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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष अष्टादश भाग.djvu/१२६
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<noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh||'''मुर्शिदाबाद'''|'''१२३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
था। अन्त में नवाब के मरने पर सिराज ही बङ्गालका स्वाधीन नवाब हुआ। अलीवर्दी के समय हिन्दू और मुसलमान दोनों ही एक समान राज्य के ऊंचे पद पर नियुक्त किये गये थे। राजा जानकीरामका पहले ही उल्लेख हो चुका है। १७५३ ई० में उसकी मृत्यु के बाद उसके चारों लड़कों को अलीवर्दी से खिलअत मिली थी। उसका लड़का राजा दुर्लभराम सेनाविभागका प्रधान दीवान था। राजा रामनारायण पटने का नायब नाजिम था। रायरायां चिन्मय राय तथा आलमचांद के लड़के ऊंचे ऊंचे पद पर नियुक्त हुए थे।उच्च पदस्थ हिन्दू-कर्मचारी ही मनसबदार (सेनानायक) बनाये जाते थे। अलीवर्दी के ऐसे हिन्दू प्रेम के ही कारण हिन्दू-मुसलमान सेनानायक लोग अविचलित उत्साह से नवाबकी जय पताकाके नीचे डटे रहे। शत्रु लोग बाहर से आ कर कुछ अनिष्ट न कर सके।
अलीवर्दीके गुण सिराज न थे अतएव इसका प्रभाव लोगों पर न पड़ सका। इसके बुरे आचरणसे अधिकांश सेनापति और प्रधान प्रधान हिन्दू कर्मचारी इससे विरक्त हो उठे। इस कारण पूरी सहायता औरसम्पत्ति रहते हुए भी इसकी राजलक्ष्मी कुछ ही दिनों में विमुख हो गई। पलासीकी लड़ाईसे इसके भाग्यने पलटा खाया तथा इङ्गलैण्ड के गोरोका भाग्योदय हुआ। {{smaller|सिराजउद्दाला और कम्पनी शब्दमें सविस्तार वर्णन देखो।}}
मीरजाफर के नाममात्र को नवाबी पद पाने के बाद मीरकासिम कुछ समय तक पुराने गौरवको लौटाने की चेष्टा करता रहा, लेकिन उसका राज्य नष्ट हो गया और अन्तमें उसे संन्यास लेना पड़ा। {{smaller|मीरजाफर और मीरकासिम देखो।}}
मीरकासिमके बाद बूढ़ा मीरजाफर अंगरेजाे की कठपुतलीकी तरह मुर्शिदाबादके सिंहासन पर कुछ दिन बैठा। १७६५ ई० में उसके मरने पर उसका लड़का उत्तराधिकारी हुए। उसके साथ भी अंगरेज लोगाे की नई सन्धि हुई। इस संधि के फलस्वरूप अंगरेजी कम्पनीने मानो शासनकार्य अपने हाथमें ले लिया।
संधिमें यह भी निश्चित हुआ कि बड़ा लाट से परामर्श ले एक नायब नियुक्त करना होगा और बिना उनकी अनुमति के वह नायब हटाया नहीं जा सकता।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
१७६५ ई० में जब अयोध्याके वजीरने अंगरेजोंसे हार खा कर, कम्पनीको पूरी अधीनता स्वीकार कर ली, तब इलाहाबाद और कोराको छोड़ उसके सभी स्थान लौटा दिये गये। कम्पनीने बादशाहको ये दोनों स्थान दे, इसके बदलेमें बादशाही फरमानके अनुसार बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त की। उन दिनों नवाब बादशाहको प्रतिवर्ष २६ लाख रुपये उपहार भेजता था। अंगरेज लोगोंने उसे देनेका भी भार लिया तथा प्रति वर्ष वे निजामतके खर्च के लिये ५३८६१३१) रु० देने में भी सहमत हुए।
१७६६ ई० में नजमउद्दौलाको मृत्यु हुई। पीछे उसका १६ वर्षका भाई सैफ उद्दौला नवाब हुआ। उसके साथ अंगरेज लोगोंकी एक सन्धि हुई और उसका वेतन घटा कर ४१८६१३१ रु० कर दिया गया। १७७० ई० में सैफउद्दौला चल बसा और उसका भाई मुबारकउद्दौला नवाब हुआ। उसके साथ भी एक सन्धि हुई तथा उसकी वृत्ति ३१८१६६१ रु० कर दी गई। मुर्शिदाबादके नवाबके साथ यही अन्तिम सन्धि है। इसके बाद 'सूबेदार' नाम रहने पर भी सारी शक्ति अंगरेज सरकारके हाथ आ गई। १७७२ ई० अंङ्गरेज सरकारने निजामतके खर्च के लिये अधिक रुं०को जरूरत न समझ केवल १२ लाख रु० निश्चित कर दिया। अभी तक यही वृत्ति निश्चित है।
मुबारक उद्दौलाके बाद क्रमशः दिलवर जङ्ग, सैयद जैन उल आदुन खाँ (अली जा), सैयद अहमद अली खाँ (बाला जा), मुबारक अली खां (हुमायू जा) तथा उसका लड़का मनसूरअली खां मुर्शिदाबादका नवाब नाजिम हुआ मनसूर अली खॅाके समयमें १८७८ ई० में निजामतमे बड़ी गड़बड़ी मची जिससे नवाबको बहुत कर्ज हो गया। इसके पहले ही नवाबके हीरा जवाहिरात सरकारकी देखभालमें रक्खे गये थे। नवाबने उन्हें बेच कर अपने कर्ज चुकाने की प्रार्थना की। सरकारने एक कमीशन बैठाया। कमीशन ने विचार कर निर्णय किया, कि नवाब नाजिमको किसी प्रकार ऋण करने का अधिकार नहीं है।
१८८० ई०को १ली नवम्बरको मनसूर अलीने नवाब<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१२७
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सौरभ तिवारी 05
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||गजकुमार मुनि—गजचिर्भिटी|१२५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>दौड़ा अर्थात् गजकुमार जबरदस्ती अच्छे अच्छे घरोंकी सती स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करने लगे। एक दिन पांसुल सेठकी स्त्री पर इन्होंने दृष्टि डाली और उसे बिगाड़ भी दिया। सेठको मालूम पड़ते ही वह क्रोधाग्निसे जल कर उनके विरुद्ध खड़ा हुआ; परन्तु राजकुमारके सामने उस बेचारेकी कुछ भी न चली। इसी प्रकार जो उनके विरुद्ध खड़ा होता था, वह जड़ मूलसे नष्ट हो जाता था
एक दिन पुण्योदयसे नेमिनाथ भगवान् द्वारकामें आये। बलभद्र, वासुदेव तथा और भी बहुतसे राजे-महाराजे उनकी पूजाके लिये पहुंचे। उनके साथ गजकुमार भी थे। भगवान्का उपदेश हुआ। उपदेशका असर गजकुमार पर खूब ही पड़ा। उन्हें संसारसे घृणा हो गई। अपने किये हुए पापों पर वे बहुत ही पश्चात्ताप करने लगे। उसी समय भगवान्के समक्ष उन्होंने दिगम्बरी दीक्षा धारण की और वनमें जा शास्त्र-ध्यानमें लीन हो तप करने लगे।
मुनि होनेका हाल जब पांसुल सेठको मालूम पड़ा तब वह क्रोधी अपना बदला लेनेके लिये वनमें पहुंचा और उन ध्यानस्थ गजकुमार मुनिके समस्त सन्धिस्थानोंमें लोहेके बड़े बड़े कीलें ठोंक कर चला आया। गजकुमार मुनि पर उपद्रव तो बड़ा ही दुःसह हुआ; पर वे जैनतत्त्वके पक्के अभ्यासी और विद्वान् थे, इस लिये उन्होंने इस घोर वेदनाको एक कांटे चुभनेके समान भी न समझ बड़ी शान्ति और धीरताके साथ शरीर छोड़ा। यहांसे ये स्वर्गमें गये। {{smaller|(आराधनाकथाकोश)}}
{{outdent|गजकुम्भ ( हिं॰ पु॰) हाथीका उभरा हुआ मस्तक, हाथीके माथे पर दोनों ओर उठे हुए भाग।}}
{{outdent|गजकुसुम (सं॰ पु॰) नागकेशर।}}
{{outdent|गजकुसुमा (सं॰ स्त्री॰) नागकेशर।}}
{{outdent|गजकूर्माशिन् (सं॰ पु॰) गज कूर्मो अश्राति, अश-णिनि। गरुड़। {{smaller|(शब्दरत्ना॰)}} पक्षिराज गरुड़ने युध्यमान गजकच्छपको भक्षण किया था, इस लिये इसका नाम 'गजकूर्माशिन्' पड़ा। {{smaller|गजकच्छपीय युद्ध देखो।}}}}
{{outdent|गजकृष्णा (सं॰ स्त्री॰) गज इव कृष्णा। गजपिप्पली, बड़ी पीपर। {{smaller|(भाषप्रकाश)}}}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|गजकेशर (सं॰ पु॰) नागकेशर, कबाबचीनी।}}
{{outdent|गजकेशरी—उड़िसाके केशरीवंशीय एक प्रतापी राजा, बटकेशरीके पुत्र। इन्होंने १२ वर्ष राज्य किया था।}}{{right|{{smaller|उत्कल देखो।}}}}
{{outdent|गजकेसर (सं॰ पु॰) एक प्रकारका धान जो अगहन महीनामें तैयार होता है। इसका चावल बहुत दिन तक रहता है।}}
{{outdent|गजक्रीड़ित (सं॰ पु॰) नृत्यमें एक प्रकारका भाव।}}
{{outdent|गजगति (सं॰ स्त्री॰) १ हाथीकी चाल। २ हाथीकी मन्द चाल (सुलक्षणा स्त्री हाथीकी मन्द चालकी तरह चलती है)। ३ रोहिणी, मृगशिरा और आर्द्रामें शुक्रकी स्थिति। ४ एक वर्णमाला वा वर्णवृत्त।}}
{{outdent|गजगमन (सं॰ पु॰) हाथीकी तरह मन्द गति, वह जो हाथीकी मंदगति सरीखे चलता हो।}}
{{outdent|गजगामी (सं॰ पु॰) हाथीकी चालकी तरह चलनेवाला, मन्द गामी।}}
{{outdent|गजगाह (हिं॰ पु॰) हाथीकी झूल, पाखर।}}
{{outdent|गजगौहर (फा॰ पु॰) गजमोती, गजमुक्ता।}}
{{outdent|गजघण्टा (सं॰ स्त्री॰) गजस्य घण्टा-६-तत्। १ हाथीके गलेका घण्टा। २ रङ्गपुर जिलाका एक वाणिज्यप्रधान नगर। यह अक्षा॰ २५° ४९' ४५" उ॰ और देशा॰ ८९° २०' पू॰ में अवस्थित है। वहांसे चूना और पाटकी रफ्तनी अधिक होती है।}}
{{outdent|गजचक्षुः (सं॰ त्रि॰) गजस्येव चक्षुर्यस्य वा गजस्व चक्षुरिव चक्षुर्यस्य इति बहुव्री॰। जिसकी आंखें हाथीकी आंखोंकी तरह हो, विकृतचक्षु।}}
{{outdent|गजचर्म (सं॰ पु॰) १ गजका चमड़ा। २ एक प्रकारका रोग, जिसमें शरीरका चर्म गजके चमड़े की तरह मोटा और कड़ा हो जाता है। यह रोग सिर्फ मनुष्य हीको नहीं होता किन्तु घोड़े को भी होता है।}}
{{outdent|गजचिर्भिट (सं॰ पु॰) गजप्रियश्चिर्भिट:। एक प्रकारका तरबूज।}}
{{outdent|गजचिर्भिटा (सं॰ स्त्री॰) गजप्रिया चिर्भिटा, मध्यली॰। इन्द्रवारुणी, इन्द्रायन, बड़ी इन्द्रफला।}}
{{outdent|गजचिर्भिटी (सं॰ स्त्री॰) गजप्रिया चिर्भिटी, इन्द्रवारुणी, इन्द्रायन।}}<noinclude>{{Multicol-end}}
{{left|Vol. VI. 32|1em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१४९
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Avantika Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{Rh||गणक|१४०}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
समझा सकते हो', शास्त्रकारों के मतानुसार वे दो गणक
कहलाते हैं । <Small>( स हिता २०)</small>
४ जातिविशेष। इनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणों से
मिलते-जुलते हैं। किसी-किसी देश में इन्हें ग्रहविप्र या
आचार्य कहते हैं। ब्रह्मयामल के १४वें अध्याय में
लिखा है-
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"शरदीपे च येोनिः शाकद्वीपे च सिद्धतिः।<br>
भूमध्ये ब्रह्मचारी व देशी द्वारकापुरे॥<br>
द्राविडं मैथिली कविप्रति सशक<br>
धर्मा धर्म वा च पञ्चानी शास्त्रिसंशकः॥<br>
सारस्वते गभमुखी गान्धारे चिपतिः।<br>
सौरदीय व तिथिविनाटके पचस चमः॥<br>
बटा जोतिषी विप्रो ब्रह्माले विधिकारकः।<br>
बम्राटे योगवेत्ता च लिटाने देवपूजकः॥<br>
रादेशे उपाध्यायो गया तनधारकः।<br>
कलिङ्ग जानामा च बाधायें गौड देशकैः॥” (मल १४ अध्याय)</poem>}}}}
गणक जाति के लोग शरद्वीप और शाकद्वीप में वेदाग्नि,
भूमध्य में ब्रह्मचारी, द्वारका में दैवज्ञ, द्राविड़ और मिथि-
ला में ग्रहविप्र, धर्माङ्ग में धर्मवेत्ता, पाञ्चाल में शास्त्री,
सरस्वती नदीतीर में शुभमुख, गान्धार में चित्रपण्डित, तीर-
होत्र में तिथिवत्, लाटदेश में ऋक्ष, रुद्रान्न में ज्योतिष,
ब्रह्म में विधिकारक, वस्त्राट में योगवेत्ता, लिटान में देव-
पूजक, राढ़देश में उपाध्याय, गया में तम्बधारक, कलिङ्ग-
देश में जान और गौड़देश में आचार्य कहलाते हैं।
ग्रहदोष शान्ति के लिये जो कुछ दान करना होता है,
वह ब्राह्मणों को मिलता है। इस देश के लोगों का
विश्वास है कि ग्रहविप्र को दान देने से ही ग्रह संतुष्ट
होता है, गृह का कोई अनिष्ट नहीं होता है।
शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार अर्थ लगाने में वे ही गणक
कहला सकते जो ज्योतिषशास्त्र अध्ययन करते तथा
ग्रहों की गतिनिर्णय और कोष्ठी गणना कर शुभाशुभ फल
निर्णय किया करते हैं। यदि ब्राह्मण, कायस्थ, वैश्य
प्रभृति दूसरी कोई जाति ज्योतिषशास्त्र अध्ययन कर
उसका व्यवसाय करें तो उनको गणक नहीं कहते वरन्
ज्योतिषिक, ज्योतिर्विद प्रभृति दूसरे किसी नाम से
पुकारे जा सकते हैं। किन्तु पूर्वकथित जातियों में
कोई-कोई ग्रह गणना की बात तो दूर रहे नवग्रह के नाम
नहीं जानने पर भी गणक कहलाता है। दूसरे-दूसरे
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
ब्राह्मणों के साथ इनका कन्या आदान-प्रदान नहीं
होता है। इन लोगों में से बहुतों ने ज्योतिषशास्त्र अध्ययन
कर प्रतिष्ठा और उन्नति प्राप्त की है। इन लोगों में जो
शिक्षित और धनी हैं, उन्हीं का आचार-व्यवहार उच्च
श्रेणी के ब्राह्मणों जैसा है। इनके साथ उच्च श्रेणी के ब्राह्मणों-
का कोई भेद देखा नहीं जाता है, सिर्फ आदान-प्रदान
की प्रथा प्रचलित नहीं है। दूसरे जो अशिक्षित वर्ग-
विप्र या गणक ब्राह्मण हैं, जो ग्रहदान लेकर ही अपनी
जीविका निर्वाह करते हैं, नया वर्ष आने पर ये घर-
घर घूमते और नूतन पत्रिका का फल सुना कर गृह-
स्थों से दक्षिणा या पारिश्रमिक स्वरूप चावल, दाल, वस्त्र
और फल प्रभृति पाते हैं। ऊपर जिन उपगणकों
का उल्लेख हो चुका है, उनके साथ इन लोगों का
कोई सम्बन्ध जान नहीं पड़ता है। उच्च श्रेणी ब्राह्मण
भी इन्हें अपनी जाति के समान नहीं मानते हैं। इनका
आचार-व्यवहार ठीक चण्डाल जैसा है। ये चण्डाल का
छुआ हुआ अन्न पीते हैं। यदि यज्ञोपवीत
लटकता न रहता तो ये ठीक चण्डाल से मालूम पड़ते।
इनका स्पर्श किया हुआ जल अपवित्र समझा जाता
है। ब्राह्मण, कायस्थ और वैश्य प्रभृति उच्च श्रेणी के हिन्दू
इन्हें चाण्डाल के समान मानते हैं। इनसे बहुत पूर्व
बंगाल, फरिदपुर प्रभृति स्थानों में रहते हैं। चण्डाल के
पुरोहित के साथ इनका आहार-व्यवहार और आदान-
प्रदान चला जाता है। कहीं-कहीं उनमें थोड़े चण्डालों-
का पौरोहित्य भी करते हैं। ये अपने को उच्च श्रेणी के
गणकों सा समझते हैं। किन्तु कोई विश्वास नहीं कर
सकता है कि इनके साथ उच्च श्रेणी के गणकों का कोई
सम्बन्ध है।
।
मनु ने जिन समस्त संकर जातियों का उल्लेख किया है
उनमें इन लोगों का नाम पाया नहीं जाता है। बृहद्-
यमलोक जातिमाला में लिखा है-
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"देवलाद्गणको जातो वेश्यागर्भवशः सदा।<br>
तस्य वृत्तिस्तु विप्रर्षे तिथिवारविवेचनम्॥"</poem>}}}}
देवल (पंडा) के औरस और वेश्या के गर्भ से
गणक जाति की उत्पत्ति है। तिथिवार प्रभृति की गणना
करना ही इनकी वृत्ति है। इस प्रमाण के अनुसार माना
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
q971qes9f72xjg88u4qd74xoa9bl49c
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५०
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Avantika Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|१४८|गणक}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
पड़ता है कि वेश्या गर्भ तथा देवल के औरस से जिस
संकर जाति की उत्पत्ति हुई है, वही आजकल आचार्य
या गणक कह कर विख्यात हैं। किन्तु परशुरामोक्त
जातिमाला मत में -
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"अम्बष्ठाद्वैश्याको जातो वा गर्भवः।<br>
नवतिथियाहिनिर्णयकारकः॥"</poem>}}}}
अम्बष्ठ के औरस से वेश्या के गर्भ से
जो संकर जाति
उत्पन्न हुई है उन्हीं को गणक कहते हैं। नक्षत्र, तिथि,
योग और ग्रहों का निर्णय करना ही इनकी उपजीविका है।
कहीं-कहीं गणक को वर्णविप्र कहा करते हैं, किन्तु
पूर्वोक्त दोनों जातिमाला में पतित ब्राह्मण को ही वर्णविप्र
कहा गया है, इनमें संकर जाति को वर्णविप्र नाम से
अभिहित नहीं किया है -
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "ब्राह्मणः पतितो भूत्वा द्विजवत्वमागतः।" (रुद्रयाम० जातिमा०)<Br>
"ब्राह्मणः पतितो भूत्वा वर्णार्थानां ब्राह्मणोऽभवत्॥" (शु० जाति०)</poem>}}}}
किसी कारण से पतित ब्राह्मण को ही वर्णद्विज या
वर्णविप्र कहा करते हैं।
परशुरामोक्त जातिमाला में इनके पतित होने का कारण
भी लिखा है -
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "चत्वारिंशत् जातिभेदा भूमौ जाता विलोमजा।<br>
एतेषां विंशति वै पुरुषाः श्रोत्रियो द्विजः।<br>
श्रोत्रियः पतितो भूत्वा वर्णब्राह्मणोऽभवत्॥”<br>
{{Right|<small>(परशुरामोक्त जातिमा०)}}</small></poem>}}}}
पहले जिन चालीस संकर जातियों की कथा लिखी
गई है, वे सबके सब विलोमज हैं। इनमें से बीस के
पौरोहित्य कार्य करने में श्रोत्रिय ब्राह्मण पतित होते हैं
एवं उन पतित ब्राह्मणों को ही वर्णब्राह्मण कहते हैं।
इससे साफ-साफ जाना जाता है कि वर्णब्राह्मण और
गणक एक जाति के नहीं हैं। जो चण्डाल प्रभृति
निकृष्ट जातियों के पुरोहित हैं, वे वर्णविप्र और जो
पूर्वोक्त संकर जाति हैं वे गणक माने जाते हैं। काल-
क्रम से आचार-व्यवहार परिवर्तन हो जाने से कहीं-कहीं
दोनों जाति एक में मिल गई हैं।
फिर भी ब्रह्मयामल में लिखा है -
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>यददयसमथ थददधधवृम भढजवृमढछ तढथ<br>
ये जाता देवब्राह्मणाः।तममधधत </poem>}}}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
ग्रहगणकी पूजा के लिये जिस ब्राह्मण ने ब्रह्मा के मुख से
शाकद्वीप में जन्म ग्रहण किया, वे
जन्मदान देवब्राह्मण हैं।
बंगाल के बहुत से शास्त्रविद् देवज्ञ अपने को ग्रहया-
मलोक्त शाकद्वीपी ब्राह्मण के जैसा परिचय देते हैं।
शाम्बपुराण में भी साम्ब कर्तृक शाकद्वीप से ब्राह्मण लाने-
की कथा विस्ताररूप से लिखी है और वहाँ शाकद्वीपी ब्राह्मणों के लिये
'माध्य' शब्द देखा। किन्तु उस पुराण के ४३वें अध्याय में -
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "न ब्राह्मणः परिवादेत् तिथिनक्षत्रसूचकः॥"</poem>}}}}
इत्यादि वचनों से तिथिनक्षत्र निरूपणादि दैवज्ञ के
काम करने से निषेध किया गया है। मालूम पड़ता है
कि उक्त पुराणोक्त निषिद्ध कर्म करने पर भी कोई-कोई
शाकद्वीपी ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण से नीच एवं गणक जाति के
जैसे गिने गये होंगे। ब्रह्मवैवर्त के मतानुसार कि जो
देवब्राह्मण का धर्म अपहरण करता है, वह धमान्धकार
नरक भोग कर अनेक भव-भव योनियों में भ्रमण
करने के बाद शबर (भील), स्वर्णकार, सुवर्णवणिक और
यवनसेवी ब्राह्मण होकर अन्त में गणनोपजीवी देव-
ब्राह्मण में जन्म ग्रहण करता है। (म०)
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "वसेत् स्वलोममानानं
च नारद गर्हितः।<br>
ततो भवेत् स गणको वैद्यः सप्त जन्मसु॥" (प्रकृतिखण्ड)</poem>}}}}
सचमुच गणक जाति की उत्पत्ति सम्बन्ध में बहुतों का
मतभेद है। जातिमाला प्रभृति ग्रन्थों में संकर जाति की
जो कथा लिखी गई है, उनमें कहीं भी इनके सिवा
विशेष किसी प्रकार का संकर जाति का उल्लेख देखा नहीं
जाता है। वर्तमान समय में फरिदपुर अञ्चल में पूर्वोक्त
संकर जाति ही गणक नाम से परिचित है। राढ़ प्रभृति
अञ्चल के गणकों का कहना है कि उनके साथ
उक्त जाति का कुछ भी संसर्ग नहीं है। जो कुछ हो,
प्रत्येक ग्रन्थ का मतभेद रहने से भिन्न-भिन्न गणक जाति का
रहना असंगत नहीं है। रघुनन्दन आचार्य किसी का
भी मत ग्रहण न कर चण्डाल के औरस से उत्पन्न गणक-
जाति का एक उल्लेख किया है, तथा प्रमाण के लिये
"मकारस्य ही पुत्री गणको बांधवः" यह वाक्य उद्धृत
किया है। यह अपूर्ण वचन किस ग्रन्थ से लिया है, इसका
कुछ भी उन्होंने उल्लेख नहीं किया है। नूतन संस्करण के
शब्दकल्पद्रुम में भी उक्त अपूर्ण श्लोक उद्धृत है।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
c3tkjoebfopbdmvo29bpiaco0ick854
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५२
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Avantika Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>{{rh|१५०|
गणनीय – गणपतिकल्प}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|गणनीय (सं० त्रि०) १. गिनने योग्य। २. नामी, प्रसिद्ध।}}
{{Outdent|गण (सं० पु०) गणेश।}}
{{Outdent|गणपति (सं० पु०) गणानां पतिः ६ तत्। १. गणेश। २. शिव। ३. स्वामी। ४. अथर्व उपनिषद विशेष। ५. मृच्छकटिक नाटक का एक ग्रंथकार। ६. गोपाल के पुत्र, 'रत्नप्रदीप' नामक ज्योतिष-शास्त्रकार। ७. वीरेश्वर के पुत्र, 'गंगाभक्तितरंगिणी' नामक संस्कृत ग्रंथ के प्रणेता। ८. राम उपाध्याय के पुत्र, 'चोरपंचाशिका' के टीकाकार। ९. एक विशिष्ट राजोपाधि; एक राजा की पदवी; दाक्षिणात्य (दक्षिण भारत के) वारंगल के राजा इस उपाधि को धारण करते थे।}}
{{Right|<small>(वारंगल देखो)।</small>}}
{{Outdent|गणपतिकल्प (सं० पु०) गणेश की एक पूजा-प्रक्रिया। यह विघ्न-शांति के लिए गणपति के उद्देश्य से किया जाता है।
विनायक नामक कोई अपदेवता या भूत होते हैं। वह समय-समय पर सुंदर नर-नारियों को आश्रय करते हैं (उन पर सवार होते हैं) या जिस पर उनकी दृष्टि रहती है, लोग उसे भूत-ग्रस्त समझने लगते हैं। विनायक का आश्रय या दृष्टि होने से प्रायः दुःख आता है। वह व्यक्ति स्वप्न में देखता है मानो अगाध जल में प्रवेश करके गोते खा रहा हो और कभी-कभी कटा हुआ मुंड भी देख पाता है; यही विनायक की दृष्टि का प्रधान लक्षण है। इसके व्यतीत (अलावा) स्वप्न में काषायवस्त्र (गेरुआ वस्त्र) आच्छादित हिंसक जंतुओं पर अधिरोहण भी किया जाता है। उस व्यक्ति को सर्वदा चांडाल प्रभृति (इत्यादि) निकट (नीच) जातियों, गर्दभों (गधों) या ऊंटों के साथ रहना अच्छा लगता है। जब वह एकाकी (अकेला) कहीं चलता है, तो उसे मालूम पड़ता है—मानो उसके साथ कितने ही दूसरे लोग लगे हैं। इससे वह डरकर चौंक पड़ता है। उसके मन की स्फूर्ति बिल्कुल विलुप्त हो जाती है। वह जो कोई भी कार्य करने लगता है, उसको विपरीत (उल्टा) फल मिलता है। राजकुमार के प्रति विनायक की दृष्टि होने पर वह राजत्व से वंचित रहता है। यदि किसी कुमारी पर उनकी दृष्टि पड़ जाती है, तो वह स्वामी-सुख से वंचित होकर घोर यातना में समय बिताती है। गर्भिणी के प्रति विनायक का आविर्भाव होने से संतान नष्ट होती है। यदि विद्यार्थी पर इनकी दृष्टि पड़ी, तो वह आचार्य या श्रोत्रिय नहीं हो सकता। इनकी दृष्टि से वणिक (व्यापारी) का वाणिज्य बिगड़ता है और पक्की कृषि में घाटा पड़ता है।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
विनायक की शांति के लिए याज्ञवल्क्य ने इस प्रकार विधान किया है—जिसके प्रति विनायक की दृष्टि हो, उस दिन के समय शिला (सिल्ट) पर पेषण (पीस) करके उबटन के साथ उसके शरीर में लगाना और मस्तक में सर्वौषधि तथा गंध-लेपन बढ़ाना चाहिए। फिर उक्त व्यक्ति को भद्रासन पर बैठा लेते हैं। अश्वशाला, हस्तिशाला, वन, दीमक के ढेर, संगम-स्थान तथा ह्रद (तलाब) की मृत्तिका (मिट्टी), रोचना, गंध और गुग्गुल जल में निक्षेप (डालना) किया जाता है। फिर एकवर्ण (एक ही रंग के) चार कलशों में जल लाकर भद्रासन के चारों ओर लगाते हैं। पीछे इसी जल से उक्त व्यक्ति को स्नान कराना पड़ता है। उसका मंत्र है—
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“
"सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं कृतम्।<br>
तेन त्वामभिषिंचामि पावमान्यः पुनंतु ते॥<br>
भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः।<br>
भगमिंद्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः॥<br>
यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमंते यच्च मूर्धनि।<br>
ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद् घ्नंतु सर्वदा॥"<poem>}}}}
इसी प्रकार स्नान कराकर उसके मस्तक पर उड़द पर बने सार्षप तेल (सरसों का तेल) डालना चाहिए। वाम (बाएँ) हस्त से कुशा ग्रहण करके इस कार्य का अनुष्ठान करते हैं।
मित, सम्मित, शालकटंकट, कुष्माँड और राजपुत्र नामों के साथ 'स्वाहा' योग करके चतुष्पथ (चौराहे) पर कुश बिछाकर उस पर बलि दी जाती है। कृताकृत (कच्चे-पक्के) तंडुल (चावल), अम्लोदन (खट्टा भात), नानावर्ण के सुगंधित पुष्प, मूलक (मूली), पूरी, कचोरी, एरण्ड की माला, दहीयुक्त व पायस (खीर), पिटक (पुआ) आदि विनायक की पूजा का उपहार व बलि हैं। यह सकल पूजोपहार एकत्र करके मस्तक को भूमि पर रख विनायक-जननी (अंबिका) की आराधना करनी चाहिए। दूर्वा और सरसों के फल से उनको अर्घ्य देना और हाथ जोड़कर यह मंत्र पढ़ना पड़ता है—
"रूपं देहि यशो देहि भाग्यं भगवति देहि मे।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे॥"
इसके पीछे (बाद) स्वच्छ वस्त्र परिधान करके (पहनकर), सफेद चंदन और सफेद फूलों की माला पहन ब्राह्मण-भोजन कराना और गुरु को एक जोड़ा कपड़ा पहनाना चाहिए। इसी प्रकार विनायक की पूजा शेष (संपन्न) होने पर नवग्रह, लक्ष्मी तथा
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५३
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Avantika Shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गणपतिदेव-गणधि'''|'''
१५१'''}}
१५१}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
धादिका का घर्षण और महागणपति का तिलक किया जाता है। इससे सकल दोषों की शान्ति होती है। विनायक भी सन्तुष्ट होकर पीड़ित व्यक्ति को परित्याग करते हैं। (याज्ञवल्क्य)
{{outdent|गणपतिदेव—दाक्षिणात्य में वरंगल राज के एक राजा, प्रतापचन्द्र के पुत्र। शिलालेख पढ़ने से जाना जाता है कि १२२८ ई० में इन्होंने चोलों को परास्त कर कलिङ्गदेश पर अधिकार किया था।}}
{{outdent|गणपतिनाग—समुद्रगुप्त के समसामयिक आर्यावर्त्तवासी एक राजा। ये समुद्रगुप्त से परास्त हुए थे।}}
{{outdent|गणपतिरावण—एक विख्यात संस्कृत ग्रन्थकार। ये रावल हरिराज के पुत्र और रामदास के पौत्र थे। इन्होंने पूर्वनिर्णय, मुहूर्त्तगणपति, शान्तिगणपति, योगाधानपद्धति और मन्त्रगणपति नामक धर्मशास्त्र प्रणयन किये हैं।}}
{{outdent|गणपतिराम—१. एक प्राचीन कवि। १२७२ ई० में इन्होंने 'धाराधश' नामक ऐतिहासिक काव्य की रचना की है। २. 'योगसारसमुच्चय' नामक वैद्यकग्रन्थरचयिता।}}
{{outdent|गणपर्वत (सं० पु०) गणानां प्रमथादीनां धावाम रूपः पर्वतः; कैलासपर्वत। इस पर्वत पर प्रमथ वा शिव के गण रहते हैं, इस लिये इसका नाम गणपर्वत पड़ा।}}
{{outdent|गणपाठ (सं० पु०) गणानां स्वरादिसूत्राणां पाठोऽत्र, बहुव्री०। पाणिनि प्रणीत एक सूत्र। इसमें स्वरादि गणों के विषय लिखे हुए हैं।}}
{{outdent|गणपाद (सं० पु०) गणस्येव पादोऽस्य, बहुव्री०। जिसके दोनों पैर प्रमथ या शिवगणों जैसे हों।}}
{{outdent|गणपोठक (सं० क्ली०) गणस्य शिवस्य पीठः आसनमिव कार्य्यते कै-कः। वासस्थान, कासी।}}
{{outdent|गणपुंगव (सं० पु०) गणः पुङ्गव इव उपमितस०। १. गणश्रेष्ठ। २. देशविशेष, एक देश का नाम। ३. उस देश के रहनेवाले। ४. उस देश के राजा।
"कौन्तेयान् सपुङ्गवान् विगताशीर्विषान् पथि चरेत् ।" (इतिहास चिन्ता ७।२७)}}
{{outdent|गणपूर्व (सं० पु०) गणानां ग्राम्यादिसङ्घानां पूर्वः प्रधानः, ६-तत्। ग्रामणी, ग्राम के अधिनायक, गाँव के मुखिया।}}
{{outdent|गणप्रमुख (सं० पु०) जाति या श्रेणी में प्रधान, वह जो जाति या समाज में श्रेष्ठ हो।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|गणभर्त्तृ (सं० पु०) गणानां प्रमथादीनां भर्त्ता, ६-तत्। १. महादेव, शिव।
"महोभर्त्तृभयं मन्यते तदयशः वृथा।" (किरातार्जुनीय ७।२५ )
२. गणेश। (त्रि०) ३. बहुजनस्वामी, जो बहुतों के अधिपति हों।}}
{{outdent|गणभोजन (सं० क्ली०) साधारण भोज।}}
{{outdent|गणमुख्य (सं० पु०) गणानां मुख्यः, ६-तत्। ग्रामणी, ग्राम के अधिनायक, गाँव के मुखिया।
"राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठास्तन्मुख्याः क्लेशभीरवः भवेयुः।" (रामायण २।१००)}}
{{outdent|गणयज्ञ (सं० पु०) गणस्य भ्रातृणां सखानां वा समूहास्य करणीयो यज्ञः। भ्रातृवर्ग अथवा सखावर्ग का अनुष्ठेय मरुत्स्तोम नामक यज्ञ, भ्रातृयों या सखाओं के करने योग्य मरुत्स्तोम नामक यज्ञ।
"जेमानोऽदितिर्जन्मना हस्तयज्ञो मरुतां गणो यशीत वा।" (वाजसनेयीसं० १७/३१/१२)}}
{{outdent|गणयाग (सं० पु०) गणोद्देशेन शास्त्रदृष्टो यागः। १. गणपति-कल्प, गणेश को तुष्ट करने योग्य पूजादि।}}
{{outdent|गणरत्न (सं० क्ली०) गणाः स्वरादि गणाः रत्नानीव यत्र, बहुव्री०। एक ग्रन्थ का नाम। पाणिनि ने गणपाठ में जो सब गण निर्देश किये हैं, वे ही इस ग्रन्थ में पद्यरूप में लिखे हैं। व्याकरणार्थियों के लिये यह विशेष उपकारी है।}}
{{outdent|गणरात (सं० स्त्री०) गणार्ना रात्रीणां समाहारः, समाहार द्विगु, घञ्; रात्रि समूह।}}
{{outdent|गणरूप (सं० पु०) गणा बहूनि रूपाणि यस्य, बहुव्री०। १. चक्रहस्त, चक्रवन का पेड़।}}
{{outdent|गणरूपी (सं० पु०) गणा बहूनि रूपाणि यस्यस्य गणरूपमस्त्यस्य, मत्वर्थे इनि। मौरता कहल, मौरट नाम का पेड़।}}
{{outdent|गणवत् (सं० त्रि०) गणोऽस्यास्त्य गण-मतुप् मस्य wः। १. गणयुक्त, जिसमें गण हो।}}
{{outdent|गणवती (सं० स्त्री०) धन्वन्तरि दिवोदास की माता का नाम।}}
{{outdent|गणशस् (अव्य०) गण वीप्सायां कारकार्थे शस्। बद्घशः; दल का दल, झुण्ड का झुण्ड।}}
{{outdent|गणश्री (सं० पु०) देवताविशेष, कोई देवता जो किसी...}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/३७५
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सौरभ तिवारी 05
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<noinclude><pagequality level="1" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||'''गुटि-गहिकोण्डा'''|'''३७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
दो बार उत्पन हुआ करता है । यहां Actias Sclene Lvepa Ratinku पासाम, श्रीमह, भोट और यव-
नामकी दूसरी मी गुटि है। वह पर्वत पर ५००० से हीपमें उत्पन्न होता है। सिवा इसके L. miranda, L.
७००० फुट ऊंचे तक उपजती है।
Sikkima और L. Sivalika कई जातीय श्रेणीकी
Rombyx Horsfielli पवद्वीपीय है।
गुटि भी देख पड़ती है।
मन्द्राज प्रान्तमें Bombyx lugubris होता है ।। ___Attacus Attas का कोवा सबसे बड़ा होता है।
जापानमें Bombyx Yama mai उपजता है। सिंहल, चोन, ब्रह्म, यवाहीप और भारतमें सर्वत्र उसकी
अब इमलेगड़ में भी उसकी खेती है। जापान यह रेशम उत्पत्ति है।
ज्यादा कीमती ममझा जाता है। राजपरिवारमें एमके Attacils Cynthin और Atharius ricin को
व्यवमायका एकाधिपत्य है।
- बङ्गालमें एडो एंडिया या एरण्ड गुटो कहते हैं।
Bombyx Pernyi, Actine sinenis, A. 19ne. Attacts Guerini एण्ड गुटोसे आतिम बुद्र
seens और A. lolo चार जातियां उत्सर चीनमें मिलती बेठता है। वादेशमें ही वह अधिक परिमाणमे उत्पन
होता हैं । एतव्यतीत A. Canningii, A. lunula
____Bombyx Mslitta भारतीय है। इसका कोवा! A. obse:urus, A. Sillhetica, Caligula, Cacharan,
अन्यान्य भारतीय गुटियाँसे बड़ा होता है। भारतमें B. C. Simla, C. Thebeta, Neoris, luttonn, N.
Amaranensis, fortunatus. sinen-is txtor Shadalla N. Stolickzkana, Orcinara lactea
प्रभृति कई भिन्न श्रेणीके रेशमी कोई हैं।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
O. Moorel, (). diaphama, Rhodia ne:wara, Ri-
___(ricula trifen stratra उत्तर पूर्व तथा दक्षिण aca, Zullika, The phila, Bengaleusis, Th.
भारत, श्रीष्ट, आसाम, ब्रह्म और यवदीपमें उत्पन्न होता luttoni, Mandarina, religiosa, Sherwilli प्रति
है। मिवा इमके C. drepansides भी मिलता है। कई इमरी किस्में हैं।
Sulassa lola और Actins Moenar श्रीदेश गुटक ( म० पु.) मत्स्यागड़ी।
जात है।
गटिका ( स० स्त्रो. ) गुटिरब गटि स्वार्थ कन टाप।
___Antheroen paphin वीरभूममें होता है। उसका १ वटिका, वटी. गोली । २ वर्तलाकार पदार्थ , गोल
नाम 'बुधी' है। सिंहल : दक्षिण, उत्तर-पूच' एवं उत्तर चीज।।
पविम भारत, वन, विहार, प्रामाम, श्रीहट्ट और यव- गुटिकाननम् ( स० क्ली० ) पवन देवा ।
होप में भी उसकी उत्पत्ति है। बहुत समयमे इम देशमें गुटिका पात (सं० पु०) गुटिकाया: पातः, ६-तत्।
उस कीड़े को रेशम टमरका कपडा बनानको काम है। किमी विषयके निरूपणार्थ गोली निक्षप, किसी चीज
Antheroen Pernsi चोन देशीय है।
पर निशान कर गोलो फकना।
Antheroea Roylii, Antheraea Acitori और गुटिकाहय ( म० पु. लो. ) लवणविशेष, एक प्रकारका
Attacus Edwardsi दारजिलिङ्गमें उत्पन्न होते हैं। नमक।
A. larissa और Anthero a Java यवदीपज है। गुह (हिं. पु०) समूह, मुगड, दल ।
___Antheroen erot tatti पूदिचेरीमें होता है। गुहा (हि पु०) लाक्षाकी बनी चौकोर लड़कियों के खेलने-
A. Simla शिमला और दारजिलिङ्ग पर्वतजात है। को गोटी।
___A. Assama आसाममें होता है। आमामी भाषा- गुटिकोण्डा-कृष्णा जिलेके अन्तर्गत दाचिपलीमे । कोस
में उसका नाम मूगा है।
___दक्षिणमें अवस्थित एक ग्राम। यहाँ एक अति प्राचीन
___Antheroea मञ्चरियाको गुटि है । फ्रान्सदेशमें शिवालय है। ग्रामके निकट ही एक गुहा है। ऐमा
समको खेती होने लगी है।
। प्रवाद है कि इस कन्दरामें मुचुकुन्द सोया करते थे।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{rh|'''Vol. VI. 94'''||}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२०५
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२०४'''|'''उत्तिष्टवम-उत्तंस'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
वृष्य, वातकर और रस एवं पाकमें मधुर है। (सुश्रुत) उत्क्षेप (स० पु०) उत्-क्षिप धञ्। १ अर्ध्वक्षेपण,.
२ पेचक, उल्लू । ३ कुररपक्षी,किसी कि.स्मका उकाब। उछाल। २ दूरोकरण, फैकफांक । ३ प्रेरण,
४ चीत्कार, शोर, हल्ला।
चालान । ४ वमनकार्य, छांट, उलटी। ५ मन्दिरके
उक्लिष्ट वम (सं० क्ली) लिष्टवत्म नाल रोगविशेष, ऊपरका स्थान । (त्रि०) ६ उत्क्षेपकारक, फेंकनेवाला।
आंसू पैदा करनेवाले मवादको बढ़ती। क्लिष्टवां देखो: उत्क्षेपक (सं० वि०) १ अर्व निक्षेपकारी. उछा-
उत्क्लेद (स. पु०) १ पाट्रभाव, तरी, भोगनेको लने वाला। २ आज्ञा देनेवाला, जो हुक्म लगाता
हालत।
है। (पु.) ३ वस्त्रको अपहरण करनेवाला, जो
उतले दन (सं.क्लो०) उतले द देखो।
कपड़ेको उछालकर चुरा लेता हो।
तन दिन् (सं• त्रि०) आद्रं, तर पड़नेवाला, जो ___ "उत्चे पकन्धिभेदौ करसन्दशहीनको।" ( याचवका २२७७)
भीग रहा हो।
उत्क्षेपण (सं० क्लो०) उत्-क्षिप-त्यु ट। १ ऊर्ध्व-
उत्त श (सं० पु०) १ उत्तेजना, अशान्ति, हलचल, क्षपण, उछाल। २ प्रेरण, चालान। ३ वमनकार्य,
झगड़ा। २ वमनच्छा, बलगमका बिगाड़। ३ रोग, छांट, उलटी। ४ उदञ्चन, सूप। ५ व्यजन, पड़ा।
बीमारी।
६ षोड़शपण, सोलह, पणको एक नाप। ७ न्याय-
उतने शक (स.पु०) विषमय कौट विशेष, एक मतसे पञ्चकर्मान्तर्गत कर्मविशेष ।
जहरीला कोड़ा। यह अग्निप्रकृति होता है। इसके "उतचे पषं ततोऽवच्चे पचमाकुचन तथा ।
काट खानसे पित्तजन्य रोग लग जाते हैं।
प्रसारयश्च गमनं कर्माण्य तानि पञ्च च ॥” (भाषापरिच्छेद)
उतकेशन (सं० त्रि.) उत्तेजना देनेवाला, जो उभा- उत्खचित (सं० त्रि.) मिथित, मखलत, मिला
रता या बेतरतीबी पैदा करता हो।
हुआ।
उत्क्लेशिन, उतले शन देखो।
उत्खरिन् (सपु०) देव विशेष ।
उतल पान-बस्ति (सं० पु. स्त्री०) वस्तिभेद, पिच- उत्खला (सं० स्त्री.) उत्-रखल-अच-टाप । मुरा
कागको एक दवा। यह पहले एरण्डवीजादि क कसे
नामक गन्धद्रव्य, एक खु.शबूदार चीज । मुरा देखो।
उदल शनक लिये लगायी जाती है। उक्त कल्कमें उत्खात (सं. वि.) उत्ख न ता। १ उम्मलित,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
एरण्डवीज, मधुक, पिप्पली, सन्धव, बचा और हबुषा-
उखाड़ा हुथा।२ उत्पाटित, गिगया हुआ। ३ विना-
फल डालते हैं। (वैद्यकनिधए)
शित, मारा हुआ। ४ खनित, खोदा हुा । “रथेनानुस्-
उत्क्षिप्त (सं० वि०) उत्-क्षिप-।-१ क्षिप्त खातस्तिमितमतिना।" (यकुन्तला) (को०) ५ उत्खनन, गट्टा।
उछाला या उठाया हुषा, जो ऊपर चढ़ा दिया गया उत्खातक लि (सं० पु०) कोड़ा विष, एक खेल। इसमें
हो। २ निराकत, घटाया हुघा, जो फेंका गया हो। शृङ्गादि दाग वृष एवं मजकी भांति मृत्तिका खोदते हैं।
१ दशैकृत, खारिज किया हुआ। (पु.) ४ धुस्तर- उत्खाता, उत्सातिन् देखो।
कल, धतूरेका समर।
उत्खातिन् (सं.वि.) १ माशक, बरबाद करने-
उवक्षिप्तकम्पन (सं० लो०भूमिकम्यविशेष, किसो वाला, जो खोद डालता हो। २ उत्खननयुक्त, जिसमें
विस्मका जलजला, एक भूडोल। इस प्रकारसे कम्प-
पानपर भूमि मानो उछन्त पड़ती है।
| उत्खेद (सं० पु. ) उत्-खिद भावे घत्र । छेदन,
उतक्षिप्तिका (म० स्त्रो०) उत्-क्षिप-क्तिन्-कन् टाप । काटछांट।
कर्यालङ्कार विशेष, कानका एक गहमा। यह अर्ध- उत्त (सं० वि०) उन्द केदने त, गुदविदेति पक्षे गावा-
चन्द्राकार रहती और कर्ण के उपरि भागमें पहनी भावः । श्रा, तर, भीगा। (हिं.) उत और उत देखो।
बाती है।
उक्तंस (सं० पु.) उत्-तसि-पच् हलचेति घन वा।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२०४
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कूज-उत्क्रोश'''|'''२०३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उत्कूज (सं० पु०) कोकिलका शब्द, कोयलका उत्कोचक (सं० वि०) उत्कोच-कन्। १ उपायन
गाना।
दान करनेवाला, जो रिशवत देता हो। २ उपायन
उत्कूट (सं० पु.) छत्र, छाता, आफताबी। ग्रहण करनेवाला, रिशवतखोर। (पु.) धीम्या-
उस्कूदन (सं.ली.) वलान, उछलकूद।
श्रमके निकटस्थ तीर्थविशेष। (भारत पादि १८३१०)
उत्कूल (वै०नि०) १पर्वतपर चढ़नेवाला, जो उत्कोठ (सं० पु०) कोठरोगभेद, किसी किस्मका
ज'चेपर हो। (अय.) २ पर्वतपर, पहाड़के ऊपर। जुजाम, एक कोढ़। इस रोगमें उदीर्ण पित्त, श्रेषण
उत्कूलित (सं० त्रि.) सागर वा नदीके तटपर पानीत, और अनिलके ग्रहसे असम्यक् वमन होता और
जो किनारे लगा हो।
सकण्ड, रागवान् तथा सानुबन्ध बहु मण्डल पड़ता है।
उत्कृति (सं० स्त्री०) २६ अक्षरका छन्दोविशेष।
(भावप्रकाश)
इसमें चार-पद होते हैं।
उत्क्रम (स० पु०) उत-क्रम-अच् । १ व्यतिक्रम,
उत्क्रत्त (सं० वि०) उत्-कृत्-न। १ छिन्न, कटा वैपरोत्य, इनहिराफ, भड़काव। २ उपरि वा वहि-
हुअा। २ उत्खात, खुदा हुआ।
गंमन, ऊपरी या बाहरी चाल। ३ उन्नति, तरक्को।
उत्कृत्य (सं० अव्य०) छिन्न करके, काटकर। उत्क्रमण (सं० लो०) उत्-क्रम-ल्याट । १अपसरण,
उत्कृत्यमान (सं० त्रि.) छिन्न किया जानवाला, जो उड़ान, निकास। २ वैपरीत्य, इनहिराफ, भटकाव ।
कट रहा हो।
उत्क्रमणीय (सं.वि.) त्यागने. योग्य, जो छोड़
उत्कृष्ट (सं० त्रि०) उत्कृष्-त । १ प्रशस्त, बढ़ा देनेके काबिल हा।
हुमा, जो खिंचकर ऊपर या बाहर निकल गया हो। उत्क्रान्त (सं० वि०) उत क्रम-क्त। १ उहत, उभरा
२ उत्तम, श्रेष्ठ, उम्दा, बढ़िया। ३ उत्कर्षान्वित हुआ, जो आगे निकल गया हा। २ उल्लवित, लांधा
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
ऊंचे दरजेवाला। ४ कर्षणवत, खिंचा हुआ। हुआ, जो पौछे रह गया हो।
५ सर्वोत्तम, सबसे अच्छा । ६ आकर्षित, खिंचा हुआ। उत्क्रान्ति (सं० स्त्रो०) उत्-क्रम-क्तिन्। उहमन,
उत्क्लष्टता (सं० स्त्री० ) श्रेष्ठता, उम्दगी, बड़ाई। उल्लङ्घन, सबकत, उभार, निकास, आगे बढ़ जानेको
उत्कृष्टत्व (सं० लो०) उत्कृष्टता देखो।
हालत । "प्रियमाग्यस्योतक्रान्तिप्रकार" (मधुसूदनसरस्वती)
उत्कष्टभूम (सं० पु०) श्रेष्ठभूमि, बढ़िया जमौन्। उत्क्रान्तिन् (सं० वि०) उगमनकरनेवाला, जो आगे
उत्कृष्टवेदन (सं० लो०) श्रेष्ठकुलके साथ विवाह- निकल गया हो।
कार्य का समापन, ऊंचे खान्दानवाले आदमीसे शादीका उत्क्राम (स० पु.) १ उगमन, उल्लङ्घन, सबकृत,
करना।
प्रागे बढ़ जानेको हालत। २ वैपरोत्य, इनहिराफ,
उत्कष्टोपाधिता (सं० स्त्री०) प्रवल मायाको स्थिति, उलट-पुलट। .
बड़े धोकेको हालत।
उत्क्रामत् (सं० वि०) उद्दमनकारो, सबकत ले
उतकेन्द्रक शक्ति (सं० स्त्री०) बलविशेष, एक ताकृत। जानवाला, जो आगे बढ़ रहा हो।
वेगसे आवर्तमान वस्तु में इसका उद्भव होता है। यह उत्क्रष्ट (सं० वि०) १ उच्चैः स्वरसे कथन करता.'
उक्त वस्तु के अंश विशेष अथवा तदुपरिस्थित अन्य हुया, जो ज़ोरसे बोल रहा हो। (लो.)२सगब्द
ट्रव्यको केन्द्रसे पृथक् फेंक देती है। उत्केन्द्रकशक्ति कथन, पुरशोर गुफ्तगू, चेंचें।
हो चक्रका कर्दम निकाल इधर उधर छिटकाती उत्क्रोद (वै० पु.) परमाबाद, उनास, खुशो। .
रहती है।
उत्क्रोश (सं० पु.) उत्क्रुश-अच् । १ जलचर
उत्कोच (सं० पु०) उत्-कुच सोचे क । उपायन, पक्षिविशेष, एक दरयायो परिन्द। यह मत्स्यघाती
रिशवत, स।
होता है। इसका मांस रक्लपित्तघ्रा, भोतल, स्निग्ध,
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्त'सिक-उत्तमपुरुष'''|'''२०५'''}}</noinclude>
१ कर्णभूषण, बालो, कानका गहना। २ शिरोभषण, इन्हें मार डाला था। प्रियव्रतके पुत्र टतीय मनु।
कलंगी।
१. छब्बीसवें व्यास। ११ जनपद विशेष। ( भारत भीष्म
उत्तंसिक (सं० पु.) नागविशेष ।
९०) यह विन्ध्यप्रदेशमें अवस्थित था। पुराणान्तरमें
उत्तंसित (सं० त्रि०) १ कर्णभूषणविशिष्ट, बाली उत्तमण और उत्तामार्ण पाठ लक्षित है। १२ अश्व-
पहने हुआ। २ शिरोभूषण युक्त, कलंगो लगाये हुआ। विशेष, किसी किस्मका घोड़ा। यह बड़ा वीर होता
उत्तराई–१ मन्द्राजप्रान्तके सलेम् जिलेका एक है। युद्ध में उत्तम आघात खाते भी अपने सादिनको
ताल्लुक। यह अक्षा० ११.४६ तथा १२° २४ उ० नहीं छोड़ता। (जयदत्त)
और ट्राधिक ७८.१५ एवं ७८° ४६ पु०के मध्य प्रव- विशेषणके रूप में समास लगनेपर उत्तम शब्द
स्थित है। भूमिका परिमाण ८०० वर्गमौल है। प्रायः संज्ञासे पोछे आता है, जैसे-हिजोत्तम, सर्वोत्तम
इसमें कोई ४३६ ग्राम लगते और प्राय ११०००० और नरोत्तम।
मनुष्य बसते हैं। हिन्दुवों को ही संख्या सबसे अधिक उत्तमगन्धा (सं० स्त्री०) मल्लिका, चमेली।
है। कुछ मुसलमान और ईसाई भी हैं। दक्षिण, उत्तमगन्धाव्य (सं० त्रि०) मधुर-सौरभ-विशिष्ट, मोठी
पूर्व और थोड़े बहुत पश्चिम भी पहाड़ खड़े हैं। ख शबूवाला।
उत्तरको पोर तिरुपातूर उपत्यका है। भूमि प्रधा- उत्तमता (सं० स्त्री० ) १ श्रेष्ठता, ख बी, बड़ाई।
नतः लाल और रेतीली है।
। २ साधुशीलता, नेकचलनी, भलाई।
२ अपने ताल्ल कका प्रधान नगर। यह दक्षिण- उत्तमताई (हिं०) उत्तमता।
पश्चिम मन्द्राजरेलवेके जोलारपेट जड-शन-टेशनसे कोई उत्तमपद (सं० पु०) उच्चस्थान, ऊंचा पोहदा।
२४ मील दूर है।
उत्तमपालैयम्-मन्द्राजप्रान्तीय मदुरा जिलेके पेरिया-
उत्तङ्ग (सं० पु०) महादेवके एक अनुचरका नाम। कुलम् ताल्लुकका एक नगर । यह अक्षा०८४८३."
(हिं०) उत्तुङ्ग- देखो।
उ० और द्राधि० ७७° २२ २० पू०में चिन्नामनूरसे
उत्तट (सं० त्रि०) स्वीय तटको उत्सित करनेवाला, ५ मील दक्षिण अवस्थित है। पहले उत्तमपालैयम्
जो अपने किनारेको सोचता हो।
मदुराके एक प्राचीन पालैयम् राज्यका प्रधान
उत्तप्त (सं० लो०) उत्-तप-क्त। १ शुष्कमांस, सूखा स्थान था।
गोश्त। २ सन्ताप, उबाल, गर्मी। (नि.)३ तप्त, उत्तमपुरुष (सं० पु.) १ श्रेष्ठ मनुष्य, अच्छा
तपा हुआ, गर्म। ४ सन्तप्त, जो जल गया हो। ५ परि अादमी। २ शाब्दिक गणका उत्तम व्यक्ति, फेलके
सत, तरबतर, नहाया-धोया। ६ चिन्तित, फिक्रमन्द । गरदानका आदना सोगा । (First person)
उत्तभित (सं० त्रि.) उन्नमित, झुका हुआ।
हिन्दीमें 'मैं' शब्द उत्तमपुरुषका द्योतक है। कर्ता
उत्तम (सं० त्रि०) उत्-तमप। १ उत्कृष्ट, श्रेष्ठ,
कारकमें सकर्मक क्रियाके साथ प्रयोग पड़नेपर 'ने'
उमदा,बढ़िया। "उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।"
आगम होता है। जैसे-मैंने पत्र पढ़ा था। किन्तु
(तुलसी) २ अन्त्य, आखिरी। "उत्तमशब्दोऽन्यार्थः।" अकर्मक और वर्तमान तथा भविष्यत कालकी सकर्मक
( सिद्धान्तकौमुदी) ३ प्रधान, खास, सबसे बड़ा। ४ प्रथम, क्रियाक साथ 'ने'का आगमनका निषेध है। जैसे-मैं
औवल। (अव्य०) ५ अत्यन्त, निहायत, बहुत । पत्र पढ़ता हूं, मैं पत्र पढ़गा, मैं आता है, मैं आया
(पु.) विष्णु। ७ व्याकरणानुसार-अन्त्य पुरुष, था और मैं आऊंगा। 'मैं' का बहुवचन 'हम' है।
आखिरी सौगा। युरोपीय इसे आदिपुरुष कहते हैं। 'मैं के साथ वर्तमानकालको क्रियापर 'ईका आगम
८ सुरुचिके गर्भजात उत्तानपादके एक पुत्र। यह | पड़ता है, जैसे-मैं बोलता है। कर्मकारकमें 'मैं' का
ध्रुवके सौतेले भाई और प्रियव्रतके भतीजे रहे । कुवेरने । 'मुझे' आदेश हो जाता है, जो अव्यय लगनेसे अपने
Vol III. 52<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्तमार्ध्य-उत्तरकुरु'''|'''२०७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उत्तमार्ध्य (सं॰ त्रि॰) अन्तिम वा उतकृष्ट अर्ध। सम्बन्धीय, आख़िरी या उम्दा अड्वे से ताल्लुक रखनेवाला।}}
{{Outdent|उत्तमाह ( सं॰ पु॰) अन्तिम दिवस, आखि़री या उम्दा दिन।}}
{{Outdent|उत्तमीय (सं॰ त्रि॰) प्रधान, उत्कृष्ट, उम्दा, सबसे ऊंचा।
{{Outdent|उत्तमोत्तम (सं॰ त्रि॰) उत्कृष्ट से उत्कृष्ट, उम्दासे उम्दा, जो सबसे अच्छा हो।}}
{{Outdent|उत्तमोपपद (सं॰ त्रि॰) सर्वोत्तम, उतकृष्ट, जिसके लिये सबसे अच्छी बात कही जा सके।}}
{{Outdent|उत्तमौजस् (सं॰ पु॰) १ दशम मनुपुत्रभेद। २ एकजन महावीर। इन्होंने कुरुक्षेत्रमें पाण्डवोंके पक्षमें रह युद्ध किया था। <small>(भारत)</small>}}
{{Outdent|उत्तम्भ (सं॰ पु॰) उत्-स्तन्भ-घञ्। १ स्तम्भी भाव, रोक रखनेकी हालत। २ निवृत्ति, छुट्टी ३ अवलम्ब, सहारा।}}
{{Outdent|उत्तम्भन (सं॰ क्ली॰) उत्त-स्तन्भ-ल्युट्। १ अवलम्बन, गिरफ्त, पकड़, टेक। २ मेख, खूंटा।}}
{{Outdent|उत्तम्भित (सं॰ त्रि॰) १ सधा या टिका हुआ। २ रोका या पकड़ा गया। ३ उत्तान, खड़ा, सीधा।}}
{{Outdent|उत्तम्भितव्य (सं॰ त्रि॰) पकड़ा या रोका जानेवाला।}}
{{Outdent|उत्तर (सं॰ क्ली॰) उत्-तृ-अप्, उत्-तरप् वा। १ प्रतिवाक्य, जवाब। <small>“प्रत्रश्चोद्यपि या पृच्छा तस्य खण्डन-मुत्तरम्।” (याज्ञवल्का)</small> २ दोषभजन वाक्य, ऐब मिटाने-वाली बात। ३ जिज्ञासित विषयमें अपने मतका प्रकाश, पूछी जानेवाली बातपर अपने ख़यालका इज़हार। किसीके आह्वान करने पर तत् श्रवण-सूचक वाक्य, किसीके पुकारने पर उसके सुन लेनेको बात। ५ उपरि तलका आवरण, ऊपरी सतह या ढक्कन। ६ दिक् विशेष, दक्षिणके सामनेकी दिशा। ७ निम्न संस्था, मिली हुई चीज़का आखि़री हिस्सा। ८ व्यवस्थाके अनुसार प्रतिवचन, कानून् में हद जवाब। ९ मीमांसानुसार अधिकरणका चतुर्थ अंश, हालतका चौथा टुकड़ा। १० उत्कृष्टता, अज़मत, बड़ाई। ११ फल, नतीजा, गणितमें शेष, बाकी फ़र्क़। १२ गीत विशेष, एक गाना। (पु॰) १३ शिव।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:१४ विराटराजके पुत्र। कौरवगणने जब विराट-राजके गो चुराये, तब ये अर्जुनको सारथी बना लड़नेको आये थे। १५ नागराज विशेष। १६ पर्वत-विशेष, एक पहाड़। (त्रि॰) १७ ऊर्ध्व, ऊंचा, बड़ा। १८ उत्तरीय, शिमाली। १९ प्रधान, श्रेष्ठ, खा़स, बढ़िया। २० वाम, बायां। २१ निम्नग, नीचे पड़ने-वाला। २२ अधिक उत्तम, ज्यादा अच्छ। २३ अनन्तर पिछला। (अन्य॰) २४ फलतः, अखीरको।
{{Outdent|उत्तरकाण्ड (सं॰ क्ली॰) १ पुस्तकका शेषांश, आखि़री किताब। २ रामायणका अन्तिम काण्ड वा पुस्तक।}}
{{Outdent|उत्तरकाय (सं॰ पु॰) शरीरका ऊर्ध्व भाग, जिस्म का ऊपरी हिस्सा।}}
{{Outdent|उत्तरकाल (सं॰ पु॰) १ भविष्यत् काल, आनेवाला वक्त। २ गौणकाल, छोटा ज़माना।}}
{{Outdent|उत्तरकाशी (सं॰ स्त्री॰) पुण्यस्थान विशेष, एक जगह। यह हरिद्वारसे उत्तर लगती और बदरीनारायणकी राहमें पड़ती है।}}
{{Outdent|उत्तरकुरु (सं॰ पु॰) जम्बूद्वीपका वर्षविशेष, कुरुवर्ष। उत्तरकुरुके सम्बन्धमें अनेक मतभेद है। अध्यापक लासेनके कथनानुसार यह जनपद तिब्बतमें ब्रह्मपुत्र नदके उभय तीर रहा। (Kart von Alt Indien) विलफोर्ड हिमालयके सानुदेशमें इसे तिब्बतका एक नगर समझते हैं। (Asiatic Researches, Vol.ix, p. 63. 67, xiv. 387) भोगोलिक सेण्टमार्टिन उत्तरकुरुका अस्तित्व नहीं मानते। उनके मतसे यह एक कल्पित स्वर्ग है। (E’tude sur la Geographie Grecque et Latine de'l Inde, 413-414) किन्तु निम्नलिखित प्रमाण देखनेसे सहजमें ही समझ पड़ता है―%एकन्नामक स्थान पूर्वकाल में रहा,――}}
{{blockcenter|<poem><small>“ये के च परेण हिमवन्त जनपदा उत्तरकुरुव उत्तरमद्रा इति।”
{{Right|(ऐतरेयब्राह्मण ८।१४)}}
“उत्तरांच कुरुन् पश्यन् पश्यश्चैव नगोत्तमान्।
देवदानवसङ्घैश्र सेवित ह्यमृतार्थि भि:॥” (रामायण अरण्य ३९।१८)</small></poem>}}
महाभारतके अनुसार सुमेरुसे उत्तर नीलपर्वतके दक्षिण पार्श्व पर उत्तरकुरु अवस्थित है। (भीष्म ५अ० )
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:१४ विराटराजके पुत्र। कौरवगणने जब विराट-राजके गो चुराये, तब ये अर्जुनको सारथी बना लड़नेको आये थे। १५ नागराज विशेष। १६ पर्वत-विशेष, एक पहाड़। (त्रि॰) १७ ऊर्ध्व, ऊंचा, बड़ा। १८ उत्तरीय, शिमाली। १९ प्रधान, श्रेष्ठ, खा़स, बढ़िया। २० वाम, बायां। २१ निम्नग, नीचे पड़ने-वाला। २२ अधिक उत्तम, ज्यादा अच्छ। २३ अनन्तर पिछला। (अन्य॰) २४ फलतः, अखीरको।
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“उत्तरांच कुरुन् पश्यन् पश्यश्चैव नगोत्तमान्।
देवदानवसङ्घैश्र सेवित ह्यमृतार्थि भि:॥” (रामायण अरण्य ३९।१८)</small></poem>}}
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" /></noinclude>२०६
उत्तमफलिनी-उत्तमा
अन्तका एकार खो देता है,जैसे-मुझको, मुझसे,मुझ-, उत्तमसंग्रह (स० पु.) १ सम्यक् संग्रहण, उम्दा
पर और मुझमें। मैंका सम्बन्धकारक "मेरा' और गिरफ्त। २ निर्जनमें पर पत्नीके साथ परस्पर
'इम'का' हमारा है। कोई कोई समझते हैं कि पालिङ्गन उपवेशनादिरूप प्रेमालाप, दूसरेको
उत्तम पुरुषमें संस्कृत और अंगरेजी व्याकरण नहीं औरतके साथ अकेले मिलना-जुलना और हंसना
मिलता। किन्तु यह बात झठ है। क्योंकि उत्तमका बोलना।
अर्थ प्रथम (First) ही है।
उत्तमसाहस (संपु.). १ स्म त्यक्त दण्ड विशेष ।
३ जैनशास्त्रानुसार संसार में सबसे उत्कृष्ट ऐश्वर्यवाले इसमें १०००, ८००० वा १८०००० पण जुर्माना देना
पुरुष। परिवर्तनशील कालके एक अपेक्षासे जैन पड़ता है। "परस्य पतनीयाक्षेपे कृते तूत्तमसाहसम्।” (याज्ञवल्का)
शास्त्रमें दो विभाग किये हैं-उत्सर्पिणी, और अव- २ उत्कट दण्ड, कड़ी सज़ा-जैसे सर्व ख हरण, अङ्ग.
'सर्पिणी। इन दोनों कालोंमेंसे हर एकमें तिरेसठ तिरे कर्तन और व्यापादन ।
सठ उत्तमपुरुष हुआ करते हैं। वे इसप्रकार हैं-चक्र- उत्तमा (स• स्त्रो०) उत्तमप-टाप। १ उत्कृष्ट
वर्ती १२, तौथ कर २४, नारायण ८, प्रतिनारायण, स्त्री, उम्दा औरत । २ खोयादि नायिकाभेद। यह
और बलभद्र। शलाका और चक्रवर्ती प्रादि शब्द देखो। । मन्दकारिणी होते भी प्रियतमके प्रति हितकारिणी
उत्तमफलिनी (स स्त्री०) उत्तम फल-णिनि-डीप। रहती है। ३ दुग्धिका, दूधी । ४ मनःशिला।
टुग्धिका, दूधी।
५भूम्यामलको,भुयिं आंवला। ५ त्रिफला; आंवला, हर
उत्तमभद्र-बबईप्रान्तके एक क्षत्रिय राजा । नासिकको और बहेरा। ६ मुस्ता, मोथा। ७ शूकदोषविशेष,
एक गुफामें जो शिलालिपि मिली, उसपर यह बात जकर बढ़ानेको दवा लगानेसे पैदा हुई एक बीमारी।
लिखी है-मलयके लोगोंने एक बार स्थानीय क्षत्रिय इसमें शूक और अजीग से लिङ्गपर मुहमाषके समान
नृपति उत्तमभद्रपर चढ़ाई की थी। बहरात नहपान रक्तपित्तको रक्तपिड़का पड़ जाती हैं। (सनुत)
नृपतिके जामाता और दोनोक उशवदातके पुत्र | उत्तमाङ्ग (स. क्लो) उत्तम प्रशस्तमङ्गम, कर्मधा।
इनके साहाय्यको सैन्य लेकर आगे बढ़े, जिससे | १ मस्तक, सर । मस्तक देखो। २ मुख, दहन ।
शत्र पीछे हटे और उत्तमभट्र के अधीन हुये थे।
"उत्तमाङ्गोडवाच्या ठाब्राह्मणयेव धारणात् ।" (मनु १९३)
उत्तमण (स० पु.) उत्तम-मृणमस्य। ऋणदाता, उत्तमाधम (सं• त्रि.) उच्च नीच, भला-बुरा,
कुज दिहन्दा, महाजन, साह ।
बढ़िया-घटिया, छोटा-बड़ा।
उत्तमर्णिक (सं० पु०) उत्तम देयत्वे नास्तास्य, ठन् । उत्तमाधममध्यम (सं. त्रि.) उच्च, नीच और
उत्तमण, कर्ज दिहिन्दा, मालिक ।
मध्य, ऊंचे, नीचे और औसत दरजेवाला।
"राज्ञाधमर्थिको दाप्य: साधिताद्दशकं शतम् ।
उत्तमाम्भस (स. क्लो०) तुष्टि विशेष, एक आस्-
पञ्च पञ्च शतं दाप्य: प्राप्तार्थोडोत्तमर्णिकः।” (याज्ञवल्का रा४३) दगी। सांख्य मतानुसार यह हिंसा छोड़नसे मिलती
उत्तमणिन, उत्तमर्थ देखो। .
है। योगमें इसका नाम सार्वभौम-महाव्रत है।
उत्तमलाम (सं• पु०) विपुल कलान्तर, बड़ा उत्तमाय्य (वै० त्रि.) उठाया या देखाया जाने-
फायदा।
वाला, जो मनाया जानेवाला हो।
उत्तमवारि (सं० लो०) १ तण्डुलोदक, चावलका उत्तमारणी (सं० स्त्रो०) १ इन्दीवरा। २ इन्द्र-
पानी। २ उत्कष्ट जल, उम्दा पानी।
वारुणी। ३ इन्द्रचिर्भिटी। ४ योधामल्लिका, जूही।
उत्तमवेश (सं० पु०) शिव, महादेव।
उत्तमार्ध (सं० पु०) १ अन्तिम अर्ध वा भाग,
उत्तमवैद्य (सं० पु.) तसाङ्ग-वेदाध्ययन वैद्य, । आखिरी पहा या हिस्सा। २ उत्कृष्ट प्रधे, निहायत
उम्दा तबीब, बढ़िया डाकर।
उम्दा पहा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४७
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४६|इन्द्रजाल|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} वृहस्पतिवारकी हाथीकी खोपड़ी में अङ्गीलका बीज वो मन्त्रपाठपूर्वक जलसेचन करे और फल लगनेपर एक वीजको त्रिलौहसे लपेट सुखमें दवा ले। इस प्रक्रियासे मनुष्य हस्ती जैसा बलवान् और वायु-त्रिलोह सकल कार्यमें बारह भाग तांबा और तुल्य पराक्रमी हो सकता है। प्रसिद्ध है। दश भाग सोना, सोलह भाग रूपा मिलानेसे त्रिलोह बनता है। महादेवका वाक्य मिथ्या नहीं, किसी वीजकी अङ्लीके वीजमें मिला मट्टीमें बोवे और फिर मन्त्र पढ़कर त्रि-लौहसे लपेट उसे मुखमें रखे तो साधक बिलकुल वैसा ही बन सकता है। कई वीज अङ्गीलमें मिलाकर बोनेसे उसी समय वृक्ष ऊगता है। अङ्गीलके फलका तैल एक विन्दु मुखमें डालनेसे मुर्दा प्रहरके मध्य ही जी उठता है।
शोभाञ्जनाका तेल, कपीतकी विष्ठा, शूकर तथा गर्दभकी चर्बी, हरिताल और मनःशिला एकमें मिला टीका लगानेसे मनुष्य वारण-जैसा बन सकता है।
पेचककी विष्ठा एरण्डतैलके साथ रगड़ गात्रमें लगाते ही लोग पागल हो जाते हैं।
सर्पका दन्त, काले बिच्छूका कण्टक और छिपकली (क्ककलास) का रक्त एकमें पोस गात्त्रपर लगाते हो मनुष्य मरता है।
सिन्दूर, गन्धक, हरिताल तथा मनःशिलाकी एकत्र पीस वस्त्रपर डालने और पीछे उसी वस्त्रकी मस्तक पर बांधनेसे समस्त जगत् अग्निमय दीख पड़ता है।
विकीरण, वट और उडुम्बरका दुग्ध किसी पात्रके मध्य लगा कर जल डालनेसे दूध निकलता है। राक्षस-जैसा लगता है और उसे देखते ही सब कोई भय खाकर भागते हैं।
अङ्गीलके फलका तेल रात्रिको प्रदीपमें जलानेसे आकाशका भूत सकल भूमिपर दीख पड़ता है।
बुधवार शनिवारको कक्लास मारकर शत्रुगणके मूत्रोत्सर्ग-स्थानमें गाड़ दे। पीछे उसे न उखाड़नेसे गत्त्र, क्लीब हो जाते हैं।
गन्धक, हरिताल, गोमूत्र और विष एकत्र पीस
{{Multicol-break}}
अग्निमें छोड़नेसे समस्त विघ्न मिटता है। (दत्तात्र यतन्त्र)
वशीकरण एवं आकर्षण वसन्त, विदेषण ग्रीष्म, स्तम्भन वर्षा, मारण शिशिर, शान्तिकर्म भरत् और उच्चाटनकार्य हेमन्तको पूर्णिमाको करना चाहिये। {{smaller|वशीकरण देखो।}} दिनके पूर्वाह्न वसन्त, मध्याह्न ग्रोम, अपराह्न वर्षा, सन्या शिशिर, अर्धरात्र हेमन्त और फिर शरत् ऋतुका समय आता है।
{{smaller|पक्षादि निर्णय}}—मारणादि अभिचार क्लष्णमें, और शान्ति प्रभृति मङ्गलकर्म शुक्लपक्षमें करना उचित है। द्वादशी तथा एकादशोको मारण; तृतीया एवं नवमी-को वशीकरण ; चतुर्दशी, चतुर्थी तथा प्रतिपत्की स्तम्भन और द्वितीया, षष्ठी एवं अष्टमीको शान्तिकर्म होता है।
अश्विनी, मृगशिरा, मूला, पुष्या तथा पुनर्वसुमें वशीकरण और अनुराधा, जेष्ठा, उत्तराषाढ़ा एवं रोहिणी नक्षत्रमें मारण, विजय, शान्ति तथा स्तम्भन किया जाता है। इस सकल कायमें तिथि और नचत्रको विवेचना आवश्यक होती है, नहीं तो मन्त्रादिकी सिद्धि बिगड़ जाती है।
जयपुष्या नक्षत्रमें गीजिह्वा और अपामार्गका मूल उखाड़ मस्तकपर रखनेसे सकल विवाद में जय मिलता है।
{{smaller|सौभाग्य}}—पुष्यानचत्र में श्वेत विकीरणका मूल उखाड़ दक्षिण वाहुपर बांधनेसे सौभाग्य बढ़ता है।
{{smaller|क्रोधीपशम}}—{{smaller|'ॐ शान्त प्रशान्त सर्वक्रोधोपशमनो स्वाहा'}} मन्त्र इक्कीस बार जपकर जो मनुष्य मुख धोता है, उसके प्रति किसीको क्रोध नहीं होता।
खेत अपराजिताका मूल हस्तपर बांधने और शिवजटाका मूल मुखमें डालनेसे हस्ती निकट नहीं आ सकता।
वृहतीमूल हस्त और मुखमें धारण करनेसे व्याघ्र-का भय छूट जाता है।
'हीं हों ह्रीं श्रीं श्रों श्रों स्वाहा' मन्त्र पढ़कर पत्थर फेंकनेसे व्याघ्र न तो मुख झुका सकता है और न चल ही सकता है। नारिकेलमूल कृष्णचतुर्दशीको धारण कस्नेसे व्याघ्रका भय नहीं होता। {{smaller|(इन्द्रजालतन्त्र)}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रजाल|४७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
स्तम्भन—जिस व्यक्तिके मुखमें सफेद चिरभिटीकी जड़ रहती है उसके सामने किसीकी बात नहीं चलती।
'ॐ ह्रीं ह्रीं रक्ष रक्ष चामुण्डे कुरु कुरु अमुकं में वशमानय वशमानय स्वाहा' मन्त्रसे कार्यसिद्धि होती है। रविवारको पुष्यानक्षत्रमें यष्टिमधुका मूल उखाड़ सभामें फेंक देनेसे सत्रका मुंह बन्द हो जाता है।
मेघस्तम्भन—एक ईटपर चार चतुष्कोण रेखा खींच दूसरी ईंटसे दबावे और 'ॐ मेघान् स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा' मन्त्र पढ़कर किसी बागमें गाड़ देवे तो मेघकि दृष्टि रुकती है।
भरणीनक्षत्रमें उदुम्बर प्रभृति क्षीरीष्टक्षके मूलकी और पांच अङ्गील परिमाण एकखण्ड काष्ठको नौकामें डाल देनेसे उसकी चाल रुक जाती है।
निद्रास्तम्भन—यष्टिमधु और वृहतीका मूल बारीक पीसकर सूंघनेसे निद्रा नहीं आती।
अस्त्रस्तम्भन—कपित्यका मूल कृत्तिका-नक्षत्रमें उखाड़ धारण करनेसे देवगणका अस्त्र भी स्तम्भित होता है।
गुलञ्चका मूल उखाड़ हस्तपर धारण करनेसे शस्त्र भय छूट जाता है।
'ॐ अहो कुम्भकर्ण महाराक्षस निकषागर्भसम्भूत परसैन्यस्तम्भन महाभय रणरुद्र आज्ञापय स्वाहा' मन्त्र १०८ बार जप करने और अपामार्गमूल शुभनक्षत्रमें उखाड़ शरीरपर मलनेसे समस्त शस्त्रका स्तम्भन होता है।
पेटकी हड्डी गोष्ठकी चारो ओर भूमिमें गाड़ देनेसे गो, मेष, महिष, अश्व प्रभृति स्तम्भित हो जाते हैं।
भृङ्गराज, अपामार्ग, खेत सर्षप, सहदेविका, अर्शघ्न, वच और खेत विकीरणका मूल उखाड़ लौह पात्रमें रखे और दो दिनके बाद निकाले। फिर उसका तिलक लगावे और 'ॐ नमो भगवते विश्वामित्राय नमः सर्वसुखीभ्यां विश्वामित्र आगच्छ स्वाहा' मन्त्रका जप करे तो सब प्राणियोंको बुद्धि स्तम्भित होती है।
'ॐ ब्रह्मवेशिনি शरे रक्ष रक्ष स्वाहा' मन्त्र पढ़कर
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सात पांसे उठायिये। उनमें से तीन कटिमें बांधने पर और बाकी हाथमें रखनेपर चौरगति रुक जाती है।
देहरञ्जन—कदम्बपत्त्र, लोधु और अर्जुनपुष्यी एकत्र पीस अङ्गमें लगानेसे दुर्गन्ध दूर होती है।
एला, शटी, तेजपत्त्र, रक्तचन्दन, हरीतकी, शोभाव्जन, मुस्तक, कुष्ठ और अन्यान्य सुगन्ध द्रव्य पीस गात्रमें मलनेसे जो सोरभ उठता है, उससे सकल हो मोहित हो जाते हैं।
आम्म्र एवं जम्बुकी आठों तथा पद्ममूल पास मधुके साथ रात्रिको मुखमें रखनेस पुरुषके मुखका दुर्गन्ध दूर होता है और सुगन्ध आने लगती है। मुरा-मांसी, नागकेशर एवं कुष्ठको बांटकर पन्द्रह दिन तक प्रातः तथा सन्धयाकाल चाटनेसे स्त्रोके मुखमें कपूरको गन्ध भर जाती है
लोहका मल, जवापुष्य और आमलको बांटकर शिरःपर लगानेसे तीन मासके मध्य सफेद बाल काले हो जाते हैं।
छागीके दुग्ध द्वारा सात दिन पर्यन्त भावना दे तिलका तेल निकाले और फिर उसे शिरःमें लगावे तो काले बाल सफेद हो जाते हैं।
अश्विनी नक्षत्र में वटकी जीवन्तिका दुग्धके साथ पुष्यनक्षत्रमें खानेसे पुरुष बलवान् बनता है। विकीरणका मूल उखाड़ गोदुग्धसे बांटकर खानेपर सात दिनमें वृद्ध भी युवाके समान कूदने लगता है।
जन्मवन्धया-चिकित्सा—रविवारको मूलपत्र तथा शाखा सहित गन्धनाकुली उखाड़ एकवणे गोके दुग्ध में अविवाहित कन्यासे पिसा ऋतुकालमें चार तोले परिमाण सात दिन पर्यन्त खावे और दुग्ध एवं मूंगको दाल प्रभृति लघु पथ्य खावे तो वन्ध्याके गर्भरह जाता है। इस औषधको खाकर उद्देग, भय, शोक और दिवानिद्रा त्याग कर देना चाहिये। परिश्रमका कार्य करना भी मना है। केवल पतिका सहवास रखना कहा है। अन्यथा होनेसे गर्भ नहीं रहता।
कष्ण अपराजिताका मूल छागीके दुग्धमें बांटकर ऋतुकालपर पीनेसे वन्धया गर्भधारण करती है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४८|इन्द्रजाल|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
गोक्षुरका वीज निसिन्धुके रसमें बांटकर तीन या सात दिन सेवन करनेसे वन्धया गर्भवती होती है।
काकवन्धया-चिकित्सा—रविवारको पुष्यानचत्रमें अश्वगन्धांका मूल महिषीके दुग्धमें बांटकर ४ तोले परिमाण सात दिन खानेसे काकवन्द्याको गर्भ रह जाता है।
मृतवत्सा-चिकित्सा—कृत्तिकानक्षत्रमें पूर्वमुख ही पीतघीषालताका मूल जलके साथ पीस दो तोले परिमाण खानेसे मृतवत्सा दोष दूर होता है।
दाड़िमका मूल दुग्धके साथ बांट पीने और निज पतिसहवास करनेसे मृतवत्सा दीर्घायु पुत्र प्रसव करती है।
मच्चिष्ठा, याष्ठमधु, कुष्ठ, त्रिफला, शर्करा, मेदा लता, चीरयुक्त भूमिकुष्माण्ड, काकोली, अश्वगन्धा-मूल, यमानी, हरिद्रा, चीरकाकोली, खेतचन्दन, दारु-हरिद्रा, हिङ्गल, कटुकी, नीलोत्पल, कुमुद एवं द्राक्षाको दो-दो तोले ले चार सेर घुतमें पकायिये और पाकके समय शतमूलीका रस तथा दुग्ध छः-छः सेर डान्त दीजिये। नियमपूर्वक पकाकर इस घृतको जो नारी पीती है, वह सुन्दर पुत्र प्रसव करती है। अल्पायु सन्तान और केवल कन्या प्रसव करनेका दोष इस घुतसे छूट जाता है। योनि एवं रजोदोष और गर्भस्रावमें यह विशेष उपकार पहुंचाता है। इसके पानसे प्रजा तथा आयुवृद्धि और ग्रहदोषकी शान्ति होती है। इसे फलष्टत कहते हैं। यह अति आयुष्कर है। वैद्य इस घृतमें खेत कण्टकारी भी डालनेको व्यवस्था देते हैं। जङ्गली वेरकी आगसे इसे पकाना पड़ता है।
गर्भस्राव-चिकित्सा—प्रथम मासके गर्भस्त्रावपर पद्मकेशर और रक्तचन्दन समभाग गोदुग्धके साथ बांट कर खानेसे दोष दूर हो जाता है। अथवा यष्टिमधु, देवदारु, शरवीज और क्षारकाकोली गोदुग्धमें पोस कर पीनेसे गर्भस्त्राव रुकता है।
द्वितीय मास नीलोत्पल, पद्ममृणाल, यष्टिमधु और कर्कटशृङ्गी गोदुग्धके साथ बांट कर पीनेसे वेदना मिटती है।
तृतीय मास रक्तचन्दन, तगर, कूट, मृणाल और
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पद्मकेशर शीतल जलमें पीसकर पौनेसे पीड़ा छूटती है। अथवा चोरकाकोली, बला और अनन्तमूलकी दुग्धमें रगड़कर पीना चाहिये।
चतुर्थ मास खेत उत्पल, मृणाल, गोक्षुर और केशरको दुग्धमें बांटकर सेवन करनेसे गर्भस्राव रुकता है। अथवा यष्टिमधु, रास्त्रा, श्यामालता, ब्राह्मण्यष्टिका और अनन्तमूल गोदुग्धमें पोसकर पोना चाहिये।
पञ्चम मास पुनणैवा, काकोली, तगर तथा नीलोत्पल अथवा वृहती, कण्टकारी, उडुम्बर, कायफल, दारुचीनी और गव्यघृत दुग्धके साथ पीसकर खानसे उपकार होता है।
षष्ठ मास सिता, क्रीवेरका मूल एवं आखुमज्जा शीतल जलमें बांट गोदुग्धके साथ अथवा गोक्षुर, शोभाच्जनवोज, यष्टिमधु, पृश्चिपर्णी तथा बला दुग्धमें पीसकर पीनेसे गर्भ नहीं गिरता।
सप्तम मास पद्मका काष्ठ एवं मूल, शृङ्गाटक और नीलोत्पल दुग्धमें बांटकर सेवन करना चाहिये। अथवा किशमिश, शृङ्गाटक और पद्मका केशर गोदुग्ध-के साथ सेवन करनेसे गर्भस्राव रुक जाता है।
अष्टम मास यष्टिमधु, पद्मकाष्ठ, विभौतक, विकीरणमूल, मुस्तक, नागकेशर, गजपिप्पलो और न्नोलपद्म बांटकर दुग्धके साथ खिलानेसे गर्भ-स्राव नहीं होता। अथवा विल्व मूल, कपित्थ, बृहती और शमीकाष्ठ सहित दुग्ध पकाकर देना चाहिये।
नवम मास गोरक्षतण्डुलका वीज और कक्कील मधु सहित पीस लेप करनेसे वेदना दूर होती है। अथवा यष्टिमधु, श्यामालता, अनन्तमूल और धीर-काकोली सहित दुग्ध पकाकर खिलाते हैं।
दशम मास सिता, अङ्कर, किशमिश, मधु और नीलपद्म गोदुग्ध सहित खिलानेसे गर्भस्त्राव रुकता है। अथवा केवल दुग्ध पकाकर ही दे सकते हैं। यष्टिमधु और देवदारु दुग्ध सहित देनेसे भी उपकार होता है।
मधु, वासक, रक्तचन्दन, सैन्धव और महेन्द्रवीज गोदुग्धमें बाँटकर खिलानेसे सर्वप्रकार गर्भस्त्रावदोष नष्ट होता है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रजालविद्या—इन्द्रतूल|४९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
गर्भ शुष्क-चिकित्सा—गर्भशुष्कता दोषकी शान्तिके लिये सिता मिलाकर गोदुग्ध पिलाना चाहिये। अथवा यष्टिमधु और गम्भारीफल समभाग बांटकर गोदुग्ध सहित खिलाना योग्य है।
सुखप्रसव-योग—श्वेत पुनर्णवाके मूलका चूर्ण बना योनिमध्य डालनेसे तत्क्षणात् गर्भ प्रसव होता है।
वासक वृक्षका उत्तरदिस्थित मूल उखाड़ और सप्त-गुण सूत्र द्वारा लपेट कटिपर धारण करनेसे प्रसवमें कष्ट नहीं पड़ता। सहदेवीका मूल कच्क्षमें बांधनेसे भी सुखप्रसव होता है।
चार अङ्गल अपामार्गका मूल योनिद्वारमें डालनेसे प्रसवमें विलम्ब नहीं लगता।
अश्वगन्धाका मूल 'ॐ ॐ फट्' मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर एक तोला घृत मिला खिलाने और 'क्ली' मन्त्र पढ़ ३२ तोले दुग्ध एवं २ तोले मरिच पका सहस्र-परिमित 'ऐ' मन्त्र जपकर पिलानेसे मूत्र स्तम्भित होता है।
{{outdent|इन्द्रजालविद्या (सं॰ स्त्री॰) मायाकर्म समझनेका शास्त्र, जिस इल्ममें बाजीगरीकी बात देखे'।}}
{{outdent|इन्द्रजालिक (सं॰ पु॰) १ कुहककारी, बाजीगर। (त्रि॰) २ भ्रान्तिजनक, ज़ाहिरी।}}
{{outdent|इन्द्रजालिन्।(सं॰ पु॰) १ कुहककारी, जादूगर। २ बोधिसत्व-विशेष।}}
{{outdent|इन्द्रजित् (सं॰ पु॰) इन्द्र जितवान्, इन्द्र-जि-किप्। १ मेघनाद, रावणका बड़ा बेटा। एक समय मेघनादको साथ ले रावण स्वर्गमें इन्द्रसे लड़ने पहुंचा था। इन्द्र रावणसे युद्ध करनेको आगे बढ़े। किन्तु मेघनाद बहुत पहिले इच्छानुसार अदृश्य होनेका वर शिवसे प्राप्त कर चुका था। अदृश्य भावमें लड़ और जीत यह इन्द्रको बन्दी बना लङ्गा पकड़ लाया। ब्रह्माने जाकर इन्द्रको कुड़ाया था। इन्द्रको जीतने-से ही मेघनादका नाम इन्द्रजित् पड़ा। लक्ष्मणने निकुम्भिला यज्ञागारमें इन्द्रजित्को मारा था।<br>{{gap}}{{smaller|"चला इन्द्रजित् अतुलित योधा।" (तुलसी)}}<br>२ दानर्वावशेष। ३ रावणके पिता और काश्मीरके राजा। ४ खुः सत्त्रहवें' शताब्ट्के एक ग्रन्थकार।}}
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{{outdent|इन्द्रजित् सिंह-बुंदेलखण्डके एक राजा। इनके पिता-का नाम मधुकर था। इन्द्रजित्सिंह ओरछा नगर में निवास करते थे। ये एक अच्छे कवि थे। इनकी सभाकी शोभा केशवदास और प्रवीणराय नामक दो कवि बढ़ाते थे। प्रवीणराय एक रण्डीका नाम था। वह सुमधुर कविता बना सकती थी। एकबार दिल्लीके सम्म्राट्ने गुणकी प्रशंसा सुन उसे बुलाया, किन्तु राजा इन्द्रजित्सिंहने न जाने दिया। उसे अकबर बादशाह बहु क्रुद्ध हुये उन्होंने इससे विद्रोही समझकर इनपर दश लाख रुपयेका जुर्माना बोला था। केशवदास इन्द्रजित् सिंहसे बहुत ही उपक्कत थे। इसलिये उनका जुर्माना माफ करानेको दिल्ली पहुंचे। उन्होंने अपने कवितागुणसे अकबरके मन्त्री वीरबलको मुग्ध बना दिया था। वीरबलके द्वारा ही इन्द्रजित्सिंहने छुटकारा पाया। इन्होंने 'धीराज नरिन्द्र' नामक एक काव्य लिखा था। १५८० ई॰ में इन्द्रजित् सिंह विद्यमान थे।}}
{{outdent|इन्द्रजिद्दिजयो (सं॰ पु॰) इन्द्रजितः विजयी, ६-तत्। इन्द्रजित्को हरा देनेवाले लक्ष्मण।}}
{{outdent|इन्द्रजिदृहन्तु (सं॰ पु॰) इन्द्रजित्-हन-तृच्, ६-तत्। इन्द्रजित्को मार डालनेवाले लक्ष्मण।}}
{{outdent|इन्द्रजिह्वा (सं॰ स्त्री॰) लाङ्गलोष्टच।}}
{{outdent|इन्द्रजीत (हिं॰) इन्द्रजित् देखो।}}
{{outdent|इन्द्रजूत (वै॰ ति॰) इन्द्र-जु इति सौत्रोधातुर्गत्यर्थः। इन्द्रदत्त, इन्द्रका दिया हुवा। {{smaller|"युव' श्वेत' पेदव इन्द ज समहि-हनम्।" (ऋक् १।११८१८) 'इन्द्रेण युवाभ्यां गमित' दत्तमित्यर्थः।' (सायण}}}}
{{outdent|इन्द्रज्येष्ठ (बै॰ ति॰) इन्द्रसुख्य {{smaller|'इन्ट् ज्येष्ठाः इन्दो जेष्ठो मुख्यो येषु ते' (ऋक् १।२३१८)}}}}
{{outdent|इन्द्रतम (बै॰ ति॰) इन्द्रसदृश। शक्तिशाली, ताकतवर।}}
{{outdent|इन्द्रतरु (सं॰ पु॰) अर्जन वृत्त।}}
{{outdent|इन्द्रता (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रका बल एवं पद, इन्द्रकी ताकत और हैसियत।}}
{{outdent|इन्द्रतापन (सं॰ पु॰) इन्द्र तापयति, इन्द्र-तप-णिघ्-ल्युं। १ वीतापी असुर। २ इन्द्रजित्।}}
{{outdent|इन्द्रतूल (सं॰ क्ली॰) १ आकाशमें उड्डीयमान सूत्र, आस्मान्में उड़नेवाला सूत। ३ अर्कवृक्षतूलक, मदारको रूई। २. कार्पास, २. कपासः।}}
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 13|2em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|५०|इन्द्रतूलक—इन्द्रधनुस्|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इन्द्रतूलक, {{smaller|इन्द्रतूल देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रतोया (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रं ऐश्वर्यान्वित तोयं यस्याः वा इन्द्रेण पूरितं तोयं यस्याः, बहुब्री॰। गन्धमादन पर्वतके निकट बहनेवाली नदी।}}
{{outdent|इन्द्रत्व (सं॰ क्ली॰) १ इन्द्रका बल और वैभव, इन्द्रको ताकत और हैसियत। २ राजत्व, बादशाही।।}}
{{outdent|इन्द्रत्वीत (वै॰ वि॰) हे इन्द्र! तेरे द्वारा रक्षित।}}
{{outdent|इन्द्रदत्तः (सं॰ पु॰) एकजन ग्रन्थकार। इनकी उपाधि 'उपाध्याय' थी। इन्द्रदत्तने 'सिद्धान्तकौमुदी-गूढ़ फकिका-प्रकाश' नामक ग्रन्थ बनाया था।}}
{{outdent|इन्द्रदमन (सं॰ पु॰) १ वाणासुरका पुत्र। (हरिवंश ३६०) ३ पवैविशेष। जलप्लावनके समय कुण्ड, तड़ाग, वट वा पिप्पल्लवृच्च पर्यन्त जल बढ़कर पहुंचने-से यह पर्व पड़ता है। ७ मेघनाद, इन्द्रजित् }}
{{outdent|इन्द्रदारु (सं॰ पु॰) १ देवदारु। २ तैल-देवदारु वृक्ष।}}
{{outdent|इन्द्रदेवी (स॰ स्त्री॰) काश्मोरराज मेघवाहनको पत्नी। इन्होंने इन्द्रदेवीभवन नामक विहार बन-वाया था। (राजतरङ्गिणी)}}
{{outdent|इन्द्रद्युति (सं॰ क्ली॰) चन्दन, सन्दल।}}
{{outdent|इन्द्रद्युम्न (सं॰ क्ली॰) १ हद विशेष, एक झील। (पृ॰) २ एक राजा। स्कन्दपुराणके उत्कलखण्डमें लिखा है, कि मालव देशमें इन्द्रद्यश्न नामक एक राजा उन्होंने ही उत्कलस्थ पुरुषोत्तम देवका मन्दिर बनवाया था। उसमें विश्वकर्मा स्वयं आ दारुमयी मूर्ति निर्माण कर गये थे। (कपिल हिता और पुरुषोत्तममाहात्मा)। मुकुन्द रामक्कत जगन्नाथमङ्गलमें लिखा है, कि इन्द्रद्युम्न एक मन्दिर बनवा ब्रह्माके निकट मूर्तिस्थापनके लिये उपदेश लेने पहुंचा था। ब्रह्मलोक पहुंचने और अनेक स्तवस्तुति सुनानेपर इन्द्रद्युम्नसे ब्रह्माने सन्तुष्ट हो एक मुहूर्तं ठहरने तथा सन्यावन्दनके बाद वर देनेको कहा। ब्रह्माके एक मुहूर्तमें मनुष्यके साठ हजार वर्ष बीतते हैं। किन्तु वहां यह कुछ समझ न सके थे। जब ब्रह्मा सन्धया करके आये, तब इन्द्रद्युम्नसे कहने लगे-अपने राज्य एकबार जाकर वापस आओ तब हम आपको मूर्ति देंगे। ये अपने राज्य वापसथा।}}
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आये, किन्तु उसके चिह्न भी कहीं न पाये। समयके फेरसे समस्त ध्वंस हो गया था। इन्द्रद्युम्न अपने राज्यको पहुंचान भी न सके। जिसको देखते, उसीसे पूछते थे—इस राज्यका नाम क्या है। अवशेषमें एक पेचक और कूर्मने इनको पूर्वकथा बतायी थी। इन्द्रद्य म्न फिर राजा हुये और कौमाय्य राजाको कन्या मालावतीके साथ व्याहे गये। उसके बाद इन्होंने प्रस्तरमय जगन्नाथका मन्दिर बनवाया था। किसी दिन एक दूतने आकर कहा, समुद्रके तौरपर एक काष्ठ तैर रहा है। इन्द्रद्युम्नने उससे पहले ब्रह्माके मुख सुनसे रक्खा था भगवान् कृष्ण निम्ब वृक्षपर प्राण छोड़ेंगे और बहकर समुद्रतोर पहुंचेगे। इसलिये दूतको बात कानमें पड़ते ही वे महासमारोहके साथ उस काष्ठकी समुद्रसे जाकर उठा लाये। विश्वकर्माने आकर उसो काष्ठसे जगन्नाथको मूर्ति बनायी थी। जगन्नाथ देखो। इन्द्रद्युम्नने जगन्नाथ देवसे अपनी कन्या सत्यवतीका विवाह कर दिया। २ अन्य एक गङ्गवंशीय नृपति। ११८८ ई॰ को इन्होंने जगन्नाथ देवके मन्दिरका पुनः संस्कार कराया था। ३ एक असुरका राजा। क्लष्णने इन्हें मार डाला था। (महाभारत वन॰ १२ १०) ४ ऋषि-विशेष। शतपथब्राह्मणमें इन्हें भाल्लवेय कहा है। ५ राजर्षि विशेष। (महाभारत वन॰ १९८ ५०) ६ मगधके पालवंशीय शेष राजा।
{{outdent|इन्द्रद्रु (सं॰ प्र॰) इन्द्रस्य द्रुः, ६-तत्। १ अर्जुनष्टच्च। २ कुटजवच। ३ देवदारु वृच।}}
{{outdent|इन्द्रद्दीप (सं॰ पु॰ क्ली॰) पौराणिक मतसे भारतके नौ विभागोंमेंसे एक विभाग। वर्त्तमान अष्ट्रेलिया।}}
{{outdent|इन्द्रधनुस् (सं॰ क्ली॰) इन्द्रे तत्स्वामिके मेघे धनुः इव, ७-तत्। इन्द्रायुध, कौस-कुजा। वर्षाकालके उद्य वा अस्त होनेके समय सूर्यको विपरीत दिशामें यह प्रायः देख पड़ता है। वृष्टिजल-कणाँकी आणविक शक्तिके प्रभावसे नाना वर्णं बन उक्त नैसर्गिक काण्ड उत्पन्न होता है। इसी प्रकार चन्द्रको आभासे कभी-कभी राम-धनुः निकलता है, किन्तु वह बहुत कम देख पड़ता है।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२००
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कल (उड़ीसा)'''|'''१९९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
प्रतापवीर नरनारसिंह देव रहा। कलिङ्गके शासक। नरहरितीर्थने कामेश्वरके सम्मुख योगानन्द-नृसिंहका, मन्दिर बनवाया था।
१२२७८से १२४९-५० तक २य भानुदेवका राज्य रहा। वे २य नृसिंहदेवके औरस और चोडा देवीके गर्भसे उपजे थे। पूर्ण उपाधि श्रीवीरादिवीर श्रीभानुदेव रहा। इनके साथ गयासुद्दीन तुगलकका तुमुल युद्ध चला था।
१२४९-५०से १२७४-५ तक ३य नृसिंहदेव राजाके पद पर बैठे। वे भानुदेवके औरस और रानी लक्ष्मीदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुये थे। उनके महिषी कमला देवीके गर्भसे सीतादेवी नामक कन्या हुयी।
१२७४-५से १३००-१ तक ३य भानुदेंवका अधिकार रहा। वह ३य नृसिंहदेवके औरस और कमला देवीके गर्भसे उत्पन्न हुये। उपाधि श्रीवीर अथवा वीरश्री भानुदेव और प्रतापवीर भानुदेव रहा। बङ्गालके शासक काजी इलयासने ३य भानुदेवके मरनेसे उत्कल पर आक्रमण किया था।
१३००-१से १३२४ तक ४र्थ नृसिहदेव राज्य करते रहे। वे ३य भानुदेवके औरस और चालुक्य कुलकी रानी हीरादेवीके गर्भसे उपजे थे। औपाधिक नाम वीरनृसिंहदेव, वीर-श्रीनरसिंह देव और वीरश्रीनृसिंहदेव रहा। उनके समय जौनपुरके शरकी खानदानवाले खा़जा जहान्ने लक्ष्मणावती और जाजनगरको कर देनेपर वाध्य किया था। फिर बहमानी वंशके सुलतान् फौरोज़ जाजनगरमें पहुंच कितने ही हाथी लूट गये। मालवेके नवाब हुसे-
नुद्दीन् होशङ्गने भी जाजनगर पर पाक्रमण मारा था।
इसके पीछेका वृत्तान्त किसी दानपत्र वा शिला लेखमें नहीं मिलता।मादलापंजी अथवा जगन्नाथ मन्दिरके वृत्तविवरणसे समझते हैं, गाङ्गेयवंशके अन्तिम नृपति भानुदेव रहे। उनका शासन शक १३५६-से लगा था। उन्हें अकटा अबटा या मत्त भी कहते थे। उनके मरने पर कपिलेन्द्र वा कपिलेश्वरदेव मन्त्रीने सिंहासन हड़प कर सूर्य वंशकी प्रतिष्ठा की थी।
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१३७४ शक (१४५२ ई॰)में इस गङ्गवंशका लोप होनेपर कपिल नामक एक सूर्यवंशी पुरुष कपिलेन्द्रदेव उपाधि धारण कर उड़ीसेके राजा बने। उन्होंने सेतुबन्ध रामेश्वर तक अधिकार फैलाया था। इसी वंशमें प्रतापरुद्रने जन्म लिया। प्रतापरुद्र के राजत्वकाल पर श्रीचैतन्यदेव श्रीक्षेत्रके दर्शनको गये थे। प्रतापरुद्रके पौत्र कखारुया देवके राजत्व बाद कपिलवंश मिटा। १५५२ ई॰ में मुकुन्ददेव राजा हुये थे। उनके राजत्वके अन्तिमकाल पर देवद्वेषी कालापहाड़ यहां आ पहुंचा था। मुकुन्दके पुत्र गोडिया गोविन्द जब राजा रहे, तब कालापहाड़ पुरी लूटने गये। गोविन्द जगन्नाथ देवकी मूर्ति उठा गढ़ पारकूदकर भागे थे। फिर १९ वत्सर अराजकता चली। अनन्तर भूञां-वंशीय रामचन्द्रदेव नामक एक व्यक्ति राजा हुये। उन्होंने जगनाथ देवको अवशिष्ट मूर्ति फिर पुरी में स्थापन करायी थी।
१५१० ई॰ को मुसलमानोंमें इस्माइल गा़जी़ने सर्व प्रथम उड़ीसे पर आक्रमण मारा था। किन्तु आधिपत्य जम न सका। उस समय भी हिन्दू राज-गणका प्रबल प्रताप था। कालापहाड़ के आनेसे स्थानीय राजा नानाप्रकार हीनबल हो गये और अवसर देख बङ्गालके नवाब सुलेमान कररानीन अनेक स्थान जीत लिये।
१५७४ ई॰ को अकबरके सेनापति मुनाइम् खा़न् और टोडरमल उड़ीसेपर झपट पड़ थे। बङ्गाल, विहार और उड़ीसके नवाब दाऊदसे जलेश्वर निकट मुगलमारी में बुद्ध चला, जिसमें दाऊदके हारते बङ्गाल एवं बिहार अकबरके हाथ लगा। वे केवलमात्र उड़ीसेके नवाब रह गये। <small>दाऊद देखो।</small> मध्य ने दाऊदकी प्ररोचनासे अफगानोंने फिर मुगलों पर अस्त्र उठाये थे। नाना स्थानपर मुग़ल और पठान लड़ मरे। १५७९ ई॰ के समय अकबरने मासूमखा़न् काबुलीको उड़ीसेका शासनकर्ता बनाकर भेजा था। किन्तु कुछ दिन पीछे उन्होने पठानोंसे मिल मुग़लोको उडीसेसे भगा दिया। फिर क़त्लखा़न् नामक एक पठानने उड़ीसेका सिंहासन पाया था। अकबरने क़त्ल-खान् के विरुद्ध मुग़ल सेना भेजी। सलीमाबाद में क़त्ल
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२००'''|'''उत्कल (उड़ीसा)'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
खान् ने सप्तग्रामके शासनकर्ता नजातको हराया था।
{{Right|<small>कतलुखान् देखो।</small>}}
१५९० ई॰ में राजा मानसिंह बङ्गाल और विहारके शासनकर्ता बने। वे वर्षाकाल पर वर्धमानके दक्षिण-पश्चिमदिकस्थ गढ़-मन्दारनमें ठहर उड़ीसा जीतने चले थे। धरपुरमें कत्लखा़न् से युद्ध छिड़ा। मुग़ल-सिपाही हार और मानसिंह के पुत्र जगत् सिंह बन्दी बने। कत्लुखा़नने विष्णुपुर जीत लिया था। अल्प दिन बाद ही क़तलखान् सहसा मर गये। उनके प्रधान वजी़र ईसा खान् ने मानसिंहसे सन्धि कर ली। जगत-सिंहको मुक्ति मिली और पुरी अकबरके अधिकारमें आ गई।
१५९२ ई॰ में सुलेमान् और उसमान् नामक कृतन खान् के पुत्रोंने सन्धिको तोड़ पुरी पर आक्रमण मारा था। राजा मानसिंह द्वितीय बार उडीसे आये। बनापुरमें मुग़ल और पठान भिड़ गये थे। पठान हारे। सुलेमान् और उसमानने फिर अवशिष्ट पठान सेना जोड सारनगढ़ में लडनेको अस्त्र उठाया। किन्तु वे मुगलोंका तेज सह न सके थे। शेष बुद्ध हो गया। सुलेमान् और उसमान मानसिंहसे झुके थे। उडीसा राज्य अकबरको मिला। राजा मानसिंह बङ्गाल, विहार और उडीसेके राजप्रतिनिधि बने थे। उसी समय स्थानीय देशी राजा रामचन्द्र देवको अकबरने बहुत माना। अकबरके अधिकार में पहुंचने पर उडीसा (बङ्गाल पौर विहारके साथ) एक शासन
कर्ता के अधीन रहा।
१६०७ ई॰ को उड़ीसा स्वतन्त्र हुआ। हाशिम खान् नामक एक व्यक्ति शासनकर्ता बने थे।
१६११ ई॰ में राजा कल्याणमल उड़ीसेके शासन-कर्ता हुये। उसी समय उसमान फिर लुप्त स्वाधीनता बचानेको दौड़े। उन्होंने पठानोंसे मिल शेष चेष्टा लगायी। किन्तु इसबार उन्हें घूमना न पडा, सुवर्ण रेखाके तीर रसकी शय्या पर प्राण छूट गया।
खुरदा और राजमहेन्द्रीको छोड़ उड़ीसेके सकल स्थानोंपर अकबरका अधिकार जमा। १६१८ ई॰ में मुक़रमखा़न् नामक तत्कालीन शासनकर्ताने राजाको
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हरा खुरदा भी दिल्ली-सम्राटके अधीन कर दिया था। किन्तु राजमहेन्द्री स्वाधीन ही रही।
१६२१ ई॰ पर शाहजहान्ने विद्रोह लगाया था। उन्होंने अपने पिता जहांगीरके रखे तत्कालीन शासनकर्ता अहमद बैको हरा उडीसा जीत लिया था। युद्ध में पठान-सामन्त उनसे मिल गये थे। १६२४ ई॰ में शाहजहान् ने अंगरेजोंको वङ्गदेशमें जहाजके सहारे वाणिज्य करने का आदेश दिया। किन्तु बङ्गाल, विहार और उड़ीसेके ततकालीन शासनकर्ता आज़िम खान बोल उठे――अंगरेज बालेश्वरके निकटवर्ती केवल पिपली नामक स्थानमें ही जहाज लगा सकेंगे।
१७०६ ई॰ को बङ्गाल, विहार और उड़ीसेके नवाब मुर्शिदकुलीखा़न् ने उड़ीसेसे मेदिनीपुरका जिला स्वतन्त्र कर दिया था। पहले वह उड़ीसेके ही अन्त-र्गत रहा।
१७७५ ई॰ में मुहम्मद तकीखा़न् उड़ीसेके सहकारी शासनकर्ता बनकर आये थे। उसी समय खुर-दाके देशी राजा रामचन्द्रदेवने मुसलमानों पर अस्त्र उठाये। अनेक युद्धके बाद वे कटकमें कैद हुये थे। मुसलमानों के भयसे पण्डे जगन्नाथ-देवकी मूर्ति दाब-कर भाग यये।
१७३४ ई॰ में मुरशिद कुलीखान् उड़ीसेके सहकारी शासनकर्ता बने। उन्होंने आकर देखा-पूर्व समयकी भांति आमदनी वसूल न होती इसका प्रधान कारण जगन्नाथदेवकी मूर्तिका पुरीमें न रहना है। दूर देशान्तरसे यात्रिगणका आना बन्द हो गया। पहले यात्रिगणका गमनागमन लगा रहनसे आमदनीके परिमाण क्रमश: बढ़ते ही जाता था। फिर उन्होंने पण्डावोंसे मूर्ति लाकर फिर मन्दिरमें रखनको विशेष समझाया। जगन्नाथकी मूर्ति वापस आयी और
आमदनी भी अधिक परिमाणसे बढ़ गयी।
१७३९ ई॰ में शरफ़राज खान् विहार और उड़ी-सेके शासनकर्ता बने। किन्तु तत्पर ही अलोवर्दी-खान् ने उन्हें हरा सिंहासन ले लिया।
१७४१-४२ ई॰ में मराठोंका उत्पात उठा।
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कल (उड़ीसा)-उत्कार'''|'''२०१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
मुशिंदकुलीके दीवान् मौर-हबीबने चुपके मराठोंको उड़ीसे बुलाया था। अलीवर्दी उन्हें भगानिके लिये अनेक बार लड़े, किन्तु सफलमनोरथ न हो सके। १७४५ ई॰ में रघुजी भोंसले बङ्गालपर चढे थे। उन्होंने उड़ीसे को हस्तगत किया। मीर हबीबको प्रतिनिधि बना रघुनी स्वराज्य को चल दिये। १७४७ ई॰ में मीरजा़फ़र मराठोंको कटकसे निकालने के लिये भेजे गये थे। किन्तु उनसे भी कुछ न बन सका। मराठे अफ़गानोंसे मिल गये थे।
१७५१ ई॰ में अलीवर्दी मराठोंको उड़ीसेसे भगाने के लिये ससैन्य कटक पहुचें। मराठे हार तो गये, किन्तु किसीप्रकार उन्होंने देश न छोड़ा। इसलिये अलीवर्दीने प्रति वर्ष १२ लाख रुपया कर ठहराकर उन्हें उड़ीसा फिर सौंप दिया।
मराठोंमें शिवभट शास्त्री प्रथम शासनकर्ता हुये थे। १७५६ मे १८०३ ई॰ तक उन्होंने उड़ीसे पर शासन चलाया। इसी समय मराठोंके पीड़नसे घबरा अनेक प्रजान जन्मभूमि छोड़ी। उसमें किसी किसी ने अंगरेजों में साहाय्य भी मांमा।
१८०३ ई॰ की १४ वीं अक्तोबरको अंगरेजोंने कटकका दुर्भद्य दुर्ग जीता था। एक ही दिन के यत्-सामान्य युद्ध में उन्होंने मराठोंके हस्तसे उड़ीसे का शासन भार निकाल लिया। उनका प्रबनत प्रताप उसी दिन उड़ीसे राज्यसे अन्तर्धान हुआ। किन्तु अधिकार मिलते भी राज्यकी सामग्रीका अभाव था। आमदनी देनवाले जमीन्दार और फ़सल तैयार करने-वाले किसान न रहे। अंगरेजोंने देखा――‘सकड़ों आम मानवशून्य हैं। उनमें शृगाल वास करते हैं। कुक्कर प्रहरी हैं।’ उन्होंने घोषणा निकाली――‘अब प्रजाकी काई भय नहीं। जो जहां रहे, आकर निज निज भूमि लें ले। पहले लोग अधिक घुम न सके थे। किन्तु क्रम क्रमसे प्रजा आयी। पूर्व में जैसी समृद्धि रही, फिर भी वैसी ही बढ गयी।
अंगरेजो के हाथ उड़ीसा आनेपर प्रधानतः तीन नियम चले थे। प्रथम―― खन्द नामक असभ्य जाति पर किसी प्रकारका कर वा नियमन बंधना और अंग
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:रेज-कर्माध्यक्षोंका सर्वदा देखते रहेना कि, वे परस्पर विवाद बढ़ा रक्त न बहायें। द्वितीय――करदराजगणपर सन्धिके अनुसार कर लगाना, किन्तु उनपर भी गवरन-मेण्टका कर न बढाना। तृतीय――कटक, पुरी और बालेश्वर तीन खास सरकारी स्थान रहना और उनका उपस्वत्व गवरनमेण्ट को ही मिलना।
{{Outdent|उत्कल (सं॰ पु॰) १ उड़ीसा प्रान्तके अधिवासी। २ ब्राह्मणश्रेणिविशेष। ३ सुद्यन्नके एक पुत्र, तन्नामसे उत्कल प्रान्तका नाम चला है। ४ शाकुनिक, बहेलिया, चिड़ामार। (त्रि) ५ भारवाहक, बोझ ढोनेवाला।}}
{{Outdent|उत्कलाप (सं॰ त्रि॰) उव्रत एवं विस्तारित पुच्छ-युक्त, खड़ी और फैली पूछवाला। <small>“तीरखली बहिंभिरुन्-कलामे:।" (रघु १६।६४)</small>}}
{{Outdent|उत्कलि (सं॰ पु॰) देवविशेष।}}
{{Outdent|उत्कलिका (सं॰ स्त्री॰) उत्-कल-वुन्- टाप्। १ उत्-कण्डा, गहरी चाह। २ ऊर्मि, लहर। ३ पुष्य-कलिका, फूलकी कली। ४ क्रीड़ा, नख़राबाजी़।}}
{{Outdent|उत्कलिकाप्राय (सं॰ क्ली॰) समासयुक्त गद्यभेद, जिस इबारतमें मिले हुये अलफा़ज, ज्या़दा रहें।<small>“भवेदुत्कलिकाप्रार्य समासाध्य दृढ़ाचरम्।” (छन्दोमञ्जरी)</small>}}
{{Outdent|उत्कर्षण (सं॰ क्ली॰) उत्-कर्ष-ल्युट्। कर्षण, जोताई।}}
{{Outdent|उत्कलित (सं॰ त्रि॰) उत्-कल-क्त। १ उत्कण्डित, खाडां, गहरी चाह रखनेवाला।२ बुद्धिमान्, अक्ल़मन्द।}}
{{Outdent|उत्का (सं॰ स्त्री॰) उत्-कन्-टाप्। उत्कण्ठिता नायिका।}}
{{Outdent|उत्का का (सं॰ स्त्री॰) उत्क- अक-अच्-टाप्। प्रति-वर्षपसूता गवी, हरसाल व्यानेवाली गाय।}}
{{Outdent|उत्काकूत् (सं॰ त्रि॰) उन्नतं काकुदमस्य। <small>उहिम्या काकुदस्व। पा ५।४।१४८।</small> उन्नत तालुयुक्त, ऊंचे तालूवाला, जिसके तालू उठा रहै।}}
{{Outdent|उत्कार (सं॰ पु॰) उत्-कृ-घञ्। कृ धान्धे। पा ३।३।३० १ धान्योत्क्षेपण, गलले की झड़ाई, अनाजकी झाड़ पछोड़। २ धान्य का राशीकरण, गल्ले का इकट्ठा किया जाना।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 51|1em}}</noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२०२'''|'''उत्कारिका-उत्कुल'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उत्कारिका (सं॰ स्त्री॰) उत्-कृ-ण्व ल। १ सुश्रु-तोक्त शोफादि-निवारक पाचन, लुपड़ी, भुरता, पुलटिस। यथा―}}
{{blockcenter|<poem><small>“निवर्तते न यः शोफो विरेकान्तैरुपक्रमेः॥
तस्य संपाचनं कुर्यात् समाहन्यौषधानि तु।
दधितक्रसुरामुक्तधान्धासे योजितानि तु॥
सिन्धानि लवणौकृत्य पचेदुत्कारिकां शुभा।
सैरण्डपत्रया शोफ़ नाशयेदुण्या तथा॥” (सुश्रुत)</small>></poem>}}
:{{gap}}उपवाससे विरेचन पर्यन्त प्रक्रिया द्वारा यदि शोफ अच्छा न हो; तो दधि, तक्र, सुरा, सुक्त, काञ्जिक, घृत एवं लवण मिला उत्कारिका पकावो और उष्ण रहते-रहते एरण्डपत्रके सहयोगसे शोफपर बांध दो।
:{{gap}}२ रोटिका, रोटी, बाटी। ३ गुटिका, बड़ी। ४ लप्सिका, हलवा, लपसी।
{{Outdent|उत्काशन (सं॰ क्ली॰) शासनकार्य, हुकूमत।}}
{{Outdent|उतकास (सं॰ पु॰) उत्कमस्यति, अस-अण्। कास रोग विशेष, किसी किस्मकी खांसी, ख़खार। यह
ऊर्ध्वंगत श्लेमाका उत्क्षेपक रोग है।}}
{{Outdent|उतकासन (सं॰ क्ली॰)<small> उत्कास देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्किर (सं॰ त्रि॰) उत्-छ कर्तरि श। उत्क्षेपक, फेंकनेवाला।}}
{{Outdent|उतकीर्ण (सं॰ त्रि॰) उत्-छ-क्त। १ उत्क्षिप्त, हाला या लगाया हुआ। २ उल्लिखित, लिखा हुआ। ३ क्षत, बिद्ध, चुभोया हुआ। ४ खोदित, खोदा हुआ।}}
{{Outdent|उत्कीर्तन (सं॰ क्ली॰) १ घोषण, प्रचार, पुकार, फैलाव। २ प्रशंसा, तारीफ।}}
{{Outdent|उतकीर्तित (सं॰ त्रि॰) १ विघोषित, मुश्तहर, ढंढोरा पीटा हुआ।}}
{{Outdent|उत्कुञ्चिका (सं॰ स्त्री॰) १ स्थूल कृष्णजीरक, मोटा काला जीरा। <small>कालानौरा देखो।</small> २ कुलिञ्ज नवृक्ष, कुलीं- जनका पेड़।}}
{{Outdent|उत्कुञ्चिता, <small>उत्कुञ्चिका देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्कुट (सं॰ क्ली॰) उन्नत कुटो यत्र। उत्तानशयन, चित पड़नेको हालत।}}
{{Outdent|उत्कुटक (सं॰ त्रि०) उत्तान, चित, पौठको जमीन्से लगाये और चेहरेको ऊपर उठाये हुवा।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उत्कुटकप्रहान (सं॰ क्ली॰) उत्कुटस्थितिका वर्जन, चित पड़नेसे परहेज़।}}
{{Outdent|उत्कुटकासन, <small>उत्कुट देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्कुण (सं॰ पु॰) उत्-कुण-हिंसने अद॰ चुरा॰ कर्मणि अच्। १ केशकोट, जूं। २ मत्कुण, खटमल।}}
:{{gap}}इसे संस्कृतमें मत्कुण, उद्दंश और किटिभ भी कहते हैं। (Anoplura) यह कीड़ा प्रायः ५०० प्रकारका होता, जिसमें मनुष्य के देहपर दो ही तरहका देख पड़ता है―― एक (Pediculus capitis)
मस्तक और दूसरा (Pediculus vestimenti) शरीरमें। किसी किसी स्थलपर पीड़ित व्यक्ति के चम में तीसरा (P. tabescentium) भी उत्पन्न हो जाता है, जो बहुत भयानक होता है। उसके उपजनेसे प्रायः
रोगीके जीवन में संशय रहता है। साधारणतः उत्कुण पशुपक्षीके शरीरमें अधिक रहता है। इसके देहका आयतन चपटा है। ११।१२ खण्ड वा दत्त बन सकते हैं। उनमें शुण्ड के अंश तीन हैं। प्रत्येकके दो पाद और स्पर्शेन्द्रियमें पांच ग्रन्थि रहते हैं। मस्तकके दोनों किनारे एक या दो के हिसाबसे क्षुद्र चक्षु देख पड़ते है। दंश दो होते हैं। एक दंशके द्वारा पशुपक्षीके केश वा पालकमें उत्कुण घूमता फिरता है। समय समय पर इसी दंशको घुसेड़ अपने कण्ठम पशु पक्षीका रक्त चूस लेता है। शिशुके मस्तक पर प्राय: उत्कुण उत्पन्न हो जाता है। यह केशपर विन्दु-विन्दु डिम्ब देता, जो आठ दिनके बाद फट पड़ता है। फिर एक मासके मध्य ही वह बढ़ जाता है। शरीरमें जो उत्कुण उत्पन्न होता, उसका स्त्रीकीट प्रति सप्ताह प्रायः ६।७ शत डिम्ब देकर बच्चे निकालता है।
:चक्षुके पलकपर भी एक जातीय उत्कुण उपजता है――जो कभी मस्तकके केशमें देख नहीं पड़ता। वह भी बहुत अनिष्टकर होता है। बन्दरके लोममें जो उत्कुण रहता, वह स्वतन्त्र जातिका होता है। कभी-कभी यह सिन्धु-घोटक में भी देख पड़ता है।
{{Outdent|उत्कुल (सं॰ त्रि॰) परिभ्रष्ट, नाख़लफ़, कपूत, अपने खा़न्दानकी इज्जत बिगाड़नेवाला।}}
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{{Outdent|उत्कारिका (सं॰ स्त्री॰) उत्-कृ-ण्व ल। १ सुश्रु-तोक्त शोफादि-निवारक पाचन, लुपड़ी, भुरता, पुलटिस। यथा―}}
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तस्य संपाचनं कुर्यात् समाहन्यौषधानि तु।
दधितक्रसुरामुक्तधान्धासे योजितानि तु॥
सिन्धानि लवणौकृत्य पचेदुत्कारिकां शुभा।
सैरण्डपत्रया शोफ़ नाशयेदुण्या तथा॥” (सुश्रुत)</small>></poem>}}
:{{gap}}उपवाससे विरेचन पर्यन्त प्रक्रिया द्वारा यदि शोफ अच्छा न हो; तो दधि, तक्र, सुरा, सुक्त, काञ्जिक, घृत एवं लवण मिला उत्कारिका पकावो और उष्ण रहते-रहते एरण्डपत्रके सहयोगसे शोफपर बांध दो।
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ऊर्ध्वंगत श्लेमाका उत्क्षेपक रोग है।}}
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रोगीके जीवन में संशय रहता है। साधारणतः उत्कुण पशुपक्षीके शरीरमें अधिक रहता है। इसके देहका आयतन चपटा है। ११।१२ खण्ड वा दत्त बन सकते हैं। उनमें शुण्ड के अंश तीन हैं। प्रत्येकके दो पाद और स्पर्शेन्द्रियमें पांच ग्रन्थि रहते हैं। मस्तकके दोनों किनारे एक या दो के हिसाबसे क्षुद्र चक्षु देख पड़ते है। दंश दो होते हैं। एक दंशके द्वारा पशुपक्षीके केश वा पालकमें उत्कुण घूमता फिरता है। समय समय पर इसी दंशको घुसेड़ अपने कण्ठम पशु पक्षीका रक्त चूस लेता है। शिशुके मस्तक पर प्राय: उत्कुण उत्पन्न हो जाता है। यह केशपर विन्दु-विन्दु डिम्ब देता, जो आठ दिनके बाद फट पड़ता है। फिर एक मासके मध्य ही वह बढ़ जाता है। शरीरमें जो उत्कुण उत्पन्न होता, उसका स्त्रीकीट प्रति सप्ताह प्रायः ६।७ शत डिम्ब देकर बच्चे निकालता है।
:चक्षुके पलकपर भी एक जातीय उत्कुण उपजता है――जो कभी मस्तकके केशमें देख नहीं पड़ता। वह भी बहुत अनिष्टकर होता है। बन्दरके लोममें जो उत्कुण रहता, वह स्वतन्त्र जातिका होता है। कभी-कभी यह सिन्धु-घोटक में भी देख पड़ता है।
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सिन्धानि लवणौकृत्य पचेदुत्कारिकां शुभा।
सैरण्डपत्रया शोफ़ नाशयेदुण्या तथा॥” (सुश्रुत)</small>></poem>}}
:{{gap}}उपवाससे विरेचन पर्यन्त प्रक्रिया द्वारा यदि शोफ अच्छा न हो; तो दधि, तक्र, सुरा, सुक्त, काञ्जिक, घृत एवं लवण मिला उत्कारिका पकावो और उष्ण रहते-रहते एरण्डपत्रके सहयोगसे शोफपर बांध दो।
:{{gap}}२ रोटिका, रोटी, बाटी। ३ गुटिका, बड़ी। ४ लप्सिका, हलवा, लपसी।
{{Outdent|उत्काशन (सं॰ क्ली॰) शासनकार्य, हुकूमत।}}
{{Outdent|उतकास (सं॰ पु॰) उत्कमस्यति, अस-अण्। कास रोग विशेष, किसी किस्मकी खांसी, ख़खार। यह
ऊर्ध्वंगत श्लेमाका उत्क्षेपक रोग है।}}
{{Outdent|उतकासन (सं॰ क्ली॰)<small> उत्कास देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्किर (सं॰ त्रि॰) उत्-छ कर्तरि श। उत्क्षेपक, फेंकनेवाला।}}
{{Outdent|उतकीर्ण (सं॰ त्रि॰) उत्-छ-क्त। १ उत्क्षिप्त, हाला या लगाया हुआ। २ उल्लिखित, लिखा हुआ। ३ क्षत, बिद्ध, चुभोया हुआ। ४ खोदित, खोदा हुआ।}}
{{Outdent|उत्कीर्तन (सं॰ क्ली॰) १ घोषण, प्रचार, पुकार, फैलाव। २ प्रशंसा, तारीफ।}}
{{Outdent|उतकीर्तित (सं॰ त्रि॰) १ विघोषित, मुश्तहर, ढंढोरा पीटा हुआ।}}
{{Outdent|उत्कुञ्चिका (सं॰ स्त्री॰) १ स्थूल कृष्णजीरक, मोटा काला जीरा। <small>कालानौरा देखो।</small> २ कुलिञ्ज नवृक्ष, कुलीं- जनका पेड़।}}
{{Outdent|उत्कुञ्चिता, <small>उत्कुञ्चिका देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्कुट (सं॰ क्ली॰) उन्नत कुटो यत्र। उत्तानशयन, चित पड़नेको हालत।}}
{{Outdent|उत्कुटक (सं॰ त्रि०) उत्तान, चित, पौठको जमीन्से लगाये और चेहरेको ऊपर उठाये हुवा।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उत्कुटकप्रहान (सं॰ क्ली॰) उत्कुटस्थितिका वर्जन, चित पड़नेसे परहेज़।}}
{{Outdent|उत्कुटकासन, <small>उत्कुट देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्कुण (सं॰ पु॰) उत्-कुण-हिंसने अद॰ चुरा॰ कर्मणि अच्। १ केशकोट, जूं। २ मत्कुण, खटमल।}}
:{{gap}}इसे संस्कृतमें मत्कुण, उद्दंश और किटिभ भी कहते हैं। (Anoplura) यह कीड़ा प्रायः ५०० प्रकारका होता, जिसमें मनुष्य के देहपर दो ही तरहका देख पड़ता है―― एक (Pediculus capitis) मस्तक और दूसरा (Pediculus vestimenti) शरीरमें। किसी किसी स्थलपर पीड़ित व्यक्ति के चम में तीसरा (P. tabescentium) भी उत्पन्न हो जाता है, जो बहुत भयानक होता है। उसके उपजनेसे प्रायः.रोगीके जीवन में संशय रहता है। साधारणतः उत्कुण पशुपक्षीके शरीरमें अधिक रहता है। इसके देहका आयतन चपटा है। ११।१२ खण्ड वा दत्त बन सकते हैं। उनमें शुण्ड के अंश तीन हैं। प्रत्येकके दो पाद और स्पर्शेन्द्रियमें पांच ग्रन्थि रहते हैं। मस्तकके दोनों किनारे एक या दो के हिसाबसे क्षुद्र चक्षु देख पड़ते है। दंश दो होते हैं। एक दंशके द्वारा पशुपक्षीके केश वा पालकमें उत्कुण घूमता फिरता है। समय समय पर इसी दंशको घुसेड़ अपने कण्ठम पशु पक्षीका रक्त चूस लेता है। शिशुके मस्तक पर प्राय: उत्कुण उत्पन्न हो जाता है। यह केशपर विन्दु-विन्दु डिम्ब देता, जो आठ दिनके बाद फट पड़ता है। फिर एक मासके मध्य ही वह बढ़ जाता है। शरीरमें जो उत्कुण उत्पन्न होता, उसका स्त्रीकीट प्रति सप्ताह प्रायः ६।७ शत डिम्ब देकर बच्चे निकालता है।
:चक्षुके पलकपर भी एक जातीय उत्कुण उपजता है――जो कभी मस्तकके केशमें देख नहीं पड़ता। वह भी बहुत अनिष्टकर होता है। बन्दरके लोममें जो उत्कुण रहता, वह स्वतन्त्र जातिका होता है। कभी-कभी यह सिन्धु-घोटक में भी देख पड़ता है।
{{Outdent|उत्कुल (सं॰ त्रि॰) परिभ्रष्ट, नाख़लफ़, कपूत, अपने खा़न्दानकी इज्जत बिगाड़नेवाला।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२०९
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२०८'''|'''उत्तरकुरु'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{gap}}जैनोंके अरिष्टनेमिपुराणान्तर्गत हरिवंशमें लिखा है――}}
{{C|<small>नीलमन्दरमध्यस्था उत्तरा: कुरवो मताः।" (५।१६६)</small>}}
नील और मन्दर पर्वतके बीच उत्तरकुरु है। <small>(विष्णुपुराण ३।२।१३)</small> अब देखना चाहिये―― प्राचीन शास्त्रके अनुसार वर्तमान में किस स्थानपर कितनी दूरतक उत्तरकुरु निरूपित है।
{{x-smaller|{{c|<poem>“ततोऽर्णवं समुत्तीर्य कुरूणाप्यु तरान् वयम्।
चणेन समतिक्रान्ता गन्धमादनमेव च॥” (हरिवंश १७०।१३)</poem>}}}}
‘समुद्र के बाद उत्तरकुरु उतर हमने क्षणकालमें गन्धमादनको भी लांघा था।’ उक्त श्लोकसे अनुमान होता है――समुद्रतीरसे गन्धमादन पर्वत पर्यन्त समुदाय भूखण्ड पूर्वकालमें उत्तरकुरु वा कुरुवर्ष कहाता था।
राजतरङ्गिणीमें लिखा है――काश्मीरराज ललितादित्य के काम्बोज, भूःखार<ref>*भूःखारका वर्तमान नाम बोखारा है। यह तातारराज्यके अन्तर्गत है।</ref>, दरद, स्त्रीराज्य प्रभृति जीत लेनेपर उत्तरकुरुवासियोंने भयसे पर्वतप्रदेशका आश्रय लिया।
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“भूःखारा: शिखरश्रेणी यन्तिः सन्त्यज्य वाजिनः।
कुण्डभाव तटुत्कण्ठां निन्युर्ट्टटा हयाननाम्॥
चिन्ता न दृष्टा भोट्टानां वक्त्वे प्रकृतिपाण्डुरे।
तस्य प्रतापो दरदां न सेहेऽनारतं मधु॥
स्त्रीराज्यदेवास्तस्वाग्रे वीक्षा कम्पादिविक्रियाम्।
उत्तराकरवोऽविक्षस्तयाज्जन्मपादपान्॥” (४।१६७-७५)</poem>}}}}
उक्त श्लोक द्वारा स्त्रीराज्यके बाद ही उत्तर कुरु निर्दिष्ट है। स्त्रीराज्य गन्धमादनसे उत्तरपश्चिम लगता है, जिसका वर्तमान स्थान तिब्बतका पश्चिमांश है।
टलेमिने उत्तरकोर्ह (Ottarokorrha) नामक एक जनपदक की बात कही है। वह संस्कृत उत्तर कुरु शब्दका रूपान्तरमात्र है। उनके मतसे उक्त स्थान सेरिका (चीन)का कियदंश है। ( Ptolemy, Geog. vi. 16)
रामायण के किष्किन्ध्याकाण्डमें लिखा है――
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“तंतु देशमतिक्रम्य शैलोदा नाम निचगा।
उभयोस्तीरयोस्तस्य कोचका नाम वेणवः॥
ते नयन्ति पर तीर सिद्धान् प्रत्यान्यन्ति च ।
उत्तराः कुरवस्तव कृतपुण्यप्रतिश्रयाः॥" ( ४३।३७-३८)</poem>}}}}
{{rule}}
{{smallrefs}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{gap}}उस स्थानको लांघते शैलोदा नाम्नी नदी मिलती है। उसके उभय तीरपर कीचक नामक वेणु है। सिद्ध उसी वेणु द्वारा नदीके पूर्व और परपार आते-जाते हैं। उत्तरकुरु उसी नदीके निकट है। वहां पुण्यवान् व्यक्ति रहते हैं।
रामायणोक्त शैलोदा नदीका नाम महाभारतमें किसी किसी स्थानपर शिला लिखा है। प्राचीन ग्रीकों और रोमकोंने सिलिस् (Silis) नामकी एक नदी लिखी है। उसके साथ महाभारतकी शिला नदीका विशेष सादृश्य आता है। आजकल सिलिस नदीको जक्षर्तेश वा सरोकुल कहते हैं। (Ukert Geographie der Griechen und Romer, Vol. iii. 2, p. 238) सरीकुल नदी आरल हदमें गिरी है। युरोपीय भूवेत्ता कहते हैं―― पूर्वकालमें आरल और कास्पियसागर एकत्र मिले थे। पाश्चात्य पुरातत्त्ववित् ष्ट्राबोके मतसे वर्तमान कास्पियसागर पूर्वकालमें उत्तरमहासागर तक विस्तृत रहा। रामायण में लिखा है―― उत्तरकुरुके बाद उत्तर-समुद्र है।
{{c|<small>“तमतिक्रम्य शैलेन्द्रमुत्तरः पयसान्निधिः।” (किष्किन्धया ४३।५४)</small>}}
ब्रह्माण्डपुराणके मतमें भी इस स्थानसे उत्तर ऊर्मि-समाकुल समुद्र है――
{{x-smaller|{{c|<poem>“उत्तरानां कुरुणान्तु पाश्वेंज्ञेयलदुत्तरः।
समुद्रः सोर्मिमालोक्य नागासुरनिषे विताम्॥” (५० अ॰)</poem>}}}}
उक्त प्रमाणसमूह द्वारा स्पष्ट हो समझ पड़ता है―― पूर्वकालमें उत्तरकुरु कास्पिय-सागरके दक्षिण तीरसे गन्धमादन पर्वतके उत्तरांश तक विस्तृत था।
रामायण और महाभारतके मतमें यह स्थान मणिमय और काञ्चनकी बालुकासे सम्पन्न है। स्थान स्थानमें हीरक, वैदूर्य और पद्मरागके तुल्य रमणीय भूमिखण्ड हैं। यहां कामफलप्रद वृक्ष सकलके मनोरथ पूर्ण करते हैं। क्षीरी नामक वृक्षसे क्षीर टपकता और फलके गर्भ में वस्त्र तथा आभरण उपजता है। यहां पुष्करिणी सकल पङ्क से शून्य और मनोरम है। इसीसे वह सर्वदा सुखस्पर्श रहती है। स्त्री-पुरुष प्रियदर्शन और शुक्लवंशसंभूत हैं। स्त्री अप्सरा-सदृश देख पड़ती हैं। सब लोग क्षीरी वृक्षका अमृत-
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२०८'''|'''उत्तरकुरु'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{gap}}जैनोंके अरिष्टनेमिपुराणान्तर्गत हरिवंशमें लिखा है――
{{C|<small>नीलमन्दरमध्यस्था उत्तरा: कुरवो मताः।" (५।१६६)</small>}}
नील और मन्दर पर्वतके बीच उत्तरकुरु है। <small>(विष्णुपुराण ३।२।१३)</small> अब देखना चाहिये―― प्राचीन शास्त्रके अनुसार वर्तमान में किस स्थानपर कितनी दूरतक उत्तरकुरु निरूपित है।
{{x-smaller|{{c|<poem>“ततोऽर्णवं समुत्तीर्य कुरूणाप्यु तरान् वयम्।
चणेन समतिक्रान्ता गन्धमादनमेव च॥” (हरिवंश १७०।१३)</poem>}}}}
‘समुद्र के बाद उत्तरकुरु उतर हमने क्षणकालमें गन्धमादनको भी लांघा था।’ उक्त श्लोकसे अनुमान होता है――समुद्रतीरसे गन्धमादन पर्वत पर्यन्त समुदाय भूखण्ड पूर्वकालमें उत्तरकुरु वा कुरुवर्ष कहाता था।
राजतरङ्गिणीमें लिखा है――काश्मीरराज ललितादित्य के काम्बोज, भूःखार<ref>*भूःखारका वर्तमान नाम बोखारा है। यह तातारराज्यके अन्तर्गत है।</ref>, दरद, स्त्रीराज्य प्रभृति जीत लेनेपर उत्तरकुरुवासियोंने भयसे पर्वतप्रदेशका आश्रय लिया।
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“भूःखारा: शिखरश्रेणी यन्तिः सन्त्यज्य वाजिनः।
कुण्डभाव तटुत्कण्ठां निन्युर्ट्टटा हयाननाम्॥
चिन्ता न दृष्टा भोट्टानां वक्त्वे प्रकृतिपाण्डुरे।
तस्य प्रतापो दरदां न सेहेऽनारतं मधु॥
स्त्रीराज्यदेवास्तस्वाग्रे वीक्षा कम्पादिविक्रियाम्।
उत्तराकरवोऽविक्षस्तयाज्जन्मपादपान्॥” (४।१६७-७५)</poem>}}}}
उक्त श्लोक द्वारा स्त्रीराज्यके बाद ही उत्तर कुरु निर्दिष्ट है। स्त्रीराज्य गन्धमादनसे उत्तरपश्चिम लगता है, जिसका वर्तमान स्थान तिब्बतका पश्चिमांश है।
टलेमिने उत्तरकोर्ह (Ottarokorrha) नामक एक जनपदक की बात कही है। वह संस्कृत उत्तर कुरु शब्दका रूपान्तरमात्र है। उनके मतसे उक्त स्थान सेरिका (चीन)का कियदंश है। ( Ptolemy, Geog. vi. 16)
रामायण के किष्किन्ध्याकाण्डमें लिखा है――
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“तंतु देशमतिक्रम्य शैलोदा नाम निचगा।
उभयोस्तीरयोस्तस्य कोचका नाम वेणवः॥
ते नयन्ति पर तीर सिद्धान् प्रत्यान्यन्ति च ।
उत्तराः कुरवस्तव कृतपुण्यप्रतिश्रयाः॥" ( ४३।३७-३८)</poem>}}}}
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{{gap}}उस स्थानको लांघते शैलोदा नाम्नी नदी मिलती है। उसके उभय तीरपर कीचक नामक वेणु है। सिद्ध उसी वेणु द्वारा नदीके पूर्व और परपार आते-जाते हैं। उत्तरकुरु उसी नदीके निकट है। वहां पुण्यवान् व्यक्ति रहते हैं।
रामायणोक्त शैलोदा नदीका नाम महाभारतमें किसी किसी स्थानपर शिला लिखा है। प्राचीन ग्रीकों और रोमकोंने सिलिस् (Silis) नामकी एक नदी लिखी है। उसके साथ महाभारतकी शिला नदीका विशेष सादृश्य आता है। आजकल सिलिस नदीको जक्षर्तेश वा सरोकुल कहते हैं। (Ukert Geographie der Griechen und Romer, Vol. iii. 2, p. 238) सरीकुल नदी आरल हदमें गिरी है। युरोपीय भूवेत्ता कहते हैं―― पूर्वकालमें आरल और कास्पियसागर एकत्र मिले थे। पाश्चात्य पुरातत्त्ववित् ष्ट्राबोके मतसे वर्तमान कास्पियसागर पूर्वकालमें उत्तरमहासागर तक विस्तृत रहा। रामायण में लिखा है―― उत्तरकुरुके बाद उत्तर-समुद्र है।
{{c|<small>“तमतिक्रम्य शैलेन्द्रमुत्तरः पयसान्निधिः।” (किष्किन्धया ४३।५४)</small>}}
ब्रह्माण्डपुराणके मतमें भी इस स्थानसे उत्तर ऊर्मि-समाकुल समुद्र है――
{{x-smaller|{{c|<poem>“उत्तरानां कुरुणान्तु पाश्वेंज्ञेयलदुत्तरः।
समुद्रः सोर्मिमालोक्य नागासुरनिषे विताम्॥” (५० अ॰)</poem>}}}}
उक्त प्रमाणसमूह द्वारा स्पष्ट हो समझ पड़ता है―― पूर्वकालमें उत्तरकुरु कास्पिय-सागरके दक्षिण तीरसे गन्धमादन पर्वतके उत्तरांश तक विस्तृत था।
रामायण और महाभारतके मतमें यह स्थान मणिमय और काञ्चनकी बालुकासे सम्पन्न है। स्थान स्थानमें हीरक, वैदूर्य और पद्मरागके तुल्य रमणीय भूमिखण्ड हैं। यहां कामफलप्रद वृक्ष सकलके मनोरथ पूर्ण करते हैं। क्षीरी नामक वृक्षसे क्षीर टपकता और फलके गर्भ में वस्त्र तथा आभरण उपजता है। यहां पुष्करिणी सकल पङ्क से शून्य और मनोरम है। इसीसे वह सर्वदा सुखस्पर्श रहती है। स्त्री-पुरुष प्रियदर्शन और शुक्लवंशसंभूत हैं। स्त्री अप्सरा-सदृश देख पड़ती हैं। सब लोग क्षीरी वृक्षका अमृत-
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८१
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२८०|उधेड़बुन—उनसठ}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
<br>ग़रीब बनाना। ८ ठगना। ९ अपमानित करना, गाली देना। १० बेंत लगाना। १ लज्जित करना, शर्म देना। १२ काटना। १३ निर्वाह करना, खाना।<br>
<br>उखेड़न (हिं॰ स्त्री॰) १ चिन्ता, फ़िक्र। २ उपाय, तदबीर। ३ व्याकुलता, बैचेनी। ४ दुःख, तकलीफ़।<br>
<br>उखेरना, <small>उखेड़ना देखो।</small><br>
<br>उध्मान (सं॰ स्त्री॰) चुल्ली, चूल्हा।<br>
<br>उध्मार, <small>उखान देखो।</small><br>
<br>उन ( हिं॰ सर्व॰) १ 'उस' का बहुवचन।<br>
<br>उनइस, <small>उन्नीस देखो।</small><br>
<br>उनका (अ॰ पु॰) १ पक्षिविशेष, एक अनदेखा पक्षेरू। (वि॰) २ विरल, गैरमामूली, अनोखा।<br>
<br>उनगुलत—बम्बई प्रान्तके रत्नागिरि जिलेकी पशुकी एक जाति। आजकल इस जातिमें केवल जङ्गली सूअर ही देख पड़ता है। यह सह्याद्रि पर्वत और सागर तटके समीप रहता है। ग्रीष्म ऋतुमें सूवर दल-दलोंके पास आते और बष्ठों लेट लगाते हैं।<br>
<br>उनचकोटरा—बम्बईके काठियावाड़ प्रदेशका एक ग्राम। यह एक बड़ी चटान पर अरबसागरके किनारे बसा है। सोमनाथ-पाटन और उनसे निकाले जानेपर उनचकोटरा वाजोंकी प्रसिद्ध राजधानी रही। यहांके खीमजी वाज एक प्रसिद्ध वीर थे। यह ग्राम झांझमेरसे दक्षिण-पश्चिम सात और भावनगरसे प्राय छियालीस मील दूर है। उनच-कोटरेसे एक मील उत्तर नीचकोठरेंमें एक कूप है। उसमें एक ही साथ ३२ पुर चल सकते हैं!<br>
<br>उनचया—काठियावाड़ प्रान्तके जूनागढ़की एक तहसील। धांकरा उपजातिके बावरिये ताबुकदार हैं। पहले उनचया एक पृथक् करद राज्य था। यह जाफ़राबादसे उत्तर-पूर्व दस और धन्तरवाड़ी नदीसे पूर्ब एक मील पड़ता है। मीराईका बन्दर सिर्फ़
३ मील उत्तर है।<br>
<br>उनचास (हिं॰ वि॰) एकोनपञ्चाशत्, चार दहाई और नौ इकाई रखनेवाला, ४९।<br>
<br>उनकली—बम्बई प्रान्तके उत्तर कनाडा जिले का एक ग्राम। यह सिद्धपुरसे उत्तर-पश्चिम १२ मील दूर<br>
{{Multicol-break}}
और अपने सुन्दर जलप्रपात (Lushington falls) के लिये मशहूर है।
<br>उनजा—गुजरात प्रान्तके बड़ोदा राज्यका एक नगर। यह अक्षां॰ २३° ४८′ १०″ उ॰ तथा द्राघि॰ ७२° २७′
पू॰ पर अवस्थित है। यहां राजपूताना-मालवा-रेल-वेका स्टेशन बना है। उनजा अहमदाबादसे उत्तर ५६ और सिद्धपुरसे दक्षिण ८ मील पड़ता है। कड़वा कुरमियोंका यह प्रधान खान है।<br>
<br>उनतदिया—बड़ोदा राज्यका एक तीर्थस्थान। यह कड़ौके निकट अवस्थित है। शैव यहां महादेवका दर्शन करने आते हैं।<br>
<br>उनतरी—काठियावाड़ प्रान्तके भालावाड़ विभागका एक देशीय राज्य। भूमिका परिमाप ६ वर्गमील है।<br>
<br>उनतीस (हिं॰ वि॰) एकोनत्रिंशत, दो दहाई और नौ इकाई रखनेवाला, २९।<br>
<br>उनदा (हिं॰) <small>उन्निट्र देखो।</small><br>
<br>उन देलवार—काठियावाड़का एक प्राचीन स्थान। इसका प्राचीन नाम उब्बत नगर है। उन्नतनगर देखो।<br>
<br>उनमाथना (हिं॰ क्रि॰) उम्नथन करना, मथ डालना।<br>
<br>उनमान (हिं॰ वि॰) १ सदृश, बराबर। २ अनुमान, अन्दाज़।<br>
<br>उनमानना (हिं॰ क्रि॰) अनुमान करना, अन्दाज़ लगाना।<br>
<br>उनमूलना (हिं॰ क्रि॰) उम्मूलन करना, उखाड़ना।<br>
<br>उनमेख, <small>उन्मेष देखो।</small><br>
<br>उनमेद (हिं॰ पु॰) फन विशेष, किसी किस्मका भाग। यह प्रथम दृष्टिसे उपजता है। इससे मत्स्य मृत्युको प्राप्त होते हैं।<br>
<br>उनरना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्गत होना, उठना, चढ़ना। २ झटके साथ गमन करना, कूद-कूद चलना।<br>
<br>उनवना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्वमन करना, भुक या लटक पड़ना। २ आच्छादित होना, ढका जाना। ३ अकस्मात् आ पड़ना, लग जाना।<br>
<br>उनवर (हिं॰ वि॰) अल्प, ख़फ़ीफ़, जो ज्यादा न हो।<br>
<br>उनवान (हिं॰) अनुमान देखो।<br>
<br>उनसठ (हिं॰ वि॰) एकोनषष्टि, पांच दहाई और
नौ इकाई रखनेवाला, ५९।<br>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८२
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2026-07-11T10:03:17Z
अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उनसरी—उनाव|२८१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
उनसरी—उनाव
एक अधिवासी पर सुलतान्
उनसरी- बलख
महमूद गजनवोको सभा पण्डित इन्हें प्राथ
अबुल कासिम उनसरी कहते हैं ।
यह अबुलफरह |
समशरोके शिष्य चोर पसजदो तथा फरुखो कवि
गुरु थे। ये अपने समय के एक श्रेष्ठ विद्दान् थे ।
उन्सरी कवि होने के सिवा विज्ञान चोर अनेक
भाषाओं के भी जाननेवाले थे । गज़नी विश्वविद्यालय के
समग्र विद्यार्थी और चार सौ कवि तथा विद्वान् इन्हें
अपना गुरु मानते थे । सुलतान् महमूदको वीरता
पर इन्होंने एक ग्रन्थ बनाया था । एकबार सुलतान्
अपने सेवक अय्याजको अलकावली कटा कर पश्चा
ताप में पड़े थे । किन्तु इन्होंने उस समय ऐसौ कविता
बनाकर सुनायो, कि सुलतान्ने प्रसन्न हो इनका
सुख सोमवार चमूख्य रखोंसे भरनेको सेवकोंको पाना
दो । १०४० या १०४८ ई० में इनको
मृत्यु हुई।
उनसो - एक मुसलमान कवि । इनका मुख्य नाम
मुहम्मद शाह था । १५६५ ई० में इनको मृत्य हुई।
उनहत्तर (हिं० वि०) एकोनसप्तति, छः दहाई
और भी पकाई रखनेवाला ५८
..
उनहार (हिं० वि० ) समान, बराबर, कम-ज्यादा
न होनेवाला ।
|
उनहारि (हिं० स्त्री०) सादृश्य, बराबरी ।
उना–पञ्जाब के होशियारपुर ज़िलेसे उत्तरपूर्व एक
तहसील इसका कितना हो पंथ शिवालिक गिर
माला और हिमालयके मध्य पड़ता है । उनाके
चारो ओर प्रायः सोहन नदी बहती है । उपत्यका के
प्रदेशको यशवनदुन कहते हैं। गेहूं, धान, चना,
कपास, नोल, ज्वार, ऊख, तम्बाकू और सबजीको उपज
यहां अधिक है। इसका क्षेत्रफल ८५७ वर्गमील है।
२
प्रधान नगर यह अक्षा० ३१
७६ २८ पू० पर अवस्थित है ।
३२ उ० और द्राधि०
सिख गुरु नानके वेदो नामक वंशधर उनमें
हो रहते हैं जिपिके अधिकार- कालमें
वेदो उपाधिधारी विक्रमसिंह नामक एक व्यक्तिको
सिखराजसे इसको और अनेक निकटस्थ स्थानोंकी
जागोरी सनद मिली यो उना पर्वतपर सोहननदोके
III.
Vol
।
71
२८१
किनारे स्थित है। यहां बाज़ार लगा करता है।
लोकसंख्या प्राय साढ़े चार हज़ार है।
उनाना (हिं० क्रि०) १ उद्यमित करना, कुका देना ।
२ तत्पर करना, कमर बंधाना ३ श्रवण करना,
कान देना । ४ आज्ञापालन करना, कड़ेपर चलना ।
उनाव-१ प्रदेशका एक जिला वह अचा
२८ एवं २७२ ७० पोर द्राधि० ८० तथा
८१° ५ पू० के मध्य अवस्थित है। भूमिका परिमाण
१०४० वर्गमील है। इसके उत्तर हरदोई, पूर्व लखनऊ,
दक्षिण रायबरेली और दक्षिण-पश्चिम फतेहपुर तथा
कानपुर जिला पड़ता है। लोकसंख्या प्रायः नौ लाख
है। उनाव लखनऊ विभाग के अन्तर्गत और युक्तप्रदेश के
छोटे लाटके शासनाधीन है।
यह कृषिप्रधान स्थान है। इसमें उनाव, पुरवा,
मौरावां, सफीपुर, बांगरमऊ, मोहान, नवलगञ्ज, हसन
गञ्ज, महाराजगन्ज और हरहा ये प्रधान नगर हैं ।
-
इतिहास – पूर्व कालमें यह जिला वनादिसे भरा
था स्थानीय मनुष्यों को विश्वास पहले मोरावें,
पुरवे पर हरदेमें भर जातिका वास था। श्रव-
शिष्ट स्थान में लोष पोर, ठठेरे प्रभृति जातिके लोग
रहते थे।
मद गोरी के समय से राजपूत निज जम-
भूमिका खेड छोड़ उनावमें पाकर बनने लगे।
१२०० से १४५०० के बीच चोहान, दोचित, रेक-
वार, जनवार और गौतम यहां आये थे । पौछे परि-
हार, गेहलोत, गौड़ और शेंगर भी पहुंच गये ।
1.
मुसलमानोंके पाक्रमण से पहले विश्णुराज राजव
करते थे। सैयद अलाउद्दीन पुत्र बहाउद्दीन ने उन्हें
जीता | क्योंकि उस समय ईरानी और काबु नौ सिपाही
तो उनके साथ थे। और राजपुत्रका विवाह था। इस
लिये मुसलमानों को सुयोग मिला। उन्होंने धार्मिक
राजाको संवाद दिया कि - 'इस शादोसे हम खुश हैं।
अतएव हम अपनी औरतोंको आपकी औरतांसे मिल-
नेके लिये भेजना चाहते हैं।' राजा सम्मत हो गये ।
इसलिये कामिनियोंके बदले सत्र वोर पालकी पर
बैठ भवाध दुर्गमें घुस गये। राजपुरुष उत्सव से मत्त हो<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
80
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उनसरी—उनाव|२८१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
<br>उनसरी—बलखके एक अधिवासी और सुलतान् महमूद गजनवीकी सभाके पद्मित्त। इन्हें प्राय अबुल क़ासिम उनसरी कहते हैं। यह अबुलफ़रह सनजरीके शिष्य और असजदी तथा फरुखी कविके गुरु थे। ये अपने समयके एक श्रेष्ठ विद्वान् थे। उनसरी कवि होनेके सिवा विज्ञान और अनेक भाषाओंके भी जाननेवाले थे। ग़ज़नो विश्वविद्यालयके समय विद्यार्थी और चार सौ कवि तथा विद्वान् इन्हें अपना गुरु मानते थे। सुलतान् महमूदकी वीरता पर इन्होंने एक ग्रन्थ बनाया था। एकबार सुलतान्
अपने सेवक अय्याज़की अलकावली कटा कर पशातापमें पड़े थे। किन्तु इन्होंने उस समय ऐसी कविता बनाकर सुनायी, कि सुलतान्ने प्रसन्न हो इनका मुख तीन बार अमूल्य रत्नोंसे भरनेकी सेवकोंको आज्ञा दी। १०४० या १०४९ ई॰ में इनकी मृत्यु हुई।<br>
<br>उनसी—एक मुसलमान कवि। इनका मुख्य नाम मुहम्मद शाह था। १५६५ ई०में इनकी मृत्यु हुई।<br>
<br>उनहत्तर (हिं॰ वि॰) एकोनसप्तति, छः दहाई और नौ इकाई रखनेवाला, ६९।<br>
<br>उनहार (हिं॰ वि॰) समान, बराबर, कम-ज्यादा न होनेवाला।<br>
<br>उनहारि (हिं॰ स्त्री॰) साहृश्य, बराबरी।<br>
<br>उना—पंजाबके होशियारपुर जिलेसे उत्तरपूर्व एक तहसील। इसका कितना ही अंश शिवालिक गिरिमाला और हिमालयके मध्य पड़ता है। उनाके चारों ओर प्राय: सोहन नदी बहती है। उपत्यकाके प्रदेशको यमुनानदुन बहते हैं। गेहूँ, धान, चना,
कपास, नील, ज्वार, जख, तम्बाकू और सब्ज़ीकी उपज यहां अधिक है। इसका क्षेत्रफल ८६७ वर्गमील है। २ अपनी तहसीलका प्रधान नगर। यह अक्षां॰ ३१° ३२′ उ॰ और द्राघि॰ ७६° २८′ पू॰ पर अवस्थित है। सिखोंके गुरु नानकके वेदी नामक वंशधर उनामें ही रहते हैं। रणजितसिंहके अधिकार-कालमें वेदी उपाधिधारी विक्रमसिंह नामक एक व्यक्तिको सिखराजसे इसकी और अनेक निकटस्थ स्थानोंकी जागीरी सनद मिली थी। उना पर्वतपर सोहन-नदीके<br>
{{c|Vol III.{{gap}}71}}
{{Multicol-break}}
किनारे स्थित है। यहां बाजार लगा करता है। लोकसंख्या प्राय सादे चार हजार है।
<br>उनाना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्बमित करना, भुका देना। २ तत्पर करना, कमर बंधाना। ३ अवण करना, कान देना। ४ आज्ञापालन करना, कहेपर चलना।<br>
<br>उनाव—१ युक्त प्रदेशका एक जिला। यह अक्षां॰ २६° ८′ एवं २७° २′ उ॰ और द्राघि॰ ८०° ६′ तथा ८१° ५′ पू॰के मध्य अवस्थित है। भूमिका परिमाण १७४७ वर्गमील है। इसके उत्तर हरदोई, पूर्व लखनऊ, दक्षिण रायबरेली और दक्षिण-पश्चिम फतेहपुर तथा कानपुर जिला पड़ता है। लोकसंख्या प्राय: नौ लाख है। उनाव लखनऊ विभागके अन्तर्गत और युक्तप्रदेशके छोटे लाटके शासनाधीन है।<br>
<br>यह कृषिप्रधान स्थान है। इसमें उनाव, पुरवा, मौरावां, सफीपुर, बांगरमऊ, मोहान, नवलगञ्ज, हसनगञ्ज, महाराजगञ्ज और हसदा ये प्रधान नगर हैं।<br>
<br>इतिहास—पूर्व कालमें यह जिला बनादिके भरा था। स्थानीय मनुष्योंको विश्वास है—पहले मौरावें, पुरवे और हरदोईमें भर जातिका वास था। अवशिष्ट स्थानोंमें लोध, अहीर, ठठेरे प्रभृति जातिके लोग रहते थे।<br>
<br>मुहम्मद गोरीके समयसे राजपूत निज जन्मभूमिका खेत छोड़ उनावमें आकर बसने लगे। १२०० से १४५० ई॰ के बीच चौहान, दीक्षित, रैकवार, जनवार और गौतम यहां आये थे। पीछे परिहार, गेहलोत, गौड़ और शेंगर भी पहुंच गये।<br>
मुसलमानोंके आक्रमणसे पहले विष्णुराज राजत्व करते थे। सैयद अलाउद्दीनके पुत्र बहाउद्दीनने उन्हें जीता। क्योंकि उस समय ईरानी और काबुली सिपाही तो उनके साथ थे। और राजपुरुषका विवाद था। इसलिये मुसलमानोंको सुयोग मिला। उन्होंने धार्मिक राजाको संवाद दिया कि—'इस शादीसे हम खुश हैं। अतएव हम अपनी औरतोंको आपकी औरतोंसे मिलनेके लिये भेजना चाहते हैं।' राजा सम्मत हो गये। इसलिये कामिनियोंके बदले सशस्त्र वीर पालकी पर बैठ अबाध दुर्गमें घुसगये। राजपुरुष उत्सवसे मत्त हो
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२४
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||'''ओखलडांगा—ओखामण्डल'''|'''४८३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
'चोखलडांगा – युक्तप्रदेश के कुमायूं जिलेका एक ग्राम ।
यह अचा० २८° १४ २० उ०, तथा देशा० ७०० ३८ !
प्पर सुरादाबाद और पलमोड़ेके मध्यवर्ती पथ
कोशोला नदी किनारे स्थित है। इस खानमें
अति उत्कट चावल होता है।
पासली (हिं० [स्त्री०) उदूखल कांड़ी। यह काठ
वा प्रस्तरको होती है। इसमें धान्यको छोड़ और
मूसल से कूट मूस निकालते हैं। हिन्दुस्थान में प्राय:
भूमिको खोद और पत्थर जोड़ पोखली बना लेते हैं।
चोखा (हिं.पु.) १ व्याज, बहाना । (वि० )
२ शुष्क, सूखा । ३ कुटिल, टेढ़ा, खराब । ४ दूषित,
खोटा । ५ विरल, जो गाढ़ा न हो ।
चोखामण्डल - काठियावाड़ प्रान्तका एक छोटा जिला
यह चा २२ एवं २२ २८ ४० और देशा
५८८ १२ पू० के मध्य अवस्थित है। भोपा
- मण्डलसे उत्तर कच्छको खाड़ी, पश्चिम अरब समुद्र
और पूर्व तथा दक्षिण रान या नाना दलदल पड़ता,
जो इसे नवानगर जिलेसे पृथक करता है। असल में
- यह एक होप है। क्षेत्रफल २५० वर्गमील है। कहीं
कहौं पहाड़ देख पड़ती है। यूहरका जंगल बहुत
है। यहां गोमती नदी छोटी है । भीमगन झोलसे
एक पहाड़ी नाला भी निकला है। बरवाला, बर दिया
और पोसितरामें रेतोला पत्थर बहुत होता, जो मकान्
जनानेमें काम देता है। मूलवासर, मूलवेल और
सामलासर में बड़े-बड़े तालाब हैं। घर-घर और
खेत-खेत कू बने हैं। पानी प्राय: खारी है। समुद्र
- किनारे कुछ नहीं उपलता किन्तु भीतरी भूमि
उर्वरा है। दक्षिणांशको अपेक्षा उत्तरां में दूनो चीज़
होती है। बनका अभाव है। कहीं कहीं वदूत और
।
इमली है बम्बई, सूरत, कराची चीर
- के
जोवार साथ व्यवसाय होता है। बाबरी, तिल
घो, घास, चूना
और नमक बाहर भेज जाता है ।
चावल, चना, गेहूं, ज्वार, कपासका वीज, चीनी,
--मसाला, धालू और कपड़ा बाहर से आता है। रूपन
और बेयत बंदर हैं। रूपन द्वारकासे १ मोल उत्तर
पड़ता है। खाड़ीमें पानोके भीतर छिपे पचाड़ हैं।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
जहाजोंको ख ूब सचेत रहना पड़ता है। यहां ब्राह्मण
और सोहाने महाजन हैं। पहले यहांके लोग काब,
मोद और काल तोम पोमें विभक्त थे। किन्तु काय
और मोद अब देख नहीं पड़ते। काल जाति वर्तमान
वाघेरोंको उत्पत्ति है। पहले श्रीकृष्णने यहां अपना
राज्य स्थापित किया था । किन्तु श्रखामण्डलके भाट
वर्णन करते हैं- ई० २य शताब्दके मध्य काल
लोगोंने इसे फिर जीत लिया। सिरोयाके वीर सुक्क ुर
बेलिमने भी श्रखामण्डल अधिकार किया था । किन्तु
दारका समुद्रमें डब जानेसे वह अपनी राजधानी
गोरिंजाको उठा ले गये । पोछे सिरोयाके दूसरे वार
मेहेम गुटुकने सुक्कर बेलिमको मार अपना राज्य
जमाया । अन्तको काल लोंगोंने फिर चोखामण्डल
जोता था । ई० ६ष्ठ शताब्द के समय काठियावाड़ के
चावड़ राजपूतोंने चाक्रमण किया चोर कालों वा
वाघेरोंको यहांसे निकाल दिया। अक्षयराज राजा
बने थे। फिर उनके पुत्र भूवड़राय और भूवरायके
पुत्र जयसेन सिंहासनारूढ़ हुये जयसेनने हो चावड़ा-
पादर नगर बसाया और एक बड़ा तालाब बनाया
था। मूलवासर भोलमें उनके समयका एक पत्थर
मिला है। जयसेनका उत्तराधिकार उनके भाई जय-
देवने पाया जगदेव के पुत्र मलजी अपने पिता के
मृत्य ु होने बाद कुछ वर्ष जो कर मर गये । उनके
लड़के देवलदेव फिर राजा बने । देवलदेव के बाद
उनके लड़के जगदेव सिंहासनपर बैठे, जिनके नक
सेन और अनन्तदेव दो पुत्र रहे। कनकसेनने हो
'कनकपुरो' बसाई, जो पोछे 'बसाई' कहाई प्राचीन
कालपर यह पुरो प्रोखामण्डल के व्यवसायका केन्द्र-
स्थल थी । वर्तमान समय केवल एक ग्राम रह गया
है। कनकसेनके बनाये बड़े-बड़े जेन मन्दिर टूटे-
फूटे पड़े है अनन्तदेव दारकामे राज्य करते थे।
हैं।
उनके अयोग्य होनेसे परमार या रोल राजपूतोंने
अपना अधिकार जमा लिया। किन्तु चावड़ों पोर
उनमें युद्द होने लगा। इधर वेरावलजी और
वोजसकी दो राठौर राजपूत जोधपुर से निकाल दिये
गये थे। यह कितनी हो फोजके साथ दारका पाये।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४२०
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऊर्ध्वपात्र—ऊर्ध्वरेखा'''|'''४१९'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
ऊर्ध्वपात्र (सं० क्ली०) ऊर्ध्वं नेतव्यं पात्रम्, मध्य-पदलोपी समा० । उलूखल प्रभृति यज्ञपात्र ।
ऊर्ध्वपाद (सं० पु०) ऊर्ध्वाः पादा यस्य, बहुव्री० । १ शरभ नामक मृगविशेष । शरभ देखो । (त्रि०) २ ऊर्ध्वदेशमें पाद रखनेवाला, जिसके ऊपरी हिस्सेमें पैर रहे ।
ऊर्ध्वपुण्ड्र (सं० पु०) ऊर्ध्वं उन्नतः पुण्ड्र इक्ष्वादिभिव । चन्दन आदिसे ललाटपर लगाया हुआ लम्बा तिलक । ब्रह्माण्डपुराणमें लिखा है—ब्राह्मणको ऊर्ध्वपुण्ड्र, क्षत्रियको त्रिपुण्ड्र, वैश्यको अर्द्धचन्द्राकार एवं शूद्रको वर्तुलाकार तिलक लगाना और जल, मृत्तिका, भस्म तथा चन्दनसे ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाना चाहिये । देवी-भागवतमें नारायणने कहा है कि वैदिक अर्थात् वेदानिष्ठ ब्राह्मणको ऊर्ध्वपुण्ड्र, त्रिशूल, वर्तुल, चतुष्कोण वा अर्द्धचन्द्राकार प्रभृति कोई तिलक लगाना मना है । पर ब्रह्माण्डपुराणके मतसे अशुचि, अनाचारी एवं पापचिन्ताकारी व्यक्ति भी ऊर्ध्वपुण्ड्र लगानेसे शुद्धता पाता और {{SIC|चण्डालतुख्य|चण्डालतुल्य}} अनाचारी ब्राह्मण ऊर्ध्व-पुण्ड्राङ्कित अवस्थामें मरनेसे स्वर्ग चला जाता है । अनेक पुराणोंको देखते जप, होम, दान, वेदाध्ययन और पितृकार्यमें ऊर्ध्वपुण्ड्रधारण निषिद्ध है । किन्तु कुलाचारमें ऐसा नहीं होता । इसलिये व्यासोक्त वचनके अवलम्बनसे निश्चित होता है कि—श्राद्धादिके समय गन्ध वस्तुद्वारा ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाना मना है, अपरापर वस्तुसे लगानेमें कोई {{SIC|वाधा|बाधा}} नहीं ।
ऊर्ध्वपुण्ड्रक, ऊर्ध्वपुण्ड्र देखो ।
ऊर्ध्वपूर (सं० अव्य०) किनारे तक भरकर ।
ऊर्ध्वपृश्नि (सं० पु०) ऊर्ध्वाः पृश्नयो {{SIC|विन्दवो|बिन्दवो}} यस्य, बहुव्री० । पशु विशेष, एक चौपाया ।
ऊर्ध्वबर्ही (सं० त्रि०) ऊर्ध्वं प्रागग्रं बर्हिर्येषाम्, बहुव्री० । पितृलोक ।
ऊर्ध्वबाल (सं० त्रि०) खड़े बालोंवाला ।
ऊर्ध्वबाहु (सं० पु०) ऊर्ध्वं ऊर्ध्वगतश्चासौ बाहु-श्चेति कर्मधा० । १ उत्तोलित हस्त, उठा हुआ हाथ । २ पञ्चम मन्वन्तरके सप्त ऋषियोंमें एक ऋषि । ३ संन्यासी सम्प्रदाय विशेष । जो साधु एक वा
</div>
{{Multicol-break}}
<div style="text-align: justify;">
उभय बाहु ऊर्ध्वदिक् उठाये रहते, उन्हें ऊर्ध्वबाहु कहते हैं । भिक्षाके द्वारा जीविकानिर्वाह करते हैं । कोई दिगम्बर वेष रखता और कोई केवलमात्र गैरिक वस्त्र पहनता है । ५ वशिष्ठके एक पुत्र । (विष्णुपु० १।१०।१३) (त्रि०) ६ बाहु उत्तोलन किये हुआ, जो हाथ उठाये हो ।
ऊर्ध्वबुध्न (वै० त्रि०) ऊर्ध्व-बन्धन, ऊर्ध्वबोधन ।
ऊर्ध्वबृहती (वै० स्त्री०) छन्दोविशेष ।
ऊर्ध्वभाक् (सं० त्रि०) १ ऊर्ध्वभाग लेनेवाला, जो ऊपरी हिस्सा पाता हो । (पु०) २ बड़वानल ।
ऊर्ध्वभाग (सं० पु०) ऊर्ध्वं उपरिस्थो भागः, एकदेशः कर्मधा० । उपरिभाग, ऊपरी हिस्सा ।
ऊर्ध्वम् (सं० अव्य०) उत्-ह्वे डसु, उरादेशः । उपरि, ऊपर ।
{{block center|<poem>
"ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति {{SIC|यूनःस्थविर|यूनः स्थविर}} {{SIC|आयति|आयाति}} ।" (मनु)
</poem>}}
ऊर्ध्वमनु (सं० पु०) पुराणोक्त जनपदविशेष । (ब्रह्माण्डपु० ४७।४८, मत्स्यपु० १२०।४८)
ऊर्ध्वमन्थी (सं० पु०) ऊर्ध्वं {{SIC|उत्तराराश्रमं|उत्तराश्रमं}} मथ्नाति, मन्थ-णिनि । नैष्ठिक ब्रह्मचारी, स्त्रीप्रसङ्गसे बिलकुल अलग रहनेवाला ।
ऊर्ध्वमान (सं० क्ली०) ऊर्ध्वमारोप्य मीयते अनेन, ऊर्ध्व-मा-ल्युट् । १ प्रस्तर वा लौहनिर्मित तौलनेका बांट । २ ऊपरी परिमाण ।
ऊर्ध्वमायु (सं० त्रि०) उच्चशब्दकारी, जो ऊंची आवाज़ देता हो ।
ऊर्ध्वमारुत (सं० क्ली०) देहस्थ वायुका ऊपरी दबाव ।
ऊर्ध्वमुख (सं० त्रि०) ऊर्ध्वं मुखं यस्य, बहुव्री० । १ ऊपरको मुख रखनेवाला ।
{{block center|<poem>
"{{SIC|प्रदीचत्यूर्ध्वं|प्रतीच्छत्यूर्ध्वं}} {{SIC|सुखमेवमूचेः|मुखमेवमूचेः}} ।" (कुमार)
</poem>}}
(पु०) २ अग्नि । (क्ली०) ३ मुखका ऊर्ध्वभाग, मुंहका ऊपरी हिस्सा । ४ उन्नतमुख, ऊंचा मुंह ।
ऊर्ध्वमुखी (सं० पु०) संन्यासियोंका एक सम्प्रदाय । यह अपना मुख ऊपरको ही रखते हैं ।
ऊर्ध्वमूल (सं० क्ली०) जगत्, दुनिया ।
ऊर्ध्वमौहूर्त्तिक (सं० त्रि०) कुछ कालके बाद होनेवाला, जो थोड़ी देरके बाद आ पड़ता हो ।
ऊर्ध्वरेखा (सं० स्त्री०) चरणचिह्नविशेष । यह अष्ट-
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५५
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६५४|कणाद|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
द्रव्यके साथ उसके परमाणुका सम्बन्ध रहता है --जैसे घटके साथ मृत्तिकाका सम्बन्ध इत्यादि।
प्रभाव चार प्रकारका है-प्रागभाव, ध्वंसाभाव,अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव। अभाव देखी।
कणादके मसमें अन्धकार कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं। तेजके अभावको ही अन्धकार कहते हैं।
प्रमाण इन्होंने दो हौ प्रकारका माना है--प्रत्यक्ष और अनुमान । उपमान अनुमानके अन्तर्भूत है।
महर्षि कणादने ही सर्वप्रथम परमाणुवाद चलाया था। इनके कथनानुसार एकमात्र परमाणु सत्वरूप नित्य पदार्थ है। उसका दसरा कोई कारण नहीं
होता।
<Small>“सदकारणवन्नित्यम् ।" (वैशे० सू० ४।१।१)</Small>
हम जो यावतीय जड़पदार्थ प्रत्यक्ष करते, वह समुदाय परमाणुके संयोगसे बनते हैं। विशेष विशेष प्रकारके परमाणुवोंमें विशेष नामक एक पदार्थ रहता है। उसोको शक्तिसे भिव-भिन्न रूप परमाणु भिन्न-जसे देख पड़ते हैं।
कणादके मतमें अदृष्ट कारण विशेष हारा पर-माणावोंका सयोग गंठनेसे इस विश्वसंसारको उतपत्ति हुयी है।
<Small>"दृष्ट कारणे सत्यदृष्ट कल्पनानवकाशात् ।"</small>
क्योंकि दृष्ट कारण रहते अदृष्ट कारणको कल्पना आवश्यक नहीं।
वास्तविक महर्षि कणाद अपनी चारो ओर जो देख पाते, उसीके ज्ञानानुशोलनमें प्रवृत्त हो जाते थे।
जो परमाणु वा जड़तत्त्व कणादने अपने सूत्र में प्रचार किया, आजकल भारतवर्ष में विशेष आदर न मिलते भी युरोपीय दार्शनिकोंने उसको यथेष्ट सम्मान दिया है। ई०से ४४० वर्ष पूर्व ग्रीक देशमें डेम-क्रिटस्ने परमाणुवाद चलाया था। उसके पीछे एपिक्यु रासने इस मतको सविशेष प्रचार किया। उनका सिद्धान्त बिलकुल कणादसे मिलता है। लुके-
{{Multicol-break}}
शियाने उनका मत प्रकाश किया। उन्होंने अपने बनाये काव्यदर्शनमें कहा है-
{{center|<poem>"Nunc age, quo motu genitalia materiai
Corpora res varias gignant, genitasque</poem>}}
{{Right|resolvant}}
{{Center|<poem>Et qua vi facere id congantur, quaeve</poem>}}
{{Right|sit ollis}}
{{Center|<poem>Reddita mobilitas magnum per inane</poem>}}
{{Right|meandi Expediam."}}
{{Right|(II. 61-64. *)}}
लक्रशियाने स्पष्ट हो स्वीकार किया, कि पर-माणु ने इस जगत्को जन्म दिया है। वास्तविक लक्रशियाका द्वितीय अध्याय पढ़नेसे कणादका मत बहुत कुछ मिलता है।
अब देखना चाहिये-किसने सर्वप्रथम परमाणुवाद चलाया था, महर्षि कणाद या थे सके डेमक्रिटस्ने ।
इस बातके समझने का कोई उपाय नहीं--कणाद किस समयके व्यक्ति रहे । अपना देशीय प्रवाद मानने-से यह ५६ हजार वर्ष के लोग हो सकते हैं। फिर भी भगवगोतामें वैशेषिकका मत रहौत हुआ है। सुतरां गोता बननेसे पहले महर्षि कणाद विद्यमान थे। इससे मानना पड़ेगा-डेमक्रिटेससे बहुत पहले इन्होंने जड़पदार्थ का मूलतत्त्व अपने सूत्रके मध्य
क्यों सनिवेश किया है। वैशेषिक-उपस्कारमें स्पष्ट कणादका जन्म हुआ। अतएव समझ सकते-महर्षि कणादने ही सर्वान परमाणवाद चलाया था। डेम हो लिख दिया है- क्रिटम्को जोवनी पढ़नेसे बोध होता-वह संन्यासि-योंके साथ भारतवर्ष आये थे। सम्भवतः संन्यासियों- के मुखसे कणादका मत सुन अपने ग्रन्यमें उन्होंने वैशेषिकको बात लिखी है।
{{Rule}}
* Thus the Great World's eternally renewed ;
Thus endless atoms are with power endued,
Successive generations to supply;
Some creatures flourishing, while others die.
Like racers, each revolving age, we find,
Retires, and leaves the lamp of life behind.
If you suppose that seeds at rest convey,
Motion to bodies, wide from truth you stay.
