धन्तवाले सभी हुए है। ३० एव पहले प्रपत्र लिख चुके है, कि यहां एक खेत बनाते रोट (ने) मिलीं थीं, जि<noinclude></noinclude> k49knxvsbzu89jtgq39fxlywq1hp48k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८६ 250 195301 666028 2026-07-07T15:44:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666028 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७४ किन्नर - देश मे / ककालोके साथ मिट्टी के बर्तन भी थे। लड़ाईसे पहिले सडकको न जगह से घुमाया गया, उस वक्त वहा कई "रोम्खड " ( शव गृह ) निकली थीं, परन्तु ककाली और वर्तनां को रखनेकी और किमीका यान न गया। यदि सडक निरीक्षक अपने चलती मुसलमान मजदूरोंमे मा पूछ लेते, तो मालूम हो जाता, कि मुसलमान को इस तरह खान-पान साथ नही बनाई जातीं । उन खोपडियों और बतनीकी किन्नर- इतिहानने जानने के लिये कितनी जरुरत है इसे कहनेकी श्रावश्यकता नहीं । मुश्किल है, कि काफी खोदाई करने पर को इच्छानुसार निकाली नही जा सकती, क्योकि उनका एक स्थान नियत नहीं है । अन्तु, इसमें सदेह नहीं, कि प्राकृतिब्बतीय प्रायोदकालीन ( सातवी सदीसे पूर्व, भी कनम् मे आदमियोकी बस्ती थी, और उस समय भी क्नूमते लड के डांडे होकर लिप्पा जानेवाला यही मार्ग था, जहा पहारे डाडोसे थाकर सुनका मार्ग भी मिल जाता था, और फिर वहा ते एक मार्ग चिनी होते सतलजके किनारे किनारे निमंड होकर कुलत (कुल्लू), चम्बा ( ऊपरी चन्द्रभागा ) होते कश्मीर जाता, दूसरा नचार, सुङरा हे सराहन के श्रागेकी खडसे दारघाटा हो, प्रथम नोगडी ( रामपुर से आगे ) की खडसे सतलज जलविभाजक डाडेको पार हो जमुनाकी शाखा नदियो पञ्चर और टौसके साथ होता एक और ster लावते सैया होते कालसीकी मडीमे पहुँच जाता था । पा उपत्यका वाले भी सीधे एक जोत पारकर टौंसमे पहुँचते थे । इस प्रकार पश्चिमी तिब्बतसे कश्मीर और "मंव्यमंडल" के गत्ते कन्से गुजरते थे । अव भी कम बहुत बडा गाव है, उसकी हजार के करीब यावादी है। २६० जून को हम -- मै और पुण्यसागर - गावमं चले । बगले के पात ही ऊपरसे जाने वाली कूल गावमे गई है। उससे साथ कुछ दूर जाकर हम नीचे उतर पड़े । पहिले कंजूर-ल्हाखड और ग्राम देवता, ढलवा का देखना था, तब लनड, और ख-ल्हाखड, गुंबाका । कह<noinclude></noinclude> gxo7sop9nl3h5z9di8z25zcs5qlxe3g पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८७ 250 195302 666029 2026-07-07T15:44:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666029 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवतासे बातचीत १७५ गावसे नीचे खेतो मे बना है । किसने बनवाया, इसका न कोई पत्थर वहा लगा है, नहीं किसीका याद है । कहनेवालो की बात माने, तो वह सतयुगसे इधर का क्या होगा । किन्तु कंजूर की जो १०३ और तंजूरकी २३५ पोथियां बहा रखी हैं, वह नरथड (मध्य तिब्बत) की छवी है, और यह छापे लडकी उस समय खोदे जा रहे थे, जब शाहजहा श्रागरे के किले मे arrant कैद भोग रहा था। याज भी दायकके वंशज हैं, उन्ही के - हाथमे प्रबन्ध है । दायकने जहा मंदिर बनवाया, मध्य-तिब्बत से छपवाकर कजुरको तिब्बतके भीतर ही भीतर होते तीन चार मास मे मंगवाया, वहा अपना एक बडा खेत—जो शायद गावका भी सबसे बडा खेत है -- भी दान चढा दिया । खेत की आमदनी से पुजारी और साल मे एक बर १०३ पोथियोके पाठ करनेवाले लामानों का भोजन-दक्षिणा दी जाती है । चिनीके बाद यहीं कनम्मे एक प्राइमरी स्कूल है। स्कूलका वर बनाने में भला पुण्य कहा, कि उनको कोई अकेले या चदा करके बनवाये ? स्कूल इसी मंदिर ( पुस्तकालय ) के बराडें जैसे घरमे लगता है | लेकिन साथ ही तहसीलदार या दूसरे किसी अफसर के आने पर उसे खाली करना पडता है । ग्रफरोकी गावमे यही टिकान जो ठहरी । अगर मानण रोना रो रहे थे। लडके बाहर धूपमें जमीनपर बैठ कर पढ रहे थे। आगे हम छोटे से टोले में गये, जहा गावके ग्रातापी देवता- लाका मंदिर हैं। गाववाले तो उसे किन्नर देश के सबसे बडे तीन- चार देवता मानते हैं । चिनीवालोका ऐसा ख्याल नही है, वह पास के गाव लडके देवता शक्कं शुक्रेा वडा मानते है । ढलस् घनी देवता है, इसका पता तो उसके मदिरकी टीनकी छत दे रही थी । क्या है, ढदलस दूसरे देवताओंकी भांति देशी टके सेर देवता नहीं हैं । हलमा के देश ठेवनमे थेन सरक् नामसे प्रसिद्ध थे । अपने शुभकमांसे सुखावती निर्वाणभूमिमं बुलाये जा रहे थे, किन्तु उन्होंने धनुग्रह-काक्षया जानेसे इन्कार कर दिया। फिर कौन स्थान कार्यक्षेत्र<noinclude></noinclude> 74k6vh5z9ej3wmnote4n0l3ye22faxr पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८८ 250 195303 666030 2026-07-07T15:44:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666030 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७६ किन्नर - देश में हो सकता है, यह देखते हुये उन्होंने दिव्यननुस किन्नर देशके क्नन् ग्रामको अपने योग्य समझा, ग्रेर गिद्धका रुप ले कर उड़ते हुये यहा पहुँचे । लडके तिनकेका पूला बनाकर उनसे खेल करते थे । किमने उठाना चाहा, तिनकेका मुद्रा न उठा, फिर 'भूप सहम दम एकट चारा | लगे उठावन टरइ न टारा।" era too गया। फिर उन्होंने "छेड" ( देवता बुला ) कर पूछ तो जान पहा, यह तो ग्रा रूप देवता है । 7 - ढब्ला-जिसे शु-भाषामे ढब्लस् भी कहते हैं—का शब्दार्थ है भिक्षु गुरु | ढला साधारण नहीं धर्म के देवता ( कोस-ल्ह) धर्मपान है | वह गृहस्थ नहीं भिक्षु हैं । वौद्ध हैं, इसलिये बलि करेके पान नहीं जाने | बुद्ध पूजा लामाग्रोके सत्कार में खुलकर पैसा खर्च करते हैं। - दूसरे देवताओ की भाति कजूस नहीं हैं, मैं ट्ब्लाके दर्शनार्थ आया था, किन्तु टला पाच दिन पहिले ऊपर सुफुग् मटके वार्षिकोत्सवम थे, फिर वहा से लौटकर अत्र खछेल्हखड्मे विराजमान थे । मेरा सौभाग्य था, जो कहीं दूर दुर्गेम स्थानमे नहीं बैठ गये । हा, देवताओ या ठिकाना - " हजरते दाग जहा बैठ गये बैठ गये ।" हम वहा से निकलकर बेलीरामकी ससुराल के घरपर पहुँचे। पिछ बार देखा था - उस समय वह विशाल घर था । अपने समयमे यह परिवार ( टोंडुन) कन्नौरका सबसे धनी घर था । इस परिवारों क आदमी शिक्षित भी हुये। बाहरमे अग्रेजी पढकर आये, किन्तु पुरुष तरुण कुछ ही वो मर गये । अव घरमै त्रिया रह गई । जिनमें एक प्रौढा बेटी भिक्षुणी र बरकी मालकिन है, दूसरी वेलीराम भ्रातु पुजकी पत्नी उसीका लड़का अब इस घरका भी स्वामी है। कुछ सा पहिले ग्राग लग जानेसे घर जल गया या थोडासा घर बन गय है, चाकी पडा घर अभी तीन-चार हाथ ही उठ पाया है, लोहार दीवान लिये पत्थर गन्ड रहे थे । जुडाई करनेवाले पत्थर और लकड़ी मिला जुड़ाई कर रहे थे। काफी बडा महल जैमा मकान बन रहा है । .<noinclude></noinclude> 9v0vc5jxw7cnjt57zcv3siq7ja0xiyc पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१८९ 250 195304 666031 2026-07-07T15:44:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666031 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नौ ३४ ३५. काठी मे शिवालय और पोथीपट्टिका ( पृष्ट- २६७ ) २७ पुत्री, नातिया सहित नेगी सन्तोखदास ( पृष्ट-५५ ) अनाथ किन्नर बाल<noinclude></noinclude> rae9srukuriedhfp5b156usp6o1pgbg पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९० 250 195305 666032 2026-07-07T15:45:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666032 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८. चिनी के मित्र ( पृष्ट-२६५ ). ३६. देवी २२५, २४८) cher ho न डने-जे नको अपने मोब - किन्नर कोकिलाये ४१ पुत्र पुत्रीयमल सदेव नेगी ठाकर सिंह (पृष्ट-६३, २०५) त्याका कैसे हो, २६ दा नहीं हुआ चाहै।<noinclude></noinclude> kq1tcmrq0n20d8lplqqmya1fbkj3lwl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९१ 250 195306 666034 2026-07-07T15:45:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666034 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवता से बातचीत १७७ खैरियत हुई, जो मकान अलग अलग था, नही तो सारा गाँव जल जाता | हम लनड मे गये, जो वहाँसे नातिदूर था । रास्ते में कोलियो के कुछ दरिद्र से घर मिले, जिनमें से एक में पिछली बार बैठकर मैने जूतेकी मरम्मत कराई थी । लनड पहुँचते-पहुँचते नवरदार अजीत (वेलीराम के भाई) भी आ गये । लवङ् ब्ल-ब्रड - क्ल-म- फो- ब्रड्का संक्षेप है, जिसका अर्थ है गुरुका प्रसाद । यह कनौर के सबसे बड़े अवतारी लामा लोछेन-रिम्पोछे का निवास स्थान है । लो-छेन् या महाभावान्त- रकार में सैकड़ो भारतीय ग्रंथोके अनुवादक रिन्छेन्-जड-पो या रत्न- नद्र अभिप्रेत हैं, जिनका जन्म दनवी सदीके ग्रन्तनें हुआ था । चार-पाँच शताब्दियों तकतो महाभापान्तरकार निर्वाण प्राप्त हो लुत रहे, फिर तिदमें अवतारोकी बाढ़ आई, और उनका भी अवतार पैदा कर लिया गया । तबसे व अवतार वरावर हो रहे हैं। नये तारको मैने दशीहुन्पो ( तिब्बत ) में दो वार देखा था, तब वह मरियल से दस-बाहर वर्ष के लड़के थे । श्रव तो बाईस - तेईसके हो गये होगे। मालूम नहीं इन्होने भी अवतारी लामाचोकी परम्परा पालन करते हुये परममूढाचार्यकी उपाधि स्वीकार की है, या कुछ पढ़ा लिखा है । विनर स्पिती और तिब्बतमे इनके कई मठ और बहुत-सी संपत्ति है। गर्भ बाहर होते ही भगत लोग दंडवत करने लगते हैं, फिर पढ़ने-लिखने का क्या काम ? पिछली बार ( १९२६ ई०) मै इस लड की कोटरीमें टहरा था । उस समय लङ् (गुरुप्रसाई) द्वार बाधने, दाग वा घास खानेका कान देता था। नीचेका तल ता व भी बदस्तूर साविक है, किन्तु ऊपर कुछ व्यवस्था अवश्य है- व्यवस्था अर्थ मदनीकी कभी हर्गिज नहीं, ग्राखिर यहाँ के तामा लोग शिक्षा के साथ सफाई भी तो नियतने सीते हैं। व्यवस्था कैसे हो, २२ नाल पहिले लामा नर चुका था, और अभी अवतार पैदा नहीं हुआ था । लनड् लोटना नघन है, वहाँ कोई पुरानी चीज ही है। -<noinclude></noinclude> ha58urcpn65c5b5ho3w7vdcg82tz1km पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९२ 250 195307 666035 2026-07-07T15:45:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666035 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७८८ किन्नर - देश में हम खछे ल्हखट् गये, जो गावके ऊपरी भाग में है । यही यहाँ का मुख्य मठ है | ख-छै-ल्ह-खट् का अर्थ मुसलमान मन्दिर (नस्जिद ) और कश्मीरी मन्दिर दोनो होता है। यहाँ के किसी लालबुझक्कड़ने कह दिया- मस्जिद की जगह पर वननेसे इसका यह नाम पड़ा। म वही बात दोहराई जाती है। इस इलाके पर न कभी मुसलमानोकी चढ़ाई हुई, न यहाँ उनका शासन सीधे तौर से रहा, न यहाँ मुमल- मान कभी आकर बसे, या यहाँ वाले मुसलमान बनकर रहे; फिर मस्जिद कहाँ से होगी ? हाँ, कश्मीरी मन्दिरकी पूरी संभावना है। महा भाषान्तरकार रत्नभद्रने वर्षो कश्मीर मे रह संस्कृत पढ़ी। वह गूगेसे इसी रास्ते कश्मीर गये । कनम् उनकी विचरण भूमिमें था, इसलिये हो सकता है; उन्होने यहाँ कश्मीरी ढंगका कश्मीरी कलाने सज्जित विहार बनवाया, जिससे यह नाम पड़ा। यह भी हो सकता है, कि भारतके अंतिम संघराज कश्मीरक महापंडित शाक्य श्रीभद्र भारतते भागकर तिब्बतमे १० वर्ष रह जव १२१३ ई० में अपनी जन्मभूमेको लौट रहे थे, तो वह कनम् होकर गुजरे और यहाँ उन्होंने एक बिहार • बनवाया । शाक्य श्रीभद्रभोट में ख-छे - पण छेनू - कश्मीरक महापंडित के नामसे प्रसिद्ध हैं, इसलिये उनके बनवाये बिहारको ख-छे-ल्ह-ख डू भी कहा जा सकता है। तीसरी व्याख्या यह भी हो सकती है, कि किसी कश्मीरीने यहाँ बिहार बनवाया। मुसलमानोको भोटवालोने कश्मी- रियोंके रुपमे ही पहिले-पहिल देखा, इसलिये उन्होने देशका नाम धर्म को दे दिया, जैसे याज भी उत्तरी भारत के कितने ही गांव वाले तुर्क शब्द मुसलमानका पर्याय समझते हैं, हालाकि तुर्क जातिका नाम है जिनमें अधिकांश छठी सदी में बौद्ध थे । ल्हासाके मेरे परिचित मुसल- मान कादिर भाईने एकवार बड़े गर्व से कहा था- हमारा एक आदमी ख-छे-पण्-छेनूके नामसे बौद्धोंका बड़ा गुरु हो गुजरा है । मैने उन्हे समझाया, कि पहिले ख-छेसे मुसलमान नही कश्मीरी समझा जाता था । हाँ, तुम्हारे पिता कश्मीरी थे, और शाक्य श्रीभद्र भो, इस प्रकार =<noinclude></noinclude> 1wj4wzueca5wdby8gx7rewogeiz19lt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९३ 250 195308 666036 2026-07-07T15:45:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666036 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवतासे बातचीत १७६ वह तुम्हारे पितृव शके थे, इसमे सदेह नहीं । यह तो हुई ख-छे ल्ह खङ की व्याख्या | मन्दिर अवश्य सात आठ सदियोंसे पहिले बना था, किन्तु आज जो विहार खड़ा है, वह केवल उस पुराने विहारके स्थान पर खड़ा है, वहाँ कोई पुरानी चीज नहीं है। सबसे पीछे जसे पन्द्रह वात साल पहिले टोमो (चुम्बी ) गेशे लामाने इस मन्दिरको फिरसे बनवाया, और अपने मटके नक्शेको देकर, जिसका अर्थ है, उन्होने पुराने नक्की भी इतिश्री कर डाली । इस विहारके सबसे अन्तिम संस्कारक या निर्माता दोमो गेशे कलिम्पोड्से ल्हासा जानेके रास्ते में पड़नेवाली टोमो (चुम्वी ) उपत्यका के रहनेवाले एक व्यवहारकुशल लामा थे अवतारी नहीं थे, किन्तु अव उनका अवतार वन गया है। टोमोंमें रहते ही उनकी ख्याति हो गई थी । तिब्बत के नामसे थ्योसोफी और यौगिक चमत्कारकी दूकान चलाने वाले कुछ युरोपीय भी उनको गुरु मानने लगे थे । गेशे किन्नर देशमे ग्राये । साधारण जनताकी तो बात क्या महाराज पदमसि' इकी भी श्रद्धा उनमे बढ़ी । महाराजा के परिवारमे एकाध मृत्यु हो चुकी थी, डाक्टर तपेदिक बतलाते थे, और गुनी लोग ब्रह्मराक्षसका दोप । ब्राह्मणोकी मंत्र-विद्या कुन्ठित सावित हुई, महाराजा लामा गुरुयोकी शरण मे पहुँच । टोमो गेशेके तंत्रमंत्र का असर हुआ । बहाराक्षस राजमहल छोड़ गया, हा अस्थायी तौरसे ही । गेशेके कहनेपर महाराजाने कजूर-तजूर भी तिब्बत से मंगवा लिये, और शायद राज- महलने रखने के लिये, जिसमे ब्राहाराक्ष की फिर उधर झाकने की हिम्मत न हो । कजरत जूर के ग्रा जानेपर तो ब्रह्मराक्षम इतना कचकचाकर पटा, कि वशीको निर्देश कर डाला । ब्राह्मणांने कहा- और लामार्थी की पोथी भगवा कजूर-तरको हटाकर लामा-मन्दिर मे भेज दिया गया. जहा वह अब भी है। यह है नुनी-सुनाई टोमो गेशेकी कथा, जातक रामपरके राजाका सम्बन्ध है। यह सभी जानते हैं कि रामपुर राज्यवश तपेदिककी बलि चढ़ा, खुद पदमसिंह भी उसीसे<noinclude></noinclude> ngfvu9idc0rohhczq0mtrcu46yjojia पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९४ 250 195309 666037 2026-07-07T15:45:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666037 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८० किन्नर - देशमे मरे । मेरे मित्र कह रहे थे, राजमहल यक्ष्मा के कीड़ोंसे भरा पड़ा है । वह तो चिनीमे भी कई पत्र मुझे लिख चुके, कि मै इस बोस्की वगलेमें न ठहरू । वह समझते थे, यहा कई, राजवंशिक बीमारी की अवस्था रह चुके हैं । किन्तु इसका यहाके पुराने निवासियोको कोई पता नहीं, और इसीलिये मैं भी यहा निश्चित ठहरा हुआ हूँ । ' टोमो गेरोकी कीर्ति किन्नर वौद्धांमें बहुत फैली । उनके इशारेपर इतना धन जमा हो गया, कि ख छे व्हा - खङ् फिरसे बन गया । जिस नमय टोमो गेशे कनम्मे थे, उसी समय एक सिंहल गेलोङ (सिंहल भिक्षु) यहाँ आया, किन्तु वह भिक्षु क्या वाकायदा छोटा सा भी नहीं था । हा टुडा जरनैल वहुतसी हाडियोका भात खाये हुये था, और शकुन तथा परचित्त ज्ञानकी अद्भुत शक्तिका धनी बना हुआ था । नम्बरदार अगरजीत भी कह रहे थे, उसकी बतलाई बाते बहुत सच निकलती थी । टुंडा जरनैल तीसरी यात्रामे मुझे तिब्बत मे मिला था । वह बड़ा साहसी घुमक्कड़ था, इसमे सदेह नहीं। वही उसने अपनी किन्नर -यात्राकी कई मनोरंजक घटनाये सुनाई । साथ ही उसे अपनी सिद्धाईका रोव मुझपर डालना नहीं था, इसलिये अपने हथकन्डो को भी बतला रहा था, जिसे साधारण सूझ और व्यवहार- कौशल समझ लीजिये । सिहला गेलोड़ कुछ दिनो गेसेके साथ रहा, किन्तु एक जङ्गल में दो सिंह, एक म्यानमे दो तलवार कही रही है ? वह यहाँ से उठकर खड्ड पारके गाव लवर में जा बॅटा। उसके चमत्कार से लोग प्रभावित होने लगे । उसका बनवाया स्तूप वहाँ आज भी मोजूद है । खड्ड आर-पारके दोनो सिद्धो में प्रतिद्वद्विता छिड़ गई । विहारकी बात है, एक सिद्ध सवेरे के समय चबूतरेपर बैठे दातवन कर रहे थे । दूसरा सिद्ध अपनी दिव्यशक्तिका परिचय देने वाघपर चढकर मिलने श्राया । दातवन करने वाला सिद्ध समझ गया -- यह लोगोंको दिखलाना चाहता है, कि मैं बड़ा सिद्व हॅू। फिर क्या दातवन वाले त्रिद्धने चबूतरेसे कहा "चल, तूभी सिद्धके - स्वागत के लिये ।" और<noinclude></noinclude> o9njm205hfro3zhz8bl4zzkw8trapk0 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९५ 250 195310 666038 2026-07-07T15:46:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666038 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवता से बातचीत १८१ चबूतरा सचमुच चला। वाधवाला सिद्ध साष्टांग दंडवत् करते जमीनपर गिर पड़ा। लेकिन यहां किन्नरमे खडके चार-पारके सिद्धोको वह नौवत नही आई | निला गेलोड अपने भविष्य कथनमे वाजी मारे जा रहा था, किन्तु वह अकेला था, उसके पार्म जमात न थी । विना जमात, करामात कहा ? उन समय और शायद श्राज भी लङके देवता शक्कर और फनमूके देवता ढव्लामे बड़ी अनवन थी, वल एक दूसरे से' गुत्यगुत्था नहीं करते थे, वाकी सब कुछ हो जाता था । सिहला गेली की मिठाईको शक्कर मान गया था, और ढवला के भी मनमे भय- संचार होने लगा था । सिंहला गेलोडने एक दिन दोनो देवताश्रीको फटकारते हुये कहा - "तुम लोग अपनेको देवता कहते हो । लोगोकी पूजा खाते हां, लोगोंकी राना बतलानेका दम भरते हो, और तुम र ापस लड़ते हो । शाक्य मुनि की क्या रही शिक्षा है ?" शक्कंश तागडगाने लगा में तैयार हूँ, जो गेलोट् लामा कहेंगे, वही करूंगा । देवताग्रीले बातचीत लुक-छिपकर थोड़े ही होती है । त्रोक् (देववाहक) के मुँह हुई, ता भी, देवता के शिरश्चालन के सकेतसे हुई, तां भी सुननेवाले थे ही। वात किसी तरह टोभोगेशे के पास पहुँच गई। टीमागेशेने संचादि सिंहला गेलो बने इन दोनों देवताओ मेल करा दिया, तो उसकी सिद्धाई नुझमे वढ चढकर समझी जायेगी। उन्होंने जल्दी जल्दी ढब्लाने वातकी, और उसे तीन मामके लिये म (पान) में ले गये | व्ला तीन मास के लिये हम्मे चला गया, अब उतने दिन उनके साथ बातचीत नहीं हो सकती थी । सिंहला- मेकी मुलट कराने की बात खटाईने ही रह गई । --- परदारजी नाम उछेखने पहुँचे । आपकी तान तक दोगला कोठरिया थी, और चार्याी तरफ मंदिर मन्दिरकेट उन्ही कोटरियोंमें थी। सूचना पाते उन्होंने हाथ जोर मनस्कार किया। वीस साल दर्शन, नाटिना वाजन्ती वर्ग के शालीन सभापण<noinclude></noinclude> d3tgwcsymvkq5owv92rm2zaxmyzcwve पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९६ 250 195311 666039 2026-07-07T15:46:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666039 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' १८२ किन्नर - देशमं बड़े ही चतुर थे । मन्दिर खोल दिया गया था। वहाँ छोटे ग्रामन पहिले ही से बिछे थे। इन्हीपर बैठकर भिक्षु लोग पूजा-पाठ करते हैं। यही भाजके समय सौंध भी बैठता है। एक ऊँचे ग्रासनपर मुझे बैठाया गया। मक्खन- सोडा नमक मिली चाय और गंगा-जमुनी बैठकीपर रखा नफीस चीनी प्याला भी था गया। फिर घटे भरके लिये तां हम तिब्बतमें पहुँच गये । का-छेन् ( महामात्य) हिन्दी नहीं बोल सकते थे, और मै किन्नर भाषा नहीं जानता था, वस दोनामे तिब्बती चलने लगी । यह भारत के एक कोने किन्नर ही नहीं यदि सुदूर मंगोलियामे भी मुझे जाना पड़े, तो इसी तरह तिब्बती नापा सहायक हो सकती 'है। ख-छे-ल्हा-खड्-लो-छेन् रिम्पोछेकी गुम्वा है, और का छन् लामा की ओरसे प्रवन्धक हैं। प्रथम लोकेन्-रिम्पोछे यद्यपि गेलुकूपा सम्प्रदाय की स्थापनासे चार सदी पहिले पैदा हुये थे, किन्तु पीछे उनकी गुम्बाये (मठ) और अवतार गेलुक्वा हो गये । गेलुक्पाका अर्थ ही है- “मित्तु-मार्गी", फिर यहाँ भिक्षुकी प्रधानता होनी हो चाहिये । का छन् भिक्षु हैं। थोड़ी देर बाद एक और भिक्षु" श्रा गये । हम दोनोने एक दूसरेको पहिचान लिया । १६२६ ई० मे जब मै पहिली वार तिव्वत गया, तभी मेरी इनसे मुलाकात हुई थी, दूसरी यात्रामे भी कितनी ही वार भेट हुई । पहिली बार तो डेपुडमे ही मेरे लिये कोठी दिलाने में इन्होने बड़ी सहायता की, यद्यपि दूसरे कारणोसे में डेपु गुम्बामे ठहर नहीं सका । सुखराम यही उनका नाम था, तब . भी पढ़ाई शुरू ही किये हुये थे और अब वह गेशे सुखे --पडित सुखे थे। दो चार ही साल हुये, वह देश लौटे। मैने उनके ज्येष्ठ साथीके बारेमे पूछा । उन्होने कहा - गेशे कल्जड ( कैमड् ) अब "छोग-रम्पा" हो गये । छोग-रम्पा विद्याकी श्राचार्य जैसी सर्वश्रेष्ठ उपाधि है । किन्तु यह सरकार की ओरसे नहीं महागुम्पा (डेपुड ) की ओरसे दी जाती है, जिसमें सात हजार भिक्षु निवास करते है, इसे भोट देशकी नालंदा समझिये । "ल्हा-रम्पा" (आचार्य) की उपाधि<noinclude></noinclude> 34prgpfz3sr4qd9gohm4v1mz538dqdd पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९७ 250 195312 666040 2026-07-07T15:46:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666040 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवताते बातचीत १८३ भाट सरकार देती है, और कड़ी परीक्षायोके वाद । उसका सम्मान सर्वोपरि है। मालूम हुआ, ग्यावोङके एक भितु ल्हारम्पा भी हैं। वह कुछ साल पहिले जन्म-भूमि श्राये थे, किन्तु फिर भोट लौट गये । यहाँ रहकर क्या करते ? पढ़ाने के लिये विद्यार्थी कहाँ मिलते ? फिर तो नारा पढा-पढ़ाया धर्मकीर्ति, चद्रकीर्ति, वसुबन्धु, अस'ग और गुणप्रभ का दर्शन भूलकर ही रहता न १ गंशे सुखे व घरवारी हो गये हैं, स्वेच्छाने नहीं वलात् । नजर लड़ गई किसी तरुण भिक्षुणीपर, सन्तान निग्रह हो नहीं सका, फिर दूसरा रास्ता करा था । अव तो उन्हे किन्नरमे रहनेपर घर- निरस्थी चलाना ही होगा । और उनकी वीस सालकी पढ़ी विद्या १ यदि वह रार के सिद्धका पथ स्वीकार करें, तो थोड़ा बहुत काम दे; किन्तु वह धर्मकीर्तिके तर्कको वर्षों पढ़ते रहे, जिनने चौदह शताब्दियो पूर्व कहा था । वेदप्रामाण्यं कचित् तृ वाद, रनाने धर्मेच्छा, जातिवादावलेपः । संतापारम्भ. पापटानाय चेति, ध्वस्त प्रज्ञाना पंच लिंगानि जाड्ये ॥ ( प्र० वार्तिक ) अर्थात् (१) वेद ( या किसी ग्रन्थ) को ( सर्वोपरि ) प्रमाण मानना; (२) किनको (जगत्का ) कर्त्ता कहना, ( ३ ) ( गंगा आदि तीथों के) खान ने धर्म चाहना; ( ४ ) ( ऊँचनीच ) जातिके विचार का अभिमान, और ( २ ) पाप मिटाने के लिये ( भूख उपवास से शरीर- को) सताप देना, ये पाचां बुद्धिमारे ( श्रादमियों) की जड़ता के नक्षण हैं। पुराने से इतने दिनो बाद मिलनेवर वड़ी प्रसन्नता हुई। उसी मेरे दिलने प्रश्न ग्रापा-या नेगी लाभा जैते भोट-भापाके द्वितीय विद्वान् तथा गेशे सुखे, लोग रम्ना कल-जुङ और ग्यावोङ् -- नाकी किनर अर्थात् भारतको आवश्यकता नहीं है ? उन्होंने<noinclude></noinclude> bo94guunwvrgbj1d9a0gb3cjah3fu5b पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९८ 250 195313 666041 2026-07-07T15:46:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666041 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८४ किन्नर - देश मे संस्कृत में होनेपर भी तिब्बती अनुवाद सत्कृत या हिन्दी में सारा जीवन लगाकर भारत की अद्वितीय प्रतिभाओं के ग्रन्थांका अध्ययन किया, उन प्रतिभायीका जिनके विना कार्शमे पढाये जाते नारे शान अधूरे हैं, और जिनके अधिकाश ग्रन्थ मूलत अव संस्कृत से सर्वथा लुप्त हो चुके हैं, और उन्हें ही पढ़ा जा सकता है, जबतक कि उन्हें फिर से अनूदित नही कर दिया जाता। जिस तरह भारतीय चित्रकलाके विकासको समझा नहीं जा सकता, यदि ग्राम अजन्ता के अमर चित्र- कारोंकी कृतियो को छोड़ दे । भारतकी मूर्तिकलाका ज्ञान आपका पूर्ण रहेगा, यदि ग्राप सॉची, भरहुत, धान्यकटक ( अमरावती) के मूर्ति - शिल्पियोको पास न श्राने दे, उसी तरह दिङ्नाग-धर्म कीति- नागार्जुन- चंद्रकीर्ति-संग-वनुबंधुके गंभीर विचारो परिचय विना भारतीय मस्तिष्क की सर्वोच्च उड़ानको श्राप नहीं जान सकेंगे। याद रखे, युरोपके सर्वश्र ेष्ठ भारतीय दर्शन के पडित औौर संस्कृतज्ञ श्राचार्य वत्स्कीने धर्मकीर्तिको भारतका काट रहा था, और मै उन्हे कान्ट और हेगेल सम्मिलित, किन्तु चौधी खोपड़ियोको कौन इसे समझाये ? काशीकी संस्कृत - परीक्षामे जब इन श्राचार्यों के उपलभ्य ग्रंथ रखे गये, तो कूप-मडकोने बावेला मचा दिया, काग्रेस मंत्रिपदको छोड़ते ही उनकी वन चाई, और परीक्षा से उन ग्रथोको निकलवा दिया। वह फिर तब तक परीक्षा में सम्मिलित नही किये गये, जब तक युक्तप्रान्तके शिक्षा विभागकी वागडोर संपूर्णानंदजीके हाथमे नही गई। संपूर्णानद को भारतीय प्रतिभाका साक्षात् परिचय है, इसलिये वह इन प्रतिभात्रोंके मूल्यको समझते नहीं अनुभव करते हैं, किन्तु क्या हम वहीं अशा किसी ऐरे गैरे - नत्थू खैरे से कर सकते हैं । क्षमा कीजिये, आज हमारे भारत संघका शिक्षा विभाग ऐसे ही हाथो मे है । अपने विपयका सबसे अयोग्य आदमी हमारा शिक्षा मंत्री बनाया गया है । खान अब्दुल गफ्फारखाने जब सुना, कि बौद्ध विचारधारा के दो द्वितीय दार्शनिक असंग और वपुवधु दो पठानबंधु थे, तो वह 1<noinclude></noinclude> 3bjaur06tghfebyjtr9pj7qc866npw9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/१९९ 250 195314 666042 2026-07-07T15:46:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666042 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवतासे बातचीत १८२ उछल पड़े। कहा- उनके ग्रंथोको हमारी भाषामे याना चाहिये, उनकी जीवनीपर प्रकाश डालिये। मैने उस समय तना ही कहा — दोनोका जन्म स्थान पेशावर ( पचनपुर) था, एक बौद्धोका प्लातोन है और $ दूसरा रिस्ताविजू । देशी शिक्षा और संस्कृतिके, अध्ययन तथा प्रचारकी गंभीर जिम्मेवारी क्या मौलाना आजाद के कधोपर रखने लायक है ? वह रवी सद्रता अव्वल मुदरिंस हो सकते है, सफल सुदरिंस भी हो सकते हैं, अरबी और इस्लामिक शिक्षा क्रमकी योजना बनानेभे सहायक हो सकते है, और से यह भी मानता हूँ, कि भारतीय शिक्षा कनमें उनके लये स्थान रहेगा । किन्तु वह संपूर्ण भारतीय शिक्षा श्री संस्कृति के श्रव्यथनका एक बहुत छोटा सा अंग होगा, उतना ही जिना मोहनजी डेरीले थाज तक के कालमे अकवर और औरंगजेब तकका an | जिन आदमी के मस्तिष्कमे हमारी साठ शताब्दीतक व्याप्त सास्कृतिक परका नहीं के बरावर ज्ञान है, क्या वही हमारा सबसे योग्य शिक्षा मंत्री हो सकता है? आप कहेंगे, उनके सहायक डाक्टर ताराचंद जो ह । क्षमा कीजिये, यहाँ "देव मिलाई जोटी है।' डाक्टर ताराचंद भी साट शताब्दियांमेसे उन्हीं डेढ़ शासके पति है । विने हककर से आजाद और ताराचंदपर पहुँच गया। आज ऐसे विद्वान् श्रोर होते रहे है, जिन्होने एक जीवन लगागा पूर्ण उनको पढ़ा है, जिनका ज्ञान भारतीय विजानने के लिये नावश्यक है, जिसका अधिकाश नौवी अनुपाददी में प्राप्त हैं। क्या मेरा या किसी भी प्रतिना प्रेमरनेवाले भारतीयका कर्तव्य रिने एक ऐना सरकारी विद्यापीठ भावाने के साथ तिब्बती भाषामें प्राप्य इन नवीन हो, जिसे समय पाकर लुत प्रथ फिर हमारी सामने श्री नारती विद्वानोंमें उनका पठन-पाठन होकर उनकी 1.<noinclude></noinclude> dhpj5en0z5gqu4972sdfl0fkb8tipyn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०० 250 195315 666043 2026-07-07T15:46:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666043 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८६ है किन्नर - देश में एकागिता दूर हो। साथही ऐसे पंडित पैदा हो, जिनकी हमें अपने दौत्य सवधकेलिये, तिब्बत, चीन, मंगोलिया, कोरिया ही नहीं जापान सारे सुदूरपूर्व में श्रावश्यकता होगी, क्योंकि वह बौद्ध साहित्य, दर्शन और इतिहासके पूरे पंडित होगे। ऐसा विद्यापीठ हमारे भोट- भाषाभाषी भूभाग ( कनौर, स्पिती, लाहुल, जास्कर और लदाख ही नही गढ़वाल, अल्मोड़ा के उत्तरी अंचल तथा शिकम् (दार्जिलिंग ) के लिये भी योग्य शिक्षक और प्रबंधक देगा । कहिये किसे इन वातोको समझाया जाये १ मौलाना आजाद और डाक्टर ताराचंद को ? वह हिन्दी उर्दू की सहायताका बॅटवारा भले कर सकते हैं-यदे हिंदीकेलिये पाँच लाख एक मुश्त दान दिया जाये, तो न्याय यह कहता है कि उर्दू को भी पाच लाख मिले । यदि हिन्दीको चालीम हजार वार्षिक सहायता दी जाये, तो उर्दू को भी उतनी मिलनी चाहिये, यदि हिन्दी साहित्य सम्मेलनके भवनके लिये दिल्लीम दस एकड़ जमीन दी जाये, तो उडू को भी उससे एक अंगुल कम नहीं दी जानी चाहिये। यह है साठ और डेढ़ शताब्दियों की धाराकी प्रतिनिधि इन दोनो भावायोके बारेमे उनके उज्ज्वल न्यायका ढंग ! क्या इसपर शिक्षा विभाग के बारेमे नही कहना होगा - "चूड़ा वश कवीरका, उपजे पूत कमाल । " हिमाचलप्रदेशके लिये तो अभी खड-विखंड रखने की नीति मालूम होती है । ६ लाख ३६ हजार श्रावादी ( १०,६०० वर्ग मील, ८४ लाख १८ हजार वार्षिक श्राय ) की २१ छोटी छोटी रियासते इकट्ठा करके हिमाचल का एक छोटा सा पुतला खडा कर दिया गया है । सारा हिमाचल काली (नेपाल सीमा ) से चंद्रभागात जव अखड हो जायेगा, तब रोना रोने की जरूरत नहीं होगी। जब सारा हिमाचल मेवा वागों, पनबिजली स्टेशनों, धातु और ऊनके कराखानोसे भर जायेगा, तो हिमाचल के पूत अपने इस सास्कृतिक भारको भी सह उठा लेंगे । किन्तु, इस समय कहनेपर तो यही उपदेश दिया जायेगा-""भारत सरकार के पास विनती कीजिये" । भारत सरकार के कर्णधार “भारतके<noinclude></noinclude> ckx1dw3noebtcq2xnq4qc7yzs35r0iz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०१ 250 195316 666044 2026-07-07T15:47:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666044 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवता से बातचीत १८७ श्राविकारक" नेहरूजी तो शिक्षा विभागकी श्रोर हो जानेका मत करेगे और आगे वही गति होगी, जो नेमके सामने बीण बजाने वाले की। मेरी इन पक्तियों यदि किसीका दिल दुखता हो, तो उसे वह जीना चाहिये, कि यह भी पक्तिना नहीं एक दुखी दिलकी ग्रह है। चाहे चाज कुछ भी हा, किन्तु मुझे विश्वास है, हिमाचल और भारत अपने कर्त्तव्यको भूल नहीं सकते । × 1 X वातक श्रुतमं ढव्ला देवताके बारेमे पूछनेपर मालूम हुआ, वह छतपर विराज रहे हैं। हम उठकर छत पर गये । धूप थी, किन्तु ढबूला तपस्वी हैं, उनके लिये धूप-छह सव एक ही है। नवरदारमे कल ही ढब्लासेबतालाप करनेको सलाह हा चुकी थी । ढलाने तीन-तीन ग्रोक्ष ( मुखरूपी मनुष्य ) हूँ, किन्तु एक दिवंगत, एक वालक और एक शिलेकी सैरपर । सेर निरके देवता असीची होते हैं और वह सिर्फ यो उपर हो निर्भर नहीं करते । प्रोक्ष न होने पर वह गूगेकी भाँति इशारे से बात करते हैं --गल बगलमें निरडुलानेका अर्थ है नहीं, की चार शिर झुकाने का अर्थ है "हा" ऊपर नीचे कूदने का अर्थ है "बहुत प्रसन्नता के साथ", हाँ, प्रश्नकर्त्ता की थोरसे दूसरी तरफ शिर झुकाने का अर्थ है "अचि या मुँह मोड़ना ।" सकेन स्पष्ट हैं, गूंगे या मौनधारी भी ऐसा ही करते हैं। किन्नरके सभी देवताओोकी भाति ढबूलाकी भी कोई खाम मूर्ति नहीं है। एक चौकोर लकड़ीका टाचा है, जिनका ऊपरी भाग कुछ गाल या । नारा टाचा रेशमी कपड़ोंने ढका है। इसी गोलाईपर पाचपाइ चादी के चेहरे लगे हैं, और ऊपरसे हाथ भरके पिस चमरी र वाले वाल है। टॉचेके भीतर से आरपार दो भोज चोले पतले लठ्ठे लगे हैं, जिनके शिरोधर शुद्ध चाँदी के व्याघ्रमुख है। लटके शिगेको श्राप वाघ दिया गया है।<noinclude></noinclude> ssq9akjsnorzz362pkau548kfhx0zil पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०२ 250 195317 666045 2026-07-07T15:47:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666045 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८८ किन्नर - देशम दी आदमियोने दोनो छोरो शिर डाल लडीको कवेवर रख देवताको उठाया, दूसरे दो आदमियोने दोनो वगलमे खड़े हो देवताको सभाला। कंपेपर उठाते ही लचीले लट्ठ हिले, जिसके साथ देवता भी स्फूर्ति थाई, ऊपर की ओर उठनेपर डेढ़ हाथ व्यासके शिरके बिखरे बाल ऊपर नीचे उड़ने लगे । मे - ढला तिव्वतसे आये हैं, इसलिये वह तिब्बती भाषा भी समझते थे, किन्तु मैने सीधे वात करना पसंद नहीं किया — कही सम्मान प्रदर्शन- 'भूल न हो जाये, और मुफ्त मे देवता के कोप का भाजन होना पडे । मैने नंबरदार अगरजीतको अपना दुभाषिया बनाया। ढला से बातचीत किन्नरकी और पाच बोलियोको छोड़ वहाकी सर्वाधिक प्रचलित अर्थात् राष्ट्रभाषा हम एक ही की जाती है। मैने सोचा ढवला यहाँ जैसे सर्वाधिक प्रचलित हम् स्कद के पक्षपाती है, कनम्की स्थानीय बोली के नही; वैसे ही वह सारे भारत के लिये सर्वाधिक प्रचलित हिन्दी के राष्ट्र- भाषा होनेका पक्षपाती छोड़ और कुछ नही हो तकते । वल्कि नबरदार अरारजीतने मुझसे हिन्दी मे पूछने के लिये कहा, किन्तु श्रादाव अलका- की गलती होनेके डर से मैने नंबरदारको ही प्रश्नकर्त्ता बनाया । देवताओं के सामने स्वार्थ की बात चलाना नहीं पसंद करना, और न कोई वैसा प्रश्न रखनेवाला था । कोठी (चिनी) की देवी चंडिका चिरकौमार्य और उसके कारण क्रोधाधिक्य और उसीकी वजहसे हर मेलेमे दो चारकी शिर फुटौवल खूनखरावी । मैं चाहता था, यह रुके । साथही लोगोने बतलाया, चडिका मास शराव बहुत खाती पीती है । शरावसे मै परिचित नही हूँ, किन्तु मातसे तो मुझे भी परहेज नहीं है, परन्तु मै यह तो नही चाहूँगा कि उसके लिये मेरा घर रक्तपकिल हो । सबकी दवा मुझे एक ही समझमे आई कि देवीका व्याह करा दिया जाये । फिर चडिका सारे किन्नर की सबसे बड़ी देवी जैसे तैसे देवता से तो व्याह नहीं कर सकती, वर भी वधूके योग्य होना चाहिये !<noinclude></noinclude> 5okx6yo0wsg9sovr9x1p8iag8uehpeo पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०३ 250 195318 666046 2026-07-07T15:47:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666046 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवता से बातचीत १८६ -र ढव्लासे बढ़कर याग्य वर कौन हो सकता था, जो बहुत बड़ा देवता हाते भी बहुत नम्र, शात और धर्मात्मा है । देवता हिल रहा था, पास खड़ा आदमी निरतर घटी वजा रहा था। अब मेरे शन्दोको और परिष्कृत भाषामे करके प्रश्नकर्त्ता ( नवरदार ) ने हाथ जोड़ कर कहना शुरू किया : -- डवर साहेब ! आपकी सेवामे काशीके महापंडित राहुलजी नम्रतापूर्वक विनती करना चाहते हैं, गुस्ताखी माफ हो । शिर ऊपर नीचे उठा अर्थात् "हा, कहे " | - कांटीकी देवी बहुत मनमानी ग्रनीति करती है । बुद्धके धर्मकी वहेलना करती है, बहुत क्रोधमे रहती है। इसकी वजहसे खुनखरावी होती रहती है । कनोरके मारे देवता भगवान् बुद्ध के उपदेशको मानते हैं, किन्तु कोठी की देवी इन्कार करती है। देवी जब तक कारी रहेगी, तब तक ऐसा ही होता रहेगा । उसका व्याह हो जाना चाहिये । इसलिये ढवला ऊपर नीचे खूब उछला. फिर उसने प्रश्नकर्ताकी र अपना शिर झुका दिया अर्थात् - "महापडित बहुत ठीक कहते हैं, कोटीकी देवीका व्याह हो जाना चाहिये ।" --कोटीकी देवां पड़ी देवी है, डवर साहेव । वह साधारण देवता से व्यास कब पसंद करेगी ? शिर ऊपर नीचे हिलकर प्रश्नकर्त्ता की ओर झुका अर्थात् -"हीं, पद - -टपर सारे । ग्राप सोनेकी मक्खीची नांति अमर हैं, हम जति जननते भरते हैं। गुस्ताखी माफ करे । शिर ऊपर नीचे कर प्रश्नकर्ताकी चार --डबरसादेन । ग्राप परोपकार के लिये वारे लिये हमारा देशने विराज रहे हैं। हा, ठीक है ।" शाक्य मुनिके धर्मकी<noinclude></noinclude> taf02ng6mgv6knr1xowelwsfs46cd4k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०४ 250 195319 666047 2026-07-07T15:47:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666047 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६० किन्नर देशम ...--"हाँ, हाँ ठीक है ।" । -- डवर साहेब ! धर्मके काममे श्राप सदा तत्पर रहते हैं । ग्रथम- को धर्म पथसे हटाना धर्मका काम है । .. -- "हा, ठीक बहुत ठीक ।" -- आप जैसे बड़े देवताके साथही व्याह करना कोठीको देवी पसंद करेगी, आप जैसा देवता ही उस चिरकुमारी चंडीपर नियत्रण कर सकेगा ।... शिर बड़ी जोरोसे अगल वगलमें डोला, जान पड़ा था, देवता गुस्से मे आकर कही नीचे न कूद पड़े । वगलमे खड़े दोनों आदमियांने उसे संभाल लिया । इसका अर्थ हुआ - - " क्रोध के साथ नहीं मैं नहीं व्याह करूंगा ।" -- डंबर साहेब ! क्षमा क्षमा । महापंडित नहीं जानते श्राप भिक्षु हैं, या व्याह नही करेंगे । भूलको क्षमा करे । . - "कोई बात नही क्षमा कर दिया ।" - कोठीकी देवीका व्याह हो जाना चाहिये यह तो आपने भी पसंद किया । - "हाँ, हाँ" - तो किसके साथ व्याह हो ? शक्कंशुके साथ ? - - "नही, वह छोटा देवता है ।" - जगीक देवता के साथ ? ... - "नही, छोटा देवता है ।" साथ १ • - रोगीके नारायण, चिनीके नारायण, उरनीके नारायणके ... --- नही वह छोटे देवता है, और देवीके संबंधी ( भाजे ) हैं - सुदा के महेश, भावाचे महेशू, चगाँव के महेश के साथ ?<noinclude></noinclude> 0axe2an0renalk8pyg9pjlfop7z9l1y पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०५ 250 195320 666048 2026-07-07T15:47:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666048 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवतासे वातचीत १६१ जोरसे शिर अगल बगलमे हिला - "नहीं, नहीं, क्या कह रहे हो, वह देवीके सगे भाई वाणासुरके लड़के हैं ।" --ख्यागी, दुनी, पगी, रार के देवता ? .. "नही नही ।" प्रश्नकर्त्ता एकदम नदी कूदकर वस्पा उपत्यकामे पहुँच गया --- डवर साहेब | और कामरूके बदरीनाथ के साथ कैसा रहेगा ? खूब उछल उछलकर शिर प्रश्नकर्त्ता की ओर झुक गया- "वहुत टीक जोड़ी रहेगी। वह भी राज्य के माफीदार माफीदार और देवी भी डवर साहेब" ता सरकारकी राय है न, कि कोठीदेवीका व्याह वदरीनाथसे हो जाये ? उछल उछलकर शिर प्रश्नकर्ताकी ओर झुका - " जरूर हो जाना चाहिये | शादी होगी । --पडित राहुलजीने अनुचित वात तो नही की ? ... - "नहीं, नहीं। व्याह हो जाना चाहिये, होगा ।" - पंडितजी क्षमा भागते हैं, आपको इतना कष्ट दिया डंवर साहेब ! - "नहीं, नहीं मुझे कोई कष्ट नही हुआ । " -श्रीर कोई श्राजा है पडितजीका, कि बात समाप्त कर दें ? ... - कोई श्राज्ञा नही, बात समाप्त हो गई । -- ताबेदारको कुछ हुकुम देना है ? -- 'हो, हो, काम है, जरूरी काम है । --नटारका, आपको मडारका काम है ? - जरूरी बात है, बहुत जरूरी। -- दिवान किताव देखनेका कान ना ? ...--, दाँ, दो दो तालते हिसाब नहीं देखा गया । तुम उसके जिम्मेवार, दिनायका तन्देहीसे देखो ।<noinclude></noinclude> 5p5qk05hr3e9hn4szrruz3xkqcpaejs पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०६ 250 195321 666049 2026-07-07T15:47:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666049 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६२ किन्नर - देशमे ढब्लांके साथ वार्तालाप समाप्त हुआ। हम बगलेकी और चले । रास्तेमे भिक्षुणियोका मठ मिला। वैसे भिक्षुणिया अधिकतर अपने घरोमे रहती है, किन्तु पूजा पाठके लिये वह यहाँ ग्राती, कुछ अपनी महन्तानी के साथ यह भी रहती हैं। भिक्षुणिया ग्राम किन्नरियोजी नाते बड़ी मेहनती होती हैं, घरकी खेती-बारीको संभाले रहनी, हॅ, मिर्फ खाने पीने पर मर-मरके काम करनेवाली इतनी सस्ती दाती कहाँ मिलेगी, इसीलिये यदि वह चाहे, तो अपने अनसे अच्छा मठ और - मंदिर कायम कर सकती हैं। जगीम उन्होने बहुत अच्छा मंदिर अभी भी बनाया है । नवरदार अगरजीत देवतासे ससम्मान वार्तालाप करनेके ग्रन्मत्त हैं । वही ब्लाके प्रबंधक है, इसलिये उन्हें बराबर हिसाव किताव या दूसरे मामलो में देवतासे सलाह लेनी पड़ती है। ढला उत्सवका बहुत प्रेमी है । तिब्बत में भी भोटिया साहित्य के महान् विद्वान के तौरपर प्रख्यात लामा तनू - जिन् ग्यल् छन ( सुडनम् नेगी लाना) कनममे पधारे। ढब्ला वाजा गाजा के साथ स्वागत के लिये गया । वह भोज भाज उपवन यात्रा श्रादिक् भी वड़ा शौकीन हैं । प्रवधक यदि खर्च अधिक होनेकी थोर सकेत करता है, तो वह नाराज हो जाता है, मैंने पूछा -- देवतापर आपका कैसा विश्वास है ? - कभी- कभी नहीं भी विश्वास हो जाता है, किन्तु सोचते हैं, सारे लोग विश्वास कर रहे हैं । फिर झूठ के साथ-साथ कोई-कोई बात सच भी निकल आती है। यदि देवताकी बात काटते हैं, तो वह धमकी देता है." फिर हम गुत हो जायेंगे ।" इसका भी डर लगता है, पूर्वजो- ' के समय से चला आया देवता लुत हो गये, यह ठीक नहीं । --- सचमुच यदि किन्नरके देवता गुन हो जाये, तो यहाँ सामाजिक जीवनमे इतना बड़ा स्थान रिक्क हा जायेगा, कि लोगोंको जीवन बहुत रूखा लगने लगेगा । देवताका मतलब यहाँ है, हर दूसरे-तीसरे निय मित भोज, गाना नाचना । देवताका अर्थ है समय-समयपर छोटे बड़े<noinclude></noinclude> 9bu7dkyoqow6ik5f1jxtbqkoa7sal4o पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०७ 250 195322 666050 2026-07-07T15:48:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666050 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>g 9 ४२.८३ चडिवारी सवारी ( पृष्ठ २३१ ) ४४. चडिका के लिये पलि प्रस्तुत (१४-०६२) ५ चडेरा पधारी (पृष्ठ २६२ टिल (६२) लाशा पर मृत्यु प्रतीक्षा ( पृष्ट-२६३)<noinclude></noinclude> bali2kihn8hyg6kqprdrp5xguythcv5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०८ 250 195323 666052 2026-07-07T15:48:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666052 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बारह- - ४८. प्रतिहार कालीन चतुर्भुज शिव (पृष्ठ २६५ ) ४६. निरत का सूर्य मन्दिर ( पृष्ट. ३३० )<noinclude></noinclude> piwa9fk5lh8s5s5b6uv39uy13f90o2k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२०९ 250 195324 666053 2026-07-07T15:48:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666053 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चीनी वापस १६३ महोत्सव । इन सभीमे नरनारी सामूहिक रूपसे सम्मिलित होते हैं। यहां सिनेमा नही है, मनोविनोदके दूसरे साधन नहीं हैं, फिर देवताओंके इस उपयोगको आप हटा कैसे सकते हैं ? (१३) चिनी वापस चिनी छोड़े दी सप्ताह हो गये थे, यद्यपि डाक स्पू तक बरावर "मलती जाती रही, किन्तु कुछ चिट्ठियोका जवाब देना था, श्राये पार्सलो- ' को भी देखना था, और लौटते समय उसी रास्ते देखनेकी कोई नई चीज नही थी, इसलिये सोचा दो दिनमें चिनी पहुँच जाना चाहिये । यदि विश्राम करनेके दिनोंको छोड़ दे, तो नमग्यासे ४ दिनमें मैं चिनी पहुंचा, रामपुर से चार दिनमें चिनी पहुँचा और शिम्लासे दो दिन में रामपुर श्रार्थात् शिम्लासे १९६ मीलपर अवस्थित तिब्बती सीमातपर इस दिन में आदमी पहुँच सकता है, और बिना अनेको अधिक कष्ट दिये । यदि पंजाब के प्रधान इजीनियरका आज्ञापत्र हो, तो हर दस-वारह मीलपर डाकवगले हैं, जिनमें श्रारामसे ठहरते यात्री जा सकती है। हाँ, जो सवारीके भरोसे यात्रा करना चाहते हैं, उन्हें निराश होना पड़ेगा | वेहतर यही है, कि कमसे कम सामान ( जिनमे उत्तरी भारतके सदके कपड़े तथा चाय-चीनी- मसाला तो रखना ही दांगा ) के साथ दो प्रादमीने एक भारवाहक शिलासे ही लेकर यात्रा शुरू करे। भुके विश्वास है, हिमाचल सरकार मेवावागा के लिये वन इन सुमिका पूरा विकास करेगी, मोटरकी सड़क नजदीक तक प्रजायेगी, लोगोकी प्रापित करनेके लिये यानि आनका रेगी, फिर खाते पीते तैलानियो के लिये किन्नर मूर्ध्नि जायेगी।<noinclude></noinclude> 2wmyktym2xisozujn7j049oe3okz9at पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१० 250 195325 666054 2026-07-07T15:48:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666054 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६४ किन्नर - देशमें २७ जून (रविवार) को जलपानके बाद हम रवाना हुये । वेगाल पहिले चल चुके थे, और चपरासीको तो कल ही जंगी भेज दिया था, जिसमें हमारे पहुँचते ही घोड़ा और बेगारू तैयार मिले। दो मील घोड़े- पर चढ़ने के बाद लिप्पा - खडसे पहिले ही उतराई शुरू हो गई। पैदल चले । चढ़ाई मे घोड़े पर चढ़ना चाहा, तो खूनट रिकाव टूटकर अलग गिर गई । घोड़ को आगे ले जाना बेकार था, खैर, चलनेका श्रभ्यात हो गया था, और दोपहर से पूर्व हम जंगी पहुँच गये। वहाँ सव सामान तैयार करके चपरासी रारहू चला गया था। हम भी रवाना हुये, और, घोड़ापर सवार होते वक्त जान पड़ा, रार तक आराम से चलेगे, किन्तु . दो मील ही आगे बढ़े थे, कि घोड़ा वार-बार बैठने की कोशिश करने लगा, सड़क थी इसलिये लुढ़कनेका डर नहीं था, किन्तु ऐसे पोते छ मीलकी अगली मंजिल कैसे म्मरी जा सकती थी ? उतर पड़े और रार पैदल ही पहुँचना पड़ा। कही घोडेकी पीठ कटी, कही घोड़ा कूदनेवाला, कही रिकाव या जीन टूटकर गिरनेवाली, कही घोड़ा चलने से अधिक लेटनेमे होशियार, घोड़ेपर कनौर की यात्रा करनेवालो- के लिये क्या-क्या श्राफत १ जान पड़ता है, घोड़ा देनेवाले पूरी तौरते वेगास धर्मका पालन करते है, या इसे उनकी तोताचश्मी कह लीजिये । अभी काफी दिन था, जब हम रार पहुँच गये, यदि पहिले से प्रबंध कर लिया गया होता, तो आज ही हम पंगी पहुँच जाते । मै 'तो' ऐसा न करनेकेलिये पछता रहा था, यहां फिर उसी जगलातकी कुटिया ठहरना पड़ा, और अवको वहाँ सहस्रस्सहरु मक्खियों धावा बोल रही थी, पगीमें डाकबगला था, और हर बंगले की भांति वहाँ मक्खियांके रोकनेकेलिये जालियाँ लगी थी। बगलेकी विशालता और स्वच्छताको देखकर तो मै पहिले मुग्ध हो गया था। यहाँ नई डाक मिली, जिसमे महेताजीकी भी चिट्ठी थी, उन्होने मेरे सुझावों के बारेमे .. हम सारे हिमाचल में फल उत्पादनके विस्तृत आयोजन लिखा था .<noinclude></noinclude> nsu7jecimhuzcoi3d3or9cmxv55zfj1 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२११ 250 195326 666055 2026-07-07T15:48:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666055 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चीनी वापस १६१ मे लग चुके हैं। हॉ, यातायात की समस्या सबसे आवश्यक है, और हमने उसे हाथमें ले लिया है, क्रय-विक्रय और शीघ्र यातायातकेलिये हमें एक सहकारी (कोपरेटिव) संगठन तैयार करना है । कुछ विशेष महत्व के स्कूलों में मालियाँ तथा विद्यार्थियोंकी शिक्षाके लिये क्लासो तथा छोटे उद्यानोंका प्रवध करना भी विचाराधीन है, "जहाँ तक चिनी तहसीलमें डाक्टर भेजनेकी बात है, इसके बारेमे मै कुछ तुरत करनेकी कोशिश करूँगा । और हिन्दी १ वह तो हमारे प्रान्ती (राज) भाषा बनाई जा चुकी है । कुछ इलाको में तिब्वता भाषा पढानेका ग्रापका सुझाव बहुत लाभदायक है और मे उसे हाथ में ले रहा हॅू। यदि आप वहाँ काम चलाऊ तिब्बती जाननेवाले व्यापक पाये, तो कृपया उनके नामसे मुझे सूचित करे, हम उन्हें तिब्बती खिलाने के लिये खुशीसे थोड़ाता पारिश्रमिक देगे । संस्कृतकी पढाई भी विचाराधीन है। "पको यह जानकर प्रसन्नता होगी, कि बुशहर और पास पड़ोस की भूमिको मिलाकर हमने " महास" के नामसे एक जिला बना दिया हे, हम आशा रखते हैं, कि नातिचिरेण हम बुशहरमे एक फल अनु- धान रटेशन स्थापित कर सकेंगे । "भं यह जानने के लिये उत्सुक हूं, कि इस विशेष इलाके में यात्रा करते समय श्रापको कोई पुरातत्विक सामग्री दिखलाई पड़ी .." पत्र पावर के प्रसन्नता रानी ही चाहिये, मेरे सुझाव बहरे कानोम पीपी | पत्रका उत्तर मैने दो दिन बाद ( २६ जूनको) चिनीसे नेजा, जा प्राय निम्न शब्दों में था --- तीतर दिनका यात्रा करके तिब्बतीमान्त पर भारत के विकी देखकर कजही लौटा। तिब्वती संस्कृत -श्रव्य- ना पर पार्क लखनेका इरादा रखना हूँ, इम नमय कुछ, ती लिलगा- ·<noinclude></noinclude> ju5u7q3jseanbxsf3wxjq0m2tjss6rk पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१२ 250 195327 666057 2026-07-07T15:49:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666057 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९६ किन्नर - देशमे " ( १ ) रारक, अपा और जगी तीनों गाँव पानीके प्रभावते 'त्राहि त्राहि ' पुकार रहे हैं। अपाको तो उजड़कर भाग जाना चाहिये पाँच छ सालसे वहाँ के खेत परती पड़े हैं, अखरोट, चूली (छोटी "खूबानी ) और वेमी ( छोटे ग्राड् ) के वृक्ष सूख चुके हैं। पीने के पानीकी यह हालत है, कि शाम सवेरे सूत जैसी पतली चश्मेकी धारा अवलंब है । लोग अपनी भेड़ बकरियोंकी माल ढुलाई या दूर जगह मे थोड़े वच गये खेतोके भरोसे बुरी तरह दिन बिता रहे हैं, पूर्वजांके समयके घर हैं, इसलिये उन्हें छोड़ना नहीं चाहते । रार और जगी में पानीका इतना अभाव तो नहीं है, किन्तु उसकी बहुत कमी हो गई है । ये तीनो गाँव शिमला से १५२-१५७ वे मील के बीच है । जगीसे तीन मील आगे और रारसे चार मील पीछे दो बड़ी धारे बहकर सतलजमे गिर रही हैं । डाइन माइट, सीमेंट, और कुशल इंजीनियर- का जहाँ काम हो, वहाँ बेचारे गाँववालोके हाथ क्या कर सकते हैं ? आप गजकी पुकारकी भांति इन गाँवोके यार्त नादको सुने इजिनयर भेजकर इनका उद्धार किजिये । लोग शरीर से मेहनत करने को तैयार है । यदि नहर ( माकूल वन गई, तो यह लोग अपने खेतो और बागोको तिगुना चौगुना कर सकते हैं । " (२) कनम् १७०वा मील) और तुङ्नमसे श्रागे तिब्बती भाषा हड्रङ इलाका है । यहाँके स्पू (१८६ मील) गाँवमे ७० साल पहिले मोरावियन मिशनने काम आरंभ किया था, और वह प्रथम विश्वयुद्वके आरंभ तक काम करते रहे। उन्होने वहाँ स्कूल खोला, फल लगाने और ऊन बुनाईका काम सिखालाया, डाकघर खुलवाया। • उनके जाने के बाद डाकघर बन्द, स्कूल भी अव नहीं । सौ घरांके विशाल गाँव में पूर्णतया अधकारका राज्य है । सारे हरड इलाके सिर्फ एक स्कूल हड्गोमें है । यहाँ के निम्न गाँवोमें तुरत स्कूल खोलने की आवश्यकता है - स्पू, नमग्या, नाको, चाडो और लियो । कनौर (चिनी है तहसील) पिछड़ा भूभाग हैं, और उसमे भी सबसे पिछड़ा है यह ह<noinclude></noinclude> jrnhlnkyaypxmtlxtdq5zw2vyefisrw पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१३ 250 195328 666058 2026-07-07T15:49:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666058 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. चिनी वापस १६७ का इलाका । यहाँ हिंदीके स्कूल तुरंत सफल नही हो सकते, इसलिये आवश्यक है कि यहाँ के स्कूलो में पहले की दो श्रेणियों में निती भाषा पढ़ाई जाये, फिर साथ हिंदी भी। तभी विद्यार्थी फंसाये जा सकते हैं । स्पूके स्कूलको पीछे मिडल कर देना होगा । वहा पादरियोका बनाया एक सुन्दर वगला है, जो अब सरकारकी सम्पत्ति है । बंगले की ओर शीघ्र ध्यान देना चाहिये, नहीं तो वर्बाद हो जायेगा । ... " (३) हिंदी हिमाचल प्रदेशकी राजभाषा है, किन्तु यहाँ के तहसीलदार मुकदमे और दूसरे कारवार उर्दू में करते हैं, यद्यपि वह हिन्दी अच्छी तरह लिख सकते हैं। जान पड़ता है, उनके पास हिदीके वाम काई सूचना नहीं आई है। इसी तरह यहाँ के स्कूलमे दूसरे दर्ज से उद् अनिवार्य रूपेण पढाई जा रही है। इन बेचारे विद्यार्थियो के उर्दू किस काम आयेगी ? यहाँ तो हिदीक वाद अग्रेजी द्वितीय भाषाके अतिरिक्त यदि किसीकी इच्छा हो, तो उसे तिब्बती पढ़नेका अवसर देना चाहिये । तिब्बती प्राइमर और चार रीडर लदाख (कश्मीर) मे पढाये जा रहे हैं, उन्हें यहाँ भी काममें लाया जा सकता है। " ( 2 ) यहाँ के लोगोकी बहुत कम मालूम है कि देशमें कितना परिवर्तन हो गया है। हिमाचल सरकारका हिंदीमे एक "हिमाचल" पत्र निकालना चाहिये, और " उचित्र रास्ते दानोंनें हर जगह पहुँ- चाना चाहिये । पत्र पहिले मातिक निकले, फिर साप्ताहिक कर दिया जाये । पर्वतीय लोगोका कला के प्रति स्वाभाविक प्रेम है, अनपढ़ चित्रों बहुतसी बात समझ जायेंगे। पत्रकी एक प्रति प्रत्येक गाँव में अवश्य जानी चाहिये । इसके लिये आापकोटाक विभागका भी कान गरन करना होगा, जिसने वह डाकघर खोलने में अधिक उदारता दिख- बाये (खिर प्रचार जो ततारका मुख्य कर्त्तव्य है ) । चिनी तहसील पेनिश गौवने डाकर खुलने चाहिये पोस्ट मास्टरका काम स्कूल<noinclude></noinclude> ic0ikv2plkc4ftxpxl6glbxebrnzw3a पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१४ 250 195329 666059 2026-07-07T15:49:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666059 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६८ किन्नर - देश मे के अध्यापक कर लेंगे) - उड़नी, जगी, कनम् सुङ्नम्, स्पू, नमग्या, नाको, चाङो, नेस, रिव्वा और कामरू । . " ( ५ ) यहाँ पुरातन सामग्री बहुत कम रह गई है। प्रोफेसर तूची की भाँति कितनेही दूसरे लोग यहाँ था चुके है, ऊपर यहाँ काठके घरो में अनेकोंवार ग्राग लग चुकी है । कलाकी दृष्टिसे तो नहीं किन्तु 1. पुरातत्त्वकी दृष्टिसे एक महत्त्वपूर्ण चीज प्राप्त हुई है, वह है प्राक्- तिव्यतीत या प्रागबौद्ध मृतक समाधियों । इन्हे लोग गलती से ख-छे- रोम्लङ • ( मुसलमानी क्रम) कहते हैं, इसीलिये जान पड़ता है इनका महत्त्व नहीं समझा गया, और समय समयपर घरोके बनाते और खेती सड़कों को खोदते वक्त जब कोई कब निकली, तो लोगांने खोपड़ी के साथ मिट्टी के बर्तनों को भी फेक दिया, ऐसी कत्रो लिप्पा, कनम्, स्पू और नम्ग्या तक मिली हैं। ... ... मुझे लिप्पामें कासेका एक पूर्ण अर्धगोल वड़ा कटोरा तथा मिट्टीका एक टोटीदार मद्यकुतुप मिला | आपके पत्रमें " " महासू". जिले का नाम पढ़नेसे पहिलेही मैं यहाकी भाषाको शु श्रार्य भोट भाषा निर्मित करने लगा था । शुभाषा संस्कृत और तिब्बती (भोट) भाषा से भिन्न है, जिसमे "श" शब्द का अर्थ देवता है । शू कोई प्रागार्यकालीन जाति थी, जिसका सम्मिश्रण आर्य जातिसे हुश्रा और अंत (ईसाकी सातवीं सदीमे ) तिब्बतियोंसे संगत हुई । आजकी भाँति अशोक के समय भी यहाँके भेड़ बकरी वाले जाड़ोमे कालसी (देहरादून) जाया करते थे, सभव हैं, उस समयकी भी कोई सामग्री भूमिके भीतर से निकले । इसलिये हिमाचल सरकारको सूचना निकालकर प्रत्येक स्कूल अव्यापक और नंबरदार के पास भेज देना चाहिये, कि ऐसी सामग्री सुरक्षित तौरसे तहसीलदार के पास पहुँचा दी जाये, और तहसीलदार को भी ग्रादेश हो कि उसे अधिक दाम पर खरीद लें । “(६) सेब, अंगूर, नासपाती, श्रालूबुखारा, चालूचा, पिस्ता, बादाम, श्राडू, अखरोट, बेमी, खूबानी, सर्दा, खबूजा आदि फल<noinclude></noinclude> h5tej5mvkij8aoouot207mzh3nxv23h पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१५ 250 195330 666060 2026-07-07T15:49:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666060 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिनी वापत १६६ लिखवाकर भेजवा रहा यहाँ पैदा होते हैं, जिनमें से बहुतों के नमूनोंके साथ यहाँ के उद्यान व्यवसाय पर तहसीलदार साहेबसे अलग नोट हूँ । वपा उपत्यका किसी चश्मे में मिट्टी तेलकी गध श्राती वतलाई जाती है, किसी जगह सीसेके धातु पापाण मिलते हैं । श्रव- रख और कोई धातु पाषाण यहाँ से कुछ मीलपर पूर्वीमं मिलते हैं । इनका नमूना में अगली डाकसे आपके पास भेज रहा हूँ । ......यहाँफे लिये विशेषज्ञ भूगर्भशास्त्री चाहिये । ... ......” X x x X रारकी उस कुटिया में बैठे मै समाचार पत्र पढ़ने और मक्खियो के भगाने में लगा था, उसी समय मेरा ध्यान नीचे दो सौगजके फासले पर जलते मारबुज चोर एकत्रित जन समूहपर पडा । मालूम हुआ शरद देवता आया हुआ है, और वहाँ उसकेलिये भोजकी तैयारी हो रही है। मेरे जिज्ञासा करनेपर मेटने कहा मैं भोजका नमूना लाये देता हूँ। और वह वहाँसे थाली भरवाकर लाया, जिसमें थे (१) धीमे पका गुड़का हलवा, (२) चूलीके तेल में पकी मोटी पूड़ियां (पोले या विठूरे), (३-४) मान सहित सत्तूका गोला, (५) फाफड़ ( श्रोगले) का चीला । यहाँका भी देवता बुद्ध धर्मको मानता है, इसीलिये शायद मास नदी या या चिनी अनेक सपने ही चूलियाँ (छोटी सुवानी, फली देख रहा तक उन्हें जब तव पोदीने के साथ चटनी के लिये इस्तेमाल करता रहा, किन्तु श्राज पहली बार यहाँ पकी चूलियाँ खानेको मिली । बहुत भोजीवी, पानव-फल था, इसलिये वैसा मालूम हुआ । श्री गवते तीन हजार फीट के करीब नीचे नदीके तटभाग पर जिया जरी थी, क्यों के वह स्थान अधिक गर्म था। फल और नाकामय क्रमशः नीचेते ऊपरकी ओर बढता है । अगले दिन (२ जून ) नवेरे चाय पीकर में चल पडा, घोड़े .<noinclude></noinclude> 87a7vrzilge3o79yvjiljezinwgyrqw पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१६ 250 195331 666061 2026-07-07T15:49:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666061 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>. १६८ किन्नर - देश में के अव्यापक कर लेंगे) - उड़नी, जगी, कनम् सुङनम्, स्पू, नमग्या, नाको, चाहो, नेसङ्, रिब्वा और कामरू । " ( ५ ) यहाँ पुरातन सामग्री बहुत कम रह गई है। प्रोफेसर तूची की भाँति कितनेही दूसरे लोग यहाँ या चुके है, ऊपर यहाँके काठके घरो में अनेकोंबार ग्राग लग चुकी है। कलाकी दृष्टिसे तो नहीं किन्तु पुरातत्वकी दृष्टिसे एक महत्त्वपूर्ण चीज प्रात हुई है, वह है प्राकू- तिव्यतीत या प्रागवौद्ध मृतक समाधियाँ। इन्हे लोग गलती से ख-छे-रोम्बङ • ( मुसलमानी कम ) कहते हैं, इसीलिये जान पड़ता है इनका महत्त्व नही समझा गया, और समय समयपर घरोके बनाते और खेती - सड़कों को खोदते वक्त जब कोई कन निकली, तो लोगोने खोपड़ीके साथ मिट्टी के बर्त्तनों को भी फेक दिया, ऐसी कन्न े लिप्पा, कनम्, स्पू और नम्म्या तक मिली हैं।''''''मुझे लिप्पामें कासेका एक पूर्ण अर्धगोल वडा कटोरा तथा मिट्टीका एक टोटीदार मद्यकुतुप मिला । आपके पत्रमें " महासू " जिले का नाम पढ़नेसे पहिलेही मैं यहाकी भाषाको शु श्रार्य भोट भाषा निर्मित करने लगा था । शुभाषा संस्कृत और तिब्बती (भोट) भाषासे भिन्न है, जिसमे "शू" शब्दका अर्थ देवता है । शू कोई प्रागार्यकालीन जाति थी, जिसका सम्मिश्रण आर्य जाति हुश्रा और अंत (ईसाकी सातवीं सदीमे ) तिब्बतियोंसे संगत हुई । आजकी भॉति अशोकके समय भी यहाँके भेड़ बकरी वाले जाड़ो कालसी (देहरादून) जाया करते थे, सभव हैं, उस समयकी भी कोई सामग्री भूमिके भीतर से निकले । इसलिये हिमाचल सरकारको सूचना निकालकर प्रत्येक स्कूल श्रव्यापक और नंबरदार के पास भेज देना चाहिये, कि ऐसी सामग्री सुरक्षित तौरसे तहसीलदार के पास पहुँचा दी जाये, और तहसीलदारको भी श्रादेश हो कि उसे अधिक दाम पर खरीद लें । “ (६) सेव, अंगूर, नासपाती, आलूबुखारा, आलूचा, पिस्ता, बादाम, श्राडू, अखरोट, वेमी, खूबानी, सर्दा, खचूजा आदि फल<noinclude></noinclude> scjv03zyzy8uya2vf32el7019i8jvij पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१७ 250 195332 666062 2026-07-07T15:50:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666062 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिनी वापस १६६ साथ यहाँ के उद्यान लिखवाकर भेजवा रहा यहाँ पैदा होते हैं, जिनमें से बहुतोके नमूनो के व्यवसाय पर तहसीलदार साहेबसे अलग नोट हूँ। वस्पा उपत्यकाके किसी चश्मेमे मिट्टीके तेलकी गंध श्राती बतलाई जाती है, किसी जगह सीसेके धातु पापाण मिलते हैं । ग्रव- रख और कोई धातु पापारा यहाँ से कुछ मीलपर पूर्वणी में मिलते हैं । इनका नमूना मैं अगली डाकसे आपके पास भेज रहा हॅू। .. .. यहाँके लिये विशेषज्ञ भूगर्भशास्त्री चाहिये । ... ......” X X . X रारकी उस कुटिया में बैठे मै समाचार पत्र के भगाने मे लगा था, उसी समय मेरा व्यान नीचे X पढ़ने और मक्खियो दो सौगजके फासले पर जलते अंगारपुंज और एकत्रित जन समूहपर पड़ा। मालूम हुआ शर देवता आया हुआ है, और वहाँ उसकेलिये भोजकी तैयारी हो रही है। मेरे जिज्ञासा करनेपर मेटने कहा मै भोजका नमूना लाये देता हूँ। और वह वहाँ से थाली भरवाकर लाया, जिसमे थे (१) धीमे पका गुड़का हलवा, (२) चूली के तेलमें पकी मोटी पूड़ियाँ (पोले या बिठूरे), (३-४) मक्खन सहित सत्तूका गोला, (२) फाफड़ ( श्रोगले) का चीला । यहाँका भी देवता बुद्ध धर्मको मानता है, इसीलिये शायद मास नही था । चिनी अनेके समय से ही चूलियाँ (छोटी खूवानी) फली देख रहा या, अब तक उन्हें जब तव पोदीने के साथ चटनी के लिये इस्तेमाल करता रहा, किन्तु श्राज पहिली बार यहाँ पकी चूलियाँ खानेको मिली। बहुत मीठी थी, अथवा नव-फल था, इसलिये वैसा मालूम हुआ । अभी गाँव से तीन हजार फीटके करीव नीचे नदीके तटभाग पर चूलिया फल रही थी, क्योंकि वह स्थान अधिक गर्म था । फल और नाज के पकनेका समय क्रमशः नीचेसे ऊपरकी ओर बढ़ता है । अगले दिन (२८ जून ) सवेरे चाय पीकर मैं चल पड़ा, घोड़े /<noinclude></noinclude> g0daeswrmgdwq5ga30o4z8xa803wtai पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१८ 250 195333 666063 2026-07-07T15:50:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666063 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>" २०० किन्नर - देशम और वे गारूके लिये प्रतीक्षा करनेकी जगह कुछ चंक्रमण ही किया जाये । सारी उतराई पारकर रास्तेपर वीरवृक्ष के नीचेके चश्मे के पास बैठ गया । एक स्त्री पेटके दर्द से कराह रही थी, मेरा एड् साल्ट तो वेगारूओं के पास था, और वह अभी जल्दी आनेवाले नहीं थे। सी भेड़ वकरियो के साथ नीचे कई जाड़ो गई थी, इसलिये टूटी फूटी हिन्दी बोल लेती थी । दूर देखा, घोड़ा लिये कोई जल्दी जल्दी आ रहा है, सवार हो नौ वजेसे पहिले ही पंगी पहुँच गया । पगीका पुराना मेट मौजूद था । "घोड़ा नही आदमी नहीं" कह रहा था । श्रव तो ६ मील की बात थी और खड्डमे हल्की चढ़ाई डेढ़मीलसे अधिक नहीं थी । मैं क्यो वह करने नगा । थोड़ी देर विश्राम करनेके बाद चल पड़ा | पगी (कोजंग) गंगामे पहुँचते-पहुँचते देखा, मेट भी घोड़ा पकड़े पहुँच रहा है । अव भी कह रहा था - घोड़ा लौटाने वाला तो नही आया, क्या करूंगा मैं ही चला चलूँगा । किन्तु वहाँ से कोलीको चिनी जाना था, इसलिये मेटको यानेकी जरूरत नही पड़ी। मैं दोपहर होनेसे पहिले ही बंगले पर पहुँच गया । चिट्ठिया और समाचार पत्र तो बराबर मेरे पास पहुँचते रहे, किन्तु मैने पार्सलोको यह रख छोड़नेके लिये कह रखा था । और वह कई थे ! : श्री निवासजीने "मेरी उपलभ्य सारी पुस्तकोऔर मसाले की वीतलके साथ चाय, साबुन, मास-मछली के दिन भेज दिये थे । मासके टिनको खरीदते समय देख भी नहीं लिया क्या है, खैर, यहाँ सर्वभक्षी जो ठहरे इसलिये दोनों टीन अकारथ नही गये । ३०, ३२ पुस्तके ( अपनी ) मगवाकर पछता रहा था, क्योकि यहाके लोगो अर्थात् अध्यापको— मे अव्ययनका कोई शोक न था । मैं उन्हें स्कूल को मुफ्त देना चाहता था, किन्तु पुस्तकदान भी तो वहा देना चाहिये, जहां उसका कोई सदुपयोग हो। इन पुस्तकोको यदि किसीने पढ़ा तो रेंजर पंडित देवदत्त शर्मा और उनकी बहिन तथा पत्ती । रामपुरमे अवश्य पुस्तको प्रमी हैं, किन्तु दस पंद्रह सेरकी पुस्तकोको बतात -<noinclude></noinclude> 0jvd5sc4k1syuf6qzxxflxs29ul562q पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२१९ 250 195334 666064 2026-07-07T15:50:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666064 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिनी वापस २०१ फिर सभालकर रामपुर ले जानेकी समस्या है, जिसे अभी ( २२ जुलाई ) तक मैं हल नहीं कर सका हूँ। श्रीनिवास के अतिरिक्त " कमलेश " जी (पद्मसिंह शर्मा, आगरा) ने भी डेढ़ सेरके करीब मसाला, भेज दिया। मैंने पाव-डेढ़ पावकेलिये लिखा था, और वह समझे होगे,. मै व हिमाचल मे गोड़ तोड़कर जम गया हूँ। ऊपरकी सारी यात्रा मैने बिना घड़ी की, घड़ी बिगड़ गई थी, उसे शिमला कुमारी रजनीके पास भेज दिया था । जव तत्र ख कलाईपर पहुँच जाती थी, और ' फिर कहावत याद ना जाती थी "एक पूतको पूत न कहो......।" लेकिन आदमी घड़ियोकी दूकान भी तो लिये घूम नहीं सकता । हाँ, इन दिनो अानदजी के पास निरतर घड़ीकी जोड़ीको देखकर मुझे उनकी होशियारीकी दाद देनी पड़ रही थी । युगोंसे घड़ी लिये घूमने के वाद सचमुच समयके बारेमें अधेरेमें रहना अच्छा नही मालूम. होता । चिनमे १६ दिन बाद लौटनेपर कोई बहुत परिवर्तन नही मालूम होता था। डाक्टर ठाकुरसिंह ग्रव भी उसी तरह दिनमें प्रसन्नमुख और शामके वाद शरावमे डूबकर गम गलत कर रहे थे । हरे खेतो मेसे कितने ही कट गये थे । हवा चलनेपर भी ग्रव सर्दी नहीं मालूम होती थी । और दिनकी मक्खियों और रातको पिस्सुग्रोके प्रहारसे दिल परेशान हो रहा था। हाँ, अब साग और फल ( खूबानी) से भडार भरपूर रहने लगा, यह भी एक नई बात हुई, किन्तु वस्तुत यदि इस मेवोके देशमे मेवो, और सागो तरकारियांकी बहार लूटनी हो तो यहाँ अगस्त के शुरूसे आकर अक्तूबर तक रहना चाहिये । अपुन कहाँ इतने भाग्यशाली है, अगस्तके शुरू मे ही यहाँसे कूच करना है, और यद्यपि यहाँ श्राये ये सदाकेलिये चिनीको ग्रीष्मनिवास बनाने और लौटते समय विश्वास नहीं, कि चिनीको फिर देखनेका अवसर मिलेगा । - .