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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२३६
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदयपुर वा मेवाढ़'''|'''२३५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
१५७२ ई॰ में उदयसिंहके मरनेपर प्रतापसिंहने पितृ सिंहासन पाया था। उनके जैसे उच्चहृदय, स्वदेश प्रेमिक और कष्ठसहिष्णु वीरपुरुष अति अल्प ही भारतवर्ष में उपजे हैं। वे स्वदेश और स्वजातिके लिये बार बार अकबर बादशाहसे लड़े। सकल युद्ध में हारते भी उन्होंने मुगलोंकी अधीनता मानी न थी। प्रतापने स्वाधीनता बचानको अपना राज्य धन गंवाया, पर्वत-पर्वत एवं वन वन चक्कर लगाया और गुहादिमें डेरा जमाया। ऐसा भी सम्बल न था, जिससे कायको क्लेश मिलते ही दिन कटता। बहु कष्टके बाद विधाता उनपर प्रसन्न हुये। उसी समय भामशाह नामक एक मन्त्रीने धन द्वारा उनका साहाय्य पहुंचाया था। प्रताप फिर राजपूतोंको जोड़ देवार नामक रणक्षेत्रपर उतर पड़े। उनके साहाय्य और रणकी दक्षतासे मुग़ल फौ़ज हार गयो। प्रतापने अल्प दिनके मध्य ही समस्त मेवाड़ छोड़ाया लिया। फिर उन्होंने समस्त मेवाड़का एकेश्वरवन वाधीन भावसे जीवनका अवशिष्ट काल बिताया। प्रतापके मरनेपर तत्पुत्र अमरसिंह राजा हुये थे। <small>प्रतापसिंह देखो।</small>
दिल्लीके सम्राट बनने पर जहांगीरने मेवाड़का राज्य अपने वशमें लाने के लिये अनेक बार यत्न लगाया, किन्तु किसी प्रकार कुछ कर न पाया। वह अमर-सिंहसे दो बार सम्पूर्णरूपमें हारा था। अवशेषपर जहांगीरने प्रतापसिंह भ्राता शक्तिसिंहको मिलाया और तदीय भ्रातुष्पुत्र अमरके विपक्ष लड़ाया। सात वर्ष बाद शक्तिसिंह जातीय विद्वेषके लिये मन ही मन शरमाये थे। फिर उन्होंने मेवाड़की प्राचीन राजधानी चित्तौर अमरको सौंप दी थी। इस संवादसे जहांगीरको असीम क्रोध आया था। उन्होंने अपने पुत्र परवीज़को ससैन्य अमरके विपक्ष भेजा। परवीज़, भी हार गये थे। फिर मुग़ल-सेनानायक महब्बत खान् बडी भारी सेना ले मेवाड़के अभिमुख चले। शाहजहान् प्रकृत अधिनायक बने थे। इतःपूर्व बहुबार लड़ राजपूतोंका सैन्य क्रमशः घट रहा था। फिर असंख्य मुग़ल सैन्यके सम्मुख अस्त्र चलानेकी पड़ी। राजपूत वीरगणने देखा-अब
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
रक्षा नहीं। उसपर भी एक बार प्राण पर्यन्त लमा जातीय गौरव बचानेको सकलने अस्त्र उठाया था। घोरतर युद्धके बाद राजपूत हारे। राणा अमरनेलाचारीमें दिल्लीश्वरका आनुगत्य माना था। किन्तु जहांगीरने उन्हें यथेष्ट सम्मानित किया। फिर भी राणा प्रतापसिंहके पुत्र अमर मुसलमानकी अधीनता सह न सके थे। उन्हें समझ पड़ा-मुसलमानके अधीन रहनेसे राजपद छोड़ने में ही सुख है। अमरने अपने पुत्र करणसिंहको मेवाड़का राज्य सौंप वानप्रस्थ पकड़ा था। १६२८ ई॰ को करणसिंहके मरने पर तत्पुत्र जगत्सिंह राणा बने। वे १६५४ ई॰ को मेवाड़के सिंहासनपर बैठे थे। उन्हींके राजत्वकालपर औरङ्गज़ेबने जिजिया कर लगाया। यह कर मेवाड़पर बांधने के लिये मुग़ल सैन्य भेजा गया था। राजपूतों में किसीने जिजिया कर देना न चाहा। उसीसे युद्ध हुया था। राजसिंहने बार बार मुग़ल सैन्यको
हराया। १६८१ ई॰ में औरङ्गजेबने जजिया कर उठा डाला। इसी वर्ष राजसिंह मरे थे। उनके पुत्र अमर (२य) राणा बने। इन्हों राणाके समयपर
मारवाड़, मेवाड़ और जयपुरके राजगणने मिलकर मुग़ल राज्य मेटनेको चेष्टा लगायी थी। मुसलमानोंने जहां जहां देवदेवीके मन्दिर तोड मसजिद बनायी, १७१२ ई॰ में एकत्र हो राजपूत राजगणने वहीं वहीं ध्वंसको धारा बहायी। किन्तु यह शुभदायक जातीय मिलन बहु दिन टिका न था। भारतका अदृष्ट बहुत ही अशुभ निकला। शुभ मिलनमें विच्छेद पड़ा था और मारवाड़के राजा जगत्सिंहने सन्धि कर अपनी कन्याका विवाह सम्राट् से कर दिया। कुछदिन बाद राणा अमर भी दिल्लीश्वरके साथ सन्धिसूत्रमें बंध गये थे। १७१३ ई॰ को अमरके मरनेपर तत्पुत्र संग्रामसिंहको पितृराज्य मिला। इस समय मुग़ल सम्राटकी अवस्था क्रमशः बिगड़ रही थी। मुग़ल बादशाहोंसे चौथ लेने लगे। १७६३ ई॰ में पेशवाने बाजीरावसे सन्धि जमायी थी। इस सन्धिके पत्रानुसार राणा मराठोंको १६०६०० रु. चौथमें देने के लिये सम्मत हुये।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|७२|इयम्—इराक्षीर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इयम् (वै॰ त्रि॰) कर्तरि असुन् किञ्च। १ गन्ता, चलनेवाला। (क्ली॰) भावे असुन्। २ गमन, चाल।}}
{{outdent|इर (सं॰ पु॰) दूर क। उर्वरा भूमि, उपजाऊ ज़मीन्।}}
{{outdent|इरंमद (वै॰ पु॰) दूरया जलेन मद्यते, इरा-मद-खच् निपातनात् ह्रस्वः। {{smaller|उग्रष्यन्ये व्यादि। पा ३।२।३९।}} १ वच्चानल, बिजलीकी आग। २ बड़वानल।}}
{{outdent|इरज्यु (वै॰ पु॰) पृथिवीका ईश्वर। {{smaller|'इरज्यी भुवनाना-मीन्नरः।' (सायण)}}
{{outdent|इरण (सं॰ क्ली॰) इरण ईरिण, ऋ-अण् पृषोदरा-दित्वात्। ऊषर भूमि, रेगस्तान, जिस ज़मीन्पर कुछ न उगे।}}
{{outdent|इरशाल (अ॰ पु॰) १ प्रशासन, हिदायत। २ आदेश, हुक्म। ३ इच्छा, मरजी।}}
{{outdent|इरसाल (अ॰ पु॰) १ वाचिकपत्र, जरुरी चिट्ठी। २ मासिक राजस्व, माहवार आमदनी। छोटा अफसर बड़े अफसरके पास प्रत्येक मास इरसाल पहुंचाता है।}}
{{outdent|इरसी (हिं॰ स्त्री॰) चक्रध्रुव, पहियेका महवर।}}
{{outdent|इरा (सं॰ स्त्री॰) इ-इन् गुणभावश्च निपातनात् अथवा इ कामं राति, इ-रा-क-टाप्। १ भूमि, ज़मीन्। २ रात्रि, रात। ३ जल, पानी। ४ अन्न, अनाज। ५ सुरा, शराब। ६ वाक्य, बात। ७ सरस्वती। ८ कश्यप की। इरादेवी वृक्षलता, वल्ली और समस्त तृणजातिको पैदा करती है। आनन्द, खुशी।}}
{{outdent|इराव—१ पारस्वस्थ प्रदेश-विशेष, ईरान्का एक भाग। यह खुरासान्से पूर्व अवस्थित है। इराक उत्तर-पश्चिमसे दक्षिण-पूर्व ६०० मील लम्बा और उत्तर-पूर्वसे दक्षिण-पश्चिम ३०० मील चौड़ा है। मुसलमान् नवाबोंके समय इराकी भारतवर्ष आ सैनिक कार्य करते थे। २ एशियायी तुर्कस्थानका एक प्रदेश। यहांके लोग अरबी बोलते हैं। यह देश दो भागोंमें विभक्त है,—सूखा और गोला। सूखेका जलवायु इच्छा और गोलेका खुराब है। किन्तु गोले भागमें कृषिकार्य अधिक होता है। यहां तिगरिस और टफ्रेतस दो नदी बहती हैं। उनके किना.रे-किनारे खजूरके पेड़}}
{{Multicol-break}}
लगे हैं। गीले भागमें दलदल बहुत है। वहां हबशी रहते हैं यहांके राजाओंके क़िले मिट्टीके होते हैं। जो चावल बीते और चटायी बुनते हैं। शतुल-हायोके लोग बड़े उपद्रवी हैं। यहां यात्री प्रायः लुट जाते हैं। उत्तरसे शमार आकर ओर भी अधिक उपद्रव उपस्थित किया करते हैं। किन्तु तुर्क-सरकार अब धीरे-धीरे तिगरिस पर अपना प्रभाव बढ़ा रही है। युफ्रेतसकी बाढ़ रुकने और दलदल सूखनेका प्रबन्ध भी हुवा है। यहांके अधिवासी अधिकतर शीया हैं। इनकी बुद्धि तीक्ष्ण होती है। गर्मीमें यहांके अमोर लोग हिन्दुस्थानी पङ्खा व्यवहार करते हैं। बगदाद और बसरा दोनों स्थान इराक में ही हैं। यहांसे खजूर, अनाज, चावल और ऊन बाहर भेजा जाता है। बाहरसे आनेवाले मालमें कपड़ा, मट्टीका तेल और पत्थरका कोयला प्रधान है। तिगरिसमें व्यापारी जहाज़ चलते हैं। यफ्रेतसमें यात्रियों को नौका रस्मोसे आदमी खींचते हैं। यहां पक्को सड़क नहीं हैं। इसलिये बाढ़ आ जाने और दल-दल रहनेसे ऊंटपर लादकर माल भेजनेमें असुविधा होती है।
ई॰ के ७वें शताब्दमें ईराककी अधिक श्रीवृद्धि हुयी थी। अब्बासी ख़लीफ़ाँकी अधीनतामें यहां कृषिकार्य बड़े जोर शोरसे चला था। किन्तु उनका अधिकार उठजानेसे फिर यह देश पूर्ववत् वन्य हो गया। अब अंगरेजोंने बगदाद जीत लिया है। अंगरेजी होनेसे फिर यहां धनधान्य बढ़नेकी आशा होती है। इराकुमें बाबलन, सिल्यूकिया, तेसिफीन प्रभृति प्राचीन नगरीका सावशेष पड़ा है। ३ सिन्धुप्रदेशकी एक नदी। यह अक्षा॰ २५० २०′ उ॰ तथा ट्राघि॰ ६७° ४५′ पू॰ पर इशुल पर्वतके नीचेसे निकलती है और दक्षिणपूर्व ४० मील बहकर कन्नड़ झील में जा गिरती है।
{{outdent|इराकी (अ॰ ति॰) इराक देशीय, इराक सुल्क के मुताप्तिक।}}
{{outdent|इराक्षीर (सं॰ पु॰) इरा जलं चीरमिव यस्य, बहुब्री॰। चीरसमुद्र। इस समुद्रके जलमें दूधका स्वाद है।}}
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{{outdent|इराव—१ पारस्वस्थ प्रदेश-विशेष, ईरान्का एक भाग। यह खुरासान्से पूर्व अवस्थित है। इराक उत्तर-पश्चिमसे दक्षिण-पूर्व ६०० मील लम्बा और उत्तर-पूर्वसे दक्षिण-पश्चिम ३०० मील चौड़ा है। मुसलमान् नवाबोंके समय इराकी भारतवर्ष आ सैनिक कार्य करते थे। २ एशियायी तुर्कस्थानका एक प्रदेश। यहांके लोग अरबी बोलते हैं। यह देश दो भागोंमें विभक्त है,—सूखा और गोला। सूखेका जलवायु इच्छा और गोलेका खुराब है। किन्तु गोले भागमें कृषिकार्य अधिक होता है। यहां तिगरिस और टफ्रेतस दो नदी बहती हैं। उनके किना.रे-किनारे खजूरके पेड़}}
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लगे हैं। गीले भागमें दलदल बहुत है। वहां हबशी रहते हैं यहांके राजाओंके क़िले मिट्टीके होते हैं। जो चावल बीते और चटायी बुनते हैं। शतुल-हायोके लोग बड़े उपद्रवी हैं। यहां यात्री प्रायः लुट जाते हैं। उत्तरसे शमार आकर ओर भी अधिक उपद्रव उपस्थित किया करते हैं। किन्तु तुर्क-सरकार अब धीरे-धीरे तिगरिस पर अपना प्रभाव बढ़ा रही है। युफ्रेतसकी बाढ़ रुकने और दलदल सूखनेका प्रबन्ध भी हुवा है। यहांके अधिवासी अधिकतर शीया हैं। इनकी बुद्धि तीक्ष्ण होती है। गर्मीमें यहांके अमोर लोग हिन्दुस्थानी पङ्खा व्यवहार करते हैं। बगदाद और बसरा दोनों स्थान इराक में ही हैं। यहांसे खजूर, अनाज, चावल और ऊन बाहर भेजा जाता है। बाहरसे आनेवाले मालमें कपड़ा, मट्टीका तेल और पत्थरका कोयला प्रधान है। तिगरिसमें व्यापारी जहाज़ चलते हैं। यफ्रेतसमें यात्रियों को नौका रस्मोसे आदमी खींचते हैं। यहां पक्को सड़क नहीं हैं। इसलिये बाढ़ आ जाने और दल-दल रहनेसे ऊंटपर लादकर माल भेजनेमें असुविधा होती है।
ई॰ के ७वें शताब्दमें ईराककी अधिक श्रीवृद्धि हुयी थी। अब्बासी ख़लीफ़ाँकी अधीनतामें यहां कृषिकार्य बड़े जोर शोरसे चला था। किन्तु उनका अधिकार उठजानेसे फिर यह देश पूर्ववत् वन्य हो गया। अब अंगरेजोंने बगदाद जीत लिया है। अंगरेजी होनेसे फिर यहां धनधान्य बढ़नेकी आशा होती है। इराकुमें बाबलन, सिल्यूकिया, तेसिफीन प्रभृति प्राचीन नगरीका सावशेष पड़ा है। ३ सिन्धुप्रदेशकी एक नदी। यह अक्षा॰ २५० २०′ उ॰ तथा ट्राघि॰ ६७° ४५′ पू॰ पर इशुल पर्वतके नीचेसे निकलती है और दक्षिणपूर्व ४० मील बहकर कन्नड़ झील में जा गिरती है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||दूराचर—इरिमेद|७३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इराचर (सं॰ क्ली॰) इरायां चरति, इरा-चर-ट। {{smaller|चरेष्ट। पा १२।१६।}} १ करका, ओला। चैत्र-वैशाख मासमें मेघ बरसनेसे प्रायः ओले पड़ते हैं। २ भूचर, जमीन्का जानवर। ३ खेचर, आस्मानी लोग—जैसे देवता भूतप्रेतादि।}}
{{outdent|इराज (सं॰ पु॰) इराया जायते, इरा-जन-ड। कन्दर्प, काम।}}
{{outdent|इरादा (अ॰ पु॰) १ इच्छा, मरज़ी। २ अभिप्राय, मतलब। ३ सङ्कल्प, क़स्द। ४ विचार, तजवीज़। ५ निर्दिष्ट स्थान, ठिकाना। ६ अर्थ, मुराद।}}
{{outdent|इरामुख (सं॰ क्ली॰) १ असुरनगर विशेष। यह मेरुके निकट था। २ प्रदोष, सन्ध्या, शाम पड़नेका वक्त।}}
{{outdent|इरावत् (सं॰ पु॰) इरा विद्यतेऽत्र, इरा भूम्नि मतुप् मस्य च वः। १ समुद्र, बहर। २ मेघ, बादल। ३ राजा, नवाब। ४ अर्जुनके एक पुत्र। इन्होंने नाग राजकी कन्या उलूपीके गर्भ और अर्जुनके औरससे जन्म लिया था। अर्जुनसे क्रूद्ध हो इरावान्को पितृव्य ने छोड़ दिया, इसलिये ये जननी द्वारा नागलोक हीमें प्रतिपालित हुये थे। एक दिन अर्जुन नागलोक गये और इन्होंने उन्हें वह अपना सकल वृत्तान्त बताया। पिताकी आज्ञासे ये रणमें पहुंचे और आर्षश्शृङ्ग राचस द्वारा मार डाले गये। (सं॰ स्त्री॰) ५ सुखद, जिससे आराम मिले। ६ खाद्य-सम्पन्न, जिसके पास खानेका सामान रहे। ७ आवासक, तसल्देली नेवाला।}}
{{outdent|इरावती (सं॰ स्त्री॰) इरा वनं तदस्या अस्ति, इरामतुप् वत्व ङीष्। १ नदी, दंर्या। २ नदीविशेष, यञ्जाबका एक दरया। अब इसे रावी कहते हैं। {{smaller|रावी देखो।}} ३ वटपत्नी, पथरचट। ४ रुद्रपत्नी। ५ ब्रह्म-देशस्थ एक नदी। {{smaller|इरावदी देखो।}}}}
{{outdent|इरावदो-ब्रह्मदेशकी प्रधान नदी। यह ब्रह्मदेशके पेगू और इरावदो विभागमें उत्तरसे दक्षिणको बहती है। इसकी उत्पत्तिका स्थान अनिश्चित है। सम्भवतः इरावदी पतकीयी पर्वतको दक्षिण-घाटीसे निकली है। छोटी और बड़ी दो शाखा मिलकर यह नदी बनी है। इरावदीमें कितनी ही नदी आकर गिरती हैं। मीगाङ्गके सङ्गमपर यह ५०से २५० मज तक चौड़ी}}
{{Multicol-break}}
हो जाती है। वहां इसकी धारा बहुत ही तीव्र बहती और पानीमें घूम-घूमकर लहर उठती है। भामोमें जहां तापिङ्ग मिलो है, वहां इसको अपूर्व शोभा खिली है। मन्दालयसे थोड़ी दूर इरावदोके किनारे सब्जी खूब ऊगती है। इसकी उपत्यकामें चावलकी कृषि को जाती हैं। मैदानमें प्रतिवर्ष बाढ़ आती है। नदी ८०० मोल लम्बी है। अकाकताङ्ग तक तो इसका तल पथरीला पड़ता, उसके बाद रेत तथाःदलदल मिलता है। बारहो मास इसमें छोटे-छोटे जहाज़ चला करते हैं। वर्षामें रंगूनसे बड़े २ जहाज भी आते जाते हैं। रंगूनसे बासिन और मन्दालयको सप्ताहमें दो बार जहाज़ छूटता है।
{{outdent|इरावेल्लिका, {{smaller|इरिवेल्लिका देखो।}}}}
{{outdent|इरिका (सं॰ स्त्री॰) इरेव, इराकन् अत इत्वम्। जल, पानी।}}
{{outdent|इरिकावन (सं॰ क्ली॰) इरिका प्रधानं वनम्, शाक-तत् वा ६-तत्, णत्व बाहुलकात्। विभाषौषधिवनस्पतिभ्यः। {{smaller|पा ८।४।५।}} जलके निकटस्थ बन, पानीके पासका जङ्गल।}}
{{outdent|इरिकोल (सं॰ पु॰) अड्डोलवृक्ष, ढेरेका पेड़।}}
{{outdent|इरिण (सं॰ क्ली॰) ऋ अतः किदिच्च इनन्। १ ऊषर भूमि, बंञ्जर जुमीन् २ जलप्रवाह, नाला, कुवां। ३ भूमिछिद्र, खन्दक। ४ मरुभूमि, रेगस्तान। ५ वेदोक्त प्राचीन जनपद। {{smaller|आर्यावर्त्त देखो।}}}}
{{outdent|इरिण्य (बै॰ त्रि॰) १ मरुभूमिसम्बन्धोय, रेगस्तानके मुताब्लिक। (क्ली॰) २ ऊषर क्षेत्र, बंञ्जर खेत। {{smaller|(सायण-क्कृत शतपथब्राह्मणभाष्य ५।२।१३)}}}}
{{outdent|इरिन् (बै॰ त्रि॰) हरि कङ्गादित्वात् णिनि यलोपः। १ प्रेरक, भेजनेवाला। 'दूरी ईरीता प्ररिता।' {{smaller|(ऋग्भाष्ये सायण ५।८७७३)}} २ ईष्य क, हसदो।}}
{{outdent|इरिमेद (सं॰ पु॰) इरो व्याधिजनकतया ईष्यकः मेदी निर्यासो यस्य, बहुव्री॰। अरिमेद, विट्खदिर। यह एक प्रकारका खैर होता और गुणमें कषाय तथा उष्ण रहता है। इससे मुख एवं दन्तरोगका औषध बनता है और रक्त गिरना बन्द हो जाता है। कण्डू, विष, श्लेषमा, क्कमि, कुष्ठ और विषाक्त व्रणको इरिमेद शोघ्र ही नष्ट कर देता है ।}}
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 19|2em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/७५
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|७४|इरिम्बिठि—इलातल|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इरिस्बिठि (सं॰ पु॰) काखवंशीय एक व्यक्ति।}}
{{outdent|इरिविल्ला (सं॰ स्त्री॰) इरिणी चासी विल्ला चेति। मस्तकका एक क्षुद्र व्रण।}}
{{outdent|इरिवेल्लि, {{smaller|इरिवेल्लिका देखो।}}}}
{{outdent|इरिवेल्लिका (सं॰ स्त्री॰) विदोष-लक्षणाक्रान्त मस्तक-की गोलाकार पिड़काविशेष, (Carbuncle of head) माथेका एक फोड़ा। इसके होनेसे बड़ी ही वेदना होती है। कभी कभी तो ज्वर तक चढ़ता है। पित्तजन्य विसर्प रोगकी तरह वैश्य इसको भी चिकित्सा करते हैं। होमिओपाथिकके मतमें ऐसे रोगपर डिपार सलफर लगानेसे विशेष फल मिलता है। कोई-कोई चिकित्सक सिलिसिया, वेलेडीना प्रभृति अन्यान्य औषधियोंको भी प्रयोग करना अच्छा समझते हैं।}}
{{outdent|इरेश (सं॰ पु॰) १ विष्णु। २ वरुण। ३ राजा। ४ वागीश।}}
{{outdent|इर्द-गिर्द (हिं॰ क्रि॰ वि॰) समन्ततः, चारो ओर, दाहने-बायें।}}
{{outdent|इर्स (सं॰ क्ली॰) १ व्रण, फोड़ा। २ क्षत, जुखुम, घाव।}}
{{outdent|इर्य (वै॰ त्रि॰) दूरसु-यक् वेदे निपातनात्। प्रेरक, भेजनेवाला।}}
{{outdent|इर्वारु (सं॰ पु॰) इरुं वीजं इयत्ति व्याप्नोति, इरु-ऋ बाहुलकात् उण्। कर्बटी, ककड़ी।}}
{{outdent|इर्वारुक (सं॰ पु॰) मृगविशेष, एक जानवर। यह पर्वतकी गुहाओंमें रहता है।}}
{{outdent|इर्वारुशुक्ति {{smaller|इर्वारुश्यक्तिका देखो।}}}}
{{outdent|इर्वारुशुक्तिका (सं॰ स्त्री॰) इर्वारुः शुक्तिका इव, उप॰ कर्मधा॰। निर्भिन्नकर्कटी, फूट।}}
{{outdent|इर्वालु, {{smaller|इर्वारु देखो।}}}}
{{outdent|इर्शाद, {{smaller|इरशाद देखो।}}}}
{{outdent|इषैना (हिं॰) {{smaller|एषण देखो।}}}}
{{outdent|इल (सं॰ पु॰) इल-क। कर्दम प्रजापतिके पुत्र।}}
{{outdent|इलज़ाम (अ॰ पु॰) १ कलङ्क, बदनामी। २ अपराध, जुमें। ३ निन्दा, हिकारत।}}
{{outdent|इलविल (सं॰ पु॰) दशरथके एक पुत्र।}}
{{outdent|इलविला (सं॰ स्त्री॰) कुवेरकी माता, पुलस्त्यकी पत्नी और तृणविन्दुकी कन्या।}}
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{{outdent|इलहाक (अ॰ पु॰) १ योग, जोड़। २ वादी तथा प्रतिवादीसे लिया जानेवाला शुल्क, जो मेहनताना मुह्यी और मुद्दाहलसे मिलता हो।}}
{{outdent|इलहाम् (अ॰ पु॰) १ सुआव्य शब्द, अच्छी आवाज़। २ आकाशवाणी, परमेश्वरकी बात।}}
{{outdent|इला (सं॰ स्त्री॰) इल-क-टाप्। १ पृथिवी, ज़मीन्। २ वाक्य, बोली। ३ गो, गाय। ४ स्वप्नशीला, खाब देखने या ज्यादा सोनेवाली औरत। ५ जम्बूद्दीप के नव वर्षमें एक वर्ष। ६ वैवस्वत मनुको कन्या। यह विष्णुके वरसे पुरुष हो सुद्युम्न कहायी थीं। अनन्तर महादेवके अभिशप्त कुमारवनमें घुसनेसे यह फिर स्त्री हो गई। बुधने इनसे विवाह कर पुरुवा नामक पुत्र उत्पन्न किया था। किन्तु इनके पुरोहित वशिष्ठदेवने शिवकी उपासना कर इनके एकमास पुरुष और एक मास स्त्री रहनेका वर प्राप्त कर लिया था। ७ कर्दम प्रजापतिके पुत्र इल। कार्तिकेयके जन्म स्थानमें जानसे ये स्त्री हुये और इला नामसे प्रसिद्ध रहे। पीछे इन्होंने भगवतीकी आराधनासे एकमास स्त्री और एक मास पुरुष रहनेका वर पा लिया था। {{smaller|इड़ा देखो।}}}}
{{outdent|इलाका (अ॰ पु॰) १ सम्पर्क, ताल्लुक, लगाव। २ नियोग, सरोकार। ३ उद्देश, जिक्र। ४ ग्रहण, कब्ज़ा, पकड़। ५ राज्य, रियासत। ६ विभाग, हिस्सा। ७ न्यायप्रभुत्व, हुक्मरानी। ८ पद, ओहदा।}}
{{outdent|इलाकाबन्द (अ॰ पु॰) दीघंपट्टकार, पटवा।}}
{{outdent|इलाकाबन्दी (अ॰ स्त्री॰) १ दीर्घपट्टकारकी वृत्ति, पठवे-का काम। २ वस्त्राभरणक्रिया, गोटे-किनारीका काम।}}
{{outdent|इलाची (हिं॰ पु॰) वस्त्रविशेष, किसी किस्मका कपड़ा। इसमें रेशम और सूत दोनों चीजें मिली रहती हैं।}}
{{outdent|इलागोल (सं॰ क्ली॰) पृथिवी, ज़मीन्।}}
{{outdent|इलाची, {{smaller|इलायची देखो।}}}}
{{outdent|इलाज (अ॰ पु॰) १ उपाय, तदबीर, दौड़-धूप। २ निवृत्ति, कुटकारा। "अपने कियेका क्या इलाज।" (लोकोक्ति) ३ चिकित्सा, दवा-मालजा। ४ दण्ड, सज़ा।}}
{{outdent|इलातल (सं॰ क्ली॰) १ राशिचक्रका चतुर्थ स्थान। २ पृथिवीतल, सतह-ज़मीन्।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इलादध—इलायची|७५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इलादध (सं॰ पु॰) यन्नविशेष।}}
{{outdent|इलान्द (सं॰ क्ली॰) १ उत्सव वा छन्दोविशेष, बक ख़ास जलसा या बहर। २ एक सामन्।}}
{{outdent|इलापत्र (सं॰ पु॰) नागविशेष।}}
{{outdent|इलाम (हिं॰) ऐलान् देखो।}}
{{outdent|इलायची (हिं॰ स्त्री॰) एला, इलाची।। (Cardamom) संस्कृतमें इसे वसुलगन्धा, ऐन्द्री, द्राविड़ी, कपीतपर्णी, बाला, बलवती, हिमा, चन्द्रिका, सागर-गामिनी, गान्धालोगर्भा, एलोका और कायस्था कहते हैं। इलायची छोटी और बड़ी या गुजराती और पूर्वी दो प्रकारकी होती है। छोटीका संस्कृत नाम उपकुब्जिका, तुत्या, कीरङ्गी, त्रिपुटा, त्रुटिवयस्था, तीच्णगन्धा, सूक्ष्म ला तथा त्रिपुटि और बड़ीका पृथ्विका, चन्द्रबाला, निष्कुटि, बहुला, स्थूलैला,}}
{{c|[[File:इलायचीका वृक्ष.jpg|200px]]<br>इलायचीका वृक्ष}}
मालेया एवं ताड़काफल आदि है। बड़ी दोनों इलायची वैद्यकमतसे शीतल, तिक्त, उष्ण, सुगन्धित, हृद्रीगकारक और पित्तरोग, कफ, मल-भेद, वमन एवं शुक्रको नाश करनेवाली हैं। बड़ी
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विशेषतः शूल, कोष्ठबद्ध, पिपासा, छर्दि एवं वायु और छोटी कफ, खास, काश, अर्थः तथा मूत्र-कृच्छ्रकी मिटाती है।
इसका पौधा चारसे आठ फीटतक ऊंचा होता और सदा हरा-भरा रहता है। इसकी मोटी लकड़ीको जड़ जुमोन्में जमती ओर उसके ऊपरी भागसे इधर उधर खड़ी डाली निकलती है। इलायची पर फल-फूल दोनों लगते हैं। भारतवर्षके नाना स्थानोंमें इलायची उपजती है। दक्षिणकी ओर कनाड़े, महिसुर, कोड़ग, तिरुवाङ्कोर और मथुराकी पावैत्यभूमिमें इसका जङ्गल खड़ा है। इसका वृक्ष चार वर्षमें बढ़ता और सातमें फलता है। फल आनेपर कृषक शाखा प्रशाखासे वोजकोष तोड़ लाते हैं। भुरभुरे पत्थरको भूमि इसके लिये उपयुक्त है।
युरोपमें पहले इलायची न होती थी। पीके भारत-वर्षसे वहां लोग इसे ले गये। मुसलमान् वैद्य छोटीकी स्त्री और बड़ीकी पुंजातीय समझते हैं। छोटी इलायची सफेद रहती, दाक्षिणात्य में उपजती और पान तथा मिठायोमें पड़ती है। यह भी कई तरहकी होती है—काग़जी, मालावरी, गुजराती और सिंहली आदि। बड़ी नेपाल तथा बङ्गाल में उपजती और दाल-तरकारीके काम आती है।
इलायचीको कन्दमूल और बीज दो प्रकारसे तैयार करते हैं। भूमि चिकण और उर्वर रहना चाहिये। अधिक वायु वा ताप लगनेसे वृक्षमर जाता है। खेतमें इधर-उधर कुछ दूसरे बड़े बड़े वृक्षोंके रहनेसे लाभहोता है। दो तीनवर्षके वृक्षका कन्दमूल भी लगा सकते हैं। गड्डा एक फुट गहरा और अट्ठारह इञ्च चौड़ा होना चाहिये। इसके पौधोंके बीच १२ फीटतक अन्तर रखते हैं। खेतका घासफूस, कङ्कड़-पत्थर और कूड़ाकर्कट साफ कर दिया जाता है। किन्तु पौधा निकल आनेपर निरानेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। क्योंकि इलायचीके नीचे दूसरी चीज़का ऊगना असम्भव है। सावधानतासे बीजको डालते हैं। किन्तु बीजको गहरेमें बोना अच्छा नहीं। ६से ८ इंच्च बढ़नेपर पौधेको उखाड़कर दूसरी जगह लगा देना चाहिये।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इलोरा|७७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
'''इलोरा (एलूरा)'''—बम्बई दीपके पूर्वांश दौलताबादसे मिला हुवा एक पार्वत्य स्थान। गुहार्मान्दरोंके लिये यह बहुत दिनोंसे प्रसिद्ध है। यहां स्थानीय पर्वत खोद-खोद कर मन्दिर बनाये गये हैं। बौद्ध, हिन्दू और जैन इन पृथक् पृथक् धर्मावलम्बियोंको देवमूर्तियां इसकी समस्त गुहाओंमें प्रतिष्ठित देख पड़ती हैं।
प्राचीन हिन्दूशास्त्रमें इसे ग्रोमेश्वर नामक शिवका तीर्थ बताया है। इसे देखनेके लिये लाखों बौद्ध, जैन और हिन्दू लोग यहां पहले आया करते थे।
भारतवर्षमें अनेक स्थानपर गुहामन्दिर विद्यमान है। किन्तु उन सबमें इलोराके गुहामन्दिर ही सर्वा-पेक्षा विस्तृत बने हुये हैं। अर्धचन्द्राक्कति-पर्वतके दक्षिण भुजपर बौद्धमन्दिर, उत्तर भुजपर इन्द्र सभा अथवा जैन-मन्दिर और मध्यस्थलपर हिन्दू-देवदेवियोंक मन्दिर हैं।
दक्षिण-भागकी गुफायें अतिप्राचीन हैं। किसी-किसीके अनुमानसे ये सन् ३५० और ५५० ई॰ के बीचमें बनाई गई थी। इस भागकी यहांके लोग ढेरावाड़ कहते हैं। प्रथम गुहा एक बौद्ध-विहार है। इसमें बड़े-बड़े आठ घर बने हैं। दूसरी नाय्यमन्दिर जैसी है। यह लोगोंके उपासना करनेका स्थान मालूम होता है। इसके बरामदेमें बहुतसी बौद्ध देवदेवियोंकी मूर्तियां हैं। तृतीय गुफा प्रथम ही जैसी है। किन्तु वह प्रथम और द्वितीय दोनों से अधिक प्राचीन मालूम होती है। अवशेष पांच गुफायें बिलकुल खण्डहर है। एकमें बृहदाकार लोकेश्वरकी मूर्ति प्रतिष्ठित है। इसके भैरववेश देखनेसे मनमें भक्ति और भयका सञ्चार होता है।
उक्त गुहावोंको लांघकर कुछ ऊपर चढ़नेसे महार-बाड़ा गुहा मिलती है। यह एक विस्तीणे विहार है। यह प्रायः ११७ फीट गहरी और साढ़े अट्ठावन फीट चौड़ी है। इसका छज्जा २४ खम्भोंपर खड़ा है। इसी गुहाविहारमें बौद्ध दरबार लगता था, ऐसी किम्बदन्ती है। इसके वाद प्रवेशद्वारपर ध्यानावस्थामें एक पद्मासन बुद्धमूर्ति विराजमान है। इसके चारों ओर पद्मछत्रधारी स्त्री पुरुषोंकी मूर्तियां खड़ी हैं। ये
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लोग अनुमानसे बुद्धको परिचर्यामें नियुक्त किये गये मालूम पड़ते हैं। इससे दक्षिण दूसरा मन्दिर है। इसमें भी उपविष्ट बुद्ध और अनेक पद्मगुच्छ्धारी नरनारियोंकी मूर्तियां है। इस मन्दिरके बाद अनेक विहार और जलाशय देख पड़ते हैं। उक्त गुफासे आगे कुछ ऊपर जानेसे विश्वकर्माकी गुफा मिलती है। यहां विश्वकर्मारूपी बुद्धमूर्ति प्रतिष्ठित है। इस मूर्तिको पूजने नाना स्थानके बढ्यी यहां आया करते हैं।
इस गुहासे आगे कुछ ऊपर द्दितल नामक एक गुहा है। पहले केवल इसका एकतल दीख पड़ा था, जो मट्टीसे भरा था। १८७६ ई॰ में मट्टी खोदते खोदते नीचेके तलकी मिट्टी निकली। पीछे स्थान परिष्कार करनेसे मन्दिर और गुफाका उद्धार हुवा। यहां बुद्धदेव, पद्मपाणि, वज्रपाणि प्रभृति बोधिसत्त्व और दूसरी भी अनेक मूर्तियां विद्यमान हैं। इसके बाद त्रितल गुफा दिखाई पड़ती है। इसकी कारीगरी बहुत भड़कीली है। दीवार पर फूल कढे हैं और नानाप्रकारके मनुष्य बने हैं। एक स्थानमें बुद्धमूर्ति सिंहासनपर बैठी है। यह समा-सोम मूर्ति प्रायः आठ हाथ ऊंची है। अन्यस्थलपर सात ध्यानावस्थ बुद्ध उपविष्ट हैं। उनके देखते ही ऐसा मालूम पड़ता है मानो पाषाणके मध्य भी जीवन है। प्रक्कत हो वे अपार्थिव ध्यानमें निमग्न हैं। इसके सिवालोचना, तारा, मामुखी प्रभृति बोधि-सत्व-रमणियोंको मूर्तियां भी उसी स्थानपर अलङ्कृत की गयी हैं। यह गुहा बौद्धोंके महायान सम्प्रदाय द्वारा बनायीगई मालम होती है।
पर्वतके मध्यस्थलपर त्रितल गुहाके निकटसे हिन्दू. देवदेवियोंके मन्दिर आरम्भ हुए हैं। ये गुहामन्दिर प्रायः १५।१६ बने हैं। बौद्ध-निर्मित गुहाओंको तरह इन मन्दिरोंमें भो विस्तर शिल्पनैपुण्य और असाधारण भास्करकार्यका परिचय मिलता है । विशेषतः बौद्धोंको गुहाओंसे हिन्दुवांके मन्दिर अधिक सुसज्जीभूत है। उनमें रावणको खाई, कैलास, रामेश्वर, नीलकण्ठ, तेलोका गण, कुंभारबाड़ा, जनवास और गोपी-मन्दिरके दृश्य प्रधान हैं ।
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. 20|2em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|७८|इलोरा|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
रावणकी खायी' गुहाके चारो ओर प्रदक्षिणा है। मन्दिरके मध्य महिषमदिंनी, हरपार्वती, शिव-ताण्डव प्रभृति सुन्दर सुन्दर देवोंकी मूर्तियां शोभित है। इसमें किसी स्थानपर दशस्कन्ध रावणके कैलास उठानेका दृश्य है; तो कहीं एक हस्तमें असि और दूसरे हस्तमें पात्र लिये करिचर्मसे आवत भयङ्कर भैरवमूर्ति रत्नासुरका विनाश कर रही है। कहों यदि ऐरावतपर इन्द्राणी विराजमान है तो कहीं शूकरपर वाराही बेठी है। कहीं यदि गरुड़पर कौमारो शोभित हैं तो कहीं वृषभपर माहेश्वरी मूर्ति स्थित है और कहीं यदि हंसपर सरस्वती बैठो हैं, तो कहीं निर्जनस्थानमें बैठकर शङ्कर डमरू बजा रहे हैं। इस प्रकार इस
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निर्जन पार्वत्य प्रदेशमें नाना देवदेवो मूतियोंके देखने-से हिन्दूमात्रके हृदय में भक्तिका सञ्चार हो जाता है।
'दश-अवतार-गुहा' और भी चमत्कारिणी है। दशावतार और उनके लोलाचित्रके सिवा गणपति, पार्वती, सूर्य, अर्धनारीश्वर प्रभृति अनेक देवमूर्तियाँ यहां बनो हैं। इस मन्दिर में अस्पष्ट शिलालेख विद्यमान है। अनुमानसे मन्दिरको प्रतिष्ठाका विवरण उक्त प्रस्तरखण्डपर लिखा गया होगा। परन्तु काल पाकर वह अस्पष्ट हो गया है। खेद है कि कोटि-कोटि मुद्रा व्ययसे इस अमानुषी कोतिको प्रतिष्ठित करनेवालोंके नामका परिचय देनेवाला निदर्शन भो आज कोई हमें नहीं मिलता ।
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{{c|[[File:कैलास.jpg|250px]]<br>कैलास।}}
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इलोरेका कैलास वा रङ्गमहल भारतवर्षके मध्य गुहामन्दिर-निर्माणको पराकाष्ठा दिखाता है। पर्वत खोदकर ऐसेः सुदृहत् देवालय अति अल्प हो बने हैं। कैलास देखनेसे समझ पड़ता है कि, प्राचीन भारतीय शिल्पी, भास्कर और स्थपतिगणोंने किस प्रकार अपनी असाधारण क्षमतासे कैलासका परिचय दिया है। इस निर्जन-वनराजि-वेष्टित कैलासभवनमें पहुंचनेसे देवादि-देव महादेवके कैलासमें पहुंचने-जैसा आनन्द आता है। जो लोग मिशरके पिरामिडकी बात सुनकर चकराते हैं, चोना प्राचीरको प्रशंसा सुनाते हैं और
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आगरेके ताजमहलपर लट्ट हो जाते हैं, उन्हें हम एकबार उक्त कैलास देख आनेका आग्रह करते हैं। इसके देखनेसे हृदयमें धर्म, भक्ति एवं शान्तिका उदय होगा। प्राचीन हिन्दू-राजगणको असाधारण देवभक्ति, स्वधर्मानुराग, निस्वार्थपरोपकारिता और अलोकिक कोतिं देख परित्तृप्ति हो जाती है।
पाश्चात्य पुरातत्त्ववित् कैलासमन्दिरको राष्ट्र-कूटाधिपति दन्तिदुर्गकर्तृक ५० ७म शतकमें निर्मित बतलाते हैं। किन्तु इस मन्दिरका उसको अपेक्षा पूर्वकालमें निमाण होना भी सम्भव है। दन्ति-
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इलोरा—इल्म|७६}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
दुर्गने इसे पुनः सज्जित और संस्कृत किया होगा। कैलासके मध्य हमारी प्रधान देवदेवियोंकी तथा रामायण एवं महाभारतके वीरोंको मूर्तियां और देवलोलाये खुदी है। चित्रविचित्र चित्रित रहनेसे इसे रङ्गमहल भी कहते हैं।
सिवा कैलासके रामेश्वर और नीलकण्ठ प्रभृति गुहायें भी दर्शनीय हैं। इन गुहावोंमें भी नाना प्रकार खोदायीका काम और देवदेवियोंकी मूर्तियां हैं।
इलोरा-पर्वतकी उत्तरभुजके प्रान्तमन्दिरका नाम पार्श्वनाथ है। यह भूमिसे ४८० हस्त ऊध्वं, अप्राचीन और इष्टक-निर्मित है। ई॰ के १८वें शताब्दमें औरङ्गाबादस्थ किसी जैन सेठने यह मन्दिर बन-वाया था। इसमें पार्श्वनाथ भगवान्की ६॥ हाथ ऊंची दिगम्बर मूर्ति ध्यान लगाये विराजमान है। गुजरातके जैन भाद्रमासमें शुक्ल चतुर्दशीकी इलोरा आ कर इस मूर्ति की पूजा करते हैं। उस समय इसका अभिषेककार्य एक मन घृतसे किया जाता है।
पार्श्वनाथके मन्दिरसे दक्षिण इन्द्रसभा है। यह तीन गुफाओं में विभक्त है। पहली ४० हस्त दीर्घं और २० हस्त विस्तृत है। इसमें १६ खम्भा और १२ कड़ी हैं। प्राचीनके चारों ओर जैन देवदेवियोंकी मूर्तियां अद्धित हैं। रचनाचातुये प्रशंसनीय है। दूसरी जगन्नाथ-सभा है। इसके मध्यमें प्रकाण्ड गर्भगृह बना है। पार्श्वनाथ, महावीरप्रभृति जैन तीर्थङ्करों और अम्बिका प्रभृति जैन देवियोंकी मूर्तियां विद्यमान हैं। तीसरी गडा रयादेवियोंको मूर्तियां विद्यमान हैं। तीसरी गुहा रण-छोड़जीका मन्दिर है। इसके गर्भग्गृह एवं प्राचीरमें सर्वत्र तीर्थङ्कर और गणधर प्रभृतिको मूर्तियां उल्लिखित हैं। इन समस्त मूर्तियोंको लोग आजकल रणछोड़जी कहते हैं। इसके सामने बरामदेमें एक पुरुष तथा एक स्त्रीकी मूर्ति हस्तिपृष्ठपर आरूढ़ है। ब्राह्मण लोग इन दोनोंको इन्द्र और इन्द्राणीकी मूर्ति समझते हैं। उनके मतमें इन्हीं दोनों मूर्तिके नामानुसार इस गुफाको इन्द्रसभा कहते हैं। वस्तुतः इन्द्रदेवकी पूजाके लिये यह मन्दिर न बना था।
सिवा इसके इलोरेकी दुमारलेना वा विवाह-सभा, सीताका नानी, एहरभद्र गुहा प्रभृति भी देखने योग्य
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वस्तु हैं। इसको उत्पत्तिके विषयमें अनेक तरहका वादप्रतिवाद सुनाई पड़ता है,—
कोई कहते हैं, कि बुधपत्नी इलाके नामानुसार इस नगरका नाम इलोरा हुवा है। यहां भुवनाश्व, दण्डक, इन्द्रद्युम्न, दशरथ, राम प्रभृति राजा राजत्व करते थे।<ref>Wilson's Analysis of the Mackenzie Manuscripts, Vol. I. p. civ.</ref>
मुसलमान् इसे राजा इलकट क स्थापित बताते हैं। पूर्वकालमें उन्होंने पर्वत खोदकर ये समस्त मन्दिर बनवाये थे। आजसे नौ सौ वर्ष पहले ये जीवित थे।
इधर ब्राह्मण कहते हैं कि १८४४ वर्ष पहले एलिचपुरमें इलुनामक एक राजा राज्य करते थे। दैव-दुर्विपाकसे उनके सर्वेशरोरमें कीड़े पड़ गये। उन्होंने इलोराशृङ्गस्य शिवालय-सरोवर नामक तीर्थमें स्नान करनेको इच्छास यात्रा की थी। यह तीर्थ पहले साठ धनुष परिमित था, किन्तु यमकी प्रार्थनासे विष्णुने पीछे गोष्पदतुल्य खर्व बना दिया। इलु राजाने यहां पहुंचकर और तीर्थजलमें वस्त्र भिंगोकर अपना क्षत शरीर धो डाला। इससे उनकी व्याधि चली गई थी। इसलिये कृतज्ञता चिरस्मरणीय रखनेके अभि-प्रायसे इलोरेका पर्वत उन्होंने खुदाया और गुहाओंमें नानाप्रकारको देवमूर्तियां प्रतिष्ठित करायी।<ref>Asiatic Researches, Vol. VI, p. 385.</ref>
{{outdent|इल्प (सं॰ पु॰) स्वर्गस्थ आश्चर्य वृक्ष, बिहिश्तका अजीब दरख़त।}}
{{outdent|इल्म (अ॰ पु॰) १ विद्या, जानकारी। २ विज्ञान, हिक-मत। ३ मन्त्र, जादू। अरबोमें उपदेश-विद्याको इल्म-अखुलाक, साहित्यकी इल्म-अदब, जलविद्याकी इल्मआब, शब्दविद्याकी इल्म-आवाज, ब्रह्मविद्याकी इल्मअखुलाक, साहित्यको इल्म-अदब, जलविद्याकी इल्म-आब, शब्दविद्याको इल्म-आवाज, ब्रह्मविद्याको इल्म-इलाही, छन्दःशास्त्रको इल्म-उरूज़, सामुद्रिकको इल्म क्याफा, अलङ्कारशास्त्रको इल्म-कलाम, रसा-यन विद्याको इल्म-कोमिया, गूढार्थको इल्म-गैब, आत्मविद्याको इल्म-जान, धातुविद्याको इल्म-तबयो, इतिहास-शास्त्रको इल्म-तवारीख, शरीरव्यवच्छेद-शास्त्र को इल्म-तशरोह, धर्मशास्त्रको इल्म-दोन, उद्भिद्विद्याकी}}
{{rule}}
{{smallrefs}}
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदयमती-उदयसिंह''|'''२३९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:पिप्पलीमूल वा त्रिकटु पांच भाग पड़ता है। २ हिक्का और श्वासका एक रस, हिचकी और दमेकी एक दवा। अभ्र एवं गन्धकको बराबर-बराबर श्वेत अपामार्ग के द्रवसे पीस पातालयन्त्र में पकाते ऊर्ध्व भागपर जो वस्तु
उड़कर लग जाता, वही उदयभास्कररस कहलाता है। यह दो गुञ्चाके अनुमान रोगोको खिलानेसे पञ्चविध श्वास अच्छा होता है। <small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</small>
{{Outdent|उदयमती――बम्बई प्रान्तस्थ गुजरातके चालुक्यराज (१०२२ से १०६० ई॰) १म भीमकी एक पत्नी। इनके पुत्र का नाम कर्ण रहा। ह्याश्रयकाव्य में लिखा है――एक दिन किसी चित्रकारने कर्णको चन्द्रपुरके कदम्बराज जयकेशीकी कन्याका चित्र देखाया, जिसने उनसे विवाह करनेका शपथ उठाया था। चित्रकारने कहा――राजकन्याने आपकी भेंटके लिये एक हाथी भेजा है। कर्ण जब हाथी लेने गये, तब उसपर उक्त राजकन्याको देख विस्मित हुये। किन्तु उन्होंने उसे कुरूप पाकर विवाह करना अस्वीकार किया। उस-पर राजकन्याने अपनी आठ सहेलियों के साथ चितापर चढ़ भस्म हो जानेको ठानी थी। उदयमतीने कर्ण से कहा-आपके विवाह न करनेसे मैं भी प्राण दे दूंगी। यह दशा देख कर्ण ने विवाह किया, किन्तु राजकन्या मियाणल्ल देवीको पत्नी खरूपमें न लिया। उधर मञ्जाल मन्त्रीको किसी लौंडीसे समाचार मिला――कर्ण एक बांदीको बहुत चाहते हैं। उन्होंने मियाणल्लदेवीको उक्त बांदी बना राजासे मिला दिया। कर्ण की वृद्धावस्थामें मियाणलदेवीके सुप्रसिद्ध सिद्ध-राज सिंह नामक पुत्र उत्पन्न हुये। कहते हैं――तीन वर्षकी अवस्थामें ही सिद्धराज सिंहासनपर एक दिन
चढकर बैठ गये। यह देख कर्ण ने ज्योतिषियोंसे पूछ उन्होको राजा बना दिया था।}}
{{Outdent|उदयमाणिक्य-त्रिपुराक एकजन राजा। कोई सवा तीन सौ वर्ष पहले यह त्रिपुराके राजा रहे। इन्हीं के राजत्वकालमें प्राचीन उदयपुर नगर बसा था। <small> विपुरा देखो।</small>}}
{{Outdent|उदयराज-सैयदाबाद के एक जन राजा। युक्तप्रदेशमै किम्बदन्ती है――उदय शालिवाहनके पुत्र और रसालुके}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:प्रबल शत्रु रहे। एक समय रसालु अपनो राजधानी में उपस्थित न थे। अवसर पाकर उदय उनकी प्रधान पत्नी कोकिलकुमारी पर आसक्त हुये। रानीने भी उदयके प्रेमसे मुग्ध हो आत्मसमर्पण कर दिया था। किन्तु उनके पास एक पालतू मेंना थी। वह पर-पुरुषके साथ रहनेपर कोकिलकुमारीको विस्तर भर्त्सना बताने लगी। अवशेषको रानीने उसके पिंजड़ेकी खिड़की खोल दी। वह उड़कर जुलना-कम्पन नामक स्थानपर पहुंची। रसालु निद्रित रहे। मैना उनके शयन-गृहमें घुस ‘चोर चोर’ चिल्लाने लगी। रसालुकी निद्रा टूट गई। उसने राजासे एक एक बात कह दी। पीछे रसालु अपनी राजधानीको आये थे। उन्होंने सम्मुख युद्ध में उदयको मार डाला। उदयको कोई उदी और कोई हुदी कहता है। पुरातत्त्वविद् समझते हैं-इन्हीं उदयसे तोचरी या यूची और रसालुसे शक या शु जाति उपजी है। अति प्राचीन कालसे इन उभय जातियों में विवाद होता आया है।
{{Outdent|उदयवत् (सं॰ त्रि॰) उस्थित, उठा या निकला हुआ, जो चढ़ आया हो।}}