Through the Vast Void as those premordiala robe,
By foreign force or gravity they move.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४२१
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AMAN KUMAR
6475
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४२०'''|'''ऊर्ध्वरेता—ऊर्मि'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
चिह्नोंमें एक है । अङ्गुष्ठ तथा उसके निकटकी अङ्गुलिके मध्यसे यह रेखा एड़ीतक पहुंचती है । इसके होनेसे मनुष्य अंशावतारी समझा जाता है । राम, कृष्ण प्रभृति विष्णुके अवतार इस रेखासे युक्त थे ।
ऊर्ध्वरेता (सं० पु०) ऊर्ध्वं ऊर्ध्वगं रेतो यस्य, बहुव्री० । १ महादेव । २ सनकादि मुनि । ३ तपस्वी विशेष । ४ भीष्म । ५ हनुमान् । (त्रि०) ६ रेतःस्खलन-रहित, जो कभी वीर्य गिराता न हो ।
ऊर्ध्वरोमा (सं० पु०) ऊर्ध्वानि रोमाणि यस्य, बहुव्री० । १ यमदूत प्रभृति । २ कुशद्वीपस्थ पर्वतविशेष । (त्रि०) ३ उन्नत रोमवाला, जिसके खड़ा रोंगटा रहे ।
ऊर्ध्वलिङ्ग (सं० पु०) ऊर्ध्वं लिङ्गं यस्य, बहुव्री० । महादेव ।
ऊर्ध्वलिङ्गी, ऊर्ध्वलिङ्ग देखो ।
ऊर्ध्वलोक (सं० पु०) ऊर्ध्वश्चासौ लोकश्चेति, कर्मधा० । १ स्वर्ग, बिहिश्त । २ आकाश, आसमान् ।
ऊर्ध्ववात (सं० पु०) ऊर्ध्वो वातः, कर्मधा० । ऊर्ध्वगत वायु, ऊपर चढ़ी हुई हवा ।
ऊर्ध्ववायु, ऊर्ध्ववात देखो ।
ऊर्ध्ववृत (सं० क्ली०) ऊर्ध्ववेष्टनेन वृतः, ३-तत् । ऊर्ध्वं दिक् आवर्तितं यज्ञोपवीतं, ऊपरको घूमा हुआ जनेऊ । "कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् ।" (मनु २।४४)
{{SIC|ऊर्ध्ववृहती|ऊर्ध्वबृहती}} (वै० स्त्री०) छन्दोविशेष ।
ऊर्ध्वभान (सं० त्रि०) ऊपर उठनेवाला ।
ऊर्ध्वशायी (सं० त्रि०) ऊर्ध्व-शी-णिनि । १ उत्तान-शायी, चित लेटनेवाला । (पु०) २ महादेव ।
ऊर्ध्वशोधन (सं० क्ली०) वमन, कै ।
ऊर्ध्वशोष (सं० अव्य०) ऊर्ध्वः सन् शुष्यति, ऊर्ध्व-अमुल् । उपरिस्थ शोषण द्वारा, ऊपर ही सूख जानेसे ।
ऊर्ध्वश्वास (सं० पु०) ऊर्ध्वश्चासौ श्वासश्चेति, कर्मधा० । १ दीर्घश्वास, लम्बी सांस । २ {{SIC|मृत्यकालीन|मृत्युकालीन}} श्वास, मरते वक्तकी सांस ।
ऊर्ध्वसानु (सं० पु०-क्ली०) ऊर्ध्वञ्च तत् सानु चेति, कर्मधा० । पर्वतादिका उपरिस्थ समतल प्रदेश, पहाड़ वगैरहके ऊपरका हमवार हिस्सा ।
</div>
{{Multicol-break}}
<div style="text-align: justify;">
ऊर्ध्वस्थ (सं० त्रि०) श्रेष्ठ, ऊपरवाला ।
ऊर्ध्वस्थित (सं० त्रि०) ऊपर रहनेवाला ।
ऊर्ध्वस्थिति (सं० स्त्री०) ऊर्ध्वा स्थितिर्यत्र, {{SIC|बहुव्रीही|बहुव्रीहि}} । १ अश्वका पृष्ठदेश, घोड़ेकी पीठ । (त्रि०) २ ऊर्ध्वस्थ, ऊपरी ।
ऊर्ध्वस्रोता (सं० पु०) ऊर्ध्वं ऊर्ध्वगतं स्रोतो यस्य, बहुव्री० । १ ऊर्ध्वरेता मुनि । २ वृक्षादि, पेड़ वगैरह ।
ऊर्ध्वाङ्ग (सं० पु०) मस्तक, सर ।
ऊर्ध्वाङ्गुलि (सं० अव्य०) उंगली उठाकर ।
ऊर्ध्वाकर्षण (सं० क्ली०) ऊर्ध्वको आकर्षण, ऊपरी कशिश ।
ऊर्ध्वाम्नाय (सं० पु०) ऊर्ध्व आम्नाय्यते, ऊर्ध्व-आ-म्ना-कर्मणि घञ् । वेदमार्गसे अतिरिक्त बोधक एक तन्त्र । इसमें गुरुभक्ति, विष्णुके दशावतार, गौराङ्ग-माहात्म्य-कीर्तन, श्रीकृष्ण-पूजाविधि, नारायणस्तव एवं गया माहात्म्य प्रभृतिका वर्णन है । नारद ऊर्ध्वाम्नायके वक्ता तथा व्यासदेव श्रोता हैं ।
ऊर्ध्वायन (सं० त्रि०) ऊर्ध्वं अयनं गमनं यस्य, बहुव्री० । १ ऊर्ध्वगत, ऊपर जानेवाला । (पु०) २ प्लक्षद्वीपस्थ पक्षि-विशेष, एक चिड़िया । (क्ली०) ३ ऊर्ध्वगति, ऊपरी चाल ।
ऊर्ध्वावर्त (सं० पु०) ऊर्ध्वं आवर्तते अत्र, ऊर्ध्व-आ-वृत-घञ् । १ अश्वपृष्ठ, घोड़ेकी पीठ । २ आवर्त-विशेष, एक घेरा ।
ऊर्ध्वासित (सं० पु०) ऊर्ध्वं उपरिभागे असितं यस्य, बहुव्री० । १ कारवेल्ल, करेला । (त्रि०) ऊर्ध्वं {{SIC|मासितं|आसितं}} येन । २ {{SIC|ऊर्ध्वपविष्ट|ऊर्ध्वोपविष्ट}}, ऊपर बैठा हुआ ।
ऊर्ह (सं० पु०) ऊर्ध्वगति, ऊपरी हरकत ।
ऊर्मि (सं० पु०-स्त्री०) ऋच्छतीति, ऋ-मि {{SIC|ऊगादेशश्च|ऊरादेशश्च}} । ऋतेरुच्च । उण् ४।४३ । १ तरङ्ग, लहर, उभार । २ प्रकाश, रौशनी । ३ वेग, झपट । ४ भङ्ग, टूट । ५ पीड़ा, तकलीफ़ । ६ वेदना, दर्द । ७ उत्कण्ठा, खाहिश । ८ शोक, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुत् और पिपासा । ९ अश्वकी एक गति, घोड़ेकी लहरिया चाल । १० भ्रान्ति, भूल । सङ्ग, साथ । ११ समूह, जखीरा । १२ शीघ्रता, {{SIC|जलदी|जल्दी}} । १३ अङ्गुलीय, अंगुश्तरी । १४ कपड़ेका चुनाव । १५ शिकन, बल ।
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऊर्मिका—ऊषणा'''|'''४२१'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
ऊर्मिका (सं० स्त्री०) ऊर्मि स्वार्थे कन्-टाप्, ऊर्मि-रिव कायति, ऊर्मि-कै-टाप् । १ अङ्गुलीयक, अंगूठी । २ भ्रमर गुञ्जन, भौरेकी गूंजन ।
ऊर्मिन् (सं० त्रि०) ऊर्मिरस्त्यस्य, ऊर्मि-इनि । ऊर्मियुक्त, लहरदार, लहरी ।
ऊर्मिमत्ता (सं० स्त्री०) १ भङ्गुरता, टूटापन । २ वक्रता, टेढ़ापन ।
ऊर्मिमान् (सं० त्रि०) ऊर्मिरस्यास्ति, ऊर्मि-मतुप् । १ तरङ्गयुक्त, लहरदार । २ वक्र, मेहराबदार ।
ऊर्मिमाली (सं० पु०) ऊर्मीणां माला विद्यते यस्य, ऊर्मि-माला-इनि । समुद्र, बहर-आज़म ।
{{block center|<poem>
"चन्द्रं प्रवृद्धोर्मिरिवोर्मिमाली ।" (रघु ३।३९)
</poem>}}
ऊर्मिला (सं० स्त्री०) लक्ष्मणकी पत्नी । यह जनककी औरस कन्या थीं ।
ऊर्म्य (सं० त्रि०) ऊर्मौ भवः, ऊर्मि-यत् । १ तरङ्गोत्पन्न, लहरसे निकला हुआ । (पु०) २ रुद्र विशेष ।
ऊर्म्या (वै० स्त्री०) रात्रि, रात ।
{{block center|<poem>
"{{SIC|तिरश्चता|तिरश्चती}} ददर्शे ऊर्म्यासु ।" (ऋक् १।११८।१)
'ऊर्म्यासु रात्रिषु ।' (सायण)
</poem>}}
ऊर्व (सं० पु०) १ जलपात्र, हौज । २ मेघ, बादल । ३ आवृत स्थान, घिरी जगह । ४ कारागृह, क़ैद-खाना । ५ और्वके पिता । ६ बड़वानल ।
ऊर्वरा, उर्वरा देखो ।
ऊर्वशर (सं० पु०) भरतवंशीय महावीर्यके पुत्र ।
ऊर्वशी, उर्वशी देखो ।
ऊर्वष्ठीव (सं० क्ली०) ऊरु च अष्ठीवन्तौ च, समाहार-द्वन्द्व । ऊरु एवं जानु, रान और घुटना ।
ऊर्वशी (सं० स्त्री०) ऊरौ उत्थिता, पृषोदरादित्वात् साधुः । उर्वशी देखो ।
ऊर्वास्थि (सं० क्ली०) ऊरोरस्थि, ६-तत् । ऊरु-देशका हाड़, रानकी हड्डी ।
ऊर्वी (सं० स्त्री०) ऊरुदेशका मध्यस्थ ।
{{block center|<poem>
"ऊरुमध्ये ऊर्वी नाम तत्र शोणितक्षयात् सक्थिशोषकः ।"
(सुश्रुत शारीर)
</poem>}}
ऊर्व्य (सं० पु०) ऊर्वौ भवः, ऊर्व-यत् । बड़वानला-धिष्ठात्री देवता, इन्द्र ।
<br><br>Vol III. 106
</div>
{{Multicol-break}}
<div style="text-align: justify;">
ऊर्ष्यङ्क (सं० क्ली०) ऊर्ष्याः पृथिव्या अङ्कमिव । गोमयच्छत्रिका । इसका संस्कृत पर्याय—दिलीर, शिलोच्चक, वशारोह और गोल्लास है । (हारावली)
ऊर्षा (सं० स्त्री०) देवताड़क वृक्ष ।
उल—युक्तप्रदेशकी एक नदी । यह शाहजहांपुर ज़िलेमें अक्षा० २८° २१' उ० तथा द्राघि० ८०° २७' पू०से निकलती और दक्षिणसे पूर्व ७ मील बह कर अक्षा० २८° २२' उ० एवं द्राघि० ८०° २८' पू०पर खेरी ज़िलेमें जा पहुंचती है । फिर सीतापुर ज़िलेमें उल अक्षा० २७° ४२' उ० तथा द्राघि० ८१° १३' पू०पर चौकासे मिलती है । पूरी लम्बाई ५५ कोस है । इसमें बाढ़ आनेका बड़ा डर रहता है । कहीं कहीं जल बिल्-कुल सूख जाती है । अलीगंज एवं गोले और लखीम-पुर तथा सिधोके बीच इसपर पुल बंधा है । यह नाव चलाने या खेतमें पानी पहुंचानेके काम नहीं आती ।
उलंग (हिं० स्त्री०) एक चाय ।
ऊलजलूल (हिं० वि०) १ अटपटांग, वाहियात । २ मूर्ख, {{SIC|गड़वड़िया|गड़बड़िया}} । ३ असभ्य, गंवार ।
ऊलर (हिं० स्त्री०) काश्मीरस्थ ह्रद विशेष, काश्मी-रकी एक झील । यह ख़ूब लम्बी चौड़ी है ।
ऊलूषी (सं० पु०) १ जलजन्तु विशेष । एक पानीका जानवर । २ मत्स्य विशेष, एक मछली । उलूषी देखो ।
ऊलूक (सं० पु०) उलूक, उल्लू ।
ऊवट, उवट देखो ।
ऊवध्य (सं० क्ली०) पशुके उदरका नपचा हुआ तृण ।
ऊष् (धातु) भ्वादि० पर० सक० सेट् । "ऊष रोगे ।" (कविकल्पद्रुम) पीड़ा देना, तकलीफ़ पहुंचाना ।
ऊष (सं० पु०) ऊष-क । १ क्षारमृत्तिका, खारी मट्टी । २ कर्णरन्ध्र, कानका छेद । ३ मलय पर्वत, चन्दनाद्रि । (क्ली०) ४ प्रत्यूषकाल, तड़का । ५ शुक्र, वीर्य ।
ऊषक (सं० क्ली०) ऊष स्वार्थे कन् । प्रत्यूष समय, सवेरा ।
ऊषण (सं० क्ली०) ऊष-ल्युट् । १ मरिच, मिर्च । २ शुण्ठी, सोंठ । ३ पिपरामूल । ४ धौत ।
ऊषणा (सं० स्त्री०) ऊषण-टाप् । १ पिप्पली, पीपल । २ चविका ।
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४२२'''|'''ऊषपुट—ऊह्यगान'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
ऊषपुट (सं० स्त्री०) काग़ज़में लिपटा नमकका दाना ।
ऊषर (सं० त्रि०) ऊषं क्षारमृत्तिकां राति ददाति, ऊष-र अथवा ऊष-रा-क । नोना स्थान, रेहकी जगह ।
{{block center|<poem>
"तत्र विद्या न वप्तव्या {{SIC|मूषं|शुभं}} {{SIC|वीजमिवोषरे|बीजमिवोषरे}} ।" (मनु २।११२)
</poem>}}
ऊषरज (सं० क्ली०) ऊषरात् जायते, ऊषर-जन-ड । १ {{SIC|पांशुलावण|पांशुलवण}} । २ रोमक नामक अयस्कान्त विशेष ।
ऊषवान् (सं० त्रि०) ऊषो विद्यतेऽस्य, ऊष-मतुप् मस्य वः । नोना स्थान, रेहकी जगह ।
ऊषा, उषा देखो ।
ऊष्म, उष्म देखो ।
ऊष्मण (सं० त्रि०) ऊष्मोऽस्त्यस्य, ऊष्म-न । ऊष्म-युक्त, गर्म ।
ऊष्मण्य (सं० त्रि०) ऊष्म निवारणीयत्वेन अस्यास्ति, ऊष्मन्-यत् । {{SIC|ऊष्मानिवारक|ऊष्मनिवारक}}, गर्मी दूर करनेवाला, ठण्डा ।
ऊष्मन् (सं० पु०) ऊष-मनिन् । १ ग्रीष्म, गरमी । २ ताप, धूप
ऊष्मप (सं० त्रि०) गर्म, भोजनका वाष्प खींच लेनेवाला ।
ऊष्मपर (सं० त्रि०) ऊष्मन्के पहले पड़नेवाला ।
ऊष्मप्रकृति (सं० त्रि०) ऊष्मन्से निकला हुआ ।
ऊष्मवत् (सं० त्रि०) तप्त, गर्म ।
ऊष्मान्त (सं० त्रि०) ऊष्मन्में समाप्त होनेवाला ।
ऊष्मान्तःस्थ (सं० पु०) अर्द्धस्वर, जो पूरा स्वर न हो ।
ऊष्मोपगम (सं० पु०) उत्तापका आगम, गर्मीकी आमद ।
ऊसन (हिं० पु०) वृक्षविशेष, तरमिरा, जेवा । इसे सर्षपकी भांति यव तथा गोधूमके साथ बोते हैं । ऊसनका तैल जलाते और खली गायों तथा भैंसोंको खिलाते हैं ।
</div>
{{Multicol-break}}
<div style="text-align: justify;">
ऊसर (हिं०) ऊषर देखो ।
ऊह् (धातु) भ्वा० आत्म० सक० सेट् । "ऊह वितर्के ।" (कविकल्पद्रुम) सन्देहसे तर्क करना, {{SIC|शुभहसे|शुबहसे}} बहस छेड़ना ।
ऊह (सं० पु०) ऊह-घञ् । १ वितर्क, बहस । २ अध्याहार, छिपाव । ३ परीक्षा, जांच । ४ अनन्वित विभक्ति लिङ्गको छोड़ अन्वययोग्य विभक्त्यादिकी कल्पना । ५ आरोप, लगाव । ६ विधिविशेष । ७ अनुमान, फ़र्ज़ ।
ऊहगान (सं० क्ली०) सामगानका एक ग्रन्थ ।
<div style="text-align: right;">साम देखो ।</div>
ऊहन (सं० क्ली०) वितर्क, बहस ।
ऊहनी (सं० स्त्री०) ऊह-ल्युट् ङीष् । सम्मार्जनी ।
ऊहनीय (सं० त्रि०) तर्क्य, {{SIC|बड़सके|बहसके}} क़ाबिल ।
ऊहा (सं० स्त्री०) ऊह-टाप् । ऊह देखो ।
ऊहापोह (सं० त्रि०) ऊहस्तर्कः अपोहः अपगतो यत्र, बहुव्री० । १ तर्कशून्य, बेबहस । २ तर्कद्वारा संशय मिटाये हुआ, जो बहससे शक मिटा चुका हो । ३ अध्ययनादिमें संशयहीन, सबकमें शक न रखने-वाला । ४ सुहृदादि प्राप्तिविषयमें कृतनिश्चय, दोस्त वग़ैरहकी मुलाक़ात ठहराये हुआ । ५ दानादिमें द्विधा मतशून्य, बेधड़क देनेवाला ।
ऊहित (सं० त्रि०) ऊह-क्त । १ तर्कित, बहस किया हुआ । २ अध्याहृत, छिपा हुआ । ३ अनुमित, फ़र्ज़ किया हुआ । ४ सम्भावित, मुमकिन ।
ऊह्य (सं० त्रि०) ऊह ण्यत् । १ तर्कणीय, बहसके क़ाबिल । २ व्यवहार्य, लगनेवाला । (क्ली०) ३ मीमांसा-शास्त्रोक्त ऊह विशेष ।
ऊह्यगान, उहगान देखो ।
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude><div style="text-align:center; font-size: 250%; margin: 20px 0;">'''ऋ'''</div>
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
ऋ (सं० पु०) १ स्वरवर्णका सप्तम अक्षर । ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत भेदसे यह तीन प्रकारका होता है । उच्चारणस्थान मूर्द्धा है । लिखनकी प्रणालीमें ऊर्ध्व देशपर एक वक्र रेखा दक्षिण जायेगी और वामदिक्से आरम्भ कर एक त्रिकोणाकृति बनानेमें आयेगी । फिर दक्षिण दिक्को अधोगामी रेखा पड़ेगी । मात्रा पराशक्ति-जैसी विख्यात है । उसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर अवस्थान करते हैं । ऋकारका {{SIC|तन्त्राक्त|तन्त्रोक्त}} नाम शूर, दीर्घमुखी, रुद्र, देवमाता, त्रिविक्रम, भारभूति, क्रिया, क्रूरा, रोचिका, नासिका, द्युत, एकपादशिरः, माला, मण्डना, शान्तिनी, जृभ्र, कर्ण, कामलता, मेधः, निवृत्ति, गणनायक, रोहिणी, शिवदूती, पूर्ण-गिरि और संप्रमो है । (वर्णोद्धारतन्त्र) २ धातुका अनुबन्ध-विशेष । "ऋचडादृक्ष ।" (कविकल्पद्रुम) ३ स्वर्ग, बिहिश्त । ४ तपन । (स्त्री०) ५ देवमाता अदिति । (अव्य०) ६ हास्य परिहास, हीही ठीठी । ७ निन्दा, छी-छी । ८ वाक्य, बात । ९ प्राप्ति, हासिल । १० वाक्यविभक्ति । (धातु) भ्वा० पर० सक० अनिट् । ११ गमन करना, जाना । १२ प्राप्त होना, पहुंचना । "ऋ गतौ प्राप्तौ च ।" (कविकल्पद्रुम) अदा० पर० सक० अनिट् । १३ गमन करना, चलना । "ऋ इरल् गत्याम् ।" (कविकल्पद्रुम) जुहो० पर० सक० अनिट् । १४ गमन करना, चल पड़ना । "ऋ रलि गत्याम् ।" (कविकल्पद्रुम) स्वा० पर० सक० अनिट् । १५ हिंसा करना, मारना । "ऋ रन हिंसने ।" (कविकल्पद्रुम)
ऋक् (सं० स्त्री०) ऋचन्ते स्तूयन्ते अनया देवाः, ऋच्-क्विप् । १ ऋग्वेद । इसकी शाखा एकविंशति हैं । २ ऋग्वेदोक्त मन्त्र । ३ स्तुति, तारीफ़ । ४ पूजा, परस्तिश । (त्रि०) ५ तप्त, गर्म ।
ऋक्कस (सं० अव्य०) ऋक्करास् । अक् ।
</div>
{{Multicol-break}}
<div style="text-align: justify;">
ऋक्ण (सं० त्रि०) व्रश्च-क्त, पृषोदरादित्वात् वलोपः । छिन्न, कटा हुआ ।
ऋक्थ (सं० क्ली०) ऋच् सुनौ थक् । पातुतुदिवचिरि-चिंसिचिभ्यस्थक् । उण् २।७ । १ धन, दौलत । २ स्वर्ण, ज़र । ३ उत्तराधिकारसूत्रसे मिलनेवाली ज्ञाति प्रभृतिकी सम्पत्ति, जो जायदाद वरासतसे हासिल हो ।
ऋक्थहर (सं० त्रि०) ऋक्थं हरति, ऋक्थ-हृ-अच् । अंशभागी, हिस्सेदार, वरासतसे माल पानेवाला ।
ऋक्ष (सं० पु० क्ली०) ऋष्-स-कित् । {{SIC|वृनृभृञ्मृगृभ्यः|वृनृदृञ्मृजृभ्यः}} कित् । उण् ३।६६ । १ नक्षत्र, सितारा ।
{{block center|<poem>
"जौद्रा राशी च देङ्गा रोषाचिन्य पृष्ठाः सुमाधानः ।
रेरुद्याग्नापोज्ञः क्रयक्रुङ्गा डयाच्चोनिङ्गेः ।" (ज्योतिष वेदाङ्ग १४)
</poem>}}
२ राशि । (रघु १२।३५)
युरोपके ज्योतिष शास्त्रमें ऋक्ष नामक स्वतन्त्र राशि है । नाम उर्सा मेजर (Ursa major) रखते हैं । यह उत्तर राशियोंमें एक समझा जाता है । इस राशिमें सात तारा रहते हैं । विशेषता यह पड़ती—इसमें कितनी ही द्वितारा और नीहारिका लगती है ।
ऋक्ष-अच् । ३ पर्वत विशेष, एक पहाड़ । यह सप्त कुलाचलके मध्य पड़ता है । कुलाचल देखो । इस पर्वतके मध्य नर्मदा नदी प्रवाहित है ।
{{block center|<poem>
"ऋक्षवन्तं गिरिश्रेष्ठमध्यास्ते नर्मदां पिवन् ।
सर्वर्क्षाणामधिपति{{SIC|र्भूमो|र्धूमो}} नामैष यूथपः ।" (रामायण ६।२७।९०)
</poem>}}
इसी ऋक्षवान् पर्वतको प्राचीन पाश्चात्य ऐतिहा-सिक टलेमिने 'ओक्षेटन' (Ouxeuton) लिखा है । वर्तमान विन्ध्य पर्वतका दक्षिण-पूर्वांश पहले 'ऋक्ष', 'ऋक्षवान्' इत्यादि नामसे पुकारा जाता था ।
{{block center|<poem>
"नर्मदाकूलमेकाकी नगरीं मृत्तिकावतीम् ।
ऋक्षवन्तं गिरिं जित्वा शुक्तिमत्यामुवास ह ।" (हरिवंश ३६।१५)
</poem>}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४२४'''|'''ऋक्षगन्धा—ऋक्सम'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
उन्होंने नर्मदाके कूलपर पहुंच मृत्तिकावती नगरीपर अधिकार किया और ऋक्षवान् पर्वतको जीत शुक्तिमतीमें डेरा डाल दिया ।
<div style="text-align: right;">मृत्तिकावती और शुक्तिमती देखो ।</div>
२ भल्लूक, भालू, रीछ । ३ शोणक वृक्ष, एक पेड़ । ४ पुरुवंशीय अजमीढ़ राजाके पुत्र । ५ पौरव विदूरथके पुत्र । ६ पुरुवंशीय अरिह राजाके पुत्र । ७ मेरुके निकटस्थ एक पर्वत । (त्रि०) ८ कृतवेधन, मारा हुआ ।
ऋक्षगन्धा (सं० स्त्री०) ऋक्षस्येव गन्धो यस्याः, बहुव्री० । वृद्धदारक वृक्ष, एक पेड़ । दूसरा नाम छागलान्त्री, आवेगी, वृद्धदारक, जुङ्ग, {{SIC|युगन्धिगन्धा|सुगन्धिगन्धा}}, छगला, महाश्यामा, जाङ्गुली, जीर्णवल्कल, कोटरपुष्पी, ऋक्षगन्धा, छागलाङ्गी, अन्त्री, जुङ्गा, छगली, जुङ्गक, श्यामा, छागलान्तिका, {{SIC|दीर्घवाहुका|दीर्घबाहुका}}, वृद्धा, और अजान्त्री (Argyreia speciosa, sweet) है ।
वैद्यक मतसे यह रसायन, वायुनाशक, बलकर तथा पिच्छिल रहता और शोथ, आमवात, कास, श्वास एवं ज्वररोगपर चलता है । बीजादि ग्रहण करना चाहिये । मात्रा दो माशा है । यह वृक्ष भारतवर्षके पश्चिमाञ्चलमें बहुत होता है । २ ऋक्षिजाहृक्षवृक्ष । ३ क्षीरविदारी वृक्ष ।
ऋक्षगन्धिका (सं० स्त्री०) ऋक्षगन्धा स्वार्थे कन्-टाप्, अत इत्वञ्च । कृष्णभूमिकूष्माण्ड, काला विदारी कन्द । संस्कृत पर्याय क्षीरविदारी, महाश्वेता और क्षीरिका है ।
ऋक्षगिरि (सं० पु०) ऋक्षश्चायं गिरिश्चेति, कर्मधा० । सप्तकुलाचलके मध्यका एक पर्वत । यह पहाड़ गोण्डवाना देशमें पड़ता और रैवतक पर्वतसे निकलता है । ऋक्ष देखो ।
ऋक्षग्रीव (सं० पु०) एक पिशाच ।
ऋक्षचक्र (सं० क्ली०) ऋक्षाणां चक्रम्, ६-तत् । राशिचक्र ।
ऋक्षजिह्व (सं० पु०) कुष्ठरोग विशेष, किसी किस्मका कोढ़ । इसमें वेदना बहुत बढ़ती है । इधर-उधर रक्त और मध्यमें पीत मिश्रित कृष्ण वर्ण रहता है । स्पर्श
</div>
{{Multicol-break}}
<div style="text-align: justify;">
करनेसे यह कठोर लगता है । आकृति ऋक्षकी जिह्वा-जैसी होती है ।
ऋक्षनाथ (सं० पु०) ऋक्षाणां नाथः, ६-तत् । १ नक्ष-त्रेश्वर चन्द्र, चांद । २ जाम्बवान् । यह कृष्णपत्नी जाम्बवतीके पिता थे ।
ऋक्षनेमि (सं० पु०) विष्णु ।
ऋक्षपति, ऋक्षनाथ देखो ।
ऋक्षर (सं० पु०) ऋष्-कसरन् । तॄषिमृशां कसरन् । उण् ४।७२ । ऋत्विक् ब्राह्मण ।
ऋक्षराज (सं० पु०) ऋक्षाणां राजा, ऋक्ष-राजन्-टच् । राजाहः सखिभ्यष्टच् । पा ५।४।९१ । १ चन्द्र, चांद । २ जाम्बवान् । (हरिवंश ३१।४८)
ऋक्षला (सं० स्त्री०) ऋच्-सलच् गुणाभावः । गुल्फाधः-स्थित नाड़ी ।
ऋक्षवन्त (सं० क्ली०) शम्बरासुरकी राजधानी ।
{{block center|<poem>
"ऋक्षवन्तं नगरे निहत्यासुरसत्तमम् ।" (हरिवंश १६ अ०)
</poem>}}
ऋक्षवान् (सं० पु०) ऋक्ष मतुप् मस्य वः । ऋक्षगिरि देखो ।
ऋक्षविभावन (सं० क्ली०) नक्षत्रोंकी गणना ।
ऋक्षविल (सं० पु०) दक्षिणी महेन्द्र पर्वतका एक बृहत् गह्वर । हनुमान्-आदि वानर सीताको ढूंढ़ते ढूंढ़ते यहीं आकर पथ भूले थे । (रामायण) आज कल सिंहलद्वीपमें आदमशृङ्ग पर्वतके निकट इसके रहनेका अनुमान लगाते हैं ।
{{SIC|ऋक्षहरौश्वर|ऋक्षहरीश्वर}} (सं० त्रि०) ऋक्षों और कपियोंके प्रभु ।
ऋक्षौक (सं० त्रि०) ऋक्ष इव, ऋक्ष इवार्थे । भल्लूकके समान हिंस्र जन्तु, जो जानवर रीछ-जैसा खूंखार हो ।
ऋक्षेश (सं० पु०) ऋक्षाणां ईशः, ६-तत् । चन्द्र, चांद ।
ऋक्षैष्टि (सं० स्त्री०) ऋक्षविशेषमाश्रित्य इष्टिः, मध्य-पदलोपो । नक्षत्रविशेषके उद्देश्यसे किया जानेवाला एक यज्ञ ।
ऋक्षोद (सं० पु०) पर्वत विशेष, एक पहाड़ ।
ऋक्संशित (सं० त्रि०) ऋक् द्वारा उत्तेजित किया हुआ ।
ऋक्संहिता (सं० स्त्री०) ऋचां संहिता, ६-तत् । ऋग्वेद ।
ऋक्सम (सं० क्ली०) ऋचा समम्, ३-तत् । सामविशेष ।
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४२६'''|'''ऋग्वेद'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
बोधाग्निमाठरौ तद्वद्याज्ञवल्क्यपराशरौ ।
प्रतिशाखास्तु शाखायास्तस्याश्च जगृहुर्मुने ॥ १८
इन्द्रप्रमतिरेकां तु संहितां जगृहे ततः
माण्डूकेयं महात्मानं मैत्रेयाध्यापयत् तदा ॥ १९
तस्य शिष्यप्रशिष्येभ्यः पुत्रशिष्यान् क्रमाद् ययौ ।
वेदमित्रस्तु साकल्यः संहितां तामधीतवान् ॥ २०
चकार संहिताः पञ्च शिष्येभ्यः प्रददौ च ताः।
तस्य शिष्यास्तु ये पञ्च तेषां नामानि मे शृणु ॥ २१
मुद्गलो गालवश्चैव वात्स्यः शालीय एव च ।
शिशिरः पञ्चमश्चासीन्मैत्रेय सुमहामुनिः ॥ २२
संहितात्रितयञ्चक्रे शाकपूर्णिरथैतरम् ।" (विष्णुपुराण ३।४ अ०)
</poem>}}
प्रथम पैलने ऋग्वेदके दो भागमें बांट इन्द्र-प्रमति और वास्कलि नामक शिष्यद्वयको दो संहिता कर दिया था । फिर वास्कलिने उसे चार भागमें बांट बोध आदि शिष्योंको सौंपा । बोध, अग्निमाठर, याज्ञ-वल्क्य और पराशर चारोंने उक्त शाखाको प्रतिशाखा पढ़ीं । हे मैत्रेय ! इन्द्रप्रमतिने अपनी पढ़ी संहिताका एकांश माण्डूकेयको पढ़ाया । उनके शिष्यप्रशिष्यकी परम्परासे क्रमशः यह शाखा फैल पुत्र और शिष्य-समूहमें चल पड़ीं । वेदमित्र और साकल्यने उक्त संहिता अध्ययन की थी । उन्होंने फिर इस शाखासे पांच संहिता बना पांच शिष्यको पढ़ाईं । इन पांचो शिष्यके नाम मुद्गल, गालव, वात्स्य, शालीय और शिशिर थे ।
इन्द्रप्रमतिके द्वितीय शिष्यने अपनी अधीत ऋक्को बांट तीन संहिता बनायीं । वास्कलिने भी अपर तीन संहिता की थीं । उन्होंने कालायनि, गार्ग्य और {{SIC|कथाजव|कथाजप}} नामक तीन शिष्यको तीनों संहिता पढ़ा दीं ।
ऋग्वेदमें १० मण्डल हैं । प्रथममें २४ अनुवाक, १९१ सूक्त ; द्वितीयमें ४ अनुवाक, ४३ सूक्त ; तृतीयमें ५ अनुवाक, ६२ सूक्त ; चतुर्थमें ५ अनुवाक, ५८ सूक्त ; पञ्चममें ६ अनुवाक, ८७ सूक्त ; षष्ठमें ६ अनुवाक, ७५ सूक्त ; सप्तमें ६ अनुवाक, १०४ सूक्त ; अष्टममें १० अनुवाक, १०३ सूक्त ; नवममें ७ अनुवाक, ११४ सूक्त और दशम मण्डलमें १२ अनुवाक, १९१ सूक्त विद्यमान हैं । इस प्रकार सूक्तसमष्टि १०२८ है । किन्तु चरण-व्यूहमें लिखा है—
</div>
{{Multicol-break}}
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
"तत्र ऋग्वेदाष्टभेदा भवन्ति चर्चा श्रावकचर्चकः {{SIC|श्रवणोपारः|श्रवणोपचारः}}
क्रमपारः क्रमजटाः क्रमरथः क्रमशकटः क्रमदण्डश्चेति चतुष्पारायणमेतेषां ।
शाखाः पञ्च भवन्ति, आश्वलायनी, साङ्ख्यायनी, शाकला, वाष्कला माण्डूका-
श्चेति तेषामध्ययनम् । अध्यायानां चतुःषष्टिर्मण्डलानि दशैव तु । वर्गाणां
परिसंख्यातं द्वे सहस्रे चतुःशते ॥ सूक्तसमेकं सूक्तानां निविशस्तं विकल्पितम् ।
दशसहस्रं {{SIC|पच्यन्ते|पठ्यन्ते}} संख्यातं वै पदक्रमात् ॥ एकशतसहस्रं वा द्विपञ्चाशत्
सहस्रार्द्धमेतानि । चतुर्थं {{SIC|शवासिद्धानामितरेषां|शतसिद्धानामितरेषां}} पञ्चाशीतिः । ऋचां दशसहस्राणि
ऋचां पञ्चशतानि च । ऋचामशीतिपादश्च पारायणं प्रकीर्त्तितम् । एकर्चं
एकवर्गश्च नवकश्च तथा स्मृतः । द्वौ वर्गौ द्व्यृचश्चौ ज्ञेयौ ऋक्त्रयञ्च शत
स्मृतम् । चतसृर्च्चां पञ्चसप्तत्यधिकञ्च शतं तथा । पञ्चस्वृचां तु द्विशतं
सहस्रं रुद्रसंयुतम् । {{SIC|पञ्चचत्वारिधिकं|पञ्चचत्वारिंशदधिकं}} तु षड़ृक्चान्तु शतत्रयम् । सप्तस्वृचां
{{SIC|शतन्त्रेयं|शतत्रयं}} {{SIC|विंशतिचाधिकाः|विंशत्यधिकाः}} स्मृताः । अष्ट ऋचां तु पञ्चाशत् पञ्चाधिका-
स्तथैव च । दशाधिकद्विसहस्राः पञ्चशाखासु निश्चिताः । वर्गसंख्या न
सूक्तस्य चत्वारश्चात्र कीर्त्तिताः ।"
</poem>}}
ऋग्वेदके आठ भेद वा स्थान हैं—चर्चा, श्रावक-चर्चक, {{SIC|श्रवणोपयार|श्रवणोपचार}}, क्रमपार, क्रमजटा, क्रमरथ, क्रम-शकट और क्रमदण्ड । इनके चार पारायण होते हैं । आश्वलायन, साङ्ख्यायन, शाकल, वाष्कल और माण्डूक भेदसे पांच शाखा हैं । अध्याय ६४, मण्डल १०, वर्ग २००६, सूक्त १०१७ वाशिष्ठके पदक्रम १५२५१४ और दूसरेके पदक्रम ८५ पड़ते हैं । ऋक्के १०५८० पादको पारायण कहते हैं । प्रथममें एक वर्ग, १ ऋक्, द्वितीयमें दो वर्ग, २ ऋक्, तृतीयमें १०० ऋक्, चतुर्थमें १७५ ऋक्, पञ्चममें १२४५ ऋक्, षष्ठमें ३०० ऋक्, सप्तममें १२० ऋक् और अष्टम अष्टकमें ५५ ऋक् हैं । पञ्चशाखामें २०१० ऋक् विद्यमान हैं । पूर्व कथित चार वर्ग सूक्तको नहीं ।
वाष्कल शाखाके अनुसार ऋक् संहिताके संख्यादि इस प्रकार निर्दिष्ट हैं—
{{block center|<poem>
"{{SIC|चतुष्ट्रृचं|चतुर्ऋचं}} समाख्यातं षट्सप्तत्युत्तरं शतम् ।
पञ्चर्चं द्वादशशतामष्टाविंशोत्तराणि च ॥
शतत्रयं षड़ृचञ्च सप्तपञ्चाशदुत्तरम् ।
सप्तर्चमेकोनविंशदुत्तरं शतमेककम् ॥
अष्टर्चाः पञ्चपञ्चाशदर्चां {{SIC|मुनिबिधौश्वराः|मुनिविधीश्वराः}}"
</poem>}}
शाकलकी १५३७५२ तथा वालखिल्यकी पदसंख्या १२०७ एवं वर्गसंख्या १८, फिर साङ्ख्यायन शाखाकी पदसंख्या इसी प्रकार है । साङ्ख्यायन शाखाकी
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४२६
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋक्साम—ऋग्वेद'''|'''४२५'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
ऋक्साम (सं० क्ली०) ऋक्च साम च तयोः समा-हारः, समाहारद्वन्द्व । ऋक् और सामका मिलन ।
ऋक्सामशृङ्ग (सं० पु०) विष्णु ।
ऋगयन (सं० क्ली०) ऋचामयनं यत्र, बहुव्री० । ऋक्-पारायण ग्रन्थ विशेष ।
ऋगयनादि (सं० पु०) पाणिनि कथित एक गण । इसके अन्तर्गत व्याख्यान, छन्दोगान, छन्दोभाषा, छन्दो-विचिति, न्याय, पुनरुक्त, निरुक्त, व्याकरण, निगम, वास्तु-विद्या, क्षत्रविद्या, अङ्गविद्या, विद्या, उत्पात, उत्पाद, उद्भाव, {{SIC|सम्बत्सर|संवत्सर}}, मुहूर्त्त, उपनिषद्, निमित्त, शिक्षा और भिक्षा है ।
ऋगावान (सं० क्ली०) ऋचां आवानं ग्रथनम्, ६-तत् । वेद पढ़ते समय अर्द्ध ऋक् प्रभृति पूर्व पदके साथ सम्मिलन ।
ऋगगाथा (सं० स्त्री०) ऋचामिव गाथा, उप० । लौकिक गीतिवेद ।
ऋग्भाक् (सं० त्रि०) ऋक्का भाग लेनेवाला ।
ऋग्मत् (सं० त्रि०) ऋक् अस्त्यस्य, ऋक्-मतुप् । १ स्तावक, तारीफ़ करनेवाला । २ पूज्य, परस्तिशके क़ाबिल ।
ऋग्मिन् (सं० त्रि०) ऋक् अस्यास्ति, ऋक्-मिनि । स्तोता, तारीफ़ करनेवाला ।
{{block center|<poem>
"{{SIC|निर्षिणमृग्मिणो|निर्णिजमृग्मिणो}} ययुः ।" (ऋक् ८।५२।४६)
'ऋग्मिणः स्तोतारः ।' (सायण)
</poem>}}
ऋग्यजुःसामवेदी (सं० त्रि०) ऋक्, यजुः और सामवेद जाननेवाला ।
ऋग्विधान (सं० क्ली०) ऋग्वेदोक्त मन्त्र द्वारा व्रतविशेषका विधान । इसमें यह वर्णन चलता, ऋग्वेदका कौन मन्त्र जपनेसे क्या फल मिलता है । फिर ऋग्विधान पढ़नेसे जानते, जगत्के आदिग्रन्थ और महाधर्मग्रन्थ ऋग्वेदवाले मन्त्रादि प्राचीन ऋषि किस प्रकार सम्मान एवं पुण्यफलप्रद मानते थे ।
अग्निपुराणमें इसतरह ऋग्विधान लिखा है—
जलके मध्य अथवा होमके समय प्राणायामपूर्वक गायत्री जपनेसे अभीष्टसिद्धि होती है । जो निरा-भोजी हो दशसहस्र गायत्री जप करता, उसका सकल<br><br>Vol. III. 107
</div>
{{Multicol-break}}
<div style="text-align: justify;">
पाप छूट पड़ता है । हविष्यान्न खा लक्ष गायत्री मन्त्र जपनेवाला मोक्ष लाभका अधिकारी है ।
ओङ्कार परब्रह्म है । प्रणवके जपनेसे सर्वपाप छूटता है । जो नाभिमात्र जलमें ठहर शतवार ओङ्कार जपता, उसको देखते ही पाप कांपता है ।
तीन मात्रा, तीन वेद, सप्त महाव्याहृति और सप्त-लोक उल्लेखपूर्वक होम करनेसे सकल जन्मका पाप छूटता है । जलके मध्य महाव्याहृति और परमा गायत्री जपनेको अघमर्षण कहते हैं । जो वह्निदैवत 'अग्निमीळे पुरोहितम्' (१।१।१) सूक्त यथाविहित एक वत्-सर जपता, उसे सकल इष्ट मिलता है । मेधाकामी '{{SIC|सदसस्पम्|सदसस्पतिम्}}', मृत्यु निवारणेच्छु '{{SIC|युनः|शुनः}}शेपमृषिम्', शत्रु एवं विघ्न दमनाभिलाषी 'हिरण्यस्तूपम्', आरोग्यकामी अथवा रोगी 'प्रस्कण्वस्योत्तमम्', आसनकी सिद्धिका इच्छुक मध्याह्नकालको 'उत्तमस्तृत्स', अर्द्ध ऋक् तथा 'उदयत्यायु रघाय्यं तेजः' पूर्ण ऋक्, सूर्यास्त होनेपर गृध्रसे परि-त्राणेच्छु 'नवयय', मोक्षकामी 'आस्यामित्कोः कः', वस्त्र-कामी 'त्वं सोम' और पुष्यकामी मध्यवेलामें 'आपन्नः शोशुचेत्' इत्यादि कामनानुयायी ऋक् यथाविहित जपनेसे सर्वप्रकार सिद्धिलाभ करता है । प्रसवके समय 'प्रमन्दिन्' सूक्त जपनेपर गर्भवेदना अनुभव न कर गर्भिणी सुखसे प्रसव कर सकती है । कर्षणकाल, वपनकाल एवं छेदनकालपर सूक्त द्वारा इन्द्रादि देवगणकी उपासना करनेसे सकल कर्म अमोघ पड़ता और कृषिके कार्यमें उत्कर्ष बढ़ता है । 'विजिगीषु र्वनस्पति' सूक्त जपनेसे मूढ़गर्भा स्त्रीका गर्भ अनायास निकल आता है । (अग्निपु० २६० अ०)
ऋग्वेद (सं० पु०) ऋगेव वेदः । प्रथम वेद । यह संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और सूत्रभेदसे चार प्रकारका है ।
ऋक्संहिताकी नाना शाखा हैं । महापुराणादिमें उल्लेख किया—कृष्णद्वैपायन वेदव्यासने वेद भाग-कर पैलको ऋग्वेद दिया था ।
{{block center|<poem>
"ऋग्वेदं प्रथमं {{SIC|विप्र पैल|विप्रं पैलं}} ऋग्वेदपारगम् ।"
"इन्द्रप्रमतये प्रादाद वाष्कलाय च संहिते ॥ १६
चतुर्द्धा स विभेदाथ {{SIC|वाष्कलिर द्विज|वाष्कलिर्द्विज}} संहिताम् ।
बोध्यादिभ्यो ददौ तास्तु शिष्येभ्यः स महामुनिः ॥ १७
</poem>}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२३
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|'''४८२'''|'''ओई—ओखल'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
जोरको चावा २ बकविशेष किसी क़िस्मका चोकना (हिं. क्रि.) १ वमन करना के निकालना।
बगला । ३ वकविशेषका अव्यक्त शब्द, किसी बगलेको
होती।
२ महिषवत् शब्द करना, भेसको तरह बोलना ।
पोकनो (सं० खो०) को देखो।
भोकपति (सं० पु०) सूर्य या चन्द्र, चाफताब या
माहताब।
चोई (हिं० खो०) उच्चविशेष, एक दरखु त ।
चोक (सं०] त्रो०) उचक निपातनात् साधुः
घर । २ आश्रय, ठिकाना। (पु० ) ३ पक्षी, चिड़िया । ओकरो (स ं० स्त्री० )
8 शूद्र, वृषल ।
ओक (सं० क्लो०) उच्यते समवैति अस्मिन्, उच-
असुन् । १ श्राश्रय, ठिकाना । २ गृह, घर । ३ स्थान,
मुकाम ।
श्रीक्काम -१ निब्रह्मदेवख पेगू प्रान्तके हन्तावाड़ी
ज़िलेकी एक नदी । यह पेगू-योमा पर्वत से निकल
मागोनके समीप हर्लेगमें जा गिरती है । चोक्कान
नदी बहुत छोटी है। किन्तु वर्षा के समय श्रीक्कान
ग्राम इसमें बड़ी-बड़ी नावें चल सकती है। सा
और दूसरी लकड़ीके इट्ठे इसमें बहाकर हलेंग पहुंच
जाते हैं । २ निम्न ब्रह्मके हन्तावाड़ी जिलेका एक
ग्राम । यह हलैंग नदोसे ५ मोल पश्चिम अवस्थित है ।
इसमें दो सराय पर दो वर्गाकार निर्मित दोष
मन्दिर हैं। सुनने में चाया, प्रायः २०० वर्ष हुये किसी
तैलङ्गने इसे बसाया था ।
चोककेतु- बम्बई] प्रान्तस्य मालखेड़वाले राष्ट्रकूट राजा-
वोंके छत्रका चिह्न । सिरूरके शिलालेखमें लिखते,
कि अमोघवर्ष के तीन राजच्छ रहे-ग्रह, पालिध्वज
चोर चोककेतु ।
कण (स ं० पु० ) केशकोट; जं ।
ओकणि (सं० पु० ) मत्कुण, खटमल ।
श्रीकताई खान् — चङ्गोज़ खान्के बड़े लड़के । १२२७
ई को इन्हें अपने पिताके राज्य तातार और उत्तर-
चीनका उत्तराधिकार मिला था। १२४२ ई० को
यह अधिक शराव पोर्नसे मर गये। चोकलाई छान्
बड़े सहृदय रहे । यह अपनी प्रजाको
चोर न्याय से मासन करते थे। इनको वीरता चोर
बुमत्ता प्रसिद्ध है । ओकताई खान् बड़े
है। राज्यका उत्तराधिकार इनके पुत्र याकूब मिला।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
राजगृह के अन्तर्गत एक
प्राचीन ग्राम । भविष्य प्रखण्ड में लिखा है-
कलियुग मध्य यहां शस्यजीवी कृषक वास
करेंगे। कलिकालमें चोकका नारोगण देवा चोर
हिजगयातिपरायण होगा। यहां के लोग पाप
कारण सर्पाघातसे विनष्ट होंगे। ( भ० ब्रह्मखण्ड ३२/५०-५२ )
धोकाई (हिं० स्त्री० ) १ वमन, क । २ वमनेच्छा,
के करनेकौ खाहिश ।
चो देखो।
घोकार (स ं० पु० ) 'भो', श्रो अक्षर ।
चीकारान्त (सं०] [वि०) अन्तमें चोकार रखनेवाला,
जिसके पछोर 'ओ' रहे ।
श्रोकिवस् ( सं ० वि० ) उच क्कसु । समवेत, एकत्र,
मिला था।
धोको,
घोकुल
चोकाई देखो।
(सं० पु० ) उच-उलच निपातनात् साधुः ।
अर्धगन्ध, श्रपक्क गोधूम । वैद्यक मतसे यह गुरु,
शुक्रवर्धक, मधुर, बलकारक, स्निग्ध, रुचिकारक,
मत्ततावर्धक और रक्त एवं वायुनाशक होता है ।
चाकोदनों (सं. स्त्री०) चीक: घाययस्थानमदन'
यस्याः, बहुव्रो० । मत्कुण, खटमल ।
श्रीकोदशानी (सं० स्त्री० ) प्राचीर, दीवार ।
श्रक्कणी ( स ं॰ स्त्री॰ ) श्रोच कण अच्- ङीप् । मत्कुण,
खटमल ।
श्रका (सं० त्रि०) १ गृहवासोके निमित्त उत्तम,
जो घरमें रहनेवालेके मुवाफिक हो । (क्लो०) २ प्रस-
व्रता, खु.शौ । २ सुविधाजनक स्थान, पाराम देने
वाली जगह । ४ विधामागार, मकान् ।
निरपेक्ष भाव
चोखट (हिं० स्त्रो) श्रीषच, दवा ।
दानो थे ।
खानुको
पोखरी,
श्रीखली देखो ।
।
पोखरा (हिं.पु.) १ ऊपर पड़ती मोन् २ उदू-
खल, चोखली ।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१५
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सौरभ तिवारी 05
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="4" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh|४७४|ऐज़न—ऐतावाड खुर्द|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ऐज़न (अ॰ अव्य॰) तथा, वैसा ही। गणना आदिमें किसी विषयको बार–बार न लिख एकही बार लिखते और उसके नीचे ऐज़न रखते हैं। इससे उक्त विषय बार बार लिखा समझा जाता है।}}
{{outdent|ऐड़ (सं॰ पु॰) एड़ा अस्तयत्र, एड़ा–अण्। १ एड़ा शब्दयुक्त अध्याय वा अनुवाक। २ इड़ाके पुत्र पुरुरवा। (त्रि॰) ३ बलकारक पदार्थयुक्त। ४ इड़ा शब्दयुक्त।}}
{{outdent|ऐड़क (सं॰ पु॰) एड़क स्वार्थे अण्। १ मेषाकार पशुविशेष, किसी क़िस्मका भेड़ा। (त्रि॰) २ मेषसम्बन्धीय, एड़क पशुसे उत्पन्न।}}
{{outdent|ऐडमिरल (अं॰ पु॰<nowiki>=</nowiki>Admiral) नौसेनाका अध्यक्ष, जहाज़ी फ़ौजका बड़ा अफसर।}}
{{outdent|ऐडविड (सं॰ पु॰) १ कुवेर। २ दशरथ राजाके एक पुत्र।}}
{{outdent|ऐडवोकेट (अं॰ पु॰<nowiki>=</nowiki>Advocate) न्यायालयमें परार्थवक्ता, मुख़तार, वकील।}}
{{outdent|ऐडवोकेट–जनरल (अं॰ पु॰<nowiki>=</nowiki>Advocate–general) हाइकोर्टका बड़ा सरकारी वकील।}}
{{outdent|ऐड़क (सं॰ त्की॰) एड़क एव, स्वार्थे अण्। अस्थि एवं तुच्छ द्रव्यकी भित्ति, हड्डी और कूड़ेकी दीवार।}}
{{outdent|ऐण (सं॰ त्रि॰) एणस्य इदम्, एण-अण्। १ मृगसम्बन्धीय, काले हिरनसे पैदा।}}
{{outdent|ऐणिक (सं॰ त्रि॰) एणं मृगं हन्ति, एण-ठक्। मृगहन्ता, काले हिरनका शिकार करनेवाला।}}
{{outdent|एणीपचन (सं॰ त्रि॰) एणीपचनदेशभवः, एणीपचनअण्। एणीपचन देशीय। {{smaller|एणीपचन देखो।}}}}
{{outdent|ऐणेय (सं॰ त्रि॰) एण्या इदम्, एणी–ठञ्। १ कृष्णसार मृगीसे उत्पन्न, काली हिरनीसे पैदा। (पु॰)२ कृष्णसारमृग, काला हिरन। (त्की॰) ३ रतिबन्धविशेष।}}
{{outdent|ऐणेयक (स॰ त्की॰) एलबालुक।}}
{{outdent|ऐण्डिनेय (सं॰ पु॰) वेदकी एक शाखा।}}
{{outdent|ऐतदात्म्य (स॰ त्की॰) यह पदार्थ वा प्रधानता रखनेका भाव।}}
{{outdent|ऐतरेय (वै॰ पु॰) ऋग्वेदकी एक शाखा। भाष्यकारोंके मतसे महिदास ऐतरेय नामक एक ऋषि
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
इस शाखाके प्रवर्तक हैं। छान्दोग्योपनिषद्में लिख दिया, कि महिदास ऐतरेयने पूर्णज्ञान लाभ किया था।}}
भाष्यकार शङ्कराचार्य के मतसे 'इतराया अपत्यं ऐतरेयः' अर्थात् इतराके अपत्यको ऐतरेय कहते हैं।
सायणाचार्य ने ऐतरेय–ब्राह्मणके भाष्यकी उपक्रमणिकामें महिदास ऐतरेयका परिचय इस प्रकार दिया है—
"किसी महर्षिके अनेक पत्नियां रहीं। उनमें एकका नाम इतरा था। उनके महिदास नामक एक पुत्र हुआ। 'अरण्यकाण्डमें' उन्हीं को 'महिदास ऐतरेय' कहा है। महर्षि अपर पत्निवोंको बहुत {{SIC|चाहते|चहते}}, किन्तु महिदाससे दूर रहते थे। किसी यज्ञसभामें उन्होंने महिदासकि उपेक्षा कर अपर पुत्र गोद पर बैठा लिये। इतराने अपने पुत्रका म्लानमुख देख कुलदेवता भूमिसे प्रार्थना की थी। उसी समय भूमिदेवता दिव्यमूर्ति धारण कर यज्ञसभामें आविर्भूत हुईं। उन्होंने महिदासको दिव्य सिंहासनपर बैठा वर दिया था—तुम सकल पुत्रोंकी अपेक्षा अधिक पण्डित होगे और ऐतरेय-ब्राह्मण प्रतिभाषण कर दोगे।" आजकल ऐतरेय–शाखाका ऐतरेय–ब्राह्मण, ऐतरेय-आरण्यक और ऐतरेय उपनिषत् पुस्तक मिलता है।
{{outdent|ऐतरेयक, {{smaller|ऐतरेयब्राह्मण देखो।}}}}
{{outdent|ऐतरेयब्राह्मण (सं॰ त्की॰) ऋग्वेदका एक ब्राह्मण। इसमें होताका कार्य निर्दिष्ट है। ऐतरेय ब्राह्मणके ४० अध्याय ८ पञ्चिकामें विभक्त हैं। {{smaller|वेद और ब्राह्मण देखो।}}}}
{{outdent|ऐतरेयी (सं॰ पु॰) ऐतरेय–ब्राह्मण पढ़नेवाला।}}
{{outdent|ऐतरेयोपनिषद् (सं॰ त्की॰) ऐतरेय आरण्यककी एक उपनिषत्।}}
{{outdent|ऐतश (सं॰ पु॰) भृगुवंशीय एक मुनि। इन्होंने ही 'ऐतश प्रलाप' नामक वैदिक ग्रन्थ बनाया था।}}
{{outdent|ऐतशायन (सं॰ पु॰) ऐतशके सन्तान।}}
{{outdent|ऐतावाड खुर्द—बम्बई प्रान्तके सतारा ज़िले का एक ग्राम। यह वालवा तहसीलके प्रधान नगर पेठसे दक्षिण ७ मील पड़ता है। मालखेड़के राष्ट्रकूट नृपतिने ब्राह्मणोंको ६७५ शककी रथाष्टमीपर जो भूमिदान किया, उसमें इसका नाम भी दिया है।}}<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
ctqry15152epjum9m0qzsut2zd558iq
पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१६
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2026-07-11T06:07:01Z
आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||एतिकायन—ऐनक|४७५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>इस विषयका शिलालेख कोल्हापुर राज्यके सामानगढ़में मिला है। उसमें ऐतावाड़–खुर्द उत्सर्ग की हुई भूमि को उत्तर सीमा बताया गया है।
{{outdent|ऐतिकायन (सं॰ पु॰) इतिकस्य ऋषेरपत्यम्, इतिक–फक्। इतिक ऋषिके सन्तान।}}
{{outdent|ऐतिशायन (सं॰ पु॰) इतिशस्य ऋषेरपत्यम्, इतिश–फक्। इतिश ऋषिके सन्तान। यह एक संस्कृतके प्राचीन विद्वान थे। मीमांसासूत्र में इनका नाम आया है।}}
{{outdent|ऐतिहासिक (सं॰ त्रि॰) इतिहासादागतः इतिहास–ठक्। १ इतिहास ग्रन्थसे समझ पड़नेवाला, जो तारीखसे मालूम हो। २ इतिहासवेत्ता, तारीखको जननेवाला इतिहासपाठक, तारीख़ पढ़नेवाला।}}
{{outdent|ऐतिह्य (सं॰ त्की॰) इतिह स्वार्थे ञा। {{smaller|अनन्तावसथोतिह–भेषजा ञा:। पा ५।४।२३।}} पारम्पर्य उपदेश, पुरानी नसीचत। जो बात बहुत दिनसे सुननेमें आती, वह ऐतिह्य कहाती है।}}
{{smaller|"ऐतिह्यं नाम आप्तोपदेशो वेदादिः।" (चरक)}}
पौराणिकोंके मत में ऐतिह्य एक प्रमाण है। वटके वृक्षमें यक्षिणी रहनेका परम्परागत उक्त वाक्य ही ऐतिह्य प्रमाण है।
{{outdent|ऐदंयुगीन (सं॰ त्रि॰) अस्मिन् युगे साधुः, इदंयुग–खञ्। इस युगके उपयोगी।}}
{{outdent|ऐध् (सं॰ स्त्री॰) अग्निशिखा, लपट।}}
{{outdent|ऐध (सं॰ पु॰) {{x-smaller|ऐध् देखो।}}}}
{{outdent|ऐन (अ॰ वि॰) १ उपयुक्त, दुरुस्त, ठीक। २ पूर्ण, पूरा। (हिं॰) {{smaller|अयन और एण देखो।}}}}
{{outdent|ऐन–उद्–दीन—बीजापुरके एक शेख़। इन्होंने 'मुलहक़ात' और 'किताब–उल्–अनवार' नामक दो ग्रन्थ लिखे हैं। उक्त दोनों ग्रन्थोंमें भारत के समग्र मुसलमान–साधुवोंका इतिहास है। सुलतान् अला–उद्–दीन हसन बाह्मनीके समय यह विद्यमान रहे।}}
{{outdent|ऐन–उल–मुल्क—१ शीराज़के एक अधिवासी। इनका उपाधि हकीम रहा। बादशाह अकबरके समय यह एक उच्च पदपर प्रतिष्ठित थे। इनकी कविता बहुत रसीली होती थी। उपनाम 'वफ़ा' रहा। १५९४ ई॰को हकीम साहब इस दुनियासे चलते बने।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
२ दिल्लीवाले बादशाह सुलतान् मुहम्मद शाह तुग़लक़ और सुलतान फीरोज़ शाहके एक दरबारी। इनका उपाधि ख्वा़जा रहा। इनके बनाये 'तरसील ऐन–उल्–मुल्को' और 'फतेहनामा' नामक दो पुस्तक विद्यमान है। फतेहनामेमें इन्होंने सुलतान अला–उद्–दीन् के विजयका वर्णन किया है।
३ वीजापुर–नवाब आदिल शाहके भाई इस्माइलके एक रिसालदार। १५९२ ई॰को बुरहान निज़ाम शाहको हरा आदिलशाहने दक्षिणकी ओर कर्नाटक और मलबार पर आक्रमण मारा था। किन्तु अपने भाई इस्माइलके बलवा करने पर उन्हें पीछे लौटना पड़ा। युद्ध होनेपर मीराजकी फौज इस्माइलसे मिल गई। वेलगांवको भेजी फौज बिना आज्ञाके वीजापुर लौट आयी थी। ऐन–उल्–मुल्क भी अपनी ३० हजार फौजके साथ उसमें मिले और राजधानी पर आक्रमण मारने को आगे बढ़े। किन्तु यह युद्धमें मारे गये। १५४२ ई॰को भी इन्होंने वीजापुर घेर लिया था, किन्तु विजयनगर नरेशके भाई वेक्ङटाद्रिने इन्हें युद्धमें परास्त किया। यह रातको रण छोड़ अहमदनगर भाग आये थे। वीजापुरमें पूर्व पादण–पुरफाटकसे १५०० गज दूर ऐन–उल्–मुल्ककी क़ब्र बनी है।
४ गुजरातके एक सूबेदार। इनका उपाधि मूलतानी रहा। उलघ खान्के जानेसे गुजरातमें मुसलमानी हुकूमत हिल गई थी। बलवा दबानेको कमाल्–उद्–दीनके भेजे सुधारक खिलजी लड़ाईमें काम आये। किन्तु १३१७ ई॰को ऐन–उल्–मुल्क मूलतानीने बड़ी फौजके साथ पहुंच शान्ति स्थापित की थी। १३०६ ई॰के समय यह मालवेके शासक रहे। उसी समय बम्बई प्रान्तस्थ कनाड़ी जिले़वाले देवगिरिके रामचन्द्र ने उपद्रव उठाया था। अला–उद्–दीन्ने ख्वाजा मलिक काफू़रको एक लाख फौजके साथ दक्षिणात्य दबाने भेजा। राहमें इन्होंने भी अपनी फौज उनकी सहायताके लिये साथ कर दी।
{{outdent|ऐनक (हिं॰ स्त्री॰) उपनेत्र, चश्मा।}}<noinclude><noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||'''ऐरंमद—ऐल'''|'''४७९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
ऐरंमद (सं० पु० ) देवमुनिके अपत्य । इन्होंने ऋग्- | ऐरावतचेत्र (सं० क्लो० ) कावेरोनदोतोरस्थ एक
वेदके मन्त्र बनाये थे ।
ऐरंमदीय (सं० क्लो०) ब्रह्मलोकका एक समुद्र ।
ऐरका (सं० वि०) एरका एय । एरका - जात । एरका देखो !
ऐराक, एराक देखो ।
ऐराको, एराकौ देखो ।
प्राचीन तीर्थस्थान | ऐरावतक्षेत्रके माहात्मामें लिखा
है— इन्द्रने हवासुरवधजनित पापसे मुक्ति पानको इस
स्थानमें श्रा तपस्या और लिङ्गमूर्तिको स्थापना को थो ।
शिवको कृपासे इन्द्रका ऐरावत फिर जो उठा और
इस स्थानका नाम ऐरावतक्षेत्र पड़ा ।
ऐरागैरा (हिं० वि०) १ अपरिचित, जो समझा- ऐरावतपदी ( स ० स्त्री० ) १ काकजङ्घा । २ महा
बूका न हो। २ तुच्छ, छोटा ।
ऐरापति (हिं०) रावत देखो।
ऐराव ( च० पु० ) शतरंज में किश्त बचाने के लिये
बादशाह और किसी दूसरे मोहरके वोचमें मोहरका
श्राना। इससे बादशाहपर किश्त नहीं रहती । किन्तु
ऐराबका मोहरा उठना नामुमकिन है। घोड़ेको
किल पड़ने से ऐराब नहीं चलता।
ऐरा (हिं० पु० ) इन्द्रवारुणी विशेष. किसी किस्म की
ककड़ी । यह तरबूज- जैसा रहता और पहाड़पर
कुमाज से सिकिमत उपजता है।
ऐरावण (सं० पु० ) इरया जलेन वनति शब्दायते,
इरावन पचाद्यच्चवारा बुरा वनमुदकं यमिन
तत्र भवः, पण ऐरावत इस्त २ जनमतानु
-
सार जम्बुद्दीपका सप्तम वर्ष
ऐरावत (सं०) इरा जसानि समय मतुप्
मध्य वः, रावान् समुद्रः तत्र भवः पण वारा
त्या विद्यतोऽयम् । १ इन्द्रहस्ती । ऐरावत शुक्लवर्ण
और चतुर्दन्तविशिष्ट है। समुद्रके मन्थनकालपर
यह उपजा था। यही पूर्व दिक्का गम है। इसका
अपर नाम अभ्रमातङ्ग, ऐरावण, अभूवल्लभ, खेत-
हस्ती, मलना, इन्द्रकुवर, हस्तिमन सदादान,
सुदामा, श्वेतकुच्चर, गजाग्रणी और नागमल है ।
ज्योतिष्मती लता, रतनजोत ।
ऐरावती (सं० स्त्री) इरावत्-यम्, इरावत्-प
ऐरावतक (सं० पु० ) १ तो हाथो को सूंड ऐल (सं० पु०) इलावा पुमान्, लाय्
हस्तिशण्डी, ।
अपत्य
२ नागरङ्ग वृच, नारंगीका पेड़।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
डोप १ विद्युत् विजली ।
ङोप । १ विद्युत्, बिजली । २ ऐरावतको स्त्री ।
३ वटपत्रीवृच, बड़ा पथरचटा । ४ उत्तरमाम के एक
नचत्रका नामान्तर । ५ पञ्चानदेशीय नदोविशेष
आजकल इसे रावो कहते हैं । इसका वेदोक्त नाम
परुष्णी है। ६ नामरङ्गवृच, नारंगोका पेड़ । ऐरा-
तोका पकाया हुआ रस अम्ल, उष्ण और सुगन्धित
होता है। इससे वात, कास और खासका रोग
कूट
जाता है। ( )
ऐरिकिन (सं० क्लो० ) एरण नगरका प्राचीन नाम ।
कनिंगहम साहब के सतसे एरबका प्राचीन नाम एर
कैन है । एरण देखी।
ऐरिष (सं०] को०) हरिये अपरभूमी भवम्, रिय
ऋण । सैन्धव लवण, पांशुलवण ।
ऐसे-मध्यप्रान्त के मंडला जिलेका एक सरकारो
जंगल। यह श्रचा॰ २२३८ से २२४० उ० तथा
देशा० ८०० ४३ ४५ से ८० ४६ ४५ पू० तक
बुनेर चोर हाल नदोके सङ्गमपर पति है।
ऐरोमें साखू ख ूब होती है ।
येरेव (स को०) इराक १ मय, शराब
२ एलवालुक, एक मनुदार चोन २ वादि
अनाज वगैरह ।
" इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि त' पुनः ।
आरुह्य्रावत ं ब्रह्मन् प्रययावमरावतीम् ॥” (विषापु० ११२१२५ ) ऐर्म्य (सं० क्लो० ) इमीय हितम्, इर्म ष्यञ् । १ सुश्रु-
२ नागरङ्ग, नारंगी 1. ३ लकुचवृच, बड़हर । 8 नाग- तोक्त अच्चनविशेष, किसी किस्म का काजल या सुरमा ।
विशेष (को०) इन्द्रधनु इरावती नदीके (वि०) २ चत पूरचके निमित्त लाभदायक, जख्म
तोरका देश |
को सुखाने काबिल ।
१ इलापुत्र। इनका अन्य नाम पुरुरवा है। यह
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|'''४८०'''|'''ऐलक—ऐषीक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
चन्द्रवंशीय राजा थे। (हिं० पु० ) २ जलप्लावन,
बाढ़ । ३ आधिक्य, बढ़ती । ४ कोलाहल, हल्ला।
ऐलक, एलक देखो।
ऐलब (सं० पु० ) कोलाहल, शोर, हल्ला ।
ऐशो (सं० स्त्रो० ) ईग्रस्य इयम्, अण् डीप । १ ईश्वर--
सम्बन्धिनी । २ दुर्गा ।
ऐशी - एक मुसलमान कवि १६०५ ई० को इन्होंने
'इतर' नामक एक मसनदो लिखो यो ।
ऐलबकार ( ० वि० ) १ कोलाहलकारी, शोर ऐशू ( हिं० पु० ) पशुरोगविशेष, जानवरोंको एक
मचानेवाला (पु० ) २ रुद्रका कुत्ता।
ऐसद (सं०वि०) साथ लानेवाला, जो खाना
लाता हो ।
ऐलवालुक (सं० क्लो० ) एलवालुक स्वार्थे ण् ।
एलवालुक, एक अतर । एलवालुक देखो।
बीमारी। इसमें पद्म मुख रुक जानेसे जुगाली
नहीं करते।
ऐश्वर (सं०बि०) १ प्रभु वा मारसे उत्पच।
२ शक्तिशाली, आलीशान् । २ ईश्वर-सम्बन्धीय
8 सबसे बड़ा ५ शिव-सम्बन्धीय।
४ ।
ऐसविल (सं० पु० ) इलविखाया अपत्य पुमान् ऐखरिक (सं० पु० ) भास्तिक, ईश्वरवादी ।
इलविल- अण । इलविला पुत्र, कुवेर ।
ऐला (सं० [स्त्री०) नदीविशेष (हिरोमा २२०)
ऐलाक (सं०वि०) ऐलाक्यस्य शत्रः पण, व,
लोपः । ऐलाक्य से विद्या- पढ़नेवाला ।
ऐलिक (स० पु० ) इलिन्यां भवः, ठक । तंसु नामक
राजा। यह इलिनोके पुत्त्र और दुष्मन्तादि के पितामह थे ।
ऐलव (स० पु० ) क
(सखी) ईश्वरस्य इयम् - डीप ।
ईश्वर सम्बन्धिनी ।
ऐश्वयं (सं० [को०) ईश्वरस्य भावः ईसर-चन् ।
१ ईश्वरका धर्म । इसका पर्याय - विभूति और भूति
है। ऐष्टविव होता है- अणिमा, २ घिमा
२ प्राप्ति, ४ प्राकाम्य, ५ महिमा ६ ईशित्व, ७ वशित्व
और ८ कामावसायिता । २ सम्पत्ति, दौलत । ३ प्रभुत्व,
मिलकियत । 8 शासनकर्ते व हुकमरानी ।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
ऐलेय ( सं .) १ एलवालुक, एक अतर
२ मनुका, नाड़ीका शाक (पु० ) इलाया अपत्य ऐखयंकर्मा (स० पु० ) रेखयें कर्म यत्र बहुमो
।
पुमान् । ३ पुरुरवा । ४ मङ्गल ।
ईश्वर- कर्मयुक्त, बड़े-बड़े काम करनेवाला
ऐवालु, एलवालुक देखो।
ऐश (सं० वि० ) ईशस्य इदम्, अण् । १ ईश-
सम्बन्धय । ( ० पु० ) २ सुख, आराम ।
ऐश- एक मुसलमान् कवि। यह बादशाह शाह
आलम के समय विद्यमान रहे। प्रकृत नाम मुहम्मद
असकरी था ।
ऐशमूल (सं० क्लो० ) लाङ्गलोमूल, एक जड़ी ।
ऐशान (सं० वि०) १ शिवसम्बन्धीय । ( पु० )
२ ईशान कोषका वायु यह कटु और घोतल
होता है । ( भावप्रकाश )
ऐप (सं० बि० ) ऐश्वर्यमस्तास्य रेखयं मतुप
मध्वः । ऐखर्य विशिष्ट बड़ी ताकत रखनेवाला ।
ऐषम (सं अव्य०) अस्मिन् वत्सरे इति निया-
तनात् साधुः । सद्यः परुत्पराय षम इत्यादि । पा ५।३।२२।
वर्तमान वत्सर में मसाल
ऐषमस्तन (सं०वि० ) ऐषमो भवः, ऐषमस्-तन
ऐषमोह्यःश्वसो ऽन्यतरस्याम् । पा ४ २ १०५ । ऐषमसम्बन्धोय,.
इस सालसे सरोकार रखनेवाला ।
ऐषमध्य (सं० वि०) एषमो भवः ऐषमस्-प्
।
वर्तमान वत्सर-सम्बन्धीय, इस सालसे सरोकार
रखनेवाला ।
ऐशानी (सं० स्त्री० ) ईशानस्य यम्, ईशान- -ण-
ङोप । १ ईशानकोण । २ शक्तिविशेष । ३ दुर्गा ।
ऐशिक (सं० ० ) शस्य भयम्, ईश ढक् । १ ईश्वर-
सम्बन्धीय।
२ मिवसम्बन्धोय २ राजसम्बन्धीय,
बादमा सरोकार रखनेवाला ।
ऐषिका
ऐषावीर (सं० ति०) दुर्बल, शक्तिहीन, कमजोर ।
(सं० [स्त्री०) १ पाठा । २विता ।
ऐषीक (सं० क्लो० ) इषोकमेव, खार्थे ण् । १ महा-
भारतीय एक पर्वत । २ अस्त्र विशेष । षौक देखी ।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||'''ऐषुकारि—ओआक'''|'''४८१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
ऐषुकारि (सं० पु० ) रघुकारस्य अपत्यम् कार
इन्। वाण निर्माताका पुत्र, तोर बनानेवाले का बेटा।
ऐषुकारिभक्त (सं० क्लो० ) ऐषुकारिणां विषयो देशः,
ऐषुकारि-भक्त र कार्यादिमी विमा
४।२।५४। १ ऐषुकारिविषय । २ ऐषुकारि देश, जिस
मुल्क में तोर बनानेवाले रहें।
कार्यादि (सं० पु० ) पावित्युक्त मयविशेष। इसमें
ऐषुकारि, सारस्यायन, चान्द्रायण, झाक्षायण, वाचा-
यप, चौड़ायन, जौलायन, खाड़ायन, दासमित्रि,
दासमित्रायण, शौद्रायण, दाचायण, शायण्डायन,
तार्च्छायण, शौभ्रायण, सौवीर, सौवोरायण, भयण्ड,
शौण्ड, शयाण्ड, वैश्वमानव, वैश्वधेनव, नड़, तुण्डदेव,
विश्वदेव और सापिङ शब्द पड़ता है।
ऐष्टक (सं० क्रो०) याचिक ईटोंका ढेर ।
ऐष्टिक (सं० पु० ) दृष्टि ठक् । १ इष्टिके व्याख्यानका
ग्रन्थ । २ यज्ञके हितका विषय । ३ अन्तर्वेदिक कर्म-
विशेष (बि०) ४ यश के साधन में समर्थ ५ यत्र-
सम्बन्धीय ।
ऐष्टिकपौर्तिक (सं० त्रि० ) इष्टापूर्त - सम्बन्धीय |
ऐसा (हिं० क्रि० वि० ) इस प्रकार से, इस तौरपर ।
ऐहलौकिक (स०] [वि०) हो भवः इहलोक
ठक् । १ वर्तमान जन्मसम्बन्धीय । २ मर्त्यलोक
सम्वन्धीय इस दुनिया से सरोकार रखनेवाला ।
ऐहिक (सं० वि०) भवम् -ठक् । १ इह
लोक-जात, इस दुनियासे पैदा । २ इहलोक-सम्बन्धीय,
इस दुनियासे सरोकार रखनेवाला ।
ऐहिकदर्शी (सं० वि० ) इहलोकके कार्य निरीक्षण-
करनेवाला, जो इस दुनियाके काम देखता हो ।'
ऐहोल - बम्बईप्रान्तके वीजापुर जिलेका एक ग्राम
यहां जो शिलालेख मिला, उसमें २य पुलकेशीका
परिचय पड़ा है।
ओ
ओ—स्वरवर्णका त्रयोदश अश्चर । इसके उच्चारणका
स्थान कण्ठ ं और प्रोष्ठ है। यह वर्ण दीर्घ एवं झुत
भेदसे दो प्रकारका होता है। कामधेनुसन्धमें कहा,
कि बोकार पक्षदेवमय विद्युताकार, चिगुणात्मक,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
ईश्वर, पचमाचमय, देवमाता चोर परमकुण्डली है।
लिखने में यह वाम दिवसे कुण्डली वन दचिप दि
मध्यस्थल में सिकुड़ेगा, उसके पीछे अधोदेशमें पुनर्वार
वामदिकको चलेगा। इसको सकल में ब्रह्मा,
विष्णु और महेश्वर अवस्थान करते हैं। इसकी मात्रा
ब्रह्मरूपियो महामति है। (वर्षोहारतन्त्र )
तन्त्रात्रो प्रकारका नाम-सत्य, पीयूष, पथि-
मास्य, श्रुति, शिरा, सद्योजात, वासुदेव, गायत्री, दो-
जङ्घक, आप्यायनी, ऊर्ध्वदन्त, लक्ष्मी, वाणी, मुखी, द्दिज,
उद्देश्यदर्शक, तीव्र, कैलास, वसुधाचर, प्रणवांध,
ब्रह्मसूत्र, अजेश, सर्वमङ्गला, त्रयोदशी, दीर्घनासा,
रतिनाथ, दिगम्बरा, वं लोकयविजया, प्रभा पर प्रीति-
वोजादिकर्षण है। माढकान्यासके अनुसार
दन्तको पंचियर न्यास किये जानेगे अभिधानमें
चोकारका एक नाम 'ऊर्ध्व दन्तपंक्ति' भी है।
२ धातुका एक अनुबन्ध। “भोर्निष्ठा त नः ।” ( कविकल्पदुम)
( अव्य० ) ३ सम्बोधन । ४ ब्राह्नान । ५ स्मरण ।
६ अनुकम्पा ( पु० ) ७ ब्रह्मा ।
ओं (सं० अव्य० ) १ ओङ्कार, प्रणव । ओम् देखो ।
२ तथास्तु, आमोन्, बहुत अच्छा ।
पॉइना (हिं० क्रि०) वारना, सदके या न्योछावर
करना ।
ओंकना, ओकना देखो।
आँगना (हिं० क्रि०) शकटके श्रचिमें तेल देना,
गांड़ीके घुरमें तेल लगाना। ओंगने से शकटका चक्र
बेखटके चलता है |
घोंगा (हिं० पु० ) अपामार्ग, लटजीरा ।
ओटना, चोटना देखो।
ओंठ (हिं०) श्रेष्ठ देखो।
घोड़ा (चिं०वि०) १ गभीर, गहरा (पुं) २. मले
गड्डा । ३ सेंध ।
(हिं.पु.) विशेष, एक रखो। इससे छाजन
पूरी करनेकी लकड़ियां बांधी जाती है।
श्रधा ( हिं० पु० ) हस्ती पकड़नेका गर्त, हाथो
फांसनेका गड़ो।
श्रोषाक (सं अव्य०) १ वमनके वेगका शब्द, के
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>Vol. III 131</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|'''४८४'''|'''ओखामण्डल'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
फिर चावोंसे मिल उन्होंने एकवार हेरोनोंको भोज
दिया। सब लोगोंके भोजनपर बैठ जानेसे राठोरोंको
मन्या के अनुसार चावड़ोंने धोके से पा उनमें कितनों
होको मार डाला था। फिर राठोरोंने चावढ़ोंको भी
नौचा देखाया। अपने भोषण कार्यके उपलक्ष में दोनों
भाइयोंने 'वावेत' उपाधि ग्रहण किया था। राठोरोंका
राज्य धीरे धीरे बढ़ा। वेरावलजीने कुछ सेना ले काठिया
बाढ़ भाक्रमण और सोमनाथपाटन अधिकार किया
था। उन्होंने अरामदमें अपनो राजधानी प्रतिष्ठित
की। राज्यका उत्तराधिकार पुत्र विक्रमसोको मिला
था। बच्चाकेराव जिवाजीने अपनी कन्या उन्हें व्या
टो। विक्रमसीके बाद जो राने १२० वर्षतक राज्य
करते रहे। १०३ राना सामगनजी घरामदेके
राजावोंमें बड़े मतिमाली निकले। उन्होंने अपना
राज्य खम्भालिया नगरतक बढ़ा लिया था । किन्तु
उनके पुत्र भोमजीने शब्द बनने पर मका जानेवाले
कितने ही जहाज लूटे। इससे अप्रसन्न हो अहमदा
बादके सुलतान महमूदने उन्हें दवाना चाहा। उसो
समय भोमलोन सेयद मुहम्मदका जहाज लूटा पोर
उन्हें दो दुधमुहे लड़कोंके साथ जहाज़में छोड़ा।
उनको स्त्री केंद कर घरामदे भेजी गयी थीं। इसपर
सुलतान को फोज बदला लेने पायो मुसलमानोंने
द्वारका लूटी थी। भोमली भाग गये। किन्तु उन्होंने
थोड़े ही दिनों बाद श्रा मुसलमानोंको मार भगाया
था। भोमली चौर हमोरखोके वंशज मानकोंमें
द्वारका अधिकार पर झगड़ा हुआ। मानकोंने
वाघेरोंके साहाय्यसे दारकाको अधिकार किया।
भोमजीने भी अपना पक्ष सबल न देख सन्धि कर को।
१५८२ ई०को अरामदे के वाघल राजा शिव रानाने
गुजरातके सुलतान मुजफ्फरको भरच दिया। कारण
अहमदाबादके स्वेदार छान्- माणसे काठियावाड़ में
हार वह श्रखामण्डल भाग आये थे । किन्तु खान्
धामको फौज उनके पीछे रहो वालोंसे यु
होनेपर शिवराना मारे गये।
सांगनजी काठियावाड़को भागे थे।
सामल मानकने अपने भाई मज्ञ
शिवराना के. पुत्र
इधर हारकाके
मानकसे कहा—
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
किसी न किसी प्रकार मुसलमानोंको यहांसे निकाल
बाहर करना चाहिये। मैं सांगनजोको ढूंढ़ने जाता
हूँ । तुम मुसलमानोंसे लड़ो और उन्हें शान्तिसे
बैठने मत दो। सात वर्ष बाद वह सांगनजीको ले
लौटे थे । फिर घोर युद्ध होने लगा । अन्तको मुसल-
मान हारे और धोखामण्डल छोड़ भागे सांगनजी
अरामदेमें सिंहासनारूढ़ हुये थे । सांगनजीके बाद
उनके पुत्र संग्रामजीने राज्यका उत्तराधिकार पाया
और वर्ष
राज्यका सुख उठाया। फिर
उनको वहनका विवाह नवानगरके
रजो
कुछ
राजा बने थे।
जामसे हुआ । १६६४ ई०को अखेरजीके मरने पर
भोजराजजीने उत्तराधिकार पाया था। उनके एक
लड़को पर सात लड़के थे लड़को का विवाह
कच्छके रावसे हो गया । ज्येष्ठपुत्र वाजेराजजी अपने
भाइयोंसे लड़ा भिड़ा करते थे । इससे उन्हें पोसितरा
नगर अलग दे दिया गया ।
१७१५ और १७१८
०को बरामदे वाल राजा द्वारकावाले वाघेरोंके
साथ काठियावाड़ में कितनी हो वार घुसे । किन्तु :
नवानगर, गोंडल और पोरबंदरको फोन उनपर चढ़ो
थी। इससे उन्हें बड़ी हानि उठाना पड़ी। एक
राजा द्वारका और वसाई में राज्य करने लगे । १८०४
ई०की ने एक बम्बईका जहाज लट लिया।
मलाह और मुसाफिर पानोमें फेंके गये। अंगरेज
सरकारने जो लड़ाईका जहाज़ शास्ति देने को भेजा,
वह खाली हाथ लौटा था। चतिपूरण मांगा जानेपर
वाघेर अस्वीकार कर गये। किन्तु १८०७ ई० को
करनल वाकर उनसे परिपूरण लेने फोजके साथ-
द्वारका पहुचे थे। बाघेल और वाघेर राजा एक
लाख दश हजार रुपया देनेको सम्मत हुये । किन्तु :
१८१० ई०को उन्होंने फिर लूट मार मचायो यो ।
बड़ोदेके रोडट कप्तान कारनकने द्वारका कुछ
सवार भेज झगड़ा मिटाया। किन्तु डाका पड़ता हो
रहा । १८१० ई०को १८यों नवम्बरको अंगरेज
सरकारने हारका चोर वैयत तीर्थस्थान समझ
गायकवाड़ के अधीन किये थे गायकवाड़ने इसके
बदले भोखामण्डलके राजावका जुर्माना और
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||'''ओखामण्डल—ओघरथ'''|'''५२५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अंगरेजो फोजके चढ़नेका खर्च डाल दिया। १८१८
ई० को पनमल मानक के पधोन कुछ राजा बिगड़े
थे किन्तु स्थानीय सेना ने उन्हें शीघ्र ही दबा
दिया। १८१८ ई०को वाधेरोंने विद्रोह उठा मिटर
हेलोको पोरबन्दर भगाया था।
१८२० ईबो
बम्बई सरकारने करनल ष्टानडोपको लड़ने भेजा ।
उन्होंने अकस्मात् दारका अधिकार कर राजावको
नौचा देखाया था । इस युद्ध में कपतान मोरियट मारे
गये। दारका-नरेश मूलमानक और उनके छोटे
भाई वरसी मानक भी धराशायी हुये। राणा संग्राम-
जो पकड़ कर सूरत भेजे गये। किन्तु कच्छ के रायने
जमानत दे उन्हें छोड़ा लिया था। फिर शान्ति
स्थापित हुई । १८५७ ई०को वाघेरोंने काठियावाड़
पर आक्रमण मारा था। लेफटिनण्ट बरटनने द्वारका
जा इस उपद्रवका कारण पूछा। वह वाघेरोंसे अच्छा
चाल-चलन रखनेको जमानत से बड़ोदे नोट पाये।
दूसरे वर्ष बसाईके वाघेर राजावीने खुले मैदान
बलवा कर वेयत होप और उनके साथी सिबन्दियोंने
दुर्गको अधिकार किया था मांडवोचे कपतान
मेले कुछ सेनाले यसमें जा उतरे घोर दुर्गपर
झपट पड़े, किन्तु दुर्ग सह रहने कुछ कर न
सके। रातको वाघेर स्वयं दुर्ग छोड़ वसाई भाग
गये। फिर बड़ोदेके मन्त्रियोंने सरकार अंगरेज से
अलग रहनेको कह वसाई आक्रमण किया था ।
वसाईको किलेबन्दी मज़बूत रहने से कई वार युद्ध
षा । अन्तको बड़ोदेके गायकवाड़ने वाघेरोंसे सन्धि-
कर झगड़ा मिटाया। दूसरे वर्ष फिर उपद्रव उठा था
गायकवाड़ने लड़ने-भिड़नेका सब काम अंगरेजोंको
खौंप दिया। वाघेरोंने श्राक्रमण मार द्वारका और
यत होप अधिकार किया था। जोधा मानक ओखा-
मण्डलके राजा बने । फिर करनल डोनोवन कुछ
सेनाले यस पहुंचे थे युद्ध में न हारते भी वाघेर
कि.ला छोड़ द्वारका भाग गये। कपतान डोनोवनने
शीघ्र ही द्वारकाको जा आक्रमण किया और वाघेरोंको
जंगल में देर दिया। पन्तको उन्होंने श्रोद्यामण्डल
छोड़ अभयपुर-पहाड़ में खाई खोद डेरा डाला था ।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
१८५८ ई० के दिसम्बर मास करनल होनरने कितने
हो फोजके साथ चक्रमय मार उन्हें वहां भी
निकाल बाहर किया। कुछ वाधेर राजाने गिर
पहाड़ की राह ली थी । बाकी अपने हथियार रख
ओखामण्डल लौटनेको सम्मत हुये ।
उधर जोधा
मानक के मर जानेसे गिर पहाड़ के वाघेर भी पकड़े
गये । १८६२ ई०को कैद किये वाघेर निकल भगे
और पोखामण्डल पहुंच उपद्रव उठाने लगे। काठिया
बाद में कई वर्ष लुटमार होते रहो। १८५० १०को
मेजर रेनोलडस्ने उन्हें परास्त किया था। युद्दमें
मेजर रमोलse पाहत चोर पोलिटिकल एक्ट के
सहकारी कपतान हेबर्ट एवं लाटूश हत हुये। इसपर
वाघेर शान्त पड़े और फिर कभी जोरसे न लड़े ।
ओोग (हिं० पु० ) कर, महसूल, लगान ।
योग (सं०वि०) अवगारी पव-गय कर्मणि क
श्रीगण श्रवगस्यते
सम्प्रसारणञ्च । अवगण्य, नफरत किया हुआ ।
घोगर- एकप्रकार सवासी यह अपनेको पचड़
।
उघड़
योगी भी कहते हैं। हाथमें रस्सोसे लिपटी हुई छड़ी
रहती है। श्रीगर यज्ञोपवीत नहीं पहनते मरनेपर
देह जलाना मना है। शवका देह समाधिस्थ किया
जाता है। सिन्धुप्रदेश में दो-एक भोगर योगो देख
पड़ते हैं ।
घोगरना (पिं० श०) भवगरण होना, चुना,
पसोजना, पनियाना ।
ओगल ( हिं० पु० ) १ ऊषर, पड़ती जमीन् ।
२ कूपविशेष, एक कुवां ।
श्रीगोयस (सं०वि०) उग्र, अत्यन्त तेजखी ।
श्रोध (सं० पु० ) उच-धब् पृषोदरादित्वात् साधुः ।
१ समूह ढेर २ नदीवेग, पानोका बहाव, बाढ़
२ परम्परा, पुरानो चा ४ उपदेश, नसीहत |
५ हुतनृत्य, फुर्तीला नाच नदी, दरवा
प्रोधदेव (सं० पु० ) प्राचीन शिलालिपि-वर्धित
उच्छकल्पके एक महाराज। इनकी पत्नी कुमारदेवी थीं।
(Inscriptionum Indicarum, Vol III. p. 119.)
घोघरथ (सं.) एक राजा यह घोषवान्
नृपतिके पुत्र धोर पोचवतोके भ्राता थे।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>Vol. III 132</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२९
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|'''५२८'''|'''ओद्वारमान्धाता—ओङ्कारेश्वर'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
स्थानपर गगनस्पर्शी मन्दिरको चूड़ा टूट गई है ।। वृहदाकार महावराहमूर्ति है । उसो मन्दिर में १३४६
ई० को एक शिवलिङ्ग प्रतिष्ठित हुआ था । उससे
थोड़ी दूर रावण नाला है। इस नालेके मध्य साढ़े
अट्ठारह फोट उच्च काले पत्थरको एक मूर्ति है। इस
मूर्ति के दम हाथ और एक सुरह है। कोई-कोई इसे
रावणको मूर्ति बताया करते हैं ।
कहीं अत मन्दिरभवन विध्वस्त हो जानेसे कुछ र
मालको वासभूमि बना है। कहीं भन्न देवदेवको
मूर्ति भूमिमें गड़ी पड़ी है। उक्त दृश्य धर्मनिष्ठ हिन्दु
वोंके प्राण व्यथित कर डालता है। पर्वतके ऊपर
सिद्धेश्वर महादेवके सुरम्य मन्दिरका भङ्गावशेष
देखने में आता है। इस मन्दिरको चारो ओर चार
द्वार हैं। प्रत्येक द्वारके सम्मुख १४ फोट उच्च एवं
१४ स्तम्भविशिष्ट द्वारप्रकोष्ट खड़ा है । मन्दिरको
भित्तिके प्रस्तर में पंक्तिपर हाथी षक्ति है। पान
कल केवल दो हाथो प्रकृत आकार में देख पड़ते,
अपर विकत ही गये हैं। इस मन्दिरसे थोड़ी दूर
मौरी- सोमनाथका मन्दिर है। इसी मन्दिरको अवस्था
अति शोचनीय है किन्तु मन्दिर में दर्शन करने
कितने ही लोग पाते हैं। श्वाखण्ड में लिखा है-
“सोमनाथ' ततो विद्धि कल्पना तौरमाश्रितम् ।
सोमेनाराधितं तीर्थ' भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥" (एष० )
सोमनाथ नर्मदा नदीवे तोर विद्यमान है।चन्द्र
इस तीर्थ की आराधना को थी । यह तोथ भोग और
मोचफलदायक है।
स्थानीय पूजक कहते पहले सोमनाथ तव थे।
मुसलमानोंके ध्वस करने आने पर यह मूर्ति प्रति-
विम्बित हुई। उसी प्रतिविम्ब में शूकरका बच्चा देख
पढ़ा था। फिर वही विधर्मी मुसलमान क्रोधसे
अधीर ही और सोमनाथको चग्निमें फेंक चल दिये।
उसो समय सोमनाथ कृष्णवर्य बन गये हैं।
सोमनाथ मन्दिर सम्म हरे पत्थरको एक
उत् मन्दोमूर्ति है। सुखसमानोंने उसका [मत्या
तोड़ डाला है ।
मान्धाता होप में प्रायः समस्त हो शिवमन्दिर हैं ।
किन्तु इससे थोड़ी दूर उत्तर नर्मदा किनारे शिव-
मन्दिर व्यतीत अनेक विष्णु और जेन देवदेवोके मन्दिर
बने हैं। नर्मदा द्विधारा होनेकी जगह मुखपर अनेक
बड़े-बड़े मन्दिर विद्यमान हैं। उनमें २४ चतुर्भुज
विष्णुमूर्ति है। इसके पतिरिक्त विष्णु के दशावतारको
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
किन्तु वह बात
ठोक नहीं। क्योंकि राज्यको मूर्ति रहने सम्भवतः
दश मुण्ड और बौस हाथ होते । यह वसनि
महाकालीको मूर्ति है । वचः स्थलपर वृश्चिक, वाम
पार्श्वपर इन्दुर और पाददेशपर भन्न शिव पड़े हैं।
नदीसे थोड़ी दूर दूसरे भी कई जैन मन्दिर विद्य
मान हैं। इन सफल मन्दिरोंमें जेन देवदेवीको
कितनी ही मूर्ति देख पड़ती हैं। मन्दिरोंपर जैन
धर्म चक्रादिको प्रतिकृति खुदी है।
पहले यह स्थान भील राजावोंके अधिकार में रहा।
मान्धाता के एक राजा भारतसिंह नामक चौहान
राजपूत को अपना आदिपुरुष बताते हैं । ११६५.
ईको उन्होंने नाथू भोसको हरा मान्धाता पधि-
कार किया था। उन्होंने नाथू भोलको कन्यासे
फिर विवाह कर लिया । आज भी श्रोङ्कार से थोड़ी
दूर पहाड़ के उत्तर कई प्राचोन मन्दिर नाथकेश
धके अधीन है। नाथू भोलके समय दुर्जयनाथ
नामक एक गोसाई पोवारको पूजा करते रहे। यहां
प्रवाद है उस समय कालभैरव और महाकालो दोनों
नरमांस खाते, उसो भयसे तीर्थ-यात्री यहां न
थे। यात्रियों के हितार्थ दुर्जयनाथने तपोबल से काली-
देवीको रिझा गुहाके मध्य स्थापित किया । किन्तु
कालस्वरूप कालभैरव में दस हुये न थे। दुर्जय-
नाथने उनके सन्तोषाय नरवलिका प्रबन्ध कर दिया।
फिर कालभैरव नरवलि लेने पाये रहे । अवशेष
१८२४ ई०को अंगरेज़ कर्मचारियोंके यत्नसे यह प्रथा
बन्द । दुर्जयनाथ के शिष्य परम्परासे योङ्कारको
हुई
पूजा करते चले जाते हैं प्रति वर्ष कार्तिक मासमें
श्रोङ्कारजीका महोत्सव होता है ।
धोद्वारा (सं० [स्त्री०) बुचमनिविशेष
मूर्ति भी देख पड़ती है। एक मन्दिरमें विष्णुको पोङ्कारेश्वर - बम्बई प्रान्तके पूना नगरका एक शिव-
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५६
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh||कणाद-कणिका|६५५}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
कणादने जो अङ्कुर लगाया, उसका सुफल भारतने न पाया। सुदूर युरोपखण्डमें डेलटन साहबने उसको पुनरुहार किया। आजकल युरोपमें परमाण वाद कौन नहीं मानता! <Small>परमाणु शब्दमें वित्त त विवरण देखो।</small>
बहुतसे लोग कहते-कणाद ईश्वरका अस्तित्व मानते न थे। कारण कणादसूत्र में किसी स्थानपर ईश्वरका नाम नहीं मिलता। जगत्के कारणको निर्धारण करना हो दर्शनशास्त्रका मुख्य उद्देश्य है। यदि कणाद ईखरको विश्वका कारण समझते, तो अवश्य ही इस विषयको स्पष्ट स्पष्ट उल्लेख करते।
फिर क्या कणाद नास्तिक रहे. अथवा ईश्वरके सम्बन्धपर कोई सन्देह रखते थे? नहीं, यह बात हो नहीं सकती। इन्होंने वेदको प्रामाण्य माना है-
<Small>"तवचनादाबायस्य प्रामाण्यम् ।" (वैशे० सू० १।२।३)</Small>
इन्होंने प्रात्मकर्म सम्पनको ही मोक्ष बताया और स्वर्ग एवं अपवर्गप्रद धर्मतत्त्वको प्रचार करनेके लिये ही अपना सूत्र बनाया है।* परमतत्त्ववित् माधवाचार्यने कणादके किसी अंशका प्राधान्य मान लिखा है-
{{Center|<small>"चित्वे व पाकजोत्पत्तौ विभागेव विभागजे ।
यस्य न खलितं बुद्धिस्त' वै वैशेषिक विदुः।" (सर्वदर्शनसंग्रह) </Small>}}
हित्वोत्पत्ति, पाक द्वारा रूपादिको उत्पत्ति और विभागज विभागको उत्पत्तिमें जिसको बुद्दि नहीं बिगड़ती, उसे विहन्मण्डली वैशेषिक समझती है। यह बात भी युक्तिसङ्गत नहीं, कि कणाद ऋषि निरी खरवादी रहे। शङ्करमिश्रने कबाद-सूत्रको व्याख्या करते स्पष्ट हो लिख दिया है-
<Small>"तदित्यनुक्रान्तमपि प्रसिद्धिसिद्धत वर परामशति ।"</small>
तत् शब्द का अर्थ 'ईश्वर' प्रसिद्ध है। अतएव पूर्व सूचना न रहते भी यहां यह ईश्वरवाचक निश्चित होता है। ईश्वर शब्दका उल्लेख न उठाते भी कणादने गौणभावसे ईखरको स्वीकार किया है। <Small>ईश्वर शब्द देखो।</small>
२ स्वर्णकार, सोनार।
{{Rule}}
<Small>* “यतोऽसादयनिःश्रेयससिद्धिः सधर्मः।" (वैशे ० सू० १।२)जिससे पभ्युदय और निःश्रेयस पर्थात् स्वर्ग एवं पपवर्ग मिलता। उसोका नाम धर्म पड़ता है।</small>
{{Multicol-break}}
कणादिगण (स'• पु०) पिप्य यादिगण, पीपल वगै-
| रह चीजें। पिप्पली, पिप्पलीमून, चश्य, चित्रक,
नागर, मरिच, एला, अजमोदा, इन्द्रपाठा, रेणुक,
जोरक, भार्गों, महानिम्बफल, हिङ, रोहिणो, मर्षप,
विड़ा, प्रतिविषा और मूर्वा सबके समवायको
कणादिगण कहते हैं। (चक्रपाणिदत्तातसया)
कादिवटो (स. स्त्रो०) नोपदका एक पौषध,
पोलपाको एक दवा। पिप्पली. वचा. देवदारु. पन-
वा, वेलकी छाल और वृहदारकका वीज बराबर
। बरावर कूटपीस ३ रत्तो कांजीके साथ खानेसे श्रीपद-
का उग्रवेग दूर होता है। (रसेन्द्रसारस'यह)
कणादौय्य (सं० पु.) खेतजोरक, सफेद जीरा।
कणाद्यलौह (सं.लो०) प्रतिसारका एक औषध,
दस्तको कोई दवा। पिप्पली, शुण्ठो, पाठा, प्राम-
लकी, बहेड़ा, हरौत को, मुस्त क, चित्रक, विड़ा, रक्त-
चन्दन, विल्व एवं होवेर समभाग और सबके समान
लौह डाल जलमें रगड़नेसे यह पौषध बनता है।
(रसरबाकर)
कणाद (स.वि.) अबके कणसे जीविका चलाने-
वाला, जो दाना बीन बौन गुजर करता हो।
कणावता ( स० स्त्री० ) अबके कणसे जीविका
निर्वाह करनेको स्थिति, जिस हालतमें दाने बोन
बोन गुजर करें।
कणामूल (स• क्लो०) पिप्पलीमूल, पिपरामूल।
कणारक-उडोसे का एक तीथे। इसका प्रक्चत नाम
कोणार्क वा कोणारक है। किन्तु कुछ लोग अपभ्रंश
बना कणारक उच्चारण करते हैं। कोणार्क देखो।
कणासुफल (सं० लो०) अझोल, देड़।
कणाहा (सं० स्त्री०) खेतजोरक, सफ़ेद जीरा।
कणिक (सं. पु०) कर्णव
१ कणा, पोपल। २ शुष्क गोधमचणे, सूखे गेहूंका
आटा। ३ शत्र, दुश्मन । ४ प्रारतिका एक नियम ।
५ धृतराष्ट्र के एक मन्त्री।
"कचिक मन्त्रियां श्रेष्ठ धृतराष्टोऽब्रवौइचः।" (भारत, सम्भव १४१५०)
अबका कप, चावलका दाना।
| कषिका (सं. स्त्रो०) कषाः सन्यस्याः, कण-उन् ।
कन प्रत इत्वम्।<noinclude></noinclude>
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कणाद-कणिका|६५५}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
कणादने जो अङ्कुर लगाया, उसका सुफल भारतने न पाया। सुदूर युरोपखण्डमें डेलटन साहबने उसको पुनरुहार किया। आजकल युरोपमें परमाण वाद कौन नहीं मानता! <Small>परमाणु शब्दमें वित्त त विवरण देखो।</small>
बहुतसे लोग कहते-कणाद ईश्वरका अस्तित्व मानते न थे। कारण कणादसूत्र में किसी स्थानपर ईश्वरका नाम नहीं मिलता। जगत्के कारणको निर्धारण करना हो दर्शनशास्त्रका मुख्य उद्देश्य है। यदि कणाद ईखरको विश्वका कारण समझते, तो अवश्य ही इस विषयको स्पष्ट स्पष्ट उल्लेख करते।
फिर क्या कणाद नास्तिक रहे. अथवा ईश्वरके सम्बन्धपर कोई सन्देह रखते थे? नहीं, यह बात हो नहीं सकती। इन्होंने वेदको प्रामाण्य माना है-
<Small>"तवचनादाबायस्य प्रामाण्यम् ।" (वैशे० सू० १।२।३)</Small>
इन्होंने प्रात्मकर्म सम्पनको ही मोक्ष बताया और स्वर्ग एवं अपवर्गप्रद धर्मतत्त्वको प्रचार करनेके लिये ही अपना सूत्र बनाया है।* परमतत्त्ववित् माधवाचार्यने कणादके किसी अंशका प्राधान्य मान लिखा है-
{{Center|<small>"चित्वे व पाकजोत्पत्तौ विभागेव विभागजे ।
यस्य न खलितं बुद्धिस्त' वै वैशेषिक विदुः।" (सर्वदर्शनसंग्रह) </Small>}}
हित्वोत्पत्ति, पाक द्वारा रूपादिको उत्पत्ति और विभागज विभागको उत्पत्तिमें जिसको बुद्दि नहीं बिगड़ती, उसे विहन्मण्डली वैशेषिक समझती है। यह बात भी युक्तिसङ्गत नहीं, कि कणाद ऋषि निरी खरवादी रहे। शङ्करमिश्रने कबाद-सूत्रको व्याख्या करते स्पष्ट हो लिख दिया है-
<Small>"तदित्यनुक्रान्तमपि प्रसिद्धिसिद्धत वर परामशति ।"</small>
तत् शब्द का अर्थ 'ईश्वर' प्रसिद्ध है। अतएव पूर्व सूचना न रहते भी यहां यह ईश्वरवाचक निश्चित होता है। ईश्वर शब्दका उल्लेख न उठाते भी कणादने गौणभावसे ईखरको स्वीकार किया है। <Small>ईश्वर शब्द देखो।</small>
२ स्वर्णकार, सोनार।
{{Rule}}
<Small>* “यतोऽसादयनिःश्रेयससिद्धिः सधर्मः।" (वैशे ० सू० १।२)जिससे पभ्युदय और निःश्रेयस पर्थात् स्वर्ग एवं पपवर्ग मिलता। उसोका नाम धर्म पड़ता है।</small>
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कणादिगण (सं० पु०) पिप्य यादिगण, पीपल वगै-रह चीजें। पिप्पली, पिप्पलीमून, चश्य, चित्रक, नागर, मरिच, एला, अजमोदा, इन्द्रपाठा, रेणुक, जोरक, भार्गों, महानिम्बफल, हिङ, रोहिणो, मर्षप,विड़ा, प्रतिविषा और मूर्वा सबके समवायको कणादिगण कहते हैं। (चक्रपाणिदत्तातसया)
कादिवटो (सं० स्त्रो०) नोपदका एक पौषध,पोलपाको एक दवा। पिप्पली, वचा, देवदारु, पन-वा, वेलकी छाल और वृहदारकका वीज बराबर बरावर कूटपीस ३ रत्तो कांजीके साथ खानेसे श्रीपद-का उग्रवेग दूर होता है। (रसेन्द्रसारस'यह)
कणादौय्य (सं० पु०) खेतजोरक, सफेद जीरा।
कणाद्यलौह (सं० लो०) प्रतिसारका एक औषध, दस्तको कोई दवा। पिप्पली, शुण्ठो, पाठा, प्राम-लकी, बहेड़ा, हरौत को, मुस्त क, चित्रक, विड़ा, रक्त-चन्दन, विल्व एवं होवेर समभाग और सबके समान लौह डाल जलमें रगड़नेसे यह पौषध बनता है।
<Small>{{right|(रसरबाकर)}}</small>
कणाद (सं० वि०) अबके कणसे जीविका चलाने-वाला, जो दाना बीन बौन गुजर करता हो।
कणावता ( सं० स्त्री० ) अबके कणसे जीविका निर्वाह करनेको स्थिति, जिस हालतमें दाने बोन बोन गुजर करें।
कणामूल (सं० क्लो०) पिप्पलीमूल, पिपरामूल। कणारक-उडोसे का एक तीथे। इसका प्रक्चत नाम कोणार्क वा कोणारक है। किन्तु कुछ लोग अपभ्रंश बना कणारक उच्चारण करते हैं। <Small>कोणार्क देखो।</small>
कणासुफल (सं० लो०) अझोल, देड़।
कणाहा (सं० स्त्री०) खेतजोरक, सफ़ेद जीरा।
कणिक (सं० पु०) कर्णव १ कणा, पोपल। २ शुष्क गोधमचणे, सूखे गेहूंका आटा। ३ शत्र, दुश्मन । ४ प्रारतिका एक नियम । ५ धृतराष्ट्र के एक मन्त्री।
<Small>"कचिक मन्त्रियां श्रेष्ठ धृतराष्टोऽब्रवौइचः।" (भारत, सम्भव १४१५०)</Small>
६ अबका कप, चावलका दाना।
कषिका (सं० स्त्रो०) कषाः सन्यस्याः, कण-उन् । कन प्रत इत्वम्।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१९१
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''१८४'''|'''
अच्छन्दस्-
-अच्छोदा'''}}</noinclude>
अराजक, बेहुकूमत ; जहां किसी बादशाहका हुक्म
न माना जाये ।
चदि-असुन्
छन्दस । वेदो यस्य ।
अच्छन्दस (सं० त्रि० ) चन्देरादेश्व कः । उण् ४।२१८ | नास्ति छन्दः १ अनुपनीत । २ वेदाधायनशून्य । ३ नास्ति छन्दः परि- मितमात्राक्षरादिवाक्यानि यत्र । पद्य नहीं, गद्यका ; नज्म नहीं, नस्त्रका । 8 अभिप्रायशून्य, बेमतलब ; ऊटपटांग | अच्छभल्ल, अच्छोभल्ल भल्लति हन्ति ।
रौछ ।
अच्छर – अक्षर देखो।
(सं० पु० ) अच्छं आभिमुख्येन अच्छ-भल्ल-अच् । भल्लूक, भाल;
अच्छरा (सं० अप्सरा ) अक्षरा देखो !
अच्छा (सं० स्त्री० ) श्रं विष्णुं व्यति । के च । पा ६|१|१३| विष्णुका आच्छादन निर्मला ।
अच्छा (हिं० वि० ) १ उत्तम, भला । २ बढ़िया, उम्दा । ३ रोगरहित, तनदुरुस्त ; (५०) ४ भला आदमी । ५ बड़ा बूढ़ा । ६ भली भांति, खू. ब ।
भलाई, उत्तमता । भलाई, अच्छाई ।
भला-चङ्गा । ( क्रि० - वि०)
अच्छाई (हिं० स्त्री० ) अच्छापन ( हिं० पु० ) अच्छावाक (सं० पु० ) अच्छ-वच घञ् । अच्छं | निर्मलं वक्तौति । सोमयागमें होताका सहकारी ऋत्विक् ।
अच्छावाकसामन् (स ं० क्लो० ) अच्छावाकेन गेयं साम । सोमयागमें होताके सहकारी ऋत्विक् द्वारा गेय सामवेदके वह मन्त्र जो होताका सहकारौ ऋत्विक् विधिपूर्वक गाता है। इसका दूसरा नाम उशीय है ।
अच्छावाकीय (सं० क्लो० ) अच्छावाकस्य ऋत्विग्- भेदस्य कर्म भावो वा । अच्छावाक नामक ऋत्विक्का कर्मादि ।
अच्छा वच्छा-अच्छा देखो।
अच्छिद्र (सं० त्रि०) छिद्र-क् छिद्रम् । स्फायि-चि- वञ्चि-शकि-चिपि-क्षुदि-सृपि--तृपि--इपि-- वन्द्य न्दि-श्विति-नृत्यंजिनौ-पदि-मदि- मुदि-खिदि-विदि- भिदि-मन्दि- चन्दि- दहि-दसि दम्भि-वसि - वाशि--शौङ - हसि
अङ्गहीनता रन्ध्रं वा यत्त्र, बहुव्री० । विना छेदका । २ दोषशून्य, बेऐब । ३ अङ्गहीनता- रहित, जिसका कोई अजो बिगड़ा न हो । ४ भ्रान्ति- रहित, भूल से बाहर । श्रायागादिक्रिया के बाद
इस तरह उच्चारण करना होता है—
'यच्छिद्रं पूजने मम तत्सर्वमच्छिद्रमस्तु' ।
अर्थात् पूजादि क्रियामें यदि कोई त्रुटि रह गई हो, तो उसका दोष दूर हो जाये ।. अच्छिद्रावधारण (सं० कौ० ) अच्छिद्र-अव-ट-णिच्- ल्युट् । यागादि क्रियासम्पन्नतया 'अच्छिद्रमस्तु' इत्यव- धारणवाक्यम् । १ यागादिका अच्छिद्रावधारण
वाक्य | २ कार्यको निष्पत्ति ।
अच्छिन्न (स ं० त्रि० ) न-छिद्-त कर्मणि, नञ्-तत् । रदाभ्यान्निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः । पा८२४२ । १ छिन्न नहीं, छेदनभिन्न ; न टूटा हुआ । २ समग्र, पूरा। अच्छिन्नपत्र (सं० पु० ) न छिन्नानि खण्डितानि पत्राणि यस्य, बहुव्री॰ । १ शाखोट वृक्ष, सिहोरा । (क्लो०) कर्मधा । २ छिन्नपत्र नहीं, समूचे पत्तोंका पेड़ । अच्कुप्ता (हिं० स्त्री० ) अत्रुप्ता, जैन-सम्प्रदायको देवविशेष ।
अच्छेद्य (स ं० त्रि०) न छेत्तुमर्हति छिद अर्ह अ कर्म्मणि यत् । जो छेदन किया न जाये | जिसे छेद न सकें ।
·
अच्छेदिक (सं० त्रि०) न-छेद-ठक् । कंदादिभ्यो नित्यम् । पा५|१|६४ | न छेदं नित्यमर्हति । छेदन करनेके योग्य नहीं । छेदनेके नाकाबिल । अच्छोत ( हिं० वि० ) १ पूर्ण, पूरा । २ अधिक, ज्यादा । ३ बहुल, बहुत ।
अच्छोद (सं० क्लो० ) अच्छ निर्मलं उदकं यस्य ।
उदकस्योदः संज्ञायाम् । पा ६।३।५७ । संज्ञायामुत्तरपदस्य उदकशब्दस्य- उदादेशो भवतौति वक्तव्यम् । ( कात्यायन । ) कैलास पर्वतका एक सरोवर । कादम्बरीमें इस सरोवरका विषय उल्लिखित है ।
अच्छोदा (सं० स्त्री० ) अच्छोदसरोवरसे निर्गता नदी - विशेषका नाम ।<noinclude>सिघि-शुभिभ्यो रक् । उण् २।१३ ।
नास्ति छिद्रम् स्खलनं
१ रन्ध्रशून्य,</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१९२
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अच्छोद-अछन'''|१८५}}</noinclude>
अच्छोद्य (सं० अव्य० ) अच्छ वद- क्यप् । <Small>अच्छ गत्यर्थ- ।</small>
<Small>बदेषु । पा १।४।६९ !</small> अच्छ वदतीति । सम्मुखमें कहकर, सामने बोलकर ।
अच्छोहिनी —<small> अक्षौहिणी देखो।</small>
{{Outdent|अच्युत (सं० पु० ) न च्युतः न च्यवते न यविष्यते वा । न-च्युक्त कालसामान्ये । नञ् - तत् । १ जिसका न कभी क्षय हुआ, न होता और न होगा ; सना- तन ब्रह्म, ईश्वर । २ कृष्ण । ३ विष्णु । ४ जैनियोंके देवताविशेष ५ द्वादश सर्गयुक्त काव्यविशेष । ६ प्रभुके कनिष्ठतम सन्तान । (त्रि०) ७ स्थिर, ठहरा हुआ । ८ अभ्रष्ट, लगा हुआ । ८ क्षरणशून्य, लाजवाल ; नाश न होनेवाला ।}}
{{Outdent|अच्युत - इस नामके अनेक संस्कृत ग्रन्थकार हो गए हैं । निम्नलिखित संस्कृत ग्रन्थ अच्युतनामधेय विभिन्न व्यक्तियोंके बनाए हैं, – १ कृष्णशतक । २ गुरुवर- । प्रार्थना-पञ्चरत्नस्तोत्र । ३ भागोरथोचम्पू । ४ रत्नमाला- नामक ज्योतिर्ग्रन्थ । ५ दायभागटीका । ६ वेदान्तामृत- चिद्रत्नच कटौका । ७ भास्वतौकरण्टीका ।}}
{{Outdent|अच्युतकुल (सं० क्लो० )वैष्णवोंका कुल या
गोत्र ।}}
अच्युत कृष्णानन्द — छान्दोग्योपनिषद्विवरण और एका- दशमाहात्मा के रचयिता ।
अच्युत कृष्णानन्द-तीर्थ – स्वयंप्रकाशानन्दतीर्थ सरस्वती- के शिष्य । इन्होंने कृष्णालङ्कार नामक शास्त्रसिद्धान्त- लेशस' ग्रहको टीका बनाई थी ।
{{Outdent| अच्च तगोत्र ( सं॰ क्लो० ) वैष्णवोंका गोत्र या कुल ।}}
अच्युतचक्रवर्ती - हरिदास तर्काचार्य के पुत्र, हारलताके टीकाकार ।
अच्युतपति- मधुसूदनाश्रमके शिष्य, जिन्होंने सीता- रामाष्टकस्तोत्र बनाया था ।
{{Outdent| अच्युत-षड्ज (सं० पु० ) विकृतस्वर - विशेष ।}}
श्रररधवव
{{Outdent|अच्युताङ्गज (सं० पु० ) अच्युतस्य अङ्गात् जायते, जन-ड । कृष्ण के पुत्र, कामदेव ।}}
{{Outdent|अच्चुतात्मज (सं० पु० ) अच्युतस्य आत्मनः जायते, जन-ड । कृष्णके पुत्र, कामदेव । यह कृष्णके औरस और रुक्मिणीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ।}}
{{Outdent|अच्युतानन्द (सं० क्लो० ) सनातन ब्रह्म । परमेश्वर ।}}अच्युतानुजा (सं० स्त्री० ) अच्युतस्य श्रीकृष्णस्य अनुजा । भगवती । श्रीकृष्ण के जन्म-दिन भगवतीने नन्दालय में जन्म लिया था, इसलिये यह अच्युतानुजा कहलाती हैं । अच्युतावास ( सं० पु० )
अच्युतेन
उष्यते अत्र
आ-वस-घञ्_ अधिकरणे ;
बहुव्रो० ।
अश्वत्थ वृक्ष,
पीपलका पेड़ ।
या परमानन्दाश्रमके
अच्युताश्रम - चिदानन्दाश्रम
शिष्य । इन्होंने रामनाममाहात्मा, रामार्चनचन्द्रिका, विश्वेश्वरोपद्धति, स ंन्यासधर्मसंग्रह प्रभृति संस्कृत ग्रन्थ बनाये थे ।
न-च्य - क्तिन्,
{{Outdent|अच्युति (सं० स्त्री० ) नञ-तत् । १ क्षरणाभाव, कायममुकामी । ( त्रि०) २ विच्युति - शून्य, लाजवाल ।
अछक ( हिं० वि०) न कका हुआ, बुभुक्षित ।
{{Outdent| अच्युत मध्यम (सं० पु० ) विकृतस्वर - विशेष । अच्युत रघुनाथ भूपाल - रामायणसारस' ग्रह - रचयिता । अच्युत वैद्य–रसस ंग्रह सिद्धान्तनामक वैद्यक-ग्रन्थके रचयिता । इनके पिताका धरणीगोणिग और पितामहका नाम महादेव था ।
{{Outdent|अक्कना ( हिं० क्रि०) भूखे रहना, डटकर न
खाना ।}}
{{Outdent| अछत (हिं० क्रि० वि० ) १ आगे, रूबरू । २ अलावा, सिवा; अतिरिक्त, भिन्न । ३ पीछे, बाद।}}
{{Outdent|अछताना पछताना (हिं० क्रि० ) पश्चात्ताप करना, अफ़सोस करना ।}}
{{Outdent|अछन (हिं० पु० ) १ अधिक समय लम्बा वक्त।}}<noinclude>अच्युताग्रज (सं० पु० ) अच्युतस्य कृष्णस्य अग्रजः । ६-तत् । १ बलराम । वसुदेवके औरस और पथ गर्भसे श्रीकृष्ण के जन्म काल में बलदेव पहले प्रसूत हुए थे, इससे इनका नाम अच्युताग्रज पड़ा। २ इन्द्र । कश्यपके औरस और अदिति के गर्भ से आगे इन्द्रने जन्मग्रहण किया था, पोछे भगवान् प्रसू हुए ; इससे इन्द्रको अच्युताग्रज और भगवान्को उपेन्द्र कहते हैं ।</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३५३
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३४६'''|'''अधः स्वस्तिक—अधम'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अधः स्वस्तिक (सं॰ क्ली॰) नीचेका स्वस्तिक।
अधकचरा (हिं॰ वि॰) १ अपूर्ण, अधूरा। २ अपटु, जो किसी काममें कुशल या दक्ष न हो। ३ जो पूर्ण रीतिसे कूटा या पीसा न गया हो, दरदरा।
अधकच्छा (हिं॰ पु॰) अर्द्धकच्छ, नदीके तटका स्थान, जो ढालू होकर नदीतलसे मिल जाये।
अधकछार (हिं॰ पु॰) अर्द्धकच्छ, पर्वताञ्चलकी उर्वरा भूमि, पहाड़की ढालू और ज़रखेज़ ज़मीन।
अधकपारी (हिं॰ स्त्री॰) अर्द्धशिरकी वह वेदना जो सूर्योदयसे मध्याह्नतक घटती और सन्धाको शान्त हो जाती है। इसे अधाशीसी और सूर्यावर्त भी कहते हैं।
अधकरी (हिं॰ स्त्री॰) अर्द्धकर, आधी क़िस्त, आधा महसूल। यह नियत समयपर दे-दी जाती है।
अधखिला (हिं॰ वि॰) अर्द्धमुकुलित, नीम-शिगुफ्ता। जो फूल पूरी तौरसे नहीं खिलता, किन्तु उसकी कुछ पखड़ियां छिटक पड़तीं, उसे अधखिला कहते हैं। (स्त्री॰) अधखिली।
अधखुला (हिं॰ वि॰) आधा बन्द और आधा खुला, जो पूरे तौरसे खुला न हो। (स्त्री॰) अधखुली।
अधगति, (हिं॰) <small>अधोगति देखो।</small>
अधगो (सं॰ पु॰) निम्नेन्द्रिय, नोचेकी इन्द्रिय।
अधगोरा (हिं॰ पु॰) युरेशिअन, जो विशुद्ध युरोपीय न हो, वह युरोपीय जिसकी माता एशिआई और पिता युरोपीय, या माता युरोपीय और पिता
एशिआई हो।
अधगोहुआं, अधगेहुआं (हिं॰ पु॰) वह गेहं जिसमें आधा यव मिला हो, गोजई।
अधघट (हिं॰ वि॰) अर्द्ध-घटित, आधा घटने और आधा न घटनेवाला, नीममानी, जिसका अर्थ पूर्ण रीतिसे प्रकट न हो।
अधजर (हिं॰ वि॰) आधा घर, अर्द्धभवन, नीम मकान। हिन्दीमें कहावत है,—
{{Block center|<poem><small>आधेंमें अधघर साझेमें सबघर।</small></poem>}}
अधचरा (हिं॰ वि॰) आधा चरा हुआ, जिसे आधा पशु खा गये हों।
अधजर (हि॰ वि॰) आधा जला हुआ, पूर्ण रोतिसे दग्ध नहीं।
अधड़ी (हिं॰ स्त्री॰) १ आधारविहीन, निराधार, वेबुनिआदि, जिसकी कोई जड़ न हो। २ आदि-अन्त-रहित, जिसका कोई शिर-पैर न हो।
अधन (सं॰ त्रि॰) नास्ति धनं यस्य, बहुव्री॰। धनहीन, दरिद्र, ग़रीब।
अधन्ना (हिं॰ पु॰) दो पैसेवाला पैसा, जो आध आनेके बराबर होता है, डबल पैसा।
अधन्य (सं॰ वि॰) १ जिसके पास धान्य विशेष रूपसे प्रस्तुत न हो, अनाजसे ख़ाली। २ समृद्धिहीन, जो खु़श-खु़रम न हो। ३ हतभाग्य, कमबख़्त।
अधप (सं॰ पु॰) अर्द्धतृप्त सिंह, नीम-आसूदा शेर, सिंह जो भूखा हो।
अधपई (हिं॰ स्त्री॰) तौलनेका एक बांट, जो दो छटांक होता है।
अधप्रिय, अधप्री (वै॰ वि॰) उस समय प्रसन्न, तब ख़ुश।
अधकर (हिं॰ पु॰) अन्तरिक्ष, पृथ्वी और आकाशके बीचका स्थान।
अधबर (हिं॰ पु॰) १ अर्द्धपथ, नीम रास्ता, आधी राह। २ मध्यभाग, बीच।
अधबांच (हिं॰ पु॰) चमारोंको चमड़ेका मोट बनानेके लिये फ़सलपर दी जानेवाली मज़दूरी।
अधबुध (हिं॰ पु॰) अर्द्ध-विद्वान्, नीमआलिम, पूरा ज्ञान न रखनेवाला व्यक्ति।
अधबैसू (हिं॰ वि॰) मध्यमावस्थासम्पन्न, नीमजवान्, आधी उम्रवाली, जिसकी जवानी ढल गई हो, अधेड़। (पु॰) अधबैसा।
अधम (सं॰ ति॰) अव-अम, वस्य धः। <small>अवद्यावमाध-मावरेफाः कुत्सिते। उण् ५।५४।</small> १ कुत्सित, खोटा। २ पापी, अपकृष्ट। ३ हीन, न्यून; बुरा ख़राब। (पु॰) ४ उपपति विशेष। इसका लक्षण रसमञ्जरीमें यों लिखा गया है,—जो पति भय, दया और लज्जासे शून्य हो कामक्रीड़ाके सम्बन्धमें कर्तव्या-कर्तव्य विवेकको न समझे, उसे अधम नायक कहते<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३४६'''|'''अधः स्वस्तिक—अधम'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अधः स्वस्तिक (सं॰ क्ली॰) नीचेका स्वस्तिक।
अधकचरा (हिं॰ वि॰) १ अपूर्ण, अधूरा। २ अपटु, जो किसी काममें कुशल या दक्ष न हो। ३ जो पूर्ण रीतिसे कूटा या पीसा न गया हो, दरदरा।
अधकच्छा (हिं॰ पु॰) अर्द्धकच्छ, नदीके तटका स्थान, जो ढालू होकर नदीतलसे मिल जाये।
अधकछार (हिं॰ पु॰) अर्द्धकच्छ, पर्वताञ्चलकी उर्वरा भूमि, पहाड़की ढालू और ज़रखेज़ ज़मीन।
अधकपारी (हिं॰ स्त्री॰) अर्द्धशिरकी वह वेदना जो सूर्योदयसे मध्याह्नतक घटती और सन्धाको शान्त हो जाती है। इसे अधाशीसी और सूर्यावर्त भी कहते हैं।
अधकरी (हिं॰ स्त्री॰) अर्द्धकर, आधी क़िस्त, आधा महसूल। यह नियत समयपर दे-दी जाती है।
अधखिला (हिं॰ वि॰) अर्द्धमुकुलित, नीम-शिगुफ्ता। जो फूल पूरी तौरसे नहीं खिलता, किन्तु उसकी कुछ पखड़ियां छिटक पड़तीं, उसे अधखिला कहते हैं। (स्त्री॰) अधखिली।
अधखुला (हिं॰ वि॰) आधा बन्द और आधा खुला, जो पूरे तौरसे खुला न हो। (स्त्री॰) अधखुली।
अधगति, (हिं॰) <small>अधोगति देखो।</small>
अधगो (सं॰ पु॰) निम्नेन्द्रिय, नोचेकी इन्द्रिय।
अधगोरा (हिं॰ पु॰) युरेशिअन, जो विशुद्ध युरोपीय न हो, वह युरोपीय जिसकी माता एशिआई और पिता युरोपीय, या माता युरोपीय और पिता
एशिआई हो।
अधगोहुआं, अधगेहुआं (हिं॰ पु॰) वह गेहं जिसमें आधा यव मिला हो, गोजई।
अधघट (हिं॰ वि॰) अर्द्ध-घटित, आधा घटने और आधा न घटनेवाला, नीममानी, जिसका अर्थ पूर्ण रीतिसे प्रकट न हो।
अधजर (हिं॰ वि॰) आधा घर, अर्द्धभवन, नीम मकान। हिन्दीमें कहावत है,—
{{Block center|<poem><small>आधेंमें अधघर साझेमें सबघर।</small></poem>}}
अधचरा (हिं॰ वि॰) आधा चरा हुआ, जिसे आधा पशु खा गये हों।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधजर (हि॰ वि॰) आधा जला हुआ, पूर्ण रोतिसे दग्ध नहीं।
अधड़ी (हिं॰ स्त्री॰) १ आधारविहीन, निराधार, वेबुनिआदि, जिसकी कोई जड़ न हो। २ आदि-अन्त-रहित, जिसका कोई शिर-पैर न हो।
अधन (सं॰ त्रि॰) नास्ति धनं यस्य, बहुव्री॰। धनहीन, दरिद्र, ग़रीब।
अधन्ना (हिं॰ पु॰) दो पैसेवाला पैसा, जो आध आनेके बराबर होता है, डबल पैसा।
अधन्य (सं॰ वि॰) १ जिसके पास धान्य विशेष रूपसे प्रस्तुत न हो, अनाजसे ख़ाली। २ समृद्धिहीन, जो खु़श-खु़रम न हो। ३ हतभाग्य, कमबख़्त।
अधप (सं॰ पु॰) अर्द्धतृप्त सिंह, नीम-आसूदा शेर, सिंह जो भूखा हो।
अधपई (हिं॰ स्त्री॰) तौलनेका एक बांट, जो दो छटांक होता है।
अधप्रिय, अधप्री (वै॰ वि॰) उस समय प्रसन्न, तब ख़ुश।
अधकर (हिं॰ पु॰) अन्तरिक्ष, पृथ्वी और आकाशके बीचका स्थान।
अधबर (हिं॰ पु॰) १ अर्द्धपथ, नीम रास्ता, आधी राह। २ मध्यभाग, बीच।
अधबांच (हिं॰ पु॰) चमारोंको चमड़ेका मोट बनानेके लिये फ़सलपर दी जानेवाली मज़दूरी।
अधबुध (हिं॰ पु॰) अर्द्ध-विद्वान्, नीमआलिम, पूरा ज्ञान न रखनेवाला व्यक्ति।
अधबैसू (हिं॰ वि॰) मध्यमावस्थासम्पन्न, नीमजवान्, आधी उम्रवाली, जिसकी जवानी ढल गई हो, अधेड़। (पु॰) अधबैसा।
अधम (सं॰ ति॰) अव-अम, वस्य धः। <small>अवद्यावमाध-मावरेफाः कुत्सिते। उण् ५।५४।</small> १ कुत्सित, खोटा। २ पापी, अपकृष्ट। ३ हीन, न्यून; बुरा ख़राब। (पु॰) ४ उपपति विशेष। इसका लक्षण रसमञ्जरीमें यों लिखा गया है,—जो पति भय, दया और लज्जासे शून्य हो कामक्रीड़ाके सम्बन्धमें कर्तव्या-कर्तव्य विवेकको न समझे, उसे अधम नायक कहते<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३४६'''|'''अधः स्वस्तिक—अधम'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अधः स्वस्तिक (सं॰ क्ली॰) नीचेका स्वस्तिक।
अधकचरा (हिं॰ वि॰) १ अपूर्ण, अधूरा। २ अपटु, जो किसी काममें कुशल या दक्ष न हो। ३ जो पूर्ण रीतिसे कूटा या पीसा न गया हो, दरदरा।
अधकच्छा (हिं॰ पु॰) अर्द्धकच्छ, नदीके तटका स्थान, जो ढालू होकर नदीतलसे मिल जाये।
अधकछार (हिं॰ पु॰) अर्द्धकच्छ, पर्वताञ्चलकी उर्वरा भूमि, पहाड़की ढालू और ज़रखेज़ ज़मीन।
अधकपारी (हिं॰ स्त्री॰) अर्द्धशिरकी वह वेदना जो सूर्योदयसे मध्याह्नतक घटती और सन्धाको शान्त हो जाती है। इसे अधाशीसी और सूर्यावर्त भी कहते हैं।
अधकरी (हिं॰ स्त्री॰) अर्द्धकर, आधी क़िस्त, आधा महसूल। यह नियत समयपर दे-दी जाती है।
अधखिला (हिं॰ वि॰) अर्द्धमुकुलित, नीम-शिगुफ्ता। जो फूल पूरी तौरसे नहीं खिलता, किन्तु उसकी कुछ पखड़ियां छिटक पड़तीं, उसे अधखिला कहते हैं। (स्त्री॰) अधखिली।
अधखुला (हिं॰ वि॰) आधा बन्द और आधा खुला, जो पूरे तौरसे खुला न हो। (स्त्री॰) अधखुली।
अधगति, (हिं॰) <small>अधोगति देखो।</small>
अधगो (सं॰ पु॰) निम्नेन्द्रिय, नोचेकी इन्द्रिय।
अधगोरा (हिं॰ पु॰) युरेशिअन, जो विशुद्ध युरोपीय न हो, वह युरोपीय जिसकी माता एशिआई और पिता युरोपीय, या माता युरोपीय और पिता
एशिआई हो।
अधगोहुआं, अधगेहुआं (हिं॰ पु॰) वह गेहं जिसमें आधा यव मिला हो, गोजई।
अधघट (हिं॰ वि॰) अर्द्ध-घटित, आधा घटने और आधा न घटनेवाला, नीममानी, जिसका अर्थ पूर्ण रीतिसे प्रकट न हो।
अधजर (हिं॰ वि॰) आधा घर, अर्द्धभवन, नीम मकान। हिन्दीमें कहावत है,—
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अधचरा (हिं॰ वि॰) आधा चरा हुआ, जिसे आधा पशु खा गये हों।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधजर (हि॰ वि॰) आधा जला हुआ, पूर्ण रोतिसे दग्ध नहीं।
अधड़ी (हिं॰ स्त्री॰) १ आधारविहीन, निराधार, वेबुनिआदि, जिसकी कोई जड़ न हो। २ आदि-अन्त-रहित, जिसका कोई शिर-पैर न हो।
अधन (सं॰ त्रि॰) नास्ति धनं यस्य, बहुव्री॰। धनहीन, दरिद्र, ग़रीब।
अधन्ना (हिं॰ पु॰) दो पैसेवाला पैसा, जो आध आनेके बराबर होता है, डबल पैसा।
अधन्य (सं॰ वि॰) १ जिसके पास धान्य विशेष रूपसे प्रस्तुत न हो, अनाजसे ख़ाली। २ समृद्धिहीन, जो खु़श-खु़रम न हो। ३ हतभाग्य, कमबख़्त।
अधप (सं॰ पु॰) अर्द्धतृप्त सिंह, नीम-आसूदा शेर, सिंह जो भूखा हो।
अधपई (हिं॰ स्त्री॰) तौलनेका एक बांट, जो दो छटांक होता है।
अधप्रिय, अधप्री (वै॰ वि॰) उस समय प्रसन्न, तब ख़ुश।
अधकर (हिं॰ पु॰) अन्तरिक्ष, पृथ्वी और आकाशके बीचका स्थान।
अधबर (हिं॰ पु॰) १ अर्द्धपथ, नीम रास्ता, आधी राह। २ मध्यभाग, बीच।
अधबांच (हिं॰ पु॰) चमारोंको चमड़ेका मोट बनानेके लिये फ़सलपर दी जानेवाली मज़दूरी।
अधबुध (हिं॰ पु॰) अर्द्ध-विद्वान्, नीमआलिम, पूरा ज्ञान न रखनेवाला व्यक्ति।
अधबैसू (हिं॰ वि॰) मध्यमावस्थासम्पन्न, नीमजवान्, आधी उम्रवाली, जिसकी जवानी ढल गई हो, अधेड़। (पु॰) अधबैसा।
अधम (सं॰ ति॰) अव-अम, वस्य धः। <small>अवद्यावमाध-मावरेफाः कुत्सिते। उण् ५।५४।</small> १ कुत्सित, खोटा। २ पापी, अपकृष्ट। ३ हीन, न्यून; बुरा ख़राब। (पु॰) ४ उपपति विशेष। इसका लक्षण रसमञ्जरीमें यों लिखा गया है,—जो पति भय, दया और लज्जासे शून्य हो कामक्रीड़ाके सम्बन्धमें कर्तव्या-कर्तव्य विवेकको न समझे, उसे अधम नायक कहते<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
वर्तनी सुधार
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधमई—अधर'''|'''३४७'''}}</noinclude>
हैं। ५ अम्लवेतस्, तुर्शह, चूक। यह वृक्ष छःसे बारह इञ्चतक ऊंचा होता और साल भर में एक बार फूलता है, जिसकी डालियोंमें विभिन्न रङ्गके फूल लगते हैं। इसके उत्पन्न होनेका स्थान पश्चिम-पञ्जाब, लवणपर्वत और सिन्धु नदके पारवाली पहाड़ियां हैं। भारतके दूसरे स्थानोंमें या तो इसकी खेती की जाती या यह बाग़ोंमें बचावकी भांति लगाया जाता है। भारतीय वैद्य इसके रसको शीतल, रेचक और कुछ-कुछ पेशाब लानेवाला समझते हैं। यह दांतका दर्द दूर करनेके काम आता और तिक्त होनेके कारण वमनको रोकनेवाला ख़याल किया जाता है। पाकस्थलीकी ज्वाला मिटाने और क्षुधा बढ़ानेपर इसका सर्वाङ्ग खिलाया करते हैं। किसी ज़हरीले कीड़ेके काटनेपर वेदना दूर करनेको इसकी पत्तीका पुलटिस बहुत लाभदायक है। बीजमें भी उपरोक्त सब गुण
होते हैं, जो संग्रहणीपर भूनकर प्रयोग किया जाता है। तरकारीके लिये भारतमें प्रायः सब जगह इसकी खेती होती है और लोग इसे कच्चा-पक्का खाते रहते हैं। यह कूपोंके समीप क्यारिओंमें लगाया जाता और साल भर बराबर मिल सकता है।
अधमई (हिं॰ स्त्री॰) अपकृष्टता, न्यूनता; बुराई, खोटाई।
अधमता (सं॰ स्त्री॰) <small>अधमई देखी।</small>
अधमभृत, अधमभृतक (सं॰ पु॰) नीचदास, अधम-भृत्य ; कमीना नौकर, दरबान।
अधमरति (सं॰ स्त्री॰) प्रयोजनकी प्रीति, मतलबकी दोस्ती; वह रति जो कार्यवश की जाये, जैसे—वेश्या धनके कारण प्रेम दिखाया करती है।
अधमरा (हिं॰ वि॰) १ अर्धमृत, नीम मुर्दा। २ मृतप्राय, मरा जैसा।
अधमर्ण (सं॰ त्रि॰) अधम-ऋणम् ; ऋणमवश्यं देयं तत् अधमं शोध्यं यस्य, बहुव्री॰। ऋणशोधक, ऋणी, क़र्जदार।
अधमर्णिक, <small>अधमर्ण देखो।</small> (स्त्री॰) ङीप् —अधमर्णिकी।
अधमशास्त्र (सं॰ पु॰) प्रदेश विशेष, एक मुल्कका नाम।
अधमा (सं॰ स्त्री॰) स्त्रियादिके अन्तर्गत नायिका विशेष। अधमा नायिका अकारण पतिपर कोप करती, इसीसे इसका दूसरा नाम चण्डी पड़ा है। यह हितकर प्रियतमके प्रति अहित किया करती है। इसके समस्त कार्य अपकृष्ट होते हैं। <small>(रसमञ्जरी)</small>
अधमाई (हिं॰) <small>अधमई देखो।</small>
अधमाङ्ग (सं॰ क्ली॰) अधमं निकृष्टं अङ्गम्, कर्मधा॰। सबसे नीचा अङ्ग; चरण, पैर।
अधमाचार (सं॰ त्रि॰) कुत्सित आचरणवाला, बदचलन; जिसका चालचलन ख़राब हो।
अधमा-दूती (सं॰ स्त्री॰) नीच दूती, वह कुटनी जो भली भांति अपने कर्तव्यको पालन न कर नायक-नायिकाको बुरे तौरसे संदेशा देती है।
अधमाधम (सं॰ त्रि॰) अपकृष्टसे अपकृष्ट, बुरेस बुरा।
अधमा-नायिका (सं॰ स्त्री॰) <small>अधमा देखो।</small>
अधमा
अधमं अर्द्धम्, कर्मधा० ।
नायिकाका अधोभाग ।
अधमा (सं० त्रि०) शरीर के अधोभाग से सम्बन्ध
रखनेवाला ।
अधमुत्रा, अधमरा देखो ।
-
अधमर्ण देखो।
अधमुख (हिं० वि० ) अधोमुख, शिर नौचेको झुकाये
हुए, औंधा, मुंहभरा ।
अधर (सं० पु० ) न त्रियते, धृङ्-अप् धारणे ;
नञ्-तत् । ऋदोरप् ।
ं पाशशश १ ओष्ठ, होंठ । २ नौचेका
ओष्ठ या होंठ । कवि प्रबाल और विम्बके साथ
अधरकी उपमा देते हैं। किसीके मतमें अधरसे
ऊपरका होंठ समझा जाता और कोई इसे नौचेके
होंठका द्योतक बताता | वस्तुतः अधर कहने से
नीचे-ऊपर दोनो स्थानका होंठ विदित होता है।
अमरको टीकामें महेश्वरने भी लिखा है, कि जो
अधर शब्दको निम्न श्रोष्ठका हो बोधक समझते हैं,
उनको बात युक्तिसङ्गत नहीं, -
केचिदुपरिवर्त्योष्ठः अधोवर्त्य श्वर इति मन्यते तदयुक्तम् ।
किन्तु कामशास्त्रमें अन्यरूप प्रयोग देख पड़ता
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधमई—अधर'''|'''३४७'''}}</noinclude>हैं। ५ अम्लवेतस्, तुर्शह, चूक। यह वृक्ष छःसे बारह इञ्चतक ऊंचा होता और साल भर में एक बार फूलता है, जिसकी डालियोंमें विभिन्न रङ्गके फूल लगते हैं। इसके उत्पन्न होनेका स्थान पश्चिम-पञ्जाब, लवणपर्वत और सिन्धु नदके पारवाली पहाड़ियां हैं। भारतके दूसरे स्थानोंमें या तो इसकी खेती की जाती या यह बाग़ोंमें बचावकी भांति लगाया जाता है। भारतीय वैद्य इसके रसको शीतल, रेचक और कुछ-कुछ पेशाब लानेवाला समझते हैं। यह दांतका दर्द दूर करनेके काम आता और तिक्त होनेके कारण वमनको रोकनेवाला ख़याल किया जाता है। पाकस्थलीकी ज्वाला मिटाने और क्षुधा बढ़ानेपर इसका सर्वाङ्ग खिलाया करते हैं। किसी ज़हरीले कीड़ेके काटनेपर वेदना दूर करनेको इसकी पत्तीका पुलटिस बहुत लाभदायक है। बीजमें भी उपरोक्त सब गुण
होते हैं, जो संग्रहणीपर भूनकर प्रयोग किया जाता है। तरकारीके लिये भारतमें प्रायः सब जगह इसकी खेती होती है और लोग इसे कच्चा-पक्का खाते रहते हैं। यह कूपोंके समीप क्यारिओंमें लगाया जाता और साल भर बराबर मिल सकता है।
अधमई (हिं॰ स्त्री॰) अपकृष्टता, न्यूनता; बुराई, खोटाई।
अधमता (सं॰ स्त्री॰) <small>अधमई देखी।</small>
अधमभृत, अधमभृतक (सं॰ पु॰) नीचदास, अधम-भृत्य ; कमीना नौकर, दरबान।
अधमरति (सं॰ स्त्री॰) प्रयोजनकी प्रीति, मतलबकी दोस्ती; वह रति जो कार्यवश की जाये, जैसे—वेश्या धनके कारण प्रेम दिखाया करती है।
अधमरा (हिं॰ वि॰) १ अर्धमृत, नीम मुर्दा। २ मृतप्राय, मरा जैसा।
अधमर्ण (सं॰ त्रि॰) अधम-ऋणम् ; ऋणमवश्यं देयं तत् अधमं शोध्यं यस्य, बहुव्री॰। ऋणशोधक, ऋणी, क़र्जदार।
अधमर्णिक, <small>अधमर्ण देखो।</small> (स्त्री॰) ङीप् —अधमर्णिकी।
अधमशास्त्र (सं॰ पु॰) प्रदेश विशेष, एक मुल्कका नाम।
अधमा (सं॰ स्त्री॰) स्त्रियादिके अन्तर्गत नायिका विशेष। अधमा नायिका अकारण पतिपर कोप करती, इसीसे इसका दूसरा नाम चण्डी पड़ा है। यह हितकर प्रियतमके प्रति अहित किया करती है। इसके समस्त कार्य अपकृष्ट होते हैं। <small>(रसमञ्जरी)</small>
अधमाई (हिं॰) <small>अधमई देखो।</small>
अधमाङ्ग (सं॰ क्ली॰) अधमं निकृष्टं अङ्गम्, कर्मधा॰। सबसे नीचा अङ्ग; चरण, पैर।
अधमाचार (सं॰ त्रि॰) कुत्सित आचरणवाला, बदचलन; जिसका चालचलन ख़राब हो।
अधमा-दूती (सं॰ स्त्री॰) नीच दूती, वह कुटनी जो भली भांति अपने कर्तव्यको पालन न कर नायक-नायिकाको बुरे तौरसे संदेशा देती है।
अधमाधम (सं॰ त्रि॰) अपकृष्टसे अपकृष्ट, बुरेस बुरा।
अधमा-नायिका (सं॰ स्त्री॰) <small>अधमा देखो।</small>
अधमार्द्ध (सं॰ क्ली॰) अधमं अर्द्धम्, कर्मधा॰। नायिकाका अधोभाग।
अधमार्द्ध (सं॰ त्रि॰) शरीरके अधोभाग से सम्बन्ध रखनेवाला।
अधमुआ, <small>अधमरा देखो।</small>
अधमुख (हिं॰ वि॰) अधोमुख, शिर नीचेको झुकाये हुए, औंधा, मुंहभरा।
अधर (सं॰ पु॰) न ध्रियते, धृङ्-अप् धारणे; नञ्-तत्। <small>ऋदोरप्। पा ३।३।९३।</small> १ ओष्ठ, होंठ। २ नीचेका ओष्ठ या होंठ। कवि प्रबाल और विम्बके साथ अधरकी उपमा देते हैं। किसीके मतमें अधरसे ऊपरका होंठ समझा जाता और कोई इसे नीचेके होंठका द्योतक बताता है। वस्तुतः अधर कहनेसे नीचे-ऊपर दोनो स्थानका होंठ विदित होता है। अमरकी टीकामें महेश्वरने भी लिखा है, कि जो अधर शब्दको निम्न ओष्ठका ही बोधक समझते हैं, उनकी बात युक्तिसङ्गत नहीं,—
<small>केचिदुपरिवर्त्यीष्ठः अधोवर्त्य श्वर इति मन्यते तदयुक्तम्।</small>
किन्तु कामशास्त्रमें अन्यरूप प्रयोग देख पड़ता है,—
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधमई—अधर'''|'''३४७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>हैं। ५ अम्लवेतस्, तुर्शह, चूक। यह वृक्ष छःसे बारह इञ्चतक ऊंचा होता और साल भर में एक बार फूलता है, जिसकी डालियोंमें विभिन्न रङ्गके फूल लगते हैं। इसके उत्पन्न होनेका स्थान पश्चिम-पञ्जाब, लवणपर्वत और सिन्धु नदके पारवाली पहाड़ियां हैं। भारतके दूसरे स्थानोंमें या तो इसकी खेती की जाती या यह बाग़ोंमें बचावकी भांति लगाया जाता है। भारतीय वैद्य इसके रसको शीतल, रेचक और कुछ-कुछ पेशाब लानेवाला समझते हैं। यह दांतका दर्द दूर करनेके काम आता और तिक्त होनेके कारण वमनको रोकनेवाला ख़याल किया जाता है। पाकस्थलीकी ज्वाला मिटाने और क्षुधा बढ़ानेपर इसका सर्वाङ्ग खिलाया करते हैं। किसी ज़हरीले कीड़ेके काटनेपर वेदना दूर करनेको इसकी पत्तीका पुलटिस बहुत लाभदायक है। बीजमें भी उपरोक्त सब गुण
होते हैं, जो संग्रहणीपर भूनकर प्रयोग किया जाता है। तरकारीके लिये भारतमें प्रायः सब जगह इसकी खेती होती है और लोग इसे कच्चा-पक्का खाते रहते हैं। यह कूपोंके समीप क्यारिओंमें लगाया जाता और साल भर बराबर मिल सकता है।
अधमई (हिं॰ स्त्री॰) अपकृष्टता, न्यूनता; बुराई, खोटाई।
अधमता (सं॰ स्त्री॰) <small>अधमई देखी।</small>
अधमभृत, अधमभृतक (सं॰ पु॰) नीचदास, अधम-भृत्य ; कमीना नौकर, दरबान।
अधमरति (सं॰ स्त्री॰) प्रयोजनकी प्रीति, मतलबकी दोस्ती; वह रति जो कार्यवश की जाये, जैसे—वेश्या धनके कारण प्रेम दिखाया करती है।
अधमरा (हिं॰ वि॰) १ अर्धमृत, नीम मुर्दा। २ मृतप्राय, मरा जैसा।
अधमर्ण (सं॰ त्रि॰) अधम-ऋणम् ; ऋणमवश्यं देयं तत् अधमं शोध्यं यस्य, बहुव्री॰। ऋणशोधक, ऋणी, क़र्जदार।
अधमर्णिक, <small>अधमर्ण देखो।</small> (स्त्री॰) ङीप् —अधमर्णिकी।
अधमशास्त्र (सं॰ पु॰) प्रदेश विशेष, एक मुल्कका नाम।
अधमा (सं॰ स्त्री॰) स्त्रियादिके अन्तर्गत नायिका विशेष। अधमा नायिका अकारण पतिपर कोप करती, इसीसे इसका दूसरा नाम चण्डी पड़ा है। यह हितकर प्रियतमके प्रति अहित किया करती है। इसके समस्त कार्य अपकृष्ट होते हैं। <small>(रसमञ्जरी)</small>
अधमाई (हिं॰) <small>अधमई देखो।</small>
अधमाङ्ग (सं॰ क्ली॰) अधमं निकृष्टं अङ्गम्, कर्मधा॰। सबसे नीचा अङ्ग; चरण, पैर।
अधमाचार (सं॰ त्रि॰) कुत्सित आचरणवाला, बदचलन; जिसका चालचलन ख़राब हो।
अधमा-दूती (सं॰ स्त्री॰) नीच दूती, वह कुटनी जो भली भांति अपने कर्तव्यको पालन न कर नायक-नायिकाको बुरे तौरसे संदेशा देती है।
अधमाधम (सं॰ त्रि॰) अपकृष्टसे अपकृष्ट, बुरेस बुरा।
अधमा-नायिका (सं॰ स्त्री॰) <small>अधमा देखो।</small>
अधमार्द्ध (सं॰ क्ली॰) अधमं अर्द्धम्, कर्मधा॰। नायिकाका अधोभाग।
अधमार्द्ध (सं॰ त्रि॰) शरीरके अधोभाग से सम्बन्ध रखनेवाला।
अधमुआ, <small>अधमरा देखो।</small>
अधमुख (हिं॰ वि॰) अधोमुख, शिर नीचेको झुकाये हुए, औंधा, मुंहभरा।
अधर (सं॰ पु॰) न ध्रियते, धृङ्-अप् धारणे; नञ्-तत्। <small>ऋदोरप्। पा ३।३।९३।</small> १ ओष्ठ, होंठ। २ नीचेका ओष्ठ या होंठ। कवि प्रबाल और विम्बके साथ अधरकी उपमा देते हैं। किसीके मतमें अधरसे ऊपरका होंठ समझा जाता और कोई इसे नीचेके होंठका द्योतक बताता है। वस्तुतः अधर कहनेसे नीचे-ऊपर दोनो स्थानका होंठ विदित होता है। अमरकी टीकामें महेश्वरने भी लिखा है, कि जो अधर शब्दको निम्न ओष्ठका ही बोधक समझते हैं, उनकी बात युक्तिसङ्गत नहीं,—
<small>केचिदुपरिवर्त्यीष्ठः अधोवर्त्य श्वर इति मन्यते तदयुक्तम्।</small>
किन्तु कामशास्त्रमें अन्यरूप प्रयोग देख पड़ता है,—
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधमई—अधर'''|'''३४७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>हैं। ५ अम्लवेतस्, तुर्शह, चूक। यह वृक्ष छःसे बारह इञ्चतक ऊंचा होता और साल भर में एक बार फूलता है, जिसकी डालियोंमें विभिन्न रङ्गके फूल लगते हैं। इसके उत्पन्न होनेका स्थान पश्चिम-पञ्जाब, लवणपर्वत और सिन्धु नदके पारवाली पहाड़ियां हैं। भारतके दूसरे स्थानोंमें या तो इसकी खेती की जाती या यह बाग़ोंमें बचावकी भांति लगाया जाता है। भारतीय वैद्य इसके रसको शीतल, रेचक और कुछ-कुछ पेशाब लानेवाला समझते हैं। यह दांतका दर्द दूर करनेके काम आता और तिक्त होनेके कारण वमनको रोकनेवाला ख़याल किया जाता है। पाकस्थलीकी ज्वाला मिटाने और क्षुधा बढ़ानेपर इसका सर्वाङ्ग खिलाया करते हैं। किसी ज़हरीले कीड़ेके काटनेपर वेदना दूर करनेको इसकी पत्तीका पुलटिस बहुत लाभदायक है। बीजमें भी उपरोक्त सब गुण
होते हैं, जो संग्रहणीपर भूनकर प्रयोग किया जाता है। तरकारीके लिये भारतमें प्रायः सब जगह इसकी खेती होती है और लोग इसे कच्चा-पक्का खाते रहते हैं। यह कूपोंके समीप क्यारिओंमें लगाया जाता और साल भर बराबर मिल सकता है।
अधमई (हिं॰ स्त्री॰) अपकृष्टता, न्यूनता; बुराई, खोटाई।
अधमता (सं॰ स्त्री॰) <small>अधमई देखी।</small>
अधमभृत, अधमभृतक (सं॰ पु॰) नीचदास, अधम-भृत्य ; कमीना नौकर, दरबान।
अधमरति (सं॰ स्त्री॰) प्रयोजनकी प्रीति, मतलबकी दोस्ती; वह रति जो कार्यवश की जाये, जैसे—वेश्या धनके कारण प्रेम दिखाया करती है।
अधमरा (हिं॰ वि॰) १ अर्धमृत, नीम मुर्दा। २ मृतप्राय, मरा जैसा।
अधमर्ण (सं॰ त्रि॰) अधम-ऋणम् ; ऋणमवश्यं देयं तत् अधमं शोध्यं यस्य, बहुव्री॰। ऋणशोधक, ऋणी, क़र्जदार।
अधमर्णिक, <small>अधमर्ण देखो।</small> (स्त्री॰) ङीप् —अधमर्णिकी।
अधमशास्त्र (सं॰ पु॰) प्रदेश विशेष, एक मुल्कका नाम।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधमा (सं॰ स्त्री॰) स्त्रियादिके अन्तर्गत नायिका विशेष। अधमा नायिका अकारण पतिपर कोप करती, इसीसे इसका दूसरा नाम चण्डी पड़ा है। यह हितकर प्रियतमके प्रति अहित किया करती है। इसके समस्त कार्य अपकृष्ट होते हैं। <small>(रसमञ्जरी)</small>
अधमाई (हिं॰) <small>अधमई देखो।</small>
अधमाङ्ग (सं॰ क्ली॰) अधमं निकृष्टं अङ्गम्, कर्मधा॰। सबसे नीचा अङ्ग; चरण, पैर।
अधमाचार (सं॰ त्रि॰) कुत्सित आचरणवाला, बदचलन; जिसका चालचलन ख़राब हो।
अधमा-दूती (सं॰ स्त्री॰) नीच दूती, वह कुटनी जो भली भांति अपने कर्तव्यको पालन न कर नायक-नायिकाको बुरे तौरसे संदेशा देती है।
अधमाधम (सं॰ त्रि॰) अपकृष्टसे अपकृष्ट, बुरेस बुरा।
अधमा-नायिका (सं॰ स्त्री॰) <small>अधमा देखो।</small>
अधमार्द्ध (सं॰ क्ली॰) अधमं अर्द्धम्, कर्मधा॰। नायिकाका अधोभाग।
अधमार्द्ध (सं॰ त्रि॰) शरीरके अधोभाग से सम्बन्ध रखनेवाला।
अधमुआ, <small>अधमरा देखो।</small>
अधमुख (हिं॰ वि॰) अधोमुख, शिर नीचेको झुकाये हुए, औंधा, मुंहभरा।
अधर (सं॰ पु॰) न ध्रियते, धृङ्-अप् धारणे; नञ्-तत्। <small>ऋदोरप्। पा ३।३।९३।</small> १ ओष्ठ, होंठ। २ नीचेका ओष्ठ या होंठ। कवि प्रबाल और विम्बके साथ अधरकी उपमा देते हैं। किसीके मतमें अधरसे ऊपरका होंठ समझा जाता और कोई इसे नीचेके होंठका द्योतक बताता है। वस्तुतः अधर कहनेसे नीचे-ऊपर दोनो स्थानका होंठ विदित होता है। अमरकी टीकामें महेश्वरने भी लिखा है, कि जो अधर शब्दको निम्न ओष्ठका ही बोधक समझते हैं, उनकी बात युक्तिसङ्गत नहीं,—
<small>केचिदुपरिवर्त्यीष्ठः अधोवर्त्य श्वर इति मन्यते तदयुक्तम्।</small>
किन्तु कामशास्त्रमें अन्यरूप प्रयोग देख पड़ता है,—
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३५५
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३४८ '''|'''अधरकण्टक—अधरीण'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Block center|<small><poem>"स्तनयोर्गण्ड्योश्चैव ओष्ठे चैव तथाधरे।
दन्ताघातः प्रकर्त्तव्यः कामिनीनां सुखावहः॥" (रति॰)</poem></small>}}
पुरुषका रक्तवर्ण अधर सुलक्षण है। इसीतरह स्त्रियोंका पाटलवर्ण, पतला और मध्यरेखा-युक्त अधर अच्छा होता है। स्थूल और कृष्णवर्ण ओष्ठ अशुभ है,—
{{Block center|<small><poem>"पाणिपादतलौ रक्तौ नेत्रान्तरनखानि च।
तालुकोऽधर जिह्वा च सप्तरक्तं प्रशस्यते॥
पाटलावर्तुलः स्निग्धरेखाभूषितमध्यभूः।
सीमन्तिनीनामधरी राज्ञां चैव स्त्रियो भवेत्॥
श्यामः स्थूलोऽधरोष्ठः स्यात् वैधव्यकलहप्रदः।" (सामुद्रिक)</poem></small>}}
(क्ली॰) ३ मदनगृह, मदनालय, योनि। (त्रि॰) ४ नीच, कमीना। ५ नीचेको झुका हुआ। ६ कुत्-सित, हक़ीर। ७ विजित, शान्त। ८ पहला, पूर्वका।
अधरकण्टक (सं॰ पु॰) दुरालभा।
अधरकण्टिका (सं॰ स्त्री॰) क्षुद्र शतावरी, छोटी शतावर।
अधरकण्ठ (सं॰ पु॰ क्ली॰) निम्नकण्ठ, नोचेकी गर्दन।
अधरकाय (सं॰ पु॰) शरीरका निम्नभाग, जिस्सका नीचेवाला हिस्सा।
अधरज (हिं॰ स्त्री॰) १ ओष्ठकी रक्ताभा, होंठोंकी सुर्खी। २ मिस्सीकी घड़ी या पानकी लाली, जो होंठोंपर जम जाती है।
अधरतस्, अधरत्तात्, अधरस्तात्, अधरस्मात्, अधरात्, अधरेण (सं॰ अव्य) नीचे, निम्नप्रदेशमें।
अधरपान (सं॰ क्ली॰) ओष्ठका चूसना, ओष्ठचुम्बन ; होंठका बोसा।
अधरम (हिं॰) <small>अधर्म देखो।</small>
अधरमकाय, <small>अधर्मास्तिकाय देखो।</small>
अधरमधु (सं॰ क्ली॰) अधरस्य मधु इव आस्वादाति-शयात्। अधररस, अधरामृत, वक्तासंव, लबकी शीरीनी।
अधरस्तात्, <small>अधरतस् देखो।</small>
अधरस्मात् <small>अधरतस् देखो।</small>
अधरखस्तिक (सं॰ क्ली॰) <small>अधःस्वस्तिक देखो।</small>
अधरा (सं॰ स्त्री॰) दक्षिणदिक्, अधोदिक्, खोटी ओर।
अधराक् (सं॰ अव्य॰) नीचे, निम्नप्रदेशमें।
अधराच् (सं॰ त्रि॰) अधरां दक्षिणां दिशमञ्चतीति, अञ्चु-क्किप्। दक्षिणदिग्गामी, जनूबकी जानिब जाने-वाला।
अधराचीन (वै॰ त्रि॰) अधराचि भवः, अधराच्-ख। १ अधः प्रदेशमें उत्पन्न होनेवाला, जो नीचेके मुल्कमें पैदा हो। २ नीचेकी ओर झुकता हुआ। ३ दक्षिणाभिमुख, जनूबकी तर्फ़ जो राग़िब हो।
अधराच्य (वै॰ त्रि॰) अधरच्यां भवः यत्। जो अधोदिक् में उत्पन्न हो, नीचेकी तर्फ़ पैदा होनेवाला।
अधरात् (सं॰ अव्य॰) अधरः अस्त्यर्थं आति। <small>उत्तराधरदक्षिणादातिः। ५।३।३४।</small> अधरतः, अधरेण, अधस्तात् ; नीचेसे, निम्नभागसे।
अधरात्तात् (वै॰ अव्य॰) नीचे, निम्नभागमें।
अधराधर (सं॰ पु॰) निम्न ओष्ठ, नीचेका होंठ ; लब।
अधरामृत (सं॰ क्ली॰) अधरस्य अमृतमिव। अधर-सुधा, होंठका अमृत, शीरीनी-ए-लब। भागवतमें लिखा है,—
{{Block center|<small><poem>"सिञ्चाङ्गनस्त्वदधरामृतपूरकेण
हासावलोककलगीतज हृच्छयाग्निम्।" १०।२९।३२।</poem></small>}}
'हे कृष्ण! आपकी सहास्यदृष्टि और आपके मधुर सङ्गीतसे हमारी जो मन्मथाग्नि जल उठी है, उसे आप अधरामृत पिला निर्वाण कीजिये।'
अधरारणि (वै॰ स्त्री॰) यज्ञ करनेको अग्नि उत्पन्न करनेके लिये जो दो लकड़ियां घिसी जाती हैं, उनमें छोटी लकड़ी।
अधरावलोप (सं॰ पु॰) अधरखण्डन, होंठका काटना।
अधरीकृत (सं॰ त्रि॰) १ विजित, हारा हुआ। २ अकर्मण्य बनाया या नाकाम किया गया।
अधरीण (सं॰ त्रि॰) अधरे भवः, अधर-ख।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३४८ '''|'''अधरकण्टक—अधरीण'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
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दन्ताघातः प्रकर्त्तव्यः कामिनीनां सुखावहः॥" (रति॰)</poem></small>}}
पुरुषका रक्तवर्ण अधर सुलक्षण है। इसीतरह स्त्रियोंका पाटलवर्ण, पतला और मध्यरेखा-युक्त अधर अच्छा होता है। स्थूल और कृष्णवर्ण ओष्ठ अशुभ है,—
{{Block center|<small><poem>"पाणिपादतलौ रक्तौ नेत्रान्तरनखानि च।
तालुकोऽधर जिह्वा च सप्तरक्तं प्रशस्यते॥
पाटलावर्तुलः स्निग्धरेखाभूषितमध्यभूः।
सीमन्तिनीनामधरी राज्ञां चैव स्त्रियो भवेत्॥
श्यामः स्थूलोऽधरोष्ठः स्यात् वैधव्यकलहप्रदः।" (सामुद्रिक)</poem></small>}}
(क्ली॰) ३ मदनगृह, मदनालय, योनि। (त्रि॰) ४ नीच, कमीना। ५ नीचेको झुका हुआ। ६ कुत्-सित, हक़ीर। ७ विजित, शान्त। ८ पहला, पूर्वका।
अधरकण्टक (सं॰ पु॰) दुरालभा।
अधरकण्टिका (सं॰ स्त्री॰) क्षुद्र शतावरी, छोटी शतावर।
अधरकण्ठ (सं॰ पु॰ क्ली॰) निम्नकण्ठ, नोचेकी गर्दन।
अधरकाय (सं॰ पु॰) शरीरका निम्नभाग, जिस्सका नीचेवाला हिस्सा।
अधरज (हिं॰ स्त्री॰) १ ओष्ठकी रक्ताभा, होंठोंकी सुर्खी। २ मिस्सीकी घड़ी या पानकी लाली, जो होंठोंपर जम जाती है।
अधरतस्, अधरत्तात्, अधरस्तात्, अधरस्मात्, अधरात्, अधरेण (सं॰ अव्य) नीचे, निम्नप्रदेशमें।
अधरपान (सं॰ क्ली॰) ओष्ठका चूसना, ओष्ठचुम्बन ; होंठका बोसा।
अधरम (हिं॰) <small>अधर्म देखो।</small>
अधरमकाय, <small>अधर्मास्तिकाय देखो।</small>
अधरमधु (सं॰ क्ली॰) अधरस्य मधु इव आस्वादाति-शयात्। अधररस, अधरामृत, वक्तासंव, लबकी शीरीनी।
अधरस्तात्, <small>अधरतस् देखो।</small>
अधरस्मात् <small>अधरतस् देखो।</small>
अधरखस्तिक (सं॰ क्ली॰) <small>अधःस्वस्तिक देखो।</small>
अधरा (सं॰ स्त्री॰) दक्षिणदिक्, अधोदिक्, खोटी ओर।
अधराक् (सं॰ अव्य॰) नीचे, निम्नप्रदेशमें।
अधराच् (सं॰ त्रि॰) अधरां दक्षिणां दिशमञ्चतीति, अञ्चु-क्किप्। दक्षिणदिग्गामी, जनूबकी जानिब जाने-वाला।
अधराचीन (वै॰ त्रि॰) अधराचि भवः, अधराच्-ख। १ अधः प्रदेशमें उत्पन्न होनेवाला, जो नीचेके मुल्कमें पैदा हो। २ नीचेकी ओर झुकता हुआ। ३ दक्षिणाभिमुख, जनूबकी तर्फ़ जो राग़िब हो।
अधराच्य (वै॰ त्रि॰) अधरच्यां भवः यत्। जो अधोदिक् में उत्पन्न हो, नीचेकी तर्फ़ पैदा होनेवाला।
अधरात् (सं॰ अव्य॰) अधरः अस्त्यर्थं आति। <small>उत्तराधरदक्षिणादातिः। ५।३।३४।</small> अधरतः, अधरेण, अधस्तात् ; नीचेसे, निम्नभागसे।
अधरात्तात् (वै॰ अव्य॰) नीचे, निम्नभागमें।
अधराधर (सं॰ पु॰) निम्न ओष्ठ, नीचेका होंठ ; लब।
अधरामृत (सं॰ क्ली॰) अधरस्य अमृतमिव। अधर-सुधा, होंठका अमृत, शीरीनी-ए-लब। भागवतमें लिखा है,—
{{Block center|<small><poem>"सिञ्चाङ्गनस्त्वदधरामृतपूरकेण
हासावलोककलगीतज हृच्छयाग्निम्।" १०।२९।३२।</poem></small>}}
'हे कृष्ण! आपकी सहास्यदृष्टि और आपके मधुर सङ्गीतसे हमारी जो मन्मथाग्नि जल उठी है, उसे आप अधरामृत पिला निर्वाण कीजिये।'
अधरारणि (वै॰ स्त्री॰) यज्ञ करनेको अग्नि उत्पन्न करनेके लिये जो दो लकड़ियां घिसी जाती हैं, उनमें छोटी लकड़ी।
अधरावलोप (सं॰ पु॰) अधरखण्डन, होंठका काटना।
अधरीकृत (सं॰ त्रि॰) १ विजित, हारा हुआ। २ अकर्मण्य बनाया या नाकाम किया गया।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३४८ '''|'''अधरकण्टक—अधरीण'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Block center|<small><poem>"स्तनयोर्गण्ड्योश्चैव ओष्ठे चैव तथाधरे।
दन्ताघातः प्रकर्त्तव्यः कामिनीनां सुखावहः॥" (रति॰)</poem></small>}}
पुरुषका रक्तवर्ण अधर सुलक्षण है। इसीतरह स्त्रियोंका पाटलवर्ण, पतला और मध्यरेखा-युक्त अधर अच्छा होता है। स्थूल और कृष्णवर्ण ओष्ठ अशुभ है,—
{{Block center|<small><poem>"पाणिपादतलौ रक्तौ नेत्रान्तरनखानि च।
तालुकोऽधर जिह्वा च सप्तरक्तं प्रशस्यते॥
पाटलावर्तुलः स्निग्धरेखाभूषितमध्यभूः।
सीमन्तिनीनामधरी राज्ञां चैव स्त्रियो भवेत्॥
श्यामः स्थूलोऽधरोष्ठः स्यात् वैधव्यकलहप्रदः।" (सामुद्रिक)</poem></small>}}
(क्ली॰) ३ मदनगृह, मदनालय, योनि। (त्रि॰) ४ नीच, कमीना। ५ नीचेको झुका हुआ। ६ कुत्-सित, हक़ीर। ७ विजित, शान्त। ८ पहला, पूर्वका।
अधरकण्टक (सं॰ पु॰) दुरालभा।
अधरकण्टिका (सं॰ स्त्री॰) क्षुद्र शतावरी, छोटी शतावर।
अधरकण्ठ (सं॰ पु॰ क्ली॰) निम्नकण्ठ, नोचेकी गर्दन।
अधरकाय (सं॰ पु॰) शरीरका निम्नभाग, जिस्सका नीचेवाला हिस्सा।
अधरज (हिं॰ स्त्री॰) १ ओष्ठकी रक्ताभा, होंठोंकी सुर्खी। २ मिस्सीकी घड़ी या पानकी लाली, जो होंठोंपर जम जाती है।
अधरतस्, अधरत्तात्, अधरस्तात्, अधरस्मात्, अधरात्, अधरेण (सं॰ अव्य) नीचे, निम्नप्रदेशमें।
अधरपान (सं॰ क्ली॰) ओष्ठका चूसना, ओष्ठचुम्बन ; होंठका बोसा।
अधरम (हिं॰) <small>अधर्म देखो।</small>
अधरमकाय, <small>अधर्मास्तिकाय देखो।</small>
अधरमधु (सं॰ क्ली॰) अधरस्य मधु इव आस्वादाति-शयात्। अधररस, अधरामृत, वक्तासंव, लबकी शीरीनी।
अधरस्तात्, <small>अधरतस् देखो।</small>
अधरस्मात् <small>अधरतस् देखो।</small>
अधरखस्तिक (सं॰ क्ली॰) <small>अधःस्वस्तिक देखो।</small><noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधरा (सं॰ स्त्री॰) दक्षिणदिक्, अधोदिक्, खोटी ओर।
अधराक् (सं॰ अव्य॰) नीचे, निम्नप्रदेशमें।
अधराच् (सं॰ त्रि॰) अधरां दक्षिणां दिशमञ्चतीति, अञ्चु-क्किप्। दक्षिणदिग्गामी, जनूबकी जानिब जाने-वाला।
अधराचीन (वै॰ त्रि॰) अधराचि भवः, अधराच्-ख। १ अधः प्रदेशमें उत्पन्न होनेवाला, जो नीचेके मुल्कमें पैदा हो। २ नीचेकी ओर झुकता हुआ। ३ दक्षिणाभिमुख, जनूबकी तर्फ़ जो राग़िब हो।
अधराच्य (वै॰ त्रि॰) अधरच्यां भवः यत्। जो अधोदिक् में उत्पन्न हो, नीचेकी तर्फ़ पैदा होनेवाला।
अधरात् (सं॰ अव्य॰) अधरः अस्त्यर्थं आति। <small>उत्तराधरदक्षिणादातिः। ५।३।३४।</small> अधरतः, अधरेण, अधस्तात् ; नीचेसे, निम्नभागसे।
अधरात्तात् (वै॰ अव्य॰) नीचे, निम्नभागमें।
अधराधर (सं॰ पु॰) निम्न ओष्ठ, नीचेका होंठ ; लब।
अधरामृत (सं॰ क्ली॰) अधरस्य अमृतमिव। अधर-सुधा, होंठका अमृत, शीरीनी-ए-लब। भागवतमें लिखा है,—
{{Block center|<small><poem>"सिञ्चाङ्गनस्त्वदधरामृतपूरकेण
हासावलोककलगीतज हृच्छयाग्निम्।" १०।२९।३२।</poem></small>}}
'हे कृष्ण! आपकी सहास्यदृष्टि और आपके मधुर सङ्गीतसे हमारी जो मन्मथाग्नि जल उठी है, उसे आप अधरामृत पिला निर्वाण कीजिये।'
अधरारणि (वै॰ स्त्री॰) यज्ञ करनेको अग्नि उत्पन्न करनेके लिये जो दो लकड़ियां घिसी जाती हैं, उनमें छोटी लकड़ी।
अधरावलोप (सं॰ पु॰) अधरखण्डन, होंठका काटना।
अधरीकृत (सं॰ त्रि॰) १ विजित, हारा हुआ। २ अकर्मण्य बनाया या नाकाम किया गया।
अधरीण (सं॰ त्रि॰) अधरे भवः, अधर-ख।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३४८ '''|'''अधरकण्टक—अधरीण'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{Block center|<small><poem>"स्तनयोर्गण्ड्योश्चैव ओष्ठे चैव तथाधरे।
दन्ताघातः प्रकर्त्तव्यः कामिनीनां सुखावहः॥" (रति॰)</poem></small>}}
पुरुषका रक्तवर्ण अधर सुलक्षण है। इसीतरह स्त्रियोंका पाटलवर्ण, पतला और मध्यरेखा-युक्त अधर अच्छा होता है। स्थूल और कृष्णवर्ण ओष्ठ अशुभ है,—
{{Block center|<small><poem>"पाणिपादतलौ रक्तौ नेत्रान्तरनखानि च।
तालुकोऽधर जिह्वा च सप्तरक्तं प्रशस्यते॥
पाटलावर्तुलः स्निग्धरेखाभूषितमध्यभूः।
सीमन्तिनीनामधरी राज्ञां चैव स्त्रियो भवेत्॥
श्यामः स्थूलोऽधरोष्ठः स्यात् वैधव्यकलहप्रदः।" (सामुद्रिक)</poem></small>}}
(क्ली॰) ३ मदनगृह, मदनालय, योनि। (त्रि॰) ४ नीच, कमीना। ५ नीचेको झुका हुआ। ६ कुत्-सित, हक़ीर। ७ विजित, शान्त। ८ पहला, पूर्वका।
अधरकण्टक (सं॰ पु॰) दुरालभा।
अधरकण्टिका (सं॰ स्त्री॰) क्षुद्र शतावरी, छोटी शतावर।
अधरकण्ठ (सं॰ पु॰ क्ली॰) निम्नकण्ठ, नोचेकी गर्दन।
अधरकाय (सं॰ पु॰) शरीरका निम्नभाग, जिस्सका नीचेवाला हिस्सा।
अधरज (हिं॰ स्त्री॰) १ ओष्ठकी रक्ताभा, होंठोंकी सुर्खी। २ मिस्सीकी घड़ी या पानकी लाली, जो होंठोंपर जम जाती है।
अधरतस्, अधरत्तात्, अधरस्तात्, अधरस्मात्, अधरात्, अधरेण (सं॰ अव्य) नीचे, निम्नप्रदेशमें।
अधरपान (सं॰ क्ली॰) ओष्ठका चूसना, ओष्ठचुम्बन ; होंठका बोसा।
अधरम (हिं॰) <small>अधर्म देखो।</small>
अधरमकाय, <small>अधर्मास्तिकाय देखो।</small>
अधरमधु (सं॰ क्ली॰) अधरस्य मधु इव आस्वादाति-शयात्। अधररस, अधरामृत, वक्तासंव, लबकी शीरीनी।
अधरस्तात्, <small>अधरतस् देखो।</small>
अधरस्मात् <small>अधरतस् देखो।</small>
अधरखस्तिक (सं॰ क्ली॰) <small>अधःस्वस्तिक देखो।</small><noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधरा (सं॰ स्त्री॰) दक्षिणदिक्, अधोदिक्, खोटी ओर।
अधराक् (सं॰ अव्य॰) नीचे, निम्नप्रदेशमें।
अधराच् (सं॰ त्रि॰) अधरां दक्षिणां दिशमञ्चतीति, अञ्चु-क्किप्। दक्षिणदिग्गामी, जनूबकी जानिब जाने-वाला।
अधराचीन (वै॰ त्रि॰) अधराचि भवः, अधराच्-ख। १ अधः प्रदेशमें उत्पन्न होनेवाला, जो नीचेके मुल्कमें पैदा हो। २ नीचेकी ओर झुकता हुआ। ३ दक्षिणाभिमुख, जनूबकी तर्फ़ जो राग़िब हो।
अधराच्य (वै॰ त्रि॰) अधरच्यां भवः यत्। जो अधोदिक् में उत्पन्न हो, नीचेकी तर्फ़ पैदा होनेवाला।
अधरात् (सं॰ अव्य॰) अधरः अस्त्यर्थं आति। <small>उत्तराधरदक्षिणादातिः। ५।३।३४।</small> अधरतः, अधरेण, अधस्तात् ; नीचेसे, निम्नभागसे।
अधरात्तात् (वै॰ अव्य॰) नीचे, निम्नभागमें।
अधराधर (सं॰ पु॰) निम्न ओष्ठ, नीचेका होंठ ; लब।
अधरामृत (सं॰ क्ली॰) अधरस्य अमृतमिव। अधर-सुधा, होंठका अमृत, शीरीनी-ए-लब। भागवतमें लिखा है,—
{{Block center|<small><poem>"सिञ्चाङ्गनस्त्वदधरामृतपूरकेण
हासावलोककलगीतज हृच्छयाग्निम्।" १०।२९।३२।</poem></small>}}
'हे कृष्ण! आपकी सहास्यदृष्टि और आपके मधुर सङ्गीतसे हमारी जो मन्मथाग्नि जल उठी है, उसे आप अधरामृत पिला निर्वाण कीजिये।'
अधरारणि (वै॰ स्त्री॰) यज्ञ करनेको अग्नि उत्पन्न करनेके लिये जो दो लकड़ियां घिसी जाती हैं, उनमें छोटी लकड़ी।
अधरावलोप (सं॰ पु॰) अधरखण्डन, होंठका काटना।
अधरीकृत (सं॰ त्रि॰) १ विजित, हारा हुआ। २ अकर्मण्य बनाया या नाकाम किया गया।
अधरीण (सं॰ त्रि॰) अधरे भवः, अधर-ख।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३५६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधरीभूत—अधर्म'''|'''३४९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>धिक्कृत, दुतकारा हुआ। २ अधरमें उत्पन्न, नीचे पैदा हुआ।
अधरीभूत (सं॰ त्रि॰) १ विजित, शिकस्त। २ अकर्मण्य-कृत, नाकाम बनाया गया।
अधरेण (सं॰ अव्य॰) अधरस्मिन् देशे दिशि वा, अधर-एनप्। <small>एनवन्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः। पा ५।३।३५ ।</small> १ निकटके निम्न देशादिसे, पासवाले नीचेके मुल्कोंसे। २ सन्निक्कष्ट दक्षिणदिक्से।
अधरेद्युः, अधरेद्युस् (सं॰ अव्य॰) अधरस्मिन्नहनि। १ अधर दिवस, परदिन; परसों, कलसे पहलेके दिन। २ उस दिन, गये दिन।
अधरेय (सं॰ त्रि॰) १ गुणविहीन, जिसमें कोई सिफ़्त न हो। २ मूल्यमें न्यून, कमक़ीमत।
अधरोत्तर (सं॰ क्ली॰) अधरश्च उत्तरश्च, समा॰ द्वन्द्व। न्यूनाधिक्य-युक्त पदार्थ, कमोवेश चीज़। २ निम्नोन्नत स्थान, ऊंची-नीची जगह। (त्रि॰) ३ ऊंचा नीचा, निम्नोच्च। ४ भला-बुरा। ५ जैसे को तैसा, सवालका जवाब। ६ नज़दीक-दूर। ७ अवेर-सवेर। ऊपर-नीचे।
अधरोंथा (हिं॰ वि॰) आधा खाया, चबाया, कुचला या पागुर किया हुआ।
अधरोष्ठ (सं॰ पु॰) १ नीचेका होंठ, लब। (क्ली॰) ओष्ठ, होंठ।
अधर्म (सं॰ पु॰) ध्रियतेऽनेन, धृङ्-मनिन्; विरो-धार्थे नञ्-तत्। १ श्रुतिस्मृति-विरुद्ध आचार, शास्त्रके प्रतिकूल व्यवहार, काम जो वेदके ख़िलाफ़ हो ; पाप, इज़ाब; पातक, गुनाह; असद्व्यवहार, बुरा बरताव; अकर्तव्य कर्म, न करने काबिल काम; अन्याय, जुल्म, धर्म-विरुद्ध कार्य, मज़हबके ख़िलाफ़ काम; कुकर्म, बुरा काम; दुराचार, बुरा चालचलन।
भागवतमें कहा गया है, कि अधर्म परब्रह्मके पृष्ठ-देशसे उत्पन्न हुए थे। आदिपुराण में अधर्म के उत्पन्न होनेकी बात इसतरह लिखी है,—
{{Block center|<poem><small>"प्रजानामन्नकामानां अन्योन्य- परिभक्षणात्।
अधर्मस्तव सञ्जातः सर्वभूतविनाशकः॥
तस्यापि निर्ऋतिर्भार्या नैर्ऋता येन राक्षसाः।
धीरास्तस्यास्त्रयः पुत्राः पापकर्मरताः सदा॥</small></poem>}}
{{Block center|<poem><small>भयो महाभयश्चैव मृत्प्रर्भूतान्तकस्तथा।
न तस्य भार्वा पुत्री वा कश्चिदस्तान्तकी हि सः।" २६१७ श्लीक।</small></poem>}}
लोग जब अन्नकामनापर एक-दूसरेको भक्षण करने लगे, तब उससे सर्वभूत-विनाशक अधर्मकी उत्पत्ति हुई। इनकी भार्याका नाम निर्ऋति था। निर्ऋतिके पुत्र होनेसे ही राक्षस नैर्ऋत कहाते हैं। इनके तीन पुत्र अतिशय भयङ्कर हैं, जो सर्वदा ही पापकर्म में रत रहते हैं। उनका नाम भय, महाभय और प्राणिगण-विनाशकारी मृत्यु है। मृत्युके भार्या किंवा पुत्र कोई भी नहीं, जिसके कारण वह सर्वान्त-कारी होता है।
हमारे शास्त्रकार पुनर्जन्म मानते थे। अब कोई पुनर्जन्म मानता और कोई नहीं भी मानता है। मनु प्रभृति ऋषियोंका मत यही है, कि शास्त्रमें जैसा लिखा, उसके अनुरूप आचरण न करने अर्थात् अधर्माचरण करनेसे मनुष्य जन्मजन्मान्तर अधमयोनि पाता है। शास्त्रमें यह निर्दिष्ट है, कि कौन-कौन अधर्म करनेसे किस-किस योनिमें जन्म होता है,—
{{Block center|<poem><small>"श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोऽजाविमृगपचिणाम्।
चण्डालपुक्कशानाञ्च ब्रह्महा योनिसृच्छति॥ ५५
कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजाश्चैव पचिणाम्।
{{Gap}}स्राणाञ्चैव सत्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत्॥ ५६
लू ताहिरटानाञ्च तिरयांचाम्बुचारिणाम्।
हिंस्राणाञ्च पिशाचाणां स्तेनो विप्रः सहस्रशः॥ ५७
तृणगुल्मलतानाञ्च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि।
क्रूरकर्म्मकृताञ्चै व शतशो गुरुतल्पगः॥ ५८
हिंसा भवन्ति क्रव्यादाः कृमयोऽभक्ष्राभक्षिणः।
परस्परादिनस्तेनाः प्रेतान्त्यस्त्रीनिषेविणः॥ ५९
संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम्।
अपहृतं च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः॥ ६०
मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः।
विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु॥ ६१
धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कास्यं हंसो जलं प्लवः।
मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम्॥ ६२
मांसं गृध्रो वपां मद्गुस्तेलं तैलपकः खगः।
चीरीवाकस्तु लवणं वलाका शकुनिर्दधि॥ ६३
कौषे यं तितिरिर्हृत्वा क्षौमं हत्वा तु दर्दुरः।
कार्पासतान्तरं क्रौञ्चो गोधा गां वाग्गुदो गुड़म्॥ ६४</small></poem>}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधरीभूत—अधर्म'''|'''३४९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>धिक्कृत, दुतकारा हुआ। २ अधरमें उत्पन्न, नीचे पैदा हुआ।
अधरीभूत (सं॰ त्रि॰) १ विजित, शिकस्त। २ अकर्मण्य-कृत, नाकाम बनाया गया।
अधरेण (सं॰ अव्य॰) अधरस्मिन् देशे दिशि वा, अधर-एनप्। <small>एनवन्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः। पा ५।३।३५ ।</small> १ निकटके निम्न देशादिसे, पासवाले नीचेके मुल्कोंसे। २ सन्निक्कष्ट दक्षिणदिक्से।
अधरेद्युः, अधरेद्युस् (सं॰ अव्य॰) अधरस्मिन्नहनि। १ अधर दिवस, परदिन; परसों, कलसे पहलेके दिन। २ उस दिन, गये दिन।
अधरेय (सं॰ त्रि॰) १ गुणविहीन, जिसमें कोई सिफ़्त न हो। २ मूल्यमें न्यून, कमक़ीमत।
अधरोत्तर (सं॰ क्ली॰) अधरश्च उत्तरश्च, समा॰ द्वन्द्व। न्यूनाधिक्य-युक्त पदार्थ, कमोवेश चीज़। २ निम्नोन्नत स्थान, ऊंची-नीची जगह। (त्रि॰) ३ ऊंचा नीचा, निम्नोच्च। ४ भला-बुरा। ५ जैसे को तैसा, सवालका जवाब। ६ नज़दीक-दूर। ७ अवेर-सवेर। ऊपर-नीचे।
अधरोंथा (हिं॰ वि॰) आधा खाया, चबाया, कुचला या पागुर किया हुआ।
अधरोष्ठ (सं॰ पु॰) १ नीचेका होंठ, लब। (क्ली॰) ओष्ठ, होंठ।
अधर्म (सं॰ पु॰) ध्रियतेऽनेन, धृङ्-मनिन्; विरो-धार्थे नञ्-तत्। १ श्रुतिस्मृति-विरुद्ध आचार, शास्त्रके प्रतिकूल व्यवहार, काम जो वेदके ख़िलाफ़ हो ; पाप, इज़ाब; पातक, गुनाह; असद्व्यवहार, बुरा बरताव; अकर्तव्य कर्म, न करने काबिल काम; अन्याय, जुल्म, धर्म-विरुद्ध कार्य, मज़हबके ख़िलाफ़ काम; कुकर्म, बुरा काम; दुराचार, बुरा चालचलन।
भागवतमें कहा गया है, कि अधर्म परब्रह्मके पृष्ठ-देशसे उत्पन्न हुए थे। आदिपुराण में अधर्म के उत्पन्न होनेकी बात इसतरह लिखी है,—
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अधर्मस्तव सञ्जातः सर्वभूतविनाशकः॥
तस्यापि निर्ऋतिर्भार्या नैर्ऋता येन राक्षसाः।
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न तस्य भार्वा पुत्री वा कश्चिदस्तान्तकी हि सः।" २६१७ श्लीक।</small></poem>}}
लोग जब अन्नकामनापर एक-दूसरेको भक्षण करने लगे, तब उससे सर्वभूत-विनाशक अधर्मकी उत्पत्ति हुई। इनकी भार्याका नाम निर्ऋति था। निर्ऋतिके पुत्र होनेसे ही राक्षस नैर्ऋत कहाते हैं। इनके तीन पुत्र अतिशय भयङ्कर हैं, जो सर्वदा ही पापकर्म में रत रहते हैं। उनका नाम भय, महाभय और प्राणिगण-विनाशकारी मृत्यु है। मृत्युके भार्या किंवा पुत्र कोई भी नहीं, जिसके कारण वह सर्वान्त-कारी होता है।
हमारे शास्त्रकार पुनर्जन्म मानते थे। अब कोई पुनर्जन्म मानता और कोई नहीं भी मानता है। मनु प्रभृति ऋषियोंका मत यही है, कि शास्त्रमें जैसा लिखा, उसके अनुरूप आचरण न करने अर्थात् अधर्माचरण करनेसे मनुष्य जन्मजन्मान्तर अधमयोनि पाता है। शास्त्रमें यह निर्दिष्ट है, कि कौन-कौन अधर्म करनेसे किस-किस योनिमें जन्म होता है,—
{{Block center|<poem><small>"श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोऽजाविमृगपचिणाम्।
चण्डालपुक्कशानाञ्च ब्रह्महा योनिसृच्छति॥ ५५
कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजाश्चैव पचिणाम्।
{{Gap}}स्राणाञ्चैव सत्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत्॥ ५६
लू ताहिरटानाञ्च तिरयांचाम्बुचारिणाम्।
हिंस्राणाञ्च पिशाचाणां स्तेनो विप्रः सहस्रशः॥ ५७
तृणगुल्मलतानाञ्च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि।
क्रूरकर्म्मकृताञ्चै व शतशो गुरुतल्पगः॥ ५८
हिंसा भवन्ति क्रव्यादाः कृमयोऽभक्ष्राभक्षिणः।
परस्परादिनस्तेनाः प्रेतान्त्यस्त्रीनिषेविणः॥ ५९
संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम्।
अपहृतं च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः॥ ६०
मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः।
विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु॥ ६१
धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कास्यं हंसो जलं प्लवः।
मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम्॥ ६२
मांसं गृध्रो वपां मद्गुस्तेलं तैलपकः खगः।
चीरीवाकस्तु लवणं वलाका शकुनिर्दधि॥ ६३
कौषे यं तितिरिर्हृत्वा क्षौमं हत्वा तु दर्दुरः।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधरीभूत—अधर्म'''|'''३४९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>धिक्कृत, दुतकारा हुआ। २ अधरमें उत्पन्न, नीचे पैदा हुआ।
अधरीभूत (सं॰ त्रि॰) १ विजित, शिकस्त। २ अकर्मण्य-कृत, नाकाम बनाया गया।
अधरेण (सं॰ अव्य॰) अधरस्मिन् देशे दिशि वा, अधर-एनप्। <small>एनवन्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः। पा ५।३।३५ ।</small> १ निकटके निम्न देशादिसे, पासवाले नीचेके मुल्कोंसे। २ सन्निक्कष्ट दक्षिणदिक्से।
अधरेद्युः, अधरेद्युस् (सं॰ अव्य॰) अधरस्मिन्नहनि। १ अधर दिवस, परदिन; परसों, कलसे पहलेके दिन। २ उस दिन, गये दिन।
अधरेय (सं॰ त्रि॰) १ गुणविहीन, जिसमें कोई सिफ़्त न हो। २ मूल्यमें न्यून, कमक़ीमत।
अधरोत्तर (सं॰ क्ली॰) अधरश्च उत्तरश्च, समा॰ द्वन्द्व। न्यूनाधिक्य-युक्त पदार्थ, कमोवेश चीज़। २ निम्नोन्नत स्थान, ऊंची-नीची जगह। (त्रि॰) ३ ऊंचा नीचा, निम्नोच्च। ४ भला-बुरा। ५ जैसे को तैसा, सवालका जवाब। ६ नज़दीक-दूर। ७ अवेर-सवेर। ऊपर-नीचे।
अधरोंथा (हिं॰ वि॰) आधा खाया, चबाया, कुचला या पागुर किया हुआ।
अधरोष्ठ (सं॰ पु॰) १ नीचेका होंठ, लब। (क्ली॰) ओष्ठ, होंठ।
अधर्म (सं॰ पु॰) ध्रियतेऽनेन, धृङ्-मनिन्; विरो-धार्थे नञ्-तत्। १ श्रुतिस्मृति-विरुद्ध आचार, शास्त्रके प्रतिकूल व्यवहार, काम जो वेदके ख़िलाफ़ हो ; पाप, इज़ाब; पातक, गुनाह; असद्व्यवहार, बुरा बरताव; अकर्तव्य कर्म, न करने काबिल काम; अन्याय, जुल्म, धर्म-विरुद्ध कार्य, मज़हबके ख़िलाफ़ काम; कुकर्म, बुरा काम; दुराचार, बुरा चालचलन।
भागवतमें कहा गया है, कि अधर्म परब्रह्मके पृष्ठ-देशसे उत्पन्न हुए थे। आदिपुराण में अधर्म के उत्पन्न होनेकी बात इसतरह लिखी है,—
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अधर्मस्तव सञ्जातः सर्वभूतविनाशकः॥
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लोग जब अन्नकामनापर एक-दूसरेको भक्षण करने लगे, तब उससे सर्वभूत-विनाशक अधर्मकी उत्पत्ति हुई। इनकी भार्याका नाम निर्ऋति था। निर्ऋतिके पुत्र होनेसे ही राक्षस नैर्ऋत कहाते हैं। इनके तीन पुत्र अतिशय भयङ्कर हैं, जो सर्वदा ही पापकर्म में रत रहते हैं। उनका नाम भय, महाभय और प्राणिगण-विनाशकारी मृत्यु है। मृत्युके भार्या किंवा पुत्र कोई भी नहीं, जिसके कारण वह सर्वान्त-कारी होता है।
हमारे शास्त्रकार पुनर्जन्म मानते थे। अब कोई पुनर्जन्म मानता और कोई नहीं भी मानता है। मनु प्रभृति ऋषियोंका मत यही है, कि शास्त्रमें जैसा लिखा, उसके अनुरूप आचरण न करने अर्थात् अधर्माचरण करनेसे मनुष्य जन्मजन्मान्तर अधमयोनि पाता है। शास्त्रमें यह निर्दिष्ट है, कि कौन-कौन अधर्म करनेसे किस-किस योनिमें जन्म होता है,—
{{Block center|<poem><small>"श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोऽजाविमृगपचिणाम्।
चण्डालपुक्कशानाञ्च ब्रह्महा योनिसृच्छति॥ ५५
कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजाश्चैव पचिणाम्।
{{Gap}}स्राणाञ्चैव सत्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत्॥ ५६
लू ताहिरटानाञ्च तिरयांचाम्बुचारिणाम्।
हिंस्राणाञ्च पिशाचाणां स्तेनो विप्रः सहस्रशः॥ ५७
तृणगुल्मलतानाञ्च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि।
क्रूरकर्म्मकृताञ्चै व शतशो गुरुतल्पगः॥ ५८
हिंसा भवन्ति क्रव्यादाः कृमयोऽभक्ष्राभक्षिणः।
परस्परादिनस्तेनाः प्रेतान्त्यस्त्रीनिषेविणः॥ ५९
संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम्।
अपहृतं च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः॥ ६०
मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः।
विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु॥ ६१
धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कास्यं हंसो जलं प्लवः।
मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम्॥ ६२
मांसं गृध्रो वपां मद्गुस्तेलं तैलपकः खगः।
चीरीवाकस्तु लवणं वलाका शकुनिर्दधि॥ ६३
कौषे यं तितिरिर्हृत्वा क्षौमं हत्वा तु दर्दुरः।
कार्पासतान्तरं क्रौञ्चो गोधा गां वाग्गुदो गुड़म्॥ ६४</small></poem>}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधरीभूत—अधर्म'''|'''३४९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>धिक्कृत, दुतकारा हुआ। २ अधरमें उत्पन्न, नीचे पैदा हुआ।
अधरीभूत (सं॰ त्रि॰) १ विजित, शिकस्त। २ अकर्मण्य-कृत, नाकाम बनाया गया।
अधरेण (सं॰ अव्य॰) अधरस्मिन् देशे दिशि वा, अधर-एनप्। <small>एनवन्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः। पा ५।३।३५ ।</small> १ निकटके निम्न देशादिसे, पासवाले नीचेके मुल्कोंसे। २ सन्निक्कष्ट दक्षिणदिक्से।
अधरेद्युः, अधरेद्युस् (सं॰ अव्य॰) अधरस्मिन्नहनि। १ अधर दिवस, परदिन; परसों, कलसे पहलेके दिन। २ उस दिन, गये दिन।
अधरेय (सं॰ त्रि॰) १ गुणविहीन, जिसमें कोई सिफ़्त न हो। २ मूल्यमें न्यून, कमक़ीमत।
अधरोत्तर (सं॰ क्ली॰) अधरश्च उत्तरश्च, समा॰ द्वन्द्व। न्यूनाधिक्य-युक्त पदार्थ, कमोवेश चीज़। २ निम्नोन्नत स्थान, ऊंची-नीची जगह। (त्रि॰) ३ ऊंचा नीचा, निम्नोच्च। ४ भला-बुरा। ५ जैसे को तैसा, सवालका जवाब। ६ नज़दीक-दूर। ७ अवेर-सवेर। ऊपर-नीचे।
अधरोंथा (हिं॰ वि॰) आधा खाया, चबाया, कुचला या पागुर किया हुआ।
अधरोष्ठ (सं॰ पु॰) १ नीचेका होंठ, लब। (क्ली॰) ओष्ठ, होंठ।
अधर्म (सं॰ पु॰) ध्रियतेऽनेन, धृङ्-मनिन्; विरो-धार्थे नञ्-तत्। १ श्रुतिस्मृति-विरुद्ध आचार, शास्त्रके प्रतिकूल व्यवहार, काम जो वेदके ख़िलाफ़ हो ; पाप, इज़ाब; पातक, गुनाह; असद्व्यवहार, बुरा बरताव; अकर्तव्य कर्म, न करने काबिल काम; अन्याय, जुल्म, धर्म-विरुद्ध कार्य, मज़हबके ख़िलाफ़ काम; कुकर्म, बुरा काम; दुराचार, बुरा चालचलन।
भागवतमें कहा गया है, कि अधर्म परब्रह्मके पृष्ठ-देशसे उत्पन्न हुए थे। आदिपुराण में अधर्म के उत्पन्न होनेकी बात इसतरह लिखी है,—
{{Block center|<poem><small>"प्रजानामन्नकामानां अन्योन्य- परिभक्षणात्।
अधर्मस्तव सञ्जातः सर्वभूतविनाशकः॥
तस्यापि निर्ऋतिर्भार्या नैर्ऋता येन राक्षसाः।
धीरास्तस्यास्त्रयः पुत्राः पापकर्मरताः सदा॥</small></poem>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{Block center|<poem><small>भयो महाभयश्चैव मृत्प्रर्भूतान्तकस्तथा।
न तस्य भार्वा पुत्री वा कश्चिदस्तान्तकी हि सः।" २६१७ श्लीक।</small></poem>}}
लोग जब अन्नकामनापर एक-दूसरेको भक्षण करने लगे, तब उससे सर्वभूत-विनाशक अधर्मकी उत्पत्ति हुई। इनकी भार्याका नाम निर्ऋति था। निर्ऋतिके पुत्र होनेसे ही राक्षस नैर्ऋत कहाते हैं। इनके तीन पुत्र अतिशय भयङ्कर हैं, जो सर्वदा ही पापकर्म में रत रहते हैं। उनका नाम भय, महाभय और प्राणिगण-विनाशकारी मृत्यु है। मृत्युके भार्या किंवा पुत्र कोई भी नहीं, जिसके कारण वह सर्वान्त-कारी होता है।
हमारे शास्त्रकार पुनर्जन्म मानते थे। अब कोई पुनर्जन्म मानता और कोई नहीं भी मानता है। मनु प्रभृति ऋषियोंका मत यही है, कि शास्त्रमें जैसा लिखा, उसके अनुरूप आचरण न करने अर्थात् अधर्माचरण करनेसे मनुष्य जन्मजन्मान्तर अधमयोनि पाता है। शास्त्रमें यह निर्दिष्ट है, कि कौन-कौन अधर्म करनेसे किस-किस योनिमें जन्म होता है,—
{{Block center|<poem><small>"श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोऽजाविमृगपचिणाम्।
चण्डालपुक्कशानाञ्च ब्रह्महा योनिसृच्छति॥ ५५
कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजाश्चैव पचिणाम्।
{{Gap}}स्राणाञ्चैव सत्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत्॥ ५६
लू ताहिरटानाञ्च तिरयांचाम्बुचारिणाम्।
हिंस्राणाञ्च पिशाचाणां स्तेनो विप्रः सहस्रशः॥ ५७
तृणगुल्मलतानाञ्च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि।
क्रूरकर्म्मकृताञ्चै व शतशो गुरुतल्पगः॥ ५८
हिंसा भवन्ति क्रव्यादाः कृमयोऽभक्ष्राभक्षिणः।
परस्परादिनस्तेनाः प्रेतान्त्यस्त्रीनिषेविणः॥ ५९
संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम्।
अपहृतं च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः॥ ६०
मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः।
विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु॥ ६१
धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कास्यं हंसो जलं प्लवः।
मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम्॥ ६२
मांसं गृध्रो वपां मद्गुस्तेलं तैलपकः खगः।
चीरीवाकस्तु लवणं वलाका शकुनिर्दधि॥ ६३
कौषे यं तितिरिर्हृत्वा क्षौमं हत्वा तु दर्दुरः।
कार्पासतान्तरं क्रौञ्चो गोधा गां वाग्गुदो गुड़म्॥ ६४</small></poem>}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude>{{Dhr|}}
{{Left|८८|4em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३५७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३५०'''|'''अधर्म'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{block center|<poem><small>छुच्छुन्दरिः शुभान् गन्धान् पत्रशाकन्तु वर्हिणः।
श्वावित् कृतान्नं विविधमकतान्नन्तु शल्यकः॥ ६५
बको भवति हृत्वाग्निं गृहकारी ह्यु पन्करम्।
रक्तानि हत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः॥ ६६
वृको मगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूमन्तु मर्कटः।
स्त्रीमृक्षस्तोकको बारि यानान्युष्ट्र पशृनजः॥" ६७</poem></small>}}
{{Right|<small>मनुसंहिता ११ अध्याय।</small>}}
ब्रह्महत्याके लिये महापातकी पहले शत-शत वत्सर नरकभोग करते हैं। नरक भोगके बाद जन्मकी बात इसतरह लिखी गई है,—
'ब्रह्महत्याकारी कुत्ते, सूअर, गधे, ऊंट, भैंस, बकरे, भेड़े, मृग, पक्षी, चण्डाल और निषादसे ले शूद्राजात पुक्कश तककी योनिमें जन्मग्रहण करते हैं। (पापकी मात्राके अनुसार क्रमसे सभी योनियोंमें जन्म हो सकता है।)। ब्राह्मण सुरापान करनेसे कृमि, कीट, पतङ्ग, विष्ठाभक्षक पक्षी और (व्याघ्रादि) हिंस्रक प्राणीकी योनिमें उत्पन्न होता है। ब्राह्मण यदि चोर हुआ, (कुल्लूकभट्टके मतसे सोना चुराया) तो मकड़े, सांप, कुकलास, जलचर पक्षी, कुम्भीरादि और पिशाचादिकी योनिमें जन्म लेता है। गुरुपत्नीसे गमन-करनेपर तृण, गुल्म, लता, कच्चा मांसखा-नेवाले पशुपक्षी, दन्तशाली सिंहादि
और क्रूरकर्मशील व्याघ्रादिकी योनिमें शतबार जन्म लेना पड़ता है। जो जीवहिंसा करता, वह कच्चामांस खानेवाला जन्तु होता है। अभक्ष्य द्रव्यको भोजन करनेवाला कृमि योनिमें उत्पन्न होता है। चोर (कुल्लूकभट्टके मतसे चोर जो महापातकी नहीं) परस्परके मांसभक्षक बन जन्मते हैं। चण्डालादि अन्त्यज जातिकी स्त्रीसे गमन करनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है। (प्रेताख्य प्राणिविशेष, कुल्लूकभट्ट)। पतित व्यक्तिका संसर्ग रहने, परस्त्रीगमन करने और ब्राह्मणका धन (सुवर्ण भिन्न) चुरानेसे ब्रह्मराक्षस बनना पड़ता है। जो मनुष्य लोभवशतः मणि, मुक्ता, प्रबाल और रत्नको अपहरण करता, वह सुवर्णकार होता है (कोई-कोई कहते हैं, कि वह हेमकार पक्षियोनिमें जन्मग्रहण करता है)। धान चुरानेसे मनुष्य इन्दुर हो जाता है। जो कांसे-
को चोरी करता, उसे हंस बनना पड़ता है। जलका चोर प्लव नामक पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। मधु चुरानेवाला डांस होगा। दूधके तस्करको काककी योनिमें जन्म दिया जाता है। तैलादि रसको अपहरण करनेसे कुत्ता बनना पड़ता है। घृतका चोर नेवला होगा। मांस चुरानेवाला गृध्रकीयोनिमें जन्म लेगा। जो चर्बीकी चोरी करता, उसे मछलीको ्यो्य्यो् निमें उत्पन्न होना पड़ता है। तेल
चुरानेवाला पतङ्ग बनेगा।
लवणको अपहरण
"करनेसे चौरीवाक कोट बनना पड़ता है। दधि
चुरानेवाला क्षुद्र वक पक्षी होता है। कौषय
वस्त्र चुरानेसे तितलो होना पड़ेगा। क्षोमवस्त्रका
तस्कर भेक बनेगा। कार्पास वस्त्रकी चोरी करनेसे
मनुष्य क्रौञ्च पक्षी होता है। मवेशी चुरानेवाला
गोधेको योनिमें जन्म लेता है। गुड़ चुरानेसे चिमगा-
दड़ होना होगा। सुगन्धि द्रव्य चुरानेवाला छळू-
दरका जन्म धारण करता है। पत्रशाकादि चुरानेसे
मयूर होगा। सिद्धान्नको हरण करनेवाला खावित्
और अपक्कानको हरण करनेवाला शल्धक बनता
आग चुरानेसे मनुष्य वकको योनिमें जन्म
गृहका उपकरण द्रव्य चुरानेवाला मृत्तिकादि
द्वारा ग्टहनिर्माणकारी पक्षवान् कोट बनता है। जो
रक्तवस्त्र चुराता, वह चकोर पक्षी होता है।
मृग-हस्ती चुरानेसे लकड़बग्घेको योनिमें जन्म मिलता
है। घोड़ा चुरानेवाला व्याघ्र होगा। फलमूलका
चोर मर्कटका जन्म पाता है। स्त्रीको चोरी करनेसे
भालुको योनिमें जन्म लेना पड़ता है।
जलका चोर
चातक पक्षी होगा। यानको हरण करनेवाला ऊंट
बनता है। अन्यान्य पशु चुरानेसे अजको योनिमें जन्म
मिलता है।
जान पड़ता है, कि जो जन्तु जो-जो द्रव्य खाकर
प्राणधारण करता, अनेकस्थलमें तद्रूप द्रव्य को हरण
करनेसे मनुष्य उसो प्रकारके किसी जन्तुको योनिमें
उत्पन्न होता है। ऋषियोंने पापवाले फलभोगके
लिये इसी नियमसे व्यवस्था की है। अनेकस्थलमें
फिर यह नियम नहीं भी है। शरीरके कर्ण, वास-
लेगा।
होती है।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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श्वावित् कृतान्नं विविधमकतान्नन्तु शल्यकः॥ ६५
बको भवति हृत्वाग्निं गृहकारी ह्यु पन्करम्।
रक्तानि हत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः॥ ६६
वृको मगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूमन्तु मर्कटः।
स्त्रीमृक्षस्तोकको बारि यानान्युष्ट्र पशृनजः॥" ६७</poem></small>}}
{{Right|<small>मनुसंहिता ११ अध्याय।</small>}}
ब्रह्महत्याके लिये महापातकी पहले शत-शत वत्सर नरकभोग करते हैं। नरक भोगके बाद जन्मकी बात इसतरह लिखी गई है,—
'ब्रह्महत्याकारी कुत्ते, सूअर, गधे, ऊंट, भैंस, बकरे, भेड़े, मृग, पक्षी, चण्डाल और निषादसे ले शूद्राजात पुक्कश तककी योनिमें जन्मग्रहण करते हैं। (पापकी मात्राके अनुसार क्रमसे सभी योनियोंमें जन्म हो सकता है।)। ब्राह्मण सुरापान करनेसे कृमि, कीट, पतङ्ग, विष्ठाभक्षक पक्षी और (व्याघ्रादि) हिंस्रक प्राणीकी योनिमें उत्पन्न होता है। ब्राह्मण यदि चोर हुआ, (कुल्लूकभट्टके मतसे सोना चुराया) तो मकड़े, सांप, कुकलास, जलचर पक्षी, कुम्भीरादि और पिशाचादिकी योनिमें जन्म लेता है। गुरुपत्नीसे गमन-करनेपर तृण, गुल्म, लता, कच्चा मांसखा-नेवाले पशुपक्षी, दन्तशाली सिंहादि
और क्रूरकर्मशील व्याघ्रादिकी योनिमें शतबार जन्म लेना पड़ता है। जो जीवहिंसा करता, वह कच्चामांस खानेवाला जन्तु होता है। अभक्ष्य द्रव्यको भोजन करनेवाला कृमि योनिमें उत्पन्न होता है। चोर (कुल्लूकभट्टके मतसे चोर जो महापातकी नहीं) परस्परके मांसभक्षक बन जन्मते हैं। चण्डालादि अन्त्यज जातिकी स्त्रीसे गमन करनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है। (प्रेताख्य प्राणिविशेष, कुल्लूकभट्ट)। पतित व्यक्तिका संसर्ग रहने, परस्त्रीगमन करने और ब्राह्मणका धन (सुवर्ण भिन्न) चुरानेसे ब्रह्मराक्षस बनना पड़ता है। जो मनुष्य लोभवशतः मणि, मुक्ता, प्रबाल और रत्नको अपहरण करता, वह सुवर्णकार होता है (कोई-कोई कहते हैं, कि वह हेमकार पक्षियोनिमें जन्मग्रहण करता है)। धान चुरानेसे मनुष्य इन्दुर हो जाता है। जो कांसे-
को चोरी करता, उसे हंस बनना पड़ता है। जलका चोर प्लव नामक पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। मधु चुरानेवाला डांस होगा। दूधके तस्करको काककी योनिमें जन्म दिया जाता है। तैलादि रसको अपहरण करनेसे कुत्ता बनना पड़ता है। घृतका चोर नेवला होगा। मांस चुरानेवाला गृध्रकीयोनिमें जन्म लेगा। जो चर्बीकी चोरी करता, उसे मछलीकी योनिमें उत्पन्न होना पड़ता है। तेल चुरानेवाला पतङ्ग बनेगा। लवणको अपहरण करनेसे चीरीवाक कीट बनना पड़ता है। दधि चुरानेवाला क्षुद्र वक पक्षी होता है। कौषय वस्त्र चुरानेसे तितली होना पड़ेगा। क्षौमवस्त्रका तस्कर भेक बनेगा। कार्पास वस्त्रकी चोरी करनेसे मनुष्य क्रौञ्च पक्षी होता है। मवेशी चुरानेवाला गोधेकी योनिमें जन्म लेता है। गुड़ चुरानेसे चिमगादड़ होना होगा। सुगन्धि द्रव्य चुरानेवाला छछूंदरका जन्म धारण करता है। पत्रशाकादि चुरानेसे मयूर होगा। सिद्धान्नको हरण करनेवाला श्वावित् और अपक्कान्नको हरण करनेवाला शल्धक बनता है। आग चुरानेसे मनुष्य वककी योनिमें जन्म गृहका उपकरण द्रव्य चुरानेवाला मृत्तिकादि द्वारा गृहनिर्माणकारी पक्षवान् कोट बनता है। जो रक्तवस्त्र चुराता, वह चकोर पक्षी होता है। मृग-हस्ती चुरानेसे लकड़बग्घेकी योनिमें जन्म मिलता
है। घोड़ा चुरानेवाला व्याघ्र होगा। फलमूलका
चोर मर्कटका जन्म पाता है। स्त्रीको चोरी करनेसे
भालुको योनिमें जन्म लेना पड़ता है।
जलका चोर
चातक पक्षी होगा। यानको हरण करनेवाला ऊंट
बनता है। अन्यान्य पशु चुरानेसे अजको योनिमें जन्म
मिलता है।
जान पड़ता है, कि जो जन्तु जो-जो द्रव्य खाकर
प्राणधारण करता, अनेकस्थलमें तद्रूप द्रव्य को हरण
करनेसे मनुष्य उसो प्रकारके किसी जन्तुको योनिमें
उत्पन्न होता है। ऋषियोंने पापवाले फलभोगके
लिये इसी नियमसे व्यवस्था की है। अनेकस्थलमें
फिर यह नियम नहीं भी है। शरीरके कर्ण, वास-
लेगा।
होती है।<noinclude></noinclude>
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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श्वावित् कृतान्नं विविधमकतान्नन्तु शल्यकः॥ ६५
बको भवति हृत्वाग्निं गृहकारी ह्यु पन्करम्।
रक्तानि हत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः॥ ६६
वृको मगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूमन्तु मर्कटः।
स्त्रीमृक्षस्तोकको बारि यानान्युष्ट्र पशृनजः॥" ६७</poem></small>}}
{{Right|<small>मनुसंहिता ११ अध्याय।</small>}}
ब्रह्महत्याके लिये महापातकी पहले शत-शत वत्सर नरकभोग करते हैं। नरक भोगके बाद जन्मकी बात इसतरह लिखी गई है,—
'ब्रह्महत्याकारी कुत्ते, सूअर, गधे, ऊंट, भैंस, बकरे, भेड़े, मृग, पक्षी, चण्डाल और निषादसे ले शूद्राजात पुक्कश तककी योनिमें जन्मग्रहण करते हैं। (पापकी मात्राके अनुसार क्रमसे सभी योनियोंमें जन्म हो सकता है।)। ब्राह्मण सुरापान करनेसे कृमि, कीट, पतङ्ग, विष्ठाभक्षक पक्षी और (व्याघ्रादि) हिंस्रक प्राणीकी योनिमें उत्पन्न होता है। ब्राह्मण यदि चोर हुआ, (कुल्लूकभट्टके मतसे सोना चुराया) तो मकड़े, सांप, कुकलास, जलचर पक्षी, कुम्भीरादि और पिशाचादिकी योनिमें जन्म लेता है। गुरुपत्नीसे गमन-करनेपर तृण, गुल्म, लता, कच्चा मांसखा-नेवाले पशुपक्षी, दन्तशाली सिंहादि
और क्रूरकर्मशील व्याघ्रादिकी योनिमें शतबार जन्म लेना पड़ता है। जो जीवहिंसा करता, वह कच्चामांस खानेवाला जन्तु होता है। अभक्ष्य द्रव्यको भोजन करनेवाला कृमि योनिमें उत्पन्न होता है। चोर (कुल्लूकभट्टके मतसे चोर जो महापातकी नहीं) परस्परके मांसभक्षक बन जन्मते हैं। चण्डालादि अन्त्यज जातिकी स्त्रीसे गमन करनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है। (प्रेताख्य प्राणिविशेष, कुल्लूकभट्ट)। पतित व्यक्तिका संसर्ग रहने, परस्त्रीगमन करने और ब्राह्मणका धन (सुवर्ण भिन्न) चुरानेसे ब्रह्मराक्षस बनना पड़ता है। जो मनुष्य लोभवशतः मणि, मुक्ता, प्रबाल और रत्नको अपहरण करता, वह सुवर्णकार होता है (कोई-कोई कहते हैं, कि वह हेमकार पक्षियोनिमें जन्मग्रहण करता है)। धान चुरानेसे मनुष्य इन्दुर हो जाता है। जो कांसे-
को चोरी करता, उसे हंस बनना पड़ता है। जलका चोर प्लव नामक पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। मधु चुरानेवाला डांस होगा। दूधके तस्करको काककी योनिमें जन्म दिया जाता है। तैलादि रसको अपहरण करनेसे कुत्ता बनना पड़ता है। घृतका चोर नेवला होगा। मांस चुरानेवाला गृध्रकीयोनिमें जन्म लेगा। जो चर्बीकी चोरी करता, उसे मछलीकी योनिमें उत्पन्न होना पड़ता है। तेल चुरानेवाला पतङ्ग बनेगा। लवणको अपहरण करनेसे चीरीवाक कीट बनना पड़ता है। दधि चुरानेवाला क्षुद्र वक पक्षी होता है। कौषय वस्त्र चुरानेसे तितली होना पड़ेगा। क्षौमवस्त्रका तस्कर भेक बनेगा। कार्पास वस्त्रकी चोरी करनेसे मनुष्य क्रौञ्च पक्षी होता है। मवेशी चुरानेवाला गोधेकी योनिमें जन्म लेता है। गुड़ चुरानेसे चिमगादड़ होना होगा। सुगन्धि द्रव्य चुरानेवाला छछूंदरका जन्म धारण करता है। पत्रशाकादि चुरानेसे मयूर होगा। सिद्धान्नको हरण करनेवाला श्वावित् और अपक्कान्नको हरण करनेवाला शल्धक बनता है। आग चुरानेसे मनुष्य वककी योनिमें जन्म गृहका उपकरण द्रव्य चुरानेवाला मृत्तिकादि द्वारा गृहनिर्माणकारी पक्षवान् कोट बनता है। जो रक्तवस्त्र चुराता, वह चकोर पक्षी होता है। मृग-हस्ती चुरानेसे लकड़बग्घेकी योनिमें जन्म मिलता है। घोड़ा चुरानेवाला व्याघ्र होगा। फलमूलका चोर मर्कटका जन्म पाता है। स्त्रीकी चोरी करनेसे भालुकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। जलका चोर चातक पक्षी होगा। यानकी हरण करनेवाला ऊंट बनता है। अन्यान्य पशु चुरानेसे अजकी योनिमें जन्म मिलता है।
जान पड़ता है, कि जो जन्तु जो-जो द्रव्य खाकर प्राणधारण करता, अनेकस्थलमें तद्रूप द्रव्य को हरण करनेसे मनुष्य उसी प्रकारके किसी जन्तुकी योनिमें उत्पन्न होता है। ऋषियोंने पापवाले फलभोगके लिये इसी नियमसे व्यवस्था की है। अनेकस्थलमें फिर यह नियमसे नहीं भी है। शरीरके कर्ण, वास-<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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श्वावित् कृतान्नं विविधमकतान्नन्तु शल्यकः॥ ६५
बको भवति हृत्वाग्निं गृहकारी ह्यु पन्करम्।
रक्तानि हत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः॥ ६६
वृको मगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूमन्तु मर्कटः।
स्त्रीमृक्षस्तोकको बारि यानान्युष्ट्र पशृनजः॥" ६७</poem></small>}}
{{Right|<small>मनुसंहिता ११ अध्याय।</small>}}
ब्रह्महत्याके लिये महापातकी पहले शत-शत वत्सर नरकभोग करते हैं। नरक भोगके बाद जन्मकी बात इसतरह लिखी गई है,—
'ब्रह्महत्याकारी कुत्ते, सूअर, गधे, ऊंट, भैंस, बकरे, भेड़े, मृग, पक्षी, चण्डाल और निषादसे ले शूद्राजात पुक्कश तककी योनिमें जन्मग्रहण करते हैं। (पापकी मात्राके अनुसार क्रमसे सभी योनियोंमें जन्म हो सकता है।)। ब्राह्मण सुरापान करनेसे कृमि, कीट, पतङ्ग, विष्ठाभक्षक पक्षी और (व्याघ्रादि) हिंस्रक प्राणीकी योनिमें उत्पन्न होता है। ब्राह्मण यदि चोर हुआ, (कुल्लूकभट्टके मतसे सोना चुराया) तो मकड़े, सांप, कुकलास, जलचर पक्षी, कुम्भीरादि और पिशाचादिकी योनिमें जन्म लेता है। गुरुपत्नीसे गमन-करनेपर तृण, गुल्म, लता, कच्चा मांसखा-नेवाले पशुपक्षी, दन्तशाली सिंहादि
और क्रूरकर्मशील व्याघ्रादिकी योनिमें शतबार जन्म लेना पड़ता है। जो जीवहिंसा करता, वह कच्चामांस खानेवाला जन्तु होता है। अभक्ष्य द्रव्यको भोजन करनेवाला कृमि योनिमें उत्पन्न होता है। चोर (कुल्लूकभट्टके मतसे चोर जो महापातकी नहीं) परस्परके मांसभक्षक बन जन्मते हैं। चण्डालादि अन्त्यज जातिकी स्त्रीसे गमन करनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है। (प्रेताख्य प्राणिविशेष, कुल्लूकभट्ट)। पतित व्यक्तिका संसर्ग रहने, परस्त्रीगमन करने और ब्राह्मणका धन (सुवर्ण भिन्न) चुरानेसे ब्रह्मराक्षस बनना पड़ता है। जो मनुष्य लोभवशतः मणि, मुक्ता, प्रबाल और रत्नको अपहरण करता, वह सुवर्णकार होता है (कोई-कोई कहते हैं, कि वह हेमकार पक्षियोनिमें जन्मग्रहण करता है)। धान चुरानेसे मनुष्य इन्दुर हो जाता है। जो कांसे-<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>की चोरी करता, उसे हंस बनना पड़ता है। जलका चोर प्लव नामक पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। मधु चुरानेवाला डांस होगा। दूधके तस्करको काककी योनिमें जन्म दिया जाता है। तैलादि रसको अपहरण करनेसे कुत्ता बनना पड़ता है। घृतका चोर नेवला होगा। मांस चुरानेवाला गृध्रकीयोनिमें जन्म लेगा। जो चर्बीकी चोरी करता, उसे मछलीकी योनिमें उत्पन्न होना पड़ता है। तेल चुरानेवाला पतङ्ग बनेगा। लवणको अपहरण करनेसे चीरीवाक कीट बनना पड़ता है। दधि चुरानेवाला क्षुद्र वक पक्षी होता है। कौषय वस्त्र चुरानेसे तितली होना पड़ेगा। क्षौमवस्त्रका तस्कर भेक बनेगा। कार्पास वस्त्रकी चोरी करनेसे मनुष्य क्रौञ्च पक्षी होता है। मवेशी चुरानेवाला गोधेकी योनिमें जन्म लेता है। गुड़ चुरानेसे चिमगादड़ होना होगा। सुगन्धि द्रव्य चुरानेवाला छछूंदरका जन्म धारण करता है। पत्रशाकादि चुरानेसे मयूर होगा। सिद्धान्नको हरण करनेवाला श्वावित् और अपक्कान्नको हरण करनेवाला शल्धक बनता है। आग चुरानेसे मनुष्य वककी योनिमें जन्म गृहका उपकरण द्रव्य चुरानेवाला मृत्तिकादि द्वारा गृहनिर्माणकारी पक्षवान् कोट बनता है। जो रक्तवस्त्र चुराता, वह चकोर पक्षी होता है। मृग-हस्ती चुरानेसे लकड़बग्घेकी योनिमें जन्म मिलता है। घोड़ा चुरानेवाला व्याघ्र होगा। फलमूलका चोर मर्कटका जन्म पाता है। स्त्रीकी चोरी करनेसे भालुकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। जलका चोर चातक पक्षी होगा। यानकी हरण करनेवाला ऊंट बनता है। अन्यान्य पशु चुरानेसे अजकी योनिमें जन्म मिलता है।
जान पड़ता है, कि जो जन्तु जो-जो द्रव्य खाकर प्राणधारण करता, अनेकस्थलमें तद्रूप द्रव्य को हरण करनेसे मनुष्य उसी प्रकारके किसी जन्तुकी योनिमें उत्पन्न होता है। ऋषियोंने पापवाले फलभोगके लिये इसी नियमसे व्यवस्था की है। अनेकस्थलमें फिर यह नियमसे नहीं भी है। शरीरके कर्ण, वास-<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३५०'''|'''अधर्म'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{block center|<poem><small>छुच्छुन्दरिः शुभान् गन्धान् पत्रशाकन्तु वर्हिणः।
श्वावित् कृतान्नं विविधमकतान्नन्तु शल्यकः॥ ६५
बको भवति हृत्वाग्निं गृहकारी ह्यु पन्करम्।
रक्तानि हत्वा वासांसि जायते जीवजीवकः॥ ६६
वृको मगेभं व्याघ्रोऽश्वं फलमूमन्तु मर्कटः।
स्त्रीमृक्षस्तोकको बारि यानान्युष्ट्र पशृनजः॥" ६७</poem></small>}}
{{Right|<small>मनुसंहिता ११ अध्याय।</small>}}
ब्रह्महत्याके लिये महापातकी पहले शत-शत वत्सर नरकभोग करते हैं। नरक भोगके बाद जन्मकी बात इसतरह लिखी गई है,—
'ब्रह्महत्याकारी कुत्ते, सूअर, गधे, ऊंट, भैंस, बकरे, भेड़े, मृग, पक्षी, चण्डाल और निषादसे ले शूद्राजात पुक्कश तककी योनिमें जन्मग्रहण करते हैं। (पापकी मात्राके अनुसार क्रमसे सभी योनियोंमें जन्म हो सकता है।)। ब्राह्मण सुरापान करनेसे कृमि, कीट, पतङ्ग, विष्ठाभक्षक पक्षी और (व्याघ्रादि) हिंस्रक प्राणीकी योनिमें उत्पन्न होता है। ब्राह्मण यदि चोर हुआ, (कुल्लूकभट्टके मतसे सोना चुराया) तो मकड़े, सांप, कुकलास, जलचर पक्षी, कुम्भीरादि और पिशाचादिकी योनिमें जन्म लेता है। गुरुपत्नीसे गमन-करनेपर तृण, गुल्म, लता, कच्चा मांसखा-नेवाले पशुपक्षी, दन्तशाली सिंहादि
और क्रूरकर्मशील व्याघ्रादिकी योनिमें शतबार जन्म लेना पड़ता है। जो जीवहिंसा करता, वह कच्चामांस खानेवाला जन्तु होता है। अभक्ष्य द्रव्यको भोजन करनेवाला कृमि योनिमें उत्पन्न होता है। चोर (कुल्लूकभट्टके मतसे चोर जो महापातकी नहीं) परस्परके मांसभक्षक बन जन्मते हैं। चण्डालादि अन्त्यज जातिकी स्त्रीसे गमन करनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है। (प्रेताख्य प्राणिविशेष, कुल्लूकभट्ट)। पतित व्यक्तिका संसर्ग रहने, परस्त्रीगमन करने और ब्राह्मणका धन (सुवर्ण भिन्न) चुरानेसे ब्रह्मराक्षस बनना पड़ता है। जो मनुष्य लोभवशतः मणि, मुक्ता, प्रबाल और रत्नको अपहरण करता, वह सुवर्णकार होता है (कोई-कोई कहते हैं, कि वह हेमकार पक्षियोनिमें जन्मग्रहण करता है)। धान चुरानेसे मनुष्य इन्दुर हो जाता है। जो कांसे-<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>की चोरी करता, उसे हंस बनना पड़ता है। जलका चोर प्लव नामक पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है। मधु चुरानेवाला डांस होगा। दूधके तस्करको काककी योनिमें जन्म दिया जाता है। तैलादि रसको अपहरण करनेसे कुत्ता बनना पड़ता है। घृतका चोर नेवला होगा। मांस चुरानेवाला गृध्रकीयोनिमें जन्म लेगा। जो चर्बीकी चोरी करता, उसे मछलीकी योनिमें उत्पन्न होना पड़ता है। तेल चुरानेवाला पतङ्ग बनेगा। लवणको अपहरण करनेसे चीरीवाक कीट बनना पड़ता है। दधि चुरानेवाला क्षुद्र वक पक्षी होता है। कौषय वस्त्र चुरानेसे तितली होना पड़ेगा। क्षौमवस्त्रका तस्कर भेक बनेगा। कार्पास वस्त्रकी चोरी करनेसे मनुष्य क्रौञ्च पक्षी होता है। मवेशी चुरानेवाला गोधेकी योनिमें जन्म लेता है। गुड़ चुरानेसे चिमगादड़ होना होगा। सुगन्धि द्रव्य चुरानेवाला छछूंदरका जन्म धारण करता है। पत्रशाकादि चुरानेसे मयूर होगा। सिद्धान्नको हरण करनेवाला श्वावित् और अपक्कान्नको हरण करनेवाला शल्धक बनता है। आग चुरानेसे मनुष्य वककी योनिमें जन्म गृहका उपकरण द्रव्य चुरानेवाला मृत्तिकादि द्वारा गृहनिर्माणकारी पक्षवान् कोट बनता है। जो रक्तवस्त्र चुराता, वह चकोर पक्षी होता है। मृग-हस्ती चुरानेसे लकड़बग्घेकी योनिमें जन्म मिलता है। घोड़ा चुरानेवाला व्याघ्र होगा। फलमूलका चोर मर्कटका जन्म पाता है। स्त्रीकी चोरी करनेसे भालुकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। जलका चोर चातक पक्षी होगा। यानकी हरण करनेवाला ऊंट बनता है। अन्यान्य पशु चुरानेसे अजकी योनिमें जन्म मिलता है।
जान पड़ता है, कि जो जन्तु जो-जो द्रव्य खाकर प्राणधारण करता, अनेकस्थलमें तद्रूप द्रव्य को हरण करनेसे मनुष्य उसी प्रकारके किसी जन्तुकी योनिमें उत्पन्न होता है। ऋषियोंने पापवाले फलभोगके लिये इसी नियमसे व्यवस्था की है। अनेकस्थलमें फिर यह नियमसे नहीं भी है। शरीरके कर्ण, वास-<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३५८
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधर्म'''|'''३५१'''}}</noinclude>स्थान, स्वभाव, गन्ध प्रभृतिके प्रति भी दृष्टि रखकर शान्तिकी व्यवस्था की गई; जैसे,—धान्य चुराने-वाला चूहा होता है। यहां प्रयोजन यह है, कि चूहा धान्य खाकर प्राणधारण करता है। मांस चुरानेसे गृध्र होता, तैल चुरानेसे पतङ्ग बनता और अभक्ष्यको भक्षण करनेसे कमियोनिमें मनुष्य जन्म लेता है—इत्यादि स्थलमें खाद्यद्रव्य के प्रति दृष्टि रखकर शान्तिकी व्यवस्था बताई गई है। मालूम होता है, कि सिद्धान्न चुरानेसे श्वावित्, कासेको हरण करनेसे हंस और कार्पासवस्त्र चुरा लेनेसे बक बनता है—इन सकल स्थलोंमें चोरी गई हुई चीज़के रङ्गसे जन्तुकी देहके वर्णका रङ्ग मिलाकर शान्तिकी व्यवस्था लिखी गई है। यान चुरानेसे ऊंट होता अर्थात् गाड़ी चुरानेके कारण मनुष्यको जन्मान्तरमें बोझ ढोना पड़ेगा ; इसीसे उसके पक्ष में उष्ट्र-जन्म विहित हुआ है। फिर किसी-किसी स्थलमें कुछ भी मर्म समझ नहीं पड़ता; जैसे,—चर्बी चुरानेसे मछली बनना पड़ता है। पूर्वकालमें आग और पानी मनुष्यकी दुर्लभ सामग्री थी। कारण, कितने ही कष्टसे अरणि घिसने पर आग निकलती थी; इससे आग सुलभ द्रव्य न था। मालूम होता है, कि उस समय इतना जलाशय नहीं रहा। इससे जल भी अति दुर्लभ समझा जाता था। यही कारण है, कि आग-पानी
लेनेसे लोग चोर कहाते थे। चोरी करनेसे ही पाप होता है। किन्तु आजकल आग-पानी लेना चोरी करनेमें दाख़िल नहीं।
आजकल समग्र सभ्यदेशमें प्रधान रूपसे नीतिशास्त्रका अनुशीलन किया जाता है। यह बात किसीसे समझाकर नहीं बताना पड़ती, कि किसे धर्म और किसे अधर्म कहते हैं। कूट तर्क छोड़ देनेसे सभी लोग अपने मनमें धर्माधर्मको विचार सकते हैं। ज्ञानवान् व्यक्तिका मन ही सद्गुरु है, जिसे वेद, बाइबिल और क़ुरान सब कुछ बताते हैं। किन्तु कूट तर्क चलानेसे बड़े गड़बड़ में पड़ना होता है। ऐसे समय धर्माधर्मका सूक्ष्म जान लेना कठिन हो जाता है। रूसके निरस्तिवादी (Nihilists)
कहतें हैं, कि हिताहित-ज्ञान, धर्माधर्म, भला-बुरा सभी शिक्षाका फल है। वास्तविक कुछ जान नहीं पड़ता। बालककालसे जिसे जैसे सिखाओ और पढ़ाओगे, वह वैसे ही सीखे और समझेगा; उसके हृदयमें वैसे ही एक दृढ़ संस्कार होते रहेगा। ऐसा संस्कार एक देशके लोगोंकी दृष्टिमें तो अच्छा
जंचेगा ; किन्तु सम्भवतः अन्य देशके लोग उसे देख कांप जायेंगे। इसीसे यह ठीक नहीं, कि क्या भला और क्या बुरा है,—
"Conscience is a mere matter of education. A
Christian living in Europe, who has murdered any body with cunning and premeditation, usually experiences a certain kind of remorse. But a Red Indian, who is every bit as much a man of flesh and blood, rejoices when he is able to surprise and slay a defenceless enemy. His conscience in no wise suffers from the act, for he has been taught from earliest youth that the more scalps he possesses, the better he will be received in the
happy hunting grounds of the great Manitou'.
