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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रस्तुत्—इन्द्रासन|५९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:करेंगे।' इन्द्रने तब इन्हें सेनापति बननेको कहा। इन्होंने उसे मान लिया। (भारत, आदि, १४ अ॰)
{{outdent|इन्द्रस्तुत् (सं॰ पु॰) इन्द्रः स्तूयते यस्मिन्, इन्द्र-स्तु-किप्। इन्द्रयन्न। इस यज्ञमें इन्द्रको आराधना हाती है।}}
{{outdent|इन्द्रस्तोम (सं॰ पु॰) इन्द्रस्य स्तोमः स्तुतिः यस्मिन्। अतिरात्त्राङ्गभूत यागविशेष। राजाका अनुष्ठेय यन्न। इसकी दक्षिणा १००००१ रु॰ है। (कात्यायन ४।४।६)}}
{{outdent|इन्द्रस्वरस (सं॰ पु॰) वृष्टिजल, बारिशका पानी।}}
{{outdent|इन्द्रस्वत (सं॰ पु॰) इन्द्रकी समता करनेवाला, इन्द्र-जैसा।}}
{{outdent|इन्द्रहव (सं॰ पु॰) इन्द्रका आह्वान।}}
{{outdent|इन्द्रड्डु (सं॰ स्त्री॰) {{smaller|इन्द्रः इयतेऽनया, इन्द्र-द्व-किप् सम्प्रसारणम्, ६-तत्। इन्द्रको आराधनाका मन्त्र।}}}}
{{outdent|इन्द्रा (सं॰ स्त्री॰) १ इन्द्रकी पत्नी शचीदूवी। २ फणिज्यक वृक्ष। ३ इन्द्रवारुणणे।}}
{{outdent|इन्द्राग्निदेवता (सं॰ स्त्री॰) अनुराधा नक्षत्र।}}
{{outdent|इन्द्राग्निधूम (सं॰ पु॰) इन्द्राग्नेः मेघानलस्य धूम-इव, उप॰ ६-तत्। १ हिम, बरफ। २ अग्निविशेष। यह अग्नि प्रति वर्ष वैशाख और ज्येष्ठ मासमें प्रायः पृथिवीपर गिरती है। इससे महिष, गो, वृक्ष तथा गृह आदि जल जाते हैं।}}
{{outdent|इन्द्राणिका (सं॰ स्त्री॰) १ निर्गुण्डीवृक्ष, संभालू। २ नौसिन्दुवार, काला संभालू}}
{{outdent|इन्द्राणिकापत्त्र (सं॰ क्ली॰) र्निंगुण्डीपत्त्र, संभालूका पत्ता।}}
{{outdent|इन्द्राणी (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रस्य पत्नी, ङीष्। अणुक् च। {{smaller|पा ४१११४८।}} १ इन्द्रकी स्त्री शची। इनके परम ऐश्वर्य है। २ दुर्गाशक्ति। देवदानव इनके अधोन रहते हैं। ये सकलकी मङ्गलदात्री हैं। {{smaller|"ऐश्वर्य' परभं यस्याः वशे देव सुरासुराः। इदि परमेश्वचं च इन्द्राणो तेन सा शिवा।" (देवीपुराण)}} ३ स्थलैला, बड़ी इलायची। ४ सूक्ष्म ला, छोटो इलायची। ५ स्त्रीन्द्रिय। ६ सिन्धुवार, संभालू। ७ इन्द्रायन।}}
{{outdent|इन्द्रादृश (सं॰ पु॰) {{smaller|इन्द्रस्यैवादर्शनमस्य, इन्द्र-आ-दृश-ढक्, ६-तत्। इन्द्रगोप कीट।}}}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|इन्द्रानुज (सं॰ पु॰) Completely भगवान्। इन्द्रके बाद अदितिके गर्भ और कश्यपके औरससे वामनने जन्म लिया था। इसलिये इनका यह नाम पड़ा है। {{smaller|जन्मविवरण वामन शब्दमें देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्राभ (सं॰ पु॰) {{smaller|इन्द्रस्यैवाभा यस्य अथवा इन्द्र इवा-भाति, इन्द्र-आ-भा-क। कुरुवंशीय धृतराष्ट्रके सप्तम पुत्र।}}}}
{{outdent|इन्द्राभा (सं॰ स्त्री॰) कङ्कपक्षिभेद, किसी किस्म का बगला।}}
{{outdent|इन्द्रायन (हिं॰ पु॰) इन्द्र वारुणी देखो।}}
{{outdent|इन्द्रायुध (सं॰ क्ली॰) इन्द्रस्यायुधमिव, ६-तत्। १ इन्द्रका अस्त्र वज्र। २ रामधनुः। इसकी उत्पत्तिका विवरण इन्द शब्दमें देखो। श्राकाशमें रामधनुष देखकर वह किसीको न दिखाना चाहिये, {{smaller|"न दिवोन्द्रायुध' दृष्टा कस्यचिद्दर्शयेत् बुधः।”}} (मनु) किन्तु किसी-किसीके मतानु-सार पर्वतपर खड़े होकर देखनेसे दिखा देनेमें कोई दोष नहीं लगता,—{{smaller|"केचित्तु पर्वतादिस्थस्य दर्शने न दोषः।"}} (मेधातिथि) ३ वज्रकमणि, हीरा श। ४ स्थावर विषान्त-र्गत कन्दविष। ५ कान्यकुजका एक पराक्रान्त नृपति। कान्यकुअ देखो।}}
{{outdent|इन्द्रायुधशिखिन् (सं॰ पु॰) किसी नागका नाम।}}
{{outdent|इन्द्रायुधा (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रायुधवत् ऊर्धराज सविष जलायुका, किसी किस्मको ज़हरोलो जोंक। इसकी पीठ इन्द्रधनुष-जैसी चमकती है।}}
{{outdent|इन्द्रारि (सं॰ पु॰) असुर, राक्षस। सर्वदा हो असुर इन्दुके यज्ञमें विघ्न डाला करते हैं।}}
{{outdent|इन्द्रार्घपादप (सं॰ पु॰) क्रमुकटच, सुपारोका पेड़।}}
{{outdent|इन्द्रालिश (सं॰ पु॰) इन्दं आलिशति, इन्द-आ-लिश-क्त । इन्द्रगोप कीट, एक कीड़ा।}}
{{outdent|इन्द्रावरज, {{smaller|इन्द्रानुज देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रावसान (सं॰ पु॰) इन्दुस्यावसानः यत्त्र बहुव्री॰। मरुभूमि, रेतोली ज़मीन्।}}
{{outdent|इन्द्राशन (सं॰ पु॰) १ सिद्धि, भांग। २ गुच्चा, घुधिची।}}
{{outdent|इन्द्राशनक, {{smaller|इन्द्राशन देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रासन (सं॰ पु॰ क्ली॰) इन्द आत्मा अस्यते चिप्यते येन, इन्दु-अस करणे लुट्। १ इन्दुका सिंहासन। २ राजाका सिंहासन। ३ पञ्चमात्रिक प्रस्तावविशेष।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्कूज-उत्क्रोश'''|'''२०३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उत्कूज (सं॰ पु॰) कोकिलका शब्द, कोयलका गाना।}}
{{Outdent|उत्कूट (सं॰ पु॰) छत्र, छाता, आफ़ताबी।}}
{{Outdent|उत्कूर्दन (सं॰ क्ली॰) वलान, उछलकूद।}}
{{Outdent|उत्कूल (वै॰ त्रि॰) १ पर्वतपर चढ़नेवाला, जो ऊंचेपर हो। (अव्य॰) २ पर्वतपर, पहाड़के ऊपर।}}
{{Outdent|उत्कूलित (सं॰ त्रि॰) सागर वा नदीके तटपर आनीत, जो किनारे लगा हो।}}
{{Outdent|उत्कृति (सं॰ स्त्री॰) २६ अक्षरका छन्दोविशेष। इसमें चार-पद होते हैं।}}
{{Outdent|उत्कृत्त (सं॰ त्रि॰) उत्-कृत्-क्त। १ छिन्न, कटा हुआ। २ उत्खात, खुदा हुआ।}}
{{Outdent|उत्कृत्य (सं॰ अव्य॰) छिन्न करके, काटकर।}}
{{Outdent|उत्कृत्यमान (सं॰ त्रि॰) छिन्न किया जानवाला, जो कट रहा हो।}}
{{Outdent|उत्कृष्ट (सं॰ त्रि॰) उत्कृष्-क्त। १ प्रशस्त, बढ़ा हुआ, जो खिंचकर ऊपर या बाहर निकल गया हो। २ उत्तम, श्रेष्ठ, उम्दा, बढ़िया। ३ उत्कर्षान्वित ऊंचे दरजेवाला। ४ कर्षणवत, खिंचा हुआ। ५ सर्वोत्तम, सबसे अच्छा। ६ आकर्षित, खिंचा हुआ।}}
{{Outdent|उत्क्लष्टता (सं॰ स्त्री॰) श्रेष्ठता, उम्दगी, बड़ाई।}}
{{Outdent|उत्कृष्टत्व (सं॰ क्ली॰) <small>उत्कृष्टता देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्कष्टभूम (सं॰ पु॰) श्रेष्ठभूमि, बढ़िया जमीन्।}}
{{Outdent|उत्कृष्टवेदन (सं॰ क्ली॰) श्रेष्ठकुलके साथ विवाह-कार्य का समापन, ऊंचे खा़न्दानवाले आदमीसे शादीका करना।}}
{{Outdent|उत्कष्टोपाधिता (सं॰ स्त्री॰) प्रवल मायाकी स्थिति, बड़े धोकेकी हालत।}}
{{Outdent|उतकेन्द्रकशक्ति (सं॰ स्त्री॰) बलविशेष, एक ताक़त। वेगसे आवर्तमान वस्तु में इसका उद्भव होता है। यह उक्त वस्तु के अंश विशेष अथवा तदुपरिस्थित अन्य द्रव्य को केन्द्रसे पृथक् फेंक देती है।उत्केन्द्रकशक्ति ही चक्रका कर्दम निकाल इधर उधर छिटकाती रहती है।}}
{{Outdent|उत्कोच (सं॰ पु॰) उत्-कुच सङ्कोचे क। उपायन,
रिशवत, घूंस।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उत्कोचक (सं॰ त्रि॰) उत्कोच-कन्। १ उपायन दान करनेवाला, जो रिशवत देता हो। २ उपायन ग्रहण करनेवाला, रिशवतखोर। (पु॰) धीम्या-श्रमके निकटस्थ तीर्थविशेष। <small>(भारत आदि १८३ अ॰)</small>}}
{{Outdent|उत्कोठ (सं॰ पु॰) कोठरोगभेद, किसी किस्मका}}
{{Outdent|जुजा़म, एक कोढ़। इस रोगमें उदीर्ण पित्त, श्लेष्म और अनिलके ग्रहसे असम्यक् वमन होता और सकण्डू, रागवान् तथा सानुबन्ध बहु मण्डल पड़ता है।}}
{{right|<small>(भावप्रकाश)</small>}}
{{Outdent|उत्क्रम (सं॰ पु॰) उत्-क्रम-अच्। १ व्यतिक्रम, वैपरीत्य, इनहिराफ, भड़काव। २ उपरि वा वहि-र्गमन, ऊपरी या बाहरी चाल। ३ उन्नति, तरक्की।}}
{{Outdent|उत्क्रमण (सं॰ क्ली॰) उत्-क्रम-ल्युट्। १ अपसरण, उड़ान, निकास। २ वैपरीत्य, इनहिराफ़, भटकाव।}}
{{Outdent|उत्क्रमणीय (सं॰ त्रि॰) त्यागने योग्य, जो छोड़ देनेके का़बिल हो।}}
{{Outdent|उत्क्रान्त (सं॰ त्रि॰) उत्-क्रम-क्त। १ उद्गत, उभरा हुआ, जो आगे निकल गया हो। २ उल्लङ्घित, लांघा हुआ, जो पीछे रह गया हो।}}
{{Outdent|उत्क्रान्ति (सं॰ स्त्री॰) उत्-क्रम-क्तिन्। उद्गमन, उल्लङ्घन, सबक़त, उभार, निकास, आगे बढ़ जानेकी हालत। <small>“प्रियमाणस्योत्क्रान्तिप्रकार” (मधुसूदनसरस्वती)</small>}}
{{Outdent|उत्क्रान्तिन् (सं॰ त्रि॰) उद्गमनकरनेवाला, जो आगे निकल गया हो।}}
{{Outdent|उत्क्राम (सं॰ पु॰) १ उद्गमन, उल्लङ्घन, सबक़त, आगे बढ़ जानेकी हालत। २ वैपरीत्य, इनहिराफ, उलट-पुलट।}}
{{Outdent|उत्क्रामत् (सं॰ त्रि॰) उद्गमनकारी, सबक़त ले जानवाला, जो आगे बढ़ रहा हो।}}
{{Outdent|उत्क्रुष्ट (सं॰ त्रि॰) १ उच्चैः स्वरसे कथन करता हुआ, जो ज़ोरसे बोल रहा हो। (क्ली॰) २ सशब्द कथन, पुरशोर गुफ्तगू, चेंचें।}}
{{Outdent|उत्क्रोद (वै॰ पु॰) परमाह्लाद, उल्लास, खुशी।}}
{{Outdent|उत्क्रोश (सं॰ पु॰) उत्क्रुश-अच्। १ जलचर पक्षिविशेष, एक दरयायी परिन्द। यह मत्स्यघाती होता है। इसका मांस रक्तपित्तक्ष, शींतल, स्निग्ध,}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रिय-इन्द्रियगोचर|६१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
शक्ति विशेषको लब्धि कहते हैं। {{smaller|क्षयोपशम शब्द देखो।}} और क्षयोपशम लब्धिके निमित्तसे आत्माका पदार्थों के प्रति परिणमन होनेसे जो आत्मामें ज्ञान उत्पन्न होता है वह उपयोग है। जैसे कोई जीव सुनना तौ चाहै परन्तु सुननेको क्षयोपशमरूप शक्ति न हो तो वह सुन नहीं सकेगा। इसलिये ज्ञानका कारण होनेसे ज्ञानावरणीय कर्मको क्षयोपशम शक्तिरूप लब्धिको इन्द्रिय माना है। एवं उपयोग इन्द्रियका फल वा कार्य है इसलिये कार्यमें कारणका उपचारकर उसे इन्द्रिय कहा है। अथवा जिस प्रकार चक्षु आदिक इन्द्रियां आत्माके परिचय करानेमें हेतु हैं उसीप्रकार उपयोग भी उसमें मुख्य हेतु है इस कारण उपयोगको इन्द्रिय (इन्द्र-आत्माका परिचायक) कहा है।
ऊपर कही गई स्पर्शन आदिक पांचों इन्द्रियां हर एक जीवमें समान नहीं होतीं। वे किसीमें एक, किसीमें दो, किसीमें तीन किसीमें चार और किसीमें पांच तक होती हैं। पृथ्वीकायिक (जिनका पृथ्वी ही शरीर है), जलकायिक, तेजस्कायिक, वायुकायिक, और वनस्पतिकायिक जीवोंके एक स्पर्शन हो इन्द्रिय रहती है। कमि आदि जीवोंके स्पर्शन और रसना ये दो इन्द्रियां होती हैं। पिपीलिका (चिंवटी) आदि जीवोंके स्पर्शन, रसना और घ्राण ये तीन इन्द्रियां होती हैं। भ्रमर मकरी वगैरहके श्रोत्रके सिवाय चार इन्द्रियां होती हैं। और घोड़े आदि पशु मनुष्य देव और नारको जीवोंके पांचों इन्द्रियां होती हैं।
मन भी आत्माका परिचायक होनेसे इन्द्रिय है। परन्तु उसे शास्त्रोंमें अनिन्द्रिय कहा है। क्यों कि जिस प्रकार ईषत्क्तश उदरवालो कन्याकी अनुदरी कन्या कहते हैं उसीप्रकार ईषत् इन्द्रियोंके समान-होनेसे मन भी ईषत् इन्द्रिय अनिन्द्रिय कहा गया है। इन्द्रियोंका जिस प्रकार विषय परिमित है—ये देश काल क्षेत्रको मर्यादामें स्थित हो पदार्थों का ग्रहण कर सकती हैं उस प्रकार मन पदार्थों का ग्रहण नहीं करता। मनका विषय क्षेत्र अपरिमित है। परन्तु आत्माका परिचायक है इसलिये अन्य इन्द्रियोंके साथ सौसादृश्य न होनेसे ईषत् इन्द्रिय है।
{{smaller|(तत्त्वार्थस्वानुसार)}}
{{Multicol-break}}
(हिं॰) ६ कुस्तीका एक पेंच। जब एक पहलवान् दूसरेको नीचे गिरा देता है और उसके हाथको कलायी पकड़ उलटे तौरपर घुमा ऊपरको खींचता है, तब इन्द्रिय चढ़ानेका पेंच काममें आता है। इस पें'चसे नीचेबाले पहलवान्का हाथ उखड़ जाता है।
{{outdent|इन्द्रियकर्म, {{smaller|इन्द्रियकार्य देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रियकाम (सं॰ वि॰) शक्ति पानेका अभिलाषी, जो ताकत हासिल करना चाहता हो।}}
{{outdent|इन्द्रियकार्य (सं॰ क्ली॰) चक्षुः प्रभृतिका कर्म, आंख वगैरहका काम। शब्दाकर्णन, स्पर्शग्रहण, रूपदर्शन, रसास्वादन, गन्धग्रहण, वचनादान, विसर्ग, गमन, और आनन्दको इन्द्रियकार्य कहते हैं। {{smaller|(सुश्रुत)}}}}
{{outdent|इन्द्रियगोचर (सं॰ त्रि॰) उपलभ्य, व्यक्त, जाहिर समझ पड़ने काबिल। चक्षुः, कर्ण, जिह्वा, नासिका, त्वक् और मनः इन्द्रिय द्वारा कः प्रकारका ज्ञान उप-जता है। प्रथमतः इन्द्रिय और वस्तुका संयोग होता है, फिर आत्मामें उसका ज्ञान आता है। इसलिये इन्द्रियां ज्ञानका मागे हैं। और उस ज्ञानपथमें पतित वस्तु इन्द्रियगोचर कहाती है—}}
{{block center|<poem>{{smaller|"घ्राणजादिप्रभेदेन प्रत्यक्षं षड़ विधं मतम्।
घ्राणस्य गोचरो गन्धोः गन्धत्वादिरपि स्मृतः॥
उद्भूतस्पर्श वदृद्रव्यं गोचर' सोऽपि च त्वचः।" (भाषापरिच्छेद)}}</poem>}}
घ्राणज आदि छः प्रकारका प्रत्यक्ष होता है। गन्ध एवं गन्धत्वको भांति गन्धगत सकल धर्म घ्राणके और उडूत अर्थात् प्रत्यच्च होनेवाला स्पर्श, स्पर्शविशिष्ट द्रव्य तथा स्पर्शका धर्म स्पर्शत्व प्रभृति सकल पदार्थ त्वक्के गोचर हैं।
{{c|{{smaller|"तथा रसो रसज्ञायास्तथा शब्दोऽपि च श्रुतेः।"}}}}
अम्ल-तिक्त-कटु-कषायादि रस एवं रसगत धर्म रसत्वादि रसनाके और शब्द तथा शब्दगत धर्म शब्दत्व प्रभृति सकल पदार्थ श्रवणके गोचर होते हैं।
{{block center|<poem>{{smaller|"उङ्ग तरूप' नयनस्य गोचरी द्रव्याणि तइन्ति पृथक्त्वस खग्रा।
विभाग-संयोग-परापरत्वं स्से हद्रवत्वं परिमाणयुक्तम्॥"}}</poem>}}
रूप रस प्रभृति सकल गुण उद्भूत और अनुद्भूत भेदसे दो प्रकारके होते हैं। दोख पड़नेवालेको उद्भुत और छिपे रहनेवालेको अनुद्भूत कहते हैं। जैसे घटादिका
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६३
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|६२|इन्द्रियग्राम-इन्द्रियबोधन|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
रूपतो स्पष्ट दीख पड़नेसे उडूत है और भर्जन-कपालस्थ अग्निका रूप 'यदि इस कपालमें अग्नि न होती तो किसी तरह भी जीव आदिका भुजना न होता' इस अनुमानसे गम्य होन के कारण, अनुडूत है। इसी प्रकार रस गन्धादिको भी समझना चाहिये। इसमें उद्धृत रूप, उड्डूत रूपविशिष्ट द्रव्य, पृथक्त्व (विभिन्नता), संख्या (एकत्व द्वित्वादि), विभाग (बांध), संयोग (मेल), परत्व (दूरत्व), अपरत्व (निकटत्व), स्रह (तेल जलादिमें रहनेवाले मिश्र-करण-समर्थं पदार्थ), द्रवत्व (तरलत्व) और परिमाण (मिकरार) ये समस्त पदार्थ चक्षुः द्वारा ग्राह्य हैं।
{{block center|<poem>{{smaller|"क्रियां जातिं योग्यहत्तिंसमवायश्च तादृशम्।
यश्चाति चक्षुः सम्बन्धादालोकोङ्ग तरूपयोः श॥"}}</poem>}}
उत्क्षेपण, अवक्षेपण, गमन प्रभृति क्रिया, मनुष्यत्व पशुत्व प्रभृति जाति और सम्बन्धविशेष समवायकी योग्यवृत्ति होनेपर चक्षुः आलोक और उद्भूत रूपके सहारे ग्रहण करता है। चक्षुः द्वारा किये गये प्रत्यक्षको चाक्षुष-प्रत्यच्च कहते हैं।
{{block center|<poem>{{smaller|"उङ्ग तत्त्पश्वदृद्रव्यं गोचरः सोऽपि च त्वचः।
रुपान्यच्चक्षुषी योग्य' रुपमवापि कारणम्॥"}}</poem>}}
पहले जिस स्पर्श शैत्य उष्ण एवं रूपका वर्णन कर आये हैं, वही स्पर्श उड़त होनेपर त्वक् द्वारा ग्राह्य होता है। एवं इसप्रकारके स्पर्शसे विशिष्ट द्रव्य भी त्वक्के गोचर होता है। रूपके सिवाय चक्षुःगोचर वस्तुमात्न त्वक्के ग्राह्य है। इस त्वाच प्रत्यक्षमें भी रूप कारण होता है। क्योंकि जिस वस्तुमें उद्भूत रूप नहीं रहता, उसका त्वाच प्रत्यच भी नहीं होता। अतएव उद्भूत रूप होनेसे ही वह होता है
{{outdent|इन्द्रियग्राम (सं॰ पु॰) १ शरीर, जिस्म। २ इन्द्रिय-समूह, हवास।}}
{{outdent|इन्द्रियघात, इन्दि, {{smaller|यवध देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रियघ्न (सं॰ पु॰) इन्द्रियं हन्ति, इन्द्रिय-हन-क। १ रोग, पीड़ा। २ चक्षरोग-विशेष, आंखकी बीमारी।}}
{{outdent|इन्द्रियज (सं॰ ति॰) इन्द्रियेभ्यी जायते, इन्द्रिय-जन-ड, ५-तत् । इन्द्रियसे उत्पन्न होनेवाला। जिसप्रकार विना पोये दूधका स्वाद नहीं जाना जा सकता और}}
{{Multicol-break}}
पीने मात्रसे तो उसका ज्ञान प्रत्यच हो जाता है उसीप्रकार विषय-सन्निकर्ष द्वारा समस्त अनुभव प्राप्त होता है इसीसे सकल इन्ट्रियां ज्ञानमें कारण मानौ गयो हैं। विषय-सन्निकर्ष उसका व्यापार होनेसे जनक और ज्ञान जन्य है।
{{outdent|इन्द्रियजित् (सं॰ त्रि॰) इन्द्रियको जीतनेवाला, जो डॉन्ट्रयके वशमें न हो।}}
{{outdent|इन्द्रियज्ञान (सं॰ क्ली॰) इन्द्रियजन्य वा प्रत्यक्ष ज्ञान, देखो-सुनी बात।}}
{{outdent|इन्द्रियदमन (सं॰ पु॰) इन्द्रियगणकी निग्रह करनेका कार्य, इन्द्रियको वृत्ति घटानेका काम।}}
{{outdent|इन्द्रियदोष (सं॰ पु॰) इन्द्रियजन्य दोष। परस्त्री-गमन, चौये प्रभृतिको इन्द्रियदोष कहते हैं।}}
{{outdent|इन्द्रियनिग्रह (सं॰ पु॰) स्वेच्छाचार-प्रवृत्त इन्द्रिय-गणका निज-निज विषयमें स्थापन अर्थात् इन्द्रियके अधीन न हो उनका दमन करना। यह समस्त धर्मों में साधारण धर्म है। सन्तोष, चमा, दया, अस्तेय, शोच, इन्द्रियनिग्रह, सद्बुद्धि, विद्या, सत्यपालन और क्रोधरित्याग ये दश धर्म मनुने कड़े हैं। योग-साधनके समय भो नासिका, कणे, वाक्य, मनः प्रभृति इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयसे रोकना पड़ता है।<br>{{gap}}इन्द्रियगणके मध्य कोई भी इन्द्रिय यदि खेच्छाचारिणो रहेंगी तों योगसाधनादि धर्मकार्य कुछ नहीं बन सकते। मन रोकनेसे हो सब इन्द्रियां वशमें रहतों हैं। इसलिये मननिरोध न होनेसे योगोको किसी भा कर्ममें सफलता नहीं होतो।}}
{{outdent|इन्द्रियप्रयोग (सं॰ पु॰) विषयके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध।}}
{{outdent|इन्द्रियबध (सं॰ पु॰) अपने-अपने विषयमें इन्द्रियको शक्तिका प्रतिघात अर्थात् आधात।}}
{{outdent|इन्द्रियबुद्धि (सं॰ स्त्री॰) इन्दि, यज्ञान देखो।}}
{{outdent|इन्द्रियबोधन (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रियं बोधति, इन्द्रिय-बुध-णिच्-लुन। १ इन्द्रियको चेतन करनेवाला, जो रुक्तको जगाता हो। (क्लु॰) २ इन्द्रियका उत्तेजन, रुक्तका जोश। ३ पानसाध्य विकलताबोध मद्य, किसी किस्मको शराब। इसको पी लेनेसे सकल इन्द्रियां स्व-स्व कार्यमें उत्तेजित हो जाती हैं।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|इन्द्रियवज्री—इन्द्रियसन्निकर्ष|६३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इन्द्रियवज्री (हिं॰ स्त्री॰) वाजीकरण-भेद, नामर्दी दूर करनेकी एक तदबीर।}}
{{outdent|इन्द्रियवत् (सं॰ त्रि॰) प्रशस्तं वा वश्यं इन्द्रियं अस्त्यस्य, इन्द्रिय-मतुप, मस्य वः। १ इन्द्रियको वशमें रखने-वाला। २ प्रशस्त इन्द्रिययुक्त, अच्छे रुक्तवाला।}}
{{outdent|इन्द्रियवर्ग (सं॰ पु॰) एकादशेन्द्रिय, इन्द्रियसमूह, ग्यारहो रुक्न।}}
{{outdent|इन्द्रियविप्रतिपत्ति (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रियको विक्तति, रुक्तका बिगाड़।}}
{{outdent|इन्द्रियवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) शब्द, स्पर्श प्रभृति विषयमें बहिरेन्द्रियको आलोचना, रुक्तका काम। वचन, आदान, विहार, त्याग एवं आनन्द ये पांच कर्मेन्द्रियों की और सङ्कल्प, विकल्प तथा अध्यवसाय ये मनःको वृत्ति हैं।}}
{{outdent|इन्द्रियवैकल्प (सं॰ क्ली॰) इन्द्रियदुर्बलता, रुक्तको कमज़ोरी।}}
{{outdent|इन्द्रियसन्ताप (सं॰ पु॰) इन्द्रियवैक्कृति, रुक्तकी बीमारी।}}
{{outdent|इन्द्रियसन्निकर्ष (सं॰ पु॰) स्व स्व विषयके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध, प्रत्यक्ष जनक व्यापार, अपने-अपने कासमें रुक्तका लगाव। इन्द्रियसन्निकर्ष कार्यमात्र दो प्रकारके कारणसे उपजता है। एक करण-विधायक अर्थात् परम्परासे सम्बन्ध रखनेवाला और दूसरा व्यापार विधायक अर्थात् साक्षात्कारण होता है। जैसे-काष्ठछेदन कार्यमें, कुठार करण विधायक और चोग्नेवालो संयोजना क्रिया व्यापार-विधायक कारण है।<br>{{gap}}हमें नासिका, कर्ण, चक्षुः, जिह्वा, त्वक् और मनः इन छः इन्द्रियों द्वारा प्रत्यच्च होता है। इस छहो तरहके प्रत्यक्षका सन्निकर्ष-व्यापार साक्षात् कारण है। तथा वह. संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्त समवेतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय और विशेषणविशेष्यभावके भेदसे छः प्रकारका है। वस्तुके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध संयोग व्यापार कहाता है। क्योंकि प्रत्यक्षमें द्रव्यके साथ इन्द्रियका संयोग होते हो उसका ज्ञान हो जाता है। जैसे- त्वक्के संयोगसे स्पर्शयुक्त द्रव्य का वा स्मर्शका प्रत्यक्ष होता है।}}
{{Multicol-break}}
द्रव्यमें रहनेवाले पदार्थके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयुक्त समवाय व्यापार कारण होता है। जैसे-किसी द्रव्यके दृष्टिगोचर होनेसे उसका गुण रूप प्रभृति भी देखनेमें आता है। वहां उस गुणके साथ इन्द्रियका संयोग हो नहीं सकता। क्योंकि गुणसे गुण कभी नही मिलता अर्थात् रूप और इन्द्रियसंयोग दोनों गुण हैं। और गुणमें इन्द्रियसंयोग कभी रह नहीं सकता। इसलिये इन्द्रिय-संयोगको गुणका प्रत्यक्ष कारण कह नहि सकते इसोसे संयुक्त-समवाय व्यापार माना है। संयुक्त वस्तु होतो है, क्योंकि उसमें इन्द्रियका संयोग रहता है। इन्द्रियसंयुक्त रहनेसे हो वस्तु नाम पड़ा है। उस संयुक्त वस्तु में रहनेवाले गुणादिमें समवाय है। अतः इन्द्रियसंयुक्त समवाय सम्बन्धसे द्रव्यमें रहनेवाले गुणक्रिया जाति प्रभृति पदार्थका प्रत्यक्ष होता है।
द्रव्यमें समवेत-समवाय सम्बन्धसे रहनेवाले पदार्थ के प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयुक्त समवेत समवाय संबध कारण है। इसलिये द्रव्यमें समवेत रहनेवाले पदार्थके प्रत्यक्षमें संयुक्त-समवेत-समवायको व्यापार माना है। द्रव्यमें समवेत गुणक्रिया और उसमें रहनेवाली जाति है। इसलिये उसका प्रत्यक्ष इन्द्रिय-संयुक्त-समवेत-समवायसे होता है। इन्द्रिय-संयुक्त द्रव्य होता है। उसमें समवेत गुणक्रिया इन्द्रिय-संयुक्त-समवेत है। गुणक्रिया में गुणत्व-कर्मत्व जातिका समवाय है अत इन्द्रिय-संयुक्त समवेत समवाय-सम्बन्ध-से जातिके प्रत्यच्च होनेमें इन्द्रिय-संयुक्त-समवेत-समवाय कारण अवश्य स्वीकार करना चाहिये।
शब्दके प्रत्यक्षमें समवाय-व्यापार कारण है। शब्द गुण और कणे द्रव्य पदार्थ है। कर्णमें शब्द समवाय. सम्बन्धसे रहता है। सुतरां कर्णके समवाय सम्बन्धसे शब्दका प्रत्यक्ष होता है। अतएव शब्दक प्रत्यक्षमें कारण समवाय सन्निकर्ष है।
शब्द-समवेत शब्दत्व जातिके प्रत्यक्षमें कारण सम वेत्त समवाय व्यापार है। शब्द कर्णमें समवेत है। उसमें शब्दत्व जातिका समवाय हैं। इसलिये शब्दत्व जातिके प्रत्यच्चमें समवेत समवाय कारण माना है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रियवज्री—इन्द्रियसन्निकर्ष|६३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इन्द्रियवज्री (हिं॰ स्त्री॰) वाजीकरण-भेद, नामर्दी दूर करनेकी एक तदबीर।}}
{{outdent|इन्द्रियवत् (सं॰ त्रि॰) प्रशस्तं वा वश्यं इन्द्रियं अस्त्यस्य, इन्द्रिय-मतुप, मस्य वः। १ इन्द्रियको वशमें रखने-वाला। २ प्रशस्त इन्द्रिययुक्त, अच्छे रुक्तवाला।}}
{{outdent|इन्द्रियवर्ग (सं॰ पु॰) एकादशेन्द्रिय, इन्द्रियसमूह, ग्यारहो रुक्न।}}
{{outdent|इन्द्रियविप्रतिपत्ति (सं॰ स्त्री॰) इन्द्रियको विक्तति, रुक्तका बिगाड़।}}
{{outdent|इन्द्रियवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) शब्द, स्पर्श प्रभृति विषयमें बहिरेन्द्रियको आलोचना, रुक्तका काम। वचन, आदान, विहार, त्याग एवं आनन्द ये पांच कर्मेन्द्रियों की और सङ्कल्प, विकल्प तथा अध्यवसाय ये मनःको वृत्ति हैं।}}
{{outdent|इन्द्रियवैकल्प (सं॰ क्ली॰) इन्द्रियदुर्बलता, रुक्तको कमज़ोरी।}}
{{outdent|इन्द्रियसन्ताप (सं॰ पु॰) इन्द्रियवैक्कृति, रुक्तकी बीमारी।}}
{{outdent|इन्द्रियसन्निकर्ष (सं॰ पु॰) स्व स्व विषयके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध, प्रत्यक्ष जनक व्यापार, अपने-अपने कासमें रुक्तका लगाव। इन्द्रियसन्निकर्ष कार्यमात्र दो प्रकारके कारणसे उपजता है। एक करण-विधायक अर्थात् परम्परासे सम्बन्ध रखनेवाला और दूसरा व्यापार विधायक अर्थात् साक्षात्कारण होता है। जैसे-काष्ठछेदन कार्यमें, कुठार करण विधायक और चोग्नेवालो संयोजना क्रिया व्यापार-विधायक कारण है।<br>{{gap}}हमें नासिका, कर्ण, चक्षुः, जिह्वा, त्वक् और मनः इन छः इन्द्रियों द्वारा प्रत्यच्च होता है। इस छहो तरहके प्रत्यक्षका सन्निकर्ष-व्यापार साक्षात् कारण है। तथा वह. संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्त समवेतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय और विशेषणविशेष्यभावके भेदसे छः प्रकारका है। वस्तुके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध संयोग व्यापार कहाता है। क्योंकि प्रत्यक्षमें द्रव्यके साथ इन्द्रियका संयोग होते हो उसका ज्ञान हो जाता है। जैसे- त्वक्के संयोगसे स्पर्शयुक्त द्रव्य का वा स्मर्शका प्रत्यक्ष होता है।}}
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द्रव्यमें रहनेवाले पदार्थके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयुक्त समवाय व्यापार कारण होता है। जैसे-किसी द्रव्यके दृष्टिगोचर होनेसे उसका गुण रूप प्रभृति भी देखनेमें आता है। वहां उस गुणके साथ इन्द्रियका संयोग हो नहीं सकता। क्योंकि गुणसे गुण कभी नही मिलता अर्थात् रूप और इन्द्रियसंयोग दोनों गुण हैं। और गुणमें इन्द्रियसंयोग कभी रह नहीं सकता। इसलिये इन्द्रिय-संयोगको गुणका प्रत्यक्ष कारण कह नहि सकते इसोसे संयुक्त-समवाय व्यापार माना है। संयुक्त वस्तु होतो है, क्योंकि उसमें इन्द्रियका संयोग रहता है। इन्द्रियसंयुक्त रहनेसे हो वस्तु नाम पड़ा है। उस संयुक्त वस्तु में रहनेवाले गुणादिमें समवाय है। अतः इन्द्रियसंयुक्त समवाय सम्बन्धसे द्रव्यमें रहनेवाले गुणक्रिया जाति प्रभृति पदार्थका प्रत्यक्ष होता है।
द्रव्यमें समवेत-समवाय सम्बन्धसे रहनेवाले पदार्थ के प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयुक्त समवेत समवाय संबध कारण है। इसलिये द्रव्यमें समवेत रहनेवाले पदार्थके प्रत्यक्षमें संयुक्त-समवेत-समवायको व्यापार माना है। द्रव्यमें समवेत गुणक्रिया और उसमें रहनेवाली जाति है। इसलिये उसका प्रत्यक्ष इन्द्रिय-संयुक्त-समवेत-समवायसे होता है। इन्द्रिय-संयुक्त द्रव्य होता है। उसमें समवेत गुणक्रिया इन्द्रिय-संयुक्त-समवेत है। गुणक्रिया में गुणत्व-कर्मत्व जातिका समवाय है अत इन्द्रिय-संयुक्त समवेत समवाय-सम्बन्ध-से जातिके प्रत्यच्च होनेमें इन्द्रिय-संयुक्त-समवेत-समवाय कारण अवश्य स्वीकार करना चाहिये।
शब्दके प्रत्यक्षमें समवाय-व्यापार कारण है। शब्द गुण और कणे द्रव्य पदार्थ है। कर्णमें शब्द समवाय. सम्बन्धसे रहता है। सुतरां कर्णके समवाय सम्बन्धसे शब्दका प्रत्यक्ष होता है। अतएव शब्दक प्रत्यक्षमें कारण समवाय सन्निकर्ष है।
शब्द-समवेत शब्दत्व जातिके प्रत्यक्षमें कारण सम वेत्त समवाय व्यापार है। शब्द कर्णमें समवेत है। उसमें शब्दत्व जातिका समवाय हैं। इसलिये शब्दत्व जातिके प्रत्यच्चमें समवेत समवाय कारण माना है।
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६५
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|६४|इन्द्रियसन्निकर्ष|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
अभाव भी एक पदार्थ है। उसके प्रत्यक्षका कारण इसप्रकार है।
सारांश—जहां जिस वस्तुका स्वरूप बिलकुल दीख नहीं पड़ता, वहां उसका एक विशेषणता-विशेषरूप सम्बन्ध माना है।
अभावके प्रत्यक्षमें विशेषणता-विशेषरूप सम्बन्ध व्यापार है। जैसे जलमें अग्नि नहीं, किन्तु अग्निका अभाव रहता है। फिर अग्निके अभावका कोई आकार नहीं होता। हम जलमें अग्निके अभावको कैसे देख सकते हैं। परन्तु जलमें अग्निका अभाव देख न पड़ते भी विशेषणता-विशेषरूप सम्बन्ध से उसका ज्ञान होता है। अर्थात् जल विशेष्य है और अग्निका अभाव विशेषण है इसलिये विशेषणता-विशेष रूप सम्बन्धसे अभावका प्रत्यच्च होता है। नहीं तो जलपर चक्षुः जाते हो अभाव कैसे समझ सकते हैं। अतएव अभावके प्रत्यक्षमें विशेषणता विशेष रूप सन्निकर्षको ही व्यापार अर्थात् साक्षात् कारण माना है।
जैनसिद्धान्तमें नैयायिक मतके समान इन्द्रिय सन्त्रि-कर्षको प्रत्यक्षमें कारण नहि माना है, क्योंकि यदि समस्त इन्द्रियोंका सन्निकर्ष होता अर्थात् यदि समस्त इन्द्रियां विषयोंसे सन्निक्कष्ट हो ज्ञान करातीं तब तो खौकार भी कर लिया जाता कि इन्द्रिय-सन्निकर्ष प्रत्यक्षमें कारण है सो तो है नही क्योंकि यह स्पष्टरूपसे देखने में आता है कि नेत्र असनिक्कष्ट होकर ही पदार्थ ज्ञान कराता है। यदि कहोगे कि जिसप्रकार स्पर्शन आदि इन्द्रियां पदार्थसे संयुक्त हो कर ज्ञान कराती हैं उसीप्रकार नेत्र भी संयुक्त होकर ही ज्ञान कराता है! सो ठीक नही, क्योंकि यदि ऐसा माना जायगा तो जिसप्रकार स्पर्शन इन्द्रियसे विलकुल सनिक्कष्ट शोत वा उष्ण पदार्थ जाना जाता है उसी-प्रकार चक्षु इन्द्रियसे भो उसमें लगे हुये काजलका ज्ञान होना चाहिये क्योंकि कन्जल नेत्रके विलकुल सन्निक्कष्ट है।
यदि यह कहा जायगा कि (चक्षुरप्राप्यकारि-आवृतानवग्रहात्) अर्थात् स्पर्शन इन्द्रिय जिसप्रकार ढके हुये पदार्थके शोत उष्णका ज्ञान नहि करा
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सकती क्योंकि वह सब्रिक्कष्ट नहीं है उसीप्रकार चक्षु भी व्यवहित पदार्थको नहीं जनाता क्योंकि व्यवहित पदार्थके साथ उसका सम्बन्ध नहीं है! सो भी अयुक्त है क्योंकि ऐसा माननेसे हेतुको अव्यापक और सन्दिग्ध मानना पड़ेगा अर्थात् यह स्पष्ट रूपसे देखनेमें आता है कि चक्षु, स्वच्छ कांचके भीतर रक्ख हुये पदार्थकी और स्वच्छ जलके भीतर पड़े हुये भी व्यवहित पदार्थको देख लेता है। इसलिये पच्क्षमें साध्यके रहनेसे और साधनके अभावसे वह अव्यापक हो जाता है तथा लोहकान्त मणि लोहके पास न भी जाकर लोहसे संबद्ध हो जाती है। इसलिये उपर्युक्त हेतु संदिग्ध है अर्थात् लोहकान्त मणिद्वारा व्यवहित पदार्थका ग्रहण न होनेसे हेतु को सत्ताका तो निश्चय हो जाता है। परन्तु वह "प्राप्त होकर लोहको ग्रहण नहि करती" इसलिये माध्यके अभावसे वहां यह सन्देह हो जाता है कि चक्षु भी व्यवहित पदार्थको ग्रहण नहि करता इसलिये वह सन्निक्कष्ट होकर पदार्थका ग्रहण करता है वा असनिक्कष्ट, इसलिये उपर्युक्त अनुमानमें हेतुके दुष्ट हो जानेसे चत्तु सन्निकर्ष सिद्ध नहीं हो सकता ।
यदि मानोगे कि अग्निके समान चक्षु भौतिक पदार्थ है इसलिये जिसप्रकार अग्निका प्रकाश संबद्ध हो पदार्थका ज्ञान कराता है। उसीप्रकार चक्षुकी किरण भी पदार्थसे संबद्ध होकर ही ज्ञान करातीं हैं। इसलिये चक्षुसन्निकर्ष युक्त है? सा भी ठीक नही, क्योंकि लोहकान्त मणिसे ही यहां व्यभिचार आता है अर्थात् लोहकान्त मणि भी भौतिक पदार्थ है परन्तु वह पदार्थके पास जाकर संबंध नहीं होती उसीप्रकार मान भी लो कि चक्षु भौतिक पदार्थ है तथापि वह पदार्थसे सनिक्कष्ट ही ज्ञान नहीं करा सकता।
यदि कहोगे चक्षु वाह्य इन्द्रिय है। इसलिये जिस प्रकार स्पर्शन आदि इन्द्रियां पदार्थसे सन्निक्कष्ट हो उसका ज्ञान कराती हैं। उसीप्रकार चक्षुभी पदार्थसे सन्निक्कष्ट होकर हो ज्ञान कराता है? सो भी ठोक नहीं। क्योंकि इन्द्रियां {{smaller|(इन्द्रिय शब्द देखो)}} दो प्रकारकी
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रियसन्निकर्ष|६५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
मानीं है एक द्रव्येन्द्रियजो विन्रनी पलक गोलक आदि हैं और दूसरी भावेन्द्रिय जो ज्ञानात्मक हैं उनमें भावेन्द्रियां प्रधान हैं और द्रव्येन्द्रियां गौण हैं इसलिये चक्षु आदि इन्द्रियां सर्वथा वाह्य इन्द्रियां हो हैं यह बात मिथ्या है और चक्षु सर्वथा वाह्य इन्द्रिय नहीं इस बातके सिद्ध हो जानेपर वह सन्निक्कष्ट होकर ही पदार्थको दिखाता है यह वात भी सर्वथा अयुक्त है।
यदि यह कहा जायगा कि चक्षु 'असन्निकृष्ट पदार्थका जनानेवाला है' अर्थात् चक्षुरिन्द्रिय और पदार्थका सन्निकर्ष न हो तो व्यवहित जो जमीन आदिके भीतर रहनेबाले पदार्थ हैं और मेरु कैलास आदि पदार्थ जो अत्यन्त दूर हैं उनका भी चक्षुसे दर्शन होना चाहिये क्योंकि उनके न देखनमें कोई प्रतिबन्धक कारण नहिं जान पड़ता। और हमारे (प्रतिवादियोंके) मतमें तो कोई दोष नहि आता क्योंकि हम चक्षुकी तैजस पदार्थ और उससे सूर्य आदि तेजिस्वी पदार्थों के समान रश्मि निकलतीं हैं ऐसा मानते हैं इसलिये जहांतक रश्मिका संबन्ध रहता है वहां तकका पदार्थ दीखता है और जिस पदार्थके साथ रश्मिका संबंध नहीं होता वह पदार्थ नहीं दोखता तथा कठिन मूर्तिके पदार्थमें रश्मियां प्रतिबद्ध भी हो जाती हैं इसलिये हमारे मतमें मेरु वा कैलास पर्वतके अन्तरालमें स्थित बहुतसे वन पर्वत आदिसे स्थगित हो जानेसे नेत्रोंकी रश्मियां आगे नही बढ़ पातीं अतः मेरु कैलास आदिका ज्ञान नहीं होता? सो भी सर्वथा अयुक्त है, क्योंकि इस शङ्गाका समाधान लोहमणिसे हो होजाता है अर्थात् जिसप्रकार लोहमणि लोहेको यर्याप खींचती है परन्तु वह व्यर्वाहत लोहेको वा अधिक दूरपर पड़े हुये लोहेको नही खींचती उसी-प्रकार चक्षु भी पदार्थको दिखाता है परन्तु अयोग्य व्यवहित और अधिक दूरवर्तीकी नहीं। तथा प्रतिवादियोंने जो चक्षुको तैजस पदार्थ मानकर उसको रश्मिकी कल्पना और उनका व्यवधान माना है वह प्रमाणबाधित है—कोई भी प्रमाण इस वातको सिद्ध नहि कर सकता।