{{Outdent|उदयवराह-बम्बई प्रान्तीय गुजरातके कर्णावती नगरका एक जैन-मन्दिर। चालुक्यराज कर्ण (१०६४-१०९४ ई॰)के उदा मन्त्रीने इसे बनवाया था। इसमें ७२ तीर्थद्धारोंकी मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। जिनमें २४ भूत, २४ वर्तमान और २४ भविष्यत् तीर्थङ्कर हैं।}}
{{Outdent|उदयसिंह――१ मेवाड़वाले राणा साङ्गाजीके कनिष्ठ पुत्र। अल्पकालस्थायी वनवीरके राजत्वके बाद ये मेवाड़के सिंहासनपर बठे थे। इन्होंके समय चित्तौरकी राजलक्ष्मी चलती बनी। १५६८ ई॰ में वीरभोग्य चित्चौर नगर अकबरने ले लिया था। फिर राणा उदयसिंह चित्तौर छोड़ राजपिप्पली वनमें गोहिलोंके निकट आश्रय ढूंढा। कुछदिन बाद ये अरावली गिरिमालाके मध्यस्थ गिरवा नामक स्थानपर पहुंचे थे। उदयसिंहने उपत्यकाके पुरोभागमें उदय-सागर नामक एक विस्तृत सरोवर खोदाया। इसी उदयसागर―पार्श्व स्थित कई गिरिशृङ्गके शिरोदेशमें}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२४०'''|'''उदयसिंहदेव-उदर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:‘नचौकी’ नामक एक प्रकाण्ड प्रासाद भी बन गया। इसी राजप्रासादमें उदयसिंह रहने लगे। क्रमश:प्रासादकी चतुर्दिक् सौधवासगृह बननेपर उदयपुर
नगर निकला था। ४२ वत्सरके वयःक्रम कालपर इन्होंने गोकुण्डा नामक स्थान में प्राण छोड़ा। मृत्युकाल पर २४ पुत्र जीवित थे। किन्तु उनमें राणा प्रताप-सिंहका नाम ही भारतमें विख्यात है। <small>प्रतापसिंह देखो।</small>
:{{gap}}२ जोधपुरके एकजन राजा। ये अकबर बादशाहके एक प्रधान सभासद थे। १५८६ ई॰ में इन्होंने सुलतान् सलीमसे अपनी कन्या बालमती को विवाह दिया। इन्हीं बालमतोके गर्भसे शाहजहान् उत्पन्न हुये थे। अकबरने जोधपुरका राज्य उदयसिंहको जागीरमें दे डाला। १५९४ ई॰ में ये
मरे थे। साथ ही इनकी चार पत्नी भी चितापर चढ़ीं। फिर उदयसिंहके पुत्र सूर्यसिंहको सिंहासन मिला था। इनके पौत्र गजसिंह और प्रपौत्र यशोवन्तसिंह रहे।
{{Outdent|उदयसिंहदेव――बम्बईप्रान्तस्थ भिनमालके एक चौहान राजा। एक प्राचीन शिलालिपिसे विदित हुआ है――ये महारावल समरसिंह देवके पुत्र रहे। इन्होंने स्वयं भिनमाल पर अधिकार किया था। १२४९ ई॰ तक जीवित रह उदयसिंह देवने कमसे कम ४३ वर्षतक राजत्व चलाया। प्रजा सम्पत्तिशाली रही। बहादुरसिंह पुत्र का नाम था। किन्तु वह इन्होंके सम्मुख
मर गये।
{{Outdent|उदयाचल,<small> उदयपर्वत देखो।</small>}}
{{Outdent|उदयातिथि (सं॰ स्त्री॰) सूर्योदयको तिथि, जिस तिथिमें सूर्य भगवान् निकलें। शास्त्रानुसार स्नान-दानादि इसी तिथिमें होता है।}}
{{Outdent|उदयादित्य-चालुक्यराज भुवनैकमलके सेनापति। कुछ दिन सेनाकी देखरेख रखने बाद ये वनवासी नामक स्थानके राजा बन गये। १०६९ और १०७६ ई॰ के मध्य उदयादित्य विद्यमान रहे।<small> वनवासी देखो।</small>}}
{{Outdent|उदयाश्व-मगधराज अजातशत्रु के पौत्र। इन्हींने पाटलीपुत्र बसाया था। <small>(विष्णु)</small> बौद्ध ग्रन्थों में इनका नाम उदयभद्र लिखा है।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उदयिन् (सं॰ त्रि॰) उदय होनेवाला, जो निकल रहा हो।}}
{{Outdent|उदयिभद्र-अजातशत्र के पुत्र। <small>उदयभद्र देखो।</small>}}
{{Outdent|उदर (सं॰ क्ली॰) उत्-ट्ट विदारणे अच्।<small> उदिट्ट-णातेरलचौ पूर्वपदान्त्यलोपश्च। उण् ५।१९।</small> १ जठर, कुक्षि, मैदा, शिकम, पेट। सुश्रुतादि प्राचीन वैद्यगणके मतसे उदर एक अङ्ग लगता है। इसमें पेशी, गुद, वस्ति एंव नाभि मर्म, चौबीस शिरा, तीस धमनी, सात आशय (वाताशय, पित्ताशय, श्लेष्माशय, रक्ताशय, आमाशय, पक्वाशय, और पक्वाशय) तथा स्त्रीके देहका एक अतिरिक्त गर्भाशय, बलय नामक अस्थि और अन्त्र है।<small> नाभि, कोष्ठ और गर्भ शब्द देखो।</small>}}
:{{gap}}पाश्चात्य चिकित्सकों के मतानुसार ऊर्ध्व वक्ष एवं उदर विच्छेदक स्नायु (Diaphragm) और अधोदेश पर वस्तिकोटरका अस्थिसमूह रहता, जिसके मध्य उदरगह्वर है। इस गह्वरमें पक्वाशय, अन्त्र, प्लीहा, यकृत, वृक्कक् और पानक्रियस (Pancreas) हैं। उदरका समस्त स्थान पतला रहता, जिसपर घन एवं दृढ़ सूक्ष्म झिल्लीका आवरक चढ़ता है। इसे अन्नावरक (Peritoneum) कहते हैं। २ युद्ध, लड़ाई।
:{{gap}}(पु॰) उदरं आश्रयत्वात्, अर्श आदिभ्योऽच् इति अच्। ३ उदररोग विशेष, पेटकी एक बीमारी। भीतर ही भीतर जिनके उपजनेसे पेट बढ़ता, उनमें कितने ही बड़े बड़े रोगका उदर नाम पड़ता है। वैद्यशास्त्र में इसे उदररोग भी लिखते हैं।
:{{gap}}प्राचीन आयुर्वेदाचार्य के इस नामकरणमें बड़ा गड़बड़ है। उन्होंने आठ प्रकारके उदर रोगका जो लक्षण किया, उससे किसी विशेष पीडाका परिचय नहीं दिया है। वह अन्य अन्य नानाप्रकार पीड़ासे ही सम्बन्ध रखता है।
:{{gap}}आलोपाथीका आसाइटिस (Ascites) अर्थात् जलोदर नाम भी ठीक नहीं बैठता। क्योंकि पेटमें जलका सञ्चय प्राय कोई विशेष पीड़ा नहीं, अन्य अन्य नानाप्रकार रोगकी चरमदशाका एक उत्कट उपसर्ग मात्र है।
:{{gap}}चरकसंहिताके संग्रहकार कहते हैं――कोष्ठ-शुद्धि
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२४०'''|'''उदयसिंहदेव-उदर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:‘नचौकी’ नामक एक प्रकाण्ड प्रासाद भी बन गया। इसी राजप्रासादमें उदयसिंह रहने लगे। क्रमश:प्रासादकी चतुर्दिक् सौधवासगृह बननेपर उदयपुर नगर निकला था। ४२ वत्सरके वयःक्रम कालपर इन्होंने गोकुण्डा नामक स्थान में प्राण छोड़ा। मृत्युकाल पर २४ पुत्र जीवित थे। किन्तु उनमें राणा प्रताप-सिंहका नाम ही भारतमें विख्यात है। <small>प्रतापसिंह देखो।</small>
:{{gap}}२ जोधपुरके एकजन राजा। ये अकबर बादशाहके एक प्रधान सभासद थे। १५८६ ई॰ में इन्होंने सुलतान् सलीमसे अपनी कन्या बालमती को विवाह दिया। इन्हीं बालमतोके गर्भसे शाहजहान् उत्पन्न हुये थे। अकबरने जोधपुरका राज्य उदयसिंहको जागीरमें दे डाला। १५९४ ई॰ में ये मरे थे। साथ ही इनकी चार पत्नी भी चितापर चढ़ीं। फिर उदयसिंहके पुत्र सूर्यसिंहको सिंहासन मिला था। इनके पौत्र गजसिंह और प्रपौत्र यशोवन्तसिंह रहे।
{{Outdent|उदयसिंहदेव――बम्बईप्रान्तस्थ भिनमालके एक चौहान राजा। एक प्राचीन शिलालिपिसे विदित हुआ है――ये महारावल समरसिंह देवके पुत्र रहे। इन्होंने स्वयं भिनमाल पर अधिकार किया था। १२४९ ई॰ तक जीवित रह उदयसिंह देवने कमसे कम ४३ वर्षतक राजत्व चलाया। प्रजा सम्पत्तिशाली रही। बहादुरसिंह पुत्र का नाम था। किन्तु वह इन्होंके सम्मुख
मर गये।}}
{{Outdent|उदयाचल,<small> उदयपर्वत देखो।</small>}}
{{Outdent|उदयातिथि (सं॰ स्त्री॰) सूर्योदयको तिथि, जिस तिथिमें सूर्य भगवान् निकलें। शास्त्रानुसार स्नान-दानादि इसी तिथिमें होता है।}}
{{Outdent|उदयादित्य-चालुक्यराज भुवनैकमलके सेनापति। कुछ दिन सेनाकी देखरेख रखने बाद ये वनवासी नामक स्थानके राजा बन गये। १०६९ और १०७६ ई॰ के मध्य उदयादित्य विद्यमान रहे।<small> वनवासी देखो।</small>}}
{{Outdent|उदयाश्व-मगधराज अजातशत्रु के पौत्र। इन्हींने पाटलीपुत्र बसाया था। <small>(विष्णु)</small> बौद्ध ग्रन्थों में इनका नाम उदयभद्र लिखा है।}}
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{{Outdent|उदयिन् (सं॰ त्रि॰) उदय होनेवाला, जो निकल रहा हो।}}
{{Outdent|उदयिभद्र-अजातशत्र के पुत्र। <small>उदयभद्र देखो।</small>}}
{{Outdent|उदर (सं॰ क्ली॰) उत्-ट्ट विदारणे अच्।<small> उदिट्ट-णातेरलचौ पूर्वपदान्त्यलोपश्च। उण् ५।१९।</small> १ जठर, कुक्षि, मैदा, शिकम, पेट। सुश्रुतादि प्राचीन वैद्यगणके मतसे उदर एक अङ्ग लगता है। इसमें पेशी, गुद, वस्ति एंव नाभि मर्म, चौबीस शिरा, तीस धमनी, सात आशय (वाताशय, पित्ताशय, श्लेष्माशय, रक्ताशय, आमाशय, पक्वाशय, और पक्वाशय) तथा स्त्रीके देहका एक अतिरिक्त गर्भाशय, बलय नामक अस्थि और अन्त्र है।<small> नाभि, कोष्ठ और गर्भ शब्द देखो।</small>}}
:{{gap}}पाश्चात्य चिकित्सकों के मतानुसार ऊर्ध्व वक्ष एवं उदर विच्छेदक स्नायु (Diaphragm) और अधोदेश पर वस्तिकोटरका अस्थिसमूह रहता, जिसके मध्य उदरगह्वर है। इस गह्वरमें पक्वाशय, अन्त्र, प्लीहा, यकृत, वृक्कक् और पानक्रियस (Pancreas) हैं। उदरका समस्त स्थान पतला रहता, जिसपर घन एवं दृढ़ सूक्ष्म झिल्लीका आवरक चढ़ता है। इसे अन्नावरक (Peritoneum) कहते हैं। २ युद्ध, लड़ाई।
:{{gap}}(पु॰) उदरं आश्रयत्वात्, अर्श आदिभ्योऽच् इति अच्। ३ उदररोग विशेष, पेटकी एक बीमारी। भीतर ही भीतर जिनके उपजनेसे पेट बढ़ता, उनमें कितने ही बड़े बड़े रोगका उदर नाम पड़ता है। वैद्यशास्त्र में इसे उदररोग भी लिखते हैं।
:{{gap}}प्राचीन आयुर्वेदाचार्य के इस नामकरणमें बड़ा गड़बड़ है। उन्होंने आठ प्रकारके उदर रोगका जो लक्षण किया, उससे किसी विशेष पीडाका परिचय नहीं दिया है। वह अन्य अन्य नानाप्रकार पीड़ासे ही सम्बन्ध रखता है।
:{{gap}}आलोपाथीका आसाइटिस (Ascites) अर्थात् जलोदर नाम भी ठीक नहीं बैठता। क्योंकि पेटमें जलका सञ्चय प्राय कोई विशेष पीड़ा नहीं, अन्य अन्य नानाप्रकार रोगकी चरमदशाका एक उत्कट उपसर्ग मात्र है।
:{{gap}}चरकसंहिताके संग्रहकार कहते हैं――कोष्ठ-शुद्धि
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदर'''|'''२४१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
न होना हो सकल प्रकार उदररोगका प्रधान कारण है। लिखते हैं――
{{c|{{x-smaller|<poem>“अग्रिदोषान्मनुष्याणां रोगसङ्घाः पृथम्विधाः।
मलवृद्ध्या प्रवर्तन्त विशेषेणोदराणि तु॥” (चरक)
</poem>}}}}
मनुष्य के अग्निदोषसे पृथक् पृथक नाना प्रकारकी पीड़ा उपजती है।विशेषतः उसके कारण मल बंधने-पर अनेक उदर रोग फूट पड़ते हैं।
किन्तु यह मत माननेसे वर्तमान चिकित्साशास्त्रके साथ सामञ्जस्य पड़ना दुर्घट है। उदरके लक्षण विचारनेसे स्पष्ट ही समझ सकते, कि उसमें अनेक
प्रकारके रोग लगते हैं। पाकस्थलीकी विवृद्धि (Dilatation of the stomach), पाकस्थली और अन्त्रके भीतरका उपपदार्थ (Foreign bodies in the stomach and intestines), पाकस्थली, अन्त्रावरक झिल्ली प्रभृति स्थानका कर्कटरोग (Cancer of the stomach, peritoneum etc.), पाकस्थली, अन्त्र प्रभृति यन्त्रका छिद्र (Perforation of the stomach and intestines), प्लीहाकी पुरातन विवृद्धि (Cronic enlargement of the spleen, ague-cake; leucocythemia), प्लीहाका तरुणप्रदाह (Acute splenitis), यकृत्का प्रदाह (Suppurative pepatitis), यकृत्का स्फोटक (Abscess of the liver), यकृत्की विशुष्कता (Cirrhosis); यकृत्के हाइटेडिड नामक कीटाणुका कोषार्वुद (Hytadid cysts of the liver), अन्त्रके स्थान विशेषका स्फोटक, अन्त्रावरक झिल्लीका प्रदाह (Peritonitis), अन्त्रावरक झिल्ली तथा उदरके अन्य अन्य स्थानका टुबरकुलर नामक विचर्चिका-सञ्चय (Tubercular deposits in peritoneum, intestines etc.), अन्त्रावरोध (Obstruction of the bowels), स्त्रीके जरायुका प्रदाह (Metritis), अण्डाधारका जल-सञ्चय (Ovarian dropsy), वृक्कककी पीड़ा (Diseases of the kidneys) प्रभृति व्याधि उदर-रोगसे भिन्न नहीं।
आयुर्वेदके मतसे उदररोग आठ प्रकारका होता है―― १ वातजनित, २ पित्तजनित, कफजनित,
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४ त्रिदोषजनित, ५ प्लीहोदर, ६ बद्धगुद, ७ आगन्तुक, और ८ दकोदर।
{{c|{{x-smaller|<poem>“पृथक् समस्त्यैरपि चेह दोष्यै: प्लीहोदरं बद्धगुदं तथैव।
आगन्तुकं सप्नममष्टमञ्च दकोदरञ्च्येति वदन्ति तानि॥” (मनुत)</poem>}}}}
चरकमें लिखा है――अत्यन्त उष्ण, अत्यन्त लवण-मिश्रित, क्षार, दाहजनक, उग्र एवं अत्यन्त अम्ल द्रव्य खाने,-वमन विरेचनादिके संशोधन बाद अनियमित भोजन पाने,-रुक्ष, विरुद्ध तथा अविशुद्ध द्रव्य पेटमें पहुंचाने,――प्लीहा, अर्श, ग्रहणी प्रभृति व्याधिक अतिशय वृद्धिपर आने,―― वमनादि क्रियाके विभ्रममें जाने,――किसी किसी पीड़ाका यथासमय प्रतीकार न लगाने,――रक्षता, वेगरोध, स्रोत सकलकी दोषजनक क्रिया छाने,――आमदोष, संक्षोभ समाने,――अतिभोजन पचाने, अर्श, वायु और मलका रोध देखाने, अन्त्र का स्फुटन एवं भेद पड़ जाने, दोषका अतिशय सञ्चय बढ़ आने, पापकर्म उठाने और मन्दाग्निका दोष हो जानेसे उदर-रोग उपजता है। सुश्रुतमें भी संक्षेपसे ठीक ऐसे ही कारण कहें हैं――
{{c|{{x-smaller|<poem>“दुर्वलाग्र्येरहिताशनस्य संशुष्कप्त्यन्ननिष्ये- वनादा।
स्रेहादिमिष्याचरणाच्च जन्तोवृद्धि द्वि गताः कोष्ठमभि चै प्रपनाः॥गुल्माकृतिव्यञ्जितलक्षणानि कुर्वन्ति घोराण्य दराणि दोषाः॥”</poem>}}}}
जिसके अग्निका तेज अच्छा नहीं, उस व्यक्तिके कुत्सित वा अतिभोजन पाने, किंवा सर्वदा खाने अथवा स्नेहादिको अधिक व्यवहारमें लानेसे कोष्ठा-श्रित दोष बढ़ते और उनसे गुल्म व्याधि-जैसे उदर रोग निकलते हैं। सामान्य लक्षण यह है――
{{c|{{x-smaller|<poem>“कुक्षेराध्यानमाटोपः शोथः पादकरस्य च।
मन्दोऽग्रिः श्लक्ष्णगण्डत्वं कार्श्य ञ्जोदरलक्षणम्॥” (चरक)</poem>}}}}
कुक्षिमें आध्मान वा आटोप उठना, पाद और कर पर शोथ चढ़ना, अग्निमान्ध लगना, श्लक्ष्णगण्डत्व पड़ना और कृशता बढ़ना उदररोगका लक्षण है। शोथको सकल प्रकार उदररोगका सामान्य लक्षण मानने-पर पित्तोदर प्रभृतिके निदान में विरोध पड़ता है।
उदररोग उपजनेसे पूर्व ये लक्षण झलकने लगते हैं――भली भांति क्षुधा न लगना, सुस्वादु, सिह एवं गुरु अन्न बड़ा विलम्ब लगने अथवा कोई द्रव्य
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 61|1em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२४३
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२४२'''|'''उदर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
खाने पर पेट गर्म पड़नेसे पचना, भुक्त द्रव्यका पचना न पचना रोगीको अच्छे प्रकार समझ न पड़ना, भोजनसे रुचि वा तृप्ति न मिलना, पाद कुछ कुछ फूल उठना, अल्प श्रमसे ही दुर्वलता रहना, शीघ्र शीघ्र श्वास प्रश्वास चलना, मल बंध जानेसे श्वास बढ़ना, उदावर्तजनित यन्त्रणा चढ़ना,
वस्तिशूल तथा सन्धिके स्थानमें वेदना भरना, अल्प भोजनसे ही पेट उचकना और दुखना, पेटपर रेखा देख पड़ते भी फूलनेपर त्रिवली न बिगड़ना। <small> (घरक)</small>
सुश्रुतने भी प्रायः इसी प्रकार पूर्व रूप लिखा है――
{{c|{{x-smaller|<poem>
“तत्पूर्वरुपं वलवर्णकाद्वावलीविनाशो जठरे हि राज्यः।
जौर्यापरिज्ञानविदाइवत्यो वस्तौ रुजः पादमतस्य शोफः॥”</poem>}}}}
यह अनेक प्रकार पीड़ाका पूर्व रूप है। विशेषतः आलोपाथीमें जिसे डिस्पे-पसिया अर्थात् अग्निमान्द्य रोग कहते, उसीके इसमें लक्षण अधिक रहते हैं। चरक और सुश्रु तमें लिखा है――पैर पर अल्प शोथ आ जाता है। किन्तु वैसा होनेपर उक्त लक्षण को किसी व्याधिका पूर्वरूप मान नहीं सकते। कारण――यकृत्, हृत्पिण्ड, वृक्कक् वा अन्त्रावरक झिल्ली प्रभृति स्थानमें प्रथम कोई रोग कुछ कालतक सञ्चित रहता है। पीछे कदाचित् देहके स्थान विशेष वा सर्वाङ्गमें भले प्रकार रक्त चलफिर किंवा श्लैष्मिक झिल्ली तथा ग्रन्थि प्रभृतिसे नि:सृत रस उपयुक्त भांति शुष्क पड़ अथवा स्वेद-मूत्र प्रयोजनानुरूप निकल न सकनेसे शरीर पर शोथ चढ़ता है।
ऊपर जो समस्त लक्षण लिखे, यकृत्की विशुष्क-ताका रोग कुछ काल तक रहनेपर हो जाते हैं।
चरकमें वातजनित उदररोगका लक्षण इस प्रकार लिखा है―― कुक्षि, हस्त, पाद एवं अण्डकोषपर शोथपाता है। पेटमें सूचके चुभने-जैसी वेदना उठती
है। कभी शरीर बढ़ और कभी घट जाता है। कुक्षि तथा पार्श्व में शूल होता है। उदावर्त, अङ्गमर्द, पर्वभेद, शुष्ककास, कृशता, दौर्बल्य और अरुचिका वेग बढ़ता है। शरीरके अधोभागमें गुरुता रहती है। वायु तथा मलमूत्र बंध जाता है। नख, चक्षु, चर्म एवं मलमूत्र कृष्ण तथा पीतवर्णमिश्चित और
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रक्तवण बन जाता है। पेटपर सूक्ष्म एवं रक्तवर्ण रेखा तथा शिरा देख पड़ती है। पेट पर आघात लगानेसे वायुपूर्ण मशककी तरह शब्द निकलता है। वायु ऊर्ध्व, अधः और पार्श्वदिक् वेदना बढ़ाते फिरता है।
माधवकरने भी कहा है――वातोदरमें हस्त, पाद, नाभि और कुक्षिपर शोथ आ जाता है। सुश्रुतमें वातोदरका लक्षण इस प्रकार लिखा है――
{{c|{{x-smaller|<poem>संगृह्य पाश्वोदरपृष्ठनाभीर्यहर्ध ते कृणशिरावनद्धम्।
सशूलमानाहवदुग्रशब्दं सतोदभेदं पवनात्मकत्वम्।”</poem>}}}}
इस जगहपर बड़ा गड़बड़ है। किसी पीड़ाके साथ उक्त लक्षणका सामञ्जस्य आ सकता है। नाभि और कुक्षिमें शोथ कहनेसे कभी नाभि तथा कुक्षिपर शोथका चढ़ना सम्भव नहीं। इससे पेटके भीतर अन्त्रावकझिल्ली में ही जलका सञ्चय प्रमाणित है। अन्त्रावरक झिल्लीमें जल भर जानेसे नाभि और कुक्षि-पर पृथक् पृथक् शोथ नहीं चढ़ता। एक ही शोथ सकल स्थानमें पहुंच रहता है। केवल रोगीके भिन्न भिन्न प्रकार पार्श्व बदलने पर अपने ही गुरुत्वसे जल निम्न दिक् गिर पड़ता है। जल अधिक होनेसे समस्त उदर भर जाता है। फिर जल अल्प रहनेसे रोगोके उठकर खड़े होने पर नाभिकी निम्न दिक् ढलता है। रोगीके वाम पार्श्व लेटनेसे वाम कुक्षि, दक्षिण पार्श्व सोनेसे दक्षिण कुक्षि और दोनो हस्त तथा दोनों पादपर भर दे चतुष्पद जन्तुकी तरह खड़े होनेसे नाभिके मध्यस्थल में जल लुढ़क आता है। फिर भूमिपर मस्तक टेक ऊर्ध्व दिक् पाद उठा देनेसे जल वक्षकी ओर सरकता है। इसीसे नाभि और कुक्षिपर पृथक् पृथक् शोथ चढ़ नहीं सकता।
दूसरी बात――यदि वातरोगसे भी पेटमें जल जमता, तो उदकोदरसे उसका प्रभेद क्या पड़ता है। इस विषयकी मीमांसा मिलना कठिन है। कारण उक्त लक्षण जब सङ्कलित हुये, तव आयुर्वेदके आचार्य शोथको अन्यरूप पीड़ा ससझते थे।
वातोदरका जो लक्षण लिखा, उससे विशेष किसी यान्त्रिक रोगका सामञ्जस्य लाना दुष्कर है। फिर भी उदर मध्यके कर्कटादि रोगपर हस्तपाद में
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२३६'''|'''उदयपुर वा मेवाढ़'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{gap}}जिन राजपूतोंने मुसलमानोंको कन्या दी, उनसे उदयपुरके राणावंशीयन विवाहसूत्र में बंधनेकी इच्छा न की। इसीसे उदयपुरके राणावोंका गौरव बहुत बढ़ा था। किन्तु अपर राजपूत राजगणके चक्षु में वह खटक गया। उन्होंने उदयपुरके राजगणसे वैवाहिक सूत्र में बंधनेकी अनेक चेष्टा लगायी थी। अवशेषमें उदयपुरसे राणावोंने कन्या देने पर सम्मत होने भी नियम रखा――राणा-वंशीय कन्यासे जो पुत्र जन्म लेगा, वही राज्यका उत्तराधिकारी बनेगा। अपरापर राजपूत राजा राज़ी हो आदान-प्रदान करने लगे थे।
१७४३ ई॰ में जयपुरके राजा सवायी जयसिंह मर गये। ज्वेठपुत्र ईश्वरीसिंह राजा बने थे। किन्तु राणाकी भगिनीके गर्भसे जयसिंहका मधुसिंह नामक
एक कनिष्ठ पुत्र हुआ था। इन्हीं मधुसिंहको राजा बनाने के लिये अनेक लोगोंने यत्न लगाया। राणा ईश्वरीसिंह के विरुद्ध सैन्य चला था। किन्तु सेंधियाके साहाय्य से ईश्वरीने राणाको हरा दिया। फिर राणाने ईश्वरीको राज्यसे निकालने के लिये होलकरका साहाय्य लिया था। विषप्रयोगसे ईश्वरी मारे गये। मधुसिंहको राज्य मिला।
१७५२ ई॰ में राणा जगत्सिंहके मरनेपर तत्पुत्र प्रतापसिंह राणा हुये। इसी समयसे मेवाड़राज्यमें मराठोंका उपद्रव उठने लगा। प्रतापसिंहके बाद तत्पुत्र राजसिंहने कुछकाल राजत्व रखा था। फिर उनके पितृव्य अरिसिंह राणा बने। सरदार उनसे बिगड़ राजसिंहके बालकपुत्र रत्नसिंहको मेवाड़ का सिंहासन सौंपनेपर तत्पर हुये। मेवाड़में दो दल बंधे थे। एकने अरिसिंह और अपर दलने रत्नसिंहका पक्ष पकड़ा था। उभय दलने मराठोंसे साहाय्य मांगा। संधिया अरिसिंहके विपक्ष में लड़े थे। उज्जयिनीके निकट कई बार युद्ध हुआ। राणा हारे थे। सेंधिया उदयपुर घरनेको बढ़े। किन्तु राणाके दीवान् अमरचन्द्रने अपने बुद्धिकौशलसे सब गड़बड़ मिटा दिया था। संधिया ६३५०००० रु॰ लेनेपर स्वीकृत हुये। इसमें ३३०००० रु॰ नकद और अवशिष्ट रुपयेके लिये जवदजिरम, नीमच और मरबून् ज़िला रेहन रहा।
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{{gap}}राणा अरिसिंह आखेटखेलते समय बूंदीके युव-राजद्वारा मारे गये। उनके बालकपुत्र हमीर राजा हुये थे। १७७८ ई॰ में हमीरके मरनेपर तदीय भ्राता भीमसिंहने सिंहासन पाया। उनकी कन्या कृष्ण कुमारी परम रूपवती रहीं। रूपकी प्रशसा सुन जयपुरके राजाने उनसे विवाह करना चाहा था। भीमसिंह भी इस शुभकायपर सम्मत हो गये। किन्तु मारवाड़के राजा मानसिंहने कहला भेजा था――‘उदयपुरके पूर्वतन राजगणने मारवाड़के राजाको कन्या देनेकी पहिलेसे ही प्रतिज्ञा कर रखी है। अतएव उसी अङ्गी
कारके अनुसार अब उन्हींको कन्या देना उचित है।’ भीमसिंह विषम समस्या में पड़ गये। किसको कन्या दी जाय? जयपुरके राजाको कन्या न देनेसे बात कटती है और मानसिंहसे मुंह मोड़ने पर पितृपुरुषकी ख्याति घटती थी। उस समय जयपुरके राजमन्त्रीने समझाया――‘ऐसे स्थलपर कन्याको मार डालना श्रेय है। इससे सकल दिक् रक्षा रहती है।’ भीमसिंहने मन्त्रीके कथनानुसार वैसाही कार्य किया था। विष-प्रयोगसे कृष्णकुमारी के जीवन गत कर दिया। इसी समयसे १८१७ ई॰ तक मराठे समय-समयपर पहुंच-कर मेवाड़का राज्य लूटते रहे। उसके बाद अंगरेजोंका शासन चलनेसे उत्पात मिटा था।
१८२८ ई॰ में भीमसिंहके मरने पर तत्पुत्र जवान-सिंहने राज्य पाया था। जब वे भी मरे, तब पुत्रादि न रहनेसे ज्ञातिसम्पर्कोय सरदारसिंह महाराणा बने। १८४२ ई॰ में वे भी मर गये। फिर उनके कनिष्ठ भ्राता स्वरूपसिंहको मेवाडका राज्य मिला। १८६१ ई॰ में स्वरूपसिंहके दत्तकपुत्र शम्भु सिंह महाराणा बने थे। १८७४ ई॰ में फिर उन्होंने अपने ज्येष्ठ भ्रातुष्पुत्र सज्जनसिंहपर राज्यका भार डाल इहलोक छोड़ दिया। १८८४ ई॰ की २३वीं दिसम्बरको सज्जनसिंह मरे थे। उनके बाद फ़तेहसिंह उदय-पुरके महाराणा हुये। १८८६ ई॰ में महाराणा साहव-को जि, सि, एस, आई, (G.C. S. I.) की पदवी मिली। कविराज श्यामलदासजी जो महाराणा सज्जनसिंकेह समयमें प्रधान मन्त्री थे, अंगरेजी सर-
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२३९
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२३८'''|'''उदयपुर वा मेवाढ़-उदयभास्कररस'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अविलम्ब खोदनेके लिये पादेश दिया। किन्तु दूसरे ही दिन औरङ्गजेब अकस्मात् पीडित हुये थे। इसलिये उनको भय लमा-सम्भवतः मन्दिरस्थ महादेवके आक्रोशसे मेरी दशा इसप्रकार बिगड़ी है। फिर उन्होंने मन्दिर खोदने की मनाई कर दी थी। उन्हींके आदेशसे पार्श्व पर एक मसजिद बनी। औरङ्गजबकी आज्ञा थी-कोई मुसलमान् जबतक नङ्गे पैरों महादेवकी
मूर्तिके दर्शन करने मन्दिरमें न जायेगा, तबतक इस मसजिदमें भी न घुसने पायेगा।
४ बङ्गालप्रदेशके अन्तर्गत पार्वतीय त्रिपुराराज्यका एक विभाग। ५ पार्वतीय त्रिपुरा राज्यके मध्यका एक ग्राम। यह गोमती नदीके तीर अक्षा॰ २३° ६१‘ २५‘ उ॰ और द्राघि॰ ९१° ३१‘ १०‘‘ पू॰ पर अवस्थित है। त्रिपुरश्वरीका मन्दिर रहनेसे यह स्थान एक तीर्थ समझा जाता है। त्रिपुरेश्वरी देवीसे ही देशका नाम त्रिपुरा पड़ा है। प्रति वर्ष इस तीर्थ के दर्शनको नाना स्थानसे सहन सहस्र यात्री आते हैं। कपास, तख़्ता और लठ बहुत बिकता है।
६ प्राचीन पार्वतीय त्रिपुराराजके मध्य स्थित एक प्राचीन नगर। आजकल यह ध्वंसप्राय है। ई॰ के १६ वें शताब्दमें उदयपुर राजा उदयमाणिक्यकी राजधानी रहा। एक शिवमन्दिर विद्यमान है। मन्दिरमें महादेवके दर्शनार्थ समय समय बहु यात्री आया करते हैं।
७ छोटे नागपुरमें देशीय राजाके शासनाधीनस्थ एक करद राज्य। यह अक्षा॰ २२° ३‘ ३०‘‘ तथा २२° ४७‘ उ॰ और द्राघि॰ ८३° ४‘ ३०‘‘ एवं ८३° ४९‘ ३०‘‘ पू॰ के मध्य अवस्थित है। उत्तर सरगुजा, पूर्व रायपुर ज़िला तथा यशपुर राज्य, दक्षिण रायगढ़ और पश्चिम सीमापर विलासपुर ज़िला विद्यमान है। भूमिका परिमाण १०५५ वर्गमौल है।
१८१८ ई॰ में अप्या साहबसे अंगरेजोंकी जो सन्धि हुयी, उसीके अनुसार उदयपुर पर उनके शासनकी अधीनता पड़ी। १८५७ ई॰ को सिपाही युद्धके
समय स्थानीय सरदार और उनके भाईने अंगरेजों पर अस्त्र उठाया और इस स्थानको जीत कुछ दिन तक
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:राजत्व चलाया था। १८५९ ई॰ में अंगरेजोंने फिर उदयपुर लिया और सरदार उत्तराधिकारीको आन्दामान द्वीप यावज्जीवन निकाल कर भेज दिया। बल-वेमें सरगुजाके राजाने अंगरेजोंको साहाय्य पहुंचाया था। इसी महत्कार्यके लिये १८६० ई॰ में बृटिश गवरनमेण्टने यह राज्य उनको सौंपा।
:{{gap}}राजधानी रावकोब मांद नदीके तौरपर अवस्थित है। उत्पन्न द्रव्य के मध्य लालमिर्च प्रचुर परिमाणसे होता है। एतद्भिन्न कार्पास, निर्यास, नानाप्रकार तैलवीज, धान्य, लोह और अल्प स्वर्ण भी मिल जाता है। कोयलेकी एक विस्तृत खानि खुदी है।
{{Outdent|उदयप्रभसूरि――एक विख्यात श्वेताम्बर जैन ग्रन्थकार। इन्होंने प्रवचन-सारोद्वार-विषमयद-व्याख्या और धर्म-शर्माभ्युदय काव्य वा सङ्घपतिचरित नामक दो संस्कृत ग्रन्थ बनाये थे। शेषोक्त ग्रन्थ आबू पर्वतवाले प्रसिद्ध जैन-मन्दिरनिर्माता राजमन्त्री वस्तुपालके सम्मानार्थ लिखा गया। उदयप्रभसूरि श्रीविजयसेन सूरिके शिष्य और नरचन्द्र सूरिक समसामयिक रहे।}}
{{Outdent|उदयप्रस्थ (सं॰ पु॰) उदयाचलकी समस्थली।}}
{{Outdent|उदयभद्र-एक बौद्धराजा। इन्होंने छः वर्ष राजत्व किया था। बौद्धोंके प्रधान विनयाचार्य उपालि विद्यमान रहे। अशोकके अनुशासनमें लिखा है――बुद्ध-निर्वाणके साठ वत्सर बाद उदयप्रभकी मृत्यु हुई थी।}}
{{Outdent|उदयभास्करकर्पूर (सं॰ पु॰) स्वनामख्यात कर्पूर, किसी किस्म का बनाया हुआ काफ़ूर। यह पक्व और सदल एवं निर्दल भेदसे दो प्रकारका है। उदय-भास्कर पीत, सर, स्वच्छ, कठिन, कट, समुदित, अग्नि-दीपक, लघु, श्रीद एवं पित्तकर होता और कफ, कृमि, विष तथा वातको खोता है। इससे नासा तथा श्रुतिका रोग, लालास्राव, गलग्रह और जिह्वाका जड़त्व भी छूट जाता है। <small>(वैद्यक निघण्टु)</small>}}
{{Outdent|उदयभास्कररस (सं॰ पु॰) १ कुष्ठाधिकारका एक रस, कोढ़ की एक दवा। केवल गन्धकसे भृत ताम्र दश, उषण (त्यूषण) पांच और विष (सींगिया) दो भाग डाल जलमें पीसे और रत्ती रत्ताको वटिका बना कुष्ठीको खिलाये। <small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</small> मतान्तरसे}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२४४
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदर'''|'''२४३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
शोथ, जलोदरी और उससे आध्मान हो सकता है। पाकस्थलीके विवृधि रोगमें भी ऐसा लक्षण रहनेकी सम्भावना है। किन्तु इस रोगका प्रधान उपसर्ग वमन ही है।
किसी व्यक्तिको यकृतको विशुष्कताका रोग लगा था। प्रथम अग्निमान्द्य हुआ, अपराह्ल को अल्प-अल्प ज्वरका वेग बढा, उसके बाद पादपर शोथ चढ़ा और सबसे पीछे वृषण एवं हस्त फूला, तथा पेट जलसे भर गया। इसी अवस्था में किसी प्रसिद्ध कविराजने उसे देख वातोदरका रोग बताया था। किन्तु रोगीके पेटसे अन्यून पन्द्रह सेर जल निकाला गया। किसी रोगीके प्रस्तावकी पीड़ासे हस्त, पाद और मुख पर शोथ चढ़ा था। पीछे एक दिन वंशी बजाते बजाते उसके वायुशूल (Flatulent colic) होने लगा। किन्तु जनैक प्रथितनामा बैद्यने रोगको वातोदर ठहराया था। अतएव जो स्वदेशीय एवं विदेशीय उभय प्रकार-को चिकित्साके शास्त्रका अनुशीलन करते, ऐसे
स्थलपर वे बड़े गड़बड़में पड़ते हैं।
पित्तोदरका लक्षण भी ठीक नहीं बैठता। चरक-संहितामें लिखा――पित्तोदर रोगमें रोगीको दाह, ज्वर, तृष्णा. मूर्छा, अतीसार और भ्रमका वेग दहलता है। मुखमें कटु आस्वाद आ जाता है। नख, चक्षु, मुख, त्वक् एवं मलमूत्रका वर्ण हरा और पीला देख पड़ता है। पेट पर नील, पीत, हरित एवं ताम्रवर्ण रेखा तथा शिरा झलकती है। फिर दाह एवं तापके उद्गारसे धूम निकलने पर पेट उष्ण रहता, धर्म तथा क्लेद छोड़ता, दबानेसे कोमल लगता और शीघ्र पकता है।
सुश्रुत नहीं कहता――पित्तोदरमें पटका कौन स्थान पकता है। उसमें संक्षेपसे यह लक्षण मिलता―― पित्तोदर होनेपर मुखशोष, तृष्णा, ज्वर एवं दाहका वेग बढ़ता है। शरीर पीत पड़ जाता है। समस्त शिरा, चक्षु, नख, मुख और मलमूत्रका वर्ण भी पीत ही रहता है। यह रोग अल्प अल्प बहुत दिनोमें बढ़ता है।
{{c|{{x-smaller|<poem>“यच्छोषतृहाज्वरदायुक्त पीतं शिरा यत्र भवन्ति पीताः।
पीताक्षिविस्मूमूत्रनस्वाननस्य पित्तोदरं तञ्च चिरामिवृद्धि॥” </poem>}}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{gap}}यकृत्की सञ्चित पीड़ासे उदर पक जानेपर ये सकल लक्षण झलक सकते हैं।
चरकमें श्लेष्मजनित उदररोगका यह लक्षण लिखा――रोगीको शरीर भारी मालूम पड़ता है। भोजनसे अरुचि रहती है। अपाक और अङ्गमर्द होता है। देहका अधिक ध्यान नहीं पड़ता। हस्त, पाद और मुख सूज जाता है। वमन करने को इच्छा बनी रहती है। सर्वदा निद्रावल्य, कास और श्वास चलता है। नख, चक्षु, मुख, मलमूत्र और त्वक्का वर्ण श्वेत पड़ जाता है। पेट पर शुक्लवर्ण रेखा और शिरा झलकती है। उदर गुरु, स्तिमित, स्थिर और कठिन हो जाता है।
सुश्रुतने भी कहा है――
{{c|{{x-smaller|<poem>“यच्छौतलं शुक्लशिरावनद्धं श्लक्ष्णा स्थिरं शुक्तनखाननस्य।
सिन्धं महच्छोफयुतं ससादं कफोदरं तच्च चिराभिवृद्धि॥”</poem>}}}}
कफोदरमें पेट शीतल, शुक्लवर्ण शिरासे व्याप्त, चिक्कण और स्थिर हो जाता है। नख और मुख शुक्ल वर्ण रहते हैं। पेट स्निग्ध और महाशोथयुक्त बनता है। देहमें अवसन्नता आ जाती है। यह उदररोग अनेक दिनों में बढ़ता है। किन्तु नाना प्रकार-के मूत्ररोग और हृदरोगमें भी उक्त लक्षण लंग सकता है। त्रिदोष-जनित उदररोगमें वातोदर, पित्तोदर और कफोदर तीनो उदररोगका लक्षण रहता है।
प्लीहोदरके सम्बन्धमें कहा है――
{{c|{{x-smaller|<poem>“असितस्यातिस चोभादृशानयानाभिचेष्टितैः।
अतिव्यवायभाराध्ववमनव्याधिकर्षणैः॥
वामपार्श्व स्थित: प्लीहाच्युतिः स्थानात् प्रवर्धते।
शोणितं वा रसादिभ्यो विवृऽन्त विवर्धयेत्।</poem>}}}}
<Small>इति तस्य प्लीहा कठिनोऽष्ठिलेवादौ वर्धमान कच्छपसं स्थान उपलभ्यते। स चौपेक्षित: क्रमेण कुक्षिं जठरमग्र्यधिष्ठानच परिक्षिपन्नु दरमभिनिवर्त यति।” (चरक)</small>
भोजनके बाद अङ्गादि अधिक चलाने, यानपर जाने, यानपर शरीर अधिक हिलाने, अतिरिक्त स्त्री संसर्ग लगाने, क्षमतासे अधिक भार उठाने, पथपर अधिक श्रम पाने और वमन तथा व्याधि द्वारा शरीर अधिक घिनानेसे पञ्चरकी वामपार्श्व स्थित प्लीहा स्वस्थानको छोड़ बढ़ती किंवा रसादि द्वारा रक्त
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदर'''|'''२४३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
शोथ, जलोदरी और उससे आध्मान हो सकता है। पाकस्थलीके विवृधि रोगमें भी ऐसा लक्षण रहनेकी सम्भावना है। किन्तु इस रोगका प्रधान उपसर्ग वमन ही है।
किसी व्यक्तिको यकृतको विशुष्कताका रोग लगा था। प्रथम अग्निमान्द्य हुआ, अपराह्ल को अल्प-अल्प ज्वरका वेग बढा, उसके बाद पादपर शोथ चढ़ा और सबसे पीछे वृषण एवं हस्त फूला, तथा पेट जलसे भर गया। इसी अवस्था में किसी प्रसिद्ध कविराजने उसे देख वातोदरका रोग बताया था। किन्तु रोगीके पेटसे अन्यून पन्द्रह सेर जल निकाला गया। किसी रोगीके प्रस्तावकी पीड़ासे हस्त, पाद और मुख पर शोथ चढ़ा था। पीछे एक दिन वंशी बजाते बजाते उसके वायुशूल (Flatulent colic) होने लगा। किन्तु जनैक प्रथितनामा बैद्यने रोगको वातोदर ठहराया था। अतएव जो स्वदेशीय एवं विदेशीय उभय प्रकार-को चिकित्साके शास्त्रका अनुशीलन करते, ऐसे
स्थलपर वे बड़े गड़बड़में पड़ते हैं।
पित्तोदरका लक्षण भी ठीक नहीं बैठता। चरक-संहितामें लिखा――पित्तोदर रोगमें रोगीको दाह, ज्वर, तृष्णा. मूर्छा, अतीसार और भ्रमका वेग दहलता है। मुखमें कटु आस्वाद आ जाता है। नख, चक्षु, मुख, त्वक् एवं मलमूत्रका वर्ण हरा और पीला देख पड़ता है। पेट पर नील, पीत, हरित एवं ताम्रवर्ण रेखा तथा शिरा झलकती है। फिर दाह एवं तापके उद्गारसे धूम निकलने पर पेट उष्ण रहता, धर्म तथा क्लेद छोड़ता, दबानेसे कोमल लगता और शीघ्र पकता है।
सुश्रुत नहीं कहता――पित्तोदरमें पटका कौन स्थान पकता है। उसमें संक्षेपसे यह लक्षण मिलता―― पित्तोदर होनेपर मुखशोष, तृष्णा, ज्वर एवं दाहका वेग बढ़ता है। शरीर पीत पड़ जाता है। समस्त शिरा, चक्षु, नख, मुख और मलमूत्रका वर्ण भी पीत ही रहता है। यह रोग अल्प अल्प बहुत दिनोमें बढ़ता है।
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पीताक्षिविस्मूमूत्रनस्वाननस्य पित्तोदरं तञ्च चिरामिवृद्धि॥” </poem>}}}}
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{{gap}}यकृत्की सञ्चित पीड़ासे उदर पक जानेपर ये सकल लक्षण झलक सकते हैं।
चरकमें श्लेष्मजनित उदररोगका यह लक्षण लिखा――रोगीको शरीर भारी मालूम पड़ता है। भोजनसे अरुचि रहती है। अपाक और अङ्गमर्द होता है। देहका अधिक ध्यान नहीं पड़ता। हस्त, पाद और मुख सूज जाता है। वमन करने को इच्छा बनी रहती है। सर्वदा निद्रावल्य, कास और श्वास चलता है। नख, चक्षु, मुख, मलमूत्र और त्वक्का वर्ण श्वेत पड़ जाता है। पेट पर शुक्लवर्ण रेखा और शिरा झलकती है। उदर गुरु, स्तिमित, स्थिर और कठिन हो जाता है।
सुश्रुतने भी कहा है――
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सिन्धं महच्छोफयुतं ससादं कफोदरं तच्च चिराभिवृद्धि॥”</poem>}}}}
कफोदरमें पेट शीतल, शुक्लवर्ण शिरासे व्याप्त, चिक्कण और स्थिर हो जाता है। नख और मुख शुक्ल वर्ण रहते हैं। पेट स्निग्ध और महाशोथयुक्त बनता है। देहमें अवसन्नता आ जाती है। यह उदररोग अनेक दिनों में बढ़ता है। किन्तु नाना प्रकार-के मूत्ररोग और हृदरोगमें भी उक्त लक्षण लंग सकता है। त्रिदोष-जनित उदररोगमें वातोदर, पित्तोदर और कफोदर तीनो उदररोगका लक्षण रहता है।
प्लीहोदरके सम्बन्धमें कहा है――
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अतिव्यवायभाराध्ववमनव्याधिकर्षणैः॥
वामपार्श्व स्थित: प्लीहाच्युतिः स्थानात् प्रवर्धते।
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<Small>इति तस्य प्लीहा कठिनोऽष्ठिलेवादौ वर्धमान कच्छपसं स्थान उपलभ्यते। स चौपेक्षित: क्रमेण कुक्षिं जठरमग्र्यधिष्ठानच परिक्षिपन्नु दरमभिनिवर्त यति।” (चरक)</small>
भोजनके बाद अङ्गादि अधिक चलाने, यानपर जाने, यानपर शरीर अधिक हिलाने, अतिरिक्त स्त्री संसर्ग लगाने, क्षमतासे अधिक भार उठाने, पथपर अधिक श्रम पाने और वमन तथा व्याधि द्वारा शरीर अधिक घिनानेसे पञ्चरकी वामपार्श्व स्थित प्लीहा स्वस्थानको छोड़ बढ़ती किंवा रसादि द्वारा रक्त
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८५
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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२८४|उन्दुवर-उन्नतनगर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|उन्दूवर (सं॰ स्त्री॰) ताम्र, तांबा।}}
{{outdent|उन्देरी—बम्बई प्रान्त के कोलाबा सागरतट का एक द्वीप। १६८० ई॰ में सीदी ने यहां खाई बना अपनी रक्षा की थी। महाराष्ट्रों ने उन्हें भगाने की निष्फल चेष्टा की। १७३२ ई॰ में अंगरेजों ने अपनी सेना भेज इस द्वीप के दुर्ग को महाराष्ट्रों के हाथ पड़ने से बचाया। किन्तु १७५९ ई॰ में राघवजी अंगरिया ने उन्देरी का दुर्ग मुसलमानों से छीन लिया था। फिर १८४० ई॰ को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा।}}
{{outdent|उन्द (सं॰ पु॰) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव।}}
{{outdent|उन्द (सं॰ त्रि॰) उन्द-क्त। १ लिप्त, लिप्त, आलूदा, भरा हुआ। २ आर्द्र, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान।}}
{{outdent|उन्नइस, <small>उन्नीस देखो।</small>}}
<br>उन्नत (सं॰ त्रि॰) उत्-नम-क्त। १ उच, ऊंचा। २ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ४ गौरवन्वित, इज्ज़तदार। ५ उत्थापित, उठाया हुआ। ६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु॰) ७ अजगर। ८ बुद्धविशेष। (क्ली॰) ९ उक्ता, उंचाई। १० दिन
परिमाण-ज्ञापक उपाय।<br>
{{block center|<poem><small>
"दिवसस्य यद्दतं यच्च श्रेष्ठं तद्योद्दतं तदृत्ततसंज्ञम् ।”
"उदग्देशं याति यथा यथा नरसूया तथा स्वादतमचमच्छलम्।
उद्दृतिं पश्यति शीघ्रं चित्तसदृशरे शोकमज्जाः पलांङ्काः॥" </small></porm>}}
{{right|(सिद्धान्त-शिरोमणि)}}
२८४
उन्दुवर-उन्नतनगर
उन्दवर (सं.ली.) ताम, तांबा।
जूनागढ़ राज्यका यह प्राचीन नगर अक्षा० २०. ४८
उन्देरी-बम्बई प्रान्तके कोलाबा सागरतटका एक
उ. और द्राधि. ७१. पू. पर अवस्थित है। प्राचीन
होय। १६८० ई में सौदीने यहां खाई बना अपनी उन्नतनगर वर्तमान उननगरके पाख में ही था। इसी
रक्षा की थी। महाराष्ट्रोंने उन्हें भगानेको निष्फल प्राचीन नगरको पीछे लोग दिलवर कहने लगे। दोनो
चेष्टा को। १७३३ ई में अंगरेजोंने अपनी सेना स्थान पास ही पास रहनसे उनदिलवर कहलाते हैं।
भेज इस दीपके टुगेको महाराष्ट्रोंके हाथ पड़ने से
बचाया। किन्तु १७५८ ई में राघवजी अङ्गरिने किन्तु हमारी समझमें उन्नतनगर हो अधिक प्रामाण्य है। इस प्राचीन
उन्देरीका टुर्ग मुसलमानोंसे छीन लिया था। फिर
नगरका विवरण स्कन्दपुराणके प्रभासखण्ड में इस प्रकार कहा है-
"तती गच्छ महादवि ! उत्तस्थानमुत्तमम् ।
१८४० ई०को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा। .