(See Nineteenth Century, No. 35. January 1880.)
'हिताहित-ज्ञान, सिवा शिक्षावाले फलके और कुछ भी नहीं। किसी युरोपीय खृष्ट-धर्मावलम्बीके सोच-विचारकर किसीको मार डालनेपर, अनुतापसे उसका हृदय जला करता है। किन्तु अमेरिकाके गौरवर्ण इण्डियनों का भी तो शरीर इसी रक्तमांससे बना है, तथापि निराश्रय शत्रु को मार सकनेसे उनके आह्लादका ठिकाना नहीं रहता। ऐसे निष्ठुर कार्यमें उन्हें कुछ भी परिताप नहीं होता। परिताप न होनेका कारण यही है, कि शैशवावस्थासे वह ऐसी ही शिक्षा पाते रहे हैं,—जो व्यक्ति मनुष्य मार अधिक मुण्ड इकट्ठे कर सकता, वही मणितौ उपदेवताके मृगया क्षेत्रमें अधिक आदर पाता है।'
रूसके निरस्तिवादी यह बात इस तात्पर्य से कहते हैं, कि मनुष्य चिरकालसे जैसी शिक्षा पाता, हृदयमें वैसी ही एक धारणा जम जाती है। इस पृथिवी पर प्रबल व्यक्ति केवल अन्याय और अत्याचार करते हैं, इसीसे लोगोंको दुःखके सिवा कहीं भी सुख नहीं देख पड़ता। दुःख पड़नेपर प्रबल लोगोंकी ज्वालासे उसका प्रतीकार नहीं देखाता। इसीसे मनुष्य धर्मा-
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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लेनेसे लोग चोर कहाते थे। चोरी करनेसे ही पाप होता है। किन्तु आजकल आग-पानी लेना चोरी करनेमें दाख़िल नहीं।
आजकल समग्र सभ्यदेशमें प्रधान रूपसे नीतिशास्त्रका अनुशीलन किया जाता है। यह बात किसीसे समझाकर नहीं बताना पड़ती, कि किसे धर्म और किसे अधर्म कहते हैं। कूट तर्क छोड़ देनेसे सभी लोग अपने मनमें धर्माधर्मको विचार सकते हैं। ज्ञानवान् व्यक्तिका मन ही सद्गुरु है, जिसे वेद, बाइबिल और क़ुरान सब कुछ बताते हैं। किन्तु कूट तर्क चलानेसे बड़े गड़बड़ में पड़ना होता है। ऐसे समय धर्माधर्मका सूक्ष्म जान लेना कठिन हो जाता है। रूसके निरस्तिवादी (Nihilists)
कहतें हैं, कि हिताहित-ज्ञान, धर्माधर्म, भला-बुरा सभी शिक्षाका फल है। वास्तविक कुछ जान नहीं पड़ता। बालककालसे जिसे जैसे सिखाओ और पढ़ाओगे, वह वैसे ही सीखे और समझेगा; उसके हृदयमें वैसे ही एक दृढ़ संस्कार होते रहेगा। ऐसा संस्कार एक देशके लोगोंकी दृष्टिमें तो अच्छा
जंचेगा ; किन्तु सम्भवतः अन्य देशके लोग उसे देख कांप जायेंगे। इसीसे यह ठीक नहीं, कि क्या भला और क्या बुरा है,—
"Conscience is a mere matter of education. A
Christian living in Europe, who has murdered any body with cunning and premeditation, usually experiences a certain kind of remorse. But a Red Indian, who is every bit as much a man of flesh and blood, rejoices when he is able to surprise and slay a defenceless enemy. His conscience in no wise suffers from the act, for he has been taught from earliest youth that the more scalps he possesses, the better he will be received in the
happy hunting grounds of the great Manitou'.
(See Nineteenth Century, No. 35. January 1880.)
'हिताहित-ज्ञान, सिवा शिक्षावाले फलके और कुछ भी नहीं। किसी युरोपीय खृष्ट-धर्मावलम्बीके सोच-विचारकर किसीको मार डालनेपर, अनुतापसे उसका हृदय जला करता है। किन्तु अमेरिकाके गौरवर्ण इण्डियनों का भी तो शरीर इसी रक्तमांससे बना है, तथापि निराश्रय शत्रु को मार सकनेसे उनके आह्लादका ठिकाना नहीं रहता। ऐसे निष्ठुर कार्यमें उन्हें कुछ भी परिताप नहीं होता। परिताप न होनेका कारण यही है, कि शैशवावस्थासे वह ऐसी ही शिक्षा पाते रहे हैं,—जो व्यक्ति मनुष्य मार अधिक मुण्ड इकट्ठे कर सकता, वही मणितौ उपदेवताके मृगया क्षेत्रमें अधिक आदर पाता है।'
रूसके निरस्तिवादी यह बात इस तात्पर्य से कहते हैं, कि मनुष्य चिरकालसे जैसी शिक्षा पाता, हृदयमें वैसी ही एक धारणा जम जाती है। इस पृथिवी पर प्रबल व्यक्ति केवल अन्याय और अत्याचार करते हैं, इसीसे लोगोंको दुःखके सिवा कहीं भी सुख नहीं देख पड़ता। दुःख पड़नेपर प्रबल लोगोंकी ज्वालासे उसका प्रतीकार नहीं देखाता। इसीसे मनुष्य धर्मा-
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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लेनेसे लोग चोर कहाते थे। चोरी करनेसे ही पाप होता है। किन्तु आजकल आग-पानी लेना चोरी करनेमें दाख़िल नहीं।
आजकल समग्र सभ्यदेशमें प्रधान रूपसे नीतिशास्त्रका अनुशीलन किया जाता है। यह बात किसीसे समझाकर नहीं बताना पड़ती, कि किसे धर्म और किसे अधर्म कहते हैं। कूट तर्क छोड़ देनेसे सभी लोग अपने मनमें धर्माधर्मको विचार सकते हैं। ज्ञानवान् व्यक्तिका मन ही सद्गुरु है, जिसे वेद, बाइबिल और क़ुरान सब कुछ बताते हैं। किन्तु कूट तर्क चलानेसे बड़े गड़बड़ में पड़ना होता है। ऐसे समय धर्माधर्मका सूक्ष्म जान लेना कठिन हो जाता है। रूसके निरस्तिवादी (Nihilists)<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कहतें हैं, कि हिताहित-ज्ञान, धर्माधर्म, भला-बुरा सभी शिक्षाका फल है। वास्तविक कुछ जान नहीं पड़ता। बालककालसे जिसे जैसे सिखाओ और पढ़ाओगे, वह वैसे ही सीखे और समझेगा; उसके हृदयमें वैसे ही एक दृढ़ संस्कार होते रहेगा। ऐसा संस्कार एक देशके लोगोंकी दृष्टिमें तो अच्छा
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<small>"Conscience is a mere matter of education. A Christian living in Europe, who has murdered any body with cunning and premeditation, usually experiences a certain kind of remorse. But a Red Indian, who is every bit as much a man of flesh and blood, rejoices when he is able to surprise and slay a defenceless enemy. His conscience in no wise suffers from the act, for he has been taught from earliest youth that the more scalps he possesses, the better he will be received in the
happy hunting grounds of the great Manitou'.
(See Nineteenth Century, No. 35. January 1880.)</small>
'हिताहित-ज्ञान, सिवा शिक्षावाले फलके और कुछ भी नहीं। किसी युरोपीय खृष्ट-धर्मावलम्बीके सोच-विचारकर किसीको मार डालनेपर, अनुतापसे उसका हृदय जला करता है। किन्तु अमेरिकाके गौरवर्ण इण्डियनों का भी तो शरीर इसी रक्तमांससे बना है, तथापि निराश्रय शत्रु को मार सकनेसे उनके आह्लादका ठिकाना नहीं रहता। ऐसे निष्ठुर कार्यमें उन्हें कुछ भी परिताप नहीं होता। परिताप न होनेका कारण यही है, कि शैशवावस्थासे वह ऐसी ही शिक्षा पाते रहे हैं,—जो व्यक्ति मनुष्य मार अधिक मुण्ड इकट्ठे कर सकता, वही मणितौ उपदेवताके मृगया क्षेत्रमें अधिक आदर पाता है।'
रूसके निरस्तिवादी यह बात इस तात्पर्य से कहते हैं, कि मनुष्य चिरकालसे जैसी शिक्षा पाता, हृदयमें वैसी ही एक धारणा जम जाती है। इस पृथिवी पर प्रबल व्यक्ति केवल अन्याय और अत्याचार करते हैं, इसीसे लोगोंको दुःखके सिवा कहीं भी सुख नहीं देख पड़ता। दुःख पड़नेपर प्रबल लोगोंकी ज्वालासे उसका प्रतीकार नहीं देखाता। इसीसे मनुष्य धर्मा-
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधर्म'''|'''३५१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>स्थान, स्वभाव, गन्ध प्रभृतिके प्रति भी दृष्टि रखकर शान्तिकी व्यवस्था की गई; जैसे,—धान्य चुराने-वाला चूहा होता है। यहां प्रयोजन यह है, कि चूहा धान्य खाकर प्राणधारण करता है। मांस चुरानेसे गृध्र होता, तैल चुरानेसे पतङ्ग बनता और अभक्ष्यको भक्षण करनेसे कमियोनिमें मनुष्य जन्म लेता है—इत्यादि स्थलमें खाद्यद्रव्य के प्रति दृष्टि रखकर शान्तिकी व्यवस्था बताई गई है। मालूम होता है, कि सिद्धान्न चुरानेसे श्वावित्, कासेको हरण करनेसे हंस और कार्पासवस्त्र चुरा लेनेसे बक बनता है—इन सकल स्थलोंमें चोरी गई हुई चीज़के रङ्गसे जन्तुकी देहके वर्णका रङ्ग मिलाकर शान्तिकी व्यवस्था लिखी गई है। यान चुरानेसे ऊंट होता अर्थात् गाड़ी चुरानेके कारण मनुष्यको जन्मान्तरमें बोझ ढोना पड़ेगा ; इसीसे उसके पक्ष में उष्ट्र-जन्म विहित हुआ है। फिर किसी-किसी स्थलमें कुछ भी मर्म समझ नहीं पड़ता; जैसे,—चर्बी चुरानेसे मछली बनना पड़ता है। पूर्वकालमें आग और पानी मनुष्यकी दुर्लभ सामग्री थी। कारण, कितने ही कष्टसे अरणि घिसने पर आग निकलती थी; इससे आग सुलभ द्रव्य न था। मालूम होता है, कि उस समय इतना जलाशय नहीं रहा। इससे जल भी अति दुर्लभ समझा जाता था। यही कारण है, कि आग-पानी
लेनेसे लोग चोर कहाते थे। चोरी करनेसे ही पाप होता है। किन्तु आजकल आग-पानी लेना चोरी करनेमें दाख़िल नहीं।
आजकल समग्र सभ्यदेशमें प्रधान रूपसे नीतिशास्त्रका अनुशीलन किया जाता है। यह बात किसीसे समझाकर नहीं बताना पड़ती, कि किसे धर्म और किसे अधर्म कहते हैं। कूट तर्क छोड़ देनेसे सभी लोग अपने मनमें धर्माधर्मको विचार सकते हैं। ज्ञानवान् व्यक्तिका मन ही सद्गुरु है, जिसे वेद, बाइबिल और क़ुरान सब कुछ बताते हैं। किन्तु कूट तर्क चलानेसे बड़े गड़बड़ में पड़ना होता है। ऐसे समय धर्माधर्मका सूक्ष्म जान लेना कठिन हो जाता है। रूसके निरस्तिवादी (Nihilists)<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कहतें हैं, कि हिताहित-ज्ञान, धर्माधर्म, भला-बुरा सभी शिक्षाका फल है। वास्तविक कुछ जान नहीं पड़ता। बालककालसे जिसे जैसे सिखाओ और पढ़ाओगे, वह वैसे ही सीखे और समझेगा; उसके हृदयमें वैसे ही एक दृढ़ संस्कार होते रहेगा। ऐसा संस्कार एक देशके लोगोंकी दृष्टिमें तो अच्छा
जंचेगा ; किन्तु सम्भवतः अन्य देशके लोग उसे देख कांप जायेंगे। इसीसे यह ठीक नहीं, कि क्या भला और क्या बुरा है,—
<small>"Conscience is a mere matter of education. A Christian living in Europe, who has murdered any body with cunning and premeditation, usually experiences a certain kind of remorse. But a Red Indian, who is every bit as much a man of flesh and blood, rejoices when he is able to surprise and slay a defenceless enemy. His conscience in no wise suffers from the act, for he has been taught from earliest youth that the more scalps he possesses, the better he will be received in the
happy hunting grounds of the great Manitou'.</small>
<small>(See Nineteenth Century, No. 35. January 1880.)</small>
'हिताहित-ज्ञान, सिवा शिक्षावाले फलके और कुछ भी नहीं। किसी युरोपीय खृष्ट-धर्मावलम्बीके सोच-विचारकर किसीको मार डालनेपर, अनुतापसे उसका हृदय जला करता है। किन्तु अमेरिकाके गौरवर्ण इण्डियनों का भी तो शरीर इसी रक्तमांससे बना है, तथापि निराश्रय शत्रु को मार सकनेसे उनके आह्लादका ठिकाना नहीं रहता। ऐसे निष्ठुर कार्यमें उन्हें कुछ भी परिताप नहीं होता। परिताप न होनेका कारण यही है, कि शैशवावस्थासे वह ऐसी ही शिक्षा पाते रहे हैं,—जो व्यक्ति मनुष्य मार अधिक मुण्ड इकट्ठे कर सकता, वही मणितौ उपदेवताके मृगया क्षेत्रमें अधिक आदर पाता है।'
रूसके निरस्तिवादी यह बात इस तात्पर्य से कहते हैं, कि मनुष्य चिरकालसे जैसी शिक्षा पाता, हृदयमें वैसी ही एक धारणा जम जाती है। इस पृथिवी पर प्रबल व्यक्ति केवल अन्याय और अत्याचार करते हैं, इसीसे लोगोंको दुःखके सिवा कहीं भी सुख नहीं देख पड़ता। दुःख पड़नेपर प्रबल लोगोंकी ज्वालासे उसका प्रतीकार नहीं देखाता। इसीसे मनुष्य धर्मा-
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''१०'''|'''कपोत'''}}
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अहंकार तथा निद्रा तथा निद्रा त्याग करते हैं। कपोत और कपोतों दोनों शावकों को खिलाते हैं। प्रथमतः यह जो खाते, उसी को अपने उदरस्थ भोजन-आधार में रख और दुग्धवत् तरल पदार्थ में परिणत कर बच्चों के मुख पहुँचाते हैं। कुछ दिन बीतने पर वह पदार्थ मण्डवत् कर और मांस को अर्धगलित रख खिलाया जाता है। इसी प्रकार वयवृद्धि के साथ खाद्य अवस्था बदल क्रमशः कठिन द्रव्य खिलाना सिखाते हैं।
डिम्ब फूटने से ५/६ दिन पीछे पंखों की रेखा देख पड़ती है। एक मास के मध्य शावक का सर्वाङ्ग पंखों से आच्छादित हो जाता, किन्तु उसे चुगना नहीं आता। फिर भी इस समय वह पिता-माता के साथ उड़ भूमि पर उतरना और घोंसले पर चढ़ना सीखता है। इतने दिन उसे खिला देना पड़ता है। मास वा दो मास का होने पर शावक चुगने लगता है।
कपोत-पक्ष के शेष भाग में १८ बड़े पंख रहते हैं। प्रथम उनसे पक्ष में उड़ने के उपयुक्त १० पंख निकलते हैं। जिस प्रकार सात वत्सर के वयस्क मनुष्य के कच्चे दाँत गिर फिर आते हैं, वैसे ही उड़ना आरम्भ करने वाले कपोत के पक्षस्थित पंख झड़कर पुनः प्रथम आते हैं। सर्वाङ्ग पक्ष के उड़ने योग्य पंखों पर प्रथम से आरम्भ हो कड़ा करते हैं। एक जब तक झड़कर भर नहीं जाता, तब तक दूसरे का गिरना असम्भव हो जाता है। इसी प्रकार पञ्चम पंख गिरने पर कपोत का वयस बदलता है। फिर दशम पंख झड़ जाने से यह युवावस्था को प्राप्त होता है।
कपोत फल, शस्यादि खा जीवन धारण करता है। यह किसी प्रकार के कीटादि नहीं खाता। किन्तु किसी श्रेणी का कपोत क्षुद्र-क्षुद्र शम्बूक खा जाता है। हिन्दुस्तान का कबूतर 'गुटरगूँ' बोलता है। यह समय ही मन्द करता, पीड़ित होने पर मौन रहता है। कपोत अपनी मादा को कपोती को मनोनीत करता, किन्तु गृहपालित मनुष्य के वशीभूत हो जाने के मिश्र जोड़ों के साथ भी रहता है।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
कपोतों में स्त्री-जाति ही यथेच्छ व्यवहार चलाती है। अनेक स्थलों में एक कपोती के लिये दो कपोत लड़ते देखे गये हैं। फिर कपोती नूतन कपोत की ओर झुक पड़ती है। इसी प्रकार दो दम्पतियों के मध्य विवाद बढ़ने पर परस्पर कपोल-परिवर्तन हुआ है। संध्याकाल पति शीघ्र-शीघ्र गृह प्रवेश करता, किन्तु अन्यान्य पक्षियों की भाँति प्रातःकाल ही उसे छोड़ नहीं चलता। सूर्य की किरण कुछ अधिक अच्छी लगती है। इसकी दृष्टि-शक्ति और वय-शक्ति अति तीक्ष्ण है। कपोत के दोनों पक्ष अति सबल और लघु होते हैं। इससे यह बहुत द्रुत उड़ सकता है।
साधारणतः कपोत देखने में अति सुन्दर लगता है। इसका वर्ण और आकार नाना प्रकार है। अधिक दीर्घ नहीं रहता, प्रायः १ फुट होता है। उसके दोनों भाग सरल एवं किसी सीमा तक पतले होते हैं। किसी पटु का पद्म-भाग अधिक जाता है। ऊपरी चञ्चु के मूल में ईषत् मांस उभरता है। यह मांस अति कोमल और समान होता है। इसी मांस पर बिल्कुल कपाल के नीचे दोनों सरस नासाविवर रहते हैं। कपाल से ऊपर मस्तक गोल हो पश्चात् दिशा की ओर ढल जाता है। मुख का विवर प्रान्त तक अति वृहत् नहीं होता। विस्तृत पश्चात् मस्तक के दोनों पार्श्व पर समसूत्र-पात से अवस्थान करते हैं। दोनों चक्षु पक्ष से दीर्घ होते हैं। किसी-किसी कपोत का पक्ष लपेट लिया जाने पर प्रान्त सूखा पड़ता और किसी का पक्ष गोलाकार बनता है। पुच्छ के पंख भी इसी प्रकार भिन्न-भिन्न आकार धारण करते हैं। पुच्छ में प्रायः १२ से १४ तक पंख रहते हैं। वह अन्यान्य स्थान के पंखों से यथेष्ट दीर्घ होते हैं। फिर किसी-किसी पूँछ वाले कपोत में सौ वा दस मात्र पंख होते हैं। साधारणतः इसके पैर घुटने के ऊपरी भाग पर्यन्त पंखों से आच्छादित रहते हैं। अँगुलियाँ नातिदीर्घ होती हैं। पैर में तीन आगे और एक पीछे आते हैं। पश्चात् की अँगुलि भूमि पर...
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<noinclude><pagequality level="1" user="बैजनाथ चौधरी" /></noinclude>{{rh|'''१४'''|'''कपोत'''}}
कपोत
सम्मुखवाल पङ्गुलिको भांति समसूत्रपात से प्रवस्थान । करती है । नख दण्डोपवेशी पक्षीको भांति वक्र रहते हैं। फिर अङ्गुलि भी दण्डोपवेशो पचौकी -भांति ग्रन्थिन्त होतो हैं। किसी किसी श्रेणीवाले कपोतके समस्त पादपर पालक निकल पाते है ।
हिन्दूस्थान में कबूतर खेलके लिये पाला जाता हैं। इससे इसका व्यवसाय चला करता है । केवल हिन्दुस्थानमें ही नहीं, पृथिवोके सकल स्थलपर कपोत - मनुष्य के त्रालय में पलता है ।
शाकुनशास्त्र के अनुसार पालक वा व्यवसायी इसकी श्रेणी भाकार, कार्य एवं गुणादि देख विभाग करते हैं । इसको प्राय: दो जाति हैं- -गोला और गिरहबाज़ । इन दो नातिके कपोत फिर अनेक विभागमें बंटते हैं। गोलावोंमें लका, गुलो, भोराजो, कौड़ियाला, बुग़दादी, सुक्खा, बाखु ता, कबरा, मूंगिया, लोटन प्रभति प्रधान हैं ।
हिन्दुस्थानी लोगों के घरों और मठोंमें एक- प्रकारका गोला स्वयं अयाचित रूपसे रहा करता है । उसे जङ्गली कबूतर कहते हैं। यह नाना वर्णका होता है। इसका मूल्य अति अल्प है।
गिरहबानों में कागुजी, सना, नीला, स्यावा, -अवलका, सुर्खा, सादा, ऊदा, भूरा, गण्डेदार, दोबान, वगैरह अच्छे समझे जाते हैं ।
गोला और दीवान देखते ही पहुंचान पड़ता है । गोलसे गिरहवानको चोंच साफ होती है । फिर गोलेके चक्षु सर्वदा शान्त भाव रहता, किन्तु -गिरहबान अपनी आंख घुमाया करता है ।
गिरहबान पैर में पर आनेसे भवरा और सत्ये पर -घोटी बढ़ जाने से घोटियाला कहाता है। पैर में पर चौर मत्थे पर चोटी दोनों होनेसे भवरा- चोटियाला कहते हैं।
1
फिर इसको
पहले हिन्दुस्थान में कपोतके असंख्य भेद रहे। - किन्तु आजकलको श्रेणियोंको देख प्राचीन नामोंके निर्णय करनेका कोई उपाय नहीं । प्राचीन कवियों- के काव्य में प्रमाण भाता, कि पुराने समय भी हिन्दु- खानमें कपोत. पाला जाता था। राजा-महाराज
श्रौर सेठ साहूकार इसे यथेष्ट रूपसे क्रीड़ादिके लिये रख लेते। उस समय लोग कपोतको बहुत अच्छा समझते और उड़ा प्रमोद करते थे ।
है।
है।
हिन्दुस्थान में वालक इसे उड़ा खेता करते हैं । aula उड़ानेके लिये गृहके सर्वापेचा उञ्च प्राचौर वा feet at ऊर्ध्व शाखापर वल्लो गाड़ना या बांधना पड़ती है। इस बल्लीपर एक चौकोन इतरी लगती कपोत उड़ने से इसी छतरी पर आकर बैठता छतरी में कपड़ेका जाल रहता है। इस जामें एक डोरी लगती, जो भूमिपर चटका करतो है । डोरो नोचेसे खींचनेपर, छतरोका जाल चारी श्रोरसे ऊपरको उमर बन्द हो जाता है। जब कोई बाहरी कबूतर मूलसे या छतरीपर बैठता, तब खेलाड़ी नोचेसे डोरो खेचता है। इससे छतरीका जाल बन्द होते हो कबूतर फंसता है । फिर छतरीको गरारो ढोली कर उतार देते और नवागत कपोतको पकड़ लेते हैं । यह अपना स्थान खुब पहचानता है । कलकत्तेके कबूतर मिर्जापुर प्रौर अलाहाबादसे छूटते भी अपने स्थानपर पहुंचते हैं। वर्तमान युरोपीय महा- समर में इसने इधर से उधर पत्र पहुंचाने में बड़ा साहाय्य किया है। पूर्व समय भो कबूनर हरकारेका कास करते थे । उर्दू के किसी कविने कहा है---
"व कबूतर किस तरह से जाये बामेधार पर। पर कतरने को लगी है कुँ चिये दीवार पर " काठ या वांस के जिस घर में इसे रखते, उसको काबुक कहते हैं। इसमें एक-एक जोड़ा कबूतर रहनेको दरवे बने होते हैं। उन्होंमें खेलाड़ी इसे खिता-पिला सन्ध्याको बन्द कर देते हैं। हिन्दु- स्थानमें प्राय: कबूतरको अकरा खिलाया जाता है।
हिन्दुस्थान में इसे घोतला, यक्ष्मा, शेमा वा शोथ रोग अधिक लगता है। शीतला निकलने से कपोतको जसमें भीगने देना न चाहिये। फिर तारपीनका वेल चुपड़ने से उक्त रोग आरोग्य होता है। शोध बढ़ने पर इसे रोट्रमें रखते और लहसुनका एक बोज खिलाबा करते हैं । शेषापर भो यही घोषध चलता है। होनेसे सरसों के तेलका फलोता जसा भस्म खिलाबा<noinclude></noinclude>
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सम्मुखवाली अँगुलियों की भाँति समसूत्रपात से अवस्थान करती है। नख दण्डोपवेशी पक्षी की भाँति वक्र रहते हैं। फिर अँगुलि भी दण्डोपवेशी पक्षी की भाँति ग्रन्थियुक्त होती हैं। किसी-किसी श्रेणी वाले कपोत के समस्त पाद पर पंख निकल आते हैं।
हिन्दुस्तान में कबूतर खेल के लिये पाला जाता है। इससे इसका व्यवसाय चला करता है। केवल हिन्दुस्तान में ही नहीं, पृथ्वी के सकल स्थल पर कपोत मनुष्य के आलय में पलता है।
शाकुनशास्त्र के अनुसार पालक वा व्यवसायी इसकी श्रेणी, आकार, कार्य एवं गुणादि देख विभाग करते हैं। इसकी प्रायः दो जातियाँ हैं—गोला और गिरहबाज़। इन दो जातियों के कपोत फिर अनेक विभागों में बँटते हैं। गोलों में लक्का, गुली, शीराजी, कौड़ियाला, बग़दादी, सुक्खा, बाख़ुता, कबरा, मूँगिया, लोटन प्रभृति प्रधान हैं।
हिन्दुस्तानी लोगों के घरों और मठों में एक प्रकार का गोला स्वयं अयाचित रूप से रहा करता है। उसे जङ्गली कबूतर कहते हैं। यह नाना वर्ण का होता है। इसका मूल्य अति अल्प है।
गिरहबाज़ों में काग़ज़ी, सब्ज़ा, नीला, स्याह, अबलक, सुर्खा, सादा, ऊदा, भूरा, गँडेदार, दीवान, वगैरह अच्छे समझे जाते हैं।
गोला और दीवान देखते ही पहचान पड़ता है। गोले से गिरहबाज़ की चोंच साफ़ होती है। फिर गोले के चक्षु में सर्वदा शान्त भाव रहता, किन्तु गिरहबाज़ अपनी आँख घुमाया करता है।
गिरहबाज़ पैर में पर आने से भँवरा और मत्थे पर चोटी बढ़ जाने से चोटियाला कहाता है। फिर पैर में पर और मत्थे पर चोटी दोनों होने से इसको भँवरा-चोटियाला कहते हैं।
पहले हिन्दुस्तान में कपोत के असंख्य भेद रहे। किन्तु आजकल की श्रेणियों को देख प्राचीन नामों के निर्णय करने का कोई उपाय नहीं। प्राचीन कवियों के काव्य में प्रमाण आता कि पुराने समय में भी हिन्दुस्तान में कपोत पाला जाता था। राजा-महाराज...
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और सेठ-साहूकार इसे यथेष्ट रूप से क्रीड़ादि के लिये रख लेते। उस समय लोग कपोत को बहुत अच्छा समझते और उड़ा प्रमोद करते थे।
हिन्दुस्तान में बालक इसे उड़ा खेला करते हैं। कबूतर उड़ाने के लिये गृह की सर्वोपेक्षा उच्च प्राचीर वा वृक्ष की ऊर्ध्व शाखा पर बल्ली गाड़ना या बाँधना पड़ती है। इस बल्ली पर एक चौकोर छतरी लगती है। कपोत उड़ने से इसी छतरी पर आकर बैठता है। छतरी में कपड़े का जाल रहता है। इस जाल में एक डोरी लगती, जो भूमि पर लटका करती है। डोरी नीचे से खींचने पर, छतरी का जाल चारों ओर से ऊपर को उभर बन्द हो जाता है। जब कोई बाहरी कबूतर भूल से या छतरी पर बैठता, तब खिलाड़ी नीचे से डोरी खींचता है। इससे छतरी का जाल बन्द होते ही कबूतर फँसता है। फिर छतरी की गरारी ढीली कर उतार देते और नवागत कपोत को पकड़ लेते हैं। यह अपना स्थान ख़ूब पहचानता है। कलकत्ते के कबूतर मिर्ज़ापुर और इलाहाबाद से छूटते भी अपने स्थान पर पहुँचते हैं। वर्तमान यूरोपीय महासमर में इसने इधर से उधर पत्र पहुँचाने में बड़ा साहाय्य किया है। पूर्व समय में भी कबूतर हरकारे का काम करते थे। उर्दू के किसी कवि ने कहा है—
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पर कतरने को लगी है कैंचियाँ दीवार पर।"</poem>}}}}
काठ या बाँस के जिस घर में इसे रखते, उसको काबुक कहते हैं। इसमें एक-एक जोड़ा कबूतर रहने के दरबे बने होते हैं। उन्हीं में खिलाड़ी इसे खिला-पिला सन्ध्या को बन्द कर देते हैं। हिन्दुस्तान में प्रायः कबूतर को बाजरा खिलाया जाता है।
हिन्दुस्तान में इसे शीतला, यक्ष्मा, शेमा वा शोथ रोग अधिक लगता है। शीतला निकलने से कपोत को जल में भीगने देना न चाहिये। फिर तारपीन का तेल चुपड़ने से उक्त रोग आरोग्य होता है। शोथ बढ़ने पर इसे रौद्र में रखते और लहसुन का एक बीज खिलाया करते हैं। शेषा पर भी यही औषध चलता है। होने से सरसों के तेल का फलीता जैसा भस्म खिलाया...
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''१२'''|
'''कपोत'''}}
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जाता है। होम्योपैथी के मत की कोई-कोई औषध इसके लिये विशेष उपकारी है।
गिरहबाज़ कबूतर आकाश में उड़ते या भूमि पर उतरते समय उलट-पुलट गिरहें लगाता है। यह इसकी जाति का स्वभावसिद्ध कार्य है। इस काम को गिरहबाज़ी कहते हैं। कोई-कोई कबूतर बड़ी गिरहबाज़ी करता है। गिरहबाज़ एक बार उड़ने से बहुत ऊँचे चढ़ता, इससे अनेक समय श्येन (शिकरा) पक्षी द्वारा मारा पड़ता है। फिर कोई-कोई एकबारगी ही दोनों ओर गिरह लगा उड़ सकता है। एक प्रकार का गिरहबाज़ बाँसों चढ़ता है। किन्तु पट्टा पहले पूरे तौर पर गिरहबाज़ी कर नहीं सकता, थोड़ा-बहुत घूम-फिर सीधे उड़ने लगता है। जो गिरहबाज़ अति अल्प दूर जा गिरहबाज़ी करता, उसे गरमाया समझना पड़ता है। गर्म होने से अधिक दूर उड़ना सम्भव है।
क्या गोला, क्या गिरहबाज़—सब तरह के कबूतरों को धूप अच्छी लगती और उनके लिये फ़ायदेमन्द भी ठहरती है। विशेषतः गिरहबाज़ भली-भाँति धूप न मिलने से घबरा जाता है। आतपहीन स्थान इसके लिये विषम अनिष्टकर है। गिरहबाज़, व्याकुल होने से पुच्छ के पंख उखड़ने या कटने पर आराम पाता है। यह दैर्घ्य में अधिक बड़ा नहीं पड़ता, साधारणतः १२ से १५ इंच पर्यन्त रहता है। इसको अंग्रेज़ी में टम्बलर-पिजन (Tumbler-pigeon) कहते हैं।
गोला कबूतर देखने में अति सुन्दर लगता है। इसके भिन्न-भिन्न परिवारों की आकृति में जो विशेष वैलक्षण्य आता, वह नीचे लिखा जाता है—
बदनदार (जैकोबिन)—इस कपोत की श्रेणी का विशेष लक्षण मस्तक के पश्चाद्देश से चक्षु के पार्श्व की राह पक्ष के ऊपरी भाग पर्यन्त दो स्तर उच्च पंखों का होना है। इसका एक स्तर वक्ष और अपर स्तर पृष्ठ की ओर झुक बढ़ता, मध्य स्थल सीमन्त की भाँति रहता है। जैकोबिन सुर्ख़, स्याह, सफ़ेद और ज़र्द रंग का होता है। पृष्ठ, पुच्छ, वक्षःस्थल और मस्तक
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प्रायः श्वेत रहता, केवल पक्ष के वर्ण में ही भेद पड़ता है। फिर जो चील सदृश लगता, वह ईंट के रक्त में ईषत् पीत मिला देने के वर्ण से मिलता है। स्याहे का रंग निहायत काला रहता, जिसमें कुछ-कुछ नीलापन झलकता है। दोनों पक्षों पर ही उक्त वर्ण होता है। फिर गलदेश वाले पूर्वोक्त दोनों स्तरों में पंखों की शिखायें उन्हीं-उन्हीं वर्णों की देख पड़ती हैं। बिल्कुल सफ़ेद और कुछ बैंगनी लगने वाले खाकी रंग का जैकोबिन (कलगीदार) भी कहीं-कहीं मिल जाता है। इसका चञ्चु ईषत् क्षुद्र और चक्षु की मणिका का चतुष्पार्श्व असित होता है। पक्ष के शेष बड़े पंख तीन होते हैं। यह अति भीरु होता है।
अंग्रेज़ी में इस श्रेणी को जैकोबिन और जैक (Jacobine and Jack) कहते हैं।
<small>लक्का—</small>क्षुद्र श्रेणी का कपोत है। लक्के का विशेष चिह्न पुच्छ के पंखों का मयूर-पंख की भाँति सर्वदा छत्राकार रहना है। ऐसे कबूतर को पूरा लक्का कहते हैं। साधारणतः जिनके पुच्छ में पंख पूर्ण छत्राकार नहीं आते, वह आधा लक्का कहाते हैं। पूरे लक्के का वर्ण समस्त श्वेत होता है। फिर वर्ण अधिक उज्ज्वल सफ़ेद रेशम की भाँति रहते इसको रेशमी लक्का कहते हैं। कोई-कोई पूरा लक्का बिल्कुल काला भी रहता, जो देखने में अधिक मनोहर नहीं लगता। आधा लक्का सफ़ेद, काला और विष्णुकान्ता के रंग का होता है। जो लक्का देखने में नानावर्णविशिष्ट और सुन्दर रहता, उसका नाम नक़्शा पड़ता है। पूरा लक्का भूमि पर चुगते समय बहुत अच्छा लगता है। यह बैठ जाते या चलने को पैर उठाते अपना गलदेश कुछ तान ऐसे सुन्दर भाव से हिलाता, कि देखते ही हृदय में आनन्द उमड़ आता है। दो-एक श्रेणी वाले लक्कों के मस्तक पर चोटी नहीं रहती। किन्तु सकल के ही पैरों पर पर (पंख) होते हैं। अंग्रेज़ी में इसे फ़ैनटैल-पिजन (Fantail pigeon) यानी लमपरा कबूतर कहते हैं।
<Small>शीराजी—</small>स्याह, सुर्ख़, ज़र्द, गहरा खाकी और
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||कपोत|१३}}
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काश्मीरा वगैरह तरह-तरह के रंगों का होता है। इसके विशेष चिह्न में चंचु (चोंच) के मूल से चक्षु (आँख) के पश्चात् अवटु (गुद्दी), पृष्ठ (पीठ) एवं पक्ष (पंख) की राह पुच्छ (पूंछ) के मूल पर्यंत एकमात्र वर्ण रहता है और निम्न चंचु के नीचे गलदेश (गला), वक्षस्थल (छाती), पक्ष का निम्न भाग तथा पुच्छ का पालक (पंख) श्वेत देख पड़ता है। फिर वयोवृद्धि के साथ जघनदेश अंगुली की ग्रंथि पर्यंत पालक से ढंक जाता है। इस जाति का कपोत बहुत बड़ा होता है। शीराजी देखने में अति सुंदर लगता है, किंतु गंभीर, भीमकाय और बलशाली रहता है। आँखें लाल नहीं होतीं, ईषत् (हल्का) कृष्णाभ पोत का भाग है। स्याह शीराजी का वर्ण सुंदर लगता है।
शीराजी का रंग उसमें चिल्ल के वर्ण पर ही अधिक देख पड़ता है। धार नीलवर्णयुक्त एवं हरिताभ चिकना होता है। खाकी शीराजी देखने में सुंदर और स्याह रंग-प्रति रहता है। काश्मीरी खाकी होते हुए भी पालक, वक्ष, पृष्ठ, पश्च तथा अवटु (गुद्दी) का वर्ण श्वेत लगता है और बैंगनी मिला बूंद-बूंद दाग पड़ता है। एकरंगे शीराजी के वक्ष एवं उदर में भिन्न वर्ण का एक क्षुद्र पालक रहने से उसे गुलदार कहते हैं। गुलदार शीराजी देखने में अति सुंदर लगता है।
<Small>सुक्खा</small>यह प्रधानतः दो श्रेणी का होता है—स्याह और धब्बेदार। यह देखने में अति सुंदर रहता है। इसके विशेष चिह्न में चंचु के ऊपर, चक्षु के उपरिभाग से शिखा के कोल पर्यंत मस्तक धब्बेदार सफेद लगता है और दोनों पक्ष तथा समस्त देह का अन्य वर्ण पड़ता है। यह अति क्षुद्र (छोटी) जाति का कपोत है। फिर सुक्खा जितना ही क्षुद्र रहता है, उतना ही सुदृश्य लगता है। यह भी लक्की की तरह गर्दन हिलाता है और अवटु (गुद्दी) उठाते समय सुंदर एवं सौष्ठव-संपन्न दिखता है। स्याह मुक्खे में उज्ज्वलता अधिक होती है। इसका भी गलदेश नानावर्ण-मिश्रित चिकना रहता है। सिवा स्याह के दूसरे रंग के मुक्खे को ही किसी के मत में धब्बेदार कहते हैं। धूसर चिह्न सदृश विशिष्ट मुक्खा चक्षु-स्निग्धकर (आँखों को सुकून देने वाला) होता है। इसके पैर में पर (पंख) नहीं रहता, किंतु मस्तक पर शिखा निकल
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
आती है।
मस्तक का श्वेतवर्ण चंचु के नीचे या गलदेश में फैल जाने से इसको दागी सुक्खा कहते हैं। दागी मुक्खे का मूल्य एवं आदर अल्प रहता है और रूप भी ईषत् विक्षो (असुंदर) लगता है। विलायती मुक्खे के मस्तक तथा पक्ष वाले तीन बड़े पालक और पुच्छ का वर्ण काला होता है। शिखा कुछ बढ़ सकती है। गात (शरीर) का वर्ण श्वेत रहता है। वहाँ तीन प्रकार का सुक्खा होता है। तीनों अंगों वाले कपोत के मस्तक का वर्ण यथाक्रम कृष्ण (काला), पीत (पीला) और रक्त (लाल) लगता है। फिर मस्तक का वर्ण, पक्ष एवं पुच्छ के बड़े पालकों में भी रहता है। अंग्रेजी में इसे नन-पिजन (Nun-pigeon) यानी 'बैरागन' कहते हैं।
<small>कोरियाला</small> चक्षु कौड़ी जैसे होते हैं। चक्षु के चतुष्पार्श्व (चारों तरफ) और नासिका के मूल में चंचु के ऊपर ईषत् रक्ताभ कोमल मांस के बड़े-बड़े फूल पड़ जाते हैं।
</small>चोटियाला</small>विशेषत्व से मस्तक पर शिखा और पाद (पैर) में पालक का विकास दिखता है। पैर में एड़ी के पास जो पर रहते हैं, वह बहुत बड़े लगते हैं। चोटियाला देखने में अधिक सुदृश्य नहीं होता। शीराजी की तरह यह भी अति बृहत् एवं भीमकाय रहता है, किंतु माधुर्यपूर्ण गंभीर भाव के बदले अपने में कुछ भीम-दर्शनत्व (डरावना रूप) रखता है। चोटियालों में किसी-किसी श्रेणी का चक्षु ईषत् कृष्णाभ लगता है। इनमें सुख की संख्या ही अधिक है। फिर सफेद-काला चोटियाला भी होता है। यह कोटर (घोंसले/गड्ढे) में बैठ गुटरगूं शब्द निकाला करता है। उक्त शब्द करते समय गलदेश का अभ्यंतरस्थ खाद्याधार (पोटा) फूल उठता है। उक्त खाद्याधार या खोल को अंग्रेजी में क्रॉप (Crop) और इस श्रेणी के कपोत को क्रॉपर (Cropper) कहते हैं। पैर के परों को देख कोई इसे फ्लै-थाइड पिजन (Flay-thighed pigeon) भी कह देते हैं।
<small>गलफुला</small>
दो प्रकार का है—स्याह और सफेद। यह अति बृहत्काय होता है। इसके चंचु से नीचे वक्षस्थल पर्यंत समस्त स्थान थैली की तरह फूल<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude>
{{Left|vol. Iv 4|1em}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४१३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४१४|कामकला-कामगा}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
अमोलक मूल, विफमा, गुडूची, मरिच हरिद्रा,
सप्तच्छदा, मुरामांसी एवं कुष्ठ दो दी तोले विड़ाग्डना,
सुस्तक, कृष्णलवण, तासक, तथा टंकण चार चार तोले
और शोधित गुमा लु चौंतीस तोले एकत्र घोमें घांटनेसे
यह बनती है। चार माषा इसको सेवन करने से
"विविधयुर्व कामा 'मः शक्रस्ततः परम् ।
वातरक्त रोग भारीग्य होता है।(रमरवाकर)
कामकलाविलास (सं•पु.) कामकलाया: विलासः
सम्यक् विवरणं यन, बहुव्री.। एक तन्वशास्त्र ।
इसमें कामकला विद्याका विषय विशेष रूपसे ।
वर्णित है। इसके प्रणेता पुण्यानन्द और टीकाकार
नटनानन्द थे। [ कामकला देसी]
कामकाज (हिं. पु. ) कर्मकार्य, कारवार, दौड़धूप ।
कामकाजी (हिं० पु. ) व्यवसायी, कारवारी।
कामकाति (सं० वि०) कामपरा कातिः शष्दो यस्थ,
काम कै शव्द तिन् बहुव्री०। काम शब्दयुक्त, अपनी
खाहिस जाहिर करनेवाला।
कामकान्ता
( सं० स्त्री० ) राजनैपाली, नेपालको
मनःशिला।
कामकाम (सं० त्रि०) कामं कामयते, काम-कम-णिच्
भण। अभीष्टप्रार्थों, खाहिश को यो चोल मांगनेवाला ।
कामकामी (सं.वि.) कामं कामयते, कम्-णिच्-णिनि ।
अभीष्टप्रार्थी, मुराद मांगनेवाला।
"भापूर्वमायमचलप्रतिष्ठ समुद्रमापः मविन्ति यहत् ।
तहत कामा: यं प्रविशन्नि सबै स मानिमाप्रीति न कामकामौ ।।"
{{Right|(भगवद्गीता)}}
कामकार (सं० वि.) कामं करोति, काम-क-अथ।
१ काम्यकार्यका निष्पादक, शाहिसके मुताविक
चलनेवाला। (पु.)२ फलाभिसन्धि, खाहिसके चाल।
कामकाली (सं.सी.) जसपचिविशेष. एक दरयायी
चिड़िया।
कामकूर (सं० पु. ) काम एव कुटं प्रधानं यस्य,
बहुव्री। १ वेश्याप्रिय, रण्डीगज। २ वैश्यविनाम्र,
रहीबानी। ३. कामराज नामक अविद्यावा
एक मन्त्र। यह तीन प्रकारका होता - कामकूर,
कामकेलि और कामक्रीड़ा। यया १म कामकूट,-
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
"विवचन्दसतः पयात काही नकृषि वृद्धि कर
मायासरेप संयुक्त नादविन्दुबखाष्टितम् ।
प्रथम शामराजस्य कू परमदुखमम् ।" (समकामडौम्)
{{Left|२य कामकूट-}}
महामाया वत: पान स्वप्रयतौति दया । (कमहडीम् )
{{Left| ३य कामकूट-}}
"मदन शिवयीन बायुवोमं चतःपरम् ।
रट्रयौन वक्षः पयात् महामायां समुहरेन। (कामवडीन )
कामकत् (सं.वि.) कामम करीति, काम-ज-क्तिम् ।
१ यथेच्छुकारक, मन के मुवाफिक चलनेवाना।
२ अभीष्ट सम्पादक, प्रपनी मुराद पूरी करनेवाला ।
{{Left|(पु.) ३ विष्णु ।}}
"कामहा कामवत् कान्ता कामः कामप्रदः प्रमः।" (विश्वमहसनाम )
कामकेलि (सं.वि.) कामे ततुकरतौ केमियस्थ,
बहुव्री. १ नम्यट, ऐयाश, छिनरा, (पु. ) काम-निमित्ता केलिः, मध्यपदन्नो । २ सुरत, छिनाला।
कामक्रीड़ा (सं. स्त्री०) कामेन क्रीड़ा, ३-तत् । १ सुरन,
ऐयायो। २ पञ्चदशाचरी एक छन्द ।"माः पञ्च स्य यस्यां सा कामकोड़ा शाया" (चरानकरटोका)
जिस छन्दमें पांच मगण अर्थात् पन्द्रहो वर्ण गुरु रहते,
उसे 'कामक्रीड़ा कहते हैं।
कामखदखा (सं० स्त्री.) कामं कमनीयं खन्नमिव
दलं पत्रं यस्याः, बहुव्री० । सुवर्णकेतकी, पीला केवड़ा ।
कामग (सं० वि०) कामन वाचस्य इच्छया यथेवं
देशं गच्छति, काम-गमड़। १ इच्छानुसार चलने-
वाला, जो अपनी खुशीसे पाता जाता हो। २ नम्पट,
रण्डीवाज, छिनरा। (पु.) ३ कन्द, कामदेव ।
कामगति (सं०वि० ) काम यथेच्छ गतिर्यस्य, बद्री ।
१ इच्छानुसार चलनेवाला, जो मर्जी के मुताबिक
प्राता-जाता हो।२ यथेच्छ देयको गमनकारक, मन-
मानी जगरको जानवाला। १ नम्पट, रहौवाज़।
कामगम (सं. वि.) काम यथेच्छ गच्छति, काम-
।गम-पच । वामगति देखो।
कामगा (सं.सो.) कामिन अनुरागेय गच्छति,
मामक
काम-गम-ड-टाप। १ कोविसा, कोयमा २ यथेच्छ.
पुरुषगामिनी, हिनास।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh||कामगामी-कामज्येष्ठ|
४१५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
"पापणमारिणवा म्ये मा.मा कामगादिकार
सुरापा भाग्मत्यागिन्धी मायामोदकमानना:" (याचवला)
कामगामी (स.वि.) काम यथेच्छ योनिविचार
अक्कलेव गच्छति प्रत्यर्थः, काम-गम-चिनि। योनि-
विचारशून्य हो यथेच्छ भावसे स्त्रीगमन करनेवाला,
रडीयाज़, हिनरा। २ कामचारी, खाहिमके मुवा-
वृथापर्यटन दश कामन व्यसन है। इनमें मद्यपान,
फिक, चसनेवाना।
द्यूतक्रीड़ा, स्त्रीसम्भोग और मृगया चार उत्तरोत्तर
कामगार (हिं. पु०) राज्यप्रवन्धकर्ता, कामदार ।
अधिक कष्टदायक होते हैं। कामज़, व्यसनमें पासत
कामगिरि (सं० पु.) कामप्रधानो गिरि, मध्यपहलो.।
होने पर धर्म और अर्थशामसै वञ्चित रहना पड़ता है।
१ कामरूपका एक पर्वत । (कालिकापुराण) २ दाक्षि-
इसलिये इनको सर्वदा छोड़ना चाहिये । २ कामजात,
जात्यका एक पर्वत
मुहब्बतसे पैदा । (पु.) ३ कामदेवके पुत्र, पनिरह।
"कामगिरि समारम्य धारकान्त महत्वरि।" (गतिसमतन्त्र)
कामजन्दर (सं० १०) कामचासो ज्वरोति, कसंधा।
कामगुण (सं.पु.) कामतो गुणः, मध्यपदली।
कामजन्य ज्वर, एक बोखार। कामरिपुके पाधिक्यसे
१ अनुराग, मुहब्बत । २ विषय, ऐ।। ३ भोग, मज़ा ।
यह ज्वर पाता है। वैद्ययास्त्र मतसे इसका लक्षण,-
कामगामी (सं. वि.) काम यथेच्छ गछति, "क्षामने चित्तविन गम्नन्द्रालस्यममोननम् ।" (माधवनिदान)
कामम् गम-णिनि। कामगामी देखो।
मनको विकलता, तन्द्रा, पालस्य पौर भोजन
कामचर (सं.वि.) कामिन धरति, काम-चर-ट। है।. भावप्रकाशके मतानुसार प्रावासवाक्य, पभोष्ट
स्वेच्छाचारी, मर्जीके मुवाफिक सब जगह घमनेवाला । पस्तुकै लाभ, वायुके उपशमकारक कार्य और दृष्ट
" नारद: कामचर कदाचित।" (इमारसम्भव) रहने के उपाय यह ज्वर छूट जाता है। क्रोधसे भी
कामचरण (सं० लो०) कामं यथेच्छ चरणं विचरणम्, इस ज्वरका उपथम होता है।
कर्मधा । यथेच्छमावसे विचरण, मनमानी चनफिर। कामनननी (सं. स्त्री.) नागवती, पानको वेन ।
कामचरत्व ( सं० लो० ) कामचरस्य भावः, काम-कामननि (सं० पु०) कामस्य जनिरुत्पत्तिः अस्मान,
चर-ख । कासचरका कार्य, मनमानी चलफिर। बडुब्रो०। १ कोकिल, सोयन। (वि.)२ मुंगधि,
कामचलाउ (हिं.वि.) किसी न किसी प्रकार कार्य
बुधबूदार।
निकाल देनेवासा, जो काम चला देता हो। कामना (सं.स्त्री.) वृक्षविशेष, एक माड़। यह
कामचार (सं० वि०) कामन वेच्छया चरति, काम कर्णाटक देशमें प्रसिद्ध है। इसका वोज भी कामना
घर-धन । . १ यथेच्छभावसे विचरणकारक, मर्जीके
कंडाता है। वैद्यकनिघण्टु इसे मटर, बल्य, करम-
सुवाफिक घूमने फिरनेवाला । २ यथेच्छभावसे पशु वृषिकर, इन्द्रिय बप्तिकर और रुश्य बताता है। राज-
चरानेवाला, जो मर्जीक मुवाफिक मवेशी चराता हो। निघण्ट के मतसे इसके वोनमें भी उन गुण होता है।
कामचारिणी (सं० स्त्री०) सुगन्ध लताविधेष, एक कामजान (सं० पु.) कामं जनयति, काम-जन-णिच्-
खुशबूदार बेल।
अच् निपातनात् न खः। अथवा काम कन्दर्पभावं
कामचारी (सं० त्रि.) १ कामिन स्वेच्छया चरति, काम. पानयति, कामज-मा-नी-ड। कोकिल, कोयल।
घर-णिनि । कामुक, ऐयाश, छिनरा । २ यथेच्छचारी, कामजित् (सं• पु.) काम जयति, काम-जि-क्किए ।
मनों के भुवाफिक चसनेवाला। (पु.) ३ मरुड़। १महादेव। २ कार्तिकेय । ३ जिनदेव ।
४ काविर, एक चिड़िया।
कामज्येष्ठ (सं.वि.) कामको बड़ा समझनेवासा,
कामन (सं.वि.) कात्मा बायते, वाम जन-।
जो पाशिका पाचन्द हो।
१ पमिसावजात, खाडियसे पैदा। बाम व्यसन
दप प्रकारका होता-
."गयाची दिवाखाः परीवादा स्त्रियो मदः।
नौयविक उपायाच बामजी दशको गवाः।" (मनुसरिता)
मृगया (शिकार ) यूतक्रीड़ा, दिवानिद्रा, पर-
निन्दा, स्त्रीसम्भोग, मद्यपान, नृत्य, गीत, वाद्य और<noinclude></noinclude>
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"पापणमारिणवा म्ये मा.मा कामगादिकार
सुरापा भाग्मत्यागिन्धी मायामोदकमानना:" (याचवला)
कामगामी (स.वि.) काम यथेच्छ योनिविचार
अक्कलेव गच्छति प्रत्यर्थः, काम-गम-चिनि। योनि-
विचारशून्य हो यथेच्छ भावसे स्त्रीगमन करनेवाला,
रडीयाज़, हिनरा। २ कामचारी, खाहिमके मुवा-
फिक, चसनेवाना।
कामगार (हिं. पु०) राज्यप्रवन्धकर्ता, कामदार ।
कामगिरि (सं० पु.) कामप्रधानो गिरि, मध्यपहलो.।
१ कामरूपका एक पर्वत । (कालिकापुराण) २ दाक्षि-
जात्यका एक पर्वत।
{{C|"कामगिरि समारम्य धारकान्त महत्वरि।" (गतिसमतन्त्र)}}
कामगुण (सं.पु.) कामतो गुणः, मध्यपदली।
१ अनुराग, मुहब्बत । २ विषय, ऐ।। ३ भोग, मज़ा ।
कामगामी (सं. वि.) काम यथेच्छ गछति,
कामम् गम-णिनि। कामगामी देखो।
कामचर (सं.वि.) कामिन धरति, काम-चर-ट।
स्वेच्छाचारी, मर्जीके मुवाफिक सब जगह घूमनेवाला ।
" नारद: कामचर कदाचित।" (कुमारसम्भव)
कामचरण (सं० लो०) कामं यथेच्छ चरणं विचरणम्,
कर्मधा । यथेच्छमावसे विचरण, मनमानी चनफिर।
कामचरत्व ( सं० लो० ) कामचरस्य भावः, काम-
चर-ख । कासचरका कार्य, मनमानी चलफिर।
कामचलाउ (हिं.वि.) किसी न किसी प्रकार कार्य
निकाल देनेवासा, जो काम चला देता हो।
कामचार (सं० वि०) कामन वेच्छया चरति, काम
घर-धन । . १ यथेच्छभावसे विचरणकारक, मर्जीके
सुवाफिक घूमने फिरनेवाला । २ यथेच्छभावसे पशु
चरानेवाला, जो मर्जीक मुवाफिक मवेशी चराता हो।
कामचारिणी (सं० स्त्री०) सुगन्ध लताविधेष, एक
खुशबूदार बेल।
कामचारी (सं० त्रि.) १ कामिन स्वेच्छया चरति, काम.
घर-णिनि । कामुक, ऐयाश, छिनरा । २ यथेच्छचारी,
मनों के भुवाफिक चसनेवाला। (पु.) ३ ग़रुड़।
४ काविर, एक चिड़िया।
कामन (सं.वि.) कात्मा बायते, वाम जन-ड।
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१ पमिसावजात, खाडियसे पैदा। बाम व्यसन
दप प्रकारका होता-
."गयाची दिवाखाः परीवादा स्त्रियो मदः।
नौयविक उपायाच बामजी दशको गवाः।" (मनुसरिता)
मृगया (शिकार ) यूतक्रीड़ा, दिवानिद्रा, पर-
निन्दा, स्त्रीसम्भोग, मद्यपान, नृत्य, गीत, वाद्य और
वृथापर्यटन दश कामन व्यसन है। इनमें मद्यपान,
द्यूतक्रीड़ा, स्त्रीसम्भोग और मृगया चार उत्तरोत्तर
अधिक कष्टदायक होते हैं। कामज़, व्यसनमें पासत
इसलिये इनको सर्वदा छोड़ना चाहिये । २ कामजात,
मुहब्बतसे पैदा । (पु.) ३ कामदेवके पुत्र, पनिरह।
कामजन्दर (सं० १०) कामचासो ज्वरोति, कसंधा।
कामजन्य ज्वर, एक बोखार। कामरिपुके पाधिक्यसे
यह ज्वर पाता है। वैद्ययास्त्र मतसे इसका लक्षण,-
"क्षामने चित्तविन गम्नन्द्रालस्यममोननम् ।" (माधवनिदान)
मनको विकलता, तन्द्रा, पालस्य पौर भोजन
है।. भावप्रकाशके मतानुसार प्रावासवाक्य, पभोष्ट
पस्तुकै लाभ, वायुके उपशमकारक कार्य और दृष्ट
रहने के उपाय यह ज्वर छूट जाता है। क्रोधसे भी
इस ज्वरका उपथम होता है।
कामनननी (सं. स्त्री.) नागवती, पानको वेन ।
कामननि (सं० पु०) कामस्य जनिरुत्पत्तिः अस्मान,
बडुब्रो०। १ कोकिल, सोयन। (वि.)२ मुंगधि,
खुशबूदार।
कामना (सं.स्त्री.) वृक्षविशेष, एक माड़। यह
कर्णाटक देशमें प्रसिद्ध है। इसका वोज भी कामना
कंडाता है। वैद्यकनिघण्टु इसे मटर, बल्य, करम-
वृषिकर, इन्द्रिय बप्तिकर और रुश्य बताता है। राज-
निघण्ट के मतसे इसके वोनमें भी उन गुण होता है।
कामजान (सं० पु.) कामं जनयति, काम-जन-णिच्-
अच् निपातनात् न खः। अथवा काम कन्दर्पभावं
पानयति, कामज-मा-नी-ड। कोकिल, कोयल।
कामजित् (सं• पु.) काम जयति, काम-जि-क्किए ।
१महादेव। २ कार्तिकेय । ३ जिनदेव ।
कामज्येष्ठ (सं.वि.) कामको बड़ा समझनेवासा,
जो पाशिका पाचन्द हो।<noinclude></noinclude>
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सदस्य वार्ता:आदेश यादव
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2026-07-11T04:47:39Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ नया अनुभाग
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text/x-wiki
{{संवाद}}
{{स्वागत}}--[[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) १४:०३, २२ अप्रैल २०२१ (UTC)
== इंडिक विकिसोर्स प्रूफ्रेडथॉन अगस्त २०२१ ==
प्यारे संपादकों,
पिछले साल प्रूफरीडथॉन में आपकी भागीदारी और समर्थन के लिए आपको धन्यवाद और बधाई। CIS-A2K ने इस साल फिर से ऑनलाइन [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021|इंडिक विकिसोर्स प्रूफरीडथॉन अगस्त 2021]] का आयोजन किया है ताकि इस भारतीय स्वतंत्रता के सीजन में हमारे भारतीय क्लासिक साहित्य को डिजिटल प्रारूप में समृद्ध किया जा सके।
'''आपको किस चीज़ की जरूरत है; '''
'''बुकलिस्ट:''' प्रूफरीड की जाने वाली किताबों के संग्रह दी ज़रूरत। कृपया अपनी भाषा में कोई पुस्तक खोजने में हमारी सहायता करें। पुस्तक किसी तीसरे पक्ष की वेबसाइट पर यूनिकोड स्वरूपित पाठ के साथ उपलब्ध नहीं होनी चाहिए। कृपया पुस्तकें एकत्र करें और हमारे इवेंट की [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Book list|पृष्ठ पुस्तक सूची]] में जोड़ें। आपको यहां बताए गए कॉपीराइट दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। पुस्तक खोजने के बाद, आपको पुस्तक के पृष्ठों की जांच करनी चाहिए और <पेजलिस्ट/> बनाना चाहिए।
'''प्रतिभागी:''' यदि आप इस कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं तो कृपया प्रतिभागी अनुभाग में अपने नाम पर [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Participants|हस्ताक्षर]] करें।
'''समीक्षक:''' कृपया इस प्रूफरीडथॉन के [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Participants#Administrator/Reviewer|व्यवस्थापक/समीक्षक]] के रूप में स्वयं को बढ़ावा दें और अपना प्रस्ताव यहां जोड़ें। व्यवस्थापक/समीक्षक इस प्रूफरीडथॉन में भाग ले सकते हैं।
'''मीडिया कवरेज:''' हम सभी इंडिक विकिसोर्स समुदाय के सदस्यों से अनुरोध करते हैं, कृपया सभी सोशल मीडिया चैनलों में जानकारी पहुंचाइए, हम हमेशा आपके विकिपीडिया/विकिसोर्स को साइटनोटिस का उपयोग करने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं। बेशक, आपको अपने स्वयं के विकिसोर्स साइटनोटिस का भी उपयोग करना चाहिए। कुछ पुरस्कार: CIS-A2K द्वारा कुछ पुरस्कार दिए जा सकते हैं। मान्य और प्रूफरीड पृष्ठों की गणना करने का एक तरीका:इंडिक विकिसोर्स कॉन्टेस्ट टूल्स <https://indic-wscontest.toolforge.org/>
'''समय :''' 15 अगस्त 2021 से 00.01 से 31 अगस्त 2021 तक 23.59 (IST)
'''नियम और दिशानिर्देश:''' मूल नियम और [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Rules|दिशानिर्देश]] यहां वर्णित हैं।
'''स्कोरिंग:''' विवरण [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon August 2021/Rules#Scoring_system|स्कोरिंग]] विधि का वर्णन यहां किया गया है। हम आशा करता हूं कि इस वर्ष लॉकडाउन में कई भारतीय विकी स्रोत शामिल।
होंगे।
आप के प्रति वफादार
जयंत नाथ
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Indic_Wikisource_Community/HiActiveUser&oldid=21800555 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== विकिमीडिया फाउंडेशन के वर्ष 2021 के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के चुनावों में मतदान करना भूलिएगा नही ==
आपका आदेश यादव,
यह संदेश आपको इसलिए भेजा जा रहा है क्योंकि आप विकिमीडिया फाउंडेशन के वर्ष 2021 के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के चुनावों में मतदान करने के योग्य हैं। इस बार चुनाव 18 अगस्त, 2021 को शुरू होंगे और 31 अगस्त, 2021 को बंद होंगे। विकिमीडिया फाउंडेशन, हिन्दी विकिस्रोत जैसी परियोजनाओं का संचालन करता है और इसके संचालन की जिम्मेदारी बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के हाथों में है। बोर्ड विकिमीडिया फाउंडेशन का निर्णय लेने वाला निकाय है। [[:m:Wikimedia Foundation Board of Trustees/Overview|बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के बारे में अधिक जानकारी यहां से प्राप्त करें]]।
इस साल कम्युनिटी के वोटों के आधार पर चार सीटों का चयन किया जाएगा। इन सीटों के लिए दुनिया भर से 19 उम्मीदवार मैदान में हैं। [[:m:Wikimedia_Foundation_elections/2021/Candidates#Candidate_Table|बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के वर्ष 2021 के उम्मीदवारों के बारे में अधिक जानकारी यहां से प्राप्त करें]]।
कम्युनिटी के लगभग 70,000 सदस्यों को मतदान के लिए आमंत्रण दिया गया है। जिसमें आप भी शामिल हैं! मतदान केवल 31 अगस्त 23:59 UTC तक जारी रहेगी।
*[[:hi:Special:SecurePoll/vote/Wikimedia_Foundation_Board_Elections_2021|'''हिन्दी विकिस्रोत के सुरक्षित निर्वाचन पर जाकर मतदान करें''']]।
अगर आप पहले ही मतदान कर चुके हैं, तो मतदान करने के लिए धन्यवाद और कृपया इस ई-मेल को नज़रअंदाज़ करें। लोग केवल एक बार वोट कर सकते हैं, भले ही उनके पास कितने भी अकाउंट हों।
[[:m:Wikimedia Foundation elections/2021|इस चुनाव के बारे में अधिक जानकारी यहां से पढ़ें]]। [[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) ११:२८, २६ अगस्त २०२१ (UTC)
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== इंडिक विकिसोर्स प्रूफ्रेडथॉन मार्च २०२२ ==
प्यारे संपादकों,
पिछले साल प्रूफरीडथॉन में आपकी भागीदारी और समर्थन के लिए आपको धन्यवाद और बधाई। CIS-A2K ने इस साल फिर से ऑनलाइन [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022|इंडिक विकिसोर्स प्रूफरीडथॉन मार्च 2022]] का आयोजन किया है ताकि इस भारतीय स्वतंत्रता के सीजन में हमारे भारतीय क्लासिक साहित्य को डिजिटल प्रारूप में समृद्ध किया जा सके।
'''आपको किस चीज़ की जरूरत है; '''
'''बुकलिस्ट:''' प्रूफरीड की जाने वाली किताबों के संग्रह दी ज़रूरत। कृपया अपनी भाषा में कोई पुस्तक खोजने में हमारी सहायता करें। पुस्तक किसी तीसरे पक्ष की वेबसाइट पर यूनिकोड स्वरूपित पाठ के साथ उपलब्ध नहीं होनी चाहिए। कृपया पुस्तकें एकत्र करें और हमारे इवेंट की [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Book list|पृष्ठ पुस्तक सूची]] में जोड़ें। आपको यहां बताए गए कॉपीराइट दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। पुस्तक खोजने के बाद, आपको पुस्तक के पृष्ठों की जांच करनी चाहिए और <पेजलिस्ट/> बनाना चाहिए।
'''प्रतिभागी:''' यदि आप इस कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं तो कृपया प्रतिभागी अनुभाग में अपने नाम पर [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Participants|हस्ताक्षर]] करें।
'''समीक्षक:''' कृपया इस प्रूफरीडथॉन के [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Participants#Administrator/Reviewer|व्यवस्थापक/समीक्षक]] के रूप में स्वयं को बढ़ावा दें और अपना प्रस्ताव यहां जोड़ें। व्यवस्थापक/समीक्षक इस प्रूफरीडथॉन में भाग ले सकते हैं।
'''मीडिया कवरेज:''' हम सभी इंडिक विकिसोर्स समुदाय के सदस्यों से अनुरोध करते हैं, कृपया सभी सोशल मीडिया चैनलों में जानकारी पहुंचाइए, हम हमेशा आपके विकिपीडिया/विकिसोर्स को साइटनोटिस का उपयोग करने के लिए मनाने की कोशिश करते हैं। बेशक, आपको अपने स्वयं के विकिसोर्स साइटनोटिस का भी उपयोग करना चाहिए। कुछ पुरस्कार: CIS-A2K द्वारा कुछ पुरस्कार दिए जा सकते हैं। मान्य और प्रूफरीड पृष्ठों की गणना करने का एक तरीका: [https://indic-wscontest.toolforge.org/ इंडिक विकिसोर्स कॉन्टेस्ट टूल्स]
'''समय :''' 01 मार्च 2022 से 00.01 से 16 मार्च 2022 तक 23.59 (IST)
'''नियम और दिशानिर्देश:''' मूल नियम और [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Rules|दिशानिर्देश]] यहां वर्णित हैं।
'''स्कोरिंग:''' विवरण [[:m:Indic Wikisource Proofreadthon March 2022/Rules#Scoring_system|स्कोरिंग]] विधि का वर्णन यहां किया गया है। हम आशा करता हूं कि इस वर्ष लॉकडाउन में कई भारतीय विकी स्रोत शामिल।
होंगे।
आप के प्रति वफादार
जयंत नाथ. १७:५४, १० फ़रवरी २०२२ (UTC)
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== Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022 ==
''Sorry for writing this message in English - feel free to help us translate it''
[[File:Wikisource-logo-with-text.svg|frameless|right|100px]]
Dear {{BASEPAGENAME}},<br>
Thank you and congratulation to you for your participation and support last year. The CIS-A2K has been conducted again this year [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022|Online Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022]] to enrich our Indian classic literature in digital format.
<u>'''WHAT DO YOU NEED'''</u>
* '''Booklist:''' a collection of books to be proofread. Kindly help us to find some books in your language. The book should not be available on any third-party website with Unicode formatted text. Please collect the books and add our [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Book list|event page book list]]. You should follow the copyright guideline described [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Book list|here]]. After finding the book, you should check the pages of the book and create [[:m:Wikisource Pagelist Widget|<nowiki><pagelist/></nowiki>]].
*'''Participants:''' Kindly sign your name at [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Participants|Participants]] section if you wish to participate in this event.
*'''Reviewer:''' Kindly promote yourself as administrator/reviewer of this proofreadthon and add your proposal [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Participants#Administrator/Reviewer|here]]. The administrator/reviewers could participate in this Proofreadthon.
* '''Some social media coverage:''' I would request to all Indic Wikisource community members, please spread the news to all social media channels, we always try to convince your Wikipedia/Wikisource to use their SiteNotice. Of course, you must also use your own Wikisource site notice.
* '''Some awards:''' There may be some award/prize given by CIS-A2K.
* '''A way to count validated and proofread pages''':[https://indic-wscontest.toolforge.org/ Indic Wikisource Contest Tools]
* '''Time ''': Proofreadthon will run: from 14 November 2022 00.01 to 30 Novemeber 2022 23.59 (IST)
* '''Rules and guidelines:''' The basic rules and guideline have described [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Rules|here]]
* '''Scoring''': The details scoring method have described [[:m:Indic Wikisource proofread-a-thon November 2022/Rules#Scoring_system|here]]
I really hope many Indic Wikisources will be present this time.
Thanks for your attention<br/>
[[User:Jayanta (CIS-A2K)|Jayanta (CIS-A2K)]]- 9 November 2022 (UTC)<br/>
Wikisource Program officer, CIS-A2K
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== हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला रजिस्ट्रेशन ==
नमस्कार,
हम आशा करते हैं कि आप सब तंदरुस्त होंगे। आपको सूचित किया जा रहा है कि आज से यानी कि 8 फरवरी 2023 से हिंदी विकिस्रोत सामुदायिक कौशल-निर्माण कार्यशाला के रजिस्ट्रेशन ऑपन हो गई है जो 15 फरवरी 2023 तक जारी रहेगी। कृपया अपना कुछ कीमती समय निकाल कर [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSck0SZ_TNpa5j9z3X_IJ8Y4PAIKNxjd3bRPmkeP_s9_vkwp7g/viewform इस फार्म] को ज़रूर भरें। बहुत शुक्रिया --[[सदस्य:MediaWiki message delivery|MediaWiki message delivery]] ([[सदस्य वार्ता:MediaWiki message delivery|वार्ता]]) १०:३४, ९ फ़रवरी २०२३ (UTC)
<!-- https://meta.wikimedia.org/w/index.php?title=Talk:CIS-A2K/Events/Hindi_Wikisource_Community_skill-building_workshop&oldid=24472896 पर मौजूद सूची का प्रयोग कर के User:Jayantanth@metawiki द्वारा भेजा गया सन्देश -->
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024 परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फ़रवरी 2024]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। ई-मेल पर कूपन द्वारा पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 5 अप्रैल 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfNQpP4Zn6GmQ3XIjDWlQ-KItIqnm-seTMO6PZGcu22lV7fgA/viewform प्रतिभागी सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ११:१२, २२ मार्च २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:५६, ७ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 10 अप्रैल 2025 तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १९:५७, २९ मार्च २०२५ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १६:३६, १० जनवरी २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:१५, २९ जनवरी २०२६ (UTC)
== विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए २५ मार्च २०२६ तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdAp7lxMY2nSh5wnsTi8SQOA4vu-0DGi2siReQtMcdictAemg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०१:१२, १८ मार्च २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस संपादनोत्सव/२०२६]] की पुरस्कार राशी अमेजन कूपन के रूप में भेजी जा चुकी है। कृपया अपना ईमेल जाँच लें। कोई समस्या हो तो मुझे सूचित करें -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०६:१३, ९ अप्रैल २०२६ (UTC)
== गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन ==
@[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिंदी_विश्वकोष_भाग_३.djvu/५१५&diff=prev&oldid=667416 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। आपके द्वारा शोधित पृष्ठों में अनुस्वार और साँचे के सही उपयोग जैसी त्रुटियाँ हैं। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०४:४७, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
27xg4pwmiq0cr6enx6brclmbz3fygs9
सदस्य वार्ता:Avantika Shaw
3
183715
667455
660714
2026-07-11T10:34:45Z
सौरभ तिवारी 05
49
/* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ नया अनुभाग
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wikitext
text/x-wiki
{{संवाद}}
== स्वागत ==
{{स्वागत}}
--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १८:४३, २ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:०२, ७ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:१८, २९ मार्च २०२५ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा सांत्वना पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:२२, १० जनवरी २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:०९, २९ जनवरी २०२६ (UTC)
== गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन ==
@[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_षष्ठ_भाग.djvu/१२७&curid=45922&diff=667454&oldid=664893 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १०:३४, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
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Avantika Shaw
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/* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ उत्तर
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wikitext
text/x-wiki
{{संवाद}}
== स्वागत ==
{{स्वागत}}
--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १८:४३, २ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:०२, ७ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:१८, २९ मार्च २०२५ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा सांत्वना पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:२२, १० जनवरी २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:०९, २९ जनवरी २०२६ (UTC)
== गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन ==
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:मुझे आप कोई शोधित पुस्तक का लिंक दे [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५४, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
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Avantika Shaw
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/* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ उत्तर
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wikitext
text/x-wiki
{{संवाद}}
== स्वागत ==
{{स्वागत}}
--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १८:४३, २ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम ==
[[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:०२, ७ सितम्बर २०२४ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:१८, २९ मार्च २०२५ (UTC)
== विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम ==
[[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा सांत्वना पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:२२, १० जनवरी २०२६ (UTC)
:प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:०९, २९ जनवरी २०२६ (UTC)
== गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन ==
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:मुझे आप कोई शोधित पुस्तक का लिंक दे [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५४, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
:ताकि हम उसके रूल देख ले आप ने जो भेजा है उससे उतना समझ नहीं अर्ह [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५६, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
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[[श्रेणी:कविता]]
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|Title=हिन्दी कौमुदी
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[[श्रेणी:भाषा और व्याकरण]]
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हिन्दी कौमुदी |
---
हिन्दी भाषाका पूर्व व्याकरण ।
पंडित अंचिकाप्रसाद वाजपेयी
retre
fa इंडियन नेशनल पब्लिशर्स लिमिटेड,
१५६ वी महुआबाजार स्ट्रीट, कलकत्ता ।
परवा साहित्य म
तृतीय संस्करण ].
[ दाम 1<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/३
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>'चिपय
भूमिका
व्याकरण
विषयसूची ।
वर्णविचार
के उच्चारण
'उच्चारण करनेकी रीति
वर्ण लिखनेकी रीति
?
२
संयुक्त वर्ण
Ε
शब्दों के वधारणके नियम
૨
सन्धि
१२
सदविचार
१८
संज्ञा
२०
" लिङ्ग विचार
२२
'शब्दोंकी साधना
२६
सर्वनाम
३६
कारक
४४<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विषय
विशेषण
( ख )
पृष्ठ
४७
किया
४६
क्रियाकी साधना
५४
प्रेरणार्थक क्रिया
६६
यौगिक क्रिया
७५
नामधालु
रुदन्त
उपसर्ग
अव्यय
८५
43
६२
क्रियाविशेषण
६३
सम्वन्धस्चक अव्यय
१५
उभयान्वयी अव्यय
૭
विस्मयादिबोधक अव्यय
६८
तद्धित प्रत्यय
Εξ
समास
१०५
वापरचना विचार
१०९
faeक्ति प्रत्ययों अर्थ
११२
शब्दों मथ
R
क्रियापदों के अर्थ
Re
शब्दको पुनक्ति
135<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम संस्करणको भूमिका ।
--100-
आज हिन्दी के वैयाकरणों और शिक्षकोंके सामने पड़े
संकुचित वित्तसे यह व्याकरण रखा जाता है, क्योंकि इसमें
कई बातें ऐसी हैं जो उन्हें सर्वथा नयी प्रतीत होगी और इस
समय यह जानना असम्भव है कि ये उन्हें कहांतक स्वीकृत
होगी। परन्तु जो पाते इस पुस्तक में उन्हें नयी थे और जिन्हें
स्वीकार करनेको आशा जी न चाहे उनपर यदि ये पूर्व-
संस्कारोंको त्याग कर विचार करेंगे, तो आशा है कि बहुतसा
मतभेद दूर हो आयगा ।
"हिन्दी कोमुरी" लिखता बारम्भ करनेके पहले हमने
भारतवासियों और विदेशियोंके लिये फोई (५१२० व्याकरण
देखे थे, जिनमें सर्वश्रेष्ठ व्याकरणों और उनके लेखकों-
की नामावली तथा उपनेका समय अन्यत्र दिया गया है।
इन व्याकरणोंमें पूर्णता और सोनकी दृष्टिले पादरी फैलागके
हिन्दी मरमरकर नम्बर पहला ओर पं० केशवराम भट्टके हिन्दी
व्याकरणका दूसरा है । पादरी लागके विदेशी होने तथा
उस समय व्याकरण की पातके ज्ञानका यथेष्ट विकास न होनेसे .
कारण उनके व्याकरणमें पहुतसो त्रुटियां और भूर्ले रद्द गयी
..
है । परन्तु जिस समय यह लिखा गया था, उस समय तथा<noinclude></noinclude>
smatpwbttg4vmye8cu5fuv3thk0seb5
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>4
( / )
=
उसके बाद वैसा भी व्याकरण किसी भारतवासियोंने नहीं बनाया
यह हमारे लिये बड़ी ही लज्जा और खेदकी बात है । हमारी
समझसे प्रत्येक व्याकरणलेखकको लिखना आरम्भ करनेके
पहले कैलागका हिन्दी ग्रामर अवश्य पढ़ लेना चाहिये ।
हिन्दी व्याकरण वर्ण, शब्द और वाक्यरचना इन तीन
काही विचार हिन्दी कौमुदीमें किया गया है। ऐसा क्यों
हुआ और छन्दशास्त्रका विचार क्यों नहीं किया गया
यह यथास्थान बतलाया गया है। हिन्दी में विरामादि चिन्हों-
का प्रयोग अव अच्छी तरह चल पड़ा है, इस लिये इनके प्रयोग-
के नियम भी होने चाहिये । यद्यपि यह पाश्चात्य प्रथा है और
संस्कृत, प्राकृत वा हिन्दी व्याकरणसे इसका सम्बन्ध कहीं नहीं
+
लगाया गया है, केवल पं० केशवराम भट्टके व्याकरण में "चिन्ह
(
विचार मिलता है) इसलिये हिन्दी व्याकरणमें इसे स्थान
नहीं मिल सकता, तथापि आजकल इस प्रकारणको उपेक्षा भी
नहीं की जा सकती। इससे हिन्दी के विद्यार्थियोंके सुभीते के लिये
परिशिष्ट "चिन्ह प्रकरण" दिया गया है। आजतक जितने
sureरण देखने में माये हैं और जो नये तैयार हो रहे हैं, उन
' सम्धिप्रकरण संस्कृत व्याकरणसे उठाकर रख दिया
गया है । हिन्दी व्याकरणमें संस्कृतका सन्धिप्रकरण ठीक
नहीं जान पड़ता, परन्तु हिन्दीमें भी सन्धि है इसका विचार
किसीने नहीं किया और एक साथ वैयाकरणने तो यहांतक
लिप दिया है कि "हिन्दीमें सन्धि और समास नहीं है ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( = )
हमारे मवसे हिन्दी में सन्धि और समास दोनों है और हिन्दी
कौमुदीके सन्धि प्रकरणमें हिन्दिकी हो सन्धि लिखो गयी
है। पर आजकल हिन्दीमें तत्सम शब्दों का प्रयोग दिनों
दिन चढ़ता जाता है, दस छिये परिशिष्टमें संस्कृत की सन्धि
भी दे दी गयी है, क्योंकि हिन्दीके पिचाधियोंके लिये इसका
जानना अत्यावश्यक है ।
P
इस व्याकरणमें नयापन इन विषयोंमें है : (१) वर्णा के
'उच्चारण के नियम (२) शब्दोंके उच्चारण के नियम, (३) हिन्दी की
सन्धि, (४) स्त्रीलिङ्गसे पुलिङ्ग बनाने के कुछ नियम, जो किसी
भाषा व्याकरण में आनतक नहीं देखे गये, (५) स्त्रीलिङ्ग
और पुलिङ्ग शब्दों की पहचान के नियम, (६) शब्दों की साधना
'विभकियों के अनुसार, ( ७ ) संस्कृत की तरह क्रियामें वाल्यका
प्रयोग तथा कर्मधान और भावप्रधान क्रियासम्बन्धी मतका
त्याग, (८) क्रियापदों के सम्बन्धमें शशास्त्र - सम्बन्धी शोध
और भविष्यकालिक क्रियाकी कल्पनापर मत, ( 8 ) प्र
ेरणार्थक
क्रियाफे रूपों तथा अर्थों का स्पष्टीकरण, (१०) यौगिक
- क्रियाओंका श्रेणिविभाग और विचार, ( ११ ) दन्त और
'तडित प्रत्ययों का विस्तृत विवेचन, ( १२ ) शब्दों और विभक्ति-
• प्रत्ययों तथा क्रियापद का अर्थनिर्णय और (१३) पदयोजना
-सम्बन्धी विशेष नियम ।
हिन्दी कौमुदीके लिये यह दावा नहीं किया जा सकता<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( 1 )
लिखनेकी प्रवृत्ति दी इसके प्रणयनका कारण है। इसमें हां
सफलता हुई है इसका विचार निरपेक्ष घेयाकरण और हिन्दी
शिक्षक ही कर सकते है। यह छोटे विद्यार्थियोंके लिये दिनों
है और लघु कौमुदी है, पर ( Philology ) शब्दशास्रके
अनुसार बननेके कारण बड़े विद्यार्थी भी इससे लाभ उठा
सकते हैं। यदि हिन्दी के अधिकारियोंने इसका आदर किया तो
उच्च श्रेणी के विद्यार्थियोंके लिये सिद्धान्त फौमुदी लिखने का
विचार किया जायगा । जो सज्जन इसकी त्रुटियां या भूलें
चातकी कृपा करेंगे, उन्हें सादर धन्यवाद दिया जायगा और
यदि चे यथार्थ त्रुटियां या भूलें होंगी तो अगले संस्करणमें
उनका संशोधन कर दिया जायगा । जो महाशय समाचार.
safare कुछ लिखें वे अपनी आलोचना चिन्हित
कर हमारे पास भेजेंगे, तो बड़ी कृपा होगी ।
कलकत्ता :
ज्येष्ठ दशहरा, सं० १९७६ १
अंबिकाप्रसाद बाजपेयी ।<noinclude></noinclude>
frtm7c8pgkvo3irq4eyqfcevh6u8m0e
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>द्वितीय संस्करणको भूमिका ।
यह संस्करण बहुत पहले प्रकाशित होनेको था, पर नाना
कारणोंसे मद्दीं हो सका। इससे शिक्षकों और विद्यार्थियोंको
जो श्रोता हुआ उसके लिये हमें खेद है।
पहले संस्करणकी जेसी समालोचना होनी चाहिये थी, नहीं
हुई। इस लिये भूर्लोका सुधार ठोक ठीक नहीं हुआ, क्योंकि
उनका ज्ञान ही नहीं हो सका । सथापि कई अंश इस संस्क-
में कुछ संशोधन र परिवर्तन कर दिये गये है।
पिछले संस्करणको भूमिका भ्रमवश यह लिख दिया गया
था कि लिङ्ग शब्दसे पुलिङ्ग शब्द यनानेके नियम किसीने
नहीं लिखे । वास्तवमें पं० केशवराम भट्टके व्याकरण उनकी
कुछ चर्चा हुई है।
'
इस संस्करणमें निखलिखित विषयोंमें महत्वका परिवर्तन
या संशोधन अथवा परिवर्द्धन हुआ है : वर्णमाला के वर्ण मौर
भेद, सन्धि, शब्दोंकी साधना, विशेषण के भेद, यौगिक fear
और समास । इनके मित्रा जगह जगह फुट नोट दे दिये गये
है, जिनसे हिन्दीवालोंको ही नहीं, अन्य भाषिक भी
सहायता मिलने की आशा है।<noinclude></noinclude>
rc5bd060u5bra0j9sfxs95c4nn3tosc
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( F )
सुविज्ञ शिक्षकों और वैयाकरणोंसे विनीत निवेदन है कि
इसमें उन्हें जिस विषयको अपेक्षा जान पड़े था जिसमें कुछ
भूल दिखाई दे उसे या तो समाचारपत्रों या निजी पत्र द्वारा
सूचित करने की कृपा करें, जिससे भगळे संस्करणमें उनका
सुधार हो सके।
अन्तमें पं० सभापति उपाध्याय व्याकरणाचार्य तथा पं०
रामाक्षा पांडेय व्याकरणाचार्यको धन्यवाद है जिन्होंने उपयुक्त
सूचनाएं देकर इस संस्करणके संशोधित रूपको सर्वसाधारणके
समक्ष रखने में सहायता दी
I
कलकत्ता :
चत्र शुक्ला प्रतिपदा सं० १९७६.
काप्रसाद वाजपेयी ।<noinclude></noinclude>
oib7og3qdtzl4zhpbipcisgsmxg6458
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय संस्करणकी भूमिका ।
--
परमेश्वरकी कृपाले हिन्दी कौमुदीका यह तीसरा संस्करण
अध्यापक मण्डली भोर विद्यार्थियोंके सामने रखनेका सौभाग्य
प्राप्त हुआ है। यह पुस्तक इसी इच्छासे लिखी गयी
थी कि पड़ने और पढ़ानेवालोंका इससे कुछ लाभ हो। इसके
लिये प्रारम्भ से ही बड़ी करनी पड़ी और जिसमें किसी म
किसी स्कूल में पढ़ायी जाने लगे, इस लिये पूर्वाद तो संग
१६७६ के पौपमें निकल गया था और उत्तराष्ट्र कहाँ
निकला और इस प्रकार पुस्तक पूरी हुई।
में
भाशा थी कि हिन्दीके वैयाकरण इसकी समालोचना
कर त्रुटियां बतलायेंगे, जिनका निवारण दूसरे संस्करण में कर
दिया जायगा। पर जब कोई विचारणीय समालोचना देखने में .
नहीं आयी, तब हमने शाप ही संशोधन प्रारम्भ कर दिया और
प्रायः आधी दूरतक पहुंचे ही थे कि सरकारने अपना मेहमान
बना लिया। इस लिये दूसरा संस्करण प्रकाशित होनेके पहले
देखा भी न जा सका और संशोधित संस्करणके पहले भूलभरा
संस्करण निकला ।.
परन्तु विहार संस्कृत परीक्षा ने इसे अपनाया, इस
लिये तीसरे संस्करण की नीवत थायी। यह बात कोई दो
.<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( || )
महीने पहले मालूम हुई कि हिन्दी कौमुदी मध्यमा परीक्षाका
कोर्स है । इस लिये जल्दी जल्दी यह तीसरा संस्करण एक
महीनेके भन्दर निकाला गया। दूसरे संस्करणपर एक व्याध
समालोचना निकली थी, पर संशोधन के समय यह नहीं मिली।
तोसी जो भूलें ध्यान में आयीं अपनी ओरसे सबका संशोधन
कर दिया गया हैं । फिर भी जो रह गयी हो उनको
और यदि अध्यापक वा विद्यार्थी वा समालोचक ध्यान
आकर्षित करेंगे, तो उनकी कृपा धन्यवाद सहित स्वीकार
की जायगी और आवश्यक होनेपर अगले संस्करणमें संशोधन
कर दिया जायगा ।
कलकत्ता !
पौष कृष्ण नवमी,
चिकाप्रसाद वाजपेयी ।
सं० १९८० वि०<noinclude></noinclude>
st5ls85wq2ptyddwvigqsll3tlt54l5
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>* ॐ श्रीगणेशाय नमः *
हिन्दी कौमुदी ।
व्याकरण |
।
जिस शास्त्र के ज्ञान से भाषाका शुद्धाशुद्धविवेक होता है,
उसे व्याकरण कहते है ।
हिन्दी व्याकरणके तीन भाग है, वर्णविचार, शब्दविचार,
और वाक्यरचना विचार । *
वर्णविचार अक्षरों के नाम, मेद और उच्चारणका वर्णन है ।
शब्दविचार में शब्दोंके भेद, साधना और व्युत्पत्तिकर
विवेचन है ।
व्याकरणका प्रयोग जिस छार्थमें यहां किया गया है, यह संस्कृत हो
नहीं, अंगरेजीसे मी भिन्न है । अंगरेजीमें छन्दशास धारक है,
पर संस्कृत में वह स्वतन्त्र यास है। इसी प्रकार शिक्षा भो संस्कृतमें
स्वतन्त्र शास्त्र है, पर अंगरेजीमें ग्रामरका प्रथम भाग है । हिन्दी में छन्दः
ras are at नेक है, परन्तु शिनाका कोई स्वतन्त्र अन्य नहीं है।
इसलिये हमने अन्य हिन्दी वैयाकरणों मनुकरणपर वर्णविचार
व्याकरणका श्रङ्ग मानकर इसमें स्थान दिया है।<noinclude></noinclude>
oyophfx7n4nzqdij8061pwa3seqivxv
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>n'
हिन्दी कौमुदी |
aartaafविचार में विभक्तियों, शब्दों और क्रियापदों के
अर्थ तथा शब्दों वाक्य बनानेकी रीतियां हैं।
वर्णविचार |
जिन वर्णो वा अक्षरोंमें हिन्दी भाषा लिपी जाती है, वे
हिन्दी, देवनागरी या नागरी कहाते हैं।
वर्णमाला कहते हैं। *
वर्णों की श्रेणीको
हिन्दी वर्णमाला में अड़तालीस अक्षर है। इनके दो भेद हैं,
स्वर और व्यञ्जन । ११ स्वर और ३७ व्यञ्जन हैं। +
जिन अक्षरोंका उधारण दूसरे अक्षरकी सहायता बिना हो
जाता है, वे स्वर कहते है । स्वरोंके दो भेद है, सानुनासिक
और निरनुनासिक | जो स्वर नकसुर योले जाते हैं वे सानु
नासिक और जिनके घोलने में नाकको सहायता नही ली जाती,
वे निरनुनासिक कहते हैं । स्वरोंकी सहायता से जिनका
उच्चारण होता है, उन्हें व्यञ्जन कहते हैं । निरनुनासिक स्वरपर
राजपुताने में ये शात्री और महाराष्ट्र तथा गुजरातमें चालयोध
जाते हैं । विहारमै कैयी शहरोंको हिन्दी अक्षर कहते है ।
समें दो स्वर और है एक ऋ वर्णका दीर्घ रूप तु और
दूसरा लृ पर हिन्दीसे इनका कोई सबन्ध न होने कारण इन्हे
वर्णमाला में स्थान नहीं दिया गया ।<noinclude></noinclude>
23msmjm2wbv1m09s3gl5ri5bys5dc7i
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>वर्णविचार !
३
*अनुनासिक वा चन्द्रविन्दु लगा देतैसे वह सानुनासिक हो
जाता है, जैसे में, श्री व्यादि ।
स्चर /
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ
ऊ ऋ ए ऐ से औ
व्यञ्जन ।
क स
व
ङ
च
ट
४
ॐ
ड ढ
ण
न
प फ य भ म
य र ल व
शयस ह्
ड ट्र
'(अनुस्वार)
व्यञ्जन दो प्रकारके होते हैं ।
जभ
31 32
धन ध
:(farent)
एक थे, जिनका उच्चारण
हिन्दी वैयाकरणाने तो पर अनुस्वार और frei
लगाकर यः यज्ञर बना लिये हैं और इन्हें स्वर उराया है और कुछने
ciate अन्तमें लिखकर इन्हें व्यंजन मात्र लिया है। यह विचारनेपर
ये न तो हर सिद्ध होते हैं प्यार न व्यंजन ही थोर इमी संस्कृतवासाने
terrane frer है।' साथ ही स्परोंकी महामता बिना इनका
धारण नहीं हो सकता, इसलिये हमने इन्हें नोंका हो एक भेद मान
लिया है। पहले संस्करण अनुस्वार या चन्द्रविन्दु स्वतन्त्र चर्ण माना
गया था, पर पूर्ण विचार करनेसे यह वर्ष नहीं मिल हुआ योंकि इसके
बोलने में समय नहीं बहता । इसलिये हम हमे चिन्ह मात्र मानते हैं ।
स्वरांका सानुनासिक उच्चारण लिखने में यह फाम आता है।
है।
पर हिंदी में<noinclude></noinclude>
62x4z0arpxiiejue3h8a5ul9gob154e
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४
हिन्दी कौमुदी |
पहले या पीछे स्वर रस देनेसे होता है, जैसे फ्, क । दूसरे, वे
जिनके पहले स्वर रहे बिना उच्चारण नहीं होता; जैसे
'अनुस्वार और विसर्ग। पिछले प्रकार के व्यञ्जन दो हो हैं ।
:
दोनो प्रकार स्वरोंके दो मेद और है, ह्रस्व और दीर्घ ।
थ, इ, उ, और ऋ ह्रस्व और आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ और औ
दीर्घं है । ए, ऐ, ओ और औ, दो दो अक्षरोंके मेलसे बने जान
पड़ते हैं और इसलिये सन्ध्यक्षर भी कहाते है । इसीसे दीर्घ
स्वर भी है। इनके हस्व रूप नहीं होते, यद्यपि हिन्दी में विशेष-
कर कविताएँ ए और मोका हस्व उच्चारण भी होता है ।
ह्रस्व स्वर के उच्चारणमें जितना समय लगता है, दीर्घ स्वर-
के उच्चारणमें उससे दूना लगता है । हस्वको एकमात्रिक और
दीर्घको हिमात्रिक भी कहते हैं।
arater उच्चारण स्वरोंके बिना नहीं हो सकता, इससे
'उनका उच्चारण करनेके लिये उनके अन्तमें "अ" लगा हुआ मान
लिया जाता है।
किसी अक्षर के साथ "कार" कहने से उसी अक्षरका बोध
होता है; जैसे ककारसे क, अकारसे अ आदि ।
areer तीन भागों में विभक्त है, स्पर्श वर्ण, अन्तस्थ वर्ण
और ऊष्म चर्ण । कसे मतक स्पर्श, यसे यतक अन्तस्थ और
शसे इतक ऊपम घर्ण कहाते हैं।
¿ स्पर्श वर्ण पांच पांच अक्षरोंकी पांच श्रेणियोंमें वटे हैं और
प्रत्येक श्रेणी वर्ग कहानी है। वर्गके यादि अक्षर से ही उसका<noinclude></noinclude>
tcfki4hxfsf67v8ec8aicv01ja43plx
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>वर्णविचार |
५
नाम पड़ता है जैसे कसे कवर्ग, चसे चधर्ग, दसे वर्ग, नसे
aa भोर पसे । कवर्ग कहने से क श्रेणी के पांचो
वर्ग
व्यञ्जनका योध होता है ।
प्रत्येक वर्गफा पदला और तीसरा वर्ण अल्पप्राण तथा
दूसरा और after महाप्राण और पांचवां सानुनासिक
अल्पप्राण कहाता है। जिन यनोंमें का भी उच्चारण
रहता है, वे महाप्राण कहाते हैं, जैसे,
६ आदि ।
न्यू+ह,
है और अक्षराँका स्थान संस्कृत व्यञ्जनोंमें नहीं है, इस
ढ़
लिये ऊपर लिखे क्रम में इनका वर्णन नहीं हुमा । द भर ढके
नीचे बिन्दी लगाने से ड़ और ढ़ अक्षर चनते
अल्पप्राण और दूसरा महाप्राण है ।
aणांक उच्चारण ।
.
1 पहला
कष्ट या गलेके बिना तो किसी वर्णका उच्चारण सम्भव -
नहीं है, पर कुछ वणों के उच्चारणके लिये कण्ठके सिवा कई
और arrant प्रयोजन होता है । जिस अक्षरके उच्चारणमें
जिस अवयवी मुख्यता रहती है, इस वर्णका वही उच्चारण-
उच्चारणस्थानके अनुसार वर्ण कंठव
म्यान महाता है।
तालव्य, मूद्धन्य, दन्त्य और ओष्ठ्य कहाते हैं।
गलेसे कष्ट्य, तालुसे तालव्य, मूर्द्धासे मूर्द्धन्य, दांतोले
दन्त्य, और ओठ ओष्ठ्य वर्णका उच्चारण होता है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हिन्दी कौमुदी ।
नीचे के फोटकले मालूम होगा कि किस वर्णका कौन
उच्चारण स्थान है :--
उच्चारणस्थान |
व्यञ्जन
स्पर्श चर्ण ।
स्वर
अध्यधाण |
अ आ के ग लघ
नासिक
अल्पप्राण
>
महाप्राण
- अन्तस्थ ऊष्म
कांठ
fac
- तालु
६. ई वज
容贫
ञ
य
श
मूर्द्धा
र ड
ठ द
ण
रड़
प्र.
दैन्त
त द
थ ध
न
ल
쇠
फ भ
म
दन्तोष्ठ
व
तालु ए ऐ
कंठोष्ट शो ओ
नासिका
उच्चारण करनेकी रीति ।
उचारणस्थान जान पर भी कणों का उशारण करतो<noinclude></noinclude>
he2u26q4krnjwvmw0xbfbrnkabfj11k
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>वर्णविचार !
विद्यार्थियोंके लिये कठिन होता है, इससे उनके उच्चारण के लिये
नियम इस प्रकार बनाये गये हैं ।
हिन्दी में ऋका उचारण रिकी भांति ही किया जाता है।
इस लिये पुराने पद्यग्रन्थोंमें काके पहले रिका ही प्रयोग देखा
जाता है।
हिन्दी में ए, ऐ, ओ और औ इन चार स्वरोंके दो दो उच्चा-
रण होते हैं। ए और थोका एक एकमात्रिक वा हस्व उच्चारण
होता है और दूसरा द्विमात्रिक वा दीर्घं । हस्य उच्चारण अन्य
'हस्व स्वरोंको मांति दीर्घ उच्चारणसे आधा समय लगता है।
जैसे, एकाई ( ह्रस्व ), एक (दीर्घ), मोहल्ला ( स्व ), मोहन
(दीर्घ) । ऐ और औका एक उधारण तो भर और जड होता
हैं। जैसे, विलेया, कौआ और दूसरा भय और अव् होता है !
जैसे, ऐसा, और एकमात्रिक प और ओके बदले इ और उ
लिखनेकी चाल भी हिन्दीमें है।
ङका उच्चारण कंठ और नासिकाको सहायतासे होता है,
इसमें नाकाका प्राधान्य इस लिये है कि दांतपर दांत रसकर
B बंगला ऐ और चौका उच्चारण में और वो होता है। हिन्दी में
यह शुद्ध है। मराठीमें अनुस्वारका सानुनासिक उघारण भी होता है,
पर बंगला में नहीं होता, इस लिये नहींका उचारण यंगाली "नहोम्”
किया करते हैं । युमालो लोग का उच्चारा प्रायः श्रो जैसा करते हैं,
इसलिये हिन्दी प्रकारके उच्चारण के लिये कहीं "या और कहीं "g"
लिखते हैं, जैसे मैकरको मेकार और नहींको नहीं ।<noinclude></noinclude>
dmkh6ce19ou0f6h4wegcedftzw1muig
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/२१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हिन्दी कौमुदी ।
भी इलका उच्चारण मनायास हो सकता है।
अपने वर्ग के
अक्षर के साथ हिन्दी में इसका उधारण होता है, स्वतन्त्र नहीं ।
तालमें सारी जीभ फैलाकर दवानेसे त्रका और जीभ की नोकको
उलटकर मुर्दामें लगानेसे णका उच्चारण होता है। ड़का
उच्चारण भी णको तरह ही होता है, पर भेद इतना ही है कि
इसके उच्चारण में नासिकासे सहायता नहीं ली जाती। अनु-
स्वारका उच्चारण हिन्दी में संस्कृतकी तरह ही होता है, पर
अनुस्वार से ही अनुनासिक वा चन्द्रविन्दुका काम भी लिया
जाता है। हिन्दीमें अनुस्वार बहुत करके चन्द्रबिन्दुके पदले ही
लिखा जाता है और संस्कृत तथा बहुत कम हिन्दी शब्दको
छोड़ सर्वत्र उसका सानुनासिक उच्चारण ही होता है, जैसे
गूढी, चांदी, उंगली, ऊंचना, नहीं, में, हैं । हिन्दीमें दीर्घ स्वर-
पर अनुस्वार होने से संदा उसका सानुनासिक उच्चारण होता है !
2
(
ड, अ, ण, ड, और ढ़, इन पांच अक्षरों में किसीसे कोई शब्द
प्रारम्भ नहीं होता ! पर पिछले तीन अक्षर शब्द के अन्त और
पांचो मध्यमें आते है ।
हिन्दीमें य, व और पका उच्चारण ज व और खकी तरह
भी किया जाता है और पुरानो कविता में तो प्रायः इनका भेद
ही नहीं माना गया है।
वर्ण लिखने की रीति ।
व्यञ्जनका उधारण स्वरके आगे या पीछे रहे विना नहीं<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/२२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>|
६
होता, पर स्वरद्दीन व्यसन लिखे जा सकते हैं। बिन व्यञ्जनों
स्वर नहीं रहता, उनके नीचे एक तिरछी लकीर कर दी जाती
है। इसे हद् चिन्ह कहते हैं।
जय स्वरों और व्यसनोंका मेल होता है, तब उनकी आकृति
चदल जाती है। स्वरोंके पूरे रूप व्यजनोंमें नहीं मिलते, पर प्रति-
निधिरूप से उनकी मात्राएं मिलती है। अकरके मिलनेसे
• व्यञ्जनके, रूपये कोई परिवर्तन नहीं होता, क्योंकि इसकी कोई
मात्रा नहीं है, केवल व्यंजनोंका हत् चिन्ह उड़ा दिया जाता है।
अन्य स्वरोंके मेलसे व्यञ्जनोंके रूपमें कुछ कुछ अन्तर पड़ता है ।
सकी मात्राएं |
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओो मो
T f ↑
199
7 7
अक्षर के ऊपर अनुस्वार और उसके पीछे घिसर्ग लगता है ।
रमें जब उ वा कफी मात्रा लगती है, तब उसके ये रूप हो
जाते हैं, रु, रू। इसी प्रकार द और हमें ऋफी मात्रा छाती
है, तब उनके ये रूप हो जाते हैं, ह, छ
संयुक्त वर्ण ।
जय दोघा अधिक नौका संयोग होता है, तब वे संयुक्त
वर्ण कहते हैं। संयुक्त वर्णों के रूप तीन प्रकार के होते हैं।
कहाँ तो अक्षरोंका स्वरूप ऐसा बदल जाता है कि उसमें मूल
"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०
हिन्दी कौमुदी ।
यक्षका कुछ भी पता नहीं चलता; कहीं एक अक्षर दूसरेपरं
लिखा जाता है और कहीं पहले अक्षरकी बड़ी सीधी रेखा
निकाल दी जाती है। पहले प्रकार के संयुक्त व्यखनक्षत्र
ये तीन ही है। क और पके योगसे क्ष, तू और रके योग से
तथा जू और न के योगसे बना है। हिन्दीमें ग्यं उच्चारण
किया जाता है।
कच, द ख और द जय हित्व लिये जाते है अथवा
rain को छोड़ और अक्षरोंका जब उनसे योग होता है,
तब एक अक्षर दूसरे के ऊपर लिखा जाता है, जैसे शकर लुधा
टह, अहा, गद्दा आदि ।
:
स, घ, च, ज, व, थ, ए, च, भ, म, यू, ल, व, श, प
और अक्षरोंमें जय एक दूसरेसे मिलता है, वय पहले आनेवाले
अक्षर अपनी बड़ी सीधी रेखासे हाथ धो बैठते है । न और
o face sोनेपर ऊपर नीचे था अगल बगल लिखे जाते हैं।
जैसे गन्ना गन्ना गल्ला गल्ला । कभी द्वित्व नहीं होते और
अपने after ऊपर लिखे जाते हैं। ण द्वित्व होनेपर
अक्षरके
या लिखा जाता है। तद्वित्व होनेपर स लिखा जाता
है, जैसे पत्तल ।
}
जय किसी अक्षरके पहले 'जाता है, तब उसके ऊपर और
'जब पीछे आता है, तब नीचे लिखा जाता है ; जैसे, अर्क, बन ।
जब के साथ त यार जुड़ता है, तब दोनोके ये रूप होते हैं :-
क का जब ज हित्व होता है, तब बातो पर नीचे लिखा जाता<noinclude></noinclude>
ciste0uvnjr9lcqz4u6k8z802fr7nnp
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>.I
J
वर्णविचार |
११
है या अगल बगल और पहले जकी लकीर गिर जाती है, जैसे,
लज्जा, राज्जू ।
कट के साथ जब जुड़ता है, तब उनके रूप ह
प्रकार होते है :-क्य, क्ष्य, टय, डच, देव जय ण किसी अन्य
व्यञ्जनसे मिल जाता है, तब उसकी बड़ी रेसर गिर जाती है।
कोर जब अपने कर्म से मिलता है, तब भी रूप इसी
प्रकार यदल जाता है। पर धारण नके समान होता है।
जैसे
ठण्ड
क और योग कके मीचे लिखा जाता है, जसे क
च
जय का संगम या उसे होता है, तब वह इन अक्षरीके
र लिया जाता है, जैसे ए ए ।
के साथ ण, न, म य र और क्या योग होनेपर संयुक्त
रूप इस प्रकार होते हैं, हा, हा,
शके उच्चारणके नियम /
हिन्दीमें सभी शब्द स्परान्त लिये जाते हैं, पर कविताको
छोड़ सर्वत्र अकारान्त शब्दोंका उधारण व्यखनात होता है :
जैसे, भारत, राम । यहां त और म स्वरान्त है, पर इनक
aarte प्रकार होता है, मानो त और में अकार है ही नहीं ।
के शब्दोंका उच्चारण करनेयो समय
दूसरा व्यञ्जनान्त बोला जाता है, जैसे, कलू घ
इसी प्रकार तीन अक्षरोंके शब्दों में तीसरा, चारमें इतरा और-
1.
दो अकारान्त<noinclude></noinclude>
rcf10hv8jab1htyjlf08nifr3ds1o3g
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/२५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२
हिन्दी फोमुड़ी।
चौथा, पांच में तीसरा और पांचवां में तीसरा और छठा
आठमें दूसरा, चौथा, उठा और आठवां व्यञ्जनान्त उच्चारित
होता है ; जैसे, कलम्, कमर, गपड्चौथ, लशूरम्पशूट, गड़-
बसव मादि |
हिन्दी में संयुक्त वर्णों के पूर्व वर्णका गुरु उधारण प्रायः नहीं
होता । जैसे रामप्रसाद शब्दका उच्चारण संस्कृतके पर
रामप्रसाद त होकर रामप्रसाद होता है ।
सन्धि । *.
[शब्दों का शीघ्रतापूर्वक उच्चारण करनेमें दो शब्दों के
arah अक्षरोंके संघर्षसे जो नया उच्चारण बनता है, उसे
वैयाकरण सन्धि कहते हैं। प्रारम्भमें उर ठहरकर जय
लोग चोलते थे, तब सन्धि नहीं होती थी । पर जब जल्दी
बोलने का प्रचार बढ़ा, तब किसी वैयाकरणने सन्धिको कहता
कर सन्धिके कुछ नियम बनाकर रख दिये और जब सन्धियुक्त
--
इस प्रकारका नाम "सन्धि" हमारे एक व्यकतीर्थ त्रिको
पसन्द नहीं है, पर प्रकरण श्रावश्यक समझते हैं। यहाँ हिन्दीको सन्धि
दो गयी है। संस्कृतको सधि परिशिष्ट में मिलेगी | हिंदी स
''शोंमें संस्कृतका अनुसरण नहीं करतो: इसकिये दोनोको मधिफे
नियमों की तुलना करना भूल है।'<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>.
सन्धि |
१३
उचारण यहुत अधिक होने लगा, तत्र व्याकरण ग्रन्थोंमें सन्धि
करणको स्थान मिल गया। सन्धि उचारणकी विशेषता
ठहरायी गयी और संस्कृतवालने नित्य सन्धि वा सन्धिकी
अनिवार्यता की दुहाई देती आरम्भ की। ]
[ परन्तु हिन्दी में नित्य सन्धि न होनेपर भी उच्चारणकी
विशेषताने सन्धिका प्रश्न सामने ला खड़ा किया है। हिन्दी में
शब्द में प्रत्यय जुड़ने पर ही सन्धि अधिक होती है, चाहे वह प्रत्यय
तद्धित हो या दन्त, लिङ्गमाय अथवा क्रियाप्रत्यय |
कुछ लोग हिन्दीमें सन्धि सुनकर बहुत असन्तुष्ट होते हैं, पर
उपाय नहीं है; क्योंकि हिन्दी शब्दोंके व्यंजनान्व उच्चारण
सन्धिका मार्ग खोल दिया है । ]
जब दो अक्षर मिलकर तीसरा रूप धारण करते हैं, त
उस मेलको सन्धि कहते हैं।
संयुक्त अक्षर और सन्धिर्मे यह अन्तर है कि संयुक्त
अक्षरमें मिले हुए अक्षर रहते हैं, केवल अगले अक्षर व्यंजनान्त
हो जाते हैं, पर सन्धिमें दोनो अक्षर बदलकर तीसरा ही रूप
धारण करते हैं।
जब दो दो अक्षरोंके शब्दोंमें सन्धि होती है, तब पहले
शब्द के प्रथम अक्षरका स्वर यदि दीर्घ होता है, तो हस्य हो
जाता है | चार अक्षरोंका प्रथम शब्द होनेपर तीसरे अक्षरका
स्वर हस्व हो जाता है। यदि उसका ह्रस्व रूप नहीं होता तो
उच्चारण अवश्य ही हम या एकमात्रिक किया जाता है और
.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/२७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४
हिन्दी कोमुदी ।
कभी कभी उसके मेलका हल स्वर लिखा और उधारण किया
जाता है अर्थात् एके चले इ और ओके चढले उ लिया जाता है।
उदाहरण :-चूड़ा+गापा बुढापा,
पुताना, लोटा+इया=लोटिया या खुटिया ।
राजपूत+भाना=राज-
अपवाद :- प्रथम शका प्रथम अक्षर ओकारान्त होनेसे
हन नही होता; जैसे, चांचे+आइन-चीग्राइन ।
जब दो स्वरोंके मेलसे तीसरा स्वर घनता है, तब उसे स्वर
सन्धि कहते हैं । पर जय स्वरान्त शब्द व्यंजनान्त होकर
प्रत्यय अथवा अन्य शब्दसे मिलता है, तब व्यंजन सन्धि होती
है । दीर्घको मनानेवाला नियम दोनो सन्धियोंमें चलता है ।
अ वा आके चाद आ रहनेसे दोनो मिलकर था हो जाते
हैं; जैसे, उड़+आई=लड़ाई, भूल+भावा=भुलाचा, राजपूत +
आना = राजपुताना, बूढ़ा -आपा-बुढ़ापा |
इस प्रकार एक हो शन्दमें इके बाद ई रहने से दोनो मिलकर
ई हो जाते हैं; जैसे, दिदी, किई को, लिई ली, पिई पी
सिईसी ।
=
इसी प्रकार एक ही शन्दमें आके बाद ई रहनेसे प्रत्यय
जुड़ने से पहले दोनो मिलकर ऐ तथा नाके बाद ऊ रहने से दोनो
मिलकर औ हो जाते हैं। यदि इकारादि प्रत्यय रहता है तो
इकारका लोप होकर प्रत्ययका अवशिष्ट भाग शब्द के जन्तमें
जुड़ता है, जैसे, माई+या=भैया, गाई+इया - गया, माई+श्या=
मैंया, नाऊ+ आ = नौआ ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सन्धि ।
१५
अ वा आके बाद पे रहनेसे दोनो मिलकर ऐ और वा
आके बाद औ रहनेसे दोनो मिलकर गौ हो जाते हैं और पहला
. या हस्व हो जाता है; जैसे, परख+ऐया=परखेया, गोड़-ऐत =
गोर्डेत चा गुड़ैत, ढाफा+ऐत डकेत, चाप + औनी= प्रपौती, चूना-+-
ऑटो = चुनौटी।
ईके बाद या रहनेसे दोनो मिलकर या और ऊ के बाद ई
'रहने से दोनो मिलकर बी हो जाते हैं; जैसे, पी+आस = प्यास
- लखनऊ+ईनची ।
जब दो अक्षरोंमें सन्धि होती हैं, तब पहले अक्षर में यदि दुहरा
व्यञ्जन हो, तो इकहरा रह जाता है और फिर सन्धि होती है।
!
जय अ, आ, ई के बाद इ, ई, ऊ, ए, यो होते हैं, तब अगले
अ, आ, ई, स्वरोंका लोप हो जाता है और व्यञ्जनोंसे बाइके
स्वरोंकी सन्धि होती है। जैसे, मासन+श्यामखनिया, लत
इयल=लतियल, सॉटा+इयाखोटिया, धोवी+प्रया धोबिया,
यंगाल +ई-बंगाली, गर्ज + ऊ = गजूं, डाका+ऊडा कृत्ताः
इया कुतिया, बिल्लो+च= चिलाच, लूट+ एरा-लुटेरा, बहन+
ओई-बहनोई |
"जब एके बाद मा होता है, तव एका लोप हो जाता है और
1
के साथ की सन्धि होती है; जैसे, पांडे+आइन =
ॐ शिक्षकोंको राये कि विद्यार्थियोंको ये नियम या बोर्ड पर
freetee ani मां : यामलन्+इदानरानिया
: r
कुत्ता+ट्या=कुत्+इया-कुतिया, सिद्धी+भाववि+आवा<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६
हिन्दी कौमुदी ।
पंडाइन, चौथे + आइन चौबाइन ।
जब किसी शब्द के अन्त में व दो और उसके बाद निश्वार्थक
अव्यय "ही" याचे, तो कभी बके अका और कभी "ही" के इका
लोप हो जायगा और वही मिलकर "भी" वा वई मिलकर "बी"
हो जायंगे ; जैसे, अब+ही=अ+ही-अभी, जब+ही=जय+दी-
जभो, कब+ही=कव्+ही-कभी, तव+द्दी=तव्+ही= तभी |
विकल्पसे "" का लोप भी होता है; जैसे, सब ही सभी
या सवी, दव+ह=दरी ।
जब किसी शब्द के अन्त में ह या हां हो और उसके बाद
"ही" शब्द आये, तो ह या हाका लोप हो जायगा और
शब्दका जो टुकड़ा बचेगा, छीके साथ उसकी सन्धि होगी;
जैसे, मुह+हो-सुहीं, कहां + हो = कहीं, यहां+ही यहीं, वहां+
हो+वहीं |
हम और तुम शब्द के बाद जब "हो" शब्द भाता है, वो मके
कार और ही हकारका लोप हो जाता है और फिर सन्धि
होती है; जैसे, हम+दी = हमी, तुम + ही तुमी |
तुम शब्दके
साथ हीकी सन्धि करनेके समय कभी हीके हुका लोप नहीं भी
करते; जैसे, तुम+ही- तुम्ही |
बो समझते हैं कि यह नियम व्यापक नहीं है, वे यह भूल जाते हैं कि
अच्छे पढ़े लिखे लोग "दय हो" न बोलकर "देवी" बोलते हैं।
उनको बुद्धिको प्रशंसा क्या की जाय जो इनवतेंड कामाचोंमें रहने के
कारण समझते हैं कि हम “भी" श्रन्ययको इसी नियमसे मना यता रहे हैं।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सन्धि ।
१७
इस, उस, जिस, किस, दिस रूपो याद जब "हो" याता
है, तो हारका लोप हो जाता है और ईके साथ
अक्षरकी सन्धि होती है, जैसे, इस+दील्यूसी, उस + डीसी,
1 जिस+डी-जिसी, किस+ह=किसी तिसर-ही- तिखी ।
""शद पहले अन्य अक्षर आनेले भी प्रायः हका लोप
.कर दिया जाता है; जैसे, सुन+दी-चुनी, वा+हो आई, पढ़ी
=पढ़ो, लिए+ह=लिपी |
इन, उन, जिन, फिन, तिन रूपों बाद जब "ही" शब्द आता
१ है, तब नके अकारका लोप फर दिया जाता है और न ही मिट
नही हो जाता है। जैसे इन+हन्दी, उन+ही=उन्दी, जिन+दी
जिन्ही, किनी किन्ही, तिन+ही तिन्ही ।
e
,
धके बाद होने का लोप हो जाता है और बचे हुए
अक्षरो सन्धि होती है। जैसे, दूध+हांडीकुबडी ।
के बाद क रहें तो पहलेका लोप हो जाता है; जैसे, नाक
स्कटानकटा
तके बाद द रहे तो दोनो मिलकर ह हो जाते हैं, जैसे,
पोत+दार पोद्दार<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दविचार |
2
जो कुछ मुहसे धोला या कानसे सुना जाता है, वह शब्द
कहाता है। शब्द दो प्रकारके हैं, सार्थक और निरर्थक |
जिनका अर्थ होता है, वे सार्थक और जिनका अर्थ नहीं होता,
वे निरर्थक फढाते हैं। व्याकरण सार्थक शब्दोंका ही नियामक
है, इसलिये यहां शब्द कहने से सार्थक शब्द ही समझता
चाहिये ।
हिन्दीमें चार प्रकार के शब्द व्यवहारमें आते है, तत्सम,
तद्भव, देशी और विदेशी ।
.
वत्सम वा संस्कृतसम शब्द बहुधा संस्कृतकी प्रथमा विभक्ति
के एकचचनके ही रूप होते हैं जैसे, राजा, माता । तद्भव
i
शब्द संस्कृत शब्दोंसे उत्पन्न होते हैं; जैसे, मेह, भगत
देशी
शब्द प्रदेश विशेषके शब्द होते हैं; जैसे, डोंगी, डाभ । विदेशी
शब्द अन्य भाषाओंके शब्द हैं, जैसे, खरगोश, शेर, ट्र ेन, गिरजा,
ट्रेन,
कम्पनी आदि।
के अनुसार
५ प्रकारके होते हैं, संज्ञा, सर्वनाम
पोथी
विशेषण, क्रिया और अव्यय ।
किसी वस्तु नामको संज्ञा कहते हैं, जैसे, पहाड़,
सोहन, परहा आदि ।
किसी वस्तु गुण, दोष, परिमाण, अवस्था और संख्य<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शदविचार ।
te
वाचक को विशेषण करते हैं जैसे, काला घोड़ा, कुरा
• आदमी, दुना भोजन, हंसता थादमी, ग्रीस कपड़े ।
}
संदके चले जो शब्द प्रयुक्त होते हैं, चे सर्वनाम
कहते हैं, जैसे सब, मैं. तू यह आदि ।
किसी कामका करना चा होना किया कहता है : जैसे,
हंसना, खेलना, पढ़ना आदि ।
free vatatrirसे था प्रत्यय जुड़नेपर भी किसी
:
: प्रकारका विकार नहीं होता. वह अन्यय कहता है जैसे, ऊपर,
• नीचे, जय, कव, पास दूर आदि । अव्यय बहुधा पुल्लिंग ही
hi हैं, पर a note लिंग भी है।
fara atra rainी अवस्था और अर्थ में अन्तर
पड़कर सिद्धपद बनता है, वे उपसर्ग और प्रत्यय कहते हैं।
शब्द के आगे जुड़नेवाले उपसर्ग और पीछे जुड़नेवाले प्रत्यय
होते हैं।
प्रत्यय चार प्रकार के होते हैं, विभकि प्रत्यय, तक्षित प्रत्यय
1. hereas a कृत् प्रत्यय ।
विभक्ति प्रत्यय बहुत ही कम है और कारक बताते हैं,
इसलिये ये कारकान्त चिन्ह भी कहते हैं।
संगा, विशेषण और सर्वनाम शब्दों के पीछे लगनेवाले प्रत्यय
2
'तखिन या नामeir कहाते हैं।
धातुमें जिन प्रत्ययों से क्रियापद बनते या
प्रत्यय कहते है ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०
हिन्दी कौमुदी ।
धातुओंमें जिन प्रत्ययोंके लगानेसे संज्ञा या विशेषण तं
हैं, वे कृत् प्रत्यय हैं।
संज्ञा और किया मूलका नाम धातु है ।
संज्ञा ।
व्युत्पत्ति के अनुसार संज्ञा तीन प्रकारकी होती है, ि
यौगिक और योग
।
रूढ़ि संज्ञा वह है जिसके टुकड़ोंका अलग अलग कोई अर्थ
न हो सके गथवा जिसका परम्परागत एक निश्चित अर्थ माना
जाता हो, चाहे उसके और भी कई अर्थ क्यों न होते हों जैसे
घोड़ा, गौ ! घोड़ा शब्द के दो टुकड़े हुए घो और ड़ा, जिनका
अलग अलग कोई अर्थ नहीं है, इसलिये घोड़ा रूढ़ि है। गौका,
प्रचलित अर्थ गाय है और हजारों वर्षों से इसका यही अर्थ
चलो आता है । परन्तु गौका भर्य इन्द्रिय और पृथिवी भी होता
है और चलनेवाला जीव मात्र गो कहा जा सकता है ।
जो संज्ञा दो संज्ञाओं के योग या प्रत्यय लगने से बनती है,
उसका नाम यौगिक है; जैसे, विद्यालय, पानवाला आदि ।
यहां पहला शब्द “विद्या" और "आलय" इन दो शब्दोंसे चना
और दूसरे में “पान" शब्दमें "वाला" ग्रत्यय लगा है।
जो यौगिक संज्ञा अपने मिले हुए शब्दोंसे निकलनेवाले अर्थ
न बताकर कोई तीसरा हो अर्ध बताती हो, वह योगरूढ़ि कहाती
है; जैसे, मोहनभोग, अंगरखा आदि ।
मोहनभोगका अर्थ
3<noinclude></noinclude>
hp0kyhmdceo40l3ip78ip9ef3mso6na
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>संज्ञा !
२१
मोहन भोग है, पर वह अर्थ न होकर उस शब्दका अर्थ ला
होता है। इसी प्रकार अङ्ग या शरीरकी रक्षा करनेवाला मात्र
है, पर उसका अर्थ होता है, यत्र विशेष |
rager संज्ञा भी चार भेद किये जाते हैं, नाम-
वाचक, जातिवाचक, गुणवाचक और भाववाचक |
किसी व्यक्ति, स्थान, देश, नदी, पर्वत प्रभृति नामको
नामवाचक संया कहते हैं। जैसे, मोहन, कानपुर, भारतवर्ष,
गङ्गा, हिमालय !
i
।
जिससे किसी जातिका बोध होता है, वह नाति..
चादानी है जैसे, मनुष्य, घोड़ा, पुस्तक आदि ।
यहां मनुष्यसे मनुष्य मात्र ही समा जाता है, घोड़ा घर
पुस्तक नहीं। इसी प्रकार घोड़ा या पुस्तक कहने से घोढ़ा ग्रा
garh सिया हाथी या लाठो फोई नहीं समम्य सकता ।
.
गुणवाचक संत्रा उसे कहते हैं, जिसका प्रयोग किसी
प्रकारका विशेष गुण बतानेके लिये किया जाय जैसे, मिठाई,
}
free, स्याही आदि। यहां मिठाई कइसे लाईक
arrer मिलने मिठाई, जैसे लड्डू, पेढे, जलेवी आदिका
मर्थ होता है। इसी प्रकार खटाई कहने से अचार या निम्बू
fare विशेष प्रकारकr tara ar स्याहीसे काले रंगका
लिएका साला समझा जाता है । विशेषणमें प्रत्यय लगाकर
गुणवाचक संज्ञा पायी जाती है।
जिसमें किसी वस्तु के गुण वा दोष वा क्रियाका भाव<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२
हिन्दी कौमुदी ।
पाया जाय, वह भाववाचक संज्ञा कहती है; जैसे लड़कपन,
मिठास, हंसी आदि। पहले शब्द में लड़केका, दूसरे मोठेका
और तीसरे में हंसने का भाव है। जातिवाचक संज्ञा, विशेषण
और धातु प्रत्यय लगने से भाववाचक संज्ञा वनती है ।
लिंगविचार |
संज्ञा दो लिङ्ग होते हैं, एक पुल्लिङ्ग और दूसरा खीलिङ्ग ।
पुलिसे पुरुपका और स्त्रीलिङ्गसे स्त्रीका बोध होता है।
अप्राणिवाचक शब्दोके स्त्रीलिङ्गसे दीनता वा छुटाईका भाव
निकलता है।
हिन्दी मे सव पुरुषवाची शब्द पुलिङ्ग और स्त्रीवाची श
स्त्रीलिङ्ग होते हैं; जैसे, मर्द, औरत, पुरुष, खी, भाई, बहुत आदि
शब्दोंमें पुरुषवाचक मर्द, पुरुष और भाई पुलिङ्ग तथा स्त्रोत्रा क
औरत, स्त्री और वहन स्त्रीलिङ्ग हैं।
हिन्दीके नाकारान्त शब्द पुल्लिङ्ग और ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग,
होते हैं, यदि वे अपने लिङ्गोको ठीक ठीक बतानेवाले हों, जैसे
लड़का, लड़की, घोड़ा, घोड़ी।
}
नीचे लिये ईकारान्त शब्द पुरुषवाची होनेके कारण पुलिङ्ग
हैं: --साई, साखी, माली, बोबी, तेली, तम्बोली, नाई, दर्जी,
बढ़ई, पटवारी, पड़ोसी, मोदी, भाई, नाती, पनती,
बहनोई,
ननदोई, सोती, छत्री, पत्री, दरी, केहरी, पापी ।
नीचे लिखे araria शब्द स्त्रीवाची होनेसे स्त्रीलिङ्ग
है : - माता, मह, दारा ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1
j
लिङ्गविचार |
२३.
संस्कृताये हुए पुंलिङ्ग वा तद्भव शब्द हिन्दीमें साधार..
4 पातः पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग या तद्भव शब्द खीलिङ्ग होते हैं;
जैसे, सेना, हत्या, दया, क्षमा, इच्छा, यात्रा, माला,
पाठशाला, गोशाला, स्त्रीलिङ्ग और पक्षी, पंछी, जी और पानी
पुलिस हैं।
अपवाद - आत्मा, महिमा, मन्त्रि (भाग), वायु, बिन्दु, (हृद,
बिन्दी,) तान, शपथ (सोह, सौगन्ध), आम (यांच), पाहु (वांह),
दाह, धातु (धात), अंजली, देव, धूप, जय, मृत्यु (मीच, वास
( पास गन्ध), औषधि, सन्तान, प्रारब्ध, समाज, ऋतु, राशि और
विधि संस्कृतमें पुंलिङ्ग होनेपर भी हिन्दीमें खीलिङ्ग हैं। *
पुर और तारा स्त्रीलिङ्ग दोनेपर भी पुलि
संस्कृत से आये नपुंसक लिया तद्भव शब्द हिन्दी में
या पुंलिङ्ग होते हैं, जैसे, फल, मधु, स्वादु (स्वाद), धारि
घृत (घी), दधि (दो) ।
अपचाद-यांष, वस्तु, पुस्तक, सामर्थ्य खोलि है ।
अप्राणिवाचक शब्द मी धाकारान्त होनेसे पुंलिङ्ग और
ईकारान्त होसे खोलिङ्ग हैं।
अपवाद -- लघुनाटक या प्रत्ययान्त खड़िया, लुटिया,
प्रदेश पश्चिमी जिलोंमें उईके संसर्गसे गोशाला, पायाला
और utarte बोले जाते है, पर लिखने में विशेष साधानीक
कारमा खोलिङ्ग लिये जाते हैं ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४
हिन्दी कौमुदी ।
अंगिया, डिविया, चिड़िया, पुड़िया, इंडिया आदि खोलिङ्ग है।
जी, पानी, वो, मोती और दही पुंलिङ्ग हैं।
टंकारान्त, तकारान्त और सकारान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग हो
हैं; जैसे, बनावट, थकावट, गत, पत, छत, छात, बात, मिठास,
प्रास
अपवाद - टाट, ठाद् मत, निकास आदि पुल्लिंग है ।
तर, ताई, गी, हूं, गाई, नी, आनी, आइत प्रत्ययान्त शब्द
स्त्रीलिङ्ग होते हैं; जैसे मूर्खता, सुन्दरताई, जिन्दगी,
खुशी, ढिठाई, पण्डितानी और पण्डिताइन ।
त्व, य, घन, चना, आपा, आव, प्रत्ययान्त शब्द पुंलिङ्ग होते
है; जैसे, मनुष्यत्व, राज्य, लड़कपन, गुडपना, बुढ़ापा, बड़ा ।
अस्वीके आकारान्त औौर तकारान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं;
जैसे, जमा, अदालत, मुसीबत
नीचे लिखे शब्द पुंल्लिङ्ग होते हैं :
(६) पुरुषोंके नाम |
F
(२) बड़ी भारी और बेढङ्गी चीजोंके नाम 1
(३) चादी और पीतल छोड़कर सव धातुभो और नगों के
नाम : जैसे, सोचा, लोहा, मानिक, नीलम भादि ।
(४) - महीनों और चारोंके नाम जैसे, चैत, वैशाख
सोमवार, मङ्गलवार ।
-
(५) ग्रहोंके नाम ; जैसे, चन्द्रमा, बुध, राहु आदि ।
(६) पहाड़ोंके नाम; जैसे, हिमालय, विन्ध्य |<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>लिङ्गविचार |
२५
-: (७) नदोंके नाम
सोनभद्र बादि ।
जैसे सिन्धु, ब्रह्मपुत्र, दामोदर,
1
(c) मेल, कीचड़, कफ, यलगम, बाल, सिर माथा, मुह
नेत्र, लवन, हाथ, पैर, कान, शरीर, पेट, कन्या, यत्रोपचीत,
जनेऊ, हृदय, दिया, मन, अहङ्कार, फोप, लोभ, मोह और प्रेम ।
+ (६) इ, ई, ऋ, ए, ऐको छोड़ सब अक्षरोंके नाम ।
(१०) मेह, चावल, चना, मटर, बान, उई, तिल, गुड़,
गन्ना !
"
नीचे लिखे शब्द स्त्रीलिङ्ग होते है ::
(१) स्त्रियोंके नाम ।
(२) कोमल, छोटी और हल्की चीजोंके नाम
(३) चांदो और पीतल ।
.
(४) तिथियोंके नाम : जैसे, पड़वा, दूज, तीज यदि ।
(५) नदियों के नाम ; जैसे, गङ्गा, यमुना, सरस्वती आदि !
(६) लार, कीच, आंख, नाक, चुटिया, विनों, भौदा मुछ,
दाढ़ी, कांख, छाती, नासी, इच्छा, बुद्धि और ममता !
(७) कई विदेशी शब्दों के नाम; जैसे, रेल, लालटेन, लैम्प,
कांग्रेस, फनफरेन्स, लिस्ट, डिक्शनरी आदि ।
7
(८) शतभिष, श्रवण, पुनर्वसु, पुण्य, हस्त, मूल, पूर्वापा
और उत्तराषाढको छोड़ सब नक्षत्रों के नाम
(e)इ, ई, ऋ, ए, ऐ स्वरोंके नाम |
(२०) अरहर, मूंग, तिली, चीनी, शक्कर |
1.<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८
हिन्दी कौमुदी ।
ठाकुर + आइन = ठकुराइन ।
पंडित+भाइन=पंडिताइन ।
चौ+आइन= चौधराइन ।
गुरु+आइन=गुरवाइन ।
पांडे+आइन=पंडाइन |
चौये+आन=चयाइन ।
ठाकुर परिवत, चौधरी, गुरु आदि शब्दों में आनी प्रत्यय
लगाकर भी स्त्रीलिङ्ग रूप यनाते हैं; जैसे :---
ठाकुर+भानी=कुरानी ।
चौधरी+आनी = चौधरानी ।
पण्डित + भनी = परिवतानी ।
गुलआनी गुरबानी ।
फारसीके मेहतर शब्द में भी आनी प्रत्यय लगाकर मेहतरानी
बनाते हैं। इसी प्रकार जेठ और देवरसे जेठानी और देवरानी
स्त्रीलिङ्ग शब्द बनते हैं ।
प्राणिवाचक आकारान्त पुंलिङ्गइया प्रत्यय लगा
कर स्त्रीलिङ्ग बनाते हैं; जैसे:
-
लोटा या = लोदिया ।
सा+या=सोटिया |
पुरुष प्रत्यय |
लगाने से
स्त्रीलिङ्ग शब्दों में घोई. आव और ओटा प्रत्यय
लिङ्ग शब्द बनते हैं, जैसे :-
बहन+आई=बहनोई, ननद + आई ननदोई, बिल्ली+भाव=
विलाय, सिल+मोटा- सिलौटा |
·
M
ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों को पुलिङ्ग बनाते ईको आ.
प्रत्ययसे बदल देते हैं, जैसे :-
दुभवी, दुधना, मन्त्री अधम्ना, गाड़ी गाड़ा, रस्सी रस्सा,
एक दो सज्जने दुग्रन्या शन्दपर यह थापत्ति की है कि यह
प्यप्रचलित है। पर ऐसी
Chi
,<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दोंकी साधना !
મ
पोथी पोथा, हांड़ी हांडा, मोली झोला, मकड़ी मकड़ा, लकड़ी
लफड़ा आदि।
.
कई ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दकि पुलिङ्गका ईको भा प्रत्ययमें
बदल देनेसे बनते हैं, जैसे रोटी, रोट । कहीं कहीं अन्तिम
-
अक्षर पहलेका व्यञ्जन भी द्विव्य कर दिया जाता है; जैसे,
लकड़ी, लकड़, टिकड़ी, टिकड़, गठड़ी, गड |
दो
शब्दोंकी साधना |
होते हैं, एकवचन और बहुवचन ।
एकवचनसे एक वस्तु और वहुवचनसे अनेक वस्तु जानी
जाती है। लड़का एकवचन है, क्योंकि इससे एक ही लड़का
समझा जाता है, पर लड़के कहोले दोसे अधिक लड़कों का
बोध होता है।
हिन्दीके संज्ञा शब्दों में छं चिमक्तियां होती है, पहली, दूमरी,
तीसरी, चौथो, पांचत्रों और सम्योधन, पर. चिभक्तियों चिन्द
चार ही है। इन चिन्हों के जुड़नेके पहले शब्द में विकार होकर
जो रूप बनता है, वह सामान्य रूप फहाता है। पहली और
है। यहाँ ये शब्द केवल यह दिखानेको लिखे गये हैं कि को पासे
as देने से पुलिंग पद बनता है। मांदी दुथन्नी लोटी हो
G
नहाती थी अब निकलकी बहुत बड़ी दुन्नी हैं, इससे उसे
अन्ना का अनुचित नहीं। इसी प्रकार के धने यदि
इकन्नीसे छोटा निकलका सिका चले तो वह अपनी ही कहावेगा ।.<noinclude></noinclude>
6dxbd9zy7pf3zhmu7qdhggxvahd86es
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०
हिन्दी कौमुदी ।
सम्बोधन विभक्ति का कोई चिन्ह नहीं है। आकारान्त पुंलिङ्ग
शब्दको छोड़ किसी शब्दकी पहली धिभक्तिके रूपों तथा अन्य
विभक्तियों के एकवचनके रूपमें किसी प्रकारका विकार नहीं
होता
| aataa raकी पहली विभक्तिके बहुवचन और
सम्बोधनके दोनो वचनों रूपों में विकार होता है ।
एकवचन
बहुवचन
पहली विभक्ति (कुछ नहीं)
(कुछ नहीं)
सामान्य रूप
(,,)
ओं
सम्भोधन
(,)
ओ
स्त्रीलिङ्ग शब्दों के बहुवचन में गां अथवा एं विकार होता है ।
आकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दोंमें विकार ।
एकवचन
पहली विभक्त (कुछ नहीं)
सामान्य रूप
ए
सम्वोधन
ए.
बहुवचन
ए
भ
'भो
अन्य अक्षरान्त पुंलिङ्ग विभक्तियों के रूप।'
एकधचन
पहली
-दूसरी फो
तीसरी ने
बहुवचन
श्रीको
T<noinclude></noinclude>
hu6vtlpuxumjaod9xvws3puq86i4al6
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>एकवचन
चौथी से
शब्दोंकी साधना |
३१
बहुवचन
भोंसे
पांचव मैं
सम्बोधन
मोमें
ओ
लिङ्ग शब्दों के रूप |
अकारान्त "बाप" शब्द ।
चहुवचन
धाप
एकवचन
१ ली
चाप
२ री
पापको
३ रो
चापने
४ यो
याप
५ वीं
से०
याप
घापों को.
धापने
यापोंसे
पापोंमें
चापो
आकारान्त पुलिङ्ग शब्दों के रूप याप शब्दफे समान ही होते है ।
आकारान्त " लड़का" शब्द ।
एकवचन
यहुवचन,
{
१ ली लड़का
लड़के
.
२ री लड़केको
३. रो. लड़केले.
लड़फो
४ थी लड़के से
लड़कोंसे
५ वीं लड़फे में:.
लड़कों में
सं०. लड़के<noinclude></noinclude>
7ztphtxggzy1k4ml6ggn325ny19e7oq
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३.२
हिन्दी कौमुदी ।
प्रायः सब अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दोंकी साधना लड़का शन्
की भांति ही होती है।
"आकारान्त तत्सम "राजा" शब्द
एकवचन
१ ली
राजा,
२ रो
राजाको
३
री
राजाने
४
थी
राजासे
५ चौ
चौं।
राजामें
सं
राजा
चहुवचन
राजा
राजाओंको
राजाने
राजाओं
3
राजाओं में
राजाओ
.
पिता, भ्राता. जामाता जैसे संस्कृतसम आकारान्त शब्द तथा
चाचा, शामा, काका. बाबा, फूफा और नानाः शब्द राजा शब्दकी
भांति साधे जाते हैं। दादा शब्द दोनो प्रकारसे साधा जाता हैं !
इकारान्त “कवि" शब्द |
एकवचन
"
१ ली
कचि
૨
'
कविको
हैरी
कचिने
बहुवचन
कवि
C
कवियों को
कविर्याने '
- कोई कोर्ट राजा शब्दको लड़का शव्दकी भांति साधते हैं, पर यह
साधना हिन्दी की प्रकृतिके विरुद्ध है। श्रावी फारसीके प्राकारान्तं शब्दों में
“मामला, मुला, मुकमा” सरीखे जो शब्द सर्वथा हिन्दीके हो गये हैं,
1<noinclude></noinclude>
r31voj5ntf1jelqzelaltkrekzibko3
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दों की साधना |
३३
एकवचन १
चहुवचन ।
४ थी
कविसे
कवियोंसे
५ व
कवि
कवियों
सं०
. . कचि
कवियो
ईकारान्त "भाई" शब्द #
एकवचन ।
बहुवचन १
१ लो
भाई
भाई
२ से
भाईको
भाइयोंको
७री
भाईने
भाइयों
४ धी
भाईसे
भारप
५ च
भादयोंमें !
भाइयो
उकारान्त "रि" शब्द ।
एकवचन 1
बहुवचन ।
१ ली
रिपु
रिं
श्री
रिपुको
रिपुत्रको
ईकारान्त
चतमें दूसरी पांच
विभक्ति तक "फ"
"ओ" के ard "य" हो जाता है।
"""यो" होता है। कारान्त शब्दोंको उन्ही चिमनियों
"थोको" ""याने" आदि पहले "" ""प दी जाती है
सोन
का भी
और
3
ऊ भी उ हो जाता है।<noinclude></noinclude>
fyp82jxkpfsrkvfwjpmt2ngnmdwcgvf
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४
हिन्दी कौमुदी ।
एकवचन |
यहुवचन |
रिपुने
रिपुमने
४ थी
रियुसे
रिपुसे
५ च
रिपुमैं
रिपुओं में
सं०
रिपु
रिपुओ
ऊकारान्त “भालू” शब्द |
एकवचन ।
बहुवचन !
१ ली
भालू
भालू
१ री
भालुको
३ री
भालूने
भालु
४ थी
भालू से
भालुमसे
५ व
भालमें
संव
भालू
भाभ
एकारान्त "पांडे" शब्द
एकवचन |
बहुवचन ।
१ ली
- पांडे
२ री
-
पड़ोंको
३ रो
पढ़ने
पड़ने
४ थी
पांडेसे
५ व
पांडे में
सं०
पांढ़े
"पांड़ो<noinclude></noinclude>
4shuyvq4vb9a1b9jl4txffvmbi1597c
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दों की साधना |
एकवचन |
बहुवचन ।
i
रोति में
रीतियोंमें
रीति
रीतियो
ईकारान्त “भुजली" शब्द ।
बहुवचन !
भुजादियां
एकचचन!
ཐར་
我
भुजाली
5
भुजालीको
भुजारियों को
A
भुजालीने
भुजालियाँ
भुजालोसे
भुजारियों
वॉ
भुजालीमें
भुजारियों में
3
भुजाली
भुजारियो
उकारान्त "वस्तु" शब्द |
एकवचन !
यहुवचन !
बली
चस्तु
चस्तुएं
से
वस्तुको
वस्तुओं को
धस्तुने
वस्तुओंने
थो
वस्तुसे
तुमसे
घाँ
चस्तुमें
वस्तुभ
वस्तु
वस्तुओ
अकारान्त "घ" शब्द ।
एकवचन ।
यहुवचन |
ली यह
हु<noinclude></noinclude>
fnu9uxzh1aqrpi8tfhprrlt0apmzrr5
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३८
हिन्दी कौमुदो।
एकवचन ।
बहुवचन
२ री
बहुको
बहुओं को
३ री
यह
बहुओ
४ थी
बहुसे
से
५ वीं
चहमें
बहुओंमें
J
सं०
चहुओ
!
वह
एकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द हिन्दीमें नहीं है। रेलवे
विदेशी शब्दोंकी साधना में दूसरी
सम्बोधन विभक्ति
शब्दमें हिन्दी विभक्यिोंके चिन्ह मात्र लगा दिये जाते हैं,
मूल शब्दमें विकार नहीं होता ।
अकारान्त "सरसों" शब्द 1
सरसों शब्द एकवचनान्त हैं और इसमें एकवचनकी
विभक्तियां लगती है ।
my<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सर्वनाम |
सर्वनाम शब्दों में पांच ही विभक्ति होती है। इनमें समय-
धन नहीं होता और न लिगभेद ही रहता है।
"सव" शब्द के रूप |
उपयचचन |
१ ली
सय
२ रौ
सबको
३ री
सपने
४ थी
सबसे
५ वीं
सबसे
शब्द रूप दोनो वचनमिं पफसे होते है। कुछ लोग
सर्वोको लयोने आदि रूप भी बनाते है ।
सर्वनाम कई प्रकारके हैं, जैसे, पुरुपत्राचक, सम्बन्ध
सुचक प्रश्नवाचक, अनिश्चयवाचक, आदरसूचक, और निजत्व-
सूचक !
प्रथम पुरुष "चह" शब्द ।
एकवचन
ली.
२.सु.. उसे, उसको
बहुवचन
घे
उ. उनको
उन्होंने<noinclude></noinclude>
amiu1whd02ezal8fjmkdp801hakumzt
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/४९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०
हिन्दी कौमुदी ।
एकवचन !
बहुवचन ।
४ थी
उससे
उनसे
५ वीं
उसमें
उनमें
"यह " शब्द |
१ ली
यह
ये
२ री
इसे इसको
इन्हें, इनको
३ री
इसने
इन्होंने #
४ थी
इससे
इनसे
५ वीं
इसमे
इनमें
१ ली
मध्यम पुरुष "तू" शब्द |
तृ
२ री
तुम
तुझे, तुमको
},
३ री
तुम्हें, तुमको
तने
४ थी
तुमने
तुम्हसे
!
५ व
तुमसे
तुझमें
तुममे
*
२६ नियमानुसार तो ' इसने” का बहुवचन "इनने" और 'उसने"
“उनने” होना चाहिये । कानपुरले पश्चिम साबाद और बजतक "इनने"
"न" लोग बोलते ही हैं, पर लिखते प्राय नहीं है। स्वपचन्द्रधर शर्मा
गुलेरी तथा और दो चार लेसक "इनने" "उनने" लिखते थे। स्वर्गवासों
प० दुर्गाप्रसाद मिश्र "इनाने" लिखा करते थे। "इन्होंने" "उन्होने" वे
अनुरवापर बुद्ध लोग विशेषकर गुजराती और महाराष्ट्र इन्होंको, उन्होको
इन्दोने, उन्होने, इन्होंमें और उन्होंने भी लिखते बोलते है ।<noinclude></noinclude>
ec1ngmayoockp5nqq105bxytrdb1ja3
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सर्वनाम
: उत्तम पुरुष "मैं" शब्द
४१
एकवचन
चष्टुवचन !.
१ ली
मैं
हम
२ री
मुझे, मुरुको
हमें दमको
,
३
४
मैंने
हमने
मुले
हमसे
५ वीं
मुझमें
हममें
सम्बन्धसुचक "जो" शब्द ।
एकवचन |
बहुवचन
६ लो
जो
जो
२ री
जिसे, जिसको
जिन्हें, जिनको
३
जिसने
जिन्होंने
४ थी
जिससे
जिनसे
५ व
जिसमें
जिन
सम्बन्ध सूचक "तो" शब्द ।
एकवचन ।
१ ली
सो
री
तिसे, तिसको
: री
श्री
वॉ
तिसने :
""
तिससे
तिसमें
"
५..
1. ...
च ुघन्चन ।
खो
तिन्हें तिनको
तिन्होंने
तिनसे
L
"
i,
".
तिनमैं..<noinclude></noinclude>
hk7nl3jrpy39xbjxz1sgcqsekigxuap
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४२
हिन्दी कौमुदी |
आजकल "सो" शब्द का प्रयोग प्रायः नहीं होता । इसके
चले "वह" शब्द रूपों का व्यवहार होता है ।
agrees "कौन" शब्द |
एकवचन
बहुवचन
१ ली
कौन
कौन
२ री
किले, किसको
किन्हें, किनकी
३१
किसने
किन्होंने
४ श्री
किससे
किनसे
५ वीं
किसमें
किनमें
आदरसूचक "आप" शब्द ।
उभयवचन ।
१ ली
आप
२३
आपको
३. री
आपने
४ थी
आपसे
५ वीं
आपमें
दोनो
में "आप" शब्द के रूप एकसे ही होते हैं प
जहां कहीं आपका बहुवचन "आप लोग बनाते हैं. वहां लो
शब्दमें विभवियां लगती है ।
"लोग" शब्द पुलिङ्ग बहुवचन होता है और आकाश
दूर “लड़के लोग” “स्त्री लोग" लिखना ठीक नहीं हैं क्योंकि श
पीछे लोग जोड़ देने से ही बहुवचन नहीं बन जाता। लोग शब्द पुि
उसका स्त्रीलिङ<noinclude></noinclude>
fffoz6gt46zw81hpueqvqvsao42gc2y
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>!
विशेषण |
संघकी भांति विशेषण में भी लिङ्गभेद होता है, परन्तु हिन्दी
आकारान्त शब्दों में ही, अन्य शब्दों में नहीं। जैसे, छोटा
लड़का, छोटी लड़की, काला घोड़ा, काली घोड़ी, लाल
गाय, लाल चैल | परन्तु विशेषण तत्सम होनेसे वह ज्योंका त्यों
रहता है; जैसे, सुन्दर पुरुप, सुन्दर स्यो ।
.
संज्ञा शब्दोंकी भांति विशेषणको साधना सत्र विभक्तियोंम
नहीं होती और संज्ञाके आगे सामान्य रूपका एक चचद ही रख
दिया जाता है, जिस संज्ञाफा यह विशेषण है वह चाहे पटु-
वचनान्त हो क्यों न हो; जैसे, काले घोड़ने लात मारी, काले
टट्टू से गिरा, उस वैलको न छेड़ो फाले घोड़ोंकी यद-
माशी, सोधे लड़कों की शिकायत |
विशेषण के भेद |
=
विशेषणके पांच भेद है :- गुणयाचफ, संख्यावाचक,
सादृश्यवाचक, परिमाणवाचक और सर्वनामवावक । गुण-
चाचक विशेषण वस्तुका गुणदोष बताता है, जैसे, अच्छा या
संस्कृताभिमानी हिन्दी लेखक संस्कृत विशेषणों में भी लिङ्ग-
- भेद करते हैं, परन्तु प्राचीन ग्रन्थोंमें नहीं लिङ्गभेद किया है जहां अत्यावस्यक
है; जैसे पुत्रवती स्त्री, श्रीमती पडितानी प्यादि ।<noinclude></noinclude>
neg8z53zsmw4qatln3u2itonpl9wd75
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४८
हिन्दी कौमुदी ।
बुरा आदमी, लाल या काला टट्टू । संज्ञावाचक विशेषण शब्दक
संख्या बताते हैं; जैसे, पाच आदमी । सादृश्यवाचक विशेषण
दूसरे शब्दों की सदृशता बताते हैं; जैसे, ऐसा आदमी । परि
माणवाचक विशेषणसे परिमाण जाना जाता है; जैसे, इतना
वडा मकान !
सख्यावाचक विशेषण शब्दों में अथवा यह, वह, ओो. सो,
कोई, के, कई, जैसे, विशेषणोंमें भी लिङ्गभेद नहीं है । परन्तु
सायवाचक ऐसा वैसा, जैसा, तैसा, कैसा और परिमाण
चाचक इतना उतना जितना, तिवना, कितना विशेषण पुलिङ्ग
एकवचन हैं। ऐसे, वैसे, जैसे तैसे, कैसे तथा इतने, उतने
जितने, तितने कितने बहुवचन और सामान्य रूप हैं। इसी
प्रकार ऐसी वैसी, जैसी, तैसी, कैसी तथा इतनी, उत्तनी,
जितनी, तितनी कितनी स्त्री
है।
"कोई” शब्दका बहुवचन - "कोई कोई" और सामान्य रूप
"किसी" होता है । 'कोई कोई' का सामान्य रूप किन्ही है !