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कहोगे कि चक्षु सन्निक्कष्ट होकर पदार्थको नहीं दिखाता इसमें संशय और भभ्रान्ति है अर्थात् यह निश्चित रूपसे नहीं कहा जा सकता कि चतु असन्निक्कष्ट होकर ही पदार्थको दिखाता है! सो भी ठीक नही, क्योंकि 'चक्षु सन्निक्कष्ट हो करही पदार्थों का ज्ञान कराता है' इस सिद्धान्तमें भी उपयुक्त दूषण मोजूद है अर्थात् चक्षु सन्निक्लष्ट ही पदार्थका दर्शन कराता है वा असन्निक्कष्ट हो यह संशय वा असनिकष्ट होकर ही कराता है यह विपर्यय वहांपर भी निर्विघ्नरूपसे विद्यमान है।
यदि कहोगे कि जिसप्रकार अग्नि तैजस पदार्थ है इसलिये उसमें रश्मियां विद्यमान रहती हैं उसी प्रकार चक्षु भी तैजस पदार्थ है इसलिये उसमें भी रश्मियां विद्यमान है तथा रश्मियुक्त अग्नि जिसप्रकार सन्निक्कष्ट हो पदार्थों का प्रकाशन करतो है उसीप्रकार चक्षु भी सन्निक्लष्ट ही पदार्थों का प्रकाशन करता है सो भी ठीक नहीं, क्योंकि जैनसिद्धान्तमें चक्षुकी तैजस नही माना तथा जिसमें तेज रहता है वह उष्ण होता है इसरीतिसे चक्षुका स्थान भी उष्ण मानना पड़ेगा और वह प्रत्यच्तबाधित है क्योंकि यह कोई नहीं कह सकता कि चक्षुका स्थान अग्निके समान उष्ण है। तथा तेजका भासुरशुक्लरूप माना है यदि चक्षुकी तैजस माना जायगा तो उसमें भासुरशुक्लरूप दोखना चाहिये।
कहोगे अदृष्टको कृपासे चच्तुमें अनुष्णपना और अभासुरपना है सो भी ठोक नही, क्योंकि अदृष्टको गुण माना है और वह निष्क्रिय है इसलिये उससे स्वरूपका नाश नहीं हो सकता—भासुरपना वा उष्ण-पना नहीं मिट सकता।
यदि कहोगे नक्तंचर मार्जार आदिके नेत्रोंमें रश्मि देखनेमें आती हैं इसलिये अवश्य चक्षु तैजसपदार्थ है। सो भी ठीक नहीं क्योंकि किसी किसोके पुगलमय चक्षु भासुररूप भो परिणत हो जाते हैं {{smaller|पङ्गलशब्द देखो।}} इसलिये नक्तंचर जीवोंके चक्षुओंमें रश्मि देखकर सब जीवोंके चक्षुओंमें रश्मिका निश्चय करनेसे कभी चक्षु तेजस पदार्थ सिद्ध नही हो सकता।
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. 17|2em}}</noinclude>
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|६६|इन्द्रियसन्निकर्ष—इन्द्रियावत्|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
तथा यह निश्चय है कि जो पदार्थ गतिमान होता है वह समीपवर्ती दूरवर्ती पदार्थको एक साथ नहीं देख सकता। चक्षुकी रश्मि भी गमनशील हैं इसलिये उनसे भी दूरवर्ती वा समीपवर्ती पदार्थका एकसाथ ज्ञान न होना चाहिये किन्तु देखनेमें आता है कि जिस समय वृत्तके नीचे खड़े होकर चन्द्रमाको देखते हैं उस समय वृक्षकी शाखा और चन्द्रमा एकसाथ दीख पड़ते हैं इसलिये मालूम पड़ता है कि चक्षुमें रश्मियां नहीं, रश्मियोंके अभावसे वह तैजस नही, और तैजस न होनेसे वह पदार्थों को सन्निकृष्ट होकर नही जनाता।
यदि चक्षुकी सन्निक्कष्ट होकर पदार्थको जानने-वाला ही माना जायगा तब 'जब कि रात्रिमें बहुत दूर जलती हुई अग्नि दीखती है और उसके पासके पदार्थ नहिं दीखते हैं उसी प्रकार जहांपर प्रकाश नही रहता वहांके पदार्थ भी दीखने चाहियें क्योंकि चच्तु-रश्मियोंको सन्तति तो बराबर अग्नितक विद्यमान रहती है इसलिये जान पड़ता है कि चक्षुमें रश्मि नहीं इसलिये उसका पदार्थों के साथ सन्निकर्ष भी नहीं होता।
यदि कहोगे जहांपर अग्नि है वहींके पदार्थ दीख सकते हैं क्योंकि वहांपर प्रकाश रहता है बीचके पदार्थोंपर प्रक्राश नहीं रहता इसलिये उन्हें चक्षु नहीं देख सकता। सो भी ठीक नहीं क्योंकि अग्नि तैजस पदार्थ है इसलिये उसको जिसप्रकार पदार्थों के प्रकाशनमें अन्य प्रकाशको अपेक्षा नहीं करनी पड़ती उसीप्रकार चक्षु भी तैजसपदार्थ है इसलिये उसके लिये भी अन्य प्रकाशको अपेक्षाको आवश्यकता नहीं इसलिये यह बात सिद्ध हुई कि चक्षु और पदार्थ का सन्निकर्ष नहीं होता अतः इन्द्रियसन्निकर्ष प्रत्यक्ष में कारण नहीं हो सकता। किन्तु पदार्थों के नियमित रूपसे और स्पष्टतासे जनानेवालो क्षयोपशम रूप शक्ति कारण है अर्थात् जिस पदार्थं का हम ज्ञान वा दर्शन करते हैं उस पदार्थ के ज्ञान वा दर्शनमें जो ज्ञानावरण वा दर्शनावरण रूप प्रतिबन्धक हैं वे जिस समय चक्षु और उपशमरूप अवस्थाको प्राप्त हो
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जाते हैं उससमय उस पदार्थ का स्पष्ट ज्ञान वा दर्शन होता है। तथा यहांपर यह भी समझ लेना चाहिये कि जिसप्रकार इन्द्रिय सन्निकर्ष प्रत्यक्षमें कारण नहीं उसोप्रकार पदार्थ और प्रकाश भी कारण नहीं क्योंकि अन्वय व्यतिरेक व्यभिचार आदि दोषोंसे उनमें भी कारणता सिद्ध नहीं हो सकती। {{smaller|(तत्त्वार्थवार्तिकालङ्कार)}}
{{outdent|इन्द्रियस्वाप (सं॰ पु॰) १ सुषुप्ति, नींद। सोते समय इन्द्रियवर्गके उपरम अर्थात् विरामका समय रहता है, अतः न कुछ दोख पड़ता है, और न अनुभव होता है। २ प्रलय। मरणकालमें इन्द्रियोका प्रलय होता है। ३ चेष्टानाश, घबराहपट।}}
{{outdent|इन्द्रियागोचर (सं॰ वि॰) अतीन्द्रिय, जो समझ न पड़ता हो।}}
{{outdent|इन्द्रियात्मन् (सं॰ पु॰) इन्द्रियमेवात्मा, कर्मधा॰। १ विष्णु। २ इन्द्रिय, अज़ी।}}
{{outdent|इन्द्रियादि (सं॰ पु॰) इन्द्रियका कारण-रूप अहङ्कार, घम गंड।}}
{{outdent|इन्द्रियाधिष्ठाट (सं॰ पु॰) अचेतन इन्द्रियोंको निज-निज कार्य में व्याप्त करनेके लिये ईश्वर द्वारा नियुक्त देवता। {{smaller|इन्द्रिय शब्द देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रियायतन (सं॰ क्ली॰) १ शरीर, जिस्म। चक्षुः, कर्णं प्रभृति इन्द्रियगणका आधार होनेसे शरीरको इन्द्रियायतन कहते हैं। २ आत्मा, रूह। नैयायिकों के मतसे स्थूल देह और वैदान्तिकोंके कथनानुसार सूक्ष्म शरीर इन्द्रियायतन है।}}
{{outdent|इन्द्रियाराम (सं॰ पु॰) इन्द्रियेषु आरमति, इन्द्रिय-आ-रम-घञ्। इन्द्रियोंको चरितार्थ करनेके लिये भोगासक्त व्यक्ति, रिन्द मस्त।}}
{{outdent|इन्द्रियार्थं (सं॰ पु॰) रूप रस स्पर्श प्रभृति इन्द्रियों-के विषय रुक्तकी चीज़। जैसे—मनोहर युवती, वंशीगीत, स्वादुविशिष्ट रस, ऋपूरादि गन्ध और अनुरागान्वित स्पर्श। इन्द्रियार्थमें लोलुपो हुये लोग प्रायश्चित्त करने योग्य हो जाते हैं,—}}
{{c|{{smaller|"इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसजीत कामतः।" (मनु ४।१६)}}}}
{{outdent|इन्द्रियावत्ः (सं॰ त्रि॰) इन्द्रिय-मतुप् मन्त्र सोमाश्चेन्दिय-}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२२२
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्पली-उत्यादिन्'''|'''२२१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उत्पली (सं॰ स्त्री॰) तुषचर्पटी, भूसीको चपाती या रोटी।}}
{{Outdent|उत्पलेखर (सं॰ पु॰) महानदीका तीरवर्ती एक प्राचीन तीर्थ। <small>महानदी देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्पवन (सं॰ क्ली॰) १ प्लावन, सैलाब, बूड़ा।
<small>“प्लावनमुत्पवनमाहुः।” (मनुभाष्ये मेधातिथि ५।११५)</small>}}
२ यज्ञीय पात्रादिके संस्कारभेद।
{{Right|<small>(आश्वलायनगृह्यनूत्र १।३।२।३)</small>
:३ कुशादि द्वारा जलका उत्क्षेपण।
{{Outdent|उत्पवितृ (सं॰ त्रि॰) १ पावन, पाक। २ पावन करनेवाला, जो पाक साफ बनाता हो।}}
{{Outdent|उत्पश्य (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वमुख, ऊपरकी ओर देखनेवाला।
{{Outdent|उत्पाट (सं॰ पु॰) उत्-पट-घ । १ उत्पात, उखाड़। २ कर्णरोग विशेष, कानकी एक बीमारी।}}
{{Outdent|उत्पाटक (सं॰ पु॰) कर्णपालीगत रोग, कानकी नोकमें होनेवाली एक बीमारी। गुरु आभरणके संयोग, ताड़न एवं अति घर्षणसे कण की पालीमें जो शोथ, दाह और पाकका रोग लगता है उसे उत्-पाटक कहते हैं। <small>(माधव निदान)</small> इसमें कान चटचटाया करता है। <small>(सुश्रुत)</small>}}
{{Outdent|उतपाटन (सं॰ क्ली॰) उत्-पट-णिच् भावे ल्युट्। १ उन्मूलन, उखाड़। २ वायुजन्य व्रणकी एक वेदना, वातसे पैदा होनेवाला दर्द।}}
{{Outdent|उत्पाटिका (सं॰ स्त्री॰) उत्-पट-णिच्-ण्वुल्-टाप् अत इत्। १ वृक्षको शुष्क छाल, पेड़का सूखा बकला। २ उत्पाटनकर्ती, उखाड़ डालनेवाली।}}
{{Outdent|उत्पाटित (सं॰ त्रि॰) उत्-पट णिच्-क्त। उन्मूलित, उखाड़ा हुआ।}}
{{Outdent|उत्पाटिन् (सं॰ त्रि॰) उन्मूलन करनेवाला, जो उखाड़ डालता हो।}}
{{Outdent|उत्पाट्य (सं॰ अव्य॰) उन्मूलन करके, उखाड़कर। (त्रि॰) २ उखाड़ डालनके योग्य।}}
{{Outdent|उत्पात (सं॰ पु॰) उत्-पत भावे घञ्। १ ऊर्ध्व-पतन, उड़ान, उछाल। २ सङ्कट, आफ़त। ३ अशुभ सूचक अकस्मात् दैवघटना, आस्मानी ग़जब। यह}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:दिव्य, आन्तरीक्ष्य और भौम भेदसे तीन प्रकारका होता है। सूर्यग्रासादि दिव्य, उल्कापातादि आन्तरीक्ष्य और भूमिकम्पादि भौम है।
{{Outdent|उत्पातक (सं॰ पु॰) उत्-पत-णिच्-ण्वुल्। १ ऊर्ध्व पतनशील जन्तु विशेष, उछल उछल कर चलनेवाला एक जानवर। इसके अष्ट पाद होते हैं। <small>“देशोत्पातकभल्लू कमक्षिकामशकावृतम्।” (भारत स्वर्गा॰ २ अ॰)</small> २ तीर्थ विशेष। <small>(भारत अनु॰)</small> (त्रि॰) उत्-पत-ण्वुल्। ३ ऊर्ध्व पतनशील, उड़ने या उछलने वाला।}}
{{Outdent|उत्यातकेतु (सं॰ पु॰) अमङ्गल चिन्ह, बुरा निशान्। उल्कापात, भूमिकम्प और उपद्रवके पातका निमित्तक उदित धूमकेतु प्रभृति उत्पात-केतु कहाते हैं।}}
{{Outdent|उत्पाती (सं॰ त्रि॰) उपद्रव उठानेवाला, जो आफ़त डालता हो।}}
{{Outdent|उत्पाद (सं॰ पु॰) उत्-पद भावे घञ्। उत्पत्ति, पैदायश, उपज।}}
{{Outdent|उत्पादक (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वस्थिता: पादा अस्य, उत्-पद-णिच्-ण्वुल्। १ पशु विशेष, एक जानवर। अष्टपादयुक्त गजाराति शरभका नाम उत्पादक है। फारसीमें इसे हुमा कहते हैं। (क्ली॰) २ कारण, सबब। (त्रि॰) ३ उतपत्तिकारक, पैदा करनेवाला।}}
{{Outdent|उत्पादन (सं॰ क्ली॰) उत्-पद-णिच्-ल्युट्। १ उत्पत्तिकारण, पैदा करनेका काम। (त्रि॰) २ उत्पादक, पैदा करनेवाला।}}
{{Outdent|उत्पादपूर्व (सं॰ क्ली॰) जैन-शास्त्रोक्त १४ पूर्वमें प्रथम पूर्व। <small>पूर्ववाद और जैनशास्त्र देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्पादशयन (सं॰ पु॰) टिट्टिभ पक्षी, टिटिहरी।}}
{{Outdent|उत्पादिका (सं॰ स्त्री॰) उत्-पद-णिच्-ण्वुल्-टाप् अत इत्। १ देहिका नामक कीट, दीमक। २ हिलमोचिका, हरहुच। ३ पूतिका, पोय। }}
{{Outdent|उत्पादित (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न किया हुआ, जो पैदा किया गया हो।}}
{{Outdent|उत्पादिन् (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न करनेवाला, जो पैदा करता हो। समासान्तमें इस शब्दका अर्थ ‘उत्पन्न किया हुआ’ लगता है।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 56|1em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२२३
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२२२'''|'''उत्पाद्य-उत्प्लव'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उतपाद्य (सं॰ त्रि॰) १ जननीय, पैदा किये जाने के काबिल। (अव्य॰) २ उत्पन्न या पैदा करके। ३ उत्तेजना देकर, भड़काके।}}
{{Outdent|उत्पाद्यमान (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न किया जानेवाला, जो निकाला जा रहा हो।}}
{{Outdent|उत्पार (सं॰ पु॰) शुद्ध घृत, साफ घी।}}
{{Outdent|उतपारण (वै॰ क्ली॰) उत्तरण, कूदकर पार होनेका काम। <small>(अर्ध्व ५।३३।२९)</small>}}
{{Outdent|उत्पाली (सं॰ स्त्री॰) उत्पल-घञ्-ङीप्। आरोग्य, तनदुरुस्ती।}}
{{Outdent|उत्पाव (सं॰ पु॰) शुद्धिकारक घृत, साफ़ करने वाला घी।}}
{{Outdent|उत्पिञ्जर (सं॰ त्रि॰) पिञ्जरसे छूटा हुआ, जो पिंजड़ेमें बन्द न हो।}}
{{Outdent|उत्पिञ्जल (सं॰ त्रि॰) १ अतिशय व्याकुल, निहायत बेचैन। २ पिङ्गलवर्ण, ज़र्द, पीला।}}
{{Outdent|उत्पित्सु (सं॰ त्रि॰) उत्पतन, उड्डयन वा उद्ग-मनका अभिलाषी, जो उठना, उड़ना या आगे बढ़ना चाहता हो।}}
{{Outdent|उत्पिष्ट (सं॰ त्रि॰) उत्-पिष-क्त। १ उन्मथित, रगड़ा या पीसा हुआ। (क्ली॰)२ सुश्रुतोक्त सन्धि मुक्तरूप अस्थिभङ्ग विशेष, जोड़की हड्डियोंके चरमरा जानेका एक आजा़र। सन्धिके उपिष्ट होनेसे उभय पार्श्व पर शोफ और दुःख उठता है। विशेषतः रात्रिको नानाप्रकार वेदना उपजती है। <small>(सुश्रुत निदान १५ अ॰)</small>}}
{{Outdent|उत्पिष्टसन्धि, <small>२ उत्पिष्ट देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्पीड़ (सं॰ पु॰) १ सुरामण्ड, शराबका जोश। २ फेन, फेना। ३ वाधा, तकलीफ़। ४ सङ्घर्षण, रगड़। ५ उन्मथन, मथाई।}}
{{c|<small>“आकाङ्घन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम्।” (मेघदूत)</small>}}
{{Outdent|उत्पीड़न (सं॰ क्ली॰) उत्-पीड़-ल्युट्। १ उत्तेजन, भड़काव। २ ठंसाठंसी। ३ प्रवर्तन, तरगी़ब। ४ आधिक्य, ज्यादती, बढ़ती।५ उपद्रव, तकलीफ़-दिहो।}}
{{Outdent|उत्पुटक (सं॰ पु॰) उत्-पुट-कन्। कर्णपालीगत रोग विशेष, कानकी लोलकमें होनेवाली एक बीमारी।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:यह रोग उपजनेसे अपलतास, शजने और कटक-लेजेकी छाल, गोहरेकी वसा, वन्य शूकर, गो एवं हरिणका पित्त तथा घृत सकल द्रव्य का प्रलेप अथवा तैल पका लगाना चाहिये। <small>(सुश्र्युत सूत्र॰ १६ अ॰)</small>
{{Outdent|उत्पुलक (सं॰ त्रि॰) आनन्दित, खुश।}}
{{Outdent|उत्प्रभ (सं॰ त्रि॰) १ प्रभावित, चमकीला। (पु॰) ३ अग्नि आग।}}
{{Outdent|उत्प्रसव (सं॰ पु॰) गर्भस्राव, इसकात-हमल।}}
{{Outdent|उत्प्राण (सं॰ पु॰) श्वास, सांस।}}
{{Outdent|उत्प्रास (सं॰ पु॰) उत्-प्र-अस दीप्तादौ घञ्। १ उपहास, हंसी। २ शधिक्य, ज्यादती। ३ दूर उतक्षेपण, फेंक फांक। ४ उत्कट हास्य, कहक़हा, खिलखिलाहट।}}
{{Outdent|उत्प्रासन (सं॰ क्ली॰) <small>उत्प्रास देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्प्रेक्षण (सं॰ क्ली॰) उत्-प्र-ईश भावे ल्युट्। १ उद्भावन, ख़याल। २ सम्भावता, होनहार। ३ ऊर्ध्व-दृष्टि, गहरी नज़र।}}
{{Outdent|उत्प्रेक्षा (सं॰ स्त्री॰) उत्-प्र-ईक्ष-अ-टाप्। १ अन-वधान, उपेक्षा, बेपरवाई। २ वितर्क उलटा ख़याल। ३ काव्यालङ्कार विशेष। प्रकृत वस्तुमें अन्यप्रकार सम्भावना उत्प्रेक्षा कहाती है।}}
{{c|<small>“सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्।” (काव्यप्रकाश)</small>}}
:यह अलङ्कार प्रधानत: दो प्रकारका होता है―― वाच्य और प्रतीयमान। जिसमें ‘जैसे’ ‘सदृश’ और ‘तरह’ प्रभृति शब्द रहते हैं,वह वाच्य और जिसमें उक्त शब्द न पड़ भावसे अर्थ लगता है, वह प्रतीयमान है। जाति, गुण, क्रिया और द्रव्य के विचारसे उक्त दोनो प्रकारके चार चार भेद होते हैं। फिर भाव एवं अभावके अभिमान और गुण तथा क्रियाके स्वरूपसे उतपेक्षा बत्तीस प्रकारकी होती है।}}
{{Outdent|उत्प्रेक्षित (सं॰ त्रि॰) सदृशीकृत, मिलाया हुआ।}}
{{Outdent|उत्प्रेक्षोपमा (सं॰ स्त्री॰) काव्यालङ्कार विशेष।<small>उत्प्रेक्षा देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्प्रेक्ष्य (सं॰ त्रि॰) सदृश बनाया जानेवाला, जो, किसी चीजके बराबर ठहराया जाता हो।}}
{{Outdent|उतप्लव (सं॰ पु॰) वल्गन, उछाल, कूदफांद।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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{{Outdent|उतपाद्य (सं॰ त्रि॰) १ जननीय, पैदा किये जाने के काबिल। (अव्य॰) २ उत्पन्न या पैदा करके। ३ उत्तेजना देकर, भड़काके।}}
{{Outdent|उत्पाद्यमान (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न किया जानेवाला, जो निकाला जा रहा हो।}}
{{Outdent|उत्पार (सं॰ पु॰) शुद्ध घृत, साफ घी।}}
{{Outdent|उतपारण (वै॰ क्ली॰) उत्तरण, कूदकर पार होनेका काम। <small>(अर्ध्व ५।३३।२९)</small>}}
{{Outdent|उत्पाली (सं॰ स्त्री॰) उत्पल-घञ्-ङीप्। आरोग्य, तनदुरुस्ती।}}
{{Outdent|उत्पाव (सं॰ पु॰) शुद्धिकारक घृत, साफ़ करने वाला घी।}}
{{Outdent|उत्पिञ्जर (सं॰ त्रि॰) पिञ्जरसे छूटा हुआ, जो पिंजड़ेमें बन्द न हो।}}
{{Outdent|उत्पिञ्जल (सं॰ त्रि॰) १ अतिशय व्याकुल, निहायत बेचैन। २ पिङ्गलवर्ण, ज़र्द, पीला।}}
{{Outdent|उत्पित्सु (सं॰ त्रि॰) उत्पतन, उड्डयन वा उद्ग-मनका अभिलाषी, जो उठना, उड़ना या आगे बढ़ना चाहता हो।}}
{{Outdent|उत्पिष्ट (सं॰ त्रि॰) उत्-पिष-क्त। १ उन्मथित, रगड़ा या पीसा हुआ। (क्ली॰)२ सुश्रुतोक्त सन्धि मुक्तरूप अस्थिभङ्ग विशेष, जोड़की हड्डियोंके चरमरा जानेका एक आजा़र। सन्धिके उपिष्ट होनेसे उभय पार्श्व पर शोफ और दुःख उठता है। विशेषतः रात्रिको नानाप्रकार वेदना उपजती है। <small>(सुश्रुत निदान १५ अ॰)</small>}}
{{Outdent|उत्पिष्टसन्धि, <small>२ उत्पिष्ट देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्पीड़ (सं॰ पु॰) १ सुरामण्ड, शराबका जोश। २ फेन, फेना। ३ वाधा, तकलीफ़। ४ सङ्घर्षण, रगड़। ५ उन्मथन, मथाई।}}
{{c|<small>“आकाङ्घन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम्।” (मेघदूत)</small>}}
{{Outdent|उत्पीड़न (सं॰ क्ली॰) उत्-पीड़-ल्युट्। १ उत्तेजन, भड़काव। २ ठंसाठंसी। ३ प्रवर्तन, तरगी़ब। ४ आधिक्य, ज्यादती, बढ़ती।५ उपद्रव, तकलीफ़-दिहो।}}
{{Outdent|उत्पुटक (सं॰ पु॰) उत्-पुट-कन्। कर्णपालीगत रोग विशेष, कानकी लोलकमें होनेवाली एक बीमारी।}}
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:यह रोग उपजनेसे अपलतास, शजने और कटक-लेजेकी छाल, गोहरेकी वसा, वन्य शूकर, गो एवं हरिणका पित्त तथा घृत सकल द्रव्य का प्रलेप अथवा तैल पका लगाना चाहिये। <small>(सुश्र्युत सूत्र॰ १६ अ॰)</small>
{{Outdent|उत्पुलक (सं॰ त्रि॰) आनन्दित, खुश।}}
{{Outdent|उत्प्रभ (सं॰ त्रि॰) १ प्रभावित, चमकीला। (पु॰) ३ अग्नि आग।}}
{{Outdent|उत्प्रसव (सं॰ पु॰) गर्भस्राव, इसकात-हमल।}}
{{Outdent|उत्प्राण (सं॰ पु॰) श्वास, सांस।}}
{{Outdent|उत्प्रास (सं॰ पु॰) उत्-प्र-अस दीप्तादौ घञ्। १ उपहास, हंसी। २ शधिक्य, ज्यादती। ३ दूर उतक्षेपण, फेंक फांक। ४ उत्कट हास्य, कहक़हा, खिलखिलाहट।}}
{{Outdent|उत्प्रासन (सं॰ क्ली॰) <small>उत्प्रास देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्प्रेक्षण (सं॰ क्ली॰) उत्-प्र-ईश भावे ल्युट्। १ उद्भावन, ख़याल। २ सम्भावता, होनहार। ३ ऊर्ध्व-दृष्टि, गहरी नज़र।}}
{{Outdent|उत्प्रेक्षा (सं॰ स्त्री॰) उत्-प्र-ईक्ष-अ-टाप्। १ अन-वधान, उपेक्षा, बेपरवाई। २ वितर्क उलटा ख़याल। ३ काव्यालङ्कार विशेष। प्रकृत वस्तुमें अन्यप्रकार सम्भावना उत्प्रेक्षा कहाती है।}}
{{c|<small>“सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्।” (काव्यप्रकाश)</small>}}
:{{gap}}यह अलङ्कार प्रधानत: दो प्रकारका होता है―― वाच्य और प्रतीयमान। जिसमें ‘जैसे’ ‘सदृश’ और ‘तरह’ प्रभृति शब्द रहते हैं,वह वाच्य और जिसमें उक्त शब्द न पड़ भावसे अर्थ लगता है, वह प्रतीयमान है। जाति, गुण, क्रिया और द्रव्य के विचारसे उक्त दोनो प्रकारके चार चार भेद होते हैं। फिर भाव एवं अभावके अभिमान और गुण तथा क्रियाके स्वरूपसे उतपेक्षा बत्तीस प्रकारकी होती है।
{{Outdent|उत्प्रेक्षित (सं॰ त्रि॰) सदृशीकृत, मिलाया हुआ।}}
{{Outdent|उत्प्रेक्षोपमा (सं॰ स्त्री॰) काव्यालङ्कार विशेष।<small>उत्प्रेक्षा देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्प्रेक्ष्य (सं॰ त्रि॰) सदृश बनाया जानेवाला, जो, किसी चीजके बराबर ठहराया जाता हो।}}
{{Outdent|उतप्लव (सं॰ पु॰) वल्गन, उछाल, कूदफांद।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्प्लवन-उत्सर्जन'''|'''२२३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उत्प्लवन (सं॰ क्ली॰) उत्-प्लु-ल्युट्। १ उल्लम्फन, उछलकूद। २ अभिमन्त्रित कुशादियुक्त वारि द्वारा द्रव्य की शुद्धि।}}
{{Outdent|उत्प्लवा (सं॰ स्त्री॰) उत्-प्ल्लु-अच्-टाप्। नौका, नाव।}}
{{Outdent|उत्प्लुत (सं॰ त्रि॰) वल्गित, उछला हुआ, जो एकाएक फांद पड़ा हो।}}
{{Outdent|उत्प्लुत्य (सं॰ अव्य॰) वल्गन करके, ऊपर उछलकर।}}
{{Outdent|उत्फल (सं॰ क्ली॰) उत्तम फल, उम्दा मेवा।}}
{{Outdent|उत्फाल (सं॰ पु॰) उत्-फल-घञ। लम्फ, उछाल।}}
{{Outdent|उत्फुल्ल (सं॰ त्रि॰) उत्-फल-क्त, उत्, फुल्लसंफुल्लयो-
रुपसंख्यानमिति निष्ठा, तस्य लः। १ प्रफुल्ल, खिला, फला। २ स्फीत, सूजा या बढ़ा। ३ उत्तानशय, चित लेटनेवाला। (क्ली॰) ४ स्त्रीन्द्रिय।}}
{{Outdent|उत्रौला-</small>उतरौला देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्स (वै॰ पु॰) उनत्ति जलेन, उन्द-स-कित्। <small>उन्दिगुधिषिभ्यय। उण् ३।३८।</small> १ प्रस्रवण, चश्मा, झरना २ खात, कुवां। <small>(निघण्ट ३।२३)</small> ३ उत्सरण, सरकाव।}}
{{Right|<small>(निरुक्त १०।९)</small>}}
{{Outdent|उत्सक्थ (वै॰ त्रि॰) ऊर्धसक्थियुक्त।}}
{{C|<small>‘उत् ऊर्ध्वं सक्थिनी ऊरु वस्था सा उत्सक्थी’</small>}}
{{Right|<small>(वक्रयजुर्भाचे महीधर २३।२१)</small>}}
{{Outdent|उत्सङ्ग (सं॰ पु॰) उत्-सञ्ज-घञ्। १ क्रोड़, गोद। २ पर्वतका शिखरदेश, पहाड़की चोटी। <small>(रघु ६।३)</small> ३ अट्टालिकाका उपरि भाग, छत। <small>(मेघदूत २९)</small> ४ अभ्यन्तर भाग, बग़ल। <small>(कुमार १।१०)</small> ५ ऊर्ध्वतल, ऊपरी मञ्जिल। ६ वहिर्भाग, बाहरी हिस्सा। <small>(रघु ८।७५)</small> ७ सङ्गम, मिलाप। ८ आलिङ्गन, हमागोशी। ९ एकशत संख्या=विवाह। <small>(व्युत्पत्ति १८५)</small> १० व्रणका भीतरी भाग, जख्मका अन्दरूनी हिस्सा।<small>(सुश्रुत, सूत्र॰) ११ गर्भ, हमल। <small>(भारत अश्व ८६।१८)</small>}}
{{Outdent|उत्सङ्गपिड़का (सं॰ स्त्री॰) नेत्रवर्त्मगत रोगविशेष, आंखके नीचे पपोटेकी फुन्सी। यह स्थूल और कण्डुमत् होती है। मुखवर्त्म के अभ्यन्तर पड़ता है। वर्ण ताम्र-जैसा होता है। <small>(माधव निदान)</small>}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उत्सङ्गित (सं॰ त्रि॰) उत्सङ्गयुक्त, मिलनेवाला।}}
{{Outdent|उत्सङ्गिनी, <small>उत्सङ्गपिड़का देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्सङ्गी (सं॰ पु॰) नाड़ीव्रणविशेष, फोड़ा, गहरा ज़ख़्म।}}
{{Outdent|उत्सञ्जन (सं॰ क्ली॰) उत्-सन्ज-णिच्-ल्युट्। ऊर्ध्व संयोजन, उत्क्षेपण, ऊपरको रहनुमाई।}}
{{Outdent|उत्सत्ति (सं॰ स्त्री॰) उत्-सदु-क्तिन्। उच्छेद, उखाड़, नोचखसोट।}}
{{Outdent|उत्सधि (वै॰ पु॰) उत्सो धीयते अत्र, उत्स-धा, कि। जलप्रवाहशील कूप, जिस कुवेंसे पानी बहा करे। <small>(ऋक् १।८८।४)</small>}}
{{Outdent|उत्सन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-सद-क्त। १ उच्छिन्न, उखड़ा हुआ। २ नष्ट, बरबाद। ३ अनायाससाध्य, आसानीसे बन जानवाला। ४ अव्यवहृत, नाकाम। ५ वर्धित, बढ़ा हुआ।}}
{{Outdent|उत्सन्नधर्म, <small>उत्सन्नयज्ञ देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्सन्नयज्ञ (सं॰ पु॰) अवलम्बित यन्न, जो यज्ञ रुक गया हो।}}
{{Outdent|उत्सर (सं॰ पु॰) छन्दोविशेष। इसमें पन्द्रह पन्द्रह अक्षरके चार पाद होते हैं। उत्सर अतिशक्वरीका एक भेद है।}}
{{Outdent|उत्सर्ग (सं॰ पु॰) उत् सृज-घञ्। १ त्याग, तर्क। २ दान, बख़शिश। ३ सामान्यविधि, मामूली का़यदा। ४ न्याय, का़नून्। ५ साग्निक कर्तव्य क्रियाविशेष। स्नान सन्ध्या एवं आचमनादिके बाद प्रथम नारायण, नवग्रह तथा गुरुको पूजा प्रदान करनी पड़ती है। द्रव्यको वाम हस्तमें रखना चाहिये। दक्षिण हस्तसे तीन बार पूज कर तत्तद्रव्याधिपति देवताको सम्प्रदान करे, फिर कर कुश, तिल एवं जलत्यागपूर्वक दान दे। इसी क्रियाको वैधोत्सर्ग कहते हैं। ६ मल-मूत्रादिके त्यागकी क्रिया। </small>(मनु १२।१२१)</small>}}
{{Outdent|उत्सर्गतः (सं॰ अव्य॰) साधारणतः, मामूली तौरपर।}}
{{Outdent|उत्सर्गिन् (सं॰ त्रि॰) त्यागो, तर्क कर देनेवाला।}}
{{Outdent|उत्सर्जन (सं॰ क्ली॰) उत्-सृज-ल्युट्। १ दान, बख़्शिश। ३ वेदोत्सर्गरूप छ: मास कर्तव्य वैदिक की}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्प्लवन-उत्सर्जन'''|'''२२३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उत्प्लवन (सं॰ क्ली॰) उत्-प्लु-ल्युट्। १ उल्लम्फन, उछलकूद। २ अभिमन्त्रित कुशादियुक्त वारि द्वारा द्रव्य की शुद्धि।}}
{{Outdent|उत्प्लवा (सं॰ स्त्री॰) उत्-प्ल्लु-अच्-टाप्। नौका, नाव।}}
{{Outdent|उत्प्लुत (सं॰ त्रि॰) वल्गित, उछला हुआ, जो एकाएक फांद पड़ा हो।}}
{{Outdent|उत्प्लुत्य (सं॰ अव्य॰) वल्गन करके, ऊपर उछलकर।}}
{{Outdent|उत्फल (सं॰ क्ली॰) उत्तम फल, उम्दा मेवा।}}
{{Outdent|उत्फाल (सं॰ पु॰) उत्-फल-घञ। लम्फ, उछाल।}}
{{Outdent|उत्फुल्ल (सं॰ त्रि॰) उत्-फल-क्त, उत्, फुल्लसंफुल्लयो-
रुपसंख्यानमिति निष्ठा, तस्य लः। १ प्रफुल्ल, खिला, फला। २ स्फीत, सूजा या बढ़ा। ३ उत्तानशय, चित लेटनेवाला। (क्ली॰) ४ स्त्रीन्द्रिय।}}
{{Outdent|उत्रौला-</small>उतरौला देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्स (वै॰ पु॰) उनत्ति जलेन, उन्द-स-कित्। <small>उन्दिगुधिषिभ्यय। उण् ३।३८।</small> १ प्रस्रवण, चश्मा, झरना २ खात, कुवां। <small>(निघण्ट ३।२३)</small> ३ उत्सरण, सरकाव।}}
{{Right|<small>(निरुक्त १०।९)</small>}}
{{Outdent|उत्सक्थ (वै॰ त्रि॰) ऊर्धसक्थियुक्त।}}
{{C|<small>‘उत् ऊर्ध्वं सक्थिनी ऊरु वस्था सा उत्सक्थी’</small>}}
{{Right|<small>(वक्रयजुर्भाचे महीधर २३।२१)</small>}}
{{Outdent|उत्सङ्ग (सं॰ पु॰) उत्-सञ्ज-घञ्। १ क्रोड़, गोद। २ पर्वतका शिखरदेश, पहाड़की चोटी। <small>}(रघु ६।३)</small>} ३ अट्टालिकाका उपरि भाग, छत। <small>}(मेघदूत २९)</small>} ४ अभ्यन्तर भाग, बग़ल। <small>}(कुमार १।१०)</small>} ५ ऊर्ध्वतल, ऊपरी मञ्जिल। ६ वहिर्भाग, बाहरी हिस्सा। <small>}(रघु ८।७५)</small>} ७ सङ्गम, मिलाप। ८ आलिङ्गन, हमागोशी। ९ एकशत संख्या विवाह। <small>}(व्युत्पत्ति १८५)</small>} १० व्रणका भीतरी भाग, जख्मका अन्दरूनी हिस्सा।<small>}(सुश्रुत, सूत्र॰)</small>} ११ गर्भ, हमल। <small>}(भारत अश्व ८६।१८)</small>}}}
{{Outdent|उत्सङ्गपिड़का (सं॰ स्त्री॰) नेत्रवर्त्मगत रोगविशेष, आंखके नीचे पपोटेकी फुन्सी। यह स्थूल और कण्डुमत् होती है। मुखवर्त्म के अभ्यन्तर पड़ता है। वर्ण ताम्र-जैसा होता है। <small>(माधव निदान)</small>}}
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{{Outdent|उत्सङ्गित (सं॰ त्रि॰) उत्सङ्गयुक्त, मिलनेवाला।}}
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{{Outdent|उत्सङ्गी (सं॰ पु॰) नाड़ीव्रणविशेष, फोड़ा, गहरा ज़ख़्म।}}
{{Outdent|उत्सञ्जन (सं॰ क्ली॰) उत्-सन्ज-णिच्-ल्युट्। ऊर्ध्व संयोजन, उत्क्षेपण, ऊपरको रहनुमाई।}}
{{Outdent|उत्सत्ति (सं॰ स्त्री॰) उत्-सदु-क्तिन्। उच्छेद, उखाड़, नोचखसोट।}}
{{Outdent|उत्सधि (वै॰ पु॰) उत्सो धीयते अत्र, उत्स-धा, कि। जलप्रवाहशील कूप, जिस कुवेंसे पानी बहा करे। <small>(ऋक् १।८८।४)</small>}}
{{Outdent|उत्सन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-सद-क्त। १ उच्छिन्न, उखड़ा हुआ। २ नष्ट, बरबाद। ३ अनायाससाध्य, आसानीसे बन जानवाला। ४ अव्यवहृत, नाकाम। ५ वर्धित, बढ़ा हुआ।}}
{{Outdent|उत्सन्नधर्म, <small>उत्सन्नयज्ञ देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्सन्नयज्ञ (सं॰ पु॰) अवलम्बित यन्न, जो यज्ञ रुक गया हो।}}
{{Outdent|उत्सर (सं॰ पु॰) छन्दोविशेष। इसमें पन्द्रह पन्द्रह अक्षरके चार पाद होते हैं। उत्सर अतिशक्वरीका एक भेद है।}}
{{Outdent|उत्सर्ग (सं॰ पु॰) उत् सृज-घञ्। १ त्याग, तर्क। २ दान, बख़शिश। ३ सामान्यविधि, मामूली का़यदा। ४ न्याय, का़नून्। ५ साग्निक कर्तव्य क्रियाविशेष। स्नान सन्ध्या एवं आचमनादिके बाद प्रथम नारायण, नवग्रह तथा गुरुको पूजा प्रदान करनी पड़ती है। द्रव्यको वाम हस्तमें रखना चाहिये। दक्षिण हस्तसे तीन बार पूज कर तत्तद्रव्याधिपति देवताको सम्प्रदान करे, फिर कर कुश, तिल एवं जलत्यागपूर्वक दान दे। इसी क्रियाको वैधोत्सर्ग कहते हैं। ६ मल-मूत्रादिके त्यागकी क्रिया। </small>(मनु १२।१२१)</small>}}
{{Outdent|उत्सर्गतः (सं॰ अव्य॰) साधारणतः, मामूली तौरपर।}}
{{Outdent|उत्सर्गिन् (सं॰ त्रि॰) त्यागो, तर्क कर देनेवाला।}}
{{Outdent|उत्सर्जन (सं॰ क्ली॰) उत्-सृज-ल्युट्। १ दान, बख़्शिश। ३ वेदोत्सर्गरूप छ: मास कर्तव्य वैदिक की}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्प्लवन-उत्सर्जन'''|'''२२३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उत्प्लवन (सं॰ क्ली॰) उत्-प्लु-ल्युट्। १ उल्लम्फन, उछलकूद। २ अभिमन्त्रित कुशादियुक्त वारि द्वारा द्रव्य की शुद्धि।}}
{{Outdent|उत्प्लवा (सं॰ स्त्री॰) उत्-प्ल्लु-अच्-टाप्। नौका, नाव।}}
{{Outdent|उत्प्लुत (सं॰ त्रि॰) वल्गित, उछला हुआ, जो एकाएक फांद पड़ा हो।}}
{{Outdent|उत्प्लुत्य (सं॰ अव्य॰) वल्गन करके, ऊपर उछलकर।}}
{{Outdent|उत्फल (सं॰ क्ली॰) उत्तम फल, उम्दा मेवा।}}
{{Outdent|उत्फाल (सं॰ पु॰) उत्-फल-घञ। लम्फ, उछाल।}}
{{Outdent|उत्फुल्ल (सं॰ त्रि॰) उत्-फल-क्त, उत्, फुल्लसंफुल्लयो-
रुपसंख्यानमिति निष्ठा, तस्य लः। १ प्रफुल्ल, खिला, फला। २ स्फीत, सूजा या बढ़ा। ३ उत्तानशय, चित लेटनेवाला। (क्ली॰) ४ स्त्रीन्द्रिय।}}
{{Outdent|उत्रौला-</small>उतरौला देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्स (वै॰ पु॰) उनत्ति जलेन, उन्द-स-कित्। <small>उन्दिगुधिषिभ्यय। उण् ३।३८।</small> १ प्रस्रवण, चश्मा, झरना २ खात, कुवां। <small>(निघण्ट ३।२३)</small> ३ उत्सरण, सरकाव।}}
{{Right|<small>(निरुक्त १०।९)</small>}}
{{Outdent|उत्सक्थ (वै॰ त्रि॰) ऊर्धसक्थियुक्त।}}
{{C|<small>‘उत् ऊर्ध्वं सक्थिनी ऊरु वस्था सा उत्सक्थी’</small>}}
{{Right|<small>(वक्रयजुर्भाचे महीधर २३।२१)</small>}}
{{Outdent|उत्सङ्ग (सं॰ पु॰) उत्-सञ्ज-घञ्। १ क्रोड़, गोद। २ पर्वतका शिखरदेश, पहाड़की चोटी। <small>}(रघु ६।३)</small>} ३ अट्टालिकाका उपरि भाग, छत। <small>}(मेघदूत २९)</small>} ४ अभ्यन्तर भाग, बग़ल। <small>}(कुमार १।१०)</small>} ५ ऊर्ध्वतल, ऊपरी मञ्जिल। ६ वहिर्भाग, बाहरी हिस्सा। <small>}(रघु ८।७५)</small>} ७ सङ्गम, मिलाप। ८ आलिङ्गन, हमागोशी। ९ एकशत संख्या विवाह। <small>}(व्युत्पत्ति १८५)</small>} १० व्रणका भीतरी भाग, जख्मका अन्दरूनी हिस्सा।<small>}(सुश्रुत, सूत्र॰)</small>} ११ गर्भ, हमल। <small>}(भारत अश्व ८६।१८)</small>}}
{{Outdent|उत्सङ्गपिड़का (सं॰ स्त्री॰) नेत्रवर्त्मगत रोगविशेष, आंखके नीचे पपोटेकी फुन्सी। यह स्थूल और कण्डुमत् होती है। मुखवर्त्म के अभ्यन्तर पड़ता है। वर्ण ताम्र-जैसा होता है। <small>(माधव निदान)</small>}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उत्सङ्गित (सं॰ त्रि॰) उत्सङ्गयुक्त, मिलनेवाला।}}
{{Outdent|उत्सङ्गिनी, <small>उत्सङ्गपिड़का देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्सङ्गी (सं॰ पु॰) नाड़ीव्रणविशेष, फोड़ा, गहरा ज़ख़्म।}}
{{Outdent|उत्सञ्जन (सं॰ क्ली॰) उत्-सन्ज-णिच्-ल्युट्। ऊर्ध्व संयोजन, उत्क्षेपण, ऊपरको रहनुमाई।}}
{{Outdent|उत्सत्ति (सं॰ स्त्री॰) उत्-सदु-क्तिन्। उच्छेद, उखाड़, नोचखसोट।}}
{{Outdent|उत्सधि (वै॰ पु॰) उत्सो धीयते अत्र, उत्स-धा, कि। जलप्रवाहशील कूप, जिस कुवेंसे पानी बहा करे। <small>(ऋक् १।८८।४)</small>}}
{{Outdent|उत्सन्न (सं॰ त्रि॰) उत्-सद-क्त। १ उच्छिन्न, उखड़ा हुआ। २ नष्ट, बरबाद। ३ अनायाससाध्य, आसानीसे बन जानवाला। ४ अव्यवहृत, नाकाम। ५ वर्धित, बढ़ा हुआ।}}
{{Outdent|उत्सन्नधर्म, <small>उत्सन्नयज्ञ देखो।</small>}}
{{Outdent|उत्सन्नयज्ञ (सं॰ पु॰) अवलम्बित यन्न, जो यज्ञ रुक गया हो।}}
{{Outdent|उत्सर (सं॰ पु॰) छन्दोविशेष। इसमें पन्द्रह पन्द्रह अक्षरके चार पाद होते हैं। उत्सर अतिशक्वरीका एक भेद है।}}
{{Outdent|उत्सर्ग (सं॰ पु॰) उत् सृज-घञ्। १ त्याग, तर्क। २ दान, बख़शिश। ३ सामान्यविधि, मामूली का़यदा। ४ न्याय, का़नून्। ५ साग्निक कर्तव्य क्रियाविशेष। स्नान सन्ध्या एवं आचमनादिके बाद प्रथम नारायण, नवग्रह तथा गुरुको पूजा प्रदान करनी पड़ती है। द्रव्यको वाम हस्तमें रखना चाहिये। दक्षिण हस्तसे तीन बार पूज कर तत्तद्रव्याधिपति देवताको सम्प्रदान करे, फिर कर कुश, तिल एवं जलत्यागपूर्वक दान दे। इसी क्रियाको वैधोत्सर्ग कहते हैं। ६ मल-मूत्रादिके त्यागकी क्रिया। </small>(मनु १२।१२१)</small>}}
{{Outdent|उत्सर्गतः (सं॰ अव्य॰) साधारणतः, मामूली तौरपर।}}
{{Outdent|उत्सर्गिन् (सं॰ त्रि॰) त्यागो, तर्क कर देनेवाला।}}
{{Outdent|उत्सर्जन (सं॰ क्ली॰) उत्-सृज-ल्युट्। १ दान, बख़्शिश। ३ वेदोत्सर्गरूप छ: मास कर्तव्य वैदिक की}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२२५
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२२४'''|'''उत्सर्जनी-उत्सादक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
एक क्रिया। पूर्व काल पर बैदशिक्षार्थी यह क्रिया करते थे――
{{x-smaller|{{c|<poem>“श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाप्यु पाकृत्य यथाविधि।
युक्तन्छन्दांस्वधीयीत मासान् विनशप्रार्ध पञ्चमान्॥
पुनय तु छन्दसां कुर्याद्वहिरुत्सर्जन द्विजः
माघशुक्लस्य वा प्राप्त पूर्वाहे प्रथमेऽहनि॥
