विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.10 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१४२ 250 46042 666520 561764 2026-07-09T12:25:36Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 666520 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|१४|गड़वा- गदर}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> गड़वा - बङ्गदेशमें लोहारडङ्गा जिलाके अन्तर्गत एक नगर। यह अक्षांश 20^\circ 8' 45'' उ० और देशान्तर 83^\circ 51' 10'' पू० में दो नदियों के तीर पर अवस्थित है। पालामऊ और सरगुजा प्रभृति विभाग का उत्पन्न द्रव्य यहाँ जमा किया जाता है और इसी जगह से दूर २ देशों में भेजा जाता है। यहाँ रेशम, चमड़ा, तिल, तीसी, घृत, रुई और लोहा संगृहीत होकर बाहर भेजे जाते हैं तथा चावल, पीतल और काँसे के बर्तन, विलायती वस्त्र, कम्बल, रेशमी कपड़ा, तम्बाकू और मसाला इत्यादि चीजें दूसरे देशों से यहाँ आती हैं। ​गड़वेता - मेदिनीपुर जिलाके अन्तर्गत एक नगर। यहाँ बहुत प्राचीन सर्वमङ्गलादेवी और कंसेश्वर शिवके मन्दिर विद्यमान हैं। पूर्व समय यहाँ एक गढ़ था। जिस जिस स्थान पर गढ़का बड़ा द्वार था, आजकल वह लालदरवाजा, हनुमानदरवाजा, पेशा दरवाजा और राउता दरवाजा नामसे प्रचलित है। यहाँ रायकोट के राजा चन्द्र का राजभवन था। इसके चारों तरफ बड़ी बड़ी तोपें रखी जाती थीं। अङ्गरेजोंके समय सब तोपें ले ली गईं। ​गड़हद - बम्बई प्रान्तीय काठियावाड़ के भावनगर राज्यका एक नगर। इसकी लोकसंख्या प्रायः ५३७५ है। यह स्वामी नारायण की सम्प्रदाय का, जिसे उत्तर प्रदेश सुधारक सहजानन्द ने १८०४ ई० को चलाया था, एक प्रधान केन्द्र है। १८३० ई० को वह यहीं बहुत से काठियों, कोलों और भीलों को अपना मतावलम्बी बना चल बसे। गड़हद में इस सम्प्रदायवालों के लिये चन्दन की मालाएँ बहुत बनती हैं और उनका एक अच्छा सा मन्दिर भी यहाँ खड़ा है। ​​{{Outdent| गड़ा (हिं० पु०) गर्त, गहरी जमीन, खाता, गड्ढा।}} ​गड़ हिङ्गलाज - बम्बई कोल्हापुर राज्यके गड़हलाज तालुकका सदर। यह अक्षांश 15^\circ 12' उ० और देशान्तर 74^\circ 25' पू० में हिरण्यकेशी नदीके वाम तट पर अवस्थित है। इसकी लोकसंख्या कोई ६३७३ होगी। प्रत्येक रविवार को बाजार लगता है, जिसमें बहुत सा चावल और दूसरा अनाज बिकता है। नगरके मध्य कालेभार का मन्दिर बना है। शहर से प्राय: ३ मील उत्तर <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> बहिरो का मन्दिर है। वहाँ सालांना मार्च मास में मेला लगता है। ​​​{{Outdent|गड़ही (हिं० स्त्री०) क्षुद्र गर्त, छोटा गड्ढा।}} ​गड़ा - १ मध्यभारतवर्ष के जबलपुर इलाके का एक प्राचीन नगर। यह अक्षांश 22^\circ 10' उ० और देशान्तर 78^\circ 56' 20'' पू० पर समुद्र से ७५ कोस दक्षिण-पूर्व में अवस्थित है। पहले यह गड़मण्डल की राजधानी था। ११०० ई० को मदनसिंह ने निकट पहाड़ के ऊपर मदनमहल नाम का एक दुर्ग निर्माण किया था। इस दुर्ग का भग्नावशेष भी आजकल देखने में अधिक सुन्दर लगता है। उसके निम्न भाग में गङ्गासागर और बालसागर नामक दो सरोवर हैं। इस शहर में एक उत्कृष्ट विद्यालय है। पूर्व समय यहाँ एक टकसाल था, जिससे बालाशाही नामक मुद्रा प्रस्तुत होकर समग्र बुन्देलखण्ड में प्रचलित थी। २ मध्यभारत के ग्वालियर विभाग के अन्तर्गत एक सामान्य राज्य। घड़ा देखो। ​​{{Outdent| गड़ारी (हिं० स्त्री०) मण्डलाकार रेखा, चक्र, घेरा।}} ​​{{Outdent| गड़ावन (हिं० पु०) लवणविशेष, एक प्रकार का नमक।}} ​​{{Outdent| गड़ि (सं० पु०) १ वत्सतर, बच्चा, बछड़ा। २ मन्थर, सुस्त बैल।}} {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"गुणानामेव दौरात्म्याद् धुरि यो नियुज्यते।<br> असञ्जातकिणस्कन्धः सुखं स्वपिति गौर्गड़िः॥" (काव्यप्रकाश)</poem>}}}} ३ वे दाग जो चेचक के बाद शरीर में रह जाते हैं। ​​{{Outdent|गडु (सं० पु०) १ गलगण्ड, गले का एक रोग जिसमें गले में सूजन हो जाती है।}} २ कुब्ज, कूबड़, ढब। ३ शल्यास्त्र, बाण, गांसी, तीर या बरछी आदि का फल। ४ कीलक, केंचुआ नाम का कीड़ा। ५ विषमग्रन्थि, कठिन गाँठ। ६ निरर्थक, वह जिसका कोई प्रयोजन न हो। ७ राजपूताना के एक कवि। इनका जन्म १७१३ ई० में हुआ था। इनके रचित कूट काव्य तथा अन्य सामयिक कविताएँ सुप्रसिद्ध हैं। ​ {{Outdent|गड्डुक (सं० पु०) १ भृङ्गार, कमंडलु। २ ऋषिविशेष, एक ऋषिका नाम।}} ​{{Outdent|गढ़ई (हिं० स्त्री०) टोटी लगा हुआ एक छोटा पानी पीने का बरतन, झारी।}} ​ {{Outdent|गड्डुर (सं० वि०) कुब्ज, कूबड़ा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> jacsel6zsf0ycoq09y9lmdhl8z7hbi4 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१४३ 250 46051 666533 561765 2026-07-09T16:27:47Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 666533 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||गड़ुल - गढ़मण्डल|१४१}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ​{{outdent|गड़ ु ल (सं० त्रि०) गड : कुमरोगोऽस्तास्ा । कुल, कुबड़ा।}} ​{{outdent|गवा (हिं० पु० ) एक तरहका लोटा । इसमें जम्न गिरानेके लिये बत्तखके गलेके जैसा एक नली लगो रहती है, समा}} ​{{outdent|गड शिरम् (सं०वि०) शिरसि गड सर, बी०सी गलेका मनुष्य, जिसका गला संग हो ।}} ​{{outdent|गडेर ( मं० पु० खो० ) मेघ, बादल ।}} ​{{outdent|गडोत्य] ( [सं०] की०) गढ़ा गड़ाख्यदेशात् उत्तिष्ठति, उद-स्था क। शांभर नमक ।}} ​{{outdent|गोल (सं० पु० ) १ गुड । २ ग्राम, गांव । ३ ग्राम, कौर ।}} ​{{outdent|गड ( सं० पु० ) वस्तुओं का समूह, जा एक दूमरेके ऊपर रखा रहता है, गञ्ज ।}} ​{{outdent|गडडर ( मं० पु० ) मेष, भेड़ा ।}} ​{{outdent|गडरिक (मं० पु० ) गड़रिया ।}} ​{{outdent|गडरिका (मं० [स्त्रो) मेषप शि. मेड़ की कतार।}} ​{{outdent|गडडल (सं० पु० ) गड़- बाहुलकात् ड ल् । मेष, भेड़ा।}} ​{{outdent|गडलिका (स्त) गडलं अनुसरति, गण्डल उन् १ मेषपंक्ति, भेड़ोंकी कतार । २ धारावाही, क्रमागत. लगातार ।}} ​{{outdent|गडलिकाप्रवाह (मं० पु०) गडलिकायाः प्रवाह व ६- तत् । भेड़ियाधसान ।}} ​{{outdent|गडडाम-नोच, लुच्चा, बदमाश ।}} ​{{outdent|गण्डारिका ( ० ० ) नदीविशेष वह नदी जिसका प्रवाह अधिक प्रवल हो ।}} ​{{outdent|गण्डालिका (सं०] स्तो) में पति मेट्रोंको कतार ।}} ​{{outdent|गड्डो (हिं० स्त० ) ढेर, पुञ्ज ।}} ​{{outdent|गडक (सं० पु० ) जलपात्रविशेष, एक तरहका पानीका वरतन ।}} ​{{outdent|गढ़ (हिं० पु० ) १२ किला।}} ​{{outdent|गढ़कप्तान (हिं० पु०) किलेदार, किलेको, फौजका अफसर।}} ​{{outdent|गढ़त (हिं० ० ) प्राकृति, बनावट ।}} ​{{outdent|गढ़म (हिंस्त्री०) गठन, बनावट ।}} ​{{outdent|गढ़नायक - उड़ीसा प्रान्तके खण्डायतोंका एक भेद । यह पूर्व कालमें गड़ोंके अधिकारो थे ।}} ​{{outdent|गढ़पति (हिं० पु० ) १ किलादार । २ राजा ।}} ​{{outdent|गढ़वाय, अ नियोंका जन्मकल्याचक थे। यहां जनियोंके छठे <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> तीर्थंकर श्रीपद्मप्रभुका जन्म हुआ था। पहिले यहाँ कौशाम्बी नगरी थी । (तौ माया ११८ )}} ​{{outdent|गढ़मण्डल- मध्यप्रदेश के गोण्डवाना के अन्तर्गत एक विस्तव । पति प्राचीन कालसे यह भूभाग स्वाधीन हिन्दू राजाओंक अधिकारमें था। उस समय गढ़ा घोर मण्डल नामके खानमें हिन्दू राजाओंकी राजधानी थी। अब भो उक्त दोनों स्थानोंमें प्राचीन खण्डहर और हिन्दू राजाओंके समय के शिलालेख मिलते हैं, जिनमे वहांको पहिलेको सहिका काफी प्रमाण मिलता है। पहले समय में भट्ट, सुहागपुर, छत्तीसगढ़, सम्बलपुर, गाङ्गपुर, यशपुर इत्यादि जिले भी उक्त गढ़मण्डलके अन्तर्गत थे । अव सो समृद्धि नहीं रही, गढ़ा और मण्डल नामके दो नगरोंसे हो सिर्फ पहले के नामका परिचय मिलता है । पहिले गढ मण्डलमें जो राजा राज्य करते थे, मोचे उनके नाम उडत किये जाते हैं-}} राजाका नाम | राज्यकाल यादवराय | २८२ ० (१) भावसिड | 45 " जगन्नाथ | ६६८ " रघुनाथ | १५९ " चंद्रदेव | ४१० " बिहारीसिड | ४४५ " नरसिहदेव | ५०.८ " वासुदेव | ५१० " गोपालमाडी | qu'ung " म पावाडी | ८·१ " गोपीनाथ | 45 " रामचन्द्र | -२०८ " सुरतामसि' इ | 022 " हरिहरदेव | " पदेव | " धनसि | " सि | " प्रतापादित्य | ८९१ " यशचन्द्र | 506 " मनोहर सि | ८०० " सुध कर दे | <** " <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> c66n7bvj0cjixoz78r90gds8trr8180 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१४५ 250 46067 666537 561767 2026-07-09T16:41:48Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 666537 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गढ़वाल'''|'''१४३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> भाबर में हाथी और निचली पहाड़ियों में चीते मिलते हैं। तेंदुए गढ़वाल में सभी जगह हैं। भालू, गीदड़ और जंगली कुत्ते भी पाए जाते हैं। इस जिले में चिड़ियाँ बहुत हैं। ​ गढ़वाल का प्राचीन इतिहास अंधकाराच्छन्न है। संभवतः इसका कुछ भाग ब्रह्मपुर राज्य में लगता था, जिसकी बात सातवीं शताब्दी के चीनी परिव्राजक (ह्वेनसांग) ने कही थी। पुराणानुसार ब्रह्मपुर का कत्यूरी राजवंश जोशीमठ का था, जहाँ से वह दक्षिण-पूर्व की ओर अल्मोड़ा तक फैल गया। स्थानीय वर्णनानुसार १४वीं शताब्दी के शेष भाग में जगतपाल नामक नृपति छोटे-छोटे राज्यों को तोड़कर देवलगढ़ में बसे थे। परंतु १५वीं शताब्दी के आदि काल में उनके महीपति शाह नामक किसी उत्तराधिकारी ने श्रीनगर को पत्तन (राजधानी) बनाकर प्रकृत स्वाधीन राज्य स्थापित किया। ​प्रायः १५८२ ई० को गढ़वाल के राजा अल्मोड़ा के चंद राजाओं से लड़े, जब रुद्रचंद ने गढ़वाल पर चढ़ाई की थी। वह कई बार विफल हुए। १६५४ ई० को शाहजहाँ ने राजा पृथ्वीशाह को दबाने के लिए अभियान भेजा, जिसके फलस्वरूप देहरादून गढ़वाल से अलग हो गया। फिर कुछ वर्ष पीछे पृथ्वीशाह ने दारा शिकोह के लड़के सुलेमान शिकोह को, जो भागकर गढ़वाल जा रहा था, बंदी बना लिया और उसे औरंगज़ेब को सौंप दिया। अल्मोड़ा के जगतचंद ने (१७०८-२० ई०) राजा को श्रीनगर से निकालकर उसे किसी ब्राह्मण को प्रदान किया था, परंतु प्रदीप शाह ने (१७१७-७२ ई०) गढ़वाल फिर से ले लिया। ​१७७९ ई० को गढ़वाल के ललितशाह ने कुमाऊँ के राजा को हरा अपने पुत्र प्रद्युम्न शाह को उस राज्य पर अभिषिक्त किया। १७९० ई० को गोरखे अल्मोड़ा विजय करके गढ़वाल की ओर बढ़े थे, परंतु तिब्बत में चीनियों से झगड़ा हो जाने के कारण लौट गए। १८०३ ई० को उन्होंने फिर चढ़ाई करके गढ़वाल को रौंदा और देहरादून पर भी अधिकार किया। प्रद्युम्न शाह मैदान छोड़कर भागे और १८०४ ई० को देहरादून के पास अपने साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हुए। ​१८१५ ई० को अंग्रेज़ों ने कुमाऊँ और गढ़वाल पर अधिकार किया। १८३७ ई० को गढ़वाल एक उपविभाग और १८८९ ई० को जिला बनाया गया। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ​इस जिले में कितने ही ऐसे मंदिर हैं, जिन्हें सभी भारतवासी परम पवित्र समझते हैं। इनमें बदरीनाथ, जोशीमठ, केदारनाथ और पाण्डुकेश्वर प्रधान हैं। गोपेश्वर में १० फुट ऊँचे एक त्रिशूल पर धर्म के महाराज के विजय की बात अंकित है, जो संभवतः एक नेपाली नृपति थे। यह निधि ई० १२वीं शताब्दी की है। मंदिरों में या लोगों के पास कितने ही ताम्रपत्र सुरक्षित हैं, जो अपनी ऐतिहासिक दिलचस्पी के लिए बहुमूल्य लगते हैं। ​गढ़वाल में ३ नगर और ३६०० ग्राम हैं। आबादी कोई ४,२८,८०० होगी। इसका सदर पौड़ी एक ग्राम मात्र है। सैकड़े पीछे ८७ लोग गढ़वाली भाषा का व्यवहार करते हैं। प्रत्येक घर पत्थरों की बाहरी दीवार से घेर दिया जाता है। यहाँ थोड़ी-बहुत सब चीज़ें उपजती हैं। ५७८ वर्ग मील में सरकारी जंगल है। साल और बाँस बहुत होता है और जलाने की लकड़ी तथा घास भी मिलती है। पहले स्थानीय व्यवहार के लिए कुछ ताँबा और लोहा निकाल लिया जाता था, परंतु अब वह काम बंद है। कुछ नदियों में अल्प परिमाण में सोना मिलता है। सन से मोटा कपड़ा और टाट बनाते हैं और कम्बल तैयार किए जाते हैं। दो-एक जगह पत्थर पर नक्काशी भी होती है। ​तिब्बत के साथ गढ़वाल का बड़ा व्यवसाय चलता है। वहाँ से नमक, ऊन, भेड़, बकरे, टंकण (सुहागा) मँगाते हैं और अनाज, कपड़ा और नकद रुपया-पैसा पहुँचाते हैं। सब कामकाज प्रायः भोटिया लोगों के हाथ में है। श्रीनगर और कोटद्वार इस जिले के बड़े बाज़ार हैं। सड़कें लगभग सभी कच्ची हैं। ​गढ़वाल समस्थान (केशवनगर) - १. हैदराबाद राज्य के रायचूर जिले की एक खिराज देने वाली रियासत। इसका क्षेत्रफल ८५४ वर्ग मील और लोकसंख्या (आबादी) प्रायः ८४,८४८ है। यह राज्य हैदराबाद से भी पुराना है। पहले यहाँ सिक्का ढलता था, जो आज भी रायचूर जिले में चलता है। कृष्णा और तुंगभद्रा नदियाँ इस राज्य के दक्षिण और पश्चिम में प्रवाहित हैं। ​२. हैदराबाद राज्य के रायचूर जिले के गढ़वाल समस्थान राज्य का प्रधान नगर। यह अक्षांश १६° १४' उ० <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> jyb1oa0rf0ctq1pl4p1bql4sdlzene2 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१४६ 250 46075 666546 561768 2026-07-09T17:51:50Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 666546 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१४४'''|'''गढ़ा-गद्य'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> देशांतर ७७° १२' पू० में अवस्थित है। इसकी लोकसंख्या (आबादी) कोई १०,९८४ होगी। गढ़वाल का दुर्ग राजा सोमाद्रि ने १७१० ई० को बनवाकर तैयार कराया था। इस नगर में रेशमी साड़ियाँ, रूमाल और ज़रदोषी (ज़रदारी) किनारे की बढ़िया धोतियाँ बनती हैं और लाखों रुपये की हैदराबाद आदि निकटस्थ नामी बाज़ारों में जाकर बिकती हैं। ​ {{Outdent|खड़ा(हिं० पु०) गढ़ा देखो।}} ​{{Outdent|गढ़ाई (हिं० स्त्री०) १. गढ़ने का काम। २. गढ़ने की मजदूरी।}} ​गढ़कोट (गढ़ाकोट) मध्य भारत के सागर जिले का एक विभाग। इसका प्रधान नगर भी गढ़कोट ही है। वह सोनार और गधेरी नदी के संगम पर अक्षांश २३° ४७' उ० और देशांतर ७८° ४१' ३०" पू० में सागर नगर से १५ कोस पूर्व को पड़ता है। संभवतः यह शहर गोंड लोगों का बनाया हुआ है। ​१५२८ ई० को बुंदेलखंड के चंद्रशाह नामक किसी राजपूत सामंत ने गोंडों को निकाल करके गढ़कोट पर अधिकार किया और एक दुर्ग बना दिया था। पन्ना के बुंदेला राजा छत्रसाल के पुत्र हृदयशाह ने चंद्रशाह वंशीय किसी राजा को रहली के अंतर्गत नायगुवान ग्राम अर्पण करके यह नगर ले लिया। उन्होंने नदी के दूसरे पार एक और दुर्ग तथा नगर निर्माण करके उसका नाम हृदयनगर रखा था। ​१७३९ ई० को हृदयशाह का स्वर्गवास हुआ। पाँच वर्ष बाद शोभासिंह और उनके भाई पृथ्वीसिंह दोनों के बीच झगड़ा उठा था। पृथ्वीसिंह पेशवा के साहाय्य (मदद) से अपने आप राजा बन बैठे। १८०९ ई० को नागपुर के राजा ने जब किले पर आक्रमण किया, तब पृथ्वीसिंह वंशीय लड़के नरसिंह ने सिंधिया का आश्रय लिया था। ज्यां बपतिस्त (Jean Baptiste) नामक किसी यूरोपीय सेनापति के अधीन सिंधिया ने एक फौज भेज दी। युद्ध में नागपुर की सेना के हारने पर सिंधिया ने मालथौन और गढ़कोट पर अधिकार करके शाहगढ़ तथा अन्य प्रदेश नरसिंह को दे डाले और बपतिस्त साहब ससैन्य गढ़कोट में रहने लगे। ​थोड़े दिनों बाद अर्जुनसिंह ने चालाकी से किला छीना था, परन्तु ६ महीने पीछे जनरल <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> वाटसन ने अंग्रेज़ी फौज के साहाय्य से उन्हें निकाल बाहर किया। यह राज्य सिंधिया के अधिकार में तो रहा, किन्तु अंग्रेज़ सरकार इसमें अपना एका (हस्तक्षेप) चलाने लगी। १८६१ ई० में अंग्रेज़ों ने सिंधिया को दूसरी जगह देकर इसको अपने अधिकार में कर लिया था। ​ आजकल नगर दो भागों में विभक्त है। बीच में सोनार नदी बहती है। नदी के उस पार हृदयनगर में कारबार (व्यापार) की बड़ी जगह है। यहाँ स्त्रियों के पहनने का सूती और पट्टी नामक वस्त्र बनता है और प्रति शुक्रवार को बाज़ार लगता है। इसके अतिरिक्त यहाँ पौष मास को एक बड़ा मेला भी होता है। सोनार और गधेरी नदी के संगम के पास ऊँची भूमि पर किला बना है। उसमें बहुत घर हैं। १८५८ ई० में अंग्रेज़ सेनापति सर ह्यू रोज़ ने उसको जीता था। नगर से एक कोस उत्तर को 'मर्दन गढ़' नाम के प्रासाद (महल) का भग्नावशेष पड़ा है। उसकी दीवार आज भी नहीं बिगड़ी। यह प्रायः ६० हाथ ऊँचा होगा। एक घुमावदार जीने (सीढ़ी) से उस पर चढ़ा जाता है। ​ {{Outdent|गढिया (हिं० पु०) गढ़ने वाला, वह जो कोई चीज़ बनाता हो।}} {{Outdent|गढ़ोई (हिं० पु०) किलेदार, गढ़पति।}} ​ {{Outdent|गण (सं० पु०) गण, कर्माणि अच् कर्तरि अच्, वा।}} १. समूह, ढेर। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "गणानां त्वा गणपतिं" (वाजसनेयी संहिता २३।१९)<br> 'पतिं' या समूहानां पालकम् (महीधर)।</poem>}}}} २. प्रमथ, शिव के सेवक। <Small>"मूर्त्सु विरती गणेषु सादरं वीक्ष्य नाथः" (मेघदूत ५६)।</small> ३. सेना की संख्या। सत्ताइस रथ, सत्ताइस गज (हाथी), इक्यासी घोड़े और एक सौ पैंतीस पदाति (पैदल सैनिक), सब समेत दो सौ सत्तर की संख्या को 'गण' कहते हैं। ४. चौर नामक गंध द्रव्य। ५. गणेश। <Small>"गणदीक्षा प्रवर्तकः" (महानिर्वाण तंत्र)।</small> ​६. विवाह में लड़का और लड़की का सद्भाव वा असद्भाव (गुण मिलान) जानने का उपाय विशेष। ज्योतिषियों ने इसे तीन भागों में विभक्त किया है, यथा- देवगण, मनुष्यगण (नरगण) और राक्षसगण। पूर्वफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्रपद, भरणी, आर्द्रा, और रोहिणी... <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> s2gzg8a8rz80v0g4q3w1axqa00w1z0v पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१४८ 250 46095 666553 561770 2026-07-09T18:22:00Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 666553 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|१४६| गाका}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अपांक्तेय समझना चाहिये। धर्मशास्त्रकार कश्यप कहते हैं कि हन्ता (हत्या करने वाला), कुटिलाङ्ग, चोर और नक्षत्रसूचक ब्राह्मण का समस्त कार्यों में ही परित्याग करना चाहिये। दूसरे-दूसरे धर्मशास्त्रों में भी गणक (ज्योतिषी) की खूब निन्दा की गई है। किन्तु संग्रहकारों का मत है कि जो ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन व व्यवसाय करते हैं, वे पतित या निन्दनीय नहीं हैं; क्योंकि ज्योतिषशास्त्र वेद का एक अंग है। वेद और धर्मशास्त्र में ब्राह्मण ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन कर सकते हैं, ऐसा विधान है। यदि अध्ययन करने से ही पतित वा निन्दनीय कहा जाए तो धर्मशास्त्र का विधान मिथ्या होता है। ​इसके अतिरिक्त कई एक शास्त्रों में ज्योतिष की बहुत सी प्रशंसा भी लिखी है: ​{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"त्रिस्कन्धवेत्ता एवं पूज्यः श्राद्धे सदा द्विजमध्ये। नक्षत्रसूची खलु पापरूपी हेयः सदा सर्वशुभकर्मसु ॥" (वसिष्ठ)</poem>}}}} ​ जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र के स्कन्धत्रय (तीनों स्कन्धों) का अच्छी तरह अध्ययन कर व्युत्पत्ति लाभ किया है, वे श्राद्ध में सब ब्राह्मणों के मध्य पूजनीय हैं। किन्तु जो नक्षत्रसूची हैं, अर्थात् ज्योतिष शास्त्र से अनभिज्ञ होने पर भी नक्षत्रादि की गणना कर जीविका निर्वाह करते हैं, वे ही पतित और निन्दनीय हैं। ​ {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"ग्रन्थतश्चार्थतश्चैवं कृत्स्नं जानाति यो द्विजः। अग्रभुक् स भवेच्छ्राद्धे पूजितः पंक्तिपावनः। नासांवत्सरिके देशे वस्तव्यं भूतिमिच्छता ॥" (वराह)</poem>}}}} ​ जो ब्राह्मण ज्योतिष के समस्त ग्रन्थों का अध्ययन कर उसका प्रकृत (वास्तविक) भाव समझ सकते हैं, वे श्राद्ध में अग्रभुक्, पूजित और पंक्तिपावन हैं। जिस देश में ज्योतिषी नहीं हैं, और जो अपना कल्याण चाहते हों, उन्हें उस देश में रहना नहीं चाहिये। इसके अलावा 'सूर्यसिद्धान्त' और 'सिद्धान्तशिरोमणि' में ज्योतिष की भली-भांति प्रशंसा की गई है। ​ शास्त्रों में दोनों तरह की बातें लिखी गई हैं। एक में गणक की प्रशंसा और दूसरे में निन्दा की गई है। यदि प्रकृत प्रस्ताव से इसकी मीमांसा न की गई तो शास्त्र-विरोध हो सकता है। इसी कारण संग्रहकारों का कथन है कि शास्त्र गणक के विषय में दोनों तरह से लिखे गए हैं। जिसने यथार्थ में ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन नहीं <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> किया अथवा अध्ययन करने पर भी व्युत्पत्ति लाभ नहीं की, वे ही नक्षत्रसूची हैं। ये द्वार-द्वार घूमते हैं और किसी के द्वारा जिज्ञासा (पूछे) नहीं किए जाने पर भी नक्षत्रों की गणना कर गृहस्थों का शुभाशुभ फल कहा करते हैं। इसी कारण शास्त्रकारों ने इन्हें 'नक्षत्रसूची' नाम से उल्लेख किया है। ये यथार्थ में ज्योतिषी नहीं हैं। ये ही पतित, अपांक्तेय और निन्दनीय हैं। पहले जो सब प्रमाण लिखे गए हैं, वे भी दूसरे वचनों के साथ मिलाकर इसी तरह व्याख्या करने होंगे। एवं इत्यादि वसिष्ठ वचन द्वारा स्पष्ट रूप से ही नक्षत्रसूची की निन्दा की गई है। इसके अतिरिक्त दूसरे-दूसरे शास्त्रों में भी नक्षत्रसूची की निन्दा देखी जाती है। जो प्रकृत प्रस्ताव से ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन करते हैं, वे निन्दनीय या अपांक्तेय नहीं हैं। ​वृहत्संहिता में लिखा है कि जो शुद्धजाति (सद्वंशजात), प्रियदर्शन, विनीतवेष, सत्यवादी, जिनका पक्षपात निन्दनीय हो, जिनकी शरीर-संधि सविभक्त और उपचित हो, जिनके हाथ, पैर, नख, नेत्र, चिबुक (ठोड़ी), दाँत, कान, ललाट और मस्तक प्रभृति चारुता-सम्पन्न (सुन्दर) हों, जो स्वर से गंभीर और मिष्टभाषी हों, जो देश और काल का तत्त्व जानते हों, जो शास्त्रीय तर्क में सभा में जाकर कभी भी भीत (भयभीत) नहीं होते, जो निपुण हों, वासनाग्रहगणित जानने के लिए कौतूहली हों, देवपूजा, व्रत और उपवास करने की जिनकी प्रवृत्ति हो, वे ही ज्योतिष शास्त्र अध्ययन करने में उपयुक्त हैं। ​ग्रहगणित अर्थात् पौलिश, रोमक, वासिष्ठ, सौर और पैतामह—इन पाँच सिद्धान्त शास्त्रों में जो युग, वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, अहोरात्र, याम, मुहूर्त, नाड़ी, विनाड़ी, प्राण, त्रुटि प्रभृति काल और तत्त्व निरूपित हुए हैं, उसके सम्यक् वेत्ता (ज्ञाता) तथा सौर, सावन, नाक्षत्र और चान्द्र—ये चार तरह के मास, अधिमास और अवम प्रभृति के ज्ञान से भिन्न, षष्टि संवत्सर, युग, वर्ष, मास, दिन और होरा प्रभृति के अधिपति निर्णय में तथा सौरादि परिमाण में प्रवीण, ग्रहों के शीघ्र, मन्द, याम्य, उत्तर और नीच-उच्च प्रभृति के कारण निर्णय में पटु (कुशल) हों। इनके अतिरिक्त जो दूसरे-दूसरे ज्योतिर्मण्डल के दुरूह विषयों की अच्छी तरह मीमांसा कर सकें... <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 6gwf7e29j4pgq3dbbn2a757qc3qnjw8 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९ 250 75741 666523 609167 2026-07-09T14:58:07Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666523 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|३८|इन्दूर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} ५ चिक्किरके विषसे मस्तकमें यातना, शोफरुक्, हिक्का और वमि होती है। इसमें तरोयी, मैनफल और अङ्कोटका क्वाथ पिला वमि तथा पूर्ववत् चिकित्सा कराना चाहिये। ६ छुछुन्दरके विषसे मलभङ्ग तथा ग्रीवास्तम्भन होता और सर्वदा दीर्घश्वास निकलता है। इसमें गोरक्ष, यव और वृहतीका क्षार खिलाते हैं। ७. अलसके विषसे ग्रीवास्तम्भ, वायुका ऊर्ध्वगमन एवं दष्टस्थानमें दुःख होता और ज्वर चढ़ता है। इसमें घृत और मधुके सहयोगसे महागद चटाना चाहिये। ८ कषायदन्तके विषसे निद्राका वेग बढ़ता, हृदयमें शीर्ष होता और शरीर कृश पड़ जाता है। इसमें शिरीषका सार, फल और वल्कल मधुसे चटाते है। ९ कुलिङ्गके विषसे दंशस्थानमें व्यथा, स्फीति और दीर्घरेखा उठती है। इसमें श्वेत एवं कृष्ण निसिन्धु, सुङ्गपर्णी और माषपर्णीको मधुके साथ खिलाना चाहिये। १० अजितके विषसे वमि, मूर्छा, एवं हृदयमें वेदना होती और चक्षुःपर श्यामता चढ़ती है। मनसा वृक्षके दूधमें काली हिरनपद्दीको पीस मधुसंयोगसे सेवन कराते हैं। ११ चपलके विषसे तृष्णा, वमि और मूर्छा होती है। इसमें देवदारु और त्रिफलाचर्णको मधुके साथ चटाना चाहिये। १२ कपिलके विषसे दंशित स्थानपर क्षत पड़ता, शरीरमें ग्रन्थि उठता और ज्वर चढ़ता है। इसमें त्रिफला, अपराजिता और पुनर्णवा मधुके साथ सेवन कराते हैं। १३ कोकिलके विषसे शरीरमें उग्र गन्थि उठता, अतिशय ज्वर चढ़ता और भौषण दाह पड़ता है। इसपर भेक और नीलष्टक्षके क्वाथमें घृतको पकाकर पिलाना चाहिये। १४ अरुणके विषसे वायु कुपित होने, १५ महाऊष्णके विषसे पित्त बढ़ने, १६ श्वेतके विषसे कफ बिगड़ने, १७ महाकपिलके विषसे रक्त खौलने और {{Multicol-break}} १८ कपोतके विषसे उक्त चारो दोष लगनेपर नान प्रकारकी पीड़ा उठती है। इन पांचों प्रकारके इन्दुरों-का विष शान्त करनेकी निम्नलिखित औषधकी व्यवस्था की गयी है,—दधि, दुग्ध एवं घृत दो-दो सेर, करञ्ज, आरग्वध, त्रिकटु तथा बृहती एक-एक और शालपर्णी दो भाग डाल सबका क्वाथ बनाये। फिर तिल, गुलञ्च, वङ्ग, मृत्तिकायुक्त गुग्गुल, कपित्थ एवं दाड़िमत्वक्‌को पीस पूर्वोक्त काथमें चतुर्थांश रहनेपर डालना और मृदु अग्निपर पकाना चाहिये । यह औषध उक्त पांचों प्रकारके इन्दूरोंका विष शान्त करनेको अमोघ है। बार्बरीका इन्दूर देखने में बहुत अच्छा लगता है। इसके कृष्णवर्ण शरीरमें श्वेत रेखा खिंची होती है। {{c|[[File:पृष्ठ-हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu-३९.jpg|200px]]<br>बार्बरीका इन्दूर}} इन्दूरके शुक्रमें विष रहता है। वस्त्र वा शरीर मूत्र लगनेसे सड़ उठता है। इन्दूरको सामान्य जन्तु समझ अवज्ञा करना उचित नहीं। जिस वाणिज्य और कृषिकार्यके लिये प्रति वर्ष कितने ही प्रकारका नियम निकलता, इसो सामान्य जन्तुसे उसपर कहा जा नहीं सकता—कितना अनिष्ट हुआ करता है। इस सामान्य जीवको भयङ्कर हिंसक प्रक्ततिका प्रमाण भी मिला है। इन्दूर अपने स्वजातीयके साथ विवाद बढ़ा परस्पर लड़ता और युद्धमें मरनेसे दूसरेका भक्ष्य बनता है। शत-शत इन्दूर एकत्र लड़ते देख पड़े हैं। नारवे देशका एक जातीय इन्दूर बहुत ही भयानक होता है। यदि लोग चूहादान लगाकर फांस लेते, तो दूसरे चूहे घृत इन्दूरको मार डालते और समस्त रक्त पी जाते हैं। पकड़नेवाला किसी प्रकार उस इन्दूरको बचा नहीं सकता। विड़ाल, {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> bofevst1psyme88jy4lvwnd12wz37rg पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४० 250 75742 666524 609179 2026-07-09T15:24:05Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666524 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" /></noinclude>{{rh||इन्दूर—इन्दौर|३९}} {{Multicol|line=1px solid black}} कुक्कुर और नकुलसे भी इन्दूर युद्ध करता है। किसी-किसी स्थल में यह उन्हें मार भी डालता है। विलायतमें एक प्रकारका इन्दूर होता, जो सोते शिशु का रक्त पीता है। एक बार विलायतके न्वूगेट कारागारसे चार कैदियोंने गंभीर रात्रिको भागनेकी चेष्टा लगायी थी। भागते समय कितने ही इन्दूरोंने उनपर आक्रमण किया। किसीने किसीका पैर पकड़ा और कोई इन्दूर किसीके गात्त्रपर जा चढ़ा था। इसी प्रकार चूहोंने कैदियोंको पकड़ लिया। वह कहां चुपके-चुपके भागे जाते थे, कहां विषम विभ्राट्‌में पड़ गये और परित्राहि परित्राहि चिल्लाने लगे। प्रतिवासियोंने आकर उन्हें बचा लिया था। उस समय वह फिर कारागार जानेसे कुछ न हिचके। {{smaller|इन्दूर मारनेका उपाय}}—थोड़ेसे सड़े आटेमें मधु मिला तथा अल्प परिमाण सांड़का गोबर छोड़ लेयी बनाते, फिर छोटी-छोटी टिकिया उतार इन्दूरके गर्तमें डालते हैं। इससे निश्चय इन्दूर मर जाते हैं। अथवा अच्छी संखियेका चूर्ण नवनीत, तथा मधु मिला लेयी बनाते और जहां इन्दूर सर्वदा आते-जाते, वहां उसे लगा देते हैं। इन्दूर लेयोको प्रेमसे खाते और साथ हो साथ पञ्चत्व भी पाते हैं। किन्तु लेयी बनाकर हाथ धो डालना चाहिये। क्योंकि इस विषाक्त वस्तुसे सहज ही अनिष्ट आ सकता है। नक्सवमिकाको आटेमें मिला खिलानेसे भी निश्चय इन्दूर मरता है। गन्धकका धूम यह सह नहीं सकता। इसीसे अनेक लोग गर्तमें गन्धक जला इन्दूर मारा करते हैं। {{smaller|औषध}}—एक छटांक इन्दूरमांस और एक पाव सर्षप तलको साथ ही आगपर चढ़ाये। मांस तला—जैसा हो जानेपर उतार लेना चाहिये। इस तेलको मलनेसे गुदभ्रंश रोग सत्वर भारोग्य होता है। {{smaller|वाणिज्य}}—इन्टूरके चमड़े और दांतका वाणिज्य चलता है। चमड़ेके दस्ताने स्त्रियां अपने लिये बनाती हैं। दांतके छोटे-छोटे बटन तैयार होते हैं। लोमको बड़े-बड़े साहब टोपीमें लगाते हैं। एकबार पारिस {{Multicol-break}} नगरके किसी नाबदानमें एकपक्ष मध्य ही छः लाख इन्दूर मारे गये थे। {{smaller|इन्दूरका घर}}—बबयी पक्षी जैसे अपना घोंसला लगाता, एक प्रकारका विलायती क्षुद्र इन्दूर भी वैसे ही वृक्षपर लतापत्रका गोलाकार घर बनाता है। घरका पथ कोई ढूंढ नहीं सकता। बालक किसी प्रकारका फल वा अन्य पदार्थ समझ उसे तोड़ लाते और भूमिमें {{c|[[File:"पृष्ठ-हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu-४०".jpg|200px]]<br>घोंसले—जैसा घर।