J<noinclude></noinclude>
stz4jq6qbvhslbzw9utlig98jfrncw7
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>किया।
किसी कामका होना या करना क्रिया कहता है । धातुमें
"ना" प्रत्यय लगने से क्रिया बनती है और अन्य प्रत्यय लगनेले
किया जो विविध रूप बनते हैं, वे क्रियापत्र कहते है ।
क्रिया हो प्रकारकी होती है, अकर्मक और सकर्मक |
संकर्मक क्रियाका कोई कर्म होता है, पर अकर्मक क्रियाका फर्म
नहीं होता। खाना सकर्मक क्रिया है, क्योंकि कोई चीज खायी
जाती है और जाना सकर्मक क्रिया है, क्योंकि कुछ जाया नहीं
जाता । परन्तु प्रयोगके अनुसार कभी एक ही क्रिया are
और कभी अकर्मक हो जाती है : जैसे: वह सिर खुजलाता है
और उसका सिर खुजलाता है। यहां पहले वाक्यकी बुज-
ब्लांना क्रिया सकर्मक और दूसरेकी अकर्मक है ।
faurant Ravari, काल, पुरुष, वचन, लिंग और वाच्य
होते हैं।
क्रिपraint दो अवस्थाएं होती हैं, सांधारण और विशेष ।
साधारण अवस्था में सीधी तरह बात कह दी जाती है और
• हिन्दीमें शुद्ध क्रियापद, जिन्हें संस्कृत में सिहन्त कहते हैं, नहीं
-राबर हैं। इस लिये कृत्प्रत्ययों तथा दो क्रियाओकि योगसे अन्य क्रियापद
नाये जाते हैं। दोनो प्रकारके क्रियापदों की पहचान यह है कि पहले में
लङ्गभेद नहीं होता और दूसरे में होता है।
४
"<noinclude></noinclude>
ctku2uvt38yrhrxcsvj27cwfd8rw439
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५५
250
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५०
हिन्दी कोमुद्री ।
i
उससे कोई विशेष अर्थ नही निकलता : जैसे वह रोटी खाता
है । पर जिल क्रियासे विशेष अर्थ निकलता है, वह उसकी
विशेष अवस्था होती है ।
जब किलीको गाथाप. उपदेश, नाशीर्वाद या गाली दी
जाय अथवा किसी कार्य की पूर्णता, अपूर्णता वा सम्भावना दि
बतायी जाय. तव विशेष अवस्था कियन्त प्रयोग किया
जाता है। जैसे. तू यह काम कर लड़के ऊधम न
तुम्हारा परिवार सुखी रहे, यह कदाचित् फल आवे, राम रोटी
सा रहा था, मैं लिखता था, इत्यादि ।
काल समयको कहते हैं ।
भूत और भविष्य |
मुख्य काल तोन है, वर्त्तमान,
मन का वह है जो बीत रहा है : जसे, यह खाता है
मैं जाता है।
जो काल बीत चुका, उसे भूत कहते हैं। जैसे, वह गया मैंने
काम किया ।
जो काल आवेगा वह भविष्य है; जैसे, मैं खाऊंगा, वह
घर जायेगा ।
अवस्थानुसार वर्तमान कालके चार भेद हैं, अपूर्ण वर्त्त
मान, पूर्ण वर्त्तमान, सन्दिग्ध वर्त्तमान और तात्कालिक वर्तमान
अपूर्ण वर्त्तमान साधारण वा सामान्य रूप से वर्त्तमान
कालका वर्णन करता है और चंताता है कि कार्य पूर्ण नहीं हुआ
है, जैसे, वह आता है, मैं जाता हूं।<noinclude></noinclude>
mqwt84b6jf6hqhl7tfdgxj8x41yr8or
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>क्रिया |
५१
पूर्ण वर्तमान सामान्य भूत और वर्त्तमानके किया पदके योग
से बनता है और बताता है कि भूत कालमें कार्य आरम्भ होकर
वर्त्तमान में
पूरा हो चुका है, जैसे, मैं नाया है ।
सन्धिग्द वर्त्तमान बताता है कि इस समय काम होने की
सम्भावना है; जैसे, मोहन जाता होगा ।
नात्कालिक वर्त्तमान से जान पड़ता है कि कार्य हो ही रहा
है, चन्द्र नहीं हैं, जैसे, सोहन ज्ञाया है।
भूतकाल आठ भेद होते है, मामान्य भूत, अपूर्ण भूत,
सन्दिग्ध भृत, पूर्ण भृत, घेतुहेतुमद् भूत्र तात्कालिक भूत,
सम्भाव्य वपूर्ण भूत और सम्भाव्य पूर्ण भूत ।
= सामान्य भूतकाल वर्णनमें कोई विशेषता नहीं होती;
-जैसे, राम गया, कृष्णने रोटी साधो ।
अपूर्ण भूत काल वह है जिसमें कार्य समाम नहीं होता ;
जैसे, मोहन पोथी पढ़ता था ।
पूर्ण भूत बताता है कि कार्यका आरम्भ और समाप्ति भूत
कालमें ही हो चुकी थी; जैसे, सोहनने पोथी पढ़ी थी ।'
सन्दिग्ध भूत यह है जिसमें कार्यके होनेका निश्चय नहीं
होता, सन्देह बना रहता है; जैसे, में गया हंगा
हेतुहेतुमद्भूतमें कोई अन्य कार्यका आधार रहता है; जैसे,
में जाता अर्थात् मैं गया नहीं, पर जिस बातपर जाना नवलस्थित
था, वह हो जाती तो में जाता ।.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५२
हिन्दी कौमुदी |
तात्कालिक भूतकाल वाह है, जिसमें काम जारी रहता है
जैसे, श्रीकृष्ण द्वारका जा रहे थे ।
सम्भाव्य अपूर्ण भूतसे सम्भावना के साथ ही भूतकालके
कार्यकी अपूर्णता जानी जाती है जैसे, जाता होता ।
7
सम्भाव्य पूर्ण भूतमें कार्यकी पूर्णताकी सम्भावना रहती हैं।
जैसे, गया होता १
भविष्य कालके दो भेद है, सामान्य भविष्य और सम्भा
भविष्य |
सामान्य भfete होनेarat Fearer घर्णन रहता है :
जैसे, मोहन आवेगा ।
P
सम्भाव्य भविष्य में भावी कार्य होनेकी सम्भावना रहती है।
इसमें विधिके रूपका प्रयोग किया जाता है; जैसे, वह लिखे
तू करे |
विधि और आशा को छोड़ हिन्दीके सब क्रियापद लिङ्ग-
भेद होता है।
fert at प्रथम, मध्यम और उत्तम ये तीन पुरुष, एक
चचन और बहुवचन दो वचन तथा पु'लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग-दो लिङ्ग
होते हैं। आकारान्त पुंलिङ्ग शब्दोंकी तरह इन क्रियापदों के लिङ्ग
चवन भी ईकारान्त, ईकारान्त तथा एकारान्त होते हैं ।
: किया चार चाच्य या प्रयोग हैं। कत्तृवाच्य कर्मचान्य
भाववाच्य और कर्मकन्तु वाच्य
केत्तृवाच्यमें कर्त्ता में पहली विभक्ति और कर्म की
3<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>क्रिया |
५३
पहली और कभी दूसरी विभक्ति होती है तथा क्रियाफे लिङ्ग
वचन तोके अनुसार होते
होते है। अर्थात् यदि कत्र्ता पुलिंग
होता है तो किया पुलिङ्ग होती है और यदि खीलिङ्ग होता है,
तो किया भी स्त्रीलिङ्ग होती है। इसी प्रकार यदि कर्त्ता एक.
वचन होता है तो क्रिया एकवचन और बहुवचन होता है तो क्रिया
चहुवचन होती है जैसे, में खाता है, तीन लड़के खेलते हैं,
सब लड़कियां कपड़े सोती हैं, एक लड़की रोतो है ।
• कर्मवाच्यमें कर्त्ता में तीसरी चिमक्ति और कर्ममें पहली
विभक्ति होती है और क्रिया लिङ्गवचन कर्मके अनुसार ही होते
हैं, जैसे लड़के पेड़ा । पाया, लड़कोंने पेड़ा खाया, लड़कीने
पेड़ा खाया, लड़कियोंने पेड़ा खाया।
लिङ्गवचन तो चले, पर क्रिया
इन वाक्योंमें कर्त्ता के
कर्मानुसार ही रही।
अगले क्यों कर्म खोलिए है, इसलिये किया भी
arran
स्त्रीलिङ्ग है जैसे, देवदत्तने रोटी खायी, राम और कृष्ण
रोटी पायी, स्त्रियोंने रोटी खायी, हमने रोटियां पायीं ।
भावाच कर्त्ता में तीसरी और कर्ममें दूसरी विभक्ति
होती है और किया तदा पुलिङ्ग एकवचन रहती है; जैसे, चापने
लड़कोंको मारा, स्त्रीने गायको दूदा ।
● और
दो रूप और होते है, पर के यौगिक
free erat, सलिये उनका वर्णन यौगिक क्रिया
मिलेगा।<noinclude></noinclude>
5sb5xkffw8ffa8kk3y7wo4jb41qgzxu
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/५९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५३
कर्म
हिन्दी कौमुदी
कर्म ही कट हो जाता है और उसमें
पहली विभक्ति होती है। कर्म करनेवाला कर्त्ता नहीं बताया
जाता और दिमाया जाता है कि काम आरसे भाप होता है !
जैसे, भोजन बनता है अर्थात् आप ही आप चलता है : फट
पकता है; मेह बरसता हैं; कपडे भोगते हैं। |
कर्मवाच्य और arearer केवल सकर्मक क्रियाके भूत
कालिक रूपों में ही होते है । कतृवाच्य और कर्मकर्तृवाच्य सव
कालोमें होते हैं । सकर्मक कियाके वर्तमान और भविष्य काल में
भी कत्तु वाच्य ही होता है ।
क्रियाकी साधना ।
विधि ( प्रत्यय )
पुरुष |
एकवचन ।
बहुवचन ।
उत्तम
"मध्यम
35°
ए', वे पं
श्रो
प्रथम
ए
ए, वें, य
आशा (प्रत्यय)
उच्चम
ॐ
यं
मध्यम
ना
श, ओ, इयी
प
प
-, आशा मध्यम पुरुपके एकवचनमें धातु और किया दोनों
रूप ज्योंके त्यों रहते हैं । नादरसूचक आज्ञा या विधिके लिये
धातु " और सो, पी. ले. दे, और कर धातुओं में "ये<noinclude></noinclude>
mkn0pavwiiw4jk4qky1qmpj03p2t6uv
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>""
५५
दले "जिये" लगाते हैं, जैसे, सीजिये, पीजिये, लीजिये,
'दीजिये, फीजिये ।
i जब कभी मध्यम पुरुषको विशेष मान देनेकी इच्छा नहीं
होती और "तुम" सर्वनामका प्रयोग भी उसके लिये नहीं किया
ज्ञाता, तब आदरसूचक "शाप" सर्वनाम के साथ भी मध्यम
'पुरुष बहुवचनको क्रिया प्रयुक्त होती है जैसे आप कहा, आप
3
हमारी बात माना । मध्यम पुरुष एकवचन के साथ जो क्रिया
आती है, वह साधारणतः धातुके रूपमें ही रहती है। पर
निषेधार्थक "न" के योग दोनो वचनों में किया रूपका
व्यवहार होता है। "न" के बदले "मत" का प्रयोग जहां
होता है, वहां एकचन में तो क्रियाका रूप और बहुवचनमें कभी
क्रियाका रूप और कभी "तो" वा "इयो" प्रत्ययान्त क्रियापद
बाता है ।
चार धातुओं की सहायता से ही सब कालोंके क्रियापद
बनते हैं और इसलिये it free are हैं। ये चार
धातु है - ६, था, गा और हो । ए धातुके वर्तमान फाल और
या तथा गा धातुओंके भूतकालय रूप ही इस समय पाये जाते
है। दो धातुकी सहायता भी अनेक क्रियापदों के लिये आय
श्यक है । जा धातु रूपरोंके विना अंगरेजी के कर्मवाच्य
और भाववाच्य नहीं बनते ।
"धातु रूप (वर्तमान काल ).
.
पुरुष
एकवचन |
उत्तम
मैं हूँ
बहुवचनं ।
धर्म है।<noinclude></noinclude>
9nyk7itcszjdo4hazyrzg7ztfhb6zbs
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६
पुष
मध्यम
एकवचन ।
नू है
हिन्दा कौमुदी ।
चहुवचन |
तुम हो
है
प्रथम
वह है
"ह" धातुके रूप विधिके समान है, इसलिये लिह
नही है ।
भूतकालिक "श्रा* धातुके रूप
पुलिङ्ग
पुरष
एकवचन |
चष्टुवचन !
उत्तम
में था
हम थे
मध्यम
तू था
लम थे
प्रथम यह था
वे थे
स्त्रीलिङ्ग ।
उत्तम
मैथी
मध्यम
तू श्री
हम धी
तुम थीं
वह श्री
प्रथम
वे थीं
हिन्दोंमें "" धातुको छोड़ सभी धातुओंसे घने किया
पदों के नाज्ञा और विधि रूपों में ही लिगभेद नहीं होता। शेष
रूप धातुमे "ता" और "आ" प्रत्ययोंके लगने से तथा भविष्य
कालके स्व विधि में "गा" लगनेसे बनते हैं, इसलिये इनमें
लिङ्गभेद रोता है ।
कान्त रूप एक प्रकारले विशेषण
हैं, इसलिये पुलिग होनेसे ई "वचन एकारान्त और स्त्री
लिङ्ग ईकारान्त होते हैं अर्थात् बहुवचन बनाते धातु " तें"<noinclude></noinclude>
673cyx48jfkq72yid1ethnk2c7zzc25
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>r
● किया ।
:
५७.
और "D" तथा स्त्रीलिंग में "ती" और "ई" प्रत्यय लगाने पड़ते
• है। "ती" और "" के बहुवचन में तो "वीं" और "ई" रूप
बनते हैं, पर "" बहुवचनमें भी "मी" ही रहती हैं। इसका
कारण यह है कि विधि बहुवचन में "गी" जुड़ती है, इसलिये
"गी" का चयन करनेकी आवश्यकता नहीं होती। इसी
प्रकार जय तो वा ईकारान्त क्रियापदके, पाद "ह" वा
• • जिन्हें श्राजकल विधि कहते हैं, किसी समय ये ही क्रियापद वर्तमान
कालके पर्यानमें प्रयुक्त होते थे । इसके प्रमाण स्वरूप "अन्धी पीरो, कुत्ते
.
"जैसे वाक्य तक पाये जाते हैं । परन्तु जब इन क्रियापदों वतमान
कालका योध न होने लगा, तवं वर्त्तमानको यतानेके लिये इन रूपोंके साथ
"" धातु यापद लगाये जाने लगे। इसी प्रकार अपूर्ण भूत काल
बतलाने के लिये विधिके साथ "था" धातुके रूप और भविष्य बतानेके लिये
"गा" धातु रूप लगने लगे। संस्कृतको यस धातु हिन्दीकी ""
धातु, स्वा धातुएँ "या" और मन् धातुसे "गा" धातु निकली है । ""
angana "था' और "गा" धातुयोंकि इसके रूप ही मिलते हैं।
tear or और गम् धातुयोंमें "प्रत्यया भूतकालिक स्थितः
और गतः रूप बनते हैं और इन्हीं प्रावृत नियम था और """
घने दें। इस प्रकार वर्तमानमें "जाय है" "पाय है" अपूर्ण भूतमें "जाय
""" और भविष्य में "जाएगा", "खायगा" स्पोका व्यवहार चल
पड़ा । कालान्तर में वर्त्तमान और पूर्णा भूतकालो पन प्रयोग में
aftaar ने लगी और "जाय" विधिके पहले संवत् प्रत्ययान्त
स्पोंसे बने क्रियापद प्रचलित हो गये । सामान्य भूतके प्रत्ययान्न रूपांत
et fear पहले ही व्यवहार किये जाते में और आज भी किये जा
7<noinclude></noinclude>
2qsz84no4h8nbnuoz3yx26juma7ljmb
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>યુ.
हिन्दी कौमुदी
"या" धातुओंसे बने क्रियापद रहते हैं, तब पूचॉक "ती" व
"ई" में अनुसार नहीं लगाते और "ह" वा "था" धातुमसे
चने बहुवचन रूप ही संयुक्त क्रियापदोको बहुवचन बनाने में
समर्थ समझे जाते हैं।
"धा" धातुकी तरह "गा" "वातुके भी भूतफालिक रूप ही
बनते हैं। पर विशेषता यह है कि “गा" धातुके रूप दोनों तरहके
होने है और एकका प्रयोग भूतकालमे तथा दूसरेका निधिके
साथ होने से भविष्य कालमें होता है। पहले रूप धातु वा
लगानेले और दूसरे आा लगानेसे बनते हैं : जैसे.
गा+या गया |
पुलिङ्ग ।
स्त्रीलिङ्ग ।
पुरुष
एकवचन
बहुवचन
एकवचन
बहुवचन
उत्तम
मैं गया
हम गये
मैं गयी
हम गय
मध्यम
तू गया
तुम गये
तू गयी
तुम गयाँ
प्रथम
यह गया
वे गये
यह नयी
ये गयी
"हो" धातुके रूप |
विधि और आशा |
पुरष
एकवचन |
बहुवचन ।
उत्तम
मैं होऊ
हम होवें, होय, हॉ
मञ्चम
तू हो, होय, हो
तुम होओ, हो
प्रथम
वह हो, होय, हो
चे होयें, होय, हों<noinclude></noinclude>
5hwsibn3q4fxeh5klnu7lbanuvkvfmh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पुरुष }
उत्तम
एकचचन ।
भविष्यकाल |
होगा होगा |
मैं होगा हंगा
लिङ्ग ।
चहुवचन !
हम होयेंगे, दोगे, होंगे
मध्यम
न होवेगा, होगा, होगा
प्रथम
यह होवेगा, होगा, होगा
तुम होओगे, दोगे
ये होयेंगे, होय गे, छोसे
स्त्रीलिङ्ग |
पुरुष
एकवचन ।
उत्तम
मैं होऊंगी, हंगी
मध्यम
प्रथम
चहुवचन !
हम होवेंगी, दोगी होंगी
तू होगी, होयगी, होगी तुम दोगोगी, होगी
वह होवेगी, होयगी, होगी वे होगा, होयंगी, होंगी
"सर" प्रत्ययान्त हो+ता-होता।
हेतुहेतुमभूत ।
पुलिङ्ग ।
उत्तम
मैं छोता
हम होते
मयम
तू होता
प्रथम
चह होता
तुम होते
होते
स्त्रीलिङ्ग ।
उत्तम
मध्यम
मैं शेती
तू होती
हम होती
प्रथम
• वह होतो
.
तुम होती
होती<noinclude></noinclude>
9ysebzl5gl17z5dw0bgzny30pzsqspe
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६०
हिन्दी श्रीमुदी |
"या" प्रत्ययान्त सामान्य मृत । हो+भ=होगा=सुजा ।
पुलिस |
पुरुष ।
एकवचन
हुवचन !
उत्तम
में हुआ
हम हुए
मध्यम
न हुआ
तुम हुए
प्रथम
वह हुआ
स्त्रीलिङ्ग
उत्तम.
में हुई
मध्यम
लू हुई
वह हुई
दुई
चे
तुम द
हुई
प्रथम
ए, था और गा धातुके साथ ही अन्य धातुओं विधि
हेतुहेतुमदभूत और सामान्य भूतके रुके योगसे ही हिन्दीके
समस्त क्रियापद बनते है
|
वर्तमान काल |
सामान्य वर्तमान
1
पुलिग होता है।
पुरुष
एकवचन ।
उत्तम
में होता है
१२
बहुवचन |
b
हम होते है
मध्यम
तू होता है
तुम होते हो
वम
वह होता है
वे होते है
स्त्री | होता है ।
उत्तम
मैं होती है
हम होती है<noinclude></noinclude>
4as6zp90ddosg8hl437gzu3kxxclkid
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पुरुष
एकवचन 1
मध्यम
तू होती है
प्रथम
यह होती है
किया।
बहुवचन ।
६१
तुम होती हो
घे होता है
तात्कालिक वर्तमान 1
पुल्लिंग हो रहा है ।
उसम
मैं हो रहा है
हम हो रहे हैं
मध्यम
तू हो रहा है
तुम हो रहे दो
प्रथम
यह हो रहा है
-
वे हो रहे हैं
|
सॉटिंग हो रही हैं ।
उत्तम
मैं हो रही हूं
दम हो रही हैं
मध्यम
तू हो रही है
तुम हो रही हो
प्रथम
यह हो रही है...
चे हो रही है
पूर्ण वर्त्तमान | हुआ है।
उत्तम
मैं हुआ है
हम हुए हैं
मध्यम.
तू हुआ है
प्रथम
वह हुआ है
'
उत्तम
मध्यम :
प्रथम
-
में हुई इं
हुई है
वक्ष हुई है
स्त्रीलिंग हुई है।
तुम हुए हो
ये हुए हैं,
दम हुए
६.
तुम हुई हो
ये हैं<noinclude></noinclude>
ipl2n9bcsqag6lli24icrrlw7c4imah
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हिन्दी कौमुदी |
पुरुष !
एकवचन ।
यहुवचन ।
मध्यम
तू हो रहा था
तुम हो रहे थे
प्रथम
यह हो रहा था
के हो रहे थे.
1
स्त्रीलिंग हो रही थी।'
उत्त्म
में हो रही थी
दम हो रही थीं
मध्यम
तू हो रही थी
तुम हो रहीं थीं
प्रथम
वह हो रही थी
चे हो रही थी.
पूर्ण भूत
पुल्लिंग
हुआ था।
उत्तम
मैं हुआ था
हम हुए थे
मध्यम
तू हुआ था,
तुम हुए थे.
प्रथम
घट्ट हुआ था
ये हुए थे :
स्त्रीलिंग । दुई श्री
;
उत्तम
मैं हुई थी
हम हुई थीं
मध्यम
तू हुई थी।
तुम हुई थ
प्रथम चह हुई थी
... gif
सन्दिग्ध भूत ।
पुल्लिंग
हुआ होगा ।।
उत्तम
मैं हुआ हंगा
हम हुब होंगे
मध्यम तू हुआ होगा
प्रथम यह हुआ होगा
तुम दुर होगे
बे हुए होने<noinclude></noinclude>
rvi2sh6ftrpi4zj0rkvyg54ahjl425r
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/६८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1
क्रिया |
स्त्रीलिंग | हुई होगी ।
६५
पुरुष -
एकचंचन |
बहुवचन ।
उत्तम
मैं हुई हंग
एम हुई होंगी
मध्यम.. तू हुई होगी
तुम हुई होगी
प्रथम :
यह हुई होगी
वे हुई होंगी
सम्भाव्य अपूर्ण भूत [ #
पुल्लिंग | आता होता । .
• उत्तम
मैं खाता होता
हम आते होते
मध्यम
P
तू आता होता
तुम आते होते
प्रथम
वह आता होता
चे होते
|
खोलिंग आती होती ।
उत्तम
मैं आती होती
हम याती होती
मध्यम
तू जात होती
तुम आती होती
प्रथम
यह गाती होती
चे माती होती
सम्भाव्य पूर्ण भूत
पुल्लिंग । आया होता ||
उत्तम
मैं लाया होता
मध्यम
तू आया होता
प्रथम
चह आया होता......
हम आये होते
तुम आये होते
वे आये होते
"होता होता" और " होती होती" प्रयोग व्यवहार नहीं
.
इसोते, "हो" धातुके बदले "आ" धातुके रूप साधकर दिखाये गये हैं।<noinclude></noinclude>
m6tss4cxbdhtriqcpaiqstrdayc0wwf
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/६९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>4
६६
हिन्दी कौमुदी !
स्त्रीलिंग | आयी होती।
पुरुष
एकवचन |
उत्तम
मैं आयी होती
मध्यम
तू आयो होती
प्रथम
वह आयी होती
बहुवचन |
हम आधी होती
तुम आयी होत
वे आयी होती
इसी प्रकार अन्य अकर्मक क्रियाओं के रूप साधे जाते हैं।,
चकना, बोलना, भूलना, मिलना और लाना क्रियाओं के रूपोंके
' लिये भी यही नियम है। सकर्मक क्रियाओंके "आ" प्रत्ययान्त
" रूपों में अन्तर पड़ता है, क्योंकि कर्मवाच्य होने के कारण उनमें
कर्मानुसार क्रिया होती है ।
सकर्मक "खा" धातु ।
सामान्य भूत | सा+आ= सामा=साया ।
पुरुष
एकवचन ।
चहुवचन |
उत्तम
भात खाया
हमने
भात खाया
मध्यम
तूने
या
तुमने
या
प्रथम
उसने
-
रोटी खायी उन्होंने
रोटी यी
यहां कम के अनुसार क्रिया हुई है, कर्त्ता लानेवाले अनु--
सार नहीं । यदि स्त्री बोले घा उसके विषयमें कोई और बोले,
और कर्म का लिंग न बदले, तो इन रूपों में अन्तर न पड़ेगा ।<noinclude></noinclude>
j53u2e9vbyxdeviamkfmde0h4ovpj62
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/७०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>क्रिया ।
पूर्ण वर्तमान
६०
6. E RE
पुरुष एकवचन |
चचवन ।
उत्तम
मैंने
भात खाया है
हमने
भात खाया है
मध्यम
ते
ir
तुमने
या
प्रथम
उसने
रोटी खायी है
उन्होंने । रोदो खायी है
नं.
उम
पूर्ण भूत |
मैंने भात खाया था हमने | भात खाया था
मध्यम तूने
या
तुमने
या
प्रथम उसने
रोटो पायी थी उन्होंने रोः। खायो यां
सम्भावपूर्ण भूत्र ।
दंत्तम मैने
भात खाया होता हमने | भात खाया होता
मध्यम सूने
या तुमने
था
प्रथम उसने
रोटी खायी होती उन्होंने रोटी खायी होती
सन्दिग्ध भूत ।
J
उत्तम मैंने भात खाया होगा हमने | भात खाया होगा
मध्यम नूने
या तुमने }
या
प्रथम - उसने / रोटी खायी होगी उन्होने | रोटी पायां होगी
.
“आ”, “जा”, “खा", "ला", "३", "हे" आदि एक
अक्षरवाली धातुओंमें जब भा" प्रत्यय लगता है, तब "आ"<noinclude></noinclude>
s53kakq0n0rnrjdol1q0x0cvv6gwazr
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ચૂંટ
हिन्दी कौमुदी ।
"या" हो जाता है; जैसे, आया, जाया, खाया, लाया, दिया, लिया
आदि । "जा" और "कर" धातुओंके सूतकालके रूपोर्मे कुछ,
निशेषता होती है । “ला" धातुके भूतकालका रूप नियमानुसार
तो "जाया" और "कर" धातुका "करा बनता है, पर हिन्दीमें
""या" और "किया" रूप भी बनते हैं और इन्हीका बहुत
प्रचलन है। "करा" शिष्ट प्रयोग नहीं समझा जाता, यद्यपि
बोलचालमें माता र और "जाया" यौगिक क्रियाओंके "वह है
जाया जाता है और मुझसे जाया जाता है जैसे कर्मचाप और
भाववाच्यमें ही काम आता है। दो प्रकारके रूपोंका, कारण यह
है कि जाया गया यादि संस्कृतके के प्रत्ययान्त गतः और
कृदन्त रूपसे बने हैं।
आकारान्त धातु का छोड़ एक अक्षरवाली धातुओंमें ज
"आ" अथवा "या" प्रत्यय जुड़ना है, तब धातुका दोर्घ स्वर
"तुम्ब" हूँ| जाता है | एकारान्त धातु "दकारान्त" हो जाती है।
जैसे ले और से लिया. दिया।
दिया, लिया, लिया, fear और frer क्रियापद
स्त्रीलिङ्गमेंदी, लो, सी, पी और को रूप होते हैं।
जिस क्रियाले कार्यका समाप्ति नहीं होती और जिसे अन्य
कियाका अपेक्षा रहती है, यह असमापिका का पूर्वकालिक
ये रूप नियमले विरुद्ध जान पड़ते हैं, परन्तु विचारपूर्वक देखनेसे
नियमानुसार ही ठहरते हैं । दिया, लिमा यदि स्त्रीलिङ्ग रूप दिय
लिपी, सियी, पियी और कियो होते हैं। किसी समय अनेक पुस्तकों
F
'<noinclude></noinclude>
sqpochepnhtgbdn7tpx5wkphlcjlk0f
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"प्रेरणार्थक क्रिया ।
किया कहती है । वह याती धातुके रूपमें ही रहती है. या
उसमें "कर", "के" वा "कर" जुड़नेसे बननी है; जसे, जा,
जाकर, जा, जाकर के |
प्रेरणार्थक क्रिया ।
जो क्रिया किसी कार्य के लिये दूसरे को में रित करती है, वह
प्रेरणार्थक क्रिया काती है, जैसे, करवाना, चुलघाना,
खिंचवाना ।
अकर्मक कर्मकर्त्तक और सकर्मक तीनो प्रकारको क्रिया-
असे प्रेरणार्थक क्रिया बनती है।
aar और कर्म क्रियाओंसे दो प्रकारको प्ररणार्थंक
किया बनती है। एक वह जिससे जिस मनुष्यको प्रेरणा की
जाती है, वो कम करता है। दूसरी वह जिससे प्रेरणा' की
जाती है, वह दूसरेसे काम कराता है; जैसे चढ़ना कसंक
क्रियाले पहली प्रेरणार्थक क्रिया चढ़ाना और दूसरी प्ररेणार्थ
बवाना | इसी प्रकार पिघलना कर्मकर्तृक निवासे पहली
प्रेरणार्थक किया पिघलाना और दूसरी प्रेरणार्थक क्रिया
निधि और उशिरा पत्रोंमें थे हो रूप लिखे जाते थे.
और पं० केयरराम भद्रकृत व्याकरण में पाये भी जाते हैं । परन्तु पीछे इन
ariat "थी" के बदले "ई" लिखी जाने लगी और ये रूप दिई, बिहे, सि
ई और कि हो गये। राय भी अनेक मनुष्य दिई लिई आदि लिखते
से जाते हैं। कालान्तर में सन्धि नियमानुसार पांकी
तर मिल गयी और दी, सो आदि रूप बन गएँ ।<noinclude></noinclude>
68zx4d6fgm1kp60amk7jaavkzurcyqm
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/७३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>•
हिन्दी कौमुदी ।
पिलाना चनती है । पहली सकमेक और दूसरी करण
भावयुक्त सकर्मकरणार्थक क्रिया है । -
इन कियाओंको धातुमें "आ" लगानेसे पहली प्रेरणार्थक
और "चा" लगानेसे दूसरी प्रेरणार्थक क्रिया बनती है; जैसे,
अकर्मक क्रिया ।
प्रेरणार्थक
करणभावयुक्त |
प्रेरणार्थक
चैटना
बैठाना
sarat
उठना
उठाना
चलना
चलाना
उठवाना
चलवानां
हंसना
हंसाना
हंसवाना
तैरना
तराना
कर्मकर्तृक क्रिया ।
= मकना
चमकाना
पिघलता
पिघलाना
भटकना
भटकाना
चमकवाना
पिघलवाना
भटकचाना
फयाओ सकर्मक प्रेरणार्थक किया धातु
"या" न लगाकर उसके प्रथम अक्षर सकारको दीर्घ कर
देने से फाती है और मूल किया अन्त में "आ" और "चा'
जाने '
रणभावयुक्त प्रग्णार्थक किया बनती है; जसे,
लड़ना
लाइना
दाना चा रवाना
पंचना
गाना
बंधाना
वा 'बंधचाना
यत्रना
पाटना
कटाना
वा कटवाना
भरना
मारना
मराना
नरवाना
WA
सादिनी ।
भरणार्थक क्रिया हिन्दी fता है, जो<noinclude></noinclude>
8xtgm9jbahjefk6fbclo1dq3qlh8t7n
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रेरणार्थक क्रिया ।
फाड़ना
कड़ाना या फड़वाना
निकलना
frकानr
निकलाना वा निकलवाना
दवना
दावना चा
दवाना
यहां दना किपाको छोड़ त क्रियाओंकी करणभावयुक्त
प्रेरणार्थक क्रियाके दो रूप दिखाये गये हैं। पहला रूप क
प्रेरणार्थक हो है पर अर्थ करभात मेरणार्थका
देता है।
कर्म कि सकर्मक प्रेरणार्थक क्रिया
- यनानेके समय धातुके अन्तमें "" मोर, "ओ" दोनो लगा सकते
है; जसे,
सूचना
*
भियाना वा भिगोना
ना वा डुवोना
freerar
डुक्वाना
कई अकर्शक और कर्मकर्तृक धातुओं के आदि अक्षर इकार
कारयुक्त हों, तो उant and fear आदि अक्षर
पकार वा मोकारयुक्त होते है, जैसे,
सिंचना
विचाना
freuter
दिखना
देखना
fernt, freeier दिवाना
* lear
गिराना
गिरवाना
पिलना
पेलना
पिलाना
पिल्याना
1
1 मिलना
* मेलना
मिलाना
freeान
1 नवता
निना निवाड़ना निथड़ाना
निवड़वाना
और जानकी बोलियों यादें ।<noinclude></noinclude>
rllzjlhgeiv8m3afx1a1riy1vdbeazk
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७२
हिन्दी कौमुदी ।
खुलना
घोलना
खुलवाना
घुलना
धोलना
धुलवाना
जिन कर्मकर्तृक धातुओंके आदि अक्षर ऊकारान्त और
अन्तिम प्रकारान्त होते हैं, उनकी सकर्मक क्रियामें ऊकार
ओकार हो जाता है और टकार दोनो
प्रेरणार्थक किभा
ओंमेंड़ हो जाता है; जैसे,
फूटना
फोड़ना
फुड़ाना
वा वा
फुड़ेवाला
टूटना
तोड़ना
तुड़ाना
वा
तुड़वाना'
छूटना
छोड़ना
छुड़ाना वा छुड़वाना
एक अक्षरवाली अकर्मक वा सकर्मक धातुओंसे प्रेरणार्थक
किया बनाते समय प्रथम प्रेरणार्थक में "ला" और द्वितीय
प्रेरणार्थक में "लवा" लगाते हैं. जसे,
खाना
पीना
सोना
रोना
सिलाना।
पिलाना
सुलाना
रुलाना
खिलवाना
पिलवाना
खुलवाना
रुलधाना
कई धातुओं की मरणार्थक कियाओंके दो रूप होनेपर भी
उनके अर्थों में अन्तर नहीं पड़ता; जैसे,
सीना
सिलाना
वा
सिलवाना
देना
दिलाना
वा
छापना
छराना
वा
छपवाना
-<noinclude></noinclude>
0pmld3vibc7yqmccrkgt0az5ynnjmcx
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>। परखना
करना
थक क्रिया ।
७३.
ान
वा
परवाना
कराना
वा
करचाना
इसी प्रकार फई एकाक्षरी सकर्मक धातुओंकी एक ही
-प्रकारको प्रेरणार्थक क्रिश बनती है और "ला" के बदले "या"
लगाया जाता है; जैसे,
गाना
ना
गयाना
लियाना
अनेक कर्म और अकर्मक धातुओंकी प्रेरणार्थक क्रिया
धारण से ही बनती है; जैसे,
ड़ना
पफड़ाना
झना
ान
समाना
ना
जगाना
गानT
er
FacानT
जिनवाना
घुमाना
घुमवाना
सुधाना
सुघवाना
सुनाना
सुनचाना
बुलाना
बुलवाना
कर्मक धातुओं की प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया "सा" और
- द्वितीय प्रेरणार्थक किया "चा" लगानेसे धनती
.<noinclude></noinclude>
6a0ekf1az2dvkzxaj2jpstegcuno0qk
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/७७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७४
देखना
दिवाना वा दिखलाना
हिन्दी कौमुदी ।
दिखवाना'
कहना
कहाना वा कहलाना
कहचाना
सीपना
सिखाना वा सिखलाना
सिवाना
कुछ धातुको प्रेरणार्थक क्रिया बीचका अक्षरल
बनती है : जैसे.
रहना
रखना
रखाना,
रखवाना
विकता
चेचना
विकाला,
विकवाना<noinclude></noinclude>
o5f5ou437pdsm8yb7oa5p8exlwkdu5h
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/७८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>IN
यौगिक क्रिया ।
atra fats योगसे जो क्रिया बनती हैं,
affee foया कहती है । हिन्दी आशा और विधि रूपों
छोड़कर सभी fears यौगिक क्रियाओंसे बनते हैं. पर
afe faarya नहीं कहते। इसका कारण यह है कि
जिन क्रिया योगसे हिन्दी के क्रियापद बनते है, उनके बिना
काल चच यादिका वर्णन असम्भव हो जाता है । जिन्हें हम
यौगिक क्रिया कह रहे हैं, वे माना, जाना, रहना, रखना,
उठना बैठना, देना, लेना, डालना, पढ़ना, सकना, चुकना,
लगना, करना, चाहना द क्रियाओंके योग बनती हैं।
जो क्रियाए इनके पहले रहती हैं, उन्हीसे अर्थ निकलता है
इनके साथ युक्त होने कारण उनके अर्थ में कुछ विशेषता या
• जाती है | अर्थ गीर रूपके अनुसार यौनिक के अनेक
भेद होते हैं। यौगिक aratni एक साग कदन्त और
दूसरा क्रिया रहता है।
पहली श्रेणी ।
जिस यौगिक
का पहला भाग असमापिका वा पूर्व-
कालिक किया होता है, उसको साधनाएँ दूसरे भाग ही रूप
[ते हैं, पहले भागकी क्रिया अर्थताभर था ज्ञाती<noinclude></noinclude>
pukpofli31s7nav6sady3v8n2ovtozo
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/७९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७६
हिन्दी कौमुद्री |
है और जिसके रूपों की साधना होती है, उसका कुछ अय
नहीं होता; जैसे, वन आना। यहां अभिप्राय तो वननेसे
है और आना का कोई अर्थ नहीं है, पर चन अर्थात्
धनकर आना freका वशेष अर्थ है महत्व वा सफलता प्राप्त
होना । इसी प्रकार मारता क्रियाका अर्थ केवल प्रहार करना
है, पर " मार डालना " किया जान ले लेने के अर्थ में प्रयुक्त होती
है | इसी भाति "तोड़ डालना,” “खा डालना,” “काट डालना"
मादिके अर्थ खण्ड खण्ड करना, हड़प या पचा जाना और
सावित न रखना है । इसे तद्योतक यौगिक क्रिया
कहते हैं। गिर पड़ना, बन पड़ना, जान पड़ना, फेक देना, गिरा
देना, दिला देना, बता देना, सुना देना, दे बैठना, रो उठना,
चढ़ना, पी लेना, जान लेना, बैठ रहना, दे रखना. टूट जाता
इसी श्रेणीकी यौगिक कियाए हैं।
शक्ति या सामर्थ्य जतानेके लिये
पीछे " सकता" क्रिया लगाकर सह
समापिका क्रियाके रूपके
सकना, मार सकता, '
जा सकना, भाग सकता, पढ़ सकना, 'लिख सकता जैसी
यौगिक क्रिया बनायो जाती हैं । यह सामर्थ्यद्योतक यौगिक
क्रिया है।
इस प्रकार कार्यकी पूर्णता वा समाप्ति बतानेके लिये भी
असमापिका क्रिया के ही पाछे "चुकता" क्रिया लगाकर यौगिक
क्रिया चनायी जाती है; जैसे, दे चुकना, लिख चुकनी
पी
चुकना आदि। इनसे देने, लिखने और पोनेके कायकी
'<noinclude></noinclude>
fu3skq01ypeinl5s7yi9jd9hy1zgx96
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>=
यौगिक क्रिया है।
39.
समाति जान पड़ती है। इसका नाम पूर्णताद्योतक यौगिक
क्रिया है ।
दूसरी श्रेणी
दूसरी श्रेणोकी यौगिक क्रिया पहला भाग तो भूत
काकै पुलिङ्ग एकचचनका रूप धारण करता है और दूसरा
'सामान्य क्रियाके रूपमें रहता है तथा इसी पिछले भागको
• साधना होती है । पहला भाग तय होता है । इस
श्रेणीst for friका दूसरा भाग सदा "कर" या
"वाहना" होता है । "करना" किया के योग से
frerana ar artfत बहाती है, इसलिये यह
arreste
यौगिक क्रिया है। यात्रा करना पड़ा काना, लिखा करना,
सोया करना आदिसे खाने पहने, लिखने और सोनेका
'स्वभाव जाना जाता है ।
इसी प्रकार "चाहना किया योग इच्छाका अर्थ पाया
जाता है, इसलिये यह च्छाद्योनक यौगिक क्रिया है । खाधा
चाहना, पट्टा चाहना आदि इस श्रेणीका क्रिया उदाहरण है।
कभी कभी संग sa के पहले घाना क्रियाके
utra arat, year, देr शब्दों का भी संज्ञा रूप धार
होता है, जैसे खाना चाहना, पढ़ना चाहना, देना चाहना आदि ।
इस यौगिक क्रिया इच्छाके सिया कार्य शीघ्र होनेका भाव
भt frnaar है, जैसे, पानी बरसा चांदता है, यादल गरजा
चाहता है, क भाषा चाहती है ।<noinclude></noinclude>
q77jon3jpzxjxs5r42kej2vfwwgx256
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૭.
हिन्दी कौमुदी ।
तोसरी श्रेणी ।
तीस श्रणोकी यौगिक क्रिया लगना, देना, कहना, पाना,
कियाate योगसे बनती है और इसका पहला भाग किया
रूपमें ही रहता है, केवल "ना" प्रत्यय "ने" कर दिया जाता है।
यह कृदन्त अप्रय कहता है; जैसे, वह खाने लगा, मैंने रामको
जाने दिया, मोgrat arस्टरने जाने कहा, सोहन वहां घुसने
नहीं पाया। लगना क्रियाके योगसे बननेवाली आरम्भद्योतक,
देना किया योग से बननेवाली आशाद्योतक और पाना क्रिया के
योगसे बननेवाली अवकाशद्योतक यौगिक क्रिया है ।
चौथी श्रेणी
चौथी की यौगिक क्रिया के दोनो भांगो में लिंगवचना
नुसार अन्तर पड़ता है और दूसरे भाग जाना, आता या
रहना किया रूप होते हैं, जैसे, मैं सोता रहा, लड़की रोती
आती है, लड़के हंसते आते है ।
जिस प्रकार ऊपर हेतुहेतुमभूतका रूप पहले भाग
रहता है, उसी प्रकार मृतके रूपका प्रयोग भी होता है ।
जैसे, लड़के भागे जाते है, लौंडी पड़ी रहती है, मैं चला
भाता है।
कभी कभी “आना” “ज्ञाना" क्रियाओं के साथ लिङ्गका
विचार न करके पहले भागका क्रियापद पुल्लिंग बहुवचन
रूपमें रखा जाता है, पर यहां वह किurer कृदन्त अध्यय<noinclude></noinclude>
i9c8vnu9m6bc2cq1dez03v8d5ygwxr7
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1 यौगिक किया।
होता है : जैसे, वह हसते हसते आता है, स्त्रियां नावते गाते
आर्थी :
पांचवी श्रेणी ।
कभी कभी इस श्रेणोकी किवाका पदला भाग भूतकालिक
क्रिया लिन रूपोंमें रहता है और दूसरे भाग में
देता, आना जाना और छोड़ना कियाओंके रूप रहते हैं। इस
aught forth at विभाग होते हैं । एक तो वह जिसका
दूसरा भाग "देन" किवासे बनता है और दूसरा वह जिसका
पहला भाग ओना पहनना और लगना कियाओंके पुलिङ्ग भूत-
का रूपमें होता है और दूसरा भाग माना,
• जाना और छोड़ना क्रियाओं रूपोंमें रहता है।
3
"देit" क्रियायोगसे maharat are far केवल
वर्तमान कालमें प्रयुक्त होती है, जैसे, में बताये देता है, लड़के
पाठ सुनाये देते है, लड़कियां व वातें कहे देती हैं। इस
: प्रकारकी यौगिक कियाके पहले भागकt fear aar exis
होती है, परन्तु वह वास्तव में किया नहीं, हृदन्न बाय है ।
ओढ़े पहने, लादे लगाये जैसे रूपों के योगसे जो यौगिक
बिनती है, उसके दूसरे हो भागकी साधना होती है,
परन्तु दोनो के बीच चिचनानुसार हुआ हुए और हुई पद
सुप्त रहते है; जैसे, वह ओढ़नी ओढ़ ( हुई) आती है, में फोट
• पहने ( हुआ ) आता हूं, लड़के धोती पहने ( हुए ) भाते हैं।<noinclude></noinclude>
tgl1ko77aa9v0w98al55orkkib4wfwh
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८०
हिन्दी कौमुदी ।
इस यौगिक कियाकी साधना तीनो कालोंमें होती है। ओडे,
भागे, लाये, लगाये श्रादि कृदन्त है ।
छठी श्रेणी ।
यौगिक क्रियाकी छठी श्रेणीमे एक ही अर्थ में दो क्रियाप
आती है । वाक्यकी कियाले सम्बन्ध न होनेपर यातो ये बस
मापिका क्रियाए होती है या "विना" अव्ययके योगमै भूत•
कालिक क्रियाके बहुवचनके रूपमें; जसे, छोड छाडकर, मार-
पीट कर लूट मारकर वह चल दिया, घिना कहे सुने वर
चला गया।
सातवी श्रेणी
इस श्रेणीकी यौगिक क्रियाका पहला भाग विशेष्य या
विशेषण होता है और दूसरेमें करना, देना, होना, खाना, आता
देखना जैसी क्रियाओं के रूप रहते हैं, जैसे, अंगीकार करना,
उपदेश देना । विशेषण भूतकालके एकवचन के रूपमें भी रहता
है, जैसे समाप्त करना, प्राप्त होना आदि ।
भूतकालिक विशेषण यदि हिन्दोका हो तो उसमें लिग
वचनानुसार परिवर्तन भी होता है;
जैसे, वह गाड़ी बडो
हुई, उसने घोडा खड़ा किया, लडके पड़े हुए।
आठवी श्रेणी ।
आठवीं श्रेणीकी यौगिक क्रियाका दूसरा भाग "जाना
क्रियाके रूपोंसे बनता है और पहले भागकी अर्थात् मुख्य किया
सदा भूतकालिक होती है ।
इस यौfre faarके दो<noinclude></noinclude>
apgg9is4i7uwvh0tbr0pavrphgrrcfw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>·
यौगिक किया।
८१
7
भागों लिंगानुसार परिवर्तन होता है। "जा" क्रिया
योगसे जो क्रिया बनती है, वह कर्मवाच्य पर भाववाच्य
होती है, परन्तु इसके कर्ता सदा चौथी कि या करण
श्री कारक होता है। इसके सिवा यह योगिक क्रिया शक्ति वा
सामर्थ्य भी पता है, जैसे, मुझसे या तुम्हसे या उससे या
हमसे या तुमसे या उनसे दूध पिया जाता है या पिया गया
काया पिया जायगा ।
ater
:
धर्म पुलिंग बहुवचन होनेसे क्रिया भी दुलिंग बहुवचन
होगी जैसे मुले या तुमसे या उससे या हमसे अथवा तुमसे
या उनसे पाये जाते है या लाये गये या खाये जायेंगे ।
eine for affe unधवन
कर्म
होती है; जैसे, मुले या तुमने या उससे या हमसे
तुमसे या उनसे रोटी पायी जाती है या खायी गयी या चाय
जग
कर्म खोट न होनेसे किया खोलि होती है
जैसे मुझसे या तुसे या उससे या हमसे अथवा तुमसे या
उनसे रोटियां पायी जाती हैं या art a ar aायी
जायेंगी।
- जाना क्रिया योग बननेवाला साare asis प्रियामें
दी होता है। इसमें, जैसा ऊपर बताया गया है, कतमें चीया
fare होती है और क्रिया सदा लिङ्ग एकवचन रहती है।
भावी प्रधान है जैसे मुझसे या तुकले
7<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૮૨
हिन्दी कौमुदी ।
या उससे अथवा हमसे या तुमसे या उनसे सोया जाता है, या
सोया गया या सोया जायगा ।
नवाँ श्रेणी ।
नव श्रेणीकी यौगिक क्रियाका पहला भाग तो
रूपमें रहता है और दूसरे में ह, था. हो और पड़ धातुओं से य
रूप रहते हैं। इस यौगिक क्रियासे बने वाक्यके कर्त्ता में दूसरी
विभक्ति होती है और यदि यौगिक क्रियाका पहला भाग सकर्मक
होता है तथा कर्म व्यक्त रहता है, तो कर्म लिनानुसार
यौगिक क्रिया रूप होते हैं, इसलिये यह कर्मवाच्य है जैसे
मुझे गेटी पानी होगी, मुझे कुछ काम करना है, रामको बड़े क
उठाने पड़े, कृष्णको चढ़े काम करने थे। परन्तु जब यौगिक
क्रियाका पहला भाग अकर्मक होता है या सकर्मक होनेपर भी
कर्म अध्यक्त रहता है, तब क्रिया सदा पुल्लिंग एकवचन होती
है, इस लिये यह भाववाच्य होता है; जैसे, मुझे जाना है, उसे
स्वाना था, लड़कीको रोना पड़ा या रोना होगा ।
इसी प्रकार दिसाई, सुनाई, जुलाई और पकडाई शब्दों
साथ "देना" क्रिया के योगले जो किया बनती है, वह भी कर्म-
वाच्य ही होती है। दिखाई आदि शब्दोंमें कोई विकार
नहीं होता और देना क्रिया अकर्मक क्रियाके समान
प्रयुक्त होती है। यहां दिखाई देना, सुनाई देना, छुलाई देना
और पकड़ाई देना क्रियाओ में इन्द्रियगोचरत्व मात्र पाया
जाता है; और दिखाई, सुनाई आदि अव्यय हैं, देने
1<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यौगिक क्रिया ।
८३
इस प्रकारके
है और यदि
से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है।
कायका कर्त्ता बहुधा अव्यक्त रहना
• व्यक्त भी होता है, तो उसमें दूसरी विभक्ति होती है और
| कर्म लिनानुसार ही किया होती है; जैसे, सरस्वती
बहुत दिनों are fदखाई दी, रामका चोल सुनाई दिया, वह
'किसीकोलाई नहीं देता, उससे चोर पकड़ाई न देगा । ये
प्रयोग हृष्टिगोचर होना, कर्णगोचर होना, स्पर्शगत और हस्त-
त होना अर्थ देते हैं ।
"चाहिये” शब्द के योग में दसी प्रकारके कर्मवाच्य और भाव-
चाय बनते हैं । " चाहिये" तो अव्यय होनेके कारण सहा
faare रहित रaar है, पर यदि वह सकर्मक क्रिया के साथ
आता है, तो कर्म चिनानुसार क्रिया बदलती है और
इसके कर्त्ता दूसरी विभकि होती है। यह कर्मवाच्य
दोता है; जैसे, मुझे रोटी खानी चाहिये, उसे दस
काम करने चाहिये, खीको भोजन बनाना चाहिये ।
यदि क्रिया कर्म हो या सकर्मक होनेपर भी उसका फर्चा
अव्यक्त हो तो क्रिया सदा पुलिङ्ग एकवचन रहेगी। इसलिये
यह किया भाववाच्य होगी; जैसे, आपको जाना चाहिये, राम-
को भव खाना चाहिये, मोहनको अव सोना चाहिये ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>नाम धातु ।
संगासे जो धातुए' चनती हैं, वे नाम धातु कहाता है।
अनेक संज्ञा शब्दों क्रियाफा चिन्ह "ना" जोड़ देनेसे नाम
किया बन जाती है और संहाके रूप ही नाम धातुका काम देते
हैं जैसे, रंग, धार, फटकार, दुतकार आदि । ये संज्ञा शब्द
हैं और धातुका भी कामं देते हैं। इनमें “ना" जोड़ देने से रंगना,
बधारना, फटकारना, दुनकारना कियाए' वन जाती है।
I
कुछ शब्दोंमें "आ" प्रत्यय लगानेसे नाम धातु बनती हैं।
टटकट, छटपट, तड़कड़, तिलमिल, लाज, पात,
जैसे शब्दों से खटखटा, फटफटा, छटपटा, तड़फड़ा, तिलमिला,
राजा, बता धातुएं और खटपटाना, फटफटाना, छटपठाना
तड़फड़ाना, तिलमिलाना, लजाना, बताना कियाग' बनती हैं।
कहीं कहीं "आ" के बदले "ला" प्रत्यय लगाकर धातु
बनाते हैं; जैसे, दूर से भुठला और वातसे बतला धातुएं और
मुलाला तथा वतलाना कियाए' बनी हैं।
कई संज्ञा शब्दों में "दया" प्रत्यय लगाकर धातु बनाते हैं।
जैसे पानी से पनिया, जूता से जुलिया, लातसे लतिया, चुकी
तुरुमा वादि धातुए ं और पनियाना, जुत्तियाना, लतियाना.
aahan किया बनी हैं।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कृदन्त ।
कर के और करके ।
धातुमें "कर", "के" और "करके" जोड़नेसे असमापिका
या पूर्वकालिक क्रिया बनती है। इससे जान पड़ता है कि
पहलेका कार्य तो हो चुका, पर उसके चादका समाप्त नहीं हु
और इसलिये यह असमायिका या पूर्वकालिक क्रिया कहाती है;
जैसे, बा+कर= खाकर जा+करन्जाकर, सुनकर = सुनकर,
कर+के= करके, ज्ञान+के- जान के, सुन+करके सुनकरके । 'करके'
'प्रत्यया प्रयोग बहुत कम किया जाता है। पिता प्रत्ययकी धातु
भी समापिका क्रियाका काम देती है।
चातुर्मे "य" और "प्रत्यय जुड़ने से भी असमापिका किया
बनती है, पर पुरानी हिन्दीकी, वर्तमान हिन्दी की नहीं। जैसे,
इतनी कथा सुनाय श्रीशुकदेवजी बोले, यह माह यह आगे ला
ता" ।
धातुमें "ता" प्रत्यय लगानेसे जो रूप घनता है, वह तिग
काम करना है, देतुहेतुमद्भूतकालिक किया. वर्तमान कालिक
"क्रिया और विशेषणका । यह आकारान्त पुंलि एकवचन होता
हैं, जैसे, वह भाव में नहीं जानता, लड़की रोती है,
खेलते हैं । भाकारान्त पुलिस शब्दोंके नियमानुसार इसके
लिंगयचन बहलते हैं ।
के<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>દ
हिन्दी कौमुदी ।
जब "ता" प्रत्यय "ते" कर दिया जाता है ओर लिंगन
कारण इसमें अन्तर नहीं पडता, तब "ते" प्रत्यययुक्त कुन
अव्यय होता है ।
उपर
धातुमे "आ" प्रत्यय लगानेसे जो रूप बनना है, वह हरा
काम करता है, भूतकालिक किया और विशेषणका । सकर्मक
धातुमे "आ" प्रत्यय लगनेसे तो कर्मके लिंगवचनानुसार यह
रूप रहता हैं और अफमक के कर्त्ता के अनुसार जैसे, मैंने पोछी
पढीं, वह भागा चला गया । यह पुल्लिङ्ग एकवचन होता है और
मकारान्त पुलिङ्ग राज्यों की भांति इसके त्रिचन बदलते हैं।
जय "म"""" कर दिया जाता है और लिङ्गवचनके कारण
इसमें परिवर्तन नहीं होता, तर "ते" प्रत्ययवाला कृदन्तयन्य
कहाता है, जैसे, हंसते हंसते नाचते गाते ।
"ना ।"
श्रातुमें 'ना" प्रत्यय जोटनेसे जो रूप बनता है वह विरा
काम करता है - आवश्यकता या कर्त्तव्य, भावी कार्य जोर
आशा बनाता है जैसे, मुझे जाना है, उसे रोटी खाना हैं, तुम्हें
सोमा है । यह पुलिग एकवचन होता है और आकारान्त
पुल्लिङ्ग एकवचन शब्दोंकी भांति इसके बहुवचन और स्त्रीलिङ्ग
रूप बनते हैं।
कृत प्रत्ययोंने तीन प्रकारसे मंजा शब्द बनते हैं (१)
क्रियामे प्रत्यय लगानेसे, ( २ ) धातुमै प्रत्यय जोडनेसे और (३)<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हृदन्त ।
८७
धातुके रूपका ही संशाकी तरह व्यवहार करनेसे । 'थाकारान्त
प्रत्यय लगने से शब्द पुल्लिङ्ग और ईकारान्त प्रत्यय जुड़नेसे
स्त्रीलिङ्ग तथा अकारान्त प्रत्यय जुड़ने से कभी पुलिङ्ग और
कभी खीलिङ्ग बनता है ।
"ना" जय “ने” कर दिया जाता है और लिंगचचनके कारण
इसका रूप नहीं बदलता, तय यह हृदन्त अव्यय होता है; जैसे,
कहने लगा, जाने दिया ।
कर्तृवाचक |
वाला, हारा, हार, सार और घाहा !
वाला, द्वारा, हार, सार और वाहा सम्पन्यसूचक प्रत्यय
क्रियाओं में लगते हैं, जिनमें आजकल "वाला" ही प्रचलित है
और "हारा" और "हार" अप्रचलित है। "बाला" और "दारा"
जुड़ने के पहले किया एकारान्त कर दी जाती है और "हार" तथा
"सार" जुड़ने पहले अन्तिम आकारका लोप कर दिया जाता
है; जैसे, बोलना + वाला चोरनेवाला, करना+हारा=करनेहारा,
होना + हार होनहार, सिर्जना+दार सिर्जनहार, मिलना+लार=
मिलनसार, चर+वाहा=चरवाहा । इन प्रत्ययोंके जुड़नेसे कर्त्तृ-
वाचक संज्ञा घनती है ।
इया एरा, ऐया और चैवा ।
1
धातु सम्बन्धक इया, एरा, ऐया और वैया प्रत्यय
जुड़नेसे भी कत्तृवाचक संज्ञा बनती है जैसे, जड़+श्या =
:<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८८
हिन्दी कौमुदी ।
जड़िया, लट+परा-लुटेरा, परख : ऐया=परमैया, गा+वा=
गया।
आ. ना ना था ।
आ, ना, नी, टाक याचक प्रत्यय हैं और धातुमें जुड़कर
व्यापार या स्वभाव बताते हैं, जैसे, भूजाजा (भूजने-
चाला ), रो+ना=रोना ( रोनेवाला अर्थात् जिसका स्वभाव
रोना है ), खा+ना= खन्ना (सानेवाले), चट+टाचा
चट्टा (चाटनेवाला ) |
याक, आलू, कडू, आड़ी, ओड़ और का ।
आक, आलु, कड़े आड़ो और ओड़ मी कर्तृघावक
पुलिङ्ग प्रत्यय हैं, पर साथ ही कर्ताका स्वभाव भी बताते हैं।
और धातुमें ही जुड़ते हैं; जैसे, तेरथावतैराक, गड़+
आलू उगड़ालू मूल+कड़ = भुलक्कड़, खेल, आड़ी-पिलाड़ी, हंस+
ओढ़-हंसोड, उचक+का उचकका= उचक्का |
आका, आऊ और ऊ ।
धातु "आ""आ" और "ऊ" प्रत्यय लगाकर भी कत्त
चाचक संज्ञा बनाते है; जैसे, लड़+आका=लड़ाका, उडा
= उड़ाका, टिक+आऊ-टिकाऊ । पर प्रेरणार्थक कर्त्त वाचक
संज्ञा बनाने में "ॐ" प्राय ही लगता है; जैसे, लड़ा+ ऊ = लड़ाक
'जुम्मा+ऊ=जुझाऊ, उड़ा+बड़ाऊ. खा+ऊषा । इसी प्रकार
लेऊ, देऊ, यदि कर्त्त वाचक संज्ञाएं बनी है। साधारण<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>f
कुड़न्त |
1 को संज्ञा भी प्रत्यय जुड़ने से बनती है, जैसे
'ऊ-मारू ।
Pierce और aणवाचक ।
मी और ऑटो !
धातुमें "तो" प्रत्यय जुड़ने से
८ह
पाचक और करणवाचक
संज्ञा' बनती है, जैसे, मुत्र+नो-सुघी, गोदस्नीोनो
हे घने और शोनेकी वस्तु। धौंकनी
धौंकनी, कतरी कतरनी, कूकनी फूकनी, कटी
कसोटी शब्दों है वे धोर्ज जिनसे धोने, करने,
'फूफ और कसका काम लिया जाता है।
हूं, न और आनी ।
S
धातु है, न और यानी प्रत्यय लगाकर भी करणवाचक
संवायी जाती है, जैसे, देव+रेती, वन-वेलन,
चला+नबलाम, भय+आनी मधानी ।
भाववाचक !
आई, आच आया, ई. न, इट वह और आस अदि ।
धातु "बाई", "भाव", "भावा", "ई", "न", "स", "ती"
"ब", "न", "गास" और "आ" प्रत्यय लगले मानवावक
संधा बनती है : जैसे, चड़ाई चढ़ाई (हलू जमीने), लड़+
भाई लड़ाई, वन+भाव = चनाय, भूर+गाना शुरुवा, हँस-
ई-हंसी, चल+नचलन, रद्द + नरहन परस्तपत
पढ़+ ी = यढ़ती घबरा+इ=घराहट, सजा+च= सजावट,<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०
हिन्दी कौमुदी ।
थका + बट=धकावट, पी+भास=प्यास, मिल+आप-मिलाप । से
धातुमें "खास" और "भाई" के बदले "लास" और "लाई"
प्रत्यय लगाते हैं; जैसे, रो+लास-रुहास, रो+लाईरुलाई ।
"आई" प्रत्यय दाम अर्थ में भी भाता है, जैसे, रंग+आई==
रंगाई, उतार + आई उतराई, छाप+भाई छपाई |
जब “भाई” प्रत्यय “देख” "सुन" "पकड़" जैसी वातुभों में
लगता है, तब वह कभी संज्ञा और कभी अव्यय होता है । दाम
अर्थ होतेसे वह संज्ञा और इन्द्रियगोचरत्व होनेसे अव्यय होता
है, जैसे, शीशा दिखाई, बात सुनाई आदिमें शीशा दिखाने और
या सुनानेका अर्थ है, पर दिखाई देना सुनाई देना आदि
इन्द्रियगोचरत्व है ।
लूट, मार, पीट, दौड़, धूप देख, भाल, पुकार, गुहार,
चोल, चाल जैसी धातुप' अपने इसी रूपमें ही भाववाचक
संशाकी भांति व्यवहार की जाती हैं।
आन
I
"आ" भाववाचक पुलिङ्ग प्रत्यय है, पर कभी कभी कर
अर्थ भी देता है जैसे, उठ+भान उठान, लग+शन लगान ।
कर अर्थ यह कर्मवाचक है ।
J
1<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>उपसर्ग |
मौके पहले उपसर्ग जुड़ने से उनका अर्थ चल जाता है ।
हिन्दी में अधिकतर संस्कृत के दो उपसर्ग प्रयुक्त होते हैं. पर कुछ
हिन्दीके और दो एक फारसी के भी काम में लाये जाते हैं।
और यत निषेधार्थक उपसर्ग है, जैसे, अमोल अमोल,
अस्तोलमोल, स+जान जान थ+पढ़-अप, अनपढ़-
अनपढ़, अन+रीतियनरीति, अन+कि=अनमिल, अन+दोनो=
अनहोनी ।
अप उपसर्ग जिस में लगता है, उसका अर्थ उलट जाता
है; जैसे, ए+पमान अपसगुन सगुन अप
कीर्ति अपकीर्ति, अपयश अपयश ( अपजस ) |
ति और निर् उपसर्ग के अर्थको देते हैं और
उपयोग तनेवाले केवल विशेषण होते हैं : जैसे
निनिडर, निर्+मय=निर्भय, निग्+अपराध-निरपराध
निर्रोपनि
।
सु और उसका हिन्दी रूप से अच्छाई तथा कु और उसका
हिन्दी रूप क बुराई बताता है जैसे, सु+पुत्र-पुत्र, स+पूत=
सपूत, कुरुपुत्र-कुपुत्र, क+पूत कपूत. कुन ढङ्गान्युङ्गा, कु+रें
fa प्रत्येकता और विपरीतता बताता है। जैसे, प्रतिदिन<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/९५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हर
हिन्दी कौमुदी ।
प्रतिदिन, प्रति+वादी=प्रतिवादी, प्रति+वर्ष= प्रतिवर्य, प्रतिशब्द
प्रतिशब्द ।
ये और ला तथा बिला फारसी उपमर्ग विना अर्धमें जाते हैं.
जैसे, चे+श=वेशक, ये + कार बेकार, केशुमार देशुमार, ला+
चार लाचार, ला+ परवाह = लापरवाह, बिला+शकविलाशक ।
वि हिन्दी उपसर्ग बिना अर्थमें आता है; जैसे, घि+चारा=
विचारा व संस्कृतका उपसर्ग विरुद्ध वा भिन्न अर्थ में आता
है; जैसे विपक्षी विपक्षी, वि+धर्मी-विधर्मी ।
श्रव्यय ।
अव्यय * शब्दों में संज्ञा शब्दोंकी तरह लिङ्ग और बचतका
घोड़ा नहीं है । प्रायः सभी अव्यय पुल्लिङ्ग एकवचन समझे
जाते हैं, पर कुछका प्रयोग स्त्रीलिङ्गको तरह भी होता है ।
पुल्लिङ्ग अध्ययका स्त्रीलिङ्ग वा स्त्रीलिङ्ग अव्ययका पुल्लिङ्ग नहीं
होता । स्त्रीलिङ्ग अव्यय बहुत ही कम हैं।
अव्यय पांच भेद है, (१) क्रियाविशेषण, (२) सम्बन्
सूचक (३) उभयान्वयी (४) विस्मयादिबोधक ( ५ ) और.
अधिकरण वोधक ।
नहीं
* सस्कृतमें तो श्रव्ययमें लिंगवचन नहीं होता और न उसमें किसी
प्रकार विकार ही होता है। पर हिन्दी सर्वथा सस्कृतका अनुकरमा
करती और इसलिये इसके कुछ अव्यय खोलिंग भी होते हैं ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>क्रियाविशेषण |
क्रियाविशेषण रूपसे जो अव्यय आते है, वे क्रियाविशेषण
कहाते है, जैसे, धीरे, सवेरे, अचानक आदि ।
mat matadan और विशेषण भt faयाविशेषण होते
है; जैसे, काम कैसा करता है, अच्छा गाता है।
antaran क्रिया विशेषण - आज कल परसों, नरसों
तरसों, नरसों, तड़के, सवेरें, सुबह, शाम, प्रातःकाल संवत्
मिती, तारीख, सर्वदा, तत्क्षण, तत्काल, हमेशा ।
• प्रकारयाचक---अचानक, अचानक, सहसा, जानो, मानो,
जल्द, जल्दी, अकस्मात् द, कपट, ठीक, टीकठाक थोड़े,
निपट, धीरे, शीघ्र, पैदल, सच, सचमुत्र, सत्य, अति, अत्यन्त
विकुल, फूड फूडमूह, एकाएक निरन्तर, देवल, लगातार,
परस्पर, यथा, तथा, वृथा, सहज. निरर्थक, अधिक, व्यर्थ, मर्यात,
यानी, इति इत्यादि सेंत, संतमैत, यम, बहुत, निश्चय,
निस्सन्देह, बेशक, के. सर्वया, स्वयं, खुद आप, कदाचित्
'शायद, कापि, वसा, यों, ज्यों, त्यों. क्यों ।
अव्यय ।
निषेधार्थकन, नहीं, मत ।
स्वीकृतिवोधक क्षं, सदी<noinclude></noinclude>
ndnd125d5zspkxhm43j6t089n5yunmh
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>૩
निध्यार्थक हो ।
-
हिन्दी कौमुदी ।
भावश्यकतार्थक चाहिये ।
कच, जब, तब, अब, कहां, जहां तहां, यहां, क्रियाविशेषणोंके
बाद निश्चयार्थक, "ही" आनेसे दोनो के मिलनेपर कभी, जमो,
तभी, अभी, कही, जहीं, तहीं, यहीं, रूप बनते हैं।
1
हां और नहींके साथ "जी" का भी प्रयोग होता है । जैसे,
जी हा, जी नही ।
कभी कमी दो क्रियाविशेषण एक साथ अथवा क्रिया-
विशेषण साथ संयोजक अव्यय भी आते है, जैसे, धीरे धीरे
जोजार, जल्दी जल्दी, नहीं तो, क्यों नहीं, और कहीं ।
शब्दों के साथ 'पूर्वक" और "कर" या "करके" जोड़नेस
किया विशेषण बनते हैं; जैसे, कृपापूर्वक, विशेषकर, बहुत
करके । क्रियाविशेषणो के सिया संज्ञा शब्दोंके साथ "से" जुडने
पर भी क्रियाविशेषण होता है; जैसे, ओरसे बोलो, बालससे
काम न करो । संस्कृत शब्दोंकी तृतीयाके एकवचन के रूप और
विशेष तथा साधारण जैसे शब्दों के पीछे तः जोडने से विशेषतः
साधारणतः क्रियाविशेषण बनते हैं।
दोपहर, सन्ध्या, सांझ, शाम क्रियाविशेषणोंके साथ कभी
कभी "से" और "को " विभक्ति भी रहती है; जैसे, दो महरको
लाना, सलया से बैठे हैं, शामको आना ।
तीन तीन शब्दों के भी क्रियाविशेषण होते हैं, जैसे, कभी
कभी, कही न कहीं हो न हो ;<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सम्बन्ध सूचक अव्यय ।
जो अव्यय किसी शब्द से सम्बन्ध रखते हैं, वे सम्बन्ध
सूचक अन्तय कहते हैं । इनके पहले वे शब्द आते हैं जिनसे
नका सम्बन्ध होता है ।
arrayan sarय प्रथार्थमें संज्ञा शब्दोंके सामान्य रूप
है और इनकी विभक्तिप्त रहती है । इसी लिये सम्बन्ध
सूचक "का" और "T" प्रत्यय "के" और "३" में चल जा
हैं, जैसे, घर के सामने, मेरे लिये ।
सम्बन्ध सूचक अध्यय ये हैं :
'आगे पीछे ( पश्चात ), ऊपर, नीचे, तले, सारे, सामने,
पास, कोच, नजदीक, समीप, निकट, अन्दर, भीतर, बाहर,
साथ, संग, समान बरावर, विरुद्ध, विपरीत, राई, ताई, लिये,
वास्तु निमित्त हेतु, कारण, समय चह, वाइस, श्रीच, पार,
परे, विना, आसपास, द्वारा, अनन्तर अनुसार, उपरान्त, वाद,
विषय, गैर, सिवा (सिवाय), गलाचा, अतिरिक्त, बडूले, पल्ले
योग्य, लायक
इन अन्यों पहले "के" और "" प्रत्यययुक्त पद जाते है
विभक्ति लुप्त रहती है। लागे, पीछे,
और इनके बाद
ऊपर और नीचे
के पहले "से" विभक्तयुक्त पद भी आते<noinclude></noinclude>
0dhn8x4df30l7atyf8ee4c32gzjc4hk
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>Εξ
हिन्दी कौमुदी ।
हैं, जैसे, मुझसे आगे, रामसे पीछे, कृष्णसे ऊपर, मोहनसे,
नीचे ।
ओर, नाई. तरफ, तरह, मार्फत, खातिर और बाबत
अव्ययोंके पहले "के" वा "३" प्रत्यययुक्त पदोंके बदले "की"
"" प्रत्यययुक्त पद आते हैं, जैसे, मेरी ओर, रामकी नाई
उसकी तरफ, राजाकी तरह, बाबूकी मार्फत, सोहनकी चावत,
तुम्हारी खातिर ।
पर्यन्त तक, पर, पै, सहित और समेतके पहले "के" प्रत्यय
लुप्त रहता है, पर सहा वा सर्वनाम सामान्य रूपमें रहते हैं।
जैसे, ग्रांमपर्धन्त, मुतक, आलेपर, नाव, प्रमसहित, चरा-
तिथसमेत ।
3
$
1<noinclude></noinclude>
4bwgdrvdrh98ibdtqinqfdk7vdrc076
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>उभयान्वयी अव्यय ।
जिस अव्ययका सम्बन्ध दो शब्दों वा वाक्योंके arari
होता है, यह daraut अव्यय कहावा है ।
उभयान्वयी अव्यय छ प्रकार के होते हैं, संयोजक, वियोजक,
कारणवाचक, संकेतार्थक, पक्षान्तरबोधक और कर्मप्रदर्शक ।
जो अव्यय दो शब्दों वा वाक्योंको जोड़ते हैं, वे संयोजक
कहते हैं, जैसे, और, सी, फिर, पुनः ।
जो are e शब्दों वा वाक्योंको अलग करते हैं, वे
वियोजक कहाते हैं; जैसे, अथवा, किंवा, वा, या, या तो, नहीं
तो, कि, चाहे, वरना
एक पक्षकी बात समाप्त करनेके बाद दूसरे पक्षकी कहने के
पहले जो मय आता है, वह पक्षान्तरबोधक कहता है; जैसे,
पर. (मैं), परन्तु, किन्तु, चरं (धरण), लेकिन, मगर, यति ।
कारण दिखाने के पहले जो अव्यय याता है, वह कारण-
वाचक फहातर है! जैसे, क्योंकि, कारण ।
जो अव्यय पूर्वको क्रियाका कर्म दिलानेके लिये माता है,
वह कर्मप्रदर्शक कहता है जैसे कि ।
I
'
जो अव्यय जोड़ के साथ आते हैं, ये संकेतार्थ कहते है
जैसे, जो-तो, यद्यपि - तथापि, जोभी- सोभी, लगता
फिर भी, यदि, अगर
--
निमित्तार्थक शव्यय निमित्त बताते है; जैसे, नतः अतएव ।<noinclude></noinclude>
fdxz8kbo98ch3gcww37vp1d0r880adh
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>'ताद्वत प्रत्यय |
जो प्रत्यय संघा, विशेषण वा सर्वनाम में जुड़ते हैं, वे तद्धित
प्रत्यय कहाते हैं। नद्रित प्रत्ययों के योगसे कर्तृवाचक, गुण-
चाचक, भाववाचक तथा मानवाचक संज्ञा, विशेषण और किया
विशेषण बनते हैं।
कर्तृवाचक |
"वाल" प्रत्यय यान वा मनुष्य के नाम जुड़ने से निवासी
या पंडा वा सन्तान अर्थका द्योतक होता है, जैसे, (पंडा में)
प्रयाग+चाल= प्रयागवाल, गया+चालयावाल ( निवासी
अर्थ ) पाली+बाल पालीवाल (सन्तान अर्थ में ) अग्र+चाल=
अग्रवाल ।
"वाला", "हार", "हार" प्रत्यय निवासी, व्यापारी वा
वाहक अर्थ यताते हैं जैसे, ( निवासी अर्थ )
तू+चाला=
'झनूवाला, नीमच वाला= नीमचवाला ( व्यापारी अर्थ )
टोपी+बाला-टोपीवाला, लकड़ी+द्वारा लकड़िहारा पानी+हारा
=पनिहारा, मनि+हार= मनिहार ।
"चान" प्रत्यय हांकते वा चलानेवाला अर्थमें आता है; जैसे,
गाड़ी+वान = गाड़ीवान, फील+वान - फीलवान (महावत ) |
"री" और "नारी" व्यसनी और व्यापारी अर्थमें आते हैं।
जैसे, जुआ+री=जुआरी, पूजा+रो=पुजारी, मोष+थारी=
भिखारी ।<noinclude></noinclude>
8utojxxicwdi4jxres7fryrv6bdx7na
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१००
हिन्दी कौमुदी ।.
"या" प्रत्यय व्यापारी तथा कर्त्ता अर्थ जनानेके लिये जोड़ा
जाता है; जैसे, मासन+श्या=मखनिया, नोन+इया = नोनिया,
आदत+या+अढ़तिया )
"
“ई” प्रत्यय सम्बन्धी, व्यापारी, अनुयायी, निवासी तथा
भावका द्योतक है, जैसे, बङ्गाल में=बङ्गाली, तेल+ई= तेली,
वैदक + ईदकी, रामनन्द + ई = रामनन्दी छठ ईदी ।
" इत" "ऐ" व्यापारद्योतक प्रत्यय है; जैसे, डाका+ऐत=
तलाठी+ऐन, गोढ़+पेत=गोईत वा गुड़त |
"जा"
" पुत्र अथक प्रत्यय है; जैसे, वहन + जा = चद्देनजा
= भैनजाभाञ्जा | भाई शब्दमें "जा" प्रत्यय लगने के समय "ई"
"ती" हा जाती है; जैसे, भाई+जा=भातीजा-भतीजा ।
"च" सम्बन्धवाचक फारसी प्रत्यय है, पर वही व्यसन
कहाँ व्यापार और कही उत्तरदायित्व भी तता है, जैसे,
अफीम + = अफीमची, मशाल +ची=मशालची, बजाना+ची=
राजाची | हिन्दी शब्दों के योग में वह सम्बन्ध ही बताता है, पर
स्थानका भी पता देता है; जसे, घड़+ची घड़ोंची ( घड़ोकी
जगह | दुम+च= दुमचो ( दुमका वन्धन )
“गौटी” प्रत्यय पात्र अर्थ में आता है, जैसे, चूना+औटी-
चुनौटी।
“आलु” “उमा” “ऊ" और "भाऊ" प्रत्यय भी "वाला"
अर्थमें आते हैं जैसे, घडी+बाल = घड़ियाल, माछ+
मछुवा, घर+आऊ घराऊ, गर्ज+ऊ ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तद्धित प्रत्यय ।
१०१
"दार" फारसी प्रत्यय सम्बन्प्रद्योतक है और इसके योगसे
संज्ञा और विशेषण बनते हैं, जैसे,, किराया+दार किरायेदार,
ज़मीन + दार= जमीनदार, जोर+दार= जोरदार,
हवादार |
1.
हवा-+-शर=
"पढ़ी" सनी और "डी" प्रत्यथ छुटाई बतानेके लिये
जोड़ा जाता है
ग+पड़ी-मंगेड़ी गांजा+पड़ी जेदी,
पन+ड़ी - पलडड़ी |
विशेषण ।
.
"का", "श", "कू", "न", "भाया" सम्बन्धaar acre
'हैं और शब्दका सामान्य रूप होनेपर लगाये जाते हैं; जैसे,
लड़का + का लड़केका, सामा+ममेरा, आप+ता=अपना, पर+
आया-पराया । "a" और "आ" व्यवसायी अर्धके भी धोत
हैं; जैसे, कांसा+श= कांसेरा, सोना+भार= सुनार, चाम+मार
चमार ।
"सा" समान और परिमाण में बाता है जैसे, लड़का +
: साड़ा, बहुत+सा=बहुतसा ।
;
.
ज्ञा शब्दों में "रेला" प्रत्यय जुड़नेसे विशेषण घनता है।
• जसे रह+ईलाहीला. गांट+लाठीला, मड़हला =
भड़कील |
"तना" प्रत्यय संख्या और परिमाण अर्थ में आना है, जैसे,
कि+तना-कितना, जिवना जितना ।
"ते" संख्यावाचक प्रत्यय है; जैसे, का+मेके, ज+पेज ।
.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०६
हिन्दी कौमुदी |
"ना" और "गुना" गुणा अर्थ में आते हैं, जैसे दो+ना=दना,
दो+गुना = दुगना, तीन+गुना-तिगुना ।
"हरा" तह अर्थ में आता है; जैसे, दो+हरा दुहरा, तीन+
हरातिहरा ।
"सरा", "था", "व" और "या" कमवाचक प्रत्यय है; जैसे,
दो+सरासरा तीन+सरा = तीसरा, चौ+धा- चौथा, छा
छा, पांचवां-पांचवां ।
गुणवाचक और भाववाचक |
"आई”, “आया", "आस", "भौती", "ताई", "पन", "पना "
भाववाचक प्रत्यय है और संज्ञा वा विशेषणमें जुड़ने से भावनात
ज्ञानाने में जैसे
आई लड़ाई,
बुढा+भापाड़ा रोड़ शापा = रोडाश, मोटा+आस = मिठास,
बान+ती पीती सुन्दरताई सुन्दरताई, लड़का +=
"लड़कपन, सुखा+पना=पना |
"गौना" भी गुणवाचकं प्रत्यय है, जैसे, खेल + श्रना=
पिलौना, दीष्ट+भना दिठौना |
=
"आई" गुणवाचक प्रत्यय भी है, जैसे, मोठा+आई मिठाई
संस्कृतके "ता" और "त्व" भाववाचक प्रत्यय भी हिन्दी
आते है; जैसे, कायर+ता=कायरता, मनुष्य+त्व-मनुष्यध्व ।
"ft" फारसी प्रत्यय भाववाचक है; जैसे, मर्दानगीः
मर्दानगी, जिन्दगी जिन्दगी |<noinclude></noinclude>
712vshvl66dnat7mxn09peqqty3pnhd
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तद्धित प्रत्यय ।
२०३
"न" फारसी प्रत्यय लघुता अर्थ में आता है, जैसे, सन्दूक +
चान्सन्दुकचा, नाग+चा=बागवाव्यगोचा ।
."न" सम्बन्धयोतक भाववाचक प्रत्यय है; जैसे, चांद+नी=
चांदनी ।
"दक्ष" गुणवाचक प्रत्यय विशेषणमें लगता है; जैसे,
काला+इस = कालिख 1
"म" भाववाचक प्रere विशेषणमें लगता है; जैसे,
काला +-मस=कलोंस |
.
"आ" "वा" और "या" प्यार, होनता वा लघुता तथा
"म" और "या" भाव दिखानेके लिये भी जोड़े जाते है ;
जैसे,
याचूस्था=घनुआ.
( प्यार में) याचू + आ = बुआ,
वच्चा+वाचवा=
बच्चा, भाई+इपा=भइया भैयां, ( लघुता वा तुच्छता अर्धमें }
नाऊ+था= नोमा, नरायनं+प्रा= नरायना, चमारस्वा=मरवा,
धोयी+इया-घोरिया ।
(भाव अर्थ में) भूख + आ = भूखा, प्यास+भा=प्यासा, सच+मा
= सच्चा, मेल+आ-मैला, गोल+आ-गोला, दुखी+श्या दुखिया ।
"ड्या" प्रत्यय लघुतापूर्ण स्त्रीलिङ्गका भी द्योतक है; जैसे
सोटा+इया= सोंटिया, बाट+इया = खटिया |
फारसी शब्दों में लगनेसे "आना" प्रत्यय धन, अवधि अथवा
भाव बताता है; जैसे, जुर्म + आना = जुर्माना, नजर+माना=
दोस्त+भाना=दोस्ताना |
नजराना, साल+आना = सालाना,
कहीं चत्र विशेषका भी अर्थ निकलता है । जैसे, दस्त-भावा=
दस्ताना (दार्थका मोजा ) |<noinclude></noinclude>
t2ks5onwejhnp0wkapimggx6m1ktb53
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-
૨૦૪
हिन्दी कौमुदी ।
"डा" भाव, प्यार वा लघुता दिखानेको संज्ञा ओर विशेषण
में जोड़ा जाता है; जैसे, मुख+ड़ा मुखड़ा, दुख+ड्रा-
दुखड़ा, जोगी+ड़ा=जोगिड़ा-जोगड़ा ।
"वाड़" सादृश्यसूचक गुणवाचक प्रत्यय है : जैसे खेल
बाट- खिलवाड़ |
"क" और "त"भाववाचक तथा गुणवाचक प्रत्यय हैं: जैसे,
ठंडा+कडक, चौ+क चौक संग+त-संगत, रंग + तरंगत,
दिक+विकन |
स्थानवाचक |
"आना", "माल", " साल", "दाल", "हर" और "का' प्रत्यय
स्थानबोधक हैं; जैसे, ठीक+आना-ठिकाना, मुह+बाना"
मुहाना, सिर+आना = सिराना, ससुर+आल= ससुराल, नाना+
साल=ननसाल, दादी+हाल = ददिहाल (दादीका मैका), पी+हर
=पीहर, भाव+का=मायका=मैका ।
क्रियाविशेषण |
"हां" और " प्रत्ययों के लगनेसे स्थानवाचक क्रिया
विशेषण वनते हैं. जैसे, कहां-कहां ज+जहां, यह+
=यां, वह+आहां ।
"ओ" प्रत्यय प्रकारार्थ में प्रयुक्त होता है; जैसे, जि+च=
1
| ज्यों, कि+=
"व" समयवाचक प्रत्यय है, जैसे, ज+वजय, क+त्रक
$
"
'<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>समास ।
दो या अधिक शब्द मिलकर जब एक हो जाते हैं। तय
समस्त शब्द कहते है । 'इस मेलका नाम समास है ।
.
समास छ प्रकारका है : इन्छ, तत्पुरुष, कर्मधारय बहु
afe, far और भाव |
जब दो वा अधिक शब्द मिला दिये जाते है तथा उनमें
विशेष्य विशेषणका सन्यन्ध नहीं होता, तब द्वन्द्व समास
होता है, जैसे, मातापिता, चापटा, राईतोव, दालरोटी,
1 सेटसाहकार |
साधारणतः अन्तिम शब्द लिङ्गानुसार हो समस्त शब्दका
लिङ्ग होता है । परन्तु जिस लिक शब्दको प्रधानता होती
है, उसीके अनुसार कभी कभी समस्त शब्दका लिङ्ग भी माना
आता है । पितामाता, नरनारी, राजारानी जैसे शब्दों में प्रत्येक
समस्त शब्दका अन्तिम अंश स्त्रीलिङ्ग है, पर पितामाता, नरः
'नारी और राजारानी स्त्रीलिङ्ग नहीं माने जाते। इसी प्रकार
'दो ar are afart शोंके समस्त शदका दिन भी
लिङ्ग
यदि उसमें सय स्त्रीलिङ्ग शब्द न हुए तो पुलिङ्ग हो होता है।
'सब अवस्थाओं में समस्त शब्द यहुवचन होता है । जैसे, कुत्ते-
विल्ली पाये डालते है', 'विल्लीचूहे उप मचा रहे हैं।
जय समस्त शब्द के पहले भागमें दूसरी, चौथी और पांव<noinclude></noinclude>
ddk2md2m6ubyr65v9hd81kxz9f5pydh
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०६
विभक्तियां तथा सम्बन्ध जतानेवाले प्रत्यय रहते हैं ओर पिउ
भागको प्रधानता होनी है, तब तत्पुरुष समास होता है ।
अर्थानुसार पांच प्रकारका तत्पुरुप समास है।
पहला, जिसमें पूर्व भाग में दूसरी विभक्ति हो और अन्तिम
भागमें कुदन्त संज्ञा हो; जैसे, अंखफोड़ा अर्थात् आंतो
फोड़नेवाला, चिडीमार अर्थात् चिड़ियाको मारनेवाला, तिल
चहा या तेलको चाटनेवाला ।
दूसरा, जिसमे पूर्व भाग में निमित्त अर्थ में दूसरी विभक्ति हो
और अन्तिम भागमें कुदन्त संज्ञा : जैसे शरणको आधा शरणा-
गत, ठकुरसुहाती, हथकड़ी ।
तीसरा, जिसमें पहले भाग में चौथी विभकि और दूसरे में
कृदन्त संज्ञा हो जैसे, देशनिकाला, दईमारा, मुहमांगा,
मनमाना, गुड़भरा, मनमाना, आंबदेखा !
चौथा जिसमें पहले भागमें सम्बन्ध जलानेवाले का, की,
के ना, नी, नेरा, री, प्रत्यय हों और दूसरेमें संज्ञा : जैसे,
धर्मावतार, लखपती, हवाचकी, घुडसाल, वनमानुम, अमचूर ।
पांचai, faeमें पहले भाग में पांaat विभक्ति हो और
दूसरे में संज्ञा वा कृदन्त हो; जैसे, श्रमन्दमगन, कैलासवासी ।
पनडुब्बा, बुडचढ़ो, बटमार ।
i
[ पं० कामताप्रसाद गुप्त ॠत हिन्दी व्याकरणमें।" दोनानाथ”
शब्द "व्याकरणको दृष्टिसे विचारणीय बताया गया है, क्योंकि
यह "दीननाथ होना चाहिये” ।
परन्तु दीननाथ और<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>समास )
100
दीनानाथ में जो अन्तर है. उम्रपर मुजोते ध्यान नहीं
दिया । "दीन" पुल्लिङ्ग और "दीना" खोटिङ्ग है। दीना शब्द
द्रौपदी में प्रयुक हुआ है । ]
कर्मधारय समासमें विशेष विशेषणका योग होता है
अथवा उपमा उपमेय मिलते हैं; जैसे, (विशेष्य विशेषण )
नील गाय, फाली मिर्च, भला मानस, कालापानी (उपमा उपमेय )
लालपोला, भलाबुरा, मोटाताना, यड़ाछोटा ।
fan समास में पहले भाग संख्या होती है और दूसरा
• विशेष्य होता है। जैसे, चौकोन, पंचदेव, तिकोना, दमकन्धर,
दशानन ।
बहुव्रीहि समासमें समस्त शब्दोंके अन्तगंत शब्दों का अर्थ न
- होकर निराला ही अर्थ होता है जैसे, चो, वायु हैं
जिनके अर्थात् प्रा। इसी प्रकार दिगम्बर दिशाएं है वत्र
जिनके (महादेव) : पीताम्बर, गीला है या जिनका (विष्णु);
लालपगड़ी, लाल हैं पड़ी जिसको ( पुलिसका कान्सटेबल ;
कनफटा, चारहसिंगा, बहुरूपिया ।
हिन्दी बहि समासमें समस्त rer aर्थ मिले हुए
अक्षरोंखें भिन्न होना आवश्यक नहीं होता: जैसे, नका,
पिनी, चम्पकवरनी, चन्द्रमुखी।
अव्ययीभाव समासमें पहला पद अय होता है और
साथ परवर्ती शब्दक्षा समास होता है, जैसे, प्रतिदिन, हर
चड़ी, (घड़ी घड़ी), अतिकाल, निर्भय सदावत १ ग्रह समास<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१११
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११०
हिन्दी कौमुदी |
पुत्र लवने" "मरा सांप” “परीक्षितने" "पांच पांडवोंने" "डा"
"नगरवासी क्या स्त्री क्या पुरुष" "चोर" उद्देश्य और "इतिहास
प्रसिद्ध है", "लयपुर वा लाहोर बसाया था", "ऋषिके गले में
डाल गया है", "कुछ न कहा", "द्रौपदीको पत्नी माना" "नाई
को मरा जान नौ दो ग्यारह हुए", "परस्पर कहने लगे" और
"धीरे धीरे घरमें से" विधेय हैं
i
कभी कभी चायके उद्देश्य और विधेय अनुक भी रहते हैं :
जैसे, भाग यहांसे, धर्मावतार, जीता रहूंगा तो कमा खाऊंगा,
दोनो वने प्रणाम किया, एकने वन्धु मान दूसरेने गुरु जान ।
इन वाक्योंमें "तू" और "मैं" उद्देश्य तथा ' प्रणाम किया"
विधेष अनुक है ।
विशेषण उद्देश्य और विधय दोनों रूपोंमें प्रयुक्त होना है।
यह कर्त्ता पहले आता है, तब उद्दे श्य और उसके बाद बा
क्रियापदके पहले आता है, तब विधेय होता है : जैसे, मधुरी
वानी चोलो, मीठे फल खाया कर, पानी ठंडा है, आदमी
सीधा है। पहले और दूसरे वाक्यके विशेषण उद्देश्य और
तीसरे और चौथे विधेय है ।
1
•
जय विशेष्य वा सर्वनाम safer and aोता है और
विशेषण ही विशेष्य कतकी भाति प्रयुक्त होता है, तब वह विशे
पण ही उद्देश्य होता है और जब विशेषण क्रिया विशेषणकी
भाति प्रयुक्त होकर विधेयके पहले आता है तो उसका अद्ध होता
है; जैसे : गुणी सर्वत्र आदर पाते हैं, वह अच्छा व्याख्यान देता है।
'<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>घाघयरचनाविचार
११६
योग्यता, आकांक्षा और आसक्तियुक्त वाक्य ही ठीक ठीक
अर्थ प्रकट कर सकता है ।
पद परस्पर उन्त्रित संम्पन्त्रको योग्यता, उनके यन्त्रय
बाकी इच्छाको आकांक्षा और उनकी समीपताको मात्ति
कहते हैं । "हाथी चिघाडता है” वाक्य में हाथी और उसके
चिघाड़ते में उचित सम्बन्ध है । यदि हाथी कहकर चुप रह जाये,
तो उसे क्रियाकी आकांक्षा वा इच्छा बनी रहती है। हाथी
क्या करता है यह प्रश्न होता है और जबतक नहीं कहा जाता
fair "faiड़ता है तक वाक्यका अर्थ नहीं होता. रूयोंकि
4
"" कहने से कोई अर्थ नहीं निकलता । “दाथ" के
वाद हो "चिघाड़ता है" कहा जाय, तो घाक्यका अर्थ होगा ।
पर यदि "हाथी" कहकर आध घंटे बाद "चिग्धाड़ता है" कहा
तो वाक्य न चनेगा और अर्थ न होगा ।
जाय,
arters वोधके लिये विभक्तिप्रत्ययों और कई अन्य
शदों तथा प्रयोग अर्थज्ञानका भी प्रयोजन है ।<noinclude></noinclude>
n76w7x4kqq8mcfs984jbsx1cop49396
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विभक्तिप्रत्ययों के अर्थ । .
पहली विभक्ति 1
(१) कर्त्ता पहली विभक्त होती है, पर पहली विभकिचाले
क्रिया oिad और पुरुषमें उसके अनुकूल होती है :
जैले, वह आता है, मैं साता है, लड़कियां खेलती हैं, तुम
आओगे
|
(२) जो संज्ञा किया और कर्मसे रहित होती है और विशेष
अथ नहीं देती, वह पहली विभक्तिमें रहती है; जैसे, पोथी,
काशी, गङ्गा, लड़का 1
(३) कर्मवाच्य के कर्म में पहली विभक्ति होती है, जैसे
मोहनने दूध पिया, रामने रोटियां खायी, मैंने लड़के पढ़ाये ।
वाक्य के पशुपक्षिवाचक या अप्राणिवाचक कर्ममैं
(४)
अपनी देह सम्हालो, मेरा कहा नानो ।
(५) द्विकर्मक वाक्यके दूसरे कर्म अथवा सम्प्रदान कारक
चाले वाक्यके कर्ममे पहली विभक्ति होती हैं; जैसे, मैंने उसे
आदमी समझा था, पर वह गधा निकला, फकीरको पैसे दो ।
दूसरी / विभक्ति ।
(१) कर्म ओर सम्प्रदान कारकों में दूसरी विभक्ति होती है ;-
उसे रामने रावणको मारा, राजाने ब्राह्मणको दान दिया ।<noinclude></noinclude>
2iehzdtrqye6rh87a62lgf1djb6a2e1
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चिप्रत्यय अर्थ ।
११३
(२) मनुष्यवाचक कर्ममें दूसरी विभक्ति होती है, पर कभी
कभी जोर देनेके लिये और प्रकार कर्म भी दूसरी विभक्ति
होनी है; जैसे, मास्टर shirt नहीं मारता, उस दोपीको
ले आओ !
(2) जिसे धिकार दिया जाय या जिसके प्रति कुछ कहा
जाय, उसके लिये दूसरी विक्तिका प्रयोग होता है, जैसे,
afaint धिवार, मतने कैकेयीको अप्रिय वचन कहे।
(५) समय वा क्रिया के साथ सम्बन्ध बतानेके लिये दूसरी
विकि होती है, जैसे, दिनकी सोना मना है।
(4) उन व्यक्तियों के वाचक शब्दोंमें दूसरी विभक्ति होती हैं,
जिनकी किसी वस्तुके लिये होती हैं या जिनकी प्रता
लिये कोई काम किया जाता है; जैसे, ब्राहाणोंको मिठाई रुचती
हे लड़कोंको तमाशा दिखा दो ।
(६) जिस किसीको किसी प्रयोजनसे कोई वस्तु दी जाती
है, पर दे नहीं डाली जाती, उसके लिये भी दूसरी विका
प्रयोग किया जाता है। जैसे, धोधोको कपड़े दिये है, सुनारको
सोना दे दो ।
(७). "चाहिये" युक्त वाक्य तथा आवश्यकता वा कर्त्तध्य
घतानेवाले चाय कतमें दूसरी विभक्ति होती है; जैसे, तुम्हे
घर जाना चाहिये 3 रोटी पानी है।
नमस्कार,
आशीर्वाद बन्दगी, सलाम, बादाव
जैसे शब्दफे योग में दूसरी विभकि होती है। जैसे, परावर-<noinclude></noinclude>
8gyx578h8j3yl0b6tsx7d9ykf1m3ujm
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११४
हिन्दी कौमुदी।
वालेको नमस्कार, बडका प्रणाम, छोटोंको आशीर्वाद, मुशीर्जी
को बन्दगी, मास्टर साहबको सलाम, मौलवी साहबको
आाव ।
(६) द्विकर्मक चाक्यकै मनुष्यधाचक कर्ममें दूसरी विभकि
होती है; जैसे. पूतना कृष्णको दूध पिलाने लगी ।
।
( १० कहना किया के योग में विकल्पसे दूसरी और चौथी
विभक्ति होती है, जैसे, वसुदेवको समाचार कहे और वसुदेवसे ।
समाचार कहे। दूसरी विभक्तिसे कुछ कुछ आशाका भाव भी
झलकता है; जैसे, नौकरसे कह दो ।
(११) दाम चताने या पूछने के समय विकल्पसे दाय
दूसरी या पांच विभक्ति होती है; जैसे, यह पोथी कितनेको
लाये या कितने में लाये। दूसरी विभक्ति निश्चित मूल्य बताती
है और पांचवीं सीमा प्रकट होती है।
(१४) जब धातुज नाम निमित्ताय चालगना क्रिया के योगमें
आता है, तब उसमें दूसरी विभक्ति होती है । यद कर्मवाचक
संज्ञा सामान्य रूपमें रहता है और दूसरी विभक्तिका चिन्ह
लुप्त रहता है; जैसे, श्रीशुकदेवजी कथा सुनाने लगे, लड़के,
पढ़ने जाते हैं । सुनाते और पढ़ने क्रियाचाचक अव्यय है ।
(१३) क्रियाविशेषणके योग में भी दूसरी विभक्ति होती है
और उसका चिन्ह लुप्त रहता है; जैसे, कहां जाओगे, किर
जाते हो !
C
(१४) ओर चा प्रति अर्थ चलाने के समय भी दूसरी विभक्ति
.<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विभकि प्रत्यय अर्थ
'होती है, पर यह सामान्य रूपमें रहती है; जैसे, परजाता
वह पटने जायगा ।
२१५
(१५) निमित्त या लिये अर्धमें दूसरी विभकि होती है।
जैसे मुझे आम का दो ।
.
- (१६) "वाला" थर्थमें भी दूसरी विभक्ति होती है और उससे
ard faster भाव निकलता है, जैसे, मैं स्कूल जानेको
या, वह आज आनेको है ।
तीसरी विभक्ति ।
sharea or aaच्यके कर्त्ता में तीसरी विमति होती
है, जैसे, सब लड़कोने रोटी साधी, लड़कियोंनेआम बाये, रामते
'रावणको मारा।
चोधी विभक्ति ।
(१): कारण और अपादान कारकोंमें चौथी विभक्ति होती
है, जसे वाणसे मारा, आंखते देखा, पेड़ जंग, धरनी
निकला ।
(२) क्रियाविशेणके योग में चोथी विभक्ति मी होती है,
पर कहीं कहीं विभक्ति चिन्ह अनुक्त भी रहता है; जैसे, किधरले.
पढ़े, मांगेले लिया. पीछेसे देखा, ऊपरसे
कहां
'उतरे, नौवेसे आये, धरखे हुए।
व
(3) क्या, दीन, कम, न्यून, प्रयोजन, ल्य, रक्षित, मिन
आदियोग या साथ हेतु और कारण वर्धमें और स्थान
· समय की दूरता बताने में चौथा विभक्तिका प्रयोग किया जाना<noinclude></noinclude>
tl9mwwv2vzjw2dbckwz584b19gnclam
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९६
हिन्दी कौमुदी |
:
है । जैसे, झगड़ेसे क्या, नेत्रसे होन, मुझसे कम, काम
प्रयोजन, मनुष्यत्वसे शून्य, विद्यासे रहित, वानरसे भिन्न,
रामसे बातचीत, भय से कांपना, पटनेसे सौ कोस, चाजसे
तीसरे वर्ष ।
"
(४) दो मनुष्यों वा वस्तुओंकी तुलना करते समय जिससे
कोई वस्तु उत्कृष्ट वा निकृष्ट बतायी जाती हैं, उसमें चौथी
विभक्ति होती है : जैसे, धनसे विद्या बढ़कर है, भिखारी
तिन से भी हल्का होता है
(५) जिस चिन्हसे व्यक्ति वा वस्तु पहचानी जाती है,
उसमें चौथी विभक्ति होती है : जैसे, भस्मसे शेव समया, जटा
से साधू माना, सिपाहियोंसे राजमहल जाना ।
(६) जिन अङ्गों में कोई दोष होता है, उनमें चौथी विभक्ति
होती है : जसे, आंखोंसे अन्धा, कानोंसे घहरा, पैर से लाचार !'
कभी कभी चौथी विभक्ति के बदले विकल्पसे तद्धित प्रत्यय
"का" और इसके रूपों का व्यवहार किया जाता है, जैसे, आंखके
अन्धे नाम ननमुख, फानके बहरे ।
पांच विभक्ति |
(1) अधिकरण कारक में पांच विभक्ति होता है. जैसे,
तिलोंमें तेल होता है, फूल में सुगन्ध होती है ।
'
(२) कारण अवस्था वा द्वारा बताने में भी पांचवीं विभक
होती है : जैसे, तनिकसे अपराध में ऐसा दण्ड अनुचित है,<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विप्रत्ययों के अथ !
११०
शिवजी के ध्यानमें मग्न रहा. प्रभुते एक ही वाणमें उसका भव
बन्धन काट दिया |
. (३) तीन या अधिक मनुष्यों वा वस्तुओं में किसी एफफी
एता या होना बतानी होती है, तो जिनसे वह ष्ठ वा होन
तायी जाती है, उनके चाचक शब्दमें पांचवी विभक्ति होती है;
जैसे पुरुष रामचन्द्र उत्तम थे, नीच सबमें निन्दनीय हो
- होता है।
(४) लुप्त
अवस्थामें विशेषकर सम्यके बाद
पांच विमति यहुत होती है जैसे, इस समय तुम चले
ओखा कहे, चार आने सेर चाल मेरे
सामने चुप रहो ।
(५) मध्य, अन्तर्गत, अवधि और अन्तर भय में भी पांचवी
विभक्त होती है, जैसे, हंसोंमें कोया, समुद्र अवाह जल,
कितने वर्षों में राम लौटे, विष्णु और शिव में भेद नहीं ।
(६) मोल यताने में भी पांचवी विभक्ति होती है; जैसे कितने
मैं तुमने गाय ली ।
सम्बोधन 1
rain forest प्रयोग किसीको बुलाने
कारवा
या सोने उसका नाम देने में किया जाता है । सम्बोधन
- पहले विस्मयादिबोधक अव्यय रखना न रखना चक्का या लेखक
: की इच्छा के अधीन है; जैसे, लड़के ! इधर ना हा राम<noinclude></noinclude>
ovnzyijj4rlp6u056rlyn1hvwmjjywb
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२८
हिन्दी कौमुदी ।
सम्बन्धचाचक अव्यय ।
"का" और "" प्रत्यय हिन्दी में संस्कृती पष्ठी विभक्ति
या सम्बन्ध कारकका काम करते हैं और विभी तरह
इनका प्रयोग होता है । (देखो पृष्ट ४५ वां ) आकारान्त पुलिङ्ग
शन्दोके नियमानुसार इनके बहुवचन और सामान्य रूप "के"
और "३" और स्त्रीलिङ्ग "की" और "री" होते हैं। ये विशे-
पणका काम करने के सिवा (१) सम्वत्थ, (२) स्थान, (३)
निर्माण में लगी वस्तु, (४) शुद्धता, (५) कारण, (६) अवस्था, (७)
प्रकार, (८) निकास, (६) योग्यता, (१०) दाम, (११) समय, (१२)
सम्पूर्णता और (१३) निश्चय वा दृढ़ता बताते हैं जैसे. राजाका
घोड़ा, व्रजकी नारियां, कंचनके थाल, दूधका दूध पानीका पानी,
राका थका मांदा, जब कृष्ण आठ वर्षके हुए, अंग्जकी बात,
आगका धुआं, पीका पानी, एक लाखका हीरा, दस दिनकी
बात, सभाकी सभा बोल उठी, सच का सच्चा ।
इन प्रत्ययले युक्त पदोके बाद यदि सविभक्तिक पद आबे
हैं तो विशेषण के नियमानुसार "फ" और "रा" "के" और
"" हो जाते हैं । सम्बन्धवाचक पुल्लिङ्ग भव्ययों के पहले भी
"के" बार "रे" रहते हैं, क्योंकि इन अव्ययोंकी विभक्ति स
समभ्यी जाती हैं; जैसे, मेरे घोड़ेकी लगाम, रामके घरके पीछे !
"के" और " प्रत्युक्त पत्रोंका एक विशेष प्रयोग भी हैं।
इसमें आवश्यक नहीं कि इनके बाद पुलिस बहुवचन या अध्यय
या विभक्ति पद हो। ऐसे प्रयोगसे "अस्तित्व" समझा<noinclude></noinclude>
pd5cw9flezjpxcqcymv4ynwqmkj56rr
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विभक्ति
अर्थ।
११६
जाता है; जैसे, मेरे वहन नहीं है, पशुपक्षीकटपतंग भी जीव
है, उसके एक लड़का है। यहां "मेरे बहन नहीं है" धारयके
बदले "मेरी बहन नहीं है" नहीं कह सकते, क्योंकि दोनो के अर्थ में
अन्तर है। पहले वाक्यका अर्थ है कि चोलनेवालेके माता
fears कन्या नहीं जन्म या इस समय जीवित नहीं है; पर
दूसरे अर्थ है कि बहन दूसरेकी है, बक्ताकी नहीं ।<noinclude></noinclude>
bvmw6n9k65up5u0ldc5xyv8i65jfrb8
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दों के अर्थ ।
आप !
मध्यम पुरुषके प्रति आदर दिखानेको "आप" सर्वनाम
प्रयुक्त होता है, पर इसकी क्रिया बहुधा प्रथम पुरुष बहुवचनमें
रहती है; जैसे, आप जानते हैं कि मैं मिठाई नहीं खाता ।
कभी कभी "आप" सर्वनाम की क्रिया मध्यम पुरुप हु
वचन में भी होती है; जैसे, आप सूर्य कुलके भूषण हो ।'
"आप" शब्द जिसके लिये प्रयुक्त होता है, उसे आज्ञा घा
उपदेश देने के समय इसके साथ "इयो" "इथे" और "इयेगा"
प्रत्यययुक्त क्रियापदका व्यवहार किया जाता है; जैसे, आग
मेरा सन्देसा कहियो, कहिये या कहियेगा ।
अन्यत्र "ए" शब्द के साथ विधिकेसाथ प्रथम पुरुषके बहु-
चचनकी क्रिया प्राती है; जैसे, आप समझे कि यह पागल है ।
"आप" स्वयं घा विना सहायक अर्थ भी आता है जैसे!
में आप चला जाऊंगा, वह आप काम कर लेगा ।
कहीं अपना सम्बन्ध जाने और कहीं अपना वा
दूसरेका प्रत्यक्ष सम्बन्ध परोक्ष रूपसे बतानेके
यतानेके लिये
भी इसका प्रयोग होता है । जैसे किसी मनुष्पसे
किसी लड़केके बारेमें पूछा जाय कि यह किसका लड़का है
और वह उसीका हो तो वह मनुष्य यह कहने पहले कि "मेरा
है" कहता है "आपका है” |. दीन वा अधिक मनुष्योंकी उप-
स्थितिमें उन्ही में किसी एकके बारेमें कहा जाये तो आप अन्य<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दोंके मथ |
१२३
पुरुपके लिये भी जाता है, जैसे "जापके यारों" यहां परोक्ष
रूप से प्रत्यक्षको चर्चा हुई है। ऐसा प्रयोग हिन्दी उर्दू को
• छोड़कर किसी भाषामें नहीं है।
"आप ही आप बिना किसीकी सहायता वा स्वेच्छा से
और मन ही मन या स्वगत भयों में भी थाता है; जैसे, आप दो
आप वह बोल उठा, तू आप हो आप कह रहा है या किसीफे
सिस्रासे, राजा आपही माप सोच रहा था कि कैसे शत्रु को
परास्त करू । .
1
"आपसे " और "आपसे आप" भी "आप ही आए" अर्थ
• भरते हैं; जैसे, वह आपसे वहां पहुंच गया, आपसे आप उसके
मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ ।
अपना ।
rai aaine आप" सर्वनाममें सम्यन्यसूचक "ना
प्रत्यय लगकर बना हुआ "अपना" शब्द "निजका" अर्थमें आता
है और तीनो पुरुषोंके लिये प्रयुक्त होता है; जैसे, सब अपनी
बड़ा चाहते हैं, तुम अपना काम करो, मैं अपने घर जाता है।
"अपना शब्द विशेषणवत् भी प्रयुक्त होती है और जय
विशेष्य होता है, तंत्र आकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दोंकी भांति इसकी
साधना होती है; जैसे, अपने मतलयकी याद सभी सुन लेते है
aria fadaiनेवाला नष्ट होता है ।
"अपना शद air में भी आता है; जैसे. भारत
अपना देश हैड पराया देश ।<noinclude></noinclude>
58edfl8hkpwxwodyykrgt2bunxeddr7
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२२
'हिन्दी कौमुदी ।
“अपना” कभी कभी लुप्त भी रहता है; जैसे, चापसे बेटेने
विनती की, बड़ोंने लड़कों को बहुत समझाया, वह घर जायगा ।
बहुत से लोग विशेषकर राजपुताने. महाराष्ट्र और गुजरातके
रहनेवाले “अपना" और उसके स्त्रीलिङ्ग "अपनी" शब्द के बदले
सम्वन्धक तद्धित प्रत्ययान्त मेरा, हमारा, तेरा, तेरा, तुम्हारा,
उसका, उनका और आपका शब्दों वा इनके और रूपोका प्रयोग
करते हैं; जैसे, मैं मेरा काम करूंगा, हम हमारी बात कहते
तू तेरा काम कर चा तुम तुम्हारा काम करो, वह उसका
काम करेगा, आप आपका काम करो। इन वाक्यों मेरा
।
हमारी तुम्हारा, उसका और आपका शब्दोंके चदले अपना,
अपनी, अपना, अपना और अपना लिखना शुद्ध है ।
"अपना अपना” शब्दों का अर्थ है "प्रत्येक मनुष्यका निजका "
या 'प्रत्येकका प्रत्येकका'; जैसे, अपने अपने भाग्यकी बात है,
अपना अपना दुःख सुख भोगना पड़ता है, अपना अपना काम
करो | महाराष्ट्र और गुजराती इस प्रयोग में बड़ी भूल करते
'हैं और "थपना अपना काम करो" वाक्यके वले "आप आपका
काम करो" बोलते हैं ।
"अपने" और "अपने राम का प्रयोग प्रथम पुरुपके बहु-
वचनके लिये पोलचालमें होता है; जैसे, अपने तो यह काम
करेंगे, अपने राम ऐल मामलोंमें हाथ नहीं डालते ।
कोई और कुछ
".
“कोई" और "कुछ" दोनो अनिश्वरवाचक सर्वनाम हैं। को
मनुष्य के लिये और कुछ वस्तुके लिये आता है; जैसे, फोई<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दों के अर्थ ।
१९२३
कहता है अर्थात् कोई मनुष्य कहता है और कुछ है अर्थात् कोई.
वस्तु है।
एक अज्ञात मनुष्य वा प्रायः अर्थात् लगभग अर्थ म
"कोई " आता है; जैसे, कोई पुकारता था अर्थात् पुकारनेवाला
मनुष्य तो यां, पर अज्ञात था, उसको बतानेवाला नहीं जानता ।
कोई रामदास है अर्थात् रामदास उसका नाम है, पर चतानेवाला
उसे नहीं जानता। कोई सौ की बात है अर्थात् लगभग
सौ वर्ष सातको बीते हुए होंगे।
"कोई कोई " बहुवचन है : जैसे, कोई कोई कहते हैं ।
"कुछ" कोई शब्द बहुवचन रूपसे जब आता है तब मनुष्य
बताता है। जैसे कुछ माते थे, कुछ जाते थे ।
"कुछ एक" फोई शव्दका चटुवचन होता है; जैसे कुछ एक
हां मिलाते थे और वाको विरोध करते थे ।
कौन और क्या ।
"कौन" ओर" "क्या" प्रश्नवाचक सर्वनाम है, जिनमें "कौन"
तो मनुष्य के लिये और "क्या" वस्तुके लिये आता हैं। जैसे, कोन
- आया है? क्या है अर्थात क्या बात या मामला है ?
"कौन कौन" या "कौन लोग " बहुवचनमें भाता है; जैसे,
कौन कौन था कौन लोग जाना चाहते हैं ।
hth साथ साparaक "सा" प्रत्ययन्कर "कोनसा"-
hi एक अर्थ माता है और इस समय यह विशेषण होता है;
जैसे, कौनसा पाप किया जो Test जंगाया, कौनसे धर्मा
आपको
त्माके आप पुत्र हैं।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२४
-
"कौन" यो at
हिन्दी कौमुदी |
ranचक सर्वनामका काम करता है;
जैसे, तुम कौन हो ? मैं तुम्हारी रक्षा करनेवाला कौन हूं ?
" क्या" आश्चर्य प्रकट करनेके लिये भी आता है और उस
समय इसके पहले "ही" रहता है; जैसे, क्या ही सुन्दर पुरुष
! क्या ही गधा है ! घरमें घुसा तो देखता क्या है कि
"क्या - क्या" उभयान्वयी अव्ययकी भांति भी आते है
जैसे, क्या स्त्री क्या पुरुष समी टकटकी लगाये देख रहे थे ।
जो और सो ।
"जी" और "सो" सम्बन्धवाचक सर्वनाम हैं और दोनोका
जोड़ा है; जैसे, जो कहते हो सी करते नहीं । *
1
कभी कभी "जो" वाला वाक्य समाप्त कर बिना "सो" के
ही दूसरा वाख्य प्रारम्भ कर दिया जाता है; जैसे, जो ईश्वरा
राधना करते हैं, सुखी रहते हैं ।
६ लागने लिखा हूँ कि बातचीत में "जो" प्रायः बोला जाता है श्री
इसका उदाहरण दिया है "परमेश्वर जो है सो
वहां "जो है सो पातके बीचमें निरर्थक थाया है।
शनिमान है ।" पर
यह "तकिया क्लाम
है और जहां बात भूल जाती है, यहां कोई "जो है सो", कोई "क्या ना
"है", कोई "तुम्हारा क्या नाम है", और कोई "माने ' बोलता है। बिहार
“तुथी” और बनारस मिर्जापुर में "प्या" वा "थोथुया" बोलते हैं
लोगों को ऐसे निरर्थक वाक्य और शब्द बोलने का अभ्यास हो जानेके कार
इनके प्रयोग बिमा के बात नहीं कर सकते ।
पर लेखादिमें ऐसी वा
नहीं लिखी जाती ।<noinclude></noinclude>
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१२५
"सो" के बदले बहुधा "वह" घोला और लिखा जाता है:
'जैसे, जो दूसरे के दुखमें दुखी और सुखमें सुखी होते हैं, चे
• ययार्थ सनुध्ध है।
. कभी कभी "जो" मी अनुक्त रहता है, पर "जो" और "सो"
• दोनो एक साथ यनुक्त नहीं रहते; जैसे, तुम्हें भावे, सो करो ।
"जो" उभयान्वयी अव्ययकी भांति "यदि" वा "अगर "
जयमें भी आता है; जैसे, जो मैं जानता तो ...
"सो" उभयान्ययी अव्ययकी भांति "अतः" "अतपच" घा
""इस लिये" अर्थ में भी आता है; जैसे, सो हे महाराज यह
आपके दर्शनोंका अभिलाषी है।
"जो" के साथ ही "कोई" जब माता है, तब दोनोका अर्थ
. होता है चाहे जो"; जैसे, शंकर से जो कोई वर मांगता है,
. वह पाता है ।
ग्रह और वह ।
"वह" तौर "वह" तथा इनके बहुवचन "ये" और "वे"
सर्वनामोंमें "बद्द" और "चे" पहले कहे हुए और "य" और
. "ये" पीछे कहे हुए नामोंका निर्देश करते हैं, जैसे, भांग मोर
अफीम दोनो कुरै नशे हैं उससे शरीर सुस्त हो जाता और इससे
कवजियत होती है और इससे पेट पेंटने लगता है और दस्त
चन्द्र हो जाता है।
असमापिका किया पहले जब "वह" आता है तब "ति”
अर्थ देता है । ज से, यह सुनकर में चला, यह कहकर वह लम्बा
हुआ<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२६
हिन्दी कौमुद्रा ।
ऐसा, वैमा, नसा और तैसा ।
"ऐसा" इस प्रकार "वैसा" उस प्रकार, "जैसा" जिस
प्रकार ओर "सा" तिस प्रकार अर्थ में आता है
जैसे, ऐसा
गया जैसा महफिलसे जूता, ऐसे गये जैसे गधेके सिरसे सींग,
जैसे को तैसा मिले।
"ऐसा" "वैसा" और "जैसा" समानता बताने में भी आते
है । जैसे, क्रिलेके ऐसा दिखाई देने लगा, मेरे जैसा सीधा
आदमी न मिलेगा. वैसे मनुष्य संसार में कम होते हैं ।
पुरा.
. नीच और निर्लज्ज अधों में "ऐसा तसा" प्रयुक्त होता
है; जैसे, कोई ऐसा तैसा नहीं जाने पाता, ऐसा तसा हो जो
अब फिर वही काम करे।
"ऐसा वैसा" साधारण वा नगण्य और मृत्यु अर्थों में
बाता है; जैसे, मैं क्या ऐसा वैसा हूं जो डरू; तुम्हारे घर के
सब से वैसे हो जायें ।
"ऐसे ऐसे" इत्यादि अर्थमें आता है; जैसे, एसे ऐसोंकी'
बात न कहो ।
“ऐसी तैसो" प्रयोग अपमान और नरक या गढ़ा अर्थ
आना हैं; जैसे, तेरे दिलकी ऐसी तैसी, अपने काम ना तो
ऐसी तैसी जाय ।
"ऐसे", "वैमे", "जैसे " और "तेसे" उपमा वा उदाहरण
देने में क्रियाविशेषण रूपसे भी आते हैं, जैसे, तुम ऐसे क्यों
कहते हो, वैसे वे हमारे गुरु हैं, ज से कहोगे वैसे ही करूंगा।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दों के अर्थ |
રણ
"फैसा" अवस्था जाननेके लिये प्रश्न बाता है। जैसे, यह
कैसा है ?
"कैसा कोई" चाहे जैसा मनुष्य अर्थमें जाता है; जैसे,
कैसा कोई बुद्धिमान क्यों न हो ।
"कैसे" किस प्रकार से वा किस कारणले अर्थ में आता है;
जैसे, तुम उसे कैसे जानते हो ?
इतना, जितना आदि ।
"इतना ", " उतना ", " जितना", "तितुना" और "कितना"
परिमाणवाचक सर्वनाम है। "इतना" निकटयत्तों और “उतना
दूत परिमाणका बोधक है। "जिवना" और "तितना" "जो"
: और "सो" की तरह जोड़के शब्द है और "कितना" प्रश्नवाचक है ।
"कितना" "दाम और गहराई पूछने के लिये ही जाता है
जैसे, तुमने कितनेको वा तिनेमें यह मोटर खरीदी ? बड़े बड़े
हे जायें, गधा कहे कितना पानी ।
S
- "इस बीचमै", "दाम" और "यथेता" अयों में पांचवीं
. विभक्तिम "इतना" और "जितता" आता है; जैसे, इतने में पुलिस
आ गयी, इतने में हम न चेचेंगे, इतनेमें काम यन जायगा ।
"उना" और "जितना " शब्दोंकी पांचवीं विभकि एफ
के रूप भी कालन्तर और दाम में नातें है, जैसे,
- जितने में मैं आऊं आऊं उतनेमें यह एक फोस निकल गया,
"जितनेमें तुमने घोड़ा पाया है उतनेमें तो उगाये नहीं हो ।
"featus"
यात्ता है; जैसे, कितने एक दिन<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२८
हिन्दी कौमुदी ।
"कितना हो" चाहे जितना अर्थमें गाता है । जैसे, कितना
ही यत्न करो, होगा वही ।
"इतना उतना " थोड़े बहुत या नगण्य अर्थ में भी आता है।
असे, मैं इतने उतने की चिन्ता नहीं करता ।
एक ।
"एक" संख्यावाचक विशेषण अनेकका विपरीत अर्थ देता
है और "कोई " अर्थ में भी प्रयुक्त होता है जैसे, एक यादमी
आया, एक दिनको यात है, एक समय वह भी था ।
कमसे एक एककर जब कई बातें बतायी जाती हैं, तब
क्रमके attest एक प्रथम अर्थमे आता है और "एक तो "
प्रथमतः अर्थ देता है; जैसे, एक करेला दूसरे नीम चढ़ा. एक
तो लासी थी ही दूसरे आ गया भैया ।
"" समान वा एक ही अर्थ में भी जाता है, जैसे,
राम लक्ष्मण एक वापके बेटे थे।
3
" आध' कोई न कोई और बहुत कम अर्थों में आता
है; जसे, एक माघ आदमी खड़ा ही रहता है, वहां एक व्याध
भलामानस हो तो हो ।
वीसो, बीसों आदि,
तीन चार भादि संख्यावाचक शन्दोंमें "शो" प्रत्यय जोड़ने
तीन चार श्रादिके ही नही, पहले एक और दोके साथ भी "हु"
अव्यय लिखा जाता था और 'भी" अर्थ देता था, पर कालान्तरमें इकारका
लोप होनेसे "" रह गया और एकट, दोट, तीनऊ,
"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दों के अर्थ ।
१२६
.से "तीनो" "चोरो" आदि बनते हैं और इनके अर्थ होते
"सारे 'तीन"" "सारे चार आदि: जैसे, तीनो बोल उठे, चाएं
हंस पड़े। इन वाक्योंका अर्थ है कि यहां तीन आदमी थे
और सब एक साथ बोल उठे तथा चार आदमी थे और सब एक
साथ हंस पड़े ।
[
"द्रो" एक अक्षरका शब्द है, इसलिये इसमें "गो" प्रत्यय,
""a" प्रत्यय लगता है और "दोओ” न होकर "दोनो"
शब्द बनता है, जैसे, दोनो भाई मेलसे रहते हैं।
दो चासो, सौयो, हजारो और लाखो आदि
- तथा दसों, योसों, पचासों, सेफड़ों, हजारों और लाखों शादि
अर्थकारी अन्तर है; जैसे, पचासो गादमी ये
का अर्थ है कि पचास आदमी थे और सब था गये । पर
गये और फिर सन्धिके नियमानुसार ऐको, तीन, चारों यादि देने तथा
तीनों अनुकरच्चपर दोठ, "दोन" रूपमें परिणत किया गया। थोड़े दिनों
retarhat areार लिखा जाने लगा और दोनो, तीन, चारो
आदि रूपं प्रचलित हो गये। एको यो घालमें यहाँ कहाँ पाता है, पर
fire प्रयोग नहीं समझा जाता को सदा निषेधार्थक अपके साथ
धाता है; जैसे, वहां एक चादमी नहीं है यमांत एक भी नहीं है । पर
दोनो, तोनो, पारो प्राft a free नहीं है, स्मोकियों मे
अन्तर है ! लाने प्रचलित वर्णविन्यासके अनुसार "बीसी) याये"
का अर्थ किया है, The twenty came पर यह ठीक नहीं है। यह
"बोसो झाये" वrter a है। पोसाका अर्थ है
Scores came or Twenties came-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१३१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३०
हिन्दी कौमुदी |
यदि कहा जाय कि "पचासों मामी आये" तो अर्थ होगा कि,
कई पचास आदमी वहां थे और वे आये। इसी प्रकार "सौगो
वाये" और "सैकड़ों माये” वाक्योंमें भी अन्तर हैं। चीसो, बीसों
और हजारो, हजारोंमें भी ऐसा ही अर्थभेद है ।
अय ।
"अ" समयवाचक क्रियाविशेषण है, पर जब उसमें
सम्बन्धसुचक "का" प्रत्यय
जुड़ता है, तब "इस" और "इस
चारका" अर्थ होते हैं; जैसे,
थबके साल न जाओ, अबकी
चात मान
हो ।
जहाँ ।
"जहां" स्थानवाचक क्रियाविशेषण है और जब इसके पीछे
"तक" अव्यय जुड़ता है और आगे "हो सके" क्रियापद रहता
है, तब वाक्यका अर्थ यथासम्भव, यथाशक्ति वा यथासाध्य
होता है; जैसे, जहांतक तुमसे हो सके यह काम कर डालो ।
कहां ।
·
s
"क" भी स्थानवाचक क्रियाविशेषण है और इसका अर्थ
होता है, किस स्थानमें, जैसे, कहां जायं ? कभी कभी इसका
अर्ध नहीं" भी होता है; जैसे, यह मकान कहां ऊंचा है ?
कहां पीछे “तक" जुड़नेते अर्थ होता है कितनी देरतक; जैसे,
मैं कहांतक उनकी प्रशंसा करू ?
·
तुलना करने के समय वाक्यमें दो वार "क" आतेपर
अर्थ होता है बड़ा अन्तर और भाव निकलता है कि दोनोंकी
'<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दों के अर्थ ।
१३१
'तुलना नहीं हो सकती। जैसे, कहां शिवजीका विदाका धनुष
और कहां ये कोमल बालक ?
जहां वहाँ ।
"जहां तहां" सर्वत्र और कहीं कहीं अथों में माता है : जैसे
घूम रहे थे जहां तां हमें भटकना भी पड़ा ।
जहांतहां लोग
कहाँ ।
"हां" क्रियाविशेषण के पोछे निश्चयार्थक क्रियाविशेषण
"ही" रहनेसे "की" रूप बनता है (देखो पृष्ठ ९४ ) और इसके
अर्थ होते है बहुत अधिक और कदाचित् जैस, पद मामला
बड़ा है,हमतें कही कोई सुन न ले ।
जिधर तिधर ।
"जिधर तिर" जहां तहां अर्थमें भाता है; जैसे, जिधर
तिघर सब लोग भागने लगे ।
पर।
"र" सम्वन्धक अव्यय विभक्तिकी तरह शदका सामान्य
रूप होनेपर उसमें जुड़ता है और ऊपर अनुसार, प्राधान्य,
अन्तर, अनन्तर, संलग्न, दाम और वार्तालापका प्रसंग इतने अर्य
बताता है; जैसे, घोड़े पर बढ़ो, धर्मपर चलो, दुष्टॉपर ईश्वरका ही
• यश चलता है, यहांसे सौ कोसपर, चार दिनपर वह गाया, हार-
पर खड़े रहो, कितने पर बैल येोगे, इसपर वह कोध कर बोला ।
"" उभयान्वयी अशय "परन्तु" अर्धमें भी आता है,
जैसे, मैंने बहुत कहा, पर उसने ध्यान ही नहीं दिया<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६३२
हिन्दी की।
लिये ।
लिये, निमित्त हेतु, कारण, वजह, सवय, जैसे सम्बन्ध.
सुचक अव्यय पहले "एल" आनेसे
इस लिये" और "किस"
असे "किस लिये" पद यतते हैं।
" इस लिये" वतः. बा
अतएव अर्थमें आता है और “किस लिये" क्यों अर्थ देता है;
जैसे, इस लिये उसने मेरी बात मान ली. मैं किस लिये वहां
जाऊं ?
P
f
"किस लिये" और "किसके लिये" पदोंके अर्थो में अन्तर
है । " किसके लिये" पदका अर्थ होता किस मनुष्यके लिये
जैसे, मैं किस लिये धन इकट्ठा कर अर्थात् क्यों धन इकट्ठा
करू, मैं किसके लिये धन इकट्टा करू' अर्थात् मेरे कोई नहीं है
जिसके लिये धन संग्रह करू ।
कि ।
"क" क्रियाविशेषण और उभयान्वयी अव्यय दोनो रूपोंसे
आता है। क्रियाविशेषण होनेपर त्योही, तभी वा तुरन्त अर्थ देता
है. जैसे, मैं घर से निकला ही था कि वह मिल गया ।
जब "कि उभयान्वयt rare होता है, तब या और
ताकि वा जिससे अर्थो मे आनेके मिया कर्मप्रदर्शक भी होता
है; जैसे, तुम जाते हो कि मै जाऊ, मैं इस लिये जाता है कि
वहां की दशा देख, उसने कहा कि मैं अभी न चलूंगा ।
वो ।
उभयान्वयी अव्यय "तो" "जो" अव्ययके जोड़े की तरह<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शद अर्थ
}
१३३
आता है, जैसे, जो मुझे चाहते होते तो ऐसा न करते | यदि
पहले चाय "" रहता है और दूसरा वाक्य "तो" अव्ययसे
प्रारम्भ होता है, जब यह "तो" तब में आता है । जैसे,
जब महाराज बायें तो तुम उनके पेपर गिर पड़ा।
""तो चाय र देने घा श्रोताका व्यानानि करने
चा निश्चय बतानेके लिये आता है। जैसे, एक तो वह ममता
दी नहीं, हमारी बात तो सुन लो, हम तो परमात्मा से प्रार्थना
करते ही रहेंगे ।
जोड़ने
चौर
"भोर" उभयान्वयी अव्यय है और दो शब्दों चा वाक्योंको
.
लिये उनके वीचमें लिखा जाता है। जेते, राम और
कृष्ण आये | रामनन्द्र वनको चले गये और भरत नन्दिमा
बोकर तप करने लगे।
"और" अन्य, अधिक या अतिरिक्त और
- आता है और विशेषण वा विशेष होना है जैसे मुझे
में भी
तुझे और को era और मुश्किल आजकल बुद्ध रख ही
और है ।
"और तो और" और "और at an aint वर्चा छोड़
"कर और औरकी कौन
है, जैसे, और तो और
वह अपने लगे चापको हो कुछ नहीं समझता ।
""और भी"" इसके अतिरिक्त अर्थ आता है; जैसे और भी,
किसीको यात सुनता ही नहीं ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१३५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३४
हिन्दी कौमुद्रो ।
भोर |
"ओर" मस्वन्यसूचक अव्यय पक्षमै नरफ, विनारा और
न्त अर्थों में आता हैं. जैसे. इस लड़ाईमें वह मेरी मर हैं,
ओरसे भी प्यार कर देना समुद्रका न ओर है न छोर
सते ठाकुर खांसते चोर इन दोनोका आया ओर |
न, नहीं और मत
"न", "नहीं" और "मत" तीनो निषेधार्थक अव्यय है, पर
मत" मध्यम पुरुषके सिवा किसीके लिये नहीं प्रयुक्त होता
से, वहाँ मत जा, ऐसा मत करो, वहां मत जाइये ।
-
"न" साधारण निषेधार्थक अव्यय है पर "नहीं" दूद्रता
तक निषेधार्थक है; जैसे, मैं न जाऊंगा, मैं नहीं जाऊंगा ।
"" more न तो और तथा और न अर्थों में भी आता है।
जान जाना चाहता हूँ, मैं न गया न
जैसे मैं
जाऊंगा।
-
जब निषेधमें कोई विशेषता नहीं होती नत्र हेतुहेतुमद्भुत,
सामान्य भूत, सम्भाव्य भूत, सन्दिग्ध वर्तमान, सन्दिग्ध भूत और
भविष्यकालों में "न' चिधिमे और अन्य कालों में "नहीं" आता
है; जैसे, वह न जाता, मैं न पा में न जाता होता, वह न
या होता, तू न जाता होगा, वह न गया होगा, मैं न जाऊंगा।
सामान्य वर्तमान में जय निषेधार्थक "नहीं" आना है, तो
उसका रूप हेतुहेतुमदनका हो जाता है अर्थात् "तू" धातुके
है" और "हे" रूप लुप्त रहते हैं, जैसे, वह नहीं आता ( है ) ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>क्रियापदों के अर्थ ।
विधि |
विधि, निषेध, सम्भावना, अभिप्राय, इच्छा तथा चिन्ता
प्रकट करने, आशीर्वाद, उपदेश, शाप तथा गाली देने प्रश्न करने
• और भूत, भविष्य और वर्तमान काल बतानेके लिये चिचिका
प्रयोग किया जाता है; जैसे, सब लोग तड़के उठें, सूर्योदय
चार कोई न सोए, चुप रहे तो काम बन जाय, समझा दो तो
. उसकी शका दूर हो जाय, परमेश्वर कुशल करे, में यह काम
कैसे करू ? जीते रहो, सदा सच बोलो, उसका सत्यानास दो
जाय, वह कैसे जाय ? आई है कि चोर इतना पीटा जाय
पर कुछ न बतावें, जब तुम्हारे लड़का हो तो उसे ले माना,
अन्य पीसे कुत्ते बायें 1
आशा ।
बांक्षा देने और आज्ञा मांगने में यात्रा
परेका व्यवहार
किया जाता है, जैसे, तुम जाओ, वह जाय, मैं जाऊं ।
काहा ते मध्यम पुरुषके साथ "न" और
"मन". अव्ययका प्रयोग होता है पर प्रथम और उत्तम पुस्
के साथ केवल "" भाता है, जैसे, तू कहांन जा, तुम मत
जायो, न जाय सेनं जाऊं ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३६
हिन्दी कौमुदी ।
भविष्यकाल ।
किसी घटना के निश्चय था उसकी सत्यताकी सम्भावना
होनेपर भविष्यकालिक क्रियापद प्रयुक्त होते हैं; जैसे, मैं
कल गाऊंगा, जो ऋषि दक्षिणा न पायेंगे तो शाप देंगे, तुम्हारे
स्त्री पुत्रादि तुम्हारे वशमें रहेंगे ।
i
किसी घटना के विषय में निश्चय न होनेपर भी भविष्य
कालके क्रियापदफा प्रयोग होता है; जैसे, किसीके प्रश्न करने
पर कि क्या यह मन्दिर अति प्राचीन है, उत्तर देनेवालेको
उसका निश्चय न होनेपर वह कहता है होगा" ।
हेतुहेतुमद्भूत ।
अपूर्ण भूत. सामान्य वर्त्तगत और हेतुहेतुमद्भूत के सिवा
इच्छा. सामर्थ्य वा शक्ति बतानेके लिये भी हेतुहेतुमभूतका
प्रयोग होता है; जैसे, जब कभी अवसर पाते तत्र खरी मुहपर
सुना देते, मुझसे यह काम नहीं होता, जो ईश्वर न सहाय होता
नो कोई जीता न वचना, यदि आज मेरे भाई होते, यदि तुम
सम्हल जाते तो डाक्नु न लूट लेते ।
सामान्य वर्त्तमान |
$
भविष्य, भूत तथा सामान्य वर्त्तमान कालों का काम करने के
सिवा स्वभाव, चिर सत्य घटना बताने, आश्चर्य प्रकट करने
नथा उपमा देनेमें भी सामान्य वर्त्तमानका प्रयोग किया जाता
है, जैसे, मैं घर जाता हूं अर्थात् शीघ्र ही जाऊंगा. तू यह बात
G.
कसे कहता है अर्थात् तूने कैसे कहीं, मैं खाता हूं, वह जहा<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>forest अर्थ |
१३०
जाता है कम ही मचाता है, जो दान पुण्य करता है वह
frain freera ता है, उसने घरमें प्रवेश किया तो देखना
पा है कि महफिल लगी हुई है, हिमवान् विहल हो ऐसे गिरे
= जैसे अन्धड़में पेड़ गिरता है।
सामान्य भूत !
सामान्य भूतका प्रयोग सामान्य वर्तमान और सामान्य
भूत दोनोंके लिये होता है : जैसे, नरतनु धारण कर जिसमे
परोपकार न किया उसने वृथा जन्म दिया, कृष्णजन्सकी घात
किसीने नहीं जानी ।
पूर्ण वर्तमान |
1. पूर्ण वर्त्तमानका प्रयोग सामान्य भूत, सामान्य वर्तमान और
पूर्ण भूत के लिये भी होता है; जैसे, हम तुम्हारे द्वारपर आये हैं
नारदने कर कि निश्चित क्षे, त्यो राजा ि
बढ़ा दानी हो गया है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>शब्दों की पुनरुक्ति |
एक ही शब्द साथ साथ जब लिखा या बोला जाता है,
तत्र उसका विशेष अर्थ होता है । क्रिया और अव्यय की पुनरुकि
तो साधारणतः वारम्वार" और "धीरे धीरे" अर्थ देती
है, पर संज्ञा और विशेषण शब्दोंको ऐसी हिरुक्ति वा गुन-
रुक्तिका अर्थ प्रत्येक धा भिन्न भिन्न भी होता है, जैसे द्रौपदी रो
रो कहने लगी, होते होते वह पहुंच गया। जब जब धर्मकी
ग्लानि होती है तव तत्र भगवान अवतार लेते है, घर घरमें
आनन्द उछाह होने लगा, बड़े बड़े योद्धा सज सज मैदान में
आये, देश देश के राजा आने लगे, नये नये वृक्ष ला लाकर
लगाये गये ।
जब संज्ञा शब्दों के बीचमें "हो" अव्यय माता है या पहला
शब्द पहलीको छोड़ अन्य विभक्तियोंमें रहता है, तब अर्थमें कुछ
अधिक अन्तर पड़ता है। "ही" का अर्थ जहां "केवल" होता है,
वहां तो शब्दका अर्थ "और कुछ नहीं केचल" होता है और
जहां "अभ्यन्तर" होता है, वहां "बाहर नहीं भीतर" अर्थ होता
है; जैसे, सीता ही सीता पुकारने लगे, मन ही मन सोचने
लगे । सम्बन्धवाचक प्रत्यय पहले शब्द के अन्त में जब रहता
है, तब कमी "लगातार" और कभी "अत्यन्त" अर्थ होता है ;
जैसे, दलके दल लोग आने लगे, यद्माशका बदमाश ।
:<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१४०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>!
शब्दों की पुनरुक्ति ।
B
कभी कभी पहला शब्द सामान्य रूप बहुवचन में रहता है
air after चिन्ह लुत रहता है। ऐसी अवस्थामै "लगातार "
अर्थ होता है : जैसे, हाथों हाथ माल पार कर दिया या यात
मामला चढ़ गया।
अत्यन्त और समस्त अर्थों में भी एक ही विशेषण दो बार
जाता है । जैसे, मीठे मीठे फल खिलाऊंगा, सेत सेत सब
.
एकसे कनिक कपूर कपास ।
उत्कृष्टता वा निकृष्टता बतानेके लिये विशेषण दो वार
यांता है, पर जिससे उत्कृष्ट वा निकृष्ट बताते हैं, उसमें चौथी
विभक्ति होती है, जैसे, बड़े बड़े बदमाश मैंने ठीक किये हैं,
अच्छे से अच्छे कपड़े पहन लो ।
icrores faशेषण जर दुहराया जाता है, तब उसका
अर्थ प्रत्येक होता है; जैसे, एक एक सुदर और एक एक
भैंस सबके पास है, सबके दस दस बेटे हुए, दो दो जाने लगे,
एक एक बोलने लगा ।
संख्यावाचक शब्दके बाद जब रुपये पैसे, मन, सैर, घंटा,
मिनिट आदि शब्द रहते हैं, तब संख्यावाचक शब्द ही दुहराया
जाता है, ये नहीं दुहराये जाते, जैसे, पांच पांच रुपये, छ छ
पैसे, दस दस मन, पांच पांच सेर, तीन दीन
दो दो
मिनिट । जब रुपये के साथ बाने या मनके साथ सेर इत्यादि
r
रहते हैं, तब थाने और सेर ही दुहराये जाते है रुपये और मग नहीं,
जैसे, पांच रुपये दो दो आने मिले छ मन तीन -तीत सेर विके ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कर्त्ता किया और कर्म ।
कर्तृवाच्यमें अकर्मक व सकर्मक क्रिया चिचनमें
सदा कर्ता के अनुकूल रहती है; जैसे, वह आता था, मैं खाता
इ, राम जायगा, कृष्ण बाया है, विहारी पढ़ेगा ।
कर्मवाच्य किश सदा कर्ता बने हुए कर्मके अनुकूल
रहती है; जैसे, गाड़ी चलती है, बादल गरजा, मेह बरसेगा ।
कर्मवाच्यमें किया कर्म के अनुकूल रहती है और सकर्मक
क्रिया पूर्ण वर्त्तमान, सामान्य भूत, सामान्य पूर्ण भूत, पूर्ण
और सन्दिग्ध भूत कालोंकी। ही कियामें कर्मवाच्य होता
जैसे, मैंने रोटी खायी है, मैंने रोटी खायी, मैंने रोटी घायो
होती. मैंने रोटी खायी थी, मैंने रोटी खायी होगी ।
सूत
खेलना और बोलना सकर्मक क्रियाएं होनेपर भी कर्त्त वाच्य
होती है, जैसे, मैं क्रिकेट खेला, वह झूठ बोला।
'
खेलना और बोलता कियाओंसे बने कर्म और कभी कभी
अन्य कर्म भी जब वाक्यमें आते है तो ये क्रियाएं कर्मवाच्य
भी होती हैं; जैसे, मैंने बड़े खेल खेले हैं, उसने चौपड़ खेली,
उसने कई बोलियां चोली ।
• जिन यौगिक क्रियाओंके सभी भाग सकर्मक क्रिया बनने
है, उन्ही में कर्मवाच्य होता है; जैसे, मैंने हलचा वा डाला है
या था या होगा वा होता 1<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कर्त्ता, क्रिया और फर्म ।
**
for freet के सभी भाग ras क्रियामों
बनते हे नवधा जिनका एक भाग भी कर्म किया यना
हुआ होता है, उनमें कर्मवाच्य नहीं होता; जैसे, मैं उसे दे
आया, वह छा गया है, राम पुस्तक लाया था ।
लाना क्रिया ले धातु और भाता क्रिया के योगसे बनी है।
पहले इसका रूप याना था, पर बाद छाना हो गया। इस लिये
लामा क्रियाका कर्मवाच्य नहीं होता ।
समका क्रियाका कर्मवाच्य होता है और नहीं भी होता
जैसे, मैंने उसे आदमी समझा, में उसे भादमी सभा ।
भाववाच्यमें किया सदा पुल्लिङ्ग एकवचनमें रहती है और
कर्त्ता वा कर्मका अनुसरण नहीं करती: जैसे, मैंने रोटियाँको
खाया, रामने ताड़काको मारा ।
कर्मा और भाववाच्य दो प्रकारके हैं, एक साधारण
(hers, दूसरे यौगिक क्रियाके। साधारण क्रियाके कर्मचा
और भावाच्या कर्त्ता तीसरी विभक्तिमें और योगिक क्रिया
कर्मवाक्य और भाववाच्यका कर्त्ता चौथी विभकिमें होता है;
जसे. (साधारण कियाके कर्मवाच्य और भाववाच्यम
बाये और मैने पेड़ोंको खाया : ( यौगिक क्रियाके कर्म-
चाय और भाववाच्य) मुझसे पढ़े खाये गये, मुझसे चला
नहीं गया !
.
a reason दो या अधिक कर्त्ता होते हैं और
उसके बीच में संयोजक aour "और" नहीं रहता तो स<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४२
हिन्दी कौमुदी 1.
कर्त्ताओंके स्त्रीलिङ्ग होनेपर किया बहुवचन स्त्रीलिङ्ग होती है,
और पुलिङ्ग होनेपर बहुवचन पुंलिङ्ग । परन्तु यदि भिन्न भिन
feat कर्त्ता हो तो द्वन्द्व समासके नियमानुसार किया होती
है; जैसे, रानी दासी सखी सभी वहां थीं, रामलक्ष्मण भरत
शत्रुघ्न दशरथ के पुत्र थे, राजारानी आये !
यदि कर्त्ता नि भिन्न बचतोंके हों और उनके बीच में
"और" अव्यय न हो तो मध्यम और उत्तम पुरुषके कर्त्ता होने-
पर किया उत्तम पुरुष तथा प्रथम पुरुष कर्त्ता होनेपर प्रथम पुरुष
चहुवचनमें होगी ; जैसे, हम तुम चलेंगे, तुम वह वहां जाओगे ।
यदि भिन्न भिन्न लिङ्गों और वचनोंके कर्ता हों और उन
सबके अथवा अन्तिम कर्त्ताके पहले "और" रहे, तो क्रिया
अन्तिम कर्त्ता के अनुकूल होगी ; जैसे, तीन मर्द लोग एक औरत
आयी।
जब किसी सकर्मक भूतकालिक क्रियाका अर्थ कोई वाक्य
होता है तो किया कर्मवाच्य न होकर भाववाच्य होती है,
अर्थात् सदा पुलिङ्ग एकवचन में रहती है, जैसे, मैंने उससे
कहा कि घर जाकर सो रहो, उसने कहा कि दासी रोटी खा
रही है।
उर्दू वाले विशेषकर दिल्लीकी ओरके उर्दू के पडित उसम मध्यम और
प्रथम पुरपके कत्तां हों तो क्रिया पुलिस बहुवचन कहते हैं, जैसे, मैं तु और
वह चलेंगे, मै तुम चलेंगे।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1.
कर्त्ता, किया और कर्म !
१४३
जब किसीका घार किया जाता है, तब उसके लिये
चहुवचनकी क्रिया प्रयुक्त होती है; जैसे, जय राम वनको जाने
लगे तय, अयोध्या में उदासी छा गयी, आप जानते है कि विद्या
बड़े परिश्रम से आती है ।
परमेश्वरको सम्बोधम करनेके समय अथवा किसीका
-अनादर करने में मध्यम पुरुष एकवचन और उसीकी क्रियाकर
प्रयोग किया जाता है; जैसे, हे नाथ, तू घट घटकी जानता है,
तेरी महिमा अपरम्पार है, तू बालक है ।
परमेश्वरके सम्बन्धमें कुछ कहा जाता है, तब उसके लिये
एकearnt किया हो प्रयोग होता है; जैसे, परमेश्वर जानता
हैं हम कूल नहीं बोलते ।
• किसी वाक्य स्त्रीपुरुपके विषय में समष्टि रूपसे कुछ
कहा जाता है, अथवा जब स्त्री अपने पति वा परिवार की ओरसे
कुछ कहती है तो वह भी अपने लिये पुलिङ्ग बहुवचनकी
ferrer प्रयोग करती है; जैसे, ब्राह्मणीने कहा कि न जाने
हम इन राक्षसों अत्याचार से कय छुटकारा पायेंगे ! •
यदि में दो कर्चा भिन्न लिङ्गों और चचनकि हों तो
- क्रियाका कर्त्ता वही माना जायगा जो मुख्य होगा और क्रिया-
उसके अनुसार होंगे जैसे, इसका कारण
के
युवराज और युवराज्ञीकी हत्या न था ।
R
यदि समय परिमाण तथा धनका विशेषण कोई संख्या हो<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४४
हिन्दी कौमुदी ।
और वह एकसे अधिक हो तो समय परिमाण तथा धनवाचक
शद पहलीको छोड़ और सब विभक्तियों तथा सम्बन्धवाचक
प्रत्यय लगतेके पहले पक वचनके सामान्य रूपमें होते हैं; जैसे,
दो घण्टे में आओ, चार चार रुपयको धोती लाये, पांच सेरका
बिका।
1<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>विशेष्य, विशेषण और सर्वनाम ।
जिस शब्दके गुण, दोष, संख्या वा अवस्था विशेषणसे जानी
आती है, उसे विशेष्य कहते हैं जैसे, सुन्दर पुरुष, नट
चड़का, चार आदमी, बीमार लड़की ।
1
विशेष्यके अनुसार ही विशेषणकेलिंगचचन होते
जैसे, काला घोड़ा, लंगड़ा लड़का, अन्धी लौंड़ी।
.. हिन्दी में आकारान्त विशेषण शब्दों में लिंगभेद प्रत्यक्ष रहता।
है और उनके रूप लिङ्गवचनानुसार बदला करते है, पर जिनके
रूप नहीं बदलते वे मी विशेष्यके लिंगवचन के अनुकूल मान
लिये जाते हैं, जैसे, मोटा लड़का, छोटी किताब, लाल स्याही
खाल, फूल । "
यदि कई विशेष्योंके लिये एक ही विशेषण हो तो विशेषण
अपने पीछे मानेवाले पहले विशेष्यके लिंगवचन के अनुकूल
रहता है; जैसे, कई छोटे बड़े लड़के और लड़कियां, मच्छी
घोड़ियां और रह
यदि विशेषणविशेष्यकी भांति माता है, तो संज्ञा शब्दोंकी
भांति व विमतियों तथा सम्बन्धवाचक प्रत्ययोंमें उसके रूप
साधे जाते हैं, जैसे, दुर्वल को न सताइये, निर्धनों को धन दो
इजियोंको सहायता करो।<noinclude></noinclude>
2kvq20shz3tnnu9ob2qzp2n59iqu2u4
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४६
हिन्दी कौमुदी !
जिस संज्ञा शब्दके पहले सर्वनाम आता है, उसीके लिंग-
वनानुसार इसके लिंगवचन भी होते हैं, जैसे, भारतमें
स्त्रियोंको गृहकार्य सौंपा जाता है, वे बाहर नहीं जातीं ।
विशेषणका प्रयोग दो प्रकारसे किया जाता है एक गुण-
श्रोतक, दूसरा विधेयद्योतक । गुणद्योतक विशेषण विशेष्य के
पहले माता है और विधेययोतक विशेषण कर्मके गुण दोष
चताता है । यदि कर्म पहली विभक्तिमें होता है, तो विशेषण
कर्मकेलिंगचचनानुसार होता है और यदि कर्म दूसरी विभक्तिमें
होता है तो भाववाच्यको क्रियाके समान विशेषण सदा पुलिङ्ग
एकवचनमें होता है; जैसे, सीधा आदमी आया है, मैंने किताब
पूरी कर दी, उसने लड़कीको टेढ़ा किया।
विशेषण क्रियाविशेषणकी भांति भी प्रयुक्त होता है और
उस अवस्था में उसके लिङ्गवचनमें परिवर्तन नहीं होता, जैसे,
वह अच्छा गाता है, उसका चित्त बड़ा कठोर है । परन्तु जब
क्रियाविशेषण क्रियाकी ही विशेषता नहीं दिखाता, बल्कि
संज्ञाका भी सम्प्रन्ध बताता है, तब संज्ञाके चिनानुसार
इसके लिङ्गवचन भी बदलते हैं; जैसे, मुझे खाना अच्छा लगता
है, उसको रोटी कड़वी लगती है।
'<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>वाक्यरचना |
arreरचनाका साधारण नियम यह है कि पहले क
और पीछे किया रहे और अन्य कारकों की आवश्यकता हो तो
कर्त्ता और क्रिया के बीच में रखे जाय; जैसे, मोहन आता है,
-सोहन रोटी खाता है।
आदि सभी कारक हों तो कर्ता पहले
में यदि
'आता है और कर्म
अन्तमें और इसके बाद किया
है।
जैसे, रामने वाणसे रावणको मारा, मालिकने मुनीम से मिख-
मँगोको एक एक पैसा दिलाया।
कर्त्ता विशेषण कतकि पहले और क्रियाविशेषण क्रिया
और कर्मके पहले रहते हैं; जैसे, सुशील लड़के अपने माता
· पिताकी आज्ञा मानते हैं, यह यहांसे शान काशी आएगा !
न करनेके समय वाक्यर्क प्रारम्भमें "या" बोला जाता
'है; जैसे, क्या परमेश्वर हम दुखियोंकी सुध लेगा ?
aran "क्या" नहीं रहता तय बोलनेके ढङ्ग और वक्त के
सुखकी आकृति से जाना जाता है कि वह यक्ष कर रहा है जैसे
"मैं जाऊ ? उसने सब मिठाई बा डाली ?
Ten करने के समय विस्मयादिबोधक अव्यय क्रियाके
-साथ पहले याता है और शेष याचय पीछे; जैसे, धन्य है तेरे
मातापिताको जिन्होंने तुझे जन्म दिया, धन्य है हम सब जिन्होंन<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६४८
हिन्दी कौमुदी ।
आपके दर्शन पाये, धिकार है तेरे शरीरको जो अपने सुपले
खुसी होता है।
चापयमें जोरानेके लिये शब्द और पद अपने खान
हटाकर दूसरे स्थानपर भी रखे जा सकते हैं; जैसे, समर्थ वे ही
हैं जो दूसरोंको सहायता करते हैं, मनुष्य उन्हें कहिये जो
दूसरेके दुखसे दुखी और खुपसे सुप्ती होते हैं, हैं तो हम निर्धन
पर हमारा मन धनवान् है ।
J<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>परिशिष्ट ।
(अ)
संस्कृतकी संधि ।
स्वर सन्धि ।
h
अ या या यादव याथा रहे, तो दोनो मिलकर आ
या ..ई. बाद याई रहे, तो दोनो मिलकर ई उ या ऊके बाद
उ या ॐ रहे, तो दोनो मिलकर के बाद ॠ रहे, वो दोनो
मिलकर ॠ हो जाते हैं; जैसे, ज्ञान+श्रभाव=ज्ञानाभाव, धर्म+
'आज्ञा=वर्म्माशा, सीता+आश्रय-सीताश्रय, हरि + इच्छा-एरीच्छा,
गौरी:-ईश्वर = गौरीश्वर, लघु+कर्मि- लघूर्मि, वधू+उत्सव=
वत्सव, पितृऋण= पितृण ।
अया के बाद यदि ए या ई रहे, तो दोनो मिलकर ए
या रहे तो दोनो मिलकर और रहे तो दोनो
- front हो जाते है; जैसे, नर+इन्द्र=नरेन्द्र, गण+श=
मिलकर श्र
गणेश, महा+दन्द्र महेन्द्र, रंमा+ईश= रमेश, राम+उदार =रामो-
दार, जल+ऊर्म्मि=जलोर्ध्नि, गद्दा+उपदेश महोपदेश, महा+ऊर्मि
महोर्म्मि, वसन्त ऋतु वसन्तु महा+पि मि
यदि यया चाके बाद ए या पे हो, तो दोनो मिलकर
ऐ और यदि ओ या ओ हो, तो दोनो मिलकर की हो जाते हैं,<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५०
हिन्दी कौमुद्रो ।
जैसे, एक+एक = एकैफ, जल+लोका=जलीका, परम+ऐश्वर्य
परमैश्वर्य, महा+औदार्य = महौदा |
यदि इया के बाद या ईको छोड़ दूसरा स्वर हो, तो
इ या ईके बदले य हो जायगा । इसी प्रकार यदि उ या ऊके
वाद या ऊको छोड़कर कोई दूसरा स्वर हो, तो उ या उके
चदले व हो जायगा और यदि के बाद ऋको छोड़ कोई
दूसरा स्वर हो, तो के स्थानमें रहो जायगा ; जैसे, यदि+अपि
यद्यपि, नि+ऊन=भ्यून, प्रति+एक = प्रत्येक, अति + भोज = प्रत्योज,
सु+आगत = स्वागत, अनु+एषण+ अन्वेषण, पितृ+अनुमति=
पित्रनुमति ।
ए, ऐ, ओ और औके बाद जब कोई स्वर रहता है, तब
कमसे ए, ऐ, ओ और ऑके स्थान में अय, आयु, अबू, आव् हो
जाते हैं; जैसे, ने+अन=नयन, न+शकनायक, पो+अन=पवन,
पौ+अक पायक 1
'१ | जब कुच्
व्यंजन सन्धि ।
वा पूके चाद कोई स्वर अथवा किसी
वर्गका तीसरा व चौथा वर्ग अथवा य. र, ल, व, ह रहे तो क्
स्थान, केज, के ड् और ए के स्थानमें व् हो जाता है; जैसे
वाक्+आडम्बरः=पागाडम्बरः, वाक् +ईशच्वागीशः, दिक्+गजः =
दिग्गजः, प्राक्+न:प्राग्धनः धिक्+याचनाधिग्धाचगा, चाकून
रोधः=वाग्रोधः, धिक् + लोभिनम् = धिग्लोभिनम्, सम्यक् + वदति =<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सम्यग्वदति
व्यञ्जन सन्धि ।
१५९
दिक्+हस्ती = दिग्दस्ती,
+अत=अजतः,
परिव्राट् + उवाच = परिप्राडुचाच 1
२। जब किसी शब्द के अन्तमें सु हो और उसके बाद कोई
स्वर अथवा ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, या व हो, तो तके चदले
द हो जाता है, जैसे, जगत्स्थन्तः-जगदन्तः, अगत् + गति=
. जगद्गति, वृहत्+घटः वृहद्धयः, उत+एडः = उहाडः भवत्+
- दर्शनं भवदर्शनं महत्+घनु = महद्धनुः, उत्+योगः उद्योगः,
. महत्+व= मद्दद्दनं ।
३। जंत्र अनुस्वारके याद किसी वर्गका कोई अक्षर होता
'है तो यह के पञ्चम वर्ण में घदल जाता है; जैसे,
शं+करः शङ्करः किंचित् किञ्चित, पं+दितः पण्डितः ।
४। जय किलो के किसी अक्षर याद किसी वर्गका
- पञ्चम वर्ण हो, तो पहला अक्षर अपने पम वर्ण में बदल जाता
दे; जैसे, वाक्+मय= वाङ्मय, वच्+मात्र अमात्र, जगत्+
नाथ:-जगन्नाथः १
[५] जब किसी ह्रस्व स्वरके बाद छ होता है, तब उस छ
पहले च बढ़ जाता है. जैसे, परि+छदः परिच्छद, प
पदच्छेदः ।
च
ला वा
। जव त् या के बाद aaar care
दूसरा अक्षर होता है तो तू या दुकै स्थानमें घाटू हो जाता
है । जैसे, महत्+छ=महच्छत्रं, पतत्। चन्द्रमण्डलं-पतचन्द्रमंडल,
+छाया एतच्छाया, उत्+दलति-उद्दलत्ति, वत्स्वीका<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>+
१५३
हिन्दी कौमुदी ।
तट्टीका, सत्+ठकार: सहकारः पतत्+ठक्कर: एतदृक्कुरः ।
७। यदि त् अथवा के बाद ज, झ, वाह, ह हो तो व
वाद को ज्, वाड् हो जाता है; जैसे, भवत् + जीवनं मव-
जीवनं विपद् + जालं= विपनाल. महत्+ञ्नं महानं
तद्+झनत्कारः=तजभ्वनत्कार, उत् + डीन उद्दीन', नद्+ डिरिडम:-
तडिण्डिमः, उत्= ढोकते-उड्ढौते, एनदु+ढका=पतडढक्का |
८। यदि तु वा के बाद श हो तो तू या है, चूमें और
श में बदल जायगा ; जैसे, श्रीमत्+शङ्कराचार्य्यः श्रीमच्छ-
ङ्कराचार्य्यः, तद्+शरीरम्=तच्छरीरम् ।
यदि त् के याद दुवा हो तो तुका इ और दको
ध हो जाता है, परन्तु ह नहीं बदलता; जैसे, उत्+ह= उद्धत,
तद्+हित=तद्धित !
१० । यदि नके बाद ज या हो तो नूको न्से बदल देते
है; जैसे, महान्+जयः = महाप, उद्यन्+
=उद्यङ्कार
१९ । यदि न के बाद श हो तो नको .गौर शको छ हो
जाता है; जैसे, धावन्+शश: धावशः ।
१२ । यदि नू के बाद ड या हो तो नको णू हो जाता
है; जैसे, महान+डामराः = महारडामराः, गजन्+ ढौकसे -
राजपढौकसे ।
१३ | यदि दद्या के बाद ल हो तो तुदु चा नूको
हो जाता है और न के पहलेवाले अक्षरपर चन्द्रबिन्दु लगता है<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>व्यज्ञेन सन्धि ।
"१५३
जिसे बृहत् + ललाटं हललाट, पतद्+लीलोद्यानं = पतली लोद्यानं,
महाव+लाभःसहांलाः ।
'
१४ । नके बाद यदि च, छठ, ठ, तथा हो तो नको
'अनुस्वार च, इफोरट, कोट, ४ औरत, थको
स्त और प हो जाता है; जैसे, नृत्यन् + चकोर नृत्यंचकोस
धावन् + छागः = धावंरछागः, चलन+विद्दिमिवष्टिहिभिः मदान्
रमांक इसन्तरति =हसंस्तरति गच्छन् + त्-
.
•कार मच्छंस्थुतकारम् ।
१५ । यदि नूके वादं स स याद हो तो नूको अनुस्वार हो
'जाता है; जैसे, दन्+शनम् दर्शनम्, मौमान्+सते मीमांसते,
वृन+दितम् = वृन्दितम् ।
६६ । यदि के बाद कोई स्पर्श वर्ण हो तो न उसी वर्गके
पञ्चम वर्ण में बदल जाता है; जैसे, आशन्पते आशङ्कते,
बालिन+गति=आलिङ्गति, वन्+चयति=वञ्चयति उत्तफन्+उ=
उत्कण्ठते, कन्स्पते=कम्पते ।
१
१० । यदि म् के बाद कोई स्पर्श वर्णं दो तो म् उसी वर्ग के
या तो पञ्चम वर्ण या अनुस्वारमें घेवलं जाता है : असे
किम्+करो करोषि या फिरोपि, क्षिप्रम्+घद्धति-
क्षिप्रचलति वा पिञ्चलति, नदीम्+तरति नदीतरति वानदीन्स-
रति गुरु+नमति गुनमति का गुरुनमति ।
२८ । म् के बाद यदि अन्तस्य या उष्म वर्ण हो तो भू फो
'अनुस्वार हो जाता है, जैसे, सत्वरम्+यादि सत्वरंयात्रि,
.<noinclude></noinclude>
f48wieovfotzheaoj9p4wlrmzeqguhx
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१५५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६०.
हिन्दी कौमुदी ।
फुलस्टाप या बिन्दी वा शून्य वहां लगाया जाता है जहां
किसी शब्द के बदले केवल एक अक्षर लिखा जाता है । जैसे, पं०
(पण्डित) या० (पाव), ला० (लाला). वी० प०, एम० ए० ।
हिन्दी arrant समासिपर फुलस्टाप या बिन्दीके बदले
ढ़ी सीधी रेखा लगाते हैं; जैसे, दया धर्मका मूल है ।
हिन्दीमें कोलनका प्रयोग बहुत कम लोग करते हैं और
जब करते है, तब कोलन के साथ डैश लगाकर कुछ बातें बताने
या गिनाने में; जैसे, नीचे लिखी बातें ध्यानमें रखो : (१)
सदा सच बोलो, (२) किसीको दुख न दो. (३) पापसे
दरो ।
शब्द वा पका अंश जब दो टुकड़ोंमें बट जाता है, तब
छोनोकी पकता घतानेको उनके बीचमें हादफेन लगाया जाता
है; जैसे, राज- फर्मचारी, मृत्यु दण्ड ।
aters चोचमें जब कोई ऐसा वाक्य आ जाता है, जो
तंत्र वाक्य यन सकता है अथवा ऐसा वाक्यांश आता है
जिसके छूट जानेसे कुछ चनता बिगड़ता नहीं। तो उसके जागे
पीछे देश लगाते हैं; जैसे, "और परमेश्वरने कहा” – क्या ? -
"प्रकाश हो जाय । रामचन्द्र- येही दशरथके युवराज थे-
१४ वर्ष पनमें पिता साये थे ।
वोलने में ठिठकना बतानेके लिये भी देशोंका प्रयोग किया
बाता है। जैसे, मुछेद है कि मैं पापका ऋण नहीं
चुका सा
"
4
J
-<noinclude></noinclude>
exle036oc30ln9fbsms9quwh5y3ervv
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१५६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>का
किसीसे कुछ
चिन्ह प्रकरण )
É
उस वाक्य के अन्तमें लगाया आता है जिसमें
किया जाता है; जैसे, तुम्हारा घर कहाँ है ?
आश्चर्य, हर्ष, विषाद आदि प्रकट करनेवाले शब्द या वाक्यके
anant चिन्ह लगाया जाता है; जैसे, भाग्य ! तेरी
भी क्या प्रशंसा फल ! ऐ मित्रो ! घर जामो !
दूसरेको उक्ति उद्धत करनेमें इनवर्टेड कामा डबल (...)
लगाये जाते हैं और जब उस उकिके भीतर तीसरेकी उकि
आ जाती है, तब इनके लिये इनटेंड कामा सिङ्गल लगाये.
जाते हैं। मनुष्य, वस्तु वा शब्दको महत्व देनेके लिये भी
इनका प्रयोग किया जाता है; जैसे, रामचन्दने सीताने कहा
"प्रिये, चनमें घड़े कए हैं।" "रामाश्वमेधर्मे" शत्रुघ्नसे लव-
कुशको कड़ाईका वर्णन करते हुए केशवदासजीने कहा है "
रान लड़ने आये, तब कुशने कहा 'कौन शत्रु ते इत्यो जो नाम
रामुदालियो ।"
किसी वाक्यांश वा शब्दको यदि अलग रखकर भी वाक्यके
बीचमें डालना चाहे तो उसे ग्रकेट या पैरेन्थेसिसमें यन्द करते
ह, जैसे, यह सत्य जान लो ( मनुष्यकें लिये इतना ही जानना
है कि इस लोक धर्म ही सुखदाता है।<noinclude></noinclude>
og8goa2b30pttqctvzf1d1cg6i0efba
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१५७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मुद्रक - त्रिकाप्रसाद वाजपेयी,
" इण्डियन नेशनल प्रेस"
१५६ बी०, मछुआ बाजार स्ट्रीट,
फलकता ।
L<noinclude></noinclude>
thvo98ncv6ul3ivnf89du7r9mswjgzp
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१५८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊर्मिला
Folers ZedTechno<noinclude></noinclude>
c8vw2pgxf14uok7xz8gnzrfncar03xy
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>A<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
( प्रबन्ध काव्य )
बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
अत्तरचन्द कपूर ऐण्ड सन्ज
दिल्ली अम्बाला आगरा जयपुर नागपुर<noinclude></noinclude>
kgqm3zhid773icfedn9efcuejjc3ul1
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रकाशक
अत्तरचन्द कपूर एण्ड सन्ज़,
काश्मीरी गेट, दिल्ली ।
प्रथमावृत्ति
मूल्य १२) रुपये
Prlated at Kapur Printing Press, Delhi, by L. Guran Ditta Kapur.<noinclude></noinclude>
3zslyoxbwj02j5uuplkqi2vqx9ft318
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्री लक्ष्मणचरणार्पणमस्तु
प्रथम सर्ग
द्वितीय सर्ग
तृतीय सर्ग
चतुर्थ सर्ग
अनुक्रम
पंचम सर्ग
पष्ठ सर्ग
क
७३
१६७
...
३४३
३६७
५१७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पूजनीय दद्दा
(बाबू मैथिलीशरण गुप्त)
वरद करों में
सादर
---बालकृष्ण शर्मा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>श्रीलक्ष्मणचरणार्पणमस्तु
यह ऊमिला है। यह ग्रन्थ, वर्षों के उपरान्त अथ प्रकाशित हो रहा
है । इस विलम्ब को मैं क्या कहूँ ? अपना बहुधन्धोपन ? अपना
प्रमाद ? प्रकाशन के प्रति मेरा अपना विराग ? मेरा नैष्कर्म्य-भाव ?
बड़ा कठिन है यह स्व-विश्लेषण- कार्य। मनुष्य स्वभावतः अपने प्रति
पक्षपात करता है। अपने को यथावत् देखने में वह हिचकता है। अपनी
नग्नता को वह निज के अचेतन और अर्धचेतन के आवरण में लपेटे
रहता है। इस दुर्बलता से मैं मुक्त नहीं हूँ। इस कारण मेरे लिये यह
कठिन है कि इस विलम्ब को यथार्थ रूप में जान सकूँ । कदाचित् जो
बातें मैंने ऊपर गिनाई हैं वे सभी इस विलम्ब के लिये उत्तरदायी हैं।
जब यह प्रयास आरम्भ हुआ था, तब से अब तक परिस्थितियों में
और मुझ में अनेक परिवर्तन हो गए हैं। और, एक प्रकार से यह कहा
जा सकता है कि इन सब परिवर्तनों, इस सब उथल-पुथल के बीच,
ऊर्मिला के स्तवन की लालसा और उस स्तवन को प्रकाश में लाने की
इच्छा - चाहे वह इच्छा बाँझ ही क्यों न हो-मेरी जीवन-संगिनी रही
है। मुझे इस गुण-गान में कितनी सफलता मिली है, इसका अनुमान
मैं नहीं लगा सका हूँ । मेरे लिये इतना ही अलम् हैं कि मुझे ऊर्मिला
माता की कथा कहने की प्रेरणा मिली। जीवन में साधना का अभाव
है। माता ऊमिला के पुनीत चरित्र का बखान करने के लिये साधक
होना, भक्त होना, श्रद्धायुक्त होना और सुष्टु कलाकार होना आवश्यक
है। मुझ में इन गुणों का नितान्त अभाव है। फिर भी, सती ऊम्मिला
की कथा कहने की प्रवृत्ति मेरे मन में जागी, –यही क्या कम सौभाग्य
की बात है ?
हाँ, तो माता ऊम्मिला के स्तवन की लालसा मेरी जीवन संगिनी
रही है। मैंने इस कथा का आरम्भ जिस समय किया था, वह समय
अब इतिहास में परिगत हो गया है। क्यों ? इसलिये कि मैंने इस
कथा को आज से सैंतीस वर्ष पूर्व आरम्भ किया था । सन् १६२१-२३
के डेढ़ वर्ष के कारावास काल में मैंने इसे लिखना प्रारम्भ किया। देश
के प्रायः पचास-साठ सहस्र जन उन दिनों कारागार में डाल दिये गए
थे । उत्तर प्रदेश के हम कई सहस्र प्राणी, जो राजनीति-चेतना-युक्त थे,
पकड़ लिए गए | उत्तर प्रदेशीय कांग्रेस समिति के सदस्य के नाते<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ख )
मैं तथा मेरे और ५४ साथी, सन् १६२१ के दिसम्बर मास की १३वीं
तिथि को, प्रयाग में, उक्त कांग्रेस समिति की बैठक करते हुए, धर लिये
गए थे। प्र ेट ब्रिटेन के राजकुमार, जो पंचम जार्ज की मृत्यु के उपरान्त
अष्टम एडवर्ड के रूप में ब्रिटिश साम्राज्य के सम्राट हुए और तदनन्तर
अब ड्यूक आफ विंड्सर हो गए हैं, उन दिनों भारत-भ्रमण कर रहे
थे। कांग्रेस ने उनका बहिष्कार किया था। दमन का चक्र तीव्रता
से चल रहा था । कांग्रेस संस्था अवैध घोषित कर दी गई थी। कांग्रेस
जन कारागार में ढकेल दिये गए थे।
प्रयाग के मलाका कारागार की एक घुड़साल अर्थात् वैरक-
न्यायालय के रूप में परिणत की गई। उन दिनों, जहाँ तक स्मरण आता
है, नॉक्स नामक एक अंग्रेज प्रयाग का जिलाधीश था। उसने हम पचपन
लोगों को डेढ़-डेढ़ वर्ष का कारावास दण्ड दिया। हम लोग कई टोली
में विभक्त कर दिये गए । कुछ नैनी केन्द्रीय कारागार भेजे गए । कुछ
आगरा कारागार गए । और, कुछ बनारस । मैं बनारस पहुँचा
अपने अन्य साथियों के साथ। प्रथम बनारस केन्द्रीय कारागार, तदु-
परान्त बनारस जिला कारागार में हम रखे गए पश्चात् प्रान्त भर के
सब उच्च श्रेणी के बन्दी लखनऊ जिला कारागार भेज दिये गए। इस
प्रकार घूमता-घुमाता मैं लखनऊ पहुँचा ।
लखनऊ में सात बन्दी भयानक समझे गए। उनके नाम ये हैं--
जवाहरलाल नेहरू, स्वर्गीय जॉर्ज जोज़ेफ, स्वर्गीय महादेव देसाई,
पुरुषोत्तमदास टण्डन, देवदास गान्धी, परमानन्दसिंह (बलिया) और
बालकृष्ण शर्मा । अतः ये सब एक छोटी घुड़साल में बन्द कर दिये
गए। सब से अलग। इस सब मण्डली में देवदास गान्धी और मैं
दो ही छोटे, अथच अध्यापनीय थे । अतः जवाहर भाई हम लोगों को
अंग्रेजी तथा भूमिति (जिया मेट्री) पढ़ाया करते थे । इम लोगों ने वहाँ,
जवाहर भाई से मैकबेथ (शेक्सपियर का दुखान्त नाटक) आद्योपान्त
पढ़ा। उसी समय से मैं समझा कि जवाहर लाल जी बड़े अच्छे शिक्षक
हैं । उनका वह स्कूल मास्टरी का अभ्यास अभी तक नहीं छूटा है।
इसी समय मेरे मन में यह विचार आया कि ऊर्मिला पर कुछ
लिखना चाहिये। अतः मैंने १६२२ ई० के नवम्बर के अन्त में या दिसम्बर
के आरम्भ में ऊम्मिला लिखनी आरम्भ की। प्रथम सर्ग लखनऊ कारा-
वास में, प्रायः एक-सवा मास में लिखा गया। जनवरी सन १६२३ के
अन्त में
लोग कारागार मुक्त हुए। उसके उपरान्त बाहर के संद
हम<noinclude></noinclude>
22ou1t78m8r1tqe85d5z1qivn81cvpk
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ग )
में फँसा और ऐसा फँसा कि ऊर्मिला को फिर से प्रारम्भ करने का अव
काश ही न मिला। सन् १६३० में दो बार छः-छः मास का कारावास
दण्ड मिला । तब लिखने का विचार आया। पर उस वर्ष कारागार में
भी नेतागीरी ने मेरा पिण्ड न छोड़ा। ऊर्मिला-लेखन का विचार यों ही
विफल रहा।
इसके उपरान्त सन् १६३१ के दिसम्बर मास में मैं फिर पकड़ लिया
गया। इस बार मुझे ढाई वर्ष का कारावास दण्ड मिला । इस बार मैंने
दृढ़ विचार कर लिया कि इस कारावास की अवधि में ऊम्मिला समाप्त
करनी है। बाधाएँ तो बहुत आई । कारागार के भीतर मार, पीट,
लड़ाई झगड़े, एक कारागार से दूसरे में स्थानान्तर आदि अनेक विप
दाएँ झेलनी पड़ीं। पर, व्याघातों के आते हुए भी, सन् १६३४ के
फ़रवरी मास में मैं जब बाहर निकला तो ऊम्मिला समाप्त कर चुका
था। प्रथम सर्ग और बाद के सर्गों के लिखे जाने में प्रायः बारह वर्षों
का व्यवधान है । हाँ, एक बात आश्चर्यजनक है। मैं जितना नित्य
लिखता था तो नीचे तिथि डाल दिया करता था। एक बार मैंने
लिपि से सब तिथियों को जोड़ कर यह जानना चाहा कि अन्ततः मुझे
इसके लिखने में कितना समय लगा। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा
जय मैंने यह देखा कि इस सम्पूर्ण ग्रन्थ को लिखने में मैंने सवा चार-
साढ़े चार मास से अधिक समय नहीं लिया । समाप्त तो यह ग्रन्थ सन्
१६३४ में हो चुका था। पर, प्रकाशित अब हो रहा है। प्रशंसा कीजिये-
यह है मेरा योगः कर्मसु कौशलम् ।
पाण्डु
जब मैंने अपने एक मित्र को यह सूचना दी कि मैं ऊम्मिला समाप्त
कर चुका हूँ, तो वे सूखे से मुँह से बोले--हूँ ! फिर थोड़ी देर के पश्चात्
बोले- यह तुमने क्या किया ? ऊर्मिला पर काव्य-प्रन्थ क्यों लिखा ?
वही पुरानी बात। यदि प्रबन्ध काव्य ही लिखना था तो कुछ और
विषय चुनते। तुम ने ऊर्मिला पर लिखकर अपना समय ही गँवाया ।
स्मरण रखिये कि मैं इन मित्र का आदर करता हूँ। उनकी रसज्ञता एवं
साहित्य-परख का मैं कायल हूँ। पर, मैं उनके इस कथन से सहमत
नहीं हो पाया। मैं यह नहीं कहता कि प्रबन्ध काव्य के लिये नए विषय
नहीं मिल सकते या नए विषयों को लेकर प्रबन्ध काव्य की रचना नहीं
हो सकती । मेरा मतभेद तो उनके इस सिद्धान्त से है कि पुराने विषयों
या व्यक्ति-विशेषों पर आज कल प्रबन्ध काव्य लिखना समय गँवाने के<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(घ )
सदृश है। पुराने विषयों को भी नवीनता से सुसज्जित किया जा
सकता है।
-
और फिर, नया क्या है ? फूल, कोकिल, पपीहा, शारदीया
पूर्णिमा, रिम झिम मेहा, लूक-लपट, आँसू, हिचकी, चुम्बन, परिरम्भण,
संध्या, ऊषा, निशीथ, मिलन, मधुमय यामिनी, अंधकार, प्रकाश, सभी
कुछ तो पुराने-धुराने हैं ? मनोराग भी पुराने हैं और उनकी अभिव्यक्ति
के
साधन- - ये शब्द--भी बहुत पुराने हो गए हैं। फिर भी नित्य प्रति
कुछ न कुछ लिखा-पढ़ा जाता है और मानव समाज उस अभिव्यक्ति
में नयापन अनुभव करता है। वस्तुतः अभिनवता, नवीनता, मौलिकता
बहुत अंशों में कलाकार की अनुभूति पर अवलम्बित है । अतः काव्य
के लिये ऐतिहासिक पौराणिक विषय, केवल मात्र चर्वितचर्वण के तर्क
के आधार पर, त्याज्य या नहीं हो सकते
I
हाँ, प्रश्न यह अवश्य उठाया जा सकता है-और उठाया गया है-
कि क्या आज का युग प्रबन्ध काव्यों के लिये उपयुक्त है ? यह प्रश्न वास्तव
में विचारणीय है। वर्तमान काल में प्रबन्ध काव्यों की रचना के लिये
जो बातें बाधा-स्वरूप समझी जा सकती हैं वे हैं-- (१) भाषा के गद्य
स्वरूप का और छापेखाने का परिपूर्ण विकास (२) साहित्य में उपन्यास
शैली का आविर्भाव, (३) पद्यात्मक शैली की अपेक्षा गद्यात्मक शैली की
अभिव्यक्ति सरलता एवं अर्थ-ग्रहण- सुकरता, (४) गद्य की अपेक्षाकृत
बन्धन-मुक्तता-अर्थात् अनुप्रास, यमक, यति, गति, मात्रा आदि के
बन्धन का गद्य में तिरोधान, (५) वर्तमान जीवन की द्रतगतिमत्ता,
अतः उसमें समय के अभाव की स्थिति, (६) विज्ञान प्रभाव के कारण
मानव की रोमांचवादी वृत्ति का लोप, (७) पुरातन कालीन दैवी तत्वों
को काव्य में प्रविष्ट करने की वृत्ति का वर्तमान विचार के साथ असा-
मञ्जस्य, (८) वर्तमान जीवन की संकुलता (complexity), अत: उस
जीवन में ऋजुता और सहज विश्वास का अभाव, (६) सत्-भाव, सत्-
विचार, सत्-आचरण के प्रति अर्थात् जीवन के शाश्वत मूल्यों के प्रति
अनास्था, अश्रद्धा और उपेक्षा, और (१०) पुरातन कालीन अनन्त,
असीम, विशाल, विराट्, अपरिमितता (Vastness) का वर्तमान विज्ञान
द्वारा लध्वीकरण । इन कारणों को उपस्थित किया जा सकता है, इस
सिद्धान्त का प्रतिपादन करने के लिये कि वर्तमान काल प्रबन्ध काव्यों
या विराट् काव्यों (Epics) के लिये उपयुक्त काल नहीं है।<noinclude></noinclude>
nvitac3w7y5x6cmcn4m6wa47z9n49lk
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ङ )
सम्भव है, इन कारणों के अतिरिक्त और भी कुछ कारण हों जो
महाकाव्यों और विराट् काव्यों के निर्माण के लिये वर्तमान युग की
अनुपयुक्तता सिद्ध करने के पक्ष में दिये जाते हों। मैंने उपयुक्त
कारण किसी ग्रन्थ से नहीं लिये हैं। मैंने अपने ही मस्तिष्क को खरोंच-
खरोंच कर ये दस कारण हूँढ निकाले हैं। इन कारणों पर विचार
करना उपयुक्त होगा या नहीं, यह प्रश्न मेरे सामने है। यह प्रश्न मेरे
मन में क्यों उठा ? इसीलिये कि साहित्य-कला-कृतियों के निर्माण
सम्बन्धी कारणों के ऊहापोह को मैं एक सीमा तक ही उपयुक्त सम-
झता हूँ । सामाजिक एवं बाह्य परिस्थितियों के ऊपर इस प्रकार कला के
विकास को आधारित करना कुछ अंशों में लाभप्रद होते हुए भी,
अंशों में अवैज्ञानिक भी है।
-
कुछ
ग्रीस के पेरिक्लीस कालीन एथेन्स के-कला विकास को
तत्कालीन एथीनियन समृद्धि एवं एथेन्स के निवासियों की आर्थिक
निश्चिन्तता पर पूर्ण रूपेण आधारित करना जिस प्रकार एक उपहासास्पद
प्रयास है, यूरोपियन रिनाएसाँस - यूरोपीय साहित्य-कला- पुनरुज्जीवन-
प्रवाह को जिस प्रकार केवल तत्कालीन परिस्थितियों पर अवलम्बित
मानना एक अवैज्ञानिक उपक्रम है, उसी प्रकार, उपर्युक्त कारणों के
आधार पर वर्तमान युग को महाकाव्य या विराट् काव्य के अनुपयुक्त
मानना अनुचित और अवैज्ञानिक है। ठीक है, पेरीक्लीस का एथेन्स
नगर-राज्य धन-धान्य पूर्ण था, लोगों को निश्चिन्तता थी, अतः वह
नैश्चिन्त्य और अवसर एक सीमा तक कला-विकास में सहायक हुआ।
पर, अवकाश और नैश्चिन्त्य मात्र से सुकरात, प्लेटो, अरस्तू,
फ़ीडियास, अनेक दुःखान्त नाटकों के लोकोत्तर रचयिता, आदि, विभू-
तियाँ कैसे प्रसूत हो गई ? इसी प्रकार जो व्यक्ति यूरोपीय पुनरुज्जीवन
काल को वणिक् वर्गीय, अभिजात वर्गीय मानते हैं, वे भी
भूल
करते
हैं-अर्थात् वे लोग जो उस पहली वेगशालिनी जीवन-लहर को केवल
मात्र भौतिक, सामाजिक परिस्थिति से निःसृत मानते हैं, वे वास्तव में
अवैज्ञानिक और प्रतिक्रियावादी हैं। तत्कालीन युग में इटली में वेनिस
और जिनोआ प्रदेश वणिकू-व्यवसाय-दृष्टि से बड़े समृद्ध नगर थे ।
वहाँ यूरोपीय पुनरुज्जीवन का कोई भी प्रतिनिधि कलाकार, साहित्य-
स्रष्टा, तत्ववेत्ता उत्पन्न नहीं हुआ। उस पुनरुज्जीवन प्रवाह के भागी-
रथ हुए उस फ्लोरेन्स प्रदेश में जो अभिजात वर्गीय प्रभाव से आक्रान्त<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( च )
नहीं था। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि साहित्य - विकास को एक
कालीन युग-परिस्थिति पर आधारित करने का प्रयास बहुधा हास्यास्पद
हो जाता है । और इसलिये मैंने अपने सम्मुख यह प्रश्न रखा था कि
मैं महाकाव्य और विराट् काव्य की सृष्टि की असंभावना के वर्तमान
कालीन कारणों पर विचार करूँ या न करूँ ।
सूक्ष्म में मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि मैं वर्तमान
युग को
विराट् काव्य कृतियों या महाकाव्यों के सृजन के लिये अनुपयुक्त
नहीं मानता। यों, यह बात तो प्रत्यक्ष है ही कि समूची मानवता के
इतिहास में व्यास, वाल्मीकि, वर्जिल, कालिदास, गोएथे, शेक्सपियर,
आए दिन पैदा नहीं होते। सिंहन के लहड़े नहीं। पर चूँकि शेक्स-
पियर अब नहीं होते- इसलिये यह तो नहीं कहा जा सकता कि अब
नाटकों का युग समाप्त हो गया ? इसी प्रकार यदि वाल्मीकि और
कालिदास अब नहीं होते तो यह कैसे कहा जा सकता है कि विराट
काव्यों या महाकाव्यों का युग समाप्त हो गया ? अभी तक प्रबन्ध
काव्यों, महाकाव्यों की सृष्टि होने की क्रिया चल रही है । मन्द या
तीव्र गति का प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं है । महत्वपूर्ण बात यह
है कि प्रबन्ध-काव्यों की ओर आज भी प्रवृत्ति है । अतः मैं यह बात
मानने में असमर्थ हूँ कि महाकाव्यों, प्रबन्ध काव्यों का सृजन-प्रयास
इस युग की प्रवृत्ति के प्रतिकूल है। हाँ, विराट् काव्यों (Epics) का
सृजन इधर सहस्राब्दियों से नहीं हुआ है। कदाचित् आगे भी न हो ।
पर, इसके लिये किसी युग की परिस्थितियों को उत्तरदायी समझना
उचित न होगा । विराट् काव्यों के रूप में प्रागैतिहासिक कालीन
मनीषियों ने, जो थाती मानवता को दी हैं वह आगे आने वाले युगों
तक उसके लिये पर्याप्त है ।
मेरी इस " ऊर्मिला” में पाठकों को रामायणी कथा नहीं
मिलेगी । रामायणी कथा से मेरा अर्थ है क्रम से राम-लक्ष्मण जन्म से
लगाकर रावण-विजय और फिर अयोध्या आगमन तक की घटनाओं
का वर्णन। ये घटनाएँ भारतवर्ष में इतनी अधिक सुपरिचिता हैं कि
इनका वर्णन करना मैंने उचित नहीं समझा । इस प्रन्थ को मैंने विशेष-
कर मनःस्तर पर होने वाली क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का दर्पण
बनाने का प्रयास किया है। रामायणीय घटनाओं का राम, सीता,<noinclude></noinclude>
lkv0fs5ch3ncc9b8wo8dpqebggj65a6
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(छ)
सुमित्रा, कौशल्या, और विशेष कर लक्ष्मण और ऊम्मिला के मनों पर
क्या प्रभाव पड़ा, वे उन घटनाओं के प्रति किस प्रकार प्रतिकृत हुए,
आदि का वर्णन ही इस ग्रन्थ का विषय बन गया है। इस में जो कुछ
कथा भाग है वह गृहीत है-वर्णनात्मक, अर्थात् घटना-विवरणात्मक
नहीं ।
मैंने राम वनगमन को एक विशेष रूप में देखने और उपस्थित
करने का साहस किया है। राम की वन यात्रा, मेरी दृष्टि में एक महान्
अर्थपूर्ण आर्य-संस्कृति-प्रसार यात्रा थी । " ऊर्मिला” में लक्ष्मण के मुख से
जो यह बात मैंने कहलवाई है, वह कदाचित पुरातन विचार वादियों
को न रुचे। पर, जितना भी मैं इस राम वन-गमन पर विचार करता
हूँ उतना ही मैं इस बात पर दृढ़ होता जाता हूँ कि राम की वन-यात्रा
भारतीय संस्कृति प्रसारार्थ, एक महान यज्ञ के रूप में थी ।
मैंने ऊर्मिला को 'जनकनंदिनी' कहा है। कुछ मित्रों ने मुझे बताया
कि ऊर्मिमला जनकदेव के अनुज सांकाश्या के राज कुशध्वज की पुत्री
थीं। इस के सम्बन्ध में मैंने वाल्मीकि रामायण देखी। उस से मुझे ज्ञात
हुआ कि सीता और ऊर्मिला दोनों जनकदेव की ही पुत्री थीं।
वाल्मीकि में श्लोक आते हैं कि जनकदेव ने रघुकुल के गुरु मुनिश्रेष्ठ
वशिष्ठ को सम्बोधित करते हुए कहा-
-
सीता रामाय भद्रं ते ऊर्मिलां लक्ष्मणायच ।
वीर्यशुल्कां मम सुतां सीतां सुरसुतोपमाम् ॥
द्वितीयामूर्मिलां चैव त्रिददामि न संशयः ।
-- मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ अपनी दो पुत्रियों में से वीर्यशुल्का
तथा देवकन्या सदृश सुन्दरी सीता, राम को, और दूसरी कन्या
ऊर्मिला, लक्ष्मण को दे रहा हूँ। यह बात मैं दृढ़ता के साथ तीन बार
कहता हूँ ।
आगे चल करके आदि कवि ने महामुनि विश्वामित्र के मुख से
राजा जनक को सम्बोधित करते हुए कहलाया है कि-
वक्तव्यं च नरश्रेष्ठ श्रूयतां वचनं मम ।
भ्राता यवीयान् धर्मज्ञ एष राजा कुशध्वजः ॥
यस्य धर्मात्मनो राजन् रूपेणाप्रतिमं भुवि ।
सुताद्वयं नरश्रेष्ठ पत्न्यर्थं वरयामहे ॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ज )
भरतस्य कुमारस्य शत्रुघ्नस्य च धीमतः ।
वरयेम सुते राजंस्तयोरर्थे महात्मनोः ॥
- हे नरश्रेष्ठ ! मुझे आप से एक बात और कहनी है। उसे भी
आप सुन लें। यह जो आपके लघु भ्राता कुशध्वज हैं, इन धर्मात्मा के
भी अति सुन्दरी दो कन्यायें हैं । उन दोनों कन्याओं को भी मैं राम के
भाई भरत तथा शत्रुघ्न के लिए आप से मांगता हूं ।
इन अवतरणों से यह स्पष्ट है कि ऊम्मिला राजा जनक की और
माण्डवी तथा श्रुतिकीर्ति जनक के अनुज राजा कुशध्वज की पुत्रियाँ थीं।
आदि कवि ने स्पष्ट रूप से ऊर्मिला को जनक नन्दिनी ही माना है ।
मेरा यह काव्य ग्रन्थ पाठकों के सम्मुख उपस्थित है। यह कैसा
है, इसका निर्णय वे स्वयं करें। इस व्याज से मेरी भारती सीता-राम
और ऊर्मिला-लक्ष्मण का गुण गा सकी- इसी में मैं उसकी सार्थकता
मानता हूँ ।
मेरे अन्य काव्य ग्रन्थों के सदृश, जो या तो प्रकाशित हो चुके हैं।
या हो रहे हैं, यह ग्रन्थ भी प्रकाश में न आता यदि आयुष्मान् पंडित
प्रयाग नारायण त्रिपाठी मेरी सहायता न करते । पाण्डुलिपि से उतर-
वाने से लगाकर पुनरावृत्ति तक के सब कार्यों में चिरंजीवी प्रयाग
नारायण मेरे सजग सहायक रहे हैं। उनके इस अकारण स्नेह से
मेरा रोम-रोम भींजा हुआ है। उन्होंने मुझे जो साहाय्य प्रदान किया
है उसके प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं हैं।
५, विंड्सर प्लेस
नई दिल्ली।
२६ जनवरी, १६५७
बालकृष्ण शर्मा<noinclude></noinclude>
bfs9rwbibc6ddcon2idfeo9unmaipne
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रोत्साहन
चलो, हे मेरी टूटी कलम,
चलो उस ओर किसी के पास ;
छोड़ दो कलियुग की मसि यहीं,
करो त्रेता युग में कुछ वास ;
किसी के हृदय खंड की व्यथा,.