तस्वैवोत्तर दिगभागे ऋषितीशतटे शुभे ।
उन्द्र (स• पु०) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव ।
एतत् स्थानं शुभं दैवि ! विप्रेभ्य: प्रददी बलात् ।
उन (स. त्रि.) उन्द-क्त । १ लिन्न, मिता, पालदा, सर्वसीमासमायुक्त चण्डौगणसुरचितम् ॥
भरा हुआ। २ भाई, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान्।
देवावाच ।
उवइस, उन्नीस देखो।
कथमुन्नतनानास्य वभूव सुरसत्तम !
उन्नत (6. त्रि.) उत्-नम-क्त। १ उच्च, ऊंचा। कथ त्वया बलाद्दत्त कियत्सौमासमन्वितम् ॥
२ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ४ गौरवा-
सत् सर्व समाचल सचेपानातिविस्तरात् ।
न्वित, इज्जतदार । ५ उत्थापित, उठाया हुपा।
ईश्वर उवाच।
६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु.) ७ अजगर । ८ बुद्ध-
मृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि कथा पापप्रणाशिनीम् ।
विशेष। (क्लो०) ८ उच्चता, उचाई। १० दिन
यां यत्वा मानवो दैवि ! मुच्यते सर्वपापकात् ॥
एतत् पूर्व पुरा प्रोक्त स्थानं सङ्केतकारणम् ।
परिमाण-ज्ञापक उपाय।
कृतौये बाझो खण्डे सृष्टिस'चैपसूचके ॥
"दिवसस्य यस मञ्च शेष तयोर्यदल्प' तन्नतस'शम् ।”
तथापि ते प्रवक्ष्यामि सचे पाच्छ ण पार्वति
"उदग्दैश' याति यथा यथा नरस्तथा तथा स्थानतमचमण्डलम् ।
उन्नामितं पुनस्तव यव लिङ्ग महोदयम् ॥
उदगदिश पश्यति चीन्नतं चितेस्तदन्तर यीनमजाः पलांशकाः॥"
षष्टिवर्ष सहस्रापि तपस्ते पु महर्षयः ।
' (सिद्धान्त-शिरोमणि)
ध्यायमाना महेशानमनादिनिधन परम् ॥
उन्नतकाल (सं० पु०) उन्नतको छाया द्वारा काल-
तेषु वै तप्यमानेषु कोटिसलो षु पार्वति !
निरूपक प्रक्रिया विशेष ।
ऋषितोयान्टे रम्ये पविवे पापनाशने ॥
'पलश्रुतिघ्न स्त्रिगुणस्य वर्गोद्यज्ये ठकर्णाहतिहद्भवेद्दा ।
भिचभूत्वा गतवाई पूतस्तवैव भामिनि !
इष्टान्त्यका तद्रहितान्ताका या भवन्ति या उत्क्रमचापलिप्ताः ॥
वकालदर्शि भिस्तव रोषरागविवर्जितः ॥
नतासवस्ते मुरहदल हवीकृत' चोन्नतकाल एवम् ।" (सिद्धान्तशिरोमणि) तपखिभिस्तदा सई लक्षितोऽहं वरानने !
"नतकाली दिनाधवत् पतित उन्नतकाल: स्वादित्य पपन्नम्।' (मिताक्षरा)| दृष्टमावत्तदा विौरिराम महेश्वरः ॥
उन्नतचरण ( स० वि०) उच्छित पादयुक्ता, पैर क्व यासि विदिती देव इत्य कानुययुईि जाः ।
उठाये हुआ।
यावदायान्ति मुनयः ईशेशेति प्रभाषकाः ॥ .
उव्रतत्व (सं० लो०) उच्चता, उचाई।
धावमानाश्च तापसा द्योतयन्तो दिशो दश ॥
उन्नतनगर (सलो०) एक अति प्राचीन नगर ।।
लिङ्गमेव प्रपश्यन्ति नापशान्ति महेश्वरम् ।
“यव चोन्नामित लिङ्ग ऋषितोयातटै शुभे।
ये ये च ददृशुलिङ्ग' मूलचण्डौशमन्ति ॥
उन्नत नाम यं लोक विख्यातं सुरसुन्दरि ॥” (प्रभासखण्ड २१६ १०)
तदा ते मुनयः स शरीरैः खर्गमाययुः ।
वर्तमान नाम उन दिलवर* है। काठियावाड़ प्रान्तके
तदा विविष्ट व्याप्त दृष्ट' वे शतयज्वना ।।
अयाचन्त तथै वान्ये मुनयस्तपसोज्ज्वलाः ।
• सर साहबने प्राचीन नगरका नाम 'उन्नतर्ग' लिखा है।। एतदन्तरमासाद्य समागत्य महोतसे ॥<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२८४|उन्दुवर-उन्नतनगर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|उन्दूवर (सं॰ स्त्री॰) ताम्र, तांबा।}}
{{outdent|उन्देरी—बम्बई प्रान्त के कोलाबा सागरतट का एक द्वीप। १६८० ई॰ में सीदी ने यहां खाई बना अपनी रक्षा की थी। महाराष्ट्रों ने उन्हें भगाने की निष्फल चेष्टा की। १७३२ ई॰ में अंगरेजों ने अपनी सेना भेज इस द्वीप के दुर्ग को महाराष्ट्रों के हाथ पड़ने से बचाया। किन्तु १७५९ ई॰ में राघवजी अंगरिया ने उन्देरी का दुर्ग मुसलमानों से छीन लिया था। फिर १८४० ई॰ को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा।}}
{{outdent|उन्द (सं॰ पु॰) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव।}}
{{outdent|उन्द (सं॰ त्रि॰) उन्द-क्त। १ लिप्त, लिप्त, आलूदा, भरा हुआ। २ आर्द्र, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान।}}
{{outdent|उन्नइस, <small>उन्नीस देखो।</small>}}
<br>उन्नत (सं॰ त्रि॰) उत्-नम-क्त। १ उच, ऊंचा। २ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ४ गौरवन्वित, इज्ज़तदार। ५ उत्थापित, उठाया हुआ। ६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु॰) ७ अजगर। ८ बुद्धविशेष। (क्ली॰) ९ उक्ता, उंचाई। १० दिन
परिमाण-ज्ञापक उपाय।<br>
{{block center|<poem><small>
"दिवसस्य यद्दतं यच्च श्रेष्ठं तद्योद्दतं तदृत्ततसंज्ञम् ।”
"उदग्देशं याति यथा यथा नरसूया तथा स्वादतमचमच्छलम्।
उद्दृतिं पश्यति शीघ्रं चित्तसदृशरे शोकमज्जाः पलांङ्काः॥" </small></poem>}}
{{right|(सिद्धान्त-शिरोमणि)}}
२८४
उन्दुवर-उन्नतनगर
उन्दवर (सं.ली.) ताम, तांबा।
जूनागढ़ राज्यका यह प्राचीन नगर अक्षा० २०. ४८
उन्देरी-बम्बई प्रान्तके कोलाबा सागरतटका एक
उ. और द्राधि. ७१. पू. पर अवस्थित है। प्राचीन
होय। १६८० ई में सौदीने यहां खाई बना अपनी उन्नतनगर वर्तमान उननगरके पाख में ही था। इसी
रक्षा की थी। महाराष्ट्रोंने उन्हें भगानेको निष्फल प्राचीन नगरको पीछे लोग दिलवर कहने लगे। दोनो
चेष्टा को। १७३३ ई में अंगरेजोंने अपनी सेना स्थान पास ही पास रहनसे उनदिलवर कहलाते हैं।
भेज इस दीपके टुगेको महाराष्ट्रोंके हाथ पड़ने से
बचाया। किन्तु १७५८ ई में राघवजी अङ्गरिने किन्तु हमारी समझमें उन्नतनगर हो अधिक प्रामाण्य है। इस प्राचीन
उन्देरीका टुर्ग मुसलमानोंसे छीन लिया था। फिर
नगरका विवरण स्कन्दपुराणके प्रभासखण्ड में इस प्रकार कहा है-
"तती गच्छ महादवि ! उत्तस्थानमुत्तमम् ।
१८४० ई०को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा। .
तस्वैवोत्तर दिगभागे ऋषितीशतटे शुभे ।
उन्द्र (स• पु०) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव ।
एतत् स्थानं शुभं दैवि ! विप्रेभ्य: प्रददी बलात् ।
उन (स. त्रि.) उन्द-क्त । १ लिन्न, मिता, पालदा, सर्वसीमासमायुक्त चण्डौगणसुरचितम् ॥
भरा हुआ। २ भाई, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान्।
देवावाच ।
उवइस, उन्नीस देखो।
कथमुन्नतनानास्य वभूव सुरसत्तम !
उन्नत (6. त्रि.) उत्-नम-क्त। १ उच्च, ऊंचा। कथ त्वया बलाद्दत्त कियत्सौमासमन्वितम् ॥
२ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ४ गौरवा-
सत् सर्व समाचल सचेपानातिविस्तरात् ।
न्वित, इज्जतदार । ५ उत्थापित, उठाया हुपा।
ईश्वर उवाच।
६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु.) ७ अजगर । ८ बुद्ध-
मृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि कथा पापप्रणाशिनीम् ।
विशेष। (क्लो०) ८ उच्चता, उचाई। १० दिन
यां यत्वा मानवो दैवि ! मुच्यते सर्वपापकात् ॥
एतत् पूर्व पुरा प्रोक्त स्थानं सङ्केतकारणम् ।
परिमाण-ज्ञापक उपाय।
कृतौये बाझो खण्डे सृष्टिस'चैपसूचके ॥
"दिवसस्य यस मञ्च शेष तयोर्यदल्प' तन्नतस'शम् ।”
तथापि ते प्रवक्ष्यामि सचे पाच्छ ण पार्वति
"उदग्दैश' याति यथा यथा नरस्तथा तथा स्थानतमचमण्डलम् ।
उन्नामितं पुनस्तव यव लिङ्ग महोदयम् ॥
उदगदिश पश्यति चीन्नतं चितेस्तदन्तर यीनमजाः पलांशकाः॥"
षष्टिवर्ष सहस्रापि तपस्ते पु महर्षयः ।
' (सिद्धान्त-शिरोमणि)
ध्यायमाना महेशानमनादिनिधन परम् ॥
उन्नतकाल (सं० पु०) उन्नतको छाया द्वारा काल-
तेषु वै तप्यमानेषु कोटिसलो षु पार्वति !
निरूपक प्रक्रिया विशेष ।
ऋषितोयान्टे रम्ये पविवे पापनाशने ॥
'पलश्रुतिघ्न स्त्रिगुणस्य वर्गोद्यज्ये ठकर्णाहतिहद्भवेद्दा ।
भिचभूत्वा गतवाई पूतस्तवैव भामिनि !
इष्टान्त्यका तद्रहितान्ताका या भवन्ति या उत्क्रमचापलिप्ताः ॥
वकालदर्शि भिस्तव रोषरागविवर्जितः ॥
नतासवस्ते मुरहदल हवीकृत' चोन्नतकाल एवम् ।" (सिद्धान्तशिरोमणि) तपखिभिस्तदा सई लक्षितोऽहं वरानने !
"नतकाली दिनाधवत् पतित उन्नतकाल: स्वादित्य पपन्नम्।' (मिताक्षरा)| दृष्टमावत्तदा विौरिराम महेश्वरः ॥
उन्नतचरण ( स० वि०) उच्छित पादयुक्ता, पैर क्व यासि विदिती देव इत्य कानुययुईि जाः ।
उठाये हुआ।
यावदायान्ति मुनयः ईशेशेति प्रभाषकाः ॥ .
उव्रतत्व (सं० लो०) उच्चता, उचाई।
धावमानाश्च तापसा द्योतयन्तो दिशो दश ॥
उन्नतनगर (सलो०) एक अति प्राचीन नगर ।।
लिङ्गमेव प्रपश्यन्ति नापशान्ति महेश्वरम् ।
“यव चोन्नामित लिङ्ग ऋषितोयातटै शुभे।
ये ये च ददृशुलिङ्ग' मूलचण्डौशमन्ति ॥
उन्नत नाम यं लोक विख्यातं सुरसुन्दरि ॥” (प्रभासखण्ड २१६ १०)
तदा ते मुनयः स शरीरैः खर्गमाययुः ।
वर्तमान नाम उन दिलवर* है। काठियावाड़ प्रान्तके
तदा विविष्ट व्याप्त दृष्ट' वे शतयज्वना ।।
अयाचन्त तथै वान्ये मुनयस्तपसोज्ज्वलाः ।
• सर साहबने प्राचीन नगरका नाम 'उन्नतर्ग' लिखा है।। एतदन्तरमासाद्य समागत्य महोतसे ॥<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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<br>उन्नतकाल (सं॰ पु॰) उन्नतकी छाया द्वारा कालनिरूपक प्रक्रिया विशेष।
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'पलश्रुतित्रिर्घ्नणस्य वर्गीयुजेष्ठकर्षाहतिष्ठवेहा।
इष्टाङ्कका तद्रिष्टातान्मका या भवन्ति या उन्नतक्रमचापलिप्ता:॥
नतासचक्रे सुरह्द्वं रैद्वबीक्षितं चोन्नतकाल एवम्।' (सिद्धान्तशिरोमणि)
नतकालो दिनार्धवत् पतित उन्नतकालः खादिल्युपपव्रम्।" (मिताचरा)</poem></small>}}
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वर्तमान नाम उन दिलवर<ref>इंण्टर साहबने प्राचीन नगरका नाम 'उन्नतदुर्ग' लिखा है।</ref> है । काठियावाड़ प्रान्तके
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२८४
उन्दुवर-उन्नतनगर
उन्दवर (सं.ली.) ताम, तांबा।
जूनागढ़ राज्यका यह प्राचीन नगर अक्षा० २०. ४८
उन्देरी-बम्बई प्रान्तके कोलाबा सागरतटका एक
उ. और द्राधि. ७१. पू. पर अवस्थित है। प्राचीन
होय। १६८० ई में सौदीने यहां खाई बना अपनी उन्नतनगर वर्तमान उननगरके पाख में ही था। इसी
रक्षा की थी। महाराष्ट्रोंने उन्हें भगानेको निष्फल प्राचीन नगरको पीछे लोग दिलवर कहने लगे। दोनो
चेष्टा को। १७३३ ई में अंगरेजोंने अपनी सेना स्थान पास ही पास रहनसे उनदिलवर कहलाते हैं।
भेज इस दीपके टुगेको महाराष्ट्रोंके हाथ पड़ने से
बचाया। किन्तु १७५८ ई में राघवजी अङ्गरिने किन्तु हमारी समझमें उन्नतनगर हो अधिक प्रामाण्य है। इस प्राचीन
उन्देरीका टुर्ग मुसलमानोंसे छीन लिया था। फिर
नगरका विवरण स्कन्दपुराणके प्रभासखण्ड में इस प्रकार कहा है-
"तती गच्छ महादवि ! उत्तस्थानमुत्तमम् ।
१८४० ई०को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा। .
तस्वैवोत्तर दिगभागे ऋषितीशतटे शुभे ।
उन्द्र (स• पु०) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव ।
एतत् स्थानं शुभं दैवि ! विप्रेभ्य: प्रददी बलात् ।
उन (स. त्रि.) उन्द-क्त । १ लिन्न, मिता, पालदा, सर्वसीमासमायुक्त चण्डौगणसुरचितम् ॥
भरा हुआ। २ भाई, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान्।
देवावाच ।
उवइस, उन्नीस देखो।
कथमुन्नतनानास्य वभूव सुरसत्तम !
उन्नत (6. त्रि.) उत्-नम-क्त। १ उच्च, ऊंचा। कथ त्वया बलाद्दत्त कियत्सौमासमन्वितम् ॥
२ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ४ गौरवा-
सत् सर्व समाचल सचेपानातिविस्तरात् ।
न्वित, इज्जतदार । ५ उत्थापित, उठाया हुपा।
ईश्वर उवाच।
६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु.) ७ अजगर । ८ बुद्ध-
मृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि कथा पापप्रणाशिनीम् ।
विशेष। (क्लो०) ८ उच्चता, उचाई। १० दिन
यां यत्वा मानवो दैवि ! मुच्यते सर्वपापकात् ॥
एतत् पूर्व पुरा प्रोक्त स्थानं सङ्केतकारणम् ।
परिमाण-ज्ञापक उपाय।
कृतौये बाझो खण्डे सृष्टिस'चैपसूचके ॥
"दिवसस्य यस मञ्च शेष तयोर्यदल्प' तन्नतस'शम् ।”
तथापि ते प्रवक्ष्यामि सचे पाच्छ ण पार्वति
"उदग्दैश' याति यथा यथा नरस्तथा तथा स्थानतमचमण्डलम् ।
उन्नामितं पुनस्तव यव लिङ्ग महोदयम् ॥
उदगदिश पश्यति चीन्नतं चितेस्तदन्तर यीनमजाः पलांशकाः॥"
षष्टिवर्ष सहस्रापि तपस्ते पु महर्षयः ।
' (सिद्धान्त-शिरोमणि)
ध्यायमाना महेशानमनादिनिधन परम् ॥
उन्नतकाल (सं० पु०) उन्नतको छाया द्वारा काल-
तेषु वै तप्यमानेषु कोटिसलो षु पार्वति !
निरूपक प्रक्रिया विशेष ।
ऋषितोयान्टे रम्ये पविवे पापनाशने ॥
'पलश्रुतिघ्न स्त्रिगुणस्य वर्गोद्यज्ये ठकर्णाहतिहद्भवेद्दा ।
भिचभूत्वा गतवाई पूतस्तवैव भामिनि !
इष्टान्त्यका तद्रहितान्ताका या भवन्ति या उत्क्रमचापलिप्ताः ॥
वकालदर्शि भिस्तव रोषरागविवर्जितः ॥
नतासवस्ते मुरहदल हवीकृत' चोन्नतकाल एवम् ।" (सिद्धान्तशिरोमणि) तपखिभिस्तदा सई लक्षितोऽहं वरानने !
"नतकाली दिनाधवत् पतित उन्नतकाल: स्वादित्य पपन्नम्।' (मिताक्षरा)| दृष्टमावत्तदा विौरिराम महेश्वरः ॥
उन्नतचरण ( स० वि०) उच्छित पादयुक्ता, पैर क्व यासि विदिती देव इत्य कानुययुईि जाः ।
उठाये हुआ।
यावदायान्ति मुनयः ईशेशेति प्रभाषकाः ॥ .
उव्रतत्व (सं० लो०) उच्चता, उचाई।
धावमानाश्च तापसा द्योतयन्तो दिशो दश ॥
उन्नतनगर (सलो०) एक अति प्राचीन नगर ।।
लिङ्गमेव प्रपश्यन्ति नापशान्ति महेश्वरम् ।
“यव चोन्नामित लिङ्ग ऋषितोयातटै शुभे।
ये ये च ददृशुलिङ्ग' मूलचण्डौशमन्ति ॥
उन्नत नाम यं लोक विख्यातं सुरसुन्दरि ॥” (प्रभासखण्ड २१६ १०)
तदा ते मुनयः स शरीरैः खर्गमाययुः ।
वर्तमान नाम उन दिलवर* है। काठियावाड़ प्रान्तके
तदा विविष्ट व्याप्त दृष्ट' वे शतयज्वना ।।
अयाचन्त तथै वान्ये मुनयस्तपसोज्ज्वलाः ।
• सर साहबने प्राचीन नगरका नाम 'उन्नतर्ग' लिखा है।। एतदन्तरमासाद्य समागत्य महोतसे ॥<noinclude></noinclude>
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{{outdent|उन्द (सं॰ पु॰) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव।}}
{{outdent|उन्द (सं॰ त्रि॰) उन्द-क्त। १ लिप्त, लिप्त, आलूदा, भरा हुआ। २ आर्द्र, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान।}}
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{{outdent|उन्नत (सं॰ त्रि॰) उत्-नम-क्त। १ उच, ऊंचा। २ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ४ गौरवन्वित, इज्ज़तदार। ५ उत्थापित, उठाया हुआ। ६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु॰) ७ अजगर। ८ बुद्धविशेष। (क्ली॰) ९ उक्ता, उंचाई। १० दिन परिमाण-ज्ञापक उपाय।}}
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"दिवसस्य यद्दतं यच्च श्रेष्ठं तद्योद्दतं तदृत्ततसंज्ञम्।"
"उदग्देशं याति यथा यथा नरसूया तथा स्वादतमचमच्छलम्।
उद्दृतिं पश्यति शीघ्रं चित्तसदृशरे शोकमज्जाः पलांङ्काः॥" </small></poem>}}
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<br>उन्नतकाल (सं॰ पु॰) उन्नतकी छाया द्वारा कालनिरूपक प्रक्रिया विशेष।
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'पलश्रुतित्रिर्घ्नणस्य वर्गीयुजेष्ठकर्षाहतिष्ठवेहा।
इष्टाङ्कका तद्रिष्टातान्मका या भवन्ति या उन्नतक्रमचापलिप्ता:॥
नतासचक्रे सुरह्द्वं रैद्वबीक्षितं चोन्नतकाल एवम्।' (सिद्धान्तशिरोमणि)
नतकालो दिनार्धवत् पतित उन्नतकालः खादिल्युपपव्रम्।" (मिताचरा)</poem></small>}}
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सर्वसीमासमायुक्तं चण्डीगणसुरक्षितम्॥</small></poem>}}
२८४
उन्दुवर-उन्नतनगर
उन्दवर (सं.ली.) ताम, तांबा।
जूनागढ़ राज्यका यह प्राचीन नगर अक्षा० २०. ४८
उन्देरी-बम्बई प्रान्तके कोलाबा सागरतटका एक
उ. और द्राधि. ७१. पू. पर अवस्थित है। प्राचीन
होय। १६८० ई में सौदीने यहां खाई बना अपनी उन्नतनगर वर्तमान उननगरके पाख में ही था। इसी
रक्षा की थी। महाराष्ट्रोंने उन्हें भगानेको निष्फल प्राचीन नगरको पीछे लोग दिलवर कहने लगे। दोनो
चेष्टा को। १७३३ ई में अंगरेजोंने अपनी सेना स्थान पास ही पास रहनसे उनदिलवर कहलाते हैं।
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बचाया। किन्तु १७५८ ई में राघवजी अङ्गरिने किन्तु हमारी समझमें उन्नतनगर हो अधिक प्रामाण्य है। इस प्राचीन
उन्देरीका टुर्ग मुसलमानोंसे छीन लिया था। फिर
नगरका विवरण स्कन्दपुराणके प्रभासखण्ड में इस प्रकार कहा है-
"तती गच्छ महादवि ! उत्तस्थानमुत्तमम् ।
१८४० ई०को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा। .
तस्वैवोत्तर दिगभागे ऋषितीशतटे शुभे ।
उन्द्र (स• पु०) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव ।
एतत् स्थानं शुभं दैवि ! विप्रेभ्य: प्रददी बलात् ।
उन (स. त्रि.) उन्द-क्त । १ लिन्न, मिता, पालदा, सर्वसीमासमायुक्त चण्डौगणसुरचितम् ॥
भरा हुआ। २ भाई, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान्।
देवावाच ।
उवइस, उन्नीस देखो।
कथमुन्नतनानास्य वभूव सुरसत्तम !
उन्नत (6. त्रि.) उत्-नम-क्त। १ उच्च, ऊंचा। कथ त्वया बलाद्दत्त कियत्सौमासमन्वितम् ॥
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न्वित, इज्जतदार । ५ उत्थापित, उठाया हुपा।
ईश्वर उवाच।
६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु.) ७ अजगर । ८ बुद्ध-
मृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि कथा पापप्रणाशिनीम् ।
विशेष। (क्लो०) ८ उच्चता, उचाई। १० दिन
यां यत्वा मानवो दैवि ! मुच्यते सर्वपापकात् ॥
एतत् पूर्व पुरा प्रोक्त स्थानं सङ्केतकारणम् ।
परिमाण-ज्ञापक उपाय।
कृतौये बाझो खण्डे सृष्टिस'चैपसूचके ॥
"दिवसस्य यस मञ्च शेष तयोर्यदल्प' तन्नतस'शम् ।”
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"उदग्दैश' याति यथा यथा नरस्तथा तथा स्थानतमचमण्डलम् ।
उन्नामितं पुनस्तव यव लिङ्ग महोदयम् ॥
उदगदिश पश्यति चीन्नतं चितेस्तदन्तर यीनमजाः पलांशकाः॥"
षष्टिवर्ष सहस्रापि तपस्ते पु महर्षयः ।
' (सिद्धान्त-शिरोमणि)
ध्यायमाना महेशानमनादिनिधन परम् ॥
उन्नतकाल (सं० पु०) उन्नतको छाया द्वारा काल-
तेषु वै तप्यमानेषु कोटिसलो षु पार्वति !
निरूपक प्रक्रिया विशेष ।
ऋषितोयान्टे रम्ये पविवे पापनाशने ॥
'पलश्रुतिघ्न स्त्रिगुणस्य वर्गोद्यज्ये ठकर्णाहतिहद्भवेद्दा ।
भिचभूत्वा गतवाई पूतस्तवैव भामिनि !
इष्टान्त्यका तद्रहितान्ताका या भवन्ति या उत्क्रमचापलिप्ताः ॥
वकालदर्शि भिस्तव रोषरागविवर्जितः ॥
नतासवस्ते मुरहदल हवीकृत' चोन्नतकाल एवम् ।" (सिद्धान्तशिरोमणि) तपखिभिस्तदा सई लक्षितोऽहं वरानने !
"नतकाली दिनाधवत् पतित उन्नतकाल: स्वादित्य पपन्नम्।' (मिताक्षरा)| दृष्टमावत्तदा विौरिराम महेश्वरः ॥
उन्नतचरण ( स० वि०) उच्छित पादयुक्ता, पैर क्व यासि विदिती देव इत्य कानुययुईि जाः ।
उठाये हुआ।
यावदायान्ति मुनयः ईशेशेति प्रभाषकाः ॥ .
उव्रतत्व (सं० लो०) उच्चता, उचाई।
धावमानाश्च तापसा द्योतयन्तो दिशो दश ॥
उन्नतनगर (सलो०) एक अति प्राचीन नगर ।।
लिङ्गमेव प्रपश्यन्ति नापशान्ति महेश्वरम् ।
“यव चोन्नामित लिङ्ग ऋषितोयातटै शुभे।
ये ये च ददृशुलिङ्ग' मूलचण्डौशमन्ति ॥
उन्नत नाम यं लोक विख्यातं सुरसुन्दरि ॥” (प्रभासखण्ड २१६ १०)
तदा ते मुनयः स शरीरैः खर्गमाययुः ।
वर्तमान नाम उन दिलवर* है। काठियावाड़ प्रान्तके
तदा विविष्ट व्याप्त दृष्ट' वे शतयज्वना ।।
अयाचन्त तथै वान्ये मुनयस्तपसोज्ज्वलाः ।
• सर साहबने प्राचीन नगरका नाम 'उन्नतर्ग' लिखा है।। एतदन्तरमासाद्य समागत्य महोतसे ॥<noinclude></noinclude>
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2026-07-15T02:08:03Z
अनुश्री साव
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/* शोधित */
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२८४|उन्दुवर-उन्नतनगर}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|उन्दूवर (सं॰ स्त्री॰) ताम्र, तांबा।}}
{{outdent|उन्देरी—बम्बई प्रान्त के कोलाबा सागरतट का एक द्वीप। १६८० ई॰ में सीदी ने यहां खाई बना अपनी रक्षा की थी। महाराष्ट्रों ने उन्हें भगाने की निष्फल चेष्टा की। १७३२ ई॰ में अंगरेजों ने अपनी सेना भेज इस द्वीप के दुर्ग को महाराष्ट्रों के हाथ पड़ने से बचाया। किन्तु १७५९ ई॰ में राघवजी अंगरिया ने उन्देरी का दुर्ग मुसलमानों से छीन लिया था। फिर १८४० ई॰ को यह द्वीप अंगरेजोंके हाथ लगा।}}
{{outdent|उन्द (सं॰ पु॰) कूलचर पशुभेद, ऊदबिलाव।}}
{{outdent|उन्द (सं॰ त्रि॰) उन्द-क्त। १ लिप्त, लिप्त, आलूदा, भरा हुआ। २ आर्द्र, भीगा। ३ सुरत, मेहरबान।}}
{{outdent|उन्नइस, <small>उन्नीस देखो।</small>}}
{{outdent|उन्नत (सं॰ त्रि॰) उत्-नम-क्त। १ उच, ऊंचा। २ श्रेष्ठ, बड़ा। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ४ गौरवन्वित, इज्ज़तदार। ५ उत्थापित, उठाया हुआ। ६ पूर्ण, भरा हुआ। (पु॰) ७ अजगर। ८ बुद्धविशेष। (क्ली॰) ९ उक्ता, उंचाई। १० दिन परिमाण-ज्ञापक उपाय।}}
{{block center|<poem><small>
"दिवसस्य यद्दतं यच्च श्रेष्ठं तद्योद्दतं तदृत्ततसंज्ञम्।"
"उदग्देशं याति यथा यथा नरसूया तथा स्वादतमचमच्छलम्।
उद्दृतिं पश्यति शीघ्रं चित्तसदृशरे शोकमज्जाः पलांङ्काः॥" </small></poem>}}
{{right|<small>(सिद्धान्त-शिरोमणि)</small>}}
<br>उन्नतकाल (सं॰ पु॰) उन्नतकी छाया द्वारा कालनिरूपक प्रक्रिया विशेष।
{{block center|<poem><small>
'पलश्रुतित्रिर्घ्नणस्य वर्गीयुजेष्ठकर्षाहतिष्ठवेहा।
इष्टाङ्कका तद्रिष्टातान्मका या भवन्ति या उन्नतक्रमचापलिप्ता:॥
नतासचक्रे सुरह्द्वं रैद्वबीक्षितं चोन्नतकाल एवम्।' (सिद्धान्तशिरोमणि)
नतकालो दिनार्धवत् पतित उन्नतकालः खादिल्युपपव्रम्।" (मिताचरा)</poem></small>}}
{{outdent|उन्नतचरण (सं॰ त्रि॰) उच्छित पादयुक्त, पैर उठाये हुआ।}}
{{outdent|उन्नतत्व (सं॰ क्ली॰) उन्नता, उंचाई।}}
{{outdent|उन्नतनगर (सं॰ क्ली॰) एक अति प्राचीन नगर।}}
{{block center|<poem><small>
"धव चोन्नामितं लिङ्गं ऋषितीर्थाटते शुभे।
उन्नतं नाम यं लोके विख्यातं सुरसुन्दरि॥" (प्रभासखण्ड २१६ अ॰)</small></poem>}}
वर्तमान नाम उन दिलवर<ref>इंण्टर साहबने प्राचीन नगरका नाम 'उन्नतदुर्ग' लिखा है।</ref> है । काठियावाड़ प्रान्तके
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{{smallrefs}}
{{Multicol-break}}
जूनागढ़ राज्यका यह प्राचीन नगर अक्षा॰ २०° ४९ उ॰ और द्राघि॰ ७१° ५' पू॰ पर अवस्थित है। प्राचीन उन्नतनगर वर्तमान उननगरके पार्श्व में ही था। इसी प्राचीन नगरको पीछे लोग दिलवर कहने लगे। दोनों स्थान पास ही पास रहनेसे उनदिलवर कहलाते हैं।
{{rule}}
{{smallrefs}}
<small>किन्तु हमारी समझमें उन्नतनगर ही अधिक प्रामाण्य है। इस प्राचीन नगरका विवरण स्कन्दपुराणके प्रभासखण्डमें इस प्रकार कहा है—</small>
{{block center|<poem><small>
"ततो गच्छे महादेवि! उन्नतस्थानमुत्तमम्।
तस्यैत्तरदिग्भागे ऋषितीर्थाटते शुभे॥
एतत् स्थानं शुभं देवि! विमुख्यः प्रददौ बलात्।
सर्वसीमासमायुक्तं चण्डीगणसुरक्षितम्॥
देवुवाच।
कथमुन्नतनानाख्य बभूव सुरसत्तम!
कथं त्वया बलात्सं कियत्सीमासमन्वितम्॥
एतत् सर्वं समाचक्ष्व संचोपाद्वातिविस्तरात्।
ईश्वर उवाच।
शृणु देवि! प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।
यां श्रुत्वा मानवो देवि! मुच्यते सर्वपापकात्॥
एतत् पूर्वं पुरा प्रोक्तं स्थानं सङ्डेतकारकम्।
तृतीये ब्राह्मणै खण्डे दृष्ट्वा चेपसूचके॥
तथापि ते प्रवक्ष्यामि संचेपाच्छृणु पार्वति।
उन्नामितं पुनस्त्वं यत् लिङ्गं महोदयम्॥
षष्टिवर्ष सहस्राणि तपस्तेपु र्महर्षयः।
ध्यायमाना महेशानमनादिनिधनं परम्॥
तेषु वै तप्यमानेषु कोटिसङ्ख्ये तु पार्वति!
ऋषितोयातटे रम्ये पवित्रे पापनाशने॥
भिक्षर्भूत्वा गतश्राहं पूतस्तवैव भामिनि!
वकालदर्शिभिस्त्वं रोषरागविवर्जितैः॥
तपस्विभिस्तदा सर्वै लंचितोऽहं वरानने!
