विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.10 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष अष्टादश भाग.djvu/१२७ 250 43916 667469 222341 2026-07-11T12:50:05Z Prajjwal3959 3861 667469 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh|'''१२४'''|'''मुर्शिदाबाद'''}}‌‍</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> नाजिमका पद छोड़ दिया । १८८२ ई०की १७वीं फरवरी को उसका लड़का सैयद हुसैन अली खाँ बहादुर सरकारसे सनद पा कर नवाब बहादुर हुआ। उसकी उपाधि इम्तिषम्-उल् मुल्क रइस् उद्दौला, अमीर उल उमरा, नवाब सर सैयद हुसैन अली खां बहादुर महव्वत जङ्ग G, C. I. E हुई। मुर्शिदाबादके निजामत महलमें निजाम रहने हैं। इनकी सलामीमें १६ वार तोप दगती है। इनके पुत्र वर्तमान नवाब वासिफ अली मिर्जा, K.C, S. I. K. C. V. हिन्दू-मुसलमानके प्रति समभाव दिखलाते हुए मुर्शिदाबादके भूतपूर्व नवाबकी उदारता और महत्त्वकी रक्षा कर रहे हैं। मुर्शिदाबाद शहर-बङ्गकी पुरानी राजधानी। मुर्शिदाबाद जिले के लालबाग सब डिविजनका यह हेड क्वार्टर अर्थात् प्रधान कार्यालय है। यह अक्षा० २४'१२" उ० तथा देशा० ८८'१७" पू०के मध्य भागीरथीके बायें किनारे पर बसा हुआ है। इसकी आबादी आज कल करीब ३५ हजार है। इसका पहले मुकसुदाबाद नाम था और पहले यहीं पर बङ्गालकी राजधानी थी। अब यह अङ्गरेजी राज्यमें शामिल है। यहां पहलेके नवाबाेंके विलुप्त प्रभावके प्रमाण आज तक वर्तमान हैं। ये मुसलमान नवाब एक समय इसी शहरसे सम्पूर्ण बङ्गालका शासन करते थे। १७०७ ई०में मुर्शिद कुली खाँ ढाका छोड़ गंगातीरवर्त्ती मक सुदाबादमें सूबादारी मसनद उठा ले गया और राज्य चलाने लगा। पलासी-युद्ध में पराजयके बादसे नवाबी हुकुमत कम होने लगी तथा धीरे धीरे अङ्ग्रेजी कम्पनीका शासन बढ़ने लगा। गड़िया युद्ध के बाद नवाबी शासन का अन्त हुआ। इष्ट इंडिया कम्पनीके दीवानी पानेके बाद केवल निजामतके अधिकारी रह कर ही नवाब लोग सन्तुष्ट हुए। {{smaller|क्लाइव, मीर कासिम आदि देखो।}} {{c|{{smaller|नामकरण}}}} ई० सन्‌की १८वीं सदीके पहले अर्थात् मुर्शिद कुली खाँके बङ्गालमें आनेके पहले मकसुदाबाद या मुकसुदाबाद एक छोटा शहर समझा जाता था। किस समय इस शहरकी उत्पत्ति हुई, ठीक मालूम नहीं पड़ता। लोग कहते हैं, कि सुलतान हुसैन शाहके समयमें मुखसूदन दास नामका एक नानकपन्थो संन्यासी था। उसने <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> सुलतानके रोगको अच्छा कर दिया था। इस उपकारमें सुलतानने उसे यह स्थान लखराज दे दिया। उसी संन्यासीके नाम पर इसका नाम मुखसुदाबाद पड़ा। रियाज-उल सलातीनका ग्रन्धकार लिखता है, कि मुखसुद खां नामक किसी वणिक् के नामसे मुक्सुदाबाद नाम हुआ है। बादशाह अकबरके समयमें मुक्सुद खाँका उल्लेख है। वह बङ्गालके शासक सैयद खांका भाई था। बंगालके अनेक स्थानों में उसने राजकर्म किया था। यह मुक्सुद खां रियाजका मुक्सुस खाँ एक है या नहीं ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता। जो हो, लेकिन थेलरके मतसे बादशाह अकबरके समयमें ही यह शहर बसाया गया था। फिर भी १७वीं शताब्दीके लिखे दिग्विजयप्रकाश नामक संस्कृत भौगोलिक ग्रन्थमें "मौरसुधावाद" नाम पाया जाता है। यहांको किरीटेश्वरीका प्रसंग भी उक्त ग्रंथमे आया है। १७०३ ई०में मुर्शिद कुली खाँ मुकसुदाबाद आ कर दीवानी करने लगा। उसके दूसरे वर्ष दाक्षिणात्यसे लौट कर मुक्‌सुदाबाद नाम बदल उसने अपने नाम पर इसका "मुर्शिदाबाद" नाम रखा। {{smaller|मुर्शिद कुली खां देखो।}} १७७२ ई० में बङ्गालका राज्य दूसरोंके हाथ गया और इस शहरकी अवनति होने लगी। शासन स्थान दूसरो जगह उठ जानेके कारण जनसंख्या भी कम होने लगी। १८१५ ई०में यहां डेढ़ लाखसे ऊपर लोग रहते थे । अभी केवल ३५ हजार लोग रहते हैं। १७५६ ई० मुर्शिदाबाद शहर भागीरीथीके दोनों किनारे लम्बाईमें ५ मील और चौड़ाई में २॥ मील फैला हुआ था। इसका घेरा करीब ३० मील लिखा गया है। १८वीं शताब्दीके इतिहास ले कर ही इस शहरकी प्रधानता दिखलाई जाती है। १७०४ ई०में मुर्शिदकुली खांने यहां राजपाट स्थापित कर अपने नाम पर इसका नामकरण किया। उस समयसे ले कर २०वीं शताब्दोके वर्तमान समय तक इस शहरमें बङ्गालके नवाब घरानेके महले मौजद है। १७६० ई०में लार्ड कार्नवालिसने बङ्गालके फौजदारी शासन विभागको कलकत्तेमें स्थापित किया जिससे मुर्शिदाबादकी ऐतिहासिक प्रधानता जाती रही।<noinclude></noinclude> m4px4w51t5dw4f4280aeyg5q2flfmi1 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष अष्टादश भाग.djvu/१२८ 250 43927 667499 222352 2026-07-11T16:48:21Z Prajjwal3959 3861 667499 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh||'''मुर्शिदाबाद-मुलना'''|'''१२५'''}}‌‍</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> १६६६ ई०में उड़िसाके बागी अफगानोंने ५ हजार मुगल सेनाको हरा इस नगरको लूटा। कहा जाता है, कि युवराज आजिम उस्‌सानने गुप्तरूपसे मुर्शिदकुलीको मारना चाहा। मुर्शिद ढाकासे यहां भाग आया। उसके यत्नसे मुक्सुवाद महलोंसे सुशोभित मुर्शिदाबाद हो गया। इससे यह अनुमान होता है, कि उस समय मग और पोर्तु गीज डकैतोंका उपद्रव कम हो गया था जिससे राजसीमाकी रक्षा करना उतना जरूरी नहीं समझा जाता था। मुर्शिद ने सोचा कि, यहांसे बङ्गाल, बिहार और उड़िसाका शासन करने में सुविधा होगी और हुगली किनारके शहर तथा गावोंके साथ खूब व्यापार चलेगा। सम्भवतः यही विचार कर उसने यहां राजधानी बसाई थी। इस शहरके नवाबी कीर्त्तियोंमें वर्तमान निजामत प्रासाद, निजामत किला, आइना-महल, अन्दर महल, निजामत कालेज और इमामवाड़ा आदि विशेष कर उल्लेखयोग्य है। १८३७ ई०में जेनरल मकल्युडकी देखरेखमें पुराने प्रासादोंकी मरम्मत होने लगी जिसमें १० लाख ६७ हजार रु० खर्च हुए। नवाब सिराजउद्दौलाकी बनाई इमामवाड़ा मसजिद मुहरममें आतशबाजोके समय जल गई जिसकी मरम्मतमें १८४७ ई०को ६ लाख रु० खर्च हुए। यह हुगलीके प्रसिद्ध इमामबाड़े से बहुत बड़ी है। नवाब सिराज इसमें जितना धनरत्न आदि छोड़ गया था उसमें अधिकांश मीरकासिमने बेच दिया । मुहर्रमके समयमे अनेक स्थानोंसे लोग यहां जमा होते है। इसके अलावा ख्वाजा खिजिरके उत्सव समयमें बड़ा समारोह होता है। इसमें पौष संक्रान्तिकी हिन्दू-प्रथाके जैसे नदीजलमें दीप बहाये जाते हैं। इसके बाद मुबारक मंजिलको मणिवेगम मसजिद,मनसूरगंजका मोती-झीलप्रासाद, भागीरथी किनारे के खुशबागका समाधिमञ्च देखने योग्य है। मोती झील पर पहले नयाजिस मह् मदने अपने रहनेके मकान बनवाये थे। पीछे गौड, नगरकी पठान कीर्तिके ध्वंसाव शेषसे सिराजउद्दौलाने मोती झील, प्रासाद और मनसूर गञ्जनगर स्थापित किये। इस प्रासादसे ही वह पलासीके युद्धक्षेत्र में उतरा था। यहां ही कर्नल क्लाइवने मीरजाफर- {{c|{{larger|Vol. XVIII. 32}}}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> को सूवेदारी मसनद पर बैठाया था। यहीं रह कर बङ्गालके दीवान लार्ड क्लाइवने कम्पनीको ओरसे पहले पहल कर वसूल किया था। यहां लार्ड वार्नहेप्टिग्स और सर जान्‌साेर १७७१-७३ ई०में रह गये हैं। {{outdent|मुलकी ( अ० वि० ) १ मुल्की देखो । २ देशी ।}} {{outdent|मुलकी―मान्द्राज प्रदेशके दक्षिण कणाड़ा जिलान्तर्गत एक नगर । यह अक्षा० १३°५' १५" उ० तथा देशा० ७४°४६'३५" पू०के मध्य अवस्थित है। मङ्गलृरसे यह ६॥ कोस उत्तर समुद्रकी खाड़ी पर बसा हुआ है।खांडीके पास ही समुद्रगर्भसे कुछ पर्वतश्रृङ्ग देखे जाते हैं जो मुलकी चा ‘प्रिमिरा रक’ नामसे प्रसिद्ध है।}} {{outdent|मुलगुन्द―बम्बई प्रदेशके धारवार जिलान्तर्गत एक नगर। यह अक्षा० १५°१७' उ० तथा देशा० ७५°३६' पू०के मध्य अवस्थित है। यह स्थान एक समय तासगांव सामन्तराजके अधीन था । १८४५ ई० में यहांके सरदार वंशके कोई उत्तराधिकारी न रहनेके कारण यह स्थान वृटिशसाम्राज्यमें मिला लिया गया।}} {{outdent|मुलजिनापुर―गुजरात प्रदेशके महिकान्य पोलिटिकल एजेन्सीके अन्तर्गत एक सामन्तराज्य । बड़ौदापति गायकवाड़ को ये कर देते हैं।}} {{outdent|मुलजिम (अ० वि०) अभियुक्त, जिस पर कोई अभियोग हो।}} {{outdent|मुलतवी (फा०वि०) जो कुछ समयके लिये रोक दिया गया हो, जिसका समय टाल दिया गया हो।}} {{outdent|{{smaller|मुलतान-मूलतान देखो।}}}} {{outdent|मुलतानी ( हिं० वि०) १ मुलतानका, मुलतान संबंधी। (स्त्री०) २ एक रागिणी। इसमें गांधार और धैवतं कोमल, शुद्ध निषाद और तीव्र मध्यम लगता है। इनके अतिरिक्त तीनों स्वर शुद्ध होते हैं। शास्त्रमें इसे श्रीराग की रागिणी कहा है। हनुमत्‌के मतसे यह दीपक राग की रागिणी है। इसके गानेका समय २१ से २४ दएड तक है। ३ एक प्रकारकी बहुत कोमल और चिकनी मिट्टी। यह खास कर मुलतानसे आती है। इसका रंग बादामी होता है और यह प्रायः सिर मलने में साबुनकी तरह काममें आती है। इससे सोनार लोग साेना साफ करते। छीपी लोग अनेक प्रकारके रंगों में अस्तर देने और साधु आदि इससे कपड़ा रंगते हैं।}} {{outdent|मुलना ( अ० मु० ) मौलावी, मुल्ला ।}}<noinclude></noinclude> pdwlvqd1mefw3x24urcjqfmid29ebbf पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५९ 250 75698 667516 609323 2026-07-11T18:47:13Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667516 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|५८|इन्द्रवीज—इन्द्रसेनानी|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|धनुषाकार (Herpes-zoster) और कटिबन्धाकार (Herpes-iris)। सिवा इसके यह रोग (Herpes-prepulacis), शिश्वत्वक् और (Herpes-labialis) ओष्ठमें भी उपजता है। स्रायुमें उपदाह उठना हो इन्द्रविडाका प्रधान कारण है। इस रोगमें शरीर ग्लानिसे भरा रहता, शिरः दुखता, और ईषत् ज्वर चढ़ आता है। पार्श्वमें शूल उठता दश-बारह दिनमें ही इन्द्रविडा आरोग्य हो जाती है। यह दद्रुजातीय रोग है।<br>{{gap}}वैद्योंके मतसे पित्तजन्य विसपैकी भांति इन्द्रविद्धा की चिकित्सा करना और सकल फुंसियोंके पकने पर काकोल्यादि गणोक्त द्रव्यको घृतपाक करके लगाना चाहिये। होमिओपाथिक डाकर युवकके यह रोग होनेपर रसटक्सका और वृद्धके होनेपर मेजेरियमका प्रधानतः व्यवहार करते हैं। सामान्य इन्द्रविद्धापर सलफर और सिपियाको, उपद्रवरहितपर माकु रिसको, लिङ्गचर्मके पूययुक्तरोगपर फाइटो और ग्राफाइटीसको, अत्यन्त पीड़ादायकपर आर्सेनिकको और दुर्बल एवं शूलग्रस्तपर टेलुरियम्को लगाते हैं।}} {{outdent|इन्द्रवोज (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य कुटजस्य वीजम्। इन्द्रयव, कुड़ा।}} {{outdent|इन्द्रवृक्ष (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य वृक्षः। १ देवदारु। इसपर लोग इन्द्रध्वज लगाते हैं इसलिये इसका नाम इन्द्रवच्चत पड़गया है। २ खेत कुंटजवृत्त। ३ अर्जुनवृत्त।}} {{outdent|इन्द्रलद्ध (सं॰ पु॰) १ मुश्कवर्जित कुलच्तणाख विशेष, किसी किस्मका खराब घोड़ा।}} {{outdent|इन्द्रवृद्धा, {{smaller|इन्द्रविडा देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रव्वृद्धिक, {{smaller|इन्द्रवज देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रवैदूर्य (सं॰ क्ली॰) बहुमूल्य रत्नविशेष, किसी किस्मका क़ौमती पत्थर।}} {{outdent|इन्द्रव्रत (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्येव व्रतम्। व्रतविशेष।<br>{{gap}}इन्द्र जैसे लोकका उपकार करनेके लिये चार मास तक् जल बरसाते हैं, वैसे ही राजा भी अपनी प्रजाको सुख देनेके लिये धनादि प्रदान किया करते हैं। इसी नियमका नाम इन्द्रव्रत है।}} {{outdent|न्द्रशक्ति (सं॰ स्त्री॰) इन्द्राणी, इन्द्रको पत्नी।}} {{Multicol-break}} {{outdent|इन्द्रशत्रु (सं॰ पु॰) इन्द्रः शत्रुः यस्य, बहुव्री॰। वृत्त्रासुर। "इन्द्रोऽस्य शमयिता वा तस्मात् इन्द्रशवः।" (निरुक्त)}} {{outdent|इन्द्रशैल (सं॰ पु॰) इन्द्राभिधः शैलः, शाक-तत्। इन्द्रकोल-पर्वत।}} {{outdent|इन्द्रश्रेष्ठ (वै॰ त्रि॰) इन्द्रको प्रधानकी भांति रखनेवाला।}} {{outdent|इन्द्रसन्धा (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रके साथ संसर्ग।}} {{outdent|इन्द्रसारथि (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य सारथिः। १ मातलि, इन्द्रका रथचालक। २ वायु, हवा। (ऋक् ४।४५।२)}} {{outdent|इन्द्रसावर्णि (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य सावर्णिः। चतुर्दश मनु। इन्द्रसुत (सं॰ पु॰) १ जयन्त। २ अर्जुन। ३ वानर-राज वाली। ४ अर्जुनष्टत्त।}} {{outdent|इन्द्रसुरस (सं॰ पु॰) इन्द्रः कुटजः दूव सुरसः, उप॰ कर्मधा॰। निर्गुण्डी वृत्त, संभालू।}} {{outdent|इन्द्रसुरसा (सं॰ स्त्री॰) इन्द्र सुरस देखी।}} {{outdent|इन्द्रसुरा ((सं॰ स्त्री॰) इन्द्रस्य आत्मनः सुरा इव प्रिया। गोरक्षककेंटिका, फूट।}} {{outdent|इन्द्रसुरिष, {{smaller|इन्द, सुरस देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रसुरिस, {{smaller|इन्द सुरस देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रसूक्त (सं॰ क्ली॰) इन्द्र-देवतं सूक्तम्, शाक॰ तत्। इन्द्रदैवत मन्त्र सुता। इसी मन्त्रसे इन्द्रका स्तव करते हैं।}} {{outdent|इन्द्रसूनु ((सं॰ पु॰) १ वानरपति बालि। २ अजन वृच।}} {{outdent|इन्द्रसेन (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य सेनेव महतो सेना यस्य, बहुव्री॰। १ परीक्षितके स्वनाम-प्रसिद्ध पुत्र। २ युधि-ष्ठिरके पुत्र। ३ नलके पुत्र। ४ किसी नागका नाम।}} {{outdent|इन्द्रसेना (सं॰ स्त्री॰) १ इन्द्रसैन्य, इन्द्रकी फौज। २ मौङ्गल्यकी ज्येष्ठ पुत्रवधू और ब्रघ्नको माता। ३ नलकी कन्या।}} {{outdent|इन्द्रसेनानी (सं॰ पु॰) सेनां नयति सेनानी किए, ६-तत्। कार्तिक। इन्द्रने कार्तिकका बल-पराक्रम देख कहा था, 'आप इन्द्रत्व लीजिये। हम आपके आदेशपर चलेंगे।" किन्तु इन्होंने उत्तर दिया,—'हमें इन्द्रत्व न चाहिये। आप हो उसे अपने हाथमें रखिये। हम आपको आज्ञानुसार सर्वथा कार्य}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> hhxjn0zct61jcepgxj1pvtn8tbdtfum पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६१ 250 75709 667517 609346 2026-07-11T19:20:07Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667517 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|६०|इन्द्राह्वा-इन्द्रिय|}}}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इन्द्राङ्गा (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रवारुणी लता, इन्द्रायण ।}} {{outdent|इन्द्रिय (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्यात्मनो लिङ्गमणमापकम्,<br>{{gap}इन्द्र-घ । इन्द लिङ्गेत्यादि । पा ५।२।८३ । १ बल, जोर। २ शुक्र, मनी। ३ शारीरिक शक्ति, जिस्मानी ताकत। ४ पांचको संख्या। ५ ज्ञानसाधन, कुव्वत सुदरिक।<br>{{gap}}इन्द्रिय तीन प्रकारको होती हैं, - ज्ञानेन्द्रिय, कम-न्द्रिय और अन्तरेन्द्रिय। चक्षुः, कणे, जिह्वा, नासिका और त्वक्‌को ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं। वाक्य, पाणि, याद, पायु और उपस्थका नाम कर्मेन्द्रिय है। मनः, बुद्धि, अहङ्कार और चित्तको अन्तरेन्द्रिय समझना चाहिये। इस प्रकार सब मिलाकर चौदह इन्द्रिय हैं। मनः सकल इन्द्रियका नियामक है। कर्णके दिक्, चम्के वायु, चक्षुःके सूर्य, जिह्वाके वरुण, नासिकाके अखिनीकुमार, वाक्यके अग्नि, हस्तके इन्द्र, चरणके विष्णु, पायुके मित्र, उपस्थके प्रजापति, मनःके चन्द्र, बुद्धिके ब्रह्मा, अहङ्कारके शङ्कर और चित्तके देवता अच्युत हैं। न्यायमतसे पृथिवीका नासिका, जलका जिह्वा, तेजःका चक्षुः, वायुका चर्म और आकाशका इन्द्रिय कर्ण होता है। सुश्रुतने बुद्धिका ब्रह्मा, अहङ्कारका ईश्वर, मनःका चन्द्र, गात्रका दिक्, चर्मका वायु, चच्तुःका सूर्य, जिह्वाका जल, नासिकाका पृथिवी, वाक्यका अग्नि, हस्तका इन्द्र, चरणका विष्णु और पायुका देवता मित्रको माना है।<br>{{gap}}इन्द्रियका व्यापार सकल कर्ताके अधीन रहता है, इसलिये इन्द्रियका अपर नाम करण है—"हत्वधीनः कर्ता कर्म धीन' करणम्।” (पद्मनाभ) नैयायिकोंके कथनानुसार मन कभी कर्ता और कभी करण बन जाता है। क्यों कि किसी रुपको देख-नेके पहले मन चले, फिर दृष्टि डालनेपर दर्शनजन्य दूसरे मनःके द्वारा ज्ञानका कार्य मन मनको इन्द्रिय नहीं सुखको भो वही अनुभव करेगा। आमा भो दर्शनसुख पाता है। है। कारणसे भिन्न वैदान्तिक समझते और बुद्धिको भी इन्द्रियसे पृथक् मानते हैं। कर्ण द्वारा बाहरी शब्द सुन पड़ता है, फिर ढांक देने-बर भी भीतर ही भीतर आया करता है‌।<br>{{gap}}{{smaller|वर्म द्वारा स्पर्शका अनुभव होता है। चतुःसे रूप}}}} {{Multicol-break}} दोख पड़ता है। नासिकासे गन्धको ग्रहण करत है। वाक्येग्ट्रियसे बात करते हैं। हस्त द्वारा समस्त वस्तु उठायो जाती हैं। चरण यातायातका कार्य चलाता है। पायु मल और उपस्थ मूत्रको त्याग करता है। अन्तःकरण तीन प्रकारका होता है,—बुद्यात्मका, अहङ्कारात्मक और मनसात्मक। शरीरके मध्य कार्य होनेसे ही मन, बुद्धि और अहङ्कारको अन्तःकरण कहते हैं। कोई दश, कोयो ग्यारह, कोयो बारह, कोयो तेरह और कोई कोई चौदह इन्द्रियतक मानते हैं। जैन-शास्त्रानुसार इन्द्रियके दो भेद हैं द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय। द्रव्येन्द्रिय स्पर्शन, रसना, घ्राग्ण, चक्षु, और श्रोत्रके भेदसे पांच प्रकार है। द्रव्यन्द्रियोंके निवृत्ति और उपकरण ये दो और उत्तर भेद हैं। शरीरको रचना करनेवाले नाम कर्मको सहायता से जो रचना विशेष हो उसे निवृत्ति कहते हैं और जो निवृत्तिका उपकार (रक्षण) करें वह उप-करण है। निवृत्ति और उपकरणक भी दो दो भेद हैं-वाह्य और आभ्यन्तर। भाव्मार्क प्रदेशांका इन्द्रियोंके आकाररूप होना सो आभ्यन्तर-निष्ट त्ति है। पुङ्गल (जिस द्रव्यमें स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण पाये जांय उसे पुद्गल कहते हैं। यह मूर्तिक है और सव लोकमें देखा जाता है) परमाणुओंको दून्द्रियरूप रचना होना सो वाह्यनिवृत्ति है। जैसे नत्र इन्द्रियमें नेत्र इन्द्रियके आकाररूप आत्माके जितने प्रदेश मसूरके समान फैले हैं, वे आभ्यन्तर-निवृत्ति हैं। और उसमें जितने पुद्गल परमाणु मसूरके आकारभपरिणत हुये हैं वे वाह्य निवृत्ति हैं। नेत्र इन्द्रियर्मे क्वष्ण शुक्ल मण्डलको तरह सब इन्द्रियोंमें जो निवृत्ति-का उपकार करे उसको आभ्यन्तर उपकरण कहते हैं। और उसी नेत्रमें पलक श्रादिके समान जी निवृत्तिका उपकार करे उसको वाह्योपकरण कहते हैं। भावेंन्द्रिय दो प्रकारको है-लब्धि और उपयोग। जिसके होनेसे आत्मा द्रव्येन्द्रियको रचनामें प्रवृत्ति करे ऐसी ज्ञानावरणीय कर्म (आत्माके ज्ञान गुणको आच्छादन करनेवाले कर्म) को क्षयोपशम रूप {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> auy4dbuakdwkx2vo9fzdnxpv85fyo3b पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२ 250 75762 667484 609246 2026-07-11T15:23:09Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667484 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रध्वज—इन्द्रपर्णी|५१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इन्द्रध्वज (सं॰ पु॰) इन्द्रार्थी ध्वजः, शाक-तत् ६-तत् वा। भाद्र शुक्लाद्दादशीके दिन इन्द्रतुष्टिके निमित्त ध्वजदान। इस दिन प्रजाके मङ्गलके लिये राजा ध्वज बना द्वारपर गाड़ते हैं और इष्टदेवको पूजते हैं। इससे प्रचुर दृष्टि और सुचारुरूप शस्यादिकी उत्पत्ति होती है। वृहत्संहिताके मतमें असुरों द्वारा अधिक पीड़ित होनेसे देवगणने ब्रह्मासे कहा था,—असुरोंसे हम लड़ नहीं सकते; आपके शरण आये हैं, कोई प्रतिविधान कर दीजिये। ब्रह्माने उत्तर दिया, तुम क्षीरोद-सागर जा नारायणका स्तव करो; वह जो केतु तुम्हें देंगे, उसे देखते ही असुर अपनी राह लेंगे। इन्द्र और अन्यान्य देवगणने वही किया। विष्णुने स्तवसे तुष्ट हो उक्त केतु (ध्वज) देवताओंको दिया और इन्द्रने उससे दुर्दान्त अरिकुलको मार अपना बदला चुका लिया। चेदिराजके वेणुमय यष्टि गाड़ यथा-विधि पूजा करनेसे इन्द्रने अतिशय तुष्ट हो कहा था,—जो राजा इसी प्रकार इन्द्रध्वज पूजेगा, उसके राज्यमें प्रजा एवं शस्यादिका आधिक्य होगा और कोई रोग न रहेगा।}} {{outdent|इन्द्रनक्षत्र (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्वामिकं नक्षत्रम्, शाक-तत्। १ जेष्ठानक्षत्र। इन्द्रनामकं नक्षत्रम्‌। २ फल्गुनी नक्षत्र‌।}} {{outdent|इन्द्रनील (सं॰ पु॰) इन्द्रइव नीलः श्यामलः। मरकत मणि, नीलम। इन्द्रनील डाल देनेसे दूधका रङ्ग काला पड़ जाता है। संस्कृत भाषामें सौरिरत्न, नीलाश्म, नोलीत्पल, तृणग्राही, महानील प्रभृति अनेक इसके नाम हैं। इन्द्रनील शनिग्रहको प्रिय है। इससे शनिदोष शान्त हो जाता है। इन्द्रनीलका वणे निविड़ मेघ-जैसा रहता है। यह मध्यम रत्न है। (शुक्रनीति) मानसोल्लासके मतमें अतसो पुष्प-जैसा इन्द्रनीलका वर्णं होता है, जो कि छाया और रोहिणाद्रिसे उपजता है। सिंहल और कलिङ्ग देशमें इसको खानि है। (भगस्तः) जहां-जहां महादानवकी आंख चुयो, वष्हां-वहां इसकी उत्पत्ति हुयी। सिंहलोत्पन्न महानील और तद्भिन्न मणि इन्द्रनोल कहाता है। इसमें कोयो नीलपद्म, कोयो नीलाम्बर, कोयो खङ्ग-}} {{Multicol-break}} धारा, कोयी शिवनीलकण्ठ वा नीलकण्ठ पक्षीके गले, कोयी उड़दके फूल, कोयी गिरिकर्णिका, कोयी निर्मल समुद्रके जल, कोयी मयूर तथा कोकिलके कण्ठ और नीले रङ्गके बुलबुल-जैसा होता है। {{smaller|दोष और गुण}}—मृत्तिका, पाषाण, शिला, वज्ज्र, कङ्कड़, अभित्रका, पटलाख्य कायादि और वर्णदोषसे मणि बिगड़ जाता है। व्यवहार्य पद्मरागका गुण इन्द्रनील में भी मिलता है। {{smaller|पद्मराग देखो।}} {{smaller|परीक्षा}}—पद्मरागके समस्त करण और उपकरण द्वारा इन्द्रनील परीक्षित होता है। रागकी अपेक्षा यह अधिक उत्तचाप सह सकता है। होती रहती भी अग्निसे इसको परीक्षा करना न चाहिये। क्योंकि अग्निका परिमाण समझ न सकने पर दाहदोषसे बिगड़ इन्द्रनील धारणकारी, परीक्षक और अनुमति देनेवाले सकलके अनिष्टका कारण बन जाता है। {{smaller|वैजात्य निर्णय}}—काच, उपल, करवी, स्फटिक और वैदूर्य देखने में बिलकुल इन्द्रनील जैसा हो होता है। किन्तु अल्प ताम्म्रवर्ण धारण करनेवाला इन्द्रनील रखने योग्य है। फिर जिसमें रामधनुःका रङ्ग झलकता हो, वह दुर्लभ और महामूल्य निकलता है। अधिक रङ्ग-वाले और डाल देनेसे समस्त दुग्धको नीलवर्ण बनाने-वालेको महानील कहते हैं। {{smaller|मूल्य}}—महागुण पद्मराग और इन्द्रनीलका मूल्य एक एकसा होता है। (गरुड़पुराण) {{outdent|इन्द्रनीलक (सं॰ पु॰) हरिन्मणि, पन्ना।}} {{outdent|इन्द्रनेत्र (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य नेत्रम्, ६-तत्। इन्द्रका चक्षुः, हज़ार संख्या।}} {{outdent|इन्द्रपति (महामहोपाध्याय)—१ मोमांसापल्वल नामक ग्रन्थके रचयिता। २ रोवां प्रदेशस्थ इस्तोगी जातिको एक शाखा।}} {{outdent|इन्द्रपत्नी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रस्य पत्नी, ६-तत्। १ शचीदेवी। इन्द्रस्य पतिः पालयित्त्री, इन्द्र-पति ङीप् णुक्, नकारादेशः। विभाषा सपूर्वस्य। पा ४।१।३४। २ इन्द्रकी पाल-यित्त्री, जो इन्द्रको परवरिश करती हो।}} {{outdent|इन्द्रपर्णी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रवत् नीलं पर्णं यस्याः,}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 2smlu9glizwyvox2w5p3122fq55wp5o पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३ 250 75764 667489 609257 2026-07-11T16:00:10Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667489 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|५२|इन्द्रपर्वत—इन्द्रब्रह्मवटी|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} :बहुव्री॰। १ इन्द्रवारुणी, कुंदरू। २ लाङ्गलिका, कलिहारी। {{outdent|इन्द्रपर्वत (सं॰ पु॰) इन्द्रनामकः वा इन्द्रवर्णः पर्वतः, शाक-तत्। १ महेन्द्रपर्वत। २ नीलपर्वत।}} {{outdent|इन्द्रपातम (वै॰ वि॰) दूसरेकी अपेक्षा अधिक प्रीतिसे इन्द्र द्वारा पान किया हुआ।}} {{outdent|इन्द्रपान (वै॰ ति॰) इन्द्र द्वारा पान किया हुवा।}} {{outdent|इन्द्रपीत, {{smaller|इन्दू पान देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रपुत्त्रा (सं॰ पु॰) इन्द्रः पुत्त्रो यस्याः, बहुव्रीहि॰। अदिति।}} {{outdent|इन्द्रपुरी (सं॰ स्त्री॰) अमरावती।}} {{outdent|इन्द्रपुरोगम (सं॰ त्रि॰) इन्द्रको आगे रखनेवाला, जिसके इन्द्र रहनुमा रहे।}} {{outdent|इन्द्रपुरोहित (सं॰ पु॰) बृहस्पति।}} {{outdent|इन्द्रपुरोहिता (सं॰ स्त्री॰) पुष्या नक्षत्र।}} {{outdent| (सं॰ क्ली॰) लवङ्ग, लौंग।}} {{outdent|इन्द्रपुष्पा (सं॰ स्त्री॰) १ लाङ्गलीष्टच, कलिहारी। २ पूतीकरच्ञ्ज, वनकरेला।}} {{outdent|इन्द्रपुष्पिका, {{smaller|इन्द्र, पुष्पा देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रपुष्पी, {{smaller|इन्द्रपुष्पा देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रप्रमति (सं॰ पु॰) इन्द्रः प्रमतिः प्रक्कष्टा मतिः यस्याः, बहुव्री॰। १ ऋद्मन्वद्रष्टा एक पृथक् वसिष्ठ ऋषि। {{smaller|(ऋक् ९।९७।४—६)। २ व्यासशिष्य पैल ऋषिके शिष्य।<br>(अग्निपुराण तथा भागवत)}}}} {{outdent|इन्द्रप्रसूत (वै॰ वि॰) इन्द्र द्वारा उत्पादित वा प्रीत् साहित, जिसे इन्द्र निकाले या बढ़ाये।}} {{outdent|इन्द्रप्रस्थ-एक प्राचीन नगर। इन्द्रप्रस्थ खाण्डवा-रण्यके मध्य था। महाराज युधिष्ठिरने इस नगर में राजधानी स्थापित को थो। उस समय इन्द्रप्रस्थ समुद्र-सदृश परिखा द्वारा अलङ्कृत और गरुड़की तरह द्विपक्ष द्वार तथा परम रमणीय सौधसमूहसे समाकीर्ण था। इसके परम रमणीय प्रदेशमें कुवेरागार-सदृश कौरव-गृह बना था। चारों ओर उद्यानमें नानाजातीय फलशाली वृक्ष थे। {{smaller|(महाभारत आदि)}}}} इन्द्रप्रस्थ एक पवित्र तीर्थ माना गया है,— {{block center|<poem>{{smaller|"इन्द्र प्रस्थमिद' क्षेत्रं' स्थापित' दैवतैः पुरा। पूर्वपश्चिमयोस्तात एकयोजनविस्तृतम्॥७५॥}}</poem>}} {{Multicol-break}} {{block center|<poem>{{smaller|कलिन्द्या दचिणे यावद्योजनानां चतुष्टयम्। इन्द्र प्रस्थस्य मर्यादा कथितैषा महर्षिभिः॥७६॥" {{right|(सौभरिसंहिता २य अ॰)}}</poem>}}}} अर्थात् पूर्वकालमें देवगणने इस इन्द्रप्रस्थको स्थापन किया था। यह पूर्व-पश्चिम एक और यमुनाके दक्षिण तक चार योजन विस्तृत था। महर्षियोंने इन्द्रप्रस्थको मर्यादा इसीप्रकार बतायी है। हमारी समझमें पूर्वसमयमें इन्द्रने विष्णुको पूजाको इससे इस स्थानका नाम इन्द्रप्रस्थ पड़ा है। इन्द्रप्रस्थ में देहत्याग करनेसे मनुष्य विष्णुतुल्य हो जाता है,— {{block center|<poem>{{smaller|"इन्द्र प्रस्थाख्यमेतद्दै क्षेत्रमिन्द्रस्य पावनम्। तेनात्र पूजितो विष्णुः क्रतुभिर्ष हुदचिणैः॥२४॥ तुष्टे न विषणुना तास्प्रै वरी दत्तो निशम्यताम्। भी शक्र तावते क्षेत्रे सर्वतीर्थमया जनाः॥२५॥ तनू' त्यक्षन्ति ये ते वै मत्तुला हिंसका अपि॥" (२ अ॰) "इन्द्र स्य खाण्डवारण्ये इन्द्र प्रस्थाभिध' शुभम्।" (सौभरिसंहिता ८ अ॰)}}</poem>}} वर्तमान दिल्लामें हो यह प्राचीन नगर था। अब इसका सामान्य ध्वंसावशेष मात्र बचा है। 'इन्दर-पत' नाम चला जाता है। सुना जाता है, कि दिल्लीपति पृथ्वीराजके समय यहां एक गढ़ बना हुआ था। चन्द कविने कहा है,— {{block center|<poem>{{smaller|"गढं इन्दपत्यं सहायं सुकज्जै उभै दीन जुट्टै करै यग्ग धज्जै॥” (पृथ्वीराजरायसा २०।७५)}}</poem>}} आज भी दिल्लीमें 'पुराना किला' नामक प्राचीन दुर्ग देख पड़ता है। उसे कोई-कोई 'इन्दरपत' कहते हैं। यद्यपि यह मुसलमानोंकां बनाया है तो भी वह किसी हिन्दू द्वारा निर्मित दुर्गपर रचित है। (Archaeological Survey Reports of India, Vol. IV. p. 2.) {{outdent|इन्द्रप्रहरण (सं॰ क्ली॰) वज्र। यह दधीचि मुनिकु हड्डीसे बना था।}} {{outdent|इन्द्रफल, {{smaller|इन्दू यव देखो}}}} {{outdent|इन्द्रभाष (हिं॰ स्त्री॰) तालविशेष। इसमें बादलके गर्जन-जैसा शब्द निकलता है।}} {{outdent|इन्द्रब्रह्मवटी (सं॰ स्त्री॰) अपस्मारनाशक वटी विशेष, मृगी रोगको गोली। रससिन्दूर, अभ्भ्र, लौह, रौप्य, स्वर्णमाचिक, विष एवं पद्मकेशर समभाग ले स्रहि,}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> g0r7thvrglb2xhy2cb4pk1cnbxyenk1 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५४ 250 75765 667493 609268 2026-07-11T16:24:45Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667493 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|इन्दरभगिनी—इन्दरभूति|५३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} :अग्नि, विजया, एरण्ड, वचा, निष्पाव, शूरण तथा निर्गुण्डीके द्रवमें घोंटे। फिर सबको कङ्गुनी सर्षपोंके तैलमें पकाते और चणमात्र वटी बनाते हैं। आर्द्र‌कके रसमें देनेसे इन्द्रप्रस्थवटी अपस्मार रोगको नाश करती है। {{smaller|(रसेन्द्रसारसंग्रह)}} {{outdent|इन्द्रभगिनी (संष स्त्री॰) शिवपत्नी। यह इन्द्रकी बहन थी।}} {{outdent|इन्द्रभूति (सं॰ पु॰) गणधरभेद। जैनियोंके चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामीके ११ गणधर थे। सर्वज्ञ तीर्थङ्करकी दिव्य ध्वनिका जो अर्थ समझकर लोगोंक लिये उपदेश देते हैं वे श्रावक, श्राविका, मुनि और आर्यका रूप चारप्रकारके गणके धारक-स्वामी गणधर वा गणेश कहलाते हैं। गणधर भिन्न भिन्न तीर्थङ्करोंके भिन्न भिन्न होते हैं। तदनुसार अन्तिम तीर्थङ्कर महावीर भगवान्के इन्द्रभूति प्रथम और मुख्य गणधर थे। इनके जीवनका वृत्तान्त जैनशास्त्रों में यों लिखा है,—<br>{{gap}}इन्द्रभूति जातिके गौतम ब्राह्मण थे। इनका जन्मस्थान गौतम नामक नगर था। ये अपने माँ बापके इन्द्रभूति, वायुभूति और अग्निभूति नामके तीन पुत्र थे। ये तीनों ही भाई वैदिक धर्मानुयायी महाविद्वान् थे। इनके पास देशदेशान्तरोंसे अनेक छात्र शास्त्राध्ययन करने आया करते थे। इन्द्रभूतिकी जिह्वापर समस्त वेद और शास्त्र नृत्य किया करते थे। इस कारण इनको अपनी विद्यावत्ताका बड़ाही घमण्ड था। ये उस समय अपने शास्त्रज्ञानके सामने संसारके विद्वानोंको तुच्छ समझते थे।<br>{{gap}}जब महावीर स्वामी चार घातिया (आत्माको अनन्त-ज्ञानशक्ति, अनन्त-दर्शनशक्ति, अनन्त-सुखशक्ति और अनन्त वीर्यशक्तिको आच्छादन कर देनेवाले कर्म) कर्मों को नष्टकर वैशाख शुक्लदशमीके दिन सर्वज्ञ हो गये और इन्द्रको आन्नानुसार कुबेरने भगवान्‌का समवशरण (व्याख्यानसभा) रचकर तैयार कर दिया, तो उनके व्याख्यानको सुननेके लिये देशदेशान्तरोंसे मनुष्य, तिर्यश्च और स्वर्गों से देवता आने लगे। जब सभाके बारहो प्रकोष्ठ भर गये और सम्पूर्ण, आगन्तुक}} {{Multicol-break}} जीव व्याख्यान सुननेकी प्रतिक्षा करने लगे, तो भगवान्‌को दिव्यध्वनि हो न निकला (तीर्थङ्घरोंकी वाणी ओष्ठ, तालु और जिह्वाके संसर्गसे नहीं निकलती, बल्कि मेघक गर्जनके समान मूर्धासे स्वरव्यष्ट्वन-रहित निकलती है। उसमें तपके प्रभावसे ऐसा अतिशय होता है कि सब देशवासी सब जातिके मनवाले प्राणी अपनी अपनी भाषामें उसे समझने लगते हैं।) दिव्यध्वनिकी प्रतीक्षा करते करते एक दिन दो दिन यहांतक कि ब्यासठ दिनतक बीत गये, परन्तु भगवान्‌की उपदेश वृष्टि न हुई। जब यह सब वृत्तान्त इन्द्रने देखा, तो उसने अपने अवधिन्ज्ञानसे (अवधिज्ञान शब्द देखो) निश्चय किया कि "भगवान्‌का कोई गणधर तो है ही नहीं, जो उनके दिव्य उपदेशको धारणा रख लोगोंको समझा सके, इस-लिये हो वाणी नहीं निस्सृत हुई है।" अब तो इन्द्रको गणधरके खोजनेको आवश्यकता हुई। उसने अपने अवधिज्ञानसे जब इन्द्रभूतिको भावी गणधर जाना, तो वह सीधा एक विद्यार्थीका वेशधारण कर उनके पास गया। उस समय इन्द्रभूति अपने छात्रोंको पढ़ा रहे थे। इसलिये इन्द्र भी उन छात्रोंमें जा कर ही बैठ गया और उनका व्याख्यान सुनने लगा। उस समय किसी विषयका प्रतिपादन करके इन्द्रभूतिने अपने विद्यार्थियोंसे पूछा—"क्यों! तुम सब लोगोंको समझमें आ गया न?" उत्तरमें अन्य विद्यार्थियोंने तो 'हां' कह दिया, परन्तु छात्रवेशधारो इन्द्र अपनी नाक भौं सिकोड़ अरुचि प्रकट करने लगा। उसके इस व्यापारसे असन्तुष्ट हो छात्रोंने इन्द्रभूतिसे कहा—"महाराज! यह नवीन छात्र आपको अवज्ञा करता है।" यह सुन इन्द्रभूतिने कहा—"क्यों! मैं समस्त शास्त्रोंका वेत्ता हूं। मेरे व्याख्यानको सब लोग पसन्द करते हैं फिर क्या कारण है कि वह तुम्हें नहीं रुचा?" उत्तरमें इन्द्रने कहा—"यदि आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता हैं, तो मेरे एक आर्याछन्दका हो अर्थ कह दीजिये वह आर्या यह है {{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 14|2em}}</noinclude> 7zdz79c78oi72it7i4yysxmpi7plgud 667494 667493 2026-07-11T16:26:47Z ममता साव9 2453 667494 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्दरभगिनी—इन्दरभूति|५३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} :अग्नि, विजया, एरण्ड, वचा, निष्पाव, शूरण तथा निर्गुण्डीके द्रवमें घोंटे। फिर सबको कङ्गुनी सर्षपोंके तैलमें पकाते और चणमात्र वटी बनाते हैं। आर्द्र‌कके रसमें देनेसे इन्द्रप्रस्थवटी अपस्मार रोगको नाश करती है। {{smaller|(रसेन्द्रसारसंग्रह)}} {{outdent|इन्द्रभगिनी (संष स्त्री॰) शिवपत्नी। यह इन्द्रकी बहन थी।}} {{outdent|इन्द्रभूति (सं॰ पु॰) गणधरभेद। जैनियोंके चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामीके ११ गणधर थे। सर्वज्ञ तीर्थङ्करकी दिव्य ध्वनिका जो अर्थ समझकर लोगोंक लिये उपदेश देते हैं वे श्रावक, श्राविका, मुनि और आर्यका रूप चारप्रकारके गणके धारक-स्वामी गणधर वा गणेश कहलाते हैं। गणधर भिन्न भिन्न तीर्थङ्करोंके भिन्न भिन्न होते हैं। तदनुसार अन्तिम तीर्थङ्कर महावीर भगवान्के इन्द्रभूति प्रथम और मुख्य गणधर थे। इनके जीवनका वृत्तान्त जैनशास्त्रों में यों लिखा है,—<br>{{gap}}इन्द्रभूति जातिके गौतम ब्राह्मण थे। इनका जन्मस्थान गौतम नामक नगर था। ये अपने माँ बापके इन्द्रभूति, वायुभूति और अग्निभूति नामके तीन पुत्र थे। ये तीनों ही भाई वैदिक धर्मानुयायी महाविद्वान् थे। इनके पास देशदेशान्तरोंसे अनेक छात्र शास्त्राध्ययन करने आया करते थे। इन्द्रभूतिकी जिह्वापर समस्त वेद और शास्त्र नृत्य किया करते थे। इस कारण इनको अपनी विद्यावत्ताका बड़ाही घमण्ड था। ये उस समय अपने शास्त्रज्ञानके सामने संसारके विद्वानोंको तुच्छ समझते थे।<br>{{gap}}जब महावीर स्वामी चार घातिया (आत्माको अनन्त-ज्ञानशक्ति, अनन्त-दर्शनशक्ति, अनन्त-सुखशक्ति और अनन्त वीर्यशक्तिको आच्छादन कर देनेवाले कर्म) कर्मों को नष्टकर वैशाख शुक्लदशमीके दिन सर्वज्ञ हो गये और इन्द्रको आन्नानुसार कुबेरने भगवान्‌का समवशरण (व्याख्यानसभा) रचकर तैयार कर दिया, तो उनके व्याख्यानको सुननेके लिये देशदेशान्तरोंसे मनुष्य, तिर्यश्च और स्वर्गों से देवता आने लगे। जब सभाके बारहो प्रकोष्ठ भर गये और सम्पूर्ण, आगन्तुक}} {{Multicol-break}} जीव व्याख्यान सुननेकी प्रतिक्षा करने लगे, तो भगवान्‌को दिव्यध्वनि हो न निकला (तीर्थङ्घरोंकी वाणी ओष्ठ, तालु और जिह्वाके संसर्गसे नहीं निकलती, बल्कि मेघक गर्जनके समान मूर्धासे स्वरव्यष्ट्वन-रहित निकलती है। उसमें तपके प्रभावसे ऐसा अतिशय होता है कि सब देशवासी सब जातिके मनवाले प्राणी अपनी अपनी भाषामें उसे समझने लगते हैं।) दिव्यध्वनिकी प्रतीक्षा करते करते एक दिन दो दिन यहांतक कि ब्यासठ दिनतक बीत गये, परन्तु भगवान्‌की उपदेश वृष्टि न हुई। जब यह सब वृत्तान्त इन्द्रने देखा, तो उसने अपने अवधिन्ज्ञानसे (अवधिज्ञान शब्द देखो) निश्चय किया कि "भगवान्‌का कोई गणधर तो है ही नहीं, जो उनके दिव्य उपदेशको धारणा रख लोगोंको समझा सके, इस-लिये हो वाणी नहीं निस्सृत हुई है।" अब तो इन्द्रको गणधरके खोजनेको आवश्यकता हुई। उसने अपने अवधिज्ञानसे जब इन्द्रभूतिको भावी गणधर 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proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|४५|इन्दरभूति—इन्द्रमेदिन्|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{block center|<poem>{{smaller|"षड़ द्रव्य नवपदार्थ विकाल-पञ्चास्तिकाय-षट्‌कायान्। विदुषां वरः स एव हि यो जानाति प्रमाणनयैः॥"}}<ref>जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छः द्रव्य, जीव, अजीव, आश्चव, बन्ध, संवर, निर्जर, मोक्ष, पाप और पुण्य ये नौ पदार्थ, अतीत, अनागत, और वर्तमान ये तीनकाल, जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, और आकाश ये पांच अस्तिकाय, एवं पृथी, जल, तेज, वायु और वनस्पति जातिके शरीरवाले पांचप्रकारे जीव और शेषकाय (वसकाय) के धारी जीव ये षट्-काय इनको जो प्रमाण और नयीसे जानता है वह ही विद्वानोंमें श्रेष्ठ हैं।</ref> (कथाकोष)</poem>}} इस जैनधर्मके मर्मको कहनेवाले अश्रुतपूर्व विषम आर्याको देखकर इन्द्रभूति बड़े चक्रराये। उन्होंने क्रोधमें आकर इन्द्रसे कहा कि "तेरा कौन गुरु है? मैं उसीसे शास्त्रार्थ करूंगा। तुझे छात्रके साथ वाद विवाद करनेसे मेरी प्रतिष्ठामें क्षति पहुंचती है।" इसके उत्तरमें इन्द्रने कहा—"मेरे जगद्पूज्य महावीर भगवान् गुरु हैं।" इन्द्रभूति बोले—"क्या वही अपने इन्द्रजालसे आकाशमें देवींको दिखानेवाला सिद्धार्थ राजाका पुत्र महावीर? क्या तू उसोका शिष्य है! अच्छा चल! उसीके साथ शास्त्रार्थं करूंगा।" इन्द्र अपने प्रयोजनको सिद्ध हुआ जान प्रसन्नतासे बोला—"आइये! मेरे साथ आइये। मैं आपको अपने गुरुके साथ मुलाकात करा दूंगा।" अपने वचनानुसार इन्द्रभूति इन्द्रके साथ चल दिये। यह देख उनके अन्य दो भाई अग्निभूति, वायुभूति और अनेक शिष्य भी साथ साथ हो लिये। चलकर वे लोग महावीर भगवान्‌के समवसरणके पास आये। समवसरणमें जो चारो दिशाओं में चार बहुत विशाल स्तम्भ (मानस्तम्भ) होते हैं, (जिन्हें देखकर मानियोंका मानभङ्ग हो जाता है।) उन्हें देखते ही उन सब लोगोंका मान गलित हो गया, वे लोग स्पर्धा छोड़ भगवान्‌को प्रदक्षिणा दे उनकी स्तुति करने लगे। उनमेंसे इन्द्रभूति तत्‌काल हो समस्त परिग्रह (धन धान्य वस्त्र आदि) कोड़ मुनि हो गये। ये ही इन्द्रभूति बादको तपस्याके बलसे अवधिन्नान और मनःपर्ययज्ञानके (दूसरेके मनकी बातको जानने-वाला ज्ञान) खामी हो गये। सात ऋषि प्रकट हो गई और समस्त तपस्वियोंमें मुख्य ही ये भगवान्‌के प्रधान {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-break}} गणधरहो गये। बस! इनके गणधर होते हो महावीर स्वामीका दिव्य उपदेश होने लगा। उसे इन्द्रभूति गणधरने धारण कर आचाराङ्ग, सूत्रकृताङ्ग आदि बारह अङ्गोंमें रचा और उसका भव्योंको ज्ञान कराया। जब तक महावीर स्वामी इस संसारमें रहे, तब तक तो ये उनके गणधर रहे, बादको जब वे मोक्षधाममें पधार गये, तब इन्हें भी सर्वज्ञता हुई। इन्होंने १२ वर्ष तक इस पृथोमण्डलपर जैनधर्मका प्रसार किया। अन्तमें अविनाशी पदप्राप्तकर सर्वदाके लिये अनन्त सुखका अनुभव करने लगे। इन इन्द्रभूतिका गोत्र गौतम था, इसलिये इनको लोग गौतम नामसे भी कहते हैं। बहुतसे लोग बौद्धधर्मके नेता गौतमको और इन गौतमको नाम-साम्यसे एक ही समझते हैं, परन्तु यह ठीक नहीं। ये दोनों भिन्न-भिन्न मतके प्रचारक भिन्न भिन्न व्यक्ति थे। {{outdent|इन्द्रभेषज (सं॰ क्ली॰) इन्द्रं महत् भेषजमौषधम्, कर्मधा॰। शुण्ठी, सोंठ।}} {{outdent|इन्द्रमख (सं॰ पु॰) इन्द्रकी प्रीतिके लिये होनेवाला यज्ञ।}} {{outdent|इन्द्रमण्डल (सं॰ पु॰) नक्षत्रमण्डल विशेष। इसमें अभिजित्से अनुराधातक नक्षत्र रहते हैं।}} {{outdent|इन्द्रमद (सं॰ पु॰) तरुगुल्म-ज्वर, पेड़पौधेको लगनेवाला बुखार‌। यह एक प्रकारका विष होता हैं और प्रथम वृष्टिके जलसे उपजता है। इन्द्रमसे तरु तथा गुल्म झुलस जाते हैं और मौन एवं जलौकादि मर जाते हैं।}} {{outdent|इन्द्रमह (सं॰ क्ली) इन्द्र-प्रोतिजनक उत्सव-यन्नादि। यह यज्ञ 'इन्द्रं अहं' प्रभृति शब्दसे आरम्भ होता है।}} {{outdent|इन्द्रमष्टकामुक (सं॰ पु॰) इन्द्रमहं कामये, इन्द्रमह-कम-उक्छ। कुक्कुर, कुत्ता।}} {{outdent|इन्द्रमादन (वे॰ वि॰) इन्द्रको प्रसन्न करनेवाला।}} {{outdent|इन्द्रमार्ग (सं॰ पु॰) इन्द्रलोकमाप्तार्थी मार्गः, शाक तत्। बदरीपाचनका निकटवर्ती तीर्थ। इस स्थानमें वशिष्ठका आश्रम था। (भारत, वन २५ २०)}} {{outdent|इन्द्रमेदिन्, (सं॰ वि॰) इन्द्रसे मित्रता रखनेवाला।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> clvb9x3rx1u3y0a359ajv1ndo68xpad पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५६ 250 75778 667504 609290 2026-07-11T17:34:10Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667504 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रयव—इन्द्रलोकेश|५५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इन्द्रयव (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य कुटजवृत्तस्य यंवः वीजमिव, उप॰ ६-तत्। कुटजबीज, कोरैयाका तुखुम, कुड़ा। (Wrightia antidysenterica) इन्द्रशब्द पर्यायमात्र और कुटज वाचक है। यह त्रिदोषघ्न, धारक, कटु, शीतल, दीपन और ज्वर, अतीसार, रक्तार्शः, वमि, वीसर्प, कुष्ठ, वातरक्त, कफ एवं शूलको नाश करनेवाला है। {{smaller|(भावप्रकाश)}} मध्यभारत, पश्चिम-प्रायदीप और ब्रह्ममें इन्द्रयव पाया जाता है। वृक्ष पतनशील है। लकड़ी हाथी दांत-जैसी सफेद, कड़ी और दानेदार होती है। तराश और खराद कर उसे इमारतमें लगाते हैं। पत्तीदार सीकेमें दो-दो फलियां निकलती हैं, जो एक २ हाथ लम्बी होती हैं। फलियोंका मुख दोनों ओर एक दूसरेसे मिला रहता है और भीतरके घूवेमें वीज पड़ता है। बम्बईमें कोमल पत्तियां और फलियां खाई भी जाती हैं। सफ़ेद और सुन्दर फूलोंके गुच्छोंमें चमेलीको तरह ख़ुशबू आती है। अतिप्राचीन कालसे दाक्षिणात्यके लोग इन्द्रयवकी पत्तियोंका नीला रङ्ग बनाते चले आते हैं।}} {{outdent|इन्द्रयु (वै॰ त्रि॰) इन्द्रके समीप पहुंचनेका अभिलाषी।}} {{outdent|इन्द्रयोग (वै॰ पु॰) इन्द्रका संयुक्त बल।}} {{outdent|इन्द्रराज (सं॰ पु॰) १ देवराज। {{smaller|इन्द्र और इन्द्रलोक देखो।}}<br>{{gap}}२ कान्यकुलका एक प्राचीन नृपति, ई॰ के ९म शतकमें समस्त उत्तरभारत में कुछकाल तक इसका अधिकार था। यह गौड़ाधिप धर्मपाल कर्तृक परास्त और राज्यच्युत हुआ था। {{smaller|कान्यकुञ्ज देखो।}} ३ लाटदेशके राष्ट्रकूटवंशीय एकाधिक नृपतिका नाम। राष्ट्रकूट शब्दमें {{smaller|विस्तृत विवरण देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रलाजी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रस्य कुटजस्य लाजा इव लाजा यस्याः‌ ओषधि वृत्तभेद।}} {{outdent|इन्द्रलाष्य, {{smaller|इन्द्रयव देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रलुप्त (सं॰ पु॰) इन्द्राणां तद्दद्वर्णानां केशानां लुप्त लोपः यस्मात्, बहुव्री॰। श्मश्रुकेशन्न रोग, बालखोरा, गञ्ज। (Alopecia, baldness) पहले मूर्छित पित्त वातके साथ रोमकूपोंमें पहुंच रोमोंको उखाड़ डालता है, फिर सशोणित श्लेष्मा रोमकूपोंको रूंध देता}} {{Multicol-break}} है। इससे दूसरोंका जन्म असम्भव हो जाता है। {{smaller|(सुश्रुत)}} यह रोग सर्वाङ्गीन दुर्बलता, ज्वर, पारददोष, उपदंश-विष एवं रक्तस्त्राव प्रभृति कारणोंस उपजता है। केशग्रन्थि सम्पूर्णरूपसे रुग्ण वा विनष्ट होने पर भी इन्द्रलुप्त प्रायः नहीं मिटता। अवधीत मतसे कड़वी तरोयौके पत्तेका रस रगड़ देनेपर यह रोग अच्छा हो जाता है। हस्तिदन्त-भस्म और रसाञ्जन छागोके दुग्धमें घोल लेपन करनेसे शीघ्र केश निकलते हैं। आलपीन या सूई द्वारा रुग्ण स्थानको छेद प्याज काटकर रगड़नेसे भी बाल आनेमें देर नहीं लगती। गोक्षुर, तिलपुष्प, मधु एवं घृत एकत्र पीस मरहमकी तरह चढ़ानेपर उपकार होता है। खेत वृश्चिकपालीका वीज घिसनेसे एक सप्ताहके मध्य ही लोम निकलता है। भिलावें, बृहतीफल और घुंघचोके फल तथा मूलको मधुके साथ पीसकर इन्द्रलुप्त पर चढ़ाना चाहिये। यष्टिमधु, नीलोत्पल, यूगकी जड़, तिल, घृत, दुग्ध एवं भृङ्गराज एकसाथ पोसकर लगानेसे घन, दृढ़मूल तथा वक्र केश उपजते हैं। इस रोगमें बार-बार शिरका मुंडाना और गर्म पानोसे धो डालना अच्छा है। होमियोपाथिक डाकर कीयो कठिन रोग अच्छा होने वा सर्वाङ्गीन दुर्बलता रहनेसे एसिडाम फसफरि-काम् स्नायवीय ज्वरसे एसिडाम् क्लारिकम, हिपारएवं सालफर, उपदंश किंवा पारद दोषसे आर्सेनिक, नेट्राम म्यूरोटिकम्, केलकेरिया, हिपार तथा फस-फरस और प्राचीन शिरःपीड़ासे केश गिरनेपर सालफरका व्यवहार करते हैं। किंवदन्ती है कि खल्वाट निर्धन नहीं रहते। {{outdent|इन्द्रलोक (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य लोकः भवनम्, ६-तत्। १ अमरावती, स्वर्ग। २ इन्द्रका स्थान।}} {{outdent|इन्द्रलोकगमन (सं॰ क्ली॰) इन्द्रलोकको अजनका जामा।