}} गाड़कर खेल मचाते हैं। घर टूटनेसे देख पड़ता, कि उसमें पर-पर अनेक स्थान रहता है। प्रत्येक स्थानमें चक्षुहीन शिशु सोया करता है। घरके बीच एक पथ चलता है। बोध होता, कि उसी पथसे यातायात लगा रहता है‌। नाना देशके लोग इन्दूर खाया करते हैं। हमारे देशके सन्ताल आर भील चूहेको चबा डालते हैं। चीन, नेपाल, कालिफारनिया, फ्रान्स, मालटा और इङ्गलेण्डमें भी कोई-कोई इन्दूर खाता है। फ्रान्स के पारिस नगरमें किसी-किसी श्वेताङ्गिनीको चूहेका शोरबा बहुत अच्छा लगता है। {{outdent|इन्दौर—मध्यभारतके मालवा प्रान्तका एक विशाल राज्य। यह अक्षा° २१° २४ तथा २४° १४′ उ॰ और द्राधि° ७४° २८ एवं ७८° १०′ पू॰ के मध्य अवस्थित है। क्षेत्रफल ८४०० वर्गमील है। वार्षिक आय प्रायः एक करोड़ रुपयेसे अधिक है। राज्यका राजनैतिक सम्बन्ध बड़ेलाटके मध्यभारतस्थ एजण्टसे सीधा लगा है। इन्दौर राज्य चार भागमें विभक्ता है। प्रथम भागसे उत्तर ग्वालियर-राज्य; पूर्व देवास, धारराज्य तथा नीमाड़, दक्षिण बम्बई प्रान्तका खान्देश जिला और पश्चिम बरवानी तथा धार पड़ता।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 6m4e7vijiovlhwelhj6e8w2342eb1gu पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४१ 250 75745 666526 609190 2026-07-09T15:46:04Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666526 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४०|इन्दौर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} है। यह उत्तरसे दक्षिण १२० मील लम्बा और ८२ मील चौड़ा है। बीचों बीच नर्मदा नदी बहती है। राज्यका दूसरा बड़ा भाग अक्षा॰ २४° ३ एवं २४° ४०′ उ॰ और द्राधि॰ ७५° ६ तथा ७६° १२ पू॰ के बीच पड़ता है। यह प्रदेश पूर्वसे पश्चिम ७० मील लम्बा ४० मील चौड़ा है। प्रधान नगर रामपुरा, भानपुरा और चंदवाड़ा है। तीसरा भाग अक्षा॰ २३° २८′ उ॰ तथा द्राधि॰ ८५° ४२′ पू॰ पँरै अवस्थित और महीदपुर नगरसे संयुक्त है। चौथे भागमें अच्क्षा॰ २२° १०′ उ॰ और द्राधि॰ ७४° ३८ पू॰ पर धीनगर विद्यमान है। कई छोटे-छोटे राज्य इन्दौरके अधीन हैं। सिवा इसके खासगी या सरकारी १५० से भी अधिक ग्राम लगते हैं। ग्राम समृद्ध हैं। प्रायः दश लाख रुपये वार्षिक ग्रामोंका आय है। उत्तरमें चम्बल और दक्षिणमें नर्मदा नदी बहती है। दक्षिण दिक् विन्धयाचल पर्वत खड़ा है। राज्य के मध्यकी मन्दसोर उपत्यका समुद्रतलसे छः-सात हज़ार फीट ऊंची है। ढाक, बबूल और दूसरे झाड़का जङ्गल पड़ता है। भूमि उर्वरा है। प्रधानतः गेहूं, चावल, बाजरा, दाल, राई, सरसों, गन्ना और रुईकी फसल होती है। अहिफेनकी कृषिके लिये भूमि अतिशय उपयुक्त है। उम्दा तम्बाकू भी बहुत पैदा होती वन्य है। जङ्गलमें साखुकी बीड़ लगायी जाती है। पशुमें सिंह, चित्रव्याघ्न, विडाल, तरक्षु, शृगाल, नील-गाव, और जङ्गली भैंसा मिलता है। नक्र और विषाक्त सर्पकी कोई कमी नहीं। इन्दौर में राजवंशीय महाराष्ट्र, हिन्दू, कुछ मुसलमान और बहुतसे गोंड तथा भील रहते हैं। सेनामें युक्तप्रदेश और पन्जाबके लोग अधिकांश हैं। भील वन्यद्रव्य खा, आखेट मार और सभ्य प्रतिवासीको लूट अपना निर्वाह करते हैं। किन्तु अब युद्धपाठशाला में शिक्षा पानेसे वह पुलिस और पलटनमें अच्छा काम देने लगे हैं। लोकसंख्या दश लाखसे अधिक है। बम्बईसे ३५३ मील दूर खंडवा जङ्कशनसे होलकर-ष्टेट-रेलवे मवूकी राह इन्दौर नगरको जाती है। महाराजको अतिरिक्त लाभका अर्धांश मिलता है। {{Multicol-break}} १८७६ ई॰ को नर्मदापर पुल बंधा था। इन्दौर से नीमचको जानेवाली पक्की सड़कपर ही सवू नगर पड़ता है। इन्दौरसे खंडवेको भी पक्की सड़क निकली है। इन्दौर नगरमें महाराज रूईका एक पुतलीघर चलाते हैं। अफीम धड़ाधड़ बाहर भेजी जाती है। अन्नका चालान अधिक नहीं होता। {{smaller|इतिहास}}—होलकर वंश गड़रिये महाराष्ट्रोंसे सम्बन्ध रखता है। किसी गड़रियेके लड़के मल्हार रावने इस वंशकी प्रतिष्ठा की है। वह १६९३ ई॰ को दक्षिणमें नीरा नदीपर होल नामक ग्राममें उत्पन्न हुये थे। करका अर्थ अधिवासी है। इसीसे इस वंशका उपाधि होलकर अर्थात् होल ग्रामका अधिवासी पड़ गया है। युवावस्था पर मल्हार राव अपने घरका काम छोड़ किसी महाराष्ट्र पदाधिकारी-की अश्वारोही सेनामें भरती हुये थे। १७२४ ई॰ को वह पेशवाके अधीन पांच सौ सवारोंके नायक बनें। थोड़े हो दिनमें मल्हार रावकी कितनी ही भूमि पुरस्कार स्वरूप मिली थी। १७३२ ई॰ को उन्होंने पेशवा के प्रधान सेनापति बन मालवेके मुगल सूबेदारको युद्धमें नीचा देखाया, इस विजयके उपलक्ष में मल्हाररावको इन्दौर और जीते प्रान्तका अधिकांश सैनिक व्ययके लिये दिया गया था। १७३५ ई॰ को वह नर्मदासे उत्तर रहनेवाली महाराष्ट्र-सेनाके अध्यक्ष बने। फिर बारह वर्षतक मल्हारराव मुगलोंसे लड़ने और बसरेसे पोर्तगीजोंको निकालने तथा रुहेलोंसे लखनऊके नवाबी बचानेमें सहायता पहुंचाते रहे। इसी बीच अधिकार और प्रभाव बढ़नेसे वह भारतीय नरेशोंमें अग्रगण्य हो गये थे। १७६१ ई॰ को पाणिपथ युद्धसे मल्हारराव सकुशल पीछे हट आये। वह मध्य-भारत पहुंचते हो अपने विशाल राज्यको घटा सम्बद्ध और नियमित बनानेमें लगे। १७६५ ई॰ को मल्हारराव स्वर्गवासी हुये। मल्हाररावके पुत्र मालीरावको राज्यका उत्त्तराधिकार मिला था। किन्तु वह सिंहासनपर बैठनेके नौ मास बाद ही पागल होकर मर गये। मालीरावके बाद सुप्रसिद्धं अहल्या-बाईने सेनापति तुकाराव जीके साथ {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> a5wmfnitm4gqj6ujwufi5m9wa9l66bj पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४२ 250 75746 666529 609193 2026-07-09T16:04:03Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666529 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्दौर|४१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} राज्यका प्रबन्ध अपने हाथ ले शान्तिपूर्वक ३० वर्षतक शासन चलाया था। १७९५ ई॰ को अहल्याबाईके मरनेपर गृहविवादसे होलकर वंशका बल घटा। किन्तु तुकारावजीके जारजपुत्र यशोवन्त रावने बिगड़ा काम बनाया था। एकबार भीषण रूपसे सेंधियाके साथ हारते ही उन्होंने अपनी सेना सुधारनेके लिये युरोपीय अफसर नौकर रखे। १८०२ ई॰ को यशोवन्त-रावने पेशवा और सेंधियाकी संयुक्त सेना हरा पूना नगर अधिकार किया था। किन्तु बसईमें जो सन्धि हुयी, उसके अनुसार यशोवन्त-रावकी सवारी इन्दौर वापस आयी और पेशवाको उनकी राजधानी मिल गयी। १८०३ ई॰ के महाराष्ट्र-युद्धसे यशोवन्त राव अलग रहे। अन्तको वह अंगरेज सरकारसे लड़ गये थे। पहले तो उन्होंने करनल मोनसनको पीछे हटाया और अंगरेज राज्यपर आक्रमण मारा, किन्तु अन्तकी लार्ड लेकसे हारनेपर १८०५ ई॰ के दिसम्बर मास बियास नदी किनारे आत्मसमर्पणकर सन्धिपत्र लिख दिया। सन्धिके अनुसार युद्धमें जीता प्रान्त अंगरेजोंको मिला था। किन्तु दूसरे वर्ष अंगरेजोंने उनका अधिकार वापस किया। १८११ ई॰ को यशोवन्तराव पागल होकर मर गये। उनके लड़के मल्हार-राव रहे, जो तुलसीबाई नामक रानीसे पैदा हुये थे। कुछ वर्षतक राज्यमें कितना ही झगड़ा चला और पिण्डारी डाकुवींका उपद्रव बढ़ा। सेनाके विप्लव मचाने पर रानीने अपनी और मल्हार रावकी रक्षाके लिये अंगरेज सरकारसे सहायता मांगी थी। इसी बीच लिये अंगरेज सरकारसे सहायता मांगी थी। इसी बीच पेशवा और अंगरेज सरकारमें युद्ध लग गया। इन्दौरने भी पेशवाके साथ योग दिया था। रानीका वध हुआ और महीदपुरमें इन्दौरकी सेनाको पूर्ण रीतिसे नीचा देखना पड़ा। १८१८ ई॰ को मन्दसोर में जो सन्धि हुयी, उससे कितनी ही भूमि राज्यसे निकल गयी थी। १८३३ ई॰ को मल्हाररावके मरनेपर उनकी विधवा रानीने मार्तण्ड रावको गोद लिया। किन्तु कुछ सप्ताह बाद मार्तण्ड-रावको निकाल हरिरावने राज्यका भार अपने हाथ उठाया था। हरिरावके समय समस्त राज्यमें अराजकताकी धूम रही। १८४३ ई॰ को {{Multicol-break}} हरिराव मरे और उनके दत्तकपुत्त्र भी कुछ मास बाद चल बसे। १८५१ ई॰ को तुकारावजी सिंहासनारूढ़ हुये थे। १८५७ ई॰ को इन्दौरकी सेनाने. अंगरेजी पोलिटिकल रेसिडेण्ट सर हेनरी ड्ररण्डको घेर लिया। मुश्किलसे वह अपने बालबच्चोंको ले भूपाल पहुंचे थे। किन्तु सेनाके कुछ सप्ताह बाद हथियार रख देनेसे फिर शान्ति हो गयी। १८८८ ई॰ को इन्दौर में ब्रिटिश रेसिडेण्ट नियुक्त हुआ। उस समय राज्य शासन संक्रान्त कितने नियम परिवर्तित और मन्त्रिसभा स्थापित हुई। १८०३ ई॰ महाराज शिवाजीराव होलकर अपने १२ वर्षके अवस्थावाले पुत्र तुकाजी रावको राज्यभार सौंपा। बाद १९०८ ई॰ को महाराज शिवाजीका परलोक हुआ। महाराज तुकारावजी इस समय वर्तमान महीप है। {{smaller|होलकर देखो।}} इन्दौर राज्यको लोकसंख्या नौ लाखसे ऊपर है। अंगरेज इन्दौरकी रक्षा करते और दूसरे राज्यसे विवाद बढ़नेपर मिटा देते हैं। इन्दौरके महाराज दूसरे राज्यसे सीधे पत्रव्यवहार न चलाने, अधिक सेना न रखने, किसी युरोपीय या अमेरिकनको अपने राज्यमें नौकरी न देनेपर वाध्य हैं। उन्हें गोद लेनेको सनद दी गयी है। अंगरेजीमें १८ और अपने राज्यमें २१ तोपोंको सलामी वह पाते हैं। ३१०० मामूली तथा २१५० गैरपाबन्द पैदल और २१०० मामूली एवं १२०० गैरपाबन्द सवार रहते हैं। २४ तोपोंमें ३४० आदमी लगते हैं। महाराजको फांसी देनेका अधिकार प्राप्त है। राज्यका आयः बढ़ते जाता है। इन्दौरकी रेसिडेन्सी में मध्यभारतीय राजावोंके लड़कोंको शिक्षा देनेके लिये राजकुमार कालेज बना है। किन्तु वह राज्यसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, समस्त व्यय अंगरेज-सरकारसे मिलता है। १२ से २० पर्यन्त राजकुमार शिक्षा पाते हैं। महाराजके स्कूलमें केवल दक्षिणी ब्राह्मण पढ़ते हैं। मन्दसोर और खारगांवमें भी अंगरेजो स्कूल हैं। २. इन्दौर राज्यका प्रधान नगर। यह अक्षा॰ २२° {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> fpfgzkwir22z50l7me841htjhigii7i 666532 666529 2026-07-09T16:06:07Z ममता साव9 2453 666532 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्दौर|४१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} राज्यका प्रबन्ध अपने हाथ ले शान्तिपूर्वक ३० वर्षतक शासन चलाया था। १७९५ ई॰ को अहल्याबाईके मरनेपर गृहविवादसे होलकर वंशका बल घटा। किन्तु तुकारावजीके जारजपुत्र यशोवन्त रावने बिगड़ा काम बनाया था। एकबार भीषण रूपसे सेंधियाके साथ हारते ही उन्होंने अपनी सेना सुधारनेके लिये युरोपीय अफसर नौकर रखे। १८०२ ई॰ को यशोवन्त-रावने पेशवा और सेंधियाकी संयुक्त सेना हरा पूना नगर अधिकार किया था। किन्तु बसईमें जो सन्धि हुयी, उसके अनुसार यशोवन्त-रावकी सवारी इन्दौर वापस आयी और पेशवाको उनकी राजधानी मिल गयी। १८०३ ई॰ के महाराष्ट्र-युद्धसे यशोवन्त राव अलग रहे। अन्तको वह अंगरेज सरकारसे लड़ गये थे। पहले तो उन्होंने करनल मोनसनको पीछे हटाया और अंगरेज राज्यपर आक्रमण मारा, किन्तु अन्तकी लार्ड लेकसे हारनेपर १८०५ ई॰ के दिसम्बर मास बियास नदी किनारे आत्मसमर्पणकर सन्धिपत्र लिख दिया। सन्धिके अनुसार युद्धमें जीता प्रान्त अंगरेजोंको मिला था। किन्तु दूसरे वर्ष अंगरेजोंने उनका अधिकार वापस किया। १८११ ई॰ को यशोवन्तराव पागल होकर मर गये। उनके लड़के मल्हार-राव रहे, जो तुलसीबाई नामक रानीसे पैदा हुये थे। कुछ वर्षतक राज्यमें कितना ही झगड़ा चला और पिण्डारी डाकुवींका उपद्रव बढ़ा। सेनाके विप्लव मचाने पर रानीने अपनी और मल्हार रावकी रक्षाके लिये अंगरेज सरकारसे सहायता मांगी थी। इसी बीच लिये अंगरेज सरकारसे सहायता मांगी थी। इसी बीच पेशवा और अंगरेज सरकारमें युद्ध लग गया। इन्दौरने भी पेशवाके साथ योग दिया था। रानीका वध हुआ और महीदपुरमें इन्दौरकी सेनाको पूर्ण रीतिसे नीचा देखना पड़ा। १८१८ ई॰ को मन्दसोर में जो सन्धि हुयी, उससे कितनी ही भूमि राज्यसे निकल गयी थी। १८३३ ई॰ को मल्हाररावके मरनेपर उनकी विधवा रानीने मार्तण्ड रावको गोद लिया। किन्तु कुछ सप्ताह बाद मार्तण्ड-रावको निकाल हरिरावने राज्यका भार अपने हाथ उठाया था। हरिरावके समय समस्त राज्यमें अराजकताकी धूम रही। १८४३ ई॰ को {{Multicol-break}} हरिराव मरे और उनके दत्तकपुत्त्र भी कुछ मास बाद चल बसे। १८५१ ई॰ को तुकारावजी सिंहासनारूढ़ हुये थे। १८५७ ई॰ को इन्दौरकी सेनाने. अंगरेजी पोलिटिकल रेसिडेण्ट सर हेनरी ड्ररण्डको घेर लिया। मुश्किलसे वह अपने बालबच्चोंको ले भूपाल पहुंचे थे। किन्तु सेनाके कुछ सप्ताह बाद हथियार रख देनेसे फिर शान्ति हो गयी। १८८८ ई॰ को इन्दौर में ब्रिटिश रेसिडेण्ट नियुक्त हुआ। उस समय राज्य शासन संक्रान्त कितने नियम परिवर्तित और मन्त्रिसभा स्थापित हुई। १८०३ ई॰ महाराज शिवाजीराव होलकर अपने १२ वर्षके अवस्थावाले पुत्र तुकाजी रावको राज्यभार सौंपा। बाद १९०८ ई॰ को महाराज शिवाजीका परलोक हुआ। महाराज तुकारावजी इस समय वर्तमान महीप है। {{smaller|होलकर देखो।}} इन्दौर राज्यको लोकसंख्या नौ लाखसे ऊपर है। अंगरेज इन्दौरकी रक्षा करते और दूसरे राज्यसे विवाद बढ़नेपर मिटा देते हैं। इन्दौरके महाराज दूसरे राज्यसे सीधे पत्रव्यवहार न चलाने, अधिक सेना न रखने, किसी युरोपीय या अमेरिकनको अपने राज्यमें नौकरी न देनेपर वाध्य हैं। उन्हें गोद लेनेको सनद दी गयी है। अंगरेजीमें १८ और अपने राज्यमें २१ तोपोंको सलामी वह पाते हैं। ३१०० मामूली तथा २१५० गैरपाबन्द पैदल और २१०० मामूली एवं १२०० गैरपाबन्द सवार रहते हैं। २४ तोपोंमें ३४० आदमी लगते हैं। महाराजको फांसी देनेका अधिकार प्राप्त है। राज्यका आयः बढ़ते जाता है। इन्दौरकी रेसिडेन्सी में मध्यभारतीय राजावोंके लड़कोंको शिक्षा देनेके लिये राजकुमार कालेज बना है। किन्तु वह राज्यसे कोई सम्बन्ध नहीं रखता, समस्त व्यय अंगरेज-सरकारसे मिलता है। १२ से २० पर्यन्त राजकुमार शिक्षा पाते हैं। महाराजके स्कूलमें केवल दक्षिणी ब्राह्मण पढ़ते हैं। मन्दसोर और खारगांवमें भी अंगरेजो स्कूल हैं। २. इन्दौर राज्यका प्रधान नगर। यह अक्षा॰ २२° {{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 11|2em}}</noinclude> 3eg428mngtxst9b9c02xu03gq9mddpj पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४३ 250 75748 666538 609194 2026-07-09T16:52:06Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666538 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४२|इन्द्र|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} ४२′ उ॰ और द्राधि॰ ७५° ५४′ पू॰ पर अवस्थित है। इन्दौरमें महाराज और बड़ेलाटके पोलिटिकल एजण्ट रहते हैं। अहल्याबाईने मल्हार-रावके मरनेपर यह नगर बनवाया था। राजप्रासाद, लालबाग, टकसालघर, हायीस्कूल, बाजार, पुस्तकालय, अस्पताल और रूईका पुतलोधर देखने योग्य है। नगरसे मिली अंगरेज़ी रेसीडेन्सीका अस्पताल बहुत बढ़िया है। कृत्रिम नाक प्रस्तुत होती है। {{outdent|इन्द्र (सं॰ पु॰) इदि परमैश्वर्ये रन्। {{smaller|ऋजेन्द्राय....... वने, रामात्राः। उण् २।२८।}} १ शक्र, देवराज। यह वेदोक्त प्राचीन देवता हैं। वैदिक ऋषि जिन देवताओंकी आराधना करते, उनमें इन्द्र ही प्रधान रहे। ऋक्संहिताके मत में इन्द्र निष्टिग्रीके पुत्र हैं। {{smaller|"निष्टियाः पुत्रमाच्यावयोतय इन्द्र सवाध इह।" (ऋक् १०/२०१११२)}} माताने इनको सहस्त्र मास और अनेक वर्ष गर्भमें रखा था। उसके बाद इन्द्रने वीयंपूर्ण हो स्वयं जन्मग्रहण किया। उस समय इनकी माता प्रमत्त हो गयी थीं {{smaller|(ऋक् ४।१८१५-८)}} इन्द्रने अपने पिताका पादहय ग्रहणकर उनको मार डाला। {{smaller|(ऋक् ४।१९।१३, तै॰ सं॰ ६।१।३।६)}} इन्द्रकी माताका नाम एकाष्टका रहा— {{block center|<poem>{{smaller|"एकाष्टका तपसा तप्यमाना जजान गर्भस्म्महिमानमिन्द्रम्। तेन देवा अस्त्रहन्त शत् न् हन्ता दू नामभवत् शचीपतिः॥" (अथर्व ३।१०।१२)}}</poem>}} एकाष्टकाने घोरतर तपस्या करके महिमान् इन्द्रको उत्पन्न किया था। इन्हीके द्वारा देवताओंने शत्रुओंपर आक्रमण मारा। शचीपति दस्युवों के हन्ता हुये थे। सोम इन्द्रके जनक हैं। {{smaller|"सोम... जनिता इन्द्रस्य" (ऋक् ९।९९।५)}} इन्द्रने अग्नि सहित पुरुषके मुखसे जन्मग्रहण किया। {{smaller|"सुखादिन्द्रयाग्रिश्च प्राणादायुरजायत।" (पुरुषसूक्त)}} ऋक्संहिताके मतमें इन्द्र एक आदित्य होते भी द्वादश आदित्यसे भिन्न हैं। इन्द्र प्रजापतिसे भी उत्पन्न माने गये हैं। {{smaller|(शतपथ १।१।१।१५)}}कहते हैं,—{{smaller|"प्रजापतिदें वासुरानसृजत‌। स इन्द्रमणि न असृजेत। तं देवा अनुवन्निन्द्रं नो जनव इति। सो अब्रवीद यथा अहं युभांस्तपसा असृक्षि एवमिन्द्र' जनध्वनिति। ते तयो अतपान्त ते आत्मनीन्द्र मपश्यत्। तमव्रु बन् जायस्व}} {{Multicol-break}} {{smaller|इति‌। प्ब्रवीत् किम् मागधे यमभिजनिष्ये इति। ऋतून् संवत्सरान् प्रजाः पशून् लोकानित्यब्रुवन्।" (तैत्तिरीय ब्राह्मण)}} प्रजापतिने देवों एवं असुरोंकी सृष्टि की, किन्तु इन्द्रकी उत्पत्ति न हुयी। देवगणने उनसे इन्द्रको भी उत्पादन करनेको कहा था। उन्होंने उत्तर दिया,—हमारी तरह तपोवलसे तुम भी इन्द्रको उत्पादन करो। इसके बाद देवता तपस्यामें प्रवृत्त हुये थे। देवताओंने इन्द्रको अपने आत्मामें देख जन्म लेनेकी प्रार्थना की इन्द्रने कहा—किस भाग्यमें जन्मग्रहण करें। देवताओंने ऋतु, वत्सर, प्रजा, पशु एवं इह लोकादिका नाम ले दिया था। उक्त श्रुतिके अन्यस्थलमें, प्रजापति द्वारा इन्द्रका उत्पादन किया जाना भी लिखा है। {{smaller|(ऐतरेयब्राह्मण २।२)}} इन्द्रकी पत्नी इन्द्राणी हैं {{smaller|(ऋक् १।१२।१२)।}} स्त्रीका नाम प्रसहा भी लिखा है। {{smaller|(ऐतरेयब्राह्मण २।२)}} वैदिक देवताओंमें इन्द्र प्रधान योद्धा एवं श्रेष्ठ शक्तिसम्पन्न थे। ऋक्संहितामें इनके असीमगुणका परिचय पाया जाता है। सामार्चिकमें भी लिखा है— {{smaller|"इन्द्रस्व वाह स्थविरी युवान्वाष्पृष्यी सुप्रतिकावस ह्यी। ती युञ्जीत प्रथमौ योगे आगते याभग्रां जितमसुराणां सही महत्॥"}} समय आनेपर (युद्धकालमें) इन्द्रने स्थविर, युवा, अनाष्टष्य, सुप्रतीक और शत्रु के असह्य वाहुहयको पहले ही योजना कर डाली, जिसके प्रभावसे असुरोंकी शक्ति पराजित हो गयी। यह सुवर्णमय कोड़ाधारण करते और सूर्यके अश्व या कभो हिरण्य-मय रथपर चढ़ते थे। वायु इनके सारथी रहे। {{smaller|(ऋक् ८।३।३।११, १०।४९।७, ८।१।२४, ८।४८।३)}} अस्त्रोंमें वज्ज्र और अङ्गश ही इन्द्र सदा व्यवहार करते थे। उस समय वृत्र नामक एक असुर देवताओंकी सर्वदा अनिष्ट करता था। देवताओंने जाकर अपना दुःख इनसे कहा। इन्द्र देवताओंके साथ वृत्त्र-संहारमें अग्रसर हुये थे। इस युद्धमें सब देवता भागे, केवल मरुङ्गण और विष्णु साहाय्यार्थं रह गये। इन्द्रने वज्रके द्वारा वृत्रकी विनाश किया। एतद्भिन्न अहि, शुष्ण, नमुचि, पिप्रु, शम्बर, उरण, {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> liz4r0drdcgiiaenwex9q3wipm0p6o4 666539 666538 2026-07-09T16:56:04Z ममता साव9 2453 666539 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४२|इन्द्र|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} ४२′ उ॰ और द्राधि॰ ७५° ५४′ पू॰ पर अवस्थित है। इन्दौरमें महाराज और बड़ेलाटके पोलिटिकल एजण्ट रहते हैं। अहल्याबाईने मल्हार-रावके मरनेपर यह नगर बनवाया था। राजप्रासाद, लालबाग, टकसालघर, हायीस्कूल, बाजार, पुस्तकालय, अस्पताल और रूईका पुतलोधर देखने योग्य है। नगरसे मिली अंगरेज़ी रेसीडेन्सीका अस्पताल बहुत बढ़िया है। कृत्रिम नाक प्रस्तुत होती है। {{outdent|इन्द्र (सं॰ पु॰) इदि परमैश्वर्ये रन्। {{smaller|ऋजेन्द्राय....... वने, रामात्राः। उण् २।२८।}} १ शक्र, देवराज। यह वेदोक्त प्राचीन देवता हैं। वैदिक ऋषि जिन देवताओंकी आराधना करते, उनमें इन्द्र ही प्रधान रहे। ऋक्संहिताके मत में इन्द्र निष्टिग्रीके पुत्र हैं। {{smaller|"निष्टियाः पुत्रमाच्यावयोतय इन्द्र सवाध इह।" (ऋक् १०/२०१११२)}} माताने इनको सहस्त्र मास और अनेक वर्ष गर्भमें रखा था। उसके बाद इन्द्रने वीयंपूर्ण हो स्वयं जन्मग्रहण किया। उस समय इनकी माता प्रमत्त हो गयी थीं {{smaller|(ऋक् ४।१८१५-८)}} इन्द्रने अपने पिताका पादहय ग्रहणकर उनको मार डाला। {{smaller|(ऋक् ४।१९।१३, तै॰ सं॰ ६।१।३।६)}}}} इन्द्रकी माताका नाम एकाष्टका रहा— {{block center|<poem>{{smaller|"एकाष्टका तपसा तप्यमाना जजान गर्भस्म्महिमानमिन्द्रम्। तेन देवा अस्त्रहन्त शत् न् हन्ता दू नामभवत् शचीपतिः॥" (अथर्व ३।१०।१२)}}</poem>}} एकाष्टकाने घोरतर तपस्या करके महिमान् इन्द्रको उत्पन्न किया था। इन्हीके द्वारा देवताओंने शत्रुओंपर आक्रमण मारा। शचीपति दस्युवों के हन्ता हुये थे। सोम इन्द्रके जनक हैं। {{smaller|"सोम... जनिता इन्द्रस्य" (ऋक् ९।९९।५)}} इन्द्रने अग्नि सहित पुरुषके मुखसे जन्मग्रहण किया। {{smaller|"सुखादिन्द्रयाग्रिश्च प्राणादायुरजायत।" (पुरुषसूक्त)}} ऋक्संहिताके मतमें इन्द्र एक आदित्य होते भी द्वादश आदित्यसे भिन्न हैं। इन्द्र प्रजापतिसे भी उत्पन्न माने गये हैं। {{smaller|(शतपथ १।१।१।१५)}}कहते हैं,—{{smaller|"प्रजापतिदें वासुरानसृजत‌। स इन्द्रमणि न असृजेत। तं देवा अनुवन्निन्द्रं नो जनव इति। सो अब्रवीद यथा अहं युभांस्तपसा असृक्षि एवमिन्द्र' जनध्वनिति। ते तयो अतपान्त ते आत्मनीन्द्र मपश्यत्। तमव्रु बन् जायस्व}} {{Multicol-break}} {{smaller|इति‌। प्ब्रवीत् किम् मागधे यमभिजनिष्ये इति। ऋतून् संवत्सरान् प्रजाः पशून् लोकानित्यब्रुवन्।" (तैत्तिरीय ब्राह्मण)}} प्रजापतिने देवों एवं असुरोंकी सृष्टि की, किन्तु इन्द्रकी उत्पत्ति न हुयी। देवगणने उनसे इन्द्रको भी उत्पादन करनेको कहा था। उन्होंने उत्तर दिया,—हमारी तरह तपोवलसे तुम भी इन्द्रको उत्पादन करो। इसके बाद देवता तपस्यामें प्रवृत्त हुये थे। देवताओंने इन्द्रको अपने आत्मामें देख जन्म लेनेकी प्रार्थना की इन्द्रने कहा—किस भाग्यमें जन्मग्रहण करें। देवताओंने ऋतु, वत्सर, प्रजा, पशु एवं इह लोकादिका नाम ले दिया था। उक्त श्रुतिके अन्यस्थलमें, प्रजापति द्वारा इन्द्रका उत्पादन किया जाना भी लिखा है। {{smaller|(ऐतरेयब्राह्मण २।२)}} इन्द्रकी पत्नी इन्द्राणी हैं {{smaller|(ऋक् १।१२।१२)।}} स्त्रीका नाम प्रसहा भी लिखा है। {{smaller|(ऐतरेयब्राह्मण २।२)}} वैदिक देवताओंमें इन्द्र प्रधान योद्धा एवं श्रेष्ठ शक्तिसम्पन्न थे। ऋक्संहितामें इनके असीमगुणका परिचय पाया जाता है। सामार्चिकमें भी लिखा है— {{smaller|"इन्द्रस्व वाह स्थविरी युवान्वाष्पृष्यी सुप्रतिकावस ह्यी। ती युञ्जीत प्रथमौ योगे आगते याभग्रां जितमसुराणां सही महत्॥"}} समय आनेपर (युद्धकालमें) इन्द्रने स्थविर, युवा, अनाष्टष्य, सुप्रतीक और शत्रु के असह्य वाहुहयको पहले ही योजना कर डाली, जिसके प्रभावसे असुरोंकी शक्ति पराजित हो गयी। यह सुवर्णमय कोड़ाधारण करते और सूर्यके अश्व या कभो हिरण्य-मय रथपर चढ़ते थे। वायु इनके सारथी रहे। {{smaller|(ऋक् ८।३।३।११, १०।४९।७, ८।१।२४, ८।४८।३)}} अस्त्रोंमें वज्ज्र और अङ्गश ही इन्द्र सदा व्यवहार करते थे। उस समय वृत्र नामक एक असुर देवताओंकी सर्वदा अनिष्ट करता था। देवताओंने जाकर अपना दुःख इनसे कहा। इन्द्र देवताओंके साथ वृत्त्र-संहारमें अग्रसर हुये थे। इस युद्धमें सब देवता भागे, केवल मरुङ्गण और विष्णु साहाय्यार्थं रह गये। इन्द्रने वज्रके द्वारा वृत्रकी विनाश किया। एतद्भिन्न अहि, शुष्ण, नमुचि, पिप्रु, शम्बर, उरण, {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 72mr589a7d5ta37jiwec4dkcgevk61c पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४४ 250 75749 666542 609195 2026-07-09T17:16:49Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666542 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्र|४३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पणि वत्स प्रभृति प्रधान प्रधान असुरांको भी इन्द्रने मारा था। {{smaller|(ऋक् १।१२।१३, १।१२।९-१०, ४।१८।१२ इत्यादि)}} नमुचि-वधके समय अश्विहय एवं सरखतीने इन्द्रको साहाय्य दिया। इस सम्बन्धपर एक गल्प है— {{smaller|"इन्द्रस्व इन्द्रियमन्नस्य रसं सोमस्य भक्षूं सुरया आसुरी नसुचिरहरत्। सोश्विनी च सरखतीञ्ज उपधावत्। शेपानोश्मि नमुचये न त्वा दिवा न नक्तं हनानि न दण्डेन न धन्वना न पृथेन न सुष्टिना न शुष्कण न आर्द्रण अथ में इदमहार्षीत्। इदं में आाजिहीर्षय इति। तेऽब्रुवन्नस्तु नाऽवाप्यथ आइराम इति। सह न एतदय आहरत इत्यन्नवीदिति। तावश्विनौ च सरखती च अपांफेनं वञ्चमसिञ्चन् न शुष्को न आर्द्रः इति। तेन इन्द्रो नमुचिरासुरस्य व्युष्टायां रात्रौ अनुदिते आदित्ये न दिवा न नक्तमिति शिर उवासयत्। तस्व शीर्ष श्र्छिन्ने लोहितमिश्रः सोमौतिष्ठत्। (शतपथ-ब्राह्मण १२।७।३।१)}} नमुचि नामक असुर इन्द्रका इन्द्रिय, अन्नरस और सुराके साथ सोमपात्र अपहरण कर ले गया। पीछे उन्होंने अश्विदय एवं सरस्वतीके निकट जाकर कहा, मैंने नमुचिकी दिवा अथवा रात्रिमें यष्टि, धनुः, चपेटिका सुष्टिसे शुष्क अथवा आर्द्र स्थानपर न मारने-का शपथ किया है। इस समय मेरी सर्वशक्ति हरण कर ली है। क्या आपलोग मेरा उद्धार कर सकते हैं?" उसके बाद अश्विद्दय एवं सरस्वतीने जलके फेनसे वज्रकी सिञ्चन कर उत्तर दिया, 'यह शुष्क वा आद्रं नहीं है'। इन्द्रने उसी वज्जसे नमुचिका मस्तक खण्ड खण्ड कर डाला। उस समय रात्रि बीतनेपर भोर हो रहा था। सूर्योदय न होनेसे वह समय रात्रि दिन कैसे समझा जा सकता था। नमुचिके मस्तक-छेदन काल सोम रक्त मिश्रित होने पर अवज्ञा करने लगे, किन्तु पोछे सब कोई पो गये। अथर्वसंहितामें लिखते,—इन्द्र असुरनारीके प्रेममें मुग्ध हुये थे। काठकके (१३.५) मतसे यह विलिस्तेङ्गा नामक दानवोपर अनुरक्त रहे। ऋक्संहितामें इन्द्रके अतिशय सोमप्रिय होनेका विस्तर प्रमाण मिलता है। इन्द्र वारिवर्षेण करते और वज्ज्र एवं विद्युत् चलाते हैं। इन्होंने असुरोंके लोहनिर्मित नगर तोड़ असंख्य दस्यु वा दास जातिका विनाश किया था। {{Multicol-break}} पौराणिकके मतमें इन्द्रके पिता कश्यप रहे। माताका नाम अदिति था। इन्होंने वृत्त्रादि असुरोंका वध करनेसे वृत्रहा नाम पाया। इन्द्र पूर्वेदिक्के पालक और सबको जलदान करनेवाले हैं । तैत्तिरीय ब्राह्मणमें लिखा, इन्द्रको अपर किसी देवोके रूपपर मोह नहीं हुआ । इन्होंने केवल इन्द्रा-णोको हो रूपपर मोहित हो पत्नी बनाया था। किन्तु पौराणिक मतसे इन्द्रने पुलोमा दैत्यको मार उसको कन्या ग्रहण की थी। वही कन्या इन्द्राणो हुई। इन्होंने दितिके गर्भस्थ पुत्त्रको नाश करनेके लिये खण्ड खण्ड किया, उतोसे मरुद्गणने जन्म लिया। दिति और मरुद देखो । पारिजातके लिय इन्द्रके साथ कृष्णका विवाद हुआ था। कृष्ण और पारिजात देखो। व्रजके गोप इन्द्रको पूजा करते रहे। किन्तु पोछे कृष्णने उस पूजाको उठा दिया था। इन्द्र क्रुद्ध हो अनवरत जल बरसाने और व्रज डुबाने लगे। कृष्णने गोवर्द्धन (हरिवंश) इन्द्रके टतोय पाण्डव धारणकर व्रजवासियोंको रक्षा को । पुत्र जयन्त, ऋषभ और मोद्र रहे। अर्जन भी इन्द्रपुत्र कहे जाते हैं। राज्यका अमरा-वतो, उद्यानका नन्दन, अश्वका उच्चैःश्रवा, हस्तोका ऐरावत, रथका विमान, सारथिका मातलि, धनुःका इन्द्रधनुः और असिका नाम परञ्ज है। इन्द्र सब देवताओंके राजा हैं। गुरुपत्नी अहल्याको हरण करनेसे इनके सहस्र चतुः हुआ। पहल्या देखो। प्रधान अस्त्र वज्ज्र है। एक एक मनु पर्यन्त इन्द्रका अधि-कार रहता है। राजत्वके बाद यह १०० वर्ष पर्यन्त ब्रह्माके निकट ब्रह्मविद्या अध्ययन करते, उसके बाद कैवल्य पाते हैं। इन्द्र त्वष्ट्पुत्त्र विश्वरूपके वध पापसे राज्यच्युत हुये । अनन्तर इन्होंने पाप भोग करनेपर फिर अपना राज्य प्राप्त किया था। इन्होंने पर्वतोंका पच्क्ष केदनेसे गोत्रहा और १०० शत अश्वमेध यन्न करनेसे शतक्रतु नाम पाया है। इन्द्रजित देखो। इन्द्रके नाम अनेक हैं- महेन्द्र, शक्रधनु, ऋभुक्षु, अर्ह, दत्तेय, वज्ज्रपाणि, मेघवाहन, पाकशासन, देव-पति, दिवस्पति, स्वर्गपति, उलूक, जिष्णु, सरुत्वान्, {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 30oh0e77coxt9b7uts2mb2me59nh8ad पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४५ 250 75751 666547 609196 2026-07-09T17:52:37Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666547 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४४|इन्द्रऋषभ—इन्द्रजनन|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} उग्रधन्वा इत्यादि है। प्रति मन्वन्तरमें इन्द्रके नाम पृथक पृथक पड़ते हैं—१ यज्ञ, २ रोचन, ३ सत्यजित्, ४ त्रिशिख, ५. विभु, ६ मन्त्रद्रुम, ७ पुरन्दर, ८ वलि, ९ श्रुत, १० शम्भु, ११ वैष्टत, १२ ऋतधाम, १३ दिवस्पति और १४ शुचि। २ परमात्मा। ३ योगविशेष। ४ श्रेष्ठ। ५ कुटजवृत्त। ६ रात्रि। ७ प्रथम। ८ राजा। ९ ज्येष्ठानक्षत्र। १० धनवान्। ११ अन्तरात्मा। १२ धन। १३ इन्द्रिय। १४ छन्दोविशेष, चौदह संख्या। १५ बङ्गालमें दक्षिणराढ़ीय और बङ्गज कायस्थोंका एक उपाधि। {{outdent|इन्द्रऋषभ (वै॰ त्रि॰) इन्द्रको वृषभकी भांति रखने-वाली, जिसे इन्द्र हामला बनाये। यह शब्द पृथिवीका विशेषण है।