<noinclude></noinclude> 54duvwkcdye0wczto18gtr7qz41cocw पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२० 250 195335 666065 2026-07-07T15:50:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666065 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-२०२ किन्नर - देशमें १४ फिर चिनी में पहिले सोचा था, जूलाईके अंततक कोटगढ़में अगस्तभर रहा -जाये, इसकेलिये ऊपर जाते समय डाक्टर भगवान सिहको पत्र भी लिख चुका था, और उनकी प्ररेणापर श्रीमती अमीरचदने एक मासकेलिये -अपना बॅगला भी देना स्वीकार कर लिया था । बदलना पड़ा, जिसमें रास्तेकी वर्षा, वहीं करने के 1 किन्तु फिर विचार कामका प्रस्तुत न होना था । और फिर चिनीमे और ठहरकर मैने अपने समयको बर्बाद भी नहीं किया । वोलके लिखाने से मन थोड़ा आलसी हो गया था । मैने उसे साम-दाम-दंड- विभेदसे काम करकेलिये तैयार किया, और उसका फल है यह " किन्नर देशमे" । इसका श्रेय सत्यार्थीजीको भी न देना कृतघ्नता होगी। उनके पास यात्राकी प्रथम मंजिल ऊपर जानेसे पहिलेही भेज दी थी, लौटनेपर उनका तार मिला, देखकर हॅसी आई। शिमलासे १३६ मील दूर इस जगहकेलिये शिमला मे तार भेजने से क्या लाभ ? समझा होगा, चिनी शिमला के आसपास ही कोई जगह होगी। उनके श्राग्रहको मैने स्वीकार कर दिमागमे पकते किन्नर इतिहासपर सिंहावलोकन कर डाला । लिखनेमे ही इतनी कठिनाई हो, तो उसकी कापी कौन रखे । लेख भेजे तीसरा सप्ताह बीत रहा है, किन्तु अभी न डाकघरने रसीद भेजी और न सत्यार्थी ही ने, डाकघरोने तो अव लौटती रसीदका भेजना अनावश्यक मान लिया है, मैं समझता हूँ, श्रौरीका भी अनुभव ऐसा ही होगा, किन्तु सत्यार्थीजीने भी लेख नहीं पाया क्या ? अथवा दो एक दूसरे लेखोकी भाँति यह भी मृत्यु भवनकी सैर करने गया ( पीछे प्राप्ति पत्र मिल गया), सत्यार्थीजी के लिये तो खत लिखते समय मानने कहा, फिर किन्नरपर एक छोटी सी पुस्तक ही क्यो न लिख दी जाये, यात्रा<noinclude></noinclude> 1ns6ivtig7jk21bb91tyijdxtagp6aa पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२१ 250 195336 666066 2026-07-07T15:50:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666066 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>फिर चिनी में २०३ सफल और सुफल हो जायेगी। मनके मुॅहसे वस वात निकल जानेकी देर थी, जीभ पकड़ ली गई, और रविवार छोड़ प्रतिदिन सोलह पृष्ठ लिखनेका व्रत बँध गया । चिनी लौटकर देखना श्रावश्यक था, कि मूत्रमें चीनी है या नहीं | दो बार परीक्षा करनेपर भी प्रभाव निकला | क्या सचमुच मूजी डायावीटिस् भाग गया ? फूलकर कुप्पा होनेका मन नहीं करता । वैसे शरीरका परिवर्तन स्वास्थ्यकी ओर मालूम होता है। हेडमास्टर साहेव ( पंडित दौलतरामजी ) ने दो मास बाद देखा, तो उन्होने भी स्वास्थ्य सुधारका साक्ष्य दिया। हाँ, पाचन शक्ति अवश्य प्रति कोमल हो गई है, यदि “भोजने मात्रज्ञता" सूत्रकी जौ भर भी वहेलना होती है, तो पेट हड़ताल करनेकी धमकी देने लगता है । हा, चिनी लौटकर एक और परिवर्तन देखनेमें श्राया और वह परके दर | चूहो डरके मारे पुण्यसागर बालू और प्याजको आलमारीके भीतर बंद करके गये थे, आने पर उनकी खेती लहलहा रही थी, चालू सारे पोन पौन वित्त तक अकुरित हो गये, व्याजमें कुछ ही सती साधी निकलीं । त्रालुोकी तरकारी बनाते भी सवाल हुआ, इन सारे प्रकुरित यात्रांका क्या किया जाये, दस सेरसे अधिक ही थे। सोच रहे थे, कही दु स्वादु न हो जायें, इसलिये उनमें से कुछको लेकर ग्राधी क्यारी वो दी पुण्यसागर आश्चर्य करने लगे - क्या यहाँ खानेकेलिये बैठगे १ मैने कहा -सारा काम अपनेही खानेकेलिये मनुष्य नही करता; जैसे हम दूसरोंके कामसे लाभ उठाते हैं, वैसे ही हमारे कामसे यदि दूसरे लाभ उठायें, तो क्या हरज ? प्याजकी हमने पाँच ही सात गाँठे वो दी। वीज बँधने की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं, जैसेही पत्तियाँ चार- पाच गुलकी होती हैं, पण्यनागर उन्हें नाचकर चटनीमें डाल देते है । पहिले चटनीमे चूलीहीका प्रवेश था, ग्रवं सेव भी शामिल हो गया है - हॉ, अभी सेव कच्चा ही है, यद्यपि उसकी लाली और<noinclude></noinclude> bgwv4j37hpbp5xld4w4djacq46szach पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२२ 250 195337 666067 2026-07-07T15:50:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666067 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशम शोख हो गई है । यहाँ ग्रानेसे पहिले रामपुरमं ही पता लग गया. कि कनौरमे मधु खूब होती है, और मधुसे चीनी महंगी होनेके कारण मिलनेका डर नही । मधु डायवेटिस्मे हानिकारक नहीं, यह भी फतवा रामपुरमे मिल चुका था, इसलिये मैने यहाँ आते ही मधु भक्षण और मधु सचयमे तत्परता दिखलानी लुरू की। चंद ही दिनोमे मालूम हो गया, सफेद मधु नहीं मिल सकती । उसकी ऋतु नहीं, लाल मिल सकती है। “उपवास करन्ते सत्त " मानकर उसीका संचय शुरू कियी हफ्ते-दो हफ्तेमे तीन सेर जमा हो गया । इधर मधु भक्षणसे अब ऊब गया । उत्तरापथसे लौटनेपर मधुकी समस्या सामने श्राई, क्या इसे समेटकर साथ ले चलना होगा । दिमागपर समस्याका हथौड़ा पड़ता है, तो बात सूझ ही जाती है। सुना, श्रोगले (फाफड़े के आटेका चीला (चिल्टा) बहुत अच्छा बनता है, और खमीरके विना तुरंत घोला, तवेपर रखा, फिर उतारकर खाते गये। नमकीन चीलोसे मीठे चीलोके प्रति मेरा पहिलेहीसे पक्षपात था, और उसमें रहते समय यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई, कि वहाँ मीठे चीलोका बोलबाला है । सतजुगमे रूसियोको चीनी और गुड़का क्या पता था ? चुकदरकी चीनी तो सौ डेढ़ सौ वर्षकी चीज है, जो रूसमे और पीछे शुरू हुई। तो पहिले वहाँ चीले कैसे खाये जाते थे ? चीलेही क्यों हरएक मीठे भक्ष्यकेलिये वहाँ मधुका उपयोग होता था - " मधुवाता ऋतायते मधुक्षरीत सिंधवः । " की ही कामना थी। मैने पुण्यसागरसे कहा-- मधु समस्या हल हो गई।" उन्होने चकित होकर पूछा - " कैसे " । मैने कहा— डटकर रोज शामको मधुमिश्रित चीले बनाते जा । परिमाण यह हुआ कि प्रस्थान के १३ दिन रहते ही मधुस्रोत सूख जायेगा । ', कमते चिनीमें परिचय तो बहुतों से हुआ, किन्तु धनिष्ठता बहुत बढ़ी, दीप दोनो श्रोरसे हो सकता है। सबसे नजदीक के तो हूँ डाक्टर<noinclude></noinclude> pty1vx34jhaakzogdc9yn86y5bv0jl3 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२३ 250 195338 666068 2026-07-07T15:51:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666068 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिनीमे २०१ और वस्तुतः कर रहे हैं। उनके दो रूप हैं ठाकुर सिंह । ठाकुरसिह कुशल कम्बोडर हैं, लोगोने उन्हें आनरेरी डाक्टरकी उपाधि दे रखी है, वह कई सालो से उसी पदसे काम भी जबसे चिनीका अस्पताल डाक्टर विरहित हुआ। एक सूर्योदय के बाद दूसरा सूर्योदय से पूर्व । शामको नित्य नियमसे वह सुरा देवीका सेवन करते हैं, यद्यपि कभी कभी जीभ वेकाबू हो जाती है, किन्तु हाथ-पैर को बेकाबू होते मैने नही देखा ! जीभ वेकाबू होनेपर भी वह धर्म और सुराके गुण गानपर लग जाती है। उनका विचार है कि ऋषि महर्षि जिस सोम-रसका पान करते थे, वह तुरा ही है । ठाकुरसिंह सुराचे अनन्य भक्त होते भी दर्जन साल से ऊपर हो गये, जबसे उन्होंने मासको नहीं छुा । ठाकुरसिंहके हमूपियाले हमनवाले कई है, जिनमे धर्मानन्द (चिनी) से थोड़ा बहुत मेरा भी परिचय हो गया है और हमारी बातचीत अधिकतर दोपहर के आस-पास होती रही है, जब कि वह प्रकृतिरथ रहते हैं । उमर साठसे ऊपरकी होगी, पहिले ' नील लिपिक थे, अब पेंशन पाते हैं। कहते थे- मैं कभी-कभी जब कोई मित्र आग्रह कर देता है, तो पी लेता हूँ । मैने कहा- मात्राले क्यों नहीं पीते ? बोले – “उस समय हाथ रोकना मुश्किल हो जाता है ।" और हाथ न रोकनेका फल दो तीन दिन पहिले देखने में श्राया । किसी दोस्त के यहाँ पान-गोष्टी करके या रहे थे, ऊँची नीची जनमे पैरोने जबाव दे दिया, गिर पड़े, कनपटी पत्थर से टकराई, खून बहने लगा । खैरियत हुई, यातायातके रास्तेपर गिरे और किसकी नजर पड़ गई । टाकुरसिंह और दोस्तों को लेकर पहुँचे । उठा लाये, कुछ उपचार करनेके बाद होश हुआ । पुण्यसागर पूछ रहे थे किमी पुस्तकका नाम बतलावे जिसमें मद्यके दोप लिखे हों । मैंने कहा - किताबे मिल सकती हैं, लेकिन कितावो और उपदेशाने लोगांते शराब नही छुड़ाई है। यहाँ किन्नर में हर महीने हर गाँवमें - - पानके लिए कटार ड लोगोको मिलते रहते हैं -- शिर फूटते<noinclude></noinclude> eyijjvedxyt79ornivoxp0mhz6zu9xe पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२४ 250 195339 666069 2026-07-07T15:51:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666069 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०६ किन्नर देशम हैं, लोग मरणासन्न हो जाते हैं। इससे बढ़कर कोई क्या उपदेश देगा ११ पंडित देवदत्त शर्मा ( अमृतसरी ) तण रेजर मुझसे एक माम पूर्व अपनी नवविवाहिता पत्नी और वहिनके साथ यहाँ पहुँचे । देहरादून कालेजसे ग्राये बहुत समय नही हुआ । मेहनती हैं और कठिन पर्वतोंको छाननेमें यहाँ वालोसे जरा भी पीछे रहनेवाले नही । कर्त्तव्य के पाबन्द और अपने निम्न कर्मचारियोको भी पाबन्द रखना चाहते हैं, डर है कही यह मॅहगा सौदा न हो जाये। विशेषकर वन- रक्षको, वनकोको अनुचित पैसा लेने से रोकना । पंजाब के हिन्दुस्रोने हिन्दी का पठन-पाठन अपनी सम्-वहिनों को सौंपकर छुट्टी ले ली, किन्तु अब पूर्वी पंजाव सरकारने हिन्दी, गुरुमुखीको राजभाषा बना दिया । औरोंकी भाँति शर्माजी भी मजबूर हुये, कि हिन्दी पढ़े । महीने दो महीने में सरकार परीक्षा लेने जा रही है। किन्तु उन्होंने काफी उन्नति कर ली है। उनकी बहिन और पत्नी तो मेरी मँगाई पुस्तको का खुलकर उपयोग करती हैं । शर्माजीको भी आदत लग गई और उन्हें नगद लाभ भी मिल रहा है । शर्माजी है बड़े मिलनसार, या हम दोनोंको यहाँ आपसमें मिलने से मिलनसारीका प्रमाण-पत्र नहीं दिया जा सकता, इस झारखंड मे एक तरहके संस्कृत तथा शिक्षा के तलवाल मिल भी नहीं सकते । वैसे शर्माजी कभी कभी भी ग्रा जाते हैं, और " किन्नर देश मे से कोई अश सुनते भी हैं। मैं रविवार की छुट्टीकी शानको उनके घरका रास्ता ले लेता हूँ । मुझे उनकी बहिन और पत्नी पर तरस आता है । कहाँसे इस जंगलमें पहुँच गईं, जहाँ पर्दा न रखने पर भी कहीं आने-जाने मिलने-जुलने का अवसर नहीं, चूल्हामात्रका अध्ययन करो, या पुस्तक मिल गई तो उसके पन्ने उलटो । I नेगी ठाकुरसेनके भतीजे तरुण वलवन्तसिंह यहाँकी एक मात्र दूकान के सचालक हैं । मेरे यहाँ पहुँचने के दिनसे ही उन्होने हर तरह से मेरी सहायता करनेका प्रयत्न किया और दुर्लभ सी भी खाग-<noinclude></noinclude> 1dhf0llzt3nfs8pqc5jt8vlood8vptk पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२५ 250 195340 666070 2026-07-07T15:51:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666070 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>फिर चिनीमे २०७ सामग्री प्रस्तुत की । उनमें दोप यही है, कि यहाँके दूसरे शिक्षितोकी भाँति मेट्रिक पासकर उन्होने पस्तकोसे बैर कर लिया । स्कूल के मास्टर वाचू बिहारीलाल बाबू रामजीदास, बाबू नारायण- सिंह, बाबू प्रिय भारत सभी सजन हैं, जहाँतक मेरा सवध है, किन्तु जिज्ञासा और पुस्तक प्रम किसे कहते हैं, इसे न जाननेमें हरएक एक दूसरेका कान काटता है । इसका यह अर्थ नही, किन्नरकी मिट्टी में हो ऐसी कोई तासीर है। मैने युक्त प्रान्त और विहारके अध्यापकोमे भी ऐसा बहुत देखा है । १६४३मे हम निजामाबाद (आजमगढ़) के मिडिल स्कूल मे गये, उभी स्कूलमे जहाँ से मैने मिडिल पास किया था । मेरे साथ नागार्जुनजी थे, उन्होंने अपने किसी प्रसगमें हेडमास्टरसे राहुल साकृत्यायन के बारेमे पूछ दिया । वह क्या जवाब देते, उन्होने यह नाम कभी नही सुना था । नागार्जुनजीको अचरज हुआ, मुझे अचरज नही हुआ, निर्फ यह मालूम हुआ कि १९०६ से १६४३ के बीच कोई परिवर्तन नही हुत्रा, जहाँ तक इन ग्रामीण स्कूलोकाः सबध है। किन्तु अब मतदाताचोकी सूची तैयार हो रही है। अब सतलज- उसी चालसे नहीं चलती रहेगी, जैसे सहस्राब्दियोसे चलती रही । पटवारी रेल से सैकड़ों मील दूर दुर्गम हिमाचलके गॉवोमें घूमकर नाम लिख रहे हैं। लोग चकित हैं, किसी अज्ञात अनिष्टकी सभावना देख रहे है---क्यो २१ साल से अधिक के पुरुपोका नाम लिख - रहे हैं ? लड़ाई पर भेजेंगे क्या ? किन्तु साठ सालके बूढ़ोंका नाम क्यों. लिख रहे है ? और २१ नाल से ज्यादाकी स्त्रियोका नाम क्यो लिखा जा रहा ? क्यों, उन्हें पकड पकड़कर नीचे तो नहीं ले जायेंगे ? क्या जाने कहीं लियोका अकाल पड़ा हो ? दाम भी देगे या मुफ्त ही ? " ग्राजकल व माँ बाप पहिलेकी भाँति वीस-तीसपर लडकीका बौदा नहीं करते।" खान्दानी घरको लडकी दो तीन सौसे कम नहीं मिलती। वैसे तो कभी बिना पैसेकी चली श्राती है"- -<noinclude></noinclude> p752w3bbld8ybqsmcyool7h0i1l4dbu पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२६ 250 195341 666071 2026-07-07T15:51:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666071 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रान धर्मानंद ने कहा था। लेकिन यदि स्त्रियोको बाहर ले जाना है, तो तरणियोका काम होगा, सत्तरी- बहत्तरी बूढियोंके नाम लिखनेका श्रर्थ क्या ? श्राज ( २२ जुलाई ) एक वृद्वने दो घंटे सिर खपाया । उसे समझाया - राजा गया, अंग्रेज गये, पंचायती राज्य कायम हुआ, किन्तु नौकरोके राज्यको पंचायती राज्य नहीं कहा जा सकता । पचायती राज्य के पचको २१ वर्षसे अधिक वाले सारे नरनारी . • चुनेंगे, इसीलिये यह लिखाई हो रही है । दुहरातेहराकर कहने पर बूढेको बात समझमें ग्राई और अच्छी तरह । + + + + तक जौ, गेहूँ, मटर वर्षा यहाँ कम होती है, किन्तु कुछ ता होतो है, और उसीके भरोसे भी लोगोकी खेती होती है। वादल तो जून समाप्त होनेके दिन भी कुछ तैरतेसे दिखलाई पड़े और "वृथा वर्षा नमुद्र घु" के अनुसार कभी-कभी सामनेकी कैलाश श्र ेणीकी चोटियो ( रल्डङ्, जेपड्रड्, हा- रङ) पर वरस भी जाते, किन्तु उसकी श्रावश्यकता तो खेतीको होती है, जहाँ फाफड और अगला सूख रहे हैं। खानकर कडे ( पवतके ऊपरी भाग ) की खेती तो मेघदेवताके भरोसे ही होती है, क्योंकि वहाँ कूलोंका पानी नही पहुँच सकता । वैसे जूनके कट चुके थे । मद्रासके चावलोकी भाति जान पड़ता है, उनकी कोई ऋतु नहीं होगी - जाड़ोको छोड़कर, क्योंकि अगस्त के श्रारम्भमें भी कही कहीं गेहूँ, जौ खड़े थे । फमलोमें वैसी अनहोनी चीज नक्की मी दिखाई पड़ी, किन्तु सिर्फ एक खेत में। कहते हैं जाड़ाके पड़ने तक मुश्किलहीसे वह पक पाती है, किन्तु हाला तो खाया जा सकता है । ग्राज ( ३१ जुलाई) को मोटी वालोंको देखकर मुँहमें पानी भर चाया। अभी भुट्टो खानेलायक दो सप्ताह बाद होगे । यह सुनने में आश्चर्य की बात होगी, कि कनौरमें कुछ ही साल पहिले तक चालू सिर्फ घरोके पासही थोड़ा-थोड़ा बोया जाता था । दूरके खेतो में चोरका<noinclude></noinclude> i1zc6adpj1s7i8mrhv86adorl53d7vg पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२७ 250 195342 666072 2026-07-07T15:51:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666072 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>4 फिर चिनीमे २०६ डर था, इमलिये लोग नहीं वोना चाहते थे। अब वह बात हट गई है, और कोपर भी गावोंसे दूर आलूके खेत लहलहाते हैं । चालू जैसी सर्वव्यापक फसल कौन है ? और ब्रह्म जिस तरह नरक छोड़ मव जगह बतलाया जाता है, उसी तरह यह नीचे पानी जमा रहनेवाली भूमिको छोड़ सभी जगह होता है। कोई फसल उसे मात नही कनौर यात्रियो को आलू के लिये आधे कर सकती, पैदावारकी दरमें तो दुनियामें अफसोस यही है कि याजके अगस्त तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, चिनमे रहनेपर तो दो सप्ताह और शायद, सैर सपाटा करने- वाले यात्री जब इधर अधिक आने लगेंगे, तौ जूनमे तैयार होनेवाले श्रालू गोभी भी वोये जायेंगे । फलको दो चार सप्ताह पहिले तैयार करना अब कौन मुश्किल बात है ? सज्जनसे वात हो रही थी। वह कह रहे थे, बड़े-बड़े हैं और पानी भी काफी ( २५ इच कोशिश करनेपर भी धान नहीं होता, वाले फूट श्रभी वस्पा उपत्यकाके एक - ) हमारे यहाँ खेत भो बरसता है, लेकिन श्राती है, किन्तु दाना ना पडता । मैने कहा - इसका अर्थ हे दाना पड़नेके समय तक तापमान गिर जाता है, और गर्म के अनावसे वाल चूड़ी रह जाती है, रानिक ढग संस्कृत ( उष्णीकृत ) वीज तो अभी हमारे कृषि कालिज में पढ़ने की चीज है, किन्तु श्राप एक काम कर सकते हैं, कमसे कम परीक्षार्थ । लकड़ीकी द्रोणी में मिट्टी पानी डालकर मई मे ही वीज वा दे, धानका वीजन बहुत घना बोया जाता है । दिनमे प्राणीको उठाकर धूपमें रख 2 नीर | पौधा दिन सूर्य के दीजिये और रातको चूदेवाले घर के प्रकाशमें ही वायुमडलसे भोजन ग्रहण करता है, रातको बाहर उसे कोई लेना देना नहीं। जून में वीजनको किने शेप दीजिये 1 देखिये तो वह बड़े प्रसन्न हुये, और कहने लगे इन नूलीको इसी तरह लगाया करते है । मैने कहा --- देहरादून ( यदपुर ) की बागमती से दूसरे नवरपर रामजवाइन धानपर परीक्षा कीजिये, नदि नफलना हुई, तो बहुत अच्छी श्रेणीका चावल<noinclude></noinclude> 7ygpgixuch6juegqwrkd60puikqkcmy पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२८ 250 195343 666073 2026-07-07T15:51:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666073 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१०. किन्नर - देश मे होगा और बड़ी मटर ( कलाय ) की भाति इसकी भी शिमले तक मॉग होगी । ४ जुलाईको जब कुछ फुहार सौ ग्राई, तो कनौरी किसानोकर दिल हरा हो गया और यहाँ के देवता भी अपनी करामात घोषित करनेकी सोचने लगे, किन्तु कनोरी देवता कच्चे गोइयों नहीं हैं। वह जो कुछ बोलते हैं, संध्या-भाषा मे बोलते हैं, जिसमें शब्दोंके दो दो नहीं चार-चार अर्थ हो सकें। श्राखिर भारी प्रतीक्षा के बाद ६ जुलाई को . हुई, लेकिन (ओरी चूने भर नहीं सिर्फ धरतीका ओठ भिगोने भर ) ओरी नहीं चूई, क्योंकि यहाँ की छते साधारणत या व्रजकोसलकी भाँति कच्ची मिट्टीकी होती हैं । किन्तु इतनी वर्षासे यहाकी भूमिका क्या होता है ? दूसरे दिन क्या उसी शामको सड़कपर धूल दिखाई पड़ी। मेघोंको लुभाकर लोगोका दिल दुखाने में भी मजा आता है । और यहाँ मेरे वासस्थानसे जिस तरह वह सतलजकी धारके ऊपर ऊपर तैरते जारहे थे, और जिस तरह सफेद बादलांके वीचसे सूर्य किरण प्रतिबिंबित हिमाच्छादित शिखर झांक रहे थे, उन्हे देखने और वर्णन करने के लिये तो किसी कविके नेत्र और हृदयकी आवश्यकता थी, किन्तु वहभी यहाँके कृषकोकी त्राहि त्राहि अपनी सरस्वतीको मुखरित कर सकता, इसमें संदेह है । और यहाँ वंगलेके जंगले से सप्तरश्मिरंजित हिमशिखरोको देखनेकी कहाँ फुर्सत थी । भक्खिया एक श्रोरसे आक्रमण कररही थीं, और श्वेत पक्षधारी क्षुद्रमच्छर दूसरी ओरसे अपनी पैनी सूइया चुभा रहे थे । हिमालय के ये क्षुद्रमच्छर सचमुचही आदमीको विहल कर देते हैं, किन्तु आदमीको एक वातसे संतोष होता है, इनमे बुद्धि बहुत कम होती है, और सूई चुभाकर वही ग्रासन जमा लेते हैं, जिससे यदि कलमकी चाल मद होनेका भय न हो, तो अपने सताने वालेको आप आसानी से यमलोक पहुँचा सकते हैं । इन रक्तचूमक कोटोंमें सबसे बुरे हैं पिस्सू, जो कटते भी हैं बहुत जोर से जान पड़त<noinclude></noinclude> 06skr0kx247u7zlamtemy27do14vlst पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२२९ 250 195344 666074 2026-07-07T15:52:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666074 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>3 5 फिर चिनीमें २११ है किसीने चिंगारी लगा दी, और हाथ भी नहीं आते, : हाथके उस जगह पहुँचते पहुँचते नौ दो ग्यारह, मच्छर, मक्खीसे चादर श्रोढ़कर आप अपने को बचा सकते हैं, खटमल से भी थोड़ा बहुत बचाव हो सकता है, किन्तु पिस्तुओं से बचने का कोई उपाय नहीं। किसीने तो खटमल को ही हिन्दुओंकी त्रिमूर्तिको परास्त करनेवाला बतलाते हुये कहा - - क्षीराब्धौ हरिः शेते हरः शेते हिमालये । ब्रह्मा च पकजे शेते, मन्ये मत्कुण शकया | किन्तु मैं समझता हूँ, वह त्रिमूर्ति विजेता मत्कुण (खटमल) नही पिस्सू हैं । आज वह अपराजेय नही है, किन्तु उसके लिये घरको वरा- वर धोते साफ करते रहना पड़ेगा फिर भी अपने परिधानोंमें सैकड़ों पिस्सू लेकर घूमने वाले मेहमानोको घरमें आनेसे आप कैसे रोक सकते हैं ? . मैं से अपनेका निश्चित समझे बैठा था, क्योकि हर रविवार तीनवार साबुन लगाकर गर्म जल से नहाना, और कपड़ों को साबुन धुलवा डालना उनसे रक्षा पानेके लिये पर्याप्त समझता था । किन्तु एक दिन एक श्वेताग जू को पिस्सू समझ कर पकड़ ही लिया। कितने भाई करेंगे, रोज रोज नहा लेते । रोज नहाना कठिन नही, ईधनकी कमी नहीं, पुण्यसागरजीका जल गर्म करनेमें श्रालस्य नही, और पादरी बोस्कीने अपने बॅगलेमें एक छोटा स्नानकोष्टक भी बना छोड़ा है । किन्तु यहाँ के तापमान में रोज-रोज नहाना समयका अपव्यय हा नहीं वेकार भी मालूम होता है। सूर्य भगवान के दिनको तीनवार साबुन लगाकर गर्म जलसे स्नान करनेपर सात दिन तक तो शीवर मैलकी वह जमनेका डर नहीं, और बिना साबुन नहाने- का में पक्षपाती नहीं हूँ । यदि कोई रोज रोज नहानेकी सार्थकता के लिये नानुन न लगाये, तो मुझे उसकी बुद्धिमानी पर सदेह होगा । हों, पुण्य कमानेवालोकी वात में नहीं करता । अपना तो शास्त्र है-गर्म-<noinclude></noinclude> 4d4d3ftxd5upoxj9nvvkkof4if9lmq2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३० 250 195345 666075 2026-07-07T15:52:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666075 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१२ किन्नर - देशमें मुल्क में रोज-रोज नहाना, हो सके तो तैरनेके लिये नदी मिलनेपर गर्मी मे दो बार भी नहाना, किन्तु हिमाचल जैसे बर्फानी देशमें नहानेका यह श्राग्रह, जहाँ धर्मराज युधिष्ठिरके राजसूयके प्रधान त्विज धौम्य ?) भी वर्षो नहानेका नाम नहीं लेते थे, और जिनके बालों, देह और कपड़ोंकी असह्य गदगीको देखकर एकवार युधिष्ठिरदूत भ्रममें पड गया था, अपनी आँखों या युधिष्ठिरकी बुद्धिपर | वैसे नित्य नहानेवाले- को मैं पापका भागी नहीं बनाता । अड़तीस माल पहिले केदारनाथने वावा धर्मदासने जो शिक्षा दी थी " वच्चा ! यहाँ रोज स्नान करनेकी आवश्यकता नहीं, कैलाशकी हवा स्नान करनेका काम देती है । " अपने रामने तो उसे इतनी कड़ी से बांधा, कि आज भी वह मानते नही उतरती । हाँ, तो वह कहाँ से आई ? पता लगा, कपड़ा धोनेवाले सजनके पास उसकी कमी नहीं । तम वर्षाकी प्यास तो जाकर २० जुलाईको बुझी । पहली रात और सारे दिन, फिर दूसरी रात भी वर्षा होती रही और श्रोरीचुवान । पहले दिन तो हमने वर्पासे टहलने का व्रत तोड़ दिया। शिमला छोड़नेके बादसे ही यह व्रत ले लिया है, कि रोज पाँच मील पैदल चला जाये, आदमी ठोकर खाकर सीखता है, यद्यपि उसमें बुद्धिमानी नहीं है । आज जैसे जीवन के लिए कुछ शारीरिक श्रमकी अनिवार्यता का तु भव हो रहा है, यदि कही एक साल पहिले उसे समझा होता, तो stafat are व्याधिसे पाला न पड़ता । " बुद्धिजीवियो | साव- धान, शरीर चलाना बेकार काम नहीं है ।" हों, तो वर्षा जब दूसरे दिन भी होती देखी, तो व्रतका स्थगित रखना पसंद नहीं किया, और वर- साती पहिने पुण्यसागर के साथ टहलने निकल पड़े। पीछे तो देखा, वर्षा बरावर व्रत तोड़ना चाहती है, किन्तु यहाँ विश्वामित्रका ती त या नहीं। और अव ( ३१ जुलाईको ) तो वर्षांसे यहाँके किसान भी ऊब गये हैं, यद्यपि बंद करानेके लिये वह अपने देवताओको मेघ देवता<noinclude></noinclude> g12yz2l6p77kl0d1ga2yhoopu472r2c पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३१ 250 195346 666076 2026-07-07T15:52:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666076 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>· फिर विभीमें २१३. लिये न के पास भेजने के लिए तैयार नहीं - क्या जाने वर्षा महीनो के रुक जाये | किसानोकी मेत्र देवताके विरुद्ध शिकायत बजा है, यह तो मै एक तटस्थ व्यक्तिके तौर पर कह सकता हूँ। यह चूलियों (वानियो) के पकनेका समय है और चूलियों कनौरवालो के लिए सब कुछ हैं । जूनके अन्तसे पकने लगती है, और पहाड़की ऊचाईके अनुसार अगस्त के प्रारम्भ तक पकती चली जाती है। उनका सुनहला और किसी - किसीका सेदुरिया रंग देखनेमें बहुत सुन्दर और खाने में भी मधुर - खासकर फसल के पहिले हफ्ते में --- मालूम होता है। फसलके समय लोग डटकर खाते हैं, पथिकोंको पाथेय लेजानेकी श्रावश्यकता नहीं है भी बहुत लोगोने यद्यपि हालकी गिनती में ८६,६०० वृक्ष चूली के लिखाये, लेकिन सभीने कम कम करके अपने वृक्षोको बताया । डरने लगे, कहीं टैक्स बढ़ानेका तो यह डौल नहीं । बुशहर में तो नहीं किन्तु दूसरी पहाड़ी रियासतों में वृक्षोंको गिनकर लिखा जाता रहा है, फिर वृक्षोकी गिनती में सदेह होना वाजिब ही ठहरा। फलदार वृक्षोंकी गिनती मैने तहसीलदार साहेबसे कह कर करवाई, जिसमें वृक्षोकी संख्या देखकर सरकार प्रभावित हो और फलोत्पादनकी वृद्धिकेलिये. ' वड़ा और तेज कदम उठाये। लोगोने वृक्षोंकी संख्या आधी करके. पतलाई, तो भी देखिये उन वृलोकी संख्या कितनी है, जिनके फलोको खरीदने के लिये हमें हर नाल पाकिस्तानको हजारों गॉठे कपड़े और लाखों मन चीनी यादि देना पड़ेगा । चिनी तहसीलमें उनकी संख्या है- अगूर सेव नासपाती श्राडू 6,538 १०,१८५ १,२५७ २,६३२ चालूचा खूबानी बादाम पिस्ता अखरोट ७,०७२ ७३६ ४५१ ११ ११,६२६ 1 यह तो वह फल हैं, जो नचारतक मोटर यानेकी प्रतीक्षा कर रहे है, जा नड़क तैयार होते ही हमारे नगरों में पट जायँगे। यहीं नहीं<noinclude></noinclude> sqa2ygbl5vsfx17vjmuosudet536uo2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३२ 250 195347 666077 2026-07-07T15:52:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666077 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1 २१४ किन्नर - देश में सड़क बनते ही दस सालके भीतर वृक्षोकी संख्या दस गुनी हो जायेगी । श्राज इन फलोंकी फसल के समय कोई कदर नहीं । मेरे टहलनेके रास्तेपर कभी किसीने एक दूकान बनाई, और वृक्षांक साथ कुछ सेवके वृक्ष लगा दिये, अच्छी जाति के बड़े बड़े सेव । किन्तु श्राज सेबों की कोई खोज-खबर लेने वाला नहीं। दस मनसे क्या कम सेव होते, किन्तु लड़कोने पहिले तो नीचेकी डालियां को साफ कर दिया, इनकी हमारे नगरोंको वडी श्रावश्यकता है, और जिनकी यह कदर है । इनके अतिरिक्त दूसरे फल हैं-चूली (८६,६०० ), बेमी ( १५, १२६), वेमर (६५२), पालू ( १२,६६७), और बरजाई (५१२) । वेमी (छोटा) आडू है; जिनके कारण कनौर वालोंको अपने अंगूर नीचे भेजनेमे जरा भी पछतावा नहीं होगा । मीका शराब शुरू हुये अभी थोड़ा ही समय हुआ है । किन्तु श्रभीसे पंगी ब्रह्मचारी जैसोंने प्रोपेगंडा शुरू कर दिया है "अंगूरी शराज, इसके सामने कुछ भी नहीं ।" मै कह रहा था चूलीकी बात, जिसकी नस्ली संख्या दो लाख से • कम नहीं होगी, अर्थात् प्रत्येक किन्नरपर पाँच पाँच पेड़ और चूली फलनेमें बड़ी बेशरम है, बेमी भी उससे मात है । प्रति वृक्ष ७-८ मन फलसे क्या कम होता होगा १ चूली फलते ही चटनीका काम देती है, जिसके लिये किन्नरोको कोई प्रेम नही । किन्तु हमारे सैलानी उतने रसिक नहीं हो सकते । पकने के समय तो " त्वमेव माता च पिता" है ही, फिर सुखा कर वह साल भर लोगोका पोषण करती है। सूखी चूलीकी लपसी मिल सके तो थोड़ा श्राटा मिलाकर, किन्नर के अधिकाr feast श्राहार है। यह वर्षा उसी चूली पर हाथ साफ कर रही है। छते सुनहली चूलियों से, वसंती बनी हैं, कितने ही खेतोंकों भी उन्होने सुनहला कर रखा है। जूलाई मासका यह एक सुंदर दृश्य है, जो दर्शकका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किये बिना नहीं रहेगा । किन्तु यह वर्षा सारा गुड़ गोवर कर रही है। चूलिया '<noinclude></noinclude> odq71234xpixmd8k7pin77g32f5zv6l पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३३ 250 195348 666079 2026-07-07T15:52:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666079 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>फिर चिनी में २१ सूख नहीं पा रही हैं, कुछ दिन और ऐसा ही रहा, तो वह सूर्य किरणोंसे वचित हो सड़ जायेंगी । फिर साल भरकी जीविका ९ यह है लोगोंके मनमें भारी चिन्ताका कारण । श्रादमीने अल्पवृष्टि वाले शुष्क प्रदेशमें अपना निवास बनाया, वहाँकी कितनी ही सुविधाओंको अपनी सुविधामें परिणत कर दिया । अव जव उसमें व्यतिक्रम होने लगता है, तो उसका सारा जीविकार्जनका ढाँचा टूटने लगता है । हे मेघ देवता ! यदि तुम्हारेमे जरा भी हृदय है, तो अपने बालगोपालों- की रक्षा करो। X X x ग्राजकल ब्लेडके जमाने में हजामत कोई समस्या नहीं, तो भी छठे माहे नाईका मुँह देखना ही पड़ता है । जहाँतक मुहके वालोंका संबंध है, वह तो वीसों सालोसे अपने ही हाथो बनते हैं । जबसे सुना कि त बुरा भयंकर बीमारियोका एक शरीरसे दूसरे शरीरमे इंजेक्शन देता रहता है, तबसे और जी घबराता है । इन पहाड़ों और भी भय के कारण हैं। मैं देख रहा था पुण्यसागर और उनके दोस्त मुफ्तकी तनखाह लेनेवाले माली - जहाँ तक इस अभागे बागका सवध है -- कमलानंदकी दाढ़ी हर दसवें पन्द्रहवे साफ हो जाती है। हजाम जरूर कोई था । मैने व्यापकी छोड़ दूकानदारी पर जुटे तरुण नेगी बलवत सिंहसे पूछा । उन्होने कहा - हजामत ! हमारे हेडमास्टर साहेव बहुत अच्छी बनाते हैं । मैने कहा - यदि कष्ट न हो तो रविवारकेलिये कहना । पहिलेसे तै नही करा लिया था, किन्तु सावधानता विचारसे उस दिन पुण्यसागर से याज स्नान मध्मादमे होगा। बिना स्नान-पूजा किये करने का कभी व्रत था । किन्तु अब तो "निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतः को विधिःको निषेध ", शंकराचार्य थारा बेट्टा जीवे, बड़े मौकेपर जम आते हो । टहल कर आये तो मास्टर विहारीलाल बॅगलेपर कह दिया- अन्न न ग्रहण<noinclude></noinclude> 3g1qylzvq33ksjuesxgyjuvv3bavsl5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३४ 250 195349 666080 2026-07-07T15:53:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666080 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१६ किन्नर - देशम मौजूद और सारे हथियारोके साथ लैस । छूतका भी डर नहीं। हेडमास्टर साहेब हजामतका व्यवसाय नहीं करते, कि उनका छूग हर किसी के सिरपर घूमता रहे। जहाँ उसका जरा भी संदेह रहता है, मैं कैंचीका काम रखता हूँ । मास्टर साहेवने मशीन से बाल काटा। मैने पूछा- शान घरानेकेलिये क्या करते हैं ? कहा- ऐसे तो उसकी महीनों नही वर्षों श्रावश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि मैं अपने हथियारो को किसी दूसरेके हाथमे नहीं देता। मुझे याद आया "लेखनी पुस्तकी नारी परहस्तगता गता" में एक यह भी जोड़ना चाहिये था । मास्टर साहेवको जरूरत पड़नेपर अपने हथियार रामपुर भेजने पडते हैं । मास्टरने सारा काम चुस्ती और सफाईसे किया । विश्वान नही रह गया नहीं तो कहता "पुरविले जनमका हव्यास । " समस्यायें इस तरह हल हुना करती है, व्यक्ति ही की नहीं समाज की भी। पहाड़में वैसे भी कम जातियाँ हैं, और किन्नरमे तो जमा पूजी दो ही जाति-कने और दागी । कनैत छूत और दागी अछूत । कनैत लिखने में डर लगता है, कोई मित्र नाराज न हो जाये, क्योंकि अब क्या पिछले राजा पदमसिंह के समय और उनकी श्राज्ञासे सारे कनैत अपनेको राजपूत लिखाते हैं । कामरूके कनैत ठाकुरसे राजपूत राजा बने वंशके अन्तिम प्रतिनिधिने अपने भाइयोंको भी खींचकर अपनी पंक्तिमें बैठा दिया- दाता उनकी आत्माको शति दे । दागी में फिर दो भेद हैं, लोहार और कोली। हिंदू जातिकी तो यही विशेषता है, कि चाहे कितने ही लाछित स्थानपर रखा गया हो, किन्तु तुम्हें कोई सतोष न होगा, यदि तुम्हारेसे भी नीचेकी तीढ़ीपर किसीको बैठा रखा गया हो । लोहारकेलिये किन्नर भाषा में "डोमडू " शब्द श्राता है, जो "डोम " का ही रूप है । यद्यपि नदईको “डोमङ' नहीं " और " कहा जाता है, किन्तु दोनोंकी रोटी बेटी एक हैं. अर्थात् वही कहीं बढ़ई, कहीं लोहार, कही सोनार, कहीं ठठेरे, कही पथेरेके रुपमे दिखलाई पड़ते हैं। यही नहीं बाजा बजानेका काम भी<noinclude></noinclude> ksiemnhddyc2b0b6qpj2akkiog0prp2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३५ 250 195350 666081 2026-07-07T15:53:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666081 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>फिर चिनीमें २१७ दागी लोग करते हैं । और बढ़इनें तो सगीत-कलाकी आचार्या समझी जाती हैं । अभी कल ही (३० जुलाई) कोठीकी प्रख्यात गायिका हिस्पती ( "पोती तो बती" है, किन्तु वहुत कोशिश करने पर भी नहीं समझ सका "हिरुका क्या अर्थ होता है ) गीत सुनाने ई थी । किन्नरकठियों प्राचीन कालसे अपने सुकंठकेलिये विख्यात है, और अभी भी उन्होंने अपनी उस प्रतिष्ठाको कायम रखा है। मुझे अफसोस है, मैंने हिस्पतीको गाने का मौका न देकर उसे सतुष्ट नहीं किया। लेकिन मुझे गीत सुनना नहीं लिखना था, जिसमें वह पाठकों के सामने भी पहुँच सके । इस्लिये यदि यहाँ कुछ भूल चूक हुई होगी, तो उसमें पाठक भी सहभागी हैं। कलाकार हिरुपांती बटई कुलकी है। उसकी दो नाने (फ्रकी ) वनाछो और छो ( जीवित तीन वीस-दस साल ) विख्यात जन कवयित्रियों रही हैं। इसलिये किन्नर के बढको सिर्फ विश्वकर्मा कहकर टाल न दीजिये । और कोली ? सबसे अन्तिम सीढी, सबसे निकृष्ट कामोंके धनी, और सबसे अधिक दाने-दाने केलिये मुहताज । यही वहाँके चमार, मोची, मगी, जुलाहे, धुनिये, धोवी और सब कुछ हैं। मतलब, जात न होनेते काम नहीं रुकता। कुछ छोटे-छोटे कामों केलिये दागी मौजूद हैं। बाकी कामों में कनैन लोग श्रापममें ही वाँट लेते हैं। कुर्मी, काठी (कोडरी), भड़भूजा, कादू, माली, पटवा यादिके सारे काम किसीकी पौती नहीं है, जिसकी मर्जी हो सो करे । मास्टर विहारीलाल के हाथ की सफाई देखकर कभी मुके तेहरान याद आता था, जहाँ साधारण सरतराश (शाब्दिक अर्थ शिरश्छेदक) एक हजामतका डेढ़ रुपया ले लेता था, या लदन जहाँ एक हजाम दिनभर में मजेमें १५ रुपये पाकटने रख सकता था। याद नहीं मैने मास्टर साहेबसे यह बात कही या नहीं। खैर, यह बात तो अपने घुमक्कड़ शास्त्रमें लिखने जा रहा सम्मानपूर्वक रोजी पैदा हृ कड़ी धर्मको छोड़े बिना चलते चलते करने का यह अच्छा मार्ग है, जिसे हर एक भावी घुमक्कड़को पहिले .<noinclude></noinclude> n167ez2vlnmgh8gs5skawcbrrn9fy3l पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३६ 250 195351 666082 2026-07-07T15:53:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666082 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१८ किन्नर - देशमें हीसे सीख रखना चाहिये - सिर्फ दाढ़ी मूछ बनाई ही नहीं पूरी 'सरतराशी । इसका यह अर्थ नही कि मैं हजामको मिलनेवाले पारिश्रमिक का ध्यान रखके यह सब सोच रहा था। मास्टर साहेब अवैतनिक हजाम हैं । इस काम में उन्हें पुण्य भले ही मिल जाता हो, पैसेका व सवाल नही। और पुण्यार्जनका उन्हें काफी अवसर मिल जाता होगा, क्योकि वह अपने हथियारको दूसरेके हाथमें देते नहीं । आत्मविस्तार वड़े घाटेकी चीज है, इसलिये "काजीजी दुबले शहरके अंदेशेमें" काजीके इस कामको उपहासस्पद समझा जाता है । यहाँ, इतने दूरके स्थानमे ससारकी श्रधी वयारके थाने का कहाँ मौका १ किन्तु दो-दो दैनिक और हर डाकसे आनेवाले दस-दस पंद्रह-पंद्रह पत्र श्राखिर ले क्या आते ? हॉ, ठीक है आँधी-वयार नहीं लाते थे, यदि वही लाते, तो डाकका रास्ता तोड़ देना असंभव नहीं । मनुष्य अपने व्यक्तित्वको जितना ही फैलाता है, • बाहरी घात प्रतिघात और वृत प्रवृत्तिका उतनाही अधिक प्रभाव उसके ऊपर होता है । यह पोस्ट या पत्रायन व्यवस्था हर्ष और विषाद दोनो को सुलभ करती है। इर्षकी वातका प्रभाव उतना स्थायी नहीं होता, जितना विषादकी बातका खैर, उन हप विषादी वातोको मै गिनने नहीं जा रहा हॅू, प्रथम तो वह मेरे पास देरतक ठहरना नही चाहती, और चाहें भी तो वहाँ गीतायोग नही घुमक्कड़ योग उन्हें ठहरने नही देता । " - इधर श्रात्मविस्तार या "दुबले शहरके देशे" का परिणाम यह हुआ है कि ईजान चाहते हैं हिमाचल -- विशेषकर किन्नर देश की सारी समस्याओं को ऊपर निकाल लायें । वात सभव है, इसके लिये कोई सर्वश पैदा होना चाहिये, जिसका दावा बहुतोने किया है, किन्तु हुआ श्राज तक कोई नहीं। तो आत्मविस्तार की सनकने फलोत्पादन विस्तार पर कलम उठानेकेलिये मजबूर किया । अपने तो अपने तहसीलदार मंगतराम जी जैसे भले मानुसको भी कष्ट में<noinclude></noinclude> o1urbof68hgtxmkymuzcjgnbq1lcdah पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३७ 250 195352 666083 2026-07-07T15:53:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666083 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१६ w अंगूर सेव १ कोठी १६०० कोठी ४०० नास्पाती खूबानी बादाम पिस्ता अखरोट श्राडू आलूचा रारड़ ४१७ कोठी ५००० रिव्वा १६६ मोर७३ सुङ्नम्५ कामरू१३६३ रिव्वा ३६६ तेलंगी ५०० कोठी १५० रिव्वा ७१ रोया ३ सडला ११७७ २ गेगी. ६३४ तेलंगी ३००० तेलंगी २०० ३ तेलंगी १०० पूर्वणी ६२. ख्वांगी १०० कोठी ३०० पूर्वणी २९१ चगाव ११६ पूर्वी ३६ मोरङ २ वा २०५० ४ व्विा ३४८ वा ९४७ चीनी ७६ पूर्वणी २२६ दुनी २२३ मोरङ ५८ कोठी ३८ ग्यावोङ, १, चिनी ८ १ ख्वागी ३०० ख्वामी ५०० दुनी ६ ३ तेलंगी २०० ख्वागी २०० रुबागी ५० तेलगी ३५ फिर चीनी में रार ६१८ ६ रारङ् २२३ चीनी २६६ - पूर्वणी ४४ मोरङ् १६२ रिव्वा १७० पूर्वणी ४६ ख्वागी १६ कोठी ५०० 60 पूर्वणी १५६ पंगी २०० पंगी ८ चिनी १४३ रोगी १६७ ४० खारी १४४ चीनी ८८ तेलगी ४० सुनम् १३ तेलगी ४०० ख्वागी १०० रोगी ६५ ३५% पूर्वणी ३६७ मीरू ६३ ६२% प्यारी ३७२ . दुनी ६८ गूर कृपा ७३ मोरङ १६६ १० सुतम् ६० दुनी १५४ ११ दुनी ४४ कामरू १२८ १२ रिस्पा ४२ भावा १२२ १३ मोरङ् ३६ रारङ् ११४ १०२ - १४ प्वारी ३८ वा ९१२ १४ म्यू २८ ८६% १६ जंगी २६ रोगी ६१ अकृपा ११ पगी ४० ४० फिब्वा २२४० 1 ८५% | १७ किल्वा २६ | १८ ख़्वारगी २६ १२६ स्किव्वा २३ २२ |२० नमग्या ४३५२ ४७% वार ३६२ रोगी ३३७ भावा २१८ चगाव २२६ दुनी २०७ ख्वागी ७२%<noinclude></noinclude> gdyyk2rn04yaxf9wgk3f51oafdiis5f पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३८ 250 195353 666084 2026-07-07T15:53:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666084 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२० TT किन्नर - देशमें डाला और उन्होने खामखाह की तनख्वाह खानेवाले पटवारियोको लगाकर चिनी तहसील के पेड़ोंको गिनवाया। एक श्रादमीको सनकने कितनो को परेशान किया ! यहीं तक नहीं गिनती हो जानेके दिनने तो कितने पेड़वालोंकी नींद हराम हो गई "टिक्कस तो लगेगा ही क्या जाने चार याना पेड़ लगता है, या ग्राठ थाना । पेड़ गणनाते मालूम हुआ कौन-कौन इलाका श्राजभी मेवोका केन्द्र है ? निम्न- तालिका मे अधिक पेड़वाले गाँवोको ही दिया गया है, और प्रतिशत सारी तहसील का है- तालिका (पृष्ठ २१६ ) से मालूम पड़ता है, कि सतलजके दाहिने तटपर रोगीसे तेलंगी, और वायें बारड्से मोरडतेकका भूभाग मेवोक वेन्द्र है, जो दोनोही नदीके आमने-सामने है । इसमेवा ज़ारको ऊपर और आगे नमग्या (सीमात तक) बढ़ाया जा सकता है, क्योंकि सतलज रोगी से हमारी सीमा तक साढ़े पाँचसे साढ़े सात हजार फीट पर ही वहती है। साढ़े पाँच से नौ हजार फीट ऊँचाईकी भूमि उन सारे मेवोंको पैदा कर सकती है, जो क्वेटा, काबुल, ईरान और मध्य एसिया में होते हैं, और स्वादमें उनसे कम नहीं। मैं समझता था शायद सदारे लिये हमे पाकिस्तान की ओर मुॅह ताकना पड़ेगा, किन्तु मालूम हुआ यहाँ सर्दा भी पैदा करके देख लिया गया है (मैने छोल्टू मे खाया भी) और ba साधारण खबू जेतो मिश्रीके टुकड़े होते हैं, आलू बुखारा होता ही है, और आड़ तो एक दिन ऐसा मीठा आाया था, कि मैं व्याकुल होकर पूछता रहा वह कहाँका था। शायद किसी देवताने उसे भेज दिया था, क्योकि ग्राडू पकने में अभी देर थी। जगली खट्टा अनार यहाँ होता है, फिर तापमान और अल्प वृष्टिकी अनुकूलता होनेसे कोई कारण नही कि यहाँ वेदाना अनार न पैदा हो - तेलंगीमे लगायी भी है कनौर ऊँचाईके अनुसार फल शौकीन सैलानियोंके उनके आगेपीछे पकते हैं । फलके पकनेका समय याद रखना चाि<noinclude></noinclude> 1sb4o5bbr9pe6d817iy58swfdvbbs7n पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२३९ 250 195354 666085 2026-07-07T15:53:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666085 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>फिर चिनीमें तेलगी में वेदाना गूर किस्मित भी पैदा होता है । २२१ फलके परिभाषाके बारेमें इतनाही कहना है कि श्राजकी मौजूदा अंगूर लतायेही ११००० मन अंगूर और सेवके पेड़ ४० हजार मन सेव पैदा कर सकते है, जिनका परिमाण नचारतक मोटर पहुँ- चतेही दसगुना डेढलाख मन अंगूर और चार लाख सेव हो जायेगा, और जिस समय नचारसे + चीनी तक रोपवे ( रस्सागाड़ी ) वन जायेगा, उस समय तो श्र ेष्ठ मेवोके पैदा करनेमें कनौर एसियामें द्वितीय हो जायेगा सतलज और उसकी शाखाओं के तटसे ६००० फीट ऊँचाई तक की दोनों तरफकी तटभूमि १०० मील लम्बी पाचसे आठ मील तक चौड़ी है । पाँच मील चौडाई भी मान ले, तो ५०० वर्गमील भूमि है जिसमें से २०० वर्गमील अनुपयुक्त माननेपर ३०० वर्ग मील कामकी है, इस सारी भूमिको मेवोंके बागसे ढाका जाना मोटर और रोपवे पर निर्भर करता है, इनपर तथा पनबिजली स्टेशन और कुछ बडी कूलोपर पचास लाखसे अधिक रुपये की जरूरत नहीं होगी फिर दस पन्द्रह लाख मन मेवे हर साल कनौरसे लेते जाइये । यातायात की बात करते नमय वैज्ञानिक यातायातको नहीं भूलना चाहिये | चीनी गाँवते ग्राधमीलपर सड़कसे थोड़ा नीचे "कत्था - लोट" मैदान है, जो प्रादर्श हवाई अड्डा बन सकता है। और वहुत थोड़ेसे परिश्रम से | वैसे पा उपत्यकामें भी ऐसे स्थान हैं, किन्तु वह मान- सून प्रभाव क्षेत्रसे शून्य नहीं है, जिससे अच्छे किस्म के मेवोकी यहीं अगर अगस्त-सितम्बर, सेव अगस्त-सितम्बर, नातपाती (नाख) - . मितभ्वर, ग्राहू - अगस्त-सितम्बर, श्रालूचा - जुलाई - श्रगस्त, खूबानी- जुलाई-अगस्त, बादाम-नितम्बर, पित्ता- सितम्बर, अखरोट - सितम्बर; : चूली - जुन-जुलाई, बेनी अगल अक्तूबर, वोसर (छोटी नास्पाती) - सितम्बर, पालू (छोटा सेब) नितम्बर-अक्तुबर वेरज़ाई ( मीठी गुठली श्री वृली) - जुलाई, न्योजा ( चिलगोजा ) - सितम्बर अक्तूबर ।<noinclude></noinclude> 0w9iqvjnb6mqaboe51svz4s17uo2c1r पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४० 250 195355 666087 2026-07-07T15:54:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666087 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२२ किन्नर - देश मे अधिक संभावना नहीं है। वहाँ अंगूर तो होता है, किन्तु फल फट जाते हैं-- अधिक वर्षा अधिक रस । हवाई की बात मानसरोवर यात्रा के लिये नहीं कह रहा हूँ - यह मालूम है न कि मानसरोवर से ( खण हृद होकर ) निकलनेवाली एक मात्र बड़ी नदी यह सतलज है, और यहाँसे मानसरोवर विमान आसानी से पहुँच सकता है, किन्तु तिब्बतको लामा और देवता उसके लिये श्राज्ञा देंगे तव । खैर, तिब्बत के लामा और देवता अमर होकर नहीं श्राये हैं, उनका भी जमाना लद चुका है। यदि चाङ् कैशकको याङ्सी से उत्तरके चीनसे संबंध तोड़ना पड़ा, जिसके लक्षण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं, तो तिच्चत को चीनी कसूनिस्टोके प्रभावमे जानेसे कोई नहीं रोक सकता | टैन का न इसमे स्वार्थ है न शक्ति है, न संभव है कि रूसके बढते प्रभाव को देखकर जिस तरह कर्जनने तिब्बतमे सैनिक : "मिशन" भेजा था, उसी तरह वह नया मिशन भेजे । भारतीय पूंजीपतियोंको चित्ता जरूर हो सकती हैं, किन्तु हमे आशा नहीं वर्त्तमान भारत सरकार भी अपने उत्तरीय शक्तिशाली पड़ोसी ( कोरिया के सीमात से लदाखतक विस्तृत) से खामखाह झगड़ा मोल लेगी। नवीन उत्तरीय राष्ट्र हमारे रास्ते मे रोड़ा अटकायेगा, इसकी संभावना नही । आशा तो है वह हमारे कैलाश-मानसरोवर यात्रियोंके लिये वैमानिक यात्राका प्रबंध खुशीसे . कर देगा। कल्पा - लोटका हवाई अड्डा सामरिक महत्त्व भी रख सकता, "किन्तु उसकी उपयोगिता यहाँके आर्थिक विकासके लिये भी बहुत है । यहाँकी गायें बहुत छोटी, बड़ी वकरीसे थोड़ी बड़ी होती है, जो यहाँ के घास चारेके देखते ठीक ही हैं, किन्तु भावी किन्नरोको अधिक पी- दूधकी आवश्यकता होगी। तो पावभर देनेवाली कामधेन्वा नही पाच सेर दूध देनेवाली गायकी आवश्यकता होगी हमारे विमान वरेली गा दूसरे पशु-जाति विकास प्रष्ठिणनोसे बड़ी जाति के साड़ोका वीर्य नालियों को लेकर दो घटेमें यहाँ पहुँचा सकते हैं, और कृत्रिम गर्भाधान द्वारा यहाँ की गायो की जातियोंमे सुधार नहीं क्रांति पैदा की जा सकती है। इन<noinclude></noinclude> 4q8o2xsxcebhwvxz1i3ybpxq0ix1phw पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४१ 250 195356 666089 2026-07-07T15:54:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666089 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>फिर चिनी में २२३ प्रसन्नताकी वात न होगी । किन्नर पहुँच जाना यात्रा दुर्गम पहाड़ोंमे हवाई खर्च अपेक्षाकृत कम पड़ेगा, इसलिये, तीन घटे के भीतर चिनी से युक्तप्रातके किसीभी नगर में ताजे अगूरों, सेवों आलू- बुखारोका आना नागरिकों के लिये कम फिर सौ रुपये किराये मे उड़कर काशीसे प्रमियोको भी कम आकर्षक न होगा । वह विमान मार्गको बदरीनाथ के ऊपर से रखवा सकते हैं, और विमानपरसे हिमाचल के इन महान् देवताको प्रणाम या पुष्प माला चढ़ा सकते हैं । भोट सीमासे, १६ मील पर ( विमान से बल्कि चालीस से भी कम ) अवस्थित भारत का यह हवाई अड्डा महत्त्वपूर्ण होगा, इसमे सदेह नहीं । यह भी स्मरण रहना चाहिये कि यदि अग्रेज अमेरिकन साम्राज्यवादियोंकी मनकी रही, र कश्मीरको बॅटना पड़ा, तो लदाखका प्रदेश अवश्य ही भारत में रहेगा । कश्मीर के पश्चिमी भाग के हाथमे न रहने पर लदाखका कश्मीर से जानेवाला मार्ग हमारे लिये बंद हो जायेगा, उस समय लदाख पहुँचने के दो ही रास्ते रह जायेंगे, एक कुक्ल से लाहुलहो जिसमें चार विकट जोतें पार करनी पडेगी, अथवा सतलजकी शाखा स्पिती नदीसे स्पिती जा लदाखको, इसीपर जिसमें "कल्पा- लोट" पडेगा । मेवांके सिवाय किन्नरमे धातुओ की भी वाङ्से मोरङ तक अब भी न्यारिये सतलज निकालते हैं। सोनेका धातुपापण भारतीय बहुत संभावना है ।" वालूको धोकर सोना सीमाके भीतर हो, यह काम होता था, यह भी सभव नहीं है । चगाँव में चाँदीकी खानमें कथा प्रचलित है। ऊपरी वस्पाके पथसे छिल्कुल गाँव के पास कितने ही खनिज पदार्थों की सभावना है, और शायद मिट्टी का तेल भी । वहाँ से लाया काला चूरा तो आागपर हरे रंगकी लौ फेंककर जलता, और थोड़ी देर यागबुका देता है, उनमें गथककी गंध तो असह्य हो उठता है । कुछ और धातुपापा मेरे पास आये हैं, जिनमें से एक पर निपल होने का संदेह है। सतिका धातु-पाषाण बहुत अच्छा यूला<noinclude></noinclude> q1gmezdsn2j4tnj7gzv1ia19cs6k1kh पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४२ 250 195357 666090 2026-07-07T15:54:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666090 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२४ किन्नरदेश मे से मिला है। बस्पा- उपत्यका और उसके निवासियांका भाग्य भी पलटने वाला है । सतलज उपत्यका मेवो और सोनेको ही नहीं चोर भी कितनी ही धातुओं को देनेवाली है, पूर्वणी अगूरमें मातवा, सेवमे तीसरा, नासपाती छठा, ग्रामं चौथा, आलूचामें तीसरा, खूबानी में छठी, अखरोट में जहाँ नवाँ स्थान रखती है, वहाँ उसके पास ही रंगीन अबरख और धातु (शायद निकल) की भी खान है। 'पार हो लिप्पा (किड ) खड्ड में अपरङ के ऊपर हल्के हरे रंग का चिकना पत्थर मिलता है, जिसे लगाकर लोग पशुओं की खो जाला - फूलीको चंगा करते हैं। श्याम खड्ड में ऊपर वड़िये, प्रतिम गाँव रोपा मिलेगा । जेलदार तोब्ग्याम परिश्रम करके वहाँसे ताकी " मिट्टी" लाये । उनका कहना है, सौ माल पहले सराहनके पानके किसी गॉवका एक ठठेरा श्राया। उसने खानसे तीन मील नीचे तावा पिघलाने कामके लिये झोपड़े बनवाये। कई साल तक वहींसे तावा निकालकर ठठेरा वर्तन बनाता रहा । उस समयके बने वर्तन भी उधर कितने ही घरोमें मौजूद है। इन तॉवेके टूटे बर्तनों को आसानी से गलाया जा सकता है, इसीलिये आजकल के कनौरी वर्त्तन बनाने वाले उसे बहुत चाहते हैं । जेलदार तो ग्यारामको तावेकी कोशिश मे मिट्टी के लिये आया देखकर गाँव वालोने उन्हें बहुत समझायाची यह काम मत करो, बुरा होंगा, देवताकी नाराजीते खान वद हुई है, तुम्हारा श्रनिष्ठ हो जायेगा। नीचे के आदमी आकर यहां भर जायेगे, फिर हम अपनी चूलियों को भी न खाने पायेगे। अग्रेजोने जानने की बहुत को किश की किन्तु हमने पता लगने नहीं दिया इत्यादि । किन्तु तो ग्याराम पढ़े लिखे आदमी है, जानते हैं, तांबा अंग्रेजो के लिये नहीं अपने लोगोके लाभ के लिये निकाला जायेगा | लोगोके लाभ भांजी मारनेवाला देवता कौन है ? -जेलदारके कथना- नुसार खानपर बहुत से पत्थर गिरे हुये हैं, किन्तु कुछ परिश्रमते उसे साफ किया जा सकता है। जो “मिट्टी" उन्होंने लाकर दी है, वह<noinclude></noinclude> t5tpj86drvesz31im1degdmdaqdf8kl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४३ 250 195358 666091 2026-07-07T15:54:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666091 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोठी देवी महातम २२१ काफी भारी है । रापाके आसपास ताँबेकी मैल बहुत मिलती है। इसलिये ताँबे की खान के होनेमें सदेह नहीं । संभव है, सराहन गोरा- के वीचके गाँव वाले उठेरेके यानेसे पहिजे भी यहाँ ताँबा निकाला जाता हो, किन्तु वह निकाला जाता था लकड़ी के कोयलेकी सहायता । • · किन्नरमे ताँवा, सुरमा, चाँदी, सीसा, मिट्टीक तेल, निकल, जस्ता, गंधक पाये जाने की संभावना है। १५ कोठी देवी महातम कोठीकी देवीका चडिका नाम मैने पहिले हो सुन रखा था, और यह भी 'जानता था कि वह किन्नरकी सबसे जागता देवी हैं। देवताका दास मैं भले ही न होऊ, किन्तु देवताओं विशेषकर उनकी कथाथांका प्रेमी तो मैं जरूर हूँ। यह हो नहीं सकता था, कि दो मील पर रहते भी मैं चडिकासे भेट किये बिना किन्नर देशसे विदा हा जाऊँ । कोटीकी यात्रा और देवी से भटकी बात कहनेसे पहिले देवीके परिचयार्थ चदं पक्तियाँ लिख देना जरूरी समझता हूँ, हो सकता है, कही पुनरुक्ति हो जाये, किन्तु देवताओ की कथा में वेसा होना अनिवार्य है, क्योकि महातम तथा "कोया" ( कथा ) सभी श्रति रूपमे हैं, और नियोकी अनेक शाखाये हुआ ही करती है । देवीका जन्म और वाल्यकाल - चडिका देवी नाम होने आप कोटीकी देवीको 'अपणों, पार्वती, दुर्गा, मृडानी चडिकाचिका" न नभक लीजिये और न इन्हे पर्वत में जन्म लेनेसे शिवकी प्रिया नमननेकी गलती गीजिये। सारे हिन्दू जानते हैं, कि लक्ष्मी, पुंश्चल ( दाती है, किन्तु पार्वती सदा मती बनी रहती है, और चडिकाका वैव<noinclude></noinclude> 51eznshkkq9f0hd5zof1bybbhlyw709 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४४ 250 195359 666092 2026-07-07T15:55:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666092 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२३ . किन्नर देशमं संबंध किसी व्यक्ति है, जो सदा उसके साथ यह है कि इस पार्वतीको गौरा पार्वतीमे भागवत -- वोपदेवकी नकली भागवत नहीं देवी भागवत - पर हड़ताल फेरनी पड़ेगी । साथ रहता है। नाराय मिलानेपर श्रापको सारी अमली भागवत' अर्थात् कोठीकी देवी afsकाका जन्म मुद्रा (गोस्नम् ) के पास की ग्वार- नामक गुफा 'नातिपुरातन कालमें हुया । उनकी सौभाग्यवती माता श्रसुरराजदुहिता श्रसुरराज महिषीकी कोख छ और सतानोंसे पवित्र हुई। सांतो संतानों में ४ वहिने और तीन भाई थे | वहिन में तीन अन्तर्धान अर्थात् काल-कवलियत हो गई, और निष्ठुर जगतने अपने स्वभाव के अनुसार उनका नाम तक भुला दिया । समय पाकर तीनो भाई सयाने हुये । वेटीका तो उत्तराधिकार होता नहीं, इसलिये बड़ी वहिन क्या दावा करती ? पिता के सुरलोक सिधारनेपर खटपट शुरू हुई। तीनों भाइयो के नाम थे महेसु — जिसे महेतुर और मरेश्वर भी पंडिताई छाँटनेवाले कह देते हैं । हम उन्हें अभी पहाड़ी रीतिके अनुसार बड्डा, माहिला और कोल्छा कहेगे । तीनांके झगड़ोंने उ रूप लिया, आखिर जाति भी तो सुंद-उपतु दकी थी। किन्तु यहाँ बीचमें कोई मोहिनी नहीं थी । इस झगड़ेको वस्तुतः पतियो कारगा नहीं कहा जा सकता, क्योकि तीनो महेतुकी तब क्या तक कोई वैध पक्षी नही है। बड़ी वहिनने देखा, यह तो वाणासुरका व' उच्छिन्न होना चाहता है- कितने ही श्रतिघरोका कहना है, पिताका नाम यही था, जो कृष्णका समधी भी था । यहाँ एक ऐतिहासिक महत्वकी बात हाथ लगी, जिनके वलपर हम कह सकते हैं, कि देवीका जन्म कलियुगसे पहिले द्वापरके बिलकुल अन्तमे हुआ था, अर्थात् पाँच हजारसे कुछ ही वर्ष पहिले । देवीने भाइयोको समझाया, वचनाश मत करो । हालमें हुये कौरव पांडवकी कलहसे सबक लो भाइयोंको कुछ होश आया, और वोले- तो वहिन ! तु ही पचवन , ' 1<noinclude></noinclude> 7a9z6l5gem72a9jnai56kdslm70l2ob पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४५ 250 195360 666093 2026-07-07T15:55:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666093 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोठी देवी महातम २२७, जा और जायदादका बँटवारा कर दे ।" बहिनने कष्टको स्वीकार किया। भावाके ऊपर घास के मैदान में अभी वह चद्वान मौजूद है, जिसपर बैठकर देवीने भाइयोका बँटवारा किया था । स्थान पहिलेसे ही निश्चित था, जहाँ देवी पहिले ही पहुँच गई । शायद समय भी पहिले निश्चित हो गया था, जो गोधूलीके आसपास था - शायद इसलिये कहता हॅू कि यह मेरी उड़ान है, श्रुतिधरने इसे नही वतलाया । मेरी उड़ानका कारण यह है कि आगे जो घटना घटित हुई, वह इसी समय सभव है । तीनो असुरपुत्र मदिरा के चपकपर चषक उड़ेलकर रक्ताक्ष और घूर्णित शिर हो गये । और झुटपुटेके कारण rareकी चीजें उन्हे दिखलाई नहीं पड़ती थी। तीनों भाइयोने बदना की । देवीने सनसे बिना उठे ही कुछ मुसकराकर, कुछ अपने मधुर किन्नर कटसे उन्हें मुग्ध कर दिया। तीनों भाई पासमें बैठ गये । देवीने पिताके राज्यका हाथमे लिया, और उसके तीन टुकड़े कर पीठ स्थान अर्थात् माती वहिन भाइयोंका जन्म स्थान (नचार सुडूरा वाले इलाकेको जो काफी कलियुग बीत जानेपर अठारह-बीस के नाम- से प्रसिद्ध हुआ) बड़े भाईको दे दिया, जिसे उसकी राजधानीक नामपर तवसे मुड्रा- महेतू या ग्रोस्नम् - महेसू कहा जाने लगा । माहिलाके हिस्लेमें नावा खडका इलाका श्राया और वह भावा- महेस् कहा जाने लगा । काछाको राजत्रामङ्का इलाका मिला, जिसको राजधानी वगाँव या टोलडके नामपर उसे वहाँका महेस कहा जाने लगा। तीनो भाई बड़े प्रतन्न हुये । यहाँ यह कह देना चाहिये, कि सुरा मरेका राज्य मानवून इलाके वाले घने देवदार वन वाली नृभि था, बाकी दोनो भाई मानसून वचित नमप्राय पर्वतोके स्वामी बने । उताको तुरा तुदरीने और बढ़ा दिया। वह बहुत बहुत धन्यवाद देते, गिरते पड़ते अपने निवासको गये। देवी अपने श्रासने तबतक न उठी, जब तक कि तीनो भाई ग्रॉखोंते .<noinclude></noinclude> nqh5ekrq1pk1rz32rqqljx3rerleed5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४६ 250 195361 666094 2026-07-07T15:55:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666094 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२८ किन्नर - देश में श्रीफल नहीं हो गये। फिर उसने अपनी चोटीमैसे कोई चीज निकाली और चुपकेसे उसे अपने दोटू ( पहाड़ी ऊनी माड़ी ) के भीतर छाती के पास छिपा उड़कर गायव हो गई। उड़कर ही गायव - होना जरूरी था, क्योकि पैदल दौड़ती, राज्यसे गुजरना पड़ता, जहाँ बहुत तो उसे माहिला और कांछा के खतरा था । देवीकी उड़ान चट्टानसे सीधे उत्तर भावा जोतके ऊपरसे आजकल के स्पिती इलाकेपरसे पूर्वाभिमुख होकर जरा दक्षिण मुड़ एक बड़े डाडेको पार कर श्या खडके उपरले अन्तिम ग्राम रोपाको हुई। देवीने वहाँ वहुत समय निवास नहीं किया, क्योंकि वोटीमें छिपाई चीजको सभालना था, और वह चीज थी मातो-शोवाल्यङ् या सक्षित नाम शोवा । रोगीसे पगी खड्डतकका चीनीवाला इलाका इसी नाम से पुकारा जाता है। देवी के जन्मसे युग पूर्व से तब तक यहीं इलाका द्राक्षी मदिरा केलिये प्रसिद्ध रहा है, आज तो श्वेताग म्लेच्छो के राज्यके समय लाये सेव, चालूचा, नास्पातीका भी वही गढ़ है । इसी इलाकेको देवीने वापकी जायदाद वॉटते समय अपनी चोटी के भीतर छिपा लिया था, और वॉटनेकेलिये गोधूलीका समय निश्चित किया था । तब तो देवीपर भाइयों को धोखा देनेका भारी म राध लगता है ! इसमें क्या सदेह । इसीलिये तो कोठी देवी सारे किन्नर देशमें "बड़ी चालाक ' ( बुरे अथोंमें कही जाती है। एक सजनने इस बातको यह कहकर कुठलानेकी कोशिश की, कि तेलगीका देवता थानिक अपने इलाकेकी देवीके हाथमे सौप कर अन्तर्धान हो गया । स्पष्ट शब्दो में कहिये तो, थानिकने श्रात्म-हत्या कर ली । श्रात्मता करना उन देवतानोकेलिये आसान नहीं हैं, जिनपर आयुका प्रभावही ही नही पड़ता । फिर समाधान यही हो सकता है, कि निराश प्रेमी हो उसे ऐसा करना पड़ा, या शोवाको ऐठनेकेलिये ऐसा किया गया । यह तो और भी भयकर लाऊन देवीपर आवेगा । यह बात सोलहो<noinclude></noinclude> sep3kwtkv4b3b9ue0904y68dsbevof8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४७ 250 195362 666095 2026-07-07T15:55:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666095 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोठी देवी महातम २२६ थाना झूठी है। वात वही सच है, जो पहिले कही गई, और उसकी आगेकी घटना भी कहती है । यहॉकी बात यहीं छोड़कर जरा हम देवलोक से नरलोक में श्रायें । यह स्मरण रखना चाहिये, कि ग्राजके किन्नरकी भाँति उस समय भी देवलोक और नरलोककी कोई सीमा निर्धारित नहीं थी । बँटवारे के समयके श्रातपात ही चिनीसे एमर्स दसराम नामका एक ठाकर_ ( ठाकर, छोटा राजा ) रहता था । ठाकरानी गर्भवती हुई । झूठकी कमाई खानेवाले और कभी कभी सच्ची अटकल लगा देनेवाले जोतिलियोने कहा -- “ पुत्र होगा, तो कल्याण होगा, पुत्री हुई तो महा अनिष्ट घटित हो सकता है ।" सयोग कहिये, हो' गई पुत्री । ठाकर घबड़ाया और उसने पैदा होते ही बच्चेको सात पोरिसा जमीन के नीचे गाड़ दिया। देवी तो दो ही मीलपर रहती थी, उसे मालूम हुआ । वह झटसे जमीनमे सुरंग खोद करके लड़कीको अपने साथ ले गई, टाकरकी पुत्री ग्राज भी देवीके विमान मे सामनेवाले मुखके नीचे चादी के पतरकी मूर्ति के रूपमे विद्यमान है, विश्वास न हो तो ग्राकर अपनी खो देख ले । देवीको पिताकी नृशसतासे पुत्रीको बचा लेने भरते ही सतोष नहीं हुआ। उसे ठाकरस्पर भारी क्रोध श्राया- देवीके स्वभावसे कहा जा सकता है, कि इस सारे कार्यमें परोपकार बुद्धि ही नहीं काम कर रही थी, बल्कि वह ठाकरको हटाकर शोवाको अपने लिये कटक बनाना चाहती थी - स्मरण रखना चाहिये, कि देवी उदुवर (लाल) वर्णा द्राक्षी सुराकी वड़ी प्र ेमी है, और इस तुरा केलिये शोवा आज नी प्रसिद्ध है । कुछ मामूली कहासुनी, दूतोके यातायात और माँग के बाद देवने टाकरको ग्राल्टीमेटम दे दिया, जिसने वचने की शर्त यदि आत्महत्या नहीं तो उससे कुछ ही कम रही होगी। ठाकर यानपर मरनेवाला पुरुष था। , - उसने भी देवताको प्रसन्न करके वरदान पाया था-- वरदान देखनेसे जान पड़ता है, उसके दाता पार्वता द्वितीयाके प्रति नगेड़ी शकर ही रहे होगे । ग्राल्टीमेटम्<noinclude></noinclude> aqoyzq4s1x4jyc23uhxqn6qp5lbkno6 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४८ 250 195363 666096 2026-07-07T15:55:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666096 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३०. किन्नर - देशमें या अंतिमेत्थमका समय बीत गया। देवी चढ़ दौड़ी। खबर पाकर ठाकर भी गढ़से उतर आया, और दुर्गसे डेढ़ ही दो फर्लांग पर जहाँ श्राजकल पनचक्की चल रही है, दोनोंकी मुडभेड़ हो गई। यहाँ अवश्य देवी साक्षात् दुर्गा वन गई थी। उसके धनुपसे छूटते वाण पार्थशरको झूठा बना रहे थे, उसकी तलवार चलानेकी फुर्ती वतला रही थी, वह उसके हाथ सभ्याको तु वाफेरोमें ही चुस्त न थे। उधर दसराम ठाकर भी कच्चा गोइयों न था, उसने भी वापर वाण, खङ्गपर खड्ग, शूलपर शूल चला देवीको छट्ठीका दूध याद करा दिया । देवी पसीने पसीने हो गई थी, उसका सारा दोडू वर्षासे भीगा जैसा मालूम होता था, किन्तु भी देवीको चिन्ता नहीं हुई थी । उसने लपककर अति चलाई, और दसरामका सिर भुट्टो की भाँति जाकर जमीनपर पड़ा। देवीकी बांछे खिल गई। उसी समय किसीके उठाकर हँसनेका शब्द सुनाई दिया। देवीने गिरे शिर परसे नजर हटा कर उधर देखा, वहाँ दमराम सहीसलामत मौजूद था। जमीनपर गिरे प्रहरणो को उठाकर देवीपर वह प्रहार करना चाहता था, कि देवीने सजग होकर ताबड़तोड़ वारा चला उन्हे बेशर कर दिया और फिर वाणोंसे दत्तरामके शरीरका छलनी करते हाथकी सफाई दिखलाते हुये दूसरी वार शिरको फिर वही बात । शिर काटकर गिराना, काटकर गिरा दिया। लेकिन उठाकर हँसते नये शिरका दसरामके धड़पर श्राजमाना, और फिर युद्ध जारी । आखिर बलकी भी कोई सीमा होती है, चाहे वह देवीके शरीरका ही क्यों न हो । देवीकी हिम्मत टूटने लगी- यह स्त्री जातिके अपमानकी बात नहीं । दसराम पुरुपदेवता को भी नाकों चने चबवा सकता था । देवीके हाथ- पैर फूल चले, समीप था, कि वह दसरामके हाथकी चिरवंदिनी हो जाय फिर वह उसके साथ कैसा बर्ताव करता, कौन जाने ? कथा तो है, दसरामके शरीर में राक्षसकी आत्मा वसती थी। खैर, श्रागम अँधेर दिखलाई पड़ने लगा । उसी समय देवीके मस्तिष्क मे बिजली सी चमकी । 1<noinclude></noinclude> kdmyieba77egvrbjj23mw5uyt54twgi पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२४९ 250 195364 666098 2026-07-07T15:56:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666098 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोठी देवी महातम २३१ उसने प्राणों के डर से दूर खड़े होकर तमाशा देखते ख्वागीके देवता मरकारिढसे कहा - "कायर क्या तमाशा देख रहा है, इसी हिम्मतपर काय (नृत्य-चक्र ) मे हर समय मेरा हाथ लेना चाहता था । जा, जल्दी दौड़कर मेरे भाइयोको खवर दे । " तीनो महेसू उस समय शोवाके सबसे नजदीक वाले भाईकी राज- चानी चगॉव ( ठोल ) मे सलाह कर रहे थे । उस दिन गोधूलीको तो उन्हें वहिनकी चालाकी नहीं मालूम हुई, दूसरे दिन जब सवेरे उठे, नशा उतर गया, तब उन्हे मालूम हुआ कि वहिनने ठग लिया, और ठगा भी वह इलाका जो तीनों भाइयोंको सबसे प्रिय था । ग्रव शिव ( अंगूरी लाल मदिरा ) कहाँ से मिलेगी ९ चर्गांवमें तीनो भाइयोंकी कमीटी इसीलिये हो रही थी, कि कैसे शिव के उद्गम स्थान शोवाको चालाक चंडिकासे छीना जाये । ये लोग इसी परिणामपर पहुँचे, कि बिना चडिकाको व्यान कराये काम नहीं चलेगा । श्रभी अन्तिम फैसला नहीं हुआ था, कि ख्वागी देवता हाफ़ते हाफते मीटिंगके स्थान चव महेसू के बैठकेमे पहुॅचा। तीनों भाई मरकरिकी यह अवस्था -देखकर एक ही साथ बोल उठे -- "मरकाल ! कहो, खैरियत तो है, क्यों घबड़ाये मालूम होते हो, क्या खवर है ?" मरकारिने इशारेसे • कहा, जरा दम ले लेने दो । चगाँव महेसून फटसे शिव के अन्तिम कुतुपको चपकमें खाली करके मरकारिके हाथमें दिया । मर- कारिट्नं हाथमें ले उसे एक सासमें मुॅहमे उँडेलकर जीनसे चाटते हुये कहा --- "खवर, बहुत बुरी । तुम्हारी बहिन दसराम ठाकरस्- के हाथमें पड़ने ही वाली है । टाकरस्से घमासान लड़ाई हो रही है । चंडिका सात बार शिर काट चुकी, किन्तु ठाकरके धड़पर नया सिर जभ जाता है...।" i ठ यात पूरी समाप्त न होने पाई थी, कि गाँव महेतू उठ खड़ा हुया और बोला- “भाइयो । परनान, मै तो चला !" "कहाँ चले, " दीनने का होकर पूछा । "चला, वहिनको बचाने ।" दोनो<noinclude></noinclude> g6zju7le79f8py2p3z4dvg0uveu66jy पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५० 250 195365 666099 2026-07-07T15:56:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666099 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३२ किन्नर - देश मे भाइयोने छोटेको बहुत समझाया - " जाने दो मरने दो। कहाँ हम उसे मारने की तदवीर सोच रहे थे। कहीं वह अपने श्राप मारी जा रही है। इससे अच्छी बात हमारे लिए क्या हो सकती है।" किन्तु, काछाने एक न सुनी और बोला - "मै तुम्हारे जैसा नीच नहीं हूँ । हमने एक ही माता के स्तन पिये हैं। अपनी सहोदराको इस तरह खतरे में पड़ी देखकर, मेरी गैरत नहीं कहती कि में उसे अधम दस- राम के हाथो मरने या वन्दी वनने दूँ ।" पकड़नेपर भी काला हाथ छुड़ाकर चल दिया । माहिलानं जेठेसे कहा - " मैने कहा न, इसे उ राडने शिव देनेका लालच दे रखा है।" , देवी नृत्य सहभागी मरकारिके साथ दौड़ता भागता काछा महेसू चीनी किले के नीचे उस जगह पहुँचा, जहां दसराम और देवी जूझ रहे थे, देवी हॉफ रही थी, तव भी कभी इधर कभी उधर झपट्टा मार रही थी। उसके बिखरे हुये वैगनी वाल हवामें उड़ रहे थे, उसकी नाक की नथ भी पीपल के पत्तेकी भाँति हिल रही थी। देखने हीसे काछाको मालूम हो गया, कि चडिका और देर तक अपने पैरोपर खड़ी नही रह सकती । उसने ध्यानसे देखा, तो मालूम हुआ, दसरान- के शिरपर एक भौरा उड़ रहा है । उसे रहस्य मालूम हो गया । उसने चिल्लाकर कहा - " वहिन, शिरके ऊपर देख ।” चडिकाने भँवरे - • को उड़ते देखा, और एक तीरसे उसे धराशायी कर दिया, दूसरे क्षण दसरामका शिर भी धरतीपर लोटने लगा, और उसके साथ ही उसका धड़ धमसे गिर कर छटपटाने लगा । रक्तरंजित गात्रा चड़िका दौड़कर भाई के गलेसे लिपट गयी, उसकी आँखोसे हर्षा वह चले । दस- रामकी पुत्री जो शत्रु से जा मिली थी - के मुँहसे करुणा वरस रही थी । उसकी इच्छा होती थी, कि जमीनपर लोटते वापके शिरको उठाकर गोदमें ले ले, लेकिन वह चडिका क्रोधको भी जानती थी - निस्सदेह वह दानवी देवी उस मानवीको कच्चा खा जाती । यह है संक्षेपमें कोठीकी देवीका जीवन वृत्त । आज सारा किन्नन<noinclude></noinclude> mk9dhqfsp915bcg6l4qjagojt6fdulm पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५१ 250 195366 666100 2026-07-07T15:56:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666100 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोठी देवी महातम २३३ देवी से थरथर काँपता है, मानव ही नहीं देवता भी । किन्नर के बतेरे गॉवोको तो उसने अपने भाई- भॉजोसे भर रखा है, यह आपको खइछो- की गीत "पतिष्टोड" से मालूम होगा । चडिकाके सामने पत्ता भी नहीं हिल सकता, वह जहाँ डपट कर कहती है- "जैसे मैने सातखुदो और अठारह गढको भूनकर रख दिया, वैसीही दशा तुम्हारी करूँगी" तो लोगोकी सिट्टी गुम हो जाती है। दूसरे देवताओंको चाँदी भी मुश्किल से मयस्सर होती है, और चडिका सोनेसे लदी रहती है, वह ' किन्नर की सबसे धनी देवता है । रोपामे उसका महल ( मन्दिर ) वना ही है, शोवाके केन्द्र कोठीमें तो उसका स्थायी निवासही ठहरा इसके बाद भी उसके सैललपाटे हुआ करते हैं । कभी कभी वह दस- रामके गढ़ पर आकर शित्रू पीते अपने शत्रु के कलेजेपर कोदो दलती है, कभी कश्मीर के दुर्गपर जाकर मेला लगाती है । आजकल (जूलाई १६४ ई० ) इधर भेड़ बकरियोमे महामारी फैली हुई है । मानवके- लिये जब अस्पताल रहते भी वर्षों से यहाँ डाक्टरका पता नहीं, "पशुचिकीछा" की बात कोन करे १ छोटे मोटे देवताओं से जब बात नही हल होती, तो लोग कोठी देवीके पास पहुँचते हैं । "मातासा बने" भी हुकुम दिया है--मै सारी बीमारी एकदम दूर कर दूँगी, किन्तु काश्मीर के किलेपर ले चलकर मेरी पूजाका प्रबन्ध करो। पूजा सामग्री के बारेमे पूछने पर मालूम हुआ कि ग्राटा, गुड़, तुरा श्रादिके , तो अतिरिक्त कुछ बीन करे और कुछ वट्टी ( दोमेरी ) मक्खन चाहिये । मला देवी की बात कौन खाली जाने दे सकता ? सात अगस्तको काश्मीरमे भारी मेला लगा । मास्टर नारायन सिंहने यह खबर सुनाते हुये कहा - पूजा तो होगी, किन्तु इतने खाडू ( भैड़े ) बकरे और इतना मकवन खर्च हो जायेगा ।" मैने कहा अर्थात् मति मक्खन सतलजमे फेक दिया जायेगा ? सतलजने नही फेंका जायेगा, लेकिन...<noinclude></noinclude> ms21xn94ampyvrh87jomw26wc0jx015 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५२ 250 195367 666101 2026-07-07T15:56:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666101 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३४ किन्नर - देशमें लेकिन क्या ? क्या उसमें से बहुत सा भाग गरीबांके मुँहमें प्रसाद के रूपमें नही जायेगा ? -- जायेगा तो १ और खाउ मक्खन अधिकतर धनियोंकि घरोसे आयेंगे। उन्ह गरीव भी खालें, तो क्या बुरा ? इसी समय वहाँ बैठे कविराज और संगीतिचार्य मास्टर प्रिय भारत 'बोल उठे - मास्टर रामजीदासको वलि बहुत बुरी लगती है । - लेकिन देवी तो मैने कहा -मास्टर रामजीदास के हाथसे बलि लेनेका आग्रह नहीं करती। जो लोग भेड़े बकरे मारा करते हैं, मारेगे इसमे मेरे और बाबू रामजीदास के वापका क्या बिगड़ता है ? रामजी - दास तो भगत आदमी है, मास नही खाते, मै तो सर्वभक्षी हूँ, किन्तु. मुझे भी यदि कोई बकरा मारकर खानेके लिये कहे, तो हाथ नहीं उठा सकता । मास्टर भारतने फिर कहा - लेकिन मास्टर रामजीदास तो हिंसाके सख्त विरोधी हैं। क्या लाठी के हाथो हिंसा बंद करना अपना फर्ज समझते हैं ? यह तो और बड़ी हिंसा होगी, हाँ, व्यर्थकी हिंता न करनेसे भी चलनेवाली हिंसाको मैं भी नहीं पसंद करता । लेकिन, इन्ही कनौर के वदरोको ही ले लो, इनकी हिंसा करना क्या ठीक नहीं है ? प्रियभारत- नही जी, मास्टर रामजीदास तो नहीं पसंद करेंगे, -- पसंद करनेका अर्थ है यदि अपने हाथसे करना, तो मै उसकी बात नहीं करता, किन्तु ऐसे हाथ बहुत हैं, जिन्हें कुछ रुपये दे दिये जाये, तो वानरयज्ञ सफल हो जायेगा । -- वानरयज्ञ ! - हाँ, वानरयज्ञ करना होगा, यदि कनौरको वड़े पैमाने पर मेवों के उद्यानके रूपमें परिणत करना है । पाठकोंकी जानकारी केलिये कह देना है, कि उन्नीसवी शताब्दी के<noinclude></noinclude> q0uqydfq2x3kjadqgwd83ryfvg19ipc पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५३ 250 195368 666102 2026-07-07T15:56:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666102 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोशी रेवो महाभ TR दूसरे नहीं और हनुमान समरस्यापत् बार-बार है। ऐसे प है। उने हो उन और - कल गये रोजेका हु दो, इस नेवादा भी को उनके बागवानी करनबहानी सोगोने लनटन के मारे। बार कुछ हाथ पैर टोला कर रखा है। सारे साथ दिल चली इस बात है. कि कौर वोका देश बने । तो बना र रामजानोबलका सात एमानदेवको चाना मेवा उद्यान वस यह हनुमान सेना और वह कर भी का सोने जाई र फेर कैसी, जो नर वर्षो से रखकर जनमजे पदाके हिंदी सामाजिक सिको अपनाने के लिये तैयार नहीं । किन्नर लोगोने पहाड़ की रुठिनाई, प्रन की कम उत्पत्ति का ख्याल करके बहुपतिमा की प्रथा चलाई। इसके कारण बहुत सी स्त्रियों कुमारी, सोमो वा निरसन्धानी जरूर रह जाती, किन्तु जनवृद्धि पर अंकुश होनेसे पृथ्यो का भार बढ़ कर दांता और वढने नहीं पाती। किन्तु हनुमान सेना के कसमें कही नाम नहीं है, जिस भद्रमुखी का देखो, एक " कुशमंकुश का पोठ पर लाद इस डालसे उम डाल पर फुदानी दीख पड़ती है, मतान-निक्की बात तो अलग यहाँ सतान उत्पतिका प्रतियोगिता भी बन रही है। पंचान साठ साल के गीतर ही कुल वजन यागनिकर बाज किन्नर के मनुष्योदी भरा पूरी करता है। 9 साल और पनार पेटिने और देखिये एक एक नरपुर पर वारवार बानर हो जाते है, का पूर्वजाने किजिये विरक पता सुसार प्राप्तागीर पर अपनी कती बनाई थी, हिश्रनुमान बना र<noinclude></noinclude> j1zjksva07z5ga3eo809t5pzurw5kz7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५४ 250 195369 666103 2026-07-07T15:56:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666103 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३६ किन्नर - देशमे शान्तिमय तरीके से दखल करले । मैंने जोर देते हुये कहा - में तो भाई, ऐसी हिंसाको मानवकी श्रात्महत्या कहता हूँ | जगली में कोई हिंसक जतु भी नहीं रह गये, कि वह इक्के दुक्के वानर पुत्रोको दवोन्च कर संख्या कम करे । किन्नर के काले भालुोंने मास खाना तो सीख लिया है, किन्तु वह भी अपने दात भेड़बकरियाँ और निरीह गाय पर ही साफ करते हैं । - हा, इनकी संख्या कम करने वाले तो कोई जानवर नहीं है, कभी कभी कुत्ते किसीको पकड़ कर कलेऊ कर पाते हैं-वा नारायन सिंह ने कहा- वह कही हजारमें एक, क्योंकि यह चालाक चतुष्पाद वृक्षोंको छोड़ नंगे पहाड़ोकी ओर बढ़ते ही नहीं, और वृक्षो पर इनकी सरवर कौन कर सकता है ? - कुत्ते भी जाड़ो में एक दोको पकड़ पाते हैं— कविने कहा- क्योकि ताजी बर्फ में वानर दौड़ नहीं पाते, उनके पैर धंस जाते हैं । - यह अभी नौसिखिये नये श्राये हुये हैं। बर्फमे रहना और जीना तो सीख गये ना, फिर वर्फमें दौड़ना भी सीख जायेंगे। इनकी संख्या वृद्धि विना वानरयज्ञके रोकी नहीं जा सकती । सचमुच मै तो मेहता साहेबको लिखूंगा -- जन्मेजय सर्पयज्ञ करके पितृऋणसे उऋण होना चाहा, जिसमें कपट ॠषिके रूपमे सर्पिणीपुत्र आरतीक ने आकर विघ्न डाला, लेकिन आप जन्मेजय पारिक्षितसे अधिक शक्तिशाली हैं, क्योंकि आपको जन-कल्याण करना है । आप वानरयज्ञ प्रारंभ करके जरूर पुण्यके भागी हूजिये । यदि उनका गुजराती पुलपुला हृदय नही तैयार हुआ तो भी निराशा होने की बात नही, साल बाद आने वाले जननिर्वाचित हिमाचल पुत्र मत्रियो से पूरी आशा की जा सकती है, कि वह इस महान् यज्ञको सम्पादन कर किन्नरका उद्धार करेगे । बस साठ हजार रुपयोकी आवश्य कता है, प्रति वानरी चार प्रतिवानर दो रुपये ।