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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२३४
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदयनाचार्य-उदयपुर वा मेवाढ़'''|'''२३३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
सम्पादनको मङ्गलमयी किरणावली बनायो। आज भी उनके वंशधर शास्त्रविद विद्वान् द्विज मिथिलामें घर घर पढ़ाया करते हैं।
फिर ‘भादुड़ी-वंशावली’ नामक वारेन्द्रब्राह्मणों के कुल ग्रन्थमें लिखा है―^
{{c|{{x-smaller|<poem>“वृस्पतिसुतः श्रीमान् भुवि विख्यातमङ्गलः।
धर्मस स्थापनार्थाय बौद्धविध्वंसहेतवे।
ख्यात उदयनाचार्य वभूव शङ्करो यथा।
ब्रह्मतत्त्वप्रकाशाय चकार कुसुमाञ्जलिम्॥
स एवोदयनाचार्यों बौद्धविध्वंसकौतुकौ।
कुल्लू कं भदुमाश्रित्य भट्टाख्य मयूरं तथा॥”</poem>}}}}
इससे समझ पड़ता है―― उदयनाचार्य कुल्लू क और मयूरभट्टके समसामयिक रहे। उन्होंने बौद्धोंके विध्वंसको जन्म लिया था और कुसुमाञ्ज़लि नामक ग्रन्थ लिखा था।
वारेन्द्र-समाजके पण्डितोंका विश्वास है――वारेन्द्र कुल में परिवर्त-मर्यादाके प्रतिष्ठाता और कुसुमाञ्जलिकार उदयनाचार्य भादुड़ी अभिन्न व्यक्ति हैं। वारेन्द्र कुलाचार्यके ग्रन्थमें भी ऐसा हो कहा है। ‘सम्बन्ध निर्णय’ नामक ग्रन्थको देखते राजशाहीके अन्तर्गत निसिन्दा ग्राममें पर उदयन रहते थे। किन्तु खल्ली के भट्टाचार्य बताते हैं―― माणिकगञ्जके अन्तर्गत बालीयाटी
ग्राममें उदयनार्य भादुड़ी बसते थे। आज भी इस ग्रामके एक उच्च स्थानको लोग ‘भादुड़ी-भिटा’ कहते हैं।
{{c|{{x-smaller|<poem></poem>}}}}“सएवोदयनाचार्यश्चिकाय कुसुमाञ्जलिम्।
तीर्थपर्यटने लब्ध तस्मादगौड़े प्रचारितम्॥” (लघुभारत)</poem>}}}}
लघुभारत-रचयिताके मतसे इन्होंने तीर्थपर्यटन कालमें कुसुमाञ्जलि ग्रन्थ पाया और गौड़ देशमें लाकर चलाया था।
इस स्थल पर कुछ गड़बड़ पड़ती है। भक्ति-माहात्म्य मिथिलामें इनका जन्मस्थान ठहराता है, उधर सम्बन्ध निर्णय निसिन्दा ग्राममें निवास बताता है। फिर कोई कोई उदयनाचार्यको वङ्गदेशवासी भी समझते हैं। <small>(वङ्गदर्शन ३य खण्ड ४८८ पृष्ठ)</small>
किन्तु अधिक विश्वासजनक मत है――उदयनाचार्यने मिथिलामें जन्म लिया और गौड़में आया था।।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:कुसुमाञ्जलि कारिकाकार रामभद्र सार्वभौमने भी इन्हें मिथिलादेशीय लिखा है।
:{{gap}}ठीक ठीक बता नहीं सकते―― उदयनाचार्य किस समय हुये थे। ‘न्यायसारविजय’ नामक ग्रन्थके रचयिता भट्टराघवने इनके श्लोक उड़त किये हैं। यह ग्रन्थ १२५२ ई॰ में बना था। फिर देखते हैं-८९८ शक (९७६ ई॰)में वाचस्पति मिश्चने “न्यायसूचीनिवन्ध” रचा था। उदयनाचार्य ने इन्ही वाचस्पतिमिश्र-विरचित न्यायवार्तिक-तात्पर्यकी ‘तात्पर्यपरिशुद्धि’ नाम्री एक टीका लिखी है। इससे मानना पड़ता है――यह ९७१ और १२५२ ई॰ के बीच अवस्थित थे। इधर वारेन्द्र उदयनाचार्य भादुड़ी ई॰ के १४ शतकमें गौड़पति गणेश के समय विद्यमान थे। सुतरां दोनो विभिन्न व्यक्ति ठहरते हैं।
:{{gap}}भक्तिमाहात्म्य के मतसे उदयनाचार्य जगन्नाथ देवका दर्शन लेने श्रीक्षेत्र पहुंचे थे। वहां पुरीके पण्डोंने माल्यचन्दनादि द्वारा इन्हें पूजा। वाराणसी में इनके जीवकी लीला साङ्न हो गयी।
:{{gap}}मैथिल उदयनाचार्य-विरचित कुसुमाञ्जलि न्यायका उतकृष्ट ग्रन्थ है। इसमें वैदान्तिक, सांख्य, मीमांसक और बौद्धमत काट ईश्वरका तत्त्व निरूपित है। अपने बनाये किरणावली नामक ग्रन्थमें कणादसूत्र के प्रशस्त-पाद भाष्यटीकासे उदयनाचार्य ने जैसा भाव विस्तृत मङ्गलाचरण लिखा, वैसा किसी टीकाके ग्रन्थमें देखने को नहीं मिलता। मैथिल तथा वङ्गदेशके
दार्शनिक पण्डित मात्र उभय ग्रन्थका विशेष आदर करते हैं। एतद्भिन्न बौद्धमतको सम्पूर्ण काट ‘आत्म-तत्त्वविवेक’ नामक एक उत्कृष्ट तत्त्वग्रन्थ भी इन्होंने बनाया है।
{{Outdent|उदयनीय (सं॰ त्रि॰) अन्त वा फलसे सम्बन्ध रखने-वाला, जो पूरा करता है।}}
{{Outdent|उदयपर्वत (सं॰ पु॰) उदयाचल।}}
{{Outdent|उदयपुर वा मेवाढ़-राजपूतानेके अन्तर्गत और देशीय राजाके अधिकार-भुक्त एक करद राज्य। इससे उत्तर वृटिशशासनाधीन अजमेर; दक्षिय बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़; पूर्व बूंदी, कोटा, जावरा, टोंक; पश्चिम}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 59|1em}}</noinclude>
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अँजली चौधरी
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सम्पादनको मङ्गलमयी किरणावली बनायो। आज भी उनके वंशधर शास्त्रविद विद्वान् द्विज मिथिलामें घर घर पढ़ाया करते हैं।
फिर ‘भादुड़ी-वंशावली’ नामक वारेन्द्रब्राह्मणों के कुल ग्रन्थमें लिखा है―^
{{c|{{x-smaller|<poem>“वृस्पतिसुतः श्रीमान् भुवि विख्यातमङ्गलः।
धर्मस स्थापनार्थाय बौद्धविध्वंसहेतवे।
ख्यात उदयनाचार्य वभूव शङ्करो यथा।
ब्रह्मतत्त्वप्रकाशाय चकार कुसुमाञ्जलिम्॥
स एवोदयनाचार्यों बौद्धविध्वंसकौतुकौ।
कुल्लू कं भदुमाश्रित्य भट्टाख्य मयूरं तथा॥”</poem>}}}}
इससे समझ पड़ता है―― उदयनाचार्य कुल्लू क और मयूरभट्टके समसामयिक रहे। उन्होंने बौद्धोंके विध्वंसको जन्म लिया था और कुसुमाञ्ज़लि नामक ग्रन्थ लिखा था।
वारेन्द्र-समाजके पण्डितोंका विश्वास है――वारेन्द्र कुल में परिवर्त-मर्यादाके प्रतिष्ठाता और कुसुमाञ्जलिकार उदयनाचार्य भादुड़ी अभिन्न व्यक्ति हैं। वारेन्द्र कुलाचार्यके ग्रन्थमें भी ऐसा हो कहा है। ‘सम्बन्ध निर्णय’ नामक ग्रन्थको देखते राजशाहीके अन्तर्गत निसिन्दा ग्राममें पर उदयन रहते थे। किन्तु खल्ली के भट्टाचार्य बताते हैं―― माणिकगञ्जके अन्तर्गत बालीयाटी
ग्राममें उदयनार्य भादुड़ी बसते थे। आज भी इस ग्रामके एक उच्च स्थानको लोग ‘भादुड़ी-भिटा’ कहते हैं।
{{c|{{x-smaller|<poem>“सएवोदयनाचार्यश्चिकाय कुसुमाञ्जलिम्।
तीर्थपर्यटने लब्ध तस्मादगौड़े प्रचारितम्॥” (लघुभारत)</poem>}}}}
लघुभारत-रचयिताके मतसे इन्होंने तीर्थपर्यटन कालमें कुसुमाञ्जलि ग्रन्थ पाया और गौड़ देशमें लाकर चलाया था।
इस स्थल पर कुछ गड़बड़ पड़ती है। भक्ति-माहात्म्य मिथिलामें इनका जन्मस्थान ठहराता है, उधर सम्बन्ध निर्णय निसिन्दा ग्राममें निवास बताता है। फिर कोई कोई उदयनाचार्यको वङ्गदेशवासी भी समझते हैं। <small>(वङ्गदर्शन ३य खण्ड ४८८ पृष्ठ)</small>
किन्तु अधिक विश्वासजनक मत है――उदयनाचार्यने मिथिलामें जन्म लिया और गौड़में आया था।।
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:कुसुमाञ्जलि कारिकाकार रामभद्र सार्वभौमने भी इन्हें मिथिलादेशीय लिखा है।
:{{gap}}ठीक ठीक बता नहीं सकते―― उदयनाचार्य किस समय हुये थे। ‘न्यायसारविजय’ नामक ग्रन्थके रचयिता भट्टराघवने इनके श्लोक उड़त किये हैं। यह ग्रन्थ १२५२ ई॰ में बना था। फिर देखते हैं-८९८ शक (९७६ ई॰)में वाचस्पति मिश्चने “न्यायसूचीनिवन्ध” रचा था। उदयनाचार्य ने इन्ही वाचस्पतिमिश्र-विरचित न्यायवार्तिक-तात्पर्यकी ‘तात्पर्यपरिशुद्धि’ नाम्री एक टीका लिखी है। इससे मानना पड़ता है――यह ९७१ और १२५२ ई॰ के बीच अवस्थित थे। इधर वारेन्द्र उदयनाचार्य भादुड़ी ई॰ के १४ शतकमें गौड़पति गणेश के समय विद्यमान थे। सुतरां दोनो विभिन्न व्यक्ति ठहरते हैं।
:{{gap}}भक्तिमाहात्म्य के मतसे उदयनाचार्य जगन्नाथ देवका दर्शन लेने श्रीक्षेत्र पहुंचे थे। वहां पुरीके पण्डोंने माल्यचन्दनादि द्वारा इन्हें पूजा। वाराणसी में इनके जीवकी लीला साङ्न हो गयी।
:{{gap}}मैथिल उदयनाचार्य-विरचित कुसुमाञ्जलि न्यायका उतकृष्ट ग्रन्थ है। इसमें वैदान्तिक, सांख्य, मीमांसक और बौद्धमत काट ईश्वरका तत्त्व निरूपित है। अपने बनाये किरणावली नामक ग्रन्थमें कणादसूत्र के प्रशस्त-पाद भाष्यटीकासे उदयनाचार्य ने जैसा भाव विस्तृत मङ्गलाचरण लिखा, वैसा किसी टीकाके ग्रन्थमें देखने को नहीं मिलता। मैथिल तथा वङ्गदेशके
दार्शनिक पण्डित मात्र उभय ग्रन्थका विशेष आदर करते हैं। एतद्भिन्न बौद्धमतको सम्पूर्ण काट ‘आत्म-तत्त्वविवेक’ नामक एक उत्कृष्ट तत्त्वग्रन्थ भी इन्होंने बनाया है।
{{Outdent|उदयनीय (सं॰ त्रि॰) अन्त वा फलसे सम्बन्ध रखने-वाला, जो पूरा करता है।}}
{{Outdent|उदयपर्वत (सं॰ पु॰) उदयाचल।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२३३
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२३२'''|'''उदयचन्द्र-उदयनाचार्य'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:{{gap}}एक अनुशासन मिला है। वेशनगर निकटस्थ गृहादिके प्राचीर इसी पर्वतके प्रस्तरसे बने हैं।
:{{gap}}३ मन्द्राज प्रदेश के अन्तर्गत गञ्जाम ज़िलेका एक ताल्लुक़। इसमें खन्द और शबर जातिके लोक अधिक रहते हैं।
:{{gap}}४ मन्द्राज प्रान्तके अन्तर्गत नेल्लूर ज़िलेकी एक तहसील। भूमिका परिमाण ८५० वर्गमील है। लोकसंख्या प्रायः एक लक्षसे कम है।
{{outdent|उदयचन्द्र―― १ बम्बईप्रान्तीय कनाड़ा ज़िलेवाले प्राचीन पल्लव-नृपति नन्दीवर्माके एक सेनापति। ये पुचानवंश-सम्भूत और वेगवती नदीतीरस्थ विल्वल-नगरके अधिपति थे। मन्द्राजप्रान्तीय उत्तर-अरकाट ज़िलेके प्राचीन नरेश उदयेन्दिरमका जो ताम्रफलक निकला, उसमें लिखा है―― २य परमेश्वरवर्मा-नृपतिके अनुयायी द्रामिल राजावोंने नन्दीपुरमें नन्दीवर्मा को घेर लिया था। किन्तु उदयचन्द्र ने वहां पहुंच अपने हाथसे पल्लवराज चित्रमयको मारा और स्वामीको कष्टसे उबारा। इन्होंने निम्बवन, चूतवन, शङ्करग्राम, नेल्लूर, नेलवेली, सुरावलन्दूर तथा अन्य स्थानों के भी रणक्षेत्रमें कई बार शत्रु को हराया और नन्दीवर्मा का राज्य बचाया था। नेलवेलीमें उदयचन्द्र ने शबरराज उदयनको भी वधकर मोरपुच्छ लगा शीशेका छत्र छीन लिया। उत्तरीय प्रान्तमें इन्होंने अश्वमेधयज्ञ करनेवाले पृथिवीव्याघ्र नृपतिके सेनापति निषादको विष्णुराजके राज्यसे भगाया और नन्दीवर्मा को उसका अधिपति बनाया था। मणाईकडो में उदयचन्द्र ने कालीदुर्ग नामक क़िला तोड़ पाण्डयोंका सैन्य हराया। नन्दीवर्मा ने अपने राज्यके २१ वें वर्षमें इनके कहनसे १०८ ब्राह्मणोंको वेल्लातूरका कुमारमङ्गल नामक ग्राम उत्सर्ग किया और उसका नाम बदल कर उदयचन्द्र-मङ्गल रख दिया। आज उसे उदयेन्दिरम् कहते हैं।}}
:{{gap}}२ बम्बई प्रान्तस्थ गुजरातवाले प्राचीन चालुक्य नृपति (११४३ से ११७४) कुमारपालकी सभाके एक जैन पण्डित। पाटनमें भद्रकाली-मन्दिरके निकट जो शिलालिपि निकली, उसमें यह बात लिखी है।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{outdent|उदयत् (सं॰ त्रि॰) अर्ध्वगामी, ऊपर चढ़नेवाला, जो निकल रहा हो।}}
{{outdent|उदयन (सं॰ पु॰) ९ अगस्त्य। २ शतानीकके पुत्र। पत्नीका वासवदत्ता और पुत्रका नाम नरवाहन था। <small>(नृसिंहपुराण २३१२)</small> मतान्तरसे यह शतानीकके पौत्र रहे। अपर पत्नीका नाम रत्नावली था। कौशाम्बी नगरी इनकी राजधानी थी। कोई कोई बुद्धदेवको इनका धर्मशिक्षक बताते है। ३ वृषभराज। ४ वत्स-राज। कथासरित्सागरमें इनका उपाख्यान आया है। ५ शुद्धोदनके एक पुरोहित। (क्ली॰) भावे ल्युट्। ६ उत्थान, निकास, उठान। ७ फल, नतीजा। ८ अन्त, अखी़र।}}
{{outdent|उदयनाथ त्रिवेदी कवीन्द्र――दुवाबके अन्तर्गत अमेठीके एक प्रधान कवि। प्रथम ये अमेठीके राजा हिन्मत-सिंहकी सभामें रह कविता बनाते थे। इनका विर-चित ‘रसचन्द्रोदय’ वा ‘रतिविनोद’ नामक हिन्दी ग्रन्थ पढ़ राजा अतिशय सन्तुष्ट हुये। उन्होंने उदयनाथको ‘कवीन्द्र’ उपाधि दिया था। उक्त पुस्तक १८०४ विक्रमाब्दमें लिखा गया। पीछे इन्होंने अमेठीके गुरु-दत्तसिंह एवं भगवन्तराय खीची, अजमेरके गजसिंह और बूंदीके बुद्धराय प्रभृति राजाकी सभामें महासम्मान पाया था। इनके पुत्र का नाम दूलह त्रिवेदी था। वे भी एक अच्छे कवि थे। उनका रचा ‘कवि-कुल-कण्ठाभरण’ नामक हिन्दीग्रन्थ युक्त-प्रदेश में समादृत है।}}
{{outdent|उदयनाचार्य (सं॰ पु॰) कुसुमाञ्जलि नामक संस्कृत दर्शनग्रन्थ प्रणेता। भक्ति-माहात्मा ग्रन्थके मतसे――}}
{{c|{{smaller|<poem>“भगवानपि तत्रै व मिथिलायां जनार्दनः।
श्रीमदुयनाचार्यरूपेण्णावततारह॥” (२७।२३)
“बौद्धसिद्धान्तमुग्धान्तमुखाय हितकारिणीम्।
व्यतेने विदुषां प्रौत्यै विमलां किरणावलीम्॥” (३१॥३)
“अद्यापि मिथिलायान्तु तदन्वयभवा द्धिजाः।
विद्वांसः शास्त्रसन्पन्ना: पाठयन्ति ग्रहे गृहे॥” (३१॥८१)</poem>}}}}
:{{gap}}अर्थात् भगवान् जनार्दन मिथिलापर उदयनाचा-र्यके रूपमें उतरे हैं। उन्होंने बौद्ध सिद्धान्तमुग्ध लोगोंके सुखविधान और पण्डित-मण्डलीके प्रीति-
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२३५
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२३४'''|'''उदयपुर वा मेवाढ़'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अरावली पर्वत और दक्षिण-पश्चिम महीकांटा है। यह अक्षा॰ २६° ४९‘ एवं २५° ५४‘ उ॰ पौर द्राघि॰ ७३॰ ७‘ तथा ७५° ५१‘ पू॰ के मध्य अवस्थित है। भूमिका परिमाण १२६७ वर्ग मील है। लोकसंख्या लगभग डेढ़ लाख है। हिन्दू और जैन अधिक रहते हैं। स्थानीय पर्वतमें महेट, भील और मीना तीन प्रकारकी असभ्य जाति रहती है।
<Small>इतिहास</small>――बहुकालसे यहां सूर्यवंशीय राजा शासन चलाते, जो महाराणा कहाते और अपनेको रामचन्द्र के अधस्तन पुरुष बताते हैं। किन्तु प्राचीन शिलालिपिसे प्रमाणित हुया है वे पहले ब्राह्मण थे, पीछे क्षत्रिय हो गये है।
राजपूत राजगणमें उदयपुरके राणा ही श्रेष्ठ और सर्वापेक्षा माननीय हैं। मुसलमान् बादशाहोंके आधिपत्यकालमें राजपूतानेके प्रधान प्रधान प्रायः सकल ही राजा किसी न किसी दिल्लीसम्राटसे दब गये थे। अनेकोंने कन्यादान भी दिया था। किन्तु प्रबल प्रतापशाली उदयपुरके राणाने मुसलमानोंको अधीनता न मान अथवा अपनी कन्या उन्हें न सौंप जातीय गौरव बचाया था। उदय-पुरके राणा राजपूत जातीय गहलोत श्रेणीकी शिशोदीय शाखाके हैं।
७२८ ई॰ में इस वंशके बप्प रावलने सर्व प्रथम मेवाड़में राज्य जमाया था। १२०१ ई में चित्तौरराज समरसिंहके मरनेपर उनके ज्येष्ठ पुत्रने राज्यसे भाग
डंगरपुरवाले जङ्गल में जाकर राजधानी बसायी थी। पहले उदयपुरके राजाका रावल (राव) उपाधि रहा। किन्तु राहुपने राजा होकर रावल के परिवर्तमें राणा उपाधि लिखा था।
१२७५से १२९० ई॰ तक लक्ष्मणसिंहने राजत्व किया। उसी समयपर अलाउद्दीन चित्तौरपर चढ़े थे। १३०३ ई॰ में वीरकेशरी हमीर राजा बने। वे
महमूदके विरुद्ध खड़े हुये थे। दिल्लीके सम्राटको कै़दकर उन्होंने यवन-कवलित मेवाड़का राज्य फिर छुड़ाया। जिससे कि जयपुर, बूंदी और ग्वालियरके राजमणने हमीरको यथाविहित सम्मानित किया था।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{gap}}राजपूत-वीर संग्रामसिंह या साङ्गाजीके समय अकबरके पितामह बाबरने चित्तौर घेरा। उन्होंने फतेहपुर-सीकरीके निकट आगे बढ़ मुगल सैन्यकी गति रोकी थी। किन्तु युद्ध में असाधारण वीरत्व देखात भी अव-शेषको वे हार गये। उसी दिनसे साङ्गाराणा फिर देशको न लौटे, पर्वत पर्वत घूम केवल बुद्धका आयोजन करते रहे। उनके मनमें था――जबतक हम युद्धमें मुगल बादशाहको न हरायेंगे,तबतक अपने देशको भी वापस न जायेंगे। मनकी आशा मनमें ही रही, अल्य दिनमें ही मृत्यु उन्हें खा गयो। १५३० ई॰ को साङ्गजीके पुत्र रत्नसिह राणा बने थे। उन्होंनेभी बूंदीराज-के साथ सम्मुख समरमें प्राण दे दिया। फिर रत्नके भ्राता विक्रमादित्यको राज्य मिला था। उस समय गुजरातके मुसलमान बहादुर चित्तौर पर चढ़े। युद्ध चलने पर चित्तौरके दुर्भेद्य दुर्गमें यावतीय मान्यगण्य राजपूत-नारीने आश्रय लिया था। जब देखा, कि दुर्ग बचाया न जा सकेगा और शीघ्र ही मुसलमानोके मुख में पड़ेगा, तब प्रायः दो सहस्त्र राजपूतबालाने अमूख्य सतीत्वरत्न रखने के लिये चितानलमें जीवन छोड़ा। दुर्गस्थित राजपूत वीरोंने जब देखा――चिराराध्य जननी, प्राणप्रतिमा दयिता और स्नेह एवं आदरके रत्न कन्यागणने अकातर जीवन छोड़ राजपूत-कुलका गौरव बढ़ाया है। तो फिर वे तेजस्वी वीरगण भी दुर्ग का द्वार खोल मुसलमानोंके सैन्यसागरमें कूद पड़े। एक-एक जन मुसलमानों को मारते मारते रणकी शय्यापर सो गया। और चित्तौर मुसलमानोंके हाथ लगा।
हुमायूंके प्रतापसे बहादुर गुजरात लौट गये। चित्तौर फिर विक्रमादित्यको मिला था। किन्तु अल्प दिनके मध्य ही सरदारों ने उन्हें राज्यसे हटा मार डाला। रणवीर नामक एक व्यक्ति राणा बने थे। अल्प दिनके बाद साङ्गाराणाके कनिष्ठ पुत्र उदयसिंहने फिर मेवाड़का राजसिंहासन अधिकारमें किया। उदयसिंहके राजत्वकालमें अकबर शाहने चित्तौर जीता था। उदयने चित्तौर खो अरावली पर्वतपर गिर्वा उपत्यकामें उदयपुर नामक नगर बसाया। यही स्थान उस समयसे मेवाड़की राजधानी बना है।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२३४'''|'''उदयपुर वा मेवाढ़'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अरावली पर्वत और दक्षिण-पश्चिम महीकांटा है। यह अक्षा॰ २६° ४९‘ एवं २५° ५४‘ उ॰ पौर द्राघि॰ ७३॰ ७‘ तथा ७५° ५१‘ पू॰ के मध्य अवस्थित है। भूमिका परिमाण १२६७ वर्ग मील है। लोकसंख्या लगभग डेढ़ लाख है। हिन्दू और जैन अधिक रहते हैं। स्थानीय पर्वतमें महेट, भील और मीना तीन प्रकारकी असभ्य जाति रहती है।
<Small>इतिहास</small>――बहुकालसे यहां सूर्यवंशीय राजा शासन चलाते, जो महाराणा कहाते और अपनेको रामचन्द्र के अधस्तन पुरुष बताते हैं। किन्तु प्राचीन शिलालिपिसे प्रमाणित हुया है वे पहले ब्राह्मण थे, पीछे क्षत्रिय हो गये है।
राजपूत राजगणमें उदयपुरके राणा ही श्रेष्ठ और सर्वापेक्षा माननीय हैं। मुसलमान् बादशाहोंके आधिपत्यकालमें राजपूतानेके प्रधान प्रधान प्रायः सकल ही राजा किसी न किसी दिल्लीसम्राटसे दब गये थे। अनेकोंने कन्यादान भी दिया था। किन्तु प्रबल प्रतापशाली उदयपुरके राणाने मुसलमानोंको अधीनता न मान अथवा अपनी कन्या उन्हें न सौंप जातीय गौरव बचाया था। उदय-पुरके राणा राजपूत जातीय गहलोत श्रेणीकी शिशोदीय शाखाके हैं।
७२८ ई॰ में इस वंशके बप्प रावलने सर्व प्रथम मेवाड़में राज्य जमाया था। १२०१ ई में चित्तौरराज समरसिंहके मरनेपर उनके ज्येष्ठ पुत्रने राज्यसे भाग
डंगरपुरवाले जङ्गल में जाकर राजधानी बसायी थी। पहले उदयपुरके राजाका रावल (राव) उपाधि रहा। किन्तु राहुपने राजा होकर रावल के परिवर्तमें राणा उपाधि लिखा था।
१२७५से १२९० ई॰ तक लक्ष्मणसिंहने राजत्व किया। उसी समयपर अलाउद्दीन चित्तौरपर चढ़े थे। १३०३ ई॰ में वीरकेशरी हमीर राजा बने। वे
महमूदके विरुद्ध खड़े हुये थे। दिल्लीके सम्राटको कै़दकर उन्होंने यवन-कवलित मेवाड़का राज्य फिर छुड़ाया। जिससे कि जयपुर, बूंदी और ग्वालियरके राजमणने हमीरको यथाविहित सम्मानित किया था।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{gap}}राजपूत-वीर संग्रामसिंह या साङ्गाजीके समय अकबरके पितामह बाबरने चित्तौर घेरा। उन्होंने फतेहपुर-सीकरीके निकट आगे बढ़ मुगल सैन्यकी गति रोकी थी। किन्तु युद्ध में असाधारण वीरत्व देखात भी अव-शेषको वे हार गये। उसी दिनसे साङ्गाराणा फिर देशको न लौटे, पर्वत पर्वत घूम केवल बुद्धका आयोजन करते रहे। उनके मनमें था――जबतक हम युद्धमें मुगल बादशाहको न हरायेंगे,तबतक अपने देशको भी वापस न जायेंगे। मनकी आशा मनमें ही रही, अल्य दिनमें ही मृत्यु उन्हें खा गयो। १५३० ई॰ को साङ्गजीके पुत्र रत्नसिह राणा बने थे। उन्होंनेभी बूंदीराज-के साथ सम्मुख समरमें प्राण दे दिया। फिर रत्नके भ्राता विक्रमादित्यको राज्य मिला था। उस समय गुजरातके मुसलमान बहादुर चित्तौर पर चढ़े। युद्ध चलने पर चित्तौरके दुर्भेद्य दुर्गमें यावतीय मान्यगण्य राजपूत-नारीने आश्रय लिया था। जब देखा, कि दुर्ग बचाया न जा सकेगा और शीघ्र ही मुसलमानोके मुख में पड़ेगा, तब प्रायः दो सहस्त्र राजपूतबालाने अमूख्य सतीत्वरत्न रखने के लिये चितानलमें जीवन छोड़ा। दुर्गस्थित राजपूत वीरोंने जब देखा――चिराराध्य जननी, प्राणप्रतिमा दयिता और स्नेह एवं आदरके रत्न कन्यागणने अकातर जीवन छोड़ राजपूत-कुलका गौरव बढ़ाया है। तो फिर वे तेजस्वी वीरगण भी दुर्ग का द्वार खोल मुसलमानोंके सैन्यसागरमें कूद पड़े। एक-एक जन मुसलमानों को मारते मारते रणकी शय्यापर सो गया। और चित्तौर मुसलमानोंके हाथ लगा।
हुमायूंके प्रतापसे बहादुर गुजरात लौट गये। चित्तौर फिर विक्रमादित्यको मिला था। किन्तु अल्प दिनके मध्य ही सरदारों ने उन्हें राज्यसे हटा मार डाला। रणवीर नामक एक व्यक्ति राणा बने थे। अल्प दिनके बाद साङ्गाराणाके कनिष्ठ पुत्र उदयसिंहने फिर मेवाड़का राजसिंहासन अधिकारमें किया।
उदयसिंहके राजत्वकालमें अकबर शाहने चित्तौर जीता था। उदयने चित्तौर खो अरावली पर्वतपर गिर्वा उपत्यकामें उदयपुर नामक नगर बसाया। यही स्थान उस समयसे मेवाड़की राजधानी बना है।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इन्द्रियाविन्दू—ब्नबतूता|६७}}</noinclude>
{{Multicol|line=1px solid black}}
:{{smaller|विश्वदेव्यस्य मती। पा ६।११२१। इति दीर्घः।}} इयिविशिष्ट, रुन या ताकत रखनेवाला।
{{outdent|इन्द्रियाविन् (सं॰ त्रि॰) इन्द्रियं प्राशस्त्येन वास्त्यस्य वहु॰, विनि। प्रशस्त इन्द्रिय-विशिष्ट, अच्छे रुन रखनेवाला।}}
{{outdent|इन्द्रियासङ्ग (सं॰ पु॰) आत्मसंयम, खुशी और रामसे बेपरवायी।}}
{{outdent|इन्द्रियेश (सं॰ पु॰) १ जीव, जान्। २ इन्द्रियका देवता।}}
{{outdent|इन्द्री (हिं॰) {{smaller|इन्द्रिय देखो।}}}}
{{outdent|इन्द्रीजुलाब (हिं॰ पु॰) मूत्र लानेवाला औषध, पेशाबर दवा। भारतमें प्रायः आधा जल और आधा दुग्ध मिलाकर इन्द्रीजुलाब लिया जाता है। शोरा वगेरह खानेसे भी पेशाब बहुत उतरता है। इसमें ठण्डी ही चीज पड़ती है। मूत्र रुकनेपर भात या खिचड़ी खाना चाहिये।}}
{{outdent|इन्द्रेज्य (सं॰ पु॰) वृहस्पति।}}
{{outdent|इन्द्रेश्वर (सं॰ पु॰) इन्द्रेण स्थापितः ईश्वरः शिव-लिङ्गम्। शिवलिङ्गविशेष।}}
{{outdent|इन्द्रीक्तरसायन (सं॰ क्ली॰) १ इन्द्रकथित रसायनवर्ग। २ ऐन्द्री, कुदरू। ३ महाश्रावणो।}}
{{outdent|इन्द्रीपल (सं॰ क्ली॰) नीलहीरक, काला होरा।}}
{{outdent|इन्द्र (सं॰ पु॰) इन्ध करणे घञ। १ दीप्ति, चमक। २ ऋषिविशेष। ३ प्रदीप, चिराग़। (त्रि॰) ४ सुलगा देनेवाला, जो जलाता हो।}}
{{outdent|इन्धन (सं॰ क्ली॰) इन्धे दीप्यतेऽनेन, इन्ध करणे ल्युट्। १ काष्ठ, लकड़ी। २ अग्निके स्वालनार्थ तृणकाष्ठ, आग जलानेको लकड़ी। (त्रि॰) ३ अग्निको चैतन्य करनेवाला, जिससे आग जले।}}
{{outdent|इन्धनवत् (सं॰ त्रि॰) इन्धनं प्रज्वालनं विद्यते-ऽस्मिन्, मतुप्। ज्वालायुक्त, जलता हुवा।}}
{{outdent|इन्धन्वन् (वै॰ त्रि॰) इन्धनमत्वन्धोयः, वेदे वनिप् निपातनात् अलोपः। ज्वालायुक्त, जो जल रहा हो।}}
{{outdent|इन्नर (हिं॰ पु॰) मसाला मिला हुवा गायका दूध। यह गाय व्यानेसे दश दिनके भीतर ही बनता है।}}
{{outdent|इन्षकर (सं॰ त्रि॰) इन्च इव काययति, इन्व-अच्-}}
{{Multicol-break}}
:कै-क। इन्धल, मृगशिरा नक्षत्रके उपरिस्थित पांच तारा।
{{outdent|इन्साफ, {{smaller|उनसाफ़ देखो।}}}}
{{outdent|इबरायनामा (फा॰ पु॰) त्यागपत्त्र, जिस काग़जमें अपने हक छोड़नेको बात लिखो जाय।}}
{{outdent|इबरानी (अ॰ वि॰) १ यहूदी, यहद जातिसे सम्बन्ध रखनेवाला। (स्त्री॰) २ यहूदियोंको भाषा।}}
{{outdent|इबलीस (अ॰ पु॰) पिशाच, शैतान्, खबोस।}}
{{outdent|इवादत (अ॰ स्त्री॰) पूजा, अर्चना, बन्दजी।}}
{{outdent|इबादतगाह (अ॰ स्त्री॰) मन्दिर, पूजा करनेको जगह।}}
{{outdent|इबारत (अ॰ स्त्री॰) १ प्रबन्ध, वाक्य-रचना, जुमलेको बनावट २ भाषा, लेख, ज़बान्, तर्ज़-तहरीर। सालङ्कारको रङ्गोन, प्रबलको जोरदार, विस्तोर्णकी तूल-तवोल और शिथिल भाषाकी लचर इबारत करते हैं।}}
{{outdent|इबारत-आरायी (अ॰ स्त्री॰) शब्द चित्र, लफूज़ोंको सजावट।}}
{{outdent|इबारती (अ॰ वि॰) लेखसम्बन्धोय, लिखावटके मुताल्लिक। जो सवाल लिखकर लगाया जाता हो, वह इबारती कहाता है।}}
{{outdent|इब्तिदा (अ॰ स्त्री॰) १ आदि, आरम्भ, शुरू। २ उत्पत्ति, पैदायश, निकास।}}
{{outdent|इब्तिदायी (अ॰ वि॰) १ प्रस्तावना-रूप, तमहोदो। २ अग्रा, आद्य, साबिक, पहला।}}
{{outdent|इब्न आबू उसैबिया-एक मुसलमान् ग्रन्थकार। इन्हें सुवफिफक-उद्-दीन अबू अब्बास अहमद भी कहते थे। इन्होंने ई॰ के १३वें शताब्दमें संस्कृतसे अरबोभाषामें 'अयून्-अल-अम्बा-फि-तबकात-उल्-अतिब्बा (अर्थात् वैद्यसम्प्रदाय सम्पर्कीय संवाद-निर्भर) नामक ग्रन्थका अनुवाद किया था। भारतवर्षीय जो-जो प्राचोन वैद्य विदेशमें पहुँचते, उन सबका कुछ-कुछ विवरण इस ग्रन्थमें लिखा जाता था। १२६८ ई॰ में इनको मृत्यु हुई थी।}}
{{outdent|इब्नबतूता—अरबके एक भ्रमणकारी।
मुहम्मद तुग़लकके समय यह भारतवर्षमें हो थे। मुहम्मदने इन्हें दोल्लोका विचार-पति बनाया था। इन्होंने}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|६८|इब्राहीम-आदिल शाह-इब्राहीम निजामशाह|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:अपना भ्रमण-वृत्तान्त पुस्तकाकारमें लिखा है। उक्त ग्रन्थमें भारतवर्षके तत्सामयिक भाव, इतिहास, भूतत्त्व प्रभृतिका खासा विवरण मिलता है। १३३२ ई॰ में ये मक्केकी तीर्थयात्रा करने गये थे।
{{outdent|इब्राहीम-आदिल शाह (१म)—ये स्मायिल आदिलशाहके पुत्र, दक्षिण विजयपुरके सुलतान् थे। १५३५ ई॰ में इब्राहीम विजयपुरके सिंहासनपर बैठे थे। १५४३ ई॰ को इन्होंने अला उद्दीन इमाद शाहको कन्या रदिया सुलतानासे विवाह किया था। और २४ वर्ष तक राजत्व किया था एवं १५५८ ई॰ में ये परलोक सिधारे थे।}}
{{outdent|इब्राहीम आदिलशाह (२य)—तहमास्यके पुत्र। इनका दूसरानाम अबुल मुजफ्फर था। १५८० ई॰ के अप्रेल मासमें ८ वर्षकी अवस्थामें ये दक्षिण-विजयपुर (बीजा-पुर) के सिंहासनपर बैठे थे। इनकी नाबालिगोंमें कमाल खुान् और चांद बीबी सुलतानाने रक्षककी भांति इनके राज्यका कार्य चलाया था। प्रथम तो कमाल खां सरल भावसे ही रहते थे, किन्तु पीछे चांद बीबीसे बिगड़ पड़े उस समय चांद बीबीके समान बुद्धिमती रमणी बहुत थोड़ी थीं। इन्होंने हाजी किशवर खांको अपने पास रख कमाल खान्का प्राणवध कराया था। इसके बाद किशवर खान् राज्यके संरक्षक बने। किन्तु उनके भो मारे जानेपर अखुलास खान्को राजकीय पद मिला था। कुछ दिन पीछे दिलावर खान ने अखुलास खान्की आंखें निकाल साम्म्राज्यका कर्तृत्व अपने हाथ में लिया था। १५६० ई॰ में इब्राहीमने दिलावरको राजकीय पदसे हटाया था और १५८२ ई॰ में आंखें खिंचा उसको क़ैदहवाने पहुंचाया था। १६२६ ई॰ में ३८ वर्ष राजत्व करने बाद इनकी मृत्यु हुई। इब्राहीम रीजा नामक इनकी कब्र विजयपुरमें बहुत अच्छी बनी है। पत्थरको दीवार पर कुरान्की आयतें अरबी हर्षों में खुदी हैं। इनके पुत्र मुहम्मद आदिल-शाहको सिंहासनका उत्तराधिकार मिला था।}}
{{outdent|इब्राहीम कुतुब शाह-गोलकुण्डाके राजा कुली कुतुब शाहके पुत्र। कुली कुतुब शाहके भ्राता जमशेद कुतुब शाहका जब देहान्त हो गया, तब अमात्यंवर्गने}}
{{Multicol-break}}
:तत्पुत्र सुभान कुलीको राजा बना दिया। उस समय सुभानकी उम्म्र केवल बारह वर्ष की थी। इसलिये राजभार ग्रहण करनेमें इसको बिलकुल अक्षम देख सब लोगोंने इब्राहीमको राज्यके लिये पसन्द किया। ये विजयनगरमें रहते थे। १५५० ई॰ की २८वीं जुलायीकी गोलकुण्डेमें इन्हें राजपद मिला। इन्होंने अपर मुसलमान् राजगणके साथ योग लगा विजयनगराधिप रामराजसे युद्ध किया और उन्हें मारकर समग्र देश आपसमें बांट लिया। १५८१ ई॰ को ५वीं जूनको ३२ वर्ष राजत्व करने बाद ये अकस्मात् मर गये। इनके पुत्र मुहम्मद कुतुब शाह पीछे राजा हुये थे।
{{outdent|इब्राहीम खान्अ—मीर-उल्-उमरा भली मर्दान् खान्के पुत्र। १६५८ ई॰ के समय बादशाह आलमगीरने इन्हें पञ्चहजारी बनाया था। पीछे इब्राहीम खांने काश्मीर, लाहौर, बिहार, बङ्गाल प्रभृति स्थानक शासनकर्ताका भो पद पाया था। बहादुरके राजत्व कालमें इनको मृत्यु हो गई थी}}
{{outdent|इब्राहीम खान् फतेहजङ्ग—नरजहां वेगमके मौसा। १६१६ ई॰ को कासिम खान्के पदच्युत होनेपर जहांगीर बादशाहने इन्हें चार हजार सिपाही सौंप शाहजहांके, अपने विहारका शासनकर्ता बनाया था। पिता जहांगीरसे विरोध करनेपर यह डांकेमें लड़े और अन्तकी कट मरे।}}
{{outdent|इब्राहीम खान् सूर—बयान शासनकर्ता ग़ाज़ी खान्के पुत्र और मुहम्मद शाह आदिलीके भगिनीपति। १५५५ ई॰ में इन्होंने बहुसंख्यक सैन्य संग्रहकर यद्यपि दिल्ली और आगरा नगर जीत लिये थे तो भी सिंहासनपर जमकर बैठ न सके। अहमद खान्ने पञ्जाबमें बल बढ़ाकर युद्धमें इन्हें हरा शम्भलको भगा दिया और दिल्ली तथा आगरे पर अपना अधिकार जमा लिया। १५६७ ई॰ को उड़ोसेमें एक युद्ध हुवा था। उसीमें बङ्गालके नवाब सुलेमान्ने इन्हें को मार डाला था।}}
{{outdent|इब्राहीम निजामशाह-बुरहान् निज़ाम शाहके पुत्र श। १५८५ ई॰ के अपरेल मासमें इन्हें दक्षिण-अहमद-}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इब्राहीम शाह शरक़ी—इभराज|६९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:नगरका राजत्व मिला था। चार मास राजत्व करनेके बाद इन्हें (निजाम-शाहको) बीजापुरके नवाब इब्राहीम आदिलशाहसे लड़ना पड़ा। इसी युद्दमें ये मारे गये।
{{outdent|इब्राहीम शाह शरकी—युक्तप्रदेश जौनपुरके एक नवाब। १४०२ ई॰ में अपने भ्राता मुबारिक शाहके मरनेसे ये गद्दीपर बैठे थे। इन्होंने अराजकता रहते भी साहित्य-की बड़ी उन्नति की। उस समय हिन्दुस्थानमें जौनपुर विद्याका भवन बन गया था। १४४० ई॰ को शरकीकी मृत्यु हुई। प्रजा इनसे बहुत सन्तुष्ट रहती थी।}}
{{outdent|इब्राहीम हुसेन लोदी—सिकन्दर शाह लादीके लड़के। १५१० ई॰ के फरवरी मासमें पिताकी मृत्यु होनेसे आगरेमें ये सिंहासनपर बैठे। इन्होंने सोलह वर्ष राजत्व किया था। १५२६ ई॰ को २०वीं फरवरीको पानीपत में बाबर शाहसे लड़ने पर ये मारे गये।}}
{{outdent|इब्राहीमी (अ॰ पु॰) मुद्राविशेष, एक सिक्का। यह इब्राहीम लोदीके समय प्रचलित था श।}}
{{outdent|इभ (सं॰ पु॰) इन्भन्। इयणः कित्। {{smaller|छण् ३।१५।३।}} १ हस्ती, हाथी। २ आठकी संख्या। आठों दिशाओंमें एक-एक दिग्गज रहता है इसलिये इभ शब्द आठकी संख्याका बोधक है। ३ नागकेशर। (वै॰ पु॰) ४ अनुचर, नौकर। ५ निर्भय शक्ति। (वि॰) ६ अनुचर द्वारा आवृत, जो नौकरींसे घिरा हो।}}
{{outdent|इभकणा (सं॰ स्त्री॰) इभीपपदा कणा पिप्पली, शाक॰ तत्। गजपिप्पली, गजपीपर।}}
{{outdent|इभकुम्भ (सं॰ पु॰) हस्तीका मस्तक, हाथीका सर।}}
{{outdent|इभक्कष्ण (सं॰ पु॰) {{smaller|इभकणा देखो।}}}}
{{outdent|इभक्कष्णा, {{smaller|इभकणा देखी।}}}}
{{outdent|इभकेशर (सं॰ पु॰) इभमद इव केशरः यस्य, बहुत्री॰। १ नागकेशर वृत्त। यह वृत्त ठोक बबूल-जैसा होता है। इसके पुष्पकी सुगन्ध एक कोसतक पहुंचती है। २ नागकेशर पुष्प।}}
{{outdent|इभकेसर, {{smaller|इभकेशर देखो।}}}}
{{outdent|इभगन्धा (सं॰ स्त्री॰) पुष्पं यस्याः, बहुव्री॰। इभस्य गन्ध एकदेशी दन्त इव नागदन्ती वृच, हत्थाजोरी, सरियारी। इस वृक्षके फल, पुष्प, पत्त्र, बल्कल प्रभृति समस्त अङ्ग हो विषले होते हैं। नागदन्ती देखो।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|इभगन्धिका, {{smaller|इसगन्धा देखो।}}}}
{{outdent|इभदन्ता (सं॰ स्त्री॰) इभस्य दन्तवत् शुभ्नं पुष्पमस्याः। १ हस्तिशुण्डीव्वच, हाथीसूंड़। २ नागदन्तीष्वच, सरियारी।}}
{{outdent|इभदन्तावा (सं॰ स्त्री॰) नागदन्ती, सरियारी।}}
{{outdent|इभनिमीलिका (सं॰ स्त्री॰) इभस्यैव निमीलिका, इम-निमोल-क-टाप्, ६-तत्। १ सिद्धि, भाग। इस वृत्तके पत्र वा बीज खानेसे नशा चढ़ता है और चतुः हाथोकी तरह बैठ जाते हैं। इसोसे भांगकी इभ-निमोलिका कहते हैं। २ पटुता, रसिकता, होशियारी, कद्रदानी।}}
{{outdent|इभपत्रिका (सं॰ स्त्री॰) चिल्लीशाक, एक सब्ज़ी।}}
{{outdent|इभपालक (सं॰ पु॰) हस्तिपक, महावत।}}
{{outdent|इभपुषा (सं॰ क्ली॰) नागकेशर।}}
{{outdent|इभपीटा (सं॰ स्त्री॰) पीटा पुलक्षणा इभी, जाति-त्वात् पूर्वनिपातनात् पुंवद्भावश्च। १ पुरुषहस्तोको भांति चिह्नयुक्त हस्तिनी। २ करिशावक, हाथीका बच्चा।}}
{{outdent|इभबला (सं॰ स्त्री॰) नागबला, पान।}}
{{outdent|इभभर (सं॰ पु॰) हस्तिसमूह, हाथीका झुण्ड।}}
{{outdent|इभमञ्जक (सं॰ पु॰) पुत्रदात्त्री लता, बेटा देनेवाली बेल।}}
{{outdent|इभमाचल (सं॰ पु॰) इभमाचलयति, इभ-आ-चल् बाहुलकात् णिच्। सिंह, शे।। पर्वतोंपर सर्वदा रक्तपानके लिये हाथियोंको मारता फिरता है इस लिये सिंहका नाम यह पड़ा है।}}
{{outdent|इभमूलक (सं॰ क्ली॰) १ हस्तिमूलक। २ गन्ध-वृक्ष।}}
{{outdent|इभया (सं॰ स्त्री॰) इभैर्यायते भच्यते, इभ-या कर्मणि घञर्थ क, ३-तत्। स्वर्णक्षोरी वृक्ष। हाथोके खानेसे इस वृक्षका नाम यह पड़ा है।}}
{{outdent|इभयुवति (सं॰ स्त्री॰) युवतिः इभी, पूर्वनिपातनात् वपुंवत् च। १ युवति हस्तिनी, नौजवान् हथिनी। २ करिशावक, हाथीका बच्चा।
{{outdent|इभराज (सं॰ पु॰) ऐरावत हस्ती। यह संपूर्ण हस्तियोंका राजा होता है।}}
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 18}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|७०|इभराट्इ—इमली|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इभराट्, {{smaller|इभराज देखो।}}}}
{{outdent|इभशुण्डी (सं॰ स्त्री॰) हस्तिशुण्डी, हाथी सूंड।}}
{{outdent|इभषा (सं॰ स्त्री॰) इभ-वा-क-टाप्। 'स्वर्णक्षीरीवृक्ष।}}
{{outdent|इलाख्य (सं॰ पु॰) इभयाख्या नास यस्य वा यस्मिन्। नागकेशर वृक्ष।}}
{{outdent|इभानन (सं॰ पु॰) इभाननमिवाननं यस्य। गणेश, गजानन।}}
{{outdent|इभारि (सं॰ पु॰) हस्तीका शव, सिंह, शेर।}}
{{outdent|इभी (सं॰ ली॰) इस्तिगी, हथिनी।}}
{{outdent|इभोषणा (सं॰ स्त्री॰) इभोपपदा उषथा, शाक-तत्। गजपिप्पल्ली, बड़ी पीपर।}}
{{outdent|इभ्य (सं॰ पु॰) इभन्य। १ शत्र, दुश्मन्। २ हाँस्त-पालक, हाथीका महावत। (बै॰ त्रि॰) ३ नृत्य-सम्वन्धीय, नौकरके सुताल्लिक। ४ धनवान्, दौलत-मन्द, जिसके बहुत नौकर रहें।}}
{{outdent|इभ्यका (सं॰ स्त्री॰) इभ्य स्वार्थ कन्टाप्। १ हस्तिनी, हथिनी। २ शक्तकी वृत्त, लीबानका पेड़।}}
{{outdent|इभ्यतिल्विल (वे॰ वि॰) इभ्यः तिल्विव इव। अनेक हस्तो और अश्व रखनेवाला, जिसके कितने ही हाथी-घोड़ा ही।}}
{{outdent|इभ्या (सं॰ स्त्री॰) इभमईतीति यत्। १ हस्तिनी, हथिनी । २ शक्तको वृत्त, लोबानका पेड़।}}
{{outdent|इभ्यिका, {{smaller|इभ्य का देखो।}}}}
{{outdent|इम, {{smaller|इद देखो।}}}}
{{outdent|इमक, {{smaller|इद' देखो}}}}
{{outdent|इमकान (अ॰ पु॰) १ सम्भव, एहतिमाल। २ अंश, वजद। ३ शक्ति, मजाल, बस।}}
{{outdent|इमकोस (हिं॰ पु॰) प्रसिग्गृह, तलवारका म्यान।}}
{{outdent|इमचार (हिं॰ पु॰) गुप्तचर, छिपा जासूस।}}
{{outdent|इंमथा (वै॰ अव्य॰) इर्द इवार्थं थाल्, इमादेशच निपातनात् वेदे श। प्रव-पूर्व-विश्व-मात्याल् छन्दसि। {{smaller|पा ५।३।१११।}} इदानीन्तन तुख्य, इसत।}}
{{outdent|इमदाद (अ॰ स्त्री॰) १ साहाय्यकार्य, मदद देनेका काम। २ दान, बखू शिश।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|इमदादी (अ॰ वि॰) साहाय्यप्राप्त, जिसे मदद मिले।}}
{{outdent|इमरतो (हिं॰ स्ली॰) मिष्टानविशेत्र, एक मिठायी। पहिले उर्दकी पीठी को खूब बारीक बांट चोरेठा जिखाते हैं और दोनोंको खूब पेंट डालते हैं। फिर कोटेचे चौखुण्ट कपड़े में यह पेंटी हुयी चीज रख दी जाती है और घी सईमें डाल गर्म किया जाता है। कपड़ेके बीचमें एक छेद रहता है। चारों छूट समेटधार उजे उठाते हैं जोर बोलते घीने केटी दबी गोल-गाल घेरा जन चीण घुम्रा घुमाधर जुनाते हैं। जानेपर उथ पर फिर कले छोड़ देते हैं। जायत कल्लेदार घेरा पककर साब हो जाता है जब पानी की चाशनीनें डुबोया जाता है। इसतरह अन्त में उतरती बन जाती है और खानमें बहुत अच्छी लगती है।}}
{{outdent|इमली (हिं॰ स्त्री॰) वृत्तविशेष, एक पेड़। यह वृक्ष बड़ा होता है ओर सदा हरा-भरा रहता है। इनकी लम्बाई ८० और चौड़ायी २५ फीटत होती है। सम्भवतः अफरैका और दक्षिण भारतमें इमली अपने आप उपजती है इसकी पत्ती पतली और बहुत छोटी होती है। लम्बी-लम्बी फली बारीक और कड़े गूदेमें ढकी रहती है। काला और मैला इसका गोंद किसी काममें नहीं आता। फल, फूल और पत्ती में खूब खटायी होती है। पत्तियोंके भिगोनेसे लालरङ्ग उतरता है।<br>{{gap}}इसके वीजको चीया कहते हैं। चीयायोंके पेरनेसे जो तेल निकलता है, वह नं तो सूंघनेमें किसी किस्म की गन्धही देता है और न खानेमें मीठा ही लगता है।<br>{{gap}}इसके वीजको चीया कहते हैं। चीयायोंके पेरनेसे जो तेल निकलता है, वह नं तो सूंघनेमें किसी किस्म की गन्धही देता है और न खानेमें मीठा ही लगता है।<br>{{gap}}भारतवर्ष में अनादिकालसे इमलीका ओषधार्थ व्यवहार किया जाता है। हिन्दुवोंने हो अरबीको इसका उपयोग बताया था। वैद्यमतसे इमली -दाहहर, पाचन, अग्निवर्धक तथा रेचक होती है और पित्तज व्याधिमें अधिक लाभ पहुंचाती है। इसके खानेसे धतूरे और शराबका नशा उतर जाता है।<br>{{gap}}दाल, तरकारी और चटनीमें इमली पड़ती है। नमक, मिर्च, मसाला और तेल मिलाकर इसकी खटायी भी बनाते हैं। लड़के कोमल-कोमल पत्तियों और फूलोंको बड़े चावसे खाते हैं।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इमाद्-उल-मुल्क—इयत्ता|७१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:विवाहादि उत्सवों पर बारी इमलीकी पत्तियोंसे बड़ी-बड़ी पत्तरे बना लोगोंको दिखाता है और पुरस्कार पाता है।
{{outdent|इमाद-उल्-मुल्क-दक्षिणापथमें इमादशाही राजवं धके स्थापविता। विजयभगरवाले किली सुखस्तलाकी घर इनका जन्म हुवा था। बाल्यकालनें ये बन्दी बन बरारयाये थे। कुछ दिन बाद बरारनी सेनापति और शासनचर्ता अज्ञान् ब्रान्ने इन्हें अपने शरीररचीके पद पर नियुक्त किया था। सुहादशा हमानी के राजव कालमें इन्होंने इलार्-उल-मुख्कको उपाधि चीर बरार-सेनानायकका पद पाया था। अपने परिपोषक खाजा महसूदके मरनेवर ये बरारके शासनकर्ता बने। जय सुचतान् महमूद बहमानी बरारने नवाब जुये, तब यह मन्नीके पदपर बैठे थे। किन्तु अपरापर अमात्यके वैभव देख न सकानेसे इन्होंने गन्विपद छोड़ दिया। पोछे ये स्वतन्त्र नवाब हो गये। एलिचपुर इन्होंने अपनी राजधानी बनाई थी। १५१३ ई॰ को इसकी मृत्यु हुयी। बादमें इनके ज्येष्ठपुत्त्रको सिंहासनका उत्तराधिकार मिला था।}}
{{outdent|इमाम (अ॰ पु॰) प्रधान याजक, स्तुतिपाठ करनेवाला। मुसलमानोंका शीया सम्प्रदाय, सुहम्मदके जामाता अलीको और उनके पारंपरिक वंशधरोंको इसी नामसे पुकारते आया है। सब मिलाकर १२ इमाम हुये हैं,—}}
{|Width=100%
|१||इमाम||अली
|-
|२||{{ditto}}||हसन
|-
|३||{{ditto}}||हुसेन
|-
|४||{{ditto}}||जैन-उल्-आबिदीन्
|-
|५||{{ditto}}||मुहम्मद बाक़िर
|-
|६||{{ditto}}||जाफ़र सादिक़
|-
|७||{{ditto}}||मूसा क़ाज़िम
|-
|८||{{ditto}}||मुहम्मद तक़ी
|-
|९||{{ditto}}||अली नक़ी
|-
|१०||{{ditto}}||हुसेन अस्करी
|-
|११||{{ditto}}||महदी
|-
|१२||{{ditto}}||भलो मूसा रज़ा
|}
{{Multicol-break}}
:{{gap}}किसी-किसीके मतमें जन्म लेनेपर भी इमाम सहदी छिपे हुये हैं। वेही जगत्में इसलाम धर्मका प्रचार करेंगे। कितने ही वर्ष पहिले मिश्रमें युद्ध होते समय एकात्र इनाम महदी दीख पड़े थे। वे अपनेको वारहवें इलाम बताते थे। चारो ओरसे मुसलमानोंने अफ्रीका पहुंच उन्हें साहाय्य दिया। धर्मयुद्धमें विधर्मियोंको हराना और मुसलमान् को बचाना ही उनका उद्देश्य था।<br>{{gap}} सुन्नी सम्प्रदायका मत स्वतन्त्र है। उसके कथनानुसार प्रत्येत अजनमन्दिर में रहनेवाले साक्षात् शुरु ही इमाम जड़जा सकते हैं। वह चार इमाम भाजता है, -हनोक, साजिक, शफी ओर हजवल।
{{outdent|इमा अदस्ता (हिं॰ पु॰) उलूखल-मुसल, खरज और खुश्का। यह लोहे, पत्थर या पीतलका बनता है और मसाला तथा दवा कूटजेके काम में आता है।}}
{{outdent|इमामबाड़ा (हिं॰ पु॰) १ लाज़िया रखने और गाड़नेकी जगह। यहां मुसलमान् शवपर भेंट चढ़ाते हैं। २ मुहरम त्यौहार सम्पन्न करनेका भवन। इमामबाड़ेमें लुहरमके समय अली ओर तत्पुत्र इसन तथा हुसेनके स्मरणार्थ उपासना को जाती है।}}
{{outdent|इमारत (अ॰ स्त्री॰) १ अमीरके राज्यका जिला। २ शासन, हुकूमत। ३ वैभव, रुतबा। ४ चमत्कार, रौनक। ५ विशाल भवन, आलीशान् मकान्।}}
{{outdent|इमि (हिं॰-क्रि॰-वि॰) एवम्, इसतरह, ऐसे।}}
{{outdent|इम्तेहान् (अ॰ पु॰) १ विचार, परख। २ परीक्षा, जांच, पूछताछ।}}
{{outdent|इम्ला (अ॰ पु॰) लेखनप्रणाली, हिज्जे।}}
{{outdent|इयत्तु (वै॰ त्रि॰) यज-उ वेदे निपातनात् सम्प्रसा-रणम्। यन्न करनेको इच्छा रखनेवाला। (ऋक् १०।४।१)}}
{{outdent|इयत् (वै॰ त्रि॰) इदं परिमाणमस्य, वतुप् घादेशश्च। किमिदम्यां वो घः। पा ५।२।४०। एतावत्, इसक दर, इतनासा ।}}
{{outdent|इयत्तक (सं॰ त्रि॰) इयत्ता इति कुत्सितार्थ कन् क्रस्वच। निन्दित इयत्ता, अल्प प्रमाण, बहुत छोटा।}}
{{c|'इयत्तकः कुत्सितेयप्त्तः अल्पप्रमाणः।' (सायण)}}
{{outdent|इयत्ता (सं॰ त्रि॰) इयती भावः इति तन् । एतावत्व, इतना परिमाण, मुकरर मिकदार, आन्दाज़।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२२८
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उदक-उदकशान्ति'''|'''२२७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
४ ऊर्ध्वगमनशील, ऊपरको घूमा हुपा। ५ उपरिस्थ,: उदकप्रमेह, उदकनेह देखो।
ऊपरवाला। ६ उत्तरस्थ, थिमाली। ७ अन्ता, उदकभार (सं॰ पु॰) जलका युग, पानी ले आखिरी।
जानकी कड़ी
उदक (सं॰ क्ली॰) उन्दो क्लेदने उन्द कुन्। उदकभूम (सं॰ पु॰) श्राद्र स्थली, तर जमीन्।
उदकश्च। ठण् २०३९। १ जल, पानी। नल देखो। २ करि- उदकमच्चिका (सं॰ स्त्री॰) जलके प्रसाधनार्थ एक
शृङ्खल, हाथी बांधनेको जमीर।
आधार, पानी रखने का अड्डा।
उदककार्य (सं॰ क्ली॰) १ जल हारा किया जाने- उदकमञ्जरीरस (सं॰ पु॰) निरामज्वरका एक
वाला एक धार्मिक कार्य। ३ देहशुचि, जिस्म की रस, पके हुये बुखारको एक दवा। एक एक भाग
सफ़ाई। ३ मृतके अर्थ हवन।
पारा, गन्धक, सोहागको फूली और मरिच तथा चार
उदककुम्भ (सं॰ पु॰) जलघट, पानीका घड़ा। भाग शर्कराको २४ प्रहर बार बार भावना देनेसे यह
उदकक्रिया (सं॰ स्त्री॰) शास्त्रविहित जलादि रस बनता है। फिर शर्कराके स्थानमें मनःशिला
हारा तर्पण। तर्पण देखी।
डालनेसे चन्द्रशेखररस निकलता है। (रसेन्द्रसारसंग्रह)
उदकक्रीड़न (सं॰ क्ली॰) जलविहार, पानीका खेल। उदकमण्डल, उदककुम्भ देखो।
उदककच्छ (सं॰ पु॰) व्रत विशेष। इसमें एक उदकमन्य (सं॰ पु॰) निस्त्वचीभूत शस्य विशेष,
मास पर्यन्त केवल यवका सत खाते और जल पीते हैं। एक पनाज। इसका छिलका उतरा रहता है।
उदकगाह (सं॰ पु॰) जल प्रवेश, पानीमें दखल। | उदकमेह (सं॰ क्ली॰) कफोत्य मेह विशेष, बल-
उदकगिरि (सं॰ पु॰) जलप्रवाहयुक्त पर्वत, नदी गमसे पैदा हुआ जिरियान्। इसमें अच्छ, बलुसित,
नालेसे भरा हुआ पहाड़।
शीत, निर्गन्ध, उदकोपम और किञ्चित् प्राविल पिच्छल
उदकट (सं॰ त्रि॰) १ जल प्रदान करनेवाला, जो मेह बहता है। (माधव निदान)
पानी देता हो। (पु॰) २ उत्तराधिकारी, वारिश, उदकमेहिन् (सं॰ त्रि॰) उदकमेहका रोगी, जिसके
जो पितरको पानी दे सकता हो।
बलगमका जिरियान् रहे।
उदकदाट, उदकद देखी।
उदकवज (सं॰ पु॰) गर्जित वृष्टि, कड़कड़ाहटको
उदकदान ( सं॰ क्ली॰) उदकक्रिया देखो।
बारिश।
उदकदानिक (सं॰ त्रि॰) तर्पण सम्बन्धीय। उदकल, उदकवत् देखो।
उदकधर (सं॰ पु॰) जलधर, बादल ।
उदकवत् (सं॰ त्रि॰) जलसंयुता, पानोसे भरा हुआ।
उदकना ( हिं॰ क्रि॰) ऊपर उठ आना, निकल उदकविन्दु (सं॰ पु॰) जलका लव, पानीका बूंद।
जाना।
उदकवह स्रोत (सं॰ क्ली॰) जलबह नाड़ो, पानी
उदकपरीक्षा (सं॰ स्त्री॰) विवाहादिके समयपर चलनेको नस। ये दो होते हैं। मूल तालु और अपर
लौकिक प्रमाण न मिलते जलमञ्जनादि द्वारा शपथका लोममें हैं। (सुश्रुत शारीरस्थान)
कराना।
उदकवहाः (सं॰ स्त्री॰), उदकवहस्रोत देखो।
उदकपर्वत, उदकगिरि देखो।
उदकवीवध, उदकभार देखो।
उदकपूर्वक (सं॰ अव्य॰) सङ्कल्पपूर्वक, दान वा उदकशाक (सं॰ क्ली॰) जलशाक, पानीमें पैदा
वचन लेनेके लिये हाथपर पानीको डालकर। होनेवाली सब्जी।
उदकप्रक्षेपण (सं॰ क्ली॰) जलके शोतीकरणका उदकशान्ति (सं॰ स्त्री॰) जलहारा ज्वरका निवारण,
उपाय, पानी ठण्डा करनेको तदबीर।
पानीसे बुखार छुड़ानेका काम। इसमें विनियोजित
उदकमतीकाश (सं॰ त्रि॰) जलप्रभ, पानी-जैसा। जल रोगीपर छिड़कते हैं।
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<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदक-उदकशान्ति'''|'''२२७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:४ ऊर्ध्वगमनशील, ऊपरको घूमा हुआ। ५ उपरिस्थ, ऊपरवाला। ६ उत्तरस्थ, शिमाली। ७ अन्त्य, आखिरी।
{{Outdent|उदक (सं॰ क्ली॰) उन्दो क्लेदने उन्द क्कुन्।<small> उदकञ्च। उण् २।३९।</small> १ जल, पानी। <small>जल देखो।</small> २ करि-शृङ्खल, हाथी बांधनेकी जञ्जीर।}}
{{Outdent|उदककार्य (सं॰ क्ली॰) १ जल द्वारा किया जाने-वाला एक धार्मिक कार्य। ३ देहशुद्धि, जिस्म की सफ़ाई। ३ मृतके अर्थ हवन।}}
{{Outdent|उदककुम्भ (सं॰ पु॰) जलघट, पानीका घड़ा।}}
{{Outdent|उदकक्रिया (सं॰ स्त्री॰) शास्त्रविहित जलादि द्वारा तर्पण। </small>तर्पण देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकक्रीड़न (सं॰ क्ली॰) जलविहार, पानीका खेल।}}
{{Outdent|उदककृच्छ (सं॰ पु॰) व्रत विशेष। इसमें एक मास पर्यन्त केवल यवका सक्त, खाते और जल पीते हैं।}}
{{Outdent|उदकगाह (सं॰ पु॰) जल प्रवेश, पानीमें दख़ल।}}
{{Outdent|उदकगिरि (सं॰ पु॰) जलप्रवाहयुक्त पर्वत, नदी नालेसे भरा हुआ पहाड़।}}
{{Outdent|उदकद (सं॰ त्रि॰) १ जल प्रदान करनेवाला, जो पानी देता हो। (पु॰) २ उत्तराधिकारी, वारिश, जो पितरको पानी दे सकता हो।}}
{{Outdent|उदकदातृ, उदकद देखी।
{{Outdent|उदकदान ( सं॰ क्ली॰) <small>उदकक्रिया देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकदानिक (सं॰ त्रि॰) तर्पण सम्बन्धीय।}}
{{Outdent|उदकधर (सं॰ पु॰) जलधर, बादल।}}
{{Outdent|उदकना (हिं॰ क्रि॰) ऊपर उठ आना, निकल
जाना।}}
{{Outdent|उदकपरीक्षा (सं॰ स्त्री॰) विवाहादिके समयपर लौकिक प्रमाण न मिलते जलमञ्जनादि द्वारा शपथका कराना।}}
{{Outdent|उदकपर्वत, <small>उदकगिरि देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकपूर्वक (सं॰ अव्य॰) सङ्कल्पपूर्वक, दान वा वचन लेनेके लिये हाथपर पानीको डालकर।}}
{{Outdent|उदकप्रक्षेपण (सं॰ क्ली॰) जलके शीतीकरणका उपाय, पानी ठण्डा करनेकी तदबीर।}}
{{Outdent|उदकप्रतीकाश (सं॰ त्रि॰) जलप्रभ, पानी-जैसा।}}
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{{Outdent|उदकप्रमेह,<small> उदकमेह देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकभार (सं॰ पु॰) जलका युग, पानी ले जानकी कड़ी}}
{{Outdent|उदकभूम (सं॰ पु॰) आर्द्र स्थली, तर ज़मीन्।}}
{{Outdent|उदकमच्चिका (सं॰ स्त्री॰) जलके प्रसाधनार्थ एक आधार, पानी रखने का अड्डा।}}
{{Outdent|उदकमञ्जरीरस (सं॰ पु॰) निरामज्वरका एक रस, पके हुये बुखारकी एक दवा। एक एक भाग पारा, गन्धक, सोहागेको फूली और मरिच तथा चार भाग शर्कराको २४ प्रहर बार बार भावना देनेसे यह रस बनता है। फिर शर्कराके स्थानमें मनःशिला डालनेसे चन्द्रशेखररस निकलता है। </small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</small>}}
{{Outdent|उदकमण्डल,<small>उदककुम्भ देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकमन्य (सं॰ पु॰) निस्त्वचीभूत शस्य विशेष, एक अनाज। इसका छिलका उतरा रहता है।}}
{{Outdent|उदकमेह (सं॰ क्ली॰) कफोत्य मेह विशेष, बल-गमसे पैदा हुआ जिरियान्। इसमें अच्छ, बलुसित, शीत, निर्गन्ध, उदकोपम और किञ्चित् आविल पिच्छल मेह बहता है। <small>(माधव निदान)</small>}}
{{Outdent|उदकमेहिन् (सं॰ त्रि॰) उदकमेहका रोगी, जिसके बलगमका जिरियान् रहे।}}
{{Outdent|उदकवज्र (सं॰ पु॰) गर्जित वृष्टि, कड़कड़ाहटकी बारिश।}}
{{Outdent|उदकल, <small>उदकवत् देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकवत् (सं॰ त्रि॰) जलसंयुक्त, पानीसे भरा हुआ।}}
{{Outdent|उदकविन्दु (सं॰ पु॰) जलका लव, पानीका बूंद।}}
{{Outdent|उदकवह स्रोत (सं॰ क्ली॰) जलबह नाड़ी, पानी चलनेकी नस। ये दो होते हैं। मूल तालु और अपर क्लोममें हैं।<small> (सुश्रुत शारीरस्थान)</small>}}
{{Outdent|उदकवहाः (सं॰ स्त्री॰), <small>उदकवहस्रोत देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकवीवध, <small>उदकभार देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकशाक (सं॰ क्ली॰) जलशाक, पानीमें पैदा होनेवाली सब्जी़।}}
{{Outdent|उदकशान्ति (सं॰ स्त्री॰) जलहारा ज्वरका निवारण, पानीसे बुखा़र छुड़ानेका काम। इसमें विनियोजित जल रोगीपर छिड़कते हैं।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२२९
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२२८'''|'''उदकषट्पलत-उदग्दश'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उदकषट्पलघृत (सं॰ क्ली॰) अर्थोरोगका घृत- उदक्त (सं॰ त्रि॰) उद-अन्ज-ता। १ कूपसे उत्तो.