}} {{outdent|इन्द्रक (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्य धनिनः कं सुखं यत्त्र, बहुव्री॰। १ सभागृह, बैठकखाना। २ इन्द्रका सुख। ३ मन्दरगिरि।}} {{outdent|इन्द्रकर्णक (सं॰ पु॰) रक्तैरण्ड, लाल रेड़का पेड़।}} {{outdent|इन्द्रकर्मन् (सं॰ पु॰) इन्द्रस्येव ऐश्वर्यान्वितं कर्मास्य। विष्णु, इन्द्रका काम करनेवाले भगवान्।}} {{outdent|इन्द्रकर्मा {{smaller|इन्द् कर्मन् देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रकील (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य कील इव। १ मन्दर-पर्वत। यह बड़ा पहाड़ है। नाना प्रकार मणिमुक्ता विद्यमान है। शिशुपाल-वधके समय श्रीकृष्णने पहले यहां क्रीड़ा की थी। २ पर्वत, पहाड़। {{smaller|"न विषमेन्द्र कौलचतुष्पथश्वभाणामुपरिष्टात्।" (सुश्रुत)}}}} {{outdent|इन्द्रकुष्वर (सं॰ पु॰) ऐरावत, इन्द्रका हाथी। समुद्रमन्थनके समय इन्द्रने इसे पाया था।}} {{outdent|इन्द्र-कूट (सं॰ पु॰) इन्द्रः ऐश्वर्यवान् कूटोयस्य, बहुव्री॰। एक पर्वत। यह कैलासके निकट विद्यमान है। {{smaller|"महामेरु सकैलास इन्द्र कूटय नामतः।" (हरिवंश १७०।१५)}}}} {{outdent|इन्द्रक्कष्ट (सं॰ त्रि॰) कृष भावे क्त तत् अस्ति अस्मिन्, अर्श आदित्वात् अच्; इन्द्रेण इन्द्रहेतुकं कष्टम्। इन्-कर्षित, जङ्गलमें पैदा होनेवाला। वृष्टिपड़नेसे जो धान्यादि स्वभावतः उपजता, वह इन्द्रकृष्ट बजता है। {{smaller|"इन्द्र कृष्ट वर्तयन्ति धान्ये ये च नदीमुखैः।" (महाभारत सभा॰ ५१।९) 'इन्द्र कैष्टः इन्द वाकृष्ट ने तु कर्षणादि वियक यवापेचः।' (नीलकण्ठ)}}}} {{Multicol-break}} {{outdent|इन्द्रकेतु (सं॰ पु॰) इन्द्रका ध्वज, विमानकी पताका।}} {{outdent|इन्द्रकोश, {{smaller|इन्द्र कोष देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रकोष (सं॰ पु॰) ६-तत्। १ मञ्च, मचान। २ खट्टा, खाट। ३ नियूह, फलोका काढ़ा। ४ निर्यास, पेड़का दूध। ५ तमङ्गक, छज्जा।}} {{outdent|इन्द्रकौषक, {{smaller|इन्द कोष देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रगिरि (सं॰ पु॰) इन्द्रनामा गिरिः, शाक-तत्। महेन्द्रपर्वत।}} {{outdent|इन्द्रगुप्त (सं॰ क्ली॰) १ उशीर, खस। (वै॰ वि॰) २ इन्द्रद्वारा रचित, जिसके इन्द्र हिफाज़त रखे।}} {{outdent|इन्द्रगुरु (सं॰ पु॰) १ वृहस्पति। २ कश्यप।}} {{outdent|इन्द्रगोप (सं॰ पु॰) इन्द्रः गोपः रक्षकः यस्य, बहुव्री॰। १ शकगीय, वीरबहूटी। यह श्वेत और रक्तवर्ण दोनों प्रकारका होता है। (वे॰ वि॰) २ इन्द्रकर्ट क रक्षित। {{smaller|(ऋक् ८।६६।३२)}}}} {{outdent|इन्द्रघोष (सं॰ पु॰) इन्द्र इति स्पष्टं घुष्यते, घुष्-घञ। इन्द्र।}} {{outdent|इन्द्रचन्दन (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्य इन्द्रप्रियं वा चन्दनम्, ६-तत् वा शाक-तत्। १ हरिचन्दन, खेतचन्दन। २ रक्तचन्दन, लाल चन्दन।}} {{outdent|इन्द्रचाप (सं॰ पु॰) इन्द्रे इन्द्रस्वामिके मेघे चाप इव, शाक-तत्। १. इन्द्रधनुः। ६-तत्। २ इन्द्राशन।}} {{outdent|इन्द्रचिर्भिटा, इन्द्र, {{smaller|चिर्भिंटी देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रचिर्भिटी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रप्रिया चिर्भिटी, शाक-तत्। एक लता। वैद्यशास्त्र मतसे इसके पर्याय हैं,—इन्दोवरा, युग्मफला, दीर्घवृन्ता, उत्तमारणी, पुष्प मज्जरिका, द्रोणणे, करम्भा और नलिका। इन्द्रचिमिटी तिक्त, शीतल ओर श्लेष्मनाशक होती है। यह पित्त, कास, व्रणदोष और मिको नष्ट करती है। चतुरोगमें इन्द्रचिर्भिटी विशेष उपकारी है। २ इन्द्रवारुणी।}} {{outdent|इन्द्रच्छन्द (सं॰ क्ली॰) इन्द्र-इव सहस्रनेत्रेण सहस्त्रगुच्छेन छाद्यते, छद-असुन्-ल्युट् निपातनात्। सहस्र-गुच्छ हार, हज़ार लड़ीको माला।}} {{outdent|इन्द्रज (सं॰ पु॰) १ इन्द्रयव । २ कुटजवृत्त।}} {{outdent|इन्द्रजतु (सं॰ क्ली॰) शिलाजतु।}} {{outdent|इन्द्रजन्न (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्यात्मनः जननः देह-}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 8n2ofv0mo2pgurh2bliy1t53z0y0d0o पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६ 250 75753 666548 609197 2026-07-09T18:14:12Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 666548 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रजननीय-इन्द्रजाल|४५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} सम्बन्धः, छः। १ इन्द्रका जन्म। २ परमात्माका देह-सम्बन्ध विशेष। {{outdent|इन्द्रजननीय (सं॰ वि॰) इन्द्रजन्म-सम्बन्धीय, इन्द्रकी पैदायशका हाल बतानेवाला।}} {{outdent|इन्द्रजम्बूकवत्पत्रा (सं॰ स्त्री॰) कृष्णसारिवा, काली सतावर।}} {{outdent|इन्द्रजव (हिं॰) इन्द्रयव देखो।}} {{outdent|इन्द्रजा (वे॰ त्रि॰) इन्द्रसे उत्पन्न, जो इन्द्रसे पैदा हो।}} {{outdent|इन्द्रजानु (सं॰ पु॰) वानरविशेष, किसो बन्दरका नाम ।}} {{outdent|इन्द्रजाल (सं॰ क्ली॰) इन्द्राणां इन्द्रियाणां जालं आवरकं यदा इन्द्रस्येश्वरस्य जालं मायेव। १ इन्द्रका पाश। २ युद्ध-कल्पना, जङ्गका फरेब। ३ छल, धोखा। ४ माया, हस्तलाघव, तिलस्म, बाजीगरी। ५ तन्वशास्त्र विशेष।<br> {{gap}}मन्त्र एवं द्रव्य द्वारा किसी वस्तुको अन्य प्रकार बनाना इन्द्रजाल नामक स्वतन्त्र शास्त्र तन्त्रके अन्तर्गत है। गुरु उपदेश विना इसकी शिक्षा नहीं मिलती। इन्द्रजालमें नाना विषय वर्णित हैं। उसे दृष्टान्त स्वरूप कुछ नीचे लिखते हैं,—<br> {{gap}}१, एक प्रस्थ (२ सेर परिमाण) महाकाल या लाल इन्द्रायणके वीजमें धात्त्रीरसकी सात भावना दे और उसे गोली—जैसा बना मुख्तके भीतर रखें तो मनुष्य कपीत बन जाता है। २, छागलके मस्तकपर कालो मट्टी रखनेसे और उसमें धतूरेका वोज बोनेसे जो फूल्छ आता है, उसको गात्रमें लगाते हो मनुष्य बकरा बन जाता है। ३, कृष्णचतुर्दशीको मयूरके मस्तक-पर कालो मट्टी चढ़ा संनका वीज डालनेसे जब फल-फूल उतरे, तब उसको गलेमें बांधते हो मनुष्य मयूरका रूप धारण कर लेता है। ४, क्लष्णचतुर्दशोको मयूरके मस्तकपर कालो मट्टी लगा कपासका वीज बोनेसे जब फल-फूल लगे, तब उसे कूट-पीसकर गात्त्रपर मलनेसे मनुष्य पानोमें नहीं डूबता और भूमिको तरह जलपर खड़ा रहता है। ५, काले कौवेके मस्तक-पर मट्टी डाल वृहती या बढ़न्तेका वोज बोये। भौर उसके फलको मुखमें दबा लेनेपर मनुष्य कौवेको तरह उड़ता है, किन्तु उसे उगल देनेसे वह फिर}} {{Multicol-break}} मनुष्य हो जाता है। ६, कृष्णचतुर्दशोको कबू तरके मत्येपर मट्टो डाल तिल बोये और दूधमें पानी मिला उसे सीं-चता रहे। फूल निकलनेपर उसे मुखमें रखनेसे कोई उस मनुष्यको देख नहीं सकता। और उस तिलके फलको कूटपीस गात्रमें लगा देनेसे मनुष्य किङ्कर बन जाता है। तथा समग्र धन-सम्पत्ति स्वेच्छाक्रमसे छोड़ बैठता है। ७, फिर उसी तिलको कपिलाके दूधमें पोस गोलो बनावे और सात राततक पकाता रहे। पीछे गीली मुखमें दबा लेनेसे देवता भी किन्तु गोली उगल सकते हैं। वह सौ उस मनुष्यको देख नहीं सकते। देनेसे उसको सब लोग फिर देख वर्षतक जोता है और क्या स्त्री क्या पुरुष सब कोई उसके वश्य हो जाते हैं। ८, कृष्ण चतुर्दशीको शकुनिके मस्तक पर मट्टी डाल लहसुन लगायिये और फूल आनेपर पुष्यानक्षत्रमें तोड़ कपिलाके घुतसे काजल पारिये। उस फूलको उक्त काजलमें मिला आंखमें लगानेसे सौ योजन पर्यन्त दीख पड़ता है। दिनके समय नक्षत्र दृष्टिगोचर होते हैं। ऊंट, गर्दभ, महिष प्रभृति बड़े-बड़े जन्तुके मस्तकपर यदि लहसुन बोवे और फल-फूल तोड़ रखे तो फिर इस फल-फूलको सु'हमें डालनेसे उक्त जन्तुके जीवित हो जानेमें कोई सन्देह नहीं रहता। उक्त सकल धारणाका मन्त्र 'ॐ ह्रीं हीं हैं ऐ लंलं ॐ भौ स्वाहा' लचजप करनेसे पुरश्चरण और सहस्र जप करनेसे होम होता है। घृत द्वारा तर्पण और मार्जन करना चाहिये। ब्राह्मणभोजनादि करानेसे सिडि मिलती है। उल्लूको खोपड़ीमें घृतसे कज्जल पार उसे आंखमें आंजनेपर अन्धकारमें भी पुस्तक पढ़ सकते हैं। 'ॐ नमो नारायणाय विश्वम्भराय इन्द्रजाल-कौतुकानि दर्शय सिद्धि' कुरु स्वाहा' मन्त्र १०८ बार जपनेसे कार्यसिद्धि होती है। उक्त मन्त्र सिद्ध न होनेसे कार्य में सफलता नहीं मिलती। 'ॐ नमः परंब्रह्म परमात्मने मम शरीरं पाहि पाहि कुरु कुरु' रक्षामन्त्र है। इसी मन्त्रसे रक्षा बांध कार्य करना चाहिये। {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 4f1sqqmhryiiw93okg8ybh0a9v278rh पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१९२ 250 75877 666525 609005 2026-07-09T15:35:17Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666525 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उतलाना-उताल'''|'''१९१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उतलाना (हिं॰ क्रि॰) आतुर होना, जल्दी मचाना, हलचल डालना।}} {{Outdent|उतल्ला (हिं॰ वि॰) आतुर, जल्दबाज, जो जल्दी करता हो।}} {{Outdent|उतवंग (हिं॰ पु॰) उतमाङ्ग, मस्तक, खोपड़ा।}} {{Outdent|उतसब (हिं॰ पु॰) उत्सव, जलसा।}} {{Outdent|उतसाह (हिं॰) <small>उत्साह देखो।</small>}} {{Outdent|उतान (हिं॰ वि॰) १ व्युत्क्रान्त, मकलूब, औंधा, उलटा, जो अपनी पीठ जमीनसे लगाये दो।}} {{Outdent|उतान-बम्बईप्रान्तके थाना जिलेका बन्दर। यह अक्षा॰ १९° १८' उ॰ तथा द्राघि॰ ७२° ४९' पू० पर थाने नगरसे १७ मील उत्तर-पश्चिम अवस्थित है। यहां एक पोर्तुगीज़ गिर्जा है। कितना ही माल आया-जाया करता है।}} {{Outdent|उतार (हिं॰ पु॰) १ अवतरण, ढलाव, ऊपरसे नीचे आनेका काम। २ निर्लज्ज स्त्री, बेशर्म औरत। ३ प्रतिलेख, अनुकरण, मुसन्ना, नकल। ४ घाट, नदी पार होनेका महसूल। ५ दरीके करघेका एक बांसा यह जुलाहेसे अलग और पश्चात् दिक् चढ़ावके बराबर पड़ता है। ६ न्योछावर, सदक़ा। ७ विषको मारने वाला पदार्थ, जिस चीज़से ज़हर उतरे। ८ अभिचार विशेष, एक टोटका। इसे कृषक अपने सङ्गलकी कामनाके किये करते और एक दिन ग्रामसे बाहर है। बसते हैं। ९ भाटा, लहरका ढलाव। १० विनाश, बरबादी। ११ मूल्यका पतन, भावका गिराव। १२ शुलकका अपचय, आमदनीकी कमी।}} {{Outdent|उतार-चढ़ाव (हिं॰ पु॰) आरोहण एवं अवतरण, चढ़ा-उतरी, ऊंच नीच, घटती-बढ़ती, भलाई-बुराई।}} {{Outdent|उतारन (हिं॰ पु॰) १ परित्यक्त वस्त्र, पुराना कपड़ा। २ न्योछावर, सदक़ा, किसीके ऊपर उतार कर दी जानेवाली चीज़। ३ निकृष्ट द्रव्य, खराब चीज़। ४ दुष्ट मनुष्थ, बदमाश आदमी।}} {{Outdent|उतारना (हिं॰ क्रि॰) १ अवतारण करना, ऊपरसे नीचे लाना। २ लिखना, खींचना, घसीटना। ३ पृथक् करना, छोड़ाना, काटना। ४ अवस्थित करना, रखना, ठहराना। ५ चतुर्दिक् घुमाना, इज्जत देखाना।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :६ परिशोध करना, दे डालना। ७ उगाहना, ले आना। ८ उपजाना, पैदा करना। ९ निर्माण करना, बनाना। १० न्यून करना, घटाना। ११ तुलना करना, तौलना। १२ नदी पार ले जाना। १३ प्रवेश करना, घुसेड़ना। १४ निःसरण करना, निकालना। १५ पान करना, पौना। १६ निगल जाना । १७ त्याग करना, छोड़ना। <small>“यार का गुस्सा भतारपर उतारती हो।" (लोकोक्ति)</small> १८ स्थानच्युत करना, हटाना। १९ ख़राब करना, बिगाड़ना। </small>“जब अपनी उतार ली तो दूसरेको उतारते क्या देर।” (लोकोक्ति)<small> २० रगड़ना, घिसना। २१ लुण्ठन करना, लूटना। २२ एकत्र करना, चुनना बिनना। २३ ढालना, भरना। २४ विभाग करना, बांटना। २५ दान करना, देना। २६ प्रेरण करना, भेजना। २७ देशनिर्वासन एवं स्वास्थयविनाशन करने को समुद्रपार और मार उतारना कहते हैं। {{Outdent|उतार-सुतार (हिं॰ पु॰) १ उपशम, आराम। २ शोधन, अदा, चुकती}} {{Outdent|उतारा (हिं॰ पु॰) १ उत्सर्ग, तफ़रीक़, कमी। २ पात्रस्थित परिपक्क अन्नादि, किसी बरतन में रखा भात वगैरह। इसे कई बार रोगीको चारो ओर आरतीकी तरह घुमाकर उतारते हैं। लोगोंको विश्वास है, रोगीकी प्रेत वाधा उतार पर उतर आती ३ सामग्री विशेष, किसी किस्म का सामान्। यह उतारमें लगता है। ४ संस्थान, पड़ाव, उतरने की जगह। ५ तरणस्थान, घाट, नदी पार करने की जगह। ६ प्रतिलेख, नक़ल। ७ उत्तर, जवाब। ८ गृह-शुल्क, घाटकी उतराई। ९ मन्दिरको प्रदत्त भूमि, जो जमीन मन्दिरको मिली हो। १० निष्कर भूमि, माफी़की ज़मीन्। इसे सरकार अपने कर्तव्य पालने-वाले सेवकको देती है। (वि॰) ११ उतारा हुआ, जो उतार डाला गया हो। पण्याधानस्थ और अल्प मूल्य द्वारा क्रीत द्रव्यको उतारेका माल कहते हैं।}} {{Outdent|उतारू (हिं॰ वि॰) १ उन्मुख, आरास्ता, राजी़, उतर पड़नेवाला। (पु॰) २ यात्री, मुसाफ़िर।}} {{Outdent|उताल (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ सत्वर, जल्द, चट! (स्त्री॰) २ त्वरा, शिताबी, जल्दी।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> m6e10xd2sxmnph2hg95ks8klpkzlvnu पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१९३ 250 75878 666534 609006 2026-07-09T16:35:29Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666534 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१९२'''|'''उताल-उत्कणिका'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उताल (विजापुर)―― मध्यप्रान्तके सम्भलपुर जिलेकी एक जमीन्दारी। यह बड़गढ तहसील में लगती और सम्भलपुर नगरसे ३८ मील दक्षिणपूर्व पड़ती है। भूमिका परिमाण ८० वर्गमील है। चावल, दाल, ऊख, रूई और तेलहनकी उपज अधिक है। उताल या विजापुरग्राममें एक सुन्दर तड़ाग और विद्यालय बना है। इसके प्रभु प्रकृत गोंड हैं। १८२० ई॰ पर अंगरेज सरकारसे पूछ सम्बलपुरको राजा महाराज साहीने स्थानीय नरेश गोपी कुलताको उताल उपाधि दिया था। उन्हींके वंशज आज भी जमीन्दारी अपने हाथ रखते हैं। {{Outdent|उताली, <small>उताल देखो।</small>}} {{Outdent|उतावल (हिं॰ स्त्री॰) १ व्यग्रता, अस्वास्थ्य, बैचैनी। २ साहस, हिम्मत। ३ शीघ्रता, शिताबी। (क्रि॰ वि॰)। ४ सत्वर, फौ़रन्। (वि॰) ५ आशुकारी, जल्दबाज़, तेजी़ देखानेवाला।}} {{Outdent|उतावला (हिं॰ पु॰) धैर्यरहित पुरुष, बेसन आदमी।}} {{x-smaller|{{c|“उतावला सो बावला धौरा सो गम्भीर।” (लोकोक्ति)}}}} {{Outdent|उतावली (हिं॰ स्त्री॰) १ त्वरा, जल्दी। २ चापल्य, बैचैनी।}} {{Outdent|उताहल (हिं॰ क्रि॰ वि॰) शीघ्र-शीघ्र, जल्द-जल्द, तेजी़के साथ।}} {{Outdent|उताहिल, <small>उताहल देखो।</small>}} {{Outdent|उताहो (सं॰ अव्य॰) १ विकल्प――अथवा, या इत्यादि। २ प्रश्न-क्या, क्यों वग़ रह। ३ विचार――अवश्य, हां! प्रभृति।}} {{Outdent|उताहोखित् (सं॰ अ॰) अथवा, आया, या।}} उतूल (सं० पु०) जातिविशेष, किसी कौमके लोग। {{Outdent|उढण, <small>उऋण देखो।</small>}} {{Outdent|उतै (हि॰ क्रि॰ वि॰) उस पार्श्व, उधर, वहां, उत।}} {{Outdent|उतैला (हिं॰ पु॰) १ माष, उड़द। (क्रि॰ वि॰) २ शीघ्र-शीघ्र, जल्द-जल्द।}} {{Outdent|उल्क (सं॰ त्रि॰) उत्क निपातनात् । १ उत्सुक, खाहां। २ वस्तु विशेषकी प्राप्तिका अभिलाषी, जो। किसी खा़स चीजके पानेका खाहां हो। ३ पश्चात्ताप-कारी, अफ़सुर्दा, उदास। ४ अनुपस्थित, गै़रहाजिर, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :जो दूसरी बात बिचारता हो। (पु॰) ५ अभिलाष, खा़हिश। ६ अवसर, मौक़ा। {{Outdent|उत्कच (सं॰ त्रि॰) उद्गतः उन्नतो कचोऽस्य। १ केश-शून्य, बेबाल। २ उन्नसकेश, खड़े बालवाला। ३ पुराणवर्णित भारतके पूर्व प्रान्तवासी दुर्धर्ष जाति-विशेष। <small>घटोत्कच देखो।</small>}} {{Outdent|उत्कच्छा (सं॰ स्त्री॰) छन्दो विशेष। इसमें छः पाद रहते हैं। प्रत्येक पादमें ग्यारह एकाक्षरमाना लगती हैं।}} {{Outdent|उत्कञ्चुक (सं॰ त्रि॰) कूर्पासकविहीन, जो चोली या मिर्जई न पहने हो।}} {{Outdent|उत्कट (सं॰ त्रि॰) उत्-कट्-अच्। तीव्र, तेज़, मामूली हिसाबसे ज्यादा। २ मत्त, मतवाला। ३ व्याप्त, भरा हुभा। ४ अधिक, ज्यादा। ५ श्रेष्ठ, बड़ा, घमण्डी। ६ विषम, नाहमवार, जो बराबर न हो। ७ कठिन, मुशकिल। (पु॰) ८ मत्त गज, मतवाला हाथी। ९ मत्तगजके गण्डस्थलसे टपकने-वाला द्रवपदार्थ, हाथीके मत्थेसे झड़नेवाला मद। १० शरकाण्ड, रामशर। ११ क्षुद्र क्षुपविशेष, एक छोटा झाड़। १२ इक्षु, ऊख। १३ रक्तेक्षु, लाल ऊख। १४ मद, नशा। (क्ली॰) १५ वृक्षभेद, एक पेड़। १६ लताविशेष, सालसा। १७ गुड़त्वक्, दालचीनी। १८ तेजपत्र, तेजपात।}} {{Outdent|उत्कटा ( सं॰ स्त्री॰) सैंहलीलता, ऊटकटारा, सफ़ेद घुंघची। सैंहली (उत्कटा) कटु, उष्ण, कृमिघ्न, दीपन एवं कोष्ठशोधन होती और कफ, स्वास तथा वायुजनित रोगको शमन करती है। <small>(राजनिघण्ट)</small> उत्कटा उष्ण, तिक्त, वृष्य और रुचिकर है। यह मूत्रकृच्छ्र, पित्त, वात, मेह, तृष्णा, हृदरोग और विस्फोटकको मारती है। इसका वीज शीतल, वृष्य, तृप्तिकर और मधुर प्रकीर्तित है। <small>(वैद्यकनिघण्ट)</small>}} {{Outdent|उत्कटासन, <small>उत्कटुकासन देखो।</small>}} {{Outdent|उत्कटुकासन (सं॰ क्ली॰) कठिनासन, नशिस्त-चारजा़न, चौखूंट बैठक, पालती मारकर बैठनेकी हालत।}} {{Outdent|उत्कणिका (सं॰ स्त्री॰) उच्छ्रित क्षुद्रांश, उठाया हुआ रेजा़ या टुकड़ा। }} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8jyqrmp4l5nrgy1anwax0lfcjgm3y7p 666535 666534 2026-07-09T16:36:16Z अँजली चौधरी 2439 666535 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१९२'''|'''उताल-उत्कणिका'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उताल (विजापुर)―― मध्यप्रान्तके सम्भलपुर जिलेकी एक जमीन्दारी। यह बड़गढ तहसील में लगती और सम्भलपुर नगरसे ३८ मील दक्षिणपूर्व पड़ती है। भूमिका परिमाण ८० वर्गमील है। चावल, दाल, ऊख, रूई और तेलहनकी उपज अधिक है। उताल या विजापुरग्राममें एक सुन्दर तड़ाग और विद्यालय बना है। इसके प्रभु प्रकृत गोंड हैं। १८२० ई॰ पर अंगरेज सरकारसे पूछ सम्बलपुरको राजा महाराज साहीने स्थानीय नरेश गोपी कुलताको उताल उपाधि दिया था। उन्हींके वंशज आज भी जमीन्दारी अपने हाथ रखते हैं।}} {{Outdent|उताली, <small>उताल देखो।</small>}} {{Outdent|उतावल (हिं॰ स्त्री॰) १ व्यग्रता, अस्वास्थ्य, बैचैनी। २ साहस, हिम्मत। ३ शीघ्रता, शिताबी। (क्रि॰ वि॰)। ४ सत्वर, फौ़रन्। (वि॰) ५ आशुकारी, जल्दबाज़, तेजी़ देखानेवाला।}} {{Outdent|उतावला (हिं॰ पु॰) धैर्यरहित पुरुष, बेसन आदमी।}} {{x-smaller|{{c|“उतावला सो बावला धौरा सो गम्भीर।” (लोकोक्ति)}}}} {{Outdent|उतावली (हिं॰ स्त्री॰) १ त्वरा, जल्दी। २ चापल्य, बैचैनी।}} {{Outdent|उताहल (हिं॰ क्रि॰ वि॰) शीघ्र-शीघ्र, जल्द-जल्द, तेजी़के साथ।}} {{Outdent|उताहिल, <small>उताहल देखो।</small>}} {{Outdent|उताहो (सं॰ अव्य॰) १ विकल्प――अथवा, या इत्यादि। २ प्रश्न-क्या, क्यों वग़ रह। ३ विचार――अवश्य, हां! प्रभृति।}} {{Outdent|उताहोखित् (सं॰ अ॰) अथवा, आया, या।}} उतूल (सं० पु०) जातिविशेष, किसी कौमके लोग। {{Outdent|उढण, <small>उऋण देखो।</small>}} {{Outdent|उतै (हि॰ क्रि॰ वि॰) उस पार्श्व, उधर, वहां, उत।}} {{Outdent|उतैला (हिं॰ पु॰) १ माष, उड़द। (क्रि॰ वि॰) २ शीघ्र-शीघ्र, जल्द-जल्द।}} {{Outdent|उल्क (सं॰ त्रि॰) उत्क निपातनात् । १ उत्सुक, खाहां। २ वस्तु विशेषकी प्राप्तिका अभिलाषी, जो। किसी खा़स चीजके पानेका खाहां हो। ३ पश्चात्ताप-कारी, अफ़सुर्दा, उदास। ४ अनुपस्थित, गै़रहाजिर,}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :जो दूसरी बात बिचारता हो। (पु॰) ५ अभिलाष, खा़हिश। ६ अवसर, मौक़ा। {{Outdent|उत्कच (सं॰ त्रि॰) उद्गतः उन्नतो कचोऽस्य। १ केश-शून्य, बेबाल। २ उन्नसकेश, खड़े बालवाला। ३ पुराणवर्णित भारतके पूर्व प्रान्तवासी दुर्धर्ष जाति-विशेष। <small>घटोत्कच देखो।</small>}} {{Outdent|उत्कच्छा (सं॰ स्त्री॰) छन्दो विशेष। इसमें छः पाद रहते हैं। प्रत्येक पादमें ग्यारह एकाक्षरमाना लगती हैं।}} {{Outdent|उत्कञ्चुक (सं॰ त्रि॰) कूर्पासकविहीन, जो चोली या मिर्जई न पहने हो।}} {{Outdent|उत्कट (सं॰ त्रि॰) उत्-कट्-अच्। तीव्र, तेज़, मामूली हिसाबसे ज्यादा। २ मत्त, मतवाला। ३ व्याप्त, भरा हुभा। ४ अधिक, ज्यादा। ५ श्रेष्ठ, बड़ा, घमण्डी। ६ विषम, नाहमवार, जो बराबर न हो। ७ कठिन, मुशकिल। (पु॰) ८ मत्त गज, मतवाला हाथी। ९ मत्तगजके गण्डस्थलसे टपकने-वाला द्रवपदार्थ, हाथीके मत्थेसे झड़नेवाला मद। १० शरकाण्ड, रामशर। ११ क्षुद्र क्षुपविशेष, एक छोटा झाड़। १२ इक्षु, ऊख। १३ रक्तेक्षु, लाल ऊख। १४ मद, नशा। (क्ली॰) १५ वृक्षभेद, एक पेड़। १६ लताविशेष, सालसा। १७ गुड़त्वक्, दालचीनी। १८ तेजपत्र, तेजपात।}} {{Outdent|उत्कटा ( सं॰ स्त्री॰) सैंहलीलता, ऊटकटारा, सफ़ेद घुंघची। सैंहली (उत्कटा) कटु, उष्ण, कृमिघ्न, दीपन एवं कोष्ठशोधन होती और कफ, स्वास तथा वायुजनित रोगको शमन करती है। <small>(राजनिघण्ट)</small> उत्कटा उष्ण, तिक्त, वृष्य और रुचिकर है। यह मूत्रकृच्छ्र, पित्त, वात, मेह, तृष्णा, हृदरोग और विस्फोटकको मारती है। इसका वीज शीतल, वृष्य, तृप्तिकर और मधुर प्रकीर्तित है। <small>(वैद्यकनिघण्ट)</small>}} {{Outdent|उत्कटासन, <small>उत्कटुकासन देखो।</small>}} {{Outdent|उत्कटुकासन (सं॰ क्ली॰) कठिनासन, नशिस्त-चारजा़न, चौखूंट बैठक, पालती मारकर बैठनेकी हालत।}} {{Outdent|उत्कणिका (सं॰ स्त्री॰) उच्छ्रित क्षुद्रांश, उठाया हुआ रेजा़ या टुकड़ा। }} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8vz3l5ilpawihs17z47elzphoycui6l पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१९४ 250 75879 666544 609007 2026-07-09T17:30:35Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666544 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कण्टक-उत्कर्तन'''|'''१९३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उत्कण्टक (सं॰ क्ली॰) वृक्षभेद, दबादूब।}} {{Outdent|उत्कण्ठ (सं॰ पु॰) उद्गतः कण्ठो यस्य। १ आसन, नशिस्त,बेठक। यह शृङ्गारके षोड़श बन्ध त्रयोदेश है।}} {{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“नारीपादौ च हस्ते न धारयेद्गलके पुनः। स्तनार्पितकर: कामी बन्धश्चोत्कण्ठमंज्ञकः॥” (रतिमञ्जरी)}}<poem>}} :{{gap}}२ प्रिय व्यक्ति वा वस्तु के लिये अभिलाष, प्यारेके वास्ते लालच। ३ पश्चात्ताप, किसी आदमी या ची़जके लिये पछतावा। (त्रि॰) ४ उद्ग्रीव,गर्दन उठाये हआ। {{Outdent|उत्कण्ठा (सं॰ स्त्री॰) उत्त-कठि-अ-टाप्। औतसुक्य, शौक, ख़ाहिश। इष्टलाभमें कालक्षेपको असहिष्णुताको उत्कण्ठा कहते हैं। यह एक सञ्चारी भाव है।}}{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“चली अग्र करि सखौ सयानी। सिय हिय अति उत्कण्ठा जानौ॥” (तुलसी)}}</poem>}} {{Outdent|उत्कण्ठित (सं॰ त्रि॰) उत्कण्ठा जाताऽस्य, उत्कण्ठा-इतच्। उद्विम्न, उत्सुक, बेचैन, अफ़सोसमें पड़ा हुआ।}} {{Outdent|उत्कण्ठिता (सं॰ स्त्री॰) नायिकाभेद, किसी किस्मकी औरत।}} {{x-smaller|{{c|“सङ्केतस्थलं प्रति भर्तूरागमनकारणं चिन्तयति या।” (रसमचरी)}}}} :{{gap}}सङ्केत स्थान पर नायकागमनके लिये दुःखित होनेवाली स्त्रीको उत्कण्ठिता कहते हैं। इसके अरति, सन्ताप, जन्मा, अङ्गाकर्षण एवं कम्पन, रोदन और शब्दयुक्त दोष निश्वास सकल लक्षण देख पड़ते है दूसरे―― <small>“आगन्तुं कृतचित्तोऽपि देवान्नायाति यत्प्रियः।</small>}} {{x-smaller|{{c|तदागमनदुःखार्ता विरहीत्कण्ठिता तु सा॥” (साहित्यदर्पण)}}}} :{{gap}}आगमनको निश्चय करते भी यदि प्रिय देवात नहीं आता, तो उस नायिकाका नाम विरहोत्कण्ठिता रखा जाता है। क्योंकि वह उसके न आनेपर दुःखित होती है। {{Outdent|उत्कता (सं० स्त्री०) उत्क-तल। १ गजपिप्पली, बड़ी पीपल। २ उत्कण्ठा, चाव।}} {{Outdent|उतकन्दक (सं॰ पु॰) रोगविशेष, एक बीमारी।}} {{Outdent|उत्कन्धर ( सं॰ त्रि॰) उन्नतः कन्धरोऽस्य, प्रादि॰, बहुव्री॰।१ उन्नतग्रीव, गर्दनको पीछे उठाये हुआ। (क्ली॰) २ ग्रीवाका पश्चात् दिक् नमन, गर्दनका पोछेको ओर झुकाव।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उत्कम्प (सं॰ पु॰) १ कामादिजनित कम्पन, लर-ज़िश, थरथराहट। <small>“सोत्कम्पानिप्रियसहचरीसम्प्रमालिङ्गितानि।” (माघ)</small> (त्रि॰) उत्-कम्म-अच्। २ उत्कम्यान्वित, लरजां, थरथरानेवाला।}} {{Outdent|उतकम्पन (सं॰ क्ली॰) विलोड़न, जुबिश,झकोर।}} {{Outdent|उत्कम्यिन् (सं॰ त्रि॰) कम्पान्वित, लरजां, जो हिलडुल या झकोर रहा हो।}} {{Outdent|उत्कर (सं॰ पु॰) उत्-कृ-अप्। १ राशि, ढेर। २ प्रसारण, फैलाव। ३ विक्षेप, फेंकफांक। कर्मणि अच्। ४ विक्षिप्त धूल्यादि, कूड़ाकर्कट। ५ रक्तक्षु}} {{Outdent|लाल ऊद्ध। ६ उत्कारिका, पुलटिस। (त्रि॰) राशि-मय, ढेर हो जानेवाला, जो जमा हो।}} {{Outdent|उत्करादि――पाणिनि-कथित एक गण। इसमें निम्न लिखित शब्द पड़ते हैं――उत्कर, सम्फल, शफर, पिप्पल, पिप्पलीमूल, अश्मन्, सुवर्ण, खलाजिन, तिक, कितव, अणक, त्नवण, पिचुक, अश्वत्थ, काश, क्षुद्र, भस्त्रा, शाल, जन्या, अजिर, चर्मन्, उत्क्रोश, शान्त, खदिर, शूर्पणाय, श्यावनाय, नैवाकव, तृणा, वृक्ष, शाक, पलाश, विजिगीषा, अनेक, आतप, फल, सम्पर, अर्क, गर्त, अग्नि, वैराणक, इड़ा, अरण्य, निशान्त, पर्ण, नीचायक, शङ्कर, अवरोहित, क्षार, विशाल, वेत्र, अरीहणा, खण्ड, वातागर, मन्तणार्ह, इन्द्रतक्ष, नितान्ताहक्ष और आद्रवृक्ष।}} {{Outdent|उत्करिका ( सं॰ स्त्री॰) मोदक विशेष, एक मिठाई। यह दुगध, गुड और घृतसे बनती है।}} {{Outdent|उत्करीय (सं॰ त्रि॰) उत्कर-सम्बन्धीय, ढेरसे निस्बत रखनेवाला।}} {{Outdent|उत्कर्कर (सं॰ पु॰) वाद्ययन्त्र विशेष, एक बाजा।}} {{Outdent|उत्कर्ण (सं॰ त्रि॰) उन्नतः कर्णा यस्मिन् यस्य वा। १ उन्नतकर्ण युक्त, जो कान खड़े किये हो। (पु॰) २ उन्नतकर्ण, खड़ा कान। ३ वायुजन्य अश्वरोग, घोडे की वातसे पैदा होनेवाली एक बीमारी। इसमें घोड़ेका कर्ण, पुच्छ और गात्र स्तब्ध हो जाता है।}} {{right|<small>(जयदत्त)</small>}} {{Outdent|उत्कर्तन (सं॰ क्ली॰) उत्-कृत-ल्युट्। १ छेदन, छेदाई। २ उत्पाटन, कांट-छांट। ३ सुश्रुतोक्त}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 49}}</noinclude> lu5l4w14yrf353hvkqoqai0rs2uuinu 666545 666544 2026-07-09T17:35:38Z अँजली चौधरी 2439 666545 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कण्टक-उत्कर्तन'''|'''१९३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उत्कण्टक (सं॰ क्ली॰) वृक्षभेद, दबादूब।}} {{Outdent|उत्कण्ठ (सं॰ पु॰) उद्गतः कण्ठो यस्य। १ आसन, नशिस्त,बेठक। यह शृङ्गारके षोड़श बन्ध त्रयोदेश है।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“नारीपादौ च हस्ते न धारयेद्गलके पुनः। स्तनार्पितकर: कामी बन्धश्चोत्कण्ठमंज्ञकः॥” (रतिमञ्जरी)</poem>}}}} :{{gap}}२ प्रिय व्यक्ति वा वस्तु के लिये अभिलाष, प्यारेके वास्ते लालच। ३ पश्चात्ताप, किसी आदमी या ची़जके लिये पछतावा। (त्रि॰) ४ उद्ग्रीव,गर्दन उठाये हआ। {{Outdent|उत्कण्ठा (सं॰ स्त्री॰) उत्त-कठि-अ-टाप्। औतसुक्य, शौक, ख़ाहिश। इष्टलाभमें कालक्षेपको असहिष्णुताको उत्कण्ठा कहते हैं। यह एक सञ्चारी भाव है।}} 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75880 666549 609008 2026-07-09T18:15:13Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666549 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१९४'''|'''उत्कर्ष-उत्कल (उड़ीसा)।'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :मूढगर्भको चिकित्साका एक उपाय, हमलकी बीमारी का नुसखा। <Small>मूढ़मर्म देखो।</small> {{Outdent|उत्कर्ष (सं॰ पु॰) उत्-कृष-घञ्। १ अतिसार, दस्तकी बीमारी। २ श्रेष्ठता, अज़मत, बड़ाई। <Small>“उत्कर्ष योषितः प्राप्ता: स्वैः स्वैर्भर्तु गुणौ: सुभैः।" (मनु ९।२४) ।</small>> ३ वृद्धि, बढ़ती। ४ आकर्षण, कशिश, ख़ैचतान। ५ सौभाग्य, इक़बालमन्दी, लहर-बहर। ६ आधिका, ज्यादती। ७ अहङ्कार, फख़्र, घमण्ड। ८ अभिमान, शेख़ी। ९ आनन्द, खुशी। (त्रि॰) १० उन्नत, बुलन्द, ऊंचा। ११ अधिक, ज्या़दा, बहुत। १२ अभिमानी, शेखी़बाज। १३ आकर्षक, खींच लेनेवाला।}} {{Outdent|उत्कर्षक (सं॰ त्रि॰) उत्-कृष-णिच्-णुल्। १ उन्नति कारक, बलन्द बनानेवाला, जो ऊपरको खींच देता हो। २ उत्पाटनकारी, उखाड़ डालनेवाला। ३ कर्षणकारी, खींच लेनेवाला।}} {{Outdent|उत्कर्षण (सं॰ क्ली॰) उत्-कृष-ल्युट्। उर्ध्व आकर्षण ऊपरकी ओरको खिंचाव। यह सुश्रुतोक्त मूढ़-गर्भकी चिकित्साका एक उपाय है।}} {{Outdent|उत्कर्षता (सं॰ स्त्री॰) १ उन्नति, तरक्की, बढ़ती। २ आधिक्य, ज्या़दती। ३ अभिमान, शेख़ी। ४ आकर्षण, खिंचाव। ५ सौभाग्य, इकबालमन्दी।}} {{Outdent|उत्कर्षित (सं॰ त्रि॰) आकर्षित, खिंचा हुआ।}} {{Outdent|उत्कर्षिन् ( स० त्रि॰) उत-कृष-णिनि । १ अर्ध्वाकर, उठा देनेवाला। २ उत्कर्षान्वित, ऊपरको उठा हुआ।