}} {{outdent|इन्द्रलोकेश (सं॰ पु॰) १ इन्द्र। २ विभिन्न भवनका राजा। जैन-शास्त्रानुसार इन्द्र सौ हैं। और वे इस प्रकार हैं—}} {{block center|<poem>{{smaller|"भवणालय चालीसा विंतरदेवाण होंति वत्तीसा। कप्पामर चउवीसा चन्दो सूरो णरो तिरियो॥" (उदद्रव्यसंहटीका)}}</poem>}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> eylq9pxkbwpk9mbe2cyonlht5a817qp पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५७ 250 75779 667508 609301 2026-07-11T18:06:57Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667508 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|५६|इन्द्रलोकेश—इन्द्रवारूणिका|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} अर्थात् भवनवासी देवोंके चालीस, व्यन्तरोंके बत्तीस कल्पवासियोंके चौबीस, ज्योतिषियोंके दो (चन्द्र और सूर्य), मनुष्योंका एक (चक्रवर्ती) और तिर्यञ्चोंका एक (सिंह) इस तरह सब मिलाकर सौ इन्द्र होते हैं। देव चार प्रकारके होते हैं—भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और वैज्ञानिक। इस पृथ्वीके नीचे रत्नप्रभा नामकी एक पृथ्वी है। उसके खरभाग, पङ्गभाग और अब्बहुलभाग ये तीन भाग हैं। उनमें आदिके जो दो भाग हैं उनमें असंख्य देवोंके भवन हैं उनमें जो देव रहते हैं, वे भवनवासी कहलाते हैं। इनके दश भेद हैं—असुरकुमार, नागकुमार, विद्युत्कुमार, सुपर्णकुमार, अग्निकुमार, वातकुमार, उदधिकुकार, स्तनितकुमार, दीपकुमार और दिक्‌कुमार। हर एक भेदमें दो दो इन्द्र और उनके दो दो प्रतीन्द्र हैं। इसलिये कुल इनमें चालीस इन्द्र हैं। इन्द्रोंके समान प्रतोन्द्रोंको विभूति होती है, अतः प्रतीन्द्रोंको भी इन्द्र कहा है। पहाड़ नदी शून्यगृह वृक्ष और विविध देशदेशान्तरोंमें जो देव रहते हैं, उन्हें व्यन्तर देव कहते हैं। उनके आठ भेद हैं—किन्नर, किं पुरुष, महोरग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत, और पिशाच। इनके भी हर एक भेदमें दो इन्द्र और दो प्रतीन्द्र होते हैं। इसलिये बत्तीस इन्द्र हैं। सूर्य चन्द्रमा आदि ज्योतिषी देव कहलाते हैं। इनके पांच भेद हैं—सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र, तारागण। इनके दो ही सूर्य और चन्द्रमा इन्द्र हैं। विमानोंमें रहनेवाले देव वैमानिक देव कहलाते हैं। उनमें प्रथम दो भेद हैं—कल्पवासी और कल्पातीत। कल्पवासियोंके बारह भेद हैं। ये कल्पवासी देव सोलह स्वर्गों के पटलीमें रहते हैं और इनके बारह इन्द्र और बारह प्रतीन्द्र हैं। इसलिये कुल चौबीस इन्द्र हैं। सोलह खर्गों के ऊपर जो विमान हैं उनके रहनेवालोंको कल्पातीत कहते हैं। उनमें इन्द्र और सामान्यदेवोंको कल्पना नहीं है। वे सब समान होते हैं। मनुष्योंमें सबसे बड़ा राजा चक्रवर्ती इन्द्र है। और तिर्यञ्चोंमें सबसे श्रेष्ठ सिंह इन्द्र है। {{smaller|(जैनशास्त्रः)}} ३ अतिथि, मेहमान्। {{Multicol-break}} {{outdent|इन्ट्रलोहक (सं॰ क्ली॰) रौप्य, चांदी।}} {{outdent|इन्द्रवंशा (सं॰ स्त्री॰) वृत्तविशेष, एक कन्द। इसमें चार पाद और प्रत्येक पादमें बारह वर्ष रहते हैं। इन्द्रवंशाके तृतीय, षष्ठ, सप्तम, नवम एवं एकादश वर्ण लघु तथा अशिष्ट गुरु होते हैं‌।}} {{c|{{Smaller|"स्वादिन्द्र वंशा ततजैरसंयुतैः।" (वृत्तरत्राकर)}}}} {{outdent|इन्द्रवचा (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रयव।}} {{outdent|इन्द्रवज्रा (सं॰ स्त्री॰) छन्दोविशेष। इसमें चार पाद और प्रत्यक पादमें ग्यारह अक्षर होते हैं। तृतीय, षष्ठ, सप्तम एवं नवम लघु तथा अवशिष्ट वर्ण गुरु होते हैं।}} {{c|{{Smaller|"स्वादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौगः।" (वृत्तरत्राकर)}}}} {{outdent|इन्द्रवटी (सं॰ स्त्री॰) वैद्यकोक्त औषध विशेष, एक दवा। मृत सूत तथा वङ्ग और अर्जुनको त्वक्‌को तुल्यांश ले शाल्मलो-मूलज द्रवमें घोटे और रत्ती प्रमाण वटिका बनाये। मधु तथा शाल्मलीमूलचूर्ण अथवा शर्कराके साथ खानेपर इन्द्रवटी प्रमेहको दूर कर देती है। {{Smaller|(रसेन्द, सारसंग्रह)}}}} {{outdent|इन्द्रवधू (सं॰ स्त्री॰) वीरबइटी, रामको गुड़िया। यह कीड़ा प्रायः लाल होता है और वृष्टि पड़नेपर अपने आय भूमिसे उपजता है।}} {{outdent|इन्द्रवल-मध्यप्रदेशका एक प्राचीन शवर राजा। यह उदयनका पुत्त्र था। शवर होते भी इसने अपनेको पाण्डुवंशीय बताया है।}} {{outdent|इन्द्रवल्लरी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रचासी वल्लरी चेति, कर्मधा॰। इन्द्रवारुणीलता, इन्द्रायन। इस लताका रस तिक्त, पुष्प पीतांवर्ण और मूल शुभ्र होता है।}} {{outdent|इन्द्रल्लका, {{Smaller|र्वा इन्द वल्ली देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रवल्लो (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रप्रिया वल्लीलता, शाक तत्। १ पारिजात लता। २ इन्द्रवारुणी।}} {{outdent|इन्द्रवस्ति (सं॰ पु॰) इन्द्रस्यात्मनी वस्तिरिव। जङ्घाका मध्य भाग, साकु, पिंडली। प्रति पाष्णि-जङ्घा के स्थानको इन्द्रवस्ति कहते हैं। {{Smaller|(सुश्रुत)}}}} {{outdent|इन्द्रवायु (सं॰ पु॰) इन्द्र और वायु ।'}} {{outdent|इन्द्रवारुणि (हिं॰ पु॰) {{smaller|इन्द वारुणी देखो।}}}} {{outdent|इन्द्रवारुणिका, {{Smaller|इन्द वारुणी देखो।}}}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> slalrwp0s0kjgpaagc2xthm5w8z38qu पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५८ 250 75781 667511 609312 2026-07-11T18:23:11Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667511 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रवारुणी—इन्द्रविड्वा|५७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इन्द्रवारुणी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रवरुणयोरियं वा इन्द्र-वरुणी देवते अस्याः इत्यण्-डीप्; इन्द्रस्य आत्मनी वारुणीव प्रिया । १ लत्ताविशेष, इन्द्रायन। (Citrallus Colocynthis) वैद्यशास्त्रके मतसे इसके पर्याय वाचक ये शब्द हैं,—विशाला, ऐन्द्री, इन्द्र, अरुण, गवादनी, क्षुद्रसहा, इन्द्रचिर्भिटी, सूर्या, विषघ्नी, गजकर्णिका, अमरा, माता, सुकर्णी, सुफला, वारुणी, बालकप्रिया, रक्तर्वारु, तारका, वृषभाची, पीतपुष्पा, इन्द्रवल्लरी, हेमपुष्यी, क्षुद्रफला, वल्ली, चित्रफला, चित्रा, गवाची, गजचिभिंटी, मृगेर्वारु, पिटङ्गीको और मृगादनी। इन्द्रवारुणी उत्तमाशा अन्तरीप, मिश्र, तुर्कस्थान, भूमध्य सागर के दीपसमूह और भारतवर्षमें स्वयं उत्पन्न होती है। गुणमें यह तिक्त, कट, शीतल, रेचन और गुल्म, पित्त, श्लेष्मा, क्तमि, कुष्ठ तथा ज्वरको नाश करनेवाली है। (राजनिघण्टु) आलैपाथिक मतसे इन्द्रवारुणी अति विरेचक होती है, क्योंकि यह अन्त्रकी श्लेष्मिक झिल्लीको उग्रता प्रदान करती है। इसको अधिक मात्रा-में सेवन करनेसे यह प्रदाहिक विषक्रिया फैलाती है। शीथ, उदरी, कोष्ठवद्ध एवं सन्यास प्रभृति रोगमें विरेचन और प्रत्युग्रता लानेके लिये इन्द्रवारुणीका व्यवहार किया जाता है। इसके सेवनसे कभी-कभी उदरमें वेदना उठती है, तबीयत मिचलाती और के आने लगती है। ऐसी अवस्थामें कर्पूर किंवा कीनारेमें देनेसे पीड़ा मिटती है। आलोपाथिक मात्रामें इन्द्रवारुणो खानेसे अनेक समय नाना रूप विघ्न पड़ सकता है। इसलिये हरसमय इसे कोई व्यवहारमें नहीं लाता। विशेष आवश्यक होनेसे विवेचनापूर्वक इन्द्रवारुणीको खाना चाहिये। इसका सार और वटिका व्यवहार्य है। मात्रा दो से दश ग्रेन तक होती है। होमिओपाथिक मतसे यह सरल अन्त्रके प्रदाह, अतिसार, रक्तातिसार, गृध्रसी, अर्धशिरःशूल, स्नायुशूल, अन्त्रशूल, वात, सन्धिवात, डिम्बाशयके स्नायवीय रोग और नाना-प्रकारको पीड़ाओंमें दो-जाती है। अत्यन्त उदर वेदना-संयुक्त, विशेष कष्टदायक रक्तातिसार, मारक्यू रियस करीसाइवास और इन्द्रवारुणीके यथाक्रम सेवनसे निष्वृत्त हो जाता है। डाकर ह्यूसने शूजरोग पर}} {{Multicol-break}} :इस औषधका व्यवहार किया था। फूलने, तीव्र वेदनाविशिष्ट पैत्तिक उदर ढील-जैसा विवमिषा तथा वमन लक्षण झलकने और वृहत् एवं सरल अन्त्रमें प्रदाह उठनेपर इन्द्रवारुणी देते हैं। डाकर ह्यूसके मतसे यह तरुण ग्टभ्रसोपर पुरातन रोगको अपेक्षा अधिक उपकार करती है। व्यथित अङ्गके उत्तोलनसे वेदना बढ़ने एवं क्रमागत सञ्चालनसे उपशम बाने और साथ ही उदरामय तथा अन्त्रशूल उठनेपर इन्द्र-वारुणी अत्यन्त लाभदायक है। पहले जलवत् एवं आममिश्रित, पीछे पित्त तथा रक्तमिश्रित और प्रस्तरखण्डके मध्य प्रेषित अन्त्र जैसी उदरवेदनाविशिष्ट रक्त आमाशयमें केलोंसिन्य उपयोगी है। मस्तक भारी पड़ने, चक्षुः तथा कपालके मध्य अत्यन्त ज्वाला उठने, और सूच या आलपीन विद्ध-जैसी यन्त्रणा से विशिष्ट अर्धशिरःशूल होनेपर इन्द्रवाणीका प्रयोग करना चाहिये। इसका फल नारङ्गी जैसा पीला या लाल होता है। उसपर खरबूजाकी तरह फांक होती है। खानमें वह अतिशय कटु लगता है। इसके गूदेसे औषध बनती है। और महिष एवं उष्ट्रपची उसे खाते हैं। अफ्रीका में कोई-कोई इसके वीजको भी खाते हैं। इन्द्रवारुणीका ताज़ा मूल दन्तमार्जनमें काम आता है। अफीकाके नीलनदीतीरवर्ती कीयो-कीयो लोग इसके फलसे एकप्रकारका रस निकालते हैं और उसे पानी भरनेको मशक में लगाते हैं। इसके गन्धसे ऊंट मशकको काट नहीं सकते। २ गोरक्षककेटी, फूट। {{outdent|इन्द्रवाह (वै॰ पु॰) इन्द्रको ले जानेवाला।}} {{outdent|इन्द्रविद्धा (सं॰ स्त्री॰) व्रणरोगविशेष, किसी किस्मकी}} {{outdent|इन्द्रविद्धा (सं॰ स्त्री॰) व्रणरोगविशेष, किसी किस्मकी फुन्सी। यह वात-पित्त बिगड़नेसे त्वक्पर जल-पूर्ण क्षुद्र क्षुद्र किंवा वृहत् वृहत् स्तवकमें पड़ जाती है। इन्द्रविडाका उद्भेद (खाज) की तरह एकत्र न हो स्वतन्त्र भावमें अवस्थित रहती है। इस रोगमें प्रथम परिष्कार जल वा दुग्धके समान स्त्राव निकलता है। उसके सूखनेसे चिचियो चिपिटिका उपजती है। चिकित्सकोंके मतसे इन्द्रविडा चार प्रकारकी होती है—विम्बाकार (Herpes-phlyc-tenoæs), चक्राकार (Herpes-circinatus), राम-}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> t7rut2j9ifgwdxv1kpbrhajx4dy0mw7 667513 667511 2026-07-11T18:26:06Z ममता साव9 2453 667513 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रवारुणी—इन्द्रविड्वा|५७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इन्द्रवारुणी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रवरुणयोरियं वा इन्द्र-वरुणी देवते अस्याः इत्यण्-डीप्; इन्द्रस्य आत्मनी वारुणीव प्रिया । १ लत्ताविशेष, इन्द्रायन। (Citrallus Colocynthis) वैद्यशास्त्रके मतसे इसके पर्याय वाचक ये शब्द हैं,—विशाला, ऐन्द्री, इन्द्र, अरुण, गवादनी, क्षुद्रसहा, इन्द्रचिर्भिटी, सूर्या, विषघ्नी, गजकर्णिका, अमरा, माता, सुकर्णी, सुफला, वारुणी, बालकप्रिया, रक्तर्वारु, तारका, वृषभाची, पीतपुष्पा, इन्द्रवल्लरी, हेमपुष्यी, क्षुद्रफला, वल्ली, चित्रफला, चित्रा, गवाची, गजचिभिंटी, मृगेर्वारु, पिटङ्गीको और मृगादनी। इन्द्रवारुणी उत्तमाशा अन्तरीप, मिश्र, तुर्कस्थान, भूमध्य सागर के दीपसमूह और भारतवर्षमें स्वयं उत्पन्न होती है। गुणमें यह तिक्त, कट, शीतल, रेचन और गुल्म, पित्त, श्लेष्मा, क्तमि, कुष्ठ तथा ज्वरको नाश करनेवाली है। (राजनिघण्टु) आलैपाथिक मतसे इन्द्रवारुणी अति विरेचक होती है, क्योंकि यह अन्त्रकी श्लेष्मिक झिल्लीको उग्रता प्रदान करती है। इसको अधिक मात्रा-में सेवन करनेसे यह प्रदाहिक विषक्रिया फैलाती है। शीथ, उदरी, कोष्ठवद्ध एवं सन्यास प्रभृति रोगमें विरेचन और प्रत्युग्रता लानेके लिये इन्द्रवारुणीका व्यवहार किया जाता है। इसके सेवनसे कभी-कभी उदरमें वेदना उठती है, तबीयत मिचलाती और के आने लगती है। ऐसी अवस्थामें कर्पूर किंवा कीनारेमें देनेसे पीड़ा मिटती है। आलोपाथिक मात्रामें इन्द्रवारुणो खानेसे अनेक समय नाना रूप विघ्न पड़ सकता है। इसलिये हरसमय इसे कोई व्यवहारमें नहीं लाता। विशेष आवश्यक होनेसे विवेचनापूर्वक इन्द्रवारुणीको खाना चाहिये। इसका सार और वटिका व्यवहार्य है। मात्रा दो से दश ग्रेन तक होती है। होमिओपाथिक मतसे यह सरल अन्त्रके प्रदाह, अतिसार, रक्तातिसार, गृध्रसी, अर्धशिरःशूल, स्नायुशूल, अन्त्रशूल, वात, सन्धिवात, डिम्बाशयके स्नायवीय रोग और नाना-प्रकारको पीड़ाओंमें दो-जाती है। अत्यन्त उदर वेदना-संयुक्त, विशेष कष्टदायक रक्तातिसार, मारक्यू रियस करीसाइवास और इन्द्रवारुणीके यथाक्रम सेवनसे निष्वृत्त हो जाता है। डाकर ह्यूसने शूजरोग पर}} {{Multicol-break}} :इस औषधका व्यवहार किया था। फूलने, तीव्र वेदनाविशिष्ट पैत्तिक उदर ढील-जैसा विवमिषा तथा वमन लक्षण झलकने और वृहत् एवं सरल अन्त्रमें प्रदाह उठनेपर इन्द्रवारुणी देते हैं। डाकर ह्यूसके मतसे यह तरुण ग्टभ्रसोपर पुरातन रोगको अपेक्षा अधिक उपकार करती है। व्यथित अङ्गके उत्तोलनसे वेदना बढ़ने एवं क्रमागत सञ्चालनसे उपशम बाने और साथ ही उदरामय तथा अन्त्रशूल उठनेपर इन्द्र-वारुणी अत्यन्त लाभदायक है। पहले जलवत् एवं आममिश्रित, पीछे पित्त तथा रक्तमिश्रित और प्रस्तरखण्डके मध्य प्रेषित अन्त्र जैसी उदरवेदनाविशिष्ट रक्त आमाशयमें केलोंसिन्य उपयोगी है। मस्तक भारी पड़ने, चक्षुः तथा कपालके मध्य अत्यन्त ज्वाला उठने, और सूच या आलपीन विद्ध-जैसी यन्त्रणा से विशिष्ट अर्धशिरःशूल होनेपर इन्द्रवाणीका प्रयोग करना चाहिये। इसका फल नारङ्गी जैसा पीला या लाल होता है। उसपर खरबूजाकी तरह फांक होती है। खानमें वह अतिशय कटु लगता है। इसके गूदेसे औषध बनती है। और महिष एवं उष्ट्रपची उसे खाते हैं। अफ्रीका में कोई-कोई इसके वीजको भी खाते हैं। इन्द्रवारुणीका ताज़ा मूल दन्तमार्जनमें काम आता है। अफीकाके नीलनदीतीरवर्ती कीयो-कीयो लोग इसके फलसे एकप्रकारका रस निकालते हैं और उसे पानी भरनेको मशक में लगाते हैं। इसके गन्धसे ऊंट मशकको काट नहीं सकते। २ गोरक्षककेटी, फूट। {{outdent|इन्द्रवाह (वै॰ पु॰) इन्द्रको ले जानेवाला।}} {{outdent|इन्द्रविद्धा (सं॰ स्त्री॰) व्रणरोगविशेष, किसी किस्मकी}} {{outdent|इन्द्रविद्धा (सं॰ स्त्री॰) व्रणरोगविशेष, किसी किस्मकी फुन्सी। यह वात-पित्त बिगड़नेसे त्वक्पर जल-पूर्ण क्षुद्र क्षुद्र किंवा वृहत् वृहत् स्तवकमें पड़ जाती है। इन्द्रविडाका उद्भेद (खाज) की तरह एकत्र न हो स्वतन्त्र भावमें अवस्थित रहती है। इस रोगमें प्रथम परिष्कार जल वा दुग्धके समान स्त्राव निकलता है। उसके सूखनेसे चिचियो चिपिटिका उपजती है। चिकित्सकोंके मतसे इन्द्रविडा चार प्रकारकी होती है—विम्बाकार (Herpes-phlyc-tenoæs), चक्राकार (Herpes-circinatus), राम-}} {{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 15|2em}}</noinclude> ign4yxh3t6c9kqlsejs72tbgbmglos7 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१० 250 75890 667475 609021 2026-07-11T14:19:57Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667475 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्तरकोशल-उत्तरदिकपाश'''|'''२०६'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :सदृश क्षीर पीते हैं। चक्रवाक और चक्रवाकीकी तरह दम्पती एक कालमें जन्म ले समभावसे बढ़ते हैं। वे एकादश सहस्र वत्सर जीते और एक दूसरेको कभी नहीं छोड़ते। मरनेपर भारुण्ड पक्षी उन्हें उठा गिरिदरीमें फेंक देते हैं।<ref>*प्लिनिने अत्तकीरस् नामक एक जनपद लिखा है। उसके साथ संस्कृत उत्तर कुरुका कितना ही सादृश्य लक्षित है।</ref> <small> (महाभारत भीष्म ७अ०, रामायण किष्किन्धया ४३ सर्ग)</small> {{Outdent|उत्तरकोशल――प्राचीन जनपदविशेष, एक पुराणा मुल्क। वर्तमान अयोध्याप्रदेशके उत्तरांशका पहले यही नाम था।}} {{Outdent|उत्तरकोशला (सं॰ स्त्री॰) उत्तरकोशलकी राजधानी अयोध्या नगरी।}} {{Outdent|उत्तरकेन्द्र (सं॰ पु॰) पृथिवीका उत्तर प्रान्त, ज़मीनका शिमाली मुल्क।}} {{Outdent|उत्तरक्रिया (सं॰ स्त्री॰) १ उत्तरकालका कर्तव्य कर्म, पिछले वक्तका काम। २ सांवत्सरिक श्राद्धादि।}} {{Outdent|उत्तरखण्ड (सं॰ क्ली॰) १ अन्तिम अध्याय, आखिरी बाब। २ पद्म, गरुड़ और शिवपुराणका अन्तिम भाग।}} {{Outdent|उत्तरखण्डन (सं॰ क्ली॰) प्रतिक्षेप, प्रत्याख्यान, तरहीद, काट, झुठलाव।}} {{Outdent|उत्तरगुण (सं॰ पु॰) जैनशास्त्रके अनुसार मुनिके मूल गुणको बचानेवाला गुण।}} {{Outdent|उत्तरङ्ग ( सं॰ क्ली॰) उत्तरमङ्गम्, कर्म॰ शकन्धा॰। १ द्वारोर्ध्वस्थ दारु, दरवाजेके ठाठपर लगनेवाली लकड़ीकी मेहराब। (त्रि॰) २ उद्गत तरङ्ग, लहर लेनेवाला। <small>“अपामिवाधारमनुत्तरङ्गम्।” (कुमार ३।४८)</small>}} {{Outdent|उत्तरच्छद (सं॰ पु॰) शय्याके उपरि आस्तरणका वस्त्र, विछौनेके ऊपरकी चादर।}} {{Outdent|उत्तरज (संं॰ त्रि॰) पश्चाज्जात, जो पीछे पैदा हो।}} {{Outdent|उत्तरज्या (सं॰ स्त्री॰) वृत्तखण्डका सुप्रतिष्ठित ज्यापिण्ड, कौसका माहिर जैब जा़विया। सुप्रतिष्ठित ज्यापिण्ड द्वारा अधींकृत गुण के द्वितीय अर्धांशकी भी यही संज्ञा है।}} {{Outdent|उत्तरज्योतिष (सं॰ पु॰) भारतका पश्चिमोत्तरप्रान्तीय जनपद विशेष। <small>“कृतस्त्रं पञ्जनदञ्चैव तथैवामरपर्वतम्।”</small>}} {{rule}} {{smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{c|<small>उत्तरज्योतिषञ्चैव तथा दिव्यकटं पुरम्॥” (भारत, सभा, ३१ अ॰)</small>}} {{Outdent|उत्तरण (सं॰ क्ली॰) उत्-तृ-ल्युट्। १ नद्यादिके पारको जाना, उतराई। २किसी स्थानमें उपस्थित होना, पहुंच।}} {{Outdent|उत्तरणस्थान (सं॰ क्ली॰) सराय, अड्डा, पड़ाव, मुका़म, उतरनेकी जगह।}} {{Outdent|उत्तरतन्त्र (सं॰ क्ली॰) सुश्रुतके वैद्यक ग्रन्थका अन्तिम भाग।}} {{Outdent|उत्तरतर (सं॰ त्रि॰) अधिक उच्च दूर वा व्यव-छिन्न, ज्यादा ऊंचा, जो बहुत हटा हो।}} {{Outdent|उत्तरतस् (सं॰ अव्य॰) १ उत्तरके प्रति, बाईं ओर ऊपर। २ पश्चात्, पीछे।}} {{Outdent|उत्तरतापनीय (सं॰ पु॰) नृसिंहतापनीयोपनि-षटुका शेष भाग।}} {{Outdent|उत्तरत्र (सं॰ अव्य॰) पश्चात्, पीछे, अखी़रको।}} {{Outdent|उत्तरदातृ (सं॰ पु॰) उत्तर देने की क्षमता रखने-वाला, जवाबदिह, जिम्मेवार, जिसे भलेबुरेका जवाब देना पड़े।}} {{Outdent|उत्तरदायक (सं॰ त्रि॰) उत्तरं ददाति, उत्तर-दा-ण्वुल्। १ प्रतुत्तरदाता, सवालका जवाब लगाने-वाला। २. प्रभुके समक्ष उत्तर प्रदानसे निज दोषके गोपनकी चेष्टा करनेवाला, जो मालिकके सामने जवाब लगा अपना ऐब छिपानेकी कोशिश करता हो।}} {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“परपुंसि रता नारी भृत्यश्चोत्तरदायकः। ससपेंच गृह वासो मृत्यु रेव न संशयः॥” (हितोपदेश)</poem>}}}} {{Outdent|उत्तरदायित्व (सं॰ क्ली॰) उत्तर देनेका अधिकार, जवाबदिही, जिम्मेवारी।}} {{Outdent|उत्तरदायी (सं॰ त्रि॰) उत्तर देने का अधिकार रखनेवाला, जवाबदिह, जिम्मेवार, जिसे भलेबुरेका जवाब देना पड़े।}} {{Outdent|उत्तरदिक् (सं॰ स्त्री॰) दिक् विशेष, उदीची, शिमाल।}} {{Outdent|उत्तरदिककाल (सं॰ पु॰) रविवारका उत्तरदिगवर्ती काल।}} {{Outdent|उत्तरदिक्पाश (सं॰ पु॰) वृहस्पतिवारके दिन उत्तर-दिक्में यात्रा युद्धादिके निषेधका ज्ञापक पाशचक्र।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 53|1em}}</noinclude> b3ohkjmy9uy28hkpp7nne4olbe4cpdh पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२११ 250 75891 667480 609022 2026-07-11T14:54:48Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667480 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२१०'''|'''उत्तरदिकस्थ–उत्तरफल्गुनी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उत्तरदिकस्थ (सं॰ त्रि॰) उत्तर दिक्पर अवस्थित, उत्तरीय, शिमाली, जो उत्तरकी ओर हो।}} {{Outdent|उत्तरदिगीश (सं॰ पु॰) १ कुवेर। २ बुद्ध। यह दोनों देवता उत्तरदिक् के अधिपति हैं।}} {{Outdent|उत्तरदिग्वली (सं॰ पु॰) उत्तरस्यां दिश वली। १ गुरु। २ चन्द्र। ये दोनों ग्रह उत्तरकी भोर बलवान् होते हैं।}} {{Outdent|उत्तरदिश, <small>उत्तरदिक् देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तरदेश (सं॰ पु॰) उत्तरकी ओरका देश, मुल्क शिमाली, ऊंचा देश।}} {{Outdent|उत्तरधेय (सं॰ त्रि॰) पश्चात किया जानेवाला, जो पीछे बन सके।}} {{Outdent|उत्तरनाभि (सं॰ पु॰ स्त्री॰) यज्ञ के उत्तरका कुण्ड, जो कुण्ड यज्ञमें उत्तरकी ओर बना हो।}} {{Outdent|उत्तरपक्ष (सं॰ पु॰) १ विचारपक्ष, प्रत्याख्यान, तरदीद, काट, झुठलाव। यह पूर्वपक्षके सिद्धान्तको काट डालता है। २ उत्तर विकल्प, पहली बहसका जवाब। ३ कृष्णपक्ष, अंधेरा पाख। ४ उत्तरीय वा वाम पार्श्व, शिमाली या बाईं ओर।}} {{Outdent|उत्तरपक्षता (सं॰ स्त्री॰) फल, आशय, नतीजा, मतलब।}} {{Outdent|उत्तरपक्षत्व (सं॰ क्ली॰) <small>उत्तरपक्षता देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तरपट (सं॰ पु॰) उपरिस्थ वस्त्र, ऊपरका कपड़ा। उपरना, ओढ़नी, चादर वगै़रहको उत्तरपट कहते हैं।}} {{Outdent|उत्तरपथ (सं॰ पु॰) उत्तरीय मार्ग, देवयान, शिमाली राह, जो गली उत्तरको निकल गई हो।}} {{Outdent|उत्तरपथिक (सं॰ त्रि॰) उत्तरः तद्देशभवः पन्थानम्, कन्। <small>पथः कन्। पा ५।१। ७५।</small> उत्तरदेशवासी, शिमालका रहनेवाला।}} {{Outdent|उत्तरपद (सं॰ क्ली॰) १ समासका शेष पद, मिले हुये लफ्ज़का आखिरी हिस्मा। २ समासयोग्य पद।}} {{Outdent|उत्तरपदिक (सं॰ त्रि॰) समासके अन्तिम पदसे सम्बन्ध रखनेवाला, जो मिले हुये लफ्जके आखिरी टुकड़ेसे ताल्लुक रखता हो।}} {{Outdent|उत्तरपदकीय, <small>उत्तरपदिक देखो।</small>}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उत्तरपर्वत (सं० पु॰) उत्तरदिक्स्थ पर्वत, शिमाली पहाड़।}} {{Outdent|उत्तरपश्चार्ध (सं॰ पु॰) उत्तर और पश्चिमका अर्ध, शिमाली और मगरबी अद्वा।}} {{Outdent|उत्तरपश्चिम (सं॰ त्रि॰) उत्तर एवं पथिम दिकस्थ, शिमाली और मगरबी।}} {{Outdent|उत्तरपाड़ा-बङ्गाल प्रान्तके हुगली ज़िलेका एक नगर। यह बालोसे उत्तर हुगली नदीपर अवस्थित है। म्युनिसपलिटी बड़ी है। यहां गवरनमेण्ट स्कूल चलता है। जयकृष्ण मुखोपाध्याय नामक एक बड़े जमीन्दारने यहां सर्व साधारणके पढ़ने का एक विराट् पुस्तकालय स्थापित कराया है। उसमें प्रान्तीय स्थानवर्णनके अच्छे अच्छे ग्रन्थ रखे हैं। सरकारी चिकित्सालय भी विद्यमान है।}} {{Outdent|उत्तरपाद (सं॰ पु॰) चतुष्पाद व्यवहारके अन्तर्गत द्वितीय पाद, अदालती कार्यवाईका एक हिस्सा यह जवाब या बचावसे सम्बन्ध रखता है। प्रत्येक अभियोगमें चार विभाग पड़ते हैं।}} {{c|<small>“पूर्वपक्ष: स्प्नृतः पादो द्वितीययोत्तरः स्प्नृतः।” (वृहस्पति)</small>}} {{Outdent|उत्तरपुरस्तात् (सं॰ अव्य॰) उत्तर-पश्चिमाभिमुख, शिमाल और मगरिबको ओर।}} {{Outdent|उत्तरपूर्व (सं॰ त्रि॰) उत्तर एवं पूर्व दिक्स्थ, शिमाली और शरकी़। २ उत्तरको पूर्व समझनेवाला, जो शिमालको मशरिक ख़याल करता हो। (पु॰) ३ ईशान कोण।}} {{Outdent|उत्तरप्रच्छद (सं॰ पु॰) तूलिकासं स्तर, रजा़ई, गुदड़ी।}} {{Outdent|उत्तरप्रत्युत्तर (सं॰ क्ली॰) १ विवाद, झगड़ा, बहस। २ अभियोगका हेतु उत्तरवाद, कानूनी बहस, जवाबपर जवाब।}} {{Outdent|उत्तरप्रोष्ठपदयुग (सं॰ क्ली॰) युग-वत्सरभेद। इसमें नन्दन, विजय, जय, मन्मथ और दुर्मुख वत्सर पड़ता है।}} {{Outdent|उत्तरप्रोष्ठपदा (सं॰ स्त्री॰) <small>उत्तरभाद्रपद देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तरफल्गुनी (सं॰ स्त्री॰) उत्तरा फलति, फल-उनन्-गुक्, गौरादित्वात् ङीष् फल्गुन शब्दात् स्वार्थे}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> is9zjnpcuq7vlvozr2a7hny088tgrxn पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१२ 250 75892 667481 609023 2026-07-11T15:06:30Z अँजली चौधरी 2439 667481 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उत्तरफाल्गुनी-उत्तरवस्ति'''|'''२११'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अण्। हादश नक्षत्र, बारहवां मसकन् कमरौ।। रोंकी एक श्वेणो। ३ खेती करनेवाले धोवियों और (B. Leonis) इसका रूप दक्षिणोत्तर मिलित नाइयों को एक श्रेणी। ४ वङ्गदेशीय हालिक कैवर्ती- पर्यङ्काकति तारकदय होता है। पर्यमा अधिष्ठात्री की एक श्रेणी। ५ मोचियोंको एक श्रेणी। देवता है। उत्तरफला नी नक्षत्र में जन्म लेनेसे मनुष्य उत्तरलक्षण (सं॰ क्ली॰) प्रक्वत उत्तरका प्रकाश, दाता, दयालु, सुशील, कीर्तिमान, सुमति, श्रेष्ठ, धौर असली जवाबको झलक। (त्रि॰) २ वाम दिक् और अत्यन्त मृदुखभाव होता है। इसके प्रथममें सिंह चिन्हित, बाई ओर निशान रखनेवाला। और उत्तर पादत्रयमें कन्या राशि पड़ता है। उत्तरलोमन् (सं॰ त्रि॰) जपरो या बाहरी ओर उत्तरफाला नो, उत्तरफल्गुनो देखो। घुमावदार बाल रखनेवाला, जिसके बाल ऊपर या उत्तरभाद्रपद (सं॰ पु॰) षडूविंश नक्षत्र, छब्बी- बाहरको घूमे रहें। सवां मसकन् कमरी (a Andromede )। इसका उत्तरवयस (सं॰ क्ली॰) जोवनके पश्चाद वर्ष, जिन्द- पर्याय प्रोष्ठपदा और देवता अहिर्बुध्न है। यह | न । य गोके पिछले साल। पर्यवरूप अष्टतारात्मक होता है। इस नक्षत्रमें जन्म उत्तरवली (सं॰ स्त्री॰) दो अध्यायमें विभक्त कठोप- लेनेसे मनुष्य धनी, कुलोन, कार्यकुशल, राजमान्य, | निषटुका द्वितीय भाग। बलवान्, महातेजखौ, सत्कर्मकारी और बन्धभक्त उत्तरवस्ति (सं॰ पु॰) मूत्राशयमें नेह पहुंचानेका निकलता है। (स्त्री॰) टाप। उत्तरभाद्रपदा। सुश्रुतोक्त एक यन्त्र । सुश्रुतने कहा है-यह यन्त्र उत्तरमन्द्र (सं॰ पु॰) उच्च :स्वरसे मन्द मन्द गनिको रोगीको चतुर्दश अङ्गलि परिमित दीर्घ, और अग्र रीति, जोरसे धीरे-धीरे गानेका तरीका। यह षड्ज भागमें मालतोपुष्यके वन्त समान तथा क्षुद्र छिद्रयुक्त ग्रामको मूछना है। इसमें सरि ग म प ध नि स्वर होगा। इसमें स्नेहका परिमाण रहेगा। रोगीका क्रमशः पागको बढ़ते जाते हैं। (स्त्री॰) उत्तरमन्द्रा। वयस पचीस वत्सरसे कम ठहरने पर विचारसङ्गत उत्तरमात्र (सं॰ क्ली॰) केवल उत्तर, सिर्फ स्नेहकी मात्रा रखना चाहिये। स्त्रीके अपत्य पथसे जवाब। चार अङ्गलि अन्तर पर मूत्रनाली लगी है। उसके उत्तरमानस (सं॰ क्ली॰) मानसके उत्तरस्थ तीर्थ | मुद्र तुल्य छिद्रका परिमाण दश अङ्ग.लि दोघ है। विशेष। उत्तरवस्ति लगानको अपत्यपथ में चार और मूत्र- "कालोदकं नन्दिकुण्डं तथा चोत्तरमानसम् । नालोमें दो अङ्गल पिचकारी देना चाहिये। पल्प अश्येत्य योजनशतादम्य णहा विप्रमुच्यते ॥” (भारत अनु॰ २५ अ॰) वयस्का कन्याके एक ही अङ्गल यथेष्ट है। ऐसे उत्तरमीमांसा (सं॰ स्त्री॰) उत्तरस्य वेदान्तभागस्य स्थलमै भौरभ वा शूकरका वस्ति व्यवहार्य हैं। उपनिषदुरूपस्य मीमांसा । वेदान्त, वेदके द्वितीय भाग अभावमें पक्षोके गलदेशका चर्म चलता है। वह भी जानकाण्डका विचारमूलक ग्रन्थ, ब्रह्मसूत्र । वेदान्त देखो। न मिलने पर हरिण के पद या अन्य किसी प्रकारका उत्तररहित (सं॰ त्रि॰) उत्तरसे शून्य, ला जवाब, कोमल चर्म बस्ति बनाने में लगता है। प्रथम रोगीको जो जवाब न रखता हो। स्निग्ध और स्वद प्रयोग कर घतटुग्धसह यथाशक्ति उत्तरराद-राढदेशका उत्तरांश। वर्तमान वङ्गाल यवागू पिलाना चाहिये। फिर जानु परिमित स्थान- प्रान्तका वईमान, मुर्शिदावाद और वीरभूम जिला पर पृष्ठ टेक (उपविष्ट भावसे) और वस्ति तथा पूर्वकालमें उत्तरराढ़ नामसे ख्यात था। राढ़ देखो। मूनि देशमें उष्ण तैल लेप मेढ़नलको दृढ़ और ऋज़ उत्तरराढ़ी-उत्तरराढवासी। १ वशन्देशीय कायस्थोंको करे। उसके बाद मेढ़में शलाका द्वारा अन्वेषणकर एक श्रेणी। जो कायस्थ राढ़के उत्तर अंशमें रहे, वेहो छः अङ्गलि परिमाणसे अल्प अल्प चलाये। वस्ति इस नामसे विख्यात हुये। २ चौबीस-परगनेके लोहा- | लगा नल फिर धीरे धीरे निकालना चाहिये। स्रह <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 341vraf5hjzs74wifpleb55zxv4ukbg 667492 667481 2026-07-11T16:13:55Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667492 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्तरफाल्गुनी-उत्तरवस्ति'''|'''२११'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :अण्। हादश नक्षत्र, बारहवां मसकन् कमरी। (B. Leonis) इसका रूप दक्षिणोत्तर मिलित पर्यङ्काकृति तारकदय होता है। अर्यमा अधिष्ठात्री देवता है। उत्तरफला नी नक्षत्र में जन्म लेनेसे मनुष्य दाता, दयालु, सुशील, कीर्तिमान्, सुमति, श्रेष्ठ, धीर और अत्यन्त मृदुस्वभाव होता है। इसके प्रथममें सिंह और उत्तर पादत्रयमें कन्या राशि पड़ता है। {{Outdent|उत्तरफाल्गुनी, <small>उत्तरफल्गुनी देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तरभाद्रपद (सं॰ पु॰) षड़्विंश नक्षत्र, छब्बी-सवां मसकन् कमरी (a Andromede)। इसका पर्याय प्रोष्ठपदा और देवता अहिर्बुध्न है। यह पर्यङ्करूप अष्टतारात्मक होता है। इस नक्षत्रमें जन्म लेनेसे मनुष्य धनी, कुलीन, कार्यकुशल, राजमान्य, बलवान्, महातेजस्वी, सत्कर्मकारी और बन्धुभक्त निकलता है। (स्त्री॰) टाप्। उत्तरभाद्रपदा।}} {{Outdent|उत्तरमन्द्र (सं॰ पु॰) उच्च :स्वरसे मन्द मन्द गानेकी रीति, जो़रसे धीरे-धीरे गानेका तरीका। यह षड्ज-ग्रामकी मूर्छना है। इसमें स रि ग म प ध नि स्वर क्रमशः आगको बढ़ते जाते हैं। (स्त्री॰) उत्तरमन्द्रा।}} {{Outdent|उत्तरमात्र (सं॰ क्ली॰) केवल उत्तर, सिर्फ़ जवाब।}} {{Outdent|उत्तरमानस (सं॰ क्ली॰) मानसके उत्तरस्थ तीर्थ विशेष।}} 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कोमल चर्म बस्ति बनाने में लगता है। प्रथम रोगीको स्निग्ध और स्वेद प्रयोग कर घृतटुग्धसह यथाशक्ति यवागू पिलाना चाहिये। फिर जानु परिमित स्थान-पर पृष्ठ टेक (उपविष्ट भावसे) और वस्ति तथा मूर्ध्नि देशमें उष्ण तैल लेप मेढ़नलको दृढ़ और ऋज़ु करे। उसके बाद मेढ़में शलाका द्वारा अन्वेषणकर छः अङ्गुलि परिमाणसे अल्प अल्प चलाये। वस्ति लगा नल फिर धीरे धीरे निकालना चाहिये। स्नेह}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> mgvlaxmkhtus87ofuqas1omrg36romx पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१३ 250 75893 667501 609024 2026-07-11T17:01:51Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667501 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२१२'''|'''उत्तरवस्त्र-उत्तराधिकारिन्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :टपक पड़नेसे अपराह्व को दुग्ध,यूष वा मांसरसका परिमित मात्रामें भोजन कराये। इसी नियमसे तीन या चार वस्ति लगाये। दूषित शुक्र वा शोणित, मूत्राघात, मूत्रदोष, योनिदोष, शुक्रदोष, शर्कराश्मरी, वस्तिशूल, वङ्घणशूल, मेढशूल, समस्त मेहरोग और अन्यान्य उत्कट वस्तिजात रोग उत्तरवस्तिसे आरोग्य हो जाते हैं। {{Outdent|उत्तरवस्त्र (सं॰ क्ली॰) उत्तरीय, चादर।}} {{Outdent|उक्तरवादिन् (सं॰ त्रि॰) उत्तर-वद-णिनि। १ प्रति-वाद्य, मुद्दालह।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“साक्षिषू भयतः सत्मु भवन्ति पूर्वादिकः। पूर्व पक्षेऽधरीभूते भवन्त्यत्तरवादिनः॥” (याज्ञवल्क्य २।१७) </poem>}}}} :२ प्रतिवादी, जवाब देनेवाला। ३ अन्यसे पश्चात्स्वत्व रखनेवाला, जो दूसरेसे पोछे हक रखता हो। {{Outdent|उत्तरवायु (सं॰ पु॰) उत्तरदिग्भव मारुत, शिमाली हवा, उतराही। यह शीत, स्निग्ध, दोष प्रकोपकर, क्लेदन, प्रकृतिस्थको बलद, मृदु और क्षतक्षीण विषार्त के लिये अधिक गुणकर होता है।<small> (मदनपाल)</small>}} {{Outdent|उत्तरवारुणी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रवारुणी, इन्द्रायन।}} {{Outdent|उत्तरवारेन्द्र (सं॰ पु॰) १ वङ्गदेशका उत्तरांश अर्थात् दिनाजपुर और रङ्गपुर जिला। २ वङ्गन्देशके वारेन्द्र ब्राह्मणों की एक शाखा।}} {{Outdent|उत्तरवेदि (सं॰ स्त्री॰) १ वेदोक्त वैदीका एक भेद। <small>“द्वे वैदी हावग्री भवतः। न उत्तरस्यामेव वैदी उत्तरवैदिं उपकिरति न दक्षिणस्याम्।” (शतपथब्राह्मण २।५।२।६)</small>}} २ कुरुक्षेत्रके समन्तपञ्चक तीर्थका अपर नाम। {{x-smaller|{{c|<poem>“तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं रामदानाञ्च मचक्रुकस्य च। एतत् कुरुक्षे वसमन्तपञ्चकं पितामहस्वीत्तरवेदिरुच्यते॥”</poem>}}}} {{Right|(भारत वन ८३ अ॰)}} :{{gap}}तरन्तुक, अरन्तुक, रामहद और मचक्र कका मध्यवर्ती स्थान कुरुक्षेत्र-समन्त पञ्चक कहाता है, जो पितामहकी उत्तरवेदि समझा जाता है। {{Outdent|उत्तरमक्थ (सं॰ क्ली॰) सक्थिका उत्तर भाग, बाईं रान।}} {{Outdent|उत्तरसाक्षिन् (सं॰ त्रि॰) १ प्रतिवादीका साक्षी, मुद्दालहका गवाह।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{x-smaller|{{c|<poem>“साक्षिनामपि यः साक्ष्यं स्वपक्षं परिभाषताम्। श्रवणाच्छावणाद्वापि ससाक्ष्युत्तरसं ज्ञकः॥” (नारद)</poem>}}}} :२ अन्यके कथन पर साक्ष्य देनेवाला, जो दूसरेकी बात सुनकर गवाही देता हो। {{Outdent|उत्तरसाधक (सं॰ त्रि॰) १ शेष भागको सम्पूर्ण करनेवाला, जो बचे हुये कामको पूरा करता २ सहायक, मददगार। ३ उत्तरको प्रतिष्ठित करने-वाला, जो जवाब लगाता हो।}} {{Outdent|उत्तरहनु (वै॰ पु॰) हनुका उपरि भाग, जबड़ेका ऊपरी हिस्सा। <small>(अथर्व ९।७।२)</small>}} {{Outdent|उत्तरा (सं॰ स्त्री॰) १ विराट्राजकी कन्या। अभिमन्युके साथ इसका विवाह हुआ था। <small>अभिमन्य देखो।</small> (अव्य॰) २ उत्तरकी ओर, शिमालकी तर्फ़।}} {{Outdent|उत्तराखण्ड (सं॰ क्ली॰) उत्तरीय विभाग, शिमाली हिस्सा। यह भारतमें हिमालयके समीप है।}} {{Outdent|उत्तरात् (सं॰ अव्य॰) वाम ओरसे, बाईं तर्फ़ पर।}} {{Outdent|उत्तरात्तात् (वै॰ अव्य॰) उत्तरसे, शिमालकी तर्फ़ पर।}} {{Outdent|उत्तराधर (सं॰ त्रि॰) १ उच्चनीच, ऊंचा-नीचा, बड़ा छोटा। “उत्तराधरा इव भवन्त्यो यन्ति।” (शतपथब्राह्मण ५।३।४।२१) (क्ली॰) २ ऊर्ध्व एवं निम्न ओष्ठ, नीचे जपरका होंठ।}} {{Outdent|उत्तराधिकार (सं॰ पु॰) सम्पत्तिका क्रमिक स्वत्व मालकी सिलसिलेवार वरासत, बपौती।}} {{Outdent|उत्तराधिकारिता (सं॰ स्त्री॰) उत्तराधिकारिका स्वत्व सिलसिलेवार वरासत।}} {{Outdent|उत्तराधिकारित्व (सं॰ क्ली॰) <small>उत्तराधिकारिता देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तराधिकारिन् (सं॰ त्रि॰) पूर्व स्वामीके अभावमें धनादिके अधिकारी पुत्र प्रभृति, वारिस। इस देशमें स्मतिक मतसे किसी व्यक्तिके मरने पर प्रथम पुत्र, उसके भी अभावमें पौत्र उसके अभावमें पौत्र और पुत्रकी भांति समान अधिकारी होता है। प्रपौत्र पर्यन्त न रहनसे पत्नी, उसके अभावमें स्वामिकुल और उसके भी अभावमें पितृकुल अधिकार पाता है। इस धनको स्त्री जीते भी भोगेगी, किन्तु निज स्त्रीधनकी भांति दे-ले न सकेगी। उसके अभावमें उसकी कुमारी, उसके अभावमें वाग्दत्ता और उसके भी अभावमें विवाहिता (पुत्रवती) को उत्तराधिकार मिलता है।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qpvwdv0haqdqqepousxyktqoi5gkah3 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१४ 250 75894 667506 609025 2026-07-11T17:38:25Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667506 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्तराधिकारिन्-उत्तरायणान्तवृत्त'''|'''२१३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> (कन्या, पुत्रहीना और विधवा अधिकारिणी नहीं होती।) विवाहिता दुहिताके अभावमें दौहित्र अधिकारी होता अभावमें उसके पिताका स्वत्व है। पिताके न रहनेसे माता और उसके भी अभावमें भ्राता उत्तराधिकारी है। प्रथम सोदर, सोदर न होनेसे वैमात्रेयको अधिकार दिया जाता है। सोदरके मरनेसे उसका पुत्र, उसके अभावमें वैमात्रेय-भ्रातृ-पुत्र उत्तराधिकारी होता है।सोदरके मातृविषयमें प्रथम अपने सोदर, उसके अभावमें वैमात्रेयका ग्रहण है। इसीप्रकार विमाताके विषयमें प्रथम विमातृपुत्र, उसके अभावमें उसका असंसृष्ट पुत्र लिया जाता है। भ्राताके अभावमें भ्रातृपुत्र और उसके भी अभावमें वैमात्रेय-भ्रातृपुत्र अधिकार पा सकता है। भ्रातृपुत्र के अभावमें भ्राटपौत्र है। उसके अभावमें पितृदौहित्र अर्थात निज भगिनीपुत्र वा वैमात्रेय भगिनीपुत्र, उसके अभावमें पितामह, उसके अभावमें पितामही उसके अभावमें पिताका सहोदरचाता, उसके अभावमें पिताका वैमात्रेय-भ्राता, उसके अभावमें पिताका सहोदरपुत्र, उसके अभावमें पिताका सहोदर-पौत्र, उसके अभावमें पिताका वैमात्रेय-पुत्र, उसके अभावमें पिताका वैमात्रेय पौत्र इत्यादि अधिकारी होता है। पिताके कुलमें कोई न रहनेसे पितामहदौहित्र, उसके अभावमें प्रपितामह-दौहित्र, उसके अभाव में प्रपितामह और उसके भी अभावमें प्रपितामहीको उत्तराधिकार मिलता है। प्रपितामहीके अभावमें पितामह का सहोदर वा व मात्रेय-भ्राता पुत्रपौत्रादि क्रमसे अधिकारी हैं।इसीप्रकार पिण्डदगणके अभावमें मातामह, मातुल और मातुलपुत्र क्रमान्वयसे उत्तराधिकार पाता है। मातुल-पुत्रके अभावमें अधस्तन सगोत्रीय, आहारदाता प्रभृति एक दूसरेके अभावमें उत्तराधिकारी होते हैं। उनके अभावमें ऊर्ध्वतन सगोत्रीय धनी, दत्त अन्न-भुक, वृद्धप्रपितामहादि पुत्रपौत्रादि क्रमसे अधिकार पाते हैं। उनके अभावमें चतुर्दश पुरुषके जातिसम्पर्कीय अधिकारी हैं। उभयकुलमें कोई न रहनेसे धनीका उत्तराधिकार गुरु, उसके अभावमें शिष्य, उसके अभावमें सतीर्थ और उसके भी अभावमें <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :एकग्राम-भुक्त अधिवासीको मिलता है। ऐसा कोई न रहनेसे राजा उत्तराधिकारी है। <small>(दायभाग)</small> {{Outdent|उत्तरान्वित (सं॰ त्रि॰) उत्तराको साथ लिये हुआ।}} {{Outdent|उत्तरापथ (सं॰ पु॰) उत्तरा उत्तरस्यां पन्थाः, अच्। भारतवर्षका उत्तरस्थित देश, आर्यावर्त्तका उत्तरांश। <small> “उत्तरापथदेशस्य रक्षितारो महीक्षितः।” (हरिवंश)</small>}} {{Outdent|उत्तराफाल्गुनी, <small>उत्तरफल्गुनी देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तराभाद्रपद,</small>उत्तरभाद्रपद देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तराभास (सं॰ पु॰) दुष्ट उत्तर, खधराब जवाब, जो उत्तर ठीक न हो। स्मतिने इसे ग्यारह प्रकारका लिखा है। यथा―― १ सन्दिग्ध, शकिया; जैसे कोई अभियोग आनेपर कहे――मुझे स्मरण नहीं, मैंने सौ रुपये लिये या पैसे पैसे। २ प्रकृतसे अन्यत्, असलीसे दूसरा―― जैसे मैंने सौ रुपये नहीं सौ पैसे लिये हैं। ३ अत्यल्प, निहायत कम―― जैसे मैने सौ नहीं, पांच रुपये लिये हैं। ४ अति भूरि, बहुत ज्यादा―― जैसे मैंने सौ नहीं, दो सौ रुपये लिये हैं। ५ पक्षैकदेशव्यापी―― जैसे मैंने सुवर्ण और वस्त्र दोनों नहीं, केवल सुवर्ण लिया है। ६ व्यस्तपद, जैसे मैंने सुवर्ण नहीं लिया, उलटा मारा गया हूं। ७ अव्यापी, बेसिर पैर। ८ निगूढ़, मैंने नहीं-किसी दूसरेने इनसे ऋण लिया होगा। ९ आकुल-जैसे मैंने रुपये लिये तो थे, किन्तु अब देने नहीं। १० व्याख्यागम्य, समझानेको जरूरत रखने-वाला। ११ असार, जैसे मैंने व्याज देंते भी रुपया नहीं लिया।}} {{Outdent|उत्तराभासता (सं॰ स्त्री॰) उत्तरकी अपर्याप्तता, जवाबकी कमी।}} {{Outdent|उत्तराभासत्व (सं॰ क्ली॰) <small>उत्तरामासता देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तरायण (सं॰ क्ली॰) उत्तरा उत्तरस्यां अयनं सूर्यादेः, अण्। <small>पूर्व पदात् संज्ञायामगः। पा ८।४।३।</small> सूर्यका उत्तर दिग् गमनकाल, मकरसंक्रान्तिसे छः मास।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“भानोर्मकरसंक्रान्तेः षण्मासा उत्तरायणम्।” (सूर्यसिद्धान्त) “शिशिरश्च वसन्तोऽपि ग्रीष्म स्यादुत्तरायणे।” (हारौत १।४ अ॰)</poem>}}}} :{{gap}}उत्तरायणमें, शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतु पड़ता है। {{Outdent|उत्तरायणान्तवृत्त (संं॰ क्ली॰) सूर्यके उत्तरवाली गतिकी}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 54|1em}}</noinclude> q0zmy8l4n7iwptlojuv261kvf6hhmu5 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१५ 250 75895 667515 609026 2026-07-11T18:35:40Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667515 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२१४'''|'''उत्तरायणी-उत्तर्जन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :सीमानिर्णायक रेखा, जो सतर आफ़ताबके शिमाल जानेकी चाल ठहराती हो। (Tropic of Cancer)}} {{Outdent|उत्तरायणी (सं॰ स्त्री॰) सङ्गीतकी मूछनाका एक भेद।}} {{Outdent|उत्तरारणी (सं॰ स्त्री॰) ऊर्ध्व घरणि। इसीको काटनेसे यज्ञीय प्रमन्य बनता है।}} {{Outdent|उत्तरार्थ ( सं॰ त्रि॰) निम्नलिखित विषयक अर्थ, तफसील जलके लिये।}} {{Outdent|उत्तरार्ध (सं॰ क्ली॰) उत्कृष्टमर्धम्। १ देहका उपरिभाग, जिसमका ऊपरी हिस्सा। २ शेषार्ध, आखिरी श्रद्धा। <small>“मध्ये मैवोत्तराधें नाज्यमवेक्षते।“ (शतपथ रोग तथा ब्रामण १।२१।१३)</small> ३ दूरतर अन्त, ज्यादा दूरका सिरा। ४ उत्तरका अर्ध, बायां अद्धा।}} {{Outdent|उत्तरार्ध (वै॰ त्रि॰) उत्तरदिकस्थ, शिमालकी ओर पड़नेवाला।}} {{Outdent|उत्तरावत् (वै॰ त्रि॰) विजयी, फतहमन्द, जीतने वाला।}} {{Outdent|उत्तराशा (सं॰ स्त्री॰) उत्तर दिक, शिमाल।}} {{Outdent|उत्तराशाधिपति (सं॰ पु॰) उत्तर दिक्के स्वामी, कुवेर।}} {{Outdent|उत्तराशापति, <small>उत्तराशाधिपति देखो।</small>}} {{Outdent|ऊत्ताराश्मन् (सं॰ पु॰) १पार्वतीय देश विशेष, एक पहाड़ी मुल्क। २ पार्वतीय नद विशेष, एक पहाड़ी दरया। (राजतरङ्गियी ४।१५७)}} {{Outdent|उत्तराषाढ़ा (सं॰ स्त्री॰) उत्तरा-आषाढ़ा। एक-विंश नक्षत्र। इसका रूप सूर्य के समान होता है। यह दो तारा युक्त है। अधिदेवता विश्व हैं। किसीके मतमें यह आठ तारका रखता और गजके दन्तवत् लगता है। इस नक्षत्र में जन्म लेनेसे मनुष्य दाता, दयावान्, विजयी, विनीत, सत्कर्मी, धनशाली, स्त्री-पुत्रयुक्त और अत्यन्त सुखी निकलता है।}} {{Outdent| उत्तरासङ्ग (सं॰ पु॰) अर्धवें आसज्यते, उत्तर-आ सड्ज-घञ्। उत्तरीयक, ओढ़नी, चादर, पिछोरी, ऊपरी या बाहरी कपड़ा।}} {{Outdent|उत्तराह (सं॰ पु॰) उत्तर-अहः-टच्। परदिन, परदिन आगे आनेवाला रोज़, कल।}} {{Outdent|उत्तराहि (सं॰ अव्य॰) उत्तरसे, शिमालसे।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उत्तरिका (सं॰ स्त्री॰) नदी विशेष, एक दरया। भरतने राजगृहसे अयोध्या आते समय समतीर्थ नामक ग्राममें इस नदीको पार किया था। उत्तरगा पाठान्तर भी लक्षित है। <small>(रामायण अयोध्या ७१।१४)</small>}} {{Outdent|उत्तरिणी (सं॰ स्त्री॰) उत्तम अरणी, बढ़िया पाकर। यह कटुक, शीत, चक्षुहितकर, लघु, उष्ण, स्निग्ध, सारक, तुवर, व्रणरोपण एवं सुखप्रसव कर होती और कास, व्रण, कृमि, श्वास, ज्वर, पित्त, प्रमेह, कफ, कुष्ठ, प्रलाप, वात, तन्द्रा, दद्रु, क्षय, मूत्रक्वच्छ, योनि-रोग तथा शोथको खोती है। इसका शाक उष्यावीर्य एवं तिक्त रहता और कृमि, अर्श, कुष्ठ, कफ तथा वातको हरता है। फल रोगमुक्त, तिक्त, उष्ण, कटुक, लघु, अग्निप्रदीपक, पित्तकोपकर, कल्याणप्रद और विषनाशक है। <small>(वैद्यकनिघण्ट)</small>}} {{Outdent|उत्तरिन् (सं॰ त्रि॰) श्रेष्ठ, बड़ा।}} {{Outdent|उत्तरीय (सं॰ क्ली॰) उत्तरस्मिन् देहभागे, छ। </small>गहादिभ्यश्च।पा ४।२।१३८।</small> उत्तरीयकवस्त्र, उपरना, ओढ़नी, चद्दर। (वि॰) २ ऊर्ध्व स्थित, ऊपरी। ३ उत्तर-दिक्स्थ, शिमाली।}} {{Outdent|उत्तरीयक, <small>उत्तरीय देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तरेतरा (सं॰ स्त्री॰) दक्षिण विभाग, जनूबी तरफ़।}} {{Outdent|उत्तरेद्युस् (सं॰ अव्य॰) पर दिन, आगामी दिवस, कल।}} {{Outdent|उत्तरोत्तर (सं॰ त्रि॰) उत्तरस्मादुत्तरः। १ अधिकाधिक, ज्यादा ज्यादा। (अव्य॰) २ क्रम-क्रम, धीरे-धीरे, बराबर। (क्ली॰) ३ उत्तर पर उत्तर, जवाबका जबाब। ४ वार्तालाप, गुफ़्तगू। ५ प्रतिवचन, रद्द जवाब। ६ आधिक्य, ज्या़दती। ७ अनुक्रम, सिल-सिला। ८ अवतरण, उतार।}} {{Outdent|उत्तरोत्तरिन् (सं॰ त्रि॰) १ सर्वदा वृद्धिशाली, हमेशा बढ़नेवाला। २ अन्यके पीछे आनेवाला, जो दूसरेके बाद पड़ता हो।}} {{Outdent|उत्तरोष्ठ (सं॰ पु॰) ऊपरिस्थ ओष्ठ, ऊपरका ओठ।}} {{Outdent|उत्तरौष्ठ, <small>उत्तरोष्ठ देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तर्जन (सं॰ क्ली॰) उच्चैस्तर्जनम्, प्रादि॰ समा॰। उच्चैः खरकी भर्त सना, जो़रकी झाड़-फटकार।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> lc8xm2bvcr0e4ot5xenmithyu2g9u38 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१६ 250 75896 667522 609027 2026-07-12T03:46:48Z अँजली चौधरी 2439 667522 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उत्तलित-उत्तिरनमेरुर'''|'''२१५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> उत्तलित (सं० वि०) उत्-तल-त । उत्क्षिप्त, उछाला , हुआ। उत्ता, उतना देखो। 