विशेष, बवासीरको बीमारीका एक घो। यवक्षार, लित, कुवेंसे निकाला हुआ। २ उस्थित, उठा या चढ़ा
पिप्पलीमूल, चव्य एवं चित्रक एक एक पल ले कल्क | हुआ। ३ प्रेरित, पहुंचाया हुश्रा। ४ कथित,
बनाये और 8 शरावक तिलका तेल तथा १२ शरावक कहा हुआ।
दग्ध डाल ४ सेर घत पकाये। इस घतसे ज्वर,अश, लोहा उदक तात (वै॰ अव्य॰) उत्तरको ओर,शिमालकी तफ।
और कासका रोग नष्ट होता है। (चक्रपाणिदत्तक्कत संग्रह) उदक्पथ (सं॰ पु॰) उत्तरीय देश, शिमाली मुल्क ।
उदकसक्त (सं॰ पु॰) भाद्रोक्त पिष्टशालि, पानौसे उदक प्रवण (सं॰ त्रि॰) १ क्रमशः दक्षिणसे उत्तरको
तर किया हुआ सत्तू।।
निम्न, सिलसिलेवार जनबसे धिमालको ढला हुआ।
उदक स्पर्श (सं॰ त्रि॰) १ जलसे शरीरके विभिन्न (कात्यायनश्रौतसूत्र २१॥३।१६) २ उत्तरमार्गगामी, शिमाली-
भङ्गस्पर्श करनेवाला। २ प्रतिज्ञाको मूर्ति के लिये राहसे जानेवाला।
जलको छनेवाला।
"उदकप्रवणो यचो यवैवमुटु ब्रह्मा भवति ।" (छान्दोग्य उप॰ ४११६)
उदक हार (सं॰ पु॰) जलवाहक, पानी ले जानेवाला। ‘उदक्प्रवय: उत्तरमार्ग प्रति हेतुरित्यर्थः।’ (माष्य)
उदकान्त (सं॰ क्ली॰) जलका तट, पानी या दरयाका उदय (सं॰ त्रि॰) उदकमहति, उदक-य। दण्डादिभ्यो
किनारा।
यः। पा ५१६६ । १ जलमें होनेवाला। २ जलम्राना,
उदकार्थिन् ( सं॰ त्रि॰) ढषित, प्यासा, पानी मांगने- पानी में धोया जानेवाला। (पु॰) ३ जलयोग्य व्रीहि
वाला।
प्रभृति, पानीमें उपजनेवाला अनाज वगैरह।
उदकाहार (सं॰ पु॰) जलका आकर्षण, पानी उदक्या (सं॰ स्त्री॰) उदक संज्ञाया यत्-टाप।
खींचनेका काम।
दिगादिभ्यो यत्। पा ४।३।५४। रजखला, जो औरत कपडोसे
उदकिका (स स्त्री०) बलानाम क्षुप, बरियारी, हो। “नोदक्ययाविभाषे त् यज्ञ गच्छेन्नचाहतः।” (मनु)
गुलशकरी।
उदगद्रि (सं॰ पु॰) १ उत्तरीय पर्वत, शिमाली पहाड़।
उदकिल, उदकवत् देखो।
२ हिमालय।
उदकी ( सं॰ स्त्री॰) पाठा, पारी, हरज्योरी। उदगयन (सं॰ क्लु॰) उत्तरायण, सूर्य के दक्षिणसे
उदकोण (सं॰ पु॰) महाकरज, बड़ा करोंदा। यह उत्तरको ओर झुकनेका समय।
पानी में होता है।
उदगरना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्गारण होना. भीतरसे
उदकीय, उदकौर्ण देखो।
बाहर निकलना। २ प्रकाश पाना, खुल जाना।
उदकीर्या (सं॰ स्त्री॰) पूतीकरञ्ज, करञ्ज। ३ उत्तेजित होना, तेज़ पड़ना।
उदकुम्भ, उदककुम्भ देखो।
उदगगल (सं॰ पु॰) पृथिवीके स्थानविशेषमें जलका
उदकेचर (सं॰ त्रि॰) जलचर, पानी में रहने या
अनुसन्धान, पानीका पता। यह एक ज्योतिषसम्बन्धीय
चलने-फिरनेवाला।
विद्या है। इससे समझ सकते हैं-किस स्थानपर
उदकेविशीण (सं॰ त्रि॰) जलमें शुष्कीभूत, पानीमें कितना गहरा खोदनेसे पानी निकलेगा।
सूखा हुआ। यह शब्द उपमाको भांति असम्भव उदगारना (हिं॰ क्रि॰) उद्गार करना, निकाल
विषयके लिये पाता है।
डालना।
उदकोदञ्जन, उदककुम्भ देखो।
उदग्ग (हिं॰) उदय देखो।
उदकोदर (सं॰ पु॰) जलोदरनाम रोग। उदर देखो। उदग्दश (सं॰ क्ली॰) उदक उत्तरा दशा यस्य।
उदकादन ( सं॰ पु॰) जल के साथ पक्वशालि, पानी में १ उत्तराग्रवस्त्र, कपड़का जो किनारा शिमालको तर्फ
उबाला हुमा चावल।
झुका रहे।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२२८'''|'''उदकषट्पलत-उदग्दश'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उदकषट्पलघृत (सं॰ क्ली॰) अर्शोरोगका घृत-विशेष, बवासीरकी बीमारीका एक घी। यवक्षार, पिप्पलीमूल, चव्य एवं चित्रक एक एक पल ले कल्क बनाये और ४ शरावक तिलका तेल तथा १२ शरावक दग्ध डाल ४ सेर घृत पकाये। इस घृतसे ज्वर,अर्श, प्लीहा और कासका रोग नष्ट होता है। <small>(चक्रपाणिदत्तक्कत संग्रह)</small>}}
{{Outdent|उदकसक्तु (सं॰ पु॰) आद्रीकृत पिष्टशालि, पानीसे तर किया हुआ सत्तू।}}
{{Outdent|उदकस्पर्श (सं॰ त्रि॰) १ जलसे शरीरके विभिन्न अङ्गस्पर्श करनेवाला। २ प्रतिज्ञाकी मूर्ति के लिये जलको छनेवाला।}}
{{Outdent|उदक हार (सं॰ पु॰) जलवाहक, पानी ले जानेवाला।}}
{{Outdent|उदकान्त (सं॰ क्ली॰) जलका तट, पानी या दरयाका
किनारा।}}
{{Outdent|उदकार्थिन् ( सं॰ त्रि॰) तृषित, प्यासा, पानी मांगने-वाला।}}
{{Outdent|उदकाहार (सं॰ पु॰) जलका आकर्षण, पानी खींचनेका काम।}}
{{Outdent|उदकिका (सं॰ स्त्री॰) बलानाम क्षुप, बरियारी, गुलशकरी।}}
{{Outdent|उदकिल, <small>उदकवत् देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकी ( सं॰ स्त्री॰) पाठा, पारी, हरज्योरी।}}
{{Outdent|उदकीर्ण (सं॰ पु॰) महाकरञ्ज, बड़ा करोंदा। यह पानी में होता है।}}
{{Outdent|उदकीय, <small>उदकीर्ण देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकीर्या (सं॰ स्त्री॰) पूतीकरञ्ज, करञ्ज।}}
{{Outdent|उदकुम्भ,<small> उदककुम्भ देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकेचर (सं॰ त्रि॰) जलचर, पानी में रहने या चलने-फिरनेवाला।}}
{{Outdent|उदकेविशीण (सं॰ त्रि॰) जलमें शुष्कीभूत, पानीमें सूखा हुआ। यह शब्द उपमाकी भांति असम्भव विषयके लिये आता है।}}
{{Outdent|उदकोदञ्जन, <small>उदककुम्भ देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकोदर (सं॰ पु॰) जलोदरनाम रोग। <small>उदर देखो।</small>}}
{{Outdent|उदकौदन (सं॰ पु॰) जल के साथ पक्वशालि, पानी में उबाला हुमा चावल।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उदक्त (सं॰ त्रि॰) उद-अन्ज-क्त। १ कूपसे उत्तोलित, कुवेंसे निकाला हुआ। २ उस्थित, उठा या चढ़ा हुआ। ३ प्रेरित, पहुंचाया हुआ। ४ कथित, कहा हुआ।}}
{{Outdent|उदक्तात् (वै॰ अव्य॰) उत्तरकी ओर,शिमालकी तर्फ़।}}
{{Outdent|उदक्पथ (सं॰ पु॰) उत्तरीय देश, शिमाली मुल्क।}}
{{Outdent|उदक्प्रवण (सं॰ त्रि॰) १ क्रमशः दक्षिणसे उत्तरको निम्न, सिलसिलेवार जनूबसे शिमालको ढला हुआ। <small>(कात्यायनश्रौतसूत्र २१।३।१६)</small> २ उत्तरमार्गगामी, शिमाली-राहसे जानेवाला।}}
{{x-smaller|{{c|<poem>“उदकप्रवणो यज्ञो यत्रैवमृदृ ब्रह्मा भवति।” (छान्दोग्य उप॰ ४।१७।९)
‘उदक्प्रवण: उत्तरमार्ग प्रति हेतुरित्यर्थः।‘ (माष्य)</poem>}}}}
{{Outdent|उदक्य (सं॰ त्रि॰) उदकमर्हति, उदक-य। </small>दण्डादिभ्यो यः। पा ५।१।६६।</small> १ जलमें होनेवाला। २ जलस्त्रानार्ह, पानी में धोया जानेवाला। (पु॰) ३ जलयोग्य व्रीहि प्रभृति, पानीमें उपजनेवाला अनाज वगै़रह।}}
{{Outdent|उदक्या (सं॰ स्त्री॰) उदक संज्ञाया यत्-टाप्।<small>दिगादिभ्यो यत्। पा ४।३।५४। </small> रजस्वला, जो औरत कपड़ोंसे हो। <small>“नोदक्ययाविभाषे त् यज्ञ गच्छेन्नचावृतः।” (मनु)</small>}}
{{Outdent|उदगद्रि (सं॰ पु॰) १ उत्तरीय पर्वत, शिमाली पहाड़। २ हिमालय।}}
{{Outdent|उदगयन (सं॰ क्ली॰) उत्तरायण, सूर्य के दक्षिणसे उत्तरकी ओर झुकनेका समय।}}
{{Outdent|उदगरना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्गारण होना भीतरसे बाहर निकलना। २ प्रकाश पाना, खुल जाना। ३ उत्तेजित होना, तेज़ पड़ना।}}
{{Outdent|उदगर्गल (सं॰ पु॰) पृथिवीके स्थानविशेषमें जलका अनुसन्धान, पानीका पता। यह एक ज्योतिषसम्बन्धीय विद्या है। इससे समझ सकते हैं――किस स्थानपर कितना गहरा खोदनेसे पानी निकलेगा।}}
{{Outdent|उदगारना (हिं॰ क्रि॰) उद्गार करना, निकाल डालना।}}
{{Outdent|उदग्ग (हिं॰) <small>उदय देखो।</small>}}
{{Outdent|उदग्दश (सं॰ क्ली॰) उदक उत्तरा दशा यस्य। १ उत्तराग्रवस्त्र, कपड़का जो किनारा शिमालकी तर्फ झुका रहे।}}
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उदगभूम-उदधिकुमार'''|'''२२९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उदग्भूम (सं॰ पु॰) उदक्. उनता प्रशस्ता वा धूमा हुआ। २ उपरिस्थ, ऊपरवाला। ३ उत्तरको
भूमियत, उदक भूमि-पच। “कयोदकपाणु सख्या पूर्वाया ओर घुमा हुआ, शिमालो। ४ पश्चात्, पिछला।
भूमरजिष्यते।” (पा ५।४।७५ स्वे सिद्धान्तकौमुदौ) उतकृष्ट भूमि, उदञ्चन ( सं॰ क्ली॰) उत्-पञ्च भावे ल्युट ।
बदिया जमीन्। १. अवक्षेपण, जपरको फेंकफांक । २ उदगमन,
उदग्र (सं॰ त्रि॰): उत-अग्र। १ उच्च, ऊंचा। चढ़ाई, उठान। ३ आच्छादन, ढक्कन। ४ घटीयन्त्र,
२ वृद्ध, बुट्टा। ३ उद्दत, अक्खड़। ४. दोर्ष, बड़ा। डोल। (त्रि॰) कर्तरि ल्युट्। ५ उत्क्षेपक, ऊपर
५ विशाल, पालीशान्। ६ महत्, अजीम। फेंकनेवाला।
उदग्रदत, (सं॰ पु॰) उद-अग्र-दट। अग्रान्तनशमहष उदञ्चित (सं॰ त्रि॰) उत्-अश्व-क्त। १ उत्क्षिप्त,
वराहभ्य थ। पा ५।४।१४५। १ उच्चदन्तहस्ती, बड़े दांतोंका फेंका या ऊपर उठाया हुआ। २ पूजित, पूजा हुआ।
हाथी। (त्रि॰) २ उच्चदन्तयुक्त, ऊंचे दांतोंवाला। ३जवंगत, चढ़ा हुआ।
उदग्राभ (वै॰ पु॰) उदक ग्राही मेघ, पानी रखनेवाला उदञ्जलि (सं॰ त्रि॰) हथेलियों को गहराकर हाथ
बादल। “मदायोदयाभस्य नमयन्वधः।” (टक् (६७।१५) उठानेवाला।
‘उदकग्राभमुदकग्राहिणं मेघम्।’ (सायण)
उदण्ड (हिं॰) उद्दस देखो।
(त्रि॰) २ जलग्राही, पानी रखनेवाला। उदण्डपाल (सं॰ पु॰) १ मत्स्यविशेष, एक मछली।
उदघटना (हिं॰ क्रि॰) निकलना, खुलना। यह अण्डे से निकलते ही भागती है। २ सर्पविशेष,
उदघाटना (हिं॰ क्रि०) उदघाटन करना, खोल किसी किस्म का सांप।
देना।
उदण्डपुर (सं॰ क्ली॰), १ मगध। २ विहारनगर।
उदय (सं॰ पु॰) उत्पन्च-धज। १चर्ममय घतादि यह नाम प्राचीन शिलालिपिमें मिला है।
पात्र, कुप्पा, घो तेल वगैरह रखनेको चमड़े का बर- उदय (हिं॰ पु॰) सूर्य, आफ़ताब।
तन। २ सन्दश, चिमटा या सन्सी। "हदयोदइस स्थान | उददान (सं॰ त्रि॰) जलसंयुक्त, पानीसे भरा हुआ।
कृतान्तानामसन्निभम्।” (भडि) ३ एकजन ऋषि। (शतपथब्राह्माण उदद्या (सं०स्त्री०) उत-मद बाहुलकात यत।
१४९२)
तेलपायिका, तिलचट्टा।
उदन ख ( सं॰ त्रि॰) उदक् उत्तरस्यां मुखमस्य। उदधि (सं॰ पु॰) उदकानि धोयन्तेऽस्मिन्, उद-धा-
उत्तरमुख, जो मुंहको शिमालकी तरफ झुकाये हो। कि। पेष वासवाहनधिषु च। पाहा।५८। १ समुद्र, बहर।
उदनत्तिक, उदभूम देखो।
२ तट, किनारा। ३ मेघ, बादल। ४ सूर्य, प्राफताब ।
उदचमस (वै॰ पु॰) उदकस्थापनयोग्य चमसाकार “स सूर्यग दिद्युतदधिनिधिः ।' (वाजसनेयसहिता ३८२२) ५ घट,
एक पात्र।
घड़ा। ६ जलाशय, तालाब। ७हद, झोल।
उदचव्वा-एक देवी। बम्बई प्रान्तीय धारवाड़ जिलेके (वै० त्रि०) ८ जलसंयुक्त, पानी से भरा हुआ।
अदरची ताल्लु कमें होरहण्डो ग्रामसे खोट्टीग नृप.
तिको जो शिलालिपि निकली, उसके पृष्ठपर इन उदधिकुमार (सं० पु०) जैन-शास्त्रानुसार देवोंके जो
देवीको मूर्ति बनी है।
व्यंतर, ज्योतिषी, भवनवासी और वैमानिक ये चार
उदज (सं० पु०) उत्-अज पशुविषयके धात्वर्थे अप्। भेद बतलाये हैं, उनमेंसे भवनवासियों का एक भेद।
समुदीरजः परषु । पा २०६९। १ पशुप्रेरण, मवेशियोंकी। उदधिकुमार देव अधोलोकको रत्नप्रभा नामक पृथ्वीके
हंकाई। (त्रि.) २ जलजात, पानीसे पैदा।. खर भागमें रहते हैं। वहाँ इनके भवनोंको संख्या
पटन-Hydrogenादीनन देखो। ....... छहत्तर लाख है। उत्कष्ट पायंकाल डेढ पल्य है।
उदच (सं.वि.). १-ऊपरि गमनकारी, ऊपरको । पल्प देखी। स्वाभाविक शरीरको लंबाई दश धनुष है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदगभूम-उदधिकुमार'''|'''२२९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उदग्भूम (सं॰ पु॰) उदक् उन्नता प्रशस्ता वा भूमिर्यत्र, उदक भूमि-अच्। <small>“कृणोदकपाण्डुसं सख्या पूर्वाया भूमेरजिष्यते।” (पा ५।४।७५ सूत्रे सिद्धान्तकौमुदौ)</small> उतकृष्ट भूमि, बदिया ज़मीन्।}}
{{Outdent|उदग्र (सं॰ त्रि॰) उत-अग्र। १ उच्च, ऊंचा। २ वृद्ध, बुड्ढा ३ उद्धत, अक्खड़। ४. दोर्घ, बड़ा। ५ विशाल, आलीशान्। ६ महत्, अजी़म।}}
{{Outdent|उदग्रदत, (सं॰ पु॰) उद-अग्र-दतृ। <small> अग्रान्तशुद्धशुभ्रवृष वराहेभ्य। पा ५।४।१४५।</small> १ उच्चदन्तहस्ती, बड़े दांतोंका हाथी। (त्रि॰) २ उच्चदन्तयुक्त, ऊंचे दांतोंवाला।}}
{{Outdent|उदग्राभ (वै॰ पु॰) उदक ग्राही मेघ, पानी रखनेवाला बादल। <small>“मदायोदग्राभस्य नमयन्वधस्त्रैः।” (ऋक् (९।९७।१५)</small>}}
{{c|<small>उदकग्राभमुदकग्राहिणं मेघम्।’ (सायण)</small>}}
(त्रि॰) २ जलग्राही, पानी रखनेवाला।
{{Outdent|उदघटना (हिं॰ क्रि॰) निकलना, खुलना।}}
{{Outdent|उदघाटना (हिं॰ क्रि॰) उद्घाटन करना, खोल देना।}}
{{Outdent|उदङ्क (सं॰ पु॰) उत्-अन्ज-घञ्। १ चर्ममय घृतादि
पात्र, कुप्पा, घी तेल वगैरह रखनेको चमड़े का बरतन। २ सन्दंश, चिमटा या सन्सी। <small>“हदयोदइस स्थान कृतान्तानामसन्निभम्।” (भट्ठि)</small> ३ एकजन ऋषि। <small>(शतपथब्राह्माण १४।६।१०।२)</small>}}
{{Outdent|उदङ्मुख (सं॰ त्रि॰) उदक् उत्तरस्यां मुखमस्य। उत्तरमुख, जो मुंहको शिमालकी तरफ़ झुकाये हो।}}
{{Outdent|उदङ्भृत्तिक, <small>उदभूम देखो।</small>}}
{{Outdent|उदचमस (वै॰ पु॰) उदकस्थापनयोग्य चमसाकार एक पात्र।}}
{{Outdent|उदचव्वा-एक देवी। बम्बई प्रान्तीय धारवाड़ जिलेके अदरङ्गुची ताल्लु कमें हीरेहण्डी ग्रामसे खोट्टीग नृपतिको जो शिलालिपि निकली, उसके पृष्ठपर इन देवीको मूर्ति बनी है।}}
{{Outdent|उदज (सं॰ पु॰) उत्-अज पशुविषयके धात्वर्थे अप्। <small>समुदीरजः पशषु। पा ३।३।३९। </small> १ पशुप्रेरण, मवेशियोंकी। हंकाई। (त्रि॰) २ जलजात, पानीसे पैदा।}}
{{Outdent|उदजन-Hydrogen<small>हाइड्रोजन देखो।</small>}}
{{Outdent|उदच (सं॰ त्रि॰) १ ऊपरि गमनकारी, ऊपरको}}
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:घूमा हुआ। २ उपरिस्थ, ऊपरवाला। ३ उत्तरकी ओर घुमा हुआ, शिमाली। ४ पश्चात्, पिछला।
{{Outdent|उदञ्चन (सं॰ क्ली॰) उत्-अञ्च भावे ल्युट्। १ उर्ध्वक्षेपण, ऊपरको फेंकफांक। २ उद्गमन, चढ़ाई, उठान। ३ आच्छादन, ढक्कन। ४ घटीयन्त्र, डोल। (त्रि॰) कर्तरि ल्युट्। ५ उत्क्षेपक, ऊपर फेंकनेवाला।}}
{{Outdent|उदञ्चित (सं॰ त्रि॰) उत्-अञ्च-क्त। १ उत्क्षिप्त, फेंका या ऊपर उठाया हुआ। २ पूजित, पूजा हुआ। ३ ऊर्ध्वगत, चढ़ा हुआ। }}
{{Outdent|उदञ्जलि (सं॰ त्रि॰) हथेलियों को गहराकर हाथ उठानेवाला।}}
{{Outdent|उदण्ड (हिं॰) <small>उद्दण देखो।</small>}}
{{Outdent|उदण्डपाल (सं॰ पु॰) १ मत्स्यविशेष, एक मछली। यह अण्डे से निकलते ही भागती है। २ सर्पविशेष, किसी किस्म का सांप।}}
{{Outdent|उदण्डपुर (सं॰ क्ली॰) १ मगध। २ विहारनगर। यह नाम प्राचीन शिलालिपिमें मिला है। }}
{{Outdent|उदथ (हिं॰ पु॰) सूर्य, आफ़ताब।}}
{{Outdent|उददान (सं॰ त्रि॰) जलसंयुक्त, पानीसे भरा हुआ।}}
{{Outdent|उदद्या (सं॰ स्त्री॰) उत्-अद बाहुलकात् यत्। तेलपायिका, तिलचट्टा।}}
{{Outdent|उदधि (सं॰ पु॰) उदकानि धोयन्तेऽस्मिन्, उद-धा-कि।<small> पेष वासवाहनधिषु च। पा ६।३।५८।</small> १ समुद्र, बहर। २ तट, किनारा। ३ मेघ, बादल। ४ सूर्य, आफ़ताब। <small>“सं सूर्येण दिद्युतदधिनिधिः।” (वाजसनेयसंहिता ३८।२२)</small> ५ घट, घड़ा। ६ जलाशय, तालाब। ७ हद, झील। (वै॰ त्रि॰) ८ जलसंयुक्त, पानी से भरा हुआ।}}
{{Outdent|उदधिकफ (सं॰ पु॰) समुद्रफेन, बहरका बलगम।}}
{{Outdent|उदधिकुमार (सं॰ पु॰) जैन-शास्त्रानुसार देवोंके जो व्यंतर, ज्योतिषी, भवनवासी और वैमानिक ये चार भेद बतलाये हैं, उनमेंसे भवनवासियों का एक भेद। उदधिकुमार देव अधोलोककी रत्नप्रभा नामक पृथ्वीके खर भागमें रहते हैं। वहाँ इनके भवनोंको संख्या छहत्तर लाख है। उत्कष्ट आयुकाल डेढ पल्य है। <small>पल्प देखो।</small> स्वाभाविक शरीरको लंबाई दश धनुष है।}}
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२३०'''|'''उदधिक्रम-उदवसना'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
इनके मानसिक भाव कुमारीकैसे होते हैं इसखिये।
कुमार नाम पड़ा है।
उदधिक्रम, उदक्षिका देखो।
उदधिक्रा (वै॰ पु॰) उदधि-क्रम-विट्। समुद्राक्रमण
कर्मा, बहर पर सफर करनेवाला।
उदन्यु (वै॰ त्रि॰) उदन्य-उए। मलेच्छु, पिपासु,
उदधिमेखला (सं॰ स्त्री॰) चारो दिक सागरसे पानी ढं ढनेवाला । “परि नबन्ये ऽबता उदन्छवः ।" (स्मृक् सहा२७)
वेष्टित पृथिवी, बहरसे घिरी हुई जमीन्।
'उदन्युव: उदकेच्छावन्तः।' (सावय)
उदधिराज (सं॰ पु॰) नदीका राना समुद्र। उदन्वत, दन्वान् देखो। .
उदधिलवण (सं॰ क्ली॰) सामुद्र लवब, बहरी नमक। उदन्वान् (वै॰ पु॰) उदकानि सन्त्यन, उदक-मतुप,
उदधिवस्त्रा, उदधिमेखला देखो।
मस्य वः। उदन्वानुदधौ च । पापा।१५। १ समुद्र, बहर।
उदधिचि (सं॰ स्त्री॰) मुक्वास्फोट, बहरी सोप। "ते च प्रापुरुदन्वन्तं बुबुधे चादिपूरुषः ।" (रघु) २ ऋषिविशेष।
उदधिसम्भव, उदधिलवव देखो।
(त्रि॰) ३ उदकयुक्त, पानी रखनेवाला । (ऋक् ५८६७)
उदधिसुत (सं॰ पु॰) उदधिके पुत्र। चन्द्र, अमृत, | उदप (सं॰ त्रि॰) पानीको पार करनेवासा ।
शङ्क और कमल उदधिके पुत्र हैं।
उदपर्णी (सं॰ पु॰) कुधान्यविशेष, एक खराव पनाम।
उदधिमुता (सं॰ स्त्री॰) समुद्रको कन्या। नमो उदपात्र (सं॰ क्ली॰) जलपूर्ण पात्र, लोटा।
और हारकाको उदधिसुता कहते हैं। .
“भिषामपुादपान वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम्।” ( मनु रास)
उदधीय (सं॰ त्रि॰) सामुद्र, समुद्रजात, बारी। उदपान (सं॰ पु॰ क्ली॰ ) उदकं पोयतेऽवति, उदक- .