<noinclude></noinclude> joddvhloszb731x2vo96549hvjtou8s पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५५ 250 195370 666104 2026-07-07T15:57:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666104 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोठी देवी महातम - वानरीके लिये दूने क्यो ९ -- किसीने पूछ दिया । २३७ - भाई सारे वानर खतम कर दिये जाये और एक वानर तथा वानरिया बच जाये, तो निर्यात का द्वार बंद नहीं कर सकते, चन्द ही सालों में वृद्धि की गति पूर्ववत् हो जायेगी; क्योकि चाहे यह रामजीके सेनापति हनुमान के वंशज हो, किन्तु न इन्होंने रामजीका व्रत स्वीकार किया न हनुमानजीका और यदि एक छोड़ सारी बानरियोको खतम कर दिया जाये और वानर सभी रहे तो सख्या पूर्ति पीढ़ियों लगेगी । मेरे श्रोता इस युक्तिसे संतुष्ट मालूम हुये, और वानरोके आतंक से नुक्त भले दिनोकी आशा करने लगे । सौभाग्यवश यहां हनूमान दासोका पता नही है, और न श्रागे ज्यादा श्राशा है, हालाकि मोने- रौला तिनफटाका लगाये कामरूमें जमा है, और जब तब कीर्तन करा देता है, किन्तु अभी मोनेरौलाकी सात पीढ़ियों कोशिश करते मर जाये, तब भी वह किन्नरोको हनूमान मक्त नहीं बना सकतीं । मुझे यही अफसोस है, कि किन्नर कुर्गवासियाकी भाति हनुमान भक्षक नहीं हैं, नहीं तो एक पथ दो काज होता । तरे भी गोली गठे तथा शिवूका थोड़ा उदारतापूर्वक प्रवन्ध हो जाये, तरे, काफी माईके लाल मिल जायेंगे, जो वानरयतमें आगे बढ़ बढ़ कर हाथ वॅटायेंगे, और कुछ ही वर्षों यह सुन्दर देश वानर कटकसे कटक हो जायेगा । मेरे पूछने पर यह भी मालूम हुआ, कि कोली लोगोको चमड़ा निका- लनेने कोई उम्र नहीं होगा, क्योंकि निल जानेपर नीचे वाले कोली फलनुका फलाहार कर लेते हैं । फिर क्या, रोमहीन बुटाबुटाया बानरचर्म दाने के रूपने लदन और पेरिकी सुन्दरियों को भी मुग्ध कर सकता है। 1 इति छोटी देवी महानन समापन | 1<noinclude></noinclude> 0gzc4nn7dh4z04hk6ek4p1r8tbm8867 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५६ 250 195371 666105 2026-07-07T15:57:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666105 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५७ 250 195372 666106 2026-07-07T15:57:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666106 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोठी देवी महातम २३६ मै चाय पीकर गया - चाय तो खैर मैं फीकी सिर्फ काढा पीता हूँ, किन्तु उसके साथ पुण्यसागरकी कृपासे फाफडके दो मधुमय चीले मिल जाया करते हैं । लेकिन शर्माजी भी चायपर इंटने जा रहे थे 1 , और ननद-भाभी सावित्री देवी और कृष्णदेवी पाकशाला में अपने शास्त्रका कौशल दिखलाने में लगी थी। मुझे भी कुछ नाश्ता करनेका याग्रह हुआ | मै " अधिकस्याधिक फल" माननेवाला तो अव नही रह गया हूँ, किन्तु सोचा ( देवी दर्बारमें ) जाना है, दो परावठियों और भीतर रखली जाये, तो काम आयेगी । परावठियों की मधुरताका क्या कहना है ? स्त्रियों को भगवान् ने जिस कामके लिये अपने चारों दायासे बनाया, यदि वह उसी काममे लग जायें, तो बस वही पारसवाली बात है, कुत्रा नहीं और लोहा भी सोना । मेरे ऐसा कहने से पुण्यसागरका रुष्ट होनेकी जरूरत नहीं, मै उनके बनाये भोजनकी निदा नहीं करता । खैर, चायपान के बाद पाँच-सात गूज़वरियों भी खाई और हम दोनो कोटी की ओर चले। रास्ता उतराई ही उतराई, अभी तो कुछ नहीं किन्तु लोटते वक्त के ख्याल से दिल कुछ उतना प्रसन्न नहीं था, मैने देवीका चालक की बात सुनाई, तो शर्माजी बोले -- यदि वहाँ पहुँचने पर उसने फिर मेघजाल फैला दिया ? मैने कहा -- " तब मै अपनी पुस्तक लिख दूँगा, कोठी देवी जैसी कुरूपा देवी सारे किन्नरमे नहीं है, बस स्त्रियों कुरूपा शिरोमणि श्यासोके विस्टकी गूँगी नौक- रानी देखी और देवियो में कोठी की देवी ।" मै फुसफुसा कर नहीं कह रहना, इतने ऊँचे स्वरमे वोल रहा था, कि आसपास के वान (ग्रीक) वृक्ष और उनकी बाड़में जहाँ तहाँ छिपे देवीके गण भी नुनले मुझे पूरा विवास था कि दवी पूरी तौर से सजग है। खैर, देवी "चालाक" व्हरी समझ गई यदि इस निठुर नास्तिकनं कहीं लिख मारा, तो उसकी पुस्तक तो चारा खूँटमे फैल जायेगा और मे यहाँ बैठी रहूँगी । दुनिया हमनेगी, काटीकी चडिका सचमुच कुरूपा है। उसने फिर<noinclude></noinclude> acbsgy4r9c6z5f1wpq8pm4xzo8o7kcl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५८ 250 195373 666107 2026-07-07T15:57:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666107 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३८ - किन्नर - देशम ( १६ ) देवीके चरणों में 1 - आखिर २३ तारीख शुक्रवारका शुभदिन श्राया । जव कि सवेरे ही सवेरे मैनें देवी के चरणोंमे पहुँचनेका निश्चय पुण्य सागरको सुनाया। महिले दिन इसलिये निश्चितकर सकता था, कि मे फोटो लेना चाहता था लेकिन कैमरा गलेमें डालकर बगलेके बाहर हुआ नहीं, कि सूर्य- को वादलोने ढॉक लिया । पुण्यमागर निराश हो गये । सवेरेकी चहलकदमीके अन्तमें पुण्य यात्राका निश्चय था । रास्तेमें पुण्यसागर कह रहे थे— व कैसे कोठी जायेगे ? धूप विना सचमुच फोटो नहीं लिया जा सकता था। मैने कल्पाके पास वादलोका रुख देखकर ताड़ लिया, यह किसकी कारस्तानी है । सतलजकी ओरसे ग्रथात् कोठी की ओर से - बादल ठीक उसी तरह फेंके जा रहे थे, जैसे जाड़ में लड़के हसे भाप छोड़कर खेला करते हैं । किन्तु यहाँ लड़कोका मासूम खेल नही, बल्कि देवी चंडिका तुली हुई थी मुझे पूर्णतया असफल करने केलिये, मैने पुण्यसागरसे कह दिया, यदि देवीका ह है, तो मेरी भी जिद है, हर रोज केमरा लटकाये चाऊगा, अभी पूर दो सप्ताह रहने हैं। देखें, तो देवी कितने दिनो तक दो-दो घंटे तु इसे बादल छोड़ती रहती है आखिर मुँह कभी तो थकैगा, और उसी समय वदा कोठी जा धमकेगा । मै अपनी वात पुण्यसागर के कान में नहीं कह रहा था, आस पासके देवदार के जंगलमे कोई देवीका गण हमारी बात सुन रहा था, उसने सारी खबर देवीको कह सुनाई। देवी- ने हट छोड़ दिया और जब ढाई मील तक जा लौटकर कल्पा पहुँचा, तो सूर्य फिर देवीके फैलाये मेघ जालसे बाहर या चुके थे | तरुण रेजर पंडित देवदत्त शर्मा से पहिले ही सलाह हो चुकी थी, कि एक दिन देवी के पास चलना है ।<noinclude></noinclude> 7gys7amq3mc13d5vm3b0c87vxotbmz3 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२५९ 250 195374 666108 2026-07-07T15:57:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666108 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कोठी देवी महातम २३६ मै चाय पीकर गया - चाय तो खैर मैं फीकी सिर्फ काढा पीता हूँ, किन्तु उसके साथ पुण्यसागरकी कृपासे फाफडके दो मधुमय चीले मिल जाया करते हैं। लेकिन शर्माजी भी चायपर डंटने जा रहे थे और ननद-भाभी सावित्री देवी और कृष्णदेवी पाकशाला में अपने शास्त्रका कौशल दिखलाने लगी थी। मुझे भी कुछ नाश्ता करनेका t ग्रह हुआ । मैं “ अधिकस्याधिक फल" माननेवाला तो अव नही रह गया हूँ, किन्तु सोचा ( देवी दर्वारमें ) जाना है, दो परावठियों और भीतर रखली जायें, तो काम आयेगी । परावठियोंकी मधुरताका क्या कहना है ? स्त्रियोंको भगवान् ने जिस कामके लिये अपने चारों हाथों से बनाया, यदि वह उसी काममें लग जायें, तो बस वही पारसवाली बात है, ना नहीं और लोहा भी सोना । मेरे ऐसा कहने से पुण्यसागरका रुष्ट होनेकी जरूरत नहीं, मैं उनके बनाये भोजनकी निदा नहीं करता / खैर, चायपान के बाद पॉच-सात गूज़वरियाँ भी खाई और हम दोनो कोठी की ओर चले। रास्ता उतराई ही उतराई, अभी तो कुछ नहीं किन्तु लौटते वक्त के ख्यालते दिल कुछ उतना प्रसन्न नहीं था, 'मैने देवीका चालकीकी बात सुनाई, तो शर्माजी बोले- यदि वहाँ पहुँचने पर उसने फिर मेघजाल फैला दिया ? मैने कहा -- “ तव मै अपनी पुस्तकमे लिख दूँगा, कोठी देवी जैसी कुरूपा देवी सारे किन्नरमें नहीं है, बस स्त्रियोमे कुरूपा शिरोमणि श्यासोके विस्ट की गूँगी नौक- ' रानी देखी और देवियांमें कोठीकी देवी ।" मैं फुसफुसाकर नहीं कह रहना, इतने ऊँचे स्वरने बोल रहा था, कि आसपास के वान ( चोक) वृक्ष और उनकी ग्रामे जहाँ तहाँ छिपे देवीके गए मी तुनले मुझे पूरा विसया, किदवी पूरी तोरसे नजग है। खैर, देवी "चालाक" व्हरी, जम गई यदि इन निठुर नास्तिकने कहीं लिख मारा, तो उसकी पुस्तक तो चारों खूँटने फैल जायेगी और में यहाँ बैठी रहूँगी । दुनिया तमकेगा, काटाकी चडिका सचमुच कुरूपा है। उसने फिर<noinclude></noinclude> i07wdbo3f3zczaxyh0ua3mjfdkdli3k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६० 250 195375 666109 2026-07-07T15:58:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666109 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-२४० किन्नर - देश में वादल फैलाने का नाम नहीं किया। फैलाती भी तो में लेखकके धर्मको छोड़ वैयक्तिक वैमनस्यके कारण अपनी सरस्वतीको श्रमत्यथवर न चलाता | देवी देवीका चेहरा और जनुकीती नाक तो सुंदर है ही, और वाये नथनेकी नथपर तो मै दिलोजान मे फिदा हो गया । रास्ते कुछ दूर तक तो हम देवदार और न्योजाके जंगलमें उतरते -गये । आज यहा जगल है, किन्तु शताब्दियों पूर्व यहा खेत थे। मैने कहा - मालूम होता है, पहिले यहा ग्राजसे अधिक आदमी बसते थे । - शर्माजीका कहना था -- नहीं, पहिले जगल काटकर लोग दो तीन साल खेती करके दूसरी जगह चले जाते थे । मै सहमत नही था -- पहिले तो दो तीन सालकी खेती के लिये इतनी परिश्रम से बड़े छोटे पत्थरों की दृढ़ दीवारे क्यों जोड़ी जातीं, जो शताब्दियों बाद आज भी - खड़ी हैं, दूसरे कोठो कोई प्राचीन सम्भ्रान्ता नगरी थी, जिसके मील धमीलपर जंगल फूँक अस्थायी खेत नहीं बनाये जा सकते। यह तो - खैर इतिहासकी बहर ठहरी, किन्तु ग्राज भी लक्षण मालूम होता है। कुछ वर्षो वाद यहा जंगल नहीं फिर खेत भी नहीं मेवोके उद्यान लग जायेगे । यह स्थान आठ हजारसे और नीचे है, जो मीठे मेवाके लिये प्रत्युपयुक्त है । रास्तेमे हमें श्रागे खेतभी मिले, वागभी मिले । वृक्ष सुनहली चूलियोसे लदे हुये थे । नीचे वृक्षोकी चूलियाँ छतोपर सुखाई जारही थी । घर, वाग, खेत, वनखड सव बीच- बीच मे बदलते जाते थे । कोठी देवीका वननिवास थाया, लकड़ी- पत्थरका तिरछी छतनाला घर था, जिसमे देवी कभी-कभी ग्राकर विराजमान होती हैं । यह देवरक्षित वनखड है, राजरक्षित वन- खड तो श्राख बॅचाकर लोग कुल्हाड़ा चला भी लेते हैं, क्योंकि जंगल विभाग हर जगह कहाँ वनपाल रख सकता है। मैने सैर करते समय एक दिन देखा, एक आदमी एक बहुत पतले कच्चे देवदारपर कुल्हाड़ा चला रहा है । हमें देखते ही वह दुपक गया। उसे क्या पर्वाह, किवीस साल बाद यह कई गुना अधिक और लकड़ी<noinclude></noinclude> bk7xkg95nabgiauyqak0ntkrn3nqhho पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६१ 250 195376 666110 2026-07-07T15:58:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666110 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चौदह- T ५२ हा देवन मान्दर (पृष्ट ३११ ५.३. सड्लाकी सुपमा ( पृष्ट-२८७)<noinclude></noinclude> 64s3h943u5t45lbdia97fqpj1l0sxct पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६२ 250 195377 666111 2026-07-07T15:58:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666111 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४२ 4 किन्नर - देश मे अखाद्य है | और वॉन, यह उच्चभूमिक हिमालयका कल्पवृक्ष है। हर साल हजारो पशु के प्राण यही बचाता है । यहाँ के गृहस्थ वान- का नाम बड़े सम्मान से लेते है । मैने शर्माजी के महगामीने पूछा- पत्तो में किनारे पर काटे हैं, पशु उन्हें कैसे खाते हैं ? उत्तर मिला -- बड़ी खुशीसे, उनके लिये हरा पत्ता हलवा है, सूखे को नहीं खा सकते | हम लोग पेटभर पत्ते नहीं दे पाते, श्रदाज करके देते हैं, जिसमें बर्फ पिघलने- के समयतक पत्ते चल जाये । क . कोठी पहुँचते-पहुँचते चूली के वृक्ष फलोसे खाली दीखते थे, वह छतोपर पड़े सूख रहे थे । आखिर हम कोठी गांव पहुँच गये । उस समय मुझे यह भी ख्याल नहीं आया था, कि कोटी इतना प्राचीन, इतना ऐतिहासिक महत्त्वका स्थान होगा। पानी की कुल पारकर यागे बढ़े। वाई और एक मंदिर दिखाई दिया। राम जीके सहगानी वनपालने कहा----यह भैरवका मदिर है, और वह है नीचे देवी मंदिर । मैने हल्के दिलसे कहा- चलो पहिले 'भैरवसे ही निवट ले । मन्दिर बाहर से भी उपेक्षित था और भीतर तो और भी बाहरी वराडेसे दो पोरसा नीचे पत्थर विछे प्रांगनके बीच एक चार-पांच हाथ गहरा नातिलघु पाषाणबद्ध कुण्ड था । बराडेसे भीतर मंदिर मे बुसिये, तो एक परिक्रमा सी थी, जिसके भीतर छोटीसी कोठरी गर्भमंदिर था। वहाँ दशभुज तथा दो हाथ लम्बी भैरवजीकी मूर्ति थी, गर्भगृह के बाहरका प्राय तीन हाथ चौडा छ हाथ लंवा अँधेरा-सा स्थान सरायका काम दे रहा था । सर्वसाधारण यात्री यहां टिकनेकी हिम्मत नही कर सकते; यहाँ आकर टिकते हैं भूल-भटककर यहाँ पहुँचे हमारे नीचेके सन्तजन । दो धूनियाँ कुछ ही समय पूर्व वहीं जली थी, जिनकी लकड़ी और कोयला अब भी वहाँ मौजूद थे। सन्तजन धूनी लगाकर यहां बैठ जाते, और फिर चिलमपर चिलम गाजा या कंकड़ "लेना हो शकर, गाजाना कंकड़, ""कैलाशके राजा, दम लगावे तो बाजा" कहते चलने लगता । मैं गाजा-कंकड़का विरोध नहीं करता<noinclude></noinclude> 21689njqv9b58cz57prea8pdouxci5r पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६३ 250 195378 666112 2026-07-07T15:58:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666112 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- देवी के चरणो मे २४१ देगा । उसे झोपड़ी बनाने के लिये पतती लकड़ी चाहिये । और साथही घरते ना वेदूर होना चाहिये । वन वह कुल्हाड़ा चला रहा था । सामा- जिक दायित्व जाये चूहे भाडने । समाजक प्रति दायित्वहीनताका उपदेश इनकी इन श्रशिक्षित किन का दे, जब कि हमारे शिक्षित करोड़पते सेठ कपड़े, यनाजने कट्रोत हटतेही समाजके गलेपर निष्ठुरतापूर्वक चलाने लगे । और केदारनायके यात्राग्रोन इनवाताय हाँ, त. देवराक्ष चनपड सचतुच पूर्णतया सुरक्षित था, किसकी शाम आई थी, देवी चडिहाके द्वारा रक्षित वनपर कुल्हाड़ा चलाये । वहाँ कितने ही बालक भी न थे । १६१० ई में जमुनोत्तरी में बानका मेने देखा था, तब हिनालनकी सभी स्वीपर इस वृत्र को देखता था, किन्तु यह नहीं ती काया है, जिसे हमारे यहाँ वान कहा रे बाजेका परचन कराया, पत्तेके है। युरोपका श्री विशाल वृक्ष मालूम था कि वहा जाता है | निम्न तो माना होता है, दवार दिवालका लकड़ी उतना होता। ईई व पीएनबी करी जी उनके उतना बड़ा होता है, न इसकी प्रचार पत्रोक देना इसीके नीचे रहा देवाचा से एक गुल के पद नहीं करते। वह जो हुने दी देशवीत देवदार को भी श्राता नावान नहीं नहीं पत हिनाचनीका किनारोवर काटे लिये बनते गाव नहीं है। मारा है। जपत गावाकडे हते हैं। पट जाड़ा ना हरे तथा अपनी शनिवार पूरी है। दिनपानीय जगदन पशुओंका आहारा होती है, जब कि चारों ओर भूमि दिन है। ले देवदार, कैल, न्योज़ारे पत्ते नकार रहते है, विन्तु यह पशुचये<noinclude></noinclude> 2omoj9fig1empc9b1v6itwc10r4oar4 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६४ 250 195379 666113 2026-07-07T15:58:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666113 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तेरह- ५०. कोठी देवीका मंदिर (पृष्ठ २६७), ५१ कामरूका दुर्ग (पृष्ठ २८७<noinclude></noinclude> dnsim1sb1hgiu44ijnehuzuwshtddju पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६५ 250 195380 666114 2026-07-07T15:58:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666114 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>• देवी के चरणो मे २४१ देगा | उसे झोपड़ी बनाने के लिये पतली लकड़ी चाहिये । और साथ ही घर से नातिदूर होना चाहिये । वन वह कुल्हाड़ा चला रहा था। सामा- जिक दायित्व जाये चूहे भाइने । समाजक प्रति दायित्वहीनताका उपदेश हम इन शिक्षित किन्न का दे, जव कि हमारे शिक्षित करोड़पति सेठ कपड़, अनाजने कंट्रोज हटतेही समाजके गलेपर निष्ठुरतापूर्वक छुरा चलाने लगे । हाँ, तदेक्षत वनपंड सचतुच पूर्णतया सुरक्षित था, किसकी शाम आई थी, कि देवी चडिहाके द्वारा रक्षित वनपर कुल्हाड़ा चलाये। यहां कितने ही बाब मान थे । १६१० ई में जमुनोत्तरी और केदारनायके रानमें बानका मने देखा था, तब हिनालनकी सभी यात्राश्रोन हिताय स्वीपर वृको देखता था, किन्तु यह नही मालूम था कि यहां प्रतीक था है, जिसे हमारे यहाँ वान कहा जाता है। निम्मल भारत होता है, हमार दिनाजका जन रेपरेचन कराया, पत्ते के का चोक विशाल वृक्ष उतना बड़ा होता है, न इसकी उतना अच्छी शता । ईई वर्ष प्रचार पहले पत्रक । उनके पुता देना इसी के नीचे रहा कर दे। हिलनाली से देवान याचा से एक गुल श्री वी हुन देवका पद नहीं करते। वह देवी देवदारको मी याना बाबान नही तेवर अथवा पन दिनाचा बाबा है। पापत किनारोवर काटे लिये गजाननटे ते है। जानना हरे तथा नी व्हीवर पूल है। दिन जो पोका प्रातरी मला होती है, जब कि चारों ओर भूमे दिदि हो जाती है। देवदार, केज, न्योज़ा के पत्ते दाखवितु वह पशुचये<noinclude></noinclude> hg2r6yz5yoz9hik8jqbx78z9kivi1lt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६६ 250 195381 666115 2026-07-07T15:59:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666115 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४२ किन्नर - देशम खाद्य है । और वॉन, यह उच्चभूमिक हिमालयका कल्प वृक्ष है। हर साल हजारो पशुओ यारा यही बचाता है । यहाँके गृहस्य वान- का नाम बड़े सम्मान से लेते है । मैंने शर्माजी के सहगामीले पूछा- पत्तो में किनारे पर काटे हैं, पशु उन्हें कैसे खाते हैं ? उत्तर मिला- बड़ी खुशी से उनके लिये हरा पत्ता हलवा है, सूखे को नहीं खा सकते । हम , लोग पेटभर पत्ते नहीं दे पाते, श्रदाज करके देते हैं, जिसमें बर्फ पिघलने- के समयतक पत्ते चल जाये । 1 व कोठी पहुँचते-पहुँचते चूली के वृक्ष फलोसे खाली दीखते थे, वह छतोपर पड़े सूख रहे थे । आाखिर हम कोडी गाँव में पहुँच गये । उस समय मुझे यह भी ख्याल नहीं आया था, कि कोटी इतना प्राचीन, इतना ऐतिहासिक महत्त्वका स्थान होगा। पानी ही कूल पारकर आगे बढ़े। वाई और एक मंदिर दिखाई दिया। शम.जोके सहगामी वनपालने कहा -- यह भैरवका मंदिर है, और वह है नीचे देवीका मंदिर । मैने हल्के दिल से कहा- चलो पहिले 'भैरवसे ही निवट ले | मन्दिर बाहरसे भी उपेक्षित था और भीतर तो और भी बाहरी बराडेसे दो पोरसा नीचे पत्थर विछे ग्रागनके बीच एक चार-पांच हाथ गहरा नातिलघु पाषाणबद्ध कुण्ड था । वराडेंस भीतर मंदिर मे बुसिये, तो एक परिक्रमा सी थी, जिसके मीतर छोटीसी कोठरी गर्भमंदिर था। वहाँ दशभुज तथा दो हाथ लम्बी भैरवजीकी मूर्ति थी, गर्भगृह के बाहरका प्राय तीन हाथ चौग छ हाथ लंबा अँधेरा-सा स्थान सरायका काम दे रहा था । सर्वसाधारण यात्री यहाँ टिकनेकी हिम्मत नहीं कर सकते; यहाँ आकर टिकते हैं भूल-भटककर यहा पहुँचे हमारे नीचेके सन्तजन । दो घूनियों कुछ ही समय पूर्व वहाँ जली थी, जिनकी लकड़ी और कोयला व भी वहां मौजूद थे । जन धूनी लगाकर यहाँ बैठ जाते और फिर चिलमपर चिलम गाजा या कंकड़ "लेना हो शकर, गाजा ना ककड़, ""कैलाशके राजा, दम लगावे तो आाजा” कहते चलने लगता । मैं गाजा ककड़का विरोध नहीं करता "<noinclude></noinclude> dn21kbw4qnktc5j3a5d1qcp17qzzxsf पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६७ 250 195382 666116 2026-07-07T15:59:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666116 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवी के चरणों में २४३ हूँ के लिए कभी कभी वह आवश्यक हो पड़ता है; किन्तु यहाँ धर्ती देखकर मेरा मन जरूर सिहर गया, क्योकि इनके दो हाथपर ही ४ लड़ी और १७ पत्थर की मूर्तियों है, जो दसवीं सदी के ग्रास- पानी है। मारे किन्नर तनी प्राचीन मूर्तियों मेने नहीं देखी, धौर साथ ही शादियोगे चैद्रगढने यह है हरगौरी, सरस्वती यादि ब्राह्मणधन मूर्तियाँ | गगोत्तरीके रास्ते में भैरवपाटीसे नीचे जागला पुल- एक धर्मशाला धुनी घोर चिलमपर नौछावर होगई । बन्दा पाली रही है, यदेकभी आग लग गई, तो इस बहुपुरातन भारत वञ्चित हो जायेगा । के लिए भी कोई स्थान होना चाहिये, यहाँको सर्दीम नचिने का ये पल पेके नीचे धुनी नहीं रमा उकते। देवी काफी धनी अपने भक्तोंके लिये एक घर खाली करा दे, या नया = है, उसे दे ताकि उपेक्षमूर्ति प्राचीन मूर्तियों की रक्षा हो सके । यदि यह न हो, स्थान यहाँ नहीं हिमाचल- संग्रहालय है । हाँ, यह मूर्तियों व उपेक्षित है। जिरका सारे पहाड़ी लोग पार्थवादी है, प्रातिर "सुर नर मुनिको येही रीती । स्वारथ लाय रेस प्रीती ।" वह उसी देवता की मान-पूजा कर सकते हैं, जो उनके दुख खमे पीव हस्तामलव दे, सिर्फ विश्वासते नहीं. देवताको स्वातरे बोलना होगा। भैरवजी और उनके बीत साथी जादू कटरी में सादीचे अषिक समयते बन्द हैं, वह न मुँहने केल गहने हैं, न सोतते ही, फिर कोरों लिये क्यों न तीन से। नगे । कभी कभी कोई पदे भी जाता है और वे, जो कभी दी कभी यहाँ पहुँचते हैं--जब आते हैं, तो भैरव और विवश भाग्य खुल जाता है। किन्तु इस समय तयले केएन मनमा कब बन्द होगा, कब इन रामूर्तियो के विपरचे धागे लटकतो ग्रागकी तलवारको टा?<noinclude></noinclude> sazo4n1x2gwdonmy44vdjwajenso67n पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६८ 250 195383 666117 2026-07-07T15:59:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666117 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४४ किन्नर - देशमें चोरवत्ती हुन साथ नदी लाये थे, और मै वीके गर्भ : था । खैर, न्य जेके हीरकी लकड़ी लोग काफ जा करके रखते हैं, जो मोमबती से भी तज जलती है, यद्यपि धुत्रा अधिक देती है, तो भी वह सुगधित होता है। शिर बनाकर हम भीतर बुजे । सामने नानाप्रहरण- घारी दशभुज "भैरव जी महाराज थे। मुझे इनके भैरव होने में सन्देह है, यद्यपि इसके लिये यहाँ के सारे लोग और पगी ब्रह्मचारी भी गंगा-तुलसी उठाने के लिये तैयार है। भैरव के साथ कुत्ता तो जरूर होना चाहिए, नेगी सतोखदात के कथनानुगर पहिले कुत्ता था । मुँह कुछ बिगड़ासा है, लेकिन उसकेलिये मनुष्य को दांवी नहीं ठहराया जा सकता, क्यों क यहाँ तक मुस्लिम जहादी कभी नहीं पहुॅचे। शानद कालने ऐसा किया है, शायद कभी छोटी मोटी परीक्षा हुई, जिसमें मैवजी खरे उतरे । मुख कुछ विद्रूप बनाया भी गया है, नोचे- का शरीर श्रद्धा है। पैरोके श्रावण से नामूर्ति होनेका सन्देह होता है, लेकिन स्तन नदारद । मूर्तिकार मरतोरण है, जो चूमता देखने में पत्थर मालूम होता है, किन्तु है काउका । शायद यह मूर्ति के साथका नहीं है । किन्तु इसे अर्वाचीन भी नहीं कहा जा सकता । अर्वाचीनकाल मे ऐसे मकरतोरा के बनाने का रवाज नहीं था । इपर उत्कीर्ण रुजा तेदुन्दर न होनेपर भी उन काल के मूर्तिशिल्पको प्रकट कर रही थी, जवकि वह भी हा गेन्मुख नहीं हो पायी थी । भैरवकी दस भुजानोमें दाहिनी ओर वरदहस्त, खड्ड, शूल, पाई और पनुप, शूल याद थे । भैरवजीकी वाई और पीवी दीवारोंसे मटाकर वो मूर्ति रखी हैं। सभी चू-पु, देखने में विन्कुल प्रत्यकी । सोच रहा था, फोटो लेने में इतना स्वार्थी नहीं हूँ, कि अपने ही दर्शनका पुण्य लूट संतुष्ट हो जाऊँ । मेरी तर्थयाना ऐ होती है, जिसमें दूसरे भी दरख- परा कर रूक । ऐसी जगहों पर बहुत आज्ञा स्वीकृत लेने के भी - फेर नही रहना चाहिये । यदि उठ सके तो वाहन से चलो और गी<noinclude></noinclude> smmh0brop1p4ku1lu0y8mpm4eeeai7z पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२६९ 250 195384 666118 2026-07-07T15:59:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666118 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवी के चरणों में २४५ दाग दो, छावा केमरे में याजाये, कोई देखे कोई न देखे, फिर पीछे देखा जायेगा । हिलाने डुलानेर मालूम हुआ, दो वीणापाणि (सर- स्वती ) तथा दो दूसरी फाष्टमूर्तियाँ है । शर्माजी ने भी सहायता की, फिर वनपाल भी आगे बटा । चारों मूर्तियां वरां श्राई, फिर बाहर दीपककी चौकीपर दीवान के सहारे खड़ी करके मैंने फोटो ले लिये, ठीक उलग या नहीं, यह तो देवता ही बनला सकते हैं। बामांके समा- अनि पार्वती सहित शिव की मूर्ति पत्थर की थी, और उसे हिलानेमें नीचे कुछ प्लास्तर टूटता, एमलिये उसे और दूसरी पापाय - मूर्तियोको मैंने छोड़ दिया । आखिर यागे श्रानेवाले समानधर्मियों केलिये भी तो कुछ रहना चाहिये। पिछली दीवार की मूर्तियों अधिक खडित है । जान पड़ता है, हम मन्दिर में हर चीजपर सफेद पुचारा फेरना धर्म, २ जाता है। फर्श, मकरतोरण, दीवार और दीवार के पासकी भूतिया नवपर वारवार पुचारा फेस गया है। मूर्तियोंपर तो वह अंगुल- चतुन मोटा जम गय है । यदि उन्हें बुलाया जाये, वो शायद किसी- पर कोई ग्रक्षर भी दिखलाई पड़े । यदि तीन अक्षर मिल जायें, तो शादी निश्चय श्रावावी हा सकता है । किन्तु देवता-काली के स्थान कनीने अभी माना उचित नहीं समझा । -यदि बराड़ या जगमोहन से विकुज नीचे ही कुएड है। पानी यो। टर है, नहीं तो छलांग मारी जा सती थी । वर्ग पाटील बडी हुई थी। अगर यहाँका देवरा पौधा है, कितना से कुरा, वर चार बूँद जूठे-पीठे पानीपर कम खड़ा होता ' विहारों वीगने दी रामजी उसे है ? उन्हें मेरे नामकी गुठलियाँ। शर्माजी- सड़ी थी। मैंने पूरा आश्वर्य हुआ, क्योंकि - भी बयाना उ ऊपर मान नहीं गया था। देला उच- भुत्र नंद है। सचमुच चनूर का बेरारना पौधा है। घरों और जी कितना ही सर अगूरी यह निर्जनता देखी जाती<noinclude></noinclude> pkjumqlvxcenfq4mss9q65up93dzak5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७० 250 195385 666119 2026-07-07T15:59:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666119 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>4 २४६ किनर - देशमें जाना चाहिये, जादुनो है - बस को जय दा बूँद है, किन्तु कोटा बराबर नहीं। कुड गंडबा बनवाया हुआ है। उससे लगे अनेक विशाल पत्थर ही सिद्ध करने हैं, कि ये भी छोड़ के नहीं है | पाडवोके श्रज्ञातवास के सारे वारह वर्ष निर्फ कनौरमं वीते थे, इसीलिये तो वह द्रोपदिनोती खान है। पंगी व्रतचारीकी सांजो के अनुसार यूला, छोटी, करमीर (किश्मीर), रडू, लहू, कनम्, कामरू, रिव्वा, मोरङ, ठगी, बारड, ननी पाके 1 की जगहें हैं। दूसरे गवेषकका कहना है, नोरमें ता उन्होंने नतलज- की धारा बदलनी चाही, किन्तु समयने साथ नहीं दिया । ननव यदि साथ देता, तो ग्राम सतलजका रुख पाकिस्तानकी ओर नहीं गा सागरकी योर होता । कुंडमे महलिया बहुत हैं, काठीदेवीकी उन्नर जितनी निगाह रहती है, उननी भैरवार नहीं। कहते हैं, वह कलियों न घटती न वढती उतनीकी उतनी ही बनी रहती है । देखा न देवा- का चमत्कार ! चर्चा चल पड़ी, तो एक सचगने कहा- सारी मछलिया मादा है नर कोई नहीं है सवाल हुआ यह कैसे ? बतलाना- पहिले एक कोली था, वह समय-समय पर समन्दर (सतलज) से मछली पकड़कर कुंडमे डाल दिया करता था, उसको ही विद्या माथी । अर्थात् पिपकी साइन्स सम्बन्धी दूसरी भारी भारी खोजोकी भाते ह विद्या मी कोलीकी बेवकूफीके कारण भारतसे गई । मैंने उनने कहा-- तब तो नई मछलियां डालने पर दो चार वर्षमें कुंड मछलियोसे ही भर जायेगा । पुण्यसागर का कहना था ... " कुंडको हर साल साफ कर दिया जाता है और पेदीमें भी मिट्टी बालू नहीं रहने पाता, फिर कूलसे ताजा पानी डाल दिया जाता है। मछलियों उस समय पकड़कर बर्तन रख ली जाती है। शायद बालू मिट्टी अभावले अंडे तर हो जाते हैं ।" सभी मनी इस नारे में बोर मतभेद है, सच्चाई क्या है, इसे तो " कुल ही हाथ नीचे बैठी "माता नाव" हा जान । फोटो लेते लेते हो बाधा गाव जमा हो गया था।<noinclude></noinclude> tgjpn1nvhv8894fvmlr1bo1l0iyupyr पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७१ 250 195386 666120 2026-07-07T16:00:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666120 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' देवीके चरणों में २४७ फाटकके बाहर एक से देवी मंदिर की योर चहो, जो दूर नहीं था। काफी लवा चौड़ा चौकार खुला जोगन था, जिसके बीच मे एक छोटामा चारो चार खुला काठमंडप था । श्रागन के एक कोनेपर फाटक से दूरकी और पत्थरका एक शिखरदार चौकोर गुटका मंदिर था मंदिरमें लकड़ी की दजिया जड़ी थी। पूछनेवर मालूम हुआ, भीतर सीनला गाई विराज रही है, बुटके मरनेके लिये बैठी है । उनकी बुद्धिपर तर या रहा था। हाँ, मंदिरके पान बाहर ढा शिवलिंग विलख रहे थे, एक तो अत्रमिहित श्रमसे कम खडा हा था, दूसरा श्रीविहीन जान पताना देवीके सदिरकी और नाष्टांग दंडवत् करते कुछ मांग रहा था। यह एते देवता कौन फुल-अच्युत देनेकेलिये तैयार ह - बेलपत्र तो काश पार्नल मंगाकर ही चढाया जा सकता है, क्योंकि यहा देवदारीके साथ उनकी निम नहीं सकती । ग्रवतक पगी चारा परमानद चेतन्य भी हमारे साथ हो लिये थे, श्रीर अपनी पेण्याची ओर तनवो हमे लाभान्वित कर रहे ये । जान पड़ता है, और पीपल ही बांके धर्म की पहुँच है । पहुँचनेने उनके पल कट जाते हैं, समुद्र का जल लगते ही वह गल जाता है, यही श्रीकाशजी विलायत अशी दिनमा ° लौटने पर नि हो गया था। का दर्जा पूजा केलिये ब्राह्मण होगे इसकी आशा ही नहीं हो उनके ज्ञानने लाभ उठानेका अवसर कहासे मिल किंतु उसकी कुर्गा नाचारी पूरा कर रहे थे । दादोनेका दावा वा शर्मा और कृत्यायन भी कर धना से शालियापके पजारी और अपने राम उनसे पाटन के भीतर कृते । बहुत छोटासा (पवकप स्थान नहीं हो सकता ना। ना एक " भाग ना, जहा चार चकमें परत हिनी ओर विका<noinclude></noinclude> pdsifvvnafm3jz46n4868hfvlfw6wxz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७२ 250 195387 666121 2026-07-07T16:00:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666121 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४८ किन्नर - देश में मंदिर और बाईं ओर चंदिकाका कोठागार है। फोटो लेने-लिवाते पुजारी भी ग्रा पहुँचा। वह एक अधेड़ कनेत था, जो साथ ही साथ देवीच प्र.क्ष (देववाहन) भी है। यह नुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई - चलो देवीकी खटोली उठानेकी श्रावश्यकता न होगी, ग्रोक्ष मुहने देवी स्वयं वोल देगी । मदिखी हतार इतके अतिरिक्त दोनका छत्रमा भी लगा था । "मंदिर का बना" पूछने पर कितने लोग तो राजा दर सेह- का नाम ले रहे थे, लेकिन पगी ब्रह्मचारीने हटतापूर्वक कहा--- पाडवोने बनाया । ब्रहाचारीको सवेरे ही सवेरे माईका प्रताद -- मालूम नही अगूरी या बेमीका - मिल गया था, और उनका मुंह लाल हो रहा था । किन्तु ब्रह्मचारी पुराना श्रखाड़िया ठहरा, उसपर पाचदस चर्षकका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । तो मंदिर पाडवोने बनाया अर्थात् कमसे कम पाच हजार वर्ष पुराना है, इसकी आधी लकड़ी बाधी पत्थर की दीवारे, देवदारको कड़िया और किवाड़ सारे ही पाडवोके बनाये हैं । अवतक पुजानि द्वार खोल दिया था । दाई ओर च विमान था और वाई और कालीका । यहाको सर्वेसर्वा चडी ही है, काली तो ऐसे ही मुसाहिबी कर रही है। चडीके बड़े मुंडमें कई चेहरे लगे हैं, जिनमें सामनेवाला सोनेका है । कह नहीं सकते शुद्ध सोने के पतरेका है, या ताँबेपर मुजम्ना किया हुआ है। चं डेकासे मैने मन ही मन कहा - "भई । नत्थ तेरी गजब ढा रही है ।" ब्रहाचारीसे पूछना जरूरी नही समझा, नहीं तो कह देते 'नृत्यको द्रौपदीने अपने हाथो देवीको पहनाया | पाडवो के अज्ञात प्रवास के प्रतापसे कनौरमे द्रोपदिया. की कमी नहीं । यहा ती द्रोपदी-सम्प्रदाय घर-घर माना जाता है। देवी के विमानमे देवी मुडसे नीचे चादी के पत्तरकी एक मूर्त्ति थी यही चिनी ठाकर दसरामकी पुत्री है। देवी के दर्शन हुये, कालिका के भी । अव ढव्ला के भविष्य कथनका निर्णय कराना था । देवीं कोई पाच वर्षकी बच्ची नहीं थी, कि बिना<noinclude></noinclude> 2feit7fwevwyfcbmqrqa4yw4iytq43m पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७३ 250 195388 666123 2026-07-07T16:00:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666123 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवी चरणों में ૨૪E. उसको स्वीकृति उसे किमी ऐरेगैरे नत्थू खैरेसे बांध दिया जाये। मैंने अपने जान होशियारी की, किन्तु देवीने एक न चलने दी। मैने मांना -- यदि यो के मुँहसे देवीने पूछे, तो क्या जाने प्रोक्ष रा जाये और ना कर दे, यदि विमानारूढ़ मुझसे पूछे, तो भुर्ज के लचीले सयुं तचका खाकर न जाने मुडको "हॉकी ओर लटका दे या “नदी” की ओर | इसलिये पहिले चिट्ठी डालनी चाहिये | दि "नहीं" निकल जाये, तो फिर भी एक मौका और पूछनेका रह जायेगा। के हाथमे लिखकर दो यो डलवाई । ज्येका पाया तो था ही, निकला ""याद नहीं करना" | क्या करे ? देवी तो जान पड़ता है अपनी किसी शर्त और किसी दामपर बेंचने के लिये तैयार नहीं । न दूसरी चिट्ठी भी ले ली, और, ब्रशचारीका अलग ले जाकर दूसरी चिट्ठी दिखलात हुये कहा लो, देवी ग्राहकेलिये राजी है, किन्तु शव विमान उत्थापन या योद चाहये | अभीतक लोगों -- द्वारा एक वार और निश्रय करा लेना पता नहीं था कि देवी चिट्ठीन क्या पूछा गया था। समझते होगे, यह पटेत दूसरोंकी भांति भी दुखदुखकी बाते धूड़ेगा। उन्हें क्या मालूम, यदि वे करना होता, ना याज पकाराम सा त्रिमूर्ति, समूचे देवी-देवताओं ने शिर पर न होता, और वैती कोटि देवता श्रद्धा-यहावा-ईश्वर के साथ उसने "त्राहि नाहि की पुतर नहीं करते। लेकिन जब उन्हें बानसातून हुई, तो और साथ + पुजारीका मत्था और उदयता जुलाने का बात कहने पर प्रोने कहा -दिना देवीकी आवां वरनही हा बता । श्राजा लेने के लिये विमान उठानेवाले मीना - विकी जोड़ी नहीं उठा सत्ती । पड मनिलाबाईन मेने वहनीज पेशनर मुहर्रिर (लिपिक) मत्तर ग्रामे वा तीन तीन ब्राढात्रा पनि धर्मानने इनके बारेमें --- देवीके सरदार है। धर्मानंद हाथ जाड़ने लगे ना आपको तो कुल नहीं होगा, हर बल-पच्चेदार आदमी है। -<noinclude></noinclude> ljsossbcu17h98bspq6sunsl0oxl07n पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७४ 250 195389 666124 2026-07-07T16:00:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666124 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५० किन्नर - देशमें मैंने भी सोचा- मुझे क्या पड़ी है, तो गोना था बुशहर मे गनाका हुआ, देवताकात भी बहुत दूर नहीं दिखाई पडता, बेचारी देवी निरकुमारी है, उतने दुनियाका खट्टा-मीठा खुलकर देखा नहीं, एक तकिये दो सिर हो जायें, ता क्या जाने इनका कुछ कान बन जाये। लेकिन " बनाएकाले विपरीत बुद्धि को गौन रोक सकता है? X 1 X कांठी बीते तीन चार घटे बहुत कार्यव्याक्ति थे । लौटने समय मस्तिष्कमे तूफान उठने लगा, और वह क्षणिक दुकान नहीं था। देव से मुके कुछ लेना-देना नही या, नवाल था भैरवजी और उनके यि । यह यहां कहासे ग्राये ? किनने इन्हे वापर स्वार्थी देवपूजक दशमं ये परमार्थी अचल देवली कहाने था धम्की ? सचमुच यहाँ मिट्टी-पत्थर धातु-काष्टके पूर्ण शरीरवाले दब- ताथों की कोई मांग नहीं। मोदा वही जाता है, जहाँ उनकी नग होती है । यहा त वे ही देवता चल सकते है, जो 'गंगा' (विगान) पर बैठे नाच सके, जिसमें उनके अगल-बगल लरने और ऊपर नीचे ऊलने सकेतसे वातचीत की जाये । पुरानागर ने कहा-- पहलवान जैसे श्रादमियांने लट्ठोका रोककर रखा, किन्तु विमान रिले बिना नही रहा । तिपाई से भूत बुलानेवाले भी एक ही कहते है सोचते हुये में वाला --जरा लचकदार लढा हटाकर देनदार या लोहे कल लगा दो, तब देवी-देवता ऊते, तो जानू । सब कलना हा है, तो क्या जरूरत है दो जनो कथंपर ऊलने की, धरतीवर पंजे हो वैठे क्यो नही ऊलते ? खैर, हटाइये उन बच्चो की-सी बातांका वाल तो है, यह मूर्निया यहाँ कैसे थाई ? ब्राह्मण धर्मकी मूर्तियों है, सोटी ना धर्मकी, और यह है बौद्ध दश, मलेय देश । मूल विरजातिर प्रथम चाया, फिर भोटीका प्रभाव तथ उनके बनिष्ट सपर्फ से बड़े पैमाने पर कवि हुआ | रे विचारों से प्रभावित हुये । याज विरा<noinclude></noinclude> 9y3mymsft5k8a35pvmrw11ozkha1upt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७५ 250 195390 666125 2026-07-07T16:00:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666125 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवी चरणों में २३.१ १६ से ६० प्रतिशत मूल) नाव शब्द, २५ से ५२ प्रतिशत हिन्दी शब्दो १४ प्रतिशत तिब्बती शब्द मिलते है। हिन्दी यासे सम्बन्ध तीन हसान्दियोग है, किन्तु तिक्त शताब्दियों (जतवाने तेरहवी तक टी थी। घनिष्टता छ इसी समय १४ सैकड़ा शब्द या पहुंचे। ये शब्द साधारण नहीं है । सारा कनौरी गिनती तिती है । "हे", "नहीं" शब्द भी तिब्बती गापाके है. जो बतलाते हैं कि भटकान्त प्रवेश कितनी कोठी की मृतिका नव क्या हो देवाची और दिन दूवक हुआ था। कता है ? मूर्तियां जिन की है, उसे देखने हुये काले दसवी रदातककी तीन हा है जब रनोट जबर्दस्त प्रभाव पडा, उतका परवान है जो नपा १४ सेना दिना शन्द, मूर्तियों के बनवाने- बाले मी दाराव बुद्र जासू नहीं हो सकते। उन समन (ट) मुरी छोटी नोटी राजधानी रही होगी, दानंदानी मनीट वाग्राज्य और पद्धति मुद्रा बनाना कियुक्त यही बात मालूम किन, जब ति नाव नो या लाया महीभाता था। लाप्रवरथामे वह काल रेमी वा अर्थात् पारा और विशनबादी हो कता है, २१७६०२०) " 1 काल होने या योजनामा (६३ ई०) ने ना नहीं लिया था ट に कई शाकवश द्या जीवन पड़ोरा था, कन्नौजका दीपम तीन और J ' (दिन) पाव (४-४५), विजय .<noinclude></noinclude> 4bmz179y9h8hs65yqyxi682iuee35pm पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७६ 250 195391 666126 2026-07-07T16:01:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666126 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५० किन्नर - देशमें ये भी सोचा- मुझे क्या पड़ी है, व्रत सोना या बुशहरमें नाका त हुआ, देवताका व्रत भी बहुत दूर नहीं दिखाई पड़ता, बे देवी निरकुमारी है, उतने दुनियाका खट्टा-मीठा खुलकर देखा नहीं, एक तकिये दो सिर हो जाये, ता क्या जाने इनका कुछ कान वन जाये। लेकिन "विनाशकाले विपरीत बुद्धि" कां कौन रोकलकता है? X X काठी वीत तीन चार घटे बहुत कार्यव्याक्ति थे । लौटने समय मस्तिष्णामे तूफान उठने लगा, और वह क्षणिक ज्ञान नहीं था। देव से मुझे कुछ लेना-देना नहीं या, नवाल या भैरवजी और उनके | यह यह कहासे श्राये ? किन उन्हें बनाया? 1 स्वार्थी देवपूजक दशमे ये परमार्थी अचल देवमती कहाने श्र धरकी ? सचमुच यहाँ मिट्टी-पत्थर धातु काष्टके पूर्ण शरीरवाजे - ताकी कोई मांग नहीं । सौदा वही जाता है, जहां उनकी मोन होती है | यहा तावे ही देवता चलते हैं, जो "गंगा' (विमान) पर बैठे नाच सके, जिसमे उनके अगल-बाल लम्बे और ऊपर नीचे ऊलने के सकेतसे वातचीत की जाये । पुएनसागर ने कहा-- पहलवान जैसे श्रादामयांने लट्ठोका रोककर रखा, किन्तु विमान हिले बिना नही रहा । तिपाई से भूत बुलानेवाले भी ऐसा हो कहते हैं, सोचते हुये में बाला -- जरा लचकदार लट्ठा हटाकर देवदार वा लोहे क? लठ्ठे लगा दो, तव देवी-देवता करें, तो जानू । पर कहना हा है, तो क्या जरूरत है दो जनो कधेपर ऊतने की, धरती प हा बैठे क्यो नहीं ऊलते ? खैर, हटाइये बच्चो वाता वाली है. यह मूर्तिया यहाँ कैसे थाई ? ब्राह्मण धर्म की मूर्तियां है, सोटी प्राण धर्मकी, और यह है वोद्र दश, मलेठ देश । नूल जिर जातिवर प्रथम चायका, फिर भोटीका प्रभाव पड़ा। इनके बनिष्ट नार्कले बड़े राहु दूरे के विचारों और भारी प्रभावित हुये । यान किनभने<noinclude></noinclude> hljr6f9jfwdnkyvrxmewrxaypgi28bg पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७७ 250 195392 666127 2026-07-07T16:01:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666127 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>गन्दा प्र दिवाली है. परम ई वाले ब तिये समुद्रसप ही है, क बाया नहीं था, वा यथाव वीजा है, वालदिल दूरी ही है संसूचन द्वारा स्थापित साम्राज्य (३१७-२०२० लगा और भी उनके द्दे-जिनानन् तिब्बत राज्य स्थापित नहीं कर लिया था ट पाय के कोई वागधर्मी शानक-वंश ग न्य सिमीका पड़ोसी राज्य था, कन्नौजका हासनपर दसवी सदीं प्रथ रवि ही नहि (विनायक) पाल (६१४-४५) 1<noinclude></noinclude> mzlb33x3lq02pvbbxjrmedvow2ccbwy पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७८ 250 195393 666128 2026-07-07T16:01:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666128 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५२ किन्नर - देशमें महेंद्रपाल (६४१ ४ ई०). देवल (६४८-५३), विनायकपाल द्वितीय (६५३-५४), महिपाल द्वितीय (६५४-५५), वनराज द्वितीय (६५५- ६०), विजयगल (६६०-१०१ ई०) बैठे थे । प्रथम महिपाल प्रल प्रतिहार शासक था, हो सकता है, उसने अपने उत्तरे पड़ोसी साम्राज्य- की निर्बलता से लाभ उठाया हो। इसमें तो संदेह ही नहीं, कि श्राजकी भाति उस समय भी किन्नर अपनी भेड़-बकरियोंको सर्दियो में देहरा- दून के जिले में ले जाते थे और उनके द्वारा हिमाचल के इस अंचलकी कोई बात कन्नोज से छिपी नहीं थी । स्पाकी घाटीसे एक सक्षेप में हम कह सकते हैं, कि मूर्तियोंका समय तो क मौरियो (छठी सदी) - हर्ष (सातवीं मदी पूर्वार्ध) का समय हो सकता है, अथवा प्रतिहारवशी प्रथम महिपाल- विजयपालका समय । यह वात भी ध्यान रखनेकी है, कि कोठीसे दत मीलपर ही डाँडा पार करके हम भागीरथीकी उपत्यका पहुँच जाते हैं, जहा उत्तरकाशी (वारहाट ) में मौखरि हर्षकालीन (लिपिके अनुसार) अभि- लेख अष्ट धातु के एक विशाल त्रिशून (शके) की जड़में खुदा हुआ है, और वही पश्चिमी भाट राजवशी शासक नागराज (ग्यारवी नदी- पूर्वार्ध) द्वारा बनवाई पीतलकी सुन्दर और बड़ी बुद्धप्रतिमा भी मौजूद है। यह शक्ति उस समयका प्रतिनिधित्व करती है, जब भी पश्चिमी हिमालय और पश्चिमी तिब्वतमे भी भोटमा साम्राजीय और जातीय विस्तार नहीं हुआ था। तो मूर्ति होगी उत समयकी, जब सोचन वशज क्यिद-दे-गोमा गोन् (६८३) ने फिर अपने वश के लिये पश्चिमी तिब्बत और पश्चमी हिमाचल के भी कितने ही भागका शासक बना दिया था । राजनीतिक परिस्थितिपर यान रखते हुये हम कोकी मूर्तियों को दसवीं सदी ही मान सकते हैं, यह भावना श्रमिक है, यदि हम केवल मूर्ति कौशलपर विचार करते हैं । अन्तिम निर्ण सो किसी अभिलेख के मिलनेपर ही किया जा सकता, जिसका मिलना संभव नहीं है ।<noinclude></noinclude> bligt4iyv50c5szupcx0gi4oios53h2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२७९ 250 195394 666129 2026-07-07T16:01:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666129 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवी के चरणों में २५३ तिब्बती प्रभु के दोनों काल (३४०-६०२ ई० र ६८३-१३०० ई०) में निरपरानाको प्रवचता की सभावना करों नहीं हो सकती, यह प्रश्न उठ सकता है। सभावना विल्कुल नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता, हिन्दु एक ही समय ब्राह्मण प्रमुख ओर भेट प्रभुत्व दोनों प्रबल रूपसे नहीं रह सकते थे। हम देखते है, किन्नर भाषा तव जाति पर तिब्बती गिनती और १४ प्रतिशत शब्दोंके रूपमें भटका प्रबल प्रभाव पड़ा है, जो उभी समय हो सकता है, जबकि ब्राह्मण प्रभुत्व उतना प्रबल न रहा हो। कोठीका शामक ब्राह्मणधर्मी श्रमवशी भरा बौद्ध होते भी दूसरे दोता है - ब्राह्मण प्रभ Y हो सकता है, क्योंकि भट-राजा के थे। किन्तु फिर वही प्रश्न वल रहते समय भटभापाका इतना गहरा प्रभार किनार केसे पटा बोटीक सूनानी र हाक्षिक समस्या खड़ी कर दिया है, में संदेह वा जली कुन्जी भी वह से मिलेगी, जबकि यहां बदियारा दोनाने ह जायेंगे, यर उन्हें स्वयं भी जानेवावि विद्या की जिसमें प्रति विविद है, कि पाच यही कलमें प्रेम हेगा। यह तां देवर भावाने पोछी (प्रासादपुर ) नगरी में थी । उस राजय रही एगा। ओर आज फैनादीत करती है। हात माजी शिवा (जिसके देश का केन्द्र रहता श्राया है। सती देशा नवी वंश प्रानसाने में दिष्ट घन है भीठी और के समय वो (ड माघी दि F कुनकर शायद स्वादेव नी रानटी में हो सक<noinclude></noinclude> 69hhtvahg8ntkpv30adrtl03nofw1f9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८० 250 195395 666130 2026-07-07T16:01:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666130 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૫૪ किन्नर - देश में किन्नर राजपाल उस समय जाड़ो में काली या हरिद्वार जाते वक्त अपनी वकरियोंपर उदुरवर्णा सुनके चर्मकुतुप नी ले जाते थे, जिसकी कान्यकुब्ज के राजप्रासादों और सामन्त-प्रासादोनें खासी मांग थी। अंग्रेजी शासनकाल मे यहाँ श्रानेवाले अग्रेज शानकों को बराबर शि भेट की जाती थी, और कितनोने उसकी प्रशना भी करी, किन्तु वह नहीं चाहते थे, कि शि विलायत से आनेवाली अगूरी शराबका जरा भी स्थान ले । 1 · कोठी और शोवाके दिन कभी बहुत अच्छे दिन थे। उस समय चिनीका क्या स्थान रहा होगा १ चिनी है तो दो हो मीलपर कोठोसे, किन्तु है वह बहुत ठंढा स्थान । अपनी जैमी ऊँचाईके कनौर दूसरे सभी स्थानोंसे चिनी अतिशीतल है, जिसका कारण है उतना खुली जगहमें होना और सामने सनातन हिमाच्छादित कैल शशिखर श्र ेणी- से टकराकर हवाका थाना । जाडोंकी सर्दीसे वचनेही केलिये स्कूल- की किले के स्थान से हटाकर कल्पाकी ओर ले जानेका निश्चय किया गया है । आशा है नई जगहनें स्कूल बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जायेगा, कि कल्पा में विमानावतरणकी आवश्यकता होगी और उसे समतल बड़े खेतो में वहीं बनाया जा सकेगा। स्कूल अपेक्षाकृत समतल भूमिमें भी तितल- द्वितल- एकतल के जोड़से काफी लम्बा चौड़ा बनाया जा सकता है । चिनी अधिक सर्द है, वहाँ के निवासी भी चिनीके जाड़े को पसन्द नही करते, तो भी चिनी प्राचीनकाल से ही सैनिक महत्त्वका स्थान रही होगी । उसका किला -- जिसका नाम ही श्रव रह गया है- एक स्वाभाविक पहाड़ी टीलेपर अवस्थित या, जिसकी चारो ओर ढलॉव और सिर्फ उत्तरकी और लगाव था। वह बहुत बड़ा किला नहीं बनाया जा सकता था, तो भी उस समय के लिये वह एक अच्छा उपयुक्त दुर्गा था। शायद इस दुर्गका निर्माण सोचन क्शके कालमें हुआ था, जिसके कुछ सम्राट माताकी ओरसे चीनी थे, किन्तु वह चीन के श्राधीन नहीं थे; तो भी चीन से तिब्बत<noinclude></noinclude> c300995ysyy0n50bbcdszakxvikpf6k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८१ 250 195396 666131 2026-07-07T16:01:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666131 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवी चरणोंने २५६ और महानसे मुका चीन परिचन देना, जान पड़ता है, भारतकी काही पानी परपरा है-ब्राह्मण तात्रिक मोटके तंत्राचारको "चीनाचार" वहा करते थे । इस प्रकार भोटराजकीय दुर्गको “चीन दुर्ग" कहा जाने लगा । यहीं भोटिया शासक भी रहता था, इसलिये आदिश लोग उसे ग्यलून ( राजधानी ) चोने कहने लगे । चीनी, चिनी या चिने नामकरण यी कारण मालूम होता है । मी साम्राज्य के एक दुर्गस्थान होनेने चीनीका महत्व कितना ही बचा और पेमाकृत अधिक सर्द मुके रहनेवाले भोट सैनिक- शाक की सदीं मले ही श्रवतुष्ट न रहे हो किन्तु यह श्राशा नहीं नवी कोटी उस काजमे भी उपेक्षित रही होगी । कोठी स्थलने हे विन्तु उसकी गनीकी लोग शिकायत नहीं करते, जैनी कि उससे भी नीचे उतलक तटभाग (नेवल ) की करते हैं। अभोट गासनवाल के साफ अवश्य काही न करते रहे होंगे, जैसे कि श्राजके लोग भी करते हैं । उस नमय "को", प्रासाद या कोठे रहे होगे, इसलिये शायद अनेक किन्नर गाँवकी भांति "पे" तथानर इसे “कोष्टट्पे” बना दिया गया । कोठी यह पहाड़ी भाषा- रियो नामकरण है। ऐसा प्राय प्रत्येक किन्नर ग्राम के नामके साथ किया गया, जिसे जीने अपने उच्चारण और दूषित लिपि - की डालकर उसे और चोट पर दिया । नये भारतको जीके नाम- कोनोर करना होगा, किन्तु साथ ही यह भी उचार करना होगा, कि नामकरण अधिकार स्थानीय निवासियों को पापदि स्थानीय निवासियों के नामकरण के उचित रखना तो कोटीको लिखना होगा को प्रसन् कामरूको "नोने ' मेरो कार्यावर व श्रमेजीकी भूषितमेारखे? हम राष्ट्रलिपि नागरी में जीउधर उतर उस्थादेगे' फोर्ड-<noinclude></noinclude> cmrw4k2rnbi22uud5xrrvilychuidhr पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८२ 250 195397 666132 2026-07-07T16:02:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666132 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५८ किन्नर - देशमें बगने नाचते बैठतेने उगना हो, फिर इनमें झाड़ा करने बात क्या था ? कई दोनो बाद भी नहीं वो, किन भो देवदतास्थाविरोधमातून होते हैं। हो सकता है चिनो नरेश दादों या यादव बैठने का श्रानन्द लेता है, किन्तु देवशात्रमें उससे कोई स्थायी अधिकार नहीं होता - केवल मु प्रमके पाती होते है। मान लीजिये बड़ा नरेनस अधिकार रखता हो, किन्तु क्या भाभी- छोटे भाई का अधकार नहीं होता, विशेषकर कनौर में नहा बहुपति- विवाह धर्मानुवादित प्रथा है। "देवतात्रांमें यह प्रथा नहीं चनतो" यर तर्क रहने दीजिये । ये देवता मानव के आरंभ काल प्राणी है, जहाँ अभी कोई व्यवस्था तैर नहीं हुई थी। दोनों नरेनस्का देवो के लाथ जो सम्वन्ध है, क्या उसमें आजकल कहीं तुन्द-उपतुन्द न्याय घट सकता था ? छोटे नरेतही गुस्ताखी यदि माने, कि उसने बड़े भाई स्थानको तु चत तोरसे दखल किया। तो क्षमा कीजिये की देवी- भी दूध की धुती नही रह गई, जिस तरह कि उनने भारवाहे कलह हो रोका था । नि । देशमेव वाट तक उतर आना, और अपने को को पांच जुनाकी धनकी देनेका अर्थ ही है, नाराज नहीं हुआ, बल्कि देवीपर भी उसके पक्षपातपूर्ण व्यवहार के कारण इष्ट हो गया है। जलभर ही गये, अभी सुलहका कोई डौल दिखलाई नहीं पड़ता । कि वह छोटे भाई ही पाठकों को जिज्ञासा हगी कि देवनाथोंमें इतनी कहासुनी केले す हो जाती है । वा ठोक है, इतनी थोत्रा जारी बार हो जाना देवता के शिरचालनसे नहीं होता। प्रोक्ष (देव) पर आकर उनके मुँह सारा वात लाप चुटकी बजाते हो जाते हैं । ऐसे समय देवता अपने बोलते है, और इस तरह प्रियभारतजा गायक और कवि हैं, यह पहिले का है। आ (३ अगस्त) वह सपेरे टहलने में शामिल हो गये थे और आत्मा<noinclude></noinclude> a77ntbecsxsc8o9k9gwygii96gknskf पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८३ 250 195398 666133 2026-07-07T16:02:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666133 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवीका मेला २५६ परमात्मा के इनकी बातोंकी इतनी दिलचस्पीने सुन रहे थे, मानो सभी बातें उनके अन्तस्तल में घती जा रही है । अन्तमें उन्हीने Fहलाके बड़े देवता "बारोवीर" की बात सुनाई । वह लड़कों को परीक्षा पाता है, युद्धमें जीत कराता है। बीमारी अच्छा नहीं कर चकता व नागज दानेपर बीमार जरूर करा सकता है । प्रियभारत जी उनाने तीन नाल पक रह चुके हैं, इसलिये बारोबीरके वारे में चोब उन्होंने नालून कीं, वह मुनीनाई नहीं, वैयक्तिक अनुभव परनिर्भर है। अपने स्वभाव के अनुसार वागेवीको दो-तीन खरीखाटी नवीन चेहरा नि उन, उन्होंने कौशल के साथ मानक पर बारोगर की परीक्षाक लिए कहा। वारोवीर साना गाने पहने पुलको भी पार करनेसे पहिले हीं बंगला एक विशाल देनदार बृजवर रहना है। वह काफी बड़ा देवता है, किन्तु उनका हरीने और नचया विमान नहीं , 1 मुगा, देता है, इसलिए यदि उसकी परीक्षा लिने गुस्तानी भी करूँ तो ईवाला नहीं देवा देवान भी उनके ये अनेक न रखने परी आवरता जानवर मैंने प्रिया से NCT कुम्हार करने और जूते हो जीव पर प 'तेरे दि 7 देवी है। जगली " नाते जना भार दुमकीन ते देशवारी- भुगतते मे तानदिनाला घरी जातविना शोर बेत बदल गया, करने स्मा बजारी रोजी कर काना व देवना " जिरे।<noinclude></noinclude> t6te5lcksivxhm63t7fcxee0g9yygbz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८४ 250 195399 666134 2026-07-07T16:02:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666134 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२ निर- देशमें प्रभातको ओर तो में चाहे कितना ही मतनेद रहा हो, किंतु में वह भी सहमत थे, कि देवाने व कहा यह ठीक नहीं किया। मैने कहा था अपने वक का मारतर घर ले जाने कलर कि देवीकांचा हुए बीटी भर मा खाये, उसे मे ला जाऊँगी। 1 फिर भी से ऊपर लि चढ़नेवाले बकरे प्रारूप बँड, खुन्नसुनकर लागारी भड भी खून जमा हंती चार विके पहले भी कुछ कु पड़जाता । 1511 + Sx 17 मैं तो समझना था, देवीकी विशेष पूजा मेरे जाने के बाद शुरू होगी, लेकिन जब मालूम हुना कि वह ७ अगस्तक हनेवाली है मुझे बड़ी प्रसन्नता और उतावलापन भी हुधा सुना देव ११ बजे श्मीर पहुँच जायेगी। मैं पुण्यसागरके लथ १२ बजे वह पहुँच गया। अभी पूजा-स्थान मे किरीका पता नहीं था। कश्मीर चीनी से दो ढाई मील पर रुड़क से नीचे की ओर आगे बडी एक पहाड़ी पर है, जिस पर किसी समय चीनी टहरा एक छोटा सा दुर्ग था। दुर्ग कवका नहीं ध्वत हो गया ? पहली शताब्दी के अन्त मे किसी अत ने वहां एक उसकी भी व दीवारे ही रह गई है। छोटा सा बहुला बनाया था, देवो के लिए एक छोटा मढ़ो और खुला गन है। हम वहाँ खड़े होकर नीचे काटी और देवने लगे शायद दूर कहीं चण्डिका की सवारी था रही हो, लेकिन न कही सवारीका पता था, न बाजे और नरखिदेश | पास नीने कश्मी गॉव के आधे दर्जन परिवार में अवश्य कु श्रपेतारण दिखाई दे रही थी। शाम लिए वा प्रोटरीकर रही थी । उन्हें कायङ् (नृनएडला में मिलित होना था। और मेला है, फिर भी कान के पर रहना चाहें, का 3 यादेश कटाना है ? हा प ये । श्राज नया अच्छा दौड़ और चदरिया व राजने पाला वी<noinclude></noinclude> rybiye1ltkx9vgnalhodrs8skhs1asi पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८५ 250 195400 666135 2026-07-07T16:02:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666135 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देवीका मेला '३६१ भूरा से शरीर पर ग्राजाने वाला था। किन्नर में चेरी की भी कम है लेकिन चोर से भूख और י नाकिरीटेकी एक और दावा है, यह खेत और वृक्ष है। हा गया, किन कु दिल जिने देख घटे भातर पाचति चलन था । वरि । महानारा हटाने लिये हाथी, रहे थे ? द घंटे पूहादूर बाजेगी ग्रायज बाटा, सन्देह नहीं । प्रजनन (विना दिखलाई 4 यावदानेच 3 , हा वैज वापी दर्शन मण्डलीं । कापसाच श्रभिनन्दन किया फवारा झंडा नवदुनि । विगत के लचीले दे देगी די बरते र देवीक जाने स्थान पर पहुँची । पूछे नहीं देता । देवी संदीपा चाहती है नीचे है, यानी भीतर आदि दामनमेयोड़ा विशद बाहर बँी। मुझे भी सवेल त निशा के देवाने बरावर पाधा ' टीन उतार । मेरी परीक्षा लेने नेस्ट्री थापा है।<noinclude></noinclude> 0oxugh4p7jfmt365e1hci80whp8d99s पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८६ 250 195401 666136 2026-07-07T16:02:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666136 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६२ किन्नर - देश में 1 1 पशु भी आकर एक घंटा और बीता, तब तक लोग और वलि जमा हो गये। देवी कुछ कोषी और कड़े मिज़ाजकी ज़रूर है, किन्तु वह इन्साफ भी पसन्द करता है। सौसे ऊपर बकरीवालों पर उसने एक पशु लगाया था और तौसे कम वालों पर कई घर मिलकर एक पशु । कुल सौसे अधिक पशु आये थे । साढ़े तीन बजे जब वलिदान शुरू हुआ, तो स्त्रियों बहुत कम दीख पड़ता थीं । समस्या थी पशुको काटेगा कौन। कोई स्वेच्छापूर्वक अपनी सेवाओ को अर्पित नहीं कर रहा था । देवीने हुकुम दिया, कि प्रत्येक गाविसे एक एक व धक लिये जय । जबर्दस्ती भरती थी। तीनो वधिकोंके गले में देवीका प्रसाद हरे रेशमकी रूमाल बांधी गई। उन्होने लम्बे डंडेका खोड़ा हायमें संभाला | वन्तिका श्रारम्भ कैलास वाली दिशासे हुआ । पहिले पाच वकरे कैलाशवामी महादवको दिये गये । देवीके स्वभावते लोग परिचित हैं, इसलिये कोई उसे फुसलाने की कोशिश नहीं करता । सभी वलि पशु तगड़े थे । वलि-कर्म में तीन आदमियोकी आवश्कता थी। एक सींग में रस्सी बांधकर अपनी ओर खीचता था, दूसरा आदमी पिले दोनों पैरोंको उठाये रखा, जिससे पशु अपनी जगह दिल न सके, फिर तीसरा श्रादमी साधकर खड़े को गर्दन पर छुपते मारता । प्राय: एक ही प्रहारमें गर्दन तिरसे अलग जा गिरती थी। तारे शरीरका संचालक शिर जहाँ तुरन्त निर्जीव पड़ जाता, वह घड़ कई मिनटों तक छटपटाता रहता था। छटपटाना क्या पीड़ाका द्योतक था मैं समझता हूँ वहाँ छटपटानेका पीड़ासे कोई सम्बन्ध नहीं था; क्योंकि पीड़ा अनुभव करने वाला शिर अलग गिर कर निश्चिन्त बैठा था । श्रागनकी चारों सीमाओं में चार स्थानों पर प्रदक्षिणाक्रमेथ बलि दी जाने लगी। माता खा'व घूम-घूमकर झूम झूमकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जातीं और छपछपकर पाचन्य पशु काट दिये जाते । दर्शकों के चेहरों पर बड़ी मसलता थी, किसीके मुख पर ग्लानिका चिह्न नहीं था । मैं भागना चाहता था, किन्तु लेखक धर्म वाध्य कर<noinclude></noinclude> s4ruhv265uh9teb1rnueoorjcliym5o पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८७ 250 195402 666137 2026-07-07T16:02:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666137 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>रहा था, कि कमसे कम एक देवी का मेला २६३ मति महोत्सव को तो आद्योपान्त देख लूँ । छोटे-छोटे लड़के लेटकर विमान बाइकों के पैर के नीचेसे तमाशा देख रहे थे। गिरते घड़ोसे निकलते खून के फौवारेसे कपड़े रंगे जा रहे थे, जूरे तो रक्तवर्म में सनही गये थे। पहली बार चारों जगहों पर बलिदान हो जाने के बाद, फिर उन्हें उसी स्थान पर दुहराया जाने | देखकर चित्त खिन होता था । तड़पती लो थोडे ऊपर चार-चार- चन्द्र जीवित पशुपतिको प्रतीक्षामे खड़े थे | मारना था, मारते; किन्तु इतरही खाकी करा आवश्यकता थी। लेकिन वहाँ समावे विश्को लभ हा दंन वाटे जा रहे थे, वहाँ साथ ही दो टोटीदार वर्तनीरा और गुड़ सकी पार भी वरावर वव्य-स्थान पर डाली खाज फाशीसे हिवर देश तक लगातार जा रही थी। यह धारका चला गया है। एक घंटे में कलकर्म समाप्त हुआ। देवी मढी भीतर पधारी । योग अपने अपने पड़ो और शिरों सभालने लगे । हुकुम मिलते ही आग पशुसोने साली हो गया, हिन्तु खूनकी कीमड़ अव भी वहाँ मौजूद थी। बोसे तो अपनी बलियो पीठ पर लाद अपने फोर से चलें और कुछ यहाँ पकाने की तैयारी करने लगे । में बहती त्याने उन्हें धोया जाने लगा और पढेर अधिक शुद्ध जल र खत हो गए। का पाच पदरी छूने पर उसने रातकी भी यही रहने निश्चय श्रीमय श्रांगन दाङ् म हुआ । श्रय लिया देखा, किन्तु कुछ पहिले भात हुने भी पड़ते चित्त दिन था, और I थोड़ी देर मैंने कूल नहीं नालून हो । वहाँ स्त्री पु मधेश बाघ उटते हो, दन्तु न कोई श्रम है, न देवकर दिन हो चोट उमराव्वेने<noinclude></noinclude> 7rsos8oknumlyl2h1emk5mwrne969wg पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८८ 250 195403 666138 2026-07-07T16:03:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666138 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६४ देखा, तरुण किन्नर - देश में कुण्डके फुड कश्मीरी ओर जा रही है । आज रात भर पानवाला । १८ किसे अपन (१६४= ) हो प्रस्थान करनेका निश्चय बहुत पहले से कर लिगा था। तवारीकी जरूरत नहीं थी और भारवाहक के लिये चार दिन पहिले पू न भगत से कह दिया गया था । लेनिन का पता था, कि इतने पर भी विघ्न वाधा ग्रान उपस्थित होगी । दस बजे तक प्रतीक्षा करने के बाद जब कोई गारवाहक नाता दिखलाई नहीं पटा, तो चिन्ता होने लगी। नीचे तहसील मे जाकर टूटने नालूम हुआ कि भार वाहको प्रबन्धक हलमन्दीको कोई सूचना नही दी गई। बारी थी रोगीवालों की । प्रस्थान स्थगित करना सम्भव नहीं था, क्योकि रास्ते में तीन जग भारarentको समयपर थाने के लिये सूचना दे दी गई थी। यहा के भांराहकों को सिर्फ सतलज तट तक पांच एक नील जाना था। हलमन्दीने विश्वास दिलाया, कि भारवाहक ठीक करके सामान पहुँच- वा देगा | पुण्यसागरको हमने सामान के साथ थाने के लिये छोड़ दिया । एक बार फिर मै स्कूल के व्यापारके किलेपर गया । मैंने उस दिन खोदाई करके एक हाथ भर मोटी कोयज्ञे चोर राखक वह निकाली थी। देखा उसे दूर तक खोदकर पदको निकाल लिया गया है। सुरक्षेवल स्मारक तो है नहीं, फिर लोग खोदकर अपने कामकी चीज़े निघले नहीं तो क्या करे ! हाँ, हमे एक लोदेका वायफ मिला | वायविद्याा युद्ध इन पहाड़ों पर बहुत पीछे तक चढ़ा जाता रहा ।<noinclude></noinclude> ciz0y5tolub3agn53voef608p7tkic1 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२८९ 250 195404 666139 2026-07-07T16:03:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666139 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिति प्रस्थान २६५ दोपहर के करना । वदा के कुंडकी मूर्तिको देव्हारा था। ग्राव बीज पुरानी दीवाने निवेश लिये पा उनकी बहुरत एक विचारस्थान रहा पहुँ こ v די कुपी था। हृषी २६ पर अपना लेवा तान्हा। उन दो फीट लम्ब एक पत्थर दीदी। सूचना मे រ घटना पर पांडवकुडमे बदरा, नेभी वर्क जो जल प्रिय- ' " फटा उत्तर नया पैन मुनि रौदर्य उप भूवित बाधन गुना है। 4 • उजन आदि है। सूट्स से आई। नन्दर कोदन सम्म दिया। भूर्ति सहित है। के जगवा, या काठ नामसा हुई। बिकी मूर्ति बना और रात दखनेपर ' जिला टूट चुके हैं। च लिए है। पटवाई और जनवी र दोनो तर कुछ मूर्ति अनवर नापने कुदते न daati मूर्ति है।<noinclude></noinclude> aktnd8zv9f30aj8u03tsqo9fevl4s38 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९० 250 195405 666140 2026-07-07T16:03:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666140 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६६ किवर देशमे कास वादे और गणेश महाराज भी विराजमान हो अपने पिताजी के पक्षमें साक्ष्य दे रहे थे। शिरकी नाई बगलकी अर्धासना मूर्ति शायद कार्तिकेय की थी, किन्तु उसके लिये मैं सपथ नहीं उठा सकता । मूर्तित्रे शिरपर जटामुकट है, जो शिवजी महाराजके पक्ष में गवाही दे रहा था। शिरके पीछे फुल टदल कमलाकार प्रभामंडल था। प्रभामंडल के शिर पर उड्डीयमान किन्नरयुगल हाथमें माला लिये हुये थे, जिनके पास पक्कि से दूम रेध मालाघर खड़े थे। मैं मूर्ति ध्यानमें मन नीचे बगल में पड़े पत्थरको यही हटाने लगा। वहीं एक और छोटासा पत्थर मिला। देखा तो उसमें हाथमें माला लिये उड्डीयमान किन्नर -मिथुन श्रौर कमलाकार प्रभामण्डलका अश स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है । मास्टर रामजीदास और मास्टर नारायण संहके अतिरिक्त कोटी अन्य गण्यमान्य सवन भी वहाँ एकत्रित हो गये थे। उनके चेहरो देखनेसे मालूम होता था, कि पंच पांडवों द्वारा स्थापित पाण्डवकुण्ड की इस मूर्ति के बारेमे वह पंडितजीकी राय जानना चाहते हैं ? मैंने भी अपनी मौन समाधिको भंग करना श्रावश्यक समझा, और कहना शुरू किया - श्राप लोग भी aara ara fear करते हैं, ले केन आपके देवता बहुतसी झूठी-सची बाते करते है । मैं आपके गांव मौजूद इस देवतासे वार्तालाप करता रहा । यह और कोई देवता नहीं, साक्षात् शिवजी महाराज है । हजार वर्ष से कुछ ही साल कम हुआ जब राज्यक्रान्ति के कारण एक राजा कन्नौज से भाग कर यहाँ कोठीमें गाया। उसके साथ लोग- भाग भी थे। उसने अपने लिये यहाँ महल बनवाया जो देवीके मन्दिर के पास ही था । उसीने यह कुण्ड बनवाया, और कुण्ड के ऊपर एक सुन्दर मन्दिर भी । मन्दिरके भीतर दो भव्य मूर्तियों शिव और पार्वती को स्थापित किया । जिनमें शिवकी मूर्ति यही है और पार्वती की मूर्त के ऊपरी भागका यह छोटा खंड बच रहा है। राजा के समय मन्दिर में अच्छी तरह पूजा-पाठ होता था । राजाका खर्च बहुत अधिक मा<noinclude></noinclude> 7wlbnc75wqxvhk7hry46nkt2j4y5rse पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९१ 250 195406 666141 2026-07-07T16:03:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666141 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिनी प्रस्थान २६७ जिनका बोझ उठाना लोगोकेलिए मुश्किल हो रहा था। उधर भोट में नया राज्य स्थापित हो गया था, और उनने वहाँ के लोगों को भडू- काश, सहायता भी दी। राजाके घर में बाग लगा दी गई। वह प्रारा भागा | शिव पार्वतीका मन्दिर ना उस श्राग से नहीं बच पाया ।. विजा घात तीन हाथोंका गवाकर इस तरह पड़े हुए हैं और पार्वतीजीचा कहीं पता नहीं । कुरड एक बार फिर हम भैरव मन्दिमें गये । भैरवकी दस भुजाओं मे दाहिनीचा वरदहस्त खड्ग, कुन्त, शूल आदि हैं और वाई और वयादि । यहाँकी माटी मिट्टीकी वह वाले फर्श के भीतर न जानें कौन कौन सी चीजें पटी है, ने एक जगह उँगली से जरा सी मिट्टी टाकर प्रपोसहित पीतल के शिनलिएकी साँस लेने लायक किया । फरदीके बहरी श्रमनमें पत्थर के छोटे मन्दिर के पास गये। महायहाय भरके दो पापाए लिङ्ग एक सहित है और लन पर लकुलीश शैन संप्रदायका उर्व शिश्न उत्मीये है। वह श्रारमीन प्राण है कि इन चीजाका सम्बन्ध गुर्जर प्रति- करते है। गुर्जर प्रतिहार काल ने लकुलीश सम्प्रदाय बहुत पर सालान्दर पहुंचे। पता लगा था, देवीके नएडार उता । तांगो बहुत दौड़ लगाने. महाशय में दाना स्वीकार किया । और वह ततयुग की नीति जटिया पधीके उपर नेकी एक प्रष्टतासिया पानी थी। tet #sitata Ke मेटे और बहुत बारीकी उत्कीर्ण गिनेही मला रंग है, जिससे नाइदेउन और रोना किरा हुआ सारी पट्टी नहीं वी<noinclude></noinclude> sb11uq3ly2p31n1xv33jdsjm49hkqrn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९२ 250 195407 666142 2026-07-07T16:03:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666142 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६८ किन्नर - देश में मठ या बरसे यह पट्टी उड़ाई गई और एक कोना तोड़कर देखा भी गया। जैने देखा कि या देवता नहीं। क देवकी जीवाका देवर ने की खान उनाना चाहता था। घी मैं कनो से ग्रामी ॥ अनुकरण लानु बैठाया और देवी थी। नहीं दे वह भी मेरे बारेमें विशेष भाव रखने हो । मने एक देवके लये झाड़ डाला - में या लोगां वह नहीं दाना व्यासान महता कि थापते राजा पदमा बसको समनेट दिन, वैदेवी भी विदा कर दें। लेकिन देवीको कामना चाहिए। देवी को रुव लंग बहुत होशियार बलाते हैं, तुली इसने काम किया, यह विकुल होशिया मक्का र वजे गाजे के साथ एक जगह का काम नही था। भीड़ काटे हैं, दूसरी टेकेकार जिन्हें रही है। कि हिन्दु- तीसरी और चौथी जगह काटे जा रहे हैं। बहरे खड़े किये जा रहे हैं और देवी कूद-कूद कर कट बादरी दुनिया के लोग देखेंगे, तो क्या कहेंगे ? - ही कहेंगे न स्तान के लोग जङ्गली है। देवी भारत की नाक कटवाना चाहती है। भारतकी की नाक कटेगीता कनौरकी नाक कटेनी, कोरी नाक फटेगी जो भारतकी नाक कटेगी | मेरे कई बोल उठे - नहीं परिडत जी ऐसा नहीं होगा | मैने कहा- ऐसा ही होनेकेलिये तो मैं देवी वह रहा हूँ। क्या मैं जानता नहीं, यक्ष यहाँनेरीले गिया दे से बातचीत न हो सके। लेकिन देवी कान में नई थोडे हा पड़ी है । मैं तो देवो ही हा सुना रहा हूँ, और यार लगों को भी कह रहा हूँ । हमारा देश का गुलाम नहीं है ।' देशको इतकी रक्षा करना एक-एक आदमीका कर्तव्य है । जिस तरह कल देवी खून का खिलवाड़ खेला, जिसके हि मेने कई फोटो लिये, जतीको ले जाकर विदेशी<noinclude></noinclude> nk0w06x60whfszxe5yowtvyrs780ob7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९३ 250 195408 666143 2026-07-07T16:04:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666143 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिनी से प्रस्थान २६६ देशी गति करेगे। जिसके बारे गरे देशको जगलो , ऐसी हमें देसी हीदी इन । नहीं, घने मेव रखा? कहेंगे कि राजा गया । मुखिया वंत नहीं पड जी, श्रव ऐसा नहीं -देन तन्तुम खुद हूँ। घर मिल थे । पिये शराव श्रर्थ तो फाग खेलू | देवों देव खूप पेट कुहरामले ' प्रतापन यमात ही करने जा रहा था कि कोई पूछ पैा दो। लगाया लोग नान को लिख मन आप बन बनोरे लोग जने शिवारहते हैं, और जाते बढाई लगी हुई है। रशिये । 