यथाशास्त्वन्तु कृत्वै बमुत्सर्गं छन्दसां बहिः।
विर मम् पक्षिणों रात्रि तदेवैमहर्निशम्॥
अत ऊर्ध्वन्तु छन्दांसि शुक्ले षु नियत: पठेत्।
वेदाङ्गानि च सर्वाणि कृष्णपच्चे षु संपठेत्॥” (मनु १९५-९८)</poem>}}}}
:{{gap}}श्रावण अथवा भाद्र मासकी पूर्णिमासे लगा गृह्य के अनुसार उपाकर्म समापनानन्तर सार्ध चार मास वेद पढ़ना चाहिये। फिर पौष मासके पुष्य नक्षत्रको ग्रामसे वहिर्भागमें पहुंच उत्सर्गक्रिया (विसर्जन होमादि) लगाये। अथवा माघ मासवाले शुक्लपक्षके प्रथम दिनको पूर्वाह्ल में यह उत्सर्ग कर्म करे। जो व्यक्ति माघ मास की पूर्णिमाको उपाकर्म करता है, वही माघकी शुक्ल प्रतिपद् को उत्सर्ग लगाता है। ग्रामके वहिर्भागमें इसी प्रकार यथाशास्त्र देवका उत्सर्ग कर एक पक्ष अहोरात्र वैदाध्ययनमें विरत
रहना चाहिये। इस उत् सर्ग-क्रियाके पीछे प्रति शुक्लपक्ष में संयतभावसे वेद पढ़ते हैं। फिर कृष्णपक्षमें समुदाय वेदाङ्गका पाठ करना चाहिये।
{{Outdent|उत् सर्जनी ( सं॰ स्त्री॰) गुदका द्वितीय वलि, मिक़दके चमड़े की दूसरी तह।}}
{{Outdent|उत् सर्प (सं॰ पु॰) १गमन वा निस्यन्दन, सर-काव। २ स्फ़ीति, सूजन, चढ़ाव।}}
{{Outdent|उत् सर्पण (सं॰ क्ली॰) उत्-रूप भावे ल्युट्। १ उल्ल- ङ्घन, लंघाई। २ ऊर्ध्वगमन, चढ़ाव। ३ त्याग, तर्क।}}
{{Outdent|उत सर्पिणी (सं॰ स्त्री॰) १ जैनोंके कालका विभाग। जैनशास्त्र में व्यवहारकालके अनेक अपेक्षाओंसे अनेक भेद कहे गये हैं। उनमें एक अपेक्षासे दो भेद होते हैं―― उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी। जिस कालमें भरत और ऐरावत क्षेत्रके जीवोंकी आयु शरीर संपत्ति सुख आदिकी वृद्धि होती चली जाय उसे उत्सपिणी काल कहते हैं और जिसमें उत्तरोत्तर हानिही होती जाय वह अवसर्पिणी हैं। <small>“भरतैरावतयोई द्विहासौ षट्समयाभ्या-</small>}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:<small>मुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्यां” तत्त्वार्थसूत्र २ अ:।</small> फिर इन दोनो कालोंके भी प्रत्ये कके छह छह भेद हैं। सुषमा सुषमा, सुषमा, सुषमा दुःषमा, दुःषमा सुषमा, दुःषमा, दुःषमा दुःषमा ये छह भेद तो अवसर्पिणीके हैं और दुःषमा दुःषमा, दुषमा आदि उलटे येही छह भेद उत्-सर्पिणीके हैं। सुषमा सुषमाका परिमाण चार कोड़ा कोडी सागरोपमकाल। <small>सागरोपमकाल देखो।</small> सुषमाका तीन कोड़ाकोड़ी, सुषमा दुःषमाका दो कोडाकोड़ी, दुःषमा सुषमाका व्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर, दुषमाका इक्कीस हजार वर्ष और दुःषमा दुःषमाका भी इक्कीस हजार वर्ष है। आजकल जो इस भरतक्षेत्र में काल चल रहा है वह अवसर्पिणीका पांचवां दुःषमा है। <small>(जैन हरिवंश ७ सर्ग ५५-६२ श्लोक)</small>
२ ऊर्ध्वगमनशील, चढ़नेवाली।
{{Outdent|उत्सर्पित (सं॰ त्रि॰) १ निस्यन्दित, सरका हुआ। २ ऊर्ध्वगमनशील, चढा हुआ।}}
{{Outdent|उत्सर्पिन् (सं॰ त्रि॰) उत् सर्पति, णिनि। १ ऊर्ध्वगामी, चढनेवाला, २ उल्लङ्घनकारी, लांघनेवाला।}}
{{Outdent|उत् सर्या (सं॰ स्त्री॰) उत् सृ-ण्यत -टाप्। ऋतु-मती अथवा गर्भयोग्यावस्थावाली गवी, गाभन होनेके काबिल गाय। <small>(जटाधर)</small>}}
{{Outdent|उत्सव ( सं॰ पु॰) उ-सु-अच्। १ आरम्भ, आगाज, शुरू। <small>(ऋक् १।१००।८।)</small> २ आनन्दजनक व्यापार, जलसा, खु़शीका काम। ३ आनन्द, खुशी। ४ उत् सेक, गर्मी। ५ इच्छाप्रसव, खाहिशका उभार। ६ कोप, गुस्सा। ७ उन्नति, तरक्की। ८ अभुदय, उरूज, बढ़ती। ९ अध्याय, बाब, किताबका एक हिस्सा।}}
{{Outdent|उत्सवसङ्केत (सं॰ पु॰) १ पुष्करारण्यवासी जाति विशेष, पुष्करके जङ्गलमें रहनेवाले लोग। <small>(भारत सभा ३१ अ॰)</small> २ म्लेच्छ जाति विशेष। ये लोग सात प्रकार के होते हैं। भारतके उत्तर पार्वत्य प्रदेश में इनका वास था। इनके जनपदको भी उत सवसङ्केत कहते हैं। <small>(भारत सभा २६ और भीष्म ६ अ॰)</small>}}
{{Outdent|उतसाद (दै॰ पु॰) यज्ञीय पशुका छेदनप्रदेश।}}
{{Outdent|उत् सादक (सं॰ त्रि॰) नष्ट करनेवाला, जो बरबाद कर देता हो।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२२४'''|'''उत्सर्जनी-उत्सादक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
एक क्रिया। पूर्व काल पर बैदशिक्षार्थी यह क्रिया करते थे――
{{x-smaller|{{c|<poem>“श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाप्यु पाकृत्य यथाविधि।
युक्तन्छन्दांस्वधीयीत मासान् विनशप्रार्ध पञ्चमान्॥
पुनय तु छन्दसां कुर्याद्वहिरुत्सर्जन द्विजः
माघशुक्लस्य वा प्राप्त पूर्वाहे प्रथमेऽहनि॥
यथाशास्त्वन्तु कृत्वै बमुत्सर्गं छन्दसां बहिः।
विर मम् पक्षिणों रात्रि तदेवैमहर्निशम्॥
अत ऊर्ध्वन्तु छन्दांसि शुक्ले षु नियत: पठेत्।
वेदाङ्गानि च सर्वाणि कृष्णपच्चे षु संपठेत्॥” (मनु १९५-९८)</poem>}}}}
:{{gap}}श्रावण अथवा भाद्र मासकी पूर्णिमासे लगा गृह्य के अनुसार उपाकर्म समापनानन्तर सार्ध चार मास वेद पढ़ना चाहिये। फिर पौष मासके पुष्य नक्षत्रको ग्रामसे वहिर्भागमें पहुंच उत्सर्गक्रिया (विसर्जन होमादि) लगाये। अथवा माघ मासवाले शुक्लपक्षके प्रथम दिनको पूर्वाह्ल में यह उत्सर्ग कर्म करे। जो व्यक्ति माघ मास की पूर्णिमाको उपाकर्म करता है, वही माघकी शुक्ल प्रतिपद् को उत्सर्ग लगाता है। ग्रामके वहिर्भागमें इसी प्रकार यथाशास्त्र देवका उत्सर्ग कर एक पक्ष अहोरात्र वैदाध्ययनमें विरत रहना चाहिये। इस उत् सर्ग-क्रियाके पीछे प्रति शुक्लपक्ष में संयतभावसे वेद पढ़ते हैं। फिर कृष्णपक्षमें समुदाय वेदाङ्गका पाठ करना चाहिये।
{{Outdent|उत् सर्जनी ( सं॰ स्त्री॰) गुदका द्वितीय वलि, मिक़दके चमड़े की दूसरी तह।}}
{{Outdent|उत् सर्प (सं॰ पु॰) १गमन वा निस्यन्दन, सर-काव। २ स्फ़ीति, सूजन, चढ़ाव।}}
{{Outdent|उत् सर्पण (सं॰ क्ली॰) उत्-रूप भावे ल्युट्। १ उल्ल- ङ्घन, लंघाई। २ ऊर्ध्वगमन, चढ़ाव। ३ त्याग, तर्क।}}
{{Outdent|उत सर्पिणी (सं॰ स्त्री॰) १ जैनोंके कालका विभाग। जैनशास्त्र में व्यवहारकालके अनेक अपेक्षाओंसे अनेक भेद कहे गये हैं। उनमें एक अपेक्षासे दो भेद होते हैं―― उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी। जिस कालमें भरत और ऐरावत क्षेत्रके जीवोंकी आयु शरीर संपत्ति सुख आदिकी वृद्धि होती चली जाय उसे उत्सपिणी काल कहते हैं और जिसमें उत्तरोत्तर हानिही होती जाय वह अवसर्पिणी हैं। <small>“भरतैरावतयोई द्विहासौ षट्समयाभ्या-</small>}}
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:<small>मुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्यां” तत्त्वार्थसूत्र २ अ:।</small> फिर इन दोनो कालोंके भी प्रत्ये कके छह छह भेद हैं। सुषमा सुषमा, सुषमा, सुषमा दुःषमा, दुःषमा सुषमा, दुःषमा, दुःषमा दुःषमा ये छह भेद तो अवसर्पिणीके हैं और दुःषमा दुःषमा, दुषमा आदि उलटे येही छह भेद उत्-सर्पिणीके हैं। सुषमा सुषमाका परिमाण चार कोड़ा कोडी सागरोपमकाल। <small>सागरोपमकाल देखो।</small> सुषमाका तीन कोड़ाकोड़ी, सुषमा दुःषमाका दो कोडाकोड़ी, दुःषमा सुषमाका व्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर, दुषमाका इक्कीस हजार वर्ष और दुःषमा दुःषमाका भी इक्कीस हजार वर्ष है। आजकल जो इस भरतक्षेत्र में काल चल रहा है वह अवसर्पिणीका पांचवां दुःषमा है। <small>(जैन हरिवंश ७ सर्ग ५५-६२ श्लोक)</small>
२ ऊर्ध्वगमनशील, चढ़नेवाली।
{{Outdent|उत्सर्पित (सं॰ त्रि॰) १ निस्यन्दित, सरका हुआ। २ ऊर्ध्वगमनशील, चढा हुआ।}}
{{Outdent|उत्सर्पिन् (सं॰ त्रि॰) उत् सर्पति, णिनि। १ ऊर्ध्वगामी, चढनेवाला, २ उल्लङ्घनकारी, लांघनेवाला।}}
{{Outdent|उत् सर्या (सं॰ स्त्री॰) उत् सृ-ण्यत -टाप्। ऋतु-मती अथवा गर्भयोग्यावस्थावाली गवी, गाभन होनेके काबिल गाय। <small>(जटाधर)</small>}}
{{Outdent|उत्सव ( सं॰ पु॰) उ-सु-अच्। १ आरम्भ, आगाज, शुरू। <small>(ऋक् १।१००।८।)</small> २ आनन्दजनक व्यापार, जलसा, खु़शीका काम। ३ आनन्द, खुशी। ४ उत् सेक, गर्मी। ५ इच्छाप्रसव, खाहिशका उभार। ६ कोप, गुस्सा। ७ उन्नति, तरक्की। ८ अभुदय, उरूज, बढ़ती। ९ अध्याय, बाब, किताबका एक हिस्सा।}}
{{Outdent|उत्सवसङ्केत (सं॰ पु॰) १ पुष्करारण्यवासी जाति विशेष, पुष्करके जङ्गलमें रहनेवाले लोग। <small>(भारत सभा ३१ अ॰)</small> २ म्लेच्छ जाति विशेष। ये लोग सात प्रकार के होते हैं। भारतके उत्तर पार्वत्य प्रदेश में इनका वास था। इनके जनपदको भी उत सवसङ्केत कहते हैं। <small>(भारत सभा २६ और भीष्म ६ अ॰)</small>}}
{{Outdent|उतसाद (दै॰ पु॰) यज्ञीय पशुका छेदनप्रदेश।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२२६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्सादन-उत्सुक'''|'''२२५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उत् सादन, ( सं॰ क्ली॰) उत्-सद-णिच्-ल्युट्। १ उत् सारण, सरकाव। २ स्थानान्तरकरण, दूसरी जगह हटा देनेका काम। <small>(कात्यायन-श्रोतसूत्र १४।१।१०)</small> ३ उद्वर्तन, उठाव। तैलादि द्वारा परिशोधनको उत्सादन कहते हैं। ४ विनाशन, बरबादी। ५ उन्मूलन, उखाड़। <small>(भारत, वन १०२ अ॰)</small> ६. महावीरादि परित्यक्त देश, बहादुरोंका छोड़ा हुआ मुल्क। ७ उत्सव, जलसा। ८ समुल्लेखन, खिंचाव। ९ निम्न व्रणका उन्नतीकरण, नीचे ज़ख़मको उभारनेका काम। १० क्षेत्रका सम्यक् कर्षण, खेतकी खासी जोताई। ११ तैलाभ्यङ्ग द्वारा शुद्धीकरण, तेल लगा सफा़ई करने का काम।}}
{{Outdent|उत्सादनीय (सं॰ त्रि॰) १ नष्ट किया जाने वाला, जो बरबाद किये जाने के का़बिल हो। २ पूर्ण करने योग्य, अञ्जाम देने लायक़। ३ चढ़ा जाने योग्य। (क्ली॰) ४ ब्रणौषध विशेष, जखमपर लगानेकी एक दवा। इससे घाव भर आता है।}}
{{Outdent|उत्सादि (सं॰ पु॰) उत्स-आदि। <small>उत्सादिभ्योऽञ्। पा ४।१।८५।</small> पाणिनिका कहा एक गण। इसमें निम्न-लिखित शब्द पड़ते हैं――उत्स, उदपान, विकर, विनद, महानद, महानस, महाप्राण, तरुण, तलुन, पृथिवी, धेनु, पंक्ति, जगती, त्रिष्टुप, अनुष्टुप्, जनपद, भरत, उशीनर, ग्रीष्म, पीलुकुण, पृषदंश, भल्लकीय, रथन्तर, मध्यन्दिन, वृहत्, महत, सत्वत्, कुरु, पञ्चाल, इन्द्रावसान, उष्णिह, ककुभ, सुवर्ण, देव।}}
{{Outdent|उत्सादित (सं॰ त्रि॰) उत्-सद-णिच्-क्त। १ उन्मूलित, उखाड़ा हुआ। २ उद्वर्तित, ऊपरको उठाया हुआ। ३ परिष्कृत, साफ़ किया हुआ।}}
{{Outdent|उत्सादितव्य (सं॰ त्रि॰) नष्ट किये जाने योग्य जो बरबाद किये जानेके का़बिल हो।}}
{{Outdent|उत्सारक (सं॰ पु॰) उत-सृ-णिच्-ण्वुल्। १ द्वारपाल, दरवान्। २ प्रहरी, चौकीदार। (त्रि॰) ३. अपसारक, हटानेवाला।}}
{{Outdent|उत् सारण (सं॰ क्ली॰) उत्-सृ-णिच् ल्युट्। १ दूरीकरण, हटा देनेका काम। २ अतिथिका स्वा़गत, मेहमान्की पेशवाई।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उत् सारित (सं॰ त्रि॰) उत्-सृ-णिच्-क्त। १ दूरी-कृत, हटाया हुआ। २ चालित, सरकाया हुआ। ३ स्थानान्तरित, दूसरी जगह पहुंचाया हुआ।}}
{{Outdent|उत् साह (सं॰ पु॰) उत-सह-घञ्। १ उद्यम, कोशिश। २ अध्यवसाय, इस्तक़लाल। ३ स्थिर-यत्न, पक्की तदबीर। ४. वीररसका स्थायी भाव, हिम्मत, हौसला। <small>“उत्तमप्रकृतिर्वोर उत्साहः स्थायिभावकः।” (साहित्यदर्पण)</small> ५ राजाका गुणविशेष, बादशाहका एक वस्फ। <small>“चारेणोत्साहयोगेन क्रिययैव च कर्मणाम्।" (मनु ९।२९८)</small> ६ कल्याण, भला। ७ सूत्र, धागा। ८ हर्ष, खुशी। ९ संरम्भ, शुरू। १० सङ्गीतशास्त्रोक्त ध्रुवक विशेष। इसका लक्षण हास्यरस, केन्दुकताल और वंशवधिकर त्रयोदशाक्षर पाद है।}}
{{Outdent|उत् साहयुक्त (सं॰ पु॰) शरभ, हुमा।}}
{{Outdent|उत् साहवत् (सं॰ त्रि॰) उद्यमी, दृढ़, हौसलेमन्द।}}
{{Outdent|उत्साहवर्धन (सं॰ क्ली॰) उत्साह-वृध्-ल्युट्। १ उद्यमवृद्धि, हौसलेमन्दी। २ वीरत्व, बहादुरी।}}
{{Outdent|उत् साहसम्पन्न (सं॰ त्रि॰) कार्यरत, हौसलेमन्द, काममें लगा रहनेवाला।}}
{{Outdent|उत्साहन (सं॰ क्ली॰) चेष्टा, दृढ़ता, कोशिश, सब्र}}
{{Outdent|उत् साहिन् (सं॰ त्रि॰) उत् साह रखनेवाला, हौसलेमन्द।}}
{{Outdent|उत्साही (सं॰ पु॰) भक्तरोगी, खानेका बीमार।}}
{{Outdent|उत् सिंहन (सं॰ क्ली॰) नासा द्वारा ऊर्ध्व श्वासका धारण, नाकसे ऊपरी सांसकी रोक।}}
{{Outdent|उत् सिक्त (सं॰ त्रि॰) उत-सिच्-क्त। १ गर्वित, मग़रूर, घमण्डी। २ वर्धित, बढ़ा हुआ। ३ उद्रिक्त, फेंका या खाली किया हुआ। ४ उद्गत, चढ़ा या उठा हुआ। ५ प्लावित, डूबा हुआ।}}
{{Outdent|उत्सिच्यमान (सं॰ त्रि॰) १ जलकी झड़ी लगानेवाला, जो पानी बरसाता हो। २ वृद्धिशील, बढ़नेवाला।}}
{{Outdent|उतसिसृक्षु (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न करनेका अभिलाषी, जो बनाना चाहता हो।}}
{{Outdent|उत् सुक (सं॰ त्रि॰) उत्-सु-क्किप्-कन्। १ इच्छुक, खाहिशमन्द, चाहनेवाला। २ उत्कण्ठित, जिसे}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 57|em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२२७
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२२६'''|'''उत्सुकता-उदक्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
जान्से लगे। ३ पश्चात्तापकारी, पछतानेवाला।
४ व्याकुल, बेचैन । (पु॰) ५ उत्कण्ठा, खाहिश, चाह।
उत्सुकता (सं॰ स्त्री॰) १ व्याकुलता, बैचैनी।
२ प्रेम, प्यार। ३ पश्चात्ताप, पछतावा, तकलीफ।
उस मन (सं॰ त्रि॰) उत्त क्रान्तः सत्रम.
समा॰। १ सूत्रसे वहि त, धागसे पलग, जो लड़ीमें
न हो। २अनियमित, बेकायदा, ढोला।
उत सूर (सं॰ पु॰) प्रतिक्रान्तं सूरं सूर्यम् । दिना-
वसान, विकाल, शाम, सूरज डूबनेका समय। -
उत्सृजन (सं॰ क्ली॰) उत-सृज-ल्युट्। १ त्याग,
सर्क। २ समर्पण, सौंप देने का काम।
उत सुन्य (सं॰ अव्य॰) त्याग करके, छोडके।
उत सृष्ट ( सं॰ त्रि॰) उत-मुज-क्त। १ त्यक्त,
छोड़ा हुघा। २ दत्त, दिया हुपा। इस्रावित,
इंडेला हुया, जो फेंक दिया गया हो।
उत सृष्टपशु (सं॰ पु॰) त्यक्त वृषभ, छोड़ा हुआ
सांड। यह किसीके मरनेपर छोड़ा जाता है।
उत्सृष्टवत् (सं॰ त्रि॰) त्याग करनेवाला, जो छोड़
उत्सृष्टत्ति (सं॰ स्त्री॰) त्यक्तवस्तु द्वारा निर्वाह।
उत्सृष्टि (सं॰ स्त्री॰) त्याग, तक।
उत् सृष्टु काम (सं॰ त्रि॰) त्याग करनेका अभि-
लाषी, जो छोड़ना चाहता हो।
उत्सेक (सं॰ पु॰) उत्-सिच्-घञ्। १ गल्प, अह
वार, घमण्ड। २ उट्रेक, उंडेल। ३ उपरिसेक,
उफान । ४ वृद्धि, बाढ़।
उत्से किन् (सं॰ त्रि॰) १ वृदिशौल, उमडनेवाला।
२ अहङ्कारी, घमण्डी।
उत्सेचन (सं॰ क्ली॰) उत्-सिच-ल्युट्। जर्व
सेचन, उबाल, उफान, बहाव, बढाव ।
उतसेध (सं॰ त्रि॰) उत-सिध-वञ् । १ उच्च,
। ऊंचा। (पु॰) २ पर्वत वृक्षादिका देयं, पहाड़
पेड वगैरहको उचाई। ३ उपरिभाग, ऊपरी हिस्सा।
४ स्थ लता, मोटापन। ५ शोथ, सूजन। ६ प्राधिक्य,
बढ़ती। ७ देह, जिस्म । (क्ली॰) ८ वध, कतल।
उतसेधांगल-एक परिमाण । जेनशास्त्रानुसार यह
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:आठ यवके बराबर होता है और इससे जीवोंके शरीर की ऊंचाई तथा छोटी वस्तुओंका परिमाण होता है।
{{Right|<small>(जैन हरिवंश ७४१)</small>
{{Outdent|उत्स्मय (सं॰ पु॰) मन्दहास्य, मुसकुराहट।}}
{{Outdent|उत्स्मयत (सं॰ त्रि॰) मन्दहास्ययुक्त, मुसकरानेवाला।}}
{{Outdent|उत्स्थ (वै॰ त्रि॰) कूप वा निर्झरसे आनेवाला, जो कुवें या भरनेसे निकलता हो।}}
{{Outdent|उथपना (हिं॰ कि॰) उत्थान करना, निकालना, हटाना।}}
{{Outdent|उथल (हिं॰ वि॰) १ अगभीर, जो गहरा न हो। २ तुच्छ, छिछोरा। ३ भेदको गुप्त रख न सकनेवाला, पेटका हलका।}}
{{Outdent|उथलना (हिं॰ क्रि॰) चञ्चल बनना, पाबन्द न रहना।}}
{{Outdent|उथलपुथल (हिं॰ त्रि॰) १ परिवर्तित, औंधा, उलटा-पुलटा। (क्रि॰ वि॰) २ परिवर्तित रूपसे, उलट-पुलटकर।}}
{{Outdent|उथला, <small>उथल देखो।</small>}}
{{Outdent|उथलाना (हि॰ क्रि॰) १ परिवर्तित करना, इधरका उधर लगाना। २ अव्यवस्थित बनाना,गड़बड़ डालना। ३ स्थानच्युत करना, असली जगहसे हटा देना।}}
{{Outdent|उद् (सं॰ अव्य॰) उक्विप-तुक्। १ प्रकाशमें, देखते-देखते, खुला-खुली। २ विभागसे, बांटकर। ३ लाभपर, फा़यदेसे। ४ उत्कर्ष में, बढ़कर। ५ ऊर्ध्व पर, ऊपर-ऊपर। ६ प्राबल्यमें, जबरन्। ७ आश्चर्य से, ताज्जुबके साथ। ८ शक्तिमें, जोर देकर। ९ प्राधान्य पर, दबावसे। १० वन्धनमें, पकड़कर। ११ भावपर, हालतके भुवाफि़क़। १२ मोक्षसे, छोड़ते हुये। १३ ब्रह्मपर, परमेश्वरके नामसे। १४ अवास्थापर, नातनदुरुस्तीसे। यह शब्द संज्ञा और क्रियाके पहले आता है।}}
{{Outdent|उद (सं॰ क्ली॰) उन्द-अच निपातनात्। १ जल, पानी। </small>“सहस्वरात्रीरुदवासतत्परा।” (कुमार ५।१६)</small (पु॰) २ करिशृङ्खला, हाथीकी जोर। }}
{{Outdent|उदक् (सं॰ अव्य॰) १ उत्तरदिक् शिमालकी तर्फ। २ उपरि, ऊपर। ३ अन्ततः, आखिरश। (त्रि॰)}}
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अँजली चौधरी
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/* शोधित */
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२२६'''|'''उत्सुकता-उदक्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:जान्से लगे। ३ पश्चात्तापकारी, पछतानेवाला। ४ व्याकुल, बेचैन। (पु॰) ५ उत्कण्ठा, खाहिश, चाह।
{{Outdent|उत्सुकता (सं॰ स्त्री॰) १ व्याकुलता, बैचैनी। २ प्रेम, प्यार। ३ पश्चात्ताप, पछतावा, तकलीफ़।}}
{{Outdent|उत्सूत्र (सं॰ त्रि॰) उत्त क्रान्तः सूत्रम्, अत्य।॰ समा॰। १ सूत्रसे वहिर्भूत, धागसे अलग, जो लड़ीमें न हो। २ अनियमित, बेका़यदा, ढीला।}}
{{Outdent|उत्सूर (सं॰ पु॰) अतिक्रान्तं सूरं सूर्यम्। दिना-वसान, विकाल, शाम, सूरज डूबनेका समय।}}
{{Outdent|उत्सृजन (सं॰ क्ली॰) उत्-सृज-ल्युट्। १ त्याग, तर्क। २ समर्पण, सौंप देने का काम।}}
{{Outdent|उत्सृज्य (सं॰ अव्य॰) त्याग करके, छोड़के।}}
{{Outdent|उत्सृष्ट (सं॰ त्रि॰) उत्-भृज-क्त। १ त्यक्त, छोड़ा हुआ। २ दत्त, दिया हुआ। ३ स्रावित, उंडेला हुआ, जो फेंक दिया गया हो।}}
{{Outdent|उत्सृष्टपशु (सं॰ पु॰) त्यक्त वृषभ, छोड़ा हुआ सांड। यह किसीके मरनेपर छोड़ा जाता है।}}
{{Outdent|उत्सृष्टवत् (सं॰ त्रि॰) त्याग करनेवाला, जो छोड़ देता हो।}}
{{Outdent|उत्सृष्टवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) त्यक्तवस्तु द्वारा निर्वाह।}}
{{Outdent|उत्सृष्टि (सं॰ स्त्री॰) त्याग, तर्क।}}
{{Outdent|उत्सृष्टुकाम (सं॰ त्रि॰) त्याग करनेका अभि-लाषी, जो छोड़ना चाहता हो।}}
{{Outdent|उत्सेक (सं॰ पु॰) उत्-सिच्-घञ्। १ गल्प, अहङ्कार, घमण्ड। २ उद्रेक, उंडेल। ३ उपरिसेक, उफान। ४ वृद्धि, बाढ़।}}
{{Outdent|उत्सेकिन् (सं॰ त्रि॰) १ वृदिशील, उमडनेवाला। २ अहङ्कारी, घमण्डी।}}
{{Outdent|उत्सेचन (सं॰ क्ली॰) उत्-सिच-ल्युट्। ऊर्ध्व-सेचन, उबाल, उफान, बहाव, बढाव।}}
{{Outdent|उतसेध (सं॰ त्रि॰) उत-सिध-घञ्। १ उच्च, ऊंचा। (पु॰) २ पर्वत वृक्षादिका देर्ध्य, पहाड़ पेड वगैरहकी ऊंचाई। ३ उपरिभाग, ऊपरी हिस्सा। ४ स्थूलता, मोटापन। ५ शोथ, सूजन। ६ आधिक्य, बढ़ती। ७ देह, जिस्म। (क्ली॰) ८ वध, क़तल। उतसेधांगुल-एक परिमाण। जैनशास्त्रानुसार यह}}
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:आठ यवके बराबर होता है और इससे जीवोंके शरीर की ऊंचाई तथा छोटी वस्तुओंका परिमाण होता है।
{{Right|<small>(जैन हरिवंश ७४१)</small>
{{Outdent|उत्स्मय (सं॰ पु॰) मन्दहास्य, मुसकुराहट।}}
{{Outdent|उत्स्मयत (सं॰ त्रि॰) मन्दहास्ययुक्त, मुसकरानेवाला।}}
{{Outdent|उत्स्थ (वै॰ त्रि॰) कूप वा निर्झरसे आनेवाला, जो कुवें या भरनेसे निकलता हो।}}
{{Outdent|उथपना (हिं॰ कि॰) उत्थान करना, निकालना, हटाना।}}
{{Outdent|उथल (हिं॰ वि॰) १ अगभीर, जो गहरा न हो। २ तुच्छ, छिछोरा। ३ भेदको गुप्त रख न सकनेवाला, पेटका हलका।}}
{{Outdent|उथलना (हिं॰ क्रि॰) चञ्चल बनना, पाबन्द न रहना।}}
{{Outdent|उथलपुथल (हिं॰ त्रि॰) १ परिवर्तित, औंधा, उलटा-पुलटा। (क्रि॰ वि॰) २ परिवर्तित रूपसे, उलट-पुलटकर।}}
{{Outdent|उथला, <small>उथल देखो।</small>}}
{{Outdent|उथलाना (हि॰ क्रि॰) १ परिवर्तित करना, इधरका उधर लगाना। २ अव्यवस्थित बनाना,गड़बड़ डालना। ३ स्थानच्युत करना, असली जगहसे हटा देना।}}
{{Outdent|उद् (सं॰ अव्य॰) उक्विप-तुक्। १ प्रकाशमें, देखते-देखते, खुला-खुली। २ विभागसे, बांटकर। ३ लाभपर, फा़यदेसे। ४ उत्कर्ष में, बढ़कर। ५ ऊर्ध्व पर, ऊपर-ऊपर। ६ प्राबल्यमें, जबरन्। ७ आश्चर्य से, ताज्जुबके साथ। ८ शक्तिमें, जोर देकर। ९ प्राधान्य पर, दबावसे। १० वन्धनमें, पकड़कर। ११ भावपर, हालतके भुवाफि़क़। १२ मोक्षसे, छोड़ते हुये। १३ ब्रह्मपर, परमेश्वरके नामसे। १४ अवास्थापर, नातनदुरुस्तीसे। यह शब्द संज्ञा और क्रियाके पहले आता है।}}
{{Outdent|उद (सं॰ क्ली॰) उन्द-अच निपातनात्। १ जल, पानी। </small>“सहस्वरात्रीरुदवासतत्परा।” (कुमार ५।१६)</small (पु॰) २ करिशृङ्खला, हाथीकी जोर। }}
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अँजली चौधरी
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:जान्से लगे। ३ पश्चात्तापकारी, पछतानेवाला। ४ व्याकुल, बेचैन। (पु॰) ५ उत्कण्ठा, खाहिश, चाह।
{{Outdent|उत्सुकता (सं॰ स्त्री॰) १ व्याकुलता, बैचैनी। २ प्रेम, प्यार। ३ पश्चात्ताप, पछतावा, तकलीफ़।}}
{{Outdent|उत्सूत्र (सं॰ त्रि॰) उत्त क्रान्तः सूत्रम्, अत्य।॰ समा॰। १ सूत्रसे वहिर्भूत, धागसे अलग, जो लड़ीमें न हो। २ अनियमित, बेका़यदा, ढीला।}}
{{Outdent|उत्सूर (सं॰ पु॰) अतिक्रान्तं सूरं सूर्यम्। दिना-वसान, विकाल, शाम, सूरज डूबनेका समय।}}
{{Outdent|उत्सृजन (सं॰ क्ली॰) उत्-सृज-ल्युट्। १ त्याग, तर्क। २ समर्पण, सौंप देने का काम।}}
{{Outdent|उत्सृज्य (सं॰ अव्य॰) त्याग करके, छोड़के।}}
{{Outdent|उत्सृष्ट (सं॰ त्रि॰) उत्-भृज-क्त। १ त्यक्त, छोड़ा हुआ। २ दत्त, दिया हुआ। ३ स्रावित, उंडेला हुआ, जो फेंक दिया गया हो।}}
{{Outdent|उत्सृष्टपशु (सं॰ पु॰) त्यक्त वृषभ, छोड़ा हुआ सांड। यह किसीके मरनेपर छोड़ा जाता है।}}
{{Outdent|उत्सृष्टवत् (सं॰ त्रि॰) त्याग करनेवाला, जो छोड़ देता हो।}}
{{Outdent|उत्सृष्टवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) त्यक्तवस्तु द्वारा निर्वाह।}}
{{Outdent|उत्सृष्टि (सं॰ स्त्री॰) त्याग, तर्क।}}
{{Outdent|उत्सृष्टुकाम (सं॰ त्रि॰) त्याग करनेका अभि-लाषी, जो छोड़ना चाहता हो।}}
{{Outdent|उत्सेक (सं॰ पु॰) उत्-सिच्-घञ्। १ गल्प, अहङ्कार, घमण्ड। २ उद्रेक, उंडेल। ३ उपरिसेक, उफान। ४ वृद्धि, बाढ़।}}
{{Outdent|उत्सेकिन् (सं॰ त्रि॰) १ वृदिशील, उमडनेवाला। २ अहङ्कारी, घमण्डी।}}
{{Outdent|उत्सेचन (सं॰ क्ली॰) उत्-सिच-ल्युट्। ऊर्ध्व-सेचन, उबाल, उफान, बहाव, बढाव।}}
{{Outdent|उतसेध (सं॰ त्रि॰) उत-सिध-घञ्। १ उच्च, ऊंचा। (पु॰) २ पर्वत वृक्षादिका देर्ध्य, पहाड़ पेड वगैरहकी ऊंचाई। ३ उपरिभाग, ऊपरी हिस्सा। ४ स्थूलता, मोटापन। ५ शोथ, सूजन। ६ आधिक्य, बढ़ती। ७ देह, जिस्म। (क्ली॰) ८ वध, क़तल। उतसेधांगुल-एक परिमाण। जैनशास्त्रानुसार यह}}
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{{Right|<small>(जैन हरिवंश ७४१)</small>
{{Outdent|उत्स्मय (सं॰ पु॰) मन्दहास्य, मुसकुराहट।}}
{{Outdent|उत्स्मयत (सं॰ त्रि॰) मन्दहास्ययुक्त, मुसकरानेवाला।}}
{{Outdent|उत्स्थ (वै॰ त्रि॰) कूप वा निर्झरसे आनेवाला, जो कुवें या भरनेसे निकलता हो।}}
{{Outdent|उथपना (हिं॰ कि॰) उत्थान करना, निकालना, हटाना।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८५
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अनुश्री साव
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२८४
उन्दुवर-उन्नतनगर
उन्दवर (सं.ली.) ताम, तांबा।
जूनागढ़ राज्यका यह प्राचीन नगर अक्षा० २०. ४८
उन्देरी-बम्बई प्रान्तके कोलाबा सागरतटका एक
उ. और द्राधि. ७१. पू. पर अवस्थित है। प्राचीन
होय। १६८० ई में सौदीने यहां खाई बना अपनी उन्नतनगर वर्तमान उननगरके पाख में ही था। इसी
रक्षा की थी। महाराष्ट्रोंने उन्हें भगानेको निष्फल प्राचीन नगरको पीछे लोग दिलवर कहने लगे। दोनो
चेष्टा को। १७३३ ई में अंगरेजोंने अपनी सेना स्थान पास ही पास रहनसे उनदिलवर कहलाते हैं।
भेज इस दीपके टुगेको महाराष्ट्रोंके हाथ पड़ने से
बचाया। किन्तु १७५८ ई में राघवजी अङ्गरिने किन्तु हमारी समझमें उन्नतनगर हो अधिक प्रामाण्य है। इस प्राचीन
उन्देरीका टुर्ग मुसलमानोंसे छीन लिया था। फिर
नगरका विवरण स्कन्दपुराणके प्रभासखण्ड में इस प्रकार कहा है-
"तती गच्छ महादवि ! उत्तस्थानमुत्तमम् ।
१८४० ई०को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा। .
तस्वैवोत्तर दिगभागे ऋषितीशतटे शुभे ।
उन्द्र (स• पु०) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव ।
एतत् स्थानं शुभं दैवि ! विप्रेभ्य: प्रददी बलात् ।
उन (स. त्रि.) उन्द-क्त । १ लिन्न, मिता, पालदा, सर्वसीमासमायुक्त चण्डौगणसुरचितम् ॥
भरा हुआ। २ भाई, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान्।
देवावाच ।
उवइस, उन्नीस देखो।
कथमुन्नतनानास्य वभूव सुरसत्तम !
उन्नत (6. त्रि.) उत्-नम-क्त। १ उच्च, ऊंचा। कथ त्वया बलाद्दत्त कियत्सौमासमन्वितम् ॥
२ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ४ गौरवा-
सत् सर्व समाचल सचेपानातिविस्तरात् ।
न्वित, इज्जतदार । ५ उत्थापित, उठाया हुपा।
ईश्वर उवाच।
६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु.) ७ अजगर । ८ बुद्ध-
मृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि कथा पापप्रणाशिनीम् ।
विशेष। (क्लो०) ८ उच्चता, उचाई। १० दिन
यां यत्वा मानवो दैवि ! मुच्यते सर्वपापकात् ॥
एतत् पूर्व पुरा प्रोक्त स्थानं सङ्केतकारणम् ।
परिमाण-ज्ञापक उपाय।
कृतौये बाझो खण्डे सृष्टिस'चैपसूचके ॥
"दिवसस्य यस मञ्च शेष तयोर्यदल्प' तन्नतस'शम् ।”
तथापि ते प्रवक्ष्यामि सचे पाच्छ ण पार्वति
"उदग्दैश' याति यथा यथा नरस्तथा तथा स्थानतमचमण्डलम् ।
उन्नामितं पुनस्तव यव लिङ्ग महोदयम् ॥
उदगदिश पश्यति चीन्नतं चितेस्तदन्तर यीनमजाः पलांशकाः॥"
षष्टिवर्ष सहस्रापि तपस्ते पु महर्षयः ।
' (सिद्धान्त-शिरोमणि)
ध्यायमाना महेशानमनादिनिधन परम् ॥
उन्नतकाल (सं० पु०) उन्नतको छाया द्वारा काल-
तेषु वै तप्यमानेषु कोटिसलो षु पार्वति !
निरूपक प्रक्रिया विशेष ।
ऋषितोयान्टे रम्ये पविवे पापनाशने ॥
'पलश्रुतिघ्न स्त्रिगुणस्य वर्गोद्यज्ये ठकर्णाहतिहद्भवेद्दा ।
भिचभूत्वा गतवाई पूतस्तवैव भामिनि !
इष्टान्त्यका तद्रहितान्ताका या भवन्ति या उत्क्रमचापलिप्ताः ॥
वकालदर्शि भिस्तव रोषरागविवर्जितः ॥
नतासवस्ते मुरहदल हवीकृत' चोन्नतकाल एवम् ।" (सिद्धान्तशिरोमणि) तपखिभिस्तदा सई लक्षितोऽहं वरानने !
"नतकाली दिनाधवत् पतित उन्नतकाल: स्वादित्य पपन्नम्।' (मिताक्षरा)| दृष्टमावत्तदा विौरिराम महेश्वरः ॥
उन्नतचरण ( स० वि०) उच्छित पादयुक्ता, पैर क्व यासि विदिती देव इत्य कानुययुईि जाः ।
उठाये हुआ।
यावदायान्ति मुनयः ईशेशेति प्रभाषकाः ॥ .
उव्रतत्व (सं० लो०) उच्चता, उचाई।
धावमानाश्च तापसा द्योतयन्तो दिशो दश ॥
उन्नतनगर (सलो०) एक अति प्राचीन नगर ।।
लिङ्गमेव प्रपश्यन्ति नापशान्ति महेश्वरम् ।
“यव चोन्नामित लिङ्ग ऋषितोयातटै शुभे।
ये ये च ददृशुलिङ्ग' मूलचण्डौशमन्ति ॥
उन्नत नाम यं लोक विख्यातं सुरसुन्दरि ॥” (प्रभासखण्ड २१६ १०)
तदा ते मुनयः स शरीरैः खर्गमाययुः ।
वर्तमान नाम उन दिलवर* है। काठियावाड़ प्रान्तके
तदा विविष्ट व्याप्त दृष्ट' वे शतयज्वना ।।
अयाचन्त तथै वान्ये मुनयस्तपसोज्ज्वलाः ।
• सर साहबने प्राचीन नगरका नाम 'उन्नतर्ग' लिखा है।। एतदन्तरमासाद्य समागत्य महोतसे ॥<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२८४|उन्दुवर-उन्नतनगर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|उन्दूवर (सं॰ स्त्री॰) ताम्र, तांबा।}}
{{outdent|उन्देरी—बम्बई प्रान्त के कोलाबा सागरतट का एक द्वीप। १६८० ई॰ में सीदी ने यहां खाई बना अपनी रक्षा की थी। महाराष्ट्रों ने उन्हें भगाने की निष्फल चेष्टा की। १७३२ ई॰ में अंगरेजों ने अपनी सेना भेज इस द्वीप के दुर्ग को महाराष्ट्रों के हाथ पड़ने से बचाया। किन्तु १७५९ ई॰ में राघवजी अंगरिया ने उन्देरी का दुर्ग मुसलमानों से छीन लिया था। फिर १८४० ई० को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा।}}
{{outdent|उन्द (सं॰ पु॰) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव।}}
{{outdent|उन्द (सं॰ त्रि॰) उन्द-क्त। १ लिप्त, लिप्त, आलूदा, भरा हुआ। २ आर्द्र, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान।}}
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२८४
उन्दुवर-उन्नतनगर
उन्दवर (सं.ली.) ताम, तांबा।
जूनागढ़ राज्यका यह प्राचीन नगर अक्षा० २०. ४८
उन्देरी-बम्बई प्रान्तके कोलाबा सागरतटका एक
उ. और द्राधि. ७१. पू. पर अवस्थित है। प्राचीन
होय। १६८० ई में सौदीने यहां खाई बना अपनी उन्नतनगर वर्तमान उननगरके पाख में ही था। इसी
रक्षा की थी। महाराष्ट्रोंने उन्हें भगानेको निष्फल प्राचीन नगरको पीछे लोग दिलवर कहने लगे। दोनो
चेष्टा को। १७३३ ई में अंगरेजोंने अपनी सेना स्थान पास ही पास रहनसे उनदिलवर कहलाते हैं।
भेज इस दीपके टुगेको महाराष्ट्रोंके हाथ पड़ने से
बचाया। किन्तु १७५८ ई में राघवजी अङ्गरिने किन्तु हमारी समझमें उन्नतनगर हो अधिक प्रामाण्य है। इस प्राचीन
उन्देरीका टुर्ग मुसलमानोंसे छीन लिया था। फिर
नगरका विवरण स्कन्दपुराणके प्रभासखण्ड में इस प्रकार कहा है-
"तती गच्छ महादवि ! उत्तस्थानमुत्तमम् ।
१८४० ई०को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा। .
तस्वैवोत्तर दिगभागे ऋषितीशतटे शुभे ।
उन्द्र (स• पु०) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव ।
एतत् स्थानं शुभं दैवि ! विप्रेभ्य: प्रददी बलात् ।
उन (स. त्रि.) उन्द-क्त । १ लिन्न, मिता, पालदा, सर्वसीमासमायुक्त चण्डौगणसुरचितम् ॥
भरा हुआ। २ भाई, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान्।
देवावाच ।
उवइस, उन्नीस देखो।
कथमुन्नतनानास्य वभूव सुरसत्तम !
उन्नत (6. त्रि.) उत्-नम-क्त। १ उच्च, ऊंचा। कथ त्वया बलाद्दत्त कियत्सौमासमन्वितम् ॥
२ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ४ गौरवा-
सत् सर्व समाचल सचेपानातिविस्तरात् ।
न्वित, इज्जतदार । ५ उत्थापित, उठाया हुपा।
ईश्वर उवाच।
६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु.) ७ अजगर । ८ बुद्ध-
मृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि कथा पापप्रणाशिनीम् ।
विशेष। (क्लो०) ८ उच्चता, उचाई। १० दिन
यां यत्वा मानवो दैवि ! मुच्यते सर्वपापकात् ॥
एतत् पूर्व पुरा प्रोक्त स्थानं सङ्केतकारणम् ।
परिमाण-ज्ञापक उपाय।
कृतौये बाझो खण्डे सृष्टिस'चैपसूचके ॥
"दिवसस्य यस मञ्च शेष तयोर्यदल्प' तन्नतस'शम् ।”
तथापि ते प्रवक्ष्यामि सचे पाच्छ ण पार्वति
"उदग्दैश' याति यथा यथा नरस्तथा तथा स्थानतमचमण्डलम् ।
उन्नामितं पुनस्तव यव लिङ्ग महोदयम् ॥
उदगदिश पश्यति चीन्नतं चितेस्तदन्तर यीनमजाः पलांशकाः॥"
षष्टिवर्ष सहस्रापि तपस्ते पु महर्षयः ।
' (सिद्धान्त-शिरोमणि)
ध्यायमाना महेशानमनादिनिधन परम् ॥
उन्नतकाल (सं० पु०) उन्नतको छाया द्वारा काल-
तेषु वै तप्यमानेषु कोटिसलो षु पार्वति !
निरूपक प्रक्रिया विशेष ।
ऋषितोयान्टे रम्ये पविवे पापनाशने ॥
'पलश्रुतिघ्न स्त्रिगुणस्य वर्गोद्यज्ये ठकर्णाहतिहद्भवेद्दा ।
भिचभूत्वा गतवाई पूतस्तवैव भामिनि !
इष्टान्त्यका तद्रहितान्ताका या भवन्ति या उत्क्रमचापलिप्ताः ॥
वकालदर्शि भिस्तव रोषरागविवर्जितः ॥
नतासवस्ते मुरहदल हवीकृत' चोन्नतकाल एवम् ।" (सिद्धान्तशिरोमणि) तपखिभिस्तदा सई लक्षितोऽहं वरानने !
"नतकाली दिनाधवत् पतित उन्नतकाल: स्वादित्य पपन्नम्।' (मिताक्षरा)| दृष्टमावत्तदा विौरिराम महेश्वरः ॥
उन्नतचरण ( स० वि०) उच्छित पादयुक्ता, पैर क्व यासि विदिती देव इत्य कानुययुईि जाः ।
उठाये हुआ।
यावदायान्ति मुनयः ईशेशेति प्रभाषकाः ॥ .
उव्रतत्व (सं० लो०) उच्चता, उचाई।
धावमानाश्च तापसा द्योतयन्तो दिशो दश ॥
उन्नतनगर (सलो०) एक अति प्राचीन नगर ।।
लिङ्गमेव प्रपश्यन्ति नापशान्ति महेश्वरम् ।
“यव चोन्नामित लिङ्ग ऋषितोयातटै शुभे।
ये ये च ददृशुलिङ्ग' मूलचण्डौशमन्ति ॥
उन्नत नाम यं लोक विख्यातं सुरसुन्दरि ॥” (प्रभासखण्ड २१६ १०)
तदा ते मुनयः स शरीरैः खर्गमाययुः ।
वर्तमान नाम उन दिलवर* है। काठियावाड़ प्रान्तके
तदा विविष्ट व्याप्त दृष्ट' वे शतयज्वना ।।
अयाचन्त तथै वान्ये मुनयस्तपसोज्ज्वलाः ।
• सर साहबने प्राचीन नगरका नाम 'उन्नतर्ग' लिखा है।। एतदन्तरमासाद्य समागत्य महोतसे ॥<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२८
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्कारमान्धाता|५२७}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं रहते। मेह तुम्हारो थपेचा उथ है। उसमें
देवता वास करते हैं।' यह कहकर नारद जहांसे
आये, वह चले गये। पोछे विन्ध्य अपनेको विकार दे
परिताप करने लगे और शिवको पूजनेको इच्छा
आजकल जहां चोद्वार विद्यमान है, वहीं आकर
पहुंच गये। यहां उन्होंने मृत्तिकाके एक शिव बनाये
और एक स्थानमें रह अचल भावसे छह मास
शिवके ध्यान में बिताये थे । आशुतोष प्रसन्न हुये और
विन्ध्यको सम्बोधन कर कहने लगे, – 'अपनी इच्छा के !