उदन् (सं॰ क्ली॰) पन्नोमास अनिशसन्यबन्दोषन्धकछत्रु दन्ना- पा अधिकरण लुपट्। १ कूप, कूवां।
सञ्चस प्रभतिषु । पाहा इति सूत्रे उदकस्य उदनादेशः।
“यावान उदपाने सर्वतः समुतोदके ।
उदक, पानी।
तावान् सर्वेषु बेदेषु आमवस्य विजानतः ॥” (गौता ९४५)
उदनिमत (वै॰ त्रि॰) तरङ्गमय, जिसमें लहरें उठे। २ कमण्डलु।
उदन्त (सं॰ पु॰) १ वार्ता, बात। २ समाचार, दयानमडूक (सं॰ पु॰) कूपका मह क, कर्वेका
ख़बर। ३ साधु, पाकसाफ, भादमी। ४ वृत्तियाजन, यह शब्द उस व्यक्तिके लिये पाता है, जो
रोजगारसे काम चलानेवाला। (त्रि॰) ५ किसी अनुभवशून्य होता और नकव्य भिन्न अन्य विषय नहीं
वस्तुके पन्त सक पहुंचनेवाला। (हिं॰ त्रि॰)। दन्त समझता।
हीन, वेदांत, जिसके दांत न निकले। यह शब्द पश्के उदप (वै॰
छटप (वै॰ त्रि॰) जलसे अपनी राह करनेवाला
लिये पाता है।
जो पानोसे पाकसाफ बना हो।
उदन्तक (सं॰) उदन्त खार्थे कन्। संवाद, उदपेष (सं॰ क्ली॰) १ जलपेष, खमीर, लेही, गारा।
खबर।
। (प॰) २. जलमें पीस कर, पानीसे रगडके।
उदन्तिका (सं॰ स्त्री॰) उदन्त-पिच्-खुल्-टाप् । उदप्नुत, (वै॰ त्रि॰) जलमें सन्तरण करनेवाला,
वृप्ति, मासूदकी, साइट।
जो पानी में तैरता हो।
उदन्य (सं॰ त्रि॰) सौमाके परे रहनेवासा, जो उदपत, उदा त देखो।
हदके उस तर्फ रहता हो।
उदबस (हिं॰ वत्रि॰) १शून्य, सूना। २ स्थानान्तरित,
उदन्य (वै॰ त्रि॰) जलमय, पानीसे भरा हुआ। किसी जगहसे हटाया हुआ, जो मारामारा फिरता हो।
सदन्यज (वै॰ त्रि॰) जलमें उपजने या रहनेवाला। उदवसना (हिं॰ क्रि॰) १ स्थानान्तरित करना, किसी
उदन्या (सं॰ स्त्री॰) उदन्यति उदकमिच्छति, जगहसे निकाल देना। २ शून्यकरना, सूना बनाना।
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:अज्ञानायोदन्यधनायावुभुवापिपाडागधेंषु। पा ७।४।३४ इति क्वच् प्रत्यये पर आत्वं निपात्यते। १ पिपासा, प्यास। वेदे बाहुल्यकात् क्यच्। २ जलानयन. पानीका लाना। ३ जलसम्बन्धिनी, पानीसे सरोकार रखनेवाली।
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२३०'''|'''उदधिक्रम-उदवसना'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:इनके मानसिक भाव कुमारीकेंसे होते हैं इसखिये। कुमार नाम पड़ा है।
{{Outdent|उदधिक्रम, <small>उदधिक्रा देखो।</small>}}
{{Outdent|उदधिक्रा (वै॰ पु॰) उदधि-क्रम-विट्। समुद्राक्रमण-कर्ता, बहर पर सफर करनेवाला।}}
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{{Outdent|उदधिराज (सं॰ पु॰) नदीका राना समुद्र।}}
{{Outdent|उदधिलवण (सं॰ क्ली॰) सामुद्र लवण, बहरी नमक।}}
{{Outdent|उदधिवस्त्रा, <small>उदधिमेखला देखो।</small>}}
{{Outdent|उदधिचि (सं॰ स्त्री॰) मुक्वास्फोट, बहरी सोप।
{{Outdent|उदधिसम्भव, <small>उदधिलवण देखो।</small>}}
{{Outdent|उदधिसुत (सं॰ पु॰) उदधिके पुत्र। चन्द्र, अमृत, शङ्क और कमल उदधिके पुत्र हैं।}}
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{{Outdent|उदन् (सं॰ क्ली॰) <small>पद्दन्नोमास् हन्निज्ञसन्धूबन्दोषन्धकञ्छन्न, दन्ना-सञ्छस प्रभतिषु। पा ६।१।६३।</small> इति सूत्रे उदकस्य उदनादेशः। उदक, पानी।}}
{{Outdent|उदनिमत (वै॰ त्रि॰) तरङ्गमय, जिसमें लहरें उठे।}}
{{Outdent|उदन्त (सं॰ पु॰) १ वार्ता, बात। २ समाचार, ख़बर। ३ साधु, पाकसाफ, आदमी। ४ वृत्तियाजन, रोज़गारसे काम चलानेवाला। (त्रि॰) ५ किसी वस्तुके अन्त तक पहुंचनेवाला। (हिं॰ त्रि॰)। ६ दन्त
हीन, वेदांत, जिसके दांत न निकले। यह शब्द पशुके लिये पाता है।}}
{{Outdent|उदन्तक (सं॰ पु॰) उदन्त स्वार्थे कन्। संवाद, ख़बर।}}
{{Outdent|उदन्तिका (सं॰ स्त्री॰) उदन्त-णिच्-ण्वुल्-टाप्। तृप्ति, आसूदकी, छकाहट।}}
{{Outdent|उदन्त्य (सं॰ त्रि॰) सौमाके परे रहनेवाला, जो हदके उस तर्फ रहता हो।}}
{{Outdent|उदन्य (वै॰ त्रि॰) जलमय, पानीसे भरा हुआ।}}
{{Outdent|सदन्यज (वै॰ त्रि॰) जलमें उपजने या रहनेवाला।}}
{{Outdent|उदन्या (सं॰ स्त्री॰) उदन्यति उदकमिच्छति,}}
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:अज्ञानायोदन्यधनायावुभुवापिपाडागधेंषु। पा ७।४।३४ इति क्वच् प्रत्यये पर आत्वं निपात्यते। १ पिपासा, प्यास। वेदे बाहुल्यकात् क्यच्। २ जलानयन. पानीका लाना। ३ जलसम्बन्धिनी, पानीसे सरोकार रखनेवाली।
{{Outdent|उदन्यु (वै॰ त्रि॰) उदन्य-उण्। जलेच्छु, पिपासु, पानी ढूंढनेवाला। <small>“हरि नबन्त्येऽबता उदन्षुवः।” (ऋक् ९।८६।२७) ‘उदन्षुव: उदकेच्छावन्तः।’ (स्त्रावण)</small>}}
{{Outdent|उदन्वत, <small>उदन्वान् देखो।</small>}}
{{Outdent|उदन्वान् (वै॰ पु॰) उदकानि सन्त्यत्र, उदक-मतुप्, मस्य वः। <small>उद्धन्वानुदधौ च। पा ८।२।१३।<small> १ समुद्र, बहर। <small>“ते च प्रापुरुदन्वन्तं युबुधे आदिपूरुषः।” (रघु)</small> २ ऋषिविशेष। (त्रि॰) ३ उदकयुक्त, पानी रखनेवाला ।<small> (ऋक् ५।८३।७)</small>}}
{{Outdent|उदप (सं॰ त्रि॰) पानीको पार करनेवाला।}}
{{Outdent|उदपर्णी (सं॰ पु॰) कुधान्यविशेष, एक ख़राब अनाज।}}
{{Outdent|उदपात्र (सं॰ क्ली॰) जलपूर्ण पात्र, लोटा।}}
{{c|{{x-smaller|“भिक्षामप्युदपान्न वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम्।” (मनु २।९६)}}}}
{{Outdent|उदपान (सं॰ पु॰-क्ली॰) उदकं पीयतेऽत्रेति, उदक-पा अधिकरण ल्युट्। १ कूप, कूवां।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान् सर्वेषु बेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥” (गौता ३।४३)</poem>}}}}
२ कमण्डलु।
{{Outdent|उदयानमडूक (सं॰ पु॰) कूपका मण्डूक, कर्वेका मेंड़क यह शब्द उस व्यक्तिके लिये आता है, जो अनुभवशून्य होता और नैकट्य भिन्न अन्य विषय नहीं समझता।}}
{{Outdent|उदप (वै॰ त्रि॰) जलसे अपनी शुद्धि करनेवाला जो पानीसे पाकसाफ बना हो।}}
{{Outdent|उदपेष (सं॰ क्ली॰) १ जलपेष, ख़मीर, लेही, गारा। (अव्य॰) २ जलमें पीस कर, पानीसे रगड़के।}}
{{Outdent|उदप्लुत्, (वै॰ त्रि॰) जलमें सन्तरण करनेवाला, जो पानी में तैरता हो।}}
{{Outdent|उदप्लुत, उदप्लुत् देखो।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२३०'''|'''उदधिक्रम-उदवसना'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:इनके मानसिक भाव कुमारीकेंसे होते हैं इसखिये। कुमार नाम पड़ा है।
{{Outdent|उदधिक्रम, <small>उदधिक्रा देखो।</small>}}
{{Outdent|उदधिक्रा (वै॰ पु॰) उदधि-क्रम-विट्। समुद्राक्रमण-कर्ता, बहर पर सफर करनेवाला।}}
{{Outdent|उदधिमेखला (सं॰ स्त्री॰) चारो दिक् सागरसे वेष्टित पृथिवी, बहरसे घिरी हुई जमीन्।}}
{{Outdent|उदधिराज (सं॰ पु॰) नदीका राना समुद्र।}}
{{Outdent|उदधिलवण (सं॰ क्ली॰) सामुद्र लवण, बहरी नमक।}}
{{Outdent|उदधिवस्त्रा, <small>उदधिमेखला देखो।</small>}}
{{Outdent|उदधिचि (सं॰ स्त्री॰) मुक्वास्फोट, बहरी सोप।}}
{{Outdent|उदधिसम्भव, <small>उदधिलवण देखो।</small>}}
{{Outdent|उदधिसुत (सं॰ पु॰) उदधिके पुत्र। चन्द्र, अमृत, शङ्क और कमल उदधिके पुत्र हैं।}}
{{Outdent|उदधिसुता (सं॰ स्त्री॰) समुद्रकी कन्या। लक्ष्मी और द्वारकाको उदधिसुता कहते हैं।}}
{{Outdent|उदधीय (सं॰ त्रि॰) सामुद्र, समुद्रजात, बाहरी।}}
{{Outdent|उदन् (सं॰ क्ली॰) <small>पद्दन्नोमास् हन्निज्ञसन्धूबन्दोषन्धकञ्छन्न, दन्ना-सञ्छस प्रभतिषु। पा ६।१।६३।</small> इति सूत्रे उदकस्य उदनादेशः। उदक, पानी।}}
{{Outdent|उदनिमत (वै॰ त्रि॰) तरङ्गमय, जिसमें लहरें उठे।}}
{{Outdent|उदन्त (सं॰ पु॰) १ वार्ता, बात। २ समाचार, ख़बर। ३ साधु, पाकसाफ, आदमी। ४ वृत्तियाजन, रोज़गारसे काम चलानेवाला। (त्रि॰) ५ किसी वस्तुके अन्त तक पहुंचनेवाला। (हिं॰ त्रि॰)। ६ दन्त
हीन, वेदांत, जिसके दांत न निकले। यह शब्द पशुके लिये पाता है।}}
{{Outdent|उदन्तक (सं॰ पु॰) उदन्त स्वार्थे कन्। संवाद, ख़बर।}}
{{Outdent|उदन्तिका (सं॰ स्त्री॰) उदन्त-णिच्-ण्वुल्-टाप्। तृप्ति, आसूदकी, छकाहट।}}
{{Outdent|उदन्त्य (सं॰ त्रि॰) सौमाके परे रहनेवाला, जो हदके उस तर्फ रहता हो।}}
{{Outdent|उदन्य (वै॰ त्रि॰) जलमय, पानीसे भरा हुआ।}}
{{Outdent|सदन्यज (वै॰ त्रि॰) जलमें उपजने या रहनेवाला।}}
{{Outdent|उदन्या (सं॰ स्त्री॰) उदन्यति उदकमिच्छति,}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:अज्ञानायोदन्यधनायावुभुवापिपाडागधेंषु। पा ७।४।३४ इति क्वच् प्रत्यये पर आत्वं निपात्यते। १ पिपासा, प्यास। वेदे बाहुल्यकात् क्यच्। २ जलानयन. पानीका लाना। ३ जलसम्बन्धिनी, पानीसे सरोकार रखनेवाली।
{{Outdent|उदन्यु (वै॰ त्रि॰) उदन्य-उण्। जलेच्छु, पिपासु, पानी ढूंढनेवाला। <small>“हरि नबन्त्येऽबता उदन्षुवः।” (ऋक् ९।८६।२७) ‘उदन्षुव: उदकेच्छावन्तः।’ (स्त्रावण)</small>}}
{{Outdent|उदन्वत, <small>उदन्वान् देखो।</small>}}
{{Outdent|उदन्वान् (वै॰ पु॰) उदकानि सन्त्यत्र, उदक-मतुप्, मस्य वः। <small>उद्धन्वानुदधौ च। पा ८।२।१३।</small> १ समुद्र, बहर। <small>“ते च प्रापुरुदन्वन्तं युबुधे आदिपूरुषः।” (रघु)</small> २ ऋषिविशेष। (त्रि॰) ३ उदकयुक्त, पानी रखनेवाला ।<small> (ऋक् ५।८३।७)</small>}}
{{Outdent|उदप (सं॰ त्रि॰) पानीको पार करनेवाला।}}
{{Outdent|उदपर्णी (सं॰ पु॰) कुधान्यविशेष, एक ख़राब अनाज।}}
{{Outdent|उदपात्र (सं॰ क्ली॰) जलपूर्ण पात्र, लोटा।}}
{{c|{{x-smaller|“भिक्षामप्युदपान्न वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम्।” (मनु २।९६)}}}}
{{Outdent|उदपान (सं॰ पु॰-क्ली॰) उदकं पीयतेऽत्रेति, उदक-पा अधिकरण ल्युट्। १ कूप, कूवां।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान् सर्वेषु बेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥” (गौता ३।४३)</poem>}}}}
२ कमण्डलु।
{{Outdent|उदयानमडूक (सं॰ पु॰) कूपका मण्डूक, कर्वेका मेंड़क यह शब्द उस व्यक्तिके लिये आता है, जो अनुभवशून्य होता और नैकट्य भिन्न अन्य विषय नहीं समझता।}}
{{Outdent|उदप (वै॰ त्रि॰) जलसे अपनी शुद्धि करनेवाला जो पानीसे पाकसाफ बना हो।}}
{{Outdent|उदपेष (सं॰ क्ली॰) १ जलपेष, ख़मीर, लेही, गारा। (अव्य॰) २ जलमें पीस कर, पानीसे रगड़के।}}
{{Outdent|उदप्लुत्, (वै॰ त्रि॰) जलमें सन्तरण करनेवाला, जो पानी में तैरता हो।}}
{{Outdent|उदप्लुत, उदप्लुत् देखो।}}
{{Outdent|उदबस (हिं॰ वि॰) १ शून्य, सूना। २ स्थानान्तरित, किसी जगहसे हटाया हुआ, जो मारा मारा फिरता हो।}}
{{Outdent|उदवसना (हिं॰ क्रि॰) १ स्थानान्तरित करना, किसी जगहसे निकाल देना। २ शून्यकरना, सूना बनाना।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदभर-उदयगिरि'''|'''२३१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उदभर (हिं॰) <small>सदर देखो।</small>}}
{{Outdent|उदभव (हिं॰) <small>उद्भव देखो।</small>}}
{{Outdent|उदभार (सं॰ पु॰) मेघ, बादल।}}
{{Outdent|उदभौत (हिं॰ पु॰) आश्चर्य, ताज्जुब, अनोखी बात।}}
{{Outdent|उदमन्य (सं॰ पु॰) १ उदकप्रधान मन्य, पानीकी मथानी। २ जलालोड़ित सघृत शक्तु, घी और पानीका सत्तू। इसे ग्रीष्ममें सेवन करना चाहिये। <small>(भावप्रकाश)</small>}}
{{Outdent|उदमदना (हिं॰ क्रि॰) उन्मत्त होना, पागस बनना।}}
{{Outdent|उदमन्य (सं॰ पु॰) यवका जल, जौका पानी।}}
{{Outdent|उदमाद (हिं॰) <small>उन्माद देखो।</small>}}
{{Outdent|उदमादी (हिं॰ वि॰) उन्मत्त, मतवाला।}}
{{Outdent|उदमान (संं॰ पु॰) १ वारिके मानका आढ़क। यह ४०९६ माशेका होता है। (हिं॰ वि॰) २ उन्मत्त, मतवासा।}}
{{Outdent|उदमानना (हिं॰ कि॰) उन्मत्त होना, पागल बनना।}}
{{Outdent|उदमेघ (सं॰ पु॰) १ जलयुक्त मेघ, पानीसे भरा हुआ बादल। २ जलवृष्टि, पानीकी झड़।}}
{{Outdent|उदम्बर (सं॰ पु॰) १ शरीरज कृमिका एक भेद, जिस्म में पैदा होनेवाला एक कीड़ा। <small>कृमि देखो।</small> २ ताम्र तांबा।}}
{{Outdent|उदय (सं॰ पु॰) उदयन्ति चन्द्रसूर्यादयो ग्रहा यस्मात्, उत्-इ-पच्। १ पूर्वपर्वत, उदयाचल।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>"उदित उदयगिरि मञ्चपर रघुवर बालपङ्न।
विकसे सन्त सरोन वन हरसे लोचन भृङ्न॥” (तुलसी)
</poem>}}}}
{{C|२ समुन्नति, उरूज, उठान।}}
{{c|{{x-smaller|“उदय तासु विभुवनमय भागा।” (तुलसी)}}}}
:{{gap}}३ मङ्गल, भलाई। ४ दीप्ति, चमक। ५ आविर्भाव, निकास। ६ वृद्धि, बढ़ती। ७ लाभ, फायदा। ८ फलसिही, कामयाबी। ९ लग्न, ग्रहगणका प्रकाश।<small> सूर्यादि शब्दमें ग्रहके उदयका विवरण देखो।</small> १० भावी उत्-सर्पिणीके सप्तम अर्हत्, उदयाश्व। यह याज्ञिकके पुत्र और शाक्यमुनिके शिष्य थे। (त्रि॰) ११ व्याकरणमें―― यश्चादगामी, पीछे पड़नेवाला।
{{Outdent|उदयगढ़ (हिं॰ पु॰) उदयाचल।}}
{{Outdent|उदयगिर――दाक्षिणात्यका एक ग्राम। यह अहमद-नगरसे १६० मील दूर है। १७६० ई॰ को मराठोंने}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:यहां निज़ामकी फौजपर आक्रमण मारा था। निजा़मके हारनेपर सन्धि हुई। दौलताबाद, सिबर, असीरगड़, तथा विजापुरका क़िसा, अहमदनगर और विजापुर विदर एवं औरङ्गावाद प्रान्तका अधिक भाग मराठोंके हाथ लगा। वर्तमान अहमदनगरके समग्र प्रान्त और नासिकके कुछ भागपर भी उनका अधिकार हो गया था। पेशवाके सेनापति सदाशिव रावने बड़ी वीरता दिखाई थी।
{{Outdent|उदयगिरि-उड़ीसा प्रान्तके पुरी ज़िलेका एक पर्वत। यह सामान्य वनपथमें खण्डगिरिसे स्वतन्त्र है। अति पूर्वकालसे (प्रायः ३०० ई० के पहले) उदयगिरि अपनी पवित्र गुहाओंके लिये प्रसिद्ध है।}}
:{{gap}}रानीहंसपुर, गणेश, स्वर्गपुरी, भजन, जया, विजया, अनन्त, हस्ति, पवन और व्याघ्र-गुफा ही प्रधान हैं। सकल गुहाओमें पर्वत तोड़ गृहादि बने हैं। आज-कल यद्यपि इनकी अवस्था नितान्त मन्द हो गई, अनेकांशमें गृहादि बिगड़ गये और सकल स्थानोंमें व्याघ्र-भल्लूक रहते, तो भी बोध होता है――पूर्व-कालपर इन सकल गुहाओंमें बौद्धधर्मावलम्बी यति तथा सन्नयासी रहा करते थे। अनेक गुहा सङ्घाराम नामसे विख्यात थीं। इन्हें देखनेके लिये पहले कितने ही बौद्ध यात्री यहां आते थे। ई० के ७म शताब्द-में चीनपरिव्राजक युअन्चुयङ्ग यहां पहुंचे थे। उन्होंने पुष्यगिरि नामक सङ्घारामकी बात लिखी है। अनु-मान है――यह सङ्घाराम उदयगिरिके ऊपर या पास ही रहा होगा।
:{{gap}}२ अन्य एक पर्वत। यह वेशनगरसे एक कोस दक्षिण-पश्चिम और सांचीसे ढ़ाई कोस दूर अवस्थित है। उदयगिरि एक मील विस्तृत है। इसमें अनेक मूर्ति खुदी हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिवकी मूर्ति वृहत् हैं। एक स्थानमें स्वर्गसे गङ्गा और यमुनाके अवतरणका दृश्य है। दृश्यका कारुकार्य अति चमत्-कारी है। जहां गङ्गायमुनाकी धार पृथिवीपर स्वर्गसे पड़ी, वहां उभय देवीकी मकरवाहना और कूर्मवाहना मूर्ति बनी है। स्वधर्मनिष्ठ हिन्दू तीर्थदर्शनको आते हैं। इस पर्वतमें चन्द्रगुप्त (२य) राजाके १०६ गुप्तकालका
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उषापति—उष्ट्र'''|'''४०१'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उषापति (सं॰ पु॰) उषायाः पतिः स्वामी, ६-तत्। अनिरुद्ध। यह कृष्णके पौत्र और प्रद्युम्नके पुत्र थे।}}
{{outdent|{{smaller|उषा और अनिरुद्ध शब्द देखो।}}}}
{{outdent|उषासानक्ता (सं॰ स्त्री॰) प्रत्यूष एवं रात्रि, सबेरा और अंधेरा।}}
{{outdent|उषित (सं॰ त्रि॰) वस् वा उष-क्त। १ पर्युषित, रात बिताये हुआ। २ दग्ध, जला हुआ। ३ निविष्ट, पहुंचा हुआ। ४ त्वरित, जल्द।}}
{{outdent|उषितङ्गवीन (सं॰ त्रि॰) उषिता अवस्थिता गावो यत्र। गोगणसे खाया हुआ, जहां गावोंने खाया हो।}}
{{outdent|उषीर (सं॰ पु॰ क्ली॰) उष-कीरच्। {{smaller|उशीर देखो।}}}}
{{outdent|उषेश (सं॰ पु॰) उषाया ईशः पतिः, ६-तत्। उषाके ईश अनिरुद्ध।}}
{{outdent|उषोदेवल्य (सं॰ त्रि॰) प्रत्युषकालको देवता मानने वाला।}}
{{outdent|उष्ट्र (सं॰ पु॰) उष-ट्रन्-कित्। उषिखनिभ्यां कित्। उण् ४।१६१। पशुविशेष, ऊंट। संस्कृत पर्याय—क्रमेल, क्रमेलक, मय, महाङ्ग, दीर्घगति, बली, करभ, दासेरक, धूसर, लम्बोष्ठ, वरण, महाजङ्घ, जवी, जाङ्गिक, दीर्घ, शृङ्खलक, महाशृ, महाग्रीव, महानाद, महापृष्ठग, महापृष्ठ, वलिष्ठ, दीर्घजङ्घ, ग्रौवो, धन्वज, शरभ, कण्टकाशन, भोलि, वङ्कर, अश्मज, मरुहाप, वक्रग्रीव, वासन्त, कुलनाश, कुञ्जनासा, मरुप्रिय, द्विककुत्, दुर्मेलञ्चन, भूतघ्न, दासेर, दीर्घग्रीव और वलिकौर्प है।}}
संस्कृत क्रमेल भिन्न भिन्न भाषाओंके शब्दोंसे मिलता है—जैसे संस्कृत 'क्रमेल', हिब्रू 'गमेल', ग्रीक 'कामिलस्', रोमक 'कमेलस्', इटलीय 'कम्मेलो', स्पेनीय 'कमेलो', जर्मन 'कमौलू', फ्रान्सीसी 'कमु,' (Chameau) अँगरेजी 'कैमेल' (Camel) अरबी 'जमेल'। इसके सिवा फारसीका शुतर शब्द धूसर जैसा मालूम पड़ता है।
यह अरब, ईरान, दक्षिण तुर्किस्तान, उत्तर-पश्चिम भारत, इजिप्तसे मरितानियातक अफरीका, भूमध्य सागर तथा सिनिगल नदी तीरके मध्यवर्त्ती प्रदेश और कनारी द्वीपमें वास करता है।
उष्ट्र तीन जातिके होते हैं—हिगुइन, वेकेती और इलहैरी। हिगुइन सबसे बड़ा होता और १५ मन
<br><br>Vol III. 101
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
तक भार ढोता है। वेकेती हिगुइनसे छोटा पड़ता है। पृष्ठमें ककुदाकृति दा कुब रहते हैं। उनके बीच द्रव्यादि रखनेसे किसी दिक् गिर नहीं सकते। ८।९ मन भार लादता है।
इलहैरी अपर जातीय उष्ट्रसे खर्व पड़ते भी भारके वहनमें सबकी अपेक्षा पटु है। ऐसा बहुकालव्यापी द्रुतगामी पशु कहीं नहीं। हम जिस परदार घोड़े का गल्प सुनते, उसे द्रुतगति अनुमान करनेसे इलहैरी ही समझते हैं। अरबी कवियोंने इसकी जौभर प्रशंसा की है। इलहैरी आठ दिनमें प्रायः ४५० कोस अफरीकाका दुर्गम मरुपथ तय करता है।
उष्ट्र—रोमन्थक कहलाता अर्थात् भुक्त वस्तु उद्गीरणपूर्वक फिर चबाता है। किन्तु दन्तकी संख्याके अनुसार अपर रोमन्थक पशुओंसे इसका लक्षण भिन्न है। अपर रोमन्थक पशुके केवल नीचेकी टङ्गमें छेदन-दन्त जमते, उसके ऊपरी अग्रभागमें नहीं निकलते। परन्तु उष्ट्रके नीचे ऊपर दोनों टङ्ग वह रहा करते हैं। सोलह ऊपर और अट्ठारह नीचे कुल ३४ दांत होते हैं। ऊपरी टङ्गमें २ छक्क, २ तीक्ष्ण एवं १२ पेषण-दन्त और नीचे ६ छक्क, ८ तीक्ष्ण तथा १० पेषणदन्त होते हैं। ऊपरके छक्क अधिकांश तीक्ष्ण दन्त-जैसे ही रहते हैं।
अपर रोमन्थक पशुओंसे उष्ट्रका दूसरा लक्षण भी भिन्न है। घन और नौकाकार गुल्फके अस्थि (Tarsus) अलग अलग रहते हैं। फिर अपर रोमन्थकोंकी तरह खुर द्विखण्डित नहीं जुड़े होते हैं। प्रायः शशककी तरह छिदे होते हैं। चर्वण कोष्ठक अति दृढ़सी पड़ती और कठोरताके उपयुक्त नहीं जंचती। नासिका वक्र और सङ्कोचनके योग्य लगती है। मस्तक बृहत् होता है। ग्रीवा क्षीण और दीर्घ रहती है। पृष्ठ देश कुब्ज होता है। ऊरु तथा जङ्घाका दैर्घ्य अपरिमित रहता है। पद स्थूल और दो मात्र नख-विशिष्ट होते हैं। पदका तल प्रशस्त रहनेसे मरुके मध्य चलते समय वालुकामें नहीं धंसता। ऊपरका होंठ शशककी तरह होनेसे उष्ट्र वालुकायुक्त अरण्यस्थित कण्टकमय गुल्मादि खा सकता है। नासिका वक्र और सङ्कोचन योग्य रहनेसे यह मरुभूमिमें 'सिमूम'
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०२'''|'''उष्ट्र'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
नामक साक्षात् कालान्तक वालुकाका प्रवाह बचा जाता है! यात्राके कालपर जब 'सिमूम' नामक वायु चलने लगता, तब उष्ट्रसे नीचे उतर मट्टीमें मुंह घुसेड़ रखने पर अति कष्टसे आरोहियोंका प्राण बचता है किन्तु इसका काम सामान्य नासिका सिकोड़नेसे ही बन जाता है।
{{center|[[चित्र:हिंदी विश्वकोष भाग ३ (page 403 crop).jpg|175px]]<br><small>उष्ट्र।</small>}}
उष्ट्रकी पाकस्थलीमें बड़ा चमत्कार है। वह अपर सकल जन्तुको पाकस्थलोसे भिन्न होतो है। पहले वह एक ओखली जैसी समझ पड़तो है! पश्चात् दिक् दो घर रहते हैं। वह मध्यमें एक कठिन पंक्ति द्वारा विभक्त हैं। यह अंश अवनालीवाले छिद्रपथके दक्षिण पार्श्वसे ढकते गया है। इस ओखलीमें जलका पोसरा रहता और आवश्यकता पड़नेसे उष्ट्र फिर जल पी सकता है। किसी किसी अरबी ऐतिहासिकने यहां तक कह दिया है कि जब मुहम्मदने टाबक नगरको यूनानियोंके विपक्षमें गमन किया, तब सैन्यके सामन्तोंने आहार एवं पानीयके अभावसे अत्यन्त विपदमें पड़ अपने अपने उंटको मार पाकस्थलीका जल पिया था। (Salis Koran, p. 164,) किन्तु युरोपके वर्त्तमान प्राणितत्त्वविद् उक्त घटना नहीं मानते।
इसे वनका कण्टकद्रुम खाना अच्छा लगता है। यथेष्ट आहार न मिलते भी उष्ट्र कातर अथवा भार वहनमें अक्षम नहीं पड़ता। अधिक दिन उपयुक्त आहार न मिलने पर पृष्ठस्थित ककुदके रक्त मांससे प्रतिपालन कार्य सम्पादित होता है।
अति पूर्वकालसे उष्ट्र मानवके व्यवहारमें लगता है। अनेक प्रमाण मिलते हैं कि वैदिक समयके
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
आर्य उंटपर चढ़ते थे। {{smaller|(ऋक् ८।४६।२२-३१)}} वह अश्वकी तरह युद्धमें भी इसका व्यवहार करते थे—
{{block center|<poem>
"यथा अघ उष्ट्रो न दौपरोनधः।" {{smaller|(ऋक् १।१३८।२)}}
</poem>}}
वैदिक समयसे ही {{smaller|(ऋक् ८।५।३७, ८।४६।३१)}} राजा अश्व गो एवं धनादिकी तरह उष्ट्रदान {{smaller|(भारत, सभा)}} करते आये हैं।
अश्वयान और गोयानकी तरह पूर्वकालमें उष्ट्रयानका भी व्यवहार रहा {{smaller|(मनु ३।२०४)}}। उस समय ब्राह्मण उष्ट्रयानपर चढ़ न सकते थे। कारण—उष्ट्रयानपर चढ़नेसे ब्राह्मणको पाप लगता है—
{{block center|<poem>
"उष्ट्रयानं समारुह्य खरयानन्तु कामतः।
स्नात्वा तु विप्रो दिग्वासाः प्राणायामेन शुध्यति॥" {{smaller|(मनु ११।२०२)}}
</poem>}}
ब्राह्मण यदि अपनी इच्छासे उष्ट्रयान अथवा गर्दभ यानपर चढ़ता, तो विवस्त्र नहा प्राणायाम करनेसे शुद्ध होता है।
शास्त्रमें उष्ट्रके मांसका भक्षण निषिद्ध है—
{{block center|<poem>
"गौधेयश्वाविदोष्ट्रञ्च सर्वं पञ्चनखं तथा।
अद्याद कुक्कुटं ग्राम्यं कुर्यात् संवत्सरं व्रतम्॥" {{smaller|(गरुड़संहिता १७२।१)}}
</poem>}}
गोह, शल्यी, उंट, पांचनखका पशु और मांसाशी गांवका मुर्गा खानेसे संवत्सर व्रतकरना चाहिये।
बाइबिलमें भी उष्ट्रका मांस अभक्ष्य-जैसा निर्दिष्ट है—"Because he cheweth the cud, but divideth not the hoop; he is unclean unto you." (Leviticus, xi. 4.)
उष्ट्र तुम्हारे पक्षमें अशुचि है। क्योंकि जुगाली चलते भी इसके खुर फटे नहीं होते।
अरब देशके कवियोंने इस पशुको 'अरण्यपोत' जैसा वर्णन किया है। उष्ट्र उन्हें प्राणसे अधिक प्रिय है। वह इसके मांस और दुग्धसे जीवन धारण करते हैं। लोमसे वस्त्र बनता और शिविरके प्रस्तुतकरणका उपादान मिलता है। यह वस्त्र उत्तरपश्चिम अञ्चलमें किसी किसी स्थानपर बिकता है। विलायतमें उष्ट्रके लोमसे क़लम तैयार होता है। उष्ट्रका मल अरब देशमें जलानेके काम आता और धूमसे निशादल बन जाता है।
वैद्यक मतसे उष्ट्रीका दुग्ध लघु, स्वादु, लवणस्वाद
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४०४
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उष्ट्रकण्टकभोजनन्याय—उष्ट्रपक्षी'''|'''४०३'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
एवं दोपन होता और कृमि, कुष्ठ, आनाह, शोथ तथा उदररोगको दूर करता है।
उष्ट्रीका घृत दोपन और वातश्लेष्मनाशक है; यह पुराना हो जानेसे कटु हो जाता है। इसको पीनेसे शोथ, विष, कुष्ठ, कृमि, गुल्म और उदररोग नष्ट होता है।
उष्ट्रका मूत्र श्वास, कास और अर्शोरोगको मिटानेवाला है।
{{outdent|उष्ट्रकण्टकभोजनन्याय (सं॰ पु॰) उष्ट्रके कण्टक भोजनका न्याय, ऊंटके कांटा खानेकी चाल। क्षतसे बहु दुःख सहते भी उष्ट्र कैसे सामान्य भोजनकी दृष्टिसे सुखकी शमो कण्टक खा जाता, वैसेही मनुष्य भी यत्सामान्य सुखके आशयसे बहुतसा सांसारिक दुःख उठाता है। क्षणभङ्गुर सुखके लिये भावी अनन्त दुःखका ध्यान न रखना उष्ट्रकण्टकभोजनन्याय कहलाता है।}}
{{outdent|उष्ट्रकर्ण (सं॰ पु॰) जनपदविशेष : यह सिन्धुनदसे उत्तरस्थित एक म्लेच्छ देश है। यूनानी ऐतिहासिकोंने इसे अष्टकणि ( Astaceni ) कहा है!}}
{{outdent|उष्ट्रकर्णिक (सं॰ पु॰) १ दक्षिणादिक्स्थ यवन देश। २ उक्त देशके लोग। सहदेवके दिग्विजयवर्णनपर कहा है—}}
{{block center|<poem>
"अश्मांसुलवधांश्चैव कलिङ्गानूष्ट्रकर्णिकान्।" {{smaller|(भारत, सभा)}}
</poem>}}
{{outdent|उष्ट्रकाण्डी (सं॰ स्त्री॰) उष्ट्र इव काण्डोऽस्य, जातित्वात् ङीष्। पुष्पविशेष, ऊंटकटारी। इसका संस्कृत पर्याय—रक्तपुष्पी, करभकाण्डिका, रक्ता, लोहितपुष्पी, और कर्णपुष्पी है। उष्ट्रकाण्डी तिक्तरस, उष्णवीर्य, रुचिकारक एवं हृद्रोगनाशक होती है। वोज मधुर है। शीतल रस उष्ण करनेसे गुणकारी, वीर्यवर्धक और सन्तर्पणजनक ठहरता है। {{smaller|(राजनिघण्टु)}}}}
{{outdent|उष्ट्रक्रोशी (सं॰ त्रि॰) उष्ट्रकी भांति शब्द निकालनेवाला, जो ऊंटकी तरह बोलता हो।}}
{{outdent|उष्ट्रगोयुग (सं॰ क्ली॰) उष्ट्रद्वय, ऊंटका जोड़ा।}}
{{outdent|उष्ट्रग्रीव (सं॰ पु॰) भगन्दररोग विशेष। प्रकुपित पित्त द्वारा वायु अधःप्रेरित होता है। वहां उसके ठहरनेसे रक्तवर्ण, सूक्ष्म, उन्नत उष्ट्रग्रीवाकार पिड़का पड़ जाती है। उसमें टपकनेकी तरह वेदना}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
उठती है। फिर प्रतिक्रियासे वह पक जाती है।
{{smaller|(सुश्रुत)}} माधवनिदानमें इसका नाम 'उष्ट्रशिरोधर' लिखा है। {{smaller|भगन्दर देखो।}}
{{outdent|उष्ट्रधूसरपुच्छिका (सं॰ स्त्री॰) उष्ट्रस्य धूसरः पुच्छ इव पुच्छः मञ्जरी यस्याः। कञ्चिकाली, विषुवा।}}
{{outdent|उष्ट्रपक्षी (सं॰ पु॰) द्रुतगामी एक भूचर पक्षी, शुतुरमुर्ग। (Struthio camelus) इसकी चोंच सोधो, फैली और भीतरको गोल होती है। माथा छोटा और गला लम्बा पड़ता है। दोनों पैर अधिक बृहत् और बलिष्ठ रहते हैं। पैरमें दो-दो तलवे होते हैं। उनमें एक भीतर और एक बाहर लगता है। भीतरी ज्यादा बड़ा और खपड़े जैसा होता है। बाज़ूसे यह उड़ नहीं सकता। किन्तु दौड़नेमें बड़ी सुविधा होती है। बाज़ू और पूंछमें मुलायम पर रहते हैं।}}
शुतुरमुर्ग अपर सकल पक्षियोंकी अपेक्षा बड़ा ठहरता है। इसलिये 'पक्षिराज' कह सकते हैं। यह चारसे छह हाथतक ऊंचा निकलता है। स्त्रीजाति एककाल प्रायः १० अण्डे देती है। फिर एक-एक अण्डा मुरगीके २४ अण्डोंको वरावर बैठता है।
अधेड़ नरका काला और चिकना तथा मादे या बच्चेका पाख काला अथच कबरा—बीच-बीच सफ़ेद रहता है। बाज़ू और पूंछके बड़े-बड़े पर सफ़ेद होते हैं। बीच बीचमें काले धब्बे देख पड़ते हैं। चक्षु अतिशय तीक्ष्ण और उज्ज्वल रहते हैं। इसे अधिक दूरके द्रव्यादि सहजमें ही देखायो देते हैं। यह बहुत बलवान् होता है। घटनाक्रमसे आक्रमण पड़नेपर यह पदके आघातसे व्याघ्रादि जन्तुओंको डरा सकता है। प्रति घण्टे शुतुरमुर्ग २० कोससे अधिक जानेकी शक्ति रखता है। अतिशय झपटनेसे यह सहज ही हाथ नहीं लगता। दक्षिण अफरीकाके लोग शुतुरमुर्गका ही चमड़ा पहन शुतुरमुर्गके आगे पहुंचते हैं। यह उन्हें भी शुतुरमुर्ग समझ नज़दीक आनेसे नहीं रोकता। इसी उपायसे वह निकट जा और विषाक्त तीर चला इसे मार डालते हैं।
शुतुरमुर्ग अरब और अफरीकाकी मरुभूमिमें रहता है। इसे शीघ्र तृषा नहीं लगती। दो-चार दिन
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०४'''|'''उष्ट्रपादिका—उष्णप्रस्रवण'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
बाद जव तृषार्त्त देखायी देता, तव मरुभूमिके मध्यसे निकाल यह कलौंटे या खरबूजेका जल पी लेता है। क्षुधा लगने पर जसे छोटा पक्षी वालका दाना तोड़ तोड़ चुगता, वैसेही शुतुरमुर्ग बड़े बड़े पत्थर, लोहेके टुकड़े, कङ्कड़, कांचके वरतन, तांबेके सिक्के और टूटे जूते निगलने लगता है। अफरीकाके लोग इसके अण्डे खाते हैं। प्राचीन कालसे विलायतमें इसके परका बड़ा आदर है। पालनेसे शुतुरमुर्ग हिल जाता है। किन्तु अपरिचित व्यक्तिको निकट आते देख यह प्रायः आक्रमण करता है। वाइविलमें शुतुरमुर्गका मांस निषिद्ध ठहरा है। {{smaller|(Leviticus, xi. 16.)}}
{{outdent|उष्ट्रपादिका (सं॰ स्त्री॰) मदनमालिनी, चमेली।}}
{{outdent|उष्ट्रयान (सं॰ क्ली॰) उष्ट्र द्वारा वहन किया जानेवाला यान, ऊंटगाड़ी।}}
{{outdent|उष्ट्रशिरोधर (सं॰ क्ली॰) भगन्दर रोगविशेष।}}
{{outdent|उष्ट्रस्थान (सं॰ क्ली॰) उष्ट्रस्य स्थानम्, ६-तत्। उष्ट्रके आवासका स्थान, ऊंटके रहनेकी जगह।}}
{{outdent|उष्ट्रासिका (सं॰ स्त्री॰) उष्ट्रस्येव आसिका आसनम्। उष्ट्रासन, ऊंटकी तरह बैठनेकी हालत।}}
{{outdent|उष्ट्रिका (सं॰ स्त्री॰) उष्ट्रस्य आक्कृतिरिव आक्कृतिर्यस्याः। १ मृण्मय सुरापात्र विशेष, शराब रखनेकी एक मट्टीका बरतन। उष्ट्रस्य स्त्री, उष्ट्र-कन्-टाप् अत इत्वम्। २ उष्ट्र, ऊंटनी।}}
{{block center|<poem>
"भूमैरुच्चिथैर्वितानितोष्ट्रिका ः" {{smaller|(माघ १२।१६)}}
</poem>}}
{{outdent|उष्ट्री (सं॰ स्त्री॰) उष-ट्रन्-ङीष्। {{smaller|उष्ट्रिका देखो।}}}}
{{outdent|उष्ण (सं॰ पु॰ क्ली॰) उष्-नक्। इनृषिविजीव्युषिमजि नक्। उण् ३।१। १ ग्रीष्म, गरमीका मौसम। २ आतप, धूप। ३ पलाण्डु, प्याज। ४ उषा, जलन। ५ अग्नि, आग। ६ सूर्य, आफ़ताब। ७ नरकविशेष। ८ पित्त, सफ़रा। ९ कौक्षदीपस्थ वर्षविशेष। (त्रि॰) १० अशीतल, गर्म। ११ तीव्र तेज़। १२ अनलस, फुरतीला।}}
वैद्यक मतसे उष्ण वीर्य द्रव्य पित्तप्रकोपकारी, लघु एवं वातश्लेष्मनाशक होता है।
{{outdent|उष्णक (सं॰ त्रि॰) उष्णां कार्यं यस्य, उष्ण-कन्। १ चिप्रकारी, फुरतीला।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उष्णकटिबन्ध (सं॰ पु॰) कर्कट क्रान्ति और मकरक्रान्तिके मध्यका स्थान, मिन्तकःहारा, गर्म खण्ड। यह ४७° प्रशस्त है। उष्णकटिबन्धमें सूर्यकी किरणें सीधी पड़नेसे उष्णता अधिक रहती है।}}
{{outdent|उष्णकर (सं॰ पु॰) उष्णाः करः किरणो यस्य, अथवा उष्णं करोति, उष्ण-कृ-अच्। १ सूर्य, आफ़ताब। (त्रि॰) २ उष्णकारी, गर्म करनेवाला, जो गरमी लाता हो।}}
{{outdent|उष्णकाल (सं॰ पु॰) उष्णावासी कालश्च, कर्मधा॰। ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम।}}
{{block center|<poem>
"तक्रं नैव घृते दद्यात् नोष्णकाले न दुर्बले।" {{smaller|(सुश्रुत)}}
</poem>}}
{{outdent|उष्णग (सं॰ पु॰) ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम।}}
{{block center|<poem>
"घित्तं रहसि मे भीमा नदीकूषमिवोष्णगः।" {{smaller|(रामायण ५।२१।२६)}}
</poem>}}
{{outdent|उष्णगु (सं॰ पु॰) उष्णाः गौः किरणो यस्य, ओकारस्य ह्रस्वत्वम्। सूर्य, आफ़ताब।}}
{{outdent|उष्णङ्करण (सं॰ त्रि॰) उष्ण करनेवाला, जो गर्म करता हो।}}
{{outdent|उष्णता (सं॰ स्त्री॰) आतप, गरमी।}}
{{outdent|उष्णत्व (सं॰ क्ली॰) उष्णता, गरमी।}}
{{outdent|उष्णदीधिति (सं॰ पु॰) उष्णा दीधितयः किरणा यस्य। सूर्य, आफ़ताब।}}
{{outdent|उष्णनदी (सं॰ स्त्री॰) उष्णा चासौ नदी चेति, नित्यकर्मधारयः। वैतरणी नदी।}}
{{outdent|उष्णप्रस्रवण (सं॰ क्ली॰) तप्तकुण्ड, गर्म पानीका झरना। जिस प्रस्रवणसे उष्ण जल निकलता अथवा जिस स्थानका जल सर्वदा उष्ण रह बहता, उसका नाम उष्णप्रस्रवण पड़ता है।}}
पृथिवीके नाना स्थानोंमें उष्णप्रस्रवण विद्यमान हैं। भारतवर्षमें जो स्थान उष्णप्रस्रवण रहनेसे तीर्थ समझे जाते, उनके नाम नीचे दिये जाते हैं—
वीरभूममें वक्रेश्वर नामक पवित्र तीर्थस्थान है। इस पुण्य भूमिमें न्यूनाधिक ८ प्रस्रवण चलते हैं। उनमें सूर्यकुण्ड नामक प्रस्रवण प्रधान है। उष्ण होते भी सूर्यकुण्डके जलसे लतायें उपजा करती हैं। जलके ऊर्ध्व भागमें उपजनेवाली प्रायः हरी और अधो-भागमें होनेवाली अधिक तापके कारण पीली पड़
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उष्णरश्मि—उष्णीष'''|'''४०५'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
जाती है। उभयको तापमानयन्त्रसे देखने पर १६४° से ८०° पर्य्यन्त ताप मिलता है।
थाना जिलेके भिवन्डी तालुकमें प्रायः १५० उष्ण कुण्ड हैं। उनमें कितने ही थाना जिलेकी वैतरणी नदीके निकट पड़ते हैं। उक्त कुण्ड अतिप्राचीन कालसे तीर्थकी तरह प्रसिद्ध हैं। पिण्डी पर्वतके पास अर्जुनकुण्ड है। उसमें १३° ताप रहता है। कितने ही क्षुद्र क्षुद्र भी उष्णप्रस्रवण हैं। उनके कर्दमसे धूम उठता है। सिन्धु प्रदेशमें अनेक उष्ण प्रस्रवण हैं। उनमें मञ्च ह्रदके निकट भीलगिरिके शिखर देशपर एक अतिशय उत्तम प्रस्रवण है। उसके जलमें हाथ डाल नहीं सकते। सिन्धु प्रदेशके लक्खी नामक ग्राममें तप्त गन्धकके कई प्रस्रवण हैं।
पञ्जाबके उत्तरांशमें हिमालय पर्वतके पास पार्वती नदी किनारे मणिकर्ण नामक तीर्थ है। इस पर्वतमय प्रदेशमें अनेक उष्ण प्रस्रवण देख पड़ते हैं। हम समझते हैं, कि वे सकल पवित्र प्रस्रवण ही पूर्वकालमें उष्णोदङ्क नामसे प्रसिद्ध थे।
{{block center|<poem>
"सप्त ह्रदं च पुष्याक्षां भृगुतुङ्गं च पर्वतम्।
उष्णोदङ्कं च कौन्तेय आसाद्य सुसुखमेधते॥" {{smaller|(भारत, वन १३५ अ॰)}}
</poem>}}
मणिकर्णके लोग उष्ण प्रस्रवणके तापसे रन्धनकार्य चलाते हैं। उन्हें जलानेके लिये काठका प्रयोजन नहीं पड़ता।
काश्मीरके उत्तर लाधक प्रदेशमें अनेक क्षुद्र उष्णप्रस्रवण हैं। चट्टग्राममें चन्द्रनाथ गिरिपर सीताकुण्ड नामक एक पवित्र प्रस्रवण है। पूर्वकालसे यह कुण्ड हिन्दुओं और बौद्धोंके पवित्र तीर्थस्थानकी तरह प्रसिद्ध है। इस कुण्डसे धूम निकलता है।
{{outdent|उष्णरश्मि (सं॰ पु॰) उष्णा रश्मयोऽस्य, बहुव्री॰। १ सूर्य, आफ़ताब। २ अर्कवृक्ष, अकौड़ेका पेड़।}}
{{outdent|उष्णरुचि, {{smaller|उष्णरश्मि देखो।}}}}
{{outdent|उष्णवारण (सं॰ पु॰-क्ली॰) उष्णां आतपं वारयति, उष्ण-वृ-णिच्-ल्यु। छत्व, छाता।}}
{{block center|<poem>
"यदर्धमम्भोरुहमिवोष्णवारणम्।" {{smaller|(कुमार ५।२२)}}
</poem>}}
{{outdent|उष्णवाष्प (सं॰ पु॰) १ तप्तवाष्प, गर्म भाप। २ अश्रु, आंसू।}}
{{outdent|उष्णवीर्य (सं॰ पु॰) उष्णां वीर्यं यस्य, १ शिशुमार,}}
<br><br>Vol III. 102
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
सङ्कुमाछी, सूस। (त्रि॰) २ तीक्ष्णवीर्य, गर्म तासीर रखनेवाला। ३ बलवान्, ताक़तवर।
{{outdent|उष्णवैताली (सं॰ स्त्री॰) एक देवी।}}
{{outdent|उष्णा (सं॰ स्त्री॰) उष्यते दह्यते यया, उष दहे नक्-टाप्। १ क्षयरोग, तपेदिक़। २ सन्ताप, गरमी। ३ पित्त, सफ़रा।}}
{{outdent|उष्णांशु (सं॰ पु॰) उष्णा अंशवो यस्य, बहुव्री॰। सूर्य, आफ़ताब।}}
{{outdent|उष्णागम (सं॰ पु॰) उष्णः आगमो यत्र। ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम।}}
{{outdent|उष्णाभिगम, {{smaller|उष्णागम देखो।}}}}
{{outdent|उष्णालु (सं॰ त्रि॰) उष्ण-आलुच्। १ उत्ताप सहन करनेके लिये असमर्थ, जो गरमी बरदाश्त कर न सकता हो। २ आतपक्लान्त, गरमीसे घबराया हुआ। ३ शीतलप्रिय, जिसे ठण्डक अच्छी लगे।}}
{{block center|<poem>
"उष्णालुः शिशिरे निषीदति तरोर्मूलावबाले शिखी।" {{smaller|(विक्रमोर्वशी)}}
</poem>}}
{{outdent|उष्णासह (सं॰ पु॰) उष्णं आतपं आसह्यते यत्र, उष्ण-आ-सह-अच्। १ हेमन्तकाल, जाड़ेका मौसम। (त्रि॰) २ उत्ताप सह न सकनेवाला, जो गरमी बरदाश्त कर न सकता हो।}}
{{outdent|उष्णिक् (सं॰ स्त्री॰) उत्-स्निह-क्विप्। सप्ताक्षर छन्दोविशेष, सात अक्षरका एक छन्द। "गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च" {{smaller|(छन्दोमञ्जरी)}} यह छन्द तीन प्रकारका होता है— मधुमती, कुमारललिता और मदलेखा।}}
{{outdent|उष्णिका (सं॰ स्त्री॰) अल्पमन्नमस्याम्, अन्न अल्पार्थे निपातनात् अन्नशब्दस्य उष्णादेशः, टाप् अत-इत्। यवागु, महेरी।}}
{{outdent|उष्णिमा (सं॰ पु॰) उत्ताप, गरमी।}}
{{outdent|उष्णोदङ्क (सं॰ क्ली॰) उष्णोभूता गङ्गा यत्र। भृगुपर्वतस्थ तीर्थविशेष। {{smaller|(भारत, वन १३५ अ॰)}} उष्णप्रस्रवण देखो।}}
{{outdent|उष्णीष (सं॰ पु॰-क्ली॰) उष्णां ईषते हिनस्ति, उष्ण-ईष-क। १ शिरोवेष्टन, पगड़ी, साफ़ा। वैद्यकके मतसे उष्णीषका धारण कान्तिजनक, केशवर्धक, आयुर्वर्धक, धूलि-शीत-उष्ण-निवारक, प्रतिश्याय तथा शिरःशूलप्रशमक और वर्ण-तेज-बल-वर्धक है। २ मुकुट, ताज। ३ चिह्नविशेष।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०६'''|'''उष्णोषधारी—उसना'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उष्णोषधारी (सं॰ पु॰) उष्णोषं धरति, उष्णोष-धृ-णिनि। उष्णोष धारण करनेवाला, जो पगड़ी या साफा बांधता हो।}}
{{outdent|उष्णोषी (सं॰ त्रि॰) उष्णोषं अस्त्यस्य, उष्णोष-इनि। १ उष्णोषधारी, पगड़ी या साफा बांधनेवाला। (पु॰) २ महादेव।}}
{{block center|<poem>
"उष्णोषीव सुवक्त्रश्च उदग्रो विनतस्तथा।" {{smaller|(भारत, अनु १४ अ॰)}}
</poem>}}
{{outdent|उष्णोदक (सं॰ क्ली॰) उष्णञ्च तत् उदकञ्चेति, कर्मधा॰। उष्णजल, गर्मपानी। यह अर्द्धावशेष, त्रिपादावशेष, चतुर्थांशावशेष भेदसे अनेक प्रकारका होता है। साधारणतः कुछ काल तपा कर भी उदक व्यवहार किया जाता है। वैद्यकोक्त साधारण उष्णोदक स्रोत-हितकर, कास, ज्वर, विरुद्ध कफ, वात एवं आमका प्रशमक, मेदविनाशी, अम्भुशोषक और वस्तिपरिशोधक है। ग्रीष्ममें अर्द्धावशेष, शरत्कालमें एकांशावशेष, हेमन्त, शीत एवं वसन्तकालमें अर्द्धावशेष और वर्षाकालमें अष्टमांशावशेष उष्णोदक पीना चाहिये। पादावशेष पित्तविनाशक, अर्द्धावशेष वातप्रशमक और त्रिपादावशेष उष्णोदक कफनाशक है। {{smaller|(भावप्रकाश)}}}}
दिनको जो तपाया जाता, वह जल रातको गुरु हो जाता है। इसलिये दिनका उष्ण जल रातको व्यवहार नहीं करते। रातको नया जल उष्ण कर काममें लाना चाहिये। उष्ण जलका स्नान भी विशेष उपकार साधक है। किन्तु मस्तकपर उष्णोदक छोड़ना न चाहिये। उससे केश और चक्षुको अपकार पहुंचता है।
{{outdent|उष्णोपगम (सं॰ पु॰) उष्ण उपगम्यते अत्र, उष्ण-उप-गम-अप्। ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम।}}
{{outdent|उष्म (सं॰ पु॰) उष-मक्। १ ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम। २ उत्ताप, धूप। ३ तीव्रता, तेज़ी। ४ क्रोध, गुस्सा। ५ श, ष, स और ह चार वर्ण।}}
{{outdent|उष्मक (सं॰ पु॰) उष्म-कन्। ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम।}}
{{outdent|उष्मज (सं॰ त्रि॰) उष्मज, गरमीसे पैदा होनेवाला। (पु॰) २ क्षुद्रकीटादि, गरमीसे पैदा होनेवाला कीड़ा। जैसे—मच्छर, खटमल वग़ैरह।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उष्मता (सं॰ स्त्री॰) उष्मस्य भावः, उष्म-तल्। उष्णता, गरमी।}}
{{outdent|उष्मपा (सं॰ पु॰) उष्माणं पिबति, उष्म-पा-क्विप्। १ पितृलोक विशेष। २ उष्मपानकारी तपस्विविशेष।}}
{{block center|<poem>
"सुवासिनो बर्हिषद उष्मपा आज्यपास्तथा।" {{smaller|(स्मृति)}}
</poem>}}
{{outdent|उष्मभास् (सं॰ पु॰) सूर्य, आफ़ताब।}}
{{outdent|उष्मवत् (सं॰ त्रि॰) उष्म-मतुप्, मस्य वः। उष्मविशिष्ट, गर्म। "ज्वरदाहोष्मवतीं तड़िम्!" {{smaller|(सुश्रुत)}}}}
{{outdent|उष्मस्वेद (सं॰ पु॰) उष्मणासौ स्वेदश्चेति, कर्मधा॰। उष्मस्वेद, गर्म पसीना। {{smaller|स्वेद देखो।}}}}
{{outdent|उष्मा (सं॰ पु॰) उष-मनिन्। १ ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम। २ उत्ताप, गरमी। {{smaller|उष्म देखो।}}}}
{{outdent|उष्मागम (सं॰ पु॰) उष्मा आगम्यते यत्र, आ-गम-अप्। ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम।}}
{{outdent|उष्मान्वित (सं॰ त्रि॰) उत्तेजित, भड़का हुआ।}}