1 1 " T कोदोगे, बी पी। लेकिन जिदा है। 17 ' I 4 1. 1 ×<noinclude></noinclude> asxrjfull0svhe0embyll17k1ehl2n7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९४ 250 195409 666144 2026-07-07T16:04:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666144 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७० किन्नर - देश में यात्रीको ठोक पीटकर वैद्यराज बनना पड़ता है । में नया ही नया डायवेटिस के रोग मे दीक्षित हुआ हूँ, जिसके लिए कुछ दवाइयाँ साथ में ले चलनी जरूरी है। उस दिन "डाक्टर" ठाकुरसिंहने एक मरणो- न्मुख रोगी की बात कही, तो मुझे स्मरण आया कि मेरे पास दो शीशियों पेन्सिलिन की है। यह भी मालूम हुआ कि व्याधि बात रोगकी है । न मैं विधान के अनुसार पेन्सिलिनुका इन्जेक्शन दे सकता थान ठाकुरसिंह | उधर रोगी बाबू श्यामाचरण के दिनों बेहोश मौन की घड़ियाँ गिन रहे थे । कम्पोन्डर ठाकुरनिद इन्जेक्शन देना तो जानते ये, किन्तु उन्होंने पेन्सिलिन् का नाम पहिले पट्टद्म मुझने ही सुना । ढङ्ग बनलाकर उन्हें एक शीशी दी। तीन-तीन घण्टे बाद पर सुई देते तीसरी सुई देने के समय श्यामाचरणने असं खोलीं और कहा- क्यों मेरे शरी• में सुई चुभो रहे हो । अव इन्जेक्सन दिये छ दिन हो गये थे । श्यामाचरण प्रति निर्बल थे, किन्तु जोन्ति ये । मैंने ठाकुरसिंहको दूसरी शीशी भी इन्जेक्शन देनेकेलिए दे दी थी । दान पूलने पर मैने कहा - पुण्य । श्यामाचरण और उनके घग्वालों का ब्राम्ह था, कि मे उनके य हाता जाऊँ । थ ड्रामा ग्रास्ते से हटना जरूर था, लेकिन रास्ता उतराई का था । उनके बहनोई मु के लिवाने हलिये श्राये थे। रास्ते में थोडी वूदा वॉदी भी हुई। थोड़ी देरमें इन ख्वांगी गाँवमें पहुँच गये। रोगीको देखा वहुत निर्बल | परवाले समझते होंगे, नाई का काम हैवाक्त भी देना । मैने उनसे कहा -- व करीका दूध, अण्डे की सफेदी - तो पूरा अन्डा भी, अक्रूरका रस और चूजे का सूप माना अनु मार देते जाओ तभी गरी में शक्ति श्रायेगी । पेन्सिलका काम या बैरी व्याधिको रोक देना, लेकिन शक्तिकेलिये शक्तिप्रद चाहारती यावश्यकता है। ख्वागीसे मैं सतलज के झूले की ओर चला। बहुत थी । इधर मक्कीकी खेती अच्छी होती है। अभी भी उतराई खेतो के आगे गने परवान (ग्रीक) का जंगल आया । जाड़ों में मानके पचें पशुओं<noinclude></noinclude> 77n8hff5s1g7sy1eqe4wwn0hdo8nomn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९५ 250 195410 666145 2026-07-07T16:04:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666145 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिनी से प्रस्थान २७३ सबसे बड़े महारा है । इसलिये खेतों त ह वृक्षोंके लिये भी झगड़ा सकता है, यो त ने उनकी व्यवस्था न की जाय। कुछ दूर प्रौर चलकर गई, और मैंने साथ जाने वाले सजनको लौटा दिया । सतच पार करने के लिये भूला है । उसे ग्राप लक्षमण-भूला न यमभिये एक मोटामा लेका तार नदा के ' ताना हुआ है। ऊपर लोहेकी एक दोनों कूलों पर दवाकर गद्दारी है, जिस पर बड़े तराजू एक पला जेव टॅगा है। पत्ते पर आदमी बैठ जाता है । पाक शिरे पर एक लड़कीधी है जो नदीके बार-पार पहुँचती है। दानों का परदा आदमी चादर रहते हैं, उनका काम है रीसेसची वारपार करना। मैं भी पत्ते पर जाकर बैठा और ज़रा देमें हाय करके बहती शतद्रुओं धानके ऊपर अधरमै दय गया। नई कहती, त शायद मुके भी हर लगता, किन्तु में ऐसे पहिले गुजर चुन था । 1 पार पहुँचने । पूरन गंगा गूटावरी लिये हुये मिले । राना पुण्यागमान शिवाये पहिले जा चुके हैं । श्रभी दश फाटकी ऊँचाई पर थे, लेखिएका साढ़े अनि माजून होती थी । परवाना व घरी पर उतार कला जाता ख्याल की का जावा, कमीत-दो-मील हंजो है, देशात न " N sednesd योजन पर उनी कैदी उसे इंतेजार था। रास्ते में एक था, मेवा है,<noinclude></noinclude> itr0ehfc4buwf3bsb1p8toy5hh39zni पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९६ 250 195411 666146 2026-07-07T16:04:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666146 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९७ 250 195412 666147 2026-07-07T16:04:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666147 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिनीसे प्रस्थान २७३ दार मुक्के का मिला एक चिनीके रेंजर श्री देवदत्तशर्मा और दूसरे विभागीय वन अधिकारी ढिलन महाशर । दानां अपने काममें मुस्तैद और मेहमान हुये। मैं जब शो उमें पहुँचा, तो दिन महाश। जाल देखने गये थे और सूस बाद लोटे | वह अपने साथ एक विशेष प्रकारके स्कटेकके दाने लाये जा कहीं यहीं ग्रात पाता है। उनका भी कहना था, कि खनन पदार्थों के बारेमें यहाँ गम्नारताने काई अनुदान नहीं हुआ, और फलों को स्थानीय जलवायु अनुकूल उत्पादन करने की घर वैज्ञानिक ढंगका उपयोग चाए वा नग , छ दिन ही पहुँच गये थे, और चटाई की गान होने से योगये। वातेने तेरा सेना और चले । खेतमें नारङ कलियाना रहा बीज 1 है। जिसका प्रायादेवी देशमे अर्थ पाल जीन वा चारी । मेने एक कहा बार भोट-रत मित्ररा ने फेंक दी, पता दर्ज । वहीं जनने रखते हुये गाने में उसे 'चुलाल एक "ग" याना होगा। सिलवानलवार उसने श्राने मधुर सागर गांव गाथा । या नवरदा के नाईते बात चल पड़ी कोडी- की काठो देने किन तरह समास लेकर विनयका नाराज या चार माह करने से इन्कार कर दिया। पर नदी नाशे हा-'देवी १५ के नाव मुख्य नारा भी। गयी पीने चाहे पुन प्रादन उसमे लिगाचे (ध) नोटीसी देवा उब पर र रातो भार देता। एक दिन वह पड़ी। तू नाही देना- "तुन दोनों बड़े मेरा जान साना वाती वन पाई जाती है, क<noinclude></noinclude> c53p1fipleihohystqgttzrou42oupe पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९८ 250 195413 666148 2026-07-07T16:04:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666148 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1 २७२ रिवर-देश में जल्दी बाली फल तीन भी हो सकती हैं। घंटे में हम शं पहुँच गये । डोई गाँव नहीं है। गोवार दोनी मील पर है। शोड-टड मे जगन-विभागका डाला है । वनले बहुत नज़दीक हो सतलज वहती है । नदी पर पहलि दीवाना है, जिसमें शखाणं विशाल शेरनाग विजवान है। शायद सहय गरुड़ महाराजने झाडा माग, जिससे फण कुछ कुचली गई वह हज़ारो हाथ लम्बे शेषनाग हैं, इ में कोई नहीं। मुश्किल यह है, की पूजा नद के इस पारने ही की जा सकती है; लेकिन उस पार जाने की न तलज आज्ञा देती है, और न विशाल पार्वत्य प्राकार | मै सोच रहा था, ऐसे प्रत्यक्ष थे। भगवान के भक्त जरूर हे ने चाहये । परा लगा, डाकबंगले के चौकीदारका शिर दर्द करने लगता है, अगर एक दिन भी पूजा करने भूल करदे ।' हा, सयांग कहिये, महीनों पहले मैने ८ अगस्त को शठड् ठहरनेका जव निश्चय किया था, י' तब इसका ख्याल भी नहीं श्राया दिलन महादय भी उसी दिन श -टमें था, कि सहायक वनरक्षक रहेंगे । पाँच हजार सात फीट की ऊँचाई पर शो ठड्का डाकबंगला बहुत अच्छी जगह पर है। तकारीकी क्यारियों और फल | केलिये वाग बहुत अधिक नहीं तो कम भी नहीं हैं। बंगला छोटा है, जिसमे दो कमरे हैं, किन्तु ग्रादमी गुज़ारा करना चाहे, तो एक कमरे मे चार आदमी भी कर सकते हैं, अन्यथा चारमें एक्का भी गुनही हा सकता ढिलन महाशयने मेरे लिये एक कमरा दे दिया मुझे सोच जरूर हुआ था, हिन्तु तीनतीन जगह भारवाहकी वैर रखने प्रवन्धकया जा चुका था और श्रागेाटलाने भर दे चुका था. इसलिये ग्राम पवर्ती करना बहुत श्रादमियांका काट डालन एक शतकी जात थी । सेप f था, जाल बनागदा ' किया कि संपर्क यावे व<noinclude></noinclude> 6bh1b5kqykwvzpe5aetlgxeu6013rko पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/२९९ 250 195414 666149 2026-07-07T16:05:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666149 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिनीसे प्रस्थान २७३ चार मुझे मौका मिला -- एक चिनीके रेंजर श्री देवदत्तशर्मा और दूसरे विभागीय वन अधिकारी ढिलन महाश। दानां अपने काममें मुस्तैद कहीं यहीं ग्रास- मेहमान हुये। मैं जब शो- उदमें पहुँचा, तो ढिनन महाय। जंगल देखने गये थे और इस बाद लोटे | वह अपने साथ एक विशेष प्रकारके स्कटेकके दाने लाये जा पाता है। उनका भी कहना था, कि खनन पदार्थों के बारेमें यहाँ गम्रताने कई अनुसंधान नहीं हुया. और फलों को स्थानीय जलयुके अनुकूल उत्पादन करने की बार वैज्ञानिक ढंगका उपयोग चाए, मान गय 1 कुछ दिन पहुँच गये थे, और चाई की मात्रा न होनेसे योग वाले रहते बस येता और चले । खेतमें नार- की किनारे कर रहा वीज पार भोट-रक मित्र है। संवार या देव उन्हानने फैदी, जिल्ला इस देश में अर्थ है - पानलप कुता दाये । वहाँ तीन या चार तर बन्टिनें थी। मेने एक दावा समने रखते हुये कहा किंतु तुरे एक "गत गाना होगा । मिचरियों को गार्नमें सवाने लगा। उराने याने मधुर करते 'चुलाल टागइर गांव गाना । नाखूनवरदा के भाईले पात चन पड़ी सेठी- की देवी का कोटी देवने दिन तरह समाने को लेकर चिनके लव ही नाराज किया वार बाह करने इन्कार कर दिना । परदा नाही हा "देवीही पुग्न याद दादा ำ - न चाहेन उप्रतिमाके (ध) या मेटीकी देवो उपर पनीर कोजावर रावते नारा ईद देता। एक दिन पह कान दील दोन व मेरा जान साना बाजी देउन नवें पाई जाता है, क<noinclude></noinclude> 5pxpt2vsp62d4fel5fcvhhomm18j8sn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०० 250 195415 666150 2026-07-07T16:05:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666150 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૨૦૪ मनुष्यों में होती है। किन्नर - देशमें वारङ् था। स्कूल में और वहा दम-वारह पहिली वार तिच मैं वार से नीचे शो में ठहरा था, क्या हो सकता था कि मुझे रघुवर न याद आता ? रघुवरका जन्मस्थान यही पाच छ श्रेणी तक पढकर वह तिब्बत भाग गया, साल तक तिब्बती भागमें न्यायशास्त्र पढता रहा । मे जानेपर टशील्हुन्पो विहारमें मेन खुबरसे परिचय हुआ । उसके बादकी तीन यात्रायोंमें वरावर उससे भट होती रही और वह हमारे काममें बड़ी सहायता करता था। वह पुस्तक पढने ही में कुशल नहीं था, बल्कि बहुत अच्छा व्यव द्वारिक ज्ञान रखना था । मेरे साथ-माथ रहते कुछ आदर्शवादी और बुद्धिवादी भी हो गया । वह बड़ी उमगे लेकर कनौर लौटा। लेकिन मठके चिरनियन्त्रित जोवनसे मुक्त हं ते ही एकवार बहाव में वह गया, और कुछ समय तक तो मदिरा और मदिरेक्षणाका एकान्न सेवन ही उसका कार्य रह गया । यह ढंग ज्यादा दिनतक नहीं चलता, हिन्दु सम्हलने से पहले ही, उसके दिन पूरे हो गये और रघुवर तरुणाई में अपनी योग्यता से कनौरको लाभ पहुँच ये विना चल बसा। ग्राज कनौरको रघुवरकी श्रावश्यकता थी । उसने प्राचीन पोथियोंको पढ़ा था, किन्तु उसका दिमाग बाजकी समस्याओ को समझने में सक्षम था। चन्नर के निवास्में मुझे न जाने कितनी वार रघुवर याद थापा । उसका हँसमुख चेहरा और जिन्दादिली वारवार शौखोके सामने प्रति- विम्वित हा उठती थी । १६ साङलामै जलपान के बाद पौने आठ बजे पुण्यसागर और मैं शो टड्से रवाना हुआ। हम प्रयागके रास्ते मे थे, किन्तु हमे सीधे नहीं जाना या ।<noinclude></noinclude> 38112d459vdne5xkmwf17lreakna4fo पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०१ 250 195416 666151 2026-07-07T16:05:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666151 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>साब्लामें , २७५ चलते-चलाते पढ़ते-पढ़ाते ख्याल आया, बस्सा उपत्यकाको भी देख लेना चाहिए | स्पां नदी सतलजयी शसा है, किन्तु काफी बडी है । इन्के ऊपरी भाग और गंगा-भागीरथीके व चमें केवल एक पर्वतश्रेणी है, जिसे पार आदमी हरशिल या मुखीचट्टी में पहुँच सकता है । मुझे इस पर्वत णीको पारकर भागीरथी के किनारे जानेकी इच्छा नहीं थी, मैं देखना चाहता था, साला के पास बाकी विस्तृत उपत्यका और रामपु की ऐतिहासिक राजधानी कामरूको। मुझे आशा थी, कि कामस से कुछ ऐतिहासिक सामग्री प्रात होगी । । हमारा रास्ता अधिक बढ़ाई उतराई का नहीं था। थोड़ी दूर श्रागे जानेपर सतलज पार नहीं-नट हरियालोसे ढका दिखलाई पड़ा। पुरय- गन्ने का यह है रोगी के अगूरोंकी वेलें । मैं लकड़ीके ठाटपर चटाई उनका बड़े गौसे देखने लगा | मैं उनके घंटे काले को कई दिनो खाता रहा, वह नुस्खा, मुमधुर र सुधी है । इर. के साथ यह भी जानता था, कि श्रगूर कहीं बाहर से जाकर नहीं लगाये गये, यह किन्नर के परम स्वदेशी बगूर है। फिर मै रोचने लगा - यासा के गाँवो ये रोगी के गूर इतने मीठे यां राते हैं? नूरो भूम छ हजार पीट नीचे होने काफी गरम है। य सूरज उगने थोड़ी देर बाद धूप या जाती है बजाय तक रहती है। हवा भी यहाँ उतनी तीन नही जो मीनाकी शुद्ध भूमिने इस हवा । भूमि रण रोगी गूर इतना मीठा होता है । जपेदा न वियेद, जडला लिये कई तरह की अंगूर बनाये रहे थे कि पहिले इनको। केन मी गुर ज्यादशमीमें लाया गया, E ये प्रकार तैयार ि चाना था। रोगी जमीन या उनकी देवी<noinclude></noinclude> 988prwcug1evycu3z7npp40fjuvhulf पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०२ 250 195417 666153 2026-07-07T16:05:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666153 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७६ किन्नर - देश में जमीनका भी अभी पूरी तौर से उपयोग नहीं किया गया है । किन्तु यह तो तभी होगा, जबकि यहाँ के फलों के निकासी के लिये सस्ते याता- यात का प्रबन्ध होगा । ढाई घटाया सात मीजसे अधिक चलो के बाद हम सतलज छोड़ बस्पाकी चार मुड़े | थोड़ी दूर ग्रागे एक पुल पार हा वाय तटसे ऊपर चढ़ने लगे । ङला यहाँ से १५ माल है । भारवाहक हमसे भा पहिले चले थे, किन्तु वहन उनके साथ हा लिये थे । तपिनी के नम्बरदार नेगी अमीचन्द रास्ते में मिल गये । श्रादमियां की बदली श्रभी तीन मी गे ये 'नेवाली थी । नम्बरदारने फर्मो की माला पहनाई . यह वड़े प्रेमन घरकी बनी एक बोतल शराब लाये थे । उन्हें यह जान कर बहुत खेद हुआ कि मदिरा मेरे लिये श्रभिशापित है, नैने अगूर सेव हमारे पाप काफी थे। ये मेटने दूध भां तैर कर रक्खा था, क्योंकि तहलका चराठी दा दिन पहिले से हा ग्रामस हुआ था । सविनको कनौर भागमें हते हैं। देवता नाग की प्रशन पहले थोड़ीसी सुन चुका था, किन्तु वह दूसरे गाँववालों की सुनी सुनाई बात थी, और उनम नाग की महिमा देठी करनेकी कोशिश की गई थी । नेगी अनीरचन्द अपने नागस् के गुण को जानते हैं। वह तीन हा दिनके पहिले की बात कह रहे थे, जब कि नागस्ने एक जादू करनेवानको पकड़ा दिया था, और दीवार में से खोपड़ी भी निकलवा दी थी। मैने कहा- मकान के भातर सपिनी नागत् के जल जानेकी बात क्या है ? - नम्ब, दारने बतलाया - यह चार पुन पहिलेकी बात है। हमारे नागका राज ब्रयेसे रमनी तत्र है । रुतलज के इस पार इका इलाका उसीका होता है । लेकिन गाँव महेशने उसे जबदती दखल कर लिया है। उस साल नागस अपने राज्धन पूजा लेने चला, लोम उसका हर गाँव स्वागत करते थे। रमनीका देवता जन्तु नरेनस् उसकी पेशवाई में था। वह अपने दलबल सहित बानी गाँव में पहुँचा ।<noinclude></noinclude> d5tpj8mjcd6kcgchkwn2mexnvcop8q4 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०३ 250 195418 666154 2026-07-07T16:05:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666154 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>साकूला में २७७ रावा वहीं गन्द्रा देवा मन्दिरमें विश्राम करना था। नागस्ने मन्दिरमें जानेसे इन्कार किया, किन्तु उसकी वात न मानकर उसे उसी मन्दिर में ठहराया गया। रातो याग लग गई। मन्दिर तां अधिकतर लकड़ी के होते ही हैं, मन्दिरके साथ देवता भी जल गये । -- नम्बरदारने दात समात करते हुये कहा – इनसे देवताओं का क्या बिराता है, वे तो श्रमर है । वेवल चेदन, लकड़ीका ढाँचा, कपड़ा- सत्ता जल गया। गोव महेशूने हमारे देवताका मजाक करते हुये कहा था - "वह देखो मस्टर आरहा है ।" उसपर नागन्ने ऐसा पत्थर गिराया कि चत्रिदेशका मुह निगह गया । सपिनी नागस्‌का सन्मान अपने राज्य (पिन) व किल्ला, पनट्, जानी र रमनी तक ही सीमित नही है, प्रितिम गांव राषा तक भगत ऐती है। कुछ ही साल पहले शवा (चनी ला लोग को शश, स्कंदर गये, किन्तु वर्षा नहीं हुई, तब नेदीय उठावा धारी राकेा । - जेवहा इसकी श्राव- में देवता, पनी नागस्- नदिदी नागस् काई बाधाव्य नाम नहीं है। एक बार एक नचि साधु महात्मा ग्राये थे, उहोने की यहाँ पक्ष था, कि यह तो आपल्या है। X ४ नये नये गाजाही पर × नये नेजा । इमने कुछ देर पेट- ५५, ५३। जगमायके जल विभागकी कुटिया में भी रखवा ये खाना नपरदा अमीर दतेघोड़ा अच्छा दिया था, ने उसपर केवल दो फर्ज स्वारीचीद्यपि रास्ता तुम उससे डरनेवाला नहीं था। इधर चानीपोली भोक, देवदाल- जगत है । तलन समते तेव्हील (500) दवनी दूरोनें बला<noinclude></noinclude> 09zx6pyvp2rq6yhtuy20w48u5nx111j पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०४ 250 195419 666155 2026-07-07T16:06:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666155 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७८. फिचर-देश में तीन हजार फीट ऊँची उठी है। यह तो बाकी धार देखनेसे भी साफ मालूम होता था | अगस्त, वपाका महीना है, यह यहाँ यदि श्राया और रास्तम इन भीगना पड़ा । ते दोन बीच है. किन्तु वे हमारे रास्ते नहीं थे । बसकी चौड़ी उपत्यका तो हमें तभी दिख लाई पड़ी, जब एक वाहीको पार करके सामने काम साला गॉव दीस पड़े । दुर्ग और पौने पांच बजे हम डाक-वॅगले पहुँच गये । वॅगला पहले है, किन्तु गाँव नदी पार है । यह जंगल-विभावका विशाल बँगला चिनीके बॅ लेकी तरह बना है, और ऐसा प्रबन्ध किया गया है, कि तीन चार सादव था से ठहर सकते हैं। तक यहां तथा कुछ दूसरे जंगल- विभाग बगलों में यही है कि वहाँ पाखाने का कोई प्रबन्ध नहीं। बड़े साहब लोग ना भगी अपने साथ लाया आशा है एक यात्री से नहीं हो सकती। हां, वगले हैं भी नहीं । ये चालीशान वगले अग्रेज लिये बनाये गये थे । साहला गेहूमछली टेलिये मौसिम ग्रक्त वरसे शुरू हाता है लेकिन साहन 1 करते थे, किन्तु वही हरएक यात्री के लिये ये प्रभुग्रोके वैर- शेकार के प्रसिद्ध है - शिकारका बहादुर लोग गये, अब तो इन बालोका खाली हनेके समय दूसरे भारतीय यात्रियों के लिये खोल देना चाहिये। भंगीके प्रबन्ध करने की आवश्यकता नहीं चिनो ब्रस्की वगले में बहुत कम खर्च र सफाई के साथ पाखाने का इन्तिजाम किया गया, वैसा ही यहां भी हो सकता है। x x x साला २२७ घरों एक बहुत बड़ा गाँव है। मैं यहाँ बंगले में ठहरकर राहूका शिकार करने नहीं खाया था। मेरे आने की खबर पहिले ही से मालूम थी, किन्तु न शामको ही कोई मिलने गाया, न सवेरे आठ बजे तक ही किसी के दर्शन हुये। बेमुरौवत कहने से क्या लाभ, मुझे अपने कामसे काम था। अगले दिन सवेरे आठ बजे चपरासीको लेकर चल पड़ा । थोड़ी सी उतराई, एक लकड़ी का पुल<noinclude></noinclude> gw3zrbsq8kqallk5yirrcnc8bo9wzm2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०५ 250 195420 666156 2026-07-07T16:06:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666156 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>साइला में २७६ फिर थोड़ी चढ़ाई, आगे साला गॉव था । गली कूचे, नाले- बालिया कमीको लगोने पाखाना बना दिया था। ऊपरसे दरात दिन । किम दिनन चल रहे थे। इतनी गन्दगी न जगी में " पी, नगे, बार प्रायताका अमर ! ब्राह्मण पाखाने का हैन ! बात के यदि नहीं, वह और घरनेर न्याककालाल छीनना ना दो देव है । यस देवताले इसी एक उपाय करना होगा | उपाय है घर- छोटे वह वैरिनागत् नामके हानेदा दिन रास्तेपर पर्वतपृष्ठ पर अवस्था एकतर में था, वह अपने आप उर यहां चला ग्राया । दानो देवता अलग प्रोक्ष (देववाहन) है। देवता कमनेकमा देवना, बहुत है, ते आलीशान मन्दिने हा मालून हान्दा था। छान बड़ी पारीवसि हद ४ ला बलिदान और दूसरी वह तो उसके नये मन्दिर में लकड़ीका २७६२ कोली लेकिन देवना फलसर बल- बहुत मनके जाने बाले ७० पाने मिलता है, और भर-भर के पत्थर बड़ा होनेमे उको जता जाता है। नकेी जातिवाले रामक है, कि मन्दरार उतार उदीक्ष अनुरण करेगा। लेकिन मुकेो मते विशेषज्ञ था । " काले - जलाले पागल एकरी भील है, और जमीन ऊर्जा बाजी होने पर भी बार है। काम निरभावाने मोने भावे चने से भीगे तैला मिला। पहले व श्री गुरुमें सेएक नीचे कुछ मिट्टी खोदकर g परिणत पर दी गई है। मोने- देशात राजे नोहे ही यानी, पांदन और रात प्रचार होता है। जे ने बड़की जीप एलीजाके }<noinclude></noinclude> 7903wxaiepct8k584iuafq0vprkg65s पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०६ 250 195421 666157 2026-07-07T16:06:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666157 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' २८० किन्नर - देशमें टूट चिह्न देखे । कुछ ही दिनों पहिले ऊपर वहीं हिमवन्ध या मे पड़ा और वहाँ से विकरालदानव नीचेकीशोर बड़े-बड़े पत्थरीको ढका चला। गाँव की छोटी धाराके किनारे लगी पनच को कहाँ से कहाँ वहा ले गया। घरोको तो नुकसान नहीं हुआ, क्योंकि हिमाचल के लोग शताब्दियोंचे अनुभवसे सुरक्षित जगहों पर ही मकान खड़ा करते हैं, किन्तु खेतोंकी मेट्रोको तोड़कर और उनमें बालू पाट कर उसने बुरी तौर से हानि पहुॅचाई। बाढ़ रातमेंचाई नहीं तो प्राण-हानि भी होती, आगे तथा गाँव के समीप पानीय कुण्ड आये, जो अच्छे पत्थरो बंधे हुये थे, इसलिये इनके बसाने वाले पाण्डवोंको छोड़ दूसरा कौन हो सकता था, हम गाँव के भीतर बद्र नाथ के आगन में पहुंचे । सारा गाँव यहाँ पहिले से ही एकत्रित था किन्तु केवल पंडित राहुल के स्वागत के लिये नहीं, किन्नरके और गाँवोकी तरह कामरू भी वानर सेनामे परास्त था । कोई चारा न देखकर आज लोग बदरीनाथ के दर्वारमें जमा हुये थे । मुझे कामरू छोड़ने पर यह बात मालूम हुई, नहीं तो मैं उन्हें वानर-यशकी विधि बतलाता, कोई देवी देवता कनौरको वानते नहीं बचा सकता, चाहे बानर यज्ञकरो या कनौरको छोड़कर भागनायो । वहाँ कुछ शिक्षित लोग भी थे, लबा बाई या न जाने का, उन्होने उच प्रोग्रामको स्थगित कर दिया और सभा स्वागत कारिणी में परिणत हो गई । बैठकका स्थान मन्दिरका सभामण्डप रक्खा गया, लेकिन मन्दिर की देहली के भीतर कोई बिना कमर मे कमरबन्द बाँधे नहीं जा सकता । मैने अपने पैन्टकी चमड़ेकी पेटी दिखलाकर कहा - यह है कमरबन्द | लेकिन उतने से देवता माननेवाले नही थे । मेरे कोटके ऊपर एक ऊनी कमरवन्द वाधा गया, फिर मैं सभामण्डपके भीतर गया । मन्दिरके, भीतर नाचनेवाले दो विमान थे, जिनमे एक बदरीनाथका था दूसरा कल्यानसिंहका । कल्यानसिंह राजा पदन सिंहसे १० पीढ़ी पहिले गद्दी पर बैठे थे, और उन्हें विप देकर मार डाला गया था। शायद उनका और भी महत्व रहा हो, अर्थात् वह कामरूके प्रथम राजाओं से रहे<noinclude></noinclude> p1zf1lx1636l2m5tg2ijrocolnhe6ik पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०७ 250 195422 666158 2026-07-07T16:06:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666158 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>माइला २८१ उन्हें देव पर मिला । वहाँ के मन्दिरोंने और होता ही है, सिवाय इस डोली खटाली जैसे विमान के । बैठ जाने पर मन्दिरके रियोका परिचय दिया जाने लगा-- ने थामसुन्दरदास (मास्टर विहारीदास के भाई) और नेगी बुजुन सेन् नन्दिदा माय (महता) या प्रबन्धक है। तीन क्स्, जिनके गुरसे बद्रीनाथ बात करते हैं, यह है पुरनजीत (अवसर प्राप्त), पालूराम और सुन्दरनेन । पुजारेस् पुजारी) है जवानदास | कारदार - गंगा- और गोकरनदान | वेतस (कास्य) हरमनदास | दूसरे कारदार * -- नेगी बदरीवर, श्यामगुख, देवलाल और किशनग. पाल । फाल्गुन मे नायका एक विशे महात्मन होता है, जिसके लिये दो विशेष कान्दार बनाये जाते हैं। उन्हें "च खेत्" (शुद्ध) कहते है, चोखेस् (गया) होगा वेशभूवचन होती है। उनके ना (नान) चूर्णदार पाजाना, शरीरार सर उनका गटपाली बागा, शि पर दिली.ीदार पगड़ी और जनेऊनी पहिने है-नेक परिनने हा नहीं है, यह जीप तथा पह गामा नहीं। चांसेज तीन दिन नदी अपना शर्वर ने काश ( फैलाय धारों जाकर पकीर यान है। चाथा सता जन्मा होम बाजन्याने द्वारकान फिर सेल (उनते है। बने ग्राऊ थाना- दूसरे नहीं देखी जा तहान ते कुम इसके माया ले पहुंचीं। बिहार में थी, बा जोत देखना तो मेरे आटी पानी पा बीए और गुरी है। परमभीतवानी<noinclude></noinclude> ayc1qpmzbl1qzaw2h8skuyjstlbxkk8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०८ 250 195423 666159 2026-07-07T16:06:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666159 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- २८२ किन्नर देशमें इनमे से विकाश बौद्ध मूर्तिया है। यह भी सुननेमें आता है कि इनमें से कितनों के ऊपर अभिलेख है। मूर्तिया ऐतिहासिक महत्त्व की है, इसमें सन्देह नहीं । मोने और साना सानने विस्तृत उपत्यका है, जिसका मुँह मीनेते जरा नीचे जाकर रॉकरा हो जाता है। यह राष्ट ही है, कि अति पुरातन युग यहाँ एक विशाल झील या ग्लेशियर रहा हागा । फिर पहाड़ तोड़कर व जलने अपना मार्ग बनाया। लेकिन यह मनुष्य- के अस्तित्वमें थाने के समय की बात नहीं । मोनेवाले कहते रहे कि पहिले यहाँ बहुत भारी सरोवर था, लोग यानी छतारसे वाल्टी डालकर पानी निकाल लिया करते थे। तब चांद, सूर्यने अपना तेज दिखा सरावर के पानीको सुखा दिया । दीनाथ मोने पहुँचने के बारेमें वाला रहे थे, कि तीन भाई द्वारका से चले । जेठा बदरिकाश्रम में पहुँचा और वहां से शिवजी को कैलाशमें खदेड़ कर वही तपस्या करने लगा। उसका नाम तभी था । पूरना टेहरीका राजा बना । छोटा राजपूरना या देवपूरना मला ग्राकर यहाँ बैठा । किन्नर भाषामें स्पा- नदीको बस्पा-गारङ् कहते है । पहले मोनेमे एक ठाकर था और साङ्लामे मुख विश्नान नामक ठाकर रहता था। मोनेका ठाकुर गाउसके वशका नाम पास्य दन था जिसका अर्थ "पावाण- पर” । सपनी ओर ब्रू ये के बीच वारी ठकरस् था और चोलि और तलि में भी अलग अलग ठाकर थे। चिनीका एमरच ठाकुर बहुत तगड़ा था ! मोनेके ठाकरने अपने दिग्विजयका चारंग सालासे किया और वीरता से नहीं धोखे से उसका सर्वनाश किया। मोने (कामरू के कुन्थुङ्- परिवारकी लड़की मुखोविश्नान की स्त्री थी । उसको अपनी रायमे मिलाया गया, सलाह हुई, कि दिन मे जब जाये, उस समय वह आकर काली झण्डी - भागनेका चिह्न थी । काली कट्टी दिखलाई भोजनोपरान्त ठाकर सो दिखला दे - सफेद डी गई, और मोने ठाकर<noinclude></noinclude> 7t1cbimcnknb8o00qx2opyld3r3bugh पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३०९ 250 195424 666160 2026-07-07T16:06:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666160 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बड्ला ने २८३ छाने दुरबड़ दोड़ हुई। वदनाय ननुश्य भी हैं देवन भी है। उनसे ने टेहरी गढवालका राज्य स्थापित कहा कि, वनेपा हटाकर यती गहू यापाठी र संवेग बाज भानूद दिला उन्हात हुआ है। देवी था वो सनोज होती है, लेनिन में उस से बैठने पर कसी को बड़ी गड़बड़ी होती है । नाम दे है गया है। ठाकुराके बिलोरी लाटी घर नवजेता को बदरीनाथ सातिक कहते हैं, सभी विजित - का उपया दिया गया पत्थरको विशेष तो मे बाट्री लागा वाया जाता है । जान पड़ता है, एमर्च (चिनी ठाकु) को दर्शनमें बड़ी कटनाश खन्ना करना पाया। सेनेकेलिये यमुनाकी घासा नदी के तटवती फोहा जनपरिगये थे। उन्हें जोतने के लिये मान्दूहलटीन नव, रहने कलिये बंगा नदी ओर चारण लिये बापयत । दीन एन खतम कि गया । पावन करके बदरानायगराकारादिव। जाप सिद हुये, जाजजन तारा शाणितपुर ये गये । बयान पर समान कर कर इसे वि भाषामे वेश जम्यादी, हाकी सीडी माल है, तर गोदाम, ་་ धान पानी खोई " भूतप२४ रे हो, यह करा है, बनेपा ६ किया रेटूरे बोटा खाली,<noinclude></noinclude> phsyj1kvys8c19h8fm2km9o9ks9l6j6 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१० 250 195425 666161 2026-07-07T16:07:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666161 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८४ किन्नर देश मे पतियोंके वीजमे राजगद्दी रक्खी है। तीसरे तल पर पांन कमरे हैं, जिनमें एक कभी नहीं खला जाता, दूमरे में सेकड़ों भेड़-बकरियाँ काटी जाती है, जबकि हर तीमरे वर्ष सराइनसे भीमा- काली यहाँ पधारती है (पधरावनी बड़े खर्च की चीज है हिमाचल सरकारने दिया है, श्रव भीमा कालीका पधारना संदिग्ध है। खाच कम कर तोमरे कमरे में. पशुका प्रोक्षण किया जाता है । चोवेनें मोमा काली वैकता है । पांचवें कमरेगे राजाका सामान - हथियार, कवच, वारूद, सीमा आदि रखा हुआ है। चौथे तलके कमरों में सबसे बड़ा दर्वार-दाल, दूसरा रनिवास, तीसरा स्नान काष्ठक, चौथा वडा रसोई-घर फिर एक पानी-धर भी। पांचवीं तल सबसे तम और सबसे ऊपर है, जहाँ एक छोटीसी कोठरी है, जिसमें वटकुला देवता निवास करता है । 1 इसी किले के भीतर राजाके रहने, खाने, काम करनेका सारा प्रबन्ध था । उस समय वह कितने थोड़े में कान चला लेते थे । इच्छा तो जरूर भीतर जाकर देखने की थी किन्तु लोगोंको बुद्ध बनाकर रखने के लिये राजानोंके बनाये नियम मूड़ विश्वास रूप धारण कर चुके हैं । राजतन्त्रसे सवद इन मूढ विश्वासोंकी सुरक्षित रखना दूसरे समय हिमाचल प्रदेश के लये खतरेकी वान हेती, किन्तु अब किस मे हिम्मत है, कि प्रजा शासनको हटा फिर राजाको लाउर गद्दी पर बैठाये। यह मैं कहूँगा कि बुशहर में कितने ही पुराने रजदवरी व भी यही समझते हैं, कि वालग होने पर टीकासाहब (युवराज ) अपने बाप दादोंकी गद्दी सम्हालेंगे। किले में बाहर के श्रादमीके जानेका तो सवाल ही नहीं उठता, वहाँ के लोग भी जब भीतर जाते हैं, ता कमर में कमरबन्द के अतिरेक उन्हें शिरपर शमलानुना काली टोपी लगानी पड़ती है। किले के बाहर एक छोटासा होता है, फिर कोठा-भडारकी कितनी ही कोठरियाँ । ' मुझे किले के भीतर के कागज-पत्रोंके देखने की वही इच्छा थी । पुराने समय मे लिखा-पढ़ी भोजपत्र पर हुआ करती थी और अक्षर<noinclude></noinclude> j58nmxq4s39vtlfss78eeiyit9pm1jj पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३११ 250 195426 666163 2026-07-07T16:07:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666163 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>साला २८५ करा (त्गुलिपिले मी निकली एक लिपि ) जान पड़ता है पुराने कागजपत्रको बहुत सम्हालकर नहीं खखा गया और साठ- वत्तर साल के पहले के लेख सुरक्षित नहीं हैं, उस समय मुझे विश्वास था, कि मराइन में पुराने कागज पत्र बहुत मिलेंगे, इसलिये मैत्रे ज्यादा बोर भी नहीं दिया । यहा मैं मोने हती रे मानेके बदरीनाथ गढ़वाली बदरीनाथ से मेंट करने ने लिये जाया करते थे। जब तक नाचे माधू-महात्माओ सेट-सेटानियाने धावा नह बल दिया, तब तक गढ़वाल वाले बदरी- नाथ और नेक बदरीनाथ में उतना ही अन्तर था, जितना बड़े भाई और छोटे भाईम | हर तीसरे माल बाजे गाजे के साथ माने बदरीनाथ चंदन पहुँचने और वहाँ एक सिहान पर बैठाकर उनी पूरी जाती। सम्वत् १६३२ ( न् १८०३०) इसके बारेमें तुराद राजा शमशेरसदने निम्न चिट्ठी तिथी-- के कुछ कागजोंगी वात करता हूँ । "नासास महासो न पचरजा नल परतोत्तमजी सी महासी परमार सो महाराज धिग्न सेसी रामसेर विधेर लगय पहुंचे । हा समाचार बजे हैं । बाइसे बजे चाहिये। उप इसे दार गरका देवकीन को नेगा रोवर वार नेगी शराननके साथ भारत गए, सो देवतेजोका सगार पाहरनगलन उप बटलार पुजा ननना इच्छी सरावद उनके मत नेगी रोशनी देते वेन देया आदे ( पा लिखते रहे । १६३८ रुबी नकल देख देवही तजीको । लानाथ ना जानेका देवने लिखा- "माज कलवारका महारादिव भी भारत सो द बने (1) देवनदान<noinclude></noinclude> jeuoqg74yv3wxe6c7mk3ihw7hwcesse पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१२ 250 195427 666164 2026-07-07T16:07:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666164 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' २८६ किनर देश में नेगी रेणवद्र हीसे यच रामरम बचने' बोल्या उपन्त जोवी बद्रीनाथजी केद्री जानेका हुकुम फरमावते होगा सी देवतेजीकी मरज - हुकुम माफक देवताजी वद्री क्षेत्रमे वेसक ले जाना ( व मूजव रकनके बद्री क्षेत्र में पुजा कर देणी और सरकारी तत्कमे देवतेजीका रकम खरच अज तक मिला करतीसो श्रवती रसम-वजय दातेकी खरच सरकार से मिल जाएगी (1) तुमने रखमव-मुजब खच लगा देखी (1) तुमको सरकारसे गुजरे मिलेंगे (1) स १६३२ रेह (प्रविटे । ३१ लिख्या हुकुम परमण (1) सुभ" । कामरूके' बदरीनाथ राजा शमशेर सिहारी चिट्ठी में 'कस्न" (कृष्ण) रूपी वहे गये हैं । लेकिन उन्हीं के पास अपने स० १६२३ (नू ८६ ई० के पत्र बदरीनाथ के रावल पुरुषात्तम शर्माने कामरू वदरीनाथको चौद्ध रूपी लिखा है । पत्रकी मूलप्रति यहा सुरक्षित है। उसका कुछ अंश निम्न प्रकार है -- "स्वास्नि श्रीमद्वदरीनाथाराधनसमासादितसमस्त तु वासेषु शौर्योदार्य गाम्भीर्यते जन्याद्यनेक गुणगणाग्रामेषु दयादा- क्षिण्यमाधुर्ययुन क्षात्रमण्डल मुकुटल-त्पादारविन्देषु दानशौड श्रीनन्म- हाराजाधिराज परमभट्टारक श्री श्री श्री श्री श्री रुमसे विकल् कल्पेषु इतस्वस्ति [श्रीकृष्ण ] चरण परिचर्य परायणान्तकरण रावलोप नाम पुरुषोत्तशर्म व हताशा राशय समृलपतराम ( ) तत्रभवत प्रतिशमीहामहे ( ) प्रवृतस्तु भावया 1) श्रागे द्वापते जो वौद्ररूप श्री वदनाथ द्वारकासे दहा श्रायके पूजा-भंगके अर्थ तहाँ राजगादी में प्राप्त हो रहा है, यात्रार्थ वह मूर्ति तमिल ..." बन ' दोनों पत्रोंको देखनेसे पता लगता है, कि सम्वत् १६२६ श्रावण तुदी २ चद्रवासर तक कामरूके वदरीनाथ जहाँ बौद्ध रूपी अथवा बुद्धरूप थे, वहाँ सं० १६३२ में वह कृष्ण रूपी गये, और फिर तो स १६५६ (सन् १९०२ ई०) भाद्रवद १० को वी रावल के पास पत्र लिखते हुये शमशेर कहते हैं- “विस्तार समझा जो लेखाकि यद्दासे हमारे गद्दीका देवता कृष्णरूपि वदरीनाथ वहां भेजा सो ( बदरीनाम )<noinclude></noinclude> 7drejx9zxt6htx2kxqxkeaslzqt2r7j पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१३ 250 195428 666165 2026-07-07T16:07:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666165 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ला २८७ जीके सिंहासनके ऊपर बैठाय के पूजा-मानता अच्छी तरह करना ( वदरी- नाथ जी के सिहासन बैठायके यथाविधिपूर्वक ५ रोज़ तक पूजा...") कामसमें मिले इन्तलेखों के देखनेसे यह भी पता लगता है, कि सितम्बर १९७५ तक अभी बुशहरके राजा यह निश्चय नहीं कर पाये थे, कि उन्हें खुशी बनना है या चन्द्रवशी एक कागज में लिखा मिला- नाम रहोस समर लकव मुकामसकूनत राजा रामपुर सहय दूर पत्र लिखा है - नाम जान उम्र सालनाम खानदानी सोरनिह ૨૦ रगुवसी वामनं राजा उगर िफलेका कोई कागज मुझे नही मिला। नाम है नार भाजप की ढूंढा जाय तो उसने भी पुराने लेख मिले । उगरसिंहने ३१७२१ ३० भापान ने दारों को धनद के ठीक करनेके वारने लिनाथा *सी स्त्री ही परनना - श्री नवश्री महाराजे को उगर सिदे ( | ) देवी जोन राखावे से ) ति भने हनीपन- मारी यांनी परवा पनी दे .. माता॥ नेनो VAL १५ दो दी थी (1- ददरे एतेन जे ए पर रहे। मक तेरे ते के रूप १०० पर १० जादमीरे स च रे ये न कलकत्र गत 3000 २०० बीपदान व नाशिक नच जस्ता (2) " 1<noinclude></noinclude> n3vhg3l7xtrotdcicz722fmbejyry2p पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१४ 250 195429 666166 2026-07-07T16:07:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666166 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>" २८८ किन्नर - देशमें राजा उगरसिंहमी में हरके वीचमें "श्री बद्रीनाथ जी न सहाय" और बाहरी पधि पर उपीकं तीन बार दुहरा है। एक म हर पर " बद्रीनाथ जी सहाय" फिर बाहरकोर "मु छाप रियामत विहरम १८५१" लिया है। इस मुहर बीचवा वृत्त में केवल "श्री" लिखा है । यह यो पहिला मोहर भो नाग अक्षरों में है । काव किले के अधिकारी मेरी सहायता करने के लिए तैयार थे किन्तु कुछ राज शिक निमा रुट थे, जिन्होंने घटक का लिया था। में किले के भीतरजा नहीं सकता था और दूसरे उस के भीत की चीजोंके ऐतिहासिक महत्वका जानते नहीं थे। में उनसे पूछा जिस कागजको लाने के लिये कहता, उसे वे ले आते। वह कुश से पानी पिलाना था । वहा कई ऐनिक महत्वकी वस्तुएँ हैं, . इसमें मुझे मन्देह नहीं। वह वस्तुये तथा वाद नी एक ही जगह रक्खी हुई हैं। हिमाचल सरकार द्वारा कालदुर्ग रक्षारक घोषित किया जाना चाहिये; और सबसे पहला काम होना चाहिये यारुदको यही न हटाकर दूर रखना। तावन्नको भावना, जिनमे लोगों में प्रबल हो, इसके लिए किलेन अभी जा सामन्ती नियमोका बोलवाला है उसे हटाना चाहिये, और इनमें स्थानीय ग्रामि जात्य वर्ग के विराध पर ध्यान नहीं देना चाहिये । बा-उपत्यका विशेषकर कामरू और सहलाने बौद्ध धर्मका प्रभाव कम है और ब्राह्मण धर्म श्रीजार है - जानना ओर बुग्रालून के फेर में पड़नेको मैं पतन कहता हूँ । लेकिन अभी भो ब्राह्ममा धर्म बहुत भीतर तक घुम नहीं सका है। सारे कनौर में ब्राह्मण कही भी मिलते नहीं । जान पड़ता है कामरूके चन्द्र दुवी होनेको लालसाने ग्राहास धर्मका यहाँ प्रवेश करावा । नाचनेवाले बद नायके पास तो किसी ऐतिहासिक सामग्री जात होनेकी श्राशा नहीं थी । किले के बाद यदि कहीं और कुछ मिल सकता था तो य"<noinclude></noinclude> c7hpk4g6v5olz1enplw9ogtihofc227 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१५ 250 195430 666167 2026-07-07T16:08:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666167 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पन्द्रहु- ५८५५ पुनरागमना मन्दिर (२७), ५-६६० )<noinclude></noinclude> 7ialpfjnzhfsw7b8oq7xeowzah4mepu पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१६ 250 195431 666168 2026-07-07T16:08:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666168 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सोलह-- ५८. कोटगल, डाक्टर बांध के परिवार मे ( पृ० ३३८ ) ५६६०. तरुण नायर, शिम्ला नगरी ( पृ० ३४५ )<noinclude></noinclude> iq3qgihf4sljguzo51f9ah3ny98b31o पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१७ 250 195432 666169 2026-07-07T16:08:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666169 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बादला में बन्दर देखने दो बज गये थे । मोने लाने भावन क्या था। वह नीचे उतर कर बहरी नानाजन करने गए फिर हमे अवस्थित महुँ । विभाग वा । नेता रही थी पुरानी सुर्तिया क्या पता है ? वा घर पीतल धार उत्यले उन्न । वि२२ लम्बी चतुर्भुज - एक तरह देख पड़ी। मूर्ति-शरीर ने का था, किन्तु र उज्वल पानी देनेही उरला । यह कला छ फि मारव न - 14. कि 1. उतरवाये । " कई ॥ श्रार न नवीन प्रक 3 कुन ए. .<noinclude></noinclude> j1rvvwgqsv0xxl92stotzl44px6tksm पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१८ 250 195433 666170 2026-07-07T16:08:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666170 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६० किन्नर - देश में इस "त्रिजातिक" मूर्तिका निर्माण कराया । "त्रिजातिक" या "विज्ञातिक- नाथ" महायान बौद्ध धर्म के तीन बड़े बोधिसत्वो -- अवलोकितेश्वर, मञ्जुश्री और वज्रपाणिकेलिये श्राता है । इसका अर्थ हुआ कि इस मूर्तिके साथ ऐसी ही दो और मूर्तियों बनाई गई थी। मालूम नहीं वह कही दूसरी जगह मौजूद है या नष्ट हो गई । यह मूर्ति कला और इतिहास दोनोकी दृष्टिसे महत्वपूर्ण है । उतनी प्राचीन तथा कलापूर्ण तो नही किन्तु रोकी एक तीन इञ्च ( केवल मूर्ति ) की बोन धर्मकी मूर्ति भी वहाँ है, जिसपर लिखा है-"ल व डवर-र-ब-न- मखडि- द- जें- ल- न- मो" । नमखादोर्जे नामके किसी धर्म गुरुकी यह मूर्ति है ! - मूर्तियोके वाद मैने पुस्तकोकी ओर ध्यान दिया । नेगी शाम तु- न्दर दासके घरसे 'आई "सुवर्णप्रभास-सूत्र " ( भोटभाषा ) की हस्त लिखित प्रतिको उठाकर देखा। इसकी प्रारम्भिक पिकामे दाय का नाम और परिचय लिखा था, जिससे मालूम हुआ कि राजा "विर- दिर सिग" के समय सरकारी अधिकारी, असि, तोल ओस्मोल, रोख-मोल आदि ने इस पुस्तकको मोनेमें लिखवाया था। विरदिर- - सिग वस्तुतः राजा केहर सिह के उत्तराधिकारी विद्या या विजयसिंह * भोटिया लेख निम्न प्रकार है- “गु गे शङ् - शुङ्- दम् छोस दर गनस् ऽदिर । दा । मेद बसोद - - - - मि- यि - वदा । मङ - पोस् बत्कुर वडि - - - - - - - - - नमस- ल्हुन-व- गदर - ग्युद् - ब्ल-न- - मेद । रिन छेन वज़ड् पो शवस क्वित वचरास पडिगनस । युल-ल- दगे वचु ऽ जमस पोडिदप्पड्स- युल मो- न ऽदिर। गनमत सsि वदग पो विदिर सिगि योन्ग वदग पो न सि दङ । - तोल दङ् । अत - - - - - - - मोल दङ । रोड- मोल - दङ । दल- त्दन - योनि गनस - - - डि मछग ग्युर रो- ज़िं- नि दडस - - - - - मद डोगन दङ । र मोन दह । खुदु - - - ग्यि वदग मो को फुल दड् । - ज़ंड दड । - - मो दड स - दोन - जे पुर दग ना. -<noinclude></noinclude> izlasaifv4y3t9gvytz3lkdqaavmvdb पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३१९ 250 195434 666171 2026-07-07T16:08:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666171 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>साङलामें २६१ उत्तरार्धम काही विगड़ा नाम है । विजयसिंह १७ वी सदी के मोजद्र थे । नेगी शास्मुन्दरदास (आयु ५३ वर्ष) अपने पिता कमला- सन्द, पितामह निदान और प्रापितामह श्यामदास तक ही को जानते है, किन्तु उन्हें यह नालून है, कि उनके वशमं श्रस्मोल नामक पूर्वज हुये थे, जाजाकडून ( नमिनि नदर) थे। कामके प्ररे परिवार चकुके श्रीकुण्डारामजी के पास एक सुवर्णसिका नागरमिता की नोट-पोथी है, जिसे दिन बगले में देखने का मौका मिला। यह शायद ग्राज मुझे तक में देवी लिखित पोथियोंमें सबने पुरानी है। इसकी नेपालगता है कि इसे मनके गाल राजा इसमें नपा । पुस्तकमें चोड्- पानीमा प्राय पछि लिखी गई। नागदा वर्ष है कि पांव १४वी सुनिधी अता है। नही हया। 517 " A 4114- 1 * ' -: - न - - प्र<noinclude></noinclude> daghvpqjsutmarxdrkelqwe7xcw5vj3 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२० 250 195435 666172 2026-07-07T16:08:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666172 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देश मे 3 काममे रामपुर के राजाओ की एक वशावली मिली, जिसे में वहाँ उद्धृत करता हूँ । प्रथम पूर्वज प्रदुमन सि मे यहाँ यदुवंशी कृष्णपुत्र अभिप्रेत हैं। सभी नामोंके साथ 'सिघ' या 'सी' लिखा हुआ है- १ प्रदुमन सिघ १२ हरिचरन २५ मेहर २ लसींध १४ माक्रमान २६ सबला ३७ विनन ३८ रगुनाथ ३ सेर १५. मुदई २७ हामी ३८ देवी ४ कमल १३ भूप २८ जवार ४० चरन ५ गुलाब १७ उमेद २६ गवरदन ४२ पदेनी ६ वरदेव १८ हरकरपाल ३० जगवीर ४२ मलबहादर ७ मेहरूप १६ करपाल ३१ सुरजन ४२ गोपी हरि २० हरदेव ३२ मदन ४४ गुरवदत ६ सरजीत २१ सलाव ३३ गोविन्द 61 जगत १०. जगबीर २२ बीमा ३४ प्रीतम ४६ अमित ११. रघु १२ गोपाल २३ बगल ३५ गुरदारो ४७ दलवदर रड - न । गत २४ पुरवा सङि वदग पो - ३३ किसन ४८ नेइल - - - मद - डोग - न । क्थ - लेगस युलल - - - • - - 1 र्बल पो सडि दाल ग्यि - - दगे - पडि छिद दकुल इदिर मिरिगस खुडस ख़ुद | ददन पोन ग्यि बदग पोज - रिंग पङि गनत लड - - - - - - - - - - - - म्युरसि चनि दड । ल्ह फ्रग बशो नु मोन - दङ । यं गर प स - - - - - पडस - ल - मे तोंग डवर व ऽद्र बडिकल - - - - द्र - - - . वचु ऽर्जम बचुनन5- दगु - दड- 1 पल खस पंडि तस पांड. योग- . द ग्री - इद्र वडिय लो - दड । क े दंड | एस - घोडि छोग ग्युर मो - पोति - द - - ग्रो - र्जुन - - - . । गनऽ - मडि छोग ग्युर से मोर दर | । - - - - - - मिठु-रि-दड- ...स्पु चड दड कोन चांग छे रिड दड हो यो बस मी क्यिद दडस वि दड- हुर- र्ज • दड- - - - - - दह । बस्थिन पडि बदग -<noinclude></noinclude> lrlzhoe9wbkt6q35itx09amvwmqu1yz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२१ 250 195436 666173 2026-07-07T16:09:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666173 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नाइलाम २६६ हरिय २० फ ६॥ चरकीकन पदवीन ६७ श्रमर ६६ प्रदेश पर पड ६= करल ५.१ मर ६७ ३ मारी ६ तपनाथ ५२ ६ नमे ८ श्रमर १०० सत्रम १६ दरम महारा १०१ मुरज ५० वि दी बाय १०२ दरमोर ३५ प १०३ ७ प्रीतन ८७ म १०३ चारमल ७२ ग -प्रम १०४ जवाला ५ ६० • . प ॐ म ०८६० १०५ बादल १०६ अमृत नम गन वी न ' प्र.1: ७ ६. १०७ कार १०३ गरिनन -पवनान ६८५ , 27 " वर भूर नय - 4. पु . 7 . स है। - F ६. छेन -<noinclude></noinclude> gfoebtnnnf9gzk3ei5gxp3d155qjp63 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२२ 250 195437 666174 2026-07-07T16:09:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666174 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>દર किन्नर - देशम कामरू मे रामपुर के राजाओ की एक वशावली मिली, जिसे में यहाँ उद्धृत करता हूँ । प्रथम पूर्वज प्रदुमन सिबमें यहां यदवशी कृष्णपुत्र अभिप्रेत हैं। सभी नामोके साथ 'सिघ' या 'तीच' लिखा हुआ है- १ प्रदुमनसिंघ २३ हरिचरन २५ मेहर २ लसींच १४ माक्रमान २६ सवला ३७ विनन ३८ रगुनाथ ३ सेर १५ मुदई २७ हामी ३० देवी ४ कमल ५ गुलाब १६ भूप १७ उमेद २८ जवार ४० चरन २६ गवरदन ४१ पदेनी ६ वरदेव १८ हरकरपाल ३० जगवीर ४२ नलवहादुर ७ मेहलप १६ करपाल ३१ मुरजन ४३ गोपी हरि २० हरदेव २२ मदन ६ सरजीत ४४ गुरवदत २१ सलाव ३३ गोविन्द 61 जगत १० जगवीर २२ बीमा ३४ प्रीतन ४६ अमित २३ बगल . ३५ गुरदारो ३६ किसन ४७ दलवदर ४८ नेइल ११ रघु १२ गोपाल - - २४ पुरवा - रह न । गतम सङि वदग डोग - न । क्थ - लेगस मदड - - - मि पडि छिद दकुल - ऽदिर द । ददन पोन ग्यि रिंग पङि गनत ल्ड - - - - पोल पो सडि दल रिय - - - - - - वचु ऽर्जम छन दट- 1 युल ल दगे रिगस खुस वचुन वदग पो र्जो दगु - - - पल खस पंडि तस - पोड - - छोग - - . ग्युर सिचन दड । ल्ह फ्रग बशो नुद्र-गंड द ग्रो मोन - दङ । यंगर प सडऽद्र- वडिग्र लो - पडस - ल - मे - गडवर व द्र वडि कल सस - पोडि - छोग - ग्युर - श्रर्जुन 'मो पोति - दङ । गनs - मडि - 1 - - - दर । क े दड | पडि वदग - ग्युर से मोर दंड | - - दड बास्यन छोग रिड दड मिड-रि-दड- - दढ- हुर- र्जु दड- ...स्पु - चड - दढ़ - कोन चोग छे हो - गो - वसङ - मां - क्यिद - दडस वि<noinclude></noinclude> mml6a14dx3xjj3fqh4olefml0nety9p पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२३ 250 195438 666175 2026-07-07T16:09:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666175 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>साङ्ला मे २६३ ४६ हरिपद ६५ गोरकोकल ८१ दलदीन ६७ श्रमर ५० फतेह ६६ परदेवर पर परदेउ करल ५१ अमर ६७ वारपल ३ भारी ६६. तपनाथ ५२ महावद्र ८ चरमेद २४ मलर १०० सग्रम ५३ मलार ६६ दरजोद ८५ दहा १०१ सुरज ५५ जगवे ७० दरकोरी साथ १०२ दरमोरत ५५ जोगदेवाल ७१ प्रीतम ८७ करम १०३ चारमल १० दलव ७२ नागर प्रेम १०४ जवाला ५७ मोर दीप ७३ रन वह दरत १०५ ग्वसदल ७४ धीर जमेहर ६० चरन १०६ मृत ५०. जगतव ७१ मंगल ६२ वीरवेसी १०७ सार ६० गुमान ६१ परमोद ७६ गोरसी ६२ केसरी १०८ करिसन ७७ लखी ६३ परजीत १०६ हरि ६२ महीपर ७ परम्भपन ६४ घरम ११० जवर ७६ दुमन ८०दनकरीत ६५ कमल १११ भूप ६६ छतर ११२ कल्यान ६३ भरव ६४ गलेही गुं निगमित विय - - - " दोन दु फगस र्ग्यस्तोड वड. " जरोमे राजा उगरसेनके समय पुस्तकी कहा है. यल पोडि फल खल- दूसरे पृष्ट पर कुछ सराव विकीय वारेमे लिखते हुये मजित ये वशि - शुद्ध सड योऽ । - - स्कुल खुनन के दस र नम - - . - - छोन येस्तोड व पियस स्त्रोस यिन नि ल्ड - - ल - घु - शिन - स्लॉड - युलल र्ग्य चुऽजम - - - - - यल छैन - - जो न्येग्यल पणे श्रु बुर सिह स्त्रियन ऽवस दापो ऽजन ग्यो नो टेन निय - . - - - श्र- प जुन दरसन ग्रिस 4 - - - . ७ - मिड पु च - यद. ख - गु भिनिखकुर दन" भाषा बहुत अशुद्ध है। -<noinclude></noinclude> mub1horwwo2iff9o2y3fmk6233fuoyy पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२४ 250 195439 666176 2026-07-07T16:09:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666176 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६४ किन्नर - देशमें ११३ केहरी ११४ विजा 'विजयी' १२५ उदय ११६ रामसिंह २१६ महेंद्र [०२८५०३०] २२१, पदम [मृ० १६४७ ई०] रामपुरमे प्राप्त दूसरी वशावली से ११७ रुद्र ११८ उग्र [ मृ० १८११ ३०] १२० समेसरांत [मृ० १६१४३०] इस वशावली पर कुछ कहने से पूर्व भी कुछ दे देना आवश्यक है । इस वंशावली में प्रदुमनसे पदमसिंह नक १३० पीढ़ियों गिनाई गई हैं, जिनमें पहलेकी ८४ पीढ़ियों निम्न प्रकार १ प्रदुमन १३ गोपाल २५ नुरमा २ अनुरुध १४ हरिचरन २६ मेहर ३७ किशन ३८ कृष्ण (विसन) ३ जमल १५ वदामा २७ जमाल ३६ रघुनाथ ४ नाहर १६ बुधिपती २८ गजपति ४० देवी ५. कमाल १७ भवनी २६ जवाहर ४१ चरन ६ जगत १८५ रन वादल ३० गवरधन ४२ परमेश्वर ७ बुदि १६ पद्म ३१ जगवरत ४२ दलबादल सुरत २० गुरवान ३२ सुरग्यान ४८ गजराव ६- नरजे २१ नरदेव ३३ मदन ४५ गरवादल १० सरजीत २२ सूरज ३४ गरजन ४६ जगत ११ जुगेन्द्र २३ भीम ३५ जवीव ४७ अनिद १२ रघु २४ सुरमगल ३६ गिरधारी ४८ बलवादुर * संवत् १६११ ( १५५४ ई० ) में रामपुर बसाया, १५५६ ई० में तिब्बतसे सधि की, १५५६ मे दिल्ली दर्जार ( अकवर ) मे गया | + जन्म सवत् १७६३ ( १७३६ ई० ) मृत्यु १० श्राषाढ़ (सौर) संवत् १८६८ (१८११ ई० ) । T जन्म १६ कातिक १८६५ मृ० १६ मार्च १९०६ (१८५० ई०), महेन्द्रसिह सौतेले भाई मियां फतेहसिंह थे, जिनके जनगीत प्रसिद्ध हैं। > hit जन्म २३ ग्राश्विन १८९५ मृत्यु २० श्रावण १६७२ (४ अगस्त १६१४ ई० ) ।<noinclude></noinclude> exlip3hj0me02cfifrny9l3r8m2ecf8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२५ 250 195440 666177 2026-07-07T16:09:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666177 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४६ भगवान ३० हरि ५८ दलीप साला में ६७ नरदल ७६ सुरसेन' २६५ ५६ जगपति देव ' ५१ श्रमर ६० तान ६६ दरजोधन ७७ भभी ७८ हरिभजन ५२ मदवहार ६१ नरमोह ७० धेनुगज ७६ धनभरत ५३ रामार ५४ जगपति ६२ मनीहर ७१ प्रीतम ८० भरत ६३ नरदेव ७२ सार ८१ हलसेन ५५ जोगेन्द्रपाल ६४ नरसिंह ७३ रतन पर नरदेव ५६ दलपति ६५ गुरभगत ७४ धजोर ८३ मार ५७ बुद्धवान ६६ मरधन ७५ मंगल ८४ अमर और पीछेकी ग्यारह पीढियों निम्न प्रकार हैं- १२० छत्रसिंह १२३ विजयसिंह १२५ रुद्रसिंह १२६ शमशेरसिंह १२१ कन्या सिंह १२४ उदयसिंह १२७ उमसिह ३० पदमसिंह १२८ महेंद्रसिंह १३१ वीरभद्रसिंह १२२ केहरीसिह १२५ रामसिंह नीचेकी पीढियाँ दोनो यशावलियोकी ठीक मालूम होती है । पहेली वशावली के गुलान (५), मुदइ (१५), उमेद (१७), मेहर (२५) *हामी (२७), जया (ट) र (२८), मलवहादुर (४२, दलवदर (४७), फतेह (५०), सलार (५३), गुमान (६०), और दूसरी वंशावलीके कम्पल (५), सुरन (८), रसवादल (= रणबहादुर, (१८), मेहर (२६), जमाल (२७, जवार (२६), दलबादल (= दलवहादुर, (४३), बलवादुर (४८) जैसे घर पी-फारनी मंगोल नाम वतला रहे हैं, कि जाल बनानेवाला अधिक चतुर नहीं था । जला कलियुगादिमें गुलाब, मुद्दई, उमेद जैसे नाम कैसे रखे जा सकते थे ? पहिली वशावली में दहारी (८५) नाम ईकर तो चार अपना काला परिचय नी दे गया है । "दहारी" श्रौर "वारी" जने नाम काजपुरी-मैथिली मगही ही क्षेत्रमे पाये जाते हैं, जहाँ दार (वाढ) पदा होनेवाले वालकका हारी और मूला (ग) ने पैदा होनेवाले बुखारी नान पडता है । अवध क्षेत्र में हमारी दूसरे हा अर्थमं प्रयुक्त होता था, जैता कि गोस्वामीजीने हा<noinclude></noinclude> 9d02mx3himvakvfycq8jhslkr2qwvw5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२६ 250 195441 666178 2026-07-07T16:10:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666178 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६६ किन्नर - देश मे -" जातु राज प्रिय प्रजा सुखारी ।" हम कामरू दुर्ग के एक लिखितम (१८७५ ई० ) में राजा शमशेर सिंह को रघुवशी लिखा देख चुके हैं, और यह वंशावली उस वंशको चन्द्र- वंशी बतलाती हैं । १८७५ ई० के बाद यह वंश परिवर्तन !! क्या रावी- वाले ब्राह्मणो की बात ठीक मानी जाये, कि दक्षिणदेश कचननगरते दो भाई दशरथ श्राये, पदुमनका भाग्य जग गया, वह राजा बना और दशरथकी सन्तान रावीमे वसकर पुरोहित बनी हो सकता है, यह कामरू वशके पहिले की वात हो । कामरूके नीचे नदी के किनारे बहुतसी समतल भूमि है | विमाना- चतरण भूमि वहाँ बहुत आसानीसे बनाई जा सकती है-बड़े-बड़े खेत अधिकतर सरकारी हैं | कामरू और ताडला के विस्तृत खेतोंको देखकर मैने समझा, कि यहां भी दो फतल जरूर होती होगी। किन्तु नीचे के खेतों में दो फसल होती ही नहीं, क्योंकि उनकी वरफ बहुत देर से पिघलती है। हॉ, गाँव के पास के ऊपरवाले खेतो में क्वारमे गेहूं बो दिया जाये, तो वरफमे दब जानेपर भी गरमीमे फतल जल्दी तैयार हो जाती है, और उसी खेत मे एक फसल और पैदा की जा सकती है। यद्यपि सप्ताह पूर्व आई भीषण वाढने लोगों को बहुत भयभीत किया, किंतु रात मे आने से उससे प्राण हानि नहीं हुई और खेतोकी भी क्षति अपेक्षा- कृत कम हुई। कामरूके खेत बहुत ऊपर पहाड़ी कडे ( पर्वतपृष्ट) तक है। कामरू छोड़ते तक शाम भी नजदीक चगई। हमारे गावसे वाहर होते ही वाजा वा श्रर्थात् लोगोंने बदरीनाथको वानर उपद्रव- शान्ति के बारेमें श्राज्ञा लेनेके लिये मन्दिरसे बाहर निकाला । लौटते समय साङलामें मुखोविश्नान ठाकरके गढ़ पर भी गये, किन्तु वहाँ भूमिके ऊपर उसका कोई चिह्न विद्यमान नहीं है। एक पहाड़ी टीले पर अनाज रखनेकेलिये लोगोने कुछ वखारे खड़ी कर ली है. किसीने एक छोटासा बाग भी घेर लिया है । हम सीधे वगलेपर चले थाये ।<noinclude></noinclude> hmkyzrblto5br6oor2aedq5r7386xln पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२७ 250 195442 666179 2026-07-07T16:10:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666179 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>साता २३७ साला मैने पहिले तीन दिन रहनेका विचार किया था, किन्तु व काई काम नही रह गया था । १२ अगस्तको प्रस्थान करना है, यह चपरासीको मालूम था, किन्तु १० की शामको जो वह लुप्त हुना, तो फिर पता नहीं लगा। दायित्वहीनताकी तो उसने हद्द कर दी। येसे लाये घोड़े का जिम्मा उसने लिया था, अब उसका सम्हालना भी हमारे ऊपर पड़ा | ११ अगस्तको फिर हम साङलाकी गन्दी गलियो मे फिर घुसे । पगी ब्रह्मचारी कल ही कैलाश-परिक्रमा से लौट आये थे । हम दोनों साथ ही गाँवमे गये। गाँवमे दो वातोकी धूम मची हुई थी । टेहरीके ब्राह्मण जोतिस श्राये थे, और लोग साल भरकी बाकी लगी जन्म- बुडलियोको धडाधड़ बनवा रहे थे । 1 एक दूसरी वातकी धूम नही घवराहटती थीं, वह भी बन्दूकोका लिखवाना | समझता हूँ, इस सीमान्त इलाके मे वन्दूकोके रखने से कि तरहका नियन्त्रण करना बहुत विचार- पूर्ण वात होगी । पाच साल पहिले पश्चिमी तिब्बतमें लूट मार मचाने वाले किरगिज़ - कजानीकी कजोरमे तुमनेकी हिम्मत इसीलिये नहीं हुईं, कि किन्नर लोग श्राग्नेय प्रस्नोका खुलेनौर से रख सकते थे। मैने पुलिसकी ओरसे निकाले विज्ञापन भी आगे देखे, जिनमे हथियारोको थानेमें जमा करनेकी पात लिखो की बात चलनेपर मेहता साहवने बतलाया, किन विचार रखने पर पावन्दी नहीं लगाना चाहते । फिर ऐसी गैरजिम्मेवारीकी नचना क्यो निकाली गई ? नीचे के अफसर ऐसी गैर- जिम्मेवारी दिसलाना करते हैं। हिमाचल सरकारने हिन्दीको राजभाषा घोषित कर दिया है। श्री भेटताजी जैसे हिन्दी-प्रमी चाहते है, कि हिन्दीमे दान किया जाय, लेकिन एक छोटे अधिकारीने अपने अधिकार. क्षेत्र कुन निकाल दिया, कि उनके पास मारी लिखा-पढी ग्रग्रेजीमें वीजानी एक बैठक - घटे ब्रिज (तारा) खेलता हा और खेलने लिये घरमे बीबी मौजूद हो, उसे हिन्दी<noinclude></noinclude> eswrwxfd6pxrswqjvclyumsk6f3xp7l पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२८ 250 195443 666180 2026-07-07T16:10:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666180 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६८ किन्नर - देशमें लिखना पढना नीखनेकीं कब कुरमन हो सकती है ? तो ऐसी श्राज्ञा निकालंगा ही। मेरी समझ में सीमान्तमें हथियारके सबन्ध में भ्रम पैदा करना अच्छा नहीं । पड़ोती तितमे हथि यारवन्द डाकू स्वछन्द विचार रहे हैं, यदि उन्हें जरा भी किन्नरा की निर्वलताका पता लगा, तो किन्नरके 'सोमान्ती गांव भी उनके क्रीड़ा क्षेत्र वन जायेंगे | किन्नर में हथियार रखने की ही छूट नहीं होनी चाहिये, बल्कि नरकारको इस बातका प्रबन्ध करना चाहिये, कि सीमान्त के पास वाले उपत्यकाके दो दो तीन-तीन गाँवों दस-पन्द्रह नई वन्दूको कम हथियार न रहें। ग्रारम्भ ही में हथियार के बारेमे जनता- में गलतफहमी फैला देना ठीक नहीं । ब्रहाचारी के साथ हम गोल-मन्दिरमं देवकी मूर्ति देखने गये । यह ' पीतलकी मामूली मूर्ति है, जो शायद किसी जी-नन्दिरमें कभी हाथ जोड़े बैठी थी । नाकमे नथ सभ्रान्त होने का चिड़ है, लेकिन यह चिन्ह वस्पा-उपत्यकामे बहुत पीछे श्राया होगा, फिर इन देवमन्दिरके पास बुद्ध मन्दिरमे गये। वहां अपने प्रधान शिष्यों सारिपुत्र और मौद्गल्यायन के साथ शाक्यमुनिकी निट्टीकी मूर्ति है । मूर्तियो निराश होकर मै पोथियों पर पड़ा | यहां अष्टसाहसिका प्रज्ञापारमिताकी एक पुरानी हस्तलिखित प्रति है । यह तीन खएडोमें थी, जिनमेसे दूसरे और तीनरे खण्ड यहां मौजूद है और पहिला सड लुत हो चुका है। पोथी सचित्र थी, शायद प्रथम खंड में और अधिक चित्र रहे। ऐसे तुन्दर चित्रो वालो पोथीको भला कौन छोड़ता ? क्या रोहूके शिकार करनेवाले किसी साहव वहादुरने उसका शिकार तो नहीं कर लिया ? अथवा किमीने चित्रोको काट कर चार-पाँच सौ वरस पुरानी इस पोथीकी होली कर डालो। हमें अपने ऐतिहासिक महत्वकी वस्तुचोकी रक्षा में और भी सावधानी करती होगी । मन्दिरके पुजारी बड़े उदार हृदय है। उन्होने तिब्बत के गरुडपुराण "वर-दोस-घोस- ग्रोल्” को जहाँ रक्खा था, वहाँ साथ<noinclude></noinclude> hifcnhobepjk0t0hgpzykcjai9s5c62 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३२९ 250 195444 666181 2026-07-07T16:10:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666181 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनको २६६ भी नहीं भूले होता है, कि ही "नासिकेतोपाख्यान" और "गरुड पुराण" को ये | भोटिया गरुड पुराणकी पुष्पिका के लेखसे मालूम इसे राजा शमशेरसिंह के समय वज़ीर रनबहादुरने लिखवाया था । निजी घरोमे हू ढने पर कामरू और सादला मे और भी कुछ पुरानी मूर्तियाँ और पाथियाँ देखी जा सकती है । माडला ब्राह्मण धर्मका भक्त है, बौद्ध धर्म यहाँ म्रियमाण सा है । देवता में शाक्यमुनिया और मा वद्धि मूर्तिया वेरीनागस् जैसे देवनाथांकी सरवर नहीं करसकती । जात-पात, छुआ-छूतमें ब्राह्मण विश्वविजयी है । आजकल स्कूल के मास्टर लोग हिन्दीमे कृष्णलीला कर रहे थे। बेचारोने नीचेकी कृष्ण लीलाको देखा नहीं, केवल अपने मनसे पढ पढाकर वह कुछ गीत और कुछ अभिनय करते हैं । लीला ( या नाटक कहिये, हिन्दी में हो रही थी, मैं देखने नहीं जा सका । पारके वगलेसे रातको गन्दी गलियोमे दोकर थाना था। लेकिन अभिनयकी बात सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। कभी किन्नरके बड़े ग्राम में नए ढग अपने यशस्वी रगमच होगे, जो जनता के सास्कृतिक तलको ऊँचा करेंगे। वगले के पास ही स्कूल है, जिसमें चार कक्षाये हैं। यह स्कूल भी मांने शैलाकी तपनाका फल है । स्कूल मे ८३ लडके पढ़ते हैं और वह तीन मील (बटतेरी और चनन्) तकसे चलकर श्राते हैं। हिमाचल मे शिवाप्राचर तभी जल्दी हो सकता है, यदि हर चालीस घरवाले गाँव में एक प्राक स्कूप खोल दिया जाय । सिन नदि - - गजिरान पर छोम स्थल सं सेर - - - युग्छन पो देल बस्तो । छोत - - - देई व बिया र चिग । - - - - - रह नि - कुलस्तिन दाब लड् वह वरुड जोन- निशेषन धार सोडल रतो.." - - - -<noinclude></noinclude> la7makaee8h34wvxjyr4bmw769lwxww पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३० 250 195445 666182 2026-07-07T16:11:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666182 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०० किन्नर - देशम २० खराहनको १२ अगस्त को हमने साडूलाते प्रस्थान कर दिया । चपरासीका भी कही पता नही था। आज १४ मील जाकर किल्वामें रहना या, लेकिन भारवाहक नये गं बदले जाते । हम एक दिन पहिले जा रहे थे, इसलिये व येमे भारवाहकोके तैयार मिलनेकी श्राशा नहीं हो सकती थी । श्रतएव १४ मीलके वास्ते प्रत्येकको तीन तीन रुपये देकर भारवाहक यहा से सीधे किल्वाकेलिये किये । पगी ब्रह्मणचारी व ये तक साथ चल, फिर सपनीमे कुछ दिन विहार करने चले गये । नैने जब कहा कि सपनी नम्बरदार एक वोतल वत्ती जलने लायक शराव लेकर आया था, तो ब्रह्मचारी वोल उठे - "क्यों नही लेलिया, मेरे लिये "? लेकिन मुझे क्या मालूम था, कि साइला में ब्रहाचारीसे मुलाकात हो जायेगी। सचमुच ही, यदि मालूम हुआ होता, कि तेरे घुमक्कड दोस् मिलने वाले हैं, तो बोतल रख छोड़नेने मुझे कोई उजुर न होता । I अव हम वस्पा नदी के किनारे-किनारे नीचे की ओर जा रहे थे, फिर पैर तेजीसे उठे ं, तो इसमे क्या आश्चर्य ? बयेने रक्खे सामान- को लेने में कुछ देर थी । पुण्यसागरको छोड़कर से आगे बढ़ा। बा की यह उपत्यका साला और नागे तक बड़ी रमणी है । हर-शिल और गंगोत्तरी दृश्य यहाँ और ऊँचे स्तर पर आ रहे थे । शोरट् जानेवाले पुलको छोड़ते मै और उतरकर फिर नतलज उपत्यका 'मे चागया । श्रव भी साढ़े पाच हजार फीट से ऊंचे पर थे, लेकिन गर्मी मालूम हो रही थी, और ग्राखिरहे कुछ गीलको चढाईमे वद सत्य भी हो उठी थी । साढे आठ बजे मैने प्रस्थान किया था और दो बजे किरवा. बगले पर पहुँच गया । यहाँ जगल विभागका बगला है, जो कुछ ही साल पहिले नया बनाया गया था। बगला भीतर-बाहर चारों चोरते बहुत सुन्दर<noinclude></noinclude> t2xhgmbdi111dve80m07mv65211o995 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३१ 250 195446 666184 2026-07-07T16:11:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666184 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनको ३०१, और साफ है, चौकीदार भी मुस्तैद । सफेद गूर पककर खतम हो चुके थे और काले अधपके थे । पकने पर भी क्या रोगी अगूरो का मुकाविला करते ? हाँ, थाइ आकारमे भी और वादमे भी बहुत अच्छे थे। भूख लगी थी और पता नही था, कि पुण्यसागर कब तक आयेंगे। लेकिन चौकीदारके “फलानि भूमिरुदक वाकू चतुर्थी" ने कार बना दिया । वगला गावसे ऊपर और जगल-विभाग का अस्पताल उसने कुछ हटकर नीचे है। डाक्टर और कम्पौण्डर दोनो छुट्टी पर थे, मुझे उनसे कोई काम भी नहीं था। गाँवने देवता के तरिक्त एक बुद्ध मन्दिर भी है। पुजारीने बतलाया कि बुद्ध मन्दिर नया है, वहाँ कोई परानी चीज नहीं है । "चुन्नीलाल डागडर" गीतकी नायिका जाती किल्वामे ही रहती है और अभी तरुणी है! लेकिन गोत वारेने अपनी खोजको और बढ़ानेको तैयार न था । में गीतकी कवयित्रीकी तरह जदमोपोतीको नही डाक्टर को, अथवा दानोका नही तरुणाईको दापी समझता हूँ । साङ्ला रचनीके बाद किवा में ही स्कूल है, जिसके साथ डाकखाना भी दधरके रोजना केन्द्र भी यहीं है। इस प्रकार किल्वा काफी महत्त्वपूर्ण स्थान है। फल यहां भी सभी तरह के होते है, किन्तु अर्ध- मानसून क्षेत्र हानेसे खास प्रकारके फल विकसित करनेपर ही यहां मोटे अगूरा गरे मीट फल पैदा किये जा सकेंगे । दा-टाई घंटे बाद पुरपसागर मी या पहुँचे । अगले दिन (१३ अगस्त) हमें पाच हो मील जाना था, नहीं तो २४ अगस्त के प्रामा गडबडी होता । सवेरे प्रातराश के बाद हमने स्थायजे छोट पहुँचे। यह चिनी तहसील का सबसे चावला ने ५७५० पाट और सतलजकी धारा तो डेढ़ फीट ऊपर है। कूपर के जगलात के डाकवगलोन सबसे बड़ा जाना है, नहरको जवाये तो बहुत दूर तक फैली हुई फोरे विकासकी तो नहीं कोशिश की गई मेवा<noinclude></noinclude> o65jfrdfkgml69y934wpnlv6s96er35 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३२ 250 195447 666185 2026-07-07T16:11:35Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666185 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०२ किन्नर - देशमे किन्तु हर तरह के सर्द मुल्कके फलांके लगाने का तजवी यहाँ बहुत किया गया । अगूरकी फसल खतम हो चुकी थी। सेवकी फसल भी टूट चुकी थी, किन्तु फल-बखारसे निकालकर मालीने खानेके लिये दिये। सेव अच्छे थे, ग्राड़, यहाँके और भी मीठे, बहुत वड़े और खून लाल रंगके अभी भी दरख्तोंपर लगे थे । छोल्ट् के खर- बृजे और सर्देको भी खाया, दोनों बहुत मीठे थे । नास्पातियाँ भी बहुत मीठी थी, अर्थात् क ेटाके मेवोंका यहाँ मुकाविला किया जा सकता है, यदि थोड़ा साइन्स र अनुसन्धानका भी श्राश्रय लिया जाय । छोल्टूमें रहनेका निश्चय इसीलिये करना पड़ा, क्योंकि मैंने सड़क इन्सपेक्टर बाबू लक्ष्मीनन्दको १४ अगस्तको मिलनेका नमय दिया था । ऐसे तो उधर चिनीमे भी कुछ देरते वर्षा अधिक होने लगी थी, किन्तु वस्पा - उपत्यकामे तो युक्तप्रान्तकी वर्षा याद आ रही थी । यहाँ भी पहुँचने के बाद वर्षा होने लगी । छल्का विशाल बाग कीड़ोद्यानसा मालूम होता है, विशेषकर एक छोर पर सतलजकी घर-घर ध्वनि और दूसरी ओर उत्तम सरल -- - देवदारुनो के को रण । यद्यपि मै स्वभावत मासाहारी हूँ, किन्तु फल, मट्ठा और सलाद जैसे हरे सागोसे मुझे अत्यन्त प्रेम है । यहाँ तलाद भी थी, किन्तु विना सिरके या खटाईके सलाद कैसी ? मैने अपने भोजनका अधिक भाग फलोको बनाया । यहाँ पर मुझे पाचवे घुमक्कड़ वैष्णव साधु मिले । घुमक्कड़ भी देवताओं की तरह एक दूसरेकी ईर्ष्यामे मरे जाते है । हाँ, यह वात अधिकतर साधु घुमक्कड़ोंमें पाई जाती है, क्योंकि वह साथ-साथ अपनी जीविकाकेलिये दूसरोको और अपनेको मो लिये बहुत से दोग-पाखंड करते रहते है । उच्च श्र ेणी के अपने घुमक्कड़-भाई के प्रति ईष्या अनमे डालने के मकड़ मे कभी नहीं हो सकती। हमारे घुमक्कड सीताराम वनारस के शीतलदाग ( मी ) के अखाड़े के शिव और सहसराम के रहने वाले थे। भारतकी प्रदक्षिण कर चुके थे, और २५<noinclude></noinclude> jxlpvgv6mkentg8a3cn6r27axdnyjl8 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३३ 250 195448 666186 2026-07-07T16:11:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666186 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनको ३०३ साल से श्रव हिमालय में विचार रहे थे। कश्मीरमे भी वर्षो रहे और इधर के पहाड़ोको तो घर ही बना लिया है। हाँ, कुल्लू में उन्होने कभी पैर नहीं रक्खा, क्योकि तरुणाई मे ही किसीने कह दिया था, "जो जाये कुल्लू, हो जाये उल्लू' । पगी ब्रह्मचारीको भी जानते थे, और मोने रौलाको भी। मोनेरौलाको "मासाद" कहकर उसे मेरी नजर में गिराना चाहते थे । वह नहीं जानते थे, कि यदि रौला सचमुच ही मास खा रहा हो, तो में उसे बधाई दूँगा । रौलाकी घुमक्कड़ी और स्कूल बनानेकी धुन, दो श्र ेष्ठ गुण क्या उसे बड़ा नही बनाते १ सीता- रामसे उनकी यात्राका वर्णन सुना। अभी कुछ महीने भावामे रहे थे,. व किल्वाका इरादा था । मैंने उन्हे अपने साथ भोजन करने के लिये निमन्त्रित किया और वड़ी रात तक उनकी बातें सुनता रहा । पिछले ढाई हज़ार वर्षों में लाखों साहस यात्रियोको हमारे देशने पैदा किया, उनकेलिये न समुद्र लव्य रहे, न गगनचुम्बी पर्वत णियाँ । लेकिन इन यात्रियोंने अपने अनुभव और ज्ञानकी अपने देश भाइयो के सामने रखने की कोशिश नहीं की । वह श्राजीवन विचरते रहे और रेत के पदचिन्हकी तरह घूमते ही घूमते कहीं विलीन हो गये । हमारे सीताराम उन्हीं लाखो नाहस यात्रियोंमें हैं, किन्तु अब हमें दूसरी तरह के यात्रियोंकी आवश्यकता है। जो मूक नहीं वाचाल हो । भार-वाहको को यहांसे दो ही मील श्रागे सतलज पार टापरी तक आना था, किन्तु वह सवेरे आ जायेंगे, इसकी मुझे आशा न थी । नामान सम्हालने के लिये पुरानागर थे ही, मै सवेरे ही हाथमें डडा लिये चल पड़ा | सललज' पर एक अच्छा लोटेका झूला बना है। झूला पारकर टापरी जा मैने तिब्वत-हिन्दुस्तान मडक पकड़ी । तीन नीने पहिले जब में इधर गया था, तो पर्वत शरीर सूखाना दिखलाई पता था, किन्तु श्रव व जगह हरियाली ही हरियाली थी । श्रागे नदी- पर देवद्वारके दिलीपची मनलजमे गिरानेवेलिये श्राये मजदूर मिले | गौरव नागको भी केन्दर लोगोते यह वरावर शिका-<noinclude></noinclude> 9rxu00pw1dfbfbafxau3cb7jwootb1m पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३४ 250 195449 666187 2026-07-07T16:11:57Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666187 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०४ किन्नर - दशमे i जंगल-विभाग की यत रही है, कि वह उनके कानमें हाथ नहीं बटाते घटा काम करने केलिये डेढ़ रुपयारोज मजूरी मिलने पर ही वे च्या अवकारा ललिया करते हैं। जगल-विभाग के एक वंडे अग्रेज अफसरने ता एक बार यह भी सुझाव स्क्खा था, कि इनकी मेडकरांवर भारी टैक्स लगा दिया जाय, जिसमें उनकी संख्या कम हो जाय और लोग मजूरी करनेके लिये वान्य हो । माहव बहादुरको मजरी अधिक करनेकी जगह यह ढग अच्छा लगा। यह जरूर ठीक नहीं है, कि किन्नर के अल्प-धान्य में नम्मिलित हानेकलिये हजारा दूसरे मुॅह ग्रा जायँ । यद्यपि ठेकेदारोको श्राज्ञा दो गई है, कि वह बाहर अनाज मगाकर अपने श्रमिकाको खिलाये, किन्तु मगानेकी तरद्ददते वचनेक लिये वह कितना ही अनाज स्थानीय लागोसे अधिक दान देकर खरीद लेते हैं । किन्नर लागों की काष्ट छेदन के कान पर तभी लगाया जा सकता है, जबकि वेतन ड्योढ़ा दूना किया जाय और खड्डीते जगह- जगह विजली पैदा कर बिजला के यारे कामम लाये जायें । जगल-विभागके गोदामक पास हमने यादवकी बहुतमी टालियां देखी । यह नीचे विलासपुर रियासत से लकड़ी काटने के लिये आये थे । में चढ़ाई चढ़कर डाक व गले मे पहुँचा । ७ मीलको नजिल मार लो थी, सोचा था आज यहां विश्राम होगा; लेकिन बाबू लक्ष्नीनन्द बुडी पर घर जानेवाले थे, दस दिन की छुट्टी में एक दिन यहां बीत जाये, यह ठीक नहीं था । मैंने भी वैगारूके श्राते ही आगे चलने का खाकृति दे दी । नचातक तीन मील की चढाई था, फिर तो पौडा पहुँचने कोई कठिनाई नहीं थी । - छाछ और फल मिला, फिर किमीने थोड़े ही समा पहिले पा घटी एक दुर्घटनाका वर्णन किया । किता तरणकुमारी हो. दिन-दहाड़े कुछ लोग जबर्दस्ती ले जा रहे थे, तरणी चिल्ला रही थी। अधिकाश पाठको को यह बड़ी भयानक बात मालूम होती होगी, किन्तु मवानाने राक्षस विवाहको बैध विवाहोमें गिना है। अर्जुन जन जबर्दस्ती रथपर<noinclude></noinclude> r0n2jl25fc4el1swaerrwuyngr42h2w पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३५ 250 195450 666188 2026-07-07T16:12:08Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666188 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>' सराहनको ३०५ बैठाकर सुभद्राको ले चला, तो वलरामका नथुना फूलने लगा, किन्तु कृष्णने मुस्करा कर बड़े भैयाको शान्त कर दिया। यहांकेलिये कुमारी परववस्तु है, परायको चाहे वलात् उठाइये या सलाहसे, धनीकी अपना पैसा मिलना चाहिये, फिर कोई परवाह नही । श्रभी कुमारीको जो लोग पकड़कर लेगये, वह मूल्य चुकानेमे हीला-हवाला नहीं करेंगे। जहाँ तक पिता माता के अधिकारका सवाल है, बात स्पष्ट है। आप कहेंगे, लड़कीका भी कोई अधिकार है ? लेकिन भारतके सभ्य कहे जानेवाले खड़मे भी कितने माता-पिता लड़की के विकारको मानते हैं । पुण्यसागर कह रहे थे, कि राजा पदमसिंहने कन्या अपहरण केलिये बहुत कड़ा दंड निश्चित कर दिया था, जिसके कारण वह रुक गया था । इसका यह अर्थ हुआ, कि राजा के राज्य के छूट जाने पर व अपहारकांने अपनेको परम स्वतन्त्र समझ लिया है । ननुवावा चाहे राक्षस विवाहका विधान करें, लेकिन हमे तो इसे जड़मूल से लोप कर देना चाहिये और सारी कन्यापहारक मंडली को दस-दस कालकेलिये बड़े घरमे चक्की पीसने के लिये भेज देना चाहिये, साथही उनकी सपत्तिका काफी भाग अर्थ दडमे ले लेना चाहिये, और ऐसे व्याहको प्रबंध कर देना चाहिये । ,, नावाहककी प्रतीक्षा ही मे थे, कि इसी समय चिनी तहसी लदार बानू मंगतराम भी था गये । मैने अपने तीन नहोनेकी यात्रा में सहायता करने के लिये उन्हे बहुत बहुत धन्यवाद दिया। कायदे अनुसार भारवाहकीको नचार तक पहुँचाना था, किन्तु उन्हें यह तकेलिये ही कहा गया था, इसीलिये वे ग्रागे चलने सेनाका करने लगे। कुछ और मजरी तथा रात्रि-नोजन देने पर पेलने लिये तैयार हो गये | कातने मक कहीं कहीं तोड़ दी श्री सिन्दुरी तौरने नहीं। बात्र लक्ष्मीनन्दकी घोड़ी सवारी मेला ही वहीं थी, किन्तु श्रव बहुत मोटी हो गई बीटच गई और हम घटेन नचार पहुँच गये ।