अनुसार वर मांगो।' तब विन्धा कातरकसे बोल
उठे, - 'हे देवादिदेव ! यदि आप प्रसन्न हुये हैं, तो
मेरो इच्छा के अनुसार शरोर बढ़ायिये । प्रभो ! आपका
जो ज्योतिर्मय रूप ( पोहार) सकल वेदोंमें वर्णित
है, उसी भक्तवान्छित रूपसे मुझे दर्शन दीजिये । महा-
देवने भक्तको वाच्छा पूरी की और मनोभाव प्रकाशकर
यह बात कह दो, - 'क्या करें, अशुभ वरदान अन्यको
दुःखजनक होगा सही. तथापि तुम्हारी इच्छा हमने
पूर्व को।' इसो समय देवों और ऋषियोंने शिवका
पूजन किया और उनसे वहीं उसी रूपमें रहनेको
कहा। महादेव मानवके सुखको वह ठहर गये।
इसी प्रकार एकमूर्ति श्राङ्कार और पार्थिव लिङ्ग दो
भागमें विभक्त हुआ। घोरमूर्ति का सदाशिव और
पार्थिव लिङ्गका नाम अमरेश्वर है ।”+
+ <poem>"बोद्धारख यथा ह्यासोत् तथा च श्रूयतां पुनः
कस्मिंचित् समये चाव नारदो भगवांस्तदा ॥ ४२
गोकर्णाख्य' शिवं गत्वा भागतो विध्यकेश्वरम् ।
तव पूजितस्तेन बहुमानपुरःसरम् ॥ ४३
मयि सर्वच विद्येत न न्यून हि कदाचन ।
इति मान' तदा श्रुत्वा नारदो मानहा तदा ॥ 88
निश्वस्य संस्थितस्तव श्रुत्वा विन्धयोऽब्रवीदिदम् ।
किं न्यूनच त्वया दृष्ट' मयि निश्वासकारणम् ॥ ४५
तच्छ्रुत्वा नारदो वाक्यमुवाच श्रयतां पुनः ।
त्वयि तु विद्यते सर्व्व' मेरुरुञ्चतरं पुनः ॥ ४६
देवेष्वपि विभागोऽस्य न तवास्ति कदाचन ।
इत्वा नारदस्तव जगाम च यथागतम् ॥ ४७
विन्धाय परिततो वै धिगेव जीवितादिकम् ।
- विश्वेश्वरं तथा शम्भु' समाराध्य जपाम्यहम् ॥ ४८</poem>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
आजकल द्वीपके मध्यभागमें पोहारचिका पर
नदीके दक्षिण भागमें अमरेश्वरका मन्दिर है। स्थानीय
पूजक चोदारको चादिलिङ्ग कहा करते हैं। रेवाखण्ड में भी ओङ्कारको आदिदेव बताया है।
{{smaller|"ओङारमादिदेवञ्च ये वै ध्यायन्ति नित्यशः।" (२२अ॰)}}
तीर्थयात्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग दर्शन करनेकी
इच्छासे था पहले पोनरमान्धाता चोर पोछे शिक्के
पार्थिवलिङ्ग अमरेश्वरका दर्शन लेते हैं। पश्चिमके
शास्त्रन्न पण्डित इसो श्रोङ्कारमूर्तिको ईश्वरका प्रत
लिए मानते हैं।
जिस समय देवद्वेषो सुलतान महमूदने सोम
नायका मन्दिर तोड़ा, उस समय भी पोहार और
अमरेश्वरका भाव भोंड़ा न था । उक्त दोनों मन्दिरों के
अतिरिक्त अनेक लिङ्ग पोर मन्दिर विद्यमान रहे।
उन सकल प्राचीन मन्दिरोंमें विधर्मी मुसलमानोंके
उत्पात से कई एककाल हो नये कई ध्वसाथ-
शेषमें पड़े और कई अङ्गहोन अवस्था में खड़े हैं। किसी
<poem>इति निश्चित्य तव व मोङ्कारं यन्त्र के स्वयम् ।
कृत्वा चैव पुनस्तव पार्थिवौं शिवमूर्त्तिकाम् ॥ ४८
आरराध वदा शम्भु' षण्मासञ्च निरन्तरम् ।
न चचाल तदा स्थानाच्छिवध्यानपरायणः ॥ ५०
प्रसन्नव तदा शम्भु ब्र ूहि त्वं मनसेसितम् ।
तमं च दर्शयामास दुलर्भ योगिनामपि ॥ ५१
रूपं यथोक्त' वेदेषु भक्तानामीसितञ्च यत् ।
यदि प्रसन्नो देवेश वृद्धि ं वे हि यथेप्सितम् ॥ ५२
किं करोनि यदा तेन ब्रियते दौयते मया ।
न युक्त परदुःखाय वरदान' ममाशुभम् ॥ ५३
तथापि दत्तवांस्तव यथेपससि तथा पुनः ।
एवं च समये देवा ऋषयश्च तथाऽमलाः ॥ ५४
सम्पूज्य शङ्करं तव स्थातव्यमिति चाब्रुवन् ।
तथैव कृतवान् देवो लोकानां सुखहेतवे ॥ ५५
चकार चैव यन्त्र वै लिङ्गमे तथा पुनः ।
पार्थिवे च तथारूपे लिङ्गमेकं तथा पुनः ॥ ५६
एवं दयं समुत्पन्न' लिङ्गमेकं हिचा व्रतम् ।
प्रणव चोद्धारच नामासीत् स सदाशिवः ॥ ५७
पार्थि वे चैव यज्जातं तदासीदमरेश्वरः ।”</poem>{{right|(शिवपुराण, ज्ञानसहिता ४६अ॰)}}<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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देवता वास करते हैं।' यह कहकर नारद जहांसे
आये, वह चले गये। पोछे विन्ध्य अपनेको विकार दे
परिताप करने लगे और शिवको पूजनेको इच्छा
आजकल जहां चोद्वार विद्यमान है, वहीं आकर
पहुंच गये। यहां उन्होंने मृत्तिकाके एक शिव बनाये
और एक स्थानमें रह अचल भावसे छह मास
शिवके ध्यान में बिताये थे । आशुतोष प्रसन्न हुये और
विन्ध्यको सम्बोधन कर कहने लगे, – 'अपनी इच्छा के !
अनुसार वर मांगो।' तब विन्धा कातरकसे बोल
उठे, - 'हे देवादिदेव ! यदि आप प्रसन्न हुये हैं, तो
मेरो इच्छा के अनुसार शरोर बढ़ायिये । प्रभो ! आपका
जो ज्योतिर्मय रूप ( पोहार) सकल वेदोंमें वर्णित
है, उसी भक्तवान्छित रूपसे मुझे दर्शन दीजिये । महा-
देवने भक्तको वाच्छा पूरी की और मनोभाव प्रकाशकर
यह बात कह दो, - 'क्या करें, अशुभ वरदान अन्यको
दुःखजनक होगा सही. तथापि तुम्हारी इच्छा हमने
पूर्व को।' इसो समय देवों और ऋषियोंने शिवका
पूजन किया और उनसे वहीं उसी रूपमें रहनेको
कहा। महादेव मानवके सुखको वह ठहर गये।
इसी प्रकार एकमूर्ति श्राङ्कार और पार्थिव लिङ्ग दो
भागमें विभक्त हुआ। घोरमूर्ति का सदाशिव और
पार्थिव लिङ्गका नाम अमरेश्वर है।"+<noinclude>{{rule}}</noinclude><poem>+"बोद्धारख यथा ह्यासोत् तथा च श्रूयतां पुनः
कस्मिंचित् समये चाव नारदो भगवांस्तदा ॥ ४२
गोकर्णाख्य' शिवं गत्वा भागतो विध्यकेश्वरम् ।
तव पूजितस्तेन बहुमानपुरःसरम् ॥ ४३
मयि सर्वच विद्येत न न्यून हि कदाचन ।
इति मान' तदा श्रुत्वा नारदो मानहा तदा ॥ 88
निश्वस्य संस्थितस्तव श्रुत्वा विन्धयोऽब्रवीदिदम् ।
किं न्यूनच त्वया दृष्ट' मयि निश्वासकारणम् ॥ ४५
तच्छ्रुत्वा नारदो वाक्यमुवाच श्रयतां पुनः ।
त्वयि तु विद्यते सर्व्व' मेरुरुञ्चतरं पुनः ॥ ४६
देवेष्वपि विभागोऽस्य न तवास्ति कदाचन ।
इत्वा नारदस्तव जगाम च यथागतम् ॥ ४७
विन्धाय परिततो वै धिगेव जीवितादिकम् ।
- विश्वेश्वरं तथा शम्भु' समाराध्य जपाम्यहम् ॥ ४८</poem>
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आजकल द्वीपके मध्यभागमें पोहारचिका पर
नदीके दक्षिण भागमें अमरेश्वरका मन्दिर है। स्थानीय
पूजक चोदारको चादिलिङ्ग कहा करते हैं। रेवाखण्ड में भी ओङ्कारको आदिदेव बताया है।
{{smaller|"ओङारमादिदेवञ्च ये वै ध्यायन्ति नित्यशः।" (२२अ॰)}}
तीर्थयात्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग दर्शन करनेकी
इच्छासे था पहले पोनरमान्धाता चोर पोछे शिक्के
पार्थिवलिङ्ग अमरेश्वरका दर्शन लेते हैं। पश्चिमके
शास्त्रन्न पण्डित इसो श्रोङ्कारमूर्तिको ईश्वरका प्रत
लिए मानते हैं।
जिस समय देवद्वेषो सुलतान महमूदने सोम
नायका मन्दिर तोड़ा, उस समय भी पोहार और
अमरेश्वरका भाव भोंड़ा न था । उक्त दोनों मन्दिरों के
अतिरिक्त अनेक लिङ्ग पोर मन्दिर विद्यमान रहे।
उन सकल प्राचीन मन्दिरोंमें विधर्मी मुसलमानोंके
उत्पात से कई एककाल हो नये कई ध्वसाथ-
शेषमें पड़े और कई अङ्गहोन अवस्था में खड़े हैं। किसी
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<poem>इति निश्चित्य तव व मोङ्कारं यन्त्र के स्वयम् ।
कृत्वा चैव पुनस्तव पार्थिवौं शिवमूर्त्तिकाम् ॥ ४८
आरराध वदा शम्भु' षण्मासञ्च निरन्तरम् ।
न चचाल तदा स्थानाच्छिवध्यानपरायणः ॥ ५०
प्रसन्नव तदा शम्भु ब्र ूहि त्वं मनसेसितम् ।
तमं च दर्शयामास दुलर्भ योगिनामपि ॥ ५१
रूपं यथोक्त' वेदेषु भक्तानामीसितञ्च यत् ।
यदि प्रसन्नो देवेश वृद्धि ं वे हि यथेप्सितम् ॥ ५२
किं करोनि यदा तेन ब्रियते दौयते मया ।
न युक्त परदुःखाय वरदान' ममाशुभम् ॥ ५३
तथापि दत्तवांस्तव यथेपससि तथा पुनः ।
एवं च समये देवा ऋषयश्च तथाऽमलाः ॥ ५४
सम्पूज्य शङ्करं तव स्थातव्यमिति चाब्रुवन् ।
तथैव कृतवान् देवो लोकानां सुखहेतवे ॥ ५५
चकार चैव यन्त्र वै लिङ्गमे तथा पुनः ।
पार्थिवे च तथारूपे लिङ्गमेकं तथा पुनः ॥ ५६
एवं दयं समुत्पन्न' लिङ्गमेकं हिचा व्रतम् ।
प्रणव चोद्धारच नामासीत् स सदाशिवः ॥ ५७
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९१
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६०'''|'''उलटी-रुमाली—उलारा'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
कसरत। मुठसे वक्षःपर मुद्गर आते भी इसमें मुट्ठी नीचे नहीं पड़ती।
{{outdent|उलटी-रुमाली (हिं॰ स्त्री॰) मुगदलकी एक कसरत! इसमें मुगदल आगे को झोंक मारते हैं।}}
{{outdent|उलटी सरसों (हिं॰ स्त्री॰) टेरो, नीचेकी मुंह-वाली कलियोंकी सरसों। इसे अभिचारमें व्यवहार करते हैं।}}
{{outdent|उलटी-सवाई (हिं॰ स्त्री॰) नौ-शृङ्खलाविशेष, जहाजकी एक जञ्जीर। अनीके नीचे सवदरा इसीसे बंधता है।}}
{{outdent|उलटे (हिं॰ क्रि॰ वि॰) व्युत्क्रमसे, खिलाफ तौरपर।}}
{{outdent|उलडना, {{smaller|उलडना देखो।}}}}
{{outdent|उलथना, {{smaller|उलटना देखो।}}}}
{{outdent|उलथा (हिं॰ पु॰) १ अनुवाद, तर्जुमा। २ नृत्य विशेष, किसी किस्मका नाच। इसमें तालपर उछलते जाते हैं।}}
{{outdent|उलथाना, {{smaller|उलटना देखो।}}}}
{{outdent|उलद (हिं॰ स्त्री॰) उंडेल, गिराव।}}
{{outdent|उलदना (हिं॰ क्रि॰) डालना, गिराना।}}
{{outdent|उलप (सं॰ पु॰) बलते, वल-कप्; सम्प्रसारणत्। १ विस्तीर्ण लता, फैलनेवाली बेल। २ कोमल तृण, मुलायम घास। ३ गुल्म, झाड़। ४ वल्ली। ५ शर। ६ कलापीके एक शिष्य।}}
{{outdent|उलप्य (वै॰ पु॰) रुद्र विशेष। {{smaller|(शुक्ल यजुः १६।४५)}} (वि॰) २ उलप-सम्बन्धीय, झाड़से सरोकार रखनेवाला।}}
{{outdent|उलफ़त (अ॰ स्त्री॰) १ मैत्री, दोस्ती। २ प्रेम, प्यार।}}
{{outdent|उलमना (हिं॰ क्रि॰) अवलम्बन लेना, झुक पड़ना, लटक जाना।}}
{{outdent|उलरना (हिं॰ क्रि॰) कूदना, फांदना, झपटना।}}
{{outdent|उलरुवा (हिं॰ पु॰) गाड़ीको उलरने न देनेवाली एक लकड़ी। यह पीछेकी ओर लगता है।}}
{{outdent|उललना (हिं॰ क्रि॰) १ गिरना, पड़ना, ढलना। २ उलट पड़ना, पलटा खाना।}}
{{outdent|उलवी (हिं॰ स्त्री॰) १ मत्स्यविशेष, एक मछली। इसके पखसे सरेस निकलता, जिसका व्यापार चलता है। (अ॰ वि॰) २ स्वर्गीय, विहिश्ती।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उलसना (हिं॰ क्रि॰) उल्लसित होना, चमकना।}}
{{outdent|उलहना (हिं॰ क्रि॰) १ अङ्कुरित होना, फूटना, निकलना। २ प्रफुल्लित होना फूल जाना। (पु॰) ३ निन्दावाद, शिकायत।}}
{{outdent|उला—बङ्गालके नदिया जिलेका एक गण्डग्राम वा नगर। कहते हैं—उलू वनसे आकीर्ण विस्तृत भूमि आबाद होनेसे ही उला नाम पड़ा है। यहां पहले अनेक कुलीन ब्राह्मण और कायस्थ रहते थे। जल-वायु बहुत अच्छा था, परन्तु पीछे बिगड़ गया। कोई पचहत्तर वर्ष बीते मलेरियाने पदार्पण कर इस नगरको श्मशानतुल्य कर दिया था। यह एक प्राचीन स्थान है। उलाकी चण्डी देवी प्रसिद्ध हैं। प्रतिवर्ष वैशाखी पूर्णिमाको बड़े समारोहसे उनकी पूजा होती है। कितने ही बंगला पुस्तकोंमें इस नगरका उल्लेख है। चण्डीमण्डपका सूक्ष्म शिल्पकार्य देखनेसे बङ्गालके प्राचीन शिल्पनैपुण्यका परिचय मिलता है। इसे वीरनगर भी कहते हैं। कारण—प्रायः सत्तर वर्ष हुए एक बार रातको कितने ही अस्त्रधारी दस्यु किस धनीके घर घुसे थे। किन्तु यहांके लोगोंने वीरत्वप्रकाशपूर्वक उनमें कितनों-हीको हताहत किया। इसीसे तत्कालीन जिल्ला-मजिष्ट्रेट एलियट साहबने 'वीरनगर' नाम रखा था। आजकल यहांके मुख्योपाध्याय बाबू बड़े सात्विक क्रियावान् हैं। प्रतिवर्ष रथयात्रा, स्नान-यात्रा, जगद्धात्रीपूजा प्रभृति उत्सव होते हैं।}}
(हिं॰ स्त्री॰) २ मेमना, भेड़का बच्चा।
{{outdent|उलाकांदी—बङ्गाल प्रान्तके मैमनसिंह जिलेका एक नगर। यह मेघना नदीके तीरपर अवस्थित है। लवण और शणका व्यवसाय अधिक होता है।}}
{{outdent|उलाटना, {{smaller|उलटना देखो।}}}}
{{outdent|उलार (हिं॰ वि॰) पश्चात् दिक्में भारग्रस्त, पीछेकी ओर दबी हुई। यह शब्द गाड़ीका विशेषण है।}}
{{outdent|उलारना (हिं॰ क्रि॰) उत्क्षेप्य करना, ऊपरको फेंकना।}}
{{outdent|उलारा (हिं॰ पु॰) पदविशेष। इसे चौतालके अन्तमें गाते हैं।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/३९३
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2026-07-12T16:47:44Z
AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६२'''|'''उलेटना—उल्का'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
हो नागलोक पहुंचे थे। वहां उलूपीकी प्रार्थनाके अनुसार उन्होंने विवाह किया। उलूपीने अपनी मनस्कामना सिद्ध होने पर अर्जुनको वर दिया था—तुम समस्त जलचरोंको जीत सकोगे। {{smaller|(भारत, आदि २१४ अ॰)}} उसी समय मणिपुरपति अर्जुनपुत्र वभ्रुवाहन पिताके आगमनकी वार्त्ता सुन अभ्यर्थना देने गये। अर्जुनने अपने पुत्रको विना युद्धकी सज्जा आते देख अत्यन्त विरक्त हो विस्तर भर्त्सना बतायी थी। वभ्रुवाहन उससे दुःखित न हुये। किन्तु उलूपीने पास जा उन्हें पितासे लड़नेको भड़काया था। उलूपीकी मायासे वभ्रुवाहनने अर्जुनको मार डाला। फिर उलूपीके दिये दिव्य मणिके प्रभावसे ही वह जिये थे। {{smaller|(आश्वमेधिक ७८-८०)}} कुम्भिरा और त्रिपुराके राजा अप-नेका उलूपी और अर्जुनके वंशीय बताते हैं।
{{outdent|उलेटना, {{smaller|उलटना देखो।}}}}
{{outdent|उलेटा, {{smaller|उलटा देखो।}}}}
{{outdent|उलेड़ना (हिं॰ क्रि॰) उंडेलना, डालना।}}
{{outdent|उलेख (हिं॰ स्त्री॰) १ आह्लाद, खुशी। २ उन्नति, वृद्धि, बाढ़। (वि॰) ३ अविघ्न, बेसमझ।}}
{{outdent|उलैंड़ना, {{smaller|उलेड़ना देखो।}}}}
{{outdent|उल्का (सं॰ स्त्री॰) ओषति, उष उकारस्य लत्वं क ततः टाप्। मुकवल्कोल्काः। उणा० ४।४२। १ तेजःपुञ्ज, ज्वाला, खाला, लपट। "उल्का ज्वालादिभावयोः।" {{smaller|(सुभूति)}} २ आकाशसे पतित अग्नि, आसमानसे गिरी आग।}}
कितने ही लोग समझते, आकाशसे जो उल्का-काण्ड पड़ते, उन्हें टूटा तारा कहते हैं। गणनातीत कालसे इस आकाशमें उत्पात होते आये हैं। फिर अति प्राचीन कालसे इस अभावनीय नैसर्गिक घट-नाको देख लोग नानप्रकार कल्पना भी लगाते रहे हैं।
वैदिक ऋषि उल्काको अग्निका अंश मानते {{smaller|(ऋक् १०।६४।४)}} और उल्काकी उत्पत्ति भी सूर्यसे मानते थे। "अवक्षिपन्नुल्कामिव द्योः।" {{smaller|(ऋक् १।१६४।४)}}
देशके प्राचीन ज्योतिर्विद्गोंने इसे अष्ट उपग्रहके मध्य गिना है। {{smaller|उपग्रह देखो।}} उनका मत इस प्रस्ता-वके उपसंहारकालमें विवृत होगा।
युरोपीय वैज्ञानिक ज्योतिर्विद् बहुत दिनसे उल्का
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
का निगूढ तत्त्व समझनेके लिये विस्तर यत्न लगा रहे हैं। किन्तु वस्तुतः वह आज भी उल्काका निगूढ़ तत्त्व विशेष रूपसे ढूंढ़ नहीं सके। जो नाना मत चलते, उनका संक्षिप्त विवरण नीचे लिखते हैं—
किसीकी समझमें टूटनेवाले नक्षत्र (Shooting stars), अग्निके गोलक (Fire-bello) उपनक्षत्र (Astervids) प्रभृति दीप्तिमान् वस्तु ही उल्का हैं। पृथिवीके निकट आनेसे वह हमें देख पड़ते हैं। युरोपके प्राचीन ज्योतिर्विद् कहते, कि वायुमण्डलके ऊर्ध्वभागमें नक्षत्र जैसे कितने ही दीप्तिमान् वस्तु समय समय पर देख पड़ते और गगनमार्गमें द्रुत वेगसे चलते; फिर शीघ्र अन्धकारमें छिपते हैं! कभी कभी कतिपय बृहदाकार वस्तु भी दृष्टिगोचर हो जाती हैं। वायुकी गतिसे उनमें विपर्यय पड़ता है। कोई अल्प-परिसर पथमें फिरते फिरते उज्ज्वल आलोक एवं धूम छोड़ता, कोई दो-तीन खण्डमें टूटता और कोई गम्भीर गर्जनके साथ फट कर भूमितलपर गिरता है।
उल्का पृथिवीपर नानाप्रकारके आकारमें गिरते देख पड़ी है। कभी बिलकुल मेघ न रहती गम्भीर
{{center|'''[[File:Hindi Vishwakosh Vol3 Page362 Ulka.jpg|350px]]'''<br><small>आकाशमें उल्का।</small>}}
गर्जनसे उल्कापात हुआ है। कभी निर्मल आकाश पर अल्प समयके मध्य मेघका अन्धकार चढ़ा और भीषण शब्दके साथ प्रस्तर पड़ा है। कभी आकाशमें सहस्र सहस्र सर्पाकारसे झलक गम्भीर गर्जनके साथ उल्का गिरी है। उल्कामें जो प्रस्तर वा लौह रहता है, वह पार्थिव प्रस्तर वा लौहसे नहीं मिलता! किसी उल्काके लौहमें सैकड़े पीछे ८६ भाग द्रवणीय लौह होता है। कहीं कहीं धातव लौहका अभाव भी रहता है। {{smaller|लौह देखो।}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उल्का'''|'''३६३'''}}
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<div style="text-align: justify;">
उल्काका प्रस्तर कभी क्षुद्राकार कभी बृहदाकार होता है। मङ्गोलियोंके विश्वासानुसार चीन देशके पश्चिमांशमें पोत नदी किनारे जो ४० फीट उच्च पर्वत खड़ा, वह आकाशसे ही टूटकर पड़ा है।
उक्त नाना आकारोंमें गिरनेसे युरोपीयोंनि प्रथम उल्का सम्बन्धपर चार प्रकारका अनुमान बांधा था।
१म—तरल पदार्थसे जैसे धूम उठता, वैसे ही उल्का-सम्बन्धीय द्रव्य भी अतिशय सूक्ष्म आकारमें पृथिवीसे वायुमण्डलके उच्चस्थ मेघपर जा जुटता और रासायनिक क्रियासे मिलकर अपने गुरुत्वके अनुसार नीचे गिरता है।
२य—उल्काके सकल प्रस्तर पहले आग्नेय गिरिसे निकल अपनी गतिके अनुसार आकाशमण्डल पर बहु दूर पर्यन्त चढ़ते और अवशेषमें फिर प्रबल वेगसे पृथिवीपर गिर पड़ते हैं।
३य—किसी किसी समय पर चन्द्रमण्डलके आग्नेय गिरिसे इतने वेगमें धातु निकलता, कि पृथिवीके निकट आ लगता और पृथिवीकी शक्तिसे खिंचकर नीचे गिर पड़ता है।
४र्थ—सकल उल्का उपग्रह हैं। यह सूर्यके चारो ओर अपने अपने कक्षमें घूमती हैं। सकल कक्ष पृथिवीके वार्षिक गतिके पथमें वक्र भावसे उत्तीर्णे होते हैं। कभी पृथिवी इन कक्षोंके समान पड़ जाती है। उस समय कक्षके उल्का नामक उपग्रह पृथिवी पर गिरते अथवा पृथिवीके वायुमण्डलमें घुस आकर्षणकी शक्तिके प्रभावसे अवशेषमें भूमिपर आ पहुंचते हैं।
उक्त चारो मतोंपर बहुत दिन तक वादविवाद चला था! अन्तको प्रसिद्ध युरोपीय ज्योतिर्विद् हरशेल साहबने स्थिर किया—सकल तारकाओंके चारो ओर दृष्टिवहिर्भूत अति क्षुद्र क्षुद्र नीहारिका तारा (Nebulæ)की तरह सूर्यके इधर-उधर भी नीहारिका-वत् पदार्थ (Nebulous matter) की राशि घिरी है। उल्काप्रस्तर (Nebuloric stone) और तारापात (Shooting stars) नामसे होनेवाला नैसर्गिक काण्ड नौहारिकावत् पदार्थका विकाश मात्र है।
<br><br>Vol III. 99
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
जब घटनाके क्रमसे भूमण्डल उक्त पदार्थ-राशिके पास पहुंचता, तब वह पृथिवीके चारो ओर घूर्णन शील चन्द्रवत् ( Sattelite ) समझ पड़ता और पृथिवीके साथ चन्द्रवत् सूर्यके चारो ओर घूम सकता है। वह सुस्पष्ट होते भी चन्द्रवत् सूर्यकी आलोकसे झलक देखनेमें आ जाता है। अनेक उल्का अतिशय क्षुद्र, कतिपय बृहदाकार हैं। पृथिवी ऐसे अनेक सहचरों या चन्द्रोंसे घिरी है। इनमें एक एक इतना बृहत् और कठिन रहता, कि सुस्पष्ट सूर्यका आलोक झलकता है। यह जब पृथिवीके अतिनिकट आता, तब अल्प समयके लिये चर्मचक्षुसे देखा जाता, फिर पृथिवीकी छाया पड़नेसे सम्पूर्ण ग्रहण हो अपना मुंड छिपाता है।
उसके बाद पेटिट साहबने गणनासे ठहराया—उल्काओंमें एक बृहदाकार प्रस्तर है। वह द्वितीय चन्द्रवत् पृथिवीके साथ घूमता है। उसका कक्ष भूमध्यसे ५००० मील और भूके मध्यभागसे ८००० मील दूर अथवा चन्द्रसे २४ मील समीप है। वह पृथिवीकी चारो ओर १० घण्टे २० मिनटमें एकवार घूमता, अतः प्रतिदिन सात वार पृथिवीकी परिक्रमा देता है।
अपने देशके प्राचीन ज्योतिर्विद् श्रीपतिने कहा है।
{{block center|<poem>
"यासां गतिर्दिवि भवेद् गणितेन गम्या तास्तारकाः सकलखेचरतोऽति दूरे।
तिष्ठन्ति या अनियतोद्गतयश्च ताराश्चन्द्राधो हि निवसन्ति तदन्वितास्ताः॥
शीतांशुवज्जलमयाद्यघनात् स्फुरन्ति ताश्चावहप्रवहमारुतसन्निरुद्धाः।
पूर्वानिलैः स्तिमितभावमुपागतोऽग्निर्भाराः पतन्ति कुहचिद् गुरुतावशेन॥"
</poem>}}
जिनकी आकाशगति गणितशास्त्रसे समझ पड़ती और जिनकी अवस्थिति समस्त गगनचारी ज्योतिष्कोंसे अति दूर लगती, उन्हें विद्वन्मण्डली तारका कहती है। फिर जिनकी गतिका नियम नहीं रहता, उन्हें ज्योतिर्विद् तारा कहता है। वह पीछे पीछे चल चन्द्रके अधोभागमें ठहरती हैं। उनमें चन्द्रकी तरह जल भरा है। वह सूर्यके किरणसे चमक स्फुरित होती हैं। उनका संस्थान आवह और प्रवह दो मारुतोंके सन्निरुद्धमें है। फिर स्तिमित भाव प्राप्त होते ही वह गुरुत्वके कारण पूर्वपवनसे भूमिके किसी स्थलपर गिर पड़ती हैं।
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६४'''|'''उल्काग्नि—उल्ब्य'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
वराहमिहिरके मतानुसार—स्वर्गसे शुभफल भोग जो गिर पड़ते, उन्हींके रूपका नाम उल्का रखते हैं। धिष्ण्या, उल्का, अशनि, विद्युत् और तारा पांच भेद हैं। उल्का तथा धिष्ण्याका पन्द्रह, अशनिका पैंतालीस और विद्युत् एवं ताराका फल कुछ दिनमें मिलता है। ताराका चतुर्थांश, धिष्ण्याका अर्द्धांश और विद्युत्, उल्का एवं अशनिका सम्पूर्ण फल है। अशनिकी आकृति चक्राकार है। वह गम्भीर शब्दके साथ मनुष्य, हस्ती, अश्व, गृह, वृक्ष और जन्तु प्रभृति पर गिरती है। विद्युत् कुटिलाकार एवं विस्तृत रहती और सहसा कड़कड़ाहटके साथ गिर जीवोंका विनाश करती है। धिष्ण्या कृश, अल्पपुच्छविशिष्ट, प्रज्वलित अङ्गार-तुल्य और हस्तद्वय परिमित है। तारा एक हस्त प्रमाण, दीर्घाकृति, एवं शुक्ल अथवा ताम्रवर्ण लगती और आकाशमें ऊर्ध्व-अधः वा वक्र-भावसे चलती है। उल्काका शिरोभाग अधिक विस्तृत रहता और गिरनेसे बढ़ चलता है। पुच्छ कृश एवं आकार दीर्घ है। यह उल्का नानाप्रकारकी होती है। {{smaller|(वृहत्संहिता ३३ अ॰)}}
कलकत्तेके अजायब घर (Museum)में अनेक उल्काप्रस्तर रखे हैं। उनके मध्य एक १८६१ ई॰की १२ वीं मईको गोरखपुरमें मिला था। उसका वज़न दो मनसे अधिक है। सिवा इसके यशोहर, बांकुड़ा, प्रभृति ज़िलोंसे भी वृहत् वृहत् उल्काके प्रस्तर संग्रह किये गये हैं।
उल्काके लौहमें अपर धातु मिलानेसे नानाप्रकारके यन्त्रादि वन सकते हैं। सुनते—ईरानके बादशाह और तिब्बतके लामा उल्काके लोहेसे वनी तलवार रखते हैं।
{{outdent|उल्काग्नि (सं॰ पु॰) उल्कैवाग्निः। उल्का, आसमानसे टूटनेवाला तारा।}}
{{outdent|उल्काचक्र (सं॰ क्ली॰) १ छिन्नमन्त्रका शुभाशुभज्ञापक चक्रविशेष। "उल्काचक्रं संप्रवक्ष्ये मन्त्रदोषादिनिर्णयम्।" {{smaller|(रुद्रयामल)}} २ विघ्न, गड़बड़। ३ उपद्रव, हलचल।}}
{{outdent|उल्काजिह्व (सं॰ पु॰) उल्केव जिह्वा यस्य। रामायणोक्त प्रसिद्ध राक्षसविशेष।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उल्काधारी (सं॰ वि॰) मशालची, फलीतेवाला।}}
{{outdent|उल्कापात (सं॰ पु॰) उल्कानां पातः। १ तामस उत्पात विशेष, आसमानसे तारोंका टूटना। २ विघ्न, बुराई।}}
{{outdent|उल्कामत्स्य (सं॰ पु॰) मत्स्यविशेष, सूस।}}
{{outdent|उल्कामाली (सं॰ पु॰) शिवके एक भृत्य।}}
{{outdent|उल्कामुख (सं॰ पु॰) उल्केव मुखं यस्य। १ प्रेतविशेष। "वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात् स्वकाच्च्युतः।" {{smaller|(मनु १२।७१)}} २ इक्ष्वाकुके एक वंशज।}}
{{outdent|उल्कामुखी (सं॰ स्त्री॰) शृगाली विशेष, लोमड़ी। इसका पर्याय शृगालिका, लोमालिका, दीप्तजिह्वा और किखि है।}}
{{outdent|उल्कुषी (सं॰ स्त्री॰) उला दाहेन कुषति, कुष-क-ङीष्। १ उल्का, तारिका टूटना। "अशनिरेव प्रथमोऽनुवाकः ह्रादुनिर्द्वितीय उल्कुषी तृतीयः।" {{smaller|(शतपथब्रा॰ ११।२।७।२१)}} 'उल्कुषी उल्का।' {{smaller|(सायण)}} २ मशाल, फलीता।}}
{{outdent|उल्कुषीमान् (दै॰ पु॰) उल्काविशिष्ट, तारेके टटनेसे सरोकार रखनेवाला। "भवेद्यत्र यव प्रापादि शग्म उल्कुषीमान्।" {{smaller|(अथर्ववेद ४।१७।४)}}}}
{{outdent|उलटा, {{smaller|उलटा देखो।}}}}
{{outdent|उलथा, {{smaller|उलथा देखो।}}}}
{{outdent|उल्ब (सं॰ क्ली॰) उत्-लोङ् क्षेपणे इति साधुः। उणादयश्च। उण् ४।८५। १ जरायु। २ गर्भवेष्टनचर्म। ३ गर्भ, हमल।
"जातमात्रं विशोध्योल्बादानं सैन्धवसर्पिषा।" {{smaller|(वाग्भट, उत्तरस्थान १ अ॰)}}
"गर्भो जरायुणावृतः उल्बं जहाति जन्मनः।" {{smaller|(शुक्लयजुः १९।७६)}}}}
{{outdent|उल्बण (सं॰ त्रि॰) उत्-वण्-अच् पृषोदरादित्वात् साधुः। १ प्रबल, ज़ोरावर। २ उद्धट, अक्खड़। ३ व्याप्त, भरा हुआ। ४ स्फुट, खिला हुआ। "हेतुर्लक्षणसंसर्गाद्व्याध्यनुल्बणलक्षणानि च।" {{smaller|(माधवनिदान)}} ५ तीक्ष्ण, तेज़। ६ प्रकाशित, ज़ाहिर। ७ निर्बाध, बेखटका। "तस्यासीदुल्बणो मार्गः पादपैरिव दन्तिनः।" {{smaller|(रघु ४।३३)}} (क्ली॰) ८ शरीरस्थित वात अथवा पित्तके प्रकोपका रोग। (पु॰) ९ वशिष्ठके एक पुत्र।}}
{{outdent|उल्ब्य (सं॰ क्ली॰) १ शरीरस्थित वातपित्त वा कफका आधिक्य। २ विपद्, आफ़त।}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उल्मुक—उल्लाप्य'''|'''३६५'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उल्मुक (सं॰ क्ली॰) ओषतीति, उषदाहे उल्मुकदर्वीति निपातनात् यस्य लः मुक् प्रत्ययश्च। १ ज्वलदङ्गार, जलती हुई लकड़ी या कोयला। "अन्वाहार्यपचनादुल्मुकमादाय।" {{smaller|(शतपथब्रा॰ ६।२।७)}} २ वृष्णिवंशीय एक राजा। {{smaller|भारत, सभा ३८।१६ )}} ३ बलरामके एक पुत्र।}}
{{outdent|उल्मुक्य (सं॰ पु॰) उल्मुके भवं यत्। १ अग्नि, आग। "अथ हैक उल्मुक्येम दहन्ति।" {{smaller|(शतपथब्रा॰ १२।५।१।१६)}} (त्रि॰) २ अङ्गार-सम्बन्धीय, जलती लकड़ीसे सरोकार रखनेवाला।}}
{{outdent|उल्लङ्कसन (सं॰ क्ली॰) रोमाञ्च, रोंगटोंका खड़ा होना।}}
{{outdent|उल्लग्न (सं॰ पु॰) किसी स्थानविशेषका लग्न।}}
{{outdent|उल्लङ्घन (सं॰ क्ली॰) उत्-लघि-ल्युट्। अतिक्रमण, लंघाई, पार जवाई।}}
{{outdent|उल्लङ्घना, {{smaller|उल्लंघना देखो।}}}}
{{outdent|उल्लङ्घनीय (सं॰ त्रि॰) अतिक्रमणयोग्य, जो लांघा जानेके काबिल हो।}}
{{outdent|उल्लङ्घित (सं॰ त्रि॰) अतिक्रमण किया हुआ, जो लांघा गया हो।}}
{{outdent|उल्लङ्घितशासन (सं॰ त्रि॰) आज्ञा न माननेवाला, नाफरमांवरदार, बलवाई।}}
{{outdent|उल्लङ्घिताध्वन् (सं॰ त्रि॰) मार्गके ऊपरसे गुज़रा हुआ, जो राह पार कर चुका हो।}}
{{outdent|उल्लङ्घ्य (सं॰ त्रि॰) उत्-लघि-यत्। उल्लङ्घनके योग्य, लांघने लायक।}}
{{outdent|उल्लम्फन (सं॰ क्ली॰) उत्-रम्फ-ल्युट्। कूद-फांद, उछाल।}}
{{outdent|उल्लम्बित (सं॰ त्रि॰) दण्डायमान, सीधा, खड़ा।}}
{{outdent|उल्लल (सं॰ त्रि॰) उत्-लल्-अच्। १ बहुलोम-युक्त, मोटे बालोंसे ढका हुआ। २ कम्पायमान, हिलता हुआ, जो कांप रहा हो।}}
{{outdent|उल्ललत् (सं॰ त्रि॰) १ कम्पायमान, हिलता हुआ। २ अनियमित रूपसे चलायमान, जो बेक़ायदे सरक रहा हो।}}
{{outdent|उल्ललित (सं॰ त्रि॰) उत्-लल-क्त। १ उचलित, जो चल चुका हो। २ तरलित, बहता हुआ। ३ कम्पित, कांपनेवाला।}}
{{outdent|उल्लस (सं॰ त्रि॰) १ प्रकाशमान, चमकीला। २ प्रसन्न, खुश। २ वहिर्गमन करनेवाला, जो निकल रहा हो।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उल्लसत् (सं॰ त्रि॰) १ क्रीड़ा-वा नृत्य करनेवाला, जो नाचकूद रहा हो। २ दीप्त, चमकीला। ३ स्वेच्छाचारी, मनमौजी।}}
{{outdent|उल्लसता (सं॰ स्त्री॰) १ दीप्ति, चमक। २ प्रसन्नता, खुशी।}}
{{outdent|उल्लसन (सं॰ क्ली॰) उत्-लस-ल्युट्। १ हर्षजनक व्यापार, खुशी पैदा करनेवाला काम। २ रोमाञ्च, रोंगटोंका खड़ा होना।}}
{{outdent|उल्लसनक, {{smaller|उल्लसन देखो।}}}}
{{outdent|उल्लसित (सं॰ त्रि॰) उत्-लस्-क्त। १ स्फुरित, फड़कने वाला। २ उद्गत, उठा हुआ। ३ आनन्दित, खुश।}}
{{outdent|उल्लसित-हरिण-केतन (सं॰ त्रि॰) जिसके हरिणका झण्डा फहराये।}}
{{outdent|उल्लाघ (सं॰ त्रि॰) उत्-लाघ-क्त निपातनात्। १ नीरोग, जिसके कोई बीमारी न रहे। २ दक्ष, होशियार। ३ शुचि, पाक-साफ़। ४ हृष्ट, मज़बूत। (पु॰) ५ मरिच, मिर्च।}}
{{outdent|उल्लाप (सं॰ पु॰) उत्-लप्-घञ्। १ शोक, अफ़सोस। "उल्लापापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरैः।" {{smaller|(भर्त्तृहरि ३।६)}} २ उच्चैःस्वरके साथ आह्वान, ज़ोरकी पुकार।}}
{{outdent|उल्लापक, {{smaller|उल्लापिक देखो।}}}}
{{outdent|उल्लापन (सं॰ क्ली॰) उत्-लप्-णिच्-ल्युट्। १ वृत्ति प्रभृति द्वारा शास्त्रकी प्रकृत व्याख्याका करना, समझा समझा कर कहना। २ खुशामदी बातें, ठकुरसोहाती।}}
{{outdent|उल्लापिक (सं॰ त्रि॰) वर्णन करनेवाला, जो खुशामदकी बातें कहता हो।}}
{{outdent|उल्लापिन् (सं॰ त्रि॰) आह्वान करनेवाला, जो ज़ोरसे पुकार रहा हो।}}
{{outdent|उल्लाप्य (सं॰ क्ली॰) उत्-लप्-णिच्-यत्। प्रेम एवं हास्यविषयक नाटकविशेष। यह स्वर्गीय घटनापर बनता है। सङ्ग्रामका ही वर्णन अधिकांश होता है। हास्य, करुणा प्रभृति रस और सङ्गीतसे उल्लाप्य भरा रहता है। नायक उदात्त गुणविशिष्ट होता है।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६६'''|'''उल्लाल—उल्लेख'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
किन्तु अङ्क एक ही लगता है। किसी-किसीके कथनानुसार उल्लाप्यमें तीन अङ्क और इक्कीस शिल्पकाङ्ग पड़ते हैं। उल्लासके मध्य 'देवीमहादेव' नामक संस्कृत ग्रन्थ प्रसिद्ध है।
{{outdent|उल्लाल (सं॰ पु॰) छन्दोविशेष। इसके प्रथम एवं तृतीयमें पन्द्रह और द्वितीय तथा चतुर्थ पादमें तेरह मात्रा लगती हैं।}}
{{outdent|उल्लाला (हिं॰ पु॰) छन्दोविशेष। इसके हरएक चरणमें केवल तेरह मात्रा लगती हैं।}}
{{outdent|उल्लास (सं॰ पु॰) उत्-लस्-घञ्। १ ग्रन्थ विशेषका परिच्छेद, किसी किताबका बाब। २ आह्लाद, खुशी। ३ प्रकाश, रौशनी।}}
{{block center|<poem>
"सौहित्यवचनोल्लासहासप्रतिभादिकृत्।" {{smaller|(साहित्यदर्पण)}}
</poem>}}
४ उद्गमन, उठान।
{{block center|<poem>
"नभोविलङ्घिभिः सेनारजोराशिभिरुद्धतैः।
सपक्षभूभृदुल्लासमद्धा कुर्वन् शतक्रतोः॥" {{smaller|(कथासरित् १४।१८)}}
</poem>}}
५ उज्ज्वलता, सफेदी। ६ वृद्धि, बढ़ती। ७ काव्यालङ्कार विशेष। इसमें उपमा वा उपरोधसे किसी विषयको प्रधान बनाते हैं।
{{outdent|उल्लासक (सं॰ त्रि॰) आह्लादकारी, जो मज़ा करता हो।}}
{{outdent|उल्लासन (सं॰ क्ली॰) १ नचाने या कुदानेका काम। २ दीप्ति, चमक।}}
{{outdent|उल्लासित (सं॰ त्रि॰) आह्लादित, खुश, जो फूला न समाया हो।}}
{{outdent|उल्लासी (सं॰ त्रि॰) उत्-लस्-णिनि। १ उल्लासयुक्त, खुशी मनानेवाला। २ प्रभावविशिष्ट, चमकदार। ३ आह्लादित, खुश।}}
{{outdent|उल्लिखत् (सं॰ त्रि॰) १ उत्कीर्ण करनेवाला, जो खींच या घसीट रहा हो। २ रेखा खींचनेवाला, जो लकीर निकाल रहा हो। ३ चित्रकारी करनेवाला, जो मुसव्वरी कर रहा हो। ४ वहन करनेवाला, जो उठा रहा हो।}}
{{outdent|उल्लिखित (सं॰ त्रि॰) उत्-लिख-क्त। १ उत्कीर्ण, खुदा हुआ। २ तनूकृत, बारीक किया हुआ।}}
{{block center|<poem>
"भद्रे वपुर्नोल्लिखितं विभाति।" {{smaller|(रघु १६।३२)}}
</poem>}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
३ चित्रित, रंगा हुआ। ४ उत्तोलित, उठाया हुआ। ५ पूर्व कहा हुआ, जो पहले बताया जा चुका हो।
{{outdent|उल्लिङ्गित (सं॰ त्रि॰) परिचित, पहचाना हुआ, जो समझा जा चुका हो।}}
{{outdent|उल्ली (सं॰ स्त्री॰) पलाण्डु, प्याज़।}}
{{outdent|उल्लु (सं॰ त्रि॰) उत्-लु-क्विप्। उत्पाटनकारी, उखाड़ डालनेवाला।}}
{{outdent|उल्लुञ्चन (सं॰ क्ली॰) उत्-लुञ्चि-ल्युट्। १ केशोत्पाटन, बालोंको नोच खसोट। २ उन्मूलन, उखाड़।}}
{{block center|<poem>
"पादकेशाग्रककरोल्लुञ्चने च पणान् दश।" {{smaller|(याज्ञवल्क्य २।२१७)}}
</poem>}}
३ केशकर्त्तन, बालकी कटाई।
{{outdent|उल्लुण्डन (सं॰ क्ली॰) उत्-लुठि-ल्युट्। निज अभिप्राय छिपा अन्य प्रकारसे मनोभावका प्रकाश, अपना मतलब छिपा दूसरी तरहसे दिलकी हालतका इज़हार।}}
{{outdent|उल्लुण्ढा (सं॰ स्त्री॰) व्याजस्तुति, बोली-ठोली।}}
{{outdent|उल्लू (सं॰ त्रि॰) १ कर्त्तन करनेवाला, जो काट डालता हो। (हिं॰ पु॰) २ उलूक, घुग्घू। यह पक्षी दिनमें अंधा रहता है। वर्ण धूसर है। शिर वर्त्तुल तथा चञ्चु प्रदीप्त रहता है। उल्लू कई तरहका होता है। किसीके शिर पर शिखा उठी रहती है। फिर किसीके पच्छ पदकी अङ्गुलितक पहुंचते हैं। उच्चता ५ इञ्चसे २ फीट पर्यन्त है। चञ्चु कुटिल रहती है। किसीके पच्छ कर्णके समीप ऊपर चढ़ जाते हैं। पच्छ मृदु, किन्तु पद कठोर होते हैं। उल्लू दिनको गुप्त रहता और रात्रिको देख पड़ता है। यह मांसाशी पक्षी है। कीटपतङ्गादिसे अपना जीवन निर्वाह करता है। शब्द बड़ा भयानक है! उल्लू प्रायः निर्जन स्थानमें निवास करता है। भारतमें इसका शब्द तथा ग्राममें वास अशुभ माना गया है। मांससे उच्चाटनादि प्रयोग किया करते हैं। पृथिवी पर किसी जातिके लोग इसे भक्ष्य नहीं बताते। इसका मांस पित्तल, भ्रान्तिकारक और वातप्रकोपन होता है। ३ मूर्ख, बेसमझ।}}
{{outdent|उल्लेख (सं॰ पु॰) उत्-लिख-घञ्। १ कथन, कहाई। २ खनन, खोदाई। ३ अलङ्कारविशेष।}}
{{block center|<poem>
"क्वचिद् भेदाद्ग्रहीतृणां विषयाणां तथा क्वचित्।
एकस्यानेकधोल्लेखो यः स उल्लेख उच्यते।" {{smaller|(साहित्यदर्पण १०म परि॰)}}
</poem>}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उल्लेखन—उशीक्'''|'''३६७'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
अनुभावक और विषयके भेदानुसार एक वस्तुका बहुप्रकार वर्णन आनेसे उल्लेखालङ्कार होता है। ४ वर्णन, बयान।
{{outdent|उल्लेखन (सं॰ क्ली॰) १ वमन, कै। २ खनन, खोदाई।}}
{{block center|<poem>
"सम्मार्जनोपाञ्जनेन सेकेनोल्लेखनेन च।
गवाञ्च परिवासेन भूमिः शुद्ध्यति पञ्चभिः॥" {{smaller|(मनु ५।१२४)}}
</poem>}}
३ उच्चारण, तलफ़्फ़ुज़।
{{block center|<poem>
"मासपचतिथीनाञ्च निमित्तानाञ्च सर्वशः।
उल्लेखनन्नकुर्वाणो न तस्य फलभाग् भवेत्॥" {{smaller|(तिथ्यादितत्त्व)}}
</poem>}}
४ कीर्त्तन, गवाई। ५ निर्देश, देखाई। ६ चित्रकारी, मुसव्वरी।
{{outdent|उल्लेखनीय, (सं॰ त्रि॰) {{smaller|उल्लेख्य देखो।}}}}
{{outdent|उल्लेख्य (सं॰ त्रि॰) उत्-लिख-यत्। उल्लेखके योग्य, लिखने लायक्।}}
{{block center|<poem>
"तदेतत् सिद्धये मन्त्रं दारीशे ल्लक्षं ददामि ते।" {{smaller|(कथासरित्)}}
</poem>}}
{{outdent|उल्लोच (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं लोच्यते, अथवा ऊर्ध्वं लोचति, उत्-लोच-घञ्। चन्द्रातप, तम्बू, चंदोवा।}}
{{outdent|उल्लोप्य (सं॰ क्ली॰) उत्-लुप-यत्। गीतविशेष, एक गाना।}}
{{outdent|उल्लोल (सं॰ पु॰) उल्लोलोति, उत्-लोल-णिच्-अच्। बृहत्तरङ्ग, बड़ी लहर।}}
{{outdent|उल्ब, {{smaller|उल्ब देखो।}}}}