'उत्तान (सं॰ त्रि॰) उद्गतस्तानो विस्तारो यस्मात्।। १अवमुखशायित, मुंह ऊपरको उठाये पड़ा हुआ, चित। २ अगभीर, उथला। ३ उच्छ्रित, खड़ा, सीधा। ४ पुटाकार, खोकला। ५ ऊध्र्व तल, सतह पर फैला | हुआ। ६ उद्घाटित, खुला। (क्ली॰) ७ जल, पानी। उत्तानक (सं॰ पु॰) उत्-तन-ख ल। १ उच्चटावृक्ष, उटङ्गनका पेड़। २ सुस्ताभेद, नागरमोथा। उत्तानकूर्मक (सं॰ क्ली॰) कुर्मासन विशेष । पासन देखो। उत्तानपत्र, उत्तानपवक देखो। उत्तानपत्रक (सं॰ पु॰) १ रतौरण्ड, लाल रेडौका पेड़। २खेतैरण्ड, सफ़ेद रेडीका पेड़। उत्तानपद् (वै॰ स्त्री॰) १ वृक्ष, पेड़। २ शक्ति, उत्तारण (सं॰ क्ली॰) उत्-तृ-णिच्-लुट । १ पारको ताकत। उत्तानपदसे दिक् और पृथिवी उपजतौ गमन, उतारा। (पु॰) कर्तरि ल्य । २ विष्णु भग- है। (ऋक् १०७२।३-४) . वान् । (त्रि॰)३ पारको गमन करनेवाला, जो उतर उत्तानपर्ण (वै॰ त्रि॰) विस्तृत पत्रयुक्त, बढ़ी हुई रहा हो। पत्ती रखनेवाला। उत्तारलोचन ( सं॰ त्रि॰) पूर्णित नेत्रयुक्त, धूमो उत्तानपाद (सं॰ पु॰) स्वायम्भ व मनुके पुत्र और हुई आंखोवाला। ववके पिता। इन राजाके सुनौति और सुरुचि दो उत्तारिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-तृ-णिनि। १ पार लगाने- पनी रहीं। सुनोतिके गर्भसे ध्र व, कीर्तिमान, आयु- वाला, जो उतारता हो। २ चपल, चुलवुला। मान एवं वस और सुरुचिके गर्भसे उत्तमने जन्म | उत्तार्य (सं॰ त्रि॰) पार किया जानेवाला, जो उता- लिया था। (हरिवंश, विष्णु पुराण, भागवत ) रनेके काबिल हो। उत्तानपादज (सं॰ पु॰) उत्तानपादके पुत्र ध्रुव । उत्ताल (सं॰ त्रि॰) उत्-चुरादित्वात् तल-धज ।. अव देखो। १ श्रेष्ठ, बड़ा। २ उत्कट, मारो। ३ कठिन, मुश्किल । उत्तानशय (सं॰ त्रि॰) उत्तान: अव मुखः शेते, शो- ४ तीव्र, तेज । ५ उच्च, ऊंचा। (पु॰) ६ मर्कट, अच् । १ अर्व मुख शयन करनेवाला, जो चित बन्दर । (क्ली॰) ७ संख्या विशेष, कोई खास अदद। लेटा हो। (पु॰) स्तन्यपायिशिशु, शोर ख्वारा उत्तिर (हिं॰ पु॰) खम्भे में गलेके ऊपर और कम्पके बच्चा, जो लड़का बहुत छोटा और माका दूध नीचे रहनेवाली पट्टी। पौता हो। | उत्तिरनमेरूर (उत्रामलोर)-मन्द्राज प्रान्तीय चेङ्गलपट उत्तानशीवन् (वै॰ त्रि॰) उत्तानस्थित, इस्तादा, जिलेके मधुरान्तकम् ताल्लुकका एक नगर । यह अक्षा. खड़ा, रुका हुआ। (पथ व २।२१।१०) १२. ३६५५" उ० और द्राघि॰ ७८ : ४८ पू॰ पर अव- "उत्तानहस्त (वै॰ त्रि॰) विस्तारित हस्त युक्त, हाथ स्थित है। चेङ्गलपटसे उत्तरनमेरूर १६ मोल पड़ता फैलाये हुपा। है। प्रायः साढ़े ७ हजार मनुष्य बसते हैं। हिन्दुवों और उत्ताप (सं॰ पु॰) उत्-तप-घञ् । १ उष्णता, गर्मी। मुसलमानोंके शासन-समयमें यह एक प्रधान स्थान था। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :२ ताप, धूप। ३ दुःख, तकलीफ़। ४ चिन्ता, फिक्र। ५ उत्तेजना, जोश। ६ चेष्टा, कोशिश। {{Outdent|उत्तापन (सं॰ क्ली॰) उष्णताकरण, गर्म करनेका काम।}} {{Outdent|उत्तापित (सं॰ त्रि॰) १ तापयुक्त, तपा हुआ, जो गर्म किया गया हो। २ दुःखित, तकलीफ़ उठाये हुआ।}} {{Outdent|उत्तार (सं॰ पु॰) उत्-त-णिच्-घञ्। १ वमन, कै, उलटी। २ उल्लङ्घन, संघाई। ३ पारगमन, उतारा। ४ रक्षा, बचाव। ५ दूरीकरण, अलगाव। (त्रि॰) ६ अत्यन्त उच्च, निहायत ऊंचा।}} {{Outdent|उत्तारक (सं॰ त्रि॰) उत्-तृ-णिच्-ण्वुल्। १ पार हो जाने वाला, जो उतर गया हो। (पु॰) २ पार लगानेवाले महादेव।}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 06mv4me5r3kicr58650cd6cd3m86uku 667542 667522 2026-07-12T08:08:29Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667542 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्तलित-उत्तिरनमेरुर'''|'''२१५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उत्तलित (सं॰ त्रि॰) उत्-तल-क्त। उत्क्षिप्त, उछाला हुआ।}} {{Outdent|उत्ता, <small>उतना देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तान (सं॰ त्रि॰) उद्गतस्तानो विस्तारो यस्मात्। १ ऊर्ध्वमुखशायित, मुंह ऊपरको उठाये पड़ा हुआ, चित। २ अगभीर, उथला। ३ उच्छ्रित, खड़ा, सीधा। ४ पुटाकार, खोकला। ५ ऊर्ध्व तल, सतह पर फैला हुआ। ६ उद्घाटित, खुला। (क्ली॰) ७ जल, पानी।}} {{Outdent|उत्तानक (सं॰ पु॰) उत्-तन-ण्वुल्। १ उच्चटावृक्ष, उटङ्गनका पेड़। २ सुस्ताभेद, नागरमोथा।}} {{Outdent|उत्तानकूर्मक (सं॰ क्ली॰) कुर्मासन विशेष। <small>आसन देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तानपत्र, <small>उत्तानपवक देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तानपत्रक (सं॰ पु॰) १ रक्तैरण्ड, लाल रेड़ीका पेड़। २ श्वेतैरण्ड, सफ़ेद रेडीका पेड़।}} {{Outdent|उत्तानपद् (वै॰ स्त्री॰) १ वृक्ष, पेड़। २ शक्ति, ताक़त। उत्तानपदसे दिक् और पृथिवी उपजती है। <small>(ऋक् १०।७२।३-४)</small>}} {{Outdent|उत्तानपर्ण (वै॰ त्रि॰) विस्तृत पत्रयुक्त, बढ़ी हुई पत्ती रखनेवाला।}} {{Outdent|उत्तानपाद (सं॰ पु॰) स्वायम्भुव मनुके पुत्र और ध्रुवके पिता। इन राजाके सुनीति और सुरुचि दो पत्नी रहीं। सुनोतिके गर्भसे ध्रुव, कीर्तिमान्, आयुमान एवं वसु और सुरुचिके गर्भसे उत्तमने जन्म लिया था। <small>(हरिवंश, विष्णु पुराण, भागवत)</small>}} {{Outdent|उत्तानपादज (सं॰ पु॰) उत्तानपादके पुत्र ध्रुव। <small>ध्रुव देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तानशय (सं॰ त्रि॰) उत्तान: ऊर्ध्वमुखः शेते, शीअच्। १ ऊर्ध्व मुख शयन करनेवाला, जो चित लेटा हो। (पु॰) स्तन्यपायिशिशु, शीर ख्वारा बच्चा, जो लड़का बहुत छोटा और माका दूध पीता हो।}} {{Outdent|उत्तानशीवन् (वै॰ त्रि॰) उत्तानस्थित, इस्तादा, खड़ा, रुका हुआ। (अथर्व २।२१।१०)}} {{Outdent|उत्तानहस्त (वै॰ त्रि॰) विस्तारित हस्त युक्त, हाथ फैलाये हुआ।}} {{Outdent|उत्ताप (सं॰ पु॰) उत्-तप-घञ्। १ उष्णता, गर्मी।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :२ ताप, धूप। ३ दुःख, तकलीफ़। ४ चिन्ता, फिक्र। ५ उत्तेजना, जोश। ६ चेष्टा, कोशिश। {{Outdent|उत्तापन (सं॰ क्ली॰) उष्णताकरण, गर्म करनेका काम।}} {{Outdent|उत्तापित (सं॰ त्रि॰) १ तापयुक्त, तपा हुआ, जो गर्म किया गया हो। २ दुःखित, तकलीफ़ उठाये हुआ।}} {{Outdent|उत्तार (सं॰ पु॰) उत्-त-णिच्-घञ्। १ वमन, कै, उलटी। २ उल्लङ्घन, संघाई। ३ पारगमन, उतारा। ४ रक्षा, बचाव। ५ दूरीकरण, अलगाव। (त्रि॰) ६ अत्यन्त उच्च, निहायत ऊंचा।}} {{Outdent|उत्तारक (सं॰ त्रि॰) उत्-तृ-णिच्-ण्वुल्। १ पार हो जाने वाला, जो उतर गया हो। (पु॰) २ पार लगानेवाले महादेव।}} {{Outdent|उत्तारण (सं॰ क्ली॰) उत्-तृ-णिच्-ल्युट्। १ पारको गमन, उतारा। (पु॰) कर्तरिल्य। २ विष्णु भगवान्। (त्रि॰)३ पारको गमन करनेवाला, जो उतर रहा हो।}} {{Outdent|उत्तारलोचन (सं॰ त्रि॰) घूर्णित नेत्रयुक्त, घूमी हुई आंखोवाला।}} {{Outdent|उत्तारिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-तृ-णिनि। १ पार लगाने-वाला, जो उतारता हो। २ चपल, चुलवुला।}} {{Outdent|उत्तार्य (सं॰ त्रि॰) पार किया जानेवाला, जो उतारनेके का़बिल हो।}} {{Outdent|उत्ताल (सं॰ त्रि॰) उत्-चुरादित्वात् तल्-घञ्। १ श्रेष्ठ, बड़ा। २ उत्कट, भारी। ३ कठिन, मुश्किल। ४ तीव्र, तेज़। ५ उच्च, ऊंचा। (पु॰) ६ मर्कट, बन्दर। (क्ली॰) ७ संख्या विशेष, कोई खा़स अदद।}} {{Outdent|उत्तिर (हिं॰ पु॰) खम्भे में गलेके ऊपर और कम्पके नीचे रहनेवाली पट्टी।}} {{Outdent|उत्तिरनमेरूर (उत्रामलोर)――मन्द्राज प्रान्तीय चेङ्गलपट जिलेके मधुरान्तकम् ताल्लुकका एक नगर। यह अक्षा॰ १२° ३६‘ ५५‘‘ उ॰ और द्राघि॰ ७९॰ ४८‘ पू॰ पर अव-स्थित है। चेङ्गलपटसे उत्तरनमेरूर १६ मील पड़ता है। प्रायः साढ़े ७ हजार मनुष्य बसते हैं। हिन्दुवों और मुसलमानोंके शासन-समयमें यह एक प्रधान स्थान था।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> puchs5q61m74q0qd5o641978ote57hw पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१७ 250 75897 667548 609028 2026-07-12T08:46:02Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667548 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२१६'''|'''उत्तष्ठड्वोम-उत्तोरित'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :सन् ई॰ के १८ वें शताब्दमें अनेक बार अंगरजी़ और फा़न्सीसी सैन्य ने इसपर अधिकार किया। आजकल सब मजिष्ट्रेटकी अदालत बैठती है। यहां पांच शिव और दो विष्णु के भग्न मन्दिर विद्यमान हैं। शिव-मन्दिरका कारुकार्य सुन्दर और प्रशंसाजनक है। पड़ोस में अनेक तेलगु रोमन-काथलिक रहते हैं।}} {{Outdent|उत्तिष्ठड्वोम (सं॰ पु॰) होम विशेष। यह होम खडे। खड़े करना पड़ता है।}} {{Outdent|उत्तिष्ठमान (सं॰ त्रि॰) उत्-स्था-शानच्। १ उत्थान शील, उठ खडा होनेवाला। २ वृद्धिशील, बढ़ चलने वाला।"}} {{Outdent|उत्तौर (सं॰ अव्य॰) तट पर, किनार, भूमिपर।}} {{Outdent|उत्तीर्ण (सं॰ त्रि॰) उत्-तृ कर्तरि क्त। १ पारगत, उतरा हुआ। २ जलसे उस्थित, पानीसे उठा हुआ। ३ निर्गत, निकला हुआ। ४ अतिक्रान्त, लांघा हुआ। ५ उपस्थित, पहुंचा हुआ। ६ कतकार्य, कामयाब। ७ मुक्त, छटा हुआ।}} {{Outdent|उत्तीर्य (सं॰ अव्य॰) पार होकर. उतरके।}} {{Outdent|उत्तीर्षु (सं॰ त्रि॰) पार होनेका अभिलाषी, जो उतरना चाहता हो।}} {{Outdent|उत्तङ्ग (सं॰ त्रि॰) उत् अतिशयेन तुङ्गः। उच्च, ऊंचा, जो ख़ूब चढ़ा हो।}} {{Outdent|उत्तुङ्गता (सं॰ स्त्री॰) उच्चता, बुलन्दी, ऊंचाई, चढ़ाई।}} {{Outdent|उत्तङ्गभुज――बम्बई प्रान्तीय कनाड़ा जिलेके एक प्राचीन नृपति। काकतीय उपाख्यानमें कहा है―― ये हिन्दुः स्थानसे आकर गोदावरीके दक्षिण बसे थे। इनके पुत्र नन्दने चालुक्य गिरिपर नन्दगिरिदुर्ग नामक एक किला बनाया था।}} {{Outdent|उत्तण्डकी (सं॰ स्त्री॰) करञ्जक, करोंदा।}} {{Outdent|उत्तुण्डित (सं॰ क्ली॰) १ कण्टकाग्र, कांटेको नोक। (त्रि॰) २ निर्गत, निकला हुआ।}} {{Outdent|उत्तुद (वै॰ पु॰) चालना करनेवाला पुरुष, जो आदमी हविःको चलाता हो।}} {{Outdent|उत्तुर (ओतूर)――बम्बई प्रान्तके पूना जिलेका एक नगर। यह पूना नगरसे उत्तर-पश्चिम ५० मील}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :अक्षा॰ १९° १७ उ॰ और द्राघि ७४° ३‘ ३०‘‘ पू॰ पर अवस्थित है। मराठा शासनके अन्त समय इस नगरके चारो ओर राइमें खानदेशके भील लट मार करते थे। इसीसे धन धान्यको रक्षाके लिये एक उच्च दुर्ग बनाया गया। पड़ोसमें दो मन्दिर बने हैं――एक सुप्रसिद्ध साधु तुकारामके गुरु केशवचैतन्य और दूसरा महादेवका महादेव मन्दिर में प्रति वर्ष मेला लगता है। {{Outdent|उत्तुष (सं॰ पु॰) उद्गतः तुषोऽस्मात्। लाजा, लाई।}} {{Outdent|उत्थान उत्तू (हिं॰ पु॰) १ वेणीकरण, सङ्कोच, चुन्नट, चीन, चौरस। २ वस्त्रका सङ्कोच, कपड़े की चुन्नट। ३ सङ्को-चास्त्र, चुन्नट डालने या बेलबूटा काढनका औजार।}} {{Outdent|उत्तूकश, <small>उत्तूगर देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तूगर (हिं॰ पु॰) वस्त्रपर सङ्कोच डोलनेवाला, जो कपडेपर चुन्नट चढ़ाता हो।}} {{Outdent|उत्तेजक (सं॰ त्रि॰) प्रोत्साहक, प्रेरक, उकसाने, भड़काने, उभारने या उठानेवाला।}} {{Outdent|उत्तेजन (सं॰ क्ली॰) <small>उत्तेजना देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तेजना (सं॰ स्त्री॰) उत्-तिज-णिच्-युच्। १ शाणादि द्वारा तीक्ष्णीकरण, शान रखनेका काम, पैनाव। २ प्रेरणा, तरगीब, पहुंचाव। ३ प्रवर्तन, लगाव। ४ भत्सना, धमकी, कहा-सुनी। ५ उद्दी-पन, भड़काव। ६ उत्साहदान, बढ़ावा। ७ सजीव-करण, ज़िन्दा करनेका काम। ८ उत्पीड़न, तक-लीफ़दिही।}} {{Outdent|उत्तेजित (सं॰ त्रि॰) उत-तिज-णिच्-क्त। १ उद्दीपित, उसकाया हुआ, जो भड़का हो। २ प्रेरित, भेजा या पहुंचाया हुआ। ३ शाणित, पैनाया हुआ। ४ विरक्त, जो अलग हो। ५ प्रवर्तित, लगाया हुआ। (क्ली॰) ६ अश्वगति विशेष, घोड़ेकी कदम चाल। ७ उद्दीपन, तरगीब, भड़काव।}} {{Outdent|उत्तोरण (सं॰ क्ली॰) उन्नतं तोरणमत्र। उच्चपुर-द्वारयुक्त नगरादि, ऊंचे दरवाजेवाले शहर व़गैरह। (त्रि॰) २ उन्नततोरणयुक्त, ऊंची मेहराबवाला।}} {{Outdent|उत्तोरित (सं॰ क्ली॰) उत्-तृ भावे इतच्। अश्व के मध्यम वेगकी गति, दुलकी, घोड़े की मामूली दौड़-वाली चाल।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ijqkxd8dotop4ps2l4vpb7nhy9729b3 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१८ 250 75898 667551 609030 2026-07-12T09:31:15Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667551 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्तोलन-उत्पक्ष्मण'''|'''२१७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उत्तोलन (सं॰ क्ली॰) उत्-तुल भावे ल्युट्। उत्थापन, उतक्षेपण, उठाव, चढ़ाव।}} {{Outdent|उत्तोलित (सं॰ त्रि॰) उत् चुरादित्वात् तुल-क्त। उत्क्षिप्त, उस्थापित, उठाया या चढ़ाया हुआ।}} {{Outdent|उत्त्यक्त (सं॰ त्रि॰) उत्-त्यज-क्त। १ परित्यक्त, छोड़ा हुआ। २ विरक्त, मुहब्बत या शौक़ न रखनेवाला। ३ ऊर्ध्वक्षिप्त, फेंका या उछाला हुआ।}} {{Outdent|उत्त्याग (सं॰ पु॰) १ उत्सर्ग, तर्क, छोड़ाव। २ उत्क्षेपण, फेंकफांक। ३ विरक्ति, दुनियावी मुहब्बतकी जुदाई।}} {{Outdent|उत्त्रस्त (सं॰ त्रि॰) अतिशय भयभीत, बहुत डरा हुआ।}} {{Outdent|उत्त्रास (सं॰ पु॰) उत्-त्रस-धञ। अतिभय, बड़ा खौफ़ या डर।}} {{Outdent|उतत्रिपद (सं॰ क्ली॰) उन्नत त्रिपदी, ऊंची तिपाई।}} {{Outdent|उत्थ (सं॰ त्रि॰) उत्-स्था-क। १ उस्थित, उठा हुआ। २ उन्नत, ऊंचा। ३ उद्गत, निकला हुआ। ४ उत्पन्न, पैदा। (पु॰) ५ उत्पत्ति, उपज, निकास।}} {{Outdent|उत्थवना (हिं॰ क्रि॰) उत्थापन करना, उठाना, लगाना।}} {{Outdent|उत्थातृ (वै॰ पु॰) १ उत्थापन करनेवाला, जो उठ रहा हो। २ अध्यवसायी, पक्का इरादा रखनेवाला।}} {{Outdent|उत्थान (सं॰ क्ली॰) उत्-स्था-ल्युट्। १ ऊर्ध्व पतन, ऊंचा पड़नेकी हालत। २ उद्यम, कोशिश। ३ उदय, निकास। ४ उन्नति, तरक्की़। ५ उठाव, उठान। ६ तन्त्र। ७ पौरुष, ज़ोर। ८ पुस्तक, किताब। ९ युद्ध, लड़ाई। १० पुनरुज्जीवन, हश्र। ११ त्याग, तर्क, छोड़ बैठने की हालत। १२ मूल, जड़, निकास। १३ मलोत्सर्ग। १४ मलरोग, दस्तकी बीमारी। १५ हर्ष खुशी। १६ सैन्य, फौज। १७ अहाता। १८ वलिदानकी शाला। १९ सीमा, हद। २० गृह-कार्य, घरका काम। २१ विचार, ख़याल। २२ रोगका सन्निकृष्ट कारण, बीमारीका नज़दीकी सबब। (त्रि॰) २३ उठवाने या निकलवानेवाला।}} {{Outdent|उत्थानवत् (सं॰ त्रि॰) कार्यार्थ तत्पर, कामके लिये तैयार।}} {{Outdent|उत्थानैकादशी (सं॰ स्त्री॰) चान्द्र कार्तिक मासकी।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :शुक्ल एकादशी, देव उठनी एकादशी। जबतक यह एकादशी नहीं पड़ती, तबतक धार्मिक हिन्दुवोंके भोजनमें ऊख, भंटा, सिंघाड़ा प्रभृति चीज नहीं चलती। लोग घरको अच्छी तरह लीप पोत विष्णु-भगवान्की पूजा करते हैं। <small>एकादशी देखो।</small> {{Outdent|उत्थापक (सं॰ त्रि॰) १ उत्थापन करनेवाला, जो उठाता हो। २ उत्तेजक, हौसला बढ़ानेवाला।}} {{Outdent|उत्थापन (सं॰ क्ली॰) उत्-स्था-णिच्-ल्युट्। १ उत्तोलन, उठाव। २ प्रेरण, पहुंचाव। ३ प्रबोधन, जगाव। ४ उपस्थितकरण, लगाव। ५ चोभन, भड़काव। ६ छोड़ाव। ७ गणितमें प्रश्नका उत्तर निकालना, सवालका जवाब ।}} {{Outdent|उत्थापित (सं॰ त्रि॰) उत्-स्था-णिच्-क्त। १ उत्तोलित, उठाया हुआ। २ प्रेरित, भेजा हुआ। ३ प्रबोधित, जगाया हुआ। ४ चोभित,भड़काया हुआ।}} {{Outdent|उत्थाम्य (सं॰ अव्य॰) १ उत्तोलन करके, उठाके। २ क्षोभन करके, भड़का कर। (त्रि॰) ३ उठाया जानेवाला, जो जगाने का़बिल हो। (वै॰) ४ प्रेरण किया जानेवाला, जो भेजे जानेके का़बिल हो।}} {{Outdent|उत्थाय (सं॰ अव्य॰) १ उठकर। २ आगे बढ़कर।}} {{Outdent|उत्थायिन् (सं॰ त्रि॰) उत्थान करनेवाला, जो उठ या निकल रहा हो।}} {{Outdent|उत्थित (सं॰ त्रि॰) उत्-स्था-क्त। १ उत्पन्न, उपजा हुआ। २ उद्गत, निकला हुआ। ३ उद्यत, मुस्तैद। ४ वर्धित, बढ़ा हुआ। ५ लगा हुआ, जो पड़ गया हो। ६ उच्च, ऊंचा, बड़ा। ७ विस्तृत, फैला हुआ। (पु॰) ८ सरल वृक्ष, सीधा पेड़। ९ दश पादका एक प्रगाथ।}} {{Outdent|उस्थितता (सं॰ स्त्री॰) अन्यकी सेवा करनेका उद्यम, दूसरोंकी ख़िदमतके लिये मुस्तैदी।}} {{Outdent|उत्थिताङ्गुलि (सं॰ पु॰) १ विस्तृताङ्गुलि, फैली हुई उंगली। २ करतल, हथेली। ३ चपट, थप्पड़।}} {{Outdent|उत्थिति (सं॰ स्त्री॰) उत्थान, बुलन्दी, उठान, उंचाई।}} {{Outdent|उत्पक्ष्मण (सं॰ त्रि॰) उस्थित नेत्रच्छदयुक्त, पपोटे ऊपरको उठाये हुआ।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 55|1em}}</noinclude> 2d4gtg4sqew1ls1c1f02ewe6jqdy1dx पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१९ 250 75899 667552 609031 2026-07-12T09:54:09Z अँजली चौधरी 2439 667552 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२१८'''|'''उत्पक्ष्मन्-उत्पन्नभक्षिन्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> उत्पक्षमन्, उत्पशाय देखो। .. उत्पविष्णु (सं॰ त्रि॰) पाक करनेके योग्य, जो पकाने के काबिल हो। उत्पट (सं॰ पु॰) उत्-पट-अच् । १ वृक्षादिको वक्को भेदकर उगत होनेवाला निर्यास, पेड़की छालको फोड़कर निकलने वाला गोंद। "त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः।" (शतपथब्राह्मण १४।६।३१) 'उत्पट: उच्चनिर्यासः' (भाष्य) । २ उपरिच्छद, उपरना, टुपट्टा, ऊपरी कपड़ा। उत्पत (सं॰ पु॰) उत् पतति अर्ध्वं गच्छति, उत्- पत-अच् । १ पक्षी, चिड़िया। २ अर्ध्वगमन, जप- | रको जवाई, उड़ान । उत्पतत् (सं॰ त्रि॰) अर्व अथवा अधः उड्डयन | उत्पत्तिमत् (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न, पैदा, उपजा करनेवाला, जो ऊपर या नीचे उड़ रहा हो। हुआ। उत्पतन (सं॰ क्ली॰) उत्-पत-लुट्। १ अव- | उत्पत्तिव्यञ्जक (सं॰ पु॰) १ उद्भवका आदर्श, पैदा- गमन, उड़ान, चढ़ाव। २ उत्पत्ति, पैदायश । ३ उदय, | यशको सूरत। २ दो बार उत्पन्न होनेका चिन्ह, निकास। ४ उत्थान, उठान। ५ उत्प्लवन, भगाई।। दुबारा उपजने का निशान् । उत्पतनिपता (सं॰ स्त्री॰) उत्पतनिपत इत्यु- | उत्पत्तिात्क्रम ( सं॰ पु॰) विपरीत भावसे च्यते यस्यां क्रियायाम्। जल एवं अधः उड्डयन, | उतपत्ति, उलटी चालको पैदायश। ऊपर और नीचेको उड़ान। उत्पथ (सं॰ पु॰) १ असत्पथ, बुरी राह । उत्पताक (सं॰ त्रि॰) उत्तोलिता पताका यस्मिन् । (अव्य॰)२ शास्त्रके विरुद्ध, अण्ड-बण्ड । उत्तोलित पताकायुक्त, जिसमें झण्डे उड़ें। उत्पथप्रतिपत्र, उत्पथप्रवृत्त देखो। “उत्पताकध्वजच्छवशोभियुग्यार्पितासनम्।” (राजतरङ्गिणी) उत्पथप्रवृत्त (सं॰ त्रि॰) असत्, मन्द, बुरा, खराब, उत्पताकध्वज (सं॰ त्रि॰) उत्तोलित पताका एवं बुरी राह या चाल पकड़नेवाला। ध्वजायुक्त, जिसमें भण्डे और निशान उड़ते रहें। - उत्पद्यमान (सं॰ त्रि॰) उत्-पद-यच-शानच् । उत्पतित (सं॰ त्रि॰) उत्-पत-त। १ उस्थित, जायमान, पैदा हो जानेवाला। उठा हुआ। २ उद्गत, निकला हुआ। उत्पन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-पद-क्त । १ जात, पैदा, उतपतितव्य (सं॰ त्रि॰) अवं उड़ाया जानेवाला, उपजा।२ उस्थित, उठा।३ अकस्मात् उद्धृत, एकाएक जो ऊपर उड़ाये जानेके काबिल हो। निकला। ४ प्राप्त, हासिल किया, पाया। ५हुपा, उत्पतिळ (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वगमनकारी, ऊपर पड़ा। ६ समाप्त, बना। ७ परिचित, समझा- चढ़नेवाला, जो कूद पड़ता हो। बूझा। उत्पतिष्णु (सं॰ त्रि॰) उत्-पत-इष्णुच् । उत्पतन- उत्पबतन्तु (सं॰ त्रि॰) सन्तानको श्रेणी रखने- शौल, उड़ने या उछल पड़नेवाला। वाला, जिसके औलादका सिलसिला रहे। . सत्पत्ति (सं॰ स्त्री॰) उत्-पत-तिन्। १ उद्भव, उत्पनभक्षिन (सं॰ त्रि॰) प्राप्त द्रव्यको खा डालने ना, पैदायश, उपज । २ आविर्भाव, देखाव । ३जल- वाला, जो हासिल किया हुआ माल उड़ा देता हो। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :पतन, उड़ान। ४ प्रलय, क़यामत। ५ लाभ, फा़यदा। फलकी भांति उद्गम, नतीजे जेसी पैदायश। {{Outdent|उतपत्तिकालीन (सं॰ त्रि॰) उद्भवके समय होने-वाला, जो पैदायशके वक्त हो।}} {{Outdent|उत्पत्तिक्रम (सं॰ पु॰) जगत्की उतपत्तिका पारि-पाट्य, दुनियाकी पैदायशका तरीका़। उपनिषद् के मतमें आत्मासे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, जलसे पृथिवी, पृथिवीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न, अन्नसे रेतः और रेतःसे पुरुषकी उत्पत्ति है।}} {{Outdent|उत्पत्तिप्रयोग (सं॰ पु॰) १ कारण और कार्यके संयुक्त रूपसे उद्भव, सबब और समरेको मिली हुई हरकतसे पैदायश। २ अर्थ, मानो, मतलब।}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 0geks3121y6l0efp1kziz1hy8tydf6v 667553 667552 2026-07-12T10:23:33Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667553 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२१८'''|'''उत्पक्ष्मन्-उत्पन्नभक्षिन्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उत्पक्षमन्, <small>उत्पक्ष्मण देखो।</small>}} {{Outdent|उत्पविष्णु (सं॰ त्रि॰) पाक करनेके योग्य, जो पकाने के का़बिल हो।}} {{Outdent|उत्पट (सं॰ पु॰) उत्-पट-अच्। १ वृक्षादिकी त्वक्को भेदकर उद्गत होनेवाला निर्यास, पेड़की छालको फोड़कर निकलने वाला गोंद।}} {{x-smaller|{{c|<poem>“त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः।” (शतपथब्राह्मण १४।६।९।३१) ‘उत्पट: वृक्षनिर्यासः’ (भाष्य)।</poem>}}}} :२ उपरिच्छद, उपरना, टुपट्टा, ऊपरी कपड़ा। {{Outdent|उत्पत (सं॰ पु॰) उत् पतति ऊर्ध्वं गच्छति, उत्-पत-अच्। १ पक्षी, चिड़िया। २ अर्ध्वगमन, ऊपरकी जवाई, उड़ान।}} {{Outdent|उत्पतत् (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्व अथवा अधः उड्डयन करनेवाला, जो ऊपर या नीचे उड़ रहा हो।}} {{Outdent|उत्पतन (सं॰ क्ली॰) उत्-पत-ल्युट्। १ ऊर्ध्वगमन, उड़ान, चढ़ाव। २ उत्पत्ति, पैदायश। ३ उदय, निकास। ४ उत्थान, उठान। ५ उत्प्लवन, भगाई।}} {{Outdent|उत्पतनिपता (सं॰ स्त्री॰) उत्पतनिपत इत्युच्यते यस्यां क्रियायाम्। ऊर्ध्व एवं अधः उड्डयन, ऊपर और नीचेको उड़ान।}} {{Outdent|उत्पताक (सं॰ त्रि॰) उत्तोलिता पताका यस्मिन्। उत्तोलित पताकायुक्त, जिसमें झण्डे उड़ें। {{x-smaller|{{c|“उत्पताकध्वजच्छत्रशोभियुग्यार्पितासनम्।” (राजतरङ्गिणी)}}}} {{Outdent|उत्पताकध्वज (सं॰ त्रि॰) उत्तोलित पताका एवं ध्वजायुक्त, जिसमें झण्डे और निशान उड़ते रहें।}} {{Outdent|उत्पतित (सं॰ त्रि॰) उत्-पत-क्त। १ उस्थित, उठा हुआ। २ उद्गत, निकला हुआ।}} {{Outdent|उतपतितव्य (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्व उड़ाया जानेवाला, जो ऊपर उड़ाये जानेके का़बिल हो।}} {{Outdent|उत्पतितृ (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वगमनकारी, ऊपर चढ़नेवाला, जो कूद पड़ता हो।}} {{Outdent|उत्पतिष्णु (सं॰ त्रि॰) उत्-पत-इष्णुच्। उत्पतनशील, उड़ने या उछल पड़नेवाला।}} {{Outdent|उत्पत्ति (सं॰ स्त्री॰) उत्-पत-क्तिन्। १ उद्भव, जन्म, पैदायश, उपज। २ आविर्भाव, देखाव। ३ ऊर्ध्व}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :पतन, उड़ान। ४ प्रलय, क़यामत। ५ लाभ, फा़यदा। फलकी भांति उद्गम, नतीजे जेसी पैदायश। {{Outdent|उतपत्तिकालीन (सं॰ त्रि॰) उद्भवके समय होने-वाला, जो पैदायशके वक्त हो।}} {{Outdent|उत्पत्तिक्रम (सं॰ पु॰) जगत्की उतपत्तिका पारि-पाट्य, दुनियाकी पैदायशका तरीका़। उपनिषद् के मतमें आत्मासे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, जलसे पृथिवी, पृथिवीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न, अन्नसे रेतः और रेतःसे पुरुषकी उत्पत्ति है।}} {{Outdent|उत्पत्तिप्रयोग (सं॰ पु॰) १ कारण और कार्यके संयुक्त रूपसे उद्भव, सबब और समरेको मिली हुई हरकतसे पैदायश। २ अर्थ, मानी, मतलब।}} {{Outdent|उत्पत्तिमत् (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न, पैदा, उपजा हुआ।}} {{Outdent|उत्पत्तिव्यञ्जक (सं॰ पु॰) १ उद्भवका आदर्श, पैदा-यशकी सूरत। २ दो बार उत्पन्न होनेका चिन्ह, दुबारा उपजने का निशान्।}} {{Outdent|उत्पत्तिव्युत्क्रम ( सं॰ पु॰) विपरीत भावसे उतपत्ति, उलटी चालकी पैदायश।}} {{Outdent|उत्पथ (सं॰ पु॰) १ असत्पथ, बुरी राह। (अव्य॰) २ शास्त्रके विरुद्ध, अण्ड-बण्ड।}} {{Outdent|उत्पथप्रतिपत्र, <small>उत्पथप्रवृत्त देखो।</small>}} {{Outdent|उत्पथप्रवृत्त (सं॰ त्रि॰) असत्, मन्द, बुरा, खराब, बुरी राह या चाल पकड़नेवाला।}} {{Outdent|उत्पद्यमान (सं॰ त्रि॰) उत्-पद-यच्-शानच्। जायमान, पैदा हो जानेवाला।}} {{Outdent|उत्पन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-पद-क्त। १ जात, पैदा, उपजा। २ उस्थित, उठा। ३ अकस्मात् उद्भूत, एकाएक निकला। ४ प्राप्त, हासिल किया, पाया। ५ हुआ, पड़ा। ६ समाप्त, बना। ७ परिचित, समझा-बूझा।}} {{Outdent|उत्पन्नतन्तु (सं॰ त्रि॰) सन्तानकी श्रेणी रखने-वाला, जिसके औलादका सिलसिला रहे।}} {{Outdent|उत्पनभक्षिन् (सं॰ त्रि॰) प्राप्त द्रव्यको खा डालने वाला, जो हासिल किया हुआ माल उड़ा देता हो।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> jmmzhvkwhqofg839x4m0zkzwc16ny4g पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२२२ 250 75902 667554 609035 2026-07-12T10:41:21Z अँजली चौधरी 2439 667554 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उत्पली-उत्यादिन्'''|'''२२१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> उत्पन्ली (सं॰ स्त्री॰) तुषचपटी, भूसीको चपाती : या रोटी। | उत्पलेखर (सं॰ पु॰) महानदीका तोरवर्ती एक प्राचीन तीर्थ । महानदी देखो। उत्पातक (सं॰ पु॰) उत्-पत-णिच-ख ल । उत्पवन (सं॰ क्ली॰) १ प्लावन, सैलाब, बूड़ा। १ अर्ध्व पतनशील जन्तु विशेष, उछल उछल कर "सावनमुत्पवनमाहुः।” (मनुभाष्ये मेधातिथि ५।११५) चलनवाला एक जानवर । इसके अष्ट पाद होते हैं। २ यज्ञीय पात्रादिके संस्कारभेद। "देशोत्पातकभन्न कमक्षिकामशकावृतम् ।" (भारत वर्गा॰ २ १०) (आश्वलायनग्टह्यन्व १।३।२.३) २ तीर्थ विशेष । ( भारत अनु॰ ) (त्रि॰) उत्-पत-खुल् । ३ कुशादि द्वारा जलका उत्क्षेपण। ३ अव पतनशील, उड़ने या उछलने वाला। उत्पविष्ट (सं॰ त्रि॰) १ पावन, पाक। २ पावन उत्यातकेतु (सं॰ पु॰) अमङ्गल चिड़, बुरा करनेवाला, जो पाक साफ बनाता हो। निशान्। उल्कापात, भूमिकम्प और उपद्रवके उत्पश्य (सं॰ त्रि॰) ऊध्वमुख, ऊपरको ओर पातका निमित्तक उदित धूमकेतु प्रभृति उत्पात- देखनेवाला। केतु कहाते हैं। उत्पाट (सं॰ पु॰) उत्-पट-घ । १ उत्पात, उत्पाती (सं॰ त्रि॰) उपद्रव उठानेवाला, जो उखाड़। २ कर्णरोग विशेष, कानको एक बीमारी। आफत डालता हो। उत्पाटक (सं॰ पु॰) कर्णपालीगत रोग, कानको उत्पाद (सं॰ पु॰) उत्-पद भावे घञ् । उत्पत्ति, नोकमें होनेवाली एक बीमारी। गुरु अाभरणके पैदायश, उपज । संयोग, ताड़न एवं अति घर्षणसे कण को पालोमें जो उत्पादक (सं॰ पु॰) जयस्थिता: पादा अस्य, उत्- शोथ, दाह और पाकका रोग लगता है उसे उत्- पद-णिच्-ख ल। १ पशु विशेष, एक जानवर। पाटक कहते हैं। (माधव निदान ) इसमें कान अष्टपादयुक्त गजाराति शरभका नाम उत्पादक है। चटचटाया करता है। ( सुश्रुत ) फारसीमें इसे हुमा कहते हैं। (क्ली॰)२ कारण, उतपाटन (सं॰ क्ली॰) उत्-पट-णिच् भावे ल्युट्। सबब । (त्रि॰) ३ उतपत्तिकारक, पैदा करनेवाला। १ उन्मूलन, उखाड़। २ वायुजन्य व्रणको एक वेदना, उत्पादन (सं॰ क्ली॰) उत्-पद-णिच्-त्य ट् । वातस पैदा होनेवाला दर्द। १ उत्पत्तिकारण, पैदा करनेका काम । (त्रि॰) उत्पाटिका (सं॰ स्त्री॰) उत्-पट-णिच्-खुल्- २ उत्पादक, पैदा करनेवाला। टाप् प्रत इत्। १ वृक्षको शुष्क छाल, पेड़का सूखा उत्पादपूर्व (सं॰ क्ली॰) जैन-शास्त्रोक्त १४ पूर्वमें बकला। २ उत्पाटनकी, उखाड़ डालनेवाली। प्रथम पूर्व। पूर्ववाद और जैनशास्त्र देखो। उत्पाटित (सं॰ त्रि॰) उत्-पट णिच् त । उन्म - उत्पादशयन (सं॰ पु॰) टिभि पक्षी, टिटिहरी। लित, उखाड़ा हुआ। उत्पादिका (सं॰ स्त्री॰) उत्पद-णिच-ख ल- उत्पाटिन् (सं॰ त्रि॰) उन्म लन करनेवाला, जो टाप अत इत्। १ देहिका नामक कोट, दीमक । उखाड़ डालता हो। २हिलमोचिका, हरहुच। ३ पूतिका, पोय । उत्पाट्य (सं॰ व्य॰) उन्मूलन करके, उखाड़कर। उत्पादित (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न किया हुआ, जो (त्रि॰)२ उखाड़ डालनके योग्य । पैदा किया गया हो। उत्पात ( सं॰ पु॰) उत्पत भावे घञ् । १ ऊर्ध्व-उत्पादिन् (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न करनेवाला, जो पतन, उड़ान, उछाल। २ सङ्कट, आफत। ३ अशुभ पैदा करता हो। समासान्तमें इस शब्दका अर्थ सूचक अकस्मात् देवघटना, आस्मानी ग़जब। यह 'उत्पन्न किया हुआ' लगता है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :दिव्य, आन्तरीक्ष्य और भौम भेदसे तीन प्रकारका होता है। सूर्यग्रासादि दिव्य, उल्कापातादि आन्तरीक्ष्य और भूमिकम्पादि भौम है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 56|1em}}</noinclude> 9li95u1sk66dwuaot72rppaqvrcs1xn पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८३ 250 75964 667462 609079 2026-07-11T12:03:15Z अनुश्री साव 80 667462 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२८२|उनाव}}</noinclude> अधिक नशा पोये थे। उधर मुसलमानोंने दुर्ग में पहुंचते | माली, कलवार, धानुक, भङ्गी, सोनार और मल्ल ही असि खींची और अविलम्ब ही राजदुर्ग अपने ! प्रभृति उच्च-नीच सभी हिन्दू रहते हैं। मुसलमानोंमें हाथमें कर लिया। राजपरिवारके निरस्त्र लोग पशुके पठान, शैख और सैयद ज्यादा हैं। वे प्रायः सकल समान मारे गये। दुर्घटनाके समय राजपुत्र शिकार हो सुन्नी सम्प्रदायभुक्त हैं। खेलने गये थे। अकस्मात यह दारुण संवाद पा वे जमीन दोरसा, मटियार, बलुई और असर कई मानिकपुरको अपने सम्पर्कीय एकजनके पाश्रयसे भगे। भागों में विभक्त है। कई वर्षके अन्तरसे गई उपजता है। उसस्थानके नरेशने राजपुत्रके साहाय्यार्थ मुसलमानों जिस वर्ष गई नहीं होता, उस वर्ष कृषक यव, उड़द, पर अपना सैन्य भेजा। किन्तु दोबार पराजय हुआ। मूग, ज्वार प्रभृति बोते हैं। ऊख, नील, सन, कपास, युहमें मुसलमानोंको फौज भी बहुत मरी। उधर बैस अफीम, तम्बाकू. सरसों और तरह तरह की सबजीको राज तिलकचन्द्र अयोध्या प्रदेश के दक्षिण भागमें स्वाधीन खेती भी होती है। भावसे राजत्व चलाते थे। मुसलमानोंने उनाव ले २ अपने जिले को तहसील। यह अक्षा... उनके परितोषार्थ कितना हो उपढौकन पहुंचाया और १७ तथा २६ ४० उ. और ट्राधि०.८०.२१ एवं साथ ही यह भी कहलाया-'हमारे बुजुर्ग बहाउद्दीन ८०.४४ पू० के मध्य अवस्थित है। चार परगने शहाबुद्दीन से मिलकर कुलोज लड़ने जाते थे। लगते हैं-उनाव, परियर, सिकन्दरपुर और हरहा। लेकिन विष्णुराजने उन्हें बेइन्साफोसे मार डाला। भूमिका परिमाण ३८५ वर्ग मील है। लोकसंख्या इसीसे हमने उनाव ले लिया है।' तिलकचन्द्रने प्रायः दो लाख है। सोचा-मुसलमानोंको चिढ़ाना अच्छा नहीं, क्योंकि ३ अपने जिलेका प्रधान नगर। यह अक्षा. उससे हमपर भी विषद पड़ सकती है। इस प्रकार २६. ३२ २५“ उ० और ट्राधि० ८०.२ पू. पर कान- अग्रपश्चात् देख उन्होंने उपहार ग्रहण किया और पुरसे साढ़े ४ कोस उत्तरपूर्व अवस्थित है। कोई वचन दिया-'हम आपसे विवाद बढ़ाना नहीं चाहते। १५ देवदेवोके मन्दिर तथा १० मसजिद हैं। इस हमारे अधिकारका कोई राजपूत आप लोगोंपर अस्त्र नगरको प्रतिष्ठाके सम्बन्धमें एक प्रवाद सुनते हैं- म उठायेगा।' फिर दिल्लोके सम्राटने सन्तुष्ट हो पूर्वकालमें उनाव नगर वनसे भरा था। कोई सवा सैयदोंको 'जमीन्दारौ'की सनद बखू शी थी। सिपाही हजार वर्ष पहले वङ्गराजके अधीनस्थ गजसिंह नामक विद्रोहके समय उनावके कितने ही लोग अंगरेजोंसे चौहान सिपाहीने इस स्थानको परिष्कार करा 'सराय- लड़े। जनवारके राजा यशोसिंह फतेहगढ़में ठहर गड़ा' नामक एक नगर बसाया। किन्तु अल्प दिन पलातक अंगरेजोंको नामा साहबके पास पकड़ भेजते | बाद ही वे इसे छोड़ गये थे। फिर कान्यकुबराज थे। अंगरेजी-सेनापति हावलकने उनके विरुद्ध सैन्य अजयपालने उन्नाव नगर पर अपना अधिकार भेजा। युद्ध में यशोसिंह पाहत हुये, जिससे उनके जमाया। उन्होंने खांडेसिंहको इस स्थानका शासन प्राण निकल गये। बलवा मिटनेपर अंगरेजोंने कर्ता बनाकर भेजा था। कुछ दिन बाद उनवन्त स्थानीय गजपुत्रको फांसीपर चढ़ाया और राज्यको सिंह नामक कोई विसेन जातीय खांडेसिंहको छीन स्वीय कर लगाया। उस समयसे आजतक उनाव मार इस स्थानके स्वाधीन राजा बने। उन्होंने अपने ब्रटिश शासनमें ही विद्यमान है। नामानुसार 'सरायगड़ा के बदले उनाव नाम रखा ____ अधिवासियोंमें राजपूतोंको संख्या अधिक है। था। १४५० ई में तहशीय राजा अमरावत सिंहके फिर ब्राह्मण, गोसाई, कायस्थ, बनिया, अहीर, लोध, | समय सैयदोंने छलकर कौशससे इस नगरको अपने पासी, काछी, कोरी, चमार, नाई, तेली, तंबोली, हाथ लिया। बरई, कुरमी, धोबी, कहार, कुम्हार, लोहार, भुरजी, .. १८५७ ई० को २८ वौं जुलाईको उनावमें सेना-<noinclude></noinclude> hb9zkebxkglw8xcbkrf3va8oa66wes8 667465 667462 2026-07-11T12:33:46Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 667465 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२८२|उनाव}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} अधिक नशा पीये थे। उधर मुसलमानोंने दुर्गमें पहुंचते ही असि खींची और अविलम्ब ही राजदुर्ग अपने हाथमें कर लिया। राजपरिवारके निरस्त्र लोग पशुके समान मारे गये। दुर्घटनाके समय राजपुत्र शिकार खेलने गये थे। अकस्मात् यह दारुण संवाद पा वे मानिकपुरको अपने समीपस्थ एकजनके आश्रयसे भगे। उसस्थानके नरेशने राजपुत्रके साहाय्यार्थ मुसलमानों पर अपना सैन्य भेजा। किन्तु दीवार पराजय हुआ। युद्धमें मुसलमानोंकी फौज भी बहुत मरी। उधर बैसराज तिलकचन्द अयोध्याप्रदेशके दक्षिण भागमें स्वाधीन भावसे राजत्व चलाते थे। मुसलमानोंने उनाव ले उनके परितोषार्थ कितना ही उपढौकन पहुंचाया और साथ ही यह भी कहलाया—'हमारे बुजुर्ग बहाउद्दीन् शहाबुद्दीनसे मिलकर कन्नौज लड़ने जाते थे। लेकिन विष्णुराजने उन्हें बेइन्साफीसे मार डाला। इसीसे हमने उनाव ले लिया है।' तिलकचन्दने सोचा—मुसलमानोंको चिढ़ाना अच्छा नहीं, क्योंकि उससे हमपर भी विपद् पड़ सकती है। इसप्रकार अग्रपश्चात् देख उन्होंने उपहार ग्रहण किया और वचन दिया—'हम आपसे विवाद बढ़ाना नहीं चाहते। हमारे अधिकारका कोई राजपूत आप लोगोंपर शस्त्र न उठायेगा।' फिर दिल्लीके सुल्ताने सन्तुष्ट हो सैयदोंको 'जमीन्दारी'की सनद बख्शी थी। सिपाही-विद्रोहके समय उनावके कितने ही लोग अंग्रेजोंसे लड़े। जनवारके राजा यशोसिंह फतेहगढ़में ठहर पलातक अंगरेजोंको नाना साहबके पास पकड़ भेजते थे। अंगरेजी-सेनापति हावलकने उनके विरुद्ध सैन्य भेजा। युद्धमें यशोसिंह घायत हुए, जिससे उनके प्राण निकल गये। बलवा मिटनेपर अंगरेजोंने स्थानीय राजपुत्रको फांसीपर चढ़ाया और राज्यको छीन स्वीय कर लगाया। उस समयसे आजतक उनाव ब्रिटिश शासनमें ही विद्यमान है। अधिवासियोंमें राजपूतोंकी संख्या अधिक है। फिर ब्राह्मण, गोसाईं, कायस्थ, बनिया, अहीर, लोध, पासी, काछी, कोरी, चमार, नाई, तेली, तंबोली, बरई, कुरमी, धोबी, कहार, कुम्हार, लोहार, सुरजी, {{Multicol-break}} माली, कलवार, धानुक, भङ्गी, सोनार और मल्ल प्रभृति उच्च-नीच सभी हिन्दू रहते हैं। मुसलमानोंमें पठान, शैख, और सैयद ज्यादा हैं। वे प्राय: सकल ही सुन्नी सम्प्रदायसुक्त हैं। ज़मीन् दोरसा, मटियार, बलुई और ऊसर कई भागोंमें विभक्त है। कई वर्षके अन्तरसे गेहूँ उपजता है। जिस वर्ष गेहूँ नहीं होता, उस वर्ष कृषक यव, उड़द, मूंग, ज्वार प्रभृति बोते हैं। जख, नील, सन, कपास, अफीम, तम्बाकू, सरसों और तरह तरहकी सब्जीकी खेती भी होती है। २ अपने ज़िलेको तहसील। यह अक्षां॰ २६° १७' तथा २६° ४०' उ॰ और द्राघि॰ ८०° २१' एवं ८०° ४४' पू॰ के मध्य अवस्थित है। चार परगने लगते हैं—उनाव, परियर, सिकन्दरपुर और हसदा। भूमिका परिमाण ३८५ वर्ग मील है। लोकसंख्या प्राय: दो लाख है। ३ अपने ज़िलेको प्रधान नगर। यह अक्षां॰ २६° २' २५'' उ॰ और द्राघि॰ ८०° २' पू॰ पर कानपुरसे साढ़े ४ कोस उत्तरपूर्व अवस्थित है। कोई १५ देवदेवीके मन्दिर तथा १० मसजिद हैं। इस नगरकी प्रतिष्ठाके सम्बन्धमें एक प्रवाद सुनते हैं— पूर्वकालमें उनाव नगर बनसे भरा था। कोई सवा हजार वर्ष पहले वङ्गराजके अधीनस्थ गजसिंह नामक चौहान सिपाहीने इस स्थानको परिष्कार करा 'सरायगड़ा' नामक एक नगर बसाया। किन्तु कुछ दिन बाद ही वे इसे छोड़ गये थे। फिर कान्यकुब्जराज अजयपालने उनाव नगर पर अपना अधिकार जमाया। उन्होंने खांडेसिंहको इस स्थानका शासन कर्ता बनाकर भेजा था। कुछ दिन बाद उनमल्ल सिंह नामक कोई विसेन जातीय खांडेसिंहको मार इस स्थानके स्वाधीन राजा बने। उन्होंने अपने नामानुसार 'सरायगड़ा'के बदले उनाव नाम रखा था। १४५० ई॰ में तहंशीय राजा अमरावत सिंहके समय सैयदोंने छलकर कौशलसे इस नगरको अपने हाथ लिया। १८५७ ई॰ की २९ वीं जुलाईको उनावमें सेना- {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> hf2dyigsdy9t1t6f64mqstfexpk8j8e 667466 667465 2026-07-11T12:34:25Z अनुश्री साव 80 667466 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२८२|उनाव}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} अधिक नशा पीये थे। उधर मुसलमानोंने दुर्गमें पहुंचते ही असि खींची और अविलम्ब ही राजदुर्ग अपने हाथमें कर लिया। राजपरिवारके निरस्त्र लोग पशुके समान मारे गये। दुर्घटनाके समय राजपुत्र शिकार खेलने गये थे। अकस्मात् यह दारुण संवाद पा वे मानिकपुरको अपने समीपस्थ एकजनके आश्रयसे भगे। उसस्थानके नरेशने राजपुत्रके साहाय्यार्थ मुसलमानों पर अपना सैन्य भेजा। किन्तु दीवार पराजय हुआ। युद्धमें मुसलमानोंकी फौज भी बहुत मरी। उधर बैसराज तिलकचन्द अयोध्याप्रदेशके दक्षिण भागमें स्वाधीन भावसे राजत्व चलाते थे। मुसलमानोंने उनाव ले उनके परितोषार्थ कितना ही उपढौकन पहुंचाया और साथ ही यह भी कहलाया—'हमारे बुजुर्ग बहाउद्दीन् शहाबुद्दीनसे मिलकर कन्नौज लड़ने जाते थे। लेकिन विष्णुराजने उन्हें बेइन्साफीसे मार डाला। इसीसे हमने उनाव ले लिया है।' तिलकचन्दने सोचा—मुसलमानोंको चिढ़ाना अच्छा नहीं, क्योंकि उससे हमपर भी विपद् पड़ सकती है। इसप्रकार अग्रपश्चात् देख उन्होंने उपहार ग्रहण किया और वचन दिया—'हम आपसे विवाद बढ़ाना नहीं चाहते। हमारे अधिकारका कोई राजपूत आप लोगोंपर शस्त्र न उठायेगा।' फिर दिल्लीके सुल्ताने सन्तुष्ट हो सैयदोंको 'जमीन्दारी'की सनद बख्शी थी। सिपाही-विद्रोहके समय उनावके कितने ही लोग अंग्रेजोंसे लड़े। जनवारके राजा यशोसिंह फतेहगढ़में ठहर पलातक अंगरेजोंको नाना साहबके पास पकड़ भेजते थे। अंगरेजी-सेनापति हावलकने उनके विरुद्ध सैन्य भेजा। युद्धमें यशोसिंह घायत हुए, जिससे उनके प्राण निकल गये। बलवा मिटनेपर अंगरेजोंने स्थानीय राजपुत्रको फांसीपर चढ़ाया और राज्यको छीन स्वीय कर लगाया। उस समयसे आजतक उनाव ब्रिटिश शासनमें ही विद्यमान है। अधिवासियोंमें राजपूतोंकी संख्या अधिक है। फिर ब्राह्मण, गोसाईं, कायस्थ, बनिया, अहीर, लोध, पासी, काछी, कोरी, चमार, नाई, तेली, तंबोली, बरई, कुरमी, धोबी, कहार, कुम्हार, लोहार, सुरजी, {{Multicol-break}} माली, कलवार, धानुक, भङ्गी, सोनार और मल्ल प्रभृति उच्च-नीच सभी हिन्दू रहते हैं। मुसलमानोंमें पठान, शैख, और सैयद ज्यादा हैं। वे प्राय: सकल ही सुन्नी सम्प्रदायसुक्त हैं। ज़मीन् दोरसा, मटियार, बलुई और ऊसर कई भागोंमें विभक्त है। कई वर्षके अन्तरसे गेहूँ उपजता है। जिस वर्ष गेहूँ नहीं होता, उस वर्ष कृषक यव, उड़द, मूंग, ज्वार प्रभृति बोते हैं। जख, नील, सन, कपास, अफीम, तम्बाकू, सरसों और तरह तरहकी सब्जीकी खेती भी होती है। २ अपने ज़िलेको तहसील। यह अक्षां॰ २६° १७' तथा २६° ४०' उ॰ और द्राघि॰ ८०° २१' एवं ८०° ४४' पू॰ के मध्य अवस्थित है। चार परगने लगते हैं—उनाव, परियर, सिकन्दरपुर और हसदा। भूमिका परिमाण ३८५ वर्ग मील है। लोकसंख्या प्राय: दो लाख है। ३ अपने ज़िलेको प्रधान नगर। यह अक्षां॰ २६° २' २५" उ॰ और द्राघि॰ ८०° २' पू॰ पर कानपुरसे साढ़े ४ कोस उत्तरपूर्व अवस्थित है। कोई १५ देवदेवीके मन्दिर तथा १० मसजिद हैं। इस नगरकी प्रतिष्ठाके सम्बन्धमें एक प्रवाद सुनते हैं— पूर्वकालमें उनाव नगर बनसे भरा था। कोई सवा हजार वर्ष पहले वङ्गराजके अधीनस्थ गजसिंह नामक चौहान सिपाहीने इस स्थानको परिष्कार करा 'सरायगड़ा' नामक एक नगर बसाया। किन्तु कुछ दिन बाद ही वे इसे छोड़ गये थे। फिर कान्यकुब्जराज अजयपालने उनाव नगर पर अपना अधिकार जमाया। उन्होंने खांडेसिंहको इस स्थानका शासन कर्ता बनाकर भेजा था। कुछ दिन बाद उनमल्ल सिंह नामक कोई विसेन जातीय खांडेसिंहको मार इस स्थानके स्वाधीन राजा बने। उन्होंने अपने नामानुसार 'सरायगड़ा'के बदले उनाव नाम रखा था। १४५० ई॰ में तहंशीय राजा अमरावत सिंहके समय सैयदोंने छलकर कौशलसे इस नगरको अपने हाथ लिया। १८५७ ई॰ की २९ वीं जुलाईको उनावमें सेना- {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> dhvex0ci53cwca4jmw2072q429g0tre पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८४ 250 75966 667479 609080 2026-07-11T14:49:38Z अनुश्री साव 80 667479 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उनाला-उन्टूरू|२८३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} २८३ उनाला-उन्दुरु पति हावलकके साथ विद्रोहियोंका प्रधान युद्ध हुआ। उन्दिरमारी (सं० स्त्री०) मूषिकारी, एक बूटो। था। यहां चौनी बनाने का एक पुतलीघर खुला है। मूषिकारी कटक तथा नेत्रको लाभ पहुंचाने, पाखुका उनावके पेड़े अधिक प्रसिद्ध हैं। विष मारने, और व्रणदोष एवं नेत्रके रोगको मिटाने- उनाला (हिं० पु.) ग्रीष्मऋतु, गर्मी का मौसम।। वाली है। ( राजनिघण्ट) । उनासो, उन्नासौ देखो। उन्दी-वृक्ष विशेष, एक पेड़ । यह बम्बई प्रान्तके उनींदा (हिं.) उब्रिद्र देखो। रत्नागिरि जिले में समुद्र किनारे साधारणतः उपजता उनेवाल-गुजराती ब्राह्मणों की एक श्रेणी। इस है। इसके वीजका कटु-तैल मूल्यवान् है। तनेसे श्रेणोके ब्राह्मण दुर्भिक्षसे पीड़ित हो अपना देश राज- छोटो नौका बनती है। पूताना छोड़ गुजरातमें जा बसे थे। ये प्रायः बड़ोदे उन्दोकवाटिका-बम्बई प्रान्तके कनाड़ा जिलेका एक और काठियावाड़में रहते हैं। उना ग्रामके नामपर ग्राम। मालखेड़ाधिप राष्ट्रकूट-नृपति भविष्य के पुत्र उनेवाल कहे जाते हैं। उक्त ग्राम वेजा और वाधल अभिमन्युने इसे एक ब्राह्मणको पेठपङ्गरकवाले राजपूतोंके नेता वैजोने इनसे छीन लिया था। प्रायः दक्षिण-शिवको सेवाके लिये उत्सर्ग किया था। ताम- कृषिकार्य और भिक्षा पर जीविका निर्वाह करते हैं।। उन्द-काठियावाड़ प्रान्तको एक छोटी नदी। यह उन्दोवनकोष्ठक-तोण्डकराष्ट्रका एक उपविभाग। आज लोधिकासे निकल उत्तरको ओर बहती हुयी जोदियाके कल इसे उररुककाड़ कहते हैं। यह काञ्चीपुरम्के पास कछको खाडौमें जा गिरती है। समीप अवस्थित है। जो प्राचीन ताम्रफलक मिला, 'उन्दक (सं० पु०) धवल यावनाल, सफेद मकई । उसमें लिखा है कि-अपने मुख्यमन्त्री ब्रह्मश्रीराज वा उन्दन (सं० लो०) लेदन, खिंचाई । ब्रह्म-युवराजके कहनेसे नन्दीवरम् टपतिने अपने उन्दर, इन्दुर देखो। राज्यके २२वें वर्षमें किसी ब्राह्मण को कोडूकोल्ली उन्दरन-बम्बई प्रान्तको एक पर्वतश्रेणी। इसके नामक इस प्रान्त का एक ग्राम उत्सर्ग किया था। आधारपर धोलका और झालावाड़ नगर बसा है। उन्दुर, इन्दुर देखो। उन्दसरवैया-काठियावाड़ का एक प्राचीन उपविभाग। उन्दुरकर्णी ( स० स्त्रो०) उन्दुरस्य कर्णइव, गौरा- आज काल यह गोहिलवाड़में मिल गया है। क्षेत्र दित्वात् डोष्। पाखुपर्णो, मूसाकानी । फल १६० वर्गमौल है। पूर्वको ओर खम्बातको | उन्दुरु, इन्दुर देखो। खाड़ी है। शतरुजी नदोके दक्षिण तट तक उन्द उन्टुरुक इन्दुर देखो। सरवैया विस्तृत है। . उन्दुरुकर्णा (सं० स्त्रो०) १ पाखुपर्णी लता, चहा- उन्दिरखेड़ा-बम्बई प्रान्तके खानदेश जिलेका एक कानो। २ दन्तोभेद, किसो किस्मको दांतो। गांव। बोरी नदीके एक होपमें श्रीनागेश्वर महा- उन्दुरुकर्णिका, उन्दुरुका देखो। देवका मन्दिर बना है। कहा जाता है-त्रयम्बक उन्दुरुकर्णी, उन्दुरुकर्या देखो। राव माम पेठेने उक्त मन्दिर निर्माण कराया था। यह उन्दुरुपर्णी, उन्दुरुका देखी। गांव बाम्बक रावको पेशवाने कोई १६३ वर्ष हुये | उन्दूर (सं० पु.) उन्द-उरु । इन्दुर, चूहा। उत्सर्ग किया था। चारो ओर ०५ फीट ऊंचा प्राचौर संस्कृत पर्याय-मुषिक, पाखु, गिरिक, बालमूषिका, है। नदीमें जानेके लिये सोपान लगे हैं और सुन्दर मूष, मूषक, मूषिक, खनक, वधु, वृष, पाखनिक, आलोकस्तम्भ खड़ा है। मन्दिर ४५ फीट लम्बा और वृश, दोना, मूषोका, विलेशय और शुषिर है। क्षुद्र २५ फीट चौड़ा है। हारप्रकोष्ठ में नन्दीको मूर्ति है। इन्दुरको चिक्क, वेश्मनकुल, चिक्का, हालाहला पौर प्रस्तर सुन्दर कारकार्यसे खचित है। । मननिका कहते हैं। इन्दुर देखो।<noinclude></noinclude> iv55zkbw61ezufuqt7fgugxso4rmffx 667482 667479 2026-07-11T15:10:50Z अनुश्री साव 80 667482 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उनाला-उन्टूरू|२८३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पति हावलकके साथ विद्रोहियोंका प्रधान युद्ध हुआ था। यहाँ चीनी बनानेका एक पुतलीघर खुला है। उनावके पेड़े अधिक प्रसिद्ध हैं। <br>उनाला (हिं॰ पु॰) ग्रीष्मॠतु, गर्मीका मौसम।