सुनो; कर दो न्योछावर प्राण;
किसी की धीमी-धीमी ग्राह
तुम को कुछ-कुछ म्रियमाण;
करे
अश्रु का विन्दु, शोक का सिन्धु,
जहाँ है उदित, क्षुब्ध,
व्यथा का असि रूपी नव इन्दु,
निर्भरित
उधर को चलो छोड़ भव सिन्धु ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
तुम्हारे पीछे-पीछे
पीछे-पीछे चला-
आ रहा हूँ मैं भी, चंचले,
पुरातन त्रेता युग का मार्ग
हुआ है लोप, निशीथांचले ;
कहीं इस घनी कुहू को देख
न रहना बैठ, न जाना हार,
ढूंढने निकली हो तुम ग्राज
मूक भावों का
ढूंढ लामो उसको तुम, अरी--
पारावार;
लेखनी हो जाओ कृत कृत्य ;
शुष्क कागद के कोनों बीच,
पुरातन
हो उठे नव करुणा का नृत्य ।
३
बाल्मीकि के गूढ़
भाव-भृंगों के मुखरित भुंड,
अछूता छोड़ गये जो पुष्प,
उसी के रस से पूरित कुंड,
विकल हो, ढूँढ निकालो, और
करो पीयूष चरित का पान,
बनो रस - सिक्त सुनाओ अखिल
विश्व को निज रस - सिक्ता तान;
न हो आलस्य, न हो उद्रेक,
ऊम्मिला की ग्रहों को सुना
न लाओ अपने मन में भ्रान्ति,
करुण रस में कर दो कुछ क्रान्ति ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पूज्य तुलसी की माला बड़े-
बड़े मनकों से गुम्फित हुई,
राम-सीता के अविचल भक्ति-
भाव से ही है चुम्बित हुई ;
लेखनी, यह छोटा मनका, न-
कहीं दिखलाई पड़ता वहाँ,
हृदय की प्राकुलता कह रही :
आह ! यह छोटा मनका कहाँ ?
न लाओ बेर, लगाओ टेर,
प्रथम सर्ग
सुनेगी वह मिथिला नन्दिनी,
सुमित्रा माँ की वह प्रिय बहू,
लखन के जीवन की चाँदनी ।
५
कई शत वर्ष गए हैं बीत
सहस्रों की गिनती हो रही ;
सुभग साकेत हुआ है खेत,
हाय! मिथिला शिथिला सो रही;
और वे भव्य भूरि प्रासाद
याद में भी कुछ-कुछ मिट गये ;
किन्तु, लेखनी, आज भी वही
गान हम को तो हैं नित नये ;
इसी से तुम से मैं बहु बार,
कह रहा हूँ--तुम डूबो आज,
अगम सम्पूर्ण भूत के गर्भ--
सिन्धु में सज जीवन के
साज ।
३<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>उम्मिला
६
सुनेगा कौन ? - प्ररी दुर्वृत्ति,
विश्व गायन को किसने सुना?
प्रकृति माता की शीतल पवन-
लोरियों को किस-किस ने सुना?
दुधमुहे शिशु का कन्दन करुण-
कौन सुना है ? देखो अरे,
अनोखी, विकृत, बावली तान-
सदा है शुष्क बुद्धि से परे ;
नहीं होगा यह कोई काव्य,
अरे, यह तो है स्पन्दन मात्र
कहीं यदि काँपा, तो फिर देख,
67
सिहर उठेंगे सारे गात्र ।
कई अव्यक्त भावना भरे-
बज उठेंगे वीणा के
कई प्यारे फूलों से
तार ;
गुँथे-
हिल उठेंगे कीड़ा के हार !
कई कोमल चुम्बन से पगे-
पेंगे नव व्रीड़ा के प्यार ;
हृत्खंड-बेधन-क्षम
कई
होंगे कट्टर पीड़ा के वार ;
लेखनी, टूटी हो ? हाँ, बनी रहो,
ऊम्मिला-पद-पद्मों
सह जाओ यह गुरु भार,
की धूलि
तुम्हें पहुंचावेगी उस पार ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम संग
१
प्रार्थना
देवि, ऊम्मिले, तेरी अकथित गाथा गाता हूँ में;
किंवा तव चरिताम्बुधि-मज्जन के हित याता हूँ मैं
अति अगम्य बलवती लहर है, थाह न पाता हूँ में;
हृदय-शिला पर तव चरणों को, देवि, विठाता हूँ मैं ।
२
सती, मुझे वर दो कि भारती मेरी हो कल्याणी ;
मैं लघु शिशु हूँ, बुद्धिहीन हूँ और निपट प्रज्ञानी ;
वैयाकरणी मैं न, असंस्कृत है यह मेरी वाणी;
किन्तु कृपा की भीख माँगता हूँ, हे लक्ष्मण रानी ।
यह कर्कश रव रुके और में सुनू वही भंकार-
वह स्वर - जिसको नित रोते हैं तव चरणालंकार ;
निपट बली तेरे प्रियतम के धन्वा की टंकार,
और, सती, तव पद नख हर लें मम मूढा हंकार ।
४
कोटि-कोटि कटुता में जीवन कटता है दिन रात ;
जीवन, शुष्क, शूल-कीर्णित है, ग्रो' छिलते हैं गात ;
उद्विग्ना प्रवृत्ति भटकाती मन को सायं प्रात;
किस से कहें ? कौन सुनता है ? किस के जोड़े हाथ ?<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५
जनक नन्दिनी, देवि ऊम्मिले, तू करुणा की मूर्ति;
तब चरणों का ध्यान हृदय को देता है सुस्पूति ;
तेरे आशीर्वचन करें मम इच्छा की सम्पूति ;
भ्रमित चित्त मेरा होवे तव करुण शान्ति की मूर्ति ।
तेरे अटल भरोसे पे यह मैंने श्रोढ़ा भार ;
यही वन्दना तव मृदु चरणों में मेरी इस बार -
ये भाव प्रसून जिन से में गूथगा यह हार,
सूख न जावें; यह माला हो विघ्न रहित तैयार ।
,
w<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम सर्ग
ध्यान
खचित शोक- रेखा है जिसके द्युति विहीन प्राभरणों में,
अलकावली-ग्रथित, श्रीहत हैं कुंडल जिसके कण में,
कथित करुण कथा बहती है जिसके कल-कल झरनों में,
नत हो जा, हे नास्तिक मस्तक, उसके युग श्री चरणों में ।
७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
पुर-प्रदक्षिणा
चलो देखें जनक की राजधानी,
विराग 'रु भोग की नगरी पुरानी
नृपति जिस देश के हैं तत्त्वज्ञानी,
जिन्हें सम हैं ज्वलित अंगार, पानी ।
शिथिल-सी कल्पने, यह पुण्य धाम-
करुणरस मूर्ति का है पितृ-ग्राम ;
ठहर प्राचीर बाहर, एक याम,
करो सुप्रदक्षिणा नयनाभिराम ।
नगर प्राचीभिमुख है 'ब्रह्मद्वार,'
जिसे प्रति प्रात बालातप निहार-
सुमन-से मृदु करों का विमल हार-
मुदित मन दे रहा है बार-बार ।
४
کا
विमोहक
जगन्नाटक सूत्रधार-
सुगूढ़ ज्ञेय तत्त्वों का प्रसार-
सदा क्यों कर रहा है बार-बार ?
यही संकेत करता पूर्व-द्वार ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५
न तुम भूलो कि यह है श्रार्य्य नगरी ;
यहाँ, ऐ कल्पने, हो जा सजग, री ;
निपट संकेतमय है यह सुभग, री;
यहाँ है गूढ़ प्राशययुक्त डगरी ।
६
सुदृढ़ है, शक्तिशाली द्वार यह है ;
प्रतापी राज प्रति की धार यह है :
पुरस्कृत शिल्प विद्या सार यह है ;
धरा-धारी धनुष का भार यह है ।
७
अनेकों कुद्ध रिपुत्रों के दलों को-
दलित करके चखाया कटु फलों को,
वही प्राचीर यह, आर्य-स्थलों को,
| सुरक्षित कर रही है निर्मूलों को ।
८
विपुल शस्त्रास्त्रों से पोषिता है ;
शतघ्नी घोष से उद्घोषिता है ;
प्रथम सर्ग
सुधन्वा धीर नर से ऊशिता है ;
धनुष- भाले गदा से
भूषिता है ।
द्विशत पादावली के अन्तरों पर-
बने हैं शिखरधारी बुर्ज सुन्दर;
जहाँ से नौबतों की चोब
सुनकर -
जनक- रिपु काँपते हैं भीत,
थर-थर ।
ह<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१०
१०
इधर यह 'दक्षिणेन्द्र-द्वार', नव है ;
जनाता चण्ड रवि का खर विभव है ;
विदेही नृपति का यह कीर्ति दव है ;
जलाता जड़ अकर्म्मो का कुरव है ।
११
नृपति ने दिशा दक्षिण द्वार वर को-
निवेदित है किया इन्द्र प्रवर को ;
प्रखर संकेत कर, प्रति आर्य्यं नर को-
दिखाता कर्म्म-पथ शर-चाप धर को ।
१२
पुनीता साँझ को वन्दन समय जब,
जिधर, मुख फेरतीं नर नारियाँ सव
उधर को दीखता 'यम द्वार' है अब ;
कि मानो दीखता है विश्व विप्लव ।
१३
उधर यह पूर्व 'ब्रह्म-द्वार' प्यारा-
दिखा उत्पत्ति-तत्त्वों का पसारा,-
बहाता नव्य रस की गान-धारा ;
इधर 'यम द्वार' ने लय को सँभारा ।
१४
उधर उत्पत्ति है तो इधर लय है ;
उधर जीवन नवल का यदि प्रणय है,
इधर तब क्षुब्ध सरिता शान्तिमय है ;
जनक- नगरी, अहो, निर्भ्रान्तिमय है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम सर्ग
१५
सुपश्चिम द्वार बनवा कर नृपति ने-
समर्पित है किया यम को सुमति ने ;
कि मानों पथ दिखाया समय-गति ने,
सुरति का हाथ पकड़ा या विरति ने ।
१६
उधर है उत्तरीय-द्वार भारी,
सुसेनापति षडानन ध्रुव प्रहारी-
जिसे रक्षित किये रिपु-मान-हारी,-
भगाते हैं व्यथाएं दूर सारी 1
१७
इसे शुभ 'कार्तिकेय-द्वार' कह कर -
नगरवासी सिहाते हैं निरन्तर ;
ध्वजा फहरा रही है यह मनोहर ;
बताती है रणांगन-मार्ग सत्वर ।
१८
सारे,
नगर चहुँ ओर सुन्दर क्षेत्र
मनोहर हरित-सा परिधान धारे,
पवन सँग कर रहे हैं नृत्य
प्यारे
कि मानों जलधि कल्लोलित हुआ, रे ।
१६
कहीं बैठे मुदित हैं भूमि स्वामी;
कहीं वे हो रहे
वृषभानुगामी ;
कहीं गाएँ चराते हैं अकामी ;
मधुर यह स्थान 'गोपुर-धाम' नामी ।
,
११<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>उम्मिला
१२
२०
विमल उपवन इधर को ग्रा मिले हैं;
सुरभिमय पुष्प जिन में ये खिले हैं ;
जुही के भुज समीरण से हिले हैं ;
चमेली - नयन-सम्पुट अध खिले हैं ।
२१
निपट निःशंक विहँगों की प्रवलियाँ-
हठीली चूमती हैं फूल- कलियाँ ;
निनादित हो रही हैं कुंज गलियाँ
चतुर मालिन चुने है फूल डलियाँ ।
२२
थकित -सी, कल्पने, सुप्रदक्षिणा यह-
हुई सम्पूर्ण, लो अब दक्षिणा यह-
चलो देखें पुरी सुविचक्षणा यह-
जनक नृप रक्षिता, शुभ लक्षणा यह ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम सर्ग
१
जनकपुर - प्रवेश
धीरे, रम्ये, जनक नगरी, सौख्य सम्पत्ति वाम,
तेरे वासी सतत रत हैं ईश-सेवाभिराम ;
कोई दृग्गोचर नर नहीं हो रहा दुष्ट, वाम ;
शान्ते, तेरी सुभग धवला देहली में प्रणाम ।
या पॅठी तू, चकितमति, हे, चित्त की वृत्ति मेरी
खोई-सी क्यों इधर फिरती दर्शनौत्सुक्य- प्रेरी ?
खोले आँखें, मुदित मन हो, देख शोभा घनेरी-
रम्ये, होवे हृदय-तल की भावना पूर्ण तेरी ।
३
प्राचीरों के सुदृढ़ गढ़ को विज्ञ कारीगरों ने-
रक्खा है क्यों विलग पुर से, शिल्प-विद्याधरों ने
क्यों छोड़ा है नगर-गढ़ के बीच सुस्थान खाली ?
कैसी वीथी परिधि यह है वेदियों से सँभाली ?
ब्रह्म-ज्ञानी जनकपुर की शुद्ध-सी मेखला है ?
या नारी की मृदुल कटि की धर्म की श्रृंखला है ?
किंवा माला जनक- यश की शुभ्र पुष्पों मयी हैं ?
या लोगों के विमल हिय से गान-धारा बही है ?
१३<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५
| मन्त्रोच्चारी. सु-पट पहने, ब्राह्मणों की कतारें-
प्रातः सायं पुर-परिक्रमा को यहाँ पाँव धारें ;
रम्या वीथी यह मुदमयी 'मंगलावीथि' नामा-
दुःख-क्लेशोद्भव भय-व्यथा मेटती है श्रकामा ।
६
क्यों जाते हैं प्रतिदिन सभी पौर ये घूमने को ?
क्यों जाते हैं नगर भर की धूल को चूमन को ?
ये संकेताक्षर कठिन हैं, गूढ़ भावों भरे हैं !
सीधी-सादी यह परिक्रमा मूढ़ता के परे है ।
७
आकृष्टा हो जिस नियम से भू सदा घूमती है-
संलग्ना हो जिस नियम से डालियाँ झूमती हैं-
गूढ़ ज्ञानी, जनकपुर में, हैं वही देखते ये,
विश्वों की हैं द्रुत परिक्रमा-शृंखला पेखते ये ।
८
प्राची से, जो सुपथ, नृप का पश्चिमान्त प्रदेश-
बाँधे है, ज्यों ललित दुलही प्रेम की गाँठ शेष;
शोभा में है अमित, वह है 'राजमार्ग' प्रसिद्ध,
व्यापारी के सकल जिससे कार्य-व्यापार सिद्ध ।
ह
सींचा जाता नित जल-कणों से सदा राजमार्ग ;
मीठी-मीठी कलित कलिका गंध से पूर्ण मार्ग ;
क्या ही शोभामय यह पुरी है विदेही, अनंगा,
मानो भू में, ग्रहह, प्रकटी प्रान आकाश-गंगा ।
१४<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०
भारी-भारी अतुल रथ से मार्ग है खूब पूर्ण,
धीरे-धीरे शकट चलते हैं किए भूमि चूर्ण ;
हस्त्यश्वों के विकट रव से गूंजती हैं
शस्त्रास्त्रों की खर चमक है या कि विद्युच्छटाएँ ?
११
प्रटाएँ
प्रथम सर्ग
इन्द्रद्वारात् प्रसृत पथ है उत्तरीया दिशा में, -
फैलायों, ज्यों स्वरित रव हो मूर्च्छिता-सी निशा में ;
देखो, है 'वामन सुपथ' की शान्त शोभा अखण्ड,
शिल्पी का है यह सुखद-सा शान्तिदा कीर्त्ति दण्ड ।
१२
रम्योद्यानों मय यह पुरी शोभती यों अनूपा
मानो कोई नवल तरुणी मोद-मुग्धा, सरूपा, अलंकार
क्रीडोत्कण्ठामय चपलता की हठीली लरी-सी,
फूलों वाली हरित लतिका से सजी वल्लरी-सी ।
१३
धीरे-धीरे पवन बहती, गुल्म श्री' पुष्प नाना-
उद्ग्रीवी हो तरणिवर को चाहते हैं बुलाना ;
स्निग्धच्छाया मय सघन से नीड़ से बोलते हैं-
पक्षी बैठे, मुखरित, ग्रहो, माधुरी घोलते हैं ।
१४
ले आए हैं सकल जग की स्नेह की येपिटारी,
आ बैठे हैं जनकपुर की
क्यों जाता है, पथिक, अब
सारे त्रेता युग मधुर की
वाटिका में विहारी ;
तू दूसरी ठौर ? आ, रे,
माधुरी है यहाँ, रे !
१५<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१५
| डाली-डाली मधुर स्वर से गूंजती है निराली ;
मूर्च्छापूर्णाकुल झपकती ग्रांख में है सुलाली ;
सद्यःस्नाता सदृश, टहनी बिन्दुयों से भरी है,
मानो धीरा अचल वसुधा अर्घ्य ले के खड़ी है ।
१६
तुष्टा हृष्टा जब चहकतीं पक्षियों की कतारें-
तो एकाकी भनक उठतीं कल्पना की सितारें;
सारे वासी इस नगर के, नादिता गान धारा-
की तानों में, मुदित करते पुण्य सुस्तान प्यारा ।
१७
क्यारी- क्यारी मधुरस भरी यों सुहाती सलौनी,
अलंकार ज्यों होली के नवल दिन में रंजिता, रंग लौनी,-
भ्रान्ता कान्ता, मधुरस भरी, हो सुहाती सुरम्या,
भू की भव्या सरस सुषमा डोलती हो अगम्या ।
अलंकार,
न्यारी-न्यारी
१८
कुंजों-कुंजों किरण कर से, रीझ के अंशुमाली-
पा जाते हैं सुमृदुल जुही की वही श्रोष्ठ - जाली ;
फूली फूली विपिन भर में डोलती है चमेली
मानो मुग्धा, श्वसुर गृह में, पा गई प्रेम-बेली ।
६१
गुनगुन-मयी तान-भंकार पूर-
ऐंठे से ये अलिगण सभी गान-भंकार पूरे-
उन्मत्तों के सदृश फिरते बाग में लुब्ध यों हैं,
मानों योगी विरत रस में लीन सम्मुग्ध ज्यों हैं ।
१६
1<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०
चौड़े चीड़े, सुखद गृह-से, बाग में स्थान हैं ये-
मानों धारे थकित नर के शान्त-से प्राण हैं ये ।
माली माला ग्रथित करते हैं यहाँ मोहनी-सी,
स्नेहाकृष्टा विमल नवला ग्रीव में सोहनी-सी ।
२१
प्रथम सर्ग
स्वच्छा वापी, विपुल जल से, प्रेम की गाँठ जोड़े,-
उत्पीड़ा से जनित भव की भ्रान्ति को दूर छोड़े,
बैठी यों है जनकपुर की प्रीति से रीति जोड़े,
जैसे कोई अविवल सती नेह का वस्त्र ओढ़े ।
२२
आ जाती हैं पुरजन प्रिया नेह में ये पगी-सी,
गोरी वाहें अमल सुपटावेष्टिता हैं, ठगी-सी ;
मानो कोई लचक लतिका भक्ति के
पुष्पाविष्टा, मुदित मन हो, नाचती
भाव धारे,
कुंज-द्वारे |
२३
प्रातः सायं पुरजन यहाँ, भक्ति से वन्दना को,
शान्तिः सेवी शमन करते चंचला स्पन्दना को-
आते हैं; ज्यों विकल बछड़े गाय के,
रज्जु तोड़े
दौड़े आते भव-विभव का व्याधि-सम्बन्ध छोड़े ।
२४
ये वापी, ये कमल सर, ये रम्य-से कूप नाना,
कल्लोलों से कलित करते ग्राम्य के रूप नाना ;
मानों सारी जनक नगरी, प्रेम की जल्पना को-
पानी द्वारा गदित करती कारुणी कल्पना को ।
१७<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
आं
२५
ये देखो, हैं जनकपुर की उच्च अट्टालिकायें ;
शिल्पयार्यो की स्वकर ग्रथिता ये बड़ी मालिकायें;
प्रांखें देखें इस विभव की आर्य-प्रभा सलौनी,
मानी, रक्षारत, प्रिय, गुणी भूप की कीति छौनी ।
२६
आर्यों के ये सुखद गृह हैं स्वच्छता के सुधाम ;
स्निग्धा, मन्दा सतत बहती वायु है प्रष्ट याम
चौड़े वातायन सुभग से, झांकते अंशुमाली,
चन्द्र ज्योत्स्ना, कलित कलिका डाल जाती निराली ।
२७
पूता वेदी चतुर कर ने प्रांगणों में गढ़ी है, -
मानो याञ्चा, नत शिर किये, हाथ जोड़े खड़ी है ;
प्रार्थी नारी नर जब यहाँ बैठते आस-पास,
नक्षत्रों का तब प्रकट हो दीखता भव्य रास ।
२८
सामाजीय प्रगति रथ के जो यहाँ सारथी हैं-
पुण्यश्लोका गहन जिनकी पुण्यदा भारती है-
वे हैं सुब्राह्मण दुव्रती, धर्मवारी, तपस्वी,
योगाभ्यासी, विगत कामा, तत्वदर्शी, मनस्वी ।
२६
लम्बे-लम्बे सबल भुज से देश-स्वातन्त्र्य प्यारा-
रक्खे हैं जो अभय बन के, सींच हृद्-रक्त-धारा;
वीरों में हैं मुकुटमणि के क्षत्रियों के सु-झुण्ड ;
छेत्ता हैं वे प्रखर प्रति से दस्युओं के नृ-मुन्
१८<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०
धन्वावारी यदपि, फिर भी हैं न ये क्रूर दुष्ट,
धारे हैं ये निज हृदय में पूर्ण निर्लोभ तुष्ट,
सौम्या निष्ठा इस दृढ सुहृद्देश से यों वही है,
पाषाणों को, त्वरित सरणी, तोड़ के ज्यों गई है।
३१
प्रथम सर्ग
व्यापारी हैं, कृषक वर है, वैश्य ये द्रव्य वाले,
लक्ष्मीसेवी, सकल जग की वाटिका को सँभाले ;
ले-ले आते शकट भर के दूर से वस्तु सारी,
ज्यों फूलों से मधु, भ्रमर हैं खींचते हो सुखारी ।
३२
ये वे है जो सतत रत हैं--पूज्य लेवी बने हैं,
वृक्षों, पुष्पों सदृश नित सेवा-रसों में सने हैं;
देते हैं ये सकल जग को गूढ़ शिक्षा सुरम्य;
'सेवा धर्मः परम गहनो योगिनामप्यगम्यः' ।
३३
उत्फुल्ला हैं, मृदुरस सनी है गृहस्वामिनी ये ;
प्रभू का अमल धन है मञ्जु-सी भामिनी ये
उत्संगों में सतत अपने देश की कीर्ति-लाज-
बैठाए ये नित कर रही हैं घरों में स्वराज ।
३४
सौन्दर्यो के अमिय-वन के प्रम्र की कोकिलाएँ.
कर्त्तव्यों के कटिन स्वर में तान को हैं मिलाए,
वीरों के हृत्सर विमल की हैं निराली तरंगे,
वेदों के सुस्वर क्वणित की हैं अनूठी मृदंगें ।
१६<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३५
हो जाता है नगर इनके श्री मुखों से प्रतिष्ठ;
छा जाती है सुखद सुषमा, दूर होता अनिष्ट ;
छाई मानों जनकपुर में ये नभो-तारिकायें-
आई हैं ये गलित करुणा से युता दारिकायें ।
३६
शिक्षा पाते
माताएं हो मुदित शिशु के खेल को जोहती हैं ;
मीठी-मीठी सरस बतियाँ चित्त को मोहती हैं ;
वाल-क्रीड़ा-मय भवन हैं, सौख्य-सौंदर्य-सिक्त,
आयों के हैं सदन शिरसा बाल-शोभाभिषिक्त ।
सुगुरुकुल
३७
में देश के ये कुमार :
कैसा छाया सघन घन-सा शिक्षकों का दुलार ?
गुर्वाणी की यह बह रही वत्सला प्रीति धार,-
स्नानाकांक्षी पुर नगर के बाल
आये अपार ।
३८
ऋग्वेदीय स्वरित रव से पूर्ण है
सुप्रदेश ;
वेदांगों के जटिल विषयों की कथा है विशेष ;
विद्यार्थी की स्फुटित रसना संस्कृता हो रही है ;
प्रारब्धों की सुदृढ़ अथवा शृंखला खो रही है ।
३६
बैठे हैं यों गुरुजन यहाँ ब्रह्मचर्याश्रमों में ;
छाई हो ज्यों जल-घन-घटा राम गिर्याश्रमों में,
छोटे-छोटे विमल बटु हैं चातकों
बूँदों-बूँदों शमन करती प्यास हैं
२०
की कतारें-
ज्ञान-धारें ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४०
ग्राम, देखें अब जनक के राज्य के सूत्र नाना;
ढाँके हैं जो जनपद महा रूप धारे विताना;
राजप्रासाद निकट महा मन्त्रणागार दिव्य,
सामन्तों से, विबुध जन से हो रहा पूर्ण भव्य ।
४१
प्रथम सर्ग
धीमान् मन्त्री गण सकल हैं कार्य में पूर्ण दक्ष,
निस्वार्थी हैं सतत रखते राज्य सेवा समक्ष ;
धर्म प्राणा सवल जनता की मनोकामनाएँ
होतीं पूरी सकल सुप्रजा की मनोभावनाएँ ।
४२
तेजस्वी है सुजनपद का युद्ध सेना विभाग-
ऐसा तीव्र प्रखरतम है मूर्तिमान् सा निदाघ-
जो वैरी के सजल सर को सोखता है नितान्त,
आर्यों का है विमल धवला कीर्ति का मंजु कान्त ।
४३
हैं अध्यक्ष प्रमुख इसके विग्रहों में यशस्वी, -
धारे हैं वे सचिव पद को, धीर हैं वे मनस्वी,
युद्धों में वे सतत रखते धर्म को हैं समक्ष,
रम्या 'जै' की मधुर ध्वनि हो पक्ष में या विपक्ष ।
४४
मन्त्री संज्ञा परिचित किये है जिन्हें वीतराग, -
हैं धारे जो निपुण कर में सन्धि वाला विभाग,
-
वे ये मन्त्री सचिव वर के संग यों सोहते हैं ।
जैसे - सन्ध्या - जल कण, शिरस्त्राण को मोहते हैं ।
२१<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अलं
ऊम्मिला
४५
साम्राज्यान्तर्गत विषय को देखते हैं अमात्य,
औदीच्यों की सकल सुविधा, ग्राम्य ये दक्षिणात्य-
पौर्वात्यों के नगर वन श्री' पश्चिमी वीथियाँ ये,
सारी बातें, द्रुत सुलझतीं गूढ़ सी गुत्थियाँ ये ।
४६
राज्य-श्री को निरत चित से गोपते हैं सुमन्त्र,
निस्वार्थी हैं नित यह चलाते हो राजतन्त्र-
मानो विश्वम्भर सजग हो पोषते हैं सुविश्व-
श्री लक्ष्मी से सतत नित संतोषते हैं सुविश्व |
४७
त्रेता की है परम महती कीत्ति-गाथा अपार;
जावेगी तू कव तक, कहाँ, कल्पने, हे असार ?
भूली-भूली अब तक फिरी है कहाँ से कहाँ तू
क्यों ग्राई थी इस नगर में ? डोलती क्यों यहाँ तू ?
४८
?
तूने, मुग्धे, अब तक न खोजा है निज स्वामिनी को,
एरी बौरी, हृदय-नभ में
मारी-मारी न फिर अब
राज-प्रासाद मधुमय के,
४६
क्यों भरा यामिनी को ?
तू चंचले, श्रा, चलें री,-
7
अञ्चले आ, चलें री ।
। ऊँचे-ऊँचे शिखरवर ये शोभते हैं निराले ;
या सोने के शुभ कलश हैं चाँदनी में सुढाले ;
सिंह-द्वारे सज कर खड़े अस्त्रधारी सुवीर-
क्षत्राणी के सजग सुत ये युद्ध के शूरवीर ।
२२<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५०
शिल्पी का, हाँ, यह महल है चातुरी का निशान,
आय्यवितिय सुचतुरता का अनोखा वितान;
भोगों का सम्पुट यह वना नेह का नव्य हार:
योगी की है यह गिरि-गुहा, ज्ञान का पुण्य द्वार ।
५.१
प्रथम सर्ग
जीवन्मुक्त प्रखर नृप के योग की तीव्र धारा, -
स्नेहाविष्टा यह वह रही यों अनूठी प्रपारा, -
ज्यों सूखे से तरुवर महाश्वत्थ की एक डाली-
पत्राविष्टा नवल ऋतु में भूमती हो निराली
५२
ऐसी पुण्या मधु सुरभि में, कल्पने, जायगी तू.
तेरी आशा नवल लतिका, हाँ, हरी पायगी तू.
माला गूंथे मत सुमन की; साज कैसे सजगे ?
पावेगी जो मृदु चरण तो फूल तेरे लजेंगे ।
प्यारे चरण मंगल करण
आ रही ह कल्पना मेरी तुम्हारे शरण
प्यारे चरण मंगल करण
२३<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>धविवित्राण
२४
प्रासाद- प्रांगण में
१
रुन-झुन, रुत-भुन, नन्हीं-नन्हीं पैजनियाँ भंकारें,-
चरण-चलन की प्रांगण भर में फैल रही गुंजारें;
किलक - क्लिक मधु स्रोत बहाती हैं विदेह की ललियाँ,
प्रात पवन में चिटखी हैं दो छोटी-छोटी कलियाँ ।
ये दो मुकुल जनकरानी की हैं जीवन प्रतिछाया,
वीतराग मिथिलेश - हृदय की ये हैं दोनों माया,
सीता और ऊम्मिला मानों सरस अमृत के कण हैं,
मौन प्रणय के पंचम स्वर में उद्गीरित गायन हैं ।
३
'
बाल-दशा मति-मुग्धाम्रों की, ग्राम छवि अवलोकें,
आम्रो, प्यारे चरण-चिन्ह को चूमें इन विमलों के,
मधुरी-मधुरी, विश्व मोहिनी बतियाँ इनकी सुन लें,
हास-पुष्प - कीर्णित हैं, आश्रो, इन फूलों को चुन लें ।
४
काले-काले, लम्बे-लम्बे, केश-कलाप घने-से-
उड़-उड़ कर समीर से क्रीड़ा करते प्रेम सने से, -
मानों गन्ध- नुब्ध सर्पों के कृष्ण झुण्ड मतवाले-
नाच रहे हैं, लोट-पोट हो, सुन्दर प्रातःकाले ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५
प्रथम सर्ग
तरल तरंगित चिकुर-जाल यह कोमल और अमल है, -
तन्तुवाय के सूत्र - जाल सा अतिशय मृदुल, चपल है,
किसने एक-एक कुन्तल की यह बारीकी पेखी ?
ज्यामितिज्ञ की मनः कल्पना- रेखा जिस ने देखी ।
६
पास-पास विष्टरासीन जब ये दोनों होती हैं-
शुक्ति सम्पुटों में तब भासित होते दो मोती हैं ;
किंवा जनक - भवन में नभ से मिथुन राशि आई हो,
अथवा दामिनि की दो किरणें पास-पास छाई हों।
७
जब दोनों वेणियां परस्पर उड़कर ! जुट पाती हैं-
तब कृष्णा यमुना की गुथ दो धारायें जाती हैं,
या दो कुहा निशायें करतीं आलिंगन लुब्धा हो, -
या दो परछाँही हैं भुज भर भेंट रहीं मुग्धा हो ।
८
सौम्य ललाट- शुभ्रता में है शुचिता खेल रही यों-
श्वेत कमल में अमल धवलता रह-रह खेल रही ज्यों,
भाल देश के ऊर्ध्वभाग में केश-वर्त्तृला-रेखा-
शोभित है ज्यों सान्ध्य-क्षितिज में अन्धकार की लेखा ।
ह
जब ललाट पर अलकावलियाँ उड़-उड़कर प्राती हैं-
आँख मिचौनी तब केशों में मानों छिड़ जाती है ;
केश-पुंज-वेष्टित ललाट ये यों शोभित होते हैं-
ज्यों विहाग के स्वर ऊषा की गोदी में सोते हैं ।
२५<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
अलं
अलं
२६
१०
ये चारों ही चपला ग्राँखें यों दौड़ी फिरती हैं,-
ज्यों गिर्योत्संगों से चपला धाराएँ गिरती हैं,-
शिशु-क्रीड़ा के निश्छल भावों की यह अविरल धारा-
वह वह कर जीवन के दुख को कर देती है न्यारा ।
११
भोली सी ये चार अँखड़ियां डोल रहीं आँगन में,
फूली फूली आनन्दित हैं फिरती इस प्रांगण में,
मानों वेदों की श्रुतियाँ हैं श्रवण छोड़ कर आई,-
अथवा चतुष्कामनाओं ने अपनी छटा दिखाई ।
१२
जनकप्रिया के मातृ-हृदय की ये आँखें लाडिलियाँ-
भक्तिप्रेम के यज्ञ-कुण्ड की हैं घृत प्राहुति पलियाँ,
श्यामा खचित भ्रू लताओं ने नयनों को जकड़ा है,
चंचलता के मन में मानों मोहन पाश पड़ा है ।
१३
आँखों के द्वारे कुछ कुछ है कृष्ण लोम की शोभा,-
पक्ष्में, मानों, सम्मार्जनियां बन आई निर्लोभा,
पलकें जब-जब पती हैं तब, मानों दो-दो तारे,-
बार-बार, मेघावृत होकर चमक रहे हैं न्यारे ।
१४
लम्बी-सी सुडौल नासा में मुक्ता लटक रहे हैं,
अधर लालिमा से रंजित ये मोती मटक रहे हैं,
मानों मानसरोवर-तीरे राजहंस-हंसिनियाँ-
मुदित पान करती हैं सुन्दर मुक्त प्रेम की कणियाँ ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५
प्रथम सर्ग
इस जोड़ी के अवरों पे है लाली राज रही यों-
प्राची के मस्तक पर कुंकुम-विन्दी भ्राज रही ज्यों,
श्रोष्ठ चतुष्टय पतले-पतले शोभित यों होते हैं-
मानों ढांपे दशन- मोतियों को रक्षक सोते हैं ।
१६
;
जब विकसित होती हैं दांतों की ये शुभ्र अवलियाँ-
तब उद्यानों में सकुचाती हैं सब नूतन कलियाँ
हास पाश जब फैलाती हैं ये दोनों सुकुमारी-
तब अशक्त-सी बंध जाती है जनक-विराग खुमारी ।
१७
कौन यहाँ से चला जायगा भवसागर तरने को ?
कौन अगस्त्य सोख सकता है इस छोटे भरने को ?
किसका है सामर्थ्य करे जो उल्लंघन यह सीमा ?
कहाँ छुपा है विरति राग वह, जो न पड़ेगा धीमा ?
१८
सीता के ताटक, ऊम्मिला की वह सुन्दर नथनी-
दूर फेंक देगी विदेह की वह विराग की कफनी ।
अखिल विश्व के पितृ-हृदय को मोहित कर सकती है,
वह वत्सलता है जो पत्थर लोहित कर सकती है ।
१६
खेल-खेल में शिर दोनों हिल जाते हैं मुदमय हो,
तब चारों कुण्डल हिलते हैं, -ज्यों मछली गुणमय हो,-
तड़प-तड़प कर प्रकटाती है निज यि की व्याकुलता ।
कहो, कहीं देखी है ऐसी शोभामयी विपुलता ?
२७<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२८
२०
गोल-गोल इन गालों की है अरुणाई कमनीया,
विश्व रचयिता के प्रमोद की गेंदें हैं रमणीया ;
या बैठी है शतपत्री की इन में सब पाटलता, -
मिथिला की राशी के हृत्तल की सारी कोमलता ।
२१
जब मधुरी मुसक्यान छबीली, मुख पर छा जाती है-
तब मृदु गण्ड-तरंग अनोखी छटा दिखा जाती है ।
इन छोटे मधुरस - कूपों की दुर्गम गहराई है-
हास- देश से हँसी अमिय-घट भरने को आई है ।
२२
गोरी-गोरी, छोटी-छोटी बातें
छोटी-छोटी बाहें झूम रही हैं,
मृग- शावक मण्डली उन्हें हो मोहित चूम रही है !
माता का ये कण्ठहार हैं चारों भुज वल्लरियाँ,
जनक देव ने रीझ सुनयना को दी हैं ये लरियां ।
२३
सीता, श्री ऊम्मला बहन के डाल गले में बहियाँ,
-
पुलकित हो बोली, मानों नव रस की बरसी फुहियाँ,
"प्यारी बहन ऊम्मिले, तुम हो मेरी अच्छी रानी,
आज सुनाओ तुम अच्छी सी मुझको एक कहानी ।"
२४
'सीता जीजी, तुम्हीं कहो कुछ पहले नई कहानी,
देखो, आँख मींच कर बैठी हूँ मैं बन कर ज्ञानी-
जैसे तात बैठते सुनने पूत वेद की गाथा, -
वैसे ही बैठी हूँ सुनने आज तुम्हारी बाता ।”<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अल
अलं
२५
प्रथम सर्ग
यों कह कर ऊम्मिला ध्यान में मग्ना बैठ गई जब-
सारी वाल-चपलता मानों हो एकत्र गई तब ;
देने लगी चुनौती मानों धीर भावनाओं को, -
ध्यानी के उन्नत ललाट की सहज सांत्वनाओं को ।
२६
कभरने लगी उसको हँस-हँस सीता सुकुमारी,
और, अवल-सी रही कनिष्ठा धीरा जनक दुलारी ;
"सीता जीजी, "यों आँखों को मूंदे-मूंदे बोली-
"कथा कह रही हो कि खेलती हो तुम मुझ से होली ।"
२७
चुटकी से उसके गालों को सीता ने तब थामा,
वचनावलियाँ उच्चारित की उस ने ये अभिरामा,
"खोलो ग्रांख ऊम्मिले, तुम पर जाऊँ मैं बलिहारी,
सन्ध्या करने को तो मैंने कहा नहीं था, प्यारी ?
२८
एक कहानी के बदले यह सन्ध्या क्यों करती हो ?
ऐ, री ढीठ, क्यों न मम बातें निज मन में धरती हो ?"
| सुन सीता के वचन ऊम्मिला ने निज आँखें खोलीं,
मानों छोटी-सी हरिणी ने खोली आँखें भोली ।
२६
बड़े चाव से सीता उस से बोली प्यार पगी-सी,
मानों रह-रह कर होती है जागृत लगन लगी सी,
"वहन ऊम्मिले, चलो खेलने चलें अन्तरुपवन में,
माँ के लिए फूल तोड़ेंगी हम तुम उस उपवन में ।'
w
२६<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३०
३०
"जीजी, माँ उन सब फूलों के हार गथ डालेंगी,
तात चरण को माला देंगी, वे निज व्रत पालेंगी,
एक बात मुझको बतला दो मेरी जीजी रानी-
तात चरण प्राते हैं तब क्यों हँसती माँ कल्याणी ?
३१
मुसका कर माँ अपनी माला क्यों उनको देती है ?
फिर उन में से एक मांग कर आप पहन लेती हैं ?
एक बार मैंने माँ से यह बात पूछ जब ली थी,
तब बस उनने मेरी चुम्मी जल्दी से ले ली थी ।
३२
किन्तु चूमकर, सुनो, रंच भी मुझे न बात बताई,
मुझसे कहा, अनोखी है, री, तेरी यह पगलाई !
इस में क्या पागलपन है, री जीजी, तुम्हीं बता दो ?
माँ की इन करतूतों का तुम मुझ को हाल जता दो ।"
३३
सीता यह सुन उठी खिलखिला, मानों बिखरे मोती,
खिसक गई मस्तक से छोटी सी वह शुभ्रा धोती,
"सुन प्यारी ऊम्मिले, मुझे ये बातें ज्ञात नहीं हैं,
माता ने मुझको भी तो ये बातें नहीं कही हैं ।"
३४
यों आपस में बातें करती चल दीं दोनों बहनें,
रूप रंग में हैं समान, ये विदेह गृह के गहने,
उपवन में दोनों बहनों की जब आ बैठी जोड़ी,
तब फूलों में लगी परस्पर होने होड़ा-होड़ी ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम सर्ग
३५
कहने लगा गुलाब,–“गुलाबीपन ? यह तो मेरा है," प्रकृतिचित्र
बोला कमल-"नेत्र विस्फारण, क्या यह भी तेरा है ?"
जुही चहकने लगी- "अहो, यह कोमलता किसकी है ?"
पारिजात बोला- “स्वर्णीया रेखा यह जिसकी है ।"
३६
विहगों में भी होड़ लग गई वहाँ अतीव श्रनूठी, प्र.नि
शुकसारिकादि विहगावलियाँ ग्रापस में सब रूठी,
"मेरा है यह रव" -यों मैना बोल हुई मतवाली,
"यह चापल्य ? - बतादे तू ही रे उपवन के माली-"
३७
;
यों कह खञ्जन लगा फुदकने पत्तों डाली डाली
पिक बोला- " मैं ने ही तो यह कण्ठ-ध्वनि है ढाली,"
सारे उपवन में वृक्षों से चहके बुन्द बिग के,
स्वागत-सूचक जय-ध्वनि निकली कण्ठों से सब खग के ।
३८
प्रति डाली का फूल किये था अर्पण अपने मन को,
इन कर कमलों में देने को उत्सुक था निज तन को,
प्रति कुञ्जों से यही भावना मयी तान उठती थी,
श्रात्म-निवेदन की मंगलमय गान धार लुटती थी ।
३६
उड़ आते निर्भीक खजनों के वे दल चंचल थे,
प्रकटाते कन्धों पर बैठे-बैठे प्रेम अचल थे ;
कभी नासिका देख ऊर्मिला की सकुचाता शुक था,
सीता के नयनों से खञ्जन को होता कुछ दुख था ।
प्र.
३१<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४०
| पर्यकों पर बैठ गईं वे दोनों इस उपवन में,
संस्कृत भाषा मानों लावण्यों की जोड़ी उदित हुई कानून में,
জান
समाप्त-शैली
३२
सीता - भुज-वेष्टिता- ऊम्मिलाऽविष्टा- सीता
एक दूसरी से होती थीं शोभित दोनों
४१
मुग्धा, -
लुब्धा ।
"देखो जीजी, एक कहानी माँ ने मुझे कही थी,
एक कपोती जब उपवन में उड़ उड़ खेल रही थी;
माँ आई थीं कुसुम-चयन को सँग आई में भी थी,
तब यह कथा सुनाई थी, में गोदी में बैठी थी "
४२
वचन ऊम्मिला के सुन सीता हो उत्फुल्लित बोली-
मानों डोल उठी उपवन में पञ्चम स्वर की टोली-
"अच्छी है ऊम्मिला, कहेंगी मुझसे वे सब वतियाँ-
जैसे चकई कथा सुनाया करती सारी रतियाँ ।"
४३
"जीजी, मैं तो पहले तुम से सुन लूँगी कुछ बातें,
तब अपनी रसना खोलूंगी, जान गई ये बातें,-
तुम सुन-सुन कर चुप हो जाती, मुझको नहीं बताती,
एक कहानी कहने में तुम मुझसे हो सकुचाती ।"
४४
तब सीता निज मृदुल
ओष्ठ द्वय को प्रति धीरे- धीरे-
खींच ले गई बहन ऊर्मिला के कर्णाम्बुधि तीरे,
और कहा कुछ, जिसको सुन कर कनीयसी मुसकाई,
'मानों भ्रमरगीत को सुनकर कलियाँ हों हरखाई ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४५
"ग्राहा ! कहो, अरो जीजी, तुम यह तो कया कहो, री,
कहो, कहो, मत देर लगायो, बातों में न बहो री ;
फिर में, अहा, सुनाऊँगी, री, तुमको एक कहानी,
जिसको सुन, तुम हो जायोगी जीजी, पानी-पानी । "
४६
प्रथम सर्ग
“सुन रानी ऊम्मले कई सौ बीत चुकी हैं वरसें-
युद्धोद्यता एक वाला तब निकली थी निज घर से,
तात चरण ने हो प्रसन्न जो कथा कही है मुझसे -
वही कह रही हूँ मैं, मेरी वहिन, ऊम्भिले, तुभसे ।
४७
पौर जनपद का प्रिय सुयशी एक नृपति नरवर था,
शुभ गान्धार देश पर उस का शासन अति शुभ-कर था;
दुष्ट वैरियों के दलने में सूर्य समान प्रखर था,
प्रजा पालने में वह राजा पूरा इन्द्र प्रवर था ।
४८
एक सर्वगुण सम्पन्ना थी उसकी अच्छी रानी,
सफल राज्य में सींच रही थी वह करुणा का पानी,
लहराती थीं प्रजा जनों की मनोवाञ्छायें यों-
इन्द्रलोक में देवगणों की सब आकांक्षायें, ज्यों ।
४६
सब ओरों से पर्वत माला घेरे थी जन-पद को,
माता के समान, रखती थी दूर सदा कुविपद को,
शुभ्र हेम-हिम से आच्छादित उसकी शिखरे सारी,
- नवल उषा उन पर मोहित हो जाती थी बलिहारो ।
,
३३<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३४
५०
स्वर्ण छटा से जब आलोकित होती पर्वत श्रेणी,
तब मानों रवि किरण गूंथती थी उसकी शुभ वेणी,
पर्वत माला अपने हिय का हिम पिघला पिघला कर,
सूर्य देव को जलार्ध्य देती थीं हिय को विकसा कर ।
५१
गा कल-कल-विभास-स्वर भरने सब दौड़े फिरते थे,
एक दूसरे के श्रङ्कों में हो प्रसन्न गिरते थे ;
उस पार्वत्य प्रदेश-भूमि में नित ऐसी लीलायें,-
नृत्य सदा करती थीं होकर प्रति क्रीड़ा शीलायें ।
५२
रंगमञ्च गान्धार देश था चिर नर्तकी प्रकृति का,
जहाँ खेल होता रहता था प्रकृति नटी की कृति का,
दुर्गम छोटे-छोटे पर्वत मार्ग अनेक खचित थे-
मानों
भूवर के ललाट पर चिन्ता - चिन्ह रचित थे ।
५३
पर्वत पादस्था उपत्यका शोभित यों होती थी-
आरोहण की लय अवरोहण में मानों सोती थी ;
पर्वत की शुभ्रता और भू की कालिमा निराली, -
मानों श्वेत कृष्ण केशों की बनी हुई थी जाली ।
५४
ऊपर से भरने गाते थे, नीचे से सब पक्षी,
मानों लगा रहे थे प्राणों के पण आन विपक्षी,
आँख फाड़ कर देख क्या रही हो, ऊम्मिला सलोनी ?
कथा सुन रही हो कि नहीं, री, तुम छोटी सी छौनी ?"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५५
"जीजी, दो-दो काम कहो मैं कैसे करूँ ? बताओ ?
कथा सुनू ? या शोभा देखूं ? यह मुझ को समझाओ;
ऐसी-ऐसी बड़ी-बड़ी ये बातें तुम ने जानी ?
जीजी, तुम तो बन बैठी हो बस पूरी गुर्वाणी !
५६
जब तुम झरने, फूल, पक्षियों की बातें करती थीं, -
जब तुम पर्वत- शोभा कह कर मेरा मन हरती थीं, -
तब मैं समझ रही थी मानों तात चले आये हैं-
कह-कह कर ये बातें मेरे मन को उलझाये हैं ।
५७
"
"मैं जब अच्छी कथा कह रही होती हूँ तब तुम यों-
सदा, ऊम्मिले, बीच-बीच में बकती जाती हो क्यों ?
मैं क्या करूँ ? तात ने जैसी बातें मुझे बताई -
वे सब मम हिय में चित्रित हो आज उभर कर आई ।
५८
अब न बीच में गड़बड़ करना, तुम अब सुनती रहना-
प्यारी-प्यारी यह छोटी सी सारी गाथा, बहना !
हाँ, तो में क्या कहती थी ? हाँ, हाँ, गान्धार नगर में-
राज्य कर रहा था नृसिंह इक राजा उस प्रान्तर में ।
५६
उस राजा के एक कुँवर था, और एक थी कुँवरी,
सुनती हो ? " - "हाँ, एक कुँवर था और एक थी कुँवरी । "
"राजा शिक्षायें देता था शास्त्र शस्त्र की उनको,
ने निर्मल दीक्षा कई अस्त्र की उनको ।
दी थी
गुरु
प्रथम सर्ग
३५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
अनुमति
३६
६०
वे दोनों राजा रानी के जीवन के तारे थ,
कई उन्होंने अपने ऐहिक सुख उन पर वारे थे,
माँ की प्यारी गोदी में जब दोनों छुप जाते थे-
स्नेह भाव रानी के उस क्षण अद्भुत सुख पाते थे ।"
६१
"जीजी, यया ही अच्छा होता यदि तुम हम
वे होते,
मैं भगिनी, तुम तात चरण के होतों बस इकलौते
हम तुम दोनों खूब देखते पर्वत की शोभा को,
दीप्तिमान शिखरों की सारी प्रभा मन लोभा को ।"
६२
"फिर बोलीं तुम?" "अच्छा, अच्छा अब न कभी बोलूंगी
कहे चलो तुम, कभी न अपनी अब जिह्वा खोलूँगी ।"
"अच्छा, फिर बस इसी तरह कुछ बरस कट गये उनके,
दोनों भाई-बहन, सुनो, आगार हो गये गुन के ।
६३
राजा की उस प्यारी बेटी की सुकान्ति कमनीया-
चमक चमक कर दिग्दिगन्त में व्याप्त हुई रमणीया,
वह पार्वत्य प्रदेश हुआ अति मुखरित उस की छवि से-
ज्यों प्रातर्वेला होती है मुखरित आगत रवि से
६४
प्रबल प्रतापी राजकुँवर वह आर्य मुकुट का मणि था,
वह था नरे शार्दूल, दस्युओंों का दल करि-करिणी था,
उसके सन्निधान में बैरी कभी न टिक पाते थे,-
उसके बाण, दस्यु-तम, रवि-कर-सदृश काट आते थे ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६५
उसी राज्य के निकट अनाओं का राजा वसता था-
जो गान्वार देश के राजा से लड़ता रहता था,
कई बार उस ने परास्त होकर हा-हा खाये थे
प्रायों की उदारता से फिर स्वाधिकार पाये थे ।
६६
प्रथम सर्ग
उसी देश के उस यःकश्चित् राजा ने जब देखा-संस्कृत काव
सिंह - शावकी ग्राम सुन्दरी को, जब उसने पेखा,-
तब वह फिर से युद्धोद्यत हो गया और यों बोला-
कृतघ्नता का दुष्ट भाव ज्यों जगती में हो डोला ।
६७
मेरी पुत्रवधू होगी यह प्रार्थ्य सुन्दरी लौनी,
अथवा भेरी बजा चलेगी फिर मेरी
कर दूँगा गान्धार देश का गर्व चूर्ण में
अब की बार मिलाऊँगा में उस नगरी को
६८
प्रक्षोणी,
क्षण में,
कण में ।
आर्य्यं नृपति गान्धार देश के यह सुन क्रुद्ध हुए यों- / रौद्र रस
दिनमणि अपने विस्तृत नभ-पथ में अवरुद्ध हुए ज्यों,
भौहों में बल पड़े, प्राँख से निकले अग्नि- अँगारे,
असि खनकी, धनु तने, बज गये भेरी और नगारे |
६६
हिम मण्डित गान्धार देश की श्यामल घाटी-घाटी-
हुई निनादित, वीरों ने निज तन से वह सब पाटी;
उमड़ चली शोणित की सरिता, आर्यवीर सव कड़के !
ढेर लग गए मुण्ड झुण्ड के और सहस्रों धड़ के ।
रस
३७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३८
७०
राजकुमार अनार्य्यं दलों में ऐसे टूट पड़ा था, -
पूर्वकाल में इन्द्र वृत्र पर जैसे टूट पड़ा था ।
किन्तु बहन ऊम्मिले ग्ररी कुछ बात हो गई ऐसे-
बैरी की कौटिल्यमयी कुछ घात हो गई ऐसे-
७१
नर शार्दूल नृपति को, नरवर राजपुत्र को, प्यारी,
दुष्ट वैरियों ने छल-बल से बन्धन युक्त किया, री,
इसे देख कर आर्य्यं वीर दल सब हत-बुद्ध हुआ, री,
प्रत्यंचाएँ ठिठकों, धीमा-सा कुछ युद्ध हुआ, री ।
७२
सुनती हो ऊम्मिले ? " - "कहे जाओ तुम, मैं सुनती हूँ,
बहुत ध्यान से, जीजी, मैं सारी बातें गुनती हूँ,
फिर क्या हुआ बताओ जल्दी, कहाँ गई सुकुमारी ?
आर्यों के, गान्धार देश की थी जो परम दुलारी ?”
७३
"सुनो, बात जब यह पहुँची उस सुन्दर राज भवन में,
लगी आग तब राजकुमारी के कोमल, मृदु तन में,
तमक उठी वह, कस कर बाँधी उस ने अपनी वेणी,
कटि बाँधी, तूणीर कसा, फिर बोली वह पिक बैनी
७४
'आयों की बेटी हूँ, माँ, मैं इस खल को समभूंगी,
तेरा दूध पिया है मैंने, अब रण में जूभूँगी ।
हूँ गान्धार देश की बाला, देखूंगी इस शठ को,
ठोकर मार चूर्ण कर दूँगी इसके कच्चे घट को ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७५
प्रथम सर्ग
यह कृतघ्न निज दर्प- मृत्तिका का कच्चा घट लाकर,-
आर्यो की मेदिनी-शिला से टकराता है आकर ?
विश्व देख ले आज कि किसको आर्य सुता कहते हैं,
यह भी देखे विश्व कि किसको अग्नि-हुता कहते हैं ।
७६
फूल उठी माता सुन उसके विकट वीर वचनों को,
अपनी प्यारी पुत्री के उन निपट धीर वचनों को,
वह बोली -- मैं धन्य हुई हूँ, मेरी बेटी प्यारो,
चलो आज हम चलें जूझने की करके तैयारी |
७७
दासी, अश्वों को लाओ, मम शस्त्रों को भी लाओ,
श्राज राज महिषी के सारे युद्ध-वस्त्र ले आयो ।
यों कह वीर राजरानी जब खड़ी हुई सज्जित हो, -
तब कोमलता वीर सरोवर में ग्राई मज्जित हो ।
७८
उछल तुरंगों पर वे बैठीं तेज पुञ्ज ज्वालाएँ,
राजमार्ग में दीप्त हो उठीं यथा अग्नि-मालाएँ ।
तब सारे गान्धार नगर में उमड़ा एक उदधि था,-
छोड़ रहा वीरत्व उछल कर निज सीमान्त-परिधि था ।
७ह
तब श्यामल घन-गर्जन-स्वर से बोली राजकुमारी,
मानों बिजली कड़क कड़क कर दूर करे अँधियारी,
'सुनो वीर, गान्धार देश की वीरांगना, सुनो तुम -
जल्दी साजो अपनी अपनी तुरगांगना, सुनो तुम ।
(22)
३६<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
भारतीय
नाही गौरव
रस
रस
४०
50
आई प्रति भारी विपत्ति है आज देश पर अपने,
नीच अनार्य शशक याया है सिंह देश में खपने,
मेरे पिता और भाई को उस ने छल के बल से,
aran-युक्त किया है; श्राश्रो हम जूझें उस खल से ।
८१
भाई, पिता, पुत्र जो अपने करने युद्ध गये हैं-
वे नरपति के पकड़े जाने से हत-बुद्धि हुए हैं,
चलो, ग्राज इस पूर्ण यज्ञ में बहनो, ग्राहुति डालो,
अपने तीर धनुष को तुम सब आज संभालो ।
:
८२
कहे न कोई -- आर्य- देश की ललनाएँ कायर हैं,
दिखला दो तुम हृदय तुम्हारे मृदु हैं पर पत्थर हैं ।
कस लो वेणी, कटि-पट बाँधो, लेलो धन्वा, भाले,
चलो, करो ऐसे प्रहार जो अरि के हिय में शाले ।
८३
आर्य देश के वृद्ध पितामह, ग्राप सभी हैं ज्ञानी,
भेजें श्राप सुताएँ, वधुएँ, दे निज आशीर्वाणी ;
अपने शोणित को देकर निज देश स्वतन्त्र करें वे,-
निष्फल अरि की कुटिल नीति का यह कटु मंत्र करें वे ।
८४
आज आग लग जाए ऐसी, धुम्राँ उठे चहुँ ओर !
आर्य पुत्रियां, रणचण्डी बन थामें निज धनु-डोर !
अरि के कलुषित हृदय-देश को बेधें, कर दें क्षीण !
आज दिखा दें वे अपने असि-धनु के हाथ प्रवीण ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम सर्ग
८५
स्वर्गादपि गरीयसी प्यारी, जन्मभूमि का पल्ला-संस्कृत प्रयोग
खींचा है दुष्टों ने, बोला है स्वदेश पर हल्ला,
कौन हृदय है जो कि न उबले निज समाज की क्षति में ?
कौन आँख है देख सके जो माँ को इस दुर्गति में ?
८६
आज लहलहाती उपत्यका रक्त धार से सींचो !
रोप कॅपा दे तुम्हें कोष से खर तलवारें खींचो !
भूखी सिंहिनियों के सम बस टूट पड़ो तुम रण में !
कर दो प्यारी मातृभूमि की व्यथा दूर तुम क्षण में !'
८७
कोधित राजकुमारी के सुन उन वचनांगारों को-
थरी गई मेदिनी, सुन कर धनु की टंकारों को !
उछल पड़ा बल्लियों हृदय का रोष, कृपाणें चमकीं,
डोल उठे दिग्गज मतवाले, और दिशाएँ दमकीं ।
८८
वृद्ध नागरिक बोल उठे, -सुन बेटी, राजदुलारी, -
इन्हीं भुजाओं ने तो की थी मातृभूमि रखवारी ?
खड्ग थाम सकती हैं, यद्यपि अब कुछ निबल पड़ी हैं,
हृदयों में प्राणों की धारा अब भी प्रबल बड़ी है ।
दह
यह धारा जब बह निकलेगी तब अरि दल काँपेगा,
कण्ठ हमारा कड़वे का स्वर फिर से आलापेगा !
चलें आज हम, और हमारी बहुएँ संग चलेंगी,
आज हमारी ये तलवारें अरि का झुण्ड दलेंगी ।
४१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>यद्ध वहान
ऊम्मिला
४२
६०
फिर तो, मेरी विमल ऊम्मले चली अनोखी सेना,
अश्व हिनहिनाए, कुँवरी का चमका भाला पैना !
आगे वृद्ध वीर थे, पीछे थीं गान्धारी नारी, -
विजय- भावना ने ज्यों मति का शुभ अनुगमन किया, री
रणोन्मत्त वृद्धों ने अपनी सुध-बुध सब बिसराई,
मानों अश्वों पर आ बैठी
शुभ्र केश दाढ़ी के मारुत में
विजय निशान श्रायंगण के वे
६२
मूर्तिमती टकुराई,
यों लहराते थे--
मानों फहराते थे ।
जिन कर में भाले थे, वे थे वृद्ध किन्तु बलशाली,
उन पर पड़ कर नाच रही थीं रवि किरणें मतवाली ;
उन बूढ़े हाथों में शोभित होते थे यों भाले, -
मानो स्थविर सँपेरे लाये विषधर काले-काले ।
६३
थीं वधूटियाँ अति कठोर धनु-धारण क्षमता-शाली,
अरि-दल के कलुषित हृदयों में तीर बेधने वाली ;
उनकी कृष्ण वेणियां सुन्दर पट से यों प्रावृत थीं,
यज्ञ-धूम्र-कुण्डलियाँ मानों वेदी से परिवृत थीं ।
६४
चाप मौर्वी ने उन कोमल स्कन्धों को घेरा था,
कोमलता के घर कठोरता ने डाला डेरा था,
वह कोमल सुस्कन्ध देश श्री' वह कटोर प्रत्यञ्चा, -
रण देवी से श्राय्यं विजय की करती थी शुभ याञ्चा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६५
घिरी मेखला से कटियाँ, थीं लटक रहीं तलवारें,
उद्गीरित होती थीं कण्ठों से जय की ललकारें,
रण में रंग खेलने चल दी थीं ये सब पार्वतियाँ,
चल दी थीं गान्धार देश की लज्जा रखने सतियाँ ।
६
ये बालाएँ पहुँच गईं क्षण भर में युद्ध-स्थल में,
नये प्राण आए योद्धाओं के विशृङ्खल दल में,
मां, बहनों, पुत्री, नारी को देख बड़े हिय उन के,
फिर क्या था ? वे लगे बेधने अरि-दल को चुन-चुन के ।
६७
क्षण भर में गान्धार देश की अक्षौहिणी बढ़ी यों,-
सहसाऽक्रमणकारिणी सरिणी की हो धार चढ़ी ज्यों ।
योद्धाों की हुंकारों से दिशा गूँज उट्ठी सब-
गिरि-गिरिसे प्रति-गर्जनकी ध्वनि घहर घहर उट्ठी तब
हद
प्रथम सर्ग
परशु परशु से लड़ा, भिड़ पड़ीं आपस में करवालें,
गदा गदा से जुटी, झन-झनाए भालों से भाले, मु
धन्वा से उड़ चले बाण, वे बरसीं तीखी बरछी,
करने लगे प्रहार वीर सब लिये कटारें तिरछी ।
हह
रण-चण्डी-सम जूझ उठी वह राजसुता सुकुमारी,
उसकी आँखों में छाई थी रण की एक खुमारी,
उस कृतघ्न राजा की छाती में था उस ने साधा,-
अपना तीर, और फिर उसको खूब जकड़ कर बाँधा ।
४३
वर्तन<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४४
१००
बस, फिर तो अनार्य दल भागा पीठ दिखाकर ऐसे,-
भाग खड़े होते हैं मृग सब देख सिंह को जैसे,
आर्य्यं नृपति नरवर कुमार हो मुक्त ग्रा गए दोनों,
देख दृश्य, निज प्रांखों का सुफल पा गए दोनों।
१०१
राजा ने सब ललना-गण को दण्ड प्रणाम किया तब
अपने लोचन के पानी से सबको अर्घ्य दिया तब,
हो प्रसन्न भाई ने चूमा निज भगिनी के शिर को,-
ज्यों हेमन्त चूम लेता है अपनी बहिन शिशिर को ।
१०२
मेरी कथा समाप्त हुई है, अब तेरी बारी है,-
क्यों न ऊम्मिले ? तू तो मेरी नन्हीं सी प्यारी है,
माँ ने तुझे कहानी जो थी कही, उसे तू कहना,
देख कहीं पागलपन कर के चुप बैठी मत रहना ।"
१०३
"सीता जीजी, सकुचाती हूँ अब मैं वह कहने में,
भला समझती हूँ मैं अपना बस अब चुप रहने में,
की है श्रवण तुम्हारे मुख से यह सुन्दर-सी गाथा-
जिस में वर्णित अद्भुत वल उस श्रार्य सुन्दरी का था ।
१०४
मेरी कथा बहुत छोटी-सी है, क्या उसे सुनाऊँ ?
उसको कह कर के, जीजी, मैं कैसे तुम्हें लुभाऊँ ?
रहने दो, वह मेरी गाथा तुम्हें नहीं भाएगी,
मम गाथा, तव गाथा-पटु मन नहीं लुभा पाएगी।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०५
प्रथम सर्ग
यह सुन सीता रूठ गईं, कुछ होकर तनी-तनी-सी,
कहने लगीं ऊम्मिला से वह कुछ-कुछ रोष-सनी-सी,
"मुझसे कभी कहलवाना श्रव तुम कुछ नई कहानी-
सब में जानूँगी, हाँ, हो तुम नटखट और सयानी ।"
१०६
देखो, मैं तुम से अत्र, जाम्रो, कभी नहीं बोलूंगी
आज अकेली ही में सारे उपवन में डोलूंगी,
मां से कह दूँगी कि तुम्हारी छोटी बेटी प्यारी-
खूब भूल जाती है कहकर निज की बातें सारी ।"
१०७
1
"बात बात में रूठ बैठना, तुम ने कब से सीखा ?
मेरो जीजी बनी मानिनी मुझ को अब यह दीखा
तनिक- तनिक सी बातों पर क्या मुझ से मुंह मोड़ोगी ?
अपनी बहिन ऊम्मिला को क्या जीजी, यों छोड़ोगी ?"
१०८
यह सुन सीता हँसकर उससे लिपट गई प्रमुदित हो-
ज्यों गिरिजा से प्रा लिपटी हो नव शशिकला उदित हो,
फिर धीरे से बोली, "प्यारी बहिन ऊम्मिला मेरी,-
कहो कहानी जल्दी से, क्यों लगा रही हो देरी ?
१०६
देखो, मैंने तुम्हें सुनाई कैसी सुघर कहानी,
श्रव तुम क्यों संकोच जाल में बैठी हो प्ररुझानी ?
मुँह तो खोलो रंच, करें हम-तुम बातें घुल-घुल के-
कहो कहानी अपनी, फिर, हम चुनें फूल मिल-जुलके ।
४५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
११०
४६
लो, माँ बैठीं, हम दोनों की बाट जोहती होंगी,
सूची सूत्र लिये, मालिन-सी, सुघर सोहती होंगी,
अपनी आख्यायिका कहो तुम, यों सकुचाती क्यों हो ?
छुई-मुई-सी प्राज कहो तो तुम मुरझाती क्यों हो ?"
१११
"अच्छा 'जीजी, वही कहानी में हूँ तुम्हें सुनाती,
है छोटी सी तो भी वह है मुझ को बहुत सुहाती,
मेरी गाथा में न मिलेगी वह शोभा पर्वत की,
फिर भी, सुनो, है नहीं इस में यदपि चमक मर्कत की ।
११२
किसी एक जंगल में रहता झुण्ड कपोतों का था,
हो स्वतन्त्र उस वन- प्रदेश में वह विचरा करता था,
फैला कर अपने पंखों को वे घूमा करते थे,
वन की निर्जनता को अपने कूजन से हरते थे ।
११३
बड़े-बड़े वृक्षों से पूरित शोभित था वह वन यों,-
वृद्धिगत पुण्यों से होता शोभित नर का मन ज्यों,
वे विशाल पादप पृथ्वी के प्यारे वक्षस्थल पर-
शिशु-क्रीड़ा करते थे नित प्रति हिल-डुल मचल मचल कर ।
११४
अखिल निम्न भूभाग जिस समय सोता था निंदिया में,-
अन्धकार का राज जिस समय रहता था दुनियाँ में, -
उस अवसर में प्रात समीरण आकर हलके हलके-
जागृत करता था वृक्षों को धीरे-धीरे चल के ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><TP
११५
प्रथम सर्ग
वृक्षों की लहलही डालियाँ, ऊँची-ऊँची उठ कर
अपरस्परवेष्टिता, नृत्य वे नित करती थी जुट कर,
पत्ते भू पर इधर उधर गिर कर मारे फिरते थे,-
मानों नृत्य-तरंगित भुज से कनक वलय गिरते थे ।
११६
प्रातःकाल स्वर्णमय डालें नित्य हिला करती थीं,
प्रातुर-सी वे वाल सूर्य के गले मिला करती थीं;
तब कपोत समुदाय, फड़फड़ा कर अपने पंखों को,
करतल ध्वनि कर, रवि-कर-अर्पित करता था अंगों को ।
११७
जब रवि अपने प्रखर करों में ज्वाला ले आता था, -
झुलसाने को पृथ्वी जब वह क्रोधित हो जाता था, -
तब वे सघन वृक्ष उस भू की करते थे रखवारी,
ज्यों सपूत बालक करता है रक्षित, निज महतारी ।
११८
छन-छन कर वृक्षों से आती थीं सूरज की किरणें -
वसुन्धरा के ललाट से जल मुक्ताओं को विनने,
मानमदिता श्राततायिनी मानों लड़ते-लड़ते-
धीरे से चल दी हो हा हा खाने डरते-डरते ।
११६
अपने-अपने नीड़ों में नित सब कपोत मतवाले-
कूजन करते थे पी-पी कर तोष-सुरस के प्याले,
वे प्रमुदित हो सदा चिढ़ाते थे निदाघ की ज्वाला
शान्तिरूपिणी उन के नीड़ों की थी मंजुल माला ।
४७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४८
१२०
संध्या को अन्तिम प्रणाम जब रवि करता था वन को-
तब कुंकुम से नहला देता था निलयों के तृण को
गुटुर गुटुर कर सब कपोत गण धन्यवाद देते थे,
फिर उस विस्तृत नैशाञ्चल को ग्राप ओढ़ लेते थे
१२१
श्ररी ऊम्मले !" "हाँ," "क्या मेरी वे बातें थीं ऐसी-
जिन को सुनते-सुनते तुम प्रति चकित हुई थी वैसी ?"
"हाँ जीजी," "चल पगली, भूल न जाओ तुम अपने को
सुन तव बातें लगी देखने में चित्रित सपने को ।
१२२
आज तुम्हारे मुख से यह वन वर्णन सुनकर रानी, -
मैंने सोचा, आज श्रा गई वन देवी कल्याणी ।"
"जीजी, यों न बनाओ, माँ की बातें यदि तुम सुनतीं-
तब मेरी बातों को मन में यों न कभी तुम गुनतीं ।
१२३
हां, तो सुनो, निरापद वन में सब कपोत रहते थे,
नत्य निपट निःशंक कपोती संग उड़ा करते थे,
एक नीड़ में एक प्रफुल्लित कबूतरी बसती थी-
निज कपोत की गुटुर गुटुर सुन वह प्रसन्न हँसती थी ।
१२४
| एक दिवस वह शुभ्र कबूतर कबूतरी से बोला-
सुन प्यारी कबूतरी, मेरा मन है कुछ-कुछ डोला,
श्राज दूर उड़ कर जाऊँगा में प्रति निर्जन वन में,
और बिताऊंगा अपना कुछ काल श्रात्म-चितन में ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२५
सूख गई चिन्ता से, उसके सुन ये वचन, कपोती,
दलक पड़े उसकी आँखों से आतुरता के मोती,
सूख गया कल कण्ठ, रुक गई गुटुर गुटुर की तानें,-
तड़प उठा हिय, मानों मारा वाण खींच व्याधा ने ।
१२६
उसकी दशा देख पारावत व्यग्र हो गया हिय में,
देख सुनों की धारा को दुखित हुआ वह जिय में,
उस ने बड़े प्यार से पोंछी उस की आँखें गीली,
संवेदन की धारा उमड़ी हिय-तल बीच रसीली ।
१२७
फिर बोला, 'हे प्रिय कबूतरी मेरी क्यों रोती हो ?
वृथा, हृदय में शोक अग्नि से क्यों विदग्ध होती हो ?
में जल्दी ही या जाऊँगा उस निर्जन कानन से,
क्षण भर भी न भुलाऊँगा मैं तुमको अपने मन से ।'
१२८
यह सुन, हिय पर पत्थर रख कर कबूतरी वह बोली, -
अपनी हृदय-नीवियाँ उसने धीरे-धीरे खोलीं,
मानों शान्त नीड़ में धधकी दावानल की ज्वाला,
अथवा नेह-कमल-सर में पड़ गया निराशा-पाला ।
१२६
'हे कपोत, उट्ठी कैसी यह हिय में विकृता लय है ?
किन हाथों ने, हाय, उजाड़ा मेरा सुखद निलय है ?
तुम यह क्या कहते हो ? मैं कुछ समझ नहीं पाती हूँ,
ये वचन, दुःख सागर में में तो उतराती हूँ ।
सुन
प्रथम सर्ग
करूण रस
४६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५०
१३०
तुम यदि जाओगे तो मैं भी संग चलूंगी, प्यारे !
मैं कैसे निकाल सकती हूँ निज ग्राँखों के तारे ?
वन की निर्जनता में तुम को मैं न कष्ट कुछ दूंगी-
मधुर तुम्हारी गुटुर गुटुर को सुन में मस्त रहूँगी ।
१३१
खूब आत्मचितन तुम करना, में तुम को ध्याऊँगी,.
यों ग्रात्मोन्नति पराकाष्ठा को मैं, प्रिय, पाऊँगी;
किन्तु छोड़ कर मुझे न जाना तुम कपोत, हे मेरे !
मेरी नैश जीवनावधि के हो तुम सुभग सवेरे ।'
१३२
" फिर क्या हुआ ऊम्मले ? ""सुन ये रसमय वचनावलियाँ --
व्याकुल हुआ देखकर अर्पित चिर सनेह की कलियाँ,
फिर धीरे से निज कबूतरी से पारावत बोला-
मानों प्रेम भाव को उन ने त्याग भाव से तोला :
१३३
'हे चंचले, वृथा शोकाकुल इतनी तुम होती हो-
नेह-पाश में बँधी हुई तुम क्यों धीरज खोती हो ?
मैं जल्दी ही आ जाऊँगा, करो न यों तुम चिन्ता,
रहो नीड़ में सौख्य शान्ति से कुछ दिन हो निश्चिन्ता ।"
१३४
अन्य कपोतों के नीड़ों में उड़ उड़ कर तुम जाना-
यों अपनी वियोग की घड़ियाँ सुख से, ग्रहो, बिताना,
कभी बुला लेना निज गृह में अन्य कपोती गण को,
कभी निमन्त्रण देना अपनी उस गिलहरी बहन को 1.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३५
प्रथम सर्ग
नन्हे-नन्हे कबूतरों की सुनना गुटुर कहानी,
प्यारी, अर्द्धस्फुटिता, तुतली उनकी बातें, रानी,
कभी डालियों पर प्रमुदित हो उड़ कर बैठी रहना,
कभी-कभी सखियों से तुम सब अपनी बातें कहना ।
१३६
जल्दी से वियोग की घड़ियाँ कट जाएँगी सारी,
मैं आ जाऊंगा जल्दी तब सुखद नीड़ में, प्यारी,
मेरी अनुपस्थिति में तुम नित धीरज धारे रहना,
रहो यहीं, मेरी कबूतरी, मानों मेरा कहना ।
१३७
यती कबूतर ने, कबूतरी को यों बातें कह कर
हिय से लगा लिया उत्सुक हो स्नेह धार में बह कर
उड़ा कबूतर फिर, वह उसके अश्रु सिक्त पत्रों से-
कानन में बरसीं फुहियाँ, जल- सिञ्चित सुपतत्रों से ।
१३८
आह बिचारी वह कबूतरी बेठी-बैठी-बैठी- अलं
रोती रही, शोक-सागर में
पंठी-पंठी-पठी;
39
"अरी ऊम्मले, तव कबूतरी ऐसी थी क्यों पगली ?
अपने प्रिय कपोत के सँग वह क्यों न विपिन में निकली ?
१३६
का
यदि कंबूतरी में होती तो कभी न रहती घर में, | संकेत (भावी जीवन
साथ-साथ में उड़ती फिरती वन में और नगर में;
कभी न उसका संग छोड़ती चाहे जो हो जाता,
चाहे वह कपोत कितने ही मेरे हा-हा खाता ।"
५१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५२
१४०
"सीता जीजी, कह सकती हो तुम ये बातें कैसे ?
हठ धर्मी कैसे कर सकती तुम कपोत से ऐसे ?
वह कबूतरी बड़ी मृदुल थी वह हठ कैसे करती ?
इन बातों पर वह कपोत से, बोलो, कैसे लड़ती ?
१४१
अस्तु, कबूतर उड़ा और वह बेटी रही कपोती,
अटवी में अपनी ग्रहों को नित रहती थी खोती ;
पल बीते, घटिकाएँ बीतीं, युग की बारी आई,
क्षण-क्षण उसके जीवन-पथ में घन अँधियारी छाई ।
१४२
बाट जोहती रही प्रति दिवस, पर, न कबूतर आया,
दाना खाना छोड़ा उसने छोड़ी जग की माया,
छोटी-छोटी सब कपोतियाँ उसको समझाती थीं,
बड़ी-बड़ी सब सखियाँ उसका तन मन बहलाती थीं ।
१४३
पर उसके जीवन में धक-धक-धक जलती थी ज्वाला,
एक धुआँ मँडराया करता था वह काला-काला,
एक दिवस जब अस्ताचल से रवि की किरणें आई,
तब उन किरणों ने कबूतरी प्राणहीन थी पाई ।
१४४
अब तुम क्यों चुप बैटी हो ? है यही कहानी मेरी,
क्यों उदास हो देख रही हो जीजी, रानी मेरी ?"
"सुनो, बहन ऊम्मिले, मुझे अब ऐसी कथा न कहना ।
रोने-धोने की बातों से अच्छा है चुप रहना ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४५
"अच्छा, अच्छा, चलो चलें अब फूल तोड़ने को हम,
माँ की पूजा सामग्री को चलें जोड़ने को हम,
देखो, कैसी खड़ी हुई है फूली सुघर चमेली,
क्या सूरज ने आकर इससे ग्राँखमिचौनी खेली ?"
१४६
आहा ! उट कर चल दीं दोनों ये बालिका सलौनी, -
मानो वायु उड़ा लाई हो दो मालिका सलीनी,
प्रति डाली से प्रति पत्ती से, प्रति प्रथखिली कली से-
"आओ, आओ ! " का रव गूँजा प्रति मृदु कुंज-गली से ।
"
१४७
"देखो जीजी, मैंने कैसी अच्छी कलियाँ तोड़ीं ।"
"अरी ऊम्मले मैं ने तेरे लिए जुही है छोड़ी, "
"जीजी, देखो, यह गुलाब है कैसा अभिमानी-सा,-
खड़ा खड़ा दे रहा दान है यह तामस दानी-सा । "
१४८
"यह केतकी, ऊम्मिले है सब कजूसों की नानी ।
काँटों से अपनी कलियों को है ढँक रही सयानी ।"
"देखो जीजी, छिन्न मुकुल ये पड़े क्यों यहाँ पथ में ?"
"इनको पौधों ने बिखराया है तेरे स्वागत में । "
१४६
"जीजी, तुम्हें याद है फूलों की कुछ कथा-कहानी ?"
"पूछो किसी कपोती से, हो कपोतियों की रानी ! "
"क्या गान्धार देश की बाला तुम से कुछ न कहेगी ?"
"बक बक करती जाएगी या तू अब मौन गहेगी ?"
प्रथम सर्ग
प्र.
५३<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५४
१५०
"प्रोहो ! जीजी ! डाँट-डपटना कब से तुम को आया ?
किस गुर्वाणी ने तुमको यह नव गुरुमन्त्र पढ़ाया ?"
"नटखटपन करती जायोगी या तुम फूल चुनोगी ?
माँ बिगड़ेंगी यदि तुम मेरी बातों को न सुनोगी ।"
१५१
जो प्रासादोद्यान स्वनित था होता इस मृदु स्वर स-
जहाँ तरंगित होता मारुत था इस स्वर हिय-हर से, -
वहाँ एक क्षण तू रह पाता यदि हे रंक, भिखारी,-
तो फिर वह निर्वाण-मधुरता तुझ को लगती खारी
१५२
यों हँसती, क्रीड़ाएँ करती, दोनों जनक दुलारी, -
पुष्प - चयन कर चलीं हर्म्य को दोनों नवल कुमारी,
भुज लतावलम्बित करण्डकों के प्रसून हँसते थे,
विमल भक्ति के भाव कुसुम की पंखुरी में फँसते थे ।
१५३
धीरे-धीरे जब वे दोनों पहुँचीं जनकालय में,
तब मानों उद्यानों से उड़ आए विहग निलय में,
सीता और ऊम्मिला दोनों लिपट गई माता से,-
मानो दो बछड़ियाँ गाय की चिपट गई माता से ।
१५४
"सीते, तुम हो बड़ी अनोखी, में बैठी हूँ कब से ?
मार्ग देखती रही तुम्हारी, अरी ऊम्मिले, तब से ।
इतनी देर लगाई क्यों तुम दोनों ने उपवन में ?
भला कहीं, होता विलम्ब है इतना पुष्प-चयन में ?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५५
क्या तुम करने लगीं वहाँ पर, कहो, ऊम्मिले मेरी ?
क्या तव तात चरण उपवन में तुम्हें ग्रा मिले थे, री ?"
"ना, माँ, मैं सीता जीजी से कहने लगी कहानी,
वही कहानी, मां, जिसमें थी कबूतरी बिलखानी ।”
१५६
"और सुनाई थी मैंने उसे पुण्य देश की गाथा, -
जिसमें बाला ने अनार्य्यं का झुका दिया था माथा,
माँ, ऊम्मला बड़ी रोनी-सी बात कह रही थी, री,
और मुझे सँग लिए दुःख में श्राप बह रही थी, री ।
१५७
ऐसी-ऐसी बातों को तुम क्यों कहती हो, री माँ,
तुम क्या ऐसी बातों से भी सुख लहती हो, री, माँ ?"
"बेटी सीता, अच्छा होता है
एकाधिक तारों से जीवन-पट
१५८
ये बातें सुनना,
पड़ता है बुनना ।
किन्तु कहानी सुन कर मन में तुम दुख क्यों करती हो ?
बातों से प्रेरित होकर क्यों आहें तुम भरती हो ?
आर्य बालिका है वह ही जो दुख के. प्रा जाने पर
पर्वत तुल्य अचल रहती है, घोर घटा छाने पर ।"
१५६
““मां, में कुछ पूछ ?” यो उत्सुक विमल ऊम्मला बोली,
"हँसना मत" यों कथन कर उठी उस की पृच्छा भोली ;
"तुम हँस दी थीं उस दिन पूछी वे बातें जब मैंने,
भेद नहीं पाया है अब तक उन का माता, मैंने ।"
प्रथम सर्ग
५.५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५६
१६०
"री, नन्ही ऊम्मिले, जानती हूँ सब बातें तेरी,
ऐसी पगली कहाँ मिलेगी जैसी त् है मेरी."
" क्या है बात मुझे भी कह दो," सीता यों उठ बोली,
मूर्तिमती उत्सुकता ने ज्यों अपनी आँखें खोलीं ।
१६१
"सीता जीजी, बड़ी भुलक्कड़ हो, तुम भूल गई क्या ?
उपवन की वे बातें विस्मृति-सरिता - कूल गई क्या ?"
"क्या कपोत वाली बातें ? हूँ ! कहाँ उन्हें में भूली: "
"जीजी, कपोतियों के पीछे डोल रही हो फूली ।"
१६२
"देखो, माँ इसकी बातें, तुम निज बेटी को देखो,-
अपनी नन्ही सरल ऊम्मिला के रंग-ढंग तो पेखो ?
स्पष्ट रूप से कहने में तुम यों सकुचाती क्यों हो ?
यदि मैं भूल गई हूँ तो फिर मुझे खिझाती क्यों हो ।"
१६३
"जीजी री, बिगड़ो मत, माला वाली बात वही है,
जो मैंने उपवन में तुम से पूछी, और नहीं है ।
तात चरण की ग्रींवा में, माँ क्यों पहनाती माला ?.
क्यों उनकी आँखों में उस क्षण आता नव उजियाला ?"
१६४
"हाँ, हाँ, माँ, बतलाओ, री, तुम ऐसा क्यों करती हो ?
कभी मूँद कर आँखें किस का विमल ध्यान धरती हो ? -
तात चरण जब आते हैं तब तुम क्यों हँस देती हो ?
अपनी माला उनको देकर फिर क्यों ले लेती हो ?"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६५
"हाँ, हाँ, पूछी मुझसे इस ने ये बातें उपवन में,
मैं क्या बतलाती ? में भी कुछ समझ न पाई मन में;
अब तुम बतलाओ, री माँ, तुम हो अच्छी माँ, मेरी ।"
बोल उठीं दोनों नन्दिनियाँ यों जिज्ञासा-प्रेरी !
१६६
प्रान ऊम्मिला ने पीछे से अपनी दोनों वाहें,-
डाल गले में दीं, मानो दो छोटी-छोटी चाहें,-
किसी वानप्रस्था की तन्मय विरत ग्रीव में आ कर -
झूल रही हों, उस ग्रीवा को मुद पर्य्यं क बना कर ।
१६७
प्रथम सग
माँ का अञ्चल खींचा सीता ने गोदी में गिर कर
ढांका निज मुख ज्यों कि चपलता क्षणिक शान्ति से घिरकर,
सुख- श्राशा में एक निमिष को स्तब्ध बैठ जाती हैं,
त्यों ही मेरी स्वप्निल आँखें सीता को पाती हैं ।
१६८
"नन्ही सी ऊम्मले, और तुम सीते, हठ धरती हो,
मेरी छोटी-सी छायाओ, तुम यह क्या करती हो ?
माला मझे गूंथ लेने दो, न अब और विलमाओ ।
सूची-सूत्र मुझे लाकर दो, उठो, दौड़ कर जाओ ।"
१६६
"परिचारिके, यहां श्रानो" यों बोली ऊम्मिल लौनी-
"माँ, अपने विचार को तुम अब रख न सकोगी मौनी,
मैं गुर्वाणी बन बैठी हूँ, आज परीक्षा लूँगी
मैं दीक्षित हूँ और आज में तुम को दीक्षा दूँगी।"
वात्सल्य
रस
५७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सत्सल्य रस
ऊम्मिला
१७०
५८
जनक- प्रिया ने ये बातें सुन कर अपने हाथों से,
छोटी बेटी को थामा, वह चला नेह गातों से,
आँखों में उस मुग्ध भाव की छटा अनोखी छाई;
हृदय उल्लसित हुआ, कपोलों पर कुछ लाली आई ।
१७१
बड़े प्यार से गोरे गालों को रानी ने चूमा,-
ज्यों वात्सल्य भाव षट्पद बन नव गुलाब पर झूमा;
सीता बजा उठीं निज दोनों गौर करों से ताली;
मानो, नाच उठे नँद-गृह में द्वापर के वनमाली ।
१७२
"अच्छा बैठो मेरी नन्हीं दोनों तुम गुर्वाणी,
आज सुनाऊँगी में तुम को अच्छी एक कहानी ।"
"कथा कहानी कौन सुनेगा ? हम तो नहीं सुनेंगी,
हम क्या करें कहानी सुनकर, हम तो वही सुनेंगी।"
१७३
"देखो, सीता, तुम तो फूले से प्रसून लाई हो,
और ऊम्मिले, तुम अच्छी-सी कलियाँ ले आई हो.
कैसी माला गूंथू ? बोलो चपल ऊम्मिला रानी,
सेंत मेंत में बन जाओगी क्या मेरी गुर्वाणी ?
तो
१७४
तुम न बताओगी यदि मुझ को इस माला का गुम्फन,-
तुम को देने होंगे दस-बारह मुझ को चुम्बन,
और सुनो, शिक्षिके, तुम्हारे कानों को खींचूँगी,
सुघर तुम्हारी आँखों को मैं प्रञ्चल से मींचूंगी ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७५
हाँ! फिर अंधी-सी हो करके खड़ी खड़ी तुम गाना,
और ऊम्मिले, हम देखेंगी वह तव मृदु मुसकाना,
यदि तुम चाहो जल्दी से इस कठिन दंड से बचना,
तो रानी, मुझको बतलाओ इस माला की रचना ।"
१७६
"ओ माँ, देखो, मैं तुमको अब सब कुछ बतलाती हूँ,-
अपनी माला-
-गुम्फन-विधि में तुम को समझाती हूँ.
पहले एक गुलाब - कली इस धागे में पहिनाओ,
फिर इस शीतभीरु को उसके तुम समीप ले जाओ ।
१७७
इस प्रकार तुम पूरी माला गूँथो औ' मुसकाओ
और साथ ही मेरे मन की बात सुनाती जाओ।"
"माँ, उम्मिला, ठीक से माला-रचना नहीं बताती,
यों ही अपनी मनमानी कुछ की कुछ बकती जाती ।"
१७८
"मेरी बड़की मुन्नी, देखू तुम अब क्या कहती हो,
देखूं ललित कला-धारा में तुम कैसे बहती हो ?
तुम भी मुझे बता दो अपनी हिय की सारी विधियाँ,
निज सुबुद्धि-मञ्जूषा की तुम प्रकट करो सब निधियाँ।”
१७६
*"देखो माँ,” यों कह उठ बोली नवल उल्लसित सीता,
मानो स्वर -भाजन को कर्णों में करती हो रीता,
"कोमल पारिजात कलियाँ तुम प्रथम सूत्र में डालो;
फिर मौलश्री के फूलों से अपनी माल सँभालो ।”
प्रथम सर्ग
५६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१८०
अपनी दोनों ललियों की सुन बातें प्यारी-प्यारी,
उस विदेह रानी ने अपनी सुध-बुध सभी विसारी;
दोनों को दोनों हाथों से खींच लिया गोदी में,
दोनों ने मिलकर जननी का नेह पिया गोदी में ।
१८१
जनक सुगृहिणी उन दोनों से बोलीं उत्फुल्लित हो, -
लाड-प्यार के पारिजात से गिरे कुसुम मुकुलित हो,
"तुम दोनों तो माला-गुम्फन मुझे बता न सकी हो,
दौड़ा-दौड़ा बुद्धि-प्रश्व निज तुम तो आज थकी हो ।
१८२
तुम्हें बताती हूँ, देखो, इन सब फूलों को अब में, -
साथ-साथ, बारी-बारी से लो, गूँयूँगी जब मैं -
तब नवरत्नों की-सी माला सुन्दर बन जाएगी,
प्रार्यपुत्र के वक्षस्थल पर यह शोभा पाएगी ।"
१८३
माता मिथिला-साम्राज्ञी ने सूची ली यों कह के, -
लगीं गूंथने प्रेम-पाश वे धीरे से, रह-रह के, -
मानो विश्व- मोहिनी माया, ले
छिटका जीवन-पथ में, हरती हो
१८४
सुराग-फूलों को,
विराग-शूलों को ।
तीक्ष्ण कटकों में जीवन जब उलझ उलझ जाता है,
६०
तब ऐसे ही पुष्पों में वह प्राणों
को
पाता है ;
उपवन में,
महा तपस्वी जनक देव के राग-रहित
फूल रहे हैं ये सांसारिक मधुर पुष्प उस मन में ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८५
प्रथम सर्ग
इसीलिए द्वापर में प्रभु ने निज पुण्या वाणी से -
कर्मवीर की तुलना की है जनक देव ज्ञानी से,
स्थितप्रज्ञ के सब गुण अंकित हैं इनके जीवन में,
इन ने ऐक्य भाव पाया है घर में, निर्जन वन में ।
१८६
शीत, उष्ण, सुख, दुःख आदि इन संस्पर्शज भावों में,-
प्रतिकूला, अनुकूला स्थिति में, सब दैहिक चावों में, -
विकट कर्मयोगी ने स्थापित किया साम्य-भावों को;
सह सकते हैं निश्चलता से ये तीखे घावों को ।
१८७
माता को चुप चाप गूथते देख ऊम्मिला बोली-
ध्यान भंग करने श्राई हो ज्यों चञ्चलता भोली,
"कैसे गूँथ रही हो चुपके से तुम अपनी माला ?
किसने तुम पर, री माँ, मोहन तूक मंत्र यह डाला ?
१८८
कब से पूछ रही हूँ मैं, पर तुम तो चुपके-चुपके-
टाल रही हो, आँखमिचौनी खेल रही हो छुप के,
यदि न बताना हो तो माँ, फिर वैसा ही तुम कह दो,
जाओ कभी न पूछूंगी यदि ऐसा ही तुम कह दो ।"
-१८६
अपनी छोटी-सी को मां ने स्वप्निल नयन उठाकर
नख से शिख तक देखा धीरे-धीरे से मुसका कर,
उसकी आँखों में अनमनपन-सा कुछ-कुछ छाया था,
कमल विनिन्दित मुख पर कुछ-कुछ रोष-भाव प्राया था।
*कर्मणैवहि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः
-गीता श्र० ३ श्लोक २०
जनक
६१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६२
१६०
तब माता सीता से बोली-"सीते, बेटी प्यारी,
तुमने कभी रुदन की कोई मूर्ति लबी है क्या, री ?"
"ना, माँ, मैंने उसकी मूरत कभी नहीं देखी है,
क्या तुम ने अपने जीवन में कभी उसे पेखी है ?"
१६१
"हाँ, सीते, अब एक चित्रपट तुम्हें दिखाऊँगी में,
रोनी सूरत देख चीन्हना तुम्हें सिखाऊँगी मैं,
मेरे सन्निधान में रोदन मूर्ति रखी है, देखो;
लो, इसकी प्रति चर्या को तुम अपने हिय में लेखो । "
१६२
माता ने यों कहा ऊम्मिला को जब इंगित करके.
हास्य- उदधि तब उछला अपनी सीमा लंघित करके,
उठी खिलखिला सीय जनकजा, औ' रानी मुस्काई,
विहँस ऊम्मिला ने गोदो में अपनी ज्योति छिपाई ।
१९३
"लली ऊम्मिले, मुझे बताओ पहला प्रश्न तुम्हारा,
जिसके कारण चंचल मन है प्राज सतृष्ण तुम्हारा;
सच्ची गुर्वाणी के सम तुम एक-एक पृच्छा को,
पूछ-पूछ कर सुनती जानो, तृप्त करो इच्छा को ।"
१६४
"वाह, अरी मेरी माँ, कैसी अच्छी माँ तुम हो, री,
- मेरी एक-एक बातों को अब तुम बतलाओ, री,
सात चरण के आने पर तुम क्यों मुस्काती हो, मां ?
मुख पर क्यों लाली आती है, यह तुम बतलाओ, माँ ?"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/७९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रथम सर्ग
१६५
को देखा है ?
"बेटी, तुमने कभी, सवेरे ऊपा
कभी रक्तवर्णा प्राची दिशि को क्या अवलोका है ?
रवि की प्रखर किरण से जल को क्या खिंचते देखा है ?
घन मेघों से भू-हृत्तल को क्या सिचते देखा है ?
१६६
जिन नियमों से अग्नि-शिखा में लाली आ जाती है,
जिन नियमों से प्राची, सुन्दर अरुणाभा पाती है,
उसी नियम से, जनक देव से मैं यां ग्रान मिली हूँ;
उसी नियम से उनके उपवन में में प्रान खिली हूँ
१६७
अब तुम समझीं ? जैसे प्राची में लाली आती है,
त्यों तव तात चरण के प्राते लाली छा जाती है, -
मेरे मुख पर मेरी बेटी, और कहूँ क्या तुझको ?
तू नन्हीं सी ही है, इस क्षण किमि समझेगी मुझको ?"
१६८
"माँ, मैं समझी हूँ कुछ-कुछ वह यह कि पिता भी मेरे-
सूर्य सदृश, तुम-सी प्राची को, हाँ, रहते हैं घेरे ;
अब तुम यह बतलाओ, माँ, तुम माला क्यों देती हो ?
क्यों उनकी ग्रीवा से तुम फिर उसको ले लेती हो ?"
१६६
"अरी ऊम्मले, तूने निशि में देखा है वह चन्दा,
अखिल तारिकायें जिसके मन में डाले हैं फन्दा ?
तेरे तात चरण को में यह
उसके बदले में मैं उन से
भक्ति-पाश देती हूँ,
नेह-पाश लेती हूँ ।
पतिव्रतापर्य
सुनयना
६३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/८०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६४
२००
जब तुम बड़ी लली हो जाओ तब तुम भी यह करना,
अपने पति के वक्षःस्थल में प्रेम-पाश यों धरना ;
देखो, री ऊम्मले, तुम्हारी सीता जीजी बैठी,-
चुपके चुपके सुनती जाती है यह मेरी बेटी ।"
२०१
सीता बोली - "पति, यह क्या है? यह तो तुम बतलायो ?
क्यों विवाह करते हैं ? यह सब तुम मुझको जतलाओ;
इतने ही में सन्निधान में दासी आ राज्ञी के-
बोली- "श्री राजाधिराज गृह आये सम्राज्ञी के ।"
२०२
सीता और ऊम्मिला यह सुन नाच उठीं प्रमुदित हो-
जैसे नभ में मिथुन राशि है करती नृत्य उदित हो,
सीता फिर बैठी माता की वत्सल गोदी आ कर,
और ऊम्मिला माँ के कन्धे लिपट गई हरषा कर ।
२०३
?
"सती, मन्त्रणागार बना है क्या यह भवन तुम्हारा
ये दोनों क्या आज कर रहीं हैं शुभ स्तवन तुम्हारा ?
किसी सुगूढ़ विषय की बातें आज हो रही हैं क्या ?
कोई प्रश्न छिड़ गया है यह आज भोर ही से क्या ?"
२०४
प्राणनाथ के इन वचनों को सुनकर जनक प्रिया ने-
सीता को अवलोका, पुलकित होकर सुता सिया ने-
कहा—“तात, ऊम्मिला प्राज कुछ माँ से पूछ रही है,
माता ने भी हम से सुन्दर सुन्दर बात कही है ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/८१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०५
प्रथम सर्ग
मिथिला - राज्ञी मन्द विहँस कर बोली उत्फुल्लित हो,-
ज्यों दाम्पत्य - भावना आई मुखरित श्री' मुकुलित हो, -
"ये दोनों बहनें बन बैठी हैं मेरी गुर्वाणी-
आज परीक्षा, ग्रहो, ले रही हैं ये दोनों ज्ञानी ।
२०६
मुझको घेर रही हैं सन्तत पूछ-पूछ कर बातें,
आप स्वयं प्राकर के इन को क्यों न यहाँ समझाते ?
सीता पूछ रही है; माता व्याह किसे कहते हैं ?
सब समाज में पति-पत्नी के जोड़े क्यों रहते हैं ?
२०७
तृप्त कीजिए आप सलोनी सीता की इच्छा को,
शान्त कीजिये मम गुर्वाणी की प्रबोध पृच्छा को ;
मैं उत्तर दे चुकी ऊम्मिला की प्यारी बातों के
है ऊम्मिला तुष्ट सुन उत्तर उन सारी बातों के । ”
२०८
यों कह प्रमुदित हो रानी ने पहिनाई वह माला ।
मिथिला-पति धीरे से बोले -" मोह-पाश क्यों डाला-
तुम ने मुझे बाँध रखने को, इस कच्चे धागे में ?
कर्म-युक्त हूँ बँधा तुम्हारे भावों के आगे मैं ।"
२०६
"प्रिय, जगदीश्वर की ग्रीवा में प्रकृति प्रिया ने डाला-
उन्हीं ईश के नियमों का यह पाश अमित गुण वाला ।
मैंने भी गूँथी है माला उन प्यारी कलियों से, -
चुनी गई हैं जो त्वदीय इन दो प्यारी ललियों से ।"
६५.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/८२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६६
ہوں
ऊम्मिला
२१०
धीरे से यों वचन निवेदित कर रानी मुसकाई,
उस सुस्मिति पर मैं ऊषा की वारूँ ललित निकाई,
उपमे! तुम अब कहाँ छिपी हो यों बन लज्जाशीला ?
जनक- प्रिया की सुस्मिति रेखा की देखो यह लीला ।
२११
पितृदेव के अंक स्थित हो विमल ऊम्मिला बोली,-
ज्यों, कुहुकिनी कोकिला ने स्वर की मञ्जूषा खोली,
"तात, प्राप कहिए वे बातें पूछीं जो जीजी ने,
क्यों कोई माता से उसकी प्यारी पुत्री छीने ?”
9
२१२
"हाँ, बेटी ऊम्मले, तुम्हें मैं यह सब समझाऊँगा,
पर, तुम समझ सकोगी तुम को मैं जब समझाऊँगा ?
देखो, बड़ी-बड़ी नदियाँ ये सब बहती जाती हैं,
विस्तृत पथ के इस प्रवाह-श्रम को सहती जाती हैं।
२१३
क्या तुम मुझे बता सकती हो कोई कारण इसका ?
प्रेरित करता है इन सबको प्राधिपत्य वह किसका ?
इस विशाल सरणी की धारा की गति है सागर में,
इसीलिए यह चली जा रही है निज गहरे घर में ।
२१४
और सुनो, देखो, सजीव ये पक्षीगण हैं जग में,
कैसे साथ चले जाते हैं ये निज जीवन-मग में !
हैं कपोत के संग कपोती गण क्रीड़ा शीलाएँ ;
देखो, ये सब मिल-जुल करती हैं अनेक लीलाएँ ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१५
स्वयं ईश से उनकी मुग्धा माया लिपटानी है,
उसने जग के इस मस्तक पर यह चद्दर तानी है;
इसी न्याय से नर समाज में ग्रान मिली है नारी,
इसी न्याय से माँ से बेटी छिन जाती है प्यारी ।
२१६
समभी सीते, जाओ अब तुम गुर्वाणी के गृह में,
तुम सब पहुँचोगी कुछ दिन में इन प्रश्नों की तह में,
देखें, आज कौन जल्दी से सूत्र पाठ करती है,
क्यों ऊम्मिले ?" "तात, हम पाठों से कभी न डरती हैं।"
२१७
यों कह कर दोनों धीरे से चल दीं शिक्षालय को,
एक दूसरी के सँग पहुँचीं वे शुभ दीक्षालय को ।
"तुम कुछ समझीं तात चरण की सब, जीजी, वे बातें?"
"अरी ऊम्मले, ब्रह्मसूत्र की सोचो तुम अब बातें । "
२१८
इधर नृपति राज्ञी से बोले--"सुनो, ग्रहो कल्याणी,
क्या-क्या बातें पूछ रही थीं ये दोनों गुर्वाणी ?"
"पूछ रही थीं, पितृदेव के आते ही यह लाली
प्रान बिछा देती है क्यों तव मुख पर सुन्दर जाली ?
२१६
और पूछती थीं कि मालिका क्यों उनको देती हो ?
फिर उस में से एक माल क्यों उन से ले लेती हो ?
पूछ-पूछ कर ऐसी ही कुछ बातें, ये कलिकायें-
पुलक- पुलक कर विकसित होती थीं ये नव ललिताएँ।"
प्रथम सर्ग
६७<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२२०
६८
रानी के कोमल कर अपने दृढ़ हाथों में लेकर, -
बोले वचन नृपति, कान्ता को अपनी माला देकर-
"सुनो, सुनयने, मुझे ऊम्मिला सीता के जीवन में, -
प्रति द्रुत परिवर्तन दृग्गोचर होता है क्षण-क्षण में ।
२२१
इन के भावी पथ को निश्चित करने की तैयारी,-
इसी समय से करना कैसा तुम समझोगी, प्यारी ?"
"आर्यपुत्र, मेरी नन्हीं-सी दोनों हैं बालायें ;
उनको उलझाए हैं मेरी गोद और शालायें
२२२
सम्प्रति बन्धन में न डालिए इस लौनी लघुता को,
यों न निमन्त्रित करिए,इन के मृदु शिर पर गुरुता को ; "
"तुम मेरे सारे भावों को, प्रिये, न समझ सकी हो,
इसीलिए तुम इस आशंका में आकर अटकी हो ।
२२३
में अपनी प्यारी कन्याओंों के प्रवास के पथ में-
डालूँगा न कुबाधा उनके भावी जीवन- रथ में ।
मेरी केवल यह इच्छा है, ये दोनों मम तारे-
दो आय के शुभ्र वक्ष नभ में खिल जाएं प्यारे ।
२२४
इसीलिए बस इसी समय से एक यज्ञ के मिस से,
आर्य सिंहगण के छीनों को में देखूंगा, जिस से, -
कुछ दिन में कोई सुयोग्य नर वीर-द्वय मिल जावें,
जो मम अन्तस्तल की छाया को पा कर सुख पावें ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२५
इस में तुम क्या कहती हो ? हे प्रिये, तुम्हारे मन में, -
यदि ऐसा प्रस्ताव ठीक हो लगता, तो गुणिगण में-
जाकर इसकी विमल वार्ता करूँ समय पाकर मैं,
देखूं, तुम क्या कहती हो मम प्रश्नों के उत्तर में । "
२२६
"देव, आपकी सम्मति में ही मेरी भी सम्मति है,
अहो, आपकी शुद्ध बुद्धि में मेरी सारी गति है ।
किन्तु माण्डवी का भी रखिये ध्यान आप, हे प्यारे,
और सुघड़ श्रुतिकीर्ति लली को भी मत प्राप विसारें ।”
२२७
हे मेरी कल्पने बता दे मुझे करेगी अब क्या ?
धनुर्यज्ञ का वर्णन कर तू सकुचाएगी तब क्या ?
पूजनीय ऋषि वाल्मीकि ने करके उस वर्णन को-
अरी कल्पने, धन्य किया है अपने कवि जीवन को ।
२२८
जिसको, री, अपनी माला में कालिदास कविवर ने
गूंथा है, -ज्यों दिन की माला गूथी है रविकर ने,
ऐसे कुशल फूल माली के स्वकर, ग्रथित हारों में-
उस विवाह वर्णन में तू फँस जाएगी तारों में ।
२२६
प्रथम सर्ग
देख, आदि कवि के उन शब्दों को ही पढ़ते-पढ़ते-
मन जाता विवाह-वेदी ढिग क्रमशः चढ़ते चढ़ते, -
जिस से त्रेतायुग में उठकर धूम्र-यज्ञ ने जगको, -
प्रेमादर्श दिखाया करके पावन जीवन मग को ।
६६<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२३०
७०
तद्वत् कालिदास की गतिमय तीव्र कल्पना-धारा-
परशुराम के प्रखर परशु का तेज दिखाती सारा,
अब तू फिर क्या जाएगी उस प्रति चित्रित उपवन में ?
क्या तू स्वाद, अरी, पाएगी इस चर्वित चर्वण में ?
२३१
पूजनीय श्री तुलसी ने भी निज अन्तर्दशन से-
मनोहारिणी छटा दिखाई है भावाकर्षण से-
वह बगिया की सैन-बैन, वह गौरी का मृदु पूजन, -
तुच्छ, सुना क्या तू सकती है वैसा कोई कूजन ?
२३२
इसीलिए तू कर प्रणाम उन प्यारे मृदु चरणों में-
किंकिणि रव के क्वणित, प्रवाहित,नादित कल झरणों में।
जीवन की कालिमा मेट तू लगा चरण-रज-चन्दन,
आ, ऊम्मिला कुमारी के पद-पद्मों में कर वन्दन ।
२३३
पट-परिवर्तन होते ही वह लक्ष्मण-रानी होगी,
अपनों को ऊम्मिला तजेगी और बिरानी होगी ;
श्वशुरालय में देवि सुमित्रा उस पर बलि जाएँगी,
वह माता कौशल्या का मृदु लाड़ प्यार पाएगी ।
२३४
कुछ वर्षों में गाढ़ प्रणय का हार ग्रथित होवेगा;
अचल प्रेम मन्दिर से हिय का सिन्धु मथित होवेगा -
मान-मनौवल की अनेक शत प्रिय लहरें लहराकर,
लाएंगी स्मितियुत सम्भाषण के शत-शत रत्नाकर ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३५
पूज्या श्वश्रू की सिखवन की मीठी-मीठी बातें-
जब-तब श्री ऊम्मिला सुनेंगी, गृह में आते-जाते;
जब शत्रुघ्न कहेंगे "भाभी ! " तब वह पुलक उठेंगी ;
सखियों के सुगूढ़ वचनों को सुन वह किलक उठेंगी ।
२३६
अपने बांके प्रिय की प्यारी उस बांकी-सी छवि पर, -
दिन में सौ-सौ बार करेंगी अपने को न्यौछावर ;
ननँदी के तीखे कटाक्ष को सुन वह खीझ उठेंगी
लक्ष्मण की वीरता - कहानी सुन-सुन रीझ उठेंगी ।
२३७
अरी कल्पने, कुछ वर्षों में यह सब हो जाएगा,
यदि तेरा सुदूर दर्शन कुछ-कुछ नव बल पाएगा; -
तो तू करना इन सब बातों का वर्णन, हे बौरी,
तब स्वामिनी तुझे न रखेगी निज करुणा से कोरी ।
२३८
अब तू चल साकेत नगर को इस पुनीत नगरी से,
वहाँ उदधि को तू उलीचना छोटी-सी गगरी से,
जब तक हे शिथिले, पहुँचेगी तू कोशलपुर वर में,
श्री ऊम्मला पहुँच जायेंगी तब तक पति के घर में ।
२३६
किन्तु, ठहर तो तनिक उधर को तू चल धीरे-धीरे,-
जिधर ऊम्मिला, माता के सँग, कमल-सरोवर-तीरे,-
आकस्मिक तैयारी की हलचल से प्राकर्षित हो-
फुल्ल कमल को लजा रही है आँखों से, विस्मित हो ।
प्रथम सर्ग
७१<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
७२
२४०
इन विस्मित विस्फारित आँखों की छबि को तू हिय में, -
हलके-हलके धर ले, चित्रित कर ले, छोटे जिय में
यह निश्चिन्त भाव, च ंचलता यह, यह उच्छृंखलता, -
बन जायेंगी - चिन्ता गहरी गम्भीरता, विकलता ।
इति श्री प्रथम सर्ग
श्री लक्ष्मणार्पणमस्तु<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अथ श्री द्वितीय सर्ग<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/९०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/९१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१)
सखि कल्पने, देख तो यह आनन्द और उल्लास महा ।
किस आकर्षण से खिच थाया, क्यों यह सहसा उमड़ रहा ?
राग-रंग यह क्यों छाया है ?
यह कैसा प्रवाह आया है ?
परम-प्रतीक्षा- सरिता का
तट, -
कहो, प्राज क्यों सरसाया है ?
अवधपुरी के द्वार-द्वार पर बँधे हुए हैं बन्दनवार ।
कौन आ गई हैं जिन के हित आज सजे ये नन्दन द्वार ?
(२)
गगन विचुम्बित नर-पति गृह के सिंह द्वार खुले हैं आज,
चतुर शिल्पियों की चतुराई सर्व दिशा में रही विराज ।
राज-भवन का कोना-कोना-
चमक रहा ज्यों निर्मल सोना;
चेतन तो क्या ? जड़ भी प्रमुदित-
स्वागतार्थ है बना सलोना ।
सखि, कुछ तो कह, यह सब क्या है, कौन शुभ घड़ी आई है ?
आज किस लिए कोशलपुर की गली-गली हुलसाई है . ?
७५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/९२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(३)
शहनाई बज रही, नगाड़ों का रव गूँज रहा सब ओर,
मानो मूर्तिमान हर्ष ध्वनि गगन भेदने चली
लक्ष-लक्ष पुरजन आए हैं,
दशरथ नृप के गृह छाए हैं,
अपना भक्ति भाव लाए हैं,
प्रेम-मुदित हैं, हरषाए
इन्हें कौन-सा को मिला है ? क्यों य
हैं
थोर ।
हर्षोन्मत्त हुए ?
वृद्ध अवध-पति के लोचन क्यों आज नेह से सिक्त हुए ?
(४)
सुनो राजगृह में गाती है गणिका मधुर-मधुर कड़ियां,
प्रीति-काव्य की गूँथ रही है चतुरा सुखद स्निग्ध लड़ियाँ ;
सुनो उठ रही वह स्वर-लहरी -
स्वागत गीतों की
रह-रह, री,
उसको सुनें और हम जानें,
क्यों उमड़ी हर्ष-ध्वनि गहरी ।
त्रेता के कोशलपुर वासी क्यों यह हर्ष
तब हम जानेंगे किस कारण ये इतने
(५)
मनाते हैं ?
इठलाते हैं ?
कौशलेन्द्र दशरथ बैठे है राजसभा में मस्त हुए ।
मनवांछित फल पाकर उनके
पूरित है श्री हस्त हुए
इधर राम-लक्ष्मण के
श्री मुख-
वृद्ध पिता का हरते
हैं दुख
उधर
भरत शत्रुघ्न
सरसा तात-हिए में
नरपति के दाएँ-बाएँ में खिले
पुरातन उपवन फूल,
हुए अंकुरित वृद्ध विटप में अथवा नव
विराजे ;
नव सुख;
पल्लव सुख मुल 1
७६<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(६)
द्वितीय सर्ग
एक बार सूखा जाता था एक बृहन्नद किसी प्रकार,
पर चारों दिशि से वह आए सोते चार-मिले मँझधार ;
फिर तो सुनद लगा घहराने,
लहरें उठीं,
लगी
नाम नाश का त्रास
लहराने,
मिटा यों,
ज्यो तम, रवि कर जब फहराने ;
अब नृपति आनंद मग्न हैं, मन में अमित सिहाए हैं,-
अपने चारों ओर देख निज नूतन रूप लुभाए हैं ।
(७)
बहुत दिनों तक धारण की जो रघुकुल यशः पताका थी.-.
अपने ही कन्धों पर हिय में चुभती दुःख शलाका थी ;
उस को कौन संभालेगा अब ?
कौन सुदृढ़ कर थामेगा अब ?
रघु का धनुष बाण क्या होगा ?
किमि अरि-हिय में शालेगा अब ?
इतने ही में बहा समीर, -
उठीं सँभाल
धनुष-तूणीर ।
इसी प्रकार सोचते थे नृप,
अग्निकुंड से अष्ट भुजायें
(5)
सचिव, अमात्य, सुमन्त्र मन्त्रियों से
आवृत में रघुकुल वीर-
राज सभा में अति शोभित है; बैठी महाजनों की भीर;
लोल विलोचन अति मुकुलित हैं,
सब के रोम-रोम पुलकित हैं,
नव प्रसन्नता की रेखा से
प्रोष्ठ सुसम्पुट मृदु विकसित हैं ।
मधुर-मधुर गाती गणिकायें जन-मन की अब थाह नहीं,
सखि कल्पने, लगा तू डुबकी; और दूसरी राह नहीं ।
७७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/९४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(e)
कई सहस्र वर्ष पहिले का रम्य गीत वह गा दे,
भूतकाल के उदधि-गर्भ से सीप शंख कुछ ला दे ।
( राज सभा में गणकाओं का गीत )
री सखि, आज अयोध्या नगरी-उमड़ी ग्राज अयोध्या नगरी;
चार जुगुल जोड़ी ने कर दीं, ग्राठ दिशायें ये जगमग, री,
उमड़ी आज अयोध्या नगरी ।
विकसित है नभ-कुंज, विहंगम गाते मंगल गीत सुहावन
श्री अवध क्या ? फुल्ल कुसुम से सजी हुई हैं नभ की डगरी;
उमड़ी आज अयोध्या नगरी
चिरकालीन, जन्म जन्मान्तर का यह योगायोग निहारा,-
चारों स्रोतस्विनी वहीं, श्राई निज-निज सागर के ढिग, री;
उमड़ी आज अयोध्या नगरी ।
नाम रूप नदियों ने खोया, जब से मिली उदधि में धारा;
सीता-राम ऊम्मला-लक्ष्मण, हुई एक गति उनकी सगरी;
उमड़ी प्राज अयोध्या नगरी ।
चारों राजकुमारों से लघु मन विदेह-ललियों का हारा ;
हमरे कुँअर बड़े हैं रसिया, बड़े पुराने हैं ये ठग, री ;
उमड़ी प्राज अयोध्या नगरी |
यो गायन समाप्त होता है, हम को भी
राम, भरत, रिपुसूदन, लक्ष्मण का यह
राम और मिथिलेश
अब ज्ञात हुआ
--
नवल प्रभात हुआ;
बँधे हैं-
७८
एक रज्जु में;
खूब सधे हैं ;
मानो अपनी
हर से मुदित हिमेश
इसीलिए यह रम्य प्रवधपुर आज
कुशल शिल्पियों ने मिल मानो स्वर्गिक
दुहिता
दे कर
बँधे हैं ;
अनूप सजाया है-
साज
लजाया है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/९५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१०)
द्वितीय सर्ग
चारों भ्राताओं ने उठ कर सब जन-गण को किया प्रणाम,
तव नरपति बोले प्रमुदित हो वचनावलियाँ यों अभिराम, -
“सभ्य-वृन्द, आर्यों के प्रतिनिधि,
है लीलामय की यह गति-विधि,
कि हैं पधारे आज आप सब,
लहरा रहा स्नेह-क्षीरोदधि;
बड़े भाग्य हैं जो सुत-वधुएँ हम ने ऐसी पाई हैं,
मिथिला की लक्ष्मियाँ स्वयं ये अवधपुरी में आई हैं ।
(११)
आर्य-धर्म-पालन प्रति दुर्गम यह
रघुकुल राजदण्ड का धारण प्रति
सुख की इन शीतल
इन विलासिता की
क्षुरस्य धारा सम है,
कठोर कारा सम है ;
घड़ियों में-
लड़ियों में-
मोह पूर्ण प्रति तरल क्षणों में
कुसुमों की इन नय छड़ियों में
आज धर्म का स्मरण, सुगुम्फन शूलयुक्त सम्मिलन महान-
हम सब को करना होगा, हम कर्मनिष्ठ हैं धर्म-प्राण ।
(१२)
राजकुमारों से हम कहते
हैं- अब
ग्राप
सम्हल जाएँ,
धर्माचरण रहे सम्मुख, ये
भौंहें कहीं
न
बल खाएँ;
जागरूकता
जीवन-धन
है,
आत्मचिन्तन है,
न्याय तुला
सत्याचरण
निश्छल हो कर, जगज्जनों की
सेवा ही, प्रभु का वन्दन है ;
के दोनों पलड़े आठों याम समान रहें;
बहिर्जंगत में, अन्तरतर में ऐक्य भाव का ध्यान रहे ।
७६<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१३)
पुरजन, सदा काल से हम पर आप कृपा करते आए,
सदा हमारी राज-काज. की चिन्ताएँ हरते आए ;
लाए
ग्राज
नेह-प्रजलियाँ,
एतदर्थ ये
रोमावलियाँ-
हैं कृतज्ञ, पुलकित,
ग्राह्लादित ;
और कहाँ हैं
शब्दावलियाँ ?
आप सज्जनों से हम क्या अब कहें ? -स्वयं हैं आप बड़े,
रघुकुल के शुभचिन्तक हैं हैं राज्यासन के स्तम्भ खड़े ।
(१४)
आर्य धर्म में यह वैवाहिक बन्धन परम
दो आत्माओं का मिश्रण है, - अभिन्नत्व
धर्ममय है,
की जय-जय है ;
एक दूसरे से रल-मिल
कर, -
जैसे दो कलिकाएँ
खिल
कर -
ईश चरण में दुल
जाना
है ;
या फिर जीवन है
पंकिल
सर ;
मेरे पौरजानपद के गृह
पारस्परिक प्रेम
संपूर्ण -
चूर्ण ।”
सदा रहें, श्रनमिलता की ये कंकरियाँ हो जायें
(१५)
यों कह् नरपति जयोद्घोष के मध्य शान्त हो मूक हुए,
पौरजनों के लोचन मुक्ता ढरक-ढरक दो टूक हुए;
प्राँखों को कुछ-कुछ समझाते,
श्ररुभी वाणी को सुरभाते,
नरपति के भाषण से
विगलित-
८०
उठे
स्नेह-सिन्धु में थे
उतराते :
एक प्रतिनिधि अपने हिय के प्रसून विथराने को ;
नवल दुलहिनों के चरणों में निज अंजलि ढरकाने को ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/९७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>द्वितीय सर्ग
(१६)
"राजन, ग्रहोभाग्य हैं हम सब के, कि आप सरताज हुए,
हम हैं धन्य, अवध धन्या, चर अचर धन्य तव राज हुए;
काम-मोक्ष की, धर्म-अर्थ
की,
अथवा नरपति से अनर्थ की,
तब शासन में, हे शासक वर
हमें न चिन्ता हुई व्यर्थ की;
अब तो चतुष्फलों की चिन्ता हुई और भी दूर घनी,
क्योंकि सदेह आज प्रकटे हैं, चारों फल, हे अवध वनी !
(१७)
!
कौशलेश के पुण्यराज्य में ऋद्धि-सिद्धि की कब थी चाह ?
फिर भी आप प्रजा वत्सल हैं, उन्हें घेर लाए, नरनाह !
सीता और ऊम्मिला बाई,
राम लखन पर बलि-बलि जाहीं,
श्रुति कीरति माण्डवी सलोनी-
बनीं अन्य दो की परछाहीं ;
अब तो हैं सिद्धियाँ अनुचरा अवध कुमारों की सारी,
आप धन्य हैं, हमें दिखाया यह सुख मुद मंगलकारी ।
(१८)
प्राज हमारे घर आई हैं ऋद्धि-सिद्धि देवियाँ सभी,
मृदुता, कला, सौख्य, सुषमा जो थीं विदेह गृह अभी-अभी;
वे मिथिला वासी क्या जानें ?
सुषमा को वे क्या पहचानें ?
ऐसी इन ललिताओं में यें-
अवधकुमार जाय अरुभाने
अब हम चारों युगल जोड़ियाँ पूजागृह में रक्खेंगे,
नृपति, आपकी कृपा कि हम सब वत्सलता-रस चवखेंगे ।"
air<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>Jofa
ऊम्मिला
(१९)
'
राजसभा की लीला कब तकतू देखेगी, अरी सखी,
चल अलबेली, सरयू तट से छोड़ें हम निज तरी सखी!
एक-एक उत्ताल लहर में-
भँवरों के गंभीर गह्वर में-
देखें हम तुम नवोल्लास यह,
जो छाया है प्रकृति अचर में ।
इधर उधर नया डुलने दे डाँड़ हाथ से छोड़, सखी,
उसे आज सरयू प्रवाह से बद लेने दे होड़, सखी !
(२०)
.
इठलाती है सरनू, लहरें उसकी ये बल खाती हैं
एक-एक में गुथी नेह का फेना ये छलकाती हैं ;
तटवर्ती वृक्षों की
डाली-
चूम रही हैं ये मतवाली ;
अवधि-हीन आनन्द समाया,
कँपी पल्लवों की हरियाली ;
बाँके लक्ष्मण, सुघड़ उम्मिला की गाथाएँ गाती हैं,
नव-विवाह उत्सव के कारण लहरें हर्ष मनाती हैं ।
८२
(२१)
दिनमणि ने नभ में निज कर से छिटकाया प्रालोक नया,
फैला सौरभ, भूतल रीमा, प्रकृति हँसी, तम-शोक गया;
उड़े विहंगम छोड़ नीड़ ये,
हुए आज हैं विगत-पीड़
ये,
खुला राग का कनक करण्डक,
मुखरित हुईं विभास-मीड़ ये ।
कण्ठ नहीं, अणु-प्रणु गाता है, दिग्-दिगन्त हैं कम्पित आज,
विश्व गा रहा - अहा रही हैं लखन हिये ऊम्मिला विराज ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२२)
द्वितीय सर्ग
अवधपुरी की सदन लक्ष्मियाँ स्नान हेतु सब आई हैं,
'शिव संकल्पमस्तु' की ध्वनियाँ सरयू के तट छाई हैं; संकाव
वेद ऋचाओं का कल गायन,
सुन पड़ता प्रति मंगल पावन,
चली, वह चली तरी उधर ही-
जिधर उठा यह स्वर मन भावन;
सुनो कल्पने, क्या कहती हैं ये सब स्नानाकांक्षिणयाँ,
सुनो मधुर भंकार रही हैं उनकी कंकण-किकिणियाँ ।
(२३)
मैं सुमन्त गृहिणी के सँग कल
पुलकित हो सुमन्त रानी की
राजभवन में गई, सखी,
यों उठ बोली नई सखी-
बड़े नेह से,
बड़े चाव से,
मुझे बिठाया
हाव-भाव से,
पटरानी ने | फिर बोलीं वे-
"वधुनों के
दर्शनाभाव से-
तुम्हें लौट जाना होगा ।” में यह सुन कर कुछ सहम गई,
वे कहती ही गई - "हमारी सब वधुएँ अव अगम भई ।"
(२४)
कुछ न समझ पाई में, आली, सोचा यह कैसा व्यापार ?
पटरानी मेरे प्रति यों क्यों रूठी बैठी हैं इस बार ?
मृदु उपहास न समझ सकी में,
खो बैठी सुध-बुध निज की मैं,
साम्राज्ञी के उस श्रीमुख पर-
गंभीरता देख झिझकी मैं ;
किलक उठीं उल्लास भरी,
वधु-दर्शन की हौस हरी ।
तब तो सौम्य सुमित्रा माता
मैं भी सम्हल गई हो आई
८३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सीता
ऊम्मिला
(२५)
"अवध वासिनी ललनायें हैं, सुत-बधुनों की चोर बड़ी,
इसीलिए वधुनों का
अपनी आँखों में ले जातीं, उन्हें
उठा
कर खड़ी खड़ी;
दर्शन-
उत्सुक नयनों का
आकर्षण -
तुम्हें न होगा, जाओ निज गृह,
मानो कहा,
, बन्द हैं दर्शन ।"
यों लक्ष्मण जननी ने बोले विहँस वचन, मैं धन्य हुई,
नवल दुलहिनों के दर्शन की इच्छा और अनन्य हुई ।
(२६)
मैं बोली कि 'अवध बालाएँ चोर, पुरुष सब डाकू - हैं,
दूर-दूर की निधियाँ लूटें, ऐसे बड़े लड़ाकू है;
अब विदेह की निधि दिखलाएँ-
आप उन्हें झटपट ले आएँ,
प्राँखें तरस रही हैं, देख,
कैसी हैं वे नव कलिकाएँ ।'
रानी कौशल्या यह सुन कर मुसका के चुप साध रहीं,
मात सुमित्रा ने धीरे से मेरी कोमल बाँह गही ।
६४.
किए दरस सीता के, वे
(२७)
हैं गौरव की गंभीर-सी मूर्ति,
उन्हें देख मन में कुछ भय, कुछ श्रादर की होती है स्फूर्ति
सचमुच वे.. विदेह ललना हैं,
गुरुता से उनकी तुलना है,
मुख प्रखर-धुति से आलोकित,
आँखों में असि की छलना है;
किन्तु ग्रहा ! लक्ष्मण-रानी को जब ग्राँखों भर के देखा,
तब तो नेत्र उमड़ ग्राये यों ज्यों बरसी हो अश्लेखा ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>द्वितीय सर्ग
(२८.)
"क्यों क्या हुआ ?" एक ने पूछा, वृद्धा दूजी बोल उठी-
"अरी, पूछती क्या हो ? वृद्धा में भी नृप-गृह बीच लुटी ;
बहू ऊम्मिला में जब अटकी,
सहसा ढरक गई दधि-मटकी,
स्निग्ध- नेह वह चला अचानक,
सँभल-सँभल, फिर-फिर में लटकी;
क्या जानू, क्यों उसे देखते सहसा ही उमड़ाय हिया,
मिथिला की जादूगरनी है, देख न क्यों अकुलाय हिया ?
(२९)
मॅझली रानी पूछ उठी- क्या है इस नन्ही दुलहिन में ?
आँखें पोंछ कहा तब मैंने यह मन्तर करती छिन में ! '
अहा ! बहू है या कि खिलौना,
मिथिला का नवनीत सलौना,
कौन ब्रह्म में हो विदेह रत,
लाए यह प्रसाद का दौना ?
अब जब जनकपुरी जाऊँगी तो यह उन से पूछूंगी।"
"पूछ क्या करोगी? बूढ़ी हो," - "लली, तुझे समझा दूँगी।"
(३०)
"मैंने भी लक्ष्मण की रानी, देखी है” तीजी बोली,
"कितना सुन्दर मुख, क्या लोचन, औ' कैसी मीठी बोली !
सुकुमारता अवध आई
है,
अथवा विधि की चतुराई है,
आँखों में वह क्या है ? देखूं ?
अहा ! अतल की गहराई है !
उसे देखते ही यह अनुभव होता - मानों
यह मैं हूँ,
कई करोड़ बरस आगे जो दौड़ गई हूँ क्षण में, हूँ
८५
सौकर्य
उर्मिल<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(३१)
यही भाव, यह अपनेपन का अति विशुद्धतम रूप निहार-
सब पागल सी हो जाती हैं देख सुमित्रा की मनुहार ;
बड़े भाग लक्ष्मण
हाथ ना गए इस
लाला के-
बाला के,
छोड़ धनुष वे
अब विचरेंगे
बने
कुसुम उस की माला के;
श्रार्य- देश
की
उसको अपने
कुल - ललनाएँ हुलस उसे अपनाएँगी,
पूजागृह में वे प्रादर्श मनाएँगी
(३२)
वह लज्जा की मूर्ति, उम्मिला बहू सौम्य-सुठि की प्रतिमा,
आत्म-निवेदन की छोटी सी मूरत है वह गुण-गरिमा ;
वीर सुधन्वा लखन-चरण में-
ढरक रही है वह क्षण-क्षण में,
मानो चिर वियोग के आँसू,
८६
प्रिय पादाम्बुज के रज-कण में;
नारी की निष्ठा का ऐसा उज्ज्वल उन्नत रूप कहाँ ?
नेह सुधा के मधुर रसों का उमड़ रहा है कूप यहाँ ।
(३३)
आँखों को देखो - रामानुज - नेह-जाल में फँसी हुई,
मिथिला-सर से युगल मछलियाँ आ पहुँची है गँसी हुई;
क्षण में ये मचलें चंचल-सी,-
लखन नाम सुन के, निश्छल-सी,
क्षण में ये नीरव हो जावें-
प्रकृत नटी के जड़ अंचल सी
सच मानों ऊम्मिला, मुरलिका के सुदूर निक्क्वण-सी है,
अथवा विस्मृत निज स्वरूप के सहसा पुनमरण-सी है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(३४)
द्वितीय सर्ग
अहो ! अभी नन्हीं है, फिर भी बरबस जिया चुराती है,
खींच हमारे प्राण, न जाने चतुरा कहाँ दुराती है ?"
यह सुन एक सखी यों बोली-
"ज्ञात न तुम्हें ? बड़ी हो भोली !
चोरी में प्राधा-साझा है,
तुम तो हो उसकी हमजोली ।
जहाँ चरा कर चित्त
हमारे विमल उम्मिला धर श्राई
रंच बता दो ठौर वही, सखि, में बलि गई, परौं पाई ।"
(३५)
"आयें, मेरे भाग कहाँ जो में उसकी संगिनि होऊँ,
चरण-धूलि भी यदि पा जाऊँ तो अति बड़भागिनी होऊँ;
मैं तो उसके हाथ विकानी,
प्रथम दरस ही में
हृदय-खंड हिम-खंड
हुआ ग्राज यह
यों कहते-कहते उस ललना के
प्ररुभानी,
बना था, -
पानी-पानी ; "
दो लोचन छलक गए,
ज्यों सन्ध्या वन्दन के जल से तुलसी के दल पुलक गए ।
(३६)
अब तक तरुणी एक ध्यान से सुनती थी चुपके-चुपके,
वह आगे बढ़ कर बोली- "मैं सुनती रही तुम्हें छुपके,
किन्तु निरी हो गौएँ तुम सब,
वधुत्रों के मुख- दर्शन की ढब -
तुम्हें न आई सपने में भी ;
अब सुन लो कुछ मेरे कर्तब;
तुम तो गई, बलैयाँ ले लीं बहुत हुआ शर चूम लिया,
यह क्या ? जब तक हो न ठठोली तब तक हो क्यों शान्त हिया ?
८७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(319)
मैं पहले सीता से सस्मित बोली पर कुछ डर, मन में,
'बतलाओ, क्या ललित सम्मिलन रहता गहन वेणु-वन में ?'
यह सुनते ही वे कुछ हिचकीं,
कुछ गंभीर हुईं, कुछ झिझकीं,
फिर गौरव से आँख उठाकर -
'यह मर्याद आपकी निज की
कि यो प्रथम परिचय में स्वागत करती हैं उपहासों से,
या कि अवध में स्वागत होता है यों सूखे बाँसों से ?'
(३८)
क्षमा याचना कर में पहुँची माण्डवि, श्रुतिकीरति के पास,
वे हैं सीधी-सादी मानों भोलेपन की हों उच्छ्वास ;
अन्त में जा कर,
सब को देख
देखा वह
मुख कमल
उजागर,
जिसकी मौन-मूर्ति की तुम सब-
-.
मुखरित होती हो, पूजा कर,
उसे देख फिर से उद्गीरित वे ही वचन हुए क्षण में
'बतलाओ, क्या ललित सम्मिलन रहता गहन वेणु-वन में ?'
55
(३६)
'मानवता से दूर, मिलन का नीड़ बना यदि निर्जन में, -
तो फिर अवध-वास छोड़ो तुम जाओ ग्रायें ! घन वन में; '
यों बोलीं हँस हँस वे बोली,
जनक लली उम्मिला सलोनी,
मानों मम विनोद भिक्षा की-
उन ने हँस कर भर दी झोली ;
मैं उन पर हो गई निछावर, सुघड़ लली ने खींची डोर
मोद-चंग चढ़ गई गगन में गूंजा मन मृदंग का घोर ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>द्वितीय सर्ग
(४०)
सुन-सुन यह विनोद वर्णन, सब नव बालाएँ वृद्धाएँ,
हरख उठीं ज्यों हरि-कीर्तन से विकसित होती श्रद्धाएँ ;
सरयू का रमणीय तीर वह-
जहाँ जुड़ी कोकिला-भीर वह-
मुखरित हुआ, समीर डुल
तरल ताल दे उठा
मेरी मृदु कल्पने, छोड़ तू अव
स्नान करेंगी अब ये त्रेता के
(४१)
नीर
उठा,
वह ;
कागद की यह नैया,
युग की आर्या मैया ।
चलो देखने नृप दशरथ का वैभव पूर्ण भव्य प्रासाद,
अन्तःपुर में चारों वधुएँ हरतीं जहाँ समस्त विषाद ;
ये सब वधुएँ नई नवेली,
संग लिए निज सखी-सहेली,
कौन खेल वे खेल रही हैं ?
किधर हरकती हैं अलबेली ?
माँ कौशल्या और सुमित्रा को किस भांति रिझाती हैं ?
रंच देख लें, श्वसुर सदन में कैसे काल बिताती हैं ?
पर चलने के पूर्व यहाँ से
(४२)
कर ले तू वन्दन अभिराम -
बालू में खेले हैं राम;
इस सरयू सरिता का, जिसकी
रघु ने
जहाँ तपस्या करके, -
श्रार्य-धर्म पाला जी
भर के,
जहाँ दिलीप सुधन्वा विचरे-
राजदण्ड शुभ कर में घर के;
श्रार्य सभ्यता के प्रकाश का एक अंश जिन कूलों से-
फैला, वहीं चढ़ा दे अंजलि त आँखों के फूलों से<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(४३)
सिकता के कण-कण में सौ-सौ निहित हुई हैं सुस्मृतियाँ,
अणु-अणु में हें अश्वमेध की छिपी हुई शत-शत कृतियाँ ;
जहाँ भानुकुल उदित
हुआ है,
जहाँ न्याय डुलमुदित हुआ है,
सरयू का वह तीर सुहावन-
आज नेह-निर्भरित हुआ है ;
रजकण, जलकण, बालू के प्रणु स्वनित वायु में मिले, अहो, -
उड़े जा रहे नभ वक्षस्थल करने क्या स्नेहार्द्र, कहो ?
(४४)
सदा काल से तुम बहती हो सीधी, स्रोतस्विनि, सरयू,
आज बहा दो उलटी धारा, मानो हे स्वामिनि, सरयू,
तनिक देर उलटी वह जाओ,
वर्तमान को दूर
हटायो,
देश काल का तोड़ कुबन्धन-
उस अतीत के गर्भ
समाओ;
मम कल्पना, लेखनी मेरी तनिक लिए जाओ तुम साथ,
कुछ बटोर लाएँगी जो कुछ श्रा जायेगा इनके
(४५)
हाथ ।
किन्तु, नहीं, जाने दो, यह तो भ्रान्त चित्त की बिनती है,
अलि, प्रतीत के प्रन्तस्तल में मेरी क्या कुछ गिनती है ?
मेरी यह कल्पना यहीं पर-
६०
विचरे त्रेता युग के भीतर,
हरिश्चन्द्र- रघुकुल सरिता यह-
वेगवती, है वह प्रति दुस्तर ;
मुझ को यहीं ऊम्मिला-लक्ष्मण के चरणों में रहने दो,
ललित व्याह की लजवंती इस कालिंदी में बहने दो ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(४६)
द्वितीय सर्ग
हे तटवर्त्ती विटप-ग्रवलियो, क्या न सुना वह स्नेहालाप ?
तुम न भूलना ललनाओं का वह रसमय वात्सल्य-मिलाप ;
रखना याद अनोखा यह दिन,
गाँठ बाँध लेना तुम गिन-गिन;
भला भटका मैं जब आकर,
यह सब पूछूंगा में जिस दिन,-
उसी समय, उस दिन, हे पादप ! जो पीते हो सरयू नीर,
तुम्हें सभी कुछ कहना होगा डुला-डुला कर किसलय-चीर ।
(४७)
नीड़ों में तुम बैठ रहे हो मौन हुए जो चुपके से,
हे सब गगन बिहारी द्विजगण, क्यों बैठे हो दुबके से ?
अवधपुरी की बालाओं
ने--
त्रेता की गृह-ललनाओं ने-
पूज्य ऊम्मिला के सुनाम की-
उन श्रद्धायुत मालाओं ने
लक्ष्मण की प्रियतमा वधू का सुन्दर नाम स्मरण किया,
उसे कभी न भूलना, रख लो विस्फारित कर मृदुल हिया ।
(४८)
एक बार आऊँगा में जब दिन मणि होता होगा अस्त
जब तुम बैठे होगे दिन के कर्मों को करके संन्यस्त ;
उस क्षण तुम सब हो कर नीरव,
किए शान्त कलरव का विप्लव,
मुझे सुनाना इस प्रभात
के.
मुदमय सम्भाषण का गौरव
तुम्हें आज निज पंख पत्र में यह गाथा है लिख लेनी,
जो कुछ कहती हैं ये स्नानातुरा रमणियाँ पिक-बैनी ।
६१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(४९)
और तुम्हें क्या कहूँ उल्लसित सरयू की चपला धारा,
युग-युग लौं उड़ेलती जाश्रो तुम यह तरल प्रेम सारा ;
अवधपुरी की नेह-पाश हो,
रघुकुल की तुम गलित श्वास हो,
शतियों की इतिहास लेखिका-
प्रिय अतीत का शुभ-प्रकाश हो ;
बनी करधनी, कौशल जनपद की तुम सब कुछ जानो हो,
वर्तमान का मधुर स्वाद यह अनुभव से पहचानो हो ।
(५०)
श्री अम्मिला कीर्ति-गाथा यह तुम ने सुन ली मन देकर,
मुझे बताना जब मैं ग्राऊँ अपना दुखित हृदय लेकर ;
अपने जन को भूल न जाना,
मुझे कहाँ है और ठिकाना ?
इधर-उधर से फिर-फिर कर के-
यहीं खिंचेगा मन दीवाना ;
शोक-तप्त, लौकिकता ज्वर से पीड़ित यह अपना माथा,
जब ला रखूं गोद में, तब तुम कहना यह प्रतीत गाथा ।
(५१)
और तुम्हारी गाथा होंगी यही ऊम्मिला की बतियाँ,
कह सुन जिन्हें पसीजी अखियाँ, धक-धक धरक उठीं छतियाँ ;
प्रात वायु में डोल उठीं जो,-
२
दशरथ के गृह जाय लुटीं जो,-
करके दरस लखन जाया के, -
सिहर उठीं ज्यों पर्ण कुटी जो,-
उन ललनाओं ने, सरयू, तव विमल कूल में जो गाया,
आज सवेरे, वही गान हो गया हिये की लघु माया ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५२)
द्वितीय सर्ग
चलो देखने अब दशरथ का भव्य विशाल, सुखद प्रासाद
जहाँ चार वधुएँ अन्तःपुर में छिटकाती हैं प्रह्लाद :
वे सब वधुएँ नई नवेली,
संग लिए निज सखी सहेली,
कीन खेल वे खेल रही हैं ?
किवर छुप रही हैं अलबेली ?
माँ कौशल्या और सुमित्रा को किस भांति रिझाती हैं ?
रंच देख लें, श्वसुर सदन में कैसे काल बिताती हैं ।
(५३)
अन्तःपुर की द्वार देहली पे बाहर रुक
जाना तू,
चरण चिन्ह ऊम्मला बहू के देख, सम्हल पग धरना तू ;
इधर उधर मत फिरती रहना,
अपने मुख से कुछ मत कहना,
हृदय-पटल
पर धीरे-धीरे-
लिखती रहना, भोली बहना
री कल्पने ! द्वार पे रुकना और सम्हल जाना, चतुरा !
लखन - उम्मिला की पद-रेखा तनिक चूम लेना, विधुरा !
(५४)
भावी की, अतीत की, विस्मृत-पट की, विस्मारक तट की, -
जीवन-वट की, मन मर्कट की, विषाद की श्यामा लट की, -
सब की याद भूल कर जाना,
रंग चढ़े तुझ पर
मस्ताना,
इधर-उधर से चित्त हटा कर
नवल वधू के चरण लगाना,
ले. श्राना उनकी क्रीड़ा के, कुछ विकसित, कुछ मुकुलित फूल,
उन्हें सजा देना हिन्दी - सरयू सरिता - कविता के कूल ॥
६३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/११०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>राजप्रासाद में
(५५)
एक बार जिन को देखा था जनक राज के मंजु सदन में,
उन्हें ग्राज चल देखें, आली, दशरथ नृप के भव्य भवन में,
ललित ऊम्मिला, सुरभित सीता आ पहुँची हैं अपने घर में,
एक छोर से दूजे तक ज्यों सौदामिनी गई अम्बर में ।
(५६)
सासों की गोदी में, मां का मृदु उत्संग छोड़ उठ आई,
अथवा उत्तर दिन की किरणें वर्तमान दिन में जुट आई,
फैला वत्सलता प्रवाह वे युग तट श्वश्रू-सरिताओं के-
पूरित थे । हिय में उफान आ गया नेह-पय-भरिताओं के ।
(५७)
एक और प्रासाद कक्ष में लक्ष्मण-प्रिया विराज रही है,
अथवा फलकासन पर सस्मित कुसुम राशि मृदु भ्राज रही है,
पीछे खड़े हुए रिपुसूदन मुसकाते से देख रहे हैं,
अपनी भाभी के स्कन्धों के ऊपर से झुक, पेख रहे हैं ।
(५८)
तन्मय-सी, नीरव-सी बैठीं सम्मुख मुग्ध सुमित्रा माता,
हर्ष और सन्तोष भाव यह मुख पर रंग अपना छलकाता ;
झलक रही है चिर कृतज्ञता उन जगती के स्वामी के प्रति,
जिनके कृपा-कटाक्ष मात्र से फूली यह फुलवारी सम्प्रति ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१११
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५६)
द्वितीय सर्ग
निज पति का औदास्य भाव वह वे अब सहसा भूल गई हैं,
क्षीर-दान की बेला का वह दुःख गया । अव शूल नहीं है ।
अब आई बहार - वृद्धा की सूनी कुटिया आज खिल उठी,
उड़ बैठी उम्मिला कोकिला, हिय की डाली आज हिल उठी ।
(६०)
एक ओर यह प्रकृति, दूसरी ओर प्रकृति की माया बैठी,
अथवा दूजी ओर प्रकृति के गुण, लक्ष्मण की छाया बैठी,
उनके पीछे सस्मित से ये लघु सौमित्र देखते हैं यों,
निश्छल भाव मनुज तन घर के आया हो कुसुमित हो कर ज्यों ।
(६१)
एक ओर वृद्धा ऋतु रानी फूली फली विराज रही हैं,
और दूसरी ओर यह कली सुख की थाली साज रही है ;
लाज समाई इन आँखों में उन में हैं सन्तोष समाया,
इधर शुत्रसूदन-नयनों में मृदु उपहास हास्य रस लाया |
(६२)
आज सुमित्रा माँ का मानस-दिङ्ग-मंडल गत-शोक हुआ है,
छाया, धूप, वायु, बादल, सब शान्त हुए। आलोक हुआ है।
उनकी प्राची दिशि में दो-दो चन्द्र उदित हैं आज सुखारे,
जिन की विमल चन्द्रिकाएँ ये हरती हैं उनके दुख सारे ।
(६३)
अरे, वेदना कहाँ ? सुमित्रा माँ के मन की हूक कहाँ है ?
उस मँडराती विकला चकई की निशीथ की कूक कहाँ है ?
कहाँ ? कहाँ वह गई वेदना ? कहाँ क्लेश की चरम यातना ?
धन्य चिरंतन तप की प्रतिमें, धन्य सुमित्रे ! धन्य भावना |
६५<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अल
ऊम्मिला
(६४)
हे माँ, झूला आज डाल दो, निज रसाल की एक डाल पे,
अथवा ग्रीवा से आंदोलित अपनी इस श्रालम्ब - माल पे ;
बैठा ऊम्मिला बहू को और लखन भी प्रान विराजें,
धीरे-धीरे तुम झोटे दो-खड़ी खड़ी वत्सलता लाजे ।
(६५)
इस धन को, हे चिर भिखारिणी माँ, किस गृह से ले आई हो ?
यदि प्रतिपण का सौदा है तो बदले में क्या दे आई हो ?
आदान - प्रतिदानों के या विनिमय के उन पुण्य-गृहों में-
मिलता है यह ? या मुनियों के तप से पूत अरण्य-गृहों में ?
(६६)
खूब जतन से इसे जोहना, देवि सुमित्रे, धन्य भाग हैं ;
आज तुम्हारे द्वारे या कर खुल खेले ये रंग-राग हैं ।
भर-भर पिचकारी उड़ने दो, गूंज उठे मीठी स्वर-लहरी ;
तन रँग जाय, हृदय भी डूबे, पुलक उठें हम सब रह-रह्, री।
६६
(६७)
यह झिलमिल प्रकाश प्रालोकित कर दे सारे जगतीतल को,
मां, यह पुण्य प्रसाद तुम्हारा करे विमल सब के हीतल को;
सर्व दिशाएँ गूँज उठें अब लक्ष्मण के उस धनु दुर्धर से,
और ऊम्मिला उन की कीर्ति गा उठे अपने स्वर हिय-हर से ।
(६८)
नव प्रभात की बेला, अथवा सान्ध्य-किरण के गृथित जाल में,
जब चाहो अंकित कर देना, माँ, चुम्बन इस शुभ्र भाल में;
मम कम्पित कल्पना रहेगी खड़ी मूक-सी एक कक्ष में,
जब तुम इस दुलहिन को, माता, छिपा रखोगी स्फुरित वक्ष में ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(६९)
द्वितीय सर्ग
विगत विषाद-वक्र रेखा के जो अंकन तव हृदय-पटल के,
आज ऊम्मिला उन्हें पोछती अपने कर से हलके-हलके ;
माँ, पुंछ जाने दो उन सब को, रहे न कुछ भी चिन्ह शेष अव
कव की बात? बहुत दिन बीते। उनका क्या लवलेश-क्लेश अब ?
( ७० )
तुम ने कब अपनी पीड़ा का स्रवित अरुष जग को दिखलाया ?
द्रवित क्षणों की संस्मृतियों को सदा भूलना ही सिखलाया ;
अच्छी माँ, इस सुख के क्षण में ग्राज तुम्हें पल्लवित देख कर,
यह कल्पना जा रही क्यों तव विगत दुःख की मलिन रेख घर ?
(७१)
जाने दो कल्पने, निरी तुम मूर्खा हो, लौटो, ग्राम्रो री,
गई कहाँ थो और कहाँ जा पहुँचीं ? पगली हो, आओ री;
देखो इधर सुमित्रा बैठी और सामने ऊम्मिला बहू
उनके पीछे रिपुसूदन हैं, कैसे वर्णन करूँ, क्या कहूँ ?
(७२)
प्राची - दिशा बधूटी के सम श्री अम्मिला बधू के लोचन,-
कुछ-कुछ उन्मीलित हैं; उन में छाए हैं लक्ष्मण-रवि-रोचन;
अभी आँख के प्रोफल हैं वे, यथा प्रात से पूर्व दिवाकर,
या पहुँचा आलोक ऊम्मिला के कपोल के फुल्ल कमल-सर ।
(७३)
रिपुसूदन उनके पीछे स्मित हास्य कर रहे हैं विकसित यों,
अरुण-किरण से प्राच्य क्षितिज में मेघ खंड होता बिलसित ज्यों;
ये बैठीं सामने सुमित्रा देख रहीं क्रीड़ा मन भावन
विश्वेश्वर की नियम-श्रृंखला मानों विश्व घुमाती पावन ।
६७
हास्य
रस<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
अमिल
प्रवीण
(७४)
झुकी हुई हैं वधू ऊम्मिला इक प्रालिखित चित्र के ऊपर,
कर सरोज में लिए तूलिका, हैं गुनगुना रहीं मीठे स्वर ;
कुछ पूरा, कुछ रहा अधूरा, रखा सामने एक चित्र-पट,
मुख-अरविन्द समझ मँडारने लगी एक लोलुप भ्रमरी-लट ।
(७५)
मानों अर्ध सृष्टि रचना कर आदि कल्पना बैठ रही हो,
कुछ-कुछ श्रमित और कुछ विस्मित मन ने मानों बाँह गही हो;
झलक रही है कुशल तूलिका में अनेक रंगों की झाँई,
मानों पंचरंगी साड़ी की पड़ी लोचनों में परछाई ।
(७६)
"भाभी, क्या नव मृगया-प्रेमी की छवि चित्रार्पित यह की है ?"
यों बोले शत्रुघ्न कि मानों जिज्ञासा- कलिका महकी है ;
“हाँ लल्ला, पर रहो देखते चुपके-चुपके मेरी लीला, "
यों धीरे से प्रत्युत्तर में बोलीं श्री ऊम्मिला सुशीला ।
(७७)
"माँ" बोले रिपुसूदन अपनी जननी को सम्बोधित कर के,
| मानों बाल-कीर बोला हो निज वाणी संशोधित कर के ;
"माँ, भाभी ने मृगया-प्रेमी अश्व रहित है, अहो, बनाया,
क्या मिथिला की चित्रकला ने अप्राकृतिकता को अपनाया ?
(७८)
बड़ा शिकारी यह भाभी का, पादत्राण-विहीन खड़ा है,
अश्व-रहित, तूणीर- रिक्त, है, धनुष भग्न, फिर भी अकड़ा है;
कैसी चित्रकला है, मैंने इसका कुछ भी भेद न जाना,
भाभी रानी, बतलाओ यह प्राखेटक का कैसा बाना ?<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(७९)
द्वितीय सर्ग
यदि शिकार को निकला था, तो अच्छा एक धनुष लेना था,
और एक बलवान तुरंगम भी तो उसको दे देना था ?
पर तुम ने तो यह सब कुछ भी नहीं दिखाया अपनी कृति में,
माँ, तुम ही कुछ कहो, सुन रही हो डूबी सी तुम विस्मृति में ।"
(03)
पुलक सुमित्रा बोलीं लख कर रिपुसूदन को यों प्रकुलाते,
"सुनती हो कल्याणी, अपने देवर की भोली-सी बातें ?
देखें, लाओ इधर चित्रपट, क्या विचित्रता तुमने भर दी,
क्या अस्वाभाविकता चित्रित इन रेखाओं में है कर दी ?"
(-१)
दिया ऊम्मिला ने उनको वह चित्र विहँस कुछ, कुछ लज्जित हो,
ज्यों लज्जा आज्ञानुवत्तनी हो, चिर नियमों से सज्जित हो;
मग्न हुई जब माँ ने देखा निज लाड़िली बहू का चित्रण,
मानों सहसा याद आ गया गत जीवन का कोई लक्षण ।
(-२)
फिर बोली “यह मृगया प्रेमी, बहू, कहाँ से तुम ने पाया ?
इतना सुन्दर रूप-निरूपण ! यह तुमको किसने सिखलाया ?
इस चिर आखेटक का मुख तो लक्ष्मण के मुख के समान है,
अपने आदर्शों के पीछे खो बैठा यह स्मृति-ज्ञान है ।
(-३)
?
मैं बलि गई. बताओ, किस ने तुम्हें सिखाई चित्रकला यह
रेखाओं की सांयोगिक प्रति ललिता अभिव्यक्ति कुशला यह ?
सच कह दो, लक्ष्मण को, तुम ने कैसे समझा कि वह शिकारी-
अपने निश्चय का पक्का है ? बोलो रानी, मैं बलिहारी ।।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
लघु
(58)
सौमित्र हुए कुछ विस्मित, कुछ शरमाए, कुछ सकुचाए,
माँ के वचनों को सुन फिर से चित्र देखने दौड़े श्राए ;
उत्सुक हो कर उन ने फिर से ललित चित्रपट को अवलोका,
कुण्ठित बुद्धि सम्हल जाती हो मानों खा कर कुछ कुछ धोका ।
(८५)
पर, बोले, "माँ, लगीं बोलने तुम भी भाभी की सी बातें,
दोनों मिल कर मुझे बनाती हो, जानू मैं ये सब घातें ;
मेरी शंकाओं का कर दो निराकरण तुम, तब में जानूँ,
ऐसा ग्रस्त व्यस्त श्राखेटक कहीं बता दो
(६६)
तब में मानूँ ।
इसके पहले मैंने देखा कहीं न ऐसा
अजब शिकारी,
धन टूटा कांपे, मानों भोली डाले खड़ा भिखारी ;
माँ, तुम कहती हो भैया से मिलती है इसकी कुछ सूरत,
है प्रणाम, यदि यह भैया की, भाभी के मन की है मूरत ।
(८७)
क्यों भाभी, क्या इसी रूप में उनका सतत ध्यान धरती हो ?
मेरे अपराजित दादा का यों ही सदा स्मरण करती हो ?'
""लल्ला ! तुम जल्पक हो ।" लज्जारुणावनता ऊम्मिला बोली,
"पगले, चुप हो !" तब जननी की यों प्रादेशांगुलियां डोलीं ।
(55)
"शिर आंखों पर है तव प्रज्ञा, किन्तु मुझे, जननी, जतलाओ,
इस विचित्र भावाभिव्यक्ति का मुझको तनिक तत्त्व समझाओ।"
"वत्स, समझ लो, तुम्हें समझना है जो कुछ अपनी भाभी से ;
बहू, खोल दो लल्ला के हिय-द्वार आज अपनी चाभी से ।"
२००<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(58)
द्वितीय सर्ग
"जाती हूं, कौशल्या जीजी बाट जोहती होंगी मेरी,
सभा भवन में जाने में हो नरपति के न कहीं कुछ देरी;
दक्षिण जन-पद के शासक का निर्वाचन- निश्चय करना है,
किसी चतुर की नव-नियुक्ति से रिक्त स्थान प्राज भरना है ।"
80 )
(
"
यों कह उठीं सुमित्रा, बोले तब शत्रुघ्न शिरोमणि हँस कर
"मां, मुझको नियुक्त करना, में खूब करूंगा शासन कस कर ;'
"लल्ला, पहले तो तुम मुझसे ले लो अभी कला की शिक्षा,
फिर अपनी झोली में मां से लेना शासक-पद की भिक्षा।"
( १ )
यों उपहास वचन भाभी के सुनकर श्री शत्रुघ्न लजाए,
फिर बोले "भाभी, भैया के ये क्या तुम ने साज सजाए ?
तनिक चित्रपट देखो अपना, देखो और मुझे समझाओ;
क्या प्रेरणा हुई थी मन में, उसकी गुत्थी तो सुलझाओ ।"
(२)
"रिपुसूदन, मैं क्या समझाऊं, एक हूक उठती है मन में,
हिय में एक बाण लगता है, स्पन्दन होता है कण-कण में;
तन की सुध कुछ-कुछ सो जाती, ये प्रांखें अँपने लगती हैं,
तब लोचन तल पे सपने की क्रीड़ाएं कँपने लगती हैं ।
(६३)
बज उठती है हृदय-बाँसुरी, एक मद-प्रलसता छा जाती,
अति सुदूर, आदर्श चिरन्तन सुन्दर की झाँकी श्रा जाती
अस्वाभाविक और प्राकृतिक, ये सब गिर पड़ते हैं बन्धन,
अपने आप हृदय की कोकिल कर उठती है प्रश्रुत क्रन्दन ।
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१४)
वन्दन की शत श्रद्धांजलियां अलख चरण में चढ़ जाती हैं,
कढ़ आती है एक आह, श्र' अर्चन सरिता बढ़ आती है;
कुछ भावाभिव्यक्ति बरबस ही ऐसी घड़ियों में हो जाती,
प्रतिपूरित जलराशि यथा, बन सरिता, सागर में खो जाती ।
(६५)
अपने आप हाथ चलते हैं और तूलिका पन्थ दिखाती;
मदमाती आँखें प्रेरित हो चित्रकला का सूत्र सिखातीं;
एक-एक रेखा में तत्मय अर्पण-रस घुलने लगता है ।
जगता है सुषुप्त अभिव्यंजन, हिय बरबस डुलने लगता है ।
(१६)
हुआ अनिल-ग्रान्दोलन एक कि नचने लगती पत्ती-पत्ती,
हुआ हृदय व्याकुल कि जल उठी नव आरती-दीप की बत्ती;
भावोन्मेष न कह कर प्राता है, लल्ला, हृद्वाम तुम्हारे,
ना जाने, कब, किस क्षण आकर वह कर देता वारे-न्यारे ।
(६७)
नाच-नाच उठते हैं पागल से ये कवि गण ताली देकर,
मानों आत्मार्पण को जाते हैं ये हिय की डाली ले कर ;
खोते हैं अपना अस्तित्व; न भौतिकता की चाह उन्हें है,
वह क्या है? तुम तनिक कहो, किस अग्नि-शिखा का दाह उन्हें हैं ?
(१८)
?
· चाह कौन सी उनके हिय में ? कौन लगन लग रही उन्हें वह ?
रह, रह, लल्ला, कौन नचाती है उनको पागल-सा ग्रह-रह
मूर्तिकार कैसा जादूगर जो प्रस्तर में प्राण फूँक दे ?
वह क्या है जो जीवित कर दे शिलाखण्ड को, एक हूक
१०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ६ )
द्वितीय सर्ग
;
ऐसा महाप्राण दानी, जो जड़ को भी चैतन्य बना दे,
ऐसा नीरव गायक, जो जड़ शब्दों को भी धन्य बना दे
वन्य प्रान्त में, गृह-आँगन में जिसकी गति सब देश-काल में,
यह है कौन ? कला का पूजक ! अमृत-पुष्प परमेश- माल में ।
(१००)
ललित कला? मैं क्या जानूँ सत्-चित्-सुन्दर स्वरूप-ग्रभिव्यंजन ?
अणु-अणु में, रज के कण-कण में, रमा हुआ है अलख निरंजन ।”
"“भाभी,” कम्पित, तन्मय, पगले रिपुसूदन बोले स्नेहादृत-
" तुमने कला - ज्ञान की सीमा को भी किया विशेष अनादृत ।" /
(१०१)
"लल्ला, पगले भी उतने हो, जितने हो तुम बड़े सलौने,
ऐसी बातें करते हो तुम जैसी करते हैं
लघु छौने;
क्या है कला ? आध्यात्मिकता की है वह समाधि - तन्मयता,
वह है एक ऊर्ध्व गति, वह है इस मृण्मयता की चिन्मयता ।
(१०२)
कविता कब उद्गीरित होती ? कब चलती कठिनी बरबस-सी ?
कब तूलिका नाच उठती है, मानों कठपुतली परवश-सी ?
मुझे बताओ, रिपुसूदन, क्या सदा भाव-संकेत तुम्हारे-
बिना
बुलाए, अतिथि सदृश, आ जाते नहीं हृदय के द्वारे ?
(१०३)
कवि कब कहता है ? केवल तब जब साधनालीन होता है,
एक जाल में विधा हुआ जब स्पंदित एक मीन होता है;
प्राण सिमिट, मिट, निठुर लेखनी की जिह्वा में आ जाते हैं,
मसि भाजन में अहंकार घुल जाता, भाव निखर प्राते हैं।
१०३<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१०४)
इसी अचानक से प्रवाह का नाम मंजु, मृदु ललित कला है,
यह प्रवाह - जो बिना नियन्त्रण के सब काल, सदा निकला है;
किन्तु कदाचित तुम पूछोगे अन्तिम ध्येय
तो सामंजस्य स्थापन का बना हुआ है
(१०५)
कला का, देवर,
कला - कलेवर ।
बहिर्जगत में, अन्तरतर में निर्मलता का ध्यान रहे नित,
तात चरण ने प्रथम दिवस ही यह शिक्षा दी हम सबके हित;
समता संस्थापन, जीवन का उसी दिशा में सतताकर्षण-
जहाँ जगत्पति का सिंहासन यही कला का अन्तिम दर्शन ।
(१०६)
अब तुम पूछोगे कि तुम्हारे अग्रज का यह कैसा चित्रण ?
मैंने उनको जैसा पाया, तद्वत् ही है यह चित्रांकण;
आर्यपुत्र मेरे
जीवन के हैं प्रादर्श शिकारी, देवर,
जो व्रत पालन को उद्यत हैं करके सब सर्वस्व निछावर ।
(१०७)
थोड़े से सहवास-काल में में यह जान सकी हूँ अब तक-
कि वे महायोगी, वे इन्द्रिय-जित्, वे गुडाकेश, वे अपलक;
यही सुदृढ़ता, यही तुम्हारे अग्रज की भामिनि का निर्णय;
मैंने उन्हें किया है चित्रित इसी लिए हो कर यों तन्मय
(१०८)
यह तो उनके पुण्य-चित्र का लौकिक अर्थ बताया मैंने,
किन्तु अलौकिक भाव लिए है यह जो चित्र बनाया मैंने;
उनको भी सुन लो, रिपुसूदन, यह है अरण्यकों की वाणी"
"कहो पुण्यदा मेरी भाभी, कहो कहो रानी कल्याणी । "
१०४<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१०६)
द्वितीय सर्ग
"प्राय-धर्म के आचार्यों ने सृष्टि तत्व है खोज निकाला,
एक सूत्र में उन ने गूंथा है सुगूढ़ वह तत्व निराला:-
मैं हूं एक, किन्तु प्रजनन के हेतु अनेकों रूप बना हूँ,
अमित विरोधाभासों का मैं अद्भुत पुंज अनूप बना हूँ ।
(११०)
इसी दशा की पुनः प्राप्ति की उत्सुक श्राकांक्षा अंकित है,
अतः समझते हो तुम, इसको कि यह प्राकृतिकता-वंचित है ;
त्रेतायुग के सभी शिकारी घोड़े पर चढ़ कर जाते हैं,
पर मम क्रीडात्सुक निस्साधन विचरण में ही सुख पाते हैं ।
(१११)
साधन हीन, स्वप्न से जागृत, जीवात्मा की यह यात्रा है,
इस में स्वामी के—उस मृग के दर्शन की उत्सुक मात्रा है;
इसीलिए, देवर, इनका है टूटा धनुष, रिक्त है तरकस,
इन का जीवन ढरक रहा है उन अलक्ष्य चरणों में बरबस ।”
(११२)
यों कह सती ऊम्मिला चुप हो रहीं कुहुकिनी नव कोकिल-सी,
और, लक्ष्मणानुज की आँखों में झलकी लड़ियाँ झिलमिल-सी;
उन ने उठ कर, भक्ति-प्रेम से प्रार्द्र हृदय की भारी लेकर,
ढरका दी चरणों में । शिर पर छए उम्मिला- ऊषा के कर
(११३)
इतने ही में सस्मित- वदना शान्ता देवी भीतर आई,
रिपुसूदन को देख उम्मिला- चरणों में कुछ समझ न पाई;
बोलीं- "जाने क्या जादू है इन बालाओं में मिथिला की ?
रघुकुल के लालों को क्षण में बाँध, बुद्धि उनकी शिथिला की ?"
१०५
ननरत्ना
देवर-भाभी
मजाक<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
4
(११४)
श्री ऊम्मिला उमँग कर बोलीं- "ननदी जीजी, तुम हो भोली,
पहले से तुम तो प्राचार्यों के सँग करती रहीं ठठोली ;
ब्राह्मण ये क्या जानें ? जादू क्या होता है ? कैसे चलता ?
वे तो तभी समझ पाते हैं जब वह उनको सहसा छलता ।
(११५)
यज्ञ कराने के मिस आये भोले एक ब्राह्मण कोरे,
यहां दाशरथिनी ने उनके ऊपर डाले अपने डोरे;
अब तो मेरी जीजी को बस मन्तर-जन्तर सूझ रहा है,
क्यों, है टीक बात मेरी यह ? लो, कुछ अनुचित नहीं कहा है ।"
(११६)
"दुलहिन रानी, तत्वज्ञानी श्री विदेह की सब कन्यायें-
कैसे सीख सकीं चतुराई, बोलो तो ये सब धन्याएं ?
क्या विदेह रानी ने कोई पाल रखा है, ग्रहो,
जो इन सब को कुशल कला की दीक्षा देता रहा
( ११७)
चतुर नर ?
निरन्तर ?"
"शान्ते, जीजी, विदेह के घर द्वार बुहारे है चतुराई,
अपनी चिन्ता करो, न पूछो कि यह चतुरता कैसे पाई;
कई वेदवित् बैठे रहते उनकी द्वार-देहली पर नित,
ननदोई भी वहीं न पहुँचें हो कर तुम से कहीं उपेक्षित ?"
(११८)
यों भावज की और नँनँद की मीठी-मीठी बातें प्यारी-
होने लगीं । हरी हो आई वाक्य चतुरता की नव क्यारी !
पूर्ण विश्व की मृदु वत्सलता और सुघड़ता, ग्रहा, सिहाई,
आई वह दशरथ के घर में, सम्भाषण में रही समाई ।
१०६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(११)
द्वितीय सर्ग
शान्ता रिपुसूदन के प्रभिमुख हो कर बोलीं यों सकुचा कर;
"भाभी से तुम बहुत कर चुके बात क्यों न ? अब जाओ बाहर;
मैं भी तनिक देर इन से कुछ कर लूं श्रुतिकीरति की बातें,
रिपुसूदन भागो, सुन उसकी बातें तुम हो सकुचा जाते ।"
(१२० )
तब दोनों ने घुल-घुल अपने-अपने मन की गाँठ खोलीं,
भौजाई ननंदी के धीमे स्वर की गूंज उठी मृदु टोली ;
बोली शान्ता "प्रये, ऊम्मिले, तुम ने तो दो दिन के भीतर,
अपनी मृदुता से प्लावित कर दिया हमारा यह सुन्दर घर ।
(१२१)
मातु सुनयना की गोदी में बोलो, क्या कुछ आकर्षण है ?
अथवा उन के पय में होता क्या ग्रात्मा का संघर्षण है ?
क्या है ? कुछ तो कहो, बताओ, क्या तुम सब को खींच रही हो ?
अपने नेह-सलिल से कैसे यों घर-घर को सींच रही हो ?
(१२२)
तव दर्शन कर अवध नारियों का मानस कृतकृत्य हुआ है,
उनके हिय में वत्सलता का एक अनोखा नृत्य हुआ है ;
मैं सुन आई हूँ, घर-घर में सब कर रहीं तुम्हारा गायन,
भाभी, तुम्हें देख क्यों सबकी आँखों से बरसे है सावन ?"
(१२३)
सुन कर अपनी नॅनँदी के ये वचन, ऊम्मिला सकुच गई यों,
नव दुलही प्रिय-दरस परस से हो जाती है छुई-मुई ज्यों;
इस कोमल संकोच भाव पर हुई निछावर शान्ता देवी,
विमल सलज्ज भाव बन कर आ गया मृदुल चरणों का सेवी ।
१०७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१२४)
धीरे से, लज्जित रसना को कुछ प्रस्फुटित और विकसित कर,
बोलीं श्री ऊम्मला, शान्ता नॅनँदी को प्रति ग्राह्लादित कर ;
"मैं क्या तुम्हें बताऊं ? जीजी, मुझ में क्या है, मैं क्या जानूं ?
जो तुम बातें कहती हो वे सब मैं निरी सत्य क्यों मानूं ?
(१२५)
हां इतना मैं जान सकी हूं कि तुम कृपा करती हो मुझ पर,
वत्सलता के वशीभूत हो अमृत-पाणि धरती हो मुझ पर ;
अवधपुरी की माताएं भी बड़े लाड़ से, बड़े चाव से,
मुझ अबोध बाला को अनिशि ढँक देती हैं प्रेम-भाव से ।”
(१२६)
"नहीं,” शान्ता बोली, "भाभी, यह रहस्य तुम सुलझाओ, री,
इस वत्सलता के प्रवाह का क्या कारण है, समझायो, री;
मुझे न टालो तुम बातों में। कुछ निगूढ़ता है इस सब में,
पिंड पडूंगी, औ' समभूंगी यह प्रति गुह्य भावना अब मैं ।"
(१२७)
यों कह श्री शान्ता देवी ने उनका मृदु कर-पल्लव थामा,
उत्सुकता से लगी पूछने इस रहस्य का कारण वामा;
लक्ष्मण रानी ने अपना मुख छिपा लिया गोदी में उनकी,
यथा छिप गया हो अपने से जीव स्वयं गोदी में गुण की ।
(१२८)
फिर कुछ ध्यान-मग्न सी होकर, कुछ धीरे से, मीठे स्वर से,
कहने लगी ऊम्मिला, मानों बही वचन-सुरसरि श्रम्बर से ;
"तुम ने ठीक कहा, है मेरी माता के पय में संघर्षण,
उस नवनीत मधुर का मुझ में आन समाया है आकर्षण ।
१०८<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१२५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१२६)
द्वितीय सर्ग
यदि कुछ है तो केवल माँ का ही प्रतिबिम्ब समाया मुझ में,
उनके पुण्य आत्ममंथन का रंचमात्र कण आया मुझ में;
मेरी जननी वत्सलता की पुण्य मूर्ति हैं, शान्ते जीजी,
मेरे तात चरण ही उनकी पूर्णा गति है, शान्ते जीजी ।
(१३०)
मातृ-धर्म के मन्त्र मनोहर हमें सिखाये थे
विश्वेश्वर के अटल नियम के रूप दिखाये
माता ने,
थे
माता ने ;
पूर्ण मुक्ति की ओर विश्व को ले जाना है काम हमारा,
जगती को तद्रूप बनाने में देना है हमें सहारा ।
(१३१)
पूर्ण सत्य की ओर विश्व का चक्र घुमाएँ- माताएँ मिल,
अपने स्तन की शुद्ध-धार से दूर करें वसुधा का पंकिल ;
मेरी माँ की यही भावना मुझ में कुछ-कुछ प्राय समानी,
इसी लिए तुम मुझे बढ़ावा देती हो, नॅनँदी कल्याणी ।"
(१३२)
सखी, कल्पने, अब देखेगी क्या ? तू कहां चलेगी, कह दे ?
पद-विन्यास ऊम्मिला के लख क्या तू ग्रव
अभी देखना है लक्ष्मण का मन-मधुकर
बीत न जाये जीवन घटिका, आ जाये न
(१३३)
मचलेगी, कह दे ?
मँडराते, सजनी,
प्रन्त की रजनी ।
अरी, देखना अभी-अभी तो वे आई हैं अपने घर में,
दो दिन में ही उन ने घर कर लिया सभी के अन्तर तर में
किस प्रकार लक्ष्मण उपवन में हुलस खिलेंगी औ' फूलेंगी ?
लक्ष्मण-शाखा पर वे कैसे भूम-झूम झुक झुक झूलेंगी ?
१०६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१३४)
अरी तुझे तो अभी देखना है यह सब स्वर्गीय दृश्य, री,
तेरे उर में अंकित होंगे लक्ष्मणोम्मिला पदस्पृश्य, री;
उनकी झांकी को तू दरसा
देना हिन्दी माँ के द्वारे,
तब तू होगी धन्य और तब
तब गृह होंगे वारे-न्यारे ।
(१३५)
सास बहू का मृदु-दुलार कुछ कुछ तू देख चुकी है, आली,
तू ने सुन लीं नॅनँद शान्ता की चुटकियाँ मधुर रस वाली ;
रिपुसूदन को कला-पाठ भी पढ़ते तू ने
और भक्ति-सर में उतराते तूने उनको
(१३६)
देख लिया है,
पेख लिया है ।
अन्तःपुर को छोड़ चलें री, अब श्रा चलें हर्म्य के बाहर,
चलें जहां, श्री राम-लखन की फैली अभिनव कीर्ति उजागर ;
टल जाने दे बरस चार छः यों ही इधर उधर विचरण में,
जाने दे तनिक ऊम्मिला-लक्ष्मण को सुख-पटावरण में ।
(१३७)
छुप
स्नेह-रज्जु यह बटी जा रही है, इसको तू बट जाने दे,
प्रथम- मिलन की अरुण झिझक को, अरी, तनिक-सी हट जाने दे;
फिर तू आकर इन दोनों की मधुर ललित नित लीला लखना,
जितने चयन कर सके उतने तू प्रसून अंचल में रखना ।
११०
(१३८)
लेखनी,थक गई हो,तनिक देर विश्राम कर लो न विश्रान्ति-गृह में,
प्यार वर्णन करो लखन का,किन्तु सुस्नान करलो न निर्भ्रान्ति दह् में?
नवल शृङ्गार रस श्रमित उमड़े, सखी, किन्तु वेला उदधि की न टूटे,
मुक्त रसना तुम्हारी लुटावे सुखद प्यार के पुष्प संसार लूटे ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१३६)
द्वितीय सर्ग
नेह के गगन में जब चढ़ेगी विमल चङ्ग, तब डोर तू थाम लेना,
ऊम्मिला के लखन धनुर्धर वीर हैं। तू सदा युगल का नाम लेना;
वायु में डोलकर, गगन को चूम कर, चङ्ग सकुशल सलौनी उड़ेगी;
खींचना डोर जब चाहना । गगन में देख भटके य' आँखें जुड़ेंगी।
अांखें दो थीं
मन में मन की
ऊम्मिला-लखन की
दोनों
जीते
(१४०)
-
--
अब चार हुई,
गुजार हुई,
होड़
बदी,
पर हार हुई |
१११.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>संघमित
श्रृंगार-वन!
सखी कल्पने
मुकुलित-कुसुम-दर्शन
(१)
चितेरी
बनो,
और लेखनी, बनो तूलिका ;
उमंगों के रंगों में रंगो,
करो चित्रित छवि सुख - मूलिका ;
रंग रेखा के
कलम की बारीकी की छटा-
उभर आए रेखा के बीच,
रंग की स्निग्ध लालिमा खिले
कल्पना-पट को देवे सींच ;
बीचोंबीच
खींच दो विमल ऊम्मिला काश,
4
जहां लक्ष्मण-से पूर्ण शशांक
विलस करते हों मदु उपहास |
(२)
आठ-दस बरस बीत ये गए,
भरा ग्राकण्ठ प्यार का सार;
अनेकों वैसारिणि
दे रहे हैं
ऊम्मिला के हिय लक्ष्मण बसे,
लखन के हिय ऊम्मिला-निवास ;
रंग यह अब चोखा चढ़ गया,
तनिक देखें उनका उल्लास;
११२
के वृन्द
कौतुक - उपहार ;
वासना का न कहीं है लेश,
न रहा कदापि कलह का क्लेश,
जब कभी बाकी जोड़ी गई,
रह गया सदा नेह अवशेष ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(३)
वह चली है तटिनी भरपूर,
दूर तक फैली जल की राशि
नहीं
है उत्कण्ठा उत्क्रोश,
मूक हो गई हिये की क्वासि ;
एक-दूजे
में
द्वितीय सर्ग
प्रोत-प्रोत -
स्रोत दोनों ये एक समान
एक धारा हो कर वह रहे,
देह दो, किन्तु एक हैं प्राण;
मान का दान और प्रतिदान,
हास का पाश और सुविलास,
ऊम्मिला के आँगन में, सखी,
कर रहे हैं मन्द स्मित रास ।
(४)
लेखनी, यह संयोग निहार,
करो कुछ ऐसा वर्णन आज ;
बहे शृङ्गार-सुरस की नदी,
न दीखे तट-वर्त्तिनी सुलाज;
आज कुछ ऐसी हो उन्मत्त-
करो विचरण - विचरण के हेतु;
नदी को पार करो, री दीन,
कहाँ की नाव, कहाँ का
सेतु ?
लखन, ऊम्मिला निभावें तुझे;
बनी कागद की तेरी नाव,
कहीं यदि वह विगलित हो गई,
अमरता घोयेगी तब
पाँव ।
११३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(2)
"सुनो, माँ, मेरी भी कुछ सुनो, -
या कि वे ही सब सच कह रहे ?"
सुमित्रा से यों प्रार्थी
बने,
ऊम्मिला के लोचन
डहडहे ;
खेलता था उन में आह्लाद,
और कीड़ा का लोलुप भाव :
किन्तु लक्ष्मण का मृदु सामीप्य-
लगाता था लज्जा के दांव
खीझ, -
पार्श्व में,
इस तरह नेत्रों को नत किए,
किन्तु दरसाती कुछ-कुछ
सुमित्रा माता के
ऊम्मिला खड़ी हुई थी रीझ ।
(६)
क्वणित परिहास-शीलता लिए,-
हिलाते मां का अंचल
छोर, -
लोचनों से कौतुक की
कर रहे थे लक्ष्मण उस
वृष्टि-
ओर ;
सुमित्रा उन दोनों के
बीच-
सीन ;
हो रही थीं पर्य
कि मानो दो मध्यान्हों मध्य-
सन्ध्या-लीन ;
हो रही अरुणा
११४
एक क्षण लक्ष्मण को वे देख,
दूसरे क्षण ऊम्मिला निहार,
सोचती थीं-"अब इस पे, या
. उस पे, मैं हो जाऊँ बलिहार ?"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(७)
कर रहे थे लक्ष्मण - "मां, तुम्हें-
कदाचित होगा कम विश्वास;
किन्तु सुन लो, ऐसी है बात-
तुम्हारी पुत्र वधू की
द्वितीय संग
खास ; "
सुमित्रा बोलीं उन से, "लखन-
कह रहे श्रुतकीरति की बात ?"
"नहीं, मां, इनकी ये जो खड़ीं-
तुम्हारे आगे हो नत माथ;
कह रही थीं कि अयोध्यावास,
मुझे है असहनीय अब और
क्योंकि मां श्वश्रू के वात्सल्य-
चीर का मैंने पाया
छोर ।"
(5)
लखन के सुन ये बचन समोद,
पाणिपल्लव से अपने खींच -
सुमित्रा ने सस्मित ली बिठा
ऊम्मिला को गोदी के बीच ;
देख उनके प्रोष्ठों की
रेख,
जहां थी लज्जा कुछ, कुछ कोप,
सुमित्रा बोली हँस कर किन्तु,
लखन लाला पर कर आरोप;
"बड़े हो तुम धनुधारी वीर,
खड़े हो लेकर मेरी
नोट,
और मम सुत-कान्ता पर आज
कर रहे हो यों कर्कश चोट ।
११५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(ह)
ऊम्मिले, बेटी, है क्या बात ?
कहो तो, देखूं, चुपके कहो ।"
उधर लक्ष्मण ने अंगुलि उठा,
किया संकेत कि "अच्छा रहो-
देख लूंगा ।" पर, मां के नेत्र
ऊम्मिला ने फेरे उस ओर,-
जिधर चुपके-चुपके से डरा
रहा था सुभग ऊम्मिला-चोर ;
पकड़ जाते अपने को देख
रंच खिसियाए लक्ष्मण, ग्रहा ।
किन्तु फिर अट्टहास का स्रोत
महल के वातायन से बहा ।
(१०)
"कहो तो, रानी, है क्या बात ?"
सुमित्रा बोलीं, हुलसे प्राण,
मन्द मुसकान बिलसने लगी,
जुट गया सुषमा का सामान ;
ऊम्मिला ने धीरे
से,
ओह,
बहुत धीरे से अपने अधर-
निछावर हुई,
डुलाए, लाज
उठी यह मधुरा वाणी निखर-
११३
"कुछ समय से ये यह प्रस्ताव
कर रह हैं मुझ से दिन-रात,
चलें विन्ध्याद्रि-दरस के हेतु
आपको ले कर अपने साथ ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(११)
द्वितीय सर्ग
सताती है इनको, मां, देवि,
आप से कहने में कुछ लाज,
इसी से मुझे बीच में
कर रहे थे ये अपना काज ; "
वृथा फिर तुमने कौशल
डाल
ऊम्मिला के सुन कर ये बैन
सुमित्रा माता हुई
हुई निहाल,
और लक्ष्मण से कहने लगीं,
" बात इतनी ही थी, क्यों लाल ?
और
नीति से लेना चाहा काम,
,
ऊम्मिला का ले कर यों नाम
कर रहे क्यों उस को बदनाम ?"
(१२)
"क्योंकि तुम मझसे भी कुछ अधिक
चाहती हो इन को, हे जननि,
इन्हीं के सुख-पौधों से
शस्य-
श्यामला है तव मानस-प्रवनि;
इन्हीं के नव विराग का
राग-
आन,
इसी से मैंने छेड़ा
किन्तु तुम दोनों ने मिल मुझे
छकाया खूब किया
हैरान ;
बात यह है कि युद्ध औ' सैन्य
आदि की देख-रेख का काम
बहुत कर चुका — चाहता हूँ अब
कुछ दिन तक करना विश्राम ।"
-
११७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१३)
"लखन, तुमको होता है डाह,
ऊम्मिला के दुलार को देख ?
याद है तुम्हें ? चन्द्र से अधिक-
प्रियतरा होती उसकी रेख ;
बहू यह मेरी
रानी
रानी बड़ी,
प्यार करने में
मुझे न लाज ;
द्वेष मत करो,
सुनो, हे वत्स,
ऊम्मिला सुन श्वश्रू के
मूल धन से है प्यारा ब्याज ।"
वचन
लाज से, गोदी में गड़ गई,
और व्रीड़ा की लोहित
कपोलों पर आकर अड़
श्रृंगार
छके वृद्धा के लोचनं
प्रणय का यह आवेग
सुमित्रा हुई धन्य, प्रति
देख लज्जा का
अंत
कान्ति
गई ।
(१४)
लड़ गई फिर अँखियाँ वे चार,
बचा कर मां के दोनों नैन;
ओष्ठ दोनों के चारों हिले,-
किन्तु निकला न एक भी बैन;
युग्म, -
निहार ;
धन्य,
पारावार;
चुराकर, चुपके-चुपके, लखन
नेत्र-षटपद् मँडराने
लगे,
ऊम्मिला के कपोल अरविन्द,
मन्दगति से इतराने
लगे ।
१.१८<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१५)
" वत्स" माता के सुन ये बचन-
युगल जोड़ी कुछ चौंकी । ग्रहा-
हिडोले की मानों भरपूर-
पैंग रुक गई, जननि ने कहा-
द्वितीय सर्ग
" वत्स, वन-यात्रा की यह बात
तुम्हारी, मुझको है स्वीकार ;
तुम्हीं दोनों जाओ मुदमान
क्योंकि मम गमन कठिन इस बार
पूछ लूँगी
नरपति से
आज
देर ?
तुम्हारे जाने में क्या
दास-दासी सब हैं तैयार
सुनो तुम वन-विहँगों की टेर ।
फूल कहता 'मैं फूला
(१६)
डालियों पर बैठे हैं विहंग,
कर रहे हैं कुछ बातें आज,
आ गए वन-विहार के हेतु,
ऊम्मिला रानी, लक्ष्मण राज
मुदित,
कली, तू भी खिल जाना, अये,
अवध के कुसुम, कली के सहित,
छये ।'
हमारी अटवी में हैं
गा उठो पक्षी स्वागत गीत,
छिटक जाए स्वागत का रंग,
ऊम्मिला- लक्ष्मण का नव मोद,
देख लज्जित हो उठे
अनंग |
११६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>yfa.
ऊम्मिला
(१७)
कुरंगम कूदो, खेलो खेल,
हरिणियो, नाचो अपना नाच ;
देखती हो क्या कौतुक भरी-
ऊम्मिला के लोचन नाराच ?
करो
तुम मत कुछ चिन्ता, अरी,
न होगी तुम अब उन से विद्ध;
सुलक्ष्मण को कर के आबद्ध,
हो गया उनका जादू सिद्ध ;
विशिख वे बड़े तीक्ष्ण हैं,
किन्तु, लक्ष्य तो है उनका उस प्रोर-
जहाँ धनुधारी लक्ष्मण वीर
बाँधते हैं निज धनु की डोर |
(१८)
गया,
कोकिले, नव वसन्त आ
हो रहा वृक्षों में रस रास ;
छेड़ दो
कुहू कुहू की तान,
फैल जाए वन में उल्लास ;
;
होड़ बद जाय, इधर ऊम्मिला,
उधर कोयल तू, बोली बोल :
आज अम्बर से गंगा बहे,
अरी, सुस्वर की मिश्री घोल ;
श्रवण जुड़ जायँ, नयन उड़ जायँ,
तान का तारतम्य बँध जाय,
लखन की हिय डाली पे प्राज
ऊम्मिला कोकिल-सी सध जाय ।
१२०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१६)
ग्राज यह गगन नृत्य कर रहा,
थिरकती है अवनी
मोहिता ;
नृत्य के क्रम से होकर थकित,
दिशाएँ हैं आठों लोहिता;
द्वितीय सर्ग
वसंतागम को सँग-सँग
आ गए लक्ष्मण
हिलोरें
लेता
लेता है
आनन्द,
रास क्रीड़ा प्रद्भुत हो रही ;
नृत्य- कम्पन से कम्पित हुई-
रजकणों की जड़ता खो गई;
लिए,
उपवन-गेह,
वन- श्री को हुलसाती आज
ऊम्मिला आई हैं सस्नेह ।
(२०)
देह धारण
कर राग सुहाग-
विचरता है । वन की वीथियां-
फुल्ल कुसुमों से सज्जित हुईं,
नेह की दरसाती रीतियाँ ;
नीतियाँ मोड़-मोड़ मुख चलीं,
प्रेम की नीति धरे सिर ताज-
आज वन में विचरण कर रही,
एक छत्रा
करती है।
राज,
टूट गिर पड़े लाज के दाम,
काम का हुआ न किन्तु प्रसार,
पंचशर कर क्या सकता वहां
जहां है लखनऊम्मिलागार ।
१२१<noinclude></noinclude>
05aa0i7nkfzjk551v43k2c3wz9k5g5z
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(२१)
विश्व में छाया नूतन लास्य,
नृत्य-क्रीड़ा का अभिनव रास
रास या महा रास का
दृश्य ?