{{outdent|उष्माय (नामधातु) उष्माणमुद्वमति, उष्मन्-क्यङ्। इसका अर्थ उष्मा उद्गमन करना या आग उगलना है।}}
{{outdent|उष्मायण (सं॰ पु॰) ग्रीष्मकाल, गरमीका मौसम।}}
{{outdent|उष्मोपगम, {{smaller|उष्मायण देखो।}}}}
{{outdent|उष्वल (सं॰ क्ली॰) चारपाईका ढांचा।}}
{{outdent|उस (हिं॰ सर्व॰) तत्, वह। यह शब्द 'वह' का रूपान्तर है। विभक्ति लगनेसे 'वह' के स्थानमें 'उस' आदेश होता है। जैसे—उसने, उसको, उससे, उसका, उसमें, उसपर। 'उस' अन्य पुरुषके एकवचनका रूप है। बहुवचन 'उन' है।}}
{{outdent|उसकन (हिं॰ पु॰) १ उबसन, जूना, बरतन मांजनेका बान या पयाल वग़ैरहका मुट्ठा। २ उभार, उठाव।}}
{{outdent|उसकना, {{smaller|उबसना देखो।}}}}
{{outdent|उसकाना, उसकारना, {{smaller|उकसाना देखो।}}}}
{{outdent|उसगन (हिं॰) {{smaller|अपशकुन देखो।}}}}
{{outdent|उसनना (हिं॰ क्रि॰) १ उबालना। २ मांडना, पानी डालकर गूंधना।}}
{{outdent|उसना (हिं॰ वि॰) उबाला हुआ, गर्म किया हुआ। जिस चावलको पानीमें डाल उबालते और भूसी निकालते, उसे उसना नामसे पुकारते हैं।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उसनाना—उसुवाना'''|'''४०७'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उसनाना (हिं॰ क्रि॰) १ उबलवाना, गर्म करवाना। २ मंडवाना, पानी डलाकर गुंधवाना।}}
{{outdent|उसनौस (हिं॰) {{smaller|उष्णोष देखो।}}}}
{{outdent|उसवा (हिं॰) {{smaller|उशवा देखो।}}}}
{{outdent|उसबुपल्ली—बम्बई प्रान्तके प्राचीन पुष्यराष्ट्र प्रदेशका एक ग्राम। महाराज सिंहवर्माके राज्य पानेसे ११ वत्सर बाद इस ग्रामके अधिवासियोंको एक शासन-पत्र सुनाया गया था। उक्त महाराज सम्भवतः विष्णुगोप वर्माके बड़े भाई रहे। विष्णुगोप वर्माने ही उक्त संस्कृत शासनपत्र निकाल यह ग्राम विष्णुहार मन्दिर पर उत्सर्ग किया। वह परमभागवत थे। सेनापति विष्णुवर्माने कण्डूकोट ग्राममें विष्णुहारका मन्दिर बनवाया था।}}
{{outdent|उसमा (हिं॰ पु॰) वसमा, उबटन।}}
{{outdent|उसमान (अ॰ पु॰) मुहम्मदके एक सखा या साथी।}}
{{outdent|उसरना (हिं॰ क्रि॰) सरकना, अलग होना।}}
{{outdent|उसरू—युक्तप्रदेशस्थ राज्यविशेष।}}
{{outdent|उसरीड़ी (हिं॰ स्त्री॰) पक्षि विशेष, एक चिड़िया।}}
{{outdent|उसलना, {{smaller|उसरना और उछलना देखो।}}}}
{{outdent|उसवदात—बम्बई प्रान्तके एक प्राचीन शक नृपति। यह अपने श्वसुर नहपानके (१०० ई॰) कोंकन और दाक्षिणात्यमें प्रतिनिधि रहे! इनके कार्ल और नासिकवाले ताम्रफलकोंमें सोमनाथ पत्तन, भड़ौच, सोपारे और गोवर्द्धनके उत्सर्गकी बात लिखी है। दाहनुकपर इन्होंने एक घाट बनवाया था। सूर्परकमें उसवदात द्वारा निर्माण कराये विश्रामालय और भोजनालय थे। नासिकके १० म, १२ श और १४ श शिलालिपिमें लिखा है, कि उसवदातका विवाह चहरात क्षत्रप नहपानकी दक्षमित्र नाम्नी कन्यासे हुआ था। इनके पिताका नाम दिनीक रहा। यह जातिके शक थे। संस्कृत ऋषभदत्तका अपभ्रंश उसवदात है। इन्होंने तीन सहस्र गोदान किये थे। उत्तर गुजरातमें आबू स्थानके निकट बनालमें सोनेका सोपान उसवदातने दिया। १४ ग्राम ब्राह्मणोंको भेंट चढ़ाये थे। यह प्रति वर्ष लाखों ब्राह्मण खिलानेवाले थे। दक्षिण काठियावाड़के प्रभासक्षेत्रमें इन्होंने आठ स्त्रियां}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
ब्राह्मणोंको ब्याही थीं। ३२ सहस्र नारियलके पेड़ उसवदातने पुरोहितोंको सङ्कल्पमें दिये। पुष्कर तीर्थमें जाकर इन्होंने तीन सहस्र गो और एक ग्राम दान किया था। थानेके पास चीवलमें उसवदातने ब्राह्मणोंको कितना ही दान दिया था। थानेके दशानू ग्राममें इन्होंने ७० सहस्र कार्षापण वा २ सहस्र सुवर्ण ब्राह्मणोंको बांटे थे। उसवदात निर्मित अम्बिका, पार, दमनगङ्गा, ताप्ती, कावेरी, दाहानु नदियोंके घाटोंपर यात्रियोंको उतराई देना पड़ती न थी। नदियोंके दोनों किनारे विश्राम स्थान और सोपान भी इन्होंने बनवाये। उसवदातने बौद्धोंको भी दान दिया था ! उच्च भारतमें सम्भवतः इन्होंने बौद्ध धर्मका अवलम्बन किया। उषवदत्तके कितने ही शिलाफलक निकले हैं। यह अपने समयके एक कर्ण रहे।
{{outdent|उससना (हिं॰ क्रि॰) १ उसरना, सरकना। २ श्वास ग्रहण करना, सांस निकालना।}}
{{outdent|उसांस, {{smaller|उसास देखो।}}}}
{{outdent|उसाना (हिं॰ क्रि॰) पकोरना, फटकारके साथ भूसी अलग करना।}}
{{outdent|उसारना (हिं॰ क्रि॰) १ विनाश करना, मिटाना। २ समापन करना, पूरे उतारना।}}
{{outdent|उसारा (हिं॰ पु॰) तृणाच्छादित द्वारप्रकोष्ठ, बरामदा, छत्ता। "नोकरको चाकर वाडर मांडीको उसारा।" {{smaller|(लोकोक्ति)}}}}
{{outdent|उसालना, {{smaller|उसारना देखो।}}}}
{{outdent|उसास (हिं॰ स्त्री॰) १ उच्छ्वास, आह। २ श्वास, सांस।}}
{{outdent|उसासना (हिं॰ क्रि॰) १ श्वास ग्रहण करना, सांस लेना। २ उच्छ्वास छोड़ना, आह भरना।}}
{{outdent|उसासी (हिं॰ स्त्री॰) श्वास ग्रहण करनेका समय, दम लेनेका वक़्त।}}
{{outdent|उसिनना, {{smaller|उसनना देखो।}}}}
{{outdent|उसीजना (हिं॰ क्रि॰) मन्द-मन्द तप्त होना, धीरे-धीरे चुरना।}}
{{outdent|उसौला (हिं॰) {{smaller|वसौला देखो।}}}}
{{outdent|उसौसा (हिं॰ पु॰) १ शीर्षस्थान, सिरहाना। २ उपधान, तकिया।}}
{{outdent|उसुवाना . (हिं॰ क्रि॰) सूजना, फूलना।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४०८'''|'''उसूल—उह्र'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उसूल (अ॰ पु॰) १ मूलतत्त्व, जड़। २ मत, अक़ीदा। यह शब्द 'अस्ल'का बहुवचन है।}}
{{outdent|उसेना (हिं॰ क्रि॰) पानीमें डाल और आगपर चढ़ा किसी चीज़को मिल न जानेतक पकाना, उबालना।}}
{{outdent|उसेय (हिं॰ पु॰) वेणु विशेष, किसी क़िस्मका बांस। यह खसिया तथा जयंतियाके पर्वत पर उपजता है। उच्चता ५०-६० फीट रहती है। इसके चोंगे बनते, जो अनेक वस्तु रखनेके काममें लगते हैं।}}
{{outdent|उसेर करना (हिं॰ क्रि॰) १ स्मरण रखना, याद न भूलना। २ प्रतीक्षा करना, राह देखना। ३ अप्रसन्न होना, नाराज, पड़ना।}}
{{outdent|उस्तरा (फा॰ पु॰) क्षुर, छुरा। काले बाल बनानेको उस्तरा लेना और किसीका माल मारनेको कोरे या उलटे उस्तरेसे मूंडना कहते हैं।}}
{{outdent|उस्ता (हिं॰ पु॰) खलीफा, होशियार नाई।}}
{{outdent|उस्ताद (फा॰ पु॰) १ अध्यापक, मास्टर। २ ज्ञानवृद्ध, बड़ी अक्लका आदमी। "आप उस्ताद आदमी हैं।" {{smaller|(लोकोक्ति)}} ३ धूर्त्त, चालाक, बदमाश। ४ गायक, वेश्याका गुरु। (त्रि॰) ५ कृतविद्य, जानकार।}}
{{outdent|उस्तादी (फा॰ स्त्री॰) १ कला कौशल, होशियारी, हुनर। २ चातुर्य, चालाकी। ३ अध्यापकका कार्य, मास्टरी।}}
{{outdent|उस्तानी (फा॰ स्त्री॰) १ गुरुपत्नी, उस्तादकी औरत। २ अध्यापिका, पढ़ानेवाली औरत। ३ धूर्त्त स्त्री, चालाक औरत।}}
{{outdent|उस्त्र (सं॰ पु॰) वस्-रक् सम्प्रसारणम्। स्थास्निदश्विवसिष्कसीति। उण् ४।१६३। १ वृष, बैल। २ रश्मि, किरण। ३ सूर्य, आफ़ताब। ४ अश्विनौकुमारद्वय। ५ देव। (त्रि॰) ६ उषारसम्बन्धीय, सबेरे देख पड़नेवाला। ७ दीप्त, चमकदार। ८ स्वच्छ, साफ़। ९ उद्गमनकारी, ऊंचा चढ़नेवाला।}}
{{outdent|उस्त्रधन्वन् (सं॰ त्रि॰) दीप्त धनुर्युक्त, चमकीली कमान् वाला।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|उस्त्रियामन् (सं॰ त्रि॰) प्रातः कालके समय बाहर निकलने वाला।}}
{{outdent|उस्त्रा (सं॰ स्त्री॰) उस्त्र-टाप्। १ गाभी, गाय। २ इन्दुरकर्णी लता, एक बेल। ३ पृथिवी, ज़मीन।}}
{{outdent|उस्त्रि (सं॰ स्त्री॰) वस्-कि। भ्रमणकारिणी, चलनेवाली।}}
{{outdent|उस्त्रिक (वै॰ पु॰) उस्त्र-ठन्। जीर्ण वृष, बुड्ढा बैल।}}
{{block center|<poem>
"ये त्वादेवोस्त्रिकं मन्यमानाः पापा भद्रमुपभो यजाः।" {{smaller|(ऋक् १।१६४।५)}}
</poem>}}
{{outdent|उस्त्रिका (सं॰ स्त्री॰) उस्त्रिक-टाप्। अल्पदुग्धवती गाभी, थोड़ा दूध देनेवाली गाय।}}
{{outdent|उस्त्रिय (वै॰ पु॰) उस्त्र स्वार्थे घ। जीर्णवृष, बुड्ढा बैल।}}
{{block center|<poem>
"बृहस्पतिरुस्त्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद्वावमती रुदानत्।" {{smaller|(ऋक् ४।५०।५)}}
</poem>}}
{{outdent|उस्त्रिया (वै॰ स्त्री॰) उस्त्रिय-टाप्। गवी, गाय।}}
{{block center|<poem>
"आयातुमित्र ऋतुभिः कल्पमानः संवेशयन् पृथिवीमुस्रियाभिः।" {{smaller|(अथर्व श९।१)}}
</poem>}}
{{outdent|उह् (धातु) भ्वादि पर॰ सक॰ सेट्। इसका अर्थ पीड़ित करना है।}}
{{outdent|उह (सं॰ अव्य॰) १ सम्बोधन वाचक ए ! अरे ! ओ ! २ निश्चयार्थवाणी—ठीक। दुरुस्त। खूब।}}
{{outdent|उहदा, {{smaller|ओहदा देखो।}}}}
{{outdent|उहदेदार, {{smaller|ओहदेदार देखो।}}}}
{{outdent|उहवां, उहां, {{smaller|वहां देखो।}}}}
{{outdent|उहान (सं॰ पु॰) देशविशेष, एक मुल्क।}}
{{outdent|उहार, {{smaller|ओहार देखो।}}}}
{{outdent|उहि, {{smaller|वह देखो।}}}}
{{outdent|उही, {{smaller|वही देखो।}}}}
{{outdent|उह्य (वै॰ अव्य॰) उह-क्विप्। १ खेदसूचक शब्द विशेष, ओह, अरे, हाय। (त्रि॰) २ वाहक, ले जानेवाला।}}
{{block center|<poem>
"हिंसाम उह्यत्र उषर्बुधः।" {{smaller|(ऋक् ४।१५।४)}}
</poem>}}
{{outdent|उह्यमान (सं॰ त्रि॰) वह्-शानच् कर्मणि। वहन किया जानेवाला, जो उठाया जाता हो।}}
{{block center|<poem>
"यथोह्यमानं खलु भोगभोजिना।" {{smaller|(नैषध)}}
</poem>}}
{{outdent|उह्र (सं॰ पु॰) वह्-रक् सम्प्रसारणम्। वृष, बैल।}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{center|{{xx-larger|'''ऊ'''}}}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊ (दीर्घ) संस्कृत तथा हिन्दी स्वरवर्णका षष्ठ अक्षर। इसका उच्चारणस्थान ओठ है। वर्णोद्धार तन्त्रमें लिखा है—उकारका रूप ह्रस्व उकारसे प्रायः मिला है। और विशेषता यह है, कि ऊकारके नीचे एक दूसरी वक्र रेखा नीचेकी तरफ अधिक जातीहै। समस्त रेखाओंमें यम, अग्नि और वरुण अवस्थित हैं। ऊर्ध्वगत मात्राको लक्ष्मी वा सरस्वती कहते हैं। इसका तन्त्रोक्त नाम—ऊ, कण्टक, रति, शान्ति, क्रोधन, मधुसूदन, कामराज, कुजेश, महेश, वामकर्णक, अर्धीश, भैरव, सूक्ष्म, दीर्घघोणा, सरस्वती, विलासिनी, विघ्नकर्त्ता, लक्ष्मण, रूपकर्षिणी, महाविद्येश्वरी, यष्टा, षगडोभू, और कान्त्यकुब्ज है। २ धातुका अनुबन्ध विशेष। "ऊक्वेत्कः।" {{smaller|(कवि॰ द्रु)}} (अव्य॰) वेञ्-क्विप्। १ सम्बोधन—ए ! ओ ! अरे ! २ वाक्यारम्भ—हां ! कहिये ! ३ दया—रहम—राम राम ! ४ रक्षा हिफाज़त—त्राहि त्राहि ! (पु॰) अवति रक्षति, अव-क्विप-ज्वर्। ज्वरत्वरस्त्रिव्यविमवामुपधायाश्च। पा ६।४।२०। ५ महादेव। ६ चन्द्र। ७ रक्षक, मुहाफिज़।}}
{{outdent|ऊगना (हिं॰ क्रि॰) उदय होना। निकलना।}}
{{outdent|ऊगाबाई (हिं॰ वि॰) निरर्थक, बेफायदा।}}
{{outdent|ऊख, {{smaller|इक्षु और ईख देखो।}}}}
{{outdent|ऊंग {{smaller|ऊंघ देखो।}}}}
{{outdent|ऊंगना (हिं॰ पु॰) पशुरोग विशेष, चौपायोंकी एक बीमारी। इस रोगमें पशु कुछ नहीं खाता-पीता। शरीर शीतल लगता और कान बह चलता है।}}
{{outdent|ऊंगा (हिं॰ पु॰) अपामार्ग, लट जीरा।}}
{{outdent|ऊंगी (स्त्री॰) {{smaller|ऊंगा देखो।}}}}
{{outdent|ऊंच (हिं॰ स्त्री॰) १ निद्रावेश, नींदका दौरा, झपकी। २ शण सूतकी बनी एक गेंड़ुरी। यह}}
<br><br>Vol III. 103
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
पहिये की धुरीमें लगती है। इससे पहिया सटा रहता और धुरकी कीलको रगड़से कटा नहीं करता।
{{outdent|ऊंघन (हिं॰ स्त्री॰) निद्रागम, झपकी।}}
{{outdent|ऊंघना (हिं॰ क्रि॰) निद्रागम होना, आंख झपकाना।}}
{{outdent|ऊंच, ऊंचा, (हिं॰) {{smaller|उच्च देखो।}}}}
{{outdent|ऊंचाई, {{smaller|उच्चता देखो।}}}}
{{outdent|ऊंचे (हिं॰) {{smaller|उच्चकै देखो।}}}}
{{outdent|ऊंछ (हिं॰ पु॰) राग विशेष।}}
{{outdent|ऊंछना (हिं॰ क्रि॰) वाल झाड़ना, कंघी करना।}}
{{outdent|ऊंट (हिं॰) {{smaller|उष्ट्र देखो।}}}}
{{outdent|ऊंट कटारा (हिं॰ पु॰) उष्ट्रकण्टक क्षुप, एक पौधा। इस झाड़ीमें कांटे होते हैं। पत्र भी दीर्घ एवं कण्टकाकार हैं। शाखा चुभनेवाले तन्तुओंसे युक्त रहती हैं। यह प्रस्तरमय तथा अनुर्वरा भूमिमें उपजता है। उष्ट्रका यह प्रिय खाद्य है। इसका मूल जलमें रगड़ कर देनेसे गर्भिणीको सुखप्रसव होता है। किसी-किसीके मतानुसार ऊंटकटारा बलवर्धक भी ठहरता है।}}
{{outdent|ऊंटकटौरा, {{smaller|ऊंटकटारा देखो।}}}}
{{outdent|ऊंटगाड़ी (हिं॰ स्त्री॰) ऊंटके सहारे चलनेवाली गाड़ी। इसमें प्रायः दो खण्ड होते हैं। रात दिनमें ऊंट गाड़ी ३० कोससे कम नहीं चलती।}}
{{outdent|ऊंटवान् (हिं॰ पु॰) उष्ट्रसञ्चालक, ऊंटको हांकनेवाला।}}
{{outdent|ऊंडा (हिं॰ पु॰) १ पात्र विशेष, एक बरतन। इसमें रुपया पैसा और गहना-गांठ भर भूमिके मध्य गाड़ते हैं। २ तहखना, चहबच्चा। (वि॰) ३ गम्भीर, गहरा।}}
{{outdent|ऊंदर, {{smaller|इन्दुर देखो।}}}}
{{outdent|ऊंधा, {{smaller|औंधा देखो।}}}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४१०'''|'''ऊंहूं—ऊतला'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊंहूं (हिं॰ अव्य॰) नैव, नहीं, कभी नहीं, हो नहीं सकता।}}
{{outdent|ऊक (हिं॰ पु॰) १ उल्का, शहाब-साक़िब, टूटता तारा। २ अग्नि, आग। (स्त्री॰) ३ चूक, किसी बात या कामका भूल जाना।}}
{{outdent|ऊकना (हिं॰ क्रि॰) १ चूकना, भूलना, भ्रममें पड़ना। २ ताप देना, जलाना।}}
{{outdent|ऊख (हिं॰ स्त्री॰) इक्षु, ईख। इक्षु देखो।}}
{{outdent|ऊखम (हिं॰) उष्म देखो।}}
{{outdent|ऊखल (हिं॰ पु॰) उदूखल, कांडी, छावन। यह काठ वा प्रस्तरनिर्मित एक गम्भीर पात्र है। इसमें डालकर धान आदिकी भूसी मूसलके सहारे निकालते हैं।}}
{{outdent|ऊगना (हिं॰ क्रि॰) जमना, जड़ पकड़ना, अंकुरा फूटना।}}
{{outdent|ऊगरा (हिं॰ पु॰) उष्ण खाद्य, उबला हुआ खाना।}}
{{outdent|ऊगू—युक्तप्रदेशके उनाव ज़िलेका एक नगर। यह समान भूमिपर उनावसे ग्यारह और फ़तेहपुर-चौरासीसे ढाई कोस दूर अवस्थित है। कन्नौजके पंवार राजपूत उग्रसेनने इसे बसाया था। ई॰ १५ वीं शताब्दी तक उनके वंशज ऊगूमें राज्य करते रहे। पीछे जौनपुरके इब्राहीम शरक़ीने उन्हें एक युद्धमें पछाड़ा था। राजपूतोंका प्रभाव घटने पर कुनबियोंने इसे अपने हाथ किया। ऊगूमें कई मन्दिर बने हैं। राजप्रासाद और न्यायालयका ध्वंसावशेष भी देख पड़ता है। वर्षमें एक बार मेला और सप्ताहमें दो बार बाज़ार लगता है।}}
कहते है—राजपूतोंके समय एक कवि ऊगू गये थे। किन्तु उनका उचित सत्कार न हुआ। उन्होंने उससे अप्रसन्न हो शाप दिया था—
{{block center|<poem>
"ऊगूके आसपास दारिदकी डौंडी फिरै टोरत चकौड़ी फिरैं
लौंडी सरकारकी।"
</poem>}}
{{outdent|ऊज (हिं॰ पु॰) उत्पात, बखेड़ा।}}
{{outdent|ऊजड़ (हिं॰ वि॰) जनशून्य, खाली, जो बसा न हो।}}
{{outdent|ऊजर (हिं॰ वि॰) १ उजला, साफ़, जो मैला न हो। २ ऊजड़, वीरान।}}
{{outdent|ऊजरा, {{smaller|ऊजर देखो।}}}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊटना (हिं॰ क्रि॰) १ अभिमान करना, मन बढ़ना। २ विचारना, सोचना, खयालमें लाना।}}
{{outdent|ऊटपटांग (हिं॰ वि॰) अंडबंड, वाहियात, खराब।}}
{{outdent|ऊड़ा (हिं॰ पु॰) १ न्यूनता, घटी। २ विनाश, बरबादी।}}
{{outdent|ऊड़ो (हिं॰ स्त्री॰) यन्त्र विशेष, ढरकी। यह जुलाहोंके सेठेमें सटी रहती है। इसपर वह लिपटे सूतको पट्टीमें फिर-फिर लगाते जाते हैं। २ यन्त्र विशेष, एक चरखी। इसपर रेशमके लच्छे डाले और एक तरही परेतोंमें निकाले जाते हैं। ३ डुबकी, गोता। ४ पनडुब्बी।}}
{{outdent|ऊढ़ (सं॰ त्रि॰) वह्-क्त। १ विवाहित, ब्याहा। २ वहन किया हुआ, जो उठाया गया हो। ३ धृत, पकड़ा हुआ। ४ अङ्गीकृत, माना हुआ।}}
{{block center|<poem>
"भार्योढं तमवज्ञाय तस्थे सौमित्रयेऽसकौ।" {{smaller|(भट्टि)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊढ़कङ्कट (सं॰ त्रि॰) ऊढ़ो धृतः कङ्कटो येन। वर्मयुक्त, सूजा या फूला हुआ।}}
{{outdent|ऊढ़ना (हिं॰ क्रि॰) चिन्तन करना, सोचना, अनुमान लगाना।}}
{{outdent|ऊढ़भार्य (सं॰ पु॰) ऊढ़ा भार्या येन, बहुव्री॰। विवाहित, ब्याहा i}}
{{outdent|ऊढ़वयस् (सं॰ पु॰) युवापुरुष, नौजवान् मर्द।}}
{{outdent|ऊढ़ा (सं॰ स्त्री॰) ऊढ़-टाप्। १ भार्या, जोरू। २ विवाहिता कन्या, ब्याही लड़की। ३ नायिका-भेद। जो ब्याही स्त्री निज पतिको छोड़ अन्य पुरुषसे आसक्त रहती, उसे जनता ऊढ़ा नायिका कहती है।}}
{{outdent|ऊढ़ि (सं॰ स्त्री॰) वह्-क्तिन्। १ वहन, ढोवाई। २ विवाह, शादी।}}
{{outdent|ऊर्णीतेजस् (सं॰ पु॰) एक बुद्ध।}}
{{outdent|ऊत (सं॰ त्रि॰) वे-क्त अथवा वयी तन्तुसन्ताने, ऊ-क्त। १ ओतवयन, बुना हुआ। २ ग्रथित, गूंथा हुआ। ३ स्यूत, सीया हुआ। ४ रक्षित, हिफ़ाज़त किया हुआ। ५ विख्यात, मशहूर। (हिं॰ वि॰) ६ पुत्रहीन, जिसके लड़का न रहे। ७ मूर्ख, गंवार। (पु॰) ८ भूत प्रेतात्मा।}}
{{outdent|ऊतर (हिं') {{smaller|उत्तर देखो।}}}}
{{outdent|ऊतला (हिं॰ वि॰) उतावला, जल्दबाज़}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४१२'''|'''ऊनोदरतातप—उमरखेड़'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
हुआ। (स्त्री॰) २ न्यून, थोड़ी। ३ न्यूनता, घटी, कमी। ४ थोड़ी, छोटी।
{{outdent|ऊनोदरतातप (सं॰ पु॰) जैनव्रतविशेष। इसमें प्रत्यह एक-एक ग्रास भोजन कम करते हैं।}}
{{outdent|ऊप (हिं॰ पु॰) अन्नव्याज, अनाजका सूद। कृषक बोनेके लिये महाजनसे अन्न उधार लेते और खेत कटनेपर मन पीछे १।४ सेर अधिक दे देते हैं। ड्योढ़ा या सवाया ऊप भी उठता है।}}
{{outdent|ऊपना (हिं॰ क्रि॰) व्याजपर अन्न ऋण देना, सूदपर अनाज उठाना।}}
{{outdent|ऊपर (हिं॰ उप॰) १ उपरि, वर, पर। (क्रि॰ वि॰) २ ऊर्ध्व, आगे। ३ अधिक, ज्यादा। "जितना ऊपर उठना ही नीचे।" {{smaller|(लोकोक्ति)}} ४ पश्चात्, पीछे। ५ प्रतिकूल, खिलाफ।}}
{{outdent|ऊपरी (हिं॰ क्रि॰ वि॰) ऊर्ध्वसे, सरपर।}}
{{block center|<poem>
"तौलोके तीनो नरे' ऊपरी टूटे लाठ !" {{smaller|(लोकोक्ति)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊपरी (हिं॰ वि॰) १ बहिरङ्ग, बाहरी। २ अगम्भीर, उथला। ३ कृत्रिम, बनावटी। ४ अन्यसम्बन्धीय, पराया। ५ अपरिचित, अजनबी। ६ विदेशीय, जो अपने मुल्कका न हो। ७ शिथिल, ढीला। ८ अयोग्य, नाकाबिल।}}
{{outdent|ऊब (सं॰ स्त्री॰) १ उद्वेग, घबराहट। २ अरुचि, नफरत। ३ उत्साह, हौसला।}}
{{outdent|ऊबट (हिं॰ पु॰) गौणमार्ग, बड़ी राहके पासकी गली।}}
{{outdent|ऊबड़खाबड़ (हिं॰ वि॰) उच्च-नीच, नाहमवार, उंचा-नीचा।}}
{{outdent|ऊबना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्विग्न होना, घबरा जाना, उकताना। २ घृणा या नफरत करना।}}
{{outdent|ऊबरना, {{smaller|उभरना देखो।}}}}
{{outdent|ऊभ (हिं॰ वि॰) १ उच्च, ऊंचा। (स्त्री॰) २ व्याकुलता, घबराहट। ३ घृणा, नफरत। ४ उष्मा, गरमी। ५ उत्साह, हौसला। ६ श्वासरोग, दमीकी बीमारी।}}
{{outdent|ऊभना (हिं॰ क्रि॰) १ दण्डायमान होना, उठना। २ उद्विग्न होना, घबराना। ३ शीघ्र शीघ्र निश्वास छोड़ना, हांफना।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊभा (हिं॰ पु॰) गर्त, गड्डा।}}
{{outdent|ऊभासांभी (हिं॰ स्त्री॰) उद्वेग, घबराहट।}}
{{outdent|ऊम् (सं॰ अव्य॰) जय्-मुक्। १ क्रोधोक्ति, मारो ! २ जिज्ञासा, क्या ! क्यों ! कैसे ! ३ निन्दा, छी ! छी ! ४ स्पर्द्धा, इतना ! ऐसा !}}
{{outdent|ऊम (सं॰ क्ली॰) अवतीति, अव-कित्-मन्। १ नगर, शहर। २ देशविशेष, एक मुल्क। {{smaller|(सिद्धान्तकौमुदी)}} ३ रक्षक, रखवाला।}}
{{outdent|ऊमक (हिं॰ स्त्री॰) उत्साह, बाढ़, उभार, झपट।}}
{{outdent|ऊमट (हिं॰ वि॰) क्षत्रियोंकी एक जाति, मालवेके ठाकुर।}}
{{outdent|ऊमना (हिं॰ क्रि॰) उठना, बढ़ना, उभरना।}}
{{outdent|ऊमर (हिं॰ पु॰) १ उदुम्बर, गूलर। २ वणिक्-जातिका एक भेद।}}
{{outdent|उमरकोट—१ सिन्धु प्रदेशके थार और पारकर जिलेकी एक तहसील। चाचर तहसीलको लेते भूमिका परिमाण ११०५ वर्गमील है। लोकसंख्या प्रायः ८० हजार होगी। २ उक्त तहसीलका एक नगर। यह अक्षा॰ २५° २१' उ॰ तथा द्राघि॰ ६९° ४६' पू॰पर अवस्थित है। पूर्व मरुभूमिके टीले इधर उधर खड़े हैं। नहर नगरमें आयी है। उमरकोटसे हैदराबादको सड़क लगी है। नगरमें कचहरी, अदालत, थाना, डाकंखाना, अस्पताल, स्कूल, तारघर, धर्मशाला और पिंजरापोल सभी हैं। ५०० वर्ग-फीटका एक किला बना है। तालपुरवाले मीरोंके समय उसमें ४०० सिपाही रहते थे। आजकल सरकारी इमारतें किलेमें ही हैं। घी, ऊंट, गाय, बैल, तम्बाकू, रुई, धातु, रंग, सूखेफल, तैल, कपड़े और ऊनका व्यवसाय चलता है। जुलाहे ऊंटकी भूलें और मोटे कपड़े बुनते हैं। १५४२ ई॰को उमरकोटमें ही अकबर बादशाहने जन्म लिया था। पहले यहां राजपूतोंका राज्य रहा। किन्तु १८१३ ई॰में तलपुरके मीरोंने इसपर अधिकार किया था। फिर १८४३ ई॰में उमरकोट अंगरेजोंके हाथ लगा।}}
{{outdent|उमरखेड़—बरार प्रान्तके वासिम जिलेकी पूसद तहसीलका प्रधान नगर। यह अक्षा॰ १९° ३६' उ॰}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऊताताई—ऊनी'''|'''४११'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊताताई (हिं॰ वि॰) बे समझ, उजड्ड, ऊटपटांग काम करनेवाला।}}
{{outdent|ऊति (सं॰ स्त्री॰) अव-क्तिन् उट्, वे-क्तिन्। १ रक्षा, हिफ़ाज़त। २ वयन, बुनावट। ३ सिलाई, सीनेका काम। ४ लीला, तमाशा। ५ चरणा, चुवाई। कर्तरि क्तिच्। ६ रक्षाकर्त्री, रखवाली करनेवाली। ७ पुराणोक्ते दशविध लक्षण में कर्मकी वासना।}}
{{block center|<poem>
"मन्वन्तराणि सद्धर्म ऊतयः कर्मवासनाः।" {{smaller|(भागवत २।१०।१४)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊतिम (हिं॰) {{smaller|उत्तम देखो।}}}}
{{outdent|ऊद (अ॰ पु॰) १ अगुरु वृक्ष, अगरका दरख्त। २ अगुरुकाष्ठ, अगरकी लकड़ी। ३ वादित्र विशेष, बरबत बाजा। (हिं॰) ४ उद्विड़ाल, ऊद बिलाव।}}
{{outdent|ऊदन, {{smaller|ऊदब देखो।}}}}
{{outdent|ऊदबत्ती (हिं॰ स्त्री॰) धूपबत्ती। यह अगुरुकाष्ठसे दाक्षिणात्यमें प्रस्तुत की जाती है। पूजापाठके समय धूप देने और सुगन्ध लेनेको इसे सुलगाते हैं।}}
{{outdent|ऊदबिलाव (हिं॰) {{smaller|उद्विड़ाल देखो।}}}}
{{outdent|ऊदल (हिं॰ पु॰) १ वृक्ष-विशेष, गुलबांदल। यह ब्रह्मा, दाक्षिणात्य और हिमालयके नीचे वनमें अधिक उपजता है। इसका तन्तु बहुत दृढ़ होता है। उससे बहुत मोटी रज्जु बनती है। २ उदयसिंह। यह आल्हाके छोटे भाई थे। ऊदल महोबेवाले नृपति परमालके मुख्य सामन्तोंमें एक थे। बाल्य कालमें ही इन्होंने माड़व पर चढ़ अपने बापका दांव लिया। पृथ्वीराजसे भी इन्होंने कई बार युद्ध किया था। अन्तको बेलाके गौनेमें पृथ्वीराजके अन्यतम वीर चौड़ाने इन्हें मार डाला। ऊदलकी वीरता भारतप्रसिद्ध है।}}
{{outdent|ऊदा (हिं॰ वि॰) १ रक्तवर्ण मिश्रित कृष्णवर्ण, सुरखी-आमेज़ काला बैंगनो। (पु॰) अश्वविशेष, एक घोड़ा। यह रक्तवर्ण मिश्रित कृष्णवर्णका होता है।}}
{{outdent|ऊदी-सेम (हिं॰ स्त्री॰) केवांच।}}
{{outdent|ऊधन् (वै॰ क्ली॰) ऊधस् पृषोदरात् सस्य नः। पशुका स्तन, चौपायेका थन।}}
{{block center|<poem>
"ऊधार्न नग्नमुषोम ते दिवा सखाय वन्न ऊधनि।" {{smaller|(ऋक् ८।१०।२०)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊधन्य (सं॰ क्ली॰) ऊधनि भवम्, ऊधन्-यत्। दुग्ध, दूध।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊधम (हिं॰ पु॰) उत्पात, बखेड़ा, झगड़ा।}}
{{outdent|ऊधमी (हिं॰ वि॰) उपद्रवी, झगड़ालू, बखेड़िया।}}
{{outdent|ऊधर् (वै॰ क्ली॰) ऊधस् पृषोदरादित्वात् सस्य रः। पशुस्तन, चौपायोंका थन। "ऊधर्ननग्ना जरन्ते।" {{smaller|(ऋक् ४।१२)}}}}
{{outdent|ऊधव (हिं॰) {{smaller|उद्धव देखो।}}}}
{{outdent|ऊधस् (वै॰ क्ली॰) उन्द-असुन्, उन्दस्य ऊधादेशः। पशुस्तन, चौपायेका थन। {{smaller|(शतपथब्रा॰ २।५।२।५)}}}}
{{outdent|ऊधस्य (सं॰ क्ली॰) ऊधसि भवम्, ऊधस्-यत्। १ दुग्ध, दूध। (त्रि॰) २ दुग्धकर, दूध पैदा करनेवाला।}}
{{outdent|ऊधस्वती (सं॰ स्त्री॰) ऊधस्-मतुप्, मस्य वः स्त्रियां ङीप्। अपने स्तनमें अधिक दुग्ध रखनेवाली गौ, जो गाय अपने थनमें ज़्यादा दूध रखती हो।}}
{{block center|<poem>
"विधिधुःस्म व्रजान् गावः पयस्योधखतीर्मु दा।" {{smaller|(भागवत १।१०।१५)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊधो (हिं॰) {{smaller|उद्धव देखो।}}}}
{{outdent|ऊन (धातु) भ्वा॰ चुरा॰ पर॰ सक॰ सेट्। "ऊनृक परिहाने।" {{smaller|(कवि॰ द्रु)}} न्यून बनाना, कम करना, घटाना।}}
{{outdent|ऊन (सं॰ त्रि॰) ऊनन्-अच् अथवा अव-नक्-ऊट्। ज्वरत्वरस्त्रिव्यविमवामिति। पा ६।४।२०। १ हीन, छोटा। २ न्यून, कम। ३ असम्पूर्ण, नातमाम। "ऊनं न सत्वेष्वधिको बबाधे।" {{smaller|(रघु २।१४)}} (हिं॰) ४ ऊर्णा, चौपायोंका गर्म रोयां। भारतमें हिमालयके मेषका रोयां उत्तम होता है। काश्मीर तथा तिब्बत ऊर्णाके लिये विख्यात है। अफ़ग़ानिस्तानकी भेड़ भी अच्छा ऊन देती है। ऊर्णाका तन्तु बहुत सूक्ष्म, दीर्घ, दृढ़, कोमल और दीप्त निकलता है।}}
{{outdent|ऊनक (सं॰ त्रि॰) ऊन स्वार्थे कन्। हीन, छोटा।}}
{{outdent|ऊनचत्वारिंश (सं॰ त्रि॰) ऊनचत्वारिंशतः पूरणः, डट्। चत्वारिंशसे एक संख्या न्यून, उंचालीस, एक कम चालीस, ३९।}}
{{outdent|ऊनता (हिं॰ स्त्री॰) न्यूनता, कमी।}}
{{outdent|ऊनत्रिंशत् (सं॰ त्रि॰) उनतीस, २९।}}
{{outdent|ऊनविंशति (सं॰ त्रि॰) उन्नीस, १९।}}
{{outdent|ऊना (हिं॰ वि॰) न्यून, कम, छोटा।}}
{{outdent|ऊनित (सं॰ त्रि॰) घटाया या कम किया हुआ।}}
{{outdent|ऊनी (हिं॰ वि॰) १ ऊर्णनिर्मित, ऊनका बना}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋतवत्—ऋतु'''|'''४३५'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋतवत् (वै॰ त्रि॰) उचितवक्ता, जो सच कहता हो।}}
{{outdent|ऋतवाक् (वै॰ पु॰) सत्य भाषण, रास्तगोई।}}
{{outdent|ऋतवादी (वै॰ त्रि॰) ऋतं सत्यं वदति, ऋत-वद्-णिनि। सत्यवादी, सच बोलनेवाला।}}
{{outdent|ऋतव्रत (सं॰ पु॰) शाकद्वीपस्थ एक उपासक।}}
{{outdent|ऋतसद् (वै॰ पु॰) ऋते यज्ञे सीदति, ऋत-सद्-क्विप्। १ अग्नि। (त्रि॰) २ सत्यमें प्रतिष्ठित, सचाईमें रहनेवाला। ३ यज्ञस्थानीय। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतसदन (वै॰ क्ली॰) ऋताय यज्ञाय सीदन्त्यस्मिन्, ऋत-सद्-ल्युट्। यज्ञार्थ उपवेशन-स्थान, ठीक या मामूली बैठक।}}
{{outdent|ऋतसाप् (वै॰ त्रि॰) १ यज्ञ प्रदान करनेवाला, जो यज्ञ देता हो।}}
{{block center|<poem>
"ये चिद्धिपूर्व ऋतसाप आसन्।" {{smaller|(ऋक् १।१७९।२)}}
"ऋतसाप ऋतस्य यज्ञस्यापरितारः।" {{smaller|(सायण)}}
</poem>}}
२ धार्मिक कार्य करनेवाला। ३ धार्मिक विश्वासमें दृढ़।
{{outdent|ऋतस्तुभ् (वै॰ पु॰) उचित रूपसे स्तुति करनेवाले एक वैदिक ऋषि।}}
{{outdent|ऋतस्था (वै॰ त्रि॰) उचित रूपसे दण्डायमान, सीधा खड़ा होनेवाला।}}
{{outdent|ऋतस्पति (सं॰ पु॰) ऋतस्य यज्ञस्य पतिः, ६-तत्। १ यज्ञपति। २ वायु।}}
{{outdent|ऋतस्पृक् (वै॰ त्रि॰) १ सत्यसे प्रेम रखनेवाला, जो सचको चाहता हो। २ जलको स्पर्श करनेवाला, जो पानीको छूता हो।}}
{{outdent|ऋतानृत (सं॰ क्ली॰) सत्य और असत्य, झूठ-सच।}}
{{outdent|ऋतायु (वै॰ त्रि॰) १ धार्मिक व्यवस्थापर चलनेवाला। २ यज्ञाभिलाषी, जो यज्ञ करना चाहता हो। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋतायी, {{smaller|ऋतायु देखो।}}}}
{{outdent|ऋतावन् (वै॰ त्रि॰) ऋतमस्यास्ति, ऋत-वनिप् दीर्घश्च। १ यज्ञविशिष्ट। २ प्रकृत व्यवहारयुक्त, सच्चे चाल-चलनवाला। ३ पवित्र, पाक, माननेवाला। ४ खाद्य उधार मांगनेवाला।}}
{{outdent|ऋतावृध् (वै॰ त्रि॰) ऋतं यज्ञं वर्द्धयति, ऋत-वृध्-क्विप् दीर्घश्च। १ यज्ञवर्द्धक। २ सत्य एवं प्रेमसे प्रसन्न रहनेवाला।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋतापहृ, {{smaller|ऋतापात् देखो।}}}}
{{outdent|ऋतापात् (वै॰ पु॰) धार्मिक व्यवस्थाको प्रतिपालन करनेवाला।}}
{{outdent|ऋति (सं॰ स्त्री॰) ऋ-क्तिन्। १ कल्याण, भलाई। २ पथ, राह। ३ निन्दा, हिकारत। ४ स्पर्द्धा, हसद। ५ गमन, चाल। ६ अमङ्गल, बुराई। ७ नरमेध यज्ञस्थ देवताविशेष। ८ आक्रमण, हमला। ९ रीति, चलन। १० सम्पद्, खुशहाली। ११ सत्य, रास्ती। १२ स्मरण, याद। १३ शरण, पनाह। १४ दुर्भाग्य, बदबख्ती।}}
{{outdent|ऋतिकर (सं॰ त्रि॰) ऋतिं करोति, ऋति-कृ-खच्-मुम्। १ शुभकारक, भलाई करनेवाला। २ अमङ्गल-कारक, बुराई करनेवाला।}}
{{outdent|ऋतीया (सं॰ स्त्री॰) ऋत-ईयङ्-टाप्। १ घृणा, नफरत। २ जुगुप्सा, हिकारत। ३ लज्जा, शर्म।}}
{{outdent|ऋतीषह् (वै॰ त्रि॰) ऋतिं पीडां शत्रुं वा सहते, ऋति-सह-क्विप्, दीर्घः षत्वञ्च। १ पीड़ा सहन करने-वाला, जो तकलीफ उठाता हो। २ शत्रुको वशीभूत करनेवाला, जो दुश्मनको दबाता हो।}}
{{outdent|ऋतीषात्, {{smaller|ऋतीषह् देखो।}}}}
{{outdent|ऋतु (सं॰ पु॰) ऋ-तुः-कित्। ऋतेश्च तुः। उण् १।७२। १ काल विशेष, मौसम, गरमी, बरसात और जाड़ेका समय। हिम, शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा और शरत् छह ऋतु होते हैं। वेदमें पांच और पाश्चात्य शास्त्रमें चार ऋतु कहे हैं। साधारण लोग तीन ही ऋतु मानते हैं।}}
पहले सोचना चाहिये—ऋतु पड़नेका कारण क्या है? आदिवेद ऋक्संहिताके मतसे सूर्य ही ऋतुके विभागकारी हैं—
{{block center|<poem>
"उतश्यावास्त्वर्तुरर्द्ध ररमतिः सविता देव आगात्।" {{smaller|(ऋक् २।३८।४)}}
</poem>}}
विरामहीन और ऋतुविभागकारी ज्योतिष्मान् सूर्य जब फिर निकलते, तब मानव शय्या छोड़ चलते हैं।
ऋक्संहिताके मतसे ऋतु पांच हैं। कोई-कोई छह भी बताता है।
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४३६'''|'''ऋतु'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
"पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्द्धे पुरीषिणं। अथे
मे अन्य उपरे विचक्षणं सप्तचक्रे षळर आहुरर्पितं।" {{smaller|(ऋक् १।१६४।१२)}}
</poem>}}
पञ्चपाद और द्वादश आकृतिविशिष्ट आदित्य स्वर्गके परम अर्द्धपर रहते, जिन्हें कुछ लोग पुरीषी कहते हैं। जब अपर अर्द्धपर आते, तब वह किसी किसीके मुह छह अरयुक्त सप्त चक्रविशिष्ट रथमें अर्पित कहे जाते हैं।
यहां पञ्चपादका अर्थ पञ्चर्तु है। सायणके मतसे हेमन्त और शिशिरको एक ही मान पञ्च ऋतु कहे हैं।
ऋक्संहितामें इसका भी आभास मिलता, कि पृथिवीकक्षकी गतिके अनुसार ऋतु बदलता है।
{{block center|<poem>
"पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने तस्मिन्ना तस्थुर्भुवनानि विश्वा।
तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न शीर्यते सनाभिः॥"
{{smaller|(ऋक् १।१६४।१३)}}
</poem>}}
परिवर्तनशील पञ्च अरयुक्त चक्रमें निखिल भुवन लीन है। उसका अक्ष अधिकतर भार वहनसे भी क्लान्त नहीं होता। उसकी नाभि चिरकाल समान रहती और कभी शीर्ण नहीं पड़ती।
सुश्रुतने लिखा है—
{{block center|<poem>
"संवत्सरात्मनो भगवानादित्यो गतिविशेषेणाक्षिनिमेषकाष्ठाकलामुहूर्त्ताहोरात्रपक्षमासर्त्वयनसंवत्सरयुगप्रविभागं करोति।" {{smaller|(सू० ३अ०)}}
</poem>}}
भगवान् सूर्य गतिविशेष द्वारा कालके देहको अक्षि, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर और युग अंशमें बांटते हैं।
सुश्रुतके मतसे—शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत् और हेमन्त छह ऋतु होते हैं। द्वादश मासके मध्य माघ-फाल्गुन शिशिर, चैत्र-वैशाख वसन्त, ज्येष्ठ-आषाढ़ ग्रीष्म, श्रावण-भाद्र वर्षा, आश्विन-कार्त्तिक शरत् और अग्रहायण-पौष हेमन्त है। शीत, उष्ण और वर्षा आदि ऋतुका लक्षण है। काल चन्द्रसूर्य द्वारा विभक्त होनेसे दो अयन पड़ते हैं, दक्षिणायन और उत्तरायण। दक्षिणायनमें वर्षा, शरत् और हेमन्त तीन ऋतु लगते हैं। कारण चन्द्र तेजःपुञ्ज हो जाते हैं। इसीसे अम्ल, लवण और मधुर तीन
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
रसोंकी ओषधि विशेष रूपसे उत्पन्न होती हैं। प्राणीमात्र क्रमशः बलवान् बनने लगते हैं। उत्तरायण कालमें शिशिर, वसन्त और ग्रीष्मका आगमन होता है। कारण सूर्य तेजःपुञ्ज रहा करते हैं। इसीसे कटु, कषाय और तिक्त तीन रसोंका बल बढ़ता और प्राणियोंका पराक्रम क्रमशः घटता है।
आयुर्वेदके मतान्तरसे—वर्षा, शरत्, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म और प्रावृट् छह ऋतु हैं। भाद्र-आश्विन वर्षा, कार्त्तिक-अग्रहायण शरत्, पौष-माघ हेमन्त, फाल्गुन-चैत्र-वसन्त, वैशाख-ज्येष्ठ ग्रीष्म और आषाढ़-श्रावण प्रावृट्का समय होता है।
छह ऋतुके मध्य वर्षाकालमें नूतन ओषधि उपजती, इसीसे अल्पवीर्य, जल क्लेदयुक्त और मृत्तिका-मलपूर्ण रहती हैं। इस ऋतुमें आकाश मेघाच्छन्न होता है। भूमि और प्राणिगणका देह दोनों जलसे आर्द्र पड़ जाते हैं। आर्द्र देहमें शीतल वायुके संयोगसे अग्निमन्द्य आता है। सुतरां नूतन अल्पवीर्य ओषधि खाने या अपरिष्कृत जल पीने पर परिपाकके समय अम्लरस बढ़ता और गला जलने लगता है। पित्तका सञ्चय होनेसे विदाह अजीर्ण घेर लेता है। शरत्कालमें आकाश मेघशून्य रहने और कर्दम शुष्क पड़नेसे सञ्चित पित्त सूर्यकिरण द्वारा समस्त शरीरमें फैल पैत्तिक व्याधि उपजाता है। हेमन्तकालमें ओषधि परिपक्व और बलवान् होती हैं। जल निर्मल रहता है। सूर्यका तेज क्रमशः घटने लगता है। इसीसे हिम और शीतल वायु द्वारा प्राणिगणका देह जड़ीभूत पड़ जाता है। फिर स्निग्ध, शीतल, गुरुपाक एवं पिच्छिल ओषधि समूह और जल द्वारा शरीरमें श्लेष्माका सञ्चय होता है।
वसन्तकालमें जीवका शरीर अल्प जड़ीभूत रहता है। पूर्व सञ्चित श्लेष्मा सूर्यकिरण द्वारा सर्वशरीरमें फैल जानेसे अपना रोग बढ़ा देता है।
ग्रीष्मकालमें जल लघु पड़ जाता है। ओषधि नीरस, रूक्ष और लघु लगती है। सूर्यके किरणसे प्राणिगणका शरीर भी शुष्कप्राय देख पड़ता है। ऐसे ओषधिभक्षण और जलपानपर नीरस, रुक्षता तथा
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४३६'''|'''ऋतु'''|}}
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<div style="text-align: justify;">
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"पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्द्धे पुरीषिणं। अथे
मे अन्य उपरे विचक्षणं सप्तचक्रे षळर आहुरर्पितं।" {{smaller|(ऋक् १।१६४।१२)}}
</poem>}}
पञ्चपाद और द्वादश आकृतिविशिष्ट आदित्य स्वर्गके परम अर्द्धपर रहते, जिन्हें कुछ लोग पुरीषी कहते हैं। जब अपर अर्द्धपर आते, तब वह किसी किसीके मुह छह अरयुक्त सप्त चक्रविशिष्ट रथमें अर्पित कहे जाते हैं।
यहां पञ्चपादका अर्थ पञ्चर्तु है। सायणके मतसे हेमन्त और शिशिरको एक ही मान पञ्च ऋतु कहे हैं।
ऋक्संहितामें इसका भी आभास मिलता, कि पृथिवीकक्षकी गतिके अनुसार ऋतु बदलता है।
{{block center|<poem>
"पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने तस्मिन्ना तस्थुर्भुवनानि विश्वा।
तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न शीर्यते सनाभिः॥"
{{smaller|(ऋक् १।१६४।१३)}}
</poem>}}
परिवर्तनशील पञ्च अरयुक्त चक्रमें निखिल भुवन लीन है। उसका अक्ष अधिकतर भार वहनसे भी क्लान्त नहीं होता। उसकी नाभि चिरकाल समान रहती और कभी शीर्ण नहीं पड़ती।
सुश्रुतने लिखा है—
{{block center|<poem>
"संवत्सरात्मनो भगवानादित्यो गतिविशेषेणाक्षिनिमेषकाष्ठाकला- मुहूर्त्ताहोरात्रपक्षमासर्त्वयनसंवत्सरयुगप्रविभागं करोति।" {{smaller|(सू० ३अ०)}}
</poem>}}
भगवान् सूर्य गतिविशेष द्वारा कालके देहको अक्षि, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त्त, अहोरात्र, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर और युग अंशमें बांटते हैं।
सुश्रुतके मतसे—शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत् और हेमन्त छह ऋतु होते हैं। द्वादश मासके मध्य माघ-फाल्गुन शिशिर, चैत्र-वैशाख वसन्त, ज्येष्ठ-आषाढ़ ग्रीष्म, श्रावण-भाद्र वर्षा, आश्विन-कार्त्तिक शरत् और अग्रहायण-पौष हेमन्त है। शीत, उष्ण और वर्षा आदि ऋतुका लक्षण है। काल चन्द्रसूर्य द्वारा विभक्त होनेसे दो अयन पड़ते हैं, दक्षिणायन और उत्तरायण। दक्षिणायनमें वर्षा, शरत् और हेमन्त तीन ऋतु लगते हैं। कारण चन्द्र तेजःपुञ्ज हो जाते हैं। इसीसे अम्ल, लवण और मधुर तीन
</div>
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<div style="text-align: justify;">
रसोंकी ओषधि विशेष रूपसे उत्पन्न होती हैं। प्राणीमात्र क्रमशः बलवान् बनने लगते हैं। उत्तरायण कालमें शिशिर, वसन्त और ग्रीष्मका आगमन होता है। कारण सूर्य तेजःपुञ्ज रहा करते हैं। इसीसे कटु, कषाय और तिक्त तीन रसोंका बल बढ़ता और प्राणियोंका पराक्रम क्रमशः घटता है।
आयुर्वेदके मतान्तरसे—वर्षा, शरत्, हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म और प्रावृट् छह ऋतु हैं। भाद्र-आश्विन वर्षा, कार्त्तिक-अग्रहायण शरत्, पौष-माघ हेमन्त, फाल्गुन-चैत्र-वसन्त, वैशाख-ज्येष्ठ ग्रीष्म और आषाढ़-श्रावण प्रावृट्का समय होता है।
छह ऋतुके मध्य वर्षाकालमें नूतन ओषधि उपजती, इसीसे अल्पवीर्य, जल क्लेदयुक्त और मृत्तिका-मलपूर्ण रहती हैं। इस ऋतुमें आकाश मेघाच्छन्न होता है। भूमि और प्राणिगणका देह दोनों जलसे आर्द्र पड़ जाते हैं। आर्द्र देहमें शीतल वायुके संयोगसे अग्निमन्द्य आता है। सुतरां नूतन अल्पवीर्य ओषधि खाने या अपरिष्कृत जल पीने पर परिपाकके समय अम्लरस बढ़ता और गला जलने लगता है। पित्तका सञ्चय होनेसे विदाह अजीर्ण घेर लेता है। शरत्कालमें आकाश मेघशून्य रहने और कर्दम शुष्क पड़नेसे सञ्चित पित्त सूर्यकिरण द्वारा समस्त शरीरमें फैल पैत्तिक व्याधि उपजाता है। हेमन्तकालमें ओषधि परिपक्व और बलवान् होती हैं। जल निर्मल रहता है। सूर्यका तेज क्रमशः घटने लगता है। इसीसे हिम और शीतल वायु द्वारा प्राणिगणका देह जड़ीभूत पड़ जाता है। फिर स्निग्ध, शीतल, गुरुपाक एवं पिच्छिल ओषधि समूह और जल द्वारा शरीरमें श्लेष्माका सञ्चय होता है।
वसन्तकालमें जीवका शरीर अल्प जड़ीभूत रहता है। पूर्व सञ्चित श्लेष्मा सूर्यकिरण द्वारा सर्वशरीरमें फैल जानेसे अपना रोग बढ़ा देता है।
ग्रीष्मकालमें जल लघु पड़ जाता है। ओषधि नीरस, रूक्ष और लघु लगती है। सूर्यके किरणसे प्राणिगणका शरीर भी शुष्कप्राय देख पड़ता है। ऐसे ओषधिभक्षण और जलपानपर नीरस, रुक्षता तथा
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋतु—ऋतुकाल'''|'''४३७'''}}
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<div style="text-align: justify;">
लघुतासे प्राणीके शरीरमें वायुका सञ्चार होता है। प्रावृट् कालमें भूमि और प्राणीका देह दोनों आर्द्र पड़ जाते हैं। सञ्चित वायु शरीरमें व्याप्त रहता है। इसीसे वातिक व्याधि उठ खड़ा होता है। फिर वायु पित्त और कफके त्रिदोषका सञ्चय भी, प्रकोपका कारण बनता है। वर्षा, हेमन्त, ग्रीष्म, शरत्, वसन्त और प्रावृट्में पित्त, श्लेष्मा तथा वातका जो दोष बढ़ता, उसका प्रतीकार करना पड़ता है।
किसी-किसी दिन प्रातःकाल वसन्त, मध्याह्न ग्रीष्म, अपराह्ण प्रावृट्, सन्ध्या वर्षा, अर्द्धरात्र शरत् और रात्रिके अवसान पर हेमन्तका लक्षण झलकता है। दिवारात्रिके मध्य ऐसा होनेसे वात, पित्त तथा श्लेष्माका सञ्चय, प्रकोप एवं प्रतीकार पड़ने लगता है। ऋतुमें व्यतिक्रम आने अर्थात् उचित समय ऋतुका लक्षण न देखानेसे ओषधि एवं जलकी अवस्था बिगड़ती और मानवगणको नानाप्रकार अनिष्टकर पीड़ा पकड़ती है। यथाकाल ऋतु होनेसे ओषधि और जल दोनों स्वाभाविक अवस्थापर रहते हैं। उनके व्यवहारसे जीवगणका आयु, बल और वीर्य बढ़ता है। साधारणतः ऋतु अन्यथा नहीं होते। फिर भी समय समयपर ग्रहनक्षत्रको किसी किसी गतिसे ऐसा देखनेमें आ जाता है।