}} {{Outdent|उत्कल (उड़ीसा)-भारतका एक प्रान्त। यह अक्षा॰ ९३° २८‘ एवं २२° ३४‘ १५‘‘ और द्राघि॰ ८३°३६ ३०, तथा ८७° ३१‘ ३०‘‘ पूर्व के बीच अवस्थित है। विहार और उड़ीसाके गवरनर इसका शासन करते हैं। उडीसामें कितने ही मित्र राज्य भी संमिलित हैं। इससे उत्तर तथा उत्तरपूर्व छोटा नागपुर एवं बङ्गालदेश, पूर्व तथा दक्षिण पूर्व बङ्गालकी खाडी, दक्षिण मन्द्राज प्रदेशका गज्जाम जिला और पश्चिम मध्यप्रदेश पड़ता है। मुख्य उडीसा ९०५३ और मित्र राज्यका क्षेत्रफल १५१८ वर्ग मील है। लोकसंख्या प्रायः पचास लाख होगी। उड़ीसेको भूमि दो प्रकारकी है। मोगलबन्दी वा अंगेरेज़ी――कटक, बालेश्वर और पुरी ज़िला <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> समान एवं उर्वर तथा गड़जात वा करद राज्य पार्वत्य भूभाग हैं। समस्थ स्त्री महानदी, ब्राह्मणी तथा वैतरणीको महीसे बनी है। महानदी तथा ब्राह्मणी मध्यभारत और वैतरणी मयूरभञ्ज एवं केंउझर करद राज्यके पर्व तसे निकलती है। ये तीनों नदी समुद्रतटकी ओर धीरे धीरे मिलनेको बढती और उड़ीसा समस्थली पर अपना संगृहीत जल ३० मीलके अन्तरसे छोड़ती हैं। किन्तु ग्रीष्ममें कहीं कहीं पानी सूख जाता है। सालनदी और सुवर्ण रेखा छोटो नदी हैं। वर्षा में बड़ी बाढ़ आती और नदी फूली नहीं समातीं। इसीलिये आधा जल नदीकी राह समुद्र पहुंचता और आधा किनारे तोड़ फोड़ देशको ही सोंचता है। महानदीमें ४५००० हजा़र वर्ग मील भूमिका जल आता है। पहले यह पर्वत के नीचे नीचे बहती और दोनों किनारसे आनेवाली अनेक अनेक शाखा प्रशाखाओं में रहती है। किन्तु समस्थलीसे मिलते ही रूप बदल जाता है। यह अपने ही रखे रेतपर चढ़ने लगती है। दोनो किनारे ऊंचे पड़ जाते हैं। इससे शाखा प्रशाखा निकलती हैं। फिर अधिक वेग नहीं रहता ओर जल समुद्रतक जा पहुंचता है। इसी प्रकार चारो ओर रेतका ढेर लगनेसे उडीसा समस्थली तैयार होती है। उड़ीसा प्रान्त धीरे धीरे नदी किनारसे नीचेको ढलता है। इससे बाढ़ आनेपर पानी लौटकर नदी पहुंच नहीं सकता। पके खेत डूब जाते हैं। जब-तक नदी अच्छी तरह नहीं उतरती, तबतक अधिकांश भूमि जलमें मग्न हो रहती है। गन्दे दलदलोंकी वायु बिगड़ने से मलेरिया फूट पड़ता है। उड़ीसामें हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, यहूदी तथा दूसरे मतावलम्बी भी रहते हैं। वकली या महिमा-धर्म्मो वहांका एक प्रच्छन्न बौद्ध-सम्प्रदाय है।<small>महिमाधम्यौं देखो।</small> किन्तु हिन्दू धर्मका चमत्कार अधिक है। वैतरणी पार होते ही पुण्यभूमि मिलती है। वैतरणीके दक्षिण तटपर अनेक शिवालय बने हैं। याजपुरमें पार्वतीका स्थान है। वह कौनसा राजकीय विभाग है, जहां स्मारक पर स्मारक नहीं <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 7d266x1jhl9m0hb955xk68jr3htwxal 666550 666549 2026-07-09T18:15:49Z अँजली चौधरी 2439 666550 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१९४'''|'''उत्कर्ष-उत्कल (उड़ीसा)।'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :मूढगर्भको चिकित्साका एक उपाय, हमलकी बीमारी का नुसखा। <Small>मूढ़मर्म देखो।</small> {{Outdent|उत्कर्ष (सं॰ पु॰) उत्-कृष-घञ्। १ अतिसार, दस्तकी बीमारी। २ श्रेष्ठता, अज़मत, बड़ाई। <Small>“उत्कर्ष योषितः प्राप्ता: स्वैः स्वैर्भर्तु गुणौ: सुभैः।" (मनु ९।२४) ।</small>> ३ वृद्धि, बढ़ती। ४ आकर्षण, कशिश, ख़ैचतान। ५ सौभाग्य, इक़बालमन्दी, लहर-बहर। ६ आधिका, ज्यादती। ७ अहङ्कार, फख़्र, घमण्ड। ८ अभिमान, शेख़ी। ९ आनन्द, खुशी। (त्रि॰) १० उन्नत, बुलन्द, ऊंचा। ११ अधिक, ज्या़दा, बहुत। १२ अभिमानी, शेखी़बाज। १३ आकर्षक, खींच लेनेवाला।}} {{Outdent|उत्कर्षक (सं॰ त्रि॰) उत्-कृष-णिच्-णुल्। १ उन्नति कारक, बलन्द बनानेवाला, जो ऊपरको खींच देता हो। २ उत्पाटनकारी, उखाड़ डालनेवाला। ३ कर्षणकारी, खींच लेनेवाला।}} {{Outdent|उत्कर्षण (सं॰ क्ली॰) उत्-कृष-ल्युट्। उर्ध्व आकर्षण ऊपरकी ओरको खिंचाव। यह सुश्रुतोक्त मूढ़-गर्भकी चिकित्साका एक उपाय है।}} {{Outdent|उत्कर्षता (सं॰ स्त्री॰) १ उन्नति, तरक्की, बढ़ती। २ आधिक्य, ज्या़दती। ३ अभिमान, शेख़ी। ४ आकर्षण, खिंचाव। ५ सौभाग्य, इकबालमन्दी।}} {{Outdent|उत्कर्षित (सं॰ त्रि॰) आकर्षित, खिंचा हुआ।}} {{Outdent|उत्कर्षिन् ( स० त्रि॰) उत-कृष-णिनि । १ अर्ध्वाकर, उठा देनेवाला। २ उत्कर्षान्वित, ऊपरको उठा हुआ।}} {{Outdent|उत्कल (उड़ीसा)-भारतका एक प्रान्त। यह अक्षा॰ ९३° २८‘ एवं २२° ३४‘ १५‘‘ और द्राघि॰ ८३°३६ ३०, तथा ८७° ३१‘ ३०‘‘ पूर्व के बीच अवस्थित है। विहार और उड़ीसाके गवरनर इसका शासन करते हैं। उडीसामें कितने ही मित्र राज्य भी संमिलित हैं। इससे उत्तर तथा उत्तरपूर्व छोटा नागपुर एवं बङ्गालदेश, पूर्व तथा दक्षिण पूर्व बङ्गालकी खाडी, दक्षिण मन्द्राज प्रदेशका गज्जाम जिला और पश्चिम मध्यप्रदेश पड़ता है। मुख्य उडीसा ९०५३ और मित्र राज्यका क्षेत्रफल १५१८ वर्ग मील है। लोकसंख्या प्रायः पचास लाख होगी। }} उड़ीसेको भूमि दो प्रकारकी है। मोगलबन्दी वा अंगेरेज़ी――कटक, बालेश्वर और पुरी ज़िला <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> समान एवं उर्वर तथा गड़जात वा करद राज्य पार्वत्य भूभाग हैं। समस्थ स्त्री महानदी, ब्राह्मणी तथा वैतरणीको महीसे बनी है। महानदी तथा ब्राह्मणी मध्यभारत और वैतरणी मयूरभञ्ज एवं केंउझर करद राज्यके पर्व तसे निकलती है। ये तीनों नदी समुद्रतटकी ओर धीरे धीरे मिलनेको बढती और उड़ीसा समस्थली पर अपना संगृहीत जल ३० मीलके अन्तरसे छोड़ती हैं। किन्तु ग्रीष्ममें कहीं कहीं पानी सूख जाता है। सालनदी और सुवर्ण रेखा छोटो नदी हैं। वर्षा में बड़ी बाढ़ आती और नदी फूली नहीं समातीं। इसीलिये आधा जल नदीकी राह समुद्र पहुंचता और आधा किनारे तोड़ फोड़ देशको ही सोंचता है। महानदीमें ४५००० हजा़र वर्ग मील भूमिका जल आता है। पहले यह पर्वत के नीचे नीचे बहती और दोनों किनारसे आनेवाली अनेक अनेक शाखा प्रशाखाओं में रहती है। किन्तु समस्थलीसे मिलते ही रूप बदल जाता है। यह अपने ही रखे रेतपर चढ़ने लगती है। दोनो किनारे ऊंचे पड़ जाते हैं। इससे शाखा प्रशाखा निकलती हैं। फिर अधिक वेग नहीं रहता ओर जल समुद्रतक जा पहुंचता है। इसी प्रकार चारो ओर रेतका ढेर लगनेसे उडीसा समस्थली तैयार होती है। उड़ीसा प्रान्त धीरे धीरे नदी किनारसे नीचेको ढलता है। इससे बाढ़ आनेपर पानी लौटकर नदी पहुंच नहीं सकता। पके खेत डूब जाते हैं। जब-तक नदी अच्छी तरह नहीं उतरती, तबतक अधिकांश भूमि जलमें मग्न हो रहती है। गन्दे दलदलोंकी वायु बिगड़ने से मलेरिया फूट पड़ता है। उड़ीसामें हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, यहूदी तथा दूसरे मतावलम्बी भी रहते हैं। वकली या महिमा-धर्म्मो वहांका एक प्रच्छन्न बौद्ध-सम्प्रदाय है।<small>महिमाधम्यौं देखो।</small> किन्तु हिन्दू धर्मका चमत्कार अधिक है। वैतरणी पार होते ही पुण्यभूमि मिलती है। वैतरणीके दक्षिण तटपर अनेक शिवालय बने हैं। याजपुरमें पार्वतीका स्थान है। वह कौनसा राजकीय विभाग है, जहां स्मारक पर स्मारक नहीं <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 6g0supt1de1wo6yq077vgxxjufhgfyd पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१९६ 250 75881 666551 609009 2026-07-09T18:18:01Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666551 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कल (उड़ीसा)'''|'''१९५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> बना। प्रत्येक ग्राममें ब्राह्मणशासन विद्यमान है।। कक जमीन्दार और माफीदार होते भी अधिकांश नगर, ग्राम यहां तक कि घर घर मन्दिर बने खण्डायत कृषि कार्य करते हैं। हैं। प्रति पूर्व कालसे जगनाथको पूजा होती करण अपनेको भारतके प्राचीन विय बताते हैं। है। जगन्नाथ देखो। कितने ही करण जमीन्दारी करते और व्याज पर ब्राह्मण, शैवका प्राधान्य रहते भी वैष्णवमार्गी रुपया तथा चावल ऋण देते हैं। किन्तु अधिकांश लोगोंको अधिक प्यारा है। उड़ीसेके ब्राधाण वैदिक मनीम, हिसाबदार और छोटे अफसर हैं। इनकी पौर लौकिक दो प्रकारके होते हैं। कहते हैं-प्राय आर्थिक दशा साधारणतः अच्छी है। ई०के १२ वें शताब्दसे कन्नौज और बङ्गालके ब्राह्मण शूद्रों में चासा (प्रधान कषक ), ग्वाला, पान, तेली, पुरी जिलेमें आकर बसते हैं। उन्हींका नाम वैदिक बाउरी (मजदूर) तांती (जुहाले), केवट, नापित, है। इससे कोई सौ वर्ष पहले वे उड़ीसाको प्राचीन धोबी, कुन्हार, बढई, कन्दू (इलवाई), लोहार, चमार, राजधानी याजपुरमें आ टिके थे। किन्तु ११७५ और मालो, हड्डो (मेहतर), मोदक (मोदी), डोम, १२०२ ई० के बोच जगन्नाथ मन्दिरको पुनः बनवान- जुगी (कोरी), सुनरी (कलवार ) प्रभृति प्रधान हैं। वाले राजा अनङ्गभीमदेवने उनके लिये पुरी जिले में पान पूर्व समयमें नरवलिके अर्थ मानवको पकड़ ४५. उपनिवेश स्थापित किये। वैदिक ब्राह्मण ले जाते थे। -कुलीन और थोत्रिय दो श्रेणीमें विभक्त हैं। कुलीन यहां मुसलमान भी बहुत रहते हैं। किन्तु वे दरिद्र, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ब्राह्मणके वाच, नन्द और गौड़ीय तीन पद्धति होती हैं। अभिमानी और असन्तुष्ट हैं। कितने हो अफगानोंके जीविका राजाको दो हुई माफ भूमि, बालकोंको वंश प्रतिष्ठित हैं। किन्तु वास्तविक ये मुसलमानी शिक्षा और पूजा अर्चनासे चलती है। श्रोत्रिय-कन्याका फौजके साथ आये सिपाहियोंके सन्तान हैं। विवाह अपने पुत्रके साथ करनेपर वैदिक ब्राह्मण आदिम अधिवासियोंमें गोंड, सन्याल, भुइया, बड़ा दहेज लेते हैं। श्रोत्रिय ब्राह्मणके भट्ट, धर, भूमिज, खरवार और कोल अधिक हैं। इनमें कुछ उपाध्याय, मित्र, रथ, श्रोत, क्यिारी, दास, पति और हिन्दू धर्मको मानते और कुछ अपने स्वतन्त्र मतपर 'शतपथी नव पद्धति हैं। लौकिक ब्राह्मण सबसे छोटे चलते हैं। और उडीसके आदि अधिवासी हैं। इनमें छः पद्धति ईसाइयों में युरोपीय, यूरेशीय, देशीय और एसि- -हैं-पण्डा, सेनापति, परही, बसतिया, पानि और याके लोग मिलते हैं। ई वापतिस्त मिशनसे माहु। कृषि, वाणिज्य, शाकविक्रय, रुपये का लेन सम्बन्ध रखते हैं। देन और तीर्थयात्रियोंको पथप्रदर्शन इनके धनोपा प्राचीन काल में इस देश में जैनों तथा बौद्धोंका प्राबल्य जनका प्रधान हार है। अधिक रहा। किन्तु सन् ई०के ४थे शताब्दमें बौद्ध- क्षत्रिय तीन प्रकारके हैं-देव, लाल और राय। धर्मका प्रभाव घटा था। फिर शैवका प्राधान्य बढ़ा। राजा, जागीरदार और महाजन इनमें मिलित हैं। भुवनेश्वर नगरमें सन् ई०के ७३ शताब्दसे सैकड़ों संख्या न्यून रहते भी आर्थिक दशा अच्छी है। द्वितीय - शिवमन्दिर बन गये हैं। वैष्णव महाभारत और श्रेणी सिंह पौर चन्द्र राजपूतोंकी है। यह छोटे मोटे रामायणको मानते हैं। किन्तु शिव और विष्णु दोनो जमीन्दार होते या फौज, पुलिस, दरबानी और चिट्ठो। सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मके एक अंश समझे जाते रसाईका काम करते हैं। लोगोंके शूद्र कहते भी हैं। कलिन, भुवनेश्वर और जगन्नाथ देखो। खण्डायत अपनको क्षत्रिय बताते हैं। पूर्व समय प्रति वर्ष उड़ीसमें चौबीस धार्मिक महोत्सव होते 'स्थानीय नृपति इनको निष्कर भूमि दे युद्धका काम हैं। उनमें विष्णुका हो पूजन अधिक रहता है। "लेते थे। आज कल इनकी संख्या बहुत अधिक है। वैशाख मासमें चन्दनयाना तीन सप्ताह चलती है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> h3no6hf8v6c3pbz7lfwm2wu6u4g1vmp 666556 666551 2026-07-09T19:18:38Z अँजली चौधरी 2439 666556 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कल (उड़ीसा)'''|'''१९५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> बना। प्रत्येक ग्राममें ब्राह्मणशासन विद्यमान है। नगर, ग्राम यहां तक कि घर घर मन्दिर बने हैं। अति पूर्व कालसे जगनाथकी पूजा होती है। <small>जगन्नाथ देखो।</small> ब्राह्मणमें शैवका प्राधान्य रहते भी वैष्णवमार्गी लोगोंको अधिक प्यारा है। उड़ीसेके ब्राधाण वैदिक और लौकिक दो प्रकारके होते हैं। कहते हैं――प्राय ई॰ के १२ वें शताब्दसे कन्नौज और बङ्गालके ब्राह्मण पुरी ज़िलेमें आकर बसते हैं। उन्हींका नाम वैदिक है। इससे कोई सौ वर्ष पहले वे उड़ीसाकी प्राचीन राजधानी याजपुरमें आ टिके थे। किन्तु ११७५ और १२०२ ई॰ के बीच जगन्नाथ मन्दिरको पुनः बनवाने-वाले राजा अनङ्गभीमदेवने उनके लिये पुरी जिले में ४५० उपनिवेश स्थापित किये। वैदिक ब्राह्मण कुलीन और श्रोत्रिय दो श्रेणीमें विभक्त हैं। कुलीन ब्राह्मणके वाच, नन्द और गौड़ीय तीन पद्धति होती हैं। जीविका राजाकी दो हुई माफ़ भूमि, बालकोंकी शिक्षा और पूजा अर्चनासे चलती है। श्रोत्रिय-कन्याका विवाह अपने पुत्रके साथ करनेपर वैदिक ब्राह्मण बड़ा दहेज लेते हैं। श्रोत्रिय ब्राह्मणके भट्ट, धर, उपाध्याय, मिश्र, रथ, ओत, तियारी, दास, पति और शतपथी नव पद्धति हैं। लौकिक ब्राह्मण सबसे छोटे और उडीसेके आदि अधिवासी हैं। इनमें छः पद्धति हैं――पण्डा, सेनापति, परही, बसतिया, पानि और माहु। कृषि, वाणिज्य, शाकविक्रय, रुपये का लेन देन और तीर्थयात्रियोंको पथप्रदर्शन इनके धनोपार्जन का प्रधान हार है। क्षत्रिय तीन प्रकारके हैं――देव, लाल और राय। राजा, जागीरदार और महाजन इनमें मिलित हैं। संख्या न्यून रहते भी आर्थिक दशा अच्छी है। द्वितीय श्रेणी सिंह और चन्द्र राजपूतोंकी है। यह छोटे मोटे जमीन्दार होते या फौज, पुलिस, दरबानी और चिट्ठी रसाईका काम करते हैं। लोगोंके शूद्र कहते भी खण्डायत अपनको क्षत्रिय बताते हैं। पूर्व समय स्थानीय नृपति इनको निष्कर भूमि दे युद्धका काम लेते थे। आज कल इनकी संख्या बहुत अधिक है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कुछ जमीन्दार और माफीदार होते भी अधिकांश खण्डायत कृषि कार्य करते हैं। करण अपनेको भारतके प्राचीन क्षत्रिय बताते हैं। कितने ही करण जमीन्दारी करते और व्याज पर रुपया तथा चावल ऋण देते हैं। किन्तु अधिकांश मुनीम, हिसाबदार और छोटे अफसर हैं। इनकी आर्थिक दशा साधारणतः अच्छी है। शूद्रों में चासा (प्रधान कृषक), ग्वाला, पान, तेली, बाउरी (मज़दूर) तांती (जुहाले), केवट, नापित, धोबी, कुन्हार, बढई, कन्दू (हलवाई), लोहार, चमार, माली, हड्डी (मेहतर), मोदक (मोदी), डोम, जुगी (कोरी), सुनरी (कलवार) प्रभृति प्रधान हैं। पान पूर्व समयमें नरवलिके अर्थ मानवको पकड़ ले जाते थे। यहां मुसलमान भी बहुत रहते हैं। किन्तु वे दरिद्र, अभिमानी और असन्तुष्ट हैं। कितने ही अफगानोंके वंश प्रतिष्ठित हैं। किन्तु वास्तविक ये मुसलमानी फौजके साथ आये सिपाहियोंके सन्तान हैं। आदिम अधिवासियोंमें गोंड, सन्याल, भुंइया, भूमिज, खरवार और कोल अधिक हैं। इनमें कुछ हिन्दू धर्मको मानते और कुछ अपने स्वतन्त्र मतपर चलते हैं। ईसाइयों में युरोपीय, यूरेशीय, देशीय और एसियाके लोग मिलते हैं। देशी ईसाई वाप्तिस्त मिशनसे सम्बन्ध रखते हैं। प्राचीन काल में इस देश में जैनों तथा बौद्धोंका प्राबल्य अधिक रहा। किन्तु सन् ई॰ के ४वें शताब्दमें बौद्ध धर्मका प्रभाव घटा था। फिर शैवका प्राधान्य बढ़ा। भुवनेश्वर नगरमें सन् ई॰ के ७वें शताब्दसे सैकड़ों सैकड़ों शिवमन्दिर बन गये हैं। वैष्णव महाभारत और रामायणको 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दूसरे समय नहीं होती। है। फिर भी जलके रुक न सकनेसे दुर्भिक्ष पड़ते कृषिमें चावल अधिक चलता है। सूखे टीलों देर नहीं लगती। १८३३-३8, ३६-३७, ३०-४० और और गहरे दलदलोंमें हर जगह उसे बो देते हैं। ४०-४१ ई०को बड़ा सूखा पड़ा और ज्वर बढ़ा था। चावल कई प्रकारका होता है। दिसम्बर जनवरीका फिर १८६६,१८१५ई० को बाढ़ पानेसे करोड़ों रुपयोंकी मार्च-अपरेल, मईजनका जुलाई-अगस्त और वर्षा हानि हुई। चौथाई लोग मर मिटे थे। समुद्र किनारे प्रारम्भका बोया दिसम्बरमें कटता है। सिवा चावल के भी तूफानी पानी चढ़ आता है। उसके नदीको बाढ़से गई, अड़हर, उड़द, नूग, मसूर, मटर, सरसों, मिलने पर जङ्गल और बस्तो दानो डब जाते हैं। सन, तम्बाकू, रूई, ऊख, पान, बाल और अनेक १८८५ ई०को ऐसी ही दशापर कटकमें कितने ही प्रकारका शाकादि भी उपजता है। सरकारी अफसर और उनके बालबच्चे मर गये थे। बालेखर, कटक, पुरी और चांदबाली बड़े बन्दर पशु और सम्पत्तिको अमित हानि हुई। तूफानी हैं। चावल और कपड़ेका व्यवसाय अधिक होता लहरने घण्टोंमें पचासों कोसों तक घर गिरा दिये थे। है। कलकत्तेसे घनिष्ट सम्बन्ध है। कितना ही माल किन्तु १८६६ ई. को जो दुर्भिक्ष पड़ा, उसका दृश्य पाता और कितना हो जाता है। प्रधानतः विलायती इतिहासके वक्षःपर सबसे ऊंचा है। चावल एवं देशी सूत, कपड़ा, बोरा, लोहालङ्गड़, तेल, मसाला, न मिलनेसे बाजार बन्द हो गये थे। रुपयेमें साढ़े तम्बाकू और सोना-चांदी बाहरसे मंगाते हैं। चावल, चारसेर चावल बिकनेसे गरीब आदमी भूकों मरे। चमड़ा, लकड़ी और लाह चालान करते हैं। बाले लोगोंने घास चबा चबाके दिन काटे थे। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> खरसे चावलका निकाश अधिक होता है। जहाज ___उड़ीसेका जलवायु दक्षिण-बङ्गाल से मिलता जुलता बराबर कलकत्त आया-जाया करते हैं। बङ्गाल है। मार्चसे मध्य जूनतक ग्रीष्म, मध्य जनले अतोबर नागपुर रेलवे उड़ीसाकै प्रधान प्रधान नगरोंको तक वषों और नवम्बरके आरम्भसे फरवरी मास तक पहुंचती है। पुरीमें नमक बहुत बनता है। कटकके शीत ऋतु रहती है। जन, जुलाई और अगस्त मास सोनेका काम प्रसिद्ध है। हैज़ा हुआ करता है। चेचक जनवरीसे मध्य अपरल . यहां रेल और सड़ककी कमी है। कलकत्तेसे तक चलती है। नीच उड़िये कुवाछूतका विचार नहीं मन्द्राज जानेवालो ग्राण्डट्रक रोड (Grand Trunk | रखते और न टोका हो लगवाना चाहते हैं। Road) कछार-जैसे प्रान्तके बीचसे निकली है। इतिहास इसोको एक शाखा कटकसे पुरीको फटी है। सम्बल उत्कलका प्राचीन नाम कलिङ्ग है। महा- पुरको भी कटक और मेदिनीपुरसे सडक लगी है। . भारतके समय वैतरणी नदी-प्रवाहित कलिङ्ग वा बन्दर बड़े जहाजोंके लिये उपयुक्त नहीं। पहले उतकलांश यज्ञीय देश समझा जाता था। उस समय माल जहाजसे पानी में ही नावपर उतरता, फिर कहीं। यहां अनेक मुनि ऋषिके आश्रम रहनेका सन्धान किनारे पहुंचता है। नावें भी बहुत कम मिलती लगा है। बुद्धदेवके समय भी यहां समृद्धि बहुत हैं। बरसातमें माल चढ़ाते-उतारते बड़ा कष्ट पड़ता बढ़ी थी। है। उडीसेको नहर भद्रखसे भागे नहीं बढ़ती। अशोकके पितामह चन्द्रगुप्तके समयसे कलिङ्ग कैदरापाडाको नहरमें कटकसे मारसाघाई तक हो। मौर्यवंशके अधीन रहा। सम्राट अशोकसे कलिङ्ग- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 2rznxnhgqjdojsvuz2p4mlmmh81yhbz 666557 666552 2026-07-09T19:38:56Z अँजली चौधरी 2439 666557 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१९६'''|'''उत्कल (उड़ीसा)'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> नौकापर विष्णु और शिव दोनो जलविहार करते हैं। स्नानयात्राके समय गणेश भगवान् तड़ागमें नहाने जाते हैं। रामलीला, कालीयदमन और जगन्नाथके जन्मका उत्सव भी बड़ा है। रथयात्रा जैसी धूमधाम दूसरे समय नहीं होती। कृषिमें चावल अधिक चलता है। सूखे टीलों और गहरे दलदलोंमें हर जगह उसे बो देते हैं। चावल कई प्रकारका होता है। दिसम्बर जनवरीका मार्च-अपरेल, मई जून का जुलाई-अगस्त और वर्षा के आरम्भका बोया दिसम्बरमें कटता है। सिवा चावल के गई, अड़हर, उड़द, मूंग, मसूर, मटर, सरसों, सन, तम्बाकू, रूई, ऊख, पान, आलू और अनेक प्रकारका शाकादि भी उपजता है। बालेश्वर, कटक, पुरी और चांदबाली बड़े बन्दर हैं। चावल और कपड़ेका व्यवसाय अधिक होता है। कलकत्तेसे घनिष्ट सम्बन्ध है। कितना ही माल आता और कितना ही जाता है। प्रधानतः विलायती एवं देशी सूत, कपड़ा, बोरा, लोहालङ्गड़, तेल, मसाला, तम्बाकू और सोना-चांदी बाहरसे मंगाते हैं। चावल, चमड़ा, लकड़ी और लाह चालान करते हैं। बालेश्वरसे चावलका निकाश अधिक होता है। जहाज़ बराबर कलकत्ता आया-जाया करते हैं। बङ्गाल नागपुर रेलवे उड़ीसाके प्रधान प्रधान नगरोंको पहुंचती है। पुरीमें नमक बहुत बनता है। कटकके सोनेका काम प्रसिद्ध है। यहां रेल और सड़ककी कमी है। कलकत्तेसे मन्द्राज जानेवाली ग्राण्डट्रङ्क रोड (Grand Trunk Road) कछार-जैसे प्रान्तके बीचसे निकली है इसीकी एक शाखा कटकसे पुरीको फटी है। सम्बल पुरको भी कटक और मेदिनीपुरसे सडक लगी है। बन्दर बड़े जहाजोंके लिये उपयुक्त नहीं। पहले माल जहाज़से पानी में ही नावपर उतरता, फिर कहीं। किनारे पहुंचता है। नावें भी बहुत कम मिलती हैं। बरसातमें माल चढ़ाते-उतारते बड़ा कष्ट पड़ता है। उडीसेको नहर भद्रखसे आगे नहीं बढ़ती। कैदरापाड़ाकी नहरमें कटकसे मारसाघाई तक ही <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> नावें चल सकती हैं। तालदण्डेको ५२ और मछगांवकी नहर ५३ मील लम्बी है। इनसे प्रायः सिंचाई होती है। उड़ीसे में प्रतिवर्ष प्रायः साढ़े बासठ इञ्च वृष्टि होती है। फिर भी जलके रुक न सकनेसे दुर्भिक्ष पड़ते देर नहीं लगती। १८३३-३४, ३६-३७, ३९-४० और ४०-४१ ई॰ को बड़ा सूखा पड़ा और ज्वर बढ़ा था। फिर १८६६,१९१५ ई॰ को बाढ़ आनेसे करोड़ों रुपयोंकी हानि हुई। चौथाई लोग मर मिटे थे। समुद्र किनारे भी तूफानी पानी चढ़ आता है। उसके नदीको बाढ़से मिलने पर जङ्गल और बस्ती दोनो डूब जाते हैं। १८८५ ई॰ को ऐसी ही दशापर कटकमें कितने ही सरकारी अफसर और उनके बालबच्चे मर गये थे। पशु और सम्पत्तिको अमित हानि हुई। तूफानी लहरने घण्टोंमें पचासों कोसों तक घर गिरा दिये थे। किन्तु १८६६ ई॰ को जो दुर्भिक्ष पड़ा, उसका दृश्य इतिहासके वक्षःपर सबसे ऊंचा है। चावल न मिलनेसे बाज़ार बन्द हो गये थे। रुपयेमें साढ़े चारसेर चावल बिकनेसे गरीब आदमी भूंकों मरे। लोगोंने घास चबा चबाके दिन काटे थे। उड़ीसेका जलवायु दक्षिण-बङ्गाल से मिलता जुलता है। मार्चसे मध्य जूनतक ग्रीष्म, मध्य जूनसे अक्तोबर तक वषों और नवम्बरके आरम्भसे फरवरी मास तक शीत ऋतु रहती है। जून, जुलाई और अगस्त मास हैज़ा हुआ करता है। चेचक जनवरीसे मध्य अपरेल तक चलती है। नीच उड़िये छुवाछूतका विचार नहीं रखते और न टीका ही लगवाना चाहते हैं। {{x-smaller|{{c|इतिहास}}}} उत्कलका प्राचीन नाम कलिङ्ग है। महा-भारतके समय वैतरणी नदी-प्रवाहित कलिङ्ग वा उतकलांश यज्ञीय देश समझा जाता था। उस समय यहां अनेक मुनि ऋषिके आश्रम रहनेका सन्धान लगा है। बुद्धदेवके समय भी यहां समृद्धि बहुत बढ़ी थी। अशोकके पितामह चन्द्रगुप्तके समयसे कलिङ्ग मौर्यवंशके अधीन रहा। सम्राट अशोकसे कलिङ्ग- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 09ek22xtuhnxq0232xjnk35txe0fa6z पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१९८ 250 75883 666554 609011 2026-07-09T18:23:08Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666554 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कल (उड़ीसा)'''|'''१९७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> वासी दीर्घकालसक लड़ते रहे। युद्ध में असंख्य कलिङ्ग आक्रमण मारा था। क्षीरधारके हारते और मारे वासी मारे गये थे। ऐसी उत्कट नरहिंसा देख । जाते भी उनके भ्रातुष्प त्र बहुसैन्य सामन्त बढा अशोकका हृदय करुणासे पिघल उठा था। दन्तपुरोको दौड़ पड़े। गुहशिव कहों निस्तार न ___अशोकप्रियदर्गे देखो। देख अपने प्रिय जामाता उज्जयिनोके राजकुमार दन्त- मौर्यशका प्रभाव घटने पर जैनराजवंशने प्रबल | कुमारसे कह गये-हमारे न रहते पवित्र बुद्धदन्तको हो कलिङ्ग जीता था। खण्डगिरिको हाथीगुफासे | सिहल पहुंचा दीजियेगा। गुहशिवके युद्ध में मारे उत्कीर्ण सुवृहत् शिलालिपिमें पराक्रान्त भीखुगज | जाने पर दन्त कुमार राजकन्याके साथ छरवेशमें पवित्र खारबलका परिचय मिलता है। खारबेलने मगध दन्त उठा सिंहलको चलते बने। उसी समयसे पर्यन्त देश जीत शुङ्गवंशको मथुरा भगा दिया था। ! बुद्धका दन्त सिंहलमें रखा और पूजा गया। सम्भ- जैनवंशके बाद कलिङ्गमें गुहवंशका अभ्युदय हुआ वतः उक्त शिवगुहके वंशन दन्तपुरोको खो उत्- था। सिंहलके 'दाथाबंश' नामक पालीग्रन्थमें कलके गड़जातका आश्रय लिया और क्रम क्रमसे कलिङ्गाधिप गुहशिव वा शिवगुहका नाम मिलता उसमें अपना प्रभुत्व फैला दिया। गौड़कविने उनके है। इस प्राचीन ग्रन्थको पढ़नेसे समझ सकते हैं वंशधरको 'नानारत्नकूट-कुट्टिमविकटकोटाटवीकण्ठी- शाकबुद्धक निर्वाण पर क्षेम नामा उनके एक शिष्यने रवो दक्षिणसिंहासनचक्रवर्ती कहा है। चितासे बुद्धदेवका पवित्र दन्त उठा कलिङ्गाधिप ब्रह्म मगधर्म गुप्तसाम्राज्यको प्रतिष्ठाके साथ उत्कल भी दत्तको जाकर दिया था। उन्होंने अपनी राजधानी उसौमें मिल गया। गुप्त-सामान्यके पतनपर यह पर मणिमाणिक्यखचित एक सुवर्ण-मन्दिर बना उसमें प्रदेश सोमवंशीय राजगणके अधिकारमुक्त हुआ था। पवित्र दन्त को रखा। इसी दन्तके कारण कलिङ्गको गुप्तराजवंश और सोमवंशी शब्द देखो। । राजधाननि दन्तपुर नाम पाया था। ३७० से ३८. सोमवशीय राजगण मादलापुञ्जोमें केशरिवंशीय ई०के बीच उत्तराधिकार-सूत्रसे शिवगुह दन्तपुरके भी कहाते थे। इसी केशरिवंशके समय उत्कलमें सिंहासन पर बैठे। पहले वे ब्राह्मणके अत्यन्त भक्ता नाना स्थानोंपर बहु शिवमन्दिर बने। उनका भग्ना- रहे। उन्होंने ब्राह्मणवर्गके परामर्शसे अपने पूर्वतन वशेष आज भी विद्यमान है। गङ्ग वा गाङ्गेय-वंशके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> राजावोंके समान दन्तका पूजना छोड़ दिया था। अभ्युदयसे सोमबंशीय राजगणका प्रभाव घट गया था। किन्तु किसी नैमर्गिक घटनासे डिग पीछे वे शक ९८८में गाङ्गव वशतिलक चोड़गङ्गका अभु- भी दन्तके कट्टर भक्त बने। ब्राह्मणवर्गने इससे ! दय हुआ। इस विषयके कितने ही शिलालेख और बिगड़ पाटलिपुत्राधिपके निकट कलिङ्ग-नरेशपर ताम्रफलक मिले हैं, जिन्हें देखनेसे हम निम्नलिखित अभियाग लगाया था। उन्होंने बुद्धदन्तके साथ गुह वृत्तान्त समझ सके हैं- शिवको पकड़ लानके लिये चित्तयान नामक एक ____शक ८८८ के कई वर्षवाद महाराज चोड़गङ्ग उत्- सामन्तराज भेजे। गुहशिव उनकी गति रोक न कलके सिंहासन पर बैठे। इनके पिता प्राच्य गङ्गवशके सके और दन्तकै साथ पाटलिपुत्र नगरको जानपर २य राजराज रहे। माताका नाम राजसुन्दरी था। वाध्य हुये थे पाटलिपुत्रमें दन्त पानसे बहु अभूतपूर्व इनको कई रानियोंका नाम-कस्तूरिकामोदिनी, काण्ड उठने लगे, जिससे पाटलिपुत्राधिप भी उसके इन्दिरा, चन्द्रलेखा, सोमला, महादेवी, लक्ष मौदेवो, भक्त बन गये। उनके मरने बाद गुरुशिव फिर उक्त | और पृथिवी महादेवी रहा। कामार्गव, राघव, दन्तको अपनी राजधानी ले आये थे। किन्तु वे राजराज, अनियकभीम और उभावलभ पुत्र थे। निश्चिन्त बैठ न सके। अल्प दिन पीछे ही चोरधार इन्हें लोग अनन्तवमी, चालुक्यगङ्ग, गाङ्गेयपर पौर नामक किसी पार्श्ववर्ती नृपतिने उनके राज्य पर विक्रमगडः उपाधिसे सम्बोधन करते थे। ये अत्यन्त <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 50|em}}</noinclude> h9f5cruxuo8wr7kjn3hdjy2vtr1l584 666558 666554 2026-07-10T01:36:12Z अँजली चौधरी 2439 666558 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कल (उड़ीसा)'''|'''१९७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> वासी दीर्घकालसक लड़ते रहे। युद्ध में असंख्य कलिङ्गवासी मारे गये थे। ऐसी उत्कट नरहिंसा देख अशोकका हृदय करुणासे पिघल उठा था। {{Right|<small>अशोकप्रियदर्गे देखो।</small>}} मौर्यशका प्रभाव घटने पर जैनराजवंशने प्रबल हो कलिङ्ग जीता था। खण्डगिरिकी हाथीगुफासे उत्कीर्ण सुवृहत् शिलालिपिमें पराक्रान्त भीखुगज खारबलका परिचय मिलता है। खारबेलने मगध पर्यन्त देश जीत शुङ्गवंशको मथुरा भगा दिया था। जैनवंशके बाद कलिङ्गमें गुहवंशका अभ्युदय हुआ था। सिंहलके ‘दाथाबंश’ नामक पालीग्रन्थमें कलिङ्गाधिप गुहशिव वा शिवगुहका नाम मिलता है। इस प्राचीन ग्रन्थको पढ़नेसे समझ सकते हैं―― शाकबुद्धक निर्वाण पर क्षेम नामा उनके एक शिष्यने चितासे बुद्धदेवका पवित्र दन्त उठा कलिङ्गाधिप ब्रह्म-दत्तको जाकर दिया था। उन्होंने अपनी राजधानी पर मणिमाणि-क्यखचित एक सुवर्ण-मन्दिर बना उसमें पवित्र दन्त को रखा। इसी दन्तके कारण कलिङ्गकी राजधानीने दन्तपुर नाम पाया था। ३७० से ३९० ई॰ के बीच उत्तराधिकार-सूत्रसे शिवगुह दन्तपुरके सिंहासन पर बैठे। पहले वे ब्राह्मणके अत्यन्त भक्त रहे। उन्होंने ब्राह्मणवर्गके परामर्शसे अपने पूर्वतन राजावोंके समान दन्तका पूजना छोड़ दिया था। किन्तु किसी नैमर्गिक घटनासे डिग पीछे वे भी दन्तके कट्टर भक्त बने। ब्राह्मणवर्गने इससे बिगड़ पाटलिपुत्राधिपके निकट कलिङ्ग-नरेशपर अभियाग लगाया था। उन्होंने बुद्धदन्तके साथ गुह शिवको पकड़ लानके लिये चित्तयान नामक एक सामन्तराज भेजे। गुहशिव उनकी गति रोक न सके और दन्तके साथ पाटलिपुत्र नगरको जानेपर वाध्य हुये थे पाटलिपुत्रमें दन्त आनसे बहु अभूतपूर्व काण्ड उठने लगे, जिससे पाटलिपुत्राधिप भी उसके भक्त बन गये। उनके मरने बाद गुरुशिव फिर उक्त दन्तको अपनी राजधानी ले आये थे। किन्तु वे निश्चिन्त बैठ न सके। अल्प दिन पीछे ही क्षीरधार नामक किसी पार्श्ववर्ती नृपतिने उनके राज्य पर <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> आक्रमण मारा था। क्षीरधारके हारते और मारे जाते भी उनके भ्रातुष्पत्र बहुसैन्य सामन्त बढा दन्तपुरीको दौड़ पड़े। गुहशिव कहों निस्तार न देख अपने प्रिय जामाता उज्जयिनीके राजकुमार दन्त-कुमारसे कह गये――हमारे न रहते पवित्र बुद्धदन्तको सिंहल पहुंचा दीजियेगा। गुहशिवके युद्ध में मारे जाने पर दन्त कुमार राजकन्याके साथ छद्म वेशमें पवित्र दन्त उठा सिंहलको चलते बने। उसी समयसे बुद्धका दन्त सिंहलमें रखा और पूजा गया। सम्भवतः उक्त शिवगुहके वंशन दन्तपुरीको खो उत्-कलके गड़जातका आश्रय लिया और क्रम क्रमसे उसमें अपना प्रभुत्व फैला दिया। गौड़कविने उनके वंशधरको ‘नानारत्नकूट-कुट्टिमविकटकोटाटवीकण्ठी-रवो दक्षिणसिंहासनचक्रवर्ती’ कहा है। मगधमें गुप्तसाम्राज्यको प्रतिष्ठाके साथ उत्कल भी उसीमें मिल गया। गुप्त-साम्राज्य के पतनपर यह प्रदेश सोमवंशीय राजगणके अधिकारमुक्त हुआ था। <small>गुप्तराजवंश और सोमवंशी शब्द देखो।