उपस्थित था संसृति का
हास ;
चराचर चहक रहे
उदित थी नेह-चन्द्र
थे मुदित,
की कोर;
दिवस में भी वह
फैली हुई
लुभाने लगी
अनेक चकोर ;
अरी ऊम्मले, ताल दे
उठो,
'नचा दो लक्ष्मण के
पद-पद्म;
महल की पाली हुईं
कपोति,
сут
हुश्रा वन आज तुम्हारा सद्म ।
(२२)
गगन ने नीली
सजाया
चन्द्र को, रवि ने निज रथ रोक,
किया आमन्त्रित अपने पास;
दिशायें ताली दे-दे उठीं,
काँपने लगा शुभ्र आकाश ;
चादर बिछा,
रंगमंच को
चांद-सूरज का हुआ
एक में एक गए वे
खूब;
सुनृत्य,
डूब
१२२
चरण- विन्यासों से कुछ सिकुड़,
फट गया वह अम्बर का छोर,
होते-होते बच गया,
प्रलय
ऊम्मिला ने की करुणा-कोर ।<noinclude></noinclude>
rcen3px2wn2nm2x3ipdo1wi4q3bat10
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२३)
फुल्ल कुसुमों ने भेजे पत्र,
पक्षियों के नीड़ों के द्वार ;
और लिख भेजा उनको कि है--
आज रसिकों का रास-विहार ;
कुसुम फूला सा बोला
ठठोली करता- 'भोली
द्वितीय सर्ग
चिटक कलिकाएँ कहने लगीं-
"रास हम भी देखेंगी ग्राज ;
न होंगी किन्तु सम्मिलित अभी,
क्योंकि लगती है हमको लाज ;'
एक,
कली,
तनिक खिल के खुल खेलो खेल-
यहां हैं लखन, जनक की
लली ।'
(२४)
"
उतर आए कोष्ठों से भ्रमर,
गुनगुनाते नीचे
उड़
चले :
फुल्ल कुसुमों के ले
दल- पाणि,
मंडलाकृति हो कर
जुड़ चले ;
नेत्र थिरके, थिरक सब
पंख,
हुआ वह खेल, हुआ
कुसुम काँपे, सब दल
हिल उठे,
वह रास ;
उमड़ आया मृदु राग
विभास ;
भूमने
लगे मत्त - से
लखन
देख यह प्रकृति-नटी का रास,
ऊम्मिला प्रिय-ग्रीवा से लटक,
कर उठी कम्पित-सा उपहास ।
१२३<noinclude></noinclude>
jjcpl2y8brh7ygqllzo2o0h50gxslrv
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(२५)
पवन डगमग पग धरती बही,
संकुचित कलियाँ कुछ हिल उठीं;
हृदय में धारे रेणु पराग,
ऋतुमती के रज-सी खिल उठीं ;
चहकने
लगे
लगे
विहंगम
विहंगम वृंद,
महक उठे नव कलिका-गुच्छ,
दहकने लगी हृदय की आग
भस्म हो चला काम वह तुच्छ ;
पड़ी,
स्वच्छता की प्राँधी चल
दक्षता उमड़ी चारों ओर,
रच गया महा रास का साज,
ऊम्मिला का नाचा मन मोर ।
बसन्ती घड़ियों में बह
पर्ण-कण्ठों से मर्मर
(२६)
घोर रव का आवाहन-मन्त्र-
प्रकृति के कण्ठ द्वार पर रुका
-
मन्द्र स्वर का सोता गम्भीर
बहा | नीरवता के ढिग झुका;
उठा,
राग ;
फाग छाई नभ में । जग बीच,
नींद का छाया राग विहाग
१२४
जागना रास-चक्र में कहां ?
यहां उल्लास, विलास, सुरास,
ऊम्मिला ने हँस कर दी डाल
सुलक्ष्मण की ग्रीवा में पाश<noinclude></noinclude>
9nzjj6pmm68cpel0vi6dvhb4agtmg5y
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(२७)
गूंज उट्ठा नव-जीवन- गीत,
बहा नवरस कण-कण में
आज ;
कोपलें फूटीं, अंडज
मुदित,
नई संसृति का जुड़ा
समाज ;
द्वितीय सर्ग
राज मधु का छाया चहुँ ओर,
डोर बँध गई नेह की नवल;
सबल लक्ष्मण भुज में बंध गई-
ऊम्मिला । बहा स्रोत प्रति प्रबल
प्यार की सरिता
उमड़ी
और
तरंगित हुआ
हृदय - कल्लोल,
लोल लोचन
सकुचाये चौर
चुम्बनों से सज गए कपोल ।
(२८)
बेच दी अपनी जड़ता प्राज-
प्रकृति ने नव चेतन के हाथ
बिक गई ज्यों हीरे की कनी,
किसी पारखी चतुर के साथ
लगन लग गई, मगन हो गई--
विमल ऊम्मिला हो गई धन्य
लखन का नव उपवन खिल उठा,
नेह हो गया नितान्त अनन्य ;
सैन्य उमड़ी मनोज की। खिले
हिये में चिर सँजोग के फूल ;
ऊम्मिला का दुकुल
हर्ष फैला
हिल उठा,
सरिता
के कूल ।
१२५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(२६)
अरे सब दिङ् मण्डल का नहीं-
चराचर का यह रास-विलास,
दिशाओं का संचालन
और
चेतनामय जग का
उल्लास, -
गुथ गया जड़ के कण-कण बीच,
और चेतन के
स्पन्दन मध्य; -
ओर नई-सी लहर,
सचेतनता
उठी सब
मिल गया गद्य और नव पद्य;
जड़ता में मिली,
अँधेरा नव प्रकाश में मग्न,
छा गया नव-किरणों
हुई
संसृति
का राज्य,
सु- रास- संलग्न ।
(३०)
धमनियों में दौड़ा नव रक्त,
भक्तगण भूले निज भगवान;
हो गए
अहम्
अपने ही में लीन,
के छुटे तीखे बाण ;
प्राण-संचालन
की
नव-क्रिया-
कर चली पैदा कुछ
उन्माद ;
नशा सा छाया चारों
वसन्तागम का नवल
१२६
ओर,
प्रसाद ;
याद भूली अन्तर की, बाह्य
रूप में हुए जीव सब मुग्ध,
मंदिर रस में परिणत हो गया
नव्य संसृति का निर्मल दुग्ध ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(३१)
क्षुब्धता भगी, जगी नव-प्रीति,
रीति रति की परिचालित हुई;
पुराने पत्ते
सव गिर गए,
नई कोंपल से कलियां चुई;
हुईं वे रंग-राग में
द्वितीय सर्ग
मस्त,
ठगी-सी जो थीं अब तक म्लान;
अभिसारिकानुकूल-
सारिका
गा उठी नव सँजोग का गान :
तान पर तान छिड़ी सब ओर,
निराशा का निशान्त हो
गया,
ऊम्मिला लक्ष्मण का सब कष्ट
मृदुल वन-विहार में खो गया ।
(३२)
कल्पने, जब यह सुन्दर रास,
छा रहा था वन में सब ओर ;
तभी ऊम्मला वधू के नैन,
बन गए लक्ष्मण के चित-चोर ;
बहुत वीरे-धीरे
से,
किन्तु,
बहुत चतुराई से वे
चले-
राशि
चुराने पिय के हिय की
सजग से वे लोचन अति
भले ;
कुटी उनकी हो गई निहाल,
किया दोनों ने उपवन-वास,
चलो, कल्पने, देख लें उन्हें,
मिटे जीवन का दारुण त्रास ।
१२७.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सम्भोज
संयोज -
ऊम्मिला
(३३)
बड़ी-सी उटज एक यह बनी,
तन रहा उस पर कुसुम - वितान;
हरित पल्लव की साड़ी पहिन,
कुटी गा रही मिलन का गान ;
ग्राज
उसके भीतर दो हृदय,
एक लय अनुगत हो मिल रहे ;
एक ही ताल-स्वरों में बँधे,
एक सुस्पन्दन से
हिल रहे;
कुटी के शून्य कक्ष में, प्रये,
मिले,
कल्पने, लक्ष्मणोम्मिला
पर्ण कुटिया रोमाञ्चित हुई,
नेत्र- वातायन उसके खुले ।
(३४)
ऊम्मिला बैठी थीं,
--
सौमित्र -
तनिक अलसाये से, कुछ
क्लान्त-
सामने बैठे थे । ज्यों पथिक-
कई शत वर्षों के
प्रवासान्ते होता
उपरान्त,
पथिक पा गया ईप्सित स्थान ;
लालसा मिटी, दरस मिल गए,
हुए लक्ष्मण
१२८
मन में मुदमान;
विश्रान्त;
मिली ऊमिला उन्हें । वे मिले
ऊम्मिला को | क्या योगायोग ?
तपस्या का फल
प्रतीक्षित
आया द्वार,
पूर्ण हुआ संयोग ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(३५)
विजृम्भण से लक्ष्मण का बदन-
हुआ धीरे से पुलकित । अहा-
कहा अँगड़ाई ने, "ऊम्मिले,
नींद का नूपुर यह बज रहा ।"
द्वितीय सर्ग
रखा लक्ष्मण ने मस्तक ग्रान-
ऊम्मिला की जंघा पर । और-
दीं भुजा,
मूँद कर नेत्र बढ़ा
प्रियतमा की ग्रीवा की ओर ;
संभोग-श्रृं
मिलेन
डोर अरुभी व्रीड़ा की । रम्य
रमण के सुरभ गए सब
तार,
थकित क्रीड़ा ऐसे
झुक
रही --
मेव ज्यों भुक आयें
दो-चार |
(३६)
ऊम्मिला ने धीरे से कहा-
"या रहा है निंदिया का सैन्य
विजित करने, अपराजित, तुम्हें,-
दिखाओ हो क्यों अपना दैन्य ?
बड़े हो युद्ध-कुशल तुम
आर्य,
छेड़ तो
दो निद्रा
से
युद्ध ;
निपट-
तनिक देखूं ये कैसे
मृदुल आँखें हो जाती क्रुद्ध,
रुद्ध कैसे होती है श्वास,
युद्ध-लक्षण दिखला दो सभी,
कहो तो ले आऊँ धनु-वाण,
या कहो प्रसि ले आऊँ अभी ।"
१२६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मिलन
ऊम्मिला
(३७)
"ऊमिले", यों अलसाने बैन
सुलक्ष्मण बोल उठे तत्काल,
"ऊमिले, तुम हो मेरा धनुष,
तुम्हीं हो मेरी असि विकराल,
तुम्हीं तो खींच रही हो मुझे
नींद के रंग महल में आज ;
तनिक मुसका दो, रानी, और,
जागरण की तुम रख लो लाज ;
नेत्र मीलित हैं मेरे,
तुम्हारे मन्दस्मित की
किन्तु,
समा जाएगी नैनों बीच,
बिंधेगा निद्रा का अविवेक ।"
(३८)
रेख, -
ऊम्मिला बिहँस उठीं, जब सुनी-
लखन की प्यार पगी यह बात ;
हो गए कुछ आरक्त कपोल,
लाज से सकुच गए सब
गात ;
देख ली उनकी लज्जा छटा,
सुमित्रा सुत घने,
प्रांखें खोल,
और बोले-“क्या युद्धोत्साह-
किये है रंजित युग्म कपोल ?
१३०
थक गई होगी करते युद्ध
नींद से -- आओ मेरे फूल 1"
ऊम्मिला के कपोल से सरक
गया उनका वह विरल दुकूल ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>( ३९ )
कहूँ आगे की मैं क्या
ऊम्मिला- चरणों का मैं
स्वामिनी हैं मेरी वे
बात ?
भक्त ;
देवि,
लखन रहते उन में
अनुरक्त;
द्वितीय सर्ग
हमारे सदृश पाप के पुंज
कुटी में कैसे करें प्रवेश ?
पूर्ण शुचिता छाई है उधर,
इधर है निन्द्य वासना शेष ;
चरण रज के प्रसाद से
जब कि
बनेंगे
निर्मल
मेरे
प्राण,
तभी
गाऊंगा
मैं
निर्द्वन्द
भाव से रति-क्रीड़ा के
गान ।
(४०)
अभी तो चलो, कल्पने, चलें,
लखन की आज्ञा लेकर आज ;
नवल कुटिया की सुन्दर द्वार-
देहलो पे बैठो सज
x
साज ;
सजगता से सब बातें
सुनो,
हृदय में लिख लो उनको, अये;
भक्ति के सूत्र, नेह के
रूप,
सभी कुछ बिखरेंगे नित नये ;
हमारे
आर्य-धर्म के विमल
ध्वजा धारी, ये, शुचिता-ओक,
ऊम्मिला- लक्ष्मण वन के
बीच,
विवरते हैं होकर गत
शोक ।
१३१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(४१)
"कहो तो एक बात में ग्राज,
पूँछ लूँ तुम से प्रिय," यों कहा-
ऊम्मिला ने । जिज्ञासा ने कि-
1
ज्ञान का शुभ कर- पल्लव गहा ;
"कहो, क्या है वह ऐसी बात
कि तुम भूमिका बाँधने चलीं ?
सुनो टुक, मैं हूँ सैनिक एक
और तुम हो विदेह की लली ;
लोक, परलोक, अण्ड, ब्रह्माण्ड,
जीव, माया -- यह मुझे न ज्ञात;
न जाने क्या तुम पूछो, देवि,
कहो फिर भी, क्या है वह बात ?"
प्रेम के शुद्ध रूप
सम्मिलन है प्रधान,
(४२)
के इन्द्र
"हास - उपहास भाव
सुनो मेरी परिपृच्छा दीन ;
मिटाओ संशय, हे वागीन्द्र,
सुनो टुक तुम हो कर तल्लीन ;
में, कहो,
या गौण ?
कोन ऊंचा है ?
भावोद्रेक ?
या कि नत प्रात्मनिवेदन मौन ?
१३२
मिलन- यह सांसारिक संयोग,
पार्थिव भाव- है न यदि पूत,
कहो तो, फिर सम्मिलनोल्लास
हुआ क्यों मनुज-प्रकृति-संभूत ? "<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१४९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(४३)
ऊम्मिला की सुनते ही बात,
उठ पड़े सहसा लक्ष्मण
जाग उठता है जैसे
उषा जब देती नभ को
वीर ;
पथिक,
चीर ;
द्वितीय सर्ग
H
ऊम्मिला को भुज भर के उठा,
बिठाया निजोत्संग के मध्य ;
और उनके मुख पर दी गाड़
दृष्टि निज स्वप्निल, निर्मल, सद्य ;
तथा - " ऊमिले. देवि ...ऊ. म्मि ले ! "
कढ़े लक्ष्मण के अस्फुट बैन,
और उतराने लगे प्रशान्त
महासागर में उनके नैन
(४४)
1
"रंच मेरी गोदी में
रंच आतुर-सी हो कर रहो ;
रंच वैसी ही झिझको, देवि,
रंच फिर से प्रश्नावलि कहो ;
मिलन
ऊम्मिले, तुम रानी ऊमिले,
लगाओ फिर प्रश्नों की झड़ी;
अपार्थिव श्री पार्थिव संयोग-
समस्या की फिर गूँथो लड़ी ;
ऊम्मिले, प्रश्न नहीं है, -प्राण-
तक का यह है नव नवनीत,
करूं कैसे विश्लेषित इसे ?
तुम ने सुरति प्रतीत ।”
जगा दी
१३३<noinclude></noinclude>
382129ohooe22m5n2qwuc42zeotokhg
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(४५)
वे सौमित्र,
सहसा कथन ;
भाव के भूखे
कर उठे जब यों
ऊम्मिला सहम गई
न निकले उसके मुख से
तत्काल,
वचन ;
लजीली रसना चुप हो रही,
कण्ठ का द्वार हुआ अवरुद्ध;
ओष्ठ का सुस्पन्दन थम गया,
हुआ चंचल मन कुछ हत बुद्ध ;
वचनावलियों ने किया
शुद्ध
नम्र दैन्याश्रम में विश्राम,
राम के अनुज निछावर हुए,
निरख यह मौन - मूर्ति अभिराम ।
(४६)
और फिर बोले हो गंभीर-
"प्रश्न क्या है? कि प्रेम में, - अहा,
सम्मिलन है प्रधान या गौण ?
चिर विरह का आसन हैं कहां ?
सुनो ऊम्मिले, तुम्हारी बात-
बड़ी गहरी है । कहीं न थाह,
कहूँ जो कुछ, उस में में यहां,
कदाचित् गुथ जाऊँगा, ग्राह;
१३४
किन्तु अपनी पृच्छा का, देवि,
तनिक विस्तृत-सा उत्तर सुनो,
जनक की तनये, रुचि अनुरूप
कंटकित यह प्रश्नोत्तर चुनो ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(४७)
द्वितीय सर्ग
रूप
में कहो-
या गौण ?
भावोद्रेक ?
प्रेम के शुद्ध
सम्मिलन है प्रधान
कौन ऊंचा है ?
या कि नत श्रात्म-निवेदन मौन ?
यही है प्रश्न यही है
बँधा है धागे में....
मिलन- यह सांसारिक संयोग, -
भाव--
- है न यदि पूत;
पार्थिवं
कहो तो फिर सम्मिलनोल्लास
हुआ क्यों मनुज- प्रकृति-संभूत ?
प्रश्न,
यह प्रश्न
अरे कच्चे धागे का सिरा कहां ?
उठता यह रह-रह प्रश्न ?
(४८)
प्रेम क्या है ? रानी कुछ कहो,
क्षुधा क्या है यह अति विकराल ?
नींद क्या है निशीथ की घोर ?
आत्मरक्षा क्या यह सुविशाल ?
बनी यदि सृजन-भाव का हेतु
सतत जीवन-धारण प्रभिलाष,
प्रश्न फिर भी है : जीवन-लोभ
किस लिए डाल रहा है पाश ?
ऊम्मिले कुछ विचार तो करो
कि कितनी गहराई के बीच,
उतारा तुमने मुझको ? अरे,
कहां ले डाला मुभको खींच ?
१३.५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मला
(४९)
उस समय जब हम सब परमाणु, -
सृष्टि के आदिकाल के समय, -
एक में एक, शक्ति से बिंधे,
मचाते थे जड़ता का
अन्न में आ कर भ्रटके
-
प्रलय -
उस समय प्राण दान का खेल-
हुआ । हम सभी हुए उत्पन्न ।
तभी से
श्रवण-रूप-रस- गन्ध-
व्याधि से हैं, हम सब प्राच्छन्न :
प्राण-
खिलाड़ी का है यह सब खेल,
वासनावृत हैं हम, हां, किन्तु
मोक्ष की बढ़ती जाती बेल
(५०)
बना
1
यह पंचभूत का कोष,
हुआ प्राणों का
नव-संचार ;
छिद
गए चेतनता के बाण,
खुले जीवन के बद्ध
किंवार ;
गया,
उत्क्रमण का विकास हो
प्रसारित हुग्रा बोध, प्रतिबोध ;
युद्ध ठन गया- आग लग गई,
दिखाई दिया रक्त-प्रतिशोध ;
जीव ने
१३६
करके
जड़ता विजित
उठाई अपनी
ग्रीवा उच्च,
प्रयुत वर्षो तक
फिर भी रहा
वासना में लिपटा वह तुच्छ ।<noinclude></noinclude>
9niiq5w0319wpj8glul519bhkxgnjtr
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५१)
आदि में शिश्नोदर की व्याधि,
रही परिचालित करती उसे
किन्तु हिय में जिज्ञासा-भाव,
द्वितीय सर्ग
छिपा था
अन्तस्तल में घुसे ;
बनों में भूला
भटका फिरा,
खोजता अपने पन का रूप ;
बना
उन्मत्त, --- बनाया और,
स्वयं का
अद्भुत रूप अनूप
क्रमिक गति से हृदयोत्पल खिला.
खिल उठे नूतन भाव विकार,-
संकल्पों की लगा
सहस्रों
गंथने
माला
मालाकार ।
(५२)
सहस्रों नव जागृत रस राग-
फाग सी लगे खेलने, अहा ;
आदि की नव-प्रस्फुटिता शक्ति,
पूर्ण विकसित हो आई यहाँ ;
निरी कामुकता का वह रूप-
-
-
प्रथम का वह प्रजनन का भाव,
कहाँ है आज ? लोप हो रहा ।
यहाँ निग्रह की ओर
झुकाव ;
शक्तियाँ धीरे-धीरे, किन्तु
हो रही हैं अवश्य उत्क्रान्त,
जीव का यात्रा-पथ विस्तीर्ण,
अभी वह कैसे होगा श्रान्त ?
१३७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(५३)
मानवेतर समाज में, देवि,
राग-रस प्रकृति-सिद्ध हैं बने ;
वासना ही उनकी प्रेरणा,
वासना ही में वे हैं सने ;
किन्तु मानवता का गल-हार,
बनी है यह विवेक-शृङ्खला :
बेड़ियां इस ने डालीं आन
बांधी
वासना
मेखला कटि में अब बँध गई।
प्राकृतिक स्फूर्ति हुई कुछ शान्त ;
विकस खिल उट्ठा ज्ञान अनूप,
भावना सँभली यह उद्भ्रान्त ।
(५४)
उच्छृङ्खला ;
प्रथम युग का वह कामुक भाव-
प्रेम में अब परिणत हो गया ;
इन्द्रियों का भौतिक
ज्ञान
खो गया है वह अन्धावेश,
प्रेम आदर्श-रूप बन
सुसंस्कृति ने खींची
हृदय में युद्ध आज ठन
१३८
गया;
करवाल,
गया ;
परितोष,
की गोदी में सो गया;
मानसिक, शारीरिक, प्रक्रिया
हो रहीं भिन्न । उदित है भानु ;
तिमिर का अवगुंठन फट रहा,
हुए आलोकित सब परमाणु ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५५)
मानसिक क्षितिज हुआ विस्तीर्ण,
हुआ प्रलोकित, द्युति से पूर्ण;
तमोगुण के भूधर के शिखर-
हो रहे हैं अब कुछ-कुछ चूर्ण;
द्वितीय सर्ग
पूर्ण स्वातन्त्र्य, पूर्ण
विस्तार,
हमारे श्वशुर, - - सदेह
पूर्णता के हैं शुचि
देह के गुण-वन्धन से मुक्ति ;
हो रहा है मुक्ता का जन्म,
फट रही है सम्पुट-युत शुक्ति;
विदेह -
--
आदर्श,
तपोबल से है निर्मित किया
उन्होंने जीवन का नव वर्ष ।
(५६)
जीव करता है
मार्ग-क्रमण
प्रतिक्षण, प्रति मुहूर्त्त, प्रति घड़ी;
प्राकृतिक जड़ता की शृङ्खला
भावोन्मेषों की लड़ी,.
बनी
लगाती है वह झटका एक
जीव बरबस खिंच आता, प्रिये,
तनिक सँभला, फिर झटका लगा,
पतन फिर हुआ पतन के लिए;
कई झटके लगते हैं, किन्तु
जीव बढ़ता जाता है सदा,
अन्त में जनक देव के सदृश
प्राप्त कर लेता है सम्पदा 1
१३६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>दार्शनिक संकेत
ऊम्मिला
(५७)
प्रेम के शुद्ध रूप में कहो,
कहाँ है पार्थिवता की चाह ?
उस अवस्था में तो, हे देवि,
नहीं है कटु वियोग का
दाह ;
वहां है
चिरकालीन
मिलाप,
मिला पट से ज्यों अंचल छोर
नहीं है वहां दरस का मोह,
हिये में बस जाता चित-चोर;
कहां ?
तुरीयावस्था म यह
प्रेमी-प्रिय
का है
भेद-भाव
प्रेम, प्रेमी, प्रियतम सब लोप
एक में एक हो रहे वहां ।
(५८)
इसी आदर्श-प्राप्ति के
वहाँ तक कैसे पहुँचा जाय ?
साधना कैसे साधी जाय ?
हृदय की सरिता की यह धार
बाँध में कैसे बाँधी जाय ?
लिए-
ऊम्मिले, मुझ में तुम श्रा मिलीं
प्रेम की मृदु पूजा के हेतु,
कली-सी तुम इस हिय में खिलीं;
तुम्हारे
श्रात्मा
आलिंगन से सिहर, -
मेरी कँपती
रहे,
१४०
तुम्हारे दरस-प्रमिय
दरस अमिय से मत्त
हुई मम आँखें झपती रहें ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(५६)
जठर-पोषण
निकल आई जैसे
से
प्रेरित हुई,
कृषि - कला;
स- इन्द्रिय भावों से
त्यों, प्रिये,
निरिन्द्रिय प्रेम-विपट
द्वितीय सर्ग
यह फला;
मिलूँ में तुम में । मुभ में आन
घुलो तुम, ज्यों कि सिता की कमी ;
पल्लवित हों मम पादप प्राण,
खिलो उस में तुम कलिका बनी;
स्नेह का अलि मँडराने लगे,
चतुर्दिक
में
गूँजे गुंजार,
धार-सी अन्तरिक्ष
में बहे,
स्वरों का बँध जाए
इक-तार ।
(६०)
प्यार -- जीवन का यह विस्तार,-
बने संसृति का गायन-भार
तरंगित करे हृदय- कासार,
सत्य - शिव सुन्दर की मनुहार;
भेद,
तुम्हारे मेरे
का यह
स्वेद की कणियां बन-बन बहे;
न बहे कामलिप्सा का स्रोत,
दरस आतुरता फिर भी रहे;
बाहु ये, कुच, यह वक्षस्थली,
लोल लोचन, मुख यह गम्भीर,
एक परिरम्भ-रज्जु में बँध--
छलक आए तन्मयता-मीर ।
१४१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(६१)
धीरता तिनके सी बह जाय,
हृदय में आतुरता उठ आय ;
एक त्रुटि युग-युग-सी खल उठे,
पलक का अन्तराय उठ जाय;
प्यार का पारावार
झिझक मिट जाय, नेत्र गड़ जाँयें,
पुतलियां ये चारों अड़ जायँ ;
ऊम्मिला का स्नेहाम्बुधि-नीर,
ऊम्मियों के मिस बढ़ बढ़ आय;
अपार
उमड़ आए,
दोनों
हम
बहें,
प्रेम की पूर्ण प्राप्ति की
कहानी दोनों कहते
कथा-
रहें ।
मोर-सा मम मन
(६२)
थाम लो तुम मेरी धनु-डोर,
थाम लूं में तव अंचल-छोर :
अग्रसर हों, उस पथ में जहां-
उठ रहा पूर्ण-प्यार का रोर;
थिरके, देवि,
डोलो पास,
सदा, -
मोरनी-सी तुम
एक में एक बद्ध हो
रहें करते हम दोनों
१४२
रास;
उसी रति-गति से प्रेरित हुए
करें हम सब जीवन के कार्य,
श्रये, दिखला दें जग
कि क्या है प्रेम और
को आज
प्रौदार्य ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१५९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(६३)
प्रम क्या है ? जीवन की
गांठ-
बंधी जिस से प्राणों की लड़ी;
हृदय कम्पन जिस से संचलित,
थिरकता रहता है हर
द्वितीय सर्ग
घड़ी;
सधा है उच्छ्वासों का नाट्य,
उसी के केन्द्र विन्दु पर सदा
बंधी है उसके गुण में, देवि,
आँख की चंचलता-सम्पदा :
प्रेम क्या है ?
तुम भी कुछ कहो,
न देखो यों अकुला कर मुझे,
तनिक हिय में गड़ जानो, प्रिये,
द्वैत की ज्वाल रंच तो बुझे ।
(६४)
फल उठे इष्ट सिद्धि का विटप,
बनो तुम में, में तुम
| दार्शनिकता
बन रहूं;
धनुष तुम धारण कर
तुम्हारे लाज-वचन
लो, और
मैं कहूं;
ऊम्मिला का विभिन्न अस्तित्व,
अरे हाँ, भूतल से मिट जाय;
और लक्ष्मण का विरहित ग्रहं
स्वप्न की चादर सा सिमिटाय
घार;
एक में एक रहें लवलीन,
बहे सुरसरि की पावन
बहें हम उधर जहाँ है घहर
रहा प्रेमाम्बुधि गहर, अपार !
१४३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>संभोज क
वर्णन,
ऊम्मिला
(६५)
अरी रानी क्यों ललचा रहीं ?
लाज से क्यों ठानी है रार ?
तनिक मुख तो कुछ ऊँचा करो,
रंच कर लूँ नैनों को प्यार;
बहुत हौले हौले से
एक चुम्बन से नीवीं एक-
हिये में पड़ जाती तत्काल;
सालती रहती है प्रति घड़ी,
कसक करती मुझको बेहाल ;
कई
ग्रंथियां तुम ने की हैं ग्रथित,
नेह-दधि की ये गांठें, देवि,
आज हो जाने दो कुछ मथित ।
(६६)
मुक्ति की प्राप्ति जीव के लिए
प्रतीक्षा है लम्बी नित नई;
रिभाने को अपना प्रिय पात्र,
साधनाएँ वह करता
कई;
प्राणियों का यह भौतिक-प्रेम,
उसी आकर्षण का है अंग;
तनिक सी ठोकर से, हे देवि,
छूट जाता छिलके का
१४४
संग;
अण्ड में हुआ प्राण निर्माण
तभी सहसा छिलका फट गया,
लगी भीतरे से जागृत
तभी इन्द्रियावरण हट गया ।
चोट,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(६७)
वनी हो प्राराधना-विभूति
ऊम्मिले, तुम मेरी इस बार;
अये, गड़ जाओ हिय में इसी-
भाँति लज्जा-नौ की पतवार;
द्वितीय सर्ग
लाज की नैया डगमग हिले,
काँपती तुम मेरी पतवार;
लगाओ इसी रीति से पार,
बह रहे हैं हम-तुम मँझधार;
पार - देखो
वह सुन्दर, दूर,
झिलमिलाता, कँपता, वह पार
सुलोचनि, पहुँचा दो तुम वहाँ,
पूर्णता की बरसा दो धार ।"
(६८)
हो गए यों कह लक्ष्मण मौन,
नेत्र उनके कुछ-कुछ मिल गए;
ऊम्मिला के वे चुम्बित प्रोष्ठ,
लजाए-से कुछ-कुछ हिल गए ;
हिल गए दो प्रबद्ध किंवार;
मिल गए दो प्राणों के
स्रोत,
खिल गए दो फूलों के
मिल गए वीणा के दो
तार;
गुच्छ,,
ऊम्मिला के नयनों से वही
प्रेम-यमुना की गहरी
धार,
लगे • उतारने लक्ष्मण
सुभट
थाम उनकी ग्रीवा का
हार ।
१.४५
गान<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(६६)
मूक शब्दावलियां
हो गई,
हृदय का स्पन्दन कुछ रुक गया;
अपार्थिव नेह, धार कर देह,
ऊम्मिला के ऊपर झुक गया;
चुक गया शताब्दियों का व्याज,
न लेखा - ड्योढ़ा बाकी रहा;
ऊम्मिला में लक्ष्मण घुल गए,
अनोखी थी वह झांकी, श्रहा !
द्वैत का सब झगड़ा मिट गया
कहो फिर कहां हिसाब-किताब ?
प्राण के सम्मिश्रण में कौन-
पूछता, हुई हानि या लाभ ?
( ७० )
नेत्र यों ही चारों झप गए,
चतुर्दिक नीरवता छा
ऊम्मिला के उरोज पर
गई;
भुके,
सुलक्ष्मण को निद्रा आ गई;
पंच-शर-रति दोनों आक्लान्त,
हुए तन्मय -से कुछ सो रहे;
पुरुष औ' प्रकृति हुए निर्भ्रान्ति,
मस्त अपनी लय में हो रहे;
१४६
खुल गए जाग्रति के सब बन्ध,
"अहं" के सारे बन्धन क्षीण;
ऊम्मिला-लक्ष्मण मानों आज
हो गए शुचि त्रिजत्व में लीन ।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(७१)
एक की मृदु गोदी में एक-
गुंथे से वे ऐसे हो
द्विवेणी का मानों
उदधि में मिलते ही सो
विध गए वे
तड़प उठा मन
ज्ञान ने क्षत पर
रहे, -
प्रवेश,
रहे;
द्वितीय सर्ग
वह उठा उनका संयत प्यार,
पूर्णता का पाया चिर संग;
ऊम्मिला की चादर पर आज,
चढ़ा लक्ष्मण का चोखा रंग,
अनंग- नाराच,
का सुकुरंग,
पट्टी बाँध
बढ़ा दी सौम्य अमन्द उमंग ।
(७२)
हो गए हृदय शान्त, निस्तब्ध,
ललकते भाव हुए विश्रान्त ;
ग्रन्थियाँ रस की घुल-घुल गई,
हुई उन्मत्ता
तटिनी शान्त ;
हर गम्भीर नेह बह चला,
पुलिन-भेदन का रहा न त्रास;
रास - रस- रति मर्यादित
सध
गया उल्लंघन उच्छवास
हुई,
अनुास
हुआ कुछ अभिनव सा उद्भूत
ऊम्मिला- लक्ष्मण का संसार,
प्रखर विप्लावन में भी सतत,
हो रहा संयम का संचार |
१४७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(७३)
हृदय-मन्थन की मधुरी
पीर-
भिमकती हुई कसक की
याद -
हँसी, -
सहमती हुई लजीली
अनमनी सी कुछ-कुछ फरियाद, -
छुप गईं ये सब, हो कृतकृत्य,
पूर्णता के अन्तर में आज;
ऊम्मिला- लक्ष्मण के खुल गए-
द्वैत के
सब गुण बन्धन- साज;
लखन के धन्वा की टंकार-
दार्शनिक ऊम्मिला
की नूपुर-भंकार,
अवश उत्कम्पित करने लगी-
चिरन्तन "एकोऽहं" के तार ।
(७४)
क्रमिक गति से जब
मन्थन - दण्ड
प्रथम परिचालित होता जाय,
तभी तक मिलता गति प्राभास,
कि जब तक गति धीमी, निरुपाय;
किन्तु जब मेरु दण्ड हो जाय-
महद्गति उत्प्राणित
गति-रूप-
कौन तब कहन उठे -- हां, यहां
अगति भी गति का है प्रतिरूप ;
१४८
एक सीमा
है--उसके पार,
स्थैय्यं, गति, एक रूप बन रही,
एक सीमा है--उसके पार
न "तू" है कहीं, न "में" हूं कहीं।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(७५)
चरमता में है निर्गुण सत्य,
विविधता का न वहां लवलेश;
एक है, वां अनेकता
नहीं है काल, नहीं है
नहीं,
देश
द्वितीय सर्ग
चरमता है नितान्त निःस्सीम,
कहो फिर किसको लाँघे कौन ?
नहीं है व
आकाश ससीम,
न है वो शब्द, न है वाँ मौन;
पूर्णता
वहाँ
अनिर्वचनीय,
वहाँ है प्यार, अपार, ग्रशेष,
द्वैत की दुविधा वहाँ न शेष,
विरह का वहाँ न क्लेश विशेष ।
(७६)
सगुण तुलना का फैला यहाँ,
चरमता के इस पार, प्रसार
बड़े
झगड़े दुलार, दुत्कार,
विचार, विकार, ससार, असार;
ऊम्मिला- लक्ष्मण इस के पार-
गए थामे सनेह-पतवार
अविद्या से तर मृत्यु-विकार,
कर रहे हैं वे अमृत-विहार;
प्रबल हृदयान्दोलन का भाव,
बन गया स्थिरता का प्रतिरूप;
प्रगति बन आई अगति स्वरूप,
बन गई अचल प्रगति गति रूप।
१४६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(७७)
संभोग
प्रेम की पार्थिवता की परिधि,
पार्थिव केन्द्रबिन्दु बन गई;
स्थूलता के स्वरूप की रेख, -
सूक्ष्म कण बन बन, छन-छन गई;
प्रम ही प्रेम अनन्त,
प्यार का उमड़ा
व्यक्तिगत मूर्त सनेह-स्वभाव,
सूक्ष्म बन अणु श्रणु में रम गया;
ऊम्मिला-लक्ष्मण का चिर नेह
खिल उठा होकर अनुपम नया;
अपार,
पारावार;
हुआ उनके जीवन में रुचिर
शान्ति नीरवता का संचार ।
(७८)
प्रेम की आरम्भिक लघु सरणि,
बन गई सिन्धु अपार, प्रथाह
न उस में रहा प्रवाह-विकार,
न रही चलित गति की कुछ चाह;
एक गम्भीर प्रशान्त सुघोष,
एक गति निश्चल, स्थिरतामयी;
चण्ड बड़वानल संयत हुआ,
मिली सामर्थ्य-गहनता
१५०
नयी;
कभी यदि हुआ
रहा फिर भी
वीचि - विक्षोभ,
वह संयमबद्ध;
नहीं प्रतिलंघित रेखा हुई,
छुट गए हृदय विकार निषिद्ध ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(७९)
सकल - विप्लावक उनकी शान्ति,
द्वितीय सर्ग
चराचर
पोषक उनका स्नेह;
जगत्-तोषक
उनका सुप्रसाद,
प्रणय उनका गम्भीर विदेह;
शिथिलता, परम तुष्टि की, लिए, -
निखिलता, चरम सिद्धि की, साथ,
ऊम्मिला-लक्ष्मण ने कर दिया-
प्रणय के प्रण को आज सनाथ;
समर्पण कुछ ऐसा
चढ़ीं हिय की भेंटें
मगन- मन- दीप शिखा
लगन कुछ ऐसी ही
हो गया-
नित नई,
जग
गई,
लग
गई ।
( 50 )
हिये आलोकित जगमग ज्योति,
'नेङ्गते सा उपमा सुस्मृता:
हुआ मानस मंडल निर्धूम,
दिशायें रहीं न मेघावृता;
हट गये संशय के सब अभ्र-
फट गये; था निर्मल ग्राकाश;
छंट गए छायामय सब विघ्न,
कट गए आत्म- दैन्य के पाश;
1
हुआ जीवन-मग में आलोक,
राज-पथ सँकड़ी गलियाँ बनी,
ऊम्मिला को जीवन-पथ बीच
लिए जा रहे ऊम्मिला- धनी ।
१५१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
( -१)
भले
भुट-पुटे क्षण चम चम कर उठे,
पन्थ-रज- कणियां हुलसित हुई;
चतुर चरणों का पुण्य प्रसाद
कि जीवन-गलियां पुलकित हुई;
लक्ष्मणोम्मिला
चरण-विन्यास-
बन गया
चतुष्फलों का रूप ;
नेह उनका
मॅज कर वन गया-
सत्य, शिव,
सुन्दर रूप अनूप
हुए यति-गति-रति-मति-पति लखन,
बनी प्रति गति मति-यति ऊम्मिला;
बन गए लखन विदेह अनंग-
बनी कल्पना-सुरति ऊम्मिला ।
(-२)
हुए अन्तर-तर
विमल विशुद्ध,
ज्ञान
जग बैठा पूर्ण प्रबुद्ध;
हुआ आन्दोलित
मुकुर का मल पल में हट गया,
भावना जगी धर्म अविरुद्ध
हिय- हिंडोल,
पैंग, समता की रह-रह बढ़ी;
बढ़ी, फिर बढ़ी और फिर बढ़ी,
अलख के सिहासन तक चढ़ी;
१५२
ऊम्मिला-लक्ष्मण मय हो गई,-
हुए ऊम्मिला-रूप सौमित्र,
ऊम्मिला-हिय में छाए लखन,-
लखन-मन बसा ऊम्मिला-चित्र |<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१६९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(८३)
युगल जोड़ी के चारों नयन
परिष्कृत निर्मल, पावन बने;
अरुणा करुणा तल्लीन,
सतत
हो रहे वे
मनभावन बने;
द्वितीय सर्ग
नयन, हिय के वातायन बने,-
दिखाते अन्तस्तल की शान्ति;
परम विश्रान्ति, चरम निर्भ्रान्ति,
छा रही जहां साधना - क्रान्ति;
लखन के प्यार पगे वे नेत्र,
ऊम्मिला के वे सकरुण नैन,
साधना के वे गहर गवाह,
मौन के वे श्रनवोले वैन |
(58)
लखन के तपो- तेजमय नेत्र-
ऊम्मिला को प्रतिबिम्बत किए.-
ऊम्मिला की स्वप्निल अॅखड़ियां-
लखन - छवि को हृदयांकित किए;
नयन
विजित इनके यों चारों
बने मद माते, गहर, गंभीर,-
लगे छलकाने चारों ओर
परम जीवन का मधुमय
नीर;
'कुसांसारिकता की मस्-भूमि,
• पल्लवित बन में परिणत हुई;
मुई तप्तता, चुई रसधार,
एकता बही, मिट गई दुई
१५३<noinclude></noinclude>
d28qjrdjnoo98rc8ge1idg2bsgyotaj
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्निला
(८५)
प्यास की हाहाकार पुकार,-
वासना का उत्तप्त बुखार,-
मोह, मद का वह मंदिर खुमार, -
उपेक्षा का प्रति शीत तुषार,-
हुए लय ये सब एकाएक,
मिट
गए मात्रास्पर्श अनेक,
छिड़ गई साम्य-गीत की टेक,
जग गया उनका विमल विवेक,
प्राण,
निम्नगा वृत्ति हुई म्रियमाण,
ऊर्ध्व श्राकृष्ट हो गए
हुए रज-तम के कुण्ठित वाण,
हो गया लखनऊम्मिला त्राण ।
(८६)
संभोग
आहा
फमालासे,
मित्रन
नहीं मृग-तृष्णा का आक्रोश,
नहीं लिप्सा की कोई चाह
नहीं बलबले, न अन्वा जोश,
न दाह, न ग्रह, न डाह प्रथाह
न तड़पन कोई बाकी रही,
न कोई वांछा रही प्रजान;
न कोई बात कही-अनकही,
न मान, न शान, न स्नेहाज्ञान;
१५४
लखन उर मिली विमल ऊम्मिला,
ऊम्मिला-हिय लक्ष्मण मिल गए;
योग कुछ ऐसा प्राकर मिला
कि दोनों हिय मिल-मिल हिल गए।<noinclude></noinclude>
99k9gl452um8nnw29w4m0zjxg80mjeb
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(50)
द्वितीय सर्ग
नहीं थी भ्रान्त
धारणा वहाँ
नहीं था बुद्धि-भेद का श्रास;
मन मलिनता का कैसे
? कहाँ ?
वहां हो सकता है
ग्रावास ?
परस्पर
सामंजस्य - विलास-
जहाँ होता रहता है नित्य,
जहाँ निशिदिन हिय में, सोल्लास,
चमकता रहता ज्ञानादित्य;
वहाँ फिर कैसी सम्भ्रम-बुद्धि ?
न रहती भ्रान्त
धारणा वहाँ,
पूर्ण थी
उनकी अन्तःशुद्धि,
श्रमा की वहाँ रजनियाँ कहाँ ?
(55)
लखनऊम्मिला हृदय में बसा -
परसर का निश्चल विश्वास;
भक्ति से नित उत्प्राणित हुआ,
लखनऊम्मिला
चिन्ह,
श्वास- निश्वास;
आत्म- अर्पण-स्वीकृति का
पूर्ण विश्वास अपार, प्रखण्ड,
स्नेह की सुस्थिर धृति का चिन्ह,
परम विश्वास अमन्द
प्रचण्ड;
क्षुद्रता का उस में न विकार,
न संशय का उस में कुछ लेश,
न क्लेश, न त्वेष, न ठेस अशेष,
मिले हृदयेश परम प्रेमेश ।
१५५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(८)
न आँधी थी, न
वहाँ
तूफान,
न वायु प्रचण्ड, न भंझावात,
नहीं था
कोई वात्याचक्र,
कलह के न थे घात-प्रतिघात;
बना नभ मण्डल नील निरभ्र,
प्रकम्पित
गहनता उस में भर-भर गई;
कहीं मानस दिक्शूल न रहा
अशुभ मात्राएँ भर-भर गई;
लखनऊम्मिलाकाश,
स्नेह-रवि-मण्डित, स्वच्छ, अनन्त;
सौम्य किरणों से पूर्ण दिगन्त,
चिरन्तन बसता जहाँ वसन्त ।
भर गए कर्णाम्बुधि वे
(१०)
लखन की धनु-टंकार प्रचंड,
ऊम्मिला की नूपुर भंकार,
बन गई अनहद नाद अनन्त,
उमड़ आई निनाद की धार;
अतल,
एक रव, एक नाद, छा गया;
गूंज थी दिगदिगन्त में व्याप्त,
हृदय, उद्घोष-तोष पा गया;
१५६
जग गई प्रकथ सुरत-रत कथा,
अतीत अनन्त स्मृति जग गई;
पग गई मधुरे रस में व्यथा
ठग गई, मगन लगन लग गई ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1553
( १ )
क्षणिक बिछुड़न की शैशव पीर-
यौवनागम में घुलमिल गई;
लिए अनजान,
प्रस्फुटन - व्यथा
यथा, मृदुला कलिका खिल गई,
द्वितीय सर्ग
ऊम्मिला कलिका चिटकी सलज,
लखन मन अलि करता गुंजार;
इधर से मधु-रस-धारा बही,
उधर से उमड़ी गायन-धार;
ऊम्मिला, लक्ष्मण बिना अपूर्ण,
सुलक्ष्मण शून्य ऊम्मिला बिना;
गणित की क्या ही गहरी सूझ
कि दो को एक रूप ही गिना ।
(ER)
दार्शनिकता
ब्रह्म माया दोनों मिल गए.-
जगन्नाटक
के सूत्र बिखेर;
बहुलता के
अन्तर से उठी-
एकता की
आतुर-सी टेर;
मिलन में द्वैत-भाव मिट गया,
उठी लय स्वनित समन्वय-मयी;
कट गया स्वप्निल सम्भ्रम जाल,
जग गई सुध-बुध तन्मय नयी.;
विषमता का कटु विष उड़ गया,
सुधा-मधु से प्याला भर गया;
ऊम्मिला-लक्ष्मण का चिर प्यार,-
चर-अचर के हिय तर कर गया ।
१५७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१३)
अधखिली आँखों में भर स्वप्न,
बाहु में आतुरता को लिए,
अधर में वचन - विकम्पन
साध,
हिये में
आकुलता लिए;
को
साध कर रसना में संलाप,
बैठ कर
श्वासोच्छवास - हिंडोल ;
लिए अजलि में हृदय-प्रसून,
अमित, रस-लोल, ललित, अनमोल, -
दुल गई विमला श्री ऊम्मला,
लखन के चरणों में चुप-चाप ;
न मोल, न भाव, न सौदा हुआ,
समर्पण हुआ आप ही प्राप ।
(६४)
भरे,
योग निद्रा नयनों में
भुजाओं में भर शक्ति प्रखण्ड;
अधर में लेकर चुम्बन-प्यास,
हृदय में प्रेम ज्वलन्त प्रचण्ड;
जीह से जपते "श्री ऊम्मिला"-
झूलते
हिय कम्पन- पर्यंक,
भरे प्राणों में
अर्पण-आग,
विचरते मस्त, निपट निःशंक ;
समर्पण-विधियां
पूरी
हुईं,
उठी तादात्म्य-गूंज
घनघोर;
सुलक्षण लक्ष्मण "अहं" बिसार-
बँधे
ऊम्मिला- दृगंचल-छोर ।
१५८<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१५)
द्वितीय सर्ग
ब्रह्माण्ड-
विश्व ही नहीं, अखिल
थिरक उठा, यह स्नेह निहार,
चराचर उत्कम्पित हो गए-
देख दम्पति का पुण्य विहार;
निशाएँ नाची दे-दे ताल,
दिवस नाचे ले कर करवाल;
उषाएँ नाचीं हो
बेहाल,
नवीं सन्धायें हो कर लाल;
रास-मण्डल परिचालित हुया;
चराचर में यति-गति भर गई;
ऊम्मिला- लक्ष्मण की
रस- राशि
प्रकृति पर कुछ जादू
कर गई ।
(२६)
गगन अवकाश नृत्य कर उठा,
नीलिमा भी कुछ कँपने लगी;
सूर्य की वह वर्चुला विभूति-
नाचती-सी कुछ भँपने लगी;
थिरक उठ्ठीं किरणें
दिशाएँ नाचीं निपट
शून्य का वक्षस्थल
मुदमान;
अजान;
गतिमान
हुआ; लहरा अम्बर
सुनसान;
नील नभ-मंडल, क्षितिज महान,
सभी थल फैला नृत्य-विधान;
अचर को दे कर
यति-गति दान,
स्थैर्य्य कर रहा
नृत्य अनुमान
१५६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१७)
सतत वर्तन - श्रम-कण वन खिले,-
गगन में शत-शत तारक बिन्दु
धीर-गति जल से पूरित हुआ-
अतल निःसीम गगन का सिन्धु
नृत्य-रेखा-मंडित
नच उठे तारक वृन्द अनेक,
नाचने लगे मुदित उडु-राज;
राशियां नचीं, नचे नक्षत्र
नाच उठा सब सौर समाज ;
आकाश,
पदन्यासों का गूँजा घोर;
लोक-लोकान्तर से रव वहा,
हर गम्भीर, अछोर, अथोर ।
(85).
नच उठी घनी कुहू -कालिमा,
नाचने लगी निशा घनघोर;
अखिल ब्रह्माण्ड नृत्य-मय हुआ,
रास-मंडल का ओर न छोर;
वर्तुलाकार ;-
नृत्य-गति-चलित निशीथ - दुकूल
वन गया पूर्ण
कृत्स्न
जगती के
फँस गए नृत्य
१६०
जीव अनेक
मंडलाकार;
ऊम्मिला- लखन-हृदय-द्वय
नचाने लगे सकल
थिरक,
संसार ;
निखिल ब्रह्माण्ड प्रवेश नच उठा,
त्याग कर निज मूढाहंकार ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अँधेरे की भी श्यामा
(६६)
छूटा,
गंथ गई ज्योति पुंज के संग;
अँधेरा और उजेला मिला-
553
दिखाने
लगा रास-रस-रंग;
द्वितीय सर्ग
अँधेरे
की परछाई पड़ी,
उजेले के
बीच;
वक्षस्थल
आत्मवत् करने को, सुप्रकाश,
खींच;
अँधेरे को ले आया
उषा, सन्ध्या, निशीथ, मध्यान्ह, -
पूर्व निशि समय, पूर्व दिन काल;
अपर निशि काल, अपर दिन काल,
नृत्य करके हो गए
निहाल ।
(१००)
मिल रहा उस “भविष्य” में “भूत",
पकड़ कर "वर्तमान" का छोर;
"आज”, बन रहा "प्रतीत" पुनीत,
"आज" में उलझी "भावी" - डोर;
दूर भावी प्रति विगत अतीत, -
लिए लघु वर्तमान का
रास की क्रीड़ा करने
संग, -
लगे;
उठी विप्लव की सतत
उमंग
बँधे,
प्रेममय नियम शृङ्खला
कर रहे कौतुक रास-विलास;
जुड़ गई एक शृङ्खला जहाँ
कहाँ फिर प्रलयोद्भव का त्रास ?
१६१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१०१)
समय की रसरी में बँध नचे-
दिवस, घटिकाएँ, वर्ष, मुहूर्त्त;
एक क्षण-क्षण में होने लगा-
चिरन्तन
नर्तन-हर्ष- स्फूर्त
प्रलय में भी संसृति के सूत्र -
सर्ग में भी विसर्ग के भाव,-
दिखाई दिये स्पष्ट,
प्रत्यक्ष;
सीमाकाश नाचने
मिट गया सकल दुराव छिपाव;
लगा, -
काल ही स्वयं दे उठा ताल,
ऊम्मिला-लखन, प्रकृति-चिरपुरुष,
नचाते हैं ब्रह्माण्ड विशाल ।
(१०२)
अमर जीवन ने अपनी बाँह -
मरण की ग्रीवा में दी डाल;
रास-गति प्रति परिचालित हुई,
"ततक-ता-थेई" की दे ताल,
हुए लय-उद्भव एक स्वरूप,
हो गए अप्यय-अव्यय एक;
मरण का चरण-स्फुरण बन गया-
अमृत गायन की अविरल टेक;
१६२
मिट गया संशय संभ्रम सकल,
मरण-जीवन का मिटा विभेद;
ऊम्मिला-लक्ष्मण के स्नेह ने-
जगाया सुप्त रुचिर निर्वेद ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१७९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>(१०३)
मरण-जीवन का एक स्वरूप,
किये हृदयंगम यह चिर सत्य
देख कर ब्रह्माण्डों का नित्य,
प्रेम-उत्प्राणित ताण्डव नृत्य,
द्वितीय सगं
प्रेम घर्षण श्रणु-प्रणु में देख, -
स्नेह कर्षण सब ओर निहार,-
ऊम्मिला - लक्ष्मण को नित देख-
परस्पर हो
अथिर मति, दीन, बुद्धि के क्षीण,
बड़े मूरख ये निपट नवीन
भक्ति की क्षीण रेख को गहे
ऊम्मिला चरण तल्लीन ।
हुए
विश्व अतुरंजन भाव
-
लोक-संग्रह का मन्त्र
-
(१०४)
बहू ऊम्मिला
जाते बलिहार;
स्वप्न लोचना-
सुलक्ष्मण दूलह गहर, गंभीर, -
नेह छिटकाते, हरते चले-
अखिल जगती की दु:सह पीर;
प्रधान,
महान,
कर रहा है उत्प्राणित उन्हें-
जगत को मिला स्नेह वरदान;
मधुरिमा फैली है सब ओर,
निराशा भगी, जगी चिर प्रश;
त्रिगुण-मय जीव, ब्रह्म-मय हुआ,
कट गए पार्थिवता-गुण-पाश ।
१६३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
(१०५)
चराचर में सनेह भर गया,
शूल भर गया, क्लेश डर गया,
भर गया है आकंठ सनेह,
बह उठा प्रेमल निर्भर नया;
चराचर सब आप्लावित हुए
मुए सब भेद-भाव-दुख भोग
चिरन्तन नेह बरसने लगा,
न क्लेश, न मोह, न शोक, न रोग;
गूंज उट्ठा हिय रंजन गान,
छिड़ गई आत्मनिवेदन तान;
हो गया जीवन का सम्मान,
हृदय का हुआ दान प्रतिदान ।
(१०६)
नयन से नयन, अधर से अधर,
मिले हिय से हिय अति स्वच्छन्द
प्राण में रमे आन
कर प्राण,
छलक
उट्ठा नव परमानन्द;
रक्त में रक्त मिला अनुरक्त,
मिट गई वह भावना विरक्त;
ऊम्मिला हुई लखन-प्रासक्त,
सुलक्ष्मण
हुए ऊम्मिला-भक्त;
रमण-परिम्भण,
१६४
नाचने लगा
कुछ हुआ
ऊर्ध्व
प्रकट कुछ हुआ
रंजन- रास,
हृदय उल्लास;
स- निश्वास,
श्वास-1
रास- श्रायास ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>द्वितीय सर्ग
१
कलम, कल्पने, मति-गति मेरी, कर व कुछ विश्राम;
चल, कर लखनऊम्मिला चरणों में तू पूर्ण-प्रणाम;
खूब किया जो लीला - वर्णन तू कर चुकी प्रथकिते ;
खुब किया जो यह कह डाला, श्ररी चमत्कृत चकिते;
पर मन में अभिमान न करना, 'मेरी कठिनी भोली,
कथित हुई ऊम्मिला- कृपा से यह गाथा अनबोली ।
२
अरी कल्पने, अब चलना है आगे वन निर्जन में,-
तुझे घूमना है बरसों तक उस अति सघन विजन में;
विधवा अवधपुरी में विधुरा विमल ऊम्मिला रानी-.
बहा रही होंगी लोचन से अपने हिय का पानी;
उनके भी दर्शन करना है, श्ररी निष्ठुरे तुझको,
आज लिए चल अपने सँग तू इस कठिनी को, मुझको ।
तेरे
मां, ऊम्मिला निभावें तुझको, खोलें तेरे नैन,
अपनी करुणा से वे भर दें
अन्तर की धड़कन को, हिय-तड़पन को,
सजनि, आत्म- कंपन को दिखला दे
तुतले बैन,
मन- फाँसी को,
सनेह - गाँसी को,
कुछ ऐसी रस-धार बहा दे अरुण-करुण रस-माती,-
कि बस जगत की सकल धीरता बहे विकल उतराती ।
१६५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
श्री कल्पने, विप्रयोग की कथा दुख भरी गा दे;
मेरी टूटी शिथिल कलम से उसको तू लिखवा दे;
दिखला दे वे दृश्य, हठीली,
}
तड़पा दे हिय को चिरसंगिनि
अरी, उठा दे हूक;
कर-कर के दो टूक ;
श्री अम्मिला, सुभट लक्ष्मण की विषम वेदना-तान, -
आज छेड़ दे नए सिरे से, री, तू निपट अजान !
५.
त्रेता
युग की कथा पुरानी, अकथित,
उसको कर के स्रवित द्रवित तू बन जा
प्रमथित, गेय,
अमर, अजेय;
झाँकी देख,
प्यार भरे मनुहार ढरे दृग, इन की
अरी चली चल अवध, विपिन में घरे लखन-पद-रेख;
श्री ऊम्मिला स्वामिनी तेरी, लक्ष्मण तेरे देव;
शरणागत को पार लगाना है दम्पति की टेव ।
इति श्री द्वितीय सर्ग
श्रीमातृ ऊम्मिला चरण कमलार्पणमस्तु
१६६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अथ श्री तृतीय सर्ग<noinclude></noinclude>
3l4t01f6lx1f4k9vibexu3kqbr05cfk
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude>
2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
ध्यान
खचित-शोक रखा है जिस के द्युति विहीन ग्राभरणों में,
अलकावली-ग्रथित, श्री हृत हैं कुंडल जिसके कर्णो में,
श्रकथित कथा कही जाती है जिस के कल-कल झरनों में,
नत हो जा, हे नास्तिक मस्तक,
उसके
युग
श्री चरणों में ।
१६६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१
अरे शून्य से गोल-गोल तुम,
अन्तस्तल के अधिवासी,
अहो, सकल ब्रह्माण्ड विश्व के,
अण्ड रूप तुम अविनाशी ;
अरे, प्रज्वलित हृदय वन्हि के, -
मृदुल प्रसून विलक्षण से,
विमल करुण रस-निधि के विगलित
तुम
प्रहरी-से,
रक्षण- से;
कारण- जन्य- विश्व - पीड़ा
के,
तुम निष्कारण- बिन्दु,
अरे;
हिय- हिलोर दरसाने
वाले,
बिन्दु-रूप तुम सिन्धु, अरे !
२
विगलित व्यथा वेदना की तुम
तरल सियाही बन आओ,
कलम की शुष्क नोक से,
मधु-मसि बन छन-छन आयो;
प्रो प्रसू, तुम बरस पड़ो, यह-
प्यासा है कागद मेरा,
प्यासी कलम, हृदय प्यासा है,
प्यासों का है यह डेरा;
वियोग-वर्णन
विप्रयोग की कथा लजीली
लिखवा दो, आओ, श्राश्रो,
मँडराम्रो, उमड़ो, सरसो,
अपनी
बूंदें ढरका
कुछ-
१७०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३
ढरका दो, अपनी कुछ बूँदें,
मेरी सूखी स्याही में,
कुछ कम्पन पैदा कर दो मम
गाथा मन चाही में
इस
आज वेदना की प्रणोदना का,
हृदयंगम तत्व करो,
यो आँसू, मेरे शब्दों में
निजत्व भरो;
अपना तरल
वही
तृतीय सर्ग
श्री अम्मिला और लक्ष्मण के-
श्री चरणों में ढरक पड़ो
करुण प्रसाद प्राप्त करने को
उन से तुम हठ कर झगड़ो ।
४
ऊँची-नीची सहज कँटीली-
पथरीली वह पगडण्डी,
जहाँ पथिक का मान भेदती,
विचरण करती वन-चण्डी;
मार्ग-रेखा हुलसेगी-
मृदुल पुण्य चरणांकन से;
प्रबल प्रतापी निकलेंगे अब
वन को निज गृह आँगन से
सीता, राम, लखन जायेंगे-
आज छोड़ अपनी नगरी;
आज अवध विधवा होगी, श्री'
सधवा होगी वन-डगरी
।
संकेत (भारी घटना की ओर)
१७१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५
आज अवध के राजमार्ग में
आकुल कोलाहल
फैला :
यह वियोग की
घटिका आई,
यह वन जाने
की वेला;
अनुप्राদ
यह अचूक सी हूक उठ रही
है सब के
अन्तस्तल में,
छल-छल छलक झलक भरती हैं
बूंदें दृग से पल-पल में;
अचल अचंचल अटल हिमांचल,
सम हैं राम धनुर्धारी;
पट-परिवर्तन हुआ, हो गई
वन जाने की
६
तैयारी ।
सिंहासन से वह कुश-आसन,
राजमहल से पर्ण कुटी;
निर्जन वन आवास बन रहा,
जन-संकुलिता अवध छुटी;
१७२
लुटी सम्पदा तीन लोक की
तप के एक इशारे पे,
वसुधा बलि-बलि गई राम के
पद-नख न्यारे-न्यारे पे;
सुकुमारता, सरलता, शुचिता,
सीता चरणों में बिखरीं,
तप-भावना सुलक्षण लक्ष्मण-
पर न्योछावर हो निखरी ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१८९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७
अरुझानी वाणी,
अकुलानी,
पानी-पानी हृदय
हुआ;
आँखों की बूंदों के मिस यह
हिय का संचित प्यार चुना;
भाषा थकी, हृदय धड़के, श्री'
फड़के अधरों के पुट वे,
कण्ठ रुद्ध, मन क्षुब्ध हुआ है,
रहे शब्द सब घुट-घुट वे;
तृतीय सर्ग
आँखें मिचीं खिचीं आहें, औ
तन-रोमावलियाँ,
सिहरी
श्री ऊम्मला- नयन की ढरकीं
लखन चरण में अंजलियाँ
८
बैठे लखन, पार्श्व में बैठी
विमल ऊम्मला खोई-सी,
हैं चारों आँखें कुछ स्वप्निल,
कुछ-कुछ
भीष्म प्रतिज्ञ भाव में
धोई - धोई
अरुणा
करुणा यह तल्लीन हुई,
अथवा सागर में सरिता को
सी;
सत्ता
संज्ञा - हीन
हुई;
रह-रह एक
दूसरे
को यों
लखते घटिकाएँ
गिरीं शिथिल ये भुज लतिकाएँ
ऊपर को उठ उठ
बीतीं,
रीती ।
१७३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
E
लक्ष्मण के उन्नत ललाट पर
रेखायें मण्डिता * हुई;
मानो हिमगिरि श्रृंग श्रृंखला
मेघ-धार-
खण्डिता
हुई;
खचित भाल-रेखा में जीवन
की प्रहेलिका उलझ
गई,
आ-था कर कण्ठों में अटकी
हृदय-ग्रन्थियाँ
मौन वेदना वही
आह से,
'श्री' नयनों से अरुण व्यथा;
रुद्ध हिचकियों से निकली प्रति
करुण वर्णनातीत कथा |
१०
लक्ष्मण रानी के लोचन द्वय,
अरुण करुण
रस-रंग रँगे,
उधर कठिन कर्त्तव्य-नाद में
लक्ष्मण-श्रवण-कुरंग
१७४
पगे;
कई-कई;
वे
दोनों नयन इधर मचले,
दोनों श्रवण उधर मचले,
विगलित करुणे ! उमड़, ठहर श्रो
भीष्म प्रतिज्ञे, तू अचले;
दो-दो गहरे हृदय-समुद्रों-
का मन्थन हो रहा यहां,
कर्म-शीलता का, सनेह का,
गठबन्धन हो रहा यहां ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मरु की तप्त व्यथा-सा हिय में
अमित छाया,
हा हा कार
यौवन की नित चरम निराशा
का सा प्यार उमड़ आया,
तृतीय सर्ग
११
में
हरे-भरे से मन-मंडल
निपट विछोह निखर आया,
ममता मिटी, मोह यह छूटा
मिटा सँजोग, मिटी माया;
निपट निराशा की निशीथ में
लगन जगी, लौ लगी भली,
इधर-उधर ऊम्मिला- लखन की
स्मृति- प्रदीपिका जगी भली ।
प्यार
१२
अनुराग
रँगे,
निःशब्द ठगे प्रिय भाव जगे;
त्रास भरे, निश्वास भरे, अति-
प्यास भरे, हिय घाव लगे;
अमित, श्रमित, कम्पित, प्रति शंकित,
रंजित, संचित शब्द हुए:
थर-थर,सिहर-सिहर, भर-भर कर ध्वनि-विज्ञान
हिय-मुक्ता उपलब्ध हुए ;
तार बँधा हिचकी का फूटा-
स्वर पीड़ा के पंचम का,
देख ऊम्मिला की गति,
टूटा-
बाँध लखन के संयम का ।
१७५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१३
हास - विलासों की प्रतिध्वनि में,
आज रुदन- श्राभास मिला;
मधु-सँजोग घटिका में आकर
यह
वियोग- विष त्रास मिला;
दरस - माधुरी
में
अदरस की,
कँकरीली वेदना मिली;
लक्ष्मण-हृदय-स्थल में सहसा
नवल कर्म्म-प्रेरणा खिली;
सुख-बलिदान, जीवनाहुति के,
आत्मार्पण के दाँव लगे,
राज-भोग, ऐश्वर्य छुट रहे,
मर-मिटने के भाव जगे ।
१४
करुणाम्बुधि अपनी मर्यादा
उल्लंघित करने आया;
विकट व्यथा का घन-समूह यह,
दिङ् मण्डल भरने आया;
ज्ञान-विराग-भाव को पीड़ा
१७६
का
समूह हरने आया;
हिय की होली में वियोग यह
चिनगारी
धरने आया;
आज ऊम्मिला-लखन परखने
को यह घटिका प्राई है;
अपने सँग अति कठिन कसौटी
का पत्थर वह लाई है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५
जीवन की दोपहरी में ही,
सन्ध्या का ग्राभास मिला,
उजियाले में अँधियाले को,
वास मिला, आवास मिला;
धूप-छाँह मिल गई अचानक,
उद्भव बीच विनाश मिला;
कम्मं, प्रेम में मिला; मुक्ति में-
तृतीय सर्ग
प्रथवा,
बन्धन- पाश
मिला;
प्रेम-योग में वित्र-योग का
क्या ही क्रमिक विकास मिला !
जीवन की गहराई में भी-
अमित हास- उपहास मिला |
१६
स्नेहाम्बुधि में नव वियोग की
भड़की
बड़वानल ज्वाला,
खल-भल, खल-भल प्रतल जल हुआ,
उठी वेदना विकराला;
तड़पे प्राण-मीन, प्रकुलाए-
हिय-मन्थर, मन मथित हुआ;
प्यार - प्रशान्त महासागर
का
विकल- विचल जल व्यथित हुआ;
वीचि - विलास - लास्य की समगति
असम, विषम, सम-हीन हुई।
रति - जल - राशि वाष्प बन आई,
संशय-सम्भ्रम-लीन
हुई
1
१७७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
अनं
.१७
मानस-क्षितिज, वियोग मेघ से
श्राच्छादित हो गया घना,
यह सुखभरा संजोग बन रहा
जीवन- सपना,
क्षणभंगुर
में अँधियारी छाई,
पड़ी
पुतलियों में झांई;
बढ़ती ही-सी अन्तरतर
में
चली
गई
दुःख- परछाई;
विमल ऊम्मिला के संगी
हें
उद्यत चलने को वन को,
सीता-राम लिए जाते हैं
ऊम्मिल-प्राण लखन-धन को ।
१८
प्रिय प्रवलम्बित हृदय विकम्पित,
में,
संचित नेह अश्रु-कण
रोमांचित तन, कठिन लखन-प्रण
लगन मगन-मन क्षण-क्षण में;
रमे लखन व्रण खण्डित, मण्डित-
प्रण,
थी
इधर
करुण रस
कर्तव्य-प्रेम-र
-रण में;
दोलाचल चित्तवृत्ति-सी
ऊम्मिला के मन में,
नभ - जल-थल में, अनिल-अनल में,
करुणा
का संचार हुआ;
उमड़ उमड़ कर, उबल उबल कर,
-हिय इक पारावार हुआ ।
१७८<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६
हिय की रणस्थली में जूझे,
तृतीय सर्ग
प्यार और कर्त्तव्य
राजस- सात्विक गुण बन्धन
रह-रह जूझे, मरे, गिरे;
कर्तव्यावहेलना
निरे;
ये,
ग्राई,
आई,
श्री आशंकाएं
पदस्खलन
कई प्रेरणाएं
की नई-नई सी,
बाई :
हिय-कामना विमोहन- लागी,
सुन्दर
शरद्-जुन्हाई-सी ;
नेह-सगाई, हिय लग
हिय लग आई,
मन मोहिनी लुनाई सी ।
२०
करुण कहानी
हिय- प्ररुझानी,
छानी-मानी नहीं रही;
प्रकुलाती प्राँखड़ियों से वह,
पानी-पानी
बनी, बही;
मथित हिचकियाँ, वचन - दीनता-
का, कुछ सँग देने आई,
निपट-धीरता ने, संयम ने
अपनी सुध-बुध बिसराई;
मन-पानस की मंदिर हिलोरें-
उमड़ उमड़ बढ़-बढ़ आई ;
कढ़ाई आहें बरवस-सी,
करुणा-सरिता च धाई ।
१७६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अम्मिला
२१
आंखों में विषमय विषाद के-
अंजन की रेखा झलकी,
छिटक पड़ी वेदना नयन से-
गंभीर अन्तस्तल की:
अति
हिय-शत दल की हलकी हलकी
श्राकुल, चंचल गति छलकी,
प्यासे अवलोकन से प्रकटी
विषम वेदना पल-पल की
१८०
पलकों में संस्मृतियां घिर-घिर
आई कई विगत कल की;
लखनऊम्मिला की वे श्रांखें-
सरिता बनीं लवण - जल की ।
एक
२२
घूम गया नयनों के आगे
चित्रपट जीवन का,
स्मरण-शृङ्खलाओं की कड़ियाँ
बजा गई स्वर खन खन का
कई मोद के कई तोष के,
कई पूर्णता के क्षण वे;
घूम गए ऩयनों के आगे
बन कर कॅकरीले कण वे;
आज चुभ गईं आँखों में वे
संस्मृतियाँ बन शूल-ग्रनी,
नयनों की किरकिरी बन गई-
पुष्प - राग की अमिय-कनी 1<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९७
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३
तृतीय सग
चारों नयनों की
गहराई
गहरी ;
उतराने लग
गई वेदना,
हुई और भी कुछ
उन नयनों में रह-रह, री;
झिल-मिल भिल-मिल सकल जग लगा,
तिरता-सा संसार
लगा;
कुछ कम्पित-सी हुई पुतलियाँ,
अस्थिर सब व्यापार लगा;
धुआँ-धुआँ-सा कुछ उठ आया,
कुछ मोती से बिखर पड़े;
कुछ आ पहुँचे युग कपोल तक,
कुछ नयनों के द्वार अड़े ।
२४
श्री ऊम्मला सलोनी की वह
नासा सुघड़ हुई अरुणा :
बूंद-बूंद मिस उन रन्ध्रों से,
श्वास-रज्जु,
रह-रह टपक चुई करुणा;
वन-गमन - मथानी,
भाजन हृदय प्रतीत हुआ:
चप्रा :
व्यथा मथित अन्तर का नासा-
रन्ध्रों से, नव-नीत
लखन सुभट निज निर्मल पट से,
बार-बार मुख पोंछ रहे;
ऊपर से सुस्थिर-से दिखते,
अन्तर-तर की कौन कहे ?
१८१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२५
श्रवणों में प्रिय-कण्ठ-ध्वनि के
सुनने की वाञ्छा उमड़ी,
हीरक-कुण्डल, आभा,
कर्णी-
में, कच-जालों से झगड़ी;
अवश मौन के अवलम्बन ने,
उन श्रवणों की तृप्ति न की;
केशों ने कणिका-किरण की,
उलझ उलझ विज्ञप्ति न की;
कण भूषण
हुए
निरादृत,
घन से;
उलभे-से कुन्तल
श्रवण रहे प्यासे के प्यासे,
अवश मौन अवलम्वन
२६
से
I
शब्द-दीनता, रुद्ध कण्ठध्वनि,
हिचकी, सिसक निराशा की,
कलकण्ठों में ये भर आईं,
लिए पीर गत आशा की;
कहाँ श्रवण की तृप्ति ? नौ' कहाँ
अभिव्यक्ति हिय-भावों की ?
यहाँ मौन भाषा ने दे दी
साक्षी
गहरे
घावों
स्वर - विश्लेषण,
ध्वनि-माधुर्य्यं
गायन - निःस्वन,
कंकण-रुण,
की;
तान समन्वय,
विलुप्त हुए;
वादन-निक्वण,
सब सुप्त हुए ।
१८२<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/१९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७
सात स्वरों का, स्वर-श्रुतियों का,
विशुद्ध कहाँ
संताप-ताप
ध्वनि- विन्यास
अतुल- विपुल
शुष्क कण्ठ
से
अवरुद्ध यहाँ
कहाँ तान, लय, गति, अलबेली ?
मुरज, मूर्च्छना कहाँ यहाँ ?
तृतीय सर्ग
सिसक हिचकियों का प्रारोहण-
अवरोहण
गहन
है
जहाँ-तहाँ ;
स्वर - विधान, कल-गान हो गया,
मूच्छित हिय के कम्पन से
श्रवण रहे प्यासे के प्यासे-
श्रवश मौन अवलम्बन
२८
से ।
अथु अलंकृत युग कपोल की
श्राभा कमनीया,
पाटल
सहसा कुछ श्यामला हो गई-
वह शोभा अति
प्रेम वात्सल्य-प्रणोदित
लक्ष्मण-प्रधर- विचुम्बित
रमणीया,
वे, -
श्री ऊम्मला कपोल - युगल, अति-
हुए स्फुरित अनुकम्पित वे;
स्नेह-धार की प्रणालिकाएं,-
शतपत्रों की कलिकाएं,-
वे कपोल की युगल जोड़ियाँ,-
सिहर उठीं: दायें-बायें
1
१८.३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२६
लक्ष्मण के दक्षिण स्कन्ध पर
वाम कपोल धरे मृदुला,-
दक्षिण कर ग्रीवा में डाले,
सिसक रही ऊम्मला कुला;
विकट वीर, मतिधीर, लखन कुछ
झिझके, कुछ अरुभाने से,—
बाँध भुजाओं में अपना धन
बैठ रहे अकुलाने से;
यो प्रालिंगन करती दीखी
आकुलता से सुस्थिरता;
ज्यों गुणमयी सुरति से लिपटी
हो भावना विरति-निरता ।
३०
चंचल भ्रू-विलास मरभाया,
निपट प्रचंचल भाव उठे;
चंचलता के सब सांकेतिक
सुस्पन्दन के भाव लुटे;
दुग चंचलता-हाट
लुट गया,
लुटी दुकान इशारों की,
क्या ही भीषण सेना उमड़ी
भावों
के
वटमारों की
१८४
उन नैनों में कहाँ इशारे ?
संकेतों का होश
कहाँ ?
जोश कहाँ ? हिय-दोष वहाँ,
चित रोष वहाँ, संतोष कहाँ ?<noinclude></noinclude>
24fols00wd00309vnvh5epeyn0b6y9y
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१
लम्बे, सघन, कृष्ण कुन्तल से
ललक लखन अँगुलियाँ मिलीं,
कंधी-सी बन इधर-उधर वे,
केश-पुंज म हिली-डुलीं,
तृतीय सर्ग
वत्सलता, सान्त्वना, प्रीति प्रति
अंगुलि - चालन से;
बरसी
ज्यों विश्वास उमड़ पड़ता है
कथित
वचन प्रतिपालन
से,
रामानुज के प्राण
पियासे-
उलझे केश कलापों में,
हृदय विध गया "हां, ना" के उन
टूटे-से संलापों में
३२
नख से शिख तक लोम-लोम तक,
अन्तर-तर का दाह हुआ:
आज ऊम्मिला की करुणा का.
लक्ष्मण- प्रण से व्याह हुग्रा:
चाह ग्रह की राह चल पड़ी,
थाह प्रथाह हुई हिय की;
उतर गई ऊम्मिला बहुत ही
गहरे, गह ग्रीवा पिय की
मोह, बिछोह, टोह लेने को
आये लक्ष्मण के मन की;
किन्तु बुद्धि कैसे विचलित हो
ऊम्मिला- प्राणधन की ?
श्री
१८५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३३
अमित अगाध अनन्त प्रीति की
भर नयनों में रीति भली-
धारण कर स्वकर्म-निष्ठा की
मति में अचल प्रतीति भली-
सती ऊम्मिला की मंजुल छवि
हिय- हिंडोल में दुलराते,
वचनों से गम्भीर नेह की
नव-कलियों को
सुभट लखन, वचनालियाँ यों-
बोले निपट सनेह भरी,
हुलसाते;
ज्यों निदाघ की दोपहरी में
बगरी ।
शीतल रस-फुहियाँ
३४
"जीवन संगिनि, करुणा-वंदिनि,
प्राणानन्दिनि,
रति
गम्ये,
रम्ये;
विकल कुंरगिणि, हिय-प्रवलम्बिनि,
मन-सर- हंसिनि, तुम
१८६
मेरे जीवन की तुम स्वामिनि,
स्नेह-यज्ञ की हवन-क्रिये,
मेरे वासन्ती यौवन की-
तुम प्रवालिके नवल,
प्रिये;
मेरे जन्म-जन्म के तप की,
तुम पावन फल-रूप बनी;
तुम मेरे नयनों की दर्शन-
शोभा रूप अनूप
अनी ।<noinclude></noinclude>
7blcxum06xa2ghb0a1ryacauvpkd5wr
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
३५
बनी कनी तुम नेह-सिन्धु की,
नयन - बिन्दु
की तुम झाँई,
पूर्ण इन्दु की ग्राभा तुम हो,
मम
स्वरूप की
परछाई;
लगन अटपटी तुम मम हिय की,
तुम मेरी
मेरे
तुम
सकरुण माया,
निर्गुण तत्व-ज्ञान की
मोहिनी सगुण छाया;
मम गायन की सुश्रुति-रूपा,-
तुम हो बनी विकम्पिन-सी ;
ठिठकी-सी, स्वर प्ररुझानी-सी,
झिकी-सी,
विस्तम्भित-सी ।
३६
तुम
मेरी
जीवन-प्रहेलिका,
सूझ-बूझ
नित
ज्ञान मयी,
तुम
तत्वार्थ- दीपिके
मेरी,
योग-मयी, तुम ध्यान-मयी,
मयी,
मेरे जीवन की गहराई -
अतल बितल पाताल
तुम सुमिरिनी बनी हो मेरी
तुम मम संस्मृति- माल नयी;
तुम रानी ऊम्मले बनी हो-
अति तन्द्रिता निशा मेरी;
तुम हो उषा, तुम्हीं प्राची की--
हो प्रमुदिता दिशा मेरी ।
१८७<noinclude></noinclude>
6scazhk1xs5ex6nqlz2d8jbxeqoecgg
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३७
मेरे भाव-पुंज की प्रतिमे,
करुणा के विगलित क्षण-सी,
तुम उल्लास रास-क्रीड़ासी,
-
तुम
गतिमती विलक्षण-सी;
तुम मम विचलित निःश्वासों की-
समाधान स्थिरते,
संतत
तुम सनेह भरिते, सरिते, तुम-
त्वरिते,
करुणा-रस-निरते;
तुम मम आराधना-परिधि की-
केन्द्र-बिन्दु हो, चिर मृदुले,
हास - विलास-पाश
तुम
मेरी,
तुम विश्वास व्यास, अतुले !
३८
मेरी शुद्ध-बुद्धि तुम, रानी,
तुम मम
क्षमता कल्याणी :
तुम
सागर- गम्भीर घोष-सी,
उद्घोषित
१८८
मेरी वाणी;
तुम निरलस तापस-रति मेरी,
तुम मेरी
सत् सक्रियता;
त्वमसि चिरन्तन सेवा मेरी,
तुम हो मम विराग-प्रियता;
तुम हो जागरूकता
निद्रित - सम्मोहन क्षण
मेरी-
की,
तुम हो मेरी सखा-सहेली,
मेरे इस जीवन-रण की 1<noinclude></noinclude>
j08d7vv62kt80i14k5wyyw3pw8ztw2u
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>बुम
३६
विदेह-नन्दिनी ऊम्मिले,
तुम दशरथ की पुत्र- वधू,
तुम रिपुसूदन की भाभी, तुम-
चार्य राम की अनुज वधू,
तुम तपस्विनी मात सुमित्रा
की हो बहू सुहाग भरी,
तुम हो निपट सुभट लक्ष्मण की,
चिर साथिनि अनुराग-भरी;
तृतीय सर्ग
तुम मेरे दुर्धर्ष धनुष की
प्रत्यंचा बन आई हो,
तनिक सुनो, आँखों में भर क्यों
यह गुक्ता धन लाई हो ?
४०
रंच ठहर जाओ, बलि जाऊँ,
यों मत मुझे अधीर करो,
बार-बार इन सुघड़ द्गों में
रह-रह कर मत नीर भरो,
धीर धरो, मत अपने हिय को-
चीर करो न्यारा-न्यारा,
देखो तो, यह भीग गया है-
मेरा उत्तरीय
तनिक सुनो तो, मेरी रानी-
में बलि जाऊँ ! सुनों जरा,
अये, डिगी जाती है, देखो,
मौन वेदना-परम्परा
सारा;
.258<noinclude></noinclude>
o7rjbqvlnbeha0z8zfdvruu56pwcz48
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३२४१
धैर्य रूप तुम सदा ऊमिले,
जनकनन्दिनी देवि, सुनो,
तुम हो प्रतिष्ठिता प्रज्ञा, तुम-
अमल वन्दिनी देवि, सुनो.
आज उमड़ आई यह कैसी
चंचलावृत्ति, अये ?
विषम चंचलावृत्ति,
कहाँ गया.
सन्तोष भाव यह ?
कहाँ गई परितृप्ति, अये ?
पुण्यवती धृतिमती सुनयना-
माता की तुम
जायी हो,
तुम विदेह तनया
हो, तुम तो
हो ।
उनकी गोद-खिलाई
४२
यह वन-गमन, विजन सेवन यह,
वन-पर्यटन श्राज प्राया;
आज निमंत्रण देने को
जंगल का समाज
१६०
यह
श्राया;
अवध-राज का काज छूट रहा,
हमने विपिन - राज पाया,
राज मुकुट की जगह राम ने-
निरा-त्रिशूल
ताज पाया;
क्यों विह्वल होती हो, रानी ?
क्यों अकुलाती हो मन मैं ?
मेरे हिय में बनी रहोगी
देवि, सदा उस निर्जन में<noinclude></noinclude>
5sqld2vhsx27qencmwm41ygjwhfr4wx
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३
राज छुटा वनवास मिला, यह-
परिधि छुट्टी, दिक्शूल गया,
प्रिये, तनिक देखो तो, उमड़ा--
जीवन- सिन्धु
प्रकूल नया;
वह महान अटवी अन्वेषण,
तापस वेश
वह साहस, वह
स्वावलम्ब - सन्देश
विशेष वहां
विपिन समस्या..
वहाँ;
तृतीय सर्ग
मैं खोजूंगा तुम प्रसून को-
उन जंगल के शूलों
में,
तुम्हें पुकारूँगा पद-पद की
प्रति ठोकर की भूलों में
४४
विमाता
यह है योगायोग,
तो बस एक बहाना है;
उस विकराल विपिन में जाकर,
उसका गर्व दहाना है
वन दुर्गमता, सहज अटन में,
अहो देवि, परिणत होगी,
उस दुर्लध्य विन्ध्य की चोटी
राम-लखन पद नत होगी
उत्तर-दक्षिण का गठबन्धन
करे हमारी पद-रेखा,
जग वह देखे जिसको उस ने
अब तक कभी नहीं देखा ।
१६१<noinclude></noinclude>
gaghwterxrx0ot8y75t9qjnl1ab03ca
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२०८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४५
आज ग्रार्य-संस्कृति-जीवन का-
यह शुभ प्रथम प्रभात हुआ,
रवि-कुल- रवि की प्रथम किरण से
अन्धकार अज्ञात
वह बर्बर अज्ञान,
अज्ञान, सुलोचनि,
वह जड़ता उस जंगल की,-
होने को है नष्ट, आ गई-
घड़ी प्रात के मंगल की ;
नव-सन्देश, ज्ञान, शुचिता के
हम वाहक निष्कामी हैं;
यह प्रादर्श प्राप्त करने को-
राम-लखन वन-गामी हैं ।
४६
संसृति चकित-नयन
-
-
सीता राम
पद - विन्यास - रेख
देखेगी,
चरण
रेखा;
वह
होगी-
नव इतिहास चित्र - लेखा;
१६२
-
-
अनायास ही आज बन रहे
हम सब नव विधान स्रष्टा,
देवि, हो रहे नयन हमारे
आज
भविष्य-भाव- दृष्टा
यह सन्देश-प्रेरणा
हिय में अनतुष्टा,
हुआ;
जागी,
हृष्टा,
लखन-चरण- गति सघन - विजन की-
ओर हो रही प्राकृष्टा 1<noinclude></noinclude>
cz2mwcxy18fhh6s2x2ff049g82weulm
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७
मुझ को जीवन सार्थकता का,
आज संदेश मिला,
देवि,
मुक्त ज्ञान-विज्ञान प्रचारित-
करने को वन- देश मिला;
नव- विचार - प्रजनन का सूचक-
यह सांकेतिक क्लेश मिला,
तुमको मेरी सुघड़ ऊमिले,
क्लेश-रूप प्रेमेश • मिला;
तृतीय सर्ग
सह जाओ यह विषम, वेदना-
तुम मेरी अच्छी रानी !
हे मम लघु लघु प्रिये, वेदना,-
तो है यां आनी जानी
४८
मैं जानूं हूं देवि, हृदय यह
हा हा कार कर उठे है,
मैं जानूं हूं, हिय रस,
भर-भर प्रांख भर
।
जानू हूं में, हिय क्रन्दन की
औ हिचकी की सब घातें,
जानूं हूं सुकुमारि तुम्हारे
मन की अनबोली बातें
पर क्या करूं ? बताओ, तुम यों,
दृग में जल भर मत देखो,
मेरी हृदय-स्वामिनी तुम, कुछ-
तनिक सम्हालो अपने को ।
बरबस -
उठे है;
१९३<noinclude></noinclude>
6h2p9ffyo5q1s1alpo2oe2x76qo98xo
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४६
यह वियोग-प्राखेटक तक-तक
मार रहा है तीर, प्रिये,
प्राणों ही में नहीं हो रही-
पसली तक में पीर, प्रिये
छाती पर लेंगे वाणों को-
होंगे नहीं अधीर, प्रिये,
हम न दिखायेंगे जग को निज
दुःख, हिये को चीर, प्रिये,
मुझे सम्हाल, सम्हालो निज को,
आज पड़ी है भीर, प्रिये,
मां को, तात चरण को देखो,
नेक धरो चित धीर, प्रिये ।
५०
मुझको जंगल में जाना है
मंगल का संदेश लिए,
सीय राम अनुगमन
मैं निज
१९४
करूँगा-
तापस वेश किए;
यह सन्यास चतुर्थाश्रम का
द्वितीयाश्रम मैं आया,
और छुट रही है मम हिय की
तुम सी यह मृदुला माया,
टूट रहे हैं प्राण, सुलोचनि,
हिय में हूक अचूक उठी;
झलकी है मन-मृग मरीचिका,
यह वियोग की .
लूक उठी ।<noinclude></noinclude>
n9b48t195a6oalt2fqctxxjrvo2xpo0
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
५१
सोच रहा हूँ, कहां
मिलेगा,
इन अधरों का अमिय वहां ?
सोच रहा हूँ, मेरी श्राकुल-
प्यास बुझेगी वहां कहां ?
फिर सोचू हूँ कि तुम - निरंतर
बनी रहोगी मम मन में,
सोचूँ हूँ कि पुकारूँगा मैं
तुमको निशि में, निर्जन में;
हृदय-दुलारी, यों ये चौदह-
बरस बड़े कट जायेंगे
अवधि अन्त में
ये
वियोग के
बादल भी हट
जायेंगे 1
प्राकुंचित
शब्द-कोश
५२
देवि, विपिन में निपट निबिड़ तम,
मानस नभ रवि किरण बिना;
प्राणी, वाँ अज्ञान- शिला की,
करते हैं नित
प्रदक्षिणा ;
ज्ञान बिना विज्ञान बिना वे
मन-मस्तिष्क असंस्कृत हैं,
उनकी प्राकृत गिरा, शुद्धता-
लक्षण से निरलंकृत है;
मानस-दिङ मंडल,
छोटा
उनका ;
वे क्या जाने तत्व सगुण के-
गुण का, निर्गुण की धुन का ?
१६५<noinclude></noinclude>
3b442g2rt9f08ihq47d6r0mnqg1fktf
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२१२
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५३
उनके लिए सृष्टि, लय, स्थिति के
प्रश्न प्रतीव अरम्य बने,
जन्म-मरण के गूढ़ तत्व ये
उनके लिए अगम्य बने,
अपरा परा प्रकृति की लीला
नयन न उनके देख सकें,
नैसर्गिक प्रक्रिया देख कर
उनके हिय धड़कें, कसकें;
वज्र घोर उद्घोष रोषमय,
यह भंझानिल का
उनको स्तम्भित कर
कंपन, -
देता है।
चपल दामिनी का कम्पन |
वे वनवासी,
५४
सतत प्रवासी,
तिमिर निवासी, मूढ़ निरे,
काम विलासी वे क्या जानें-
निरे ?
अक्षर-तत्व निगूढ़
निगूढ़ निरे
१.६६
नहीं मानसिक जीवन उनका ;
आध्यात्मिकता वहां कहां ?
भौतिकता-प्रसार फैला है
वन में यहां-वहां
केवल
आज विजित करने उस भौतिक,
दैहिक, शारीरिक बल को, -
राम-लखन वन-गमन कर रहे
सँग ले
आत्म-ज्ञान-दल को ।<noinclude></noinclude>
eci52bzovoywq2koehbdww5zaei2h1q
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२१३
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
५५
उनका,
रहे,
मात्रास्पर्श भाव है
इन्द्रिय-रस में डूब
अपनी ही प्रतिछाया से वे,
डर कर छिन छिन ऊब रहे,
ईति, भीति, आशंका, शंका-
से वे चिर शंकित रहते,
भय-संचार हृदय में उनके,
वे उर में कम्पित रहते;
अभय दान देने को उनको,
सुन्दरि, मैं कटिवद्ध हुआ;
यह सन्देश आज मम सम्मुख
सहसा ही सन्नद्ध हुआ ।
५६
भूख लगी- आखेट कर लिया,
प्यास लगी - जल-पान किया,
कष्ट किसे कहते हैं, यह तो-
चोट लगी, तब जान लिया;
शारीरिक वेदना हुई तो -
रोए, चिल्लाए,
तड़पे ;
प्रतीकार करने को बिगड़े,
कड़के, फड़के, कुछ
झड़पे ;
भय-पूरित,
अज्ञान- पराजित,
सतत विजित जीवन
उनका ;
उनकी ग्रीवा में है
भय का, सतत मृत्यु-गुण का ।
फन्दा-
१९७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२१४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
यह
५७
'तमसो मा ज्योतिर्गमयत्वम्,
-
मृत्योर्मा अमृतं
ले चल,
विद्या से संयुक्त मुझे कर,
अमृत चखा, हे श्रचल अटल ! '
महामन्त्र है यह
हम सब का,
इसे प्रचारित करने को-
प्रिये जा रहा हूँ मैं, इसके-
रव से वन-नभ भरने को ;-
पावन सन्देश हमारा,
सब जगती का क्लेश हरे;
अभय बना दे, अमृत पिला दे,
मृत्यु-भीति
निःशेष
५८
करे ।
'अग्ने नय सुपथा राये' का
अनल-मंत्र
जपते-जपते,
अपथ विजन को सपथ करूँगा
धूनी तपते-तपते;
मैं
१६८
आर्य सभ्यता, आर्य ज्ञान प्रौ'-
आर्यों की संस्कृत वाणी,-
परापरा विद्या -का वैभव,
वेद - भारती
कल्याणी, -
आर्यों की ये सब विभूतियाँ,
वन में प्रसारिता होंगी;
जटिल कुटिल अज्ञान-भावना-
निश्चय पराजिता होगी ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२१५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५ह
-
आर्य सांस्कृतिक विजय पताका
घन वन में फहरायेगी,
देखो तो यह ज्ञान ध्वजा अब
कहां-कहां लहरायेगी;
नग्न ज्ञान-शून्यता
आएगी सु-ज्ञान
पहन कर
भूषा,
नव विचार मणि भरिता होगी-
रिक्त हृदय की मंजूषा
तृतीय सर्ग
भ्रम यवनिका उठेगी, निर्मल-
-
आँखें खुल-खुल
जायेंगी:
पलक उठेगी, दृग कनीनिका-
चकित मुदित हुलसाएगी ।
६०
चकित, चमत्कृत सी दीखेगी-
व्रीड़ा,
प्रकृति वधूटी की
विम्बित होगी अनेकता में
शुद्ध एकता की क्रीड़ा;
ज्ञानोत्फारित, ध्यानोन्मीलित,
स्वप्नोत्थित आँखें जिनकी-
उन वन-जन की हो जायेंगी,
निशा रूप घड़ियां दिन की;
दवि, ऊम्मिले, सोचो, कितने-
सुख का वह शुभ दिन होगा ?
ज्ञान-दान, साधना-पूर्ण- वह,
अतिशय पावन क्षण होगा ।
| दर्शना
१६६<noinclude></noinclude>
qthm5cq1g5vr8xfhj4iculjr45wxlhb
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६१
यह वन-गमन नहीं है, यह तो-
मेरी तीर्थ-यात्रा है,
इस प्रवास में आदर्शों की
चिन्मय सम्पुट मात्रा है;
नग्न चरण, निःसाधन जीवन,
जन-धन-हीन प्रवासी
ज्योति अखण्ड प्रचण्ड
विचरूँगा संयासी
ज्ञान- शिखा, प्रज्वलित प्रनिंगित
दिखलाएगी मुझे दिशा;
वह प्रकाश प्रालोक हरेगा-
वन-जन-हिय की कुहू निशा ।
६२
सकल लोक रंजन, जन-मन के-
सम्मार्जन का कार्य, प्रिये,
इस से कैसे मुख मोड़ें हम,
धर्मोत्प्राणित आर्य, प्रिये ?
२००
मैं,
जगाए
मैं ;
हमें धन्य करना है वन की
वसुधा का कौमार्य्यं, प्रिये,
कितनी दया राम की, उनका-
कितना है औदार्य्य, प्रिये,
राज छोड़, वैरागी बन कर,
भोग छोड़, योगी बन के -
विजय- गमन प्रण ठान चले, बन-
गहन प्रवासी वन-वन के ।<noinclude></noinclude>
jmroazqat63ljxwntj21ythsezxgq5f
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२१७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६३
हम हैं
हम
नव-सन्देश प्रचारक,
नव-शंख-ध्वनि
कारी;
शुद्ध लोक-संग्रह-कारी हम-
नव विधान के अधिकारी;
नवल ज्ञान-विज्ञान वह्नि की,
हम ज्वलन्त ज्वालाएं हैं,
हम दाहक, हम अनल वाहिनी-
विकराला मालाएं
हैं,
तृतीय सर्ग
दीपक-दर्शक, तिमिर - विनाशक,
इन्द्रिय शासक, मुक्त मना, -
ज्ञान धर्म जग
में
फैलाने,
निकलेंगे हम युक्त
मता ।
६४
धर्म-भावना,
ज्ञान- प्रेरणा
सीय-राम पद-रेणु उड़ा कर
हुलस, सुख पायेगी,
पवन
बह वह अटवी में वह जीवन-
का सन्देश सुनाएगी;
अमल-कर्मरति,
जागेगी;
वन की अँधियाली वीथी निज
तिमिर- आवरण
धीरे-धीरे वहां प्रसारित
होगी
बन्धन
सुसंस्कृता भाषा,
टूटेंगे, जागेगी-
विमल मुक्ति की अभिलाषा ।
त्यागेगी;
२०१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२१८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
नाचेगा
६५
धन्य अरण्य निवासी होंगे,
हम होंगे कृतकृत्य, प्रिये,
निविड़ तिमिर में ज्ञान - शिखा का
होगा निर्मल नृत्य,
आलोक निराला,
वन-वीथियां मुदित होंगी,
प्रिये;
अन्धकार पूरित
हृदयों
में
पावक किरण
उदित होगी;
झाड़
और
झंखाड़ कँटीले,
ऊँचे-ऊँचे
भूधर वे-
आलोकित होंगे प्रकाश से
अतल - वितल-से
गह्वर वे ।
६६
सघन निशा, खर-रश्मि- कृशा बन,
होवेगी
प्रातर्वेला,
काली घड़ियां, ऊषा-क्षण बन
दीखेंगी.
२०२
करती खेला;
विपिन वासियों के सोते से
भाव विहंगम चहकेंगे,
हिय-शतदल खिल जायेंगे,
पाटल-दल- सम
मन-
महकेंगे;
मुसकाती, हँसती आएगी
ऊषा निंदियारे वन में
यह सुषमा प्रतिबिम्बित होगी,
राम चरण नख दर्पण में ।<noinclude></noinclude>
jy90c38gamzrvwz0r34z8ek8e2qm01l
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६७
अजग-सजग, जड़, -ग्रजड़, प्रचर, चर
मेरे पग-पग पे,
होंगे
मानव हिय में अभिनव विप्लव
होगा एक एक डग पे;
अँधियाला उजियाला होगा
रात्रि दिवस वन आएगी;
उदित ज्ञान- रवि की किरणें घन-
वन में छन-छन आएंगी;
तृतीय सर्ग
जंगल के अधखुले नयन से
प्रति कृतज्ञता
बरसेगी;
संस्कृति - शून्य हृदय में उस क्षण
अति रसज्ञता सरसेगी ।
६८
वन में, विहँस, अवतरित होगा-
जिस क्षण प्रथम प्रभात, सखी,
जिस क्षण सहसा, छिप जाएगी
घन- तिमिरावत
रात, सखी,
जिस दिन वन के दृग देखेंगे
यह रहस्य अज्ञात, सखी,
जिस क्षण निद्रित वन में होगा
जागृति का उत्पात, सखी;
वह दिन, वह क्षण, वह मुहूर्त, वह-
घटिका स्वर्णमयी होगी;
उस दिन राम-लखन जीवन की-
आकांक्षा विजयी होगी 1
२०३<noinclude></noinclude>
fgrhi2i4vmjui6m2egl9ci5g0niljk1
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२०
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६६
घोर अविद्या को विद्याऽनल-
में सुस्नान कराने को,
ज्वलित वह्नि में लिए जा रहा-
हूँ श्रज्ञान हटाने
सुमुखि, मूढ़तामय खल वल्कल
जल-जल अनल-रूप होगा,
को;
अन्तर तर के रुद्ध भाव का
सुन्दर अमल रूप होगा;
भय- मिश्रित
नैराश्य - भावना
प्रशा
में
परिणत होगी,
भय की छाती प्रभय-वाण से-
विध-विध क्षत-विक्षत होगी ।
७०
रजनी चर, प्रज्ञान भयंकर,
मोह, प्रमाद, विकार बुरे,
क्रोध, काम, हिंसादि, रूप में
विचरें वन मँ दुरे-दुरे,-
२०४
दुबके तिमिरावृत गह्वर में
नहीं रश्मि का लेश जहां,
अप्रकाश, भय, असत् वृत्तियां,
फैला सम्भ्रम, क्लेश वहां;
वसुधा का यह दुख हरने को
में सज्जित हो चला, प्रिये,
तुम्हें तड़पती छोड़, हृदय में-
प्रति लज्जित हो चला, प्रिये ।<noinclude></noinclude>
p08nf2mk5bckdgvp08tvt3kmpfabk6j
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२१
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७१
मानवता की श्रमिक प्रगति ने
सहसा आज छलांग भरी,
एक गिरि-शिखर से दूजे पर
मानों सहसा टांग धरी,
कुछ घड़ियों में शताब्दियों का
विस्तृत पथ तय होवेगा,
प्रयुत योजनों का वह अन्तर
लघु अंगुलिमय होवेगा;
तृतीय सर्ग
देवि, आज का यह यात्रा दिन,
शुभ, विप्लव-संचारी है,
मंगलकारी अविकारी है,
यह क्षण
प्रलयंकारी है ।
७२
निर्मित आज हो रहा है, सखि,
जगती का इतिहास नया,
छिटक रहा है भूमण्डल में
यह उत्क्रमण-विकास नया;
आज फैलने वाला है, सखि,
उन्नत ज्ञान-विलास नया,
क्योंकि बना है वन प्रान्तर में
लक्ष्मण राम निवास
वन- असीम का राज मिल गया,
मिला विपिन आवास
नया:
छुटी संकुचित प्रवध, सुलोचनि,
यह ससीम का त्रास गया ।
नया;
२०५<noinclude></noinclude>
hqep7fuocqhurola7cj0827fkodwda3
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२२
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मिला
७३
इस प्रभात में आदि सृष्टि का,
नव प्रभात-दर्शन होगा :
इस नव जागृति का परिरम्भण,
सुमुखि,
ज्ञान- सचेतनता मय
से हिय-संघर्षण
नई सूझ, इस नई
आकुल संकर्षण
दीख पड़ेगी बलि-बलि जाती
जड़ता पर नव चेतनता ;
मूच्छित सी दिखलाई देगी;
यह
अज्ञान-अचेतनता I
७४
तनिक निहारो नवल सबेरा,
रोमहर्षण होगा;
कम्पन-
होगा,
बूझ का
होगा;
प्रांखों में सपना भर के,
तनिक निहारो उन घड़ियों को,
सब जग को अपना कर के,
२०६
मेरे-तेरे
का
यह मण्डल
लंघित
नव
संदेश वहन
-
आकुंचित
करके,
पावनता
तुम देखोगी जी भर के;
उस तादात्म्य भाव में, स्वामिनि,
दुसह वेदना कहीं नहीं,
विप्रयोग-संयोग रोग की
यह विवेचना नहीं कहीं ।<noinclude></noinclude>
4wcmpy6ltrxu7esq1zsmlfj5zn08x3y
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
७५
प्रथम किरण प्रलोकित क्षण वे,
प्रथम
प्रभात प्रलंकृत
वे,
प्रथम सुहासित, प्रथम सुभाषित,
नव-स्वर-भंकृत वे,
मुखरित
जनरंव पूजित, कलरव कूजित,
गुंजित, रंजित बे घड़ियां, -
जिन के वक्षस्थल से उठतीं
नव-गायन-ध्वनि की कड़ियां
प्रात- समीरण के धागे में,
जागृत-क्षण- मणि की लड़ियां,
खोलेंगी अलसित
चमक चमक
जग जन-गण की आँखड़ियां-
७६
नवल
प्रभात, - धन्य,
युग-
परिवर्तक आदर्शों का सपना,
प्रथम प्रभात - धन्य, फल लाया-
वृद्ध
प्रजापति का तपना;
प्रेरणा निराली-सी,
यादि प्रभात, - धन्य, जगदीश्वर-
की
नित्य प्रभात - धन्य, सविता की
नवल
अवध-प्रभात, - धन्य, ले
राम वन गमन की
विपिन - प्रभात, - धन्य,
किरण मतवाली-सी;
श्राया
घटिका;
आलोकित
होगी ज्ञान-किरण स्फटिका ।
२०७<noinclude></noinclude>
lbxqqewdpznkxww9sc6vxu9mr0ysiom
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
७७
करो रंच अन्तमुर्ख अपनी,
ये अँखियां बड़ियां बड़ियां,
अन्तर तर में तनिक निहारो-
आदि प्रभात मयी घड़ियां;
उस दिन परम
दिव्य अक्षर की
सृष्टि-प्रेरणा जागी थी,
स्वयं जगत्पति ने
अपनी वह
अगुण एकता त्यागी
थी;
उस क्षण शून्य भर गया सहसा
से,
अनेकता-संसृतियों
निर्गुण, स्वयं बँध गया अपनी
इन गुणशीला कृतियों से ।
७८
कालातीत अकाल गर्भ से-
प्रकटा काल अशेष नया,
अखिल शून्य से प्रकट हुआ यह
अन्तरिक्ष
मय देश
नया,
, फिर जग
आई
२०८
सृजन-प्रेरणा
नव प्रभात की वेला में,-
अगणित तत्व चमकने लागे
प्रात की बेला में,
प्रथम
चतुर कलाधर ने अणु-अणु का
गुम्फन कर ब्रह्माण्ड रचा,
तारक- मंडल,
नभ-गंगा मय,
सकल विश्व का काण्ड रचा ।<noinclude></noinclude>
dby0h2ei85kraa61wv6qdq72xu067rx
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७६
चमका सूर्य, सौर मण्डल सब
एक ताल पर थिरक उठा,
भूमण्डल,
ग्राकाश,
खमण्डल
रास-खेल में निरत लुटा,
रवि - उस कवि-पुराण- अनुशासक
की ज्वलन्त
किरणें - प्रणोरणीय
कन्दुक-क्रीड़ा,
भावना
की वे अति उत्सुक पीड़ा;
तृतीय सर्ग
प्रथम बार चमकी थीं ये सब
तब क्या छटा निराली थी,
मानों किसी मत्स्य वेधक की
वह किरणों की जाली थी ।
८०
उस प्रभात मं किरण बलाएँ-
लेती थी सचराचर की,
जैसे माँ फूली फिरती हो
बेटी देख बराबर की ;
नाच रही थी किरणें, नचता-
था जग का व्यापार, प्रिय,
नव-प्रेरणा तरंगित
जैसे
होता हिय-कासार,
पहले-पहल झाँक विटपों ने
देखी जल में परछाई,
उत्सुकता, प्रिय-हिय दर्पण में,
ज्यों निरखे अपनी झाँई ।
प्रिये,
२०६<noinclude></noinclude>
n33w7h4dxrjt6oaui4r4qu0j4epbkg4
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२६
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
८१
प्रथम- प्रात में, देवि, ऊम्मिल,
भीषण गिरि-निर्माण हुआ,
अगम तुरंग शिखरों का, गहरे-
गह्वर का कल्याण हुआ,
शैल-शृंखलायें
कल-जल से
ऐसे आविर्भूत हुई
ज्यों प्रति मथित भाण्ड से अभिनव
तत्व - राशि
खड़ी खड़ी
उद्भूत
वन्दना कर रही
हैं गिरि-मालाएँ तब से,
सखि, देखो तो, अलख झलक को-
जगा रही हैं ये कब से ।
८२
प्रथम- प्रभात क्षणों में, सुन्दरि,
हुआ प्रपूर्ण उदधि-संचय,
घिर-घिर कर यों जुट आया जल
ज्यों माँ की छाती में, पय;
२१०
हुई,
प्रथम लहर उस दिन जब उट्ठी
तब अद्भुत उद्घोष हुआ,
मानों बद्ध पूर्णता के हिय-
मध्य. मुक्ति - श्राक्रोश
हुआ;
प्रथम सबेरे के दिन
कुछ
लहर,
प्रातुर-सी दौड़ पड़ीं;
मानों सीमा तथा असीमा
कुछ होड़ा-होड़ पड़ी ।<noinclude></noinclude>
a5tmep5ayhqhujm13kmtw8tx2tc9f92
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२७
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>धधकते
८३
ज्वालामुखी
उस
भड़के
प्रभात में भूतल से,
संचित आग उठा लाए वे,
पृथ्वी के वक्षस्थल से,
आदि प्रजापति की तप ज्वाला
की प्रज्वलित निशानी वे,
सौम्य प्रात की प्रति करालता
की संकलित चिन्हानी वे,
तृतीय सगं
सुन्दरि, यह सत्यता अनूठी-
विकराला है:
जीवन-जल है,
ज्वाला है ।
है, ध्रुव है,
जिस पृथ्वी पर
उसके हिय में
६४
प्रथम प्रभात क्षणों में, स्वामिनि,
फिर प्रजनन के भाव जगे,
अथवा जड़ता की छाती में
चेतनता के घाव
हुई;
जड़ में हुआ अंकुरित चेतन,
प्रस्फुटिता नव-शक्ति हुई,
स्वर-प्रणोदना से जड़ता में-
सजग भाव-अभिव्यक्ति
जल-कल-कल में जीवन खल-बल
का चंचल संचार हुआ,
वा सम्यक रूपेण सरण-कृत
ऐसा यह संसार हुआ ?
लगे,
२११<noinclude></noinclude>
lnmu6lv1motjkhzsap34n2nbwfduwon
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२८
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
८५
स्त्रजन-जनन- श्रम- कण हरने को
कल-कल करता वहा सलिल;
उस प्रभात में सचराचर को
व्यजन डुलाने लगा अनिल
डग-मग पग धरती सी डरती
कुछ-कुछ सिहर सिहर बहती,
देवि, प्रभाती हवा चली थी-
जग को सृष्टि कथा कहती।
अनिल, सलिल, जीवन-धारा सब
जगती तल
बह आए
अथवा होने
पे;
लगी दान की
T
वर्षा नित
भूमण्डल पे ।
८६
उस प्रभात में, वृक्ष उगे, वा-
जग निद्रा उद्ग्रीव
हुई,
कर,
दुम-दल फूटे सिहर - सिहर
ज्यों गत पीर सजीव हुई;
२१२
चम्पा, जुही, और चम्बेली
अलबेली सी महक उठीं
मानों कोई मुग्धा, यौवन,
में स्तम्भित हो, बहुक उठी;
प्रथम बार कलियों ने श्राखें
सृष्टि देखने को खोली;
.
चतुर पारखी नें ज्यों दृग से
निज चिन्तामणि- निधि तौली ।<noinclude></noinclude>
ruq7bm7hw0n4e5fcp8gtcq5e3jiu9hc
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>फड़के
८७
उस प्रभात में प्रथम प्रथम ही
पंख, विहग चहके,
बही
विभास-गान - स्वर - धारा
भूमण्डल में रह रह
के,
चेतनता
उड्डीयमान
हो
फहराई
नीलाम्बर
में,
मानों
चुम्बित
वेणु-तरंगें
लहराई
मानस सर
तृतीय सर्ग
में;
निर्मल जल छल-छल-छल-छल कर ध्वनि
छलका सब दिङ मंडल में,
मूक लूक मय मौन मरुस्थल,
ध्वनि-जल-
-सिक्त हुआ पल में ।
55
कुसुम-दलों पर झलक उठे, वे
ओस-विन्दु
न्यारे-न्यारे,
ग्रमल कपोलों पर ज्यों झलकें
अश्रु-बिन्दु
नवल जीवनोल्लसित क्षणों के
वे आँसू श्रानन्द भरे,
प्रकृति- बधूटी की मन्थन - रति
के वे श्रम-कण बिन्दु खरे ।
उन में इकरंगी किरणों की
दीखी सात-सात झाँई;
उस प्रभात में यह अनेकता
गुंथी एकता में आई
प्यारे-प्यारे;
: २१३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
दह
कुसुम खिले, मकरन्द रिले, द्विज-
वृन्द मिले, द्रुम- शिखर हिले,
प्रथम प्रभात क्षणों में फैली
चेतनता, मम
नवोम्मिले ;
निखर चले, जड़ता से विरहित
हो कर जीवन-भाव, प्रिये,
अपरा परा प्रकृति का न्यारा-
न्यारा हुआ स्वभाव, प्रिये !
चेतन - लीन
हुई;
एक अचेतनता में उलझी,
दूजी
जड़-चेतन, दोनों विराट् की
सेवा में तल्लीन हुई ।
जागे द्विपद,
१०
चतुष्पद जागे,
बौराने से जल-थल में,
हुआ प्राण-निर्माण अनोखा
जड़ता के इस बल्कल में;
२१४
पल-पल में, जल-थल में लहरें
हुईं तरंगित प्राणों की,
प्रकृति अतिथि सेवा करने लग-
गई, नये मेहमानों की;
प्रजनन, सतत आत्म-संरक्षण,
हुए स्वभाव-सिद्ध गुण ये,
उस प्रभात में गुण-बन्धन में
फँसे ईश चिर-निर्गुण वे
15<noinclude></noinclude>
8dsc7k2ru3wvou8ad577hheb0i0rz4e
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६१
मानवता उत्क्रान्त हो उठी
विकसित निपट प्रफुल्लित -सी,
थकित अलस आँखें खुल प्राई
ज्यों कलिकाएँ मुकुलित-सी ;
विस्फारित, भय व्यथित, सम्भ्रमित
चकित नयन ने जग देखा,-
वनथल पर अंकित थी, प्रमदे,
चतुष्पदों
की पग - रेखा;
तृतीय सगं
बीहड़ विपिन, निबिड़ तम पूरित,
जन-गण का आवास हुआ,
गिरि - गहू वर में, द्रुम शाखा पर,
उनका आदि-निवास हुआ ।
६२
शब्द- दीनता
प्रोठों
पर थी,
कर्णों में अभिव्यक्ति व्यथा;
सजनि, अबोली अलिखित ही रह-
गई सृष्टि की आदि कथा;
क्रमिक प्रगति से
जन-समूह में
भाषा का
संचार
हुआ,
कँपते-कँपते
तुतलाते
से,
शब्दों का
विस्तार
हुआ;
काल बनें, संज्ञा बन आई,
क्रिया बनी, अभिधान बने,
नाम विशेषण, क्रिया-विशेषण
के ये सब सन्धान बने ।
२१५<noinclude></noinclude>
cxzwy9a6wsjmj4gm914kw17jsf0brqc
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६३
निमिष- मुहूर्त्त - विपल-घटिका-दिन,-
मास-
-वर्ष -निर्माण
हुआ,
अथवा सकल विश्व मंडल की
क्रमिक प्रगति का ज्ञान हुआ;
भूत-भविष्य विभाजित करता
वर्तमान आया छिन में,
एक काल के तीन रूप हो-
गए, ध्यान-मय उस दिन में;
ऋतु-सज्जित यह वर्ष हो गया,
दिवस हुआ यह घटिका-मय;
किंवा मानवता के हिय में
कुछ-कुछ हुआ ज्ञान-संचय ।
६४
उस प्रभात में मानव-हिय में
ज्ञान-प्रणोदन हुआ
ज्यों सूने
करुणा- रोदन
२१६
स्वयं,
मन- दिङ मंडल में
हुआ स्वयं ;
क्यों ? क्या ? कैसे ? के प्रश्नों से,
हृदय विकम्पित, व्यथित हुआ;
अन्वेषण- प्रेरणा
मथानी
से अन्तरतर- मथित हुआ;
कहाँ? मैं कहाँ ? अरे, तू कहाँ ?
मैं हूँ कौन ? और तू क्या ?
यों
अकुला कर मानव बोला,
ठोकर खा, जब वह चूका ।<noinclude></noinclude>
ola0kw1ye6hpkxvp3sb50g5rvuy6la9
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
६५
यदि प्रभात काल
मधुर
ये हैं
वर्तमान
ये हैं
क्रीड़ा के
संस्मरण-से,
विज्ञान - प्रगति
के
विगत अधिकरण-से,
मेरी स्वामिनि, प्रथम प्रात का
ऋण हम सब के ऊपर है,
उस ऋण का सम्पूत्ति कार्य यह
देवि, कठिन है, दुस्तर है:
यह
विद्या - विज्ञान प्रगति ऋण
व्याज सहित चुकता करने, -
राम लखन बन जाते हैं, ऋण-
की पाई-पाई
६६
भरने ।
वन में प्रथम प्रभात-क्षणों की-
छवि का आकर्षण होगा,
उसी प्रथम प्रातर्वेला का
कुछ-कुछ शुभ दर्शन होगा;
वन में नव आदर्शोत्प्राणित
लखन राम-लीला
होगी,
अथवा
-
प्रथम प्रभात प्रेरणा
-
फिर से
गतिशीला होगी;
वैसे ही विस्फारित होंगी-
वन-जन की प्राखें चकिता,
जैसे प्रथम-किरण-वेला
चमकीं थीं थकिता थकिता ।
में
२१७<noinclude></noinclude>
pkmelk410qca43lbuccy3z5aydey453
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६७
ह कल्याणि, मुझे साहस दो,
बल दो, दृढ़ता दान करो,
म्झ, तव नयन-तरंगिणि-वाहित-
लक्ष्मण का, कुछ त्राण करो,
ह विदेह नन्दिनी, हृदय में-
भर दो,
वैदेही- निष्ठा
मत अकुलाओ, हॅस मुसका कर
मुझको आज विदा कर दो;
तुम्हीं बता दो, समझाऊँ क्या
कह कर तुम को, प्राण-प्रिये,
सदा तुम्हारी शुद्ध बुद्धि का
मुझको है अभिमान, प्रिये !
विष- पीयूष मिले हैं
जीवन-
मधु में एक संग,
रानी,
सुधा-पात्र से भी है छलका
करता गरल रंग, रानी,
जीवन-धारण से जागी यह-
आत्मार्पण- उमंग,
रानी,
विष से अमिय-गन्ध, मधु-रस से
विष-तरंग, रानी;
उठती
स्वर-तरंग में करुण हूक है,
२१८
मिला रुदन
में गायन-स्वन,
गुंथा हुआ है
मरण-भाव में,
हे सुकुमारि,
अमर जीवन ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>हε
यह संयोग-सुधा, अंजलि भर
मैंने, प्रिये, खूब पी है,
आँखों में, हिय में, रग-रग में,
यह मधु मस्ती भर ली है;
छलावाদশ
सुधा मधुर, हाला की मस्ती-
में, यह विष प्याला आया,
दैवयोग
विषमय
अपने
हाथों से
तृतीय सर्ग
गुल्लाला लाया;
तुम्हीं कहो ? क्या प्राँखें मीचे
बैठ रहूँ मैं विना पिये ?
होवेगा · बदनाम तुम्हारी-
मधुशाला का नाम, प्रिये !
१००
तुम रस दात्री, मैं मधुपायी,
तुम प्याली, में मतवाला,
मैं मंदिरा, तुम पात्र मनोहर,
मैं गाहक, तुम मधुशाला;
खूब पिलाया मधुरस त ने
श्रो मेरी
रानी,
वरदे;
कर दे
तू
दानिनि, मत हठ कर तू, ले प्रा,
आज गरल यह भर-भर दे;
उत्प्राणित मुझको,
मेरी झिझक, अरी, हर दे,
अये, मत उठा, गरल भरे ये-
प्याले, तू सम्मुख धर दे ।
२१६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१०१
हार कहाँ ? हिय-भार कहाँ ? हिय-
में मनुहार यहाँ छाई,.
मेरी रानी, विमल ऊम्मिले,
यह घटिका विष ले आई,
मौन सैन से, सरस बैन से,
मंदिर नैन से, कह दो यह, -
कि तुम चढ़ा जाओ ये प्याले,
मत झिझको अब यों रह-रह,
गहर गरल की लहर उठ रही,
उतराने दो अब बह-बह,
कर लेने दो, स्वामिनि मुझको,
गरल-पान यह सुबह-सुबह ।
१०२
गरलमयी तुम, सुधामयी तुम,
तुम मेरी मदिरा-वाला,
अभय-दान देती, मदमाती,
मुझको कर दो मतवाला;
२२०
आज विश्व देखे कि ऊम्मिला-
मधु-लोभी, यह मस्त लखन,
किस मस्ती से गरल-पान कर
झुम रहा अम्लान वदन,
आज तुम्हारी मधु-शाला का
यह अनिशि पीने
मृत्यु-पान कर हो
आज अमर जीने
वाला,
जायेगा
वाला ।
ালনদশ<noinclude></noinclude>
jri3oft2gz63sl3kn7l30tm0saa4l3e
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०३
जिन ओठों ने, सजनि, तुम्हारे
अधरामृत का पान किया,
जिन ओठों को तुमने
}
वरदे,
सतत अमिय-रस-दान दिया,
उन ओठों के लिए श्राज हैं-
प्राए गरल भरे
प्याले,
आज पड़ गया हूँ में, सुन्दरि,
तृतीय सर्ग
कालकूट विष
के
पाले,
दे दो तुम वरदान कि में कर-
जाऊँ पान वियोग-गरल,
चुपके-चुपके पी जाने दो,
यह विषाद-मय गरल तरल ।
१०४
व्यथा - शून्य में नहीं, नहीं है-
मेरा हिय यह अचल उपल,
मत समझो कि नहीं
प्रिये, बुलबुले
सरवर हूँ मैं वह कि भरा है
जिस में अमल ऊम्मिला जल,
जल में वह हूँ जिस में होती
रहती पल-पल में
हलचल हूँ वह जो मँडराती
रहती अन्तर म चंचल,
चंचल अन्तस्तल मैं हूँ वह
जो बाहर है अचल-अटल ।
हलचल ;
उठते हैं,
उबल - उबल,
२२१
लक्षण
अत्रित्रिण<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१०५
ண்களிட
तुम सी वस्तु छोड़ना है इन
प्राणों- की ठण्डी फाँसी,
फाँसी ऐसी, लगी रहेगी-
बरसों
तक जिसकी
गाँसी;
गाँसी वह,
जिस से
घुट-घुट कर
भी न टूटने
पाए. दम,
दम वह, जो सहने
को उद्यत -
है
वियोग- वेदना
चरम;
प्राणों में तड़पन होती है,
अकुलाता है, प्रिये, हृदय,
किन्तु क्या करूँ, खड़ा सामने
यह कर्त्तव्य निठुर, निर्दय ।
१०६
जब कुछ उथल-पुथल होती है,
जब कि खलबली मचती है,
जब मानवता करवट लेती
नव-नव रचना
२२२
रचती है, -
परिपाटी की भीम शिलाओं-
को जब खण्ड-खण्ड करके,
नव-विचार बह-बह आता है
अपना चंड रूप धर के;
जब प्रेरणा-मेरु-गिरि से है
होता मथित समुद्र- हृदय, -
तब संक्रान्ति, क्रान्ति, के क्षण की-
पीड़ा होती है निश्चय 1<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०७
जाना, -
एक विचार- काल को करके-
क्रमित, दूसरे में
यों ही बड़ा व्यथा-मय होता-
है परिवर्तन का आना,-
फिर क्या कहना विप्लवकारी का?
वह तो है मूर्त-व्यथा
बड़ी अबोली, बड़ी ठठोली-
मय है उसकी स्फूर्ति-कथा;
तृतीय सर्ग
अंधकार में नव प्रकाश को
छिटकता वह मस्ताना,
अपनी धुन का धुनी, घूमता-
धरे प्रचारक का वाना 1
१०८
उसी पुण्य संक्रान्ति काल की
घटिका आई आज, प्रिये,
इसीलिए मिल गया हमें यह
विस्तृत विपिन - स्वराज, प्रिये,
हम सन्यासी,
विपिन प्रवासी,
नव सन्देश
प्रचारक हम,
मन-भय हारी, मंगलकारी,
सब जन-गण-उद्धारक
है विचलित भावना यहाँ, हम-
क्यों न नियंत्रित करें उसे ?
व्यथा बुलाती हमको, हम भी
क्यों न निमन्त्रित करें उसे ?
हम;
२२३<noinclude></noinclude>
trx6wlm2xc5m1k55ekdyqlsa2tp8fk4
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1/27-29h
ऊम्मिला
१०६
वेदना,
दुस्सह व्यथा, असह्य
अमित कष्ट संगी अपने,
सीता-राम-लखन जाते हैं
वन में जीवन- तप
देने
हाय, न खींचो तड़पा
वाली आहें, रह-रह के,
तपने,
तनिक बँधाओ मुझको ढाढस
तुम दृढ़ता से यों कह के-
'जीवन एक
पहेली बन कर
आया
है,
इसको बूझो,
सावधान, यह है समरस्थल,
प्रिय, मत हिचको, तुम जूझो ।'
११०
बस, इतना ही कहो, सलौनी,
फिर मैं सब कुछ कर लूँगा,
फिर तो वन का घोर तिमिर दुख
मैं क्षण भर में हर लूंगा;
२२४
मुझे और कुछ नहीं चाहिए,
में हूँ एक सुभट प्रहरी,
बस मुझ को दे दो तुम अपनी
स्मिति रेखा
•
यह अश्रु-भरी;
प्रभु-भरी आँखों में
भर के,
कुछ सपना - सा, मुसका दो,
मुझको, प्रिये, आज तुम, हाँ, कुछ,
प्रेरित कर दो, उकसा दो 1.<noinclude></noinclude>
991u7urs50virc690xrtfwxj81dsnut
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१११
तुम क्या जानो देवि, तुम्हारी-
"हाँ-हाँ" में कितना बल है ?
तुम क्या जानों कि इस तुम्हारी-
स्वीकृति में कितनी कल है ?
है समर्थ तव भ्रू
विश्व समग्र
-
- विलास यह
नचाने
तव दृक-पात समर्थ सदा है।
विद्रोह मचाने में
•
नव
तृतीय सर्ग
तुम हो प्रकृति रूपिणी देवी-
तुम हो यदि शक्ति-प्रतिमा-
त्वमसि मदीया चिर-प्रेरणा-
त्यहि मदीय भक्ति- प्रतिमा ।
११२
तुम मेरा
साहस, बल, वैभव,
तुम मम
तुम मम
नव
हास - विलास, प्रिये,
नेह-सरणि, तुम मेरा-
सन्देशोल्लास - प्रिये,
तुम मम व्यथा-कथा, तुम मेरी-
निवासिनी अंतस्तल की,
तुम अन्तर्यामिनि, स्वामिनि तुम
हो इस लक्ष्मण निश्चल की;
तुम जानो हो, सब कुछ बातें
देवि, लखन अन्तर-तर की
सभी भावनाएं जानो हो
तुम मेरे जीवन भर की ।
२२५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
११३
बस तुम और सुमित्रा माता,
दोनों मुझ को जानो हो,
हिय की सकल प्रेरणाएँ तुम
दोनों ही पहचानो हो,
और कौन इस त्रेता युग में
है जो मुझको जान सके ?
और कौन है जो मुझ को कुछ
समझ सके, पहचान सके ?
तुम दोनों ही
मेरे
सारे
भेद-भरम को समझो
हो,
सास-बहू तुम
दोनों
मेरे
धरम-करम को समझो हो ।
११४
मेरी तपस्विनी जननी की-
तुम हो करुण
छटा, रानी,
मैंने तुम मँ देखी माँ की
अरुण तपस्या, कल्याणी !
२२६
मेरी माता की करुणा का
तुम हो मूर्त स्वरूप, प्रिये,
उनके जीवन की अनबोली
तुम हो व्यथा अनूप, प्रिये,
तुम दोनों पर त्रेता युग का
"सव नारीत्व निछावर है,
तुम दोनों के चरण-नखों से
उजागर है ।
तप भावना<noinclude></noinclude>
p6d7o41pa6abqb695wnzl2f9lncfe9q
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४३
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
११५
तुम,
परम सहानुभूति रूपा
चरम, विषम वेदना-मयी,
तुम हो बलिवेदी की उठती-
शिखा, परम पावना, नयी,
आत्माहुति का यह
क्षण प्राया
है अपना खप्पर लेकर,
कर लेने दो इसका स्वागत
मुझको निज जीवन देकर;
यह है अग्नि परीक्षा, रानी,
बलि-दीक्षा दो तुम्हीं मुझे,
"स्वाहा " कहने के पहले ही,
देखो, कहीं न अग्नि बुझे ।
११६
आज श्रात्म-लय की तन्मयता,
की, यह ज्ञान-तरंग उठी-
मेरे सात स्वरों में जागृति, -
की
यह नवल उमंग उठी,
मेरी वीणा ग्राज
मिला दो,
आओ, देवि, उसी
स्वर में;
इसकी ये खूंटियाँ खीच दो,
तारतम्य
"बाँधो,
मेरी रानी तनिक मिला दो-
मेरे स्वर में स्वर अपना,
मेरे स्वर को आज
ठहर-ठहर थर-थर
सिखा दो
परमे;
कँपना ।
२२७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
११७
देवि, मधुर वीणा का निक्वण
मम अन्तरतर में भर दो
हिय-मन्थन-शीला
सकल चराचर में
स्वर - पीड़ा
भर दो,
छन्द-हीन,
गतिहीन, बेसुरा,
ताल रहित जीवन जग का-
ज्ञान नहीं है स्वर का, लय का,
छुटा ध्यान स नि ध प म ग का,
तुम स्वर-लय-यति-गति-रति- रम्ये,
कम्पित कर दो स्वर-लहरी,
आज वहा दो स्वर-रस-धारा
कुछ गहरी, कुछ-कुछ ठहरी ।
११८
आज आत्म-लय का अगेय गीत गाऊँगा में
परम आनन्द कन्द अन्तहीन स्वर में,
-
उमँग उमँग पूर्ण प्रेम भर लाऊँगा मैं
-
प्रवरोहण - लहर में,
उमड़ उठेगी
प्राण - आरोहण
स्वर - तरंगिणी
रसधार
घहर-घहर भर जायगी अम्बर में,
रस-स्रोत, श्रोत-प्रोत करेगा ब्रह्माण्ड सब
तान गूंज जायगी प्रखण्ड चराचर में,
तुम मेरी मानिनी, दानिनी, रानी, करो मुझे
कृतकृत्य जीवन के प्रथम
विस्मारक नाद की अनन्त गान - लहरियाँ
प्रहर में,
तरंगित हुई, देवि, मम मानसर में ।
२२८<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११६
स्त्रष्टि प्रेरणा के तीव्र, मन्थन-विषाद भरे
तृतीय सर्ग
झल-झल झलके हैं तारे नभ-सर में,
अखिल ब्रह्माण्ड का दुरूह चक्रव्यूह भेद
कर गूंजती है गायन-ध्वनि प्रान्तर में,
सूर्य-चन्द्र-ग्रह- सौर मण्डल - श्राकाशगंगा-
मन-मणि सम गुँथे गान-प्राण-हर में,
घूम-घूम झूम-झूम नृत्य करता है विश्व,
विश्व रूप, शक्ति बीज ब्रह्म के अधर में;
अवध नची है, दशरथ नृप नाच रहे,
कैकेयी नाचती पड़ी ज्ञान के चक्कर में,
इस क्षण केवल श्रीराम शान्त, स्थिर बुद्धि,
विचरण कर रहे हैं प्रासाद
१२०
एकोऽहं यद्यपि बहु रूप हो गया मैं यह-
भर में ।
ध्वनि उठती हैं इस सृष्टि के भँवर में,
विश्व-नियमों की क्षुद्र घंटिका खनकती है।
नियति की कटि में चरण में, सुकर में,
क्रान्ति - उत्क्रमण - सुविकास - नाश- पाश-बद्ध
जूझता है जग लीलामय के समर में,
एक सूत्र, एक लय, एक तान, एक गान
एक ध्यान, भेद कहाँ पर में ? अपर में ?
वन-वासी अवध-निवासी के ये भेदभाव
दूर हुए, भेद नहीं
जंगल में, घर में,
द्वैत भाव मिट रहा, दूर हो रहा है भेद
शीतल छाया में, रवि किरण प्रखर में ।
२२ε<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१२१
एक महाकाल के अनेक क्षण खण्ड रूप
भेद-भाव युत फैल रहे जग
दिन, रात, प्रहर, मुहूर्त, क्षण, घटिकादि,
भर में,
सब का निलय महाकाल के उदर में,
स्वयं विकराल महाकाल दीन भाव धरे
लीन हो जाता है श्री अकाल के अन्तर में,
उस क्षण तन्मयता सिन्धु लहराता आके
भेद भाव मिट जाता क्षर में, अक्षर में,
यही आत्म लय का अगेय गीत गाने दो, री-
परम आनन्द कन्द अनहद स्वर में,
उमँग उमँग पूर्ण नेह भर ले आने दो-
प्राण श्रारोहण श्रवरोहण - लहर में ।”
१२२
यों कह, उनका
करते लक्ष्मण
अथवा हृदय-निगूढ़
चुम्बन करते
मौन हुए,
भाव सब
कुछ मुखरित, कुछ गौण हुए,
२३०
एक
बार दोनों ने दोनों
को देखा
पैठ
गए
नयन
प्राँखें भर के,
ऊम्मिला-हृदय में
ऊम्मिला श्रीवर के,
एक दूसरे पर बलि जाते,
हृदय ग्रन्थियाँ खोले-से-
कुछ क्षण तक तो यों ही दोनों,
बैठ रहे अनबोले-से ।<noinclude></noinclude>
gcmlrfbsqdk3q21jo930ysfic4qcobp
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४७
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
१२३
हुए स्फुरित कुछ ऊर्मिला-अधर
फिर कुछ कण्ठ निरुद्ध हुआ,
फिर, हठ करते हिय का प्राकुल
अभिव्यंजन हतबुद्ध हुश्रा,
कुछ अटके, कुछ भटके, ठिठके,
वचन लाज-लटकीले वे,
अन्तरंतर में पैठ रहे अति-
अरुण, करुण, चटकीले वे;
कथा শपে
थके शब्द, रस-गोपनीयता-
से
झगड़ा
" करते-करते,
फिर मुखरित हो उठे छबीले
वे कुछ-कुछ डरते-डरते ;
१२४
"मेरे प्राण, त्राण की तुम से,
नहीं माँगती मैं भिक्षा,
मुझे याद है, देव, तुम्हारी
स्पर्श - तितिक्षा
की
यादर लाड़ प्यार, जीवन में--
इतना तुम ने मुझे दिया,
चिर अनुरक्ति-सुधा रस में ने
अंजलि भर-भर अमित पिया;
लखन- प्रिया बन
श्री विदेह की
देव, तुम्हारे श्री
बैठ हुई हूँ
अमर हुई हूँ |স
कन्या में
चरणों में-
धन्या
मैं,
शिक्षा;
|
२३१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४८
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१२५
देव, तुम्हारे शुभ दर्शन से
मेरा जीवन धन्य हुआ,
श्री चरणों में आत्म-निवेदन
मेरा विनत, अनन्य हुआ,
तुम मेरी शुद्धा निष्ठा, प्रिय,
तुम मेरी परमागति
हो,
तुम मम ज्ञान राशि तुम मेरी-
पावन परब्रह्म- रति हो,
तुम मेरे संचित प्रसाद हो-
जीवन- किसलय- सम्पुट के,
बड़े जतन से तुम्हें पा सकी
हूँ, हे प्राण, स्वयम् लुट के ।
१२६
तुम मेरे यौवन- निशीथ की-
दीप- शिखा
हो इठलाती,
एकाकिनी यात्रिणी की तुम,
हो श्रालोकमयी बाती,
२३२
तुम हो मेरे सुभग सबेरे,
मेरे बालातप तुम हो,
जप तुम हो, तप तुम हो, अव्यय-
मम अश्वत्थ विटप तुम हो,
तुम मेरे प्रज्वलित हुताशन-
अधिष्ठान आत्माहुति
के,
तुम हो चिर प्रकाश दाता, प्रिय,
मेरे जीवन की द्युति के |<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२४९
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२७
तुम मम अर्चन, वन्दन, पूजन,
ज्ञान, ध्यान के हो स्वामी,
अनुगामिनी तुम्हारी मैं तुम
मेरे अभय अग्रगामी,
कितने नेह-निगूढ़ तत्व ये
आत्म-रमण-रीतियाँ
देव,
कई,
नई;
तुम ने मम हृद्गत की हैं, है-
सुरत- रीतियाँ
तुम मेरे गुरुदेव
तृतीय सर्ग
पुरातन,
सतत सनातन रूप प्रभो,
तुम हो मेरी प्राण-प्रतिष्ठा
तुम मम मूर्ति अनूप, प्रभो !
१२८
तुम
मेरी
के श्रादर्श
जीवन-कुरंगिणी -
शिकारी हो,
हे प्रिय, तुम
मेरे जीवन के
धनुधारी हो,
बड़े चतुर
मेरी चपल अहंता की यह-
मृगी हुई कब की घायल,
प्रिय, मैं तो हो चुकी कभी की
तव धनु वाणों की कायल;
समय नहीं है कि मैं दिखाऊँ
नीके तीखे बाणों को,
आज समय ही नहीं, बताऊँ-
उन सब शर-सन्धानों को ।
२३३<noinclude></noinclude>
2m4unaikziunz3sljr3m2eh0o5qfeyq
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५०
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१२६
तुम मम कृति-पति, पति-पति रति-पति,
तुम मम चिर अविकारी हो,
तुम मम प्रकृत कला कौशल, तुम-
नवल भाव संचारी हो,
तुम मेरी तूलिका, सुकठिनी,
तुम मेरी छबि, तुम कविता,
तुम हो मेरे अमल चन्द्रमा,
तुम मम जीवन- नभ- सविता ;
तुम हो मेरी प्रेम-पूर्णता,
तुम मेरी आध्यात्मिकता,
तुम मेरे आराध्य देव हो-
तुम हो मेरी तात्विकता !
१३०
"
-
मेरे जन्म जन्म के तुम प्रभु,
मैं तव
चरणों की दासी,
तुम मेरे
मेरे
चिर-नेह भिखारी,
हृदय- दश-वासी,
मेरे द्वारे अलख जगाते-
तुम शिव शंकर रूप बने,
मेरा अहं-भाव-विष पीते-
तुम प्रलयंकर रूप
बने;
खूब लिया संदेशवहन का
अतुल भार अपने शिर यह,
खब किया जो प्राज कर लिया
निज-जीवन-पथ सुस्थिर यह ।
२३४<noinclude></noinclude>
46hz5q5g58dbfevh644fgi4mebcc2x6
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५१
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३१
प्रथम प्रात का ऋण भुगताने
को अब विपिन-गमन होगा,
वन जग मग आलोकित होगा
चिर
अज्ञान- दमन होगा,
विजन-गमन मिस जन-गण-संग्रह
का संदेश - बहन
होगा,
अथवा किसी ऊम्मिला का सुख-
उपवन-देश-दहन
होगा;
तृतीय सर्ग
आग लगा, सुख-बाग जलाए-
राग-सुहाग
लुटाते - से,
मेरे प्रिय,
तुम विपिन पधारो,
ममता-मोह
छुटाते से 1
१३२
मेरी करुणामयी
सुमित्रा -
माँ
रोएँगी, रोने
दो,
श्रो मेरे आखेटक, अपने-
ही मन की तुम होने दो,
मैं ? में इन अपनी आँखों को
फोडूंगी, यदि
देखूँगी कि कहीं न
पथ की बाधाएँ
तुम जाओ, सुखेन जानो; हम-
दोनों की कुछ बात नहीं,
हमें चलित कर दे, यह चौदह
वर्षों की न बिसात कहीं ।
ये रोवें, करू
तुम्हारे
होवें;
२३५<noinclude></noinclude>
610xnv3w9f82laf25poo4a9m4c7uz3y
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१३३
हम नारी हैं चिरप्रतीक्षिका,
हम हैं चिर परीक्षिताएं,
चिर वियोग यज्ञाहुति से हम
सन्तत
निमृत कुटी की द्वार-देहली
पर चिर नेह-प्रदीप धरे, -
युग-युग लौं उकसाती
हैं हम
बाती,
चौदह बरस ? नहीं प्रिय चाहो-
यदि, चौदह युग लौं जाओ,
खूब करो उद्धार विश्व का,
रहती
हरे, हरे;
दीक्षिताएं,
ज्ञान- रश्मियां
फैलाओ ।
१३४
मैं नारी हूं, देव, बनी हूं
मयी,
मैं नित संग्रह भाव
अपनी निधियों के प्रति मैं हूँ
कुछ-कुछ कृपण स्वभावमयी,
नवीनता
२३६ चत्रि
में गृह भी हूँ, गृह-स्वामिनि-
हूं, घर की रखवालिन
मैं हूँ अपने घर की रानी
निज उपवन की मालिन हूं,
मैं बखला उठती हूँ, प्रिय, यदि
कोई मेरी वस्तु छुए,
वे हैं मेरे शत्रु कि जो मम
उपवन-नाश-प्रवृत्त
हुए ।<noinclude></noinclude>
i37g7oqvc8fltd79avburcf5qbwta26
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३५
यह कैकेयी कौन, कि जो श्री-
राम चन्द्र को भेजे वन ?
यह कैकेयी कौन ?
जो सीता का सुखद सदन ?
उजाड़े
यह कैकेयी कौन ? ऊम्मिला का
उपवन जो करे दहन ?
कैकेयी ? लूट ल
सुमित्रा
माता की गोदी का धन ?
तृतीय सर्ग
derp.
आर्यपुत्र, मैं ? मैं कुछ भी तो
समझ न पाई ये
कर्त्तव
कोसल जनपद में यह विप्लव
हुआ कहो क्यों ? कैसे ? कब ?
१३६
सब जन हुए आज पागल ? या-
मैं ही हूँ बौरानी-सी ?
क्या में ही यों सोच रही हूँ
नादानी-सी ?
मूर्तिमती
यह अन्धेर ? प्रचण्ड मौर्य का
यह निष्ठुर आदेश, प्रभो,-
तुम भी धर्म, धर्म कहते हो
इसको हे प्राणेश,
प्रभो,
आग लगे इस
धर्म-क्रान्ति में
जो बुद्धि का
है कैसा यह धर्म
गण के हृदय
विनाश करे,
कि जो जन-
निराश
करे?
२३७<noinclude></noinclude>
4yjk1c9i5a8wgdafiul6sb7yat0kyqx
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>kump
ল
ऊम्मिला
होंगी
१३७
सुनती हूँ कि नृपति दशरथ का
है कोई प्रदत्त
जिसके कारण प्रार्य
श्रीलक्ष्मण होंगे
श्रीरामानुगामिनी
सीता जीजी, जानूँ हूँ,-
अपनी तेजस्विनी बहिन को
बचपन से
यह प्रतिपाल वचन का क्या है ?
यह वर है क्या बला, कहो ?
धर्म-कर्म है कहाँ ? किधर है-
निष्ठा इस में भला, कहो ?
१३८
पहिचानूं हूँ,
यह है सब पाखण्ड, प्राणप्रिय,
बुद्धि दोष का यह व्यापार, -
जिस के वश नरपति ने खोया
यह समस्त सद्भाव, विचार;
धर्म,
परिमित है, निःसीम नहीं है-
वचन - प्रतिपालन का,
रखना पड़ता है विचार भी
जन समाज परिचालन
वचन
का,
वह वर,
राम, श्र
वनचर;
पालने में होता है
पूर्ण विचार हितामृत का, -
देश, काल, पात्रता, परिस्थिति,
धार्मिक भाव, नृतानृत का ।
२३८<noinclude></noinclude>
i78n061xgsx3spg2gkgldsh9m80hgr7
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
१३६
वरंब्रूहि कह देना भी क्या
कोई सहज ठठोली है ?
वर दें भिखमंगे वामन थे ?
जिनके कांधे झोली है ?
7
वर देना है काम
उसी का
जो प्रभु अन्तर्यामी है.-
सर्व-शक्ति जिसके एकांशस्थित
निष्कामी है |
है, जो
बड़ी अनोखी बात कि अब वर
देने लगे द्विपद जन
भी, -
भाव- समत्व-स्थिति है जिनके
हिय में नहीं एक क्षण भी ।
१४०
यदि तुम मेरे प्रेम नेम-वश
हो कर मुझे एक वर दो-
और माँग लूं में तुम से यह,
कि तुम ब्रह्म हत्या कर दो।
तब क्या वह वरदान तुम्हारा,
धर्म-विहित होगा ?
बोलो,
वह व्रत परिपालित होगा ? क्या-
उस में धर्म निहित होगा ?
तुलनात्मका बुद्धि से व्रत का
पालन नहीं रहित होता
व्रत- परिपालन सदा, प्राण प्रिय,
ज्ञान-विचार सहित होता ।
२३६<noinclude></noinclude>
1qgtq61onot8fdxvoi4cx6p5sv0oovc
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२४०
happ
१४१
यह है एक कुपरिपाटी, प्रिय,
यह सम्पूर्ण स्वधर्म नहीं,
सोचो तो, इस धर्म-धर्म में
हो जावे न अधर्म कहीं;
माँ कैकेयी धर्म-कर्म का
लोम-चर्म हैं खींच रहीं,-
अपने स्वार्थ-बीज को वे हैं
इसी बहाने सींच रहीं,
यह अज्ञान भयंकर है, प्रिय,
तात चरण श्री दशरथ का,
खो बैठे हैं सविचार सव
वे निज कृति के इति प्रथ का ।
१४२
जन-गण-मंगलकारी
सीता-
रमण श्रार्य श्रीराम सदा,
धुरन्धर, देव-पुरन्दर-
धर्म
वन्दित, वे निष्काम सदा,
वे हैं मेरे पितृ देव सम
सदा समत्व बुद्धि वाले,
उन्हें समझ क्या सकें स्वार्थ-रत
मूर्ख ममत्व बुद्धि वाले ?
आर्य राम के एक चरण नख
पर त्रैलोक्य निछावर है,
उन का ही तो है इस जग में
जो जंगम है, स्थावर है !<noinclude></noinclude>
7b620zuq25ewmd13l4v2pglelcbml1s
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५७
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>553
तृतीय सर्गं
१४३
नित एकत्व भाव धारा के
चिर बाहक जो राम स्वयं-
'भुंजीथाः त्यक्तेन' मन्त्र के संस्कृत प्रयोग
चिर साधक जो राम स्वयं-
उन्हें कभी मोहित कर सकती
क्या यह स्वार्थ भाव-माया ?
उनके आगे क्षुद्र, अवध के
राजपाट की यह छाया;
घोर विचार शून्यता है यह
श्री कैकेयी रानी की,
प्रदर्शनी कर रहीं ग्राज वे
अपने हिय अज्ञानी की 1
१४४
यह अन्याय, धर्म का नाटक-
रचता हुआ, श्रवध आया,
फैला रहा हमारे गृह में
यह अपनों मिथ्या
सभी फँस गए हैं इस भ्रम में,
तुम भी भ्रमित हुए, स्वामी !
धर्म-विचार, अधर्म श्राक्रमण-
से प्रतिक्रमित
हुए,
स्वामी,
शिथिला बुद्धि हुई है। सब जन-
किंकर्त्तव्यविमूढ़
उठो धनुर्धर मेरे, तुम
यों
वनगमनारूढ़ हुए
हुए,
क्यों
?
माया,
२४१<noinclude></noinclude>
tjdrkmx88kei7s0wcx4i5ynt96t6pyd
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५८
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
准
तक
जानोगे
फैलाने
१४५
इस अन्याय, अधर्म दुष्ट के
शिर पर चरण- प्रहार करो,
अपनी प्रज्ञा के तीरों के
तक-तक तीखे वार करो,
नाश करो इस अन्ध दम्भ का,
आज अवध को पूत करो,
इस पाखण्डमयी धार्मिकता
को तुम भस्मीभूत करो,
तुम ज्ञान- रश्मियाँ
वन-निर्जन में ?
यहाँ अवध को छोड़ोगे क्या
यों ही निविड़ तिमिर घन में ?
१४६
यह अविचार विपिन जाने का
राम-हृदय कैसे आया
?
उनके विमल हृदय-दर्पण में
पड़ी प्रसत् की क्यों छाया ?
या तो सब जग पागल है, या-
फिर में ही हूँ
सब जग ? या में
धम्म-धर्म,
राम
उन्मत्ता,-
ही भूली हूँ
कर्म - सत्ता ?
लखन, सीता, कौशल्या,
मात सुमित्रा, सब
या फिर, प्रिय, मेरे हीहिय की
ज्ञानाग्नि के स्फुलिंग बुझे ?
२४२<noinclude></noinclude>
m0805d1g9uxgan2jpxl5guxwcmnhjcf
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२५९
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४७
माना में नारी हूँ कृपणा,
मैं हूँ स्वार्थ-स्वभाव मयी,
किन्तु तत्व- विश्लेषण की है,
मुझ में अविकल चाह नयी,
मुझे तनिक भी संग दोष की
नहीं दीख पड़ती छाया,
मोह नहीं है, लोभ नहीं है,
नहीं रंच ममता-माया;
शुद्ध भावना से
तृतीय सर्ग
उत्प्राणित
मेरे ये
विचार, प्यारे,-
आज उमड़
आए हैं बरबस,
निर्णयार्थ
न्यारे-न्यारे
१४८
तुम कहत हो वन-जन-मन में जमावा
होगा ज्ञान- विकास नया,
मैं कहती हूँ प्रथम अवध में
करो धर्म-विनाश
दायें-बायें ;
धर्म-धुरीण राम के भ्राता,
पूज्य सुमित्रा के जाये,
यह अन्याय हो रहा है, प्रिय,
तव सम्मुख,
यह अधर्म का भाव यहाँ पर
फैल रहा है। जन-गण में,
पहले इसको करो पराजित,
प्रिय, तुम निज जीवन - रण में ।
नया,
२४३<noinclude></noinclude>
mhooxk6wc33bl87azr09z9bulyjbb5a
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>आधुनिक
Demary
ऊम्मिला
राज नहीं
धर्म - धारणा
१४६
में, मेरे प्रिय,
तुम प्रचण्ड-सी क्रान्ति करो,
सद्विचार, सद्भाव, तर्कमय-
कृति से सब की भ्रान्ति हरो,
कह दो ग्राज पिता दशरथ से
कि यह अधर्म नहीं होगा,
कह दो, लक्ष्मण के रहते यह
यह घोर कुकर्म नहीं होगा;
कैकेयी का यह,
दशरथ का न स्वराज यहाँ,
जन-गण-मन-रंजन कर्त्ता ही
होता है अधिराज यहाँ ।
१५०
मन्त्र-मुग्ध मणि फणि अनन्त सम
तुम कैसे यों दीन
हे मेरे अपराजित,
किस धुन
में
२४४
हुए
?
बोलो,
?
तुम लीन हुए
कहाँ गई वह सहज वीरता
उचट चोट करने वाली ?
कहां गई हुङकारमयी वह
वाणी, भय भरने वाली ?
भू-लुण्ठित कर दो अधर्म यह
अपने चरण प्रहारों से,
कम्पित कर दो दिग-दिगन्त यह
निज़ गंभीर ललकारों से ।<noinclude></noinclude>
19k556eqdj48kej6mydp6nrk723vjiw
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६१
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अपने
१५१
आर्य धर्म के करवट लेने
की यह घटिका आई है,
महाक्रान्ति के सूत्र आज यह
सँग-सँग लाई है,
स्वार्थ-प्रेरणा का रौरव रव
शान्त करो, निस्तब्ध
निज ज्वलन्त शंख ध्वनि से, प्रिय,
सब के हृदय विदग्ध करो,
धर्म-बंध
का पालन
करो,
तृतीय सर्ग
महानाश का मन्त्र फूंक दो,
मेरे. विकिट क्रान्ति कारी,
भस्म करो ये गलित रूढ़ियाँ,
मेरे निपट भ्रान्तिहारी ।
१५२
ऐकान्तिक कर्तव्य नहीं है।
पितुराज्ञा-पालन, प्राणेश,-
यह भी क्या मैं तुम्हें बताऊँ
हे मेरे विशुद्ध ज्ञानेश ?
है उस में भी काल-परिस्थिति-
बन्धन, देश- अवस्था
का,
करना पड़ता है विचार-निज
धर्म-स्वकर्म-व्यवस्था
गुरुजन-प्राज्ञा
निर्बन्ध
नहीं,
छुट सकता है अंश-कर्म से
पूर्ण धर्म-सम्बन्ध
कहीं ?
का;
२४५<noinclude></noinclude>
k22khbaqnootf8y23tk5qykw0gg2jlm
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६२
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तक
ऊम्मिला
विमला;
१५३
आशिक कर्म रूढ़ियाँ क्यों कर-
रहीं भावना तव विकला ?
बस अच्युत सद्धर्म-परिधि ही
है अलंघनीया
भक्तराज प्रह्लाद कर चुके
हैं पितुराज्ञा उल्लंघित,
फिर भी उनकी पुण्य स्मृति है।
ग्राज सकल जन-गण-वंदित,
लंघनीय है आज्ञा गुरुजन-
की अधर्म्य, श्रविचारमयी,
मान्य गुरोराज्ञा क्यों होगी,
जो विषमयी, विकार-मयी ?
१५४
तुम विचार क्रान्ति के उपासक,
तुम नवीनता उन्नायक,
तुम प्राचीन दम्भ के भेदक,
तुम जड़ता
के गति-दायक,
तुम कोदण्ड, प्रचण्ड-भाव के,
नवोत्क्रान्ति के तुम सायक,
तूणीर चमत्कारों के,
प्रत्यंचा निश्चायक;
तुम
तुम
शब्द- बेधन-क्षम तुम हो, तुम-
-
-
नष्ट
-
कर्ता,
अचूक खिलाड़ी
"भवति न भवति"-भाव हर्ता
संशय
वाक्य
तुम हो निपट
संवंशक
२४६<noinclude></noinclude>
8uuecko8t122ojlxpposukv39ioxvnm
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५५
वड़ा,
आज अवध में फैल रहा है।
निपट कुकर्म - विकर्म
यहाँ धर्म की प्रोट लिए इस-
जन-पद-बीच अधर्म खड़ा,
है,
छाया है दुष्कर्म भयानक,
धर्म-भावना रोती
बोलो, मेरे निपट धनुर्धर,
तुम को आज चुनौती है, -
तृतीय सर्ग
प्राँखें खोले, धोखा खाते,
यह अधर्म स्वीकार करो,-
फिर कैकेयी- कुमनोरथ-
गढ़ को क्षण में क्षार करो ।
या
१५६
आज जगत को सूर्य वंश की
टेक तनिक दिखला तो दो,
धर्म किसे कहते हैं, भोले-
जग को यह सिखला तो दो,
दिखला दो, दो हाथ, धर्म की
धाक-साख विठला तो दो,
इस अधर्म के जमे हुए जो-,
चरण, उन्हें फिसला तो दो,
खिसका तो दो अचल शिला इस-
भीषण, जड़ परिपाटी की,
पगडण्डी निर्विघ्न करो, प्रिय,
अगम धर्म की घाटी की ।
२४७<noinclude></noinclude>
npapb3n93g7m5339mxn0230lsba4rer
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६४
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१५७
प्राज धनुष की डोर सजाए,
शर संघाने, सज्जित हो,-
कूद पड़ो, ललकार भरे, तब-
प्राण रण नदी मज्जित हों,
यहाँ स्वार्थ-परता दिखलाती
हैं अपनी प्रकृति,
आज करो विद्रोह
स्वामिन्,
भयानक
इस अधर्म के प्रति, स्वामिन्;
गुरु-जन, माता, पिता, सुहृज्जन,
जो भी हों अधर्म धारी,
उन से लोहा लेने में मत
भिमको, हे स्वकर्म कारी ।
१५८
विद्रोही ही जग में करते
हैं सुधर्म-निर्माण नया,
शुष्क प्रस्थियों में संचारित
करते हैं ये प्राण नया,
नव-धारावाही
विद्रोही
नूतन
काल- प्रवर्त्तक
है,
महानाश-ताण्डव
का गतिमय
२४८
विद्रोही, ही नर्तक है;
उसकी गति में नाश सृजन,
ये
उभय परस्पर हैं मिलते,
जैसे
होता है
शूल धन्य
कोमल शत-दल के खिलते ।<noinclude></noinclude>
02k1z0th4amgvvlc7kyn6y7uj97lb17
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
१५६
है बिद्रोह पतित-पावन, वह
अभिनव
सृजन-निशानी है,
है विद्रोह नित्य जाग्रति मय,
गति की गहन निशानी है,
है,
अलस, मंदिर, रसमय, स्वप्नोत्थित
नयनों का वह सपना
यह विद्रोह
नवाशा - पूरित
हिय का विकल तड़पना है,
प्रिय भविष्य दर्शन की आशा
है विद्रोही के हिय में,
सुख-बलि है, आत्माहुति है, नित-
इस के जीवन सक्रिय में ।
१६०
सकल सृष्टि विद्रोह-कला की
लहर मस्तानी
एक
है,
इसीलिए प्रति वस्तु यहाँ की,
प्रियतम, ग्रानी-जानी है,
स्थिरता केवल जड़ता में है
जीवन में अस्थैर्य भरा,
इसीलिए तो मानव-हिय में
विकास - प्रधैर्य
विद्रोही,
सतत
सहज हठीले तुम
दरसा दो
चूर्ण-चूर्ण निज
विद्रोह कला,
पदाघात से,
कर दो भीम शिला श्रचला ।
भरा,
२४६<noinclude></noinclude>
0d2lxy0v4urwfiahq9iqfpatv0kpw12
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६६
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१६१
इन श्राब्रह्म भुवन लोकान्तर-
में विद्रोह सतत छाया,
पुरुष, प्रकृति के बीच दृष्टिगत
होती चिर विरोध छाया,
एक सचेतन है, दूजी ने-
जड़ता ही को अपनाया,
पुरुष गुण, गुणमयी प्रकृति है,
अक्षर पुरुष, क्षरा माया,
बन्धन- मुक्ति, सगुण-निर्गुण के
बीच विरोध-भाव आया,
अथवा यह विद्रोह
निरंजन-
रंजन अपना रंग लाया 1
१६२
क्षर-अक्षर में, श्रचर-सचर में-
अजर-श्रमर विद्रोह
भरा,
परम पुरुष की द्रोह-रूपिणी
है यह प्रकृति परा-अपरा;
२५०
कर जड़ से विद्रोह, सचेतन
अंकुर आविर्भूत हुआ,
कर विद्रोह परम निर्गुण से
गुणमय विश्व प्रसूत हुप्रा;
फिर तुम आज अवध में विप्लव
करने से क्यों डरते हो ?
प्रिय, बतलाओ, क्यों चुपके से
पितुराज्ञा शिर धरते हो ?<noinclude></noinclude>
9bm9l1j4v0xtu8bjx0i2rna6prtmzzy
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
१६३
जग पूजित है सत्य-धर्म-रत,
सन्निष्ठा-मय
विद्रोही-
गतानुगति का वह विध्वंसक
वह प्राणों का निर्मोही,-
परिपाटी द्रोही
विद्रोही
है,
जग की आवश्यकता
धीर उत्क्रमण, सतत प्रगति की
वह परमावश्यकता है,
यदि न जलाए ज्वाला उस के
नव विचार की दाहकता-
तो फिर कैसे हो सकती है
निखिल लोक संग्राहकता ?
१६४
उस के हिय में है प्रस्वीकृति,
निष्ठा-प्रेरित
नास्तिकता,
उसकी नास्तिकता में भी है
शुद्ध तर्क की आस्तिकता,
नासदीय सूक्तोक्त
भावना
है हिय में
मंगलकारी;
उसकी आँखों में
रहती है
प्रश्न-चिन्ह की
चिनगारी;
चिन्तन में ललकार भरी है
रसना में है 'नहीं ! नहीं !'
प्रबल
-
पुराण पुरातनता कर
सकती विचलित उसे कहीं ?
२५१<noinclude></noinclude>
6baq6x31g4anh0dm3nyvtyv221aemrb
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६८
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१६५
विद्रोही है ज्ञान-वह्नि का -
पुरंज, प्रचण्ड, अमन्द, ज्वलन्त,
धर्म, विचार, सुसंस्कृति, गति का
प्रखर प्रकाश अजस्र, अनन्त,
नव- विचार - उत्पादक जो
भी
है, बस,
है,
हैं,
वह विद्रोही
नवल भाव उन्नायक जो भी
है, वह ही विद्रोही
तुम भी विद्रोही हो, प्रिय, तुम-
परिपाटी के शत्रु बड़े,
सार-शून्य रूढ़ियाँ तुम्हें किमि
रख सकती हैं यों जकड़े ?
१६६
अन्ध, प्रविश्लेषित, अविचारित
स्वीकृति ही आडम्बर है,
गुणातीत की अस्वीकृति का
चिन्ह् धरा है, ग्रम्बर है;
२५२
निर्गुण लीलामय की यह सब
लीला अस्वीकृति-मय है,,
स्वीकृति में यह विश्व कहाँ है ?
स्वीकृति में लय ही लय है;
तुम हो सगुण रूप मेरे, प्रिय,
निज प्रस्वीकृति प्रकट करो,
आज गुरोराज्ञालंघित कर
पौरजानपद-कष्ट हरो ।<noinclude></noinclude>
gpx9yllaocvkqd8xql95dsrlkxodgf0
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२६९
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६७
" पर पर, मैं क्या कहती हूँ
श्री' यह किस से कहती हूँ ?
मुझे सँभालो, प्रिय,
प्लावन में मैं
प्रवाह के
बहती हूँ,
खूब जानती हूँ
मेरा यह
नि:स्सार,
कथन व्यर्थ है, है
मैं हूँ एक ओर, है दूजी
ओर कृत्स्न जग का अविचार,
तृतीय सर्ग
मुँह वाये चौदह वर्षों की
अवधि खड़ी है सम्मुख प्राज,
हा ! कैकेयी सास, बनी क्यों-
तुम जग भर की दुर्मुख प्राज?
१६८
प्रो प्रिय, तनिक भाँक देखो तो,
हुआ
हृदय
सुना-सुना,
मुझे समस्त विश्व
लगता है
प्रिय,
प्रतिशय
ऊना-ऊना;
इतने !
कल
दस दिन!
चौदह वरस, एक सौ अड़सठ,
अरे महीने हैं
पाँच सहस्र एक सौ
क्षण मुहूर्त ये हैं
सचमुच समय अनन्त-वन्त है-
इस क्षण इसका भान हुआ,
लम्बी होती है दुख- छाया
इस क्षण इसका मान हुआ ।
कितने ?
२५३<noinclude></noinclude>
lauiah2388t3imt5vpdtdlb7psgtits
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१६ε
अव
सार
तत्व मेरे जीवन का
वन-वन में
भटकेगा,
वन - पशुओं
से
उलझेगा,
में
अटकेगा,
वह
वह
यहाँ ऊम्मिला
प्रासादों में,
शूलों
राज करेगी
उपवन में,
हृदय, अरे प्रो निष्ठुर, निर्मम
फटता क्यों न एक क्षण में ?
आँखो श्रो बेपीर ऊम्मिला-
,
की निःसार नृत्य शीला-
पथराई तुम नहीं अभी तक ?
देख रही हो यह लीला ?
१७०
मेघ घिरेंगे,
शीत
आयगी,
ऋतुएँ
-
श्राएँ जाएँगी,
सरयू
की
बलखाती
कोयल
२५४
इठलाती लहरें
लहराएँगी,
कूकेगी, कुहकेगा
तृषित पपीहा उपवन में,
यहाँ ऊम्मिला होगी, होंगे-
सीता-राम-लखन
वन में !
हाय, हुई निरुपाय ऊमिला,
कोई तनिक सहारा दो,
मुझ अनाथिनी को उसका वह
अपना बाँका प्यारा दो 1<noinclude></noinclude>
b6ykw6gfjrc4oov5ukxdn1171f64ggr
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७१
शून्य हृदय, मन शून्य, शून्य चित,
शून्य कल्पना का ग्रम्बर,
नियम- नियन्त्रण - शून्य नियति है,
सुप्त जगद्धर विश्वम्भर;
यहाँ घृणित अन्याय हो रहा,
सुनने वाला नहीं यहाँ !
राज करेंगे भरत ? लखन वन-
वन विचरेंगे यहाँ, वहाँ ?
विधना
कर ले
तृतीय सर्ग
घोर अनन्त निराशा का यह
दुश्रायाँ ताना किसने?
अरे, आज जीवन का पूरा
ताना-बाना किसने ?
यह
१७२
तार-तार सब अलग हो गए,
टूटा
तारतम्य व्यापार,
-
असहनीय हो गया दैव को,
लखनऊम्मिला का यह प्यार,
प्राज चुनौती तुझको,
तू कस-कस कर वार,
देख, रहे अवशेष न तेरा-
कोई निष्ठुर प्रत्याचार;
हाँ, हाँ सब कुछ सहना होगा,
सह लूंगी, हां, सह लूंगी,
तुम वन जाओ, किसी भाँति में
यहाँ अवध में रह लूंगी ।
२५५<noinclude></noinclude>
94ogpivddz2itzvu688mjysa5etqq94
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१७३
प्रिय, बिन बोले उमड़ प्राय यदि-
यह हिय, तो मेरा बस क्या ?
मैं क्या करूँ कभी रह-रह यदि
छलके घट करुणा
ओ निर्मोही, निठुर धनुर्धर,
अपने नैना;
तुम मूंदो
कान मूंद
मूंद लो, सुने-अनसुने
कर दो तुम
तड़पन तो होगी होने दो,
रोऊँगी, रो लेने दो;
अपने युगल चरण तुम मुझको
ग्रॉस से धो लेने दो ।
१७४
श्रो प्रिय, दिवस काटने का तुम
कुछ तो
जतन बता जाना,
जिस से पुनः अवध प्राने पर-
विद्योग प्रति
दुख
पड़े
२५६
न
तुमको पछताना,
मेरे बैना;
अवधि अन्त में छटा लख सकूँ
मैं इन सरसिज-चरणों की-
देते
अपने
जाना
मुझे सुमरिनी
कुछ संस्मरणों की ;
रस का ?
कर दो मुझ को लक्ष्मण-मय, निज-
आत्मरूप मुझको कर दो,
रिक्त हुआ जाता हिय, इस में
तुम लक्ष्मण-लक्ष्मण भर दो ।<noinclude></noinclude>
cx868zghzn0e2u2pqcldlg91a0bp9ni
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७५
क्यों न मुझ तुम बन बीहड़ में
संग-संग लेकर चलते ?
क्यों छोड़े जाते हो मुझको
प्रवधि-वहिन में
याँ जलते ?
संग चलूंगी, वन विचरूँगी,
तुम पर न्यौछावर हूंगी,
मिला कण्ठ में कण्ठ, गान से
मैं प्रटवी को भर दूँगी,
तृतीय सर्ग
किन्तु जल्पना है मेरी यह
श्राया इसका ध्यान मुझे,
में क्या-क्या कहने लगती हूँ
इसका रहा न ज्ञान मुझे ।
१७६
मँडराने लग गया धुआँ यह
मेरे मानस मंडल
में,
यथा सृष्टि के पूर्व धूम्र था
पूरे ब्रह्म-कमण्डल
सब विचार धूमिल से हैं, बस-
एक वेदना स्पष्ट हुई,
धूम्र-प्रावरण के अन्तर
अग्नि-शिखा आकृष्ट
ना जानूं क्या हुआ कि मन में
मूक-चूक
ही शेष
रही
सब बातें तो लुप्त हो चुकीं,
हुई;
से
में,
एक हूक अवशेष रही
1
२५७<noinclude></noinclude>
0f344zn23xodnqc4a97sb6rnowgxhll
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पृष्ठभूमि में
अथा
3397323
है
ऊम्मिला
१७७
जब तुम वन में होगे, तब यदि
ऋतुनों का ऊधम होगा, -
तो मेरा क्या होगा?
वह दुःख,
होगा ?
बोलो, कैसे कम
सन-सन करती जब आवेगी
पवन मदोन्मत्ता बहती,
जब मम आँगन में डोलेगी-
सुरत प्रतीत कथा कहती,-
तब मेरे इस निष्ठुर हिय का
होगा कैसा हाल, कहो ?
कैसे समझाऊँगी
इसको-
मैं, हे दशरथलाल, कहो ?
१७८
उपा, प्रात, मध्यान्ह, साँझ, सब-
नित प्रति आएँ जाएँगे,
नैश-गगन में
निशानाथ
२५८
नखत हँसेंगे,
मुसकाएँगे,
काली रात, सतत ज्योत्स्ना-मय,
निशि का याँ उद्भव होगा,
कभी स्फटिक दिन, कभी साध्र दिन
का सुरम्य ताण्डव होगा,
रमण, तुम्हारी अनुपस्थिति में
कैसे इसे सहूँगी मैं ?
कौन यहाँ होगा जिस से निज
हिय की कथा कहूँगी मैं ?<noinclude></noinclude>
le4y3ufq6jio95vjn1zkwrl08zjnoo8
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७६
क्या बीतेगी करुणा भरिता
श्वश्रू माता के मन पे ?
क्या बीतेगी उन के करुणा-
तापस - जीवन पे ?
जर्जर
विना राम के कोशल- जनपद
का क्या होगा, पता नहीं;
बिना राम के नृपति न दे दें
प्राण कहीं;
आपने आकुल
यह सब अनाचार,
तृतीय स
सन्निष्ठा
के धोखे
हो रहा यहाँ,
इसको ही तुम कहते हो निज
जीवन का
संदेश महा ?
१८०
मैं कुछ भी समझी न हो न हो,
मैं हूँ कुण्ठित बुद्धिमयी,
किंवा मेरी बुद्धि हुई हो
शोक विकार
-
पर इसका क्या करूँ ? हृदय में-
करतीं ज्वालाएँ-
देतीं
लप लप
रोम-रोम झुलसाए
हैं ये अति विकरालाएँ,
धैर्य? अहो प्रिय, नारी का यह
जीवन है धृति-मति प्रतिमा,
पर इस का क्या हो ? में तो हूँ-
आज बनी प्रति-गति प्रतिमा ।"
अशुद्ध मयी,
-
२५६<noinclude></noinclude>
11ipzmx7751tl058xk33rsml81lzj0k
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१८१
यों कह हुई ऊम्मिला नीरव
प्रिय के कन्धे पे झुक के,
मानों आत्म-निवेदन लेने
लगा बलाएँ रुक-रुक के;
सलज, डबडबाती अँखियाँ भर-
आई, आँसू छलक पड़े,
मानों कमल-दलों से आतुर
वे सीकर कण ढलक पड़े;
आश्वासन से भरे लखन के
वचन, मौन से उलझ पड़े;
फिर सहसा अभिव्यक्ति-प्रेरणा
के प्रसाद से सुलझ कढ़े ।
१८२
"प्रिये, जनक नन्दिनी ऊम्मिले,
तुम हो नित अविकारमयी,
तुम हो संग-दोष-रहिता, तुम-
पुण्य पवित्र विचार मयी,
२६०
यह सुन्दर ऐकान्तिक प्रांशिक
धर्म
-
समन्वय विश्लेषण,
-
कर्म अकर्म - विकर्म वाद का,
-
प्रिये,
2
तुम्हारा सुविवेचन,--
नित्य सत्यता मयी
शुद्ध
भारती
तुम्हारी
कल्याणी, -
यह सब, मुझे, सर्व अंशों में-
स्वीकृत है, मेरी रानी ।<noinclude></noinclude>
d01ers0rfi7esbulnnz19r7j98o3ieh
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>वह
है
परिपाटी
तव
अतिशय
-
१८३
नित-विद्रोह-प्रेरणा
कल्याण-मयी;
उच्छेद
-
भावना
है जग-जन की त्राणमयी;
तत्सम्बन्धी सभी तुम्हारी
उक्तियाँ हैं अमला,
दोष रहित, सद्भावोत्प्राणित,
सभी युक्तियाँ हैं सबला;
चस्त्रि
उग्र
तृतीय समु
किन्तु एक है बात और भी-
उस पर तनिक विचार करो,
नैंक सोच लो, माँ कैकेयी-
से यों तुम मत रार करो ।
१८४
कैकेयी माँ दूर देश की हैं. कै कमी
शीला:
वे हैं अनुभव
युद्ध-सन्धि में प्रकट कर चुकीं -
हैं वे निज निपुणा
उत्तर-पश्चिम से प्राची तक-
विस्तृत है।
उनका अनुभव,
इसीलिए उनके हिय में है
श्राया एक भाव अभिनव,
हैं गौरव कांक्षिणी बड़ी माँ-
कैकेयी, यह है प्रत्यक्ष,
पर, इस बार, हुआ है उनके
गौरव का कुछ ऊँचा लक्ष्य
लीला;
बাইন
कैकसी के पालको
प्रधानता प्रदान
नवीन जीने
२.६१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
बनजाने नवीन उद्देश्य
१८५
के उत्तरपथ-प्रगत
वैभव से वे परिचित हैं,
किन्तु आर्य-विस्तार विन्ध्य की
ओर बहुत ही परिमित है;
रह-रह कर कैकेयी को यह
दक्षिण पथ ललचाता है
बहुत दिनों से विन्ध्य - विजय का
सपना उन्हें सताता है,
इसीलिए, रानी, उन ने यह
ऐसी युक्ति मिलाई है,
निज सपना सच्चा करने की
घटिका वे ले आई हैं ।
१८६
आर्य राम त्रैलोक्य जयी हैं,
यह कैकेयी जानें हैं,
लक्ष्मण की कर्मठ निष्ठा को,
सुन्दरि, वे पहिचानें
पहिचानें हैं,
२६२
केवल राम सपथ कर सकते
हैं इस अपथ विपिन मग को,
बस हम ही कर सकते हैं यह
गौरवदान
आर्य-जग को;
कैकेयी ने सोच समझ कर
रचा खेल यह सारा जब-
सिवा खेलने के है बाकी
रहा कौन सा
चारा अब ?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२७९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८७
यह वरदान और आज्ञा तो,
प्रिये, औपचारिकता है,
राज भरत को, विपिन राम को,
यह सब सांसारिकता है,
तृतीय सर्ग
राम की माता
विपिन-गमन से ज्ञान-धर्म की। नवीन उद्भावना
विस्तृत स्फूत्ति नई होगी,
श्रतः मात की विजयोत्कण्ठा
की
संपूति
आज नवल
नहीं
नहीं
होगी;
विपिन -गमन सांस्कृतिक विजय स
केवल उत्प्राणित होगा.
वह मन रंजन, जन- दुख भंजन
सब जग-सम्मानित होगा ।
१८८
तुम मत समझो इस को केवल
कौटुम्बिक विवाद, रानी,
तनिक पुराणमयी आँखों से
इसको देखो, कल्याणी,
इतिहास-पृष्ठ का
अभिनव श्रीगणेश होगा, -
उस पुराण का, जिसका नायक
सीता- पति रमेश
धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक,
तत्त्व विचार सिखाने को, -
आर्य राम अवतीर्ण हुए हैं
जग को पन्थ दिखाने को ।
होगा ;
२६३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१८६
बन गमन
दूसरा
कारण
किन्तु,
साधारण सा
-
तुम कह सकती हो कि अवध से-
ही न ज्ञान क्यों फैलावें ?
कह सकती हो कि यदि बात यह-
है, तो हम क्यों बन जायें ?
देवि, संदेश-प्रचारण
काम नहीं,
शक्ति कहाँ ? जब तक कि साधना
जन में आठों याम नहीं ?
राज-भोग-मय जीवन में वह
आज कहाँ, आदर्श
कहाँ ?
चिन्तन-स्थिरता कहाँ ? कहो वह
विमल विचार-विमर्श
कहाँ ?
१६०.
आज हमारे कन्धों
पर है.
रानी,
कितना महत् कार्य,
क्या अन्यथा सहज वन जाते,
अग्रज राम
२६४
आर्य्य, रानी ?
इस स्वधर्म- सम्पूत्ति- अर्थ तो
कुछ संयम करना होगा,
अध्यवसाय, अध्ययन, जप, तप
मन-शम, दम करना होगा;,
यह है एक साधना,
साधक-
सिद्ध आज दोनों तैयार
यह अज्ञान हटेगा, अब श्री
उतारेंगे भूभार
राम<noinclude></noinclude>
ns8xz45v9t7dxktfhiqum0e5ki6lotd
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८१
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६१
कर उठता है अवश हृदय यह
हाहाकार विलाप, प्रिये,
चौदह बरस, अवधि लम्बी है,
दुख का तौल न नाप प्रिये,
पर, तुम श्रार्य-नन्दिनी, विमले,
तप विमण्डिता,
आर्य-वधू
करुणामयी सुमित्रा माँ की
स्नेह-मूर्ति तुम अखण्डता,
मार्मिक
तृतीय सर्ग
मुसका कर कह दो कि ग्रजी, हाँ,
जाश्रो, जाश्रो,-
निर्मोही,
ज्ञान-विराग मुझे न सिखाओ,
जाओ वन, जन-मन भाम्रो ।
तुम ने
१६२
मेरी माँ को देखा
केवल सुख की घड़ियों में,
अब देखना महत्ता उनकी
तुम इन दुख की घड़ियों में,
कैसे वे तुम पर नित प्रति बलि-
बलि जाएँगी, छिन छिन
तनिक देखना कैसे
में,
तुमको
जोहेंगी निशि में, दिन में;
कैसे तुम्हें सान्त्वना दूँ मैं ?
क्या कह के समझाऊँ # ?
तुम सब कुछ जानो हो, तुम को
कैसे धैर्य्य बँधाऊँ मैं ?
२६५<noinclude></noinclude>
laqseiafext5ox3u32hp4i6ybsuhqw4
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८२
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१९३
इतना तो तुम खूब समझ लो
कि तुम लखन की रानी हो,
हृदय प्रश्म की तुम तरला रति,
मेरे मन की रानी हो,
जंगल में तव नाम-स्मरण से
संतत मम मंगल होगा,
मेरे लिए अन्यथा वह तो-
जंगल ही जंगल होगा;
तुम कहती हो कि तुम चलोगी
मेरे
संग संग
किन्तु, देवि, मैं राम
बन में, एक सी अभावमा
नहीं, बस
40.
और कहूँ क्या इस
क्षण में ? " ।
१९४
"मेरे प्राण, मोह माया के
तुम मेरे संहारक हो,
तुम हो
श्री गुरुदेव, ऊम्मिला-
के, तुम
शुद्ध विचारक हो,”
२६६
यों लक्ष्मण के चरणों में झुक
विमल ऊम्मिला बोल उठी,
मानों मूक मौन रसना, वर-
सहसा डोल
पाकर
उठी,
"यह उपदेश स्नेह मय दे कर
तुम ने मुझ को धन्य किया,
तुम ने मेरी चलित बुद्धि को,
अब एकस्थ अनन्य किया ।<noinclude></noinclude>
11vusc73d7nhq6md3ldg30cbj1qgbn9
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६५
धन्य धन्य तुम, धन्य राम हैं,
धन्या हैं जीजी मेरी,
धन्य नृपति, वन-वास धन्य है,
धन्य सास तीजी मेरी,
धन्य अरण्य, धन्य कोशलपुर,
जिस में खेले
राम लखन,
धन्य यह घड़ी जब वन जाते
तृतीय सर्ग
सीता लक्ष्मण राम चरण,
पटपरिवर्त्तक,
नर्त्तक,
धन्य संदेस, धन्य यह जीवन
धन्य स्वधर्म, स्व-कर्म नया,
धन्य वह घड़ी शुभ भविष्य की
जब फैलेगा
१९६
धर्म नया |
करो अर्चना नव प्रभात की,
हिरण्मयी उस प्रतिमा की,
वन में अलख जगाओ, देखो-
ग्रपलक, ललक झलक- भाँकी,
काल- प्रवर्त्तक,
ज्ञान प्रगति दाता,
तुम संस्कारक, उपचारक तुम,
धर्म कर्म सद्गतिदाता ;
दीप सँजोए, तुम वन जाओ,
तिमिर हरो, अज्ञान हरो,
यह भृभार उतारो, जन-गण-
मन को तुम सज्ञान करो ।
२६७<noinclude></noinclude>
3eh01c2epf4fw80xylhgac1hcf3uxqf
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
कौन आर्य
१६७
रानी न कहेगी
कि हाँ सुखेन कहो, स्वाहा !
राज, भोग, सुख, सब अर्पित हों
लक्ष्य प्राप्ति के हित, आहा !-
इस स्वाहा ! स्वाहा! में कितना
आत्मदान की चरम
गौरव है, कितना
बल है ?
वेदना-
कितनी
कल है !
पर
में भी प्रिय,
मानवता की पाद-पीठ
तुम को न्यौछावर कर के,
रो लेगी ऊम्मिला तुम्हारी,
'चुपके-चुपके, जी भर के ।
१६८
यहाँ वेदना देते, जग को-
निर्मल ज्ञान-दान देते,
तुम जाओ, चलती बेला, हँस-
मुझको
२६८
प्राण दान
देते,
प्रिय, हिय निश्चय धड़क उठे हैं,
सोच-सोच यह अवधि बड़ी;
मुरझाने लगती
सूने मग में
है आशा
खड़ी खड़ी;
पर, इस से क्या ? बड़ा पुरातन
यह
जीवन-युद्धस्थल
है;
जायो, मेरे प्राण, ऊम्मिला-
सदा तुम्हारी अविचल है ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६६
साधु, साधु, यह भला किया जो-
तुम ने यह अनुमति दे दी,
मुझ को नई स्फूर्ति दे दी श्री'
संनिष्ठा की रति दे दी।"
यों श्राजानु
लखन- प्रिया,
भुजाओं में भर,
लक्ष्मण बोले-
"रानी, तुम ने आज हृदय के
मेरे
सब बन्धन खोले,"
तृतीय सर्ग
चुम्बन करते, हिय लिपटाते,
यों कह लक्ष्मण मूक हुए,
अथवा लखनऊम्मिला-हिय के
सहसा अगणित
२००
एक क्षण होता है जीवन में, 'नवीन' ऐसा
टूक हुए।
जब सब व्यक्त भाव रुक-रुक जाते हैं,
भाव अभिव्यक्ति शक्ति हीन अवला-सी थक
गिर पड़ती है, नेत्र झुक झुक आते हैं,
हृदय के वेदनानल की कुछ लपटों में
मानव भाषा के शब्द फुंक-फूंक जाते हैं,
मौन विष के बुझे हुए वे मूक-हूक-तीर
बरबस हिय बीच भुँक-भुंक जाते हैं;
लड़ते-झगड़ते-प्रटकते. अस्फुट शब्द
हिचकी के मिस टुक जाते टुक आते हैं,
हिचकियों ग्रहों के व्याज से शतियों के सब
शब्द-ऋण छिन ही में चुक-चुक जाते हैं ।
२६६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८६
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२०१
एक क्षण प्राता है जीवन में 'नवीन' ऐसा,
जब क्षुब्ध मौन पारावार लहराता है,
उमड़ आती है ऐसी बेबसी की लहरी कि
शब्द- दैन्य-भाव हिय बीच हहराता है;
व्यथित हृदय-तल मथित, थकित होता,
केवल निश्वास-मय घोप घहराता है,
5
कर्पण, घर्षण, अश्रु-वर्षण के ताण्डव में
मौन वेदना का उत्तरीय फहराता है;
उस क्षण हृदय सिन्धु की उन लहरों में,
सब शब्द कौशल वह अवश जाता है,
दह जाता कृत्रिम भाषा का व्याकरण-भौन,
केवल तन्मय मौन, गौण रह जाता है ।
२०२
कब कैसे आता है जीवन में 'नवीन' क्षण,
जब घन रण ठन जाता है अपने आप ?
'मौन-भाव, अभिव्यक्ति भाव गुंथ-गुंथ जाते,
गोपनीयता के रण आँगन में
बिन बोले चाले, नयनों के झरोखों से झाँक-
चुप-चाप ;
झाँक झट तकने लगता है हृदय-ताप;
कभी आँसू बन, कभी रिक्त चितवन वन,
हिय की व्यथा छलकती है अतुल प्रमाप;
कौन वेदना-दानी रसज्ञ है जिसने दिया,
शब्द-पटु रसना को दान यह मौनालाप ?
यह मौन-भाव लीलामय का वरदान है ?
या कि यह केवल है एक मूक अभिशाप ?
२७०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०३
सब बाह्य जग, सब ग्रन्तर जगत, सब-
काल, सब देश
काल-प्रशेषता, आकाश अनन्तता
तृतीय सर्ग
मौन-मय बन जाते हैं,
मिल के,
एक होती, मीन के वितान तन जाते हैं;
अहो रात्रि धीरे-धीरे, गुप-चुप नाचते से,
दीखने लगते हैं जब साजन जाते है;
एक-एक निमिष निस्तब्ध, शब्द दीन हुए,
अनन्त अयुत युग वन-वन जाते हैं;
रसना, निस्तब्ध होती, कण्ठ ध्वनि-हीन होता,
मौन देव हिय में मगन मन आते हैं,
पीतम की कण्ठ ध्वनि के कम्पन-संस्मरण-
कण, स्मृति प्रकाश में छन-छन आते हैं ।
२०४
कुछ ऐसी दाहकता होती है विरह की, कि-
हिय में सहसा अनोखे दाग दगते हैं,
बोल चाल की रुझान मिटती अपने आप
हृदय- कुरंगम
अंग-अंग
भाषण प्रवृत्ति-पु ंज अवश भगते हैं;
तड़पता है चुपचाप
जब कि व्यथा के तीखे बाण ग्रा लगते हैं;
सिहर सिहर कँप उठते हैं,
रोम-रोम ग्रनबोली बिथा में पगते हैं;
कथा भरे मौन नैन सैन, अनबोले वैन,
शब्द-रस- माधुरी को सहसा ठगते हैं
लगती ठगौरी बौरी भोरी-भोरी भावना को,
अलसित नयन मौन भाव
जगते हैं ।
२७१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
कारूनिक
२०५
"मेरी विमल ऊम्मिला को तुम
खूब प्यार कर लो, देवर,
कहाँ मिलेंगे चौदह वर्षों
तक फिर ये मधु-मधुर अधर ?
पियो ऊम्मिला रानी का रस-
स्नेह आज अंजलि भर-भर,
ओ निष्ठुर, यो विकट धनुर्धर,
ग्रहो हठी, मेरे देवर।”
करुणामयी जनकजा सीता
जब आकर यों बोल उठीं,
तब उस मौन उदधि
शब्द-मयी कल्लोल
२०६
में मानों
उठी ।
ऊम्मिला
लक्ष्मण भुज-वेष्टिता
मिलन सकुच गई, लक्ष्मण झिझके,
व्रीड़ा रंजित वे कपोल हो-
गए ऊम्मिला के निज के,
२७२
"बलि जाऊँ, दोनों ऐसे ही
बने रहो तुम कुछ क्षण को,
देवर, यों ही गोदी में तुम
लिए रहो अपने धन को;
यह मेरा मातृत्त्व अस्फुटित
तनिक धन्य हो जाने दो,
मेरी वत्सलता को, देवर.
तुम अनन्य हो जाने दो ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२८९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०७
सती सुमित्रा माँ के जीवन
के दुख-सुख की
की गहराई,
नयनों से नापने निमिष में
सीता आज यहाँ आई,
आज बलाएँ ले लेने दो
तुम दोनों की इसी तरह,
सकुचो मत, शीतल होने दो
नयन, ऊम्मले, किसी तरह,
तृतीय सगं
त्वम् अखण्ड सौभाग्यवती भव, संस्कृत के
देवि,
ऊम्मिले, कल्याणी,
अवधि अन्त में पूर्ण सुखी तुम प्रश
होगी, श्रो बहिना रानी |
२०८
अच्युत सती राम-जाया की
तुम यह आशिष गृहण करो,
इस वियोग को, विमल ऊम्मिले,
धीर भाव से सहन करो;
समझाए भी नहीं मानते,
बड़े हठी हैं लाल
लखन,
बरबस, बहन, कर रहे हैं ये,
श्रार्य-पुत्र का
कौन आज है सकल त्रिलोकी
इनके-
में, जो पद नख पे
न्यौछावर सत्वर न करेगा
श्री, वैभव, सब गिन-गिन के ?"
भार वहन
२७३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२०६
यों कहते-कहते भर आई
श्री सीता की आँखड़ियाँ,
मानों सीकर कण
अभिषिक्ता
पाँखड़ियाँ,
हुई कमल की
सजल कमल दल से जल ढल-ढल
अमल - कपोलों पर आया,
ज्यों करुणा-कर्षण, हिय-तल से,
श्री सीता ने
आँखें पोछीं
व्याकुल जल भर-भर लाया;
अपनी
अपनी सजला
अंचल से,
ज्यों धैर्य ने शान्त होने को
कहा भावना चंचल से ।
२१०
लक्ष्मण ने सीता-चरणों में
उठकर किया. नम्र वन्दन,
ज्यों सदेह विश्वास कर रहा
शुद्ध भक्ति का अभिनन्दन;
२७४
सीता ने लक्ष्मण को कम्पन-
युत शुभ आशीर्वाद
ज्यों याचक को..
कम्पनशील
दिया,
करुण कृपा ने
प्रसाद दिया;
फिर सीता से मिली ऊम्मिला-
अमित शोक- तप्ता
अरुणा,
ज्यों प्रखण्ड शक्ति में सन्निहित
हो जाती गंभीर करुणा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सगं
२११
लक्ष्मण, सीता और ऊम्मिला
दोनों के सँग यों निखरे,-
ज्यों मध्याह्न, उपा सन्ध्या को
लेकर,
संग-संग
बिचरे;
सीता और ऊम्मिला दोनों
भुज भर ऐसे चिपट गई,
जैसे प्रशा और निराशा
रीझ परस्पर लिपट गई;
फिर धीरे से विमल ऊम्मिला
बोली छाती किए कड़ी,
"जीजी हृदय मसोस रहा है,
ना जानूं क्यों, घड़ी-घड़ी ।"
२१२
"मैं जानूँ हूँ, बहिन ऊम्मिले,
क्यों अकुलाता विकल जिया,
मैं जानूं हूँ कि क्यों तड़पने-
लग जाता है, हाय, हिया;
बहिन, तुम्हारे हृदय सिन्धु के |
बड़वानल की ज्वालाएँ- उफैला
मैं जानूँ हूँ कितनी शोषक
हैं वे प्रति विकरालाएँ;
बस चलता तो मैं न कभी यह
बुरी घड़ी आने
देती,
बस चलता तो लखन लाल को
मैं न कभी जाने देती ।
२७५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२१३
नहीं शक्ति श्री राम स्वयं की
जो कि रोक रक्खें इनकों,
कौन कर सके है अंजलिगत
इस दिन मणि को, इस दिन को ?