<br> <br>उनासी, <small>उन्नासी देखो।</small><br> <br>उनींदा (हिं॰) <small>उन्निद्र देखो।</small><br> <br>उनेवाल—गुजराती ब्राह्मणोंकी एक श्रेणी। इस श्रेणीके ब्राह्मण टुमिडसे पीड़ित हो अपना देश राजपूताना छोड़ गुजरातमें जा बसे थे। ये प्राय: बड़ोदे और काठियावाड़में रहते हैं। उना ग्रामके नामपर उनेवाल कहे जाते हैं। उक्त ग्राम वेजा और वाधल राजपूतोंके नेता वेजोने इनसे छीन लिया था। प्राय: कृषिकार्य और भिक्षा पर जीविका निर्वाह करते हैं।<br> <br>उन्ड—काठियावाड़ प्रान्तकी एक छोटी नदी। यह लोधिकासे निकल उत्तरकी ओर बढ़ती हुयी जोदियाके पास कछकी खाड़ीमें जा गिरती है।<br> <br>उन्दक (सं॰ पु॰) धवल यावनाल, सफेद मकई।<br> <br>उन्दक (सं॰ क्ली॰) लोढन, खिंचाई।<br> <br>उन्दक, <small>इन्दुर देखो।</small><br> <br>उन्दरन—बम्बई प्रान्तकी एक पर्वतश्रेणी। इसके आधारपर धोलका और भालावाड़ नगर बसा है।<br> <br>उन्दसरवैया—काठियावाड़का एक प्राचीन उपविभाग। आज काल यह गोहिलवाड़में मिल गया है। क्षेत्रफल १६० वर्गमील है। पूर्वको ओर खम्बातकी खाड़ी है। शतरूञ्जी नदीके दक्षिण तट तक उन्दसरवैया विस्तृत है।<br> <br>उन्दिरखेड़ा—बम्बई प्रान्तके खानदेश जिलेका एक गांव। बोरी नदीके एक द्वीपमें श्रीनागेश्वर महादेवका मन्दिर बना है। कहा जाता है—त्रम्बकराव माम पेठेने उक्त मन्दिर निर्माण कराया था। यह गांव त्रम्बक रावको पैशवाने कोई १६३ वर्ष पूर्व छत्रसर्ग किया था। चारो ओर ७५ फीट ऊंचा प्राचीर है। नदीमें जानेकि लिये सोपान लगे हैं और सुन्दर आलोकस्तम्भ खड़ा है। मन्दिर ४५ फीट लम्बा और २५ फीट चौड़ा है। द्वारप्रकोष्ठमें नन्दीकी मूर्ति है। प्रस्तर सुन्दर कारूकार्यसे खचित है।<br> {{Multicol-break}} २८३ उनाला-उन्दुरु पति हावलकके साथ विद्रोहियोंका प्रधान युद्ध हुआ। उन्दिरमारी (सं० स्त्री०) मूषिकारी, एक बूटो। था। यहां चौनी बनाने का एक पुतलीघर खुला है। मूषिकारी कटक तथा नेत्रको लाभ पहुंचाने, पाखुका उनावके पेड़े अधिक प्रसिद्ध हैं। विष मारने, और व्रणदोष एवं नेत्रके रोगको मिटाने- उनाला (हिं० पु.) ग्रीष्मऋतु, गर्मी का मौसम।। वाली है। ( राजनिघण्ट) । उनासो, उन्नासौ देखो। उन्दी-वृक्ष विशेष, एक पेड़ । यह बम्बई प्रान्तके उनींदा (हिं.) उब्रिद्र देखो। रत्नागिरि जिले में समुद्र किनारे साधारणतः उपजता उनेवाल-गुजराती ब्राह्मणों की एक श्रेणी। इस है। इसके वीजका कटु-तैल मूल्यवान् है। तनेसे श्रेणोके ब्राह्मण दुर्भिक्षसे पीड़ित हो अपना देश राज- छोटो नौका बनती है। पूताना छोड़ गुजरातमें जा बसे थे। ये प्रायः बड़ोदे उन्दोकवाटिका-बम्बई प्रान्तके कनाड़ा जिलेका एक और काठियावाड़में रहते हैं। उना ग्रामके नामपर ग्राम। मालखेड़ाधिप राष्ट्रकूट-नृपति भविष्य के पुत्र उनेवाल कहे जाते हैं। उक्त ग्राम वेजा और वाधल अभिमन्युने इसे एक ब्राह्मणको पेठपङ्गरकवाले राजपूतोंके नेता वैजोने इनसे छीन लिया था। प्रायः दक्षिण-शिवको सेवाके लिये उत्सर्ग किया था। ताम- कृषिकार्य और भिक्षा पर जीविका निर्वाह करते हैं।। उन्द-काठियावाड़ प्रान्तको एक छोटी नदी। यह उन्दोवनकोष्ठक-तोण्डकराष्ट्रका एक उपविभाग। आज लोधिकासे निकल उत्तरको ओर बहती हुयी जोदियाके कल इसे उररुककाड़ कहते हैं। यह काञ्चीपुरम्के पास कछको खाडौमें जा गिरती है। समीप अवस्थित है। जो प्राचीन ताम्रफलक मिला, 'उन्दक (सं० पु०) धवल यावनाल, सफेद मकई । उसमें लिखा है कि-अपने मुख्यमन्त्री ब्रह्मश्रीराज वा उन्दन (सं० लो०) लेदन, खिंचाई । ब्रह्म-युवराजके कहनेसे नन्दीवरम् टपतिने अपने उन्दर, इन्दुर देखो। राज्यके २२वें वर्षमें किसी ब्राह्मण को कोडूकोल्ली उन्दरन-बम्बई प्रान्तको एक पर्वतश्रेणी। इसके नामक इस प्रान्त का एक ग्राम उत्सर्ग किया था। आधारपर धोलका और झालावाड़ नगर बसा है। उन्दुर, इन्दुर देखो। उन्दसरवैया-काठियावाड़ का एक प्राचीन उपविभाग। उन्दुरकर्णी ( स० स्त्रो०) उन्दुरस्य कर्णइव, गौरा- आज काल यह गोहिलवाड़में मिल गया है। क्षेत्र दित्वात् डोष्। पाखुपर्णो, मूसाकानी । फल १६० वर्गमौल है। पूर्वको ओर खम्बातको | उन्दुरु, इन्दुर देखो। खाड़ी है। शतरुजी नदोके दक्षिण तट तक उन्द उन्टुरुक इन्दुर देखो। सरवैया विस्तृत है। . उन्दुरुकर्णा (सं० स्त्रो०) १ पाखुपर्णी लता, चहा- उन्दिरखेड़ा-बम्बई प्रान्तके खानदेश जिलेका एक कानो। २ दन्तोभेद, किसो किस्मको दांतो। गांव। बोरी नदीके एक होपमें श्रीनागेश्वर महा- उन्दुरुकर्णिका, उन्दुरुका देखो। देवका मन्दिर बना है। कहा जाता है-त्रयम्बक उन्दुरुकर्णी, उन्दुरुकर्या देखो। राव माम पेठेने उक्त मन्दिर निर्माण कराया था। यह उन्दुरुपर्णी, उन्दुरुका देखी। गांव बाम्बक रावको पेशवाने कोई १६३ वर्ष हुये | उन्दूर (सं० पु.) उन्द-उरु । इन्दुर, चूहा। उत्सर्ग किया था। चारो ओर ०५ फीट ऊंचा प्राचौर संस्कृत पर्याय-मुषिक, पाखु, गिरिक, बालमूषिका, है। नदीमें जानेके लिये सोपान लगे हैं और सुन्दर मूष, मूषक, मूषिक, खनक, वधु, वृष, पाखनिक, आलोकस्तम्भ खड़ा है। मन्दिर ४५ फीट लम्बा और वृश, दोना, मूषोका, विलेशय और शुषिर है। क्षुद्र २५ फीट चौड़ा है। हारप्रकोष्ठ में नन्दीको मूर्ति है। इन्दुरको चिक्क, वेश्मनकुल, चिक्का, हालाहला पौर प्रस्तर सुन्दर कारकार्यसे खचित है। । मननिका कहते हैं। इन्दुर देखो।<noinclude></noinclude> 9sk07zcmkuv3jo96mhkwx44kwl9vcyu 667490 667482 2026-07-11T16:01:41Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 667490 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उनाला-उन्टूरू|२८३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पति हावलकके साथ विद्रोहियोंका प्रधान युद्ध हुआ था। यहाँ चीनी बनानेका एक पुतलीघर खुला है। उनावके पेड़े अधिक प्रसिद्ध हैं। <br>उनाला (हिं॰ पु॰) ग्रीष्मॠतु, गर्मीका मौसम।<br> <br>उनासी, <small>उन्नासी देखो।</small><br> <br>उनींदा (हिं॰) <small>उन्निद्र देखो।</small><br> <br>उनेवाल—गुजराती ब्राह्मणोंकी एक श्रेणी। इस श्रेणीके 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गांव त्रम्बक रावको पैशवाने कोई १६३ वर्ष पूर्व छत्रसर्ग किया था। चारो ओर ७५ फीट ऊंचा प्राचीर है। नदीमें जानेकि लिये सोपान लगे हैं और सुन्दर आलोकस्तम्भ खड़ा है। मन्दिर ४५ फीट लम्बा और २५ फीट चौड़ा है। द्वारप्रकोष्ठमें नन्दीकी मूर्ति है। प्रस्तर सुन्दर कारूकार्यसे खचित है।<br> {{Multicol-break}} <br>उन्दिरमारी (सं॰ स्त्री॰) मूषिकारी, एक बूटी। मूषिकारी कटक तथा नेत्रको लाभ पहुंचाने, आंखका विष मारने, और ब्रणदोष एवं नेत्रके रोगको मिटानेवाली है। <small>(राजनिघण्ट,)</small><br> <br>उन्दी—द्रुम विशेष, एक पेड़। यह बम्बई प्रान्तके रत्नागिरि जिलेमें समुद्र किनारे साधारणतः उपजता है। इसके बीजका कटु-तैल मूख्वान् है। तनेसे छोटी नौका बनती है।<br> <br>उन्दोकवाटिका—बम्बई प्रान्तके कनाड़ा जिले का एक ग्राम। मालखेडाधिप राष्ट्रकूट-नृपति भविष्यके पुत्र अभिमन्युनै इसे एक ब्राह्मणको पेठपङ्गकवाले दक्षिण-शिवको सेवाकि लिये उत्सर्ग किया था। ताम्रफलकपर उक्त विवरण लिखा है।<br> <br>उन्दीवनकोष्ठक—तोण्डराष्ट्रका एक उपविभाग। आजकल इसे उरुककाडू कहते हैं। यह काञ्चीपुरमके समीप अवस्थित है। जो प्राचीन ताम्रफलक मिला, उसमें लिखा है कि—अपने मुख्यमन्त्री ब्रह्मश्रीराज वा ब्रह्म-युवराजके कहनेसे नन्दीवरम् नृपतिने अपने राज्यके २२वें वर्षमें किसी ब्राह्मणको कोड्कोशि नामक इस प्रान्तका एक ग्राम उत्सर्ग किया था।<br> <br>उन्दुर, <small>इन्दुर देखो।</small><br> <br>उन्दुरकर्णा (सं॰ स्त्री॰) उन्दूरस्य कर्णइव, गौरादित्वात् ङीष्। आखुपर्णी, मूसाकानी।<br> <br>उन्दुर, <small>इन्दुर देखो।</small><br> <br>उन्दुरूक <small>इन्दुर देखो।</small><br> <br>उन्दुरकर्णी (सं॰ स्त्री॰) १ आखुपर्णी लता, चूहाकानी। २ दन्तोमेद, किसी किस्मकी दांती।<br> <br>उन्दुरकर्णिका, <small>उन्दुरूकर्णा देखो।</small><br> <br>उन्दुरकर्णी, <small>उन्दुरकर्णा देखो।</small><br> <br>उन्दुरपर्णी, <small>उन्दुरकर्णा देखो।</small><br> <br>उन्दूर (सं॰ पु॰) उन्द-उरू। इन्दुर, चूहा। संस्कृत पर्याय—मुषिक, आखु, गिरिक, बालमूषिका, मूष, मूषक, मूषिक, खनक, बभ्रु, टुष, आखनिक, वृश, दोना, मूषीका, विलेशय और शविर है। शुद्ध इन्दुरको चिक, वेशनकुल, चिक्का, हालाहला और अञ्जनिका कहते हैं। <small>इन्दुर देखो।</small><br> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 77cubcp13tgcmp3sk0vc8i9y2arew41 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८७ 250 75970 667538 609083 2026-07-12T06:57:28Z अनुश्री साव 80 667538 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२८६|उन्नतनगर-उन्नड्व}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} नवपरिणीत भार्याको भलावुरा कहा। उससे बेजल उन्नतनाभि (स. त्रि.) उन्नतो नाभिर्यस्य । उच्च- बाजीने क्रइ हो उन्बतनगर पर आक्रमण मारा था। नाभियुक्त, निकले हुये तांदवाला, तोंदल। उन्होंने बहुसंख्यक अधिवासियोंका मस्तक विखण्डित उन्नतशिरः (सं० वि०) शिर उठाये हुषा, जो सर कर अपना दारुण क्रोध मिटाया। उन्नतनगरमें ऊपरको खड़ा किये हो। ब्रह्महत्या हुयो चौर पुण्यभूमि पापमयो समझो गयो। उन्नतांश (सं० पु०) उत्तुङ्ग भाग, ऊंचा हिस्सा। ब्राह्मण मात्र यह स्थान छोड़ दिलवर नगरमें जाकर ज्योतिषमें चन्द्रमाके दक्षिण वा वाम उन्नत अंशको रहे। उसी समयसे यह स्थान उन कहलाने लगा। देखते हैं। इन मुसलमानोंके हाथमें जाने से उससे डेढ़ कोस दक्षिण | उन्नतानत (सं० त्रि.) उबत पानत। उच्चनीच, दिलवर नामक नगर बसा। गुजरातवाले सुलतानोंके | ऊंचा-नोचा। राजत्वकाल में यह एक प्रसिद्ध स्थान हो गया था। उन्नति (संत्रि०) उत्-नम-क्तिन् ।१ वृद्धि, बढ़ती। २ उदय, उठान। ३ समृद्धि, शहाला। ४ उगम, तपःऽग्निहोवनिष्ठानां वेदाध्ययनशालिनाम् । उभार। ५गरुड़पत्नौ। ६ गौरव, इज्जत। ७ सौ- अन्माकं रचिता कोऽस्ति कलिकाले च दारुणे॥ भाग्य, नेकबख तो। ८ उच्चता, उचाई। ८ यमको को दातारीग्यद कथित् को वे मुक्ति प्रदास्यति ॥ भार्या। ये दक्षको एक कन्या थों। ईश्वर उवाच । नक्षत्रादिके उदयको शृङ्गाति कहते हैं- नहाकालखरूपेण निधीनां धनद: प्रति । "मासान्तपाद प्रथमेऽथ वैन्दो: गोबतियद्दिवसेऽवगम्या । युमभ्यगे दास्यति ट्रव्यं समागाराधितोऽपि सः ॥ तदोदयेऽस्ते निशि वा प्रसाध्यः शङ्का विधाः खादितनाडिकायैः ॥” प्रारोग्यदायको नित्य दुर्गादित्यो भविष्यति । (सिद्धान्तशिरोमणि) महोदयं महानन्ददायकं यो भविष्यति ॥ सभ्यागाराधितो ब्रह्मा सर्वकायषु सर्वदा। उन्नतिमत् (सं० त्रि.) १ उच्छ्रित, उठा या निकला सर्वान् कामांस्तथा मोक्ष खभक्तिञ्च प्रदाखति ॥ हुआ। २ उत्तुङ्ग, ऊंचा। विप्रा ऊचुः। उन्नतीश (स० पु.) उन्नतिके स्वामी, गरुड़। यदि तीर्थानि तिष्ठन्ति सर्वाणि सुरसत्तम । उन्नतोदर (सं० पु०) वृत्तखण्ड का अर्ध्व पीठ, दाय- . सङ्गानेश्वरतार्थेषु तथा देवकुले युभे ॥ रेके कतकी ऊपरी सतह । कलावपि महारौद्र अस्माकं यजनाय वै । उन्बद्ध (सं. त्रि.) उत्-नह-ता। १ उहद, टंगा स्थानकं तहि गृहीमो नान्यथा च महेश्वर ॥ या लटका हुधा । २ उत्कट, उभरा हुश्रा। स तथेति प्रतिज्ञाय ददौ तेभ्यः पुरं शुभम् ॥ ३ स्फौत, सूजा या फूला हुआ। ४ उन्म ता, खुला हुआ। साप्तभौम: शशाङ्काभैः प्रासादः परिशोभितम् । नानायानसमायुक्त सर्वतः शोभयान्वितम् । ऋषय ऊचुः । एवं तेभ्यो हि नगर दत्त्वा देवो महेश्वरः । यदि तुष्टो महादेव स्थलकेश्वरनामभृत् । ददर्श विश्वकर्माण प्राञ्जलि पुरत: स्थितम् ॥ अवलोकयनगर सदा तिष्ठ स्थले हर ॥ विश्वकर्मोवाच । तर्थताक्त्वा तदा देवा: स्थलकेऽस्मिन् सदा स्थितः । विलोक्यतां महादेव नगर नगरोत्तमम् । कृते रवमय देवि वेतायाच हिरण्मयम् ॥ सौवर्ण स्थलमारुह्य निर्मितं त्वत्प्रसादतः । रोपाञ्च दापर प्रोक्त' स्थलमश्ममयं कली। विश्वकर्मवचः श्रुत्वा भगवास्त्रिपुरान्तकः । फलं तव स्थितो देवः स्थलकेश्वरनामतः ।। तमारुरोह स्थलकं देवैः सर्वमहर्षिभिः । सदा पूज्ये महादेव उन्नतस्थानवासिभिः । नगर' लोकयामास रमा प्राकारमणितम् । माघे मासि चतुर्दश्यां विशेषस्तव नागरे । ऋषयस्तष्ट वुः सर्वे सवस्थ विपुरान्तकम् ॥ इति ते कथितं देवि उन्नतस्य महोदयम् । तानुवाच महादेवो कृणुध्व' वरमुत्तमम् ।। श्रुतं पापहर' मृणां सर्वकामफलप्रदम् ।।" (प्रभासखण्ड २१६ १०)<noinclude></noinclude> jaagwuwlmv7nq8ft9gh3go8hxb1ad1s 667539 667538 2026-07-12T07:05:07Z अनुश्री साव 80 667539 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२८६|उन्नतनगर-उन्नड्व}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} नवपरिणीत भार्याको भलाबुरा कहा। उससे बेजल बाजीने क्रुद्ध हो उन्नतनगर पर आक्रमण मारा था। उन्होंने बहु संख्यक अधिवासियोंका मस्तक द्विखण्डित कर अपना दारुण क्रोध मिटाया। उन्नतनगरमें ब्रह्महत्या हुयी और पुखभूमि पापमयी समझी गयी। ब्राह्मण मात्र यह खान छोड़ दिलवर नगरमें जाकर रहे। उसी समयसे यह खान उन कहलाने लगा। उन मुसलमानोंके हाथमें जानिसे उससे डेढ़कोस दक्षिण दिलवर नामक नगर बसा। गुजरातवाले सुल्तानोंके राजत्वकालमें यह एक प्रसिद्ध स्थान हो गया था। {{smallrefs}} {{rule}} नवपरिणीत भार्याको भलावुरा कहा। उससे बेजल उन्नतनाभि (स. त्रि.) उन्नतो नाभिर्यस्य । उच्च- बाजीने क्रइ हो उन्बतनगर पर आक्रमण मारा था। नाभियुक्त, निकले हुये तांदवाला, तोंदल। उन्होंने बहुसंख्यक अधिवासियोंका मस्तक विखण्डित उन्नतशिरः (सं० वि०) शिर उठाये हुषा, जो सर कर अपना दारुण क्रोध मिटाया। उन्नतनगरमें ऊपरको खड़ा किये हो। ब्रह्महत्या हुयो चौर पुण्यभूमि पापमयो समझो गयो। उन्नतांश (सं० पु०) उत्तुङ्ग भाग, ऊंचा हिस्सा। ब्राह्मण मात्र यह स्थान छोड़ दिलवर नगरमें जाकर ज्योतिषमें चन्द्रमाके दक्षिण वा वाम उन्नत अंशको रहे। उसी समयसे यह स्थान उन कहलाने लगा। देखते हैं। इन मुसलमानोंके हाथमें जाने से उससे डेढ़ कोस दक्षिण | उन्नतानत (सं० त्रि.) उबत पानत। उच्चनीच, दिलवर नामक नगर बसा। गुजरातवाले सुलतानोंके | ऊंचा-नोचा। राजत्वकाल में यह एक प्रसिद्ध स्थान हो गया था। उन्नति (संत्रि०) उत्-नम-क्तिन् ।१ वृद्धि, बढ़ती। २ उदय, उठान। ३ समृद्धि, शहाला। ४ उगम, तपःऽग्निहोवनिष्ठानां वेदाध्ययनशालिनाम् । उभार। ५गरुड़पत्नौ। ६ गौरव, इज्जत। ७ सौ- अन्माकं रचिता कोऽस्ति कलिकाले च दारुणे॥ भाग्य, नेकबख तो। ८ उच्चता, उचाई। ८ यमको को दातारीग्यद कथित् को वे मुक्ति प्रदास्यति ॥ भार्या। ये दक्षको एक कन्या थों। ईश्वर उवाच । नक्षत्रादिके उदयको शृङ्गाति कहते हैं- नहाकालखरूपेण निधीनां धनद: प्रति । "मासान्तपाद प्रथमेऽथ वैन्दो: गोबतियद्दिवसेऽवगम्या । युमभ्यगे दास्यति ट्रव्यं समागाराधितोऽपि सः ॥ तदोदयेऽस्ते निशि वा प्रसाध्यः शङ्का विधाः खादितनाडिकायैः ॥” प्रारोग्यदायको नित्य दुर्गादित्यो भविष्यति । (सिद्धान्तशिरोमणि) महोदयं महानन्ददायकं यो भविष्यति ॥ सभ्यागाराधितो ब्रह्मा सर्वकायषु सर्वदा। उन्नतिमत् (सं० त्रि.) १ उच्छ्रित, उठा या निकला सर्वान् कामांस्तथा मोक्ष खभक्तिञ्च प्रदाखति ॥ हुआ। २ उत्तुङ्ग, ऊंचा। विप्रा ऊचुः। उन्नतीश (स० पु.) उन्नतिके स्वामी, गरुड़। यदि तीर्थानि तिष्ठन्ति सर्वाणि सुरसत्तम । उन्नतोदर (सं० पु०) वृत्तखण्ड का अर्ध्व पीठ, दाय- . सङ्गानेश्वरतार्थेषु तथा देवकुले युभे ॥ रेके कतकी ऊपरी सतह । कलावपि महारौद्र अस्माकं यजनाय वै । उन्बद्ध (सं. त्रि.) उत्-नह-ता। १ उहद, टंगा स्थानकं तहि गृहीमो नान्यथा च महेश्वर ॥ या लटका हुधा । २ उत्कट, उभरा हुश्रा। स तथेति प्रतिज्ञाय ददौ तेभ्यः पुरं शुभम् ॥ ३ स्फौत, सूजा या फूला हुआ। ४ उन्म ता, खुला हुआ। साप्तभौम: शशाङ्काभैः प्रासादः परिशोभितम् । नानायानसमायुक्त सर्वतः शोभयान्वितम् । ऋषय ऊचुः । एवं तेभ्यो हि नगर दत्त्वा देवो महेश्वरः । यदि तुष्टो महादेव स्थलकेश्वरनामभृत् । ददर्श विश्वकर्माण प्राञ्जलि पुरत: स्थितम् ॥ अवलोकयनगर सदा तिष्ठ स्थले हर ॥ विश्वकर्मोवाच । तर्थताक्त्वा तदा देवा: स्थलकेऽस्मिन् सदा स्थितः । विलोक्यतां महादेव नगर नगरोत्तमम् । कृते रवमय देवि वेतायाच हिरण्मयम् ॥ सौवर्ण स्थलमारुह्य निर्मितं त्वत्प्रसादतः । रोपाञ्च दापर प्रोक्त' स्थलमश्ममयं कली। विश्वकर्मवचः श्रुत्वा भगवास्त्रिपुरान्तकः । फलं तव स्थितो देवः स्थलकेश्वरनामतः ।। तमारुरोह स्थलकं देवैः सर्वमहर्षिभिः । सदा पूज्ये महादेव उन्नतस्थानवासिभिः । नगर' लोकयामास रमा प्राकारमणितम् । माघे मासि चतुर्दश्यां विशेषस्तव नागरे । ऋषयस्तष्ट वुः सर्वे सवस्थ विपुरान्तकम् ॥ इति ते कथितं देवि उन्नतस्य महोदयम् । तानुवाच महादेवो कृणुध्व' वरमुत्तमम् ।। श्रुतं पापहर' मृणां सर्वकामफलप्रदम् ।।" (प्रभासखण्ड २१६ १०)<noinclude></noinclude> 4ewoqhdje2z0cx5sjkuxmrpm6qp16ia 667555 667539 2026-07-12T10:56:21Z अनुश्री साव 80 667555 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२८६|उन्नतनगर-उन्नड्व}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} नवपरिणीत भार्याको भलाबुरा कहा। उससे बेजल बाजीने क्रुद्ध हो उन्नतनगर पर आक्रमण मारा था। उन्होंने बहु संख्यक अधिवासियोंका मस्तक द्विखण्डित कर अपना दारुण क्रोध मिटाया। उन्नतनगरमें ब्रह्महत्या हुयी और पुखभूमि पापमयी समझी गयी। ब्राह्मण मात्र यह खान छोड़ दिलवर नगरमें जाकर रहे। उसी समयसे यह खान उन कहलाने लगा। उन मुसलमानोंके हाथमें जानिसे उससे डेढ़कोस दक्षिण दिलवर नामक नगर बसा। गुजरातवाले सुल्तानोंके राजत्वकालमें यह एक प्रसिद्ध स्थान हो गया था। {{smallrefs}} {{rule}} {{block center|<poem> तपःऽग्निहोत्रनिष्ठानां वेदाध्ययनशालिनाम्। अन्माकं रक्षित कोऽस्ति कलिकाले च दारुणे॥ को दातारंमदं कश्चित् को वै मुक्तिं प्रदास्यति। ईश्वर उवाच। महाकालस्वरूपेण निधीनां धनदः पति। युष्मभ्यो दास्यति द्रव्यं समग्राराधितोऽपि सः॥ आरोग्यदायको नित्यं दुर्गादिद्यो भविष्यति। महोदयं महानन्ददायकं यो भविष्यति॥ समग्राराधितो ब्रह्मा सर्वकार्येषु सर्वदा। सर्वान् कामांस्तथा मोक्षं स्वभक्तिं च प्रदास्यति॥ विप्रा ऊचुः। यदि तीर्थानि तिष्ठन्ति सर्वाणि सुरसत्तम। सङ्गमेश्वरतीर्थे षु तथा देवकुण्डे शुभे॥ कलावपि महारौद्र अस्माकं यजनाय वै। स्थानकं तर्हि गृह्णीमो नान्यथा च महेश्वर॥ स तथेति प्रतिज्ञाय ददौ तेभ्यः पुरं शुभम्॥ सातभौमैः शताद्भैः प्रासादैः परिशोभितम्। नानायानसमायुक्तं सर्वतः शोभयान्वितम्। एवं तेभ्यो हि नगरं दत्वा देवो महेश्वरः॥ ददर्श विश्वकर्माणं प्राञ्जलिं पुरतः स्थितम्॥ विश्वकर्मोवाच। विलोक्यतां महादेव नगरं नगरोत्तम्। सौवर्णं स्थलमास्थाय निर्मितं त्वत्प्रसादतः॥ विश्वकर्मवचः श्रुत्वा भगवान्त्रिपुरान्तकः। तमारूरोहद् स्थलं दैवैः सर्वमर्हिभिः॥ नगरं लोचयामास रम्यं प्राकारमण्डितम्। ऋषयस्तुष्टुवुः सर्वे तवस्त्वं त्रिपुरान्तकम्॥ तानुवाच महादेवो वृणध्वं वरसुत्तमम्॥ </poem>}} {{Multicol-break}} <br>उन्नतनाभि (सं॰ त्रि॰) उन्नतो नाभिर्यस्य। उच्च- नाभियुक्त, निकले हुये तांदवाला, तोंदल।<br> <br>उन्नतशिरः (सं॰ त्रि॰) गिर उठाये हुआ, जो सर ऊपरको खड़ा किये हो।<br> <br>उन्नतांग (सं॰ पु॰) उन्नत भाग, ऊंचा हिस्सा। ज्योतिषमें चन्द्रमाके दक्षिण वा वाम उन्नत ग्रहको देखते हैं।<br> <br>उन्नतानत (सं॰ त्रि॰) उन्नत आनत। उचनीच, ऊंचा-नीचा।<br> <br>उन्नति (सं॰ स्त्री॰) उत्-नम्-क्लिन्। १ वृद्धि, बढ़ती। २ उदय, उठान। ३ समृद्धि, खुशहाली। ४ उन्नम, उभार। ५ गरुड़पंक्ती। ६ गौरव, इज्जत। ७ सौ- भाग्य, नेकबख्ती। ८ उच्चता, ऊचाई। ९ यमकी भार्या। ये दक्षकी एक कन्या थीं ।<br> नक्षत्रादिके उदयको श्रृङ्गान्नति कहते हैं— नवपरिणीत भार्याको भलावुरा कहा। उससे बेजल उन्नतनाभि (स. त्रि.) उन्नतो नाभिर्यस्य । उच्च- बाजीने क्रइ हो उन्बतनगर पर आक्रमण मारा था। नाभियुक्त, निकले हुये तांदवाला, तोंदल। उन्होंने बहुसंख्यक अधिवासियोंका मस्तक विखण्डित उन्नतशिरः (सं० वि०) शिर उठाये हुषा, जो सर कर अपना दारुण क्रोध मिटाया। उन्नतनगरमें ऊपरको खड़ा किये हो। ब्रह्महत्या हुयो चौर पुण्यभूमि पापमयो समझो गयो। उन्नतांश (सं० पु०) उत्तुङ्ग भाग, ऊंचा हिस्सा। ब्राह्मण मात्र यह स्थान छोड़ दिलवर नगरमें जाकर ज्योतिषमें चन्द्रमाके दक्षिण वा वाम उन्नत अंशको रहे। उसी समयसे यह स्थान उन कहलाने लगा। देखते हैं। इन मुसलमानोंके हाथमें जाने से उससे डेढ़ कोस दक्षिण | उन्नतानत (सं० त्रि.) उबत पानत। उच्चनीच, दिलवर नामक नगर बसा। गुजरातवाले सुलतानोंके | ऊंचा-नोचा। राजत्वकाल में यह एक प्रसिद्ध स्थान हो गया था। उन्नति (संत्रि०) उत्-नम-क्तिन् ।१ वृद्धि, बढ़ती। २ उदय, उठान। ३ समृद्धि, शहाला। ४ उगम, तपःऽग्निहोवनिष्ठानां वेदाध्ययनशालिनाम् । उभार। ५गरुड़पत्नौ। ६ गौरव, इज्जत। ७ सौ- अन्माकं रचिता कोऽस्ति कलिकाले च दारुणे॥ भाग्य, नेकबख तो। ८ उच्चता, उचाई। ८ यमको को दातारीग्यद कथित् को वे मुक्ति प्रदास्यति ॥ भार्या। ये दक्षको एक कन्या थों। ईश्वर उवाच । नक्षत्रादिके उदयको शृङ्गाति कहते हैं- नहाकालखरूपेण निधीनां धनद: प्रति । "मासान्तपाद प्रथमेऽथ वैन्दो: गोबतियद्दिवसेऽवगम्या । युमभ्यगे दास्यति ट्रव्यं समागाराधितोऽपि सः ॥ तदोदयेऽस्ते निशि वा प्रसाध्यः शङ्का विधाः खादितनाडिकायैः ॥” प्रारोग्यदायको नित्य दुर्गादित्यो भविष्यति । (सिद्धान्तशिरोमणि) महोदयं महानन्ददायकं यो भविष्यति ॥ सभ्यागाराधितो ब्रह्मा सर्वकायषु सर्वदा। उन्नतिमत् (सं० त्रि.) १ उच्छ्रित, उठा या निकला सर्वान् कामांस्तथा मोक्ष खभक्तिञ्च प्रदाखति ॥ हुआ। २ उत्तुङ्ग, ऊंचा। विप्रा ऊचुः। उन्नतीश (स० पु.) उन्नतिके स्वामी, गरुड़। यदि तीर्थानि तिष्ठन्ति सर्वाणि सुरसत्तम । उन्नतोदर (सं० पु०) वृत्तखण्ड का अर्ध्व पीठ, दाय- . सङ्गानेश्वरतार्थेषु तथा देवकुले युभे ॥ रेके कतकी ऊपरी सतह । कलावपि महारौद्र अस्माकं यजनाय वै । उन्बद्ध (सं. त्रि.) उत्-नह-ता। १ उहद, टंगा स्थानकं तहि गृहीमो नान्यथा च महेश्वर ॥ या लटका हुधा । २ उत्कट, उभरा हुश्रा। स तथेति प्रतिज्ञाय ददौ तेभ्यः पुरं शुभम् ॥ ३ स्फौत, सूजा या फूला हुआ। ४ उन्म ता, खुला हुआ। साप्तभौम: शशाङ्काभैः प्रासादः परिशोभितम् । नानायानसमायुक्त सर्वतः शोभयान्वितम् । ऋषय ऊचुः । एवं तेभ्यो हि नगर दत्त्वा देवो महेश्वरः । यदि तुष्टो महादेव स्थलकेश्वरनामभृत् । ददर्श विश्वकर्माण प्राञ्जलि पुरत: स्थितम् ॥ अवलोकयनगर सदा तिष्ठ स्थले हर ॥ विश्वकर्मोवाच । तर्थताक्त्वा तदा देवा: स्थलकेऽस्मिन् सदा स्थितः । विलोक्यतां महादेव नगर नगरोत्तमम् । कृते रवमय देवि वेतायाच हिरण्मयम् ॥ सौवर्ण स्थलमारुह्य निर्मितं त्वत्प्रसादतः । रोपाञ्च दापर प्रोक्त' स्थलमश्ममयं कली। विश्वकर्मवचः श्रुत्वा भगवास्त्रिपुरान्तकः । फलं तव स्थितो देवः स्थलकेश्वरनामतः ।। तमारुरोह स्थलकं देवैः सर्वमहर्षिभिः । सदा पूज्ये महादेव उन्नतस्थानवासिभिः । नगर' लोकयामास रमा प्राकारमणितम् । माघे मासि चतुर्दश्यां विशेषस्तव नागरे । ऋषयस्तष्ट वुः सर्वे सवस्थ विपुरान्तकम् ॥ इति ते कथितं देवि उन्नतस्य महोदयम् । तानुवाच महादेवो कृणुध्व' वरमुत्तमम् ।। श्रुतं पापहर' मृणां सर्वकामफलप्रदम् ।।" (प्रभासखण्ड २१६ १०)<noinclude></noinclude> atcvu9c33selvt4uaxpkgam8n07i8uj 667556 667555 2026-07-12T11:28:51Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 667556 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२८६|उन्नतनगर-उन्नड्व}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} नवपरिणीत भार्याको भलाबुरा कहा। उससे बेजल बाजीने क्रुद्ध हो उन्नतनगर पर आक्रमण मारा था। उन्होंने बहु संख्यक अधिवासियोंका मस्तक द्विखण्डित कर अपना दारुण क्रोध मिटाया। उन्नतनगरमें ब्रह्महत्या हुयी और पुखभूमि पापमयी समझी गयी। ब्राह्मण मात्र यह खान छोड़ दिलवर नगरमें जाकर रहे। उसी समयसे यह खान उन कहलाने लगा। उन मुसलमानोंके हाथमें जानिसे उससे डेढ़कोस दक्षिण दिलवर नामक नगर बसा। गुजरातवाले सुल्तानोंके राजत्वकालमें यह एक प्रसिद्ध स्थान हो गया था। {{smallrefs}} {{rule}} {{block center|<poem><small> तपःऽग्निहोत्रनिष्ठानां वेदाध्ययनशालिनाम्। अन्माकं रक्षित कोऽस्ति कलिकाले च दारुणे॥ को दातारंमदं कश्चित् को वै मुक्तिं प्रदास्यति। ईश्वर उवाच। महाकालस्वरूपेण निधीनां धनदः पति। युष्मभ्यो दास्यति द्रव्यं समग्राराधितोऽपि सः॥ आरोग्यदायको नित्यं दुर्गादिद्यो भविष्यति। महोदयं महानन्ददायकं यो भविष्यति॥ समग्राराधितो ब्रह्मा सर्वकार्येषु सर्वदा। सर्वान् कामांस्तथा मोक्षं स्वभक्तिं च प्रदास्यति॥ विप्रा ऊचुः। यदि तीर्थानि तिष्ठन्ति सर्वाणि सुरसत्तम। सङ्गमेश्वरतीर्थे षु तथा देवकुण्डे शुभे॥ कलावपि महारौद्र अस्माकं यजनाय वै। स्थानकं तर्हि गृह्णीमो नान्यथा च महेश्वर॥ स तथेति प्रतिज्ञाय ददौ तेभ्यः पुरं शुभम्॥ सातभौमैः शताद्भैः प्रासादैः परिशोभितम्। नानायानसमायुक्तं सर्वतः शोभयान्वितम्। एवं तेभ्यो हि नगरं दत्वा देवो महेश्वरः॥ ददर्श विश्वकर्माणं प्राञ्जलिं पुरतः स्थितम्॥ विश्वकर्मोवाच। विलोक्यतां महादेव नगरं नगरोत्तम्। सौवर्णं स्थलमास्थाय निर्मितं त्वत्प्रसादतः॥ विश्वकर्मवचः श्रुत्वा भगवान्त्रिपुरान्तकः। तमारूरोहद् स्थलं दैवैः सर्वमर्हिभिः॥ नगरं लोचयामास रम्यं प्राकारमण्डितम्। ऋषयस्तुष्टुवुः सर्वे तवस्त्वं त्रिपुरान्तकम्॥ तानुवाच महादेवो वृणध्वं वरसुत्तमम्॥ </small></poem>}} {{Multicol-break}} <br>उन्नतनाभि (सं॰ त्रि॰) उन्नतो नाभिर्यस्य। उच्चनाभियुक्त, निकले हुये तांदवाला, तोंदल।<br> <br>उन्नतशिरः (सं॰ त्रि॰) गिर उठाये हुआ, जो सर ऊपरको खड़ा किये हो।<br> <br>उन्नतांग (सं॰ पु॰) उन्नत भाग, ऊंचा हिस्सा। ज्योतिषमें चन्द्रमाके दक्षिण वा वाम उन्नत ग्रहको देखते हैं।<br> <br>उन्नतानत (सं॰ त्रि॰) उन्नत आनत। उचनीच, ऊंचा-नीचा।<br> <br>उन्नति (सं॰ स्त्री॰) उत्-नम्-क्लिन्। १ वृद्धि, बढ़ती। २ उदय, उठान। ३ समृद्धि, खुशहाली। ४ उन्नम, उभार। ५ गरुड़पंक्ती। ६ गौरव, इज्जत। ७ सौभाग्य, नेकबख्ती। ८ उच्चता, ऊचाई। ९ यमकी भार्या। ये दक्षकी एक कन्या थीं।<br> नक्षत्रादिके उदयको श्रृङ्गान्नति कहते हैं— {{block center|<poem><small> "मासान्तपादे प्रथमेऽथ वेन्दो: शृड्गोत्रतिथिद्वयसेडगम्या। तदोदयेऽस्ते निशि वा प्रसाध्य: शङ्कुर्विधा: स्वादितनाड़िकाद्यै:॥"</small></poem>}} {{right|(सिद्धान्तशिरोमणि)}} <br>उन्नतिमत् (सं॰ त्रि॰) १ उच्छित, उठा या निकला हुआ। २ उन्नत, ऊंचा। <br>उन्नतीश (सं॰ पु॰) उन्नतिके स्वामी, 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पर आक्रमण मारा था। उन्होंने बहु संख्यक अधिवासियोंका मस्तक द्विखण्डित कर अपना दारुण क्रोध मिटाया। उन्नतनगरमें ब्रह्महत्या हुयी और पुखभूमि पापमयी समझी गयी। ब्राह्मण मात्र यह खान छोड़ दिलवर नगरमें जाकर रहे। उसी समयसे यह खान उन कहलाने लगा। उन मुसलमानोंके हाथमें जानिसे उससे डेढ़कोस दक्षिण दिलवर नामक नगर बसा। गुजरातवाले सुल्तानोंके राजत्वकालमें यह एक प्रसिद्ध स्थान हो गया था। {{smallrefs}} {{rule}} {{block center|<poem><small> तपःऽग्निहोत्रनिष्ठानां वेदाध्ययनशालिनाम्। अन्माकं रक्षित कोऽस्ति कलिकाले च दारुणे॥ को दातारंमदं कश्चित् को वै मुक्तिं प्रदास्यति। ईश्वर उवाच। महाकालस्वरूपेण निधीनां धनदः पति। युष्मभ्यो दास्यति द्रव्यं समग्राराधितोऽपि सः॥ आरोग्यदायको नित्यं दुर्गादिद्यो भविष्यति। महोदयं महानन्ददायकं यो भविष्यति॥ समग्राराधितो ब्रह्मा सर्वकार्येषु सर्वदा। सर्वान् कामांस्तथा मोक्षं स्वभक्तिं च प्रदास्यति॥ विप्रा ऊचुः। यदि तीर्थानि तिष्ठन्ति सर्वाणि सुरसत्तम। सङ्गमेश्वरतीर्थे षु तथा देवकुण्डे शुभे॥ कलावपि महारौद्र अस्माकं यजनाय वै। स्थानकं तर्हि गृह्णीमो नान्यथा च महेश्वर॥ स तथेति प्रतिज्ञाय ददौ तेभ्यः पुरं शुभम्॥ सातभौमैः शताद्भैः प्रासादैः परिशोभितम्। नानायानसमायुक्तं सर्वतः शोभयान्वितम्। एवं तेभ्यो हि नगरं दत्वा देवो महेश्वरः॥ ददर्श विश्वकर्माणं प्राञ्जलिं पुरतः स्थितम्॥ विश्वकर्मोवाच। विलोक्यतां महादेव नगरं नगरोत्तम्। सौवर्णं स्थलमास्थाय निर्मितं त्वत्प्रसादतः॥ विश्वकर्मवचः श्रुत्वा भगवान्त्रिपुरान्तकः। तमारूरोहद् स्थलं दैवैः सर्वमर्हिभिः॥ नगरं लोचयामास रम्यं प्राकारमण्डितम्। ऋषयस्तुष्टुवुः सर्वे तवस्त्वं त्रिपुरान्तकम्॥ तानुवाच महादेवो वृणध्वं वरसुत्तमम्॥ </small></poem>}} {{Multicol-break}} <br>उन्नतनाभि (सं॰ त्रि॰) उन्नतो नाभिर्यस्य। उच्चनाभियुक्त, निकले हुये तांदवाला, तोंदल।<br> <br>उन्नतशिरः (सं॰ त्रि॰) गिर उठाये हुआ, जो सर ऊपरको खड़ा किये हो।<br> <br>उन्नतांग (सं॰ पु॰) उन्नत भाग, ऊंचा हिस्सा। ज्योतिषमें चन्द्रमाके दक्षिण वा वाम उन्नत ग्रहको देखते हैं।<br> <br>उन्नतानत (सं॰ त्रि॰) उन्नत आनत। उचनीच, ऊंचा-नीचा।<br> <br>उन्नति (सं॰ स्त्री॰) उत्-नम्-क्लिन्। १ वृद्धि, बढ़ती। २ उदय, उठान। ३ समृद्धि, खुशहाली। ४ उन्नम, उभार। ५ गरुड़पंक्ती। ६ गौरव, इज्जत। ७ सौभाग्य, नेकबख्ती। ८ उच्चता, ऊचाई। ९ यमकी भार्या। ये दक्षकी एक कन्या थीं।<br> नक्षत्रादिके उदयको श्रृङ्गान्नति कहते हैं— {{block center|<poem><small> "मासान्तपादे प्रथमेऽथ वेन्दो: शृड्गोत्रतिथिद्वयसेडगम्या। तदोदयेऽस्ते निशि वा प्रसाध्य: शङ्कुर्विधा: स्वादितनाड़िकाद्यै:॥"</small></poem>}} {{right|(सिद्धान्तशिरोमणि)}} <br>उन्नतिमत् (सं॰ त्रि॰) १ उच्छित, उठा या निकला हुआ। २ उन्नत, ऊंचा। <br>उन्नतीश (सं॰ पु॰) उन्नतिके स्वामी, गरुड़।<br> <br>उन्नतोदर (सं॰ पु॰) उत्तखड्का ऊंचा पीठ, दायरेकी कृतकी ऊपरी सतह।<br> <br>उन्नद्ध (सं॰ त्रि॰) उत्-नह्-त। १ उब्द्ध, टंगा या लटका हुआ। २ उत्कट, उभरा हुआ। ३ स्फीत, सूजा या फूला हुआ। ४ उन्मुक्त, खुला हुआ।<br> {{rule}} {{smallrefs}} {{block center|<poem> ऋषय ऊचुः। यदि तुष्टो महादेव स्थलकेश्वरनामस्नु। स्थलोकयज्ञगर' सदा तिष्ठ खगे इर॥ तथेतुकृत्वा तदा देवाः स्थलकेऽखिन्न सदा स्थितः। कृते रत्नमय' देवि वेतायाब्द हिरखयम्॥ शौप्याब्द दापरे प्रोक्त' स्थलमस्मय' कलौ। फल' तव स्थितो देवः स्थलकेश्वरनामतः॥ सदा पूज्यो महादेव उन्नतस्थानवासिभिः। मासि मासि चतुर्दश्यां विशेषस्व जागरे॥ इति ते कथितं देवि उन्नतस्य महोदयम्। श्रुतं पापहर' तृष्णा सर्वकामफलप्रदम्॥" (प्रभासखण्ड २१६ अ॰)</small></poem>}}<noinclude></noinclude> bvymv11o8sfc806kzvrur4hw6lpz9ek 667558 667557 2026-07-12T11:30:35Z अनुश्री साव 80 667558 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२८६|उन्नतनगर-उन्नड्व}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} नवपरिणीत भार्याको भलाबुरा कहा। उससे बेजल बाजीने क्रुद्ध हो उन्नतनगर पर आक्रमण मारा था। उन्होंने बहु संख्यक अधिवासियोंका मस्तक द्विखण्डित कर अपना दारुण क्रोध मिटाया। उन्नतनगरमें ब्रह्महत्या हुयी और पुखभूमि पापमयी समझी गयी। ब्राह्मण मात्र यह खान छोड़ दिलवर नगरमें जाकर रहे। उसी समयसे यह खान उन कहलाने लगा। उन मुसलमानोंके हाथमें जानिसे उससे डेढ़कोस दक्षिण दिलवर नामक नगर बसा। गुजरातवाले सुल्तानोंके राजत्वकालमें यह एक प्रसिद्ध स्थान हो गया था। {{smallrefs}} {{rule}} {{block center|<poem><small> तपःऽग्निहोत्रनिष्ठानां वेदाध्ययनशालिनाम्। अन्माकं रक्षित कोऽस्ति कलिकाले च दारुणे॥ को दातारंमदं कश्चित् को वै मुक्तिं प्रदास्यति। ईश्वर उवाच। महाकालस्वरूपेण निधीनां धनदः पति। युष्मभ्यो दास्यति द्रव्यं समग्राराधितोऽपि सः॥ आरोग्यदायको नित्यं दुर्गादिद्यो भविष्यति। महोदयं महानन्ददायकं यो भविष्यति॥ समग्राराधितो ब्रह्मा सर्वकार्येषु सर्वदा। सर्वान् कामांस्तथा मोक्षं स्वभक्तिं च प्रदास्यति॥ विप्रा ऊचुः। यदि तीर्थानि तिष्ठन्ति सर्वाणि सुरसत्तम। सङ्गमेश्वरतीर्थे षु तथा देवकुण्डे शुभे॥ कलावपि महारौद्र अस्माकं यजनाय वै। स्थानकं तर्हि गृह्णीमो नान्यथा च महेश्वर॥ स तथेति प्रतिज्ञाय ददौ तेभ्यः पुरं शुभम्॥ सातभौमैः शताद्भैः प्रासादैः परिशोभितम्। नानायानसमायुक्तं सर्वतः शोभयान्वितम्। एवं तेभ्यो हि नगरं दत्वा देवो महेश्वरः॥ ददर्श विश्वकर्माणं प्राञ्जलिं पुरतः स्थितम्॥ विश्वकर्मोवाच। विलोक्यतां महादेव नगरं नगरोत्तम्। सौवर्णं स्थलमास्थाय निर्मितं त्वत्प्रसादतः॥ विश्वकर्मवचः श्रुत्वा भगवान्त्रिपुरान्तकः। तमारूरोहद् स्थलं दैवैः सर्वमर्हिभिः॥ नगरं लोचयामास रम्यं प्राकारमण्डितम्। ऋषयस्तुष्टुवुः सर्वे तवस्त्वं त्रिपुरान्तकम्॥ तानुवाच महादेवो वृणध्वं वरसुत्तमम्॥ </small></poem>}} {{Multicol-break}} <br>उन्नतनाभि (सं॰ त्रि॰) उन्नतो नाभिर्यस्य। उच्चनाभियुक्त, निकले हुये तांदवाला, तोंदल।<br> <br>उन्नतशिरः (सं॰ त्रि॰) गिर उठाये हुआ, जो सर ऊपरको खड़ा किये हो।<br> <br>उन्नतांग (सं॰ पु॰) उन्नत भाग, ऊंचा हिस्सा। ज्योतिषमें चन्द्रमाके दक्षिण वा वाम उन्नत ग्रहको देखते हैं।<br> <br>उन्नतानत (सं॰ त्रि॰) उन्नत आनत। उचनीच, ऊंचा-नीचा।<br> <br>उन्नति (सं॰ स्त्री॰) उत्-नम्-क्लिन्। १ वृद्धि, बढ़ती। २ उदय, उठान। ३ समृद्धि, खुशहाली। ४ उन्नम, उभार। ५ गरुड़पंक्ती। ६ गौरव, इज्जत। ७ सौभाग्य, नेकबख्ती। ८ उच्चता, ऊचाई। ९ यमकी भार्या। ये दक्षकी एक कन्या थीं।<br> नक्षत्रादिके उदयको श्रृङ्गान्नति कहते हैं— {{block center|<poem><small> "मासान्तपादे प्रथमेऽथ वेन्दो: शृड्गोत्रतिथिद्वयसेडगम्या। तदोदयेऽस्ते निशि वा प्रसाध्य: शङ्कुर्विधा: स्वादितनाड़िकाद्यै:॥"</small></poem>}} {{right|(सिद्धान्तशिरोमणि)}} <br>उन्नतिमत् (सं॰ त्रि॰) १ उच्छित, उठा या निकला हुआ। २ उन्नत, ऊंचा। <br>उन्नतीश (सं॰ पु॰) उन्नतिके स्वामी, गरुड़।<br> <br>उन्नतोदर (सं॰ पु॰) उत्तखड्का ऊंचा पीठ, दायरेकी कृतकी ऊपरी सतह।<br> <br>उन्नद्ध (सं॰ त्रि॰) उत्-नह्-त। १ उब्द्ध, 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श्रद इधर-उधर काम ढूंढते घूमा करते है यह श्रोदतो (सं० स्त्री०) उषा, सवेरा । (सं० पु० क्लो० ) उन्द-युच् श्रोतूर - बम्बई प्रान्तके पूना जिलेका एक नगर। अना॰ १८° १३´ उ०, तथा देशा० १४° ३ पू० में कुसुमावतीके वामतटपर अवस्थित है । जुन्नरसे योतूर १ मोल उत्तरपूर्व है। बाज़ार बड़ा और मारो है। नगरसे २ मोल पथिम पर्वत है। रोडो- कड़, नागपुर और जुन्नर तीन फाटक हैं। यहां एक दुर्ग और नदी किनारे दो मन्दिर है। भोली आक्रमणसे नगर बचानेको जुदर दरवाज़े के पास उक्त दुर्ग बनाया गया था। मन्दिरोंमें एक सुप्रसिद्ध तुकारामके गुरु केशवचैतन्य का और दूसरा कपर्दिकेश्वर महादेवका है। चावपके अन्तिम सोमवार का मेला लगता है। सरकार मन्दिर की कुछ साहाय्य देती है। उतना । श्रोतो ( हिं० वि० ) श्रोता ( हिं० पु० ) (वि०) २ उतना । ओद (सं० पु० ) १ अन्न, अनाज । (हिं० पु० ) २ आर्द्रभाव, तरी, गीलापन । ( वि० ) ३ पार्द्र, नम, गोला, जो सूरवा न हो । श्रोदन उद-युच् नलोपश्च । उन्द न लोपय । उण २१७६१ भक्त, भात । २ भक्ष्य, अनाज । चोदनपाको (सं० स्त्रो०) चोदनस्य पाकर पाको यस्याः बहुवो। १ नोनष्टि । २ श्रीषधिविशेष | श्रोदना, श्रोदनिका देखो । घोटनाइया (सं० खो चोदनस्य पाना यस्याः, बहुव्रो० । १ महासमङ्गा, ककई । २ वाट्या लक, बरियारी। श्रोदनाह्ना, चौदनिका देखो । चोदनिका (सं० खो) १ महासमङ्गा, ककई। २ वाट्यालक, बरियारी । श्रोदनी (सं० स्त्रो० ) ओदन इव श्राचरति, ओदन- किए डोपनादेखी १ दरी बुनने की पटरीका पावा । श्रोदनीय (सं० वि० ) ओदन यत् । विभाषाहविरपूपादिभ्यः । पा ५।१।४ भच्य वस्तु, खाने लायक चीज़ । श्रदम्बरी ( श्रदम्बर) उत्तर गुजरात के ब्राह्मणोंकी एक शाखा ७०ई० को प्रिनिने चोदम्बरियोंको कच लोग बताया था । १५० ई०को टलेमिने इनके प्रधान नगरका नाम ओरबादरी ( Orbadari ) लिखा, जो सिन्धुसे पूर्व रहा। लोग वर्तमान राधनपुरको उक्त नगर समझते हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पोट (मोड)-१ बम्ब प्रान्तके खेड़ा जिलेका एक नगर । यह अचा॰ २२° ३७′ उ० और देशा० ७३० १० पू०पर अवस्थित है। लोकसंख्या प्राय: साढ़े नौ हजार है। २ बम्बई प्रान्तके कच्छ जिसको नोनिया जाति चोदर (हिं.) उदर देखी - श्रीदोंका काम भूमि खोदना है । यह काठियावाड़ में | श्रोदरना (हिं० क्रि० ) चटखना, फटना, बरबाद होना । भी मिलते हैं। चोद अपनेको सगरसुत भगोरथके चोदा (हिं०वि०) घाई, तर, जो सूखा न हो। वंश उत्पन होनेवाले चत्रिय बताते हैं। रामाला के चोदारना ( क्रि०) तोड़ना फोड़ना, फाड़ डालना, वर्णनानुसार सिद्धराजने मालवेसे कुछ श्रदको मट्टी में मिलाना । सहस्रलिद खोदने पाटन बोलाया था किन्तु जमाना एक चोदन्तोसे उनका प्रेम बढ़ा चौर उसको उन्होंने रानी बनाने कहा। उसने इस बात से असम्मत हो भागनेको चेष्टा लगायो थी । सिराजने उसका पीछा किया और उसे पकड़ लेनेपर कितने हो चोदोको जान मार दिया। जख्माने महत्या कर से शाप दिया था तुम्हारे हृदमें कभी जल न रहेगा। - Vol. III. 134 चोर दाचिपत्य को एक असभ्य जाति । चोका दूसरा नाम बुद्धव है । यह अतिशय बलिष्ठ और मांसप्रिय होते हैं । वराह एवं इन्दुरका मांस इन्हें बहुत अच्छा लगता है। शारीरिक परिश्रम पोहर पतिमय 'पटु होते और जो काम पाते, उसोको कर डालते हैं। किन्तु दूसरों जातिवाले लोगोंके साथ इन्हें कोई काम करना अच्छा नहीं लगता । यह स्वजातिवालोंमें मिलजुल<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 769923p0uusyuurw3mvh0v4oj8l9zgh पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९२ 250 76096 667483 665066 2026-07-11T15:18:53Z सौरभ तिवारी 05 49 /* प्रमाणित */ 667483 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh||उलाहना—उलूपी|३९१}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|उलाहना (हिं॰ पु॰) उपालम्भन, शिकवा, शिकायत।}} {{outdent|उलिचना, {{smaller|उलीचना देखो।}}}} {{outdent|उलिन्द (सं॰ पु॰) वल-किन्दः सम्प्रसारणम्। १ कुलिन्द देश। २ शिव।}} {{outdent|उलीचना (हिं॰ क्रि॰) जलनिक्षेप करना, हाथ या किसी दूसरी चीज़से पानी फेंकना।}} {{outdent|उलुप (सं॰ पु॰) १ शाखापत्रयुक्त लता, डाल और पत्तीवाली बेल। २ कोमलतृण, मुलायम घास।}} {{outdent|उलुपी (सं॰ पु॰) शिशुक, सूस।}} {{outdent|उलुबेड़िया—१ बङ्गाल प्रान्तके हवड़ा जिलेकी एक तहसील। इसमें उलुबेड़िया, आमता, बाघनान और शामपुर चार थाने लगते हैं।}} २ हवड़ा जिलेका एक नगर। यह हुगली नदीके किनारे अक्षा॰ २२° २८' उ॰ तथा द्राघि॰ ८८° ९' १५" पू॰ पर अवस्थित है। उलुबेड़िया मेदिनीपुरकी राहमें पड़ता है। १६८६ ई॰ पर्यन्त यह स्थान उड़ीसामें मिला था। {{outdent|उलुम्बा (सं॰ स्त्री॰) यमानी, अजवायन।}} {{outdent|उलुलि (सं॰ पु॰) उल-उलि। वृद्धिसूचक शब्द (वाच्य), गुरराहट।}} {{outdent|उलूक (सं॰ पु॰) बल-उक् सम्प्रसारणञ्च। {{smaller|उलूकादयश्च}}। उण् ४।४१। १ इन्द्र। २ पेचक, उल्लू। ३ उलूखल, ओखली। ४ दुर्योधनका एक दूत। ५ विश्वामित्रके एक पुत्र। ६ एक जनपद। {{x-smaller|(मार्क॰पु॰ ५८।४०)}} यह स्थान भारतके उत्तरांशमें अवस्थित है। अर्जुन दिग्विजयके समय यहां आये थे। उस समय वृहन्त इस देशके राजा रहे। {{smaller|(महा॰ सभा २६ अ॰)}} कहीं इसे उलूत {{smaller|(महा॰ भीष्म ९।५३)}} और कहीं कुलूत {{smaller|(वामनपु॰ १३।४२)}} भी कहा है। आजकल इसे कुउ कहते हैं। ज्वालामुखी तीर्थके उत्तर विपाशी तटसे यह जनपद लगता है। इसकी प्राचीन राजधानी नगरकोट थी। वर्तमान राजधानी सुलतान‍्पुर है। ७ चट्टग्रामका एक प्राचीन नगर। {{smaller|(भविष्य, ब्रह्मखण्ड १४।२०)}}}} ८ जन्तुविशेष। यह लाङ्गुलहीन एकजातीय वानर है। इसका सर्व शरीर काला रहता, केवल चक्षुका भ्रू सफेद पड़ता है। कर्ण अधिकांश मनुष्यकी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> तरह होते हैं। उलूक सीधा चलता और उमा करता है। यह 'उलक, उलक' बोलनेसे श्रीहट्ट, आसाम प्रभृति अञ्चलोंमें उलूक कहलाता है। बैठनेसे यह एक फीट ऊंचा देख पड़ता है। चीटी और मकड़ी वगैरह इसके खानेकी चीजें हैं। फिर वृक्षका पत्र और उपादेय फल भी इसे अच्छा लगता है। यह शीघ्र फंदेमें नहीं पड़ता। ग्रीष्मकालमें ही यह पकड़ा जाता, क्योंकि उस समय वृक्ष छोड़ भूमिपर सोनेको उतर आता है। वृक्षपर पकड़ा जानेसे आहार-जल छोड़ता और इहसंसारसे मुंह मोड़ता है। किन्तु बच्चे शीघ्र ही हिल जाते हैं। {{outdent|उलूकपाद (सं॰ पु॰) अश्वपादरोग विशेष, घोड़ेके पैरकी एक बीमारी। कूर्चको आवर्तन कर जङ्घामें उत‍्पन्न होनेवाला शोथ उलूकपाद कहलाता है।}} {{outdent|उलूकयातु (वै॰ पु॰) वेदोक्त असुर विशेष। यह असुर उल्लूकी सूरतमें रहता है। {{smaller|(ऋक् ७।१०४।२२)}}}} {{outdent|उलूकाश्रम (सं॰ पु॰) इन्द्रका भवन, इन्द्रके रहनेकी जगह।}} {{outdent|उलूखल (सं॰ क्ली॰) ऊर्ध्वं खमुलूखं पृषोदरादित्वात् ला-क। १ धान कूटनेका काष्ठ वा पाषाणमय पात्र, खल। २ गुग्ग लु, गूगुल।}} {{outdent|उलूखलक, {{smaller|उलूखल देखो।}}}} {{outdent|उलूखलसन्धि (सं॰ पु॰) कक्षावङ्घण दशनसन्धि।}} {{outdent|उलूखलसुत (वै॰ पु॰) उलूखल द्वारा अभिषुत सोमरस। {{smaller|(ऋक् १।२८।१)}}}} {{outdent|उलूखलिक (सं॰ त्रि॰) उलूखलमें कूटा हुआ, जो खलमें साफ़ किया गया हो।}} {{outdent|उलूट (सं॰ पु॰) जातिविशेष।}} {{outdent|उलूत (सं॰ पु॰) उलति हिनस्ति यः, उल् बाहुलकात् उतच् । १ अजगर सर्प, बहुत मोटा और बड़ा सांप। २ जनपद विशेष, एक बसती।}} {{outdent|उलूप, {{smaller|उलुप देखो।}}}} {{outdent|उलूपी (सं॰ पु॰) १ शिशुकमत‍्स्य, सूस। (स्त्री॰) २ ऐरावत कुलके कौरव्य नामक नागराजकी कन्या। पाण्डुनन्दन अर्जुन वनवासके समय गङ्गाद्वारके निकट इन नागकन्या द्वारा आकर्षित}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> lfadi0t3m16a5cs61ouzppxa7zo0e8j पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१६ 250 76338 667464 667427 2026-07-11T12:29:24Z आदेश यादव 3609 667464 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||एतिकायन—ऐनक|४७५}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>इस विषयका शिलालेख कोल्हापुर राज्यके सामानगढ़में मिला है। उसमें ऐतावाड़–खुर्द उत्सर्ग की हुई भूमि को उत्तर सीमा बताया गया है। {{outdent|ऐतिकायन (सं॰ पु॰) इतिकस्य ऋषेरपत्यम्, इतिक–फक्। इतिक ऋषिके सन्तान।}} {{outdent|ऐतिशायन (सं॰ पु॰) इतिशस्य ऋषेरपत्यम्, इतिश–फक्। इतिश ऋषिके सन्तान। यह एक संस्कृतके प्राचीन विद्वान थे। मीमांसासूत्र में इनका नाम आया है।}} {{outdent|ऐतिहासिक (सं॰ त्रि॰) इतिहासादागतः इतिहास–ठक्। १ इतिहास ग्रन्थसे समझ पड़नेवाला, जो तारीखसे मालूम हो। २ इतिहासवेत्ता, तारीखको जननेवाला इतिहासपाठक, तारीख़ पढ़नेवाला।}} {{outdent|ऐतिह्य (सं॰ त्की॰) इतिह स्वार्थे ञा। {{smaller|अनन्तावसथोतिह–भेषजा ञा:। पा ५।४।२३।}} पारम्पर्य उपदेश, पुरानी‌ नसीचत। जो बात बहुत दिनसे सुननेमें आती, वह‌ ऐतिह्य कहाती है।}} {{smaller|"ऐतिह्यं नाम आप्तोपदेशो वेदादिः।" (चरक)}} पौराणिकोंके मत में ऐतिह्य एक प्रमाण है। वटके वृक्षमें यक्षिणी रहनेका परम्परागत उक्त वाक्य ही ऐतिह्य प्रमाण है। {{outdent|ऐदंयुगीन (सं॰ त्रि॰) अस्मिन् युगे साधुः, इदंयुग–खञ्। इस युगके उपयोगी।}} {{outdent|ऐध् (सं॰ स्त्री॰) अग्निशिखा, लपट।}} {{outdent|ऐध (सं॰ पु॰) {{x-smaller|ऐध् देखो।}}}} {{outdent|ऐन (अ॰ वि॰) १ उपयुक्त, दुरुस्त, ठीक। २ पूर्ण, पूरा। (हिं॰) {{smaller|अयन और एण देखो।}}}} {{outdent|ऐन–उद्–दीन—बीजापुरके एक शेख़। इन्होंने 'मुलहक़ात' और 'किताब–उल्–अनवार' नामक दो ग्रन्थ लिखे हैं। उक्त दोनों ग्रन्थोंमें भारत के समग्र मुसलमान–साधुवोंका इतिहास है। सुलतान् अला–उद्–दीन हसन बाह्मनीके समय यह विद्यमान रहे।}} {{outdent|ऐन–उल–मुल्क—१ शीराज़के एक अधिवासी। इनका उपाधि हकीम रहा। बादशाह अकबरके समय यह एक उच्च पदपर प्रतिष्ठित थे। इनकी कविता बहुत रसीली होती थी। उपनाम 'वफ़ा' रहा। १५९४ ई॰को हकीम साहब इस दुनियासे चलते बने।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> २ दिल्लीवाले बादशाह सुलतान् मुहम्मद शाह तुग़लक़ और सुलतान फीरोज़ शाहके एक दरबारी। इनका उपाधि ख्वा़जा रहा। इनके बनाये 'तरसील ऐन–उल्–मुल्को' और 'फतेहनामा' नामक दो पुस्तक विद्यमान है। फतेहनामेमें इन्होंने सुलतान अला–उद्–दीन् के विजयका वर्णन किया है। ३ वीजापुर–नवाब आदिल शाहके भाई इस्माइलके एक रिसालदार। १५९२ ई॰को बुरहान निज़ाम शाहको हरा आदिलशाहने दक्षिणकी ओर कर्नाटक और मलबार पर आक्रमण मारा था। किन्तु अपने भाई इस्माइलके बलवा करने पर उन्हें पीछे लौटना पड़ा। युद्ध होनेपर मीराजकी फौज इस्माइलसे मिल गई। वेलगांवको भेजी फौज बिना आज्ञाके वीजापुर लौट आयी थी। ऐन–उल्–मुल्क भी अपनी ३० हजार फौजके साथ उसमें मिले और राजधानी पर आक्रमण मारने को आगे बढ़े। किन्तु यह युद्धमें मारे गये। १५४२ ई॰को भी इन्होंने वीजापुर घेर लिया था, किन्तु विजयनगर नरेशके भाई वेक्ङटाद्रिने इन्हें युद्धमें परास्त किया। यह रातको रण छोड़ अहमदनगर भाग आये थे। वीजापुरमें पूर्व पादण–पुरफाटकसे १५०० गज दूर ऐन–उल्–मुल्ककी क़ब्र बनी है। ४ गुजरातके एक सूबेदार। इनका उपाधि मूलतानी रहा। उलघ खान्के जानेसे गुजरातमें‌ मुसलमानी हुकूमत हिल गई थी। बलवा दबानेको कमाल्–उद्–दीनके भेजे सुधारक खिलजी लड़ाईमें काम आये। किन्तु १३१८ ई॰को ऐन–उल्–मुल्क मूलतानीने बड़ी फौजके साथ पहुंच शान्ति स्थापित की थी। १३०६ ई॰के समय यह मालवेके शासक रहे। उसी समय बम्बई प्रान्तस्थ कनाड़ी जिले़वाले देवगिरिके रामचन्द्र ने उपद्रव उठाया था। अला–उद्–दीन्ने ख्वाजा मलिक काफू़रको एक लाख फौजके साथ दक्षिणात्य दबाने भेजा। राहमें इन्होंने भी अपनी फौज उनकी सहायताके लिये साथ कर दी। {{outdent|ऐनक (हिं॰ स्त्री॰) उपनेत्र, चश्मा।