{{outdent|उल्बण, {{smaller|उल्बण देखो।}}}}
{{outdent|उवट—प्रसिद्ध वेदभाष्यकार। इन्होंने शुक्लयजुर्वेदकी काण्वशाखाका भाष्य और ऋग्वेदीय 'शौनकप्रातिशाख्यभाष्य' नामक ग्रन्थ बनाया है। यजुर्वेदभाष्य पढ़नेसे समझते हैं कि उवट वज्रटके पुत्र और आनन्दपुरके अधिवासी थे। यथा—}}
{{block center|<poem>
"आनन्दपुरवास्तव्यवज्रटाख्यस्य सूनुना।
मन्त्रभाष्यमिदं कृतञ्च पदवाक्यैः सुनिश्चितैः॥"
</poem>}}
किसीके मतानुसार ई॰ एकादश शताब्दीमें भोजराजके समय यह अवन्तिनगरमें विद्यमान रहे। भविष्यभक्तिमाहात्म्य नामक संस्कृत ग्रन्थमें लिखते हैं कि उवट काश्मीर देशमें रहते और मम्मट तथा कैयटके समसामयिक थे।
<br><br>Vol III. 100
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
"उवटो मम्मटश्चैव कैयटश्चेति ते त्रयः।
कैयटो भाष्यटीकाकृदुवटो वेदभाष्यकृत्॥" {{smaller|(भक्तिमा॰ ३१८ पृ॰)}}
</poem>}}
सुननेमें आया है कि ऋग्वेदीय शौनकप्रातिशाख्य-भाष्य लिखने बाद उवटने ऋग्भाष्य बनाया था।
{{outdent|उवना (हिं॰ क्रि॰) उदित होना, निकल आना।}}
{{outdent|उवनि (हिं॰ स्त्री॰) उदय, उठान, निकास।}}
{{outdent|उशङ्कव (सं॰ पु॰) नृपतिविशेष, एक राजा।}}
{{outdent|उशत् (सं॰ त्रि॰) वश-शतृ। आकाङ्क्षाकारी, ख्वाहिशमन्द, चाहनेवाला।}}
{{outdent|उशती (सं॰ स्त्री॰) वश-शतृ-ङीप् सम्प्रसारणम्। १ आकाङ्क्षिणी, चाहनेवाली। २ अमङ्गलवाक्य, बुरी बात।}}
{{outdent|उशधक् (वै॰ त्रि॰) अभिलाष रखने और दहन करने वाला। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|उशना (वै॰ अव्य॰) अभिलाषसे, खुशीमें, जल्द।}}
{{outdent|उशनाः (सं॰ पु॰) वश कान्तौ कनसि ऋह्यादित्वात् सम्प्रसारणम्। वशेः कनसिः। उण् ४।२३७। दैत्यगुरु शुक्राचार्य।}}
{{block center|<poem>
"उशनाचोशनसः पुत्रस्तस्यासीत्सुतराजकः।" {{smaller|(भारत, आदि)}}
</poem>}}
{{smaller|शुक्र देखो।}}
{{outdent|उशवा (अं॰ पु॰) वृक्ष विशेष, एक पेड़। इसका मूल रक्तशोधक है। खून बिगड़नेसे प्रायः लोग उशवा पीते हैं।}}
{{outdent|उशाना (वै॰ स्त्री॰) वश-चानश्। ताच्छील्यावयोवचनशक्तिषु चानश्। पा ३।२।१२८। पर्वतजात यज्ञीय ओषधिविशेष, होममें लगनेवाली एक पहाड़ी बूटी। "तदेयोशाना नामौषधिर्जायते।" {{smaller|(शतपथब्रा॰ ४।४।१।३)}}}}
{{outdent|उशिक् (सं॰ त्रि॰) उश्यते, वश-इजिः-कित्। वशः कत्। उण् २।७१। १ कमनीय, चाहा जाने क़ाबिल, उम्दा। २ मेधावी, होशियार। {{smaller|(निघण्टु ३।१५)}} (पु॰) ३ अग्नि, आग। ४ घृत, घी। (स्त्री॰) ५ कच्चिवान्की माता।}}
{{outdent|उशित (सं॰ त्रि॰) अभिलषित, चाहा हुआ।}}
{{outdent|उशी (सं॰ स्त्री॰) वश-ई सम्प्रसारणम्। अभिलाष, ख्वाहिश।}}
{{outdent|उशीक्, {{smaller|उशिक् देखो।}}}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''३६८'''|'''उशीनर—उशीरादि पाचन'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उशीनर (सं॰ पु॰) उशीप्रदो वाञ्छाप्रदो नरो यत्र। १ गन्धार देश। २ गन्धार जनपदवासी क्षत्रिय।}}
{{block center|<poem>
"द्राविडाश्च कलिङ्गाश्च पुलिन्दाश्चाप्युशीनराः।
कोलिसर्पामाहिषकास्तास्ताः क्षत्रियजातयः।
वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात्॥" {{smaller|(भारत, अनु ३३।२२)}}
</poem>}}
३ चन्द्रवंशीय एक राजा। यह शिवि राजाके पिता और महामनाके पुत्र थे। इनके चरित सम्बन्धमें कहा है—
'एक समय इन्द्र और अग्निने उशीनरका धर्मबल देखनेके लिये श्येन एवं कपोतकी मूर्त्ति बनाई। और श्येनके भयसे कपोतने राजाके ऊरु देशमें जाकर आश्रय लिया। तब श्येन कहने लगा—अपने भक्ष्य कपोतके आपका आश्रय पकड़नेसे मैं भोजनाभावसे अत्यन्त कातर हो रहा हूं; अतएव उसे देकर अपना धर्म बचाइये। राजाने उत्तर दिया—इस कपोतने तुम्हारे भयसे घबड़ाकर जो हमारा आश्रय लिया है, इसको छोड़ना हमारा धर्म नहीं, क्योंकि शरणागतका त्याग विप्र, गो और मातृहत्याके तुल्य पातक है। श्येन बोला—आहारके लिये ही सब प्राणी बने और आहारसे ही सब जीव पले हैं; अन्यान्य सकल विषय छोड़ चिरकाल जी सकते हैं, किन्तु आहार न मिलनेसेही लोग मरते हैं—आहार न पानेसे मेरा प्राण कैसे बचेगा और मेरे मरनेसे स्त्रीपुत्रोंका ठिकाना कहां लगेगा। इसलिये एक कपोतकी रक्षासे बहु प्राणी नष्ट होते हैं। अपर धर्मसे विरोध रखनेवाला धर्म कुधर्म है। इन दोनोंके मध्य गुरु लघु देख उचित कर्त्तव्य निर्द्धारण कीजिये। राजाने कहा—पक्षिन् ! अपनी बातसे धर्मज्ञ समझ पड़ते भी तुम क्यों अधार्मिककी तरह ऐसा अनुरोध कराते हो ? क्षुधा मिटानेके लिये कपोतको छोड़ अपर जो चाहो, कहते ही पावोगे। इसपर श्येनने कपोतकी बराबर राजाका मांस मांगा था। राजाने अविचलित चित्तसे वही मान कपोत परिमित मांस देते देते क्रमसे सब शरीर काट डाला। {{smaller|(भारत वन १३१ अ॰)}}
{{outdent|उशीर (सं॰ पु॰ क्ली॰) वश-ईरन्-कित्। वशः कित्। उण् ४।३१। सुगन्धिमूलक, खस।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
संस्कृत पर्याय—अभय, नलद, सेव्य, अमृणाल, जलाशय, लामज्जक, लघु, लय, अवदाह, इष्टकापथ, उषीर, शृगाल, लघु, लय, अवदान, इष्टकापथ, इन्द्रगुप्त, जलवास, हरिप्रिय, वीर, वीरण, समगन्धिक, रणप्रिय, वीरतरु, शिशिर, शीतमूलक, वितानमूलक, जलमेद, सुगन्धिक, सुगन्धिमूलक और कछु है।
खसका क्षुप ५।६ फीट पर्यन्त बढ़ता है। मूल पीताभ पांशुवर्ण, गन्ध तीव्र और आस्वाद कटु है। यह भारत और ब्रह्मदेशमें उत्पन्न होता है। इसकी जड़को पङ्खे और टट्टीमें लगाते हैं। आजकल इसे युरोपमें कितनेही लोग सुगन्धि द्रव्यकी तरह व्यवहार करते हैं। सबको जलके साथ बांटकर मत्थेपर लगानेसे तरावट आती है। वैद्यकके मतसे उशीर घर्म, दौर्गन्ध्य, दाह, रक्तपित्तका रोग, मोह, भ्रम, ज्वर तथा पित्तको दबाता और सुगन्ध बढ़ाता है। यह शीतल, लघु, तिक्त एवं पाचक है।
{{outdent|उशीरक (सं॰ क्ली॰) उशीर स्वार्थे कन्। {{smaller|उशीर देखो।}}}}
{{outdent|उशीरगिरि (सं॰ पु॰) पर्वत विशेष, मैनाक पहाड़।}}
{{outdent|उशीरवीज (सं॰ पु॰) १ उशीरका वीज, खसका तुख्म। २ मैनाक पर्वत, हिमालयके उत्तर एक पहाड़।}}
{{outdent|उशीरस्तम्ब (सं॰ पु॰) खसका गट्ठा।}}
{{outdent|उशीरादिचूर्ण (सं॰ क्ली॰) चूर्ण विशेष, एक बुकनी। उशीर, तगरपादुका, शुण्ठी, काकला, श्वेतचन्दन, रक्तचन्दन, लवङ्ग, पिप्पलीमूल, पिप्पली, एला, नागेश्वर, मुस्तक, यष्टिमधु, कर्पूर, वंशलोचन और तेजःपत्र सबको बराबर ले कूटे-पीसे। फिर समुदाय चूर्णके समान कृष्णा अगुरुका चूर्ण डाल अष्ट गुण शर्करा मिलानेसे यह प्रस्तुत होता है। उशीरादि चूर्ण आधा तोला लेनेसे रक्त वमन, पिपासा और गात्रदाहका वेग मिट जाता है। इस औषधके सेवन बाद दो तोले गूलरका रस डेढ़ तोला चीनी मिलाकर पीना चाहिये।}}
{{outdent|उशीरादि पाचन (सं॰ क्ली॰) पाचन विशेष, एक काढ़ा। उशीर, वाला, मुस्तक, धान्यक, शुण्ठी, वरीक्रान्ता, लोध्र एवं वेणशुण्ठी चार-चार आनीभर ले आध सेर जलमें पकाये। आध पाव जल जलते-जलते बचने पर उतार कर पाचनको छान लेना चाहिये। इसे}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उशीरासव—उषसुत'''|'''३६९'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
पीनेसे अरुचि, अतिशय वेदनायुक्त विबन्ध घर्म्मं, ज्वरातिसार और रक्तातिसार प्रभृति रोग प्रशमित होते हैं।
{{outdent|उशीरासव (सं॰ क्ली॰) आसव विशेष, एक दवा। उशीर, वाला, पद्ममूल, गाम्भारीत्वक्, नीलोत्पल, प्रियङ्गु, पद्मकाष्ठ, लोध्र, कुड़, मञ्जिष्ठा, दुरालभा, अर्क, चिरायता, उदुम्बरत्वक्, राठी, क्षेत्र-पापड़ा, पटोलपत्र, काञ्चनत्वक्, अमरूदकी छाल, तथा मोचरस आठ-आठ तोले, द्राक्षा १६० तोले, धायके फूल १२८ तोले, चीनी ढाई सेर, मधु सवा छह सेर और जल आठ सेर किसी नूतन पात्रमें डाल मुंह बांध कर एक महीने रख छोड़े। फिर इस आसवको उपयुक्त मात्रामें सेवन करनेसे रक्तपित्त प्रमेह प्रभृति अनेक रोग विनष्ट होते हैं। इस आसवको रखनेका पात्र प्रथमतः जटामांसी और मरिच चूर्ण द्वारा धूपित कर लेना चाहिये।}}
{{outdent|उशीरिक (सं॰ पु॰) उशीर-ठन्। किसरादिभ्यः ठन्। पा ४।४।५३। १ उशीरका व्यवसायी, खसका रोज़गार करनेवाला। (त्रि॰) २ उशीर सम्बन्धीय, खसका बना हुआ।}}
{{outdent|उशीरी (सं॰ स्त्री॰) उशीर स्वार्थे ङीष्। छोटी केशे। इसका संस्कृत पर्याय मिषि, गुञ्जा, अम्लान, नीरज और शर है। यह मधुर एवं शीतल और पित्त, दाह तथा क्षयरोगनाशक है। {{smaller|(राजनिघण्टु)}}}}
{{outdent|उशेण्य (सं॰ त्रि॰) वश-केन्य। छन्दसि वशेर्केन्यकेन्ल्यनः। पा ३।१।८४। कमनीय, खूब सूरत, चाहाजाने क़ाबिल। "आं ये मातुरुशेण्यो जनिष्ठ।" {{smaller|(ऋक् २।३।८)}}}}
{{outdent|उष् (धातु) सक॰ भ्वा॰ पर॰ सेट्। इसका अर्थ दहन और वध करना है।}}
{{outdent|उष (सं॰ पु॰) उष-क। १ क्षारमृत्तिका, खारी मट्टी। २ प्रभात, सबेरा। ३ रात्रिका शेष समय रातका आखिरी वक़्त। ४ कामी, शहवतपरस्त। ५ गुग्गुल, गूगुर। (क्ली॰) ६ पांशुज लवण।}}
{{outdent|उषङ्कु (सं॰ पु॰) संहारकर्त्ता महेश्वर।}}
{{outdent|उषण (सं॰ क्ली॰) उष बाहुलकात् क्युन् वा। १ मरिच, मिर्च। २ शुण्ठी, सोंठ। ३ चविक। ४ पिप्पलीमूल, पिपलमूल।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उषणा (सं॰ स्त्री॰) उषण-टाप्। १ पिप्पली, पीपर। २ शुण्ठी, सोंठ। ३ चविका।}}
{{outdent|उषणादिचूर्ण (सं॰ क्ली॰) चूर्णविशेष, एक बुकनी। मरिच, पिप्पलीमूल, मुस्तक, अतिविषा, वासकत्वक्, गोक्षुर, बृहती, कण्टकारी, यष्टिमधु, मूर्वामूल, भार्ङ्गीयष्टिका, मोचा, वंशलोचन और यवक्षार बराबर एक साथ कूट-पीस कपड़ा छान करनेसे यह चूर्ण बनता है। उषणादिचूर्ण एक मासा जलके साथ खानेसे लोहितज्वर, विस्फोटक, रोमान्तिका, जीर्णज्वर, और मसूरिका रोग अच्छा हो जाता है।}}
{{outdent|उषत् (सं॰ पु॰) यदुवंशीय एक राजा। इनके पिताका नाम सुयज्ञ और पुत्रका शिनेयु था।}}
{{outdent|उषती (सं॰ स्त्री॰) उष-शतृ-ङीप् आगमविधेरनित्यत्वात् नुमभावः। अमङ्गलवाक्य, नागवार जुबान्, जिस बातसे दूसरेका दिल दुखे। "यथास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेदुषतीं पापलोक्याम्।" {{smaller|(भारत, आदि ९१।८०।८)}}}}
{{outdent|उषद्गु (सं॰ पु॰) यदुवंशीय एक राजा। यह स्वाहि राजाके पुत्र थे।}}
{{outdent|उषद्रथ (सं॰ पु॰) पुरुवंशीय एक राजा। यह तितिक्षुके पुत्र और उशीनरके भ्राता थे। {{smaller|(हरिवंश ३१ अ॰)}}}}
{{outdent|उषप (सं॰ पु॰) ओषतीति, उष दाहे कपन्। उषिकुटिदिकखिजिभ्यः कपम्। उण् ४।१४२। १ अग्नि, आग। २ सूर्य। ३ चितावृक्ष, चीतका पेड़।}}
{{outdent|उषर्बुध (सं॰ त्रि॰) प्रत्यूषमें उठनेवाला, जो तड़के जागता हो।}}
{{outdent|उषर्बुध (सं॰ पु॰) उषसि बुध्यते, उषस्-बुध-क। १ अग्नि, आग। "सूर्यस्य रोचनाद्विवान् देवा उषर्बुधः।" {{smaller|(ऋक् १।१४।९)}} २ रक्तचिता, लालचीत। ३ बालक, बच्चा।}}
{{outdent|उषस् (सं॰ क्ली॰) ओषति हिनस्त्यन्धकारमिति, उष-असिप्रत्ययः स च कित्। उषः कित्। उण् ४।२३३। प्रत्यूषकाल, सबेरा, तड़का। "आसीदासन्ननिर्वाणः प्रदीपार्च्चिरिवोषसि।" {{smaller|(रघु १२।१)}}}}
{{outdent|उषसी (सं॰ स्त्री॰) उषं दिवसं स्यति विनाशयति, उष-सो-क-ङीप्। सन्ध्याकाल, शाम।}}
{{outdent|उषसुत (सं॰ पु॰) पांशुज लवण, लोनी मट्टीका नमक।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४००'''|'''उषस्त—उषाकल'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उषस्त (सं॰ पु॰) चाक्रायण ऋषि। "ततो ह्योषस्तश्चाक्रायण उपरराम :" {{smaller|(शतपथब्रा॰ १४।४।१२)}}}}
{{outdent|उषस्ति, {{smaller|उषस्त देखो।}}}}
{{outdent|उषस्य (सं॰ त्रि॰) उषस्-यत्। पाष्टुपिकृष्यशी यत्। पा ४।३।३१। प्राभातिक, सवेरेवाला।}}
{{outdent|उषा (सं॰ स्त्री॰) उष स्त्रियां टाप्। १ वेदोक्त देवता, वेदकी एक देवी। ऋक् और सामसंहिताके अनेक मन्त्रोंमें इन देवीकी स्तुति की गयी है।}}
ऋक्संहिताके मतसे—यह आकाशकी कन्या {{smaller|(ऋक् १।४८।१६)}} भग एवं वरुणकी भगिनी {{smaller|(ऋक् १।११३।५)}} और रात्रिकी बड़ी सहोदर {{smaller|(ऋक् १।१२४।८)}} हैं। रात्रि और उषा दोनों कई जगह साथ साथ भगिनी कही गयी हैं—"नक्तोषासा, उषसानक्ता"। यह सूर्यकी प्रणयिनी हैं। उषा मनुष्योंका आयु दिन-दिन घटा प्रकाशित होती हैं।
वेदसंहितामें जिस भावसे इनको बताया है, उसका उदाहरण नीचे दिया जाता है—
{{block center|<poem>
"उषा उच्छन्ती समिधाने अग्ना उद्यन्त्सूर्य उर्विया ज्योतिरश्रेत्।
अमिनती दैव्यानि व्रतानि प्रमिणती मनुष्या युगानि।
ईयुषाणामुपमाश्वतीनामायतीनां प्रथमोषा व्यद्यौत्॥२
एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि ज्योतिर्वसाना समना पुरस्तात्।
ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु प्रजानतीव न दिशो मिनाति॥३
उषो अदर्शिर्वाघृषो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियांखि।
अध्मस्नेव ससती वोधयन्ती शश्वत्तमागात् पुनरेयुषीणाम्॥४
पूर्वार्द्धे रजसो भानुमर्ज्वा जनिवदक्कत प्रकेतुम्।
व्यु प्रथते वितरं वरीयो श्रोभा पृक्ष्णी पिपीतएष्या॥५"
{{smaller|(ऋक् १म॰, १२४ सू॰)}}
</poem>}}
अग्निके समिध् द्वारा जल उठनेसे उषा अन्धकारकी आड़में सूर्योदयकी तरह बहुल ज्योति प्रकाश करती हैं। वह दैवव्रतकी अविघ्नकारिणी और मनुष्यकी आयुःक्षयकारिणी हैं। अतीत तथा नित्य उषा सकलके समान और आगामी उषा सकलके प्रथम रहती हैं। उषाने द्युतिलाभ किया है। उषा स्वर्गकी दुहिता हैं। ज्योतिःद्वारा घिर पूर्व दिक्में क्रमसे वह देख पड़ती हैं। मानो सूर्यका अभिप्राय समझ कर ही वह उनके पथमें घूमती हैं। वह कभी दिशाओंकी हिंसा नहीं करतीं। सूर्यकी तरह वह
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
अपना वक्षः दिखाती रहती हैं। नोधा ऋषिके समान अपना प्रियवस्तु ढूंढ़नेके लिये उषाने भी अपनेको आविष्कार किया है। गृहिणी की तरह उठकर उषा जगत्में सबको जगाती हैं। वह अभिसारिकाओंमें सबसे आगे आती हैं। वह आकाशके पूर्व भागसे निकल दिशाओंको चैतन्य करती हैं। वह जनक-स्थानीय स्वर्ग और पृथिवीके अङ्कमें बैठ दोनोंको भरपूर फैलाती हैं।
{{block center|<poem>
"सदृशीरद्य सदृशीरिषु श्रो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धामः।
अनवद्यास्त्रिंशतं योजनानै कैका क्रतुं परिघन्ति सद्यः॥" {{smaller|(ऋक् १।१२४।८)}}
</poem>}}
जैसी ही आज वैसी ही कल भी वह अनवद्य हैं। प्रतिदिन उषा वरुण एवं सूर्यकी अवस्थितिके स्थानसे ३० योजन आगे रहती हैं। एक एक उषा उदयकाल पर ही गमनागमनरूप कर्म निर्वाह किया करती हैं।*
इन्द्रने ही उषाको उत्पन्न किया है—"यः सूर्यं य उषसं जजान।" {{smaller|(ऋक् २।१२।७)}} फिर इन्द्रही उषाको विनष्ट भी करते हैं {{smaller|(ऋक् ४।३०।११)}}।
निघण्टुमें उषाके यह नाम लिखे हैं—विभावरी, सूनरी, भास्वती, ओदती, चित्रामघा, अर्जुनी, वाजिनी, वाजिनीवती, सुन्नावरी, अहना, द्योतना, श्वेत्या, अरुषी, सूनृता, सूनृलावती, सूनृतावरी। {{smaller|(निघण्टु १।८)}}
पूर्व कालमें ग्रीक और रोमक उषा देवीकी पूजा करते थे। ग्रीक उषादेवीको एओस (Eos) और रोमक अरोरा (Aurora) कहते थे। वह हाइपेरियन एवं थेयरकी कन्या, हिलियन तथा सिलिसकी भगिनी और टिटान अस्त्रियसकी पत्नी थीं। होमरने उषाको दिवादेवी लिखा है।
२ प्रत्यूष, सवेरा। ३ वाण राजाकी कन्या और अनिरुद्धकी पत्नी। {{smaller|अनिरुद्ध शब्दमें विस्तृत विवरण देखो।}}
{{outdent|उषाकल (सं॰ पु॰) उषार्या कलः शब्दो यस्य, बहुव्री। कुक्कुट, मुर्गा।}}
<hr />
<small>* सायणाचार्यके मतसे सूर्य प्रत्यह ५०५८ योजन अर्थात् एक दण्डमें ७९ योजन चलते हैं। ३० योजन आगे चलते सूर्यसे साढ़े बाईस पल पहले उषाका उदय होता है।</small>
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४३४'''|'''ऋतचित्—ऋतयुज्'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
७ सूर्य, आफ़ताब। ८ परब्रह्म। ९ रुद्र। १० देवताविशेष। ११ यज्ञ। १२ दक्षकन्याके गर्भजात धर्मपुत्र। १३ मिथिलेश्वर विजयके पुत्र। इनके पुत्रका नाम शुनक था। (त्रि॰) १४ दीप्त, चमकीला। १५ पूजित, इज़्ज़तदार। १६ उचित, ठीक। १७ धार्मिक, ईमान्दार। १८ सत्य, सच्चा। १९ गत, गया हुआ।
{{outdent|ऋतचित् (वै॰ त्रि॰) यज्ञ वा जलको समझनेवाला। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतजात (सं॰ त्रि॰) उचित समयपर होनेवाला, जो ठीक वक्तपर पड़ा हो।}}
{{outdent|ऋतजातसत्य (वै॰ त्रि॰) धार्मिक व्यवस्थाके अनुसार मुख्य विषय समझनेवाला, यज्ञके निमित्त जन्म लेने और उचित फल पानेवाला। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतजित् (वै॰ पु॰) ऋतं जयति, ऋत-जि-क्विप् तुगागमश्च। १ यज्ञविशेष। (त्रि॰) २ यज्ञजेता, इक् हासिल करनेवाला।}}
{{outdent|ऋतजुर् (वै॰ त्रि॰) अतिशय वार्धक्यप्राप्त, जो धार्मिक अर्चनमें बुड्ढा पड़ गया हो। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतज्ञा (वै॰ त्रि॰) सम्यक् अवगत, धर्मनीति समझनेवाला, जो यज्ञको जानता हो। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतज्य (वै॰ त्रि॰) उत्तम ज्यायुक्त, जो सचाईका रोदा रखता हो। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतद्युम्न (सं॰ त्रि॰) ऋतं द्युम्नं कीर्तिर्यस्य, बहुव्री॰। सत्यको ही अपनी कीर्ति बनानेवाला, जो सचाईके लिये मशहूर हो।}}
{{outdent|ऋतधामा (सं॰ पु॰) ऋतं धाम अस्य, बहुव्री॰। १ विष्णु। २ परमेश्वर। ३ इन्द्रविशेष। यही त्रयोदश मन्वन्तरके मनु होंगे। (त्रि॰) ४ शुद्ध प्रकृतिवाला, जो सच्ची क़ुदरतका हो।}}
{{outdent|ऋतधीति (वै॰ त्रि॰) प्रकृत स्वभाववाला, जो सच्ची तारीफ़ पाता हो। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतध्वज (सं॰ पु॰) १ ब्रह्मविशेष। २ रुद्रविशेष। ३ राजा शत्रुजित्के पुत्र। ४ वेदिग नगरके एक राजा। ५ प्रत्यर्दनका नामान्तर।}}
{{outdent|ऋतनि (वै॰ पु॰) ऋतं जलं नयति, ऋत-नी-क्विप्,}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
ह्रस्वत्व निपातनात्। १ सूर्य, आफ़ताब। (त्रि॰) २ सत्यका नेता, सचाईका रहनुमां। {{smaller|(सायण)}}
{{outdent|ऋतपर्ण (सं॰ पु॰) सूर्यवंशीय एक राजा। यह अयुताश्वके पुत्र थे। नल राजाने इनके निकट सारथि बन कलिकोपका शेषकाल बिताया था। अक्षक्रीड़ा और गणना विषयमें इन्हें विशेष पारदर्शिता रही। कलिभयनाशक नामावलीमें यह भी कीर्त्तित हैं—}}
{{block center|<poem>
"कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च।
ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्त्तनं कलिनाशनम्॥"
</poem>}}
{{outdent|ऋतपा (वै॰ त्रि॰) सत्यको न छोड़नेवाला, जो सचाईपर रहता हो। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतपेय (सं॰ पु॰) ऋतं स्वर्गफलं पेयं भोग्यमस्मात्, बहुव्री॰। यज्ञविशेष। यह यज्ञ क्षुद्र पाप दूर करनेका है।}}
{{outdent|ऋतपेशा (वै॰ पु॰) ऋतं जलं पेशो रूपं यस्य, बहुव्री॰। वरुण।}}
{{block center|<poem>
"वरुणाय ऋतपेशसे दधीत।" {{smaller|(ऋक् ६।६६।१)}}
</poem>}}
{{outdent|ऋतप्रजात (वै॰ त्रि॰) १ उचित समय पर होनेवाला, सच्ची प्रकृति रखनेवाला। २ जो सत्य समझता हो। ३ जलसे उत्पन्न। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतप्रवीत (वै॰ त्रि॰) उचित रूपसे विचारा हुआ, यज्ञ, सत्य वा जलसे भरा हुआ। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतप्सु (वै॰ पु॰) १ यज्ञीय हविर्भोजी देवताविशेष। २ सत्यस्वरूप देवता। (त्रि॰) ३ पूर्णाकृतियुक्त, पूरी सूरत-शकल वाला। ४ सत्यरूपी या यज्ञीय हविः खानेवाला। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतम् (सं॰ अव्य॰) ऋत-कमि। सत्य, ठीक।}}
{{outdent|ऋतम्भर (सं॰ पु॰) ऋतं बिभर्ति, ऋतम्, भृ-खच्। १ सत्यपालक, सचाई रखनेवाला। २ परमेश्वर। (त्रि॰) ३ अपनेमें सचाई रखनेवाला।}}
{{outdent|ऋतम्भरा (सं॰ स्त्री॰) १ बुद्धि, अक़्ल। २ प्लक्षद्वीपान्तर्गत नदीविशेष।}}
{{outdent|ऋतयुक्ति (वै॰ स्त्री॰) १ सत्यसंयोग, सच्चा मेल। २ ऋक्का उचित उपयोग, भजनका ठीक लगाव। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतयुज् (वै॰ त्रि॰) १ सम्यक् सज्जित, ख़ूब सजा हुआ। २ यज्ञको जानेवाला। {{smaller|(सायण)}}}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋणिधनिचक्र—ऋत'''|'''४३३'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
पहले एकादश कोष्ठ बना चार भागसे पूरण करना चाहिये। उन्हीं कोष्ठोंमें अकारादि क्रमसे हकार तक लिखते हैं। प्रथम पांच कोष्ठोंमें ह्रस्व और दीर्घ क्रमसे दो-दो वर्ण बना फिर क्रमान्वयसे एक एक वर्ण खींचा जाता है। उसके बाद सब कोष्ठोंके ऊपर सिलसिलेवार ६, ६, ६, ०, ३, ४, ४, ०, ०, ०, ३ और नीचे २, २, ५, ०, ०, २, १, ०, ४, ४, १ अक्षर लगाना चाहिये। साध्य वर्णसमूह अर्थात् स्वरव्यञ्जन रूपसे पृथक्कृत वर्ण तथा हं प्रभृति वर्णसमूहके साथ मिलित अङ्क एवं साधकका नामाक्षरसमूह स्वरव्यञ्जन-रूपसे पृथक् कर २ प्रभृति अङ्कसे मिलानेपर दोनों अर्थात् साध्य और साधकके अङ्कराशिद्वयको ८से बांटते हैं। दोनोंमें साध्यका अङ्क अधिक आनेसे ऋण और साधकका अङ्क अधिक आनेसे धन होता है।
{| class="wikitable" style="text-align:center; margin:auto; width:90%;"
|-
| ६ || ६ || ६ || ० || ३ || ४ || ४ || ० || ० || ० || ३
|-
| अ<br>आ || इ<br>ई || उ<br>ऊ || ऋ<br>ॠ || ऌ<br>ॡ || ए || ऐ || ओ || औ || अं || अः
|-
| क || ख || ग || घ || ङ || च || छ || ज || झ || ञ || ट
|-
| ठ || ड || ढ || ण || त || थ || द || ध || न || प || फ
|-
| ब || भ || म || य || र || ल || व || श || ष || स || ह
|-
| २ || || ५ || ० || ० || २ || १ || ० || ४ || ४ || १
|}
मान लीजिये—साध्यमन्त्र हं और साधकका नाम हरि है। मन्त्रका अङ्क हं और साधकका अङ्क (ह+अ का अङ्क १+२ और र+इ का अङ्क ०+२) ५ होता है। अतएव साध्य अङ्क ६ और साधकके अङ्क ५ दोनोंमें ८ से भाग नहीं लगता। इसमें साधककी अपेक्षा साध्यका एक अङ्क अधिक रहनेसे ऋण पड़ता है। विपरीत होनेसे धन समझा जाता।
मन्त्र 'ऋणयुक्त' रहनेसे शुभप्रद और धनयुक्त रहनेसे अशुभप्रद होता है। साध्य अर्थात् मन्त्र वर्ण अधिक पड़नेसे जप करना चाहिये—
{{block center|<poem>
"मन्त्रो यद्यधिकाइः स्यात् तदा मन्त्रं जपेत् सुधीः।
समेऽपि च जपेन्मन्त्रं न जपेत्तु ऋणाधिके॥
शून्यं मृत्युं विजानीयात् तस्माच्छून्यं विवर्जयेत्॥"
</poem>}}
Vol. III. 109
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
मन्त्रका वर्ण अधिक वा सम रहनेसे जपना योग्य है, किन्तु ऋण अधिक पड़नेसे जप करना निषिद्ध है। शून्यमें मृत्यु होता है।
{{outdent|ऋणिया (हिं॰) {{smaller|ऋणी देखो।}}}}
{{outdent|ऋणी (सं॰ त्रि॰) ऋणमस्त्यस्य, ऋण-इनि। ऋणग्रस्त, क़र्ज़दार।}}
{{outdent|ऋणोद्ग्राहण (सं॰ क्ली॰) ऋणस्य उद्ग्राहणं ६-तत्। प्राप्य ऋणकी प्रार्थना करते भी यदि अधमर्ण नहीं चुकाता, तो उसके साथ मनुका कहा व्यवहार चलाया जाता है—"धर्म, व्यवहार, छल, आचरित और बल-प्रयोगके उत्तरोत्तर किसी उपायसे प्राप्य अर्थका उद्धार करना चाहिये। अधमर्णके आत्मीय सुहृद्गणसे प्रिय वाक्यमें अर्थ प्रार्थन और अनुगमन करनेको धर्म कहते हैं। चुकते समय पर्यन्त अधमर्णको साधौ दिद्यादिके मध्य आबद्ध करके रखनेका नाम व्यवहार है। कौशल क्रममें संग्रह कर ऋणिककी धनसम्पत्तिसे ऋण वसूल करना छल कहलाता है। स्त्री, पुत्र, पशु प्रभृतिको रोक अथवा अधमर्णके द्वारदेशपर बैठकर ऋणको चुकती आचरित है। अपने मकान् पर ला अधम-र्णको मारना-पीटना बलप्रयोग समझा जाता है।"}}
कात्यायनने कहा है—राजा, प्रभु एवं विप्रसे मीठे बोल, ज्ञाति तथा शत्रुसे धोका दे, वणिक्, कृषक तथा शिष्यसे कड़ी बात कह और दुष्ट व्यक्तिसे मार-मार कर ऋणग्रहण करना चाहिये।
{{outdent|ऋत् (धातु) भ्वा॰ पर॰, (इयडपद्मे) आत्म॰ (गत्यर्थे) सक; (अन्यार्थे) अक॰ सेट्। १ गमन करना, जाना। २ स्पर्धा करना, बराबरी मिलाना। ३ घृणा करना, नफ़रत रखना। ४ दया करना, रहम लाना। ५ ऐश्वर्य रखना, ताक़तवर होना।}}
{{outdent|ऋत (सं॰ क्ली॰) ऋ-क्त। १ उच्छवृत्ति, सिला बीन-कर गुज़र करनेका रोज़गार।}}
{{block center|<poem>
"ऋतमृतुञ्छिलं प्रोक्तममृतं स्यादयाचितम्।
मृतन्तु याचितं भैक्षं प्रमृतं कर्षणं स्मृतम्॥" {{smaller|(मनु ४।४)}}
</poem>}}
२ जल, पानी। ३ सत्य, सचाई। ४ व्यवस्था, क़ा-नून्। ५ धर्मनीति, पाकीज़ रस्म। (पु॰) ६ विष्णु।
{{block center|<poem>
"अहिंसत्सत्यमर्त्तञ्च पवित्रं पुण्यमेव च।" {{smaller|(भारत ३।२१५।२)}}
</poem>}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४३३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४३२'''|'''ऋणचित्—ऋणिधनिचक्र'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋणचित् (वै॰ त्रि॰) ऋणमिव चिनोति, चि-क्विप् तुगागमश्च । १ पापका दण्ड देनेवाला, जो अज़ाबको दबाता हो। २ परिशोधके लिये स्तुतिको ऋणकी तरह ग्रहण करनेवाला, जो अदा करनेके लिये तारीफ़को क़र्ज़की तरह लेता हो।}}
{{outdent|ऋणच्युत् (सं॰ त्रि॰) ऋण वा पापसे छुटकारा देने-वाला, जो क़र्ज़ या अज़ाबको छुड़ाता हो।}}
{{outdent|ऋणञ्जय (सं॰ पु॰) १ ऋग्वेदोक्त एक राजा। २ ऋषि विशेष।}}
{{outdent|ऋणद (सं॰ त्रि॰) ऋण परिशोध करनेवाला, जो क़र्ज़ चुकाता हो।}}
{{outdent|ऋणदाता, {{smaller|ऋणद देखो।}}}}
{{outdent|ऋणदान (सं॰ क्ली॰) ऋणस्य दानम्, ६-तत्। ऋणपरिशोध, अदा-क़र्ज़, उधारकी चुकती।}}
{{outdent|ऋणदायक (सं॰ त्रि॰) ऋणं ददाति, ऋण-दा-ण्वुल्। ऋणदाता, क़र्ज़ देनेवाला।}}
{{outdent|ऋणदायी, {{smaller|ऋणद देखो।}}}}
{{outdent|ऋणदास (सं॰ त्रि॰) दासविशेष, एक नौकर। ऋणके लिये दासत्व स्वीकार करनेवाला ऋणदास कहलाता है।}}
{{outdent|ऋणमत्कुण (सं॰ पु॰) ऋणो मत्कुण इव, ७-तत्, ऋणं परकृतर्णं ममेव इति कुणति वदति, ऋण-कुणात्-कुण-क। प्रतिभू, लग्नक, ज़ामिन्।}}
{{outdent|ऋणमार्गण (सं॰ पु॰) ऋणं मार्गयते परार्थं स्वगत-त्वेन प्रार्थयते, ऋण-मार्ग-ल्यु; प्रतिभू, ज़ामिन्, अपनी ज़िम्मेवारी पर दूसरेकी रुपया उधार दिलानिवाला।}}
{{outdent|ऋणमुक्त (सं॰ त्रि॰) ऋणात् मुक्तः, ५-तत्। ऋण परिशोध किये हुआ, जो क़र्ज़ अदा कर चुका हो।}}
{{outdent|ऋणमुक्ति (सं॰ स्त्री॰) ऋणात् ऋणस्य वा मुक्तिर्भवत्यस्मात्। ऋण-मुच्-क्ति। ऋणपरिशोध, अदा-क़र्ज़।}}
{{outdent|ऋणमोक्ष (सं॰ पु॰) ऋणात् मोक्षः ५-तत्। ऋण-परिशोध, अदा-क़र्ज़।}}
{{outdent|ऋणमोचन (सं॰ क्ली॰) ऋणात् मोचयति, ऋण-मुच्-णिच्-ल्यु। काशीस्थ तीर्थविशेष। {{smaller|(काशीखण्ड)}}}}
{{outdent|ऋणया (सं॰ त्रि॰) १ पापका दण्ड देनेवाला, जो अज़ाबको दबाता हो। २ पाप वा ऋण दूर रखने-वाला, जो अज़ाब या क़र्ज़को अलग रखता हो।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋणयावन्, {{smaller|ऋणया देखो।}}}}
{{outdent|ऋणलेख्य (सं॰ क्ली॰) ऋणग्रहणका उपयोगी पत्न, तमस्सुक। {{smaller|तमस्सुक देखो।}}}}
{{outdent|ऋणवत्, {{smaller|ऋणवान् देखो।}}}}
{{outdent|ऋणवान् (सं॰ त्रि॰) ऋण रखनेवाला, क़र्ज़दार।}}
{{outdent|ऋणशुद्धि (सं॰ स्त्री॰) {{smaller|ऋणशोधन देखो।}}}}
{{outdent|ऋणशोधन (सं॰ क्ली॰) ऋणका परिशोध, क़र्ज़की चुकती।}}
{{outdent|ऋणादान (सं॰ क्ली॰) ऋणस्य आदानम्, ६-तत्। १ अधमर्णसे उत्तमर्णके धनकी प्राप्ति, क़र्ज़दारसे महा-जनके रुपयेकी चुकती। २ स्मृतिशास्त्रोक्त अष्टादश विवादोंके अन्तर्गत एक व्यवहार। {{smaller|व्यवहार देखो।}}}}
{{outdent|ऋणान्तक (सं॰ पु॰) ऋणहर्त्ता मङ्गल ग्रह।}}
{{outdent|ऋणापकरण (सं॰ क्ली॰) ऋणस्य अपकरणं अपनो-दनम्, ६-तत्, अप-कृ-ल्युट्। ऋणपरिशोध, क़र्ज़की चुकती।}}
{{outdent|ऋणापनोदन (सं॰ क्ली॰) ऋणस्य अपनोदनम्, ६-तत्, अप-नुद्-ल्युट्। ऋणशोध, क़र्ज़से छुटकारा।}}
{{outdent|ऋणापाकरण, {{smaller|ऋणापकरण देखो।}}}}
{{outdent|ऋणार्ण (सं॰ क्ली॰) ऋणपर ऋण, सूददरसूद।}}
{{outdent|ऋणिक (सं॰ त्रि॰) ऋणमस्यास्ति, ऋण-ठन्। ऋणी, क़र्ज़दार।}}
{{block center|<poem>
"द्विगुणं प्रददातव्यं ऋणिकैस्तस्य तद्धनम्।" {{smaller|(याज्ञवल्क्य)}}
</poem>}}
{{outdent|ऋणिधनिचक्र (सं॰ क्ली॰) तन्त्रोक्त ग्राह्यमन्त्रका शुभाशुभ-प्रकाशक चक्रविशेष। रुद्रयामलमें लिखा है—}}
{{block center|<poem>
"कोष्ठान्ये कादशान्येव वेदेन पूरितानि च।
अकारादि हकारान्तं लिखेत् कोष्ठेषु तत्त्ववित्।
प्रथमं पञ्चकोष्ठेषु ह्रस्वदीर्घ क्रमेण तु॥
हं क्षं इत्थं लिखेत् तत्र विचारे खलु साधकः।
शेषेष्वे कैकशी वर्णान् क्रमतस्तु लिखेत् सुधीः॥
षट्कालकालवियदग्निसमुद्रवेद-
खाकाशशून्यदहनाः खलु साध्यवर्णाः।
युग्माब्धिपञ्चवियदम्बरयुक्शशाङ्क-
व्योमाब्धिवेदशशिनः खलु साधकर्णाः॥
नामान्तुह्लादकत्वाद्गजबभृक्ते हं
मालोभयोरधिकशे पमृणं धनं स्यात्॥"
</poem>}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋजुनौति—ऋणग्राहो'''|'''४३१'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋजुनौति (सं॰ स्त्री॰) सरल व्यवहार, सीधी चाल।}}
{{outdent|ऋजुमुष्क (वै॰ त्रि॰) सुदृढ़ एवं बलवान्, मज़बूत और ताक़त वर, हट्टाकट्टा। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋजुरश्मि (सं॰ त्रि॰) सरल रज्जुचिह्नयुक्त, जो रस्सीके सीधे निशान् रखता हो।}}
{{outdent|ऋजुरेख (सं॰ क्ली॰) ऋजुश्चासौ रेखा चेति। सरल रेखा, सीधा कृत।}}
{{outdent|ऋजुरोहित (सं॰ क्ली॰) सरल इन्द्रधनु।}}
{{outdent|ऋजुवनि (वै॰ त्रि॰) अनुकूलहस्त, जो अच्छी चीज़ देता हो। {{smaller|(ऋक् ४।४१।१५)}}}}
{{outdent|ऋजुशंस (सं॰ त्रि॰) ऋजु यथा तथा शंसति कथयति, ऋजु-शंस-अच्। सरलभाषी, सीधा बोलनेवाला।}}
{{outdent|ऋजुश्रेणी (सं॰ स्त्री॰) मूर्वा, किसी किस्मका पटसन।}}
{{outdent|ऋजुसर्प (सं॰ पु॰) ऋजुश्चासौ सर्पश्चेति, निपातनात् कर्मधा॰। १ सर्प विशेष, किसी क़िस्मका सांप। २ दर्वीकर सर्प, बड़े फनका सांप।}}
{{outdent|ऋजुसूत्र (सं॰ क्ली॰) जैन वृत्तिविशेष। यह अप्रमाण तथा निर्धारित अर्थको लेता है। भूत एवं भविष्यत् इसके भावमें कुछ भी नहीं। ऋजुसूत्र केवल प्रत्यक्ष विषयपर विश्वास रखता है।}}
{{outdent|ऋजुहस्त (सं॰ त्रि॰) विस्तृतपाणि, हाथ फैलाये हुआ।}}
{{outdent|ऋजूक (सं॰ पु॰) ऋज-ऋकक्। १ देशविशेष, एक मुल्क। २ पर्वत विशेष, एक पहाड़। इसी देश या पर्वतसे विपाशा नदी निकली है।}}
{{outdent|ऋजूकरण (सं॰ क्ली॰) अऋजु ऋजु क्रियते, ऋजु-अभूत तद्भावे च्वि-कृ-ल्युट्, पूर्वदीर्घः। १ सरल बनानेका कार्य, सीधा करनेकी हालत। २ सुश्रुतोक्त यन्त्र-कर्म विशेष।}}
{{outdent|ऋजूकृत (सं॰ त्रि॰) सरल किया हुआ, जो सीधा बनाया गया हो।}}
{{outdent|ऋजूयत् (सं॰ त्रि॰) ऋजु गच्छति, अथवा ऋजू गच्छति, ऋजु-क्यच्, ऋजूय-शतृ। ऋजुगामी, सीधा जानेवाला।}}
{{outdent|ऋजूया, {{smaller|ऋजुरेखा देखो।}}}}
{{outdent|ऋजूयु (सं॰ त्रि॰) १ धार्मिक, ईमान्दार। २ सरल, सीधा।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋज्व (सं॰ पु॰) ऋज-रन्। ऋज्रेन्द्राग्रवज्रविप्रेत्यादिना निपातनात् रन् गुणाभावः। उण् २।२८। १ नायक, रहनुमान्। (त्रि॰) २ सरलगामी, सीधा चलनेवाला। ३ रक्ताभ, श्यामोमायल सुर्ख, लालभूरा।}}
{{outdent|ऋज्वी (सं॰ स्त्री॰) ऋजु-ङीष्। १ सरलतमयी स्त्री, सीधी औरत। २ ग्रहगणकी एक गति।}}
{{outdent|ऋञ्जसान (सं॰ पु॰) ऋज असानच्-कित्। अश्निभृञ्जि-मन्दिमन्दिभ्यः कित्। उण् २।८९। १ मैत्र, वादल। (त्रि॰) २ धावमान, दौड़ता हुआ।}}
{{outdent|ऋण (धातु) तना॰ उभ॰ सक॰ सेट्। "ऋणष्टृञ् गतौ।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} गमन करना, जाना।}}
{{outdent|ऋण (सं॰ क्ली॰) ऋ-क्त गत्वञ्च। ऋणमृणार्थे। पा ८।२।६०। १ उधार, क़र्ज़, देना।}}
{{block center|<poem>
"जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणैर्ऋण वा भवति ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः।" {{smaller|( मिताक्षरा )}}
</poem>}}
ब्राह्मण ऋषिऋण, देव ऋण और पितृ ऋण त्रिविध ऋण लेकर जन्म लेता है। ब्रह्मचर्यसे ऋषि-ऋण, यज्ञकर्मसे देवऋण और पुत्रोत्पादनसे पितृऋण छूटता है। २ दुर्गभ भूमि, वोहड़ ज़मीन। ३ पाप, अज़ाब। ४ दुर्ग, क़िला। ५ जल, पानी। ६ क्षय-राशि, बाक़ी। (पु॰) ७ व्यास मुनि। (त्रि॰) ८ अङ्कशास्त्रोक्त संख्याविशिष्ट, जो किसी घटायी हुयी अदतसे मिला हो। ९ पापी, बुरा काम करनेवाला। १० गमनकारी, जानेवाला।
{{outdent|ऋणकर्त्ता (सं॰ त्रि॰) ऋण लेनेवाला, क़र्ज़दार, जो उधार लेता हो। "ऋणकर्त्ता पिता शत्रुः।" {{smaller|(चाणक्य)}}}}
{{outdent|ऋणकाति (वै॰ त्रि॰) ऋणवत् फलप्रदा कातिः स्तुतिर्यस्य, बहुव्री॰। अवश्यफलदायक स्तुतिशाली, जो तारीफ़को क़र्ज़की तरह मञ्जूर कर फ़ायदा बख्शता हो।}}
{{outdent|ऋणग्रस्त (सं॰ त्रि॰) ऋणेन ग्रस्तः, ३-तत्। बहुऋणयुक्त, क़र्ज़से लदा हुआ।}}
{{outdent|ऋणग्रह (सं॰ पु॰) १ ऋण लेनेका काम, क़र्ज़-दारी। २ ऋण लेनेवाला, जो क़र्ज़ करता हो।}}
{{outdent|ऋणग्राहक (सं॰ त्रि॰) ऋणं गृह्णाति, ऋण-ग्रह-ण्वुल्। अधमर्ण, ऋणकारक, क़र्ज़ लेनेवाला।}}
{{outdent|ऋणग्राही, {{smaller|ऋणग्राहक देखो।}}}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४३१
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४३०'''|'''ऋघावान्—ऋजुधा'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋघावान् (वै॰ त्रि॰) ऋघा अस्यस्य, ऋघा-मतुप्, मस्य वः। हिंसक, खूंखार। "कवीमृण्वन्त मृघावान्।" {{smaller|(ऋक् १।१५१।२)}} 'ऋघावान् हिंसकः।' {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋच् (धातु॰) तुदा॰ पर॰ सक॰ सेट्। "ऋच स्तुत्याम्।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} स्तुति करना, तारीफ़ बताना।}}
{{outdent|ऋच (सं॰ पु॰) एक राजा। यह सुनौकके पुत्र थे।}}
{{outdent|ऋचस (सं॰ त्रि॰) ऋच्-कसुन्। स्तोता, तारीफ़ करनेवाला।}}
{{outdent|ऋचसे (सं॰ अव्य॰) ऋच्-कसेन्। स्तुति करनेके लिये, तारीफ़ बतानेके वास्त।}}
{{outdent|ऋचा, {{smaller|ऋक् देखो।}}}}