मानों लूट चली मैं तुम को,
अनुभव करती हूँ ऐसा,
यही सोचती हूँ कि हाय, यह-
मेरा है अनर्थ कैसा ?
पर, क्या करूँ नहीं समझेंगे
ये लक्ष्मण समझाए से,
अपनों से ही जोर चले है, -
ये बन रहे पराए-से ।
२१४
जगती भी क्या याद करेगी
सनेह सेवा निष्ठा,
यह
-
भ्रातृ-प्रेम की आज हो रही-
है, ऊम्मिले, नव प्रतिष्ठा;
यह वियोग-क्लिष्टा, हिय-रति से
श्लिष्टा, निष्ठामयी घड़ी,-
करने आई आज मधुकरी :
यह रघुकुल के द्वार खड़ी;
२७६
"
भिक्षा दी दशरथ - कौशल्या-
श्री ऊम्मिला - सुमित्रा ने,
अपनी झोली भर-भर ली है
इस याचिका विचित्रा ने ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१५
श्री दशरथ ने
पुरुषोत्तम सुत
माँ कौशल्या ने
रामचन्द्र
सम
भेंट
किया,
सीता दे,
निज जीवन-सुख भेंट किया;
पूज्य सुमित्रा, बहन ऊम्मिला-
ने जो कुछ दी है भिक्षा, -
वह तो स्वयं
निवेदन को ही
है
मानों
अर्पण-शिक्षा;
तृतीय सर्गं
बलि वेदी पथ की पगडण्डी
सकरी, ऊँची,
नीची
पर तुम ने तो आत्म-निवेदन
की परिसीमा खींची है ।
२१.६
आत्मार्पण भावना विमल
की उलि
तुम हो स्फूर्ति-मयी महिमा,
विगलित करुणा, व्यथा, वेदना
की तुम मूत्तिमती प्रतिमा;
यह महान् बलिदान तुम्हारा,
लबनिदोन
यह स्वाहा, यह न्यौछावर, आलबातदान
मिलेगा ? यहाँ भरा है-लो.
गागर में सागर; |
कहाँ
तुम ने
सच कहती हूँ बहन, नहीं है
लेश औपचारिकता का;
इस बलिदान संस्मरण में है
काम न सांसारिकता का ।
२७७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अम्मा
२१७
मँझली माँ न हृदय दे दिया,
तुम ने दे डाला जीवन,
वह जीवन-धन, न्यौछावर तुम
जिस पर होती हो क्षण-क्षण;
में लज्जा से गड़ जाती हूँ,
देख तुम्हारा यह बलिदान,
कितना आत्म-निमज्जन गहरा !
क्या ऊँचा बलिदान-विधान !
तुम जलती ही यहाँ रहोगी
सुलगाए
संस्मरण-अनल,
किस मुँह से कुछ कहूँ तुम्हें मैं,
ओ मेरी ऊम्मिला विमल ?
२१८
में जाऊँगी अपने पिय के-
सँग, इस में कुछ तो कल है,
पर तुम ? हाय, लखन के आगे-
चल सकता किस का बल है ?
२७८
तुम सँग होतीं तो कट जाते
लम्बे चौदह जीवन भी,
जंगल मंगल मय हो जाता,
खलता नहीं एक क्षण भी;
पर, लक्ष्मण हैं बड़े हठीले,
चलता उन से किसका बस ?
लाख स्ववश हों हम नारी, पर-
फिर भी हैं पुरुषों के वश ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२१६
तृतीय स
राम শ
"अन्तर है श्रीराम चन्द्र में,
जीजी, और सुलक्ष्मण में,-
वही भेद जो कि है सिद्ध-गुण,
और साधना-लक्षण में;
वह अन्तर जो उन दोनों में
है, वह है तुम में मुझ में,
आर्य राम हैं सिद्ध; भावना
है मुमुक्षु
रामानुज
में;
इसीलिए वे सकुचाते हैं
मुझे साथ ले चलने में;
जीजी, है कल्याण इसी में-
यहाँ अवध में जलने में
२२०
मैंने कहा, मुझे
सँग ल लो
मेरा याँ कुछ काम नहीं;
तो बोले कि ऊम्मिले, मैं हूँ
लक्ष्मण, मैं श्रीराम नहीं;
मैं न कहीं हो जाऊँ बाधा
उनकी परम साधना की,
मैं प्रतिबन्धक कहीं न होऊँ
शिवाराधना
जीजी,
उनकी
ठीक कहा है उन ने,
तुम में मुझ में क्या समता ?
तुम हो त्रिगुणातीत भगवती,
मैं हूँ दुर्बलता, ममता ।
की;
२७६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९६
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२२१
अच्छा है, जीजी, तुम जाओ,
हिय में गड्ढा करती-सी;
जानो, अपने चिर-वियोग की
चिनगारी याँ धरती-सी,
आज
जाश्रो,
जीवन के सब
याद आते हैं
मधुमय क्षण,
जाओ, वे देखो, आते हैं-
बालापन के
श्रो जीजी, देखो, वह माँ, वे-
तात- चरण, वे गुर्वाणी,
वे क्रीड़ाएँ, वे
वह तुतली-तुतली
२२२
लीलाएँ,
वाणी ।
वह किलकारी भरी कण्ठ-स्वर-
लहरी, वह सुरम्य उपवन,
वह रोना, वह मचल रूठना,
वह हँसना,
वह पुष्प-चयन,
सुसंस्मरण,
वह माँ का दुलार, वत्सलता-
वह, वे उनके मृदु चुम्बन,
वह झुंझलाहट, जब होता था
दोनों
का
वेणी - गुम्फन,
२८०
माँ से यह झगड़ा कि ऊम्मिला
को चुम्मी दी, न दी हमें-
उस को ही दुलार करती हो,
अब समझी मैं खूब तुम्हें ।<noinclude></noinclude>
p10nkrbl41482xmldri34qel22g97eo
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२३
फिर कल्याणमयी जननी की
वह मुसक्यान मनोहर-सी,
दोनों को गोद में उठाना,
वह कम्पन गति थर-थर सी,
-
वह सनेह की धार मौनमय,
माँ का वह अनबोलापन,
वे क्षण, हम दोनों का बाला-
पन का वह मृदु भोलापन,
तृतीय सर्ग
यह निपटारा कि यह अमुक स्तन
जीजी का, यह है मेरा,
माँ का कहना, दोनों जीजी-
के हैं, बता कहाँ तेरा ?
२२४
फिर दोनों का हँस कर माता-
की गोदी में छिप जाना,
फिर श्री पितृदेव के कन्धों-
पर चढ़ना, फिर इतराना,
फिर उन से कुछ बात पूँछना,
फिर उनका कुछ समझाना,
साम छन्द का, उनके कहने-
से, फिर कुछ गायन गाना;
फिर उनकी वह तन्मयता, वह-
डुबकी, वह गति थिर, अचला,
फिर उन महामहिम योगेश्वर
की स्वप्निल आँखें सजला ।
२८१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९८
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
वह
२२५
जीजी, जीजी, तात चरण की
सागर गम्भीर गिया,
फिर यज्ञायोजन, धनुभंजन-
फिर फिर वेदी अग्नि- शिरा,
फिर संवरण सभी बहनों का,
फिर वे सब सुख की बतियाँ,
श्वसुरालय में स्नेह मयी उन
सासों की पुलकित छतियाँ,
टूटे,
वे रतियाँ सुख की, जीजी, जब-
मैं- तू के बन्धन
लुटेराम सीता से और
ऊम्मिला ने लक्ष्मण लूटे ।
ये
२२६
संस्मरण धुएँ से आए
उठ स्मृति- नभ-थल भरने को,
क्या ये अलम् नहीं हैं हिय के
टुकड़े-टुकड़े करने को ?
२८२
इतना खेला, खाया, सुख से
प्रतिदिन संग-संग, सीते,
श्रीर आज तुम किए जा रही
सब राग-रंग रीते ?
ये
जीजी, त्रिगुण-विजयिनी, वरदे,
मुझ को थोड़ा सम्बल दो,
थोड़ी सी कल दो, थोड़ी-सी
आशा, थोड़ा सा बल दो ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/२९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२२७
अब तक कभी नहीं समझा था,
कि यह वियोग- व्यथा क्या है ?
अब तक यही समझ रक्खा था,
जीवन एक मधु कथा है;
सीता और ऊम्मिला बिछुड़ें,-
असम्भावना-सी यह थी,
लखन ऊम्मिला पृथक् - पृथक् हों,
यह शंका भी दुःसह थी;
तृतीय सगं
कौन जानता था : भविष्य यह-
प्रमित हलाहल - मय
होगा ?
किसे ज्ञात था यह भावी का
समय अश्रु-जल मय होगा ?
२२८
रानी;
अभी अभी ये कहते थे यह
कि तुम सुनों मेरी वाणी-
मधु- पीयूष मिले हैं जीवन-
रस में संग-संग,
जीजी, यह सत्यता, नित्यता-
यह, हृदयंगम आज हुई,
जान गई कितनी जल्दी सुख-
घटिका होती
सुइयाँ- सुइयाँ सी चुभ गइयाँ,
मेरे ही तल में, जीजी;
रम्य रमण-क्षण गए, वेदना-
व्यथा आज मुझ पर रीझी ।
छई-मुई;
२८३<noinclude></noinclude>
govulwhuhi8odd1hk3xoew0epwemaml
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२२६
करुण
जीजी, कभी-कभी घन वन में
स्मरण मुझे भी कर लेना,
कभी-कभी अपने देवर के
हिय में मम स्मृति भर देना;
आर्य राम के श्री चरणों में
करना नित मेरा वंदन,
तनिक सम्हाले रखना, हैं अति
उग्र सुमित्रा के
मेरे सेंदुर की
घन वन में
रक्षा तुम
करती रहना,
हे तुम अच्युत सती भवानी,
हे मेरी अच्छी बहना । "
२३०
"ओ ऊम्मिले सलौनी, मरी
अनुजा, ओ लक्ष्मण-जाया,
जनक देव सम सिद्ध तपोधन-
के. हिय की तुम मृदु माया,
२८४
नंदन;
नेह भरी,
अम्मा की तुम बड़ी लाड़िली-
छोटी बेटी
तुम लक्ष्मण-स्वामिनि, धन-दामिनि
तुम करुणा-रस-नेह भरी,
तेजमयी तुम, ओजमयी तुम,
परम तपस्या-भाव मयी,
रागमयी, वैराग्यमयी, तुम
समवेदना स्वभावमयी ।<noinclude></noinclude>
5avng04trkfr4vocffnqk7z13j3i9i8
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३१
यह मुझसे मत कहो कि क्षण भर-
भी तुम मुझसे बिछड़ोगी,
हिय में तुम्हें लिए जाऊँगी,
कैसे मुझसे पिछड़ोगी ?
वन-खण्ड में, अरण्य
सदा वसोगी मम
दुलराती डोलूंगी तुम को
मैं निज हिय में वन-धन में;
लक्ष्मण अग्रज
गहरा
रंग
गहन में,
मन में,
तृतीय सर्ग
सन्ध्या के झुटपुटे समय में,
मुसकाती ऊषा में,
सदा बलाएँ लूँगी मैं तब
निज मन की मंजूषा में
२३२
तुम्हें छिपाए निज डिबिया में,
मैं वन-वन में डोलूंगी,
मन की बात करूंगी तुम से,
मैं गुप-चुप रस घोलूंगी;
बड़े रँगीले
छानते हैं,
आर्य-पुत्र, ऊम्मिले, तुम्हारे-
हिय की व्यथा जानते हैं;
प्राणों से भी प्रिय लक्ष्मण हैं
उनको, यह तुम जानो हो,
उन के मौन सनेह - सिन्धु की
गहराई पहचानो हो ।
२८५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२३३
मुख से नहीं, नयन से बातें
करते हैं वे, री बहना,
खूब जानती हो
न यह सब,
तुम से व्यर्थ अधिक कहना,
प्रातः प्राज लखन जब बोले
कि वे संग जाएँगे
वन,
तब वे यों देखने लग गए
मानों उफन गया
रहे मौन, बोले न रंच भी,
आखें तैरती रहीं,
बस,
फिर ललाट की रेखाओं ने
हिय-विषाद- वेदना
जीवन,
कही ।
२३४
खड़े रहे लक्ष्मण
आज्ञा के-
लिए देर
तक
राम- समक्ष,
पर, व्रश्चिक दंशन पीड़ा से
-
-
भरा हुआ था उन का वक्ष;
२८६
फिर "अच्छा" यों कह कर, फिर से
विचार- तल्लीन हुए,
वे
पर, लक्ष्मण के जाने पर वे
सहसा
करुणा-दीन हुए;
मुख से निकला -"हाय ऊम्मिला!"
औ फिर हिय अवरुद्ध हुआ,
आँसू नहीं एक भी निकले,
मन तड़पा, हत- बुद्ध हुआ ।<noinclude></noinclude>
h4ci3as8zyluf0w5g1uf5fror0n7n3y
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३५
विचलित होती देख
मुझे, बे-
सम्हल गए, फिर इक छिन में,
वादल हटे, नेत्र चमके, रवि-
तृतीय सगं
मानों दो चमकें दिन में,
तुम से, बहना, तुम से में क्या-
कहूँ बात अपने
मन की ?
मेरे लिए बनी है क्या-क्या
यह मृदु मूरत लक्ष्मण की,
आर्य-पुत्र से नहीं पा सकी
हूँ प्रसाद
माता-पन
का,
आर्य-पुत्र
ज्यों सिंहिनी
पर मातृत्व उमड़ता मेरा
मुख देखूं जब लक्ष्मण का ।
२३६
यह समझो कि लखन हैं मुझको,
अधिक कोख के जाए से,
प्रियतर हैं वे मुझको अपने
निज के गोद-खिलाए से;
•
जोहती रहती,
है अपना शावक चंचल,
त्यों लक्ष्मण पर फैला दूँगी,
मैं अपना दुकूल
की
छत्रच्छाया
में भय का कुछ लेश नहीं,
उन के साहचर्य में, रानी,
कुछ श्राशंका, क्लेश नहीं ।
अंचल;
.२८७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२३७
वर्ष, मास, दिन, रात, प्रात औ, '
सन्ध्या, त्रुटि, घटिका, पल, क्षण,
इन सब को अतिलंधित कर,
लौटेंगे श्री राम,
बहन, तुम्हारी सीता भी, श्री-
रामचन्द्र की छाया-सी, -
अवधि अन्त में अवध आयगी
'ब्रह्म-जीव बिच माया सी; '
वह देखो, भविष्य के कोने-
पर लौ-सी
सुलगाए वह-
नन्हीं आशा विहँस रहीं है,
हलकी ज्योति जगाए वह ।"
२३८
"तुम में शुद्ध दीर्घ दर्शन की,
जीजी, है सामर्थ्य बड़ी,
तुम भविष्य दृष्टा हो, मैं हूँ-
वर्तमान के बीच पड़ी,
२८८
नहीं दीख पड़ती है मुझ को
आशा की किरणें झिलमिल,
इसीलिए तो जला जा रहा-
है मेरा यह हिय तिल-तिल ;
फिर
लखन;
जब तुम कहती हो, भविष्य है।
परम सुखद, चिर-मंगलमय,
तब कुछ-कुछ कम हो जाता है।
इस मन का यह जंगल-भय;<noinclude></noinclude>
j5v1e2fr7q8lhv9uy7qd922685x9d6v
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३६
मुझे नहीं दिखलाई पड़ती
तृतीय ग
भावी की
मरा
तब
स्वरूप रेखा
-
तो अवलम्ब बनी है।
श्रद्धा अनूप-लेखा,
तुम कहती हो, इसीलिए तो-
वह भावी मंगलमय है ?
यों तो, यह मेरा जीवन-थल
पंकिल है, प्रति जलमय है;
राम-वल्लभा के वचनों पर
मेरा है।
विश्वास,
I
बहन,
इसी सहारे
पार करूंगी
अवधि - उदधि गम्भीर गहन ।"
२४०
"क्यों कातर हो रहीं, ऊम्मिले,
मुझे न अधिक अधीर करो,
अपना वह विश्वास दिखा दो,
मेरी दुविधा-पीर
अपरिमित है;
हम आर्यों के लिए, ऊम्मिले,
काल सदा निःसीमित है,
वह प्रशेष है, अन्तहीन है,
वह तो सदा
वर्तमान है कर्म-साधना,
भावी ही जीवन फल है,
वहीं मुक्ति-निवाणं, वहीं है;
त्राण, वहीं स्थिति अविचल है ।
हरो,
२८६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अल
ऊम्मिली
स्वयं उठेगा
सीता-राम,
का सम्बन्ध
२४१
यह जीवन अनन्त हैं, रानी,
अन्त-वन्त है यह वनवास,
प्रेम-योग अच्युत, अनन्त है,
क्षण भंगुर वियोग का त्रास;
ऊम्मिला-लक्ष्मण
अनन्त, अछेद्य,
पर वियोग का यह अन्तर है,
दुर्गम नहीं, नहीं दुर्भेद्य,
यह अवगुंठन,
होगा फिर संयोग-विहार,
क्यों छोटा करती हो मन को,
अरी ऊम्मले, तुम इस बार ?
२४२
खूब ठीक तुम कहती हो है-
अवधि-उदधि गंभीर गहन,
पर, तव तपश्चरण नौका है,
श्रद्धा है पतवार,
बहन !
लक्ष्मण भैया की संस्मृति है
केवट, आशा धीर पवन;
अवधि - अन्त है, इस नौका का
विश्राम भवन;
तटवर्ती
नौका चालन प्रेरणमय
-
है,
सीता के प्राशीर्वचन,
तुम अवश्य सकुशल पहुँचोगी
सागर के उस पार, बहन ।
२६०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४३
वन- जल-थल में, अनिल अनल में
तुम होगी सँग-सँग मेरे,
लक्ष्मण के स्मृति नभ-मंडल को
सदा रहोगी तुम घेरे,
आर्य पुत्र के हृदय अतल में
वत्सलता की भाई - सी
चमक चमक उछलोगी, रानी,
लक्ष्मण
की
परछाई-सी,
तृतीय सर्ग
यहाँ छोड़ कर तुम्हें, न समझो,
हम दम्पति सुख लूटेंगे,
सब विहार-सुख इस कोसलपुर
ही पीछे छूटेंगे ।"
२४४
"तुम अरागिणी वन, वैरागी-
आर्य राम के सँग जाओ,
इस विराग अनुराग-रंग
मुझको भी तुम रँग जाओ;
जीजी, अपने ही हाथों से,
इकटक ज्योति जगा जाओ,
मेरे आकुल हिय में,
बरदे,
अपलक लगन लगा जाओ;
लगन लगाती, ज्योति जगाती,
में
हिय-मन्थन करती
जाओ,
वन में नवयुग का
उद्घाटन
अभिनन्दन करती,
जाओ ।
२६१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३०८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कम्मिला
२४५
अवध अँधेरी करती, वन में-
उजियाला करती जानो,
सीते, हल-सीता से पूरित
करती
वन धरती,
जाओ,
भाषा, योग, ज्ञान, कृषि, यह सब
वन में छिटकाती जाओ,
वन-वासिनियों की हिय-कलियाँ
नित चिटकाती
तुम
विमल वैजयन्ती संस्कृति की
वन में फहराती जाश्रो,
राम-लखन सँग सरयू-लही-
तुम लहराती जायो ।
जाओ,
सी
२४६
"अंजन - रंजित
चंचल
खंजन-
मद-भंजन
राम
रण- व्यंजन
इन नैनों में, -
निरंजन- रंजन, घन-मन-
इन सैनों में,-
जीवन- वरण,
मरण-प्रपहरणा,
वन-वन-दर्शन- चाह
भरे,
हर्षण, वर्षण, आकर्षण की
२६२
कम्पन ग्राह अथाह भरे,-
धैर्य्य-निकन्दन- क्रन्दन
- कर,
गुरु-जन-वन्दन करती जाओ,
रामानुगामिनी बन. हिय में,
तुम स्फुलिंग भरती जाओ ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२४७
थर-थर लहर-लहर अन्तर से
सर - निर्भर
बह आने दो,
हहर-हर भर-भर कर उसको
अपनी-सी कह जाने दो,
वह जाने दो तनिक धीरता,
तिनके-सी, मेरी
जीजी,
तृतीय सर्ग
वन जाओ, मम नेत्रांजलियों-
से तुम कुछ
भीजी-भीजी ;
रोको मत अपने को,
मुझ को,
आओ हम दोनों
रो
लें,
ग्राम्रो जाती बेला
थोड़ा-सा
यह
अश्रु-रंग
घोलें।"
२४८
भर भर आई चारों आंखें,
झरझर बरबस बरस
पड़ीं,
सरस हो गई बन जाने की
वह प्रति दाहक अरस घड़ी;
सीता के वक्ष पर ऊम्मिला
झुकी सह समाश्रित-सी, •
और ऊम्मिला के शिर पर भुक-
सीता गई निराश्रित
विमल ऊम्मिला की भुज- लतिका
सीता का गल-हार हुई,
सीता की भुज वल्लरियाँ कुछ
शिथिल हुई, लाचार हुई ।
सी,
२६३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
रातू
लखन
२४६
देखते रहे दूर से '
नयनों में विषाद भर के,
वे हो गए समाधि-मग्न-से
बीती
बात
इतने ही में दाशरथी श्री
श्रार्य राम, नित धीर मना,
वहाँ पधारे गजगति से वे
पुरुषोत्तम गंभीर मना,
छिटकाते अविचलित भावना,
धैर्य, तितिक्षा, क्षमता, बल,
आग फूंकते, जीवन
राम पधारे अचल, अटल ।
२५०
देते,
जिन के पग-डग पर डगमग-
डगमग भूमण्डल होता था,
जिनकी स्मिति रेखा पर जग सब
अपनी सुधबुध खोता था;
२६४
जिनके
याद करके,
-विलास में उद्भव -
प्रलय नाचता रहता था,
जिनके अतल हृदय में करुणा-
मंत्री-निर्भर बहता था;
पूर्णकाम, निष्काम राम वे
वहाँ पधारे, नेह पगे,
उनकी श्री मुख-ग्राभा से भव-
भय भागे, सब क्लेश भगे ।
रम<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५१
राम, -- श्याम तन, निरानन्द घन,
जन
राम,
भव
-
-
-
गण
-
मन
रंजनकारी,
- मगन- मन- गगनविहारी
भय - दुख भंजनकारी;
राम, -- खिलाड़ी, बारी बारी
तृतीय सर्ग
दुख-सुख- खेल
खिलाते
वे,
राम, - रुलाते,
राम, -हँसाते,
विष पीयूष पिलाते वे ;
-
--
राम, अमानी, अति अभिमानी,
निर्गुण-सगुण एक सँग वे,
राम, -- सहारे, जग उजियारे,
राम, अनेक-एक रंग वे ।
२५२
राम, नहीं नर, एक चिरन्तन
मनन-पुज हिन्दू-मन का,
राम, एक
उत्कर्ष
-
कल्पना,
इक आदर्श ग्रार्य्य-जन का;
राम, सत्य, शिव, सुन्दर भावों-
की
कल्याणमयी झाँकी,
राम, सच्चिदानंद भाव की
छवि नयनाभिराम, बाँकी,
राम, -विचार-विमन्थन-रत हिय-
का नवनीत मधुरिमामय,
राम, नित्यतामय, मंगलमय
संतत
सुन्दरता
-
-
संचय ।
२६५<noinclude></noinclude>
g1uqhjqrac6k0byv4jmg4fgrdrr3j4c
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३१२
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
राम,
-
-
२५३
राम, -- उपद्रष्टा,
भर्त्ता, भोक्ता,
राम, विदेही,
राम, सीयपति,
राम, रमापति, त्रेतायुग की
संस्कृति की विभूति प्यारी,
राम, -- त्याग, तप, जन रंजन की
मगन लगन न्यारी
-शब्द वह जो कि चराचर
में फैला है, गूंज रहा,
राम, अखण्ड शक्ति वह, जिसकी
सत्ता फैली यहाँ-वहाँ ।
२५४
पुरुषोत्तम, सर्वोत्तम, तमहर,
रविकुल- कमल - दिवाकर वे,
राम पधारे, जन रखवारे,
अशरण-शरण,
२६६
गुणाकर वे ;
न्यारी;
दोनों बहनें
खड़ी हो गई
हिय की दुर्बल त्रुटियाँ-सी
फिर ऊम्मिला राम चरणों में
दुली गंग - जल - लुटिया - सी;
छए
- अनुमन्ता,
सर्वेश्वर,
राम, सदेही
परमेश्वर,
कोमल, दृढ़ कर-पत्रं राम के-
ऊम्मिला के शिर पे,
मानो सुस्थिरता छाई हो
विकल भावना अस्थिर पे ।<noinclude></noinclude>
pr6t3dp3lrhvojrbfj1cuuok091cgdb
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३१३
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५५
रसना हिली राम की निकली-
आशीर्वादमयी
वाणी:
" तपस्विनी भव, चिर सौभाग्यवती भव
नव |
त्वम्
भव . कल्याणी;
तृतीय सग
संस्कृतपदावली
सजल नयन तब उठीं ऊम्मिला
आँसू पोंछे सीता ने,
धीरज
दिया
राम
ने,
करुणामयी राम-परिणीता ने;
सुधृति गृहीता हुई ऊम्मिला,
शान्त हुई, प्रकृतिस्थ हुई,
हृदय हुआ उपरमित, और सब
चित्त वृत्ति विरतिस्थ हुई ।
२५६
"देवि, ऊम्मिले, कत्ता कितना
है स्वतंत्र निज कृतियों में,-
है परतन्त्र, व्यक्ति कितना निज-
कर्मों की प्रवृतियों में,-
किस सीमा तक स्व-परिस्थिति से
कर्त्ता पुरुष नियन्त्रित है
किस सीमा तक वह नैसर्गिक
नियमों से अनुतन्त्रित है, -
किस सीमा तक कर्मी करता
दायित्व वहन,
ऊम्मिले ! '
"3
कर्मों का
हैं ये प्रश्न निगूढ़,
बोले यों श्री
राम
वचन ।
२६७<noinclude></noinclude>
gdovoge9zrk6906wco2a5g79ul8tint
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३१४
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२५७
"कौन जानता है कैसे यह
हुश्रा प्रवृत्तित घटनाचक्र ?
कौन जानता विधि ने खींची--
भाग्य रेख सीधी या वक्र ?
आज दोष- गुण के वितरण का
+
अवसर
नहीं,
बहू रानी,
इस क्षण वस्तुस्थिति
-
स्वीकृति में
ही है मंगल,
कल्याणी !
व्यथा, दाह श्री'
दु:ख, वेदना,
चिन्ता, क्षोभ, वियोग अनल,
यह सब तुम ले लो, कल्याणी,
फैलाए अपना
अंचल ।
२५८
जीवन में
वरदान
समझना
श्रभिशापों को ही जय है,
युद्धस्थल में तनिक हिचकना
ही मानवता का क्षय है।
२६८
जीवन, मरण, दुःख, सुख जो कुछ
मिले उसी का स्वागत है,
भय किसका, जब यह सब संसृति
अनख चरण शरणागत है ?
सुख दुख तो स्वभाव - इन्द्रिय-गुण-
वशवर्त्ती माया मय है,
भय?-
१-भय तो इस कःतर मन का
केवल
छाया-भ्रम-भय है ।<noinclude></noinclude>
m8001w4y2jrzpkzp2jq7qt16z1arha7
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३१५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२५६
भस्म ही
यज्ञाहुति की पुण्य
से विभु ने यह सृष्टि रची,
यज्ञाहुति से ही, जग में जन,
गण-हिताय यह वृष्टि मची,
देवि, जानती हो यज्ञाहुति ?
वह क्या है ? क्या है
वह यज्ञ ?
तृतीय सर्ग
शुद्ध यज्ञ किस
को कहते हैं
श्री विदेह सम
मुनि तत्वज्ञ ?
ये
तिल घृत - इन्धन - प्राहुतियाँ
हैं विडम्बना यज्ञों
की,
प्रचलित यज्ञों की परिपाटी
है प्रवंचना यज्ञों की ।
२६०
स्रष्टि रची प्रभु ने निर्गुणता-
की अपनी आहुति दे के,
जगत रचा माता ने अपने
हिय की रुधिराहुति दे के;
आत्म-दान- सेवा की यज्ञा-
हुतियों ही से यह जग है,
यज्ञ भाव से मुख मोड़े वह
आत्म-प्रवंचक, जग ठग
उसी यज्ञ का निठुर निमन्त्रण
ले कर आया है यह क्षण,
तुम्हीं बता दो, बहू, क्या करें ?
घर बैठें या जाएँ वन ?
है;
२६६<noinclude></noinclude>
nzs6u481jabco7llw7398cykzpwua7d
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३१६
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिलो
बलिदान
शुद्ध
२६१
यज्ञ है -- सर्वभूत-हित-
जीवन देना,
रत हो कर
शुद्ध यज्ञ है-- जग हिताय सब
अपना तन, मन, धन देना,
की सेवा,
शुद्ध यज्ञ है--जग
तत्लीना, चिर मुक्ति मयी,
यज्ञ है - प्राहुति
शुद्ध
देह
-
भावना
-
देना, '
भुक्ति
मयी,
प्राण-यज्ञ तो प्राण-दान है
निज आदर्शो की.
धुन में,
श्रात्म-यज्ञ है - लय हो जाना
अगुण-सगुण-गुण-निर्गुण
में
२६२
किरणों की अजस्र
आहुतियाँ,
हैं दे रहे
अंशुमाली ;
मेघ उठे,
धाराएँ बरसीं,
३००
सरसी, हरषी प्रति डाली;
भू-नक्षत्र - सौरमण्डल
श्राहुतियाँ आकर्षण
कब से झाँकी दिखा
शुद्ध यज्ञ के दर्शन
की, -
रहे हैं
की !
इसीलिए कहते हैं : प्रभु ने -
सकल विश्व सह-यज्ञ रचा,
बन सह-यज्ञ स्वयं जगती में
लीलामय सर्वज्ञ नचा !
-<noinclude></noinclude>
tqwefi3tq2eqlbun7b79njvuf7n5dcz
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३१७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६३
अणु-अणु से, कण-कण से क्षण-क्षण
तृतीय सर्ग
यज्ञ भाव
ये उमड़ रहे,
प्राण- दान,
आत्मार्पण के ये
मेघ
घनेरे घुमड़ रहे;
लघुता कहाँ ? स्वार्थपरता वह-
कहाँ ? कहाँ संकुचित व्यथा?
संचय कहाँ ? ग्रहण कैसा ? जब-
अपरिग्रह की यहाँ कथा !
इस आहुतिमय, आत्मदान मय,
विमल यज्ञ-पूरित जग में,-
कैसे बैठ रहें हम, अपना
विना दिए कुछ इस मग में ?
२६४
यह वन-गमन प्रथम आहुति है
मानवता के चरणों में,
यह तो छोटा सा अथ
है
जन सेवा के उपकरणों में;
जो कुछ लिया अभी तक उसका
कृतज्ञता ज्ञापन है,
सेवाओं
यह
आगे की
प्रथम
लक्ष्मण भी
जाएँगे वन, है-
चरण- संस्थापन
का यह
है;
यही व्यथा
अन्तरतर में,
मेरी शक्ति नहीं कि रख सकूँ,
मैं लक्ष्मण को इस घर में ।"
३०१<noinclude></noinclude>
p61ofmo3c6fdm2axht9m4tku85vdb3r
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३१८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
सीता
२६५
"श्रार्य, सिधारो अपने सँग ले
जीजी को, ले इन को भी,
मैं कभी न वन जाने देती
एकाकी इक छिन को भी,
मेरी जीजी हैं रघुकुल की,
श्री. विभूति, लज्जा, करुणा,
आर्यों की वे हैं धृति, मेधा,
क्षमा, कीर्ति, सेवा अरुणा,
इस प्रसून को लिए, अकेले
जाने देती मैं न कभी,
हठ करती, चाहे
फिर होते
क्षुब्ध, कुपित गुरु
२६६
देव सभी ।
आर्य, त्वदीय छत्र-छाया में
रंच मात्र भी भीति नहीं,
मंगल ही मंगल है, मेरे-
हिय में शुद्ध प्रतीति यही;
सीता-रमण राम के सँग-सँग
दाहक भव-भय-भीति कहाँ ?
द्वन्द्व - विमुक्ति वहाँ, दृढ़ता स्थिर,
३०२
समता,
निर्भय नीति
वहाँ ;
आशंका,
शंका,
निर्बलता,
आकुलता का त्रास नहीं,
भीति-भावना आ सकती है
'कभी आप के पास कहीं ?<noinclude></noinclude>
ijpz7x8hgk3jkclare0yotl0fbwl7w4
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६७
"आप सिधारें, कोसल जनपद
अनाथ करते जाएँ,
अटवी को, अटवी के जन-गण-
को, सनाथ करते जाएँ,
यह ग्रज्ञान भार
भूमण्डल-
का,
इसको
हरते
जाएँ,
अलख जगाते,
लगन लगाते,
तृतीय सर्ग
दीप शिखा
धरते जाएँ;
लिखते जाएँ इतिहासों के
पृष्ठों पर यह प्रगति कथा,
हरते जाएँ मानवता की
यह जड़तामय प्रगति व्यथा ।
२६८
-
और क्या कहूँ ? आर्य, जानते-
हैं अन्तर का कोलाहल,
छिपी आप से नहीं, देव, यह-
मम
चित्त वृत्ति
इधर-उधर मैं भूल रही हूँ,
अस्थिरता के भूले
उड़ी जा रही हूँ तिनके-सी
पड़ कर मोह-वगुले में,
पर, हैं. आर्य, आत्म आहुति की
यह घटिका यदि आई है,
तो में बाधा नहीं बनूंगी,
श्री रघुवीर दुहाई है !"
दोलाचल;
३०३<noinclude></noinclude>
5bl9zzwj2ua661k1vete3d3pi9vci9c
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२६६
सुन कर वचन ऊम्मिला के श्री-
रघुवर धीर उमड़
आए,
नयन - अम्बर में
कुछ-कुछ मेघ घुमड़ आए,
उनके गहन
सीता, राम, ऊम्मिला, लक्ष्मण
गहरे पैठ गए जल में,
सम्हले राम,
अन्यथा होता
निश्चय आप्लावन
उसी समय, सब के नयनों में
पड़ी सुमित्रा की
अथवा उस क्षण वहाँ
नौका- सी
माता
२७०
झाँई
सुमित्रा
आई |
सब ने चरणों में वन्दन की
श्रद्धांजलियाँ अर्पण कीं
वृद्धा श्रद्धा को नव विश्वासों ने
समर्पण
भेंट
मातृहरूख की
देशम
३०४
की
पल में;
झुके देर तक राम सुमित्रा
माता के श्री चरणों में,
मानों नवधा भक्ति लग गई
सेवा - उपकरणों में;
पद
-
उठा राम को हृदय लगाया
स्नेह विहवला माता ने,-
मानों दिव्य चरित अपनाया
हो पौराणिक गाथा. ने ।<noinclude></noinclude>
60uystcvgy821z7uqc5ec0irzpqh9kf
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सगं
२७०
राम सुमित्रा के वक्षस्थल
पर शिर रख यों व्यक्त हुए-
मानों लघु चापल्य-भाव सब
वत्सलता अनुरक्त
सीय - राम
हुए
पूज्य सुमित्रा माता ने ली
कई
बलाएँ तन्मय हो,
ज्यों प्राचीन नवीन विचारों-
में संघटित समन्वय हो;
एक हाथ से खींच हृदय से
लिपटाया सीता को.. यों,
सन्ध्या ने अपने हिय में हो
खींचा दोपहरी को ज्यों ।
२७१
इधर-उधर सिय-राम, सुमित्रा -
माँ उन के मध्यस्था थीं,
मानों यौवन-स्मृतियों से घिर
बैठी
वृद्धावस्था
अथवा ऊषा और प्रात विच
रेखा-सी धूमिल तम की
किंवा दो गतियों के अन्तर
में वह श्वास परिश्रम की;
के मध्य सुमित्रा
यों शोभित हो गई भली
ज्यों दो चंचल मायाओं को
संग लिए करुणा निकली ।
थी;
३०५<noinclude></noinclude>
2upka32it9cxldnqrhy87m2ubqdr1od
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२७२
अंचल पकड़, दूगंचल नत कर
शरमाए, कुछ हिचके से, -
कुछ श्रातुर से, कुछ गंभीर से,
कुछ-कुछ मन में झिझके से-
प्रार्य राम बोले धीरे से
वचन करुण रस
लिपटाने ;
ज्यों संकुचित कृतज्ञ भाव वह,
बैठा हो कुछ सुलझाने;
एक-एक शब्दों में उमड़ीं
एक मॉल
आतुरताएं
कई-कई,
धीर सुमित्रा माँ
की स्मृतियाँ
मानों जागीं
२७३
नई-नई ।
"तुम से कहते. सकुचाता हूँ-
कुछ, हे तपस्विनी माता,
तुम ने छुटपन से ही धृति-मति
दी है, मनस्विनी माता,
३०६
वत्सलता
बैठ तुम्हारी गोदी कितना-
यह दुलार रस पान किया,
माँ, तव आँगन मचल मचल नित
का दान लिया;
रज-रंजित मुख तुमने चूमा,
दूध पिलाया ललक-ललक,
हम सब को जोहता रहा है
तंव वात्सल्य सजग, अपलक ।<noinclude></noinclude>
hsc7eu8gwasytxmnveny5sen1nvpimo
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
२७४
धूल भरे, खिसियान भरे, ये-
पग-रगड़ते राम-लक्ष्मण,-
आपस में नित उलभ-सुलभते
झगड़ते राम-लक्ष्मण-
लड़
'राजा बेटा राम'
तुम्हारा
औ तव 'बड़ा हठी' लक्ष्मण,
आज तुम्हारे
दिखलाता
द्वारे
श्राया
कौतुक - लक्षण,
अलख जगाते जोगीड़ों की
सब सज-धज साजे आए,
भीख मांगते, दौड़े अपनी-
माँ के दरवाजे आए ।
२७५
तुम अजस्र दानिनी, जननि, हैं-
बड़े भिखारी
हम
दोनों,
नित्य-नित्य भिक्षा लेते हैं,
पारी पारी
हम
अबकी लेने
भीख
तुम्हारी
दोनों;
हम दोनों सँग-सँग आए,
हे माँ देवि, तुम्हारे भिक्षुक
देखो तो क्या रंग लाए;
लज्जित हूँ, अति लज्जित हूँ, माँ,
क्या कह दूँ मैं, क्या न कहूँ,
श्री चरणों में विनय करूँ या,
माँ केवल में मौन रहूँ ?
३०७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२४
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>'ऊम्मिला
२७६
माँ, कितना यह आत्मनिरीक्षण,
जीवन का कितना अनुभव,
तव मानस मंडल में कितना
एकत्रित है
तुम ने अपनी इन आँखों से
क्या-क्या नहीं देख डाला ?
देखे कितने
देखीं स्थितियाँ
जीवन में मौलिकता है, या-
है केवल चर्वितचर्वण ?
तुम ही जानो हो कैसा है-
माता, यह
२७७
घटनाकर्षण ।
माँ, तुम चरम तपस्या रूपा,
परम भागवत भक्तिमयी,
आत्मसमर्पण की तुम प्रतिमा,
अनुरक्तिमयी ;
वत्सलता
पट-परिवर्तन,
विकराला;
जगद्धात्री तुम करुणामयि,
सृष्टि- पालिका अविचल हो,
समतामयी,
समन्यवरूपा,
दुख-सुख में तुम अविकल हो;
लय- संभव,
जननि, तुम्हारी मधुर गोद में
सुख-सपना दिन रैन
कितनी गहरी- गहरी
रहे,
बातें
तव अनबोले नैन कहें ।
३०८<noinclude></noinclude>
7ekicg8oxb47qs7s5wfem38dw5795an
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७८
जननि, अभी तक गूंज रही हैं
वे लोरियाँ कि 'मेरे बाल,
देखो वह निंदिया श्राई है
तुम्हें खिलाने,
मेरे लाल,
चन्दा मामा चुम्मी
चुम्मी देने
श्राया
होकर
हाल- विहाल,
सो जाओ मेरे लालन,
मम-
गोदी को तुम करो निहाल' ;
तृतीय सर्ग
एक बार फिर वह स्वर गा दो,
आज सुला दो सब संशय,
अपना अंचल
फैला दो, माँ,
कर दो हम को अजय, अभय ।
२७६
ठुमुक ठुमुक तुम आज नचा दो,
अपने ये नन्हे शिशु द्वय,
कर दो इनके चरण चलित तुम
आदर्शों की ओर अभय;
हिय थिरका दो, मन थिरका दो
कर दो हम सब को तन्मय,
अलख झलक झाँकी- दर्शन का
हिय में तुम भर दो निश्चय;
ये जाए कोख के तुम्हारे
प्राज हुए हैं यौवन-मय,
देखो, अपने शिशुओं की यह
क्रीड़ा दुग में भर विस्मय ।
३०१<noinclude></noinclude>
o3s5qcj7tnj03lzv7c626uv05qsscgi
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२६
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२८०
खेल अनेक खिलाने वाली,
लाड़-लड़ाने
वाली,
माँ,
हिय हुलसाने वाली, हँस-हँस,
गोद चढ़ाने
वाली, माँ,
ग्राज गोद से खिसक - खिसक कर
भाग रहे हैं बालक ये, -
यह भी प्राँख-मिचौनी
देखो,
माँ, सनेह प्रतिपालक हे;
अपने इन प्यारे वत्सों को
ओझल होने दो कुछ क्षण,
इसी व्याज से बहलाने दो
इन बच्चों को अपना मन ।
२८१
हे निष्ठुर जग की कोमलता,
हे सनेह की दीप-शिखे,
हे वत्सलता की स्रोतस्विनि,
जीवन-मंगलाम्बिके,
३१०
विश्व-सृजन की तीव्र वेदने,
जीवन धारण की संक्रान्ति,
मानवता के शैशव - मानस
की तुम, हे कल्लोलिनि भ्रान्ति,
तुम विषाद की मूक-व्यथा हो
चपल भाव की हे विश्रान्ति,
हे माँ, हे संसार जननि हे-
भ्रान्त जगत की चिर निर्भ्राति ।<noinclude></noinclude>
2gocd6om53qb8m6d725w7y2pp9avsmf
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
हे एकाक्षर
२८२
नाम धारिणी,
माँ, तुम हो कल्याणमयी,
प्रथमोच्चारण की प्रणोदना
की हो तुम चाहना नयी,
तुतली असंस्कृता वाणी की
हो तुम मुग्धा गुण
गरिमा,
आद्य शब्द संस्फुरण भाव की
तुम हो मूर्तिमती महिमा ;
मुसकाते अधरों से 'माँ' का
तरल लार-सा नाम चुआ,
थर-थर, लहर सिहर, अन्तर से
उद्गीरित यह नाम हुआ ।
२८३
माँ - शैशव की अश्रुधार से
बनी,
भरी मटुकिया सरस
माँ, -- खीके शिशु के रज-रंजन
से जिसकी सब गोद सनी;
क्षणिक हास के मृदु विलास से
उत्फुल्लिता सलौनी, माँ,
दुग्ध दान कर्त्री, पयस्विनी,
मथुरा, निरी अलौनी, माँ,
माँ, -- प्रबोध दायिनी, सुसंस्कृति-
शिक्षा की गुर्बाणी, माँ,
माँ, -- बालक की शब्द-दीनता
की अतुला मृदु वाणी, - माँ ।
३११<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
अश्रुनी,
२८४
मुसक्यान
कनी,
परिहास अनी, विगलित करुणा,
जग संचालक के हिय की तुम
वत्सलता - ग्राभा
मेघ खण्ड सी अमला, सजला,
सजग दामिनी सी चपला
मातृ-धर्म पालन में माँ, तुम-
अचल हिमांचल सी अचला;
गहर गंभीर मृदंग घोर-सी
मूर्ति सुक्षमता-सी
सेवा
सतत रक्षिका नभ मण्डल - सी
संलग्ना हो ममता-सी ।
२८५
संध्या के अश्वत्थ वृक्ष की,
डाली-सी तुम कूजित हो,
मुखरित, उत्फुल्लित प्रभात की
प्राची-सी तुम पूजित हो;
३१२
कितन पंछी अभय गोद में
करते हैं,
रैन बसेरा
प्रात, तुम्हारे स्मृति अम्बर में
कितने
ग्रान
विचरते हैं;
अरुणा,
सांझ प्रांत, दिन रात, तुम्हारा
ही तो एक
सहारा ह
भला-बुरा, जैसा ह वैसा
बालक सदा तुम्हारा ह ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३२९
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667071
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२८६
जननि, तुम्हारी मधुर लोरियाँ
जीवन-गायन गाती हैं,
कितनी करुणा, वत्सलता यह
कितनी व सरसाती हैं;
यह अभिशाप जगत सृजनन का
शुभ प्रसाद तुम ने माना,
पूर्ण श्रात्म-उत्सर्ग भाव को
ही तुम न सब कुछ जाना;
तृतीय सर्ग
जीवन के उत्क्रान्ति काल की
माँ, तुम हो अति मौन व्यथा,
शत शत शताब्दियों के पट पर
लिखी तुम्हारी अमिट कथा ।
२८७
तुम से अधिक व्यथा तत्त्वों का
और कौन है ज्ञाता, माँ ?
तुम हो करुण स्वरूपा, तुम हो
वेदना - लाता,
मौन
तुम हो महद् ब्रह्ममयि, जननी,
तुम हो ईश भक्ति-रूपा,
तुम जग की प्राधारभूत हो,
तुम हो प्रादि-शक्ति
तुम हो जीवन मरुस्थली की
कुसुमित लतिका रस-भरिता,
तुम जीवन उछालती-सी, माँ,
अवतरिता सरिता त्वरिता ।
रूपा,
माँ,
३१३<noinclude></noinclude>
6syt8w8t55tmoealigyjql64clh9pch
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
को कामछली
२८८
माँ के बिना असम्भव है जग,
से
सूना है, तम शोकित है,
माँ की नेह-दीप-बाती
सब जग मग आलोकित है;
माँ के झीने अंचल में हैं
टँकी हुई जीवन-स्मृतियाँ,
माँ की मीठी गोदी में हैं
उलभी शैशव की कृतियाँ
क्यों हो इतनी ऊँची तुम, माँ,
भेद तनिक यह खोलो तो,
किस पुनीत माटी से तुम को
गढ़ा ईश ने, बोलो तो ?
सांसारिक रू
लोक मारत,
रूप
३१४
बहू
२८६
माँ, मैं हूँ तब सुख का तस्कर,
ऊम्मिला का दाहक,
मानो मैं बन कर आया हूँ
व्यथा-वेदना का वाहक,
पर लक्ष्मण को अवध छोड़ना
यह तो कार्य कठिनतम है
लक्ष्मण हठी जनम के हैं, यह
जानो हो, माता मम हे !
वह लक्ष्मण का अतुल प्रेम,
वह-
कठिन नेम तुम जानो हो,
लक्ष्मण के आदर्श भाव को,
जननी, तुम पहचानो हो ।<noinclude></noinclude>
lp7p2svcz721do7ryy9amv9bqep34ss
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३१
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२६०
छोड़ा;
लोग कहेंगे : त्याग राम का,-
शासन- सिहासन
लोग कहेंगे : क्या निस्पृहता !
राजभोग से मुख मोड़ा,
पर यह कितने जानेंगे, माँ,
कि है त्याग की परिसीमा,-
जहाँ, राम के त्यागभाव की
गति भी नहीं पहुंचती, माँ,
तृतीय सर्ग
बहू ऊम्मिला
का मुख मण्डल
और तुम्हारे,
जननि, चरण,
रामचन्द्र के
त्याग-भाव को
कोई नहीं
लज्जित करते हैं क्षण-क्षण |
२१
राम नहीं, न यह सीता भी,
लखन न, नहीं तात दशरथ,-
परम पूजनीया कौशल्या
माँ भी नहीं, न बन्धु भरत, -
पहुँच पाते हैं
जहाँ तुम्हारा आसन है, -
वहाँ जहाँ ऊम्मिला बहू के,
करुण भाव का शासन है ;
यह ज्वलन्त बलिदान तुम्हारा
यह लोकोत्तर त्याग, जननि,
और कहाँ मिल सकता है यह
ध्रुव विराग अनुराग, जननि ।
३.१५<noinclude></noinclude>
fd3q3ht7pap7qg0yu0iohjjo3rwxvns
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२६२,
करुणा, दया, तितिक्षा, सेवा,
ये सब तव हिय-संगिनियाँ,
मौन-वेदना,
धीर - सान्त्वना
हैं तब तन-मन
तुम विरागिणी, भक्ति-रागिणी
तुम हो मूत्तिमती क्षमता,
तुम सनेह-रस-धारा हो, माँ,
तुम हो वत्सलता,
कैसे तुम से कहूँ कि वन को
जाने दो सिय-राम-लखन
?
तो नहीं कहूँगा, माँ, हो
ममता,
रंजिनियाँ;
चाहे
पितुराज्ञा-लंघन ।
२६३
यदि तुम चाहो, तो पितुराज्ञा
क्या ? जगपति की आज्ञा को-
राम करेगा लंघित, सब को,
दश सहस्र पितुराज्ञा को;
३१६
जननी तव संकेत मात्र पर
ये सब धर्म-कर्म-बन्धन,-
उन्मूलित कर सकता हूँ में,
कर सकता इनका भंजन । "
"बस, बस, मेरे वत्स,” सुमित्रा -
माता तब यों झट बोलीं,
ज्यों आतुर अभिव्यक्ति-भाव ने
निज स्वर-मंजूषा खोली ।<noinclude></noinclude>
o7mnjl3jfq7y019i8aw1fsv004bflwp
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२९४
"तुम ने मुझे निहाल कर दिया,
मेरे
लाल
राम
मेरे,
सूने मानस - नभ- मंडल
के ;
तुम
नव
मेघ- श्याम
मेरे,
तृतीय सर्ग
धन्य हुई पाकर में इतना-
यह विश्वास तुम्हारा लाल,
पर तुम यह क्या कहते हो, हे-
मेरे प्यारे भोले बाल ?
यह अगाध तव भक्ति-भाव, यह-
प्रेम-नेम-विश्वास
परम-
--
बलि जाऊँ, मेरे हिय को है
पहुँचाता सुख-शान्ति चरम ।
२६५
पर मैं कैसे कहूँ, कि तुम
पितुराज्ञा उल्लंघित कर दो ?
कैसे कहूँ धर्म पालन
अपने को वंचित कर दो ?
1
भवितव्यता अमिट है, यह वन-
गमन राम का लक्ष्मण का;
पालन तो निश्चय होगा ही,
सुत तव तात चरण-प्रण का ;
हम ? में, बहू ऊमिला, जीजी-
कौशल्या, सब सह लेंगी,
छाती पर पत्थर रख कर इस
अवधि अन्त तक रह लेंगी ।
.
से
३१७<noinclude></noinclude>
0ahp04vg2j7rhaden8h9ax2odx6qccg
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मला
२६६
कह लेंगी हम सब आपस में,
सब अपने जी की बातें,
सह लेंगी हम ज्यों-त्यों दुखकी
सब तीखी- तीखी
तुम्हें रोक रखना, हे लालन,
है यह चरम स्वार्थपरता,
घातें,
वह तो है कायरता, वह है-
नव सन्देश निरादरता ;
करो गमन वन, बन जोगी तुम
निर्जन- विचरण करो भले,
तव अनुगमन करण लक्ष्मण के-
मन की दुविधा हरो भले ।
२६७
वह सुनसान तान सुन
है क्रन्दन के गायन
पड़ती
की,
वत्स राम होने दो वन में
तुम लीला रामायण की ;
३१८
दो
इधर अवध में, करुण रुदन का
राग उठे तो उठने
गुरुजन-मातृ-पितृ-हृदयों
संचित निधियाँ लुटने दो,
की
जुट आने दो आज भीर तुम,
करुणामय सन्तापों की,
छिटकी है क्या छटा आज यह
जगपति के अभिशापों की ।<noinclude></noinclude>
dqs8uvy34qto88mtswi52vaadx2xjy7
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
२६८
किसने
भेद बनाए
हैं ये
के ?
जग में गायन- रोदन
दोनों ही तो हिय मन्थन के
फल हैं,
व्यथा-प्रणोदन के,
गायन सगुण, रुदन निर्गुण है,
दोनों ही में पीड़ा है,
दोनों ही हैं करुणा-रंजित,
दोनों में
रस-क्रीड़ा
है,
गायन में स्वर-गुण-बन्धन है,
कन्दन में है निर्गुण मुक्ति
हिय-विलाप ही से अभिभूता
होती है गायन की युक्ति ।
२६६
तान गीत की बंधी हुई है ;
गायन है
स्वर - दामोदर;
कन्दन- बन्धन हीन सदा है;
बहता मुक्त रुदन-निर्भर ;
स्वर - लहरों की सीमाओं से,
रोदन सर
गायन की
निर्मुक्त
सदा,
वह प्रकृत अवस्था
निःसीमा-संयुक्त
.
राम ललन मन हरण, आज है
स्वागत इस क्रन्दन-क्षण
स्वागत है रोदन का
के इस जनक विलक्षण
सदा,
का 1
गायन
का ।
३१६<noinclude></noinclude>
2jl0ts4mhdulow00zc8jtcnleox2jbu
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३००
जिस अन्तर से तुम रिपुसूदन--
लक्ष्मण भरत गीत
उस में क्रन्दन- व्यथा
निकला,
भरी है,
जो है अति अतीत, विकला,
में यह कैसे भूलूँ, लालन,
कि तुम आँसुों के फल हो,
दाहक प्रबल निदाघ प्रतीक्षा-
के तुम मम शीतल जल हो,
बिना रुदन के कब निकला है।
गायन फूटे कण्ठों से ?
वह तो सदा बहा है केवल,
दुख के लूटे कण्ठों से ।
३०१
राम, तुम्हारी मधुर कण्ठ-ध्वनि, -
इस के सुनने के पहले,
कितने रोने रोये ; पाया-
तुमको उनके बदले,
तब
३२०
पाकर तुम्हें निहाल हुई हम
माँएँ, दुख भूलीं अगले,
पर अँसुत्रों से सिचे खिंचे हो
तुम मम गायन- स्वन, पगले,
से हूँ
कर
मैं ;
करुणा की गहराई
लाई तुम्हें उठा
उसी गहनता में पाऊँगी
तुमको आज लुटा
कर मैं ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०२
जो क्रन्दन में गायन, गायन
में क्रन्दन अनुभूत करें,-
सत् - विद्, तत् -विद्, चिदानंद विद्
वे ही हैं प्रवधूत खरे;
की
तुम निर्जन में जनपद देखो,
भोग त्याग में तुम देखो;
सर्वेश्वर समझो, निःसाधन-
वन-वासी कर अपने को,
तृतीय सर्ग
हम माँएँ भी इस क्रन्दन में
गायन-अनुभव कर लेंगी,
तव विरहानल को, चन्दन, सम
हम निज हिय में भर लेंगी ।
३०३
मम मन में शून्यता, रिक्तता,
एकाकिनी व्यथा छाई,
सुनी-सुनी सी लगती है,
अवध की ठकुराई;
राम,
निरबलम्ब
आधार-शून्यता,
देखो,
जीवन में आई
चौथेपन में स्वावलम्ब
की
क्या ही यह लकुटी पाई !
तुम ने खूब परीक्षा लेने-
ठानी है, रामललन,
नई वयस में वन जाने की
निकली है यह नई चलन ।
३२१<noinclude></noinclude>
6k379sg7lpv0gfmdet199n39wqtgwqu
पृष्ठ:1924 हिन्दी कौमुदी अम्बिका प्रसाद वाजपेयी Hindi PDF.pdf/१०१
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/* अशोधित */ "विस्मयादिबोधक अव्यय । विस्मय, हर्ष, शोक, लज्जा, ग्लानि आदि भाव प्रकट करने वाले अव्यय विस्मयादिबोधक कहाते हैं। ' सम्वोधन करने के लिये हे, हो, अहो, भो, रे, रो, अरे, अ नजी, अये..." के साथ नया पृष्ठ बनाया
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="AKTBot" /></noinclude>विस्मयादिबोधक अव्यय ।
विस्मय, हर्ष, शोक, लज्जा, ग्लानि आदि भाव प्रकट करने
वाले अव्यय विस्मयादिबोधक कहाते हैं।
'
सम्वोधन करने के लिये हे, हो, अहो, भो, रे, रो, अरे, अ
नजी, अये आते हैं जैसे, हे राजा, हो भाई, श्री साधुमो,
रे बदमाश री लुखी, अजी हजरत, अये पाजी।
f
दर्प प्रकट करनेके लिये वा प्रशंसा में धन्य धन्य, जय जय,
वादवाह, शाबाश, अव्यय आते हैं।
शोक प्रकट करने लिये दा, हाय हाय, हाय देया, अह, ओफ
शोक, अफसोस अल्पयोंका प्रयोग होता है।
निरादर वा तुच्छता दिखाने के लिये छिः छिः, थूथु, धिक्कार,
धत, हुश, किशयोंका व्यवहार होता है ।
अभिवादन में प्रणाम, नमस्कार, सलाम, धन्दगी, जय
श्रीकृष्ण, रामराम, जयगोपाल, जुहार और आशीर्वादमें आशी.
र्वाद का आशीस, असोत, चिरजीव अव्यय रूपले आते हैं।
प्रार्थना करनेमें दुहाई अव्यय आता है।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊमिला
३०४
योगायोग हुआ यह कैसा ?
इस में है कल्याण चरम,
संभवतः हो इसी व्याज से, --
मानवता का त्राण परम
है.
बुद्धिग्राह्य है यह सब, लालन,
पर हिय में है मूक व्यथा,
यह वियोग पैदा करता
मन में एक अचूक व्यथा ;
सीता राम लखन विन चौदह-
बरस ? -- तड़प जाता है जिय ;
लाख-लाख समझाने पर भी
टूक-टूक होता है हिय ।
३०५
इसका क्या उपाय है ?
माता का यह हृदय विचित्र बड़ा,
सदा धड़कता ही रहता है
कर लो चाहे खूब कड़ा ;
३२२
तुम्हें नहीं रोकूंगी; जाने-
दूँगी में निर्जन वन में,
राम, कहो तो, माता हूँ या
निपट राक्षसी, इस क्षण में ?
रे
तू माँ के
हृदय, विरोधों-
का है तू आगार, अरे,
पसीजते पत्थर, धिक-धिक,
तेरा निष्ठुर प्यार अरे ।
रे,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३०६
प्यार बड़ा, सत्कार बड़ा, यह
लाड़, दुलार बड़ा कर के,-
तुम्हें विपिन में भेज रही हूँ
मैं हिय से झगड़ा कर के ;
वत्स, सिधारो तुम, मैं हिय से
यहाँ श्रकैले लड़ लूंगी;
जैसे-तैसे में निष्ठुर इस-
हिय से यहाँ झगड़ लंगी ;
तृतीय सर्ग
हिय-निस्पन्दन नहीं बनेगा,
वत्स, तुम्हारा पद-बन्धन,
विनिर्मुक्त, निर्वन्ध सिधारो
वन तुम, हे दशरथ नंदन ।
३०७
सुवन, तुम्हारी विकट प्रतीक्षा-
रीता;
में यौवन बीता
ढलती हुई वयस में पाया
तुम सम फल यह मन चीता;
सोच रही थी, जीवन विप मय
था, पर अब तो मधु
क्षण भर को भूली कि
एकरूप -मय विष-मय
खूब करा दी स्मृति तुम ने है।
प्रिय, इस निपट सत्यता की,
मैं मोहावृत्त हो भली थी
सुध इस नित्य तथ्यता की ।
--
मय है,
यहां तो
है,
३२३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३०८
सीमा सदा हुआ करती है,
लालन कष्ट सहन की भी,
जीवन में बांधी
सीमा दुःख-बहन
जाती है
की भी,
पर यह होता
वहां जहां हों
न्यारे न्यारे,
दुख, सुख ये
सीमा कैसी वहां जहां दुख,
पर सुख, सुख पर दुख वारें ?
इसीलिए अभिशाप रूप यह
जगपति ने वरदान दिया,
अथवा आर्य धर्म सैद्धान्तिक-
तत्वों का सम्मान
किया ।
३०६
दुख में दुख होता है; सुख में-
अनुभव होता है संतोष;
इस में मेरा दोष नहीं, मम-
मातृ-हृदय का है यह दोष;
३२४
प्राते देख तुम्हें सीता जब
उत्फुल्लित हो जाती है,
या ऊम्मिला, लखन के आगे
जब मुकुलित हो जाती है,
तब, हे वत्स, सुमित्रा का यह
हिय हो जाता है मुदमान;
और तुम्हारे बिना दिवस-क्षण
बन जाते हैं कल्प समान<noinclude></noinclude>
ssjrrt1s4cafgzbx9owmrnrvhwatroo
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१०
मां का मन ही ऐसा है, मैं-
कहो क्या करूं ? क्या न करूं ?
कैसे हिय को समझाऊं में ?
कैसे मन में
धैर्य धरूं ?
पर अतिरिक्त धैर्य के कोई
मार्ग न शेष रहा, हे राम,
ज्वाला प्लावन प्राज इधर को
सहसा प्रान वहा है, राम,
तृतीय सर्ग
तन-मन भस्म हो रहा है यह,
अंगारे जीवन-पथ में,
पर, इस से क्या ? नहीं करूंगी
अपना यह मस्तक नत मैं ।
३११
हँस हँस आज करुँगी स्वागत
ज्वाला का, अंगारों का,
हँस हँस भार उठाऊंगी इन-
विपदा के अम्बारों का,
धर्म-मार्ग से च्युत न करूंगी
तुम को, हे अच्युत लालन,
अवध उजाड़ो, विपिन बसाओ,
करो कर्म व्रत प्रतिपालन;
शंकर तुम, प्रलयंकर बन कर
बन में करो राम-लीला,
वत्स, लिए अपने सँग जाओ
अनुज लखन, सीता शीला ।
4
३२५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३१२
जीवन की थाली में कितनी
यह वेदना भरी है,
लाल,
छलक छलक पड़ती है, पथ में-
कैसे कोई रखे सँभाल ?
वत्स, धूम्र की कुंडलियां उठ-
अन्तर-तर से,
श्राती हैं
झर पड़ती हैं आँखें जैसें
सावन के मेघा बरसें,
सुनने वाला कौन रहेगा
याँ विलाप के बैनों
का ?
यहां रहेगा कौन
पोंछने
का ?
वाला प्रसू
प्रांसु नैनों
३१३
कुछ ऐसा है लिखा भाग में
कि यह रहे जीवन सूना,
कुछ ऐसा है योग कि मिलता-
रहा दुःख नित दिन दूना,
३२६
इधर-उधर टक्कर खाता, यह-
मन,
मंडाराता अकुलाता
जनपद में भी सदा करेगा
अनुभव भाव निपट निर्जन,
सीय लाडिली, राम दुलारे,
हे तुम मुझ निर्धन के घन
विजन सुखेन पधारो, मेरे
प्यारे सीता, राम, लखन ।<noinclude></noinclude>
pvmwet3guvskllvdkrxmy1on4z2jonb
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१४
सीते वेटी, तुम से मैं क्या
कहूँ ? जानती हो सब कुछ,
प्रकट करूँ में क्या हिय अपना
तृतीय सर्ग
तुम से नहीं छिपा अब कुछ,
ऐसे
रत्न बहू-बेटों
को
भेज रही हूँ निर्जन में,
फिर भी ये निर्मोही मेरे-
प्राण रमे हैं इस तन में,
बहू, कदाचित अभी और भी
कष्ट शेष है जीवन में,
यहां और भी कुछ अनर्थ ही
होगा इस चौथे पन में ।
३१५
पति परायणा, पतित पावना,
भक्ति भावना मृदु तुम हो,
स्नेहमयी, वात्सल्यमयी,
श्री-
राम-कामना मृदु तुम हो,
हो;
तुम नारी हो, तुम नारी की
हृदय - व्यथा से परिचित हो,
तुम हो करुणामयी, बहू, तुम
समवेदना अपरिमित
इस हिय में है अनिवर्चन मय,
जो कुछ वाङमय रहित, बहू,
है विश्वास, उसे समझोगी
तुम प्रति आदर सहित, बहू
!
३२७<noinclude></noinclude>
lrycz4brdi1j4b18p1f3bjp1m4m1ni8
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३१६
सदा पटा है तुम से मेरा
सौदा
में,
तुम हो एक ग्राहिका मेरी,
बहू, सहस्रों-लाखों
में ;
व्याकरणज्ञा हो अनबोली
भाषा की, तुम कल्याणी,
खूब समझती हो तुम छानी-
छानी
नयनों की
वाणी,
भाषा की, वाक्यों की, श्रुति की,
शब्दों की गति जहाँ नहीं,
सीते बेटी, सहज पहुँचती
है यह तव मति महा वहीं ।
३१७
हिय में जहाँ हो रहा है यह
हाहाकार प्रचंड, बहू,
जहाँ उठ रही है यह ज्वाला,
चंड,
ज्वलन्त, अखंड, बहू,
उस थल तक जा जा कर आतीं
लौट लौट शब्दावलियां,
जैस कुलस-झुलस जाती हों
खर निदाघ में नव कलियां,
निःशब्दता राज करती हो -
जहाँ, वहाँ कैसी अभिव्यक्ति ?
वहाँ पहुँच पाती है केवल
सह-अनुभूतिमयी अनुरक्ति |
३२८<noinclude></noinclude>
adc8wroflffvq4x12vfpwt34iqp0yf4
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
३१८
बहू, समझती हो तुम मेरे,
हिय की गहर गंभीर व्यथा
तुम से नहीं छिपी है, बेटी,
माँ के हिय की धीर-कथा,
.
इस असीम वेदना परिधि से
घिरी हुई हूँ, सीमित में,
अचरज है जीवित हूँ अब तक,
और रहूँगी जीवित मैं;
विधिना ने कठोरता-प्रतिनिधि
रूपा मुझे बना कर के,
धो डाले हैं अपने कर द्वय,
मम हिय में पाहून भर के ।
३१६
माएँ जिसे उठाए फिरतीं
प्रांखों में, हिय में, मन में,
कभी धूल भी नहीं लगी थी
जिस के उत्फुल्लित तन में,
वही बहू सीता सुकुमारी
घूमेगी अब
और सुमित्रा
निर्जन में,
राज करेगी
यहां महल के प्रांगन में,
बेटी,
हिय फट जाना था, पर है यह-
बड़ा कठोर हृदय,
इतिहासों में लिखी जा सकूँ,
हूँ में वह निर्दय, बेटी !"
३२६<noinclude></noinclude>
2xmhjgkny2gqz7lk613onwn49yfwi2q
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३२०
"श्रो माँ ! " अश्रु सनी सीता यों
'बोली व्यथा भरी वाणी,
"देवि, चिरन्तन सहन शीलता
की तुम
तुम हो चिर गुर्वाणी,
यों निज आत्म-प्रड़तान कर के
मुझको तुम लज्जित न करो,
ओ माँ, गहरे व्यथा - सिन्धु में
मुझे और मज्जित न करो;
इस अस्थिरतामयी अवध में
तुम हो एक, स्थिरा, अचला,
और दूसरी कौशल्या
हैं धृतिमती निपट अटला
२१३
माँ,
यह कोसल जन-पद जहाज है
क्षुब्ध वेदना सागर है,
- पार लगाने वाला तुम द्वय-
का यह हिय करुणाकर है,
३३०
तुम हो
ज्ञान- विदग्धा,
करुणामयी धीरता
तपस्विनी,
तव पद नख पर स्वयं तितिक्षा-
न्यौछावर
है, मनस्विनी,
पूज्य श्वसुर की दशा बड़ी ही
चिन्तनीय हैं, हे माता,
केवल तव
धीरता बन रही
है सब की चिन्ता - त्राता ।<noinclude></noinclude>
f5ddtnh47rnamdgtp021nvw8rufnkhh
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२२
मैं ने तुम से निज जननी का
प्यार, दुलार, लाड़, पाया,
मात, रही है सदा तुम्हारी
तृतीय सर्ग
मुझ
पर
वत्सल घन छाया,
एक प्रबोध बालिका से मैं,
युवती होकर बढ़ी यहाँ,
सासों की छाया में मैं श्री
राम चरण में चढ़ी यहाँ,
देवि तुम्हीं ने तो मुझ को यह
आत्मापर्ण का पाठ दिया,
और तुम्हीं ने मम मन-मन्दिर
का यह मुक्त कपाट किया ।
३२३
उसी तुम्हारी शिक्षा का यह-
परिपालन है विजन-गमन,
सदा प्रणोदक हैं
मेरे तो
तव श्री चरणों के
रज-कण,
उन्हें देख कर ही मम
मन में
होती है विराग की स्फूर्ति,
उन के दर्शन से होती है
आत्म-निवेदन-पूर्ति;
मेरी
ह माँ, उसी तुम्हारी पद-रज
का यह शुभ प्रसाद पा कर,
सीता, राम अनुगमन करती,
आज अयोध्या से बाहर ।
३३१<noinclude></noinclude>
7d1p7eedodnqo4iq5riiced3ybqvagi
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
अवधि - अन्त
३२४
माता, तुम प्रच्छेद्य कवच वह
अपने आशीर्वादों का,
पहनाओ अपने पुत्रों को,
भय न रहे अपवादों
मुझको दृढ़ता, स्थैर्य, अचलता-
का तुम, माँ, दे दो वरदान,
भर दो मेरे अंचल में, माँ,
शिव-संकल्प- रूप
में तव चरणों के
दर्शन कर फिर फूलूंगी,
एक बार फिर तव ग्रीवा में
डाल भुजाएँ भूलूंगी
३२५
राम विश्व-विजयी, भय किसका ?
हैं लक्ष्मण दुर्दान्त वली,
मेरे पीछे हैं देवर ; हैं
कल्याण;
का,
श्रागे
सीता - कान्त
बली;
३३२
संग संग हैं, जननि, हमारे-
तप साधन-सिद्धान्त
बली,
कैसे फिर हो सकते भौतिक
भय से हम आक्रान्त बली ?
आज हो रही है इस
में नैतिक उत्क्रान्ति
नगरी
भली,
हमें मिलेगी निश्चय वन की
डगरी में विश्रान्ति भली I<noinclude></noinclude>
jfy66zgz23unw1rvocogrqij8l2jjf0
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३४९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>तृतीय सर्ग
३२६
सिद्ध राम, साधक लक्ष्मण हैं,
में
साधना-रूप
निष्ठा,
अपरिग्रह की आज हमारे
कुल में हुई
नव प्रतिष्ठा,
राज छुटा, छुट गई भोग की
सकल वासना वह क्लिष्टा,
विजन मिला, हो गई हृदय में
त्याग-भावना
संश्लिष्टा ;
मुक्ति युक्ति मिल गई मधुर यह,
अपने आप बन्ध टूटे,
जननि, तुम्हारे राम, लखन ये-
भोग-भावना से छटे ।
रंग
३२७
मेरे पति, मेरे देवर ये,
विराग-त्याग रँग में,
देखूंगी सब कौतुक वन के
इन दोनों के सँग-सँग में ;
चौदह वर्षों का वन-अनुभव,
ले कर मैं घर आऊँगी,
माँ कितनी ही कौतुक मणियां
में अपने संग
देवि, तुम्हारी यह उच्छृंखल,
कुछ-कुछ यह अल्हड़ सीता,
हो आएगी बड़ी पंडिता
बड़ी ज्ञान-अनुभव-नीता
1.
लाऊँगी ;
३३३<noinclude></noinclude>
9eer7mmanp9ac49etzqc755k6gjp20r
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३२८
आकर तुम्हें सुनाऊँगी, माँ,
सब विचित्र वर्णन वन के
देवर के सब कार्य, और सब
कर्म-धर्म जीवन-धन के ;
हम तीनों की बाट जोहती-
रहना, तुम मत थकना, माँ,
तुम मेरी ऊम्मिला बहिन को
खूब सम्हाले रखना, माँ,
यह लक्ष्मण की कितनी प्यारी-
है, इसको तुम जानो हो;
और लखन से अधिक ऊम्मिला-
को हे माँ, तुम मानो हो ।
३२६
अभी, एक दिन, मुझ से हँस कर
लालन लक्ष्मण यों बोले:
भाभी, खूब ठगे तुम सब ने
माताओं
के मन भोले,
ऐन्द्रजालिकाएँ
मिमिला
मिमिला की
३३४
होती बड़ी कला वाली.
किन्तु देखने में तुम सब यों
लगती हो भोली-भाली I
राम, भरत, लक्ष्मण, रिपुसूदन
अब न कहीं के यहाँ रहे,
अब तुम सब बधुनों के आगे
हम बेटों की कौन कहे ?<noinclude></noinclude>
oijt7aqejsjzqmw08m1edaxf1734wed
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३०
मैं बोली कि ललन तुम लाए
हमें लूट मिथिलापुर
से,
अव यों बातें बना रहे हो
हुए ठग ठाकुर-से ?
ठगे
हम ने माता पिता छोड़ कर
ग्राकर यहाँ प्रवास किया,
अपना सद्म छोड़ कर, लालन,
इस तव गृह में वास किया
तृतीय सर्ग
फिर भी डाह कर रहे हो तुम
क्यों हम से ? कुछ न्याय करो ;
निष्ठुर युवक, युवतियों के प्रति
तुम यों मत अन्याय करो ।
३३१
तो बोले कि, डाह की क्या ?
मैं बात कर रहा मन्तर की,
निश्चय तुम सब जानों हो कुछ
घातें जन्तर-तन्तर की;
आर्य राम पर तुम ने पढ़ कर,
फूंकी कुछ पुड़िया ऐसी,
कि बस तुम्हारे कर में उनकी
वृत्ति हुई गुड़िया
भगत भरत भैया भी छोटी
भाभी के फरफन्द फँसे ;
और तुम्हारी विमल ऊम्मिला
ने मुझ पर छलछन्द कसे ।
जैसी,
३३५<noinclude></noinclude>
lzenbx8f7w6gjylehl4xf03mbgtifsl
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३३२
माताओं को उधर, सुतों को
इस दिशि सर करके तुम ने
सिक्का खूब जमाया सब के
हिय को हर करके तुम ने,
इसीलिए कहता हूँ, तुम सब
जादूगरनी हो, भाभी
सीख साख कुछ आई हो, तुम-
सब हिय-हरनी हो, भाभी,
मां, लल्ला की इन बातों से
चुना पड़ रहा मेह घना;
तुम जानो हो, विमल ऊम्मिला
पर उनका है नेह घना ।"
३३३
बहू, जानती हूँ, हैं हिय में,
कई कई मेरे
बातें
उठ उठ आती हैं संस्मृतियां
से नई-नई मेरे,
हिय
३३६
अब
पर उनके टटोलने को
श्रवसर नहीं रहा, बेटी
अतः ऊम्मिला से मैं ने अव-
तक कुछ नहीं कहा, बेटी,
इसके लिए पड़े हैं चौदह-
कोई,
वरस, नहीं जल्दी
देख परख लूंगी पीछे मैं
हिय की निधि धोई धोई ।<noinclude></noinclude>
i2jt5eu9r023rtqa90dvj7e5kedakxw
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३४
राम, नयन अभिराम, वत्स, तुम,
जलद श्याम, मेरे बारे,
जाओ करो सनाथ विपिन को
मेरी आंखों के तारे ;
ल
लक्ष्मण वत्स, कहूँ क्या तुम से ?
भार तुम्हारा गुरुतर है,
अपने पन को दिखलाने का
आया यह शुभ अवसर है;
तृतीय सर्ग
माम् विद्धि त्वम् जनकनन्दिनी,
रामं विद्धि दशरथं त्वम्;
विटवीं त्वमयोध्यानगरी,
-
गच्छ वनं त्वम् यथा सुखम् ।
३३५
वत्स, वन गमन के मिस मेरे
पय की आज परीक्षा है,
आज देखना है : कैसी
दुग्ध-धार की दीक्षा है,
एक बार पहले ही अध्वर-
नाशक दुष्ट-दलित कर के,
तुम दोनों ने दिखलाए हैं
कौतुक निज तीखे शर के,
किन्तु परीक्षा अब की, लक्ष्मण,
है दुस्तर है बहुत कड़ी,
पर मम पय-पोषिता तुम्हारी
बांहें भी हैं बड़ी-बड़ी ।
मम
३३७
पदावली<noinclude></noinclude>
3cs1g239jiiwopeo6ndjilhbx9sx4wi
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३३६
तुम आजानु बाहु, लालन मम,
जीवन के हो उजियारे,
शिव संकल्पमयी निष्ठा युत
विपिन सिधारो, हे
स्मरण रहे जीवन अशेष है,
मोह न झटका दे तुम को,
प्यारे !
जीवन की लालसा, मार्ग से
कहीं न भटका दे तुम को ;
मैं प्रसन्न हूँ,
आदर्शों पर
तुम को
न्यौछावर करके,
पूर्ण करो जीवन-सँदेस तुम,
लालन, अपना जी भर के ।
३३७
स्मरण रखो, सीता है रघुकुल-
की लज्जा, गौरव गरिमा,
और मातृ-शक्ति है तुम्हारे
लिए वत्स, सीता महिमा,
३३८
यदि सीता को, प्राण तुम्हारे-
रहते, ग्रांच लगी कुछ भी,
'तो तुम को कपूत समभूंगी
मुख देखूंगी मैं न
कभी ;
जाओ वन, ज्वलन्त आदर्शो-
" से उत्प्राणित हो
करके,
त्याग-तपस्या-रत हो जाओ,
ग्रहं भावना खो करके ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"माँ, देखोगी
३३८
दूध तुम्हारा
नहीं
लजाएगा
लक्ष्मण,
देकर अपने
प्राण
करेगा
वह आदर्शों का रक्षण,
जिस के बन्धु राम हों, जिसकी -
पूज्य सुमित्रा महतारी,
धिक् है वह, यदि प्राण-मोह में
पड़, बन जाए श्रविचारी;
तृतीय सगं
लक्षण आदर्श
एक-एक घूँट में तुम्हारे-
पय के, मैं ने अमृत पिया,
कैसे विचलित कर सकती है
मुझे मृत्यु की अनृत किया ?
३३६
जननि, तुम्हीं ने तो सिखलाया-
है कि मरण ही जीवन है,
लीलामय के प्रांगण में तो
प्राण-हरण ही जीवन है,
कहा तुम्हीं ने न था कि लो इन-
मृत्यु- गीत की कड़ियों में,
बन्धन-भंजन की घड़ियों में,
आत्मदान की लड़ियों में,
जीवन-स्वर, जीवन-क्षण, जीवन-
आज्ञापालक
पुत्र
मुक्ता, ये
हैं टँके हुए,
वैसे ही जैसे कि
शून्य में
सभी अंक हैं अँके
हुए ?
३३६<noinclude></noinclude>
59olyq6714oyy0684b6ia41uwx32rhi
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३४०
हे मेरी गुर्वीणि जननि, तव -
शिक्षा है अंकित उर में,
वैसे ही जैसे जग-पोषण
संचित है लघु गो-खुर में,
अवधि अन्त में देखोगी तुम
लक्ष्मण या तो लक्ष्मण है,
या पहुँचा है वहाँ जहाँ
की
स्थिति अज्ञेय, विलक्षण है ;
निश्चय जानो, दूध तुम्हारा -
लजाएगा लक्ष्मण,
नहीं
वरदे ! दो वरदान तुम्हारा
लक्ष्मण होवे शुभ लक्षण ।”
३४१
यों कह, श्रातुर हो लक्ष्मण ने
थामें माँ के पूज्य चरण,
और चरण कमलों में कर दी
भक्ति-अश्रु की निधि अपर्ण ;
३४०
उठा लिया माँ ने, छाती में भर
गोदी में बिठा लिया,
फिर कॅपते-कँपते शब्दों 'में
उन को आशीर्वाद दिया ;
माँ के प्राशीर्वादों से सिय-
राम-लखन अभिषिक्त हुए;
विपिन चले हिय- घर्षण - चन्दन
से प्रचित, संलिप्त हुए ।<noinclude></noinclude>
4xag93jrvqx46ta7f4zoybbr8c7u65x
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>भर दो, माँ, भर दो अन्तर तर,
तृतीय सर्ग
तव वेदना, व्यथा, करुणा से, आप्लावित कर दो अभ्यन्तर,
भर दो, माँ, भर दो ग्रन्तर तर ।
इति श्री तृतीय सर्ग
श्री लक्ष्मणार्पणमस्तु ।
३४१<noinclude></noinclude>
4k4l1ghmbnrfexcx27uip31pa4pjadk
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५८
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667103
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude>
2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३५९
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अथ श्री चतुर्थ सर्ग
विरह मीमांसा<noinclude></noinclude>
8hm0zaud96jkav4qx0qsewnvtyt8bqm
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६०
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
अधरों की
आन्दोलित
निर्गुणता
हृदय-स्पन्दन- रण
१
वरणावृतकर,
अपना, -
अर्धोन्मीलित नयनों में,
भर विश्व-व्यथा का सपना-
स्मिति-रेखा से,
कम्पन, -
करता
क्षण-संक्रम
छुटवाता
परिरम्भण,
हिय अवलम्बन, -
है ऐसा
कौन खिलाड़ी
करता जो यों मनमानी ?
जिस ने संघर्ष दिया, वह-
है कौन
वेदना- दानी ?
२
-
अस्तित्व, तक,
वेदना, रई
हिय, मटुकी,
गति
चलिता,
श्राकर्षण, रज्जु
बना है,
छलकीं बूंदें रस गलिता ;
३४४
किस के अदृष्ट हाथों ने
?
यह मन्थन-दंड सम्हाला
यह चिर मन्थन का किस ने,
शाप दे डाला ?
वरदान
मथ सृष्टि-तत्व को किस ने
करुणा-नवनीत निकाला ?
किस ने रस-दान दिया यह
नित नया, अतीत, निराला ?
.<noinclude></noinclude>
33hp7drkg38r7qcvtnbd124jg4xmjhm
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३
जग हृदय अकारण यों हीं
करता रहता हा, हा, हा,
कुछ है जिसके पाने को,
जग होता है नित स्वाहा ;
व्रण है गहरा,
कसके है,
धरने को मिला. न फाहा,
कुछ ज्ञात नहीं वह क्या है,
चतुर्थ सर्ग
व्रण का अंजन मन चाहा ?
कुछ है, है कहीं, कहाँ है ?
क्या है ? है कितना ? कैसा ?
जिन ने पाया वे कहते :
है वह बस इतना, ऐसा ।
४
अति रिक्त- रिक्त-सा हिय है,
सूना सूना जीवन
है,
सूना ही जीवन-पथ
है,
सूने जीवन के क्षण
अस्तित्व-विटप, करुणा से-
हैं ;
नित सींच रहा है
कोई,
पर-
कलिकाएँ
धोई धोई ;
फूली जीवन - टहनी
जगती का यह कौतुक लख,
जगती की आँखें रोई ;
जग गई हिये में सहसा
करुणा कुछ खोई-खोई
1
३४५<noinclude></noinclude>
mbsseiwevlfu9wrfcdxkmogz198dtnr
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५
कोई दे रहा यहाँ पर
जीवन में एक
उलहना,
बोलो तो, जग में कब तक-
होगा एकाकी रहना ?
हो बड़े ढूँढने वाले,
देखें, ढूंढो हम
को तो,
हम यहीं छिपे हैं तुम में,
तुम देखो, कुछ दमको तो ;
अवगुंठन तनिक हटा
तो
दो,
;
कुछ दूर करो तम को
हम को पाओगे बरबस,
तुम अन्तर में चमको तो ।
६
ये युग पर युग बीते हैं,
कुछ खोज रहा है प्राणी,
तुम कैसे ? छिपे किधर हो ?
हो कहाँ, वेदना-दानी ?
अस्तित्व विहग यह जब से-
जग का हो गया निराला,
जिस क्षण से अवश हुआ है,
जग
श्रहं भावना
वाला,-
३४६
समाया
जब से यह द्वैत
जगती के अन्तर तर में,
तब से मँडराती करुणा
सब के मानस-अम्बर में ।<noinclude></noinclude>
qympmyuatb9dtnzgeh9jjcl2vvef691
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सुन रहा जगत है कब से
युग-युग की व्यथा-कहानी,
कब से मँडारती है यह
आतुरता
छानी छानी;
चतुथ स
उद्भ्रान्त
जग भूल
वृत्तियाँ
आई',
गया अपने को,
पागल-सा फिरता, जब से -
सच्चा
समझा सपने
को;
अपने को सपने में खो,
लुट गया जगत मतवाला,
चढ़ गई बहुत ही गहरी
अस्तित्त्व-रूप की
होला ।
द
है बस, इतनी
चेतनता :
वह ढूंढ रहा धन अपना,
है भूला नहीं अभी तक,
अज्ञात नाम का जपना ;
इस मद में भी तो उसको
वेदना सताती रहती,
भटकाती है वह निशि दिन,
अन्तस्तल रहती
पीतम के इस बिछुड़न की,
वेदना बड़ी गहरी है;
स्वप्निल अतीत की संस्मृति,
आकर्षक है, जहरी है ।
दहती ;
३४७<noinclude></noinclude>
5wd4itkpx6ijh2p4q7c401d516yycum
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
जग में, प्रशान्त निर्गति से-
गति आविर्भूत हुई है,
उस क्षण से प्रति श्रणु-कण में,
वेदना प्रसूत हुई है ;
अव्यक्त भाव से जग यह
जिस क्षण से व्यक्त हुआ है,
यह विश्व ईश के हिय से-
जिस क्षण से व्यक्त हुआ है,
उस दिन से उस ही क्षण से,
उट्ठी ह व्यथा पुरानी,
प्रणु-अणु में समा गई है,
यह
विरह-वेदना-रानी
१०
जग को विभु ने अपने से
है अलग किया जिस दिन से,
पुनर्मिलन उत्कंठा
यह
हिय में उमड़ी उस छिन से ;
मन
में,
है,
३४८
है असन्तोष-सा
कुछ असम्पूर्णता-सी
परितृप्ति नहीं मिलती है,
याञ्चामोघा- सी है ;
यह
मानो सालस हाथों
से,
उड़ जायँ अचानक तोते ;
ज्यों लुटें सुसंचित निधियाँ,
सब रहें नींद में
सोते ।<noinclude></noinclude>
nl101lzl8bgyebbejrq5m1ez4kn48yf
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६५
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667110
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चतुर्थ सर्ग
११
अक्षर से क्षर
प्रकटा है,
निर्गुण से
हुआ है,
वह एक अनेक बना है,
वह विगुण, सुनिपुण हुआ है,
सगुण
अब सगुण, ग्रगुण
होने को -,
यों अकुलाता है
छिन छिन,
क्षर, अक्षर में मिलने को
दिन बिता रहा है गिन-गिन,
अपना पन पा जाने की,
है यही एक आकुलता,
खट-खट निशि-दिन होती है,
देखें यह पट कब खुलता ?
१२
रह रह कर कोई गायक,
मन में स्वर सींच रहा है,
तम्बूरे
के तारों को,
छिन छिन
में खींच रहा है,
स्वर - साम्य
नहीं मिल
पाता,
ढीली
खूँटियाँ पड़ी
हैं;
है तारतम्य बिखरा सा,
दरकी तूंबी, लकड़ी
स्वर - तान कहां से उठे ?
स्वर-साधन रंच नहीं है,
सुस्वर वह नहीं निकलता,
केवल वेदना यही है I
है;
३४६<noinclude></noinclude>
gyre0unexv67a8qa36furxwhw23fbtk
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६६
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१३
श्रचरों में व्यथा
चिर आकर्षण मिस,
सचरों में करुणा
भरी है,
विभु ने,
फूँकी,
इस संघर्षण मिस, विभु ने,
जड़ में भर दी है करुणा,
अणु को गति-बन्धन दे कर,
चेतन में व्यथा
जीवन- निस्पन्दन
अब अखिल विश्व में प्रति छिन,
यह हाहाकार मचा है
लीलामय ने यह नाटक
क्या ही प्रदभुत विरचा है !
१४
घन उमड़ें - हिय भी उमड़े,
बरसें, -- प्रांखें
घन
बरसें,
लू चले हृदय में तब, जब-
जड़ जग निदाघ में तरसे;
३५०
उँडेली,
देकर,
क्या ही विभु ने भेजा है-
यह अपरस्पर अवलम्बन,
जड़-चेतन का प्रकटा है,
आलिंगन, मुद परिरम्भण ;
पर,
प्यास नहीं बुझती है,
लग रही आस की फाँसी,
आ जाओ, अलख खिलाड़ी,
तुम डाले गलबहियां सी ।<noinclude></noinclude>
mp3cwwxbohm62v5moxamlmnc324qjj3
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६७
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>जड़ जग का
१५
सारा वैभव
चतुर्थ सर्ग
चेतन ने प्रकट
किया है,
चेतन को
स्थिर
अवलम्बन
जड़ जग ने
यहां दिया है,
फिर भी न तोष पाया इन-
आदानों प्रति दानों से,
सन्तुष्टि
नहीं हो
आपस के
पाई
सम्मानों से
रह गई प्रतुष्ट
पिपासा,
है हूक उठ चली हिय की,
यह हूक मिटेगी तब, जब,
मूरत देखेंगे पिय की ।
१६
कलियाँ रोतीं
टहनी पे,
रोते
प्रसून डाली पे,
पत्तियाँ बिलखती हैं
ये
बेलों की
प्रति जाली पे
लतिकाएँ
रो-रो गिरती
विटपों के वक्ष स्थल पर,
झर रहे ओस
के आंसू
सिंचा
करुणा- जल
वन उपवन में छल-छल कर ;
1
हुआ है
जग की
क्यारी- क्यारी
में,
है भरा व्यथा का
इस जीवन की भारी में
पानी
1
३५१<noinclude></noinclude>
78xfhtqig6pv1e3a98m7g3st5rm0w5o
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिल
१७
जब अनिल
सिसकती
प्राती
पूछने बात कलियों की,
तब व्यथा सुना जाती है
वह जग की सब गलियों की;
तृण, पर्ण, प्रसून, विटप, दल,
सुनते हैं
व्यथा-कहानी,
सुन
कर वे
ढरकाते हैं
अपनी
अपने अन्तर का पानी ;
स्वीकृति देते हैं,
डुल-डुल कर मन्द पवन में
करुणा ही करुणा रहती,
है गृह, वन में, उपवन में।
१८
जीवन की सिसक भरी है।
तरु में, गुल्मों में,
तृण में,
ज्यों कसक भरी रहती है
गहरे पीड़ामय व्रण में,
प्रच्छन्न प्रेरणा
३५२
बन
के
छिन छिन में उठ
उठ प्रती
तरु में
जीवन - रस
बन के,
वह
पर्णो में
लहराती,
कोंपल बन-बन कर फूट
जीवन की सिसक रसीली,
बन गई बेल, वल्लरियां,
कलिका बन गई लजीली ।<noinclude></noinclude>
ju4c5xseouzijdl1dn63uidweqhhmkc
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३६९
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६
पतझड़ में प्ररुभानी-सी,
नव द्रुम-दल में उलझी-सी,
वेदना नित्य जीवन की,
सुलझी सुलभी
श्राई
सी
वल्कल के अन्तर-तर
रस-गति संभूत हुई
रस-आरोहण के
में,
है,
चतुर्थ सर्ग
वेदना
मिस से
प्रसूत हुई है ;
जीवन की पैनी
पैनी-
नन्हीं-नन्हीं-सी
सुइयाँ,
चुभ गईं सृष्टि के हिय में,
झर उठीं विथा की फुहियाँ ।
अटकी
२०
विकास-उत्कंठा-
कलियों के प्रस्फुट उर में,
ज्यों गमन-लालसा उलझे
पिय
के झंकृत
कुसुमों के फूले हिय से
आंसू भर रहे व्यथा के,
कुछ अकथ कथा
कहते हैं,
ग्राडोलित पर्ण
लता के ;
है चिर
वियोग-दुख अंकित
द्रुम की पत्ती-पत्ती में,
है भरी व्यथा फूलों
रज
की रत्ती रत्ती
की
नुपूर में,
में !
३५३<noinclude></noinclude>
1067p17bit07san19b1l4jhoy88sx32
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊमिला
२१
उद्ग्रीव हुए, आतुर से,
तरु किसको बुला रहे ये ?
निमंत्रण
कुछ सैन
देते,
क्यों बाहें डुला रहे ये ?
है कौन
पाहुना जिसकी
हिय बीच
प्रतीक्षा धारे,
हैं खड़े खड़े कब से ये,
मुरझाए विटप बिचारे !
इन
को
आमंत्रण देते
हैं वर्ष
सहस्रों
बीते,
पर आए नहीं, अभी तक
वे निठुर अतिथि मनचीते ।
२२
आतुरता
लिए पधारीं
नवेली,
सज-सज पत्तियाँ
हैं नृत्य कर रहीं कब से
अकुलाती
नव अभिसारिका बनीं ये
यहां अकेली,
द्रुत पवन-यान पे
चढ़ के,
पिय को ढूंढने
चली हैं,
उड़-उड़ दिन में पतझड़ के,
३५४
ससुराल
बिछुड़ीं
पत्तियाँ
चल
दीं
से,
शाखा -जननी
पर मिल पाईं न अभी तक
अपने पिय सजन धनी से ।<noinclude></noinclude>
ks6c2tnu66cgzb12n9518mpz0zblpip
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७१
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३
शाखाओं
से
हहराती
बह रही
निमंत्रण
करुणा,
चतुर्थ सग
नव किसलय दल के मिस से
कँप उठी वेदना अरुणा,
यह जीवन-सिसक निराली
अभिव्यक्त हो उठी छिन छिन,
यह क्षणिक चेतना रोई
पूरन अनन्त जीवन बिन,
चिर जीवन का आवाहन
करते शतियां बीती हैं,
वृक्षों पत्तों को आहे-
भरते शतियां बीती हैं
२४
कोयलिया
विरह-भरी -सी
विष बुझे बोल बोले है,
वह कुऊ कुऊ के
मिस से
नभ में करुणा
घोले है,
अन्तस्तल
की ज्वाला से
पड़
गई कोकिला
काली
उस कूक-हूक
से कांपी
सब आमों की हरियाली,
उमड़ी कोयल कंठों से
पिय-मिलन- बिथा मतवाली,
पत्तियां कँप उठीं रह-रह
सिहरी प्रति डाली-डाली
1
३५५<noinclude></noinclude>
6wfbqfwk5slnprx4825prl2pwzqvz6s
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
रो-रोकर
यह
काग
२५
बिलख
कां-यो कां हो !
यह भेद नैक
की-की, कहां-कहां में
बीतता जाता,
इस
सब
समय
आशा कह रही कि पीतम
अब आता है, अब श्राता,
इस अब अब की जब तब में,
लगभग सब जीवन बीता,
जब तनिक टटोला हिय को
पाया रीता का रीता
२६
विहगों के कल कूजन से
हिय करुणा उमड़ रही है,
पंखों के फैलाने में
श्रातुरता घुमड़ रही है,
३५.६
उनको चटपटी लगी है
साजन के दरस परस की,
हिय के निस्पन्दन के मिस
की करुणा कसकी,
अन्तर
है नित अनन्त
रहा है
दरद - दीवाना,
तुम निष्ठुर,
बतलाना,
जीवन वह
जिसकी, -
सुषमा पाने को
जग भर की विहगावलियाँ
कूजन मिस रोई सिसकीं।<noinclude></noinclude>
gq1pda8rpxfd9mse4sx6lq7ldweeevr
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७३
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अन्वेषण
२७
खंजन न फुदक प्रकट की
मय आकुलता,
प्रकटी
मयूर पंखों
स
दुख की
चित्रित संकुलता,
प्रकटी
कपोत- कूजन
में
आकंठ
व्यथा-मंजुलता,
मैना
ने
निज
चतुर्थ सर्ग
वह
अमित प्रकट की
अहं स्वभाव-विफलता,
कह के भी मैना, मैं-ना,
खोई तन्मयी मृदुलता,
कर दी विनष्ट क्षण भर में,
अपनी वह परम अतुलता ।
२८
खंजन चंचलता प्रकटी
अंजलिगत
चल पारद सी,
कुछ लगी ढूंढने रह-रह
वह आतुर विकल दरद सी,
छिन उलझी कुछ दानों में,
वह छिन ठिठकी छिन अटकी
छिन इधर, छिन उधर फुदकी
छिन यहाँ छिन वहाँ भटकी,
घड़ी-घड़ी
कुछ ढूंढ रही
'
अकुलाती,
हिय- रंजन,
पर पा न सकी वह अब तक
निज खंजन-रूप निरंजन
३५७<noinclude></noinclude>
9002kfmx4iaux9kqhl5xbzjej4ffj33
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७४
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
श्राँखों
आंसू - लड़ियां
२६
केकावलियाँ सब नाचीं
धन-गर्जन की ध्वनि सुन के,
डग मग पग थिरक उठीं वे,
हिय थिरक उठे सब उनके,
से खूब लुटाई
चुन-चुन के,
युग-युग । से नाँच रहे हैं,
अकुलाए
हैं मोर बड़े ही
धुन के,
हैं
दर्शन को
नृत्य- निपुण
के,
वे सब उस
जिस ने लघु जीवन दे कर,
बांधे दृढ़ बंध त्रिगुण के ।
कबूतर
३०
दिन
रैन
कहते
the
कंठों
से
वेदना
हैं
व्यथा
अपनी
गुटुर - कहानी,
छलकाते
हैं
अनजानी,
जीवन के वाण लगे हैं,
हो रही यहाँ
मनमानी,
३५८
कुछ भेद न खुल पाया है,
हें यां सब बातें छानी,
यह भेद भरम
क्या समझें
मूरख कपोत अज्ञानी ?
पर, व्यथा प्रकट करती है.
यह गुटुर गुटुर मय वाणी ।<noinclude></noinclude>
ibb24erlux5a8zlxtzbpwtn1jivu3bq
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३१
कहती है छद्म कहानी,
मैंना मैं-ना
कह-कह
के,
यदि तू है 'ना' तब फिर क्यों-
कहती 'मैं' ना रह-रह के ?
पिय से विरहित हो 'मैं' के
धक्के खाए सह-सह के,
क्यों खोया निज को 'मैं' की
इस सरिता में बह वह के ?
पड़ कर 'मैं' के
अलबेला
पीतम
चतुर्थ सर्ग
फन्दे में
खोया,
बस उसी घड़ी से निशि-दिन
हिय रोया,
मानस रोया ।
३२
सन्ध्या के श्यामल क्षण में
चिर दीप शिखा-सी
जलती,
जड़ता के
काले
तल म
जीवन की सिसक
उछलती,
सन्ध्या
अँधियाले
आ
फैलाती है
रँग का अंचल,
उस में
भर देता
कोई
अचंचल,
गहरी वेदना
चल मन्द समीरण के मिस
कँप उठते हैं सूने क्षण,
अस्तित्व-व्यथा से कम्पित
होते वसुधा के कण-कण
।
३५६<noinclude></noinclude>
p56954er44pqijawo8ckcy1rvnnouij
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३३
समय में कोई
नीरव
गायन
गाता
है,
मानस-दिङ मंडल
को यह
कम्पित करता
जाता
है
लाता
है
कहाँ-कहाँ
से
स्वर - सामंजस्य
निराला ?
ऐसा स्वर फूँक रहा है,
छाले पर छाला,
पड़ता
भर दे, हाँ, निर्दय भर दे,
तू रिक्त हृदय में
करुणा,
अँधिश्रारे में उसका दे
तू दीपशिखा वह अरुणा
३४
छिन्नाभ्र,
लालिमा रंजित
नभ-बीच डोलता रहता,
मानो क्षत, भ्रमित पथिक-सा
वह पथ टटोलता रहता,
३६०
या सई साँझ वह नभ में
मन लगन रोलता रहता,
अथवा दिनमणि किरणों का
सिन्दूर घोलता रहता,
प्रति सन्ध्या को नभ स्थल में
बादल की नित की क्रीड़ा,
बरसाती ही रहती है
तन मन की आकुल पीड़ा ।<noinclude></noinclude>
6g4p19919pksu1kcpnv2bkyn2otspzs
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सन्ध्या
३५
क्या ग्राती मानो
ढल जाता यौवन दिन का,
काला सा पड़
जाता है
चम चम उजियाला छिन का,
सन्ध्या
बटोर
लाती
है
दिन की स्मृति ग्रह-भरी-सी,
चतुथ स
उजियाली-सी,
गोरी-सी,
सुख - संस्मृति - चाह - भरी सी
-
सन्ध्या के अनु-अनु छिन क
इस
हैं
गुंथे हुए धागे में,
टॅकी सुसंस्मृति-मणियाँ
क्षण
के काले तागे में ।
३६ J
उजियाले
को
अँधियाला
आ ढँक लेता है ऐसे,
श्यामल अंचल ढकता है
सुकुमार
गौर
मुख
जैसे,
झीने
उजियाली बिथा चमकती,
अँधियाले पर
से
ज्यों
दर्शन आतुर
घूंघट
"की ओट
दमकतीं,
गहरा होता
जाता
है
छिन छिन अँधियाला जग में,
ज्यों घिरती निपट निराशा
प्रेम-प्रतीक्षा- मग में
चिर
३६१<noinclude></noinclude>
5t2ps3bex4wzhhu9l11y5few6y35vpa
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
इन
हिय- तल
३७
सूने-सूने
4
क्षण में
मन में खुटखुट होती है,
आकांक्षा || निरी
अकेली
भोली लुट-लुट रोती है,
नित घनी साँझ की बेला
कोई डाकू आता है,
बटमार निपट सूने में
सब कुछ लूटे जाता है,
अकुलाता रहता
सन्ध्या के प्रति पल-पल में,
अँधियाला बिम्बित होता
लोचन के कम्पित जल में ।
३८
धूमिल - सा
होता जाता
इस नभ का नीला अम्बर,
आती हैं पहन-पहन ये
दिग्वधुएँ श्याम दिगम्बर,
३६२
दुख भरी निराशा-सी कुछ,
कुछ भ्रान्त श्रान्त आशा-सी,
मन- नभ में छा जाती है
कुछ क्लान्ति, मूक भाषा-सी,
सन्ध्या के इस अंचल में,
कम्पित-सी, अश्रु- सनी-सी,
ना जानें किसने भर दी,
यह इतनी व्यथा घनी-सी ?<noinclude></noinclude>
6trod855u3z1oxcvzpe8578l9ksqo51
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३७९
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667124
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चतुर्थ सर्ग
३६
सन्ध्या को थपकी
दे के
चुपके से गोद
सुलाती,
आती है करुण
तमिस्रा
निज
अंचल-छोर
डुलाती,
निशि के अँधियारे में है
संचित दुख की
परछाई,
चुपके
इस घनी कालिमा में है
चिर विप्रयोग की भाई,
जल भुन कर ज्योति-विरह से
पड़ गया अँधेरा काला,
पर कहीं न दीखा अब तक
अँधियारे में उजियाला
४०
रह-रह कर नभ-मंडल
1
में
उडुगण चमके कैंप-कैंप के
अथवा दुख-भरी निशा
के
दुख के सब छाले तपके,
इस धीर पवन के मिस से
यह पुंज उठा ग्रहों का,
अँधियारे
के मिस आया
यह दल निराश चाहों का,
श्रोसों के आँसू
के रतियाँ रोई,
निःशब्द, मौनमय क्षण में
अपनी सुधबुध सब खोई ।
ढरका
.३६३<noinclude></noinclude>
1f7ya4i405jfhns5fmnrace6avx4qnz
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८०
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४१
1
जब पूर्व- निशा यह परिणत-
जाती अर्ध-निशा में,
हो
तब
हृदय-वेदना आकुल
मँडराती सकल दिशा में,
अवलम्ब ढूंढती फिरती
है निरवलम्ब लघु आशा,
अँधियारे में मिलती है
उसको नित निपट निराशा,
प्रति श्रान्त, निशा पगली-सी,
यह मार्ग-क्रमण करती है,
चिर अभिसारिका बनी यह
उद्भ्रान्त भ्रमण करती है ।
४२
भींजी है प्रोस कणों से,
यह
अर्ध-रात्रि दुखियारी,
चू-चू
उसकी
३६४
कर टपक रही है
अँधियारी सारी,
पीतम की मगन लगन म
रात्रि ने बिता दी घड़ियां,
रो रोकर खूब भिगोई
समय-श खला - कड़ियाँ,
सब
पर जिस ने दिन- छिन दे कर
यह दिया. रात को ताना,
ढूंढे भी मिला न अब तक
अलबेला मस्ताना ।
वह<noinclude></noinclude>
khaur1x5f4s68axpx67g43bg3wdmt5e
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ना.
४३
जाने कहाँ छिपा है ?
है कहाँ पिऊ की बस्ती ?
कण-कण क्षण-क्षण जन-मन में,
सुनते हैं उसकी हस्ती,
पर हाय,
हा,
द्वैत-अवगुंठन
अपनेपन की मस्ती,
जग गहरी ढाल चुका है
हस्ती की
हाँ,
मदिरा सस्ती,
चतुर्थ सर्ग
इसीलिए तो रातें-
ये, बुला-बुला कर हारीं,
पर अब तक वह न मिला है,
थक बैठीं खोज
जव
४४
विचारी ।
कभी-कभी आती है
निशि पहिन चाँदनी साड़ी,
तब और दूर हो जाता
वह पीतम अलख खिलाड़ी,
हाँ, इसीलिए उजियाली-
रातों में विधा बढ़े हैं,
ज्योत्स्ना में, इसीलिए
यह दूना जहर चढ़े
निशि ढूंढ रही है पिय को
ममता की ज्योति जगा कर,
पर, वह मिलता है उस क्षण
जब ढूंढो स्वयं ठगा कर ।
तो,
है,
३६५<noinclude></noinclude>
llwyye4elcg5s1335y4eq326l5pjkps
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८२
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667127
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४५
वह रति-रस-गोप्ता,
वह प्रीति रीति-रत,
वह
वह
शाश्वत,
मानी,
प्रेम-नेम-निर्माता,
अलख-वेदना- दानी,
वह, जो चोटों पर चोटें
देता है छानी-छानी,
वह, जिसकी टेव
यही है,
युग-युग की बड़ी
वह कब मिलने वाला है
अहमस्मि रूप-ज्योत्स्ना में ?
वह तो छिटेगा आके
सोऽहं-अनूप-ज्योत्स्ना में ।
४६
निशि की अपनी उजियारी,
निशि की अपनी अँधियारी,
नित उसको ढूंढ रही हैं,
ये
दोनों
ना
पारी- पारी,
जाने
पुरानी,
कितने-कितने
ये युग अनन्त बीते हैं ?
पर अब तक पड़े हुए सब,
क्षण, पलक,
हस्त, रीते हैं
है विरह कथा
अन्वेषण-कथा
यह लम्बी,
पुरानी,
है प्रीति रहस्यमयी यह,
रस-सनी भाव अरुझानी
1
३६६<noinclude></noinclude>
17izs7s2jrl4ff0p744kd1t2hqofewr
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८३
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७
जब परिणत अपर निशा में
यह मध्य निशा हो जाती,
तब थकित यात्रिणी-सी वह
झुक कर कुछ-कुछ सो जाती,
यों ही
वह सहसा लुट
उत्सुक ऊषा
सोती-सोती-सी
जाती है,
की झाँई
नभ में जुट जुट आती है,
चतुर्थ सर्ग
ऊषा
निशि
का
निहारने लगती
अन्वेषण- सपना,
वह भी
विस्फारित नयना
ढूँढती
कलाधर
अपना ।
४८
ऊषा की उन श्राँखों में
है अचरज भी, वाञ्छा भी,
उन में चिर-जीवन भी है,
नवजीवन की याञ्चा भी,
जग मग निहार कर जग को
आश्चर्य भरा नैनों में
पाने
जग नायक के
का
श्रौत्सुक्य
भरा
बैनों
में,
ऊषा
जग नट-नागर
को
नित ढूंढ-ढूंढ
कर
हारी,
उत्कंठा
लिए
हिये
हिये में,
यों ही रह गई बिचारी ।
३६७<noinclude></noinclude>
czfgs1tyzmpxjwyc4mln4xa83f86bxi
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८४
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४६
ऊषा
के मंजुल
क्षण में
कौतुकमय
करुणा
छलकी,
प्रिय दर्शन
की
उत्कंठा
मानों
नयनों से
ढलकी,
लाली सी फैल गई कुछ,
उजियाली-सी
कुछ
छाई,
ज्यों शुभ्र वस्त्र पर, हिय ने-
ग्रारक्त फुई
जग कुछ चिंहुका, कुछ उझका,
कुछ झिका उन्निद्रित -सा,
कुछ लगा ढूंढने रह-रह,
सालस सा, कुछ तन्द्रित सा ।
५०
आता प्रभात कर में ले
रवि-दीप- श्रारती
थाली,
मुखरित हो उठती सहसा,
पत्ती
हर
३६८
डाली-डाली,
बरसाई,
करता आरती नियम से
प्रतिदिन यह सुभग सबेरा,
पर, उसे मिला न अभी तक
इस जग का चित्र-चितेरा !
यह व्यक्त सबेरा जिस दिन,
अव्यक्त काल हो लेगा,
उस दिन पिय को पाएगा,
जब अपना पन खो देगा ।<noinclude></noinclude>
1m3b8mh4p1q3vjps5j6o9j4h2fuf4t3
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चतुर्थ सर्ग
the
हैं
रवि
अष्टयाम
५.१
अंशुमान
तप
करते
तपधारी,
हैं ढूंढ रहे कुछ,
निशि-दिन
यों बने हुए
नभचारी,
है कुछ धुन इन्हें, बने जो-
बिहारी,
विश्राम नाम को भी ये
ये ऐसे । गगन
भूले हैं कल्मष
हारी,
है खोज इन्हें जिसकी वह
है छिपा कहीं ऐसे स्थल,
है जहाँ न गति गति की भी,
है वह थल निभृत विविस्थल ।
५२
प्रति निमिष, मुहूर्त, प्रतिक्षण,
प्रति पल, प्रति घटिका, सरणी,
ये सब मिल फेर रहे हैं
उसकी
सन्नाम- सुमरनी,
प्राते-जाते
ये
निशि-दिन,-
यह
उजियारा,
अँधियारा,
यह
ग्राकर्षण,
अपकर्षण, -
घन गर्जन, यह
जलधारा,-
ये देश काल घटनायें,
ये चलन कलन मय कृतियाँ,-
नित प्रति सब ढूंढ रहे हैं
विभु के रहस्य की सृतियाँ |
३६६<noinclude></noinclude>
0uu1lq3ugd348n4gog5a5jmm7lj6f7e
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५३
क्षण-क्षण
में
में इसीलिए तो
अन्वेषण - व्यथा
भरी है,
कण-कण
में इसीलिए यह
आकर्षण - कथा
भरी है;
श्राकर्षण, प्रातुरता-
जड़
ढुलका- दुलका,
बहता है,
चेतन हिय यह कैंप-कैंप के,
नित क्वासि ? क्वासि ? कहता है;
परदे में छुप के, निष्ठुर,
क्यों देते हो यह पीड़ा ?
मत विलग रहो इक छिन भी,
अब श्राम्रो करते क्रीड़ा ।
५.४
श्रा
जाओ
ठुमक ठुमुक के
जल-थल में,
जड़-चेतन में,
हो जाओ प्रकट सलोने,
क्षण-क्षण में, प्रौ कण-कण में,
३७०-
जग की वियोग की ज्वाला
कुछ शान्त करो, प्रा जाम्रो,
ब्रह्माण्ड निखिल को प्रव मत
तुम और अधिक विलखाओ ;
जब से ब्रह्माण्ड हुआ है
तुम से यह अलग अकेला,
प्रत्येक बिन्दु में
भर गया दरद
तब से
अलबेला ।<noinclude></noinclude>
re0390153biiqzrfxe9yjenvzjgu43q
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५५
में विम्बित है
चिर-वियोग की झांई,
चतुथ संग
मानव-हिय
इस
है इसीलिए
पड़ रही
जीवन
में
ये
सब
दुःख-परछाई,
आँसू, हिचकी,
हिचकी, आहें ये
ग्राकुलता,
लगन बावरी, भोली,
हृदय-स्पन्दन,
यह
यह
हिय-वेदना-प्रतुलता ;
हिय का खिच-खिंच के क्षण-क्षण
यों
होना,
हैं ये चिर दुख के प्रतिनिधि
यह करुण गीत, यह रोना ।
५६
यह चिर प्रतीत दुख-गाथा,
यह नित नवीन विरहानल,
यह क्रम अनन्त सम्भ्रम
यह अचल वियोग हिमाचल,
असन्तोष, यह तड़पन,
यह
यह लगन
अटपटी
आँखों का लग जाना
बौरी,
यह
हिय का खिंचना बरजोरी,
मानव अन्तर
में
चिर विप्लव मचा रहे हैं,
हृदय-स्पन्दन के मिस ये,
सब जग को नचा रहे हैं।
का,
३७१<noinclude></noinclude>
rrx0f6fyifvpd4gkjtt0sd8vnpjovm6
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५७
आँसू उमड़े ग्रन्तर से,
चिर हिय-मन्थन के फल ये,
सम्भूत हुए हृत्तल में,
वेदना-प्रसाद - विकल
थे,
चिर विरह-वल्लरी पर ये
अभिषिक्त श्रोस - जल-कण से,
झर उठे आह-आलोड़ित,
सुकुमार तरल कम्पन से,
नित मगन लगन लतिका के
ये कीर्णित, कुसुम कलित से,
अति अतल विरह-वारिधि के
ये मोती अमल, ललित से ।
५८
जीवन
में
मिल
गई
चलते-चलते
वेदना - बाला,
अति प्रखर विरह-शूलों से
पड़ गया हिये में छाला;
पीतम का मान मनाने
अकुलाया मतवाला,
बड़े जतन से
हिय
आँखों
ने
गूँथी
यह
मोहन माला;
पिय
के
अदृष्ट चरणों में
३७२
लिपटी ये तरला लड़ियाँ
अथवा पड़ गई अलख-सी
ये
स्नेह-श्रृंखला-कड़ियाँ ।<noinclude></noinclude>
q4fc2i4bvmp46bu5g5p02bko2clcef9
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३८९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६
चतुर्थं सगं
आँसू
से सींच
जीवन का पादप
रहा
है,
कोई,
मनोरथ की ये
पत्तियाँ
सिहरी हैं
बोई धोई,
जीवन-ऋतुनों को हिय ने
पावसमय बना दिया है,
सब आशाओं को इस ने
क्या ही अनमना किया है ?
जब देखो तो
उमड़ा-घुमड़ा
बादल-सा
रहता है,
जब
देखो,
दम बेचारा
उखड़ा - उखड़ा
रहता है ।
६०
वेदना प्रथक
पनिहारिनि,
है ग्राह लचीली रसरी,
हिय गहर गंभीर कुँआ है,
हैं
नयन छलकती गगरी,
है स्मृति रस्सी का फन्दा,
संकल्प बना
श्वासारोहण
घट-भ व भ ब,
अवरोहण
जब तब,
है घट का खिचना
भर-भर कर ढरकाती है।
नयन - गगरी
वेदना
को,
पंकिल कर-कर देती है
लघु आशा की डगरी को ।
३७३<noinclude></noinclude>
35ser48swqipsgrw4j3qvgtsktd3440
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९०
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
विस्तीर्ण
ये
६१
प्रतीक्षा पथ
समय-क्षण
रजकण
हैं,
नैराश्य - कुहू
छाई
है,
प्राशंका रूप पवन
कम्पित
विश्वास- लकुटिया,
है लगन
दीप की बाती,
आशा - यात्रिणी
अकेली,
छिन छिन
कँपती, अकुलाती ;
मंग जोह
रही हैं कब से
प्यासी
आँखें अकुलानी,
है;
stic
६२
अन्तर्ज्वाला बह निकली
हो कर के पानी-पानी ।
क्या ही विचित्र कौतुक यह-
अंगारों
जल
टपके,
पत्थर से पानी
निकले,
पानी में
लपटें
लपकें,
मँडराते
हुए धुँए में
वह
अलख
भर देता कोई पानी,
करता है। यों मन-मानी;
वेदना- दानी
आँसू,
विरोध- छाया
के
हैं
तत्व-रूप ये
मानो,
३७४
वा मूक पुकारों के हैं
अपनत्त्व- रूप ये
मानों ।<noinclude></noinclude>
0wfd95ynvqi5yllqwyofaxtbvc2cgo3
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६३
इच्छा - कारीगरनी
सुन्दर
आँखों के ये
कल्पना - भवन
ह,
है,
डह - डहते
ग्राकुल
से
वातायन हैं,
सोपान सुयों के
ये
चतुर्थं स
उतराती
7
चढ़ने को बने वहाँ पर,
चढ़ते चढ़ते
आशा
कँपकँप
फिसले है
कर थर-थर,
श्रो निठुर नेक आकर
के
के,
तुम पाँव थाम दो इस
देखो, बेचारी कब से
यह
खड़ी खड़ी है सिसके ।
૬૪
ये आँखें भिगो रही हैं
पिय-पथ के धूल-कणों को,
नित्य-प्रति सींच रही हैं
विरह-त्रिशूल क्षणों को,
प्रतीक्षा-पथ को
ये
विस्तीर्ण
जल - सिक्त
कर रही हैं ये,
अथवा रसमय हिय-निधि को-
नित रिक्त कर रही हैं ये,
सी अकुलाती,
झर-झर आती हैं जब-तब,
बिन कहे अकारण ही ये,
भर-भर उठती हैं डब डब ।
३७५<noinclude></noinclude>
8mtctx98aewu1roe3o9qhtqlzfxclsu
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
पीतम आवें
प्रिय-पथ
दृग
६५
बुहारती
रहतीं
पक्ष्म सुसम्मार्जनियाँ,
आँखें बरसाती रहतीं
छिन छिन में जल की
रिमझिम में,
इस आशा से भर-भर के,
ढरकीं रस की धाराएँ,
नयनांजलियाँ
प्राते ही होंगे प्रीतम,
यह साध हिये में घर के,
जी उठी शिथिल हिय-आशा,
वह कई बार मर-मर के ।
६६
इस अलग-थलग सत्ता को,
इस स्वार्थमयी
रटना को,
इस स्वकेन्द्रिता माया को,
भर-भर के,
कणियां,
इस वैयक्तिक
घटना को,
उत्सर्ग-स्वरूप
बनाया,
करुणा रस पूरित
करके,
बनाया,
३७६
हिय कूप, समुद्र
यह लवण अश्रु-जल भर के ;
हैं बड़ी ईश- अनुकम्पा,
सकरुण हृदय-स्पन्दन से-
छुट गई भावना मन की
दृढ़ स्वार्थ मूल बन्धन से ।<noinclude></noinclude>
j300xeimz5gooqhe93d7kr6lbeuub6v
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>है अश्रु तत्व
है अश्रु-सार
६७
प्रजनन
का,
संसृति का,
है अश्रु-तार विधना की
इस मोहनमाला कृति का,
व्यक्ति में व्यक्ति गुम्फित कर
इस जल की तरल लड़ी में,-
चतुर्थ सर्ग
सामूहिकता
उपजाई
वैयक्तिक
कड़ी कड़ी
में,
करुणा विगलित धारा के-
धागे में गुँथा सकल जग,
नयनों से
सिक्त
हुआ है,
कँकरीला जीवन का मग ।
कितनी
६८
ही
विरह-स्मृतियाँ
हैं गुंथी अश्रु-लड़ियों में,
उमड़ीं अनेक चिन्ताएँ
इन
हैं
रोदन की घड़ियों में,
वेदना-मोती
आँसू की तरल
लड़ी में,
ज्यों उलझा हो हिय-कम्पन
सकरुण संगीत - कड़ी
में,
हिय की सब संचित
करुणा
है,
में
नित भरती ही रहती
लोचन - पथ
अनजाने
कुछ डरती-सी बहती है ।
३७७<noinclude></noinclude>
lzqa6evd1fso8yjeao44ql5me2otcni
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९४
250
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667140
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६६
जग क्या है ? करुण विरह की
धुंधली सी
परछाई
है,
जग - नयनों
की बूंदों
में
अपने-पन
की
झाँई
है,
अश्रु के
सचराचर
परछाई
ये करुण
जब अश्रु सलिल में 'में' ने
प्रतिबिम्ब निहारा
अपना,
तब मूर्त रूप बन आया-
मन का यह कल्पित सपना,
बिम्ब से प्रकटीं
की
क्रीड़ाएँ,
से
प्रकटी
हैं
विरह-पीड़ाएँ
७०
है प्रलय- अश्रु का शोषण,
उद्भाव - अश्रु-वर्षण
है,
संकर्षण-शून्य
प्रलय
है,
उद्भव - हिय
संघर्षण
है,
आँसू
सूखे,
जग
डूबा,
आँसू वरसे, जग
प्रसू के सिंचन से हैं
यह सब जग अजर-अमर सा
सरसा,
जग आँसू की
खेती है,
है
विश्व बूंद
नैनों की,
३७८
है सृष्टि एक प्रति-छाया
उन अलख नैन- सैनों की ।<noinclude></noinclude>
503qx5b9fjsqvd9u3hsijzl0t5apj9q
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>आँसू
७१
प्रणोदनामय हैं,
आँसू हैं प्रेरक कृति के,
आँसू आधार
निराधार
इस
चतुर्थ सर्ग
बने हैं
संसूति के,
रति - प्रेरक,
मति-गति प्रेरक,
संगीत - प्रणोदक
आँसू,
आँसू-ध्वन्योत्पादक
ये,
ये
प्रीति- प्रमोदक
आंसू,
प्रतिविम्बत
करते बहते
युग-युग की
व्यथा पुरानी,
छल-छल कर कहते रहते,
हिय की
वेदना-कहानी ।
७२
करुणा ने
विगलित
करके,
अन्तर के
अटल उपल
को,
प्रकटाया प्रीति - व्यथा
अति विरहित तरल सुफल को,
के
लोचन - खिड़कियाँ
उघाड़े
आते
हैं
ललक-ललक ये,
हिय भवन
रिक्त-सा करते
ये
भीगा
जाते हैं ढलक ढलक
वक्षस्थल,
भीगे-
ये लोल-कपोल, पलक ये,
आकर्षित,
भर गिरे श्वास
जीवन-तरु के अमलक ये ।
२३७६<noinclude></noinclude>
66wd3ehvlg3pmlhr1e8d0f925rq75ij
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९६
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
७३
अति दूर सुदूर न जाने
कितनी दूरी से आता,
वंशी
का वह
आकर हिय तरसा
आ रही कहाँ से, बोलो,
ध्वनि, मींड, मरोर सिसकती,
अन्तर में पैठ रही है,
श्रातुर सो तनिक
स्वर - दरद
दिया है जिस ने
वह अलख बाँसुरी वाला,
छिप रहा कही अन्तर में,
पहने आँसू की माला ।
स्वरमय
भर अमर
७४
वादन-साधन
में
बिथा अलबेली,
उलझा दी फिर से किस ने
करुणा की
३८०
गूढ़ पहेली ?
संगीत - प्रसारण
झिझकती ;
के मिस
कंठों से उमड़ी करुणा,
स्वर-अवलम्वन वाद्यों से,
वह उठी वेदना अरुणा,
स्वर- कंपन
जाता ;
गायन में रोदन भर के
जग लूट लिया छिन भर में,
किस ने करुणा यह भर दी
संगीत सुधामय स्वर में ?<noinclude></noinclude>
nbum505jjjyg671cdyrbgmznbdbr440
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९७
250
196154
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७५
भूमंडल और
खमंडल
तूबियाँ बनीं
ध्वनि-चलिता,
नक्षत्रों की
अगणित-सी
खूंटियाँ बनीं
प्रज्वलिता ;
आकर्षण - अपकर्षण
के
चतुर्थ सर्ग
तारों का जाल बिछा है,
चिर काल- दारु है, उस में-
करुणा- संगीत खिचा है ;
है
वीणकार
पट
पीछे
स्वर पीड़ा सरसाता है
ध्वनि-विन्यासों के मिस से,
नित करुणा
बरसाता है ।
७६
ब्रह्मांड रूप
वीणा
की
लघु वाणी प्रतिछाया है,
हाँ, इसीलिए इस में
भी
कारुणिक सुरित-माया है ;
करुणा रुण-रुण कर बहती
तारों की भंकारों से,
हिय ग्राकुल हो उठता है
कम्पित: स्वर-संचारों
वर की मरोर से लगती
प्राणों को आकुल फाँसी,
संस्मरण और कस देते
साँसत की वह स्वर-गाँसी ।
३८१<noinclude></noinclude>
1jomjemaedl0b5iyvwgzya6hu1ln6lz
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
७७
आकाश रूप
बाँसुरिया -
शून्यता- रन्ध्र
अगणित
हैं,-
नित वायु- श्वास से निशि-दिन
यह मनहर वेणु क्वणित है ;
नित अलख
अँगुलियाँ करतीं
स्वर - गतियों
का परिचालन,
यों ही जग
में होता है
करुणा व्रत का
प्रतिपालन ;
वेदना
जगा
देते
हैं
स्वर
पैठ-पैठ
अन्तर
में,
स्वर-पीड़ा
भर देते हैं
जगती के अभ्यन्तर में ।
560
बज उठती है कम्पित-सी
मुरली,
उत्कंठा
सुर-लीला करती,
जागृत करती,
अन्तस्तल में ध्वनि भरती ;
३८२
ये प्राण आप ही
बरबस
खिंच जाते हैं ध्वनि सुन के,
बन्धन ढीले पड़ते हैं
सब लोक-लाज के गुण के
दे रहा दरद चुपके से,
वह अलख बाँसुरी वाला,
प्राणों को
तड़पाता है,
वह पीर-पाँसुरी वाला<noinclude></noinclude>
siw7iredml10f6rxw2dny9aq976urwy
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/३९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७६
चतुर्थ सर्ग
जब कूक भरी वंशी यह
हिय हूक जगा जाती है,
तब सूने अन्तस्तल
चिर-लगन लगा
में
जाती
है ;
रन्ध्रों से
सप्त स्वरों की
उलझी सी पीड़ा
बहती,
वह रोम-रोम
को
अह-रह
क्षण-क्षण सिहराती
रहती ;
स्वर-टीप | मुरलिया की सुन
हिय-टीस रसक उठती है,
श्रामंत्रित अभिलाषा की
यह सिसक, कसक उठती है ।
८०
स्वर बड़ी दूर से आते
सूनेपन में रह-रह के,
स्वर संग मिलन की स्मृतियाँ
आ जाती हैं बह-बह के,
आतुरता से
भर जाते
पल निमिष, सभी अहरह के,
अन्तर में स्वर घुसते हैं
कानों में कुछ कह-कह
के,
श्रो
विश्व - दरद - दीवाने,
श्रो
अलख वेदना दानी,
क्यों फैली,
तनिक बता दो,
जल थल में बिथा परानी ?
३८३<noinclude></noinclude>
mp6okj04nw2w8zz2a57rx80xlpiea4g
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
वीणा,
यह
ये
८१
तम्बूर, सरंगी,
बाँसुरिया धुनवाली,
के. बाजे,
तार ताँत
यह मुद मृदंग गुणवाली ;
श्वासोत्प्राणित मृदु स्वर ये,
अंगुलि-प्रहार-मय यह लय,
देते रहते हैं
ये सब
नित अमित व्यथा का परिचय,
यह विश्व-वेदना क्यों है ?
क्यों है यह चिन्तन-पीड़ा ?
प्रो लीलामय, तुम यों क्यों
करते हो करुणा -क्रीड़ा ?
८२
सुख की गहराई में भी
शाश्वत दुःख की झलक है,
श्रानन्द मुदित
मुदित नयनों में
चिर निरानन्द अपलक है;
दुख ही दुख लहराता है
सुख के अस्थिर हियतल में,
बड़वानल मँडराता है
कल्लोलित क्षुब्ध प्रतल में;
संगीत - लहर
से रह-रह
जग में करुणा उमड़ी है,
रोदन कंपन से झंकृत
३८४
गायन की कड़ी कड़ी है ।<noinclude></noinclude>
mmxryie4gepwt42sx3nz95qwccnkuf8
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चतुर्थ सर्ग
संभूत
८.३
महाभूतों
में,
उद्भूत
संचरित
वनस्पतियों
में,
प्राण
लहरी में,
में,
जीवनोत्क्रमण-गतियों
आतुरता,
है छिपी... एक
वेदना एक गति चलिता,
सब में है झलक दिखाती
करुणा उच्छलिता,
अरुणा
ना जाने, किस क्षण, कैसे,
जग गई ज्योति प्रज्वलिता ?
है वहा रही प्रसू यह,
विगलिता वेदना ललिता 1
८४
अँधियारे - उजियाले
में, -
अणु-अणु में, रजकण-कण में,-
इन सब पार्थिव तत्वों में,-
पल-निमिषों में, क्षण-क्षण में,-
निशि-दिन
अग्नि में,
वायु- कम्पन
में, -
जल-वर्षण,
नभ - घर्षण
में, -
में-
में, -
मन हरण किरण-नर्तन
आकर्षण - अपकर्षण
में, साँझ-सवेरे,-
इस गतिमय चलन-कलन में,
-
दुख ही दुख भरा हुआ है,
संसृति के नियम-वहन में ।
3
३८५<noinclude></noinclude>
0oszkbvk73r7p6pn9x8k8q36453bfth
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>'ऊम्मिला
मन
में,
रोदन - स्वन
नूपुर के
८५
रुन-झुनझुन में,-
गायन में, स्वर-साधन में,-
श्रातुरता- पुलकित तन मॅ
निष्ठुर प्रिय-आराधन में, -
हृदय-स्पन्दन में,-
में, कम्पन में,-
हिचकी के गुण-बन्धन में, -
चुम्बन में परिरम्भण में,-
वेदना
अरुण
लहराई,
रतनारी
करुणा
छाई,
हो गई
चेतना के मिस
हिय की
वेदना - सगाई ।
८६
जल-थल की यह आकुलता,
विह्वलता इतनी
सारी,
युग-युग की यह
आतुरता,
यह मगन लगन
३८६
रतनारी,
जगती की इतनी करुणा,
यह शाश्वत व्यथा घनी-सी,
ऊम्मिला-हृदय में उट्ठी
यह टीस मसोस सनी-सी,
इस अचर-सचर जग भर की
वेदना घुमड़ कर आई
ऊम्मिला बहू के आँगन
धन-राशि घुमड़ कर छाई ।<noinclude></noinclude>
det3q8ksykb5o4l0y0d46e69ybu51xl
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८७
वैयक्तिक व्यथा जगत की,
जन गण
की
कसक - कहानी,
अति परिधि-गता करुणा यह,
उत्कंठा
छानी छानी,
यह
कसक-सिसक
अलबेली,
यह
मींड,
मींड, मरोर पुरानी,
यह
टीस, अथोर घनेरी,
चतुर्थ सर्ग
हृदयान्दोलिका
अयानी,
ये विश्व - वेदना
की
है
जीवन-विम्बित
प्रतिछाया,
ब्रह्मांड - व्यथा
ही ने त्यह
आरक्त
विन्दु छिटकाया ।
८८
प्राती-जाती
रहती हैं
पतझड़ की आकुल घड़ियाँ,
भरती - उगती
रहती हैं
पत्तियाँ और पंखड़ियाँ,
निशि-दिन यह पवन निगोड़ी
सन-सन करती बहती है,
छिनछिन
टल्ला दे-दे के
अपनी कहती रहती है ;
करुणा
यों उमड़ रही है
ऊम्मिला बहू के आँगन,
हिय में निदाघ रहता है,
नयनों में बसता सावन ।
३८७<noinclude></noinclude>
mott7v5ys9c9814vh8dh5wjf1rm4p4w
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
८६
इस विरह जन्य तड़पन में
निःसीमित करुणा उमड़ी,
पीड़ा छाई जन-पद में,
वन बसा, अयोध्या उजड़ी,
आकुल प्राणों की
श्वासोच्छ्वास-तरंगे,
.
उखड़ी
ये
शिथिला हो गई
अचानक
जीवन की सरस
कल नयन-नदी बढ़ आई,
हो गई वेदना
गहरी,
ऊम्मला- हृदय
में आकर
उमंगें,
यह विश्व-वेदना ठहरी I
लक्ष्मण - विछोह से हिय में
जग गई साधना तप की,
आँसू के मिस अन्तर से
की अंजलि टपकी,
श्रद्धा
यह अवधि-दीप बन आई,
पीतम स्मृति-दीपक
बाती,
हिय लगन जगी लो बन के
प्रकाश फैलाती,
मंजुल
इस समय प्रतीक्षा- मग में
ऊम्मिला लिए निज दीपक,
३८८
बैठी है जोगन
बन के
नित: बाट जोहती
अपलक ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६१
आशंकाओं की ग्रांधी,
भय, अविश्वास
के बादल,
कम्पित करते ह हैं
स्मृति- दीप शिखा को प्रतिपल,
दृढ़ श्रद्धांचल से रक्षित
वह ज्योति अखंड जगी है,
बुझने की कभी नहीं वह,
लौ ऐसी भली लगी है,
विरहानल
खिल उठीं
चतुर्थ सर्ग
योगिनी सतत जपती है
अपने योगी की माला,
आँसू से
बुझा रही हैं
वह अन्तरतर की ज्वाला ।
६२
लुट गई ऊम्मिला पल में
देकर अपना जीवन-धन,
पिय के विछोह की लपटें
बन
आई
मय मरुथल में
तपस्या- कलियाँ,
हिय धड़कन बनी सुमरनी,
संस्मृति बन गई अँगुलियाँ,
वन-वास अवधि के दिन छिन,
बन गए बड़े से,
मनके
हो गए प्राण कुछ प्राकुल,
कुछ-कुछ उखड़े-उखड़े से ।
यज्ञ - हुताशन,
३८६<noinclude></noinclude>
krazg825kutiqeximounfzeceu0ymyf
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६३
ऋन्दन निस्पन्दन व्रण की
'विस्तृत-सी करुण कहानी,
विधुड़न के समय-पटल पे
लिख रही ऊम्मिला रानी,
आँसू स्याही
मसि भाजन
बन आए,
नेत्र बने ये,
बन गए पर्व गाथा
संकल्प-विकल्प
कम्पित लेखनी बनी है
ऊम्मिला-हृदय की धड़कन,
गम्भीर विछोह व्यथा से
आकुल है कोमल तन-मन ।
घने
के
ये,
१४
है
वही
ऊम्मिला-पीड़ा
उसकी
बीती,
अपनी ही
हो गई दुलक कर उसमें
चर-अचर व्यथा सब रीती,
३६०
में
उसकी उस विरह-व्यथा
विम्बित है जग की करुणा,
उस के हृदय-स्पन्दन में
ह
विश्व-वेदना अरुणा,
जग का यों अलग-अलग सा,-
संक्रम ही बिछुड़न मय है,
लक्ष्मण का विपिन-गमन ही
ऊम्मिला वियोग-निलय है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६५
संस्मरण सघन घन
छाए,
नयनों से बरस पड़े ये,
निःश्वासों के
मन-नभ में
झंझानिल से
झगड़े ये ;
मानस
चतुर्थ सर्ग
दिगन्त में उट्ठी-
स्मृति-मेघ-मालिका
गहरी,
उठ चली टीस बिजली-सी
ग्रहों मिस धन-ध्वनि गहरी ;
अभ्भ्रावृत, तरणि-किरण-सी
चमकी आशा रह-रह के,
हृदयाकाश में तड़प कर
नित मौन पपीहे चहके ।
६६
सुख-संस्मृति-मय वह जीवन
बन गया क्षणिक सुख-संपना,
रह गया ऊम्मिला के ढिग
बस लखन नाम का जपना;
कर,
अपना
सर्वस्व लुटा
मानवता के
चरणों में,
ऊम्मिला खो
गई सहसा,
आवरणों में.
दुख के घन
पिय विरह जनित नित से
दुख
जीवन बन गया उलहना,
जीवन का ध्येय बना है
यह विषय वेदना सहना ।
३६१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४०८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६७
अपने पीतम की छबि का
नयनों में बिम्ब उतारे,
बैठी हैं लक्ष्मण-रानी
यह
प्रतिबिम्ब हिए में धारे;
आँख-मिचौनी-क्रीड़ा,
यह अपलक झलक सुहावन,
उठ उठ
ये
वेदना- दानिनी
बरसाती है
बन
के
नित सावन ;
कर थहाती हैं
मेघावलियाँ काली,
बन गई निमिष में सहसा,
उजियाली भी अँधियाली
हद
दुख के संस्मरणों के ये
गरबीले
मेघा
बरसे,
जितने
बरसे उतने
ये
प्राण- पपीहे
तरसे,
मूसलाधार
धाराएँ
उठ धाई
मन अम्बर
से,
वेदना
हूक उठ आई
जगती
३६२
के अन्तरतर से,
आँधी, पानी, पंकिल
थल,
जीवन में मिले घनेरे,
दुख- सार
जीवन
भूत
बन आए
के
साँझ-सबेरे |<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६६
छिन दामिनियाँ छिन गर्जन,
छिन धाराएँ, छिन बादल,
छिन उपल विपुल, छिन फुहियाँ,
छिन उथल-पुथल, प्रति चंचल,
यों ही ऊम्मिला
सलोनी
नित बिता रही निज जीवन,
श्राकुलता से
पूरित
हैं
चतुर्थ सर्ग
अनबोली
पार्श्व में
उनके जीवन के क्षण-क्षण,
मन विकल, प्राण ये बेकल,
हिय व्याकुल, चित
ऊम्मिला-वेदना
विरहाकुल,
अमिता,
उमड़ी नयनों से दुल-बुल ।
देख
चल
१००
कल्पने, उनको
सन्ध्या के मौन क्षणों में,
चुपके-चुपके नत हो
उनके युग
जा
श्रीचरणों में ;
बैठी हैं देवि सुमित्रा
करके शुचि सन्ध्या-वंदन,
उमड़ी निःश्वास हठीली,
धड़का हिय का निस्पन्दन ;
सी बैठी है
ऊम्मिला
भोली,
ज्यों निपट धीरता के ढिग,
बैठी
करुणा
अनबोली
।
३६३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१०१
दिन थक कर मुरझ गया है
सन्ध्या के पल-अंचल में,
श्रम श्रान्ति व्यथा उमड़ी है
खग वृन्दों के कल-कल में,
गोधूली
धूमिल - सा
वेला में
हुआ
दिगम्बर,
छाया
औदास्य हृदय
में
कैंप उठी
वेदना
थर-थर,
डर-डर कर धर पग
धीरे
नभ में अँधियाला आया,
लुट चला उजेला छिन में
बढ़ चली तिमिर की छाया ।
१०२
संस्मरण- विहंगम
आए
हिय-नीड़ - निलय
में अपने,
कलरव से मानस-अम्बर-
लग गया निमिष में कँपने ;
३६४
क्या दरद पराया जाने
यह बांझ सांझ अलबेली ?
सुख-स्मृति बटोर लाती है
नित यह बेदरद अकेली ;
मधुमय सँजोग की स्मृतियाँ
हिय की गुपचुप प्रिय वतियाँ,
सन्ध्या बाँधे अंचल
लाती हैं कई सुरतियाँ ।<noinclude></noinclude>
cv9qm8rdi42t89vvcgwnvx3616rdadd
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>चतुर्थ सर्ग
१०३
वे
कई
मधुर
घटिकाएँ .
कल्लोल
भरी
लहरातीं,
सन्ध्या के
सूने
क्षण में
ग्रा जाती हैं
मदमाती,
अभिशाप रूप वन जाते
सुख क संस्मरण निराले,
दुखदाई हो जाते
हैं
ये प्रति दुलार के पाले ;
बैठी
हैं साँस-बहू
N
ये
सन्ध्या के नीरव क्षण में,
जीवन की कसक-कहानी
उट्ठी है उनके मन में ।
१०४
करुणा की इन छवियों के,
कल्पने, सान्ध्य-दर्शन कर,
चुपके तू, अरी, चली आ
उनकी पद-रज शिर पर धर;
चिर-विरह-वेदना की है,
यों उलझी हुई कहानी,
फिर कभी उसे सुलझाना,
सुन अरी, कल्पने रानी !
दर्शन कर, दीक्षित हो जा
तू करुण- रहस्य
अगम में,
तब
गाना विरह
कथानक
कंपित स्वर कोमलतम में ।
३६५<noinclude></noinclude>
17ygue92gyqge3hufo532ox5oehenqo
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४१२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३६६.
इति श्री चतुर्थ सर्गः
श्री मातृ ऊम्मला चरणकमलार्पणमस्तु 1<noinclude></noinclude>
p47pc1h6mgrkhet3qk79rf33tgb0wf0
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४१३
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अथ श्री पंचम सर्ग<noinclude></noinclude>
gwm90up5nnp0ylaomc22z5nu7wvtthw
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४१४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude>
2f8fvf5emj53iy92n72do4g2xlq5v6f
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४१५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
१
छुट्यो सँग सपनो, मिट्यो लघु सँयोग अभिशाप,
चिर वरदान वियोग की, मिल्यौ
आप ही आप ।
२
चले जाहु
भोरे सजन, अनबोले,
सकुचात,
हिय की हिय में रह गई, नैकु न निकसी बात ।
प्यार कहानी हृदय में, अरुझानी अकुलाय,
बाणी अटकी कंठ में, हे मेरे रसराय !
४
वे स्वप्निल रतियाँ मधुर, वे बतियाँ चुपचाप,
ह्वै विलीन हिय में बनीं आज विछोह - विलाप ।
५
साजन, संस्मृति नेह की, खटकि-खटकि रहि जाय,
अटक अटकि आंसू भरें, भरै हृदय निरुपाय ।
रसक्रीड़ा,
६
व्रीड़ा सलज, पीड़ा बनी गंभीर,
रति संस्मृति निशिता अनी, बनी हिये की पीर ।
३६६<noinclude></noinclude>
or1rteszxwsn9pl0pnjjbe5sxkhfg76
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
७
मुरि जनि देखहु तुम इतें, हे सुकुमार कुमार,
अभि जाएँगे दृग, इहां बिछे साँस के तार ।
४००
5
बीहड़ कानन सम भयो, जीवन-वन एकान्त,
सघन विरह-पल्लवन सौं, भयो प्रपूर्ण दिनान्त ।
६
दुसह विथा के जमि गए, विकट भार-भंखार,
नित संकल्प-विकल्प के, ठाढ़े भए पहार 1
१०
निपट निराशा सिंहनी, गरजि रही घनघोर,
लिए संग भय- शावकन्हि, डोलि रही चहुँ ओर ।
११
गहि प्रत्यंचा पलक की, भ्रकुटी तीर कमान,
आखेटक, आवहु इतें, साधि निशित दृग वान ।
१२
अहो अरण्यक, ह्वै गयो, जीवन गहन अरण्य,
छाँड़ि विजन, आवहु, इतें बसहु सनेह शरण्य ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४१७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
१३
वन लोभी तुम, विपिन प्रिय, ग्रहो सुमित्रालाल,
मम जीवन-वन में तनिक, चलहू ग्रटपटी चाल ।
१४
जीवन-अटवी में बिछ गत संस्मृति के शूल,
कंटक प्रिय, कबहूं इतै, तुम आवहु पथ भूल ।
१५
जा छिन जीवन की उठी, प्रथम पुलक मुदमान,
ताई छिन तें हौं तुम्हें, ढूंढि रही अनजान ।
१६
देस काल के गरभ में, हौं पैठी अकुलाय,
ढूंढि थकी तुमकों, सजन, भेस अनेक बनाय ।
१७
उद्भिज, डज, खनिज लौं, स्वदज, जलज अनेक,
रूप बरे, पै ना मिट्यो, यह वियोग अविवेक ।
१८
छिन, तुम ने करि कृपा, या जीवन में आय
दियो दान संयोग को हौं हुलसी हरषाय ।
४०१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४१८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१६
अब वे छिन सपने
भए, गए सुदूर पराय,
निपट निराशा - जलधि
में, रह्यो हृदय उतराय ।
२०
विपिन बिहारी हौं नटी, तुम नट सुघर प्रवीन,
मों बिन कैसे होंउगे,
४०२
२१
सूत्रधार तुम, सुनट तुम, तुम
हौं प्रवीन नट नागरी,
२२
रंग-मंच-रस-लीन ?
नाटक के प्रान,
रस भावना प्रधान ।
अहो तनिक ठाढ़े रहो, भटकि बाँह जनि जाहु,
निभृत नृत्य शाला भई, आहु, सजन, गृह हु ।
२३
जीवन नाटक के परे, रीते अंक अनेक,
श्रावहु खेलहु तुम इतें, छिटकावहु स्मिति-रेख ।
२४
विकल प्राण, आकुल नयन, व्याकुल मन, तन छीन,
बुद्धि चकित, हिय दुख-निरत, 'अहं' सुरत-रस-लीन ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२५
जग सूनो, हिय रचि रह्यो, सजन, विया के रंग,
मंडल में छई, यह वेदना अनंग ।
मानस
-
मन-ग्रम्बर
२६
में कँपि रही,
विरह-वेदना-चंग,
अवधि डोरि काटहु, पिया, चलहु मोहि लै संग |
२७
सपने की खिरकीन
ते कबहूं तो प्राणेश,
झांकि देखि जायो करो, अर्ध चेतना देश ।
२८
जनम जनम की साधना के मम फल हृदयेश,
भले गए तुम विजन, लै नव चेतन सन्देश ।
२६
जानि गई सहसा, सजन, यह बात सविशेष,
मोंहि मिले हैं एक संग, क्लेश और प्रेमेश ।
३०
सिहरि - सिहरि रहि जाति है, हृदय-वल्लरी दीन,
नेक समाश्रय देहु, हे मेरे विटप नवीन
1
४०३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३१
मो अँगना फुहियाँ बरसि, सुइयाँ-सी चुभि जॉय,
घन छहियां, बहियां पकरि लाई विरह बुलाय ।
४०४
३२
धोए-धोए-से सघन, द्रुम पल्लवन्हिं निहारि
कसक, सिसक मिस बहि चली, नयन उघारि उधारि ।
३३
घन आए, छाई घटा, हरि गिरी जल धार,
घरि-घरि गरजी विथा, हिय विच बारम्बार ।
३४
छाय रह्यो हिय गगन में, घटाटोप घनघोर,
चमकावहु स्मित- किरण निज, इतं अहो चितचोर ।
३५
भई भली, संगिनि मिली, यह करुणा गुणहीन,
चल साधना-पथ, पथिक, हौं, तुम, करुणा. तीन ।
३६
मन डोल्यो- डोल्यो फिर, पावस में दिन रैन,
कहा कहीं याकी कथा ? पावत नैक न चैन ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
जल बरसत, कसकत
३७
हृदय, भारी-भारी होय,
वरसावत मद रंग कोउ, घन चूनरी निचोय |
३८
गिरत परत उठि उठि चलत, गूंघत बीच सनेह,
ढूंढ़ि रही इत उत तुम्हें, हिय-वेदना प्रदेह |
३६
जलधारा मिस दुरि पर्यो, नभ - करुणा उद्रेक,
बुद्-बुद् मिस भू वक्ष पे छाले परे अनेक |
४०
जल भीनी द्रुम-वल्लरी, भुमि-भूमि इठलाति,
प्रभु सिक्त नित हरित ज्यों, विथा-वेलि लहराति ।
४१
सिहरि सिहरि रहि जात हैं, वायु-विडोलित पात,
ज्यों उसाँस ते कँपत हैं रोम-रोम सब गात ।
४२
पवन-बीजना लगत ही, भरत विटप-जल-बिन्दु,
ग्राह उठत ही भरत ज्यों, नयन बिन्दु मय सिन्धु ।
४०५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४३
मेरी हलकी चुनरिया, रँगी तिहारे रंग,
देखहु, इत उत चुअत है, अरुणा करुण उमंग ।
४४
रंग्यो- रॅग्यो- सो लगि रहो, नभ को नील दुकूल,
पवन उड़ावत जात ये, मेघ खंड के तूल ।
४५
नील गगन - हिय में
यों संकल्पन को उड़त
उड़े, दल बादल के ठाट,
हिय बिच धूम्र विराट ।
४०६
४६
कबहुँ - कबहुँ बदरान के, वक्षस्थल को चीर,
दिनकर प्रकटत, ज्यों प्रकट होत हिये की पीर ।
४७
गंग-जमुन ज्यों मिलत हैं, श्री प्रयाग में आय,
त्यों अँखियन की दोउ नदी, अंक मध्य मिलि जायँ ।
४८
सिसक -- लहर, हिचकी - भंवर, ग्रह भई कल नाद,
-- द्विवेणी तें उमड़ि, छलक्यो फेन-विषाद ।
नयन --<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
४६
उतै जात बढ़ि दृग नदी, जितें प्रपूर्ण समुद्र,
करे कृपा जो उदधि, तों मिटै भावना क्षुद्र
५०
भूलि ग्रहं लघु हौं तुम्हें पाय न सकिहौं, प्राण,
हौं दासी, तुम सेव्य मम, मेरो यहै विधान ।
५१
मैं तुम रूप न होउंगी, तुम मो में रमि जाहु,
सूनी परी कुटीर मम, आहु सजन गृह आहु ।
५२
शून्य रूप ह्वै कें तुम्हें, कैसे पावों नाथ ?
मेरे या लघु 'अहं' कौं, करौ सनेह-सनाथ ।
५३
नित्य निवेदित हृदय मम
शून्य रूप ना होय,
निचोय - निचोय |
हिय ढरकावत नयन तैं नेह
५४
एक रूप है मैं कहहु कैसे करिये प्रेम ?
प्रेमी प्रेमिक एक, तब, कितें नेह को नेम ?
४०७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५५
दरस - पिपासा जो मिटै तो यह कैसो नेह ?
बरसावहु प्रिय, द्वैत को रिमझिम रिमझिम मेह ।
५६
ह्वै प्रदेह कोऊ भजै हौं सदेह सुकुमारि,
चरण वन्दना करति हौं, हृदय निहारि -निहारि ।
४०८
५७
जोहत जोहत बाट, ये बीते दिवस अनेक,
पिय मम हिय में हूँ रह्यो, यह विछोह अतिरेक ।
५८
रात अँधेरे पाख की, दीपक-हीन कुटीर,
आय सँजोवहु दीयरा, हियरा भयो अधीर ।
पूह
तेल हीन, रीती, इतं मम प्रदीप की सीप,
उत सिगरे घर घरन में, जगे संजोग प्रदीप ।
६०
कारो अम्बर ओढ़ि के आवत कारी रात,
वह छानी मानी कहत, प्रति अँधियारी बात 1<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
६१
साय-साय हिय करि रह्यो, साँय साँय जिय होत,
साँय-साँय निशि करति है, बहुत नयन- जल-सोत ।
६२
कारी निशि, कारी प्रवनि, कारी दिशि चुपचाप,
कारी नयन कनीनिका, कारे
६३
केस-कलाप ।
कारे द्रुम, कारी लता, कारो सब संसार,
कारो कारो ह्वै रह्यो, हिय-बिछोह-संचार
६४
पिय, इन कारे छिनन में, तिय हिय अति प्रकुलाय,
मौन रुदन मन करि रह्यौ तुमहिं बुलाय-बुलाय ।
६५
कारी निशि तें भर गई, हिय में भाई श्याम,
भई जाति हों बावरी, टूटत
६६
संयम-दाम |
झिलमिल झिल-मिल करतु है, श्याम नेश आकास,
तपकि- तपकि रहि जात ज्यों, हिय-वेदना- विकास |
1
४०६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६७
अँधियारी अध रात की, कँपि कँपि अम्बर बीच, -
सीकर - कण मिस, वेदना रही हिये बिच सींच ।
६८
नींद निगोड़ी छाँड़ि
चली गई वा पार,
के दृग को निर्भर देस,
पिय, कहूँ दूर परदेश ।
४१०
६६
घन अँधियारो, रात की निपट बलैयाँ लेत,
ज्यों झुक-झुकि कोउ नेह-घन, हृदय उडेले देत ।
७०
निशा बनूं हौं, तुम बनौ निविड़ तिमिर घन, प्रान,
कि छाव, गहन, गहर, गंभीर, महान ।
७१
नभ मंडल को चक्र यह चल्यो जात दिन रैन,
गति मय यह ब्रह्मांड सब, नैकु न पावन चैन ।
७२
तारक मंडल मालिका, गूँथी ईश बनाय,
फेरि रहे छिन छिन वहै, हिये सिहाय सिहाय ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सगं
७३
अतल, वितल, पाताल लौं, सकल खमंडल लोक,
ढूंढि रहे, पिय ना मिले, मिट्यो न हिय को शोक ।
७४
विचलित हिय, विगलित नयन, दलित भाव सुकुमार,
खंड-खंड अस्तित्व को करत वियोग-कुठार ।
७५
निशि के सूने छिनन में हिय में खुटखुट होय,
लघु आशा घन तिमिर में, ठाढ़ी-ठाढ़ी रोय ।
७६
सूनेपन में करि उठत, यह हिय हा-हाकार,
तड़प-तड़प रहि जाति है, दरस-परस-मनुहार ।
७७
हार कहीं या कौं, कहीं अथवा हिय की जीत,
जो निबहतु है हृदय यह, निशि-दिन प्रीति प्रतीत ?
७८
रीति अनौखी प्रीति की जीत समझिये हार,
हार
भरे सपनेन में, करिये विजय- विचार ।
४११<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४१२
७६
रार करत हिय बाबरो, अपने ही सौं खीझ,
बिना मोल किमि बिक गयो, वा श्रीमुख पै रीझ ?
८०
नयनन तें बोलत गए तुम अनबोले बोल,
मौन श्रनी वह चुभ गई, हियहि टटोल-टटोल |
८१
प्रेम -- फांस अस्तित्व की, प्रेम-हिये की प्यास,
प्रेम -- प्रणोदन प्रजन को प्रेम प्राण की प्रास ।
८२
प्रेम -- रज्जु, अस्तित्व -- घट, पन घटनयन अधीर,
पिया मिलन की भावना, कूप गहन गंभीर ।
८३
हौं पनिहारिन घाट की, तव संजोग-सुख-नीर,
हुलिस कलस भरिबे चली, लिए प्यास की पीर ।
८४
लोचन - पनघट पै फँस्यौ, घट सनेह की डोर,
उतरि गयो गहरो बहुत बिल्यो न नीर अथोर ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
८५
सजन, तनिक सी गगरिया, क्यों खाली रहि जाय ?
नैक निकट आवहु इतै, भरहु याहि मुसिक्याय ।
८६
या पनघट के सुनट तुम, या पनघट के राज,
खेल खेल ओझल भए क्यों पनघट तें प्राजु ?
८७
मम नागरिया गगरिया, भई आज निस्तब्ध,
काकरिया मारहु, करहु झन भंकृतिमय शब्द |
८५
बिहॅसि काँकरी मारहू, भरहु गागरी श्राय,
प्यासी मेरी कलसिया, लटकि रही निरुपाय |
८
पनिहारिनि एकाकिनी, हौं प्यासी, संतप्त,
रोम-रोम प्यासौ, रहयो यह अस्तित्व अतृप्त ।
६०
बड़े दिनन तें, जतन तें, बड़ी दूर ते, नाथ,
हौं श्रावतु हौं घट लिए, या को करहु सनाथ ।
४१३.<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४१४
६१
तुम पनघट-पति, कूप-पति, तुम घट-पति, हे प्रान,
पनिहारिनि-पति, नीर-पति, प्रेम-रज्जु-गुण वान ।
२
"भब भब" करि घट-रिक्कता भागै, जागे भाग,
नीर-पीर छूटै मिटै, रीतेपन को दाग |
६३
सोरठा
मोंहि प्रपुनी जानि, करहु कृपा एती, सजन,
करि सँजोग जल दान, भरहु रिक्त अस्तित्व-घट |
१४
सार हीन अति ह्वै गयो, तुम बिन मम संसार,
छिन छिन भए पहार सम सुनहु जीवनाधार ।
६५
लगन बावरी हृदय की, अभिसारिका प्रवीन,
बौरानी-सी फिर रही, इत-उत, तव रस लीन ।
६६
योग-छेम को मोह तजि, दीप नेम को साजि,
लगन अँधेरी डगर में, चली
गेह तें भाजि ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
६७
लाज गई, कुल कान सब बिकी तिहारे संग,
फैल परी, इत उत बगरि प्राकुल हृदय उमंग ।
हद
मेरे या हिय की कसक छलक उठी सब ठौर,
सकल चराचर तें उठी चेतन सिसक-मरोर ।
हह
जगद्व्यापिनी मम विथा भई अहो, प्राणेश,
मम कंपन ते कँप उठ्यो, सब जग को हिय- देश ।
१००
क्लेश मिल्यौ, किंवा मिल्यौ कंपित नेह प्रसाद,
व्यथा रूपिणी ह्वै गई विगत दिनन की याद 1
१०१
यह संयोग वियोग को अपरस्पर
अवलम्ब,
करि के या जग में घटित, क्यों बैठे, हेरम्ब ?
प्राण
१०२
पिरीते तुम बिना सूनौ भयो दिगन्त,
उदित होहु मन-गगन में, भरहु प्रकाश अनंत ।
४१५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
मम
१०३
सनेह-नैया परी, विरह- समुद्र मँझार,
छिन छिन में यह वढ़ि रह्यो, उग्र पवन संचार |
१०४
प्राय तनिक देखहु इते, कैसो हाल बिहाल
डगमग, डग मग ह्वै रही या नौका की चाल ।
१०५
बन्ध-हीन, गुन गलित, हैं सड़ी लकरिया चार,
का जानों का ह्वै गए, सुदृढ़ डांड पतवार ?
१०६
उफनि रह्यी है सिन्धु यह, विकट लहर की मार,
फेनन के मिस उमड़ के आयो सिन्धु विकार ।
१०७
टेर गगन में उठि
रही मेरी
बारम्बार,
४१६
भनक कान क्यों ना परी, प्रो मेरे सरकार ?
१०८
तुम वन-विचरण कर रहे निपट अकेले नाथ,
बही जाति है यह इतें, मेरी नाव अनाथ ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२०६
रसरी बांधो नेह की, नैन सैन के छोर,
खींचि लेहु टूटी तरी, श्री चरणन की ओर ।
११०
पीतम, साधन हीन
हौं, निस्साधन मम नाव,
केवल नेह निवाह को
अहै साधना भाव
१११
या विछोह के सिंधु में, केवल यह प्रतीति,
सजन, निबाहोगे अवश, चिर पिरीत की रीति ।
११२
एतो जिय विश्वास है, केवल एती आस,
कबहूँ तो बहि जायगी तरी तिहारें पास |
११३
आशंका को उठि रह्यो, भंझानिल घनघोर,
भीति- बीचि - विक्षोभ को घहयो घोर अथोर ।
११४
यह विरहाम्बुधि तट रहित, अवधि-नीर गम्भीर,
मास, वर्ष, दिन, छिन भए, चंचल लहर अधीर ।
४१७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३४
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196191
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667181
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
११५
४१८
नित संशय को उठि रह्यो, उभरि उभरि तूफान,
प्रकट्यो सर्व विनाश को, फेनिल क्रुद्ध विधान ।
११६
गरजि-गरजि घिरि-घरि, घुमड़ घटाटोप घन आय,
अम्बर में ऊधम करत, खर बिजुरी चमकाय ।
११७
दिग्भ्रम में मेरी तरी, परी निरी
असहाय,
याहि उबारहु करि कृपा, हे मेरे रस राय !
११८
तान,
करहु
तरंगित शून्य में, निज वंशी की
इक छिन में मिटि जाइगो, मन-दिग्भ्रम - अज्ञान ।
११६
अथवा तुम करिकें कृपा करहु धनुष टंकार,
भय भाग, पहुँचे तरी सागर के वा पार ।
१२०
लखन नाम मम दीप लघु, लखन शरण मम आस,
लखन-चरण मम भक्ति दृढ़, लखन-नेह विश्वास ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
१२१
लखन संस्मरण-मत्त हौं, लखन-चरण मम नेह,
लखन-संतरण-भाव
मम, लखन ग्रामरण देह |
१२२
लक्ष्मण - लक्ष्मण धर्म मम, लक्ष्मण लक्ष्मण कर्म,
लखन - लखन हिय मर्म मम, लखन-लखन मम शर्म ।
१२३
सोरठा
हे मेरे पर पार बढ़ि प्रवहु या सिन्धु विच,
नैया लेहु उबार, डगमग, उग-मग ह्वै रही ।
१२४
कलरव कूजन करि रहे, भाव विहंगम-वृन्द,
निशा सिरानी, जगि उठ नव उमंग के छन्द ।
१२५
नील गगन में रुपहरी छहरी छटा अपार
मानों नील तड़ाग में बही दुग्ध की धार ।
१२६
दिन-मणि प्राची सों मिल्यो विहँसि, हुलसि, हरषाय,
जग जाग्यो, भाग्यो तिमिर, जग्यो बिग-समुदाय ।
४१६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ॐम्मिला
१२७
दिन के सँग दिन की विथा जगी, ठगी, रस लीन,
रवि-कर-प्रथिता जाल में फँस्यो दीन मन-मीन ।
१२८
पंछिन के सँग, प्रीति की चहकी चाह अतीत,
हृदय मुरलिका तैं उठ्यो, विरह-भैरवी-गीत |
१२६
कुसुम दलन तें कँपि गिरे प्रोस - बिन्दु सुकुमार,
मनो कपोलन तैं ढरत, अश्रु-बिन्दु द्वै चार ।
१३०
लहरे दूर्वादल सिहरि,
प्रात- समीरण
पाय,
४२०.
ज्यों निश्वास समीर तें, संस्मृति-तृण लहराय ।
१३१
डरियां- बहियां द्रुमन की, डोलि उठीं मुदमानः
भुज सैनन तें होत ज्यो, पियतम को आह्वान |
१३२
देखि 'उषा को बिहॅसिबो, प्राची को मृदु हास,
विरहिनि इन दिन छिनन में खीझत, होत उदास ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
१३३
प्राची सों दिन-मणि मिले, मिट्यो विरह-दुख द्वन्द,
विकसे जन-गण-हिय कमल, विलसे मन-मकरन्द ।
१३४
प्रकृति, किरण - जल अमल में, छल-छल उठी नहाय,
नील गगन - अम्बर पहिरि, लहराई हरपाय ।
१३५
तरणि-मिलन तैं प्रकृति को, भयो विरह-दुख अन्त
किन्तु विरहिनी के हिय हूक अचूक उठन्त
1
हृदय-नीड़ में
१३६
बैठे बोलत बोल,
भाव-खग,
कहां तिहारो प्रात है, कित किरण- कल्लोल ?
.
१३७
दक्षिण अटवी में दुर्यो, मम दिग्भानु ज्वलन्त,
याही तें मन- गगन में, छायो तिमिर अनन्त ।
१३८
भाव विहंगम वृन्द हे, करहु तरणि आह्वान,
क्यों हूं तो या विरह-निशि को होवे अवसान ।
४२१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१३६
निशि तें दूनी प्रात में बढ़त विरह की पीर,
दिन ते दूनो, रात में जियरा होत अधीर ।
१४०
सोरठा
सूरज बंस पतंग,
उदित होउ
मम
गगन में,
हुलसावह अंग अंग
कोमल दृढ़ कर परस तें ।
४२२
१४१
बही जात जीवन- नदी, सही न जात उपाधि,
कही जात मुख ते न कछु या प्रवाह की व्याधि ।
१४२
निकसी उद्गम तें लिए हिये अमन्द उमंग,
लहर चुनरी पै चड़यौ, नव प्रवाह को रंग ।
छलकि वही कल गीत
१४३
तै, प्रीति अतीत पुनीत,
द्रुत गति में प्रकटी झलकि उत्कंठा की रीत ।
१४४
पिता-वंश, पति-वंश, इन द्वं कूलन के बीच,
जीवन-तटिनी बहि रही, बिरह-पीर-जल सींच ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
१४५
तुम समुद्र, मिथिला दुरे, लहराए वा ठौर,
मो सरिता हित तुम सजन, भए और के और ।
१४६
हौं लघु सरणी, मिल गई, पिय, तुम में सकुचाय,
सतला हौं, अतला भई, तुम सम सागर पाय ।
१४७
प्यास,
लहर-लहर सों मिलि गई, बुझी अपूरन
जीवन सों जीवन मिल्यो, मियो प्रवाह प्रयास 1
१४८
पै इक दिन तुम मम उदधि, गए नाँघि मर्याद,
तव तें तटिनी में उठ्यो कोलाहल, प्रतिवाद ।
१४६
उमड़यो सागर विजन में, छाड़ि नदी को संग,
असंभावना मिस भयो, विधि-विधान को भंग ।
१५०
फिर प्रवाह को दाह वह, फिर वह हाहाकार,
फिर वियोगमय वेदना, फिर गतिमय अभिसार ।
४२३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
सूने-सूने ह्वै गए,
१५१
विस्तृत
दोऊ कूल,
सिकतामय निस्सारता प्रकटि भई प्रतिकूल ।
१५२
पल-पल बिकल बिलाय जल, कल-कल कलपत जाय,
मचल-मचलि, चलि - चलि थक्यों जात न अतल समाय ।
१५३
अतल - अवध में ना मिलें,
प्रतल - अवध तेंदूर,
अतल - अवधि लौं उमड़िहैं
निर्जन में भर पूर ।
१५४
बही चलहु जीवन-सरणि, या में कछु न वसाय,
कबहूं तौ दुरि परहुगी, अतल शरण में जाय ।
१५५
साधन पथ लम्बो बड़ो, निपट
प्रतीक्षा-पूर्ण,
देखौं
श्रद्धा-साधना, कब हो
सम्पूर्ण
४२४
१५६
सोरठा
कहूं विरह-मरु बीच, लुप्त न होवें मम नदी,
आवहु सिन्धु नगीच नांघि अवधि-मर्याद यह ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
१५७
उजड़ गई गुंजन मयी, मम संयोग निकुंज,
ठाढ़ो भयो पहार
सो, यह वियोग को पुंरंज ।
१५८
तुंग शिखर, हिय
विकट चढ़ाई
वेदना, शिलाखंड-दिन मास,
गई, दरस परस की आस ।
- १५६
गिरि पै घने विषाद के जमे गुल्म सर्वत्र,
रोमांचक संस्मरण वे भए विकम्पित पत्र ।
टेढ़ी, सँकरी,
१६०
कंटकित, बनी प्रतीक्षा-वाट,
द्ग- जल, - गिरि निर्भर उमड़ चित्तर्हि करत उचाट ।
आशंका गह्वरन
१६१
में,
भभके हिंसक जीव,
गरजि गरजि कै ह्वै रहे, पद-पद पे उद्ग्रीव ।
१६२
पुनर्मिलन-क्षण-दूरता, कुज्झटिका-सी
फैलि
विरह- शैल पे करि रही, स्वप्निल क्रीड़ा-केलि ।
४२५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१६३
हौं एकाकी यात्रिणी चढ़ी
चढ़ी जात अकुलात.
गिरत, परत, पुनि पुनि उठत, सहत घात-प्रतिघात ।
१६४
भयौ
चिर विश्वासाश्रय
भयो मम
पथ प्रकाशिका बनि
४२६
श्रवलम्बन-दंड,
गई, श्रद्धा ज्योति प्रखंड 1
१६५
एक-एक करि कैं, करत शिलाखंड कौं पार
विरह- शैल पै चढ़ि रही मगन लगन
१६५
मनुहार ।
कबहु- कबहु यह लकुटिया लचक जात, हे प्रान,
चरण-विकम्पन कौं, कबहुँ होत देह कौं भान ।
१६७
कबहूं-कबहूं दीप की शिखा निरी अकुलात,
कबहुँ निराशा पवन तें, विचलित है-ह्वै जान |
*१६८
हौं गरीबिनी यात्रिणी,
यात्रिणी, रंगी तिहारे रंग,
सजन, छुड़ावहु तनिक यह इति-भीति दुःसंग |<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
१६६
विकट पहाड़ प्रदेश के, पर पिया को देश,
गिरि-लंघन बिन किमि मिलें पुन्य प्रेम परमेश ।
१७०
सोरठा
विरह शैल के पार, पीतम, तुम क्यों रमि रहे ?
आवहु, अहो उदार, दुर्गम गिरि कौं भेदि के ।
१७१
क्षीरोदधि में ज्यों रमँ, अशिशायी भगवान,
तैसे मम हिय उदधि में रमहु ऊम्मिला- प्रान ।
१७२
जैसे सागर में उठत, केलि मयी कल्लोल,
हिय- समुद्र कों करहु त्यों प्रान्दोलत हिंडोल ।
१७३
ज्यों समुद्र मन्थन भए, निकसे चौदह
रत्न,
त्यों तुम सश्रम करहु प्रिय, हिय मन्थन यत्न ।
मृदु
१७४
परिरम्भण-भार को मेरु- सुमन्थन-दंड,
प्राणाकर्षण की बनै, रसरी पूर्ण अखंड ।
४२७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला.
१७५
ढरकावहु मो हृदय मथि प्रिय, नवनीत प्रवाह,
सरसावहु अनुरागिणी, अनबोली मनचाह ।
१७६
मेरे हृदय - समुद्र की जल
श्यामल गम्भीर,
अतल तलातल लौं भरी, वामें संचित पीर ।
१७७
हिय-सागर तैं उठि रही बड़वानल की ग्रह,
प्रिय, चहु दोउ भुजन तैं, अन्तरतर को दाह ।
१७८
कब लौं हिय हहरे, कहहु,
कब लौं आवोगे बिहँसि, हे
एकाकी विक्षुब्ध ?
प्रिय, मन्थन लुब्ध ?
४.२८
१७६
चिन्ता सम्भ्रम के बड़े ग्राह नक विकराल,
या समुद्र में बढ़ि रहे, सुनहु ग्रहो व्रतपाल !
१८०
नीलगगन सम तव स्मरण, झलकत सिन्धु मकार,
पं थिर रहत न एक छिन, मेरो पारावार<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सग
१८१
परछाई संस्मरण की, कम्पित है-ह्वै जात,
लहरन सम यह उठत है हिय-विछोह अकुलात ।
१८२
चलित, थकित, नित व्यथित, इत, अमथित हियको सिन्धु,
याहि करहु कर्षित, मथित, है मम पूरन इन्दु !
१८३
शशि, मम नभ में उदित हवै, मथित करहु हिय- सिन्धु,
युग कपोल तट पै छिटकि, झलकें श्रम-कण बिन्दु ।
१८४
पूरण ताहि न जानिए, पूर्ण ताप बिन जोय,
ताही तें हिय उदधि में भर्यो अनलमय तो ।
१८५
रोम-रोम जो भरि गए तो यह ऊनो प्रेम,
हरि हरि हिय हारिबी, यह पिरीतो नेम |
१८६
विप्रयोग- बड़वाग्नि जो सोखे सागर नीर,
तौ, फिर सहज सनेह की रही अधूरी पीर ।
४२६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१८७
युग प्रनन्त लौं हहरिबौ युग अनन्त लौं दाह,
अथक जोहिबो बाट को, यह सनेह निबाह ।
१८८
साँचो प्रेम अकाल मम, प्रेम देश-गुण मुक्त,
प्रेम निरन्तर, अनवरत अथक प्रतीक्षा युक्त ।
१८६
सोरठा
कसौ कसौटी नाथ, जेती मोकों कसि सकौ,
हृदय तिहारे हाथ, युग अनादि तें विकि गयो ।
१६०
दृग रंजन, मम नयन में, अंजन बनि अँजि जाहु,
लोचन की फुहियान में, कछ छिन बैठि नहाहु ।
१६१
काजर की रेखा बने बसहु लोचनन बीच,
बाँध अंजन गुण बने नयन खञ्जनन्हि खींच ।
१६२
सुवान सँग, होउ अंक श्रासीन,
कबहुँ ढरकि
कबहुँ कपोलन पै
ढरक होउ सुरति रस-लीन ।
४३०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
१९३
कबहुँ नयन - खिरकीन तें, कूदि हृदय के गेह,
आत्मलीनता मिस करहु बरबस मोंहि प्रदेह |
१९४
यिनिधि मम अनमोल तुम, तुम मम काजर-रेख,
दृग कनीनिका तुम बने, तुम मम नेह-विवेक ।
१६५
जा दिन तैं तुम बन गए, करिकै अवध अनाथ,
तब तें नयनन को छुट्यो, काजरहू को साथ ।
१६६
हौंस मिटी, काजर छुट्यो, मच्यो नयन में कीच,
कारी झांई पीर की परी पुतरियन बीच ।
१६७
ये तैरे-तैरे
फिरें,
नयना निपट अधीर,
युग लोचन में हूँ रही दरस - काकरी-पीर
।
१६८
सोरठा
ये नैना अनजान, प्रकट करत हिय दरद को,
ज्यों कोऊ नादान, घाव दिखावतु प्रापुनो ।
४३१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>'ऊम्मिला
१६६
जीवन- डगरी में छिपी निशि अँधियारी पीर,
तकि तकि कैं कोउ दै रह्यो, विरह वेदना तीर ।-
२००
भांति-भांति के राग की चपल भ्रान्ति उद्भ्रान्ति,
करिबे को आई यहाँ, नवल क्रान्ति उत्क्रान्ति ।
२०१
चल्यो जात हो हिय सहज, बिध्यो नेह के शूल,
सिसक रही पीड़ा-लली, भई लाज उनमूल ।
२०२
धसक-धसकि, मिटि मिटि गए, मधुर मनोरथ - मौन,
बात पूछिबे कों, कहहु रहयो भौन में कौन ?
२०३
कित सँजोग ? कित सरलता ? कितै सुनिश्चय-साज ?
इत उत जित-तित तैं उमड़ि, परी विकलता आज ।
२०४
४३२.
क्षत-विक्षत हिय बहि रह्यो, लगे
प्रश्न के तीर,
मौन निरुत्तर वेदना मन, चित, धुनत
शरीर ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४४९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२०५
चिन्ता- कठिनी लिखि रही प्रश्न चिन्ह प्रति वार,
क्यों ? कित ? का ? कैसे ? कहाँ ? को फैल्यो विस्तार ।
२०६
युग प्रनादि के गरभ सों निकसी जीवन-वाट,
युग अनन्त लौं जात यह, ज्यों नभ-गंग विराट ।
२०७
भेदि लोक लोकान्तरहिं, भेदि अंड-ब्रह्माण्ड,
निर्झरिणी सम फटि परी, जीवन- डगर प्रकाण्ड |
२०८
निखिल सृष्टि के चक्र पै,
मण्डित यह मग-रेख,
जिमि ललाट पे खचित हैं,
विथा-कथा के लेख ।
२०६
या पथ-रेखा पै धरत, होलें-हौलें पाँय,
ढूँढति ढूंढति तुमहि, हौं आइ गई एहि ठांय ।
२१०
दीख परत अजहूं, सजन, डगरी लम्बी मोहि,
हृदय हारिबे लगत है, यह अनन्त पथ जोहि ।
४३३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२११
किते तिहारी मृदु छटा ?
कितें तिहारो नेह मय
कितें तिहारो देश ?
चिर संयोग विशेष |
४३४.
२१२
कित पिया की नगरिया ? अजहुं न जानी जाय,
का जानौं साजन रहे कौन देश में छाय ?
२१३
चलिवो-चलिवो रैन-दिन, तनिक न रहिबो बैठि,
अष्टयाम को जागिवो, अन्तर तर में पैठि ।
२१४
सुनियो धनु टंकार की अनहद धुनि हिय बीच,
करिबो मानस अर्चना, नयनन तें जल सोंचि ।
२१५
जीवन मग में चलन के ये साधन निष्काम,
जीवन को साफल्य है, नित प्रयत्न अविराम ।
२१६
जिय एतो विश्वास है, हिय में एती ग्रास,
देस तिहारो' है कहूँ, जहाँ तिहारो बास ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२१७
गिरि परिये, फिर चलिय उठि यह नेम-निरवाह,
दूर पास जानत नहीं, लगन मगन की राह ।
२१८
सोरठा
क्षत आशा के शूल, जीवन के पथ में बिछे,
हिय की भोरी भूल, मग की कांकरियाँ भई ।
२१६
ग्रहो दुरे क्यों समय के अन्तर-पट में जाय ?
आवहु, पीतम, अवधि की यह यवनिका हटाय |
२२०
भग्न मनोरथ की विछी जीवन-पथ में धूर,
परि के घटना चक्र में, भई कल्पना चूर ।
२२१
दूरि-दूरि लौं धरि हो बूरि दिखाई देत,
धूरि-धूसरित
रह्यो, अँग-सँग हृदय समेत ।
२२२
श्राशंका के पवन में रजकण नाचि उड़ायं,
छिनछिन उडि उड़ि धूलिकण नैनन में परि जाँय ।
४३५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२२३
या मग में षट् ऋतुन को रहि रहि ऊधम होत ।
कबहूं चमकत शरद् शशि, कबहुँ भाद्र खद्योत ।
२२४
ग्रीषम, वर्षा, शरद् मुद, शिशिर, मधुर हेमन्त,
अन्तवन्त अनुराग मय, मंजुल मंदिर बसन्त 1
२२५
पारी पारी सों सकल, ऋतु वैभव मिलि जात,
पै एकाकी पथिक को, हृदय और अकुलात ।
विप्रयोग
२२६
ग्रीषम भयो, आँसू-पावस पीर,
नित निरभ्र विश्वास की, भई शरद् ऋतु
धीर ।
२२७
४३६
निपट निराशा को शिशिर, संशय को हेमन्त,
चिर आशा को बनि गयो, कुसुमित वरद बसन्त ।
२२८
जीवन-पथ में मिलत जब, विकट निदाघ दुरन्त,
तब अँग-अँग तें उठत है दाहक ज्वाल ज्वलन्त ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५३
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२२६
भुलसत हिय, दहकत हृदय, श्राशा वरिवरि जात,
तड़पत मन, सूखत अधर, रोम-रोम मुरभात |
२३०
दलित मनोरथ- बालका, होत ग्रग्नि
अंगार,
नग्न चरण मग गामिनी, तड़पत पन्थ मँझार |
२३१
मन-नभ-मंडल में तपत, प्रबल
विछोह - पतंग,
चलत लूक उच्छ्वास की, ले मरीचिका संग |
२३२
विश्व तपत, ब्रह्मांड सव होत विदग्ध विशेष,
बापी कूप तड़ाग में, रहत न जल निःशेष ।
२३३
लिए बालुका-धूलिकण उठत बवंडर घोर,
धूमिल सो ह्वै जात है, नभ-अम्बर को छोर ।
२३४
लगत प्यास, श्रमकण चुवत, छुवत लपट मय पौन,
चली जात, तोऊ सतत, पथ गामिनि यह कौन ?
४३७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२३५
यों जीवन-पथ में निरखि, विकट निदाघ- प्रकोप,
हिय तैं उठि, मन गगन में, गरज उठत घन तोप ।
२३६
अँसुवन की पावस झड़ी लगत ग्रापुही आप,
ज्यों वर्षा शीतल करत, खर निदाघ अभिशाप ।
२३७
कारे, कजरारे, भरे, निरे
मेघ
मेघ के कोट,
मन नभ में करि उठत हैं,
२३८
भय-विद्युत विस्फोट |
हहरत हिय, लहरत पवन,
बहरत गहर उमंग,
आँखिन तैं बहि-वहि उठत
दुसह वेदना-रंग |
४३८
२३६
अँसुवन तें जीवन- डगर, पंकमयी है
पंकमयी ह्वै जात,
फिसलत- फिसलत यात्रिणी, चली जात अकुलात ।
२४०
ज्यों निदाच दुख देत है, त्यों पावस को काल,
ये दोऊ ऋतु करत हैं हिय को हाल बिहाल ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२४१
जब प्रवीरता बढ़त है, तब कछ धीरज देत,
श्रावत शरद् सुहावनी पूरन इन्दु समेत ।
२४२
अति वियोग मय छिनन में, अति अधीर पल माँहि,
दृढ़ प्रतीति जागत हिये, रहत कुसंशय नाहि ।
२४३
हिय - प्रकाश निरभ्र, मुद, सुस्थिर भासित होय,
शारदीय नभ रहत ज्यों, नील, निरभ्र, प्रतोय ।
२४४
निपट शुद्ध विश्वासमय, मन-दिगन्त ह्वै जात,
चिर सनेह के संस्मरण हिये उठत मुसकात ।
२४५
मगन लगन
अम्बर
रुचिर होत धीरतापूर्ण,
हर सिन्धु नद होत ज्यौं, युग तट लौं श्रपूर्ण ।
२४६
ज्यों पूरन शशि उदित है, लसत गगन मंकार,
त्यों विलसत हिय-गगन में, पीतम छवि साकार ।
४३६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मला
४४०
२४७
उड़गण मिस चमकत,
भरत,
नैश हास्य के फूल,
शरद्-निशा हुलसत, पहिरि मुद चाँदनी- दुकूल ।
२४८
त्यों पिय की मुसक्यान की स्मिति को अंचल प्रोढ़,
लगन ठगौरी वदतु है, शरद निशा तें होड़ ।
२४६
कबहुँ शीत की कँपकँपी, ज्यों हिय में छ्वै जात,
त्यों विचलित ताको, कबहुँ कम्पन हिये समात ।
२५०
चिर प्रतीतिमय शरद् ऋतु, ठिठुरि शिशिर है जात,
ज्यों धीरज नैराश्य में, परिणत हूँ अकुलात ।
२५१
अंग-अंग कैंपिबे लगत, पहुँचत हिय लौ ठंड,
दरस परस की चाह अति चलित करत हिय खंड ।
२५२
"
आलिंगन की भावना सँग रहिबे की चाह,
शिशिर - निराशा में करत, शीतल हिय- उत्साह ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२५३
दुश्चिन्ता की हसन्ती धधकत है दिन रैन,
तऊ हृदय ठिठुरत रहत, लहत न इक छिन चैन ।
२५४
चली जात पथ गामिनी, करत शिशिर को अन्त
पुनि, मग में मिलि जात है, संशय को हेमन्त ।
२५५
शीतल हिय, शीतल चरण, शीतल सव बहिरंग,
अन्तरंग शीतल श्रमित, शीतल सब रंग-ढंग ।
२५६
शीतल दिशि शीतल निशा, बड़ी-बड़ी विकराल,
ऊबत चिर-पथ-गामिनी, होत न प्रातः काल ।
२५७
इत संशय, चिन्ता उत, जित-तित संभ्रम मूक,
कहिये का सों ? किमि ? कहहु, हिय बतियाँ दो-टूक ?
२५८
गरजत बरसत माघ के मेघ घिरत सब ओर,
कँपत चरण, लरजत हृदय, होत शब्द घनघोर ।
४४१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२५६.
ज्यों अनचाहे अतिथि गण, घर घेरत हैं ग्राय,
गंगन घेरिबे में न त्यों, माघ- मेघ शरमायं ।
२६०
धाय,
संशय के हेमन्त में, श्राशंका घन
भय-भैरव - उद्घोष सों भरत हृदय असहाय ।
२६१
रोम-रोम कँप उठतु है, ठिठुरि जात अँग- अंग,
आँखिन तं चुइ परंतु है, हिय-वेदना अनंग |
४४२
२६२
निर्जन जीवन- डगर में चली जात यह कौन ?
कितै देस याको ? बन्यो कित धौं याको भौन ?
२६३
साजन, तुम मेरे निलय, तुम हो मेरे
देस,
श्रो परदेसी, तुमहिं मैं ढूंढत देस-विदेस ।
२६४
.
छांड़ि शिशिर नैराश्यमय, संशयमय हेमन्त,
पावत तव पथगामिनी, पुनि चिर आश बसन्त ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४५९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२६.५
उठि आवत है हृदय तें पुनि नवजीवन साँस,
आशा सुहरावति सम्हरि, दुसह वेदना फांस ।
२६६
सोरठा
हे मेरे प्रेमेश, सुनी मम जीवन
डगर,
मम ऐकान्तिक क्लेश, हरहु प्राय गहि बाँह मम ।
२६७
फूल्यौ मन- सर में ग्रमल, हृदय कमल रसपीन,
तव चरणन में है रह्यो यह उत्पल तल्लीन ।
२६८
सहज सहस दल कमल
यह,
लिए समर्पण भावना, भूमि
प्रेम-नाल - संलग्न,
रह्यौ रसमग्न ।
२६६
निःस्पन्दन की पाँखुरी, अरुण नेह को रंग,
मंदिर सुरित की गन्ध मधु, रेणु अमन्द उमंग ।
२७०
भूमि कमल नित करि रह्यो, आशा-पवन-विलास,
सतत श्वास- निःश्वास मिस करत समर्पण - रास ।
४४३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४४४
२७१.
मम अर्चन साधन-चरण विचरि रहे वन-वीथि
कहु, करौं सम्पूर्ण किमि कमल- समर्पण रीति ?
२७२
या मन के कासार में उठत तरंगें लोल,
मौन कल्पना, लहर सम करत रहत कल्लोल ।
२७३
कम्पित सर में हिय कमल डुलि-डुलि उठत प्रथोर,
आत्म-निवेदन की सतत आकुल उठत मरोर ।
२७४
देखत नहिं तुम प्रेम को नेम, अहो रसराय,
छांड़ि चिरन्तन नेह-निधि, रमे विपिन में जाय ।
२७५
तुम निष्ठामय, तुम सुदृढ़, निपट धीर व्रतपाल,
कहा नेह ऊनो परत, जब हिय होत विशाल ?
२७६
सोरठा
वन तें हाथ बढ़ाय, लेहु पूर्ण निधि आपुनी,
हृदय-कमल अकुलाय, कछु कछु मुर्भत जात है ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२७७
हिय की कोमलता सकल, घुलि-धुलि बहत प्रधीर,
ढरकि नयन तैं अर्घ्यं मिस, बहत हृदय की पीर ।
२७८
जग को मधु - सौन्दर्य सब, नयन-बिन्दु में आय,
झलकि झलकि, इत उत बगरि, प्रकटि रह्यौ अकुलाय ।
२७३
बने सत्य- शिव-रूप
तुम,
हौं
सुन्दरता-रूप,
मो विनु, पिय, किमि होउगे तुम सम्पूर्ण अनूप ?
२८०
बिना सत्य- शिव के रहत सुन्दर सदा अपूर्ण,
त्यों सुन्दर बिनु सत्य - शिव, किमि है है संपूर्ण ?
२८१
जीवन को माधुर्य सब सुन्दरता की सार,
वा दिन तैं, तुम बिन भयो, जड़ अस्तित्व विकार ।
२८२
कहा सुघड़ सुकुमारता
? कहा मोद उल्लास ?
तुम बिन सुन्दरता कहा
?
कित विलास ? कित हास ?
४४५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२८३
भई विरह-विधुरातुरा तव अनुचरा प्रतीति,
अन्तस्तल में झलकि, झुकि, सरसावहु रसरीति ।
२८४
तव चरणन की हौं सदा, शुक्ल दासिका दीन,
मोंहि करहु, हे सत्य-शिव, नित निज रस तल्लीन ।
२८५
प्रति दिन दृग जोहत रहत, सतत तिहारी बाट,
ज्योति चिरन्तन जगि रही, मुक्त कुटीर - कपाट 1
२८६
बिछे प्रतीक्षा बाट में
लोचन -मुकुल
सनीर,
४४६
पलक- पंखुरियाँ ह्वै रहीं पल-पल ललकि अधीर ।
२८७
मो बगिया में दुरि परौ कबहूं तो सुकुमार,
डोलि रह्यो व्याकुल पवन, करि वियोग संचार ।
२८८
हारि गई नैनान की कली निमंत्रण देत,
पलक-पाँवड़े परि गए नेह-पराग समेत ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
२८६
अब तौ सूनी कुंज पै करहु कृपा की कोर,
छिटकि खिलहु निशि-नाथ से है के आत्म-विभोर,
२६०
सघन कुंज की गलिन में,
प्रवहु खेलहु खेल,
करहु सनाथ छवाय पद
मेरी जीवन- बेल ।
२६१
आँख मिचौनी मिस दुरहु उझकि उझकि तुम प्रोट,
कछ काँकरिया-सी चुभे, देहु सैन की चोट ।
२६२
मेरी भीनी
हौं रति, तुम
चुनरिया
रँगी
तिहारे रंग,
दूलह बने मेरे
नवल अनंग ।
२६३
बैठि रहति है मन लगन, हिय कुटीर के द्वार,
नेह भगन जोहत रहत, निशि-दिन पंथ तिहार ।
२६४
पक्ष्म - लोम-सम्मार्जनी,
लोचन भारी पूर्ण,
भारत, सींचत रहत नित, पंथ-मृत्तिका चूर्ण ।
४४७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४४८
२६५
द्वार देहरी पे धरे चिर
अनुराग प्रदीप,
द्वार-समीप ।
कब ते उत्कंठा ललकि, बैठी
२६६
कासों कहियत प्रेम को नेम ? कहा अनुराग ?