दृष्टमावलोक्य विप्रैर्विरराम महेश्वरः॥
क्व यासि विदितो देव द्रष्टुं नुयुधिञ्जा:।
यावदागम्यन्ति मुनयः ईशेति प्रभाषकाः॥
धावमानांस्तपसा द्योतयल्लो दिशो दश॥
लिङ्गनेव प्रपश्यन्ति नापश्यन्ति महेश्वरम्।
ये ये च दह्युलिङ्गं मूलचक्षुश्मनिके॥
तदा ते मुनयः सर्वै शरीरैः स्वर्गमाययुः।
तदा विविष्टं व्यामं हष्ट्वै वै शतधजना॥
व्याचन्त तत्रै वाक्ये मुनयस्तपसोऽञ्जलाः।
एतदन्तरमासाद्य समागत्य महीतले॥</small></poem>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२०
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ऐरंमद—ऐल|४७९}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ऐरंमद (सं॰ पु॰) देवमुनिके अपत्य। इन्होंने ऋग्वेदके मन्त्र बनाये थे।
ऐरंमदीय (सं॰ त्की॰) ब्रह्मलोकका एक समुद्र।
ऐरक्य (सं॰ त्रि॰) एरका–ण्य। एरका–जात। {{smaller|एरका देखो।}}
ऐराक, {{smaller|एराक देखो।}}
ऐराकी, {{smaller|एराकी देखो।}}
ऐराग़ैरा (हिं॰ वि॰) १ अपरिचित, जो समझा–बूझा न हो। २ तुच्छ, छोटा।
ऐरापति (हिं॰) {{smaller|ऐरावत देखो।}}
ऐराब (अ॰ पु॰) शतरंजमें किश्त बचानेके लिये बादशाह और किसी दूसरे मोहरके बीचमें मोहरेका आना। इससे बादशाहपर किश्त नहीं रहती। किन्तु ऐराबका मोहरा उठना नामुमकिन है। घोड़ेकी किश्त पड़नेसे ऐराब नहीं चलता।
ऐरालू (हिं॰ पु॰) इन्द्रवारुणी विशेष, किसी किस्मकी ककड़ी। यह तरबूज–जैसा रहता और पहाड़पर कुमाऊंसे सिकिमतक उपजता है।
ऐरावण (सं॰ पु॰) इरया जलेन वनति शब्दायते, इरा–वन पचांद्यच्; अथवा इरा सुरा वनमुदकं यस्मिन तत्र भवः, अण्। १ ऐरावती हस्ती। २ जैनमतानु–सार जम्बुद्दीपका सप्तम वर्ष। {{smaller|(जैनहरि॰ ५।१८)}}
ऐरावत (सं॰ पु॰) इरा जलानि सन्त्यत्र, मतुप् मस्य वः, इरावान् समुद्रः तत्र भवः अण् इरावत्या विद्यतोऽयम्। १ इन्द्रहस्ती। ऐरावत शुक्ल वर्ण और चतुर्दन्तविशिष्ट है। समुद्रके मन्थनकालपर यह उपजा था। यही पूर्व दिक्का गज है। इसका अपर नाम अभ्रमातङ्ग, ऐरावण, अभ्रभूवल्लभ, श्वेत–हस्ती, मल्लनाग, इन्द्रकुञ्जर, हस्तिमल्ल, सदादान,
सुदामा, श्वेतकुञ्जर, गजाग्रणी और नागमल्ल है।
<poem>"इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः।
आरुह्यौरावतं ब्रह्मन् प्रययावमराक्तीम्॥"</poem> {{smaller|(विष्णुपु॰ १।९।२५)}}
२ नागरङ्ग, नारंगी। ३ लकुचवृक्ष, बड़हर। ४ नाग–विशेष। (त्की॰) ५ इन्द्रधनु। ६ इरावती नदीके तीरका देश।
ऐरावतक (सं॰ पु॰) १ हस्तिशुण्डी, हाथीकी सूंड। २ नागरङ्ग वृक्ष, नारंगीका पेड़।
{{Multicol-break}}
ऐरावतक्षेत्र (सं॰ त्की॰) कावेरीनदीतीरस्थ एक प्राचीन तीर्थस्थान। ऐरावतक्षेत्रके माहात्मामें लिखा है—इन्द्रने वृत्रासुरवधजनित पापसे मुक्ति पानेको इस स्थानमें आ तपस्या और लिङ्गमूर्तिकी स्थापना की थी। शिवकी कृपासे इन्द्रका ऐरावत फिर जी उठा और इस स्थानका नाम ऐरावतक्षेत्र पड़ा।
ऐरावतपदी (सं॰ स्त्री॰) १ काकजङ्घा। २ महा ज्योतिष्मती लता, रतनजोत।
ऐरावती (सं॰ स्त्री॰) इरावत्–इयम्, इरावत्–अण्–ङीप्। १ विद्युत्, बिजली। २ ऐरावतकी स्त्री। ३ वटपत्रीवृच, बड़ा पथरचटा। ४ उत्तरमार्गके एक नक्षत्रका नामान्तर। ५ पञ्चालदेशीय नदीविशेष। आजकल इसे रावी कहते हैं। इसका वेदोक्त नाम परुष्णी है। ६ नागरङ्गवृक्ष, नारंगीका पेड़। ऐरावतीका पकाया हुआ रस अम्ल, उष्ण और सुगन्धित होता है। इससे वात, कास और श्वासका रोग छूट जाता है। {{smaller|(वैधकनिघण्टु)}}
ऐरिकिन (सं॰ त्की॰) एरण नगरका प्राचीन नाम। कनिंग्हम साहबके मतसे एरणका प्राचीन नाम एरकैन है। {{smaller|एरण देखो।}}
ऐरिण (सं॰ त्की॰) इरिणे ऊषरभूमौ भवम्, इरिण–अण्। सैन्धव ल़वण, पांशुलवण।
ऐसे-मध्यप्रान्त के मंडला जिलेका एक सरकारो
जंगल। यह श्रचा॰ २२३८ से २२४० उ० तथा
देशा० ८०० ४३ ४५ से ८० ४६ ४५ पू० तक
बुनेर चोर हाल नदोके सङ्गमपर पति है।
ऐरोमें साखू ख ूब होती है ।
येरेव (स को०) इराक १ मय, शराब
२ एलवालुक, एक मनुदार चोन २ वादि
अनाज वगैरह ।
ऐर्म्य (सं० क्लो० ) इमीय हितम्, इर्म ष्यञ् । १ सुश्रु-
- तोक्त अच्चनविशेष, किसी किस्म का काजल या सुरमा ।
(वि०) २ चत पूरचके निमित्त लाभदायक, जख्म
को सुखाने काबिल।
ऐल (सं० पु०) इलावा पुमान्, लाय्
१ इलापुत्र। इनका अन्य नाम पुरुरवा है। यह<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ऐरंमद (सं॰ पु॰) देवमुनिके अपत्य। इन्होंने ऋग्वेदके मन्त्र बनाये थे।
ऐरंमदीय (सं॰ त्की॰) ब्रह्मलोकका एक समुद्र।
ऐरक्य (सं॰ त्रि॰) एरका–ण्य। एरका–जात। {{smaller|एरका देखो।}}
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ऐरालू (हिं॰ पु॰) इन्द्रवारुणी विशेष, किसी किस्मकी ककड़ी। यह तरबूज–जैसा रहता और पहाड़पर कुमाऊंसे सिकिमतक उपजता है।
ऐरावण (सं॰ पु॰) इरया जलेन वनति शब्दायते, इरा–वन पचांद्यच्; अथवा इरा सुरा वनमुदकं यस्मिन तत्र भवः, अण्। १ ऐरावती हस्ती। २ जैनमतानु–सार जम्बुद्दीपका सप्तम वर्ष। {{smaller|(जैनहरि॰ ५।१८)}}
ऐरावत (सं॰ पु॰) इरा जलानि सन्त्यत्र, मतुप् मस्य वः, इरावान् समुद्रः तत्र भवः अण् इरावत्या विद्यतोऽयम्। १ इन्द्रहस्ती। ऐरावत शुक्ल वर्ण और चतुर्दन्तविशिष्ट है। समुद्रके मन्थनकालपर यह उपजा था। यही पूर्व दिक्का गज है। इसका अपर नाम अभ्रमातङ्ग, ऐरावण, अभ्रभूवल्लभ, श्वेत–हस्ती, मल्लनाग, इन्द्रकुञ्जर, हस्तिमल्ल, सदादान,
सुदामा, श्वेतकुञ्जर, गजाग्रणी और नागमल्ल है।
<poem>"इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः।
आरुह्यौरावतं ब्रह्मन् प्रययावमराक्तीम्॥"</poem> {{smaller|(विष्णुपु॰ १।९।२५)}}
२ नागरङ्ग, नारंगी। ३ लकुचवृक्ष, बड़हर। ४ नाग–विशेष। (त्की॰) ५ इन्द्रधनु। ६ इरावती नदीके तीरका देश।
ऐरावतक (सं॰ पु॰) १ हस्तिशुण्डी, हाथीकी सूंड। २ नागरङ्ग वृक्ष, नारंगीका पेड़।
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ऐरावतक्षेत्र (सं॰ त्की॰) कावेरीनदीतीरस्थ एक प्राचीन तीर्थस्थान। ऐरावतक्षेत्रके माहात्मामें लिखा है—इन्द्रने वृत्रासुरवधजनित पापसे मुक्ति पानेको इस स्थानमें आ तपस्या और लिङ्गमूर्तिकी स्थापना की थी। शिवकी कृपासे इन्द्रका ऐरावत फिर जी उठा और इस स्थानका नाम ऐरावतक्षेत्र पड़ा।
ऐरावतपदी (सं॰ स्त्री॰) १ काकजङ्घा। २ महा ज्योतिष्मती लता, रतनजोत।
ऐरावती (सं॰ स्त्री॰) इरावत्–इयम्, इरावत्–अण्–ङीप्। १ विद्युत्, बिजली। २ ऐरावतकी स्त्री। ३ वटपत्रीवृच, बड़ा पथरचटा। ४ उत्तरमार्गके एक नक्षत्रका नामान्तर। ५ पञ्चालदेशीय नदीविशेष। आजकल इसे रावी कहते हैं। इसका वेदोक्त नाम परुष्णी है। ६ नागरङ्गवृक्ष, नारंगीका पेड़। ऐरावतीका पकाया हुआ रस अम्ल, उष्ण और सुगन्धित होता है। इससे वात, कास और श्वासका रोग छूट जाता है। {{smaller|(वैधकनिघण्टु)}}
ऐरिकिन (सं॰ त्की॰) एरण नगरका प्राचीन नाम। कनिंग्हम साहबके मतसे एरणका प्राचीन नाम एरकैन है। {{smaller|एरण देखो।}}
ऐरिण (सं॰ त्की॰) इरिणे ऊषरभूमौ भवम्, इरिण–अण्। सैन्धव ल़वण, पांशुलवण।
ऐरी—मध्यप्रान्तके मंडला ज़िलेका एक सरकारी जंगल। यह अक्षा॰ २२°३८’ से २२°४०’ उ० तथा
देशा० ८०० ४३ ४५ से ८० ४६ ४५ पू० तक
बुनेर चोर हाल नदोके सङ्गमपर पति है।
ऐरोमें साखू ख ूब होती है ।
येरेव (स को०) इराक १ मय, शराब
२ एलवालुक, एक मनुदार चोन २ वादि
अनाज वगैरह ।
ऐर्म्य (सं० क्लो० ) इमीय हितम्, इर्म ष्यञ् । १ सुश्रु-
- तोक्त अच्चनविशेष, किसी किस्म का काजल या सुरमा ।
(वि०) २ चत पूरचके निमित्त लाभदायक, जख्म
को सुखाने काबिल।
ऐल (सं० पु०) इलावा पुमान्, लाय्
१ इलापुत्र। इनका अन्य नाम पुरुरवा है। यह<noinclude>{{Multicol-end}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३६
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2026-07-14T18:23:07Z
आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओम्|५३५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अथवा प्रणव शब्दका उल्लेख है। इससे समझ पड़ता-
वेदको संहिता अर्थात् प्राचीनतम भागके साथ साथ
ओमका आविर्भाव हुआ है । उसी गणनातोत कालसे
ऋषियोंने भारतव प्रचार करनेको उद्योग लगाया।
ऋग्वेद सरेय ब्राह्मण में लिखा है
प्रतिगर एवं तथेति गाथाया श्रीमिति वै देवं तथेति मानुषम् ।" ( अ१८ )
सकल वेदोंकी प्राय: सकल हो उपनिषदों में घोम्
पर कुछ न कुछ लिखा और उसके पाठसे कई प्रकार
श्री गूढार्थ प्रतिपादित था । यथा-
है
१म – सेतु । श्रथर्ववेदको संहिता में श्रम् 'सेतु'
जैसा निर्दिष्ट है । (६१०, ८४) २य - मनं । ( छान्दोग्य )
श्य—काय । ( छान्दोग्य ) ४ थे - रथ । (कैवी उप० २६० )
। (श्वेताश्वतर २८ ) ६४ – उद्गोथ । (छान्दोग्य १1१)
५म—– उडुग
७म - खास । (कान्दोग्य ७१२ ) दम - अग्नि हम - तेजः ।
“तेजो प्रथममोङ्कारात्मकमासीत् । तत्तेजोऽनेनैवोमित्येव तपव्युनति ।”
(मैवी उप०) १० - ज्योतिः । "दीपातीम् ज्योतिः प्रकाशना
ज्योतिः । प्रणवाख्यप्रणेतारमरूपो वोतनिद्रो विजरो विमृत्य ु र्विशोकी
भवतीत्य वं ह्याह । ” (मैत्री उप० ६२५) ११ - वाक्य । १२ - शब्द ।
(छान्दोग्य २:२३) १३ - रस तैत्तिरीय उप० २७) १४ - जल ।
"आपी ज्योतिरसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् " (मैवी उप० ६।१५)
१५ - मिथुन । ( छान्दोग्य ११६ ) १६ - ज्ञेय । ( योगशास्त्र )
१७ - यूप ।
।” (प्राणाग्रिोव उप० ) १८ – सर्व ।
। “बोङ्कारो यूपः
"ओमिति ब्रह्म । श्रमितोदं सर्वम्।” ( तैत्तिरीय उप० १८ )
ऊपरौ अर्थो से स्पष्ट समझ पड़ता, कि वही
विमा है।
२०- खोकारवाक्य । २१ - अनु-
१८ - आरम्भ |
मति २२ – अपाकृति। २२ – बखोकार ।
ब्रह्मको महिमा प्रकाश करनेको 'थोम्' मन्द
नाना अर्थों में व्यवहृत हुआ है। भिन्न भिन्न उप-
निषविषयका विस्तर प्रमाण मिलता है।
"मोमित्येतदचरमुद्दोथमुपास्रोत ।
श्रोमिति द्वायति तस्योपव्याख्यानम् । ” ( छान्दोग्य ३ १११ )
“श्रोमित्ये तदचरमुदृगौथः तहा एतन्मिथुन ं वागेवर्क प्राय: साम यहा
च प्रायश्चके च साम च ( छान्दोग्य २२१५ )
उपासना
करना
पचरवरूप उद्गीथ 'ॐ' को
चाहिये। क्योंकि 'ॐ' प्रचर से हो प्रारम्भ कर साम
{{Multicol-break}}
प्रवृति गाये जाते है इसलिये रोष
हैं।
है चोहारको व्याख्या करना कर्तव्य है।
:
उहोथ
वाक्य हो
डोनेसे प
ऋक्, प्राण हो साम और 'ॐ' अक्षर हो
वाक्य एवं प्राण ऋक् तथा सामका कारण
और साम शब्द राय मिथुन (१)
उगीय है।
" तथा एतन्मिय नमी मिये तस्मिन्नवरे जाते यदा में मिथुनी
समागच्छत आयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् " " कामानां
भवति य एतदेव विद्यानचरमुद्गीथमु गस्तं " ( छान्दोग्यउप० १६० )
और प्राण-
जैसे पुरुष परस्पर मिलने कामति क
वाक्यरूप स्त्री
हातो, वैसे हो जब
रूप पुरुषका मिथुन अर्थात् मिलन मंडला, तब
उनको परस्पर काम मिलता है। (१६) जो
विद्दान् व्यक्ति इस मतको देख उहोथ ओङ्कारको
उपासना करता, वह जब जो चाहता, वही फल पा
जाता है। (शश७ )
तंत्तिरीय उपनिषद
-
“श्रोमिति ब्रह्म । श्रमितोद सर्वम् श्रोमित्येतदनुति व्य वा
अप्यो श्रावयेव्या श्रावयन्ति । श्रमिति सामानि गायन्ति ओं शामिति
शस्त्राणि शंसन्ति । चामित्यध्वर्यु प्रतिगरं प्रतिग्टयति । श्रमिति ब्रह्मा
प्रसीति । श्रमित्यग्नि होव मनुजानाति । श्रमिति ब्राह्मणः प्रवचावाद |
ब्रह्ममा, वानोति ब्रह्म वो प्राप्नोति।” (१)
श्रोङ्कार हो ब्रह्म है। इस संसार सकल हो
श्रोङ्कार है । सकल कार्योंके पादिमें प्रोङ्कार प्रयोग
करना चाहिये। कोई वैदिक विषय सुनाने में प्रथम
हो प्रोङ्कार उच्चारण करना पड़ेगा । श्रोङ्कार प्रयोग
पूर्वक सामगान किया जाता है । शास्त्र पढ़ने में
प्रथम 'ॐ श' वाक्य बोलते हैं। अध्वर्युको मन्त्र
पढ़ते समय पहले ॐ उच्चारण कर लेना चाहिये ।
ब्रह्म कमर से पूर्व 'ॐ' शब्द बोलना पड़ता है।
ॐ शब्द उच्चारण कर अग्निहोत्र याग करते हैं।
पोद्दार उचारणपूर्वक वेदाध्ययन करनेमे वेदविद्या
और ब्रह्मविद्या दोनों मिलती हैं।
a
" परवापरच ब्रह्म यदोद्धारस्तस्मादिद्दाने तेदेवायतने नैकवरमन्वे ति | श
स यद्येकमावमभित्र्यायोत स तेन व संवेदितस्त यमेव जगन्यामभिसम्पद्यते ।
तसृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तव तरसा ब्रह्मचर्येण श्रइया सम्पन्नो महि-
मान मनुभवति । अथ यदि हिमावस्य मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिच यजुर्भि
रुन्नोयते । सोम लोकं स सोमचोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते । ४ ।<noinclude>{{Multicol-end}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३७
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५३६|ओम्|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>यः पुनरेतत् विमावेणैवीमि ते न वाचरेण परं पुरुषमभिध्यायोत स तेजसि
सत्य सम्पन्नः । यथा पादोदरचा विनिमुद्यते एवं ह वै स पाद्मना
विनिर्मुक्तः स सामभिकत्रीयते ब्रह्मलोक स एतस्माज्जीवधनात् परात्परं
पुरिथ्यं पुरुषमौचते तदेतो की भवतः । ५ । तिखो मावा मूर्त्तिमत्य:
प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः । क्रियासु वाह्याभ्यन्तरमध्यमासु समग्रक्
प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः : ६ भिरेतं यजुर्भिरन्तरिच' स सामभिर्यत्तत्
कवयो वेदयन्ते । तमी रवायतने नान्वेति विधान् यत्तच्छान्तमजरम
मृतमभय' परचेति ॥ ( प्रश्नोपनिषत् ५ प्रश्र )
ओङ्कार हो पर और अपर ब्रह्म है। विद्वान् इस
श्रङ्कार ( श्रोङ्कारको उपासना ) द्वारा पर और
अपर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं । २ । जो व्यक्ति एकमात्रा-
विशिष्ट ॐकारको उपासना उठाता, वह अति सत्वर
पृथिवी पर जन्म पाता है। श्रोङ्कारको प्रथम मात्रा
वेदस्वरूप है। प्रथम मात्रा हो उपासकको मनुष्य-
लोक पहुंचाती है। (प्रथम मात्राको उपासना करने से
मनुष्यलोक मिलता है) इस मनुष्यलोकमें वह
उपासक ब्रह्मचर्यं
ब्रह्मचर्य एवं श्रहासम्पन्न हो नाना-
विध महिमा अनुभव करता है । ३ । तो व्यक्ति
दिमाया विशिष्ट पोहारको उपासना करेगा, वह
यजुर्वेदस्वरूप द्विमात्रा द्वारा अन्तरिक्ष लोक पहुँ-
चेगा; फिर सोमलोक में नानाविध विभूति अनु
भव कर इहलोकको चलेगा । ४ । जो व्यक्ति
विमात्राविशिष्ट श्रङ्गार द्वारा उस परमपुरुषको
ध्यान करता, वह सूर्यरूप तेजःसम्पन्न बनता है।
जैसे सर्प प्राचीन चर्म छोड़ कष्टसे छूटता, वैसे ही
उक्त उपासक भी सामरूप श्रोङ्कारसे ब्रह्मलोक
पहुंचता और जीवसमष्टिरूप हिरण्यगर्भसे उत्-
कुष्ट सर्व शरीरानुप्रविष्ट परब्रह्मको देख सकता
है। उसी पोद्धारको मूर्तिमतो तीन मात्रा प्रकार,
उकार और मकार हैं। वह तीनों आत्मा ध्यानकी
क्रियामें लगा करती हैं। उक्त तीनों मात्राका परस्पर
सम्बन्ध विद्यमान है। उनका प्रयोग एकही विषय में
होता है। किसी क्रियामें उनका श्रप्रयोग नहीं
पड़ता, किन्तु समुदाय पाइ, चाभ्यन्तर चोर मध्यविध
क्रियामें प्रयोग चलता है। जो व्यक्ति श्रोङ्कारका
विभाग विशेषरूपमे जानता, वह कमी विचलित नहीं
होता 141 धानी क्वरूप प्रथम माताद्वारा लोक,
{{Multicol-break}}
यजुःखरूप द्वितीय मात्रा द्वारा अन्तरीक्ष एवं सामरूप
तृतीय मात्रा द्वारा ब्रह्मलोक और श्रोङ्काररूप साधन
द्वारा जरा-मृत्यु विहीन शान्त परब्रह्मपद पाते हैं । ७ ।
"ओमित्ये तदचरमिटं सर्व तस्योपव्याख्यान भूतं भवद्भविष्यदिति
सर्वमोङ्कार एव । यञ्चान्यत्रिकालातीतं तदपोद्धार एव।” “सर्व ह्येतदृ
ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ।” ( माण्ड क्योपनिषत् )
यह समुदय हो ब्रह्म है। हमारा जो जीव श्रात्मा
है, वह भी ब्रह्म है । उसी आत्माका अभिन्न ब्रह्म
चार अंश में विभक्त है ।
जैसे र प्रकृति सके विवर्त और पतिय ब्रह्म
विपक्षका पधिष्ठान उतरता हो पोकार
दय वाक्प्रपञ्चका एकमात्र आधार पड़ता है। ( अर्थात्
इस श्रोङ्कारमें हो समुदय वाक्य परिकल्पित है ) वह
पोङ्कार ब्रह्मस्वरूप है, क्योंकि पोहार ब्रह्मका अभि-
धायक है ( चभिधायक शब्द अभिधेयसे मित्र नहीं )
ओङ्कार विवर्त शब्दाभिधेय प्राण और घटादि सकल
हो आत्माका धर्म है । किन्तु उक्त प्राणादि श्रभिधायक
वाक्य से भिव नहीं। इससे लिखा है-
"वाचारम्भण' विकारो नामधेयम् ।”
अर्थात् वाक्य द्वारा आरब्ध वस्तुमात्र नाममात्र हैं ।
सुतरां अन्तरात्मक पोवार परिहयमान समुदयसे
अभिन्न है। 'ओङ्कारको समुदय' मान उपासना करने से
ब्रह्मप्राप्ति होती है अर्थात् श्रोङ्कारको उपासना
जब चित्त निर्मल रहेगा, सभी ब्रह्म रूपसे समझ
पड़ेगा। फिर ब्रह्मपद मिलनेमें विलम्ब नहीं होता ।
यह पोहार ब्रह्मज्ञानको प्राप्तिका उपाय होनेसे ब्रह्मका
निकटवर्ती है । अतीत. भविष्यत् और वर्तमान-
हमारा सब ज्ञानगम्य ओङ्कार हो है।
"सोऽयमात्माऽध्यचर मोङ्कारोऽधिमाव पादामावामाबाच पादा अकार
उकारो मकार इति । ८ जागरितस्थानी वैश्वानरोऽकारः । प्रथमा मावा-
रादिमत्वाद्दाप्रोति ह वै सर्वान् कामानादिय भवति य एवं वेद | 21 स्वप्रस्थान-
तेजस डकारो द्वितौया मावोत्कर्षादुभयत्वाहोत्कर्ष ति ह व ज्ञानसन्त
समानश्च भवति नास्या ब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद । १० । सुषुप्तस्थान:
प्राज्ञो मकारस्त तोया मात्मा मितेरपोतेर्वा मिनोति वा इदं सर्वमपीतिय
भवति च एव वेद । ११ । अमावश्यतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत
एवमोङ्कार चात्मव स विशत्यात्मनात्मान' य एवं वेद। १२।”
वह आत्मा अक्षरको अधिकार कर अवस्थित है।<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१९४
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अज'''|'''१८७'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>होनेपर दुग्धाभाव के कारण वह सबल नहीं होने पातीं। अधिक सन्तान होने पर कई जगह एकाध बच्चा मर जाता है। बकरीका दूध सहजमें परिपाक होता, जिसके कारण रुग्णव्यक्तिको बहुत ही सुपथ्य और लाभदायक है ; विशेषतः कासरोगोके पक्षमें यह बहुत हितकर है। वैद्यक ग्रन्थोंके मतसे बकरीका दूध मधुर, शीतल और धारक होता है। इसे पीनेसे क्षुधा को वृद्धि होती, रक्तपित्त और क्षयकास नष्ट हो जाता है। बकरी कटु और तिक्त द्रव्य खाती और सदा घूमती फिरती है । इसलिये इसके दुग्ध सेवनसे सकल दोष नष्ट होते हैं। प्रसवसे दश दिन पीछे बकरीका दूध पीनेको व्यवस्था लिखी है-
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>"अजागावी महिष्यश्च ब्राह्मणी च प्रसूतिका !<br>
शुध्यन्ति दिवसेरेव दशभिर्नात्र संशयः ॥ ( स्मृति )</poem>}}}}
कितनी ही बकरियोंके गलमें स्तन जैसा मांस-पिण्ड निकल आता है । यह स्तन निरर्थक है, इसमें दूध नहीं होता । इसीसे नीतिशास्त्रकारोंने एक उपमा देकर निर्गुण पुरुषको इस तरह निन्दा की है—
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते ।<br>
अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥”</poem>}}}}
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इस चतुर्वर्ग में जिसके एक भी नहीं, उस व्यक्तिका जन्म बकरीके गलेवाले स्तनको तरह निरर्थक है ।
बकरीके खुरका अग्रभाग नुकीला और तीखा होता, इसलिये थोड़ीसी सुविधा पानेसे उच्च प्राचीर और दुर्गम पर्वतके ऊपर यह चढ़ सकती है। दैवात् कभी उच्च स्थानसे पैर फिसल पड़नेपर यह भूमिको ओर मस्तक झुका देती है, इसीसे समस्त भार के ऊपर पड़ता और भूमिपर गिरनेसे इसके शरीरमें अधिक आघात नहीं लगता । कोई-कोई इतर जाति, लोगोंके दरवाज़े बकरी और बन्दर नचाते घूमा करते हैं । बकरीके खुरका अग्रभाग नुकीला होनेसे यह उनके चारो पैर एक ही जगह जमा एक साधारण छड़ीके ऊपर इसे खड़ा कर सकते हैं। हिमालय प्रदेश के लोग तिब्बत देशके साथ बाणिज्य
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>करते हैं । पथ दुर्गम है । पर्वतके ऊपर सङ्कीर्ण स्थान होकर कभी चढ़ना और कभी उतरना पड़ता है । उस जगह दूसरा कोई पशु यातायात कर नहीं सकता । इससे भूटानवासी बकरीको पीठपर पण्यद्रव्य लादकर अनायास ही उस दुर्गमपथ से गमनागमन करते हैं ।
बकरियां प्रायः सकल प्रकार उद्भिद खाती हैं । इनका अखाद्य कुछ भी देख नहीं पड़ता । कँटीला पेड़ चबाते भी इन्हें कोई कष्ट नहीं । किन्तु नवीन मञ्जरी और नूतन टणपर ही इनको कुछ अधिक रुचि होती है। यह प्रायः जल नहीं पोतीं । शरीरमें जल लगनेसे भी इन्हें अतिशय कष्ट मालूम होता है, इसीसे यह वृष्टिके समय घर से बाहर नहीं निकलतीं । शरीरमें अधिक जलस्पर्श होने से कभी- कभी इनके एक प्रकार रोग उत्पन्न हो जाता है। इस रोगसे सर्वाङ्गके लोम भर पड़ते हैं । ग्टहपालित बकरियां कितनी हो निरोह होती, किन्तु बड़े-बड़े मस्त बकरे बहुत उपद्रव करते हैं। स्त्रियों और बालक-बालिकाओं को इनको ठोकर खा धराशायी होना पड़ता है । हाथ में खाद्य द्रव्य देखते हो यह छोड़कर खा जाते हैं। मेंढ़ेके साथ लड़ाई होने से बकरा प्रायः जयी होता है। फिर भी, दोषको बात यही है, कि ठोकर मारते समय मेंढ़ा शिर नीचे को झुका छूटा चला आता, किन्तु बकरा शिर उठा ठोकर मारता है। इससे सावधान न हो सकते मेंढ़ेकी ठोकर बकरेको छाती या इसके पेटमें लगती है । बकरियां खेलते समय परस्पर मार-पीट मचाती हैं। सामनेके दोनो पैर उठा, गर्दन और शिर कुछ वक्र बना वह ऐसा भाव दिखाती हैं, मानो उसी ठोकर में ब्रह्माण्ड फटकर दो टुकड़े हो जायेगा । किन्तु इनका आडम्बर मात्र सार है, आघात करते समय दोनो केवल शृङ्ग-शृङ्गपर हलकी ठोकर लगाती हैं । इसीसे उद्भट कवियोंने कहा है-
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>"अजायुद्धे ऋषिश्रादे प्रभाते मेघडम्बरे ।<br>
दम्पत्योः कलहे चैव वारम्भे लघुक्रिया ॥ "</poem>}}}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१९५
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''१८८'''|'''अज '''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
</noinclude>बड़े-बड़े बकरीं और बकरियोंके सींगमें एक प्रकार कीट उत्पन्न होता है। बकरेके अन्त्र और पित्तकोषमें एक प्रकारको शिला भी उत्पन्न होती है । यह शिला अत्यन्त विषघ्न है, इससे पूर्वकालके लोग इसे औषधार्थ नाना रोगों में व्यवहार करते थे । इस देशमें बकरेके चमड़ेसे ढोलक, तबला, बायां प्रभृति वाद्ययन्त्र मढ़े जाते हैं, इसके सिवा इससे कोई दूसरा बड़ा काम नहीं निकलता इतर लोग जलद उतारे गये बकरेके चमड़ेको जलाकर खा डालते हैं । साधारण बकरेके बालका चित्रकार कलम बनाते हैं। बकरे उच्चस्थानपर सोना पसन्द करते हैं । इसीसे वह प्रायः भग्न प्राचीरपर सोते हैं । कितने ही लोग इस बातको कुलक्षण समझते हैं । वह कहते हैं, कि बकरा किसीको लक्ष्मीश्री देख नहीं सकता। इसको यही प्रार्थना है, कि गृहस्थका घर टूट जाये और यह उसके ऊपर सुखसे सोये ।
बकरेकी लेंडी सड़ाकर रखनेसे बाग और शस्य- क्षेत्रके लिये बढ़िया खाद होती है । यह गोबरको बनिस्बत अनेकांश में उत्कृष्ट है; किन्तु कृषकोंके मतसे भेंड़की लेंडीमें और भी अधिक तेज रहता है । वैद्य किसी-किसी रोगके मुष्टियोगमें बकरेको लेंडी देते हैं । फोड़ा शीघ्र न पकनेसे बकरेको लेंडी गर्म- कर वेदना-स्थलपर प्रलेप देना पड़ता है। पार्श्वशूल- में बकरेको लेंडी, हींग, अदरक, आतप चावल और असगंधका बकला एकमें पीसकर गर्म करे। थोड़ा उबाल आ जाने से यह औषध बेदना - स्थल पर लगाते ही पौड़ा घट जाती है। पक्षाघात रोगमें बकरेकी लेंडी पानीमें पकाकर इससे अवशाङ्ग मलनेपर थोड़ा उपकार होता है। कृत्रिम स्वर्ण प्रस्तुत करनेके लिये घोड़े और बकरेको विष्ठासे पारा मारना पड़ता है। स्वर्ण देखो। धोबी या रजक बकरे और भेड़की लेंड़ीसे कपड़े धोते हैं । इससे कितना ही मैल छूट जाता है । एकांतरा या ऐकाहिक ज्वर आने से अज्ञ लोग शनिवार किंवा मङ्गलवारको शेष- रात्निमें बकरेको रस्मो चुरा तिराहे में इसपर मूत्रत्याग करते हैं। किसीके मतसे, बकरेका खूंटा उखाड़
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
इसके गर्तमें मूत्रत्याग करनेसे भौतिक ज्वरका उपशम हो जाता है ।
यौवनकाल उपस्थित होनेपर बकरेके शरीरसे
बड़े ज़ोरमें बदबू निकलने लगती है। कितनी हीका अनुमान है, कि बकरेका कोष हो इस बदबूका प्रधान स्थान है । वैद्योंके मत से इस तरहके बदबूदार बकरे का सदा पास रखना कासरोगको शान्त करता है । खस्मौ या बकरीके शरीर में यह बदबू नहीं होती । अन्यान्य सकल प्राणियोंके मध्य में बकरा ही अधिक नपुंसक होता है । इसका प्रधान कारण अयोग्य मिलन है। जहां यह दोष नहीं, वहां अधिक नपुंसक बकरे नहीं उत्पन्न होते । नपुंसक बकरे मांस औषधमें काम आता है। हंसकी तरह बकरा भी सहजमें हौ अज्ञान किया जाता है। पीठके बल लिटाकर हंसकी आंखके पास एक लकड़ो घुमानेसे सांस एकबारगी ही रुक जाती और वह मुग्ध हो जाता है, फिर उठकर नहीं भागता । एक करवट लिटा और आंखें बन्द कर देनेपर फिर बकरेसे भी उठा नहीं जाता।
पूर्वकालसे भारतवर्षमें सभी लोग विशेष आदर- पूर्वक अजमांसको भोजन करते आये हैं । पुरोहित- को अजपञ्चौदन देनेसे यजमान खर्गलाभ करते हैं । आजकल जैसे गृहमें बन्धुबान्धव आने से हम तरह तरहको तरकारी मंगाते और पूरी- कचौड़ी बनवा हैं, वैसे हो पूर्व कालके ऋषि तपस्वी और ब्राह्मण किसीके घर पहुंचनेपर गृहस्थ तत्क्षणात् एक बकरा काट उन अभ्यागत व्यक्तियोंको भोजन कराते थे । उत्तर-चरितके चतुर्थाङ्गमें लिखा है—
{{blockcenter|{{x-smaller|“समांसं मधुपर्क इत्याम्नायं बहुमन्यमानाः श्रोवियायाभ्यागताय वत्सतरौं' महोक्ष' वा महाजं वा निर्वपन्ति गृहमेधिन इति हि धर्मस्वकाराः समामनन्ति।”}}}}
यह वेदविधि सम्मत है, कि स्नातकोंकी अभ्यर्थना- के लिये समांस मसुपर्क देना कर्तव्य है । गृहस्थ व्यक्ति बकरेको मारकर अभ्यागत ब्राह्मणोंको भोजन करायें । धर्मशास्त्रकार इस विधिका आदर करते हैं।{{blockcenter|{{x-smaller|मधुपर्क शब्दमें इसका विशेष विवरण देखी।...}}}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude>
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Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''१८८'''|'''अज '''}}
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</noinclude>बड़े-बड़े बकरीं और बकरियोंके सींगमें एक प्रकार कीट उत्पन्न होता है। बकरेके अन्त्र और पित्तकोषमें एक प्रकारको शिला भी उत्पन्न होती है । यह शिला अत्यन्त विषघ्न है, इससे पूर्वकालके लोग इसे औषधार्थ नाना रोगों में व्यवहार करते थे । इस देशमें बकरेके चमड़ेसे ढोलक, तबला, बायां प्रभृति वाद्ययन्त्र मढ़े जाते हैं, इसके सिवा इससे कोई दूसरा बड़ा काम नहीं निकलता इतर लोग जलद उतारे गये बकरेके चमड़ेको जलाकर खा डालते हैं । साधारण बकरेके बालका चित्रकार कलम बनाते हैं। बकरे उच्चस्थानपर सोना पसन्द करते हैं । इसीसे वह प्रायः भग्न प्राचीरपर सोते हैं । कितने ही लोग इस बातको कुलक्षण समझते हैं । वह कहते हैं, कि बकरा किसीको लक्ष्मीश्री देख नहीं सकता। इसको यही प्रार्थना है, कि गृहस्थका घर टूट जाये और यह उसके ऊपर सुखसे सोये ।
बकरेकी लेंडी सड़ाकर रखनेसे बाग और शस्य- क्षेत्रके लिये बढ़िया खाद होती है । यह गोबरको बनिस्बत अनेकांश में उत्कृष्ट है; किन्तु कृषकोंके मतसे भेंड़की लेंडीमें और भी अधिक तेज रहता है । वैद्य किसी-किसी रोगके मुष्टियोगमें बकरेको लेंडी देते हैं । फोड़ा शीघ्र न पकनेसे बकरेको लेंडी गर्म- कर वेदना-स्थलपर प्रलेप देना पड़ता है। पार्श्वशूल- में बकरेको लेंडी, हींग, अदरक, आतप चावल और असगंधका बकला एकमें पीसकर गर्म करे। थोड़ा उबाल आ जाने से यह औषध बेदना - स्थल पर लगाते ही पौड़ा घट जाती है। पक्षाघात रोगमें बकरेकी लेंडी पानीमें पकाकर इससे अवशाङ्ग मलनेपर थोड़ा उपकार होता है। कृत्रिम स्वर्ण प्रस्तुत करनेके लिये घोड़े और बकरेको विष्ठासे पारा मारना पड़ता है। स्वर्ण देखो। धोबी या रजक बकरे और भेड़की लेंड़ीसे कपड़े धोते हैं । इससे कितना ही मैल छूट जाता है । एकांतरा या ऐकाहिक ज्वर आने से अज्ञ लोग शनिवार किंवा मङ्गलवारको शेष- रात्निमें बकरेको रस्मो चुरा तिराहे में इसपर मूत्रत्याग करते हैं। किसीके मतसे, बकरेका खूंटा उखाड़
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इसके गर्तमें मूत्रत्याग करनेसे भौतिक ज्वरका उपशम हो जाता है ।
यौवनकाल उपस्थित होनेपर बकरेके शरीरसे
बड़े ज़ोरमें बदबू निकलने लगती है। कितनी हीका अनुमान है, कि बकरेका कोष हो इस बदबूका प्रधान स्थान है । वैद्योंके मत से इस तरहके बदबूदार बकरे का सदा पास रखना कासरोगको शान्त करता है । खस्मौ या बकरीके शरीर में यह बदबू नहीं होती । अन्यान्य सकल प्राणियोंके मध्य में बकरा ही अधिक नपुंसक होता है । इसका प्रधान कारण अयोग्य मिलन है। जहां यह दोष नहीं, वहां अधिक नपुंसक बकरे नहीं उत्पन्न होते । नपुंसक बकरे मांस औषधमें काम आता है। हंसकी तरह बकरा भी सहजमें हौ अज्ञान किया जाता है। पीठके बल लिटाकर हंसकी आंखके पास एक लकड़ो घुमानेसे सांस एकबारगी ही रुक जाती और वह मुग्ध हो जाता है, फिर उठकर नहीं भागता । एक करवट लिटा और आंखें बन्द कर देनेपर फिर बकरेसे भी उठा नहीं जाता।
पूर्वकालसे भारतवर्षमें सभी लोग विशेष आदर- पूर्वक अजमांसको भोजन करते आये हैं । पुरोहित- को अजपञ्चौदन देनेसे यजमान खर्गलाभ करते हैं । आजकल जैसे गृहमें बन्धुबान्धव आने से हम तरह तरहको तरकारी मंगाते और पूरी- कचौड़ी बनवा हैं, वैसे हो पूर्व कालके ऋषि तपस्वी और ब्राह्मण किसीके घर पहुंचनेपर गृहस्थ तत्क्षणात् एक बकरा काट उन अभ्यागत व्यक्तियोंको भोजन कराते थे । उत्तर-चरितके चतुर्थाङ्गमें लिखा है—
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यह वेदविधि सम्मत है, कि स्नातकोंकी अभ्यर्थना- के लिये समांस मसुपर्क देना कर्तव्य है । गृहस्थ व्यक्ति बकरेको मारकर अभ्यागत ब्राह्मणोंको भोजन करायें । धर्मशास्त्रकार इस विधिका आदर करते हैं ।{{x-smaller|मधुपर्क शब्दमें इसका विशेष विवरण देखी।...}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१९६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh||'''अज'''|'''१८६'''}}</noinclude>प्रायः इस देश में मांस इन कई प्रकारों से रँधकर खाते हैं—१ साधारण कोरमा, २ कलिया, ३ खोरमा, ४ पोलाव, ५ कवाब, ६ भुना हुआ, ७ बड़ा या पेठा। बच्चे बकरे का मांस खाने में सबसे अच्छा बताया गया है।
आजकाल बकरा, मेंढा और भैंसा, यही तीन जन्तु बताने के निकट बलि दिये जाते हैं। दूसरे जन्तु अधिक बलि नहीं चढ़ाए जाते। फिर कभी किसी-किसी स्थान में मुर्गी, कबूतर और शूकर की भी बलि दी जाती है। किन्तु बकरे की बलि ही अधिक चलित है। जिस बकरे के सींग निकल आए हों, उसके शरीर में कहीं छत न हो और पहले जिसे गालादि किसी पशु ने काटा भी न हो, वही बकरा बिकने योग्य होता है। भविष्यपुराण में लिखा है—
"अजानां महिषाणाञ्च मेषाणाञ्च तथाविधां।<br>
प्रीणयेत् विधिषद् मां भक्षयेन्मित्रवर्यकैः॥<br>
दुर्वाया दर्र्व्वेन पूज्यं दर्भमावाद्येपूजयेत्।<br>
मन्त्राणां शर्कंरं श्रेष्ठं कर्मणादक्षितंयुतं ॥<br>
पूजकस्तु स्वयं नैनं भक्षनादार्थं कृतम्।<br>
सर्वव्याध्यावदारन्तु मथिवागंनिवारितम् ॥"
बकरे, मेंढे और भैंसे के शोणितमांस से दुर्गा को विधिपूर्वक तुष्ट करे। दुर्गा के दर्शन करने से जो पुण्य होता है। किन्तु दर्शन की अपेक्षा वन्दनादि द्वारा और भी अधिक पुण्य होता है। फिर, वन्दनादि की अपेक्षा दुर्गा को स्पर्श करने से फल अधिक है। स्पर्श को देखते पूजा में अधिक पुण्य है। फिर पूजा की अपेक्षा देवी को स्नान कराने से और भी फल-लाभ होता है। स्नान कराने की अपेक्षा तर्पण अधिक श्रेष्ठ है। फिर जिस पूजा में मांसदान के लिये भैंसे और बकरे की बलि दी जाती है, उसका फल सबसे अधिक है।
किन्तु देवी की रुचि बकरे के मांस पर ही अधिक रहती है—
"कलभा दश्वगोवि प्रविरेव हृतार्पिंता।"
बकरे के रक्त से तर्पण करने पर वह देवी दस वर्ष तक प्रीत रहती है। इसी संस्कार में यज्ञ से
पुण्यलाभ की आशा में अनेक हिन्दू ताली बजाते और नाचते-नाचते जयध्वनि करते हैं, जिसमें उन्हें कुछ भी मनःकष्ट नहीं होता। बकरा मारते समय यदि दो हाथ चलाने पड़ें या कटा हुआ मुण्ड देवान् बोल उठे, तो समझ में विपद् पड़ने की सम्भावना हो जाती है।
दो हाथों में बकरा कटने से, 'उलटा बुधा' कहाता है। अकास यही विश्वास है, कि दो हाथों में बकरा कटने से पूजा खण्डहीन हो जाती और इसलिये देवता बलि का ग्रहण नहीं करता। बकरे के उलटा होने से यजमान के घर में कोई विघ्न पड़ता है, इसलिये उस उलटे बकरे के मांस से होम करना होता है। होम करने से सकल दोष की शांति हो जाती है।
(गवि देखो।)
अज जाति साधारणतः नौ प्रकार की होती है। जैसे—१ जङ्गली, २ सामान्य गृहपालित, ३ मालटैकी, ४ सोरियाकी, ५ अङ्गोराकी, ६ कश्मीरी, ७ न्यूडियाकी, ८ नेपाली, और ९ सिनिदेशवाली।
यह बकरा—मध्य-एशिया के हिमालय और ककेसस् पर्वत प्रदेश में वास करता है। इस जातीय बकरे को
[चित्र: यहाँ पर एक सींग वाले बकरे का रेखाचित्र (Sketch) बना हुआ है]
गर्दन छोटी, सींग बड़े और पीठ टेढ़ी होती है। सर्वाङ्ग धूसरवर्ण लोम से आवृत्त, समझ पीठ की रीढ़ पर एक काली रेखा, पूँछ छोटी और पेट दाढ़ी भूरी होती है।
सामान्य गृहपालित बकरा—हमारे देश में दो प्रकार का देख पड़ता है। प्रथम,—नाना वर्ण का खर्चाहार बकरा। द्वितीय,—राम बकरा। बहुदेशादिका खर्चाहार बकरा प्रायः काले, सादे और मटमैले रङ्ग का होता है। प्रधानतः वह काले रङ्ग का ही अधिक देखने में आता है। इनमें कोई बकरी<noinclude></noinclude>
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2026-07-14T17:41:18Z
Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अज'''|'''१८६'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>प्रायः इस देश में मांस इन कई प्रकारों से रँधकर खाते हैं—१ साधारण कोरमा, २ कलिया, ३ खोरमा, ४ पोलाव, ५ कवाब, ६ भुना हुआ, ७ बड़ा या पेठा। बच्चे बकरे का मांस खाने में सबसे अच्छा बताया गया है।
आजकाल बकरा, मेंढा और भैंसा, यही तीन जन्तु बताने के निकट बलि दिये जाते हैं। दूसरे जन्तु अधिक बलि नहीं चढ़ाए जाते। फिर कभी किसी-किसी स्थान में मुर्गी, कबूतर और शूकर की भी बलि दी जाती है। किन्तु बकरे की बलि ही अधिक चलित है। जिस बकरे के सींग निकल आए हों, उसके शरीर में कहीं छत न हो और पहले जिसे गालादि किसी पशु ने काटा भी न हो, वही बकरा बिकने योग्य होता है। भविष्यपुराण में लिखा है—
{{Block center|<poem><small> "अजानां महिषाणाञ्च मेषाणाञ्च तथाविधां।<br>
प्रीणयेत् विधिषद् मां भक्षयेन्मित्रवर्यकैः॥<br>
दुर्वाया दर्र्व्वेन पूज्यं दर्भमावाद्येपूजयेत्।<br>
मन्त्राणां शर्कंरं श्रेष्ठं कर्मणादक्षितंयुतं ॥<br>
पूजकस्तु स्वयं नैनं भक्षनादार्थं कृतम्।<br>
सर्वव्याध्यावदारन्तु मथिवागंनिवारितम् ॥"</poem></small>}}
बकरे, मेंढे और भैंसे के शोणितमांस से दुर्गा को विधिपूर्वक तुष्ट करे। दुर्गा के दर्शन करने से जो पुण्य होता है। किन्तु दर्शन की अपेक्षा वन्दनादि द्वारा और भी अधिक पुण्य होता है। फिर, वन्दनादि की अपेक्षा दुर्गा को स्पर्श करने से फल अधिक है। स्पर्श को देखते पूजा में अधिक पुण्य है। फिर पूजा की अपेक्षा देवी को स्नान कराने से और भी फल-लाभ होता है। स्नान कराने की अपेक्षा तर्पण अधिक श्रेष्ठ है। फिर जिस पूजा में मांसदान के लिये भैंसे और बकरे की बलि दी जाती है, उसका फल सबसे अधिक है।
किन्तु देवी की रुचि बकरे के मांस पर ही अधिक रहती है—
</small>"कलभा दश्वगोवि प्रविरेव हृतार्पिंता।"</small>
बकरे के रक्त से तर्पण करने पर वह देवी दस वर्ष तक प्रीत रहती है। इसी संस्कार में वश से
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पुण्यलाभ की आशा में अनेक हिन्दू ताली बजाते और नाचते-नाचते जयध्वनि करते हैं, जिसमें उन्हें कुछ भी मनःकष्ट नहीं होता। बकरा मारते समय यदि दो हाथ चलाने पड़ें या कटा हुआ मुण्ड देवान् बोल उठे, तो समझ में विपद् पड़ने की सम्भावना हो जाती है।
दो हाथों में बकरा कटने से, 'उलटा बुधा' कहाता है। अकास यही विश्वास है, कि दो हाथों में बकरा कटने से पूजा खण्डहीन हो जाती और इसलिये देवता बलि का ग्रहण नहीं करता। बकरे के उलटा होने से यजमान के घर में कोई विघ्न पड़ता है, इसलिये उस उलटे बकरे के मांस से होम करना होता है। होम करने से सकल दोष की शांति हो जाती है।
</small>(बली देखो।)</small>
अज जाति साधारणतः नौ प्रकार की होती है। जैसे—१ जङ्गली, २ सामान्य गृहपालित, ३ मालटैकी, ४ सोरियाकी, ५ अङ्गोराकी, ६ कश्मीरी, ७ न्यूडियाकी, ८ नेपाली, और ९ सिनिदेशवाली।
<Small>वन्घ बकरा—</small>मध्य-एशिया के हिमालय और ककेसस् पर्वत प्रदेश में वास करता है। इस जातीय बकरे को
[चित्र: यहाँ पर एक सींग वाले बकरे का रेखाचित्र (Sketch) बना हुआ है]
गर्दन छोटी, सींग बड़े और पीठ टेढ़ी होती है। सर्वाङ्ग धूसरवर्ण लोम से आवृत्त, समझ पीठ की रीढ़ पर एक काली रेखा, पूँछ छोटी और पेट दाढ़ी भूरी होती है।
<Small>सामान्य गृहपालित बकरा—</small>हमारे देश में दो प्रकार का देख पड़ता है। प्रथम,—नाना वर्ण का खर्चाहार बकरा। द्वितीय,—राम बकरा। बहुदेशादिका खर्चाहार बकरा प्रायः काले, सादे और मटमैले रंग का होता है। प्रधानतः वह काले रङ्ग का ही अधिक देखने में आता है। इनमें कोई बकरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अज'''|'''१८६'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>प्रायः इस देश में मांस इन कई प्रकारों से रँधकर खाते हैं—१ साधारण कोरमा, २ कलिया, ३ खोरमा, ४ पोलाव, ५ कवाब, ६ भुना हुआ, ७ बड़ा या पेठा। बच्चे बकरे का मांस खाने में सबसे अच्छा बताया गया है।
आजकाल बकरा, मेंढा और भैंसा, यही तीन जन्तु बताने के निकट बलि दिये जाते हैं। दूसरे जन्तु अधिक बलि नहीं चढ़ाए जाते। फिर कभी किसी-किसी स्थान में मुर्गी, कबूतर और शूकर की भी बलि दी जाती है। किन्तु बकरे की बलि ही अधिक चलित है। जिस बकरे के सींग निकल आए हों, उसके शरीर में कहीं छत न हो और पहले जिसे गालादि किसी पशु ने काटा भी न हो, वही बकरा बिकने योग्य होता है। भविष्यपुराण में लिखा है—
{{Block center|<poem><small> "अजानां महिषाणाञ्च मेषाणाञ्च तथाविधां।<br>
प्रीणयेत् विधिषद् मां भक्षयेन्मित्रवर्यकैः॥<br>
दुर्वाया दर्र्व्वेन पूज्यं दर्भमावाद्येपूजयेत्।<br>
मन्त्राणां शर्कंरं श्रेष्ठं कर्मणादक्षितंयुतं ॥<br>
पूजकस्तु स्वयं नैनं भक्षनादार्थं कृतम्।<br>
सर्वव्याध्यावदारन्तु मथिवागंनिवारितम् ॥"</poem></small>}}
बकरे, मेंढे और भैंसे के शोणितमांस से दुर्गा को विधिपूर्वक तुष्ट करे। दुर्गा के दर्शन करने से जो पुण्य होता है। किन्तु दर्शन की अपेक्षा वन्दनादि द्वारा और भी अधिक पुण्य होता है। फिर, वन्दनादि की अपेक्षा दुर्गा को स्पर्श करने से फल अधिक है। स्पर्श को देखते पूजा में अधिक पुण्य है। फिर पूजा की अपेक्षा देवी को स्नान कराने से और भी फल-लाभ होता है। स्नान कराने की अपेक्षा तर्पण अधिक श्रेष्ठ है। फिर जिस पूजा में मांसदान के लिये भैंसे और बकरे की बलि दी जाती है, उसका फल सबसे अधिक है।
किन्तु देवी की रुचि बकरे के मांस पर ही अधिक रहती है—
<small>"कलभा दश्वगोवि प्रविरेव हृतार्पिंता।"</small>
बकरे के रक्त से तर्पण करने पर वह देवी दस वर्ष तक प्रीत रहती है। इसी संस्कार में वश से
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पुण्यलाभ की आशा में अनेक हिन्दू ताली बजाते और नाचते-नाचते जयध्वनि करते हैं, जिसमें उन्हें कुछ भी मनःकष्ट नहीं होता। बकरा मारते समय यदि दो हाथ चलाने पड़ें या कटा हुआ मुण्ड देवान् बोल उठे, तो समझ में विपद् पड़ने की सम्भावना हो जाती है।
दो हाथों में बकरा कटने से, 'उलटा बुधा' कहाता है। अकास यही विश्वास है, कि दो हाथों में बकरा कटने से पूजा खण्डहीन हो जाती और इसलिये देवता बलि का ग्रहण नहीं करता। बकरे के उलटा होने से यजमान के घर में कोई विघ्न पड़ता है, इसलिये उस उलटे बकरे के मांस से होम करना होता है। होम करने से सकल दोष की शांति हो जाती है।
</small>(बली देखो।)</small>
अज जाति साधारणतः नौ प्रकार की होती है। जैसे—१ जङ्गली, २ सामान्य गृहपालित, ३ मालटैकी, ४ सोरियाकी, ५ अङ्गोराकी, ६ कश्मीरी, ७ न्यूडियाकी, ८ नेपाली, और ९ सिनिदेशवाली।
<Small>वन्घ बकरा—</small>मध्य-एशिया के हिमालय और ककेसस् पर्वत प्रदेश में वास करता है। इस जातीय बकरे को
[चित्र: यहाँ पर एक सींग वाले बकरे का रेखाचित्र (Sketch) बना हुआ है]
गर्दन छोटी, सींग बड़े और पीठ टेढ़ी होती है। सर्वाङ्ग धूसरवर्ण लोम से आवृत्त, समझ पीठ की रीढ़ पर एक काली रेखा, पूँछ छोटी और पेट दाढ़ी भूरी होती है।
<Small>सामान्य गृहपालित बकरा—</small>हमारे देश में दो प्रकार का देख पड़ता है। प्रथम,—नाना वर्ण का खर्चाहार बकरा। द्वितीय,—राम बकरा। बहुदेशादिका खर्चाहार बकरा प्रायः काले, सादे और मटमैले रंग का होता है। प्रधानतः वह काले रङ्ग का ही अधिक देखने में आता है। इनमें कोई बकरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अज'''|'''१८६'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>प्रायः इस देश में मांस इन कई प्रकारों से रँधकर खाते हैं—१ साधारण कोरमा, २ कलिया, ३ खोरमा, ४ पोलाव, ५ कवाब, ६ भुना हुआ, ७ बड़ा या पेठा। बच्चे बकरे का मांस खाने में सबसे अच्छा बताया गया है।
आजकाल बकरा, मेंढा और भैंसा, यही तीन जन्तु बताने के निकट बलि दिये जाते हैं। दूसरे जन्तु अधिक बलि नहीं चढ़ाए जाते। फिर कभी किसी-किसी स्थान में मुर्गी, कबूतर और शूकर की भी बलि दी जाती है। किन्तु बकरे की बलि ही अधिक चलित है। जिस बकरे के सींग निकल आए हों, उसके शरीर में कहीं छत न हो और पहले जिसे गालादि किसी पशु ने काटा भी न हो, वही बकरा बिकने योग्य होता है। भविष्यपुराण में लिखा है—
{{c|{{x-smaller|<poem>"अजानां महिषाणाञ्च मेषाणाञ्च तथाविधां।<br>
प्रीणयेत् विधिषद् मां भक्षयेन्मित्रवर्यकैः॥<br>
दुर्वाया दर्र्व्वेन पूज्यं दर्भमावाद्येपूजयेत्।<br>
मन्त्राणां शर्कंरं श्रेष्ठं कर्मणादक्षितंयुतं ॥<br>
पूजकस्तु स्वयं नैनं भक्षनादार्थं कृतम्।<br>
सर्वव्याध्यावदारन्तु मथिवागंनिवारितम् ॥"</poem>}}}}
बकरे, मेंढे और भैंसे के शोणितमांस से दुर्गा को विधिपूर्वक तुष्ट करे। दुर्गा के दर्शन करने से जो पुण्य होता है। किन्तु दर्शन की अपेक्षा वन्दनादि द्वारा और भी अधिक पुण्य होता है। फिर, वन्दनादि की अपेक्षा दुर्गा को स्पर्श करने से फल अधिक है। स्पर्श को देखते पूजा में अधिक पुण्य है। फिर पूजा की अपेक्षा देवी को स्नान कराने से और भी फल-लाभ होता है। स्नान कराने की अपेक्षा तर्पण अधिक श्रेष्ठ है। फिर जिस पूजा में मांसदान के लिये भैंसे और बकरे की बलि दी जाती है, उसका फल सबसे अधिक है।
किन्तु देवी की रुचि बकरे के मांस पर ही अधिक रहती है—
{{C|<small>"अजस्य दश्वगोवि प्रविरेव हृतार्पिंता।"</small>}}
बकरे के रक्त से तर्पण करने पर वह देवी दस वर्ष तक प्रीत रहती है। इसी संस्कार में वश से
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पुण्यलाभ की आशा में अनेक हिन्दू ताली बजाते और नाचते-नाचते जयध्वनि करते हैं, जिसमें उन्हें कुछ भी मनःकष्ट नहीं होता। बकरा मारते समय यदि दो हाथ चलाने पड़ें या कटा हुआ मुण्ड देवान् बोल उठे, तो समझ में विपद् पड़ने की सम्भावना हो जाती है।
दो हाथों में बकरा कटने से, 'उलटा बुधा' कहाता है। अकास यही विश्वास है, कि दो हाथों में बकरा कटने से पूजा खण्डहीन हो जाती और इसलिये देवता बलि का ग्रहण नहीं करता। बकरे के उलटा होने से यजमान के घर में कोई विघ्न पड़ता है, इसलिये उस उलटे बकरे के मांस से होम करना होता है। होम करने से सकल दोष की शांति हो जाती है।
</small>(बली देखो।)</small>
अज जाति साधारणतः नौ प्रकार की होती है। जैसे—१ जङ्गली, २ सामान्य गृहपालित, ३ मालटैकी, ४ सोरियाकी, ५ अङ्गोराकी, ६ कश्मीरी, ७ न्यूडियाकी, ८ नेपाली, और ९ सिनिदेशवाली।
<Small>वन्घ बकरा—</small>मध्य-एशिया के हिमालय और ककेसस् पर्वत प्रदेश में वास करता है। इस जातीय बकरे को
[चित्र: यहाँ पर एक सींग वाले बकरे का रेखाचित्र (Sketch) बना हुआ है]
गर्दन छोटी, सींग बड़े और पीठ टेढ़ी होती है। सर्वाङ्ग धूसरवर्ण लोम से आवृत्त, समझ पीठ की रीढ़ पर एक काली रेखा, पूँछ छोटी और पेट दाढ़ी भूरी होती है।
<Small>सामान्य गृहपालित बकरा—</small>हमारे देश में दो प्रकार का देख पड़ता है। प्रथम,—नाना वर्ण का खर्चाहार बकरा। द्वितीय,—राम बकरा। बहुदेशादिका खर्चाहार बकरा प्रायः काले, सादे और मटमैले रंग का होता है। प्रधानतः वह काले रङ्ग का ही अधिक देखने में आता है। इनमें कोई बकरी
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१९७
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{𝐑𝐡|१६०|
अज}}</noinclude>छोटो, शरीरपर क्षुद्र-क्षुद्र लोम, अधिक दूध न देनेवाली होती ; किन्तु उसका मांस कोमल और सुखादु रहता है । बङ्गालमें रामबकरा अधिक नहीं होता । युक्तप्रदेश, विशेषत: राजपूताने और बुंदेलखण्डको गड़रिया जाति हो इन्हें अधिक पालती है । रामबकरा दीर्घाकार होता और उसके लम्ब कान गर्दनके पास लटका करते हैं । उनमें अधिकांश
बकरके शरौरसे लोम निकाल लेने पड़ते हैं । यथा- कालमें उन्हें न निकालनेसे वह आप हो भर जाते हैं । खस्मोके लोम हो सर्वोत्कृष्ट होते, जिनके नीचे बकरीके लोमका नम्बर है। किन्तु पाठेके लोम खस्मोके लोम जैसे अच्छे नहीं होते । एक- एक बकरे के
सादे ही होते ; फिर भी, भूरे और काले रङ्गके राम- बकरे कहीं-कहीं देख पड़ते हैं । राम बकरियां सामाना गोकी भांति दूध देती हैं। गड़रिये उसी दुग्धसे घृत प्रस्तुत करते हैं । पश्चिमको कितनी ही मिठाइयां बकरोके घोसे तय्यार होती हैं। राम बकरेका मांस कठिन होता और खानेमें भी अच्छा नहीं लगता ।
<Small>मालटावाले बकरेके—</small>लम्ब कान उसकी गर्दनके पास लटका करते हैं। इसके लोम श्वेतवर्ण होते और माथेमें सींग नहीं रहते ।
<Small>सौरियाका बकरा—</small> आजकल पृथिवीके अनेक स्थानों में देख पड़ता है। फिर भी, मिश्रदेश, भारत-समुद्रके उपकूल और मादागास्कर द्वीपमें ही वह अधिक मिलता है । उसके लोम और कान बहुत लम्बे होते हैं ।
<small>अङ्गोराका बकरा—</small> अनेकोंको विश्वास है, कि अङ्गोरेके और कश्मीरके बकरेंमें कोई प्रभेद नहीं। वह दोनो एक जातीय हैं, किन्तु वास्तविक रूपसे ऐसा नहीं है। अङ्गोरेके सींग गर्दनको ओरको वक्र, मुंह भेड़कासा और शरोरमें बड़े-बड़े लोम होते हैं। ऊपरके लोम पातला, मुलायम और चिकने रहते, जिनसे पशम निकलता है । नीचे के लोम क्षुद्र और बाल जैसे कठिन होते हैं । वसन्त कालके आरम्भमें
बकरेके
शरीर से प्रायः डेढ़ सेरतक पशम निकलता है । अङ्गी- रासे प्रति वर्ष २५००० मन पशम आता, जिसका मूल्प न्य नाधिक बीस लाख रुपये होता है । रूम-राज- धानी कुस्तुनतुनियासे भी विस्तर बकरे प्रतिवत्सर केप्-कलोनीको प्रेरित किये जाते हैं। एक-एक अच्छे बकरेका मूल्य प्रायः ढाई हजार रूपयेतक लगता है । फिर भी, सामान्य भांतिका बकरा पांच-छः सौ रूपयों- में बिकता है।
काश्मीरके बकरोंमें—अधिकांश ही हिमालयके उत्तर दिक्वाले तिव्वत प्रभृति स्थानोंसे लाये गये हैं। काश्मौरी बकरेका मुंह छोटा और ढालू, कान बड़े और कम लटकनेवाले; सींग लम्ब े और सीधे होते—जो कुछ वक्र हो एक दूसरेपर जाकर गिरते हैं। सर्वाङ्ग बड़े-बड़े लोमसे आवृत रहता है । ऊपरका लोम वाल जैसा कठिन और निम्नका लोम कोमल और पशम जैसा चिकना रहता है। शरत्- कालसे पशम जमने लगता ; वसन्तकालके आदितक भी अल्प-अल्प बढ़ा करता है । किन्तु इस समय
पशम काट लेना आवश्यक है। वह आप हो झरा जाता है। बकरके शरोरमें प्रायः आधसेर
उसे काट न लेनेसे काश्मीरवाले एक-एक उत्कृष्ट पशम उत्पन्न<noinclude></noinclude>
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<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>छोटो, शरीरपर क्षुद्र-क्षुद्र लोम, अधिक दूध न देनेवाली होती ; किन्तु उसका मांस कोमल और सुखादु रहता है । बङ्गालमें रामबकरा अधिक नहीं होता । युक्तप्रदेश, विशेषत: राजपूताने और बुंदेलखण्डको गड़रिया जाति हो इन्हें अधिक पालती है । रामबकरा दीर्घाकार होता और उसके लम्ब कान गर्दनके पास लटका करते हैं । उनमें अधिकांश
सादे ही होते ; फिर भी, भूरे और काले रङ्गके राम- बकरे कहीं-कहीं देख पड़ते हैं । राम बकरियां सामाना गोकी भांति दूध देती हैं। गड़रिये उसी दुग्धसे घृत प्रस्तुत करते हैं । पश्चिमको कितनी ही मिठाइयां बकरोके घोसे तय्यार होती हैं। राम बकरेका मांस कठिन होता और खानेमें भी अच्छा नहीं लगता ।
<Small>मालटावाले बकरेके—</small>लम्ब कान उसकी गर्दनके पास लटका करते हैं। इसके लोम श्वेतवर्ण होते और माथेमें सींग नहीं रहते ।
<Small>सौरियाका बकरा—</small> आजकल पृथिवीके अनेक स्थानों में देख पड़ता है। फिर भी, मिश्रदेश, भारत-समुद्रके उपकूल और मादागास्कर द्वीपमें ही वह अधिक मिलता है । उसके लोम और कान बहुत लम्बे होते हैं ।
<small>अङ्गोराका बकरा—</small> अनेकोंको विश्वास है, कि अङ्गोरेके और कश्मीरके बकरेंमें कोई प्रभेद नहीं। वह दोनो एक जातीय हैं, किन्तु वास्तविक रूपसे ऐसा नहीं है। अङ्गोरेके सींग गर्दनको ओरको वक्र, मुंह भेड़कासा और शरोरमें बड़े-बड़े लोम होते हैं। ऊपरके लोम पातला, मुलायम और चिकने रहते, जिनसे पशम निकलता है । नीचे के लोम क्षुद्र और बाल जैसे कठिन होते हैं । वसन्त कालके आरम्भमें
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बकरके शरीरसे लोम निकाल लेने पड़ते हैं । यथा- कालमें उन्हें न निकालनेसे वह आप हो भर जाते हैं । खस्मोके लोम हो सर्वोत्कृष्ट होते, जिनके नीचे बकरीके लोमका नम्बर है। किन्तु पाठेके लोम खस्मोके लोम जैसे अच्छे नहीं होते । एक- एक बकरे के
शरीर से प्रायः डेढ़ सेर तक पशम निकलता है। अंगोरा से प्रति वर्ष २५,००० मन पशम आता है, जिसका मूल्य न्यूनाधिक बीस लाख रुपये होता है। रूसी राजधानी कुस्तुनतुनिया से भी विस्तृत बकरे प्रतिवर्ष केप-कॉलोनी को प्रेषित किए जाते हैं। एक-एक अच्छे बकरे का मूल्य प्रायः ढाई हजार रुपये तक लगता है। फिर भी, सामान्य भांति का बकरा पांच-छः सौ रुपयों में बिकता है।
<small>काश्मीरके बकरोंमें—</small>अधिकांश ही हिमालयके उत्तर दिक्वाले तिव्वत प्रभृति स्थानोंसे लाये गये हैं। काश्मीरी बकरेका मुंह छोटा और ढालू, कान बड़े और कम लटकनेवाले; सींग लम्बें और सीधे होते—जो कुछ वक्र हो एक दूसरेपर जाकर गिरते हैं। सर्वाङ्ग बड़े-बड़े लोमसे आवृत रहता है । ऊपरका लोम वाल जैसा कठिन और निम्नका लोम कोमल और पशुम जैसा चिकना रहता है। शरत्- कालसे पशम जमने लगता ; वसन्तकालके आदितक भी अल्प-अल्प बढ़ा करता है । किन्तु इस समय
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१९८
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अज - अजकेशौ'''|१९१}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>
होता है। तिब्बत देश के बकरे का लोम सर्वोत्कृष्ट है। इसी से काश्मीर के अच्छे-अच्छे दुशाले प्रस्तुत होते हैं। काश्मीर के महाराज ने तिब्बत वाले बकरों के पशम का ठेका ले लिया है, दूसरा कोई उसे खरीद नहीं सकता। तिब्बत के समस्त पर्वतीय अंचलवाले लोग बकरे पालते हैं। लद्दाख, पोधक, गरो प्रभृति स्थानों में बहुत बकरे विद्यमान हैं। शाल और पशम देखो।
<Small>न्यवियाका बकरा</small>अफ्रीका के न्यूबिया, उत्तर मिश्र और अबीसीनिया प्रदेश में बहुत रूप से देखा पड़ता है। इसके पैर लम्बे और शरीर के लोम क्षुद्र होते हैं।
<Small>नेपाली और गिनी देश का बकरा</small> अधिक प्रसिद्ध नहीं है।
{{outdent|अज (सं० पु०) बुद्धिविशिष्ट शरीरस्थ जीव (जीवात्मा), जिस्म में रहने वाली अक्लमन्द रूह।}}
वेदान्त के मत में बुद्धिविशिष्ट पुरुष ही जीव और स्त्री ही प्रकृति। वेदान्तवादी कहते हैं कि परब्रह्म से जीव पृथक् नहीं है। जगत् में जीव एक है; उसके बुद्धिरूप नाम भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु नामभेद रहते भी वह पृथक् नहीं। जैसे आकाश एक है, फिर वही आकाश घट और पट दोनों स्थानों में रहने के कारण अनेक नहीं कहा जाता। इस प्रकार का उपाधिभेद रहते भी समस्त जीव एक ब्रह्म के सिवा और कुछ भी नहीं हैं। वैदान्तिकों का सिद्धान्त है—
{{c|{{smaller|"सर्वं खल्विदं ब्रह्म।"}}
यह समस्त जगत् केवल ब्रह्ममय है। जगत् के समस्त प्राणी ब्रह्म हैं, जगत् में सिवा ब्रह्म के और कुछ भी नहीं है। इसी से वेदान्तवादी मनुष्य को भी कहते हैं—
{{c|{{smaller|""तत्त्वमसि"}}}}
तुम ही वह ब्रह्म हो।
{{c|{{smaller|"निरीश्वराः सांख्याः।"}}}}
सांख्यवादी ईश्वर नहीं मानते, इसी से उनकी आँखोंमें वेदान्त का मत भ्रान्त जँचता है। सांख्यमतावलम्बी कहते हैं—'जगत् में अनेक जीव विद्यमान हैं। किन्तु यदि यह स्वीकार किया जाए कि जगत् में एक ही जीव है, तो एक के जन्म और मरण और सुख-दुःख से दूसरे को जन्म-मरण और सुख-दुःख क्यों
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
प्राप्त नहीं होता? इसलिये जीव का बहुत्व स्वीकार करना असंगत नहीं होता।'
नैयायिक कहते हैं कि ज्ञानादि वृत्तियाँ जीव के धर्म हैं। जीव अनेक हैं, वे नित्य और व्यापक रहते हैं। कर्तृत्व और भोक्तृत्व जीवों का ही धर्म है। जीव व्यापक होते भी (उनके अष्टलब्ध शरीर में...) संयोगविशेष को जन्म और वियोगविशेष को हम मृत्यु कहते हैं। नतुवा जीव का प्रकृत जन्म या उसकी प्रकृत मृत्यु नहीं है। ऐसी ही युक्ति द्वारा नैयायिक जीवात्मा का अजत्व प्रतिपन्न करने की चेष्टा करते हैं।}}
{{outdent|अजक (सं० पु०) अज-कै-क। पुरुरवा-वंश के सप्तम नृपति। विश्वामित्र ने इसी वंश में जन्म ग्रहण किया था।}}
{{outdent|अजकर्ण, अजकर्णक (सं० पु०) अजस्य कर्ण इव पर्णं यस्य। जिस वृक्ष में बकरे के कान जैसे पत्ते हों। १. सालवृक्ष। अजस्य कर्णः। ६-तत्। २. बकरे के कान। स्वार्थे कन्, अजकर्णक।}}
{{outdent|अजकव, अजकाव (सं० पु०, क्ली०) यो विष्णुः को ब्रह्मा तौ वाति त्रिपुरासुरवधद्वारा अनेन वा... ६-तत् (वाचं)। १. शिवधनुः। त्रिपुरासुर का वध कर महादेव ने इस धनुष द्वारा ब्रह्मा और विष्णु को तुष्ट किया था, इससे इसका नाम अजकव रखा गया। अजक वाति। २. बर्बरो वृक्ष। ३. जहरीला बिच्छू। <Small>बर्बरो देखो।</small>}}
{{outdent|अजका (सं० स्त्री०) अजस्य विकारः, श्रवयवः, गलेस्तनः, विकारार्थे कन्। १. छागगलस्थित स्तनाकार मांसपिण्ड, बकरे के गले में स्तन जैसा मांस का लोथड़ा। २. बकरे की विष्ठा या उसकी लेंडी।}}
{{outdent|अजकाजात (सं० पु०) अजकेव जातः, ५-तत्। रोगविशेष। रक्तवर्ण व्रण। आँख को लाल फूली, नाखूना।}}
{{outdent|अजकाव (सं० पु०, क्ली०) १. यज्ञीय पात्र, यज्ञ का बर्तन। २. रोगविशेष, एक किस्म की बीमारी। अजकौ विष्णु-ब्रह्माणौ अवति अच्। ३. शिवधनुः, महादेव का धनुष।}}
{{outdent|अजकेशी (सं० स्त्री०) नीलीवृक्ष।}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अज - अजकेशौ'''|१९१}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>
होता है। तिब्बत देश के बकरे का लोम सर्वोत्कृष्ट है। इसी से काश्मीर के अच्छे-अच्छे दुशाले प्रस्तुत होते हैं। काश्मीर के महाराज ने तिब्बत वाले बकरों के पशम का ठेका ले लिया है, दूसरा कोई उसे खरीद नहीं सकता। तिब्बत के समस्त पर्वतीय अंचलवाले लोग बकरे पालते हैं। लद्दाख, पोधक, गरो प्रभृति स्थानों में बहुत बकरे विद्यमान हैं। शाल और पशम देखो।
<Small>न्यवियाका बकरा</small>अफ्रीका के न्यूबिया, उत्तर मिश्र और अबीसीनिया प्रदेश में बहुत रूप से देखा पड़ता है। इसके पैर लम्बे और शरीर के लोम क्षुद्र होते हैं।
<Small>नेपाली और गिनी देश का बकरा</small> अधिक प्रसिद्ध नहीं है।
{{outdent|अज (सं० पु०) बुद्धिविशिष्ट शरीरस्थ जीव (जीवात्मा), जिस्म में रहने वाली अक्लमन्द रूह।}}
वेदान्त के मत में बुद्धिविशिष्ट पुरुष ही जीव और स्त्री ही प्रकृति। वेदान्तवादी कहते हैं कि परब्रह्म से जीव पृथक् नहीं है। जगत् में जीव एक है; उसके बुद्धिरूप नाम भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु नामभेद रहते भी वह पृथक् नहीं। जैसे आकाश एक है, फिर वही आकाश घट और पट दोनों स्थानों में रहने के कारण अनेक नहीं कहा जाता। इस प्रकार का उपाधिभेद रहते भी समस्त जीव एक ब्रह्म के सिवा और कुछ भी नहीं हैं। वैदान्तिकों का सिद्धान्त है—
{{c|{{smaller|"सर्वं खल्विदं ब्रह्म।"}}
यह समस्त जगत् केवल ब्रह्ममय है। जगत् के समस्त प्राणी ब्रह्म हैं, जगत् में सिवा ब्रह्म के और कुछ भी नहीं है। इसी से वेदान्तवादी मनुष्य को भी कहते हैं—
{{c|{{smaller|""तत्त्वमसि"}}}}
तुम ही वह ब्रह्म हो।
{{c|{{smaller|"निरीश्वराः सांख्याः।"}}}}
सांख्यवादी ईश्वर नहीं मानते, इसी से उनकी आँखोंमें वेदान्त का मत भ्रान्त जँचता है। सांख्यमतावलम्बी कहते हैं—'जगत् में अनेक जीव विद्यमान हैं। किन्तु यदि यह स्वीकार किया जाए कि जगत् में एक ही जीव है, तो एक के जन्म और मरण और सुख-दुःख से दूसरे को जन्म-मरण और
सुख-दुःख क्यों
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
प्राप्त नहीं होता? इसलिये जीव का बहुत्व स्वीकार करना असंगत नहीं होता।
नैयायिक कहते हैं कि ज्ञानादि वृत्तियाँ जीव के धर्म हैं। जीव अनेक हैं, वे नित्य और व्यापक रहते हैं। कर्तृत्व और भोक्तृत्व जीवों का ही धर्म है। जीव व्यापक होते भी (उनके अष्टलब्ध शरीर में...) संयोगविशेष को जन्म और वियोगविशेष को हम मृत्यु कहते हैं। नतुवा जीव का प्रकृत जन्म या उसकी प्रकृत मृत्यु नहीं है। ऐसी ही युक्ति द्वारा नैयायिक जीवात्मा का अजत्व प्रतिपन्न करने की चेष्टा करते हैं।}}
{{outdent|अजक (सं० पु०) अज-कै-क। पुरुरवा-वंश के सप्तम नृपति। विश्वामित्र ने इसी वंश में जन्म ग्रहण किया था।}}
{{outdent|अजकर्ण, अजकर्णक (सं० पु०) अजस्य कर्ण इव पर्णं यस्य। जिस वृक्ष में बकरे के कान जैसे पत्ते हों। १. सालवृक्ष। अजस्य कर्णः। ६-तत्। २. बकरे के कान। स्वार्थे कन्, अजकर्णक।}}
{{outdent|अजकव, अजकाव (सं० पु०, क्ली०) यो विष्णुः को ब्रह्मा तौ वाति त्रिपुरासुरवधद्वारा अनेन वा... ६-तत् (वाचं)। १. शिवधनुः। त्रिपुरासुर का वध कर महादेव ने इस धनुष द्वारा ब्रह्मा और विष्णु को तुष्ट किया था, इससे इसका नाम अजकव रखा गया। अजक वाति। २. बर्बरो वृक्ष। ३. जहरीला बिच्छू। <Small>बर्बरो देखो।</small>}}
{{outdent|अजका (सं० स्त्री०) अजस्य विकारः, श्रवयवः, गलेस्तनः, विकारार्थे कन्। १. छागगलस्थित स्तनाकार मांसपिण्ड, बकरे के गले में स्तन जैसा मांस का लोथड़ा। २. बकरे की विष्ठा या उसकी लेंडी।}}
{{outdent|अजकाजात (सं० पु०) अजकेव जातः, ५-तत्। रोगविशेष। रक्तवर्ण व्रण। आँख को लाल फूली, नाखूना।}}
{{outdent|अजकाव (सं० पु०, क्ली०) १. यज्ञीय पात्र, यज्ञ का बर्तन। २. रोगविशेष, एक किस्म की बीमारी। अजकौ विष्णु-ब्रह्माणौ अवति अच्। ३. शिवधनुः, महादेव का धनुष।}}
{{outdent|अजकेशी (सं० स्त्री०) नीलीवृक्ष।}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''१९२'''|
'''अजक्षौर - अजगर'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{outdent|अजक्षीर (सं० क्ली०) अजायाः क्षीरं, ६-तत्; पुंवद् भाव:।<small>ङयापोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलम्। पा० ६।१।६३।</small> बकरी का दूध।}}
{{outdent|अजग (सं० क्ली०) अजं विष्णुं गच्छति शरत्वेन (वा०), अज-गम्-ड। शिवधनुः, महादेव का धनुष। (पु०) अजेन ब्रह्मणा गीयते, गम्यते वा, कर्मणि गै-क, गम्-ड वा। १. अग्नि। २. विष्णु।}}
{{outdent|अजगन्धा (सं० स्त्री०) अजस्य गन्ध इव गन्धोऽस्याः। जंगली अजवायन, अजमोदा।}}
{{outdent|अजगन्धिका (सं० स्त्री०) अजस्य गन्ध इव गन्धोऽस्याः। बकरे जैसी जिसको बदबू हो, बर्बरी शाक, वन-तुलसी।}}
{{outdent|अजगन्धिनी (सं० स्त्री०) अज-गन्ध-इन्, ङीप्। अजस्य मेषस्य गन्धः सम्बद्धः एकदेशः, अर्थात् शृङ्गः, स फलरूपेण अस्या अस्ति। अजशृङ्गी, जिङ्गनी।}}
{{outdent|अजगर (सं० पु०) अज-गृ-अच्। 'अज' छागं गिरति, गिलति। जो बकरे को निगले। बृहत् सर्प, बड़ा साँप।
अजगर शब्द से प्रायः हम बृहदाकार सर्प को समझते हैं, किन्तु वास्तविक ऐसा नहीं है। अजगर बृहदाकार पहाड़ी साँप (Python and Boa Constrictor) होता है। एशिया और अफ्रीका में यह अजगर मिलता है। प्राणितत्त्ववित् पण्डित इसे पाइथन कहते हैं। भारतवर्ष में पाइथन रेटिक्यूलेटस् (Python reticulatus) जातीय अजगर ही सर्वापेक्षा बृहत् होते हैं। अमेरिका के अजगर का नाम बोआ कन्स्ट्रिक्टर (Boa constrictor) है। यह बकरे, मेंढ़े, हरिण, महिष, चीते और हाथी तक को पकड़ खा डालता है। अज प्रभृति बड़े-बड़े जन्तु निगल जाने के कारण इस पहाड़ी जाति के बड़े साँप का नाम अजगर पड़ा है। गोखुरे, क्यूटौये प्रभृति साँपों को हम अजगर कह नहीं सकते।
पहाड़ी बड़ा साँप १०–१५ हाथ दीर्घ होता है; कितने ही लोगों ने अस्सी हाथ लम्बा अजगर भी देखा है। एक बार एक अजगर अफ्रीका में कितने ही सिपाहियों को निगल गया था। रोमकों ने उसी
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
साँप को मार उसका चर्म रोमराज्य में लाकर रखा। अबुल बैहकी ने अपनी तारीखे-नसरी पुस्तक में लिखा है कि ग़ज़नी के सुलतान महमूद ने सोमनाथ को जय कर स्वदेश वापस जाते समय पथ में एक बृहदाकार
अजगरको वध किया था। उसी साँप का चमड़ा ग़ज़नी नगर में सिंहद्वार पर लटका कर रखा गया था। चमड़ा ६० हाथ लम्बा और ४ हाथ चौड़ा था। बैहकी ने लिखा है— 'इस बड़े साँप की बात पर यदि किसी को विश्वास न हो, तो वह ग़ज़नी जाकर अपनी आँखों देख आए।' बैहकी महमूद के समकालिक मनुष्य थे।
पहाड़ी अजगर क्षुधार्त होने से ह्रद, नदी और निर्झर के पास वृक्ष में अपनी पूँछ लपेट झूला करता है। इसके मलद्वार के समीप काँटिया जैसी एक हड्डी होती है, इसी से वृक्ष में वह हड्डी लगाकर यह अनायास ही लटक सकता है। किसी जन्तु के जल पीने को जाने से उसी समय यह कूदकर उस पर जा गिरता है। एक बार पकड़ा जाने पर दुर्जय वन का हाथी भी पहाड़ी अजगर के मुँह से छूटकर नहीं भाग सकता। भाग न सकने का कारण यह है कि इसके नीचे और ऊपर वाले दोनों दाँत मुँह के भीतर की ओर घूमे हुए रहते हैं। इसी से निगलने के समय पश्वादि का शरीर सहज में उदरस्थ हो सकता है; किन्तु उसे बाहर की ओर खींचने पर दाँत उसमें फँस जाते हैं। अनेकों ने देखा है कि जन्तु को एक बार दबोचकर पकड़ने पर साँप अपनी इच्छा से भी उसे छोड़ नहीं सकता।
इसके मसकुर की बनावट बहुत ही अनोखी है। अन्यान्य जन्तुओं का मसकुर जुड़ा हुआ रहता...}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अजगर - अजगव'''|'''१९३''''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>करनेसे वह केवल दो गलफर चला अपना मुख विस्तीर्ण कर सकता है। पहाड़ी अजगर के मसकुरकी हड्डी जुड़ी हुई नहीं होती; एक-एक हड्डी पृथक्-पृथक् लगी रहती है। इससे यह अनायासमें सकल और खेलते फिरता है । यह इच्छा करनेसे समोपकी ओर भी अपना मुंह फैला सकता है और ऊपर की ओर भी । फिर, इच्छा करनेसे एक ओरको दाढ़ न चला अनायासमें दूसरी ओरको दाढ़ खोल शिकारको निगल सकता है । इसके ऊपरवाले मसकुर में दो श्रेणी और नीचे- वालेमें केवल एक श्रेणी दांत होते हैं । यह शिकारके ऊपर झपट पलभरमें उसे पूछसे जकड़ लेता और पीछे मुंह की लारसे उसका सर्वाङ्क भिगो देता है। इससे जन्तुका शरीर चिकना हो जाता है । सुतरां निगलनेमें बड़ी सुविधा होती है । कोई-कोई कहते हैं, कि शिकार उदरस्थ होनेपर यह अपने शरीरको उलट-सुलट ऐसा घुमाता है, कि बड़े-बड़े पशुओंकी हड्डियां भी चर- मराकर टूट जाती हैं । कभी-कभी शिकार पकड़ते ही यह निमेषमध्य में उसका सर्वाङ्ग जकड़ कर बांध लेता है । उसी समय सब हड्डियां चूर-चूर हो जाती हैं । इस कारण से भी गो, महिषादि बड़े-बड़े पशु मुंहसे छूटकर भाग नहीं सकते। आहार कर चुकनेपर यह अनेक दिन पर्यन्त हिल-डुल नहीं सकता, निर्जीव जड़ पदार्थको तरह एक जगह पड़े सोया करता है । ऐसी अवस्थापर इसे सहजमें ही मार सकते हैं ।
बड़े-बड़े जन्तु निगलते समय छाती में आहार अटक जानेसे पीछे श्वासरोध हो सकता, तज्जन्य विधाताने इसका श्वासयन्त्र आश्चर्यकौशल से निर्माण किया है । इसके फेफड़े में दो कोष होते हैं—एक Water और एक बड़ा । बड़े कोष के प्रान्तभागमें वायु रहनेका एक स्थान बना है। बड़े-बड़े पश्वादि निगलते समय उसी आधारस्थित वायुसे रक्त परिष्कृत होता है। इसके चक्षु क्षुद्र होते हैं और सर्वाङ्ग कृष्ण और हरिद्रावर्णसे चित्रित रहता है
{{left|४९|3em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पहाड़ी अजगर और अन्यान्य सकल उरगोंका मलमूत्र एक ही पथसे निर्गत होता है ।इसका विष्ठा ठौक चूने जैसा रहता है। पहाड़ी अजगरों के पेटमें अत्यन्त कृमि उत्पन्न होते, जिससे कितने ही सांप मर जाते हैं । हमारे देशके हिमालय पर्वत और दक्षिण - प्रान्तमें इस जातिके विस्तर अजगर विद्यमान हैं। कई वर्ष हुए, वीरभूम जिलेके अन्तर्गत गणटीयाको रेशमवालो कुटोके सम्मुख बृहदाकार पहाड़ी अजगर नदीके जलमें बह आया । चरवाहे उसी जगह गो-बकरे और भेड़-बकरे चराते थे। अजगरने झाड़ोसे बाहर निकल एक भेड़को निगल डाला। कुटीके अध्यक्ष राइट साहबने यह संवाद पाकर उसे गोलोसे जा वध किया । हिमा- लय पर्वत में मयाल नामक एक प्रकारका अजगर होता है । यह सचराचर १०।१२ हाथ दीर्घ, किन्तु तालवृक्षको अपेक्षा भी अधिक मोटा रहता है । पहाड़ी लोग इस सांप को पकड़ गृहस्थोंके घर-घर नचाते समय इसके मुखसे लाङ्गूल पर्यन्त एक-एक कर बेंतके मुरंदरे डाल देते और मोटी छड़ीसे आघात करते जाते हैं । उस समय सर्प क्रोधसे फूल उठता है । चारो ओर चार संपेरे खड़े रहते हैं । उनके शिरपर काठको टोपी और टोपीमें बड़े-बड़े लोहे के काँटे चुभे होते हैं । सांप क्रोधमें मनुष्यको अपेक्षा भी अधिक उच्च हो और चारो ओर घूम- फिरकर संपेरोंके शिरको दर्शन करने दौड़ता है । इसीको मयाल सांपका नाच कहते हैं ।
{{Outdent|अजगरी (हिं० वि० ) अजगरका,अजगरवाला, अजगर - सम्बन्धीय ।}}
{{Outdent|अजगल्लिका, अजग़ल्ली (सं० स्त्रो० ) १ बर्बरोलच बबइतुलसी । २ क्षुद्ररोगान्तर्गत बाल्यरोग विशेष, क प्रकारको कफबातसे उत्पन्न होनेवाली फुन्सी । इस रोगका लक्षण यह है-}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“स्निग्धाः स्ववर्णाः ग्रथिता नौरुजा मुद्गसन्निभाः ।<br>
पिटिकाः कफवाताभ्यां बालानामजगल्लिका ॥" (वाभट उ० ३१०)</poem>}}}}
{{Outdent|अजगव (सं० कौ० पु० ) अजगं विष्णु वाति, अजग- वाक । पिनाक, शिवधनुः, महादेवका धनुष ।}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''१९६'''|
'''अजमायु — अजमेर'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>{{outdent|अजमायु (सं० पु० ) बकरे किसी भिंभिहाहट, बकरे का सा शब्द।}}