हेमन्त ऋतुमें उत्तर दिक्से शीतल वायु चला करता है। उसमें दिक् धूम तथा धूलि और भूमि हिमसे आवृत रहती है। ऐसे समय हस्ती प्रभृति उद्भिद्भोजो प्राणी बलवान् पड़ जाते हैं। शिशिरकालमें अतिशय शीत होता है। प्रबल वायु बहता और और हेमन्तकालका सकल लक्षण झलकने लगता है। वसन्त कालमें दक्षिण दिक्से वायु चलता है। पृथिवी नानाप्रकार उपादेय फलपुष्पसे परिशोभित होती है। कोकिल प्रभृति पक्षिगणके सङ्गीतसे पृथिवी मनोहर वेश बनाती है। ग्रीष्मकालमें नैर्ऋत कोणसे असुखकर वायु आता है। सूर्यका किरण तीक्ष्ण पड़ जाता है। भूमि उत्तप्त और दिक् प्रज्वलित प्राय देखाई देती है। वृक्ष पर्णशून्य और जीवजन्तु तृषातुर रहते हैं। प्रावृट्कालमें पश्चिमका
<br><br>Vol. III. 110
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
वायु बहता है। पश्चिम दिक्से वायुसे मेघ आकृष्ट होकर आकाशमण्डलको घेरते हैं। विद्युत् और गम्भीर गर्जनके साथ पानी बरसता है। वर्षाकाल सकल नदी जलसे भर जाती हैं। पृथिवी बहु शस्यसे परिशोभित होती है। मेघ अल्प गर्जनके साथ बरसता है। शरत्कालमें सूर्यके किरण खरतर वर्त्तते हैं। श्वेतवर्ण मेघ रहनेसे आकाश निर्मल देख पड़ता है। सकल भूमि सूख जाती है। सरोवरमें पद्मकुमुदादि खिलते हैं।
वसन्त कालपर यष्टिक, यव, शीत, मुद्ग, नीवार, कोद्रव प्रभृति शस्य; लाव, विष्किर (कपोत) प्रभृतिका मांस; यूष, पटोल, निम्ब, वार्त्ताकु प्रभृतिका व्यञ्जन; तीक्ष्ण, रुक्ष, कटु, क्षार, कषाय, शुष्क एवं उष्ण द्रव्य, और स्नान, मैथुन, बलप्रयोग तथा विहार प्रभृति उपकारी होता है। मधुर रस, स्निग्ध और गुरु द्रव्य छोड़ देना चाहिये। ग्रीष्म ऋतुको यव, यष्टिक, गोधूम, पुरातन तण्डुल, उष्णोष्ण मांस रस और गुरु, बलकर एवं कफकर द्रव्यका व्यवहार अच्छा है। नदीका जल, उष्ण एवं रुक्ष द्रव्य, अल्प जलयुक्त सक्तु, रौद्र, व्यायाम, दिवा निद्रा, मैथुन और मद्य सेवन करनेसे हानि होती है। जो प्रत्येक ऋतुमें इसीप्रकार व्यवहार करता, उसके ऋतुका रोग नहीं लगता।
युरोपीय ज्योतिर्विद्गणके मतमें पृथिवीकी वार्षिक स्थितिसे कक्षके सम्बन्ध पर सकल ऋतु उदित होते हैं। सूर्यके दक्षिण अयनान्तविन्दुसे महाविषुवरेखाको जाते मध्यका समय शीत, महाविषुवसे उत्तरायणान्त विन्दुको जाते मध्यका समय वसन्त, उत्तरायणान्त विन्दुसे तुलाराशिको जाते मध्यका समय ग्रीष्म और तुलाराशिसे दक्षिण अयनान्तविन्दुको जाते शरत्काल कहाता है। सूर्यके द्वारा ऋतुका उक्त परिवर्त्तन पृथिवीकी ही गतिसे पड़ता है।
२ स्त्रीरजः। {{smaller|ऋतुमती देखो।}} ३ दीप्ति, रौशनी, चमक। ४ मास, महीना। ५ सुवीर।
{{outdent|ऋतुकर (सं॰ पु॰) महादेव, शङ्कर।}}
{{outdent|ऋतुकाल (सं॰ पु॰) ऋतोः कालः, ६-तत्। १ ऋतुका}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४३८'''|'''ऋतुकालीन—ऋतुमती'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
समय, मौसमका मौक़ा। २ स्त्रीके रजोदर्शनकी प्रथम रात्रिसे षोड़श रात्रि पर्य्यन्त, औरतोंके महीनेकी सोलह रात। {{smaller|ऋतुमती देखो।}}
{{outdent|ऋतुकालीन (सं॰ त्रि॰) ऋतुकालस्य इदम्, छञ्। ऋतुकालसम्बन्धीय, मौसमके मौकेसे सरोकार रखनेवाला।}}
{{outdent|ऋतुगण (सं॰ पु॰) ऋतुसमूह, मौसमोंका ज़खीरा।}}
{{outdent|ऋतुगमन (सं॰ क्ली॰) ऋतुके समयका स्त्रीसम्भोग, महीना आनेसे औरतके पास जानेका काम।}}
{{outdent|ऋतुगामी (सं॰ त्रि॰) ऋतौ गच्छति, ऋतु-गम्-णिनि। ऋतुकालपर सङ्गत होनेवाला, जो महीना होनेसे औरतके पास जाता हो।}}
{{outdent|ऋतुग्रह (सं॰ पु॰) ऋतूनां ग्रहो यत्र, बहुव्री॰। यज्ञविशेष, ऋतुकी शुद्धिके लिये किया जानेवाला यज्ञ।}}
{{outdent|ऋतुचर्या (सं॰ त्रि॰) ऋतुका आचरण, मौसमका काम। ऋतुकालीन कर्मको ऋतुचर्या कहते हैं। जैसे वसन्तमें भ्रमण, ग्रीष्ममें दिवाशयन, वर्षामें अङ्गरागमर्दन, शरत्में विदेशगमन, और हेमन्त तथा शिशिरमें अग्नितपन प्रशस्त है।}}
{{outdent|ऋतुजित् (सं॰ पु॰) मिथिलाराजवंशीय जनक राजा। यह कुशध्वजके परवर्त्ती सप्तम पुरुष थे।}}
{{outdent|ऋतुथा (सं॰ अव्य॰) १ उचित वा नियत समयपर, मुनासिब या मुक़र्रर वक़्तसे। {{smaller|(सायण)}} २ समय-समयपर, कभी-कभी। {{smaller|(विष्णु० ५।१३)}} ३ क्रमशः, ठीक तौरपर। ४ भिन्नप्रकारसे, अलग-अलग।}}
{{outdent|ऋतुदान (सं॰ क्ली॰) ऋतुकालका स्त्रीप्रसङ्ग, महीनेपर औरतकी सोहबत। यह पुत्रोत्पत्तिके लिये किया जाता है।}}
{{outdent|ऋतुधर्म (सं॰ पु॰) ऋतूनां धर्मः, ६-तत्। ऋतुगणकी अवस्था, मौसमकी हालत।}}
{{outdent|ऋतुधामा (सं॰ पु॰) १ द्वादश मनुकालीन इन्द्र।}}
{{block center|<poem>
"रुद्रपुत्रस्तु सावर्णी भविता द्वादशो मनुः।
ऋतुधामा च तवेन्द्रो भवितां गणमे सुरान्॥" {{smaller|(विष्णु० २।२२)}}
</poem>}}
२ विष्णु।
{{outdent|ऋतुपति (सं॰ पु॰) ऋतूनां पतिः श्रेष्ठः, ६-तत्। १ वसन्त ऋतु, मौसम-बहार। २ अग्नि, आग।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋतुपरिवर्त्त (सं॰ पु॰) ऋतूनां परिवर्त्तः, ६-तत्। एक ऋतुके बाद दूसरे ऋतुका आगमन, मौसमका अदलबदल।}}
{{outdent|ऋतुपरीक्षा (सं॰ स्त्री॰) आर्त्तव परीक्षा, मौसमी जांच। ऋतुके समय योनिका कण्डूयन, अङ्गकी वेदना आदिलक्षण वैद्यको देखलेना चाहिये। {{smaller|(भविसंहिता)}}}}
{{outdent|ऋतुपर्ण (सं॰ पु॰) एक राजा। {{smaller|ऋतुपर्ण देखो।}}}}
{{outdent|ऋतुपर्याय {{smaller|ऋतुपरिवर्त्त देखो।}}}}
{{outdent|ऋतुपा (वै॰ पु॰) ऋतून् पाति रक्षति ऋतुषु सोमं पिबति ऋतुभिः देवैः सह सोमं पिवतोति वा, ऋतु-पा-किप्। १ वर्षपालक इन्द्र। (त्रि॰) २ नियत समयपर सोम पीनेवाले।}}
{{outdent|ऋतुपात्र (वै॰ क्ली॰) अश्वत्थ प्रभृति काष्ठनिर्मित यज्ञीय पात्रविशेष, ऋतुवोंके तर्पण करनेका पात्र।}}
{{block center|<poem>
"तस्मादश्वत्थे ऋतुपात्रे स्रातां काम्यमयत्येव भवतः।"
{{smaller|(शतपथब्रा० ४।३।३।४)}}
</poem>}}
{{outdent|ऋतुप्राप्त (सं॰ त्रि॰) ऋतु तद्योग्यः पुष्पानि प्राप्तोऽनेन। १ फलपुष्पादि-उत्पन्न, फूला-फला। २ फलमात्रके भोजनसे जीविकानिर्वाह करनेवाला, जो सिर्फ फल खाकर काम चलाता हो।}}
{{outdent|ऋतुमत् (सं॰ त्रि॰) ऋतु-मतुप्। ऋतुयोग्य-फलपुष्पविशिष्ट, जो मौसमी फलफूल रखता हो। १ नियत समयपर उपस्थित होनेवाला, जो बंधे वक्त पर आता हो। (क्ली॰) २ वरुणका उद्यान या बाग।}}
{{outdent|ऋतुमती (सं॰ स्त्री॰) ऋतुरस्या अस्तीति, ऋतु-मतुप्-ङीष्। ऋतुयुक्ता स्त्री, जो औरत हैज़से हो। संस्कृत पर्याय—रजस्वला, स्त्रीधर्मिणी, धर्वी, आत्रेयी, मालिनी, पुष्पवती और उदक्या है। {{smaller|(अमर)}} वैद्यकोक्त लक्षणके अनुसार ऋतुमतीका मुख किञ्चित् स्फीत एवं प्रसन्न रहता, और मुखके मध्य तथा दन्तमें अधिक क्लेद जमता है। कुक्षिदेश, चक्षुर्द्वय और केशपाश शिथिल पड़ जाता है। बाहु, स्तन, नितम्ब, नाभि, ऊरु, जघन और कटिदेश फड़कता है। यह सङ्गमेच्छु, प्रियभाषिणी और हर्ष तथा औत्सुक्यशालिनी देखाई देती है। {{smaller|(चरक)}} महर्षि सुश्रुतने कहा है—}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋतुमती'''|'''४३९'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
"नियते दिवसेऽतीते सङ्कुचत्यम्बुजं यथा।
ऋतौ व्यतीते नार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा॥
मासे नौपचितं काले धमनीभ्यांतदार्तवम्।
ईषत् कृष्णं विगन्धश्च वायुर्योनिमुखं नयेत्॥
तदर्षाद्वादशात् काले वर्त्तमानमसृक् पुनः।
जरापक्कशरीराणां याति पञ्चाशतः क्षयम्॥" {{smaller|(सुश्रुत शारीर)}}
</poem>}}
दिवावसानको पद्मकी भांति ऋतुकाल बीतनेसे नारीकी योनि भी सिकुड़ जाती है। आर्तव शोणित एक मासमें जमता और ईषत् कृष्णवर्ण एवं दुर्गन्ध-विशिष्ट हो वायु तथा धमनीके सहारे योनिमुखपर आ पहुंचता है। स्त्रीका ऋतु द्वादश वर्षसे लगा शरीर जरा जीर्ण पड़ते पञ्चाशत् वर्ष वयस तक चलता है। भावमिश्रका मत भी ऐसा ही है—
{{block center|<poem>
"द्वादशाब्दात्परादूर्ध्वं आपञ्चाशत् समाः स्त्रियः।
मासि मासि भगद्वारा प्रवृत्तं मार्त्तवं स्रवेत्॥
आर्तवस्त्रावदिवसात् ऋतः षोडशरात्रयः।
गर्भग्रहणयोग्यस्तु स एव समयः स्मृतः॥"
{{smaller|(भावप्रकाश पूर्वख० १म भाग)}}
</poem>}}
बारह वत्सरसे लगा पचास वत्सर पर्यन्त स्त्रियोंके भगद्वारसे स्वभावतः मास-मास आर्तव निकलता है। आर्तव निःसरणके प्रथम दिवससे षोड़श रात्रि पर्यन्त ऋतु रहता, वही गर्भ ग्रहणके योग्य काल ठहरता है।
* वैद्यकग्रन्थ हारीतमें लिखा है—
{{block center|<poem>
"रजः सप्तदिनं यावत् ऋतुश्च भिषजां वर।"
</poem>}}
हे भिषक्श्रेष्ठ ! सप्तदिन पर्यन्त यावत् रजः रहता, उसीको सब कोई ऋतु कहता है।
वाग्भटने बताया है—
{{block center|<poem>
"ऋतुस्तु द्वादशनिशाः पूर्वास्तिस्त्रश्च निन्दिताः।" {{smaller|(शारीरस्थान १ अ०)}}
</poem>}}
प्रथम दिवससे द्वादश रात्रि पर्यन्त ऋतुकाल रहता है। इसके प्रथम तीन दिन निन्दित हैं।
भगवान् मनुका मत है—
{{block center|<poem>
"ऋतुः स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोड़श स्मृताः।
चतुर्भिरितरैः सार्धमहोभिः सद्विगर्हितैः॥" {{smaller|(मनु ३।४५)}}
</poem>}}
शिष्ठनिन्दित प्रथम चार दिन रखनेसे स्त्रीका ऋतुकाल स्वाभाविक अवस्थामें षोड़श रात्रि रहता है।
संहिताकार दो प्रकारका ऋतु बताते हैं—प्रकाशित और अप्रकाशित। साधारणतः द्वादश वर्षसे
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
रजोदर्शन होनेपर प्रकाशित और द्वादश वर्षके वाद रजः न निकलनेसे अप्रकाशित वा अन्तःपुष्प कहाता है। यथा—
{{block center|<poem>
"वर्षाद्द्वादशकादूर्ध्वं यदि पुष्पं वहिर्न हि।
अन्तःपुष्पं भवतीव पनसोडुम्बरादिवत्॥" {{smaller|(कश्यप)}}
</poem>}}
बारह वर्षके वाद भी प्रकाशित न होनेसे पुष्पको पनस उडुम्बरादिको भांति अन्तःपुष्प कहते हैं।
ज्योतिषशास्त्रमें निर्दिष्ट है, किस तिथिको आद्य ऋतु होनेसे क्या फल मिलेगा। यथा—
प्रतिपद्को विधवा, द्वितीयाको पुत्रवर्द्धिनी, तृतीयाको सौभाग्यवती, चतुर्थीको सुखनाशिनी, पञ्चमीको सुभगा, षष्ठीको सम्पत्ति तथा सप्तमीको धननाशिनी, अष्टमीको सुख-पुत्र-दायिनी, नवमीको क्लेशभागिनी, दशमीको सुखिनी, एकादशीको अर्थनाशिनी, द्वादशीको रतिवर्द्धिनी, त्रयोदशीको मङ्गलकारिणी, चतुर्दशीको दुर्भगा और पूर्णिमा एवं अमावास्याको आद्य ऋतु आनेसे स्त्री दुःखरोगवर्द्धिनी होती है। फिर चैत्रमें विधवा, वैशाखमें बहुपुत्रवती, ज्येष्ठमें रुग्णा, आषाढ़में मृत्युदायिनी, श्रावणमें धनहारिणी, भाद्रमें दुर्भगा एवं क्लीवा, आश्विनमें तपस्विनी, कार्त्तिकमें धनहीना, अग्रहायणमें बहुपुत्रवती, पौषमें व्यभिचारिणी, माघमें पुत्रसुखान्विता, और फाल्गुनमें महीना पड़नेसे स्त्रीको सर्वसमृद्धि-सम्पन्ना बनना पड़ता है। आद्य ऋतुमें स्त्रीके लिये अश्विनी सुखप्रद, भरणी, कामवर्धक, कृत्तिका दैन्यकारक, रोहिणी सुखद, मृगशिरा कामभोगकर, आर्द्रा सुखद, पुनर्वसु सुखकर, पुष्या सुखवर्धक, अश्लेषा अशुभकारक, मघा शोकप्रद, पूर्वफल्गुनी तथा उत्तरफल्गुनी वैधव्यदायक, हस्ता पुत्रवर्धक, चित्रा अङ्गसौन्दर्य्यकारक, स्वाति शुभविधायक, विशाखा सुखनाशक, अनुराधा अर्थभोगकारक, ज्येष्ठा पतिवियोगवर्धक, मूला अशुभकारक, पूर्वाषाढ़ा अर्थनाशक, उत्तराषाढ़ा सुखदायक, श्रवणा सुखवर्धक और धनिष्ठा शतभिषा, पूर्वभाद्रपदा, उत्तरभाद्रपदा एवं रेवती नक्षत्र सुखप्रद है।
ऋतुमती स्त्रीको प्रथम दिनसे ब्रह्मचर्य पकड़ना, पड़ता है। दिवानिद्रा, अञ्जन, अश्रुपात, स्नान,
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४४०'''|'''ऋतुमती—ऋतुवेला'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
अनुलेपन, तैलादिमर्दन, नखच्छेदन, धावन, अतिशय हास्य वा उच्चैःस्वरकथन, उच्चशब्द-श्रवण, अवलेखन, वायुसेवन और परिश्रम छोड़ देना चाहिये। क्योंकि गर्भेका सन्तान दिवानिद्रासे निद्राशील, अञ्जनके व्यवहारसे अन्ध, अश्रुपातसे विकृतदृष्टि, स्नान एवं अनुलेपनसे दुःखित, तैलादिके मर्दनसे कुष्ठयुक्त, नखच्छेदनसे कुनखी, धावनसे चञ्चल, अतिशय कथनसे प्रलापी, उच्चशब्दके श्रवणसे वधिर, अवलेखनसे चञ्चल, वायुसेवन तथा परिश्रमसे उन्मत्त और अतिशय हास्यसे दन्त, ओष्ट, तालु एवं जिह्वामें कपिशवर्ण बन जाता है।
महर्षि सुश्रुतके मतसे स्त्रीको ऋतुमती होनेपर तीन दिनतक कुशासनपर शयन, शराव वा पत्रपर हविष्यान्नका भोजन और स्वामीका सहवास न करना चाहिये। चतुर्थ दिवस स्नान करके वस्त्रालङ्कार परिधान एवं स्वस्तिवाचनपूर्वक पहले पतिको देखना विधेय है। क्योंकि ऋतुस्नानके बाद चक्षुमें जैसा पुरुष पड़ता, वैसा ही सन्तान उपजता है। {{smaller|गर्भाधान देखो।}}
पतिको एक मास ब्रह्मचर्य रख भार्या ऋतुकालके चतुर्थ दिवस घृत और दुग्धके योगसे शालितण्डुलका अन्न खाना चाहिये। पत्नी भी एक मास ब्रह्मचर्य पालन और उसदिन तैलमर्दन एवं अधिक परिमाणसे मांससंयुक्त अन्न भोजन करती है। फिर पति वेदादि धर्मशास्त्रपर विश्वास जमा और पुत्रकामना लगा, उसी छठीं, आठवीं, दशवीं या बारहवीं रातको पत्नीपर पहुंचता है। चतुर्थसे द्वादश दिवसके मध्य जितना ही सहवास चलता, सन्तान उतना ही हृष्टपुष्ट, बलिष्ठ और ऐश्वर्यशाली निकलता है। त्रयोदश दिवससे फिर समागम करना न चाहिये।
ऋतुके प्रथम दिवस आयुहीन, द्वितीय दिवस सूतिकागृहमें ही नष्ट और तृतीय दिवसको गमन करनेसे सन्तान असम्पूर्ण-अङ्ग वा अल्पायु होता है। एतएव ऋतुके तीन दिन गमन करना न चाहिये। द्वादश दिवस बीतनेपर फिर एकमास पर्यन्त ब्रह्मचर्य रखती हैं। {{smaller|गर्भ देखो।}}
आद्य ऋतुमें मङ्गलाचार किया जाता है—
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
"प्रथमर्त्तौ तु पुष्पिण्याः पतिपुत्रवती स्त्रियाः।
अक्षतैरासनं कुर्यात्तास्मिंस्तामुपवेशयेत्॥
हरिद्रागन्धपुष्पादीन् दद्यात्ताम्बूलकम्पुनः।
आशिषो वाचयेयुस्ताः पतिपुत्रवती भव॥
दीप्तैर्नीराजनं कुर्यात् सदीपै वासथैर्द्रढैः।
ताः सर्वाः पूजयेत् पश्चात् गन्धपुष्पाक्षतादिभिः॥
लवणापूपमुद्गादि दद्यात्ताभ्यः स्वशक्तितः॥" {{smaller|(प्रदीपपारिजात)}}
</poem>}}
ऋतुमती स्त्रीको प्रथम ऋतुमें ही पड़ोसकी पति-पुत्रवती नारी अक्षतका आसन बनाकर बैठाती हैं। फिर हरिद्रा, गन्धपुष्प, ताम्बूल एवं माल्यादि दे और 'तुम पुत्रवती हो पतिके साथ सुखसे समय बितावो' कह वह उसकी आशीर्वाद करती हैं। पीछे प्रदीप-विशिष्ट गृहमें ले जाकर उसकी आरती उतारी जाती है। अन्तको ऋतुमतीके घरकी स्त्री मङ्गलाचार करनेवाली नारियोंको गन्ध, पुष्प और अक्षतादि द्वारा पूज अपनी शक्तिके अनुसार लवण, पिष्टक एवं मुद्गादि देती हैं।
{{outdent|ऋतुमय (सं॰ त्रि॰) ऋतुविशिष्ट, मौसमी।}}
{{outdent|ऋतुमुख (सं॰ क्ली॰) ऋतूनां मुखम्, ६-तत्। पौर्ण चान्द्रमासका प्रथम दिन, मौसमका शुरू।}}
{{outdent|ऋतुयाज (सं॰ पु॰) १ ऋतुका यज्ञ। २ प्रातःसवनका एक यज्ञ। यह आज्य शस्त्रसे पहले होता है।}}
{{outdent|ऋतुराज (सं॰ पु॰) ऋतूनां राजा, ऋतु-राजन्-टच्, ६-तत्। राजाऽहः सखिभ्यष्टच्। पा ५।४।९१। वसन्त काल, मौसम-बहार।}}
{{outdent|ऋतुलिङ्ग (सं॰ क्ली॰) ऋतूनां लिङ्गं चिह्नम्, ६-तत्। १ ऋतुपर्यायका वसन्तादि चिह्न, मौसमके आसार। २ ऋतुमती होनेका लक्षण, औरतको महीना होनेके आसार।}}
{{outdent|ऋतुवती, {{smaller|ऋतुमती देखो।}}}}
{{outdent|ऋतुविपर्यय (सं॰ पु॰) ऋतुके क्रमका भङ्ग, मौसमका बिगाड़। वसन्तादिके स्थानमें शरदादिकी धर्मप्रवृत्ति ऋतुविपर्यय कहलाती है।}}
{{outdent|ऋतुवृत्ति (सं॰ पु॰) ऋतुषु वृत्तिर्यस्य, बहुव्री॰। वत्सर, वर्ष, साल।}}
{{outdent|ऋतुवेला (सं॰ स्त्री॰) ऋतूनां वेला कालः, ६-तत्। ऋतुकाल, महीनेका वक्त।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋतुवैषम्य—ऋतेजा'''|'''४४१'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋतुवैषम्य (सं॰ क्ली॰) ऋतुचर्याका विपरीताचरण, मौसमके खिलाफ़ काम।}}
{{outdent|ऋतुशः, {{smaller|ऋतुश देखो।}}}}
{{outdent|ऋतुशूल (सं॰ क्ली॰) ऋतुकाल पर रजोरोधसे उत्पन्न शूलरोग, महीने पर हैज़ बन्द होनेसे पैदा हुआ दर्द। पुष्षके वातादिसे मारे जाने पर यह शूल उठता है। शोणित पिच्छल, घन एवं स्निग्ध रहता और बहुत गिरता है। योनि और नाभिमें परम दारुण वेदना होने लगती है। {{smaller|(रसरत्नाकर)}}}}
{{outdent|ऋतुषट्क (सं॰ क्ली॰) हिम-शिशिर-वसन्त-ग्रीष्म-शरत्, छहों मौसम।}}
{{outdent|ऋतुष्ठा, {{smaller|ऋतुष्ठा देखो।}}}}
{{outdent|ऋतुसन्धि (सं॰ पु॰) ऋतोः सन्धिः, ६-तत्। ऋतुद्वयका मिलनकाल, दो मौसमोंके मिलनेका वक़्त। वर्तमान ऋतुके सात अन्तिम और आगामी ऋतुके सात प्राथमिक दिवस ऋतुसन्धि कहलाते हैं।}}
{{block center|<poem>
"ऋतोरन्तादि सप्ताहाहतुसन्धिरिति स्मृतः।" {{smaller|(वाग्भट)}}
</poem>}}
{{outdent|ऋतुसमय, {{smaller|ऋतुकाल देखो।}}}}
{{outdent|ऋतुसम्मिता (सं॰ स्त्री॰) मुनिखर्जूरिका, बढ़िया पिण्ड खजूर।}}
{{outdent|ऋतुसात्म्य (सं॰ क्ली॰) ऋतुके अनुकूल भोजनादि, मौसमके मुवाफ़िक़ खाना वग़ैरह।}}
{{outdent|ऋतुसेव्य (सं॰ त्रि॰) ऋतुषु सेव्यः। ऋतुके भेदानुसार व्यवहार करने योग्य, जो मौसमके मुवाफ़िक़ काममें लाने लायक हो। सुश्रुतके मतानुसार वर्षाकालको प्राणीका शरीर क्लिन्न एवं अग्नि मन्द पड़ जाने और वातादि सकल दोष उठ खड़े होनेसे क्लेदविशोषक तथा दोष-सञ्चारक कषाय, तिक्त एवं कटुविशिष्ट, घन, अधिक स्निग्ध वा अधिक रूक्ष न होनेवाला पदार्थ और उष्ण एवं अग्नि-उद्दोपक भोज्य आहार करना चाहिये। ऐसे समय वृष्टिका ही जल पीना सर्वोत्कृष्ट रहता, नतुवा उष्णजल मधु मिलाकर लेना पड़ता है। भूमध्यस्थ वाष्प बचानेके लिये खाट या तख्त पर लेटना उचित है। अतिरिक्त जलपान, हिमसेवा, मैथुन, आतप, व्यायाम, दिवानिद्रा और अजीर्णकर भोजन छोड़ देते हैं; शरत्-कालको कषाय, मधुर एवं तिक्तरस, दुग्ध, मिष्टान्न, मधु,}}
<br><br>Vol. III. 111
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
सर्वप्रकार तण्डुलादि, जाङ्गलमांस और नदी-तड़ाग-पुष्करिणी प्रभृतिका जल हितकारी है। एतद्भिन्न पित्तप्रशमनकारक सकल ही द्रव्य व्यवहार करना चाहिये। तीक्ष्णवीर्य-अम्ल-उष्ण-क्षार द्रव्य, दिवानिद्रा, रौद्र, रात्रिजागरष और मैथुनसे हानि होती है। हेमन्त एवं शिशिरकालको लवण, क्षार-तिक्त-अम्ल, तथा कटु रस, तैल, घृत, उष्ण अन्न, तीक्ष्णपान, माष, शाक, दधि, मिष्टान्न, नूतन तण्डुल, सकल-प्रकार मांस, मद्य और मैथुन प्रभृतिके व्यवहारसे कोई अनिष्ट नहीं आता। नहानेके लिये उष्ण जल ही कहा है।
{{outdent|ऋतुस्तोम (सं॰ पु॰) एक दिवस साध्य यज्ञविशेष।}}
{{outdent|ऋतुस्थला (सं॰ स्त्री॰) अप्सरोविशेष, एक परी।}}
{{outdent|ऋतुस्ना (वै॰ त्रि॰) उचित ऋतुपर नियत, जो मुनासिब मौसम पर बंधा हो।}}
{{outdent|ऋतुस्नाता (सं॰ स्त्री॰) ऋतौ ऋतुकाल-विहित-चतुर्थदिवसे स्नाता, ७-तत्। ऋतुके चतुर्थ दिवस शुद्धिके लिये स्नान करनेवाली स्त्री।}}
{{block center|<poem>
"पूर्वं पश्ये दृतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना।" {{smaller|(सुश्रुत)}}
</poem>}}
ऋतुस्नाता स्त्री पहले जैसा पुरुष देखती, वैसा ही पुत्र उत्पन्न करती है।
{{outdent|ऋतुस्नान (सं॰ क्ली॰) ऋतौ ऋतुकालविहितदिने स्नानम्, ७-तत्। ऋतुकालीन चतुर्थ दिवसका स्नान, महीनेके बाद चौथे दिनका नहान।}}
{{outdent|ऋतुहरीतकी (सं॰ स्त्री॰) ऋतुके भेदसे द्रव्यविशेषके साथ मिश्रित हरीतकी, मौसमी हर्र। भावप्रकाशमें लिखा—वर्षांमें सैन्धव, शरत्में शर्करा, हेमन्तमें शुण्ठीचूर्ण, शिशिरमें जीरकचूर्ण, वसन्तमें मधु और ग्रीष्मकालमें गुड़के साथ हरीतकी खानेसे उत्कृष्ट रसायन होता है।}}
{{outdent|ऋते (सं॰ अव्य॰) १ पृथक्-पृथक्, अलग-अलग। २ विना, वग़ैरह।}}
{{block center|<poem>
"अवेधि मां प्रीतमुते सुरेक्षणात्।" {{smaller|(रघु ६।६३)}}
</poem>}}
{{outdent|ऋतेकर्म (वै॰ अव्य॰) १ त्यागकर, छोड़ के। २ विना, वग़ैर।}}
{{outdent|ऋतेजा (वै॰ त्रि॰) ऋते जायते, ऋते-जन्-विट्। यज्ञके लिये उत्पन्न, जो व्यवस्थाके लिये सच्चा हो।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''उमरगढ़—ऊरुद्वयस'''|'''४१३'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
एवं द्राघि० ७७° ४५' पू०पर अवस्थित है। १८१८ ई०को यहां हालकर सरदार और निजामकी सेनामें युद्ध हुआ। १७६५ ई०में निजामने उमरखेड़ परगना १७६३ ई०का युद्ध समाप्त होनेपर पेशवाको दे डाला था। पूनामें हारनेपर पेशवा १८१८ ई०को पूर्वकी ओर भागते यहां ठहर गये। ब्राह्मण साधु महाराजकी चिताके स्थानपर एक अच्छासा मन्दिर बना है। सुप्रसिद्ध गोमुख स्वामीका भी यहां मठ था। वह प्रतिवर्ष एक चेलेके साथ इधर-उधर दौरेपर जाते और प्रायः २ लाख रुपया मांग लाते, जिसे पुण्यकार्यमें लगाते थे। उन्होंने अनेक मन्दिर तथा कूप बनवाये। दूर-दूरसे लोग यहां मानता करने आते हैं। १८५९ ई०में गोदावरी किनारे महात्माने इहलोक छोड़ा था। मठमें स्वामीका समाधि प्रतिष्ठित है।
{{outdent|उमरगढ़—युक्तप्रान्तके एटा जिलेकी जलेसर तहसीलका एक नगर। यह जलेसर नगरसे साढ़े चार कोस दक्षिण-पूर्व सेंगरनदीके वामतटपर अवस्थित है। पहले यहां यदुवंशियोंकी राजधानी रही। एक पुराना किला खड़ा है। उसमें उक्त वंशके प्रतिनिधि रहते हैं। किलेके चारो ओर एक गहरी खाई खुदी थी। आजकल वह पूर गयी है। मकान भी टूटे फूटे हैं। ठाकुर बहादुरसिंहके समय मराठोंने सेंधियाके अधीन उमरगढ़ लूटा था। नीलकी दो कोठियां चलती हैं। उनमें एक यदुवंशियों और एक युरोपीयोंके अधीन है। किलेकी दीवारोंके आसपास आमके उम्दा बाग लगे हैं।}}
{{outdent|उमरपुर—विहार प्रान्तके भागलपुर जिलेकी बंका तहसीलका एक नगर। यह अक्षा॰ २५° २' २३" उ॰ तथा द्राघि॰ ८६° ५७' पू॰पर अवस्थित है। यहां जिलेके दक्षिणांशमें उत्पन्न शालि प्रभृति धान्य एकत्र किये और मुंगेर एवं सुल्तानगंजकी राह पूर्वको भेज दिये जाते हैं। एक बड़े तालाबपर शाह-शुजाकी मसजिद बनी है। डुमरांव कोई आध कोस उत्तर पड़ता है।}}
{{outdent|ऊमस, {{smaller|ऊमस देखो।}}}}
{{outdent|ऊमझना, {{smaller|ऊमझना देखो।}}}}
<br><br>Vol III. 104
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊमा (हिं॰ स्त्री॰) यव वा गोधूमकी हरित् मञ्जरी, गेहूं वगैरहकी ताजी बाल।}}
{{outdent|ऊय् (धातु) भ्वा॰ आत्म॰ सक॰ सेट्। "ऊयीङ् वयने।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} सीना, टांकना।}}
{{outdent|ऊर (सं॰ पु॰) धान्यवपन नियमविशेष, धान बोनेकी एक चाल। जड़हन लगानेका नाम ऊर है। बैंगन एक महीने बाद उखाड़ कर जब जलसे भरे खेतमें बोया जाता, तब ऊर कहलाता है।}}
{{outdent|ऊरज (हिं॰) {{smaller|ऊर्ज देखो।}}}}
{{outdent|ऊरध (हिं॰) {{smaller|ऊर्ध्व देखो।}}}}
{{outdent|ऊररी (सं॰ अव्य॰) ऊर् बाहुलकात् ररीक्। १ विस्तारसे, बढ़कर। २ अङ्गीकार, हां, ठीक है।}}
{{outdent|ऊररीकृत (सं॰ त्रि॰) स्वीकृत, माना हुआ।}}
{{outdent|ऊरव्य (सं॰ पु॰) ऊरोर्जातः ऊरु-यत्। ब्रह्माका ऊरुजात, वैश्य, बनिया।}}
{{outdent|ऊरी (सं॰ अव्य॰) ऊरु बाहुलकात् रीक्। १ विस्तारसे, फैलाकर। २ स्वीकार, मञ्जूर, हां। (हिं॰ स्त्री॰) ३ यन्त्रविशेष, एक औजार। जुलाहे इसे दुतकला या सलाका भी कहते हैं।}}
{{outdent|ऊरीकृत (सं॰ त्रि॰) ऊरी-कृ-क्त। १ अङ्गीकृत, माना हुआ। २ विस्तृत, फैला हुआ।}}
{{outdent|ऊरु (सं॰ पु॰) ऊर्णुयते आच्छाद्यते, कुः नुलोपश्च। ऊर्णोतेर्णुलोपश्च। उण् १।३१। जानुका उपरिभाग, टांगका ऊपरी हिस्सा, रान।}}
{{outdent|ऊरुग्राह (सं॰ पु॰) ऊरुं गृह्णाति स्तभ्नाति, ऊरु-ग्रह-अण्। ऊरुस्तम्भरोग। {{smaller|ऊरुस्तम्भ देखो।}}}}
{{outdent|ऊरुग्लानि (सं॰ स्त्री॰) ऊरुकी निर्बलता, रानकी कमजोरी।}}
{{outdent|ऊरुज (सं॰ पु॰) ऊरोर्जातः, ऊरु-जन-डः। १ वैश्य, बनिया। २ भृगुवंशीय और्व नामक मुनि।}}
{{block center|<poem>
"रजसा तमसा चैव समुद्रिक्तास्तयोऽसृजत्।" {{smaller|(विष्णुपु॰ १।५।४)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊरुजन्मा, {{smaller|ऊरुज देखो।}}}}
{{outdent|ऊरुदघ्न (वै॰ त्रि॰) ऊरु-दघ्नच्। ऊरुपरिमित, रानके बराबर।}}
{{block center|<poem>
"ऊरुदघ्नो द्वितीयो जानुदघ्नस्तु तोयः।" {{smaller|(शतपथब्रा॰ १३।२।३।२)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊरुद्वयस, {{smaller|ऊरुदघ्न देखो।}}}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४४२'''|'''ऋतेयु—ऋधत्'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋतेयु (सं॰ पु॰) १ ऋषिविशेष। यह वरुणके पुरोहित थे। २ एक राजा। {{smaller|(महाभारत)}}}}
{{outdent|ऋतोक्ति (सं॰ त्रि॰) सत्यभाषण, रास्तगोई।}}
{{outdent|ऋतोद्य (वै॰ क्ली॰) ऋत-वद्-क्यप्। सत्यवाक्य, सच वात।}}
{{outdent|ऋत्वन्त (सं॰ पु॰) ऋतुकालकी समाप्ति, महीनेका अखीर।}}
{{outdent|ऋत्विक् (सं॰ पु॰) ऋतौ यजते, ऋतु-यज्-क्विन्, निपातनात् साधुः। १ पुरोहित, वेदके मन्त्रोंसे यज्ञमें कर्मकाण्ड करानेवाला। संस्कृत पर्याय याजक, भरत, कुरु, वागयत, वृत्तवर्ही, यतस्रुक्, मरुत्, सवाध और देवयव है। चार ऋत्विक् प्रधान होते हैं, होता, उद्गाता, अध्वर्यु और ब्रह्मा। फिर बड़े यज्ञोंमें कहीं आठ और कहीं सोलहतक ऋत्विक् रहते हैं। यथा—ब्राह्मणाच्छंसी, प्रस्तोता, मैत्रावरुण, प्रतिप्रख्याता, पोता, प्रतिहर्त्ता, अच्छावाक, नेष्टा, अग्नीध, सुब्रह्मण्य, ग्रावस्तुत् और उन्नेता। २ काव्योक्त नायकका धर्मसहायविशेष। "ऋत्विक् पुरोधसः क्षत्त्रं आविदस्तापसास्तथा धर्मे।" {{smaller|(साहित्यद॰ ३।४१)}}}}
{{outdent|ऋत्विय (वै॰ त्रि॰) ऋतु-घस्। छन्दसि घस्। पा ४।३।१०६। १ ऋतुकालोपस्थित, मौसमपर पहुंच हुआ। २ ऋतुकालोत्पन्न, मौसममें पैदा हुआ। ३ ऋतुकालका कर्त्तव्य, जो मौसममें किये जानेके क़ाबिल हो। ४ नियमित, पावन्द। (क्ली॰) ५ ऋतुकाल, औरतके महीनेका वक्त।}}
{{outdent|ऋत्वियावत् (वै॰ त्रि॰) ऋत्वियमस्यास्तीति, ऋत्विय-मतुप्, मस्य वः दीर्घश्च। १ पुत्रोत्पादनकर्मयुक्त, जो लड़का पैदा करनेमें लगा हो। २ व्यवस्थानुरूप, क़ानूनी।}}
{{outdent|ऋत्व्य (वै॰ त्रि॰) ऋतुरस्य प्राप्तः तत्र भवः वा, ऋतु-यत्, संज्ञापूर्वक-विधेरनित्यत्वात् गुणाभावः अजवच्च। {{smaller|ऋतिय देखो।}}}}
{{outdent|ऋतूददर (वै॰ पु॰) मृदु उदरं यस्य, पृषोदरादित्वात् मस्य लोपः। १ सोम। (त्रि॰) २ मृदु-उदरविशिष्ट, मुलायम पेटवाला, भला।}}
{{outdent|ऋतूपा (वै॰ पु॰) १ अर्दनपाती। २ गमनपाती।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
३ दूरपाती। ४ मर्मवेधी, जोड़ फोड़नेवाला। ५ गमन-वेधी। ६ दूरभेदी। {{smaller|(निरुक्त ६।३३)}}
{{outdent|ऋतूवृध, {{smaller|ऋतूपा देखो।}}}}
{{outdent|ऋद्ध (सं॰ क्ली॰) ऋध-क्त। १ मंडा धान्य, जो अनाज भूसीसे अलग कर दिया गया हो। २ सिद्धान्त, क़ौल। ३ दृढ़, मुज़र्ग। ४ समृद्ध, दौलतमन्द। ५ सम्पन्न, खुश।}}
{{outdent|ऋद्धि (सं॰ स्त्री॰) ऋध-क्तिन्। १ वृद्धि, बढ़ती। २ सम्पत्ति, दौलत। ३ सिद्धि, करामात। ४ पार्वती। ५ लक्ष्मी। ६ देवताविशेष। ७ वैद्यकोक्त अष्टवर्गके अन्तर्गत ओषधि विशेष। इसे लोग प्रायः ऋद्धि-वृद्धि कहते हैं। यह लताजात, सरोमक और श्वेत लोमान्वित होती है। ऋद्धि देखनेमें तृणग्रन्थिके समान लगती और वामावर्त्तसे फलती है। {{smaller|(राजनिघण्टु)}} गुणमें यह वृद्धिके तुल्य है। ऋद्धि वल्य, त्रिदोषघ्न, शुक्रल, मधुर, गुरु एवं ऐश्वर्यकर रहती और मूर्च्छा तथा रक्तपित्तको दूर करती है। {{smaller|(भावप्रकाश)}} ८ महा-श्रावणी, गोरखमुण्डी। ९ कुवेरपत्नी।}}
{{outdent|ऋद्धिकाम (सं॰ त्रि॰) सम्पत्ति वा अभ्युदयका अभिलाषी, जो अपनी बढ़ती चाहता हो।}}
{{outdent|ऋद्विजा (सं॰ स्त्री॰) १ सर्पगन्धा, नागदेवना। २ गन्धरास्ना, खुशबूदार गिलोय।}}
{{outdent|ऋद्धिमत् (सं॰ त्रि॰) ऋद्धिरस्यास्तीति, ऋद्धि-मतुप्। १ वृद्धियुक्त, बढ़ा हुआ। २ सम्पत्तिशाली, दौलतमन्द। ३ सिद्धियुक्त, करामाती।}}
{{outdent|ऋद्धिसाक्षात्क्रिया (सं॰ स्त्री॰) अलौकिक शक्तिका प्रदर्शन, अनोखी ताक़तका काम।}}
{{outdent|ऋद्धिसिद्धि (सं॰ स्त्री॰) सुखसम्पत्ति, ठाटबाट, धूम-धाम, अमन-चैन।}}
{{outdent|ऋध् (धातु) दिवा॰ स्वादि॰ पर॰ अक॰ सेट् उदित् इरिच्च। "ऋध्यतिर् वृद्धौ।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} वृद्धि पाना, बढ़ना।}}
{{outdent|ऋधक् (सं॰ अव्य॰) १ सत्य, सच, बेशक। २ वियोगसे, अलग-अलग। ३ शीघ्र, जल्द, फ़ौरन्। ४ निकट, पास, क़रीब। ५ लाघवपर, घटकर।}}
{{outdent|ऋधत् (सं॰ त्रि॰) ऋध-शतृ। वर्द्धित होनेवाला, जो बढ़ रहा हो।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४१४'''|'''ऊरुपर्वा—ऊर्जन्य'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊरुपर्वा (सं॰ पु॰) ऊर्वाः पर्वेव, ५-तत्। जानु, घुटना।}}
{{outdent|ऊरुफलक (सं॰ क्ली॰) ऊर्वीः फलकमिव, ६-तत्। नितम्बदेश, सुरीन, पुट्ठा।}}
{{outdent|ऊरुभिन्न (सं॰ त्रि॰) ऊरुमें छिद्र रखनेवाला, जिसके फटी रान् रहे।}}
{{outdent|ऊररी (सं॰ अव्य॰) ऊर्-उरीक। {{smaller|उररी देखो।}}}}
{{outdent|ऊरुसम्भव (सं॰ पु॰) ऊरोः सम्भव उत्पत्तिर्यस्य, बहुव्री॰। १ वैश्य, बनिया। (त्रि॰) २ ऊरुसे उत्पन्न होनेवाला, जो रान्से निकलता हो।}}
{{outdent|ऊरुस्तम्भ (सं॰ पु॰) ऊरुं स्तभ्नाति, ऊरु-स्तम्भ, अण्। ऊरुरोगविशेष, रान्की एक बीमारी। वैद्यकके मतमें शीतल, उष्ण, द्रव, शुष्क, गुरु तथा स्निग्धकर वस्तु अतिरिक्त बरतने, अधिक परिश्रम करने, विशेष चलने फिरने, दिनको सो रहने और रातको जगने प्रभृति कारणोंसे सञ्चित वात, श्लेष्मा, भेद एवं पित्त भड़क उठता है। उस समय अस्थि श्लेष्मपूर्ण रहनेसे दोनों ऊरु स्तब्ध, शीतल, अचेतन, स्थानान्तर गमन वा पदस्थापनके लिये अशक्त और अतिशय व्यथित हो जाते हैं। उसीसे मोह, अङ्गमर्द, आर्द्र वस्त्रके अवगुण्ठन जैसे अनुभव, तन्द्रा, वमन, अरुचि और ज्वरका वेग बढ़ता है। अतिनिद्रा, अतिमुग्धता, अलसता, ज्वर, लोमहर्ष, अरुचि, वमन और जङ्घा एवं ऊरुद्वयकी अवसन्नता इस रोगका पूर्वरूप है। जिसके ऊरुस्तम्भमें दाह उठता, वेदना एवं सूचिवेधवत् पीड़ाका वेग बढ़ता और सब शरीर कांपता, उसका मृत्यु आ पहुंचता है। उक्त उपद्रवशून्य और स्वल्पदिनोत्पन्न ऊरुस्तम्भकी चिकित्सा करना चाहिये। कोई कोई इसे आढ्यवात भी कहते हैं। {{smaller|(माधवनिदान)}}}}
ऊरुस्तम्भमें स्नेहक्रिया, रक्तस्राव, वमन, विरेचन और वस्तिकर्म सम्पूर्ण निषिद्ध हैं। इस रोगमें वही चिकित्सा चलाये, जो श्लेष्माको हटाये और वायु न भड़काये। पहले रूक्ष क्रियासे कफको शान्त कर देते, पीछे वायुके प्रशमका कार्य हाथमें लेते हैं। व्यायाम, उच्च स्थानको लम्फ प्रदान, स्रोतके प्रतिकूल सन्तरण प्रभृति कार्य बन सकनेसे कफक्षयके लिये उपकारी हैं।
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
चिकित्सा—सर्षप और दीमककी मट्टी मधुके साथ पीस प्रलेप लगाना चाहिये। त्रिफला, चव्य, सोंठ एवं पिपरामूल अथवा आंवला, हर, बहेड़ा, सोंठ, पीपल और मिर्चका चूर्ण बराबर मधुके साथ चाटनेसे ऊरुस्तम्भ रोग दबता है। इस रोगपर 'अष्टकट्वरतैल' विशेष उपकारी है। उसको इसप्रकार तैयार करते हैं—मूर्च्छित सर्षपतैल ४ सेर, तक्र ३२ सेर, दधि ४ सेर, पिपरामूल २ पल और सोंठ २ पल एक साथ पका तैल अवशेष रहते छान लेते हैं। यह अष्टकट्वर तैल ऊरुस्तम्भको जड़से उखाड़ डालता है।
{{outdent|ऊरुस्तम्भा (सं॰ स्त्री॰) ऊरोरिव स्तम्भाक्कृतिर्यस्याः। कदलीवृक्ष, केलेका पेड़।}}
{{outdent|ऊरुद्भव (सं॰ त्रि॰) ऊरुसे उत्पन्न, जो रान्से निकला हो।}}
{{outdent|ऊर्ज् (धातु) चुरा॰ पर॰ अक॰ सेट्। १ जीवित होना, ज़िन्दगी पाना, जी उठना। २ बलिष्ठ होना, ताक़त हासिल करना।}}
{{block center|<poem>
"यो वा अन्नमत्ति स प्राणिति तमूर्जयति।" {{smaller|(शतपथब्रा॰ ७।५।१।२८)}}
</poem>}}
(स्त्री॰) ऊर्ज्-क्विप्। ३ बल, ताक़त। ४ अप्सरस नामक अन्नका सार-भूत रस। (क्ली॰) ५ अन्न।
{{block center|<poem>
"तमः समूहाक्कृतिमप्यशेषादूर्जां जयन्तं प्रथितप्रकाशान्।" {{smaller|(भट्टि)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्ज (सं॰ पु॰) ऊर्जयति उत्साहयति यत्नं, ऊर्ज-णिच्-अच्। १ कार्त्तिक मास, कातिकका महीना। २ उत्साह, हौसला। ३ बल, ज़ोर। ४ द्वितीय मन्वन्तरके सप्तर्षियोंमें एक ऋषि। ५ निश्वास, दम। ६ जीवन, ज़िन्दगी। ७ वीर्य।}}
{{block center|<poem>
"पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जञ्च यच्छति।" {{smaller|(मनु २।५५)}}
</poem>}}
(क्ली॰) ऊर्ज्यते अनेन, ऊर्ज-घञ्। ८ जल, आब।
{{block center|<poem>
"नमः ऊर्जे इषे त्र्याय पतये यज्ञरेतसे।
वलिदाय च जीवानां नमः सर्वरसात्मने॥" {{smaller|(भागवत ४।२४।३८)}}
</poem>}}
९ काव्यालङ्कार विशेष।
{{outdent|ऊर्जयत् (सं॰ त्रि॰) १ बली, ताक़तवर। २ बल-दायक, ताक़त देनेवाला।}}
{{outdent|ऊर्जायोनि (सं॰ पु॰) ऋषिविशेष। {{smaller|(भारत, अनु॰ ४ अ॰)}}}}
{{outdent|ऊर्जावाह (सं॰ पु॰) शुचिके एक पुत्र।}}
{{outdent|ऊर्जन्य (सं॰ पु॰) ऋग्वेदोक्त एक राजा। {{smaller|(ऋक् ५।६१।१०)}}}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऊर्जस्—ऊर्णनाभ'''|'''४१५'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊर्ज्जस् (सं॰ क्ली॰) ऊर्ज्ज-असुन्। १ बल, जोर। २ अप्सरस विशेष। {{smaller|(भारत, अनु॰ ११२ अ॰)}}}}
{{outdent|ऊर्ज्जनि (सं॰ पु॰) बलदायक, ताक़त देनेवाला।}}
{{outdent|ऊर्ज्जस्तम्भ (सं॰ पु॰) द्वितीय मन्वन्तरके सप्तर्षिमें एक ऋषि।}}
{{outdent|ऊर्ज्जस्वत् (सं॰ त्रि॰) शक्तिशाली, ताक़तवर।}}
{{outdent|ऊर्ज्जस्वती (सं॰ स्त्री॰) १ दक्षकन्या तथा धर्मपत्नी। २ प्रियव्रतकी कन्या और उशनाकी पत्नी। ३ प्राणकी पत्नी।}}
{{outdent|ऊर्ज्जस्वी (सं॰ क्ली॰) ऊर्ज्जस्-विन्। १ अलङ्कारविशेष। जिससे अतिशय अहङ्कार झलकता, उसे कवि ऊर्ज्जस्वी अलङ्कार कहते हैं। (त्रि॰) अतिशयितं ऊर्जा बलमस्यास्ति। २ अतिशय बलवान्, बड़ा जोरावर। ३ तेजस्वी।}}
{{outdent|ऊर्ज्जा (सं॰ स्त्री॰) ऊर्ज्ज भावे अ-टाप्। १ बल, जोरावरी। २ उत्साह, मौज। ३ वृद्धि, उठान। ४ अप्सरसकी विकृति विशेष।}}
{{outdent|ऊर्ज्जानी, {{smaller|ऊर्ज्जा देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्ज्जावान् (सं॰ त्रि॰) ऊर्ज्जा अस्यास्ति, ऊर्ज्जा-मतुप् मस्य वः। १ बलवान्, ताक़तवर। २ वृद्धियुक्त, बढा हुआ। स्त्रियां ङीप्। ऊर्ज्जावती।}}
{{block center|<poem>
"ऊर्ज्जावतीं महापुण्यां मधुमतीं दिवौकसाम्।" {{smaller|(भारत, अनु॰ २६ अ॰)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्ज्जित (सं॰ त्रि॰) ऊर्ज्ज-क्त। १ बलशाली, ताक़तवर। २ वृद्धियुक्त, उभरा हुआ। ३ विख्यात, मशहूर। ४ तेजस्वी। ५ उत्साहित, हौसलेमन्द।}}
{{block center|<poem>
"उपपत्तिमूर्ज्जिताश्रयम्।" {{smaller|(किरात)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्ज्जिताश्रय (स॰ पु॰) श्रेष्ठ, बड़ा, दिलदार।}}
{{outdent|ऊर्ज्जी (सं॰ त्रि॰) खाद्यविशिष्ट, जिसके पास खूब खाना रहे।}}
{{outdent|ऊर्ण (सं॰ त्रि॰) ऊर्णा अस्यास्ति, ऊर्णा अर्म आदित्वात् अच्। मेषलोमनिर्मित, ऊनी, ऊनका बना हुआ।}}
{{outdent|ऊर्णदेश—एक प्राचीन जनपद। {{smaller|(भारत, सभा ५१।१८)}} यह जनपद कैलास और हिमालयके मध्य अवस्थित है। इससे पूर्व रावण-ह्रद और उत्तरपश्चिम लांधक प्रदेश है। नीतिघाट नामक एक पथ द्वारा यह}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
स्थान तिब्बतसे स्वतन्त्र हुआ है। उक्त पथ प्रायः अर्द्ध मील विस्तृत है। उद्भिदादि अधिक नहीं उपजते। स्थान-स्थान पर केवल स्तूपाकार प्रस्तर पड़े हैं।
शतद्रु नदी पार करनेपर देव नामक स्थानमें कुछ उत्तर पहुंचने पर कई क्षुद्र ग्राम लक्षित होते हैं। वह नाना वर्ण और नाना भावसे स्थापित हैं। पहले देव नामक राजा ग्रीष्मकालमें यहीं आकर रहते थे। ऊर्णदेशमें यही स्थान अति मनोरम है। थोड़ी दूर आगे गिरिमालासे सुवर्ण निकलता है। क्षुद्र क्षुद्र पर्वत ग्रेनाइट प्रस्तरके बने हैं। उसके बीच-बीच अकीक-जैसे पत्थरके टुकड़े भी देखनेमें आते हैं। यहांके लोग स्रोतके जलसे धो स्वर्णकणाको आहरण करते हैं।
ऊर्णदेशमें शशक बहुत हैं। उनके पिछले पैर और लोम बड़े होते हैं। गो, अश्व और गर्दभ प्रायः देख पड़ते हैं। हरण-जैसा एक जन्तु होता है। वह इन्दुर जैसा लगता है। दोनों कान बहुत बड़े होते हैं। किन्तु पूंछका पता नहीं चलता। जिस छागके लोमसे शाल बनता, वह यहां देखनेको मिलता है।
पहले यह जनपद सूर्यवंशीय क्षत्रियोंके अधिकारमें था। एक बार लाधकके उग्र प्रकृति तातारोंने यहांके राजाको मार डाला था। राजवंशियोंने चीन-सम्राट्से साहाय्य मांगा। कुछ काल यह चीन-सम्राट्को रच्चावेचणमें पड़ा था, पीछे तिब्बतवाले दलई लामाके हाथ लगा।
यहांके अधिवासियोंको जनिया कहते हैं।
{{outdent|ऊर्णनाभ (सं॰ पु॰) ऊर्णैव तन्तुर्नाभौ यस्य, नाभेरुपसङ्ख्यानमित्यच् ह्रस्वः। यापोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलम्। पा ६।३।६३। कीटविशेष, मकड़ा। अपर नाम लूता, तन्तुवाय और मर्कटक है। यह नाना जातीय रहता और नाना श्रेणीमें विभक्त पड़ता है। पृथिवीके प्रायः सकल देशोंमें ऊर्णनाभ मिलता है। किन्तु क्रान्तिमण्डलपर ही इसका रहना अधिक है। विशेषतः कर्कट क्रान्तिका ऊर्णनाभ बृहदाकार होता है। वह केवल क्षुद्र क्षुद्र कीट खाकर ही सन्तुष्ट नहीं रहता, समय पाकर छोटे छोटे पक्षियों पर भी आक्रमण करता है।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४१६'''|'''ऊर्णनाभ—ऊर्णनाभि'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
मस्तक और उदरवाले उपरिभागके व्यवधानमें बादाम-जैसा एक कठिन फलक निकलता है। उदर उसमें मिला रहता है। फिर उदर पोला और ज्यादा नर्म भी होता है। पैर आठ रहते हैं। हरएक पैरमें सात गांठें पड़ती हैं। आखिरी पैरमें कंघीकी तरहके दो कांटे निकले होते हैं। सम्मुखका जबड़ा पतङ्ग-जैसा नहीं होता। वह सकल दिक् को झुक सकता है। जबड़ेके अन्तमें तीक्ष्ण कांटा लगता है। निकट ही एक अति क्षुद्र छिद्र पड़ता है। उसी छिद्रसे विषाक्त तरल पदार्थ निकलता है। दोनों जबड़ोंके मध्य जिह्वा होती है। वह मुखके बहिरिन्द्रिय-जैसी देखायी देती है।
सचराचर इसके ८ चक्षु होते हैं। किसी किसीके छह और अति अल्प संख्यकके दो चक्षु रहते हैं। उदरके उपरिभाग पर इधर उधर दाग पड़ जाते हैं। फिर किसीके उसी स्थानपर अति परिष्कृत अनावृत चर्म चढ़ा होता है।
ऊर्णनाभके फेफड़ेमें दो अथवा चार छिद्र रहते, जो उदरके तल भागपर पड़ते हैं। मलद्वारके निकट तन्तूत्पादक यन्त्र रहता है। उसपर भी सूक्ष्म सूक्ष्म छिद्र होते हैं। उनके बीचसे अति सूक्ष्माकार तन्तु निकलते हैं। वही सूक्ष्मतन्तु एकत्र हो जालमें सूतके लच्छे-जैसे देख पड़ते हैं। तन्तूत्पादक यन्त्रसे प्रथम एक प्रकारका चिपचिपा पदार्थ छूटता है। वही पदार्थ वायुके स्पर्शसे तन्तुके आकारमें परिणत हो जाता है।
{{center|[[चित्र:हिंदी विश्वकोष भाग ३ (page 417 crop).jpg|250px]]<br><small>ऊर्णनाभ</small>}}
तन्तुमें निकलनेपर यह नाना कारणोंसे जाल बनाता है। कोई जालमें रहता, कोई जालसे कीट
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
पतङ्ग पकड़ जीविका निर्वाह और कोई जाल बना अपर कीटादिके आखेटकी सुविधा करता है। किसी-किसी ऊर्णनाभको लोगोंने गर्तमें रहते देखा है।