}}<noinclude><noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> mnfxpalxrq112jvtzq5bnu99np0lllk पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१७ 250 76340 667463 665804 2026-07-11T12:28:46Z आदेश यादव 3609 667463 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४७६|ऐनस—ऐन्द्रवारुणी}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{Outdent|ऐनस (सं॰ त्की॰) एन एव स्वार्थे अण्। पाप, गुनाह।}} {{Outdent|ऐना (हिं॰) {{smaller|आईना देखो।}}}} {{Outdent|ऐनापुर—बम्बई प्रान्तके बेलगांव ज़िलेका एक विशाल ग्राम। यह अथनी–कागवाड सड़कपर अथनीसे कोई १३ मील दक्षिण–पश्चिम अवस्थित है। ग्रामसे बाहर दक्षिण ओर एक तालाबके पास मुसलमान–साधु पीर काज़ीकी कब्र है। १६३९ ई॰को फ्रान्सीसी पर्याटक मनडेलस्लो (Mandelslo) यहां आये थे। उन्होंने‌ एयनाटौर (Eynatour) नाम लिखा है। १७९१ ई॰को कपतान मूर (Captain Moor) महाराष्ट्रोंके सहायक बन टीपूसे लड़ने पहुंचे। उनकी वर्णनाके अनुसार ऐनापुरमें मुसलमान अधिक रहते और अच्छे–अच्छे मकान बने थे। १८४२ ई॰को यह ग्राम दूसरे ८ ग्रामोंके साथ अंगरेजोंके हाथ लगा। कारण मीराज‌ प्ट्टवर्धन शाखाके प्रतिनिधि गोपालरावने किसी उत्तराधिकारीके व्यतीत स्वर्गगमन किया था।}} {{Outdent|ऐनि—सूर्य के पुत्र। सूर्यवंशको ऐनिवंश भी कहते हैं।}} {{Outdent|ऐनीता—(हि॰ पु॰) मर्क्टको दर्पण देखानेका काम। यह क़लन्दरोंकी भाषा है।}} {{Outdent|ऐनू—जापानकी उत्तर द्वीपवासी एक जाति। पहले यह लोग कूराइलसे येजू आये थे। फिर जापानके प्रधान द्वीप पर बस गड्डों में रहनेवाले कोरोपोक गुरुवोंको इन्होंने मार भगाया। किन्तु जापानियोंके दक्षिण तथा पश्चिमसे आ पहुचनेपर इन्हें येजूमें जाकर रहना पड़ा था। यह शराब बहुत पीते और मैले–कुचैले रहते हैं। जापानियोंसे ऐनू लंबे होते हैं। बाल न बनवानेसे इनकी दाढ़ी–मूछ खूब भरी रहती है। स्त्रियां मुंह, हाथ और मत्थेपर गोदना गोदाती हैं। वल्कलका वस्त्र पहना जाता है। जाड़ेमें मृगचर्म धारणकर शरीररक्षा करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों बाली पहनते हैं। लिखना–पढ़ना कोई नहीं जानता। इनके विश्वासानुसार पृथिवी एक मत्स्यके पृष्ठपर स्थित है। उसीके हिलनेसे भूकम्प आता है। यह भालूको पूजते हैं। ऐनू भोजन करनेसे पहले देवतावोंको धन्यवाद देते और रोगमें पड़नेसे अग्निका नाम लेते हैं। पहले यह लोग किसी अपराधीको प्राणदण्ड}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> करते न थे। मारना–पीटना ही बड़ी सज़ा रही।‌ कोई किसीका वध करनेसे नाक कान काटे जानेका दण्ड पाता था। यह अपरिचित व्यक्तिका बड़ा आदर–‌सत्कार करते हैं। {{Outdent|ऐनूर मारिगूदी—महिसुर राज्यका सरकारी जंगल।‌ क्षेत्रफल ३० वर्ग मील है।}} {{Outdent|ऐन्दव (सं॰ त्की॰) इन्दु–देवता अस्य इन्दु–अण्। १ मृगशिरा नक्षत्र। २ चान्द्रायण नामक व्रतविशेष।‌ ३ चान्द्रमास। (त्रि॰) ४ चन्द्र–सम्बन्धीय।}} {{Outdent|ऐन्दवी (सं॰ स्त्री॰) ऐन्दव–ङीप्। सोमराजी, बाकची,‌ कालीजीरी।}} {{Outdent|ऐन्द्र (सं॰ त्की॰) इन्द्रो देवता अस्य इन्द्र–अण्। १ ज्येष्ठा नक्षत्र। २ मूलविशेष, एक जड़ी। इसे साधारणतः जङ्गली अदरक कहते हैं। संस्कृत पर्याय वनार्द्रका, वनजा और अरण्यजार्द्रका है। यह कटु, अम्ल और रुचि, बल एवं अग्निकारक है।‌ {{smaller|राजनिघण्ट}} (त्रि॰) ३ इन्द्र–सम्बन्धीय। ४ इन्द्रके उद्देश्यसे‌ आहूत। (पु॰) ५ इन्द्रके पुत्र जयन्त, अर्जुन एवं‌ वालि वानर प्रभृति। ६ इन्द्रकृत व्याकरण। ७ वृष्टिका जल। ८ देवसर्षप वृक्ष।}} {{Outdent|ऐन्द्रजालिक (सं॰ पु॰) इन्द्रजालेन क्रीड़तीति, इन्द्रजाल–ठक्। १ इन्द्रजालकारक, बाज़ीगर। इसका संस्कृत पर्याय—प्रतीहारक, मायाकारक, कौसुतिक,‌ मायावी, व्यसक, मायी और मायिक है। (त्रि) २ इन्द्रजाल–सम्बन्धीय, बाज़ीगरीसे सरोकार रखनेवाला।}} {{Outdent|ऐन्द्रतुरीय (सं॰ त्की॰) उदकदानविशेष। इसका‌ चतुर्थांश इन्द्रको दिया जाता है।}} {{Outdent|ऐन्द्रद्युम्न (सं॰ त्की॰) इन्द्रद्युम्नमधिकृत्य कृतमाख्यानम्, इन्द्रद्युम्न–अण्। इन्द्रद्युम्न राजाके वृत्तान्तसे घटित महाभारतका एक आख्यान।}} {{Outdent|ऐन्द्रयव (सं॰ पु॰) इन्द्रयव, इंदरायन।}} {{Outdent|ऐन्द्रलुप्तिक (सं॰ त्रि॰) इन्द्रलुप्त–ठक्।‌ इन्द्रलुप्त रोगविशिष्ट, गंजा।}} {{Outdent|ऐन्द्रवायव (सं॰ त्रि॰) इन्द्रवायु देवते अस्य। इन्द्र–वायु–अण्। इन्द्र–वायुसम्बन्धीय।}} {{Outdent|ऐन्द्रवारुणी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रवारुणी लता, ककड़ी की बेल।}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 2gu7uu5pyrdjk0n4cybmkbi7qi6g6qe पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१८ 250 76342 667467 666464 2026-07-11T12:38:34Z आदेश यादव 3609 667467 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ऐन्द्रशर्मि—ऐबारा|४७७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ऐन्द्रशर्मि (सं॰ पु॰) इन्द्रशर्मिणी ऽपत्वं पुमान्, इञ्। इन्द्रशर्मा राजाके पुत्र।}} {{outdent|ऐन्द्रशिर (सं॰ पु॰) हस्तिविशेष, एक हाथी।}} {{smaller|{{right|(रामायण २।७०।२२)}}}} {{outdent|ऐन्द्रसेनि (सं॰ पु॰) इन्द्रसेनस्य अपत्यं पुमान्, इञ्। इन्द्रसेन नामक नरपतिके पुत्र।}} {{outdent|ऐन्द्राग्न (सं॰ त्रि॰) इन्द्राग्नी देवते अस्य, अण्। १ इन्द्राग्नि–सम्बन्धी। २ इन्द्र एवं अग्निके उद्देश्यसे आहुत।}} {{outdent|ऐन्द्रानेर्ऋत (सं॰ त्रि॰) इन्द्र एवं निर्ऋतसे रखनेवाला।}} {{outdent|ऐन्द्रापौष्य (सं॰ त्रि॰) इन्द्रापूषाणौ देवते अस्य‌, अण् उपधा अतो लोपश्च। १ इन्द्र एवं सूर्य–सम्बन्धीय। २ इन्द्र और सूर्यके उद्देश्यसे आहुत हविः प्रभृति।}} {{outdent|ऐन्द्राबार्हस्पत्य (सं॰ त्रि॰) इन्द्र और बृहस्पतिसे सम्बन्ध रखनेवाला।}} {{outdent|ऐन्द्रामारुत (सं॰ त्रि॰) इन्द्र और मरुतसे सम्बन्ध रखनेवाला।}} {{outdent|ऐन्द्रायुधं (सं॰ त्रि॰) इन्द्रप्रदत्तं आयुधं यस्य,‌ बहुव्री॰। १ इन्द्रप्रदत्त अस्त्रविशिष्ट। २ इन्द्रके धनुर्वाणसे सम्बन्ध रखनेवाला।}} {{outdent|ऐन्द्रावरुण (सं॰ त्रि॰) इन्द्र एवं वरुणके निमित्त‌ पवित्र।}} {{outdent|ऐन्द्रावैष्णव (सं॰ त्रि॰) इन्द्रविष्णु देवते अस्य, अण्। इन्द्र एवं विष्णु सम्बन्धीय।}} {{outdent|ऐन्द्रासौम्य (सं॰ त्रि॰) इन्द्रसोमौ देवते अस्य,‌ अण् व्यञ्। इन्द्र एवं सोम–सम्बन्धीय।}} {{outdent|ऐन्द्रि (सं॰ पु॰) इन्द्रस्यापत्यं पुमान्, इन्द्र–इञ्। १ इन्द्रपुत्र जयन्त। २ अर्जुन। ३ वालि वानर। ४ काक, कौवा।}} {{outdent|ऐन्द्रिय (सं॰ त्रि॰) इन्द्रियेण प्रकाश्यते इन्द्रिय–अण्। १ इन्द्रिय–सम्बन्धीय। २ इन्द्रिय द्वारा ज्ञातव्य, मालूम पड़नेवाला। (ल्की॰) ३ इन्द्रियग्राम।‌ ४ आयुर्वेदका अंशविशेष इसमें इन्द्रियोंका ही विषय वर्णित है।}} {{outdent|ऐन्द्रियक (सं॰ त्रि॰) इन्द्रियेण अनुभूयते इन्द्रिय–}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> वुञ। १ प्रत्यक्ष, समझ पड़नेवाला। २ इन्द्रिय–ग्राह्य। (पु॰) ३ इन्द्रियाश्रित व्याधिविशेष। शब्दादि विषयके मिथ्यायोग, अभियोग वा अयोगसे जो रोग‌ हो जाता, वह ऐन्द्रियक कहलाता है। {{smaller|(चरक)}} ऐन्द्रियेधी (सं॰ त्रि॰) केवल इन्द्रियसुखकी चिन्ता रखनेवाला।}} ऐन्द्री (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रस्य इयम्, इन्द्र–अण्–ङीप्। १ शची, इन्द्रकी पत्नी। २ दुर्गा। ३ इन्द्रवारुणी, ककड़ी। ४ पूर्वदिक्। ५ एला, इलायची। ६ गोरक्ष-कर्कटी।}} ऐन्द्रीफल (सं॰ त्की॰) इन्द्रवारुणीफल, ककड़ी।}} ऐन्द्रीरसायन (सं॰ त्की॰) रसायनविशेष। यह ऐन्द्री, मत्स्याक्षी, ब्रह्मसुवर्चला तथा शङ्पुष्पी तीन–तीन यव, स्वर्ण दो यव और विष एक तिल एवं घृत एक पल डालने से बनता है। {{smaller|(चरक)}}}} ऐन्धन (सं॰ त्रि॰) इन्धनस्य इदम्, इन्धन–अण्। इन्धन–सम्बन्धीय, जलानेकी लकड़ीसे सरोकार रखनेवाला।}} ऐन्धायन (स॰ पु॰) इन्धस्य ऋषेरपत्यं पुमान्, फक्। इन्ध नामक ऋषिके सन्तान।}} ऐन्ध (सं॰ त्रि॰) इने सूर्ये स्वामिनि वा भवः, इन–ण्व। १ सूर्यभव। २ स्वामिभव।}} ३ निम्नश्रेणीकी एक जाति। यह लोग दाक्षिणात्यके कुर्गप्रदेशमें रहते हैं। बढ़ई और लोहारका काम इनके जीविका–निर्वाहका द्वार है। आचार–व्यवहार कोड़गों–जैसा रहता है।}} ऐपन (हिं॰ पु॰) चावल और हलदीको एकसाथ पीसकर बनाया हुआ लेपन। यह माङ्गलिक द्रव्य समझा और देवार्चनमें खरचा जाता है। इससे कलस आदिपर थापें लगाते हैं।}} ऐब (अ॰ पु॰) १ दोष, बुराई, ख़राबी। २ अवगुण, बुरी आदत। छिद्रान्वेषण करनेवालेको 'ऐबजो' और छिद्रान्वेषणको 'ऐबजोई' कहते हैं।}} ऐबारा (हिं॰ पु॰) १ मेषादि रखनेका स्थान, जिस बाड़ेमें भेड़ वग़ैरह रहें। २ गोवाड़, जङ्गलमें जानवरोंके रखनेकी जगह।}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}} Vol. III 130</noinclude> avimf0yirvf22uophgpzlpzjqs6q03k 667468 667467 2026-07-11T12:41:35Z आदेश यादव 3609 667468 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ऐन्द्रशर्मि—ऐबारा|४७७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ऐन्द्रशर्मि (सं॰ पु॰) इन्द्रशर्मिणी ऽपत्वं पुमान्, इञ्। इन्द्रशर्मा राजाके पुत्र।}} {{outdent|ऐन्द्रशिर (सं॰ पु॰) हस्तिविशेष, एक हाथी।}} {{smaller|{{right|(रामायण २।७०।२२)}}}} {{outdent|ऐन्द्रसेनि (सं॰ पु॰) इन्द्रसेनस्य अपत्यं पुमान्, इञ्। इन्द्रसेन नामक नरपतिके पुत्र।}} {{outdent|ऐन्द्राग्न (सं॰ त्रि॰) इन्द्राग्नी देवते अस्य, अण्। १ इन्द्राग्नि–सम्बन्धी। २ इन्द्र एवं अग्निके उद्देश्यसे आहुत।}} {{outdent|ऐन्द्रानेर्ऋत (सं॰ त्रि॰) इन्द्र एवं निर्ऋतसे रखनेवाला।}} {{outdent|ऐन्द्रापौष्य (सं॰ त्रि॰) इन्द्रापूषाणौ देवते अस्य‌, अण् उपधा अतो लोपश्च। १ इन्द्र एवं सूर्य–सम्बन्धीय। २ इन्द्र और सूर्यके उद्देश्यसे आहुत हविः प्रभृति।}} {{outdent|ऐन्द्राबार्हस्पत्य (सं॰ त्रि॰) इन्द्र और बृहस्पतिसे सम्बन्ध रखनेवाला।}} 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त्रि॰) इन्द्र और बृहस्पतिसे सम्बन्ध रखनेवाला।}} {{outdent|ऐन्द्रामारुत (सं॰ त्रि॰) इन्द्र और मरुतसे सम्बन्ध रखनेवाला।}} {{outdent|ऐन्द्रायुधं (सं॰ त्रि॰) इन्द्रप्रदत्तं आयुधं यस्य,‌ बहुव्री॰। १ इन्द्रप्रदत्त अस्त्रविशिष्ट। २ इन्द्रके धनुर्वाणसे सम्बन्ध रखनेवाला।}} {{outdent|ऐन्द्रावरुण (सं॰ त्रि॰) इन्द्र एवं वरुणके निमित्त‌ पवित्र।}} {{outdent|ऐन्द्रावैष्णव (सं॰ त्रि॰) इन्द्रविष्णु देवते अस्य, अण्। इन्द्र एवं विष्णु सम्बन्धीय।}} {{outdent|ऐन्द्रासौम्य (सं॰ त्रि॰) इन्द्रसोमौ देवते अस्य,‌ अण् व्यञ्। इन्द्र एवं सोम–सम्बन्धीय।}} {{outdent|ऐन्द्रि (सं॰ पु॰) इन्द्रस्यापत्यं पुमान्, इन्द्र–इञ्। १ इन्द्रपुत्र जयन्त। २ अर्जुन। ३ वालि वानर। ४ काक, कौवा।}} {{outdent|ऐन्द्रिय (सं॰ त्रि॰) इन्द्रियेण प्रकाश्यते इन्द्रिय–अण्। १ इन्द्रिय–सम्बन्धीय। २ इन्द्रिय द्वारा ज्ञातव्य, मालूम पड़नेवाला। (त्की॰) ३ इन्द्रियग्राम।‌ ४ आयुर्वेदका अंशविशेष इसमें इन्द्रियोंका ही विषय वर्णित है।}} {{outdent|ऐन्द्रियक (सं॰ त्रि॰) इन्द्रियेण अनुभूयते इन्द्रिय–}} <noinclude>{{left|Vol. 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न रहे। ऐभावत (सं० पु० ) प्रभावतोऽपत्यं घुमान्, इभावत नामक ऋषिके पुत्र। ऐभी (सं० स्त्री० ) इभ इत्याख्या यस्याः, इभ-अण-ङोष प्रज्ञादिभ्यश्व । पा ५४३८ । हस्तिघोषालता, हाथोचिंधार। ऐमक- पपगानस्थानके सुत्रो मुसलमानों को एक जाति। हेरातसे उत्तर यह रहते हैं । इनको संख्या प्रायः पांच लाख है। भाषा कालमुकसे मिलती है। ऐमक वोर एवं वन्य तथा युद्धके लिये प्रसिद्ध हैं। ऐम्बकुल- दाचिणात्यको एक नीच जाति। जातिके लोग कृषिकार्य द्वारा जीविका चलाते हैं। पोशाक कोड़गों जैसी रहती है। किन्तु यह लोग कोड़मोंके साथ विवाह वा पाहारादिका व्यवहार नहीं रखते। कुर्गं प्रदेश में छ: प्रकारके ऐम्बकुल या गोले देख पढ़ते हैं। ऐयत्य (सं० [को०) परिमाण, संख्या, मूल्य, मित्र- दार, अदद, कीमत ऐयपदेव - बम्बई प्रान्तस्थ थाना जिलेके एक शिलाहार- राजा १०८४ ई के ताम्रफलक लिखा-पपरा-जित राजाने ऐयपदेवको डगमगाये साम्राज्यपर जमा दिया था। ऐयपराध - बम्बई प्रान्तख कोइचके एक शिलाहार- राजा। रत्नगिरि जिलेके खरिपाटन नगरमें जो ताम्रपत्र मिला, उसमें इनका नाम लिखा है। इनमें विजेताका गुण भरा रहा। चन्द्रपुर नगरके समीप ऐयपराजया राज्याभिषेका था। ३ खसा, सास ऐया - १ नोचजातिविशेष। इस जातिके लोग दाचि चायवाले मदुरा प्रदेश में रहते हैं (हिं० त्रो०) २ प्रधान वह स्त्री, इज्जतदार बुड्ढी औरत। ऐयाम (अ० पु० ) समय, दिन, वक्त, मौका। ऐवार ( ० पु० ) १ धूर्त, इलो, उस्ताद धोकेवा २ मन्द्राप्रान्त के सलेम जिलेको एक नदी यह अक्षा० १२° ७ से १२° ३८ ४५ उ० तथा द्राधि० <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ७७° ४८ ४० से ७७० ४८ १५ पू०तंक अवस्थित है। ऐयारी (च० खो०) धूर्तता, इस उस्तादी, (स्त्री०) छल, धोखेबाजी। ऐयावेज — काठियावाड़के उन्द- सरवियाका एक छोटा‌ राज्य और नगर यह नगर अचा० २१ २४ उ० तथा देशान्तर ७१°४७′ पू० पर अवस्थित है। राजा‌ बड़ोदेके गायकवाड़ चौर जनागढ़ के नवाब दोनों के कर देते हैं। ऐयाश ( अ० वि० ) १ सुखी, खुब मौज उड़ानेवाला। २ विषयासक्त, रण्डीबाज़। ऐयाशी ( ० स्त्रो०) विषयासकि, रण्डीबाजी। ऐर (सं० वि) राय भवः, पण १ अन्नसे उत्पन्न, अनाज से पैदा। २ भूमिजात, जमीन से निकला हुआ। ३ जलजात पानीसे पैदा।‌ (को०) ४ लोकस्थ सरोवरविशेष। (पु० ) ५ एक अति प्राचीन हिन्दू राजा। ऐरनी-१ बम्बईप्रान्तके धारवाड़ जिलेको एक पहाड़ी।‌ यह उस जिलेके दक्षिण-पूर्व कोचमें पंवस्थित है। उंचाई २०० से ७०० फोटतक है। उत्तरांश वृक्षशून्य है। किन्तु मध्यभाग और दक्षिण में झाड़ी लगी है। तुङ्गभद्राके समीप यह डेढ़ मोल लम्बो, पाथ मोल चौड़ी और ५०० से ७०० फीट तक ऊंची है। चोटो नोकदार है। पाछे ढालू है नोचेका मैदान अंजन‌ वृक्षोंसे ढंका है। उत्तरां में हरिण एवं वन्य शूकर चोर दचियांग भेडिये रहते हैं। २ बम्बई प्रान्तके धारवाड़ जिलेका एक बड़ा ग्राम। यह तुङ्गभद्रा नदी किनारे अवस्थित है। रेत सर बूजे बोये जाते हैं। पहले यहां कंबल बुने जाते थे। किन्तु १८७६-७७ ई०को दुर्भिक्ष पड़नेसे जुलाहोंके भाग जानेपर यह व्यवसाय बन्द हो गया। ऐरानीमें एक किला भी था। १८८० ई० को १२वों जूनको सवेरे करनल वेलेस्लिने उक्त किलेको अधिकार किया। १८८२ ई० को कपतान बरगोनोने देखभाल इस किलेको खुब मजबूत वताया था। पश्चिम और दक्षिण–पश्चिम खाई रही।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 9031izyto7vdxb4u4tg119yzh190a8k 667472 667471 2026-07-11T13:28:46Z आदेश यादव 3609 667472 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४७८|ऐबी—ऐरनो|}} {{Multicol|line=1px solid 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3609 667474 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४७८|ऐबी—ऐरनो|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ऐबो (अ॰ वि॰) १ दूषणविशिष्ट जिसके नुक़्स‌ रहे। २ दुष्ट, खराब। ३ अङ्गहीन, जिसके कोई अज़ो न रहे। ऐभावत (सं॰ पु॰) प्रभावतोऽपत्यं पुमान्, अण्। इभावत नामक ऋषिके पुत्र। ऐभी (सं॰ स्त्री॰) इभ इत्याख्या यस्याः, इभ-अण्-ङीष्। {{smaller|प्रज्ञादिभ्यश्व। पा ५।४।३८।}} हस्तिघोषालता, हाथीचिंधार। ऐमक—अफ़गानस्थानके सुन्नी मुसलमानोंकी एक जाति। हेरातसे उत्तर यह रहते हैं। इनकी संख्या प्रायः पांच लाख है। भाषा कालमुकसे मिलती है। ऐमक वोर एवं वन्य तथा युद्धके लिये प्रसिद्ध हैं। ऐम्बकुल—दाचिणात्यकी एक नीच जाति।‌ इस जातिके लोग कृषिकार्य द्वारा जीविका चलाते हैं। पोशाक कोड़गों–जैसी रहती है। किन्तु यह लोग कोड़गोंके साथ विवाह वा आहारादिका व्यवहार नहीं रखते। कुर्गं प्रदेशमें छ: प्रकारके ऐम्बकुल या गोले देख पड़ते हैं। ऐयत्य (सं॰ त्की॰) परिमाण, संख्या, मूल्य, मिक़-दार, अदद, क़ीमत। ऐयपदेव—बम्बई प्रान्तस्थ थाना जिलेके एक शिलाहार–राजा। १०९४ ई॰के ताम्रफलकमें 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पश्चिम और दक्षिण–पश्चिम खाई रही।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> hcud2ng34ixaitp526cwg4icjl52lzb 667495 667474 2026-07-11T16:28:43Z आदेश यादव 3609 667495 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४७८|ऐबी—ऐरनो|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ऐबो (अ॰ वि॰) १ दूषणविशिष्ट जिसके नुक़्स‌ रहे। २ दुष्ट, खराब। ३ अङ्गहीन, जिसके कोई अज़ो न रहे।}} {{outdent|ऐभावत (सं॰ पु॰) प्रभावतोऽपत्यं पुमान्, अण्। इभावत नामक ऋषिके पुत्र।}} {{outdent|ऐभी (सं॰ स्त्री॰) इभ इत्याख्या यस्याः, इभ-अण्-ङीष्। {{smaller|प्रज्ञादिभ्यश्व। पा ५।४।३८।}} हस्तिघोषालता, हाथीचिंधार।}} {{outdent|ऐमक—अफ़गानस्थानके सुन्नी मुसलमानोंकी एक जाति। हेरातसे उत्तर यह रहते हैं। इनकी संख्या प्रायः पांच लाख है। भाषा कालमुकसे मिलती है। ऐमक वोर एवं वन्य तथा युद्धके लिये प्रसिद्ध हैं।}} {{outdent|ऐम्बकुल—दाचिणात्यकी एक नीच जाति।‌ इस जातिके लोग कृषिकार्य द्वारा जीविका चलाते हैं। पोशाक कोड़गों–जैसी रहती है। किन्तु यह लोग कोड़गोंके साथ विवाह वा आहारादिका व्यवहार नहीं रखते। कुर्गं प्रदेशमें छ: प्रकारके ऐम्बकुल या गोले देख पड़ते हैं।}} {{outdent|ऐयत्य (सं॰ त्की॰) परिमाण, संख्या, मूल्य, मिक़-दार, अदद, क़ीमत।}} {{outdent|ऐयपदेव—बम्बई प्रान्तस्थ थाना जिलेके एक शिलाहार–राजा। १०९४ ई॰के ताम्रफलकमें लिखा—अपराजित राजाने ऐयपदेवको डगमगाये साम्राज्यपर जमा दिया था।}} {{outdent|ऐयपराध—बम्बई प्रान्तस्थ कोक्ङणके एक शिलाहार–राजा। रत्नगिरि जिलेके खारेपाटन नगरमें जो ताम्रपत्र मिला, उसमें इनका नाम लिखा है। इनमें विजेताका गुण भरा रहा। चन्द्रपुर नगरके समीप ऐयपराजका राज्याभिषेक‌ हुआ था।}} {{outdent|ऐया—१ नीचजातिविशेष। इस जातिके लोग दाक्षिणात्यवाले मदुरा प्रदेशमें रहते हैं। (हिं॰ स्त्री॰) २ प्रधान वृद्ध स्त्री, इज्ज़तदार बुड्ढी औरत। ३ श्वसा, सास।}} {{outdent|ऐयाम (अ॰ पु॰) समय, दिन, वक्त, मौक़ा।}} {{outdent|ऐवार (अ॰ पु॰) १ धूर्त, छली, उस्ताद धोकेबाज़। २ मन्द्रासप्रान्तके सलेम जिलेकी एक नदी। यह अक्षा॰ १२° ७’ से १२° ३९’ ४५’’ उ॰ तथा द्राघि॰}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ७७° ४९’ ४०’’ से ७७° ४९’ १५’’ पू॰ तक अवस्थित है। {{outdent|ऐयारी (अ॰ स्त्री॰) धूर्तता, छल, उस्तादी, धोकेबाज़ी।}} {{outdent|ऐयावेज—काठियावाड़के उन्द–सरवियाका एक छोटा‌ राज्य और नगर। यह नगर अक्षा॰ २१° २४’ उ॰ तथा देशान्तर ७१°४७’ पू॰ पर अवस्थित है। राजा‌ बड़ोदेके गायकवाड़ और जूनागढ़ के नवाब दोनोंके कर देते हैं।}} {{outdent|ऐयाश (अ॰ वि॰) १ सुखी, ख़ूब मौज उड़ानेवाला। २ विषयासक्त, रण्डीबाज़।}} {{outdent|ऐयाशी (अ॰ स्त्री॰) विषयासक्ति, रण्डीबाज़ी।}} {{outdent|ऐर (सं॰ त्रि॰) इरायां भवः, अण्। १ अन्नसे उत्पन्न, अनाजसे पैदा। २ भूमिजात, जमीनसे निकला हुआ। ३ जलजात, पानीसे पैदा।‌ (त्की॰) ४ ब्रह्म लोकस्थ सरोवरविशेष। (पु॰) ५ एक अति प्राचीन हिन्दू राजा।}} {{outdent|ऐरनी—१ बम्बईप्रान्तके धारवाड़ जिलेकी एक पहाड़ी।‌ यह उक्त जिलेके दक्षिण–पूर्व कोणमें अवस्थित है। उंचाई २००से ७०० फीटतक है। उत्तरांश वृक्षशून्य है। किन्तु मध्यभाग और दक्षिणमें झाड़ी लगी है। तुङ्गभद्राके समीप यह डेढ़ मील लम्बी, आध मील चौड़ी और ५००से ७०० फीट तक ऊंची है। चोटी नोकदार है। पार्श्व ढालू है। नीचेका मैदान अंजन‌ वृक्षोंसे ढंका है। उत्तरांशमें हरिण एवं वन्य शूकर चोर दक्षिणांशमें भेड़िये रहते हैं।}} २ बम्बईप्रान्तके धारवाड़ ज़िलेका एक बड़ा ग्राम। यह तुङ्गभद्रा नदी किनारे अवस्थित है। रेतमें खऱबूजे बोये जाते हैं। पहले यहां कंबल बुने जाते थे। किन्तु १८७६–७७ ई॰को दुर्भिक्ष पड़नेसे जुलाहोंके भाग जानेपर यह व्यवसाय बन्द हो गया। ऐरानीमें एक किला भी था। १८८० ई॰की १२वीं जूनको सवेरे करनल वेलेस्लिने उक्त किलेको अधिकार किया। १८८२ ई॰को कपतान बरगोनीने देखभाल इस किलेको ख़ूब मजबूत वताया था। पश्चिम और दक्षिण–पश्चिम खाई रही।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> pzn4x7mrorxg8lyxzbwcduuojrspkwo पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३० 250 76360 667500 609258 2026-07-11T16:49:58Z आदेश यादव 3609 667500 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh||ओङ्गोल—ओजित|५२८}}</noinclude>मन्दिर ग्रह मुद्दा नदी किनारे सोमवार महल में राशिके मध्य चयुग्म राशि। अवस्थित है। १७४० और १७६० ई० के बीच कृष्णजीपन्त चितरावने इसको लोगोंसे चन्दा करके बनाया। भाऊ साहव या सदाशिवराव चिमनाजोगे मन्दिर बनते समय छह वर्ष तक एक हज़ार रुपया मासिक‌ दिया था। द्वार पूर्वाभिमुख है। फाटकको दीवार बहुत मजबूत बनी है। प्रायको पारो घोर साधु-सन्तके विद्यामार्थ कमरे हैं। मन्दिर से नदीतक सिड़ियां लगी है। प्रतिवर्ष होम होता है। मन्दिरके पास ही श्मशान रहनेसे पूनाके लोग भय खाते हैं। सरदार हर रुपये साल होमके लिये देती है। यहां नन्दोको मूर्ति प्रति विशाल है। ओङ्गोल - १] मन्द्राजप्रान्त के मेलर जिलेको एक तहसील क्षेत्रफल ९८७ वर्ग मोल है।‌ इसके लम्ब चौड़े मैदानको मूमि बहुत अच्छी है। फसल खब उपजती है। नदी के रथपथमें कूप बने हैं। तालाब बहुत कम हैं। जङ्गल भी कह देख नहीं पड़ता। २ मन्द्राज - प्रान्त के नेल्लर जिलेका एक नगर। यह अक्षा० १५° ३०´ २० उ० तथा देशा० ८०० ५ ३० पू० में मूसी नदी किनारे स्थित है। १८०३-०० ई०को यहां म्युनिसपलिटी पड़ी थी। वस्तुतः यह मगर मण्डपति वंशके राजावोंको राजधानी रहा।‌ वह सदा वेङ्कटगिरिके नरेशोंसे लड़ा-भिड़ा करते थे। मपति नरेशोंने विद्याको बड़ा उत्साह दिया। इसीसे ओङ्गल अपने पण्डितोंके लिये आसपास प्रसिद्ध। अन्ततः गिरिके राजाने मण्डपति नरेशोंको दबा दिया था। श्रइना, ऊंछना देखो। चोखा (हिं.वि.) १ तुच्छ, डकोर, कोटा २ उथला,‌ छिछला, हलका । ३ शक्तिहीन, कमज़ोर । 8 कम पड़नेवाला, जो लंबा न हो। “नहां बड़ी सेवा तहां भोका फल्द।” (लोकोक्ति) घोकाई (०) तुच्छता, हलकापन, कम पढ़नेको हालत। ओछापन ( हिं० पु० ) ओछाई देखो। Vol. III. 133 २ अयुग्ममात्र, ताक, ऊना । ( हिं०) भोज: देखो । श्रजः (सं० क्लो० ) उन आर्जवे असुन्, वलोपश्च । उजे बँले बलोपश्च । उण् ४।१८१ । १ बल, ज़ोर । २ दोहि चमक । ३ अवलम्बन, सहारा । ४ प्रकाश रोशनी। ५ मेषादि द्वादश राशिके मध्य १म, श्य, धूम, उम, स एवं ११श राशि । ६ समासबाहुल्य एवं पदा- डम्बरताका काव्यगुण । इस गुणयुक्त रौतिका नाम गौड़ी है। ७ त्रादिका कोमल, हथियार वर्ग रचका इल्म ८ ज्ञानेन्द्रियगणको पटुता । रसादि सप्त- धातुके सारभागसे पैदा एक धातु वैद्यक मतसे यह सर्वशरीरस्थ, स्निग्ध, शीतल, स्थिर, शुक्लवर्ण, कफात्मक और बलपुष्टिकारक है। भ्रमरके फल- पुष्पसे मधु संचय करनेको तरह नाना धातुसे चीज । प्रभिचात् चय, कोप, शोक, चिन्ता, इकट्ठा होता है। परिश्रम और पापोन घट जाता है। घोनः व्यापच पड़ने सधगावल, गावका गुरुत्व, वर्षमेद और ग्लानि, तन्द्रा तथा निद्राका वेग बढ़ता है । पोजल — काठियावाडको एक छोटी नदी। यह गिर पहाड़के उत्तर प्रावण्य से निकलती और दक्षिणको भोर यह चलती है। बनघालो में नगर के समीप भोजन उपेन नदोसे मिल गयी है। योजना (हिं. क्रि.) अवरोध करना, रोकना । पीजसोन चोखत् देखो। श्रजस्कर (सं० वि०) भोजोधातुवर्धक, हैवानो कृम्पत बढ़ानेवाला। ओजस्तर (सं० त्रि०) अधिक मोनोधातुयुक्त, जिसके हैवानो 'कुव्वत ज्यादा रहे। भोजस्य भोज देखो। श्रीजखत् (स० वि० ) श्रजोऽस्यास्ति, पोन:- वलच् । १ तेस्रो मान्दार शान्दार । २ बलवान्, जोरावर । ओजस्विता (सं० स्त्री० ) प्रोजखिनो भाव:, चोजस्- तल्-टाप् । १ बलवत्ता, जोरावरी । २ तेजखिता मान्-शौकत । घोजी घोल (पु) बीज-पच । १ मेषादि दादम घोजित भी देख देखो।<noinclude></noinclude> hwqss4vmmlbpi9w6i8llnt1i98zjm1u 667502 667500 2026-07-11T17:03:03Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 667502 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्गोल—ओजित|५२९}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मन्दिर ग्रह मुद्दा नदी किनारे सोमवार महल में राशिके मध्य चयुग्म राशि। अवस्थित है। १७४० और १७६० ई० के बीच कृष्णजीपन्त चितरावने इसको लोगोंसे चन्दा करके बनाया। भाऊ साहव या सदाशिवराव चिमनाजोगे मन्दिर बनते समय छह वर्ष तक एक हज़ार रुपया मासिक‌ दिया था। द्वार पूर्वाभिमुख है। फाटकको दीवार बहुत मजबूत बनी है। प्रायको पारो घोर साधु-सन्तके विद्यामार्थ कमरे हैं। मन्दिर से नदीतक सिड़ियां लगी है। प्रतिवर्ष होम होता है। मन्दिरके पास ही श्मशान रहनेसे पूनाके लोग भय खाते हैं। सरदार हर रुपये साल होमके लिये देती है। यहां नन्दोको मूर्ति प्रति विशाल है। ओङ्गोल - १] मन्द्राजप्रान्त के मेलर जिलेको एक तहसील क्षेत्रफल ९८७ वर्ग मोल है।‌ इसके लम्ब चौड़े मैदानको मूमि बहुत अच्छी है। फसल खब उपजती है। नदी के रथपथमें कूप बने हैं। तालाब बहुत कम हैं। जङ्गल भी कह देख नहीं पड़ता। २ मन्द्राज - प्रान्त के नेल्लर जिलेका एक नगर। यह अक्षा० १५° ३०´ २० उ० तथा देशा० ८०० ५ ३० पू० में मूसी नदी किनारे स्थित है। १८०३-०० ई०को यहां म्युनिसपलिटी पड़ी थी। वस्तुतः यह मगर मण्डपति वंशके राजावोंको राजधानी रहा।‌ वह सदा वेङ्कटगिरिके नरेशोंसे लड़ा-भिड़ा करते थे। मपति नरेशोंने विद्याको बड़ा उत्साह दिया। इसीसे ओङ्गल अपने पण्डितोंके लिये आसपास प्रसिद्ध। अन्ततः गिरिके राजाने मण्डपति नरेशोंको दबा दिया था। श्रइना, ऊंछना देखो। चोखा (हिं.वि.) १ तुच्छ, डकोर, कोटा २ उथला,‌ छिछला, 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solid black}}</noinclude>ओजिष्ठ (सं०वि०) पोज- इष्ठन् । परिशायमविन या ४२५५ बलवान, तेजस्वी, दीप्तिशाली, जोरावर शान्दार, रौशन । वर. जीयस् (सं० ० ) धोज - इयसुन् । द्विवचने विभज्यो - देतरवोयसुनौ। पा ५|३|५७। तेजस्वी, यलवान, दोस, तात रौशन / ओजोदा (सं० ति० ) प्रोजोधातु प्रदान करनेवाला, जो जोर देता हो। ओजोन (० पु० 02000) वायुविशेष, एक लतीफ् हवा । इसमें कोई रङ्ग नहीं रहता । गन्ध अपने ढङ्गका निराला होता है । १७८५ ई०को वान मारम ( Van marum ) ने इस पदार्थको जांचा था। अधिक शीतल करमेये यह मोलके पानोको तरह बहने लगता और बड़े जोरसे भड़क उठता है। जिनमें इसका पंथ पाया जाता है। यह पानी में बहुत कम मिल सकता है। जलको निष्फल बनाने में इसे अधिक व्यवहार करते हैं। ग्रामों वायु इसका जितना अंश रहता, उतना नगरोंके वायुमें नहीं मिलता। श्रोज़ोनका घनत्व आक्सिजनसे ड्योढ़ा बैठता है । उष्ण डोनेसे यह सिजन बन जाता है। इसमें गन्ध मिटानेका गुण विद्यमान है। ओजोन पेपर (Ozone paper) वायुको परीक्षा लेनेका एक पत्र इवाको जांचका कागज़ | इससे वायु पोज़ोन नामक वायुका रहना न रहना मालूम होता है। भोजोनकस (चं० पु० Ozone box) सम्पुट विशेष, एक सन्दूक इसमें पोमीन पेपरको रख वायुपर पोजोनका रहना न रहना देखते हैं । सम्पुटको बनावट अनोखी होती है। वायु भिन्न प्रका शादि द्रव्य इसमें प्रवेश कर नहीं सकते । प्रोजोबला (सं० स्वी० ) बौद्ध मतानुसार बोधिद्रुमको एक शक्ति । प्रोमा (सं० पु० ) वज-ड-मनिय । १ प्रेरक, भेजने या पहुंचानेवाला (पु० ) २ शक्ति, ताबूत ३ वेग, तेज़ चाल । पो ( पु० ) १ उदर, मिकम, पेट २ पत्रांत <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ओझइत (हिं० पु० ) मन्यसे प्रेतादि वाधा हटाने बाला, जो झाड़-फंक करता हो । चोर (हिं० पु० ) १ उदर, पेट । मेदा। इसमें भोजन करनेसे खाद्य एकत्र होता है । पोभरतामवत- बम्ब प्रान्तके नासिक जिलेको एक नहर वह एक पुरानो महर रहो, जो १८०२ ई० को बढ़ा और सुधारकर खोली गयी। इसमें गोदावरीको शाखा वागगङ्गा और पालखेड़ नहर से पानी आता है। लंबाई दो मौल है। इसमें होलकर महाराजका प्रायः ५८३६) और अंगरेज़ सरकार १९२०) रु० लगा था । सोमाके परिवर्तनमें होलकर ने इसे अंगरेज सर- कारको सौंप दिया । पोझरी पोझल (हिं० खी०) देखी। (हिं० खो०) १ छाया, परवाहों । २ पाढ़, परदा, घोट | "आंख ओझल पहाड़ श्रोझन ।” ( लोकोक्ति ) (वि०) ३ गुप्त किया। घोझला घोला (पिं० पु० ) बचेका दूधको पोकर उगलना । ओझा ( हिं० पु० ) १ मन्त्रादि द्वारा सर्पदष्ट भूत- ग्रस्त प्रभृति रोगियोंको आरोग्य करनेवाला, जो झाड़- फंकसे सांप काटे या भूतके मारे बोमारको पच्छा कर देता हो । २ भूतप्रेत उतारनेवाला।" मां डायन ।” ( लोकोक्ति ) ३ ऐन्द्रजालिक, बाज़ीगर । 8 मेंथिल ब्राह्मयोंका एक उपाधि । यह लोग मध्य- प्रदेशके चांदे, रायपुर, ४ रहते और भाट, गायक पड़ते हैं। हुशङ्गाबाद प्रभृति स्थानोंमें अथवा भिक्षुक के वेशमें देख इसाई (हिं० खो०) श्रीकाका कार्य अभिचार, झाड़फंक, बाज़ीगरी । श्रोमायन ( हिं० स्त्री० ) श्रमाको पत्नी । श्रोभार–१ बम्बई प्रान्तके पूना जिलेका एक ग्राम । यह जुवार से ६ मोल दक्षिणपूर्व कुकची नदोके वाम तटपर अवस्थित है। यहां गणपतिका एक अवतार हुआ था। ग्राम से पश्चिम गणपतिका मन्दिर बना है। फाटकको राह बहुत अच्छी है। दोनों पोर डारपालको सुन्दर मूर्ति है हाराय काठको मोक्षा<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 9jyj1ure9l311i2z4sc69eu5cvexdi8 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३२ 250 76362 667509 609260 2026-07-11T18:08:36Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 667509 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओझियाल गोंड—ओडाशङ्कर|५३१}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>चार गायकको मूर्ति बढ़ाती हैं। सब मूर्तिपर चमकीला रंग चढ़ा है। प्राप दो दीपकस्तथ है। सात तोरणको परिक्रमा बनी है। ग्रामका प्राय मन्दिर में लगा है। इनामदार प्रबन्ध करते हैं। २ बम्बई प्रान्तके श्रहमदनगर ज़िलेको एक नदी।‌‌ इस नहरका मुंह सङ्गमनेर नगरसे १० मोल नोचे‌ श्रोकर ग्राममें प्रवरके वाम तटपर अवस्थित है। लंबाई १८ मील है । २७०८८ एकर भूमि इससे सींची जाती है। १८७९ ई० को यह पूरे तौरपर बनकर तैयार हुयी थी। चोभारपर पुल बंधे चौर पेड़ हैं। मियाल गोंड - मध्यप्रदेश के गोंडोंको एक माखा । राजपूतानेके चारणोंकी तरह यह लोग भी वीणा बजा-बजा जातीय वोरपुरुषोंका यश गाते फिरते हैं। हाथमें मोरका पक्ष रहता है। चोकियाल चकोर और धनेशका चमड़ा बेचते है। लोगोंके विश्वासानुसार धनेशका चमड़ा घर में रहने से धन चोर सोभाग्य बढ़ता है। इससे यह बड़े चादर के साथ क्रय किया जाता है । इनको स्त्रियां दूसरी हिन्दू- रमणियोंके हाथमें गोदना गोद देती हैं। यहांको हिन्दू स्त्रियोंके विचारानुसार इनसे हाथ में गोदना गोंदानेपर वैधव्यको दशा भोगना नहीं पड़ती। दूसरी श्रेणीके चोभियालोंको माना कहते हैं। वह दूसरे गोडोके साथ बैठकर नहीं खाते, कारच अपनेको बहुत बड़ा लगाते हैं। श्रोत श्रीट ( हिं० स्त्री० ) १ अवरोध, रोक, चाढ़ “तिनकेकी ओट पहाड़।” ( लोकोक्ति ) २. छाया, परछाहौं । २ गुप्तस्थान छिप कर बैठने को जगह। 8 घूंघट ५] विरोध, बचाय ६ अवष्टम्भ, सहारा । घोटन (हिं० खो०) यन्त्रविशेषका दण्ड, चरो का डंडा । यह दो रहतीं और कपास से बिनौलेको अलग करती है। पहले हिन्दुखानमें घर घर घोटनसे . काम लिया जाता था । किन्तु अब मिल या पुतलीघर चलने से इसका व्यवहार अधिक देख नहीं पड़ता । ओटना (हिं० क्रि०) १ कापसको चरखीपर लगा वीज <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> छोड़ाना, कपासका बिनौला निकालना । २ दोष हो रोक लेना, पकड़ना । ३ दायो बनना, २ दायी बनना, जवाबदीह होना । ४ पुनः पुनः कथन करना, अपनी ही बात नावना। श्रटनी ( हिं० स्त्री० ) कापस परिष्कार करनेका एक वन्ध, कपास साफ करनेको चरखो। इससे कपासका बिनौला निकाल रुई तैयार करते हैं । ओटल ( हिं० स्त्री० ) व्यवधान, परदा, आड़। घोटा ( हिं० पु० ) १ पार्श्व- भित्ति, बगली दीवार, आड़। “लोपू घोटा सामनेका चबूतरा। ३ कपास घोटने को चरखोपर रखा जानेवाला महोका लोंदा। इससे चरक्षो अपनी जगह नहीं छोड़ती। ४ चरो चलानेवाला। घोटो, नीदेखी मरे मोटा । " ( लोकोक्ति ) २ घरके पीठ (हिं०) घोश देखी। पोटंगना (हिं. क्रि०) पाय पकड़ना, किसके सहारे बैठना या लेटना। मोड़ (हिं० [स्त्री०) घोट, घाड़। श्रोड़व देखो। श्रोड़क, श्रोड़चा ( हिं० पु० ) १ काष्ठपात्रविशेष, काठका एक बरतन इससे चैत्रका जल उसोचते हैं। २ वेंड़ो, दोरो। इससे निलका जल देवमें पहुंचाया जाता है । यह गहरी टोकरो जैसा रहता है। दोनो भोर डोरी लगा दो आदमी इसे चलाते हैं । घोड़ा चोदेखी। घोड़न ( हिं० स्त्री० ) १ अवरोध, रोक । २ ढाल, बचावको चो घोड़ना (हिं० क्रि०) १ अवरोध लगाना, बोचमें हो रोक रखना । २ विस्तारित करना, फैला देना । घोड (पु) रामविशेष। इसमें सममध पौर नि-यांच हो सर लगते है। घोड़ा (हिं० पु० ) १ टोकरा, खांचा । २ गर्त, ३ गड्ढा। सेंध (वि०) ४ गभीर, गहरा। घोडाशङ्कर - एक संस्कृत ग्रन्थकार । यह सुधाकरके पुत्र और शुचिकरके पौत्र थे । ग्रन्थविधानधर्म कुसुम और स्मृतिसुधाकर नामक पुस्तक इनके लिखे हैं ।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> sr09ro0g0tytatowfuos3n5owl43i1x पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३३ 250 76363 667510 609261 2026-07-11T18:16:14Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 667510 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५३२|ओड़िका—ओतु|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ओड़िका (सं० स्त्री० ) धान्यविशेष, नीवार। यह शोषण, रुच, कफ वायु वृद्धिकर और पित्तनाशक। होती है। ओड़ो, ओड़िका देखो। अोढ़ापलङ्कषा (सं० स्त्री०) गोरक्षमुण्डो, गोरखमुंडी । चोणि (संवि) गुप-इन् । १] अपनयनकारी, ओड़ (००) चा उदो-रक, दस् डत्वम् । बचा देनेवाला। (पुस्त्री०) २ सोमरस प्रस्तुत १ जवाकुसुमवृक्ष, गुड़हरका पेड़। यह संग्राही और केशहित होता है । ( भावप्रकाश) इसके सेवन से मल और मूत्र रुकता है । ( राजवल्लभ) चोड़ कटु, उष्ण, इन्द्रलुप्तहर, विच्छर्दिजन्तुजनक और सूर्याराधन है। ( राजनिघण्ट ) २ उड़ीसा मुल्क । उत्कल देखो। प्रायः उत्कल के उत्तरांशको श्रीड़ कहते हैं । ( त्रि० ) २ देशका अधिवासो, उड़िया। ओडकाख्या, घोड़ाख्या देखी। प्रदेश (पु.) उत्कल, उड़ीसा । 8 पर्याय (००) सूर्यकान्तपुष्य, गोड़सरका पेड़ । श्रीपुष्प (सं० क्को) पाच तत् पुष्पचेति, कर्मधा० । १ जवाकुसुम, गुड़हरका फूल। २ जवा- कुसुमहच, गुड़हरका पेड़ पोपुष्पा (सं० स्त्री० ) जवावृच, गुड़हरका पेड़ । बोड़ाख्या (सं० [स्त्री० ) घोड्रामाख्या यस्य, बहुव्री० । नवापुष्प वृक्ष, गोड़हरका पेड़ । चोड़ (सं०] [वि०) चा-यह- सम्यक् रूपसे वहन किया था, जो बच्छी तरह ढोया गया हो। चोदन ( हिं० स्त्री० ) श्रोढ़ाई, ढांकनेका काम | २ वस्त्र विशेष, चोदना (हिं० कि०) १ लपेटना जिस्मको वस्त्रसे प्रोढ़नेका कपड़ा । से देश ढांकना । २ पोड़ना, रोक रखना। (पु० ) ३ देहाच्छादन- वस्त्र, जिम ढांकनेका कपड़ा। ४ विस्तरको चद्दर । "सासका चोढ़ना पतोहका बिछोना" (लोकोक्ति ) १ चोटनी (हिं० श्री.) छोटी चर या पिछोरी। यह स्त्रियोंके ही काम आती है। "बोढ़नी को बतास लगौ ।” ( लोकोक्ति ) चोर (०) बल बहाना, धोका चोड़वाना (हिं. को०) चाच्छादित पोढ़ाने के कामपर किसी दूसरेको लगाना। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ओढ़ाना ( हिं० क्लो० ) अन्यको आच्छादित करना, दूसरेको ढांक देना । करवाना, करनेका एक पात्र । इसके दो भाग होते हैं । ३ स्वर्गम, जमोन् पाखान् रथा करनेवाली शशि, जो ताकत बरकरार रखती हो। ५ रक्षा, हिफाजत । श्रीणी (सं० स्त्री० ) ओणि देखो । घोल (सं० बि०) चा-वेज त भीतर भरा हुआ । १ अन्तर्व्याप्त २ बुना हुआ। ३ कपड़े के तानेका सूत । (हिंस्त्रो०) सुप विश्राम, फुरसत, धाराम । ५ श्रालस्य, सुस्ती।६ लाभ, कायदा । ७ खल्पव्यय, किफायत । अभिष्टांग बचत । ओतपोदरम् - मन्द्राज प्रान्तके तेनिवज्ञा जिलेको एक तहसील | इसका परिमाण १०८५ वर्ग मोल है। लोकसंख्या प्रायः तीन लाख निकलेगी । तूतकू डो नामक प्रसिद्ध बन्दर इसो तसो लगता है। पोत- पोदरम् ही प्रधान नगरका भी नाम है । इसमें इत्तियापुरम् को जमीन्दारी भी पड़ती हे भूमि काली घर बराबर है। कहीं कहीं इमलीके बाग़ लगे हैं। रूई अधिक होती है। समुद्र किनारे खेतवालुका भरी है। उसमें ताड़ चोर बल होता है। साउथ इण्डियन रेलवे मदुरा- से इस तहसील में आती है । मनियाची जङ्शन और तूतीकोरिन टरमिनस है। पोतपोदरम् नमरी- में तहसीलदारी है। भोतप्रोत (सं० वि०) १ परस्पर सङ्गठित, एक दूसरेसे लगा हुआ । ( पु० ) २ ताना-बाना । ३ विवाह विशेष, किसी किस्मको शादी। इसमें एक-दूसरेको लड़को लड़का दोनों देते हैं। श्रोता (०वि०) उस परिमाणवाला, उतना। ओतु (सं० पु० स्त्री) पवति रचति गृहमासुभ्य अव-तुन्-जट् । चिनिगमिममिचविधा छय् । १।७० ॥ व्वरत्वरेत्यादि । पा (18|८०| १ विडाल,<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 7te15b3l2m2lp7bbspclsc3xooo1bkn पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३५ 250 76364 667514 609263 2026-07-11T18:28:53Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 667514 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५३४|ओद्म—ओम्|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> कृषिकार्य चलाते और पथ-कूप प्रभृतिके निर्माण में हाथ लगाते हैं। पहले त्रोहर भूतप्रेत पूजते थे, पीछे वैष्णव बन गये। फिर भी पेशाम देवताका भय और प्रेम आज भी कुछ कम नहीं। बहुविवाहको प्रथा प्रचलित है। क्योंकि अधिक स्त्रो रहने से चाय भी बढ़ जाता है। खियां शारीरिक परिश्रम द्वारा पर्यो पार्जन करती हैं । ओझ (स० पु० ) उन्द भावे मन् नलोपः गुणश्च । अवोद'चौद्मप्रश्रथहिमश्रथाः। पा६४१२८ । क्ल ेद, तरी, गोलापन । २ प्रवाह, बहाव | श्रीनन् (सं० क्लो० ) उन्द- मनिन् नलोपश्च । श्रन्न देखो । ओधना (हिं० क्रि० ) बन्धनमें पड़ना, लग जाना, अटकना । बोधस् (सं० को०) पशुस्तन, जानवरका बाख या श्रायन । घोघे (हिं.पु.) खामो मालिक। सफाईको चीज़ । खद्गादि परिष्कार करनेवाले इष्टका - खण्डको अपनी कहते हैं । चोपथ (सं० पु० ) १ शिरोभूषण, जुल्फ २ शृङ्ग, सौंग । ( सायण) घोषथो (सं० [स्त्री०) सुन्दर केशयुक्त, जुल्फोंवाला, जो बालोंको बनाये चुनाये हो। घोपोसम ( ० पु० Opossum ) पशुविशेष, एक चौपाया । यह उत्तर अमेरिका संयुक्तराज्य, कालि फोरनिया, टेक्सास और दक्षिण अमेरिकामें मिलता है। इसमें अन्य पशुके अपक्क पोतकपर टूट पड़नेका विशेषत्व विद्यमान है। यह कई प्रकारका होता है । दांत और अंगूठे अनोखे देख जेसा कोटा चोर कोई बिल्लो पढ़ते हैं। कोई चहे लेसा बड़ा रहता है। स्त्री जाति वसन्त ऋतुमें छहसे सोलह बच्चेतक उत्- पत्र करती है। चौदह या सह दिनमें बसे होशि यार हो जाते हैं। दक्षिण अमेरिकामें बच्चे मांको पोठपर चढ़े और उसको पूछने अपनी पूंछ कसे रहते हैं । श्रनचन ( हिं० स्त्री० ) अदवायन, खाटके पायताने लगनेवालो रस्सी । इसको कसनेसे चारपाई कड़ी पर जाती है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> श्रनचना (कि.) पदवायन कसना, खाटके भोवरी (हिं. सो० ) शुद्र पायतानेको रो कड़ी करना । ओनवना, उनवना देखो। श्रीना (हिं० पु० ) जलके उद्गमनका पथ, पानी निकलनेको राष्ट्र | चना (हिं०बि०) श्रनाना ( हिं० क्रि० ) घोनामासो (हिं सो०) विशाल ताकतवर । सुनना, कान लगाना । च नमः सिचम्, विद्या- रम्भ के समयका एक मङ्गल वाक्य | न्दन (सं० पु० ) १ मङ्गल । २ कनिष्ठ । ओप (हिं० स्त्रो०) १ शोभा, खूबसूरती, चमक । २ रंग, कुलई । ओषधी (०) कवच धारण किये हुआ वीर, जो सिपाही बख् तर पहने हो । घोना ( क्रि०) परिष्कार करना, रंगना, मलना । प्रोनी (०) परिष्कार करनेका वस्तु, ओफ ( अ० अव्य० ) अरे, हाय, बाप रे बाप | झोपड़ी। ° छोटा मकान, श्रम् (सं० अव्य० ) अवति रचतोति, श्रव-मन् टिलोपः उट्च । भवतेष्टिलोपश्च । उय् १।१४१ । ज्वरत्वरेत्यादि । पा |४| २० | योगसुखकारने लिखा है- प्रणव " तस्य वाचकः प्रणवः ।” (११२७) ईश्वरका वाचक प्रणव ठहरता अर्थात् ॐ कहने से ईश्वर समझ पड़ता है । अब देखना चाहिये - जिस शब्द के उचारणसे हो ईश्वरका सम्बोधन और ईश्वरको महिमाका प्रकाशन होता, सुति तथा स्मृति उसो ॐ मन्दका किस प्रकार भाव पाया जाता है। शुक्लयजुर्वेदको माध्यन्दिन मायामे सर्वप्रथम 'प्रचद' शब्दका उल्लेख मिलता है- “प्रणवैः शास्त्रार्थाां रूपम्पयसा सोमऽ चापाते ।” (१२२५) " श्रीप्रतिष्ठ ।" ( २१३ ) फिर कृष्णयजुः प्रभृति माखा संहिता भागमै<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> e4a99d0u2rbrzdyioq2vxm3gbq7xsll पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५७ 250 76400 667505 609398 2026-07-11T17:34:31Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 667505 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६५९|कणिक-कण्टकदला|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} <Small>अत इनि उनी। पा ।५।२।११५ ।</small> १ अत्यन्त सूक्ष्मवस्तु, निहायत बारीक चीज । २ अग्निमन्थ वृक्ष, गनियारी।३ कणा,जर्ग, किनका । ४ तण्ड लविशेष, एक चावल । ५ जलादिका सूक्ष्मांश, पानी वगैरहका बारीक हिस्सा {{Center|<Small>"वामुत्थाप्ट स्वजलकणिका शौतले नानिलेन!" (मेघदूत)</Small>}} कणित (सं० लो०) कण आर्तनादे भावे-ता। पीड़ित-का यातनासूचक नाद, गमसे भरी आवाज । कणिश (सं० ली०) कणो विद्यतेऽस्य, कण-इनि,कणिनः शेवते अस्मिन्, कणिन्-शौ-ड। शस्यमञ्जरी,अनाजकी बाल। कणिष्ठ (सं० त्रि०) कण-इष्ठन्। १ अन्य अपेक्षा क्षुद्र, दूसरेकी बनिस्बत छोटा। २ अन्य अपेक्षा हीन, दूसरेसे कम। कणी (सं० स्त्री०) कण-ईकन्। १ अल्प, थोड़ी। २ हयकण्ठलता, एक बेल। ३ कणिका, कनी,टुकड़ा। ४ तण्डु लविशेष, किसी किस्मका चावल। कणीक (सं० वि०) अल्प, सूक्ष्म, छोटा, बारीक। कोका (सं० स्त्री०) कण-डोप । १ कणिका, कनी,छोटा टुकड़ा। कपीचि (सं० पु०) कण-ईचि। <Small>सकणिभवामौचिः। उप ४।७०।</small> १ पल्लवी, छोटी डाली। २ निनाद, आवाज़। (स्त्री०) ३ पुष्पितालता, फलदार बेल। ४ गुप्ता, घुंघची। ५ शकट, गाड़ी। कणीची (सं० स्त्री०)<small> कचौचि देखी।</small> कीयः (सं० वि०) कण-ईयसुन्। <Small>हिवचनविभन्यौपप-देवरवौयमुनो। पा ५।३।५७।</small> १ अत्यन्त सूक्ष्म, निहायत बारीक। २ अन्य अपेक्षा क्षुद्र, दूसरेको बनिस्बत छोटा। कणायान् (सं० पु०) कण-ईयसुन्। १ कनिष्ठ,छोटा। २ क्षुद्र, हकोर। ३ हीन, कम। कणौसक (हिं०) <small>कविश देखो।</small> कणे (सं० प्रव्य०) कण्-ए। १ इच्छानुरूप, जीभर । (हिं०) २ निकट, समीप, पास। कणेर (सं० पु०) कण एर। कर्णिकारवृक्ष, अमल-तासका पेड़। {{Multicol-break}} कणेरा (सं० स्त्री०) कणेर-टाप । १ वेश्या, रण्डी। २ हस्तिनी, हथिनी। कणेरु (सं० पु०) कण-एरु। १ कर्णिकार वृक्ष,अमलतासका पेड़। (स्त्री०) २ वेश्या, रण्डी। ३ हस्तिनी, हथिनी। कण्ट (सं० पु०) कटि-अच् । १ कण्टक, काटा। २ वकुल वृक्ष, मौलसरोका पड़ । कण्टक (सं० पु० लो०) कटि-खु ल । १ सूचौका अग्रभाग, सूईको नोक । २ कांटा, खार।