{{outdent|अजमार, अजमारक (सं० पु० ) अज-मृ- णिच्-अण्,
अजान् मारयति ; उप-तत् । कुर्वादिभ्यो ण्यः । पा । ११५१ । कसाई, जो बकरे को मार उसका मांस बेचे; मांस- विक्रयी, गोश्त बेचनेवाला ।}}
{{outdent|अजमीढ़ (सं० पु० ) अजमीढ़ो यज्ञे सिक्तो यत्र । १ देशविशेष, अजमेर । २ राजा युधिष्ठिर । ३ सुहोत्र- के एक पुत्र । अजमेर देखो ।}}
{{outdent|अजमुख (सं० पु० ) अजस्य छागलस्य मुखमिव मुखं यस्य । दक्ष प्रजापति, सतोके पिता, शिवके श्वशुर ।}}
दक्षने नारदको बातमें पड़कर शिवको कन्यादान दिया था, किन्तु कुटुम्बिता भली भांति बराबर में न हुई । दक्ष महाराज चक्रवर्ती थे; इनका कितना विभव और कितना सुखैश्वर्य रहा । किन्तु इनके दामाद श्मशान-वासी भङ्गड़ भोलानाथ थे, जो शिरमें भस्म लगाते और भाँग खाते रहे। देवताओंको सभा लगनेपर दामादको ज्वालासे दक्षराजको अपने शिरपर हाथ रखकर बैठना पड़ता था । अन्तमें इन्होंने चिन्ताकर शिवका अपमान करनेके लिये एक यज्ञको आरम्भ किया । त्रिभुवनको निमन्त्रणका पत्र भेजा गया । केवल प्राणको नन्दिनी सती बाक़ी रह गई; फिर सती के सम्पर्कसे जिनके साथ में सम्पर्क था, वह शिव भी निमन्त्रणका पत्र पानेसे छूट गये । किन्तु जब बापके घरमें धूमधाम होती, तब स्वीका मन निमन्त्रण न पानेपर भी चुलबुलाया करता है । सती विना आह्वान हो पित्रालयमें यज्ञ देखनेको जा पहुंचीं । दक्षने सतीको देख जो मनमें आया, 'वह कहकर सभा के मध्य शिवको निन्दा की । शिव- प्रेमभिखारिणी सतीके हृदयमें वह कटुवाक्य वाण जैसे चुभ गये। उन्होंने यह कहकर प्राणत्याग किया, – “ आप पिता हैं, मैं कन्या होकर अधिक क्या कहेगी । किन्तु जिस मुखसे आपने शिवको निन्दा की है, वह मुख आप देखेंगे, कि बकरेकासा हो जायेगा ।" बोलते-बोलते सतीमें फिर सती न रहीं, उन्होंने सबके सम्मुख यज्ञस्थलमें प्राण छोड़ दिया ।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
यह संवाद कैलास में पहुंचा। फिर क्या था, त्रिशूलीके कोपसे त्रैलोक्य कम्पित होने लगा । पातालमें नाग भयभीत हुए, शून्यमें यक्षरक्ष घबराये और सारा जगत् उथल-पथल हो गया । शिव विरूपाक्ष प्रभृति महावीरोंको लेकर दक्षालय गये ; पागलने जिस पापमुखसे उनको निन्दा की थी, उसको उन्होंने काटकर दूर फेंक दिया। अवशेषमें दक्षको पत्नीने आकर दामाद से अनेक स्तवस्तुति की। इससे दक्षको पुनर्वार प्राण वापस मिला, किन्तु जन्मको तरह इन्हें छागलका मुण्ड पहनकर
रहना पड़ा ।
कितने ही लोग अनुमान करते हैं, कि हरि- द्वारके निकटमें कनखल और हरिको - पैढ़ी इन्हीं सब स्थानोंको लेकर दक्षराजकी राजधानी सुशोभित थी ।
{{outdent|अज़मूदा, आज़मूदा ( फा० वि० ) परीक्षित, जांचा हुआ ।}}
अजमेर, अजमेरु – राजपूताने के अन्तर्गत अजमेर- मेवाड़का एक प्रधान नगर। कोई कोई कहते हैं, कि सूर्यवंशीय अजमीढ़ राजाने पहले इस नगरको निर्माण कराया था। किसीके मतसे महाभारत के वनपर्वमें उक्त विदुर राजाका यह राज्य है, कालक्रम- से ध्वंस हो गया है। पीछे चौहान राजाने इसे पुनर्वार निर्माण कराया ।
अजमेर पहले चौहानवंशीय राजपूतोंके अधीन रहा । इस वंशके अजय राजाने पहले नाग- पर्वतमें एक दुर्गको निर्माण करानेके लिये चेष्टा की थी, किन्तु उनका यत्न निष्फल हो गया। इसके बाद उन्होंने तारागढ़ पहाड़ में गढ़-बितलो नामके एक दुर्गको निर्माण कराया । सन् ११०० ई० में इन्द्रकोट नामक उपत्यकापर अजमेर नगर स्थापित किया गया। गुजरात के सोमनाथवाले मन्दिरको लूटने जाते समय महमूद अजमेरके भीतरसे निकल गये थे । राह में यहांके अनेक देवालय और देवमूर्तियां उन्होंने विनष्ट कर डालीं । अजय के पुत्रका नाम अना या अर्णोराज था, जिन्होंने अनासागर निर्माण कराया ।<noinclude><noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अजपति — अज़माना'''|'''१९५'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>दान करने से उनमें फिर विच्छेद नहीं होता। (अथर्व ५।२७)।
{{outdent|अजपति (सं० पु०) अज-पा-डति, ६-तत्। १. बड़ा बकरा। २. मेष राशि का अधिपति, मङ्गलग्रह।}}
{{outdent|अजपथ (सं० पु०) अजस्य पन्थाः, ६-तत्; अजेन ब्रह्मणा निर्मितः पन्थाः, ३-तत्। १. छाग के पद द्वारा जो पथ हो, जो राह बकरे के चलने से बन जाए। २. प्रजापति ने जो पथ सृष्ट किया हो, ईश्वर की बनाई राह; छायापथ।}}
{{outdent|अजपथ्य (सं० त्रि०) अज-पथ, इवार्थे यत्; अजपथ इव। १. देवपथ जैसा। २. सङ्कीर्ण (पथ)। ३. गगन-सेतु-तुल्य, आकाश के मार्ग समान। अजपद, अजपाद देखो।}}
{{outdent|अजपा (सं० स्त्री०) यत्नेन विना जप्या, न-जप-कर्मणि अच्। १. हंसमन्त्र। २. स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास।}}
हम प्रतिदिन जिस निश्वास को ग्रहण और जिस प्रश्वास को त्याग करते हैं, उसका कियदंश देवता भोगते हैं। विश्वसार में लिखा है—
{{c|{{x-smaller|<poem>"अष्टौ हि सहस्रकं षट्शतानि दिवानिशोः।<br>
भवन्ति हंसजप्यानि निश्वासोच्छ्वासनामतः॥।<br>
षट्शतानि गणेशस्य षट्सहस्रं प्रजापतेः।।<br>
गदापाणेः षट्सहस्रं षट्सहस्रं विलोचने॥।<br>
सहस्रं स्यादात्मनस्तु सहस्रन्तु गुरुदये।।<br>
परमात्मनि सहस्रं स्यादिति संख्या निवेदयेत्॥"</poem>}}}}
रात्रि-दिन के मध्य में मनुष्य के निश्वास-प्रश्वास की संख्या २१६०० बार होती है। इसका नाम हंसमन्त्र है। इस जप के मध्य में ६०० गणेश, ६००० प्रजापति, ६००० विष्णु, ६००० शिव, १००० गुरुदेव और १००० परमात्मा के कहे गए हैं।
हम नहीं समझ सकते कि निश्वास-प्रश्वास में एक-एक देवता के अधिकार होने का क्या तात्पर्य है। ऊपर श्वास-प्रश्वास की जो संख्या लिखी गई है, आधुनिक मत के साथ उसका विशेष अनैक्य नहीं। कोएटेनेट के मत से शिशु भूमिष्ठ होने पर प्रति मिनट में उसके श्वास-प्रश्वास की संख्या ४४ और पाँच वर्ष की आयु
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पर २६ होती है। इसी तरह वयःक्रम, शीत-ग्रीष्म और खाद्य-सामग्री के प्रभाव से श्वास-प्रश्वास की संख्या घटती-बढ़ती रहती है। स्वस्थ युवा व्यक्ति के श्वास-प्रश्वास की संख्या औसत से प्रति मिनट २० बार मानने पर समस्त दिवा-रात्रि में २८८०० बार हो जाती है। हमारे शास्त्रकारों ने २१६०० बार संख्या की गणना की है, अतएव इन उभय के मध्य में अधिक प्रभेद नहीं।
हं अर्थात् निश्वास खींचने में अधिक समय नहीं लगता। स अर्थात् निश्वास छोड़ने में अपेक्षाकृत अधिक समय बीत जाता है। पुरुष के पक्ष में इन दोनों क्रियाओं का अनुपात १०:१२ और शिशु एवं स्त्री के पक्ष में १०:१४ है। प्राणायाम और निश्वास देखो।
{{outdent|अजपाद (सं० पु०) अजस्य पाद इव पादो यस्य, बहुव्रीहि। १. रुद्रविशेष, रुद्रदेवता। २. पूर्वभाद्रपद नक्षत्र। अजपार्श्व, श्वेतक के पुत्र। (हरिवंश)।}}
{{outdent|अजपाल (सं० त्रि०) अजान् पालयतीति, अज-पा-णिच्-अण्। जो बकरा-बकरी पाले, गड़रिया।}}
{{outdent|अजब (अ० वि०) अनोखा, अभूतपूर्व, कौतूहलाकीर्ण, आश्चर्यजनक।}}
{{outdent|अजबबन्धु (सं० पु०) अजः छागलः बुद्धिविषये बन्धुरिव यस्य। जिसकी बुद्धि बकरे के समान स्थूल हो; मूर्ख, गधा, बेवकूफ।}}
{{outdent|अजबला (सं० स्त्री०) काली तुलसी।}}
{{outdent|अजभक्ष (सं० पु०) अज-भक्ष, घञ् कर्मणि; अजैः भक्ष्यते असौ, ६-तत्। बबूल, बर्बरी वृक्ष। बबूल की पत्तियाँ बकरियाँ बड़े प्रेम से खाती हैं, इसी से इसका नाम अजभक्ष पड़ा।}}
{{outdent|अजमत (अ० पु०) १. बड़ाई, शान-शौकत, प्रताप। २. करामात, चमत्कार, सिद्धि।}}
{{outdent|अजमल (सं० पु०) १. गोधूम, गेहूँ। २. लेंडी, मिंगनी।}}
{{outdent|अजमाइश, आज़माइश (फ़ा० स्त्री०) परीक्षा, जाँच। (हिं० क्रि०) परीक्षा लेना, अजमाना, आज़माना, जाँचना।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''१९४'''|'''अजगावं – अजपञ्चौदन'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>इस शब्दके अजकव, अजकाव, अजीकव और अजगाव रूप भी होते हैं।
{{outdent|अजगाव (सं० पु०, क्ली०) अजग-अव-अण्। अजगं विष्णु अवति, रक्षति। उपपद-स०। हरधनु, विष्णु की रक्षा करने वाला महादेव का धनुष।}}
{{outdent|अजगुत (हिं० पुं०) अनहोनी, अनोखी बात, आश्चर्य का विषय।}}
{{outdent|अज़ग़ैब (फ़ा० पु०) ग़ैब से हुआ काम, अदृष्ट-सम्भूत विषय।}}
{{outdent|अज़बी (हिं० वि०) ग़ैब से हुआ; अनोखा।}}
{{outdent|अजघन्य (सं० त्रि०) न जघन्यः, अधमः, नञ्-तत्। जघनमिव जघन्यः, जघन-यत्। अनधम, भला, श्रेष्ठ, बड़ा।}}
{{outdent|अजघोष (सं० पु०) एक प्रकार का सन्निपात ज्वर, जिसमें रोगी का बोल बन्द हो जाता है।}}
{{outdent|अजघ्निवस् (सं० त्रि०) न मारने वाला।}}
{{outdent|अजजीव, अजजीविक (सं० त्रि०) अजछागः क्रय-विक्रयादिना जीविका जीवनोपायो यस्य, बहुव्री०। छाग-मेषादि का व्यवसायी, भेड़-बकरी का सौदागर।}}
{{outdent|अजटा (सं० स्त्री०) नास्ति जटा जटाकारं मूलं यस्याः, बहुव्री०। पनियाला, एक प्रकार का वृक्ष।}}
{{outdent|अजड़ (सं० त्रि०) जड़ नहीं; चेतन, जानदार। (पुं०) वह वस्तु जो जड़ न हो; सजीव वस्तु, जानदार चीज़।}}
{{outdent|अजड़ा (सं० स्त्री०) अजड़-णिच्-अच्; अजड़यति स्पर्शमात्रेण अङ्गमर्दनार्थं सञ्चालयति, उपपद-स०। १. पनियाला, एक प्रकार का वृक्ष। (त्रि०) २. जड़भिन्न, चेतन।}}
{{outdent|अजड़ाफल (सं० क्ली०) पनियाले का फल।}}
{{outdent|अजण (हिं० पुं०) १. अर्जुन। २. सहस्रार्जुन।}}
{{outdent|अजण्टा—<small>अजिठा देखो।</small>}}
{{outdent|अजत्व, अजात्व (सं० क्ली०) बकरा होने का भाव, बकरापन।}}
{{outdent|अजथ्या (सं० स्त्री०) अज-ध्यन्।<small>अजाविभ्यां ध्यन्। पा० ५।७।८।</small>यूथी, स्वर्णयूथिका; वसन्ती जूही या चमेली।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|अजदण्डी (सं० पु०) गौरादित्वात् दण्डोऽस्याः। ब्रह्मदण्डी, ङीष्। अजस्य ब्राह्मणो वृक्षः। वह वृक्ष, जिसका ब्राह्मण दण्ड बनाते थे।}}
{{outdent|अज़दहा (सं० पु०) अजगर, बड़े-बड़े पशुओं को लील जाने वाला साँप।}}
{{outdent|अजदेवता (सं० पु०) मध्यपदलोपि कर्मधारय। अजाधिष्ठाता देवता, अग्नि। वह देवता, जो बकरे का अधिष्ठाता हो।}}
{{outdent|अजन (सं० त्रि०) १. उत्पत्तिशून्य, जिसका जन्म न होता हो। २. जहाँ कोई मनुष्य न हो, एकान्त।}}
{{outdent|अजननि (सं० स्त्री०) न-जन, आक्रोशे अनि, नञ्-तत्। जन्माभाव, जन्म का न होना।}}
{{outdent|अजनबी (फ़ा० वि०) बिना जाना-बूझा; अपरिचित, नया।}}
{{outdent|अजनामक (सं० पु०) सोनामाखी धातु।}}
{{outdent|अजनि (सं० स्त्री०) वाहिका, स्वर्गपन्या।}}
{{outdent|अजन्ता—<small>अजिठा देखो।</small>}}
{{outdent|अजन्तुजग्ध (सं० त्रि०) जिसे कीड़ों ने न खाया हो; समूचा, पूरा।}}
{{outdent|अजन्म, अजन्मा, अजन्मन् (सं० पु०) न-जन्-मनिन्। नास्ति जन्म यस्य यत्र वा, बहुव्री०। १. जन्मरहित, जिसका जन्म न हो। २. मोक्ष।}}
{{outdent|अजन्य (सं० त्रि०) जन्-णिच्-यत्। न जायते, नञ्-तत्। शुभाशुभसूचक भूकम्पादि उत्पातविशेष। जननीय।}}
{{outdent|अजप (सं० पु०) न-जप-अच्; अस्पष्टं जपति, निन्दार्थे नञ्। १. कुपाठक, जो भली-भाँति पाठ न कर सके। अजं पाति, अज-पा-क, ६-तत्। २. जो छाग-रक्षा करे, छागपालक; बकरी पालने वाला मनुष्य।}}
{{outdent|अजपञ्चौदन (सं० पु०, क्ली०) पुरोहित को यजमान कर्तृक छागदान, बकरी-बकरे का दान। अथर्ववेद में अजदान का इस प्रकार फल लिखा है—अजदान करने से यजमान तृतीय आकाश के तृतीय स्वर्ग वाले तृतीय पृष्ठ स्थान को प्राप्त करता है।<small>(९|५|२३)
।</small> एक पति के रहते स्त्री यदि अन्य पति को ग्रहण करे, तो अजपञ्चौदन...}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{rh||'''अजमेर-अजय'''|'''१९८'''}}</noinclude>
इस दरगाहको पवित्र समझते हैं। शहाबुद्दोनके दोष नष्ट हो जाते हैं। युरोपीय चिकित्सकोंने
अजमेरको आक्रमण करने आनेसे पहले खाजा
परीक्षा द्वारा देखा है, कि अजमोदा हिक्का, वमन
मुईनुद्दीन चिश्ती नामक एक फ़कोर इस जगह और मूत्राशय प्रभृतिको वेदनामें विशेष उपकार
आ पहुंचे थे। प्रायः वह खाजा नामसे प्रसिद्ध करती है। वैद्यशास्त्र में अजमोदा, अजवायन, जङ्गली
हैं। यह दरगाह उन्हींका कबरस्थान है। प्रति अजवायन, ईरानी अजवायन और खुरासानी अज-
वत्सर इसमें उर्स नामका एक मेला लगता है। वायनके विषय में कुछ गड़बड़ जान पड़ती है
। अनेक
वह छः दिन रहता और उसमें कोई २०,००० लोग स्थलमें अजमोदाको जगह अजवायन, जङ्गली अज-
समवेत होते हैं।
वायन प्रभृति सकल प्रकारको अजवायने समझो
अजमेरमें एक दूसरी भी बड़ी मसजिद है, जो जाती हैं। किन्तु यह बात ठीक नहीं। अजमोदा,
पहले जैनियोंका मन्दिर रही, पोछे मुसलमानोंने अजवायन और जङ्गली अजवायन,-यह तीनो एक
उसपर अपना अधिकार किया। अनासागर इदके हो श्रेणोके उद्भिद् (Umbellifers) हैं। इनके
ऊपर जहांगीरने सफेद पत्थरका महल बनवाया था। मध्यमें फिर अजमोदा और अजवायन एक जातीय
आजकल उसमें चीफ कमिशनर वास करते हैं। (Carum), और जङ्गलो अजवायन अन्य जातीय
अजमेर-मेरवाड़ा-राजपूतानेका एक अंगरेजी प्रान्त । (Seseli) है। युरोपीय उद्भिद्शास्त्र में अजमोदाका
गवरनर-जनरलके राजपूतानमें रहनेवाले एजण्ट Carum Roxburghianum, Benth ; atua-
इस प्रान्तका प्रबन्ध चीफ कमिशनरकी भांति करते का Carum copticum, Benth; इसी जातिका
हैं। इस प्रान्तमें दो छोटे-छोटे जिले हैं-अजमेर होने के कारण जीरका Caruin Carui, Linn और
और मेरवाड़ा। यहां पर्वत खूब फैले हुए हैं। बहु जङ्गली अजवायनका नाम Seseli indicum है।
मूल्य अभरक और प्रधानतः तांबा और सौसा धातु ईरानो अजवायन कोई स्वतन्त्र द्रव्य नहीं, ईरान
जगह-जगह मिलती है। प्रधान फल अनार और देशसे इसको आमदनी होने के कारण ही इसे
अमरूद है। चीता और भेड़िया तो कम देख ईरानी अजवायन कहते हैं। किन्तु खुरासानी
पड़ता ; किन्तु बघेरा नागपर्वतसे देवैरतक भरा है अजवायन एकबारगी हो स्वतन्त्र पदार्थ है। यह
और जङ्गली सूअरों को भी देशौ राज्योंमें कोई कमौ वार्ताकु, व्याकुड़, कण्टकारौके श्रेणीमुक्त वृक्षका वीज
नहीं, जिन्हें राजपूत बड़े शौकसे शिकार करते है। (Solanaceae) है। उद्भिशास्त्र में इसका नाम
जलवायु अत्यन्त स्वास्थ्यकर है। ग्रीष्ममें गर्मी और
Hyoscyamus niger, Linn है। डाकरी पुस्तकमें
शीतमें सर्दी रहती है। यहां पानी कम बरसता इसके पत्तेको हाइयोसियामस कहते हैं।
है। अजमेर शब्दमें इतिहास देखो।
अजमोदाख्या (स० स्त्री०) अजवायन ।
अजमोद, अजमोदा (सं० स्त्रो०) अज-मोदि-अण, अजमोदिका (स. स्त्री०) अजवायन ।
अजान् मोदयतोति। अजवायन। इस शब्दके कई अजमोदाद्यवटक (सं० पु०) आमवातका एक औषध ।
एक यह पर्याय हैं-खराह्वा, वस्तुमोदा, वर्कटी, अजमांस (स० लो०) छागमांस, बकरका गोश्त ।
मोदा, गन्धदला, हस्तिकारवी, गन्धपत्रिका, मायूरो, अजम्भ (सं० पु०) न सन्ति जम्भा दन्ता अस्य, बहुव्रो ।
शिखिमोदा, मोदाढ्या, वक्रिदीपिका, ब्रह्मकोशी, १ भेक, मेंड़क। २ सूर्य, आफ़ताब। (त्रि०)
विशाली, हयगन्धा, उग्रगन्धिका, मोदिनौ, फलमुख्या ३ दन्तशून्य, जिसके दांत न हों।
और विशल्या। वैद्यशास्त्रके मतसे अजमोदा-कटु, अजय (स' पु०) न जि-अच्. नञ्-तत्। १ जया-
उष्ण, रुक्ष और रुचिकर होती है। इससे कफ,
भाव, हार। अजैन छागलेन यातौति, या-क।
वायु, शूल, आध्मान, अरुचि और क्षुधामान्य प्रभृति २ अग्नि, आग। ३ छप्पय छन्दका एक भेद।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३६४'''|'''अधिमात्र—अधियार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिमात्र (सं॰ त्रि॰) अधिक मात्रा यस्य। १ अधिक प्रमाण, मौताज से ज्यादा। (अव्य०) २ कविता-विषयपर, शायरी के मज़मूनसे।
अधिमात्रकारुणिक (सं॰ त्रि॰) १ अधिक रूपसे दयालु, निहायत मेहरबान। (पु॰) २ बौद्धोंके एक महाब्राह्मणका नाम।
अधिमास (सं॰ पु॰) अधिको रविसंक्रान्तिद्वयमध्य-वर्त्तिचन्द्रमासः, रविसंक्रान्तिशून्य शुक्लप्रतिपदादिदर्शान्त श्चन्द्रमासः, प्रादि-स॰। असंक्रान्त मास, अधिक-मास; मलमास, लौंदका महीना। <small>मलमास देखो।</small>
अधिमित्र (सं॰ क्ली॰) अधिकं मित्रम्, प्रादि सं॰। ग्रहगणका परस्पर मिलनविशेष, ग्रहोंका आपस में मिलान। ज्योतिषके मतसे चन्द्र, मङ्गल और
वृहस्पति सूर्यके, सूर्य और बुध चन्द्रके, सूर्य, चन्द्र और वृहस्पति मङ्गलके, सूर्य और शुक्र बुधके, सूर्य, चन्द्र और मङ्गल वृहस्पतिके, बुध और शनि शुक्रके, और बुध और शुक्र शनिके मित्र हैं।
फिर शुक्र और शनि सूर्यके, बुध मङ्गलके, चन्द्र बुधके, बुध और शुक्र वृहस्पतिके, रवि और चन्द्र शुक्रके और रवि, चन्द्र और मङ्गल शनिके शत्रु होते हैं। चन्द्रका कोई शत्रु नहीं। सिवा मित्र और शत्रुके अवशिष्ट ग्रह सम समझे जाते हैं। जैसे,—रविके चन्द्र, मङ्गल और वृहस्पति मित्र, किन्तु शुक्र
और शनि शत्रु होते हैं; इसोसे बुध रविके सम है।
ग्रहोंके तात्कालिक मित्र-निरूपण करनेका नियम यह है,—जिन ग्रहोंसे चतुर्थ, दशम, द्वितीय, तृतीय और एकादश—इन सकल स्थानोंमें जो सकल ग्रह रहेंगे, वह उन्हीं-उन्हीं ग्रहोंके तात्कालिक मित्र समझे जायेंगे। इन सकल स्थानसे भिन्न दूसरे स्थानमें रहने से ग्रह तात्कालिक होते हैं। जो ग्रह जिस ग्रहका स्वाभाविक मित्र, सम और शत्रु हुआ करता, वह तात्कालिक अधिमित्र, मित्र और सम बन जाता है।
अधिमुक्तक (सं॰ पु॰) माधवीलता, चमेली।
अधिमुक्ति (सं॰ स्त्री॰) १ अनुभव, तजरबा। २ दृढ़ विश्वास, पुख़ता एतक़ाद। इस शब्दका व्यवहार बौद्ध अधिक करते हैं।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिमुक्तिक (सं॰ पु॰) बौद्ध धर्मानुसार—महाकाल, सबको नाश करनेवाला परमेश्वर।
अधिमुक्तिका (सं॰ स्त्री॰) मुक्तागृहा, शक्ती, सीप।
अधिमह्य (सं॰ पु॰) शाक्यमुनि। चौंतीसवें पूर्वजन्ममें शाक्य-मुनिको अतिमुह्य कहते थे।
अधियज्ञ (सं॰ पु॰) अधिकृतो यज्ञो यस्मात्, प्रादिबहुव्री॰। १ परमेश्वर, यज्ञको अधिकृत करनेवाला पुरुष। अधिकः अधिकाङ्गयागः, प्रादि स॰। २ अधिकाङ्ग याग, वह यज्ञ जिसमें अनेक अङ्ग रहते हैं। ३ प्रधान यज्ञ। (त्रि॰) ४ यज्ञ सम्बन्धीय, यज्ञका। ५ यज्ञके विषयमें, यज्ञको अधिकार कर, यज्ञकी बातपर।
अधिया (हिं॰ पु॰) १ अर्धांश, आधा टुकड़ा। २ मौज़ेमें निस्फ़, पट्टीकी शिरकत, 'आधी पट्टीकी हिस्सेदारी।' ३ उत्पन्न हुए शस्यका अर्धांश प्रभु और अर्धांश कार्य करनेवालोंको प्रदान करनेका नियम, उपजका आधा हिस्सा मालिक और आधा मजदूरों को देनेका क़ायदा। ४ गांवकी आधी पट्टीका ज़मीन्दार, अधियार।
अधियाङ्ग (सं॰ क्ली॰) अधिक अङ्ग फजूल अज़ो।
अधियान (हिं॰ पु॰) गोमुखी; जप करनेकी थैली। यह थैली प्रायः ऊनकी बनती और गोमुख- ्सो्स्सो् होती
है। इसके ऊपर कारीगर रङ्गीन रेशम या जनसे
गो, राम, कृष्ण आदि देवतोंके चित्र भी बेल बूटोंमें
निकाल देते हैं । भक्त इसके भीतर रुद्राक्षको माला
डाल अपने इष्टदेवका मन्त्र जपा करते हैं। कहतें
हैं, कि विना गोमुखी खोलकर माला फेरनेसे सिद्धि
प्राप्त नहीं होती ।
अधियाना (हिं० क्रि० ) अधशमें विभाजित करना,
आधा-आधा हिस्सा लगाना, दो समान भागों में बांटना
बराबर-बराबरके दो टुकड़े उतारना ।
अधियार (हिं० पु० ) १ सम्पत्तिका अधीश,
मिलकियतका निस्क हिस्सा, जायदादका आधा
साझा । २ अधींशका प्रभु, निस्फ का काबिज़ ।
२ गांवके आधे जोतका असामी । ५. दो गांवों में
. बराबर हिस्सा रखनेवाला जमीन्दार या आसामी । :
मलमास देखो ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३६४'''|'''अधिमात्र—अधियार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिमात्र (सं॰ त्रि॰) अधिक मात्रा यस्य। १ अधिक प्रमाण, मौताज से ज्यादा। (अव्य०) २ कविता-विषयपर, शायरी के मज़मूनसे।
अधिमात्रकारुणिक (सं॰ त्रि॰) १ अधिक रूपसे दयालु, निहायत मेहरबान। (पु॰) २ बौद्धोंके एक महाब्राह्मणका नाम।
अधिमास (सं॰ पु॰) अधिको रविसंक्रान्तिद्वयमध्य-वर्त्तिचन्द्रमासः, रविसंक्रान्तिशून्य शुक्लप्रतिपदादिदर्शान्त श्चन्द्रमासः, प्रादि-स॰। असंक्रान्त मास, अधिक-मास; मलमास, लौंदका महीना। <small>मलमास देखो।</small>
अधिमित्र (सं॰ क्ली॰) अधिकं मित्रम्, प्रादि सं॰। ग्रहगणका परस्पर मिलनविशेष, ग्रहोंका आपस में मिलान। ज्योतिषके मतसे चन्द्र, मङ्गल और
वृहस्पति सूर्यके, सूर्य और बुध चन्द्रके, सूर्य, चन्द्र और वृहस्पति मङ्गलके, सूर्य और शुक्र बुधके, सूर्य, चन्द्र और मङ्गल वृहस्पतिके, बुध और शनि शुक्रके, और बुध और शुक्र शनिके मित्र हैं।
फिर शुक्र और शनि सूर्यके, बुध मङ्गलके, चन्द्र बुधके, बुध और शुक्र वृहस्पतिके, रवि और चन्द्र शुक्रके और रवि, चन्द्र और मङ्गल शनिके शत्रु होते हैं। चन्द्रका कोई शत्रु नहीं। सिवा मित्र और शत्रुके अवशिष्ट ग्रह सम समझे जाते हैं। जैसे,—रविके चन्द्र, मङ्गल और वृहस्पति मित्र, किन्तु शुक्र
और शनि शत्रु होते हैं; इसोसे बुध रविके सम है।
ग्रहोंके तात्कालिक मित्र-निरूपण करनेका नियम यह है,—जिन ग्रहोंसे चतुर्थ, दशम, द्वितीय, तृतीय और एकादश—इन सकल स्थानोंमें जो सकल ग्रह रहेंगे, वह उन्हीं-उन्हीं ग्रहोंके तात्कालिक मित्र समझे जायेंगे। इन सकल स्थानसे भिन्न दूसरे स्थानमें रहने से ग्रह तात्कालिक होते हैं। जो ग्रह जिस ग्रहका स्वाभाविक मित्र, सम और शत्रु हुआ करता, वह तात्कालिक अधिमित्र, मित्र और सम बन जाता है।
अधिमुक्तक (सं॰ पु॰) माधवीलता, चमेली।
अधिमुक्ति (सं॰ स्त्री॰) १ अनुभव, तजरबा। २ दृढ़ विश्वास, पुख़ता एतक़ाद। इस शब्दका व्यवहार बौद्ध अधिक करते हैं।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिमुक्तिक (सं॰ पु॰) बौद्ध धर्मानुसार—महाकाल, सबको नाश करनेवाला परमेश्वर।
अधिमुक्तिका (सं॰ स्त्री॰) मुक्तागृहा, शक्ती, सीप।
अधिमह्य (सं॰ पु॰) शाक्यमुनि। चौंतीसवें पूर्वजन्ममें शाक्य-मुनिको अतिमुह्य कहते थे।
अधियज्ञ (सं॰ पु॰) अधिकृतो यज्ञो यस्मात्, प्रादिबहुव्री॰। १ परमेश्वर, यज्ञको अधिकृत करनेवाला पुरुष। अधिकः अधिकाङ्गयागः, प्रादि स॰। २ अधिकाङ्ग याग, वह यज्ञ जिसमें अनेक अङ्ग रहते हैं। ३ प्रधान यज्ञ। (त्रि॰) ४ यज्ञ सम्बन्धीय, यज्ञका। ५ यज्ञके विषयमें, यज्ञको अधिकार कर, यज्ञकी बातपर।
अधिया (हिं॰ पु॰) १ अर्धांश, आधा टुकड़ा। २ मौज़ेमें निस्फ़, पट्टीकी शिरकत, 'आधी पट्टीकी हिस्सेदारी।' ३ उत्पन्न हुए शस्यका अर्धांश प्रभु और अर्धांश कार्य करनेवालोंको प्रदान करनेका नियम, उपजका आधा हिस्सा मालिक और आधा मजदूरों को देनेका क़ायदा। ४ गांवकी आधी पट्टीका ज़मीन्दार, अधियार।
अधियाङ्ग (सं॰ क्ली॰) अधिक अङ्ग फजूल अज़ो।
अधियान (हिं॰ पु॰) गोमुखी; जप करनेकी थैली। यह थैली प्रायः ऊनकी बनती और गोमुख-जैसी होती है। इसके ऊपर कारीगर रङ्गीन रेशम या ऊनसे गो, राम, कृष्ण आदि देवतोंके चित्र भी बेल बूटोंमें निकाल देते हैं। भक्त इसके भीतर रुद्राक्षकी माला डाल अपने इष्टदेवका मन्त्र जपा करते हैं। कहतें
हैं, कि बिना गोमुखी खोलकर माला फेरनेसे सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
अधियाना (हिं॰ क्रि॰) अर्धांशमें विभाजित करना, आधा-आधा हिस्सा लगाना, दो समान भागों में बांटना बराबर-बराबरके दो टुकड़े उतारना।
अधियार (हिं॰ पु॰) १ सम्पत्तिका अर्धांश, मिलकियतका निस्क हिस्सा, जायदादका आधा साझा। २ अर्धांशका प्रभु, निस्फ़का क़ाबिज़। ३ गांवके आंधे जोतका असामी। ५ दो गांवों में बराबर हिस्सा रखनेवाला जमीन्दार या आसामी।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधियारी—अधिरोहण'''|'''३६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधियारी (हिं॰ स्त्री॰) १ सम्पत्तिके अर्धांशका अधिकार, मिलकियतका निस्फ़ हिस्सा, जायदादका आधा इख़तिआर। २ दो गांवोंकी बराबर हिस्सेदारी।
अधियोग (सं॰ पु॰) अधिको योगः, प्रादि-स॰। ज्योतिष के मतसे यात्रिक शुभ योग। इस योगमें यात्रा करनेसे मङ्गल होता है और कोई विघ्न नहीं पड़ता।
अधियोध (सं॰ पु॰) अधि-युध्-घञ्, आधिक्येन युध्यति। १ महायोद्धा, बड़ा वीर, अज़ीम शुजा। (अव्य॰) २ महायोद्धाके विषय में, बड़े वीरको लेकर, अज़ीम शुजाकी बाबत।
अधिरज्जु (वे॰ त्रि॰) १ रज्जुधारण किये हुए, रसी लिये हुए। २ बांधते हुए, लपेटते हुए। ३ हथ-कड़ी-बेड़ी डालते या पहनाते हुए।
अधिरथ (सं॰ पु॰) अध्यारूढः रथम्, अत्या॰ स॰। महारथ, रथपर विराजमान वीर, योद्धा जो रथपर चढ़ा हो। २ सारथी, रथ चलानेवाला, गाड़ीबान। ३ विशाल रथ, बढ़िया गाड़ी।
४ अङ्गवंशोद्भव सत्यकर्माके पुत्र। इनकी स्त्रीका नाम राधा था। अधिरथ धृतराष्ट्र के सखा और कर्णके पालक-पिता रहे। किसी समय यह अपनी पत्नी राधाको साथ लेकर भागीरथी तीर जा उपस्थित हुए थे। राधाने गङ्गाजलमें एक बहती हुई मञ्जूषाको (सन्दूक़) आते देख स्वामीके निकट लानेकी प्रार्थना की। जलसे जैसे ही मञ्जूषा निकाल अधिरथने खोली, वैसे ही उसमें एक सद्यप्रसूत सुत देख पड़ा, जिसे उठा भार्याको दे दिया। उस समय राधाके पुत्रादि न हुए थे। बालक पाकर वह महानन्दसे घर गईं और यथाविधि उसका भरण-पोषण करने लगीं। वही बालक पृथा द्वारा परित्यक्त कर्ण निकला। <small>(महाभारत, विष्णुपुराण ४।१६ अ॰)।</small> अधिरथ सूतका
कार्य करते थे और कर्णको पुत्रत्वमें प्रतिग्रह कर लिया; कर्णके सूतपुत्र कहलानेका यही प्रधान कारण था।
(क्ली॰) ५ गाड़ीका असबाब या बोझ।
अधिरथी (सं॰ पु॰) १ सूर्य, आफ़ताब। २ समुद्र, बहर।
अधिरथ्यम् (सं॰ अव्य॰) प्रधान मार्गपर, बड़ी राहमें।
अधिराज् (सं॰ पु॰) अधिराजत इति, अधि-राज क्विप्। १ सम्राट्, नृप, बादशाह। (त्रि॰) २ अधिक शोभान्वित, ज़्यादा रौनक़दार।
अधिराज (सं॰ पु॰) अधिको राजा, टच् स॰। अधीश्वर, सम्राट्, बादशाह।
अधिराज्य (सं॰ क्ली॰) अधिकं राज्यम्, प्रादि-स॰। साम्राज्य, शाही।
अधिराज्यभाक् (सं॰ पु॰) अधिराट्, साम्राज्यके वैभवका अधिकारी; शाहीका मालिक,—
{{Block center|<poem><small>"अत्त्यन्यान् पृथिवीपालान् पृथिव्यामधिराज्यभाक्।" (महाभारत)</small></poem>}}
अधिराष्ट्र (सं॰ क्ली॰) अधिकृतं राष्ट्रमत्र, प्रादि-बहुव्री॰। १ राज्य, बादशाहौ। (अव्य॰) २ राज्यको अधिकार कर, राज्यके विषय में।
अधिरुक्भ (सं॰ त्रि॰) अधिगतं रुक्मं आभरणं येन, प्रादि-बहुव्री॰। १ आभरण-प्राप्त, जिसे ज़ेवर या गहना मिला हो। (पु॰) अधिकं रुक्मं सुवर्णाभरणम्, प्रादि-स॰। २ अधिक सुवर्णीभरण, ज्य़ादा सोनेका ज़ेवर या गहना।—
{{Block center|<poem><small>"अध स्या योषणा मही प्रतीचि वशमश्व्यं ।
अधिरुक्मा विनीयते।" (ऋक् ८।४६।३३।)</small></poem>}}
अधिरूढ़ (सं॰ त्रि॰) अधि-रुह-क्त कर्तरि। १ चढ़ा या ऊपर पहुंचा हुआ। २ अत्यन्त वृद्धियुक्त, निहायत चढ़ा-बढ़ा।
अधिरूढ़समाधियोग (सं॰ त्रि॰) ससाधिके योगमें अधिरूढ़, गहरे ध्यानमें लगा।
अधिरोपण (सं॰ क्ली॰) ऊपरका चढ़ाना या उठाना।
अधिरोपित (सं॰ वि॰) अधि-रुह-णिच्-क्त पुक् कर्मणि। <small>रुहः पोऽन्यतरस्याम्। पा ७।३।४३।</small> अतिशय आरोपित हुआ, ऊपर रखा गया।
अधिरोह (सं॰ पु॰) अधि-रुह-घञ्। ऊपरका आरोहण, चढ़ाव।
अधिरोहण (सं॰ क्ली॰) अधि-रूह-ल्युट् भावे। १ ऊपरका आरोहण, ऊंचेका चढ़ाव। २ सोपान, सिड्डी। <small>"'आरोहणं स्यात् सोपानं।' (अमर)</small><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधियारी—अधिरोहण'''|'''३६५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधियारी (हिं॰ स्त्री॰) १ सम्पत्तिके अर्धांशका अधिकार, मिलकियतका निस्फ़ हिस्सा, जायदादका आधा इख़तिआर। २ दो गांवोंकी बराबर हिस्सेदारी।
अधियोग (सं॰ पु॰) अधिको योगः, प्रादि-स॰। ज्योतिष के मतसे यात्रिक शुभ योग। इस योगमें यात्रा करनेसे मङ्गल होता है और कोई विघ्न नहीं पड़ता।
अधियोध (सं॰ पु॰) अधि-युध्-घञ्, आधिक्येन युध्यति। १ महायोद्धा, बड़ा वीर, अज़ीम शुजा। (अव्य॰) २ महायोद्धाके विषय में, बड़े वीरको लेकर, अज़ीम शुजाकी बाबत।
अधिरज्जु (वे॰ त्रि॰) १ रज्जुधारण किये हुए, रसी लिये हुए। २ बांधते हुए, लपेटते हुए। ३ हथ-कड़ी-बेड़ी डालते या पहनाते हुए।
अधिरथ (सं॰ पु॰) अध्यारूढः रथम्, अत्या॰ स॰। महारथ, रथपर विराजमान वीर, योद्धा जो रथपर चढ़ा हो। २ सारथी, रथ चलानेवाला, गाड़ीबान। ३ विशाल रथ, बढ़िया गाड़ी।
४ अङ्गवंशोद्भव सत्यकर्माके पुत्र। इनकी स्त्रीका नाम राधा था। अधिरथ धृतराष्ट्र के सखा और कर्णके पालक-पिता रहे। किसी समय यह अपनी पत्नी राधाको साथ लेकर भागीरथी तीर जा उपस्थित हुए थे। राधाने गङ्गाजलमें एक बहती हुई मञ्जूषाको (सन्दूक़) आते देख स्वामीके निकट लानेकी प्रार्थना की। जलसे जैसे ही मञ्जूषा निकाल अधिरथने खोली, वैसे ही उसमें एक सद्यप्रसूत सुत देख पड़ा, जिसे उठा भार्याको दे दिया। उस समय राधाके पुत्रादि न हुए थे। बालक पाकर वह महानन्दसे घर गईं और यथाविधि उसका भरण-पोषण करने लगीं। वही बालक पृथा द्वारा परित्यक्त कर्ण निकला। <small>(महाभारत, विष्णुपुराण ४।१६ अ॰)।</small> अधिरथ सूतका
कार्य करते थे और कर्णको पुत्रत्वमें प्रतिग्रह कर लिया; कर्णके सूतपुत्र कहलानेका यही प्रधान कारण था।
(क्ली॰) ५ गाड़ीका असबाब या बोझ।
अधिरथी (सं॰ पु॰) १ सूर्य, आफ़ताब। २ समुद्र, बहर।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिरथ्यम् (सं॰ अव्य॰) प्रधान मार्गपर, बड़ी राहमें।
अधिराज् (सं॰ पु॰) अधिराजत इति, अधि-राज क्विप्। १ सम्राट्, नृप, बादशाह। (त्रि॰) २ अधिक शोभान्वित, ज़्यादा रौनक़दार।
अधिराज (सं॰ पु॰) अधिको राजा, टच् स॰। अधीश्वर, सम्राट्, बादशाह।
अधिराज्य (सं॰ क्ली॰) अधिकं राज्यम्, प्रादि-स॰। साम्राज्य, शाही।
अधिराज्यभाक् (सं॰ पु॰) अधिराट्, साम्राज्यके वैभवका अधिकारी; शाहीका मालिक,—
{{Block center|<poem><small>"अत्त्यन्यान् पृथिवीपालान् पृथिव्यामधिराज्यभाक्।" (महाभारत)</small></poem>}}
अधिराष्ट्र (सं॰ क्ली॰) अधिकृतं राष्ट्रमत्र, प्रादि-बहुव्री॰। १ राज्य, बादशाहौ। (अव्य॰) २ राज्यको अधिकार कर, राज्यके विषय में।
अधिरुक्भ (सं॰ त्रि॰) अधिगतं रुक्मं आभरणं येन, प्रादि-बहुव्री॰। १ आभरण-प्राप्त, जिसे ज़ेवर या गहना मिला हो। (पु॰) अधिकं रुक्मं सुवर्णाभरणम्, प्रादि-स॰। २ अधिक सुवर्णीभरण, ज्य़ादा सोनेका ज़ेवर या गहना।—
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अधिरुक्मा विनीयते।" (ऋक् ८।४६।३३।)</small></poem>}}
अधिरूढ़ (सं॰ त्रि॰) अधि-रुह-क्त कर्तरि। १ चढ़ा या ऊपर पहुंचा हुआ। २ अत्यन्त वृद्धियुक्त, निहायत चढ़ा-बढ़ा।
अधिरूढ़समाधियोग (सं॰ त्रि॰) ससाधिके योगमें अधिरूढ़, गहरे ध्यानमें लगा।
अधिरोपण (सं॰ क्ली॰) ऊपरका चढ़ाना या उठाना।
अधिरोपित (सं॰ वि॰) अधि-रुह-णिच्-क्त पुक् कर्मणि। <small>रुहः पोऽन्यतरस्याम्। पा ७।३।४३।</small> अतिशय आरोपित हुआ, ऊपर रखा गया।
अधिरोह (सं॰ पु॰) अधि-रुह-घञ्। ऊपरका आरोहण, चढ़ाव।
अधिरोहण (सं॰ क्ली॰) अधि-रूह-ल्युट् भावे। १ ऊपरका आरोहण, ऊंचेका चढ़ाव। २ सोपान, सिड्डी। <small>"'आरोहणं स्यात् सोपानं।' (अमर)</small><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अधियोग (सं॰ पु॰) अधिको योगः, प्रादि-स॰। ज्योतिष के मतसे यात्रिक शुभ योग। इस योगमें यात्रा करनेसे मङ्गल होता है और कोई विघ्न नहीं पड़ता।
अधियोध (सं॰ पु॰) अधि-युध्-घञ्, आधिक्येन युध्यति। १ महायोद्धा, बड़ा वीर, अज़ीम शुजा। (अव्य॰) २ महायोद्धाके विषय में, बड़े वीरको लेकर, अज़ीम शुजाकी बाबत।
अधिरज्जु (वे॰ त्रि॰) १ रज्जुधारण किये हुए, रसी लिये हुए। २ बांधते हुए, लपेटते हुए। ३ हथ-कड़ी-बेड़ी डालते या पहनाते हुए।
अधिरथ (सं॰ पु॰) अध्यारूढः रथम्, अत्या॰ स॰। महारथ, रथपर विराजमान वीर, योद्धा जो रथपर चढ़ा हो। २ सारथी, रथ चलानेवाला, गाड़ीबान। ३ विशाल रथ, बढ़िया गाड़ी।
४ अङ्गवंशोद्भव सत्यकर्माके पुत्र। इनकी स्त्रीका नाम राधा था। अधिरथ धृतराष्ट्र के सखा और कर्णके पालक-पिता रहे। किसी समय यह अपनी पत्नी राधाको साथ लेकर भागीरथी तीर जा उपस्थित हुए थे। राधाने गङ्गाजलमें एक बहती हुई मञ्जूषाको (सन्दूक़) आते देख स्वामीके निकट लानेकी प्रार्थना की। जलसे जैसे ही मञ्जूषा निकाल अधिरथने खोली, वैसे ही उसमें एक सद्यप्रसूत सुत देख पड़ा, जिसे उठा भार्याको दे दिया। उस समय राधाके पुत्रादि न हुए थे। बालक पाकर वह महानन्दसे घर गईं और यथाविधि उसका भरण-पोषण करने लगीं। वही बालक पृथा द्वारा परित्यक्त कर्ण निकला। <small>(महाभारत, विष्णुपुराण ४।१६ अ॰)।</small> अधिरथ सूतका
कार्य करते थे और कर्णको पुत्रत्वमें प्रतिग्रह कर लिया; कर्णके सूतपुत्र कहलानेका यही प्रधान कारण था।
(क्ली॰) ५ गाड़ीका असबाब या बोझ।
अधिरथी (सं॰ पु॰) १ सूर्य, आफ़ताब। २ समुद्र, बहर।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिरथ्यम् (सं॰ अव्य॰) प्रधान मार्गपर, बड़ी राहमें।
अधिराज् (सं॰ पु॰) अधिराजत इति, अधि-राज क्विप्। १ सम्राट्, नृप, बादशाह। (त्रि॰) २ अधिक शोभान्वित, ज़्यादा रौनक़दार।
अधिराज (सं॰ पु॰) अधिको राजा, टच् स॰। अधीश्वर, सम्राट्, बादशाह।
अधिराज्य (सं॰ क्ली॰) अधिकं राज्यम्, प्रादि-स॰। साम्राज्य, शाही।
अधिराज्यभाक् (सं॰ पु॰) अधिराट्, साम्राज्यके वैभवका अधिकारी; शाहीका मालिक,—
{{Block center|<poem><small>"अत्त्यन्यान् पृथिवीपालान् पृथिव्यामधिराज्यभाक्।" (महाभारत)</small></poem>}}
अधिराष्ट्र (सं॰ क्ली॰) अधिकृतं राष्ट्रमत्र, प्रादि-बहुव्री॰। १ राज्य, बादशाहौ। (अव्य॰) २ राज्यको अधिकार कर, राज्यके विषय में।
अधिरुक्भ (सं॰ त्रि॰) अधिगतं रुक्मं आभरणं येन, प्रादि-बहुव्री॰। १ आभरण-प्राप्त, जिसे ज़ेवर या गहना मिला हो। (पु॰) अधिकं रुक्मं सुवर्णाभरणम्, प्रादि-स॰। २ अधिक सुवर्णीभरण, ज्य़ादा सोनेका ज़ेवर या गहना।—
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अधिरुक्मा विनीयते।" (ऋक् ८।४६।३३।)</small></poem>}}