{{outdent|ऋचीक (सं॰ पु॰) ऋच्-ईकक्। १ सविताविशेष। यह दिवके पुत्र थे। २ जमदग्निके पिता भृगु-मुनि। ३ देशविशेष, एक मुल्क।}}
{{outdent|ऋचीष (सं॰ क्ली॰) १ भ्राष्ट्र, तवा। (पु॰) २ नरक विशेष।}}
{{outdent|ऋचीषम (सं॰ पु॰) ऋचा स्तुत्या समः, निपातनात् ईत्वं षत्वञ्च। १ इन्द्र। (त्रि॰) २ ऋग्विषेशके समान गुणविशिष्ट।}}
{{outdent|ऋचेयु (सं॰ पु॰) पुरुवंशीय राजा रौद्राश्वके पुत्र।}}
{{outdent|ऋच्छ् (धातु) तुदा॰ पर॰ सक॰ अकच्च सेट्। १ गमन करना, चलना। २ मुग्ध होना, फरेफ़्ता बनना। ३ कठिन होना, मुश्किल पड़ना। कोई कोई मूर्च्छित होनेके स्थानमें विलीन पड़नेका अर्थ लगाते हैं।}}
{{outdent|ऋच्छ (हिं॰) {{smaller|ऋक्ष देखो।}}}}
{{outdent|ऋच्छका (सं॰ स्त्री॰) अभिलाष, ख्वाहिश।}}
{{outdent|ऋच्छरा (सं॰ स्त्री॰) ऋच्छति प्राप्नोति परपुरुषम्, ऋच्छ्-अर स्त्रियां टाप्। ऋच्छेररः। उण् ३।१३१। १ वेश्या, रण्डी। २ बन्धन, बेड़ी।}}
{{outdent|ऋज् (धातु) भ्वादि॰ आत्म॰ सक॰ अकच्च सेट्। १ स्थिर रहना, ठहरना। २ जीना। ३ बलवान् होना। ४ कमाना। भ्वादि॰ आत्म॰ सक॰ सेट्। "सृजिञ् भर्जि।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} ५ भूंजना।}}
{{outdent|ऋजिप्य (सं॰ त्रि॰) ऋजु प्राप्नोति गच्छति, आप्-यत् पृषोदरादित्वात् साधुः। सरलगामी, सीधा चलनेवाला।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋजिश्व (वै॰ पु॰) ऋग्वेदोक्त एक राजा।}}
{{outdent|ऋजीक (सं॰ त्रि॰) ऋज्-ईकन्-कित्। ऋजेष। उण् ४।२२। १ रञ्जित, रंगा हुआ। २ मिश्रित, मिला हुआ। ३ उपहत, विगड़ा हुआ। (पु॰) ४ इन्द्र। ५ धूम, धूआं। ६ साधन, तदबीर। ७ पर्वतविशेष, एक पहाड़।}}
{{outdent|ऋजीति (सं॰ पु॰) ऋजु गच्छति, ऋजु-इ-तिच्, पृषोदरादित्वात् साधुः। १ ऋजुगामी बाण, सीधा जानेवाला तीर। (त्रि॰) २ प्रज्वलित, जलता हुआ।}}
{{outdent|ऋजीष (सं॰ पु॰) भृज्जते रसोऽस्मात्, भर्ज्-ईषन् ऋजादेशश्च। भर्जेर्ऋजाय। उण् ४।२८। १ भ्राष्ट्र, तवा। २ नरकविशेष। ३ नीरस सोमलताका चूर्ण। ४ धन। ५ सोमलता-निःसृत रस।}}
{{outdent|ऋजीषिन् (सं॰ त्रि॰) १ झपटने या पकड़नेवाला। २ नीरस सोमलताके चूर्णसे बना हुआ।}}
{{outdent|ऋजु (सं॰ त्रि॰) अर्ज्यति गुणान्, साघुः। अञ्जिदृशि कम्यसोति। उण् १।२८। १ अवक्र, सीधा। संस्कृत पर्याय अजिह्म, प्रगुण, प्राञ्जल और सरल है। २ अनुकूल, मुवाफ़िक़। ३ सुन्दर, ख़ूबसूरत। (पु॰) ४ वसु-देवके एक पुत्र। "ऋजुं सममर्द्दनं भद्रं सङ्कर्षंमधीश्वरम्।" {{smaller|(भागवत ९।२४।४४)}}}}
{{outdent|ऋजुकाय (सं॰ त्रि॰) ऋजुः कायो यस्य, बहुव्री॰। १ अवक्रदेह, सीधे जिस्मवाला। (पु॰) २ कश्यपमुनि।}}
{{outdent|ऋजुक्रतु (वै॰ त्रि॰) उचित कार्य करनेवाला, जो ईमान्दारीसे चलता हो। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋजुग (सं॰ त्रि॰) ऋजु यथा स्यात् तथा गच्छति, ऋजु-गम्-ड। १ सरल व्यवहारी, सीधा बरताव करनेवाला। २ सरलगामी, सीधा चलनेवाला। (पु॰) ३ बाण, तीर।}}
{{outdent|ऋजुगाथ (सं॰ त्रि॰) शुद्ध गान करनेवाला, जो ठीक गाता हो।}}
{{outdent|ऋजुता (सं॰ स्त्री॰) ऋजोर्भावः। १ सरलता, सीधा-पन। २ अवक्रता, खड़ाखड़ी। ३ अकापट्य, ईमान्दारी।}}
{{outdent|ऋजुदास (सं॰ पु॰) वसुदेवके एक पुत्र।}}
{{outdent|ऋजुधा (सं॰ अव्य॰) अवक्र भावसे, सीधे, ठीक तौरपर।}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋग्वेद—ऋघा'''|'''४२९'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
तिथि काण्व, यक्ष्मानाशन प्राजापत्य, यजत आत्रेय, यज्ञ प्राजापत्य, यम वैवस्वत, यमी, यमी वैवस्वती, ययाति नाहुष, रक्षोहा ब्राह्म, राहुगण आङ्गिरस, रातहव्य आत्रेय, राति भारद्वाजी, राम जामदग्न्य, रेणु वैश्वामित्र, रेभ काश्यप, रोमशा, लव ऐन्द्र, लुश धानाक, लोपामुद्रा, वत्स आग्नेय, वत्स काण्व, वत्सप्रि भालन्दन, वप्र वैखानस, वरु आङ्गिरस, वरुण, वत्रि आत्रेय, वश अश्व्य, वसिष्ठ मैत्रावरुणि, वशिष्ठ पुत्रगण, वसु भारद्वाज, वसुकर्ण वासुक्र, वसुकृद् वासुक्र, वसुक्र ऐन्द्र, वसुक्र वासिष्ठ, वसुक्रपत्नी, वसुप्रना रौहिदश्व, वसुश्रुत आत्रेय, वसुयव आत्रेय, वाग् आम्भृणी, वातजूति वातरशन, वामदेव गौतम, विन्दू आङ्गिरस, विप्रजूति वातरशन, विप्रबन्धु गौपायन वा लौपायन, विभ्राट् सौर्य, विमद ऐन्द्र, विरूप आङ्गिरस, विवस्वान् आदित्य, विहव्या काश्यप, विश्वक कार्ष्णि, विश्वकर्मा भौवन, विश्वमना वैयश्व, विश्ववारा आत्रेयी, विश्वसामा आत्रेयी, विश्वामित्र गाथिन, विश्वावसु देवगन्धर्व, विष्णु प्राजापत्य, विहव्य आङ्गिरस, वीतहव्य आङ्गिरस, वृशजार, वृषगण वासिष्ठ, वृषाकपि ऐन्द्र, वृषास्क वातरशन, वेण भार्गव, वैखानस (शत), व्यश्व आङ्गिरस, व्याघ्रपाद वासिष्ठ, शंयु वार्हस्पत्य, शकपूत नार्मेध, शक्ति-वासिष्ठ, शङ्ख यामायन, शची पौलोमी, शतप्रभेदन वैरूप, शबर काक्षीवान्, शशकर्ण काण्व, शस्रत्याङ्गिरस, शार्यात मानव, शास भारद्वाज, शिखण्डिनी, शिवि औशीनर, शिरिम्बिठ भारद्वाज, शिशु आङ्गिरस, शुनःशेप आजिगर्ति, शुनहोत्र भारद्वाज, श्यावाश्व आत्रेय, श्येन आग्नेय, श्रद्धा कामायणी, श्रुतकक्ष आङ्गिरस, श्रुतबन्धु गौपायन वा लौपायन, श्रुतिविद् आत्रेय, श्रुष्टिगु काण्व, संवनन आङ्गिरस, संवरण प्राजापत्य, संवर्त्त आङ्गिरस, सङ्कुसुक यामायन, सत्यधृति वारुणि, सत्यश्रवा आत्रेय, सदापृण आत्रेय, सध्रि वैरूप, सध्यंस काण्व, सप्तर्षि, सप्तगु आङ्गिरस, सप्तवधि आत्रेय, सप्ति वाजम्भर, सप्रथ भारद्वाज, सरमा देवशुनी, सर्वहरि ऐन्द्र, सव्य आङ्गिरस, सस आत्रेय, सहदेव वार्षागिर, साधन भौवन, सारिस्सृक्व शाङ्ग, सार्पराज्ज्ञी, सिकता निवावरी,
<br><br>Vol. III. 108
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
सिन्धुक्षित् प्रैयमेध, सिन्धुद्वीप आम्बरीष, सुकक्ष आङ्गिरस, सुकीर्त्ति काक्षीवान्, सुतम्भर आत्रेय, सुदास् पैजवन, सुदीति आङ्गिरस, सुपर्ण काण्व, सुपर्ण तार्क्ष्यपुत्र, सुबन्धु गौपायन, सुमित्र कौत्स, सुमित्र वाध्र्यश्व, सुराधा वार्षागिर, सुवेदा शैरीषि, सुहस्त्य घोषेय, सुहोत्र भारद्वाज, सूक्तु भार्गव, सूर्या सावित्री, सोभरि काण्व, सोम, सोमाहुति भार्गव, स्तम्बमित्र शाङ्ग, सूरमरश्मि भार्गव, स्रस्तरात्रेय, हरिमन्त आङ्गिरस, हर्यत प्रागाथ, हविर्धान आङ्गिरस, हिरण्यगर्भ प्राजापत्य, हिरण्यस्तूप आङ्गिरस।
ऋक्संहिता पढ़नेसे आर्यजातिका आदिम इतिहास, प्राचीन आचार-व्यवहार, धर्म मत एवं विश्वास प्रभृति सकल अवश्य ज्ञातव्य विषय समझ पड़ता है।
<div style="text-align: right;">{{smaller|आर्य शब्द देखो।}}</div>
निर्णय करनेका कोई उपाय नहीं, ऋक्संहिता किस समय संगृहीत हुई थी। सम्भवतः जिस समय आर्य सभ्यता चारो ओर फैलने और सुसभ्य आर्य-मण्डली अग्निपूजा प्रचार करनेके लिये नाना देश घूमने लगो, उसी प्राचीन काल द्वापरके शेषभागपर कृष्णद्वैपायनके हाथ प्रथम वेदकी संहिताके संग्रहकी नींव पड़ी। मोक्षमूलर प्रभृति युरोपीय पण्डितोंके कथनानुसार ऋग्वेदका छन्दस् भाग ईसाकी उत्पत्तिके १००० वत्सरसे पूर्व बना था। उन्होंने भी मुक्त कण्ठसे ऋक्संहिताको समग्र सभ्य-जगत्का आदि ग्रन्थ माना है। {{smaller|वेद शब्दमें विस्तारित विवरण देखो।}}
"One thing is certain : there is nothing more ancient and primitive, not only in India, but in the whole Aryan world, than the hymns of the Rig-veda." (Max Müller's Origin and growth of Religion, p. 152)
किसी समय ऋग्वेदकी प्रतिशाखाके ब्राह्मण, आरण्यक, सूत्रादि प्रचलित थे। किन्तु अब केवल ऐतरेय ब्राह्मण, शाङ्खायन गृह्य एवं श्रौतसूत्र, आश्वलायन श्रौत और गृह्य सूत्र ही मिलते हैं।
<div style="text-align: right;">{{smaller|ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषत्, श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र प्रभृति शब्द देखो।}}</div>
{{outdent|ऋघा (सं॰ स्त्री॰) ऋह-घञ्, गुणाभावः। हिंसा, मारने-काटनेकी तबीयत।}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४२८'''|'''ऋग्वेद'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
अमीवर्त्त आङ्गिरस, अमहीयु आङ्गिरस, अम्बरीष वार्षागिर, अयास्य आङ्गिरस, अरिष्टनेमि तार्क्ष्य, अरुण वैतहव्य, अर्च्चन् हैरण्यस्तूप, अर्च्चनाना आत्रेय, अर्बुद काद्रवेय, अवत्सार काश्यप, अवस्यु आत्रेय, अश्वमेध भारत, अश्वसूक्ति काण्वायन, अष्टक वैश्वामित्र, अष्टादंष्ट्र वैरूप, असित काश्यप, आङ्गूष, आयुःकाण्व, आसङ्गप्लायोगि, इत भार्गव, इक्ष्वाकु दाढैच्युत, इन्द्र, इन्द्र मुष्कवान्, इन्द्र वैकुण्ठ, इन्द्रप्रमति वासिष्ठ, इन्द्रमातृ देवजामि, इन्द्रस्नुषा, इन्द्राणी, इरिम्बिठि, काण्व, इष आत्रेय, उचथ्य आङ्गिरस, उत्कील कात्य, उपमन्यु वासिष्ठ, उपस्तुत वाष्टिहव्य, ऊरुक्षय आमुहीयव, ऊरुचक्रि आत्रेय, उर्वशी, उल्लुप्ततायन, उशना काव्य, ऊरु आङ्गिरस, ऊर्ध्वकृशन यामायन, ऊर्ध्वग्रावा आर्बुदि, ऊर्ध्वनाभा ब्राह्म, ऊर्ध्वसद्मा आङ्गिरस, ऋजिश्वा भारद्वाज, ऋणाञ्च वाधागिर, ऋणञ्चय ऋषम, वैराज वा शाकर, ऋषभ वैश्वामित्र, ऋषि द्विट्लिङ्ग, ऋष्यशृङ्ग वातरशन, एकटू नौधस, एतश वातरशन, एवयामरुदात्रेय, कक्षीवान् दैर्घतमाः (औशिज), कण्व घौर, कस वैश्वामित्र, कपोत नैर्ऋत, करिक्रत वातरशन, कर्णश्रुद्वासिष्ठ, कलिप्रागाथ, कवष ऐलूष, कवि भार्गव, कश्यप मारीच, कुत्स आङ्गिरस, कुमार आग्नेय, कुमार आत्रेय, कुमार यामायन, कुरुस्तुति काण्व, कृशसवांहव्य त्रैवृष्णि, कुशिक ऐषौरथि, कुशिक सौभर, कुसीदी काण्व, कूर्म गार्त्समद, कृतयशाः आङ्गिरस, कृश भार्गव, कृष्ण काण्व, कृष्ण आङ्गिरस, केतु आग्नेय, गय आत्रेय, गय प्रात, गर्ग भारद्वाज, गविष्ठिर आत्रेय, गातु आत्रेय, गाथी कौशिक, गृत्समद आङ्गिरस शौनहोत्र, गौतम राहूगण, गोधा, गोपवन आत्रेय, गोषूक्ति काण्वायन, गौरवीति शाक्त्य, घर्म सौर, घर्म तापस, घोर आङ्गिरस, घोषा काक्षीवती, चक्षु मानव, चक्षुः सौर, चित्रमहा वासिष्ठ, च्यवन भार्गव, जमदग्नि भार्गव, जय ऐन्द्र, जरत्कर्ण सर्प ऐरावत, जरिता शार्ङ्ग, जामदग्न्य, जुहु ब्रह्माणस्पति, जुती वातरशन, जेता माधुच्छन्दः, तपुमूर्द्धा बार्हस्पत्य, ताम्ब पार्ण, तिरश्चीर आङ्गिरस, त्रसदस्यु पौरुकुत्स, त्रित आप्त्य, त्रिशिराः त्वाष्ट्र, त्रिशोक काण्व, त्र्यरुण त्रैवृष्ण,
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
त्वष्टा गर्भकर्त्ता, दक्षिणा प्राजापत्या, दमन यामायन, दिव्य आङ्गिरस, दीर्घतमाः औचथ्य, दुर्मित्र कौत्स, दुवस्यु वन्दिन, दृढ़च्युत आगस्त्य, देवमुनि ऐरम्मद, देवरात वैश्वामित्र, देवल काश्यप, देवरात भारत, देवश्रवाः भारत, देवश्रवाः यामायन, देवातिथि काण्व, देवापि आर्ष्टिषेण, द्युतान मारुति, द्युम्नविश्वचर्षणि आत्रेय, द्युम्नीक वासिष्ठ, द्रोणशार्ङ्ग, द्वित आप्त्य, धरुण आङ्गिरस, ध्रुव आङ्गिरस, नभः प्रभेदन वैरूप, नर भारद्वाज, नहुष मानव, नाभाक काण्व, नाभानेदिष्ट मानव, नारद काण्व, नारायण, निध्रुवि काश्यप, नीपातिथि काण्व, नृमेध आङ्गिरस, नेम भार्गव, नोधा गौतम, पणि नामक असुरगण, पतङ्ग प्राजापत्य पराशर शाक्त्य, परुच्छेप दैवोदासि, पर्वत काण्व, पवित्र आङ्गिरस, पायु भारद्वाज, पुनर्वत्स काण्व, पुरुमीढ़ आङ्गिरस, पुरुमीढ़ सौहोत्र, पुरुमेध आङ्गिरस, पुरुहन्मा आङ्गिरस, पुरूरवाः ऐल, पुष्टिगु काण्व, पूतदक्ष आङ्गिरस, पूरण वैश्वामित्र, पुरु आत्रेय, पृथु वैण्य, पृश्नि अजगण, पृषध्र काण्व, पौर आत्रेय, प्रगाथ काण्व, प्रचेताः आङ्गिरस, प्रजापति, प्रजापति परमेष्ठी, प्रजापति वाच्य, प्रजापति वैश्वामित्र, प्रजावान् प्राजापत्य, प्रतर्द्दन काशिराज दैवोदासि, प्रतिरक्ष आत्रेय, प्रतिप्रभ आत्रेय, प्रतिभानु आत्रेय, प्रतिरथ आत्रेय, प्रथ वासिष्ठ, प्रभुवसु आङ्गिरस, प्रयस्वन्त आत्रेय, प्रयोग भार्गव, प्रस्कण्व काण्व, प्रियमैध आङ्गिरस, बन्धु गौपायन वा लौपायन, बभ्रु आत्रेय, बाहुवृक्त आत्रेय, बुध आत्रेय, बुध सौम्य, बृहदुक्थ वामदेव्य, बृहद्दिव आथर्व्वण, बृहस्पति आङ्गिरस, बृहस्पति आङ्गिरस, बृहस्पति लौक्य, ब्रह्मातिथि काण्व, भयमान वार्षागिर, भरद्वाज बार्हस्पत्य, भर्ग प्रागाथ, भावयव्य, भिक्षु आङ्गिरस, भिषगार्थर्वण, भुवन आप्त्य, भूतांश काश्यप, भृगु वारुणि, मत्स्य सामद, मथित यामायन, मधुच्छन्दा वैश्वामित्र, मनु आप्सव, मनु वैवस्वत, मनु सावरण, मन्यु तापस, मन्यु वासिष्ठ, मातरिश्वा काण्व, मान्धाता यौवनाश्व, मान्य मैत्रावरुणि, मुद्गल भार्म्यश्व, मूर्द्धन्वान् आङ्गिरस, मृत्तवासा द्वित आत्रेय, मृढीक वासिष्ठ, मेधातिथि काण्व, मेध्य काण्व, मेधा-
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋग्वेद'''|'''४२७'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
१५३७१४ तथा बालखिल्यकी पदसंख्या १८८६ एवं वर्गसंख्या १७ है।
{{block center|<poem>
"ऋग्वेदस्य तु शाखाः स्युरेकविंशतिसंख्यकाः।"
</poem>}}
कोई कोई ऋग्वेदकी शाखा २१ बताता है, किन्तु वास्तविक यह नहीं। प्रधानतः पांच ही शाखा हैं। जो लोग २१ बताते, वह प्रशाखा भी मिलाते हैं।
ऋक्संहिताका पारायण दो प्रकार होता है—प्रकृतिरूप और विकृतिरूप। फिर प्रकृति रूप भी रूढ़ और योगभेदसे दो प्रकारका पड़ता है। जैसे 'अग्निमीळे पुरोहितम्' इत्यादि रूढ़ और 'अग्निं ईळे पुरोहितम्' इत्यादि योग है।
विकृतिरूप आठ प्रकारका है। यथा—
{{block center|<poem>
"जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथो घनः।
अष्टौ विकृतयः प्रोक्ताः क्रमपूर्वा महर्षिभिः॥"
</poem>}}
जटा, माला, शिखा, लेखा, ध्वज, दण्ड, रथ और घन आठ प्रकारका विकृतिक्रम महर्षिगणने कहा है।
<div style="text-align: right;">{{smaller|जटा प्रभृति प्रत्येक शब्द देखो।}}</div>
ऋक्संहितामें जिस-जिस देवताका नाम लिया अथवा जिस जिस देवता और ऋषिका देवता रूपसे स्तव किया, उसका नाम नीचे दिया है—
अक्षकितव। अक्षा। अग्नायी। अग्नि, (ब्राह्मणीय, जातवेदा, निमथ्य, रक्षोहा, वैश्वानर और शौचीक)। आङ्गिरस अत्रि। अदिति। अधिषवण चर्म वा हरिचन्द्र। अध्वैता। अन्तरिक्ष। अन्न। अपांनपात्। अप्वा। अब्जा अष्टि। अभिशाप। अरण्यानी। अर्य्यमा। अलक्ष्मीनाश। अश्वा। अश्मद्वय। असमाति। अहिवुघ्न। असुनीति। अहोरात्र। आत्मा। आदित्यगण। आप, (अपांनपात्, गाव, सोम)। आप्र। आप्रिय। आबौ। आमीः। आसङ्ग। इडा। इन्दु। इन्द्र (कपीञ्जल-रूपी, वैकुण्ठ)। इन्द्राणी। इन्द्राश्व। इळा। इषुगण। इषुधि। इष्या। उपमन्यवा। मित्रातिथि पुत्र। उपाध्याय। उर्वशी। उलूखल। उशना। उषा (वा सूर्यप्रभा)। ऋक्ष। ऋतु। ऋत्विक्। ऋभुगण। ओषधि। क। कवच। कशुषेय। काल सम्बत्सरात्मा। कुत्स। कुरङ्ग। कुशश्रवस त्रासद्दस्यु। कृषि। केशी। कौरयाण। क्षेत्रपति। गङ्गा। गर्त्तार्त्तायी। गो।
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
गुग्गू। ग्रावण। चन्द्रमाः। चित्र। ज्ञान। ज्या। तनूनपात्। तार्क्ष्य। तिरिन्दिर। पारशव्य। त्रसदस्यु। त्वष्टा। दक्षिणा। दधिक्रा। दम्पोत। दाल्भ। दिक्। दुःस्वप्ननाशन। दुन्दुभि। द्यावा पृथिवी। द्यावाभूमि। द्यौः। द्रविणोद-द्रुघण। द्वारदेवो। धाता। नक्ता। नदीगण। नराशंस। निर्ऋति। पक्षि। पथ्यास्वस्ति। परमात्मा। पर्जन्य। पर्वत। पवमान। पितृगण। पितृमेधः। पुरोषा। पुरुमीढ़ वेद्दश्वा। पूरुष। पुरूरवः ऐल। पूषा। पृथिवी। पृश्नि। प्रजापति। प्रतोद। प्रस्कण्व। बर्हिः। बघुस्तृचः। ब्रहस्पति। ब्रह्मा। ब्रह्मणस्पति। भग। भारती। भावयव्य। भाववृत्त। भूमि। मण्डूक। मन्यु। मरुद्गण। मित्र। मृत्यु। मृत्युविमोचनी। यक्ष्मनाशन। यथानिपात। यम। यमी। यूप। रति। रथ। रथगोपा। रश्मि। राका। रात्रि। रुद्र। रोदसी। रोमशा। लिङ्गोक्त-देवता। वनस्पति। वरुण। वसिष्ठ। वसिष्ठपुत्रगण। वसुक। वाक्। वागाम्भृणी। वामदेव। वायु। वास्तोष्पति। विश्वकर्मा। विश्वामित्र। विश्वतश्व। विश्वदेव। विष्णु। वृषाकपि। वेण। व्रश्चिनौ। शची पौलोमी। शाकधूम। शक्र। शुन। शुनासिर। श्येन। श्रद्धा। श्वानू। सदसस्पति। समित्। सरण्यु। सरमा। सरस्वती। साध्यगण। साङ्कृत्य सोमक। सिनीवाली। सिन्धु। सुबन्धु। सूर्य। सूर्या। सोम (पवमान वा पूषा)। स्वाहाकृति। हरि। हरिश्चन्द्र प्रजापति। हविर्धान। हस्त। होता।
ऋक्संहितामें कहीं ३३ देवता और कहीं ३३३९ देवका उल्लेख है।
ऋक्संहिताके ऋषिगणका नाम—अंहोमुच् वामदेव्य, अकष्टा माषा, अगस्त्य, अगस्त्यकी स्वसा, अग्नि, अग्निचाक्षुष। अग्नितापस, अग्नि-पावक, अग्नियविष्ठसहके पुत्र, अग्निवैश्वानर, अग्निशौचीक, अग्निश्रुत सौर, अघमर्षण मधुच्छन्दः, अङ्ग औरव, अजमीढ़ सौहात्र, अति गण, अत्रि भौम, अत्रि सांख्य, अदिति, अदिति दाक्षायणी, अनानत-पारुच्छेपि, अनिल वातायन, अनिगु श्यावाश्वि, अपाला आत्रेयी, अप्रतिरय ऐन्द्र, अभितपा सौरः,
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२०
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ऐरंमद—ऐल|४७९}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ऐरंमद (सं॰ पु॰) देवमुनिके अपत्य। इन्होंने ऋग्वेदके मन्त्र बनाये थे।
ऐरंमदीय (सं॰ त्की॰) ब्रह्मलोकका एक समुद्र।
ऐरक्य (सं॰ त्रि॰) एरका–ण्य। एरका–जात। {{smaller|एरका देखो।}}
ऐराक, {{smaller|एराक देखो।}}
ऐराकी, {{smaller|एराकी देखो।}}
ऐराग़ैरा (हिं॰ वि॰) १ अपरिचित, जो समझा–बूझा न हो। २ तुच्छ, छोटा।
ऐरापति (हिं॰) {{smaller|ऐरावत देखो।}}
ऐराब (अ॰ पु॰) शतरंजमें किश्त बचानेके लिये बादशाह और किसी दूसरे मोहरके बीचमें मोहरेका आना। इससे बादशाहपर किश्त नहीं रहती। किन्तु ऐराबका मोहरा उठना नामुमकिन है। घोड़ेकी किश्त पड़नेसे ऐराब नहीं चलता।
ऐरालू (हिं॰ पु॰) इन्द्रवारुणी विशेष, किसी किस्मकी ककड़ी। यह तरबूज–जैसा रहता और पहाड़पर कुमाऊंसे सिकिमतक उपजता है।
ऐरावण (सं॰ पु॰) इरया जलेन वनति शब्दायते, इरा–वन पचांद्यच्; अथवा इरा सुरा वनमुदकं यस्मिन तत्र भवः, अण्। १ ऐरावती हस्ती। २ जैनमतानु–सार जम्बुद्दीपका सप्तम वर्ष। {{smaller|(जैनहरि॰ ५।१८)}}
ऐरावत (सं॰ पु॰) इरा जलानि सन्त्यत्र, मतुप् मस्य वः, इरावान् समुद्रः तत्र भवः अण् इरावत्या विद्यतोऽयम्। १ इन्द्रहस्ती। ऐरावत शुक्ल वर्ण और चतुर्दन्तविशिष्ट है। समुद्रके मन्थनकालपर यह उपजा था। यही पूर्व दिक्का गज है। इसका अपर नाम अभ्रमातङ्ग, ऐरावण, अभ्रभूवल्लभ, श्वेत–हस्ती, मल्लनाग, इन्द्रकुञ्जर, हस्तिमल्ल, सदादान,
सुदामा, श्वेतकुञ्जर, गजाग्रणी और नागमल्ल है।
<poem>"इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः।
आरुह्यौरावतं ब्रह्मन् प्रययावमराक्तीम्॥"</poem> {{smaller|(विष्णुपु॰ १।९।२५)}}
२ नागरङ्ग, नारंगी। ३ लकुचवृक्ष, बड़हर। ४ नाग–विशेष। (त्की॰) ५ इन्द्रधनु। ६ इरावती नदीके तीरका देश।
ऐरावतक (सं॰ पु॰) १ हस्तिशुण्डी, हाथीकी सूंड। २ नागरङ्ग वृक्ष, नारंगीका पेड़।
{{Multicol-break}}
ऐरावतचेत्र (सं० क्लो० ) कावेरोनदोतोरस्थ एक प्राचीन तीर्थस्थान। ऐरावतक्षेत्रके माहात्मामें लिखा है—इन्द्रने हवासुरवधजनित पापसे मुक्ति पानको इस
स्थानमें श्रा तपस्या और लिङ्गमूर्तिको स्थापना को थो।
शिवको कृपासे इन्द्रका ऐरावत फिर जो उठा और
इस स्थानका नाम ऐरावतक्षेत्र पड़ा।
ऐरावतपदी ( स ० स्त्री० ) १ काकजङ्घा। २ महा ज्योतिष्मती लता, रतनजोत ।
ऐरावती (सं० स्त्री) इरावत्-यम्, इरावत्-प
डोप १ विद्युत् विजली ।
ङोप । १ विद्युत्, बिजली । २ ऐरावतको स्त्री ।
३ वटपत्रीवृच, बड़ा पथरचटा । ४ उत्तरमाम के एक
नचत्रका नामान्तर । ५ पञ्चानदेशीय नदोविशेष
आजकल इसे रावो कहते हैं । इसका वेदोक्त नाम
परुष्णी है। ६ नामरङ्गवृच, नारंगोका पेड़ । ऐरा-
तोका पकाया हुआ रस अम्ल, उष्ण और सुगन्धित
होता है। इससे वात, कास और खासका रोग
कूट
जाता है।
ऐरिकिन (सं० क्लो० ) एरण नगरका प्राचीन नाम ।
कनिंगहम साहब के सतसे एरबका प्राचीन नाम एर
कैन है । एरण देखी।
ऐरिष (सं०] को०) हरिये अपरभूमी भवम्, रिय
ऋण । सैन्धव लवण, पांशुलवण ।
ऐसे-मध्यप्रान्त के मंडला जिलेका एक सरकारो
जंगल। यह श्रचा॰ २२३८ से २२४० उ० तथा
देशा० ८०० ४३ ४५ से ८० ४६ ४५ पू० तक
बुनेर चोर हाल नदोके सङ्गमपर पति है।
ऐरोमें साखू ख ूब होती है ।
येरेव (स को०) इराक १ मय, शराब
२ एलवालुक, एक मनुदार चोन २ वादि
अनाज वगैरह ।
ऐर्म्य (सं० क्लो० ) इमीय हितम्, इर्म ष्यञ् । १ सुश्रु-
- तोक्त अच्चनविशेष, किसी किस्म का काजल या सुरमा ।
(वि०) २ चत पूरचके निमित्त लाभदायक, जख्म
को सुखाने काबिल।
ऐल (सं० पु०) इलावा पुमान्, लाय्
१ इलापुत्र। इनका अन्य नाम पुरुरवा है। यह<noinclude>{{Multicol-end}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२७
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<noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|५२६|ओघवत्—ओङ्कारमान्धाता|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ओघवत् (सं० वि० ) घोघः जलवेनादिरस्तास्य,
घोष मतुप मस्य वः १ जलवेगादियुक्त, जोरसे बहने-
वाला । ( पु० ) २ एक राजा । यह घोघरयके
पिता थे । ( भारत, अनु० २५०)
ओघवती (स० स्त्री० ) १ महाभारतोक्त श्रोघवान्
राजाकी कन्या । इन्होंने सामोके पानानुसार दिन-
रूपधारो अतिथि धर्मको अपना शरीरतक दे डाला
था। धर्मने परितुष्ट हो उन्हें वर प्रदान किया ।
उससे यह लोकोपकारार्थ अर्ध देहसे नदी बन
गर्यो । ( भारत, अनु० २अ० ) २ कुरुक्षेत्रको एक नदी ।
( भारत, भौम० )
पोवार (सं० पु० ) पोम् कार
१ प्रणव । पहले
ओङ्कार उच्चारण कर, पोछे वेद पढ़ते है । ब्रह्मा
कण्ठको फोड़ प्रथम चाहार और पथ शब्द निकला
था। इससे यह दोनों शव्द माङ्गलिक समझे जाते
हैं। पोम् देखो। २ आरम्भ, शुरू | ३ सप्त समा
वयवका प्रथम अवयव । ४ एक लिङ्ग । "ओङ्कार ं प्रथमं लिन'
द्वितीयन्तु विलोचनम् ।” ( काशीखण्ड )
श्रोङ्कारभट्ट - एक प्राचीन संस्क तग्रन्थकार । भूगोलसार
नामक पुस्तक इन्होंने लिखा था ।
ओङ्कारमान्धाता (सं० पु० ) मध्यप्रदेश में नीमाड़
जिलेके अन्तर्गत नर्मदा नदीका मध्यवर्ती एक दोप
यह अचा० २२ २४० और देशा० ७८ १० पू०पर
अवस्थित है। चलित नाम मान्धाता है । ओङ्कार-
मूर्तिधारी महादेवका मन्दिर रहने से इस स्थानको
श्रीमान्धाता भी कहते हैं। मान्धाताका प्राचीन
नाम 'विदूर्यमे' था। स्कन्दपुराण श्वाखण्ड में लिखा
है-- राजा मान्धाताने श्रीङ्गारके निकट प्रार्थना को,
जिससे सन्तुष्ट हो उन्होंने के बदले मान्धाता
संज्ञा रख दी। *
मान्धातोवाच ।
यदि तुष्टोऽसि देवेश वरं दातु त्वमिच्छसि ।
वैदूर्य्यो नाम शैलेन्द्रो मान्धाता ख्यातुमर्हेतु ॥
देवस्थानसभं ह्येतत् त्वत्प्रसादाद्भविष्यति ।
अन्नदानं तपः पूजा तथा प्राणविसर्जनम् ॥
ये कुर्व्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासिना ||
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
इस दोपका श्रवस्थान अति सुन्दर है । इससे
थोड़ी दूरपर नर्मदाको कावेरौ नाम्नो एक शाखा
बहती है। फिर इसो नामको एक छोटो नदी नर्मदा-
से अलग रह मान्धाताके निकट कावेरोमें जा मिलो
है। एक ही स्थानमें दो सहम है। ऐसा पवित्र
तो भारतवर्षमें पति विरल है। पुरायादिका तो-
माहामा देखते ऐसे तो में वास वा खान करनेसे
अशेष पुण्यलाभ होता है ।
यहां नर्मदाके उभय पार्श्व पर हरे रङ्गका पहाड़
देख पड़ेगा। पहाड़के मध्य जहां नदोका प्रवाह
चलता, वहां जल गभीर, स्वच्छ और शान्त रहता है ।
जनमें असंख्य कच्छप और मत्स्य सेलते फिरते हैं।
वह इतने निर्भीक और विश्वासी रहते, कि घाट
किनारे [लाई छोड़ देनेसे निर्भय था चाया करते हैं।
stant परिमाण प्राय: एक वर्ग मोल है ।
-
1
ओङ्कार लिङ्ग आधुनिक नहीं । स्कन्द, शिव,
पद्म प्रभृति पुरायोंमें पोद्धारका नाम उजा
है । शिवपुराण में लिखा है, “किसी समय महर्षि
नारद गोकर्ष तीर्थसे विन्ध्यपर्वतको पाये थे। यहां
विधने बड़े सन्मान से उनको पूजा को पहले
नारदको विश्वास रहा विन्ध्यपर्वतके पास सव
कुछ है, किसी वस्तुका अभाव नहीं; इससे विन्ध्य
अहङ्कार करते - हमारे सब है । अतएव नारदने
निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर
पूछा, 'भगवन् ! मैंने क्या दोष किया, जो
निवास कोड दिया
तुम्हारे पास सब कुछ है।
।
-
नारदने कहा, 'विन्य
किन्तु तुम्हारे ऊपर देवता
तस्य तद्दचनं श्रुत्वा मान्धातुः परमेश्वरः ।
उवाच वचन' देवो मान्धातारं महीपतिम् ॥
सर्वमेतन्न पश्रेष्ठ मत्प्रसादाद्भविष्यति ।
यन्म े चीर्यं महौपाल दृष्ट्वाहयत्वयाऽनघ ॥
तदा प्रभृति मान्धाता वैदूर्य्यो गौयते गिरिः ।
अस्य तीर्थस्य माहात्मग्रामान्प्रमुखा नृपाः ।
सर्व्वकामसमापन्ना लोके क्रौड़न्ति वैष्णवे ।
श्रवणात् कीर्त्तनाद्यापि इयमेधफलं लभेत् ॥”
(स्कन्दपुराण, रेवाखण्ड १२५० )<noinclude>{{Multicol-end}}
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ओघवत् (सं॰ त्रि॰) ओघः जलवेनादिरस्तास्य, ओघ–मतुप् मस्य वः। १ जलवेगादियुक्त, जोरसे बहनेवाला। (पु॰) २ एक राजा। यह ओघरथके पिता थे। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}}
ओघवती (स॰ स्त्री॰) १ महाभारतोक्त ओघवान् राजाकी कन्या। इन्होंने स्वामीके आज्ञानुसार द्विज-
रूपधारी अतिथि धर्मको अपना शरीरतक दे डाला था। धर्मने परितुष्ट हो उन्हें वर प्रदान किया।
उसीसे यह लोकोपकारार्थ अर्ध देहसे नदी बन गयी। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}} २ कुरुक्षेत्रकी एक नदी।
{{right|{{smaller|(भारत, भीष्म॰)}}}}
ओङ्कार (सं० पु० ) ओम्–कार। १ प्रणव। पहले ओङ्कार उच्चारण कर, पीछे वेद पढ़ते है। ब्रह्माके कण्ठको फोड़ प्रथम आङ्कार और अथ शब्द निकला था। इसीसे यह दोनों शब्द माङ्गलिक समझे जाते हैं। {{smaller|ओम् देखो।}} २ आरम्भ, शुरू। ३ सप्त समावयवका प्रथम अवयव। ४ एक लिङ्ग। {{smaller|"ओङ्कारं प्रथमं लिङ्गं द्वितीयन्तु विलोचनम्।" (काशीखण्ड)}}
श्रोङ्कारभट्ट - एक प्राचीन संस्क तग्रन्थकार । भूगोलसार
नामक पुस्तक इन्होंने लिखा था ।
ओङ्कारमान्धाता (सं० पु० ) मध्यप्रदेश में नीमाड़
जिलेके अन्तर्गत नर्मदा नदीका मध्यवर्ती एक दोप
यह अचा० २२ २४० और देशा० ७८ १० पू०पर
अवस्थित है। चलित नाम मान्धाता है । ओङ्कार-
मूर्तिधारी महादेवका मन्दिर रहने से इस स्थानको
श्रीमान्धाता भी कहते हैं। मान्धाताका प्राचीन
नाम 'विदूर्यमे' था। स्कन्दपुराण श्वाखण्ड में लिखा
है-- राजा मान्धाताने श्रीङ्गारके निकट प्रार्थना को,
जिससे सन्तुष्ट हो उन्होंने के बदले मान्धाता
संज्ञा रख दी। *
मान्धातोवाच ।
यदि तुष्टोऽसि देवेश वरं दातु त्वमिच्छसि ।
वैदूर्य्यो नाम शैलेन्द्रो मान्धाता ख्यातुमर्हेतु ॥
देवस्थानसभं ह्येतत् त्वत्प्रसादाद्भविष्यति ।
अन्नदानं तपः पूजा तथा प्राणविसर्जनम् ॥
ये कुर्व्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासिना ||
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इस दोपका श्रवस्थान अति सुन्दर है । इससे
थोड़ी दूरपर नर्मदाको कावेरौ नाम्नो एक शाखा
बहती है। फिर इसो नामको एक छोटो नदी नर्मदा-
से अलग रह मान्धाताके निकट कावेरोमें जा मिलो
है। एक ही स्थानमें दो सहम है। ऐसा पवित्र
तो भारतवर्षमें पति विरल है। पुरायादिका तो-
माहामा देखते ऐसे तो में वास वा खान करनेसे
अशेष पुण्यलाभ होता है ।
यहां नर्मदाके उभय पार्श्व पर हरे रङ्गका पहाड़
देख पड़ेगा। पहाड़के मध्य जहां नदोका प्रवाह
चलता, वहां जल गभीर, स्वच्छ और शान्त रहता है ।
जनमें असंख्य कच्छप और मत्स्य सेलते फिरते हैं।
वह इतने निर्भीक और विश्वासी रहते, कि घाट
किनारे [लाई छोड़ देनेसे निर्भय था चाया करते हैं।
stant परिमाण प्राय: एक वर्ग मोल है ।
-
1
ओङ्कार लिङ्ग आधुनिक नहीं । स्कन्द, शिव,
पद्म प्रभृति पुरायोंमें पोद्धारका नाम उजा
है । शिवपुराण में लिखा है, “किसी समय महर्षि
नारद गोकर्ष तीर्थसे विन्ध्यपर्वतको पाये थे। यहां
विधने बड़े सन्मान से उनको पूजा को पहले
नारदको विश्वास रहा विन्ध्यपर्वतके पास सव
कुछ है, किसी वस्तुका अभाव नहीं; इससे विन्ध्य
अहङ्कार करते - हमारे सब है । अतएव नारदने
निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर
पूछा, 'भगवन् ! मैंने क्या दोष किया, जो
निवास कोड दिया
तुम्हारे पास सब कुछ है।
।
-
नारदने कहा, 'विन्य
किन्तु तुम्हारे ऊपर देवता
तस्य तद्दचनं श्रुत्वा मान्धातुः परमेश्वरः ।
उवाच वचन' देवो मान्धातारं महीपतिम् ॥
सर्वमेतन्न पश्रेष्ठ मत्प्रसादाद्भविष्यति ।
यन्म े चीर्यं महौपाल दृष्ट्वाहयत्वयाऽनघ ॥
तदा प्रभृति मान्धाता वैदूर्य्यो गौयते गिरिः ।
अस्य तीर्थस्य माहात्मग्रामान्प्रमुखा नृपाः ।
सर्व्वकामसमापन्ना लोके क्रौड़न्ति वैष्णवे ।
श्रवणात् कीर्त्तनाद्यापि इयमेधफलं लभेत् ॥”
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ओघवत् (सं॰ त्रि॰) ओघः जलवेनादिरस्तास्य, ओघ–मतुप् मस्य वः। १ जलवेगादियुक्त, जोरसे बहनेवाला। (पु॰) २ एक राजा। यह ओघरथके पिता थे। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}}
ओघवती (स॰ स्त्री॰) १ महाभारतोक्त ओघवान् राजाकी कन्या। इन्होंने स्वामीके आज्ञानुसार द्विज-रूपधारी अतिथि धर्मको अपना शरीरतक दे डाला था। धर्मने परितुष्ट हो उन्हें वर प्रदान किया। उसीसे यह लोकोपकारार्थ अर्ध देहसे नदी बन गयी। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}} २ कुरुक्षेत्रकी एक नदी।{{right|{{smaller|(भारत, भीष्म॰)}}}}
ओङ्कार (सं० पु० ) ओम्–कार। १ प्रणव। पहले ओङ्कार उच्चारण कर, पीछे वेद पढ़ते है। ब्रह्माके कण्ठको फोड़ प्रथम आङ्कार और अथ शब्द निकला था। इसीसे यह दोनों शब्द माङ्गलिक समझे जाते हैं। {{smaller|ओम् देखो।}} २ आरम्भ, शुरू। ३ सप्त समावयवका प्रथम अवयव। ४ एक लिङ्ग। {{smaller|"ओङ्कारं प्रथमं लिङ्गं द्वितीयन्तु विलोचनम्।" (काशीखण्ड)}}
ओङ्कारभट्ट—एक प्राचीन संस्कृतग्रन्थकार। भूगोलसार नामक पुस्तक इन्होंने लिखा था।
ओङ्कारमान्धाता (सं॰ पु॰) मध्यप्रदेशमें नीमाड़ जिलेके अन्तर्गत नर्मदा नदीका मध्यवर्ती एक द्वीप। यह अक्षा॰ २२° १४’ उ॰ और देशा॰ ७६° १७’ पू॰पर अवस्थित है। चलित नाम मान्धाता है। ओङ्कार-मूर्तिधारी महादेवका मन्दिर रहनेसे इस स्थानको
ओङ्कारमान्धाता भी कहते हैं। मान्धाताका प्राचीन नाम 'वैदूर्यशूल' था। स्कन्दपुराणके रेवाखण्डमें लिखा है—राजा मान्धाताने ओङ्कारके निकट प्रार्थना की, जिससे सन्तुष्ट हो उन्होंने वैदूर्यशूलके बदले मान्धाता संज्ञा रख दी।*
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<poem>यदि तुष्टोऽसि देवेश वरं दातु त्वमिच्छसि।
वैदूर्य्यो नाम शैलेन्द्रो मान्धाता ख्यातुमर्हेतु॥
देवस्थानसभं ह्येतत् त्वत्प्रसादाद्भविष्यति।
अन्नदानं तपः पूजा तथा प्राणविसर्जनम्॥
ये कुर्व्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासिना।</poem>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
इस दोपका श्रवस्थान अति सुन्दर है। इससे
थोड़ी दूरपर नर्मदाको कावेरौ नाम्नो एक शाखा
बहती है। फिर इसो नामको एक छोटो नदी नर्मदा-
से अलग रह मान्धाताके निकट कावेरोमें जा मिलो
है। एक ही स्थानमें दो सहम है। ऐसा पवित्र
तो भारतवर्षमें पति विरल है। पुरायादिका तो-
माहामा देखते ऐसे तो में वास वा खान करनेसे
अशेष पुण्यलाभ होता है।
यहां नर्मदाके उभय पार्श्व पर हरे रङ्गका पहाड़
देख पड़ेगा। पहाड़के मध्य जहां नदोका प्रवाह
चलता, वहां जल गभीर, स्वच्छ और शान्त रहता है ।
जनमें असंख्य कच्छप और मत्स्य सेलते फिरते हैं।
वह इतने निर्भीक और विश्वासी रहते, कि घाट
किनारे [लाई छोड़ देनेसे निर्भय था चाया करते हैं।
परिमाण प्राय: एक वर्ग मील है।
ओङ्कार लिङ्ग आधुनिक नहीं । स्कन्द, शिव,
पद्म प्रभृति पुरायोंमें पोद्धारका नाम उजा
है । शिवपुराण में लिखा है, “किसी समय महर्षि
नारद गोकर्ष तीर्थसे विन्ध्यपर्वतको पाये थे। यहां
विधने बड़े सन्मान से उनको पूजा को पहले
नारदको विश्वास रहा विन्ध्यपर्वतके पास सव
कुछ है, किसी वस्तुका अभाव नहीं; इससे विन्ध्य
अहङ्कार करते - हमारे सब है । अतएव नारदने
निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर
पूछा, 'भगवन् ! मैंने क्या दोष किया, जो
विश्वास छोड़ दिया हैं। नारदने कहा—'विन्ध्य तुम्हारे पास सब कुछ है। किन्तु तुम्हारे ऊपर देवता
<poem>तस्य तद्दचनं श्रुत्वा मान्धातुः परमेश्वरः।
उवाच वचन' देवो मान्धातारं महीपतिम्॥
सर्वमेतन्न पश्रेष्ठ मत्प्रसादाद्भविष्यति।
यन्म े चीर्यं महौपाल दृष्ट्वाहयत्वयाऽनघ॥
तदा प्रभृति मान्धाता वैदूर्य्यो गौयते गिरिः।
अस्य तीर्थस्य माहात्मग्रामान्प्रमुखा नृपाः।।
सर्व्वकामसमापन्ना लोके क्रौड़न्ति वैष्णवे।
श्रवणात् कीर्त्तनाद्यापि इयमेधफलं लभेत्॥”</poem>{{right|(स्कन्दपुराण, रेवाखण्ड २२अ॰)}}<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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ओघवती (स॰ स्त्री॰) १ महाभारतोक्त ओघवान् राजाकी कन्या। इन्होंने स्वामीके आज्ञानुसार द्विज-रूपधारी अतिथि धर्मको अपना शरीरतक दे डाला था। धर्मने परितुष्ट हो उन्हें वर प्रदान किया। उसीसे यह लोकोपकारार्थ अर्ध देहसे नदी बन गयी। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}} २ कुरुक्षेत्रकी एक नदी।{{right|{{smaller|(भारत, भीष्म॰)}}}}
ओङ्कार (सं० पु० ) ओम्–कार। १ प्रणव। पहले ओङ्कार उच्चारण कर, पीछे वेद पढ़ते है। ब्रह्माके कण्ठको फोड़ प्रथम आङ्कार और अथ शब्द निकला था। इसीसे यह दोनों शब्द माङ्गलिक समझे जाते हैं। {{smaller|ओम् देखो।}} २ आरम्भ, शुरू। ३ सप्त समावयवका प्रथम अवयव। ४ एक लिङ्ग। {{smaller|"ओङ्कारं प्रथमं लिङ्गं द्वितीयन्तु विलोचनम्।" (काशीखण्ड)}}
ओङ्कारभट्ट—एक प्राचीन संस्कृतग्रन्थकार। भूगोलसार नामक पुस्तक इन्होंने लिखा था।
ओङ्कारमान्धाता (सं॰ पु॰) मध्यप्रदेशमें नीमाड़ जिलेके अन्तर्गत नर्मदा नदीका मध्यवर्ती एक द्वीप। यह अक्षा॰ २२° १४’ उ॰ और देशा॰ ७६° १७’ पू॰पर अवस्थित है। चलित नाम मान्धाता है। ओङ्कार-मूर्तिधारी महादेवका मन्दिर रहनेसे इस स्थानको