</small> सोमवंशीय राजगण मादलापुञ्जोमें केशरिवंशीय भी कहाते थे। इसी केशरिवंशके समय उत्कलमें नाना स्थानोंपर बहु शिवमन्दिर बने। उनका भग्ना-वशेष आज भी विद्यमान है। गङ्ग वा गाङ्गेय-वंशके अभ्युदयसे सोमवंशीय राजगणका प्रभाव घट गया था। शक ९९९ में गाङ्गोव वंशतिलक चोड़गङ्गका अभुदय हुआ। इस विषयके कितने ही शिलालेख और ताम्रफलक मिले हैं, जिन्हें देखनेसे हम निम्नलिखित वृत्तान्त समझ सके हैं―― शक ९९९ के कई वर्षवाद महाराज चोड़गङ्ग उत्-कलके सिंहासन पर बैठे। इनके पिता प्राच्य गङ्गवशके २य राजराज रहे। माताका नाम राजसुन्दरी था। इनकी कई रानियोंका नाम-कस्तूरिकामोदिनी, इन्दिरा, चन्द्रलेखा, सोमला, महादेवी, लक्ष मीदेवो, और पृथिवी महादेवी रहा। कामार्णव, राघव, राजराज, अनियङ्कभीम और उभावल्लभ पुत्र थे। इन्हें लोग अनन्तवर्मा, चालुक्यगङ्ग, गाङ्गेयपर और विक्रमगङ्ग उपाधिसे सम्बोधन करते थे। ये अत्यन्त <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 50|em}}</noinclude> 9120fxy5p0e25dhaddu2orbnuhkxuho पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१९९ 250 75884 666555 609012 2026-07-09T18:25:39Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 666555 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१९८'''|'''उत्कल (उड़ीसा)'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> प्रसिद्ध और शक्तिशाली थे। इन्होंने उत्कलका राज्य राजराजके श्यालक स्वखरदेवने महेश्वरका मन्दिर दबा बङ्गदेशको भी जीत लिया। सदुगै अनमया नगर बनवाया था। छीन चोड़गहने मन्दार-नरेशको मार भगाया था। शक ११२० में श्य राजराज उत्कलके नरेश सम्भवतः पाईन-अकबरीमें जिस स्थानका माम 'सरकार इये। ये अनियकभीमदेवके औरस और रानो बाघल्ला मन्दारन' लिखा है, वही मन्दार प्रान्त रहा। आज देवोके गर्भ से उपजे थे। इनका उपाधि नाम राजेन्द्र था। कल इसे भीतरगढ़ या भौटागढ़ कहते हैं। चोड़गङ्गने राजराजके सिंहासनारूढ. होते हो मुहम्मद बखू ति- अपना राज्य गङ्गाके उत्तरसे गोदावरौके दक्षिण तक यारके दो सेनापति मुहम्मद शेरान् और अहमद शेरान् बढ़ा लिया था। किन्तु चेदी-शिलालेखके अनु उड़ोसे पर चढ़े, किन्तु अपने प्रभुके वध का समाचार पा सार रत्नदेव राजाने इन्हें नीचा दिखाया। ये बडे लौट पड़े। ३य राजराजने शक ११३३ तक राज्यका धार्मिक थे। इन्हीं को धाज्ञासे पुरोमें जगवाथ सुख उठाया था। देवका मन्दिर बना । चोड़गण के समय विज्ञान शक ११३३ से ११६० तक ३य अनङ्ग भोमदेवने और साहित्यको भी अच्छी उवति हुई। संस्कृत शासन चलाया । वे ३य राजराजके औरस और और तेलगु भाषा का प्रचार अधिक था। शक चाल क्यवंशीया सदगुणा वा मकणा देवी के गर्भ से १०२१ में प्रातानन्द ने भाखती नामक ज्योतिष उत्पन्न हुये थे। विकलिङ्गनाथ उपाधि रहा। उनके सम्बन्धीय ग्रन्थ लिखा। कोई ८० वर्षके वयसमें इन्होंने ब्राह्मण-मन्त्री विष्णु तुममाणो पृथिवीपति और ७२ वत्सर राज्य कर इहलोक छोड़ा था। आज भी यवनोंसे लड़े थे। शक १९६० को १म दृसिंहदेवने चोड़गङ्गके नामका परिचय पुरोके चुडनसाही महले, राज्य पाया । ये पनङ्गभीमदेवके औरस और कटक नगरसे दक्षिणपश्चिम तीन कास चुड़नपुखरौ | कस्त रादेवोके गर्भस उत्पन्न हुये थे। १म नृसिंह तालाब, सारङ्गगढ किले और कटक जिलेके याजपुर देवने राढ़ और वारेन्द्र पर आक्रमण कर यवना को नगरमें मिल सकता है। .. हराया। कोणार्कका बड़ा मन्दिर उन्हों के आदेश शक १०६८में कामाणवने सिंहासन पर बैठ बना था। फिर कोणाकोण वा कोणार्कवाले सूर्या- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> १०७८ तक वाजत्व किया। ये चोड़गङ्गके औरस लय के भी वेहो निर्माता रहे। १म नृसिंह देवको और कस्त रिकामादिनौके गर्भसे उत्पन्न हुये थे। सभामें रहनेवाले पण्डित विद्याधरने एकावलो नामक उपाधिरूपसे कामाणवको लोग कामार्णव देव, अनन्त अलङ्कारका एक ग्रन्थ लिखा था । शक ११८६में मधु-कामार्णवदेव और अनन्तदेव भी कहते रहे। उनके शासनका अन्त हुआ। शक १०७८ से १०८४ तक राघव राजा बने।। ११८६ से १२००-१ तक १म भानुदेवने राजत्व .. उन्होंने चोडगङ्गके औरस और रविकुलको इन्दिराके | किया। वे १म नृसिंहदेवके औरस और माल- गर्भसे जन्म लिया था। चन्द्रको कन्या सीतादेवीके गर्भसे उत्पन्न हुये थे। शक १.८२ को २य राजराज राजा हुये। ये १म भानुदेवने श्रोत्रिय ब्राह्मणों को भूमि तथा रह चोड़गड़के औरम और चन्ट्रलेखाके गर्भसे उपजे थे। समर्पण कर सैकड़ों दानपत्र लिखे थे। इनका औपाधि नाम अनन्तवर्मदेव रहा। शक | शक १२००-१ से १२२७-२८ तक श्य नृसिंह देव १११२ मे उनका शासन समाप्त हो गया। उत्कलके सिंहासन पर सुशोभित हुये। वे १म __शक १११२ मे ११२० पर्यन्त २य अमिया-भीम | भामुदेवके चौरस और चालक्य-वंशीय जाकज्ञा देवीके वा अनभीमदेवने राज्य किया था। ये घोड़ गर्भसे सम्भूत थे। उपाधि वीरनृसिंहदेव, वीरथी गङ्गके पुत्र और २य राजराजके भ्राता रहे। गोविन्द अथवा श्रीवीरसिंह देव, प्रतापौर श्रीनृसिंहदेव, नामक इनके एक महाबलं बाण मन्त्री थे। श्य वीरश्री. वा. श्रीवोरनरनारसिंहदेव और प्रमन्तवर्म <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> kojova786jokjwwandou8vv8iv35au3 666559 666555 2026-07-10T02:04:41Z अँजली चौधरी 2439 666559 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१९८'''|'''उत्कल (उड़ीसा)'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> प्रसिद्ध और शक्तिशाली थे। इन्होंने उत्कलका दबा बङ्गदेशको भी जीत लिया। सदुगै अनमया नगर छीन चोड़गहने मन्दार-नरेशको मार भगाया था। सम्भवतः पाईन-अकबरीमें जिस स्थानका माम 'सरकार मन्दारन' लिखा है, वही मन्दार प्रान्त रहा। आज कल इसे भीतरगढ़ या भौटागढ़ कहते हैं। चोड़गङ्गने अपना राज्य गङ्गाके उत्तरसे गोदावरौके दक्षिण तक बढ़ा लिया था। किन्तु चेदी-शिलालेखके अनु सार रत्नदेव राजाने इन्हें नीचा दिखाया। ये बडे धार्मिक थे। इन्हीं को धाज्ञासे पुरोमें जगवाथ देवका मन्दिर बना । चोड़गण के समय विज्ञान और साहित्यको भी अच्छी उवति हुई। संस्कृत और तेलगु भाषा का प्रचार अधिक था। शक १०२१ में प्रातानन्द ने भाखती नामक ज्योतिष सम्बन्धीय ग्रन्थ लिखा। कोई ८० वर्षके वयसमें इन्होंने ७२ वत्सर राज्य कर इहलोक छोड़ा था। आज भी चोड़गङ्गके नामका परिचय पुरोके चुडनसाही महले, कटक नगरसे दक्षिणपश्चिम तीन कास चुड़नपुखरौ | कस्त रादेवोके गर्भस उत्पन्न हुये थे। १म नृसिंह तालाब, सारङ्गगढ किले और कटक जिलेके याजपुर देवने राढ़ और वारेन्द्र पर आक्रमण कर यवना को नगरमें मिल सकता है। .. हराया। कोणार्कका बड़ा मन्दिर उन्हों के आदेश शक १०६८में कामाणवने सिंहासन पर बैठ बना था। फिर कोणाकोण वा कोणार्कवाले सूर्या- १०७८ तक वाजत्व किया। ये चोड़गङ्गके औरस लय के भी वेहो निर्माता रहे। १म नृसिंह देवको और कस्त रिकामादिनौके गर्भसे उत्पन्न हुये थे। सभामें रहनेवाले पण्डित विद्याधरने एकावलो नामक उपाधिरूपसे कामाणवको लोग कामार्णव देव, अनन्त अलङ्कारका एक ग्रन्थ लिखा था । शक ११८६में मधु-कामार्णवदेव और अनन्तदेव भी कहते रहे। उनके शासनका अन्त हुआ। शक १०७८ से १०८४ तक राघव राजा बने।। ११८६ से १२००-१ तक १म भानुदेवने राजत्व .. उन्होंने चोडगङ्गके औरस और रविकुलको इन्दिराके | किया। वे १म नृसिंहदेवके औरस और माल- गर्भसे जन्म लिया था। चन्द्रको कन्या सीतादेवीके गर्भसे उत्पन्न हुये थे। शक १.८२ को २य राजराज राजा हुये। ये १म भानुदेवने श्रोत्रिय ब्राह्मणों को भूमि तथा रह चोड़गड़के औरम और चन्ट्रलेखाके गर्भसे उपजे थे। समर्पण कर सैकड़ों दानपत्र लिखे थे। इनका औपाधि नाम अनन्तवर्मदेव रहा। शक | शक १२००-१ से १२२७-२८ तक श्य नृसिंह देव १११२ मे उनका शासन समाप्त हो गया। उत्कलके सिंहासन पर सुशोभित हुये। वे १म __शक १११२ मे ११२० पर्यन्त २य अमिया-भीम | भामुदेवके चौरस और चालक्य-वंशीय जाकज्ञा देवीके वा अनभीमदेवने राज्य किया था। ये घोड़ गर्भसे सम्भूत थे। उपाधि वीरनृसिंहदेव, वीरथी गङ्गके पुत्र और २य राजराजके भ्राता रहे। गोविन्द अथवा श्रीवीरसिंह देव, प्रतापौर श्रीनृसिंहदेव, नामक इनके एक महाबलं बाण मन्त्री थे। श्य वीरश्री. वा. श्रीवोरनरनारसिंहदेव और प्रमन्तवर्म <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> राज्य राजराजके श्यालक स्वप्नश्वरदेवने महेश्वरका मन्दिर बनवाया था। शक ११२० में ३य राजराज उत्कलके नरेश हुये। ये अनियङ्कभीमदेवके औरस और रानी बाघल्ला देवीके गर्भ से उपजे थे। इनका उपाधि नाम राजेन्द्र था। राजराजके सिंहासनारूढ होते ही मुहम्मद बख्तियारके दो सेनापति मुहम्मद शेरान् और अहमद शेरान् उड़ीसे पर चढ़े, किन्तु अपने प्रभुके वध का समाचार पा लौट पड़े। ३य राजराजने शक ११३३ तक राज्यका सुख उठाया था। शक ११३३ से ११६० तक ३य अनङ्गभीमदेवने शासन चलाया। वे ३य राजराजके औरस और चालुक्यवंशीया सदगुणा वा मङ्कणा देवी के गर्भ से उत्पन्न हुये थे। विकलिङ्गनाथ उपाधि रहा। उनके ब्राह्मण-मन्त्री विष्णु तुम्माणो पृथिवीपति और यवनोंसे लड़े थे। शक १९६० को १म नृसिंहदेवने राज्य पाया । ये पनङ्गभीमदेवके औरस और <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 3vywfpgt3g60qnb8a9ukgq3bsl8u5h9 666560 666559 2026-07-10T02:34:48Z अँजली चौधरी 2439 666560 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१९८'''|'''उत्कल (उड़ीसा)'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> प्रसिद्ध और शक्तिशाली थे। इन्होंने उत्कलका राज्यदबा बङ्गदेशको भी जीत लिया। सदुर्ग अनमया नगर छीन चोड़गङ्ग ने मन्दार-नरेशको मार भगाया था। सम्भवतः आईन-अकबरीमें जिस स्थानका माम ‘सरकार मन्दारन’ लिखा है, वही मन्दार प्रान्त रहा। आज कल इसे भीतरगढ़ या भीटागढ़ कहते हैं। चोड़गङ्गने अपना राज्य गङ्गाके उत्तरसे गोदावरीके दक्षिण तक बढ़ा लिया था। किन्तु चेदी-शिलालेखके अनुसार रत्नदेव राजाने इन्हें नीचा दिखाया। ये बड़े धार्मिक थे। इन्हीं को आज्ञासे पुरीमें जगन्नाथ देवका मन्दिर बना। चोड़गङ्गके के समय विज्ञान और साहित्यको भी अच्छी उन्नति हुई। संस्कृत और तेलगु भाषा का प्रचार अधिक था। शक १०२१ में शतानन्द ने भास्वती नामक ज्योतिष सम्बन्धीय ग्रन्थ लिखा। कोई ९० वर्षके वयसमें इन्होंने ७२ वत्सर राज्य कर इहलोक छोड़ा था। आज भी चोड़गङ्गके नामका परिचय पुरीके चुडङ्गसाही महले, कटक नगरसे दक्षिणपश्चिम तीन कास चुड़ङ्गपुखरी तालाब, सारङ्गगढ किले और कटक जिलेके याजपुर नगरमें मिल सकता है। शक १०६९में कामार्णवने सिंहासन पर बैठ १०७८ तक राजत्व किया। ये चोड़गङ्गके औरस और कस्तूरिकामीदिनीके गर्भसे उत्पन्न हुये थे। उपाधिरूपसे कामार्णवकी लोग कामार्णव देव, अनन्त मधु-कामार्णवदेव और अनन्तदेव भी कहते रहे। शक १०७८ से १०९४ तक राघव राजा बने। उन्होंने चोडगङ्गके औरस और रविकुलकी इन्दिराके गर्भसे जन्म लिया था। शक १०९२ को २य राजराज राजा हुये। ये चोड़गङ्ग के औरम और चन्द्र लेखाके गर्भसे उपजे थे। इनका औपाधि नाम अनन्तवर्मदेव रहा। शक १११२ मे उनका शासन समाप्त हो गया। शक १११२ मे ११२० पर्यन्त २य अमियङ्क-भीमवा अनङ्गभीमदेवने राज्य किया था। ये चोड़ गङ्गके पुत्र और २य राजराजके भ्राता रहे। गोविन्द नामक इनके एक महाबलं ब्राह्मण मन्त्री थे। २य <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> राजराजके श्यालक स्वप्नश्वरदेवने महेश्वरका मन्दिर बनवाया था। शक ११२० में ३य राजराज उत्कलके नरेश हुये। ये अनियङ्कभीमदेवके औरस और रानी बाघल्ला देवीके गर्भ से उपजे थे। इनका उपाधि नाम राजेन्द्र था। राजराजके सिंहासनारूढ होते ही मुहम्मद बख्तियारके दो सेनापति मुहम्मद शेरान् और अहमद शेरान् उड़ीसे पर चढ़े, किन्तु अपने प्रभुके वध का समाचार पा लौट पड़े। ३य राजराजने शक ११३३ तक राज्यका सुख उठाया था। शक ११३३ से ११६० तक ३य अनङ्गभीमदेवने शासन चलाया। वे ३य राजराजके औरस और चालुक्यवंशीया सदगुणा वा मङ्कणा देवी के गर्भ से उत्पन्न हुये थे। विकलिङ्गनाथ उपाधि रहा। उनके ब्राह्मण-मन्त्री विष्णु तुम्माणो पृथिवीपति और यवनोंसे लड़े थे। शक १९६० को १म नृसिंहदेवने राज्य पाया। ये अनङ्गभीमदेवके औरस और कस्तू रादेवीके गर्भसे उत्पन्न हुये थे। १म नृसिंह देवने राढ़ और वारेन्द्र पर आक्रमण कर यवना को हराया। कोणार्कका बड़ा मन्दिर उन्हों के आदेश से बना था। फिर कोणाकोण वा कोणार्कवाले सूर्या-लय के भी वेहो निर्माता रहे। १म नृसिंह देवको सभामें रहनेवाले पण्डित विद्याधरने एकावली नामक अलङ्कारका एक ग्रन्थ लिखा था। शक ११८६में उनके शासनका अन्त हुआ। ११८६ से १२००-१ तक १म भानुदेवने राजत्व किया। वे १म नृसिंहदेवके औरस और माल-चन्द्रकी कन्या सीतादेवीके गर्भसे उत्पन्न हुये थे। १म भानुदेवने श्रोत्रिय ब्राह्मणों को भूमि तथा गृह समर्पण कर सैकड़ों दानपत्र लिखे थे। शक १२००-१ से १२२७-२८ तक २य नृसिंह देव उत्कलके सिंहासन पर सुशोभित हुये। वे १म भामुदेवके औरस और चालक्य-वंशीय जाकल्ला देवीके गर्भसे सम्भूत थे। उपाधि वीरनृसिंहदेव, वीरश्री अथवा श्रीवीरनृसिंह देव, प्रतापवीर श्रीनृसिंहदेव, वीरश्री वा श्रीवीरनरनारसिंहदेव और अनन्तवर्म <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 7se1iz20an1t468a30u2c5bat3zbj8m पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८० 250 75959 666567 609076 2026-07-10T05:47:19Z अनुश्री साव 80 666567 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उद्वेजनीय-उधेड़ना|२७९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} उद्ध जनोय- उधेड़ना ५ पश्चात्ताप, पछताव। (वि०) उधम, ऊधम देखो। ४ कष्ट, तकलीफ। ६ भयप्रदर्शक, डरावना | " स्थानप्राप्तिविहीना हि गीतवत् कुलकन्यका। " उद्दे जो परस्यापि श्रयमायेव कर्णयोः ॥” (कथासरित्सागर २४ २५ ) उ अनीय (०) भयप्रदर्शक चंदा देनेवाला। उचित (सवि०) छत्-विविचलि अफ़सुर्दा । २ भयाकुल, घबराया हुआ । उदि (संच) उतादि यत्र उस वेदियुक्त, क'ची वेदोवाला। उदय (सं० त्रि) वायुके साथ मिश्रणयोग, जी हवामें मिलाया जा सकता हो । उद्दल (सं० त्रि०) उत्क्रान्तो वेलायाम्, अत्या० समा० । १ अपने तौरका प्लांवित करनेवाला, जो अपना किनारा डुबा रहा हो । २ सीमातिक्रान्त, हदको लांच जानेवाला २ कुलातिक्रान्त, अपने खान्दानकी हद छोड़ देनेवाला । “समयोह लजलराशिजलैः ।” (कथासरित्०) उसित देखी। उद्देष्ट (सं० पु०) १ चतुर्दिकनं घेराई २ नगर- वेष्टन, शहरको घेर लेने का काम । उएम (स० को०) उत्-लुट् १ हस्तपादशा श्रवेष्टन, हाथपैर को बंधाई । २ उन्मोचन, खोलाई । ३ श्रालिङ्गन, हमागोशी, लिपटाई । " ह्रदयो टन' तन्द्रा लालानुतिररोचक: ।" ( सुश्रुत ) २७९ उधर (हिं० क्रि०वि०) सब वहां उस पोर उधरना (हिं० क्रि०) १ उद्धार होना, छूटना । २ उद्दार उधरसे शिव०) उस चोर या त करना, छोड़ना । ३ उघड़ना, अलग-अलग हो जाना । ( १ तर्फ से । उधराना (हिं० क्रि०) १ वायुसे इतस्ततः होना, हवा में उड़कर बिखर जाना । २ मदोन्मत्त होना, झगड़ा लगाना । उधलना (हिं० क्रि०) १ कामातुर होना, मस्त पड़ना । "धी न बेटी उधल गई समधे टो।" ( लोकोक्ति ) २ अन्य पुरुष के साथ पलायमान होना, दूसरे सदको लेकर भागना । ३ नष्ट होना, बिगड़ना । उधली ( हिं० स्त्रो० ) कामासक्त, छिनाल, बिगड़ी औरत । "लो वह वलें सांप देखाये ।” ( लोकोक्ति ) उधाड़ (हिं० पु० ) उखाड़, कुश्तीका एक पेंच । इसमें एक पहलवान दूसरेको लंगोटा पकड़ कर उठाता और भूमिपर गिराता है। उवार (हिं० पु० ) १ ऋप कर्ज़ । “नौ नकद न तेरह उधार ।” ( लोकोक्ति ) २ दैन, मंगनी । ३ उद्धार, नजात । उधारक (हिं०) उद्धारक देखो। उधारना (हिं० क्रि०) उद्दार करना, छोड़ना । उद्दष्टनीय ( सं ं० नि० ) उन्मोचनयोग्य, खोल देनेके उधारो ( हिं०वि०) उद्धार करनेवाला, जो निजात देता हो । कामिल उद्देष्टित (सं० त्रि०) चतुर्दिक् चाहत, चारो ओरसे उघुनाला – बङ्गाल प्रान्त के सन्तालपरगने का एक पुराना घिरा हुआ । । उड़ (सं० पु० ) उत्-वच्-टच् वर, घोडर, दूल्हा । "उद्दापि भवेत् पापी सौंसर्गात् कुलनायिके । वेश्यागमनज' पाप' तस्य पुसी दिने दिने ॥" ( महानिर्वाणतन्त्र ) उधः (सं० क्ली० ) वह प्रापणे, उन्द क्लेदने वा असुन् । अपोन, स्तन, बाख, चायन । उधड़ना (हिं० क्रि० ) १ अपावृत होना, उचड़ जाना । २ उदघाटित होना, खुलना । ३ निस्त्वचीतभूत होना, खाल खिंचना 8 ताड़ित होना, वेत पड़ना . ५ उन्मुक्त होना, छूट जाना। ६ नष्ट होना, बर- बादमें पड़ना। नाला और गांव। यह राजमहल से दक्षिण 4 मोल " उ० और द्राधि० ८७ ५३ १५” अक्षा• २४० ४८ ३० पू०पर अवस्थित है । १७६३ ई० में मेजर अदम्सने यहां नवाब मोरकासिमको फौज हरायी थी। गड़- खाइयोंका ध्वंसावशेष आज भी विद्यमान है। गल नालेपर जो बढ़िया पुल बनाया, उसे गङ्गाको धारने आगे बढ़कर बहाया है । उधेड़ना (हिं० क्रि०) १ पृथक् पृथक् करना, खोलना । २ अपाहत करना, उचाड़ना । २ ग्रथित करना, 8 तोड़ना ! ५ विजय करना, जीतना । 4 इतस्ततः फेंकना, बिखराना। उलझाना । ४ ! ७ निर्धन करना,<noinclude></noinclude> ild8vo1triewff9oq2au8itnpn4hjz5 666569 666567 2026-07-10T06:17:52Z अनुश्री साव 80 666569 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उद्वेजनीय-उधेड़ना|२७९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>४ कष्ट, तकलीफ़। ५ पश्चात्ताप, पछतावा। (त्रि॰) ६ भयप्रदर्शक, डरावना।<br> {{block center|<poem><small> "खानप्राप्तिविहीना हि गीतवत् कुलकन्यका। उद्वेजनो परस्यापि श्रूमाणैव कर्णयो:॥" (कथासरित्सागर २४।२५)</small></poem>}} <br>उद्वेजनीय* (सं॰ त्रि॰) भयप्रदर्शक, कांपा देनेवाला।<br> <br>उद्वेजित (सं॰ त्रि॰) उत्-विज्-णिच्-क्त। १ क्लेशित, अफ़सुर्दा। २ भयाकुल, घबराया हुआ।<br> <br>उद्वेदि (सं॰ त्रि॰) उन्नता वेदी यत्र। उन्नत वेदियुक्त, ऊँची वेदीवाला।<br> <br>उद्वेय (सं॰ त्रि॰) वायुके साथ मिश्रणयोग्य, जो हवामें मिलाया जा सकता हो।<br> <br>उद्देल (सं॰ त्रि॰) उत्क्रान्तो वेलायाम्, अल्य॰ समा॰। १ अपने तीरका प्लावित करनेवाला, जो अपना किनारा डुबा रहा हो। २ सीमातिक्रान्त, हदको लांघ जानेवाला। ३ कुलातिक्रान्त, अपने खानदानकी हद छोड़ देनेवाला। <small>"असमयोहेलजलराशिजलै:।" (कथासरित्॰)</small> <br>उद्देलित, <small>उद्देल देखो।</small> <br>उद्देष्ट (सं॰ पु॰) १ चतुर्दिक् वेष्टन, घेराई। २ नगर-वेष्टन, शहरको घेर लेनेका काम।<br> *उद्देष्टन* (सं॰ क्ली॰) उद्-वेष्ट-ल्युट् । १ हस्तपादका आवेष्टन, हाथ-पैरोंको बंधाई । २ उन्मोचन, खोलाई । ३ आलिङ्गन, हमागोशी, लिपटाई । “इद्योष्टन’ तन्त्रा लालासुतिरीरचकः ।” (सुश्रुत) *उद्देष्टनीय* (सं॰ त्रि॰) उन्मोचनयोग्य, खोल देनेके क़ाबिल । *उद्देष्टित* (सं॰ त्रि॰) चतुर्दिक् आवृत, चारो ओरसे घिरा हुआ । *उद्दोह* (सं॰ पु॰) उद्-वह्-घञ् । वर, जौहर, दूध । "उद्दोहापि भवेत् पापी संचारात् कुलनाशकि । वेध्यामनजं' पापं तस्य पुंचो दिने दिने॥" (महानिर्वाणतन्त्र) *उधः* (सं॰ क्ली॰) वद्ध प्रापणे। उद्ध खेदने वा अस्त्रु । पापीन, स्तन, बाख, थायन । *उधड़ना (हिं॰ क्रि॰)* 1. *उपावृत होना, उचड़ जाना।* 2. *उद्घाटित होना, खुलना।* 3. *निश्चेतनभूत होना, खाल खिंचना।* 4. *ताड़ित होना, बेत पड़ना।* 5. *उन्मुक्त होना, छूट जाना।* 6. *नष्ट होना, बरबादी में पड़ना।* उद्ध जनोय- उधेड़ना ५ पश्चात्ताप, पछताव। (वि०) उधम, ऊधम देखो। ४ कष्ट, तकलीफ। ६ भयप्रदर्शक, डरावना | " स्थानप्राप्तिविहीना हि गीतवत् कुलकन्यका। " उद्दे जो परस्यापि श्रयमायेव कर्णयोः ॥” (कथासरित्सागर २४ २५ ) उ अनीय (०) भयप्रदर्शक चंदा देनेवाला। उचित (सवि०) छत्-विविचलि अफ़सुर्दा । २ भयाकुल, घबराया हुआ । उदि (संच) उतादि यत्र उस वेदियुक्त, क'ची वेदोवाला। उदय (सं० त्रि) वायुके साथ मिश्रणयोग, जी हवामें मिलाया जा सकता हो । उद्दल (सं० त्रि०) उत्क्रान्तो वेलायाम्, अत्या० समा० । १ अपने तौरका प्लांवित करनेवाला, जो अपना किनारा डुबा रहा हो । २ सीमातिक्रान्त, हदको लांच जानेवाला २ कुलातिक्रान्त, अपने खान्दानकी हद छोड़ देनेवाला । “समयोह लजलराशिजलैः ।” (कथासरित्०) उसित देखी। उद्देष्ट (सं० पु०) १ चतुर्दिकनं घेराई २ नगर- वेष्टन, शहरको घेर लेने का काम । उएम (स० को०) उत्-लुट् १ हस्तपादशा श्रवेष्टन, हाथपैर को बंधाई । २ उन्मोचन, खोलाई । ३ श्रालिङ्गन, हमागोशी, लिपटाई । " ह्रदयो टन' तन्द्रा लालानुतिररोचक: ।" ( सुश्रुत ) २७९ उधर (हिं० क्रि०वि०) सब वहां उस पोर उधरना (हिं० क्रि०) १ उद्धार होना, छूटना । २ उद्दार उधरसे शिव०) उस चोर या त करना, छोड़ना । ३ उघड़ना, अलग-अलग हो जाना । ( १ तर्फ से । उधराना (हिं० क्रि०) १ वायुसे इतस्ततः होना, हवा में उड़कर बिखर जाना । २ मदोन्मत्त होना, झगड़ा लगाना । उधलना (हिं० क्रि०) १ कामातुर होना, मस्त पड़ना । "धी न बेटी उधल गई समधे टो।" ( लोकोक्ति ) २ अन्य पुरुष के साथ पलायमान होना, दूसरे सदको लेकर भागना । ३ नष्ट होना, बिगड़ना । उधली ( हिं० स्त्रो० ) कामासक्त, छिनाल, बिगड़ी औरत । "लो वह वलें सांप देखाये ।” ( लोकोक्ति ) उधाड़ (हिं० पु० ) उखाड़, कुश्तीका एक पेंच । इसमें एक पहलवान दूसरेको लंगोटा पकड़ कर उठाता और भूमिपर गिराता है। उवार (हिं० पु० ) १ ऋप कर्ज़ । “नौ नकद न 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लेने का काम । उएम (स० को०) उत्-लुट् १ हस्तपादशा श्रवेष्टन, हाथपैर को बंधाई । २ उन्मोचन, खोलाई । ३ श्रालिङ्गन, हमागोशी, लिपटाई । " ह्रदयो टन' तन्द्रा लालानुतिररोचक: ।" ( सुश्रुत ) २७९ उधर (हिं० क्रि०वि०) सब वहां उस पोर उधरना (हिं० क्रि०) १ उद्धार होना, छूटना । २ उद्दार उधरसे शिव०) उस चोर या त करना, छोड़ना । ३ उघड़ना, अलग-अलग हो जाना । ( १ तर्फ से । उधराना (हिं० क्रि०) १ वायुसे इतस्ततः होना, हवा में उड़कर बिखर जाना । २ मदोन्मत्त होना, झगड़ा लगाना । उधलना (हिं० क्रि०) १ कामातुर होना, मस्त पड़ना । "धी न बेटी उधल गई समधे टो।" ( लोकोक्ति ) २ अन्य पुरुष के साथ पलायमान होना, दूसरे सदको लेकर भागना । ३ नष्ट होना, बिगड़ना । उधली ( हिं० स्त्रो० ) कामासक्त, छिनाल, बिगड़ी औरत । "लो वह वलें सांप देखाये ।” ( लोकोक्ति ) उधाड़ (हिं० पु० ) उखाड़, कुश्तीका एक पेंच । इसमें एक पहलवान दूसरेको लंगोटा पकड़ कर उठाता और भूमिपर गिराता है। उवार (हिं० पु० ) १ ऋप कर्ज़ । “नौ नकद न तेरह उधार ।” ( लोकोक्ति ) २ दैन, मंगनी । ३ उद्धार, नजात । उधारक (हिं०) उद्धारक देखो। उधारना (हिं० क्रि०) उद्दार करना, छोड़ना । उद्दष्टनीय ( सं ं० नि० ) उन्मोचनयोग्य, खोल देनेके उधारो ( हिं०वि०) उद्धार करनेवाला, जो निजात देता हो । कामिल उद्देष्टित (सं० त्रि०) चतुर्दिक् चाहत, चारो ओरसे उघुनाला – बङ्गाल प्रान्त के सन्तालपरगने का एक पुराना घिरा हुआ । । उड़ (सं० पु० ) उत्-वच्-टच् वर, घोडर, दूल्हा । "उद्दापि भवेत् पापी सौंसर्गात् कुलनायिके । वेश्यागमनज' पाप' तस्य पुसी दिने दिने ॥" ( महानिर्वाणतन्त्र ) उधः (सं० क्ली० ) वह प्रापणे, उन्द क्लेदने वा असुन् । अपोन, स्तन, बाख, चायन । उधड़ना (हिं० क्रि० ) १ अपावृत होना, उचड़ जाना । २ उदघाटित होना, खुलना । ३ निस्त्वचीतभूत होना, खाल खिंचना 8 ताड़ित होना, वेत पड़ना . ५ उन्मुक्त होना, छूट जाना। ६ नष्ट होना, बर- बादमें पड़ना। नाला और गांव। यह राजमहल से दक्षिण 4 मोल " उ० और द्राधि० ८७ ५३ १५” अक्षा• २४० ४८ ३० पू०पर अवस्थित है । १७६३ ई० में मेजर अदम्सने यहां नवाब मोरकासिमको फौज हरायी थी। गड़- खाइयोंका ध्वंसावशेष आज भी विद्यमान है। गल नालेपर जो बढ़िया पुल बनाया, उसे गङ्गाको धारने आगे बढ़कर बहाया है । उधेड़ना (हिं० क्रि०) १ पृथक् पृथक् करना, खोलना । २ अपाहत करना, उचाड़ना । २ ग्रथित करना, 8 तोड़ना ! ५ विजय करना, जीतना । 4 इतस्ततः फेंकना, बिखराना। उलझाना । ४ ! ७ निर्धन करना,<noinclude></noinclude> 7t06tptkne0b8fj9yaz503pil5a0xu7 666571 666570 2026-07-10T06:47:04Z अनुश्री साव 80 666571 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उद्वेजनीय-उधेड़ना|२७९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>४ कष्ट, तकलीफ़। ५ पश्चात्ताप, पछतावा। (त्रि॰) ६ भयप्रदर्शक, डरावना।<br> {{block center|<poem><small> "खानप्राप्तिविहीना हि गीतवत् कुलकन्यका। उद्वेजनो परस्यापि श्रूमाणैव कर्णयो:॥" (कथासरित्सागर २४।२५)</small></poem>}} <br>उद्वेजनीय* (सं॰ त्रि॰) भयप्रदर्शक, कांपा देनेवाला।<br> <br>उद्वेजित (सं॰ त्रि॰) उत्-विज्-णिच्-क्त। १ क्लेशित, अफ़सुर्दा। २ भयाकुल, घबराया हुआ।<br> <br>उद्वेदि (सं॰ त्रि॰) उन्नता वेदी यत्र। उन्नत वेदियुक्त, ऊँची वेदीवाला।<br> <br>उद्वेय (सं॰ त्रि॰) वायुके साथ मिश्रणयोग्य, जो हवामें मिलाया जा सकता हो।<br> <br>उद्देल (सं॰ त्रि॰) उत्क्रान्तो वेलायाम्, अल्य॰ समा॰। १ अपने तीरका प्लावित करनेवाला, जो अपना किनारा डुबा रहा हो। २ सीमातिक्रान्त, हदको लांघ जानेवाला। ३ कुलातिक्रान्त, अपने खानदानकी हद छोड़ देनेवाला। <small>"असमयोहेलजलराशिजलै:।" (कथासरित्॰)</small> <br>उद्देलित, <small>उद्देल देखो।</small> <br>उद्देष्ट (सं॰ पु॰) १ चतुर्दिक् वेष्टन, घेराई। २ नगर-वेष्टन, शहरको घेर लेनेका काम।<br> <br>उद्देष्टन (सं॰ क्ली॰) उद्-वेष्ट-ल्युट् । १ हस्तपादका आवेष्टन, हाथ-पैरोंको बंधाई । २ उन्मोचन, खोलाई । ३ आलिङ्गन, हमागोशी, लिपटाई। {{block center|<poem><small> "हृदयोहेष्टन' तन्त्रा लालाश्रुतिरीरचकः।" (सुश्रुत)</poem></small>}} <br>उद्देष्टनीय (सं॰ त्रि॰) उन्मोचनयोग्य, खोल देनेके क़ाबिल।<br> <br>उद्देष्टित* (सं॰ त्रि॰) चतुर्दिक् आवृत, चारो ओरसे घिरा हुआ।<br> <br>उद्दोढ़ (सं॰ पु॰) उद्-वह्-घञ्। वर, जौहर, दूध।<br> {{block center|<poem><small> "उद्दोढ़ापि भवेत् पापौ संसर्गात् कुलनायिके। वेश्यागमनजं पापं तस्य पुंसो दिने दिने॥" (महानिर्वाणतन्त्र)</small></poem>}} <br>उधः (सं॰ क्ली॰) वद्ध प्रापणे। उद्ध खेदने वा असुन्। आपीन, स्तन, बाख, आयन।<br> <br>उधड़ना (हिं॰ क्रि॰) १ उपावृत होना, उचड़ जाना। २ उद्घाटित होना, खुलना। ३ निश्चेतनभूत होना, खाल खिंचना। ४ ताड़ित होना, बेत पड़ना। ५ उन्मुक्त होना, छूट जाना। ६ नष्ट होना, बरबादी में पड़ना।<br> {{Multicol-break}} उद्ध जनोय- उधेड़ना ५ पश्चात्ताप, पछताव। (वि०) उधम, ऊधम देखो। ४ कष्ट, तकलीफ। ६ भयप्रदर्शक, डरावना | " स्थानप्राप्तिविहीना हि गीतवत् कुलकन्यका। " उद्दे जो परस्यापि श्रयमायेव कर्णयोः ॥” (कथासरित्सागर २४ २५ ) उ अनीय (०) भयप्रदर्शक चंदा देनेवाला। उचित (सवि०) छत्-विविचलि अफ़सुर्दा । २ भयाकुल, घबराया हुआ । उदि (संच) उतादि यत्र उस वेदियुक्त, क'ची वेदोवाला। उदय (सं० त्रि) वायुके साथ मिश्रणयोग, जी हवामें मिलाया जा सकता हो । उद्दल (सं० त्रि०) उत्क्रान्तो वेलायाम्, अत्या० समा० । १ अपने तौरका प्लांवित करनेवाला, जो अपना किनारा डुबा रहा हो । २ सीमातिक्रान्त, हदको लांच जानेवाला २ कुलातिक्रान्त, अपने खान्दानकी हद छोड़ देनेवाला । “समयोह लजलराशिजलैः ।” (कथासरित्०) उसित देखी। उद्देष्ट (सं० पु०) १ चतुर्दिकनं घेराई २ नगर- वेष्टन, शहरको घेर लेने का काम । उएम (स० को०) उत्-लुट् १ हस्तपादशा श्रवेष्टन, हाथपैर को बंधाई । २ उन्मोचन, खोलाई । ३ श्रालिङ्गन, हमागोशी, लिपटाई । " ह्रदयो टन' तन्द्रा लालानुतिररोचक: ।" ( सुश्रुत ) २७९ उधर (हिं० क्रि०वि०) सब वहां उस पोर उधरना (हिं० क्रि०) १ उद्धार होना, छूटना । २ उद्दार उधरसे शिव०) उस चोर या त करना, छोड़ना । ३ उघड़ना, अलग-अलग हो जाना । ( १ तर्फ से । उधराना (हिं० क्रि०) १ वायुसे इतस्ततः होना, हवा में उड़कर बिखर जाना । २ मदोन्मत्त होना, झगड़ा लगाना । उधलना (हिं० क्रि०) १ कामातुर होना, मस्त पड़ना । "धी न बेटी उधल गई समधे टो।" ( लोकोक्ति ) २ अन्य पुरुष के साथ पलायमान होना, दूसरे सदको लेकर भागना । ३ नष्ट होना, बिगड़ना । उधली ( हिं० स्त्रो० ) कामासक्त, छिनाल, बिगड़ी औरत । "लो वह वलें सांप देखाये ।” ( लोकोक्ति ) उधाड़ (हिं० पु० ) उखाड़, कुश्तीका एक पेंच । इसमें एक पहलवान दूसरेको लंगोटा पकड़ कर उठाता और भूमिपर गिराता है। उवार (हिं० पु० ) १ ऋप कर्ज़ । “नौ नकद न तेरह उधार ।” ( लोकोक्ति ) २ दैन, मंगनी । ३ उद्धार, नजात । उधारक (हिं०) उद्धारक देखो। उधारना (हिं० क्रि०) उद्दार करना, छोड़ना । उद्दष्टनीय ( सं ं० नि० ) उन्मोचनयोग्य, खोल देनेके उधारो ( हिं०वि०) उद्धार करनेवाला, जो निजात देता हो । कामिल उद्देष्टित (सं० त्रि०) चतुर्दिक् चाहत, चारो ओरसे उघुनाला – बङ्गाल प्रान्त के सन्तालपरगने का एक पुराना घिरा हुआ । । उड़ (सं० पु० ) उत्-वच्-टच् वर, घोडर, दूल्हा । "उद्दापि भवेत् पापी सौंसर्गात् कुलनायिके । वेश्यागमनज' पाप' तस्य पुसी दिने दिने ॥" ( महानिर्वाणतन्त्र ) उधः (सं० क्ली० ) वह प्रापणे, उन्द क्लेदने वा असुन् । अपोन, स्तन, बाख, चायन । उधड़ना (हिं० क्रि० ) १ अपावृत होना, उचड़ जाना । २ उदघाटित होना, खुलना । ३ निस्त्वचीतभूत होना, खाल खिंचना 8 ताड़ित होना, वेत पड़ना . ५ उन्मुक्त होना, छूट जाना। ६ नष्ट होना, बर- बादमें पड़ना। नाला और गांव। यह राजमहल से दक्षिण 4 मोल " उ० और द्राधि० ८७ ५३ १५” अक्षा• २४० ४८ ३० पू०पर अवस्थित है । १७६३ ई० में मेजर अदम्सने यहां नवाब मोरकासिमको फौज हरायी थी। गड़- खाइयोंका ध्वंसावशेष आज भी विद्यमान है। गल नालेपर जो बढ़िया पुल बनाया, उसे गङ्गाको धारने आगे बढ़कर बहाया है । उधेड़ना (हिं० क्रि०) १ पृथक् पृथक् करना, खोलना । २ अपाहत करना, उचाड़ना । २ ग्रथित करना, 8 तोड़ना ! ५ विजय करना, जीतना । 