प्रायः सभी मकड़े गेंद-जैसे कोयेके बीच अपना अण्डा रखते और अण्डा परिपुष्ट पड़नेपर कोयेको काटा करते हैं। जबतक फूटनेका समय नहीं आता, तबतक कोई उस डिम्बाधारको अपने पृष्ठपर डाल चक्कर लगाता, कोई छातीपर चढ़ाता और कोई उदरपर अति यत्नसे रख विघ्नबाधा बचाता है। एक-एक गोलेमें प्रायः २००० अंडे होते हैं। गोलेसे बाहर निकलने पर बच्चे पहले अपनी माताके समस्त शरीरमें क्षुद्राकार चिपट जाते हैं।
मकड़ियां (ऊर्णनाभकी स्त्रियां) नाना प्रकारकी होती हैं और प्रायः सभी पुरुषकी अपेक्षा बड़ी निकलती हैं। स्त्री-पुरुषका सहवास बड़ा भयानक होता है। यदि पुरुष स्त्रीका मन नहीं रिझाता, तो वह उसके हाथों मारा जाता है।
सकल ही देशोंमें मकड़े नाना आकार और नाना प्रकारके देख पड़ते हैं। फिर सभी मकड़े पतङ्ग अथवा क्षुद्र जीवको पकड़ मार डालते हैं। गङ्गातीरस्थ मुङ्गेर नगरके निकट कभी कभी एक बड़ा, काला और लाल मकड़ा मिलता है। उसका जाल देखनेमें उज्ज्वल हरित्वर्ण रहता और छहसे बारह हाथतक लम्बा होता है।
हिमालयके निकट सफेद-लाल रङ्गके बड़े-बड़े मकड़े होते हैं। कहते हैं, उनके जालमें पक्षी तक फंस रहते हैं। जालमें आ जानेसे बहुसंख्यक ऊर्णनाभ मिल जुल उसे खा डालते हैं।
सिंहल द्वीपमें एक जातिका मकड़ा देख पड़ता, जिसका पैर अति कठिन होता है। छिपकली पर्यन्त उसी पदमें फंस जाती है।
किसी स्थानपर चत पड़नेसे मकड़ेको लगाने पर रक्तस्राव रुकता है। विलायतमें मकड़ेका जाल ज्योतिष-शास्त्रीय दूरवीक्षणयन्त्रके तारकी तरह व्यवहृत होता है।
{{outdent|ऊर्णनाभि, {{smaller|ऊर्णनाभ देखो।}}}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४१८'''|'''ऊर्ध्वक्रिया—ऊर्ध्वपातन'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
१ स्मृतिशास्त्रोक्त कुशमय ब्राह्मण। (त्रि॰) २ उन्नत केश रखनेवाला, जिसके खड़ा बाल रहे।
{{outdent|ऊर्ध्वक्रिया (सं॰ स्त्री॰) {{smaller|ऊर्ध्वकर्म देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्ध्वग (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वं गच्छति, ऊर्ध्व-गम-ड। १ ऊर्ध्वगामी, ऊंचा जानेवाला। २ स्वर्गगामी। ३ सत्पथावलम्बी, ऊंची चाल पकड़नेवाला। (पु॰) ४ शिरोरोग, सरकी बीमारी।}}
{{outdent|ऊर्ध्वगत (सं॰ त्रि॰) ऊपर गया हुआ।}}
{{outdent|ऊर्ध्वगति (सं॰ स्त्री॰) १ उच्चगति, ऊंची चाल। २ उन्नत स्थानपर आरोहण, ऊंची जगहकी चढ़ाई। ३ स्वर्गारोहण। (त्रि॰) ४ उच्चगतिप्राप्त, ऊपर पहुंचा हुआ। ५ मुक्त।}}
{{outdent|ऊर्ध्वगपुर (सं॰ क्ली॰) १ आकाशस्थ गृह, आसमानी मकान्। २ पुर नामक असुरका घर। ३ हरिश्चन्द्र राजाकी पुरी।}}
{{outdent|ऊर्ध्वगम (सं॰ पु॰) {{smaller|ऊर्ध्वगति देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्ध्वगमन (सं॰ क्ली॰) {{smaller|ऊर्ध्वगति देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्ध्वगामी (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्व-गम-णिनि। ऊर्ध्वगमन करनेवाला, जो ऊंचा जाता हो।}}
{{outdent|ऊर्ध्वग्रावा (वै॰ पु॰) सोमलताको दबानेके लिये प्रस्तर उठानेवाला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वचरण (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वचरणौ यस्य। १ ऊर्ध्वगत चरणवाला, पैर उठाये हुआ। (पु॰) २ अष्टचरण शरभ। इस सिंहके चार चरण उठे होते हैं। ३ उन्नत पदसे तपस्या करनेवाले साधु। यह भूमिपर मस्तक जमा हाथोंके सहारे उठते हैं।}}
{{outdent|ऊर्ध्वचित् (सं॰ त्रि॰) संग्रह करता हुआ, जो ढेर लगा रहा हो।}}
{{outdent|ऊर्ध्वजानु (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वं जानुनी यस्य, बहुव्री॰। उन्नतजानु, ऊंचे घुटनोंवाला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वज्ञ (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वं जानुनी यस्य, निपातनात् साधुः। ऊर्ध्वजानु, ऊंचे घुटनोंवाला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वज्ञु (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वं जानुनी यस्य, पच्चे जानुनोर्ज्ञुः। ऊर्ध्वाविभाषा। पा ५।४।१२९। ऊर्ध्वजानु, ऊंचे घुटनोंवाला।}}
{{block center|<poem>
"ऊर्ध्वज्ञुमण्डूक इव प्लुतोऽरेः।" {{smaller|(माघ)}}
</poem>}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊर्ध्वतन (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वे उत्पन्नः, ऊर्ध्व-तन। उपरिस्थ, ऊपरी।}}
{{outdent|ऊर्ध्वता (सं॰ स्त्री॰) उच्चता, उंचाई।}}
{{outdent|ऊर्ध्वताल (सं॰ स्त्री॰) तालविशेष, ऊंचा ताल।}}
{{outdent|ऊर्ध्वतिक्ता (सं॰ पु॰) चिरायता।}}
{{outdent|ऊर्ध्वतिलकी (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वमुन्नतं तिलकं यस्यास्ति, ऊर्ध्व-तिलक-इनि। उन्नततिलकविशिष्ट, खड़ा टाका लगाये हुआ।}}
{{outdent|ऊर्ध्वथा (सं॰ अव्य॰) ऊर्ध्व-थाल्। १ ऊर्ध्व प्रकारसे, ऊंचे तौरपर। २ ऊर्ध्वमें, ऊपर-ऊपर।}}
{{outdent|ऊर्ध्वदंष्ट्रकेश (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वदंष्ट्रकानां ईशः पतिः, ६-तत्। महादेव।}}
{{block center|<poem>
"नमोर्ध्वदंष्ट्रकेशाय ग्रहायावतताय च।" {{smaller|(भारत, शान्ति)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्ध्वदृष्टि (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वे दृष्टिर्यस्य, बहुव्री॰। १ ऊर्ध्वदेशपर दृष्टि निक्षेपकारी, जो ऊंची जगहपर नज़र डालता हो। २ ऊर्ध्वनेत्र, ऊंची आंखवाला। (स्त्री॰) ३ भ्रूद्वयकी मध्यवर्त्ती दृष्टि, भौंहोंके बीचकी नज़र। ४ उत्क्षिप्त दृष्टि, उठी या चढ़ी निगाह। ५ मृत्युकालीन दृष्टि, मरते वक़्तकी नज़र। ६ योगविशेष।}}
{{outdent|ऊर्ध्वदेव (सं॰ पु॰) ऊर्ध्व उत्कृष्टश्चासौ देवश्चेति, कर्मधा॰। १ परमेश्वर। २ विष्णु।}}
{{outdent|ऊर्ध्वदेश (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वश्चासौ देशश्चेति, कर्मधा॰। उपरिभाग, ऊपरी हिस्सा।}}
{{outdent|ऊर्ध्वदेह (सं॰ पु॰) ऊर्ध्व उत्तरकालीनश्चासौ देहश्चेति, कर्मधा॰। मरणान्तर प्राप्त होनेवाला शरीर, जो जिस्म मरनेके बाद मिलता हो।}}
{{outdent|ऊर्ध्वद्वार (सं॰ पु॰) १ उन्नत द्वार, ऊंचा दरवाज़ा। २ ब्रह्मरन्ध्र।}}
{{outdent|ऊर्ध्वनभा (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं नभो यस्य, बहुव्री॰। आकाशका मध्यदेशस्थ वायु, आसमान्के बीचकी हवा।}}
{{outdent|ऊर्ध्वनयन (सं॰ पु॰) शरभ।}}
{{outdent|ऊर्ध्वन्दम (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वन्-दम्-खच्। ऊर्ध्वस्थ, ऊपरी।}}
{{outdent|ऊर्ध्वपथ (सं॰ पु॰) आकाश, आसमान्, ऊपरी राह।}}
{{outdent|ऊर्ध्वपातन (सं॰ क्ली॰) चढ़वाई।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऊर्णपट—ऊर्ध्वकेश'''|'''४१७'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊर्णपट (सं॰ पु॰) लूता, मकड़ा।}}
{{outdent|ऊर्णमृद (सं॰ त्रि॰) ऊर्णमिव मृदीयः, ऊर्ण-मृदीयस् निपातनात्। कम्बलादिके समान कोमल, कम्बलकी तरह मुलायम।}}
{{block center|<poem>
"ऊर्णमृदं प्रथस्व।" {{smaller|(कौशिकसू॰ २३।१३७)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्णवाभि, {{smaller|ऊर्णनाभ देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्णा (सं॰ स्त्री॰) ऊर्ण-ड-टाप्। ऊर्णोते डः। उण् ५।४०। १ मेषादिका लोम, पश्म, ऊन। {{smaller|पश्म देखो।}} २ भ्रूद्वयके मध्यवर्त्ती मृणालसूत्रके समान सूक्ष्म रोमराजीका चिह्न विशेष। यह चिह्न होनेसे मनुष्य चक्रवर्त्ती राजा वा महायोगी होता है। ३ चित्ररथ गन्धर्वकी पत्नी।}}
{{outdent|ऊर्णापिण्ड (सं॰ पु॰) ऊनका गोला।}}
{{outdent|ऊर्णामय (सं॰ क्ली॰) ऊर्णा विकारार्थे मयट्। मेषलोमनिर्मित सूत्रादि, ऊनी धागा वगैरह।}}
{{block center|<poem>
"ऊर्णामयं कौतुकहस्तसूत्रम्।" {{smaller|(कुमार)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्णायु (सं॰ पु॰) ऊर्णा अस्त्यस्य, ऊर्णा-युस् सिद्वात् आतो न लोपः। १ मेषलोम-निर्मित कम्बलादि, ऊनी कम्बल वगैरह। २ मेष, भेड़। ३ ऊर्णनाभ, मकड़ा। ४ ऊर्णभङ्ग। ५ किसी गन्धर्वका नाम।}}
{{outdent|ऊर्णावत् (सं॰ त्रि॰) ऊर्णानिर्मित, ऊनी।}}
{{outdent|ऊर्णावन (वै॰ त्रि॰) ऊर्णा अस्यास्ति, ऊर्णा वनच्। १ ऊर्णायुक्त, ऊनसे भराहुआ। २ मेषादिलोमनिर्मित, ऊनी।}}
{{block center|<poem>
"ऊर्णावन्तमित्व तत् वरुथस् नाभिम्।" {{smaller|(शतपथब्रा॰ ७।५।२।३५)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्णावल (सं॰ त्रि॰) ऊर्णायुक्त, ऊनी।}}
{{outdent|ऊर्णासूत्र (वै॰ क्ली॰) ऊर्णा एव सूत्रम्। मेषादि लोम, ऊन।}}
{{block center|<poem>
"ऊर्णासूत्रेण कवची वयति।" {{smaller|(शुक्लयजुः १९।८०)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्णास्तुक (सं॰ त्रि॰) ऊर्णायुक्त, ऊनी, भेड़ वगैरहके बालका बना हुआ।}}
{{outdent|ऊर्णास्तुका (सं॰ स्त्री॰) ऊर्णास्तबक, ऊनकी लच्छी।}}
{{outdent|ऊर्णु (धातु) अदा॰ उभ॰ सक॰ सेट्। "ऊर्णुञ आच्छादने" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} आच्छादन करना, ढांकना।}}
{{block center|<poem>
"ऊर्णुनाव स शची-घ नराणामनीकिनीम्।" {{smaller|(भट्टि १४।१०३)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्णुत (सं॰ त्रि॰) आच्छादित, ढका हुआ।}}
{{outdent|ऊर्णुवान् (सं॰ त्रि॰) आच्छादन करनेवाला, जो ढांकता हो।}}
{{outdent|ऊर्द (सं॰ त्रि॰) ऊर्द-अच्। क्रीडायुक्त, खिलाड़ी।}}
<br><br>Vol III. 105
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊर्दर (सं॰ पु॰) ऊर्जेन दृणाति विदारयति, ऊर्ज-दॄ-अच् वा। ऊर्जे दृणातेरपचौ पूर्वपदान्त्यलोपश्च। उण् ५।२०। १ वीर, बहादुर। २ राक्षस। ३ धान्यादि रखनेका एक पात्र, कुसूल।}}
{{outdent|ऊर्ध्व (सं॰ त्रि॰) उत्-हा-डः पृषोदरादित्वाद्रूपादेशः। १ उच्च, ऊंचा। २ उत्कृष्ट, उम्दा। ३ उपरिस्थ, ऊपरी। ४ अनन्तर, पिछला। ५ परित्यक्त, छूटा। ६ उत्पाटित, उखड़ा। (क्ली॰) ७ उच्चता, ऊंचापन। ८ ऊर्ध्वदेश, ऊपरी मुल्क। ९ मृदङ्ग विशेष, किसी किस्मका ढोल या तबला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वक (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वः सन् कायति शब्दायते, ऊर्ध्व-कै-क। मृदङ्गविशेष, किसी किस्मका ढोल या तबला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वकच (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वा उत्पाटिताः कचा यस्य, बहुव्री॰। ऊर्ध्वगत केश रखनेवाला, जो बाल नोचा या उखाड़ा जा चुका हो।}}
{{outdent|ऊर्ध्वकण्टा (सं॰ स्त्री॰) ऊर्ध्वं कण्टः कण्टको यस्याः, बहुव्री॰। महाशतावरो, बड़ी सतावर।}}
{{outdent|ऊर्ध्वकण्ठ (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वः कण्ठो यस्य, बहुव्री॰। ग्रीवादेश उन्नत किये हुआ, जो गर्दन उठाये हो।}}
{{outdent|ऊर्ध्वकर्ण (सं॰ त्रि॰) कान खड़े किये हुआ।}}
{{outdent|ऊर्ध्वकर्म (सं॰ क्ली॰) ऊर्ध्वं ऊर्ध्वदेशप्राप्त्यर्थं कर्म। मृतव्यक्तिके उद्देश्यसे किया जानेवाला सकल श्राद्धादि।}}
{{outdent|ऊर्ध्वकाय (सं॰ पु॰-क्ली॰) कायस्य ऊर्ध्वम्। १ कटिदेशसे उपरिस्थ अवयव, कमरसे ऊपरका जिस्म। ऊर्ध्वं उन्नत: कायो यस्य, बहुव्री॰। उन्नत देहवाला, जो ऊंचा पूरा जिस्म रखता हो।}}
{{outdent|ऊर्ध्वकृशन (सं॰ त्रि॰) फेनाता हुआ, जो झाग छोड़ रहा हो। यह सोमका विशेषण है।}}
{{outdent|ऊर्ध्वकेतु (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वं उन्नतं केतुर्यस्य यत्र वा। उत्थित ध्वजावाला, जिसके झण्डा खड़ा रहे। २ उड़ती ध्वजावाला, जिसमें झण्डा फहराता देखे। (पु॰) ३ जनकवंशीय एक राजा।}}
{{block center|<poem>
"ऊर्ध्वकेतु सन्तस्मादाजनेऽथ पुरजित् सुतः।" {{smaller|(भागवत ९।२१।२३)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्ध्वकेश (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं उन्नतः केशो यस्य, बहुव्री॰।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऊर्ध्वपात्र—ऊर्ध्वरेखा'''|'''४१९'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊर्ध्वपात्र (सं॰ क्ली॰) ऊर्ध्वं नेतव्यं पात्रम्, मध्यपदलोपी समा॰। उलूखल प्रभृति यज्ञपात्र।}}
{{outdent|ऊर्ध्वपाद (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वाः पादा यस्य, बहुव्री॰। १ शरभ नामक मृगविशेष। {{smaller|शरभ देखो।}} (त्रि॰) २ ऊर्ध्वदेशमें पाद रखनेवाला, जिसके ऊपरी हिस्सेमें पैर रहे।}}
{{outdent|ऊर्ध्वपुण्ड्र (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं उन्नतः पुण्ड्र इक्ष्वादिभिव। चन्दन आदिसे ललाटपर लगाया हुआ लम्बा तिलक। ब्रह्माण्डपुराणमें लिखा है—ब्राह्मणको ऊर्ध्वपुण्ड्र, क्षत्रियको त्रिपुण्ड्र, वैश्यको अर्द्धचन्द्राकार एवं शूद्रको वर्तुलाकार तिलक लगाना और जल, मृत्तिका, भस्म तथा चन्दनसे ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाना चाहिये। देवी-भागवतमें नारायणने कहा है कि वैदिक अर्थात् वेदानिष्ठ ब्राह्मणको ऊर्ध्वपुण्ड्र, त्रिशूल, वर्तुल, चतुष्कोण वा अर्द्धचन्द्राकार प्रभृति कोई तिलक लगाना मना है। पर ब्रह्माण्डपुराणके मतसे अशुचि, अनाचारी एवं पापचिन्ताकारी व्यक्ति भी ऊर्ध्वपुण्ड्र लगानेसे शुद्धता पाता और चण्डालतुख्य अनाचारी ब्राह्मण ऊर्ध्वपुण्ड्राङ्कित अवस्थामें मरनेसे स्वर्ग चला जाता है। अनेक पुराणोंको देखते जप, होम, दान, वेदाध्ययन और पितृकार्यमें ऊर्ध्वपुण्ड्रधारण निषिद्ध है। किन्तु कुलाचारमें ऐसा नहीं होता। इसलिये व्यासोक्त वचनके अवलम्बनसे निश्चित होता है कि—श्राद्धादिके समय गन्ध वस्तुद्वारा ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाना मना है, अपरापर वस्तुसे लगानेमें कोई वाधा नहीं।}}
{{outdent|ऊर्ध्वपुण्ड्रक, {{smaller|ऊर्ध्वपुण्ड्र देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्ध्वपूर (सं॰ अव्य॰) किनारे तक भरकर।}}
{{outdent|ऊर्ध्वपृश्नि (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वाः पृश्नयो विन्दवो यस्य, बहुव्री॰। पशु विशेष, एक चौपाया।}}
{{outdent|ऊर्ध्वबर्ही (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वं प्रागग्रं बर्हिर्येषाम्, बहुव्री॰। पितृलोक।}}
{{outdent|ऊर्ध्वबाल (सं॰ त्रि॰) खड़े बालोंवाला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वबाहु (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं ऊर्ध्वगतश्चासौ बाहुश्चेति कर्मधा॰। १ उत्तोलित हस्त, उठा हुआ हाथ। २ पञ्चम मन्वन्तरके सप्त ऋषियोंमें एक ऋषि। ३ संन्यासी सम्प्रदाय विशेष। जो साधु एक वा}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
उभय बाहु ऊर्ध्वदिक् उठाये रहते, उन्हें ऊर्ध्वबाहु कहते हैं। भिक्षाके द्वारा जीविकानिर्वाह करते हैं। कोई दिगम्बर वेष रखता और कोई केवलमात्र गैरिक वस्त्र पहनता है। ५ वशिष्ठके एक पुत्र। {{smaller|(विष्णुपु॰ १।१०।१३)}} (त्रि॰) ६ बाहु उत्तोलन किये हुआ, जो हाथ उठाये हो।
{{outdent|ऊर्ध्वबुध्न (वै॰ त्रि॰) ऊर्ध्व-बन्धन, ऊर्ध्वबोधन।}}
{{outdent|ऊर्ध्वबृहती (वै॰ स्त्री॰) छन्दोविशेष।}}
{{outdent|ऊर्ध्वभाक् (सं॰ त्रि॰) १ ऊर्ध्वभाग लेनेवाला, जो ऊपरी हिस्सा पाता हो। (पु॰) २ बड़वानल।}}
{{outdent|ऊर्ध्वभाग (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं उपरिस्थो भागः, एकदेशः कर्मधा॰। उपरिभाग, ऊपरी हिस्सा।}}
{{outdent|ऊर्ध्वम् (सं॰ अव्य॰) उत्-ह्वे डसु, उरादेशः। उपरि, ऊपर। "ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनःस्थविर आयति।" {{smaller|(मनु)}}}}
{{outdent|ऊर्ध्वमनु (सं॰ पु॰) पुराणोक्त जनपदविशेष। {{smaller|(ब्रह्माण्डपु॰ ४७।४८, मत्स्यपु॰ १२०।४८)}}}}
{{outdent|ऊर्ध्वमन्थी (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं उत्तराराश्रमं मथ्नाति, मन्थ-णिनि। नैष्ठिक ब्रह्मचारी, स्त्रीप्रसङ्गसे बिलकुल अलग रहनेवाला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वमान (सं॰ क्ली॰) ऊर्ध्वमारोप्य मीयते अनेन, ऊर्ध्व-मा-ल्युट्। १ प्रस्तर वा लौहनिर्मित तौलनेका बांट। २ ऊपरी परिमाण।}}
{{outdent|ऊर्ध्वमायु (सं॰ त्रि॰) उच्चशब्दकारी, जो ऊंची आवाज़ देता हो।}}
{{outdent|ऊर्ध्वमारुत (सं॰ क्ली॰) देहस्थ वायुका ऊपरी दबाव।}}
{{outdent|ऊर्ध्वमुख (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वं मुखं यस्य, बहुव्री॰। १ ऊपरको मुख रखनेवाला।}}
{{block center|<poem>
"प्रदीचत्यूर्ध्वं सुखमेवमूचेः।" {{smaller|(कुमार)}}
</poem>}}
(पु॰) २ अग्नि। (क्ली॰) ३ मुखका ऊर्ध्वभाग, मुंहका ऊपरी हिस्सा। ४ उन्नतमुख, ऊंचा मुंह।
{{outdent|ऊर्ध्वमुखी (सं॰ पु॰) संन्यासियोंका एक सम्प्रदाय। यह अपना मुख ऊपरको ही रखते हैं।}}
{{outdent|ऊर्ध्वमूल (सं॰ क्ली॰) जगत्, दुनिया।}}
{{outdent|ऊर्ध्वमौहूर्त्तिक (सं॰ त्रि॰) कुछ कालके बाद होनेवाला, जो थोड़ी देरके बाद आ पड़ता हो।}}
{{outdent|ऊर्ध्वरेखा (सं॰ स्त्री॰) चरणचिह्नविशेष। यह अष्ट-}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४२०'''|'''ऊर्ध्वरेता—ऊर्मि'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
चिह्नोंमें एक है। अङ्गुष्ठ तथा उसके निकटकी अङ्गुलिके मध्यसे यह रेखा एड़ीतक पहुंचती है। इसके होनेसे मनुष्य अंशावतारी समझा जाता है। राम, कृष्ण प्रभृति विष्णुके अवतार इस रेखासे युक्त थे।
{{outdent|ऊर्ध्वरेता (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं ऊर्ध्वगं रेतो यस्य, बहुव्री॰। १ महादेव। २ सनकादि मुनि। ३ तपस्वी विशेष। ४ भीष्म। ५ हनुमान्। (त्रि॰) ६ रेतःस्खलन-रहित, जो कभी वीर्य गिराता न हो।}}
{{outdent|ऊर्ध्वरोमा (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वानि रोमाणि यस्य, बहुव्री॰। १ यमदूत प्रभृति। २ कुशद्वीपस्थ पर्वतविशेष। (त्रि॰) ३ उन्नत रोमवाला, जिसके खड़ा रोंगटा रहे।}}
{{outdent|ऊर्ध्वलिङ्ग (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं लिङ्गं यस्य, बहुव्री॰। महादेव।}}
{{outdent|ऊर्ध्वलिङ्गी, {{smaller|ऊर्ध्वलिङ्ग देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्ध्वलोक (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वश्वासौ लोकश्चेति, कर्मधा॰। १ स्वर्ग, बिहिश्त। २ आकाश, आसमान्।}}
{{outdent|ऊर्ध्ववात (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वा वातः, कर्मधा॰। ऊर्ध्वगत वायु, ऊपर चढ़ी हुई हवा।}}
{{outdent|ऊर्ध्ववायु, {{smaller|ऊर्ध्ववात देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्ध्ववृत (सं॰ क्ली॰) ऊर्ध्ववेष्टनेन वृतः, ३-तत्। ऊर्ध्वं दिक् आवर्त्तितं यज्ञोपवीतं, ऊपरको घूमा हुआ जनेऊ।}}
{{block center|<poem>
"कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत्।" {{smaller|(मनु २।४४)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्ध्ववृहती (वै॰ स्त्री॰) छन्दोविशेष।}}
{{outdent|ऊर्ध्वभान (सं॰ त्रि॰) ऊपर उठनेवाला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वशायी (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्व-शी-णिनि। १ उत्तान-शायी, चित लेटनेवाला। (पु॰) २ महादेव।}}
{{outdent|ऊर्ध्वशोधन (सं॰ क्ली॰) वमन, कै।}}
{{outdent|ऊर्ध्वशोष (सं॰ अव्य॰) ऊर्ध्वः सन् शुष्यति, ऊर्ध्व-अमुल्। उपरिस्थ शोषण द्वारा, ऊपर ही सूख जानेसे।}}
{{outdent|ऊर्ध्वश्वास (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वश्वासौ श्वासश्चेति, कर्मधा॰। १ दीर्घश्वास, लम्बी सांस। २ मृत्यकालीन श्वास, मरते वक्तकी सांस।}}
{{outdent|ऊर्ध्वसानु (सं॰ पु॰-क्ली॰) ऊर्ध्वञ्च तत् सानु चेति, कर्मधा॰। पर्वतादिका उपरिस्थ समतल प्रदेश, पहाड़ वगैरहके ऊपरका हमवार हिस्सा।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊर्ध्वस्थ (सं॰ त्रि॰) श्रेष्ठ, ऊपरवाला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वस्थित (सं॰ त्रि॰) ऊपर रहनेवाला।}}
{{outdent|ऊर्ध्वस्थिति (सं॰ स्त्री॰) ऊर्ध्वा स्थितिर्यत्र, बहुव्रीही। १ अश्वका पृष्ठदेश, घोड़ेकी पीठ। (वि॰) २ ऊर्ध्वस्थ, ऊपरी।}}
{{outdent|ऊर्ध्वस्रोता (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं ऊर्ध्वगतं स्रोतो यस्य, बहुव्री॰। १ ऊर्ध्वरेता मुनि। २ वृक्षादि, पेड़ वगैरह।}}
{{outdent|ऊर्ध्वाङ्ग (सं॰ पु॰) मस्तक, सर।}}
{{outdent|ऊर्ध्वाङ्गुलि (सं॰ अव्य॰) उंगली उठाकर।}}
{{outdent|ऊर्ध्वाकर्षण (सं॰ क्ली॰) ऊर्ध्वको आकर्षण, ऊपरी कशिश।}}
{{outdent|ऊर्ध्वाम्नाय (सं॰ पु॰) ऊर्ध्व आम्नाय्यते, ऊर्ध्व-आ-म्ना-कर्मणि घञ्। वेदमार्गसे अतिरिक्त बोधक एक तन्त्र। इसमें गुरुभक्ति, विष्णुके दशावतार, गौराङ्ग-माहात्म्य-कीर्तन, श्रीकृष्ण-पूजाविधि, नारायणस्तव एवं गया माहात्म्य प्रभृतिका वर्णन है। नारद ऊर्ध्वाम्नायके वक्ता तथा व्यासदेव श्रोता हैं।}}
{{outdent|ऊर्ध्वायन (सं॰ त्रि॰) ऊर्ध्वं अयनं गमनं यस्य, बहुव्री॰। १ ऊर्ध्वगत, ऊपर जानेवाला। (पु॰) २ प्लक्षद्वीपस्थ पक्षिविशेष, एक चिड़िया। (क्ली॰) ३ ऊर्ध्वगति, ऊपरी चाल।}}
{{outdent|ऊर्ध्वावर्त्त (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं आवर्त्तते अत्र, ऊर्ध्व-आ-वृत-घञ्। १ अश्वपृष्ठ, घोड़ेकी पीठ। २ आवर्त्तविशेष, एक घेरा।}}
{{outdent|ऊर्ध्वासित (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वं उपरिभागे असितं यस्य, बहुव्री॰। १ कारवेल्ल, करेला। (त्रि॰) ऊर्ध्वं मासितं येन। २ ऊर्ध्वपविष्ट, ऊपर बैठा हुआ।}}
{{outdent|ऊर्ह (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वगति, ऊपरी हरकत।}}
{{outdent|ऊर्मि (सं॰ पु॰-स्त्री॰) ऋच्छतीति, ऋ-मि ऊगादेशश्च। ऋतेरुच्च। उण् ४।४३। १ तरङ्ग, लहर, उभार। २ प्रकाश, रौशनी। ३ वेग, झपट। ४ भङ्ग, टूट। ५ पीड़ा, तकलीफ। ६ वेदना, दर्द। ७ उत्कण्ठा, खाहिश। ८ शोक, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुत् और पिपासा। ९ अश्वकी एक गति, घोड़ेकी लहरिया चाल। १० भ्रान्ति, भूल। सङ्ग, साथ। ११ समूह, जखौरा। १२ शीघ्रता, जलदी। १३ अङ्गुलीय, अंगुश्तरी। १४ कपड़ेका चुनाव। १५ शिकन, बल।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऊर्मिका—ऊषणा'''|'''४२१'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊर्मिका (सं॰ स्त्री॰) ऊर्मि स्वार्थे कन्-टाप्, ऊर्मिरिव कायति, ऊर्मि-कै-टाप्। १ अङ्गुलीयक, अंगूठा। २ भ्रमर गुञ्जन, भौंरेकी गूंजन।}}
{{outdent|ऊर्मिन् (सं॰ त्रि॰) ऊर्मिरस्त्यस्य, ऊर्मि-इनि। ऊर्मियुक्त, लहरदार, लहरी।}}
{{outdent|ऊर्मिमत्ता (सं॰ स्त्री॰) १ भङ्गुरता, टूटापन। २ वक्रता, टेढ़ापन।}}
{{outdent|ऊर्मिमान् (सं॰ त्रि॰) ऊर्मिरस्यास्ति, ऊर्मि-मतुप्। १ तरङ्गयुक्त, लहरदार। २ वक्र, मेहराबदार।}}
{{outdent|ऊर्मिमाली (सं॰ पु॰) ऊर्मीणां माला विद्यते यस्य, ऊर्मि-माला-इनि। समुद्र, बहर-आजम।}}
{{block center|<poem>
"चन्द्रं प्रवृद्धोर्मिरिवोर्मिमाली।" {{smaller|(रघु ३।३९)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्मिला (सं॰ स्त्री॰) लक्ष्मणको पत्नौ। यह जनककी औरस कन्या थीं।}}
{{outdent|ऊर्म्य (सं॰ त्रि॰) ऊर्मौ भवः, ऊर्मि-यत्। १ तरङ्गोत्पन्न, लहरसे निकला हुआ। (पु॰) २ रुद्र विशेष।}}
{{outdent|ऊर्म्या (वै॰ स्त्री॰) रात्रि, रात।}}
{{block center|<poem>
"तिरश्चता ददर्शे ऊर्म्यासु।" {{smaller|(ऋक् १।११८।१)}}
'ऊर्म्यासु रात्रिषु।' {{smaller|(सायण)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्व (सं॰ पु॰) १ जलपात्र, हौज़। २ मेघ, बादल। ३ आवृत स्थान, घिरी जगह। ४ कारागृह, कैदखाना। ५ और्वके पिता। ६ बड़वानल।}}
{{outdent|ऊर्वरा, {{smaller|उर्वरा देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्वशर (सं॰ पु॰) भरतवंशीय महावीर्यके पुत्र।}}
{{outdent|ऊर्वशी, {{smaller|उर्वशी देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्वष्ठीव (सं॰ क्ली॰) ऊरु च अष्ठीवन्तौ च, समाहारद्वन्द्व। ऊरु एवं जानु, रान और घुटना।}}
{{outdent|ऊर्वशी (सं॰ स्त्री॰) ऊरौ उत्थिता, पृषोदरादित्वात् साधुः। {{smaller|उर्वशी देखो।}}}}
{{outdent|ऊर्वास्थि (सं॰ क्ली॰) ऊरोरस्थि, ६-तत्। ऊरुदेशका हाड़, रानकी हड्डी।}}
{{outdent|ऊर्वी (सं॰ स्त्री॰) ऊरुदेशका मध्यस्थ।}}
{{block center|<poem>
"ऊरुमध्ये ऊर्वी नाम तत्र शोणितक्षयात् सक्थिशोषकः।"
{{smaller|(सुश्रुत शारीर)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊर्व्य (सं॰ पु॰) ऊर्वौ भवः, ऊर्व-यत्। बड़वानलाधिष्ठात्री देवता, इन्द्र।}}
<br><br>Vol III. 106
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊर्ष्यङ्क (सं॰ क्ली॰) ऊर्ष्याः पृथिव्या अङ्कमिव। गोमयच्छत्रिका। इसका संस्कृत पर्याय—दिलीर, शिलोच्चक, वशारोह और गोल्लास है। {{smaller|(हारावली)}}}}
{{outdent|ऊर्षा (सं॰ स्त्री॰) देवताड़क वृक्ष।}}
{{outdent|उल—युक्तप्रदेशकी एक नदी। यह शाहजहांपुर जिलेमें अक्षा॰ २८° २१' उ॰ तथा द्राघि॰ ८०° २७' पू॰से निकलती और दक्षिणसे पूर्व ७ मील बह कर अक्षा॰ २८° २२' उ॰ एवं द्राघि॰ ८०° २८' पू॰पर खीरी जिलेमें जा पहुंचती है। फिर सीतापुर जिलेमें उल अक्षा॰ २७° ४२' उ॰ तथा द्राघि॰ ८१° १३' पू॰पर चौकासे मिलती है। पूरी लम्बाई ५५ कोस है। इसमें बाढ़ आनेका बड़ा डर रहता है। कहीं कहीं जल बिलकुल सूख जाती है। अलीगंज एवं गोले और लखीमपुर तथा सिधोके बीच इसपर पुल बंधा है। यह नाव चलाने या खेतमें पानी पहुंचानेके काम नहीं आती।}}
{{outdent|उलंग (हिं॰ स्त्री॰) एक चाय।}}
{{outdent|ऊलजलूल (हिं॰ वि॰) १ अटपटांग, वाहियात। २ मूर्ख, गड़वड़िया। ३ असभ्य, गंवार।}}
{{outdent|ऊलर (हिं॰ स्त्री॰) काश्मीरस्थ ह्रद विशेष, काश्मीरकी एक झील। यह खूब लम्बी चौड़ी है।}}
{{outdent|ऊलूषी (सं॰ पु॰) १ जलजन्तु विशेष। एक पानीका जानवर। २ मत्स्य विशेष, एक मछली। {{smaller|उलूषी देखो।}}}}
{{outdent|ऊलूक (सं॰ पु॰) उलूक, उल्लू।}}
{{outdent|ऊवट, {{smaller|उवट देखो।}}}}
{{outdent|ऊवध्य (सं॰ क्ली॰) पशुके उदरका नपचा हुआ तृण।}}
{{outdent|ऊष् (धातु) भ्वादि॰ पर॰ सक॰ सेट्। "ऊष रोगे।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} पीड़ा देना, तकलोफ पहुंचाना।}}
{{outdent|ऊष (सं॰ पु॰) ऊष-क। १ क्षारमृत्तिका, खारी मट्टी। २ कर्णरन्ध्र, कानका छेद। ३ मलय पर्वत, चन्दनाद्रि। (क्ली॰) ४ प्रत्यूषकाल, तड़का। ५ शुक्र, वीर्य।}}
{{outdent|ऊषक (सं॰ क्ली॰) ऊष स्वार्थे कन्। प्रत्यूष समय, सवेरा।}}
{{outdent|ऊषण (सं॰ क्ली॰) ऊष-ल्युट्। १ मरिच, मिर्च। २ शुण्ठी, सोंठ। ३ पिपरामूल। ४ धौत।}}
{{outdent|ऊषणा (सं॰ स्त्री॰) ऊषण-टाप्। १ पिप्पली, पीपल। २ चविका।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४२२'''|'''ऊषपुट—ऊह्यगान'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊषपुट (सं॰ स्त्री॰) कागजमें लिपटा नमकका दाना।}}
{{outdent|ऊषर (सं॰ त्रि॰) ऊषं क्षारमृत्तिकां राति ददाति, ऊष-र अथवा ऊष-रा-क। नोना स्थान, रेहकी जगह।}}
{{block center|<poem>
"तत्र विद्या न वप्तव्या शुभं वीजमिवोषरे।" {{smaller|(मनु २।११२)}}
</poem>}}
{{outdent|ऊषरज (सं॰ क्ली॰) ऊषरात् जायते, ऊषर-जन-ड। १ पांशुलवण। २ रोमक नामक अयस्कान्त विशेष।}}
{{outdent|ऊषवान् (सं॰ त्रि॰) ऊषो विद्यतेऽस्य, ऊष-मतुप् मस्य वः। नोना स्थान, रेहकी जगह।}}
{{outdent|ऊषा, {{smaller|उषा देखो।}}}}
{{outdent|ऊष्म, {{smaller|उष्म देखो।}}}}
{{outdent|ऊष्मण (सं॰ त्रि॰) ऊष्मोऽस्त्यस्य, ऊष्म-न। ऊष्म-युक्त, गर्म।}}
{{outdent|ऊष्मण्य (सं॰ त्रि॰) ऊष्म निवारणीयत्वेन अस्यास्ति, ऊष्मन्-यत्। ऊष्मानिवारक, गर्मी दूर करनेवाला, ठण्डा।}}
{{outdent|ऊष्मन् (सं॰ पु॰) ऊष-मनिन्। १ ग्रीष्म, गरमी। २ ताप, धूप}}
{{outdent|ऊष्मप (सं॰ त्रि॰) गर्म, भोजनका वाष्प खींच लेनेवाला।}}
{{outdent|ऊष्मपर (सं॰ त्रि॰) ऊष्मन्के पहले पड़नेवाला।}}
{{outdent|ऊष्मप्रकृति (सं॰ त्रि॰) ऊष्मन्से निकला हुआ।}}
{{outdent|ऊष्मवत् (सं॰ त्रि॰) तप्त, गर्म।}}
{{outdent|ऊष्मान्त (सं॰ त्रि॰) ऊष्मन्में समाप्त होनेवाला।}}
{{outdent|ऊष्मान्तःस्थ (सं॰ पु॰) अर्द्धस्वर, जो पूरा स्वर न हो।}}
{{outdent|ऊष्मोपगम (सं॰ पु॰) उत्तापका आगम, गर्मीकी आमद।}}
{{outdent|ऊसन (हिं॰ पु॰) वृक्षविशेष, तरमिरा, जेवा। इसे सर्षपकी भांति यव तथा गोधूमके साथ बोते हैं। ऊसनका तैल जलाते और खली गायों तथा भैंसोंको खिलाते हैं।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऊसर (हिं॰) {{smaller|ऊषर देखो।}}}}
{{outdent|ऊह् (धातु) भ्वा॰ आत्म॰ सक॰ सेट्। "ऊह वितर्के।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} सन्देहसे तर्क करना, शुबहसे बहस छेड़ना।}}
{{outdent|ऊह (सं॰ पु॰) ऊह-घञ्। १ वितर्क, बहस। २ अध्याहार, छिपाव। ३ परीक्षा, जांच। ४ अनन्वित विभक्ति लिङ्गको छोड़ अन्वययोग्य विभक्त्यादिकी कल्पना। ५ आरोप, लगाव। ६ सिद्धिविशेष। ७ अनुमान, फर्ज।}}
{{outdent|ऊहगान (सं॰ क्ली॰) सामगानका एक ग्रन्थ।}}
<div style="text-align: right;">{{smaller|साम देखो।}}</div>
{{outdent|ऊहन (सं॰ क्ली॰) वितर्क, बहस।}}
{{outdent|ऊहनी (सं॰ स्त्री॰) ऊह-ल्युट् ङीष्। सम्मार्जनी।}}
{{outdent|ऊहनीय (सं॰ त्रि॰) तर्क्य, बड़सके काबिल।}}
{{outdent|ऊहा (सं॰ स्त्री॰) ऊह-टाप्। {{smaller|ऊह देखो।}}}}
{{outdent|ऊहापोह (स' त्रि॰) ऊहस्तकः अपोहः अपगतो यत्र, बहुव्री॰। १ तर्कशून्य, बेबहस। २ तर्कद्वारा संशय मिटाये हुआ, जो बहससे शक मिटा चुका हो। ३ अध्ययनादिमें संशयहीन, सबकमें शक न रखनेवाला। ४ सुहृदादि प्राप्तिविषयमें कृतनिश्चय, दोस्त वगैरहकी मुलाकात ठहराये हुआ। ५ दानादिमें द्विधा मतशून्य, बेधड़क देनेवाला।}}
{{outdent|ऊहित (सं॰ त्रि॰) ऊह-क्त। १ तर्कित, बहस किया हुआ। २ अध्याहृत, छिपा हुआ। ३ अनुमित, फर्ज किया हुआ। ४ सम्भावित, मुमकिन।}}
{{outdent|ऊह्य (सं॰ त्रि॰) ऊह ण्यत्। १ तर्कणीय, बहसके काबिल। २ व्यवहार्य, लगनेवाला। (क्ली॰) ३ मीमांसा-शास्त्रोक्त ऊह विशेष।}}
{{outdent|ऊह्यगान, {{smaller|उहगान देखो।}}}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude><div style="text-align:center; font-size: 250%; margin: 20px 0;">'''ऋ'''</div>
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋ (सं॰ पु॰) १ स्वरवर्णका सप्तम अक्षर। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत भेदसे यह तीन प्रकारका होता है। उच्चारणस्थान मूर्द्धा है। लिखनकी प्रणालीमें ऊर्ध्व देशपर एक वक्र रेखा दक्षिण जायेगी और वामदिक्से आरम्भ कर एक त्रिकोणाकृति बनानेमें आयेगी। फिर दक्षिण दिक्को अधोगामी रेखा पड़ेगी। मात्रा पराशक्ति-जैसी विख्यात है। उसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर अवस्थान करते हैं। ऋकारका तन्त्राक्त नाम षूर, दीर्घमुखी, रुद्र, देवमाता, त्रिविक्रम, भारभूति, क्रिया, क्रूरा, रोचिका, नासिका, द्युत, एकपादशिरः, माला, मण्डना, शान्तिनी, जत्र, कर्ण, कामलता, मेधः, निवृत्ति, गणनायक, रोहिणी, शिवदूती, पूर्णगिरि और संप्रमो है। {{smaller|(वर्णोद्धारतन्त्र)}} २ धातुका अनुबन्ध-विशेष। "ऋचडादृक्ष।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} ३ स्वर्ग, बिहिश्त। ४ तपन। (स्त्री॰) ५ देवमाता अदिति। (अव्य॰) ६ हास्य परिहास, हौहौ ठौठौ। ७ निन्दा, छी-छी। ८ वाक्य, बात। ९ प्राप्ति, हासिल। १० वाक्यविभक्ति। (धातु) भ्वा॰ पर॰ सक॰ अनिट्। ११ गमन करना, जाना। १२ प्राप्त होना, पहुंचना। "ऋ गतौ प्राप्तौ च।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} अदा॰ पर॰ सक॰ अनिट्। १३ गमन करना, चलना। "ऋ इरल् गत्याम्।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} जुहो॰ पर॰ सक॰ अनिट्। १४ गमन करना, चल पड़ना। "ऋ रलि गत्याम्।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} स्वा॰ पर॰ सक॰ अनिट्। १५ हिंसा करना, मारना। "ऋ रन हिंसने।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}}}}
{{outdent|ऋक् (सं॰ स्त्री॰) ऋचन्ते स्तूयन्ते अनया देवाः, ऋच्-क्विप्। १ ऋग्वेद। इसकी शाखा एकविंशति हैं। २ ऋग्वेदोक्त मन्त्र। ३ स्तुति, तारौफ। ४ पूजा, परस्तिश। (त्रि॰) ५ तप्त, गर्म।}}
{{outdent|ऋक्कस (सं॰ अव्य॰) ऋक्करास्। अक्।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋक्ण (सं॰ त्रि॰) व्रश्च-क्त, पृषोदरादित्वात् वलोपः। छिन्न, कटा हुआ।}}
{{outdent|ऋक्थ (सं॰ क्ली॰) ऋच् सुनौ थक्। पातुतुदिवचिरिचिंसिचिभ्यस्थक्। उण् २।७। १ धन, दौलत। २ स्वर्ण, जर। ३ उत्तराधिकारसूत्रसे मिलनेवाली ज्ञाति प्रभृतिकी सम्पत्ति, जो जायदाद वरासतसे हासिल हो।}}
{{outdent|ऋक्थहर (सं॰ त्रि॰) ऋक्थं हरति, ऋक्थ-हृ-अच्। अंशभागी, हिस्सेदार, वरासतसे माल पानेवाला।}}
{{outdent|ऋक्ष (सं॰ पु॰ क्ली॰) ऋष्-स-कित्। वृनृभृञ्मृगृभ्यः कित्। उण् ३।६६। १ नक्षत्र, सितारा।}}
{{block center|<poem>
"जौद्रा राशी वेङ्गा रोषाचिन्य पृष्ठाः सुमाधानः।
रेरुद्याग्नापोज्ञः क्रयक्रुङ्गा इयाच्चोनिङ्गेः।" {{smaller|(ज्योतिष वेदाङ्ग १४)}}
</poem>}}
२ राशि। {{smaller|(रघु १२।३५)}}
युरोपके ज्योतिष शास्त्रमें ऋक्ष नामक स्वतन्त्र राशि है। नाम उर्सा मेजर (Ursa major) रखते हैं। यह उत्तर राशियोंमें एक समझा जाता है। इस राशिमें सात तारा रहते हैं। विशेषता यह पड़ती—इसमें कितनी ही द्वितारा और नीहारिका लगती है।
{{outdent|ऋक्ष-अच्। ३ पर्वत विशेष, एक पहाड़। यह सप्त कुलाचलके मध्य पड़ता है। {{smaller|कुलाचल देखो।}} इस पर्वतके मध्य नर्मदा नदो प्रवाहित है।}}
{{block center|<poem>
"ऋक्षवन्तं गिरिश्रेष्ठमध्यास्ते नर्मदां पिवन्।
सर्वर्क्षाणामधिपतिर्धूमो नामैष यूथपः।" {{smaller|(रामायण ६।२७।९०)}}
</poem>}}
इसी ऋक्षवान् पर्वतको प्राचीन पाश्चात्य ऐतिहासिक टलेमिने 'ओक्षेटन' (Ouxeuton) लिखा है। वर्तमान विन्ध्य पर्वतका दक्षिण-पूर्वांश पहले 'ऋक्ष', 'ऋक्षवान्' इत्यादि नामसे पुकारा जाता था।
{{block center|<poem>
"नर्मदाकूलमेकाकी नगरी मृत्तिकावतीम्।
ऋक्षवन्तं गिरिं जित्वा शुक्तिमत्यामुवास ह।" {{smaller|(हरिवंश ३६।१५)}}
</poem>}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४२४'''|'''ऋक्षगन्धा—ऋक्सम'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
उन्होंने नर्मदाके कूलपर पहुंच मृत्तिकावती नगरीपर अधिकार किया और ऋक्षवान् पर्वतको जीत शुक्तिमतीमें डेरा डाल दिया।
<div style="text-align: right;">{{smaller|मृत्तिकावती और शुक्तिमती देखो।}}</div>
२ भल्लूक, भालू, रीछ। ३ शोणक वृक्ष, एक पेड़। ४ पुरुवंशीय अजमीढ़ राजाके पुत्र। ५ पौरव विदूरथके पुत्र। ६ पुरुवंशीय अरिह राजाके पुत्र। ७ मेरुके निकटस्थ एक पर्वत। (त्रि॰) ८ कृतवेधन, मारा हुआ।
{{outdent|ऋक्षगन्धा (सं॰ स्त्री॰) ऋक्षस्येव गन्धो यस्याः, बहुव्री॰। वृद्धदारक वृक्ष, एक पेड़। दूसरा नाम छागलान्त्री, आवेगी, वृद्धदारक, जुङ्ग, युगन्धिगन्धा, छगला, महाश्यामा, जाङ्गुली, जीर्णवल्कल, कोटरपुष्पी, ऋक्षगन्धा, छागलाङ्गी, अन्त्री, जुङ्गा, छगली, जुङ्गक, श्यामा, छागलान्तिका, दीर्घवाहुका, वृद्धा, और अजान्त्री (Argyreia speciosa, sweet) है।}}
वैद्यक मतसे यह रसायन, वायुनाशक, बलकर तथा पिच्छिल रहता और शोथ, आमवात, कास, श्वास एवं ज्वररोगपर चलता है। बीजादि ग्रहण करना चाहिये। मात्रा दो माशा है। यह वृक्ष भारतवर्षके पश्चिमाञ्चलमें बहुत होता है। २ ऋक्षिजाहृक्षवृक्ष। ३ क्षीरविदारी वृक्ष।
{{outdent|ऋक्षगन्धिका (सं॰ स्त्री॰) ऋक्षगन्धा स्वार्थे कन्-टाप्, अत इत्वञ्च। कृष्णभूमिकूष्माण्ड, काला विदारी कन्द। संस्कृत पर्याय क्षीरविदारी, महाश्वेता और क्षीरिका है।}}
{{outdent|ऋक्षगिरि (सं॰ पु॰) ऋक्षश्चायं गिरिश्चेति, कर्मधा॰। सप्तकुलाचलके मध्यका एक पर्वत। यह पहाड़ गोण्डवाना देशमें पड़ता और रैवतक पर्वतसे निकलता है। {{smaller|ऋक्ष देखो।}}}}
{{outdent|ऋक्षग्रीव (सं॰ पु॰) एक पिशाच।}}
{{outdent|ऋक्षचक्र (सं॰ क्ली॰) ऋक्षाणां चक्रम्, ६-तत्। राशिचक्र।}}
{{outdent|ऋक्षजिह्व (सं॰ पु॰) कुष्ठरोग विशेष, किसी किस्मका कोढ़। इसमें वेदना बहुत बढ़ती है। इधर-उधर रक्त और मध्यमें पीत मिश्रित कृष्ण वर्ण रहता है। स्पर्श}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
करनेसे यह कठोर लगता है। आकृति ऋक्षकी जिह्वा-जैसी होती है।
{{outdent|ऋक्षनाथ (सं॰ पु॰) ऋक्षाणां नाथः, ६-तत्। १ नक्षत्रेश्वर चन्द्र, चांद। २ जाम्बवान्। यह कृष्णपत्नी जाम्बवतीके पिता थे।}}
{{outdent|ऋक्षनेमि (सं॰ पु॰) विष्णु।}}
{{outdent|ऋक्षपति, {{smaller|ऋक्षनाथ देखो।}}}}
{{outdent|ऋक्षर (सं॰ पु॰) ऋष्-कसरन्। तॄषिमृशां कसरन्। उण् ४।७२। ऋत्विक् ब्राह्मण।}}
{{outdent|ऋक्षराज (सं॰ पु॰) ऋक्षाणां राजा, ऋक्ष-राजन्-टच्। राजाहः सखिभ्यष्टच्। पा ५।४।९१। १ चन्द्र, चांद। २ जाम्बवान्। {{smaller|(हरिवंश ३१।४८)}}}}
{{outdent|ऋक्षला (सं॰ स्त्री॰) ऋच्-सलच् गुणाभावः। गुल्फाधःस्थित नाड़ी।}}
{{outdent|ऋक्षवन्त (सं॰ क्ली॰) शम्बरासुरकी राजधानी।}}
{{block center|<poem>
"ऋक्षवन्तं नगरे निहत्यासुरसत्तमम्।" {{smaller|(हरिवंश १६ अ॰)}}
</poem>}}
{{outdent|ऋक्षवान् (सं॰ पु॰) ऋक्ष मतुप् मस्य वः। {{smaller|ऋक्षगिरि देखो।}}}}
{{outdent|ऋक्षविभावन (सं॰ क्ली॰) नक्षत्रोंकी गणना।}}
{{outdent|ऋक्षविल (सं॰ पु॰) दक्षिणी महेन्द्र पर्वतका एक बृहत् गह्वर। हनूमानादि वानर सीताको ढूंढ़ते ढूंढ़ते यहीं आकर पथ भूले थे। {{smaller|(रामायण)}} आज कल सिंहलद्वीपमें आदमशृङ्ग पर्वतके निकट इसके रहनेका अनुमान लगाते हैं।}}
{{outdent|ऋक्षहरौश्वर (सं॰ त्रि॰) ऋक्षों और कपियोंके प्रभु।}}
{{outdent|ऋक्षौक (सं॰ त्रि॰) ऋक्ष इव, ऋक्ष इवार्थे। भल्लूकके समान हिंस्र जन्तु, जो जानवर रीछ-जैसा खूंखार हो।}}
{{outdent|ऋक्षेश (सं॰ पु॰) ऋक्षाणां ईशः, ६-तत्। चन्द्र, चांद।}}
{{outdent|ऋक्षैष्टि (सं॰ स्त्री॰) ऋक्षविशेषमाश्रित्य इष्टिः, मध्यपदलोपो। नक्षत्रविशेषके उद्देश्यसे किया जानेवाला एक यज्ञ।}}
{{outdent|ऋक्षोद (सं॰ पु॰) पर्वत विशेष, एक पहाड़।}}
{{outdent|ऋक्संशित (सं॰ त्रि॰) ऋक् द्वारा उत्तेजित किया हुआ।}}
{{outdent|ऋक्संहिता (सं॰ स्त्री॰) ऋचां संहिता, ६-तत्। ऋग्वेद।}}
{{outdent|ऋक्सम (सं॰ क्ली॰) ऋचा समम्, ३-तत्। सामविशेष।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६६२
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कण्टपना-कण्ठ|६६१}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
कण्ट्रपत्रा, <small>करपवफला देखो।</small>
कण्टपत्रिका (सं० स्त्री०) वार्ताको वृक्ष, भंटेका पौदा।
कण्टपाद (सं० पु०) विकत वृक्ष, बैंचो।
कण्डपुङ्खा (सं० स्त्री० ) कण्टकशरपुवा, कंटीली शरफोंका।
कण्टपुटिका, <small>कटपुडा देखो।</small>
कण्टफल (सं० पु०) कण्ठं कण्टकान्वितं फलम् मध्यपदलो। १ देवताड़, बूंधरबेल, सनैया।२ क्षुद्र गोक्षुरक, छोटी गोखरू । ३ पनस, कटहल। ४ धुस्त-रक, धतूरा। ५ लताकरत, किसी किस्मका करोंदा। ६ एरण्ड, रेड़। ७ नद्याम। ८ कुसुम्भ, कुसुम। ९ ब्रह्मदण्डी। बहुव्रीहि समास करनेसे उक्त फलोंके पेड़का भी बोध होता है।