३ मत्स्या-दिका कोकस, मछलीको नोकदार हड्डी। ४ नख, नाख न् । ५ रोमाञ्च, रोंगटीका खड़ा होना। ६ क्षुद्रशत्रु, छोटा दुश्मन। ७ तीव्र वेदना, तेज, दर्द। ८ हानिकारक भाषण, नुकसान पहुंचानेवाली बात। ९ दुःखका कारण, तकलीफ का सबब। १० वाद- विवादका खण्डन, बहसको तरदौद। ११ विघ्नवाधा, अड़चन। १२ प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम नक्षत्र । १३ शाक्य मुनिका अख। १४ किसी अग्रहारका नाम। १५ वेणु, बांस १६ कर्मस्थान, कारखाना । १७ दोष, ऐब। १८ मकर, मगर। यह कामदेवका चिह्न है। १९ केन्द्र, दायरेका मरकज । {{Center|<small>"लग्नान्वु यून कर्माणि केन्द्रमुक्तञ्च कण्टकम्।" (ज्योतिष)</Small>}} २० गोक्षुरक्षुप, गोखरू । २१ मदनवृक्ष, मैनफल । २२ विल्ववृक्ष, बेलका पेड़। २३ इदोवृक्ष, देशी बादाम। २४ बनमुद्ग, जङ्गली मूंग। २५ ववूरकक्ष, बबूल। २६ पद्मवौज, कमलगट्टा। कण्टककरन (सं० पु०) करजभेद, जङ्गली करोंदा। कण्टककिंशुक (सं० पु०) कण्टको पारिजात, कांटेदार मदार। कण्टकच्छद (सं० पु०) खेतकेतकवृक्ष, सफेद केवड़ेका पड़ा। कण्टकवय ( सं० क्लो०) कण्टकारीत्रय, तीनों कटैया। वृहती कण्टकारी और गोक्षुर तीनोंका समूह कण्टकत्रय कहाता है। कण्टकत्रय त्रिदोष, श्रम, ज्वर, पित्त, हिक्का और तन्द्रालापको नाश करता है। <Small>(वैद्यकनिघण्ट)</small> कण्टकदला (सं० स्त्री०) केतको वृक्ष,<noinclude></noinclude> qg9jxeext1v5iqwgeeshjnevwkmdire पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५८ 250 76401 667549 609399 2026-07-12T08:46:09Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 667549 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कण्टकदेही-कण्टकारी|६५७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कण्टकदेही (सं० त्रि०) कण्टकप्रधानो देहोऽस्थास्ति, कण्टकदेव-इनि। १ कण्टकावृत शरीरविशिष्ट,कांटेदार जिस्म रखनेवाला। (पु०) २ शख्यक,खारपुश्त, स्याही। ३ मत्स्यविशेष, कंटवा। कण्टकद्रुम (सं० पु०) कण्टकप्रधानो द्रुमः कण्टकेन पाचितो वा द्रुमः, मध्यपदलो०। १ शाल्मलिवृक्ष, सेमरका पेड़। २ खदिरवृक्ष, खैरका पेड़। ३ कण्टक- युक्त वृक्ष, कांटेदार पेड़। बबूल वगैरह कंटीले पेड़ोंको कण्टकद्रुम कहते हैं। कण्टकपक्षक (सं० त्रि०) कण्टकं पक्षे यस्य ततः खार्थे कन्। पक्षमें कण्टक रखनेवाला, जिसके बाज़ में कांटा रहे। कण्टकपञ्चमूल (सं० लो०) स्वल्पमहत्तणवलो कण्टक-संजक पञ्च मूल, पांच कंटीली जड़ें। करमर्द, गोक्षुर, झिण्टी, शतमूली और हिंसा पांचोका मूल मिलानेसे यह औषध बनता है। वैद्यक मतसे कण्टकपञ्चमूल रक्तपित्त, सर्वप्रकार मेह, शुक्रदोष, तीनप्रकारके शोथ और श्लेष्माको नाश करता है। कण्टकपाली (सं० स्त्री०) स्वनामख्यात वृक्ष, हिऊन-गरना। कण्टकमावता (सं० स्त्री० ) कण्टकैः प्रावृता व्याप्ता,३-तत्। घृतकुमारी, घीकुवार। कण्टक फल (सं० पु०) कण्टकराचितं फलं यस्य, मध्यपदली०। १ पनसवृक्ष, कटहलका पेड़। २ गोक्षुर, गोखरू। ३ कण्टकारी, भटकटैया। ४ एरण्डवृक्ष, रेड़ का पेड़। ५ धुस्तरवृक्ष, धतूरेका पौदा। ६ देवदाली, मोखल, तल्खुखारा। ७ कुसुम्भ- वृक्ष, कुसुमका पेड़ । ८ ब्रह्मदण्डोवृक्ष। ९ करमवक्ष,करोंदेका पेड़। जिस वृक्षका फल कांटेदार रहता, उसको संस्कृतन 'कण्टकफल' कहता है। कण्टकफला (सं० स्त्री०) <small>कटकफल देखो।</small> कण्टकभुक (सं० पु०) कण्टकान् भुङक्त, कण्टक-भुज-क्किप । इष्ट्र, ऊंट। ऊँटको कंटोला पौदा ही खाने में सबसे अच्छा लगता है। कण्टकमदैन (सं० त्रि०) १ कण्टकोंको कुचलनेवाला,जो कांटोंको रौंदता हो। २ अशान्ति मिटानेवाला, </Small>Vol. III. 165{{gap}}{{gap}} {{Multicol-break}} जो झगड़ा-झन्झट दूर कर देता हो। (को०) ३ कण्टकोको कुचलने का काम, कांटों की गैंदाई। ४ अशान्तिनिवारण, झगड़ा भाभट मिटाने का काम। कण्टकयुक्त (सं० वि०) कण्ट कविशिष्ट, कांटेदार, कंटोला। कण्टकलता ( सं० स्त्री०) १ वपुषा, खीरा। २ कर्क टिका, ककड़ी। कण्टकन्ताकी (सं० स्त्रा०) कण्ट कैराचिता वन्ताको मध्यपदलो०। वार्ताकु, बैंगन, भंटा। कण्टकशृङ्ग (सं० पु०) पर्वतविशेष, एक पहाड़। यह महाभद्र के उत्तर अवस्थित है। <Small>(लिङ्गपु० ४५|५५)</small> कण्टकोणो (सं० स्त्री०) कण्टकानां श्रेणो यस्याम्, बहुव्री०। १ कण्टकारी, भटकटैया। २ पलकीमृग, खारपुश्त, स्थाही। कण्टकस्थल (सं० पु०) भारतका अग्नि कोणस्थ जन-पदविशेष, एक मुल्क। <Small>(मार्कसेयपुराय)</small> कण्टकस्थली (सं० स्त्री०) <small>कएकस्खन देखो।</small> कण्टका (सं० स्त्री०) १ कण्टकारिका, भटकटैया। २ दुरालभा, जवासा । ३ वनमुद्र, मोट। 8 कर्कटिका,ककड़ी। कण्टकाख्य (सं० पु०) शृङ्गाटक, सिंघाड़ा। कण्टकागार (सं० पु०) कण्टका आगारो यस्य अथवा कण्टकं अथवा कण्टकं आगिरति. करार आगिरति, कण्टक-पा-ग-अच् । १शरट, गिरगिट । २ शल्लको, खारपुश्त. स्था हो। कण्टकाव्य (सं० पु०) कण्ट कैराव्यः, ३-तत । १ कुञ्जकक्ष, बेला। २ विस्ववक्ष, बैचका पेड । ३शाल्मलिवृक्ष, सेमरका पेड़। कण्टकार (सं० पु०) कण्टकमृच्छति, कण्टक-ऋ-अण्। १ थाल्मलिवृक्ष, सेमरका पेड़। २ किसी किस्मका बबूल। कण्टकारिका (सं० स्त्री०) कण्टकान् इयर्ति ऋच्छति वा, कण्टक-ऋ-ख ल-टाप, इत्वञ्च । कण्टकारी नामक वृक्षविशेष। <Small>करकारो देखो।</small> कण्टकारी (सं० स्त्री० ) कण्टकार-डोप । क्षुद्राक्ष विशेष, भटकटैया। इसका संस्कृत पर्याय-निदिग्धिका, स्पृशो, व्यात्री, बहती, प्रचोदनी, कुलो, खुद्रा, दृष्या,<noinclude></noinclude> 1g3tuhq9zy4p7bwb58lp4277h5qonup पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३५९ 250 83688 667476 347140 2026-07-11T14:21:18Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 667476 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३५२'''|'''अधर्मचारिन्—अधश्चौर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>धर्मकर एक काल्पनिक उपाय द्वारा मनको समझा लेता है। ऐसे ही कूट तर्क खड़ेकर निरस्तिवादी धर्माधर्मको नहीं मानते। २ ब्रह्माके एक पुत्र। <small>(वायु और ब्रह्माण्डपुराण १०।१ ।)</small> अधर्मकी भार्याका नाम मिथ्या था, जिसने माया नामकी कन्या और दम्भ नामके पुत्रको उत्पन्न किया। निर्ऋतिने अपुत्रा होनेके कारण माया और दम्भ दोनोको ले लिया था। <small>(श्रीभागवत ४२)</small> श्रीमद्भागवत और विष्णुपुराण में इसका उल्लेख नहीं, कि अधर्म किसके पुत्र थे। टीकाकार श्रीधरस्वामीने निम्नलिखित शुकोक्त वचन अवलम्बनकर अधर्मको ब्रह्माका ही पुत्र बताया है,— {{Block center|<poem><small>"धर्मः स्तनादृदक्षिणतो यत्र नारायणः स्वयं। अधर्मः पृष्ठतो यस्य मृत्यर्लोकभयङ्करः॥"</small></poem>}} <small>(विष्णुपुरास्प्तकी टीका १।७।२९।)</small> अधर्म शब्द पुराणादिमें रूपक भावसे व्यवहृत है। फलतः यह एक मनोवृत्ति है जो अनिष्ट कार्योत्पादक होनेसे मृत्यु, पातक प्रभृति नामों पर प्रयोग की गई है। ३ सूर्यके एक सहचरका नाम। अधर्मचारिन् (वै॰ त्रि॰) धर्मं चरति अनुतिष्ठति, चर-णिनि; न धर्मचारी, ६- तत्। पापाचारी, धर्मका अनुष्ठान न करनेवाला, जो मज़हबके खिलाफ़ काम करे। अधर्मतस्, अधर्मतः (सं॰ अव्य॰) अधर्मसे, झूठ-मूठ, बेइन्साफ़ीसे। अधर्मदण्डन (सं॰ क्ली॰) अधर्मका दण्ड, बेइन्साफ़ी की सज़ा। अधर्ममय (सं॰ त्रि॰) अधर्मः प्रकृतः, प्राचुर्यार्थे मयट्। <small>तत्प्रकृतवचने मयट्। पा ५।४।२१।</small> पापमय, प्रचुर पापयुक्त, पापपूर्ण; लामज़हब, जो बहुत बुरा काम करे। (स्त्री॰) अधर्ममयी। अधर्मात्मन् (सं॰ त्रि॰) अधर्मः प्रधान: आत्मा यस्य। अत्यन्त अधर्मचारी, महा पापिष्ठ, दुराचारी, कुमार्गी, जिसके हृदयमें पाप भरा हो; इज़ाब से भरपूर। अधर्मास्तिकाय (सं॰ पु॰) अधर्मका विभाग, ईज़ाबकी मद। जैनशास्त्रमें जो छः द्रव्य माने गये हैं, उनमें एक अधर्मास्तिकाय भी है। इसमें नित्यता और रूप नहीं और यह जीव और पुद्गलकी स्थितिको साहाय्य देता है। इसमें स्कन्ध, देश और प्रदेश नामक तीन भेद रहते हैं। अधर्मिन् (सं॰ त्रि॰) अधर्म-इनि अस्त्यर्थे। अधार्मिक, अधर्मात्मा, पापाचारी; गुनहगार इज़ाब करनेवाला। अधर्मिष्ठ (सं॰ त्रि॰) अतिशायने अधर्म-इष्ठन् भत्वाद् टिलोपः। <small> अतिशयने तमविष्ठनौ। पा ५।३।५५। अतिशय पापयुक्त, अतिशय अधर्मशील, महापापी। अधर्मी (हिं॰ पु॰) पाप करनेवाला व्यक्ति, पापी मनुष्य। अधर्म्य (सं॰ त्रि॰) न धर्माय हितं यत्। पापोत्-पादक, अन्याय-सम्बलित, नियम या धर्म विरुद्ध, पापमय ; इज़ाब से भरा, लामज़हब, गुनहगार। अधर्षणी (सं॰ त्रि॰) प्रचण्ड, पुरज़ोर; प्रबल, ताक़तवर; निर्भय, बेख़ौफ़; जो दबाया या डराया न जा सके, जिसपर कोई प्रभाव डाल न सके, जीतनेके अयोग्य। अधवा (सं॰ स्त्री॰) न विद्यमानो धवः पतिर्यस्याः, बहुव्री॰। विधवा स्त्री, मृतभर्तृका, रांड, जिसका पति विद्यमान न हो, बेशौहरकी औरत। अधवारी (हिं॰ स्त्री॰) वृक्षविशेष, एक पेड़ या दरख्त। इसका काष्ठ भवन और साजसज्जाके निर्माणमें लगता है। अधश्वर (सं॰ पु॰) अधः अधोभागे खनित्वा चोरयति चोर एव स्वार्थे अण्। सेंध लगानेवाला चोर। अधश्चौर (सं॰ पु॰) अधः अधोभागे खनित्वा चोरयति चोर एव स्वस्थ अण्। सेंध मारनेवाला चोर, जो मकानकी दीवार काटकर चोरी करे। पहले भारतवर्षमें सभी विद्याओं की विशेष रूपसे उन्नति हुई थी। लोग कहा करते हैं,—'यदि मार न पड़ती, तो चोरी जैसा कोई रोजगार न था।' उस समय इस देशमें चोरविद्याकी भी विशेष उन्नति देख पड़ती थी। चोर कितना ही हिसाब-किताब बना वैज्ञानिक उपाय द्वारा गृहस्थ के घर में सेंध लगाते<noinclude></noinclude> i1sp57xnr9ku3dz4n1ndhvubicb04lr 667477 667476 2026-07-11T14:22:13Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667477 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३५२'''|'''अधर्मचारिन्—अधश्चौर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>धर्मकर एक काल्पनिक उपाय द्वारा मनको समझा लेता है। ऐसे ही कूट तर्क खड़ेकर निरस्तिवादी धर्माधर्मको नहीं मानते। २ ब्रह्माके एक पुत्र। <small>(वायु और ब्रह्माण्डपुराण १०।१ ।)</small> अधर्मकी भार्याका नाम मिथ्या था, जिसने माया नामकी कन्या और दम्भ नामके पुत्रको उत्पन्न किया। निर्ऋतिने अपुत्रा होनेके कारण माया और दम्भ दोनोको ले लिया था। 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(सं॰ स्त्री॰) न विद्यमानो धवः पतिर्यस्याः, बहुव्री॰। विधवा स्त्री, मृतभर्तृका, रांड, जिसका पति विद्यमान न हो, बेशौहरकी औरत। अधवारी (हिं॰ स्त्री॰) वृक्षविशेष, एक पेड़ या दरख्त। इसका काष्ठ भवन और साजसज्जाके निर्माणमें लगता है। अधश्वर (सं॰ पु॰) अधः अधोभागे खनित्वा चोरयति चोर एव स्वार्थे अण्। सेंध लगानेवाला चोर। अधश्चौर (सं॰ पु॰) अधः अधोभागे खनित्वा चोरयति चोर एव स्वस्थ अण्। सेंध मारनेवाला चोर, जो मकानकी दीवार काटकर चोरी करे। पहले भारतवर्षमें सभी विद्याओं की विशेष रूपसे उन्नति हुई थी। लोग कहा करते हैं,—'यदि मार न पड़ती, तो चोरी जैसा कोई रोजगार न था।' उस समय इस देशमें चोरविद्याकी भी विशेष उन्नति देख पड़ती थी। चोर कितना ही हिसाब-किताब बना वैज्ञानिक उपाय द्वारा गृहस्थ के घर में सेंध लगाते<noinclude></noinclude> ma7ii0er2efi0l1u906oopk5xx6epuq 667478 667477 2026-07-11T14:22:46Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667478 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" 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अधर्मचारिन् (वै॰ त्रि॰) धर्मं चरति अनुतिष्ठति, चर-णिनि; न धर्मचारी, ६- तत्। पापाचारी, धर्मका अनुष्ठान न करनेवाला, जो मज़हबके खिलाफ़ काम करे। अधर्मतस्, अधर्मतः (सं॰ अव्य॰) अधर्मसे, झूठ-मूठ, बेइन्साफ़ीसे। अधर्मदण्डन (सं॰ क्ली॰) अधर्मका दण्ड, बेइन्साफ़ी की सज़ा। अधर्ममय (सं॰ त्रि॰) अधर्मः प्रकृतः, प्राचुर्यार्थे मयट्। <small>तत्प्रकृतवचने मयट्। पा ५।४।२१।</small> पापमय, प्रचुर पापयुक्त, पापपूर्ण; लामज़हब, जो बहुत बुरा काम करे। (स्त्री॰) अधर्ममयी। अधर्मात्मन् (सं॰ त्रि॰) अधर्मः प्रधान: आत्मा यस्य। अत्यन्त अधर्मचारी, महा पापिष्ठ, दुराचारी, कुमार्गी, जिसके हृदयमें पाप भरा हो; इज़ाब से भरपूर। अधर्मास्तिकाय (सं॰ पु॰) अधर्मका विभाग, ईज़ाबकी मद। जैनशास्त्रमें जो छः द्रव्य माने गये हैं, उनमें<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>एक अधर्मास्तिकाय भी है। इसमें नित्यता और रूप नहीं और यह जीव और पुद्गलकी स्थितिको साहाय्य देता है। इसमें स्कन्ध, देश और प्रदेश नामक तीन भेद रहते हैं। अधर्मिन् (सं॰ त्रि॰) अधर्म-इनि अस्त्यर्थे। अधार्मिक, अधर्मात्मा, पापाचारी; गुनहगार इज़ाब करनेवाला। अधर्मिष्ठ (सं॰ त्रि॰) 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मध्यमकं तावत् इदानीं चतुःशालकमपि दूषयामि। तत् कस्मित्रु देशे सन्धिमुत्पादयामि।</small> {{Block center|<poem><small>देशः कोनु जलावसेकशिथिलो यस्मिन्न शब्दोभवे- द्भित्तीनाञ्च न दर्शनान्तरतः सन्धिःकराली भवेत्। क्षारक्षीणतया च लोष्टककृशं जीर्ण कृ हर्म्य भवेत्, कम्मिन् स्त्रीजनदर्शनञ्च न भवेत् स्यादर्थसिद्धिश्च मे॥</small></poem>}} भित्तिं परामृश्य निव्यादित्यदर्शनोदकसेचनेन दूषितेयं भूमिः, क्षारक्षीणा मूषिकोत्करश्चेह। इन्त! सिद्धोऽयमर्थः। प्रथममेतत् स्कन्दपुत्राणां सिद्धि-लक्षणम। अत्र कर्मप्रारम्भे कीदृशमिदानीं सन्धिमुत्पादयामि। इह खलु भगवता कनकशक्तिना चतुर्विधः सन्ध्यु पायो दर्शितः। तद्यथा, —पक्केष्ट-कानामाकर्ष णम्, आमेष्टकानाञ्छेदनं, पिण्डमयानां सेचनं, काष्ठमयानां पाटनमिति। तदत्र पक्के ष्टके दृष्टिकाकर्ष णम् तत्र,— {{Block center|<poem><small>पद्मव्याकोशं, भास्करं, वालचन्द्रं वापीविस्तीर्णं', स्वस्तिकं, पूर्णकुम्भं, तत्कस्मिन् देशे दर्शायामशिव्प', दृष्टा श्रीयं यद्वस्मियं यान्ति पौराः॥</small></poem>}} तदव पक्कष्टके पूर्णकुम्भ एव शोभते । तमुत्पादयामि । नमो वरदाय कुमारकार्तिकेवाय नमः कनकशक्तये ब्रह्मण्याय देवाय देवव्रताय, नमो भास्करनन्दिने, नमो योगाचार्याय स्वाहं प्रथमः शिष्यः । तेन च गोरोचना मे दत्ता, - अनयाहि समालब्ध' न मां द्रचान्ति रक्षिणः । शस्त्रञ्च पतितं गावे रुजं नोत्पादयिष्यति । तथा करोति । धिक् कष्टम् ? प्रमाणस्वम् मे विस्तृतम् ? बां, इद यज्ञोपवीतं हि नाम ब्राह्मणस्य महदुपकरणद्रव्यम् । विशेषतोऽस्मद्दिधस्य, कुवः 1- एतेन मापयति भित्तिषु कर्ममार्ग- म तेन मोचयति भूषणसम्प्रयोगान् । की भवति मन्चकपाट, दष्टस्य कौटभुजग : परिवेष्टनञ्ज । मापयित्वा कर्म समारभे । ' तथा ' कृत्वावलोक्य च । एक लोष्टाव- कृत्वा, श्रये न कृत्वा दृष्ट्वा च । अये ज्वलति प्रदीपः । सन्धिः । भवतु, प्रविशामि । अथवा प्रवेशयामि । तथा प्रविश्य दृष्ट्वा च । वारमुद्दाटयामि । क्कनु श्रये पुरुषइयं ३५३ पुनः कर्म कृत्वा - समाप्तोऽयं न तावत् प्रविशामि प्रतिपुरुष' कचित् । नमः कार्तिकेयाच सुप्तम् । भवतु, आत्मरचायें खलु । सलिल' ग्टहीत्वा चिपन् सशङ्कम् । मा तावत् भूमौ पतत् शब्दमुत्पादयेत् । भवतु एवं तावत् । इदानों परीच किं लतामुप्तमुत परमार्थ सुप्तमिद इयम् । चासयित्वा परीचा च । श्र "परमार्थसुत नानेन भवितव्यं । तथाहि- विश्वासोऽस्य न शङ्गितः, मुविशदः खल्पान्तरं वर्तते दृष्टिगढ़-निमीलिता, न विकला नाभ्यन्तरं चञ्चला । गावं स्वस्तशरीर सन्धिशिथिल' शय्याप्रमाणाधिकं, दीपचापि न म बेला यदि ॥* 'मैं बाग में सेंध लगा बोचके महलमें घुसा ह अब मकानमें सेंध लगाना पड़ेगी। किन्तु मकानमे किस जगह सेंध लगाई जाती है ? दौवारमें जहां हमेशा पानीको चपेट पड़नेसे मही गोली हो गई है, वहां सेंध मारनेसे शब्द न निकलेगा। फिर दूसरी दीवार के बीच में न अड़नेसे गट्टा भी बहुत बड़ा वन जायेगा। दीवार कहां नोना लगनेसे पुरानी और वैकाम पड़ गई है? किस जगह सेंध लगाने से स्त्रियोंसे भेंट न होगी और मेरा काम भी बन जायेगा ? 'इसके बाद दीवारपर हाथ रखकर वह बोला- इसी जगह तो रोज गहरा पानी पड़ता, जिससे यह जगह नष्ट हो गई; यही जगह नोना लगने से धसको है। इस जगह चूहेने गड्डा भी बनाया है। जो हो. इसमें सन्देह नहीं, कि काम खूब बना चोरोंके काम निकलनेका यही पहला लक्षण है। अब काम शुरू किये देता हूं, किन्तु गड्डा कैसे खोदा जाता है ? भगवान् कनकशक्तिने चार तरहसे सेंध काटनेका उपाय बताया है। पक्की ईंटका मकान होनेसे ईंट उखाड़ कर बाहर निकालना होता; कच्ची ईंटके मकानको ईंट काटकर दूर फेंक दो जातो; चिकनो महोके मकानपर पानी डालना पड़ता लकड़ीका मकान चौरा जाता है। यह ; शेवोऽयं सन्धिः । धिक्कष्टम् । पहिना दष्टोऽसि । (यशोपनीतेना िपक्की ईंटका मकान हैं, इसलिये ईट उखाड़कर । यज्ञोपवीतेनाङ्गुलिं गावगनाटयति) चिकित्सा ही खोऽमि पुन वर्षा . निकाल डालना चाहिये ।' द<noinclude></noinclude> mkiyfgc43vptgrtp0qfm4vmtqy37tpm 667487 667486 2026-07-11T15:39:14Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667487 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधश्चौर'''|'''३५३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>थे। मृच्छकटिक एक अति प्राचीन नाटक है। इसमें सेंध करनेका आश्चर्यमय कौशल लिखा गया है। बात यह है, कि शर्विलक एक विशुद्ध ब्राह्मण-सन्तान थे; किन्तु मदनिका नामकी वेश्याके प्रति उनका मन लग जाने से उन्हें धनकी आवश्यकता पड़ गई। इसी कारण वह दरिद्र चारुदत्तके घर सेंध लगाने पहुंचे। उन्होंने पहले सेंध मार वृक्षवाटिकामें प्रवेश किया और फिर सोचने लगे,— <small>"वृक्षवाटिका-परिसरे सन्धिं कृत्वा प्रविष्टोऽस्मि मध्यमकं तावत् इदानीं चतुःशालकमपि दूषयामि। तत् कस्मित्रु देशे सन्धिमुत्पादयामि।</small> {{Block center|<poem><small>देशः कोनु जलावसेकशिथिलो यस्मिन्न शब्दोभवे- द्भित्तीनाञ्च न दर्शनान्तरतः सन्धिःकराली भवेत्। क्षारक्षीणतया च लोष्टककृशं जीर्ण कृ हर्म्य भवेत्, कम्मिन् स्त्रीजनदर्शनञ्च न भवेत् स्यादर्थसिद्धिश्च मे॥</small></poem>}} भित्तिं परामृश्य निव्यादित्यदर्शनोदकसेचनेन दूषितेयं भूमिः, क्षारक्षीणा मूषिकोत्करश्चेह। इन्त! सिद्धोऽयमर्थः। प्रथममेतत् स्कन्दपुत्राणां सिद्धि-लक्षणम। अत्र कर्मप्रारम्भे कीदृशमिदानीं सन्धिमुत्पादयामि। इह खलु भगवता कनकशक्तिना चतुर्विधः सन्ध्यु पायो दर्शितः। तद्यथा, —पक्केष्ट-कानामाकर्ष णम्, आमेष्टकानाञ्छेदनं, पिण्डमयानां सेचनं, काष्ठमयानां पाटनमिति। तदत्र पक्के ष्टके दृष्टिकाकर्ष णम् तत्र,— {{Block center|<poem><small>पद्मव्याकोशं, भास्करं, वालचन्द्रं वापीविस्तीर्णं', स्वस्तिकं, पूर्णकुम्भं, तत्कस्मिन् देशे दर्शायामशिव्प', दृष्टा श्रीयं यद्वस्मियं यान्ति पौराः॥</small></poem>}} तदव पक्कष्टके पूर्णकुम्भ एव शोभते । तमुत्पादयामि । नमो वरदाय कुमारकार्तिकेवाय नमः कनकशक्तये ब्रह्मण्याय देवाय देवव्रताय, नमो भास्करनन्दिने, नमो योगाचार्याय स्वाहं प्रथमः शिष्यः । तेन च गोरोचना मे दत्ता, - अनयाहि समालब्ध' न मां द्रचान्ति रक्षिणः । शस्त्रञ्च पतितं गावे रुजं नोत्पादयिष्यति । तथा करोति । धिक् कष्टम् ? प्रमाणस्वम् मे विस्तृतम् ? बां, इद यज्ञोपवीतं हि नाम ब्राह्मणस्य महदुपकरणद्रव्यम् । विशेषतोऽस्मद्दिधस्य, कुवः 1- एतेन मापयति भित्तिषु कर्ममार्ग- म तेन मोचयति भूषणसम्प्रयोगान् । की भवति मन्चकपाट, दष्टस्य कौटभुजग : परिवेष्टनञ्ज । मापयित्वा कर्म समारभे । ' तथा ' कृत्वावलोक्य च । एक लोष्टाव- कृत्वा, श्रये न <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>कृत्वा दृष्ट्वा च । अये ज्वलति प्रदीपः । सन्धिः । भवतु, प्रविशामि । अथवा प्रवेशयामि । तथा प्रविश्य दृष्ट्वा च । वारमुद्दाटयामि । क्कनु श्रये पुरुषइयं ३५३ पुनः कर्म कृत्वा - समाप्तोऽयं न तावत् प्रविशामि प्रतिपुरुष' कचित् । नमः कार्तिकेयाच सुप्तम् । भवतु, आत्मरचायें खलु । सलिल' ग्टहीत्वा चिपन् सशङ्कम् । मा तावत् भूमौ पतत् शब्दमुत्पादयेत् । भवतु एवं तावत् । इदानों परीच किं लतामुप्तमुत परमार्थ सुप्तमिद इयम् । चासयित्वा परीचा च । श्र "परमार्थसुत नानेन भवितव्यं । तथाहि- विश्वासोऽस्य न शङ्गितः, मुविशदः खल्पान्तरं वर्तते दृष्टिगढ़-निमीलिता, न विकला नाभ्यन्तरं चञ्चला । गावं स्वस्तशरीर सन्धिशिथिल' शय्याप्रमाणाधिकं, दीपचापि न म बेला यदि ॥* 'मैं बाग में सेंध लगा बोचके महलमें घुसा ह अब मकानमें सेंध लगाना पड़ेगी। किन्तु मकानमे किस जगह सेंध लगाई जाती है ? दौवारमें जहां हमेशा पानीको चपेट पड़नेसे मही गोली हो गई है, वहां सेंध मारनेसे शब्द न निकलेगा। फिर दूसरी दीवार के बीच में न अड़नेसे गट्टा भी बहुत बड़ा वन जायेगा। दीवार कहां नोना लगनेसे पुरानी और वैकाम पड़ गई है? किस जगह सेंध लगाने से स्त्रियोंसे भेंट न होगी और मेरा काम भी बन जायेगा ? 'इसके बाद दीवारपर हाथ रखकर वह बोला- इसी जगह तो रोज गहरा पानी पड़ता, जिससे यह जगह नष्ट हो गई; यही जगह नोना लगने से धसको है। इस जगह चूहेने गड्डा भी बनाया है। जो हो. इसमें सन्देह नहीं, कि काम खूब बना चोरोंके काम निकलनेका यही पहला लक्षण है। अब काम शुरू किये देता हूं, किन्तु गड्डा कैसे खोदा जाता है ? भगवान् कनकशक्तिने चार तरहसे सेंध काटनेका उपाय बताया है। पक्की ईंटका मकान होनेसे ईंट उखाड़ कर बाहर निकालना होता; कच्ची ईंटके मकानको ईंट काटकर दूर फेंक दो जातो; चिकनो महोके मकानपर पानी डालना पड़ता लकड़ीका मकान चौरा जाता है। यह ; शेवोऽयं सन्धिः । धिक्कष्टम् । पहिना दष्टोऽसि । (यशोपनीतेना िपक्की ईंटका मकान हैं, इसलिये ईट उखाड़कर । यज्ञोपवीतेनाङ्गुलिं गावगनाटयति) चिकित्सा ही खोऽमि पुन वर्षा . निकाल डालना चाहिये ।' द<noinclude></noinclude> 842v2mjviiw5szxv5qyrep1cnqsl7lv 667488 667487 2026-07-11T15:56:27Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667488 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधश्चौर'''|'''३५३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>थे। मृच्छकटिक एक अति प्राचीन नाटक है। इसमें सेंध करनेका आश्चर्यमय कौशल लिखा गया है। बात यह है, कि शर्विलक एक विशुद्ध ब्राह्मण-सन्तान थे; किन्तु मदनिका नामकी वेश्याके प्रति उनका मन लग जाने से उन्हें धनकी आवश्यकता पड़ गई। इसी कारण वह दरिद्र चारुदत्तके घर सेंध लगाने पहुंचे। उन्होंने पहले सेंध मार वृक्षवाटिकामें प्रवेश किया और फिर सोचने लगे,— <small>"वृक्षवाटिका-परिसरे सन्धिं कृत्वा प्रविष्टोऽस्मि मध्यमकं तावत् इदानीं चतुःशालकमपि दूषयामि। तत् कस्मित्रु देशे सन्धिमुत्पादयामि।</small> {{Block center|<poem><small>देशः कोनु जलावसेकशिथिलो यस्मिन्न शब्दोभवे- द्भित्तीनाञ्च न दर्शनान्तरतः सन्धिःकराली भवेत्। क्षारक्षीणतया च लोष्टककृशं जीर्ण कृ हर्म्य भवेत्, कम्मिन् स्त्रीजनदर्शनञ्च न भवेत् स्यादर्थसिद्धिश्च मे॥</small></poem>}} <small>भित्तिं परामृश्य निव्यादित्यदर्शनोदकसेचनेन दूषितेयं भूमिः, क्षारक्षीणा मूषिकोत्करश्चेह। इन्त! सिद्धोऽयमर्थः। प्रथममेतत् स्कन्दपुत्राणां सिद्धि-लक्षणम। अत्र कर्मप्रारम्भे कीदृशमिदानीं सन्धिमुत्पादयामि। इह खलु भगवता कनकशक्तिना चतुर्विधः सन्ध्यु पायो दर्शितः। तद्यथा, —पक्केष्ट-कानामाकर्ष णम्, आमेष्टकानाञ्छेदनं, पिण्डमयानां सेचनं, काष्ठमयानां पाटनमिति। तदत्र पक्के ष्टके दृष्टिकाकर्ष णम् तत्र,—</small> {{Block center|<poem><small>पद्मव्याकोशं, भास्करं, वालचन्द्रं वापीविस्तीर्णं', स्वस्तिकं, पूर्णकुम्भं, तत्कस्मिन् देशे दर्शायामशिव्प', दृष्टा श्रीयं यद्वस्मियं यान्ति पौराः॥</small></poem>}} <small>तदत्र पक्केष्टके पूर्णकुम्भ एव शोभते। तमुत्पादयामि। नमो वरदाय कुमारकार्तिकेयाय, नमः कनकशक्तये ब्रह्मण्याय देवाय देवव्रताय, नमो भास्करनन्दिने, नमो योगाचार्याय, यस्वाहं प्रथमः शिष्यः। तेन च गोरोचना मे दत्ता,—</small> {{Block center|<poem><small>अनयाहि समालब्धं न मां द्रक्ष्रान्ति रक्षिणः। शस्त्रञ्च पतितं गात्रे रुजं नोत्पादयिष्यति।</small></poem>}} <small>तथा करोति। धिक् कष्टम्? प्रमाणसूत्रम् मे विस्तृतम्? आं, इदं यज्ञोपवीतं हि नाम ब्राह्मणस्य महदुपकरणद्रव्यम्। विशेषतोऽस्मद्विधस्य, कुवः—</small> {{Block center|<poem><small>एतेन मापयति भित्तिषु कर्म्ममार्ग- मे तेन मोचयति भूषणसम्प्रयोगान्। उद्धाटको भवति मन्त्रदृढ़कपाटे, दष्टस्य कीटभुजगैःपरिवेष्टनञ्ज।</small></poem>}} <small>मापयित्वा कर्म्म समारेभे। तथा कृत्वावलोक्य च। एक लोष्टावशेषोऽयं सन्धिः। धिक् कष्टम्। अहिना दष्टोऽम्मि। (यज्ञोपवीतेनाङ्गुलिं वडा विषवेगं नाटयति।) चिकित्सा कृत्वा स्वस्थोऽस्मि।) पुनः कर्म्म</small> कृत्वा, श्रये न <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><small>कृत्वा दृष्ट्वा च। अये ज्वलति प्रदीपः। पुनः कम्मे कृत्वा-समाप्तोऽयं सन्धिः। भवतु, प्रविशामि। अथवा न तावत् प्रविशामि प्रतिपुरुषं प्रवेशयामि। तथा प्रविश्य दृष्ट्वा च । वारमुद्दाटयामि । क्कनु श्रये पुरुषइयं ३५३ कचित् । नमः कार्तिकेयाच सुप्तम् । भवतु, आत्मरचायें खलु । सलिल' ग्टहीत्वा चिपन् सशङ्कम् । मा तावत् भूमौ पतत् शब्दमुत्पादयेत् । भवतु एवं तावत् । इदानों परीच किं लतामुप्तमुत परमार्थ सुप्तमिद इयम् । चासयित्वा परीचा च । श्र "परमार्थसुत नानेन भवितव्यं । तथाहि- विश्वासोऽस्य न शङ्गितः, मुविशदः खल्पान्तरं वर्तते दृष्टिगढ़-निमीलिता, न विकला नाभ्यन्तरं चञ्चला । गावं स्वस्तशरीर सन्धिशिथिल' शय्याप्रमाणाधिकं, दीपचापि न म बेला यदि ॥* 'मैं बाग में सेंध लगा बोचके महलमें घुसा ह अब मकानमें सेंध लगाना पड़ेगी। किन्तु मकानमे किस जगह सेंध लगाई जाती है ? दौवारमें जहां हमेशा पानीको चपेट पड़नेसे मही गोली हो गई है, वहां सेंध मारनेसे शब्द न निकलेगा। फिर दूसरी दीवार के बीच में न अड़नेसे गट्टा भी बहुत बड़ा वन जायेगा। दीवार कहां नोना लगनेसे पुरानी और वैकाम पड़ गई है? किस जगह सेंध लगाने से स्त्रियोंसे भेंट न होगी और मेरा काम भी बन जायेगा ? 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इससे सेंधका गड्ढा नपता; गहना उतरता, दरवाज़ा मज़बूती से बन्द रहनेपर किवाड़ा खुल जाता और सांप या बिच्छूके डङ्क मारनेपर गांठ बंधती है। 'इसके बाद उसने सेंधकी जगह नाप काम शुरू कर दिया। गड्ढे को गहराकर वह बोला,—'एक ईंट और बाक़ी है, जिसके निकलते ही सेंध फूट जायेगी। अरे यह क्या! क्या सांपने काट खाया?' तब उसने जनेऊसे उंगली बांधी, किन्तु विषसे शरीर भभक उठा। इसके बाद चिकित्सा से चङ्गा होकर उसने सेंध फोड़ी। भीतर जाकर देखा, कि दिया जलता था। अन्तमें गड्ढेकी चौड़ाकर सोचने लगा,—'अब तो भीतर घुस जाऊं। नहीं, एकबारगी ही घुस जाना अच्छा नहीं, पहले एक पुतलेको घुसेड़कर देखूं। कोई तो नहीं। कार्तिकेयको नमस्कार करता हूं। घरमें दो आदमी सोरहे हैं। आदमियोंको सोने दो, पहले अपने बचाव के लिये दरवाजा खोल लूं। दरवाज़ा पुराना हो गया, किवाड़से आवाज़ आती है! कहीं से थोड़ासा पानी ढूंढ लाऊं! पानीसे सावधान होकर किवाड़ आर्द्र करूं। पीछे मट्टी गिरनेसे आवाज़ आती है, पीठके सहारे कीवाड़ खोल लूं। जो ही, अब देखना चाहिये, कि ये दोनो असलमें सोते हैं या नहीं; भय दिखानेसे मालूम हुआ, कि असलमें सो रहे हैं। इनकी हलकी सांससे नहीं जान पड़ता कि इन्हें भय लगा है। क्योंकि ख़ूब साफ़ और रह-रहके सांस चलती है, आंखें अच्छी तरह मुंद गई हैं और पुतलियां भी घूमते नहीं देख पड़तीं; शरीर के जोड़ ढीले पड़े और हाथ-पैर बिस्तर से बाहर लटके हैं। असलमें न सोने से आंखपर कभी दियेकी रोशनी नहीं सही जाती।' मृच्छकटिक अति प्राचीन पुस्तक है। शर्विलककी कथा सुननेसे जान पड़ता है, कि पूर्वकालमें इस देशके चोर अपना व्यवसाय बहुत अच्छी तरह समझते-बूझते थे। एक ग्राम्य गल्प प्रचलित है, कि आकाशसे जो वज्र गिरता, वह केले या सार नामक वृक्षमें लगनेसे फिर निकल नहीं सकता, फंस जाता है। सेंध मारनेवाले चोर उसी वज्रके लोहेसे अपना खन्ता बनवाते हैं। यह ठीक नहीं कहा जा सकता, कि इस गल्पकी उत्पत्ति कैसे हुई है। लोहारकी दुकान के पास एक जंगला रहता है। कहते हैं, कि शायद सेंध लगानेवाले चोर उसी जंगलेमें रातको लोहा और मज़दूरीका दाम फेंक जाते हैं। लोहार इशारेसे समझ सकता, कि किस चोरको खन्तेकी ज़रूरत पड़ी है। वह चुपके से एक खन्ता बना उसी जंगलेमें रख देता है। सेंध फोड़नेवाले चोर रातको आ अपना हथियार ले जाते हैं। अधश्शिरस् (सं॰ क्ली॰) अधः अधोवर्ति शिरः मस्तकं यस्य। अवाङ्मस्तक, मुंह लटकाये हुए आदमी। अधस् (सं॰ अव्य॰) अधर-असि। <small>पूर्वाधरावराणामसि</small><noinclude></noinclude> sx24er99h2jzsg47s3hsz62gduurgke 667520 667519 2026-07-12T03:22:03Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667520 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३५४'''|'''अधश्चौर—अधस्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>'किन्तु सेंधका गड्डा भी तो कई तरहका होता है,—कमल के फूल-जैसा, सूर्य-जैसा, अर्द्धचन्द्राकार, दीर्घाकार, स्वस्तिक-जैसा और पूर्णकुम्भ-जैसा। अब मैं किस जगह अपना हुनर दिखाऊं, जिसे कल शहरके लोग देखकर अचम्भ में पड़ जायें। इस ईंटके पक्के मकान में पूर्ण कुम्भाकार—पानी भरे घड़े-जैसा गड्डा ही अच्छा लगेगा। इसलिये मुझे वैसा ही गड्डा बनाना चाहिये। 'वरदाता कुमार कार्तिकेयको नमस्कार है। कनकशक्तिको नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेव देवव्रत, भास्करनन्दी और योगाचार्यको नमस्कार है। मैं उनका पहला शिष्य हूं। उन्होंने तुष्ट होकर मुझे गोरोचना दी है। इसे शरीर में लगानेसे नगररक्षक मुझे देख न सकेगा और शरीरपर हथियार चलनेसे चोट न 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है। कहते हैं, कि शायद सेंध लगानेवाले चोर उसी जंगलेमें रातको लोहा और मज़दूरीका दाम फेंक जाते हैं। लोहार इशारेसे समझ सकता, कि किस चोरको खन्तेकी ज़रूरत पड़ी है। वह चुपके से एक खन्ता बना उसी जंगलेमें रख देता है। सेंध फोड़नेवाले चोर रातको आ अपना हथियार ले जाते हैं। अधश्शिरस् (सं॰ क्ली॰) अधः अधोवर्ति शिरः मस्तकं यस्य। अवाङ्मस्तक, मुंह लटकाये हुए आदमी। अधस् (सं॰ अव्य॰) अधर-असि। <small>पूर्वाधरावराणामसि</small><noinclude></noinclude> k3wkp8wy8hohqao6fnv9xbsmm95spsf 667521 667520 2026-07-12T03:22:55Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667521 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३५४'''|'''अधश्चौर—अधस्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>'किन्तु सेंधका गड्डा भी तो कई तरहका होता है,—कमल के फूल-जैसा, सूर्य-जैसा, अर्द्धचन्द्राकार, दीर्घाकार, स्वस्तिक-जैसा और पूर्णकुम्भ-जैसा। अब मैं किस जगह अपना हुनर दिखाऊं, जिसे कल शहरके लोग देखकर अचम्भ में पड़ जायें। इस ईंटके पक्के मकान में पूर्ण कुम्भाकार—पानी भरे घड़े-जैसा गड्डा ही अच्छा लगेगा। इसलिये मुझे वैसा ही गड्डा बनाना चाहिये। 'वरदाता कुमार कार्तिकेयको नमस्कार है। कनकशक्तिको नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेव देवव्रत, भास्करनन्दी और योगाचार्यको नमस्कार है। मैं उनका पहला शिष्य हूं। उन्होंने तुष्ट होकर मुझे गोरोचना दी है। इसे शरीर में लगानेसे नगररक्षक मुझे देख न सकेगा और शरीरपर हथियार चलनेसे चोट न लगेगी। यह बात कहकर शर्विलकने शरीरमें गोरोचना लगा ली। इसके बाद उसने कहा,—अरे! सेंध नापनेका गज़ तो मैं भूल आया। फिर कुछ सोच-समझकर वह बोल उठा,—गज़ न सही, अपने इस जनेऊसे नाप लेनेपर ही काम चल जायेगा। ब्राह्मणका जनेऊ बड़े ही कामकी चीज़ है। विशेषतः मेरे-जैसे ब्राह्मणको इससे कितना ही काम पड़ जाता है। इससे सेंधका गड्ढा नपता; गहना उतरता, दरवाज़ा मज़बूती से बन्द रहनेपर किवाड़ा खुल जाता और सांप या बिच्छूके डङ्क मारनेपर गांठ बंधती है। 'इसके बाद उसने सेंधकी जगह नाप काम शुरू कर दिया। गड्ढे को गहराकर वह बोला,—'एक ईंट और बाक़ी है, जिसके निकलते ही सेंध फूट जायेगी। अरे यह क्या! क्या सांपने काट खाया?' तब उसने जनेऊसे उंगली बांधी, किन्तु विषसे शरीर भभक उठा। इसके बाद चिकित्सा से चङ्गा होकर उसने सेंध फोड़ी। भीतर जाकर देखा, कि दिया जलता था। अन्तमें गड्ढेकी चौड़ाकर सोचने लगा,—'अब तो भीतर घुस जाऊं। नहीं, एकबारगी ही घुस जाना अच्छा नहीं, पहले एक पुतलेको घुसेड़कर देखूं। कोई तो नहीं। कार्तिकेयको<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>नमस्कार करता हूं। घरमें दो आदमी सोरहे हैं। आदमियोंको सोने दो, पहले अपने बचाव के लिये दरवाजा खोल लूं। दरवाज़ा पुराना हो गया, किवाड़से आवाज़ आती है! कहीं से थोड़ासा पानी ढूंढ लाऊं! पानीसे सावधान होकर किवाड़ आर्द्र करूं। पीछे मट्टी गिरनेसे आवाज़ आती है, पीठके सहारे कीवाड़ खोल लूं। जो ही, अब देखना चाहिये, कि ये दोनो असलमें सोते हैं या नहीं; भय दिखानेसे मालूम हुआ, कि असलमें सो रहे हैं। इनकी हलकी सांससे नहीं जान पड़ता कि इन्हें भय लगा है। क्योंकि ख़ूब साफ़ और रह-रहके सांस चलती है, आंखें अच्छी तरह मुंद गई हैं और पुतलियां भी घूमते नहीं देख पड़तीं; शरीर के जोड़ ढीले पड़े और हाथ-पैर बिस्तर से बाहर लटके हैं। असलमें न सोने से आंखपर कभी दियेकी रोशनी नहीं सही जाती।' मृच्छकटिक अति प्राचीन पुस्तक है। शर्विलककी कथा सुननेसे जान पड़ता है, कि पूर्वकालमें इस देशके चोर अपना व्यवसाय बहुत अच्छी तरह समझते-बूझते थे। एक ग्राम्य गल्प प्रचलित है, कि आकाशसे जो वज्र गिरता, वह केले या सार नामक वृक्षमें लगनेसे फिर निकल नहीं सकता, फंस जाता है। सेंध मारनेवाले चोर उसी वज्रके लोहेसे अपना खन्ता बनवाते हैं। यह ठीक नहीं कहा जा सकता, कि इस गल्पकी उत्पत्ति कैसे हुई है। लोहारकी दुकान के पास एक जंगला रहता है। कहते हैं, कि शायद सेंध लगानेवाले चोर उसी जंगलेमें रातको लोहा और मज़दूरीका दाम फेंक जाते हैं। लोहार इशारेसे समझ सकता, कि किस चोरको खन्तेकी ज़रूरत पड़ी है। वह चुपके से एक खन्ता बना उसी जंगलेमें रख देता है। सेंध फोड़नेवाले चोर रातको आ अपना हथियार ले जाते हैं। अधश्शिरस् (सं॰ क्ली॰) अधः अधोवर्ति शिरः मस्तकं यस्य। अवाङ्मस्तक, मुंह लटकाये हुए आदमी। अधस् (सं॰ अव्य॰) अधर-असि। <small>पूर्वाधरावराणामसि</small><noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> 5tnka10hh25yoqa6jwbvnyp2wyozri3 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३६२ 250 83693 667523 347145 2026-07-12T03:55:01Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 667523 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधसेरा—अधिक'''|'''३५५'''}}</noinclude><small>पुरधवश्चैषाम्। पा ५।३।३९ । १ नीचे, तले। ३ पातालमें, अधोभागमें। अधसेरा, असेरा (हिं॰ पु॰) आध सेरका बांट, जो लोहेका होता है। अधस्तन (सं॰ वि॰) अधोभवः, अधस्-ट्यु तुट् च। अधोभव, निम्नगत; नीचेका। अधस्तमाम्, अधस्तराम् (सं॰ अव्य॰) अतिशयेन अधः, तमप् तरप् आमु। <small>किमेत्तिङव्ययघा दाम्बद्रव्यप्रकर्षे। पा ५।४।११।</small> अत्यन्त अधोभागमें, बहुत नीचे। अधस्तल (सं॰ क्ली॰) १ किसी वस्तुके नीचेका स्थान, किसी चीज़के नीचेकी जगह। २ नीचेका कमरा। ३ तहख़ाना। अधस्तात् (सं॰ अव्य॰) अधर-अस्ताति, अध् आदेशः। १ अधोभागमें, नीचे। २ रतिगृहमें, ऐशके कमरेमें। अधस्ताद्दिश् (सं॰ स्त्री॰) निम्नप्रदेश, नीचेकी दुनया। अधस्पद (सं॰ क्ली॰) अधोवृत्ति पदम्। निम्नपद, पैरके नीचेकी जगह। अधस्पदम् (सं॰ अव्य॰) पदके अधोभागमें, पैरके नीचे। अधा (वै॰ अव्य॰) <small>अध देखो।</small> अधांगा (हिं॰ पु॰) पक्षिविशेष, एक चिड़िया। इसके सारे शरीरका रङ्ग ख़ाकी होता, किन्तु गरदन के ऊपरका सम्पूर्ण अंश लाल और बाज़ू तथा पर सुनहला रहता है। अधाधुन्ध (हिं॰ क्रि॰-वि०) भीषण रूपसे, ज़ोर-शोरसे। अधाना (हिं॰ पु॰) अस्थायोविशेष, एक तरहका ख़याल। इसे तिलवाड़ा तालपर बजाते हैं। अधामार्ग, अधामार्गव (सं॰ पु॰) न धीयते अधाः तादृशं मार्ग वातीति वा-क। धामार्गव वृक्ष, अपामार्ग, लटजीरा। (Achyranthes Aspera) अधारणक (सं॰ त्रि॰) साहाय्य करनेके अयोग्य, जो सहारा न दे सके। अधारिया (हिं॰ पु॰) गाड़ीबानके बैठनेकी जगह जो बैलगाड़ीपर रहती है, मोढ़ा। अधार (हिं॰ स्त्री॰) १ सहारेकी चीज़। २ साधुओंके टेकेका पीढ़ा जो काठ के डण्डे में लगा रहता है। ३ सफ़रके सामान डालनेकी झोली। (पु॰) ४ नया बैल, जो फेरा न गया हो। (वि॰) ५ प्यारी, सहारा देनेवाली। अधार्मिक (सं॰ त्रि॰) धर्मं चरति आसेवते, <small>धर्मं चरति। पा ४।४।४१ ।</small> इति ठक् धामिकस्ततो विरोधार्थे नञ्-तत्। पापी, बेईमान। अधार्य (स॰ त्रि॰) धारण करनेके अयोग्य, जिसे थाम, ले जा या रख न सकें। अधावट, अधौटा (हिं॰ वि॰) आधा औटा, औटते-औटते जो आधा गाढ़ा हो जाये। यह विशेषण प्रायः दूधके साथ व्यवहार किया जाता है। अधि (सं॰ पु॰) १ आधीयते दुःखमनेन। आधि, मनःपीड़ा, दिलकी जलन। संस्कृतमें यह शब्द उपसर्गकी भांति भी ऊपर और उस ओरका अर्थ बताने को क्रिया और संज्ञाके साथ लगता है। अधिक (सं॰ वि॰) अध्यारूढ़ एव, स्वार्थे कन् उत्तरपदलोपश्च। १ अतिरिक्त, फ़ालतू। २ प्रधान, ख़ास। ३ असाधारण, ग़ैरमामूली। ४ अनेक, कितना ही। (पु॰) ५ काव्यशास्त्रोक्त अलङ्कार-विशेष,— {{Block center|<poem><small>"महतोर्यन्महीयांसावाश्रिताश्रययोः क्रमात्। आश्रयाश्रयिणौ स्यातां तनुत्वे ऽप्यधिकन्तु तत्॥</poem></small>}} <small>आश्रितमाधेयम् आश्रयस्तदाधारः, तयोर्महतोरपि विषये तदपेचया तन् अप्याश्रयाश्रयिणौ प्रस्तुतवस्तुप्रकर्ष विवक्षया यथाक्रमः यत् अधिकतरतां व्रजतः।"</small> आधार और आधेयको पहले बड़ा बता, फिर छोटे आधार या आधेयकी उससे महत्तर बताने पर अधिक अलङ्कार होता है,— {{Block center|<poem><small>"युगान्तकाले प्रतिसंहृतात्मनो जगन्ति यस्यां सविकाशमासत्। तनौ ममुस्तव न कैटभद्विषस्तपोधनाभ्यागमसम्भवा मुदः॥" (माघ १।२३ ।)</small></poem>}} 'प्रलयकालमें जिन्होंने अपनेमें जीव-सकलको संहृत कर लिया था, उन्हीं कैटभारि श्रीकृष्णके जिस शरीरमें समस्त जगत् विलीन होनेपर भी स्थान रहा; तपोधन नारदके आगमन से उत्पन्न आनन्द उसी शरीरमें फिर न समा सका।'<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> d9kh7l8z617m1e9j7f1a6wqhownfou4 667524 667523 2026-07-12T03:55:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667524 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधसेरा—अधिक'''|'''३५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude><small>पुरधवश्चैषाम्। पा ५।३।३९ । १ नीचे, तले। ३ पातालमें, अधोभागमें। अधसेरा, असेरा (हिं॰ पु॰) आध सेरका बांट, जो लोहेका होता है। अधस्तन (सं॰ वि॰) अधोभवः, अधस्-ट्यु तुट् च। अधोभव, निम्नगत; नीचेका। अधस्तमाम्, अधस्तराम् (सं॰ अव्य॰) अतिशयेन अधः, तमप् तरप् आमु। <small>किमेत्तिङव्ययघा दाम्बद्रव्यप्रकर्षे। पा ५।४।११।</small> अत्यन्त अधोभागमें, बहुत नीचे। अधस्तल (सं॰ क्ली॰) १ किसी वस्तुके नीचेका स्थान, किसी चीज़के नीचेकी जगह। २ नीचेका कमरा। ३ तहख़ाना। अधस्तात् (सं॰ अव्य॰) अधर-अस्ताति, अध् आदेशः। १ अधोभागमें, नीचे। २ रतिगृहमें, ऐशके कमरेमें। अधस्ताद्दिश् (सं॰ स्त्री॰) निम्नप्रदेश, नीचेकी दुनया। अधस्पद (सं॰ क्ली॰) अधोवृत्ति पदम्। निम्नपद, पैरके नीचेकी जगह। अधस्पदम् (सं॰ अव्य॰) पदके अधोभागमें, पैरके नीचे। अधा (वै॰ अव्य॰) <small>अध देखो।</small> अधांगा (हिं॰ पु॰) पक्षिविशेष, एक चिड़िया। इसके सारे शरीरका रङ्ग ख़ाकी होता, किन्तु गरदन के ऊपरका सम्पूर्ण अंश लाल और बाज़ू तथा पर सुनहला रहता है। अधाधुन्ध (हिं॰ क्रि॰-वि०) भीषण रूपसे, ज़ोर-शोरसे। अधाना (हिं॰ पु॰) अस्थायोविशेष, एक तरहका ख़याल। इसे तिलवाड़ा तालपर बजाते हैं। अधामार्ग, अधामार्गव (सं॰ पु॰) न धीयते अधाः तादृशं मार्ग वातीति वा-क। धामार्गव वृक्ष, अपामार्ग, लटजीरा। (Achyranthes Aspera) अधारणक (सं॰ त्रि॰) साहाय्य करनेके अयोग्य, जो सहारा न दे सके। अधारिया (हिं॰ पु॰) गाड़ीबानके बैठनेकी जगह जो बैलगाड़ीपर रहती है, मोढ़ा। अधार (हिं॰ स्त्री॰) १ सहारेकी चीज़। २ साधुओंके टेकेका पीढ़ा जो काठ के डण्डे में लगा रहता है। ३ सफ़रके सामान डालनेकी झोली। (पु॰) ४ नया बैल, जो फेरा न गया हो। (वि॰) ५ प्यारी, सहारा देनेवाली। अधार्मिक (सं॰ त्रि॰) धर्मं चरति आसेवते, <small>धर्मं चरति। पा ४।४।४१ ।</small> इति ठक् धामिकस्ततो विरोधार्थे नञ्-तत्। पापी, बेईमान। अधार्य (स॰ त्रि॰) धारण करनेके अयोग्य, जिसे थाम, ले जा या रख न सकें। अधावट, अधौटा (हिं॰ वि॰) आधा औटा, औटते-औटते जो आधा गाढ़ा हो जाये। यह विशेषण प्रायः दूधके साथ व्यवहार किया जाता है। अधि (सं॰ पु॰) १ आधीयते दुःखमनेन। आधि, मनःपीड़ा, दिलकी जलन। संस्कृतमें यह शब्द उपसर्गकी भांति भी ऊपर और उस ओरका अर्थ बताने को क्रिया और संज्ञाके साथ लगता है। अधिक (सं॰ वि॰) अध्यारूढ़ एव, स्वार्थे कन् उत्तरपदलोपश्च। १ अतिरिक्त, फ़ालतू। २ प्रधान, ख़ास। ३ असाधारण, ग़ैरमामूली। ४ अनेक, कितना ही। (पु॰) ५ काव्यशास्त्रोक्त अलङ्कार-विशेष,— {{Block center|<poem><small>"महतोर्यन्महीयांसावाश्रिताश्रययोः क्रमात्। आश्रयाश्रयिणौ स्यातां तनुत्वे ऽप्यधिकन्तु तत्॥</poem></small>}} <small>आश्रितमाधेयम् आश्रयस्तदाधारः, तयोर्महतोरपि विषये तदपेचया तन् अप्याश्रयाश्रयिणौ प्रस्तुतवस्तुप्रकर्ष विवक्षया यथाक्रमः यत् अधिकतरतां व्रजतः।"</small> आधार और आधेयको पहले बड़ा बता, फिर छोटे आधार या आधेयकी उससे महत्तर बताने पर अधिक अलङ्कार होता है,— {{Block center|<poem><small>"युगान्तकाले प्रतिसंहृतात्मनो जगन्ति यस्यां सविकाशमासत्। तनौ ममुस्तव न कैटभद्विषस्तपोधनाभ्यागमसम्भवा मुदः॥" (माघ १।२३ ।)</small></poem>}} 'प्रलयकालमें जिन्होंने अपनेमें जीव-सकलको संहृत कर लिया था, उन्हीं कैटभारि श्रीकृष्णके जिस शरीरमें समस्त जगत् विलीन होनेपर भी स्थान रहा; तपोधन नारदके आगमन से उत्पन्न आनन्द उसी शरीरमें फिर न समा सका।'<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> t79yo7iucaq03p5c08cmk1h83mq8fr6 667525 667524 2026-07-12T03:56:30Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 667525 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधसेरा—अधिक'''|'''३५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude><small>पुरधवश्चैषाम्। पा ५।३।३९ । १ नीचे, तले। ३ पातालमें, अधोभागमें। अधसेरा, असेरा (हिं॰ पु॰) आध सेरका बांट, जो लोहेका होता है। अधस्तन (सं॰ वि॰) अधोभवः, अधस्-ट्यु तुट् च। अधोभव, निम्नगत; नीचेका। अधस्तमाम्, अधस्तराम् (सं॰ अव्य॰) अतिशयेन अधः, तमप् तरप् आमु। <small>किमेत्तिङव्ययघा दाम्बद्रव्यप्रकर्षे। पा ५।४।११।</small> अत्यन्त अधोभागमें, बहुत नीचे। अधस्तल (सं॰ क्ली॰) १ किसी वस्तुके नीचेका स्थान, किसी चीज़के नीचेकी जगह। २ नीचेका कमरा। ३ तहख़ाना। अधस्तात् (सं॰ अव्य॰) अधर-अस्ताति, अध् आदेशः। १ अधोभागमें, नीचे। २ रतिगृहमें, ऐशके कमरेमें। अधस्ताद्दिश् (सं॰ स्त्री॰) निम्नप्रदेश, नीचेकी दुनया। अधस्पद (सं॰ क्ली॰) अधोवृत्ति पदम्। निम्नपद, पैरके नीचेकी जगह। अधस्पदम् (सं॰ अव्य॰) पदके अधोभागमें, पैरके नीचे। अधा (वै॰ अव्य॰) <small>अध देखो।</small> अधांगा (हिं॰ पु॰) पक्षिविशेष, एक चिड़िया। इसके सारे शरीरका रङ्ग ख़ाकी होता, किन्तु गरदन के ऊपरका सम्पूर्ण अंश लाल और बाज़ू तथा पर सुनहला रहता है। अधाधुन्ध (हिं॰ क्रि॰-वि०) भीषण रूपसे, ज़ोर-शोरसे। अधाना (हिं॰ पु॰) अस्थायोविशेष, एक तरहका ख़याल। इसे तिलवाड़ा तालपर बजाते हैं। अधामार्ग, अधामार्गव (सं॰ पु॰) न धीयते अधाः तादृशं मार्ग वातीति वा-क। धामार्गव वृक्ष, अपामार्ग, लटजीरा। (Achyranthes Aspera) अधारणक (सं॰ त्रि॰) साहाय्य करनेके अयोग्य, जो सहारा न दे सके। अधारिया (हिं॰ पु॰) गाड़ीबानके बैठनेकी जगह जो बैलगाड़ीपर रहती है, मोढ़ा।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधार (हिं॰ स्त्री॰) १ सहारेकी चीज़। २ साधुओंके टेकेका पीढ़ा जो काठ के डण्डे में लगा रहता है। ३ सफ़रके सामान डालनेकी झोली। (पु॰) ४ नया बैल, जो फेरा न गया हो। (वि॰) ५ प्यारी, सहारा देनेवाली। अधार्मिक (सं॰ त्रि॰) धर्मं चरति आसेवते, <small>धर्मं चरति। पा ४।४।४१ ।</small> इति ठक् धामिकस्ततो विरोधार्थे नञ्-तत्। पापी, बेईमान। अधार्य (स॰ त्रि॰) धारण करनेके अयोग्य, जिसे थाम, ले जा या रख न सकें। अधावट, अधौटा (हिं॰ वि॰) आधा औटा, औटते-औटते जो आधा गाढ़ा हो जाये। यह विशेषण प्रायः दूधके साथ व्यवहार किया जाता है। अधि (सं॰ पु॰) १ आधीयते दुःखमनेन। आधि, मनःपीड़ा, दिलकी जलन। संस्कृतमें यह शब्द उपसर्गकी भांति भी ऊपर और उस ओरका अर्थ बताने को क्रिया और संज्ञाके साथ लगता है। अधिक (सं॰ वि॰) अध्यारूढ़ एव, स्वार्थे कन् उत्तरपदलोपश्च। १ अतिरिक्त, फ़ालतू। २ प्रधान, ख़ास। ३ असाधारण, ग़ैरमामूली। ४ अनेक, कितना ही। (पु॰) ५ काव्यशास्त्रोक्त अलङ्कार-विशेष,— {{Block center|<poem><small>"महतोर्यन्महीयांसावाश्रिताश्रययोः क्रमात्। आश्रयाश्रयिणौ स्यातां तनुत्वे ऽप्यधिकन्तु तत्॥</poem></small>}} <small>आश्रितमाधेयम् आश्रयस्तदाधारः, तयोर्महतोरपि विषये तदपेचया तन् अप्याश्रयाश्रयिणौ प्रस्तुतवस्तुप्रकर्ष विवक्षया यथाक्रमः यत् अधिकतरतां व्रजतः।"</small> आधार और आधेयको पहले बड़ा बता, फिर छोटे आधार या आधेयकी उससे महत्तर बताने पर अधिक अलङ्कार होता है,— {{Block center|<poem><small>"युगान्तकाले प्रतिसंहृतात्मनो जगन्ति यस्यां सविकाशमासत्। तनौ ममुस्तव न कैटभद्विषस्तपोधनाभ्यागमसम्भवा मुदः॥" (माघ १।२३ ।)</small></poem>}} 'प्रलयकालमें जिन्होंने अपनेमें जीव-सकलको संहृत कर लिया था, उन्हीं कैटभारि श्रीकृष्णके जिस शरीरमें समस्त जगत् विलीन होनेपर भी स्थान रहा; तपोधन नारदके आगमन से उत्पन्न आनन्द उसी शरीरमें फिर न समा सका।'