<noinclude></noinclude> rc4qtyezirt9eb4bkktilum9zbytzil पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३६ 250 195451 666189 2026-07-07T16:12:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666189 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०३ किन्नर - देशमं ' चिनी छोड़नेके बादकी डाक यहां पड़ी हुई थी, डाक ली, डाकली, पंगी बाबूने सेव और पेय से सत्कार किया और वहाँ से चलकर हम ग्रा ही सात बजे पौंडा डाकबगलेपर पहुँच गये | पंगीबाबूने सहायता न की होती, तो भारवाहक न मिलनेसे बाज नचार ही में रह जाना पड़ता । वास्तु के वाद अब हम मानसून क्षेत्रमे थे और इस माल तो वरपामे मेघ देवता अधिक उदारता दिखला रहे थे, उन्होने हमसे छेड़-छाड़ नहीं की । × लेकिन ग्राज सराहनमे - पौडासे सराहन दो पड़ाव है अर्थात् बेगास्त्रोको एक जगह बदलना पड़ता। हमने वा० लक्ष्मीनन्दसे कहा, कि दो श्रानाकी जगह चार थाना प्रतिमील मजूरी दीजिये और भारवाहको को यहाँसे सीधे सराहन चलनेके लिये ठीक कीजिये । कुलियोको पहिले भेज दिया, किन्तु प्रातराश तैयार करने में पाचक गणने काफी देर कर दी, इसलिये हम साढ़े नौ बजेसे पहिले नहीं चल सके। मीलभरपर ही शोल्डिङ् मिला, यहाँ जाते समय खम्बा तरुणने चाय पिलाई थी । घरोके श्रगवाड़े-पिछवाड़े गोवर-मट्टी मिश्रित एक फुट मोटी कीचड़ थी । चढ़ाईमे सवारी नही की, अधिकतर पैदल ही चलते १ बजे चौरा पहुँच गये । पौडाते २२ साल पहिले सड़क तरंडा होकर ऊपर ऊपर जाती थी, किन्तु पीछे नीचेसे दूसरा समीपतमका मार्ग निकाल दिया गया । 'श्रव तरडा कौन जायगा ? चौरामें डेढ़ घंटा विश्राम हुना | चौकीदार साहवने कुछ मीठी नास्पतियाँ भी लाकर दी - हो चौकीदार साहब ही कहना चाहिये, क्योकि इधर के डाकबंगलोमे चौकीदारका काम गाँव के नंबरदार या धनी प्रभावशाली आदमीको ही दिया गया है - निस्सन्देह यह समुद्र मे वर्षा है, धनीको और धनी बनाने और गरीवको और गरीब रखनेका उपाय । चौरासे चलकर शामसे बहुत पहिले हम सराहन पहुँच गये । श्राज किन्नर - सीमा ( मन्योटीधार ) को पार करते ही वर्षां जोरकी होने लगी ।<noinclude></noinclude> dwzo8opa1ofv6q3crc12om3egwq82yt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३७ 250 195452 666190 2026-07-07T16:12:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666190 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराइनको ३०७ सराहन के डाक बगले में ठहरे, यद्यपि आज्ञापत्र न होनेसे वहाँ ठहरनेका हमारा अधिकार नही था । ' सकते है, आज १५ अगस्त सन् १९४८ ई० था। भारतको अंग्रेजो से मुक्त हुये ३६५ दिन पूरे हो चुके । स्वतन्त्रता कितनी मधुर वस्तु है और साथ ही कितनी मूल्यवान भी । इसके मूल्यको वे ही समझ जो परतन्त्र देशके वासी रहते स्वतन्त्र देशोंमे घूम चुके हैं । फिर हमारे देशकी परतन्त्रता केवल अग्रेजी राज्यकी कालरात्रि के साथ ही नही शुरू हुई । वह तबसे प्रारम्भ हुई, जबसे हमारा देश विदेशियोका अखाड़ा बन गया । मैं अपने देशकी त्रुटियो, राजनीतिक भूलोको जानता हूँ, किन्तु जब मैं १५ अगस्त १६४७ ई० को प्रारम्भ होनेवाले नये युगकों देखता हूँ, तो सबको भूल जाता हूँ । ढोगी, नृशस, पल्ले दर्जे के स्वार्थी वृटिश शासको के प्रति मेरे हृदय मे तभी से पार घृणा प्रविष्ठ हुई, जबकि मुझे राजनीतिक मुध बुध नाई । अदृश्य उडेके मारे ग्रेज भारत छोड़कर भागे, राजी खुशीसे या दयाभावसे बिल्कुल नही । जिस तरह भागती सेना त्यक्तस्थानको ध्वस्त करके जाती है, वही बात अग्रेजोने यहां का वह देशके दो भाग करनेसे ही सन्तुष्ट नहीं हुये, बल्कि रियासतोको भी ऐसा बढावा दे गये, कि भारत और छिन्न-भिन्न शं जाये । वह आशा नहीं रखते थे, कि सभी मुकुटधारी अपने राज्य के स्वतन्त्र प्रभु होंगे, किन्तु वह यह विश्वास जरूर रखते थे, कि पाच-सात बड़ी रियानते स्वतन्त्र ट्रान्स- जार्डन बनेंगी। वेचिन- मटली तिलमिला रही थी, जब सरदार पटेल इन पाँच सौ मुकुटधारियो- को समझा-बुझाकर प्रजाना डर दिखलाकर भारत सघमे शामिल कर रहे थे। अग्रज रिपो ही नहीं, ग्रग्रेज “समाजवादियों को पूरा भरोना था. कि निजाम उनके काम आयेगा और बृटिश राजमुकुटमें गालकुडाफा दोहन ही नहीं, ग्रामपजाही शामनकी बागडोर भी संबद्ध रहेगी। उन्होंने नका या गाधीके चेले नेहरू और पटेल सिर्फ किस्त्यानद नही जायेंगे। वह सोच रहे थे, यदि भारत संघ<noinclude></noinclude> 7soevqvwt67cm7orquso5mukq7d8b1l पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३८ 250 195453 666191 2026-07-07T16:12:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666191 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०५ किन्नर देशमे गॉधी के पथसे भ्रष्ट होने लगेगा, तो राष्ट्रसंघमे ले जाकर हिन्दकी फजी- हत करेंगे। लेकिन पाँच ही दिनोंमे प्रचंड श्राधी की तरह टूटकर भार- तीय सेनाने वेविन चौकड़ी के सभी मस्वोको व्यर्थ कर दिया । इन पांच दिनों में भारतके हृदयपर तनी पिस्तौल ही हमने नहीं छीन ली, वल्कि सारे वृटिश शासक भी नगे हो गये । कडगनने जल्दी जल्दी हैदाराबाद की शिकायत को विना विशेष पूछताछ किये राष्ट्रसघ ससकी प्रारम्भिक बैठकमे रख दिया । " समाजवादी" वेविन्ने भारतको सैनिकवादी ( आक्रमणकारी ) घोषित किया । श्रर्जन्तीना के फामिस्ट प्रतिनिधिने भारतको फासिस्त इताली और हैदरावादको वीसीनिया उद्घोपित किया । इन पाँच दिनोंमे बटेश रेडियो और वहाँ के पत्रोने भारत के विरुद्ध खुलकर विपवमन किया। उन्होने इस बात की भी परवाह नही की, कि अगले महीने वृटिश साम्राज्य परिषद् होने जा रही है, कही भारतका सवन्ध इंग्लैन्डसे बिगड़ न जाय । वेविन, कड्ग और वृटेनके रेडियो प्रचारक बच्चे नहीं है। उन्होंने भारत के सोहदको थोथी चीज और निज़ामकी तानाशाहीको अधिक मूल्यवान समझा, तभी अपना पैतरा वदला । वह ट्रान्सजार्डन की तरह भारत उदरमे अपना एक अड्डा बनाना चाहते थे, लेकिन बेचारे हताश हुये । निज़ामने किचन हो पाकिस्तान भागकर शरणार्थी । बनना पसन्द नही किया और हथियार डाल दिया। क्या अब भी वृटिश मुकुट से हमे कोई सबन्ध रखना चाहिये ? क्या अव भी वृटिश साम्राज्य के भीतर रहने की बात करना परले दर्जेको निर्लजता नहीं कही जायेगी ? मुझे पूरा विश्वास है, नये विधान ने हमारा देश अपनेको स्वतन्त्र प्रजातन्त्र घोषित करेगा । 3 १५ अगस्त हमारे इतिहासका सदा स्मरणीय दिन रहेगा । उस दिन अपनी सफलताओ पर मेरा विचार दौड़ रहा था। साल भर हमने अपने देशको अधिक संगठित, अधिक बलवान बनाया, इसमें मुझे सन्देह नहीं । और मतभेद चाहे कितना ही हो, किन्तु मैं यह<noinclude></noinclude> hb34lxhbl6un1dkrxya53cxvs43kr5o पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३३९ 250 195454 666192 2026-07-07T16:12:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666192 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनको ३०६ मानता हूँ, कि भीतरी फूट और जोकी कुटिल चालको विपल करना, और देशको साल भर मे इतना सगठित और सवल बनाना काग्रेस नेतृत्वका ही काम था । यदि देश की बागडोर किसी एक या अनेक दूसरे दलो के हाथमें होती, तो कहीं सूर्य-वशके झंडे के नीचे भ्रातृसहार होता, कही जाटस्तान के युद्ध घोप होते, कही सिक्खस्तान के । फिर पेशवाशाही और हिन्दूशाहीका स्वप्न देखने वाले बहती गंगामे हाथ धोनेने वाज न श्राते । देश-रक्षा के काममे काग्रेस नेतृत्व सफल हुआ, किन्तु वहीं वात देश के नवनिर्माणके बारेमे नही कही जा सकती ? ', फिर मेरा ध्यान गया लदाखकी ओर, जहाँ सिन्धु उपत्यका, नुना उपत्यका और जास्कर - उपत्यकामे पाकिस्तानी धर्मान्ध अत्पसख्यक निरीह बौद्धों पर जुल्म के पहाड़ ढा रहे हैं । लाहुल यहाँ से दो ही पहाड़ो के पार है और उनसे दो दिनमें एक ही पहाड़ पार करने पर आदमी जास्कर पहुँच जाता है | ज़ासकरके सैंकड़ो बौद्ध गृहस्थो और भिक्षुग्रो को इन तायियोने तलवार के घाट उतारा । नुना और लामायुरू में भी उन्होंने ऐसा ही किया । नालूम नही ११वी सदीकी सुन्दरतम भारतीय चित्र कलाकी नि यो ग्रत्ची और मुम्राके बिहारोकी इन्होने क्या गति बनाई । मरे आदमियो के स्थानकी पूर्ति नवजात शिशु कर सकते हैं, विन्तु नष्ट होनेपर इन कलानिधियोकी पूर्ति क्या कभी हो सकेगी ?११वी शताब्दीकी भारतीय चित्रकला के लिये ये दोनो विहार अजन्ता थे । फिर में कुल लाहुल-लदाखके रास्ते पर विचार करने लगा । यान लदाखकी रक्षाकेलिये हम सैनिक महायता इसी रास्ते से भेज सकते है। यह गन्ता पठानकोट, योगेन्द्रनगर, कुल्ल - लाहुल होते जाता है । वदे पाना उड शुरू कर दिया, तो पठानकोट खतरे में हो पेगा, और फिर केंद्रीय भारत से कश्मीर लदाखका ही सबन्ध विनि नहीं हो जायगा, वरिक कुल्ल - उपत्यका भी कट जायगी । उसकेलिये जरूरी ना कि एक दूसरो सडक भी तैयार की जाती । ऐसी प्रतानांते बनाई जा सकती है। शिनलासे नारकंडा तक °<noinclude></noinclude> bd79n0es8c5hewfv3vooeizupoz9acq पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४० 250 195455 666194 2026-07-07T16:13:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666194 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१० किन्नर - देश में मोटरकी सडक बनी हुई है। उधर कुल की मोटर सड़क भी वीस-पचीस मील तक बाजार में श्राती है। नारकण्डासे साठ वासठ मीलकी सड़क निकालकर कुल्ल की सड़क से मिलाया जा सकता है | यह मोटर सड़क सबसे छोटो और अत्यन्त सुरक्षित होगी । वर्तमान सड़क पर भी छोटी स्टीन गाड़ी एक बार जा चुकी है। सैनिक महत्व के ख्याल अधिक खर्च होने पर भी इस सडकका बनाया जाना अत्यावश्यक है, साथ ही यह सड़क व्यवहारतः बहुत लाभदायक सिद्ध होगी। इसके निकलने पर कुल के फलोकी निकासी में ही ग्रासानी नहीं होजायगी, बल्कि सतलज पारके अनी और उसके पास के इलाके में फलोका एक दूसरा कुल्लू तैयार हो जायगा । शायद लोग समझ नहीं रहे हैं, कि जास्कर के बौद्धोका कतल ग्राम लाहुलकेलिये खतरेकी घटी है। हाँ, तो मै १५ अगस्त को अपने देशकी सफलताओं और त्रुटियोपर विचार कर रहा था। आज सारे देश मे स्वतन्त्रता- दिवसकी धूम होगी, किन्तु यहाँ पहाड़में एकदम सुनसान हैं। इन लोगो का इसमे दोष क्या है ? परिवर्तन लोगोंने देखा यदि पिछले साल भरमे पहिले से कोई विशेष होता, तो वे जरूर उत्सव मनाते । पहाड़के लोगोसे बढ़कर. उत्सव-प्र मी मिलना मुश्किल है । + X × सराहनमें मै एक-दो दिन ठहरना चहता था । मुझे बहुत आशा थी, कि यहाँ भीमाकाली के मन्दिरसे वहुतती ऐतिहासिक सामग्री और लिखितम प्राप्त होंगे । वाबू लक्ष्मीनन्दके साथ रहनेमे डाकबंगले मे जगह तो मिल गई, किन्तु एस डी. श्री. भी १६ को ग्रानेवाले थे, उनके स्वागत-सत्कार की तैयारी करनेके लिए नायब तहसीलदार राम- पुरसे श्राये हुये थे । डाक व गलेमें दो ही कमरे हैं, एक कमरा आने- वाले मेहमान के लिये अवश्य पर्याप्त नहीं था। पति पत्नी, दो बच्चे और एकाध सवन्धी भला एक कमरे में कैसे आ सकते थे ? तहसीलदारने . मुझे ही कमरा खाली करने केलिए कहना चाहो, किन्तु दूसरोने इसके<noinclude></noinclude> mq9pttg7kg77cxzhhqsxctruek9w5on पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४१ 250 195456 666195 2026-07-07T16:13:18Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666195 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनको ३११ लिये राय नही दी । मुझसे कहते तो मैं जरूर दूसरी जगह चला जाता। सरकारी नौकरो और कारपरदाजोमे उसी तरहकी हड़बड़ी मची हुई थी, जैसे राजा साहबके आनेपर होता रहा होगा । कामरू मे ही वाढ़ने मीपण रूप धारण नहीं किया था, बल्कि पिछले माह सराहनमे भी जलप्रलय आ गया था। वाजारकी सड़कपर खडका पानी बहने लगा था, और कितनीही दूकानोमे पानी भरगया था । अगले दिन मैं सीधे भीमाकालीके मन्दिरकी तरफ गया। बाहरी काटकपर सवत् १८७१ छोटा सवत् ३५ जेठ प्रविष्टे ३० का लेख है । फाटक से भीतर आँगन मे गये । श्रॉगनमें गोवर विखराही होना चाहिये, क्योकि गाँवकी गायांको यहाँ बुलाकर सदावर्त दी जाती है। वस्तुतः बाहर की खामिनानी यही भीमाकाली थी, राजा तो उसका कायथ भर था । भीमाकालीके खजाने में बहुत धन वताया जाता है, किन्तु राजाकी श्राज्ञाने ही उसे खोला जा सकता है । राजा पदमसिह के करने (१६४७) पर बनाने पर लगी मुहर व नये राजासाहव जब गद्दार बैठेगे तभी उसे तोड़कर खजाना खोलनेको लग श्राशा रखते हैं। शायद इन लोगोको अभी विश- पास नहीं, कि गद्दी सदाके लिए सतम हो गई है। सीमा काली बहुत धनी है। उसके लिए रामपूर और चिनी तहसील मे मालगुजारी पर चार थाना प्रतिरूपया लोगोसे वसूल किया जाता है। नही मालूम अवनी चारवाना रुपया वसूल किया जायेगा या नहीं। नेहरा जी हमारी सरकारको धर्म वारेमे तटस्थ कहते है । फिर हिमाचल सरकार कैसे खेतदाजांसे जवदली नालगुजारीके, राय रपये चारखाना वसूल करेगी ? रोहर तहसील रुपया नहीं तीन बहुत बना चावल प्रतिवर्ष देवीके लिये देता है | यावल मराली, कव और बादेवी जागीरी गाँव है। देवी मादा प्रतिवर्ष २५०८०) और पर १६०००) बताया गया । वर्ष विशेष होता है, जिसके लिये धानापना<noinclude></noinclude> isif2417kr46aao3k3p1n9z1aoukb2s पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४२ 250 195457 666196 2026-07-07T16:13:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666196 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१२ किन्नर - देश मे और वसूल किया जाता है । हम भीतरी फाटक मे एक ग्रांगनमे गये। जब महल नहीं वने थे, तब राजा और उनका रनिवास यही रहा करता था। राजा माहव ६ स्थानापन्न एस. डी. श्री साहवकां यदि यहाँ ठहराया जाता, तं जरूर उनका दम घुटने लगता । एक और फाटक पार करनेपर हम देवी मन्दिर के सामने पहुॅचे। देवी के मन्दिरके भीतर तो बसाह रियासत मे भी नोगडी - खडसे ऊपर ऊपर के ही लोग जा सकते हैं. फिर मेरे भीतर जाने की बात क्या हो सकती थी ? बाहर वालोके दर्शनके लिए बाहर के द्वार पर सिहवाहिनी अष्टभुजा देवीकी मूर्ति है। पुजारीने बतलाया, कि भीतर भी इसी तरहकी अष्टधातु की मूर्ति है, हाँ, वह तीन हाथ लम्बी है । मन्दिर कामलके किलेका ही बड़ा संस्करण समझिये, इसमें पांच तल हैं। प्रथम तलपर पोच कोट रियॉ हैं, जिनमे से एक में रुपया रक्खा हुआ है बाकी कभी कभी हवन और बलिपशु काटने के काम आती है । दूसरे तलकी चार कोठरियो में नये मन्दिर के पास वाली कोठरी में स्वयं देवी रहती है और बाकी तीनमे वर्तन - भाण्डार पाठस्थान और शिन ( लालमदिरा ) रक्खे जाते हैं। तीतरे तल पर भी चार कोठरियां है: जिनमें क्रमश: बालिका भगानी (सिइवाहिनी नहीं ), खजाना ( राजा की मोहरसे वन्द), पानी और एक खुला स्थान है। चौथे तलके बड़े कमरे मे मांस पकता है, दूसरेमे छोटा रसोई घर है और तीसरा खाली है । पाँचवा तल छते नीचेका खाली है । देवीके अधिकारियोमे सर्वोपरि सपनी-निवासी नेगी विद्यानद पाच सालसे विस्ट पद पर काम रहे है । पहिले वे राजके पुलि विभागमे थे । देवी के विस्टको ३५ ) रुपया मासिक मिलता है. जब कि ४५) मासिक पर भी कनौर मे मजूर काम करने के लिये नहीं मिलते | इनसे पहिले शोवडूके बरकतदास बीस साल तक विस्ट पद पर रहे। ८१५ में अग्रेजोंने भी देखा था, कि राजा के दर्वार में किन्नरोका ही प्रभुत्व<noinclude></noinclude> 4evjodes6zivwet07no75kjiyz3eepn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४३ 250 195458 666197 2026-07-07T16:13:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666197 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनको ३१३ है | देवीके दर्वारके बारेमें तो यह बात और भी स्पष्ट है, श्राखिर राजवंश भी तो कनौरसे श्राया था। विरटको राजा नियुक्त करता है। बिस्टके नीचे दो कायथ है, जिन्हे २५) मासिक मिलता है और श्रा यहाँ बारह थाना सेर हे। एक डडीदार (भंडारी) है जिसे २५) महीना मिलता है । ११) मासिक पाने वाले दो शिकारू हैं, जिनका काम शिकार करना नही बल्कि वकरा-वकरी खरीद कर लाना है। बकरे आजकल चालीस-चालीम, पचास-पचास पर विक रहे हैं। देवीको प्रतिमास १२, दशहरे में ६० और चैत नवरात्रमे ३६ वलि - पशुओ की rane श्यकता होती है। इसके ऊपरसे शुद्धरामेश और दूसरे देवता बाहरी प्रदक्षिणा मे बकरे, नुन्नर और मुगेकी बलि चढ़ाते हैं । वृनरे कर्मचारियोमे दो प्रोलिया ( दरवान ) ७) मासिक और भोजन पर, दो कटेक (भीतरी द्वारपाल ) ७] और भोजन, दो देवकन्यार (माली) १०) र भोजन, एक जलेहरू (कहार) ५) और भोजन; एक शिरकोट कोटिया (श्रीकोट [रोरा) : १ ||) और भाजन; दो गुर (पुजारी) रावी के ब्राह्मण ३ ) और भोजन, एक वोज्गी (भोजक) जो पदमसिंह द्वारा स्थापित रघुनाथजी मन्दिरने पूजा करता है, यह निरामिपाहारी रहता है और ३) मानिक तथा भोजन पाता है। एक प्रोत (पुरोहित) जिसका कान के फूल लाना और मन्दिरके भूपणकी रक्षा करना । एक रसिया (वान्नपानीकाम करने वाला) ५) और भोजन पाता है । ३) और में जन पर एक नामी मन्दिर के भीतर झाड़ने वहारने का काम करता है। एक रीकोलिन केवल भोजन पर मन्दिरसे वाटर का बहाल रखी है। एक सनदार देवीका साईस मातिक १६) पाता है। एक अक्ष (देव) और एक सहायक प्रोक्ष तीन-तीन जय देवी उनके शिर पर प्राती हैं, और उन्हें काम करना है, ता उन्हें मन्दिर जोजन भी मिलता है। बाजा बजाने वाले गुरी निर्फ वजन पर ढेरी रहते थे, किन्तु अब तिर्फ एक ही है| सरकारने सरच जो कम कर दिया है। पुराना मन्दिर ५<noinclude></noinclude> g1aoao256laq6nzy42yw0ykec6vtowm पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४४ 250 195459 666198 2026-07-07T16:13:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666198 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-३१४ किन्नर - देशमें - अच्छी हालत मे है, किन्तु उसी तरहका एक नया मन्दिर भी बनकर तैयार हो गया है। इसे पढमहिने अक्षय कीर्ति प्राप्त करनेकेलिये हाल ही में बनवाया। बाहरी खडके पास चौथे खडमें' नरसिंहजीका शिखरदार पाषाण मन्दिर है। नरसिहजी रामपर चले गये, अब उनकी जगह बदरीनाथजी विराजमान है। इनकी सेवा-पूजालिये भोजन और ३) मासिकपर पुजारी, कुचडे (माली ब्राह्मण) और वोटिया तीन जने रहते हैं । बदरीनाथ की पोलकी मूर्ति कपड़ेने की थी । मुझे सन्देह हुआ, मैने कपड़ा हटवाया, तो वह बुद्धी बदरी- नाथ निकले । मन्दिर देख सुनकर में विस्टसाहब के कार्यालय गया, किन्तु वहाँ दस-वीस मालकी वहियों के अतिरिक्त कोई काम नहीं था । मैने पूछा -- मन्दिरका पुराना कागजपत्र दिखलाइये | विस्टने प्रकृत स्वर मे कहा- वह तो जल गया । -- जल गया । मन्दिर मे तो ग्राग नहीं लगी, फिर जला केले ? - - सरदार साहब चैतमे जला गये । सरदार साहब जला गये ! आप क्या कह रहे है ? - हाँ, जला गये, जलाने के समय में भी था और तहसीलदार देवकीनंद भी । सच कहूँ, मेरे कानोंको विश्वात नही हुआ और ग्राज भी विश्वाव करनेका मन नही चाहता । पुराने, ऐतिहासिक महत्व के कागजको कोई शिक्षित उत्तरदायी कर्मचारी कैसे जलाने का साहस करेगा ? मेहताजी को भी जलाने की बातका विश्वास नहीं होता, किन्तु कागज गये कहाँ ? और सराहनमे जिससे भी मेरी बात हुई, उसने कागज़ों जलाये जानेकी बात कही। दिन भर कागज़ जलते रहे । गोरखोने १४० वर्ष पहिले रामपुरमे राजके कागज़ोते होली खेली थी और श्रव यह दूसरी क्रूर होली खेली गई । यदि किसीने जलाया है, तो उसने देश और संस्कृति पर प्रहार करके अक्षय अपराध किया है, उसे कठोरतम दण्ड मिलना चाहिये । और<noinclude></noinclude> c8ufafw5me2yoea5jpgwc0n3lxhdr8v पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४५ 250 195460 666200 2026-07-07T16:14:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666200 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनकी ३१५ लौटकर भोजन करने के बाद सड़क से नीचे समीप ही अवस्थित रावी ब्राह्मण गॉव मे गया । यहाँ चौबीस भारद्वाज, सोलह वाशिष्ठ और वीन कौशल गोत्री श्रादि-गौड़ ब्राह्मण बसते हैं। किसी समय यहाँ पाँच नौ घर ब्राह्मण थे, और गाँव नीचे दूर तक बसा हुआ था, किन्तु व घटते घटते साठ रह गये। आज भी आठ-दस घर निस्सन्तान मरनेसे खाली पड़े हैं। एक पचासमे अधिक वर्ष के संस्कृतज्ञ ब्राह्मण (विष्णु) मिले । उन्होंने बनारस जाकर सस्कृत में मध्यमा तक पढ़ा था । श्रादमी कुछ स्पष्टवादीसे मालूम होते थे, या कहिये धाईसे ढेड़ नहीं छिपा करता । वे स्वीकार कर रहे थे, कि हमारे यहाँ सपिएड नहीं सगोत्र विवाह भी होता है । भारद्वाज लोग अपने को दक्षिण देश के काञ्चन (काची) नगरसे आये परदुमनके भाई दशरथकी सन्तान कहते हैं । मैंने पूछा- तो वह पर- दुमन कृष्ण के पुत्र नहीं थे। फिर तो राजा चन्द्रवशी नहीं हो सकते । -हॉ, नहीं थे, यह ता पटियाला के राजाने यहाँके राजाको एक चार पढा दिया, कि श्राप चन्द्रवशो हैं । की रावके भारद्वाजी ब्राह्मण सन्ताने हैं। मैं उसी सतयुग की पोथी सैकड़ो बॉधकर रखी गई है। एक पुरानी परम्परा यह भी है, कि और रामपुर के राजवश दो सगे भाइयों मन्दिर के बरामदे में जाकर बैठा था, जहाँ वेष्टनों में लिपटी कलियुग के अन्त तक केलिये पथके बारेमे पूछने पर उक्त पंडितजीने वतलाया - वह कागज पर लिखी है और फलित ज्योतिष तथा तन्त्र-मन्त्री पुस्तक है। यदि तालपन वा भोजनपर होती, तो मुके जरूर न देखनेका अफसोस होता। कागज तेरहवी नदी ओर वादने भारतमें प्रचलित हुआ, बनाने की हाल पहने एक वृक्षमे लाखो वर्षों से मौजूद नात रोपाही तरफ ले जाकर लाग तिब्बत- नालोके लिये कागज बनाते हैं। रॉबीन बड़े विद्वानकी आवश्यकता नाशाद कभी नहीं हुई दर्गा, किन्तु पुरोहिती उनकी जीविका थी, भाव अभी नहीं रहा होगा। मैने कुछ इस लिखित<noinclude></noinclude> o0vrtzychoil0dlqez02l8ogcqubdog पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४६ 250 195461 666201 2026-07-07T16:14:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666201 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१६ किन्नर-देशम पस्तक देखनी चाही । यद्यपि मध्यान्हका समय था और लोग उधर उधर चले गये थे, तब भी कई शिक्षित व्यक्ति मेरे पास आ गये थे और मेरी जिज्ञासाकी पूतिकेलिये तैयार थे। उन्होंने बतलाया कि पोथियांचे फटी पुरानी हो जानेपर हुए लोग उन्हें सतलजमे बहा दिया करते हैं, इसीलिये कम पोथियाँ रह गई है। तो भी उन्होने दोनो साल तक की पुरानी पोथिया दिखलाई, जिनमे से एक भागवत एकादश- स्वन्ध ( दशमस्कन्ध नहीं ) का दोहा - चौपाई मे भाषान्तर था, जिसे संवत् १६६२ (तुलसी निर्वाणके बारह साल बाद ) में सन्तदास के शिष्य चतुरदासने रचा। डेढ़-दो सौ सालकी एक और पोथी देखी जो पहाड़ी तथा हिन्दी मिली-जुली भाषामें गीतापर लिखी गई है। लौटकर डाकबंगले श्राये | एस्. डी. श्रो- साहब था गये थे और विश्राम कर रहे थे। मैं भी अपने कमरे मे विश्राम करने चला गया । तीन-चार बजे बाहर निकला, एस डी श्री श्री प्रेमराज अपनी पती साथ वराडे में ताश खेल रहे थे। शायद उनके खेल में एक सेकेन्डके लिये भी विघ्न डालना मेरे लिये अनुचित था, किन्तु मै शिष्टाचार- प्रदर्शन के लिये मरा जा रहा था। मैंने पास जाकर नमस्ते किया ! उनके रुखको देखकर मैने इस बात के लिये भी खैरियत मनाई, कि उन्होंने घुडककर इस अनुचित दखल के लिये मुझे फटकारा नहीं ! उन्होंने मुँह फेरकर देखा भी नहीं, कि कौन नमस्ते कर रहा है, और वह अपने खेलमे संलग्न रहे । मैने अपने को अपमानित विल्कुल अनुभव नहीं किया, हो लोट- कर अपने कमरे में चला श्राया- श्री प्र ेमराजजीने मुझे पहिले देखा नही, किन्तु वह मुझे उसी तरह भली प्रकार जानते है, जैसे रामपुरके सारे राजकर्मचारी | यदि जानते भी न हो, तो भी शिक्षा और संस्कृति की मॉग है, शिष्टाचार प्रदर्शन करनेकी । कारण ढूढ़ते- मुझे शिमला तक थाने के बाद ही असली बातका पता लगा। श्री प्रोमराज वी० ए० मे राजामात्यका स्वच्छ श्वेत रुधिर है । वह चन्वा महाराज- '<noinclude></noinclude> 8fxxrfwm69rtm0h1zpjiyhwcntrx64i पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४७ 250 195462 666202 2026-07-07T16:14:25Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666202 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनसेकोट ३१७ के महामन्त्री दीवान बहादुर श्रीमाधवराम के पौत्र, दीवानजादा राय- साहब के पुत्र है और साथ ही कश्मीर के हालके दीवान तथा श्राजकल पूर्वा- पंजाब हाईकोर्ट के जज श्री मेहरचन्द महाजन के दामाद है | स्वपन्वामे मजिस्ट्र ेट थे, द्रव बुशहरके कर्ताधर्ता है। भला एते ग्रासीका विना श्रज्ञा पाये "नमस्ते" कहना क्या गुस्ताखी नहीं थी ? मेने दिल अपने अपराधको स्वीकार किया, और दिलमें ही मीकार कर सकता था, क्या के क्षमा याचना केलिये जाना दूसरी सुन्तली हानी । मुझे मालूम हुआ कि क्यों उन्होंने चिनी तहसील मे हुकुम भेजा था, कि उनके पास मारी लिखा-पढी अग्रेजीमें करनी चाहिये । हिमाचल सरकारने यदि हिन्दीको राजमाता घोषित किया था, तो झलमारा था। (२१) सराहनसे कोटगढ़ १७ अगस्तको प्रोग्रामने एक दिन पहिले में रामपरकी ओर चला । नीम दिनक्रम पूरे तीन महीने पुण्यनागर मेरे साथ रहे । उनके प्रश्न अब तक निश्चिन्त हो गया था। साना-पीना हिसाब- वितान सब उन जिसमे ना और वह पूरा ध्यान रखते थे मेरे स्वा- शरीर व केवन मिडल पान प्रारम्भिक स्कूल के व्या उपने धर्म और आदर्श का अच्छा समिश्रण है । इनके प प्रा है और विवाह विच्छेद नी चलता है। पीछे गोई देख पत्र चली गई, छांटे बरकेट दलिये कहा। पुण्यसागरने की यह है, - है, तुम्ही नाली" और आता जीवित है, इसलिये उनसे मिलने जाना मेरे आज एक<noinclude></noinclude> j1ddfz20jr1ci0p3zwwkfsvoaf9z8g9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४८ 250 195463 666203 2026-07-07T16:14:36Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666203 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१८ किन्नर - देशमं सीधे-सादे, सहृदय, निस्स्वार्थ मित्रका साथ छूट रहा था। नौ बजे मैं सराहन से चला, कुछ दूर तक पुण्यसागर भी साथ-साथ आये । रास्तेकी अदला-बदली और ढेरीसे मैने यहाँसे सीधे रामपुर (२१ मील) के लिये पांच-पांच रुपयेके तीन भारवाहक कर लिये थे । रास्ता कही कही टूटा था, किन्तु बुरी तरह नहीं । मंगलाड-बड तक तो उतराई रही, जिसे पिछली बार चढ़नेमे छठीका दूध याद या गया था, फिर चढ़ाई शुरू हुई, लेकिन अब ऐसी चढाईसे में नया नहीं खाता था । श्रागे म झोली गाँव श्राया। रामपुरकी श्रोते दो-तीन गूजर आ रहे थे । उनकी भैसे ऊपर कही कडेपर चरने गई थी। करण स्वरमे कह रहे थे --" पिछले साल झगड़ा हुआ था। यहां के लोग कहने लगे 'तुम पाकिस्तान चले जाओ नहीं तो तुम्हें मार डालेंगे ।' हमने कहा 'पाकिस्तानको तो हम जानते नही, मारना हो, मार डालो, ' अब कंडेकी चराई के लिये धमकाते हैं। बाबू फिर तो झगड़ा नहीं है गा ?" मैने उन्हे सान्वना दी और कहा हमारी सरकार अपने देश में हिन्दू-मुसलमानका झगड़ा वर्दाश्त नहीं करेगी । तुम लोगोंका कही घर है, या सदा घूमते ही रहते हो ? - ——घर है, जाड़ोमे नदी के पास के गाँवमे अपनी झोपड़ियोमे रहते हैं। - तो तुम लोगोको अपने गाँव पटवारीके पास जा मतदानायो में अपना नाम लिखवा लेना चाहिये । राजारानीका राज गया । श्रव प्रजाका राज है । तुम्हे पंच चुनना होगा । उनमें दो पुरुष और एक जवान लड़की थी। सभी के शरीर स्वस्थ रंग साफ, नाक नुकीली और कद उँचा था । मैं सोच रहा था, यह गूजर उन्ही शक घुमन्तुनो की सन्तान, जो इक्कीस सौ वर्ष पहिले भाग कर भारत ग्राये । इनके सरदाराने भारतपर सदियो राज किया । कितनेही घुमन्तू जाट-गूजर राजपूत के रूपमे नीचे बस गये, और कुछ आज भी अपने पूर्वजों की तरह पशुलोको लेकर घुमन्तूजीवन बिता रहे हैं । भारतमें थाकर इन्होने भारतीय धर्म स्वीकार किया और पीछे कुछ .<noinclude></noinclude> rbvbcb0ava76e284wxy3r5xepykgxgy पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३४९ 250 195464 666204 2026-07-07T16:14:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666204 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनसे कोटगढ़ ३१६ सुभीता देखकर इस्लामको मान लिया। आज वह सुभीता कुभीता हो" गया । पहिले पहाड़ों मे जन संख्या कम थी, तब कड़ों ( पहाड़के ऊपरी भागो) को कोई पूछता नहीं था । आदमी बढे, धरती एक अंगुल भी न बढ़ी। श्रव पहाड़ी लोग कंडो पर गूजरोको देखना नही चाहते । इसके लिये अच्छा बहाना है हिन्दू मुसलमानका विलगाव समस्या आर्थिक समस्या है | गूजरोकी रास्ते में एक जगह भारवाहकोकी प्रतीक्षा करनी पड़ी, फिर साथ पाथेयको खाकर मै पाँच बजे रामपुर पहुँच गया । जाते समय गर्मीका महीना था, व वर्षा ग्रपने यौवन पर थी, जिसने चारो तरफकी हरी- तिमी अपने पूर्ण यौवनपर लादिया था । Creaगला और अतिथि भवन दोनोंही नगर के बाहर दोनों तरफ काफी दूरपर है । मे रामपुरमें एकान्त वास करने नहीं आया था, बल्कि कुछ काम करना चाहता था। पंडित दौलतरामसे इस विषय मे पहिले ही बात हो चुकी थी । उन्होंने बिल्कुल शहर के भीतर रेज़र कार्टरमें ठहरनेका प्रबन्ध किया था। पता लगते ही श्रीविद्याधर ग्रायुर्वेदालंकार भी ग्रागये और एम ग्रावासमे प्रतिष्ठित हो गये। अखवार और चिट्ठियाँ ढेरकी देर थी। कुछदेर शिष्टाचारकी बात हुई, भोजन हुआ और मित्र लोग चलेगये, फिर लालटेनको सिरहाने रखकर पारावण शुरू किया, किन्तु क्या रात भरमे वह खतम होने वाला था ? एक बजे मैंने लालटेनका बुकाकर सोना चाहा, शरीरको ढाँककर मैं हजारों मच्छरोते बच सकता था, लेकिन रामपुर गरम जगह है । चादर टांगते ही शरीर पतीने पतीने हाने लगा। फिर नीचेसे सह- समुज लगते कुंदने लगे । नैने चोरवत्ती उठाकर देखा - खटमल श्रोणि चारीत्रोरने वाकमण कररही थी । अव सोना असंभव था, मैंने लालटेन फिर जलाई और प्रात काल तक अखंड पाठ चलता रहा । बीवी रहा था और रहनेकी क्या आवश्यकता, री पल दो। बातचीतने पता लग गया था कि रामपुरते कामकी - कल<noinclude></noinclude> p2rmh1svo80fcesxq8070akctmxxpk9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५० 250 195465 666205 2026-07-07T16:15:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666205 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२० किन्नर - देशमे - सामग्री अधिक मिलनेकी श्राशा नहीं । अगले दिन ( १८ अगस्त ) जब अपना निश्चय सुनाया तो वे हॅस पड़े मैने पंडित दील तरामजीको अर्थात् श्राप इतने कायर : है । हाँ, मैं यह स्वीकार करता हूँ, मैने खटम्ल, मच्छर, पिल्लू इन त्रिमूर्ति - के सामने अपने को सदा कायर सिद्ध किया, लेकिन पंडिन दौलतराम मेरी कायरता पर नही हॅसे ये । उन्होंने कहा कि स्कूल में ग्राजकल छुट्टी है, वहाँ खटमलका नाम नहीं और दवा तथा रोशनी के कारण मच्छर भी कम है, मसहरी हमारे पास है । जलपान समाप्त करते करते हमारा सामान भी नई जगह जाने लगा और पहिले तो जाकर मै तीन घटे सबकुछ छोड़कर सोगया । फिर श्री विद्याधरजी के साथ बाजार में निकला। खुदरंग और मोटी पश्मीनेकी दो चादरे वहांते पहिले मँगा चुका था, अब एक सफेद चादर लेना चाहता था । रामपुर इधर पश्मीना बुननेका केन्द्र वन गया है। चादरे बारीक बनती हैं, लेकिन कश्मीरकी सफाई और सुन्दरता कहाँ ? हमने पचासो चादरे देखी, लेकिन कोई ठीक नही पड़ी। अगले दिन विद्याधरजीने कुछ और चादरे दिखलाई', लेकिन मैने वेमनसे एक अच्छी चादर =१)मे ले ली । - सराहनमे निराश होनेके वाद रामपुरसे में ज्यादा आशा नही रखता था। दो तीन छपी पुस्तके मिली, जिनमेसे एक डाक्टर फॉन डेर स्लीनकी पुस्तक "हिमालयमे चार मातका चक्कर " पढी । इसमें स्थानो के उच्चारा कई हजार वढा चटाकर लिखे गये हैं । मेरेलिये कोई ज्ञातव्य बात नहीं मिली। स्लीन भूगर्भ शास्त्री थे, साथही अपनी डच्जातिके अनुरूप ही साम्राज्यवादी रंगमे खूब गाटे रंगे हुये थे । फिर भारत और भारतीयोके वारेमें उनकी राय जाननेकी विशेष ग्राव- श्यकता नहीं। उन्होंने हिमालयको ग्रत्पलस्- काकेशका समवयस्क बतलाया है यूरेसिया महाद्वीप दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर सरकने लगा, है जिसमें रुकावट पड़ने पर हिमालय समुद्र के पेटके भीतरते उसी तरह ऊपर उमड़ा, जैसे योरप और अफ्रीका के महाभूखंडां के सघन से परिन्,<noinclude></noinclude> 0rnzqwjzd2ck2ohofzbq0nn1ywxcfp3 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५१ 250 195466 666206 2026-07-07T16:15:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666206 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनसेकोटगढ ३२१ अतलस्, अल्प आदि । श्राजभी उत्तरीय भूभागका संतरण धरतीके भीतर ही भीतर दाव रहा है, जिसके कारण हिमालय क्षेत्रमे अधिक भूकंप आते हैं। स्लीनको भी कनौरकी पशुवलि देखकर बहुत क्षोभ हुआ था और उसने अपने दृष्टिकोण से लिखा था "इस काडको देखतेही तुम्हें मालूम होने लगेगा, कि इन अर्धसम्योपर धार्मिक पागलपनका भूत मवार हुआ है । और यह याद रखिये कि एकाधही दशाब्दी पहिलेकी बात है, जब यही कुरा इसी ढगसे मानुपपत्रों पर पड़ता था । ... साउंसे मत्तर धड धरतीपर पड़े छटपटा रहे थे । रक्तकी गंध आदमीको बेहोश कर रही थी ।" रलीन १९२५ई में इधर आया था, अर्थात पिल्लीवार मेरे नेने एकसाल पहिले । उसका यह कहना गलत है, कि उससे दस- बीस साल पहिले कनौर में मनुष्य वली होती थी। सराहनमें पिछली शताब्दी के आरम्भतक मनुष्य वलि ज़रूर हुआ करती थी । रामपुरमे और कुछ बाते मालूम हुई जिनमें राज्य के संबन्धम निम्न बातें उल्लेखनीय है - १८०३-१५ तक बुशहर पर गोरखोका अधिकार रहा । राजा ( उगर सिंह) भागकर चगोव चला गया । गोरखा वडतूसे आगे अपना अधिकार नहीं जा सके । १ नवम्बर १८१४ ई० को अग्रेजोने लखनऊ गोरखोके विरुद्ध बुद्ध घोषित किया, जिसका ग्रन्थ २ दिनम्बर १८१५ ई० को सुगौलीकी के साथ हुआ । राजा महेन्दर सिंह घेवेवाले श्रादन वरम- के के से, जबकि जर १५ सराहन पहुँचा था । राजा महेन्द्रतिके भरनेपर १८५० में उनके पुत्र शमशेरसिंह लड़के ही । मन्दरहि बडे भाई मित्र तेहसिंह, १८३७३०६०) ने १८५६ में विद्रोह किया था । मोनियम परी ईपीज़ल लूमे गये और १८ प<noinclude></noinclude> jy15tockajvflwsfhxi9jp91zl26g0t पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५२ 250 195467 666207 2026-07-07T16:15:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666207 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२२ किन्नर देशमें काम करनेके वाद १८८३ मरे, फिर पादरी स्क्रीन वहाँ काम करने लगे और १८६७ मे उन्होंने २५ श्रादमियोंको ईसाई बनाया । १८५० मे चर्चमिशनने चिनीमें काम शुरू करना चाहा था, किन्तु अन्ते मोरावियन पादरी की मिशन राजा शमशेरसिह दुर्बल धिकारी 'टीका रघुनाथ सहने स्थापित करने में सफल हुये । मस्तिष्क के आदमी थे । इनके उत्तरा- १८८७-६८ई में अपने मत्युतक राज्य कार्य सँभाला और उन्होंने ही १८८७-६० राज्यका परिमाप कराया । उससे पहिले पोवारी वज़ीर रन बहादुरकी बहुत चलती थी। टीका रघुनाथ से उसका झगड़ा हो गया और अन्तमें रनबहादुरको कैथू 'शिनला '- के जेल में निस्सन्तान मरना पड़ा। राजके खानदानी वज़ीर पोचारी, शोवा और कुलहवंशके हुआ करते थे । शोवा वजीरका घर पामें था । पजाव सरकारकी श्रोरसे छपे मुख्य कुलोके वंश-वृक्ष और वंशावलीमे रामपुरका वंशवृक्ष निम्नप्रकार (पृष्ठ ३२३) मिलता है - जेम्स वेली फ्रेज़रने १८१की अपनी यात्राका वर्णन पुस्तक “हिमाल पर्वतमे””, सुन्दरही नही बहुत ही ज्ञानवर्धक किया है । यह उन पुस्तकों है, जिन्होने १६वीं सदी के प्रारम्भ और कुछ पहिले के भारत का बहुतही व्यापक चित्रण किया है। फ्र ेज़र जैसे कितने लेखकोने तो उस समयकी वेशभूषाका रेखाचित्र भी खींचा था । वेज्ञीने निरतके पास न्यारियोंको बालू धोकर सोना निकालते देखा । उसने बज़ोर टीकमदास से पापाणशत-नीका वर्णन सुनकर लिखा "बिल्कुल ठीक रोमको कता पुल्त (पापाणपोतिका) की भाँति होती है, जो मन दोमन- के पत्थरोको फेकती है। इसकेलिये रस्सा बहुत मोटा होता है और सौ-सौ आदमी मिलकर एक बड़े वृक्ष सहारे फेकते हैं ।" फोज़रने लिखा है कि राजा उगरसिंहके मरनेपर २२ व्यक्ति सती हुये, जिनमें ३ रानियाँ, १२ अन्त पुरिकाये, २ वज़ीर और १ चोवदार थे । वह The Hind Mountain (Lomabon 1820)<noinclude></noinclude> n7dtbh3mirxxnsb3wnvywfthepzfjkl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५३ 250 195468 666208 2026-07-07T16:15:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666208 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनसे कोटगढ़ ३२२ १, उदयसिंह 1 २. रामसिह | ३. रुदरसिंह ४. उग्ररसिह (मृ० १८११) I ५. महेदरसिंह (मृ०१८४०) ६. शमशेरसिह (मृ० १८१४) फतेहसि (ज. १८६५ मृ० १८७६ ई०) खुनासिह (मृ०१८६७) ७, पदमसिह (न. १८७३ मृ. १६४७) वीरेन्द्रसिह (१८) वीरमंद्र देवीदर जगजीत रनवीर (ज, २४-६ १६३४) (मृ०. १९२२) (ज. १९०४) (मृ० १९२१) , हरदेव लिखना है कि बुशहरकी सिन अधिक सुन्दर होती हैं, इसलिए बाजारमें यहाकी दाखियो बड़ी मांग है। नहीं जो ग्रात्र-दन तथा वीस-पचीन खरीदी जाती है वह पहाड़ने नीचे जाकर डेढ़ती दो-सौ मेति । अर्थात १८१५ ई० मे नीचे और यहाँ दासप्रथा खूब धनुदिनी | यह भारतीय दानवामियोकी प्रशा करते हुये लिखालाई निकर खामी नहीं हैं, वक इनके दास बनानन्दराम रते है | बहुधा ने सानियांते इतने हिल मेल नानांचाही ני नार की बड़ी प्रसन्न करते हुये कहता है "कनौर<noinclude></noinclude> 0499zj7twt2ep2sinmnly2ojzk3nfyz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५४ 250 195469 666209 2026-07-07T16:15:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666209 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशमें ३२४ निवासी उससे बिल्कुल भिन्न भाषा बोलते हैं, जो हिमगिरिके दक्षिण- पार्श्वमे बोली जाती है, किन्तु साथही यह भी कहा जाता है, कि वह चीन-भूमिक भोटियों की भावासे भी भिन्न है । कनौरी के ऊपर तातार (मगोल) मुखमुद्राकी बहुत गहरी छाप है । वह खुले दिल के तथा स्वभाव-विष्टवादी होते हैं । वह वीर हैं, परिश्रम और स्वतन्त्रता प्रेमी होते ह । वह निष्कपट, नम्र, अतिथिसेवी, ईमानदार और विश्वासपात्र होते हैं। इसलिये यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, कि राजा इनपर इतना विश्वास करता है, और राजशक्ति इतनी अधिक इनके हाथोमे है । राजके बहुत से मुख्य परिवार और सरकार के प्रधान प्रधान पदाधिकारी कनौरवंशके हैं । राजाके वैयक्तिक परिचारक उसी प्रदेशके हैं और सैनिक विशेष करके वहांहीते भरती किये जाते हैं ।" (पृष्ठ २४४ ) X X X २० अगस्त तककेलिये मै यहाँ ठहर गया । आज कल शहरकी बाजारमें चहल पहल कम थी। स्कूलकी लम्बी छुट्टी है। एन०डी० प्रो० साहब दौरे पर गये हैं । वरसात के समय लोग बहुत कम दूर-दूर जाते है । यह तो मैं ही था जो इस समय भी यात्रा कर रहा था। 2 २० अगस्तको पंडित सत्यदेव और मास्टर अनुलाल से भेट हुई । मास्टर लालको सात सालकी सजा दी गई थी, और यहाँ के पुराने अधिकारी, जो श्रव भी शासन यन्त्र सम्हाले हुये थे, बहुत निश्चित थे । लेकिन, वह यह नहीं समझ पाये, कि प्रजाके राजमें आखोमे धूल hine प्रजासेकोको खोका काँटा समझकर दूर फेंका नहीं जा सकता। मै इस रायसे सहमत था, कि रियासती मशीनको उन्हीं जाकड़ी पुर्जी से चलाया जा रहा है, नौकरशाहीकी रफ्तार वदतर हो गई है, और हर काममें वह दीर्घसूत्रता प्रदर्शित करती है। अपनी जान बचाने के लिये बहानोंकी उसके पास कमी नहीं है। हिमाचल सरकार<noinclude></noinclude> sqk502dgp1n4g557jmym9tirukkqz7d पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५५ 250 195470 666210 2026-07-07T16:16:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666210 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनसे कोटगढ़ ३२५ स्थापित हो गई है, किन्तु प्रजा प्रतिनिधियोका उसके साथ सहयोग नही है । प्रजा प्रतिनिधियां के हाथमे शासनकी बागडोर देनेमें कठिनाई अवश्य है, क्योंकि रियासतो मे जननिर्वाचित कोई भी सस्था नहीं थी । सरकार प्रजामंडल के कुछ पुराने नेताओंको परामर्शदाता बनाना चाहती है, लेकिन सड़े और वदनाम पुराने रियासती नौकरोकी आज भी जारी काली कारतूतोका पुचारा वह अपने मुँहपर पुतवानेके लिये तैयार नहीं । वस्तुत केन्द्रीय सरकारको चाहिये था, कि दूसरी जगहा की तरह यहाँ भी अस्थायी मन्त्रिमन्डल बना देती । जन निर्वा- चित राजकीय संस्था कार्ड भलंही न हो, किन्तु प्रजामंडलने कई रियानतो में काफी संघर्ष किया। उनके तपे तपाये नेताओ मे ऐसे लोग मोजूद है, जो शासन के दायित्वको नम्हाल सकते है । उन्होंने जनता के संघर्ष का नेतृत्व किया, इसलिये यह कहना ठीक नहीं होगा, कि जनता उनके साथ नहीं है। में यह बात सिर्फ बुशहरको लेकर नहीं कह रहा हूँ, बल्कि सारे हिमाचल प्रदेशमे नौकरशाही योग्यता से जो प्रतिक्रिया होरही है, यह किसी सरकारने लिये अच्छी नहीं । हालका कुँड टूट गया है, जहाँ ले कि गांव के लोगोको पीने का पानी मिला करता था | लिखा-पढी होते कितनेही महीने हो गये, किन्तु कोई लाभ नहीं। लोग कहते है - इससे भलातो राजाही का राज या । सामने दारपणा नज़र रखके रज़ लगाने और तुरन्त श्रवर्तियर मेजर कुटकी सरम्मत करादी जाती। ऐसे कितने ही उदाहरण भोजूद है, जिनमें प्रयास मैट्रिक पास पुराने रियासती नौकर प्रथम मिस्ट्रेट बना दिये गये और बहुतही लायक तथा ईमानदार किन डाल दिये गये । भी हिमाचन-तरकार चार महीने की है, उस पूरे लगउन र दार्मपरायण होनेरे लिये इतना समय पना ठीक है, किन्तु जिन ईटोने यर इमारत खड़ी की जा दृति और निर्बल है । 3 कूलने के सटलो चोर मच्छरीने तघर्ष नहीं करना पड़ा और '<noinclude></noinclude> iyqa92z7xdc5p0ytkf3d3oqqvgex51h पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५६ 250 195471 666212 2026-07-07T16:16:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666212 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२६ किन्नर - देश में अधिक समय लोगोसे बातचीत करने में वीता । रियासत के पुस्तकालय से एक ही दो कामकी पुस्तकें मिल सकी । ऐतिहासिक सामग्री के लिये सभी सराहनकीोर इशारा कर रहे थे। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई, कि राजाको पेन्शन मिल गई और रानी गर्मियां बिताने दरा- हन चली गई है। विधवा राजवहू (लाड़ी साहवा) को १०००) मानिक पेन्शन मिली थी। उन्होंने उजुर किया, कि इतनेमें उनका खर्च नहीं चल सकता | सरकारने उसपर विचार किया और देखा कि एक अकेले व्यक्तिकेलिये हजार रुपया अधिक होते हैं, इसलिये हजारका ८००) कर दिया | सराहनमे मैने सुना कि किसी वकील साहबको नया आवेदन पत्र तैयार करनेकेलिये कहा गया है। श्रावेदन-पत्र तैयार करने में वकील साहव तो घाटेमें नहीं रहेंगे, लेकिन सरकार फिर सोचने- लिये मजबूर होगी - क्या जाने नौ हजार व सौ रुपया वार्षिक खर्च एक विधवा पुजारिनपर उसे अधिक मालूम हो । तामन्तशाही ठाट ग्रव नही चलेगा, इस बातका बेचारीका पता नहीं, और नाहक वकीलो- मे रुपया वॉट रही है। छोटी रानीने भी इसीतरह कई हजार रुपया दरवारी चापलूसों में वांठे, कि पेन्शनका आधा रुपया उसके लड़के- को मिले, किन्तु बुशहरके लिये क्या ख़ास नियम बनाया जा सकता है ? X X ' X २१ अगस्त को मैने रामपुर से प्रस्थान किया । भैराखड़ तक उतराई थी । वहाँतक तो सवारी बेकार थी। किन्तु श्रागे छ मील ठाणेदार की कड़ी चढ़ाई के लिये घोड़ा अच्छा समझा और सामान के दो खच्चरोके साथ घोड़ेका इन्तजाम भी कर लिया गया । नौ बजे चलते समय नोगढ़ी के लाला खुशीराम भी साथ हो गये । मन्योटी किन्नरकी सीमा है और नोगढी खड्ड सराहन देवी मन्दिर में प्रविष्ट होनेवालो की सीमा है । लेकिन, नौगढीकी तरफ मेरा ध्यान इस सीमाकै कारण श्राकृष्ट नहीं हुआ । लाला खुशीरामने अपनी सूझ और<noinclude></noinclude> jsdgxz62eef5e1bpgugbgvzvubigb9u पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५७ 250 195472 666213 2026-07-07T16:16:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666213 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहन से कोटगढ ३२७ परिश्रमसे यहां एक ऐसा नमूना खड़ा कर दिया है, जो इस बातका नमाण है, कि कैसे कम पैसे मे भी हिमाचलका औद्योगीकरण किया जा सकता है । श्राज जहाँ कई एकड़ोमे वाग और खेत लहलहा रहे हॅ, तथा एक कारखाना चल रहा है, पन्द्रह साल पहिले वहाँ कुछ भी नहीं था । लाला खुशीरामके पिता जगलोका ठेका लिया करते पे, किन्तु मरते समय पुत्रोको आर्थिक कठिनाइयांमे छोड गये । खुशीराने मामूली हिन्दी-उर्दू के सिवा अधिक पढ़ा भी नहीं था, लेकिन वे मनस्वी तथा परिश्रमी जीव थे । राजासे जमीन ली । पत्थर नोडने बटोरते उनके हाथ में छाले पड़ गये । वहाँ कुछ खेत तैयार किया । पासके खडसे जल ले आये । उनकी उड़ान मामूली नवधि तक सीमित नहीं रही, उन्होंने कूल को और ऊँची तथा बड़ी करन जज्ञके परिमाण और पतन शक्तिका बढ़ावा । साथ ही उनके दिमागमे योजना भी बढ़ती गई । ग्राज इन जलशक्तिले दो ग्रा की चयाँ चल रही है, तेल पेलने, चावल कूटने फटकनेकी मशानें भी काम कर रही है काट. चीरनेकी मशीन अलग लग गई हैं। १४० बा दिनामो बिजली तैयार कर रहा है, किन्तु बिजली का उपयोग चिराग वालने और रेडियोकी कुछ बैटरियों उनके सिवा और नहीं। दोना चकेन। रोज ३१) मन थाटा पीस देती है। कहां दो और चूली होनेपर चार कनटर तेल मेला | चावल कूटनी प्रतिदिन ८०) चावल कूट देती है । यह val ' वित्त होते हुये भी लाला सुशीरामने जायदाद चालीन पचान हजारकी है, जो सब हुई है। अभी भी उनका विभाग थका नगरे ख्याल करके कि मेरा और बडाऊँगा, कोनवान नह तो दिवार रुपये<noinclude></noinclude> 4rg4ulbe7cqvrjumiyzrfa3u6x6ccgl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५८ 250 195473 666214 2026-07-07T16:16:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666214 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२८ किन्नर - दशमे आपको और मिल जाय, तो आप अपने कारखाने में क्या क्या चीजे बढायेंगे १ - मै तीन हजार रुपये लगाकर कुलके पानी को तिगुना कर दूँगा । दस हजार रुपये में दोसौवीस वोटका डिनामी और पांचहजारमे दोनों वीस वोल्टकी मोटर लगा दूँगा, जिसमे मशीने पनचक्कीसे नहीं बिजली से चले ! श्राठ हजारमे ऊन धोने, धुनने, रंगने और पूर्न करनेकी मशीन और पाँच हजारमे ऊन कताई की मशीन या जायेगी । ऊनकी रंगाई और पूनीका प्रबन्ध यदि होजाये और लोग तकली की जगह चसे उसका सूत कातने लगे, तो पहाड़के लोग मालामाल हो जाये । खुशीरामजीने यह भी बतलाया कि सभी मशीने भारतकी बनी मिल सकती हैं, वह विदेशी मशीनोकी तरह दीर्घजीवी नहीं होती, किन्तु साथही उनका दाम कम होता है । भलेही उतनी दीर्घजीवी न हो, किन्तु स्वदेशी मशीने हमे डालर और पौण्डकी परतन्त्रतासे तो बचा सकती है। लाला खुशीरामने एक सफल उद्योगही स्थापित नहीं कर लिया, वल्कि इस बात को भी सिद्ध कर दिया, कि हिमालयके हरएक खडुपर थोड़ी पूँजी और स्वदेशी मशीनो द्वारा बिजली चालित कारखाने स्थापित किये जा सकते हैं । यह विजली रोपवे द्वारा पहाड़ के दुर्गम स्थानोमे मालके यातायातको सुगम और सस्ता बना सकती है। मुझे आशा है, हिमाचल-तरकार आर्थिक सहायता दे लाला खुशीरामको अपनी योजना सफल बनानेम हाथ वटायेगी और साथही नेगी सन्तोषदास जैसे हिमाचल के कितनेही मनस्वियोको नौगढ़ीकी तीर्थयात्रा करके वहाँ से सीखने का मौका देगी। सिर्फ आर्थिक सहायतासे ही काम नहीं चलेगा, सरकारको विजली और यन्त्र-विद्याकी शिक्षाका भी शीघ्र प्रवन्ध करना होगा । मैने कारखाने में जाकर कूलसे गिरते पानीको देखा। दोनो पन- चकियो के लिये अलग जलपातनिकाये थी। पानीकी कमी के कारण चक्कियों और मशीनें एक साथ नहीं चलाई जा सकती । कूलका सार<noinclude></noinclude> 4rideksvvr4rzh6l5x3744yn7ujnleg पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३५९ 250 195474 666215 2026-07-07T16:16:46Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666215 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहनसे कोटगढ़ ३२६ पानी एक बड़ी जलपातानिका द्वारा एक बड़े चक्को पर डाला जा रहा था । चक्क का सिर्फ धुरा लोहेका था, वाकी भागको लकड़ी से यहाँ के बढइयोने बनाया था । बुरके दूसरे शिरेपर घुमाऊ पेटीवाला चका था। सभी चीज़े सीधी सादी थी, किन्तु देश के लिये कितनी लाभ- दायक ? खुशीरामजी उत्माही जीव हैं। उन्होने छूतछात उठाने के बारेमें आजकल चलरहे ग्रान्दालननर कुछ टिप्पणी करते हुये राजनीतिकी तरफ भी पग बढ़ाना चाहा। मैंने समझाया - आप अपने इस कारखाने द्वारा सिर्फ अपनी मालाई नहीं वल्कि देशकी भलाई कर रहे हैं । श्राप देशका एक उपयोगी दिशामें पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी काममे धागे बढे । राजनीतिक अखाड़ेबाजी आपके कामको खराव कर देगी। उन्होंने मेरी नातको बहुत पसन्द किया । कारखाने देखकर पंगी ब्रह्मचारीका दिया लवा बडा हाथमें लिये में ग्रागे वटा, और नोगडीसे चारमील ( रामपुर से मील) पर अवस्थित दत्तनगरमं वंदे पर पड़ते पहुँचा । हरियाली के विचार मे तो पच्छी है, किन्तु गाँवमे एकथोर कीचड़की मडाव उदलती है और दूसरीचीर परामे लास बाल मक्खियांका झुंड एक- एक जगह बैठा मिलता है । दत्तनगरकी दृकानोमे तो श्राधा अविकार मक्षिकाया । दत्तनगर कुछ ऐतिहानिक स्थान का मालूम होता है, किन्तु एतिशक्तिके चिए देवी मन्दिर मे अस्तव्यस्त लगे कुछ उपर है। सम्भव है, धरतीक नीचे कुछ और भी बीजे दिपीरा। दावार को नुकाविता करते चार मील और चके निरन पहुंचा। निखके मन्दिरको देखना अत्यावश्यक था। इ श्राब्दी नवलाना जाता है, जिसपर सन्देह करनेकी बहुत गुजारा नही है। पर नारद्वाज ब्राह्मण भगवानकी पूजा रादि होते भी नानाहारी है। मन्दिर बहुत बड़ा<noinclude></noinclude> 24kpnzxclofntl3xrkfwmxt2oar8glz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६० 250 195475 666216 2026-07-07T16:16:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666216 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३० . किन्नर - देश में नही है, किन्तु सुन्दर है । गुप्तकालीन शिलदार मन्दिरो आकारका है और सारा पत्थरका बना हुआ है | ग्रामपालकी मेने मन्दिरका तल बहुत नीचे है, यह भी उनकी प्राचीनताका द्योतक है। पुजारी से फाटक खुलवाकर आगनमे गया । पहिले मेरी दृष्टि अव नीचे गई। अक्षयवट यह मेरा रक्खा नाम है। पुजारीतीने इतनाही कहा, कि हमारी कितनी ही पीडिवाइस को इसी रूप- मे देखती चली गई, वह न वढता है न घटता है । बड़ेगा कैसे ? वह एक चट्टानपर उगा है, जहाँ खाद-जल के लिये बराबर चान्द्रायण चलता रहता है। अक्षयवटके नीचे पुरानी खडित मूर्तियों थी, जिन्होंने मेरे ध्यानको अपनी ओर आकर्षित किया था । खडित तो सभी मूर्तिया थी, किन्तु अधिक तर घिसी भी थी। इनमें वह मूर्तिया नीथी, जो कभी मन्दिर में स्थापित की गई थी। इनमें एक और लम्बोदर भगवान भी विद्यमान थे । उनके पासकी द्विभुजमूर्ति तो और भी तुन्दर थी, फिर कोर दो बूटधारी सूर्य भी थे, जिनके दोनों हाथो में दो मुखी फूल थे । पुजारीजी, सूर्यके बूटपर विश्वास करने केलिये तैयार न थे, यद्यपि आँखों से उसे देख रहे थे । हिन्दू जूता पहिने अपने घर ( घर के गर्भ मे ) नहीं जा सकता, फिर सूर्य भगवान क्यों ऐसा प्रतिचार करते हैं ! लेकिन उनको क्या मालूम कि बूटधारी सूर्य मूलत शक- देवता थे, यहां आकर उन्हें उसी प्रकार ठोक-पीटकर हिन्दू देवता बना दिया गया, जैसे लाखो शोको हिन्दू | फिर मन्दिर के भीतर जगमोहनमे दाखिल हुये । श्रधोवस्त्र ( पैन्ट, पाजामा पहनकर भीतर जाना fafa है, किन्तु धोती तो विस्तरेमे बंधी थी। सैर, भीतर चले हो गये । यहाँ भी कुछ टूटी फूटी मूर्तियाँ देहली पास खड़ी की गई थी, उनमें सूर्यभी थे और पूरे नही । गर्ममन्दिर मे पुजारीके सिवा कोई नहीं जा सकता । वहाँ की खड़ी मूर्ति हमे उतनी अच्छी भी नहीं लगी। जान पड़ता है, एकसे अधिक बार यहां मूर्तिनंसक आये और खडित मूर्तियां को हटाकर दूसरी भद्दी और भद्दीवर मूर्तियाँ बनवाकर स्थापित की<noinclude></noinclude> td8c9i1sxy96m53lm699wzdhyy6p8ft पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६१ 250 195476 666217 2026-07-07T16:17:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666217 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1 सराहनसे कोटगढ़ ३३१ गई। इनके भीतर विष्णु और हरगौरींकी भी मूर्तियों थी और वहुत छोटी भी नहीं थी । तो क्या सूर्य मन्दिरके अतिरिक्त यहाँ छोटे मोटे कुछ और भी मन्दिर थे? श्रांगनमे दूसरी जगहको खंडित मूर्तियों इस वातका और पुष्ट कर रही थी। सूर्य भगवान फलाहारी हैं, किन्तु वगल टेकी मन्दिरकी देवीका वलिके बिना काम नहीं चलाता। हम मन्दिर को चाची दीदी का मान लेते हैं। उस समय जान पड़ता है, निरत एक विशिष्ट स्थान था। क्या यहाँ कोई पहाड़ी राजाकी राजधानी थी रा प्रतिहारसम्राज्यकी क्षत्री थी ? नीचे जानेका रासा शिमला से तो नहीं रहा होगा, फिर तो सतलजके साथ-साथ जाना होता होगा । यादवीं सदी में नोट साम्राज्य बहुत प्रबल था, क्या वह सराहन के ग्रास- पाम तक के रुक गया था ? मन्दिर और निरतका इतिहास ना होगा या यही भूनिमे निहित है। खुशी और शकांसे सूर्य पूजी जा सकती है, लेकिन इन मन्दिरको शक कालम नहीं लेजाया जा सकता । याज मन्दिर, पुजारी और गांव-वस्ती सभी श्रीहीन है। 21 मन्दिरका दर्शन कराने के लिये पुजारीजीको एक रुपया दक्षिणा दी । अरे परे लड़केने यार पूरा - आपने सबके लिये दक्षिणा दी ना? | मने कहा- नहीं, मैंने निर्फ बुजारीको दिया । निरतमे राजकी धर्मशाला और विभागका डाकबॅगला दोनों हैं। मैंने सराहन के नवजागा ते कर लिया और मायके पायेयकी देखा एक आदमी नाल बुन वापशावाने गया बाकि ननननने मजुलियां . उनकेपा मौजद भी थी। " m 14 बन्द नहीं गि, यदि " इनका सोता। नईलने सिगरेट 4 हा मुँह फफक- न देता मेने उने और खच्चर<noinclude></noinclude> olfpzxujnap6geq0ui6z8x240lwfgjn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६२ 250 195477 666219 2026-07-07T16:17:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666219 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३२ किन्नर - देशमं वालेको भी पैसा देकर जल्दी ग्रानेकेलिये कह रास्ता लिया। दो-तीन मील जानेपर भेड़ा खड्ड मिली। यहां उतराई खतम हुई। यहीं पुराने बुशहर राज्य की सीमा है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं, कि नलज मैदान में उतरने तक इसपार सारा हिमाचल प्रदेश है । श्रयं जीने बीच- बीचमे दो-दो चार-चार गांवोंके द्वीप पजाव- सरकारके हाथमें रखे थे, जो श्रव भी वदस्तूर साविक मौजूद है। भारत सरकारने यह सोचने का कष्ट नहीं उठाया, कि इन द्वीपो के कारण शासनमें कितनी कठिनाई पड़ती है। लालचंद स्टोक कह रहे थे - ठाणेदार के इलाके के रास्तेमं खूनही गया। एक ग्रादमी कई साल पलटनमे नाकरी करनेके बाद कमाई लिये घर जा रहा था, स्थानीन कुछ लागाने पेलेकेलिये उसकी हत्या कर दी। पुलिसको कर्मएव देखकर वह शिमला तुमरिन्डेन्टसे मिले। कहनेपर सुपरिन्डेन्टने कुछ करनेमें अनिच्छा प्रकट की वह हमारे पंजाबमे नही है। लालचन्दने जोर देकर कहा— कोटगढ़ और ठाणेदार पजाब मे है, यदि इसके बारेमें आप कोई कार्रवाई नहीं करेगे, तो स्थानीय बदमाशोका मन बढ़ जायगा । लेकिन २३ अगस्त तक तो पुलिस चादर तान कर सोई हुई थी। दूसरे प्रान्तमे द्वीप बनाने का ऐसा ही फल होता है। भारत सरकारका यह कर्तव्य था, कि हिमाचल प्रदेशको बनाते समय इन द्वीपोको खतम कर देती । - मैने भैड़ा खड्डको पुल से पार किया । यहाँसेछ मील ठाणेदार तक चढ़ाई है । रास्ते ग्रादमीका साढे चार हजार फीट ऊपर उठना पड़ता है । पहिले पुलपर फिर थोड़ा ऊपर चढकर काफी देर प्रतीक्षा करनी पड़ी, तब कही साईत घोडा लेकर ग्राया । यात्रामे ऐसी अनु विधाओोपर गरम हो जानेको मै बुद्धिमानी बात नहीं समझता । मैं घोड़े. पर सवार हुआ और चढ़ाई चढ़ने लगा। मेघ देवताने भी वरसनेकी ठान ली थी। मैं अपने विस्तर-बन्दपर कदल रखना चाहता था, किन्तु खच्चरवालेने पाल डालने की बात कहकर वैसा करने नहीं दिया । र व वह वक्त तथा विस्तरेको खुली वर्षामे भिगोते ला रहा था ।<noinclude></noinclude> mnb8kvsm45bqfkkq7yt86f56j977apv पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६३ 250 195478 666220 2026-07-07T16:17:32Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666220 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सराहन से कांटगढ " ३३३ लवारीका घोडा लगड़ा किन्तु मजनूत था और उसने चढ़ाई में कही- कायरता नहीं दिखलाई। पहाड़ोकी हरियाली के बारेमे क्या पूछना है ? हाँ, तिवसे कही कहीं खेत ढह गये थे, कितनीही जगह हमे घने कुहरेमे चलना पड़ा, जिससे दन कदम आगे देखना मुश्किल था । जब कुहरा हटा तो दूर तक पर्वनके लहलहाते खेत दिखलाई पड़े । सतलज नीचे बहुत दूर थी, जिसके उसपार कुल्लुकी पर्वतश्र णियों थी । ज्ञान वन गया था, जब हम टाणेदार पहुॅचे। मैने ठाणेदारमें न उतरकर डाक्टर भगवानसिंहके पास कोटगढ़ जानेका निश्चय किया । दाणेदार डाक बंगलेमें ठहरना पड़ता और अगले दिन फिर सामान होनेका प्रबन्ध करना पडता । मोटरकी सड़क तक पहुँचने पर पथ - फलक नी बतला रहा था, कि काठगढ़ यहाँले ढाई मील है। सूर्यास्त हो चला था। रासा दे जरा भी मूलते तो अँधेरेमें भटकते रहनेका डर था किन्तु नने चलनादी निश्चय किया । खच्चरवाले रास्ता ढूँढ लेगे, इसलिये उनकी परवाह न कर से कदम तेज बढ़ाने लगा, किन्तु कितना ही काम बडाया, वेरा हानेसे पहिले कोटगड़ नही पहुँच सका । - टावर भगवानसिंह भरही पर पे और वहां मेरी प्रतीक्षा दो दिन पहिले दीए रही थी। खबर भी था पहुॅचे। मे घरमे या गया कटर नगवाननिट और उनकी पत्नी लानदेवीके श्रातिथ्य के पारसी प्रानानटी यह ख्याल करके कि ग्रव यात्राका स्वरूप जीना है। चातक हुन एते स्थानमें ये जहाँ पैसा किसी कदाचार अन विधाके साथ करानेने सहायता नरवाना, दारोदारने मोटकी है। प ने " नेटर के बन्द कर दिया था, किन्तु तो नहीं। पर और आदमी भी मिल जाते हैं । ना जाता है, दन्तु वह नीचे के शहरोंकी तरह दिन विरासत है।