कहा दरस की लालसा ? कहा हिये को दाग ?
२६७
परिभाषा चिर प्रेम की निपट अटपटी होय,
वाको तृत्व निगूढ़ प्रति, जानत है कोउ कोय ।
२६८
प्रेम सगुण कोऊ कहत, कोउ निरगुन कहि देत,
कोऊ द्वैत अभाव कौं कहत सनेह-निकेत ।
२६६
मो मन प्रेम स्वरूप है कम्पन मय अविराम,
स्वर, लय, यति, गति मय बन्यौ प्रेम रूप अभिराम ।
३००
प्रेम-चटपटी हृदय की, प्रेम-अटपटी बात,
प्रेम-भूमिबो मत्त ह्वै, इतै उतै बतरात ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>1553
३०१
पंचम सर्ग
-
प्रेम बन्यो अस्तित्व की सार
रूप मनुहार,
प्रेम-दरस की प्यास है, उत्कंठित
३०२
अभिसार ।
प्रेम - मौनमय वेदना, प्रेम-प्राण की
प्यास,
अधरन में कछु हास ।
प्रेम-हिये में रोइबो,
३०३
प्रेम-सृष्टि की परिधि को केन्द्र विन्दु सुकुमार,
प्रेम - पुरातन हिय कथा, प्रेम-हिये की हार ।
३०४
हिय-व्रण नित्य दुराइबो, कहिबो कछु न बनाय
प्रेम-नेम की रीति यह, रहिवो मन समुझाय ।
३०५
कहा भयो जो छांड़ि के चले गए हृदयेश ?
प्रथा सनातन प्रीति की, पालत हैं प्रेमेश ।
३०६
प्रेम-चिरन्तन विकलता, प्रेम-चिरन्तन ग्रह,
प्रेम - सतत अवहेलना, प्रेम-दरस की चाह ।
४४६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३०७
x
प्रेम - विरागी, प्रेम- यह चिर अनुराग अतीत,
प्रेम-ग्रहं विस्मरणमय, आत्म-स्मरण पुनीत
३०८
प्रेम - नेम
की
निठुरता,
प्रेम - छेम उपहास,
-
प्रेम-हेम इव
शुद्धता,
प्रेम- कसौटी त्रास
I
२०६
प्रेम - संस्मरण
नाम को,
प्रेम-चरण सेवा विकल,
प्रेम- सुकीर्तन-भाव,
प्रेम-अर्चना-चाव
1
३१०
४५०
मन मोती को खोइबो, नित्य ठगैवो प्रान,
अनबोले सहिवौ विथा, यह प्रेम की कान 1
३११
छांड़ि धर्म की व्याधि सब, छांड़ि सुकर्म उपाधि,
अव्यभिचारी नेह की रहौं साधना साधि ।
'३१२
नेह-भक्ति- बन्धनन में, मोहि मिलि गई मुक्ति,
भली हाथ सहसा लगी, यह समाधिः की युक्ति ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
३१३
गुण-बन्धन- विरहित भयो, राग भयो सुविराग,
द्वैत- भयो अद्वैतमय, प्रेम-योग, तप, त्याग ।
३१४
धूनी तपो न चीमटा खनक्यौ एक बार,
तऊ प्रेम-सन्यासिनी, भई वियोगिनि नार
३१५
सतत ध्यान, नित संस्मरण, तपश्चरण दिन-रेन,
पुण्य प्रेम को नेम यह, यह साधना ऐन ।
३१६
जा हिय में नित बसत है, प्रेम पुनीत विशुद्ध,
तहाँ राखिये कहहु किमि संस्कृति धर्म विरुद्ध ?
३१७
पिय-सनेह को वरत जहँ पुण्य दीप अविराम,
तहाँ अन्यतम वासना रहत न एकी याम 1
३१८
सोरठा
प्रेमी को संसार, सतत साधनामय बन्यौ,
वहाँ कहाँ कुविचार, तार नेह को जहँ बँध्यौ ?
४५१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६८
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३१६
नेह-सगाई गई, प्रणय-पाणि पिय
दृढ़ अनन्य आश्रय मिल्यो जीवन भयो सनाथ
३२०
बॅधी चूनरी पीय के, उत्तरीय के संग,
गठबंधन चोखो भयो, उमड़ यो नेह अनंग |
३२१
विप्रयोग के क्षणन में भनक परी यह कान,
होत न तप श्राचरण बिन, पिय दरसन मुदमान ।
४५२
३२२
धारि हिये में अहनिशि, पीय ध्यान अनमोल,
अलख जगावत नेह को बोलि बोले बोल ।
३२३
बाला जोगिनि बावरी चली जात अलमस्त,
त्रस्तभाव भागे सकल, भयो भोग-भय अस्त
दग्ध
३२४
वासना-क्षार की भस्म विभूति रमाय,
ध्यान-मग्न जोगिनि भई, अलख चरण मन लाय ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४६९
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३२५
पंचम सर्ग
जागरूकतामय भयो जोगिन को सब काल,
गुडाकेश जाके सजन, किमि सौवे सो बाल ?
३२६
प्रीति जगी, निद्रा भगी, लगी समाधि प्रचंड,
नाम रटन की धुनि लगी अहरह, सतत, अखंड |
३२७
मोह छुट्यो, माया मिटी, टूटे अनियम दाम,
निरलसता पूरित भये निशि-दिन के सव याम ।
३२८
विरह-अग्नि- धूनी तपत, काहू ग्रसन बैठि,
सजन ध्यान-मग्ना भई,
अन्तस्तल में पैठि ।
३२६
सोरठा
भय उनींदे नैन, मन राच्यौ
पीतम चरण,
लखन नाम के बैन, निशि-दिन निकसत हृदय तें ।
३३०
प्रेम-योगिनी हौं बनी, पीतम-ध्यान-समाधि,
छूटि गई संसार की, सब व्यवहार उपाधि ।
४५३<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३३१
नाम-संस्मरण
कर्म मम,
मानस - अर्चन
धर्म,
मगन ध्यान पिय को वन्यौ या
जीवन को मर्म ।
४५४
३२२
गत सँजोग के दिनन की, संस्मृति जब जगि जात,
तब हिय रोवत, अधर दोउ, पुनि कछु कछु भुसकात ।
३३३
हाँ चाहत ही बाँधियौ, समय-दाम में प्रेम,
चाहत ही हो उलटियौ या अनन्त को नेम ।
३३४
देश-काल-बन्धन रहित, कैसे बाँध्यो जाय ?
किमि अनन्त आकाश यह, अंजलि बीच समाय ?
३३५
प्रिय, त्वदीय सीमा-रहित नेह अनन्त, अछोर
यह समुभी इन दिनन में विवश हियहि भकभोर ।
३३६
अब सभी यह व्यर्थ है, हिय को
चहिय राखियो मौनमय दुसह
हाहाकार,
बिथा संचार ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३३७
पंचम सर्ग
सहिये, सब सहिये बिहंसि तनिक न
कहिये बात,
रहिये गुप-चुप मारि मन, यह
नेह संघात ।
३३८
राजयोग, हठयोग तैं, प्रेम-योग
बड़ होय,
प्रेमेश्वर - प्रणिधान में, जात विचलता खोय ।
३३६
ग्रासन, प्राणायाम, यम, नियम, धारणा, ध्यान,
चिर समाधि, सब कछु मिलत, रहत न जड़ अज्ञान ।
३४०
अनचाहे, सब यम-नियम, सधत आपही आप,
चित्तवृत्ति को योगमय होत निरोध श्रमाप ।
३४१
जा प्रासन में जमि गए, प्रीति वियोगी जीव,
सोई आसन होत है सफल सुसिद्ध प्रतीव ।
३४२
प्राण श्वास उच्छ्वासमय बनत चलित हिन्दोल,
दुलरावत उल्लसित हूँ, पीतम नाम अमोल ।
४५५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४५६
३४३
ध्यान अपने सजन को धरिबौ नित दिन रैन,
तजिबी प्रेय विचार मय योग छैम को ऐन ।
३४४
सतत धारणा मिलन की, हिये राखि अनुरक्त,
चलियो जीवन डगर में, लोक-लाज करित्यक्त ।
३४५
प्रेम-योग में मिलत यों नित समाधि-आनन्द,
चिदानन्द मय, भक्ति युत, मिलत मुक्ति स्वच्छन्द ।
३४६
ज्ञान योग सायास है, प्रेम-योग अनयास,
एक शून्य मय ध्यान है, दूजो दरस-बिलास ।
३४७
ज्ञान योग में रहत है नित निरोध को त्रास,
प्रेम योग बन्धन रहित विनिर्मुक्त आभास ।
३४८
ज्ञान योग अभ्यास में बरजोरी को संग,
प्रेम योग के पाठ में, स्वेच्छित हृदय-उमंग ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
३४६
किन्तु प्रेम के योग में, होत सबै वह बात,
ज्ञान योग में जो सतत,
पद-पद पै दरसात ।
३५०
वह यम, नियम, धारणा, वह सुप्राणायाम,
वहै समाधि अनिगिता, वह ध्यान निष्काम ।
३५१
तोऊ प्रेम-सँजोग में, कछु विशेषता आहि
ज्ञान योग पावक सतत, कोटि कष्टकर जाहि ।
३५२
जानिए, प्रेम जोग के बीच,
अन्तर एतो जानिए,
एक चलत मस्तिष्क तें
,
दुजो हृदय उलीच ।
३५३
सोरठा
अचला भक्ति प्रबाध, मोंहि मिली पिय-कृपा तें,
मिल्यो सनेह अगाध, इन वियोग के छिनन में ।
३५४
प्रेम योगिनी हौं बनी, कारण जानौं नाँहि
मम निष्कारण नेह को, राखहु, पिय, हिय माँहि ।
४५७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४५८
३५५
का जानौं क्यों होत हैं प्रेम-बावरे प्रान ?
छिन छिन कसकत रहति है, हिय की नेह-उठान ।
३५६
उठि उठि श्रावति है ललकि, हृदय-समर्पण-हूक,
एक-लग्नता मिस लगत, प्राण-समाधि अचूक ।
३५७
जब स्मृति हँसि कहि जात कछु, विगत दिनन की बात,
तब सँजोग के संस्मरण हिय मसोसि ग्रकुलात ।
३५८
भरत हृदय, बरसत नयन, सरसत हिय की बेलि,
सूने मानस-गगन में, करत वेदना केलि
प्राण कहत, हम
३५६
वावरे, हृदय कहत, हम रक्त,
मन बोलत, हों ध्यान रत, जीवन, चरणासक्त ।
प्रेम, योग-संयुक्त
३६०
वै रह्यो सकल अस्तित्व,
हिम, अनादि तै, करि चुक्यो वरण त्वदीय पतित्व ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
३६१
मम हिय-बगिया में खिले, भक्ति कल्पना-फूल,
अर्चन सौरभयुत कुसुम लेहु, ग्रहो सुखमूल !
३६२
पुहुप सुकोमल ये रंगे विविध भावना रंग,
श्वास वायु डोलित करत प्रकट विकास उमंग |
'
३६३
ये वियोग-कंटक जमे फूलन के सँग आय,
करहु कृपा एती, सजन, कंटक देह हटाय
३६४
कुसुमन तं खिलि उठि रह्यी आत्मसमर्पण भाव,
विस्फारित पंखुरी भई, नेकु न रह्यौ दुराव ।
३६५
वनमाली सींचत पुहुप नयन-कणन तैं नित्य,
इत रस शोषत रहतु है, नित वियोग आदित्य ।
३६६
रंग-विरंगे भाव के कुसुम खिले सुकुमार,
आवहु ग्रंथ इनहि तुम, हे मम मालाकार ।
|
४५६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३६७
लै शूची परिहास की, ललित केलि को तार,
भेदि छेदि, करि मृदु चयन करहु पुहुप निरवार ।
४६०
३६८
ललित, कलित, कोमल, मंदिर, मधुर सुमन की गन्ध,
फैलि रही उद्यान विच ग्रहो जीवनानन्द
३६६
हियं सिहाय, इत आय, पिय, माला मृदुल बनाय
पहिरहु पहिरावहु बिहँसि मन-मन में हरषाय ।
३७०
आत्म-निवेदन- सुमन कों, पिय, करिये स्वीकार,
हरिये इनकी उल्लसित उत्कंठा को भार ।
३७१
सोरठा
1
समर्पित रहि जाय, क्यों विकास अस्तित्व यह ?
श्रवहु मान बिहाय, नयनन में स्वीकृति लिए ।
३७२
देखि व्यर्थ श्रम आपुनो देखि शून्य उद्यान,
छिन छिन में अकुलात है, मन-माली अनजान |<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
३७३
सचि-सींचि हिय-वाटिका कर्यो प्रयास अथोर,
तऊ तिहारी ना भई, तनिक कृपा की कोर ।
३७४
लै निग्रह की कतरनी, मनमाली नित बैठि,
राग द्रुमन्हिं छांटत रहत, हृदय-वाटिका पैठि ।
३७५
अमल सुमन फूलत हिये, नहीं वासना संग,
लखन चरण रति को चढ्यौ उन पै चोखो रंग ।
करत रहत
रोम-रोम लौं
३७६
उद्यान में भाव-भृंग गुंजार,
है उठत, गुन-गुन-धुनि-संचार ।
३७७
पुहुप - पंखुरिया हूँ रहीं, लोचन-सीकर- सिक्त,
सद्य नेह-मधु सों भर्यो, कुसुमन को हिय रिक्त ।
३७८
एती नव रस सों भरी यह सनेह निधि पीन,
युग अनादि तें रही तव चरणार्पण- लीन ।
४६१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४६२
३७६
मेरी जीवन- वल्लरी, तव अवलम्बन-हीन,
निरादृता सी ह्वै रही, धूरि-धूसरित छीन ।
३८०
तुम द्रुम मम अश्वत्थ दृढ़, लेहु बेलि लिपटाय,
अवलम्बन की साध मम, क्यों असफल रहि जाय ?
३८१
तुम आश्रयदाता, सजन, रस
जीवन-दातार,
या भू-लुंठित बेलि की, नेकु सम्हारहु भार ।
३८२
या सुकुमारी बेलि को, कौन बड़ो है भार ?
भुज- अवलम्बन तनिक तें, ह्वै जैहै
३८३
उद्धार ।
छाय रहीं तव वक्ष पै, केवल एती चाह,
बस, इतनोई सो रह्यौ, या जीवन में दाह ।
३८४
लिपट लपैटौं भुजन तें तुमहिं जीवनाधार,
छाय, निछावर तँ रहौं, बस इतनी मनुहार ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४७९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
३८५
सोरठा
द्रुम-वल्लरी अधीर, वन्यौ निराश्रित हृदय मम,
निरलम्ब की पीर, श्राश्रय दे, हरि लेहु, पिय !
३८६
मानस - नभ में दूर लौं, चढ़ी कल्पना-चंग,
लप झप लप झप कर रही, यह अनुरक्त पतंग |
३८७
नेह-डोर - अवलम्ब लै, चढ़ी चंग आकास,
ठुमकत, सर सर करत नित, बढ़ी जात सायास ।
३८८
लगन मगन मन - गगन में, लहरत इत उत धाय,
ठहर-ठहरि भाजत, मनौं, कोउ कछु ढूंढत जाय ।
३८६
तुमह ढूंढिवे यह चली, बंधि सनेह की डोर,
उत्सुक आकुलता लिए, लहरत कंपत अथोर ।
३६०
ठुमकावहु यह चंग, पिय, श्री कर में गहि डोर,
याहि डुलाव हरषि हिय, मन नभ बिच चहुँ ओर ।
४६.३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४८०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३६१
कबहुँ डोर की ढील है, कबहुँ खेचि कँ, प्रान,
मन-नभ-मंडल में करहु, चंग-केलि गुणवान ।
३९२
सोरठा
मेरी चंचल चंग, सजन, निहारहु नैन भरि,
ऐंच पैंच को रंग, सरसावहु मन-गगन
३६३
में ।
हृदय विपंची तें उठे, किमि
स्वर-मय भंकार ?
का जानों कैसें
कैसें भयो
स्वर - साधन-संहार ?
४६४
३६४
जज्जर तूंबी हृदय की, दारु-खंड-मन, मग्न,
तार भावना के सबै विखरि भए निर्लग्न |
३६५
गायन-स्वर है रुदनमय, बहे आप ही आप,
मधुर मींड़ ध्वनि हूँ गई, हिय हिचकी चुपचाप ।
३६६
चतुर कलाधर तुम निपुण वीणकार, हे नाथ,
या वीणा जर्ज्जरित की, लाज तिहारे हाथ ?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४८१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
३६७
स्वर रुके, धुनि धि गई, कहाँ तान-लय-कूक ?
हिय वीणा ते उठति है, एक मूक सी हूक
३६८
लुप्त भई सब स्वरन की, झन-भंकार-मरोर,
मूक रुदन- कम्पन-मयी, हिय ते उठत हिलोर ।
३६६
वीणकार वीणा तजी, वीण तज्यो स्वर भार,
स्वरन तज्यो गायन-नियम, भयो रुदन-संचार ।
४००
सोरठा
स्वर अरुझे, लय मूक, तार-तार ढीले परे,
हिय वेदना अचूक, हृदय विपची तें उठी ।
४०१
प्राणन में फांसी परी, पर् यो श्वास में फन्द
रुँध्यो नाम - संस्मरण शुभ, प्रकट भयो दुख-द्वन्द ।
४०२
जीवन में सुख-दुःख को, देख्यो यहे हिसाब,
भरी मिली दुख की बही, सुख की रिक्त किताब ।
४६५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४८२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४६६
४०४
अन्तरतर त्यो पर्यो, भंग ताल, रस, रंग,
भई घोर रव रहित मम, यह अस्तित्व- मृदंग |
ध्रुपद
४०५
ताल ग्रटपट भई तीनताल सम हीन,
• भ्रमित दीपचन्दी भई, चाचर गति श्रति छीन ।
४०६
दृढ़ता मय हिय ध्रुपद गति, भई विकम्पित ग्राज,
विगरि गयो नैश्चिन्त्य मम, तीनताल सम साज ।
४०७
मधु संजोग सुख मय ललित अमित सुरति रसलीन,
सहज दीपचन्दी भई, ताल हीन, सम हीन ।
४०८
उत्कंठित प्रति चलित नित, मन गति चाचर ताल,
सम गति रहिता हूँ गई, भई ग्रटपटी चाल ।
४०६
सोरठा
ताल हीन, रव हीन, रीती परी मृदंग यह,
करहु याहि रवपीन, भरि उद्घोष गंभीर मृदु ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४८३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
४१०.
तुम अनादि, शाश्वत, सजन, अन्तहीन मम ग्रास,
उत अनादि मय ध्येय मम इतै अनन्त प्रयास ।
४११
तुम अनन्त ग्राकाश, प्रिय, हीं प्रछोर नभ-गंग,
वक्षस्थल पर उठत, मम उत्ताल तरंग |
तव
४१२
तुम प्रकाश के पुंज प्रिय, हौं लघु किरण तिहार,
हीं तव चिर अनुगामिनी, ग्राज रही हिय हारि ।
४१३
तुम संगीत स्वरूप नित, हौं स्वर श्रुति लघु एक,
तुम बिन किमि निबहै, सजन, मम मृदुला स्वर-टेक ?
४१४
गह गंभीर समुद्र तुम हीं लघु वीचि - विलास,
तुम न करहु जो कछु कृपा, तो कित कल उल्लास ?
४१५
गूँजि रही मन- गगन में, पिय,
करहु नैन नाराच तैं मम
तव धनु-टंकार,
वियोग-संहार |
४६७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४८४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४६८
४१६
कब लौं ? यों मन बावरो, पूछि रह्यो अकुलाय,
तब लौं, जब लौं काल को, चलन-कलन मिट जाय ?
४१७
रे मन, नेह निबाह को, पन्थ अगम्य, अनन्त,
या मारग को होता है, कहु, कब, केहि विधि, अन्त ?
नित सँजोग में
४१८
रहत, सदा पियासे प्रान,
सतत चटपटी ही है, शुचि सनेह वरदान ।
४१६
शारदीय नभ, नील तुम, नेह-सुपूरन- इन्दु,
आकर्षित हहरात मम वय अगाध हिय सिन्धु ।
४२०
तुम आकाश असीम, हौं उदधि ससीम, गंभीर,
मे बनी तुम लौं गई, मम उसांस की पीर ।
४२१
नित जप, नित तप, ध्यान नित, नित पिय चिन्तन-योग,
नित्य नाम को संस्मरण, यों ही कटत वियोग ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४८५
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
४२२
निशि-दिन चहकत रहतु है, यह मेरो मन-कीर,
कब अइहें जीवन धनी, निपट धनुर्धर, धीर ?
४२३
वे सँजोग के संस्मरण, प्रजहूँ बने नवीन,
बीते युग-युग सम वरस, तऊ भए ना छीन
४२४
पैनी- पैनी दुख-अनी, अरु पैनी ह्वै जात,
ज्यों-ज्यों बीतत दिवस ये, ज्यों-ज्यों बीतत रात ।
४२५
जो न पावती प्रीति को, यह वेदना प्रसाद,
तो किमि सुनि सकते श्रवण, अनहद नेह-निनाद ?
४२६
विफल मनोरथ-तृणन सों छाई हृदय-कुटीर,
तृणन्हि उड़ावत जात यह, विथा-वायु गंभीर ।
निर्जनता नीकी
४२७
लगत,
कोलाहल न सुहाय,
जन-संकुलित प्रदेश तें, चित्त उचटि अकुलाय ।
४६६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४८६
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४२८
बैठि निपट एकान्त में, धरिय ध्यान ग्रविकार,
तह रहि रचिये श्रापुनो, सपने को
४२६
संसार ।
जन-पद, जन-रव, जन-नगर, जन-गण हों
प्रति दूर,
कहूँ कुटीर बनाइए, जहाँ मौन
भरपूर ।
४७०
४३०
सोरठा
रमि रहिए सब काल, प्रति निःशब्द प्रदेश में,
चलिय अटपटी चाल, प्रति अबाध गति-रूप है ।
४३१
जहाँ न पहुँचत शब्द, जहँ वायु-विकम्प न लेश,
जहँ न होत मति-गति चलित, तहाँ पिया को देश ।
४३२
जहाँ धीर गंभीरता, जहँ न रार, अविचार,
जहँ सम भाव स्थिति सहज, तहँ पीतम दरबार ।
४३३
जहॅ न कलह की कालिमा, जहँ न अलस अनुरक्ति,
तहाँ रहत पीतम, जहाँ जागरूक ग्रासक्ति ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
४३४
जहाँ मौन को राज, जहं वाणी की गति नाहि,
अलबेले पीतम चतुर, सतत बसत तेहि ठाहि
४३५
आँखिन प्रखिन में जहाँ, होत प्राण-पण-मोल,
तहाँ कहहु किमि बोलिए, निपट अधूरे बोल ?
J
४३६
आत्म-निवेदन मौनमय, हृदय-समर्पण मौन,
मौन दान प्रतिदान यह हिय संघर्षण मौन ।
४३७
बजत सजन की मुरलिया, मौन-राग-स्वर साधि,
उत्प्राणित हिय तें बहुत, पूरन प्रेम अनादि ।
४३८
जहाँ मौन की पूर्णता, चहाँ
मौन उपराम,
तहँ शब्दोच्चारण लगत, निपट
असंस्कृत, बाम ।
शब्द- समुद्र
४३६
मॅभाइ कै मम
नीरव प्रमेश,
पहुँच गए वा पार, जहँ पूर्ण मौन को देश ।
४७१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४८८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४७२
४४०
चढ़ि उसाँस की
नाव, हौं पहुँचौंगी वा पार,
या वचनोदधि के
परे, जहाँ मौन मय प्यार ।
४४१
सोरठा
कबहुँ न करिए
भंग, अनवोली आराधना,
जब सिहरत अंग-अंग, तब मुखतें का बोलिए ?
४४२
शब्द, दीन कंठ में ग्रटकि अटकि रहि जात,
अति नीरव स्वर-हीनता, उठि श्रावत, अकुलात ।
४४३
ध्वनि-शून्यता-प्रसार तह, पूरनता जहँ होय,
चहिय राखियो आपुनो नेह मरम सब गोय |
४४४
जहाँ भरित चिर नेह, तहँ कहाँ शब्द व्यापार ?
हिय-कम्पन हू थम्हत जहँ, ताँ किमि सरव विकार ?
४४५
वायु-विकम्पन श्रवण-गत, है
शब्द ध्वनि-रूप,
पै मन- इन्द्रिय के परे, राजत मौन अनूप<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४८९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
४४६
श्रवण, नयन, भुख, नासिका, मन, शरीर, अंग-अंग,
ना जाने कब के विके, अपने पिय के संग ।
अब कैसी
४४७
ध्वनि-निपुणता, कैसो स्वर-संचार ?
शब्द थके, रसना मगन, छूट्यो भव-रव-भार ।
४४८
सोरठा
मौन धारि, मन वारि, मन ही मन श्राराधिवी,
हिय के नैन उधारि रहसि देखिबौ पिय-छटा ।
४४६
अन्तर पट करि राखिये, अपनी प्रीति नवीन,
मन की मन में जो रहै, कबहुं न होये छीन ।
४५०
प्रीति लजीली रहत नित, घूँघट-पट की ओट,
कबहुं न वाकों दीजिए, जग-नयनन की चोट ।
४५१
प्रेम-सुगोपन हित निरत, अहै श्याम-पट एक,
जासों लगे न नेह कीं, जग कुदृष्टि की रेख ।
४७३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४५२
सरल तन्तु को पुंज यह,
बन्यो सुगोपन-मंत्र,
तन्तु वाय मन बनि रह्यौ,
जीवन भयो सुयंत्र ।
४५३
ताना लै एकान्त
की,
बाना - वचन-निरोध,
कारीगर ने पट
बुन्यौ हिय में धारि प्रबोध |
४५४
मन ने यह शुचि पट बुन्यौ, लै गोपन के तार,
मौन -साँवरे - वस्त्र को, फैलि रह्यौ विस्तार |
|
४५५
श्यामल अंचल मौन को, प्रोढ़ि चिरन्तन प्रीति,
दरसावतु है मौन
मय,
हृदय-समर्पण - रीति ।
४७४
४५६
. कर कम्पन, लोचन सजल, विचलित विकल उसाँस,
कबहुँ- कबहुँ कहि देत ये, गुप्त प्रीति-रस-फांस ।
४५७
कैसें इनहिं निवारिये, ये नहि छांड़त संग,
हठ करि रहत समीप नित करत मौन रस भंग ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
४५८
झलकत लोचन कपन में, प्रीति विधा- अतिरेक.
ज्यों झलकत सत्वृतिन में हिय को अमल विवेक ।
४५६
मौन श्याम पट में दुरी, जदपि प्रीति सुकुमार,
तऊ सकल संसार में. चरचा भई अपार ।
४६०
छानी मानी राखियाँ, सबै चहत रस-रीति,
फैलि जात पै वह, यहै बड़ी जु प्रीति अनीति ।
४६१
कैसे प्रीति दुराइए ? है अति कठिन दुराव,
हाव-भाव रंग-ढंग सौं, छलकि उठत हिय-चाव |
४६२
गुप-चुप के अरमान वे, गुप-चुप को हिय-दान,
गुपचुप के रस भाव, सब प्रकट होत अनजान ।
४६३
तऊ न मुख तें बोलिए, या में है बड़ भेद,
अनबोली हिय लगन में, मिलत भक्ति निर्वेद ।
४७५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४७६
४६४
रसमत्त,
आत्मवन्त निर्द्वन्द हवे, प्रेम-योग
अनबोले प्रिय चरण में, करिये हृदय प्रदत्त ।
४६५
अव्यवसायी बुद्धि तें, प्रेम योग ना होय,
अव्यभिचारी भक्त जे पावत पीतम सोय ।
४६६
कल्मष रहित, प्रशान्त चित, प्रेम मगन सब काल,
तेई पावत प्रापुनो, सजन प्रीति प्रतिपाल ।
४६७
सतत ध्यान को धुन लगे, तब कित शब्द प्रमाद ?
भूलि जात उन छिनन में, या तन हू की याद ।
४६८
शब्द ब्रह्म हूं ते परे, पीतम की पद-पीठ,
देखि सकत सोई, खुलं जिनकी अन्तर दीठ ।
४६६
सोरठा
ठाढ़ी कब सों प्रीति, घूँघट-पट की ओट हवं,
डिगी जात रस-रीति, पिय, वियोग अन्तर हरहु |<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
४७०
मम लघु जीवन परिधि के, केन्द्र-बिन्दु तुम, देव,
तुम साधन, तुम सिद्धि मम, तुम सुमिद्ध स्वयमेव ।
४७१
खचित भाग्य रेखान के,
तुम रेखा -गणितज्ञ.
उलटी-सीधी रेख सव, जानत तुम, सर्वज्ञ ।
४७२
परिधि होत ज्यों-ज्यों बड़ी, होत केन्द्र सरदू
अहं भाव के बढ़त ज्यों बढ़त अन्धतम कर ।
४७३
बढ़त जात ज्यों-ज्यों सतत, अपनेपन को गर्व,
दूर होत तितनो अधिक, आत्म-निवेदन पर्व :
४७४
जितनी ही छोटी परिधि, जितनो लघु विस्तार,
उतनो केन्द्र नगीच है, समभ
४७५
समुझनहार ।
काका कहियत चेतना ? जीवन कहा कहाय ?
कहा तत्त्व या स्फुरण को, जो इत उत चलि जाय ?
४७७०<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४७८
जीवन
-
४७६
यह नव चेतना, अहै दरस की प्यास,
याही तें उत्क्रमण को, यहाँ प्रवास -
-
प्रयास ।
४७७
जा छिन तें वा एक के
भए स्वरूप
अनेक,
विवेक ।
प्रकट्यो ताई समय तैं, यह चेतना
४७८
चेतनता प्रकटी भली, जीवन मिल्यो
अनन्त,
जीवन के सँग सँग चली दरसन
-
प्यास ज्वलन्त ।
४७६
अवश गुणन तें बँध रह्यो, वह निरगुनी महान,
अगुन होइवे को पुनः मचलि रह्यो गुणवान ।
४८०
पुनः प्राप्ति निज रूप की, पुनः पूर्ण विस्तार,
याई सतत प्रयत्न ते मचत हिये मैं रार ।
४८१
जीवन में अरु ग्रमित इच्छा, द्वेष, विकार,
द्वन्द्व - विमोहन भाव ये, काम, राग, अविचार ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४८२
पंचम सर्ग
क्यों आवत कुविचार ? यों पूछत हैं नर नारि,
यह हू है उन सजन की एक ग्रदा सुकुमारि ।
४८३
लीला मय, लीला निरत, लीला करत अपार,
पाप, पुण्य मिस करि रहे, निज लीला विस्तार |
४८४
-
वे मोहित इत उत ग्रटकि, भटक जात नर-नारि,
भ्रष्ट हवे जात हैं, प्रिय की डगर विसारि ।
मार्ग
-
४८५
गिरि परिवौ, उठियो पुनः, नेकु न रहिबाँ हार,
पीतम की या गैल में, कैसी हार विचार ?
४८६
-
-
हिय में लिए चिरन्तनी प्यास प्रणोदित प्रस
युग अनादि तें हौं, चली ग्रावतु हौं, सोल्लास ।
४८७
अव पाये, पाये पिया, भाजि न सकिहो और,
पट अंचल में बाँधि
कै, राखहुँगी बरजोर ।
४७६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४८०
४८८
मम युग युग की साधना, या जीवन में आय
वे है पूरन - काम ध्रुव, अपनो पीतम पाय ।
४८६
जब हवै है पिय दरस, तब का हव है हिय-बीच ?
तब मो मन ह वै जायगो, कालातीत नगीच |
-
४६०
क्षर अक्षर तें, काल तें, कारण हूँ तेंदूर,
जो झलकै, तो रिक्त - हिय, क्यो न होय भरपूर ?
अटल परन्तप
४९१
सजन मम, गुडाकश, उबुद्ध,
उनकी पद रज तें बनत हिय तद्रूप, विशुद्ध ।
४६२
काम, क्रोध, मद, लोभ तजि, मत्सर, द्वेष विकार,
चलिए पिय की डगरिया, यहै चिरन्तन प्यार ।
४६३
भव्य राजप्रासाद यह, सुदृढ़
प्राचीर,
तुम बिन सब सूने भए, हे धनुधारी धीर ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
४९४
उचटि रमत मन वन विषै, भावत नाहिन भौन,
रहित चित्त श्रीदास्यमय, जीभ रही गहि मौन |
४६५
दखिन पौन, री, मद भरी, हौले हौले आय,
मेरे आँगन डोलि तू, पिय-वतियाँ
४६६
वतराय ।
कहु, कहु, कैसे हैं सजन ? एरी दखिन बयार,
कह, शिर पे तो बढ्यो, जटाजूट को भार ?
४६७
केती गहरी, बोलि री, भई बिवाई पांय ?
कुलिश शूल केते गए तलुअन बीच समाय ?
४६८
रघुकुल की श्री कीर्ति वह, मिथिलाकुल की कान,
कैसी हैं मम अग्रजा, कोमल पुहुप समान ?
४६६
जिनके स्वप्निल नयन में, देश, काल, आकास,
ग्रार्य राम वे करत किमि, कह, वन-बीच निवास ।
४८१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४८२
५००
पहिरत वह कौन विधि, सीता वल्कल चीर ?
सजन सम्हारत होइंगे केहि विधि पर्ण कुटीर ?
५०१
'वर्षातप, प्रांधी प्रखर, शीत, उपल
को त्रास,
अरु वन-वन को डोलिवो, तृण-कुटीर को वास ।
५०२
दक्षिण दिशि दूती, अरी, यो घटपटी बयार,
जहूँ धारण कर रही, ह्रौं जीवन को भार ।
५०३
धनु धारे, तूणीर कसि, करि श्राखेटक वेश,
विचरत हवेहें प्राण धन, हरत विजन को क्लेश |
५०४
वल्कल - पट सों प्ररुभि केँ, वन-भारित के शूल,
कहत होंगे सजन सों, ग्राएं कित पथ भूल
५०५
?
चढ़ि ऊँचे गिरि-शिखिर पै, लै दृढ़ धनु की टेक,
पीय निहारत होइंगे, दूर, क्षितिज की रेख ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/४९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५०६
पंचम सग
ग्रांखिन में सपनो
होत होईंगें, देखि
भरे, नासा में उच्छ्वास,
इत, पीतम कछुक उदास ।
-
-
५०७
-
सीय राम लक्ष्मण चरण रेणु गह्न वन माँझ,
बन-जन- दुख हैं हरत, प्रति प्रातः, प्रति साँझ ।
५०८
करि विनष्ट अज्ञान-तम, हरिवाँ जड़ भू-भार,
बड़ो कठिनतर कर्म्म यह, करिवो ज्ञान
५०६
-
प्रसार ।
धर्म-भावना जगत की, उठी हिए में पीर,
राजमहल ऊजड़ भए,
वन में बसी कुटीर ।
५१०
सूने परे गवाक्ष ये, शून्य भई सब ठौर,
जा दिन ते कमलाक्ष मम, मुरे विपिन की ओर ।
५११
वातायन मो सदन के, भये उदास अपार,
अब कोउ उत्सुक ना रह्यो, उनते भाँकन हार ।
४८३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४८४
५१२
लता गुल्म तरु बाग के, लगत अनमने दीन,
पुहुप दुखारे हवे रहे, गन्ध हीन, श्रीहीन ।
५१३
अबध विकल, जनपद विकल, विकल अवध की गैल,
वन हुलसित, वन-जन मुदित, मुदित विन्ध्य कोशल ।
५१४
विकट नियम यह राम को, जानत हैं कोउ कोय :
व्यक्ति को हिय दरद, जग को मरहम होय ।
कछ
५१५
एक खपे, वरु, जग जिए, यहै धर्म को तत्व,
नतरु निमिष में जगत सब, हवे जैहै निःसत्व ।
५१६
निश्चय, यह गृह, अवध यह, यह सरयू को तीर,
राजभवन, उद्यान, सब सुने भए अधीर ।
५१७
निच, हिय सूनो पर्यो, मम कुटीर हू शून्य,
रजत बालुकामय भए, नदी-तीर हू शून्य ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
५.१८
मातु सुमित्रा देवि को, धीर हृदय हहरात,
भरत बन्धु को नयन जल, नैकु नाहिं ठहरात |
५१६
बहि-बढ़ि प्रावत नैन ते विकल द्विवेणी धार,
फुर, उन बिन हिय-धैर्य हू, भयो प्रधीर उभार ।
५२०
पै व्याकुलता तें कहूं, सर्यो करत हैं काम ?
जीवन-मूल्य
चुकाइए, दै-दै चौखे
५२१
दाम |
जीवन-धारण है कर्यो हँसी-खेल कछु नाहि,
बिना प्राण उत्सर्ग के, ठौर नाहिं, जग मांहि ।
५२२
पूज्य श्वसुर निज प्राण दे, थाप्यो नव प्रादर्श,
अब हहै इक नाम तैं
५२३
प्रण-वात्सल्य-विमर्श ।
त्याग और सन्यास की परिभाषा अब एक,
.
भरत पूर्ण सन्यास है, भरत त्याग तप
टेक |
४८५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५२४
मानवता किमि
यदि न ऊम्मिला
सदन
पावती, ये अमोल उपहार,
मैं होतो हाहाकार ?
५२५
कहा भयो जो वन गई
सीता सती पवित्र ?
जन-मन अंकित होयगो
वह आदर्श चरित्र ।
४८६
५२६
मानवता जब मत्त्व हव, भूलेगी सत् रूप,
तब सीता को स्मरण शुभ दे है शांति अनूप ।
५२७
कहा भयी जो ऊम्मिला तड़पति है दिन रैन ?
याई मिस जगह रह्यो, पुण्य ज्ञान गुण ऐन ।
यज्ञः
५२८
आत्म बलिदानमय, भई जगत की सृष्टि,
मम साजन पोषण करत, करि दृग- जल की वृष्टि ।
५२६
श्रांखें रोवति बावरी, हिय मूरख हहरात,
पै विवेक गम्भीर हवे, कहत तितिक्षा बात ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
५३०
मन माती मानत नहीं,
जहाँ रुदन की हाट में
भटकि जात वा गैल,
विकत स्निग्धता-तैल ।
५३१
हँसि - हँसि सहिये वेदना, कहत ज्ञान यों बात,
रोय लीजिए कबहुँ तों, यों कहि मन विलखात ।
५३२
जब अधरन तैं भरत हैं ललित हास्य के फूल,
तब खटकतु हैं दूगन में, गलित रुदन के शूल ।
जब प्रकटत है अधर
५३३
त कोमल हास - विलास,
ताई छिन चुइ परत है दृग तैं कसक उदास ।
५३४
ललित हास्य, विगलित रुदन, फुल्ल वदन, दृग आर्द्र,
ये प्रसाद विभु ने दिए, हवं प्रसन्न करुणार्द्र ।
५३५
झलकत ज्यों नभ वक्ष पै, नैश तारिका-माल,
त्यों हिय में तपकत रहत, रंजित व्यथा-प्रवाल ।
४८७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५३६
हिय क हा-हाकार को, नेह न कहत प्रवीन,
नेहा गहर गंभीर है, थिर है, नित्य अदीन ।
५३७
नेह न हा-हा खातु है, भीख न मांगत नेह
नित्य मगन, नित तुष्ट जे, नेह-नीति- घर तेह |
५३८
मँगता मांगत दीन ह्वै, कृपा कोर की भीख,
बिना मोल बिकि जाइवो, यही नेह की लीक ।
५३६
बिन सोचे, बिन कछु कहे, बिना भाव अनजान,
न्योछावर हवे जात है, दृग, मन, हिय, जिय, प्रान ।
५४०
कहा
मांगिवो रोड़ कैं,
पिय को नेह प्रसाद ?
हौं न याचिका, जो करौं
ठाकुर सों फरियाद ।
५४१
४८८
जोगी जोगिन प्रेम के, प्रातुर याचक नाहि,
वे हैं प्रेमी, बावरे, ठाकुर जिन हिय मांहिं ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४४२
पंचम सर्ग
हाँ कवहूं हिय कहि उठत, व्यथा इत्यलम् देव ।
कहा करों कछु परि गई, हिय की दुर्बल टेव ।
५४३
ज्यों अनचाह कढ़ि उठत, ग्रन्तस्तल की ग्राह
त्योंई कबहूं दैन्य- मिस, प्रकटत हिय को दाह ।
५४४
पै अव पिय लौं जाहूंगी, हीं हवं निपट प्रदीन,
तापस पिय ढिंग जाय किमि, हृदय-दीनता छीन ?
५४५
हे हिय, अब छांह इतै, अपनो हाहाकार,
धरह धीर
उपरामता, अरु
निर्वेद अपार |
५४६
साजन बन तप तपि रहे, प्रज्वल दिवस-मणीव,
'धरहु ध्यान, हे हृदय तुम, अव हवे के उद्ग्रीव ।
दीन बने, नत ग्रीव
शुद्ध सनेह-प्रवाह है,
५४७
ह्वै, अब न वितावहु काल,
नित अदीन, उत्ताल ।
४८६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५०६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५४८
रसमाती घहरत सदा मगन लगन की बाढ़,
अलस दैन्य कैसो वहां, जहां सनेह प्रगाढ़
५४६
?
होत जात है नेह-नद अब
निज सागर. दिशि बढ़ि रह्यो,
प्रति गहर गभीर,
श्री यमुनैव सुधीर ।
४६०
५५०
अवश मिटैगो एक दिन, यह प्रवास को त्रास,
निचै इक दिन होइगो, सागर-हृदय निवास ।
५५१
नित्य, सनातन, ज्योतिमय, मेरे पिय की कान्ति,
उनके चिन्तन, ध्यान में, कितै दैन्य ? कहँ भ्रान्ति ?
५५२
विगतज्वर है, दैन्य तजि, धरिय ध्यान मन लाय,
नित पीतम को ध्याइए, सुख-एषणा विहाय ।
५५३
कबहुँ न करिये प्रार्थना, कहिय न कातर बैन,
हिय को सदा बनाइए ध्यान, भक्ति, रति ऐन ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५०७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
५५४
नन संन ते हूँ न कहुँ, छलकै कातर भाव,
या तें लोचन में सदा भरिय प्रचंचल चाव ।
५५५
दिन दूनी, निशि चौगुनी पुनि याही अनुपात,
बढ़े जु हिय की विकलता, तउ रहिये मुसकात ।
५५६
कबहुँ न कीजै सजन की कहूँ सिकायत जाय,
यों न ढिढोरा पीटिए, हिय-लघुता दरसाथ ।
५५७
रस- प्रतिदान निबाहिबौ, है यह उनको काम,
अपनो एतो काम है, विकि जैबी वेदाम ।
५५८
काऊ कौं यदि उसक यह कि हम बड़े रस राय,
हमें ठसक यह, भक्त हम, निःसाधन, निरुपाय ।
५५६
लेहु, चहै ठुकराहु, पिय, हिय तव चरणन पाहि,
ठकुर सुहाती क्यों कहौं ? चाटुकारिणी नाहि ।
४६१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५०८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५६०
दरस प्यास की आस बड़, तड़पावतु है प्रान,
तऊ डगर ना छाँड़िहों, करिहौं सतत पयान ।
५६१
तुम इतमो जनि देखियो, चढ़ि उत्तंग पहाड़,
या दिशि में उमड़ी ग्रहै, दृग-सरिता की बाढ़ ।
५६२
पिय कहिहाँ ना हिय-विथा, अपनी धीरज खोय,
सीखि गई हौं राखियो, विथा हिये में गोय |
५६३
पिय के दुसह वियोग में, केहि विधि निकस प्रान ?
स्मरण ध्यान के पाश में अटके रहत निदान ।
५६४
४६२
हिय, जिय, दृग उच्छ्वास में,
पीतम रहे समाय,
रोम-रोम में पिय रमे, प्राण कहां तै जाय ?
५६५
बलिहारी या नेह की, प्राण जान नहि देत,
निशि दिन तड़पावत रहत, कठिन परीक्षा लेत ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
५६६
छांड़ि प्राण यों संत में, पियहि न मिलिए धाय,
प्रेम-नेम प्रतिपालिए, आजीवन मन लाय ।
५६७
प्राण त्यागि देवौ ग्रह कछु न कठिनतर कर्म,
जीवित रहि, सहियौ विथा, यहै प्रेम को ममं ।
५६८
अमर प्रेम-रसमत्त हवै, प्रेमी
साधत योग,
मृत्यु एक मदिरा
है, पियत न नेही लोग ।
५६६
कहा बड़ाई मद पिये, भए शून्य, मदहोश ?
जागरूक हवें साधित्रो, प्रेम योग निर्दोष ।
५७०
प्रेम वियोगी मृत्यु को, नहिं मांगत वरदान,
अमृत भक्ति अनुरक्ति जहँ तहँ कैसो अवसान ?
५७१
सूत्रधार जहँ प्रेम चिर, अमृत नटी, नट राज,
मृत्यु यवनिका को तहाँ कहौ, कौन सो काज ?
J
४६३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४६४
५७२
छकि छ कि दूग - मधुकरन ने कर्यो रूप रस-पान,
वियोगाग्नि में करत वे अब छ कि छ कि असमान ।
५७३
हव
वैश्वानर
रूपिणी, विरह- हुताशन-जाल,
दहत मोह, ग्रावत निखरि, प्रेम-हेम तत्काल ।
५७४
प्रेम कहा, जो ना पर्यो, विरह अनल की ग्रांच ?
बन्हि परीक्षित नेह है, नित्य चिरन्तन सांच ।
५७५
जब नाचे मन मगन हवे,
तबै समझिये, वह भयो
विरह-प्रशनि के बीच,
कछुक सनेह नगीच ।
५७६
अनल- रास-क्रीड़ा
बनी,
प्रेम-परीक्षा शुद्ध,
ता बिन नाहिन होतु है शुद्ध नेह उबुद्ध ।
५७७
क्यों न अनल-तांडव मचै ? क्यों ना धधके ज्वाल ?
क्यों न लपकि लपटें
बढ़ें, हिय दाहक विकराल ?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
५७८
जहां मिलन को लास्य है, जहँ सँजोग-माधुर्य,
तहां विरह-तांडव ग्रथिर, तह वियोग-प्राचुर्यं ।
५७६
बनी सजन प्रच्छन्नता, अग्नि चंड, विकराल,
दरस चाह की बढ़ि चली, ललकि लपट दुत लाल ।
५८०
भए असम वा अग्नि में, सर्व कुशल अरु छेम,
एक वस्तु यह बचि रही, शुद्ध प्रेम को नेम ।
५८१
छिनछिन ज्यों-ज्यों तपतु है, त्यों-त्यों निखरत रंग,
खूब बनायो ईश ने अग्नि प्रेम को संग |
५८२
लोभ, लाभ, सुख, धाम, धन, लौकिकता, कुसलात,
प्रेम पन्थ जो चलिय, तौ, भसम करिय ये सात ।
५८३
लघु लौकिक उपचार तें होत न नेह-निबाह,
ऐंडी-बैंडी, अटपटी है नेह की राह |
४६५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४९६
ज्ञानानल
५८४
ज्यों दहत है अज्ञानान्धः कार,
त्यों विकार कौं, विरह की अग्नि करत है क्षार ।
५८५
सोरठा
कसर न कछ रहि जाय, विरह ज्वाल धधके अमित,
संत गई पिय पाय, कहै न यों कोउ प्रान्त में ।
५८६
प्रम भावना तो है,
ग्रन्वषण सायास,
जाको आदि न अन्त है, ऐसो अथक प्रयास ।
५८७
प्रीतम मति गति अनुसरण, ग्रहै प्रेम को तत्व,
प्रेम कहा ? है खोइबो, अपनो क्षुद्र निजत्व ।
५८८
देखिय अनहंकार तं, अपनी
प्रात्मनिवेदन भाव में, कैसो
-
५८६
सदा लघुत्व,
ग्रात्म गुरुत्व ?
अनुसरिये सब काल मं, प्रियतम की पद-रेख,
ग्राकुल हवं न बिसारिये, हिय को अमल विवेक ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६०
पंचम सर्ग
पुण्य प्रेम मादक
प्रेम मत्त, छाँड़त
है, किन्तु न रहित विवेक ।
नहीं निज विशुद्धि की टक |
५६१
जानत हौं, मानत नहीं, कसकत पीर अधीर,
जानत हौं, दृग तें छलक उठत नीर हिय चीर ।
५६२
जानत हों,
यह प्रेम को
तक हृदय या गंल
पन्थ अटपट होय,
पे चलत, अपुनपौ खोय ।
५६३
जानत हों, सब बात, पै, हिय तें कहा बसाय ?
सिसकत, मचलत, हँसत कछु, वा मारग चलि जाय ।
५६४
एक विवशता-सी श्रहै, हिय लगिबे की बात,
बरबस सिंच जैबौ परत, जब हिय ललकि लुभात ।
५६५
रात दिना के दरद को, लेत विहँसि हिय मोल,
फिर खोयो-खोयो फिरत, नैनन में मद घोल ।
४६७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५६६
जानि दरद की अमिटता, यदि न करे कोउ नेह,
कहा कहिय वा मनुज को ? वृथा धरी नर देह ।
४६८
५६७
वहिरन्तर के दृगन कं, खुले होत है प्रेम,
जो न हिये की खुलि सकै, तौ नहि निवहत नेम ।
५६८
नैकहु नेना ना नमें, जब देख्यो वह रूप,
वह किशोरपन की ठसक, वह छवि शुभ्र अनूप ।
५६६
अजहूँ या स्मृति-पटल पँ, वरसन की वह बात,
अंकित ऐसी है मनहुँ चढ़ी जु काल्हि बरात ।
६००
धनुष-यज्ञ की वह छटा, राजन्हि के वे ठाठ,
तुम ऐसो दुर्धर्ष वह, मानहु उकठ कुकाठ ।
६०१
आर्य राम को धैर्य वह, उनको वह उल्लास,
राम नयन गंभीरता, लखन नयन चल रास ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
६०२
वह उत्साह अदम्य प्रति उनकी वह ठकुरास,
सद्यस्मृति सी प्रजहुँ वह, हियहि करत सोल्लास ।
६०३
वह विवाह मंडप विशद, वे
ग्रह, काल कब थिर रह्यो
गुरुजन, वे तात,
? भई पुरानी बात ।
६०४
बड़ी पुरानी बात है, पै नित नई लखात,
वाई दिन तो हृदय में, भयो
६०५
नेह संघात ?
युग-युग को सम्बन्ध वह वा दिन भयो नवीन,
फिरि मैं जगि श्राई वहै, प्रीति-रीति प्राचीन ।
६०६
वा दिन की उनकी गुनौं, कौन-कौन सी बात,
उनकी तौ प्रति बात में दीखत मधु छलकात ।
६०७
उन बातन कौं सुमिरि के, हिरदी भरिभरि जात,
उन मधुमय घटिकान में, हती न विधि उतपात ।
४६६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६०८
वा दिन जब आई घड़ी पाणिगह्न की, ग्रह,
हिय में तब कितनी हती, प्रातुर, श्रमल उछाह ।
५००
६०६
धरकि रह्यो हो बेग तें मेरो हिय सुकुमार,
उन तन झिझकत रहि गई, नैन उधारि निहारि ।
६१०
ममात्मजा यह ऊम्मिला कर गहु, लक्ष्मण धीर ।
तात चरण बोले गिरा यों
६११
सागर गंभीर ।
उनने कम्पित पाणि गहि, भर्यो हिये रस-रंग,
उन लोचन में प्यार हो, मो दृग भक्ति तरंग ।
-
६१२
ग्रह सुदृढ़ कर गहन वह मम अवलम्बन - भाव,
मोहि स्मरण है वा निमिष, मिटि गौ द्वेत-दुराव ।
६१३.
मिली ऊम्मला लखन में, लखन ऊम्मिला आय,
उत्तरीय. सौं बँध गयो, मेरो अंचल जाय !<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
६१३
वह गठबंधन, हिय चलन, पाणि गहन वह मूक,
वाई छिन जागी हिए,
६१५
रस-भावना मलूक ।
गठबंधन वह ना हतो, वह न तो पट-बन्ध,
वह तो जीवन-गाँठ ही, वह प्राणन को फन्द ।
६१६
यज्ञ, अनल, नक्षत्र, शशि, सूर्य, लग्न, शुभ वर्ष,
ये क्षर, अक्षर प्रेम के साक्षी भए सहर्ष ।
यज्ञ हुताशन
६१७
की बढ़ी, जब ज्वाला उत्ताल,
तब हम दोउन के मनों, हिय हवै गये निहाल ।
६१८
स्वाहा ! स्वाहा ! को उठी हुती सुध्वनि गंभीर,
छिन स्वाहा हवे गई, ग्रह- भावना - पीर ।
ता
६१६
उन सँग अग्नि प्रदक्षिणा पूर्ण भई जा
-
काल,
तब तें अर्पित हवै गयो, हृदय भूलि निज हाल ।
५०१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊमिला
५०२
वा
६२०
दिन की इक बात तो, अजहुँ मोहिं हुलसात,
अजहूँ हौं हँसि लेतु हौं, सोचि सोचि वह वात ।
६२१
इतनी दृढ़ता सों गह्यो, मो कर उन करि प्यार,
हौं विदेह तनया, नतरु, करि उठती सीत्कार ।
६२२
पाणि गहन के समय के वे सब स्मरण - उमंग,
मन में उठि करि देत हैं, हृदय श्राज हूं भंग
६२३
वे दिन का जानौं कितें, सहसा गए पराय ?
पंछी के-से उड़ि गए अपनो नीड़ विहाय ।
६२४
वे दिन सुख सपने भये, उलटयो दैव- विधान,
भयो जागरण स्वप्न, अरु, स्वप्न जागरण मान ।
६२५
सुख की स्वप्निल कल्पना, जागृत भई सशंक,
सुख की ध्रुव जागरण वह पर्यो स्वप्न पर्यं क ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
६२६
खोई-खोई वृत्ति इक, उठि प्रावत है म्लान,
इत उन सब दिशि में लगत निरानन्द सुनसान ।
६२७
अकुलात,
उड़त नयन-अलि गगन तन यों ई से
उदासीन हिय होत है, अंग शिथिल वै जात ।
६२८
शून्य नील आकाश में, नैना विचरत जाय,
कढ़ि श्रावत है हृदय तें विफल ग्रह निरुपाय |
६२६
भ्रमित श्रमित हवै जात हैं, मग्न मनोरथ मौन,
थकित शिथिल सों चलत है, यह उसाँस को पौन ।
६३०
मथित, गलित, अति चलित हिय, दरमावत है क्लान्ति,
प्रतिक्रिया मिस यों कबहुँ, वह पावत विश्रान्ति ।
६३१
सुरति अथक, पैं, अधिकरण शिथिल होत एहि ठांहि,
तन धरिबे की यह बिथा, मिटत पूर्णतः नाहिं |
५०३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६३२
श्रान्त, अहो प्रिय, श्रान्त अति, बहुत भई हौं श्रान्त,
पं ध्रुव पद धरती चली आवतु हौं निर्भ्रान्ति ।
५०४
६३३
थकी ग्रमित, पैरंचहूं, हौं न मानिहीं हार,
छोड़ चुकी कबकी, सजन, हिय को हार विकार ।
६३४
लेहु गोद, हौं थकि गई, यह न कहौंगी, देव,
अब तौं पथ पै चलन की खूब परि गई टेव ।
६३५
हारे इन्द्रिय उपकरण, तो न कछू बड़ि बात,
अथक रहे जो हिय लगन, तीन साधना घात ।
६३६
पथ को महदन्तर निरखि, निरखि मार्ग विस्तीर्ण,
सत्य साधना को हृदय, कबहुँ न होत विदीर्ण ।
६२७
अथक चरण, दरसन लगन, अथक साधना नीक,
सन्नेहाराधन अथक, अमिट नेह की लीक ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६३८
पंचम सर्ग
अमिट नेह की लीक पै धरत धरत ध्रुव पाय,
निचे इक दिन लेहुँगी, अपने पियहिं मनाय ।
६३६
ऊँची ऊँची चढ़त जात प्रेम की बाट,
चढ़ि चलु, चढ़ि चलु, विरहणी, खोले नैन कपाट |
६४०
काल सान्त: बामे लगे तीन काल के जोड़,
वह मम नित्य सनेह सों, किमि बद सकिहै होड़ ?
६४१
अवधि रहित, अन्तर रहित, अन्तर्हित, अन अन्त
अपलक, अमल, सनेह चिर, इति वदन्ति गुणवन्त ।
६४२
बरस, मास, दिन, रात, पल, घटिका, निमिष, मुहूर्त,
इनकी का गिनती, जहाँ भयो नेह-रस स्फूर्त ।
६४३
छूटि गयो दिन गिनन को मेरो विकल स्वभाव,
जागि गयो है अब हिये, कछ -कछ, अविकल चाव ।
५०५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५०६
६४४
यह वियोग हू ह्वै
धृति गृहीत मय ह्वै
रह्यो, अब संयोग प्रतीत,
चल्यो कछु कछु द्वन्द्वातीत ।
६४५
तपत विरह धूनी, भई मति-गति कछुक समान,
हौले-हौलें हृटि रह्यो, यह अन्तर अज्ञान ।
६४६
ध्यान योग ही मैं झलकि, मिलत मधुर संयोग,
कहा सँयोग-वियोग को छूटि जायगो भोग ?
६४७
धरकहु मत, हे हृदय तुम, करकहु मत, हे नैन,
दरकहु मत, तन-भांड है, उफनहु जनि मन- फैन ।
६४८
होहु उपरमित शमित नित, धरहु
ध्यान, धरि धीर,
पीतम प्राए गेह मम, बने
चिरन्तन पीर ।
६४६
आज वेदना-रूप धरि,
लेहु बलैयाँ हुलसि, हिय, करहु समर्पित प्रान ।
प्राए सजन सुजान,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
वे आए श्रांसू बने,
६५०
वे बन आए चोट,
वे श्राए हैं विरह बनि ह्वै नैनन की प्रोट ।
६५१
हिय - कम्पन - मिस करि रहे, पिय, उत्पल मालाँच,
रोम-रोम में रमि रहे, वे बनि चिर रोमांच ।
६५२
अधरन में लाली बने, रंजित भए सुजान,
नयनन्हिं बने कनीनिका, भए कृष्ण रँग खान ।
६५३
सघन केस मिस उड़ि सजन, या मुख पे मँडरात,
लट मिस लटकि कपोल पै, चुम्बन करत सिहात ।
६५४
श्राकुलता बनि कैं हिये, छाय रहत पिय आय,
कबहूँ ह्वै रस-लीनता, प्रावत लाज विहाय ।
आवत हैं कबहूँ सजन,
कबहूँ मनः प्रसाद बनि
६५५
बनि के हिय की खीझ,
छाय रहत पिय रीझ ।
५०७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६५६
श्ररी ऊम्मिले, बावरी, छटा निहारहु श्राज,
भीतर-बाहर सजन के, लखहु अटपटे काज |
६५७
कबहूँ श्रावत हैं सजन, बने माघ के मेह,
प्रलयंकर प्लावन
भरत,
६५८
मोरे प्रांगन-गेह |
५०८
गरजत,
हहरत,
करत हैं, भीम भयंकर घोष,
घन गर्जन उद्घोष मिस प्रकट होत पिय-रोष |
-
६५६
झकझोरत तन सजन, बनि झंझानिल संचार,
दिक्-दिगन्त लौं होत है, जड़ थिरता संहार ।
६६०
घन-गर्जन ? अथवा श्रहै यह पिय धनु-टकार ??
किंवा उनकी सुनि परत, यह गंभीर हुंकार ?
६६१
बने शीत हेमन्त की; ठिठुरावत अँग-अंग,
कुज्झटिका बनि पिय भरत, दृग में धूमिल रंग ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
६६२
कबहूं बिलसत गगन में, पिय बनि पूरन इन्दु,
पुनि कबहूं चुइ परत हैं, बनि-बनि सीकर बिन्दु ।
६६३
बरसत कबहूं उपल बनि कबहुं बने जलधार,
कबहूं बति घन बीजुरी, चमकत सौ-सौ बार ।
६६४
विलास,
पतझड़ की पीड़ा बने, वने बसन्त
मरण-जनम के वक्ष पै, करत रहत पिय रास ।
६६५
पात - विलगता मिस भयो, उनको प्रकट विराग,
नव किसलय-दल मिस प्रकट भयो रुचिर अनुराग ।
६६६
देत
मृत्यु- संदेश प्रिय,
प्रकटे पतझड़ काल,
थिरक उठे कोंपलन में,
देत सजीवन ताल ।
६६७
लता, पत्र में,
में, बेलि में,
द्रुम-वल्लरी मँझार,
फैलि रहयो है छलकि यह मेरे पिय को सार ।
५०६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५१०
६६८
डार-डार में पिय रमे, लता-पत्र में पीय,
प्रकटि रह् यो- तृण दलन में पिय को भाव स्वकीय |
६६६
अमिय कुई कलिका बने, नव बसन्त के मध्य
सरसावत हैं सजन नित, चिर जीवन-रस सद्य ।
६७०
फूटीं नवल प्रवालिका, बल्कल को हिय फारि,
अथवा बिहँसे मम सजन, जड़ता अमित विदारि ?
६७१
छलक्यो पाटल कुसुम में, श्रमल गुलाबी रंग,
अथवा पिय के अधर तें छलकी हास्य-तरंग ?
६७२
कलियन ने उन्मुक्त हवै, खोले नैन अधीर,
या मिस प्रकटी सजन की, चिर विकास की पीर ।
६७३
पुहुप पंखुरियन में रही, सुकुमारता समाय,
मानहु झलकी पीय की, हिय-करुणा अकुलाय 1<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
६७४
भूमि वृन्त पै सुमन धन, भूलि रहे सोल्लास,
मानहु पिय-हिय कल्पना करति भूमि-भुकि रास ।
६७५
मम पिय की मृदुता भरी पुहुप पंखुरियन मध्य,
गूंजे अलि-गुजार मिस, उनके कोमल पद्य ।
६७६
कुसुम हृदय में नहिं भर्यो, यह पराग अधिकाय,
मम पीतम की चरण-रज, उनमें प्रकटी प्राय ।
६७७
कुसुम दलन में, पत्र में,
कंटक हूँ में आय
इत उत क्रीड़ा करत हैं,
मेरे पिय हरषाय ।
६७८
ऊँची नील अटा चढ्यौ बैठि शून्य की सेज,
प्रकटि करि रह्यो खर तरणि, मम पीतम को तेज ।
६७६
पावस ऋतु की मदभरी मादकता मिस आय
पीतम सालस देत हैं, अपनो रँग छलकाय ।
५११<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६८०
शुभ्र शर्वरी नाथ मिस, विचरि अगम आकास,
नील गगन सर, करत पिय, जल क्रीड़ा सायास ।
५१२
६८१
सीकर-कण भू-वक्ष पै नहि टपकावत इन्दु,
जल-विहार प्रक्षिप्त हैं, ये पिय-कर जलविन्दु ।
६८२
रज के प्रति कण-कणन में मिले मोंहि पिय श्राज,
मैंने अणु-अणु में लख्यौ, पिय को प्राज स्वराज ।
६८३
खर निदाघ में पिय बसत, पीतम वसत वसन्त,
भई पीय-मय प्रकृति यह, पिय को आदि न अन्त।
६८४
पिय अनन्त आकाश सम, पिय अनन्त ज्यों काल,
पिय अनन्त मम आश सम, पिय अनन्त व्रत पाल ।
६८५
काल देश मय पीय मम, काल देश ते दूर,
पास, दूर, सब ठौर, हौं पिय पायौ भरपूर ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>पंचम सर्ग
६८६
भली भई, दुविधा गई, मिट्यो सँजोग-वियोग,
या वियोग हू में मिल्यौ, मोहि चरम संजोग ।
६८७
पल-पल में, क्षण-क्षणन में, सबै ठौर, सब काल,
मोहिं मिले कण-कण में, अपने सजन कृपाल ।
६८८
मियों काल को भेद यह, मिट्यो विरह को दाह,
चन्दन - लेपन हवं गयो, हिय को अनल-प्रवाह |
प्रीति-रीति
६८६
अमला भई, रति-गति भई प्रदेह,
भई प्रतिगित भक्ति हिय, भयो प्रपार्थिव नेह ।
६६०
अब आई उपरामता, अब पायो निर्वेद,
अब रति अबला हवं गई, मिट्यो स्वंद को खेद ।
६६१
लक्ष्मणमय अन्तर भयौ, बाहिर लखे न कोय,
रहसि ध्यान चिन्तन करों, कबहूँ प्रकट न होय ।
५१३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६६२
निरखौं केश-कलाप में छटा जटा की भव्य,
रहौं, तपत तप नेम को, यह मेरो मन्तव्य ।
६९३
पिय, तुमने मम 'में' हर्यो, देहु
काहू दाम न लेहुँगी, यह
मोहि 'में' रूप,
श्रद्वैत अनूप
५१४
६६४
पै कैसें भगरहूं, अहो, अपने ही सौं जाय,
कहा करों, यह में गयो अपने ग्राप विहाय ।
६६५
बारि नेह को दीयरा, अन्तर में धरि गोय,
पिय को ढूंढन जो चली, तो गई आपुहि खोय ।
६६६
कहा भयो यह, ऐं ? अरे, मिट्यौ जात यह द्वैत ?
कैसे . सहसा वहि उठ्यो यह प्रवाह अद्वैत ?
६६७
देख्यो जो निज नैन भरि भयो द्वैत को अन्त,
सहज द्वैत की यवनिका उठि उठि चली तुरन्त ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६६८
पंचम सर्ग
यह केसी अद्वैत गति, जहां न आकुल भाव ?
ग्रहो, कौन यह नेह जहँ, चुवत न दृग तैं चाव ?
६६६
का पूरनता मिलि गई ? हिय क्यों धरकत नाहि ?
पै, कब कम्पन होत है लक्ष्मण के हिय माँहि ?
७००
भयो ऊम्मिला को हृदय,
लक्ष्मण हृदय अनूप,
वनी ऊम्मिला लखन मय,
लखन ऊम्मिला रूप,
७०१
ग्रो जगती के लोग सब,
आज
ऊम्मिला को भयो
गावहु मंगल-गान,
पृथग्देह-प्रवसान ?
७०२
अब तो ये कटि-कटि परे देश काल के बन्ध,
दुई मुई मरिमरि मिटी, अहं भावना ग्रन्ध ।
७०३
मेरे कर में धनुष है, मेरे कर करवाल,
भई जनकजा ऊम्मिला लक्ष्मण, दशरथ
लाल ।
७०४
वन विचरौं, कौतुक
करौं, हरौं जनन के क्लेश,
अवध भई टवी गहन, रही न दुविधा लेश ।
५१५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>इति श्री पंचम सर्गः
श्री मातृ ऊम्मिला चरणकमलार्पणमस्तु ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अथ श्री षष्ठ सर्ग
पूर्ण प्रणाम<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१
राम - श्याम तन, चिरजीवन-धन,
जन गण मन रंजन
-
राम, - धर्मधर,
-
कारी,
राम, - धनुर्धर,
उद्भव भय भंजन हारी,
राम, - प्रविचलित, करुण चलित-चित,
ललित
लीला कर्ता,
राम - नित्य निष्काम राम वे,-
राम
सतत
-
कर्म निष्ठा भर्ता;
मतिदायक,
राम, - लोकनायक,
खर सायक-धर, जय-जय हे,
राम - सदय हे, विजय-निलय, हे,
जय जय जय कल्मष-क्षय, हे ।
२
इन्द्रिय-पति, इन्द्रिय गोचर पति,
अहंकार मन बुद्धि पते,
छाया पति,
कायापति, माया
सीतापति,
नित शुद्धमते,
५१८
महामहिम योगेश्वर हरि हर,
जागरूक उद्बुद्ध यते,
गुडाकेश, कूटस्थ अचल प्रति,
गति पति, अन अवरुद्ध गते,
सदा शान्त चित, अनुद्विग्न नित,
मर्यादा पुरुषोत्तम, हे,
जय जय दशरथनन्दन, जय, हे,
जय जय जयति नरोत्तम, हे ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३
गहन विजन प्रज्ञान तिमिर हर,
प्रखर दिवाकर सीताराम,
भूमिभार हर वन मंगलकर,
नित करुणाकर, सीताराम,
वन विजयी, खरदूषण विजयी,
लंका विजयी, सीताराम,
कोटि-कोटि विपदा विजयी, नित
आत्म- जयी श्री सीताराम,
षष्ठ सर्ग
पूर्ण हुई तपमयी साधना,
बाधाएँ सब चूर्ण हुई,
अवधि कट गई वनोवास की
पितुराज्ञा सम्पूर्ण
हुई ।
४
चौदह बरस
विलीन हुए वे
भूतकाल
के
अंचल
में,
क्षण-क्षण
क्षण क्षण
-
रहा काल कब सुस्थिर ? अस्थिर-
इस गतिमय जग चंचल में ?
भीषण चक्र प्रवर्त्तन,
परिवर्तन छाया,
क्षण-क्षण कालोत्क्रमण निरन्तर.
क्षण क्षण
-
पुरःसरण - माया,
तन-मन-जीवन, रोम-रोम में,
है गति अनुगति अनस्थिरा,
काल ? काल है महाशून्य में,
केवल गति का ज्ञान निरा ।
५१६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
काल सदा
५
क्षण आवर्तन - अनुक्रमण मय,
चलन-कलन मय काल सदा,
है त्रिकाल मंडित त्रिपुंड युत,
महाकाल का भाल
धूप, छाह, प्रातः, सन्ध्या, निशि,
दिवसों की शृंखला बनी,
सूर्य, चन्द्र, भूमंडल, ग्रह, सब-
चलते गति अपनी अपनी,
आकाश-देश में,
चलिता गति से बोधित है,
मानव मन में देशान्तर से
-
सदा,
समय सदा
अनुमोदित है ।
६
अवधपुरी से लंका तक जो,
बनी एक पथ की रेखा,
जिससे होकर आर्य सभ्यता
ने दक्षिण जन-पद देखा,
५२०
जिस रेखा ने, किरण-जाल बन,
किया प्रकाशित ग्रन्थ विजन,
उसका मंडित होना ही है,
अवधिकाल
का चलन- कलन,
अतः अवध से लंका
तक का
नाम हुआ चौदह वत्सर,
देश काल का प्रकट हुआ यों,
चिर
अवलम्बन अपरस्पर ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>प्रतिक्रमित वन
७
-
देश हो गया
अवधि उत्क्रमित काल हुआ,
-.
ग्रग्नि परीक्षा
रघुवर दशरथ
में
पारंगत,
लाल हुआ,
निर्जन घन वन हुआ प्रफुल्लित,
प्राज्ञानान्धः कार
कटा,
जन गण मन मंदिर में जागी
-
ज्ञान ज्योति
भूभार हटा
षष्ठ सर्ग
पाप कटा, अन्याय मिट गया,
अनाचार का अन्त हुआ,
सीता राम लखन का तप,
जन-मंगल कर फलवन्त हुआ ।
८
यों तो दिन पर दिन प्रतिदिन ही,
कटते रहते हैं नर के,
समय विताना लिखा हुआ है,
छिन छिन एक-एक करके,
कुछ को काल कलित करता है,
कुछ करते हैं काल कलित,
कुछ को समय चलाता रहता,
कुछ करते हैं समय चलित,
काल- प्रवर्त्तक,
गति परिवर्त्तक,
रामचन्द्र
ने
युग बदला,
लुप्त हो गई त्रेता युग की,
घन प्रज्ञान-निशा प्रबला ।
५२१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
विश्वजयी रावण की लंका,
राम चरण नत हुई भली-
रही न परपीड़न-ग्राशंका,
अनाचार की घड़ी
टली ;
एक दुखद
दुःस्वप्न कल्पना-
सम रावण का
युग बीता,
भूमि विमुक्त हुई बन्धन से
छुटी
-
भूमि सुता
विभीषिका
सीता,
कुटिल रावणीया
भूतकाल
गर्भस्थ हुई,
लंका
की
निर्ह्रादवती सब
सेना अस्त व्यस्त
-
हुई ।
१०
राम
नहीं
भौतिकतावादी,
श्रीराम
सदा,
लोभी वे,
सत्य सन्ध
नहीं भूमि अर्जन
हैं अलिप्त निष्काम सदा,
५२२
सदा लोक कल्याण भावना-
प्रेरित
-
-
पुण्य कर्म उनका,
प्रात्यन्तिक सन्यास स्वार्थं का,
बना स्वभाव धर्म उनका
इसीलिए लंका नगरी में,
फैला था उल्लास महा,
राम-करों से नृपति बिभीषण
का जब था अभिषेक वहाँ ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५३९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११
बहुत दूर लंका नगरी है,
सुनो कल्पने, अरी सखी,
बहुत दूर पीछे त्रेता युग-
है, सुन लो सहचरी सखी,
पर, तुम चली चलो, करती हो
क्या कालोदधि
की शंका,
सेतुबन्ध श्रीराम नाम का,
स्मरण करो, पहुँचो लंका,
षष्ठ सगं
क्या पराजिता ? नहीं सत्-जिता,
लंका की निरखो शोभा,
राजमार्ग की, प्रति गृह गृह की,
छटा निहारो मन लोभा ।
१२
आर्य राम की विजय नहीं यह,
है प्रचार सत्-संस्कृति का,
अतः लंक में नहीं रहा भय,
विजय गर्व की दुष्कृति का
गृह-गृह में उल्लास -हास है,
नगर निवासी अमित सुखी,
आर्य राम चालित सुराज्य में,
कैसे
कोई
कोई रहे
दुखी ?
आज विभीषण
राजा होंगे,
हो प्रभिषिक्त
राम कर से,
देंगे ये ही हाथ राज, है-
जिसने जीता खर
-
शर से ।
५२३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१३
प्राज त्याग, संग्रह की शोभा,
सँग सँग लंका में निखरी,
-
आज त्याग की, जन-संग्रह की,
शोभा छहर
-
जहां ?
छहर बिखरी,
इन्द्रियजित, संयमी, ग्रात्मजित,
नर को लोकेषणा कहाँ ?
लोभ कहाँ उस पुण्य हृदय येँ,
शुद्ध सत्गवेषणा
जो जग-जन के हृदयों में नित
विश्वधर्म के भाव भरे,
वह जन-मन पति अपने सिर क्यों
पर शासन का भार धरे ?
१४
रामचन्द्र के जय-निनाद से,
गूंज रही लंका-नगरी,
सुमति विभीषण के प्रसाद से
पुलक रही डगरी - डगरी,
५२४
सब प्राबाल वृद्ध पुरवासी
हर्षित फूले - फूले से
अति प्रसन्न मन डोल रहे हैं।
निज पथ भूले भूले से,
हुई
घर
-
-
सज्जिता लंका नगरी,
घर सज कर पुलक उठा,
आज लंक में प्रति गृह से सुख
स्वर्णिम बहु-बह, ढुलक, लुटा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>षष्ठ सर्ग
१५
स्वर्णगृहों के स्वर्ण शिखर सब,
चमक
उठे
प्रातर्वेला,
करने लगे गवाक्ष वायु से-
किरणों से खेला,
डोलित,
स्वर्ण-खचित सब द्वार देहली,
रवि-किरणों में चमक उठी,
-
गृह कपाट- मंडित कर - कौशल,
कृतियाँ छिनमें दमक उठीं,
प्रातर्वेला
लंका
लज्जित अरुणा
अथवा
-
निखरी,
बाला- सी,
राम यज्ञ वेदी की,
-
-
लोहित रंजित ज्वाला सी ?
•
१६
हेम कलश नाना विधि चित्रित,
मधु जल भरित बरे द्वारे,
वे लंका के वैभव कौशल
के प्रमाण न्यारे-न्यारे,
नगर वासियों के कृतज्ञता --
भरित हृदय के द्योतक वे,
राम विभीषण के सत् प्रेरित-
कार्यों के अनुमोदक वे,
द्वार-द्वार पर दमक रही है।
मंजुल कंचन - कान्ति भली,
चिर शान्ति के वा मिली है,
लंका को यह शान्ति भली ।
५२५<noinclude></noinclude>
bnf8rh7p4vcjqp5pd1a83x42j05qp35
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
-
१७
मुक्ता हीरक गुम्फित तोरण,
द्वार-द्वार पर फूल रहे,
जग-मंग ज्योति निहार नागरिक-
गण, मन ही मन फूल रहे,
झल-मल झल-मल झलक रहे हैं।
रवि किरणों से वन्दनवार,
हार धार कर सिहा रहे हैं।
कपु
के
निर्भयता गृह-गृह में व्यापी,
विस्तृत हुई शान्ति की बाट,
आज
पूर्ण उन्मुक्त हो गए
लंका - गढ़ के भीम कपाट ।
१८
कदली, नारि केल दल वेष्टित,
नन्दन-द्वार,
प्रतिगृह के
कपाट - आधार,
मरकत इव शोभित करते हैं,
अपनी
श्राभा का
.
विस्तार,
द्वार देहली पर अंकित हैं,
कुंकुम, स्वस्तिक चिन्ह अनेक,
भीतों पर हैं लिखित अनेकों,
भाव भरे सुन्दर, लघु लेख,
कहीं लिखा है 'रामो जयति,
भवतु चिरजीवी
विभीषणः '
कहीं
लिखा
है...
५२६
'भवतु सच्चिदानन्द स्वरूपं इदं मनः'<noinclude></noinclude>
egq6w2cg0zwtf99sx2op7mfchpf30km
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>-
१६
विस्तृत राजमार्ग जल-सिंचित,
जन संकुलित, तरंगित है,
नाना वस्त्राभरण - कान्ति से,
आलोकित, अतिरंजित है,
दोनों ओर सघन वृक्षों से
राजमार्ग श्राच्छादित है,
उस पथ पर जनगण की गति प्रति
सुखकर तथा अवाधित है,
-
षष्ठ सर्ग
डुलता,
जन-समूह कल्लोलित सर- सम-
इधर उधर हिलता
चला जा रहा है लहरों सा
हंस सब से मिलता-जुलता ।
२०
लहरा रही गृहों पर सुन्दर
मन मोहिनी ध्वजाएँ ये,
ऐसी लहरा रहीं कि सहसा
-
सागर वीचि
अठखेलियाँ
चंचल
कर रही हैं ये
प्रात समीरण में,
-
कुछ मिसरी सी घोल रही हैं
ये अपने मन ही मन में,
भी
ये फहराई थीं उस दिन
जब रावण का व्याह हुआ,
और आज भी फहराती हैं,
लजाएँ
ये,
जब रावण का दाह हुआ ।
५२७<noinclude></noinclude>
bgvzql0gtbatp1ltky171evtjzyxsr1
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२१
किन्तु आज की बात और है,
आज और ही है आनन्द,
आज मुक्ति का मिला संदेशा,
सकल दिशाएँ हैं स्वच्छन्द,
वरुण मुक्त हैं, मुक्त मरुद्गण,
वायु मुक्त, उन्मुक्त सभी,
अब जग में कोई क्यों होगा
परवश, बन्धनयुक्त कभी ?
इसीलिए उन्मुक्त पताकाएँ
हर्षित लहराती हैं,
विश्व-मुक्ति-सन्देश वाहिनी
ये सब दिशि फहराती हैं ।
२२
लंक दुर्ग के कोट - कँगूरे
नव सज्जित हो विहँस रहे.
राम चिन्हयुत केतु अनेकों
दुर्ग- शिखर पर विलस रहे,
गढ़ प्राचीर हरित पल्लव से,
चीनांशुक - सं
सज्जित हैं,
अथवा दुर्भेद्यता, दुर्गं की
कोमलता में मज्जित है,
बुर्जों से सैनिक दल की यह
बहती
अट्टहास
-
धारा,
ज्यों नर, शिलाखण्ड भेदन कर,
प्लावित करते जग सारा ।
५२८<noinclude></noinclude>
02kggv8i5jrtbahh1co53a6u5s4g68g
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२३
सिंह-द्वार खुले हैं गढ़ के,
प्रहरी खड़े शस्त्रधारी,
पुरवासी गढ़ में हैं प्रात-
जाते, लिए भेंट भारी,
घोर नगाड़ों से, दुन्दुभि से,
घन निनाद की धार वही,
गोमुख, रंग, शंख बजते हैं--
अम्मर में ध्वनि गूंज रही,
ग्रज लंक - राजेश्वर
षष्ठ सर्ग
होंगे
नृपति विभीषण विज्ञानी,
अभिषकोत्सव के कारण है
सज्जित लंक राजधानी |
२४
राज सभा में पुर-नर-नारी
प्रति प्रसन्न, एकत्रित हैं,
चतुर शिल्पकारों की कृति स
सभा भवन प्रति चित्रित हैं,
मुक्ता, मणि, हीरक, नीलम की--
जग मग जग मग ज्योति जगी,
मानो अम्बर में अनगिनती
नक्षत्रों की भीड़ लगी,
बहुरंगी वस्त्रों की मणियों--
में है झलक रही झांई,
मानो झलक रही दर्पण-गत
इन्द्र धनुष
-
की परछाई ।
५२६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२५
तीन उच्च सिंहासन
-
राज
-
सभा का
मंच
-
मंडित
वना,
ज्यों जग-रंग-मंच पर मंडित
आसन त्रिगुणों का
सिंहासन के पीछे सज्जित
चंवर छत्र धर दास खड़े,
उनके पीछे नतमस्तक, पर
अतिशय सजग, खवास खड़े,
सिंहासन से कुछ नीचे दो
इधर-उधर उच्चासन हैं,
उनके नीचे सामन्तों के
सुन्दर जटित सुखासन हैं ।
२६
हैं मध्य में विभीषण नरपति,
मन्दोदरी सहित,
कोई राजेश्वर हो
यदि वह है अर्धाग-रहित;
राजी
कैसे
५३०
हं दाहिनी ओर सीता सह-
अवधेश्वर रघुवर आसीन,
बाई ओर विराज रहे हैं।
किष्किन्धेश्वर नीति प्रवीण,
प्रपना,
रहे,
नीचे प्रासन पर श्री लक्ष्मण,
अंगद राज, विराज
उनके नीचे सामन्तों के
सचिवों के दल भ्राज रहे ।<noinclude></noinclude>
0wlis5syxac19flzuhfvnygqouqnc6i
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२७
राम आज भी वही राम हैं,
जो कल तक थे वनवासी,
वहीं वेश है, वही भाव है,
सदा एक रस, अविनाशी,
4
हुआ पूर्ण वनवास काल, वन--
जाग उठा, रावण हारा,-
सीता मिली, हुआ तप सुसफल,
मिटा जगत का अँधियारा,-
--
षष्ठ सर्ग
उनके चरण प्रताप मात्र से
-
-
यह जादू हो गया, सही
किन्तु अविचलित, नित्य प्रनिगित
बने आज भी राम वही ।
२८
स्वस्ति-पाठ की ध्वनि उच्चारित-
हुई, सभा
निस्तब्ध
हुई,
श्रुति गायन के
स्वर साधन में,
जन- रव गति
निःशब्द हुई,
शब्द ब्रह्म बन कर यह लहरा
उठी पताका संस्कृति की,
हुई सांस्कृतिक विजय पूर्ण श्री-
या राम की मति धृति की,
नहीं शस्त्र विजिता यह लंका, -
यहाँ विजय है शास्त्रों की,
यह जय है तापस आय के
शुद्ध शब्द - ब्रह्मास्त्रों
की ।
५३१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२६
उठे राम निज सिंहासन से -
धन्य मंजु छवि स्वप्निल-सी,
धन्य योग निद्रिता, जागृता,
वह लोचन छवि भिल-मिल सी,
धन्य धन्य उन्नत ललाट, जिस-
पर मण्डित चिन्तन-रेखा,
धन्य सभी जन की आँखें जो
वनों राम की छवि लेखा,
बलि जाऊँ प्राजानु बाहु बे,
चिर रक्षक, जग-पोषक वे,
धन्य वरद कर कमल श्रमल वे,
जन रंजन,
३०
जनतोषक वे ।
वह विशाल वक्षस्थल जिस पर,
रावण-शर के चिह्न बने,
वे सुन्दर कपोल द्वय, जिन से--
ढरके करुणा अश्रु घने,
५३२
धन्य चरण में, जिनने उत्तर-
को दक्षिण से जोड़ दिया,
जिनने नव-पथ निम्मित करके
मानव गति को मोड़ दिया,-
बलि जाऊँ, वे चरण बने जो
आश्रय दाता शूलों के,
वे पद जो विचरे हैं शोधन-
करते जन मन भूलों के ।
-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५४९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>'३१
शिर पर जटाजूट है, अथवा-
जग-रक्षण का भार.
अथवा कच कुंडलियों के मिस
बढ़ा,
षष्ठ सर्ग
जन
-
कृतज्ञता - भार चढ़ा,
अथवा श्यामल भूतकाल के
गर्भस्थित चौदह वत्सर,
जटाभार वन कर छाए हैं
रामचन्द्र के मस्तक
पर,
एक-एक कुन्तल - अवली
में
उलझ रहीं सौ-सौ स्मृतियाँ,
ग्रथिता हैं प्रति जटा कुंडली-
में तप की अनेक कृतियाँ !
३२
जिस निद्रा में विगत काल यह,
लय हो कर सो जाता है, -
जिस निद्रा की श्याम गली में,
उद्बोधन खो जाता है,
जिस निद्रा में है अतीत का
मद प्रति संमोहन कारी,
जिस निद्रा में
है विराम प्रति
सुखकारी,
संस्मृति - हारी,
रही नयन
वही नींद अँज
दशरथ नंदन
उस निद्रा के
नयन उनींदे
में
निर्गुण के,
आधिपत्य से
हैं उनके ।
५३३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३३
जिस जागृति में उद्योद्भव है,
जिस जागृति में
मति-गति है,
जिस जागृति में
वर्तमान की-
निरलस, सजग
कर्म-रति है,
जिस जागृति में है भविष्य की
निर्माणों की,
नव ग्राशा
जिस जागृति में सुस्पन्दन है,
चलिता गति है प्राणों की,
जिस जागृति में मोह विनाशक,
जागरूकता मय बल है,
भरा हुआ श्रीराम नयन में
वही जागरण अविचल है ।
३४
जिस के बल पर मानव जन-गण,
शुभ भविष्य दर्शन करते, -
जिस पर नित अवलम्बित हो कर
नर हिय में श्राशा भरते,
वह सुदूर
दर्शन - समर्थता-
५३४
भरे राम निज नैनों में, -
खड़े हुए हैं अमित भाव ले
अपने अकथित बैनों में,
चित्रलिखी सी राजसभा सब
उन्हें
-
निहार- निहार रही,
पल-पल में अपलक शोभा पर
अपना तन-मन वार रही ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३५
युग कर में ले राज मुकुट शुभ,
गज गति से आगे जाकर,
धरा राम ने नृपति विभीषण-
के शिर, मुकुट ज्योति श्राकर,
किया प्रतिष्ठित राज-दण्ड फिर
दक्षिण कर में नर पति के,
चन्दन लेपन किया भाल में
स्वधर्म मति के,
लंकेश्वर
सादर
-
षष्ठ सर्ग
फिर सागर नद-नदियों का जल
कुश में ले मस्तक सींचा,
या कि त्याग की परिसीमा को
प्रभु ने धीरे से
३६
खींचा
देख राम-लीला यह, कुछ-कुछ-
लंकेश्वर के अधर हिले,
रोके भी न रुके, नयनों में-
आकर आँसू विन्दु खिले,
अभिवादन कर लौटे
अपने सिंहासन पर राम,
शत-शत कण्ठों से ध्वनि उट्ठी,
जयति राम, जय जय निष्काम,
तब श्री रामचन्द्र की वाणी
मेघ घोष इव गहर गंभीर,
सभा भवन में उठी विकम्पित,
करती भीम दुर्ग प्राचीर ।
५३५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
३७
"राजन, राजेश्वरी, ग्राज क्या
कहूँ ? सँकोची शब्द बड़े,
कैसे उद्गीरित हों ? वे तो-
अन्तस्तल में अटक
मैं वाणीपति भी, अभिलाषी-
हूँ कि मौन वरणीय गहूँ,
कैसे
शब्दातीत हृदय की
बात अनिर्वचनीय
कहूँ ?
पड़े,
हिय में, मन में,
चिन्तन में है
उलभी इतनी
वात पड़ी,
जिन्हें नहीं कह सकती वाणी,
शब्दों की न बिसात बड़ी ।
३८
राजन, आप समझते हैं सब
निपट कृतज्ञ भाव मेरे,
भवतः प्रति, किष्किन्धेश्वर प्रति,
सुहृद्भाव मम बहुतेरे,
५३६
मत्तः परिवर्तित सुधर्म यह,
जिस विधि से अनुसरित हुआ,
उसे देख कर रामचन्द्र का
यि
कृतज्ञता
भरित हुआ,
धर्माचरण, निरत, तत्परता-
लख लख दाक्षिणात्य जन की-
अति प्रसन्न है राम, हुई है-
पूर्ण तुष्टि उसके मन की ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>३६
नरपति, मेरे यज्ञ कर्म की
यह पूर्णाहुति आज हुई,
वह जीवन- साधना राम की
यहाँ कुल-काज हुई,
प्राज
आज हुई है पूर्ण कामना
नम निष्काम तपस्या की,
तत्व-दीपिका मिली राम को,
जग की सकल समस्या की,
आज पूर्णता
पष्ठ सर्ग
मिली परन्तप-
लक्ष्मण के नैष्ठिक तप की,
प्राज हुई है पूरी
माला
जनकनन्दिनी के जप की ।
४०
बातें कहने को अनेक हैं
इस मंगलमय अवसर पर,
यदि हो कुछ विस्तार अधिक तो
क्षमा करें मुझको, नरवर,
जीवन - इति
कर्तव्यता हुई-
हो पूरी जिस शुभ क्षण में-
उस क्षण उठ उठ आते
भाव अनेकों जन मन
आज राम की यही दशा है,
क्या कह दूँ ? क्या-क्या न कहूँ ?
कहूँ या कि कुछ भी न कहूँ ? मन
मौन गहूँ ? चुप साध रहूँ ?
ही हैं
में
;
५३७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५४
250
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४१
अपने मन की बात कहूँगा-
नहीं होगा
प्राज
केवल प्रकट रूप से
प्रवचन,
होगा
राम-मन का चिन्तन,
ग्राज
एक-एक
जीवन
की घटना
सम्मुख
श्रा- श्रा
जाती है,,
कई दुख सुख की संस्मृतियाँ
वह सँग सँग ले आती है;
चौदह वर्षों के
जीवन का -
पूर्ण
चित्रपट सम्मुख है,
उसमें घटनामय जीवन के-
अंकित कई दुःख-सुख हैं ।
४२
राजन् राम, सीय-लक्ष्मण सह,
बरसों पहले, निज घर से,—
एक साध लेकर निकला था,
अपने
नगर
सुखाकर से,
उसी साध से प्रेरित हो कर,
५३८
लक्ष्मण भी सँग-सँग धाए,
कुल- लक्ष्मी ऊम्मिला बहू को
लक्ष्मण वहीं छोड़ आए,
चौदह वर्षों के पहिले का
अनुज वधू का वह श्रीमुख,
वह विषाद मंडित मुख आता,
राम हृदय-दृग के सम्मुख<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४३
कौन साध थी वह जीवन की ?
कैसी थी मन में आशा ?
जो कुछ मन में था, उसको, नृप,
कैसे प्रकट कर भाषा ?
विश्व विजय की चाह नहीं थी,
और न रक्त-पिपासा थी,
केवल कुछ सेवा करने की
उत्कण्ठित. प्रभिलाषा थी,
षष्ठ सर्ग
इतना था विश्वास कि हम हैं।
लोकोत्तर धन के
स्वामी,
लोक हिताय बाँटना जिसका,
धर्म हमारा निष्कामी
४४
यही साधना, यही कामना,
यही भावना ले मन में,
इधर-उधर विचरे हैं लेकर
यही भाव हम निर्जन में;
इस प्रणोदना ही से प्रेरित,
हुए सकल मेरे कृत कर्म्म,
शुद्ध विचार-प्रचार आचरण
यही राम
-
लक्ष्मण का धर्म,
जो कुछ भी थोड़ी सी सेवा
है यह
उसका श्रेय
नहीं राम को,
कभी-
उसके तो हैं
यश के भाजन आप सभी ।
५३६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५६
250
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
साधन
की
वन में हमें
४५
परिपक्वावस्था
मिली सुखदा,
दक्षिण वन वन गया हमारे-
लिए सकल उद्भव
इसीलिए यह दक्षिण मुझको
प्रियतर है उत्तर से भी,
इसीलिए अटवी है मुझको
प्रियतर अवध नगर से भी,
हुए विपिन में हमको दर्शन
पूर्ण विराट् विश्व भर के,
हम सब के हो गए, न वन के
रहे, न रंच रहे घर के
४६
वन में सीता, राम, लखन ने
अपना शुद्ध रूप जाना,
सब को अपना करके हमने
निज स्वरूप
को पहचाना,
भूमि विजय, साम्राज्य स्थापन,
यह न आर्य का ध्येय कभी,
आर्य सभ्यता छोड़ चुकी है
कब की सृतियाँ प्रेय सभी,
५४०
दुख-हा,
जो अपने को जग भर में,
जग भर को अपने में लेखे, -
वह परपीड़न की दुष्कृति में,
क्यों न आत्म-पीड़न देखे ?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>४७
महामहिम रावण का, मेरा,
नहीं व्यक्तिगत था झगड़ा,
आत्मवाद, साम्राज्यवाद का
वह था अनमिल भेद बड़ा,
विकट सुभट, उद्भट सेनापति,
महा प्रतापी रावण थे,
वे प्रचण्ड जगदाक्रान्ता थे,
उनके पोषक भाव न थे;
षष्ठ सर्ग
भू-अर्जन पर शासन, मारण,
रण, धन, सुख उपभोग, विलास, -
इतने ही तक हन्त, रह गया,
सीमित उनका मनोविकास ।
४८
इधर राम ने बचपन ही से
पढ़ा लोक
रक्षा
का पाठ,
उधर बली रावण ने अपने
साजे विश्व विजय
के ठाठ,
इधर त्राण के भाव, उधर थे-
जग प्राक्रमण-भाव
दुर्वप,
अतः अवश्यम्भावी था यह
कि हो
एक खेद है यह
राम-रावण-संघर्ष,
यह शस्त्रोमृत
हो कर सत्य हुआ विजयी,
यदि प्रशस्त्र जय होती, तो वह
होती पूर्ण विशुद्ध नयी ।
।
५४१<noinclude></noinclude>
p5pph7r6tfbjwigujtvfpwcl6bnprpw
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
४६
यदि श्री रावण के विचार भी
हो जाते
मेरे अनुरूप,
यदि वे किसी
अपने सबल
तरह तज सकते
विचार कुरूप,
तो फिर सत्य जानिए, नरपति,
जग कुछ का कुछ हो जाता,
मानव-हिय का असुर-भाव वह
चिरनिद्रा में सो
यही दुःख है कि मैं वीर वर
सका,
रावण - हृदय न जीत
इतना भर ही नहीं रह गया,
दशरथ नन्दन के वश का ।
५०
जाता,
रावण हारे, खेत
रहे वे,
पर बदले न भाव उनके,
सभी जानते हैं कि बड़े थे
वे पक्के अपनी धुन के,
५४२
अन्तिम समय, रणांगन में जब
विनत लखन पहुँचे सम्मुख,
तब वे बोले : 'रामानुज, है-
का मुझ को दुख,
एक बात
तुम दोनों हो महा प्रतापी
स्वप्न लोक-वासी,
पर हो
मत समझो कि बन सकोगे तुम
जन
-
ग्रज्ञान शोक- नाशी ।
-<noinclude></noinclude>
2b4u51pjkdseeo2rv64ednqgyj2q1rv
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५५९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५१
यदि कोई जगदीश्वर है, तो-
उसकी यह भी है लीला-
कि वह असत् के द्वारा ही है
प्रकटाता मति गति शीला,
मत समझो कि कर सके हो तुम,
ग्रसद्भाव का उच्चाटन,
हो सकता है असत् उसी का
जिसका है जग पर शासन,
रावणवाद
षष्ठ सर्ग
सत्य-प्रसत्य तत्त्ववित् मूर्खो-
का यह एक बखेड़ा है,
यह पथ-जिस पर तुम दोनों हो,
अतिशय टेढ़ा मेढ़ा है ।
-
५२
मत समझो रावण मरने से-
रावणत्व का ग्रन्त हुआ,
यो मरने से और अधिकतर
विस्तृत मेरा पन्थ हुआ,
चिरस्थायी है,
वह है सृष्टि-तत्त्व, लक्ष्मण,
धर्म-भावना में मत भूलो,
पहचानो निजत्व, लक्ष्मण,
याग्रो, मम
निर्दिष्ट मार्ग पर-
चलो, भोग
भोगो जग के,
जग के त्राता मत कहलाओ,
तुम यों अपने को ठग के ।
५४३<noinclude></noinclude>
0g3w4vu788oedx2d8qdmivwyfndbc8y
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
५३
जग तारण ? यह एक ढोंग है,
जग का त्राण असम्भव है,
उसी तरह जैसे मृत शव को-
जीवन-दान असम्भव है,
जग अपनी गति से चलता है,
वह गति है प्रज्ञेय, लखन,
कैसे राम
कर सकेंगे उस-
गति का स्वेच्छारूप चलन ?
लखन, कदाचित् अदमनीय हैं
कोई गति जग जालन में,
कहो राम से जाकर, तुम मत-
पड़ो जगत् प्रतिपालन मं,
-
५४
दुर्दमनीय चक्र है यह तो,
यों ही चलता जाएगा,
किसी तरह भी नहीं किसी के-
वश में यह जग आएगा,
५४४
रावण ने भी खेले हैं ये,
सब जप-तप के खेल, लखन,
पर सच कहता हूँ पाई हैं--
सव
बातें
बेमेल, लखन,
सम अनुभव से तुम दोनों कुछ
सीखो, यह है अभिलाषा,
किन्तु राम मन में है जग के-
वाता होने की आशा ।<noinclude></noinclude>
cyui7mm9z0tyzd729tnilm826ym30m1
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>षष्ठ सग
५५
मेरा मार्ग प्रशस्त मार्ग है
उस पर चलो, बनो विजयी,
तव अग्रज पद-नत लंका की,
भोगो श्रीसम्पत्ति नयी,
रावण मरता है, पर जीवित--
है मम रावणत्व का तत्त्व,
ऐसा तत्त्व कि पद-पद पर जो
ललकारेगा श्री रामत्त्व,
लक्ष्मण, सुखी रहो, कह देना --
अपने अग्रज से कि : वली,-
रज्जु जल चुकी थी, पर उसकी,
ऐंठन तब भी नहीं जली ।"
५६
राजन, इन
शब्दों से
प्रकटित
होती है
उनकी महिमा,
इन शब्दों में भरी हुई है,
रावण की गौरव गरिमा,
वह अभिमान चण्ड दिन-मणिवत्
जो जग में नित तपता था, -
वह भौतिकतावाद भयंकर
जिस से त्रिभुवन कँपता था, -
महाराज रावण के अन्तिम
शब्दों में है भाव वही--
वही भाव, जिसके हिय में है
-
अन्य भाव का
चाव
नहीं ।
५४५.<noinclude></noinclude>
jk9tt5h0ew8z3hnbjyb0hg6kjz9iqbs
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
इन
५७
शब्दों में जड़ निश्चितता
भरी हुई है, खेद यही,
इन भावों में नेति नेति का
अथकित सुमथित स्वेद नहीं,
जीवन में इति निश्चितता का
अन्य नाम है ग्रात्म विनाश,
नेति भाव
में अन्वेषण है,
श्रम है, है नित आत्म-विकास;
असद्भाव है व्यक्त अतः वह
हो जाता है अनुकरणीय,
यों विचार कर श्री रावण ने
समझा असद्भाव वरणीय ।
५८
राम प्रबोध नहीं है, वह भी-
पाप-
प-स्थिति से से परिचित है,
षड्रिपुत्रों की दाहक-मोहक
किसको अविदित है,
माया
. ५४६
जग-जन-गण के ग्रन्तस्तल में,
दुष्प्रवृत्तियाँ संचित हैं,
पर कुछ ऐसे भी हैं जो इन
से वंचित हैं;
दुर्भावों
इसीलिए यह ध्रुव प्राशा है--
कि यह जगत है सत्य-स्वरूप,
सतत यत्न से पा सकता है।
यह जग अपना रूप अनूप ।<noinclude></noinclude>
peqpoxuj6zivss7cnx6f1g1ey2yhl56
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>५६
भौतिकवाद, शुष्क तर्कों को
ले, दिन रात मचलता है,
प्रत्यक्षता-वाद के पीछे--
पीछे निशि-दिन चलता है,
अन्ध-शक्ति एवं पदार्थ जड़, --
ये दो उसके स्तम्भ बड़े,
भौतिकतावादी चलते हैं--
षष्ठ सर्ग
दोनों
को
पकड़े - पकड़े,
पर इन दो से विश्व- पहेली
नहीं सुलझती है, राजन,
इनके पीछे चलने से वह--
और उलझती है, राजन !
६०
कैसे आविर्भूत
आविर्भूत हुई यह
नित्य चेतना चिनगारी ?
-
कैसे अग्नि-शिखा यह जागी,
एक रूप न्यारी
जड़ पदार्थ से ? अन्धशक्ति से ?
किससे चेतन भाव जगा ?
-
न्यारी ?
इसी प्रश्न से समय-समय पर
उठ उठ
भौतिकवाद
ठगा,
जड़वादी, भौतिकतावादी,
ये
पदार्थ-वादी,
सारे-
इसी प्रश्न के कारण
बरबस
कह उठते हैं : हम हारे !!
५४७<noinclude></noinclude>
25tme32m0hymx8doztr9h8coj2y7s10
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६४
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६१
वेद,
वे कहते
कहते हैं नाहं
किन्तु हम कहते हैं, जानो--
नहीं जानते तो प्रयत्नतः
'
तुम अपने को पहचानो,
पर, वे इति निश्चितता-वादी,
नहीं देखते हैं इस प्रोर,
अपितु जगत में फैलाते हैं,
नित प्रति अपने कर्म-कठोर ;
पर पीड़क, स्वातंत्र्य- विनाशक,
जग शोषक उनकी कृतियाँ--
नित दूषित करती रहती हैं
जग की धर्म कर्म - सृतियाँ |
६२
भौतिकवाद, चेतना विरहित,
है वह निपट निराशावाद
राजस्, तामस् गुणमय वह है
मानव मन का
५४८
-
मत्त प्रमाद,
इस जीवन के परे कुछ नहीं,
यों कहते हैं जड़वादी
मनः प्रसाद- शून्य हैं, उनके --
कर्म नहीं हैं हैं प्रविषादी,
आत्मवाद में है अनन्तता
का प्रति रुचिर-ज्ञान- वैभव,
वहाँ नहीं संचय - संचय का
सुन पड़ता है: कर्कश रव ।<noinclude></noinclude>
0vgkv8tv9x9wldwygvxz9wu1xy3n74t
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६३
केवल मात्र
एक जीवन की
मरणान्ता आशा धारे,
जग में कर्म लिप्त होते हैं।
-
ये जड़वादी बेचारे,
इसी लिए उनके
श्रात्म विमोहन
कम्मों में
क्रीड़ा है,
उनके कम्पों में मारण है,
नाशन है, पर पीड़ा है,
-
षष्ठ सर्ग
इसे भूल ही जाते
कि यह जगत तप का
हैं वे,
फल है,
इस अश्वत्थ वृक्ष का फल है
त्याग, भोग तो बल्कल है ।
६४
करके त्यक्त आत्म-निर्गुणता
स्वयं ईश जग रूप
-
हुआ,
हो तप-तप्त प्रजापति बैठा,
सकल सृजन का भूप हुआ,
यह ब्रह्माण्ड तपस्या के बल,
गतिमय, स्रतिमय, चलित हुआ,
अणु-अणु में, कण-कण में सन्तत
प्रथम तपोबल ज्वलित हुआ,
सतत तपस्या, त्याग निरन्तर,
वहिरन्तर तपमय, राजन,
तप से क्षण में ही मिट जाता--
है यह उद्भव - भय, राजन !
૪૨<noinclude></noinclude>
cp4v82shpo22ek3z1ya3kpulw52kt23
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६५.
दे कर रक्त हृदय का अपने,
दुग्धधार के मिस जननी,
करके प्राणों को न्यौछावर,
रमणी--
शुद्ध प्यार के मिस,
सींच रही है
श्रात्म-त्याग की --
धारा
से
जग पादप को,
सिखा रही है तप की विधियाँ,
'अहमिति' जग उन्मादक को,
क्षण-क्षण, ग्राठों याम न हो, यदि
तप, तो यह जग कहाँ रहे ?
निमिष मात्र में महा प्रलय हो,
सृष्टि कथा फिर कौन कहे ?
६६
नहीं निरीश्वर विश्व निखिल यह,
चेतन इच्छित,
सेश्वर है,
सकल लोक लोकान्तर गति का
परिचालक
५५०
सर्वेश्वर है,
खनिज, जलज, उद्भिज, स्वदेज प्रौ'
कामज, थल, नभ चर प्राणी
महाभूत, ये गन्ध- रूप रस--
-
परस उपकरण, यह वाणी, --
-
इन सब की गति का संचालक
सूत्रधार है अलख झलक,
करता है संचालित जग को;
वह नित जागृत, चिर अपलक ।<noinclude></noinclude>
qs32rujhod3os4plklwums6a536fhuq
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>जीव
षष्ठ सर्ग
Plice
६७
सच्चिदानन्द
हूँ जग-कर्ता,
रूप है,
भर्ता,
जग नाशक, उत्पादक,
हूँ माया तम हर्त्ता--
-
-
'मैं' पा सकता हूँ अपना पद,
यदि अपने को पहचानूं,
'सोsहं,' यह है सत्य सनातन,
यदि 'मैं' निज स्वरूप जानूँ,
सतत प्रयत्नों में प्रन्तर्हित
है 'मेरी' सत्-रूप छटा,
'मैं' बन जाता हूँ 'वह' ज्यों ही-
यह घूँघट-पट रंच हटा ।
६८
जग को अपना रूप दिखाना,
निज श्रम-कण की झांई में,
आत्म-बिम्ब को झलका देना,
लोचन की परछाई में,
जीवनेतिकर्तव्यता
यही
रामचन्द्र
के
जीवन की,
उसने इसी लिए निज नगरी
छोड़ी, शरण गही वन की,
सत्य- विचार हुए हैं विजयी,
-
-
हुआ,
असुर भाव प्रपहरण
में प्रसन्न हूँ, आज लंक में—
सद्भावों का वरण हुआ ।
५५१<noinclude></noinclude>
3mi2uiph5pjfodx9r43wbsrocedu1dd
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६६
लोग कहा करते हैं : प्रार्थिक--
संचय ही है आत्म विकास,
अर्थ लाभ मूलक है, उनके --
मन से, जन का प्रगति-विलास,
-
अर्थार्जन है उनके मत में
मापदण्ड जन-संस्कृति का, --
निरा द्रव्य-संचय ही है परि--
चायक मानव धृति कृति का,
आर्थिक संचय ही है द्योतक
क्रमिक ऐतिहासिक गति का
उन के मत से अर्थ - शून्य-युग
है परिचायक अवनति का ।
७०
अर्थ-वाद ही प्रगति चिह्न है,
यों विचार कर, वे मन में,
येन केन रूपेण अर्थ
-
संचय
५५२
-
करते
का
क्षण-क्षण में,
-
न्याय और अन्याय तथा सत्-
असत् विचार छोड़ कर के,-
प्रचुर प्रर्थ-संचय करते हैं,
जड़ता-वादी जी भर के,
नहीं जानते वे कि अन्ततः
ये विचार भ्रम मूलक हैं--
प्रगति चिह्न ये नहीं, अपितु ये
सत् - संस्कृति - उन्मूलक हैं ।<noinclude></noinclude>
ax4w6cqdo1k9r7h4khnsz95wnui2qab
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५६९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७१
अर्थ प्रगति का चिह्न नहीं है,
वह है प्रगति-नदी का फेन,
वह तो यों ही उतराता है,
होने को विलीन, बेचैन,
जो कुछ ऊपर तैर रहा है-
वह है नदी नहीं, राजन,
क्या फेनिल विचार हो सकता-
है द्रुत नदी कहीं, राजन ?
षष्ठ सर्ग
इस विकार संचय से कैसे
-
-
हो ?
नव प्रवाह उत्पादन
निपट अज्ञता में यों पड़ कर
कैसे संस्कृति साधन हो ?
७२
अर्थ प्रगति का चिह्न ? अनोखी-
सूझ अर्थवादी जन
की,
यह प्रवृत्ति परिचायक उन के
चिन्तन, मनन - शून्य
तनिक सुदूर विगत युग-युग का
यदि कर लें अवलोकन वे,
तो मिट जायेंगे क्षण भर में
उन के सकल प्रलोभन ये,
उन ऋक्साम गायकों के ढिग
था कौन सा अर्थ संचय ?
जो लोकोत्तर आध्यात्मिकता
उन हिय प्रकटी निःसंशय ?
मन की,
५५३<noinclude></noinclude>
jhlmf95j8x7o2q325fnq1p70m0rsmsr
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७०
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
७३
यदि संस्कृति-गति लौकिक, प्रार्थिक-
संचय के सँग-सँग चलती-
तो वल्कल वसनों के युग में
कैसे
ज्ञान ज्योति
जलती ?
द्रव्य - पुष्टि
पर
आधारित ही
नहीं
ज्ञान-मति गति शीला,
केवल भौतिकता- पंजर में
नहीं निहित उस की लीला,
मानवेतिहास की प्रगति का
मापदण्ड धन-धान्य नहीं,
यह समाज संस्कृति जा सकती--
नापी धन से कभी कहीं ?
-
७४
ही है
शुद्ध विचार प्रौढ़ता
भित्ति सभ्यता संस्कृति की,
सदाचरण शीलता मात्र हे,
द्योतक संस्कृति, मति, धृति की,
५५४
यों तो तन धारण करना ही
जड़ता का अवलम्बन है,
जड़ चेतन अवलम्ब परस्पर-
यह ही जगत्-संक्रमण है;
-
किन्तु सचेतन भाव नहीं है
इस जड़ता से सीमा-बद्ध,
है तथैव मानव
नहीं अर्थ
-
संस्कृति भी
संचय
आबद्ध 1<noinclude></noinclude>
qzdyzlckbw96xsejj4blm3gi51gyslh
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>षष्ठ सर्ग
७५
है साम्राज्यवाद
का नाशक,
सदा,
दशरथ नंदन राम
-
है भौतिकता-वाद विनाशक,
जन मन रंजन राम
-
सदा,
धन्य विभीषण ग्राप, हुए जो
मम निष्काम सहायक यों,
अर्थ-वाद मय स्थिति में प्रकटे
आप सत्य परिचायक
-
यों,
लोग कहेंगे कि यह विभीषण
है स्वदेश- रिपु, कुल द्रोही,
हुआ देश-प्राक्रान्तक-रिपु के--
संग विभीषण निर्मोही ।
७६
फेल रहा है यह भी जग में,
प्रति मिथ्याभिमान, राजन,
कि हम देश हित कर सकते हैं,
अपने त्यक्त प्राण, राजन,
राष्ट्रधर्म
कैसे हो
सकता
मिथ्या
जन-गण का ऐकान्तिक धर्म ?
पक्ष - समर्थन सदा राष्ट्र का,
हो सकता है निपट अधर्म ;
इष्टदेव संस्थापन,
है अज्ञानी जन की बान,
यों असत्य के पीछे मरना,
आत्म- हनन सम है अज्ञान ।
५५५<noinclude></noinclude>
81ej1pp07wh2to15pausph78im3q76s
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७२
250
196329
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
७७
सदा एक ही वस्तु पूज्य है,
वह है सत्य, असत्य नहीं,
असत् अर्चना का इस जग में,
हो सकता है तथ्य
कहीं ?
तत्त्वहीन, सद्ज्ञान विमोहक,
सदा अन्ध अनुकरण प्रभाव,
सत्य रहित कैसे स्वीकृत हो--
स्वदेश- पूजा प्रस्ताव ?
यह
आचरणीय धर्म्म केवल वह
शुद्ध सत्य अनुमोदित जो,
कैसे ग्राह्य कहो हो सकता
वह है असत् प्रणोदित जो ?
७८
कभी, समूचा राष्ट्र दुष्टता-
मय हो जाता है, राजन,
कभी, देश का सत्य भाव सब,
द्रुत खो जाता है, राजन,
५५६
-
जन-गण पागल हो उठते हैं,
जग उठता है नाशक-भाव,
निपट, विकट विक्षिप्त भावना
कर देती है सत्य-दुराव,
जन-समूह श्रातुर हो
जाते,
लगती प्रबल रक्त की प्यास,
अपनों का ही शोणित पीकर,
यों करते हैं जग का नाश ।<noinclude></noinclude>
2r2t2k7ge50re4en4p1b1uo87m2ed40
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>७६
उत्पादक
मारक,
आक्रान्तक,
षष्ठ सर्ग
नाशक, दाहक प्रवृत्तियाँ,
सहसा जागृत होती हैं ये,
असुर भावमय दुष्कृतियाँ,
-
बिखर फैल पड़ती हैं हृद्गत
दुष्ट भावनाएँ गुप्ता,
ज्यों प्रज्वलित हसन्ती-गत हो
अग्नि-राशि अति उन्मुक्ता
ऐसे क्षण में यही धर्म है,
कि हम राष्ट्र के विमुख चलें,
फिर चाहे हम अपनों ही के-
क्रोधानल में क्यों न जलें ।
८०
एक ग्राग है, जो जलती है,
सहसा धधक धधक कर के,
ऐसा दाबानल है, जो है-
जलता भभक भभक कर के,
शम, दम, संयम प्रतिबंधित कर
जन-उन्माद
बफरता है,
मानवता अपहृत होती है,
पशुता से जग
भरता है,
सत्य, ज्ञान, संस्कृति, शतियों का
यह
संचित वैभव सारा, -
क्षण में भस्मसात् होने को
खिच आता है- बेचारा !
५५७<noinclude></noinclude>
sdho7w7yak40ee5ikb78kb4a5r6ka78
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७४
250
196331
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667321
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
८१
जबकि राष्ट्र-मद, ज्वाला-गिरि-
सम, श्राग उगलने लगता है, -
जन-समूह के हृदयों में जब,
भाव आसुरी जगता है,
,
तब स्वधर्म है यही चलें हम -
सामूहिकता के प्रतिकूल,
और करें उच्छिन्न निरन्तर,
निज स्वदेश जन-मन की भूल;
देश विदेश, संकुचित जन का,
है अनुचित संकुचित विचार,
है मनीषियों का स्वदेश वह,
जहाँ सत्य- शिव का विस्तार ।
८२
हैं जग के नागरिक सभी हम,
सब जग भर यह अपना है,
सीमित
देश- विदेश - कल्पना,
मिथ्या भ्रम का सपना है,
५५८
देश-काल का अतिक्रमण कर
बनना है हमको विजयी,
फिर क्यों खींचें हम अपनी यह
सीमा रेखा
-
नयी नयी ?
-
जो सम्मार्ग-गमन करता है-
वही हमारा बन्धु, सखा,
सत्य पराङ्मुख, सदा त्याज्य है।
हो रावण या शूर्पणखा ।<noinclude></noinclude>
nzs4jy8f4950cjdofrk9to1ywhd386r
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८३.
हुए सहायक, नृपति, ग्राप मम,
क्योंकि पक्ष या मेरा सत्य,
नहीं इसलिए कि था बड़ा बल-
शाली दशरथराज अपत्य,
जिस क्षण आप सहायक मेरे,
आए थे वन कर, राजन्,
तब पलड़े में झूल रही थी,
यह जय, इधर-उधर, राजन्,
षष्ठ सर्ग
कौन जानता था कि अन्ततः
किसे वरेगी विजय- श्री ?
कौन जानता था कि मुझे ही
वरण करेगी विजय- श्री ?
८४
नहीं राजसिक प्रलोभनों से
हुए
विभीषण
राम-सखा,
केवल,
उनने शुद्ध दृष्टि से
शुभ स्वधर्म का रूप
राजन्, कैसे करूं प्रशंसा ?
धन्य आपका अमल विवेक ;
द्विगुणित हुग्रा लोक सद्-गति प्रति
मम विश्वास आपको देख ;
भौतिकता का ? नहीं, सत्य का -
था वह सुन्दर आकर्षण, -
जिससे खिंच कर किया आपने,
मुझ पर
कृपा-वारि-वर्षण ।
लखा,
५५६<noinclude></noinclude>
ecgnrxm9w62uuctynyoq0lhcrhwdagv
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
८५
नृपति, श्रापकी यह शुभ निष्ठा,
धर्म - भाव
तत्परता यह, -
यह अफलाकांक्षिणी कर्म- रति,
सत्य-निर्भरता
शुद्ध
यह, -
मानवता के लिए बनेगी,
पथदर्शिका प्रदीप शिखा,
प्रतिबिम्बित है तव नयनों में
सनातन अनादि का,
नरपति,
धर्म
राक्षस- वंश - शिरोमणि,
धन्य आप, सत्-ग्राहक, हे,
धन्य आप, इस लंक-द्वीप में
सत् - जल - राशि प्रवाहक, हे !
८६
धन्य सभी राक्षसगण, जितने-
किया असत् का तीव्र विरोध,
धन्य धीर वे, अटल रहे जो-
देख चण्ड रावण का क्रोध,
५६०
आप सभी सज्जन गण के प्रति
मैं नत मस्तक हो कर के, -
कृतज्ञता ज्ञापन
करता हूँ,
रिपु न
सब विजयीपन खो करके,
लखें मुझको वे भी जो
रहे वीर मेरे
प्रतिकूल,
राम नहीं चाहता कि हो वह
कभी किसी के दृग का शूल ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>८७
हे सब जन-गण, आप त्यागिए,
भौगोलिक, संकुचित विचार,
भरिये हृदयों में व्यापकता,
करिये
आप ग्रात्म विस्तार;
-
अपने और पराये की वह-
सीमा उल्लंघित
करके, -
कर के नैनों को विस्फारित,
दर्शन करिए जग भर के;
षष्ठ सर्ग
लंक प्रवध- किष्किन्धा की यह
लघुता आज हुई म्रियमाण,
सब जन के श्रम से, यह देखो,
हुआ वृहद् भारत निर्माण ।
55
-
आज हुए हैं द्वार-मुक्त सब
हुई दिशाएँ उन्मुक्ता ;
विश्व-मुक्ति-लालसा हुई है-
क्रियाशील, गति संयुक्ता
जन-गण के हृदयों की आशा-
सक्रिय, बन्धनहीन हुई,
हुए पराये भी अब अपने-
भय-भावना विलीन हुई;
श्राकुंचित वृत्तियाँ हट रहीं
रविकर अपहृत तम-घन-सी,
भेद-भावना आज मिट रही,
दुःस्वप्न संस्मरण-सी ।
गत
-
-
५६१<noinclude></noinclude>
o8ntmye7lf1ifiomhhs9env0la7dq5e
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
८६
खुलने दो कपाट
नया समीरण
दुलने दो चिर
अन्तर के,
डुलने दो,
जीवन- प्रासव
ग्राज नया रँग
घुलने
दो;
साम्य भाव दोला सम गति से,
इधर-उधर तुम डुलने दो,
आज दृगों के दो पलड़ों में,
करुणा-मुक्ता तुलने दो;
रह न जाय प्रतिबन्धक कोई-
जग भर को मिल-जुलने दो,
युग-युग की यह भेद कालिमा,
इसे आज तुम धुलने दो ।
६०
यह देखो उत्तर-दक्षिण
का
दृढ़ गठबन्धन हुआ भला, -
शुद्ध नेह की नीति हुई है,
यह देखो, स्थापित, अचला;
सुविचारों की बाट खुली है,
लेन-देन का हाट खुला;
हृदय आयतन का शतियों का
यह प्रबद्ध कपाट खुला;
"
जग में पवन यान पर चढ़-चढ़
विचरगे सद्भाव
फलेंगे चढ़ उदधि-लहर
धर्म- विचार
नये,
पर
अनश्वर
ये ।
५६२<noinclude></noinclude>
7efgbxi9qsy79zimix00f0rz4em0m36
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५७९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>सुसन्देश वाहिनी अथकता
मेट रही स्थल का अन्तर,
सुविचारों के सुदृढ़ सेतु से,
मिटा जलधि का महूदन्तर;
संग्रह भस्म हुआ, हिय बैठा-
खर तप की धूनी तपने,
द्वीप द्वीपान्तर
हुए
देश - विदेश
अपने,
हुए अपने ;
षष्ठ सर्ग
अब कंसी परिधियाँ संकुचित ?
अब केसा सीमित घेरा ?
मुक्त ग्रात्म-विस्तार हुआ है,
ग्रव कंसा तेरा-मेरा ?
सब
६२
मेरा-तेरा है, तरा-
मेरा, में तू, तू मैं हूँ,
तू सुख में, तब में सुख में
तू दुख में, में दुख में हूँ-
छटा छिटक फैली यह मेरी,
तू मेरा, लंका मेरी,
वह
वह
किष्किंधा नगरी तेरी,
कोसल नगरी तेरी;
कोसल नगरी ही लंका है,
लंका है कोसल नगरी,
भाण्ड हुआ जल-राशि-निमज्जित,
भिन्न कहाँ वापी, गगरी ?
५६३<noinclude></noinclude>
30ampw3cce2e16yg73sxfcovwf2ig6b
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
जब तक
६३
श्रासक्तता, ग्रीव में
-
-
जब तक ग्रहं रज्जु फंदा, -
नृपति, तभी तक है इस जग में,
पन घट
का
भव भव नाहम्-नाहम्' करता,
भागेगा रीतापन, -
जब
संचय-धन्धा;
ग्रहो, उसी क्षण होगा जग में...
राम-राज्य का संस्थापन;
आज विभीषण राज हो रहा
राम - राज मंगल कारी,
फैला है
घन
-
प्रकाश लंका में
अज्ञान तिमिर हारी ।
६४
वह अचेतना
धीरे- धीरे
अहंभाव की,
दूर हुई,
वह लालसा विकट संचय की
आज दूर भरपूर हुई,
चूर-चूर हो गई, जगत में,
आक्रमणों की श्राशंका,
डंका यह बज रहा मुक्ति का,
पुण्य स्नाता है लंका;
शंका, संशय, मोह, प्रलोभन,
जन धन हरण भाव भागे,
त्याग त्रेता ने कुभाव सब
उसके
परम भाग
जागे ।
५६४<noinclude></noinclude>
cfemwofgbdm8gdgdfw6vioi7fv7z5wz
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६५
में,
लहराये सद्विजय पताका,
इस जगती के प्रांगण
चतुर्दिशा कल्याण-निहित हो,
ध्वज के स्वस्ति शुभांकन में,
असद्विचार पराजित, कुंठित,
भूलुंठित, उन्मूलित हो
सत्यमेव विजयी हो, राजन,
प्रेम - विटप
फल-फूलित हो,
षष्ठ सर्ग
आगे-मागे ध्वजा सत्य की,
पीछे-पीछे
जनसेना,
त्रेता का यह धर्म सनातन,
जग को विमल ज्ञान देना ।
६६
यह महान् आदर्श हमारा,
यह सन्देश हमारा है,
यही हमारी परम्परा है,
यह विचार की धारा है;
-
आज निमंत्रण है जन जन को,
आम्रो मंगल गान करो,
बनो सच्चिदानन्द रूप तुम,
सब अपना उत्थान
पान करो इस त्यागामृत का,
अपने बन्धन आप हरो,
अपनी थाती आप सम्हालो,
जग भर का सन्ताप हरो ।
करो;
५६५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८२
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
६७
हो निमग्न श्रानन्द उदधि में,
जग भर में डोलो, विचरो,
हो उन्मुक्त मलय- मारुत इव,
जग में आत्म-सुगन्ध भरो;
-
-
अमृत पुत्र हो तुम मत भूलो,
तुम अनन्त जीवन स्वामी,
नेक निहारो तुम अपनी छवि,
हे जन, वन कर निष्कामी,
देखो तो, यह जग क्षण भर में
स्वर्ग लोक बन
जायेगा,
सब बाधाएँ
दूर
हटेंगी,
वह
अपनापन
पाएगा ।
हैद
में,
हैं
बाधाएँ
बड़ी-बड़ी,
इस सन्देश प्रचार - मार्ग
गगन चुम्बिनी पर्वत माला-
पथ को रोके
५६६
-
अचल खड़ी,
सागर की उत्ताल तरंगें,
नाच रहीं पथ में प्रबला,
विकट शूल हैं, भीम शिलाएँ,
विजन सघनता है सबला,
वर्षा, श्रातप, शीत, भयंकर,
वन- पशुओं से
पन्थ घिरा,
सत्य-प्रचारक के पथ में है
बाधाओं का पुंज निरा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८३
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>६६
यही प्राधिभौतिक बाधाएं,
अलम् नहीं हैं इस पथ की,
और कई बातें आती हैं
बाधा बनी प्रगति रथ की,
गतानुगति- विश्वास - जनित
अन्य
-
यह,
अनुसरण - परम्परा--
कुण्ठित करती ग्रात्मवरण को,
रूढ़ि कब रही स्वयंवरा ?
सत्य-तपस्या
-
-
षष्ठ सर्ग
जरठ- नवीन भाव संघर्षण--
जनित प्रचण्ड अनल-भय से, --
हृदय दूर हट जाता है,
शिव-सुन्दर-सत्य-समुच्चय से ।
१००
मानव की मानवता क्या है ?
कि वह आग से खेल करे ?
नर है स्वयं अग्नि-चिनगारी,
क्यों न अग्नि से मेल करे ?
पावक ही है,
उद्भावक जग की, जन की,
है मनुष्य आग्नेय कल्पना,
अग्नि-पुंज - विभु के मन की,
फिर, विचार-संघर्ष अनल से,
यह कैसी भय-भीति, कहो ?
अग्निशिखा है अनल-सुतों की
कल्मष-हर कुल-रीति, अहो !
५६७<noinclude></noinclude>
anxk31opqpfy90hccfp0rfpcwt5mmky
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१०१
प्रगति, धर्म- रति, सत्कृति, सन्मति,
सम्भ्रम कंचुकि- त्याग, सदा--
चिरजीवन का तत्त्व यही है,
-
यही भावना है वरदा,
कंचुकि- त्याग, प्रगति, यह गति-विधि,
अमित कष्टकर है, राजन्,
किन्तु कष्ट-यत्नाच्छादन से--
अपिहित सदा मोक्षभाजन,
-
चिर- जीवन -प्रधिकार प्राप्ति है
बाल- विनोद नहीं,
केवल
बिना प्रयत्नों के होता है
यों ही आत्मिक-बोध कहीं ?
१०२
जीवन कया है ? है प्रचण्ड यह,
गति - संक्रमण सचेतन का
घूर्णित घोर चक्र है विभु का,
यह जड़ता के भेदन का,
५६८
चलित अनवरत गति में भी है,
समता संस्थापित
-
निर्गति,
गति में गति शून्यता भरी है,
ताण्डव में भी है सम-यति ;
• यत्नशीलता की गति में है
अतुला निर्गति, समता की,
कैसी अद्भुत छटा मोहिनी--
यह जीवन की क्षमता की !<noinclude></noinclude>
qlo7ei19hx39g2dxgqw8pdt8iqgoas3
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०३
धीर, गहर, गम्भीर नीर-सा
जीवन प्रबल प्रवाह
बना,
जिस के अन्तर में नित गति है,
शीतलता
है, दाह घना,
जग की प्यास बुझाना निशिदिन,
शिलाखण्ड भेदन
करना,
ऐसे ही अटपटे काम यह,
करता
है
जीवन भरना,
-
षष्ठ सर्ग
बाधाएँ
भीतर-भीतर खूब बह
ऊपर से समतल सा
रहा
है,
गति मय भी है, यति मय भी है,
थिर भी है, चंचल-सा है ।
१०४
जीवन सतत युद्ध है, जीवन -
गति है, है जीवन ऐसा,
है प्रयत्न मय, गुंजन जीवन,
संघर्षण भय कैसा ?
फिर
परिवर्तन उत्क्रमण भान है
एक
-
मात्र
-
जीवन - लक्षण
फिर विचार कंचुकी-गलित का
क्यों यह संमोहक रक्षण ?
अतिलंधित करना,
है जीवन का मन्त्र सदा,
फिर क्यों सत्य प्रचार पन्थ की
विपदा को समझें विपदा ?
५६६<noinclude></noinclude>
an8b2clzs3m5vnngllw1051snrs62qe
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१०५
कम्म में कल्याण-कामना,
निरलसता, थिरता, समता,-
मन में जागरूकता, वचनों--
में धर निर्वाचन क्षमता,
विश्व मुक्ति भावना हृदय में,
-
-
--
कर में सत् - अवलम्बन दण्ड -
आँखों में भविष्य का सपना,
चरणों में सत्-प्रगति प्रखण्ड,
यदि विश्वास-भक्ति श्रद्धा के
पथ के पथिक धीर ऐसे, --
सन्तत विचरें, तो फिर जग में--
बहे न सत् - समीर कैसे ?
१०६
जीवन है चिर विप्लव-गायन,
स्वर जिसके हैं सन्तत- क्रान्ति,
गीत-भार है नित-परिवर्तन,
गायन- लय है चिर अश्रान्ति,
अथकित, निरलस, सतत प्रगति यह
गायन स्वर - प्रारोहण
है,
सत्य
सनातन
अनुभव-संचय,
अवरोहण
मन-मोहन
है,
शुद्ध ज्ञान
विज्ञानान्वेषण
५७०
है सुन्दर सम गायन का,
गीत सिद्धि है यह, कि बने नर,
पुण्य रूप नारायण का |<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१०७
नित यह विप्लव गायन गाते--
नित साधन करते-करते,
बढ़े चलो जीवन-पथ में सब
हे जन,
पग धरते-धरते,
हरते जग की तिमिर कालिमा--
-
नव प्रकाश
भरते - भरते
अपना रूप प्राप पहचानो
भवसागर
-
तरते - तरते,
षष्ठ सर्ग
जग में विप्लव के तत्त्वों का
निशि-दिन अथक प्रसार करो,
गतानुगति विधि-जनित, तिमिर-मय,
यह जग का भू-भार हरो ।
१०८
जीवन है सद्ज्ञान-गम्य गति,
नहीं तिमिर प्रावृत गति वक्र,
जीवन है पावक-चिनगारी,
जीवन है फिर विप्लव - चक्र,
भौतिकता की चाह भयंकर
है जीवन विकार, राजन्,
संचय नहीं, अपितु जीवन में--
है नित त्याग-सार, राजन्,
अतः आर्य संस्कृति ने जग को
दिया मन्त्र स्वाहा ! स्वाहा !!
आत्म-हवन से ही मिलता है,
निज मनचाहा ।
आत्व-रूप
५७१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८८
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१०६
भाव व्यंजना- धाराएँ
-
मम,
देखो, बढ़ती जाती हैं,
संचित बातें मेरे
राजन्, बढ़ती
चढ़ती जाती है वाणी के --
दोला की यह पैंग बड़ी,
हिय की,
प्राती
हैं,
आज राम की
अनिर्वचनता
सकुच रही है
घड़ी घड़ी कुछ भाव अनोखे --
उठ उठ आते हैं, मन में:
चंचल कथन- नोदना, नरपति,
हो उठती है क्षण-क्षण में ।
११०
पर, अब नहीं कहूँगा, राजन्,
बहुत हो चुका संभाषण,
केवल फिर से मैं करता हूँ,
निज कृतज्ञता का ज्ञापन,
खड़ी खड़ी,
सब वानर, सब रिक्ष वीरवर,
हैं मम वत्सलता भाजन,
और आप सुग्रीव आदि की,
कहूँ बात क्या में, राजन् ?
निपट अधूरी ही रह जाती
जीवन- आशा सारी,
मम
यदि न सहायक होते मेरे,
आप
५७२
बन्धु सम वन-चारी |<noinclude></noinclude>
8rbbyc5sdysaph17gqhe2ix96cqpmxp
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५८९
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१११
अत छोड़िए धर्म-अवलम्बन,
करिए सत्याचरण सदा.
सदा सत्यनारायण को भज,
हरिए सब जग की विपदा,
मंगलमस्तु, आप सब रहिए
धर्म भाव तल्लीन हुए, "
यों कह मौन हुए सीतापति,
निज आसन आसीन हुए;
षष्ठ सर्ग
जन-गण के कण्ठों से निकला
दाशरथी का शुभ स्तवन,
'रामचन्द्र की जय' की ध्वनि से
हृदय
गूँज उठा सव सभा भवन ।
११२
लंकाधीश्वर धीर विभीषण
उठे स्वर्ण सिंहासन से,
मानों रामचन्द्र का तप-फल
उट्ठा ज्वलित हुताशन से,
आगे आकर झुके विभीषण,
रामचन्द्र के चरणों में,
मानों मन एकाग्र हो
भक्ति भाव उपकरणों
लगाया लंकेश्वर को,
उठ करुणाकर रघुवर ने,
गया
में,
अथवा वैभव को अपनाया
यती तपस्वी वनचर ने ।
५७३<noinclude></noinclude>
8pi3l6o5tku9qlplj8puzcz0xjfjz9v
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
११३
चरण-वन्दना कर लंकापति
बोले यों गम्भीर
गिरा :
"आर्य राम, है मेरे मन की-
दशा श्राज प्रति अनस्थिरा,
हृदय अनेक भावनाओं से
आन्दोलित हो रहा यहाँ,
इधर-उधर यह विचर रहा है
ना जाने मन कहाँ-कहाँ,
मेरी आँखों के आगे ही
युग परिवर्तन हुआ
महा-नाश देखा है,
होते नव-निर्माण
११४
घटित,
देखा
गठित |
मैने जग संहार कारिणी,
देखी विकट
राम
-
लीला
जग निर्माण कारिणी
देखी
राम-वृत्ति - पोषण
-
-
शीला,
५७४
महानाश का ताण्डव देखा,
देखा जीवन रास, प्रभो !
मारक भी, जीवनदायक भी,
देखा भ्रकुटि-विलास, प्रभो,
वज्रघोष भी सुना
श्रवण से,
दुन्दुभि - हर्ष - निनाद सुना,
आर्य्यं, विभीषण ने जीवन में
बहुत-बहुत कुछ सुना-गुना ।<noinclude></noinclude>
iqpwuk8fvjsx7k47qynth3pi306cutd
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>मैंने ये
घटिकायें
११५
संक्रान्तिकाल
देखीं
की
चपला,
षष्ठ सर्ग
मैने
नव
-
संगठन नोदना
-
हृदयंगम की है प्रवला,
इन आँखों के आगे ही द्रुत
गति से पतनोत्थान हुआ,
प्राण हरण भी हुआ लंक में-
चिर नव-जीवन दान
वह प्रतीत
हुआ,
गौरव लंका का
चिर निद्रित हो गया, अहो ।
-
वह भौतिकतावाद मृत्यु को-
निद्रा में सो गया, अहो ।
११६
ऐसे समय ग्रहो ऐसे क्षण,
जब इतने संस्मरण उठें, -
जब मन नभ-मण्डल में आकर,
ये इतने घन गन जुटें,
तव, हे राम, शिथिल हो जाती-
परवश-सी,
रसना, यों ही
वचनावलियाँ हो
हो जाती हैं
कुछ कुण्ठित, कुछ सालस सी,
क्षमा करें श्रीराम गुरु, मुझे,
यदि डगमगे शब्द - निश्चय,
यदि न शब्द से आज दे सकूँ,
राम- शिष्यता का
परिचय |
५७५<noinclude></noinclude>
jvham1nunhjs9i7iqmaph72nqc5d9j2
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
११७
श्राज निखिल लंका के जन का,
हिय-प्रतिबिम्बक बन कर में,-
धन्य हुआ हूँ, राम-चरण में
श्रद्धांजलि अर्पण
क्षत्रिय रूप धरे वन आए,
भले,
देव जगद्गुरु आप
श्री चरणों की कृपा हो गई,
कर में,
भौतिकता सन्ताप
दाह मिट गया, बरस रहा है,
प्रभु
का
अनुकम्पा नीहार,
आर्य
कीजिए लंक-द्वीप की
भक्ति भावना
११८
अंगीकार ।
त्वम् धन्यासि ग्रहो जगदम्बे,
जनकसुते, वरदे, सीते,
हे अनिगिते, अग्नि- शिखे, हे,
राम
• ५७६
धनुर्धर-परिणीते,
निष्ठा-पथ-दर्शिके,
टले,
दीपिके,
रामेन्द्रिय पति मनोरमे,
-
राम - युद्ध - दुर्धर्ष
प्रतिहिंसे,
-
-
नोदने,
हे सदा क्षमे,
लंकेश्वर का, लंका-जन का,
यह वन्दन स्वीकार करो,
निज आशीर्वचनों से सबके-
हिय में पुण्य- विचार भरो ।
।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>११६
शुद्ध धर्म की, सत्य स्नेह की
तुमने खींची परिसीमा,
श्रद्धा ज्योति प्रकाश
हुआ न
रंच
तुम्हारा,
कभी धीमा,
कुहू निराशा के क्षण में भी
राम चरण - रति
रही भली,
हार गया शतशः प्रयत्न कर,
रावणत्व की नहीं चली,
षष्ठ सर्ग
दानवत्व दुर्दान्त उधर था,
इधर तुम्हारी दृह 'नाहीं',
है लंका साक्षी, न हो सकी,
मलिन तुम्हारी
१२०
परछाहीं ।
रामचन्द्र की विजय नहीं है-
कुछ भी, तव जय के आगे ।
तुमने तो लंका जीती है,
जननि, अकेली ही प्रा के,
पुण्य अलौकिक मातृरूप लख,
राक्षस नहीं रहे दानव,
एक झलक में ही, माँ, तुमने ---
उनको बना दिया मानव,
आर्य-सांस्कृतिक- सूर्योदय की
प्रथम-किरण, जननी,
तुम हो
तव चरणार्पण के क्षण से ही
भागी लंका की
रजनी ।
५७७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१२१
विजय राम
सीता की
CL
की पीछे आई,
जय है पहले,
यह है अमिट सत्य, फिर चाहे,
यों कोई कुछ भी कह ले,
पुण्य तुम्हारे दरस, न करते
यदि उत्पन्न यहाँ.... मतभेद,
तो न राम के लिए लंक-जय
हो सकती इतनी अस्वेद,
सात्विकत्व, देवत्व और इन
सतीत्व-सुभावों ने--
चरम
लंका को जीता है, माता,
तव सत, शील स्वभावों ने !
१२२
-
आर्य राम की यह जय तो है-
केवल लोकाचार क्रिया,
वास्तव में तो, माँ, तुमने ही,
लंका का गढ़ क्षार किया,
• ५७८
भस्म कर चुका था लंका को
तव ज्वलन्त अभिशाप अनल,
हनूमान का लंक- दहन तो--
खेल-प्रदर्शन था
केवल,
जनक सुते, श्रीराम
वल्लभे,
जगद्वन्द्य, तुम धन्य सती,
पूर्ण हुए हैं, धन्य हुए हैं
तुम्हें वरण कर राम यती ।<noinclude></noinclude>
snrf1s7bzy71u7mldxfzzgyn400ygfu
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>.१२३
त्रेता युग के धर्म
के धर्म धुरन्धर
पुरुषोत्तम प्रतिनिधि हैं राम,
नारी धर्म प्रकट करता है,
केवल, देवि, तुम्हारा नाम,
देगा,
सीता नाम अनन्त काल तक
सन्निष्ठा - परिचय.
तव सुस्मरण, दिग्भ्रमित मन को-
सन्तत अभय-निलय देगा,
षष्ठ स
माता, तुमने आत्म-यज्ञ में-
अपनी श्रात्माहुति दी है,
पुण्य आदर्श प्रतिष्ठा
एक
तुमने इस युग में की है ।
१२४
विचलित आज हो रहा है, प्रभु,
अचल विभीषण का मन भी,-
वह मन जिसे न चलित कर सका,
नरमेधक भीषण रण भी,
गत संस्मरणों का उठ आना,
स्वाभाविक है ऐसे क्षण,
स्वाभाविक ही है कि हो उठे
विगत स्मृति से विचलित मन,
-छोटी बातें भी बनती हैं
पुनः स्मरण में शूल अनी,
• फिर उन बातों का क्या कहना,
जो संलग्ना रही
घनी !
५७६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१२५
आज ढूंढती हैं आँखें उन-
महाबली
नर वीरों
-
को,
उन दिग्विजयी प्रति पराक्रमी,
सुदृढ़ धनुर्धर धीरों को,
जिनकी घन हुंकार मात्र से
डगमग
कम्पित होता था अम्बर,
जिनके पदाघात से
डुलते थे दिग्गज
जिनके मुकुट किरीटों की द्युति
खर रविकर के पटतर थी, -
किसे ज्ञात थी, उनकी महिमा
हा, इतनी क्षण- नश्वर
१२६
थी ?
एक स्वप्न की लीला के सम
वह ठकुरास विलीन हुई,
वह गरिमा, वह ठकुर सुहाती,
छिन भर में ही छीन हुई,
५८०
भूधर,
लीन हुई हैं वे सब बातें
भूतकाल
- श्रन्तस्तल में,
पर उनकी छाया बिम्बित हैं
वर्तमान के
4
कल जल
में,
आर्य, एक युग था वह भी जो-
प्रगति प्रेरणा दायक
-
था,
चिर विकास की उलझन का वह-
युग अच्छा परिचायक था ।<noinclude></noinclude>
3d71qrlscyx7brhkmlml7apj5fcuahr
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१२७
डगमग डगमग करती, कँपती,
पग पर पग धरती धरती,-
कभी फिसलती, कभी घिसलती,
सँभल - सँभल
डरती - डरती,
जन-सामूहिकता, गति पथ पर,
निशि दिन चलती रहती है,
यह विकास स्रोतस्विनी, प्रभो,
छिनछिन बहती रहती है ।
षष्ठ सर्ग
इस विकास का अमिट अंश है
भौतिकवाद - मयी उन्नति,
चाहे वह न भले ही होवे,
अन्तिम ध्येय, चरम इति-गति ।
१२८
रावण - वाद, विकास मार्ग का,
पथ- परिचायक
प्रस्तर है,
रावण-वाद, प्रकृति तत्त्वों का,
सुन्दर ज्ञान अनश्वर है,
मानस - दिङ मण्डल को विकसित
करता है भौतिक विज्ञान,
रावणत्व में सदा निहित है
अन्वेषण की अथक उड़ान,
रावणीय यत्नों के बिन किमि
खुलें प्रकृति के घूंघट-पट ?
इसीलिए आवश्यक है इस-
जग में निरलस रावण हठ ।
५८१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
इसीलिए जग
मम अग्रज का
१२६
सदा रहेगा
निपट कृतज्ञ,
उनने प्रकृति-ज्ञान फैला कर,
जग की हरी भावना ग्रज्ञ,
किन्तु हन्त ! वह अथ कान्वेषण,
सीमोल्लंघन कर न सका,
प्रकृति-बद्ध हो गया परिश्रम,
और एक डग भर न सका,
भौतिकता के संचय में पड़,
भू-भार,
वह विज्ञान हुआ
इसीलिए, हे आर्य, आपको,
करना पड़ा पयोनिधि पार ।
१३०
श्रार्य आपकी चरण-क्रिया से-
फैला • श्रात्मज्ञान आलोक,
यह सन्देश मिल गया जग को,
चरम मोक्ष का पुण्यश्लोक,
भौतिक प्रात्मिक विज्ञानों का-
हुप्रा समन्वय मंगलमय,
पदार्थ - संकलन - वृत्तियाँ
वे
'मिटीं, हुआ
है सवादय,
५८२
छूटी प्राणों की वह फाँसी,
टूटी रज्जु प्रलोभन की,
नहीं रही अब राम-कृपा से
आशंका जन- दोहन
की ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/५९९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>देव, आपके
कैसे. निज
१३१
प्रति प्रगटाऊँ
कृतज्ञतानन्द ?
षष्ठ सर्ग
आज
.. आपकी
छूट गए सब
पुण्य कृपा से
भव भय फन्द,
1
१८
छन्दहीन, गतिहीन, वसुरा,
ताल रहित था जग-जीवन,
उसे आपने गति-मय, यति-मय,
सुस्वर किया, अहो श्रीमन्,
आप धन्य हैं, धन्य सुलक्ष्मण,
धन्या जनक सुता सीता, -
जिनने
भीति- मुक्त कर दी है
वसुन्धरा
-
रावण भीता ।
१३२
बीता रावण-युग आक्रान्तक,
बीत गईं भय की घड़ियाँ,
मंगल-करण राम-युग आया,
टूटीं वे बन्धन- कड़ियाँ,
सरण चिरन्तन, क्षण- प्रावर्तन,
गमन आगमन नित नूतन,-
-
जीवन का व्यापार यही है
नित स्थापन, नित उन्मूलन
चला गया जो भला गया वह,
जो
आया, - अच्छा
यों आने जाने ही
प्रकटी है विभु की
आया,
के मिस,
माया ।
५८३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६००
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१.३३
सन्धिकाल में उठ आती है,
सिंहावलोकन - मयी
चाह,
भला, बुरा जो कुछ बीता है,
उसे सोच होता है दाह,
आह एक कढ़ ही आती है
गत दिवसों की संस्मृति से,
हो ही जाता है मनमोहित,
भली-बुरी गत
अतः विभीषण गत संस्मृति से,
हो मोहित, तो अचरज क्या ?
गत होकर जो प्राण न खींचे
तो संस्मरण-स्वभावज क्या ?
१३४
संस्कृति से,
युगल-चरण तो आरोपित हैं
अमल राम-युग के क्षण में, - ·
किन्तु, नयन मुड़ कर उलझे हैं,
विगत - काल के दर्शन में,
१८४
बीत गया, जीवन का वह भी--
एक काल था, वह बीता,
खेद यही है कि उस काल में
नहीं हो
सका मन चीता,
यदि ऐसा हो सकता, तो फिर-
होती नहीं युद्ध-पीड़ा,
सहज-सहज ही इस नवयुग की
होने
लगती नव-क्रीड़ा ।
+<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६०१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३५
उस युग में जीवन था, मद था,
था उत्साह, अमन्द, अभंग,
उस युग में थी कर्म - उग्रता,
था यौवन के मद का रंग,
प्रलयान्ता प्रशा
थी उसमें,
उसमें थी सान्ता लीला,
हन्त, उस समय उठ न सकी थी
गति शीला,
षष्ठ सगं
क्रिया श्रनन्ता
कई निराशायें
भी थी वाँ,
आशाएँ भी
कई-कई,
मद-माती-सी
कर्म - प्रेरणा
ਹਨ
प्राती थी
नई-नई ।
१३६
उस युग की असफलताओं के
ये पल सोते से जागे,
सभी सफलताएँ उस युग की
नाच रहीं दृग के आग;
क्या-क्या भव्य मूर्तियाँ थीं वे,
जो अब काल- विलीन हुई,
क्या ज्वलन्त प्रतिभा थी वह जो-
निष्प्रभ, श्रीहीन हुई,
अब
सुसफलता - असफलताओं के-
पुंज, और गत-युग-वैभव,
अल्हढ़ यौवन कहाँ ? कहाँ वह,
तेरा उच्छ खल शैशव ?
५८५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६०२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१३७
तुम असफल थेोगत युग, तुम ----
दारुण दुख थे, दाहक थे,
तुम आकुंचित थे,
असद्भाव संग्राहक
पर तुम मोहक थे, तुम में थी
राजस्- कर्म्मठता,
निरलस्
तुम में दृढ़ता थी, साहस था,
बल था, अहंभाव हठ था,
तुम में, चरम वेदना भी थी,
आशंका, पीड़ा भी थी,
पर, प्राणों से खेल खेलने--
की तुम में क्रीड़ा भी थी ।
१३८
अब यह आया है नवीन युग,
कैसा है ? क्या है इसमें ?
नव-निर्माण, विश्व-मंगल की,
संचित आशा है
५८६
इसमें,
देकर अपने वक्षस्थल
रंजित,
.
का,
गाढ़, उष्ण शोणित,
"
इस नवयुग को रामचंद्र ने
स्थापित किया, किया पोषित,
कुण्ठित थे,
थे,
आश्रो, नवयुग, उन्नत मस्तक-
हो हम स्वागत करते हैं,
तेरे नव आदेशों को हम
शिर आँखों पर धरते हैं ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६०३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१३६
बन्धन ? हाँ बन्धन-भंजन का
बल दे, प्रो नवयुग वत्सर,
हर ले यह कायरता, हर ले--
यह आलस्य, मोह, मत्सर,
7
आत्म-समर्पण की अनहद ध्वनि,
उठे विश्व के अम्बर में,
परम-मुक्ति की जगे लालसा,
जग में, सकल चराचर में,
षष्ठ सर्ग:
हो जाने दे भस्म युगों के
ग्रात्म दीनता के बन्धन,
-
कम्पित होने दे हृदयों में
•
मुक्ति - भावना - सुस्पन्दन
१४०
i
चिर जीवन की, रुचिर मुक्ति की,
नव-प्राशा मन
।
में धारे,
आए हैं हम सब जग जन-गण,
हर्षित नव-युग के द्वारे,
गत संस्कार जनित आलस है,
लक्ष्य दूर है झिलमिल - सा,
मार्ग विकटताओं से पूरित,
प्रति शूलित है, पंकिल सा,
देगा,
पर, तव भृकुटि - विलास-प्रणोदन,
आयें, हमें सम्बल
इस पथ में; हे देव, आपका,
नाम हमें मंगल देगा ।"
५८७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६०४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१४१
यों कह सिंहासन पर बैठे,
नृवर विभीषण लंकापति,
और उठे अपने आसन से
वानरपति, किष्किन्धापति,
वे बोले,
शुद्ध
“लंकेश्वर, में हूँ-
अनागर, वनवासी,
है सौन्दर्यहीन मम भाषा,
निपट असंस्कृत,
यदि श्री राम गुणोपचार का,
कर न सकूं मैं सफल प्रयत्न,
तो न भाव दोषी हैं मेरे,
अपितु शब्द हैं निपट अक्रत्स्न ।
१४२
किया राम ने जो वह, वे ही-
कर सकते थे, इस जग में,
भूमि भार अपहरण - भाव है
मण्डित उनके प्रति डग में,
फूल - फूल
चरण- परस
ग्रबला-सी,
उठती है उनके
से वसुन्धरा,
उनकी पद-रज से रंजित है
सारी प्रकृति परा अपरा,
यह अज्ञान तिमिर - मोचन तो,
हे दशरथ
राम नाम
-
नन्दन की टेव.
भर से होता है
दंग-उन्मीलन तो स्वयमेव ।
८८<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६०५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१४३
मुझ वानर को 'वा' विरहित कर,
दिखलाया जग का कौतुक,
हिय में भर दी ज्ञान-पिपासा,
प्रश्न-वृत्ति उत्सुक,
जागी
वृक्षों के फल खाते-खाते,
चाट पड़ी अव श्रुति- फल की,
राम कृपा से हिय-दर्पण में,
षष्ठ संग
शुद्ध रूप
आभा झलकी,
किन्तु, राम के
लिए नहीं यह
कोई बड़ा
अनोखा काम,
जड़ता में
चेतनता
भरना
है उनकी
क्रीड़ा अविराम |
१४४
हाँ, अब होगा, पति, हमारी -
कठिन परीक्षा का प्रारम्भ,
क्योंकि राम सामीप्याश्रित यह
अब न रहेगा दृढ़ अवलम्ब,
उत्तर जनपद चौदह वर्षों-
से टकटकी लगाए है,
राम पुन: आगमन पन्थ में,
-
-
निज दंग सुमन बिछाए है,
आज राम की उत्तर-यात्रा
लंका से होगी आरम्भ,
अथवा आज दाक्षिणात्यों का
हृदय- भवन होगा निस्तम्भ |
५८६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६०६
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>अम्मिला
१४५
आर्य राम की अनुपस्थिति में
हमें स्वधर्म.
राम निदर्शित
निभाना है,
पुण्य-मार्ग से
-
हो कर हम को
यदि हम सब हैं राम- शिष्य तो,
सावधान हम रहें सदा,
जागरूक हम रहें निरन्तर,
अलस न होवें
राक्षस-पति, वानर-पति, नर-पति,
जग - पति राम, हमें बल दो,
जिससे, प्रभु, तव विकट तपस्या
भूमण्डल में सुसफल हो ।
१४६
हे निर्बन्ध, बाँध कर रख लें
तुमको हम इस जनपद में,
निस्सीमित को मचल-मचले हम
बाँधे छोटी-सी हद 'में,
५६०
यदा-कदा,
बार-बार यों उठ आते हैं
विकल हृदय में भाव, प्रभो,
तुम जानो हो, देव, सभी कुछ,
तुम से नहीं दुराव, प्रभो,
जाना है,
आर्यावर्त्त वासियों के प्रति
होगा यह अन्याय निरा,
इसीलिए, 'रह जायें प्रभु,' यों-
कहते होती मूक गिरा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६०७
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<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>षष्ठ सर्ग
१४७
क्या होगा उस समय यहाँ पर
जब श्रीराम-गमन होगा ?
सूनी सूनी लंका होगी,
दक्षिण वन
सूना
-
होगा,
किन्तु राम-लीला अविकल है,
• अविचल, नित्य अकम्पित है,
- जीवन
प्रभ
-
-
सूत्र हमारे सबके,
इच्छा - अवलम्बित हैं,
देव, पधारो, अवध-जनों के--
हृदयों में आनन्द भरो,
चौदह वर्षों का सांघातिक
यह वियोग का फन्द हरो ।"
१४८
राम चरण वन्दन करके जब,
बैठे श्री. सुग्रीव कपीश,
उठी सभा में हर्ष - ध्वनि तब,
रामचन्द्र, जगदीश,
जय जय
हुई विसर्जित राजसभा वह,
करती रघुपति का गुणगान,
की आशंका से
राम-गमन
थे सबके मुखमण्डल म्लान,
उधर दुर्ग में केतु - विमण्डित
सज्जित पुष्पक वायु-विमान,
सूचित करता था कि राम की
यात्रा घटिका पहुँची श्रान ।
५६१<noinclude></noinclude>
s7vdxly4efaedkictq9xsju3ucqoqng
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६०८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
वह देखो
१४६
प्रासीन हुए हैं
-
पुष्पक में सिय- राम लखन,
देखो, लंकेश्वर करते हैं
रपति को अन्तिम वंदन,
श्री लक्ष्मण से भेंट रहे हैं
धीर विभीषण विचलित से,
वह देखो, कुछ ढरक रहे हैं--
-
प्रसू मुक्ता
विगलित से,
वह देखो, वह उठा भुमि से
राजहंस सा पुष्पक यान,
वह देखो, वह चला लंक से
मँडराता
-
वित्तेश विमान ।
१५०
चढ़-चल, चढ़-चल, अरी कल्पने,
सीता-पति के सँग-सँग तू,
सुन्दरि, गगन-चारिणी बन कर
निरख-परख अम्बर रँग तू,
५६२
उड़ी चली चल कोशलपुर तक,
बदती होड़ वायु-गति से,
सुन, हँस कहती हैं कुछ, सीता,
श्री उम्मिला- प्राण- पति से,
शुन्य गगन में श्रमित हिय भरी
लहरा रहीं वचन ध्वनियाँ,
देवर-भाभी के वचनों से-
बरस रहीं मधु-रस कनियाँ ।<noinclude></noinclude>
ge7zxjwldiqhrhrxq3q9g9mnufsgqku
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६०९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५१
" देवर ?" "हाँ कल्याणि !" "कहो
क्या बात उठ रही है मन में ?
अब तो यह महदन्तर घटता
जाता है प्रति क्षण-क्षण में, "
रहे
सुन सीता के वचन सुलक्ष्मण,
इकटक उन्हें निहार
चिन्तन-नींद भरे नयनों में
अकथित बात विचार रहे,
षष्ठ सर्ग
"क्या देखो हो मुझको, देवर,
यों तुम सोए-सोए से ?
सतत जागरण थकित लगो हो
तुम तो
खोये - खोये
१५२
से ।
गुडाकेश, कुछ बोलो तो जी,
यों न निहारो ठगे-ठगे,
कहो, हो रहे हैं क्यों ये दूग
कुछ सोये, कुछ
क्या हिय में आ बैठी कोई
सुघड़ नींद की ठकुरानी ?
क्या लंका के किसी झरोखे
लगन रह गई अरुझानी ?
श्रथवा क्या कोई वनबाला
कुछ टोना कर गई, कहो ?
किसकी यह संस्मृति नैनों में
अलस चाह भर गई, अहो ?"
जगे-जगे ?
५६३<noinclude></noinclude>
5rbkz65ty5qg8l23ahtkt9yu7hn0ayk
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१५३
"भाभी," यों श्री लक्ष्मण बोले,
विहँस मधुर वचनावलियां,
"भाभी, यदि ऐसी ही भोली
होतीं ये विदेह
यदि, यों सहज छोड़ देतीं ये
रघुकुलजों का
तो क्यों प्राज लंक
बन्धु विभीषण का
बाँध दाशरथियों को रखतीं
हैं विदेह की नन्दिनियाँ,
बड़ी चतुर हो तुम मैथिलियाँ,
हो तुम सब मायाविनियाँ ।
१५४
कैसा लंक झरोखा, भाभी ?
और कहाँ की वनबाला ?
क्यों भटके वह, जिसने पहनी -
श्री मिथिला की वरमाला ?"
५६४
हिय-आसन,
में होता
शासन ?
"पर लालन, एकाधिकता तो
है रघुकुल की रीति, अहो, "
"यदि भाभी को सौत चाहिए,
तो अग्रज से कहूँ, कहो ?"
ललियाँ,
"अपनी चिन्ता करो, ललन हे, "
"पर, पथ दर्शक तो हैं वे, "
"पर उस शूर्पणता के मन के
चिर आकर्षक तो हैं ये ।"<noinclude></noinclude>
0751tstcbcq97egz46u3129gnvnovj6
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६११
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५५
"होने को थी सौत तुम्हारी, "
"वह दं-रानी बन न सकी ।"
"फँस बनती ? उस विचार
को जब जेठानी सह न सकी ?
बहन-बहन सब मिल बैठी हैं।
बन दे- रानी जेठानी,
अब श्रीरों की गुज़र कहाँ ? क्यों-
है न ठीक, भाभी रानी ?"
षष्ठ वर्ग
"तो यों कहो कि बहन ऊम्मिला
की स्मृति में ही हो डूबे,
अब समझी हो इसीलिए यों-
उत्सुक से, ऊबे - ऊबे ।
'
१५६
मैं समझी थी कि तुम हो गए
लालन, पूरे
वैरागी,
समझी थी कि बन गए हो तुम-
निरे उकठ
नीरस, त्यागी ।
देख तुम्हारी
विकट साधना,
मुझे हो गया था भ्रम, जी,
पर, मन-मन फोड़ा करते थे-
तुम लड्डू, यह अब समझी,
धन्य भाग्य ऊमिला वहन के,
ढोंगी पति पाया,
ऐसा
भीतर-भीतर
रस,
फैलाई
यह
ऊपर से-
यति माया ।
५६५<noinclude></noinclude>
eaxwq5kiituvaan7y5yzyzv98pyaehf
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१५७
सच बोलो, क्या करते हो तुम
सदा ऊम्मिला का ही
योग-साधना में भी
ध्यान ?
क्या है,
सदा ऊम्मिला का प्रणिधान ?"
"भाभी, तनिक राम से पूछो,
क्या हो जाता है मन में,
कैसे 'सीते' 'सीते' करते,
विचरे थे वे वन-वन में,
मैं तो फिर भी छोटा ही हूँ,
मेरी कौन बिसात, अहो,"
"अजी, बता दो तुम्हीं, न सकुचो
देवर, मन की बात
कहो ।"
१५८
"मन की बात ? देवि,
वह
. कबकी
पैठ गई है हिय-तल में,
भस्म हो चुके हैं विकारमय
संकल भाव
५६६
ज्वलितानल में,
-
कथन प्रेरणा अन्तस्तल में,
निद्रित-सी, मालस-सी है
मन की बात, क्या कहूँ तुम से,
वह सचमुच नीरस-सी है,
जिसे रसज्ञ सुरस
कहते है
वह रस सूख गया कबका
अब है रहा एक रस केवल,
भाभी, अपने मतलब का<noinclude></noinclude>
l6f6yq74uwojubql87ozhm5zm5gj8tm
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१५६
नवरस से जो परे परम रस,
इन्द्रिय की गति जहाँ नहीं,
भाभी, आत्म-रमण की लीला
अब होती है वहीं कहीं,
दारुण दाह मिटा अन्तर का
मन का संभ्रम दूर हटा,
यौवन- मदिरा उतर गई है,
सत्य-नेह हिय में प्रकटा,
षष्ठ सर्ग:
अमल सलिल में में डूबा हूँ,
दरस पिपासा
-
मृता हुई,
तो क्या विस्मृत हुई ऊम्मिला ?
नहीं, सुरति संस्कृता
१६०
हुई।
नहीं ऊम्मिला विस्मरणीया,
नाम-सुमिरिनी
वह
मेरी,
कैसे विस्मृत हो वह जिसकी,
मालाएँ मैंने
उसका तो विस्मरण, देवि, है
प्रात्म-विमोहित हो जाना,
श्री ऊम्मला-रूप- विस्मृति है:
मोह-नींद में सो जाना,
मैं निद्रापति जीत चुका हूँ-
आत्म-विमोहन की पीड़ा,
बरसों से हो रही देवि यों-
जागरूकतामय
क्रीड़ा ।
फेरी ?
५६७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१४
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१६१
कैस
हो ऊम्मिला- विस्मरण,
कैसे छूटे उसका
उसका सत्य सनेह
ध्यान ?
बना है
मम आत्मोन्नति का
सोपान,
उसके
सन्नेहाश्रय
से ही
मैंने पाई
मुक्ति
भली,
उसके
एक सहारे
से ही
फली,
मम
तप साधन-बेलि
देवि, ऊम्मिला ने ही दी है,
चिन्तन एकाग्रता
यहाँ
उसके विना भटकता फिरता
मन ना जाने
जाने कहाँ-कहाँ ?
१६२
मुझे परमपद की समीपता,
स्नेहमार्ग से
मिली भली,
भाभी, अब वह द्वन्द्व रूपिणी,
मन संभ्रम - भावना टली,
-
दूर-पास का भेद मिट गया,
दर्शन - उत्सुक दाह मिटा,
हिय में पिय रम गए लखन के,
प्रातुर नैन- प्रवाह मिटा,
छटा निखर भाई जगती की,
उसका वक्र कुरूप मुश्रा,
जगत ऊम्मिला-मय सनेह-मय,
चिदानन्द घन रूप हुआ !"
५६८<noinclude></noinclude>
8rbp8fljfq3tuhhhzrk4he59jqb3p8x
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१५
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>"तो क्या दरस
१६३
तुम्हें सताती
लालसा, लालन,
तनिक नहीं ?"
"हाँ नहीं में
षष्ठ सर्ग
दे सकता हूँ,
इसका उत्तर क्षणिक कहीं ?
स्वयं विदग्धा हो तुम, भाभी,
तुम कर चुकीं तत्व दर्शन,
तुम सब कुछ जानो हो, कैसा --
होता
है
-
हिय - संघर्षण,
कैसे कहूँ कि रंच नहीं है
हिय में दरस चाह अवशेष ?
किन्तु चाह में दाह नहीं है,
नहीं प्रशान्ति भ्रान्ति का लेश ।
१६४
मिलन- चटपटी, लगन - अटपटी,
दरस टकटकी है
बाकी,
पर अव होने लगी लगन को,
सभी ठौर पिय की झांकी,
सत्य प्रेम की सुसफलता मय
निर्वैर वृत्ति जागी,
यह
-
दूर पास सब जगह हो गया
लखन, ऊम्मिला - अनुरागी,
दवि, ऊम्मिला के सनेह ने
दी है मुझको शान्ति अमित,
उसने ही हिय मध्य किया है
'सोऽहं' अनहद नाद ध्वनित ।
५६६<noinclude></noinclude>
3j7dlf4vm9vhgv07ml5frohsdqss26b
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१६
250
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१६५
जब निकला था घर से तब थी
विप्रयोग की तीव्र जलन,
होता रहता था संस्मृति के
संस्कारों से
हृदय दलन,
घिर-घिर आती थीं क्षण-क्षण में
मन-मन में सौ-सौ स्मृतियाँ,
याद बनी आग्रा जाती थीं
क्रीड़ा बीड़ा की कृतियाँ,
वह आतुरता मय हिय- कम्पन,
भाभी, अब प्रियमाण हुआ,
अब तो केवल शुद्ध प्रेम का-
ध्यान-योग मय ज्ञान हुआ ।"
१६६
"पर उस विगत-काल में भी हैं,
देवर, कितना आकर्षण ?
उसकी स्मृति से हो उठता है
अब भी
मुझे रोम-हर्षण,
६००
घर से निकले थे यौवन के
सुख-दुख को ले के सँग में,
अब फिर घर को चले रँगे से,
प्रौढ भावना
-
के रँग में,
वे पहाड़ सम चौदह वत्सर,
वे भी लंघित हुए, ललन,
खूब नयन भर-भर कर देखा-
काल - चक्र का चलन-कलन ।”<noinclude></noinclude>
ldmr6z9tbq8slhughljoj80qxxmosp8
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>षष्ठ सर्ग
१६७
"निश्चय भाभी, स्मृति प्रतीत की,
संमोहक, आकर्षक
है,
पुनः स्मरण उन गत दिवसों का,
ही हिय-हर्षक है,
निश्चय
-
अब ! तब ! ग्रोफ्फ़ो! कितना अन्तर !
कितना घटना पूरित काल ।
कितनी कितनी कठिन परीक्षा !
कितने-कितने जग-जंजाल !
देवि, हृदय भी हम लोगों का
क्या विराट रंग स्थल है ?
कौन कहँगा इसको, भाभी,
कि यह हमारा हृत्तल है ?
१६८
नहीं रहा यह हृदय, हृदय अब
है इतिहास ग्रन्थ यह एक,
जिसके कम्पन - पृष्ठांकित है,
नर-श्रम कथा अनन्त, अनेक,
क्या पुराण, इतिहास बना है,
हम सबका गत हिव-कंपन,
प्रति प्रति कम्पन में नवरस के
संघर्षण का है अंकन,
मानवता की प्रगति, परागत,
श्रान्ति, क्रान्ति सब अंकित है
हिय- इतिहास ग्रन्थ का, भाभी,
पृष्ठ- पृष्ठ प्रति
रंजित है ।
६०१<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१६६
प्रति चित्रित हैं चित्त-चित्रपट,
झलक रहे हैं रंग कई,
चित्रलिखे-से लख पड़ते हैं
मन के भाव अनंग कई,
रखांकित हैं भूमि-भार- हर
सँग-संग कई,
कृतियाँ ये
कहीं सघन वन, कहीं कुटी है,
कहीं तुंरंग गिरि-शृंग कई,
बाधाओं से प्राच्छादित हैं
रघुकुल-कमल-पतंग
कहीं राम
-
कहीं,
सीता लक्ष्मण के
हिय की प्रगट उमंग रही ।
१७०
नयनों के सम्मुख जब आता,
उन गत दिवसों का यह चित्र,
हे भाभी, तब हो जाती है
मेरे मन की दशा विचित्र,
६०२
भूल-भुलैया में फँसती हैं
मनोवृत्तियाँ लक्ष्मण की,
मनोमोहिनी, हृदय हारिणी,
हैं सब स्मृतियाँ गत क्षण की,
केवल इस प्रतीत की स्मृति पर
है अवलम्बित
स्मरण-पुंज कर
मानवता,
नर को प्रकटी
या माधव की माधवता ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६१९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७१
वह अनुभव शून्यता, देवि, वह-
वन-जीवन की प्रथम
घड़ी,
उपालम्भ दे रही श्राज भी,
वह वन-पथ
में खड़ी खड़ी,
प्रथम दिवस जब तुम्हें श्रमित लख,
करुणा- सिन्धु हुए विचलित,
तब मंरा पाषाण हृदय भी,
देवि, हो गया था विगलित,
षष्ठ सर्ग
हम दो भूलों को सँग में ले
निकले थं रघुवर ज्ञानी,
लीट रह हैं आज संग ल
अनल परीक्षित दो प्राणी ।
१७२
यौवन
गया,
प्रौढ़ता आई,
प्रश्न
गया, उत्तर आया,
आँखें खुलीं
अँधेरा भागा,
हमने जीवन
भर
पाया,
यौवन की
प्रन्वेषण- पीड़ा,
इस अपराह्न
प्रखर दुपहरी का वह त्रास,
हर ले गया, देवि, जीवन के -
चौदह वर्षों का
काल में, भाभी,
सजग शान्ति का आसव है,
जीवन के कृतकृत्य भाव का
इसमें संचित अनुभव है ।
वनवास,
६०३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१७३
जीवन के अपराह्न काल में
दारुणता का शल्य नहीं
इसमें गति है, निरलसता है,
पर वह प्रौच्छृंखल्य नहीं,
गति में भी थिरता है, यति है,
अब कृति में भी निष्कृति है,
रति में भी है अरति निरन्तर,
अव स्मृति में भी विस्मृति है,
राम कृपा से सहज उदासी
अमल वृत्तियाँ जागी हैं,
अब लक्ष्मण अनुरागी भी हैं।
एवं पूर्ण विरागी हैं ।
१७४
नहीं ऊमिला है अब 'मेरी',
वह मैं एक स्वरूप हुप्रा
जैसे रघुपति का स्वरूप वह-
सीता-रूप अनूप हुआ,
६०४
सीता बिन यह राम-नाम ध्वनि
निपट अधूरी है जग में,
सीता-राम, पूर्ण-ध्वनि बन कर
प्रकटी रसना के मग में,
सीता-राम,
ऊम्मिला-लक्ष्मण,
एक रूप बन गए सभी,
अपने को खोया जंगल में-
अच्छे हम वन गए सभी ।<noinclude></noinclude>
5kglb6y3919v2yimby2x14ekfwxqo1z
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१७५
इसीलिए अब देवि, नहीं है,
वह मिलनोत्कण्ठा का दाह,
पीतम छाए हैं अन्तर में,
रही न 'क्वासि ? क्वासि ? ' की चाह,
सतत प्रयत्नों से
पाया है
स्नेहोदधि का थाह प्रथाह,
षष्ठ सर्ग
पैठ गया हूँ
अतल-वितल लौं,
अब क्यों कढ़े
वेदना ग्रह ?
यौवन सरिता मिली सिन्धु में
अब क्यों आवे उलट प्रवाह ?
पूर्ण वपूर्णग्वं
स्वाहा !!
अब कैसा
प्रवाह उत्साह ?
१७६
उस अशोक उपवन में तुमने,
वरदे, परम सिद्धि पाई,
- इधर विजन में रामानुज ने
अपनी
सुध-बुध
राम ? राम तो सदा एक रस,
पर, तप साधन उनका भी,-
परिपक्वावस्था
है इस जंगल में,
को पहुँचा,
भाभी,”
"और, लखन, उनकी गति क्या है।
जो रह गए श्रवधपुर में ?
'एकोऽहं' - भावना
जगी है,
क्या उन सबके भी उर में ?"
बिसराई,
६०५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२२
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>कमिला
यज्ञ हुताशन
१७७
"देवि, आग में नहीं तपे क्या,
नगरी के ?
बान्धवगण निज
वे जन भी क्या,
पथिक हमारी
आत्माहुति है नहीं अनोखी,
हम लोगों का ही सौभाग्य
अवधपुरी में भी प्रकटा है
यह अनुरागपूर्ण
वैराग्य,
धधक रहा है
राम-लखन के घर में भी,
ज्वलिता है चौदह वर्षों से
वेदी अवध नगर में भी ।
१७८
देवि, नहीं हैं,
डगरी
के ?
सतत तप रहे हैं
यह धूनी,
चौदह वर्षों से
वे भी,
क्यों न जगे फिर, देवि ? एक-रस-
पूर्ण भावना उनमें
६०६
भी ?
वे भी सभी अवश्य हुए हैं
नित
अनुरागी - वैरागी,
निश्चय ही उन सबके हिय में
है निर्भ्रान्त वृत्ति जागी,
इस तप साधन से प्रकटे हैं
कई नरोत्तम अब जग में
पुरुषोत्तम ही पुरुषोत्तम प्रव
तुम्हें मिलेंगे जग मग
में ।<noinclude></noinclude>
5s7oo2uxnqgc3tsoqsees9uroekyffx
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२३
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667371
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>षष्ठ सर्ग
१७६
नर को नारायण कर देना,
लीला है:
यही राम की
इसीलिए यह दैहिक बन्धन,
श्रव कुछ
ढीला-ढीला है,
भरतं माण्डवी, रिपुसूदन - श्रुति-
कीर्ति, हमारी सब माएँ-
पुरुषोत्तम रूपिणी हो गईं
सकल अवध की ललनाएँ ।
राम नेह-रत
राम-रूप हो
अवध-निवासी
गए भले,
एक तपस्या के भटके में
सव जग के जंजाल टले ।"
१८०
"लक्ष्मण, हाँ, वास्तव में तुम अब
हो बन गए बड़े ज्ञानी,
खूब खूब
श्राती है,
लालन,
तुम को गुत्थी सुलझानी,”
"यह प्रमाण पत्रिका, देवि, तुम,
दो मम अग्रज को जाके,
वे प्रसन्न हो तुमको देंगे
कुछ उपहार बड़े बाँके,"
"उन से तो उपहार बहुत
से-
पाए, कुछ तुम भी तो दो, "
"क्या है मेरे पास ? देवि, है-
यह प्रणाम, लेना हो, लो ।"
६०७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२४
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
है पैतृक
१८१
" नहीं विनोद, सत्य कहती हूँ,
तुम तो, ललन, बिना श्रम ही, -
करते हो तत्त्वार्थ-निरूपण,
अपने अग्रज के
" वत्सल कृपा तुम्हारी है यह,
जो तुम ऐसा कहती हो,
भाभी, मुझ पर तुम अनुकम्पा
सन्तत करती रहती हो,
सम्पदा तुम्हारी
-
यह तत्वार्थ निरूपण, देवि,
मैथिल - महाप्रसाद राशि से
मैंने पाए कुछ कण, देवि ।
१८२
सम ही; '
"
वैदेही के पिता और
पति,
ये दो मम पथ- दर्शक
हैं,
राम सहायक हैं साधन के,
जनक
६०८
विचार
विमर्शक हैं,
देवि, तुम्हारे भर्त्ता, कर्त्ता,
ये दो ही दुखहर्त्ता हैं,
मैथिलि, तव पति, पिता, यही दो-
उद्धर्त्ता हैं,
भवसागर
राम, जनक की पुण्य कृपा से
मैंने निज स्वरूप जाना,
नेत्रोन्मीलन किया उन्हीं ने,
तब अपने को पहचाना ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८३
“चाहे कुछ भी कहो लखन, पर-
ज्यों-ज्यों घटता है अन्तर,
ज्यों-ज्यों अवध निकट आती है,
त्यों-त्यों कँपता है अन्तर,
सास मिलेंगी, बहनें होंगी,
भरत मिलेंगे, प्रो लालन,
उस क्षण हिय का कैसे होगा
निश्चल धीरज व्रत पालन ?
-
षष्ठ सर्ग
तनिक सम्हाले रखना, होऊँ-
कहीं न में बौरानी-सी,
कहीं न हो जाऊँ मैं, लालन,
खोई - सी,
अरुभानी सी ।
१८४
-
मैं विचलित सी हो जाती हूँ,
सोच सोच वह मिलन-घड़ी,
देवर, उस घटिका में होगी,
-
यदि धीरज से
हृदय परीक्षा बड़ी
सहज सह सकूँ,
उस क्षण की
ममता, माया, -
कड़ी,
तब समझू में
हुई अलिप्ता,
सच्ची धीर राम जाया,
तुम नर, तव अग्रज नारायण,
निर्विकल्प हो तुम जिय में,
तुम क्या जानो क्या होता है,
देवर, नारी के हिय में ?"
-
६०६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२६
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१८५
"देवि, तुम्हारे नर-नारायण,
लालित हैं,
नारी से ही
नारी - नेह - अश्रु से
उनके,
अंग अंग प्रक्षालित हैं,
नारी के ही हाड़-माँस से
उनका यह
अस्तित्व बना,
रग-रग में हो रहा प्रवाहित
नारी ही का रुधिर घना,
पोषण कर्त्री,
नारी उनकी
-
नारी नेह - नीर - भर्त्री,
नर नारायण तप साधन की
नारी ही
१८६
M
बाधा - हर्त्री ।
फिर वे भला क्यों न समझेंगे,
नारी के हिय भावों
-
को, -
जिनने लगा दिया स्त्री के हित,
अपने जीवन दावों को ?
०६१०
-
-
हम नारी सुत, नारी तो है-
हृदयवल्लभा जीवन की,
क्यों न समझ पाएंगे बातें
सब हम नारी के मन की ?
भाभी, खूब समझता हूँ में,
तव मृदु हृदय-विकम्पन को,
पोष्य पुत्र हूँ में सीता का,
समभूं जननी के मन को ।"<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१८७
"बलि - बलि जाऊँ, मेरे लालन,
यह सुन कर में धन्य हुई,
तुम को पाकर मम वत्सलता,
कब की, वत्स, अनन्य हुई,
पर तुम विलग न मानो, मेरे-
हिय में है कुछ ऐसी बात,
कि नर नारियों के हृदयों की,
नहीं समझ पाते हैं,
-
तात,
षष्ठ सर्ग
नारी हृदय-परख, पुरुषों की,
है केवल मस्तिष्क प्रसूति,
मानूँ हूँ में कि है कदाचित
उस में नहीं हृदय अनुभूति ।
-
१८८
-
हृदय सिन्धु नारी का जैसे
उफन पड़े है, हहर - हहर,-
विकट ज्वार भाटे की उस में
जैसे उठती तुंरंग लहर, -
-
जो कम्पन उस में होता है,
जैसी होती है
तड़पन, -
जैसे रसरी तुड़ा-तुड़ा
कर
वह अकुलाता है क्षण क्षण,-
त्यों संभवतः नर हृदयों में
खर अनुभूति नहीं होती,
पुंभावना, कदाचित नर की
अपना रूप नहीं खोती ।
६११<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१८६
इसीलिए कहती रहती हूँ,
देवर, मैं अपने
जिय में,
नर क्या जाने क्या होता है,
नारी के कम्पित
यह न्यूनता नहीं पुरुषों की,
यह तो है उन का भूषण,
नहीं मानती हूँ मैं इस को,
पुरुष जातियों का दूषण,
नर यदि है खर दोपहरी, तो,
नारी है शीतल छाया
नर नारी दो रूप बना कर
प्रकटी है विभु की माया ।"
-
१६०
"देवि, यदि न हों स्वीकृत मुझ को
हिय में,
वैदेही के ये
सुविचार,
तो न समझना रंच इसे भी,
केवल मम मस्तिष्क - विकार,
६.१२
.
तुमने बड़ी तत्त्व की बातें
कह दी हैं, भाभी, इस बार,
क्षमा करो यदि मैं न कर सकूँ
उन सब को सहसा स्वीकार,
है अवश्य ही नर-नारी के--
भिन्न रूप का भेद यहाँ,
पर, अक्षर, अव्यक्त, आदि में
नर-नारी का भेद कहाँ ?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६२९
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१९१
प्रादि-अन्त तो भेद रहित है,
केवल मध्य भेदमय है,
इसीलिए इस मध्य
भेद - विभेद,
काल में,
खेद मय है;
-
भेद - खेद के परे पहुँचना,
यही समन्नुति है जन की,
नर-नारी हो, नारी नर हो
यही सुगति है जीवन की,
नर-नारी दोनों
झलक उठें जब
तभी समझिए कि
षष्ठ सर्ग
में दोनों
बरबस - से,
यह हुआ है
हृदय प्रपूर्ण एक
-
रस से ।
१६२
विकसित पूर्ण पुरुष वह, जिस में,
हो नारी की परछाई,
जो जग-जन की
समझे नारी
जिस की सर्वभूत-हित-रति में
हो नारी हिय का कम्पन,
जिस की आँखों में जग देखे
माता की छवि का अंकन,
देवि, नरोत्तम है वह, जिसमें
हो नर-नारी का
ऐसे ही नर-वर
मिश्रण,
भरते हैं
जग का स्रवित - वेदना व्रण ।
हृदय, वेदना,
की नाई,
६१३<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६३०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
वह नर तो
१६३
वानर है, जिस में-
नारीपन का अंश नहीं,
वह है उपल, नहीं हिय, जिसमें
सह- संवेदन - दंश
प्रतिविकसित नर में रहती है,
नारीपन की भाई,
कुछ
उसी तरह ज्यों विभु में विम्बित,
प्रकृति-नटी की
पुरुष नहीं है टोली केवल, -
वानर, विपिन चरों की, देवि,
नहीं मस्तिष्क मात्र से
है अनुभूति नरों की, देवि !
प्रतः
१६४
भरत सदृश योगेश्वर की तुम
भाभी,
योग - नोदना हो,
विकट तपस्वी लक्ष्मण की तुम,
ज्ञान बोधना
६१४
-
हो भाभी,
परछाई,
पावक सम तुम परम पवित्रा,
अनल दीक्षिता, तेजमयी
सब कुछ देख चुकी हो तुम अब,
रही कौन सी बात नयी ?
-
नहीं,
एक बार हो सहन कर चुकीं
तुम यह पुनर्मिलन - पीड़ा,
एक बार फिर और सही, यह-
प्राणों की आकुल क्रीड़ा ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६३१
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६५
निश्चय, वरदे, स्वजन - मिलन का,
होगा बड़ा विकट अवसर,
निश्चय, उस क्षण हृदय हमारे,
बरबस उमड़ेंगे, भर - भर,
निश्चय प्राणों में आकुलता,
चंचलता, होगी
तड़पन,
निश्चय, भाभी, इन हृदयों में
षष्ठः सर्ग
-
मच
जाएगा भीषण रण,
पर तुम हो विदेह की बेटी,
पुत्रवधू हो
दशरथ
की,
तुम हो सहगामिनी राम की,
विकट साधना के पथ की ।
१६६
तव तपस्विनी अनुजा जिस क्षण,
दृग में संचित नेह भरे,-
सम्मुख आ जाएगी, भाभी,
उस क्षण ईश सहाय करे,
यदि उस क्षण यह गलित न होवे
चौदह वर्षों का वैराग्य,
यदि रह सकूं अचंचल उस क्षण,
समभूंगा मैं अपने
भाभी, प्रथम, सीय-दर्शन-क्षण
अग्रज की वह निश्चल मूर्ति,
मुझे ऊम्मिला प्रथम दरस-क्षण
निश्चय देगी बल की
स्फूर्ति ।
भाग्य,
'६१५<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६३२
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
१९७
देवि, न समझो कि मय हृदय में,
तव हिय सम अनुभूति नहीं,
मत समझो कि नरों के हिय में,
नारी हृदय विभूति नहीं,
-
-
वही विकलता, वही विमलता,
वही सलिल सा स्रोत यहाँ,
नारी - हिय-सम स्निग्ध भाव से,
हिय है श्रोत-प्रोत
देवि, यहां भी लगी
कम्पित प्राणों में
हुई है,
फाँसी,
नर के हिय में भी है सन्तत,
नारी के हिय की गाँसी ।
१६८
सीता के हिय का आन्दोलन,
लक्ष्मण अनुभव करता है,
और ऊम्मिला का हिय कम्पन,
राम- हृदय में
६१६
यहाँ,
भरता है,
देवि, इधर दो नर-हृदयों में,
नारी का हिय कँपता है,
नारीपन की अग्नि-शिखा में,
नर-हिय निशि-दिन तपता है,
नर में नारी का न चिह्न तो,
मानव-प्रेम-धर्म क्या है ?
यदि नारी-पन न हो पुरुष में,
तो नर को नर क्यों चाहे ?<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६३३
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proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>१६६
भाभी, तव नर-नारायण है,
स्वयं
श्रीर
अर्द्धनारी नटराज,
-
अर्द्ध-नर-नटीश्वरी हो,
तुम ऊम्मिला जगत में श्राज,
देवि, नहीं देखा क्या तुमने
अग्रज का वह नारी रूप ?
उन की इस विशाल छाती में,
है नारी का हृदय श्रनूप,"
षष्ठ सर्ग
"देव"र" यों कहते ही कहते,
छलकीं सीता की प्राँखें,
- और लखन के वचन-भृंग .की
भींज गई कोमल पांखें ।
२००
सखि, कल्पने, चला जाता है,
मन्थर गति से पुष्पक-यान,
उस पर से यह दीख पड़े है
धरती करती
हुई
पयान,
वह देखो, अव दीख रहा है,
कोसल जनपद का भू भाग,
जिसे देख कर श्रार्य राम का,
विचलित हुआ विदेह-विराग,
अब कुछ क्षण में ही पहुँचेगा
अयोध्या नगरी
यान
-
में,
और हर्ष सागर उमड़ेगा
कोसलपुर की डगरी में ।
६१७<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६३४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>ऊम्मिला
२०१
तुझ में यह सामर्थ्य कहाँ है
कि तू कर सके वह वर्णन ?
तेरे बस का नहीं, सखी री,
वह सम्मिलन रोमहर्षण;
यही बहुत है कि तू आ सकी
सँग-सँग इस कोसलपुर तक,
बक मत प्रब, कर मिलन दरस तू
तन मन लोचन से छक-छक;
मिलन नहीं यह, अरी बावरी,
यह है पूर्ण आत्म-दर्शन,
कहाँ शक्ति है कि तू कर सके
इस विमुक्त रस का वर्षण ?
२०२
बरसों की वह प्यास-परीक्षा,
बरसों की वह
हिय-तड़पन -
बरसों की
वेदना
दिवानी,
बरसों का
चिन्तन कम्पन,
->
६१८
बरसों का वह सतत प्रतीक्षित
सम्मिलनोत्सुकतामय
क्षण,
कौन कर सके चित्रित उसको
जब प्रतिपल होवे हिय-रण ?
नहीं कठिन कुछ चित्रित करना
विश्व - कान्तियों
का चित्रण,
पर, कल्पने, असम्भव ही है
दिखलाना हिय का स्पन्दन ।<noinclude></noinclude>
gnvhttibkkkchml2ek018aztqdr5pqu
पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६३५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude>२०३
लखन - ऊम्मिला जब बिछुड़े थे
तब थे दो साधक पथ के,
खूब चले पथ में ये दोनों
बैठे रंच,
न रंच थके;
षष्ठ सर्ग
अब जब मिले, सिद्ध थे दोनों
प्रारम्भिक चाञ्चल्य न था,
हृदय - मिलन-क्षण नयन अजल थे,
वहाँ हृदय चापल्य न था;
नयनों में प्रति नीरवता थी,
वाणी में
था मौन परम,
हृदयों में अनुभूति-बोध था,
प्राणों में थी शान्ति चरम;
मन ही मन थे लखन निछावर एक ऊम्मिला की टक पे,
और ऊम्मिला
न्यौछावर थी उनके एक चरण नख पे ।
इति षष्ठ सर्ग
इति श्री ऊम्मला समाप्त ।
श्री ऊर्मिलार्पणमस्तु
ॐ शान्तिः
११६<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:उर्म्मिला.pdf/६३६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="" /></noinclude><noinclude></noinclude>
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