4 इतस्ततः फेंकना, बिखराना। उलझाना । ४ ! ७ निर्धन करना,<noinclude></noinclude> skcxht0ke4c3ioa6imnw2ltnt8nennm 666574 666571 2026-07-10T07:34:24Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 666574 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उद्वेजनीय-उधेड़ना|२७९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} <br>४ कष्ट, तकलीफ़। ५ पश्चात्ताप, पछतावा। (त्रि॰) ६ भयप्रदर्शक, डरावना।<br> {{block center|<poem><small> "खानप्राप्तिविहीना हि गीतवत् कुलकन्यका। उद्वेजनो परस्यापि श्रूमाणैव कर्णयो:॥" (कथासरित्सागर २४।२५)</small></poem>}} <br>उद्वेजनीय* (सं॰ त्रि॰) भयप्रदर्शक, कांपा देनेवाला।<br> <br>उद्वेजित (सं॰ त्रि॰) उत्-विज्-णिच्-क्त। १ क्लेशित, अफ़सुर्दा। २ भयाकुल, घबराया हुआ।<br> <br>उद्वेदि (सं॰ त्रि॰) उन्नता वेदी यत्र। उन्नत वेदियुक्त, ऊँची वेदीवाला।<br> <br>उद्वेय (सं॰ त्रि॰) वायुके साथ मिश्रणयोग्य, जो हवामें मिलाया जा सकता हो।<br> <br>उद्देल (सं॰ त्रि॰) उत्क्रान्तो वेलायाम्, अल्य॰ समा॰। १ अपने तीरका प्लावित करनेवाला, जो अपना किनारा डुबा रहा हो। २ सीमातिक्रान्त, हदको लांघ जानेवाला। ३ कुलातिक्रान्त, अपने खानदानकी हद छोड़ देनेवाला। <small>"असमयोहेलजलराशिजलै:।" (कथासरित्॰)</small> <br>उद्देलित, <small>उद्देल देखो।</small> <br>उद्देष्ट (सं॰ पु॰) १ चतुर्दिक् वेष्टन, घेराई। २ नगर-वेष्टन, शहरको घेर लेनेका काम।<br> <br>उद्देष्टन (सं॰ क्ली॰) उद्-वेष्ट-ल्युट् । १ हस्तपादका आवेष्टन, हाथ-पैरोंको बंधाई । २ उन्मोचन, खोलाई । ३ आलिङ्गन, हमागोशी, लिपटाई। {{block center|<poem><small> "हृदयोहेष्टन' तन्त्रा लालाश्रुतिरीरचकः।" (सुश्रुत)</poem></small>}} <br>उद्देष्टनीय (सं॰ त्रि॰) उन्मोचनयोग्य, खोल देनेके क़ाबिल।<br> <br>उद्देष्टित* (सं॰ त्रि॰) चतुर्दिक् आवृत, चारो ओरसे घिरा हुआ।<br> <br>उद्दोढ़ (सं॰ पु॰) उद्-वह्-घञ्। वर, जौहर, दूध।<br> {{block center|<poem><small> "उद्दोढ़ापि भवेत् पापौ संसर्गात् कुलनायिके। वेश्यागमनजं पापं तस्य पुंसो दिने दिने॥" (महानिर्वाणतन्त्र)</small></poem>}} <br>उधः (सं॰ क्ली॰) वद्ध प्रापणे। उद्ध खेदने वा असुन्। आपीन, स्तन, बाख, आयन।<br> <br>उधड़ना (हिं॰ क्रि॰) १ उपावृत होना, उचड़ जाना। २ उद्घाटित होना, खुलना। ३ निश्चेतनभूत होना, खाल खिंचना। ४ ताड़ित होना, बेत पड़ना। ५ उन्मुक्त होना, छूट जाना। ६ नष्ट होना, बरबादी में पड़ना।<br> {{Multicol-break}} <br>उधम, ऊधम देखो।<br> <br>उधर (हिं॰ क्रि॰ वि॰) तव, वहाँ, उस ओर।<br> <br>उधरना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्धार होना, छूटना। २ उद्धार करना, छोड़ना। ३ उघड़ना, अलग-अलग हो जाना।<br> <br>उधर से (हिं॰ क्रि ॰वि॰) उस ओर या तर्फ से।<br> <br>उधराना (हिं॰ क्रि॰) १ वायु से इतस्ततः होना, इधर-उधर उड़कर बिखर जाना। २ मदोन्मत्त होना, झगड़ा म लगाना।<br> <br>उधलना (हिं॰ क्रि॰) १ कामातुर होना, मस्त पड़ना। <small>"धं न बेटी उधल गई समधेटो।"(लोकोक्ति)</small> २ अन्य पुरुष के साथ पलायमान होना, दूसरे सर्द को लेकर भागना। ३ नष्ट होना, बिगड़ना।<br> <br>उधली (हिं॰ स्त्री॰) कामासक्त, छिनाल, बिगड़ी औरत। <small>"उधली बई चले सांप देखये" (लोकोक्ति)</small><br> <br>उधाड़ (हिं॰ पु॰) उखाड़, कुश्ती का एक पेंच। इसमें एक पहलवान दूसरे को लंगोटा पकड़ कर उठाता और भूमि पर गिराता है।<br> <br>उधार (हिं॰ पु॰) १ ऋण, कर्ज़।<small>"नौ नकद न तेरह उधार।" (लोकोक्ति)</small> २ देन, मांगनी। ३ उद्धार, निजात।<br> <br>उधारक (हिं॰) <small>उद्धारक देखो।</small><br> <br>उधारना (हिं॰ क्रि॰) उद्धार करना, छुड़ाना।<br> <br>उधारी (हिं॰ वि॰) उद्धार करनेवाला, जो निजात देता हो।<br> <br>उधुनाला—बंगाल प्रान्त के सतगांव परगने का एक पुराना नाला और गांव। यह राजमहल से दक्षिण ६ मील अक्षां॰ २४° ४२′ २०″ उ॰ और द्राघि॰ ८७° ५२′ १५″ पू॰ पर अवस्थित है। १७६३ ई॰ में मेजर एडम्स ने यहां नवाब मीर कासिम की फौज हरायी थी। गढ़-खाइयों के अवशेष आज भी विद्यमान हैं। मुगलों ने नाले पर जो बढ़िया पुल बनाया, उसे गढ़ की धारने आगे बढ़कर बढ़ाया है।<br> <br>उखेड़ना (हिं॰ क्रि॰) १ टुकड़े-टुकड़े करना, खोलना। २ उपावृत करना, उचाड़ना। ३ व्यथित करना, उलझाना। ४ तोड़ना। ५ विजय करना, जीतना। ६ इतस्ततः फेंकना, बिखराना। ७ निर्धन करना।<br> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> f0oub2cqubeywtmfk2x08cudlri64f1 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८१ 250 75960 666577 609077 2026-07-10T11:22:33Z अनुश्री साव 80 666577 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२८०|उधेड़बुन—उनसठ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} २८० ८ ठगना । उधेड़बुन—उनसठ गरीब बनाना । 2. अपमानित करना, गाली देना । १० बेंत लगाना । ११ लज्जित करना, करना, खाना । २ उपाय, शर्म देना । १२ काटना । १३ निर्वाह उधेडमन (खि) चिन्ताफिक तदबीर | उधेरना, उड़ना देखो। व्याकुलता येचेनो दुःख तकलीफ। उद्यान (०) पुठो, ल्हा समान देखो। उमार, नहिं०) १ 'उस'का बहुवचन | उनइस, उनीस देखो। उनका (अ० पु० ) १ पक्षिविशेष, एक अनदेखा पखेरू । (वि०) २ विरल गं रमामूली अनोखा । गुलम्ब प्रान्तके रखागिरि जिलेके - एक योग केवल जल स्वर श्रणो । आजकल इस हो देख पड़ता है। यह सह्याद्रि पर्वत और सागर तटके समीप रहता है। घोष ऋतु स्वर दत ग्रीष्म ऋतु में स्वर दल- दलोंके पास घाते और घण्टों लेट लगाते हैं। -a उनकोटरा के काठियावाड़ प्रदेशका एक ग्राम। यह एक बड़ी चटान पर अरबसागर के किनारे बसा है । सोमनाथ पाटन और उनासे निकाले जाने- पर समचकोटरा वानोको प्रसिद्ध राजधानी रहो। यहांके खीमजी वाज एक प्रसिद्ध वीर थे। यह ग्राम मेरी दक्षिण-पथिम सात और भावनगर प्राथ शियालीस मोल दूर है । उनच कोटरे से एक मोल उत्तर मोचकोठरेनें एक कूप है। उसमें एक ही साथ ३२ पुर चल सकते हैं ! - धनश्या काठियावाड़ प्रान्तके जनागढ़को एक त सोख । । धांकरा उपजातिके बाबरिये तालुकदार हैं । पहले उनचया एक पृथक् करद राज्य था । यह जाफराबाद उत्तर-पूर्व दश पोर धन्तरवाड़ी नदी से पूर्व एक मोल पड़ता है। मेराईका बन्दर सिर्फ २ मोल उत्तर है। और अपने सुन्दर जलप्रपात (Lushington falls ) की लिये मशहूर है। उनजा- गुजरात प्रान्त के बड़ोदा राज्यका एक नगर । यह अक्षा० २३° ४८ १० उ० तथा द्राधि० ৩২° २७ पू० पर अवस्थित है। वेका ष्टेशन बना है । यहां राजपूताना मालवा रेल- उनजा अहमदाबादसे उत्तर ५५ पोर सिद्धपुर से दक्षिण ८ मोल पड़ता है। कड़वा कुरमियोंका यह प्रधान खान है। उनत दिया - बड़ोदा राज्यका एक तीर्थस्थान । यह कड़ोके निकट अवस्थित है। यहां महादेवका दर्शन करने पाते हैं। उनतरी - काठियावाड़ प्रान्तके झालावाड़ विभागका एक देशीय राज्य | भूमिका परिमाण ६ वर्गमील है । उनतीस (हिं०वि०) एकोनविंशत, दो दहाई और मी पकाई रखनेवाला, २८ उनदा (हिं० ) उन्निद्र देखो । . उन्नतनगर देखो । २ अनु- उन देलवार- काठियावाड़का एक प्राचीन स्थान | इसका प्राचीन नाम उन्नत नगर है । उनमाथना (छिं क्रि० ) उन्मथन करना, मथ डालना । उनमान (हिं० वि० ) १ सट्टश, बराबर । मान, अन्दाज़ | उनमानना (हिं० क्रि०) अनुमान करना, अन्दाज़ लगाना । उनमूलना (हिं०क्रि०) उम्र लग करना, उखाड़ना। उनमेख, उन्मेष देखो। उनमेद ( हिं० पु० ) फन विशेष किसी किस्म का भाग । यह प्रथम दृष्टिसे उपजता है। इससे मत्स्य मृत्यु को प्राप्त होते हैं । उनरना (हिं० क्रि०) १ उदुगत होना, उठना, चढ़ना । २ प्लवके साथ गमन करना, कूद-कूद चलना । उनवना (हिं० क्रि०) १ उग्रमन करना भुक या लटक पड़ना । २ आच्छादित होना, छा जाना । ३ अकस्मात् आ पड़ना, लग जाना । उनचास (हिं०वि०) एकोनपश्चात् चार दहाई उनवर (हिं. वि०) चव्य, फोफ, जो ब्यादा न हो। चोर मी एकाई रखनेवाला, ४८ उनकली - बम्बई प्रान्तके उत्तर कनाड़ा जिलेका एक उनवान (हिं०) अनुमान देखो। उनसठ (हिं० वि० ) एकोनषष्टि, पांच दहाई और: ग्राम। यह सिहपुर से उत्तर-पश्चिम १२ मील दूर नौ एकाई रखनेवाला, ५८ ।<noinclude></noinclude> 7afp5x95du3wf9zhj1rjbp45yq5j6rf पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५० 250 76181 666528 609391 2026-07-09T16:02:48Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 666528 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कड़क-कड़बड़ा|६४९}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कड़क (सं० ली०) कद्यते अयते, कड़-अच् संज्ञायां कन्। १ कड़कच लवण, समुन्दरी नमक। इसका संस्कृत पर्याय-सामुद्र, विकूट, अक्षीव, वशिर, सामु-ट्रज,सागरज और उदधिसम्भव है । भावप्रकाश मतसे कड़क मधुर, विपाक, वैषत् तिक्त एवं मधुररसयुक्त,गुरु, न अतिशय शीतल तथा न अतिशय उष्ण, अग्निदीपक, भेदक, क्षारयुक्त, अविदाही, कफकारक,वायुनाशक, तीक्षण और अरुक्ष होता है। (हिं० स्त्री०) २ कठोर शब्द, कड़ी आवाज़। ३ अपद, तड़प। ४ वज, बिजलो। ५ अखगति-भेद, घोड़े की एक चाल । ६ रोगविशेष, एक बीमारी। इसमें मूत्र रुक-रुक उतरता और इन्द्रियमें दाई उठने लगता है। ७ पटेबाजीका एक हाथ। इसे खेलाडीके दक्षिण पदयर वाम ओर फटकारते हैं। ८ कठोरता, कड़ापन। ९ पोड़ाविशेष, कसक, दर्द। यह रुक-रुक कर हुआ करती है। कड़कच (सं० लो०) सामुद्रलवण, समुन्दरी नमक। यह लवण सफेद और काला दोप्रकार होता है। बङ्गालके वीरभूम जिलेमें सिवा सफेदक काला नहीं मिलता। कालेको अपेक्षा सफेद कुछ कड़ा-जैसा लगता है। कड़कंच संन्धव लवपकी भांति विशुद्ध रहता है। इससे स्मतिशास्त्र में विधवावोंके भोजनको सैन्धव और सामुद्र दोनों लवण का विधान है। कड़कड़ (हिं० पु०) कठोर शब्दविशेष, एक कड़ी आवाज। दो वस्तुवों के एक दूसरेसे टक्कर खाने या परस्परके आघातसे टूट-फूट जानेके शब्दका नाम 'कड़-कड़' है। कड़कड़ाता (हिं० वि०) १. चटखता हुआ, जो कड़कड़ा रहा हो। २ प्रचण्ड, घोर, तेज, कड़ा। कड़कड़ाना (हिं० क्रि०) १ कठोर शब्द निकालना, बोलना, ज़ोर ज़ोरसे चिल्लाना। २ भङ्ग करना,तोड़ डालना। ३ गर्म करना, ताना । कड़कड़ाहट (हिं० स्त्री०) कठोर शब्द, कड़ी आवाज़। कड़कना (हिं० क्रि०) १ तड़पना, कड़कड़ाना, कड़ी पावाज निकालना।२ चटखना टूटना-फूटना।३ घोर शब्दके साथ डांट बताना, जोर-जोर बोलना। </Small>Vol. III. 163{{gap}}{{gap}} {{Multicol-break}} कड़कनाल (हिं० स्त्री०) एक तोप। इसका मुंह चौडा होता है। यह यत्र को भयभीत करनेके लिये दागो जाती है। कारण इसका शब्द अत्यन्त कठोर और घोर डोना है। कड़कवांका (हिं० पु०) बलवान् नवयुवक, ताकत-वर नौजवान् जिमका गब्द सुनकर लोग कांपनेलगते, उमो युवक को 'कड़ कबांका' कहते हैं। कड़कबिजली (हिं० बी०) १ स्त्रियों का एक अल-झार, औरतोंका एक गहना। यह कानोम पहनी जाती है। इसका दूसरा नाम 'चांदवाला' है। कारण यह चन्द्राकार बनती है। कडका (हिं० पु०) कठोर शब्दविशेष, एक कड़ी आवाज। कड़ाकेका शब्द 'कड़का' कहाता है। कड़खा (हिं० पु०) गतिविशेष, एक नगमा। यह एक प्रकारका युद्धसङ्गीत है। इसमें वोरोंको प्रशंसा भरी रहती है। कड़खा सुन योद्धा उत्तेजित होते हैं। कडखैत (हिं० पु०) १ कड़खा सुनानवाला, जो कडखा गाता हो। २ चारण, बन्दी, भाट । कड़कर, <small>कट्टडर देखो।</small> कडङ्ग (म० पु०) कई मादकताशतिं गमयति जन-यति, कड़-गम-ड। १ सुराविशेष, एक शराब। २ देशविशेष, एक मुल्क। कडकर (सं० पु०) कड़ात भक्षणीयशस्यादेः सका-शात् नियत क्षियत, कड़-ए-खच्, कई भक्षणीय-शस्थादिकं गिरति प्रात्मनः सकाशात्, कड़-ए-पच् वा। वुष, भूसो, पैरा। कड़करीव (वि०) कड़ङ्गर वुष अहति, कड़कर-घन्। बुधभक्षक, भूसी खानवाला। {{Center|<small>"नवारपाकादिकडरौटेरामश्वते जानपदे कथित् ।" ( रघु ६।९ )</Small>}} कड़न (सं० क्लो०) गड्यते सिच्यते जलादिकम्, गड़-मनन् गकारस्य ककारः। <Small>गड़ेरादिश्व कः। उण.६।१०६।</small> पावविशेष, एक बरतन। कड़न्दिका (सं० स्त्रो०) विज्ञान, विद्या, इल्म, वाक-फियत, हिकमत। कड़बड़ा (हिं० वि० ) १ कर्बुरित, कबरा। (पु०)<noinclude></noinclude> cjxojlbbzth0s8n4qlm3pitm0p1x23d पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५१ 250 76186 666536 609392 2026-07-09T16:37:30Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 666536 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६५०|कड़बा-कड़ी|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} २ कर्बुरित श्मश्रुविशिष्ट पुरुष, कबरी दाढ़ीवाला आदमी। कड़बा (हिं० पु० ) गोलाकार ट्रव्यविशेष, एक गोल चोज़। हलके फालपर बांधा जानेवाला अब रोष कड़बा कहाता है। इससे हल भूमिमें अधिक नहीं धंसता। कड़बी (हिं० स्त्री०) मकई और ज्वारके हरे या सूखे वृक्ष। यह काट काट कर पशुवोंको खिलायो जाती है। कड़म्ब (सं० पु०) कडू-अम्बच । <Small>ककदिकडिकठिभ्योऽम्वच । उण् ४।८२।</small> शाकनाडिका,सबज़ीका डण्ठल । २कलम्बौ शाक, नारी। ३ अग्रभाग, अगौरा । ४ कोण,कोना। ५ अङ्कर, कोपल । ६ कदम्ब। ७ वाण, तीर। कड़म्बक (सं० पु०) कड़म्ब स्वार्थ कन्। १ शाक नाडिका, सब्जीका डण्ठल। २ कलम्बिशाक, नाडी। कड़म्बो (सं० स्त्री०) कड़म्बो भूयसा विद्यते ऽस्याः, कड़म्ब-प्रच-डोष । <Small>अर्श प्रादिभ्योऽच । पा ५।२।१२७।</small> कलबी-शाक, नाड़ी, कलमोशाक। कड़वक (सं० पु०) अपच शके निबन्धका अध्याय, विरामसूचक सर्ग। {{Center|<small>"अपध'शनिबन्धोऽअिन् सगाः कविकाभिधाः ॥” ( साहित्यदर्पण) </small>}} कड़वा (हिं) <small>कटु देखी।</small> कड़वी (हिं) <small>कटु शब्द देखी।</small> कड़हन (हिं० पु०) वन्यधान्यभेद, कठधान, जङ्गली चावल। यह मोटा होता है। कड़ा (हिं० पु०) १चड़ाभेद, खड़वा। इसे हाथ या पैरमें पहनते हैं। २चुल्ला, कुण्डा। यह लोहे या दूसरे धातुका बनता है। ३ कपोतभेद, किसी किस्म का कबूतर। (वि०) ४ कठिन, सखत, न दबनेवाला। ५ रुक्ष, रूखा। ६ उग्र, तेज। ७ गाढ़,चुस्त, जो ढीला न हो। ८ नातिसिक्त, जो ज्यादा तर न हो। ८ सबल, मजबूत । १० तीक्ष्ण, खरा। ११ सहनशील, बरदाश्त करनेवाला। १२ दुःसाध्य, मुश्किल। १३ तीव्र, तीखा। १४ असह्य, बरदाश्त न होनेवाला। {{Multicol-break}} कड़ाई (हिं० स्त्री०) कठोरता, सख तो, कड़ापन । कड़ाका (हिं० पु०) १ कठोर द्रव्यके भङ्गका शब्द, कड़ी चीजके टूटनेको अावाज । २ उपवास, फाका। कड़ाबौन (हिं० स्त्रो०) १ कराबीन, चौड़े महको बन्दूक। इसमें कितनी ही गोलियां भरकर दागौ जाती हैं। २ तपञ्चा, झोका, छोटी बन्दूक। यह कमरमें बांधी जाती है। कड़ार (सं० पु० ) गड़ सेचने आरन् कड़ादेशश्च । <Small>गड़े : कड़च । उण, १।१३५ ।</small> १ पिङ्गलवणं, भूरा रङ्ग । २ दास, नौकर । ३ दानमानविधि । ( त्रि०) ४ पिङ्गलवर्णयुक्त, गन्दुमी, भूरा। कड़ालिङ्गो-एक श्रेणौके संन्यासों। यह उपासक सम्पदायके अन्तगत हैं। कड़ालिङ्गो सर्वदा नग्न रहते और अपनी जितेन्द्रियताको रक्षाके लिये लिङ्गपर लोहेका एक कड़ा चढ़ा रखते हैं। यह प्रथा नानक-पन्थियों में भी चलती है। कड़ाह (हिं० पु०) १ कटाह, लोहेको बड़ी कड़ाही। इसमें दोनों पोर पकड़कर उतारने-चढ़ानेके लिये कुण्डे लगाये जाते हैं। बहुत आदमियोंके लिये परो, हलवा वगैरह बनानको इसे व्यवहार करते हैं। कड़ाहा,<small> कड़ाह देखो।</small> कड़ाही (हिं० स्त्री०) क्षुद्र कटाह, छोटा कडाह । कड़ि का (सं० स्त्री०) कलिका, कूडी। कड़ितुल (सं० पु०) कटयां तुला तोलनं ग्रहण यस्य, पृषोदरादित्वात् टस्य डः। खड़ग, तलवार। कड़ियल (हिं० पु०) मृणमय पात्रका भग्न खण्ड, मटके या घड़े का टूटा-फटा टकड़ा। इसमें अग्नि की स्थापनकर दबा देते हैं। कड़िया (हिं० स्त्रो०) दोर्घकाष्ठ, कांड़ा। दाना झाड़ लेने से अरहरका जो सूखा पड़ बच जाता, वही 'कड़िया' कहलाता है। कड़ियाली ( सं० स्त्री० ) अश्वके मुखका रज्ज, लगाम । कड़ी (हि० स्त्री०) १ शृङ्खलाके सूत्रका वलय, जनौरको लड़ोका छल्ला। २ क्षुद्र मण्डल, छोटा छल्ला। ३ अन्तरा, गौतमें मुखडेके बाद पानवाला<noinclude></noinclude> kk6dqp1fb2zr2vles0hc0r37cnbmlqg पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५२ 250 76188 666561 609393 2026-07-10T03:38:03Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 666561 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कड़ीदार-कढ़ोरना|६५१}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} हिस्सा। ४ धनी। ५ पस्थिविशेष, एक हड्डी। पशु-वोंके वक्षःस्थलके अस्थिको 'कड़ों' कहते हैं। ६ कटि-नेता, मुशकिल, अड़चन । ७ कठोर, सख्त। कड़ीदार (हिं० वि०) १ मण्डलविशिष्ट, छल्लेदार, जिसके कड़ी रहे। (पु०)२ किसी किस्मका कसीदा। यह शृङ्खलाके सूत्र-जैसा होता है। कड़ आ (हिं०) <small>कटु देखो।</small> कड़ पा तेल (हि०) <small>कट तैल देखो।</small> कड़ आना (हिं० क्रि०) १ कट बोध होना, कड़ वा लगना। २ वह होना, गुस्सा आना, नाक-भौं चढ़ाना। ३ पोड़ा करना, दर्द होना, किरकिराना। कड़ आहट (हिं०) <small>कट ता देखो।</small> कड़ई (हिं० स्त्री०) कट, चरपरी। मृतकके घर-वालोंको सम्बन्धियों द्वारा भेजा जानेवाला भोजन 'कड़ई-रोटो' या 'कड़ ई-खिचड़ीं' कहाता है। कड़ लो (सं० स्त्री०) अस्त्रविशेष, एक हथियार। कड़ डुच्ची (सं० स्त्री०) क्षुद्र कारवेल, छोटा करेला, करेली। कड़ (हिं०) <small>कटु देखो।</small> कड़ेरा (हिं० पु०) खरादकर कोई चीज बनानेवाला । कड़े लोट (हिं० पु०) व्यायामभेद, मालखम्भकी एक कसरत । कड़ेलोटन, <small>कड़े लोट देखो।</small> कड़ोड़ा (हिं० पु०) उच्च पदाधिकारी, करोड़ोंका अफसर। कड़ा (हिं० वि०) ऋण ले लेकर अपना काम चलानेवाला, जो कुज के भरोसे रहता हो। कड, <small>कड्दा देखो।</small> कढ़ना (हिं० क्रि०) १ वहिर्गत होना, निकलना । २ उदय होना, चढ़ना, देख पड़ना। ३ अग्रसर होना, बढ़ना। ४ घनीभूत होना, गढ़ियाना। कढनी (हिं० स्त्री०) मन्थनरन्न, नेतो, मथानोको रस्त्री। कढलाना (हिं० क्रि०) हाथ या पैर पकड़ कर घसीटना, बथेड़ना। कढ़बाना, <small>कढ़ाना देखो।</small> {{Multicol-break}} कढ़ाई (हिं० स्त्री०) १ वहिष्करण, काढ़नेका काम, निकलाई। २ वहिष्करणका पारिश्रमिक, निकास देनेको उजरत । ३ सूचिकम, सूईका काम, कसीदा। सूचिकमका पारिश्रमिक, कसोदा काढनेकी उजरत। ५ कड़ाही। कढ़ाना (हिं० क्रि०) वहिर्गत कराना, बाहर निकलाना। कढ़ाव (हिं० पु०) १ सूचिकर्म, शिल्प, कसौदा, नक्श। २ कड़ाह। कढ़ावना, <small>कढ़ाना देखो।</small> कढ़ी (हिं॰ स्त्रो०) व्यञ्चन विशेष, एक सालन । कड़ाही में घी या तेल खू व कड़कड़ा हौंग, राई पौर हलदीका चूर्ण छोड़ देते हैं। जब यह चूर्ण ख ब पकता और सोंधा सुगन्ध आने लगता, तब मढे या पतले दहीसे घुला हुआ वेसन कड़ाहामें पड़ता है। पीछे नमक-मिच छोड़ इसे धोमो पांच में पकानेसे कढ़ी बन जातो है। प्रायः कढ़ीमें बेसनकी छोटी छोटी पकौड़ियां भो डाल देते हैं। कढ़ी अत्यन्त खाद व्यञ्जन है। जिन त्योहारों पर पूरी नहीं बनतो, उनमें कढ़ी अवश्य छनती है। यह भातके साथ खानसे बहुत अच्छी लगती है। कढ़ी पाचन, दीपन, लघुपाक, रुचिजनक और कफ, वायु तथा बद्धकोष्ठ रोगनाशक है। कढ़ोमें पड़नेवालो पकोड़ो फुल्चौड़ी कहाती है। कढ़ पा, <small>कदुवा देखो।</small> कढ़ वा (हिं० पु०) १ एहीत, लिया हुघा, जो निकाला गया हो। २ रातका रखा भोजन। यह बच्चोंके लिये बचाकर रख लिया जाता है। ३ ऋण, देना। ४ पात्रविशेष, पुरवा, बोरका । करना (हिं० क्रि०) यन्त्रविशेष, एक औज़ार । इससे धातुके पावापर शिल्पकार गोलाकार रेखायें खोंचते हैं। कढ़या (हिं० पु०) १निकाल लेनेवाला, जो अलग कर लेता हो। २ उद्दारकर्ता, उबार लेनेवाला, जो बचाता हो। (स्त्रो०) ३ कड़ाही। कदोरना (हिं० क्रि०) घसौटना, लथेड़ना, कढ़खाना।<noinclude></noinclude> my1kppw639f96mg74ub1nuxmze56tko पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५३ 250 76189 666565 609394 2026-07-10T05:13:44Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 666565 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६५२|कण-कणाटीर|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कण (सं० पु०) कणति अतिसूक्ष्मत्वं गच्छति, कण-पचाद्यच । १ लेश, दाना। २ धलिका क्षुद्रांश,खाकका जरी। हिमलव, बरफका तबक। ४ जल-विन्दु, पानीका कतरा। ५ अग्निस्फुलिङ्ग, आगकी चिनगारी। ६ रत्नमुख, जवाहरका रुरू। ७ शस्य-मञ्जरी, गल्लेको बाल। ८ परमाणु, जरी। ९ अतिसूक्ष्म, निहायत बारीक। १० तण्डल प्रकृतिका क्षुद्र अंश । {{Center|<small>"कणान् वा भक्षयेदव्द पिण्याकं वा सक्वविशि।" ( मनु १२।९२)</Small>}} १० पिप्पली, पोपल। ११ वनजीरक, जंगली जीरा। कणकच (हिं० पु०) १ कपिकच्छ, केवांच। २ करज,करौंदा। कणगच, <small>कचकच देखो।</small> कागज, <small>कथकच देखो।</small> कणगुग्गुलु ( सं० पु०) कणचासो गुग्गुलुश्चेति, कर्मधा०। १ गुगगुलुविशेष, एक गूगुल। इसका संस्कृत पर्याय-गन्धराज, स्वर्णकणे, सुवर्ण, कनक, वंशपति, सुरभि और पलस्कष है। राजनिघण्टके मतसे कणगुग्गुलु कणभुक् कट, उष्ण, सुगन्धि, रसायन और वायु, शूल, गुल्म, उदरामान तथा कफनाशक है। कणजिविका ( सं० स्त्री०) १ महासमङ्गा, कगहिया। २ सारिवा, अनन्तमूल । ३ बहुपत्रिका, भुई आंवला। कणजीर (सं० पु०) कणवासी जौरश्चेति, नित्य कर्मधा०। खेतजीरक, सफेद जीरा। कणजीरक (सं० लो०) कर्ण क्षुद्रं जीरकम्, कणजीर स्वार्थ कन। क्षुद्रजीरा, छोटा जीरा। इसका संस्कृत पर्याय-हृद्यगन्धि और सुगन्धि है। भावप्रकाशके मतसे कणजोरक रुक्ष, कटु, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, लघु, धारक, पित्तवधक, मेधाजनक, गर्भाशयशोधक, पाचक, बलकारक, शुक्रवर्धक, रुचिकारक, कफनाशक,चक्षुका हितजनक और ज्वर, वायु, उदरामान, गुल्म, वमि तथा प्रतिसार रोगनाशक है। <Small>जीरक देखो।</small> कणजीरा (हिं०) <small>कणजौरक देखो।<small> कणजीण (सं० स्त्री०) खेतजौरक, सफेद जीरा। कणनिर्यास (सं० पु०) गुगगुलु, गूगुल। कणप (सं० पु०) कण-पा-क। अस्त्रविशेष, बरछा, भाला । {{Multicol-break}} कणप्रिय (सं.पु०) सूक्ष्मचटक, गौरैया, चिरैया। कणभ (सं० पु०) कण इव भाति, कण-भा-क। १ अग्निप्रकृति कीटविशेष, एक नेशदार मक्खी। इसके काटनेसे विसर्प, शोथ, शूल, ज्वर, वाम और शरीर को अवसन्नताका वेग बढ़ता है। <Small>(भावप्रकाश )</small> २ पुष्यवृक्ष-विशेष, एक फलदार पेड़। ३ कोटभेद, एक कोड़ा। इसके काटनेसे पित्तज रोग लगते हैं। ४ अन्यजातोय कोट, किसी किस्मका कोड़ा। वह चार प्रकारका होता है-त्रिकण्टक, कुणो, हस्तिकक्ष और अप-राजित। इसके काटनेसे शरीर में खयथ, अङ्गमर्द तथा गुरुताका बोध पाता और दष्ट स्थान काला पड़ जाता है। <Small>( सुत्रुत)</small> कणभक्ष (सं० पु०) कणान् भक्षयति, कण-भक्ष-ख ल। १ खामचटक, एक चिड़िया। २ कणाद। कणाद देखो। कणभक्षण (सं० लो०) शस्यलेश भोजन, नाजके किनकोंका खाना। कणभुक् (सं० पु०) कणान् भुत्तो, कण-भुज-क्विम् । कणाद-ऋषि। कणमूल ( सं० लो०) १ पिप्पलोमूल, पिपरामूल । २ पञ्चतिक्त वृत, पांचकड़वी चीजीका घी। कण लाभ (सं० पु०) कणानां लाभो यस्मात्, बहुव्री। पेषण करनेका एक यन्त्र, चक्को। २ श्रावत, गिर्दाब,भंवर । कणशः ( सं० अव्य०) कण वीसार्थे शस्। पल्य अल्य, कौडी कौड़ी, थोड़ा-थोड़ा। कणही (सं० स्त्री०) लताशिरीष, वल्लिशिरीष। कणा (सं० स्त्री०) कण-टाप् । १ जीरक, जीरा। २ पिप्पली, पोपल। ३ कुम्भोरमक्षिका, एक मक्खो । ४ खेतजौरक, सफेद जीरा। ४.कृष्णजीरक, काला जीरा। ६ अल्प, थोड़ा। {{Center|<small>"कदलीफलमध्यस्थ कणामावमपक्वकम् ।" (तिथ्यादितत्त्व )</Small>}} कणाच (हिं० पु०) केवांच। कणाजटा (सं० स्त्री०) पिप्पलीमूल, पिपरामूल । कणाटोन (सं० पु०) कणाय अटति, कण-पट-इनन् पृषोदरादित्वात् दीर्घत्वञ्च। खननपक्षा, खड़रैचा । कपाटौर (सं० पु०) कण-अट-ईरन् । <Small>कणाटीन देखो।</small><noinclude></noinclude> nlr9kvwbcgjaemc0uy263vf1vyhj27f 666566 666565 2026-07-10T05:15:28Z अंजली राजभर 4516 666566 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६५२|कण-कणाटीर|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कण (सं० पु०) कणति अतिसूक्ष्मत्वं गच्छति, कण-पचाद्यच । १ लेश, दाना। २ धलिका क्षुद्रांश,खाकका जरी। हिमलव, बरफका तबक। ४ जल-विन्दु, पानीका कतरा। ५ अग्निस्फुलिङ्ग, आगकी चिनगारी। ६ रत्नमुख, जवाहरका रुरू। ७ शस्य-मञ्जरी, गल्लेको बाल। ८ परमाणु, जरी। ९ अतिसूक्ष्म, निहायत बारीक। १० तण्डल प्रकृतिका क्षुद्र अंश । {{Center|<small>"कणान् वा भक्षयेदव्द पिण्याकं वा सक्वविशि।" ( मनु १२।९२)</Small>}} १० पिप्पली, पोपल। ११ वनजीरक, जंगली जीरा। कणकच (हिं० पु०) १ कपिकच्छ, केवांच। २ करज,करौंदा। कणगच, <small>कचकच देखो।</small> कागज, <small>कथकच देखो।</small> कणगुग्गुलु ( सं० पु०) कणचासो गुग्गुलुश्चेति, कर्मधा०। १ गुगगुलुविशेष, एक गूगुल। इसका संस्कृत पर्याय-गन्धराज, स्वर्णकणे, सुवर्ण, कनक, वंशपति, सुरभि और पलस्कष है। राजनिघण्टके मतसे कणगुग्गुलु कणभुक् कट, उष्ण, सुगन्धि, रसायन और वायु, शूल, गुल्म, उदरामान तथा कफनाशक है। कणजिविका ( सं० स्त्री०) १ महासमङ्गा, कगहिया। २ सारिवा, अनन्तमूल । ३ बहुपत्रिका, भुई आंवला। कणजीर (सं० पु०) कणवासी जौरश्चेति, नित्य कर्मधा०। खेतजीरक, सफेद जीरा। कणजीरक (सं० लो०) कर्ण क्षुद्रं जीरकम्, कणजीर स्वार्थ कन। क्षुद्रजीरा, छोटा जीरा। इसका संस्कृत पर्याय-हृद्यगन्धि और सुगन्धि है। भावप्रकाशके मतसे कणजोरक रुक्ष, कटु, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, लघु, धारक, पित्तवधक, मेधाजनक, गर्भाशयशोधक, पाचक, बलकारक, शुक्रवर्धक, रुचिकारक, कफनाशक,चक्षुका हितजनक और ज्वर, वायु, उदरामान, गुल्म, वमि तथा प्रतिसार रोगनाशक है। <Small>जीरक देखो।</small> कणजीरा (हिं०) <small>कणजौरक देखो।</small> कणजीण (सं० स्त्री०) खेतजौरक, सफेद जीरा। कणनिर्यास (सं० पु०) गुगगुलु, गूगुल। कणप (सं० पु०) कण-पा-क। अस्त्रविशेष, बरछा, भाला । {{Multicol-break}} कणप्रिय (सं.पु०) सूक्ष्मचटक, गौरैया, चिरैया। कणभ (सं० पु०) कण इव भाति, कण-भा-क। १ अग्निप्रकृति कीटविशेष, एक नेशदार मक्खी। इसके काटनेसे विसर्प, शोथ, शूल, ज्वर, वाम और शरीर को अवसन्नताका वेग बढ़ता है। <Small>(भावप्रकाश )</small> २ पुष्यवृक्ष-विशेष, एक फलदार पेड़। ३ कोटभेद, एक कोड़ा। इसके काटनेसे पित्तज रोग लगते हैं। ४ अन्यजातोय कोट, किसी किस्मका कोड़ा। वह चार प्रकारका होता है-त्रिकण्टक, कुणो, हस्तिकक्ष और अप-राजित। इसके काटनेसे शरीर में खयथ, अङ्गमर्द तथा गुरुताका बोध पाता और दष्ट स्थान काला पड़ जाता है। <Small>( सुत्रुत)</small> कणभक्ष (सं० पु०) कणान् भक्षयति, कण-भक्ष-ख ल। १ खामचटक, एक चिड़िया। २ कणाद। कणाद देखो। कणभक्षण (सं० लो०) शस्यलेश भोजन, नाजके किनकोंका खाना। कणभुक् (सं० पु०) कणान् भुत्तो, कण-भुज-क्विम् । कणाद-ऋषि। कणमूल ( सं० लो०) १ पिप्पलोमूल, पिपरामूल । २ पञ्चतिक्त वृत, पांचकड़वी चीजीका घी। कण लाभ (सं० पु०) कणानां लाभो यस्मात्, बहुव्री। पेषण करनेका एक यन्त्र, चक्को। २ श्रावत, गिर्दाब,भंवर । कणशः ( सं० अव्य०) कण वीसार्थे शस्। पल्य अल्य, कौडी कौड़ी, थोड़ा-थोड़ा। कणही (सं० स्त्री०) लताशिरीष, वल्लिशिरीष। कणा (सं० स्त्री०) कण-टाप् । १ जीरक, जीरा। २ पिप्पली, पोपल। ३ कुम्भोरमक्षिका, एक मक्खो । ४ खेतजौरक, सफेद जीरा। ४.कृष्णजीरक, काला जीरा। ६ अल्प, थोड़ा। {{Center|<small>"कदलीफलमध्यस्थ कणामावमपक्वकम् ।" (तिथ्यादितत्त्व )</Small>}} कणाच (हिं० पु०) केवांच। कणाजटा (सं० स्त्री०) पिप्पलीमूल, पिपरामूल । कणाटोन (सं० पु०) कणाय अटति, कण-पट-इनन् पृषोदरादित्वात् दीर्घत्वञ्च। खननपक्षा, खड़रैचा । कपाटौर (सं० पु०) कण-अट-ईरन् । <Small>कणाटीन देखो।