<noinclude></noinclude> t7kr5to4hy688939e4osdkxalpsax40 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६४ 250 195479 666221 2026-07-07T16:17:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666221 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३४ किन्नर - देश मे ( २२ ) यात्राका यंत शिमला जाना कब होगा, इसका अभी निश्चय नहीं था। मोटर- वम तो शिमला से अठारह मील ज्योग तक ही थाकर रुक जाती थी । हाँ, जीप यहाँ तक था जाती थी, किन्तु राता टूटने से वह भी वन्द थी । कोटगढ़ और ठाणेदार मेवाकी खान है। यह नेवोकी फसलका समय था, लेकिन वर्णने सड़क खराब करके सेवाके भजनेने बड़ी रुकावट पैदा कर दी थी। बागवाले बहुत परेशान थे । खच पर ढोने पैसा भी अधिक लगता था और समय भी । मुझे अपने लिये चिन्ता नही थीं । अव ठौर पर पहुँच गया था और जब चाहूँ यहाँ आगे जानेका इन्तिजाम हो सकता था। डाक्टर भगवानसिंह तो डक्टर ठहरे ही, उनकी पत्नी भी चिकिलिका ह । मुझे यह जानकर बहुत संतोष हुआ, कि दो दिनकी परीक्षामे चीनी नहीं निकली अर्थात् मैने भी डायवेटिस्को दबोच लिया, तो भी डाक्टर हवने वधान किया, कि पहाड़मे रोग दब जाता है मैदानमे दवा रहे तब है अमली दवीचना | कोटगढ़ ईसाई धर्मप्रचारका केन्द्र प्रायः एक सदीसे रहा है । यहाँ मिशन के बहुत से बॅगले और बगीचे है । किन्तु मिशन अँग्रेजी राज्य के महारे फल-फूल रहा था - दर्जनों साहब, साहिविने यहाँकी ताप- हीन हवामें रहकर धर्मप्रचार कर रही थी । किसी-किसी बहाने तरकार भी सहायता देती और विलायत से भी पैमा श्राता था । भारतकी स्व- चन्ताके वाद दुनिया ही उलट गई। अभी सालही बीता है, किन्तु मिशनका वगलवाला घर ढड-मंड होने लगा। क्या यहाँके मिशनकी भी वही हालत होगी जो सू, चिनी और केलड़के मिशनो की हुई ? सभी बंगलो और ठाटवाटके कायम रखने के लिये पैसांकी जरूरत है। बगीचे उतने पैसे नहीं दे सकते, लेकिन अभी मिशन कुछ बगलीको<noinclude></noinclude> ca84yevs8yap499l7nfd9qrjg8jka6h पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६५ 250 195480 666222 2026-07-07T16:17:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666222 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्राका अंत ३३५ वेचवेचकर भी जीवन रक्षा कर सकता है । अव मिशन के कर्णधार भारतीय है, वह चादर के अनुसार अपने पैर को पसार सकते हैं। स्कूल- में मिशनने अवनति नहीं की। स्वतन्त्रभारत हीमे मिडल स्कूल से वह, हाई स्कूल बनाया गया। पादरी धनसिंहकी मैने बड़ी प्रशंसा सुनी, जिससे आशा है मिशन सम्हल जायेगा। हमारे देशमे सभी धर्मो को विविध क्षेत्र सेवाका अधिकार है। मुझे यह पसन्द नहीं कि, कही भी के स्मृतिशेष रह जाये । ग्रॅ जोके रहते ईसाई संस्थाने अदूरदर्शिता से काम भले ही लिया हो, किन्तु ईसाई धर्म दुर्राष्ट्रीयताका पोषक नहीं है । प्रायः चालीस बरस पहिले सत्यानंद स्टी कभी ईसाई धर्मका प्रचार करने के लिये यही कारगढमे श्राये थे, किन्तु भारतके साबुग्रो और सिद्धों के जीवनने उन्हें अपनी और आकृष्ट किया, और सात वरसके लिये वह एक गुफा वट गये। कोटगढसे ठाणेदार जाते समय बड़ी खड्ड में सड़क से नीचे अब भी यह गुफा मोजूद है । फिर गुफाबास छोड़ कर रोकने एक पहाड़ी तरुणति व्याह कर लिया, और अन्त में तो ईसाई धर्म छोट सत्यानन्दस्टोक वन वह उपनिषद् के भक्त बन गये । जब से उनकी वर्ष पहिले हरशिल ( गगांत्तरी ) ने ग्राकर बसे साहेबसे तुलना करता है, नाटककी बुद्धिमानीकी दाद देनी पड़ती है। हर- शिलवाले नादेवने वहाँके लोगोका हा उपकार दिया। उमीने वहाँ पहिलेपल घालूा प्रचार किया, गंगा द्वारा नीचे लकड़ी बाई । उसने भी टाकी तरह एक पहाडीची वाट निया । उसने लकड़ी- की मी दादादाता टोन कान बनाना, कि बाज भी वह r घर बनाने सोचा होगा, दारुराल मदारी वाजायेगी। लेकिन उसक एली और चली गई इनका पता ना अन्नावर भारतीय बनावा होता, तो रा. इमे वे वहा, इसलिये उस<noinclude></noinclude> 5mrpmdguh25mgr8clkb8gopzvidognv पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६६ 250 195481 666223 2026-07-07T16:18:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666223 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३६ किन्नर - देश मे परिस्थिति अनुकूल नहीं थी। स्टोकने अपनी सन्तानको शुद्ध भारतीय बनाया, और स्वयं भी भीतर और बाहर दोनोंसे वे भारतीय रहे। मैंने सत्यानन्द स्टोकको १६२९ ३० की वरनात में बम्बई देखा था | सहयोगका यह यौवन काल या, सारे भारत में राजनीतिक व्याख्यानोकी धूम थी । स्टोक असहयोगी थे, और शुद्ध खादी के ती- कुर्ते में चौपाटी की सभा मे व्याख्यान दे रहे थे - "हिमालयले क्या- कुमारी तक वस हिमशुभ्र खादी ही खादी हो जाय" । मै भी नहयोग मे भाग लेने कुर्ग से बिहार के रास्ते में था । असहयोगी स्टोक प्रथम विश्वयुद्ध मे सैनिक भरती करानेमें उसी तरह तत्परता दिखला रहे थे, जैसे गाँधीजी । किन्तु युद्ध ममातिके वाद जो 1 उससे उन्हें घोर असन्तोप हो गया । जिस नीति जोने अपनाई तनोपका उन्होंने निर्फ अपने सहयोग द्वारा ही नहीं प्रगट किया, बल्कि युद्धके उपलक्ष में जो विजय-शिखर स्थापित किया था, उसे तोड़कर उन्होंने उती स्थान पर हिन्दू पूजा - मन्दिर बनाया। मन्दिरमें लकड़ी में खुदे जगह-जगह उपनिपद और गीता के संस्कृत वचन हैं। लालचन्द बतला रहे थे, इनमें से बहुत से वाक्योको पिताजीने स्वयं अपने हाथोसे खोदा था । कि कोटगढ़ के लिये तो सत्यानन्द स्टोक बहुत कुछ थे । वह ग्राये थे यहाके लोगोको ईसाई बनाने, और वन गये स्वयं हिन्दू । किंतु उन्होंने कोटगढ़ को एक दूसरीही चीज़ बना दिया, जिससे वहाँ के सभी नरनारी उन्हें आज भी प्रातः स्मणीय पितातुल्य समझते हैं । याज कोटडका इलाका उत्कृष्ट जाति के सेवोका बाग वन गया है, इसका आरम्भ स्टोकने किया था । ग्राज कोटगढ़ के लोगोका जीवन-तल इन्हीं सेवी की बदौलत बहुत ऊँचा हो गया है। स्टोकने अनरसे हाईस्कूल खोलकर लोगो में शिक्षाका प्रसार किया । इलाकेमे उतका व्या- पक प्रभाव दिखलाई पड़ता है। स्टोक बड़े उदार और दयालु स्वभाव- के थे । कोटगढ़ के लोगोकी भलाईका ध्यान उनको अपने जीवन के अन्तिम समय ( १६४६ ई० ) तक रहा। गरीब किसान कुण<noinclude></noinclude> nk13vkt4cqsi8c4g392xbcnygnu3tlm पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६७ 250 195482 666224 2026-07-07T16:18:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666224 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्राका यत ३३७ लेकर अपनी जमीन बनियाँको वेच देते थे । वह उन्हे विना सूद ॠण देने और कहते थे-पनी जमीन बेचो मत, यह ग्रागे चलकर बहुत यवान होगी। स्टॉकने अपने बगीचेमे वयालीस प्रकारके अच्छी अच्छी जातिके नेव लगाये थे, जिनकी पौधको उन्होंने अपनी जन्मभूमि अमेरिकामें ही नहीं दुनिया के दूसरे देशोसे भी मंगवाया था, लेकिन सिर्फ अपने लाभकेलिये नहीं किया । कोटगढ़मे सेबोके चार में उन्होंने अपने को मकल और बहुत उत्साही मिश्नरी सिद्ध किया उन्होंने यह भी सिखलाया, कि अपने सेवाका सच्चा श्रेणी- बन्धन करके ग्राहकों में अपनी साख बढ़ाना बहुत लाभदायक वस्तु है । उनकी समधिन नहसीलदार श्रमीचन्दकी पत्नी अपने वामके सेवांकी ताली हजार पर उठाकर भी श्रेणी विभाजनका काम ठेकेदारके दान नहीं छोड़ना चाहतीं । वह स्वय वागमि जाकर फलोका श्रेणी- विभाजन करती हैं। रटोकने सबसे पहिले जर्बदस्त चान्दोलन करके बदसि बेगार प्रथाका दूर कराया था। जनता के हितकी कौनसी बात थी, जिसे स्टोक यागे या नहीं ये फिर क्यों नहीं गढ़के लोग स्टीक निधनका अपनी वैयक्तिक क्षति समकेगे ? तीन पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं। दोनों बड़े पुत्र कोटगढ के एक ब: गण्यमान्य व्यक्ति रानादेव देवीदानके दामाद है । मवसे घंटे लानचन्दका व्याह सब तहसीलदार रायसाहेब अमीचन्दकी आ है। लकियाँ भी अच्छे घरो में ब्याही है। स्टोक- शिक्षित सुसस्कृत यश को चिरगावी करना X हिन्दू परिवार है, जो अपने पिताके नाकर्तव्य समझता है। X × नई है। देवतादेन वासनेते धने नहीं, कशापयश होती थी ? में तो और नादबने से लेन २६ ग्रस्त तक ही रह<noinclude></noinclude> 3z19ba35qq9bsnfatx67w6t487z00tn पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६८ 250 195483 666225 2026-07-07T16:18:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666225 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३८ किन्नर- देशमें लड़ हो जाते हैं, बर्फ जल्दी पड़ बहुत दूर नहीं जाना चाहता, कठिनाई न हो । चन्द्रकान्तजी डाक्टर भगवानमिहका परिचय १९३७ ई० में (लाहुल) में हुआ था | वह एक भक्त बौद्ध है, अपने नाम के साथ वो (बौ) लगात है । वह जन्मने नहीं नगसे बौद्ध हुये। उनकी पत लाजदेवी माता नताकी यारसे बाद भी और जातिने भी निवती । मेरे लिये सालके सात याठ महीने हिमाल मिं विताना स्वास्थ्य और कार्य दोनो हट अनिवार्य हो गया है। बैरी डायवेटिमकी रामबाण औषधि हिमालय ही मालूम होती है । मेरे हिमाचल मित्राने कई जगह कुटीर बनानेका निमन्त्रण दे रक्खा है। ठाकुर गोविन्दसिंह बाबी. टूटूपानी और अपने गांव ककोहमे निमन्त्रित कर रहे हैं, जो है, और ७ हजार फीट ऊँचे हैं। मैं ५ से ७ हजार फीट तक हीकी ऊँचाईको पसन्द करता हूँ, इससे ऊपर फल खट्ट जाती है। साथ हा मै मांटरकी सड़कते जिसमें श्रावश्यकता पड़ने पर नीचे थाने अपने यहाँ कुल्लूमे आनेकेलिये जंगर दे रहे हैं। डाक्टर भगवानति नारकडासे ६५ मीलपर अवस्थित अनीसे यांच ऊपर एक पांच-सादे - पाँच हजार फीट की जगहकेलिये निमन्त्रण दिया है। ऊँचाई यहाँ विलकुल ठीक है, पासम देवदारोका जंगल है, और पानी भी बहुत है। कोटगढ के आसपास भी बना-बनाया घर मिल सकता है, किन्तु वहाँ मई-जून मे पानी का कष्ट होता है। डाक्टर साहब ४-५ एकड़ जमीन खरीद चुके हैं, जिसमेसे मेरे लिये अपेक्षित एक एकड़ देने को तैयार हैं और अपने मकान के साथ मेरे कुटीर को भी बनवा देने की भी तैयार है । इसके साथ-साथ चिकित्सक और चिकित्सिका प्रतिवेशी होने का भी लाभ | देखे अन्न-जल विवर लेजाता है । अगली गर्मियो तो मै अनी जा रहा हूँ, यह नारकडासे २५ मोलगर है जिसमें चढ़ाई उतराई ग्राधी-आधी है । डाक्टर माहनको मैने अगस्त भर रहनेकेलिये लिखा था । दो- एक और सहकारियोके भा नीचेसे यानेकी श्राशा थी, इसलिये मे<noinclude></noinclude> jx0chiq3q4k728u5p50yl8pctj87wfp पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३६९ 250 195484 666226 2026-07-07T16:18:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666226 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्राका त ३३६ एक मकान ठीक कर देने के लिये कहा था, और तहसीलदारनी महाराया (श्रीमती मीचन्दन बहुत कृपा करके अपने यहाँ स्थान देना स्वी- कार कर लिया था । किन्तु जिस “शासन- शब्दकोश" के लिये मै पहिले थाना चाहता था, उनका काम तैयार न था । मे २३ अगस्त को तहसीलदारनी महाशयाचे घर मध्याह्न भोजन के लिये गया और उन्हे बहुत बहुत धन्यवाद दिया । तह ीलदारनी वागके काममे बहुत चुस्त हैं। उनके लड़क प्रकाशचंद के एम० एस सी० ह और उद्यान- विद्या सापडत बसे तमाजदारनी भी मंजूरी देनमे कजूसी नहीं करना, किन्तु पुत्र ता लाल-लाल वातं करता था । . २४ ने अपने रंगको दौता नहीं किया। व्यांग सेना या मारवगक थाने की कोई आशा न थी । सर्व- गाजा किसी वक्त माठाणेदार पहुँच सकती थी, परन्तु आकाश- वृत्तिका भरना क्या ? रलवेी बाहरी एजेन्सी ठाणेदार है । उसके वार्या श्री रमेशचन्द्रजा भी नहीं कह सकते थे, कि जीप कब श्रायेगी । तम ने यही लरचय किया, कि जैसे ही वर्षा-हूदी कम छा, श्र अब खबर पर लदना यमि नारकन्डे चल दना चाहिये, आगे देखा जायेगा ! " डबर मगगनसिंहक पाकी स्वास्थ्य समस्यापर एक दिन विवाहा ॥। उन्बलारा, किरतन राग यहाकी बाया है। अनुकुन्नू ७०% लाहुल ने ५% ७०%, पट ७०%, कीट खाई । ७०% श्री. कोट- नापुजसेवा व नकी इन उनकी सामावश्य उसने तनय। एक द मून्छ के ना जाने ६ अगस्तको<noinclude></noinclude> 2q5m0kbwnmcx185dqjs4lxhcw7c6spt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७० 250 195485 666227 2026-07-07T16:18:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666227 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४० किन्नर - देश में दिन दुर्दिन नही रहा । घूमते-घामते ठाणेदार चले गये। श्री रमेश- चन्द्रजीकी वातसे अभी भी जीप का कोई ठौर-ठिकाना नहीं था । फिर उनके साथ स्टोक भवनमे गये। सेव का मौसिम हो फिर उद्यान- पति घरमे कव मिल सकता है ? खवर गई तो लालचन्दजी चले याये । बारेमें बातचीत होती रही। हाईम मेरा मन नहीं लगा और उनसे कितनी देरतक पहाइके जीवन के अपने पिता के बारेमें बतला रहे थे- मैं कालेज छोडकर चला श्राया । पिताने जन भी अनन्तोष नही प्रगट किया और मेरे हाथमे दोहजार रुपये देकर कहा जाओ मारा भारत घूम आयो । मैं दो साल तक घूमता रहा। पहाड़ी जनगीतकी बात चली, तो उन्होंने बतलाया- यहाँ एक रामायणका गीत है, जो रात-रात भर गाया जाता है। इसकी कथामे कितनीही विचित्रिताये हैं, जिनमें एक है सीताजीके बनाये बड़ेका लंका पहुँचना | मुझे उस वक्त अपना डिक्टोफोन प्राप्त करनेका प्रयास बाद श्राया । यह मशीन साढ़े पन्द्रसौ रुपयेमे मिल रही है । वह आपके भाषण या गानेको तार पर रेकार्ड कर लेती है और फिर उसीपर लगाकर ग्राप ग्रामोफोनको तरह उसे सुन सकते हैं । तारको सलेटकी तरह माफ किया जा सकता है, और फिर नये रिकार्ड किये जा सकते हैं। चीज बडे कामकी है । उस पर अपनी पुस्तक भी बोलकर लिखवा सकता हूँ, जिने पीछे मी गति करके टाइप कर लिया जा सकता है। उसपर जन गीतो और जनपवाड़ोको भी उतारा जा सकता है, दाम भी बहुत नहीं है, लेकिन वह सिर्फ ए० सी० बिजलोसे चलता है। उसमें डी० सी० विजली काम देती है न बैटरी। यदि बैटरी काम देती, तो फिर क्या कहना १ मेरे लिखनेपर डाक्टर वासुदेव-- शरण अग्रवालने और पूछताछ करके लिखा कि साढ़े ग्राउस रुपये और खर्च किये जॉब तो २३० वाल्ट ए० मी० जेनरेटर और ट्रान्सफार्मर भी लिया जा सकता है । उत्साह मन्द पड़ गया, क्यों "कि यह दोनो मशीने एक-एक मनकी है। उनको चलानेकेलिये . .<noinclude></noinclude> g1qqbkjx9dexr1z3ljdsnlna4yanyb4 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७१ 250 195486 666228 2026-07-07T16:19:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666228 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्राका श्रत ३४१ पेटरोल चाहिये, जी श्राजकल वडी दुर्लभ चीज है । फिर साथ ही लेखक साथ बिजली-मित्रा भावनना होगा या किसीको रखना पड़ेगा। तक कि डक्टीफा किलिये तबतक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, जब चलनेवाला डिक्टोफान तैयार नहीं हो जाता । लालचन्द्रजीने मन्दिर दिखलाया | कोटगढ़ के उद्यानपति मारे परशान है। ग्रॅवेरा होतेही हज़ारोंकी संख्या में उड़कर चले आते है, और खानेसे भी अधिक सेवाको वरवाद करन है। पचामा हजारका नुकसान हो रहा है। लालचन्दकी वह दो-चारका गिरानी है, लेकिन उनसे क्या बनने वाला है ? उन्हाने उद्यानपति सबके सामने प्रस्ताव रक्खा, कि दस-बारह मील दूर चमादक दिनके वर्ग पहुँचकर उनका सहार करना चाहिये । स्टाक परिवार इसलिये तीन-चार हजार रुपया भी देने लकिन दूरे लोग पैस खर्च करने की तैयार नहीं- बरंगी ने दनक सैर मनायेगी ? जिस तरह किन्नरोको वानर-वज कन्ना यावा हागया है, उसी तरह कोटगढ़वालो के लिये चनगाद यज्ञ करना आवश्यक है। नेते कर लिया यदि श्राज जी नहीं आई तो कल खचरपर सामान लादकर नारकडा चलहू गा । x X × २७ वा अधरपर मानान रखवाकर में पेदलही नारकण्डे- बालके रासने टाईनील चढाईका या एक नीना का रास्ता बना लिया गया था । २१।। | नाम वाली पटेल नावा जानेवाली नई मोटरक ** 3 नाग ताजाना बनाई गई है, दुई भागे बदराज पहुँच जायेगी फिर कुछ मालो दिवारे बजार एकड़ा पारी मइयामें श्रा<noinclude></noinclude> rzcbcqyskzpfvjcrqdgugnednh7fjal पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७२ 250 195487 666229 2026-07-07T16:19:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666229 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४२ किन्नर - देश मे देहरादून -- चकराता मोटर सड़को मिल जायेगी । इसी सड़कपर कुटीर चनान के लिये ठाकुर गोविन्द सिहने निन दे रखा है। पौन चार घटा चलने के बाद दोपहरी में नारकंडा पहुँच गया । नारकडा वस्तुनः नागकडा का ग्राम है । कडा पतपुष्ठको कहते हैं। नाग देवताकी मढी व मी माटर के पास मौजूद है यद्यपि पासकी देवीने नागकी महिमा घटा दिया है। नारकडा ६१६० फीट अर्थात् प्राय. चिनी वरावर उंचा है। जाते समय यह स्थान जितना सर्द मालूम हुआ था, अब उतना नहीं था । हिमालय के सभी डाकवगला की 'नारक के डाकबगला जैन होना चाहिये । यहाँ कोई भी पथिक ३ दिन किराया देकर उरकता है । भोजनकी वस्तुका भी मूल्य नियत है, और रोयाँ मौजूद रहता है । यदि श्राशा न होती, तो मै दोचार दिन भी मोटर के लिये ठहर सकता था, लेकिन कोई आशा भरोसा नहीं था। ग्रागे केलियेनने तो तै किया हैं, वरफ पिघलते ही पलके प्रारम्भ से नीचेने इथर श्राजाऊँ, और अक्टूबर अन्तमे लौटा करूँ । श्रनो यहाँते २४ मील है; जिसमें सतलजके किनारे लूरी तक १३ मोल उतराई ही उतराई है, वहाँ तक आज भी जीप जा सकती है। फिर द मील नदोके किनारे नीचे जाकर पुलपार हो ६ मील चढाई चढ़कर श्राश्रतो है। नीसे साठ वासठ मील आगे बननारमे कुल्लूवाली मोटर सड़क मिल जाती है । नारकडेमे बैठे-बैठे मेरा ध्यान श्रनपर गया, फिर शिमला-कुल सड़क पर भी । - आज कृष्णाष्टमी थी । लोग वा देर तक गानाबजाना करते रहे। मैं मा निश्चिन्त होगया था, क्यो किसी बीनार को शिग्लासे लेकर एक रिक्शा रामपुर गया था और अब खाला लाटा था। 1 मैने उसी का योग तक के लिये २२ मील के लिये १८) कौन लेता ? १८) में कराला । वैसे हता तो लेकिन रास्ता उतराईका था और<noinclude></noinclude> 53crxkxwky28sovetv7dww6udb7i9ej पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७३ 250 195488 666230 2026-07-07T16:19:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666230 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्राका अत ३४३ चूछे जानेसे २= ) पैदा कर लेना बुरा नहीं था । यद्यपि रिक्शा सामान और सवारी दोनोकेलिये किया था, लेकिन सवारी करनेकी मेरी इच्छा नहीं थी । x × चार उबले अंडे और सेव पाकेटमें रखकर २८ अगस्तको में सवेरे ही सात बजे चल पड़ा । का तरह चलना ही गया। चालोका कान जब व्योगसे २२ मीलने साडे सत्रह मील गियाबैताल सड़क कही बुरी नही थी, लेकिन मोटर ही बन जाता है, तो वे आगे क्यों जॉय १ उनकी बला सेवके वर्गांचे थोर बालूके खेतवाले रोते रहे। मैंने सुना था, का वजे योगने मोटर चलती है । श्राखिरी साढ़े चार भील से रिक्शे पर बैठ गया । वहासे कई मील पहले सड़क पर कई जगह काल तक पीपे पड़े हुये थे, जिनमें से बहुतला अलकतरा बहकर चरवाद हा या । नटुककी मरम्मत करके उसपर डालने के लिये पीपे लाये गये थे, लेकिन काम खटाईम पड़ गया। लड़केकी मालिक वरवर निश्चय नहीं कर पा रही है, कि अभी सड़कको एकतरफा वा नारान कलिये रखकर मरम्मत कर दी जाये, अथवा उसे दूनी चीकत का यातायात- जायक बना दिया जाये ? नौकर-शाहीकी जय जय सनाई जाएगी, यदि सड़क दोचार जगह धमक कर नही गरा दी और खर्चा न पड़ा और पांच-दस जोन अनंता अनिष्ट न हुआ ! सरकारों को कुछ मत करिये, ན་ लेनी पुराने लत नहीं। और बहुतते काम हो शाह ने जाके के डर से कुछ- किंतु शिरपरको प्री ज्ञान ये मनमा जेजे देव गहुँचना | कैलारा ५ आई पी लेनि लादा अ बालू देख्न माता चार रूपये और आदमी<noinclude></noinclude> 8lodj5k9jzldk5c60szvemw6grmj5ya पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७४ 250 195489 666231 2026-07-07T16:19:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666231 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૪૪ किन्नर - देशमें का डेढ़ रुपया, फिर नह क्यों सवारी लेजाना पसन्द करता | मह सवारी बैठाली, ओर भीतर तथा छतपर जितने या सके उनने वालूके बोरे लाद लिये, फिर ड्राइवर साहबने हुकुम दिया, कि अब जगह नहीं है । अन्धेर नगरी में कौन पूछता है, मै ताकता ही रह गया और बम चली गई । वंगल के चौकीदार साहेवका भी कहीं तो सामान वहाँ रखाकर निश्चिन्त बैठता । का प्रतीक्षा करने लगा । पता नहीं था, नहीं व मे छ बजे वस काफी देर करके आई और धड़ाधड़ आालुके बोरे लाटे जाने लगे । ३० लादने का अर्थ था १२० रूपया | नवारी इतना कहाँ मिल सकता था ? मुझे डर लगने लगा, कि कहीं इस समय नी छूट न जाना पड़े। खैर, मै उन भाग्यवानों में ते था, जिन्हे चालू के साथ समें बैठने की जगह मिल गई। कई यात्री भी छूट गये। यह भी कैलाश कम्पनीकी माटर-वस थी । आदमी ही जगह बालू लादना अवैध था, दुर्लभ पेटरौल लोगोंकी सुविधा के लिये इन मोटर बनियो की दिया जाता था, और उसका था यह सदुपयोग !! बालू नये ड्राइवरको भी कुछ मिला होगा, लेकिन मन योमे पाँचसे अधिक नहीं, बाकी रूपये शिमला पहुँचनेसे पहले ही रास्ते में सेठ साहबके हाथ में उसने देदिया। इस पाप और अत्याचारके रोकने के लिये वही कौन था ? पुलिसको भी कुछ मिलता होगा, तभी तो. योगमे अपने सामने यह सव होते देख ग्रॉख मूँदे बैठी थी। भ्रष्टाचार हटाने का सारे देशमें हाहल्ला मचा हुआ है, किन्तु वह इतना सहल रोग नही । औषधि कठोर है, नही तो रोग असाध्य नहीं है । - पचास मोटी तोदवालोको कालेवाजारी और भ्राचारीके अपराध मे नगरोके चौरस्तेपर फाँसी लटका दीजिये और सर्वस्वहरण कर लीजिये, फिर देखिये किसकी हिम्मत होती है ? यदि भारतको भयंकर आर्थिक संकट और राजनीतिक असतोप से बचाना है, तो " नान्य पन्थ विद्यतेऽयनाय" ।<noinclude></noinclude> 7w28u5zgq707vco0i74uxkxpij2i1be पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७५ 250 195490 666232 2026-07-07T16:19:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666232 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यात्राका यत ६ बजे बम शिमला पहुँची, ओर कुछ मिनटों बाद मैं फरग्रोव में नावर-परिवार में था । × X x પૂ चिट्टियोमे पता लगा कि ५ सितम्बरको सम्मेलन कार्य समिति की बैठक है, जिसमें ३ को चलकर ही मे उपस्थित हो सकता था । पांच दिन र पान ये, व इन्ह चाहे शिमलामं विनाॐ या दिल्ली में ? मैने दिल्ली प्रोग्रामको स्थगित कर दिया। प्रोफेसर लाजतराव नार, उनकी पत्नी और बहन नवने मेरे स्वास्थ्य में सुधार होनेकी वात वी मुके भी मालूम हो रहा था, किन्तु यह या हिमालय और नित्य प्रति कमसेकम पांच मील टहलने का वरदान | शिमलामे एक काम वा, मेनाजीर मिलकर कनोर के सबधमे बातचीत करना और प्राकालीन समाधिके कास्य पात्र तथा मद्य कुतुपको संग्रहालय केलये करना । यह काम अगले ही दिन हो गया। मेहताजी का ग्रान्चमा जाऊँ, जिनसे आठ मीलार सनिवार स्थान पाचर फोट ऊँचा धार बहुत मशीन है । उनका य ना करवाया, हिचमा चिनकना तथा पुरावच्व दोनों की दृष्टिले दीपूर्ण स्नान पर लेजाऊँ दिल दोनों में तिम्रा शिलासे प्रस्थान किया। पशी रेलने कार तेही चला। शिमला नेले चलन महाविपीने वालोन मेरे थे। गाड़ी रानी भी जैन ही तैनी सेना और गाड़ी खडुमे गिरनेका बाजेवाला पहुँचे। लता- बारी से रिजर्व की सामान रखवाकर लेट था, लेकिन गनीकी वाल<noinclude></noinclude> 23x2nrtmr8i2w1deqm7htc4paw3jx65 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७६ 250 195491 666233 2026-07-07T16:19:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666233 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૩૪૬ किन्नर - देशमें २३ किन्नर - देशपर एक ऐतिहासिक दृष्टि यहं किन्नर देश है । किन्नर के लिए किंपुरुष शब्दभी सकृतने प्रयुक्त होता है, ग्रत इसीका नाम किंपुरुष देश या किपुरुावर्ष भी है । किन्नर या किंपुरुष देवताथोकी एक योनि मानी जाती थी, किन्तु उससे हमें इतिहासके नाननेमें कोई सहायता नहीं मिलती । यदि किन्नरका शब्दार्थ "बुरा आदमी" ले लं, ता याने शत्रुरु ऐसे शब्दोका प्रयोग याज भी हुआ करता है । किन्हीने को यह नाम दिया होगा, यह तो जरूर मालूम होता है, और ऐसा नाम की भाषामे होनेपे यह वही हो- कलिये शत्रु- सकता है, तो क्या किन्नर ग्रार्यो से भिन्न थे ? हां, आदिन रूपमें भिन्न ज़रूर मालूम होते हैं । किन्नरदेशियोको ग्राजक्ल थानपान वाले कनौरा कहते हैं । पहिले कनौर या किन्नरका क्षेत्र बहुत विस्तृत था । कश्मीर से पूर्व नेपाल तक प्राय साराही पश्चिमा हिमालयतो निश्चित ही किन्नरजातिका निवास था, चन्द्रभागा ( चना ) नदी के तटार ब्राज कहीं कनौरी भाषा नहीं बोली जाती, किन्तु मुत्तपिटकके मानव ( ईसापूर्व द्वितीय तृतीय सदी में लिखा है चन्द्रभागानदीतीरे होसि किन्नरी तदा ", जिससे सष्ट है कि पार्वतीय भाग बनाव तटपर उस समय किन्नर रहा करते थे। इसी तरह उत्तरकाशी (टेरी) के पासके धरासू आदि "सू" शब्द गाव वाला हु, कि कभी वहां- भी किन्नरीभाषा बोली जाती थोकिन्नगभाना "श" या "" 'शब्द देवता के लिए श्राता है। श्रार्यों द्वारा अपने पड़ोसी पहाड़ियो को यह नाम शत्रुतासे ही नहीं वल्कि उनके स्नानादिकी उपेक्षा के कारण भी दिया गया हो सकता है, किन्तु इसे दस तभी कह सकते हैं, जब मालूम हो कि उस समय श्रार्य उनसे अधिक शुद्ध- प्रेमी थे । ..<noinclude></noinclude> orw5miercszcvndy3krmu1qo54wiic1 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७७ 250 195492 666234 2026-07-07T16:20:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666234 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर देशवर एक ऐतिहासिक दृष्टि अतु, जैनेगी हा ३४७ शब्द किन्नरका ही अपभ्रंश है, चोर हिसा समय कागारे हिमालयका नाम रहा होगा, कुचित शहरात ( यत्र महान् जिला ) की एकल चिनी तथा कुनी उतरकर उससे लगे हुये २०, २ व्यवहत होता है। दृष्टिविलकरनेपर नोरी भागमे जिसका रावधिक प्रचालान् हनून है, और वलियाँइ थोराड्कद शुभ हुये तारी " शुन्नम् उस्कन्यम्) तीन भाषाओं तत्व मिले ती (पीटना, न कृत और इन दोनोसे भिन्न एक नका माथा जिन ग्रासाना के लिए हम “शू भाषा" कह लेते हात रचित वस्तु नामोमें इन दोनों भाषाओं का नाम बना है, इसे अभी ठीक नहीं हा जा सकता, क्योकि केन्द्रका श्री पूर्ण ७६८ रा तैयार नहीं हुआ है। यहाँ हम कनोरीभाषा (हम्द कुछ वानगादेव है। . (१) न परेल माटगाव शब्दीली ने (ग्राम), शि (.., भूवन् (शाखा च मेडिन ) सा (नाम), का (मिजास 1, (नाना ), निशा), शुभ, बान (पा, (, किम् (ब), (, मलाई ' (, नेद् (नारना, ताङ्गेकू (हराना), 1. 201 T J कदन प्ररोग करते दिपा है- - म तथा ड नः 1 } नया कुस कुने) । कभी हजान है, जैसे-<noinclude></noinclude> fvqt0qn8ida4ya86b8xsu77ngk9cf56 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७८ 250 195493 666236 2026-07-07T16:20:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666236 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४८ किन्नर - देश मे चौरस (चोर). परमेशरस् (परमेश्वर ), उपालन ( श्रजपाल ) संस्कृत के शब्द कनौरी भाषामें काफी मिलते है और सभी तरह के - काटी (काष्ठ), कोहर ( कुहरा ), विजुल बिजली ), रिखा (गंछ. खउ (खाद्य), छोप ( ग्रुप, मसिरस ), (भगवान्), पुजा (पूजा), वीदी 1 रडॉलस् (रवा), योगवान् ( बहुत ), वया भैया है। - संस्कृत धातु में निकू, मिकू लगाकर खूब प्रयोग किया गया है- लोनिक ( लाना), भगेनिक ( भागना ), टेमिक ( हटाना), विचारेमिक ( विचारना ), भ्य- मिकू ( भर करना, पुजा-लन्निक ( पूजा करना ), पकयामिक ( पकाना ), फेक्वामि (फेना), पोलटेन्निकू ( पलटना ), जोडेमिक ( जोड़ना), लटक्थानिक (लटकाना) भूज्या सिक् (भुंजना ), वसन्निक (वसना), वज़ मैकू ( बजाना छरयामिक ( छोड़ देना ), रङ-यमिक ( रंगना ), सज्यामिक (सजाना), लजाशेमिक (लजाना), सुचन्निक (सोचना ), कयामिक ( काटना ) गोल्यामिक ( गलाना ) | - ' फो खस ( भेड़ी), दमत् T (३) “शू” भाषा वस्तुत. कनौरी भाषाका मूल ब्रश है । यत्र कुछ उसके शब्दोको लीजिये-- शू ( देवता ), ओम् ( पथ ), रङ्- (गिरि) ती (पानी), शुप् (फेन), पोम (हिम ), ठंड- (बर्फ), को ( अँगार ), रॉक ( ताप ), लान् (वायु), जू ( वादल), युक् सूर्य) लाइ ( दिन ), गोल (मास), रुद ( सीग ), कुइ । कुत्ता (हरिन ), होम् ( भालू ), ऐरड् ( चाखेट ), (बैल), री ( तख्ता ), पोलाच ( रुधिर ), बम् (मधु ), टालड- ( चमड़ा ), शोक् ( कण्ठ ), ताकुस् (नाक), गार् दाँत ), वड् (चरण), लिङ्- ( हृदय), रिड्-स् ( बहिन ), छङ् (पुत्र), चित् (वेटी), छद् (जामाता ), ते ( पुत्रवधू), रु (ससुर), तेते (दादा) कौतेते ( परदादा ), कोणस् (मित्र), जड ( मोना, ठोग (मफेद ) सै (दस), ग (सौ) लोन्निक ( बहुत ), कुस्क्या ( बहुत ज्यादा केनू (तुम), कोमो ( भीतर ), रेनम् ( वनन्त ), य्वा (नीचे),<noinclude></noinclude> l5qyzmlufcfpy6f0iyhcg88w0sypjap पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३७९ 250 195494 666237 2026-07-07T16:20:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666237 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- किन्नर देशपर एक ऐतिहासिक दृष्टि 1 ૨૪ ईसिक ( प्रश्न करना रोमिक ( वोजना, हचेमिक ( होना ), स्कुन्निक ( उबालना ), लुन्निक ( बांधना ), रन्निक ( देना ), रेनिक् ( बचना ), चुन्नक् ( चलना चूर्ण करना), लन्निक (करना), कनिक ( बुलाना, बुन्निक ( आना ), निक ( निकलना, प्रकट होना, लानिक ( कहना ), ग्वानिक ( खोदना, काटना ) कस-मिक ( मिलाना), लशिक (बनाना पकाना, उन्निक (लेना, माँगना), तोशे मिक (बैठना, वनिक (परिहान करना, हँसना ), छिमिक (चूसना ), पनिक ( उबालना पोछना ), दुनिक (मीखना, नामिकू (गिनना ), चेभिकूर्माना, (क्युवनिक लादना (उठाना) | ', - कनोर लोगो प्रगतिहासिक परिचयकेलिये अभी तक उनकी नारा ही एकमात्र सहायक है, आगे चलकर संभव है, उस समयकी भौतिक सामग्री प्रात हो जाये । किन्नर जातिका सबसे पुराना स्तर हे "श", उसना साथीने पहले खश नाथ नमागम हुआ मालूम होता है । श्रार्य में भारत पहुंच चुके थे। समय है उस समय चंद्रभागा वह पश्चिम तक रहते हो, र उनी समय श्रार्य पशुपालने उन सार्क हुआ हो । थागे चनकर तो यह संपर्क तथा प्रभावनना रहा कियाज अधिश किन (स्नेतों ने श्रमी (शु) मायादार ग्रार्थनानोपना लिया | जैने हिमाचल के नागकेसर के और नाव आर्य-भाषा- काही उपर पीछे नोट-देशिक प्रभावमें हो । मोटापा प्रत, लक्षख श्री देव ' हाय कोट आनी श्रावादीकी नापा गलन होगा, कि मान सरोवर मन हड्रद् में पहिले नोटवावी र ईनाकी सातवीं (ई) ने चीनी तानने हाइड्रो-<noinclude></noinclude> 06roah7b1hnyjz30mi0pxzta5hlo445 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८० 250 195495 666238 2026-07-07T16:20:37Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666238 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५० किन्नर देशम तट तक फैले भांटमाम्राज्य की स्थापना की। इसी समय चीनी क स्तानकी भाति किन्नर - देशमे भी मीट सैनिक और शासक यात संख्यामे ग्राकर रहने लगे, कितने ही भोट पपाल भी उत्तरी चरागाहोंमें पशुचारण करने लगे । भोट साम्राज्य स्थापन इचन- गेम्बो ही तिब्बतमे बौद्धधर्मका स्थापक तथा निम्ता साहित्यका नी आरंभक था । उससे पहिले आधुनिक किन्नर देशम बोद्ध-धम पहुंच चुका था, यह संदिग्ध मालूम होता है। अशोक के समय बौद्ध धर्म प्रचारक दूर-दूर तक पहुँचे थे, तो भी वह यहां जैसे पिछड़े लोगोमे पहुँने, इसका प्रमाण नहीं मिलता । हा, अशांक राज्यसे इनका सा जरूर • रहा होगा। देहरादून जिले में चकराताकी सड़कपर पहाड़ते नीचे उतरते ही कालसीका पुराना किंतु व व्यस्तप्राय नगर पड़ता है। इसीके नीचे बनुना तटपर अब भी वह शिला है, जिन पर अशोक अभिलेख खुदे हैं । शाक के और अभिलेखो को भांति यह शिलालेख भी ऐसे स्थान पर खुदवाया गया था, जहा अधिक जनसमागम होता था । कालसी ( खलतिका) उस समय मध्यदेशके साथ हिमालयके व्यापारका एक प्रधान केन्द्र था, इसमें सदेह नहीं। यहां हिनको समूरीखाल (कादली मृग), पशन तथा कोमल ऊन के दुस्स, कस्तुरी तथा दूसरी बहुमूल्य वस्तुये श्राकर किती थी । पालीवाङ्मय मे उल्लिखित (अजपथ-बकरीका रास्ता यही से चार महाता था। भी जाड़ा की संख्यामे कनौरे अपनी भेड़-बकरियो को लेकर कालसो पहुँचते हैं, पाप' व्यापार की मंडिया रामपुर (बुशहर शिम्ला और कुल्लूभे खुल 'जानेसे अव कालसीका वह महत्त्व नहीं रहा, और वह प्राचीन नगरी सिसक- सिसक कर मर रही है । ' उपरोक्त कथनसे यह निश्चित है. कि ईसापूर्व तीसरी दोमे कनौर लोगोका के साम्राज्य के साथ संपर्क था। बौद्ध धर्मसे संपर्क स्थापित करने के लिये उनमे संस्कृतिका स्तर ऊँचा होना चाहिये था, जिसका पता उस समय नहीं मालूम होता है इनका प्रमाण कनौरको 1<noinclude></noinclude> p3uhl89t4kqhxr5f44u9fdufqqci19o पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८१ 250 195496 666239 2026-07-07T16:20:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666239 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशपर एक ऐतिहासिक दृष्टि ३५९ प्रत्येक पुरानो वस्ती में पाई जानेवाली वह मृतक समाधियाँ हैं, जिन्हें यहावे लाग भ्रमले “बले राम्खङ' (सुतल्मान क) कहते है, इसीलिये क्योकि आधुनिक कनारे सिवाय श्रापत्काल के अपने मुदांक जलाते है, मकान के लिये नीच देते, खेत बनाते या सड़क निकालते समय जब. कोई पत्थर के टुकड़ोंने चिनी, पटियासे ढकी मृतक समाधि निकल की कन कह उठते है। उन्हें यह नही नामें वर्तनोमें भोजन और मदिरा नहीं रखी जाती, सल्मानोका कभी निवास रहा। वह यह भी नही आती है, उसे मालूम कि नानी और नहीं इन प्रदेश समझ किने, कि कभी उन्ही पूर्व अपने मृतकोको जलाने नही गाव नाय कामे थाकर भूखी न रह जाये, इनके लिये नसानी रखते थे । प्राचीन मिसबाकी मा कम वा जहान के स्मरण & किनकी इन मृतक समाधिरोकी और विद्वानाना, लदाख की मृतक नमाधियों का उल्लेख हुआ है, और यह भी जाना गया है, कि पहिले लदाख मे तिब्बती भाषा नापी जानि नहीं रहती थी। जून १९४८ में ऊपरी कनौर केलिप्या (लिलिट) भाव में ठहरा था। जहा जोतिमी लानाने वात करता किसी सुवा (सई) की नीर डालत नमः हड्डी निकलने की कान बड़ाकर पृ, तो सीधा मादा उत्तर नम्बर' बहुपाती है। स(स)- बात कही। मिलान कर्म या दाहा कला, ३ ला की नाय जतन भी मिलना अनिवार्य है।" यह नाग लगा। कुवालोका देते है. अलइय सेना पर एक द पुजा उना | उसे बुलाकर कुदाल ले एक बारबार सदस्टाया, में कुदाल चलानेही चेतन भी कम निक्लनेका<noinclude></noinclude> k91z9idcku8cbhl1a89ifbash0qrkzr पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८२ 250 195497 666240 2026-07-07T16:20:58Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666240 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५० . किन्नर देशम तट तक फैले भोटसाम्राज्यकी स्थापना की। इसी समय चीनी तुक स्तानको भाति किन्नर देशमें भी भोट सैनिक और शासक वात संख्यामे ग्राकर रहने लगे, कितने ही भोट पाल भी उत्तरी चरागाहोंमें पशुचारण करने लगे । भोट साम्राज्य स्थापना इचन् गेम्बो ही तिब्बतमे बौद्धधर्मका स्थापक तथा विता साहित्यका नी आरंभक था । उससे पहिले आधुनिक किन्नर देशम बोद्ध-धम पहुँच चुका था, यह संदिग्ध मालूम होता है । ग्रशांत के समय बौद्ध धर्म प्रचारक दूर-दूर तक पहुँचे थे, तो भी वह यहां जैसे पिछड़े लोगो मे पहुँ इसका प्रमाण नहीं मिलता । हा, अशांक राज्यमे इनका जरूर रहा होगा। देहरादून जिले में चकराताकी asaपर पहाड़ते नीचे उतरते ही कालसीका पुराना किंतु यत्र व्यस्तप्राय नगर पड़ता है ! इसीके नीचे यमुना तटपर श्रव भी वह शिला है, जिन पर अशोक के अभिलेख खुदे हैं । शोकके और अभिलेखीको भांति यह शिलालेख भी ऐसे स्थान पर खुदवाया गया था, जहा अधिक जनसमागम होता था । कालसी ( खलतिका) उस समय मध्यदेशके साथ हिमालयके व्यापारका एक प्रधान केन्द्र था, इसमें सदेह नहीं । यहाँ हिनवन्तकी समूरीखाल (कादली मृग), पशन तथा कोमल ऊनके दुस्त, कस्तूरी नया दूसरी वहुमूल्य वस्तुये आकर किती थी । पालीवाङ्मयमे उल्लिखित (जपथ-वकरीका रास्ता ) यही से चार महाता था । श्रारभी जा पी संख्यामे कनौरे अपनी भेड़-बकरियो को लेकर कालसो पहुँचते हैं; यद्यपि व्यापारकी मंडिया रामपुर (बुशहर शिम्ला और कुल्लू में खुल जाने से अव कालसीका वह महत्त्व नहीं रहा, और वह प्राचीन नगरी एक- सिसक कर मर रही है । उपरोक्त कथनसे यह निश्चित है कि ईसापूर्व तीसरी मदो कनौर लोगोका के साम्राज्य के साथ संपर्क था । बौद्ध धर्मसे संपर्क स्थापित करने केलिये उनसे संस्कृतिका स्तर ऊँचा होना चाहिये था, जिसका पता उस समय नहीं मालूम होता । इसका प्रमाण कनौरको<noinclude></noinclude> 1160rcniw4xfv5bok7yqrewa38hd4ja पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८३ 250 195498 666241 2026-07-07T16:21:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666241 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशपर एक ऐतिहासिक दृष्टि ३५१ प्रत्येक पुरानी बस्ती में पाई जानेवाली वह मृतक समाधियाँ है, जिन्हे यहां के लोग भ्रमते " खच्छे-रोम्खड" (मुसल्मान कब्र ) कहते हैं, इसीलिये क्योकि आधुनिक कनौरे सिवाय आपत्काल के अपने मुद्दोंका जलाते हैं, ', मकान के लिये नीव खं दते, खेत बनाते या सड़क निकालते समय जब. कोई पत्थर के टुकड़ो से चिनी, पटियासे ढकी मृतक समाधि निकल चाती है, तो उसे वह मुसलमानकी कन कह उठते हैं। उन्हे यह नही • मालूम कि मुमहमानी कोमें वर्तनोमे भोजन और मदिरा नही रखी जाती, और नही इस प्रदेशमे मुसल्मानोका कभी निवास रहा। वह यह भी नही समझ नकते, कि कभी उन्हींके पूर्वज अपने मृतकोको जलात नहीं गाड़ते थे, और मृतात्माये कनमें ग्राकर भूखी न रह जाये, इतकेलिये प्राचीन मिलियोकी माति कामे खाद्य और पेय सामग्री रखते थे । जहां तक मुझे स्मरण हैं, किन्नरकी इन मृतक -समाधियो की ओर विद्वानोका व्यान आकृष्ट नहीं हुआ, यद्यपि लदाखकी मृतक समाधियों का उल्लेख हुआ है, और यह भी माना गया है, कि पहिले लदाख मे तिब्बती भाषा-भाषी जाति नहीं रहती थी। जून १६४८ मे ऊपरी कनौर केलिया (लितिट) गाव मे मैं ठहरा था। वहांके जोतिसी लामाने बात करता किसी गुवा (मठ) की नीव डालते समय हड्डी निकलने की बात कही। फिर कान खड़ाकर व मेने पूछा, तो सीधा सादा उत्तर मिला रधर "खछे - रोम्खद्" बहुधा निकल आती है । खछे (मुसलमान)-- क यहा नही हो सकता, सोचकर मैने पूछा - 'हड्डी के साथ बर्तन भी रहते ह ।' उत्तर मिला - " वतन मिलना अनिवार्य है ।" यह भी पता लगा कि वर्तन बहुधा मिट्टी के होते हैं, जिन्हें लोग फेंक देते हैं, या लड़के खेलकर फोड़ डालते है। चोर पूछताछ करने पर एक श्रादमीके खेत मे कुछ साल पहले का भकलने का पता लगा । उसे बुलाकर कुदाल ले हम नाग उसके दांये खेत को चार चल पड़े. यद्यपि वह वारवार कह रहा था, कि कम का हमने खोदकर फेंक दिया। उसके खेतमें कुदाल चलानेकी नौबत नहीं आई, उसक पड़ोसी पजीरामके खेतभ भी कन निकलने का<noinclude></noinclude> bev80q7qs187diojrec3tr6y073sj3g पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८४ 250 195499 666242 2026-07-07T16:21:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666242 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ર किन्नर - देशमें पता लगा । आठ साल पहिले किसी पुजारीकी - सावधानीसे यावा गाव जल गया—यहांके मकानीका अविक भाग लकड़ीका होता है । पंजीरामने अपना घर गांव के वीचमे अवस्थित अपने खेतमे बनाना प्रारंभ किया। नीव खीदते समय कुदाल पत्थर के पटिये टकराई। पटिया हटाने पर पातालपुरीकी और जानेका द्वार मिला, जिसके नीचे उतरने का पत्थर की खुड्डिया थी । पजीरामने हाथ-दो हाथ खोदकर छोड़ दिया। लोगोंने छिपे खजाने की बात बतलाकर उत्साहित किया । गावके जेलदार बसीलाल भी पहुँच गये, चार कुदालें चली । चार-पाच हाथ नीचे जानेपर जगह कुछ चौड़ी थी, जिसमें मुदकी हडिया और चीजे मिली । पजीरामने चीजों के मिलनेसे मुझमे इन्कार किया, किन्तु जेलदार के कथनानुसार उसमें बर्तन आदि निकले थ । हाँ, खजाना नहीं मिला । पंजीराम व उस स्थानपर अपना घर खड़ाकर चुके थ। मैं कुदाल लिये उसे भीतर से देखनेका आग्रह कर रहा था। पंजीरामने कहा- अभी एक मास पहिले इसी खेत मे यहा ऊारी दीवार ( मेड़ ) के पात एक "खछे रोम्खड" निकली थी । पजीरामकी जानमें जान आई, जब मैने कहा- चलो, इसकी खोदा । का खेत के ऊपरी सिरेपर दीवार (मेंड़ की जड़मे थी, जिसके ऊपर से पानी की गाली बहती थी, और वरसोसे पानी उसके भीतर पहुँच चुका था। खुदवानेपर तीनहाथ लम्बी डेढ़हाथ चौड़ी हाथभर ऊँची पाणखंडो चिनी कब्र मिली । वजीराम की पहिली कुदालने ढाकने की एक पटियाको ही यहाँ रहने दिया था, उसे हटवाया गया । हड्डियों अस्तव्यस्त की हुई थी, और पानी लगनेसे खुसखुकर टूट रही थी । खोपड़ी धी (लम्बाई मे ) थी, जिसको लम्बाईका श्राधा घेरा १८ इच और चौड़ाईका अाधा घेरा छ इच था । देखने से स्पष्ट मालूम होता था, आदमी दीर्घकपाल था। हाथपैरकी हड्डियां बतला रही थीं, कि आदमी लवे कदका था और उसे कनमें पैरोको होगा । खोपड़ी मे ऊपरी दातोकी बाधी पक्ति मोड़करही रखा जा मका मौजूद थी, जिनमे तीन<noinclude></noinclude> m4zo3gu3z72bdywsqs6ra2m4cewfv0m पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८५ 250 195500 666243 2026-07-07T16:21:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666243 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर देश पर एक ऐतिहासिक दृष्टि ३५.३ दाढे (तीसरी खोखली), फिरदो दात, एक कुकुरदत फिर एक टूटे दाँतकी जगह और तब दो सामनेके दात - जड़मे कुछ श्रागेको वढे थे । आदमीकी श्रायु ३५-४० सालकी रही होगी । हड्डियाँ इतनी खुसखुसी थी, और इतनी टूटती थी, कि उन्हे दिल्ली पहुँचानेका प्रबन्ध नहीं किया जा सकता था । यद्यपि मेरी बड़ी इच्छा थी, कि एक सम्पूर्ण कंकाल हाथ लगे, किन्तु यहाँ को स्वेच्छासे खोद कर निकाली नही जा सकती । गाँवके वैद्यने ग्राचल फैलाकर हड्डियोंको माग लिया। उन्होंने उन्हें जला घोटकर दवा तैयारकी होगी, और उसे कितनेही बीमारोके पेटमें उतारा होगा। · इस कसे निम्न ऐतिहासिक जातीका पता लगा --- (१) लिप्पाके पुराने निवासी श्राजकल के अपने वशजो की भाँति गोलकपाल या मध्य. कपाल न हो दीर्घकाल थे – वैसेही जैसे लदाख के पुराने निवासी; (२) वह मुद्दों को जलाते नहीं गाड़ते थे, (३) कामे मुर्दोंका, शिर पश्चिमकी थोर होता था; (४) मुर्दे के साथ खाद्य और पेय रखते थे; (५) सभवत लोग लम्बे कदके थे । क्त्र खोदते समय पंजीरामको मालूम हुआ, कि मै कने निकली चीजका अच्छा दामभी दूँगा, इस लिये उन्होने घर से लाकर एक कांसेका कटोरा और एक मिट्टीका टीटीदार मन्यकुतुप दे दिया | उनका कहना था, कि दोनों चीजे इसी कवनें शिरके पास दाहिनी ओर रखी हुई थी। लेकिन उनकी बात संदिग्ध है। हो नहीं सकता, कि बड़ी कनके मुर्दे के पास कोई वर्तन न रहा हो । जेलदारने मी दूसरे दिन चीजोके निकलनेपर जोर दिया, और जब पजीरामको बुलावा. तो उन्हें यानेकी हिम्मत न हुई । ऐसा कटोरा और मिट्टीका भवकुतुप आजकल इस इलाके में नहीं, वनते। दोनों के कारी- गर अपनी कलाने दक्ष थे । कटोरा साढ़े सात इंच व्यासका पूर्ण अर्धगोल है, जिनकी पेदीकों घात बहुत जगह उड़ गई है । कुतुपमें गृटे जाने लायक मुँह और एक पतली सुन्दर टोंटी लगी है। समाधिके काल के बारेमें कुछ बातें कही जा सकती हैं - (१) उस २३<noinclude></noinclude> mw954o4a3hde567h8mxoo11lmnyq99m पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८६ 250 195501 666244 2026-07-07T16:21:42Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666244 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५४ किन्नर - देश में समय यहाँ दीर्घकपाल ग्रामियोंकी बस्ती थी, जिनका तिब्बती गोलकपाल लोगोसे सपर्क नही हुआ था; (२) अभी बौद्ध धर्मके कर्म के मिान्तका परिचय नही हुआ था, इसलिये मृतकके खाद्य और पेयका प्रवन्ध करना पड़ता था--र्थात् यह ममाधियाँ उस समयकी हैं, जबकि भोट (तिब्बत) लोगोंका पश्चिम में विस्तार नहीं हुआ था, वा राज्यविस्तार होनेपर भी अभी उसका व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा था । भोट- इतिहान्ते हमें मालूम है, कि ईमाकी सातवा सदीके मध्य में भोट राज्यका विस्तार इस प्रदेशमें हुआ था, व्यापक प्रभावकेलिये कम पेकम एक सदी और होनी चाहिये। इस प्रकार ऐसी को आठवी सदी पीछे नहीं हो सकती । कब्रों के वर्णन से हम विपयातरमें नहीं चले गये, यह कहने से यह भी मालूम हुआ कि कनौरकी भाषामें तिब्बती शब्द और लोगो में तिब्बती-रक्त भी सातवीं सदी के मध्यते सम्मिलित होने लगा। आयो- की भाषा संस्कृत और रक्तका भी प्रभाव उनके प्रथम सपर्क के समय ताम्रयुग अथवा ईसापूर्व द्वितीय सहसान्दीने आरम्भ हुआ, जो श्रागे बढ़ता ही गया और जतो किन्नरोंका ऐना बहुत थोडा ही भाग रह गया, जिसने अपनी श्रादिम भाषा ("शू" ) के कुछ को सुरक्षित रखा है । प्राचीन किन्नरोका भारतकी ग्रन्थ प्राचीन जातियों और विशेषकर प्रागार्य सिधुजाति से क्या सम्बन्ध था, इसपर कल्पना दौड़ाने का इत छोटेसे लेखमें अवसर नही है । X X किन्नर जाति और देश के इतिहासको हम निम्नभागांमे वॉट सकते हैं - (१) प्रागार्थ ( या प्राग् खश आदिम किन्नर ) काल (२) श्रार्य या प्राग्भोटकाल (३) भोटकाल ताम्र युग ईसवी सातवी सदीतक ईसवी तेरहवी सदीतक<noinclude></noinclude> glosms5qbzzu23bl7i6u1pcrh7l20qo पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८७ 250 195502 666245 2026-07-07T16:21:53Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666245 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशार एक ऐतिहासिक दृष्टि (४) ठाकरशाही ( ५ कामरू (रामपुर) - राजवंश ३१८ पंद्रहवी सदी के अंततक फरी १६४५ ई० तक प्रथमकालकी भौतिक सामग्री अभी हमें प्राप्त नही है, उसके बारे में भाषा के आधारपर ही हम कुछ कल्पना कर सकते हैं, जैसा कि हमने ऊपर किया भी और सजातीय भाषाओके तुलनात्मक अध्ययन से कुछ और कह सकते हैं । प्राग् भोटकालकी सामग्री से हमें अधिक वातोका पता लग सकता है, यदि इन " खछे - रोम्खडों" की सावधानीसे खोदाई और जाच पड़ताल की जाये। इनका पता मुझे लिप्पासे नीचे (जंगी, राना) में नही बल्कि ऊपर कनम्, स्पू होते भोटसीमापर अवस्थित भारत के प्रतिम गाव नम्रग्या तक मिला है। स्पूसे एक मिट्टी- का बर्तन भी हस्तगत हुआ । कनभूमें कुछ साल पहिले तिब्बत-हिन्दु- स्तान सड़कको नई जगहने निकालते समय कई का निकली, जिनके मिट्टीरे वर्तन और हड्डियों को “खछे-रोम्खङ ” समझकर फेक दिया गया । श्राश्वर्य यह है कि इस सड़ककी देखरेख भारतीय इन्जीनियर और वर्सियर कर रहे थे, जो अनपढ़ नहीं थे । किन्तु, पठित होनेका अर्थ संस्कृत होना अनिवार्य नहीं है । स्वतन्त्र हिमाचल-प्रदेश और उसके योग्य संस्कृति-कला- मर्नश चीफ कमिश्नर श्री एन० सी० मेहता का देखना होगा, कि अवसे ऐसी बहुमूल्य ऐतिहासिक सामग्री नष्ट न होने पाये । मृतकसमाधियों की उपलब्ध सामग्री (कासेका कटोरा और मिट्टीका मद्यकुतुप ) से पता लगता है, कि प्राकू, भोटकालने किन्नर लोगोकी सास्कृतिक तल ग्राजसे निम्न नहीं था, यद्यपि अभी उनके धार्मिक विश्वास अधिक प्रारंभिक थे। भोटकाल (वी - १३वी सदी) - भोट साम्राज्य स्थापक सोंड - चन्- गेम्बो (६६० ६५ ई०) का वंश ६०८ ई० तक शक्तिशाली रहा । श्रतिम सम्राट् प्रोट् स डन (काश्यप ६०८-३५ ) के समय वह छिन्न-भिन्न होने लगा, और अवने अवस्था यहाँतक पहुँच गई, कि श्रीट् तु छू सके<noinclude></noinclude> gt2pxu20dtdqt4jusna4vbjk4cplcze पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८८ 250 195503 666246 2026-07-07T16:22:03Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666246 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५६ किन्नर - देश मे नीचे तक गढवाल हे किन्तु उनके पुत्रने वे चुग-गोनूको राड - पुत्र दपल्-खोर् व-चन् (१८३ ई०) को राजधानी व्हाना छोड़ पश्चिमकी चोर भागना पड़ा। उसने पश्चिमी तिब्बत (माननरोवर प्रान्त या डरी- कोर सुम् को अपने विकार मे किया । वालिस्तान, लदाख, लाहुलही नही वर्तमान कौर और उत्तरकाशी देहरी) से कितने ही माग परभी उसका अधिकार था। राज्यको अपने तीन पुत्रो में बॉट दिया, जिसमें शुङ. गूगे) मिला। इसीके राज्यमे कनौर, ऊपरी देहरी और ऊपरी वदरीनाथभी था । इसके पौत्रनागराजने उत्तरकाशी (वारहाटने) एक चौद्ध विहार बनाया था, जिसकी सुन्दर और अपेक्षाकृत विशाल बुद्ध-प्रतिमा आज भी वहाँ दत्तात्रय के नामसे पूजी जाती है। प्रतिमा नीचे भोट- भाषा के लेखमें दानपति नागराजका स्पष्ट उल्लेख है । दपल-खोर-व- चन् (६८३) की तेरहवी पीढ़ी अर्थात् तेरहवी सदी के मध्यम व्रत-प-दे गूगेका राजा था, उसके उत्तराधिकारी जिन्दरमल, जितनल, कलनमल, परत मल ( १३२० ई० १ ) के नाम बतलाते हैं, कि उनपर भारतीय प्रभाव बहुत पड़ चुका था और इसमें कनौरवालोका विशेष हाथ रहा होगा, इसमें सदेह नहीं क्योंकि गूगेको जनतामे सबसे अधिक संख्या उनकी थी, और सास्कृतिक तलभी उनका श्रावकी भाति उनसे ऊँचा था । - - - दसवी सदी के वाद भोट- जातिका नेतृत्व - विशेषकर सांस्कृतिक और धार्मिक क्षेत्र में गूगेने किया । गूगेके राजा खोर्-ल्दे ( भिक्षुनाम ये- श्री ) ने सतलजतट पर थोलिका महाविहार बनाया, जिसे गढवाली लोग श्रादिबदरी कहते हैं। इसमे श्राश्चर्य करना नहीं होगा, यदि खोजते पता लगे, कि हमारे बदरीनाथ मूलतः एक बौद्धतीर्थ और देवालय था । खोर-ल्देने बौद्ध प्रचारक बनाने केलिये २१ भोट तरुणोको कश्मीर संस्कृत पढने के लिये भेजा, किन्तु उनमे दोही जीवित लौट सके, जिनमे एक था, महाभाषान्तरकार रिन्छेन जड पो ( रखभद्र ६५८ - २०५५ ई० ) इसभा षान्तरकारने ऐसे सैकड़ों संस्कृत ग्रंथोका भोटभाषा अनुवाद<noinclude></noinclude> klayqgg0b9wgnrxxowa9yilhit3qrae पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३८९ 250 195504 666247 2026-07-07T16:22:14Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666247 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशपर एक ऐतिहासिक दृष्टि ३५७ करके सुरक्षित कर दिया, जिनमें अधिकारा संस्कृतमे सर्वदाकेलिये लुन हो चुके हैं। रिन्छेन डोके बनवाये कई मन्दिर कौर, सिती और लदाख में है । कनौर में कनम्, रिवा और स्पूमे श्रव भी उनके बनाये मन्दिरोंका परिचय कराया जाता है, यद्यपि स्पूकी बुद्ध प्रतिमाको छोड़कर किसीका उत समयका होना संभव नहीं है। थोलिङ संस्थापक येशेोके प्रयत्रका हो फल था, जो उसके मरनेके बाद १०४२ ई० में, भारतीय पंडित दीपकर श्रीजान थोलिड पहुॅचे। यद्यपि वह कनोर ( खुनू) में नहीं गये, किन्तु इसमे सदेह नहीं कि ग्यारहवी सदीकी धार्मिक और साहित्यिक हलचलका कनौर पर पूरा प्रभाव पड़ा । करके वर्णनसे ज्ञात होगा, कि भोटप्रभावान्नित कनौरका इतिहास सम्राजीप और गूगे दो भागोमें विभक्त है। सातवीसे दसवी सदीतक भोटसाम्राज्य मे रहने से कनौर पर ल्हासाका प्रभुत्व रहा। यद्यपि उस समय भोटभापा, भोटरक्त के साथ वौद्धधर्मले परिचित होनेका उसे मौका मिला, किन्तु था यह विदेशी शासन और शोपणका समय । चीनी तुस्तान की मरुभूमिमें प्रात मोटिया हस्तलेखोंके उदाहरणसे हम जान सकते हैं, कि इन तीन सदियं में कनौरमे भी भोटराजकी जगह-जगह सैनिक छावनियाँ रही होगी, मुख्य-मुख्य स्थानोंपर उनके शासक रहते होगे। सारे कनौरके शासकका निवास स्थान चिनीही रहा होगा, भोटिया लोग इसीलिये तो इसे राजधानी चिनी ( ग्वल स चिने ) कहते हैं । वैसे वस्पा उपत्यकाका साइला गाँव भी इसका दावा कर सकता है, किन्तु वह विस्तृत मतलज उपत्यकाका शासन केन्द्र नही हो सकता था। कनौर और भोटका इतना रक्त और भाषा सम्मिश्रण इन्ही तीन मदियोमे हुआ। बल्कि भाषा सम्मिश्रण कहना ही पर्याप्त नहीं होगा, इन तीन सदियोंने तो मानसरोवर, लदाख, वान्तिस्तान और स्थितीकी पुरानी भाषा ही लुन हो गई, और उसको स्थान भोट भावाने लिया । यही बात मध्यरनियामे हम तुर्कों को करते देखते हैं। इनके दूरके सम्बन्धी नोटियांकी भाँति हुवराज तुर्क भी छूटी सदीने मध्यएमिया<noinclude></noinclude> c0qnf70hhlnsdhp6gdose4fuj4tm4vq पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९० 250 195505 666248 2026-07-07T16:22:24Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666248 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५८ किन्नर देशमें पर अधिकार करते हैं, और चार पांच सदियोके वाद अपनी भाषा और अपनी जातिका वहीं पूरा प्रभुत्व छोड़ते हैं । - इस काल मे कनौरे लाग पहिले और ग्राजकी भाति कृषि और वाणिज्य पर गुजारा करते थे । यहाँके आर्थिक ढाँचे कोई परिवर्तन नही हुआ । १६२१ में निस्टर एच् एम् ग्लोबरने "सतलज उपत्यका जंगल सर्वे" के विवरण मे लिखा है – “कनौरकी आबादी बहुत कम है, 'और निवासियो के लिये खेती पर्याप्त है । ऊपरी कनौर में सिचाईकी नहगे के बिना खेती सभव नहीं है। ... हाल मे, १९१२-१६१३ ई० मे सिचाई की बड़ी योजना दोपपूर्ण इजिनियरीके कारण असफल रही। कनौर में धूपवाले पर्वतगात्रपर, जहॉपर वृक्ष और वन दुर्बल अवस्था में हैं, खेतो की सीढ़ियाँ मिलती हैं। जान पड़ता है, कुछ शताब्दियों पहिले किसी सफल तिव्वती आक्रमणमें- जिसका वर्णन तिब्बती इतिहास में और स्मरण स्थानीय परंपरामे मिलता है— सिचाईकी प्रधान नहरे नष्ट कर दी गई, जो फिर कभी नहीं बनाई जा सकी ।" सफल तिब्बती आक्रमण सातवी सदीका ही था, किन्तु वह क्षणिक लूट के लिये नहीं बल्कि स्थायी प्रभुत्व जमाने के लिये था । हो नहीं सकता, कि जो शासन मध्य एसियाकी मरुभूमिके नगरोके जीवनको नहरो द्वारा कायम रख सका, वह कनौरकी नहरोको व्वस्त करता । देशकी समृद्धि परही तो उसका अपना लाभ भी निर्भर करता था ? सामाजिक, सास्कृतिक और धार्मिक जीवनमे इस समय जो परिवर्तन हुना, उसका प्रभाव आज भी कनौर में वर्तमान है । वह है, मुर्दा गाडने का जगह जलानेको प्रथा । तिब्बती रूपके बौद्ध धर्मके स्वीकार के साथ वहुपति विवाह ( सभी भाइयोकी एक पक्षी ) की प्रथाको हम तिब्बत की देन नहीं कह सकते । जीवनोपयोगी सामग्री की कृच्छता में खानेवाले मुखोकी संख्या सीमित रखने केलिये हिमालय ही नहीं लका के पर्वतों में भी लोगोंने बहुपतिताको स्वीकार किया था । अर्धघुमन्तू भोटिया सैनिक और शासकोने खुलकर किनारियो के साथ वैध और अवैध यौन-संबध<noinclude></noinclude> o9lqhxw55bp9yoxcvbebb0ozeczepi2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९१ 250 195506 666249 2026-07-07T16:22:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666249 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशपर एक ऐतिहासिक हि ३१६ स्थापित किये, जिसका परिणाम भाषा और रक्त सम्मिश्रण के रूपमे ', श्रव भी देखा जाता है । दसवी शताब्दी के प्रारम्भमे भोट साम्राज्य लड़खड़ाने लगा, उसके दूर दूरके भाग स्वतन्त्र हाने लगे। इस समय हिमालय के सीमान्तपर उसका पड़ोसी कन्नोजका गुर्जरप्र तेहार साम्राज्य था। यह हो नहीं सकता था, कि अपने पड़ोसीकी निर्बलतासे वह लाभ उठाये विना रहता । दसवीं सदी के मध्य में किसी समय किन्नर देशपर प्रतिहारोका नित्य हो गया। कहा नहीं जा सकता कि शासन सीधे कन्नौज द्वारा नियुक्त अधिकारी करता था या कोई किन्नर सामत। कोठीमें आज भी इन कालकी सरस्वती, हरगौरी आदि ब्राह्मण-देवताओ की मूर्तियाँ मोजूद हैं। कोठी देवीके कायथ ( लेखक ) नेगी ठाकुरसिंह वहॉकी पुरानी परम्परा सुना रहे थे, जिसके अनुसार नीचे से भागकर थाया कोई राजी कोठी में महल बनवाकर रहता रहा। एक दिन जब वह रानी - सहित बाहर टहलने या उद्यानमे चौपड़ खेलने में लगा था, तो देवीने उसके महलमें ग्राग लगा दी और राजाको किन्नर -देश छोड़कर भागना पड़ा । इस परम्पराकी व्याख्या यहीं हो सकती है, कि महमूद गजनवीके बनारस तक के याक्रमणले जर्जरत होकर जब प्रतिहार साम्राज्य ध्वस्त हुआ । तो स्वयं कन्नौजका राजा या उसका कोई राजकुमार भागकर किन्नर देशमें शरणार्थी हुआ । कन्नौज के बिगड़े राजवशिकका खर्च छोटासा किन्नर - देश कहाँ तक वहन करता । लोगोने विद्रोह किया और ग्यारहवी सदी के प्रथमपाद में भगोड़े राजाको किन्नरसे भागना पड़ा। इसी राजाने कोटीमें आज भी मौजूद पापाणकुण्डके साथ एक नुन्दर शिवमन्दिर बनवाया । हो सकता है मन्दिर काष्ठ का रहा हो और जल जानेसे उसका अवशेष नहीं मिलता। लेकिन मन्दिरमे स्थापित दो कुटकी चतुर्भुजी शिवमूर्ति आज भी कुएडपर मौजूद है। इस श्रमाधारण सुन्दर मूर्तिके साथ उतनीही वड़ी एक दूसरी मूर्ति भी थी, जिसके प्रनामण्डलका एक खंड मालाधारी किन्नर मिथुन 1<noinclude></noinclude> ev399zkahflmuvo682fudd6ovyn0vp9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९२ 250 195507 666250 2026-07-07T16:22:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666250 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६० किन्नर देशमें के साथ वहाँ रखा हुआ है | बहुत सम्भव है, वह मूर्ति गौरी की थी। कोटीकी इस अद्भुत शिवमूर्ति और दूसरी इक्कीस काण्डपागमयी ब्राहाणधर्मी मूर्तियांकी व्याख्या केवल इसी तरह की जा सकती है, कि प्रथम भोट साम्राज्य के पतनं ( दसवी सदी) और पश्चिमी तितके भोट- राजवशके शक्तिशाली होनेके वीच किन्नर - देशवर गुर्जर प्रतिहारों का अधिकार हो गया । पश्चिमी तिब्बत के राजवशका भी हाथ शर- णार्थी प्रतिहार राजा विरुद्ध हुआ होगा। एक प्रतिहार राजकुमार इसी समय भागकर सिहल गया था, और वहाँ कुछ समय उत्ते राज्य करने का मौका भी मिल गया था। कुल्लू के राजवशको पालवशकी शाखा बतलाया जाता है । परम्परा कहती है कि मुसलमानो के ग्राम- मासे परास्त हो ११वी सदीके तृतीय पादमे कोई राजकुमार मायापुरी ( हरिद्वार) और गढ़वाल के रास्ते कुल्लू पहुँचा । मैं समझता हूँ, इस भगोड़े राजकुमार या राजाका सम्बन्ध पालवशसे जोड़ना गलत है । ११वी सदी में पालवश पर कोई सकट नहीं श्राया था । जान पड़ता है। राजाके नामके साथ पालशब्द यानेने यह भ्रम हुआ । गुर्जर प्रतिहारो मे कई पाल नामबाले राजा हुये हैं। महीपाल तो दूसरा बिक्रम था । की ११वी सदी तृतीय पादनें कुल्लू जानेसे सन्देह होता है, कि कहीं वही कोठीसे भगाया राजा कुल्लू तो नही पहुँचा । अस्तु, किन्नर - इतिहास में गुर्जर प्रतिहार शासनका भी स्थान है। दसवी सदीके चतुर्थपादमे सोब्चन्वशके ही एक राजकुमारने पश्चिमी तिब्बती मे नये राज्यकी स्थापना की । श्रागे चलकर इस वशने किन्नर और बारहाट ( उत्तरकाशी ) तक भारतकी और अपना पैर वढाया । यह भाट प्रभुताका द्वितीय युग है। राज्य पीछे लदाख, गूगे और पुरग तीन भागांमे वट गया, यह हम पहिले कह चुके हैं। नोट प्रभुता के द्वितीय काल ( गूगे काल १०वीसे १३ वी सदी) मे कनौर दूरके शासकों की शापित जनता नही रह गया । यद्यपि नया वश ल्हासा के सम्राट्वंशकी ही शाखा थी, किन्तु अब वह कनौर की सीमा -<noinclude></noinclude> twgoym1lkltbri26444di8shd18etb7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९३ 250 195508 666251 2026-07-07T16:22:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666251 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>• किन्नर - देशार एक ऐतिहासिक दृष्टि ३६१ पर आकर बन गया था और उसकेलिये अपेक्षाकृत अधिक संस्कृत किन्नर-जातिकी सहायता श्रावश्यक थी। इस समय शासन मध्यभोटसे लाये शातको और सैनिकोके बलपर नही चल रहा था, बल्कि उसका प्रधान आधार था राजवशके सवधी (साले, वहनोई, दामाद) के रूपमें कनौरी भद्रवर्ग - जोवो या ठाकरस् ( ठाकुर ) । इस कालमें विशेष कर ग्यारहवी सदीमें संस्कृत ग्रंथोके भोट भाषामे अनुवाद तथा धार्मिक सुधारका केन्द्र भी गूगे रहा। आशा रखनी चाहिये, कि इस कालमे भी कनौरकी श्रार्थिक समृद्धिमें बाधा नहीं पड़ी होगी। पहाड़ोंमे जहाँ तहाँ दूर तक फैले परित्यक्त खेत उस समय श्रावाद रहे होंगे । कनौज के गुर्जर प्रतिहारोकी भाँति उनके उत्तराधिकारी गड़वारे भी अपने उत्तरी पड़ासियोंके दुर्गम स्थानों पर चढ़ाई करने की कोशिश नहीं करते रहे होगे, और उनके ब्यावारके लाभ, सौगातो तथा भेंटोंसे ही संताप कर लेते होगे, और "भोहता पिछ त चले" की नौबत कम आती होगी । वारहवी सदी के अतमें गूगेके शासन में पश्चिमी हिमाचल ( कमायूसे (कुल्लू) के उत्तरीभागमें वसनेवालीं वह सारी जातियाँ थी, जिनके चेहरे पर तिब्बती (मगोलीय ) मुख मुद्रा और भाषा पर पूर्ण या पूर्ण तिब्बती प्रभाव है। गूगेके अन्तिम राजानोके परतापमल जैसे नाम बतलाते हैं, कि कमसे कम राजवशमे भारतीयता का बोलवाला था, सभव है उनकी रानियों पहाड़ी राणा यांचे 'घरोसे आती हो । इसका परिणाम यदि बाराका प्रभुत्व बढने के रूपमें न हुआ हो, तो भी जात-पातका, लुत्रा दूत का प्रवेश तो जरूर हुआ होगा । कनौर में वाढ़ी (बढ़ई + तोदार + सोनार + कसेरा ) और कोली ( चमार + कोरी ) को अछूत समझा जाता है । इस कालमें उपरोक्त पेशे इन्हीं लोगोंके हाथ में थे, यह कहना मुश्किल है, क्योंकि यह लोग कनौरों ५ या १० सैकड़ेकी पन संख्या में रहते भी अपनी हिंदीवंशकी भाषा बोलते हैं, जो ग्राज- ·<noinclude></noinclude> dr0k7mb0w2mlw4qm0e643mp1ckabh77 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९४ 250 195509 666252 2026-07-07T16:23:07Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666252 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६२ किन्नर - देशमें कलकी राजस्थानी और आसपास की दूसरी भाषाओंके नज़दीक है। इसीलिये अपन शकाल (दवसे १३ वी सदी में ) इनका पहाड़ जाना मुश्किलसा मालूम होता है । 1 ठाकरशाही (१४ वी १५वीं सदी) - वारहवी सदी के व्रत के साथ उत्तरी भारतके वौद्ध-केन्द्रो नालदा, विक्रमशिला, उडतपुरीका अन होता है । तेम भारतीय बौद्ध सध-राज शक्यश्री- भद्र (११२७-१२२५ ) शरणार्थीके तौरपर १२०३ ई० मे मध्यभोटमें गये और वहाँ दस साल रहकर १२१३ ई० मे अपनी जन्मभूमि कश्मीर चले गये । कश्मीर जानेका रास्ता गूगे, कनौर, और कुल्लूसे ही रहा होगा, किन्तु इस यात्रा का कोई विवरण देखनेमें नहीं आया, जिससे कि कनौरकी अवस्थाका विशेष परिचय प्राप्त हो सके। गूगे राजवंशकी शक्ति अवश्य उत समय क्षीण होने लगी थी, और तेरहवी सदी के अंत तक पहुँचते पहुँचते राजवंशका प्रभुत्व थोलिंगके आस पास के कुछ गाँवो तक नीति ह गई। वृटिश शासन के उठ जानेपर अगस्त १३४८ में शिमला के पान ठियाग के एक गाँव के रानाने जब अपनेको स्वतंत्र घोषित करनेकी धृता की, तो गूगे राजवंशके निर्बल होनेपर उसके शातक और सामन्त, जिनमें कितने ही राजाके सगे-संबंधी होने से काफी प्रभावशालः थे, क्यो न अपने को स्वतंत्र घोषित करते ? गूगे राजवशका उच्छेद नहीं निर्बल हना मैने कहा, वशका उच्छेद तो अव भी नहीं हुआ है, और थो लड़के पास आज भी एकदो गॉवका "राजा" बनकर वह मौजूद है । इस प्रकार चौदहवीं सदीके श्रारभ में गूगेके राज्यमें हर दो-दो दार-चार गाँव के स्वतंत्र राजा बन गये, जिन्हें कनोरी भाषा ठाकर कहते हैं ठाकर, ठाकुर और ठाकरस् एक ही शब्द है । यह मूलतः किन भाषाका शब्द है, यह कहना मुश्किल है । यद्यपि इसका प्रयोग काठियावाड़, बगालते लेकर सारे भारत में कहीं सामन्तों, कहीं राजपूतों कहीं ब्राह्मणो और कहीं हजामों के लिये होता है, पुरी जगन्नाथको भो ठाकुरजी कहा जाता है, किन्तु इससे इसका संबंध संस्कृत से नही जोड़ा<noinclude></noinclude> s94kinn5frd5vmd53fhj48g93r4nc42 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९५ 250 195510 666253 2026-07-07T16:23:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666253 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर देशपर एक ऐतिहासिक दृष्टि . ३६३ जा सकता। मुझे तो सदेह होता है, इसकी उत्पत्ति हिमालय के इसी कोनेमे हुई । मूलत यह तिब्बती शब्द ठक्कर (श्वेत रक्त ) से निकला मालूम होता है, जो राज-रक्तका पर्याय है। किन्तु इस व्याख्यामे एक दिक्कत है. ठक कर इस अर्थ मे तिब्बती साहित्य में कहीं देखनेको २५ नहीं मिलता । जो भी हो सोलहवीं सदी के आसपास कामरू (रामपर) राजवश द्वारा ध्वस्त होनेके पहिले सारा कनौर सात ठाकरस्में विभक्त था, जिसके अधिकृत क्षेत्रको "सात खुद" भी कहा जाता था । सातो खुदोंने अपने अपने ठाकर चोर ने अपने राजदेवता थे, जैसे- नाम स्थान देवता (१) दोशो खूद गौरा और नीचे वतारू (२) पद्रह-वीन खूद गान्मी (३) अठारह-बीस खूद सुरा लाली मेश (मेशुर) (४) बडो खूद भावा मे (५) पग्राम (राजग्राम) बूँद ठोल (चगांव) मेरा (६) लुब खूद चिनी (लुङ) चडिका (कोठी) (७) टुकूरा-खूँद कामल (मोने) बदरीनाथ आज भी कोठीकी चडिका तथा दूसरे कनौरी देवता लोगों को धमकाते हैं – हमने सातों खूदों और अठारह गढ़ों को नष्ट कर दिया । - तुम्हारी भी वही दशा करेंगे, यदि वात नहीं मानोगे । श्रठारह गढ़ रामपुरते नीचे शिमला के पहाड़ी अठारह राजाओं के गिने जाते थे । सात दोनें पहिलीको छोड़ बाकी कनोरी भाषा क्षेत्रमें पड़ती है, इनमें अन्तिम चार ही वर्तमान चिनी तहसील के अंतर्गत अथवा मुख्य वनौर के अग है । ठीक-ठीक सीमा निर्धारित करनेपर नीचे (सतलज उपत्यकामे) मनोटी धार (चौरासे ३ मील नीचे) और रूपी नाला (रूपीते ४ मील नीचे) से लेकर ऊपर भावा खड्ड (नदी) और बस्थानदी के उद्गमो एव श्यामो खड्ड तक कनौर-देश है । प्राजक्ल नापा और संस्कृतिका कोई विचार कर दो कनौर भाषा-भाषी खूदोंको<noinclude></noinclude> 1t24pc40lqah3l6fxxd9hyllu91bdej पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९६ 250 195511 666254 2026-07-07T16:23:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666254 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६४ किन्नर - देश में पहाड़ी भाषा-भाषी - हिन्दी रामपुरकी तहसील मे जोड़ रखा गया है, जिसमें केवल शसनके सुभीते को ही ध्यान में रखा गया है। सभव है, अपने यौवनकालमे गूगेका राज्य दोशी बूँद (रामपुर वाले इलाके तक) रहा हो, यह भी संभव है । कि ग्यारहवी सदीमें वहाँ कनोरी भाषा बोली जाती हो। गूगे-राज्य के छिन्न-भिन्न होनेपर सातों खुदोमें सात ठाकरस् कायम हो गये, जिनमे राजधानी (ग्लस ) चिनी का खूँद (लुवङ) सबसे विस्तृत होनेसे पीछे कई और ठाकरसीने बट गया इसका प्रमाण हमें लिपा (लितिङ), लनङ, मोरङ (लगनन्) तङ • लिङ् और चोलिड में स्पष्ट मिलता है । इनके अतिरिक्त तुमने भी ठाकुर रहा होगा। ठाकरोके वशजोंका अब पता नहीं लगता, निर्फ स्पिलो ( लङके नीचे) में एक ठाकुरवांश बतलाया जाता है। I यह ठाकरशाही कनौरके हासका काल है । देश सात बूंदों ही नही और भी कितनी ठकरैतियों में विभक्त हो गया। हर ठाकुर दूमरे ठाकुर पर आक्रमण और लूटकरना अपना हक समझता था, ऊपरते समयसमय पर उत्तरी और पूर्वी पड़ोसी भोट-भाषा-भाषी भी लुटमार करनेते बाज नही आते थे । श्रभी वारूदके हथियारोंका समय नहीं था। ठाकरोने बड़े गावोंमे छोटे-छोटे गढ़ बना रखे थे, जिनमें से कुछ ग्राजभी लुङ, मोरङ और कामरूके गढ़ोंके रूपमें वर्तमान है । यह गढ ३०, ४० हाथ लंबे, कुछ कम चौड़े, छः सात मजले काष्ट और पाषाण खडोरे ऊँचे मकान होते थे, जो ऐसी जगह बनाये जाते थे, जहाँ आक्रमणकारियो के लिये चढ़ना आसान न हो। शत्रुका श्राक्रमण होनेपर लोग इन गढ़ोने पनाह लेते और वही से शत्रुनोंपर तीरों और पत्थरोंकी वर्षा करते थे । अपने प्राणोंकी रक्षा वह इसप्रकार भलेही कर सकते हों, किन्तु असफल व्रतएव क्रुद्ध शत्रु से वह अपनी नहरों और खेतोंकी रक्षा नहीं कर सकते थे । ठाकरशाहीका दूसरा अर्थ था घोर अशांति, धन-प्राण की रक्षा, जिसका ही फल है, श्राजके जगह जगह परित्यक्त खेत, ग्रामों और विहारोके व्वस । तिव्वतमें भी चौदहवी, पदवी और सोलहो सदिया '<noinclude></noinclude> 0udicyzrwk4vw24b043krxbpc2mka38 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९७ 250 195512 666255 2026-07-07T16:23:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666255 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देशपर एक ऐतिहासिक दृष्टि ठाकरशाहीकी थी, जिसका त मंगोल सेना द्वारा ३६५ भोट विजय १६४२ ई० में और उसे पाचवे दलाईलामा के हाथमें समर्पणके साथ हुआ । कनौर में इसका अंत एक सदी या कुछ अधिक पहिले हुआ । कामरू (रामपुर) राजकाल (१६४८ ई० तक) - वस्पा - उपत्यका में या टुकूपा खुदको हम स्मरण कर चुके हैं । वस्पा सतलजको शाखा नदी है, और ग्राउ- साड़े आठ हजार फीट ऊपर अवस्थित इसकी उपत्यका बहुत ही चौरस, वितृत और सारे कनौर में अत्यधिक उर्वर मानी जाती है । यही कामरू और साब्ला के एक दूसरे के प्रतिसमीप दो महाग्राम हैं । कामरूको कनोरी और तिब्बती भाषा में सोने भी कहा जाता है। सारे वस्पानिवासी कनोरीमाला बोलते हैं । यह उपत्यका कृमिकेलिये हो प्रति उपयोगी नहीं है, बल्कि वस्पा उद्गमवाले डडे को परकर आसानी से तिब्वत पहुँचा जा सकता है, जो पशम और ऊनके व्यापारकेलिये वहुत सुभीतेकी चीन है । बस्पा उपत्यका के दक्षिण मे रोहडू (तहसील ) में पहाड़ी हिंदी भापियोंकी घनी आबादी है, जहांसे होते अशोक समयकी भाति आज भी कनोर अजपाल कालसी पहुँचते हैं। इस प्रकार वस्पा निवासियोंको कृषि और तिब्बत से व्यापारका ही अधिक सुभीता नहीं था, बल्कि वह भारतीय मैदान से भी अधिक सबंध रखते थे । ऐसी अवस्थामें यहाँ के ठाकरस्की शक्ति का वढना स्वाभाविक था। बस्पा या टुकूपा खुद ठाकर की राज- धानी कामस मोने) थी। उसने जहाँ, कृषि र व्यापारकी अनुकूलता से अपनी शक्तिको दृढ़ किया, वहाँ भारतमें नवागत वारूद के हथियारों से भी लाभ उठाया। शायद उसकी उपत्यकामें कहीं सीसेकी ख़ान मौजूद थी। इस शक्तिके साथ वह श्रातपासके ठाकरसों पर चढ़ दौड़ा। यह सोलवीं सदीका मव्य रहा होगा। एक एक करके कनौर के तारे ठाकर ध्वस्त हुये । विजेताने शत्रुवंशको जीवित रखना पसंद नहीं किया । उस समयकी चिनीसे नीचे सतलज पार तङ् लिड में कर था, जो पहिले कामरूका निशान बना, फिर मोरङ् और श्रागे<noinclude></noinclude> 9lbgy5ftyog45j2yim6zkgb8whvkogx पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९८ 250 195513 666256 2026-07-07T16:23:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666256 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६६ किन्नर - देश में तक का सतलजका ऊपरी वाया तट ले उसने नीचे की ओर मुद्द किया होगा । कामरूके एक या अनेक विजेतायोंने किन तरह अपनी विजय यात्रा पूरी की, और तने ३८०० वर्ग मीलका राज्य स्थापित किया, इसका वर्णन हमारे पान तक नहीं पहुँचा । हा, उनके द्वारा वस्त ठाकरसोंके गढ़ और कुल जन तियाँ अवश्य हमारे पास तक पहुँची हैं। चिनीसे नीचे की ओर जानेपर उरिनीके नीचे चोलडके खडहर श्रवभी स्तलजके दाहिने तट पर मौजूद है। इसका बस कामरू ठाकरने किया । इसी तरह चिनी ठाकरसका भी सहार हुआ । ठाकर जितना आपस में लड़ने भिड़नेने बहादुर थे, उतना ही मिल कर शत्रु से मुकाविला न करनेसे निर्वल भी थे । कहते हैं, कामलके इशारेपर प्रजाने स्वयं चिनीके ठाकरके महल में आग लगा दो । आग लगाकर चिनी गढ़ जलाया गया, यह ता सच्ची बात है । १६१०-११ ई० मे जब गढ के एक भागको स्कूल बनाने कलिये वरावर किया जा रहा था, तो वहाँ कोयला, जले पत्थर निकले थे। किन्तु यह विश्वात करना मुश्किल है, कि कामरूके ठाकरका विना लड़ेही चिनीपर अधिकार मिल गया होगा। फिर अन्तिम ठाकरके हाथमें चिनी अतिरिक्त दो मील पूर्व कश्मीरका भी छोटा गढ़ था, वह वहा भी लड़ा होगा | चिनी ठाकरसका नामलेवा न रह गया । उत समय के निवासियोंके सिर्फ दो खान्दान ( खटियान और रुवों के बच रहने जान पड़ता है, लड़ाई बहुत कर हुई। गढ़की जगह के अतिरिक्त आज कोई पुरानी वीज चिनीमे दिखाई नहीं पड़ती । (राग)- बाई (पाषाण- वापी) का जलस्रोत पुराना है। श्यानङ् ( श्मशान ) मे शायद उस समय भी मुर्दे जलाये जाते थे। इसी के पास परित्यक्त खेतोंकी दीवारें बतलाती हैं, कि किसी समय कृषि और अधिक होतो थी । वस्पा- उपत्य- काको छोड़ चिनीके वरावर कृषि उपयोगी ढालुओं भूमि सारे कनौर मे कहीं नहीं है, और याज भी बहुतसे ध्वरत खेत हिमाचल सरकारी<noinclude></noinclude> 2woul4ktm1nv39nioak07mlc2tvhgb2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/३९९ 250 195514 666257 2026-07-07T16:24:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666257 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देश पर एक ऐतिहासिक दृष्टि ३६७ विशाल नहर योजनाकी प्रतीक्षा कर रहे हैं । चिनी भविष्यमें एक औद्योगिक नगर बनै । श्वान के दो फर्लाङ ऊपर किसी समय तलरवेरङ्नागस्का चश्मा था, जिससे बहुनसा पानी निकलता था । नागस् (नाग) किसी कारण नाराज हो । उड़कर सतलज पार चला गया, पानी दे रहा है। कश्नीरसे नेपालतक ऐसे और आज वार गावको कितने ही उड़े नागो तथा हिमाचल सरकार के हाथमें सूखे चश्मोकी कथायें प्रसिद्ध हैं, किन्तु यह है, कि कनौरमे नहर निकालकर कितने ही नागों को फिरसे लाकर बतादे | किन्नर की सारी ठकुराइयोंको ध्वस्त कर एक राज्य के रूपमे परिणत करनेवाला वह कामरूका ठाकुर कौन था ? कामरूकी परम्परा बतलाती है कि यहाँ के किसी शासकने फतेहपर्वत (पहाड़ी टाँस) से बहुत से सैनिक बुलाकर कामरू में बनाये और उनकी मददसे उसने चिनीके प्रचण्ड ठाकर एमरस्को ध्वस्त किया। पीछे कामल ठाकरके वशज बुशहर के राजा अपना किन्नर - जातीयताको छिपाने के लिये बहुत उत्तुक थे । इसीलिये उनकी चारसे इस बात की पूरी कोशिश की गई। कि उनके वशका सम्बन्ध किन्नरोंके साथ न जोड़ा जाय। बुशहर राजाकी वशावली बहुत लम्बी चौड़ी है जो कृष्णके पुत्र प्रद्युम्नसे प्रारम्भ होकर राजा पदमसिंह (१६१४-४७) तक १२१ पीढ़ियांमें समाप्त होती है । यह बशावली कितनी झूठा है जिसे हन अन्यत्र वतला चुके हैं। प्रद्युम्नके पुत्रका नाम छुबल एक हस्तलेखमें बतलाया गया है । दूसरे हस्तलेखमें राजाथोकी संख्या और भी अधिक है । उसमें प्रदुमन सिहके पुत्र श्रनिरुपसिह पुत्रका नाम जमला तेह बतलाया गया है। लुबल एक एतिहासिक पुरुष मालूम होता है, जिसीका ही विगड़ा रूप जमल है । डबल वस्तुत भोटिया शब्द छोबलका विकृत रूप है। शरानड ( सराहन) के राजा छोवल के राज्यकालकी सोनेके अक्षरोंमें लिखी श्रेष्ठ- साहसिका प्रज्ञापारमिता (भोटभाषा) छितकुलसे लाकर आज भी<noinclude></noinclude> rnrx5981ewzk7ibhqrrw25yblmxrgtu पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०० 250 195515 666258 2026-07-07T16:24:10Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666258 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1 २६८ किन्नर - देश मे कामरू में रखी हुई है। हो सकता है । यही कामलका सर्वकिन्नर- विजेता शासक हो, और इसीने अपनी राजधानी कामरुते सराहनमे वदली । राजधानी क्यों बदली १ इतने ठाकरोंका राज्य छीनकर कामलका ठाकर अधिकार रखता था, कि वह व ठाकरस् नाम छोड़कर राजा वन जाये । कामल राजाने कनौर - विजय के बाद उत्तरके आक्रमणकारियोका पीछा करते श्यासू खड्ड और सुनमकी जीतसे श्रागेके भोट भाषाभाषी इलाके हढंङको भी जीत लिया; वह कार्य सोलहवीं सदीमें ही उपादि हो गया और तब तक पश्चिम और दक्षिण में भी काफी राज्य विस्तार हो गया था | कामरू ठाकरको राजा कहलाने भरते ही सतोष नहीं हुआ, आाखिर उसका शासन कनौर भिन्न दूसरी जातियों पर भी था, जो सच्चे क्षत्रियको ही वड़ा माननेकेलिये तैयार थे। अत्र कानल राजाको सच्चा क्षत्रिय वननेकी धुन सवार हुई। इस कठिनाईका इल करना ब्राह्मणोके हाथमें था, लेकिन वह जानते थे, कि जब तक राज- धानी कनौर भाषा-भाषी वस्पा- उपत्यका कामल गावमें रहेगी, जब तक राजवश कनौरी भाषा बोलता रहेगा, तब तक उनका जोर नहीं लगेगा | राजधानी उठाकर पहाड़ी भाषाभाषी सराहनमे लाई गई । सराहनको वाणासुरकी राजधानी शोणितपुर बनाया गया, और कामरू ठाकरवशका वश-वृक्ष सूर्यवंश चंद्रवशसे जोड़ दिया गया। सराहनले हटते हुये राजधानी पीछे रामपुरमे श्राई, क्योंकि वहा वर्फ और ग्राधी- का डर न था । रामपुर राजवशने किन्नरी भाषा और रक्तते इन्कार कर दिया, उसने अपनी रोटी-बेटी राजपूत राजाओंसे ही रखी। श्रव कौन कह सकता है, कि रामपुर बुशहरके राजा साहेव चन्द्रवशावतस नहीं हैं। इतना होने पर भी राजाकी पुरानी राजधानी कामरू है, कामरूकी गद्दी पर बिना बैठे वह पचा राजा नहीं हो सकता। अंतिम राजा पदमसिंह- को १६१४में रामपुरमें और १६१५ में कामरूमें गद्दी पर बैठना पड़ा ।