<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> 9n8be932t6x23n1hjpe8hinv8e834ct 667526 667525 2026-07-12T03:57:33Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667526 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधसेरा—अधिक'''|'''३५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude><small>पुरधवश्चैषाम्। पा ५।३।३९ ।</small>१ नीचे, तले। ३ पातालमें, अधोभागमें। अधसेरा, असेरा (हिं॰ पु॰) आध सेरका बांट, जो लोहेका होता है। अधस्तन (सं॰ वि॰) अधोभवः, अधस्-ट्यु तुट् च। अधोभव, निम्नगत; नीचेका। अधस्तमाम्, अधस्तराम् (सं॰ अव्य॰) अतिशयेन अधः, तमप् तरप् आमु। <small>किमेत्तिङव्ययघा दाम्बद्रव्यप्रकर्षे। पा ५।४।११।</small> अत्यन्त अधोभागमें, बहुत नीचे। अधस्तल (सं॰ क्ली॰) १ किसी वस्तुके नीचेका स्थान, किसी चीज़के नीचेकी जगह। २ नीचेका कमरा। ३ तहख़ाना। अधस्तात् (सं॰ अव्य॰) अधर-अस्ताति, अध् आदेशः। १ अधोभागमें, नीचे। २ रतिगृहमें, ऐशके कमरेमें। अधस्ताद्दिश् (सं॰ स्त्री॰) निम्नप्रदेश, नीचेकी दुनया। अधस्पद (सं॰ क्ली॰) अधोवृत्ति पदम्। निम्नपद, पैरके नीचेकी जगह। अधस्पदम् (सं॰ अव्य॰) पदके अधोभागमें, पैरके नीचे। अधा (वै॰ अव्य॰) <small>अध देखो।</small> अधांगा (हिं॰ पु॰) पक्षिविशेष, एक चिड़िया। इसके सारे शरीरका रङ्ग ख़ाकी होता, किन्तु गरदन के ऊपरका सम्पूर्ण अंश लाल और बाज़ू तथा पर सुनहला रहता है। अधाधुन्ध (हिं॰ क्रि॰-वि०) भीषण रूपसे, ज़ोर-शोरसे। अधाना (हिं॰ पु॰) अस्थायोविशेष, एक तरहका ख़याल। इसे तिलवाड़ा तालपर बजाते हैं। अधामार्ग, अधामार्गव (सं॰ पु॰) न धीयते अधाः तादृशं मार्ग वातीति वा-क। धामार्गव वृक्ष, अपामार्ग, लटजीरा। (Achyranthes Aspera) अधारणक (सं॰ त्रि॰) साहाय्य करनेके अयोग्य, जो सहारा न दे सके। अधारिया (हिं॰ पु॰) गाड़ीबानके बैठनेकी जगह जो बैलगाड़ीपर रहती है, मोढ़ा।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधार (हिं॰ स्त्री॰) १ सहारेकी चीज़। २ साधुओंके टेकेका पीढ़ा जो काठ के डण्डे में लगा रहता है। ३ सफ़रके सामान डालनेकी झोली। (पु॰) ४ नया बैल, जो फेरा न गया हो। (वि॰) ५ प्यारी, सहारा देनेवाली। अधार्मिक (सं॰ त्रि॰) धर्मं चरति आसेवते, <small>धर्मं चरति। पा ४।४।४१ ।</small> इति ठक् धामिकस्ततो विरोधार्थे नञ्-तत्। पापी, बेईमान। अधार्य (स॰ त्रि॰) धारण करनेके अयोग्य, जिसे थाम, ले जा या रख न सकें। अधावट, अधौटा (हिं॰ वि॰) आधा औटा, औटते-औटते जो आधा गाढ़ा हो जाये। यह विशेषण प्रायः दूधके साथ व्यवहार किया जाता है। अधि (सं॰ पु॰) १ आधीयते दुःखमनेन। आधि, मनःपीड़ा, दिलकी जलन। संस्कृतमें यह शब्द उपसर्गकी भांति भी ऊपर और उस ओरका अर्थ बताने को क्रिया और संज्ञाके साथ लगता है। अधिक (सं॰ वि॰) अध्यारूढ़ एव, स्वार्थे कन् उत्तरपदलोपश्च। १ अतिरिक्त, फ़ालतू। २ प्रधान, ख़ास। ३ असाधारण, ग़ैरमामूली। ४ अनेक, कितना ही। (पु॰) ५ काव्यशास्त्रोक्त अलङ्कार-विशेष,— {{Block center|<poem><small>"महतोर्यन्महीयांसावाश्रिताश्रययोः क्रमात्। आश्रयाश्रयिणौ स्यातां तनुत्वे ऽप्यधिकन्तु तत्॥</poem></small>}} <small>आश्रितमाधेयम् आश्रयस्तदाधारः, तयोर्महतोरपि विषये तदपेचया तन् अप्याश्रयाश्रयिणौ प्रस्तुतवस्तुप्रकर्ष विवक्षया यथाक्रमः यत् अधिकतरतां व्रजतः।"</small> आधार और आधेयको पहले बड़ा बता, फिर छोटे आधार या आधेयकी उससे महत्तर बताने पर अधिक अलङ्कार होता है,— {{Block center|<poem><small>"युगान्तकाले प्रतिसंहृतात्मनो जगन्ति यस्यां सविकाशमासत्। तनौ ममुस्तव न कैटभद्विषस्तपोधनाभ्यागमसम्भवा मुदः॥" (माघ १।२३ ।)</small></poem>}} 'प्रलयकालमें जिन्होंने अपनेमें जीव-सकलको संहृत कर लिया था, उन्हीं कैटभारि श्रीकृष्णके जिस शरीरमें समस्त जगत् विलीन होनेपर भी स्थान रहा; तपोधन नारदके आगमन से उत्पन्न आनन्द उसी शरीरमें फिर न समा सका।'<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude><noinclude></noinclude> obi68mfr3rmu6yb0y7npds4ojtnwi38 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३६३ 250 83695 667527 347147 2026-07-12T04:24:05Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667527 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३५६'''|'''अधिक—अधिकरण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>इस स्थानमें श्रीकृष्णका शरीर आधार है। पहले वही आधार इतना बढ़कर बताया, कि उसमें समस्त जगत् लीन हो गया था। पीछे नारदके आगमन से उत्पन्न आनन्द उसी आधारका दूसरा आधेय बना। इस आधेयकी इतनी प्रशंसा हुई, कि जिस शरीरमें सम्पूर्ण जगत् समा गया था, उसमें भी इसे स्थान न मिला, यह एकबारगी ही उमड पड़ा। युगान्त इत्यादि माघका श्लोक काव्यप्रकाशवाले अधिक अलङ्कारकी भांति उद्धृत किया गया है। किन्तु माघकी टीकामें मल्लिनाथने उसे अतिशयोक्ति अलङ्कार बताकर निर्देश किया है,— <small>"कविप्रौढ़ोक्तिसिद्धातिशयेन स्वतः सिद्धस्यभेदेनाध्यवसितातिशयोक्तिः स च मुदामन्तः सम्वन्धोक्त्या सम्बन्धरूपा।"</small> यह श्लोक दोनो अलङ्कारमें अच्छी तरह लग जाता है,— {{Block center|<poem><small>"अहो विशालं भुपाल भुवनत्रितयोदरम्। माति मातुमशक्योऽपि यशोराशिर्यदव ते॥"</small></poem>}} अर्थात्,— {{Block center|<poem><small>अमित राशि यशकी यदपि तदपि जगत्-उर बीच। पैठि जात नृप देखिये कत हूं ऊच न नीच॥</poem></small>}} यहां यशोराशि अधेय है। पहले यह इतनी बड़ी बताई गई, कि इसका परिमाण न किया जा सका। फिर त्रिभुवनको आधार मान इतना बड़ा बताया, कि वह इसे धारण कर सका था। ६ न्यायमत से—हेतु—उदाहरण अधिक, अधिक हेतु आदिकथन, संबब और मिसालका ज्य़ादा देना। (क्ली॰) ७ आधिक्य, बहुतायत। (अव्य॰) ८ अधिक मात्रामें, बहुत ज्य़ादा। अधिकचयकारिन् (सं॰ वि॰) अत्यन्त विनाशक, बहुत बरबादी करनेवाला। अधिकण्टक (सं॰ पु॰) यासक्षुप, दुरालभाविशेष। अधिकतम (सं॰ त्रि॰) अधिक-तमप्। अनेकके मध्य अधिक, अत्यन्त उत्कृष्ट; सबसे ज्य़ादा, निहायत उम्दा। अधिकतर (सं॰ त्रि॰) अधिक-तरप्। दोके मध्य एकसे अधिक, दोमें एकसे ज्य़ादा। अधिकता (सं॰ स्त्री॰) ज्य़ादती, बहुतायत। अधिकतिथि (सं॰ स्त्री॰) अतिरिक्त तिथि, जो सौर वर्ष पूरा करनेको जोड़ी जाती है। अधिकदन्त, अधिदन्त (सं॰ पु॰) फ़ालतू दांत जो दूसरेपर जम आता है। अधिक-दिन, अधिदिन (सं॰ क्ली॰) फ़ालतू दिन, जो सौर वर्ष पूरा करने में जुड़ता है। अधिकन्तु (सं॰ अव्य॰) अधिकं-तु। और भी, इससे भी ज्य़ादा। अधिकप्रिय (सं० क्लो० ) त्वक्, दालचीनो । अधिकमांसार्मन् (सं० क्लो० ) आंखका उभरा हुआ मांस । अधिकमास (सं० पु० ) कर्मधा० । अधिक म जो सौर वर्ष पूरा करनेको जोड़ा जाता है, मलमास, लौंदका महीना । मलमास देखो। अधिकरण (स ं० क्लो० ) अधिक ल्युट् । आधारोऽधि- करणम् । पा १ ४ ४५| आधार, सहारा । व्याकरणमें कर्ता और कर्मको क्रियाका जो आधार होता है, उसे अधिकरण-कारक कहते हैं । जैसे—क आस्ते अर्थात् वह चटाईपर बैठा है । यहां 'वह' कर्ता । इस कर्ताको वास-रूप क्रियाका आधार 'कट'' इसलिये कट अधिकरण कारकमें प्रयुक्त हुआ है। पुनश्च—,— स्थाल्यां पचति अर्थात् बरतन में वह भोजन बनाता है । यहां अन्नादि पाक-क्रियाका आधार स्थालौ है। इसलिये स्थाली अधिकरण ' कारक बन गई है। २ "औपश्चषिको वैषयिको ऽभिव्यापकच त्याधारस्त्रिधा ।" ( भट्टोजिदीक्षित ) आधार तीन प्रकारका है, -१ औपश्लेषिक, वैषयिक और ३ अभिव्यापक । किसी अवयवसे जो संयोग रहता है, उसे औपश्लेषिक आधार कहते हैं । यथा, 'कटे आस्ते' अर्थात् वह चटाईपर बैठा है । किसी विषयको बोध करानेवाला आधार वैषयिक है । यथा, 'मोचे इच्छास्ति' अर्थात् मोक्षपानेको उसको इच्छा है । तात्पर्य यह, कि मोक्ष उसको इच्छाका जहां आधार में आधेय वस्तु सम्पूर्ण रूपसे निहायत उम्दा । : विषय है। व्याप्त रहती, वहीं अभिव्यापक होता है । यथा, 'दुग्ध- -<noinclude></noinclude> rf7oexfn2m2kmc3tvx039rx3gxmj27w 667528 667527 2026-07-12T04:33:48Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 667528 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३५६'''|'''अधिक—अधिकरण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>इस स्थानमें श्रीकृष्णका शरीर आधार है। पहले वही आधार इतना बढ़कर बताया, कि उसमें समस्त जगत् लीन हो गया था। पीछे नारदके आगमन से उत्पन्न आनन्द उसी आधारका दूसरा आधेय बना। इस आधेयकी इतनी प्रशंसा हुई, कि जिस शरीरमें सम्पूर्ण जगत् समा गया था, उसमें भी इसे स्थान न मिला, यह एकबारगी ही उमड पड़ा। युगान्त इत्यादि माघका श्लोक काव्यप्रकाशवाले अधिक अलङ्कारकी भांति उद्धृत किया गया है। किन्तु माघकी टीकामें मल्लिनाथने उसे अतिशयोक्ति अलङ्कार बताकर निर्देश किया है,— <small>"कविप्रौढ़ोक्तिसिद्धातिशयेन स्वतः सिद्धस्यभेदेनाध्यवसितातिशयोक्तिः स च मुदामन्तः सम्वन्धोक्त्या सम्बन्धरूपा।"</small> यह श्लोक दोनो अलङ्कारमें अच्छी तरह लग जाता है,— {{Block center|<poem><small>"अहो विशालं भुपाल भुवनत्रितयोदरम्। माति मातुमशक्योऽपि यशोराशिर्यदव ते॥"</small></poem>}} अर्थात्,— {{Block center|<poem><small>अमित राशि यशकी यदपि तदपि जगत्-उर बीच। पैठि जात नृप देखिये कत हूं ऊच न नीच॥</poem></small>}} यहां यशोराशि अधेय है। पहले यह इतनी बड़ी बताई गई, कि इसका परिमाण न किया जा सका। फिर त्रिभुवनको आधार मान इतना बड़ा बताया, कि वह इसे धारण कर सका था। ६ न्यायमत से—हेतु—उदाहरण अधिक, अधिक हेतु आदिकथन, संबब और मिसालका ज्य़ादा देना। (क्ली॰) ७ आधिक्य, बहुतायत। (अव्य॰) ८ अधिक मात्रामें, बहुत ज्य़ादा। अधिकचयकारिन् (सं॰ वि॰) अत्यन्त विनाशक, बहुत बरबादी करनेवाला। अधिकण्टक (सं॰ पु॰) यासक्षुप, दुरालभाविशेष। अधिकतम (सं॰ त्रि॰) अधिक-तमप्। अनेकके मध्य अधिक, अत्यन्त उत्कृष्ट; सबसे ज्य़ादा, निहायत उम्दा। अधिकतर (सं॰ त्रि॰) अधिक-तरप्। दोके मध्य एकसे अधिक, दोमें एकसे ज्य़ादा। अधिकता (सं॰ स्त्री॰) ज्य़ादती, बहुतायत। अधिकतिथि (सं॰ स्त्री॰) अतिरिक्त तिथि, जो सौर वर्ष पूरा करनेको जोड़ी जाती है। अधिकदन्त, अधिदन्त (सं॰ पु॰) फ़ालतू दांत जो दूसरेपर जम आता है। अधिक-दिन, अधिदिन (सं॰ क्ली॰) फ़ालतू दिन, जो सौर वर्ष पूरा करने में जुड़ता है। अधिकन्तु (सं॰ अव्य॰) अधिकं-तु। और भी, इससे भी ज्य़ादा। अधिकप्रिय (सं॰ क्ली॰) त्वक्, दालचीनी। अधिकमांसार्मन् (सं॰ क्ली॰) आंखका उभरा हुआ मांस। अधिकमास (सं॰ पु॰) कर्मधा॰। अधिक मास जो सौर वर्ष पूरा करनेको जोड़ा जाता है, मलमास, लौंदका महीना। <small>मलमास देखो।</small> अधिकरण (सं॰ क्ली॰) अधि-कृ-ल्युट्। <small>आधारोऽधि-करणम्। पा १।४।४५।</small> आधार, सहारा। व्याकरणमें कर्ता और कर्मकी क्रियाका जो आधार होता है, उसे अधिकरण-कारक कहते हैं। जैसे—कटे आस्ते अर्थात् वह चटाईपर बैठा है। यहां 'वह' कर्ता है। इस कर्ताकी वास-रूप क्रियाका आधार 'कट' है। इसलिये कट अधिकरण कारकमें प्रयुक्त हुआ है। पुनश्च—,— स्थाल्यां पचति अर्थात् बरतन में वह भोजन बनाता है। यहां अन्नादि पाक-क्रियाका आधार स्थाली है। इसलिये स्थाली अधिकरण कारक बन गई है। <small>"औपश्लेषिको वैषयिको ऽभिव्यापकश्चेत्याधारस्त्रिधा।" (भट्टोजिदीक्षित)</small> आधार तीन प्रकारका है,—१ औपश्लेषिक, २ वैषयिक और ३ अभिव्यापक। किसी अवयवसे जो संयोग रहता है, उसे औपश्लेषिक आधार कहते हैं। यथा, 'कटे आस्ते' अर्थात् वह चटाईपर बैठा है। किसी विषयको बोध करानेवाला आधार वैषयिक है। यथा, 'मोक्षे इच्छास्ति' अर्थात् मोक्षपानेको उसकी इच्छा है। तात्पर्य यह, कि मोक्ष उसकी इच्छाका विषय है। जहां आधार में आधेय वस्तु सम्पूर्ण रूपसे व्याप्त रहती, वहीं अभिव्यापक होता है। यथा, 'दुग्धे-<noinclude></noinclude> kzoth7am1uuade3usd6kriwgz85gz6p 667529 667528 2026-07-12T04:34:35Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667529 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३५६'''|'''अधिक—अधिकरण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>इस स्थानमें श्रीकृष्णका शरीर आधार है। पहले वही आधार इतना बढ़कर बताया, कि उसमें समस्त जगत् लीन हो गया था। पीछे नारदके आगमन से उत्पन्न आनन्द उसी आधारका दूसरा आधेय बना। इस आधेयकी इतनी प्रशंसा हुई, कि जिस शरीरमें सम्पूर्ण जगत् समा गया था, उसमें भी इसे स्थान न मिला, यह एकबारगी ही उमड पड़ा। युगान्त इत्यादि माघका श्लोक काव्यप्रकाशवाले अधिक अलङ्कारकी भांति उद्धृत किया गया है। किन्तु माघकी टीकामें मल्लिनाथने उसे अतिशयोक्ति अलङ्कार बताकर निर्देश किया है,— <small>"कविप्रौढ़ोक्तिसिद्धातिशयेन स्वतः सिद्धस्यभेदेनाध्यवसितातिशयोक्तिः स च मुदामन्तः सम्वन्धोक्त्या सम्बन्धरूपा।"</small> यह श्लोक दोनो अलङ्कारमें अच्छी तरह लग जाता है,— {{Block center|<poem><small>"अहो विशालं भुपाल भुवनत्रितयोदरम्। माति मातुमशक्योऽपि यशोराशिर्यदव ते॥"</small></poem>}} अर्थात्,— {{Block center|<poem><small>अमित राशि यशकी यदपि तदपि जगत्-उर बीच। पैठि जात नृप देखिये कत हूं ऊच न नीच॥</poem></small>}} यहां यशोराशि अधेय है। पहले यह इतनी बड़ी बताई गई, कि इसका परिमाण न किया जा सका। फिर त्रिभुवनको आधार मान इतना बड़ा बताया, कि वह इसे धारण कर सका था। ६ न्यायमत से—हेतु—उदाहरण अधिक, अधिक हेतु आदिकथन, संबब और मिसालका ज्य़ादा देना। (क्ली॰) ७ आधिक्य, बहुतायत। (अव्य॰) ८ अधिक मात्रामें, बहुत ज्य़ादा। अधिकचयकारिन् (सं॰ वि॰) अत्यन्त विनाशक, बहुत बरबादी करनेवाला। अधिकण्टक (सं॰ पु॰) यासक्षुप, दुरालभाविशेष। अधिकतम (सं॰ त्रि॰) अधिक-तमप्। अनेकके मध्य अधिक, अत्यन्त उत्कृष्ट; सबसे ज्य़ादा, निहायत उम्दा। अधिकतर (सं॰ त्रि॰) अधिक-तरप्। दोके मध्य एकसे अधिक, दोमें एकसे ज्य़ादा।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिकता (सं॰ स्त्री॰) ज्य़ादती, बहुतायत। अधिकतिथि (सं॰ स्त्री॰) अतिरिक्त तिथि, जो सौर वर्ष पूरा करनेको जोड़ी जाती है। अधिकदन्त, अधिदन्त (सं॰ पु॰) फ़ालतू दांत जो दूसरेपर जम आता है। अधिक-दिन, अधिदिन (सं॰ क्ली॰) फ़ालतू दिन, जो सौर वर्ष पूरा करने में जुड़ता है। अधिकन्तु (सं॰ अव्य॰) अधिकं-तु। और भी, इससे भी ज्य़ादा। अधिकप्रिय (सं॰ क्ली॰) त्वक्, दालचीनी। अधिकमांसार्मन् (सं॰ क्ली॰) आंखका उभरा हुआ मांस। अधिकमास (सं॰ पु॰) कर्मधा॰। अधिक मास जो सौर वर्ष पूरा करनेको जोड़ा जाता है, मलमास, लौंदका महीना। <small>मलमास देखो।</small> अधिकरण (सं॰ क्ली॰) अधि-कृ-ल्युट्। <small>आधारोऽधि-करणम्। पा १।४।४५।</small> आधार, सहारा। व्याकरणमें कर्ता और कर्मकी क्रियाका जो आधार होता है, उसे अधिकरण-कारक कहते हैं। जैसे—कटे आस्ते अर्थात् वह चटाईपर बैठा है। यहां 'वह' कर्ता है। इस कर्ताकी वास-रूप क्रियाका आधार 'कट' है। इसलिये कट अधिकरण कारकमें प्रयुक्त हुआ है। पुनश्च—,— स्थाल्यां पचति अर्थात् बरतन में वह भोजन बनाता है। यहां अन्नादि पाक-क्रियाका आधार स्थाली है। इसलिये स्थाली अधिकरण कारक बन गई है। <small>"औपश्लेषिको वैषयिको ऽभिव्यापकश्चेत्याधारस्त्रिधा।" (भट्टोजिदीक्षित)</small> आधार तीन प्रकारका है,—१ औपश्लेषिक, २ वैषयिक और ३ अभिव्यापक। किसी अवयवसे जो संयोग रहता है, उसे औपश्लेषिक आधार कहते हैं। यथा, 'कटे आस्ते' अर्थात् वह चटाईपर बैठा है। किसी विषयको बोध करानेवाला आधार वैषयिक है। यथा, 'मोक्षे इच्छास्ति' अर्थात् मोक्षपानेको उसकी इच्छा है। तात्पर्य यह, कि मोक्ष उसकी इच्छाका विषय है। जहां आधार में आधेय वस्तु सम्पूर्ण रूपसे व्याप्त रहती, वहीं अभिव्यापक होता है। यथा, 'दुग्धे-<noinclude></noinclude> 18jijhunli7pc383qo50kbho6qd1ha7 667530 667529 2026-07-12T04:35:15Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667530 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३५६'''|'''अधिक—अधिकरण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>इस स्थानमें श्रीकृष्णका शरीर आधार है। पहले वही आधार इतना बढ़कर बताया, कि उसमें समस्त जगत् लीन हो गया था। पीछे नारदके आगमन से उत्पन्न आनन्द उसी आधारका दूसरा आधेय बना। इस आधेयकी इतनी प्रशंसा हुई, कि जिस शरीरमें सम्पूर्ण जगत् समा गया था, उसमें भी इसे स्थान न मिला, यह एकबारगी ही उमड पड़ा। युगान्त इत्यादि माघका श्लोक काव्यप्रकाशवाले अधिक अलङ्कारकी भांति उद्धृत किया गया है। किन्तु माघकी टीकामें मल्लिनाथने उसे अतिशयोक्ति अलङ्कार बताकर निर्देश किया है,— <small>"कविप्रौढ़ोक्तिसिद्धातिशयेन स्वतः सिद्धस्यभेदेनाध्यवसितातिशयोक्तिः स च मुदामन्तः सम्वन्धोक्त्या सम्बन्धरूपा।"</small> यह श्लोक दोनो अलङ्कारमें अच्छी तरह लग जाता है,— {{Block center|<poem><small>"अहो विशालं भुपाल भुवनत्रितयोदरम्। माति मातुमशक्योऽपि यशोराशिर्यदव ते॥"</small></poem>}} अर्थात्,— {{Block center|<poem><small>अमित राशि यशकी यदपि तदपि जगत्-उर बीच। पैठि जात नृप देखिये कत हूं ऊच न नीच॥</poem></small>}} यहां यशोराशि अधेय है। पहले यह इतनी बड़ी बताई गई, कि इसका परिमाण न किया जा सका। फिर त्रिभुवनको आधार मान इतना बड़ा बताया, कि वह इसे धारण कर सका था। ६ न्यायमत से—हेतु—उदाहरण अधिक, अधिक हेतु आदिकथन, संबब और मिसालका ज्य़ादा देना। (क्ली॰) ७ आधिक्य, बहुतायत। (अव्य॰) ८ अधिक मात्रामें, बहुत ज्य़ादा। अधिकचयकारिन् (सं॰ वि॰) अत्यन्त विनाशक, बहुत बरबादी करनेवाला। अधिकण्टक (सं॰ पु॰) यासक्षुप, दुरालभाविशेष। अधिकतम (सं॰ त्रि॰) अधिक-तमप्। अनेकके मध्य अधिक, अत्यन्त उत्कृष्ट; सबसे ज्य़ादा, निहायत उम्दा। अधिकतर (सं॰ त्रि॰) अधिक-तरप्। दोके मध्य एकसे अधिक, दोमें एकसे ज्य़ादा।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिकता (सं॰ स्त्री॰) ज्य़ादती, बहुतायत। अधिकतिथि (सं॰ स्त्री॰) अतिरिक्त तिथि, जो सौर वर्ष पूरा करनेको जोड़ी जाती है। अधिकदन्त, अधिदन्त (सं॰ पु॰) फ़ालतू दांत जो दूसरेपर जम आता है। अधिक-दिन, अधिदिन (सं॰ क्ली॰) फ़ालतू दिन, जो सौर वर्ष पूरा करने में जुड़ता है। अधिकन्तु (सं॰ अव्य॰) अधिकं-तु। और भी, इससे भी ज्य़ादा। अधिकप्रिय (सं॰ क्ली॰) त्वक्, दालचीनी। अधिकमांसार्मन् (सं॰ क्ली॰) आंखका उभरा हुआ मांस। अधिकमास (सं॰ पु॰) कर्मधा॰। अधिक मास जो सौर वर्ष पूरा करनेको जोड़ा जाता है, मलमास, लौंदका महीना। <small>मलमास देखो।</small> अधिकरण (सं॰ क्ली॰) अधि-कृ-ल्युट्। <small>आधारोऽधि-करणम्। पा १।४।४५।</small> आधार, सहारा। व्याकरणमें कर्ता और कर्मकी क्रियाका जो आधार होता है, उसे अधिकरण-कारक कहते हैं। जैसे—कटे आस्ते अर्थात् वह चटाईपर बैठा है। यहां 'वह' कर्ता है। इस कर्ताकी वास-रूप क्रियाका आधार 'कट' है। इसलिये कट अधिकरण कारकमें प्रयुक्त हुआ है। पुनश्च—,— स्थाल्यां पचति अर्थात् बरतन में वह भोजन बनाता है। यहां अन्नादि पाक-क्रियाका आधार स्थाली है। इसलिये स्थाली अधिकरण कारक बन गई है। <small>"औपश्लेषिको वैषयिको ऽभिव्यापकश्चेत्याधारस्त्रिधा।" (भट्टोजिदीक्षित)</small> आधार तीन प्रकारका है,—१ औपश्लेषिक, २ वैषयिक और ३ अभिव्यापक। किसी अवयवसे जो संयोग रहता है, उसे औपश्लेषिक आधार कहते हैं। यथा, 'कटे आस्ते' अर्थात् वह चटाईपर बैठा है। किसी विषयको बोध करानेवाला आधार वैषयिक है। यथा, 'मोक्षे इच्छास्ति' अर्थात् मोक्षपानेको उसकी इच्छा है। तात्पर्य यह, कि मोक्ष उसकी इच्छाका विषय है। जहां आधार में आधेय वस्तु सम्पूर्ण रूपसे व्याप्त रहती, वहीं अभिव्यापक होता है। यथा, 'दुग्धे-<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> b59osl7v85m3pwpnxs9ippytfhu3tjn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३६४ 250 83697 667532 347150 2026-07-12T05:44:44Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667532 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधिकरण—अधिकर्म'''|'''३५७'''}}</noinclude>माधुर्यमस्ति' अर्थात् दूधमें माधुर्य विद्यमान है। यहां माधुर्य गुण समस्त ही दुग्धमें व्याप्त हो रहा है। वोपदेवके मतसे आधार चतुर्विध है—<small>सामीप्याश्चे षविषयैर्व्यावृत्या-धारश्चतुर्विधः।</small> सामीप्य, आश्लेष, विषय और व्याप्ति। सामीप्यका अर्थ समीपका भाव है; यथा, 'गङ्गायां घोषः' अर्थात् गङ्गाके समीप या लक्षणद्वारा किनारेपर घोष रहता है। किसी वस्तुकी आसक्ति विषय होती है; यथा, 'धने स्पृहा' अर्थात् उसे धन पानेकी बड़ी लालसा है। जब एक पदार्थ दूसरे में रहता, तब व्याप्ति समझी जाती है; यथा, 'सकले स्थितः' अर्थात् वह सकल जगत् में व्याप रहा। अधिकरण-कारकमें सप्तमी-विभक्ति होती है। <small>सप्तम्यधिकरणे च। पा २।३।३६ ।</small> न्यायमतमें यह विषयादिप ञ्चाङ्गका विवेचनात्मक शास्त्र है,— {{Block center|<poem><small>"विषयो विश्यश्चै व पूर्वपक्षस्तथोत्तरम्। निर्णयश्च ति पञ्चाङ्गं शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ॥” विषय, विशय, पूर्वपक्ष, उत्तर और निर्णय - इसी पञ्चाङ्गको अधिकरण कहते हैं । पञ्चाङ्गका विस्तृत विवरण इसतरह है, -१ विषय - अर्थात् विचारके योग्य वाक्य, २ विशय - किसीके अर्थ निश्चय न होनेका संशय, ३ पूर्वपक्ष - प्रकृत अर्थका विरोधी तर्क, ४ उत्तर - किसी विषयका सिद्धान्त करनेपर उसके अनुकूल तर्क और ५ निर्णय - महावाक्यके तात्पर्यका निश्चय । "एवं क्रमेण विवेचनमत्राधिक्रियते इत्यधिकरणम् ।” (तिथ्यादितत्त्व) उक्त पञ्चाङ्गके विचारसे इस विषयादि विवेचन-शास्त्रका नाम अधिकरण पड़ा है । अधिक्रियतेऽर्थाद्विचारोऽस्मिन्ननेनेति करणम् । प्रतौतिसाक्षिको धर्मविशेष: । ( मीमांसा ) न्याय मतसे— प्रतीति- साक्षिक धर्मविशेष । 'घटवत् भूतले' इत्यादिसे भूतल में घटको अधिकरणता समझ पड़ती है । अधिकरणभोजक (सं० पु० ) न्यायाधीश, हाकिम, जज । अधिकरणमण्डप (सं० क्लो० ) न्यायालय, अदालत, कचहरी । अधिकरणविचाल (सं० पु० ) अधिकरणस्य विचाल: अन्यथाकरणम्, वि-चल-घञ् ; ६-तत् । अधिकरणविचाले च। पा ५।३।४३ । १ द्रव्यको अवस्थान्तर देना, चौजको हालतका बदलना । २ संख्यान्तरका करना, अददका घटाना बढ़ाना। यह एक राशिको भाग करना किंवा अनेक राशिको एक भाग बनाना है । जैसे यदि एक राशिके पांच भागका एक भाग बना, तो अधिकरणका संख्याविचाल हुआ । काशिका - यथा "अधिकरणं द्रव्यं तस्य विचालः सख्यान्तरापादनम् । एकं राशिं पञ्चधा कुरु, अष्टधा कुरु; अनेकमेकधा कुरु ।" अधिकरण-ठन्, अधि- अधिकरणसिद्धान्त (सं० पु० ) यस्यार्थस्य सिद्धौ जायमानायामेवान्यस्य प्रकरणस्य प्रस्तुतस्य सिद्धिर्भवति सः । गौ० ० १११ ३० । न्यायमतसे- अन्य प्रकरणको सिद्ध करनेवाली सिद्धि, जिस सिद्धिसे दूसरी सिद्धियां भी मिल जायें। अधिकरणिक (सं० पु० ) करणं धर्माधिकरणं श्रश्रयतया अस्ति अस्य | विचार करनेके निमित्त धर्माधिकरण मण्डपमें नियुक्त प्राड्- विवाक, विचारपति, मुनसिफ, सदरआला, जज । अधिकरणैतावत्व (सं० क्लो० ) नीचे के आधारका नियत परिमाण, नौचेको तहको बंधो हुई मिकदार । वा अधि- | अधिकरण्य (सं० क्लौ० ) अधिकार, बल; इति- यार, ज़ोर । वेदविचारात्मक ग्रन्थमीमांसा विशेष भो अधिकरण है। यह दो प्रकारका होता है, -कर्म- मीमांसा और ब्रह्ममीमांसा | जैमिनि -प्रणीत कर्म- मीमांसा ही कर्मकाण्ड के ब्रह्मविचारका ग्रन्थ है। इ पूर्वमीमांसा भी कहते हैं । फिर, वेदव्यास-प्रणीत ब्रह्ममीमांसा ब्रह्मकाण्ड-वेदविचार-ग्रन्थ है | यह उत्तर मीमांसा कहलाता है । ८० अधिकर्म, अधिकर्मन् (सं० अव्य०) कर्मणि विभक्त्यर्थे अव्ययो वा अच् समासान्त । १ कर्माधिकृत, सच्च कामसे । ( क्लो. ) अधिकं कर्म प्रादि-स० । २ अधिक कर्म. बड़ा काम । ३ पर्यवेक्षण, देख-भाल । (त्रि०) बहुव्री० । ४ अधिक कर्मयुक्त, बड़े काममेंअधिकरणता (सं० स्त्री०) अधिकरण-तल् । अधिकरणमिति फंसा हुआ ।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude>आश्लेष एकदेशसम्बन्धको कहते हैं ; यथा, 'कानने वसति' अर्थात् वनके एकदेशमें रहता<noinclude></noinclude> 63mouw1bui93n3y7910pgpcimk2fiqq 667533 667532 2026-07-12T06:32:38Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 667533 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधिकरण—अधिकर्म'''|'''३५७'''}}</noinclude>माधुर्यमस्ति' अर्थात् दूधमें माधुर्य विद्यमान है। यहां माधुर्य गुण समस्त ही दुग्धमें व्याप्त हो रहा है। वोपदेवके मतसे आधार चतुर्विध है—<small>सामीप्याश्चे षविषयैर्व्यावृत्या-धारश्चतुर्विधः।</small> सामीप्य, आश्लेष, विषय और व्याप्ति। सामीप्यका अर्थ समीपका भाव है; यथा, 'गङ्गायां घोषः' अर्थात् गङ्गाके समीप या लक्षणद्वारा किनारेपर घोष रहता है। किसी वस्तुकी आसक्ति विषय होती है; यथा, 'धने स्पृहा' अर्थात् उसे धन पानेकी बड़ी लालसा है। आश्लेष एकदेशसम्बन्धको कहते हैं; यथा, 'कानने वसति' अर्थात् वनके एकदेशमें रहता है। किसी वस्तु की आसक्ति विषय होती है; यथा 'धने स्पृहा' अर्थात् उसे धन पानेकी बड़ी लालसा है। जब एक पदार्थ दूसरे में रहता, तब व्याप्ति समझी जाती है; यथा, 'सकले स्थितः' अर्थात् वह सकल जगत् में व्याप रहा। अधिकरण-कारकमें सप्तमी-विभक्ति होती है। <small>सप्तम्यधिकरणे च। पा २।३।३६ ।</small> न्यायमतमें यह विषयादिप ञ्चाङ्गका विवेचनात्मक शास्त्र है,— {{Block center|<poem><small>"विषयो विश्यश्चै व पूर्वपक्षस्तथोत्तरम्। निर्णयश्चे ति पञ्चाङ्गं शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम्॥"</small></poem>}} विषय, विशय, पूर्वपक्ष, उत्तर और निर्णय—इसी पञ्चाङ्गको अधिकरण कहते हैं। पञ्चाङ्गका विस्तृत विवरण इसतरह है,—१ विषय—अर्थात् विचारके योग्य वाक्य, २ विशय—किसीके अर्थ निश्चय न होनेका संशय, ३ पूर्वपक्ष—प्रकृत अर्थका विरोधी तर्क, ४ उत्तर—किसी विषयका सिद्धान्त करनेपर उसके अनुकूल तर्क और ५ निर्णय—महावाक्यके तात्पर्यका निश्चय। <small>"एवं क्रमेण विवेचनमत्राधिक्रियतें इत्यधिकरणम्।" (तिथ्यादितत्त्व)</small> उक्त पञ्चाङ्गके विचारसे इस विषयादि-विवेचन-शास्त्रका नाम अधिकरण पड़ा है। अधिक्रियतेऽर्थाद्विचारोऽस्मिन्ननेनेति वा अधिकरणम्। वेदविचारात्मक ग्रन्थमीमांसा विशेष भी अधिकरण है। यह दो प्रकारका होता है,—कर्ममीमांसा और ब्रह्ममीमांसा। जैमिनि-प्रणीत कर्म-मीमांसा ही कर्मकाण्ड के ब्रह्मविचारका ग्रन्थ है। इसे पूर्वमीमांसा भी कहते हैं। फिर, वेदव्यास-प्रणीत ब्रह्ममीमांसा ब्रह्मकाण्ड-वेदविचार-ग्रन्थ है। यह उत्तर मीमांसा कहलाता है। अधिकरणता (सं॰ स्त्री॰) अधिकरण-तल्। <small>अधिकरणमिति प्रतीतिसाक्षिको धर्मविशेषः। (मीमांसा)</small> न्याय-मतसे—प्रतीति-साक्षिक धर्मविशेष। 'घटवत् भूतले' इत्यादिसे भूतल में घटकी अधिकरणता समझ पड़ती है। अधिकरणभोजक (सं॰ पु॰) न्यायाधीश, हाकिम, जज। अधिकरणमण्डप (सं॰ क्ली॰) न्यायालय, अदालत, कचहरी। अधिकरणविचाल (सं॰ पु॰) अधिकरणस्य विचालः अन्यथाकरणम्, वि-चल-घञ्; ६-तत्। <small>अधिकरणविचाले च। पा ५।३।४३ ।</small> १ द्रव्यको अवस्थान्तर देना, चीज़की हालतका बदलना। २ संख्यान्तरका करना, अददका घटाना-बढ़ाना। यह एक राशिको भाग करना किंवा अनेक राशिको एक भाग बनाना है। जैसे यदि एक राशिके पांच भागका एक भाग बना, तो अधिकरणका संख्याविचाल हुआ। यथा काशिका,— <small>"अधिकरणं द्रव्यं, तस्य विचालः संख्यान्तरापादनम्। एकं राशिं पञ्चधा कुरु, अष्टधा कुरु; अनेकमेकधा कुरु।"</small> अधिकरणसिद्धान्त (सं॰ पु॰) <small>यस्यार्थस्य सिद्धौ जायमानायामेवान्यस्य प्रकरणस्य प्रस्तुतस्य सिद्धिर्भवति सः। गौ॰ वृ॰ १।१।३० ।</small> न्यायमतसे—अन्य प्रकरणको सिद्ध करनेवाली सिद्धि, जिस सिद्धिसे दूसरी सिद्धियां भी मिल जायें। अधिकरणिक (सं॰ पु॰) अधिकरणं-ठन्, अधिकरणं धर्माधिकरणं आश्रयतया अस्ति अस्य। विचार करनेके निमित्त धर्माधिकरण मण्डपमें नियुक्त प्राड्-विवाक, विचारपति, मुनसिफ़, सदरआला, जज। अधिकरणैतावत्व (सं॰ क्ली॰) नीचेके आधारका नियत परिमाण, नीचेकी तहकी बंधी हुई मिक़दार। अधिकरण्य (सं॰ क्ली॰) अधिकार, बल; इख्तियार, ज़ोर। अधिकर्म, अधिकर्मन् (सं॰ अव्य॰) कर्मणि विभक्त्यर्थे अव्ययी॰ वा अच् समासान्त। १ कर्माधिकृत, सच्चे कामसे। (क्ली॰) अधिकं कर्म प्रादि-स॰। २ अधिक कर्म बड़ा काम। ३ पर्यवेक्षण, देख-भाल। (त्रि॰) बहुव्री॰। ४ अधिक कर्मयुक्त, बड़े काममें फंसा हुआ ।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8tl15m58rglah6dj20g53q3uhtwszcc 667534 667533 2026-07-12T06:33:18Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667534 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधिकरण—अधिकर्म'''|'''३५७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>माधुर्यमस्ति' अर्थात् दूधमें माधुर्य विद्यमान है। यहां माधुर्य गुण समस्त ही दुग्धमें व्याप्त हो रहा है। वोपदेवके मतसे आधार चतुर्विध है—<small>सामीप्याश्चे षविषयैर्व्यावृत्या-धारश्चतुर्विधः।</small> सामीप्य, आश्लेष, विषय और व्याप्ति। सामीप्यका अर्थ समीपका भाव है; यथा, 'गङ्गायां घोषः' अर्थात् गङ्गाके समीप या लक्षणद्वारा किनारेपर घोष रहता है। किसी वस्तुकी आसक्ति विषय होती है; यथा, 'धने स्पृहा' 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पञ्चाङ्गके विचारसे इस विषयादि-विवेचन-शास्त्रका नाम अधिकरण पड़ा है। अधिक्रियतेऽर्थाद्विचारोऽस्मिन्ननेनेति वा अधिकरणम्। वेदविचारात्मक ग्रन्थमीमांसा विशेष भी अधिकरण है। यह दो प्रकारका होता है,—कर्ममीमांसा और ब्रह्ममीमांसा। जैमिनि-प्रणीत कर्म-मीमांसा ही कर्मकाण्ड के ब्रह्मविचारका ग्रन्थ है। इसे पूर्वमीमांसा भी कहते हैं। फिर, वेदव्यास-प्रणीत ब्रह्ममीमांसा ब्रह्मकाण्ड-वेदविचार-ग्रन्थ है। यह उत्तर मीमांसा कहलाता है। अधिकरणता (सं॰ स्त्री॰) अधिकरण-तल्। <small>अधिकरणमिति प्रतीतिसाक्षिको धर्मविशेषः। (मीमांसा)</small> न्याय-मतसे—प्रतीति-साक्षिक धर्मविशेष। 'घटवत् भूतले' इत्यादिसे भूतल में घटकी अधिकरणता समझ पड़ती है। अधिकरणभोजक (सं॰ पु॰) न्यायाधीश, हाकिम, जज। अधिकरणमण्डप (सं॰ क्ली॰) न्यायालय, अदालत, कचहरी। अधिकरणविचाल (सं॰ पु॰) अधिकरणस्य विचालः अन्यथाकरणम्, वि-चल-घञ्; ६-तत्। <small>अधिकरणविचाले च। पा ५।३।४३ ।</small> १ द्रव्यको अवस्थान्तर देना, चीज़की हालतका बदलना। २ संख्यान्तरका करना, अददका घटाना-बढ़ाना। यह एक राशिको भाग करना किंवा अनेक राशिको एक भाग बनाना है। जैसे यदि एक राशिके पांच भागका एक भाग 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ro4fh83sxfk7fip9a0utoh4sq2fqrtw 667535 667534 2026-07-12T06:34:04Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667535 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधिकरण—अधिकर्म'''|'''३५७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>माधुर्यमस्ति' अर्थात् दूधमें माधुर्य विद्यमान है। यहां माधुर्य गुण समस्त ही दुग्धमें व्याप्त हो रहा है। वोपदेवके मतसे आधार चतुर्विध है—<small>सामीप्याश्चे षविषयैर्व्यावृत्या-धारश्चतुर्विधः।</small> सामीप्य, आश्लेष, विषय और व्याप्ति। सामीप्यका अर्थ समीपका भाव है; यथा, 'गङ्गायां घोषः' अर्थात् गङ्गाके समीप या लक्षणद्वारा किनारेपर घोष रहता है। किसी वस्तुकी आसक्ति विषय होती है; यथा, 'धने स्पृहा' अर्थात् उसे धन पानेकी बड़ी लालसा है। आश्लेष एकदेशसम्बन्धको कहते हैं; यथा, 'कानने वसति' अर्थात् वनके एकदेशमें रहता है। किसी वस्तु की आसक्ति विषय होती है; यथा 'धने स्पृहा' अर्थात् उसे धन पानेकी बड़ी लालसा है। जब एक पदार्थ दूसरे में रहता, तब व्याप्ति समझी जाती है; यथा, 'सकले स्थितः' अर्थात् वह सकल 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<small>अधिकरणमिति प्रतीतिसाक्षिको धर्मविशेषः। (मीमांसा)</small> न्याय-मतसे—प्रतीति-साक्षिक धर्मविशेष। 'घटवत् भूतले' इत्यादिसे भूतल में घटकी अधिकरणता समझ पड़ती है। अधिकरणभोजक (सं॰ पु॰) न्यायाधीश, हाकिम, जज। अधिकरणमण्डप (सं॰ क्ली॰) न्यायालय, अदालत, कचहरी। अधिकरणविचाल (सं॰ पु॰) अधिकरणस्य विचालः अन्यथाकरणम्, वि-चल-घञ्; ६-तत्। <small>अधिकरणविचाले च। पा ५।३।४३ ।</small> १ द्रव्यको अवस्थान्तर देना, चीज़की हालतका बदलना। २ संख्यान्तरका करना, अददका घटाना-बढ़ाना। यह एक राशिको भाग करना किंवा अनेक राशिको एक भाग बनाना है। जैसे यदि एक राशिके पांच भागका एक भाग बना, तो अधिकरणका संख्याविचाल हुआ। यथा काशिका,— <small>"अधिकरणं द्रव्यं, तस्य विचालः संख्यान्तरापादनम्। एकं राशिं पञ्चधा कुरु, अष्टधा कुरु; अनेकमेकधा कुरु।"</small> अधिकरणसिद्धान्त (सं॰ पु॰) <small>यस्यार्थस्य सिद्धौ जायमानायामेवान्यस्य प्रकरणस्य प्रस्तुतस्य सिद्धिर्भवति सः। गौ॰ वृ॰ १।१।३० ।</small> न्यायमतसे—अन्य प्रकरणको सिद्ध करनेवाली सिद्धि, जिस सिद्धिसे दूसरी सिद्धियां भी मिल जायें। अधिकरणिक (सं॰ पु॰) अधिकरणं-ठन्, अधिकरणं धर्माधिकरणं आश्रयतया अस्ति अस्य। विचार करनेके निमित्त धर्माधिकरण मण्डपमें नियुक्त प्राड्-विवाक, विचारपति, मुनसिफ़, सदरआला, जज। अधिकरणैतावत्व (सं॰ क्ली॰) नीचेके आधारका नियत परिमाण, नीचेकी तहकी बंधी हुई मिक़दार। अधिकरण्य (सं॰ क्ली॰) अधिकार, बल; इख्तियार, ज़ोर। अधिकर्म, अधिकर्मन् (सं॰ अव्य॰) कर्मणि विभक्त्यर्थे अव्ययी॰ वा अच् समासान्त। १ कर्माधिकृत, सच्चे कामसे। (क्ली॰) अधिकं कर्म प्रादि-स॰। २ अधिक कर्म बड़ा काम। ३ पर्यवेक्षण, देख-भाल। (त्रि॰) बहुव्री॰। ४ अधिक कर्मयुक्त, बड़े काममें फंसा हुआ ।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Dhr|}} {{Left|८०|4em}}</noinclude> 1bh6trnit9ayjbv1hwbxdjqv4arbzyz 667546 667536 2026-07-12T08:29:50Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667546 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधिकरण—अधिकर्म'''|'''३५७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>माधुर्यमस्ति' अर्थात् दूधमें माधुर्य विद्यमान है। यहां माधुर्य गुण समस्त ही दुग्धमें व्याप्त हो रहा है। वोपदेवके मतसे आधार चतुर्विध है—<small>सामीप्याश्चे षविषयैर्व्यावृत्या-धारश्चतुर्विधः।</small> सामीप्य, आश्लेष, विषय और व्याप्ति। सामीप्यका अर्थ समीपका भाव है; यथा, 'गङ्गायां घोषः' अर्थात् गङ्गाके समीप या लक्षणद्वारा किनारेपर घोष रहता है। किसी वस्तुकी आसक्ति विषय होती है; यथा, 'धने स्पृहा' अर्थात् उसे धन पानेकी बड़ी लालसा है। आश्लेष एकदेशसम्बन्धको कहते हैं; यथा, 'कानने वसति' अर्थात् वनके एकदेशमें रहता है। किसी वस्तु की आसक्ति विषय होती है; यथा 'धने स्पृहा' अर्थात् उसे धन पानेकी बड़ी लालसा है। जब एक पदार्थ दूसरे में रहता, तब व्याप्ति समझी जाती है; यथा, 'सकले स्थितः' अर्थात् वह सकल जगत् में व्याप रहा। अधिकरण-कारकमें सप्तमी-विभक्ति होती है। <small>सप्तम्यधिकरणे च। पा २।३।३६ ।</small> न्यायमतमें यह विषयादिप ञ्चाङ्गका विवेचनात्मक शास्त्र है,— {{Block center|<poem><small>"विषयो विश्यश्चै व पूर्वपक्षस्तथोत्तरम्। निर्णयश्चे ति पञ्चाङ्गं शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम्॥"</small></poem>}} विषय, विशय, पूर्वपक्ष, उत्तर और निर्णय—इसी पञ्चाङ्गको अधिकरण कहते हैं। पञ्चाङ्गका विस्तृत विवरण इसतरह है,—१ विषय—अर्थात् विचारके योग्य वाक्य, २ विशय—किसीके अर्थ निश्चय न होनेका संशय, ३ पूर्वपक्ष—प्रकृत अर्थका विरोधी तर्क, ४ उत्तर—किसी विषयका सिद्धान्त करनेपर उसके अनुकूल तर्क और ५ निर्णय—महावाक्यके तात्पर्यका निश्चय। <small>"एवं क्रमेण विवेचनमत्राधिक्रियतें इत्यधिकरणम्।" (तिथ्यादितत्त्व)</small> उक्त पञ्चाङ्गके विचारसे इस विषयादि-विवेचन-शास्त्रका नाम अधिकरण पड़ा है। अधिक्रियतेऽर्थाद्विचारोऽस्मिन्ननेनेति वा अधिकरणम्। वेदविचारात्मक ग्रन्थमीमांसा विशेष भी अधिकरण है। यह दो प्रकारका होता है,—कर्ममीमांसा और ब्रह्ममीमांसा। जैमिनि-प्रणीत कर्म-मीमांसा ही कर्मकाण्ड के ब्रह्मविचारका ग्रन्थ है। इसे पूर्वमीमांसा भी कहते हैं। फिर, वेदव्यास-प्रणीत ब्रह्ममीमांसा ब्रह्मकाण्ड-वेदविचार-ग्रन्थ है। यह उत्तर मीमांसा कहलाता है।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिकरणता (सं॰ स्त्री॰) अधिकरण-तल्। <small>अधिकरणमिति प्रतीतिसाक्षिको धर्मविशेषः। (मीमांसा)</small> न्याय-मतसे—प्रतीति-साक्षिक धर्मविशेष। 'घटवत् भूतले' इत्यादिसे भूतल में घटकी अधिकरणता समझ पड़ती है। अधिकरणभोजक (सं॰ पु॰) न्यायाधीश, हाकिम, जज। अधिकरणमण्डप (सं॰ क्ली॰) न्यायालय, अदालत, कचहरी। अधिकरणविचाल (सं॰ पु॰) अधिकरणस्य विचालः अन्यथाकरणम्, वि-चल-घञ्; ६-तत्। <small>अधिकरणविचाले च। पा ५।३।४३ ।</small> १ द्रव्यको अवस्थान्तर देना, चीज़की हालतका बदलना। २ संख्यान्तरका करना, अददका घटाना-बढ़ाना। यह एक राशिको भाग करना किंवा अनेक राशिको एक भाग बनाना है। जैसे यदि एक राशिके पांच भागका एक भाग बना, तो अधिकरणका संख्याविचाल हुआ। यथा काशिका,— <small>"अधिकरणं द्रव्यं, तस्य विचालः संख्यान्तरापादनम्। एकं राशिं पञ्चधा कुरु, अष्टधा कुरु; अनेकमेकधा कुरु।"</small> अधिकरणसिद्धान्त (सं॰ पु॰) <small>यस्यार्थस्य सिद्धौ जायमानायामेवान्यस्य प्रकरणस्य प्रस्तुतस्य सिद्धिर्भवति सः। गौ॰ वृ॰ १।१।३० ।</small> न्यायमतसे—अन्य प्रकरणको सिद्ध करनेवाली सिद्धि, जिस सिद्धिसे दूसरी सिद्धियां भी मिल जायें। अधिकरणिक (सं॰ पु॰) अधिकरणं-ठन्, अधिकरणं धर्माधिकरणं आश्रयतया अस्ति अस्य। विचार करनेके निमित्त धर्माधिकरण मण्डपमें नियुक्त प्राड्-विवाक, विचारपति, मुनसिफ़, सदरआला, जज। अधिकरणैतावत्व (सं॰ क्ली॰) नीचेके आधारका नियत परिमाण, नीचेकी तहकी बंधी हुई मिक़दार। अधिकरण्य (सं॰ क्ली॰) अधिकार, बल; इख्तियार, ज़ोर। अधिकर्म, अधिकर्मन् (सं॰ अव्य॰) कर्मणि विभक्त्यर्थे अव्ययी॰ वा अच् समासान्त। १ कर्माधिकृत, सच्चे कामसे। (क्ली॰) अधिकं कर्म प्रादि-स॰। २ अधिक कर्म बड़ा काम। ३ पर्यवेक्षण, देख-भाल। (त्रि॰) बहुव्री॰। ४ अधिक कर्मयुक्त, बड़े काममें फंसा हुआ।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Dhr|}} {{Left|८०|4em}}</noinclude> p58qrmnjglkqfek7qecmoe0qexr95rj पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३६५ 250 83698 667540 641854 2026-07-12T07:54:39Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667540 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''३५८'''|'''अधिकर्मकर—अधिकार'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|अधिकर्मकर (सं॰ पु॰) अधिकं कर्म तत् करोतीति, कृ-आलोम्यादौ ट। दासविशेष, सेवकविशेष, शुश्रूषकविशेष; मज़दूरोंका जमादर।}} {{outdent|अधिकर्म कृत (सं॰ पु॰) अधिकं कर्म-अधिकर्म, तत् कृतं येन। दासविशेष, शुश्रूकविशेष, नौकरोंका चौधरी।}} {{outdent|अधिकर्मिक (सं॰ पु॰) अधिकृत्य इट्टं कर्मणेऽलम्, अधिकर्म-ठन्। <small>अषडक्षासित'ग्वल'कर्माल'पुरुषाध्युत्तरपदात् खः। पा ५।४।७।</small> हाटका अध्यक्ष, बाज़ारका दारोग़ा।}} {{outdent|अधिकल्पिन् (वै॰ पु॰) होशियार जुआरी, चालाक क़िमारबाज़।}} अधिकवाक्योक्ति (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्त सम्भाषण, बढ़ावा, अधिक प्रशंसा, हदसे ज्य़ादा तारीफ़। अधिकषष्टिक (सं॰ त्रि॰) परिमाण या मूल्यमें साठसे अधिक या ज्य़ादा। अधिकसंवत्सर (सं॰ पु॰) सौर वर्ष पूर्ण करने को जोड़ा जानेवाला अतिरिक्त मास, महीना जो शम्सी साल पूरा करनेको ऊपरसे जोड़ लिया जाये। अधिकसप्ततिक (सं॰ त्रि॰) परिमाण या मूल्यमें सत्तरसे अधिक या ज्य़ादा। अधिकांग, <small>अधिकाङ्ग देखो।</small> अधिकांश (सं॰ पु॰) १ अतिरिक्त भाग, ज्य़ादा हिस्सा। (हिं॰ क्रि॰-वि॰) २ विशेषतः ज्य़ादातर। ३ प्रायः, अकसर। अधिकाई (हिं॰ स्त्री॰) १ आधिक्य, बढ़ती; बड़ाई, महिमा। अधिकाङ्ग (सं॰ क्ली॰) अधिकोऽङ्गात्। १ योद्धाओंके हृदयपर दृढ़ रूपसे कवच बांधने के लिये पट्टिकादि, कमरबन्द। (त्रि॰) अधिकमङ्गं यस्य, बहुव्री॰। २ अधिक अङ्गयुक्त, बीससे अतिरिक्त अङ्गुल्यादि अङ्गयुक्त; ज्य़ादा अज़ावाला, जिसके मामूलीसे ज्य़ादा आज़ा हीं। अधिकाधिक (सं॰ त्रि॰) एक दूसरेसे बढ़कर, ज्य़ादासे ज्य़ादा। अधिकानन—दक्षिण-देशीय कवि अय्यर के भ्राता। पहले यह राजकर्तक प्रतिपालित होते थे, पीछे राज- चन्द्रालोकमें लिखा है, कि रूपक अलङ्कारके तीन भेद होते हैं। इनमें अधिकाभेदरूपक वह है, जो उपमान और उपमेयका कई प्रकार अभेद बता फिर उपमेय में कुछ विशेषता दिखाता है, शुभग, सुशीतल, भावनो सुन्दर आनन्दकन्द | रैन- दिवस नित रहत है शोभित आनन -चन्द ॥ यहां चन्द्र उपमान और मुख उपमेय है । पहले तो शुभगता, शीतलता, सुन्दरता आदि गुण दोनोमें समान बताये थे, किन्तु पोछे मुखको दिन-रात शोभित रहनेवाला कह उसका गुण चन्द्रसे बढ़ा दिया गया । अधिकाम (सं० पु० ) १ अधिक काम, अत्यन्त अभिलाष, ज्यादा ख़्वाहिश | ( त्रि०) अधिक: कामो यस्य, बहुव्रो । २ अत्यन्त कामयुक्त, निहायत ख़्वा हिशमन्द | अधिकार, अधीकार (सं० पु० ) अधि-क्त-घञ् । १स्वामित्व, आधिपत्य । २ नियोग अर्थात् कर्तव्य कर्म, कार्यभार । ३ आरम्भ, अनुष्ठान ; शुरू, आगाज़ | ४ स्वीकार, मजूर । ५ खत्व, हक । ६ प्रकरण, सिलसिला । ७ पद, दरजा । ८ गवर्नमेण्ट, सरकार, । ८ जायदाद, सम्पत्ति । १० सम्बन्ध, रिश्ता । ११ प्रमाण, हवाला । १२ चेष्टा, कोशिश । १३ विषय, मज़- मून । १४ वाक्य, फ़िकुरा । १५ राजाका छत्रादि धारण । १६ व्याकरणप्रसिद्ध अनुवृत्तिका सम्बन्ध | १७ न्यायमतसे - प्रवर्तमान पुरुषनिष्ठताको ज्ञायमान सत्प्रकृतिका हेतु, धर्मविशिष्ट द्वारा कृतकर्मका फल- जनकत्व । १८ काव्यज्ञोंके मतसे - व्यवस्थापन । मेघ- दूतमें लिखा है, –“कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्तः ।” अर्थात् अपने नियोगसे प्रमत्त होकर इत्यादि । यहां अधिकार-शब्द नियोग अर्थ में आया है। 'स्वाधिकारात् खनियोगात्' इति मल्लिनाथः ।<noinclude></noinclude> 7ukz0xl0ujwyvgbxd5vzjg15v2sp8lu 667544 667540 2026-07-12T08:28:31Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 667544 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{rh|'''३५८'''|'''अधिकर्मकर—अधिकार'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|अधिकर्मकर (सं॰ पु॰) अधिकं कर्म तत् करोतीति, कृ-आलोम्यादौ ट। दासविशेष, सेवकविशेष, शुश्रूषकविशेष; मज़दूरोंका जमादर।}} {{outdent|अधिकर्म कृत (सं॰ पु॰) अधिकं कर्म-अधिकर्म, तत् कृतं येन। दासविशेष, 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अधीकार (सं॰ पु॰) अधि-क्-घञ्। १ स्वामित्व, आधिपत्य। २ नियोग अर्थात् कर्तव्य कर्म, कार्यभार। ३ आरम्भ, अनुष्ठान; शुरू, आग़ाज़। ४ स्वीकार, मञ्जूर। ५ स्वत्व, हक़। ६ प्रकरण, सिलसिला। ७ पद, दरजा। ८ गवर्नमेण्ट, सरकार,। ९ जायदाद, सम्पत्ति। १० सम्बन्ध, रिश्ता। ११ प्रमाण, हवाला। १२ चेष्टा, कोशिश। १३ विषय, मज़मून। १४ वाक्य, फ़िकुरा। १५ राजाका छत्रादि धारण। १६ व्याकरणप्रसिद्ध अनुवृत्तिका सम्बन्ध। १७ न्यायमतसे—प्रवर्तमान पुरुषनिष्ठताकी ज्ञायमान सत्प्रकृतिका हेतु, धर्मविशिष्ट द्वारा कृतकर्मका फल-जनकत्व। १८ काव्यज्ञोंके मतसे-व्यवस्थापन। मेघ-दूतमें लिखा है,—<small>"कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्तः।"</small> अर्थात् अपने नियोगसे प्रमत्त होकर इत्यादि। यहां अधिकार-शब्द नियोग-अर्थमें आया है। {{Block center|<poem><small>'स्वाधिकारात् स्वनियोगात्' इति मल्लिनाथः।</poem></small>}}<noinclude></noinclude> 65v9co2858yzc3yk95c4e09p80fdbnn 667545 667544 2026-07-12T08:29:22Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667545 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" 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इत्यादि। यहां अधिकार-शब्द नियोग-अर्थमें आया है। {{Block center|<poem><small>'स्वाधिकारात् स्वनियोगात्' इति मल्लिनाथः।</poem></small>}}<noinclude></noinclude> 7mp1s3gzmowlpe3ptzum73crea856pc 667547 667545 2026-07-12T08:30:06Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667547 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{rh|'''३५८'''|'''अधिकर्मकर—अधिकार'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|अधिकर्मकर (सं॰ पु॰) अधिकं कर्म तत् करोतीति, कृ-आलोम्यादौ ट। दासविशेष, सेवकविशेष, शुश्रूषकविशेष; मज़दूरोंका जमादर।}} {{outdent|अधिकर्म कृत (सं॰ पु॰) अधिकं कर्म-अधिकर्म, तत् कृतं येन। दासविशेष, शुश्रूकविशेष, नौकरोंका चौधरी।}} {{outdent|अधिकर्मिक (सं॰ पु॰) अधिकृत्य इट्टं कर्मणेऽलम्, अधिकर्म-ठन्। <small>अषडक्षासित'ग्वल'कर्माल'पुरुषाध्युत्तरपदात् खः। पा ५।४।७।</small> हाटका अध्यक्ष, बाज़ारका दारोग़ा।}} {{outdent|अधिकल्पिन् (वै॰ पु॰) होशियार जुआरी, चालाक क़िमारबाज़।}} अधिकवाक्योक्ति (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्त सम्भाषण, बढ़ावा, अधिक प्रशंसा, हदसे ज्य़ादा तारीफ़। अधिकषष्टिक (सं॰ त्रि॰) परिमाण या मूल्यमें साठसे अधिक या ज्य़ादा। अधिकसंवत्सर (सं॰ पु॰) सौर वर्ष पूर्ण करने को जोड़ा जानेवाला अतिरिक्त मास, महीना जो शम्सी साल पूरा करनेको ऊपरसे जोड़ लिया जाये। अधिकसप्ततिक (सं॰ त्रि॰) परिमाण या मूल्यमें सत्तरसे अधिक या ज्य़ादा। अधिकांग, <small>अधिकाङ्ग देखो।