ओङ्कारमान्धाता भी कहते हैं। मान्धाताका प्राचीन नाम 'वैदूर्यशूल' था। स्कन्दपुराणके रेवाखण्डमें लिखा है—राजा मान्धाताने ओङ्कारके निकट प्रार्थना की, जिससे सन्तुष्ट हो उन्होंने वैदूर्यशूलके बदले मान्धाता संज्ञा रख दी।*
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<poem>यदि तुष्टोऽसि देवेश वरं दातु त्वमिच्छसि।
वैदूर्य्यो नाम शैलेन्द्रो मान्धाता ख्यातुमर्हेतु॥
देवस्थानसभं ह्येतत् त्वत्प्रसादाद्भविष्यति।
अन्नदानं तपः पूजा तथा प्राणविसर्जनम्॥
ये कुर्व्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासिना।</poem>
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इस दोपका श्रवस्थान अति सुन्दर है। इससे
थोड़ी दूरपर नर्मदाको कावेरौ नाम्नो एक शाखा
बहती है। फिर इसो नामको एक छोटो नदी नर्मदा-
से अलग रह मान्धाताके निकट कावेरोमें जा मिलो
है। एक ही स्थानमें दो सहम है। ऐसा पवित्र
तो भारतवर्षमें पति विरल है। पुरायादिका तो-
माहामा देखते ऐसे तो में वास वा खान करनेसे
अशेष पुण्यलाभ होता है।
यहां नर्मदाके उभय पार्श्व पर हरे रङ्गका पहाड़
देख पड़ेगा। पहाड़के मध्य जहां नदोका प्रवाह
चलता, वहां जल गभीर, स्वच्छ और शान्त रहता है ।
जनमें असंख्य कच्छप और मत्स्य सेलते फिरते हैं।
वह इतने निर्भीक और विश्वासी रहते, कि घाट
किनारे [लाई छोड़ देनेसे निर्भय था चाया करते हैं।
परिमाण प्राय: एक वर्ग मील है।
ओङ्कार लिङ्ग आधुनिक नहीं । स्कन्द, शिव,
पद्म प्रभृति पुरायोंमें पोद्धारका नाम उजा
है । शिवपुराण में लिखा है, “किसी समय महर्षि
नारद गोकर्ष तीर्थसे विन्ध्यपर्वतको पाये थे। यहां
विधने बड़े सन्मान से उनको पूजा को पहले
नारदको विश्वास रहा विन्ध्यपर्वतके पास सव
कुछ है, किसी वस्तुका अभाव नहीं; इससे विन्ध्य
अहङ्कार करते - हमारे सब है । अतएव नारदने
निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर
पूछा, 'भगवन् ! मैंने क्या दोष किया, जो
विश्वास छोड़ दिया हैं। नारदने कहा—'विन्ध्य तुम्हारे पास सब कुछ है। किन्तु तुम्हारे ऊपर देवता
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<poem>तस्य तद्दचनं श्रुत्वा मान्धातुः परमेश्वरः।
उवाच वचन' देवो मान्धातारं महीपतिम्॥
सर्वमेतन्न पश्रेष्ठ मत्प्रसादाद्भविष्यति।
यन्म े चीर्यं महौपाल दृष्ट्वाहयत्वयाऽनघ॥
तदा प्रभृति मान्धाता वैदूर्य्यो गौयते गिरिः।
अस्य तीर्थस्य माहात्मग्रामान्प्रमुखा नृपाः।।
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कण्टकारीकृत-कण्टकालुक|६४९}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
रेचक कहा है। पदतलमें प्रदाह पड़ने पार जलयुक्त पिड़का उठनेसे यह व्यवहार की जाती है। दन्त-मूलमें व्यथा बढ़नेसे कण्टकारीका धम और उत्ताप विशेष उपकारी है। डाकर मोरहेडके कथनानुसार यह विशेषतः कफनिःसारक होती है।
कहीं कहीं लोग कण्टकारीका वीज खाते हैं। कण्टकारीघत (सं० लो०) कासरोगका एक वैद्यकोक्त औषध, खांसोको एक दवा। यह अल्प, अपर और वृहत भेदसे विविध रहता है।
<Small>अल्प-</small>कण्टकारी और गुलञ्च तीस-तीस पल ६० सेर जलमें क्वाथ करे। सवा पांच सेर जल अव-शिष्ठ रहनेसे उस क्वाथको छान लेते हैं। फिर इसी क्वाथमें ४ सेर घत पकाना चाहिये। यह हत पौनेसे वाताधिक्य तथा कासरोग छुटता और अम्निका वेग फटता है।
<Small>अपर-</small>कण्टकारीका क्वाथ सवा छह सेर, घृत ४ सेर और राम्रा, बाव्यालक, विकटु तथा गोक्षुर समुदायका बराबर-बराबर कल्क १ सेर यथा विधि पका सेवन करनेसे पञ्चविध कासरोग विनष्ट होता है।
<Small>वइत्-</small>मूल, पत्र एवं शाखायुक्त कण्टकारीका क्वाथ सवा छह सेर, घृत ४ सेर पौर वाट्यालक, त्रिकटु, विडङ्ग, शटो, चित्रक, सचल लवण, यवचार, सूखा कच्चा बेल, पामलको, कुष्ठ, खेतपुनर्णवा, अतीस, दुरालभा, प्राम्सलोनिका, वृहती, हरीतकी, यमानी,दाडिम, ऋद्धि, द्राक्षा, रक्तपुनर्णवा, कर्कटशृङ्गी, भूम्यामलको, ब्राह्मणय ष्टिका, राम्रा तथा गोक्षुर समुदायका बराबर-बराबर कल्क १ सेर अच्छीतरह पका सेवन करनेसे सर्वप्रकार कासरोग एवं कफरोग छुट जाता है।
स्वरभेदरोगके अधिकारपर निम्नलिखित कण्ट-कारीघृत कहा है-
कण्टकारीको कण्टकारीके ही रससे क्वाथ कर चतुर्थांश बचनेपर वाट्यालक, गोक्षुर एवं त्रिकटु के कल्क और घृत सबको फिर भली भांति पकाते हैं। यह पत पीनेसे स्वरभङ्ग और पञ्चविध कास
{{Multicol-break}}
विनष्ट होता है। रागोका बलाबल देख आध तोलेसे घृतको मात्रा बढ़ाना चाहिये। अनुपान भी रोगीको अवस्थाके अनुसार उष्णदुग्ध प्रभृति व्यवस्थेय है। कण्टकारीका रस यथेष्ट न मिलनसे अष्टगुण जल डाल देते हैं।
कण्टकारीत्रय (सं० का०) वृहती, गणिकारो और दुरालभा तीनों द्रश्यका समुदाय । सिद्धयोगमें गणि- कारोके स्थानमें गोक्षुर लेते हैं। कण्ट कारोवय तन्द्रा,प्रलाप, भ्रम, पित्त, ज्वर, और विदोषको नाश करता है। <Small>(वैद्यकनिघण)</small>
कण्टकारी (सं० पु०) विकत वृक्ष, बैंची।
कण्टकारीद्रुम, <small>कटकारौद्रु देखो।</small>
कण्टकारीद्दय (सं० ली०) बृहती पौर कण्टकारी उभय द्रव्य, छोटो और बड़ी दोनों कटेरी।
कण्टकारीफल (सं० लो०) कण्टकारीका,फल, भटकट येको गोलो। यह ति, कट क, दीपन, लघु, रुक्ष, उष्ण और खास, कास, ज्वर, अनिल तथा कफरोगनाशक है। <Small>(भावप्रकाश )</small>
कण्टकायें (स० पु०) कुटजवच, मकोय ।
कण्टकार्या, <small>कटकारो देखो।</small>
कण्टकायोंदि (सं० पु०) पित्तले मज ज्वरका एक कषाय, सफर और बलगमके बोखारका एक काढ़ा या जौर्यादा। कण्टकारी, अमृता, ब्राह्मण्यष्ठि, शुण्ठी, इन्द्रयव, दुरालभा, चिरायता, रक्षचन्दन, मुस्त,पटोल और कट को सब २ तोले प्राधसेर जखमें उबाल आध पाव रहनेसे उतार ले। फिर यह काढ़ा पित्तश्लेष्मज ज्वरके रोगीको छानकर पिलाना चाहिये। कण्ट कार्यादि पाचन पीनेसे पित्त, श्र्लभा,ज्वर, दाह, तृष्णा, अरुचि, वमि, कास और हृदय एवं पाखेको वेदनाका निवारण होता है। <Small>(चक्रपाणिदत्तक्कतसंग्रह)</small>
कण्टकाल (सं० पु०) कण्टं कण्टकव्याप्त फलं कालयति उत्पादयति, कण्ट कस-णिच-अण, कण्ट कैः कण्टकाकीर्णफलरलयति शोभते, कण्टक-अल-अच्वा। १पनसवृक्ष, कटहलका पेड़। २मन्दार, मदार।
कण्टकालिका (सं० स्त्री०) कण्टकारी, कटाई।
कण्टकालुक (सं० पु०) कण्टकैरलयति कराएं काल-<noinclude></noinclude>
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६६०|कण्टकाशन-कण्टपत्रफला|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
यति वा, कण्टक पल, कण्ट-कल वा उकञ् । १ दुरा-लभा, नवासा। २ पासक्षुप, लालजवासेका पौदा।
कण्टकाशन (सं० पु०) कण्टक अनाति, कण्टक-अशल्य। उष्ट्र, ऊंट।
कण्टकाठील (सं० पु०) कण्टक: अष्ठीलेव यस्य,बहुव्री०। मत्स्यविशेष, एक मछली। अपर नाम कुलिश है। इसके हड्डियां बहुत होती हैं।
कण्टकिज (सं० नि०)१मत्स्यसे उतपत्र, मछलीसे पैदा। २ मदनवृक्षसे उत्पन्न, मैनफलके पेड़से निकला हुआ ।
कण्टकित (सं० त्रि०) कण्टको रोमाञ्चो जातोऽस्य, कण्टक-इतच।<small> तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतच्। पा ५॥२॥३६॥</small> १ रीमाञ्चित, रोंगटे खड़े किये हुआ। २ कण्टकयुक्ता, कांटेदार, कंटीला।
कण्टकिन्, <small>कण्टको देखो।</small>
कण्टकिनी (सं० स्त्री०) कण्टकाः सन्त्यस्याः, कण्टक-इनि डीप। १ वार्ताको क्षुप, बैंगनका पौदा। २ कण्टकारिका, कटेरी। ३ रक्तभिण्टी, लाल कटसरैया। ४ मधुखजरोवृक्ष, मोठी खजूरका पेड़।
कण्टकिफल (सं० पु० ) कण्टकि कण्टकयुक्त फलं यस्य, बहुव्री०। १ पनसवृक्ष, कटहलका पेड़। माशेलक्षप. करवे जमीकन्टका पौदा। ३त्रपषा- फल, खीरा।
कण्टकिफला (सं० स्त्री०) कर्कटी, ककड़ी।
कण्टकिल (सं० पु०) कण्टकोऽस्स्तस्य, कण्टक अस्वयं इलच। वंशविशेष, कंटीला बांस।
कण्टकिलता (सं० स्त्री०) कण्टकिनो चासौ लता चेति, कर्मधा० । १ कर्कटी, ककड़ीको बेल । २ नपुषी-लता, खीरकी बेल।
कण्टकिला (सं० स्त्री०) <small>कहकिल देखो।</small>
कण्टको (सं० पु० ) कण्टकोऽस्यास्ति, कण्टक-इनि। १ मत्स्य, मछलौ। २ खदिरवृक्ष, खैरका पेड़। ३ मदनक्ष, मैनफलका पेड़। ४ गोक्षुरक्षुप, गोखरूका झाड़। ५ वदरवृक्ष, बेरका पेड़। ६ वंशविशेष,एक कंटीला बांस। ७विकान्तवृक्ष, बैंची। ८ विट-खदिर। विल्ववृक्ष, बेलका पेड़। १० पारिभद्र
{{Multicol-break}}
वृक्ष। (स्त्री०) कण्टक अर्श प्रादित्वात् अच-डोष। ११ वार्ताकोविशेष, एक कंटीला भांटा। राजवल्लभ मतसे यह कट, तिता, उष्णवीय, दोषजनक, रक्त एवं पित्तप्रकोपकर और कण्ड, तथा कच्छनाशक है। १२ शमौवच, सेमका पौदा। १३ वहती. कटाई। (त्रि०) १४ कण्टकयुक्त, कंटीला।
कण्टकोकारी ( सं० स्त्री०) कण्टकों में कार्य करने-वाली, जो कांटोंमें काम करती हो।
कण्टकोद्रुम (सं० पु०) कण्टको चासो दुमश्चेति पृषोदरादित्वात् दीर्घः, कर्मधा० । १ खदिरवृक्ष, खैरका पेड़। २ वार्ताकोवृक्ष, बैंगनका पौदा।
कण्टकोपारिजात (सं० पु०) पारिभद्रक, पांगरा।
कण्ट कोफल, <small>कल्टकिफल देखो।</small>
कण्टकोफला, <small>कण्टकिफला देखो।</small>
कण्टको लता, <small>कटकिलता देखो।</small>
कण्टकोशरपुडा (सं० स्त्री०) शरपुडाभेद, किसी किस्मकी सरफोंका। यह कटु, उष्ण, और क्वमि एवं शूलघ्न होती है। <Small>(वैद्यकनिघण्टु )</small>
कण्टकोशक (सं० पु०) पारिभद्रवृक्ष, पांगरा।
कण्टकुरण्ट (सं० पु०) कण्टः कण्टकप्रधानः कुरण्टः, मध्यपदली०। १ पौतमिण्टी, पौली कटसरैया। २ झिण्टोक्षुप, कटसरैयेका पौदा।
कण्टकोद्धरण (सं० लो०) १ कण्टक आदिका निवा-रण, निराई। २ क्लेशनिवारण, तकलीफ दर करनेका काम। ३चोर डाकुवोंका निकाला जाना।
कण्ट तनु (सं० स्त्री०) कण्टा कण्टकान्विता तनु-यस्याः, मध्यपदलो। १ केतकीपुष्य, केवड़े का फूल। २ बृहती, कटेरी।
कण्टदला (सं० स्त्री० ) कण्टं कण्टकाचितं दलं यस्याः, मध्यपदलो। १ केतकोवृक्ष, केवड़ेका पेड़। २ खेतकेतकी, सफेद केवड़ा।
कण्टपत्र (सं० पु०) १ विकसस वृक्ष, बैंची। २ शृङ्गा-टक, सिंघाड़ा।
कण्टपत्रक (सं०पु०) कण्टपन खार्थे कन् । शृङ्गा-टक, सिंघाड़ा।
कण्टपत्रफला (सं० स्त्री०) ब्रह्मदण्डो वृक्ष ।<noinclude></noinclude>
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''१८६'''|'''
अछना-
-अज'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|( क्रि० वि०) २ क्रमशः, अहिस्ता-अहिस्ता ; शीघ्र नहीं, धीरे-धीरे ।}}
{{outdent|अकना (हिं० क्रि० ) होना, रहना ।}}
अछनेरा--युक्तप्रदेश के आगरा जि.लेका एक कसबा । यह रेलोंका जङ्गशन-ष्टेशन है।
अकप (हिं० वि०) न छिपनेवाला, ज़ाहिर । अम्मो (हिं० पु० ) आश्चर्य, अज्जुब । अछय - अक्षय देखो।
अछयकुमार—अक्षकुमार देखो ।
अकरा, अकरो - अमरा देखो।
अछरौटी (हिं० स्त्री० ) वर्णमाला, हरूफ तहज्जी । अछल ( हिं० वि० ) निश्चल, लाफरेब ; जो कपटी न हो ।
अवाना (हिं० क्रि०) सजाना, बनाना । अवानी (सं० स्त्री० ) प्रसूता स्त्रियों को दिया जाने - वाला पाकविशेष। यह घृत में परिपक्क किया जाता और इसमें मेवा, अजवाइन, सोंठ आदि कई दवायें पड़ती हैं। अछाम (हिं० वि० १ स्थूल, मोटा ।
२ बलवान्,
मज़बूत । अछियार (हिं० पु० ) सुख गोटवालौ गजक
अछी (हिं॰ स्त्री॰) आलवृक्ष, अलका दरखूत् या पेड़ । अछूत, अछूता ( हिं० वि० ) १ स्पर्श न किया हुआ, न कुना गया । २ काममें न लाया गया, नवोन ।
अछेद,
अछेद्य - अच्छा देखो।
अछेव - अच्छिद्र देखो।
अछेह - श्रच्छेद्य देखो ।
अकोप (हिं० वि० ) १ नग्न, नङ्गा । २ तुच्छ, छोटा । अछोभ, अछोह, अछोही—श्रक्षोभ देखो। अज्— क्षेपण, गति । भ्रा० प०, सक० सेट् ।
अन्वेष्वपि दृश्यते । पा ३।२।१०१ ।
अज् - दीप्ति (जि, इदित०) चु० उ० अक० धातु सेट् । अज (सं० पु० ) न जायते, न-जन-ड, नञ्-तत् । १ जिसका जन्म न हो, ईश्वर । २ जौव । ३ ब्रह्मा । ४ विष्णु । ५ शिव । ६ चन्द्र । ७ कामदेव । ८ अयोध्या के सूर्यवंशीय एक
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
राजा जो रघुके पुत्र और रामचन्द्र के पितामह थे ; . इनकी स्त्रीका नाम इन्दुमतो था, जिनके गर्भ से दशरथ ८ ऋषिषिशेष । उत्पन्न हुए थे । ११ मेंढ़ा । १२ सोनामाखी धातु ।
१० बकरा ।
१३ अजन्मा । १४ नेता । (स्त्री०) अजा ~ १ सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिका प्रकृति । २ बकरो । ३ ओषधि-विशेष, काकड़ासींगो ।
अज यानो बकरा चतुष्पद जन्तु है । इसका सर्वाङ्ग लोमसे आवृत है । किसी-किसी जातिवाले बकरेको देहपर कोमल और रेशम जैसे चिक्कण और किसी- किसीके बाल जैसे मोटे लोम होते हैं । बकरे के दो शृङ्ग रहते, पूंछ छोटो होती; पागुर करते समय भुक्तद्रव्य जब मुखमें पेट से निकलता, तब 'हड़ात्' करके सामान्य एक शब्द उठता 1 बकरके बत्तोस दांत होते हैं। इनमें बीस नोचे और बारह ऊपर रहते हैं । नोचेके बौस दांतों में दोनो जबडों के बारह दांतोंसे खाद्यद्रव्यको बकरा चबाता और सामनेवाले आठ दांतोंसे तृणादि उखाड़ता है। ऊपरवाले दोनो जबडों में केवल खाद्यद्रव्य के चबानेके लिये बारह दांत लगे हैं। भूमिष्ठ होनेसे पौछे बकरेवाले शिशुके केवल छ : जबड़े के दांत रह जाते हैं। सामने के दांत इक्कीस दिनमें निकल आते हैं । एक वर्ष या पन्द्रह महीने बाद सामने के दो दांत टूट जाते ; फिर नये दांत निकलते हैं । दो अथवा ढ़ाई वर्षके वय:क्रममें सामनेके और दो दांत गिर पड़ते, साढ़े तीन वर्ष में फिर दो दांत गिरते ; बाक़ो दो साढ़े चार वर्ष में गिर जाते हैं । अतएव पांच वर्षतक दांत देखकर बकरेका वयःक्रम निश्चित किया जा सकता है । लोग कहते हैं, कि बकरा तेरह वर्ष जीता है ।
बकरे का वयःक्रम सात मास होनेसे सन्तानो- त्पादनको शक्ति उत्पन्न हो जाती है; बकरोका बस एक बर्ष होने से गर्भधारणका काल उपस्थित होता है । किन्तु दोनोका वयःक्रम कुछ और परिपक्क होनेसे शावक खूब हृष्टपुष्ट और बलिष्ट हुआ करते हैं । छ: महीने गर्भसे पोछे बकरीके सन्तान होती है और प्रायः दो, कहीं तीन-चार तक बच्चे हो जाते हैं। बकरीके दोसे अधिक सन्तान<noinclude>{{Multicol -end}}</noinclude>
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Sanjana Chowdhury
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४५४'''|'''अनुत्तमाम्भस्-अनुत्साह'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|बढ़िया कुछ न मिले। २ सर्वोत्तम नहीं, जो सबसे अच्छा न हो। ३ व्याकरणमें उत्तमपुरुषपर अव्यवहृत, जो उत्तम पुरुषमें न लगे।
{{x-smaller|{{c|<poem>“सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम्।
आहार्यत्वादनर्घत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा॥” (हिपोपदेश) </poem>}}}}
{{Outdent|अनुत्तमाम्भस् (सं॰ क्ली॰) सांख्य मतसे——इन्द्रिय-सुखके प्रति विरक्ति और विद्वेष, दुनीयावी आरामसे बेपरवायी देखाना और परहेज़ रखना।}}
{{Outdent|अनुत्तमाम्भसिक, <small>अनुत्तमाम्भस् देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुत्तर (सं॰ त्रि॰) नास्ति उत्तरः परतरो यस्मात्, नञ् -५-बहुव्री॰। १ अत्यन्त श्रेष्ठ, निहायत उम्दा। ६-बहुव्री॰। २ उत्तररहित, लाजवाब। ३ अपकृष्ट, नकारा। न उत्तरति चलति, उद-तृ-अच्, नञ् -तत्। ४ स्थिर ठहरा हुवा। ५ प्रधान, स। ६ मौन, ख़मोश, चुपका। ७ दक्षिणका, दाक्षिणात्य-सम्बन्धीय। (क्ली॰) ८ अयोग्य उत्तर, नाका़बिल जवाब, जो जवाब धोकेसे दिये जाने पर जवाब न समझा जाये। (पु॰) ९ जैन-देवविशेष, जैनियोंके एक खा़स देवता। (स्त्री॰) १० उत्तर-विरुद्ध दिक्, जो दिशा उत्तर न हो, दक्षिण, जनब।}}
{{Outdent|अनुत्तरयोगतन्त्र (सं॰ क्ली॰) बौद्धतन्त्रकै अन्तिम चार तन्त्रकी उपाधि का नाम।}}
{{Outdent|अनुत्तरङ्ग (सं॰ त्रि॰) उद्गतस्तरङ्गो वीचिश्चाञ्चल्यं वा यस्मात्, प्रादि-बहुव्री॰; ततः नञ्-तत्। अनुदगत तरङ्ग, ऊपर न उठी हुयी लहरवाला, अचञ्चल,
जो न चले।}}
{{Outdent|अनुत्तरोपपातिकदशा (सं॰ स्त्री॰) जैनशास्त्र-विशेषका नाम}}
{{Outdent|अनुत्तान (सं॰ त्रि॰) न उत्तानम्, विरोधे नञ्-तत्। उत्तान नही, अवनत, अवतान, अवाङ्मुख, अधोमुख, मुंहभर, सरके बल।}}
{{Outdent|अनुत्थान (सं॰ क्ली॰) उत्थानका अभाव, न उठना, बैठे रहना, निश्चेष्टता, काहिली।}}
{{Outdent|अनुस्थित (सं॰ त्रि॰) न उठा हुवा, जो निकला न हो।}}
{{Outdent|अनुस्थितविद्या, अनुत्थितशिरा (सं॰ स्त्री॰) उभरी और}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:बिद्ध शिरा, जो शिरा उठी न हो, खराब जगहकी बन्दिशसे कांपने और ख़ूनका फ़ितूर उठानेवाली नाड़ी, दुःस्थानके बन्धनसे कांपती हुई शिरा जो शोणित-सम्मोह लगाती है।
{{Outdent|अनुत्पत्ति (सं॰ स्त्री॰) न उत्पत्तिः अभावार्थे नञ्-तत्। उत्पत्तिका अभाव, पैदाका न होना।}}
{{Outdent|अनुत्पत्तिक (सं॰ त्रि॰) नास्ति उत्पतिः यस्य, नञ्-बहुव्री॰। उत्पत्तिशून्य, जन्मरहित, लापैद, जो पैदा न हो।}}
{{Outdent|अनुत्पत्तिकधर्मक्षान्ति ( सं॰ स्त्री॰) बौद्धमतानुसार, भावी अवस्थाकी तुष्टि, आयन्दा हालतके लिये क़नात।}}
{{Outdent|अनुत्पत्तिसम (सं॰ पु॰) न्यायमतसे-किसी विषय-पर यह दिखानेकी चेष्टा चलाते हुये वितर्क बढ़ाना, कि वैसी कोई चीज नहीं मिलती, जिससे वह निकल सके।}}
{{Outdent|अनुत्पन्न (सं॰ त्रि॰) न उत्पन्नम्, नञ्-तत्। १ उत्पन्न नहीं, अजन्मा, उत्पन्न न होनेवाला, लापैद, जो पैदा न हो। २ अप्रतिहत, असमाप्त, असर न पड़ा हुवा, पूरा न किया गया।}}
{{Outdent|अनुत्पाद (सं॰ पु॰) न उत्पादः उत्पत्तिः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ उत्पत्तिका अभाव, पैदा न होना। २ प्रभावका न पड़ना, असरका न आना। (त्रि॰) ३ उत्पत्तिशून्य, बेपैद।}}
{{Outdent|अनुत्पादक्षान्ति (सं॰ स्त्री॰) पुनर्जन्म न पानेकी तुष्टि, दुबारा पैदा न होनेकी खुशी।}}
{{Outdent|अनुत्पादन (सं॰ क्ली॰) उत्पत्तिका अभाव, पैदाका न पड़ना।}}
{{Outdent|अनुत्पाद्य (सं॰ पु॰) उत्पादनके अयोग्य, जो पैदा होने का़बिल न रहे, नित्य, मुदामी।}}
{{Outdent|अनुत्साद (सं॰ पु॰) न उत्साद अवसादनम्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ अवसादाभाव, उच्छेदाभाव, अख़ीरका न आना, टुट-फूटका न पड़ना। (त्रि॰) २ उच्छे दशून्य, अटूट, जो उखड़-पखड़ न पड़े।}}
{{Outdent|अनुत्साह (सं॰ पु॰) न उत्साहः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ उत्साहका भाव, हौसले का न होना।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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बढ़िया कुछ न मिले। २ सर्वोत्तम नहीं, जो सबसे अच्छा न हो। ३ व्याकरणमें उत्तमपुरुषपर अव्यवहृत, जो उत्तम पुरुषमें न लगे।
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आहार्यत्वादनर्घत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा॥” (हिपोपदेश) </poem>}}}}
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:बिद्ध शिरा, जो शिरा उठी न हो, खराब जगहकी बन्दिशसे कांपने और ख़ूनका फ़ितूर उठानेवाली नाड़ी, दुःस्थानके बन्धनसे कांपती हुई शिरा जो शोणित-सम्मोह लगाती है।
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Sanjana Chowdhury
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुत्साहता-अनुदात्तेत्'''|'''४५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:(त्रि॰) नञ् -बहुव्री॰। २ उत्साहशून्य, बेहौसला, जिसका दिल किसी बातपर बढ़ता न हो।}}
{{Outdent|अनुत्साहता (सं॰ स्त्री॰) अनुत्साहकी स्थिति, हौसला न होने की हालत।}}
{{Outdent|अनुत्सिक्त (सं॰ त्रि॰) न उत्सित गर्वितम्। अगर्वित, बेफ़ख्र, घमण्ड न घसीटनेवाला, सीधा-सादा।}}
{{Outdent|अनुत्सुक ( सं॰ त्रि॰) न उत्सुकम्, नञ्-तत्। उत्सुकभिन्न, उत्कण्ठाशून्य, बेहौसला, बेख़्वाहिश, जिसे लगी न हो। २ अननुरक्त, अव्यग्र, मातदिल।}}
{{Outdent|अनुत्सुकता (सं॰ स्त्री॰) उत्सुक रहने का अभाव,
बेहौसलेमन्दी, बेदिली।}}
{{Outdent|अनुत्सूत्र (सं॰ त्रि॰) उत्क्रान्तं सूत्रम्, अतिक्रा॰-तत्; ततः नञ्-तत्। सूत्रके अनुरूप, रीतिके अनुसार, सूत्रयुक्त, बाका़यदा, बारस्म, बंधा हुवा।}}
{{Outdent|अनुत्सेक (सं॰ पु॰) उत्सेकका अभाव, धृष्टताका न धमकना, गुस्ताखीका न गुज़रना।}}
{{Outdent|अनुत्सेकिन् (सं॰ त्रि॰) उत्सेकशून्य, धृष्टतारहित, जो गुस्ताख़ न हो, घमण्ड न घसीटनेवाला।}}
{{Outdent|अनुद (सं॰ त्रि॰) न नुदति; नुद-क-, नज-नत्। १ अप्रेरक, न भेजनेवाला, जो किसीको न पहुंचाये। अनु तुल्यं ददाति, अनु-दा-क। २ तुल्यरूप दाता, बराबर सूरत बख्शनेवाला।}}
{{Outdent|अनुदक (सं॰ त्रि॰) नास्ति उदकं जलं यत्र, नञ्-बहुव्री॰। १ जलशून्य, बेपानी, जहां पानी न पायें। अल्पार्थे नञ्-तत्। २ अल्पजलस्थायी, थोड़े पानी में ठहरनेवाला। ३ उदकदान-विशेष रहित, जिसमें ज्यादातर पानीका काम न पड़े।}}
{{Outdent|अनुदग्र (सं॰ त्रि॰) न उद्गतं गर्वेण ऊर्ध्वे घूर्णितं अग्रं मस्तकं यस्य, नञ् बहुव्री॰। १ ऊंचा नहीं, नीचा, अनुच्च, पश्त। २ न उभरा हुवा, जो ऊपर न उठा हो। ३ मृदु, अतीक्ष्ण, मुलायम। नास्ति उदग्रो यस्मात्। ४ अत्युन्नत, निहायत सरफ़राज। ५ अति उत्कट, बहुत बेढब। ६ अति उद्धत, हदसे ज्यादा मगरूर।——
<small>"उंदग्रदशनांशुभिः।" (माघ॰ २।२१।)</small>}}
{{Outdent|अनुदत्त (सं॰ त्रि॰) दिया हुवा, जमा किया गया, जो वापस पहुंचा हो।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अनुदय (सं॰ पु॰) उदयका अभाव, न निकलना, दिखायी न देना।}}
{{Outdent|अनुदर (सं॰ त्रि॰) न अल्प उदरं यस्य, अल्पार्थे नञ्-बहुव्री॰। (स्त्री॰) १ अल्पोदरशाली, कृशोदर, जिसका पेट बड़ा न हो। २ कृश, दुबला-पतला। (स्त्री॰) अनुदरा।}}
{{Outdent|अनुदर्शन (सं॰ क्ली॰) अनु दृश-ल्युट्। अनुचितन्तन, अनुस्मरण, याददाश्त, फिक्रमन्दी, पश्चात् अथवा सर्वदा चिन्ताका चढ़ाना, पीछे या हमेशा फिक्रका फैलना।}}
{{Outdent|अनुदर्शिन् (सं॰ त्रि॰) विचार बांधते हुवा, ख़याल लड़ानेवाला, जो आगेकी बात सोच रहा हो।}}
{{Outdent|अनुदात्त (सं॰ पु॰) उद् ऊर्ध्व आत्तः उच्चार्यत्वेन गृहीतः अच् उदात्तः, न उदात्तः, विरोधे नञ्-तत्। <small]उच्चै रुदात्तः। पा १।२।२९।</small> १ उदात्त नहीं, जो ऊंचा न हो, उठाया न गया, बुलन्द न रहनेवाला। स्वर तीन प्रकार सुनते हैं,—— उदात्त, अनुदात्त और स्वरित। मुखके भीतर तालु प्रभृति स्थानके ऊर्ध्व भागसे जिन सकल स्वरका उच्चारण उठता, वह उदात्त कहलाते हैं। मुख में तालु प्रभृति स्थानके निम्नभागसे निकलनेवाले सकल स्वर अनुदात्त समझ जाते हैं। जिस शब्दके उच्चारणमें उदात्त और अनुदात्त यह दोनो धर्म मिलें, उसका नाम स्वरित रखा गया है। मतलब यह, कि जिससे पहले अर्धमात्रा उदात्त और पीछे अर्धमात्रा अनुदात्त रहती, उसे स्वरित समझते हैं। उदात्तादि संज्ञा स्वरवर्णकी ही पड़ती है,——}}
{{x-smaller|{{c|<poem>“उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च स्वरास्त्रयः।
दौर्घोह्स्वः प्नुतश्चे ति काजतो नियमस्त्वचि।” (शिक्षाशास्त्र)</poem>}}}}
:{{gap}}अर्थात् उदात्त, अनुदात्त और स्वरित——यही तीन प्रकारके स्वर सुनते हैं। कालवशतः अच् वर्णके ह्स्व, दीर्घ और प्लुत-यह तीन नाम रखे जाते हैं।
{{Outdent|अनुदात्ततर (सं॰ पु॰) अनुदात्तसे अधिक, अनु-दात्तसे जो शब्द बोलने में हलका रहे।}}
{{Outdent|अनुदात्तादि (सं॰ क्ली॰) नाममात्रका आधार जिसका प्रथम शब्दखण्ड अनुदात्त रहता है।}}
{{Outdent|अनुदात्तेत् (सं॰ पु॰) क्रिया-सम्बन्धीय मूल,}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४६३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४५६'''|'''अनुदात्तोदय-अनुद्धृत'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:जिसके अनुबन्धमें अनुदात्त उच्चारण यह बतानेको रहता, कि वह केवल आत्मनेपदमें आता है।
{{Outdent|अनुदात्तोदय (सं॰ क्ली॰) वह शब्दखण्ड जिसमें बोलते ही अनुदात्त स्वर लगता है।}}
{{Outdent|अनुदात्तोपदेश, <small>अनुदात्तेय देखो।</small>
{{Outdent|अनुदार (सं॰ त्रि॰) न उद्र-आ-रा-क। १ अदाता, दाता नहीं, न देनेवाला, जो फै़याज़ न हो। २ अमहत्, जो बड़ा न रहे। ३ असरल, टेढ़ा। ४ अदक्षिण, खि़लाफ़, उलटा। (पु॰) नास्ति उदारो यस्मात्, नञ् ५-बहुव्री॰। ५ अतिदाता, निहायत फै़याज़। ६ अतिमहत्, निहायत आला। ७ अति-सरल, बहुत सीधा। ८ अतिशय वाञ्छापूरक, ख़्वाहिशको खूब पूरा करनेवाला। अनुगतो दारान्, अतिक्रा॰ सं॰। स्त्रीके अनुगत, औरतका ताबदार।}}
{{Outdent|अनुदित (सं॰ त्रि॰) उद्-इण-क्त, न ईषत् उदितः (सूर्यः) यस्मिन् काले, ईषदर्थे नञ्-बहुव्री॰। १ अरुणोदयकाल, पौ फटनेका वक्त, जिस समय पूर्वदिक्में ईषत् सूर्यकिरण चमकता और दो-एक नक्षत्र भी देख पड़ता है।—— <small>‘उदिते जुहोति अनुदिते जुहोति’ (श्रुति)</small> (त्रि॰) नञ्-तत्। २ उदित नहीं, न निकला हुवा, जो देख न पड़ा हो। वद-क्त, नञ्-तत्। ३ अकथित, न कहा गया।}}
{{Outdent|अनुदिन (सं॰ अव्य॰) वीप्सार्थे अव्ययी॰। प्रति दिन, प्रत्यह, रोज-ब-रोज, दिन-दिन।}}
{{Outdent|अनुदिवस, <small>अनुदिन देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुदिशम् (सं॰ अव्य॰) प्रत्येक प्रान्तमें, हर ओर, चारों तर्फ़।}}
{{Outdent|अनुदृष्टि (सं॰ स्त्री॰) अनुगता दृष्टि अनुकूला वा दृष्टिः, अतिक्रा॰-तत्। १ अनुगत दृष्टि, अनुकूल दृष्टि, नेक नज़र, मेहरबानीकी निगाह। २ अनुदृष्टिनेय, पुरखन। (त्रि॰) ६-बहुव्री॰। ३ अनुगत अथवा अनुकूल दृष्टि विशिष्ट, नेक नजर रखनेवाला, जो मेहरबानीकी निगाह रखे।}}
{{Outdent|अनुदेय (सं॰ त्रि॰) वापस या पीछा दिया जाने-वाला, जो वापस या पीछा पहुंचाया जाये।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अनुदेयी (सं॰ स्त्री॰) परिवर्तन, पलटा, एवज़ जो चीज़ किसी दूसरी चीज़के लिये देना पड़े।}}
{{Outdent|अनुदेश (सं॰ पु॰) अनु पश्चात् अनुदिश्यते, अनु-दिश-घञ्। <small>ययासं ख्यमनुदेश: समानाम्। पा १।३।१०।</small> १ पश्चात् उच्चारण, पिछला तलफ़फुज। २ उपदेश, तालीम। ३ किसी पहली चीज़का हवाला। अनुदिश्यते, कर्मणि घञ्। ४ उपदेश्य, सिखाया जानेवाला।}}
{{Outdent|अनुदेशिन् (सं॰ त्रि॰) १ पश्चाद् सङ्केत करते हुवा, जो पीछे का हवाला दे रहा हो। २ अनुदेशका विषय बनते हुवा, पिछले का़यदेपर कायम होनेवाला।}}
{{Outdent|अनुदेह (सं॰ अव्य॰) देहसे पश्चात्, जिस्मके पीछे।}}
{{Outdent|अनुदैर्घ्य (सं॰ त्रि॰) प्रशस्त, लम्बाचौड़ा, तूलानी, जो खूब बढ़ा या फैला हुवा हो।}}
{{Outdent|अनुद्गीर्ण (सं॰ त्रि॰) १ वमन न किया गया, जो कै़ न हुवा हो। २ घृणा न किया हुवा, जिससे नफरत न दिखायी गयी हो। ३ ठोकर न लगाया गया, जिसपर लात न पड़ी हो।}}
{{Outdent|अनुद्देश (सं॰ पु॰) न उद्देशः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ उद्देशका अभाव, मतलबका न रहना। २ जिसका कोई अनुसन्धान न निकले, खोजसे खा़ली।}}
{{Outdent|अनुद्धत (सं॰ त्रि॰) न उद्वतम्, विरोधार्थे नञ्-तत्। विनययुक्त, जो उद्धत न हो, अनुग्र, शान्त, सौम्य, ऊंचा न उठा हुवा, हलीम।}}
{{Outdent|अनुद्धरण (सं॰ क्ली॰) न उद्धरणम्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ उद्धारका अभाव, छुटकारका न मिलना। २ दान, प्रतिष्ठा अथवा प्रमाणका न होना, बख्शिश, बन्दिश या सुबूतका न रहना।}}
{{Outdent|अनुद्धर्ष (सं॰ पु॰) उद्धर्षका अभाव, उद्वेगका न उठना, घबराहटका पैदा न होना, शान्ति, अमन-चैन।}}
{{Outdent|अनुद्धार (सं॰ पु॰) उद्-धृ-घञ्; न-उद्धारः नञ्-तत्। १ उद्धारका अभाव, छुटकारेका न पाना। (त्रि॰) नास्ति उद्धारः ज्येष्ठादि लभ्यांशो यत्र, नञ्-बहुव्री॰। २ विंशोद्धारादि रहित, बीस छुटकारसे खा़ली।}}
{{Outdent|अनुद्धृ (सं॰ त्रि॰) न उद्धृतम्, नञ्-तत्। १ उद्धार}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४५६'''|'''अनुदात्तोदय-अनुद्धृत'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:जिसके अनुबन्धमें अनुदात्त उच्चारण यह बतानेको रहता, कि वह केवल आत्मनेपदमें आता है।
{{Outdent|अनुदात्तोदय (सं॰ क्ली॰) वह शब्दखण्ड जिसमें बोलते ही अनुदात्त स्वर लगता है।}}
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{{Outdent|अनुदार (सं॰ त्रि॰) न उद्र-आ-रा-क। १ अदाता, दाता नहीं, न देनेवाला, जो फै़याज़ न हो। २ अमहत्, जो बड़ा न रहे। ३ असरल, टेढ़ा। ४ अदक्षिण, खि़लाफ़, उलटा। (पु॰) नास्ति उदारो यस्मात्, नञ् ५-बहुव्री॰। ५ अतिदाता, निहायत फै़याज़। ६ अतिमहत्, निहायत आला। ७ अति-सरल, बहुत सीधा। ८ अतिशय वाञ्छापूरक, ख़्वाहिशको खूब पूरा करनेवाला। अनुगतो दारान्, अतिक्रा॰ सं॰। स्त्रीके अनुगत, औरतका ताबदार।}}
{{Outdent|अनुदित (सं॰ त्रि॰) उद्-इण-क्त, न ईषत् उदितः (सूर्यः) यस्मिन् काले, ईषदर्थे नञ्-बहुव्री॰। १ अरुणोदयकाल, पौ फटनेका वक्त, जिस समय पूर्वदिक्में ईषत् सूर्यकिरण चमकता और दो-एक नक्षत्र भी देख पड़ता है।—— <small>‘उदिते जुहोति अनुदिते जुहोति’ (श्रुति)</small> (त्रि॰) नञ्-तत्। २ उदित नहीं, न निकला हुवा, जो देख न पड़ा हो। वद-क्त, नञ्-तत्। ३ अकथित, न कहा गया।}}
{{Outdent|अनुदिन (सं॰ अव्य॰) वीप्सार्थे अव्ययी॰। प्रति दिन, प्रत्यह, रोज-ब-रोज, दिन-दिन।}}
{{Outdent|अनुदिवस, <small>अनुदिन देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुदिशम् (सं॰ अव्य॰) प्रत्येक प्रान्तमें, हर ओर, चारों तर्फ़।}}
{{Outdent|अनुदृष्टि (सं॰ स्त्री॰) अनुगता दृष्टि अनुकूला वा दृष्टिः, अतिक्रा॰-तत्। १ अनुगत दृष्टि, अनुकूल दृष्टि, नेक नज़र, मेहरबानीकी निगाह। २ अनुदृष्टिनेय, पुरखन। (त्रि॰) ६-बहुव्री॰। ३ अनुगत अथवा अनुकूल दृष्टि विशिष्ट, नेक नजर रखनेवाला, जो मेहरबानीकी निगाह रखे।}}
{{Outdent|अनुदेय (सं॰ त्रि॰) वापस या पीछा दिया जाने-वाला, जो वापस या पीछा पहुंचाया जाये।}}
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{{Outdent|अनुदेयी (सं॰ स्त्री॰) परिवर्तन, पलटा, एवज़ जो चीज़ किसी दूसरी चीज़के लिये देना पड़े।}}
{{Outdent|अनुदेश (सं॰ पु॰) अनु पश्चात् अनुदिश्यते, अनु-दिश-घञ्। <small>ययासं ख्यमनुदेश: समानाम्। पा १।३।१०।</small> १ पश्चात् उच्चारण, पिछला तलफ़फुज। २ उपदेश, तालीम। ३ किसी पहली चीज़का हवाला। अनुदिश्यते, कर्मणि घञ्। ४ उपदेश्य, सिखाया जानेवाला।}}
{{Outdent|अनुदेशिन् (सं॰ त्रि॰) १ पश्चाद् सङ्केत करते हुवा, जो पीछे का हवाला दे रहा हो। २ अनुदेशका विषय बनते हुवा, पिछले का़यदेपर कायम होनेवाला।}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुद्धृताभ्यस्तमय-अनुध्या'''|४५७}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:न किया गया, जिसे छुटकारा न मिला हो। आलोड़नादिना केनापि प्रकारेण सारांशोत्यापितं यस्मात्, नञ्-बहुव्री॰। २ मन्थनादिद्वारा सारांश न निकाला गया।——<small>पयोऽनुड तसारचञ्च हविष्यान्न प्रचक्षते ।' (स्मति)</small> ३ अनाहत, ज़ख्म न खाये हुवा, जिसके चोट न लगी हो। ४ अप्रदत्त, न दिया गया। ५ अविभाजित, न बंटा हुवा। ६ अप्रमाणित, जिसका सुबत न मिला हो।}}
{{Outdent|अनुद्धृताभ्यस्तमय (सं॰ पु॰) सूर्यास्त होनेपर गाहपत्यमें जो आहवनीय अग्नि रहे।}}
{{Outdent|अनुद्भट (सं॰ त्रि॰) सौम्य, शान्त, अनुग्र, जो उद्भट न हो, सादा, हलीम, बेजो़म।}}
{{Outdent|अनुद्य (सं॰ त्रि॰) उच्चारणके अयोग्य, तलफ़फु़ज़के नाका़बिल, जो बोला न जा सके।}}
{{Outdent|अनुद्यत (सं॰ त्रि॰) उद्यमविहीन, नाकाम, अलस, सुस्त, धैर्यरहित, बेसब्र, जो अपने कामपर खड़ा न हो}}
{{Outdent|अनुद्यमी, small>अनुद्यत देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुद्यूत (सं॰ क्ली॰) अनु-दिक्क्त। १ पुनर्वार पाश क्रीड़ा, एक बार जुवा खेल फिर जुवा खेलना। २ महाभारतवाले सभापर्वके अन्तर्गत पर्वविशेषका नाम।
}}
{{Outdent|अनुद्योग (सं॰ पु॰) न उद्-युञ्-भावे घञ्, अभाव नञ्-तत्। उद्योगका अभाव, कोशिशका न होना। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। २ उद्योगरहित, कोशिश न करनेवाला।}}
{{Outdent|अनुद्योगिन् (सं॰ त्रि॰) उद्योगशून्य, कोशिश न करनेवाला, सुस्त, नाकाम।}}
{{Outdent|अनुद्र (सं॰ त्रि॰) अनुदक, बे-पानी, आबसे खाली, जहां या जिसमें पानी न पाया जाये।}}
{{Outdent|अनुद्रष्टव्य (सं॰ त्रि॰) १ देखे जाने योग्य, जो नज़र आने का़बिल हो।{}
{{Outdent|अनुद्रुत (सं॰ त्रि॰) अनु-ट्ठ-क्त। १ अनुगत, आगे २ पश्चाद् गत, पीछे पहुंचा। यथा,——}}
{{x-smaller|{{c|<poem>“अनुद्रुतः संयति येन केवलम्
बलस्य शत्रु: प्रशशंस शीघ्रताम्।” (माघ १|५२)</poem>}}}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:{{gap}}(क्ली॰) ३ मात्राका चतुथ कालविशिष्ट ताल-विशेष, गानेका एक पैमाना जो आधे द्रुत या चौथाई मात्राका होता है। ४ घसीट, जल्द-जल्दका लिखना। ललितविस्तरके दशवें अध्यायमें लिखा है,——
:{{gap}}‘बोधिसत्व कुछ बड़े होनेसे पाठशालामें लिख़ना सीखने भेजे गये थे। कपिलवस्तुमें विश्वामित्र नामक कोई गुरुमहाशय (दारकाचार्य) रहे। बुद्ध उन्हींकी पाठशालामें पहुंच चन्दनकी पट्टीपर लिखने लगे। उसके बाद उन्होंने गुरुमहाशयसे पूछा-आप मुझसे क्या लिखायेंगे-अङ्गदेशके अक्षर, या वङ्गदेशके, या मगधके, या अनुद्रुत?’ (इसीतरह चौसठ प्रकारके अक्षरका विषय लिखा है।) मालूम होता, कि
अनुद्रुत शब्दसे घसीटका ही मतलब निकलता है।
{{Outdent|अनुद्वाह (सं॰ पु॰) न-उद-वह-भावे घञ्; नञ्-तत्। विवाहका अभाव, शादीका न सजना। (त्रि॰) २ विवाहशून्य, बेशादी, जिसकी भांवर न भरी हो।}}
{{Outdent|अनुद्विग्न (सं॰ त्रि॰) न उद-विज्-क्त, विरोधे नञ्-तत्। उद्विग्नभिन्न, अव्याकुल, जो चिन्तित या उद्वेगयुक्त न हो, न घबराया हुवा, जो फ़िक्रमें न पड़ा हो, खुशदिल।}}
{{Outdent|अनुद्वेग (सं॰ पु॰) उद-विज्-घञ् , न उद्वेग, अभावार्थे नञ्-तत्। १ उद्वेगका अभाव, घबराहटका न घरघराना। (त्रि॰) २ उद्वेगशून्य, बेफिक्र, खटका न लगा हो।}}
{{Outdent|अनुद्वेगकर (सं॰ त्रि॰) उद्वेग न उत्पन्न करनेवाला, जो घबराघट न पैदा करे।}}
{{Outdent|अनुधावत् (सं॰ त्रि॰) पश्चाद् गमन लगाते हुवा, जो पीछे-पीछे दौड़ रहा हो।}}
{{Outdent|अनुधावन (सं॰ क्ली॰) अनु पश्चात् धाव-ल्युट्। १ पश्चाद्गमन, पीछेका चलना। २ तत्त्वनिश्चयकी चेष्टा। ३ अनुसन्धान, खोज, ढूंढ-ढपक। ४ शुद्धि, सफाई, मैलका छुड़ाना।}}