<noinclude></noinclude> 2zy7figrpuab1vir4cfpe46nxwi3wbd पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०१ 250 195516 666259 2026-07-07T16:24:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666259 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>• किन्नर देश पर एक ऐतिहासिक दृष्टि ३६६ रानपुर राजवशमें राजा केहरसिंह मी एक शक्तिशाली राजा था । इसीने सम्वत् १६११ (सन् १९५४ ) मे रामपुरको बसाया और दो साल बाद विजेताके तौर पर तिब्बत के साथ सन्धिकी। इस सन्धिपत्रका ब्यौरा इस प्रकार पाया जाता है - गूगेके राजा गजोद् थोके समय लदाख के राजाने ङरिकोरसुम् ( पश्चिमी तिब्बत) ले लिया । डरीमरयुलने नीचेका प्रदेश लदाख श्रौर बुशहरके मयुक्त अधिकार मे रहा। उसी समय भोट-सेनापति गलदन्- छेड्ने साचा, यदि मैं डरीपर सैनिक अभियान करूँ, तो ङीमरयुलको जीत सकता हू। इसीलिये गलदन् छेवड् डरीकी ओर गया । इसी समय बुशहर के राजा हरीसिहने पड़ोस के इक्कीस राजानों और अठारह ठाकुनेको तिब्बत र अभियान के लिये निमन्त्रित किया, लेकिन कोई नहीं श्राया । तब राजा केहरीसिहने मानसरोवर तीर्थ मे स्नान करने के बहाने अभियानका स्वयं प्रारम्भ किया। उत्तरी गूगेमें पूलिङ-था पर उनकी सेनापति गलदन छेत्र से मुलाकात हुई। फिर मित्रतापूर्ण सम्बन्ध सुवर्णयको प्रशस्त करने के लिये भोट- राजाकी ओर से गलदन् छेन और बुशहरके राजा केहरीसिहने महामुनि बुद्धकी शपथ ले निम्न प्रकारकी सन्धि की "हमारा पारस्परिक मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध तव तक उभयपक्ष द्वारा अलिक और परित्याज्य रहेगा, जब तक कि भूकेन्द्रवर्ती कैलाश, देवताका अनन्त निवास हिमविहीन नहीं होगा, मानसरोवरका जल नहीं सूखेगा, काला कोचा सफेद नहीं हो जायेगा और लोकमें प्रलय नही जायगी। दोनों राजाची प्रजाकी भलाई और राज्योंकी अनुरणना कायम रखनेकेलिये दूत भेजना तै हुना, और बुशहर प्रति तीसरे वर्ष हरीके चार प्रान्तो - चपरड्, स्पुरद् तावा और रूदोक् तथा राजधानी तक एक दूत भेजा करेगा। दोनों राजाओं की प्रजा भी हरतरह के शुल्क और करीने पूर्णतया मुक्त हो जहाँ चाहे वहाँ व्यापार ૐ૪<noinclude></noinclude> omoa2lyx2jla0952hy33xfwnl3tjv01 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०२ 250 195517 666260 2026-07-07T16:24:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666260 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३७० किन्नर - देशमे कर सकेंगी। दोनो राजाञ्चोके बीच बहुत अच्छा सम्बन्ध राखा जायगा ।" "फिर सेनापति गलदेन् छे और बुशहरके राजा बेहरसिंहकी संयुक्त सेनायें एक जगह एकत्रित हुई और उन्होंने लदाख-विजनने लिये प्रयाण किया । तिती सेनापति गलन् छेवट और बुशहर सेनाक छोदास्ने लदाख में सगेगांमोनू में छावनी डाली । मैदानी प्रदेश के हथियार- वन्द पठान और (डेरी) कोरनुमू के लोग लेह-लदाख में जमा हुये । गलदेन छेवङको इस बात मे सन्देह होने लगा, कि नै युद्ध जीत सकूंगा और डरीमरयुलसे यागे के प्रदेश पर अधिकार प्राप्त कर सकूँगा । तब उसने सफेद खता (रेशमी वस्त्रखड ) एक घोड़े के कन्वे और पूँछ वाधके प्रार्थनोकी कि यदि मुझे विजय मिलनेवाली है, तो घोड़ा शत्रु सेना के भीतर होता लौट आये; अन्यथा कहीं ग्राधे रास्ते से ही चला श्राये | सेनापति गलदेन छेव को बहुत चिन्ता हुई, जब 'देखा कि पोड़ा निश्चित रास्ते पर गये बिना लौट आया । बुशहर के मन्त्री तथा चोपोन् डवङ- दोन्हुप्ने सलाह करके मैदानी लोगोको पाँच तंड़ा सोने- चाँदीका घूस दिया। वह साथ छोड़कर अपने घर की ओर रवाना हुये । लदाखकी राजधानी तिब्बत और बुशहरके हाथ श्राई, सेनापति गलदेन छेवको बहुत प्रसन्नता हुई । लदाखकी राजधानी लूट लो गई और तिब्बत तथा बुशहरने सभी चीज़ोको ले लिया थाड़े समय बाद गलदेन्-छेवङ् मर गया। उसके सहायक पलजड्ने सेनापतिको व्यान पूजामें बैठा कहकर अधिकार अपने हाथमे ले लिया ।" 1 कामरू वशने ठाकरशाही समाप्त कर सारे कनौर और बाहर भी एक बड़ा राज्य स्थापित किया । राज्यमें शाति और व्यवस्था स्थापित होना लोगों के कम लाभका काम नहीं था। शासन-प्रणालो वही पुरानी थी, जिसमें गुणदोष दोनो रहते भी वह कम खर्चीलो थी । शासन और न्याय चलाने के लिये गाव-गाव एक “मुखिया", एक "चारस्" एक “हलनदी” और एक "टोकन्या" रहा करते । हलनदी और टोकन्या<noinclude></noinclude> 4s67tv7983149a8krer4om804vbcx9k पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०३ 250 195518 666261 2026-07-07T16:24:41Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666261 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - देश पर एक ऐतिहासिक दृष्टि ३७१ कोली (1) जातिके होते। इनके अतिरिक्त गाँवकी पंचायत मे २, ३ "मले मानुन' भी होते थे । कर जमा करना झगड़ोका फैसला करना इन्होका काम था। साल दो सालमे एकवार राजधानीसे दरोगा श्राता, जी वडे मुकदनोका फैला करता । वदियोंके रखनेकेलिये एक कू जेज कामे था, जिसमे बदीको उतारकर समय समयपर रोटी पानी रस्सी लटका दिया जाता। यह शासन, न्याय और दड व्यवस्था पहिले के शासन के समय से चली आई थी, इसमें सदेह नहीं । राज्य गोर्खानि ९८०३-१२ मे छीन लिया था, जबकि गोरखा राज्य कांगड़ा तक फेल गया था । गोखों को हरानेके बाद अग्रेजोने बुशहर राज्यका फिर राजा महेन्दर सिह हाथमें देदिया । तवसे राज्य अग्रेजो की छत्राशंसे रहा। उन्नाव नदीके प्रारम्भमै तिव्वत एक अज्ञात रहस्य- पूर्ण देश था । वह रवव चीन के आधीन था, जिसकी शक्तिका अभी पूरा पता नहीं लग पाना था, कररसे उसके उसपार कहीं अग्रेजो के प्रतियां राज्य था, इसलिये बुशहर राज्य की उत्तरी सीमा पर जसा तोरसे व्यान रखते थे । उन्होने इसीलिये "तिब्बत- हिन्दुस्तान सड़क " बनाई, रियासत के धनज हुने और बुरका विशाल जगल तो टीमें लिया, तो उनके रहते तक वह फिर नहीं छूट सका, और व श्री दिपाचल-प्रदेशके न जाने पर भी यहाके जंगल तथा "तिब्बत- हिन्दुस्तान नड़क' का जन्य पूर्वी पंजाब सरकार के हाथमें है । प्रवत्वक भी कभी कभी १८६४ ई० में जो अग्रेजोने रामपुर राजवंश के नमन किन्नर लोगोका इतना ही लाभ हुआ, कि किन नए टाकरो और बाहरी डाकुलांकी लूटने वह बच गये, लेकिन नवराज और उसके नौहरोही लूटखट कम न थी । ठाकर शादी जीवन्त नहरे फिर यावाद नहीं हो सकीं। वट्टी - वडी तन्सावाले अत्रेज़ वनाधिकारी जगह-जगह बने भव्य वगलों में विहरते किए उन्होंने जगलकी ग्रामदनी बढ़ाने के अतिरिक्त यदि किसी प्रभार दिया, तो नहीं कि कनोरोको मेड़-बकरियोपर कड़ा<noinclude></noinclude> el0leuji0h674olq5q7418wwwi3gr5m पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०४ 250 195519 666262 2026-07-07T16:24:52Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666262 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३७२ किन्नर - देश में टेक्स लगाया जाये, जिसमे उनकी म ख्या कम हो, और कनारे जंगल. विभागकी मजूरी करने के लिये मजबूर हो । राज और ग्रग्रेजी जगल विभागसे अधिक सेवाका काम वल्कि मोरावियन पादरियोने अपनी परिमित शक्तिके अनुसार करना चाहा। १८६२३० मे उन्होंने तितकी सीमासे दसमील इधर स्थू ग्रामको अपना केन्द्र बनाया और तबसे १६१८ तक ग्रामवासियोको मसीहका संदेश ही नहीं दिया, वल्कि उनकी श्रवस्थाको बेहतर बनाने की कोशिश की। थावे दर्जन से अधिक जर्मन तथा दूसरे युरोपीय पादरी यहाँके लोगोकी सेवा करते वहीं मर गये। आजभी उनकी उपेक्षित कत्रो के पत्थर वहाँ मौजूद है। उन्होने बच्चोंके लिये स्कूल खोला, औरतोका मोजा वनियान तथा अच्छे ढके ऊँनी कपड़े बुनने का ढंग सिखलाया, दर्जनो मर्दाको ढका काम सिखलाया । यद्यपि श्राज उनके बनाये ईसाइयोमेते एक भी नहीं है, किन्तु उनके स्कूल में पढ़े श्रादमी मौजूद है, मोजा - बनियान आज भी स्पू मे अच्छी बुनी जाती है, और दर्जनो वढई के काममें चतुर आदमी पादरीका गुनगान करते हैं । स्पूसे कुछ समय बाद चिनीमें भी मोरावियन पादरियोने अपना केन्द्र खोला । यहाँ पर भी उन्होंने शिक्षा- प्रसार करनेका ध्यान किया । कनौरमें जो ग्राज सेब, अगूर, नास्पाती, चालूचा, वादाम, खूबानी यादि फलों का इतना प्रचार हुआ है, इसमे मोरावीयन मिशनरियोंका काफी हाथ था। राजकी श्रोरसे सुधार यही हुआ, कि मालगुजारी बढ़ानेकेलिये १८८६ ई० में राजकी वाकयदा सर्वे की गई, १८६५ में पुरानी पंचायतों और उनके सस्ते न्यायकी जगह चिनीमें तहसील और पुलीस बैठा दी गई। शिक्षा पर लाज शरमके मारे कभी थोड़ा सा पैसा खर्च करनेका कष्ट उठाया गया। हाँ, देवताओंकी जागीर और पूजा-उत्सवमें जराभी कसर नही रखी गई, न ब्राह्मणों और लामाओको हो लोगोको उल्लू बनाने में सहायता और प्रोत्साहन देने में पीछे रहा गया। इस चातका पूरा प्रबंध रखा गया, कि कनौरसे अज्ञानकी काली रात हटने न<noinclude></noinclude> ky0dvk0655rafgfsjuf0rqo03bnser9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०५ 250 195520 666263 2026-07-07T16:25:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666263 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत ३७३ पाये, और इसमे वह सफल हुये, आज कनौर हिमाचल का सबसे पिछड़ा इलाका है। लेकिन फर्वरी १९४८ के वाद, हिमाचल प्रदेशके बन जानेकेवाद भी क्या कनौर वैसा ही पिछड़ा रखा जायेगा ? अभी तो यहां के लोगो को कुछ नही मालूम कि उनके राजनीतिक जीवनमे कोई बड़ी घटना घटी है। यहाँ हिमाचल के इस सुदूर कोनेमें गाँव-गाँव और घर-घर मे हमे विद्याका प्रदीप जलाना होगा, मेवो और खनिज पदार्थों से उत्पा- दन तथा ऊनीवस्त्र व्यवसाय के विस्तारसे लोगोंके हाथमे धन पहुँचाना • होगा, तब वह और उनके पड़ोसी भोटिया लोग भी जान सकगे, कि हिमाचल में नवजीवन श्राया है। २४ किन्नर - गीत दुनिया के लिये अल्पपरिचित दूर देशका नाम सुनने पर पहिले बह स्वप्नलोकसा मालूम होता है । फिर एकाएक वहाँ पहुँच जाने पर कुछ विरमय, कुछ अज्ञात आकर्षण, कुछ विचित्र नवीनतासी मालूम होती है । वहाँ कुछ महीनों रह जानेपर उसके वर्त्तमान और अतीतको नजदीक से यथाविधि अध्ययन करनेपर उसकी रहस्यमयता जाती रहती है, ग्रामीयता श्रा जाती है। मेरा मन भी किन्नर के बारेमें इन सारी परिस्थितियोंसे किसी समय गुजरा। किन्नरका अतीत मेरे लिये अच्छा मनोरजनकी वस्तु है, किन्तु मैं उनके भविष्य-- युगो वाद कल से शुरू होने वाले भविष्य के अधिक ग्रात्मीयता अनुभव करता हूँ । साथ आदमी किन्नर सम्बन्धी भावुक, वैज्ञानिक कल्पनाओं और वेपणाने ही लीन नहीं रह सकता, जबकि उसके आसपास मेवोंके उद्यान लहलहा रहे हो। उनमें छोटेसे छोटे सेव वृक्ष भी फलोंसे इतने<noinclude></noinclude> omf95f3kqlyi30ep824uojcmfrlux0d पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०६ 250 195521 666264 2026-07-07T16:25:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666264 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३७४ किन्नर - देश में लदे हो, कि थून्ही लगानेवर भी शालाग्रही रक्षा तदिग्ध मान होती हो । सेव भी ऐसे जो आपने सामने ही छोटी छोटी हरी बने --- ते गये लाल रंग के हो एक दिन एकाएक ऐसे चमकीले रक्तवर्ण परिणत हो जाते हो, कि उन्हे देखकर ईरानी कवि तुन्दरियो कोलको "से वसुख" की उपमा देने के लिये मजुर हो । नास्पाती - यहा नासानी नही उनकी श्र ेष्ठ जाति नाखे होती है आपके पड़ोस में हो, जा पिछले साल फलभारसे अपनी एक शाखा नहीं एक अगको गंवा चुकी हो, और पूछने पर मालूम हो कि यह अमृताविशायी फल सितम्बर पगा, तो श्रापका मन कैसा करेगा, यदि आपको अगस्त के आरम्भ ही में स्थान छोड़ना पड़े। मे २० मईको चिनी पहुॅचा, तबतक तेव पर फूलों की बहार खतम हो चुकी थी और छोटे छोटे दाने लगे थे। मेरे सामने ही वे वचनने तराईकी ओर अमर होने लगे । नैने चूलीकी तो वचपन से ही चटनी शुरू करदी - 'जोई रान सोई राम" । फिर पहिला फल जो खानेको मिला, वह चूलियो (इधरकी खूबानियो) का था । लेकिन सोच रहा था, क्या सेव अगूरको विना चले ही किन्नर छोड़ना पड़ेगा । पहिले तो डौल कुछ ऐसा ही मालूम हुआ था, किन्तु अन्तमे प्रस्थानको जूलाईके ग्रारम्भने अगलने स्थगित करना पड़ा । जुलाई के उत्तरार्धने मेव श्राया- पिछले सालका रखा तेवतो बहुत बार खा चुका था। यह शर्माजी के रेजरकारका तेव था, जो चिनीमें सबसे पहिले पकता है। खट्टा तो था, किन्तु ताजा था । सुन रखा था, उसमे विटामिन 'सी' बहुत है । उसके बाद तो आलूचा भी आने लगा, और अन्त मे उससे मन ऊब गया । नूनाके अनुयायियोका जब बहुत खाते-खाते स्वर्गीय भोजन " मन्ना" ते मन ऊब गया, तो शालूचाकी बात ही क्या करनी ? डर था, कहीं नई द्राक्षा चखे ही यहाँ से निकलना न पड़े । देवता कभी कभी मेरी कड़वी मीठी बातों से कितने ही पाठकोकी भांति बिदकते भी है, किन्तु ग्रन्तमें स्निग्धता प्रदर्शन किये बिना नहीं रहते। इस प्रकार उन्होंने २५ -- 1<noinclude></noinclude> s0p4nojq2499p2tnodw475h1a31sody पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०७ 250 195522 666265 2026-07-07T16:25:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666265 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत ३७१ जुलाईको खवर नर भेजकर दिलासा दी- नीचे नेवल (नदी तट ) मे गूर पहने लगा है। लेकिन मैं भी भारी यथार्थवादी हूँ, में देवताओ के दिलानेसे सन्तुष्ट नहीं हो सकता । अन्तमे २७ जूलाईको प गूगेका गुच्छा देखने को नही खानेकेलिये श्राया उसके वादसे तां रोज ही कमीहत और कभी काले अगूर चा रहे है। अपहरित पहिले याचे, खड्ड और मनोज गधी होने पर भी अच्छे थे, किन्तु जव ' के घने काले मधुर अगूर आने लग त घरसे कई हरितगुच्छो- को हटाना पड़ा। अभी यह पहिले पकनेवाले अगूर है, असली रोके लिये महीना भर और ठहरने की जरूत है, खैर पेट भरना नहीं परिचय -लचीत्र है, खानकर लेखक केलिये । साजात् परिचय पर ही उसकी लेखनी इतमीनान और कुरती के साथ चल सकती है । मी (२ अगस्त) चीनी पाच दिन और रहना है और किन्नर मे समय मे और भी परिचय प्राप्त हो तो पूरे डेढ़ सप्ताह, इतने सकता है। x X X fear कटकी प्रशमामे जब हमारे सतयुग तक के मनीपियो "नेति नेति" कहा है, तो उसके बारेमे मेरी अनेक बार पुनरुक्ति, आशा है, यदि भूपण नहीं तो दूपण भी नहीं समझी जायेगी। किन्नर क मधुर है, गीत मधुर है, साथ ही वह अत्यन्त सरल र कृ त्रिम है, उसमे कोई उत्तादी कलावाजी नहीं है । संगीत और कविता दो मेरा सम्वन्ध बहुत ग्रच्छा नहीं रहा है, मालूम नहीं किमका दोष है । संगीत कम्राट और कविषु गव आदेश करते हैं- रसगुल्लेका परखी एलवाई होता है. और मे कहता हूँ खानेवाला । मुझे नहीं सालु छन्द (बोट ) मेरे पदमें अधिक हैं या दूसरे पक्ष । पक्कै के बारेमे मेरा मतभेद हो सकता है, किन्तु जनसंगीत विकतर मित्र लगते हैं। जनवगीत पहाड़ी संगीत मुझे बहुत मधुर<noinclude></noinclude> 3hvf0454321p7ytp0h1fh8pxsbaz9ak पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०८ 250 195523 666266 2026-07-07T16:25:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666266 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३७६ किन्नर - देशमें मालूम होता है, और उसमे भी प्रथम स्थान में किन्नर संगीत को देता हूँ । वनश्री वोध-पक्षियोंको मुखरित कर देती है । जान पड़ता है। प्राकृतिक सुपमा श्रोर मधुर संगीत तथा मधुर का कोई नैसर्गिक सम्बन्ध है, तभी तो पहाड़िने कोकिलकठी होती है, और किन्नरकंटकी इतनी महिमा गाई गई है। हिमाचलकी नारियों कोई भी काम विना गीतके कर नहीं सकतीं। हृदय सिहरानेवाली पहाड़ी जगहने खड़ी घास काट रही है, और उनकी गीतध्वनि नदीके कलकल के साथ मिश्रित हो रही है। हरे खेतों में निराई कर रही हैं, और मधुरक दिगन्तको मुखरेत कर रहा है । किनमें ता यार ! सगीत नरीका स्वास वन गया है । २२ जुलाईको हम टहलने जा रहे थे। बगलेसे दो मीलसे कुछ आगे देवदारु वनस्थलीमे पहुँचे । एकाएक कहीसे मधुर ध्वनि श्राने लगी "ना-न-न-न-न-न-न-न-ना-इ । ना-न-न-न-न-न-न-न- नो-नेने ।” पुण्यसागरके कथनानुसार गीत था-- "जब मोपोती वोली सखि हे सखो। चलो विरने कंडे, खेत रक्षा करे ।...” कृष्ण भगती बोली "विहरने तो कहती हो, कलेवा क्या ले चले ?" 'कलेवा तो ले चले रोपडका भुना गेहूँ । किल्वा फाफडका थाटा । ठोकरोके काले उड़दकी दाल । .." . मै गीतकी भाषा नहीं समझता था, किन्तु सुन्दर सङ्गीत के लिये "भाषा समझनेकी उतनी ग्रावश्यकता भी नहीं है, यद्यपि इसका यह अर्थ नहीं कि नैसर्गिक सौंदर्य आभूषण के मूल्यको और नहीं बहाता । हम सुनते हुये श्रागे बढ़ते गये। स्वर मधुर था, साथ ही ठोस भी, यद्यपि उसको अर्थ यह नहीं कि वह कर्कश था। धीरे धीरे स्वर दूर *पर्वतका ऊपरी भाग ।<noinclude></noinclude> hk8c9vtyq3y2jmktcgudnn2i8arhhw4 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४०९ 250 195524 666267 2026-07-07T16:25:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666267 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- किन्नर -गीत ३७७ होता गया, और प्रतिव्वनि श्रवभी कानों मे गूज रही थी । श्राध मील जाकर लौटे, ता देखा अब भी वह तरुणकठ उसी तरह गीतमन है । मैने गायिकाको देखनेकी कोशिश पहिले व्यर्थ ही की थी, किन्तु अवकी ऊचाईकी ओर सड़क के छोरपर और जाने पर प्रायः पाचसौ फीट ऊपर शिलातल पर कोई तरुण बठेन (सुन्दरी) उसी तरह गीतलीन थी, जैसे वाकी महाश्वेता श्राच्छोदसरोवर के तटपर । यहा पशुपक्षी संगीत के श्रानन्दमें विभोर हो निश्चेष्ट श्रचेतनसे नही बन गये थे मैं नहीं समझता, हम दोनोंके अतिरिक्त भी वहाँ कोई श्रोता था । यहा वटिनके हाथ में वीणा नहीं थी, और न वह शुभ्र सुन्दर वेप ही, जो उस दिन महाश्वेताने धारण किया था । वीणाका काम उसका शरीर दे रहा था कभी वह दोड़ को हिलाती कभी चादरको कभी फिर अपने पैरोको, फिर दोनों हाथोंको, और वस्त्र - बहुत मलिन ऊनी चादर (दोड़) कन्धेपर नूई से बँधी । काफी दूर, और सो भी सीधे शिरके ऊपर जैसे स्थान पर, इसलिये मै नही कह सकता, कि वह रुपीना थी या नहीं, किन्तु श्रायुमे पोडशी नहीं तो विंशिका से अधिक नहीं थी । यांड़ी ही देर में किसी देहवासीने उपद्रव किया और वह संगीत छोड़ दोह के ऊपर दोनों कन्धोंको ढोकनेवाली चदरिया उतारकर उसे देखने लगी। हम भी वहासे विदा हो गये । , - जहाँ संगीत इतना प्रिय हो, वहाँ गीतकी अधिक माग होना भी आवश्यक है । गीत किन्नर में बहुत बनते हैं, किन्तु श्रधिकाशकी वायु दस-पन्द्रह साल से अधिक नहीं होती । जनगीतों के कवियोंका नाम तो दुनियामे सभी जगह प्राप अज्ञात रहता है; इसलिये यहा भी वही बात हो, तो कोई ग्राश्चर्य नहीं । किन्नर गीतो के देखने से पता लगेगा, कि पके जनकविका मस्तिष्क काफी विकसित है। छद बहुत सरल है, और प्रान गायत्री छकी भाति तीन पादके होते हैं । छद भी वैदिक हृदीकी नाति ही अक्षर-छद है, जहाँ करने पूरी वतत्रता है । गीतने अन्तिम गायकको हस्व-दीर्घ- पदको दुहराते अगले<noinclude></noinclude> cg1i41nz1yjzowu38c82n92i5ed9yub पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१० 250 195525 666268 2026-07-07T16:25:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666268 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- ३७८ किन्नर - देश में छदके प्रथम पादसे जोड़नेका वही ढंग दिखाई पड़ता है, जो भोजपुरी ग्रादिके कितनेही जनगीतौमें पाया जाता है। गीतां नये भावोके व्यंजक शब्द भी प्रयुक्त होते हैं, जैसे "भाव" (व्हाव शब्द ही, जो प्रेम, चाह और भावुकता के लिये प्रयुक्त होता है । सगीत सार्वजनीय वस्तु है, इसका यह अर्थ नहीं, कि यहाँ संगीतका व्यवसाय करनेवाले व्यक्ति हैं ही नहीं । मैं कोठीको बढ़इन - हिरपोती- का जिक्र कर चुका हूँ। उसकी दो बुलाये, जिनमें खइलो अभी भी जिन्दा है, प्रसिद्ध गायिकाये ही नहीं विख्यात जनकवयित्रिया भी थी। मुझे खेद है, उनकी अच्छी कविताये हिरपोतीको याद न थी । लेकिन जैसा कि ऊपर कहा, यहाके जनगीत चिरस्थायी नहीं होते । "मिया साव" और "गुरकुम्पोती" के गीत तीन पीढ़ी पुराने हैं, और कुछ वृद्धों को ही याद है । । किन्नर के जिन ग्यारह गीतोको मैं यहा दे रहा हूँ, उन्हें ग्राजकल प्रचलित गीतों में सर्वश्र ेष्ठ नहीं कहा जा सकता । सर्वश्रेष्ठ ग्यारह गीतोकेलिये कमसे कम दो सौ सर्वप्रिय अच्छे अच्छे गीतोके सग्रह करनेकी श्रावश्यकता थी, जिसके लिये मेरे पास समय कहा था ? इन जनगीतोमे प्रेमका स्थान अधिक होना स्वाभाविक है । किन्तु यहाँ संग्रहीत गीतो में "रूपसिंह" ( १० ) और 'चुन्नीलाल डागर " ( ११ ) को ही प्रेमगीत कह सकते हैं । "गुरुकम्पोती " ( २ ) और “मियाँ सा’व” ( १ ) एकान्तेन प्र ेम गीत नहीं हैं। "उतमवीर नेगी" (३), "सूरज मोनी" (८) और "व्यासमोनी" ( ६ ) किन्नर-जीवन के विभिन्न पहलुयोंकी झांकी देते हैं । "युमुदासी" ( ६ ) और "सागरसेन” ( ५ ) पारिवारिक सामाजिक जीवन के चित्रण के साथ करुण भावको व्यक्त करते हैं । "पोतिष्टङ्” ( ४ ) मे कोई कला नही है, जहाँ तक भाषाका सम्बन्ध है, किन्तु संगीतका माधुर्य तो कंठ पर निर्भर है । हो, इससे यह अवश्य मालूम होगा कि किन्नरके देवता 3 भी कितनी बातो में मानवोंसे भेद नहीं रखते । "बेलीराम बाबू" ( ७ )<noinclude></noinclude> llu8nq8js8rzpik2s2820c7ixzwdw78 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४११ 250 195526 666269 2026-07-07T16:26:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666269 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत ३७६ अनियंत्रित कामुकताका निदर्शन है, जिसमे यौन सम्बन्धके कठोर प्रतिवधवाले समाजसे ग्राये व्यक्ति के ऐसे देश में अनाचारकी सुलभताको वतलाया गया है, जहाँ यौन-स्वातंत्र्य स्वाभाविक रूपमें पाया जाता है । जनगीत माधुर्यमें उत्तमसगीत होते हैं, और रस- परिपाकमे सुन्दर काव्य । मानव जीवन का जितना वास्तविक चित्रण जनगीतोमे होता है, उतना चोर जगह मिलना कठिन है, और यथार्थवाद तो उनकी अपनी विशेरता है। इसीलिये प्रत्येक जनगीत अपने पीछे जीवन इतिहास रखते हैं । किन्नर जनगीत इतने लायु को होते हैं ? गायकोका यहाँ कोई विशेष वर्ग नहीं है, जवानी ढलने से पहिले जैसे प्रत्येक किन्नरी नर्तकी है, वैसे ही वह गायिका भी है । इसीलिये वही गीत गाया जा सकता है, जो इन नारियो हृदयको अपनी ओर आकृष्ट कर सकते हैं । जिस गीतने एक बार उनके हृदयको आकृष्ट कर लिया, वह कुछही महीनो में मन्योटी-वारसे हरके डांडे तक नदीतटो, जङ्गलो, खेतो और पहाड़ी डॉडोको मुखरित करने लगेगी । यहाँ किसी गीतको संरक्षण- प्राप्ति या कलाकी दुहाई देकर प्रचारित नहीं किया जा सकता । यही वाते सभी जनगीतो के बारेमें कही जा सकती है । मैंने गीतो के कवियो और उनमें वर्णित घटनाथोकी सच्चाई यादिके जानने के लिये थोड़ा-बहुत प्रयत्न किया । 'चुन्नीलाल डागडर" का गीत किल्वासे सम्बन्ध रखता है । शर्माजीका नौकर वहीका रहनेवाला है । एक दिन उनसे पूछा- क्या ज़दमोपोती श्रव भी है। -- - हॉ, श्रभी उमर नहीं ढली है, दो बच्चोकी माँ है । - क्या वह इस गीतको सुनकर नाराज नहीं होती ? पहिले नाराज होती थी, लेकिन किसका किसका मुँह रोके ? उसने बतलाया, ज मोपोती तर कुमारी थी। डाक्टरकी उसके भाईते दोस्ती थी, प्राते-जाते उनके साथ डाक्टरका प्रेम हो गया । गीतकी पीने जोपोती के प्रति न्याय नहीं किया है। गीत से<noinclude></noinclude> c9b0f8vo0nvez42psc62sgljh1bjcmo पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१२ 250 195527 666270 2026-07-07T16:26:19Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666270 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८० किन्नर - देश में मालूम होता है, डाक्टर सच्चा प्रेमी था, जडू मोपोनीने ही विश्वामधान किया । किन्तु यह कभी विश्वास करनेकी बात नहीं, कि एक नगर ( सरगोधा, पंजाब ) का शिक्षित अपने व्यवसायमं भी दक्ष डाक्टर तरण एक शिक्षिता ग्रामीण साधारण तरुणीचे माथ जीवन विताना स्वीकार करता। यदि जख्मोपोती की यह विश्वास होता, तो वह कभी उसे नहीं छोड़ती। यह भी स्मरण रहना चाहिये, कि जिन देशमि स्त्री-पुरुषो सम्वन्ध में पूरी स्वतंत्रता बरती जाती है, वहाँ कुमारियों निराबाव प्रेम का अधिकार रखती है। इसे आप किन्नरही नहीं, निव्वत, श्रग्दो, मंगोलिया और जापान तक मे पायेंगे । हो, व्याइके बाद वह स्वच्छता सह्य नहीं मानी जाती । जनोपोती कुमारी थी, उसे स्वच्छदनाके उपयोगका पूरा अधिकार था, साथही अपने रास्ते को बदलनेका भी, जबकि उसने देखा, उसका प्रेमी एक क्षण के लिये ही प्रेमका उपा सक रहना चाहता है । जङ्मोपोतीको अपने प्र ेमका गीत पसन्द नहीं, किन्तु “उतमवीर” की प्र ेमिका “यालू ज़ोमो ” ( वनफूल भिक्षुणी) सेरयड ६० से ऊपर सालकी वृद्धा श्रव भी जीवित है। उसका गीत जब यहाँ चिनी बनो - में इतना प्रचलित है, तो कनम् और सुनम्मे कितना होगा, इसे कहने की आवश्यकता नही। मैने उसके भाई जेलदार तो ग्याराम के पुत्रसे पूछा - सेरयडको तुम जानते हा ? -सेरयड् ! मेरी बुना है---उसने बड़े इत्मीनानके साथ उत्तर दिया। - सर अपना गीत सुनकर खुश होती है ? - हो, खुश होती है। ' वह नाखुश होने की कोई बात नहीं हैं। सेरय भिक्षुणी बनी थी, पीछे व्याह कर लिया, इसे चौददेशो में कही बुरा नहीं समझा जाता । चाहे उत्तमवीरकी बुचाने पचास रस्सियों में बटी चोटीवाली बहको जगह शिरमुन्डी “ज़ामो” को देखर भले ताना दिया हो । सेरयड के लिये<noinclude></noinclude> mlvebruw2spvakjh9ybxec4h865ur12 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१३ 250 195528 666271 2026-07-07T16:26:29Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666271 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत ३८१ भी यह गीत प्रेमकी एक मधुर स्मृतिका भी उद्बोधक है, इसलिये भी वह उसे प्र ेमसे सुनती होगी । "मियाँ साव" गीत में जनजीवन के एक दूसरे पहलुका चित्रण किया गया है | मिव साहब फतेहसिंह राजासे ज्येष्ठ पुत्र होने परभी साधारण स्त्रीके पुत्र होने के कारण गद्दीसे वचित हुये । पीछे भाई राजा शमशेरसिंह से श्राज्ञा ले नुदूर हड - रमे जा राज्यसे विद्रोह किया; किन्तु इस पहलू ने 'जनमनको अपनी और नही खीचा । उसका ध्यान अधिकतर उत्पीड़न की घोर गया। राजा शमशेर सिहमी कन्नौर श्राते, तो उसी तरह मेट-मुखियोको ५० असवाव पर ६० बेगारू तैयार रखने, पड़ते, उसी तरह घी चावल - वकरा जमा करना पड़ता । एकतरह इस गीत में सामन्ती उत्पीड़नका अप्रत्यक्षरूपेण विरोध है । किन्नर के जो पुराने गीत अब भी प्राप्य हैं, उन्हें संग्रहीत किया जाना चाहिये । जइछोकी भाँति अभी भी कितनी ही वृद्धाये मिलेंगी, जिनसे वहुत पुराने गीत मिल सकेंगे । यदि ४४ वर्षकी युवाली स्त्रियोसे अस्सीसाल पुराने गीत मिल सकते हैं, तो ज़इछोसे सवा सौ वर्ष तक के गीत भी मिल सकते हैं। फिर व्याह उत्सव ग्रादिके भी गीत है, जो और भी पुराने काल तक जायेंगे । किन्नर पाठकोकी वर्तमान पीटीका यह कर्त्तव्य है, कि वह इन गीतोंको सर्वदा के लिये लुप्त होनेसे बचायें । ' किन्नर भाषाका थोड़ासा नमूना पुस्तक के अन्त में दिया जानेवाला है । किन्नर इतिहासपर भी सिहावलोकन करते समय उसका जिक्र वाया है, किन्नरभाषा प्रारंभिक शिक्षाका माध्यम वनकर बहुत जल्द सारे किन्नरसे निरक्षता दूर कर सकती है, किन्तु अभीतो यह बात प्रणयरोदनसी ही मालूम होगी। तो भी इसमें तो किसीको आपत्ति नींद सकती, कि किन्नर भाषा के शब्दोका सर्वाग पूर्ण शब्द सग्रह किया जाये। निर्मानमय प्राय. नारा पश्चिमी हिमालय प्राचीन किन्नरभावा बोलता था, किन्तु धीरे धीरे उसका क्षेत्र संकुचित होते होते वर्तमान<noinclude></noinclude> db30bpukimf3ea0nc6nxhfr55elxrs3 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१४ 250 195529 666272 2026-07-07T16:26:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666272 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८२ किन्नर - देश में कनौर भर रह गया । यह भी भाषा के बहुत से शब्द जुत होगये हैं, जिनका स्थान हिन्दी और भोटिया शब्दोने लिया है। सज्ञा और धातु ही नहीं विभक्तियाँ और सहायक क्रियायें तक हिन्दी या भोटियाकी आ पहुँची है - "हे" के लिये किन्नर में प्रयुक्त होनेवाला शब्द "दुगु " भोटिया है; और "गया" के लिये हिन्दीका "ग्यो" जिसमें "श" विदेशी शब्द के साथ जुड़नेवाला अनुबन्धनात्र है, ""या" वही "गयो" है। जैना कि मै पहिले कह चुका हूँ, किन्नर शब्दकोशमें प्रायः २५ से ५२ सैकड़ा हिन्दी, १४ सैकड़ा भोटिया और ३६ ते ५६ सैकड़ा तक शुद्ध किन्नर (शू) भाषा के शब्द हैं। वस्तुत: इन दोनों भाषाओ ने किन्नर- भाषा- प्रदेश के बहुत से भागोको पहिले ही ले लिया । शायद किन्नर-भाषा का यह छोटा द्वीप बचा भी, इसीलिये, क्योंकि उसने सीमास्थ देश का रूप ले लिया । जब किसी भाषाका अधिकाश शब्दकोश ही नहीं afer for a तक का भी स्थान दूतरी भात्रा लेने लगती है, तो समझ लिजिये अब वह अन्तिम घड़ियों गिन रही है । इसके अतिरिक्त शायद ही कोई किन्नर पुरुष मिले, जो काम चलाऊ हिन्दी न जानता हो, स्त्रियोनें अभी काफी ऐनी है, जा हिन्दी से परिचित नहीं है। इस प्रकार किन्नर भापाको चाहे कुछ दशाब्दियों भर न भी खतरा हो, किन्तु उसके शब्दकोशको खतरा जरूर है। अभी ही पचासी हिन्दी के धातु श्राचुके हैं, जिनके किन्नर पर्याय हो चुके हैं। इसलिये किन्नर-भाषा के शब्दो के वृहत् सग्रहकी अत्यन्त श्रावश्यकता है, और इसमें जितनी ही जल्दीहो उतनीही कम हानिकी सभावना है। मैने माल्टर रामजीदासको इसकी प्रेरणा तो दी है, वह हिन्दी ही नहीं भोटभाषा भी जानते हैं । संस्कृतिकेलिये मैने भी सहायता देने को कहा है। देखे उन्हें अपने "छम्' (जप यान) में इसके लिये फुर्सत होती है, या नहीं । श्रागेतो इस पुनीत कार्य के लिये कितने ही तरण मिलेंगे, किन्तु उनके कार्य क्षेत्र में अवतीर्ण होते समय तक किन्नरभाषा और भी सैकड़ो शब्दो की खो बैठेगी, जिनमें कितनेही शायद कुन्जी के शब्द हो । " .<noinclude></noinclude> 127kwzdggsrwy6tfn618xygmj9owcln पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१५ 250 195530 666273 2026-07-07T16:26:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666273 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर-गीत ३८३ किन्नर भाषाकी रक्षाका काम एक और व्यक्ति कर सकते थे, किन्तु वह प्राचीनता के इतने गव्हरखो हमें डूबे हुये हैं, जिससे उन्हें पता नही लग पाता, कि भारत में भारी परिवर्तनहा चुका है, और कुछ ही सालोमे और भी घोर परिवर्तन होना चाहता है। वह है नेगीलामा त जिन् ग्याल्छन्, तिब्बती भाषाचे प्रकांड विद्वान् । प्रकाड विद्वान् कहने मात्र से उनकी योग्यताका परिचय नही मिलेगा, मै तिब्बतसे ही जानता हूँ, भोटराजधानी ल्हासामें वहाँके बड़े बड़े राज पुरुष अपने लड़कोकी उनके पास श्राग्रह के साथ भेजा करते थे । वहाँ उनका बहुत सम्मान था, किन्तु सवको लात मारकर वह काशीकी कुछ गर्मियों में मृत्यु- मुखमे रह कर तीन साल से अपनी जन्मभूमिमें आकर लोगों में ज्ञान धर्मका प्रसार कर रहे हैं। दूर दूरसे लोग उनका उपदेश सुनने आते हैं, जो किन्नर भागा होते हैं । यदि उन्ही उपदेशोंको किन्नर-भाषा में लिखकर छपा दे ( जिसके हजार बारहसी ग्राहक श्रसानीसे मिल सकते हैं ) । इससे जहाँ उनके विचारोंका प्रचार होगा, वह किन्नर - भाषा भी लिपि- बद्ध हो जायेगी। अभी तक पंडित टीकाराम द्वारा सगृहीत कुछ गीत ( बगाल एसिया सभा के जर्नल में प्रकाशित), एक इजील तथा कुछ और पृष्ठ ही किन्नर भाषा में छप पाये हैं । इन गीतोंको मैंने उनके निर्माणकाल के अनुसार रखा है। कालमे भी कुछ वर्षो का अन्तर हो सकता है। कवि - श्रज्ञात गायिका- - . मियां साव गीतकाल - १८१६ ई० (१) 'विद्याचरनी श्रायु- २० वर्षः जात-कनेत ग्राम-चिनी [ कमलानंद वायु ५५ वर्ष लेखक -- { भगत सिंह पुण्यसागर " " ता० ६-६-४८ विवरण- मिया साहेब फतेहसिंह बुशहरके अन्तिम राजा पदम- सिके ( मृत्यु १६४७ ई० ) पितामह महेंद्रसिंह ( मृ० १६१४ ) के बड़े<noinclude></noinclude> f4u53uzytonlsbenhnacd2stgfac5gx पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१६ 250 195531 666274 2026-07-07T16:27:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666274 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८४ किन्नर - देशमें भाई थे । राजकन्या के पुत्र न होनेसे गद्दीसे वचित रहे, और पीछे हमें जा राज्यसे बगावत करके लोगोको इतना तंग किया कि हर वालों ने पकड़ लिया। फतेहसिंह राजकन्याचे पुत्र न होनेसे महीने वचित रहे, किन्तु उनके भतीजे राजा शम्शेरसिंह के योग्य पुत्र टीका रघुनाथसिंहकी मृत्युके वाढ पदमसिंह ही पुत्र रह गये थे, और वह रायकन्या के पुत्र न थे । शम्शेरसिंहने टेहरी के राजकुमारको गोद लिया, किन्तु ग्रग्रेजोको वह पसंद नहीं आया, श्रीर उन्होंने पदमसिंहको ही गद्दापर बिठाया । '' खुना रामपुरो, कुमो दरबार कुमो, नीचे रामपुर के बीच दवर बीच। कुमो दरवारु, तुकुथदेन् महाराज, बीच दर्वारके, तख्त कार महाराज । गिलमुदेन' शुम् गोर, मियों साबुस् लोतोश, "कोन्सस या कोन्सस " ई श्रोर लन्तोक, शिरङ् लन्तोया ?" गिलन पर दवरी । मियों साहेव बोले "छोटक ! हे छोटक एक अर्ज करता हूँ, स्वीकार करोगे १" देवे महारास लोतोश् | यह कहने पर, महाराज बोले--- "किन्ठ दुया ओरज़ी, गली ठू मरोन्चिक ।" "हेद् श्रीरजी मानी, ग कनोरिड् बीतोक् । कनोरिट मुलुक ख्यामा, नुली मशूरियू मुलुक । ' देव - कालि ' "तुम्हारी क्या है अर्जी, मै क्यो ना तुनगा ?" "और चर्जी (कोई ) नहीं, मै कनौर जाऊँगा कनौर मुल्क देखगा, स्थान, कैलास् ता दरशन ।” महाराज लोलितो, " की कनोरिङ् था देश | वह मशहूर मुल्क देवता कालीका स्थान, नौ कैलासका दर्शन । " महाराज बोले, "तुम कनौर न जाओ । पोरजाउ तकलिफ रन्ति ।" प्रजाको तकलीफ दोगे ।"<noinclude></noinclude> 9nncoffzc357422cj6q5c6p6qcqpayj पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१७ 250 195532 666275 2026-07-07T16:27:12Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666275 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत प्रग्नर मश्कोतिश जी मियाँ साबा । "बीतोकी चुत्मा श्रोलिया पालार । भल्या चूलार ।” ३८५ विल्कुल नही माना, मियाँ साहवजी ने । "जाना चाहे तो गरीबोंको पालना । वड़ोको नोचना ।" चुलबुली सता, हुन् वीमिक् नीयो । पह फटते फटते, तभी चल दिये । "ब्रड् चलिया हम् तोनू, चलो चलन्दोरा । " ढाई नीज़ा ग्रसवाव, शुम् नीज़ा बूगार । "मेरे चलिन कहाँ हो, चलो चलौवा ।" ढाई-वीस असला (श्रौ ) तोन-बीस बेगार | दो रि रि विन्ना, वस्तू ना जङ्तू । राजा जड-मदेन्, फीयनान्ड महाराजू, धन्याशित् श्रढरेजू ।' वाँसे ऊपर ऊपर श्रा, वड्तू जस्तू में । राजाके पुलपर, फोकट नाम राजाका, बनाया ( उसे ) मित्र साबिस लोतोश "मेट- मुखिया हम् तोन १ - 'रो बाथ करा, चवलस् कोनिकङ् वाखोरा ।" - योजने । मियॉ साहेब बोले "मेट-मुखिया + कहाँ हो ? रसद-वान लानो, चावल, गेहॅू बकरा ।" एक राती वेशो, शुपारी ता छीलो एक रात बैठे, और सोपारी छीले । बुलबुली सना, हुन वीमिक नियो । पह फटते फटते, तभी चल दिये । " चलिया हम् तीनू, चली चलन्दोरा । " टाइनीज़ा असवाव, शुम नीज़ा बूगार । *नोकर-चाकर २५ " मेरे चलिया ! कहाँ हो, चलो चलौवा ।" टाई वीस असवाव, तीन-वीस वेगार | + गावो दो अधिकारी ।<noinclude></noinclude> ahx3cbcg35y1obp81i6ceyrb5jndg6y पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१८ 250 195533 666276 2026-07-07T16:27:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666276 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८६ किन्नर - देश में दो रिड - रिट बुिन्ना, डोकीचु देन् कम्बा | मियाँ साविस लोतो, "ग (ली) कम्बा वीतोक् । वहाँसे ऊपर ऊपर था, चहान ऊपर कम्वा । मियाँ साहेब बोले "मैं कम्बा जाऊँगा । दुरिगायू दर्शन, द्रोरोमा सन्ताने। दुर्गाका दर्शन, द्वारोमा देवल-गने । द्रोरोमा सन्ताङो, कम्वा दुरिंगा याशी ।" मियाँ साविस रन्ग्यं श् मियाँ साबिस लोतो अङ डेरो हम् तोन् १” 9 ड दप्या नजराना । "मेट-मुखिया हम् तोन् ? द्वारोमा देवल-श्रंगने, कम्वा दुर्गा नाचती । " मियाँ' साहबने दिया, पाँच रुपया नजराना । मियाँ साहेव बोले "मेट-मुखिया ! कहाँ हो ? हमारा डेरा कहाँ है ?" मेट- मुखिया लोतोश् "जी लो जी महाराजा ! किनू डेरो कैलितोक, डोम्बरु देवराङ ।" मियाँ साबिस लोतोश् "ग माविक देवराडे । मेट-मुखिया बोले "जी जी महाराजा ! आपका डेरा देगे, देवताके देवालयमे ।” मिया साहेब बोले “मैं ना जाऊं देवालय । तंज्यानकी हवेली (मुझे ) चाहिये । तन्ज्यान् कोठाल, ग्यातोक् । डेरो ता चुम् ग्यो, तन्त्यानू कोठालो । तन्ज्यानु पेरड् सोम्पोरू मोज़रो विग्योश । डेरा तो लग गया, तन्त्र्यान्की हवेली में | तन्ज्यान् - परिवार सवेरे मोजराको गया । सोमू मोज़ बेरड, जी मियाँ साबू | "सबेरे मोजरा वेला मियां साहेबजी ।" गुश्कीची वादो मिया साविस लोतोश् । मुस्काते हसते मिया साहब बोले । *देवालयके पासकी समतल भूमि जो नाचके अखाड़ेका काम देती है ।<noinclude></noinclude> jd2kycgowa0hh62wxdrxsybuwt485nt पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४१९ 250 195534 666277 2026-07-07T16:27:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666277 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर-गीत "तन्ज्यान् नेगानी, तन्ज्यानू नेगानी" । किन्ना ता चेइताई, सुरतू बन्छिन् हविश्” १ ३८८७ "तन्यान्की नेगानी, तन्त्र्यान्की नेगानी । * तुम सब तो हो, मुरत् सुन्दरी कहाँ गई ?" दे लोन्ना वेर, नेगानी ता लोतोश् | यह कहने पर, नेगानी तो वोली । 'बोरे ता वीग्याश्, कडे ज़मी पोरी ।' 'ननद तो गई, कंडे खेत राखने' । ढे लोन्नू वेड्, मुरत् वन्छिन् पोचा । मु.तू वन्दिन्पोच्या सोनू मुज़रो बग्योश् । मियॉ साबिस लोतोश् "या मुरतू वन्दिन् ! यह कहने के समय, मुरतू सुन्दरी त्रा पहुँची । ' मुरतू सुन्दरी पहुॅची, भोरे मोजराको गई । मियाँ साहेव वोले "हे मुरतू सुन्दरी ! कशी श्रोमचू वातट्, मोरजात् हले दुबा ? मोरजात् हले वीशे, दो गली मानेन्मा । श्रट् प्राचू मुन्दी | हमारा प्रथम वचन, मर्याद क्या रखोगी ?" “मर्याद क्या भूलूंगी, सो नही जानती । मेरी अंगुली मुन्दरी । " 'मुरतू वन्दिन् लोतो, "आम्च वातद् तामा | अत पोत्याशिम वीतो,” मियाँ सादिस् लोनोंशू । मुतू सुन्दरी बोली “प्रथम वचन रखूं तो मुझे लजा श्राती " मियाँ साहव बोले । "हुन् वीमि नीयो, बुलबुली सडता ।" 'ग्रभी चलना है, यह फटते फटते । " लोवेर मुतू वन्छन् लोतीश् | यह कहने पर मुरतू सुन्दरी बोली । "ज़ी मियाँ बाबू, कीता मुलुक मालिक | "निया साहेव जी आप तो मुल्कके मालिक 1 मैं तो खशियाकी बेटी ।" नवा सोशिना चीने |" गीकी स्त्री<noinclude></noinclude> ddpo1ve6jd3n6ml5zqgcic44mqynyzm पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२० 250 195535 666278 2026-07-07T16:27:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666278 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८८ किन्नर - देशमें दे लोन्मूर मियांसास लोतोश । यह कहनेकी बेला, मियासादेव बोले । “दो मनेशिश मियासाविस लोतो मइ ।" "सो अज्ञात मुझे नहीं ।" "कम्बा ओर हम् तोन् ? मियाँसाहेव बोले “कम्वाका बढ़ई कहा है ? पोलगी बुनारा " पालकी बनादे ।" मूर, मुतू ठिन् लोतोश् ! "डू पोलगी माशर, ग खाशिया चीमे । "यह (वात) कहने पर, मुरतू सुन्दरी बोली । मुझे पालकी ना शोभती, मैं खशियाकी बेटी । ग पोलमी माग्याक, ग ताबा ग्यातोक् ।" चलो चलन्दोरा, बुलबुली सकेर । मैं पालकी ना चाहूँ, मुझे घोड़ा चाहिये । " चलो (फिर) चलौना, पह फटते सवेरे । हुन् बूीमिक हाचे, चलो चान्द्रा । ढाई नीज़ा असवाव, शुम् नीज़ा बूगार । } अब चलनेको हुये, चलो (फिर) चलौना । ढाई-वीस असवाब तीन-वीस बेगार । दो रिङ् रिङ बुिन्ना, बाटीचु उरने । मियाँ साब फतेसिंह, उरा वङ्लो कुमो । वहाँ से ऊपर ऊपर श्राये कटोरीसी उरनीमे । मियाँ साहेव फतेहसिंह, उडनी बगले में । मियॉ साथ लोतोश् “मेट-मुखिया हत् तोश् १” मेट- मुखिया लोन्ना, उरा चारसु छाडा । मियाँ साहेब वोले "मेट- मुखिया नहीं हैं ?" मेट-मुखिया कहिये, उडनी चारस्का पूत । * पश्चिमी हिमालय मे बसनेवाले कनेतोंका दूसरा नाम खशिया (खरा) भी है । खश (क) नाम कश्मीर और कारगर (कशगिरि) मे है ।<noinclude></noinclude> 8jikt1jifveo8k1ddo9p7briwgok27n पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२१ 250 195536 666279 2026-07-07T16:27:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666279 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर -गीत ३८६ 1 नाम तो कहिये, विश्वंभर भैया नान वा लोन्ना, विसिवर वैयर । वोरो वात काराश, चौलश्-कोनिकङ् वोखोरा । रसदपानी लाया, चावल, गेहूँ बकरा । एक राती वेशो, उरा बडलायू । एक रात बैठे उड़नी बगलामें । बुलबुल' सरिङ हुन बीमिक नीयो । पह फटते प्रातः, तभी चल दिये । दो रि-रिड् बुन्ना, माताशोवाल्यड् । वाँसे ऊपर ऊपर श्रा, मातो शोवाल्यं । रोश्माले चीने, तंबुत्रा चूक्योश् । रोशमाले+ चीनी, तबू लगवाया । रावायू ग्रामस्को । । पापाण वापके पास । " रोश्माले चीनीका मेट-मुखिया कहा है ?” "रोशमालेयु चीनेयु, मेट-मुखिया हात तो ?” मेट-मुखिया लोन्ना, सुबारसु छाटा । मेट-मुखिया कहिये, सुवारसका पूत । सुखदास वैरारा सुखदास भैया । शुम दिया वैसी, भोलिया चुल्यायोश । तीन दिवस बैठे, बड़ों को नोचा । श्रोलिना पल्यायो । गरीवको पाला । तबू लगाके, वनातका तंबू । तोबुवा चुगू चुग, बुनातो तोबूवा । राव बाटे डारी, दो नी तबुवा कुनी । सुरतू वंठिन् मुरतू, पसम पनिम् मा नेग्यो । नीले सूतकी डोरी, वहां तबू भीतर । मुरतू सुन्दरी मुस्तू, पम्म कातना'न जाने । चुलबुली सर, हुन् वीमिक् श्राये । पह फटते प्रात., तभी चलते हुये । वाटी बेगार चल्यो, चालेन चाले योश | वेट-वेगार चले, चला चलौवा । हड-रङ् कुमो । ह-रडके भीतर | ज् रङ् कुमां, गुरमेल बेशायीश् । हटर के भीतर, गुरमहल बनवाया । गुरमेल वेशायाश् डाईगोलु कुमो । गुरुमहल बनवाया, ढाईमास भीतर । 1 चीनकि पास के इलाके का नाम, जा रोगोते पगोखड्डे तक है, और सदा तेरा केन्द्र रहा गावांकी भाँति यह चीनीका विशेष है ।<noinclude></noinclude> q3dntsh6ays8nkgas6raa37nghnnqxu पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२२ 250 195537 666280 2026-07-07T16:28:05Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666280 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६० किन्नर - देश में दुम् साचे लग्यो, हड रडू न्वामा किया पंचायत, हड्रङ भोटोने । हुन् हला लन्ते, वोसेन् मा हन्शो | "अब क्या करिये, वस नहीं सकते ?” est डोमड्स लो, "मजत् किना कर | हंगोका कोली बोला " मदद तुम करो । चुम्मस् चुमतो ।" जवनाचे चुम्ग्य श, हिलन् चे व्यङग्यो - " दुश्मन् बीदा, ग्रड् किम्-श हम तो । ? पकड़ना तो मैं करूंगा।" झपट पकड़ा, कापा डरा ( मियाँ) | "मेरा दुश्मन श्राया, मेरे गृहदेव कहाँ हो ? ब्रड् किम्-शू हम् तोइँ, मामइ दुरिंगा । मेरे गृहदेव कहाँ हो, मातादुर्गा | मामइ दुरिंगा, लगुरा वीरा ! माता दुर्गा लकड़ा वीर ( है ) ! चोरम् जङ् राइँ ।” चमत्कार दिखलाओ।" ज़ली ज़ग्यो, पोलाच रोदङ । दिखाया तो दिखाया, रक्तकी वर्षा, पोलाच दड् रनु शोरू नङ सोरप् । रक्तकी वर्षा, लोहेका श्रोले सोनेके सर्प । मियाँ सावत लोतोश्, “धीरो हङ्कङ, न्यम्;ङ, देखियो तमासो हुना ग्राङन्यूपी कानू ।” दो शोङ शोङ्कायाश्, शास्यो देशङ चो । - मियाँ साहेब बोले “ ठहरो हङ भोट्टो ! देखना तमाशा, अब तो मेरी, पीछे तुम्हारी।” वहाँसे नीचे नीचे लाये श्यासो गॉवमे । शास्यो विश्ट लोतोश " ने लनशिम् मा एको । श्यामी मंत्री बोला "ऐसा करना नहीं ठीक 1 नो ली मुलुकु देवङ ।” यह भी मुल्क के देव | " सिक्या खोल्या यांश विश्टइनरदासस । ववन खुलवाया, मंत्री इन्द्रदासने । दी शशाङ बिन्ना धारेउ देन पाङ । वासे नी वेनीचे श्राये धारपर पगी में । राजा ।<noinclude></noinclude> nxuaz505u3qybib7vzidt9vz3s96j40 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२३ 250 195538 666281 2026-07-07T16:28:16Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666281 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत ३६१ एकराती वेशो, दो शोड शो बिन्ना । एकरात बैठे, वहासे नीचे आये । खोनाचु उरने । युचा ला) डेना, बरन् मावुसत्री । उड़नी उत्पत्यका | नीचे से ऊपर ( श्राई) वर्न साहवकी पुलिस । सत्रीस् लोतं श् “ने लन्निगू मइके ।” पुलिस ने कहा ' यह करना नहीं ।" टिप्पणी- मिया साहेवका पुलिस पकड़कर नीचे ले गई, किन्तु फतेहसिंह शरीरले बेकार हो चुके थे। हङ -रड वाले अपने ऊपर किये गये अत्याचारोले क्रुद्ध हो उन्हें ताजे चमड़े में बाँधकर लाये थे, जिससे जकड़े उनके हाथ-पैर फिर ठीक नहीं हुये। फतेहसिंहको छोड़ दिया गया, किन्तु वह अधिक दिन जीवित नही रहे । मुरतू सुदरी बहुत दिनो तक अपने मायके में जीवित रही । मियाँ साहेब के बारेमें पहाड़ी भाषामे भी गीत बनी थी, जिनमे से कुछ पद हैं- मियाँ साइवी पालगी चाली, वीमा कालियो खाँडो । मिया चाली फतिया लिंगा, लोगी गरची खादो || मियाँ साहेबकी पालकी चली, साथै भीमा कालिका खाँड़ा। मियाँ चला फतेसिंह, लोगोकी खर्ची ( जीविका ) खाने ॥ थट्टे पाचे कौडडूदी, जलाँ ग्रागिरी घेटी । ते ना जायोगी देवी ममादया । मियाँ राजियों बेटो || बड़े पीछे कडेमें, जलती ग्रागकी ज्वाला | तू नहीं जानता देवी मनोई ! कि मियाँ राजाका बेटा || पारवती घाडगे लाये देवियारे डबा । पारते निकालने लगी देवीकीसके । छेवीये बालडू घाले, नोवीपे जगा ॥ खाई गरची देवी मसोई, दलमल उई । खाई गरची हुनई, राटी लेना उई ॥ - ( १२० ) भालियां निकालीं, नौ-बीम कटोरे ॥ देवी मसोईको खचीं खाई, खूब मौज हुई। हुकी खरची खाई, एक रोटी नी न हुई ||<noinclude></noinclude> srbj0yl05nm61a6256yyznd748wecsr पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२४ 250 195539 666282 2026-07-07T16:28:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666282 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६२ कवि - श्रज्ञात किन्नर - देश में (२) गुरकम्पोती गीत-काल १८७० ई० (3) गायिका - हिरपोती, श्रायु -४४ वर्ष, जात-बढ़ई, गाँव-कोठी लेखक - पुण्यसागर ता० ३०-७-४८ विवरण - गुरकम्पोती वारंगी निवासी वजीर गुरदासकी वहिन थी, जिसका व्याह चिनीके चिनचारस् वशक्रे देवारामसे हुआ था । उसे पुत्र हुआ, किन्तु देवारामने उसे अपना पुत्र नहीं स्वीकार किया । राजा शमशेरसिंह ( मृत्यु १६१४ ई०) उस पर मुग्ध हुये और पालकी पर चढ़ा उसे अपने अन्तः पुरमें ले गये । दो गोल्यो दङ् शोङ्, खोनेउ रम्यूरो । वहासे वहीं, रामपुर उपत्यका कुमी दरवारी, तोग देन माराज | बीच दर्वारके, तखतपर महाराज । गेलमुदेन् शुम् गोर | माराज़स् लातोश् “गुरदास वज़ीर हम् तोइ ? ङ ओम्पे जाइँ ।" गिलमपर दर्बारी । महाराज बोले "गुदात वजीर कहाँ हो ? हमारे संमुख श्राश्रो ।" यह कहने पर, गुरुदास वजीर । दे लोन्न, बेरङ, गुरदास वज़ीर । निश् गुद् हथ् जोरथो “ठ रिङ तोइँ माराज़ १" "रिङ् मिग् ठ रिङ् तोग् किन् रिङ जे ते दुइँ ?” दोनो कर हाथ जोड़के "क्या कहते महाराज ?" "कहना क्या कहूँ, तुम्हारी कितनी वहिन हैं ?” " जी (ले) ज़ी माराज ! ङ् रिज़े मा दुग् ।” "रिड्ज़ मादुग् रिङो, अ पोथूङ सोत्यइँ ।” " "जी, जी महाराज ! मेरी वहिन नही है।" " वहिन नहीं कहते, (तो) मेरा पैर छूत्रों ।" "पोयूरङ् मा सोत्या, श्रृङ शुमूले रिङ्ङ्ग। “पैर ना चूऊँगा, मेरी तीन बहिने । *गुद कन्नौरीमे हाथको कहते हैं ।<noinclude></noinclude> pm8w857hqcl7zjz0rh4ctfop2pnerm2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२५ 250 195540 666283 2026-07-07T16:28:39Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666283 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर गीत ३६३ जेश्मसे रिङ जे मरखोन्योजाङे । जेठी व न मरखोनी जंगीमें । - जाब विपोनू गोरे; मज़ङ सेरिड जे, अकूपा-विश्टु गोरे, कोन्सङ मेरिङ, - जगी विश्वोन् (वंश) के घरे, मझली बहिन, पाके विश्टुके घरे; कनिष्ठा भगिनी, चिनचारसु देवाराम " छ मारिडो ।” श्रानेनु मय्टे, चिनेचारस् छङ रड अपने मै चिनचारस के पुत्र के साथ, ( थी किन्तु) चिनचारस् देवाराम बोला "मेरा पुत्र नही । " वन्टिन् गुरकम्पोती शोड् दरवारोजव् क्योश् । सुन्दरी गुरकम्पोती वीच दर्बार गई । रामपुर उपत्यका बीच दरवारके, खोनउरो, कुमी दरवारी । तोखतुदेन् माराज, गुरकम्पोतिस् लोतीश् “ज़े देव ज़े माराज़ ! ई श्रीर्जी लन्तोक् । हेट् ठ दुश्रोर्जी, “चिनचारस् देवरामस् तख्त पर महाराज, गुरकम्पोती बोली " जयदेव जय महाराज ! एक अर्जी करूँगी । दूसरी क्या अजीं, "चिनचारस् देवाराम, 'मेरा पुत्र नही' बोलता । " 'ग्रड् हृट् मा' रिडी " माराजस् लेतोश, ‘रूवड' ज़ोर्मट् ख्याते ।' स्वङ् ख्वामा, चिनचारसु वङ् । महाराज बोले 'रूप-रंग देखे ।' रूप-रङ्ग देखा तो, चिनचारसका रूप ( था ) | माराज़स् लोतोश् "ग कनोरिड् बूतिक । महाराज बोले “मैं कन्नौर जाऊँगा । नरके गाँव के अपने स्थानी विशेषण होते हैं, यह जगीका विशेषण है। नन्दी, इस घर में कभी कोई मन्त्री रहा होगा ।<noinclude></noinclude> 7dgamr8c6iop3nnb0lgo209kpppdctj पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२६ 250 195541 666284 2026-07-07T16:28:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666284 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६४ कनोरिड-तमासी । दो रि रि बीना, रोश्माले उ चीने । किन्नर - देशमें कनौर के तमाशा की । वाँसे ऊपर थाये, ', रोश्माले चीनी में । “गुरुदान वजीर ! चलो सैर चले | माराज़ लोतोश् “गुरदास वज़ीरऽ ! महाराज बोले पइँ सेली बीते । माज़ा कोटिड पे, मामायु दरशण । देवि चंडिके | " दो शो शो बीमा, थुस्को वेरासी । ज़ी वेरो दरशण । कोठी के बीच, माताका दर्शन । देवी चंडिका का ।" वाँसे नीचे नीचे ग्राके, ऊपर भैरवका, भैरवजीका दर्शन | दो शं शो बीमा, कुमो देवराड । वाँसे नीचे-नीचे ग्राये, देवल के बीच । देवताविमानमे देवी चंडिका । गंगाgrata देवियो चडिके । मारज़ शम्शेर सिस, मिलाकात् लन्ग्योश । दो नेस्-नेस बीमा, जाखोल्यो म्यारिङ । महारोज शम्शेरसिंहने मुलाकात की। उससे परे परे हे झाडीवाली वारंगी । विश्ट् गोरिङदेन, बिश्टू पेरङ् ता । मन्त्रीके घरपर, मन्त्री-परिवार मिला । "किना तो चेइ तोई, गुरकम्पोती हम ताश् ?” "गुरकम्पोती तोशा, कल्पा सेरिड्डा, कल्पा-सेरिड् ङो, ग्यमूडस् तीशेदो ।" "तुम सब तो हो, गुरकम्मोती कहाँ है ?" "गुरकम्पोता (तो,) है, कल्पा के खेत में, कल्पा के खेतो, या ग्लाको पानी देवी ।" राज़ चलग्यो कल्पा सेरिड्डो । महाराज चले गये, कल्पा के खेतों मे । रकम्पोतीयू, जमनाचे चुमग्योश् । गुरकम्पोतीको भटसे जा पकड़ा। *वारंगी गावका स्थायी विशेषण । एक प्रकारका फफड़ा ।<noinclude></noinclude> 67fdfpd5293l5rge8rzjkq1rd9flcbu पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२७ 250 195542 666285 2026-07-07T16:29:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666285 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हिल्नाचे व्यड् ग्योश | "ठ बात रिड् तोई ?” किन्नर-गीत “ग चिनचारस् छङ् रङ्, उमासरन नेगी ।" माराज़स् लोतोश् “वाहा लगेदा, ३६५ (a) कापी और डर गई । "वात क्या कहती हो १" “मेरा चिनचारस्-पुत्रसे उमाशरण नेगी ।” महाराज वोले “भाव (तुझसे) लग गया । अव तो जाना होगा ।" हुनता वीमिंग हाचे ।" "ज़ोरमङ् ता कोरमङ, अमा रङ् बापू | तकदिर लिख्या शिद्, अङ् (भालो) माई । " श्रम चू बेरड शो, चिनचारस् देवाराम । " ग्रड् छड् मा रिडो।" "जन्म और कर्म तो, माता श्र पिता । तकदीर लिखा है, मेरे (अच्छा ) लाही ।" पहिले समय तो चिनचारस् देवाराम वोला (था) "मेरा पुत्र नहीं ।" जादोवेरड् शङ् माराजु पलगीउ । इससमय तो महाराज की पालकी पर बुलबुली सड् हुन् वीमिंग हाचे । पह फटते प्रात. श्रव जाना होरहा । (३) उत्तमवीर नेगी कवि - श्रज्ञात गीतकाल - १९०८ (१) ई० गायिका - विद्याचरनी, ग्रायु - २० वर्ष, जाति-राजपूत, ग्राम चीनी लेखक - रतनचर (मुडनम् ) ता० ६-६-४८ विवरण- उत्तमवीर नेगी कनमूके रहनेवाले समृद्ध परिवारके श्रादमी ये । उनके घरका नाम 'गेलोङ्” था, शायद उनके पूर्वज गेलोड (भिक्षु ने गृहस्थ हुये थे । उतमवीरकी पत्नी व (जुलाई १६४८) नी जावित (६० वर्षको आयु) हैं, किन्तु गीतका नायक कई साल पहिले मर गया । तेरयकी वहिन जी अपने भाई सुनम ना=म चाह ।<noinclude></noinclude> 91rqcu96hbvxrcerhsw1pamfblvx1l5 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२८ 250 195543 666286 2026-07-07T16:29:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666286 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>- किन्नर - देश में निवासी जेलदार तोव्या रामके घर में भिक्षुणी है । उतमवीरकी दी पुत्रिया हुई बुटित् ल्हामो (दीवानसेनकी पत्नी) और हिरकोली । हिरकोलीका पति अगरराम घर-दामाद वनकर गेलोड बशको जीवित रखे है । गीत में कुछ कनम्की बोली के (उद्धरण चिन्हवाले) शब्द भी हैं । दो गोल्यो दङ् शोङ,जङ चोथङ कनम् । जङ, चो थङ कनम्, गेलोङ गोरिड् ढेन् । - वहाँने वहाँ जा कनम् सोनेका मैदान | कनम् सोनेका मैदान, गेलोड (नामक) घर में । गेलाका पूत, उतनवीर नेगी गेलोङ छङा, उतमवीर नेगी । उतमवीर ले तो "ग्रड जोमो नाने ! तोरोगस् तङ् पखोली, हुन मोरछङ् हाचिशे । उत्तमवीर बोला 'मेरी भिक्षुलो बुग्रा ! श्रव तक अबूझ था, अब सयाना हो गया । पोरमी मायेच हाले, पोरमी योग्याम बीतो । छरेव वीरतो केरिङ, नीना ढाई-तीज़ा | ज़ोमो नानेस लोतोश "वंजा छेमा छरेव छरेव, छमा छेरे बहू विना कैसे चले, बहू खोजने जाऊँगा । थोड़ा द्रव्य दे, वीस ढाई-वीत । उतमवीरा ! छरेव् ? भिक्षुणी बुद्या बोली "भाजे उत्तमवीर ! क्यों थोड़ा-थोड़ा, क्यों थोड़ा-थोड़ा ? सन्दूकी वायरिङ, पेता छ गाटा ? सन्दूक लेजा, पैसेका क्या घाटा ? आमचो गिलट् पैसा, तु खयाल रुड्-ग् । बरावर । सथालखू रुङ् रग्, चुली रेमो पुराना गिलटका पैसा, वह दलाख ककड़का ढेर । दस लाख कंकेंड़का ढेर, चुली*गुठली के बराबर । * छोटी खूबानी ।<noinclude></noinclude> 4cbv7n4khb72f55yy4jrqo6q6wkt9hd पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४२९ 250 195544 666287 2026-07-07T16:29:21Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666287 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत नरनर ली हजार, पक्-पक् ली हजार । ,३६७ गिन-गिन के हजार, नाप नापके हजार । दे लोन्ना वेरङ् उत्तमवीरस् लोतोश | यह कहने पर उत्तमवीर वोला । "बैठू छोपेल हाम् तोनू, तोनू ठ बैठूं ? "तत्रा" चावीम वीरा, कोरती खोनाचो । "बैटू छोपेल ! वहाँ है, कहाँ है चाकर । शुभ् शड् दुरू, काचु घोड़ा लाने जा, कोरतीके मैदानसे । व्याकारा, ढाई बीस घोड़े ( वहा) से बीनकर ला | डाईनीज़ा तावा, वीन्या मताई गोन्मा । तीनसाला बछेड़ा, बछेड़ी बिन व्यायी घोड़ी | तिङ् डो से तावा, बङखोनो थोरिङ ।” तुन्दर चालका घोड़ा, पावके ऊपर लच्छन । पलबोरो वेरड ताबा पोंच्याग्यो । पलभरके समयमे, घोडा आ पहुँचा । पोङ खातङ चो, तवाता) तद् तद्द् | नीचे द्वारपर घोड़े को देखके । - उतमवीर खुशी हाचि ग्योश, खुशी हाचियोश् । तावा पन्होन पद्दन्यो, चीलडी रङ् श्ररगा । मारो रड् माटन, यापचेनू रोनो । रडू पतलू अरगा । उत्तमवीर खुश हो गया, खुश होगया । घोड़े को पहनाव पिन्हाया, घन्टी और घुघरू । यास्तरण और जीनपोश उत्तमवीर नेगी, तावा "थोरिड्” शोकनिस् । उत्तमवीर ताबा, गोठ् युलोमा पक्ती । । लोहेकी रिकाव । पीतलका बुध । उत्तनवीर नेगी, घोड़ा ऊपर सवार हुआ । उत्तमवीरका घोडा गोड्युलके योगा । चाकर ।<noinclude></noinclude> a43m7s75tfvk8czey9urtcul4f2m5rd पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३० 250 195545 666288 2026-07-07T16:29:31Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666288 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६८८ किन्नर - देश में उत्तमवीर ग्ररगा, शुम्-छोश्रो रोन्यातो । दोरिङ् रिङ् वीमा, थङ् लिड गोडयुलो । उत्तमवीरका बुध, शुमलो में गूजा । वासे ऊपर ऊपर जा, थङ - लिड में गोडयुलके । मारवोरिस् गोरे मारवोरिस् न्योट जाई । नामङ ठ दू गयोश्, नामङ् ठ दू ग्योश् ? " मारवोरिसके घरे, मारवोरिसकी दो जाई । नाम (उनका ) क्या था, नाम ( उनका ) क्या था ? - नामङ तालोन्ना, नीछोरङ सेर यङ् । नाम तो कहिये, जोलो और सेरयङ् । 'न्छन् ता जीछो, चालाक ता सेरयङ् । जीलो माइटङ छेछाङ । सुंदरी तो जीछो, चालाक तो सेरयङ । नीलो मायकेकी कन्या । *“श्रृङ ्म भावो मा वदा, सेर्यङ— यालू ज़ोमो !” - चालाकी ता ग्याशी, गोर-वनु मा पकनी । "मेरे भाव मे नही जची, सेरयङ् यालू भिक्षुषी । " चलाक तो चाहिये, घर-वन के योगा | "चालक पोरमी फीमा, गोर-वन चाल्यातो ।” उतमवीरस लोताश्, “पन्ठङ बङ पेरङ् । - "चालाक बहू ले जाये, घर-वन चलायेगी " उत्तमवीर बोला, “घर भरके लोगो । कितान् ता तोच्, सेरयङ्लोनिक् हम् तोश् ?” “सेरयङ् ता लोन्ना, थड् गोन्पो कुमो । लामा चेईनो बागे, ज़ोमो चेइनू दूरे । - तुम तो हो, सेरयङ नामक कहाँ है ?” “सेरयङ् तो कहिये, ऊपर मठके भीतर ! लामा सबसे पीछे, भिक्षुणी सबसे आगे । * शुम्ली = लनङ, कनम्, स्वीलोकेगाव तुङ नम् गाव | | गुलाब का फूल । |<noinclude></noinclude> gtiwryorjtsanyevg1a75osls1xzl91 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३१ 250 195546 666289 2026-07-07T16:29:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666289 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर गीत ' ३६६ भुम् पोती स्तीलो ।" गुद चुमचुम् कातोश्, बाहरे गोन्पागू | उतमवीरस् लोतीशू ' सेरयड बालू जोनो । रिड जे या रिङ ज़े ! - हाथ पकड़े लाया, प्रज्ञापोथी पढ़ती ।" बाहर मे मठके । उत्तमवीर "वाला "सेरयड बालू भिक्षुणी | बहिन हे वहिन ! मोरात हाले दूया, काशी ग्रांमीचू वातढ् ।” सेर जामी लोतांश "फाने गोन्दीमा जुइँ | विचार ( तुम्हारा ) कैला ? हमारी पहिली बात ।" सेर भिक्षुणी बोली "पहिल सवेरे नही आये । हुनाग यालू जामो, 'छोसों बरछोत् तोक् । बरछत् बन्ना, वरछोत् सिल सिल शेते ।" , अव में बालू भिक्षुणी + धर्ममं वाधा श्रायेगी । धर्म में बाधा होगी, तो वारक पाठ करायेगे ।" विहारमें भोज देंगे | उस् मढचा फुलतो उत्तमवोर नेगी सेर्यङ् लिक्शिस् वीग्योश | उत्तमवीर नेगी तेरयको साथ लेगया । छानेनु गोरे जोमो, नाने लोतोशू । " बन्जा उतमवीर ! जोमो पोरमी ट कहूँ ?" अपने घर में ( जानेपर ) भिक्षुणी बुग्रा वोली । "भॉजे उत्तमवीर ! भिक्षुणी वहू क्यो लाये ? " (५) पोष्टिङ फविवित्री -- बनाओ और खइलो भगिनीद्वय, खइटो ग्रायु - ७० साल गायिका - हिरपोती, आयु-४४ दप, जात्-वढई, गाँव- कोटी ( गीतकाल -- १६२० ) लेखक -- पुण्य सागर नज्ञापारमिताकी पोथी भिक्षुणी व्रत में । ता० ३०-७-४८<noinclude></noinclude> j0xtdn1l1k3oyb521mmi9fp0ggozeii पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३२ 250 195547 666290 2026-07-07T16:29:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666290 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०० किन्नर - देश में विवरण - कोठी (कोटिड पे ) किन्नरका पुरातन केन्द्र है, जहाँ की देवी चंडिका सारे किन्न में प्रसिद्ध है। चंडिकाको पार्वती दुर्गा मिलानेका प्रयत्न न कीजिये, यह पहाड़की देवी है, जिसका अपना पृथक् वशवृक्ष है। पूजा और होनके समयका यहाँ वर्णन है । , दो गोल्यो दड शोड, माज़ो कोष्टिपे । वहाँ से वहाँ कोठी के माझे | देवियो चडिके, शुम् बोड् बाहेर । थुको बैरासी । देवी डिका, तीसरे वर्ष बाहर (आई)। ऊपर भैरव के (आगे)। चडिकेस् लोतोश् “ग्रड् कम्दार हम् तोइँ । ऋङ् श्रोम्पे जारइँ ।” चडिका बोली ' मेरे कामदार* कहाँ हो १ मेरे सम्मुख जाश्रो ।" देवेरङ, निश् गुद-दथ जोरयो । 'ठ रि-तो मामइ, मामइ चंडी के ? " रिम्ठरि तोक्, पोतिष्टङ् लम्मिग बन्स रियाते । यह कहने पर ( कामदारने) दोनोकर हाथ जोड़ा । "क्या कहती हैं माता, माता चडिका ?" कहना क्या कहूँ, प्रतिष्ठा करनी ( है ) । भाजे बुलाया । वन्जस् अरियाते रोगे नारेनस् | भाजे बुलाओ रोगी के नरायणको । र चीने वन्जस् विश्नू नारेनस् । और चीनी के भाजे विष्णुनारायणको । +शीशेरिङ् डबर, रङ् †मरकारिङ् । र† । रोग नारेनस्, कनारो थीम्यार । शिशेरिं देवता और मरकारिङको बुलायो । रोगी-देवता नारायण भूतोको याम्हें । चिने नरेनस कैलस थोम्या रई । चीनीका नारायण, कैलाश को थाम्हे । शेशरिड् डबर र क्रूमो थोम्पारई । शेशरिङ् देवता, पर्वत वीच था है। मरकारिड डवर डेवोरङ थोम्यार । मरकारिङ देवता देवलको थाहै । *कारवारी पी का देवता ख्वानीका देवता ।<noinclude></noinclude> 0otejhe2la5jhr0687spelliyf17y7e पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३३ 250 195548 666291 2026-07-07T16:30:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666291 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर गीत कालिका देवी वहेरो थोम्यारह । यो वामने होम्बुकार लानो ।” ४०१ कालिका देवी भैरवको थामहे । ब्राह्मण युगल होम कार्य करे ।" देवी चडाने जकु देन् तोशिस् । देवी चंडिका अपने यज्ञ मे बैठी । होम्बुकार लाने रड् शेशोरि डबर वोक्योश | चडिकेरोशायोश्, शीरडो मे वारो । बायडू देत्र हिलेदो, दम् विन्निक् मादु ।' होम कार्य करते समय शेशोरिङ् देव आया । चंडिका रोपमं ग्राई, चेहरे से ग्राम वली । वा हिल गई, भला होने को नहीं, , विघ्न हो गया । बिगनी ता वोयो । (५) सागर सेन कवि-अज्ञात गीतकाल -- १६२८ (१) गायिका-- रामदेवी श्रायु १६ वर्ष - जात कनैत ग्राम-चिनी लेखक - रतनचंद विद्यार्थी छठी श्र ेणी (मुड्नम) ता० ६-६-४८ विवरण - तागरमेन मुटराका रहनेवाला था, जो चिनी तहसील के बाहर के कनौर पड़ता है । जगलमें पेड़ दुलाई-चिराईका काम हो रहा था, उसीमें लकड़ी के स्लीपरके या गिरनेसे मर गया। गीत जहां-तहा पूर्ण है । दी गोले द शोड़, राटोली ग्रोस्नम् । बहाते वहा राठीलो मुडरा । कोदारट् डानेउ नुस्कों, लोदड् दास् गरे । कोदार वाहने परे, लोदङ् दम्यस घरे । पानीतो या मातोइ, मातो मा वत्कङ् । पूत है या नहीं, की वात नहीं । श्रनेनु शुभ् पाजी, नाभडू ठदु गयो ? उसके तीन पूता, नाम (उनका ) क्या था ? चो साउ नाम सागरतेन पिंजारी | जेटेका नाम, साउना, बुदारान बैनर विचलेका नाम, २६ सागरसेन पुजारी । बुदाराम भैयार ।<noinclude></noinclude> g60ikerm7qygd0ocr4oqdbbybn1p95w पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३४ 250 195549 666292 2026-07-07T16:30:15Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666292 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०२ किन्नर - देश में बहूचे साउ नामड, मोनसुखदास चैयर । छोटेका नाम था, मनसुखदास भैयार | दो शुम् लिउ पानी, हातु लो वन्ज़स् १ ये तीनो पूत (ये), किनके भाजे । हातुलोमा लोन, छलचो घन्जस् | (और) किसी के नहीं, छल्के भाजे । सागरसेन गुरवई हात् दू गयोश ? गुरव ता लोमा, स्पूलिङ् विश्ट छाडा | सागरसेनका मीत, कौन था ? मीत तो कहिये, पुलिंगी मन्त्री पूता नाम ता लोन्ना, बोदरीसेन नेगी । नाम तो कहिये, बदरीतेन नेगी । सागरसेन पिज़ारिउ पोरमी, नलचे फनमु जाई । रुपी लमटू वन्जी, शिवदयाली वन्दिन् । सागरसेन पुजारीकी बहू, नचार फननूकी जाई । रूपी लमटकी भाजी, शिवदयाली वन्छिन् । वोदरीसेनस् लोतोश गुरवई या गुरवई । बोदरीसेन बोला मीत के मीत ! पहॅ सेली बीते, ते-ग्रोस्नम् नुस्को । चलो सैर चले, बड़े बुडराके पार । ते-ग्रोस्नम् नीचोलु, कोनीच छुकशिम् । वड़ेतु रा अपने मीतते मिलने । काशद कोनीच साथै थारू राब्शन्मू । हमारे मीत के साथ वाघ मारने । देलान् बेरड, सागरलेनस् लोतोश् । "नाने या नाने! ग काम बूतिाक । नलचे जंगलू कुमो, ढुलान चिरानु कामङ् ।” यह कहनेपर, सागरसेन ( बुलाते ) वोला । "बुना हे बुना ! मै कामसे जाता हूँ । नचारके जंगल भीतर ढोने- चीरनेका काम । " ני नाने ता लोतोश " बन्जा सागर सेना ! बुचा तो बोली "भाजे सागरसेन ! की काम था बी, दुलान कामड दम् मइ । गेली गिराइबूीतोक्, शी का शिम्बीता । तुम कामपर न जानो ढोनेका काम अच्छा नहीं । ' सिल्ली गिरके आयेगी, मृत्यु तेरी लायेगी । ।<noinclude></noinclude> 2yy6swgzgvz3kp3k5yc3nnkqdpr4673 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३५ 250 195550 666293 2026-07-07T16:30:26Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666293 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर-गीत ४०३ पैसा चुठ गाटा, पैसा गाटा भइ ना । वाशुरी पाटी शेतो, लदख चूल वाशुरी । पीतलु पाटी ससार, मुलु पाटी शेतोक । पैसे का क्या घाटा, पैसा घाटा नहीं है ।" बाँसुरी पट्टी लगाऊँगा, लदाखी खूबानीकी वाँसुरी । पीतल पट्टी लोगोंकी, रूपेकी पट्टी लगाऊँगा । शीमिक् वी माशी, सागरसेनु शीमिक् । मौत श्रा गई, सागरसेनकी मौत । माऊस् तड् जुम्विक् कोख मा ग्याशी । शिवदयाली बन्टिन्, का तो शीरड चाले । सरशिम् सागर सेना, अनेनू इपटो रिट जे 1 विन फूले मुझसे कोस ना जाये । शिवदयाली सुन्दरी ! तुम बैठना चाहती । सागरसेन चल वसा, उसकी एकलो बहिन | नाम ना लोना, कुन्डा ता बन्धिनी । नाम उसकाकहिये, कुन्डा सुन्दरी । कुन्डा वन्दिनी दुलकुलिङ करावो । कुन्दा सुन्दरी छलछल (ग्रासू) रोती । ठुल्ठुली करावो, वाशुरी ख्याउ करावा । बाशुरी ख्याउ श्रानेन् युडजू बाशुरो । "श्रट् युजे बाशुरो चादी पाटी शेशे । छल-छत अँा) रोती, वातुरी देखि रोती । वातुरी देखि, अपने भाईकी वामुरी । "मेरे भाईकी बासुरी, चादी पट्टी लगाई तर मा रशिशू । किसी को न मिलती ।" (६) युमदासी (प्रज्ञादासी) कवि - प्रजात गीतकाल -- १६३२-३३ ई० भाविका विद्याचरणी श्रायु- २० साल जात-कनेत गाव-चीनी - लेन- नगत सिंह २-६-४८<noinclude></noinclude> tll0jkwmuljhgz425c5tdwci9l134sk पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३६ 250 195551 666295 2026-07-07T16:30:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666295 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४ ०४ किन्नर - देश में अनोचो देना शोवड श्रनोचो देना ठमा लोना | ग्रनोच के ऊपर शोव, श्रनोच के ऊपर क्या नहीं कहैं । ठटी देना शोव | चबूतरेके ऊपर शीव | उंटी देना शो मासु गोरिड् देन । पोर्मा हम्चा दूगयोश ? चबूतरेके ऊपर (सा)शोवङ् (गाव), महता घरे । पत्नी कहाँ की थी ? पोरमीता लोन्ना, याना देश, छेचा, हातु लो जाई ? पत्नी तो कहिये, जानी गॉवकी कन्या, किसकी ( थी) जाई ? हातु लोन् मालोन्, होमटो जाई । होम टो जाई, नामङ् ठ दू गयोश ? नाम ता लोन्ना, बन्छिन् कमला देवी - (और) frant नही, होमस्ट्रोकी जाई । होमो की जाई, नाम (उसका ) क्या था ? नाम तो कहिये, सुन्दरी कमला देवी । बन्छिन् कमलादेवीयु, ठकुखिङ् दू गोश ? ठ कुखिड् दू गयोश श्रनेनू इपटो पानी । ग्राने इपटो पाजी, नाम ठदू गयोश ? सुन्दरी कमला देवीके, क्या कोखमं था । क्या कोखमे था, अपना बेला पूत । अपना अवेला पूत, नाम ( उसका क्या था ? नामङ् ता लोन्ना, रतनसीग नेगी । नाम तो कहिये, रतनसिंह नेगो । रतनसींग नेगियु, पोरमी हामूच दू गयोश ! 4 रतनसिंह नेगी की पत्नी कहाकी थी। पोरमी तो लोन्ना, यो छेचाचन् । पत्नी तो कहिये, येकी कन्या । यो छेचाचेन, हातू लो जाई ? न येकी कन्ना, किसकी (थो) जाई । हातुलो मानी, मेवानी जाई । ( और ) किसीकी नहीं, मेबान्की जाई । मेवानी जाई, छातुलो वनूज़िक ? मेवानी जाई, किसकी भाजी /<noinclude></noinclude> 944ye3leuinph9lvzk6x5y5enc2w4gk पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३७ 250 195552 666296 2026-07-07T16:30:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666296 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत हा लो मालोन् साला रेपाल वनजिक । साढला पाल्टू बनज़िकू, नानड ठ दू गयोश ? ४०१ (और) किसी की नहीं, साङ्ला रेपल्टूकी भाजी । साला रेपल्टू भाजी, नाम ( उसका ) क्या था ? नाम तो लोन्ना, वन्न् ियुदासी । नाम तो कहिये, सुन्दरी प्रज्ञादासी । बन्टिन्युनदासी, ठकुखिङ् दू गयोश १ कुखिङ् यूने जर नर मुनिवास कुखिङ् । सुन्दरी प्रजादासीकी, क्या कोखमें था ? कोखमें सूर्य उदय, सोनेकी कोख (थी ) । ग्राने न्यटङ् पानजीयु, नामड ठ दू गयोश ? नामङ ता लोन्ना विद्याचद र रामपाल । उसके पूतांकी जोड़ी, नाम (उनका ) क्या था ? नाम तो कहिये विद्यावद श्री रामपाल । x मे ग्रामास लोतोश “नमशा युम्दानी । नशा युदासी ! पालेस् श्रीम् ग्यातो । 