कण्टफला (सं० स्त्री०) कण्डं कण्टकाचित फलं यस्याः। १ देवदाली लता। २ लघुकारवेल्ली, छोटा करेला। ३ ब्रह्मदण्डी वृक्ष। ४ कर्कोटी, काकरोल, गुलककरा। ५ बृहती, कटाई।
कण्टल (सं० पु०) कण्टः अस्त्यस्य, कण्ट-पलच;कण्टेन कण्टकेन अति पर्याप्नोति, कण्ट-अल-अच इति वा। वावल वृक्ष, बबूलका पेड़। इसका संस्कृत पर्याय-वावल, स्वर्णपुष्य और सूक्ष्मपुष्य है।
कण्टवल्ली (सं० स्त्री०) कण्टा कण्टकान्विता वल्ली, श्रीवल्ली वृक्ष। इसे कोकण-में बाघे टी कहते हैं।
कण्टवृक्ष (सं० पु०) तेजःफलवृक्ष, कायफलका पेड़।
कण्टसारका (सं० स्त्री०) खेतमिण्टोवृक्ष, सफेद कटसरैयेका पेड़।
कण्टाकारी (सं० पु०) १विकात वृक्ष, बैंचौका पौदा। (स्त्री०) २ पनसवृक्ष, कटहल।
कण्टाकुम्भाड़, (सं० पु०) कण्टकलताविशेष, एक कंटोली बल।
कण्टाफल (सं० पु०) कटि भाव अप कण्टा कण्ट-कोपलक्षितं फलं यस्य। १ धुस्तूरवक्ष, धतूरेका पेड़। २ पनसवच, कटलका पौदा। ३ पनसफल कटहल ।
कण्डारवी (सं० स्त्री०) वासा, नौलो नरगन्दी।
</Small>Vol. III. 166{{gap}}{{gap}}
{{Multicol-break}}
कण्टारिका ( सं० स्त्री०) १ अग्निदीपनी वृक्ष । २ कण्ट-कारी, कटेरो।
कण्टागेल (सं० पु०) <small>कटात गला देखो।</small>
कण्टार्तगला (सं० स्त्री० ) नोलझिण्टी, काली कट-सरैया।
कण्टाईलता, <small>कस्टात गला देखो।</small>
कण्टाल (सं० पु०) १ मदनवृक्ष, मैनफलका पौदा। २ पनसक्ष, कटहलका पेड़।
कण्टालिका,<small> कटकारी देखी।</small>
कण्टाली, <small>कटकारी देखो।</small>
कण्टालु (सं० पु०) कण्टाय कण्टकाय अलति पर्याप्नोति, कण्ट-अल-उण । १ ववूरक वृक्ष, बबूलका पेड़। २ वृहतो, कटाई। ३ वंश, बांस । ४ वार्ताको वृक्ष, बैंगनका पौदा। ५ कर्कटीभेद, किसी किस्मकी ककडी।
कण्टाहय (सं० पु०) कराएं कण्टकं पाहूयते स्पर्धते,कण्ट-बा-हे-क। पद्मकन्द, कमलगट्टा।
कण्टिका (सं० स्त्री०) अतिबला, ककैया, ककई।
कण्टी (सं० पु०) कण्टः कण्टकः अस्यास्ति, कण्ट-इनि। १ खेतापामार्ग, सफेद लटजीरा। २ गोक्षुर, गोखरू । ३ क्षुद्रगोक्षुर, छोटी गोखुरू। ४ खदिर, खैर।
कण्ठ (सं० पु०) कण्ठ। <Small>कोष्ठः। उच् ।१।१०५।</small> १ गलदेश, ग्रोवाके सम्मुखका भाग, हलक, नरेटा, टंटवा। सुश्रुतके मतानुसार कण्ठमें चार तरुणास्थि मध्यपदलो। श्रीवल्लोवृक्ष, बाधेटौं। और मण्डला नामक तीन अस्विसन्धि हैं। इसको नाडोमें उभय पाच पर 'चार धमनी' रहती हैं। उनमें दोको लोला और दोको मन्या कहते है। किसी प्रकारसे उक्त धमनी विद्ध होने पर मूकता एवं स्वरविकृति आती और रस-ग्रहणको शक्ति चली जाती है। २ ग्रोवाका समुदाय अंश, गर्दनका सारा हिस्सा। अनेक स्थलमें कण्डशब्द ग्रोवाके समस्त अंशका भी द्योतक है। कण्ठव्यतीत ग्रोवाके अन्यान्य अंशमें ४ कण्डरा, १ कूर्च, ९ अस्थि, ८ अस्थिसन्धि और ३६ स्नायु हैं। पौवाके उभय पाश्च में पड़नेवाली कारला शिरातोंका नाम ४शिरावोंका नाम माढका है। इन सिरावोंके विद्य होनेसे सद्यः मृत्य पाता है। <Small>(सुनुव)</small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३६६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधिकारविधि—अधिक्षित्'''|''३५९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिकारविधि (सं॰ पु॰) अधिकारे फलस्वाम्ये विधिर्विधानम्। (वाच॰) मीमांसोक्त विधिविशेष, यह बतानेका कायदा, कि मनुष्य जो कर्म करता, उससे कैसा फल निकलता है। मीमांसा-शास्त्रके अनुसार जो जैसा फल चाहे, वह वैसा ही यज्ञकर पा सकता है। स्वर्गकामनावालेको अग्निहोत्र और राजाको राजसूय यज्ञ करना चाहिये।
अधिकारस्थ (सं॰ त्रि॰) न्यायालय में प्रतिष्ठित, दफ़्तरमें मुक़रर।
अधिकाराढ्य (सं॰ त्रि॰) क्षमता सम्पन्न, इख़तियार-वाला।
अधिकारिता (सं॰ स्त्री॰) अधिकारिणः भावः, तल्। <small>तस्य भावस्त्वतलौ। पा ५।१।।११९ ।</small> अधिकारित्व, स्वामित्व।
अधिकारित्व (सं॰ क्ली॰) स्वामित्व, इजारा।
अधिकारिन् (सं॰ त्रि॰) अधि-कृ-णिनि। १ स्वामी, स्वत्ववान्, जिसे अधिकार प्राप्त हो; मिलकियत-वाला। (पु॰) २ अध्यक्ष, हाकिम। ३ प्रभु, मालिक। ४ वेदान्तशास्त्रवेत्ता, वेदान्त में पारङ्गत पुरुष। ५ मूर्त्यादिका वेशकर्ता, तस्वीरें बनानेवाला कारीगर।
बङ्गाल में 'अधिकारी' उपाधिधारी ब्राह्मणों और वैष्णवोंकी एक श्रेणी है। अधिकारी ब्राह्मण सकल ही विष्णुमन्त्र से दीक्षित होते हैं। यह कितने ही
नवशाख और नीच जातिके गुरु हैं। इनके शिरपर बड़ी बड़ी शिखाका गुच्छा रहता और सर्वाङ्गमें गोपीमृत्तिकाका लाल तिलक और राधाकृष्णनामकी छाप होती है। कण्ठ में मोटी-मोटी तुलसीकी माला लटकती है। नीच जातिके गुरु होनेसे इनके घर में सब्राह्मण भोजनादि नहीं करते। फिर भी, यह नियम बङ्गाल में सर्वत्र प्रचलित नहीं। किसी किसी स्थानमें विशुद्ध राढ़ीय ब्राह्मण इनके घर विवाहादि भी कर लेते हैं।
अधिकारी (सं॰ पु॰) १ पुरुष, मर्द। २ प्रभु, मालिक। ३ स्वत्ववान्, हक़दार। ४ क्षमताशील पुरुष, इख़्तियारवाला आदमी। (स्त्री॰) अधिकारिणी।
अधिकार्थ (सं॰ त्रि॰) एकसे अधिक अर्थ रखनेवाला, जिसमें एकसे ज्य़ादा माने निकलें, बढ़ाकर बताया गया, मुबालग़ा दिया हुआ।
अधिकार्थवचन (सं॰ क्ली॰) स्तुति-निन्दाप्रयुक्तं अध्यारोपितार्थवचनं अधिकार्थवचनम्। स्तुति किंवा निन्दा द्वारा आरोपित वस्तुके धर्मसे भी अतिरिक्त गुण-वचन, तौक़ीर या हिक़ारतसे किसी चीज़ की इतनी तारीफ़, जितनी क़ाबिलियत उसमें न हो; अतिरिक्त स्तुति या निन्दा द्योतक वाक्य, ज्य़ादा तौक़ीर या हिक़ारत ज़ाहिर करनेवाला फ़िक़रा। जैसे—तृण वातच्छेद्य है; यहां, दुर्बलता प्रयुक्त निन्दा देख पड़ती है। फिर नदीको काकपेया बतानेसे उसके जलपूर्ण होनेके गुणकी प्रशंसा है।
अधिकृच्छ्र (सं॰ पु॰) अधिकं कृच्छ्रं कष्टं साधनतयाऽस्त्यस्य। १ एक मास-साध्य अधिकृच्छ्र नामक व्रत विशेष। (क्ली॰) प्रादि-स॰। २ अधिक कष्ट,
ज्य़ादा तकलीफ़। (त्रि॰) ३ अधिककष्टयुक्त, बड़ी मुश्किलमें पड़ा हुआ।
अधिकृत (सं॰ पु॰) अधि-कृ-क्त। १ अध्यक्ष, हाकिम। २ अधिकारी, हक़दार। ३ आयव्ययादिका अवक्षेपक, आमदनी ख़र्च वग़ैरह जांचनेवाला। (त्रि॰) ४ नियुक्त, मुक़रर किया गया। ५ अधिकार किया हुआ, जिसपर क़ब्ज़ा हो गया हो।
अधिकृति (सं॰ स्त्री॰) अधि-क-क्तिन्। १ अधिकार, क़ब्ज़ा। २ स्वत्व, हक़, दावा।
अधिकृत्य (सं॰ अव्य॰) १ शीर्षपर स्थान देकर, प्रधान विषय बनाकर। २ विषयमें, बाबत। ३ प्रमाणसे, हवालेपर।
अधिक्रम (सं॰ पु॰) अधि-क्रम-घञ् भावे, मान्तात् न वृद्धिः। <small>नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्थानाचमेः। पा ७।३।३४।</small> १ आक्रमण, हमला। २ आरोहण, चढ़ाई।
अधिक्रमण (सं॰ क्ली॰) आक्रमण, मारनेका कार्य, हमला करनेका काम।
अधिक्षित् (सं॰ त्रि॰) अधि-क्षि-क्विप् कर्तरि। १ क्षयकारी, नाशकरनेवाला। (क्ली॰) भावे क्विप्। २ क्षय, नाश। (वै॰ पु॰) ३ राजा, बादशाह।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधिकारविधि—अधिक्षित्'''|''३५९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिकारविधि (सं॰ पु॰) अधिकारे फलस्वाम्ये विधिर्विधानम्। (वाच॰) मीमांसोक्त विधिविशेष, यह बतानेका कायदा, कि मनुष्य जो कर्म करता, उससे कैसा फल निकलता है। मीमांसा-शास्त्रके अनुसार जो जैसा फल चाहे, वह वैसा ही यज्ञकर पा सकता है। स्वर्गकामनावालेको अग्निहोत्र और राजाको राजसूय यज्ञ करना चाहिये।
अधिकारस्थ (सं॰ त्रि॰) न्यायालय में प्रतिष्ठित, दफ़्तरमें मुक़रर।
अधिकाराढ्य (सं॰ त्रि॰) क्षमता सम्पन्न, इख़तियार-वाला।
अधिकारिता (सं॰ स्त्री॰) अधिकारिणः भावः, तल्। <small>तस्य भावस्त्वतलौ। पा ५।१।।११९ ।</small> अधिकारित्व, स्वामित्व।
अधिकारित्व (सं॰ क्ली॰) स्वामित्व, इजारा।
अधिकारिन् (सं॰ त्रि॰) अधि-कृ-णिनि। १ स्वामी, स्वत्ववान्, जिसे अधिकार प्राप्त हो; मिलकियत-वाला। (पु॰) २ अध्यक्ष, हाकिम। ३ प्रभु, मालिक। ४ वेदान्तशास्त्रवेत्ता, वेदान्त में पारङ्गत पुरुष। ५ मूर्त्यादिका वेशकर्ता, तस्वीरें बनानेवाला कारीगर।
बङ्गाल में 'अधिकारी' उपाधिधारी ब्राह्मणों और वैष्णवोंकी एक श्रेणी है। अधिकारी ब्राह्मण सकल ही विष्णुमन्त्र से दीक्षित होते हैं। यह कितने ही
नवशाख और नीच जातिके गुरु हैं। इनके शिरपर बड़ी बड़ी शिखाका गुच्छा रहता और सर्वाङ्गमें गोपीमृत्तिकाका लाल तिलक और राधाकृष्णनामकी छाप होती है। कण्ठ में मोटी-मोटी तुलसीकी माला लटकती है। नीच जातिके गुरु होनेसे इनके घर में सब्राह्मण भोजनादि नहीं करते। फिर भी, यह नियम बङ्गाल में सर्वत्र प्रचलित नहीं। किसी किसी स्थानमें विशुद्ध राढ़ीय ब्राह्मण इनके घर विवाहादि भी कर लेते हैं।
अधिकारी (सं॰ पु॰) १ पुरुष, मर्द। २ प्रभु, मालिक। ३ स्वत्ववान्, हक़दार। ४ क्षमताशील पुरुष, इख़्तियारवाला आदमी। (स्त्री॰) अधिकारिणी।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिकार्थ (सं॰ त्रि॰) एकसे अधिक अर्थ रखनेवाला, जिसमें एकसे ज्य़ादा माने निकलें, बढ़ाकर बताया गया, मुबालग़ा दिया हुआ।
अधिकार्थवचन (सं॰ क्ली॰) स्तुति-निन्दाप्रयुक्तं अध्यारोपितार्थवचनं अधिकार्थवचनम्। स्तुति किंवा निन्दा द्वारा आरोपित वस्तुके धर्मसे भी अतिरिक्त गुण-वचन, तौक़ीर या हिक़ारतसे किसी चीज़ की इतनी तारीफ़, जितनी क़ाबिलियत उसमें न हो; अतिरिक्त स्तुति या निन्दा द्योतक वाक्य, ज्य़ादा तौक़ीर या हिक़ारत ज़ाहिर करनेवाला फ़िक़रा। जैसे—तृण वातच्छेद्य है; यहां, दुर्बलता प्रयुक्त निन्दा देख पड़ती है। फिर नदीको काकपेया बतानेसे उसके जलपूर्ण होनेके गुणकी प्रशंसा है।
अधिकृच्छ्र (सं॰ पु॰) अधिकं कृच्छ्रं कष्टं साधनतयाऽस्त्यस्य। १ एक मास-साध्य अधिकृच्छ्र नामक व्रत विशेष। (क्ली॰) प्रादि-स॰। २ अधिक कष्ट,
ज्य़ादा तकलीफ़। (त्रि॰) ३ अधिककष्टयुक्त, बड़ी मुश्किलमें पड़ा हुआ।
अधिकृत (सं॰ पु॰) अधि-कृ-क्त। १ अध्यक्ष, हाकिम। २ अधिकारी, हक़दार। ३ आयव्ययादिका अवक्षेपक, आमदनी ख़र्च वग़ैरह जांचनेवाला। (त्रि॰) ४ नियुक्त, मुक़रर किया गया। ५ अधिकार किया हुआ, जिसपर क़ब्ज़ा हो गया हो।
अधिकृति (सं॰ स्त्री॰) अधि-क-क्तिन्। १ अधिकार, क़ब्ज़ा। २ स्वत्व, हक़, दावा।
अधिकृत्य (सं॰ अव्य॰) १ शीर्षपर स्थान देकर, प्रधान विषय बनाकर। २ विषयमें, बाबत। ३ प्रमाणसे, हवालेपर।
अधिक्रम (सं॰ पु॰) अधि-क्रम-घञ् भावे, मान्तात् न वृद्धिः। <small>नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्थानाचमेः। पा ७।३।३४।</small> १ आक्रमण, हमला। २ आरोहण, चढ़ाई।
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अधिकारस्थ (सं॰ त्रि॰) न्यायालय में प्रतिष्ठित, दफ़्तरमें मुक़रर।
अधिकाराढ्य (सं॰ त्रि॰) क्षमता सम्पन्न, इख़तियार-वाला।
अधिकारिता (सं॰ स्त्री॰) अधिकारिणः भावः, तल्। <small>तस्य भावस्त्वतलौ। पा ५।१।।११९ ।</small> अधिकारित्व, स्वामित्व।
अधिकारित्व (सं॰ क्ली॰) स्वामित्व, इजारा।
अधिकारिन् (सं॰ त्रि॰) अधि-कृ-णिनि। १ स्वामी, स्वत्ववान्, जिसे अधिकार प्राप्त हो; मिलकियत-वाला। (पु॰) २ अध्यक्ष, हाकिम। ३ प्रभु, मालिक। ४ वेदान्तशास्त्रवेत्ता, वेदान्त में पारङ्गत पुरुष। ५ मूर्त्यादिका वेशकर्ता, तस्वीरें बनानेवाला कारीगर।
बङ्गाल में 'अधिकारी' उपाधिधारी ब्राह्मणों और वैष्णवोंकी एक श्रेणी है। अधिकारी ब्राह्मण सकल ही विष्णुमन्त्र से दीक्षित होते हैं। यह कितने ही
नवशाख और नीच जातिके गुरु हैं। इनके शिरपर बड़ी बड़ी शिखाका गुच्छा रहता और सर्वाङ्गमें गोपीमृत्तिकाका लाल तिलक और राधाकृष्णनामकी छाप होती है। कण्ठ में मोटी-मोटी तुलसीकी माला लटकती है। नीच जातिके गुरु होनेसे इनके घर में सब्राह्मण भोजनादि नहीं करते। फिर भी, यह नियम बङ्गाल में सर्वत्र प्रचलित नहीं। किसी किसी स्थानमें विशुद्ध राढ़ीय ब्राह्मण इनके घर विवाहादि भी कर लेते हैं।
अधिकारी (सं॰ पु॰) १ पुरुष, मर्द। २ प्रभु, मालिक। ३ स्वत्ववान्, हक़दार। ४ क्षमताशील पुरुष, इख़्तियारवाला आदमी। (स्त्री॰) अधिकारिणी।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिकार्थ (सं॰ त्रि॰) एकसे अधिक अर्थ रखनेवाला, जिसमें एकसे ज्य़ादा माने निकलें, बढ़ाकर बताया गया, मुबालग़ा दिया हुआ।
अधिकार्थवचन (सं॰ क्ली॰) स्तुति-निन्दाप्रयुक्तं अध्यारोपितार्थवचनं अधिकार्थवचनम्। स्तुति किंवा निन्दा द्वारा आरोपित वस्तुके धर्मसे भी अतिरिक्त गुण-वचन, तौक़ीर या हिक़ारतसे किसी चीज़ की इतनी तारीफ़, जितनी क़ाबिलियत उसमें न हो; अतिरिक्त स्तुति या निन्दा द्योतक वाक्य, ज्य़ादा तौक़ीर या हिक़ारत ज़ाहिर करनेवाला फ़िक़रा। जैसे—तृण वातच्छेद्य है; यहां, दुर्बलता प्रयुक्त निन्दा देख पड़ती है। फिर नदीको काकपेया बतानेसे उसके जलपूर्ण होनेके गुणकी प्रशंसा है।
अधिकृच्छ्र (सं॰ पु॰) अधिकं कृच्छ्रं कष्टं साधनतयाऽस्त्यस्य। १ एक मास-साध्य अधिकृच्छ्र नामक व्रत विशेष। (क्ली॰) प्रादि-स॰। २ अधिक कष्ट,
ज्य़ादा तकलीफ़। (त्रि॰) ३ अधिककष्टयुक्त, बड़ी मुश्किलमें पड़ा हुआ।
अधिकृत (सं॰ पु॰) अधि-कृ-क्त। १ अध्यक्ष, हाकिम। २ अधिकारी, हक़दार। ३ आयव्ययादिका अवक्षेपक, आमदनी ख़र्च वग़ैरह जांचनेवाला। (त्रि॰) ४ नियुक्त, मुक़रर किया गया। ५ अधिकार किया हुआ, जिसपर क़ब्ज़ा हो गया हो।
अधिकृति (सं॰ स्त्री॰) अधि-क-क्तिन्। १ अधिकार, क़ब्ज़ा। २ स्वत्व, हक़, दावा।
अधिकृत्य (सं॰ अव्य॰) १ शीर्षपर स्थान देकर, प्रधान विषय बनाकर। २ विषयमें, बाबत। ३ प्रमाणसे, हवालेपर।
अधिक्रम (सं॰ पु॰) अधि-क्रम-घञ् भावे, मान्तात् न वृद्धिः। <small>नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्थानाचमेः। पा ७।३।३४।</small> १ आक्रमण, हमला। २ आरोहण, चढ़ाई।
अधिक्रमण (सं॰ क्ली॰) आक्रमण, मारनेका कार्य, हमला करनेका काम।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३६०'''|'''अधिक्षिपदञ्जनेत्र—अधिजिह'''|}}</noinclude>अधिक्षिपदञ्जनेत्र (सं॰ त्रि॰) ऐसे नेत्रोंवाला, जो कमलकी आभाको मार दें, जिसकी आंखें ऐसी हों, कि उनसे नरगिस झेप जाये।
अधिक्षिप्त (सं॰ त्रि॰) अधि-क्षिप-क्त। १ तिरस्कृत, निन्दित; हक़ीर, जिसे लोग बुरा समझें। २ प्रेरित, कृताधिक्षेप; जो फेंका गया हो, डाला जानेवाला।
अधिक्षेप (सं॰ पु॰) अधि-क्षिप-धञ् भावे। १ तिरस्कार, निन्दा; हिक़ारत, मलामत। २ स्थापन, प्रेरण; चालान, रवानगी।
अधिगणन (सं॰ क्ली॰) १ अतिरिक्त गणन, ज्य़ादा शुमार। २ अधिक मूल्यका लगाना, ज्य़ादा दामका जोड़ना।
अधिगत (सं॰ त्रि॰) अधि-गम-क्त कर्मणि। १ स्वीकृत, प्राप्त; दस्तयाब। २ विदित, जाना-माना।
अधिगन्तव्य (सं॰ त्रि॰) १ गमन करने योग्य, जाने क़ाबिल। २ प्राप्तव्य, जो मिल सके।
अधिगन्त (सं॰ पु॰) १ अग्रसर होनेवाला पुरुष, आदमी जो आगे बढ़े। २ प्राप्त करनेवाला व्यक्ति।
अधिगम (सं॰ पु॰) अधि-गम-घञ्, न दीर्घः। <small>व्याख्यानादिरूपोपदेशजनितं ज्ञानम्।" (सर्व॰ दं॰ सं॰)</small> १ ज्ञान, समझ। २ प्राप्ति, पहुंच। ३ स्वीकार, मञ्जूरी। ४ लाभ, फ़ायदा। ५ उपार्जन, कमाई। ६ व्याख्यानादिरूप उपदेशसे उत्पन्न हुआ ज्ञान, जो समझ
लेक्चर सुननेसे आये।
अधिगमन (सं॰ क्ली॰) १ आविष्कार, ईजाद। २ प्राप्ति, पहुंच। ३ अध्ययन, मुतालह। ४ सहवास ; शादी, हमबिस्तरी।
अधिगर्त्य (वै॰ अव्य॰) सारथीके स्थानपर प्राप्त होकर, गाड़ीबानकी जगह पर पहुंचकर।
अधिगव (वै॰ अव्य॰) गवि-विभक्त्यर्थे अव्य॰, वेदे अच्। (वाच॰) गौसे प्राप्तकर, गायसे पाकर।
अधिगुण (सं॰ पु़॰) अधिकः गुणः, प्रादि-स॰। १ अतिशयित विनयादि गुण, हदसे ज्य़ादा आजिज़ी बग़ैरह सिफ़त। (त्रि॰) अधिको गुणो यस्य, बहुव्री॰। २ अधिक गुणयुक्त, ज्य़ादा सिफ़तवाला।
(अव्य॰) अधिरूढ़ी गुणो यत्र। ३ ज्याधिरूढ़ धनुषसे, रोदा चढ़ी हुई कमानपर।
अधिगुप्त (सं॰ त्रि॰) अधिक रूपसे गुप्त, सुरक्षित; खूब छिपा हुआ, महफूज़।
अधिचङ्क्रम (वै॰ त्रि॰) किसी वस्तुपर चलता या रेंगता हुआ।
अधिचरण (सं॰ क्ली॰) किसी वस्तुपरका चलना, हिलना-डोलना या ठहरना।
अधिज (सं॰ त्रि॰) उच्चकुलसम्भूत, ऊंचे ख़ान्दानमें पैदा हुआ, जो अपने वंशके कारण उच्च हो, ख़ान्दानमें सबसे बड़ा।
अधिजनन (सं॰ क्ली॰) उत्पत्ति, पैदायश।
अधिजानु (सं॰ अव्य॰) जानु या घुटनों पर।
अधिजिह्व (सं॰ पु॰) अधिका जिह्वा यस्य। १ द्विजिह्व सर्प, दो ज़बानका सांप। सांपकी जीभ फटी रहती है, इसीसे इसे द्विजिह्व या अधिजिह्व कहते हैं। सर्पके द्विजिह्व होनेका वृत्तान्त महाभारतमें इसतरह लिखा है,—
सागर मन्थन हो गया था। सागर से उच्चैःश्रवा, ऐरावत, सोम, अमृत प्रभृति कितनी ही सामग्री निकल आईं। एक दिन कद्रु और विनता—दोनो सपत्नी-भगिनी बैठ कहानी कह रही थीं। पारिजातकी कहानी, माणिककी कहानी, बात-बातमें उच्चैःश्रवाकी कहानी छिड़ गई। विनताने कहा,—"मुझे समझ पड़ता, कि घोड़ेकी पूंछ सफेद है।" कंद्रु भी बोल उठी,—"नहीं, बहन! मेरी समझमें घोड़ेका अयाल काला है। अच्छा, तो आओ; इस विषयमें हम पण करें, जो हरेगा, उसीको जन्मकी भांति, दासी बनकर रहना होगा।" उच्चैःश्रवा वास्तविक श्वेतवर्ण अश्व है। कद्रु ने देखा, कि हार जाने से सपत्नीके पास दासी बनकर रहना होगा; उससे एक छल करना उन्हें उचित समझ पड़ा। यही स्थिर कर उन्होंने अपने सन्तान—सर्पोंसे बुलाकर कहा,—"वत्स! कल तुम उच्चैःश्रवा घोड़ेकी पूंछ में लिपट काले रूएं जैसे दिखाई देना। ऐसा न करने से मैं सपत्नीके सामने हार जाऊंगी, मुझे जन्मकी भांति<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३६०'''|'''अधिक्षिपदञ्जनेत्र—अधिजिह'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिक्षिपदञ्जनेत्र (सं॰ त्रि॰) ऐसे नेत्रोंवाला, जो कमलकी आभाको मार दें, जिसकी आंखें ऐसी हों, कि उनसे नरगिस झेप जाये।
अधिक्षिप्त (सं॰ त्रि॰) अधि-क्षिप-क्त। १ तिरस्कृत, निन्दित; हक़ीर, जिसे लोग बुरा समझें। २ प्रेरित, कृताधिक्षेप; जो फेंका गया हो, डाला जानेवाला।
अधिक्षेप (सं॰ पु॰) अधि-क्षिप-धञ् भावे। १ तिरस्कार, निन्दा; हिक़ारत, मलामत। २ स्थापन, प्रेरण; चालान, रवानगी।
अधिगणन (सं॰ क्ली॰) १ अतिरिक्त गणन, ज्य़ादा शुमार। २ अधिक मूल्यका लगाना, ज्य़ादा दामका जोड़ना।
अधिगत (सं॰ त्रि॰) अधि-गम-क्त कर्मणि। १ स्वीकृत, प्राप्त; दस्तयाब। २ विदित, जाना-माना।
अधिगन्तव्य (सं॰ त्रि॰) १ गमन करने योग्य, जाने क़ाबिल। २ प्राप्तव्य, जो मिल सके।
अधिगन्त (सं॰ पु॰) १ अग्रसर होनेवाला पुरुष, आदमी जो आगे बढ़े। २ प्राप्त करनेवाला व्यक्ति।
अधिगम (सं॰ पु॰) अधि-गम-घञ्, न दीर्घः। <small>व्याख्यानादिरूपोपदेशजनितं ज्ञानम्।" (सर्व॰ दं॰ सं॰)</small> १ ज्ञान, समझ। २ प्राप्ति, पहुंच। ३ स्वीकार, मञ्जूरी। ४ लाभ, फ़ायदा। ५ उपार्जन, कमाई। ६ व्याख्यानादिरूप उपदेशसे उत्पन्न हुआ ज्ञान, जो समझ
लेक्चर सुननेसे आये।
अधिगमन (सं॰ क्ली॰) १ आविष्कार, ईजाद। २ प्राप्ति, पहुंच। ३ अध्ययन, मुतालह। ४ सहवास ; शादी, हमबिस्तरी।
अधिगर्त्य (वै॰ अव्य॰) सारथीके स्थानपर प्राप्त होकर, गाड़ीबानकी जगह पर पहुंचकर।
अधिगव (वै॰ अव्य॰) गवि-विभक्त्यर्थे अव्य॰, वेदे अच्। (वाच॰) गौसे प्राप्तकर, गायसे पाकर।
अधिगुण (सं॰ पु़॰) अधिकः गुणः, प्रादि-स॰। १ अतिशयित विनयादि गुण, हदसे ज्य़ादा आजिज़ी बग़ैरह सिफ़त। (त्रि॰) अधिको गुणो यस्य, बहुव्री॰। २ अधिक गुणयुक्त, ज्य़ादा सिफ़तवाला।
(अव्य॰) अधिरूढ़ी गुणो यत्र। ३ ज्याधिरूढ़ धनुषसे, रोदा चढ़ी हुई कमानपर।
अधिगुप्त (सं॰ त्रि॰) अधिक रूपसे गुप्त, सुरक्षित; खूब छिपा हुआ, महफूज़।
अधिचङ्क्रम (वै॰ त्रि॰) किसी वस्तुपर चलता या रेंगता हुआ।
अधिचरण (सं॰ क्ली॰) किसी वस्तुपरका चलना, हिलना-डोलना या ठहरना।
अधिज (सं॰ त्रि॰) उच्चकुलसम्भूत, ऊंचे ख़ान्दानमें पैदा हुआ, जो अपने वंशके कारण उच्च हो, ख़ान्दानमें सबसे बड़ा।
अधिजनन (सं॰ क्ली॰) उत्पत्ति, पैदायश।
अधिजानु (सं॰ अव्य॰) जानु या घुटनों पर।
अधिजिह्व (सं॰ पु॰) अधिका जिह्वा यस्य। १ द्विजिह्व सर्प, दो ज़बानका सांप। सांपकी जीभ फटी रहती है, इसीसे इसे द्विजिह्व या अधिजिह्व कहते हैं। सर्पके द्विजिह्व होनेका वृत्तान्त महाभारतमें इसतरह लिखा है,—
सागर मन्थन हो गया था। सागर से उच्चैःश्रवा, ऐरावत, सोम, अमृत प्रभृति कितनी ही सामग्री निकल आईं। एक दिन कद्रु और विनता—दोनो सपत्नी-भगिनी बैठ कहानी कह रही थीं। पारिजातकी कहानी, माणिककी कहानी, बात-बातमें उच्चैःश्रवाकी कहानी छिड़ गई। विनताने कहा,—"मुझे समझ पड़ता, कि घोड़ेकी पूंछ सफेद है।" कंद्रु भी बोल उठी,—"नहीं, बहन! मेरी समझमें घोड़ेका अयाल काला है। अच्छा, तो आओ; इस विषयमें हम पण करें, जो हरेगा, उसीको जन्मकी भांति, दासी बनकर रहना होगा।" उच्चैःश्रवा वास्तविक श्वेतवर्ण अश्व है। कद्रु ने देखा, कि हार जाने से सपत्नीके पास दासी बनकर रहना होगा; उससे एक छल करना उन्हें उचित समझ पड़ा। यही स्थिर कर उन्होंने अपने सन्तान—सर्पोंसे बुलाकर कहा,—"वत्स! कल तुम उच्चैःश्रवा घोड़ेकी पूंछ में लिपट काले रूएं जैसे दिखाई देना। ऐसा न करने से मैं सपत्नीके सामने हार जाऊंगी, मुझे जन्मकी भांति<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अधिक्षिप्त (सं॰ त्रि॰) अधि-क्षिप-क्त। १ तिरस्कृत, निन्दित; हक़ीर, जिसे लोग बुरा समझें। २ प्रेरित, कृताधिक्षेप; जो फेंका गया हो, डाला जानेवाला।
अधिक्षेप (सं॰ पु॰) अधि-क्षिप-धञ् भावे। १ तिरस्कार, निन्दा; हिक़ारत, मलामत। २ स्थापन, प्रेरण; चालान, रवानगी।
अधिगणन (सं॰ क्ली॰) १ अतिरिक्त गणन, ज्य़ादा शुमार। २ अधिक मूल्यका लगाना, ज्य़ादा दामका जोड़ना।
अधिगत (सं॰ त्रि॰) अधि-गम-क्त कर्मणि। १ स्वीकृत, प्राप्त; दस्तयाब। २ विदित, जाना-माना।
अधिगन्तव्य (सं॰ त्रि॰) १ गमन करने योग्य, जाने क़ाबिल। २ प्राप्तव्य, जो मिल सके।
अधिगन्त (सं॰ पु॰) १ अग्रसर होनेवाला पुरुष, आदमी जो आगे बढ़े। २ प्राप्त करनेवाला व्यक्ति।
अधिगम (सं॰ पु॰) अधि-गम-घञ्, न दीर्घः। <small>व्याख्यानादिरूपोपदेशजनितं ज्ञानम्।" (सर्व॰ दं॰ सं॰)</small> १ ज्ञान, समझ। २ प्राप्ति, पहुंच। ३ स्वीकार, मञ्जूरी। ४ लाभ, फ़ायदा। ५ उपार्जन, कमाई। ६ व्याख्यानादिरूप उपदेशसे उत्पन्न हुआ ज्ञान, जो समझ
लेक्चर सुननेसे आये।
अधिगमन (सं॰ क्ली॰) १ आविष्कार, ईजाद। २ प्राप्ति, पहुंच। ३ अध्ययन, मुतालह। ४ सहवास ; शादी, हमबिस्तरी।
अधिगर्त्य (वै॰ अव्य॰) सारथीके स्थानपर प्राप्त होकर, गाड़ीबानकी जगह पर पहुंचकर।
अधिगव (वै॰ अव्य॰) गवि-विभक्त्यर्थे अव्य॰, वेदे अच्। (वाच॰) गौसे प्राप्तकर, गायसे पाकर।
अधिगुण (सं॰ पु़॰) अधिकः गुणः, प्रादि-स॰। १ अतिशयित विनयादि गुण, हदसे ज्य़ादा आजिज़ी बग़ैरह सिफ़त। (त्रि॰) अधिको गुणो यस्य, बहुव्री॰। २ अधिक गुणयुक्त, ज्य़ादा सिफ़तवाला।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>(अव्य॰) अधिरूढ़ी गुणो यत्र। ३ ज्याधिरूढ़ धनुषसे, रोदा चढ़ी हुई कमानपर।
अधिगुप्त (सं॰ त्रि॰) अधिक रूपसे गुप्त, सुरक्षित; खूब छिपा हुआ, महफूज़।
अधिचङ्क्रम (वै॰ त्रि॰) किसी वस्तुपर चलता या रेंगता हुआ।
अधिचरण (सं॰ क्ली॰) किसी वस्तुपरका चलना, हिलना-डोलना या ठहरना।
अधिज (सं॰ त्रि॰) उच्चकुलसम्भूत, ऊंचे ख़ान्दानमें पैदा हुआ, जो अपने वंशके कारण उच्च हो, ख़ान्दानमें सबसे बड़ा।
अधिजनन (सं॰ क्ली॰) उत्पत्ति, पैदायश।
अधिजानु (सं॰ अव्य॰) जानु या घुटनों पर।
अधिजिह्व (सं॰ पु॰) अधिका जिह्वा यस्य। १ द्विजिह्व सर्प, दो ज़बानका सांप। सांपकी जीभ फटी रहती है, इसीसे इसे द्विजिह्व या अधिजिह्व कहते हैं। सर्पके द्विजिह्व होनेका वृत्तान्त महाभारतमें इसतरह लिखा है,—
सागर मन्थन हो गया था। सागर से उच्चैःश्रवा, ऐरावत, सोम, अमृत प्रभृति कितनी ही सामग्री निकल आईं। एक दिन कद्रु और विनता—दोनो सपत्नी-भगिनी बैठ कहानी कह रही थीं। पारिजातकी कहानी, माणिककी कहानी, बात-बातमें उच्चैःश्रवाकी कहानी छिड़ गई। विनताने कहा,—"मुझे समझ पड़ता, कि घोड़ेकी पूंछ सफेद है।" कंद्रु भी बोल उठी,—"नहीं, बहन! मेरी समझमें घोड़ेका अयाल काला है। अच्छा, तो आओ; इस विषयमें हम पण करें, जो हरेगा, उसीको जन्मकी भांति, दासी बनकर रहना होगा।" उच्चैःश्रवा वास्तविक श्वेतवर्ण अश्व है। कद्रु ने देखा, कि हार जाने से सपत्नीके पास दासी बनकर रहना होगा; उससे एक छल करना उन्हें उचित समझ पड़ा। यही स्थिर कर उन्होंने अपने सन्तान—सर्पोंसे बुलाकर कहा,—"वत्स! कल तुम उच्चैःश्रवा घोड़ेकी पूंछ में लिपट काले रूएं जैसे दिखाई देना। ऐसा न करने से मैं सपत्नीके सामने हार जाऊंगी, मुझे जन्मकी भांति<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३६८
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />अधिजिक - अधिदेवता</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>दासी बनकर रहना होगा ।" सर्पाने वही किया ।
उसीसे विनता हारों, कद्रको जीत हुई थी। एक
दिन विनता पुत्र गरुड़ने सर्पों से पूछा, कि किसतरह
तुम हमारो जननीको दासोत्वसे मुक्त कर सकते हो ।
सर्प बोले, – “ आप अमृत ला दीजिये | अमृत मिलने-
से हो हम तुष्ट होंगे और आपकी जननी दासोत्व से
· मुक्त हो जायेंगी ।" गरुड़ने यह बात सुन महाकष्टसे
अमृतकुम्भ लाकर कुशके ऊपर रख दिया। उन्होंने
.. अमृत रखकर सर्पों से कहा, “अब तो, मेरी जननी
दासीत्वसे मुक्त हुई । यह अमृत रखा है, आप
: स्नानाह्निक कर इसे पोजिये ।” सर्प स्नान करने चले
गये, देवराज इन्द्रने वह सुयोग देख चुपके-चुपके उस
अमृतभाण्डको चुरा लिया। सर्पो ने जाकर देखा,-
अमृत नहीं पाया, किसीने चुरा लिया था । उसौसे वे
मनमें दुःखित हो कुश चाटने लगे । कुशकौ तीक्ष्ण
धारसे सपकी जिह्वा फट जानेके कारण, उनका |
नाम 'द्विजिह्व' पड़ा था ।
'
२ कण्ठगत मुखरोगविशेष, जोभको सूजन ।
अधिजिह्वक ( सं० पु० ) जिह्वागत रोगविशेष, जीभ- |
की एक बीमारी । यह रोग कफ शोणितसे उत्पन्न
होता, जिसमें जिह्वापर जिह्वाग्रवत् शोथ रहता है ।
पक जानेसे यह असाध्य है । इसमें और उपजिह्वामें
यही भेद हैं, कि यह जोभके ऊपर और वह जोभके
नीचे होती है। आयुर्वेद में इस रोगका लक्षण यह
लिखा है,
“जिह्वाग्ररूपः श्वयथुः कफात्तु जिह्वाप्रबन्धौ परिरक्तमिश्रः।”
( सुश्रुत० नि० १६ अ० )
अधिजिह्वा, अधिजिह्विका (सं० स्त्री० ) जिह्वारोग
विशेष, जीभको एक बीमारी । अधिजिह्वक देखो |
अधिज्य (सं० क्लो० ) ज्या गुणमधिक्कतं श्रध्यारूढ़ा
ज्या यत्न वा । ‘मौर्वीं ज्या शिञ्जिनी गुण’-इत्यमरः । आरोपित
गुणक धनुः, धनुष, जिसका गुण चढ़ा हो ; खिंचे हुए
रोदेकी कमान । शकुन्तलामें लिखा है,
"कृष्णसारे ददञ्चक्षुस्त्वयि चाधिज्यकार्मुके ।
मृगानुसारिणं साचात् पश्यामोव पिनाकिनम् ॥”
कृष्णसार मृग और ज्या युक्त- धनुर्धारी आपके प्रति
३६१
दृष्टिपात करनेसे ठौक मृगानुसारी पिनाको - जैसा
देख पड़ता है ।' (त्रि०) २ प्रत्यञ्चा चढ़ा या रोदा
खिंचा हुआ ।
:
अधिज्योतिषम् (सं० अव्य० ) सूर्यतारकादिज्योतिष-
के अधिकारसे, रोशनी या दुनियावी सितारों और
• सैयारोंको बाबत ।
अधित्य (सं० अव्य० ) ऊपर होकर, ऊचे चढ़कर ।
अधित्यका (सं० स्त्री०) अधि त्यकन् । उपाधिभ्यां त्यकन्नास-
ब्रारूढ्योः । पा ५।२।३४। पर्वतके ऊपरको भूमि, पहाड़के
. ऊपरको ज़मीन, उच्च और प्रस्तरमय पृथिवी । (Table
land ) इसके . विरुद्ध पर्वतको निकटवर्ती भूमि
उपत्यका कहलाती है । कालिदासका वचन है, —
“अधित्यकायामिव धातुमय्यां लोध्रद्रुमं सानुमतः प्रफुल्लम् ॥” (रघु० २ २ | )
‘पर्वतकौ धातुमयौ अधित्यका प्रफुल्ल लोध्रद्रुम-जैसी
देख पड़ी।'
२ यम ।
-
अधिदण्ड नेट (सं० पु० ) १ दण्ड देनेके लिये
नियुक्त किया गया कर्मचारी, हाकिम जो सज़ा देनेके
लिये मुकरर हो ।
अधिदन्त, अधिदन्तक ( सं० पु० ) अध्यारूढो दन्तम्,
अत्या- तत् । दन्तमूलगत रोगविशेष, गजदन्त, दांतके
ऊपरका दांत । घोड़ेके दांतपर कभी छः से भी ज्यादा
दांत निकल आते हैं, जिससे घास खानेपर उसका
. मन भाग जाता है । सात या आठ दांत जिस
घोड़े के दांतपर जम उठते, उसे अधिदन्त कहते हैं,-
“सप्तभिश्चाष्टभिर्दन्तैः ख्यातयाधिकदन्तकः । " ( जयदत्त अवचि० ३५०)
अधिदार्व (सं० त्रि०) काष्ठमय, लकड़ीका ।
अधिदिन (सं० क्ली० ) अतिरिक्त दिन जो सौरमास
पूरा करनेको जोड़ा जाये ।
अधिदेव (सं० पु० ) अधिकृतो देवो येन,
बहुव्री• । परमेश्वर सकल देवताओंका अधिप ।
अधिदेवता ( सं० स्त्री० ) अधिष्ठात्री देवता, शाक०
तत् । देवात्तल् । पा ५।४।१७। अधिष्ठात्री देवता, कुलदेवी ।
हमारे हिन्दू शास्त्रानुसार एक-एक स्थान किंवा वस्तुमें
- एक - एक देवता अधिष्ठित हैं। यह उस उस स्थान
किंवा वस्तुको अधिष्ठात्री देवता हैं । जैसे, 'जलदेवता'
कहनेसे जलको अधिष्ठात्री देवता समझी जाती हैं,
प्रादि
८१<noinclude></noinclude>
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधिजिह्वक—अधिदेवता'''|'''३६१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>दासी बनकर रहना होगा।" सर्पांने वही किया। उसीसे विनता हारों, कद्रकी जीत हुई थी। एक दिन विनता पुत्र गरुड़ने सर्पों से पूछा, कि किसतरह तुम हमारी जननीको दासीत्वसे मुक्त कर सकते हो। सर्प बोले,—"आप अमृत ला दीजिये। अमृत मिलनेसे ही हम तुष्ट होंगे और आपकी जननी दासोत्व से मुक्त हो जायेंगी।" गरुड़ने यह बात सुन महाकष्टसे अमृतकुम्भ लाकर कुशके ऊपर रख दिया। उन्होंने अमृत रखकर सर्पों से कहा,—"अब तो, मेरी जननी दासीत्वसे मुक्त हुईं। यह अमृत रखा है, आप स्नानाह्निक कर इसे पीजिये।" सर्प स्नान करने चले गये, देवराज इन्द्रने वह सुयोग देख चुपके-चुपके उस अमृतभाण्डको चुरा लिया। सर्पों ने जाकर देखा,—अमृत नहीं पाया, किसीने चुरा लिया था। उसीसे वे मनमें दुःखित हो कुश चाटने लगे। कुशकी तीक्ष्ण धारसे सर्पोंकी जिह्वा फट जानेके कारण, उनका नाम 'द्विजिह्व' पड़ा था।
२ कण्ठगत मुखरोगविशेष, जीभकी सूजन।
अधिजिह्वक (सं॰ पु॰) जिह्वागत रोगविशेष, जीभकी एक बीमारी। यह रोग कफ-शोणितसे उत्पन्न होता, जिसमें जिह्वापर जिह्वाग्रवत् शोथ रहता है। पक जानेसे यह असाध्य है। इसमें और उपजिह्वामें यही भेद हैं, कि यह जीभके ऊपर और वह जीभके नीचे होती है। आयुर्वेंद में इस रोगका लक्षण यह लिखा है,—
{{C|<small>जिह्वाग्ररूपः श्वयथुः कफात्तु जिह्वाप्रबन्धी परिरक्तमिश्रः।"</small>}}
{{Right|<small>(सुश्रुत॰ नि॰ १६ अ॰)</small>}}
अधिजिह्वा, अधिजिह्विका (सं॰ स्त्री॰) जिह्वारोग विशेष, जीभकी एक बीमारी। <small>अधिजिह्वक देखो।</small>
अधिज्य (सं॰ क्ली॰) ज्या गुणमधिक्कृतं अध्यारूढ़ा ज्या यत्र वा। <small>'मौर्वीं ज्या शिञ्जिनी गुण'-इत्यमरः।</small> आरोपित गुणक धनुः, धनुष, जिसका गुण चढ़ा हो; खिंचे हुए रोदेकी कमान। शकुन्तलामें लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"कृष्णसारे ददञ्चक्षुस्त्वयि चाधिज्यकार्मुके।
मृगानुसारिणं साचात् पश्यामीव पिनाकिनम्॥"</small></poem>}}
कृष्णसार मृग और ज्या-युक्त-धनुर्धारी आपके प्रति
दृष्टिपात करनेसे ठीक मृगानुसारी पिनाकी-जैसा देख पड़ता है।' (त्रि॰) २ प्रत्यञ्चा चढ़ा या रोदा खिंचा हुआ।
अधिज्योतिषम् (सं॰ अव्य॰) सूर्यतारकादिज्योतिषके अधिकारसे, रोशनी या दुनियावी सितारों और सैयारोंकी बाबत।
अधित्य (सं॰ अव्य॰) ऊपर होकर, ऊंचे चढ़कर।
अधित्यका (सं॰ स्त्री॰) अधि-त्यकन्। <small>उपाधिभ्यां त्यकन्नास-न्नारूढ़योः। पा ५।२।३४।</small> पर्वतके ऊपरकी भूमि, पहाड़के ऊपरकी ज़मीन, उच्च और प्रस्तरमय पृथिवी। (Table land) इसके विरुद्ध पर्वतकी निकटवर्ती भूमि उपत्यका कहलाती है। कालिदासका वचन है,—
{{C|<small>"अधित्यकायामिव धातुमय्यां लोध्रद्रुमं सानुमतः प्रफुल्लम्॥"(रघु॰ २।२९।)</small>}}
'पर्वतकी धातुमयी अधित्यका प्रफुल्ल लोध्रद्रुम-जैसी देख पड़ी।'
अधिदण्ड नेतृ (सं॰ पु॰) १ दण्ड देनेके लिये नियुक्त किया गया कर्मचारी, हाकिम जो सज़ा देनेके लिये मुक़रर हो। २ यम।
अधिदन्त, अधिदन्तक (सं॰ पु॰) अध्यारूढ़ो दन्तम्, अत्या-तत्। दन्तमूलगत रोगविशेष, गजदन्त, दांतके ऊपरका दांत। घोड़ेके दांतपर कभी छः से भी ज्य़ादा दांत निकल आते हैं, जिससे घास खानेपर उसका मन भाग जाता है। सात या आठ दांत जिस घोड़े के दांतपर जम उठते, उसे अधिदन्त कहते हैं,—
{{C|<small>"सप्तभिश्चाष्टभिर्दन्तैः ख्यातश्चाधिकदन्तकः।" (जयदत्त अश्वचि॰ ३अ॰)</small>}}
अधिदार्व (सं॰ त्रि॰) काष्ठमय, लकड़ीका।
अधिदिन (सं॰ क्ली॰) अतिरिक्त दिन जो सौरमास पूरा करनेको जोड़ा जाये।
अधिदेव (सं॰ पु॰) अधिकृतो देवो येन, प्रादि बहुव्री॰। परमेश्वर सकल देवताओंका अधिप।
अधिदेवता (सं॰ स्त्री॰) अधिष्ठात्री देवता, शाक॰ तत्। <small>देवात्तल्। पा ५।४।१७।</small> अधिष्ठात्री देवता, कुलदेवी। हमारे हिन्दू शास्त्रानुसार एक-एक स्थान किंवा वस्तुमें एक-एक देवता अधिष्ठित हैं। यह उस-उस स्थान
किंवा वस्तुकी अधिष्ठात्री देवता हैं। जैसे, 'जलदेवता' कहनेसे जलकी अधिष्ठात्री देवता समझी जाती हैं,<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Dhr|}}
{{Left|९१|4em}}</noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधिजिह्वक—अधिदेवता'''|'''३६१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>दासी बनकर रहना होगा।" सर्पांने वही किया। उसीसे विनता हारों, कद्रकी जीत हुई थी। एक दिन विनता पुत्र गरुड़ने सर्पों से पूछा, कि किसतरह तुम हमारी जननीको दासीत्वसे मुक्त कर सकते हो। सर्प बोले,—"आप अमृत ला दीजिये। अमृत मिलनेसे ही हम तुष्ट होंगे और आपकी जननी दासोत्व से मुक्त हो जायेंगी।" गरुड़ने यह बात सुन महाकष्टसे अमृतकुम्भ लाकर कुशके ऊपर रख दिया। उन्होंने अमृत रखकर सर्पों से कहा,—"अब तो, मेरी जननी दासीत्वसे मुक्त हुईं। यह अमृत रखा है, आप स्नानाह्निक कर इसे पीजिये।" सर्प स्नान करने चले गये, देवराज इन्द्रने वह सुयोग देख चुपके-चुपके उस अमृतभाण्डको चुरा लिया। सर्पों ने जाकर देखा,—अमृत नहीं पाया, किसीने चुरा लिया था। उसीसे वे मनमें दुःखित हो कुश चाटने लगे। कुशकी तीक्ष्ण धारसे सर्पोंकी जिह्वा फट जानेके कारण, उनका नाम 'द्विजिह्व' पड़ा था।
२ कण्ठगत मुखरोगविशेष, जीभकी सूजन।
अधिजिह्वक (सं॰ पु॰) जिह्वागत रोगविशेष, जीभकी एक बीमारी। यह रोग कफ-शोणितसे उत्पन्न होता, जिसमें जिह्वापर जिह्वाग्रवत् शोथ रहता है। पक जानेसे यह असाध्य है। इसमें और उपजिह्वामें यही भेद हैं, कि यह जीभके ऊपर और वह जीभके नीचे होती है। आयुर्वेंद में इस रोगका लक्षण यह लिखा है,—
{{C|<small>जिह्वाग्ररूपः श्वयथुः कफात्तु जिह्वाप्रबन्धी परिरक्तमिश्रः।"</small>}}
{{Right|<small>(सुश्रुत॰ नि॰ १६ अ॰)</small>}}
अधिजिह्वा, अधिजिह्विका (सं॰ स्त्री॰) जिह्वारोग विशेष, जीभकी एक बीमारी। <small>अधिजिह्वक देखो।</small>
अधिज्य (सं॰ क्ली॰) ज्या गुणमधिक्कृतं अध्यारूढ़ा ज्या यत्र वा। <small>'मौर्वीं ज्या शिञ्जिनी गुण'-इत्यमरः।</small> आरोपित गुणक धनुः, धनुष, जिसका गुण चढ़ा हो; खिंचे हुए रोदेकी कमान। शकुन्तलामें लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"कृष्णसारे ददञ्चक्षुस्त्वयि चाधिज्यकार्मुके।
मृगानुसारिणं साचात् पश्यामीव पिनाकिनम्॥"</small></poem>}}
कृष्णसार मृग और ज्या-युक्त-धनुर्धारी आपके प्रति<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>दृष्टिपात करनेसे ठीक मृगानुसारी पिनाकी-जैसा देख पड़ता है।' (त्रि॰) २ प्रत्यञ्चा चढ़ा या रोदा खिंचा हुआ।
अधिज्योतिषम् (सं॰ अव्य॰) सूर्यतारकादिज्योतिषके अधिकारसे, रोशनी या दुनियावी सितारों और सैयारोंकी बाबत।
अधित्य (सं॰ अव्य॰) ऊपर होकर, ऊंचे चढ़कर।
अधित्यका (सं॰ स्त्री॰) अधि-त्यकन्। <small>उपाधिभ्यां त्यकन्नास-न्नारूढ़योः। पा ५।२।३४।</small> पर्वतके ऊपरकी भूमि, पहाड़के ऊपरकी ज़मीन, उच्च और प्रस्तरमय पृथिवी। (Table land) इसके विरुद्ध पर्वतकी निकटवर्ती भूमि उपत्यका कहलाती है। कालिदासका वचन है,—
{{C|<small>"अधित्यकायामिव धातुमय्यां लोध्रद्रुमं सानुमतः प्रफुल्लम्॥"(रघु॰ २।२९।)</small>}}
'पर्वतकी धातुमयी अधित्यका प्रफुल्ल लोध्रद्रुम-जैसी देख पड़ी।'
अधिदण्ड नेतृ (सं॰ पु॰) १ दण्ड देनेके लिये नियुक्त किया गया कर्मचारी, हाकिम जो सज़ा देनेके लिये मुक़रर हो। २ यम।
अधिदन्त, अधिदन्तक (सं॰ पु॰) अध्यारूढ़ो दन्तम्, अत्या-तत्। दन्तमूलगत रोगविशेष, गजदन्त, दांतके ऊपरका दांत। घोड़ेके दांतपर कभी छः से भी ज्य़ादा दांत निकल आते हैं, जिससे घास खानेपर उसका मन भाग जाता है। सात या आठ दांत जिस घोड़े के दांतपर जम उठते, उसे अधिदन्त कहते हैं,—
{{C|<small>"सप्तभिश्चाष्टभिर्दन्तैः ख्यातश्चाधिकदन्तकः।" (जयदत्त अश्वचि॰ ३अ॰)</small>}}
अधिदार्व (सं॰ त्रि॰) काष्ठमय, लकड़ीका।
अधिदिन (सं॰ क्ली॰) अतिरिक्त दिन जो सौरमास पूरा करनेको जोड़ा जाये।
अधिदेव (सं॰ पु॰) अधिकृतो देवो येन, प्रादि बहुव्री॰। परमेश्वर सकल देवताओंका अधिप।
अधिदेवता (सं॰ स्त्री॰) अधिष्ठात्री देवता, शाक॰ तत्। <small>देवात्तल्। पा ५।४।१७।</small> अधिष्ठात्री देवता, कुलदेवी। हमारे हिन्दू शास्त्रानुसार एक-एक स्थान किंवा वस्तुमें एक-एक देवता अधिष्ठित हैं। यह उस-उस स्थान
किंवा वस्तुकी अधिष्ठात्री देवता हैं। जैसे, 'जलदेवता' कहनेसे जलकी अधिष्ठात्री देवता समझी जाती हैं,<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Dhr|}}
{{Left|९१|4em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३६९
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३६२'''|'''अधिदेवन—अधिपुरुष'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>'वनदेवता' कहने से वनाधिष्ठात्री देवताका बोध होता ।
है । अन्तर्यामी अमृतस्वरूप परब्रह्म हैं । वह सर्वत्र
अधिष्ठित हैं; फिर भो सकल वस्तुसे पृथक् उन्हें कोई
नहीं समझता । हमारी एक-एक इन्द्रियको एक-एक
अधिष्ठात्री देवता कल्पित हुई हैं । जैसे,—- कर्णको
दिक्, त्वक्के वायु, चक्षुके सूर्य, जिह्वाके वरुण, नासि-
काके अश्विनीकुमार, वागिन्द्रियके अग्नि, हस्तके इन्द्र,
पैरके उपेन्द्र, पित्तके मित्र, उपस्थके प्रजापति, मनके
का संयम । यह नियम बौद्ध
अधिपतिवती (सं० स्त्रो० ) देवीविशेष ।
(सं० स्त्री० ) महाराणी, मलका ।
(सं० अव्य० ) राह पर, सड़क पर ।
चन्द्र ।
अधिपत्नी
अधिपथम्
अधिपा (सं० त्रि० )
१ अधीश्वर, राजा ।
अधिपातोति, अधि-पा- क्विप् ।
२ अधिपति, सरदार । ३ अधि-
पालक, परवरिशकुनिन्दा |
अधिपांशुल, अधिपांसुल (सं० त्रि०) मलिन, मैला,
अधिदेवन (वै० वि० ) १ भवनका वह भाग जिसमें गर्दखोर, धूलिसे धूसरित ।
२ इष्टदेव ।
द्यूत होता हो, जुआ खेलनेका कमरा ।
अधिदैव (स० क्लो० ) १ परमेश्वर |
२ अधिष्ठाता देव ।
अधिदैवत (सं० स्त्री० ) अधिष्ठाट दैवतम्, प्रादि- स० ।
१ अधिष्ठात्री देवता । २ अन्तर्यामी पुरुष, परमेश्वर ।
३ आधिदैविक रोग । (अव्य०) ४ देवताके अधिकारसे ।
अधिदैविक (सं० ति० ) अधिदेव -सम्बन्धोय, रूहानी ।
अधिनाथ (सं० पु० ) अधिकः नाथः, प्रादि-स० ।
१ अधीश्वर, बड़ा मालिक । २ नायक, सरदार,
अफ़सर । ३ काल-योग- शास्त्र के रचयिता ।
अधिनाय (सं० पु० ) अधि-नौ घञ्,
विनय
वायुनासौ इति । गन्ध, सौरभ ; खुशबू |
अधिनायक (सं० पु० ) १ सरदार, अफसर । २ प्रभु,
मालिक ।
अधिनिर्णिज् (वै० त्रि०) जिसपर घूंघट पड़ा हो,
नकाबसे छिपा ।
अधिप (सं० पु० ) अधि-या क, अधिपातीति ।
श्रतश्चोपसर्गे कः । पाश२३१ राजा, बादशाह । २ ईश्वर ।
३ प्रभु, मालिक ।
8 अधिकारी, सरदार, अफ़सर ।
अधिपति (सं० पु० ) अधिकः पतिः, प्रादि-स० ।
१ ईश्वर । २ शिरका वह भाग विशेष जहां मारका
आघात विशेष रूपसे होता है ।
“तञ्च रोमावर्तस्थानं मस्तका-
· भ्यन्तरे सर्वशिरासम्मिलनस्थानञ्च " (सुश्रुत० शा० ६ ० 1 ) ३ खामी,
३.