</small> अधिकांश (सं॰ पु॰) १ अतिरिक्त भाग, ज्य़ादा हिस्सा। (हिं॰ क्रि॰-वि॰) २ विशेषतः ज्य़ादातर। ३ प्रायः, अकसर। अधिकाई (हिं॰ स्त्री॰) १ आधिक्य, बढ़ती; बड़ाई, महिमा। अधिकाङ्ग (सं॰ क्ली॰) अधिकोऽङ्गात्। १ योद्धाओंके हृदयपर दृढ़ रूपसे कवच बांधने के लिये पट्टिकादि, कमरबन्द। (त्रि॰) अधिकमङ्गं यस्य, बहुव्री॰। २ अधिक अङ्गयुक्त, बीससे अतिरिक्त अङ्गुल्यादि अङ्गयुक्त; ज्य़ादा अज़ावाला, जिसके मामूलीसे ज्य़ादा आज़ा हीं। अधिकाधिक (सं॰ त्रि॰) एक दूसरेसे बढ़कर, ज्य़ादासे ज्य़ादा। अधिकानन—दक्षिण-देशीय कवि अय्यर के भ्राता। पहले यह राजकर्तक प्रतिपालित होते थे, पीछे राज-<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>वंश-सम्भ्य बताये गये। इन्होंने नानाविषयिणी कविता बनाई थी। अधिकाना (हिं॰ क्रि॰) १ अधिक हो जाना, ज्य़ादा देखाई पड़ना। २ बढ़ना, ऊपर चढ़ना। अधिकामेदरूपक (सं॰ पु॰) अलङ्कार विशेष। चन्द्रालोकमें लिखा है, कि रूपक-अलङ्कारके तीन भेद होते हैं। इनमें अधिकाभेदरूपक वह है, जो उपमान और उपमेयका कई प्रकार अभेद बता फिर उपमेय में कुछ विशेषता दिखाता है,— {{Block center|<small><poem>शुभग, सुशीतल, भावनी सुन्दर आनन्दकन्द। रैन-दिवस नित रहत है शोभित आनन-चन्द॥</poem></small>}} यहां चन्द्र उपमान और मुख उपमेय है। पहले तो शुभगता, शीतलता, सुन्दरता आदि गुण दोनोमें समान बताये थे, किन्तु पीछे मुखको दिन-रात शोभित रहनेवाला कह उसका गुण चन्द्रसे बढ़ा दिया गया। अधिकाम (सं॰ पु॰) १ अधिक काम, अत्यन्त अभिलाष, ज्य़ादा ख़्वाहिश। (त्रि॰) अधिकः कामो यस्य, बहुव्री॰। २ अत्यन्त कामयुक्त, निहायत ख़्वा हिशमन्द। अधिकार, अधीकार (सं॰ पु॰) अधि-क्-घञ्। १ स्वामित्व, आधिपत्य। २ नियोग अर्थात् कर्तव्य कर्म, कार्यभार। ३ आरम्भ, अनुष्ठान; शुरू, आग़ाज़। ४ स्वीकार, मञ्जूर। ५ स्वत्व, हक़। ६ प्रकरण, सिलसिला। ७ पद, दरजा। ८ गवर्नमेण्ट, सरकार,। ९ जायदाद, सम्पत्ति। १० सम्बन्ध, रिश्ता। ११ प्रमाण, हवाला। १२ चेष्टा, कोशिश। १३ विषय, मज़मून। १४ वाक्य, फ़िकुरा। १५ राजाका छत्रादि धारण। १६ व्याकरणप्रसिद्ध अनुवृत्तिका सम्बन्ध। १७ न्यायमतसे—प्रवर्तमान पुरुषनिष्ठताकी ज्ञायमान सत्प्रकृतिका हेतु, धर्मविशिष्ट द्वारा कृतकर्मका फल-जनकत्व। १८ काव्यज्ञोंके मतसे-व्यवस्थापन। मेघ-दूतमें लिखा है,—<small>"कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्तः।"</small> अर्थात् अपने नियोगसे प्रमत्त होकर इत्यादि। यहां अधिकार-शब्द नियोग-अर्थमें आया है। {{Block center|<poem><small>'स्वाधिकारात् स्वनियोगात्' इति मल्लिनाथः।</poem></small>}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> lxqaj4zfo4q751022dzzx4qgzytmzqe पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३६६ 250 83700 667550 347153 2026-07-12T09:17:15Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667550 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधिकारविधि—अधिक्षित्'''|''३५९'''}}</noinclude>अधिकारविधि (सं० पु० ) अधिकारे फलस्वाम्ये । विधिर्विधानम् । ( वाच० ) मोमांसोक्त विधिविशेष, यह बतानेका कायदा, कि मनुष्य जो कर्म करता, उससे कैसा फल निकलता है। मीमांसा - शास्त्र के अनुसार जो जैसा फल चाहे, वह वैसा ही यज्ञकर पा सकता है । स्वर्गकामनावालेको अग्निहोत्र और राजाको राजसूय यज्ञ करना चाहिये । अधिकारस्थ (सं० त्रि० ) न्यायालय में प्रतिष्ठित, दफ़्तरमें मुकरर । अधिकाराढ्य (सं० त्रि० ) क्षमता सम्पन्न, इखतियार- वाला । (सं० स्त्रो० ) अधिकारिण: भावः, अधिकारित्व, अधिकारिता तल् । तस्य भावस्वतौ । पा ५।१२।११९ । स्वामित्व | अधिकारित्व (सं० क्लो० स्वामित्व, इजारा । 'अधिकारिन् (स ं० त्रि० ) अधि-कृ- णिनि । १ स्वामी, स्वत्ववान्, जिसे अधिकार प्राप्त हो; मिलकियत - वाला । ( पु० ) २ अध्यक्ष, हाकिम । मालिक । ४ वेदान्तशास्त्रवेत्ता, वेदान्त में पारङ्गत पुरुष । ५ मूर्त्यादिका वेशकर्ता, तखोरें बनानेवाला कारीगर । ३ प्रभु, बङ्गाल में 'अधिकारी' उपाधिधारी ब्राह्मणों और वैष्णवोंकी एक श्रेणी है । अधिकारी ब्राह्मण सकल ही विष्णुमन्त्र से दीक्षित होते हैं । यह कितने हो | नवशाख और नौच जातिके गुरु हैं । इनके शिर- - पर बड़ी बड़ी शिखाका गुच्छा रहता और सर्वाङ्गमें गोपौमृत्तिकाका लाल तिलक और राधाकृष्णनामको छाप होती है। कण्ठ में मोटी-मोटी तुलसीको माला लटकती है। नौच जातिके गुरु होनेसे इनके घर में सब्राह्मण भोजनादि नहीं करते । फिर भी, यह नियम बङ्गाल में सर्वत्र प्रचलित नहीं। किसी किसी स्थानमें विशुद्ध राढ़ीय ब्राह्मण इनके घर विवाहादि भी कर लेते हैं । `अधिकारी (सं० पु०) १ पुरुष, मर्द । २ प्रभु, मालिक | | ३ स्वत्ववान्, हकदार। ४ क्षमताशील पुरुष, इति- यारवाला आदमी। (स्त्री० ) अधिकारिणे । वाला, जिसमें एक से ज्यादा माने निकलें, बढ़ाकर बताया गया, मुबालगा दिया हुआ । अधिकार्थवचन (सं० क्लो० ) स्तुति-निन्दाप्रयुक्त' अध्यारोपितार्थवचनं अधिकार्थवचनम् । स्तुति किंवा निन्दा द्वारा आरोपित वस्तुके धर्मसे भी अतिरिक्त गुण- वचन, तौकीर या हिकारतसे किसी चीज़ को इतनी तारीफ़, जितनी काबिलियत उसमें न हो; अतिरिक्त स्तुति या निन्दा द्योतक वाक्य, ज्यादा तौकीर या हिकारत ज़ाहिर करनेवाला फ़िकरा । जैसे—टण वातच्छेद्य है ; यहां, दुर्बलता प्रयुक्त निन्दा देख पड़ती है । फिर नदोको काकपेया बतानेसे उसके जलपूर्ण होनेके गुणको प्रशंसा है । अधिकृच्छ्र (सं० पु० ) अधिकं कृच्छ्रं कष्टं साधन- तयाऽस्त्यस्य | १ एक मास - साध्य अधिकृच्छ्र नामक व्रत विशेष । ( क्ली० ) प्रादि- स० । २ अधिक कष्ट, ज्यादा तकलीफ | ( त्रि० ) ३ अधिककष्टयुक्त, बड़ी मुश्किल में पड़ा हुआ । अधिकृत ( सं० पु० ) अधि-कृ-त । १ अध्यक्ष, हाकिम । २ अधिकारी, हकदार । ३ आयव्ययादिका अवक्षेपक, आमदनी खर्च वगैरह जांचनेवाला । (त्रि०) ४ नियुक्त, मुकरर किया गया । ५ अधिकार किया हुआ, जिसपर कब्ज़ा हो गया हो । अधिकृति (सं० स्त्री० ) अधि-क-क्तिन् । १ अधि- कार, कब्ज़ा । २ स्वत्व, हक, दावा । अधिकृत्य (सं० अव्य० ) १ शीर्षपर स्थान देकर, प्रधान विषय बनाकर । २ विषयमें, बाबत । ३ प्रमाण- से, हवालेपर | अधिक्रम (सं० पु०) अधि-क्रम-घञ् भावे, मान्तात् न वृद्धिः । नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्थानाचमेः । पा ७| ३ | ३४। १ आक्रमण, हमला । २ आरोहण, चढ़ाई । अधिक्रमण (सं० क्लो० ) आक्रमण, मारनेका कार्य, हमला करनेका काम । to अधिक्षित् (सं० त्रि०) अधि-क्षि- क्विप् कर्तरि । १ क्षयकारी, नाशकरनेवाला । (क्लो०) भावे क्विप् । २ क्षय, नाश। (वै० पु० ) ३ राजा, बादशाह । अधिकार्थ (सं० त्रि० ) एकसे अधिक अर्थ रखने-<noinclude></noinclude> f2p6v2d1jl6gccvckeqiu5vtmcehj8p पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४१५ 250 106308 667491 373169 2026-07-11T16:12:39Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 667491 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामज्वर--कामतापुर|४१६}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{Left|कामज्वर, कामगवरदेखो।}} कामठ (सं० वि०) कमठस्य इदम् कमठ-पण् । १ कच्छपसम्बन्धीय, कछुवेसे सरोकार रखनेवाला। २ कमण्डलु-सम्बन्धीय। कामठक (सं० १०) सर्पविशेष, एक सांप। धृतराष्ट्र नामक नागवंशी इसने जन्म लिया था। फिर जनमेजय राजाके सर्पयज्ञमें यह मारा गया। (महाभारत आदि०) कामठा:-मध्यप्रदेशस्थ भण्डारा जिलेके तिरोरा विभागको एक जमीन्दागे। भूमिका परिमाण २८१ वर्गमौल है। लोकसंख्या १५ हजारसे अधिक है। कोई सवा सौ गांवोंसे तेरह हजारसे अधिक घर बने हैं। प्रायः सौ वर्षसे ऊपर हुये नागपुरके राजाके अधीन यह कुनवी वंशको एक जमीन्दारी रही। किन्तु राजाके विपक्ष में विद्रोहाचरणसे उनके हाथसे निकाल यह किसी लोदी वंशीयको दी गयी। वह मालगुजारी दे इसे भोग करते हैं। इसमें कामठा नामक एक ग्राम भी है। वह अक्षा० २१. ३१ और देशा. ८.. २१ पू० पर अवस्थित है। लोकसंख्या डेढ़ हजारसे अधिक है। अधिवासी खेतीबारी करते हैं। कामठाके सरदार या जमीन्दार यहीं रहते हैं। उनके घर चारो और प्राचीर और गड़से वेष्टित हैं। कामठी-मध्यप्रदेशके नागपुर जिलेका एक प्रधान नगर। यह अक्षा० २११३३०"उ०. और देशा० ७.१४ ३०“पू० परं अवस्थित है। यहां सेना निवास (छावनी) है। कामठी नागपुर शहरसे उत्तर-पूर्व साढ़े चार कोस पड़ती है। लोकसंख्या पचास हजारसे अधिक है। यहां देशी विदेशी वस्त्र और लवण पवादिका क्रय-विक्रय होता है। शस्यका व्यवसाय प्रायः माड़वारी महाजनों के हाथ है। यहां वंशीलाल प्रबीरचंदकी बनवायो एक सुन्दर पक्की पुष्करिणी और उससे लगा एक मन्दिर तथा उद्यान कनहान नदीपर सेतु बंधा है। उसके ऊपर. और छत्तीसगढ़की रेलगाड़ी चलती है। रेलका एक टेशन भी है। औषधालय, विद्यालय और अति - थियों के लिये धर्मशासाबनी है। यहाँ ४६० कूप देख. पड़ते हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कामड़िया (हिं. पु.) चर्मकार-सायुसम्प्रदायविशेष । यह साधु राजपूतानेमें रहते हैं। रामदेवकी वाणी गाना और भिक्षा मांग कर अपनी जीविका चलाना इनका काम है। कामण्डलव (सं० वि०) कमहसी वः, कमण्डलु.. अण् बहुव्री।१ कमण्डलु सम्बन्धीय। (को०) २ कमण्डलुका कार्य, कुम्हारका पेशा। कामण्डलेय (सं०वि०) कमण्डलोरिदम्, कमण्डलु-दः उवर्णस्य लोपः ढस्य एय। ढेलापोऽकट्रवाः । पादा॥१३५. {{C|पायने यौमीयियः फटसों प्रत्ययादीनाम्। पा १|३}} {{Right|कमण्डलु-सम्बन्धीय।}} कामतरु (पु.) कामं यथेच्छ जातस्तकः, मध्य. पदम्तो। १ बन्दाक वृक्ष, बांदा। यह पेड़ों पर पाप ही पाप उत्पन्न होता है। २ कल्पवृक्ष । कामता-युक्तप्रान्तके बांदा जिले का एक ग्राम । यह चित्रकूट पर्वतके निकट अवस्थित है। कामदगिरिक. नाम पर इसे कामता कहते हैं। कामतापुर-कोचविहार प्रान्तका एक सावशिष्ट यिता थे। यह नगर कामरूपके कामपीठमें प्रवखित. है। जब कामरूपका राज्य परिममें करतोया नदी तक विस्तृत था, तब यह नगर उस राज्यको राजधानी रहा। उस समय इसकी शोभासमृद्धि जैसीथो, उसका. चित्रमात्र भी अब नहीं। अाजकल यह एक बुद्र ग्रामको अपेक्षा भी होनावणाम हो गया है। भग्नावशेषके मध्य दुर्ग, राजप्रासाद, सरोवर, उद्यान,. देवाच्य इत्यादि सकल विषयोंका वसावशेष है। इसके पश्चिम लालबाजार नामक एक छोटा शहर है। युरोपीय साधारणतः इसे लालबाजार ही करते हैं। पहले कामतापुर धरला नदीके पविम तट पर. अवस्थित था। किन्तु पानकल धरला प्राचीन स्थान शेड़ कितना हा पूर्वको इट गयी है। इसलिये या उससे बहुत दूर पड़ता है।नागपुर गौर विस्तृत स्थान प्राज भी कामतापुरके पूर्व खासी पड़ा है। उस स्थानको देखनसे मासूम होता है कि पहले घरमा पाजकसको पपेश बहुत विसत और.<noinclude></noinclude> kiil4jdo0007tr0o1ra2wdsaynqlulb पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४१६ 250 106309 667541 373170 2026-07-12T07:56:37Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 667541 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामतापुर|४१७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} प्रवन नदी थी। कामतापुरके बीच इस समय भी एक क्षुद्र नदी प्रवाहित है। इसको सिङ्गोमारी" * (पृङ्गीमारी वा सिंहमारी) कहते हैं। इस क्षुद्र नदीने प्राचीन नगर दो मागोम बांट दिया है। पूर्व खडसे पश्चिम खण्ड छोटा है। जहां शिडीमारी नगरमें उसी या महा नगरसे निकली है, वहीं वहीं अधिकांश स्थान स्रोतके प्रवाहसे विनष्ट हो गया है। नगर बहुत कुछ आयताकार है। परिधि प्रायः १८ मौन होगा। उसके मध्य पूर्वको ही ५ मोल धरलाका पुराना कोट उत्तर-पश्चिमसे दक्षिणपूर्व कोणके अमिमुख पड़ता है। नगर पपर तीनों दिक मलकिट तथा मृगमय वृहत् प्राकारसे परिवेष्टित है। खाई दो हैं-एक नगरको चारो ओर, और दूसरी नगरके अभ्यन्तरमें दुगके चारो ओर । ऐसा जान पड़ता है कि-दुर्गको खाईको मिट्टी खोद दुर्गके मुरचे धनाये गये हैं। फिर नगरको खाईको मिट्टी निकाल खार्डके बाहर ढालू पुश्ता बांधा है। यह पुश्ता और दुर्गका मुर्चा भाजकक्ष अधिकांश स्थानों में टूट गया है। मगरको नगरके खाई और दुर्गका सुरचा ही उक्त कारणसे प्रति हहत् और विस्त न था। नगरको खाईके आगे ही इसकी तीनां और नगर रक्षार्थ मुरचे हैं। पूर्वको धरला नदीकी और कोई मुरचा नहीं। दुर्गको खाईका विस्तार आजकल कहीं कम कहीं ज्यादा है। इसके किनारे पर पानकरन खेती बारी होने लगी है। इससे क्षेत्रमें बलसंग्रहके लिये दुगंको खाई काट कर नाना स्थानो में मैदानसे मिला दी गयी है। दुर्गके मुर चोंका तलभाग प्रायः १३० फीट विस्त त और २० । ३० फीट ऊंचा होगा। किन्तु देखते ही इसके अधिक उच्च रहनको प्रतीति होती है। कालक्रमसे शिखरदेशको मृत्तिका छूट मूलदेशमें पा लगनेसे तलदेशको विस्तृति कुछ बढ़ गयी है। किन्तु इसके समझानेका कोई उपाय नहीं-पहले पायतन कितना बड़ा ' था? मुरचे नीचेसे अपर तक मिट्टोके बने हैं। भली भांति समझ पड़ता है कि बाहरी ओर रटकका • पातसे सोग मनी मस्स्यसे इसका नाम मनोमारी क्वा। फिर दूसरोंके कथनानुसार सिशब्दस सिंहमारी बना। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पावरण था। नगरकी खाईका विस्तार इस समय भी २५० फीट है। किन्तु अब ठीक अनुमान कर नहीं सकते-गभीरता कितनी थी। कारण खाई बहुत मर पायो है। वाहरका पुश्ठा देखनेसे मालूम होता है कि गभीरता भी बहुत सामान्य न होगी। नगरमें तीन तोरण वर्तमान हैं। फिर शिङ्गीमारीके पश्चिम पूर्व एक तोरण रहनेका अनुमान लगाते हैं। सम्भवतः इस तोरपके पास ही मुसलमानोंका डेरा था। ऐसा भनुमान करने का कारण यह है कि यहां भी वैसी ही रक्षोपयोगी व्यवस्था देख पड़ती है, जैसी अन्यान्य तोरोंड़ोंके निकट खाई और मुरचौमें मिलती हैं। एतद्भिव यहां एक तोरण रहनेका दूसरा प्रमाण भी है। इस स्थानसे एक पुरातन प्रशस्त राइ वरावर उत्तरको और नगरके मध्य कोषागार नामक प्रान्तिकारी भग्ना. वशेष तक चली गयी है। फिर वहां यह कुछ टेढ़ी पड़ दक्षिणमुख घोड़ाघाट पहुंची है। इस राह पर दूसरे भी साधारण कार्यो के चिन्ह देख पड़ते हैं। यह राह वहिर्देशमें सौदल दोघीके तौरसे घोड़ावाटको पोर गयी है। नगरसे दीघोतक राइ प्रायः ३मील है। इसके भी उभय पार्श्व पर कई अहानिकावोंका भग्नावशेष है। इस देशके लोगों के कथनानुसार नगरसे सौदल दोघी तक पथिपावस्थ भग्न अट्टालिकायें मुगलोंने बनवायी थी। किन्तु यह उनका भ्रम. मालम होता है। इसके मध्य एक इटास्तुपके जपर दो ओर दूसरे इष्टकस्तूप पर चार ग्रानाध्ठ पत्थरके सम्पूर्ण एवं सौष्ठवशून्य स्तम्भ हैं। हिन्दूराजावांके समय यहां बहुत प्रालिकार्य थीं। चबरोधके समय मुसनमानाने उन प्रालिकार्वोपर अधिकार कर वास किया था। फिर उनको दुर्दधा मी सुसन्तमामौके हायसे हुई जिस स्थानमें एक तोरण रहन नदीके दो मौन पश्चिम एक भग्नप्रायः तोरण मिला प्रस्तर-निर्मिम स्वम्भादि रहनेसे इम तोरणका है। नाम "शिलाहार है। यह सकल स्तम्भप्रस्तर सौष्ठव- शून्य हैं। और किसी प्रकार कार कार्यविषिष्ट नहीं। पिसाहारवे दो मोल पत्रिम दूमरा भी तोरण<noinclude></noinclude> bsfc4ig3potebfmiasewgxzdvn5orxc पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४१७ 250 106310 667543 373171 2026-07-12T08:14:17Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 667543 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४१८| कामतापुर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} है। इसको "वाघहार" कहते हैं। इस तोरणके शिखरदेशमें एक व्याघ्रमूर्ति थी। नगरके उत्तरांशमें धरला नदीके प्राचीन स्थानके सुखसे पश्चिम प्राय: एक मोल दूर "होकोहार' नामक तोरण है। कामरूप जिले में कई असभ्य लोगोंके नाम सुन पड़ते हैं। उनमें होको भी एक असभ्य जाति होगी। इसीसे होको नामक किसी पसभ्य जातिके नामानुसार सम्भवत: तोरणका नाम भी रक्खा गया है। यह सकल तोरण इष्टकनिर्मित थे। इनके निकट नानाविध रक्षणोप योगी उपाय थे।आज भी उन सबका भग्नावशेष पड़ा है। होकोहारके वहिर्देशमें राहके वामपाल और थिङ्गीमारीके पूर्व एक क्षुद्र दुर्ग है। यह प्रायः एक वर्गमोल जमीन पर बना है। इस दुर्गको “पात्रका गढ़" कहते हैं। कारण इसमें पात्र अर्थात् प्रधान मन्त्री रहते थे। इसकी गठनप्रणाली और व्यवस्थादि नगर टुगको मांति अधिक उत्क्वाष्ट नहीं। फिर भी यह इस प्रकार निर्मित हुवा है, कि नगर दुर्गसे ही इसकी वृहत् स्तूप है। यह ३० फीट उच्च है। इसका रक्षाका कार्य अनायास चल सकता है। इस दुर्ग से कुछ उत्तर ऐक क्षेत्रके मध्य राजाका सानागार था। इसको चारो ओर पाजकल तम्बाकूको खेती होती है। क्षेत्रके एक स्थानको भान भी "शीतलवास" कहते हैं। किन्तु यहां किसी प्रकारको अट्टालिकाका चिह्न नहीं । यहां गमलेकी भांति पत्थरका एक पात्र विद्यमान है। वह ग्रानाइट पत्थर खोदकर बनाया गया है। इसका । किनारा ६ इंच मोटा है। मुखका विस्तार साढे ६॥ फोट और गभीरता साढ़े तीन फीट है। इसके अभ्यन्तरमें पत्थरकी एक शिड्डी जैसी बनी है सम्भवतः उसीके सहारे इसमें उतरते थे। पत्थरके बाहर इस प्रकार चढ़ने का कोई उपाय नहीं। इसीसे अनुमान होता है कि पत्थर भूमिमें गड़ा था। फिर इसका किनारा सानभूमिके मध्यभागी समपृष्ठ था। इस स्नानागारका क्षेत्र देखनसे स्पष्ट समझाते है कि स्त्रना गार और शीतसवास दोनों एक सुन्दर शयाशीतल मनोरम उधामके मध्य थे। कालक्रमसे उद्यानके वृक्षादि विनष्ट हो गये हैं। प्रधबा अधिकार्यके लिये सकल हयादि काट भूभाग बनाया गया है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> नगरके मध्य प्रधान स्थान दुर्ग और राजप्रासाद है। यह प्रायः नगरके मध्यस्थलमै पवखित है। इसको चारो ओर ६० फोट विस्तृत एक खाई है। दुर्ग पूर्वपश्चिम १८६० फीट और उत्तर-दक्षिण १८८० फोट विस्तृत है। खाईके बाहर दुर्ग का सुरक्षा और खाईके भीतर इष्टक-पाचीर है। उत्तर और दक्षिण दिक् खाईके तोरसे यह प्राचीर लगा है। फिर पूर्व- पश्चिम प्राचीरको बगलमें-चौड़ा ढाल पोता है। दुर्गक. सुरचोंके बाहर दक्षिणपूर्व कोषमें कई क्षुद्र पुष्करिणी और एक वृहत् तड़ाग है। पर तीनां पोर दुर्ग के मध्यविस्तारमें प्रायः २०० गज भूमि मट्टीके मुरचेसे वेष्टित है। यह वेष्टितस्थान तीन भागों में विभक्त है। सम्भवतः यह स्थान रानान्त:पुर रहा। इसके बाहर कई क्षुद्र पुष्करिणी हैं। किन्तु निकटमें अट्टालिकाका कोई चिह नहीं मिलता। दुर्ग के अभ्यन्तरमै इष्टक-पाचौरके मध्य उत्तरांशपर शिखरदेश ३६० फोट विस्तृत और चतुष्कोथाकार है। इस स्तूपके दक्षिण-पश्चिम कोणमें एक छुट अथच गभीर पुष्करिणी है। इसीसे स्तूपका यह अंथ पाज भी नहीं विगड़ा। इसको चारी पोर इष्टकको ठहो यो। किन्तु आजकल पुष्करिणीके तौरको छोड़ दूसरी किसी तरफ नहीं है। इसके निकट दूसरी भी कई क्षुद्र पुष्करिणी इनको देखते ही जान पड़ता है कि दुर्गको रक्षा करनेको पुष्करिणी खोदी गयीं थीं। फिर उसी मृत्तिकाको राशिसे यह स्तूप निर्मित दुवा । इस सूपका अभ्यन्तर इष्टकगठित नहीं, केवच वालू और मिट्टीसे भरा है। इस स्तूपके जपर उत्तर एवं दक्षिणभागमें ईटोंसे बंधे १० फीट चौड़े दो कूप हैं। दोनों कूषों का तलदेश तक बंधा है। स्तूपके अपर पूर्व-पश्चिम दो स्थान हैं। देखने से सहजमें ही समझ सकते है कि पहले वहां अट्टालिका यो। पूर्वको तरफ इसी टेरपर वेदीको भांति क्षुद्र चतुष्कोणाकार एक स्थान है। अनेकोंके पनुमानमें यहां कामतखरीका प्राचीन मन्दिर था। दूसरा.भो भग्नावशेष है। सोगोंके जायमानुसार वहां<noinclude></noinclude> p0cm0ufo0eok6ndwpywx699nu1gm0qn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६९ 250 106367 667496 373233 2026-07-11T16:32:06Z आदेश यादव 3609 /* शोधित नहीं */ 667496 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude><noinclude></noinclude> 030lueu02owke93y8plqp8ema88m2o4 667497 667496 2026-07-11T16:32:32Z आदेश यादव 3609 /* शोधित नहीं */ 667497 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="आदेश यादव" /></noinclude>800 कामवर -- कामशक्ति तत् । काम-मतुप् छोए मस्य यः १ दारुहरिद्रा काम: कामवासी (सं०नि० ) कामं यथेच्छं वसति, फास ङीप् । | । - कन्दर्यभावः अस्वस्याः । २ मेथुमका अभिलाष रखने- वस्- णिनि । इच्छानुसार मानास्थानमें प्रस्थिरभाव से वाली, जिस श्रौरतको शहवत चढ़ो हो । वास करनेवाला, जो पारियके सुवाषिक रहता ही कामवर (सं०वि०) कामादपि सोन्दर्येच वर: ये छ: कामविड (सं०जि०) कामवायेन विच १ श्रतिसुन्दर, निहायत खूबसूरत । ( पु० ) २ यथेच्छ कन्दर्पवाणविद्ध, स्थनको इच्छा से श्राकुल । वर, मनमानी वख् शिश । कामविहन्ता (सं० पु० ) कामस्य कन्दर्पस्य विशेषेण इन्ता नाथयिता, काम-विन्दन्- १ महादेव । (वि०) २ कामरि जयकारो, कामदेवको जोत लेने- लगता है। २ वसन्त, वाला । 10 1 इससे कन्दर्प को कामचोरों (४० वि०) कामं पर्याप्त' बोयें यस्य बहुव १ अपरिमित योर्यणालो, खूब साकत रखनेवाला । (को०) कामस्य बीर्यम् -सत् । २ कन्दको गि कामदेवका वल । कामवल्लभ (सं० पु० ) कामः कमनीयः अतएव वल्लभः प्रियः कर्मधा। यहा कामस्य कन्दस्य वक्षभः, १ आम्रवृक्ष, भामका पेड । 4- तत् । अम्रिका मुकुल कन्दर्पको बहुत प्यारा है। पूजा में प्राखमुकुल २ सारस पक्षी। बहार । कामयज्ञमा (सं० खो०) कामस्य कन्द बलभा प्रिया । १ रति । २ ज्योत्सा चांदनी । कामवश (सं० वि० ) कामस्य वश: वशीभूतः - तत् । कामरिपुके वशीभूत, जो शहबतके तावेमें रहता हो । कामवश्य (सं० वि० ) कामस्य वश्यः वश्यतामापत्रः, कामवश-य । कन्दर्प पोड़ा के वशीभूत, जी यत यक् । तावेमें हो । कामाच (सं० पु० ) कामं यचेच्छं जाती हच मध्य- पदनो० । बन्दाक, वांदा । कामवृत्त (सं० त्रि०) कामं यथेच्छ निरङ्गं वृत्तमस्य, वटुव्रो० यचेच्छाचारी, मनमानी पास चलनेवाला। कामहप्ति (सं. खां०) कामेन खेच्छया वृत्तिः तत्। शहवत स्त्रो०) १ स्वेच्छाचार, मनमानी चाल । २ कामरिपुका कार्य, कामदेवका काम (वि०) कामती उत्तिरस्य बहुब्री ३ यथेच्छाचारयुक्त, मनमौजी | कामवृषि (सं० पु० स्त्री०) कामस्य हरिणात् बहुमो कामवाण (सं० पु० ) कामस्य कन्दर्पस्य वाचः शरः, -तत् । कन्दर्प का वाण, कामदेवका तोर । कामदेव पुष्पके पांच वाण रखते हैं । "अरविन्दमशोक शिरीष' 'चवमुत्पलम् । पतानि प्रकीर्तन्ते पचवायस्य सायकाः ॥" पद्म, अशोक, शिरोष, भम्र और उत्पल पांचों पुष्प कन्दर्पपचवाण हैं। पांच प्रकार कर्मानुसार कन्दर्पयाथ अन्य नामों- से भी समिति - १. कामना नामक महाक्षुप, एक बड़ा झाड़ कर्णाटक देशमें इसे 'काम' कहते हैं। कारण कामइडि सेवन करनेसे बलवीर्य बढ़ता है। इसका संस्कृत पर्यायारहसिंग. मनोजहरि, मदनायुः, कन्दर्पजीव, जितेन्द्रियाह्न, कामैकजीव चौर जोवसंध है। राजनिघग्रह के मत से यह मधुररस चोर व रुचि काममति तथा इन्द्रियको गति बढ़ानेवाली है। २ कामरिपुको डि, कामदेवको बढ़ती। कामता (सं० स्त्री० ) कामं कमनीयं वन्तं यस्याः, । पेड़ । कामवाद (सं० पु० ) कामं यथेच्छ वादः। यच्छबी पाटलाच एक पेड़ प्रवाद, मनमानी बात। “सम्मोहनोन्मादनी च शोषयतापनस्तथा । स्तम्भमये ति कामस्य पञ्चवाणाः प्रकीर्तिताः ॥” सोहोन, उन्मादन, घोषण तापन, घोर स्तम्भन पांच कामवायोंके नाम हैं। - काममति (सं० सी०) कामस्य मतिर्नाविकामैद:, । । तत् कामदेवको एक पक्षो राधयमने इस २ मैथु | कामशक्तिके पचास विभाग किये हैं, -१ रति, २ मोति कामिनी, मोहिनी, कमलमिया, विलासिनो कामवान् (सं० पु० ) कामः प्रस्वास्ति, काम-मतुप् मस्य वः । १ अभिलाषयुक्त, खारिशमन्द । नेच्छायुक्त, महबतको खाहिश रखनेवाला । ५ ।<noinclude></noinclude> qsx05i9y77i2drr40333dul99lum6xp सदस्य वार्ता:Avantika Shaw 3 183715 667473 667460 2026-07-11T14:11:17Z सौरभ तिवारी 05 49 /* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ उत्तर 667473 wikitext text/x-wiki {{संवाद}} == स्वागत == {{स्वागत}} --[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १८:४३, २ सितम्बर २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४ परिणाम == [[File:Wikisource Barnstar Blue Hires.png|right|90 px]]बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२४]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा प्रोत्साहन पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजक मंडल आपका धन्यवाद करता है। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए 14 सितंबर 2024 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSdWVzDKMKixXn6K3U3B6vM1_CR8nx64sKCUn304IAf9mBPPSQ/viewform पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी जरूर दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) ०७:०२, ७ सितम्बर २०२४ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/फरवरी २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा गुणवत्ता पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि तथा प्रतिभागिता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए १० अप्रैल २०२५ तक [https://docs.google.com/forms/d/1ul_ASrq9lkzsPmGeziRNy7s5qktnNa66sxOVdUF1mnI/preview पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) २०:१८, २९ मार्च २०२५ (UTC) == विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५ परिणाम == [[File:Main Barnstar.png|right|90 px]] बधाई हो! <span style="font-size:11pt">प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५]] में भाग लेकर इसे सफल बनाने तथा सांत्वना पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आयोजकों की तरफ से धन्यवाद एवं बधाई। पुरस्कार राशि प्राप्त करने के लिए 20 जनवरी 2026 तक [https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSddj_4DywI-lZ0ko_Fj2X1JqWh71cNUaij1nmL63RGx_yOITg/viewform?usp=header पुरस्कार सूचना प्रपत्र] जरूर भरें। पुरस्कार प्राप्त होने की सूचना भी दें। --[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १७:२२, १० जनवरी २०२६ (UTC) :प्रिय {{PAGENAME}} जी, [[विकिस्रोत:सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर २०२५|सामग्री संवर्द्धन संपादनोत्सव/नवंबर 2025]] की पुरस्कार राशि अमेजन कूपन के रूप में आपके ई-मेल पर भेज दी गई है। यह ई-मेल “हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप sent you an Amazon Pay Gift Card!” शीर्षक से भेजा गया है। कूपन नहीं मिलने की स्थिति में अपने ई-मेल के स्पैम मेल को जाँच लें तथा हमें सूचित करें। -[[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) १८:०९, २९ जनवरी २०२६ (UTC) == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_षष्ठ_भाग.djvu/१२७&curid=45922&diff=667454&oldid=664893 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १०:३४, ११ जुलाई २०२६ (UTC) :मुझे आप कोई शोधित पुस्तक का लिंक दे [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५४, ११ जुलाई २०२६ (UTC) :ताकि हम उसके रूल देख ले आप ने जो भेजा है उससे उतना समझ नहीं अर्ह [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) १०:५६, ११ जुलाई २०२६ (UTC) ::@[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]]जी, मैंने उसी पुस्तक के पृष्ठ की कड़ी आपको दी है जिस पुस्तक पर आप शोधन कार्य कर रही हैं। आप उस पृष्ठ के [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिन्दी_विश्वकोष_षष्ठ_भाग.djvu/१२७&action=edit स्रोत सम्पादित करें] कड़ी पर जाकर साँचे के सही उपयोग को देख सकती हैं। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १४:११, ११ जुलाई २०२६ (UTC) j5h7wds9dq55kthqiddpg6wswydcn2d विकिस्रोत:गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव/जुलाई २०२६ 4 193661 667537 666573 2026-07-12T06:50:48Z Prajjwal3959 3861 /* प्रतिभागी */ 667537 wikitext text/x-wiki __NOTOC__ <div style="width: 99%; color: #111; {{box-shadow|0|0|6px|rgba(0, 0, 0, 0.55)}} {{border-radius|2px}}"> <div style="overflow:hidden; height:auto; background: #ADD8E6; width: 100%; padding-bottom:18px;"> <div style="font-size: 36px; margin-top: 24px;margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height: 1.2em;"> <center>गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव<span style="color: #666"></span></center></div> <div style="font-size: 24px; padding-top: 0px; margin-left: 16px; margin-right:10px; font-family: 'Linux Libertine',Georgia,Times,serif; line-height:1.2em; color: #666; "> {{/Navbar}} '''गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६''' [[w:विकिमीडिया फाउंडेशन|विकिमीडिया फाउंडेशन]] एवं [[w:गूगल|गूगल]] के सहयोग से '''हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप''' द्वारा आयोजित पुस्तक निर्माण संपादनोत्सव है। इसका लक्ष्य ०३ जुलाई २०२६ से २२ जुलाई २०२६ तक विकिस्रोत के अशोधित पुस्तकों को शोधित करना है। == नियम == इस संपादनोत्सव में शामिल होकर पुरस्कार जीतने के लिए निम्न नियमों का पालन अनिवार्य है : # कोई भी विकिमीडिया खाता वाले सदस्य इस प्रतियोगिता में शामिल हो सकते हैं। यदि आप विकिमीडियन नहीं हैं तो पहले [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%87%E0%A4%B7:%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81&returnto=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4%3A%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5%2F%E0%A4%9C%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88+2024 खाता] बना लें। # संपादनोत्सव अवधि (भारतीय समयानुसार) — ०३ जुलाई २०२६ (१२:०० पूर्वाह्न) से २२ जुलाई २०२६ (११:५९ अपराह्न) होगी। # नीचे पुस्तक सूची में शामिल पुस्तकों के निर्देशित 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पुस्तक के अंश को न चुनें। # पुस्तक सूची अनुभाग में प्रतिभागी मनपसंद पुस्तक की पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर कर पुस्तक के उस अंश को अपने संपादन कार्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं। सभी प्रतिभागी किन्ही अन्य प्रतिभागीयों के द्वारा चुनी गई पुस्तक परिधि के सामने हस्ताक्षर ना करें। # पुस्तक अंश पर दो दिनों (४८ घंटे) तक संपादन न करने की स्थिति में प्रतिभागी के नाम के आगे से उसे हटाया जा सकता है तथा वह पुस्तक अंश किसी अन्य प्रतिभागी द्वारा शोधन के लिए चुना जा सकता है। # प्रतिभागी संपादनोत्सव के अंतिम दिन (२२ जुलाई २०२६) तक ही अपने शोधित पृष्ठों की गलतियाँ सुधार सकते हैं। इसके बाद के सुधार संपादनोत्सव में शामिल नहीं होंगे। आयोजक/निर्णायक ऐसे पृष्ठों के शोधित स्तर को अशोधित कर सकते हैं जो अंतिम दिन तक ठीक नहीं किए गए हों मगर बाद में सुधारे जाएँ। # दो चेतावनियों के बाद भी उपर्युक्त नियमों का उल्लंघन करने वाले को संपादनोत्सव से बाहर किया जा सकता है या प्रतिबंधित किया जा सकता है। # प्रबंधक/पुनरीक्षक के संपादनोत्सव संबंधी निर्णय सर्वमान्य होंगे। == पुरस्कार == इसमें दिए जाने वाले पुरस्कारों की सूची निम्नलिखित है: # पहला पुरस्कार: ₹ ७,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २५०) # दूसरा पुरस्कार: ₹ ६,५०० के कूपन (न्यूनतम अंक २२५) # तीसरा पुरस्कार: ₹ ६,००० के कूपन (न्यूनतम अंक २००) # ३ उत्कृष्टता पुरस्कार: ₹ ५,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १७५) # ५ गुणवत्ता पुरस्कार: ₹ ४,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १५०) # ५ प्रोत्साहन पुरस्कार: ₹ ३,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १२५) # ५ सांत्वना पुरस्कार: ₹ २,००० के कूपन (न्यूनतम अंक १००) पुरस्कार पाने वाले सभी प्रतिभागियों को वर्ष के अंत में अनुभव प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। == पुस्तक सूची == :यहाँ पृष्ठ परिधि विषयसूची पृष्ठ पर दिखाई देने वाली संख्या के अनुसार दी गई है। यह पीडीएफ की पृष्ठ संख्या से भिन्न हो सकती है। प्रतिभागी अपने शोधित करने वाले पृष्ठों को विषयसूची पृष्ठ की संख्या के अनुसार ही चुनें। सभी पुस्तकों के साथ १० अंक के लिए शोधित किए जाने वाले पृष्ठों की संख्या दे दी गई है। :*(आवश्यकता पड़ने पर पुस्तक संख्या बढ़ाई जा सकती है।) # [[विषयसूची:ज्ञानकोश भाग 1.pdf|ज्ञानकोश भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के अशोधित पृष्ठ (१२१ पृष्ठ = कुल ३०० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग एक]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५९ से पृष्ठ संख्या ९३ तक (३० पृष्ठ) तथा पृष्ठ संख्या १७५ से पृष्ठ संख्या २६८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:२९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६९ से पृष्ठ संख्या ४५८ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४५९ से पृष्ठ संख्या ५२२ तक के अशोधित पृष्ठ (कुल १५० अंक) —[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १६:०१, २ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग तीन]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १८ से पृष्ठ संख्या १४१ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०८:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) --[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:१९, ६ जुलाई २०२६ (UTC) प्रतियोगिता के शुरुआत हुए तीन दिन हो गये. इस परिधि के एक भी पृष्ठ में काम जारी नहीं हुआ. ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १४२ से पृष्ठ संख्या २६५ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) १२:०४, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २६६ से पृष्ठ संख्या ३८९ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५१, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३९० से पृष्ठ संख्या ५१३ तक (कुल ३१० अंक) — [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:४४, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ५१४ से पृष्ठ संख्या ६३७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६३७ से पृष्ठ संख्या ७६१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०५:०८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu|हिंदी विश्वकोष भाग चार]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:५७, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२८, ३ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:४०, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९७ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९८ से पृष्ठ संख्या ६२१ तक (कुल ३१० अंक) —[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६२२ से पृष्ठ संख्या ७४५ तक (कुल ३१० अंक) —<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४६ से पृष्ठ संख्या ७६५ तक (कुल ५० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग छः]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १ से पृष्ठ संख्या १२४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२५ से पृष्ठ संख्या २४८ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३७, ४ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४९ से पृष्ठ संख्या ३७२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३३, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७३ से पृष्ठ संख्या ४९६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Arshsultanpuri|Arshsultanpuri]] ([[सदस्य वार्ता:Arshsultanpuri|वार्ता]]) ११:०१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९७ से पृष्ठ संख्या ६०४ तक (कुल २७० अंक) — # [[विषयसूची:हिन्दी विश्वकोष अष्टादश भाग.djvu|हिन्दी विश्वकोष भाग अठारह]] — १० अंक के लिए ४ पृष्ठ शोधित करने होंगे। ## '''पृष्ठ-परिधि १''' : विषयसूची के पृष्ठ अभिमत से पृष्ठ संख्या १२२ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) १६:१६, ७ जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि २''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या १२३ से पृष्ठ संख्या २४६ तक (कुल ३१० अंक) — [[सदस्य:Prajjwal3959|Prajjwal3959]] ([[सदस्य वार्ता:Prajjwal3959|वार्ता]]) ०७:३१, १० जुलाई २०२६ (UTC) ## '''पृष्ठ-परिधि ३''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या २४७ से पृष्ठ संख्या ३७० तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ४''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ३७१ से पृष्ठ संख्या ४९४ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ५''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ४९५ से पृष्ठ संख्या ६१८ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ६''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ६१९ से पृष्ठ संख्या ७४२ तक (कुल ३१० अंक) — ## '''पृष्ठ-परिधि ७''' : विषयसूची के पृष्ठ संख्या ७४३ से पृष्ठ संख्या ७६३ तक (कुल ५२ अंक) — == प्रगति == {{Special:IndexPages|key=गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६}} ==प्रतिभागी== :प्रतिभागी यहाँ <nowiki>#~~~~</nowiki> लगाकर हस्ताक्षर कर #[[सदस्य:Shivaniya shaw|Shivaniya shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Shivaniya shaw|वार्ता]]) ११:१३, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अँजली चौधरी|अँजली चौधरी]] ([[सदस्य वार्ता:अँजली चौधरी|वार्ता]]) ११:४९, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Lado Shaw|Lado Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Lado Shaw|वार्ता]]) १२:११, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अमृता कुमारी पाण्डेय|अमृता कुमारी पाण्डेय]] ([[सदस्य वार्ता:अमृता कुमारी पाण्डेय|वार्ता]]) १२:१२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sonu kumar 07|Sonu kumar 07]] ([[सदस्य वार्ता:Sonu kumar 07|वार्ता]]) १४:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sanjana Chowdhury|Sanjana Chowdhury]] ([[सदस्य वार्ता:Sanjana Chowdhury|वार्ता]]) १५:५२, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:रेखा साव|रेखा साव]] ([[सदस्य वार्ता:रेखा साव|वार्ता]]) १६:३८, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अनुश्री साव|अनुश्री साव]] ([[सदस्य वार्ता:अनुश्री साव|वार्ता]]) १८:५०, २ जुलाई २०२६ (UTC) #<span style="color:green;">&#9997;</span>[[u:शीतल सिन्हा|<u><span style="color:Magenta;">शीतल </span></u>]] ([[User talk:शीतल सिन्हा|<span style="color:blue;">talk</span>]]) १९:०७, २ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:आदेश यादव|आदेश यादव]] ([[सदस्य वार्ता:आदेश यादव|वार्ता]]) ०२:०३, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:अंजली राजभर|अंजली राजभर]] ([[सदस्य वार्ता:अंजली राजभर|वार्ता]]) ०४:४५, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:MuskanChaudhary121|MuskanChaudhary121]] ([[सदस्य वार्ता:MuskanChaudhary121|वार्ता]]) ०७:५१, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Sweta rani Gupta|Sweta rani Gupta]] ([[सदस्य वार्ता:Sweta rani Gupta|वार्ता]]) १०:४९, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Ranju Rajbhar|Ranju Rajbhar]] ([[सदस्य वार्ता:Ranju Rajbhar|वार्ता]]) १३:२२, ३ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Avantika Shaw|Avantika Shaw]] ([[सदस्य वार्ता:Avantika Shaw|वार्ता]]) ०८:३३, ४ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:Koyal Singh|Koyal Singh]] ([[सदस्य वार्ता:Koyal Singh|वार्ता]]) १०:३५, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १८:२१, ५ जुलाई २०२६ (UTC) #[[सदस्य:ममता साव9|ममता साव9]] ([[सदस्य वार्ता:ममता साव9|वार्ता]]) ०६:११, ६ जुलाई २०२६ (UTC) == आयोजक एवं निर्णायक मंडल == संपादनोत्सव के सुचारु आयोजन तथा उसमें सुधारे गए पुस्तक पृष्ठों की गुणवत्ता पर निगरानी रखने तथा पुरस्कार प्रदान करने के लिए निम्नानुसार आयोजक एवं निर्णायक मंडली बनाई गई है : :'''आयोजक-''' # [[सदस्य:अनिरुद्ध कुमार|अनिरुद्ध कुमार]] ([[सदस्य वार्ता:अनिरुद्ध कुमार|वार्ता]]) — संपर्क सूत्र (हिंदी विकिमीडियन्स यूज़र ग्रुप) एवं प्रबंधक # [[सदस्य:अजीत कुमार तिवारी|अजीत कुमार तिवारी]] ([[सदस्य वार्ता:अजीत कुमार तिवारी|वार्ता]]) — प्रबंधक :'''निर्णायक-''' # [[सदस्य:नीलम|नीलम]] ([[सदस्य वार्ता:नीलम|वार्ता]]) प्रबंधक # [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) — प्रबंधक == परिणाम == == रपट == </div> </div> <div style="padding: 10px; padding-left: 20px; "> </div> </div> </div> </div> [[श्रेणी:संपादनोत्सव]] sv17mol4zirap6c8mvzulmeiy6o6a0r सदस्य वार्ता:AMAN KUMAR 3 196394 667485 2026-07-11T15:25:37Z सौरभ तिवारी 05 49 "{{संवाद}} {{स्वागत}}--~~~~ == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिंदी_विश्वकोष_भाग_३.djvu/३९२&diff=prev&oldid=667483..." के साथ नया पृष्ठ बनाया 667485 wikitext text/x-wiki {{संवाद}} {{स्वागत}}--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १५:२५, ११ जुलाई २०२६ (UTC) == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिंदी_विश्वकोष_भाग_३.djvu/३९२&diff=prev&oldid=667483 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद।--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १५:२५, ११ जुलाई २०२६ (UTC) 4aqgxu2vtbrpregobb6gdb86sk2zoau 667518 667485 2026-07-12T00:40:43Z AMAN KUMAR 6475 /* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ उत्तर 667518 wikitext text/x-wiki {{संवाद}} {{स्वागत}}--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १५:२५, ११ जुलाई २०२६ (UTC) == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिंदी_विश्वकोष_भाग_३.djvu/३९२&diff=prev&oldid=667483 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद।--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १५:२५, ११ जुलाई २०२६ (UTC) :@[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, क्या में साँचा:SIC का प्रयोग शोधित पृष्ठ के सुधार में कर सकता हूँ? [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:४०, १२ जुलाई २०२६ (UTC) 7sa2pd5gq6yon2m9cx3ybyslitehuzd 667531 667518 2026-07-12T05:39:38Z सौरभ तिवारी 05 49 /* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ उत्तर 667531 wikitext text/x-wiki {{संवाद}} {{स्वागत}}--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १५:२५, ११ जुलाई २०२६ (UTC) == गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन == @[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]]जी, कृपया [https://hi.wikisource.org/w/index.php?title=पृष्ठ:हिंदी_विश्वकोष_भाग_३.djvu/३९२&diff=prev&oldid=667483 इसे] देखें और इसके अनुसार आपके द्वारा शोधित किए गए पृष्ठों में २२ जुलाई तक सुधार कर लें। संपादनोत्सव के दौरान गुणवत्ता का भी ध्यान रखते हुए आप निःसंकोच शोधन कार्य जारी रखें। धन्यवाद।--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १५:२५, ११ जुलाई २०२६ (UTC) :@[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, क्या में साँचा:SIC का प्रयोग शोधित पृष्ठ के सुधार में कर सकता हूँ? [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- ००:४०, १२ जुलाई २०२६ (UTC) ::@[[सदस्य:AMAN KUMAR|AMAN KUMAR]]जी, पृष्ठों को शोधित करने के लिए आप साँचे का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन आपको ये ध्यान रखना होगा कि पृष्ठ के शब्द या तो गलत छपे हों या अधूरे हों। उपरोक्त पृष्ठ पर ही आपने '''वृद्धिसूचक''' पर SIC साँचा लगाकर '''ध्वनिसूचक''' लिख दिया, जबकि पृष्ठ पर '''वृद्धिसूचक''' ही लिखा है। ऐसी गलतियों से बचकर आप अपना शोधन कार्य जारी रख सकते हैं। धन्यवाद। [[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) ०५:३९, १२ जुलाई २०२६ (UTC) qby22yg3k1wllvqok1vc5l9iwahf2tm