1 सूजी बोली "बहू प्रज्ञादासी ! बहू प्रज्ञादानो ! चरवाही जाना चाहिये । नोड देन पालेस् । जा रज् देने पालस्: बीमे पागानु पगलेत् । नोरट्पर चरवाही । नोरदार चरवाही, चनरीचमर चराना । जीने यागानु पालेस् बोतर मर चापरि ।" चमरी चमर चराना, मट्ठा माखन लाना ।” युम्दासिस लोतोश 'ड्युने क्रमा ! प्रज्ञादानी बोली '(है) मेरी साबूजी ! किनो जवाब देती । तुम्हे जवाब देती हूँ | किन ज्या केोकून पालेत् मक । , तुम्हे जवान देती हूँ, ने चरवाही ना जाऊँ ।<noinclude></noinclude> qiy5h45dr7afldwboj6lgg9yud7883a पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३८ 250 195553 666297 2026-07-07T16:30:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666297 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०३ किन्नर - देश में ङ् डेय दम् माय, पन्ने सुटी शेते । विद्याचद र रामपाल, "दे लान्ना वेरङ् । कमला पोतीस् लोतोश् नो व वात ' रिट् तोइँ | मेरी देह अच्छी नहीं, पूतो को भेज दें। विद्याचंद और रामपाल " यह कहने पर । कमलावती बोली 'यह क्या वात बोलती ?' नमशा युमदासी ! किनू वूीम सिन्ज्यातो । हाले माबुिक रिङतो, गोर छङ् ले पालेस् । गोरड ले पालस्, हातो सिन ज्यातो । वह प्रज्ञादासी : तुझे जाना होगा || क्यो 'नहीं जाऊँगी' कहती, सासरे चरवाही सासरे चरवाही, किसको नहीं जाना पड़ता है तुझे जाना होगा ? किनो सिन ज्यातो । न्टिन्युदासी बीगयोश नो रड देन् पालेत् । नो रङ देन पालेस्, ढाई गोली पालेस् । ढाई गोला दीया, खोरग्यु माजन् सरसर | द्विक्यो | सुदरी प्रज्ञादासी गई, नोरङ पर चरवाही । नोड पर चरवाही, ढाई मात चरवाही । ढाई मास पीछे, उदास तुखी पड़ी। डंडेके उपर निकली | डानियु देन द्वाद्वा "हाह भगवान ठाकुर ! युभे कुटोनो लानाशित् ।" डेके ऊपर निकली "हा भगवान ठाकुर ! , सास कुटनीने कर दिया। कोट था छड वल, श्रखा क्योदु । कोटका गेठिमें सिर दर्द दे रहा । ढाई गोलो दोम्या, उख्याद्द् वदारिङो । ढाई मास पीछे 'फुलाईचा आई” वोले । tएक महोत्सव<noinclude></noinclude> 2zkb8abwjovqqke9l00ysnseyte61u7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४३९ 250 195554 666298 2026-07-07T16:31:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666298 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शालङ् योवा चप् ग्योश । किन्नर गीत उख्याङ् ठटीचु देन् ज़ये बन्छिन् हात् तोश् ? जये शोकिन् हात् तोश १ ४०७ पशुगण नीचे उतरे । फुलाइचके चौतरे पर, सबसे सुंदरी कौन थी ? जये वन्छिन् लोन्ना, वन्न् ियुमुदाती । बड़ी शो कियू छोटियु मलूडोगड् । सबसे शौकीन कौन थी ? "सबसे सुदरी कहिये, सुदरी प्रज्ञादासी । सबसे सु दरीकी छोटी ग्रायु मृत्युलोकमे । मदानी वलदेन शुम् डालड् गुलबास् । सम् बेला चांबे, निम्लाइ बरड रिमाची नलग्यो । प्रज्ञादासीके सीस पर, तीन गुच्छा ( था ) । प्रात. बेला कली, सायवेला एकदम मुरझा गई । ठ बीछल हाचे, हेद् बद्दल मानी । युमदासी यानेनो वीछत पर परिवातोश् डेय पीर पोडेदाश, मासोके न पीरट । क्या कारण हुआ ? और (कोई कारण नहीं | प्रज्ञदामी अपने कारण, व्याधिमें पड़ी । देहमे व्याधि पड़ी, या व्याधि । फीस | मनाटी मासोक्याच श्रपसेान । मनमेंस युमदारिस लोतोश " नावाचा प्रेमी ! रचक्रो हुन्याशे, डर तोल्याम् वीरहूँ। " रतनसिंह की ग्योश, हिल हित गढ़ जेर गश । प्रज्ञादासी बोली '[हे मेरे ] प्रमके पती ! वही मरेंगी, देव उठाने (पूछने) जाओ ।" रतनविह गया, चमचम प्रकट हुआ । गादेन डम्बर तोप्या दोरा । देवता विमान में देवता उठाया । होली जैतीदेवताका सवारी विमान ) ।<noinclude></noinclude> jovnwqptwdb5k710nktkdsngcnqzsdp पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४० 250 195555 666299 2026-07-07T16:31:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666299 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०८ किन्नर देश में डंवर तोल्याइश शोड नरेनस् । देवता उठाना, शोका नरेनस (देव) | डोम्बोरस् लोतो, 'जु माजो लाये हूत्यो । देवता बोला 'इस मध्याह में, ठूल्यो जान्या चुत् कन् पश ग यानी ।" रतनसिंहिंस लोताश्” पद्शो हाल रिङग्योश | की सोथिडो डम्बर अरजी चु तडिस्, क्यों तूने उठवाया, तृण पूला मै नहीं ।" रतनसिंह बोला "तृणपूला किसने कहा ? जचु तडिस । रजी मोन्या रहूँ । “पोरमी पीरड् पोरयाश् दोशङ् खोरया रिड् । " दोश खोरयाम् वस् आप शक्तिमान देव, रज करनेके लिये । अरज करने के लिये (उठाया ), अरज स्वीकारो । (बता) देना । " "पत्नी व्याधी पड़ी, दोप- कारण क्यङ् चमनङ् मा ताल्याश् । डोम्बरिस् लोतोश् “नतङ् शत् मादुक । दोप कारण बताना दूर, मूड़ नहीं उठा । देवता बोला "मुझे (भला) नहीं दीखता । नो रङ न् यूने, रेन्निगो त्यारी। उस पर्वतपर सूर्य, डूबनेको तैयार । होट्याशिम् मारके | हटा नहीं सकता। रतन सिंह बीग्योश पुजिरो कुमी । रतनसिंह गया चारदीवारोके भीतर । युमदासिस् लोतोश 'डम्वरस् ठ रिड. श् ?” प्रज्ञादासी बोली "देवता क्या वोला ?" रतनसिंह नेगिस् लोतोश द रिडिम् वस् थङ । चमन हि मा हिंल्याश पोरमी या पोरमी ! किंतु हाचिमिड मुशकल । " रतनसिंह नेगी वोला "कुछ कहना तो दूर । मूड भी नहीं हिलाया, पत्नी है पत्नी ! तेरा रहना मुश्किल ।"<noinclude></noinclude> t7ll1z2ayspl9nrhkf402r6ttf3qcjj पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४१ 250 195556 666300 2026-07-07T16:31:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666300 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर-गीत ४०६ युम्दालीयु मिगो, ठुलठुली मिस्ती । ठुल्ठुल् कराव् ग्येश् । प्रज्ञादासीकी श्रॉखमें, छल-कूल सुधा । युमदासिस लोगोश 'श्रवोचा प्रेमी । छल-छल रो पड़ी । प्रज्ञादासी बोली " ( हे मेरे ) प्र ेमके पती । हेतु लोशिश् दयलो, थुमो पाजी। और वात रहे, मेरी गोदके वच्चे, हातो लो गुढो । किसके हाथमे ? मावोची प्रेमी । ग्रड् सुत्चेत् ना । प्रमके पती! मेरा विचार करो तो । हात पोरमी था फीरहूँ । 1 हासू पोरमी फीमा, पाञ्जिनू गाटा देतो । फितांकी चल्मा, ग्रह वइचेची फीर | दूसरी पत्नी ना लाना । वईचे निसवबाग, पन्जे शाद्वातो ।” दूसरी पत्नी लानोगे तो बच्चो को कष्ट होगा । यदि लानाही चाहो, तो मेरी वहनिया लाना । बहनिया निमवबाग, बच्चाको पालेगी ।" शमशम् तुरम् मदामी हुन्याशू । गोधूली बेला प्रज्ञादासी डूब गई । छि छिन् जरग्योश शुप्याज देस्का । उपाकाल प्रकटे देवपक्षी जैसे । रालो चाड चपग्यो शुरिशड् कुत्र्यायो । कवि - प्रज्ञात (नदी) तटके घाटे उतार पद्मकाठे फूंक दिया । (७) बेलीराम वावू गीतकाल -- १६३६-३७ ई० ग्राम - चीनी ता० २-६-४८ गानिका - तुखदेवी, प्रायु-१६ वर्ष जात - कनैत लेखक - भगत सह बीचा डेनोई यू बाबू, नामड् ठ दू गोश् ? नीचे से ऊपर (आना) एक बड़ा बाबू, नाम (उनका ) क्या था ? नामदूता लोना, बेलीराम बाबू । नाम तो कहिये, वेलीरान बाबू ।<noinclude></noinclude> qpdwsl3xq3pm6xdaywzq95x13xiptxl पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४२ 250 195557 666301 2026-07-07T16:31:44Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666301 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१० किन्नर देशम दो डेन् डेन् बन्ना, रेशमालो चीने, वहाँ से ऊपर ऊपर थाये, रेशम मी चीनी में | रेशमसी चीनी, कैसी जगह है ? रेशमालोचीने, व जागा दूगयीशू ? छुनेस्क्यु जागा, सरान दरबार देवकी । कैमी सुदर जगह, नगहन दर जैमी । 1 रिको ख्यामा सोमोने कैलास | ऊपरकी ओर देखे, मानने के स कैलास परवतीयू, शुम्जब डालदोश | शिव-पार्वतीको तीनचार प्रनाम है। लोकोच ख्यामा, ठ जागा दूग्याश ? उ-ली तरफ देखे, कौन जगह है ? छान मुलको । दो लोलो बिन्ना, रंग व इयू देन् शो ! रंग- वईियू देशो युगणे पानी तु तुड् । यह नगरका स्थान । उससे उरे उर ग्राये तो पाथर वापी ऊपरे । पावर बापी ऊपरे cडा पानी पीवर, माग्रिक्शे ऐतुमिक् नहीं तृन हो पाना । वहाँ से परे परे जा, शीतल पंगी वगला । दो नेस् ने वीमा शीलसु, कोज़ड वडलो । वेजीराम बाबू, गुरवई हात् दूग्योश | वेलीराम बाबूका मोत कौन था ? गुरबई ता लोन्ना, ख्वड योजायू छाडा । मीत तो कहिये, ख्वागीरे बेज़ाका पूत । होल मैनारा । नाम ता लोन्ना, होरू वैयारा । नाम तो कहिये, वेलीराम लोतोश् गुरवई या गुरवई । बेलीगम बोले मीत हे मीत ! राक तु मिकू चल शे, बेज़ागू छाडा होल | किंगोटीयू, मायी, अडरेज र गुरवाई र दरम् वाई । सुरा पीना चाटते, बेनाका पूत होरु । गुरवाई | तुम घटिया नहीं साहेब के मील कुन्नीगु वीर, जाखोर्यो य्वारि । मीत और वरम भाई | बुलानेवाले हो जाओ, झाड़ीवाली पारगी ।<noinclude></noinclude> cy9p4w5vxm5syj3uskum13qtv0ic56w पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४३ 250 195558 666302 2026-07-07T16:31:55Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666302 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नीमच्यानी गोरे । किन्नर - गीत मीमध्यान, जाई, नोरपुरी वन्टिन् । हो मैयालस बीग्योश, जाखोरों व्यारि । होल वेवालसू लोनोश “रिजे या रिड्ज़े ! ४११ सीमच्यान् के घरे । सीमच्चान्की जाई, नरपुरी सुन्दरी । होरू मैया गया, झाड़ीवाली व्वारगी । होरू भैया व'ला ' बहिन रे बहिन ! बुलाने को भेजा, वेलीराम बाबू । चलो चले पगी, पीके बगले ।” नरपुरी सुन्दरी शाम होते स्वारगी, रात पगली बगले । । नगुमी शोचेश, वेलीराम बाबू बीते प क जड, कोज़ड वडला " नरपुरो वन्दिन् तुरेरड् व्यारिड् । शुपाकोट वडलो । ढां नेस ने बीमा, शीलन कोज़ड् वढलो । वेलीरामस् लोतोश " कोनीच या कांनीच " वासे परे परे जा, शीतल पगी बगला । वेलीरान बोला "प्यारी हे प्यारी !" चाहकी नारी, चारपाई पर बैठो चारही नारी । चाद क्या है ? । भावांची पोरमी, चारपाई तोशिएँ भावांची पारमी, मारोठ दुदया ? "जा मिगृ भावा दुषा, लाचिग्बू भावो दुश्या ?" नीरपुरीस् लातोश्, “लान चम्पू भावा मा दुग् । जा निक् ना स्यातांक्, रोपड जोदु चपटी | "भांनकी चाह है, पहिरनकी चाह है ?" नरपुरो वंली "पहिरनकी चाह नहीं है । । भोजन तो चाहिये, रोपड गेहूं की चपाती । -भारा, पोवडू।" काले उड़द की दाल ।” नरपुरी पन्नू, पेटीये दू पोश । रोनित्चा ज्ञाग्याशू । वरपरी सुन्दरी, कैनी पेटू थी (वह) | बारह चपाती खा गई ।<noinclude></noinclude> 6qhk8ckn7h8anzjipbngnxufhkfyn43 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४४ 250 195559 666303 2026-07-07T16:32:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666303 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१२ किन्नर - देशमें शुपा कोज़डू बदलो, सटरेड् छोजुरट, जीमीचु पोरी । नोरपुरी बन्छिन् ठ लोची बुदा १ ' रातको पणी बगले, सवेरे छोजुपर्वत खेतकी रखवाली। हेद् लोबा मानी, रोग् जोद चपटी । - माशु पैथ, चोपर मार कवि - सूरजमनी पारे । नरपुरी सुन्दरी को कितना लोभ हो गया । और लोभतो नहीं, पड गेहूं की चपाती । काले उड़द की दाल, मक्खन तरावर । (८) सूरजमनी गीतकाल - १६३६ ई० जात- कैनत ग्राम-चिनी ३५ साल " " " विद्याचरनी ग्रायु- २० साल गयिका - जोमो बागपती " लेखक -- भगतसिह ( विद्यार्थी) और पुण्यसागर " ता० १-६ ४५ वल्-खोन रिंगनिम, पल्टूचा गोरिडी देन् । खल्दूचो गोरिडो देन् । पगंनेके सिरे मोरङ्, ख्यल्टू के घरे, रूयल्टू के घरे । ख्यल्चो गोरिंङो देन्, ख्यल्टू इपटो जाई । ख्यल्टू इपटो जाई नाम ठ दूगयो ? नाम ता लेना, बन्छिन् सूरजमनी । ख्यल्टू के घरे, ख्यल्टकी एकली जाई । ख्यकी एकली जाई, नाम (उसका ) क्या था ? नाम तो कहिये, तुन्दरी सूर्यमणि । सूरजमनीयु हुनूची, स्यानाजीत् दोर् वीनोकी । वारिङ् का तोग्ङो युन्तांक्, वारिङ पस्राडो तोशक् । सूर्यमणि (का) मन था, सेना जीतको व्याहना । बाहर के सारे चलूगी, वाहरली और बैठगी ।<noinclude></noinclude> kulredpazad32azp2091bgqk27mray9 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४५ 250 195560 666304 2026-07-07T16:32:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666304 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत स्थानाजीतो मुन् चो सूरजननी फीतोक् । सूरजमनी फीसत, शीमि मा वच्यो । ४१३ सेनाजीत (का) विचार था, सूर्यमणिको लाऊँगा । सूर्यमणिके व्याह तक, मृत्यु नहीं रुकी । सेनाजीतु शोमिक, माउस तद् जुम्मिक् । माउस तब ज़म्मिक वस क्यड् मा ज्ञार् मेन्निक् दम् दूँ । स्वानाजी सेनाजीत का मरना, बिन फूले नुना । बिन फूले मुझसे तो, न जनमना अच्छा । नवे सूरजमनी इल्मांप्यार लग्योश् । सूरजमोनिस लोतो, "बापू या बापू - נגן सेनाजीत के डूबनेपर, सूर्यमणिको विद्याका प्रम हुथा । सूर्यमणि बोली 'बापू हे बापू !” प्रयो लोशदु ग्रड् प्रयोमा वीक | फागली हुशोक, ग सकूला वति । मेरे व्याहकी कहते में वाहन जाऊँ । मैं पोथी सीनूंगी, ने स्कूले जाऊँगी । चीनो स्कूली कुमी, इलम पका लोशडु । लेग्यो छावनी चीने, स्कूलो मस्टर हात् तो ? चीनी स्कूलने, पक्का इलम (६) बोलते । बड़े नगर चीनी, सूतके मास्टर कौन हैं ? हातो (लो) मा लोनू, बाने दुकानो अडा पानी काढा, नाडू ट द्गवांश ? (और) कई नहीं कहो, चीनी दुयनिका पूत । दर्पानका पूत, नाम (उसका ) क्या था ? नाम ता लोना, जी नूप सिंह मास्टर । नाम तो कहिये, भूपदवी मास्टर | गोप्यन्यसूची, तेले डेखरा चन् हरीलाल मास्टर | उसके बाद तेलगी पुरुष हरालाल मास्टर |<noinclude></noinclude> ccu5a3xiy5ea2vhzgwetp9w89a940bf पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४६ 250 195561 666305 2026-07-07T16:32:28Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666305 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१४ किन्नर - देशम 1 दोगोल्यो न्युम्ची बारड् मासुछाडा। उनके बाद वाले महता पूत ? नामड् ता लोन्ना, मोहन नाल मास्टर नामता कहिये, मोहनलाल मास्टर | दोगोल्यो न्युम्ची, बाबू नराननसिंह मास्टर | ठ होशियार ताक्योश्, निश नुकरी चाल्यो । उनके बाद बाबू नगया मिह मास्टर | किनने होशियार है, दो नौकरी चलाते । इद् ता डाखाने बाबू, इत्ता मकूलां मास्टर । एकता डाकखाने बा, श्री एक स्कूल के मास्टर | : वापुस्ता लाताश "ग्रड् चीने ग्एज ! बाप बेला नेती बेटी सूरज | ठ चीने वीम् ग्याच, रिदङ् रुकूना वीरहूँ ।" रिद सकूली कुमो, मास्टर हात् लोकिश ? क्या चीनी जानेकी जरूरत, दिव्वा स्कूले जइयो । रिव्वाके स्कूलमे मास्टर कौन है ? मास्टर ता लोन्ना गवीरचंद मास्टर। मास्टर तो कहिये, गंभीरचंद मास्टर । सूरजमनी ल तो 'गुरुजी ! परनान । सूर्यमणि बोली 'गुरुजी प्रणाम । ग सकूना वितो, ग कागली हूशोक् शेक् अखरङ् शेस्तोक्, ग नुकरी लान्तोक् मास्टरानी हाच. कु, कन्या पाठशाला खोल्यो तोक् । मैं स्कूल में आऊंगी, मैं कागज सीखेंगी । काले अक्षर चीन्हूगी, मैं नौकरी करूँगी | मास्टरानी होऊँगी, कन्या पाठशाला खोलूँगी । हिन्दी प्रचार करुँगी । हिन्दी परचार लान्ताक् । सूरजमोनी ठ होशियारी, स्कूलो छाङानू प्रोस्ताद | वन्दिन् सूरजमानी न्युजका वागे छेचाका दूरे । सूर्यमणि कितनी होशियार, स्कूल के बच्चाकी उस्ताद । सुंदरी सूर्यमणि पुरुष के पीछे स्त्रियों के श्रागे । कलङ् कालम्, गुदा कतावरङ् । कानने कलम और हाथमे किताव ।<noinclude></noinclude> dc756wm37z81pl0p4lad1ywr6ubpbfg पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४७ 250 195562 666306 2026-07-07T16:32:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666306 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर-गीत ४१५ सूर्यमनी कोनीच, वीनाला जाई । सूर्यमणिकी सखी, वीनेोकी जाई । इलमा त सूरजमोनी, वन्छन् ता विदापाती । दे। व्ये! कोनिच रिगेन् सेरकिम् सन्तड । शुम् कलडो कायड, शुम् कलडी कावड | विद्या वडी सूर्यमणि, सुदरी तो विद्यावती । वह दोनों मखियाँ, उपरले सेरकिम् नृत्यागनमे । तेहरा नृत्य-चक, तेहरा नृत्य-चक्र | नो कायड् माजाड, जहे दूरे हानोश दृरता ताशा व्यन्द्र छाडा जराला जीत । सी-वरं लुदेन शोड, काय अन्तान लानो, उस नृय चक्र मध्ये, रवमे श्रागे कौन बैठा ? आगे तो बैठा, शुम् दम् मीयु छाडा । हे बन्टिन्हाद् तीश ? पूत ज्वालाजीत । सिंह पारि ऊपर, तीन भले मानुस के पूत । नृत्य चक्र दूँढते, सबने सुन्दरी कौन है ? बन्टन् तो तोशा, बन्दिनविदापाती । सुन्दरी तो थी, सुन्दरी विद्यावती | अनाडू तेग गुरजमोनी । सूरजमनीडू गुदो, प्राचो जो मुन्दी | हनी बी विदा पीती गुदों, जोड़ी चदीषु टागुमा । पताप बाबुम् लीताश ग्वाट प्लवर चारम् लानीच | नीना दाई। सूर्यमणिके डाबकी, अगुलीने नोनेकी मुदरी । विद्यावती के हाथमें जोड़ा चाँदीका ककरा | नावा बोला दोनों पलनर आराम करा । . नृचक होता सदा ही ।" सूरनाननू लाल श् याम मा लान । बोली में आराम ना करूँगी। ।<noinclude></noinclude> jxhv6ixbp4mwoycp9assbpfjvyzc0if पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४८ 250 195563 666307 2026-07-07T16:32:49Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666307 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१६ किन्नर - देशमें आरम् नीतो सोदाई, काय नीतो ई जीव् । " × श्राराम होता सदा ही, नृत्य-चक्र होता एक वार ।" × दो-न्योटड् रिड्ज़े, द्वन् लोशिश द्वा तोश । - X पल वर श्रारम लाग्यो, थक्को ठटीयू देन् । परत बाबु लोांश "जु नामपती श्रई । " X वह दोनों बहिने, निकलने को तो निकल बैठी | पलभर आराम करने, ऊपरके चौतरेपर प्रताप बाबू वाले "यह नास्पाती लो । सूरजमोनिस् लोतोश युड्ज़ या युद्धे । नर्यमणि बोली भाई है भाई ! - ग नासपती माग्याक् ग नासपती मार वाक । नासपती ग्यामा, अङ युड्ज़ बगीचा श्रो। " मुझे नास्पाती ना चाहिये, नास्पाती ना चाहिये । नास्पाती चाहिये तो मेरे नवागमें है । वन्दिन् सूरजमोनी, पकाई मनस्वी । सुन्दरी सूर्यमणि, पक्के मसूबेकी । घीजेन् मा कोचोश | फुसलावा ना माना । हुना वेर गुरु द्वर परायो । इसी समय (अपने ) गुरुको परन्या । रचन्टो गोरे, छाडा गवीरचन्द मास्टर । रंगन टो घरके पूत गंभीरचंद्र मास्टर | (६) व्यासमोनी क - व्यासमोनी गीतकाल -- १६३७-३८ ई० गायिका - विद्याचरणी श्रायु- २० वर्ष जात कनैव गाँव-चीनी लेखक -- भगत सिंह -- -- ता० २-६-८ शीलस् पुन्नम् थव्क्थानु गौरिङ देन् । शीतल पूर्वणी, यवक्या के घरे । श्रनेनु गुलव जी, नामङ्ठदू गयेाश । | स्वयं गुयलवका पुत्र, नाम उसका क्या था । '<noinclude></noinclude> hpmt8qznn05kwztl960brxzda2ldr6g पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४४९ 250 195564 666308 2026-07-07T16:33:01Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666308 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर गीत नाम ता लोन्ना नाशक- सैराकु छेचा । नाराक सैराठ मालोन् खोनाचु तेले । ४१७ नाम तो कहिये, नारक- सैराकका पुरुष । नारक- सेराक: क्यो नही वोली, मैदानकी तेलंगी । तुला जाई, हतु तो मालान । किसकी जाई ? (और) किसीकी नहीं | थेर गज़गुज़ाई, नामड् ठ दूगयो । थेरगज़की जाई, नाम क्या था ? नाम ता लोना, व्यासमोनी वन्दिन । नाम तो कहिये, न्यासमणि सुन्दरी । व्यामांनी लोनो "युड्जे वा युड्ज़ | व्यासमणि वोली "भाई हे भाई ! स्वक्च डाल चोक, ध्वरबसी ज़री जारहूँ ।" ज़रज़ामिक बमका कुकुलिक रनग्यांश । अम्मी चन्दु लोतोश " अमीरचंद किन निचुडलड रहें । उलचिम्म ग्या । नीचे सिर नवाती हूँ, स्वीकार करना ।" स्वीकार तो दूर, बुलाकर ताना मारा। वाला "मुझे सिर नवाना नहीं चाहिये । थपक्यानु छड पुरोनीच डलड ऍ ॥" 3 अपने पतिको सिर नवा । धक्शन के पूत, पूरनको सिर नवा ।" व्याममोनिस लोगोश 'युड्न युजे! व्यासमणि वाली 'भाई है भाई' ! नटोकड बाके, वड् विशिद मानी । ऐना ताना न दो, मे (तो) गई नही मुत्रनु शोचिशि गांड दी (ली) मा विशिन् मश्को । मां बापने लगादिवा सासरे । वह इन्कार नहीं हो सकता । माडिक्की चन्मा बोन्युड चुईजन विनोद | तांगी चलना, अभाव मा बि । તારાik नही जानेको विचारती, तो कुलकी इज़त जाती । (सात) बैठने की सोचती, तो मेरा प्र ेम नहीं है। चिनी पातके गावोका इलाका । २७<noinclude></noinclude> acjameuucjbjtf6ptnh87kbsjigwe23 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५० 250 195565 666309 2026-07-07T16:33:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666309 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१६ किन्नर - देशमें चारम् नीतो सोदाई, काय नीतो ई जोव् । " X चाराम होता सदा ही, नृत्य-चक्र होता एक वार ।" × दो न्योट रिड्ज़े, द्वन् लोशिश हा तोरा । पलवर ग्राम लान्याश को ठटीयू वेन् । परतप वास लोगोश “जु नामपती श्रई । " 1 X वह दोनो वहिने, निकलने की तो निकल बैठी पलभर आराम करने, ऊपरके चौतरेपर। प्रताप बाबू वोले "यह नास्पाती लो । सूरजमोनिस् लोतोश युड्ज़ या युद्ध | सूर्यमणि बोली भाई है भाई ! नासपती माग्याकूग नासपती माग् याक । नासपती ग्यामा, ग्रङ युड्ज़ बगीचा श्रो। " मुझे नास्पाती ना चाहये, नास्पाती ना चाहिये । नास्पाती चाहिये तो, मेरे नैनाके बाग में है । न्न सूरजमोनी, पकाई मनसूबी । सुन्दरी सूर्यमणि, पक्के मंसूबे की | घीजेन् मा कोचोश | हुना वेर गुरु द्वर् परायो । फुतलावा ना माना । इसी समय (अपने ) गुरुको परन्या । रचन्टी गोरे, छाडा गवीरचन्द मास्टर | रंगचन टो घर के पूत गंभीरचंद्र मास्टर । क वे व्यासमोनी -- (६) व्यासमोती गीतकाल - १९३७-३८ ई० गायिका - विद्याचरणी श्रायु २० वर्ष जात कनैत गाँव-चीनी लेखक -- भगत सिह ता० २-६-४८ शीलस् पुन्नम् थव्यानु गोरिङ देन् । शोतल पूर्वणी, थवक्या के घरे । श्रनेन गुलव पजी, नाम टदू गयेाश । स्वयं गुयलवका पुत्र, नाम उसका क्या था ।<noinclude></noinclude> 1kkcaxw59tqy44o892e3o5mc63afjpo पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५१ 250 195566 666310 2026-07-07T16:33:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666310 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत नाम ता लोन्ना नाराक- सैराकु छेचा । नाराक सैराक ठ मालोन् खोनाचु तेले । ४१७ नाम तो कहिये, नारक - सैराकका पुरुष । नारक- सेराक: क्यो नही बोली, मैदानकी तेलगी । तुला जाई, हतुला मालान । किसकी जाई ? (और) किसीकी नही । थेर गज़गुज़ाई, नामड् ठ दूगयोश् । थेरगज़की जाई, नाम क्या था ? नाम ता लोन्ना, व्यासमोनी बन्दिन । नाम तो कहिये, न्यासमणि सुन्दरी । " 1 व्यातमोनीस् लोनोश् “युड्ज़े या युड्ज़ | व्यासमणि वोली "भाई हे भाई ! य्वक्च डॉलड् चोक्, थ्वरवसी ज़री जारइँ ।” ज़रजामिक वम कपड कुकुलिकड् रन्ग्यो । अम्मीर चन्दु लोतोश "ङ डोचिम्म ग्या । नीचे सिर नवाती हूँ, स्वीकार करना । " स्वीकार तो दूर, बुलाकर ताना मारा। अमीरचंद बोला "मुझे सिर नवाना नही चाहिये । किन प्रभिचु डलङ रहॅ । थपूक्यानु छङ पुरोनीच डलङ रहॅ ।” अपने पतिको सिर नवा । पकवान के पूत, पूरनको सिर नवा ।" व्यासमोनिस् लोतोश् ‘युड्ज े या युड्जे 'व्यासमणि वोली 'भाई हे भाई' ! नइ छोङ थाकेहूँ, अङ् विशिद् मानी । ऐसा ताना न दो, मै (तो) गई नही सुन्वोनु शोचिशिद् गोर्लङ दो (ली) मा विशिम् मश्को । माँ बापने लगादिया सासरे । वह इन्कार नहीं हो सकता । मावुक की चुमा बोन्युड चु ईज़त वियोदु । तोशांगी चलमा, ग्रड भाव मा बि । नही जानेको विचारती, तो कुलकी इज्जत जाती । (सासरे) बैठने की सोचती, तो मेरा प्र ेम नहीं है। चिनी के पास के गाँवोका इलाका । २७<noinclude></noinclude> 6hspml4p1vplavnx6drug91imwrx4ok पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५२ 250 195567 666311 2026-07-07T16:33:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666311 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४१८ किन्नर - देश शीलस्सु पुन्नम् ग्रड् भाव मावि । थोरिड् ख्यामो डोक आपट् ख्यामी गंगा । नो दुश्मन् गंगा । - शीतल पूर्वणी, (किन्तु) मेरा ऊपर देखो पत्थर, नीचे मटे होचो चल्मा, ग्रङ पीठकेच हृत् माय । श्रमा लोन्निक् स्याना, बापू सर शिस् दुर्गस् । (उससे ) प्रम नहीं | देखो गंगा (सतलज) | वह दुश्मन गंगा । मायके रहना सोचती तो, मेरा सहारा कोई नहीं । माई तो बुढ़िया, बापू सिधारे परलोक ! युब्ज़े लोन्निक् आगे रएसी कुमो । भैया तो ( गये) परराज्य-बीच । बोरे लोक हेमी, ख्वङ कोड जाई, गङ्गासोरोनी वन्न् । भाभी तो परजन, ख्वगी कोञड्की जाई, गङ्गासरनी तुन्दरी । दम् चल्मा वोरे कोच चल्मा हेदु मी । फोय मुशरि "व्यासमोनी वन्दिन् दम् दुग्यो । अच्छा सोचे तो भाभी, बुरा सौचै तो परजन । फोकटमें मशहूर --- व्यासमणि सुन्दरी अच्छी थी । शवनङ् चूलियु थुट्के, कतङ रेगु काजे । मय् तोशिस पुन्नम् मय्को बियु ईमान । हुना बेरड शो को शुम्पोतनु नम्शा । कवि अज्ञात सावनमे चूलीका छिल्का, कातिक्रमें बेमीकी भूती | नही बैठूं पूर्वणी, नही (तो) जाये ईमान | वकी वेरा तो कश्मीर के पोतकी बहुद्या । (१०) रूपसिंङ् ठाणेदार गीतकाल - १६४० ई० गायिका -- विद्याचरनी श्रायु -- २० वर्ष जातकनेत ग्राम चीनी - लेखक - पुण्यसागर ता०५८ ४८<noinclude></noinclude> a1cm8lswbp2137qp10r5tbkzuaf67y1 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५३ 250 195568 666312 2026-07-07T16:33:43Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666312 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत ४१६ विवरण - नेगी रूपसिह चोनीमे थानेदार होकर कितने समय तक रहे थे। उन्हीं की प्रेम कथा इस गीत में वर्णित है । दड् गोल्यो दड शो रुशमालो चीने । ततः ततः रुश्माले चीनी । ठ जगा दूगयोश ? जागा ला देमो । कैसी जगह है ? जगह तो सुन्दर | जागा ले देमो, पानी ले ठडा । जगह तो सुन्दर, पानी भी ठडा । ठज़गा दूगयो‍, गोमा शिम्ले छावनी । कैसी जगह ? शिमलानगर जैसी । गोमा अँडरेज़ मापक, सरना हवा चल्ले दा । डेयङ् सडपो वड् रे । जगह अग्रेजो जैमी, सनसन हवा चलती । देहको स्वस्थ्य करती । यूठ माराज़ तासील, थोरिड् ग्रड्जू बढ्ला । नीचे महाराज की तहसील, ऊपर अग्रेजका बगला । नामीशे नाज़क, सेव नास्पाती । जेन् खोरीश बारमासी फूले । नाना भातिके, सेव नास्पाती । अत्यंत अच्छे वारहमासी फूल | ज़ेन खोरोश वारमासी फूले, लाचिमिगी चल शे । अत्यन्त अच्छे वारहमासी फूल, लगानेको (मन) चाहे । रिगेन् सी महलो, अफसर हात् तोश् ? शीशेके घरमें अफसर कौन था ? अफसरता लोन्ना, कुले बोना-युडजा । अकसर तो कहिये, कुलेका पुरुष । कूलेयु वज़ीरू बेटा । मन् वनू ताशित् नामड् जी नेगी रूपसिंङ् । बारू ताशित् नामङ्, जो हिरदयाल सिङ् । *कूले के वज़ीरका बेटा । माँ-बापने रखा नाम, नेगी रूपसिंहजी । भाई बन्दोंने रखा नाम, हरदयालसिहजी । थानेदार हरदयाल सिंह । ठाणेदार हिरदयाल सिड् । ठाणेदार हिरदयाल सिड, गुरवई, नामड् ठ दू गयोश ! गुरवई ता लोन्ना सुगेसरपारू वन - युड्जे । थानेदार हरदयाल सिंहके भीतोका नाम क्या था ? मीत तो कहिये, सुगेसरपारका पुरुष । *गावका नाम ।<noinclude></noinclude> c6jpnrx2xlrlwbmaodkterfm80ox0bw पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५४ 250 195569 666313 2026-07-07T16:33:54Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666313 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२० किन्नर - देशमें हातोलो छाडा ? पट्क छाटा । किसका पूत ? पटक पूत । नामड् ठ दूगयो ? कानगो फकीरचंद | दो गाल्यो न्युमची भड्कनम् वन्युज | क़नम् लुकपोत्रो छाडा, मन वन ताशित् नामद, सोनम् तन् नेगी नाम ( उसका ) क्या था ? कानूनगो फकीरचंद | उसके बाद मैदान (जैसे) वनमूका पुरुष । नमके कपोका+पून, मा-वापने रखा नाम । बैयारू ताशित जी काहनसिंङ् मास्टर | दो गोल्यो न्युमची, यू-टुकपा बोन् युत । शोवड माथासु छाङा, नाम दो शुमल्यो गुरवई, मोल्हू बात रौवा लग्नो, वीते मा शोवड सोनम् तन् नेगी । भाई वंदीने रखा, काहन सिंह मास्टर | उसके बाद, निचले बोगवान सिङ् नेगी । वोटङ् चू यूठङ । वीते यूउड् नेपाजू । पाका पुरुष | महताका पूत, नाम भगवानसिंह नेगी । ये तीनो मीत सफेदेके वृक्षके नीचे । (इस) बातकी सलाह करते, "नीचे ख्वागी जाय या नहीं । साये बहादुरे, होम-जोग लोशोदू । दस भादो१, हीम-यज्ञ कह रह है । लोन्ना वरेड कानसिङ लोतोश ! यह कहने पर कानसिह बोले । गुरव या गुरवई किशी वीमा वीरच् । मीत है मीत तुम्हे जाना है जानो फुरसदु मादू, नोकरीरङ् वातड । मुझे फुर्सत नहीं नौकरीकी बात है। माराज़ दम् मा लन्विश्, इलम गल्ती बीतो । महाराजा अच्छा नही करेंगे, पढाई खराव होगी । नौकरीसे खारिज कर देंगे । नोकरी खारिज लन चिश । *गावका नाम ! खान्दानका नाम । विरूपा उपत्यका । ख्वागीका दूसरा नाम । १ सौर भाद्रपद (सिम्तबर )<noinclude></noinclude> e84pel966tgjwc5yxefwqtekzmbxcgo पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५५ 250 195570 666315 2026-07-07T16:34:04Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666315 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दे लोन्ना वेरड्, बोगवानसि किन्नर गीत लोतांश ! गुरव या गुरवई, दो मा नेशित् ग्रड् मइ ।' ४२१ यह कहनेपर भगवानसिंह बोले ! मीत हे मीत ! यह हम श्रज्ञात नहीं है । वैया हरामी, कोनीच बेमानी | भाईलोग हरामी है, मीत बेईमान है । मा वीते चल्ना न्योट कोनीचू दरम । बीमेलोशिश वीग्योश, दो शुम्ल्यो गुरवाई । | नही चलना सोचें तो मीतोका धरम है । जाना कहके गये वे तीनो मीत । यूड नेपाल, सीप्रोल देन शोड् । नीचे ख्वागीमें, सिहपौर के ऊपर । कोय वाबू निश गुत्-हत् जोडयात्रा ! M - छायाँ गुरवाई? कोयड के बाबूने दोनो करहाथ जोड़के ( कहा ) । प किमों बीते, तमाकू तुङ् मू । दो नेसनेस बीमा, कोयडू गोरे । - कुम वल तोशिश् । दारूपोतिस् लोतोश्, “पोछायाँ कोनीच् वाटीचू शराव तुड्ङी । श्रागये मीत ? श्राश्रो चले घर तमाकू पीये । तत तत: जाके कोंडके घरमे । बैठक के भीतर बैठ | दारुपोती ने कहा "आगये मीत | कटोरीमे शराव पीजिये । जी रूपस, कोनिच लम्याचू जाई, बन्ठिन् स्याम्पोती । रूपसिहजी की प्रमिका, लम्पाकी जाई, सुदरी श्यामावती । कानसिद्ध कोनिच वन्दिन् दारुपोती । वोगवानसिह कोनिच वन्टिन् देवामोनी । स्याम्पोतिस लोतोश " कोनीच या कोनीच ! काहन सिंहकी प्रमिका सुन्दरी दारुपोती ! भगवानसिहकी प्रमिका, सुंदरी देवर्माण । श्यामावती बोली "सखी हे सखी "<noinclude></noinclude> qrymoledh8a6owlo93ksr61r03q438s पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५६ 250 195571 666316 2026-07-07T16:34:22Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666316 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२२ किन्नर - देश में प सोबत बीते, द्रमा सन्त डोम्बरू दर्शन | डोम्बरू दर्शन, शुम् डम्बर जोम् जोम् ।" दो नेस्- नेम् बीमा सिप्रोलु देन् शोड् । कुमोको ख्यायो । श्री सभी चलें, दूववाले अखाड़े में । देवताका दर्शन, तीन देवता एकत्रित ।" ततः तः जाके, सिंहपौर (फाटक ) के ऊपर | भीतरको देखा । कुमख्यामा, शुमलेउ ठाकुरे । भीतर देखा, तीन जने देवता । धूरे कौ ख्यामा, स्क्योद देस् स्पोशिश । - देबिउ चडिके । ागेको देखा, बनालपक्षीसी सजी । देवी चडिका । दोगाल्यो दसी मरकारिङ डंम्बर । उसके बाद फिर मरकारिड देवता । दो गाल्यो दसी अनेन् कालीयु देवी । स्याम्पोती ठटियुदेन् तोशिश । उसके बाद फिर स्वयं कालीदेवी । श्यामावती चबूतरे पर बैठी, दोनो करहाथ जोड़े आरती गाने लगी । भारती गाते (देख) | निश गुतहत् जोडाइचा ग्रर्ती शेदो । - ती शेदे रङ् । जी रूपसिह ठाणेदार हैरान् हाचेश् । रूपसिंह थानेदार हैरान होगया । रूपसिङ वीग्योश स्यम्भातियुदड कायड । - स्यम्पोतिस लोतोश "युद्ध जे या युङ्-जे ! रूपसिंह गये श्यामावतीकी नृत्य मंडलिकामें । श्यामावती बोली "भाई हे भाई ! काय ठप, ग हौलासू चामे । अङ् चोरड छाटेस्, की वजीरु बेटा । हमारी मंडलिका में क्यों आये, मैं छोटेकी बेटी । मेरा आचल छोटा, तुम वजीर के बेटा ।<noinclude></noinclude> 316606pinoxdpgajtrrl9109gpnapcs पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५७ 250 195572 666317 2026-07-07T16:34:33Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666317 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत किन पालो लाभस् । - देलोन्ना वेर, रूपसिंगिस् लोतोश । "रिडजे या रिड्जे ! दो मानेशित् देलू लागेन शुरू-शुरू |" ४२३ तुम्हारा #दामन लम्बा । यह कहने पर रूपसिंह वोले । ड मइ । - "बहिन है बहिन ! सो नहीं अज्ञात मुझे । दिल लग गया है ।" रूपसिङ लोतोश " कोनीच या कोनीच ! रूपसिंह बोले "मीत हे मीत ! हुन्-वीमिक हाचे । जु हाला लन्ते, वेन्नड् वोदेदा १" अव जाना है। क्या करे, प्रेम बढ़ गया ?” स्याम्पोतिस लोतोश " कोनीच या कोनीच । श्यामावती बोली "मीत हे मीत ! , वेन्नङ् वोदेन्ना, स्तेनूफच हाल्यो ।” प्रमबढ़ा तो भेट प्रषण करेंगे ।" रूपसिङ् स्तेन्फच मोखमोलू चोली । कस्तूरीचो साबुन, रड फूलेन तेलङ । रूपसिंह की भेट (थी) मखमल की चोली । कस्तूरीका साबुन, और फुलेलका तेल । श्याम्पोतिस शेतोश, शुलरी र जोयुग् । - खड् मेवारी स्ताकुच दूम द्वादा | - श्यामावतीने भेजा चिलगोजा और गेहूँ मुना | मुँहमें आग जलाते, नाक से धुनों देनेवाला । बन्ठिन् स्यम्पोती रे द्यारू दोम्या । सुंदरी श्यामावती आठ दिन पीछे । चेमार पोरयातोश् डेयङ मा सुकेच्च बेमार, बीमार पड़ी, देहमें असह्य पीड़ा । मोन म सुकेच्च अपसोस । कुखिड् जा शङ्क रन ग्यो । शिमशिम् गङ् तुरगस्, स्याम्पोतो दुव्याश । मनमें असा शोक | कुक्षिमें प्रत्यन्त पीड़ा करती । सूर्यास्त होते-होते श्यामावती श्रस्त हुई । *याचल और दामन खान्दानका संकेत है ।<noinclude></noinclude> 3lq1mn34i9i0fkk6ueodhm0wyqixiog पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५८ 250 195573 666318 2026-07-07T16:34:47Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666318 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૪ किन्नर - देश में शुम् ग्रारू दोम्या श्यम्नरन् बान् । तीन दिवस पीछे श्यामसरण वाचूने । चीठी लिख्यायो “स्याम्पोती द्रव्याश ।” चिट्टी लिखा "श्यामावती ग्रस्त होगई।" दो चीठी शेतो रूपमिद गूढो । उस चिट्ठीको मैं भेजा रूपसिंह के पास । बच्चो कागली, "स्याम्पोतो हुपाश्” । थसे 'रडू जी रुपसिंह ठाणेदार हेगन हाचेश । सोडा धारी शाप | कागज में पढा "श्यामावती ग्रस्त होगई । " सुनकर रूपसिंहजी थानेदार शोकाकुल होगये । पंद्रह दिवमतक शोक । कानसिड लोतो "गुरवई या गुरवई । काहन सिंह बोले "मीत हे मीत ! अपसोस था लन्नी । अपसोस मत करो ! कोनीच हल्लू चामेत्, की वज़ीरू बेटा । प्रेमिका छोटे की बेटी थी, तुम वजीरके बेटा । दे लोन्न ू बेरङ् रूपसिगिस् लोतोश्, यह कहने पर रूपमिह बोले- दो मा-नेशित् ड् मई, "सो विदित मुझे नही है, हतली खोशियाउ छाङा । हम ( दोनो ) खशियाकी सन्तान ।" (१२) चुन्नीलाल डाक्टर कवयित्री - गंगासरनी (जीवित), ग्राम - खव्यांगी गतिकाल -- १६४० गायिका -- विद्याचरमी श्रायु - २० ताल, जात कनैत ग्राम -- चिनी लेखक - भगतसिह (चिनी स्कूल ) और पुण्यसागर तारीख १-३-४८ घटना -- डाक्टर चुन्नीलाल, सरगोधा ( पंजाब ) निवासी १६४०- १६४४ ई० के करीब चारसाल जगलविभागकी ओरसे किल्या अस्पताल मे डाक्टर रहे, उसी समयकी यह प्रेम कथा है। बायो कि लिवा थोरिड् हसपतालों । कटोरी जैसे किल्याके ऊपर अस्पताल । * हिमाचल के कनेतोका दूसरा नाम ।<noinclude></noinclude> 9batfx806pfkrtfpp9jf172fq8dpyq2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४५९ 250 195574 666319 2026-07-07T16:34:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666319 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर गीत ४२५ डागडर वा छात् तौ १ डाक्टर बाबू कौन थे ? वाट चुराया कि लिम्बा, श्रपद अडरेज् हस्पतालो । श्रपङ डरे हस्पतालो, डागडर वाचू हात् तोश् १ कटोरी जैसे किल्वाके नीचे श्रमजी अस्पताल | नीचे अग्रेजी अस्पताल, डाक्टर बाबू कौन थे ? डागर बाबू लोन्ना, हात् द-मीचो छाडा । हात् दा मीचो छाडा, देसो सेठो छाटा । डाक्टर कहिये, किसी भले आदमीके पूत । किसी भले आदमीके पूत, देशके सेठ के पूत । छदा दूगयोश् ? देसो सेठी छाडा, नाम नाम ता लोन्ना, चुन्नीलाल डागडर । देश के सेठ के पूत, नाम ( उनका ) क्या था ? नाम तो कहिये, चुन्नीलाल डाक्टर । चुन्नीलाल डागडरा, गुरबाई हात् दूगयोश ? गुरवाई ता लोना, रोड जेलदारो छाढा । रोड जेलदारो छाटा, नाम नामख् ता लोन्ना, कम्पोटा चुन्नीलाल करके, मीत कौन थे ? मीत तो कहिये, रोड जेलदारके पूत । वादा दूगयोश १ जेहरसिंह । रोखू जेलदार के पूल, नाम ( उसका ) क्या था ? नाम तो कहिये, कम्पौडर जाइर सिंह । दो न्योट गुरवाईचो, बेनङ (लिया ) बोदी | नुकरी च (लिया ) ईन्ड, किल्ला हस्पतालो । उन दोनों मीतोमें, प्र ेम था बहुत । नौकरी करते एकसाथ, किल्वा अस्पताल में । चुन्नीलाल डागहरू, कोनीच हता दूगयो‍ ? चुन्नीलाल डाक्टरकी प्रेमिका कौन थी ?<noinclude></noinclude> evdco16wl2ueu3wr0gizpesfxwrosf2 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६० 250 195575 666320 2026-07-07T16:35:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666320 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२६ किन्नर - देश में कोनीच ता लोन्ना, फयूलो छेचाचो । फयूलो छेचाची, हातू ( लो ) नाई । प्रमिका तो कहिये, स्वदेशकी तरणी । स्वदेशकी तरुणी, किसीकी ( थी ) जाई । हात् ( लो ) मानी, थङ् गोरो जाई । थड् गोरो जाइयू, नामङ् छदा दूगयोश ? नामङ् ता लोना, बन्छन् जड मोती । (और) किसीकी नहीं, थडगरकी जाई । थङ्गरकी आई, नाम ( उसका ) का था ? नाम तो कहिये, सुन्दरी भद्रावती । वन्दिन् ज मोपतिस लोतोश "डागडरा बाइसाई | डागड वाइसाई, श्रीखी-सोखी बातङ् । सुन्दरी भद्रावती बोली " है डाक्टर मीत ! हे डाक्टर मीत ! दुख-सुखकी बातमे । ओखी-सोखी बातङ्, बाइसाइयू मोरज्ञात तारइँ ।” देलोशिमिग वेरङ् परनाम लोशिश बोलशिगयोश | दुख-सुखकी बात में मिताई। मर्यादा ( रखना ।" यह कहकर प्रणाम बोल विदा हुई। न्छिन् जब मोपोती, कोनेच हात् दू गयोश ? सुन्दरी भद्रावतीकी सखी कौन थी ? कोनेच ता लोन्ना, वाढो जाई । सखी तो कहिये, यड्वड्की जाई । यङ्वाङी जाई; नाम ड् ठ दू गयांश ? नामङ् ता लोन्ना, बन्छिन् किशन भगती । जन्मोपोतिस लोतोश " कोनिच या कोनिच ! की जाई, नाम (उसका ) क्या था ? नाग तो कहिये, सुदरी कृष्ण भक्ती । भद्रावती बाली, "सखी हे सखी!<noinclude></noinclude> cgxq01hfzgfksrvpo3043i3icbmvhqe पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६१ 250 195576 666321 2026-07-07T16:35:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666321 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर गीत ४२७ पोईकडे वीते, जमीयू पोरी लान्ते । चलो कंडे विहरने खेत रक्षाकरे । जमीयू पोरी मा लनमा, दो मन् रिङ्जना नर्श । दो खाटिये नाशा ।" ' खेत रक्षा न करे, वह नारी ना समझी जाये। वह खोटी समझी जाये ।" किशन भगती लोतोश "वीतं ता रिडतोइँ, शिलपुरा ठ फीते ?" कृष्णभक्ति बोली "विहरने तो कहती, कलेवा क्या लेचले १" "शिल पुग ता फीते, रोपड जादू पुग ।" "शिल पुग् ता फीते, फुल्-गस् ठ फीते ?" “फुल् गस् ता फीते, किल्वा योल्मो तीसढ़ ।” ठोकरो रोमशु पैथड् । " "कलेवा तो ले चले, खेतका गेहूं भुना ।" "कलेवा तो लेवें, भोजन वस्त्र क्या ले चले ?" "भोजनवस्त्र लेचले, किल्वा फाफड चाटा । ठोकरोके काले उड़द की दाल ।" दो न्योट कोनीच वीम् लोशिश् वीरायांश् । कान्डेयो फयुल लो, ज़मीयो पोरी लानो । ज़मीयो पोरी लानो, टागू ती शेदो, ब्रासो चो शालो । वह दोनो सखियाँ, यह कहके चली गई । गॉव कडेकी खेतकी रक्षा करतीं । खेतकी रक्षा करती जौमें पानी देतीं, फाफङ निराती | बन्दिन् मोपोती, खोरग्यु माजन सरसर । शुम् यारो कुमो, जमोपांती पीरङ् । सुन्दरी भद्रावती, रोगी सुखी पड़ गई। तीन दिनों के बीच, भद्रावतीको व्याधी । पीर पोरातो, बल जशबू पीरट् । बल ्म जराब् पीरङ्, डेयो मा सोकेच पीरम् । व्याधि थापड़ी, सिर दर्दकी व्याधी । सिर दर्द की व्याधी, देहे असह्य पीड़ा<noinclude></noinclude> 8q16wyks92e73qm8ejxgt6px1cgnr6f पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६२ 250 195577 666322 2026-07-07T16:35:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666322 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२८ किन्नर - देशमं मनमें श्रम शोक | मोनाडो मा सोकेच अफसोस । चिठी कुमो चेयोश, चुनीलालु गुदो । चिट्ठी लिख भेजा, चुन्नीलाल के पास । चुनीलालो गुदो, वन्चो कागली । चुन्नीलाल के पास, कागजको बाँचा | वन्चो कागली, व्योरा ठ दुगयोश ? व्योरा ता लोन्ना, कोनीच पीरड पोरयोस् । कागजको बाँचा, व्योर (यहाँ ) क्या था ? ब्योरा तो कहिये, प्रेमिका बीमार पड़ी। चुनीलाल डागडर, कोनीच पीरड् थस्थत | कोनीच पीर यासेर, स्तिङ् शूलङ लन्ग्यो । चुन्नीलाल डाक्टरको प्रमिकाकी बीमारी तुमरे । प्रमिकाकी पीड़ा सुनके हृदय-शूल लगगया ! रातो-रात कडे दौड़ गये । रातो-रात कडे दवाग्योश । X दो लटिन कडे शेन । हाथे लालटेनले, कडकी मडईको । बहरे पोश शम्मु दे, टिन्यच कुमो ख्यायो । बेहर इशारा रनग्योश, शब् पोटड्स ठीसो । बाहर घासपरसे, झरोखे भीतर झाँका । बाहरसे संकेत करते, ककणियों फेकी । जङ् मोपोती कोनीचु, इशारा थसेरड् पीरङ् घटया ग्योश । जङ् मोपोतिस लोतोश, "कोनीच या कोनीच ! भद्रावतीकी पीड़ा सकेत सुन घट गई । भद्रावती बोली "प्यारे हे प्यारे ! १ ठ इशारा लन्ताइँ, कुम ठ मा बि कुमो जाइँ कोनीच ! खेरपोशी देन ताशी ।" क्यो सकेत करते, भीतर क्यो ना आते ? भीतर आओ प्यारे ! श्रासन बैठो ।"<noinclude></noinclude> r303jr95gpukamxcsivsyevcgglvh6s पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६३ 250 195578 666323 2026-07-07T16:35:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666323 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर-गीत ४२६ चुनीलाल विग्याश जाति पादेन । चुन्नीलालस लातोश 'कोनीच या कानीच, डेयड् पीड हाल ताश ? - चुन्नीलाल गये, भद्रवता के ग्रासन ऊपर | चुन्नीलाल बोले ' प्यारी हे प्यारी ? देहें पीड़ा कैनी है' ? जमे पति लताश "ज पीरङ् गन्डु । जुपी गन्डु, सचक्यु डुवेशे ।" भद्रावती बोली "यह व्याधी बुरी व्याधी । यह व्याधी बुनी व्याधी, सच मरूँगी ।" चुन्नीलालस लातोश् "वानीच या कोनीच ! होने कादर था जाई, टिद् मठिद् लान्ते । चुन्नीलाल वाले, 'प्यारी हे प्यारी ! ऐसी कार न हो, कुछ न कुछ करेंगे । दवा इलाज करेंगे । शेल मा नू इलाज लान्ते । शेल मानू इलज लागते, पाइँ हस्ताल। बीते । इस्पताला बीमुॅ तागत दुइँ आमा दुइ ?' दवा इलाज करने, चले । अस्पताल चले । अस्पताल चलने की ताक्त हैं या नहीं ?" मापतिस ताश "कानीच या कोनीच ! श्रड् ता मादुग तागोद, हस्पताल बीमु ।” चुनीलाल लोतोश " कित् तागत् मा निमा डडी दुअते ।" भद्रावती बोली "प्यारे हे प्यारे ! मुझे नही ताकत, अस्पताल जाने की ।" चुन्नीलाल बोले "तुम्हे ताक्त नही तो डडी बनवाते हैं ।" याम्यायो पलवल माज़ाडी । बनाकर तैयारकिया पलभरके बीच, रायमिचु डंडो । दोश बीमा, बागे गोरङ देन् । आठ श्रादमियोंकी डडी । वहाँ से नीचे नीचे गये, कागेगढ़के ऊपर ।<noinclude></noinclude> bvltqu0nu9om7wtf5god4c7qi1isqyu पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६४ 250 195579 666324 2026-07-07T16:35:51Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666324 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३० किन्नर - देश चुनीलाल लो' 'चु वैयार ! चुन्नी नाल बोले 'दम-पाच भैया ! लवर श्राराम लानिच, पल्वर गस् उठायतोक दोश शो बीमा, कातोयरिङ्ग बगली । - - पलभर श्राराम करो, पलभर में उठाना ।' वहाँ से नीचे-नीचे जा, लाये बंगले पर । थोरिङ पालो कुम कुमाराउ, चारपाई देन् । चुन्नीलाल लोतोश् 'कम्पोटर जेरसिह ! बगलेपर कमरे के भीतर चारपाईके ऊपर । चुन्नीलाल बोले “कम्पौडर जहर सिंह । नीचलु कोनीच पोचाश, इलाज दम् लानी ! इलाज दम् लानी, कलथानङ, शुम् जब् । अपनी प्यारी पहुँच गई, इलाज अच्छा करना । इलाज अच्छा करना, सवेरे तीन वार । दिनको सात बार । चारकि चु स्तिस जव ।" जङ्मोपोतीस् लोतोश “कोनीच या डागडर ! जो पीर होट्यामा, जुछे गोरी वस् क्य भद्रावती बोली "प्यारे हे डाक्टर ! यह रोग हटजाये तो इस जन्मकी बात क्या परलोक में सत् रखूँगी ।" छिमा चु ईमान तातोक हुनागु वर जङ्मोपोती इमान मा ताता । सिच इमान वक्य जुछेत्र मा रख्यायोश | इसी समय भद्रावतीने सत् नहीं रखा। परलोकमें सतकी बात क्या अभी नही दिखाया 1 वेर काठस्यानो नमशा | जो मोपोतिस् लोतोश " भाव मा बि । इसीसमय कोठिस्याकी बहू ( वन गई ) । भद्रावतीने कहा 'मेरा प्र ेम नहीं होता ।<noinclude></noinclude> 89oxvm1budu2tvml2z0vkghbkubq9wf पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६५ 250 195580 666325 2026-07-07T16:36:02Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666325 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - गीत ४३१ नो देशी कोचा भावो मा बि ।" चुन्नीलाला लोतोश "गगाजीतु गुरबई ! श्रृङ सुन्चन् मा, मुनरिड्जु दन्दे था लन्राई, ईमान हथेरङ् बमान । इस देशी कोच * मे मेरा भाव नही है ।" चुन्नीलाल बोले “गंगा जीत मीत ! मैने सोचा कि नारीपर विश्वास न करो, सत् होके हेद् लोशिश दयले, इमान मायच रडिक । - लड् च देउ काउथङ्, अड् सांनी वितरी । सती । और तो छोड़ो, सत नही रडीके पास । मेरी चादीकी कधी, मेरा सोनेका कंठा ! दुनिया ता बेइमान, कि (ली) वेमान हाले ! प्रोमचु बेरङ् शेड् ठी गोलिस प्रानु वेन्नड् । हुनागु दुनिया तो बेईमान, तू वेईमान कैसे ! पहिली वेरा कैसे गले प्राणमा प्र ेम । शोपुर वेईमानी ।" श्रवकीबेरा तो पूरीहो बेईमान ।" जनोपति कनुउजड़ गुगल | भद्रावतीके कानमे सोनेका कुडल | 9 मियन चेय लोतांश, दो (ली) पीतलु गुगरू । मिमा खुशिश बत जब गुरू थग् छ ेत् । लोग तो बोलते, वह पीतलका कुडल । लोग प्रसन्न वात ( करते), कु डल तो अवश्य सोनेका । चुन्नीलाल हिम्मत देन, जब मो विबिग बेरङ् ख्यायो, शवदन्वादो चुन्नीलालु लोतोश् । हेद् लोशश् दयलो ड् प्राचो सुंदरी ।" चुन्नीलालने हिवावसे, भद्राको जातेसमय देखा । (मुँह से) शब्द निकालते, चुन्नीलाल बोले- - "दूसरी बात छोड़ो, मेरी अगली की अंगूठी ।" *देशी = मैदानी, कोचा = कनौर भिन्न लोगो के लिये अपमानपूर्ण नाम ।<noinclude></noinclude> r9r7peuuho7rjjqzp0cd64m6k4butrb पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६६ 250 195581 666326 2026-07-07T16:36:13Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666326 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३२ २५ किन्नर - भाषा अन्यत्र लिखा जा चुका है, कि किन्नर भाषा में तीन तत्व पाये जाते है -- मूल शू (किन्नर) भावा, हिन्द-योरपीय (संस्कृत पारिवारिक) भाषा, भट (तिब्बतीय भाषा । हम यहाँ उसका कुछ तत्त्व - विश्लेषण करना चहते हैं-- 1 [१] पृथिवी वर्ग-- १-- शब्द सूची डला-डेला 這支 पृथिवी -मटिङ हि मिट्टी-शो भो भूकम्प - वन चुलिङ [ २ ] जन्नवग- वालू- वाल्यङ् हि जल - ती ककड़ - श शू. भाप - वन पत्थर -- रग नदी - गारङ - - खेत रिम् क्यारी — डोव्यङ नदी - समुद्रङ हि हि नाली -कुलङ चबूतरा - ठटी नहर-कुलङ हि उपत्यका नालङ - हि धारा - दारङ हि श्रधित्यका पाव हि चश्मा - नागस् हि पर्वत - रड कूप - कुवङ हि शिखर - बल सर—सोरङ हि सानु - रहू येठङ हि जलपात -छतगङ डॉड़ा--तीरक हि बर्फ-ठनङ गुफा -- श्रग हिम-प्वम् गुफा - डबरक हि बोला--शोरू टीला - डनी शू. बादल - जू *संकेतो का अर्थ है, शू-शू भाषा, भो=भोट भाषा, भो शू. हि = हिन्दी, संस्कृत तथा दूसरी भाषामे |<noinclude></noinclude> jqbsauoz1vees1y1tzkdsasrdgbwotd पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६७ 250 195582 666327 2026-07-07T16:36:23Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666327 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - भाषा ४३३ रस- रोस हि छाल - वोद् स्वाद -- जमद शू हीरा - सग [३] अग्निवर्ग- देवदार - क्यलमड शु अग्नि मे - भो न्योज़ा - रीवाटड शू-हि अगार - मे-ठां कैल-लिम् 'शू भस्म - वोल्पा हि पदुम- शुर शू चिनगारी - क्यङ शू भुज--पद वाटड शू-हि - ग्रॅगीठी — ग्यठुरू शू खूबानी खमानी, चुल हि चूल्हा - मे - लिड भो-शू गूर-दाखड हि चिमनी - दुसरड शू अखरोट का -- शू भौर-पपिल्स शू नासपाती - नसपोती हि चक्रमक -मेरक भो-शू वादाम - बदम हि बारूद - दाय हि वीरी - श्वन धुआँ - दुवड हि सफेदा - क्रमल [ ४ ] वायु- श्राकाश-वर्ग- गुन्ताब-यालू वायु - लान शू प्याज --- प्यास हि - लीलान लहसुन - लोस्नङ हि श्राकाश-सोरगड हि वत्थू --टका शू नर्क- नोरोक हि फाफड़ - त्रस भो [५] वनस्पतिवर्ग- मड़ा - केद्रो वन - वोन्यड हि कंगुनी - राग वृक्ष-वोड शू. १ चालू- हालू हि लता - लानिड शू कद्दू -- कोडू हि पौधा - सोलिच शलगम् -- शशिमट शू झाड़ी-ज़रवरड लकड़ी --- शिड भो पत्ता--तरह हि [६] पशुवर्ग-- पशु -- सेमन्चन भैड़िया--चढकूं मा २५<noinclude></noinclude> 44dmtln94dcbqvtim0dzxo1bt2uku7c पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६८ 250 195583 666328 2026-07-07T16:36:34Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666328 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३४ शृगाल - शालस हि रीछ - होम शू. वानर - बन्दरस हि हरि-खो कस्तूरा — रोच नर-स्क्यो मादा - मन शू.. - चमगादड़ – तुर्यात्च शू बैल - दमस शू याक -युग भो निन्नर - देशमें जोक—तिशम [5] पक्षिवर्ग- पक्षी प्या - मोर - मोरेस 1 चकोर - तिक गौरैया - किम-प्याच चील - दड शुरस वाज-पाजी गिद्ध गोल्डेस - उल्लू - कुक श 度 हि 後 याकगाय-- श्रीमे भो कबूतर -- र प्या गाय -- खलङ श पडुक — कोजा बकरी - बाखोर तीतर - तितरस हि वकरा - श्राज़ हि मुग, कुकुरी हि भेड़ - खस भेड़ा-कर श [६] कीट वग- गदहा - फोच श कीट - होङ कठफोरा-शी-ठोड - भो-श श - घोड़ा – रङ घोड़ी-गोन्मा - पिस्सू – श्पग श a खटमल -पुट श हाथी - हथी हि जू - रिंग श खच्चर — कोचर चीलर, " कुत्ता -कुई बिल्ली - पिशी घुन-प्याच चूहा - क्युच झिल्ली - वुतुकच कनखजूरा - कनासोल जाळूस-- श [2] जलचर वर्ग-- हि-शू मछली -- मछस हि पतंग - शूप्याच भो-श मेंडक - तिपलोक्च श तितली -- 33<noinclude></noinclude> 1aprxe11pytd3s4smxsx2gwxsvjckru पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४६९ 250 195584 666329 2026-07-07T16:36:45Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666329 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - भाषा ४३५ - भौरा बौरस डस – छतिक हि - चौरा चांरड हि श ू रथ-रोथङ हि मक्खी श [१३] मनुष्यवर्ग- मधुमक्खी - वमय श मनुष्य - मी भो मच्छर - गुज़रे - पुरुष – डेखरस [१०] सरीसृपवर्ग-- छाङ मी भो - सर्प सप हि स्त्री- छेस बिच्छू - सोकोक श बूढ़ा -- रुज़ा - साँडा छ मर श बूढ़ी - यङजे [११] धातुवर्ग - तरुण – डेखराच सोना 1 भो तरुणी -- छेचाच चॉदी-मल तवा जस्ता - सोत - रागा - कोली बालक - छङ भो म हि बालिका - छेचाच शिशु -- थितलकच हि लोहा - रोन पीतल--पीतल कौसा - कासङ हि $ chal char हि [१२] देववर्ग-- देश डंबर a भूत--शुना रकशस श ू भूतनी - सावनिक पिशाच - वोन शिरस हि हि श पत्नी - नार पति - दाच माता -- श्रमा पिता - ववा वेटा-छङ - वेटी - चिमेद पोता--स्पाच पोती -- छचाच, स्पाच नाती - स्पाच - राक्षस रकशश हि भौजा -- बंजा देवालय - देवरङ, सन्तङ हि भॉजी -- वंजिक, वनुच हि मूर्ति - कुँडा भो मामा - मोमा हि 6 ho chal char विमान - रोधङ हि मामी नाने - श ू<noinclude></noinclude> 822s1zk0mo3ubf1w9u7sww8jasuirdz पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७० 250 195585 666330 2026-07-07T16:36:56Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666330 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६ किन्नर - देश में सा-वपुच सी-- श्रमनिच -- नाने शहि भा हाथ --गुद (श्) हथेली - इस्तलड (हि) - पैर-वढ़ (शू.) पुन דיר - फूफा --ममा श जॉब - लुम् (शु) मुह-खकङ् (मो) गाल - पिंड (शू) वाहन -- दाश्रोचा रिडचे श बहनोई -- शकपी हि भाई - ते, वया (छोटा) श हि श्रीठ--तुनड (हि) नाक- स्तुकुच (शु) कान -- कनङ (हि) वाल - क्र (भो) --- भाभी - वोरे हि दामाद-- छद श वहू-नमशा भो दुलहा --- खतुच श आँख -- मिक (भो) दुलहन --- खतिच चचा - वपुच (शू) चची - मनिच ( भी, शू) सासु-युमे (भो) ससुर-रू (शू) भतीजा-- अत्योइड (शू) नाना - तेते (शू) नानी - ममापो आई (शू, हि) दादा - तेते (शू) दादी - अपी, श्रई (शू.) 7 (शू) परदादा - कोतेते परदादी -- कोपि (शु) नोकर--नुकुर, चाकोर (हि) नौकरानी --- छुपा ( भो) शरीर---डेय (हि) जीभ - ले (भो) . भौं -- मिक्ल्यू (भो) अंगुली -- प्रच (शू) शिर - वल (शू) [१४] ग्राम वर्ग- गाँव-देश (हि) घर - किम् (भो) कमरा - पन्ठङ (हि ? ) कोठरी - पन्ठडच (2) भीत--वितिङ (हि) द्वार-द्वारड (हि) खिड़की --- टिनङ (शू ? ) गवाक्ष----" छत --मलथङ (भो) फर्श - - फोर (शू) श्रॉन -- खतङ (हि) केवाड़ - पितड (शू ?)<noinclude></noinclude> jdnih0kua501h3boybr36ojwcd536g3 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७१ 250 195586 666331 2026-07-07T16:37:06Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666331 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>धरन - जलदारड (हि) चारपाई - माज़ा (हि. विछौना - पोश (१) किन्नर - भाषा - हल तल तक्रिया -कुम (शू) शू 3 कुदाल -- गोलिड हसिया - जेथड कुल्हाड़ी -- लस्त हि श by bar श्रोदना - फांका शेमिक गस (शू) कुल्हाड़ा कवल -- दोरी (शु) लोई -- चदर (हि) पट्ट - चदर (हि) पट्टी = पोरिन नगर -- सोर (हि) सड़क -- सोलोक (हि) रथ-रोत् (हि) गाड़ी--गडी (हि) डडी -- टडी (हि) - [१५] कृपि वर्ग- कृषि -- जमीमोरी (हि) खेन रिम् (शू.) - 23 गॅडासा-लेमा डलिया - छुटोच टोकरी " हलवाहा-हालस चरवाहा - पालस सईस - खसदार [१६] वाज्यवर्ग - वाणिज्य - छोड ४३७ शू हि हि भो दूकान-दुकान हि - दुकानदार दुकानदार हि सौदा -- सौदा हि मेड़ - दोरिड (शू) तराजू —त्राज़ू हि जोतना हाल लनिक (हि) बटखरा - बटे हि बोना - पुशमिक (शु) नाप ― -पग वनिड निराना - अरलन्निक (शू) तेल - तेलङ हि काटना -- लाम्मिक हि गुड़--- गुडड -हि दावना - माडोलनिक हि चीनी--खड • हि मीसना - बरमिक शू. तमाखु -- तमाखू हि che chee श्रीमाना- लीमिक मसाला -- बोशार - बाँधना क सीचना - तीशनिक क्यारी -- डोव्यड हि हल्दी - पीग वोशार हि शू मिर्च -- पिपली हि chet सेर सेर हि che he he<noinclude></noinclude> 6cpz2kos4nq8xlgrj497qeoba9jqg4s पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७२ 250 195587 666332 2026-07-07T16:37:17Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666332 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३८ छटाँक -छटॉक हि [सोलोक = छ छटाँक किन्नर - देशमें मोची मोची (हि) चमड़ा -टलन (शू.) ब्र े = दो सोलोक, जूता - श्वङ् (भी) कोतट् = ३ या ४ सोलोक् जूती - पञ्च ( भो) टमेट =४ ब्रे ] ब] जाल तवत् (शु) [१७] शिलिवर्ग- - [८] आयुधवग-- हथियार - योजङ् (हि) वढई रस् (शू) - (हि) वसूला - बासि रुखानी - त्यागू झू.) - रंदा रदी (हि) चारा - अरी (हि) वर्मा - बारेमा (हि) खराद - छुकोर (भो) लोहार - डोमङ 'शू.) हथौड़ा - थोडच (शु) हथौड़ी - " - घन - गोनङ (हि) संडास -- सोनेशड् (हि) भाथी - सखुल (शू) सोनार -- सोनारस (हि) चिमटी -- चिमटू हि) टठरा - डायेङ् (हि १) हजाम -- नाई (हि) तुरा -- खुरच (हि) कैंची - कतू (हि) दर्जी - सूई (हि) सूई - क्यब् (भो) तलवार - त्राल (हि) छुरा - खुर् (हि) छुरी खुरच (हि) भाला - बोर हो (हि) तीर मो (शू) - धनु - गुम (शू) वाणकल - मोवल शु-हि) बंदूक --तुपुक (हि) तोप --- नोप (हि) डंडा - वेर्शा (शू) सोटा - लुङ्मा (भो) लाठी--नल (शू) गोफन - स्कोल्डा (शू) [१६] राजवर्ग-- राजा-राजा (हि) रानी - रानी (हि) मुखिया - गोवा (भो) कायथ --- कयतस, केतस् (हि) चौकीदार-चोकदार (हि) सिपाही - सोपाई (हि)<noinclude></noinclude> edsq5cuxgp9zt9i210kxfpuklr6hcom पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७३ 250 195588 666333 2026-07-07T16:37:27Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666333 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-- चपरासी - चपरासी (हि) मुहर्रिर - केस् (हि) दूत - फोन (भो) पंचायत - पंचात् (हि) मेट - चारस् (हि) [२०] अन्नपान वर्ग- भोजन - खऊ (हि) रोटी-रोटे (हि) ! सत्तू युद्शू) श्राटा चीतङ् (शू) गेहुँ-ज़द् (शू) जौ - टग (भो) मटर --यर (शू ?) किन्नर - भाषा ४३६ मधु -- बस पान - तुङ मिक भो शरावरक हि कच्ची शराब - शुदुङ भो दूध खेरङ हि -- दही दायेङ हि छाछ बोत हि १ मक्खन -- चोपरङ मार भो घी - स्कशिच्चुमार [२१] वस्त्रवर्ग- भो कलाय - बड़ीमटर, (हि) - परिधान गस कुर्ता-कुर्ती चोली- चोली अंगरखा छुवा हि भो नगा जौ - श्रय् ट, शू ? कमरबंद - गधुङ चीला--होत् (शू पायजामा - सुथन लपसी -- थुक्पा, फटिङ् शू साड़ी--दोडी हलवा - पोरसाद् हि चादर - छल्ली पूड़ी-पोले हि मोजा - वड- सव माग- स्कन् श तरकारी - वज़ी हि दस्ताना - गु-सव टोपी--ठेपड मास - शा भो पगड़ी -- पाग ba che che of bad to bo bo bব bo byo cho सूप - न्योरा शू चावल - रलू हि १ [२२] पात्रावर्ग-- वर्तन -- वनिङ शू चटनी - चटनी हि लोटा लोटरी चार-चार che तेमन -छोव श - थाली-नङ कटोरा वटेच्च हि शू 4 हि<noinclude></noinclude> ck0llrto2ago5wmhx97mqe672r9h6i7 पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७४ 250 195589 666334 2026-07-07T16:37:38Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666334 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>i ४४० प्याला - नङच श किन्नर - देश में किराया-कराया हि घड़ा -- गगरी (पीतल) हि सड़क -- सोलोक हि دو " - पाहू (मिट्टी) शू [२४] सर्वनामवर्ग- -- सुराही होरिच मिट्टी श वह दो शू. चमच - ख्योट शू कलछी - करछी चीमटा - चीमट हि तुबा -- तोमङ हि sheche cha वे - दोगा, दोगो (स्त्री) श तू --क तुम कि -- श ू [२३] यात्रावर्ग पथिक - मुसाफर हि cher ग्राप-कि मैग, हम् कशा अपने माउं, वह अनु -- श शू. पथ -- - कम् शू सब -- चोइ, और ऐ, हबै श पथशाला -सराइ हि श्राधा -- ढङ, पूरा-पूरी हि कुली -- कुली हि कुल - चोइ, थोड़ा गटो, छेरप् २-विभक्तियां कर्ता, कर्म, करण, सप्रदान, अपादान, सम्बन्ध और अधिकरण इन सातो विभक्तियोंमे शब्दों के रूप निम्न प्रकार चलते हैं। हदो (वह) के रूप एक वचन १. कर्त्ता २. कर्म हदो (वह) बहुवचन हदोगो (वे) दीप ( उसको) हदोगोन (उनको) ३. करण दोस ( उसके द्वारा ) ४. सम्प्रदान हदोताई (उसके लिये ) ५. अपादान हदोदोक्स ( उससे ) हदीगोनस ( उनके द्वारा ) हदोगोनताई' (उनके लिए) हदोगोंक्स ( उनसे ) ६. सम्बन्ध होम्यू (उसका ) हदोगं नू (उनका ) ७. अधिकरण हृदोदन ( उसपर ) हृदो गोनू, दन् ( उनपर )<noinclude></noinclude> lws8jfuhqacnvjg69hf6ldo21yivz4f पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७५ 250 195590 666335 2026-07-07T16:37:48Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666335 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किन्नर - भाषा ४४१ तू (का) के रूप (मैं) के रूप १ का (तू) किनो (तुम ग्राप) १ ग (मै) निङ (हम) २ कानू किनू .२ श्रा निडानू ३ कस कन् ३ गस निडोस ४ कानू कन् ४ अडताई निडानुताई ५ कनदोक्स कनूनूदोक्स ६ कन ७ कनदन कानू किनूनूदन ५ ग्राडदोक्स निडोदोक्स ६ ग्रा निडोनू अदन ७ निङानूदन इन तीनो सर्वनामों में ग का भोट भाषासे सम्बन्ध जान पड़ता है, बाकी दोनों शू भाषाके हैं। शब्दो के रूपके लिए अज (बकरी) मी (मनुष्य). एकवचन बहुवचन एकवचन बहुवचन १ ज मुलुक ज १ मी कुस (वदी) मी २ श्रज् जानू २ मीयू मीनू ३ जुल जानुस ३ मीस मीनुस ४ जता जानूताई ४ मीयुताई मीनूताई ५ श्रजुदोक्स जानूदोक्स ५ मीयुदोक्स मीनूदोक्स ६ अजू जानूदोक्ल ६ मीयू मीनू ७ जूदेन (दन) श्रजानुदेन ७ मीयू देन मीनू देन ३ - - किन्नर धातुये i कटेमिक (हि) - काटना दौरसोमिक (हि) - दौड़ना कुलमिक (शु) -- मारना पीटना खाऊ (हि) - खाना खाऊरनिक (हि + शू) - खिलाना खाऊलन्निक ( हि + शू) – पकाना ख्यामिक (शू ) - देखना गनम् (हि) सूचना - फुकारमिक (हि) - फूकना फेयामिक (हि) - फेकना बुी-मिक (शू) - जाना यमिक (शू) - सोना यसूचीमिक (शू) -जागना युत्मिक (शू ) - चलना<noinclude></noinclude> jigimrwyrxrj9l1cm6z10wot9vw28cv पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७६ 250 195591 666336 2026-07-07T16:37:59Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666336 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ર - किन्नर देश में चरान् लनिक (हि) - - चीरना चल्यामिक (हि) - चलाना चुम्मिक (हि) - पकड़ना चुरमिक (शू) - दूइना चुरामिक (हि चुराना चूलन्निक (शू ) -- खासना - चेमिक श) - लिखना • रनिम्शोन्निक (शु) - दिलाना रन्निक (शु) - देना रुन चिमक (शु) - सुनना रेन्निक (शु) - बैचना लनिम्शोनिक (शू ) कराना लन्निक (शु) - करना लुटामिक (६) - लूटना छरामिक (हि) - छोड़ना लेम्मिक (शु) - चाटना छिक्यामिक (हि) - छीकना वसन्निक (दि) - वसना जोगमिक (शू) - खरीदना तुङमिक (भो) - पीना तैरन्निक (हि) - तैरना तोरोमिक (शू ) - रहना, बैठना थुक्यामिक (हि) - थूकना थीमिक (शू) - उठाना - समजनिक (हि) - समझना सरशीमिक ( भो ) – उठना सैली वीमिक (डि+ शू, घूम तेल मिक (शू) - वांचना, पढ़ हुदमिक (श ) -- पढ़ाना होशिमिक (शु) - पढ़ना ४ -- क्रियारूप किन्नर भाषाके क्रिया-रूप वर्तमान, भविष्य, भूत और आज निम्न प्रकार होते है- निक (करना) धातु वर्तमान एक वचन बहुवचन लानो दू (करण है ) लानोदुच (करते हैं) प्रथम पुरुष " मध्यम पुरुष उत्तम पुरुष प्रथम पुरुष मध्यम पुरुष का लन्तोन उत्तम पुरुष गलन्तोक " " भविष्य काल हदो लन्तो ( वह करेगा) हदीगोलन्तोश ( करेगे) किनो लन्तीन निडा लन्तिच<noinclude></noinclude> hym57t4kx5o2n3qa9qtvia8gzhhfn9c पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७७ 250 195592 666337 2026-07-07T16:38:09Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666337 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शद् (क्रिया) किन्नर-भाषा भूतकाल सभी पुरुषों और बचनों केलिए श्राज्ञा (विधि) ४४३ सभी पुरुषोंकेलिये एक वचन में लनी (कर) और बहुवचनमे निच (करो) है | किन्नर भाषा में वार्तालाप यह रास्ता कहाँ जाता है ? सड़क कहाँ है ? तुम कहाँ जाते हो १ मैं चिनी जाता हूँ । यह रास्ता ठीक है ? दूकान कहाँ है ? दुकानदार कौन है ? डाक कब आयेगी ? हमको दूध चाहिये ? यहाँ आटा मिलेगा ? यहाॅ मजूर मिलेगा १ डेका दाम क्या है ? दूधका दाम क्या है ? एक सेरका दाम १ यहाँ कोई फल मिलेगा १ यहाँसे गाँव कितनी दूर है ? श्रामे हम वियोदु ! ? सोलोक हम दु कि हम वियोतो चिने वियोतोक । जुम् निया १ दुकान हम् दु ! व्हत् ताश १ डाकलेर वि॒ितोक १ श्रृङ् खरेङ् ग्यमिक तो ! ज्याची पाता है, ज्वा कुली । लोट् माल तेता ! " खेरङ् " ईसेस मालङ् १ उपाशी पारया तोबा १ जिच देश तेता बर्क दु । S श्रृङ् नङ जाइ मेरे पास श्राश्री | तुम्हारा नाम क्या है । किन् नाम ठित तुम्हारा घर कहाँ ? तुम्हारे गाँवमें दुकान है ? तुम्हारे गाँव में दूध मिलेगा ! किन किम हम १ किन देश दूकान ताचा ! किन् देशङ् खेरङ् पारयातोकु । '<noinclude></noinclude> oyh8cqy46n7sfvamv04ha8qcu07l0ld पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७८ 250 195593 666338 2026-07-07T16:38:20Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666338 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1 ૪૪૪ किन्नर देश में फल मिलेगा । श. उशी पारयाताक वहाँ क्या है ? वहाँ पानी है ? वहाँ चश्मा है ? यहाँ स्कूल है ? कब तक गॉव श्रायेगा १ सवेरे चलेगे । शाम वहाँ पहुँचेंगे। धूप बहुत है । आज बादल है । अभी चला। अभी नही चलेगे । मुझे भूख लगी है। तुम्हें प्यास लगी है ? दङ्ठदु ? दती तोचर ? दङ्नागस ती ताचा ? ग्रड स्कूलदु ? देशको तेरङ पिशान ! सेविते । शुया दङ् बिते । जोक दु । तारा जु जु दु । हुन V । हुल मा बीते । श्रृङ्ग्रोन बिसेदु । किती करो तो य दो निदरङ् तडो दू । जड्न विइ । उसे नींद लगी है। यहाँसे जाओ। उसके पास जाश्री । यहाँ श्राश्र । दादङ् बुिइ । जङ् जाइ । यहाँ न था । कुर्सी पर बैठा । चारपाई पर लेटा | हम थक गये। जङ् थ जाइ । खुरसीदङ तोशिड् । मजो देन त्रिन दिशि . कस यल शे । कसेड्-म यल शे । हम नही थके । चढ़ाई बहुत हैं । वाली टङ् दु । उतराई बहुत है । वाली र दु । रास्ते में खतरा है। रास्ता खतरेका है। श्रोमो व्यङ् दु । व्यमिक श्रमदु |<noinclude></noinclude> pxi57e04meq1uagenjth4umj7o46bfo पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४७९ 250 195594 666339 2026-07-07T16:38:30Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666339 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सीधी चढ़ाई है। रास्ता सीधा है। राम्ता आसन है । रास्तेमे पानी है । रास्ते मे जगल है । रास्ता खराब है। आज पानी बरसेगा । वल धूप होगी। कल हम रोगी रहेंगे । देवता कब उठेगा ! देवताका उत्सव है | देवता क्या बोलता है ? यह देवी अच्छी नही है । देवताका माली कौन है। देवतासे सवाल पूछना तुम्हारा धर्म क्या है ? तुम बौद्ध हो ? हम बौद्ध हैं । है 1 किन्नर - भाषा हम धर्म नही मानते | तुम मृत मानते हो ? हम कुबूत नही मानते । माँस पकाशा पइँ । चावल पकाओ = रल पइँ, साग भाजी बनायो । सरसोका साग बनायी । फाफड़ेका चीला बनायो । मीठा चीला बनाओ । चापट टडू दू । श्रम सोल्डन दु । श्रीम सुकङ दु । श्रोमो ती दु । श्रोमो जगल दु । श्रोमो कोचङ दु । तोरो लग्या तो । नसोम युने द्वा तो । नसोम निङा होगे तोशेच 1 शू तेरङ तोल्यातो । शूजतरङ् 1 शू ठे रिङोतो ? ' शू दम मदु । शुग्रोक् त दु ? शु ईमिक तो । किठ मोन्या च ? कि छोस्पा तोइ ? निङ छोपा तोच | निङ दोरम म मन्याच् । कि शुना, मन्याच | निङा थन् रोटी बनाओ = रोटे लनी । चाय वालो = चा स्कोइ बाजी लनी । शेरशो स्कम् लनी । शिमिक म मन्याचु | वोस्तो होदा लनी । थीग होदा लनी । ૪૪<noinclude></noinclude> kjk1kzc64f9vp3bp18rqsapkodfkelx पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४८० 250 195595 666340 2026-07-07T16:38:40Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666340 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૪૬ चूलीकी लपर्सी बनाओ। यहाँ कुछ नहीं मिलता । यह सब कुछ मिलता । किन्नर - देश में चुल फटिङ लनी च्व ठची मापोरेच जङ चोइ पोरयातो लड़के, इधर ग्राो । - लाट्जङ जाई । लड़की, तुम्हारा नाम क्या है ? शुटीच् किन् नामङ्ठद् भाई, तुम कहाँ जाते हो ? हमें रास्ता बनायो । हमारे माथ चलो । श्रापको धन्यवाद । तुम अच्छे आदमी हो ? यह तुम्हारी मजूरी है। यह तुम्हारा इनाम हमारे पास रुपयेका पैसा नहीं । नोटका रुपया है ? रुपयेका पैसा भुना दोगे। तुम हमारे साथ रहोगे ? हम तुम्हारे साथ रहेंगे । हम तुम्हारे पास नहीं रहेंगे । हम नौकरी नही करेंगे । हम तुम्हारा काम करेंगे । दिनकी कितनी मजूरी १ महीने ही कितनी तन्खाह ? कल काम नहीं है । आज छुट्टी है = तोरो छुट्टी । रघुवर चालाक है। तुम झूठ बोलते हो ? 1. मैं सच बोलता हूँ । ' ते कि हम व्यो तो ङ श्रोम् जङ चि । I ङकङ - किन कोस्टङ । । कि दम् मी तो कई । लु किनू मजूरी तो । जु किनू वखतीस | क्ष रूप्यो पैसा गाम । बोड रुप्या तावा ? दप्पो पैसा मा स्क्वौल तोजाँ । कि श्रङ् दङ् तोश जॉ । निङ किन्दङ तोशिच् । " म तोशिच् । " निङ नुकरो मलानिच् । - निङ किन् कम लन् तोच् । द्यारो मजूरी तेता ? गोलू तन्खा तेता । j वह आदमी सुस्त है = दो मी सुस्त } नसोम् कम मैच 1 रघुवर चलाग दू । किं स्कोलङ रिङो तोइ । निग, टोव रिङोतो । 1<noinclude></noinclude> 6dqks7xfj6xmi3p4tau62dvt448fhci पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४८१ 250 195596 666341 2026-07-07T16:38:50Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666341 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४८२ 250 195597 666342 2026-07-07T16:39:00Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666342 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f पृष्ठ:2015.349194.Kinar-Desh.pdf/४८३ 250 195598 666343 2026-07-07T16:39:11Z AKTBot 6197 बॉट: OCR से निर्मित पृष्ठ 666343 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude> 2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f