शौहर । ४ प्रभु, मालिक । बौद्धमतमें चार अधि-
पति माने गये हैं, - १ यज्ञाधिपति, २ वित्ताधिपति,
: ३ वीर्याधिपति और 8 व्ययाधिपति ।
अधिपुरुष, अधिपूरुष (सं० पु० ) अधिकः उत्तमः
पुरुषः, प्रादि स० । १ परमेश्वर । २ श्रेष्ठ पुरुष |
विश्वात्माके औरस और शतरूपाके गर्भ से स्वायम्भुव
मनुका जन्म हुआ था । इन्हें ही पुराणकार अधिपुरुष
कहते रहे,
-
“ततः कालेन महता तस्याः पुत्रोऽभवन् मनुः । ४४
स्वायम्भुव इति ख्यातः स विराडिति नः श्रुतम् ।
तद्रूपगुण सामान्यादधिपुरुष उच्यते । " ४५
( मत्स्यपुराण चतुर्थ अध्याय । )
'इसके बाद बहुत दिनमें मनु नामक उनके एक
पुत्र उत्पन्न हुए थे । उनका नाम स्वायम्भ ुव रखा
गया। हमने सुना है, कि वहो विराट् कहलाते हैं ।
रूपगुणका सादृश्य रहनेसे उनका नाम अधिपुरुष
पड़ा है।'
ऋग्वेद और अथर्ववेद के पुरुष सूक्त में अधिपुरुष
शब्दका उल्लेख वर्त्तमान है । किन्तु उसमें एक प्रभेद
है। इन दोनो हौ स्थलोंमें अधि अव्ययके साथ
पुरुष शब्दका समास नहीं किया गया, —
“तस्माद्दिराडजायत विराजो अधि पूरुषः।” (ऋग्वेद १००/५1 )
‘उनसे विराट् और विराटसे पुरुष उत्पन्न
हुए थे ।'
फिर देखिये, – “विराडये समभवद्दिराजी अधि पूरुषः ।”
(अथर्व० १शा)
'प्रथम विराट् उत्पन्न हुए थे, विराट्से पुरुषने
जन्म लिया ।'
हम चाहे वैदिक अथवा पौराणिक हो मतको
ग्रहण करें, इसी पुरुष से समस्त सृष्टि हुई है ।अधिपतिप्रत्यय (सं० पु० )विषयको ग्रहण करने -दर्शन के अन्तर्गत है ।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३६२'''|'''अधिदेवन—अधिपुरुष'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>'वनदेवता' कहने से वनाधिष्ठात्री देवताका बोध होता है। अन्तर्यामी अमृतस्वरूप परब्रह्म हैं। वह सर्वत्र अधिष्ठित हैं; फिर भी सकल वस्तुसे पृथक् उन्हें कोई नहीं समझता। हमारी एक-एक इन्द्रियकी एक-एक
अधिष्ठात्री देवता कल्पित हुई हैं। जैसे,—कर्णकी दिक्, त्वक्के वायु, चक्षुके सूर्य, जिह्वाके वरुण, नासिकाके अश्विनीकुमार, वागिन्द्रियके अग्नि, हस्तके इन्द्र, पैरके उपेन्द्र, पित्तके मित्र, उपस्थके प्रजापति, मनके चन्द्र।
अधिदेवन (वै॰ त्रि॰) १ भवनका वह भाग जिसमें द्यृत होता हो, जुआ खेलनेका कमरा।
अधिदैव (सं॰ क्ली॰) १ परमेश्वर। २ इष्टदेव। २ अधिष्ठाता देव।
अधिदैवत (सं॰ स्त्री॰) अधिष्ठातृ दैवतम्, प्रादि-स॰। १ अधिष्ठात्री देवता। २ अन्तर्यामी पुरुष, परमेश्वर। ३ आधिदैविक रोग। (अव्य॰) ४ देवताके अधिकारसे।
अधिदैविक (सं॰ त्रि॰) अधिदेव-सम्बन्धीय, रूहानी।
अधिनाथ (सं॰ पु॰) अधिकः नाथः, प्रादि-स॰। १ अधीश्वर, बड़ा मालिक। २ नायक, सरदार, अफ़सर। ३ काल-योग-शास्त्रके रचयिता।
अधिनाय (सं॰ पु॰) अधि-नी-घञ्, अधिनीयते वायुनासौ इति। गन्ध, सौरभ ; ख़ुशबू।
अधिनायक (सं॰ पु॰) १ सरदार, अफ़सर। २ प्रभु, मालिक।
अधिनिर्णिज् (वै॰ त्रि॰) जिसपर घूंघट पड़ा हो, नक़ाबसे छिपा।
अधिप (सं॰ पु॰) अधि-या-क, अधिपातीति। <small>आतश्चोपसर्गे कः। पा ३।२।३ ।</small> १ राजा, बादशाह। २ ईश्वर। ३ प्रभु, मालिक। ४ अधिकारी, सरदार, अफ़सर। अधिपति (सं॰ पु॰) अधिकः पतिः, प्रादि-स॰।
१ ईश्वर। २ शिरका वह भाग विशेष जहां मारका आघात विशेष रूपसे होता है। <small>तञ्च रोमावर्तस्थानं मस्तकाभ्यन्तरे सर्वशिरासम्मिलनस्थानञ्च।" (सुश्रुत॰ शा॰ ६ अ॰।)</small> ३ स्वामी, शौहर। ४ प्रभु, मालिक। बौद्धमतमें चार अधिपति माने गये हैं,—१ यज्ञाधिपति, २ वित्ताधिपति, ३ वीर्याधिपति और ४ व्ययाधिपति।
अधिपतिप्रत्यय (सं॰ पु॰) विषयको ग्रहण करने का संयम। यह नियम बौद्ध दर्शन के अन्तर्गत है।
अधिपतिवती (सं॰ स्त्री॰) देवीविशेष।
अधिपत्नी (सं॰ स्त्री॰) महाराणी, मलका।
अधिपथम् (सं॰ अव्य॰) राह पर, सड़क पर।
अधिपा (सं॰ त्रि॰) अधिपातीति, अधि-पा-क्विप्। १ अधीश्वर, राजा। २ अधिपति, सरदार। ३ अधिपालक, परवरिशकुनिन्दा।
अधिपांशुल, अधिपांसुल (सं॰ त्रि॰) मलिन, मैला, गर्दखोर, धूलिसे धूसरित।
अधिपुरुष, अधिपूरुष (सं॰ पु॰) अधिकः उत्तमः पुरुषः, प्रादि स॰। १ परमेश्वर। २ श्रेष्ठ पुरुष। विश्वात्माके औरस और शतरूपाके गर्भ से स्वायम्भुव
मनुका जन्म हुआ था। इन्हें ही पुराणकार अधिपुरुष कहते रहे,—
{{Block center|<poem><small>"ततः कालेन महता तस्याः पुत्रोऽभवन् मनुः। ४४
स्वायम्भुव इति ख्यातः स विराडिति नः श्रुतम्।
तद्रूपगुण सामान्यादधिपुरुष उच्यते।" ४५</poem></small>}}
{{Right|<small>(मत्स्यपुराण चतुर्थ अध्याय।)</small>}}
'इसके बाद बहुत दिनमें मनु नामक उनके एक पुत्र उत्पन्न हुए थे। उनका नाम स्वायम्भुव रखा गया। हमने सुना है, कि वही विराट् कहलाते हैं। रूपगुणका सादृश्य रहनेसे उनका नाम अधिपुरुष पड़ा है।'
ऋग्वेद और अथर्ववेद के पुरुष-सूक्त में अधिपुरुष शब्दका उल्लेख वर्त्तमान है। किन्तु उसमें एक प्रभेद है। इन दोनो ही स्थलोंमें अधि अव्ययके साथ पुरुष शब्दका समास नहीं किया गया,—
{{Block center|<poem><small>"तस्माद्विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।" (ऋग्वेद १०।९०।५।)</poem></small>}}
'उनसे विराट् और विराटसे पुरुष उत्पन्न हुए थे।'
फिर देखिये,—<small>"विराडग्रे समभवद्विराजो अधि पूरुषः।"</small>
{{Right|<small>(अथर्व॰ १९।३।९।)</small>}}
'प्रथम विराट् उत्पन्न हुए थे, विराट्से पुरुषने जन्म लिया।'
हम चाहे वैदिक अथवा पौराणिक ही मतको ग्रहण करें, इसी पुरुष से समस्त सृष्टि हुई है।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३६२'''|'''अधिदेवन—अधिपुरुष'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>'वनदेवता' कहने से वनाधिष्ठात्री देवताका बोध होता है। अन्तर्यामी अमृतस्वरूप परब्रह्म हैं। वह सर्वत्र अधिष्ठित हैं; फिर भी सकल वस्तुसे पृथक् उन्हें कोई नहीं समझता। हमारी एक-एक इन्द्रियकी एक-एक
अधिष्ठात्री देवता कल्पित हुई हैं। जैसे,—कर्णकी दिक्, त्वक्के वायु, चक्षुके सूर्य, जिह्वाके वरुण, नासिकाके अश्विनीकुमार, वागिन्द्रियके अग्नि, हस्तके इन्द्र, पैरके उपेन्द्र, पित्तके मित्र, उपस्थके प्रजापति, मनके चन्द्र।
अधिदेवन (वै॰ त्रि॰) १ भवनका वह भाग जिसमें द्यृत होता हो, जुआ खेलनेका कमरा।
अधिदैव (सं॰ क्ली॰) १ परमेश्वर। २ इष्टदेव। २ अधिष्ठाता देव।
अधिदैवत (सं॰ स्त्री॰) अधिष्ठातृ दैवतम्, प्रादि-स॰। १ अधिष्ठात्री देवता। २ अन्तर्यामी पुरुष, परमेश्वर। ३ आधिदैविक रोग। (अव्य॰) ४ देवताके अधिकारसे।
अधिदैविक (सं॰ त्रि॰) अधिदेव-सम्बन्धीय, रूहानी।
अधिनाथ (सं॰ पु॰) अधिकः नाथः, प्रादि-स॰। १ अधीश्वर, बड़ा मालिक। २ नायक, सरदार, अफ़सर। ३ काल-योग-शास्त्रके रचयिता।
अधिनाय (सं॰ पु॰) अधि-नी-घञ्, अधिनीयते वायुनासौ इति। गन्ध, सौरभ ; ख़ुशबू।
अधिनायक (सं॰ पु॰) १ सरदार, अफ़सर। २ प्रभु, मालिक।
अधिनिर्णिज् (वै॰ त्रि॰) जिसपर घूंघट पड़ा हो, नक़ाबसे छिपा।
अधिप (सं॰ पु॰) अधि-या-क, अधिपातीति। <small>आतश्चोपसर्गे कः। पा ३।२।३ ।</small> १ राजा, बादशाह। २ ईश्वर। ३ प्रभु, मालिक। ४ अधिकारी, सरदार, अफ़सर। अधिपति (सं॰ पु॰) अधिकः पतिः, प्रादि-स॰।
१ ईश्वर। २ शिरका वह भाग विशेष जहां मारका आघात विशेष रूपसे होता है। <small>तञ्च रोमावर्तस्थानं मस्तकाभ्यन्तरे सर्वशिरासम्मिलनस्थानञ्च।" (सुश्रुत॰ शा॰ ६ अ॰।)</small> ३ स्वामी, शौहर। ४ प्रभु, मालिक। बौद्धमतमें चार अधिपति माने गये हैं,—१ यज्ञाधिपति, २ वित्ताधिपति, ३ वीर्याधिपति और ४ व्ययाधिपति।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिपतिप्रत्यय (सं॰ पु॰) विषयको ग्रहण करने का संयम। यह नियम बौद्ध दर्शन के अन्तर्गत है।
अधिपतिवती (सं॰ स्त्री॰) देवीविशेष।
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अधिपा (सं॰ त्रि॰) अधिपातीति, अधि-पा-क्विप्। १ अधीश्वर, राजा। २ अधिपति, सरदार। ३ अधिपालक, परवरिशकुनिन्दा।
अधिपांशुल, अधिपांसुल (सं॰ त्रि॰) मलिन, मैला, गर्दखोर, धूलिसे धूसरित।
अधिपुरुष, अधिपूरुष (सं॰ पु॰) अधिकः उत्तमः पुरुषः, प्रादि स॰। १ परमेश्वर। २ श्रेष्ठ पुरुष। विश्वात्माके औरस और शतरूपाके गर्भ से स्वायम्भुव
मनुका जन्म हुआ था। इन्हें ही पुराणकार अधिपुरुष कहते रहे,—
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स्वायम्भुव इति ख्यातः स विराडिति नः श्रुतम्।
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{{Right|<small>(मत्स्यपुराण चतुर्थ अध्याय।)</small>}}
'इसके बाद बहुत दिनमें मनु नामक उनके एक पुत्र उत्पन्न हुए थे। उनका नाम स्वायम्भुव रखा गया। हमने सुना है, कि वही विराट् कहलाते हैं। रूपगुणका सादृश्य रहनेसे उनका नाम अधिपुरुष पड़ा है।'
ऋग्वेद और अथर्ववेद के पुरुष-सूक्त में अधिपुरुष शब्दका उल्लेख वर्त्तमान है। किन्तु उसमें एक प्रभेद है। इन दोनो ही स्थलोंमें अधि अव्ययके साथ पुरुष शब्दका समास नहीं किया गया,—
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'उनसे विराट् और विराटसे पुरुष उत्पन्न हुए थे।'
फिर देखिये,—<small>"विराडग्रे समभवद्विराजो अधि पूरुषः।"</small>
{{Right|<small>(अथर्व॰ १९।३।९।)</small>}}
'प्रथम विराट् उत्पन्न हुए थे, विराट्से पुरुषने जन्म लिया।'
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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अधिष्ठात्री देवता कल्पित हुई हैं। जैसे,—कर्णकी दिक्, त्वक्के वायु, चक्षुके सूर्य, जिह्वाके वरुण, नासिकाके अश्विनीकुमार, वागिन्द्रियके अग्नि, हस्तके इन्द्र, पैरके उपेन्द्र, पित्तके मित्र, उपस्थके प्रजापति, मनके चन्द्र।
अधिदेवन (वै॰ त्रि॰) १ भवनका वह भाग जिसमें द्यृत होता हो, जुआ खेलनेका कमरा।
अधिदैव (सं॰ क्ली॰) १ परमेश्वर। २ इष्टदेव। २ अधिष्ठाता देव।
अधिदैवत (सं॰ स्त्री॰) अधिष्ठातृ दैवतम्, प्रादि-स॰। १ अधिष्ठात्री देवता। २ अन्तर्यामी पुरुष, परमेश्वर। ३ आधिदैविक रोग। (अव्य॰) ४ देवताके अधिकारसे।
अधिदैविक (सं॰ त्रि॰) अधिदेव-सम्बन्धीय, रूहानी।
अधिनाथ (सं॰ पु॰) अधिकः नाथः, प्रादि-स॰। १ अधीश्वर, बड़ा मालिक। २ नायक, सरदार, अफ़सर। ३ काल-योग-शास्त्रके रचयिता।
अधिनाय (सं॰ पु॰) अधि-नी-घञ्, अधिनीयते वायुनासौ इति। गन्ध, सौरभ ; ख़ुशबू।
अधिनायक (सं॰ पु॰) १ सरदार, अफ़सर। २ प्रभु, मालिक।
अधिनिर्णिज् (वै॰ त्रि॰) जिसपर घूंघट पड़ा हो, नक़ाबसे छिपा।
अधिप (सं॰ पु॰) अधि-या-क, अधिपातीति। <small>आतश्चोपसर्गे कः। पा ३।२।३ ।</small> १ राजा, बादशाह। २ ईश्वर। ३ प्रभु, मालिक। ४ अधिकारी, सरदार, अफ़सर। अधिपति (सं॰ पु॰) अधिकः पतिः, प्रादि-स॰।
१ ईश्वर। २ शिरका वह भाग विशेष जहां मारका आघात विशेष रूपसे होता है। <small>तञ्च रोमावर्तस्थानं मस्तकाभ्यन्तरे सर्वशिरासम्मिलनस्थानञ्च।" (सुश्रुत॰ शा॰ ६ अ॰।)</small> ३ स्वामी, शौहर। ४ प्रभु, मालिक। बौद्धमतमें चार अधिपति माने गये हैं,—१ यज्ञाधिपति, २ वित्ताधिपति, ३ वीर्याधिपति और ४ व्ययाधिपति।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिपतिप्रत्यय (सं॰ पु॰) विषयको ग्रहण करने का संयम। यह नियम बौद्ध दर्शन के अन्तर्गत है।
अधिपतिवती (सं॰ स्त्री॰) देवीविशेष।
अधिपत्नी (सं॰ स्त्री॰) महाराणी, मलका।
अधिपथम् (सं॰ अव्य॰) राह पर, सड़क पर।
अधिपा (सं॰ त्रि॰) अधिपातीति, अधि-पा-क्विप्। १ अधीश्वर, राजा। २ अधिपति, सरदार। ३ अधिपालक, परवरिशकुनिन्दा।
अधिपांशुल, अधिपांसुल (सं॰ त्रि॰) मलिन, मैला, गर्दखोर, धूलिसे धूसरित।
अधिपुरुष, अधिपूरुष (सं॰ पु॰) अधिकः उत्तमः पुरुषः, प्रादि स॰। १ परमेश्वर। २ श्रेष्ठ पुरुष। विश्वात्माके औरस और शतरूपाके गर्भ से स्वायम्भुव
मनुका जन्म हुआ था। इन्हें ही पुराणकार अधिपुरुष कहते रहे,—
{{Block center|<poem><small>"ततः कालेन महता तस्याः पुत्रोऽभवन् मनुः। ४४
स्वायम्भुव इति ख्यातः स विराडिति नः श्रुतम्।
तद्रूपगुण सामान्यादधिपुरुष उच्यते।" ४५</poem></small>}}
{{Right|<small>(मत्स्यपुराण चतुर्थ अध्याय।)</small>}}
'इसके बाद बहुत दिनमें मनु नामक उनके एक पुत्र उत्पन्न हुए थे। उनका नाम स्वायम्भुव रखा गया। हमने सुना है, कि वही विराट् कहलाते हैं। रूपगुणका सादृश्य रहनेसे उनका नाम अधिपुरुष पड़ा है।'
ऋग्वेद और अथर्ववेद के पुरुष-सूक्त में अधिपुरुष शब्दका उल्लेख वर्त्तमान है। किन्तु उसमें एक प्रभेद है। इन दोनो ही स्थलोंमें अधि अव्ययके साथ पुरुष शब्दका समास नहीं किया गया,—
{{Block center|<poem><small>"तस्माद्विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।" (ऋग्वेद १०।९०।५।)</poem></small>}}
'उनसे विराट् और विराटसे पुरुष उत्पन्न हुए थे।'
फिर देखिये,—<small>"विराडग्रे समभवद्विराजो अधि पूरुषः।"</small>
{{Right|<small>(अथर्व॰ १९।३।९।)</small>}}
'प्रथम विराट् उत्पन्न हुए थे, विराट्से पुरुषने जन्म लिया।'
हम चाहे वैदिक अथवा पौराणिक ही मतको ग्रहण करें, इसी पुरुष से समस्त सृष्टि हुई है।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३७०
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधिपूतभृतम्—अधिमांसार्म'''|'''३६३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिपूतभृतम् (वै॰ अव्य॰) विशुद्ध सोमरससे भरे पात्रपर।
अधिपेषण (सं॰ त्रि॰) कूटने या पीसनेपर नियुक्त, जो कुटाई या पिसाईका काम करे।
अधिप्रज (सं॰ त्रि॰) अधिका प्रजा यस्य यस्मिन् वा, बहुव्री॰। २ अधिक प्रजायुक्त, ज्य़ादा रैयतवाला। (स्त्री॰) अधिका प्रजा, प्रादि-स॰। अनेक प्रजा,
कितनी ही रैयत।
अधिप्रजम् (सं॰ अव्य॰) संसाररक्षा के उपायकी भांति जन्म विषयपर।
अधिप्रष्टियुग (सं॰ क्ली॰) १ प्रष्टि या तीन घोड़ेसे आगेवाले पर रखा गया जुआ। किसी-किसी वलिदान के समय जुए में तीन घोड़े जुतते, जिसमें चौथा भी जोता जा सकता है। <small>'वाहनत्रयमध्यवर्त्ति युगविशेषः।' (सायण॰)</small> (पु॰) २ चौथा घोड़ा, जो किसी-किसी वलिदानके
समय जुएवाले तीन घोड़ोंके साथ जोत दिया जाता है।
अधिभू (सं॰ पु॰) अधि-भू-क्विप्, अधिभवतीति। स्वाम्यर्थेऽत्राधि। १ राजा, बादशाह। २ स्वामी, पति। ३ प्रभु, मालिक।
अधिभूत (सं॰ क्ली॰) १ जड़ पदार्थका आत्मा, बेजान चीज़की रूह। <small>"यमधिकृत्य यो वर्तते स एव तस्याधिभूतो नाम। यथा यस्व नामेन्द्रियस्व यत् कार्य्यभूतं तदेव कार्यं तस्येन्द्रिय स्वाधि भूतविषयः।" (सुश्रुत॰ शा॰ १ अ॰)</small> २ ईश्वरकी सत्ता। ३ परमेश्वर। ४ प्रकृति, कुदरत।
अधिभूतम् (सं॰ अव्य॰) जड़ पदार्थ के विषय में, बेजान चीज़की बाबत।
अधिभोजन (सं॰ क्ली॰) अधिकं अतिरिक्तं भोजनम्, प्रादि-स॰। १ अत्यन्त भोजन, ज्य़ादा ग़िज़ा। (त्रि॰) अधिकं भोजनं धनं मूल्यं वा यस्य, बहुव्री॰। २ अधिकमूल्य-लभ्य, बेशक़ीमत। वेदमें भोजन शब्द धनके अर्थसे प्रयोग किया गया है,—
{{Block center|<poem><small>"दशाश्वान् दश कोशान् दृश वस्त्राधिभोजना।
दशो हिरण्यपिण्डान् दिवोदासादसानिषम्॥" (ऋग्वेद ६।४७।२३ ।)</poem></small>}}
अधिभौतिक, आधिभौतिक (सं॰ वि॰) प्राकृतिक, क़ुदरती।
अधिमंथ (हिं॰) <small>अधिमन्य देखो।</small>
अधिमन्थ (सं॰ पु॰) अधिकं मध्यतेऽनेन, अधि-मन्थ-घञ् करणे। १ अरणि काष्ठका मन्थनावयवविशेष। २ अभिष्यन्दोत्थ नेत्ररोग विशेष। आंखकी सख्त्
सूजन। यह रोग चार तरहका होता है,—१ वातज, २ पित्तज, ३ कफज और ४ रक्तज। अभिष्यन्द या नेत्रशूल उपेक्षित होनेपर अधिमन्य रोग लग जाता है। इसका लक्षण नीचे देखिये,—
{{Block center|<poem><small>"ब्रृद्धै रेतैरभिष्यन्दै र्नराणामक्रियावताम्।
तावन्तस्त्वधिमन्थाः स्युर्नयने तीव्र वेदनाः॥
उत्पाव्यत इवात्यर्थं नेत्रं निर्मध्यते तथा।
शिरसोर्ध्वञ्च तं विद्यादधिमन्थं स्व लक्षणेः॥
हन्याद्दृष्टिं श्लैष्मिकः सप्तरावादधिमन्थो रक्तजः पञ्चरावात्।
षड्रात्राद्वा वातिको वै निहन्यात् मिथ्याचारात् पैत्तिकः सद्य एव॥
अधिमन्थेषु सर्वेषु ललाटे वेधयेच्किराम्।
अशान्त सर्वथा मन्ये भ्रुवोस्तु परिदाहयेत्॥"(सुश्रुत॰ उ॰ ६ अ॰)</poem></small>}}
अधिमन्थन (वै॰ क्ली॰) १ अग्नि उत्पन्न करनेका मन्थन, आग पैदा करनेकी रगड़। (त्रि॰) २ अग्नि उत्पन्न करनेके मन्थन योग्य, आग पैदा करनेकी रगड़के क़ाबिल।
अधिमन्ति (सं॰ वि॰) नेत्रशूलसे व्यथित, आशोबेचश्मका बीमार।
अधिमांस (सं॰ क्ली॰) अधिकं मांसमत्र। रोग-विशेष, जिसमें नेत्र या मसूड़ोंका पश्चाद्भाग सूज जाता है, आंखों या मसूड़ोंकी सूजन। <small>दन्त देखो।</small>
अधिमांसक (सं॰ पु॰) अधिकं मांसमत्र कप्, बहुव्री॰। दन्तरोगविशेष, दांतकी एक बीमारी। इसका लक्षण यह है,—
{{Block center|<poem><small>"हनुभवान्तादन्ते अतिवेदनमहाशोथो लालाखावश्च भवति। (भावप्र॰)
हानव्ये पश्चिमे दन्ते महाशोथो महारुजः।
लालास्रावी कफकृती विज्ञेयः सोऽधिमांसकः।"</small></poem>}}
{{Right|<small>(सुश्रुत॰ नि॰ १६ अ॰)
अधिमांसार्म (सं॰ क्ली॰-पु॰) दृष्टिशुक्लगत रोग-विशेष, आंखकी बीमारी जो नासूरसे होती है। इसका लक्षण नीचे लिखा जाता है,—
{{Block center|<poem><small>"पद्माभं मृदु रक्तार्म यन्मांसं चीयते सिते।
पृथुसृद्वधिमांखार्म बहुलञ्च यकृन्निभम्॥" (माधव॰ नि॰)</small></poem>}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अधिपेषण (सं॰ त्रि॰) कूटने या पीसनेपर नियुक्त, जो कुटाई या पिसाईका काम करे।
अधिप्रज (सं॰ त्रि॰) अधिका प्रजा यस्य यस्मिन् वा, बहुव्री॰। २ अधिक प्रजायुक्त, ज्य़ादा रैयतवाला। (स्त्री॰) अधिका प्रजा, प्रादि-स॰। अनेक प्रजा,
कितनी ही रैयत।
अधिप्रजम् (सं॰ अव्य॰) संसाररक्षा के उपायकी भांति जन्म विषयपर।
अधिप्रष्टियुग (सं॰ क्ली॰) १ प्रष्टि या तीन घोड़ेसे आगेवाले पर रखा गया जुआ। किसी-किसी वलिदान के समय जुए में तीन घोड़े जुतते, जिसमें चौथा भी जोता जा सकता है। <small>'वाहनत्रयमध्यवर्त्ति युगविशेषः।' (सायण॰)</small> (पु॰) २ चौथा घोड़ा, जो किसी-किसी वलिदानके
समय जुएवाले तीन घोड़ोंके साथ जोत दिया जाता है।
अधिभू (सं॰ पु॰) अधि-भू-क्विप्, अधिभवतीति। स्वाम्यर्थेऽत्राधि। १ राजा, बादशाह। २ स्वामी, पति। ३ प्रभु, मालिक।
अधिभूत (सं॰ क्ली॰) १ जड़ पदार्थका आत्मा, बेजान चीज़की रूह। <small>"यमधिकृत्य यो वर्तते स एव तस्याधिभूतो नाम। यथा यस्व नामेन्द्रियस्व यत् कार्य्यभूतं तदेव कार्यं तस्येन्द्रिय स्वाधि भूतविषयः।" (सुश्रुत॰ शा॰ १ अ॰)</small> २ ईश्वरकी सत्ता। ३ परमेश्वर। ४ प्रकृति, कुदरत।
अधिभूतम् (सं॰ अव्य॰) जड़ पदार्थ के विषय में, बेजान चीज़की बाबत।
अधिभोजन (सं॰ क्ली॰) अधिकं अतिरिक्तं भोजनम्, प्रादि-स॰। १ अत्यन्त भोजन, ज्य़ादा ग़िज़ा। (त्रि॰) अधिकं भोजनं धनं मूल्यं वा यस्य, बहुव्री॰। २ अधिकमूल्य-लभ्य, बेशक़ीमत। वेदमें भोजन शब्द धनके अर्थसे प्रयोग किया गया है,—
{{Block center|<poem><small>"दशाश्वान् दश कोशान् दृश वस्त्राधिभोजना।
दशो हिरण्यपिण्डान् दिवोदासादसानिषम्॥" (ऋग्वेद ६।४७।२३ ।)</poem></small>}}
अधिभौतिक, आधिभौतिक (सं॰ वि॰) प्राकृतिक, क़ुदरती।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिमंथ (हिं॰) <small>अधिमन्य देखो।</small>
अधिमन्थ (सं॰ पु॰) अधिकं मध्यतेऽनेन, अधि-मन्थ-घञ् करणे। १ अरणि काष्ठका मन्थनावयवविशेष। २ अभिष्यन्दोत्थ नेत्ररोग विशेष। आंखकी सख्त्
सूजन। यह रोग चार तरहका होता है,—१ वातज, २ पित्तज, ३ कफज और ४ रक्तज। अभिष्यन्द या नेत्रशूल उपेक्षित होनेपर अधिमन्य रोग लग जाता है। इसका लक्षण नीचे देखिये,—
{{Block center|<poem><small>"ब्रृद्धै रेतैरभिष्यन्दै र्नराणामक्रियावताम्।
तावन्तस्त्वधिमन्थाः स्युर्नयने तीव्र वेदनाः॥
उत्पाव्यत इवात्यर्थं नेत्रं निर्मध्यते तथा।
शिरसोर्ध्वञ्च तं विद्यादधिमन्थं स्व लक्षणेः॥
हन्याद्दृष्टिं श्लैष्मिकः सप्तरावादधिमन्थो रक्तजः पञ्चरावात्।
षड्रात्राद्वा वातिको वै निहन्यात् मिथ्याचारात् पैत्तिकः सद्य एव॥
अधिमन्थेषु सर्वेषु ललाटे वेधयेच्किराम्।
अशान्त सर्वथा मन्ये भ्रुवोस्तु परिदाहयेत्॥"(सुश्रुत॰ उ॰ ६ अ॰)</poem></small>}}
अधिमन्थन (वै॰ क्ली॰) १ अग्नि उत्पन्न करनेका मन्थन, आग पैदा करनेकी रगड़। (त्रि॰) २ अग्नि उत्पन्न करनेके मन्थन योग्य, आग पैदा करनेकी रगड़के क़ाबिल।
अधिमन्ति (सं॰ वि॰) नेत्रशूलसे व्यथित, आशोबेचश्मका बीमार।
अधिमांस (सं॰ क्ली॰) अधिकं मांसमत्र। रोग-विशेष, जिसमें नेत्र या मसूड़ोंका पश्चाद्भाग सूज जाता है, आंखों या मसूड़ोंकी सूजन। <small>दन्त देखो।</small>
अधिमांसक (सं॰ पु॰) अधिकं मांसमत्र कप्, बहुव्री॰। दन्तरोगविशेष, दांतकी एक बीमारी। इसका लक्षण यह है,—
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हानव्ये पश्चिमे दन्ते महाशोथो महारुजः।
लालास्रावी कफकृती विज्ञेयः सोऽधिमांसकः।"</small></poem>}}
{{Right|<small>(सुश्रुत॰ नि॰ १६ अ॰)
अधिमांसार्म (सं॰ क्ली॰-पु॰) दृष्टिशुक्लगत रोग-विशेष, आंखकी बीमारी जो नासूरसे होती है। इसका लक्षण नीचे लिखा जाता है,—
{{Block center|<poem><small>"पद्माभं मृदु रक्तार्म यन्मांसं चीयते सिते।
पृथुसृद्वधिमांखार्म बहुलञ्च यकृन्निभम्॥" (माधव॰ नि॰)</small></poem>}}<noinclude></noinclude>
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अधिपेषण (सं॰ त्रि॰) कूटने या पीसनेपर नियुक्त, जो कुटाई या पिसाईका काम करे।
अधिप्रज (सं॰ त्रि॰) अधिका प्रजा यस्य यस्मिन् वा, बहुव्री॰। २ अधिक प्रजायुक्त, ज्य़ादा रैयतवाला। (स्त्री॰) अधिका प्रजा, प्रादि-स॰। अनेक प्रजा,
कितनी ही रैयत।
अधिप्रजम् (सं॰ अव्य॰) संसाररक्षा के उपायकी भांति जन्म विषयपर।
अधिप्रष्टियुग (सं॰ क्ली॰) १ प्रष्टि या तीन घोड़ेसे आगेवाले पर रखा गया जुआ। किसी-किसी वलिदान के समय जुए में तीन घोड़े जुतते, जिसमें चौथा भी जोता जा सकता है। <small>'वाहनत्रयमध्यवर्त्ति युगविशेषः।' (सायण॰)</small> (पु॰) २ चौथा घोड़ा, जो किसी-किसी वलिदानके
समय जुएवाले तीन घोड़ोंके साथ जोत दिया जाता है।
अधिभू (सं॰ पु॰) अधि-भू-क्विप्, अधिभवतीति। स्वाम्यर्थेऽत्राधि। १ राजा, बादशाह। २ स्वामी, पति। ३ प्रभु, मालिक।
अधिभूत (सं॰ क्ली॰) १ जड़ पदार्थका आत्मा, बेजान चीज़की रूह। <small>"यमधिकृत्य यो वर्तते स एव तस्याधिभूतो नाम। यथा यस्व नामेन्द्रियस्व यत् कार्य्यभूतं तदेव कार्यं तस्येन्द्रिय स्वाधि भूतविषयः।" (सुश्रुत॰ शा॰ १ अ॰)</small> २ ईश्वरकी सत्ता। ३ परमेश्वर। ४ प्रकृति, कुदरत।
अधिभूतम् (सं॰ अव्य॰) जड़ पदार्थ के विषय में, बेजान चीज़की बाबत।
अधिभोजन (सं॰ क्ली॰) अधिकं अतिरिक्तं भोजनम्, प्रादि-स॰। १ अत्यन्त भोजन, ज्य़ादा ग़िज़ा। (त्रि॰) अधिकं भोजनं धनं मूल्यं वा यस्य, बहुव्री॰। २ अधिकमूल्य-लभ्य, बेशक़ीमत। वेदमें भोजन शब्द धनके अर्थसे प्रयोग किया गया है,—
{{Block center|<poem><small>"दशाश्वान् दश कोशान् दृश वस्त्राधिभोजना।
दशो हिरण्यपिण्डान् दिवोदासादसानिषम्॥" (ऋग्वेद ६।४७।२३ ।)</poem></small>}}
अधिभौतिक, आधिभौतिक (सं॰ वि॰) प्राकृतिक, क़ुदरती।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिमंथ (हिं॰) <small>अधिमन्य देखो।</small>
अधिमन्थ (सं॰ पु॰) अधिकं मध्यतेऽनेन, अधि-मन्थ-घञ् करणे। १ अरणि काष्ठका मन्थनावयवविशेष। २ अभिष्यन्दोत्थ नेत्ररोग विशेष। आंखकी सख्त्
सूजन। यह रोग चार तरहका होता है,—१ वातज, २ पित्तज, ३ कफज और ४ रक्तज। अभिष्यन्द या नेत्रशूल उपेक्षित होनेपर अधिमन्य रोग लग जाता है। इसका लक्षण नीचे देखिये,—
{{Block center|<poem><small>"ब्रृद्धै रेतैरभिष्यन्दै र्नराणामक्रियावताम्।
तावन्तस्त्वधिमन्थाः स्युर्नयने तीव्र वेदनाः॥
उत्पाव्यत इवात्यर्थं नेत्रं निर्मध्यते तथा।
शिरसोर्ध्वञ्च तं विद्यादधिमन्थं स्व लक्षणेः॥
हन्याद्दृष्टिं श्लैष्मिकः सप्तरावादधिमन्थो रक्तजः पञ्चरावात्।
षड्रात्राद्वा वातिको वै निहन्यात् मिथ्याचारात् पैत्तिकः सद्य एव॥
अधिमन्थेषु सर्वेषु ललाटे वेधयेच्किराम्।
अशान्त सर्वथा मन्ये भ्रुवोस्तु परिदाहयेत्॥"(सुश्रुत॰ उ॰ ६ अ॰)</poem></small>}}
अधिमन्थन (वै॰ क्ली॰) १ अग्नि उत्पन्न करनेका मन्थन, आग पैदा करनेकी रगड़। (त्रि॰) २ अग्नि उत्पन्न करनेके मन्थन योग्य, आग पैदा करनेकी रगड़के क़ाबिल।
अधिमन्ति (सं॰ वि॰) नेत्रशूलसे व्यथित, आशोबेचश्मका बीमार।
अधिमांस (सं॰ क्ली॰) अधिकं मांसमत्र। रोग-विशेष, जिसमें नेत्र या मसूड़ोंका पश्चाद्भाग सूज जाता है, आंखों या मसूड़ोंकी सूजन। <small>दन्त देखो।</small>
अधिमांसक (सं॰ पु॰) अधिकं मांसमत्र कप्, बहुव्री॰। दन्तरोगविशेष, दांतकी एक बीमारी। इसका लक्षण यह है,—
{{Block center|<poem><small>"हनुभवान्तादन्ते अतिवेदनमहाशोथो लालाखावश्च भवति। (भावप्र॰)
हानव्ये पश्चिमे दन्ते महाशोथो महारुजः।
लालास्रावी कफकृती विज्ञेयः सोऽधिमांसकः।"</small></poem>}}
{{Right|<small>(सुश्रुत॰ नि॰ १६ अ॰)
अधिमांसार्म (सं॰ क्ली॰-पु॰) दृष्टिशुक्लगत रोग-विशेष, आंखकी बीमारी जो नासूरसे होती है। इसका लक्षण नीचे लिखा जाता है,—
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३६४'''|'''अधिमात्र—अधियार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिमात्र (सं॰ त्रि॰) अधिक मात्रा यस्य। १ अधिक प्रमाण, मौताज से ज्यादा। (अव्य०) २ कविता-विषयपर, शायरी के मज़मूनसे।
अधिमात्रकारुणिक (सं॰ त्रि॰) १ अधिक रूपसे दयालु, निहायत मेहरबान। (पु॰) २ बौद्धोंके एक महाब्राह्मणका नाम।
अधिमास (सं॰ पु॰) अधिको रविसंक्रान्तिद्वयमध्य-वर्त्तिचन्द्रमासः, रविसंक्रान्तिशून्य शुक्लप्रतिपदादिदर्शान्त श्चन्द्रमासः, प्रादि-स॰। असंक्रान्त मास, अधिक-मास; मलमास, लौंदका महीना। <small>मलमास देखो।</small>
अधिमित्र (सं॰ क्ली॰) अधिकं मित्रम्, प्रादि सं॰। ग्रहगणका परस्पर मिलनविशेष, ग्रहोंका आपस में मिलान। ज्योतिषके मतसे चन्द्र, मङ्गल और
वृहस्पति सूर्यके, सूर्य और बुध चन्द्रके, सूर्य, चन्द्र और वृहस्पति मङ्गलके, सूर्य और शुक्र बुधके, सूर्य, चन्द्र और मङ्गल वृहस्पतिके, बुध और शनि शुक्रके, और बुध और शुक्र शनिके मित्र हैं।
फिर शुक्र और शनि सूर्यके, बुध मङ्गलके, चन्द्र बुधके, बुध और शुक्र वृहस्पतिके, रवि और चन्द्र शुक्रके और रवि, चन्द्र और मङ्गल शनिके शत्रु होते हैं। चन्द्रका कोई शत्रु नहीं। सिवा मित्र और शत्रुके अवशिष्ट ग्रह सम समझे जाते हैं। जैसे,—रविके चन्द्र, मङ्गल और वृहस्पति मित्र, किन्तु शुक्र
और शनि शत्रु होते हैं; इसोसे बुध रविके सम है।
ग्रहोंके तात्कालिक मित्र-निरूपण करनेका नियम यह है,—जिन ग्रहोंसे चतुर्थ, दशम, द्वितीय, तृतीय और एकादश—इन सकल स्थानोंमें जो सकल ग्रह रहेंगे, वह उन्हीं-उन्हीं ग्रहोंके तात्कालिक मित्र समझे जायेंगे। इन सकल स्थानसे भिन्न दूसरे स्थानमें रहने से ग्रह तात्कालिक होते हैं। जो ग्रह जिस ग्रहका स्वाभाविक मित्र, सम और शत्रु हुआ करता, वह तात्कालिक अधिमित्र, मित्र और सम बन जाता है।
अधिमुक्तक (सं॰ पु॰) माधवीलता, चमेली।
अधिमुक्ति (सं॰ स्त्री॰) १ अनुभव, तजरबा। २ दृढ़ विश्वास, पुख़ता एतक़ाद। इस शब्दका व्यवहार बौद्ध अधिक करते हैं।
तंजरबा ।
अधिया (हिं० पु० ) १ अर्धाश, आधा टुकड़ा ।
२ मौज़ेमें निस्फ, पट्टोकी शिरकत, 'आधी पट्टोको
हिस्स ेदारी ।' ३ उत्पन्न हुए शस्यका अधीश प्रभु
और अधश कार्य करनेवालोंको प्रदान करनेका
नियम, उपजका आधा हिस्सा मालिक और आधा
मजदूरों को देनेका कायदा | 8 गांवकी आधी पट्टीका
• ज़मीन्दार, अधियार ।
अधियाङ्ग (सं० क्लो० ) अधिक अङ्ग. फजूल अज़ो ।
अधियान ( हिं० पु० ) गोमुखो, जप करनेका थैलो ।
यह थैली प्रायः ऊनको बनतो और गोमुख - जैसो होती
है। इसके ऊपर कारीगर रङ्गीन रेशम या जनसे
गो, राम, कृष्ण आदि देवतोंके चित्र भी बेल बूटोंमें
निकाल देते हैं । भक्त इसके भीतर रुद्राक्षको माला
डाल अपने इष्टदेवका मन्त्र जपा करते हैं। कहतें
हैं, कि विना गोमुखी खोलकर माला फेरनेसे सिद्धि
प्राप्त नहीं होती ।
अधियाना (हिं० क्रि० ) अधशमें विभाजित करना,
आधा-आधा हिस्सा लगाना, दो समान भागों में बांटना
बराबर-बराबरके दो टुकड़े उतारना ।
अधियार (हिं० पु० ) १ सम्पत्तिका अधीश,
मिलकियतका निस्क हिस्सा, जायदादका आधा
साझा । २ अधींशका प्रभु, निस्फ का काबिज़ ।
२ गांवके आधे जोतका असामी । ५. दो गांवों में
. बराबर हिस्सा रखनेवाला जमीन्दार या आसामी । :
अधिमुक्तिक (सं० पु० ) बौद्ध धर्मानुसार - महा-
काल, सबको नाश करनेवाला परमेश्वर ।
अधिमुक्तिका (स० [स्त्री०) मुक्ताग्टहा, शक्ती, सोप |
अधिमय (सं० पु० ) शाक्यमुनि । चौंतीसवें पूर्व-
जन्ममें शाक्य-मुनिको अतिमुह्य कहते थे ।
अधियज्ञ (सं० पु० ) अधिकृतो यज्ञो यस्मात्, प्रादि-
बहुव्रो० ।
१ परमेश्वर, यज्ञको अधिकृत करने-
वाला पुरुष । अधिक: अधिकाङ्गयागः, प्रादि स० ।
२ अधिकाङ्गयाग, वह यज्ञ जिसमें अनेक अङ्ग रहते
हैं। ३. प्रधान यज्ञ । ( त्रि० ) ४ यज्ञ सम्बन्धीय,
यज्ञका । ५ यज्ञके विषय में, यज्ञको अधिकार कर
यज्ञकी बातपर ।
मलमास देखो ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२५२
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रेखा साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कविक-कविता|२५३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
पेगू प्रभृतिमें जैसे पालि भाषा बौद्ध पीठस्थानोके शिलालेखोंमें खोदित देख पड़ती, वैसीही आजतक न चलने भी बोलि आदि द्वीपोके शिलालेखो और धर्मपुस्तको में यह मिला करती है। यवद्वीपमें कवि शब्दका अर्थ रहस्य वा आख्यायिका लगाते है। सम्भवतः प्राचीनकालको इस भाषामें रहस्य और आख्यायिका बनानेसे ही 'कवि' नाम पड़ा है। फिर कितनी ही के अनुमानमें संस्कृत काव्य शब्दसे 'कवि' की उत्पत्ति है।
किसी किसी शब्दशास्त्रविदके मतमें यह यवद्वीपको देशीय भाषा नहीं, किसी समयमें भिन्न देशसे आकर वहां चली होगी। वस्तुतः भारतीय दक्षिण देशकी भाषाओंमें इसके अनेक मेल देख पड़ते हैं। किन्तु यवद्वीपकी यवानीभाषासे यह अधिक मिलती है। इसलिये कवि भाषा भिन्न देशीय समझी जा नहीं सकती। पुरानी हिन्दीसे जैसे नयी हिन्दी कम मिलती, वैसे ही प्राचीन कविभाषासे भी नवीन यवानी पृथक् लगती है। फिर प्राचीन हिन्दीके व्यवहारानुसार जिस प्रकार अनेक अप्रचलित शब्द सहजमें लोगोंको समझ नहीं पड़ते, उसी प्रकार कवि भाषाके अनेक शब्द वर्तमान यवद्वीपके प्रधान प्रधान पण्डितोंको छोड़ साधारणके लिये कठिन जानते हैं। यवद्वीपका प्राचीन इतिहास जाननेको कवि भाषा सीखना चाहिये। यवद्वीपमें मुसल्मानोके आनेसे पहले बौद्धो और हिन्दूओका राज्य था। उनका विवरण इस भाषाके लिखित प्राचीन शिलालेखोंमें मिलता है। यह और बालिके धर्मग्रन्थ व्यतीत रामायण, महाभारत, ब्रह्माण्डपुराण प्रभृति प्राचीन संस्कृत पुस्तक यवभाषामें अनुवादित हुये हैं। इस भाषाका
लिखित 'ब्रातयुद' अर्थात् भारतयुद्ध नामक ग्रन्थ सर्व प्रधान है। इस ग्रन्थको दया नामक प्रदेशीय राजा नयवयके आदेशसे आग्युसुदा नामक किसी व्यक्तिने बनाया था। जयवयको कुरूसेनापति शल्यकी कथा बहुत अच्छी लगती थी। उन्होंने की मनसुब्धि लिये कुरुपाण्डवका युद्ध अवलम्बन कर १११८ शकमें "ब्रातयुद्ध" (भारतयुद्ध) लिखा गया।
कविक (सं॰ क्ली॰) कवि स्वार्थे कन्। १ खलीन, लगाम। २ कवि, शायर।
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<br>कवित्त (हिं° पु°) वृक्षविशेष, एक पेड़। यह
मलय प्रायोद्वीपमें उपजता है। फल गोल और सरस
होते हैं। आज कल यह बङ्गदेश, दक्षिणभारत
और ब्रह्मदेशमें भी लगाया जाता है। कविकका
दूसरा नाम मलक्का जामरूल है।<br>
<br>कविकङ्कण (मुकुन्दराम चक्रवर्ती)—बङ्गालके एक
प्रसिद्ध और प्रधान प्राचीन कवि, चण्डीमङ्गलप्रणेता।<br>
<br>कविकण्ठहार (सं॰ पु॰) कवीनां कण्ठहार इव
आदरणीय इत्यर्थः। १ कवियोंका उपाधि विशेष,
शायरोका एक खिताब। २ सुप्रसिद्ध अलङ्कार ग्रन्थ।
कविकर्णपुर, प्रसिद्ध वैष्णव ग्रन्थकार। यह काञ्चनपल्ली
(कांचड़ापाड़ा) ग्रामवाले परम वैष्णव शिवानन्द
सेनके पुत्र थे। इनका प्रचलित नाम परमानन्द रक्षा।
इन्होंने संस्कृत भाषामें चैतन्यचरित महाकाव्य,
आनन्दवम्भू और चैतन्यचन्द्रोदय नाटक प्रणयन
किया। <small>कञ्चनपल्ली देखो।</small>
<br>कविका (सं॰ स्त्री॰) कवि स्वार्थे कन्-टाप्। १ खलीन,
लगाम। २ कविका पुष्प वृक्ष, एक फूलदार पेड़।
३ मत्स्यविशेष, एक मछली। <small>कव्यो देखो।</small><br>
<br>कविक्रतु (वैं॰ त्रि॰) ज्ञानवान्, समझदार।<br>
<br>कविकन्द, १ कविकर्णपुरके पुत्र और कविवल्लभके पिता। यह एक प्रसिद्ध पण्डित थे। इनके बनाये काव्य
चन्द्रिका, धातुचन्द्रिका, रत्नावली, रामचन्द्रचम्पू,
शान्तिचन्द्रिका, सरस्वती और स्तवावली नामक ग्रन्थ
विद्यमान हैं। २ बङ्गालके भाषा रामायण, भागवतादि
रचयिता एक प्राचीन कवि।<br>
<br>कविचछद (सं॰ त्रि॰) कविः शब्दः च्छद आवरण-
वस्त्रमिव यस्य, बहुव्री॰। पण्डित, समझदार।<br>
<br>कविज्येष्ठ (सं॰ पु॰) सब कवियोंसे बड़े, वाल्मीकि।<br>
<br>कविञ्जुक (सं॰ पु॰) पक्षिविशेष, एक चिड़िया।<br>
<br>कवितम (सं॰ त्रि॰) अयमेषामतिशयेन कविः; कवि-तमप्। अतिशय ज्ञानवान्; नितान्त समझदार।<br>
<br>कवितर (सं॰ त्रि॰) अपेक्षाकृत बुद्धिमान्, ज्यादा
समझदार।<br>
<br>कविता (सं॰ स्त्री॰) कवेर्भावः, कवि-तल्-टाप्। काव्य, शायरी, तुकबन्दी।<br>
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