</small><noinclude></noinclude> 4s6h2kbz7qmmfq4oeajnymryt3at5lz पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५४ 250 76191 666568 609395 2026-07-10T06:04:55Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 666568 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कणाटौरक-कणाद|६५३}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कणाटीरक ( सं० पु०) कणाटोर स्वाथै कन्। <Small>{{right|कपाटौर देखो। }}</Small> कणाद (सं० पु०) कणं अत्ति भक्षयति, कण-अद-अण। १ मनिविशेष यही वैशेषिक दर्शनके प्रणेता रहे। इनका दूसरा नाम श्रौलुक्य, कणभक्ष, कणभुज और काश्यप है। महषि कणादने 'विशेष' नामक एक अतिरिक्त पदार्थ स्वीकार किया, इसीसे उनके बनाये दर्शनसूत्रका नाम लोगोंने वैशेषिक रख लिया है। कणादके मतसे छह भाव पदार्थ और एक प्रभाव पदार्थ अर्थात् सब सात पदार्थ हैं। छह भाव-पदार्थो के नाम यह हैं-१ट्रय, २ गुण, ३ कर्म,४ सामान्य, ५ विशेष और समवाय। द्रव्य प्रथम पदार्थ है। यह नौ प्रकारका होता है। यथा- <Small>{{Center|<poem>"पृथिव्याफ्तेजोवायुराकाशं कालीदिगात्मा मन इति द्रव्यापि।"</Poem>}} {{Right|(वैशे० सू० १।१।५)}}</small> क्षिति, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक, आत्मा और मनका नाम द्रव्य है। जिसमें गन्ध रहता, उसको विहान् चिति कहता है। हम जलमें भी गन्ध अनुभव करते हैं किन्तु वह गन्ध जलका नहीं ठहरता, पृथिवीसे जलपर उतरता है-जैसे किसी नतन मृत्पात्रमें रख थोड़ी देर बाद पीनपर जलसे सोधा गन्ध पाने लगता है। सुतरां मानना पड़ेगा-आश्रयका गन्ध ही जलमें अनुभूत होता है। केवलमात्र शुक्लरूप किंवा स्वभाविक द्रवत्व रखने वाले ट्रव्य का नाम जल है। शुक्ल पोत प्रमृति नानाविध रूप देख पड़ने और स्वभावसिद्ध द्रवत्व न रहनसे पृथिवीको जल कैसे कह सकते हैं। स्वाभाविक उष्णता-युक्त द्रव्य तेज कहाता है। अमुष्ण, अशोतल और किसी प्रकारके पाकसे उत्पन्न न हुये स्पर्शविशिष्ट ट्रव्यको वायु कहते हैं। जिससे शब्द उठता, उसका नाम आकाश पड़ता। है। कोई-कोई कहता-वायुसे ही शब्द निकलता,सतरां भाकाशको स्वीकार करना चल नहीं सकता।। </Small>Vol. III. 164{{gap}}{{gap}} {{Multicol-break}} यह सन्देह दूर करनेके लिये विश्वनाथ न्यायपञ्चाननने लिखा है- <Small>{{center|<poem>"न च वारवश्वेषु सूझशब्दक्रमैच बायौ कारणगुणपूर्वका र उत्पद्यतामिति वाच्य अयावत द्रव्यभावित्वेन वायोर्विशेषगुचत्वाभात्र</poem>}}{{right|(सिद्धान्तमुक्तावली)}}</small> कोई नहीं कहता-प्रथमतः वायुके अवयवमें सूक्ष्म शब्द उठता, फिर उसी शब्दसे स्थल वायमें स्थ ल शब्द खुलता है। क्योंकि आश्रय नाश जिसके नाशका कारण नहीं, वह वायुका विशेष गुण कैसे हो सकता है। आश्रय विद्यमान रहते भोजन शब्दका विनाश हो जाता, तब पाश्रयनाशको शब्दके नाशका कारण कहना किसी मतसे सकस नहीं पाता। एकमात्र शब्द ही आकाशको सिमित हेतु है। इस सम्बन्धपर लिखते हैं- <Small>"परिशेषानमाकाशस्थ ।” (२०१ श्रा० २७ सू०)</small> अन्य अष्टविध द्रव्योंमें शब्द रहना पसम्भव होनेसे शब्द ही आकाशका एकमात्र लिङ्ग (अनुमापक हेतु) है। ज्येष्ठत्व और कनिष्ठत्व आदि जानके कारण पदार्थको दिक कहते हैं। जिसमें कृतिज्ञान प्रभृति रहता, उसका नाम आमा पड़ता है। जिस पदार्थके रहनेसे हम सुख, दुःख प्रकृति उठाते और विजातीय ज्ञानको झलक देख नहोंगर उसको संज्ञा मन बताते हैं। गुण पदार्थ २४ प्रकारका है। यथा-रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, वियो परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रगत शब्द, गुरुत्व, द्रवत्व, मेह, संस्कार, पाप और धर्म। <Small>{{right|(शे० सू० १।१।६)}}</small> कर्म पांच प्रकारका होता है-उत्क्षेपण, प्रव-क्षेपण, पाकुच्चन, प्रसारण और गमन । <Small>(शे० स०,१।१।७)</small> सामान्य दो प्रकारका है-साधारण धर्म वा जा विशेष। जिस पदार्थ के रहनेसे परमाणवो साधा जाता, वही विशेष कहाता है। <Small>(वैशे० सं०१।२।३)</small> समवाय नित्य सम्बन्धको कहते हैं। <Small>(वैशे० सं० ७।२।२)</small><noinclude></noinclude> 3idg9g3t85xg6lernf0qqosw2kwg3b8 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१८९ 250 83348 666521 346655 2026-07-09T13:05:24Z Shivaniya shaw 4129 666521 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|१८२| अचिरत्विष्— अचौन}}</noinclude> {{Outdent|अचिरत्विषु (सं० स्त्री० ) अचिरा अल्पकालस्थायिनी । विट् प्रभा यस्याः । क्षणप्रभा ; विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिरद्युति (सं० स्त्री०) अचिरा अल्पकालस्थायिनी द्युतिः प्रभा यस्याः । विद्युत्, बिजली । {{Outdent|अचिरप्रभा (सं० स्त्री० ) अचिरा क्षणकालस्थायिनी प्रभा यस्याः, बहुव्री० । क्षणप्रभा ; विद्युत्, बिजली ।}} अचिरभास् (सं० स्त्री० ) अचिरा अल्पकालस्थायिनी भाः प्रभा यस्याः । १ विद्युत्, बिजली। कर्मधा० । २ अल्पकालस्थायिनी प्रभा, थोड़ी देर ठहरनेवाली रोशनी ।}} अचिररोचिस् ( सं॰ स्त्री० ) अचिरं रोचि : दोप्ति - र्यस्याः । १ विद्युत, बिजली । कर्मधा० । २ अल्पकाल- स्थायिनी कान्ति, थोड़ी देर ठहरनेवाली चमक ।}} अचिरस्य (सं० अव्य० ) अल्पकालमें, थोड़ी देर में; अचिरात्, फौरन् ; शीघ्र, जल्द ।}} चिरांश (सं० स्त्री० ) अंशवो यस्याः, बहुव्री० । अचिराः क्षणस्थायिनः १ विद्युत्, बिजली । कर्मधा ० । २ क्षणस्थायी किरण, थोड़ी देर रहनेवाली चमक । अचिरात् (स ं० अव्य० ) शीघ्र, जल्द ; विलम्ब, झट-पट | विना अचिराभा (सं० स्त्री० ) अचिरा आभा यस्याः । विद्युत्, बिजली । अचिराय (सं० अव्य० ) शीघ्र, जल्द | अचिरेण (स ं० अव्य० ) शीघ्र, जल्द । यह अचिवल - काश्मीरका एक बृहत् जलोत्स । अचगान गांवके अत्यन्त सन्निकट है। पहले यहां नर्तकी रहती थीं । अल्प ही है। हलाण्डवाले सम्प्रति इस राज्यको अधिकार करनेकी विशेष चेष्टा कर रहे हैं । सुलतान सिकन्दर मुदाके राजत्वकालमें (सन् १६०७- १६३७ ई०) यह राज्य अतिशय प्रबल हो गया था । नयाद्दीप, मलयके अन्तर्गत जोहर, पहाङ्, केदा एवं पेराक राज्यने भी इसको वश्यताको स्वीकार किया। यह राज्य आयतनमें कोई १६,४०० वर्ग मोल है । लोकसंख्या कोई ३,२८,००० होगी । इस देशमें प्रचुर परिमाणसे चावल और मिर्च उत्पन्न होता है । पूर्वकाल में यहां रेशमका खूब कम होता था, किन्तु आजकल इस व्यवसायको अवस्था नितान्त अवनत हो गई है । चीन बाणिज्यका एक सुविख्यात बन्दरगाह है । सन् १५८८ ई० में हलाण्डवाले पहले यहां बाणिज्यार्थ आये थे । अंगरेज- बणिकोंने सन् १६०२ ई० में यहां पहले पदार्पण किया । फ्रान्सोसियोंने भी यहां व्यवसाय फैलनेको चेष्टा की थी; किन्तु देशीय बणिक् बीच-बीच इस आशङ्कासे गड़बड़ मचा देते, कि पीछे स्वार्थको क्षति न होती। इसलिये कोई भी जाति विशेष सुविधा पा न सको। यहां प्रचुर परिमाणसे स्वर्ण उत्पन्न होता है । अचीनवासो मलयजातिको अपेक्षा दीर्घ और सुश्री हैं। अचीन नगर इस राज्यको राजधानी है। यह एक क्षुद्र नदौपर समुद्रसे डेढ़ कोस दूर अवस्थित है । यामुरा नामक यहां एक आग्नेय-गिरि है । यह पर्वत कोई ६००० फूट् उच्च होगा । सन् १७०० ई० में अचीनराज्यको अपरिमित रूपसे अचिष्णु (स ं० त्रि० ) अच्- गतौ- इष्णुच् । गमनशील, श्रीवृद्धि हुई थी । कहते हैं, कि राजाके पास सर्वदा जानेवाला । अचीता (हिं० वि० ) २ आकस्मिक । ३ बेअन्दाज़ । १ विना सोचा-समझा । हाथी रहते थे । अब भी इस देशमें बहुतसे हाथी हैं ; किन्तु हाथो पालनेको प्रथा प्राय: उठ गई । अचीनवाले प्रथम स्वाधीन राजाके राजत्वकालको चीन - सुमात्रा-दोपके उत्तर अंशका एक प्रतापशाली अवधि में ही हलाण्डवालोंके साथ यहांके अधिवासि- स्वाधीन राज्य । इस दोपके समस्त राजाओं ने एक- योंका विवाद होने लगा और जबतक मलक्का एक कर हलाण्डवालोंको अधीनताको स्वीकार किया |द्दीपका पतन और हलाण्डवालोंके प्रतापका है। अचीन राज्य अद्यापि स्वाधीन है। किन्तु ह्रास न हुआ, तबतक यह विवाद न मिटा ।<noinclude>इसके अधिक काल स्वाधीन बने रहने की सम्भावना</noinclude> qad57knk0na74nb8fjwkqh5h5q7c5i8 666527 666521 2026-07-09T16:02:12Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 666527 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|१८२| अचिरत्विष्— अचौन}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अचिरत्विषु (सं० स्त्री० ) अचिरा अल्पकालस्थायिनी । त्विट् प्रभा यस्याः । क्षणप्रभा ; विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिरद्युति (सं० स्त्री०) अचिरा अल्पकालस्थायिनी द्युतिः प्रभा यस्याः । विद्युत्, बिजली । {{Outdent|अचिरप्रभा (सं० स्त्री० ) अचिरा क्षणकालस्थायिनी प्रभा यस्याः, बहुव्री० । क्षणप्रभा ; विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिरभास् (सं० स्त्री० ) अचिरा अल्पकालस्थायिनी भाः प्रभा यस्याः । १ विद्युत्, बिजली। कर्मधा० । २ अल्पकालस्थायिनी प्रभा, थोड़ी देर ठहरनेवाली 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अधीनताको स्वीकार किया है। अचीन राज्य अद्यापि स्वाधीन है। किन्तु इसके अधिक काल स्वाधीन बने रहने की सम्भावना अल्प ही है। हलाण्डवाले सम्प्रति इस राज्यको अधिकार करनेकी विशेष चेष्टा कर रहे हैं । सुलतान सिकन्दर मुदाके राजत्वकालमें (सन् १६०७- १६३७ ई०) यह राज्य अतिशय प्रबल हो गया था । नयाद्दीप, मलयके अन्तर्गत जोहर, पहाङ्, केदा एवं पेराक राज्यने भी इसको वश्यताको स्वीकार किया। यह राज्य आयतनमें कोई १६,४०० वर्ग मोल है । लोकसंख्या कोई ३,२८,००० होगी । इस देशमें प्रचुर परिमाणसे चावल और मिर्च उत्पन्न होता है । पूर्वकाल में यहां रेशमका खूब कम होता था, किन्तु आजकल इस व्यवसायको अवस्था नितान्त अवनत हो गई है । अचीन बाणिज्यका एक सुविख्यात बन्दरगाह है । सन् १५८८ ई० में हलाण्डवाले पहले यहां बाणिज्यार्थ आये थे । अंगरेज- बणिकोंने सन् १६०२ ई० में यहां पहले पदार्पण किया । फ्रान्सोसियोंने भी यहां व्यवसाय फैलनेको चेष्टा की थी; किन्तु देशीय बणिक् बीच-बीच इस आशङ्कासे गड़बड़ मचा देते, कि पीछे स्वार्थको क्षति न होती। इसलिये कोई भी जाति विशेष सुविधा पा न सको। यहां प्रचुर परिमाणसे स्वर्ण उत्पन्न होता है । अचीनवासी मलयजातिको अपेक्षा दीर्घ और सुश्री हैं। अचीन नगर इस राज्यको राजधानी है। यह एक क्षुद्र नदीपर समुद्रसे डेढ़ कोस दूर अवस्थित है । यामुरा नामक यहां एक आग्नेय-गिरि है । यह पर्वत कोई ६००० फूट् उच्च होगा । सन् १७०० ई० में अचीनराज्यको अपरिमित रूपसे श्रीवृद्धि हुई थी । कहते हैं, कि राजाके पास सर्वदा हाथी रहते थे । अब भी इस देशमें बहुतसे हाथी हैं ; किन्तु हाथो पालनेको प्रथा प्राय: उठ गई । अचीनवाले प्रथम स्वाधीन राजाके राजत्वकालको अवधि में ही हलाण्डवालोंके साथ यहांके अधिवासियोंका विवाद होने लगा और जबतक मलक्का द्दीपका पतन और हलाण्डवालोंके प्रतापका ह्रास न हुआ, तबतक यह विवाद न मिटा ।<noinclude></noinclude> dkvoh5o5hf4b6vlcu5sc3wykn4av11m 666530 666527 2026-07-09T16:04:44Z Shivaniya shaw 4129 666530 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|१८२| अचिरत्विष्— अचौन}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अचिरत्विषु (सं० स्त्री० ) अचिरा अल्पकालस्थायिनी । त्विट् प्रभा यस्याः । क्षणप्रभा ; विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिरद्युति (सं० स्त्री०) अचिरा अल्पकालस्थायिनी द्युतिः प्रभा यस्याः । विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिरप्रभा (सं० स्त्री० ) अचिरा क्षणकालस्थायिनी प्रभा यस्याः, बहुव्री० । क्षणप्रभा ; विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिरभास् (सं० स्त्री० ) अचिरा अल्पकालस्थायिनी भाः प्रभा यस्याः । १ विद्युत्, बिजली। कर्मधा० । २ अल्पकालस्थायिनी प्रभा, थोड़ी देर ठहरनेवाली रोशनी ।}} {{Outdent|अचिररोचिस् ( सं॰ स्त्री० ) अचिरं रोचि : दीप्ति - र्यस्याः । १ विद्युत, बिजली । कर्मधा० । २ अल्पकाल- स्थायिनी कान्ति, थोड़ी देर ठहरनेवाली चमक ।}} {{Outdent|अचिरस्य (सं० अव्य० ) अल्पकालमें, थोड़ी देर में; अचिरात्, फौरन् ; शीघ्र, जल्द ।}} {{Outdent|अचिरांशु (सं० स्त्री० )अचिराः क्षणस्थायिनः अंशवो यस्याः, बहुव्री० । १ विद्युत्, बिजली । कर्मधा ० । २ क्षणस्थायी किरण, थोड़ी देर रहनेवाली चमक ।}} {{Outdent| अचिरात् (सं० अव्य० ) शीघ्र, जल्द ;विना विलम्ब, झट-पट । {{Outdent| अचिराभा (सं० स्त्री० ) अचिरा आभा यस्याः । विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिराय (सं० अव्य० ) शीघ्र, जल्द ।}} {{Outdent|अचिरेण (सं० अव्य० ) शीघ्र, जल्द ।}} अचिवल - काश्मीरका एक बृहत् जलोत्स । अचगान गांवके अत्यन्त निकट है। पहले यहां नर्तकी रहती थीं । {{Outdent|अचिष्णु (सं० त्रि० ) अच्-गती- इष्णुच् । गमनशील, जानेवाला ।}} {{Outdent| अचीता (हिं० वि० ) २ आकस्मिक । ३ बेअन्दाज़ । १ विना सोचा-समझा ।}} अचीन - सुमात्रा-दीपके उत्तर अंशका एक प्रतापशाली स्वाधीन राज्य ।इस दोपके समस्त राजाओं ने एक-एक कर हलाण्डवालोंको अधीनताको स्वीकार किया है। अचीन राज्य अद्यापि स्वाधीन है। किन्तु <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इसके अधिक काल स्वाधीन बने रहने की सम्भावना अल्प ही है। हलाण्डवाले सम्प्रति इस राज्यको अधिकार करनेकी विशेष चेष्टा कर रहे हैं । सुलतान सिकन्दर मुदाके राजत्वकालमें (सन् १६०७- १६३७ ई०) यह राज्य अतिशय प्रबल हो गया था । नयाद्दीप, मलयके अन्तर्गत जोहर, पहाङ्, केदा एवं पेराक राज्यने भी इसको वश्यताको स्वीकार किया। यह राज्य आयतनमें कोई १६,४०० वर्ग मोल है । लोकसंख्या कोई ३,२८,००० होगी । इस देशमें प्रचुर परिमाणसे चावल और मिर्च उत्पन्न होता है । पूर्वकाल में यहां रेशमका खूब कम होता था, किन्तु आजकल इस व्यवसायको अवस्था नितान्त अवनत हो गई है । अचीन बाणिज्यका एक सुविख्यात बन्दरगाह है । सन् १५८८ ई० में हलाण्डवाले पहले यहां बाणिज्यार्थ आये थे । अंगरेज- बणिकोंने सन् १६०२ ई० में यहां पहले पदार्पण किया । फ्रान्सोसियोंने भी यहां व्यवसाय फैलनेको चेष्टा की थी; किन्तु देशीय बणिक् बीच-बीच इस आशङ्कासे गड़बड़ मचा देते, कि पीछे स्वार्थको क्षति न होती। इसलिये कोई भी जाति विशेष सुविधा पा न सको। यहां प्रचुर परिमाणसे स्वर्ण उत्पन्न होता है । अचीनवासी मलयजातिको अपेक्षा दीर्घ और सुश्री हैं। अचीन नगर इस राज्यको राजधानी है। यह एक क्षुद्र नदीपर समुद्रसे डेढ़ कोस दूर अवस्थित है । यामुरा नामक यहां एक आग्नेय-गिरि है । यह पर्वत कोई ६००० फूट् उच्च होगा । सन् १७०० ई० में अचीनराज्यको अपरिमित रूपसे श्रीवृद्धि हुई थी । कहते हैं, कि राजाके पास सर्वदा हाथी रहते थे । अब भी इस देशमें बहुतसे हाथी हैं ; किन्तु हाथो पालनेको प्रथा प्राय: उठ गई । अचीनवाले प्रथम स्वाधीन राजाके राजत्वकालको अवधि में ही हलाण्डवालोंके साथ यहांके अधिवासियोंका विवाद होने लगा और जबतक मलक्का द्दीपका पतन और हलाण्डवालोंके प्रतापका ह्रास न हुआ, तबतक यह विवाद न मिटा । <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 966jatvertb37o1aq1sl6nlsugvtixw 666531 666530 2026-07-09T16:05:51Z Shivaniya shaw 4129 666531 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|१८२| अचिरत्विष्— अचौन}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अचिरत्विषु (सं० स्त्री० ) अचिरा अल्पकालस्थायिनी । त्विट् प्रभा यस्याः । क्षणप्रभा ; विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिरद्युति (सं० स्त्री०) अचिरा अल्पकालस्थायिनी द्युतिः प्रभा यस्याः । विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिरप्रभा (सं० स्त्री० ) अचिरा क्षणकालस्थायिनी प्रभा यस्याः, बहुव्री० । क्षणप्रभा ; विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिरभास् (सं० स्त्री० ) अचिरा अल्पकालस्थायिनी भाः प्रभा यस्याः । १ विद्युत्, बिजली। कर्मधा० । २ अल्पकालस्थायिनी प्रभा, थोड़ी देर ठहरनेवाली रोशनी ।}} {{Outdent|अचिररोचिस् ( सं॰ स्त्री० ) अचिरं रोचि : दीप्ति - र्यस्याः । १ विद्युत, बिजली । कर्मधा० । २ अल्पकाल- स्थायिनी कान्ति, थोड़ी देर ठहरनेवाली चमक ।}} {{Outdent|अचिरस्य (सं० अव्य० ) अल्पकालमें, थोड़ी देर में; अचिरात्, फौरन् ; शीघ्र, जल्द ।}} {{Outdent|अचिरांशु (सं० स्त्री० )अचिराः क्षणस्थायिनः अंशवो यस्याः, बहुव्री० ।१ विद्युत्, बिजली । कर्मधा ० । २ क्षणस्थायी किरण, थोड़ी देर रहनेवाली चमक ।}} {{Outdent| अचिरात् (सं० अव्य० ) शीघ्र, जल्द ;विना विलम्ब, झट-पट ।}} {{Outdent| अचिराभा (सं० स्त्री० ) अचिरा आभा यस्याः । विद्युत्, बिजली ।}} {{Outdent|अचिराय (सं० अव्य० ) शीघ्र, जल्द ।}} {{Outdent|अचिरेण (सं० अव्य० ) शीघ्र, जल्द ।}} अचिवल - काश्मीरका एक बृहत् जलोत्स । अचगान गांवके अत्यन्त निकट है। पहले यहां नर्तकी रहती थीं । {{Outdent|अचिष्णु (सं० त्रि० ) अच्-गती- इष्णुच् । गमनशील, जानेवाला ।}} {{Outdent| अचीता (हिं० वि० ) २ आकस्मिक । ३ बेअन्दाज़ । १ विना सोचा-समझा ।}} अचीन - सुमात्रा-दीपके उत्तर अंशका एक प्रतापशाली स्वाधीन राज्य ।इस दोपके समस्त राजाओं ने एक-एक कर हलाण्डवालोंको अधीनताको स्वीकार किया है। अचीन राज्य अद्यापि स्वाधीन है। किन्तु <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इसके अधिक काल स्वाधीन बने रहने की सम्भावना अल्प ही है। हलाण्डवाले सम्प्रति इस राज्यको अधिकार करनेकी विशेष चेष्टा कर रहे हैं । सुलतान सिकन्दर मुदाके राजत्वकालमें (सन् १६०७- १६३७ ई०) यह राज्य अतिशय प्रबल हो गया था । नयाद्दीप, मलयके अन्तर्गत जोहर, पहाङ्, केदा एवं पेराक राज्यने भी इसको वश्यताको स्वीकार किया। यह राज्य आयतनमें कोई १६,४०० वर्ग मोल है । लोकसंख्या कोई ३,२८,००० होगी । इस देशमें प्रचुर परिमाणसे चावल और मिर्च उत्पन्न होता है । पूर्वकाल में यहां रेशमका खूब कम होता था, किन्तु आजकल इस व्यवसायको अवस्था नितान्त अवनत हो गई है । अचीन बाणिज्यका एक सुविख्यात बन्दरगाह है । सन् १५८८ ई० में हलाण्डवाले पहले यहां बाणिज्यार्थ आये थे । अंगरेज- बणिकोंने सन् १६०२ ई० में यहां पहले पदार्पण किया । फ्रान्सोसियोंने भी यहां व्यवसाय फैलनेको चेष्टा की थी; किन्तु देशीय बणिक् बीच-बीच इस आशङ्कासे गड़बड़ मचा देते, कि पीछे स्वार्थको क्षति न होती। इसलिये कोई भी जाति विशेष सुविधा पा न सको। यहां प्रचुर परिमाणसे स्वर्ण उत्पन्न होता है । अचीनवासी मलयजातिको अपेक्षा दीर्घ और सुश्री हैं। अचीन नगर इस राज्यको राजधानी है। यह एक क्षुद्र नदीपर समुद्रसे डेढ़ कोस दूर अवस्थित है । यामुरा नामक यहां एक आग्नेय-गिरि है । यह पर्वत कोई ६००० फूट् उच्च होगा । सन् १७०० ई० में अचीनराज्यको अपरिमित रूपसे श्रीवृद्धि हुई थी । कहते हैं, कि राजाके पास सर्वदा हाथी रहते थे । अब भी इस देशमें बहुतसे हाथी हैं ; किन्तु हाथो पालनेको प्रथा प्राय: उठ गई । अचीनवाले प्रथम स्वाधीन राजाके राजत्वकालको अवधि में ही हलाण्डवालोंके साथ यहांके अधिवासियोंका विवाद होने लगा और जबतक मलक्का द्दीपका पतन और हलाण्डवालोंके प्रतापका ह्रास न हुआ, तबतक यह विवाद न मिटा । <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qxywwegq2pphfxpaur7cx6t9xmjwxou पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१९० 250 83349 666575 346656 2026-07-10T07:48:58Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 666575 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अचौन—अच्छव'''|'''१८३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अचीनाधिपतिने मलक्का दीपको अधिकार करनेके लिये कमसे कम दश बार जङ्गी जहाजोंको प्रेरण किया था । सन् १६१५ ई० में तात्कालिक राजा सिकन्दर मुदाने ५०० जङ्गी जहाजों और ६०,००० सिपाहियोंको रवाना किया। उनमें १०० जहाज इतने बड़े थे, जितने बड़े जहाज उस समय किसी यूरोपीय राजाके पास न रहे। इससे स्पष्टं मालूम होता है, कि अचीनाधिपति कैसे धनी और प्रतापशाली राजा थे । सन् १६४१ ई० में सिकन्दर मुदाको मृत्युके बाद क्रमान्वयसे तीन स्त्रियोंने राजप्रशासन किया । सन् १६८८ ई० में अरबों के एक दलने स्वजातिको राजा बनाया था। इसके बाद अचीनको अवनति होने लगो। सन् १८१६ ई० में यवद्दोप हलाण्डको प्रत्यर्पण किया जानेसे इङ्गलण्डीय गवर्णमेण्टने अचीन पर अपने प्रभुत्वको अक्षय रखनेको चेष्टा को । सन् १८१८ ई० को सन्धिमें यह नियम रखा गया- कोई जाति अचीनमें रहने न पायेगा । सन् १८२४ ई० में जब इङ्गलण्डोय गवर्णमेण्ट ने हलाण्डके साथ कितने ही अधिकारोंका विनिमय किया, तब सुमात्रामें इङ्गलण्डका जो सकल अधिकार था, वह हलाण्डको दिया गया । सन् १८७३ ई० में हलाडके सैन्यदलने अचीन नगरपर आक्रमण किया । इसमें हलाण्डवाले सम्पूर्ण पराभूत हुए और उन्हें विस्तर क्षतिको उठाना पड़ा । किन्तु हलाण्डवालोंने एकबारगो हो भग्नोत्साह न हो थोड़े दिनों बाद पुनर्वार युद्धको आरम्भ किया एवं सन् १८७४ ई० के जनवरी मासमें प्राचीन नगरको हाथमें ले लिया । {{Outdent|अचूक (हिं० वि० ) १ न चूकनेवाला, निश्चित । ( क्रि० वि०) २ विना चूके, बराबर ।}} {{Outdent|अचेत (सं० त्रि०) १ चेतनाशून्य, बेहोश । २ बेअक्ल, निर्बुद्धि । ३ जड़, बेजान । (क्लो० ) ४ बेजान चीज . जीवनशून्य पदार्थ ।}} {{Outdent|अचेतन (सं० त्रि०) नास्ति चेतना यस्य । चेतना- शून्य, ज्ञानशून्य । बेजान, बेअक्ल । जो सकल पदार्थ इच्छानुसार कहीं नहीं जाते, देखते और सुनते नहीं और न सुख-दुखका अनुभव हो करते, उन्हें}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अचेतन कहते हैं । जैसे-हक्ष, पर्वत इत्यादि । पीड़ादिवशतः ज्ञानशून्य हो जाने से जब मनुष्य इच्छानुसार बात नहीं करता और पूछनेपर बातका उत्तर नहीं देता, तब उसे भी अचेतन कहा जाता है ।<small>मूर्च्छा, सन्नग्रास, ज्वर, मस्तिष्क प्रदाह, कृमि प्रभृति शब्दोंमें इसका विशेष विवरण देखो ।</small> {{Outdent|अचेतस् (सं० त्रि०) न चित असुन् । सर्वधातुभ्योऽसुन् । उण् ४११८८। नञ्-तत्। चेतनाशून्य, बेहोश ।}} {{Outdent| अचेतान ( सं० त्रि०) न चित-शानच्, नञ्-तत् । चेतनाशून्य, वेहोश ।}} {{Outdent|अचेलपरौसह (हिं० पु० ) आगममें कथित वस्त्र पहनने और उनका दोष न देखनेका नियम ।}} {{Outdent|अचेष्ट (सं० त्रि०) नास्ति चेष्टा यस्य, बहुव्री० । १ निश्चेष्ट, चेष्टारहित ; विना कोशिश । २ ज्ञानशून्य, बेहोश ।}} {{Outdent|अचेष्टता (सं० स्त्री० ) अचेष्ट- तल्-टाप् । निश्चेष्टता, चेष्टाराहित्य |}} {{Outdent|अचैतन्य (सं० वि० ) नास्ति चैतन्यं यस्य । ज्ञानशून्य, चेतनारहित । बेहोश ।}} {{Outdent|अचेना( हिं० ० पु० ) तकलीफ, दुःख, बेचैनी ।}} {{Outdent|अचैना(हिं० पु० ) चारा काटनेका लकड़ीवाला कुन्दा । यह जमोनमें गड़ा रहता और इसपर रखकर गंडाससे चारा काटा जाता है। पहुंटा । २ लकड़ी काटने और छीलनेका ठोहा ।}} {{Outdent|अचोट ( हिं० वि० )जिसके चोट न लगे, सुरक्षित ।}} {{Outdent| अचोना ( हिं० पु० ) १ आचमनी । २ पानी पीनेका पात्र, कटोरा ।}} {{Outdent|अच्छ ( सं० अव्य० ) न च्छाति दृष्टिम्,छो- क । १ अभिमुखमें, सम्मुखमें। रूबरू, सामने । (त्रि० ) न च्यति, छो-क; २ स्वच्छ, निर्मल; साफ़,बेमेल । (पु० ) ३ स्फटिक । ४ भालू । ५ अक्षि,आंख । ६ अक्षयकुमार । ७ रुद्राक्ष ।}} {{Outdent|अच्छत -- <small>अच्छत देखो ।</small>}} {{Outdent| अच्छत्र (सं० त्रि० ) छदि-रक् छत्र । नास्ति । राजशासनं यत्र । जिस स्थलमें राजच्छत्र न हो ।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude> n5u4p5imho1j1ogmr6nk1rj7u9nj0x8 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३५० 250 83679 666562 666516 2026-07-10T04:23:19Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 666562 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अद्रोह—अद्वैत'''|'''३४३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अद्रोह (सं॰ पु॰) न द्रोहः, अभावार्थे नञ्-तत्। द्रोहका अभाव, डाहका न होना। अद्रोहवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) वह वृत्ति या स्वभाव, जिसमें द्रोह न रहे, तबीअत जो हसदसे बरी हो। अद्रोहिन् (सं॰ त्रि॰) द्रोहसे दूर, जो हसद न करे। अद्वय (सं॰ क्ली॰) न द्वयम्। <small>द्विविभ्यां तयस्वायज्वा। पा ५।२।४३।</small> १ दोका अभाव, एकताई। २ ब्रह्मका एकाकी भाव। ३ अन्तिम सत्य। (पु॰) ४ बुद्धका एक नाम। (त्रि॰) ५ दो नहीं, एक, अकेला, तनहा। अद्वयवादिन्, अद्वैतवादिन् (सं॰ पु॰) अद्वय-वद्-णिनि ; सर्वं खल्विदं ब्रह्म इति वदति। १ वैदान्तिक, अद्वैतवादी २ बुद्ध। अद्वयत्, अद्वयस् (वै॰ त्रि॰) न-द्वि असिच् नास्ति द्वयं यस्य। <small>नित्यमसिच् प्रजामेधयोः। पा ५।४।१२२। नित्यग्रहणा-दन्यचापि भवतोति सूच्राते। (इति वामनः)</small> द्वयरहित, जिसमें दो न हों। अद्वयानन्द (सं॰ पु॰) अद्वयात् लब्धः आनन्दः। ब्रह्मानन्द, ब्रह्मज्ञानोदित आनन्द, वह आराम जो परमेश्वरको पहंचानने से मिलता है। २ आत्मबोध टीकाकार। (त्रि॰) ३ ब्रह्मानन्दविशिष्ट, जिसे परमेश्वरका आनन्द मिला हो। अद्वयानन्दनाथ—कृष्ण के पुत्र, कालरात्र-पद्धति-रचयिता। अद्वयारण्य—एक वैदान्तिक, योगवाशिष्ठरामायण्टीका और प्रमाणमञ्जरीव्याख्या-रचयिता। अद्वयाविन् (वै॰ त्रि॰) देवपितृयानरूप मार्गद्वयसे रहित। अद्वयु (वै॰ त्रि॰) न द्वयं द्विप्रकारो ऽस्त्यस्य वाहुलकात् उ, बहुव्री॰। द्विप्रकार कपटता-शून्य, भीतर और बाहर एकभावयुक्त। अद्वार (सं॰ क्ली॰) न द्वारम्, निन्दार्थे नञ्-तत्। १ गुप्तद्वार, प्रवेशके अयोग्य द्वार। २ वह स्थान जहां द्वार न हो, बेदरवाज़े की जगह। (त्रि॰) नास्ति द्वारं यस्य, बहुव्री॰। ३ द्वारशून्य, बेदरवाज़ा। ४ दुष्प वेश, घुसने नाक़ाबिल। ५ अनुपाय, जिसे किसी तरहकी न सूझे। मनुसंहितामें लिखा है,— {{Block center|<poem><small>"अद्वारेण च नातीयद ग्रामं वा वेश्म वाव्रृतम्। रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत्॥"४।७३।</small></poem>}} 'प्राचीरादिवेष्टित ग्राम किंवा गृहमें प्राचीरको उल्लङ्घनकर प्रवेश करना न चाहिये। रातके समय वृक्षके मूलकी वासको दूरसे हो परित्याग करे।' कुल्लूकभट्टने इसकी यों टीका की है,— <small>'प्राचीराद्यावृत ग्रामं गृहच्ञ द्वारव्यतिरिक्तप्रदेशेन प्राकारादि लङ्घनं कत्वा न विशेत्।'</small> अद्विज (सं॰ त्रि॰) ब्राह्मण नहीं, जो ब्राह्मण न हो। अद्वितीय (सं॰ त्रि॰) द्विधा इतं भेदं गतं द्वीतं तस्य भावः द्वैतं तन्नास्ति यस्य, बहुव्री॰। <small>द्वेस्तीयः पा ५|२।५४। १ स्वजातिके द्वितीयसे रहित अपनी जाति में बेजोड़। २ केवल, ख़ास। ३ अतुल्य, लासानी। अहिष्येण्य (वै॰ त्रि॰) न द्वेष्टुं शीलमस्य, द्वषि-एण्यन् किच्च ; नञ्-तत्। प्रियरूप, प्रियरस, अद्वेष्यरस ; जो घृणा करने योग्य न हो, जिससे वैर रखना उचित नहीं। अद्वेष (सं॰ पु॰) न द्वेषः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ द्वेषाभाव, हसदका न रहना। (त्रि॰) नास्ति द्वेषोऽस्य बहुव्री॰। २ द्वेषशून्य, द्वेषरहित; हसद न रखनेवाला, दिलका सच्चा। अद्वेषरागिन् (सं॰ त्रि॰) द्वेषसे दूर रहनेवाला, जो हसद न रखे। अद्वेषस् (वै॰ त्रि॰) न द्विष-असुन्, नञ्-तत्। अद्वेष, द्वेषहीन, जिसे डाह न रहे। अद्वेषिन् (सं॰ त्रि॰) द्वेषरहित, हसद से ख़ाली। अद्वेष्टृ (सं॰ पु॰) जो शत्रु न हो, मित्र ; दोस्त। अद्वैत (सं॰ क्ली॰) द्विधा इतं द्वीतं तस्य भावः द्वैतं भेदः ; न द्वैतम्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ अभेद, एकताई। २ ब्रह्म और जीवकी अभिन्नता। ३ अन्तिम सत्य, आख़िरी सचाई। ४ एक उपनिषत्का नाम। (त्रि॰) नास्ति द्वैतं भेदो यत्र, बहुव्री॰। ५ भेदरहित, द्वितीयरहित, एक, ब्रह्म ; दोसे ख़ाली, जिसका कोई जोड़ न हो। (पु॰) ६ अद्वैतप्रभु नामक एक गौराङ्गभक्त आचार्य।<noinclude></noinclude> 3aizcqf9hehkd7f3bfez5lm5qiv95yb 666563 666562 2026-07-10T04:24:11Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 666563 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अद्रोह—अद्वैत'''|'''३४३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अद्रोह (सं॰ पु॰) न द्रोहः, अभावार्थे नञ्-तत्। द्रोहका अभाव, डाहका न होना। अद्रोहवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) वह 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रहित। अद्वयु (वै॰ त्रि॰) न द्वयं द्विप्रकारो ऽस्त्यस्य वाहुलकात् उ, बहुव्री॰। द्विप्रकार कपटता-शून्य, भीतर और बाहर एकभावयुक्त। अद्वार (सं॰ क्ली॰) न द्वारम्, निन्दार्थे नञ्-तत्। १ गुप्तद्वार, प्रवेशके अयोग्य द्वार। २ वह स्थान जहां द्वार न हो, बेदरवाज़े की जगह। (त्रि॰) नास्ति द्वारं यस्य, बहुव्री॰। ३ द्वारशून्य, बेदरवाज़ा। ४ दुष्प वेश, घुसने नाक़ाबिल। ५ अनुपाय, जिसे किसी तरहकी न सूझे। मनुसंहितामें लिखा है,—<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{Block center|<poem><small>"अद्वारेण च नातीयद ग्रामं वा वेश्म वाव्रृतम्। रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत्॥"४।७३।