अधिरूढ़ (सं॰ त्रि॰) अधि-रुह-क्त कर्तरि। १ चढ़ा या ऊपर पहुंचा हुआ। २ अत्यन्त वृद्धियुक्त, निहायत चढ़ा-बढ़ा।
अधिरूढ़समाधियोग (सं॰ त्रि॰) ससाधिके योगमें अधिरूढ़, गहरे ध्यानमें लगा।
अधिरोपण (सं॰ क्ली॰) ऊपरका चढ़ाना या उठाना।
अधिरोपित (सं॰ वि॰) अधि-रुह-णिच्-क्त पुक् कर्मणि। <small>रुहः पोऽन्यतरस्याम्। पा ७।३।४३।</small> अतिशय आरोपित हुआ, ऊपर रखा गया।
अधिरोह (सं॰ पु॰) अधि-रुह-घञ्। ऊपरका आरोहण, चढ़ाव।
अधिरोहण (सं॰ क्ली॰) अधि-रूह-ल्युट् भावे। १ ऊपरका आरोहण, ऊंचेका चढ़ाव। २ सोपान, सिड्डी। <small>"'आरोहणं स्यात् सोपानं।' (अमर)</small><noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Dhr|}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३७३
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३६६'''|'''अधिरोहणी—अधिवासी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिरोहणी (सं॰ स्त्री॰) आरुह्यते अनया, अधि-रुह-ल्युट् करणे। निश्रेणि, नसेनी, सिड्डी, ज़ीना; वह वस्तु जिसके द्वारा ऊपर चढ़ें। अमरकोषके पाठमें अधिरोहिणी लिखा गया है,—<small>निश्चे णिस्त्वधिरोहिणी।"</small>
अधिलोक (सं॰ पु॰) १ जगत्, विश्व, दुनिया,। (त्रि॰) २ सांसारिक, दुनियावी।
अधिलोकम् (सं॰ अव्य॰) जगत्के विषयपर, दुनियाकी बाबत।
अधिलोकनाथ (सं॰ पु॰) जगत्के प्रभु, दुनिया के मालिक।
अधिवक्तृ (सं॰ त्रि॰) अधि-वच्-तृच्। पक्षपातसे बात करनेवाला, जो एक ओर ढलकर बोले। (वै॰ पु॰) २ पृष्ठपोषक, वकील। ३ सन्तुष्ट करनेवाला पुरुष, वह आदमी जो तसकीन दिलाये। ४ व्याख्यानदाता, ख़ूब बोलनेवाला आदमी। (स्त्री॰) अधिवक्त्री।
अधिवचन (सं॰ क्ली॰) अधि-वच्-ल्युट्। १ पक्ष-पातयुक्त कथा, तरफ़दारीकी बात। २ वकालत, बहस वितर्क। ३ नाम, संज्ञा ; इस्म, लक़ब।
अधिवस्त्र (सं॰ त्रि॰) अध्याहृतं वस्त्रं येन, प्रादि-बहुव्री॰। जिसकी देहपर वस्त्र निहत हो, पोशाक पहने हुए।
अधिवाक (सं॰ पु॰) अधि-वच्-घञ्। पक्षपात-युक्त वाक्य, तरफ़दारी-आमेज़ सखुन, एक-तरफ़ी बात।
अधिवाचन (सं॰ पु॰) चुनाव, कई लोगों में एक को निर्वाचन करनेकी सम्मति, नामज़दगी।
अधिवास (सं॰ पु॰) अधि-वस निवासे घञ्। १ निवास, बसनेका स्थान, ठहरनेकी जगह। २ सहवासी, पड़ोसी, हमसाया। अधि-वस सुरभीकरणे घञ् भावे। ३ सौरभ, खु़शबू। अधिवासयति देवता अनेन इति, अधि-वस-णिच् करणे। ४ गन्धमाल्यादि द्वारा संस्कार। देवताओंकी पूजाके पहले दिन या किसी यज्ञादि क्रियामें अधिवास नामक एक संस्कार किया जाता है। इस देशमें एक ताम्रपात्र, कठौते या अन्य किसी आधारमें मृत्तिका, गन्ध (अतर), शिला, धान्य, दूर्वा, पुष्प, फल, दधि, घृत, स्वस्तिक,—
आग, सिन्दूर, शङ्ख, कज्जल, रोचना, खेतसर्षप, स्वर्ण, रौप्य, ताम्र, चामर, दर्पण, दीप और प्रशस्तपात्र—इन बाईस द्रव्योंको एकत्र संग्रह करना पड़ता है। प्रशस्तपात्रपर अन्यान्य द्रव्य रखे जाते हैं। दुर्गोत्सवादि कोई-कोई क्रियाओं में अधिवास संस्कार पूजाके पूर्वदिन होता है। अन्नप्राशन, यज्ञोपवीत, विवाह प्रभृति क्रियाओं में इन सकल संस्कारके दिनोंमें ही अधिवास करते हैं। सामवेदीय अधिवासके द्रव्य बाईस हैं, यजुर्वेदके अधिवासमें इक्कीस ही लगते हैं। पूजाके उपलक्ष में अधिवास करनेपर मन्त्रपाठपूर्वक एक-एक द्रव्यको उठा देवताके कपालसे स्पर्श कराना पड़ता है। फिर मृत्तिकाको स्पर्श कर पुनर्वार द्रव्य प्रशस्त पात्रमें रखे जाते हैं। इसीतरह एक-एक करके समस्त द्रव्य एक बार देवताके कपाल और फिर मृत्तिकासे स्पर्श कराते हैं। अन्नप्राशनादिके लिये कोई शुभकर्म होनेपर जिसका संस्कार होगा, उसीके कपालसे अधिवासका द्रव्य स्पर्श करना पड़ेगा। स्थल विशेष और कुलपरम्पराकी प्रथा विशेषसे अन्नप्राशनादि शुभकर्मके पूर्वदिन अधिवास होता है। <small>अन्नप्राशन और दुर्गोत्सव देखो।</small>
५ विवाहके पूर्व तैल और हरिद्रा चढ़ानेकी चाल। ६ उबटन, देहपर तेल-मिले आटेकी मालिश। ७ अधिक संस्थान, ज्य़ादा देरका क़याम। ८ अन्यके भवनका निवास, दूसरेके मकानका रहना। मनुने इसे स्त्रियोंके छः दोषोंमें लिखा है।
अधिवासन (सं॰ क्ली॰) अधिवासयति स्थापयति देवता अनेन, अधि-वस- णिच्-ल्युट्। १ अधिवास, गन्ध-माल्यादि द्वारा संस्करण। २ मूर्तिमं देवप्रतिष्ठा।
३ धरनेका बैठना। ४ देवपूजाके पूर्वदिनका अनुष्ठान-विशेष।
अधिवासित (सं॰ त्रि॰) सुगन्धित, ख़ुशबूदार।
अधिवासिता (सं॰ स्त्री॰) निश्चित निवास, मुक़रर ठहराव।
अधिवासिन् (सं॰ त्रि॰) निवास करनेवाला, रहनेवाला, जो टिक जाये।
अधिवासी, <small>अधिवासिन् देखो।</small><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३६६'''|'''अधिरोहणी—अधिवासी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिरोहणी (सं॰ स्त्री॰) आरुह्यते अनया, अधि-रुह-ल्युट् करणे। निश्रेणि, नसेनी, सिड्डी, ज़ीना; वह वस्तु जिसके द्वारा ऊपर चढ़ें। अमरकोषके पाठमें अधिरोहिणी लिखा गया है,—<small>निश्चे णिस्त्वधिरोहिणी।"</small>
अधिलोक (सं॰ पु॰) १ जगत्, विश्व, दुनिया,। (त्रि॰) २ सांसारिक, दुनियावी।
अधिलोकम् (सं॰ अव्य॰) जगत्के विषयपर, दुनियाकी बाबत।
अधिलोकनाथ (सं॰ पु॰) जगत्के प्रभु, दुनिया के मालिक।
अधिवक्तृ (सं॰ त्रि॰) अधि-वच्-तृच्। पक्षपातसे बात करनेवाला, जो एक ओर ढलकर बोले। (वै॰ पु॰) २ पृष्ठपोषक, वकील। ३ सन्तुष्ट करनेवाला पुरुष, वह आदमी जो तसकीन दिलाये। ४ व्याख्यानदाता, ख़ूब बोलनेवाला आदमी। (स्त्री॰) अधिवक्त्री।
अधिवचन (सं॰ क्ली॰) अधि-वच्-ल्युट्। १ पक्ष-पातयुक्त कथा, तरफ़दारीकी बात। २ वकालत, बहस वितर्क। ३ नाम, संज्ञा ; इस्म, लक़ब।
अधिवस्त्र (सं॰ त्रि॰) अध्याहृतं वस्त्रं येन, प्रादि-बहुव्री॰। जिसकी देहपर वस्त्र निहत हो, पोशाक पहने हुए।
अधिवाक (सं॰ पु॰) अधि-वच्-घञ्। पक्षपात-युक्त वाक्य, तरफ़दारी-आमेज़ सखुन, एक-तरफ़ी बात।
अधिवाचन (सं॰ पु॰) चुनाव, कई लोगों में एक को निर्वाचन करनेकी सम्मति, नामज़दगी।
अधिवास (सं॰ पु॰) अधि-वस निवासे घञ्। १ निवास, बसनेका स्थान, ठहरनेकी जगह। २ सहवासी, पड़ोसी, हमसाया। अधि-वस सुरभीकरणे घञ् भावे। ३ सौरभ, खु़शबू। अधिवासयति देवता अनेन इति, अधि-वस-णिच् करणे। ४ गन्धमाल्यादि द्वारा संस्कार। देवताओंकी पूजाके पहले दिन या किसी यज्ञादि क्रियामें अधिवास नामक एक संस्कार किया जाता है। इस देशमें एक ताम्रपात्र, कठौते या अन्य किसी आधारमें मृत्तिका, गन्ध (अतर), शिला, धान्य, दूर्वा, पुष्प, फल, दधि, घृत, स्वस्तिक,—<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>आग, सिन्दूर, शङ्ख, कज्जल, रोचना, खेतसर्षप, स्वर्ण, रौप्य, ताम्र, चामर, दर्पण, दीप और प्रशस्तपात्र—इन बाईस द्रव्योंको एकत्र संग्रह करना पड़ता है। प्रशस्तपात्रपर अन्यान्य द्रव्य रखे जाते हैं। दुर्गोत्सवादि कोई-कोई क्रियाओं में अधिवास संस्कार पूजाके पूर्वदिन होता है। अन्नप्राशन, यज्ञोपवीत, विवाह प्रभृति क्रियाओं में इन सकल संस्कारके दिनोंमें ही अधिवास करते हैं। सामवेदीय अधिवासके द्रव्य बाईस हैं, यजुर्वेदके अधिवासमें इक्कीस ही लगते हैं। पूजाके उपलक्ष में अधिवास करनेपर मन्त्रपाठपूर्वक एक-एक द्रव्यको उठा देवताके कपालसे स्पर्श कराना पड़ता है। फिर मृत्तिकाको स्पर्श कर पुनर्वार द्रव्य प्रशस्त पात्रमें रखे जाते हैं। इसीतरह एक-एक करके समस्त द्रव्य एक बार देवताके कपाल और फिर मृत्तिकासे स्पर्श कराते हैं। अन्नप्राशनादिके लिये कोई शुभकर्म होनेपर जिसका संस्कार होगा, उसीके कपालसे अधिवासका द्रव्य स्पर्श करना पड़ेगा। स्थल विशेष और कुलपरम्पराकी प्रथा विशेषसे अन्नप्राशनादि शुभकर्मके पूर्वदिन अधिवास होता है। <small>अन्नप्राशन और दुर्गोत्सव देखो।</small>
५ विवाहके पूर्व तैल और हरिद्रा चढ़ानेकी चाल। ६ उबटन, देहपर तेल-मिले आटेकी मालिश। ७ अधिक संस्थान, ज्य़ादा देरका क़याम। ८ अन्यके भवनका निवास, दूसरेके मकानका रहना। मनुने इसे स्त्रियोंके छः दोषोंमें लिखा है।
अधिवासन (सं॰ क्ली॰) अधिवासयति स्थापयति देवता अनेन, अधि-वस- णिच्-ल्युट्। १ अधिवास, गन्ध-माल्यादि द्वारा संस्करण। २ मूर्तिमं देवप्रतिष्ठा।
३ धरनेका बैठना। ४ देवपूजाके पूर्वदिनका अनुष्ठान-विशेष।
अधिवासित (सं॰ त्रि॰) सुगन्धित, ख़ुशबूदार।
अधिवासिता (सं॰ स्त्री॰) निश्चित निवास, मुक़रर ठहराव।
अधिवासिन् (सं॰ त्रि॰) निवास करनेवाला, रहनेवाला, जो टिक जाये।
अधिवासी, <small>अधिवासिन् देखो।</small><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३६६'''|'''अधिरोहणी—अधिवासी'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिरोहणी (सं॰ स्त्री॰) आरुह्यते अनया, अधि-रुह-ल्युट् करणे। निश्रेणि, नसेनी, सिड्डी, ज़ीना; वह वस्तु जिसके द्वारा ऊपर चढ़ें। अमरकोषके पाठमें अधिरोहिणी लिखा गया है,—<small>निश्चे णिस्त्वधिरोहिणी।"</small>
अधिलोक (सं॰ पु॰) १ जगत्, विश्व, दुनिया,। (त्रि॰) २ सांसारिक, दुनियावी।
अधिलोकम् (सं॰ अव्य॰) जगत्के विषयपर, दुनियाकी बाबत।
अधिलोकनाथ (सं॰ पु॰) जगत्के प्रभु, दुनिया के मालिक।
अधिवक्तृ (सं॰ त्रि॰) अधि-वच्-तृच्। पक्षपातसे बात करनेवाला, जो एक ओर ढलकर बोले। (वै॰ पु॰) २ पृष्ठपोषक, वकील। ३ सन्तुष्ट करनेवाला पुरुष, वह आदमी जो तसकीन दिलाये। ४ व्याख्यानदाता, ख़ूब बोलनेवाला आदमी। (स्त्री॰) अधिवक्त्री।
अधिवचन (सं॰ क्ली॰) अधि-वच्-ल्युट्। १ पक्ष-पातयुक्त कथा, तरफ़दारीकी बात। २ वकालत, बहस वितर्क। ३ नाम, संज्ञा ; इस्म, लक़ब।
अधिवस्त्र (सं॰ त्रि॰) अध्याहृतं वस्त्रं येन, प्रादि-बहुव्री॰। जिसकी देहपर वस्त्र निहत हो, पोशाक पहने हुए।
अधिवाक (सं॰ पु॰) अधि-वच्-घञ्। पक्षपात-युक्त वाक्य, तरफ़दारी-आमेज़ सखुन, एक-तरफ़ी बात।
अधिवाचन (सं॰ पु॰) चुनाव, कई लोगों में एक को निर्वाचन करनेकी सम्मति, नामज़दगी।
अधिवास (सं॰ पु॰) अधि-वस निवासे घञ्। १ निवास, बसनेका स्थान, ठहरनेकी जगह। २ सहवासी, पड़ोसी, हमसाया। अधि-वस सुरभीकरणे घञ् भावे। ३ सौरभ, खु़शबू। अधिवासयति देवता अनेन इति, अधि-वस-णिच् करणे। ४ गन्धमाल्यादि द्वारा संस्कार। देवताओंकी पूजाके पहले दिन या किसी यज्ञादि क्रियामें अधिवास नामक एक संस्कार किया जाता है। इस देशमें एक ताम्रपात्र, कठौते या अन्य किसी आधारमें मृत्तिका, गन्ध (अतर), शिला, धान्य, दूर्वा, पुष्प, फल, दधि, घृत, स्वस्तिक,—<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>आग, सिन्दूर, शङ्ख, कज्जल, रोचना, खेतसर्षप, स्वर्ण, रौप्य, ताम्र, चामर, दर्पण, दीप और प्रशस्तपात्र—इन बाईस द्रव्योंको एकत्र संग्रह करना पड़ता है। प्रशस्तपात्रपर अन्यान्य द्रव्य रखे जाते हैं। दुर्गोत्सवादि कोई-कोई क्रियाओं में अधिवास संस्कार पूजाके पूर्वदिन होता है। अन्नप्राशन, यज्ञोपवीत, विवाह प्रभृति क्रियाओं में इन सकल संस्कारके दिनोंमें ही अधिवास करते हैं। सामवेदीय अधिवासके द्रव्य बाईस हैं, यजुर्वेदके अधिवासमें इक्कीस ही लगते हैं। पूजाके उपलक्ष में अधिवास करनेपर मन्त्रपाठपूर्वक एक-एक द्रव्यको उठा देवताके कपालसे स्पर्श कराना पड़ता है। फिर मृत्तिकाको स्पर्श कर पुनर्वार द्रव्य प्रशस्त पात्रमें रखे जाते हैं। इसीतरह एक-एक करके समस्त द्रव्य एक बार देवताके कपाल और फिर मृत्तिकासे स्पर्श कराते हैं। अन्नप्राशनादिके लिये कोई शुभकर्म होनेपर जिसका संस्कार होगा, उसीके कपालसे अधिवासका द्रव्य स्पर्श करना पड़ेगा। स्थल विशेष और कुलपरम्पराकी प्रथा विशेषसे अन्नप्राशनादि शुभकर्मके पूर्वदिन अधिवास होता है। <small>अन्नप्राशन और दुर्गोत्सव देखो।</small>
५ विवाहके पूर्व तैल और हरिद्रा चढ़ानेकी चाल। ६ उबटन, देहपर तेल-मिले आटेकी मालिश। ७ अधिक संस्थान, ज्य़ादा देरका क़याम। ८ अन्यके भवनका निवास, दूसरेके मकानका रहना। मनुने इसे स्त्रियोंके छः दोषोंमें लिखा है।
अधिवासन (सं॰ क्ली॰) अधिवासयति स्थापयति देवता अनेन, अधि-वस- णिच्-ल्युट्। १ अधिवास, गन्ध-माल्यादि द्वारा संस्करण। २ मूर्तिमं देवप्रतिष्ठा।
३ धरनेका बैठना। ४ देवपूजाके पूर्वदिनका अनुष्ठान-विशेष।
अधिवासित (सं॰ त्रि॰) सुगन्धित, ख़ुशबूदार।
अधिवासिता (सं॰ स्त्री॰) निश्चित निवास, मुक़रर ठहराव।
अधिवासिन् (सं॰ त्रि॰) निवास करनेवाला, रहनेवाला, जो टिक जाये।
अधिवासी, <small>अधिवासिन् देखो।</small><noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३७४
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधिवाहन—अधिष्ठातृ'''|'''३६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिवाहन (सं॰ पु॰) किसी मनुष्यका नाम। लोग इन्हें अङ्गका पुत्र बताते हैं।
अधिविकर्तन (सं॰ क्ली॰) टुकड़े उड़ानेका काम, काट डालने का कार्य।
अधिविद्यम् (सं॰ अ ) विज्ञानके विषय में, इसके
लिये |
अधिविन्ना (सं० स्त्री० ) १ स्त्री जिसके पतिने फिर
विवाह कर लिया हो, जोरू जिसके शौहरने उसके
जीते दूसरी शादी कर ली हो । २ स्त्री जिसके पतिको
उसकी कोई परवा नहीं ।
अधिवेत्तव्या, अधिवेदनीया, अधिवेद्या (स० स्त्रो० )
स्त्री जिसके रहते दूसरा विवाह करना उचित हो,
जोरू जिसके जीते जो दूसरी शादी करना मुनासिब
समझा जाये ।
अधिवेट, अधिवेत्ता (सं० त्रि०) पति जो एक स्त्री
रहते दूसरौसे विवाह करे, एक जोरू होते दूसरी
औरतसे शादी करनेवाला शौहर |
अधिवेदन (सं० क्लो० ) एक स्त्रीको उपस्थिति में
दूसरोको शादी |
दूसरौसे विवाह, एक जोरू रहते
अधिवेदनीय ( सं० त्रि० ) अधि- विदु - अनीयर् ।
एकबार विवाह करनेपर फिर विवाह करने योग्य,
जो एकबार शादी कर फिर शादी करने काबिल हो ।
अधिवेद्य (सं० त्रि० ) अधि-विदु-यत् कर्मणि ।
एकबार विवाह करनेपर पुनर्वार विवाह करने योग्य,
जो एकबार शादीकर फिर शादी करने काबिल हो !
अधिवेद्यम् (सं० अव्य०) वेदके विषयमें, वेदकी बाबत |
अधिवेशन (सं० क्लौ ० ) १ सङ्घ, बैठक, जमाव ।
३ उत्सव, जलसा ।
अधिशायन ( सं० क्लो० ) १ लेटना । २ सोना ।
अधिशायित (स ं० त्रि०) १ लेटा हुआ, जो आराम
करनेका आदी हो।
अधिश्रण (सं० क्ली ) अधि-श्रा-पाके णिच्-ल्य ुट् ।
पाचन, हाज़मा ।
३६७
सं० क्ली० )
अधि-श्रीञ् पाके ल्य ुट् ।
अधिश्रयण
चूल्ह े परका धरना, भट्ठीपरका चढ़ाना, किसी चोज़को
आग पर रखनेका काम ।
अधिश्रयणाय पाकाय
(सं० स्वी० ) अधिश्रीयते पच्यतेऽत्र,
अधि-श्रोञ्·अधिकरणे ल्युट् ततो ङीप् ।
१ चूल्हा,
तन्दूर । २ सिद्धो, ज़ोना ।
अधिश्रयणीय (सं० त्रि० )
हितं छ । १ पाक-सम्बन्धोय, चाशनीका । अवि-
श्रोञ् पाक-कर्मणि अनीयर् । २ पाक बनाने योग्य,
(सं० अव्य० ) अधि-श्रीञ्-कत्यार्थे
तवै। कृत्यार्थे तवैकेन कन्यत्वनः । पा ३ | ४ | १४ | पाचनसे, हाज़मे-
के ज़रिये ।
अधिश्रित (सं० त्रि० )
अधि- श्रि-क्त | १ आश्रित,
प्राप्त। २ आगपर रखा हुआ, चूल्हे पर चढ़ाया गया ।
अधिश्री (सं० वि० ) अधिका श्रीर्यस्य, बहुव्री० ।
१ अतिशय शोभान्वित, निहायत रौनक़दार |
२ अधिक सम्पत्तिशाली, निहायत ज़रदार । (स्त्री० )
अधिका श्री, प्रादि-स० । ३ अत्यन्त श्री, हद से
ज्यादा रौनक |
अधिषवण (वै० क्लो० ) अधिषूयते सोमोऽत्र, अधि-
षू-ल्य ुट् आधारे ।
१ सोमाभिषवका चर्ममय पात्र,
सोमरस निकालनेको चमड़ेका बरतन । २ सोम-
रसादि पानका पात्र, सोमरस आदि पीनेका बरतन ।
"अंशु दुहन्तो अध्यासते रावोत्यधिषवणचर्मणः ।
"
निरुक्त १२२|१ |
भावे ल्युट् ।
३ अभिषव, निचोड़ । (त्रि०
४ सोम-
रस निकालने और छाननेके काम आनेवाला ।
अधिषवण्य (वै० त्रि०) पुञ् - अभिषवे ल्युट् इति
अधिषवणं ततो यत् । भवे छन्दसि ।
भिषवका, सोमरस निकालने और छाननेवाला ।
२ अधिषवणफलक ।
"थव दाविव जघनाधिषवण्या कृता ।
पा४|४|११० | १ सोमा-
उलूखलसुतानामवेद्दि'द्र जालः ॥” (ऋक् ११२८५२ )
'अधिषवण्या उभे अधिषवणफलके 1' ( साथण )
- अधिश्रय (सं० पु० ) अधि-श्रीञ् - पाके अच् । १ पात्र, अधिष्ठाट, अधिष्ठाता (स० त्रि०) अधि-स्था-टच्-
बरतन जिसमें कोई चीज़ रखी जाये ।
चाशनी, जलाव ।
२ पाक,
षत्वम् । १ अध्यक्ष, नियन्ता, मुखिया, सरदार ; यह
देखनेवाला, कि नियमित रूपसे कार्य होता है या<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधिवाहन—अधिष्ठातृ'''|'''३६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिवाहन (सं॰ पु॰) किसी मनुष्यका नाम। लोग इन्हें अङ्गका पुत्र बताते हैं।
अधिविकर्तन (सं॰ क्ली॰) टुकड़े उड़ानेका काम, काट डालने का कार्य।
अधिविद्यम् (सं॰ अ॰) विज्ञानके विषयमें, इल्मके लिये।
अधिविन्ना (सं॰ स्त्री॰) १ स्त्री जिसके पतिने फिर विवाह कर लिया हो, जोरू जिसके शौहरने उसके जीते दूसरी शादी कर ली हो। २ स्त्री जिसके पतिको उसकी कोई परवा नहीं।
अधिवेत्तव्या, अधिवेदनीया, अधिवेद्या (सं॰ स्त्री॰) स्त्री जिसके रहते दूसरा विवाह करना उचित हो, जोरू जिसके जीते जी दूसरी शादी करना मुनासिब
समझा जाये।
अधिवेतृ, अधिवेत्ता (सं॰ त्रि॰) पति जो एक स्त्री रहते दूसरी से विवाह करे, एक जोरू होते दूसरी औरतसे शादी करनेवाला शौहर।
अधिवेदन (सं॰ क्ली॰) एक स्त्रीकी उपस्थिति में दूसरी से विवाह, एक जोरू रहते दूसरी को शादी।
अधिवेदनीय (सं॰ त्रि॰) अधि-विदु-अनीयर्। एकबार विवाह करनेपर फिर विवाह करने योग्य, जो एकबार शादी कर फिर शादी करने क़ाबिल हो।
अधिवेद्य (सं॰ त्रि॰) अधि-विदु-यत् कर्मणि। एकबार विवाह करनेपर पुनर्वार विवाह करने योग्य, जो एकबार शादीकर फिर शादी करने क़ाबिल हो!
अधिवेद्यम् (सं॰ अव्य॰) वेदके विषयमें, वेदकी बाबत।
अधिवेशन (सं॰ क्ली॰) १ सङ्घ, बैठक, जमाव। ३ उत्सव, जलसा।
अधिशायन (सं॰ क्ली॰) १ लेटना। २ सोना।
अधिशायित (सं॰ त्रि॰) १ लेटा हुआ, जो आराम करनेका आदी हो।
अधिश्रपण (सं॰ क्ली॰) अधि-श्रा-पाके णिच्-ल्युट्। पाचन, हाज़मा।
अधिश्रय (सं॰ पु॰) अधि-श्रीञ्-पाके अच्। १ पात्र, बरतन जिसमें कोई चीज़ रखी जाये। २ पाक, चाशनी, जलाव।
अधिश्रयण (सं॰ क्ली॰) अधि-श्रीञ् पाके ल्युट्। चूल्हे परका धरना, भट्ठीपरका चढ़ाना, किसी चीज़को आग पर रखनेका काम।
अधिश्रयणी (सं॰ स्त्री॰) अधिश्रीयते पच्यतेऽत्र, अधि-श्रोञ् अधिकरणे ल्युट् ततो ङीप्। १ चूल्हा, तन्दूर। २ सिड्ढी, ज़ीना।
अधिश्रयणीय (सं॰ त्रि॰) अधिश्रयणाय पाकाय हितं-छ। १ पाक-सम्बन्धीय, चाशनीका। अधिश्रीञ् पाक-कर्मणि अनीयर्। २ पाक बनाने योग्य,
अधिश्रयितवै (सं॰ अव्य॰) अधि-श्रीञ्-कृत्यार्थे तवै। <small>कृत्यार्थे तवैकेन् कन्यत्वनः। पा ३।४।१४ । पाचनसे, हाज़मेके ज़रिये।
अधिश्रित (सं॰ त्रि॰) अधि-श्रि-क्त। १ आश्रित, प्राप्त। २ आगपर रखा हुआ, चूल्हे पर चढ़ाया गया।
अधिश्री (सं॰ त्रि॰) अधिका श्रीर्यस्य, बहुव्री॰। १ अतिशय शोभान्वित, निहायत रौनक़दार। २ अधिक सम्पत्तिशाली, निहायत ज़रदार। (स्त्री॰) अधिका श्री, प्रादि-स॰। ३ अत्यन्त श्री, हद से ज्य़ादा रौनक़।
अधिषवण (वै॰ क्ली॰) अधिषूयते सोमोऽत्र, अधि-षू-ल्युट् आधारे। १ सोमाभिषवका चर्ममय पात्र, सोमरस निकालनेको चमड़ेका बरतन। २ सोम-रसादि पानका पात्र, सोमरस आदि पीनेका बरतन। <small>"अंशुं दुहन्तो अध्यासते गवीत्यधिषवणचर्मणः।" निरुक्त १।२।१ ।</small> भावे ल्युट्।
३ अभिषव, निचोड़। (त्रि॰) ४ सोमरस निकालने और छाननेके काम आनेवाला।
अधिषवण्य (वै॰ त्रि॰) पुञ्-अभिषवे-ल्युट् इति अधिषवणं ततो यत्। <small>भवे छन्दसि। पा ४।४।११० ।</small> १ सोमाभिषवका, सोमरस निकालने और छाननेवाला। २ अधिषवणफलक।
{{Block center|<poem><small>"यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता।
उलूखलसुतानामवेद्विद्रं जाल्गु लः॥" (ऋक् १।२८।२)
'अधिषवण्या उभे अधिषवणफलके।' (सायण)</small></poem>}}
अधिष्ठातृ, अधिष्ठाता (सं॰ त्रि॰) अधि-स्था-तृच्-षत्वम्। १ अध्यक्ष, नियन्ता, मुखिया, सरदार; यह देखनेवाला, कि नियमित रूपसे कार्य होता है या<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधिवाहन—अधिष्ठातृ'''|'''३६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिवाहन (सं॰ पु॰) किसी मनुष्यका नाम। लोग इन्हें अङ्गका पुत्र बताते हैं।
अधिविकर्तन (सं॰ क्ली॰) टुकड़े उड़ानेका काम, काट डालने का कार्य।
अधिविद्यम् (सं॰ अ॰) विज्ञानके विषयमें, इल्मके लिये।
अधिविन्ना (सं॰ स्त्री॰) १ स्त्री जिसके पतिने फिर विवाह कर लिया हो, जोरू जिसके शौहरने उसके जीते दूसरी शादी कर ली हो। २ स्त्री जिसके पतिको उसकी कोई परवा नहीं।
अधिवेत्तव्या, अधिवेदनीया, अधिवेद्या (सं॰ स्त्री॰) स्त्री जिसके रहते दूसरा विवाह करना उचित हो, जोरू जिसके जीते जी दूसरी शादी करना मुनासिब
समझा जाये।
अधिवेतृ, अधिवेत्ता (सं॰ त्रि॰) पति जो एक स्त्री रहते दूसरी से विवाह करे, एक जोरू होते दूसरी औरतसे शादी करनेवाला शौहर।
अधिवेदन (सं॰ क्ली॰) एक स्त्रीकी उपस्थिति में दूसरी से विवाह, एक जोरू रहते दूसरी को शादी।
अधिवेदनीय (सं॰ त्रि॰) अधि-विदु-अनीयर्। एकबार विवाह करनेपर फिर विवाह करने योग्य, जो एकबार शादी कर फिर शादी करने क़ाबिल हो।
अधिवेद्य (सं॰ त्रि॰) अधि-विदु-यत् कर्मणि। एकबार विवाह करनेपर पुनर्वार विवाह करने योग्य, जो एकबार शादीकर फिर शादी करने क़ाबिल हो!
अधिवेद्यम् (सं॰ अव्य॰) वेदके विषयमें, वेदकी बाबत।
अधिवेशन (सं॰ क्ली॰) १ सङ्घ, बैठक, जमाव। ३ उत्सव, जलसा।
अधिशायन (सं॰ क्ली॰) १ लेटना। २ सोना।
अधिशायित (सं॰ त्रि॰) १ लेटा हुआ, जो आराम करनेका आदी हो।
अधिश्रपण (सं॰ क्ली॰) अधि-श्रा-पाके णिच्-ल्युट्। पाचन, हाज़मा।
अधिश्रय (सं॰ पु॰) अधि-श्रीञ्-पाके अच्। १ पात्र, बरतन जिसमें कोई चीज़ रखी जाये। २ पाक, चाशनी, जलाव।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधिश्रयण (सं॰ क्ली॰) अधि-श्रीञ् पाके ल्युट्। चूल्हे परका धरना, भट्ठीपरका चढ़ाना, किसी चीज़को आग पर रखनेका काम।
अधिश्रयणी (सं॰ स्त्री॰) अधिश्रीयते पच्यतेऽत्र, अधि-श्रोञ् अधिकरणे ल्युट् ततो ङीप्। १ चूल्हा, तन्दूर। २ सिड्ढी, ज़ीना।
अधिश्रयणीय (सं॰ त्रि॰) अधिश्रयणाय पाकाय हितं-छ। १ पाक-सम्बन्धीय, चाशनीका। अधिश्रीञ् पाक-कर्मणि अनीयर्। २ पाक बनाने योग्य,
अधिश्रयितवै (सं॰ अव्य॰) अधि-श्रीञ्-कृत्यार्थे तवै। <small>कृत्यार्थे तवैकेन् कन्यत्वनः। पा ३।४।१४ । पाचनसे, हाज़मेके ज़रिये।
अधिश्रित (सं॰ त्रि॰) अधि-श्रि-क्त। १ आश्रित, प्राप्त। २ आगपर रखा हुआ, चूल्हे पर चढ़ाया गया।
अधिश्री (सं॰ त्रि॰) अधिका श्रीर्यस्य, बहुव्री॰। १ अतिशय शोभान्वित, निहायत रौनक़दार। २ अधिक सम्पत्तिशाली, निहायत ज़रदार। (स्त्री॰) अधिका श्री, प्रादि-स॰। ३ अत्यन्त श्री, हद से ज्य़ादा रौनक़।
अधिषवण (वै॰ क्ली॰) अधिषूयते सोमोऽत्र, अधि-षू-ल्युट् आधारे। १ सोमाभिषवका चर्ममय पात्र, सोमरस निकालनेको चमड़ेका बरतन। २ सोम-रसादि पानका पात्र, सोमरस आदि पीनेका बरतन। <small>"अंशुं दुहन्तो अध्यासते गवीत्यधिषवणचर्मणः।" निरुक्त १।२।१ ।</small> भावे ल्युट्।
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अधिषवण्य (वै॰ त्रि॰) पुञ्-अभिषवे-ल्युट् इति अधिषवणं ततो यत्। <small>भवे छन्दसि। पा ४।४।११० ।</small> १ सोमाभिषवका, सोमरस निकालने और छाननेवाला। २ अधिषवणफलक।
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अधिष्ठातृ, अधिष्ठाता (सं॰ त्रि॰) अधि-स्था-तृच्-षत्वम्। १ अध्यक्ष, नियन्ता, मुखिया, सरदार; यह देखनेवाला, कि नियमित रूपसे कार्य होता है या<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३६८'''|'''अधिष्ठान—अधीवास'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं। (पु॰) २ अधिदेवता, प्रधान देव। ३ परमेश्वर। ४ राजा, बादशाह। ५ रक्षक, परवरिश-कुनिन्दा। (स्त्री॰) अधिष्ठात्री।
अधिष्ठान (सं॰ क्ली॰) अधि-स्था-ल्युट् षत्वम्। १ स्थिति, अवस्थान; मुक़ाम, पड़ाव। २ वासस्थान, रहनेकी जगह। ३ नगर, शहर। ४ आश्रय, सहारा। ५ भ्रमका आरोप करनेवाली वस्तु, वह चीज़ जिसमें दूसरी चीज़ भूलसे देखी जाये; जैसे मरीचिका में जल, रस्मीमें सांप और सांपमें चांदी। ६ सांख्यमतसे — भोक्ता और भोग्यका संयोग; जैसे—आत्मा, शरीर और इन्द्रियां विषयसे संलग्न हैं। नियन्तृत्व, अधिकार, सरदारी। ८ चक्र, पहिया। ९ प्रभाव। १० पहुंच, पासका खड़ा होना। ११ आशीर्वाद, दुआ।
अधिष्ठान-शरीर (सं॰ पु॰) वह सूक्ष्म देह जिसमें मृत्युके पीछे आत्मा पितृलोकमें रहता है, मृत्युके बाद पितृलोकपर रहनेको आत्माका सूक्ष्म शरीर।
अधिष्ठापक (सं॰ त्रि॰) शासन, पर्यावेक्षण या रक्षण करनेवाला, जो हुकूमत, निगहबानी या हिफ़ाजत रखे।
अधिष्ठित (सं॰ त्रि॰) अधि-स्था-क्त कर्मणि। १ अध्युषित, बसा हुआ। २ निर्वाचित, चुना गया। ३ नियुक्त, मुक़रर। ३ पर्यावेक्षित, देखा-भाला। ४ नियमपूर्वक सञ्चालित, क़ायदेसे चलाया गया। ५ पर्यावेक्षक, देखभाल रखनेवाला।
अधिस्त्रि (सं॰ अव्य॰) स्त्री या पत्नीके विषय में, औरत या जोड़ू की बाबत।
अधिस्त्री (सं॰ स्त्री॰) श्रेष्ठ या सुप्रसिद्ध स्त्री, ऊंचे दरजेकी या मशहूर औरत।
अधिहरि (सं॰ अव्य॰) अव्ययी॰। हरिको अधिकार कर, भगवान्के विषयमें।
अधीकार, <small>अधिकार देखो।</small>
अधीत (सं॰ क्ली॰) अधि-इङ्-क्त भावे। १ अध्ययन, मुतालह। कर्मणिक्त। २ कृताध्ययन, पठित, पढ़ा या मश्क किया हुआ पाठ। (त्रि॰) २ जिसे अध्ययन कर चुके हों, मुतालह किया हु।
अधीति (सं॰ स्त्री॰) अधि इङ्-क्तिन्। १ अध्ययन, मुतालह, पढ़ाई। (वै॰) २ इच्छा, ख़्वाहिश। ३ स्मृति, याददाश्त।
अधीतिन् (सं॰ त्रि॰) अधीतमनेन, अधीत-इनि। <small>इष्टादिभ्यश्च। पा ५।२।८८ ।</small> अध्ययनविशिष्ट कृताध्ययन; ख़ूब पढ़ा हुआ, जिसका पढ़ना पूरा हो चुका हो।
अधीत्य (सं॰ अव्य॰) अध्ययन करके, पढ़के।
अधीन (सं॰ त्रि॰) अधिगतमिनं प्रभुम्, अत्या॰ स॰। <small>तदधीनवचने। पा ५।४।५४ ।</small> १ आयत्त, दबैल। २ वशतापन्न, मातहत। ३ वाध्य, लाचार। यह शब्द प्रायः समासके अन्तमें रहता है।
अधीनता (सं॰ स्त्री॰) वाध्यता, मातहती।
अधीनत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अधीनता देखो।</small>
अधीमन्थ, <small>अधिमन्थ देखो।</small>
अधीयत् (सं॰ त्रि॰) १ पढ़ता हुआ। २ स्मरण करता हुआ।
अधीयान (सं॰ पु॰) १ विद्यार्थी, तालिबेइल्म। २ वेद पढ़ने या पढ़ानेवाला।
अधीर (सं॰ त्रि॰) न धीरं धैर्यान्वितम्, नञ्-तत्। १ अस्थिर, चञ्चल; चुलबुला, बेसब्र। २ कातर, व्याकुल, परेशान्, घबड़ाया हुआ। ३ असन्तुष्ट, जो आसूदा न हो। ४ मूर्ख, बेवकूफ़। (पु॰) ५ अयोग्य वैद्य, नालायक, हकीम।
अधीरता (सं॰ स्त्री॰) धैर्यका अभाव, बेसब्री।
अधीरा (सं॰ स्त्री॰) १ विद्युत्, बिजली, जो ठहरती नहीं। २ मानकी अवस्थामें मध्या और प्रगल्भा नायिका विशेष। अधीरा नायिका ज्येष्ठा और कनिष्ठाके भेदसे दो प्रकारकी होती है। यह मानके समय नायकके प्रति अव्यङ्ग्य कोप दिखाती और परुषवाक्यप्रयोग, तर्जन-गर्जन और ताड़ना किया करती है,—
{{Block center|<poem><small>रमि आये कहु वामसों अवशि आज घन श्याम।
धिक् धिक् निलज नदान बनि करो नीचके काम॥</small></poem>}}
अधीवास (वै॰ पु॰) अधि-वस-घञ् आच्छादने। <small>उपरि सर्वतः सञ्छाद्यतेऽनेनेत्यधीवासो महाकञ्चु कः।" (काव्या॰)</small> महाकञ्चुक, अबरक़।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३६८'''|'''अधिष्ठान—अधीवास'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं। (पु॰) २ अधिदेवता, प्रधान देव। ३ परमेश्वर। ४ राजा, बादशाह। ५ रक्षक, परवरिश-कुनिन्दा। (स्त्री॰) अधिष्ठात्री।
अधिष्ठान (सं॰ क्ली॰) अधि-स्था-ल्युट् षत्वम्। १ स्थिति, अवस्थान; मुक़ाम, पड़ाव। २ वासस्थान, रहनेकी जगह। ३ नगर, शहर। ४ आश्रय, सहारा। ५ भ्रमका आरोप करनेवाली वस्तु, वह चीज़ जिसमें दूसरी चीज़ भूलसे देखी जाये; जैसे मरीचिका में जल, रस्मीमें सांप और सांपमें चांदी। ६ सांख्यमतसे — भोक्ता और भोग्यका संयोग; जैसे—आत्मा, शरीर और इन्द्रियां विषयसे संलग्न हैं। नियन्तृत्व, अधिकार, सरदारी। ८ चक्र, पहिया। ९ प्रभाव। १० पहुंच, पासका खड़ा होना। ११ आशीर्वाद, दुआ।
अधिष्ठान-शरीर (सं॰ पु॰) वह सूक्ष्म देह जिसमें मृत्युके पीछे आत्मा पितृलोकमें रहता है, मृत्युके बाद पितृलोकपर रहनेको आत्माका सूक्ष्म शरीर।
अधिष्ठापक (सं॰ त्रि॰) शासन, पर्यावेक्षण या रक्षण करनेवाला, जो हुकूमत, निगहबानी या हिफ़ाजत रखे।
अधिष्ठित (सं॰ त्रि॰) अधि-स्था-क्त कर्मणि। १ अध्युषित, बसा हुआ। २ निर्वाचित, चुना गया। ३ नियुक्त, मुक़रर। ३ पर्यावेक्षित, देखा-भाला। ४ नियमपूर्वक सञ्चालित, क़ायदेसे चलाया गया। ५ पर्यावेक्षक, देखभाल रखनेवाला।
अधिस्त्रि (सं॰ अव्य॰) स्त्री या पत्नीके विषय में, औरत या जोड़ू की बाबत।
अधिस्त्री (सं॰ स्त्री॰) श्रेष्ठ या सुप्रसिद्ध स्त्री, ऊंचे दरजेकी या मशहूर औरत।
अधिहरि (सं॰ अव्य॰) अव्ययी॰। हरिको अधिकार कर, भगवान्के विषयमें।
अधीकार, <small>अधिकार देखो।</small><noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधीत (सं॰ क्ली॰) अधि-इङ्-क्त भावे। १ अध्ययन, मुतालह। कर्मणिक्त। २ कृताध्ययन, पठित, पढ़ा या मश्क किया हुआ पाठ। (त्रि॰) २ जिसे अध्ययन कर चुके हों, मुतालह किया हु।
अधीति (सं॰ स्त्री॰) अधि इङ्-क्तिन्। १ अध्ययन, मुतालह, पढ़ाई। (वै॰) २ इच्छा, ख़्वाहिश। ३ स्मृति, याददाश्त।
अधीतिन् (सं॰ त्रि॰) अधीतमनेन, अधीत-इनि। <small>इष्टादिभ्यश्च। पा ५।२।८८ ।</small> अध्ययनविशिष्ट कृताध्ययन; ख़ूब पढ़ा हुआ, जिसका पढ़ना पूरा हो चुका हो।
अधीत्य (सं॰ अव्य॰) अध्ययन करके, पढ़के।
अधीन (सं॰ त्रि॰) अधिगतमिनं प्रभुम्, अत्या॰ स॰। <small>तदधीनवचने। पा ५।४।५४ ।</small> १ आयत्त, दबैल। २ वशतापन्न, मातहत। ३ वाध्य, लाचार। यह शब्द प्रायः समासके अन्तमें रहता है।
अधीनता (सं॰ स्त्री॰) वाध्यता, मातहती।
अधीनत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अधीनता देखो।</small>
अधीमन्थ, <small>अधिमन्थ देखो।</small>
अधीयत् (सं॰ त्रि॰) १ पढ़ता हुआ। २ स्मरण करता हुआ।
अधीयान (सं॰ पु॰) १ विद्यार्थी, तालिबेइल्म। २ वेद पढ़ने या पढ़ानेवाला।
अधीर (सं॰ त्रि॰) न धीरं धैर्यान्वितम्, नञ्-तत्। १ अस्थिर, चञ्चल; चुलबुला, बेसब्र। २ कातर, व्याकुल, परेशान्, घबड़ाया हुआ। ३ असन्तुष्ट, जो आसूदा न हो। ४ मूर्ख, बेवकूफ़। (पु॰) ५ अयोग्य वैद्य, नालायक, हकीम।
अधीरता (सं॰ स्त्री॰) धैर्यका अभाव, बेसब्री।
अधीरा (सं॰ स्त्री॰) १ विद्युत्, बिजली, जो ठहरती नहीं। २ मानकी अवस्थामें मध्या और प्रगल्भा नायिका विशेष। अधीरा नायिका ज्येष्ठा और कनिष्ठाके भेदसे दो प्रकारकी होती है। यह मानके समय नायकके प्रति अव्यङ्ग्य कोप दिखाती और परुषवाक्यप्रयोग, तर्जन-गर्जन और ताड़ना किया करती है,—
{{Block center|<poem><small>रमि आये कहु वामसों अवशि आज घन श्याम।
धिक् धिक् निलज नदान बनि करो नीचके काम॥</small></poem>}}
अधीवास (वै॰ पु॰) अधि-वस-घञ् आच्छादने। <small>उपरि सर्वतः सञ्छाद्यतेऽनेनेत्यधीवासो महाकञ्चु कः।" (काव्या॰)</small> महाकञ्चुक, अबरक़।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३६८'''|'''अधिष्ठान—अधीवास'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं। (पु॰) २ अधिदेवता, प्रधान देव। ३ परमेश्वर। ४ राजा, बादशाह। ५ रक्षक, परवरिश-कुनिन्दा। (स्त्री॰) अधिष्ठात्री।
अधिष्ठान (सं॰ क्ली॰) अधि-स्था-ल्युट् षत्वम्। १ स्थिति, अवस्थान; मुक़ाम, पड़ाव। २ वासस्थान, रहनेकी जगह। ३ नगर, शहर। ४ आश्रय, सहारा। ५ भ्रमका आरोप करनेवाली वस्तु, वह चीज़ जिसमें दूसरी चीज़ भूलसे देखी जाये; जैसे मरीचिका में जल, रस्मीमें सांप और सांपमें चांदी। ६ सांख्यमतसे — भोक्ता और भोग्यका संयोग; जैसे—आत्मा, शरीर और इन्द्रियां विषयसे संलग्न हैं। नियन्तृत्व, अधिकार, सरदारी। ८ चक्र, पहिया। ९ प्रभाव। १० पहुंच, पासका खड़ा होना। ११ आशीर्वाद, दुआ।
अधिष्ठान-शरीर (सं॰ पु॰) वह सूक्ष्म देह जिसमें मृत्युके पीछे आत्मा पितृलोकमें रहता है, मृत्युके बाद पितृलोकपर रहनेको आत्माका सूक्ष्म शरीर।
अधिष्ठापक (सं॰ त्रि॰) शासन, पर्यावेक्षण या रक्षण करनेवाला, जो हुकूमत, निगहबानी या हिफ़ाजत रखे।
अधिष्ठित (सं॰ त्रि॰) अधि-स्था-क्त कर्मणि। १ अध्युषित, बसा हुआ। २ निर्वाचित, चुना गया। ३ नियुक्त, मुक़रर। ३ पर्यावेक्षित, देखा-भाला। ४ नियमपूर्वक सञ्चालित, क़ायदेसे चलाया गया। ५ पर्यावेक्षक, देखभाल रखनेवाला।
अधिस्त्रि (सं॰ अव्य॰) स्त्री या पत्नीके विषय में, औरत या जोड़ू की बाबत।
अधिस्त्री (सं॰ स्त्री॰) श्रेष्ठ या सुप्रसिद्ध स्त्री, ऊंचे दरजेकी या मशहूर औरत।
अधिहरि (सं॰ अव्य॰) अव्ययी॰। हरिको अधिकार कर, भगवान्के विषयमें।
अधीकार, <small>अधिकार देखो।</small>अधीत (सं॰ क्ली॰) अधि-इङ्-क्त भावे। १ अध्ययन, मुतालह। कर्मणिक्त। २ कृताध्ययन, पठित, पढ़ा या मश्क किया हुआ पाठ। (त्रि॰) २ जिसे अध्ययन कर चुके हों, मुतालह किया हु।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधीति (सं॰ स्त्री॰) अधि इङ्-क्तिन्। १ अध्ययन, मुतालह, पढ़ाई। (वै॰) २ इच्छा, ख़्वाहिश। ३ स्मृति, याददाश्त।
अधीतिन् (सं॰ त्रि॰) अधीतमनेन, अधीत-इनि। <small>इष्टादिभ्यश्च। पा ५।२।८८ ।</small> अध्ययनविशिष्ट कृताध्ययन; ख़ूब पढ़ा हुआ, जिसका पढ़ना पूरा हो चुका हो।
अधीत्य (सं॰ अव्य॰) अध्ययन करके, पढ़के।
अधीन (सं॰ त्रि॰) अधिगतमिनं प्रभुम्, अत्या॰ स॰। <small>तदधीनवचने। पा ५।४।५४ ।</small> १ आयत्त, दबैल। २ वशतापन्न, मातहत। ३ वाध्य, लाचार। यह शब्द प्रायः समासके अन्तमें रहता है।
अधीनता (सं॰ स्त्री॰) वाध्यता, मातहती।
अधीनत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अधीनता देखो।</small>
अधीमन्थ, <small>अधिमन्थ देखो।</small>
अधीयत् (सं॰ त्रि॰) १ पढ़ता हुआ। २ स्मरण करता हुआ।
अधीयान (सं॰ पु॰) १ विद्यार्थी, तालिबेइल्म। २ वेद पढ़ने या पढ़ानेवाला।