{{Outdent|अनुधावित (सं॰ त्रि॰) पीछा किया गया, जिसके पीछे कोई पड़ा हो।}}
{{Outdent|अनुध्या (सं॰ स्त्री॰) अनु-ध्ये अङ्। १ शुभानु-चिन्तन, मङ्गलचिन्ताका चढ़ना, भलाईका ख़याल,}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|115|3e}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुद्धृताभ्यस्तमय-अनुध्या'''|४५७}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:न किया गया, जिसे छुटकारा न मिला हो। आलोड़नादिना केनापि प्रकारेण सारांशोत्यापितं यस्मात्, नञ्-बहुव्री॰। २ मन्थनादिद्वारा सारांश न निकाला गया।——<small>पयोऽनुड तसारचञ्च हविष्यान्न प्रचक्षते ।' (स्मति)</small> ३ अनाहत, ज़ख्म न खाये हुवा, जिसके चोट न लगी हो। ४ अप्रदत्त, न दिया गया। ५ अविभाजित, न बंटा हुवा। ६ अप्रमाणित, जिसका सुबत न मिला हो।
{{Outdent|अनुद्धृताभ्यस्तमय (सं॰ पु॰) सूर्यास्त होनेपर गाहपत्यमें जो आहवनीय अग्नि रहे।}}
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{{Outdent|अनुद्यमी, <small>अनुद्यत देखो।</small>}}
{{Outdent|अनुद्यूत (सं॰ क्ली॰) अनु-दिक्क्त। १ पुनर्वार पाश क्रीड़ा, एक बार जुवा खेल फिर जुवा खेलना। २ महाभारतवाले सभापर्वके अन्तर्गत पर्वविशेषका नाम।
}}
{{Outdent|अनुद्योग (सं॰ पु॰) न उद्-युञ्-भावे घञ्, अभाव नञ्-तत्। उद्योगका अभाव, कोशिशका न होना। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। २ उद्योगरहित, कोशिश न करनेवाला।}}
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{{Outdent|अनुद्रुत (सं॰ त्रि॰) अनु-ट्ठ-क्त। १ अनुगत, आगे २ पश्चाद् गत, पीछे पहुंचा। यथा,——}}
{{x-smaller|{{c|<poem>“अनुद्रुतः संयति येन केवलम्
बलस्य शत्रु: प्रशशंस शीघ्रताम्।” (माघ १|५२)</poem>}}}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:{{gap}}(क्ली॰) ३ मात्राका चतुथ कालविशिष्ट ताल-विशेष, गानेका एक पैमाना जो आधे द्रुत या चौथाई मात्राका होता है। ४ घसीट, जल्द-जल्दका लिखना। ललितविस्तरके दशवें अध्यायमें लिखा है,——
:{{gap}}‘बोधिसत्व कुछ बड़े होनेसे पाठशालामें लिख़ना सीखने भेजे गये थे। कपिलवस्तुमें विश्वामित्र नामक कोई गुरुमहाशय (दारकाचार्य) रहे। बुद्ध उन्हींकी पाठशालामें पहुंच चन्दनकी पट्टीपर लिखने लगे। उसके बाद उन्होंने गुरुमहाशयसे पूछा-आप मुझसे क्या लिखायेंगे-अङ्गदेशके अक्षर, या वङ्गदेशके, या मगधके, या अनुद्रुत?’ (इसीतरह चौसठ प्रकारके अक्षरका विषय लिखा है।) मालूम होता, कि
अनुद्रुत शब्दसे घसीटका ही मतलब निकलता है।
{{Outdent|अनुद्वाह (सं॰ पु॰) न-उद-वह-भावे घञ्; नञ्-तत्। विवाहका अभाव, शादीका न सजना। (त्रि॰) २ विवाहशून्य, बेशादी, जिसकी भांवर न भरी हो।}}
{{Outdent|अनुद्विग्न (सं॰ त्रि॰) न उद-विज्-क्त, विरोधे नञ्-तत्। उद्विग्नभिन्न, अव्याकुल, जो चिन्तित या उद्वेगयुक्त न हो, न घबराया हुवा, जो फ़िक्रमें न पड़ा हो, खुशदिल।}}
{{Outdent|अनुद्वेग (सं॰ पु॰) उद-विज्-घञ् , न उद्वेग, अभावार्थे नञ्-तत्। १ उद्वेगका अभाव, घबराहटका न घरघराना। (त्रि॰) २ उद्वेगशून्य, बेफिक्र, खटका न लगा हो।}}
{{Outdent|अनुद्वेगकर (सं॰ त्रि॰) उद्वेग न उत्पन्न करनेवाला, जो घबराघट न पैदा करे।}}
{{Outdent|अनुधावत् (सं॰ त्रि॰) पश्चाद् गमन लगाते हुवा, जो पीछे-पीछे दौड़ रहा हो।}}
{{Outdent|अनुधावन (सं॰ क्ली॰) अनु पश्चात् धाव-ल्युट्। १ पश्चाद्गमन, पीछेका चलना। २ तत्त्वनिश्चयकी चेष्टा। ३ अनुसन्धान, खोज, ढूंढ-ढपक। ४ शुद्धि, सफाई, मैलका छुड़ाना।}}
{{Outdent|अनुधावित (सं॰ त्रि॰) पीछा किया गया, जिसके पीछे कोई पड़ा हो।}}
{{Outdent|अनुध्या (सं॰ स्त्री॰) अनु-ध्ये अङ्। १ शुभानु-चिन्तन, मङ्गलचिन्ताका चढ़ना, भलाईका ख़याल,}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|115|3e}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२५३
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh|२५४|कवितायी-कविल}}</noinclude>
{{Multicol|line=1px solid black}}
<br>कवितायी (हिं॰) <small>कविता देखो।</small><br>
<br>कविताविदी (सं॰ त्रि॰) कवितां वेत्ति, कविता-विद्-
णिनि। कविताज्ञ, शायरी समझनेवाला, जो कवितायी
जानता हो।<br>
<br>कवितृ (सं॰ त्रि॰) ज्ञानवान्, अक्लमन्द।<br>
<br>कवित्त (हिं॰ पु॰) छन्दोविशेष। यह दण्डकके अन्तर्गत है। इसमें चार पाद और प्रत्येक पादमें इकतीस-इकतीस अक्षर लगाते हैं। यह मनहरन और धनाक्षरी भी कहाता है। कवित्तका प्रथम वर्ण गुरु रहता, अन्य वर्णों के लिये गुरु लघुका कोई नियम नहीं चलता। उदाहरण नीचे लिखा है,—<br>
<small>"तालत पै ताल पै तमालन पै मालत पै, इन्दावन बोनिन बिहार वंगोवट पै। कही पदमाकर अखण्ड रासमण्डल पै, मण्डित उमण्ड मढ़ा कलिंदीके तट पे॥ छत पर छान पर कुजत छटान पर लक्षित लतान पर लाड़िलौको लट पे। आयो भल छायो यह गरद गोन्दारें जेहि पायौ छवि आज ही कम्हाईके सुकट पै॥" (पद्माकर)<small>
<br>कवित्य (सं॰ पु॰) कवित्य वृच, कैथका पेड़।<br>
<br>कवित्व (सं॰ क्ली॰) कवेर्भावः, कवि-त्व। १ कविता
रचनाकी शक्ति, शायरी करनेका माहा। २ ज्ञान,
समझदारी।<br>
<br>कवित्वन (वै॰ क्ली॰) १ स्तुति, तारीफ़। २ ज्ञान,
समझ।<br>
<br>कवित्वन (वै॰ क्ली॰) १ स्तुति, तारीफ़। २ ज्ञान,
समझ।<br>
<br>कविनासा (हिं॰) <small>कर्मनाशा देखो।</small><br>
<br>कविपुत्र (सं॰ पु॰) कवेः भृगुपुत्रस्य पुत्रः, ष्-तत्।
१ शुक्राचार्य। २ भार्गव ऋषि।<br>
<small>"भृगोः पुत्रः कविर्विधान।" (महाभारत, आदि ६९ अ॰)</small>
<br>कविप्रशस्त (वै॰ त्रि॰) कवियों द्वारा अत्यन्त प्रशंसित,
शायरोंसे बड़ा नाम पाये हुवा।<br>
<br>कविभूषण (सं॰ पु॰) कवीनां भूषणमिव। १ उपाधि-
विशेष, एक खिताब। २ कविचन्द्रके पुत्र।<br>
<br>कविय (सं॰ क्ली॰) कं सुखं अजती, क-अज-क,
ओजस्थाने वि आदेशः। खलीन, लगाम।<br>
<br>कविरञ्जन, बङ्गालके एक विख्यात शाक्त कवि।<br>
{{right|<small>रामप्रसाद देखो।</small>}}
<br>कविरथ (सं॰ पु॰) एक राजा। इनके पिता का नाम चित्ररथ था।<br>
{{Multicol-break}}
<br>कविराज (सं॰ पु॰) कवीनां राजा वेह:, कवि- राजन्-टच्। १ कवि श्रेष्ठ, बड़ा मायद। २ भाट,
कवित्त कहनेवाली एक जाति। ३ बङ्गदेशीय वैद्यों का
उपाधि।<br>
<br>कविराज, एक कवि। इन्होंने 'राघवपाण्डकाव्य' काव्य बनाया था। पाश्चात्य मतसे यह ई॰ १०म शताब्दमें विद्यमान रहे।<br>
<br>कविराजी (हिं॰ स्त्री॰) १ बङ्गदेशीय वैद्यक चिकित्सा,
हकीमी। (वि॰) २ कविराज सम्बन्धीय, हकीमके मुताल्लिक।<br>
<br>कविराजी, एक उपासक सम्प्रदाय। रूप कविराजने यह
सम्प्रदाय चलाया था। गुरुने रूपसे गृहस्थियों का रमणीके हाथ का भोजन ग्रहण करनेको रोका था। इसीसे उन्होंने एक दिन शङ्खधारिणी गुरुजनोंके हाथसे भोजन न किया। गुरुने यह सुनकर उनकी तीन कण्ठियोंमें दो कण्ठियों छीन ली। फिर रूप बची हुयी एक कपटो लेकर भागे थे। छोटोंमें अनेक वैष्णव उनके मतानुयायी हुये। इसीसे लोग इस सम्प्रदायवालों को कविराजी कहते हैं। कविराजी प्रभु वैष्णवोंके घरमें न तो विवाह और न किसी दूसरेका बनाया भोजन करते हैं। यह प्रायः सभी सदा चारी होते हैं। कोई
कोई कविराजियों को ही 'स्प्रष्टदायक' कहते हैं।<br>
<br>कविराम, दिग्विजयप्रकाश नामक संस्कृत ग्रन्थके
रचयिता। कुछ नहीं सकने, यह किस राजाकी
सभाके पण्डित थे। इनका ग्रन्थ पढ़नेसे सम्भवते, कि
कविराम यशोराजके राजा प्रतापादित्यके समसामयिक
रहे। कविरामके दिग्विजयप्रकाशमें भारतवर्षका तत्-
कालीन भूट्ठत्तान्त और प्रवाद लिखा है ।<br>
२ बिहारमें डोम जातिके चांई को भी कविराम कहते हैं।
<br>कविरामायण (सं॰ पु॰) कविना कवितया कवि-
काव्येषु वा रामः अयनं आश्रयो यस्य, बहुब्री॰।
कविताके रामका आश्रय रखनेवाले वाल्मीकि मुनि।<br>
<br>कविराय (हिं॰ पु॰) कविराज, भाट।<br>
<br>कवित्त (सं॰ त्रि॰) कु कव ना वणने ईत्रच्। १ स्तोता, तारीफ़ करनेवाला। २ शब्दकारक, आवाज़ देनेवाला।<br>
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रेखा साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२५४|कवितायी-कविल}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
<br>कवितायी (हिं॰) <small>कविता देखो।</small><br>
<br>कविताविदी (सं॰ त्रि॰) कवितां वेत्ति, कविता-विद्-
णिनि। कविताज्ञ, शायरी समझनेवाला, जो कवितायी
जानता हो।<br>
<br>कवितृ (सं॰ त्रि॰) ज्ञानवान्, अक्लमन्द।<br>
<br>कवित्त (हिं॰ पु॰) छन्दोविशेष। यह दण्डकके अन्तर्गत है। इसमें चार पाद और प्रत्येक पादमें इकतीस-इकतीस अक्षर लगाते हैं। यह मनहरन और धनाक्षरी भी कहाता है। कवित्तका प्रथम वर्ण गुरु रहता, अन्य वर्णों के लिये गुरु लघुका कोई नियम नहीं चलता। उदाहरण नीचे लिखा है,—<br>
<small>"तालत पै ताल पै तमालन पै मालत पै, इन्दावन बोनिन बिहार वंगोवट पै। कही पदमाकर अखण्ड रासमण्डल पै, मण्डित उमण्ड मढ़ा कलिंदीके तट पे॥ छत पर छान पर कुजत छटान पर लक्षित लतान पर लाड़िलौको लट पे। आयो भल छायो यह गरद गोन्दारें जेहि पायौ छवि आज ही कम्हाईके सुकट पै॥" (पद्माकर)<small>
<br>कवित्य (सं॰ पु॰) कवित्य वृच, कैथका पेड़।<br>
<br>कवित्व (सं॰ क्ली॰) कवेर्भावः, कवि-त्व। १ कविता
रचनाकी शक्ति, शायरी करनेका माहा। २ ज्ञान,
समझदारी।<br>
<br>कवित्वन (वै॰ क्ली॰) १ स्तुति, तारीफ़। २ ज्ञान,
समझ।<br>
<br>कवित्वन (वै॰ क्ली॰) १ स्तुति, तारीफ़। २ ज्ञान,
समझ।<br>
<br>कविनासा (हिं॰) <small>कर्मनाशा देखो।</small><br>
<br>कविपुत्र (सं॰ पु॰) कवेः भृगुपुत्रस्य पुत्रः, ष्-तत्।
१ शुक्राचार्य। २ भार्गव ऋषि।<br>
<small>"भृगोः पुत्रः कविर्विधान।" (महाभारत, आदि ६९ अ॰)</small>
<br>कविप्रशस्त (वै॰ त्रि॰) कवियों द्वारा अत्यन्त प्रशंसित,
शायरोंसे बड़ा नाम पाये हुवा।<br>
<br>कविभूषण (सं॰ पु॰) कवीनां भूषणमिव। १ उपाधि-
विशेष, एक खिताब। २ कविचन्द्रके पुत्र।<br>
<br>कविय (सं॰ क्ली॰) कं सुखं अजती, क-अज-क,
ओजस्थाने वि आदेशः। खलीन, लगाम।<br>
<br>कविरञ्जन, बङ्गालके एक विख्यात शाक्त कवि।<br>
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<br>कविरथ (सं॰ पु॰) एक राजा। इनके पिता का नाम चित्ररथ था।<br>
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<br>कविराज (सं॰ पु॰) कवीनां राजा वेह:, कवि- राजन्-टच्। १ कवि श्रेष्ठ, बड़ा मायद। २ भाट,
कवित्त कहनेवाली एक जाति। ३ बङ्गदेशीय वैद्यों का
उपाधि।<br>
<br>कविराज, एक कवि। इन्होंने 'राघवपाण्डकाव्य' काव्य बनाया था। पाश्चात्य मतसे यह ई॰ १०म शताब्दमें विद्यमान रहे।<br>
<br>कविराजी (हिं॰ स्त्री॰) १ बङ्गदेशीय वैद्यक चिकित्सा,
हकीमी। (वि॰) २ कविराज सम्बन्धीय, हकीमके मुताल्लिक।<br>
<br>कविराजी, एक उपासक सम्प्रदाय। रूप कविराजने यह
सम्प्रदाय चलाया था। गुरुने रूपसे गृहस्थियों का रमणीके हाथ का भोजन ग्रहण करनेको रोका था। इसीसे उन्होंने एक दिन शङ्खधारिणी गुरुजनोंके हाथसे भोजन न किया। गुरुने यह सुनकर उनकी तीन कण्ठियोंमें दो कण्ठियों छीन ली। फिर रूप बची हुयी एक कपटो लेकर भागे थे। छोटोंमें अनेक वैष्णव उनके मतानुयायी हुये। इसीसे लोग इस सम्प्रदायवालों को कविराजी कहते हैं। कविराजी प्रभु वैष्णवोंके घरमें न तो विवाह और न किसी दूसरेका बनाया भोजन करते हैं। यह प्रायः सभी सदा चारी होते हैं। कोई
कोई कविराजियों को ही 'स्प्रष्टदायक' कहते हैं।<br>
<br>कविराम, दिग्विजयप्रकाश नामक संस्कृत ग्रन्थके
रचयिता। कुछ नहीं सकने, यह किस राजाकी
सभाके पण्डित थे। इनका ग्रन्थ पढ़नेसे सम्भवते, कि
कविराम यशोराजके राजा प्रतापादित्यके समसामयिक
रहे। कविरामके दिग्विजयप्रकाशमें भारतवर्षका तत्-
कालीन भूट्ठत्तान्त और प्रवाद लिखा है ।<br>
२ बिहारमें डोम जातिके चांई को भी कविराम कहते हैं।
<br>कविरामायण (सं॰ पु॰) कविना कवितया कवि-
काव्येषु वा रामः अयनं आश्रयो यस्य, बहुब्री॰।
कविताके रामका आश्रय रखनेवाले वाल्मीकि मुनि।<br>
<br>कविराय (हिं॰ पु॰) कविराज, भाट।<br>
<br>कवित्त (सं॰ त्रि॰) कु कव ना वणने ईत्रच्। १ स्तोता, तारीफ़ करनेवाला। २ शब्दकारक, आवाज़ देनेवाला।<br>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामंतापुर|
४१६}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
राजभवन था। किन्तु यह असम्भव है। ऐसे क्षुद्र
स्थानमें गजभवन बन नहीं सकता। सम्भवतः यह
देवीका उत्सवमञ्च था। नौसकी कोठोके लिये यहांसे
ईटे संग्रहीत हुयी थीं। वह प्रति सुगठित रहीं।
किन्तु यहां नो ईटें आज भी इधर उधर पडी है, वह
भारतवर्षको साधारण ईटोसे कुछ विसक्षण नहीं।
ढेरको दक्षिण दिक मध्यस्थलसे एक इष्टक-प्राचीर
दुर्गप्राचीर तक उत्तर-दक्षिण विस्तृत है। इस
'प्राचौरकी पूर्व प्रोर कई इष्टकस्तूप हैं। अभ्यता इन
सकस स्थानों में दरवार लगता और सरकारी काम
चलता था। इसो और ढेरके पूर्वगावमें उसीको
बराबर दीर्घ एक दीर्घिका है। कथनानुसार राजा
"इस दौधिकामें कई कुम्भौर पानकर रखते थे। इस
दीपिकाके उत्तर-पूर्व कोपमें दूसरा क्षुद्र ढेर है । इस
ढेरकी चारी ओर दौर्घिकासे एक नहर निकाल धुमा
दी गयी है। इस क्षुद्र देर में भी बहुत ईटें पड़ी है।
इससे यहां देवमन्दिर होने का अनुमान करते हैं।
कुम्भीर दीर्घिकासे बिलकुल पूर्व दूसरा एक ढेर है।
योगोंके कथनानुसार इस पर अस्त्रागार था। बड़े
ढेरके पश्चिम दक्षिण और मध्य प्राचीरके पसिम जो
खण्ड पड़ता है, वह प्राचौरके पूर्वखण्डकी अपेक्षा छोटा
लगता है। सम्भवतः यहां राजाका भवन रहा।
इसीके विलकुल उत्तर अन्तःपुर था। अन्तःपुरके पूर्व
किनारे बड़ा ढेर है। पश्चिम पोर मिट्टीका मुरचा है।
दक्षिण और उत्तरमें ईटका प्राचीर है। इसके मध्य
स्थसमें एक स्तूप है। अनुमानमें यह स्तुप पन्तःपुरस्य
कोई देवालय था। इस स्तूपके निकट दो पुष्करिणी
हैं। सम्भवतः यही दोनों स्त्रियों के व्यवहारार्थ पत्थरसे
चंधी थीं। बड़े ढेरके दक्षिण-पश्चिम कोणको पुष्क
रिणोके तौर पर दूसरे मन्दिरका भग्नावशेष है। अन्तः
पुरके निकट इन दोनों पुष्करिणियोंमें और पूर्वोक्त
बड़े ढेर पर (निस स्थानमें कामतेश्वरीके मन्दिर
बड़ा दुष्ट था, दूसरेका अमिष्ट करना उसे पच्छो
रहनेका अनुमान किया गया था, वहां भी) प्रस्त
रादिके भन्नखण्ड मिलते हैं। यहां फोट लम्बा
१८ इस व्यासविशिष्ट धूसरवर्गके पानाइट पत्थरके
स्तम्भका एक पख पड़ा है। इसका प्रभाग पठ
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पहल और मूलदेश चौकोर है। लोगों के कथमा-
नुसार यह स्तम्भका अंश नहीं, नौखाम्बर नामक
नृपतिके प्रयोगोचकका खण्डमात्र है। प्रवादानुसार
इस दुर्गको विश्वकर्मा पौर नगरके वहिर्देशका मुरचा
नगराधिष्ठात्री कामतखरीदेवीने अपने हाथ बनाया था।
पूर्वदिकमें धरलाके तौर कामतेश्वरी-निर्मित मुरचा
कथनानुसार इसके निर्माण समय राजाको नहीं।
देवीके पादेशसे एकादिक्रमसे चार दिन उपवास
रखना था। किन्तु तीन दिन बीत जाने पर राजा
फिर क्षुधा सहन सके और चतुर्थ दिन पाहार करने
लगे। उस समय देवीने भी तीन ही पोरका मुरचा
बांधा था। इस लिये चौथी ओरका मुरचा बंध न
सका। धरलाके तौरसे बाघहार तक एक प्रशस्त
पथ है। राजप्रासादके भग्नावशेषसे एक मील दूर
शिङ्गीमारी नदीको वर्तमान खाड़ी है। इसके निकट
दूसरी भी क्षुद्र खाड़ी है। उसके ऊपर वाधहारके
सम्मुख कुछ दूर टका मेहरावदार पुल है। इसी
पुल पर होकर उन धरला बाघहारको राह है।
वाघहारके निकट एक प्रस्तरमय स्थान है। लोग
उसे गौरीपट्ट कहते हैं। इसका शिवलिङ्गीय
है। वृहदाकार शिवलिङ्ग पर मन्दिर था। पानकल
उसका विमान मिलता है। निकट हो एक पुष्क-
रिणी है। वह पूर्वपश्चिम २०० फीट दी और
उत्तर-दक्षिण २०० फौट विस्तीर्ण है। दोनों ओर
दो घाट बने हैं। निकट ही कई उत्कीर्ण मूर्तिविशिष्ट
वृहदाकार प्रस्तर हैं। उनसे एकमें अर्धनागिनीमूति
पौर दूसरेमें वैष्णव-वैष्णवी मूर्ति खुदो है।'
प्रासामको बुरुजी पढ़नेसे समझते हैं कि ई.
शताब्दके प्रथम भाग कामरूपमें नीलध्वज नामक एक
राजा थे। उनके सम्बन्धमें कई प्रवाद हैं-बगुड़ा
मिलेवाले ब्राह्मणके एक गोरचक रहा। वह गोरक्षक
लगता था। प्रतिदिन दूसरेके क्षेत्रमें गो प्रादि छोड़
वह स्वयं सोया करता था। प्रत्यक्ष शस्यको ऐसी हानि
देख सबने अपसे उसके भृत्य के दुर्व्यवहारको बात
कही। ब्राप्रपने एक दिन स्वयं उन विषयका<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४१९
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४२०|
कामतापुर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
अनुभव करनेका मैदान ना देखा कि उसका गोरक्षक
एक पेड़के नीचे बड़ा सोता है और एक सर्प फणा फैला
उसके मुखको धूप रोक रहा है। ब्राहाण सर्प देख कर
डरा और द्रुतपद भागने लगा। उसी समय सर्प
मनुष्य प्राते देख सरक गया। ब्राह्मणने पास
जा कर देखा कि उसके पदतलमें अष्टदल पद्म, त्रिशूल,
अर्धरेखा प्रभृति राजलक्षण है। यह देख माधण उसे
जगा कर घर ले गया और किसी प्रकारका नोचकर्म
करनेकी निषेध किया। अवशेषको एक दिन ब्रामणने
उससे बुलाकर प्रतिज्ञा करा सी-किसी दिन राजा
होने पर वह उनको मन्त्री बनायेगा। कालक्रमसे
कामरूपराज धर्मपालके तदानीन्तन वंशधर दुर्बल
फिर वही गोपालक उनको मार स्वयं
नीलध्धन नामसे राजा हुवा और अपने राज्यका
"ब्राह्मणराज्य" नाम रख प्रतिपालक ब्राह्मणको मन्त्री
बनाया। दूसरे प्रवादके पनुसार किसी ब्रह्मा आपके
घर एक दासी थी।
उमौके गर्भसे एक पुत्रसन्तान
हुवा। ब्राह्मणने उसे गोरक्षा नियुक्त किया। काल
क्रमसे उक्त रूपसे वही गोरक्षक नीलध्वज हुवा। फिर
कोई कहता है कि गोरक्षक असुर (असभ्य जातीय)
था। अन्ततः राजा नीलध्वनने मिथिलासे ब्राह्मण
और कायस्थ ले जाकर कामरूपमें बसाये थे। फिर
"कामतापुर" * नामसे उन्होंने एक नगर भी बसाया।
नीलध्वनने इस नगर में राजधानी स्थापन कर
नगर मुसलमानोंने अधिकार किया। १४२० .शकको
"कामतेवर" उपाधि प्रहणपूर्वक अपनेको "सच्छद्र
नामसे प्रचारित किया था।
नौलध्वजके पीछे उनके पुत्र चकध्वज और
चक्रध्वनके पीछे उनके पुत्र नीलाम्बर राजा हुये।
नौताम्बरने ही घोडाघाटके गढ़ और अनेक कौतिकी
स्थापन किया। एकबार नीलाम्बरराजक मन्त्रिपुत्र
राजरानी पर पासक्त हुये। रामाने उन्हें मार और
नौलध्वजने सम्भवतः १२५.६. शहाब्दकी कामतापुर पत्तन किया
था। किन्तु किसी किसीके अनुमानमें बोमनापुर नामक एक पद नपर
पहलेसे हो रहा नौलवज उसी नगरका विक्षार बढ़ा पीर दुर्गादि बना
कैपल रामधानी वाले गये । १२२०३० शकम भी इस मगरका नामोल
"मिलता।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
उनका मांस पका मन्त्रीको खिलाया था। मन्बीके
खा चुकने पर रानाने उन्हें पुत्रमुण्ड देखाया और
समस्त विवरण बताया। मन्त्रौ नधु पाप पर गुरु-
दण्ड देख पतित राजसंसर्ग परित्याग पूर्वक गडाके
मानच्छलसे कामरूप छोड़ चल दिये। फिर उन्होंने
गङ्गास्नान कर प्रतिशोध लेनेको गौड़ेश्वर हुसेन थाह
नवाबसे साहाय्य मांगा था। नवाबने राज्यको अवस्था
समझ बूझ कर बहु सैन्य सह कामरूपकी यात्रा की।
घोर युद्ध होते भी कामतेश्वर पराजित न हुये। इससे
नवाब नगर घेर बैठ गये। अवरोध १२ वर्ष पर्यन्त
रहा। मुसलमानोंने इस दौर्वकालके मध्य नगरके
बाइर्भागमें अनेक कीर्ति विनष्ट कर अपने रहने योग्य
अवान्तिका और पुष्करिणी तक बनवा लीं। अवशेषमें
उन्होंने कौशल अवलम्बन किया था। राजाको यह
सम्वाद भेजा गया-मुसलमान अवरोध छोड़ चले
जायंगे, किन्तु जानेसे पहले मुसलमानांको रमणी
रानीसे साक्षात् करना चाहती हैं। नीताम्बर प्रस्ताव
पर सम्मत हुये। किन्तु मुसलमानोंने दोलामें स्त्रियों को
न भेज सशस्त्र योहा रवाना किये। उन्होंने भीतर
पहुंच नगर अधिकार किया और राजाको बांध लिया।
किसीके कथनानुसार वन्दी राजा गौड़को प्रेरित हुये
पौर किसीके कथनानुसार वह मार डाले गये। फिर
कोई कहता है कि राजा प्राण वचा भागे थे। पन्ततः
कामतापुरमें मुसलमानोंकी जयपताका छड़ी थी। प्राज.
वही नगर भग्नस्तुप मात्र में परिणत है, जिसने ४००सौ
वर्ष पूर्व एककाल मुसलमानोका बादश वार्षिक अवरोध
पमायाम सह लिया। कालको विचित्र महिमा है।
"गुरुजनकथाचरित्र" नामक घासामके अन्य में
लिखा है, कामतापुर में दुर्लभनारायण नामक एक
राजा थे। उनके साथ गौड़ेखर धर्मनारायणका एक
भीषण युग वा। दुर्लभनारायणको ही कोई काम-
क्यके राजा धर्मपालका और कोई जितारिका
वसीय बताते हैं। अन्ततः युद्ध में अनेक लोग मारे
गये। फिर दोनों राजावाने रातको खा देश इसरेः
दिन सवता-सापन-पूर्वक सन्धि कर सी।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४२०
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2026-07-13T06:58:18Z
Lado Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामतापुर|४२१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
उसके पीछे गौड़खरने कामरूपको अवस्था देख
राजा दुर्लभनारायणके पास सात ब्राह्मण और सात
कायस्थ भेजे थे। उन्हीं चौदह मनुष्योंमें प्रधान १२
भादमियोंको राजा दुर्लभनारायणने बारभ या साख्या
दो। कामरुप देखो। बारभू या ही सम्भवतः गौड़ेश्वरके
सेनापति थे। दुर्लभनारायणने उनके साहाय्यसे भोट
राजका विद्रोह दबायाथा। कालक्रममें कामरूपके मध्य
कोचजातिको संख्या और प्रभाव बढ़ने से राजा दुर्लभः
नारायण कुछ श्रीधष्ट हो गये। फिर पादि भूयांवोंके
'मरनेसे वह अधिक उत्कण्ठित हुये। कुछ दिन पीछे
कोचोंके मध्य हानी नामक किसी सरदारको प्रधानत्व
मिला। वह क्रमशः अपना अधिकार बढ़ाने लगा।
पौर प्रवशेष, घोड़ाघाटको छोड़ भासाम प्रदेशका
राना बन बैठा। इसके हीरा और जीरा दो कन्या
१४॥ईको (१४१८ शक) हुसेन शाहने और
भित्र अन्य कोई सन्तान न थी। दोनों कन्यावाके
१५२३ ई० को (१४४५ शक) अव्यवहित परवर्ती
अविवाहितावस्था में पति अप दिनके पागे पोछे दो
सन्तान एये। जीराके सन्तानका नाम पिश और
होराके सन्तानका नाम विश था। हाजीराजकुमारी
कन्यावोंके पुत्र होते देख महा चिन्तान्वित हुये। उसी
समय देववाणी सुन पड़ी थी-यह दोनों पुत्र देवदेव
महादेवके चौरससे उत्पन्न हुये है। किसी किसीके
कथनानुसार हरिया नामक किसी मच जातीय सर
दारसे हीराका विवाह हुवा था, किन्तु उसके औरससे
सत्यब नहीं। अन्तका यह दोनों सन्तान विशेष
पराक्रमी हुये। इन्होंने अपना नाम "विखसिं"और
"शिवसिंह" रखा तथा अपने को शिवबंधीय एवं '
खश्रेणीके लोगोंको "राजवंशीय" बता प्रचार किया।
क्रमशः विश्वसिंह नाना देश (बुरुजीके मतमें १४२ से
३. शकके मध्य) कामतापुर पधिकार कर राजा हुये
पौर श्रीसे वैदिक ब्राह्मण वा "कामरूपी ब्राह्मण"
प्राख्या दे स्वराज्यमें वसा दिये। इन्होंने बौद्धधर्म बढ़ते
समय लुप्तप्राय कामाख्यापीठका उहार किया था।
कामतापुर कितने दिनका है। पुरुचीके मतसे
राना नीलवन कामतापुरके सापयिता नहीं, संस्कार
कर्ता और राजधानीकर्ता मात्र थे। अन्यके अनुसार
राजा नीलध्वनने १२५०-६. शकको (१२२८-३८
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ई०) यहां राजधानी स्थापित की। उक्त ग्रन्थको
हो देखते १४२० शक, (१४८८०) हुसेन शाहने
कामतापुर अधिकार किया था। १२ वर्ष अवरोधके पीछे
नगर अधिकृत हुवा। सुतरां १४०८ शकको (१४८६
ई.) हुसेन याहने प्रथम नगर पर पाक्रमण किया।
उस समय नीलध्वजके पौत्र नौशाम्बर कामतापुरके
सिंहासन पर अधिष्ठित थे। मुतरां नीलध्वजके समयसे
नौशाम्बरको राज्यकाल-समाप्तिके मध्य प्रायः १५०॥
१६. वर्ष व्यतीत हुये। फिर नीलध्वजवंशीय राजा-
वोंने प्रत्येक न्यूनाधिक ५५ वर्ष राजत्व किया। पूर्व-
भारतके इतिहास लेखक मिष्टर मनटगोमागे मार्टिन
साहबने इस सम्बन्धमें जो कालसंख्या निर्देश की है।
उसके साथ इसका मेल नहीं। उनके कथनानुसार
गौडराज नसरत चाहने राज्यारोहण किया था।
सुतरां हुसेन शाहका राजत्वकाच २७ वर्ष रहता है।
२७ वर्षसे नगरावरोधके १२ वर्ष (मार्टिन साहब इसे
नहीं मानते। वह इस वातको अतिशयोक्ति समझ छोड़
देना चाहते हैं। फिर वह स्वयं भी अवरोधकालकी
कोई संख्या नहीं बताते।) निकाल डालने पर १५
वर्ष बचते हैं। फिर विखसिंहके कामतापुरका अधि.
कारकास बुरुजौके मतमें १४२० और १४३० शकके.
(१४८८ और १५०८१०) मध्य था। मिष्टर मार्टिनने
विश्वसिंहके कामतापुर अधिकार की कोई बात
नहीं लिखो। उक्त कानसंख्याके अनुसार हुसेन
शाहने स्वीय राज्यारोहणके कालसे (मार्टिनके मतमें
१४५ई० या १४१८ शक) प्रायः ७० वर्ष-पोछे
(तुरुनीके मतमें १४०८ शक या १४८७ ई.) कामता.
पुर पर आक्रमण किया था। किन्तु मार्टिनके मतले
उनके राजत्वकालका परिमाण केवल २७ वर्ष था।
फिर बुरुजीके मतसे कामतापुरका पाक्रमण-काल
१४०८ शक या १४८६ रहा। विन्तु मार्टिनक
मतसे उस समय ( १४५१५) १५११ ई.
(१४४१ अंक) या उससे दो-चार वर्ष पर्व था।
कारब बुरुषीके मतले विससिपके कामतापुरका<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४२२|
कामतापुर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
अधिकारकाल विवेचना करनेसे समझ पड़ता है कि
कुछ दिन कामतापुर में मुसलमानोंका पंधिकार रहा।
कामतापुर नामका कारण क्या है ? बुरुजीके
मतसे तौलध्वज इसके स्थापयिता नहीं। किन्तु उनके
द्वारा संस्कृत होनेसे इसका प्राचीन नाम मौजूद रहा।
क्यांकि बुरुष्ली पढ़नेसे १२२० शकमें भी इसका नाम
मिलता है। किन्तु इसके मूल स्थापयिताका नाम
बुरुजीमें नहीं लिखा है। इस नगरमें शिङ्गीमारीके
सौरवर्ती गोसाईनीमारी नामक स्थानपर कामतेश्वरी
देवी हैं। अनेकोंके मतानुसार इन्हीं
रानाने वहां मन्दिर बनवा दिया। प्रथमतः विश्व.
नगरका नामकरण हुवा. है। कामतापुरके दुर्गम
भग्नावशेषके विवरणस्थल पर कामदेश्वरी देवीका
उल्लेख किया गया है। दुर्गमें उत्तरांधके बहत् स्तूप पर
इनके प्राचीन मन्दिरका भग्नावशेष है। इन देवीके
सम्बन्ध में एक प्रवाद है,-"प्रागज्योतिष्य राधिपति
भगदत्तकी शिवके वरसे एक कवच मिन्ना था। महा
भारतके युद्धौ भगदत्तके मरने पर यह कवच हस्तिना
पुरमें ही रहा। शेषको उक्त नौलध्वजके पुत्र चक्र
ध्वजने एक दिन स्वप्नमें देख और स्वप्ननिर्दिष्ट उपायसे
कवच आहरण कर दुर्ग के मध्य मन्दिर निर्माण पूर्वक
स्थापन किया। उन्हें स्वपमें ही कवचको पूजा-पहति
और प्रधिष्ठात्री देवीको मूर्ति अवगत हुयो यो। उन्होंने
उसीके अनुसार देवीकी प्रतिमा बनवा उसके मध्य
कवच रख दिया। पहले इसके निकट पनि होता
था। अवशेषको मुसलमानोंके हाथ देवीको प्रतिमा
विनष्ट होने पर कवच एक पुष्करिणीमें छिप गया।
उसके पछि विखसिंह-वंशीय विहारके चतुर्थ राजा प्राण
नारायणके अधिकारकाचमें भूना नामक एक धीवरने
उस स्थान पर एक पुष्करिणीमें मत्स्य पकड़नेको जान
डासा, नहाँ शिङ्गीमारी नदीने नगर में प्रवेश किया है।
किन्तु वह नाल इतना भारी समझ पड़ा कि किसी
प्रकार उठ न सका। अवशेषको धीवरने राजाके
निकट सम्वाद भेना। राजा प्रावनारायण कवचका
व्यापार जानते और उसके लिये उत्सुक भी थे । उक्त
परामर्श कर हाथी पर चढ़ा:एक आए मेना.या।
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ब्राह्मणको वहां जाने पर डवको नगानेसे जाचमें
कवच मिस गया। उन्होंने इस्तस्थित एक रेगमी
थैलीमें डाल उसे हाथोकी पीठ पर रखा और हायीको
उसको इच्छाके अनुसार चलने दिया। हाथो गिट्टी-
मागके तौरसे जाने लगा। अवशेषको जहां नदीने
प्राचीन नगरको सीमाको छोड़ा है, उसके निकट
गोसाई नौमारी नामक स्थान पर वह खड़ा हो गया;
फिर किसी प्रकार वहांसे न हटा। ब्राह्मणोंने स्थिर
किया कि देवी वहाँसे जाना घाइती न घौं। इसीसे
सिंहके मानीत वैदिक ब्राह्मणोंमें एक पुजक नियुक्त
हुवा था। किन्तु देवीने स्वप्न में मैथिली ग्रामपोंके मध्य
पूजक नियुक्त करनेको पादेय दिया। कारण वही
पहले देवीको पूजा करते थे। इसी प्रकार एक मैथिली
ब्राह्मण पूजक बनाये गये। कुछ दिन बीतने पर
उन्होंने राजासे कहा-देवीके प्रदिशसे हमें प्रत्यर
रात्रिको मन्दिरमें चक्षु बांधकर जाना पड़ता है।
हम वहां तबला बजाते हैं। देवी एक सुन्दरीके
वैशम नग्न होकर तास ताल पर नाचती है। किन्तु
देवीके निषेधसे हमने उन्हें कमी इस प्रकार प्रांखसे
नहीं देखा।' यह बात सुन राजाको कौतूहल उत्पन्न
हुवा। वह इसी रात्रिको मन्दिर जा दरबानकी
मांससे झांकने लगे। - देवी अन्तर्यामिनी हैं। उन्होंने
राजाको देखते ही नृत्य बन्द कर भाप दिया,-
प्रतापर यदि वर्तमान नारायणवंशीय कोई राजा किसी
दिन या रातको मन्दिरको सीमामें पायेगा, तो
उसी समय वह मर जायेगा। उस दिनसे पान
तक उनके वंशीय मन्दिरको सीमाके मध्य प्रवेश नहीं
करते। किन्तु सेवाका प्रबन्ध लगा दिया जाता है
यह मन्दिर प्राज मो.वना है। मन्दिर इष्टनिर्मित
है। गठनप्रवासी मुसमानी चानकी है। मन्दिरको
चारो ओर पुष्पोद्यान है। प्रतिमा नतन है। निर्मित
प्रतिमाके ममें उन कवच रखा है। मन्दिरके मध्य
कथनानुसार यह प्रसरण प्राचीन मगरके मनाव-
सम्बाद सुन वह उमसित हुये। उन्होंने ग्रामसे
शेषसे मिलता है। प्रवादासार पाने पर पत्रक<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामदेव|
४२५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
किया कि वह फिर शरार पायेगा और दक्षको देह-
जात रति नानी सुन्दरी रमणीको कामदेवको पत्नी
बना दिया। (कालिकापुराण १५०)
इधर सन्धया यह सोच अत्यन्त दुःखित हुयौं कि
पिता तथा भ्राता उन्हें चाहते थे और अपना दृणित
देह छोड़नेको तपस्या करने लगीं। कठोर तपस्यासे
• प्रीत ही भगवान्ने उनसे वर मांगने को कहा। सन्ध्याने
प्रथमतः अन्य कोई वर न मांग यही चाहा था कि
प्राणी उपजते हो सकाम न हों। भगवान्ने उनको
इस प्रार्थनाके अनुसार शैशव, कौमार, यौवन एवं
बार्धक्य चार भागमें क्याक्रम बांट द्वतीय भाग अर्थात्
यौवनको कामौत्यत्तिके कालरूपमें निर्देश किया
और कौमारका शेष समय भो उसीके भीतर लगा
दिया। (कालिकापुराण १९०) इसीसे प्राणियोंके उत्पन्न
होते ही कामभाव प्रकाधित नहीं होता।
देव तारकासुर्के उत्पोड़नसे अत्यन्त व्यतिव्यस्त
हुये थे! उसी समय इन्द्र के प्रादेशी कामदेवको
शिवका ध्यान भङ्ग करने जाना और कुछ दिनके लिये '
प्रजाहीन होना पड़ा। शिवपुराणमें इसको पाख्या
यिका इस प्रकार वर्णित है,-"महादेवी सतीने
दक्षके यन्त्र में देह छोड़ा था। उसके पीछे महादेव
कठोर जितेन्द्रियता अवलम्बनपूर्वक महायोगमें
निमग्न हुये। उसी समय तारकासुरने देवसमूहके
प्रति अत्यन्त उत्पीड़न प्रारम्भ किया। देव व्यतिव्यस्त
हो उसके वधसाधनका उपाय सोचने लगे। . इन्द्रादि
देवगणने स्वयं कोई उपाय निश्चय न कर सकने पर
ब्रह्मासे परामर्म मांगा था। ब्रह्माने उनसे कहा-
'महादेवके वीर्य व्यतीत तारकासुरका निधन न होगा।
महेश्वरी सती हिमालयके ग्रहमें पुनर्जन्म ले महादेव
की शश्रूषाको सर्वदा उनके निकट रही हैं।इस
समय महादेवका योग तोड़ उनको पार्वतीके प्रति
अमिताषी कर सकने पर महादेव पौरससे महावीर
कुमार मन्नग्रहण कर तारकासुरका निधनसाधन
करेंगे। देवगणने उसी परामर्थके अनुसार कामदेवको
महादेवका ध्यान छुड़ाने पर नियुक्त किया था। माना
पाली कामदेव रति एवं वसन्तके साथ अभियान
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पूर्वक महादेवका योग तोड़ने पहुंचे और पुष्पधनुः पर
पुष्यवाण चढ़ा महादेवको लक्ष्यकर फेंकने लगे। महा-
देवने कन्दवाणसे पाहत होते ही क्रोधके साथ उन
पर अपनी दृष्टि डाली थी। फिर महादेवके ललाटसे
प्रदीप्त अग्निशिखाने निकल कन्दमूर्तिको बिलकुल
जला दिया ।" दूसरे जन्म में कामदेव ही श्रीकृष्ण के पुत्र
प्रद्युम्नरूपसे पाविर्भूत हुये। हरिवंशमै कामदेवके
जन्मका विवरण इस प्रकार वर्णित है,-"श्रीकृष्णक
औरस और रुक्मिणीके गर्भसे प्रद्युम्नका जन्म हुवा था ।
जन्मके पीछे सातवों रातको शम्बरासुरने मायाके बल
उन्हें सूतिकारहसे हरण कर स्वीय पत्नी मायावतीको
दे दिया। मायावतीके कोई शिशु न था।
प्रद्युम्नको पा कर अत्यन्त पाल्हादित हुयौं। फिर
थिशके अङ्गप्रत्यङ्ग आदि विशेष रूपसे लक्ष्य कर माया-
वतीने समझा कि वही शिशु उनका प्रियतम स्वामी
कन्दप था। उनको यह भी स्मरण पाया कि हरके
कोपानससे जलनेके पीछे देवगणने वैसे ही उन्हें पुनर्वार
पतिको प्राप्तिका विषय बतला दिया था। मुसरी वह
मारवत् शिशुका पालन न कर सकी। उन्होंने धाबीके
हाथ उसे सौंपा था। फिर रसायन प्रादिके प्रयोगले
सत्वर बर्षित कर मायावती उससे मिल गयौं।
प्रद्युम्न भी बैष्णव अस्त्रसे शम्बरासुरको मार पीके
साथ पिटर लौट आये। कहनेको शम्बरासुरको
पत्नी होते भो वस्तुत: मायावती उसकी पत्नी न थी।
कन्दप को पनी रति पुनर पतिप्राप्तिको कामनासे
देवगणके पादेशानुसार मायावलसे शम्बरासुरको
पत्री बन कर रहती थी।" (हरिवंय १६९ प.)
{{Gap}}महाभारत और विष्णुपुराणमें कामदेव धर्भके पुत्र
माने गये हैं,-
“श्रद्धा काम चला दर्प नियम तिरामनम् ।
सन्तीषश्च तथा सुष्टिोमं पुष्टिरसूयन ।
मेधा श्रुतं किया दर्थ नय विनयमेव च ।
बोध बुद्धि तथा बना विनयं वपुराणम् ॥
व्यवसाय प्रजभे व चेमं शान्तिरस्यत ।
मुख सिडियम कोसिरिये ते धर्मसूनवः ।"
{{Right|(परिषभम.१८)}}
तेरह धर्मपनियों के मनमाने काम, चलान रूप<noinclude></noinclude>
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सदस्य वार्ता:AMAN KUMAR
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AMAN KUMAR
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/* गुणवत्ता संवर्द्धन संपादनोत्सव जुलाई २०२६ में आपके संपादन */ उत्तर
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{{संवाद}}
{{स्वागत}}--[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] ([[सदस्य वार्ता:सौरभ तिवारी 05|वार्ता]]) १५:२५, ११ जुलाई २०२६ (UTC)
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:::@[[सदस्य:सौरभ तिवारी 05|सौरभ तिवारी 05]] जी, अगर SIC साँचा न जोड़े तो लेख संपादनोत्सव में मान्य होगा [[User:AMAN KUMAR|<b style="color:olive;font-size:18px;text-shadow:2px 2px 4px #888"><u>विक्रम प्रताप</u></b>]]<sup>[[User talk:AMAN KUMAR|<b style="color:teal"><u>(बातचीत)</u></b>]]</sup>-- १६:२५, १२ जुलाई २०२६ (UTC)
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