</small></poem>}} 'प्राचीरादिवेष्टित ग्राम किंवा गृहमें प्राचीरको उल्लङ्घनकर प्रवेश करना न चाहिये। रातके समय वृक्षके मूलकी वासको दूरसे हो परित्याग करे।' कुल्लूकभट्टने इसकी यों टीका की है,— <small>'प्राचीराद्यावृत ग्रामं गृहच्ञ द्वारव्यतिरिक्तप्रदेशेन प्राकारादि लङ्घनं कत्वा न विशेत्।'</small> अद्विज (सं॰ त्रि॰) ब्राह्मण नहीं, जो ब्राह्मण न हो। अद्वितीय (सं॰ त्रि॰) द्विधा इतं भेदं गतं द्वीतं तस्य भावः द्वैतं तन्नास्ति यस्य, बहुव्री॰। <small>द्वेस्तीयः पा ५|२।५४। १ स्वजातिके द्वितीयसे रहित अपनी जाति में बेजोड़। २ केवल, ख़ास। ३ अतुल्य, लासानी। अहिष्येण्य (वै॰ त्रि॰) न द्वेष्टुं शीलमस्य, द्वषि-एण्यन् किच्च ; नञ्-तत्। प्रियरूप, प्रियरस, अद्वेष्यरस ; जो घृणा करने योग्य न हो, जिससे वैर रखना उचित नहीं। अद्वेष (सं॰ पु॰) न द्वेषः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ द्वेषाभाव, हसदका न रहना। (त्रि॰) नास्ति द्वेषोऽस्य बहुव्री॰। २ द्वेषशून्य, द्वेषरहित; हसद न रखनेवाला, दिलका सच्चा। अद्वेषरागिन् (सं॰ त्रि॰) द्वेषसे दूर रहनेवाला, जो हसद न रखे। अद्वेषस् (वै॰ त्रि॰) न द्विष-असुन्, नञ्-तत्। अद्वेष, द्वेषहीन, जिसे डाह न रहे। अद्वेषिन् (सं॰ त्रि॰) द्वेषरहित, हसद से ख़ाली। अद्वेष्टृ (सं॰ पु॰) जो शत्रु न हो, मित्र ; दोस्त। अद्वैत (सं॰ क्ली॰) द्विधा इतं द्वीतं तस्य भावः द्वैतं भेदः ; न द्वैतम्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ अभेद, एकताई। २ ब्रह्म और जीवकी अभिन्नता। ३ अन्तिम सत्य, आख़िरी सचाई। ४ एक उपनिषत्का नाम। (त्रि॰) नास्ति द्वैतं भेदो यत्र, बहुव्री॰। ५ भेदरहित, द्वितीयरहित, एक, ब्रह्म ; दोसे ख़ाली, जिसका कोई जोड़ न हो। (पु॰) ६ अद्वैतप्रभु नामक एक गौराङ्गभक्त आचार्य।<noinclude></noinclude> gixcy5eqohi9g41s109yu14j78fmlsn 666564 666563 2026-07-10T04:24:49Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 666564 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अद्रोह—अद्वैत'''|'''३४३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अद्रोह (सं॰ पु॰) न द्रोहः, अभावार्थे नञ्-तत्। द्रोहका अभाव, डाहका न होना। अद्रोहवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) वह वृत्ति या स्वभाव, जिसमें द्रोह न रहे, तबीअत जो हसदसे बरी हो। अद्रोहिन् (सं॰ त्रि॰) द्रोहसे दूर, जो हसद न करे। अद्वय (सं॰ क्ली॰) न द्वयम्। <small>द्विविभ्यां तयस्वायज्वा। पा ५।२।४३।</small> १ दोका अभाव, एकताई। २ ब्रह्मका एकाकी भाव। ३ अन्तिम सत्य। (पु॰) ४ बुद्धका एक नाम। (त्रि॰) ५ दो नहीं, एक, अकेला, तनहा। अद्वयवादिन्, अद्वैतवादिन् (सं॰ पु॰) अद्वय-वद्-णिनि ; सर्वं खल्विदं ब्रह्म इति वदति। १ वैदान्तिक, अद्वैतवादी २ बुद्ध। अद्वयत्, अद्वयस् (वै॰ त्रि॰) न-द्वि असिच् नास्ति द्वयं यस्य। <small>नित्यमसिच् प्रजामेधयोः। पा ५।४।१२२। नित्यग्रहणा-दन्यचापि भवतोति सूच्राते। (इति वामनः)</small> द्वयरहित, जिसमें दो न हों। अद्वयानन्द (सं॰ पु॰) अद्वयात् लब्धः आनन्दः। ब्रह्मानन्द, ब्रह्मज्ञानोदित आनन्द, वह आराम जो परमेश्वरको पहंचानने से मिलता है। २ आत्मबोध टीकाकार। (त्रि॰) ३ ब्रह्मानन्दविशिष्ट, जिसे परमेश्वरका आनन्द मिला हो। अद्वयानन्दनाथ—कृष्ण के पुत्र, कालरात्र-पद्धति-रचयिता। अद्वयारण्य—एक वैदान्तिक, योगवाशिष्ठरामायण्टीका और प्रमाणमञ्जरीव्याख्या-रचयिता। अद्वयाविन् (वै॰ त्रि॰) देवपितृयानरूप मार्गद्वयसे रहित। अद्वयु (वै॰ त्रि॰) न द्वयं द्विप्रकारो ऽस्त्यस्य वाहुलकात् उ, बहुव्री॰। द्विप्रकार कपटता-शून्य, भीतर और बाहर एकभावयुक्त। अद्वार (सं॰ क्ली॰) न द्वारम्, निन्दार्थे नञ्-तत्। १ गुप्तद्वार, प्रवेशके अयोग्य द्वार। २ वह स्थान जहां द्वार न हो, बेदरवाज़े की जगह। (त्रि॰) नास्ति द्वारं यस्य, बहुव्री॰। ३ द्वारशून्य, बेदरवाज़ा। ४ दुष्प वेश, घुसने नाक़ाबिल। ५ अनुपाय, जिसे किसी तरहकी न सूझे। मनुसंहितामें लिखा है,—<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{Block center|<poem><small>"अद्वारेण च नातीयद ग्रामं वा वेश्म वाव्रृतम्। रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत्॥"४।७३।</small></poem>}} 'प्राचीरादिवेष्टित ग्राम किंवा गृहमें प्राचीरको उल्लङ्घनकर प्रवेश करना न चाहिये। रातके समय वृक्षके मूलकी वासको दूरसे हो परित्याग करे।' कुल्लूकभट्टने इसकी यों टीका की है,— <small>'प्राचीराद्यावृत ग्रामं गृहच्ञ द्वारव्यतिरिक्तप्रदेशेन प्राकारादि लङ्घनं कत्वा न विशेत्।'</small> अद्विज (सं॰ त्रि॰) ब्राह्मण नहीं, जो ब्राह्मण न हो। अद्वितीय (सं॰ त्रि॰) द्विधा इतं भेदं गतं द्वीतं तस्य भावः द्वैतं तन्नास्ति यस्य, बहुव्री॰। <small>द्वेस्तीयः पा ५|२।५४। १ स्वजातिके द्वितीयसे रहित अपनी जाति में बेजोड़। २ केवल, ख़ास। ३ अतुल्य, लासानी। अहिष्येण्य (वै॰ त्रि॰) न द्वेष्टुं शीलमस्य, द्वषि-एण्यन् किच्च ; नञ्-तत्। प्रियरूप, प्रियरस, अद्वेष्यरस ; जो घृणा करने योग्य न हो, जिससे वैर रखना उचित नहीं। अद्वेष (सं॰ पु॰) न द्वेषः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ द्वेषाभाव, हसदका न रहना। (त्रि॰) नास्ति द्वेषोऽस्य बहुव्री॰। २ द्वेषशून्य, द्वेषरहित; हसद न रखनेवाला, दिलका सच्चा। अद्वेषरागिन् (सं॰ त्रि॰) द्वेषसे दूर रहनेवाला, जो हसद न रखे। अद्वेषस् (वै॰ त्रि॰) न द्विष-असुन्, नञ्-तत्। अद्वेष, द्वेषहीन, जिसे डाह न रहे। अद्वेषिन् (सं॰ त्रि॰) द्वेषरहित, हसद से ख़ाली। अद्वेष्टृ (सं॰ पु॰) जो शत्रु न हो, मित्र ; दोस्त। अद्वैत (सं॰ क्ली॰) द्विधा इतं द्वीतं तस्य भावः द्वैतं भेदः ; न द्वैतम्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ अभेद, एकताई। २ ब्रह्म और जीवकी अभिन्नता। ३ अन्तिम सत्य, आख़िरी सचाई। ४ एक उपनिषत्का नाम। (त्रि॰) नास्ति द्वैतं भेदो यत्र, बहुव्री॰। ५ भेदरहित, द्वितीयरहित, एक, ब्रह्म ; दोसे ख़ाली, जिसका कोई जोड़ न हो। (पु॰) ६ अद्वैतप्रभु नामक एक गौराङ्गभक्त आचार्य। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> knehghqjwbzvlj54a4djndeawa57pfd पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२५१ 250 105304 666540 371938 2026-07-09T17:08:18Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 666540 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२५२|कवली-कवि}}</noinclude> {{Multicol|line=1px solid black}} <br>कर्मणि क्त। १ भुक्त, खाया हुआ। २ ग्रस्त, निगला हुआ। ३ अधिकृत, किया हुआ।<br> <br>कवली (सं॰ स्त्री॰) बदरी वृक्ष, बैरी।<br> <br>कवलीकृत (सं॰ त्रि॰) प्रकवलं कवलं कृतम्, कवल- चि-कृ-क्त। कवलित, कौर बनाकर खाया हुआ।<br> <br>कवष (वै॰ त्रि॰) कु-असुन् छन्दस्मात् वत्वम्। छिद्रयुक्त, जिसमें छेद रहें।<br> <br>कवष (वै॰ त्रि॰) कु-अषच्। १ सच्छिद्र (कपाटादि) छिददार (किवाड़ वगैरह)। (पु॰) २ प्राचीन ऋषिविशेष। इनके पिताका नाम इलूष था। माता दासी रहीं। ऋक्संहिताके दशम मण्डलमें इनके बनाये मन्त्र विद्यमान हैं। एक समय सारस्वत प्रदेशमें कतिपय ऋषि यज्ञ करते थे। इन्होंने उनकी पंक्तिमें बैठ भोजन करना चाहा। किन्तु उन्होंने इन्हें दासीका पुत्र बता निकाला था। इससे यह ऋषि क्रोधांवेगमें चल दिये। फिर इन्होंने तपस्या कर अनेक मन्त्र बनाये थे। उन मन्त्रोंको सुन देवगण प्रसन्न हुए। इससे ऋषि प्रार्थना करने लगे और यह उनकी पंक्तिमें लिये गये। <small>(ऐतरेयब्राह्मण)</small> ३ धर्मशास्त्रके रचयिता।<br> <br>कवस (सं॰ पु॰) कु-अस्। सन्नाह, ज़िरह। २ कण्टक-गुल्म, कंटीला झाड़।<br> <br>कवाग्नि (सं॰ पु॰) कुअल्पो अग्नि; को: कवातिशः। अल्प अग्नि, थोड़ी आग।<br> <br>कवाट (सं॰ क्ली॰) कलं शब्दं घटति, कु भावे अप्-अट् अच्; कं वातं वटति वारयति वा, क वट्-अण् कपाट, शब्द करने या वायुको रोक रखनेवाला किवाड़।<br> {{block center|<poem> "मीचवारकवाटपाटनकरो काशीपुराधीश्वरो।" (अन्नदासत्व) </poem>}} <br>कवाटक (सं॰ क्ली॰) कवाट स्वार्थे कन्। कवाट, किवाड़।<br> <br>कवाटन्न (सं॰ पु॰) कवाटम् इति शकत्वा, कवाट- हन्-डक्। शक्तौ हस्तिकवाटयो:। वा ३।२।५४। तस्कर विशेष, किवाड़तोड़ छलनेवाला डाकू।<br> <br>कवाटचक्र कवाटचक देखो। <br>कवाटवृक्ष (सं॰ क्ली॰) कवाटं वृक्षं यस्यात्, भू-तत्। स्वनामख्यात वृक्ष, एक पेड़।<br> {{Multicol-break}} <br>कवाटी (सं॰ स्त्री॰) कवाट अल्पार्थ डीप्। क्षुद्र कपाट, किवाड़ी।<br> <br>कवाम (अ॰ पु॰) १ पक्कागढ़ रस विशेष, पकाकर शर्बत-जैसा बनाया हुआ रस, जिलाम। २ गीला, चागनी।<br> <br>कवायद (अ॰ पु॰) १ व्यवस्थायें, तारीके। २ व्याक- रणके नियम। ३ लड़ाईकी तालीमी तरीका। सेनामें योद्धाओंकी टोलियां अग्रभाग एवं पश्चात् भागमें नियमानुसार लगायी जाती हैं। सैन्याध्यक्ष शिकाके शब्द उच्चारण करते हैं। सैनिक वाद्य प्रदर्शित भी बजते हैं। इस पर सैनिक अपना कार्य करने लगते हैं। उनके अग्रगमन, पश्चात्गमन, सुदृढपरिवर्तन, शस्त्र सज्जीकरण, उत्तोजन, प्रहार, आक्रमण, रक्षा, शयन और उपवेशन आदिका नाम क़वायद है। <br>यह शब्द 'कायदे' का बहुवचन है। हिन्दी में इसे स्त्रीलिङ्ग भी मानते हैं।<br> <br>कवार (सं॰ पु॰-क्ल॰) कं जलं आवारयत्वेन वृणोति,-क-वृ-अण्। १ पद्म, कंवल। २ पक्षिविशेष, एक चिड़िया। इसका उच्च अतिदीर्घ होता है।<br> <br>कवारि (सं॰ पु॰) कुत्सितोऽ अरिः, कोः कवादेश:। । कुत्सित शत्रु, पाजी दुश्मन।<br> <br>कवासख (सं॰ त्रि॰) कुत्सितस्य सखा, कुत्सबा- टच्, कोः कवाद्यः। कुत्सित सखायुक्त, खुदगर्ज।<br> <br>कवि (सं॰ पु॰) कवते स्तोकान् ग्रयते वर्णयति वा,- कव्-इन्। १ कविता-गान प्रभृति रचयिता, शायर, छन्द बनानेवाला। २ वाल्मीकि। ३ शुक्र। ४ पण्डित। ५ ऋषिविशेष। यह भृगुके पुत्र और शुक्राचार्यके पिता थे। ६ सूर्य, सूरज। ७ कलि देवके ज्येष्ठ भ्राता। ८ ब्रह्मा। ९ वासुदेव और देराज प्रजापतिकी कन्याके एक पुत्र।<br> {{block center|<poem><small> "कन्यायां भरतश्रेष्ठ देवराजप्रजापतेः। ऊद्रुः पूरुः शतह्रदश्च सत्यभाक् कविः॥" (हरिवंश २ अ॰)</small></poem>}} (त्रि॰) १० क्रान्तदर्शी, औलिया। ११ मेधावी, आक्रमन्द। (सं॰ स्त्री॰) कु-अच्छ्। <small>अच इ:। उप ४।१४८।</small> १२ खलीन, लगाम। कवि-यवद्वीपकी प्राचीन भाषा। ब्रह्म, श्याम,- {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> nsld9kxl2flajhao5poxndx97pxrjj6 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४१२ 250 106305 666522 373166 2026-07-09T13:08:33Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 666522 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामकला-कामकलावटी| ४१३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पाशा मेधापासूनशरपसाकारितख द्वारा!-: बालारुचारचाको शशिमानुक्रमानु लोचनविवया । मिथुम गुणमेदादा विन्दुवयात्मक वाले। कामशीमियशप्रमुखइन्वयात्ममा बितसम् । वसुकोणनिवासिन्यो याताः सध्यारयावशिन्धाधाः । पुर्यटकमेवेदं चक्रमनीः सम्बिदामनी देव्याः । सहिषयहरयता: सर्वचादि-खरूपमापनाः । अन्नदशारनिलया लसन्ति शरदिन्दुसन्दराकाराः। नहायपतिकोषे योगिन्धः स सिडिदाः पूर्वाः । देवौधोक में न्द्रियविषयमया वियदेवभूपाद्याः । भुवमारचक्रमवमा देवीमनुकरणविवरयस्फुरपाः । सध्यासवर्णवसमाः सवित्याः सम्प्रदाययोगिन्यः । भध्यामहदहातिसम्मावा: खौलतामाकाराः। अहार और पञ्चतम्मान गुप्ततर योगिनीसमूह है। कामाकर्षियादिस्वरूपतः योदमारमध्याम्ने । सद्रास्त्रिखण्यास सम्धिन्मष्य; समष्ठिताः सर्वाः । पादिमहाग्रहवामा मासा बालार्ककान्तिभिः सदृशाः ॥ पाचारनषकमस्या भवचक्रावन परिणतं येन। नवनादयनयोपि च सद्राकरिष परिपसायक। पस्खास्तगादिसप्तकमाचारयं वमटका स्पष्टम् । माध्यादिमावरुप मध्यमम्पियामेतदध्यास, अणिमादिम क्योऽस्था: खोकरकममीयकामिमीरूपाः । विद्यान्तरफलम सा गुपमा मान्यम निकैतमगाः ॥ परमानन्दानुभवः परमगुरुनिर्विषविज्ञामा । स पुनः क्रमेया मित्रः कामयत्व ययौ विमर्शा'मान। पासोमः थोपीठ कृतयुगकारी गुरुः शिवो विद्याम् । तस्य ददी खगव्य कामेव विमर्श कपि। साप्येय मिबसचान स्थानेशन् नाष्ठमध्यवासाख्यान्। चित्रमाणविषयमूस्त्रेितायुगादिकारणविगुरुन् । बौविवाधिपतीन् परोषा विद्यर्ण प्रकाशयामास । पतरोधवितयामनुयझौतु गुरुममा विहितः" भावार्थ-पादिसृष्टि का कारण शिव और शति दो विन्दुखरूप है। इन दोनों विन्दुमें शिवरूप विन्दु खेतवर्ण और शतिरूप विन्दु रतवर्ण है। शिव विन्दुसे जब यतिविन्दु मिलता, तब उभय विन्दुके इनीस पचर, समुदाय भाषा. एवं पत्र भूतादि <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> शिव पोर इकार अक्षरसे शक्तिका बोध है। इसीखिये शिवविन्दु, मतिविन्दु पार नाद तीनांके संमिश्रणसे "आई"कारको उत्पत्ति हुवा करती है। इसीको कामकला करते और इसी शक्ति का नाम त्रिपुरा सुन्दरी रखते हैं। उक्त तीनों विन्दु एक त्रिकोण- चक्रके मध्यस्थित हैं। सुतरां त्रिपुरासुन्दरी उसी चक्र मध्य प्रवस्थान करती हैं। फिर उसके कोण समूहमें सिविपदा योगिनियाँका अधिष्ठान है। इन त्रिपुरासुन्दरीका बालारणकी भांति अरुण वर्ण है। मस्तकमें चन्द्रकला चन्द्र, सूर्य और अग्नि चक्षुब्रय हैं। पाश, अङ्गुम, इक्षु. धनुः और पचथर हिरदच्छदमसरीने नयन्ति गुप्ततरयोगिनीस मा. इस्तमें प्रतिष्ठित हैं। पोष्ठदयमें अव्यक्त, महत्, भूतानोन्द्रियदयकं ममय देण्या विकारपोड़कम् । फिर मध्यम पचभूत, दश इन्द्रिय, मन और षोड़श विकार अवस्थित है। यह कामकलाविद्या अवगत हो सकनेसे त्रिपुरा- सुन्दरीत्व मिलता है। किन्तु गुरुके उपदेश व्यतीत केवल शास्त्रपाठसे इसमें कभी ज्ञानलाभ नहीं होता। इसके ४६ मूलतत्त्व हैं। यथा- १ शिव, २ शक्ति, ३ सदाशिव, ४ ईश्वर, ५ शुद्ध विद्या, ६ माया, ७ कन्ना, ८ विद्या, राग, १० काल, ११ नियति, १२ पुरुष, १३ प्रकृति, १४ प्रहार, १५ बुधि१५ मनः, १७ श्रोत्र, १८ त्वक, १८ नेत्र, २. जिवा, २१-वाण, २२ पाद, २२ पाणि, २४ पायु, २५ तपस्य, २६ शब्द, २० स्पर्श, २८ रूप, २८ रस, ३. गन्ध, २१ आकाश, ३२ वायु, ३३ तेना, ३४ पप ३५ पृथिवी इत्यादि। कामकखाख्यरस (सं० पु.) बाजीकरणौषध, ताकतको एक दवा। मृतसूमानक और स्वर्णको पखगन्धा एवं गुड़चौके रस पौर मुसती तथा कदलीकन्दके द्रवमें घोंटते हैं। मृतसूताम्रक एवं स्वर्णको धीमी धीमी आंचमें पका फिर उक्त ट्रवोंसे मटन करना चाहिये। संयोगका काम नाम पड़ता है। दोनों विन्दु भाना इसी प्रकार बारवार घाटते और पकाते आठ पुट लगाते . कला और नाद रखते हैं। इन शिवशक्ति विन्दुसे | है। शाल्मलौनात निर्यासके साथ चार भाषा सेवनः करनेसे यह बसवीर्य बढ़ाता है। (रसरबाबर ) यावतीय पदार्थको सृष्टि होती है। कार अचरमे ! कामकसावटौ । स्त्री) औषषविशेष, एक दवा।<noinclude></noinclude> iz8fyckhs9oe33g85225qker8jus2g8 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५०० 250 107473 666541 664982 2026-07-09T17:15:55Z सौरभ तिवारी 05 49 /* प्रमाणित */ 666541 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||कायस्थ|५०१}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>है। उनसे अयोध्या, काशी, इलाहाबाद, मिर्जापुर, गोरखपुर, प्रभृति स्थानोंमें ही लोग बहुत रहते हैं। {{smaller|भटनागर}}—अपनेको चित्रगुप्तके पुत्र चित्रका सन्तान बताते हैं। उनमें कोई कहता कि पूर्वकाल भट नदीके तीर रहनेसे ही उक्त नाम पड़ा है। फिर किसीके मतमें महमूद गज़नवी, तैमूर और हुमायूंके पुत्र कामरानने दुर्ग अधिकार करनेके लिये भटनगरमें प्राणपणसे युद्ध किया था। उसी इतिहास-प्रसिद्ध भटनगरमें जो लोग रहे, वह भटनागर नामसे विख्यात हुवे। उनमें दो श्रेणी हैं—भटनागर कदीम या पुराने और गौड़कायस्थोंमें मिल जानेवाले भटनागरी। {{smaller|शकसेन}}—'सखिसेना'से ही अपने नामकी उत्पत्ति बताते हैं। उनके पूर्वपुरुषोंने वीरत्व दिखा श्रीनगरके श्रीवास्तव्य राजावोंसे उक्त उपाधि पाया था। प्रकृत प्रस्तावसे जिन्होंने शक राजावोंके सेनाविभागमें कृतित्व दिखाया, उन्हींका वंश 'शकसेन' कहाया। प्राचीन शिलालिपिमें शकसेनजातीय कायस्थ-ठक्कुर नाम लिखा है। शकसेनोंमें भी 'खरे' और 'दूसरे' दो कुल हैं। प्रवादानुसार उक्त श्रेणीके सोमदत्त नामक कोई व्यक्ति कुशके कोशाध्यक्ष थे। शकसेन कहते कि उन्हीं कुशने प्रीत ही सोमदत्तको खर अर्थात् सत् सम्बोधन किया था। उनके वंशधर इसीसे 'खरे' कहे जाते हैं। दूसरा गल्प भी है—अकबरके पिता हुमायूं जब ईरान भाग गये, तब उनके साथ कितने ही शकसेन भी रहे। ईरानमें उन्होंने १६ वर्ष व्यतीत किये। लौटने पर भारतवर्षके शकसेन उनके साथ भोजन करनेको सम्मत न हुवे। इसी प्रकार ईरानसे प्रत्यागत शकसेन और उनके वंशधर 'दूसरे' अर्थात् हेय समझे गये। शकसेन अपनेको चित्रगुप्त-पुत्र मतिमान‍्का वंशधर बताते हैं। उनका अधिक वास इटावा जिले में है। कन्नौज राना जयचन्द्रके मरने पर शकसेन समरसिंहके अधीन इटावेमें जा कर बसे थे। उनके आदिपुरुष पुष्करदास और निर्मलदासने समरसिंहके निकट जागीरमें कई गांव और चौधरी पदको लाभ किया। उनके वंशधर समरसिंहके समयसे अंगरेजी <noinclude>{{left|Vol. IV,{{gap}}126}}{{Multicol-break}}</noinclude> अधिकार पर्यन्त पुरुषानुक्रममें इटावेकी कानूनगोई करते रहे।<ref>Hume's Memorandum on the Castes of Etawa, p. 87.</ref> इटावेके उक्त शकसेन कायस्थ वंशमें ही प्रसिद्ध वीर राजा नवलरायने जन्म लिया था। वह फरुखाबादवाले बङ्गस-नवाबके वजीर और प्रधान सेनापति रहे। उन्होंने अनेक स्थानमें युद्ध कर जो वीरत्व दिखाया, वह प्रशंसनीय कहाया है।<ref>Journ. As. Soc. Bengal, Vol. XLVIII, pt. I, p. 50—66. नवलरायका विस्तृत विवरण द्रष्टम्य है।</ref> इटावेके भाट आज भी राजा नवलरायकी वीरगाथा गाया करते हैं। {{smaller|अहिठान}}—अपना परिचय चित्रगुप्तपुत्र विश्वभानुके नामसे दिया करते हैं। अहिठान नाम कैसे बना है? उसके सम्बन्धमें एक गल्प सुनते हैं—वाराणसी में बनार नामक एक विख्यात राजा रहे। उन्हें उक्त श्रेणीके पूर्वपुरुषोंने अष्टप्रकार मुक्ताका उपहार दिया था। उसीसे अष्टान (अहिठान) नाम चल पड़ा। उनमें पूर्वी और पश्चिमी दो भेद हैं। पूर्वी जौनपुर तथा उसके निकटवर्ती स्थान और पश्चिमी लखनऊ एवं उसके आसपास वास करते हैं। उभय श्रेणियोंमें पान-भोजन प्रचलित नहीं। {{smaller|अन्वष्ठ}}—अपनेको चित्रगुप्तके पुत्र हिमवान‍्का वंशधर बताते हैं। प्रवाद है—उनके पूर्वपुरुष गिरनार पर्वत पर जा कर रहे और वहां अम्बादेवीकी पूजा करने पर 'अम्बष्ठ' नामसे परिचित हुवे। स्कन्दपुराणीय सह्याद्रिखण्ड और विष्णुपुराणसे समझ पड़ता कि भारतके पश्चिमांशमें, अम्बष्ठ नामक एक जनपद रहा। बहुत सम्भव है कि उसी स्थानके अधिवासी कायस्थ अम्बष्ठ नामसे ख्यात हुये। ग्रीक (यूनानी) ऐतिहासिक आरियानने उनका नाम अम्बष्ठो (Ambastae) लिखा है। अम्बष्ठ बहुतसे, बङ्गालमें भी जा कर रहने लगे हैं। उक्त प्रदेशके अम्बष्ठ कायस्थोंका आचार-व्यवहार ब्राह्मणों से मिलता है। <noinclude>{{rule}}</noinclude><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> m8vnzbhpkjck3qj0bmh6e8gz6f9s4gm 666576 666541 2026-07-10T11:07:16Z AKTBot 6197 666576 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||कायस्थ|५०१}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>है। उनसे अयोध्या, काशी, इलाहाबाद, मिर्जापुर, गोरखपुर, प्रभृति स्थानोंमें ही लोग बहुत रहते हैं। {{smaller|भटनागर}}—अपनेको चित्रगुप्तके पुत्र चित्रका सन्तान बताते हैं। उनमें कोई कहता कि पूर्वकाल भट नदीके तीर रहनेसे ही उक्त नाम पड़ा है। फिर किसीके मतमें महमूद गज़नवी, तैमूर और हुमायूंके पुत्र कामरानने दुर्ग अधिकार करनेके लिये भटनगरमें प्राणपणसे युद्ध किया था। उसी इतिहास-प्रसिद्ध भटनगरमें जो लोग रहे, वह भटनागर नामसे विख्यात हुवे। उनमें दो श्रेणी हैं—भटनागर कदीम या पुराने और गौड़कायस्थोंमें मिल जानेवाले भटनागरी। {{smaller|शकसेन}}—'सखिसेना'से ही अपने नामकी उत्पत्ति बताते हैं। उनके पूर्वपुरुषोंने वीरत्व दिखा श्रीनगरके श्रीवास्तव्य राजावोंसे उक्त उपाधि पाया था। प्रकृत प्रस्तावसे जिन्होंने शक राजावोंके सेनाविभागमें कृतित्व दिखाया, उन्हींका वंश 'शकसेन' कहाया। प्राचीन शिलालिपिमें शकसेनजातीय कायस्थ-ठक्कुर नाम लिखा है। शकसेनोंमें भी 'खरे' और 'दूसरे' दो कुल हैं। प्रवादानुसार उक्त श्रेणीके सोमदत्त नामक कोई व्यक्ति कुशके कोशाध्यक्ष थे। शकसेन कहते कि उन्हीं कुशने प्रीत ही सोमदत्तको खर अर्थात् सत् सम्बोधन किया था। उनके वंशधर इसीसे 'खरे' कहे जाते हैं। दूसरा गल्प भी है—अकबरके पिता हुमायूं जब ईरान भाग गये, तब उनके साथ कितने ही शकसेन भी रहे। ईरानमें उन्होंने १६ वर्ष व्यतीत किये। लौटने पर भारतवर्षके शकसेन उनके साथ भोजन करनेको सम्मत न हुवे। इसी प्रकार ईरानसे प्रत्यागत शकसेन और उनके वंशधर 'दूसरे' अर्थात् हेय समझे गये। शकसेन अपनेको चित्रगुप्त-पुत्र मतिमान‍्का वंशधर बताते हैं। उनका अधिक वास इटावा जिले में है। कन्नौज राना जयचन्द्रके मरने पर शकसेन समरसिंहके अधीन इटावेमें जा कर बसे थे। उनके आदिपुरुष पुष्करदास और निर्मलदासने समरसिंहके निकट जागीरमें कई गांव और चौधरी पदको लाभ किया। उनके वंशधर समरसिंहके समयसे अंगरेजी <noinclude>{{left|Vol. IV,{{gap}}126}}{{Multicol-break}}</noinclude> अधिकार पर्यन्त पुरुषानुक्रममें इटावेकी कानूनगोई करते रहे।<ref>Hume's Memorandum on the Castes of Etawa, p. 87.</ref> इटावेके उक्त शकसेन कायस्थ वंशमें ही प्रसिद्ध वीर राजा नवलरायने जन्म लिया था। वह फरुखाबादवाले बङ्गस-नवाबके वजीर और प्रधान सेनापति रहे। उन्होंने अनेक स्थानमें युद्ध कर जो वीरत्व दिखाया, वह प्रशंसनीय कहाया है।<ref>Journ. As. Soc. Bengal, Vol. XLVIII, pt. I, p. 50—66. नवलरायका विस्तृत विवरण द्रष्टव्य है।</ref> इटावेके भाट आज भी राजा नवलरायकी वीरगाथा गाया करते हैं। {{smaller|अहिठान}}—अपना परिचय चित्रगुप्तपुत्र विश्वभानुके नामसे दिया करते हैं। अहिठान नाम कैसे बना है? उसके सम्बन्धमें एक गल्प सुनते हैं—वाराणसी में बनार नामक एक विख्यात राजा रहे। उन्हें उक्त श्रेणीके पूर्वपुरुषोंने अष्टप्रकार मुक्ताका उपहार दिया था। उसीसे अष्टान (अहिठान) नाम चल पड़ा। उनमें पूर्वी और पश्चिमी दो भेद हैं। पूर्वी जौनपुर तथा उसके निकटवर्ती स्थान और पश्चिमी लखनऊ एवं उसके आसपास वास करते हैं। उभय श्रेणियोंमें पान-भोजन प्रचलित नहीं। {{smaller|अन्वष्ठ}}—अपनेको चित्रगुप्तके पुत्र हिमवान‍्का वंशधर बताते हैं। प्रवाद है—उनके पूर्वपुरुष गिरनार पर्वत पर जा कर रहे और वहां अम्बादेवीकी पूजा करने पर 'अम्बष्ठ' नामसे परिचित हुवे। स्कन्दपुराणीय सह्याद्रिखण्ड और विष्णुपुराणसे समझ पड़ता कि भारतके पश्चिमांशमें, अम्बष्ठ नामक एक जनपद रहा। बहुत सम्भव है कि उसी स्थानके अधिवासी कायस्थ अम्बष्ठ नामसे ख्यात हुये। ग्रीक (यूनानी) ऐतिहासिक आरियानने उनका नाम अम्बष्ठो (Ambastae) लिखा है। अम्बष्ठ बहुतसे, बङ्गालमें भी जा कर रहने लगे हैं। उक्त प्रदेशके अम्बष्ठ कायस्थोंका आचार-व्यवहार ब्राह्मणों से मिलता है। <noinclude>{{rule}}</noinclude><noinclude>{{smallrefs}}</noinclude> jgpobsk1oqjtnvnosqqeqpt6spj91yb विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६ 4 193661 666572 666211 2026-07-10T07:28:43Z Prajjwal3959 3861 /* प्रतिभागी */ 666572 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # 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पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) --[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:१९, ६ जुलाई २०२६ (UTC) प्रतियोगिता के शुरुआत हुए तीन दिन हो गये. इस परिधि के एक भी पृष्ठ में काम जारी नहीं हुआ. ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष अष्टादश भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग अठारह]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ अभिमत से पृष्ठ संख्या १२२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) १६:१६, ७ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२३ से पृष्ठ संख्या २४६ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४७ से पृष्ठ संख्या ३७० तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७१ से पृष्ठ संख्या ४९४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९५ से पृष्ठ संख्या ६१८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६१९ से पृष्ठ संख्या ७४२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४३ से पृष्ठ संख्या ७६३ तक (कुल ५२ अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:११, ६ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Prajjwal3959|Prajjwal3959]] ([[सदस्य वार्ता:Prajjwal3959|वार्ता]]) ०७:२७, १० जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] 9fl6fdvfhdryh00o3mp3qhdgr3mupl4 666573 666572 2026-07-10T07:32:21Z Prajjwal3959 3861 /* पुस्तक सूची */ 666573 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित पृष्ठों में से शोधित किए गए पृष्ठ ही अंक के लिए गिने जाएँगे। सूची के बाहर की पुस्तकों या पृष्ठों पर किए गए कार्य संपादनोत्सव के लिए मान्य नहीं होंगे। # निर्धारित पुस्तक के सामने १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दी गई है। प्रतिभागी एक दिन में अधिकतम २० अंक के पृष्ठ शोधित कर सकते हैं। अधिक पृष्ठ शोधित करने पर आरंभिक २० अंक के पृष्ठों का मूल्यांकन किया जाएगा। # संपादनोत्सव के २० दिनों में एक प्रतिभागी अधिकतम ३०० अंक के पृष्ठ सुधार सकते हैं। इससे अधिक पृष्ठ सुधारने पर आरंभिक ३०० अंकों के पृष्ठों का ही मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त समग्र गुणवत्ता के आधार पर अधिकतम ५० गुणवत्ता के अंक निर्णायकों द्वारा दिए जाएँगे। गुणवत्ता के अंक शोधित अंक के ५०% से अधिक नहीं हो सकते हैं। # यदि पृष्ठ में तीन या अधिक ग़लतियाँ हो तो उसे शोधित से अशोधित कर दिया जाएगा तथा उसके लिए प्रतिभागी को कोई अंक नहीं दिया जाएगा। # प्रतिभागियों से पुस्तक को पृष्ठ संख्या के बढ़ते क्रम से शोधित करने की उम्मीद की जाती है जैसे १०१, १०२, १०३... आदि। शोधित करने के लिए किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा चुनी हुई पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) --[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:१९, ६ जुलाई २०२६ (UTC) प्रतियोगिता के शुरुआत हुए तीन दिन हो गये. इस परिधि के एक भी पृष्ठ में काम जारी नहीं हुआ. ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष अष्टादश भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग अठारह]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ अभिमत से पृष्ठ संख्या १२२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) १६:१६, ७ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२३ से पृष्ठ संख्या २४६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Prajjwal3959|Prajjwal3959]] ([[सदस्य वार्ता:Prajjwal3959|वार्ता]]) ०७:३१, १० जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४७ से पृष्ठ संख्या ३७० तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७१ से पृष्ठ संख्या ४९४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९५ से पृष्ठ संख्या ६१८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६१९ से पृष्ठ संख्या ७४२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४३ से पृष्ठ संख्या ७६३ तक (कुल ५२ अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:११, ६ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Prajjwal3959|Prajjwal3959]] ([[सदस्य वार्ता:Prajjwal3959|वार्ता]]) ०७:२७, १० जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] rimycrcrep62uh2cgbxz0tru7lcfgzm सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07 3 195599 666543 2026-07-09T17:20:08Z सौरभ तिवारी 05 49 "{{संवाद}} {{स्वागत}} --~~~~ == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_भाग_4.djvu/५००&diff=prev&oldi..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 666543 wikitext text/x-wiki {{संवाद}} {{स्वागत}} --[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १७:२०, ९ जुलाई २०२६ (UTC) == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_भाग_4.djvu/५००&diff=prev&oldid=666541 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। आपके द्वारा शोधित पृष्ठों में सामान्य स्तर से अधिक त्रुटियाँ हैं। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद। --[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १७:२०, ९ जुलाई २०२६ (UTC) 462uff48a9b45fck7sxxohcfoxx9s9h