अधीर (सं॰ त्रि॰) न धीरं धैर्यान्वितम्, नञ्-तत्। १ अस्थिर, चञ्चल; चुलबुला, बेसब्र। २ कातर, व्याकुल, परेशान्, घबड़ाया हुआ। ३ असन्तुष्ट, जो आसूदा न हो। ४ मूर्ख, बेवकूफ़। (पु॰) ५ अयोग्य वैद्य, नालायक, हकीम।
अधीरता (सं॰ स्त्री॰) धैर्यका अभाव, बेसब्री।
अधीरा (सं॰ स्त्री॰) १ विद्युत्, बिजली, जो ठहरती नहीं। २ मानकी अवस्थामें मध्या और प्रगल्भा नायिका विशेष। अधीरा नायिका ज्येष्ठा और कनिष्ठाके भेदसे दो प्रकारकी होती है। यह मानके समय नायकके प्रति अव्यङ्ग्य कोप दिखाती और परुषवाक्यप्रयोग, तर्जन-गर्जन और ताड़ना किया करती है,—
{{Block center|<poem><small>रमि आये कहु वामसों अवशि आज घन श्याम।
धिक् धिक् निलज नदान बनि करो नीचके काम॥</small></poem>}}
अधीवास (वै॰ पु॰) अधि-वस-घञ् आच्छादने। <small>उपरि सर्वतः सञ्छाद्यतेऽनेनेत्यधीवासो महाकञ्चु कः।" (काव्या॰)</small> महाकञ्चुक, अबरक़।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अधिष्ठान (सं॰ क्ली॰) अधि-स्था-ल्युट् षत्वम्। १ स्थिति, अवस्थान; मुक़ाम, पड़ाव। २ वासस्थान, रहनेकी जगह। ३ नगर, शहर। ४ आश्रय, सहारा। ५ भ्रमका आरोप करनेवाली वस्तु, वह चीज़ जिसमें दूसरी चीज़ भूलसे देखी जाये; जैसे मरीचिका में जल, रस्मीमें सांप और सांपमें चांदी। ६ सांख्यमतसे — भोक्ता और भोग्यका संयोग; जैसे—आत्मा, शरीर और इन्द्रियां विषयसे संलग्न हैं। नियन्तृत्व, अधिकार, सरदारी। ८ चक्र, पहिया। ९ प्रभाव। १० पहुंच, पासका खड़ा होना। ११ आशीर्वाद, दुआ।
अधिष्ठान-शरीर (सं॰ पु॰) वह सूक्ष्म देह जिसमें मृत्युके पीछे आत्मा पितृलोकमें रहता है, मृत्युके बाद पितृलोकपर रहनेको आत्माका सूक्ष्म शरीर।
अधिष्ठापक (सं॰ त्रि॰) शासन, पर्यावेक्षण या रक्षण करनेवाला, जो हुकूमत, निगहबानी या हिफ़ाजत रखे।
अधिष्ठित (सं॰ त्रि॰) अधि-स्था-क्त कर्मणि। १ अध्युषित, बसा हुआ। २ निर्वाचित, चुना गया। ३ नियुक्त, मुक़रर। ३ पर्यावेक्षित, देखा-भाला। ४ नियमपूर्वक सञ्चालित, क़ायदेसे चलाया गया। ५ पर्यावेक्षक, देखभाल रखनेवाला।
अधिस्त्रि (सं॰ अव्य॰) स्त्री या पत्नीके विषय में, औरत या जोड़ू की बाबत।
अधिस्त्री (सं॰ स्त्री॰) श्रेष्ठ या सुप्रसिद्ध स्त्री, ऊंचे दरजेकी या मशहूर औरत।
अधिहरि (सं॰ अव्य॰) अव्ययी॰। हरिको अधिकार कर, भगवान्के विषयमें।
अधीकार, <small>अधिकार देखो।</small>
अधीत (सं॰ क्ली॰) अधि-इङ्-क्त भावे। १ अध्ययन, मुतालह। कर्मणिक्त। २ कृताध्ययन, पठित, पढ़ा या मश्क किया हुआ पाठ। (त्रि॰) २ जिसे अध्ययन कर चुके हों, मुतालह किया हु।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अधीति (सं॰ स्त्री॰) अधि इङ्-क्तिन्। १ अध्ययन, मुतालह, पढ़ाई। (वै॰) २ इच्छा, ख़्वाहिश। ३ स्मृति, याददाश्त।
अधीतिन् (सं॰ त्रि॰) अधीतमनेन, अधीत-इनि। <small>इष्टादिभ्यश्च। पा ५।२।८८ ।</small> अध्ययनविशिष्ट कृताध्ययन; ख़ूब पढ़ा हुआ, जिसका पढ़ना पूरा हो चुका हो।
अधीत्य (सं॰ अव्य॰) अध्ययन करके, पढ़के।
अधीन (सं॰ त्रि॰) अधिगतमिनं प्रभुम्, अत्या॰ स॰। <small>तदधीनवचने। पा ५।४।५४ ।</small> १ आयत्त, दबैल। २ वशतापन्न, मातहत। ३ वाध्य, लाचार। यह शब्द प्रायः समासके अन्तमें रहता है।
अधीनता (सं॰ स्त्री॰) वाध्यता, मातहती।
अधीनत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अधीनता देखो।</small>
अधीमन्थ, <small>अधिमन्थ देखो।</small>
अधीयत् (सं॰ त्रि॰) १ पढ़ता हुआ। २ स्मरण करता हुआ।
अधीयान (सं॰ पु॰) १ विद्यार्थी, तालिबेइल्म। २ वेद पढ़ने या पढ़ानेवाला।
अधीर (सं॰ त्रि॰) न धीरं धैर्यान्वितम्, नञ्-तत्। १ अस्थिर, चञ्चल; चुलबुला, बेसब्र। २ कातर, व्याकुल, परेशान्, घबड़ाया हुआ। ३ असन्तुष्ट, जो आसूदा न हो। ४ मूर्ख, बेवकूफ़। (पु॰) ५ अयोग्य वैद्य, नालायक, हकीम।
अधीरता (सं॰ स्त्री॰) धैर्यका अभाव, बेसब्री।
अधीरा (सं॰ स्त्री॰) १ विद्युत्, बिजली, जो ठहरती नहीं। २ मानकी अवस्थामें मध्या और प्रगल्भा नायिका विशेष। अधीरा नायिका ज्येष्ठा और कनिष्ठाके भेदसे दो प्रकारकी होती है। यह मानके समय नायकके प्रति अव्यङ्ग्य कोप दिखाती और परुषवाक्यप्रयोग, तर्जन-गर्जन और ताड़ना किया करती है,—
{{Block center|<poem><small>रमि आये कहु वामसों अवशि आज घन श्याम।
धिक् धिक् निलज नदान बनि करो नीचके काम॥</small></poem>}}
अधीवास (वै॰ पु॰) अधि-वस-घञ् आच्छादने। <small>उपरि सर्वतः सञ्छाद्यतेऽनेनेत्यधीवासो महाकञ्चु कः।" (काव्या॰)</small> महाकञ्चुक, अबरक़।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३७६
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधीवासस्—अधोक्षज'''|'''३६९'''}}
३६६</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधीवासस् (सं॰ अव्य॰) वस्त्रपर, पोशाकके ऊपर।
अधीश (सं॰ पु॰) अधिक ईशः, प्रादि- स॰। अधिपति, सार्वभौम, प्रभु, महाराज चक्रवर्त्ती; मालिक, सबपर राज्य करनेवाला।
अधीश्वर (सं॰ पु॰) अधिकः ईश्वरः, प्रादि-स॰। राजा, प्रभु, अधिपति, सार्वभौम; बादशाह, मालिक।
अधीष्ट (सं॰ क्ली॰) अधि-इष-क्त भावे। <small>विधिनिमन्त्रणा-
मन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्। पा ३।३।१६१ ।</small> १ सत्कारपूर्वक
नियोग या व्यापार, इज्ज़तका काम जो वेतनख्वाह सौंपा जाये। (त्रि॰) कर्मणि क्त। २ सत्कार-पूर्वक नियोजित, इज्ज़तसे काम में लगाया गया।
अधुत, अधूत (सं॰ त्रि॰) धुञ् कम्पने कर्मणि क्त; न धूतम्, नञ-तत्। अकम्पित, जो हिला-डुला न हो।
अधुना (सं॰ अव्य॰) इदम्-धुना, इदमोऽश्भावो धुना च प्रत्ययः। १ इदानीं, अब इस समय। २ आजकल, इन दिनों।
अधुनातन (सं॰ त्रि॰) अधुना ल्युट्-तुट च। इस समयका, इदानीं भव, इदानीन्तन, एतत्कालीन, हालका, आजकलवाला।
अधुर (सं॰ त्रि॰) नास्ति धुः भारो यस्य, अच् बहुव्री॰। भारशून्य, बोझ से ख़ाली।
अधुत, <small>अधुत देखो।</small>
अधूमक (सं॰ त्रि॰) नास्ति घूमो यत्र कप्, बहुव्री॰। धूमशून्य, जहां धुआं न हो।
अधूरा (हिं॰ वि॰) अपूर्ण, नाकामिल। २ अर्ध, निस्फ़, आधा। ३ खण्डित, टूटा हुआ। ४ असमाप्त, जो ख़त्म न हुआ हो। ५ अधकचरा, अर्धशिक्षित।
अधृत (सं॰ पु॰) १ भगवान् जो सबको धारण करते हैं, किन्तु उन्हें कोई धारण नहीं करता। (विष्णुसह॰) (त्रि॰) २ न धारण किया गया, जिसे
कोई रोक न सके।
अधृत (सं॰ स्त्री॰) न घृङ्-क्तिन्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ धैर्याभाव, बेसब्री, घबड़ाहट। २ धारणा-भाव, याददाश्त का न रहना। ३ दोषाभाव, बेऐबी। ४ आतुरता, जल्दी।
अदृष्ट (सं॰ त्रि॰) ञिधृषा प्रागल्भ्ये क्त। <small>धृषिशसी वैयात्ये। पा ७।२।१९ ।</small> १ लज्जाशील, शर्मीला। २ अनभिभूत, नाग़ालिब, जो दबाया न गया हो। ३ अहिंसित, नामज़रूह, जो घायल नहीं हुआ।
अधृष्य (सं॰ त्रि॰) न धृष्यम्, नञ्-तत्। १ अनभिभवनीय, अधर्षणीय; जिसपर हमला न किया या जो जीता न जा सके। २ अप्राप्तव्य, वेपहुंच।
३ अभिमानी, घमण्डी। ४ अप्रगल्भ, लज्जाशील; शर्मदार।
अधेंगा (हिं॰ पु॰) पक्षिविशेष जिसका रङ्ग मटमैला, चेहरा लाल और पर सुनहला रहता है; अधांगा।
अधेड़ (हिं॰ वि॰) अर्धवयसप्राप्त, अधवैसा, निस्फ़ उम्रवाला; अधोगत-अवस्थासम्पन्न, उतरती जवानी वाला; जिसकी उम्र ढल रही हो।
अधेनु (वै॰ स्त्री॰) न धेनुः, नत्र-तत्। <small>घेट् इच्च उण् ३।३४।</small> दोहनशून्य गौ, दूध न देनेवाली गाय।
अधेला (हिं॰ पु॰) आधे पैसेका सिक्क़ा, जो तांबेसे बनता है।
अधेलिका (हिं॰ स्त्री॰) अन्धकारिता, धुंधलाहट।
अधैर्य (सं॰ त्रि॰) नास्ति धैर्यं यस्य बहुव्री॰। १ धैर्यशून्य, बेसब्र। २ चञ्चल, उतावला, जल्दबाज़। (क्ली॰) न धैर्यम्, अभावार्थे नञ-तत्। ३ धैर्यका अभाव, बेसब्री, घबड़ाहट।
अधैर्यवान् (हिं॰ त्रि॰) <small>अधैर्य देखो।</small>
अधो, <small>अधस् देखो।</small>
अधोअक्ष (वै॰ त्रि॰) अक्षस्य अधस्तात्। <small>अनुदात्ते च कुधपरे। पा ६।१।१२०।</small> १ निम्न में व्यापक, जो धुरी या गाड़ीके नीचे लगा हो। (अव्य॰) २ धुरीके नीचे।
अधोऽक्ष (सं॰ क्ली॰) अधस् अक्षं यत्र, असि बहुव्री॰। हविर्धान-अक्षका अधोमार्ग, उस गाड़ीके नीचेकी राह जिसमें होमका घी रहता था।
अधोक्षज (सं॰ पु॰) अक्षात् इन्द्रियात् जायते, जनड; ५-तत्। १ विष्णु जो इन्द्रियज्ञानके अयोग्य हैं। २ श्रवण नक्षत्र। (त्रि॰) अधः कृतं तिरस्कृतं इन्द्रियज्ञानं येन, बहुव्री॰। ३ जितेन्द्रिय, जिसने इन्द्रियज्ञानको तिरस्कृत कर दिया हो,—<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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३६६</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधीवासस् (सं॰ अव्य॰) वस्त्रपर, पोशाकके ऊपर।
अधीश (सं॰ पु॰) अधिक ईशः, प्रादि- स॰। अधिपति, सार्वभौम, प्रभु, महाराज चक्रवर्त्ती; मालिक, सबपर राज्य करनेवाला।
अधीश्वर (सं॰ पु॰) अधिकः ईश्वरः, प्रादि-स॰। राजा, प्रभु, अधिपति, सार्वभौम; बादशाह, मालिक।
अधीष्ट (सं॰ क्ली॰) अधि-इष-क्त भावे। <small>विधिनिमन्त्रणा-
मन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्। पा ३।३।१६१ ।</small> १ सत्कारपूर्वक
नियोग या व्यापार, इज्ज़तका काम जो वेतनख्वाह सौंपा जाये। (त्रि॰) कर्मणि क्त। २ सत्कार-पूर्वक नियोजित, इज्ज़तसे काम में लगाया गया।
अधुत, अधूत (सं॰ त्रि॰) धुञ् कम्पने कर्मणि क्त; न धूतम्, नञ-तत्। अकम्पित, जो हिला-डुला न हो।
अधुना (सं॰ अव्य॰) इदम्-धुना, इदमोऽश्भावो धुना च प्रत्ययः। १ इदानीं, अब इस समय। २ आजकल, इन दिनों।
अधुनातन (सं॰ त्रि॰) अधुना ल्युट्-तुट च। इस समयका, इदानीं भव, इदानीन्तन, एतत्कालीन, हालका, आजकलवाला।
अधुर (सं॰ त्रि॰) नास्ति धुः भारो यस्य, अच् बहुव्री॰। भारशून्य, बोझ से ख़ाली।
अधुत, <small>अधुत देखो।</small>
अधूमक (सं॰ त्रि॰) नास्ति घूमो यत्र कप्, बहुव्री॰। धूमशून्य, जहां धुआं न हो।
अधूरा (हिं॰ वि॰) अपूर्ण, नाकामिल। २ अर्ध, निस्फ़, आधा। ३ खण्डित, टूटा हुआ। ४ असमाप्त, जो ख़त्म न हुआ हो। ५ अधकचरा, अर्धशिक्षित।
अधृत (सं॰ पु॰) १ भगवान् जो सबको धारण करते हैं, किन्तु उन्हें कोई धारण नहीं करता। (विष्णुसह॰) (त्रि॰) २ न धारण किया गया, जिसे
कोई रोक न सके।
अधृत (सं॰ स्त्री॰) न घृङ्-क्तिन्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ धैर्याभाव, बेसब्री, घबड़ाहट। २ धारणा-भाव, याददाश्त का न रहना। ३ दोषाभाव, बेऐबी। ४ आतुरता, जल्दी।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अदृष्ट (सं॰ त्रि॰) ञिधृषा प्रागल्भ्ये क्त। <small>धृषिशसी वैयात्ये। पा ७।२।१९ ।</small> १ लज्जाशील, शर्मीला। २ अनभिभूत, नाग़ालिब, जो दबाया न गया हो। ३ अहिंसित, नामज़रूह, जो घायल नहीं हुआ।
अधृष्य (सं॰ त्रि॰) न धृष्यम्, नञ्-तत्। १ अनभिभवनीय, अधर्षणीय; जिसपर हमला न किया या जो जीता न जा सके। २ अप्राप्तव्य, वेपहुंच।
३ अभिमानी, घमण्डी। ४ अप्रगल्भ, लज्जाशील; शर्मदार।
अधेंगा (हिं॰ पु॰) पक्षिविशेष जिसका रङ्ग मटमैला, चेहरा लाल और पर सुनहला रहता है; अधांगा।
अधेड़ (हिं॰ वि॰) अर्धवयसप्राप्त, अधवैसा, निस्फ़ उम्रवाला; अधोगत-अवस्थासम्पन्न, उतरती जवानी वाला; जिसकी उम्र ढल रही हो।
अधेनु (वै॰ स्त्री॰) न धेनुः, नत्र-तत्। <small>घेट् इच्च उण् ३।३४।</small> दोहनशून्य गौ, दूध न देनेवाली गाय।
अधेला (हिं॰ पु॰) आधे पैसेका सिक्क़ा, जो तांबेसे बनता है।
अधेलिका (हिं॰ स्त्री॰) अन्धकारिता, धुंधलाहट।
अधैर्य (सं॰ त्रि॰) नास्ति धैर्यं यस्य बहुव्री॰। १ धैर्यशून्य, बेसब्र। २ चञ्चल, उतावला, जल्दबाज़। (क्ली॰) न धैर्यम्, अभावार्थे नञ-तत्। ३ धैर्यका अभाव, बेसब्री, घबड़ाहट।
अधैर्यवान् (हिं॰ त्रि॰) <small>अधैर्य देखो।</small>
अधो, <small>अधस् देखो।</small>
अधोअक्ष (वै॰ त्रि॰) अक्षस्य अधस्तात्। <small>अनुदात्ते च कुधपरे। पा ६।१।१२०।</small> १ निम्न में व्यापक, जो धुरी या गाड़ीके नीचे लगा हो। (अव्य॰) २ धुरीके नीचे।
अधोऽक्ष (सं॰ क्ली॰) अधस् अक्षं यत्र, असि बहुव्री॰। हविर्धान-अक्षका अधोमार्ग, उस गाड़ीके नीचेकी राह जिसमें होमका घी रहता था।
अधोक्षज (सं॰ पु॰) अक्षात् इन्द्रियात् जायते, जनड; ५-तत्। १ विष्णु जो इन्द्रियज्ञानके अयोग्य हैं। २ श्रवण नक्षत्र। (त्रि॰) अधः कृतं तिरस्कृतं इन्द्रियज्ञानं येन, बहुव्री॰। ३ जितेन्द्रिय, जिसने इन्द्रियज्ञानको तिरस्कृत कर दिया हो,—<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधीवासस्—अधोक्षज'''|'''३६९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधीवासस् (सं॰ अव्य॰) वस्त्रपर, पोशाकके ऊपर।
अधीश (सं॰ पु॰) अधिक ईशः, प्रादि- स॰। अधिपति, सार्वभौम, प्रभु, महाराज चक्रवर्त्ती; मालिक, सबपर राज्य करनेवाला।
अधीश्वर (सं॰ पु॰) अधिकः ईश्वरः, प्रादि-स॰। राजा, प्रभु, अधिपति, सार्वभौम; बादशाह, मालिक।
अधीष्ट (सं॰ क्ली॰) अधि-इष-क्त भावे। <small>विधिनिमन्त्रणा-
मन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्। पा ३।३।१६१ ।</small> १ सत्कारपूर्वक
नियोग या व्यापार, इज्ज़तका काम जो वेतनख्वाह सौंपा जाये। (त्रि॰) कर्मणि क्त। २ सत्कार-पूर्वक नियोजित, इज्ज़तसे काम में लगाया गया।
अधुत, अधूत (सं॰ त्रि॰) धुञ् कम्पने कर्मणि क्त; न धूतम्, नञ-तत्। अकम्पित, जो हिला-डुला न हो।
अधुना (सं॰ अव्य॰) इदम्-धुना, इदमोऽश्भावो धुना च प्रत्ययः। १ इदानीं, अब इस समय। २ आजकल, इन दिनों।
अधुनातन (सं॰ त्रि॰) अधुना ल्युट्-तुट च। इस समयका, इदानीं भव, इदानीन्तन, एतत्कालीन, हालका, आजकलवाला।
अधुर (सं॰ त्रि॰) नास्ति धुः भारो यस्य, अच् बहुव्री॰। भारशून्य, बोझ से ख़ाली।
अधुत, <small>अधुत देखो।</small>
अधूमक (सं॰ त्रि॰) नास्ति घूमो यत्र कप्, बहुव्री॰। धूमशून्य, जहां धुआं न हो।
अधूरा (हिं॰ वि॰) अपूर्ण, नाकामिल। २ अर्ध, निस्फ़, आधा। ३ खण्डित, टूटा हुआ। ४ असमाप्त, जो ख़त्म न हुआ हो। ५ अधकचरा, अर्धशिक्षित।
अधृत (सं॰ पु॰) १ भगवान् जो सबको धारण करते हैं, किन्तु उन्हें कोई धारण नहीं करता। (विष्णुसह॰) (त्रि॰) २ न धारण किया गया, जिसे
कोई रोक न सके।
अधृत (सं॰ स्त्री॰) न घृङ्-क्तिन्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ धैर्याभाव, बेसब्री, घबड़ाहट। २ धारणा-भाव, याददाश्त का न रहना। ३ दोषाभाव, बेऐबी। ४ आतुरता, जल्दी।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अदृष्ट (सं॰ त्रि॰) ञिधृषा प्रागल्भ्ये क्त। <small>धृषिशसी वैयात्ये। पा ७।२।१९ ।</small> १ लज्जाशील, शर्मीला। २ अनभिभूत, नाग़ालिब, जो दबाया न गया हो। ३ अहिंसित, नामज़रूह, जो घायल नहीं हुआ।
अधृष्य (सं॰ त्रि॰) न धृष्यम्, नञ्-तत्। १ अनभिभवनीय, अधर्षणीय; जिसपर हमला न किया या जो जीता न जा सके। २ अप्राप्तव्य, वेपहुंच।
३ अभिमानी, घमण्डी। ४ अप्रगल्भ, लज्जाशील; शर्मदार।
अधेंगा (हिं॰ पु॰) पक्षिविशेष जिसका रङ्ग मटमैला, चेहरा लाल और पर सुनहला रहता है; अधांगा।
अधेड़ (हिं॰ वि॰) अर्धवयसप्राप्त, अधवैसा, निस्फ़ उम्रवाला; अधोगत-अवस्थासम्पन्न, उतरती जवानी वाला; जिसकी उम्र ढल रही हो।
अधेनु (वै॰ स्त्री॰) न धेनुः, नत्र-तत्। <small>घेट् इच्च उण् ३।३४।</small> दोहनशून्य गौ, दूध न देनेवाली गाय।
अधेला (हिं॰ पु॰) आधे पैसेका सिक्क़ा, जो तांबेसे बनता है।
अधेलिका (हिं॰ स्त्री॰) अन्धकारिता, धुंधलाहट।
अधैर्य (सं॰ त्रि॰) नास्ति धैर्यं यस्य बहुव्री॰। १ धैर्यशून्य, बेसब्र। २ चञ्चल, उतावला, जल्दबाज़। (क्ली॰) न धैर्यम्, अभावार्थे नञ-तत्। ३ धैर्यका अभाव, बेसब्री, घबड़ाहट।
अधैर्यवान् (हिं॰ त्रि॰) <small>अधैर्य देखो।</small>
अधो, <small>अधस् देखो।</small>
अधोअक्ष (वै॰ त्रि॰) अक्षस्य अधस्तात्। <small>अनुदात्ते च कुधपरे। पा ६।१।१२०।</small> १ निम्न में व्यापक, जो धुरी या गाड़ीके नीचे लगा हो। (अव्य॰) २ धुरीके नीचे।
अधोऽक्ष (सं॰ क्ली॰) अधस् अक्षं यत्र, असि बहुव्री॰। हविर्धान-अक्षका अधोमार्ग, उस गाड़ीके नीचेकी राह जिसमें होमका घी रहता था।
अधोक्षज (सं॰ पु॰) अक्षात् इन्द्रियात् जायते, जनड; ५-तत्। १ विष्णु जो इन्द्रियज्ञानके अयोग्य हैं। २ श्रवण नक्षत्र। (त्रि॰) अधः कृतं तिरस्कृतं इन्द्रियज्ञानं येन, बहुव्री॰। ३ जितेन्द्रिय, जिसने इन्द्रियज्ञानको तिरस्कृत कर दिया हो,—<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अधीवासस्—अधोक्षज'''|'''३६९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधीवासस् (सं॰ अव्य॰) वस्त्रपर, पोशाकके ऊपर।
अधीश (सं॰ पु॰) अधिक ईशः, प्रादि- स॰। अधिपति, सार्वभौम, प्रभु, महाराज चक्रवर्त्ती; मालिक, सबपर राज्य करनेवाला।
अधीश्वर (सं॰ पु॰) अधिकः ईश्वरः, प्रादि-स॰। राजा, प्रभु, अधिपति, सार्वभौम; बादशाह, मालिक।
अधीष्ट (सं॰ क्ली॰) अधि-इष-क्त भावे। <small>विधिनिमन्त्रणा-
मन्त्रणाधीष्टसंप्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्। पा ३।३।१६१ ।</small> १ सत्कारपूर्वक
नियोग या व्यापार, इज्ज़तका काम जो वेतनख्वाह सौंपा जाये। (त्रि॰) कर्मणि क्त। २ सत्कार-पूर्वक नियोजित, इज्ज़तसे काम में लगाया गया।
अधुत, अधूत (सं॰ त्रि॰) धुञ् कम्पने कर्मणि क्त; न धूतम्, नञ-तत्। अकम्पित, जो हिला-डुला न हो।
अधुना (सं॰ अव्य॰) इदम्-धुना, इदमोऽश्भावो धुना च प्रत्ययः। १ इदानीं, अब इस समय। २ आजकल, इन दिनों।
अधुनातन (सं॰ त्रि॰) अधुना ल्युट्-तुट च। इस समयका, इदानीं भव, इदानीन्तन, एतत्कालीन, हालका, आजकलवाला।
अधुर (सं॰ त्रि॰) नास्ति धुः भारो यस्य, अच् बहुव्री॰। भारशून्य, बोझ से ख़ाली।
अधुत, <small>अधुत देखो।</small>
अधूमक (सं॰ त्रि॰) नास्ति घूमो यत्र कप्, बहुव्री॰। धूमशून्य, जहां धुआं न हो।
अधूरा (हिं॰ वि॰) अपूर्ण, नाकामिल। २ अर्ध, निस्फ़, आधा। ३ खण्डित, टूटा हुआ। ४ असमाप्त, जो ख़त्म न हुआ हो। ५ अधकचरा, अर्धशिक्षित।
अधृत (सं॰ पु॰) १ भगवान् जो सबको धारण करते हैं, किन्तु उन्हें कोई धारण नहीं करता। (विष्णुसह॰) (त्रि॰) २ न धारण किया गया, जिसे
कोई रोक न सके।
अधृत (सं॰ स्त्री॰) न घृङ्-क्तिन्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ धैर्याभाव, बेसब्री, घबड़ाहट। २ धारणा-भाव, याददाश्त का न रहना। ३ दोषाभाव, बेऐबी। ४ आतुरता, जल्दी।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अदृष्ट (सं॰ त्रि॰) ञिधृषा प्रागल्भ्ये क्त। <small>धृषिशसी वैयात्ये। पा ७।२।१९ ।</small> १ लज्जाशील, शर्मीला। २ अनभिभूत, नाग़ालिब, जो दबाया न गया हो। ३ अहिंसित, नामज़रूह, जो घायल नहीं हुआ।
अधृष्य (सं॰ त्रि॰) न धृष्यम्, नञ्-तत्। १ अनभिभवनीय, अधर्षणीय; जिसपर हमला न किया या जो जीता न जा सके। २ अप्राप्तव्य, वेपहुंच।
३ अभिमानी, घमण्डी। ४ अप्रगल्भ, लज्जाशील; शर्मदार।
अधेंगा (हिं॰ पु॰) पक्षिविशेष जिसका रङ्ग मटमैला, चेहरा लाल और पर सुनहला रहता है; अधांगा।
अधेड़ (हिं॰ वि॰) अर्धवयसप्राप्त, अधवैसा, निस्फ़ उम्रवाला; अधोगत-अवस्थासम्पन्न, उतरती जवानी वाला; जिसकी उम्र ढल रही हो।
अधेनु (वै॰ स्त्री॰) न धेनुः, नत्र-तत्। <small>घेट् इच्च उण् ३।३४।</small> दोहनशून्य गौ, दूध न देनेवाली गाय।
अधेला (हिं॰ पु॰) आधे पैसेका सिक्क़ा, जो तांबेसे बनता है।
अधेलिका (हिं॰ स्त्री॰) अन्धकारिता, धुंधलाहट।
अधैर्य (सं॰ त्रि॰) नास्ति धैर्यं यस्य बहुव्री॰। १ धैर्यशून्य, बेसब्र। २ चञ्चल, उतावला, जल्दबाज़। (क्ली॰) न धैर्यम्, अभावार्थे नञ-तत्। ३ धैर्यका अभाव, बेसब्री, घबड़ाहट।
अधैर्यवान् (हिं॰ त्रि॰) <small>अधैर्य देखो।</small>
अधो, <small>अधस् देखो।</small>
अधोअक्ष (वै॰ त्रि॰) अक्षस्य अधस्तात्। <small>अनुदात्ते च कुधपरे। पा ६।१।१२०।</small> १ निम्न में व्यापक, जो धुरी या गाड़ीके नीचे लगा हो। (अव्य॰) २ धुरीके नीचे।
अधोऽक्ष (सं॰ क्ली॰) अधस् अक्षं यत्र, असि बहुव्री॰। हविर्धान-अक्षका अधोमार्ग, उस गाड़ीके नीचेकी राह जिसमें होमका घी रहता था।
अधोक्षज (सं॰ पु॰) अक्षात् इन्द्रियात् जायते, जनड; ५-तत्। १ विष्णु जो इन्द्रियज्ञानके अयोग्य हैं। २ श्रवण नक्षत्र। (त्रि॰) अधः कृतं तिरस्कृतं इन्द्रियज्ञानं येन, बहुव्री॰। ३ जितेन्द्रिय, जिसने इन्द्रियज्ञानको तिरस्कृत कर दिया हो,—<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Left|९३|4em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४६५
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Sanjana Chowdhury
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{r|'''४५८'''|'''अनुध्यान-अनुनिर्वाप'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
अच्छी फिक्रका लगना। २ अनुग्रह, मेहरबानी। ३ आसक्ति, लालच, फंसाव।
अनुध्यान (सं॰ क्ली॰) अनु-ध्ये ल्युट्।
चिन्ता, मुदामी फि.क। २ पश्चात् चिन्ता, पिछली
फिक्र।
{{Outdent|अनुयायिन् (सं॰ त्रि॰) ध्यान धरते हुवा, विचार बांधनेवाला, ख्याल लड़ाते हुवा, जो गौर लगा रहा हो।}}
{{Outdent|अनुध्येय (सं॰ त्रि॰) अनु-ध्यै-कर्मणि-यत्। पश्चात्वचिन्त्य, पीछे ख्याल लड़ाने काबिल।}}
{{Outdent|अनुनय (सं॰ पु॰) अनु-नी-अच्। १ ैविनय, प्रणिपात, प्रार्थना, सान्त्वना, अर्ज़, मिहमानदारी। (त्रि॰) २ विनीत, सन्तुष्ट। (अव्य॰) ३ विनीत भावसे, झुककर, का़यदेमें।}}
{{Outdent|अनुनयप्रतिघप्रहाण (सं॰ क्ली॰) बौद्ध मतस——विनीत आचरणके विरोधका त्याग, अच्छे चालचलनकी बुरायियोंका छोड़ना।}}
{{Outdent|अनुनयमान (सं॰ त्रि॰) प्रसन्न करते हुवा, जो खुश कर रहा हो, सम्मान देनेवाला, जो इज्जत बढ़ाये।}}
{{Outdent|अनुनयामन्त्रण (सं॰ क्ली॰) सन्तोषजनक सम्भाषण, खुश करनेवाली बात।}}
{{Outdent|अनुनयिन् (सं॰ त्रि॰) नम्र, सभ्य, शान्त, शायस्ता, हलीम, नेक।}}
{{Outdent|अनुनाद (सं॰ पु॰) अनु-नद-घञ्; अनुरूपो नादः, प्रादि-स॰। प्रतिध्वनि, प्रतिशब्द, अनुरूप शब्द, पश्चात् शब्द, गूंज, बाज़गश्त, जैसीकी तैसी आवाज़।}}
{{Outdent|अनुनादित (सं॰ त्रि॰) प्रतिध्वनित, प्रतिशब्दाय मान, गंजते हुवा, बाज़गश्त लगाया गया।}}
{{Outdent|अनुनादिन् (सं॰ त्रि॰) अनु सदृशं नदति शब्दायते, अनु-नद-णिनि। प्रतिरूप शब्दकारक, जी अनुरूप शब्द निकाले, गुंजाते हुवा, जो बाज़गश्त निकाल
रहा हो।}}
{{Outdent|अनुनायिका (सं॰ स्त्री॰) नायिका अनुगता, अनुपश्चात् नयति वा। दासी, टहलुयी, ख़िदमतगारा, जो स्त्री किसी नायिकाके अधीन हो अथवा पीछ-पीछे चले।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|अनुनाश (सं॰ पु॰) अनु-नश-घञ्। १ पश्चात् मरण, पीछेका मरना। (त्रि॰) अनु पश्चात् न आशा आकाङ्क्षा यस्मात् यस्य वा, नत्र -बहुव्री॰। २ पश्चात् आशा-आकाङ्क्षा न रखनेवाला, जो पोछे उम्मीद न बांधे। ३ पश्चात् आशा-आकाङ्क्षा न दिलानेवाला, जो पोछे उम्मीद न दे।}}
{{Outdent|अनुनासिक (सं॰ त्रि॰) नासिकां अनुगतत्वेन उच्चारितम्, अतिक्रा॰-तत्। <Small>मुखनासिकावचनोऽनुनासिकम्। पा १।१।८।</small>मुखके साथ नासिकासे उचार्यमाण, जो मुंहके सहारे नाकसे बोला जाये। यह शब्द, वर्ण अथवा अक्षरका विशेषण है। ञ, ण, न, ङ और म अनुनासिक वर्ण होते हैं।}}
{{Outdent|अनुनासिकत्व (सं॰ क्ली॰) अनुनासिक होनेका भाव, जिस हालतमें हर्फ़ मुंहके सहारे नाकसे बोला जाये।}}
{{Outdent|अनुनासिकलोप (सं॰ पु॰) अनुनासिक ध्वनि अथवा अक्षरका निकाल डालना, नाकसे निकलनेवाले शोर या हर्फ को उड़ा देना।}}
{{Outdent|अनुनासिकात्व (सं॰ क्ली॰) आकारका अनुनासिक उच्चारण, ‘आ’ का नाकसे बोला जाना।}}
{{Outdent|अनुनासिकादि (सं॰ पु॰) अनुनासिक उच्चारणसे प्रारम्भ होनेवाला युक्ताक्षर, यो मिला हुवा हर्फ़ आवाज-गुन्नासे शुरू हो।}}
{{Outdent|अनुनासिकान्त (सं॰ पु॰) अनुनासिक वर्णमें समाप्त होनेवाला धातु, जो हर्फे असली आवाज़ गुन्नामें खत्म हो।}}
{{Outdent|अनुनासिकोपध (सं॰ त्रि॰) अन्तिम वर्णसे प्रथम अनुनासिक अक्षर रखनेवाला, जिसके मा-क़ब्ल-अख़ीर हर्फे गुन्ना लगा हो।}}
{{Outdent|अनुनिनीषु (सं॰ स्त्री॰) शान्त हो जानेका इच्छुक जो ठण्डा पड़ और राजी़ हो जाना चाहता हो।}}
{{Outdent|अनुनिर्जहान (सं॰ त्रि॰) बाहर जाते हुवा, जो कहींसे दूर जा रहा हो।}}
{{Outdent|अनुनिर्देश (सं॰ पु॰) पूर्व आदर्शानुयायो वर्णन अथवा सम्बन्ध, पहली मिसालसे मिलते हुवा बयान या रिश्ता।}}
{{Outdent|अनुनिर्वाप (सं॰ पु॰) देवताके अर्थ ढाली जानेवाली}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४२२
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Lado Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामताल-कामदेव|
४२३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
यात्रियोको प्रतिमाके गर्भसे कवच निकाल कर देखा
देते हैं। किन्तु यह कार्य बहुत छिप कर किया
जाता है।
कामतापुरके ध्वंसावशेषमें पाजकल कृष्णकाय
'भालुकका प्रावास बना है।
आईन-अकवारीमें भी कामसापुरका उल्लेख है।
मार्टिन साहब मालदहसे हस्तलिखित एक प्राचीन
पुस्तक लाये थे। उसमें धंगदेशका विवरण लिखा है ।
• उसके लेखानुसार नसरत शाहके अव्यवहित पूर्ववर्ती
हुसेन शाहने कामतापुरेश्वर हरपनारायणको मार
उनका राज्य जीता। हरपनारायण सदा लक्ष्मीमान्-
राजके पौत्र और मालिकाङ्गराजके पुत्र थे।
कामताल (सं० पु.) कामं सालयति प्रतिष्ठापयति,
काम-तत्-पिच्-भण्। कोकिल, कोयन ।
कामतिथि (सं० स्त्री० ) कामस्य पूनार्थ प्रशस्ता तिथिः,
मध्यपदलो। त्रयोदशी, तेरस । इसी तिथिको
कामदेवको पूजा करते हैं।
कामद (सं० वि०) कामं अभिलाषं ददाति, काम-दा-
क। १ कामदाता, सुराद पूरी करनेवाला। (पु०)
काम द्यसि स्वसौन्दर्येण प्रवखण्हयति कतिस्त्वात् ।
नाशयति वा, काम-द्यो-क। २ कार्तिकेय ।
कामदगिरि (सं० पु.) चित्रकूट पर्वत। चित्रकूट देखो ।
कामदमणि (सं.पु.) चिन्तामणि ।
कामदमिनी. (सं. स्त्री.) कामस्य दमः उपशमः
अस्तास्याः, काम-दम इनि। कामरिपुको वशीभूत
करनेवाली स्त्री, जो औरत अपनी खाहिश दबा
चको हो।
कामदर्शन (सं० त्रि.) कामं मनोनं दर्शनं यस्य,
बहुव्री। सुन्दर, खुधसूरत।
कामदहन (सं० पु०) शिव ।
कामदा (सं० स्त्री०) काम प्रभीष्टं ददाति, काम-दा
“क-टाप्। .१ कामधेनु ।
२ नागवली लता, पान ।
३ हरीतकी, हर। ४ एक देवी। महिरावण इन्हें
पलता था। हन्दी विशेष। इसमें दश अधर-रहते
और क्रमानुसार रगण, यगण तथा.जगण लगते हैं।
कामदानी (हि.सी.) अविस पुष्पादि, बेशदूटा ।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
यह बादलेके तार या सनमसितारसे बनती है।
२ वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। इसपर सलमेसितारके
फल निकाले जाते हैं।
कामदार (हिं० पु.) १ राज्यप्रबन्ध कारो, रियासतका
इन्तिजाम करनेवाला। राजपूतान' और मालवेके
राज्यों में कामदार रहते हैं। (वि०) कलावतके बेल-
बूटीवाला।
कामदीपकरस (सं• पु० ) वाजीकरण का एक औषध,
ताकतको कोई दवा। खेतपुनर्नवाका मूल, मोच
रस, पारा और गन्धक बराबर भाल्मलीको छालके
रसमें मिलाकर गोलो बांधनेसे यह प्रस्तुत होता है।
इसका नाम चाण्डालिकयोग है। एक गोलो दो
पल दूधके साथ खानेसे बहुत बलवीर्य बड़ता
है। (रसरमावर)
कामदुध (सं० त्रिः) कामं दोग्धि, काम-दुइक हस्य
धः। प्रभीष्टसम्पादक, मुराद पूरी करनेवाला।
कामदुधा (सं० स्त्री०) काम-दुह-टाप्। कामधेनु ।
{{Right|कामधन देखी।}}
कामदुह (सं० वि०) काम दुह किए। अभीष्टप्रद,
खाहिश पूरी करनेवाला।
कामदुहा, कामदुधादेखो।
कामदूता (सं० स्त्री०) मनःशिला ।
कामदूति, . कामतो देखो।
कामदूतिका (सं०. स्त्री.) कामस्य दूतिका इव उहो-
पकत्वात्। नागदन्ती, हाथीसूंड ।
कामदूती (सं० स्त्रो०) कामस्य दूतीव, उपमित-
समा०। १ मनःशिला।. पाटलष्क्ष, परवलको
३ कोकिला, कोयल।
कामदेव (#. पु.). काम एव देवः । १ कन्ट्य ।
इसका संस्कृत . नामान्तर-मदन, मन्मथ, मार,
प्रद्युम्न, मौनकेतन, कन्दपं, दपक, अनङ्ग, पश्चथर, सर,
शम्बरारि, मनसिज, कुसुमेषु, अनन्यज, पुष्पधन्वा,
रतिपति, मकरध्वज, प्रामभू, ब्रह्मसू और विश्वकेतु
है। शास्त्रकार कामदेवके पचास भेद बताते हैं-
१ काम, २ कामद, ३ कान्त, ४ कान्तिमान, ५ कामग,
कामचर, कामी,८ कामुक, ९ कामवर्धन,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४२३
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Lado Shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४२४|
कामदेव }}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
१० राम, ११ रम, १२ रमण, १३ रतिनाथ, १४ रति
प्रिय, १५राविनाथ, १६ रमाकान्त, १७ रममाण,
१८ निशाचर, १५ नन्दक, २० मन्दन, २१ मन्दो,
२२ नन्दयिता, २३ पञ्चवाण, २४ रतिसख, २५ पुष्यः
धन्वा, २६ महाधनु, २७ भ्रामक, २८ भ्रमण,
२८भ्रममाण, ३० श्चम, ३१श्चान्त, ३२ भ्रामक,
३३ भृङ्ग, ३४ धान्तचार, ३५ भ्रमावह, ३६ मोहन,
३७ मोहक, २८ मोह, ३८ मोहवर्धन, ४० मदन,
४१ मन्मथ, ४२ मासा, ४३ भूननायक, ४४ गायन,
४५ गौतिज, ४६ नर्तक, ४७ खेलक, ४८ उन्मत्तो-
मत्तक, ४८ विलास और ५० लोभवर्धन ।
निम्नलिखित कई स्थान कन्दपक माने गये हैं-
“पाद गुल्फे तोरीच मग नामो कुछ छदि।
की कर च पीठच गरे नेत्रे असावपि ।
ललाट शीर्षकैमेषु कामस्थान विधिक्रमात् ।
दर्य पुसी स्त्रिया वामे सकल विपर्ययः ।
पादानुष्ठ प्रतिपदि हितीवायाध गुरुफकै ।
कादश वनीमायाँ भतु भगदेशतः।
माभिस्थाने च पक्षम्या पायात कुचमधले।
सप्ता उदय च षष्टम्पा कदमतः।
भवमा कण्ठदेशे च दशमा चौदासः।
एकादया गयादा भयने तथा।
अव च वयोदयो चतुर्दो घलाटक।
पौरमास शिखाया भातम्यक्ष कवि क्रमात् ।"
{{Right|(परदीपिका)}}
पदइय, गुल्फच्य, अरहय, भग, नाभि, कुचहय,
हृदय, कच, कण्ठ, श्रीष्ठ, गण्ड, चक्षु, कर्ण, ललाट,
मस्तक और कैयौ तिथिके अनुसार कामदेवका अधि
छान होता है। शुक्लपक्ष में पुरुषके दक्षिण अङ्ग एवं
स्त्रीके वाम अत और कृष्णपक्षमें पुरुषके वाम पर तथा
स्त्रोके दक्षिण अङ्गक क्रमानुसार उक्त स्थान समूहका
। प्रतिपद तिथिको पदके अङ्गष्ट, प्रति ब्रमाका.
अधाने उस उपहाससे पत्यन्त सजिलो कामका वेग
हितीयाको गुरुफ, वतीयाको जरदेश, चतुर्थीको भग,
पक्षमीको माभि, षष्ठीको कुचमडल, सप्तमीको
दय, अष्टमीको कक्ष, नवमीको कण्ड, दशमीकी
पोष्ठ, एकादशीको गण्ड, बादशीको चन, वयोदशीको
कर्ण, चतुर्दशीको ससाट गौर पूर्णिमाको मतको
कामदेव रहता है।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
कामदेवको ध्येयमूर्ति इस प्रकार कही है,-
"कामदेवम्त कर्तव्यः शवपाविभूषयः ।
चापवायकरराव मदाधितखोचनः ।
रतिः प्रतिक्षधामतिर्मार्थाय वास्तवोच्चताः।
चतम्नस्तस्त्र कर्तव्या: पबनी रूपमनोहरा
चत्वारय करातस्य कार्या मालिनीपमाः ।
कैतुय मकर: कार्य: पचमाचमुखी महान "
{{Right|(हेमाद्रिधत विषधर्मोचर)}}
कामदेव शाह, पद्म, धनुः और वाण धारण करते
हैं। मदके कारण चक्षु ईषत् कृश्चित हैं। केतु मकर
है। पच्च वाण हैं। रति, प्रीति, शक्ति पौर उज्वमा
नानी चार स्त्री हैं।
बेदमें कामको उत्पत्तिके सम्बन्ध में कहा है,-
"कामो नई प्रथमो नम देवा पापः। (ऋक् २08).
सर्वप्रथम मनके ऊपर कामका प्राविर्भाव पाता
सुतरां उससे पहले उत्पत्तिका कारण
निकला है।
कालिकापुराणमें भी लिखा है-
ब्रह्मान दच ग्रंथति मानस पुत्रोको सृष्टि की थी।
'उसी समय सन्ध्या नानी एक रूपवती कन्यामी उत्पन्न
इयो। उस मनोरम कन्याको देख ब्रमाके दयमें
चिन्ता उठी-'यह जगत्का कौन कार्य करेगी। इसीसे
परम रमवीय मूर्ति कामदेवका जन्म हुवा। समाने
उन्हें जगत्के नरनारीसमूहको मुग्ध करने के लिये
आदेश दे पुष्पधनुः और पुष्यथर प्रदान किया। काम-
देवने यह देखना चाहा कि इस पुष्यवाय हारा कार्य
सिरि होगी या नहीं। इसीसे उन्होंने परीक्षाके लिये
समीपख ब्रह्मा, दशादि ऋषि और सन्धया पर वाचा-
घात किया। उससे सकस कामपौड़ित हो गये।
इसी समय महादेव वहां जा पहुंचे। उहोंने कन्याके
कामभाव देख उपहास किया था।
रोका। फिर उन्होंने कामको अत्यन्त क्रुज हो अभि-
माप दिया वा-हरके कोपानससे बस जावेगा।
कामदेवने पकारण इस प्रकार प्रमियत हो, प्रभासे
अनुपायी मार्थना की। उस समय बचाने मो बाम.
देवका बैसा अपराध न देख यावर कर पाबस्त<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४२६|
कामदेव-कामधेनु}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
तिने नियम, तुष्टिने सन्तोष, पुष्टिने लोम, मेघाने
श्रुत, क्रियाने दण्ड, नय एवं विनय, वपुने व्यवसाय,
शान्तिने अम, सिधिने सुख और कीर्तिने यशः नामक
पुत्र प्रसव किया यह सभी धर्मके पुत्र कहलाते हैं।
भागवतके सतसे कामदेव ब्रह्माके पुत्र हैं,-
"यदि कामो बुवोः क्रोधो लोमयाधीरधच्छदावा"
ब्रह्माके हृदयसे काम, हयसे क्रोध और अध
रोष्ठसे लोभको उत्पत्ति हुयी है।
भागवतके हो अन्य स्थल में फिर कामदेवको सङ्क पद्मवीज, पुनर्नवा,
ल्पका पुत्र कहा है,-
“सरमायास्तु सदस्पः कामः सहस्पनः पतः।" (भागवत ६६१)
ब्रह्माकी कन्या सवाल्याके पुत्र सकल्प है। मुहल्पसे
लेना चाहिये। फिर पुडकेचुरस १६ शरावक,
ही कामकी उत्पत्ति हुयी है।
यजुर्वेद में भी कामका उल्लेख मिलता है। उसमें
कामको ही दाता और गृहीता माना है,-
"कौदात् कस्मा प्रदान कामीदात् कामायादात् ।
कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामतते ।" (गल यजुः ॥४८)
यह प्रश्न होने पर कि-किसने दान किया और
किसको दान दिया है, उत्तर होगा कि कामने दान
किया और कामको ही दान दिया है। क्योंकि काल ही
दाता पौर काम ही प्रसिग्रहोता है। प्रतएव हे काम।
यह द्रव्य तुम्हारा ही है।
२ गोपकपुरीके एक राजा कदम्बराज। इनकी
महिषीका नाम केतसादेवी था यह विख्यातं वीर
थे। इन्होंने वार्ड के बल मलय, कोकण और महाद्रि
जीता या। शिलालेखके अनुसार कामदेवने
११८१ ई० से १२०४ ई. तक राजत्व किया। ३ इस
नारायणके पुत्र। महमारायण देखो। ४ परमेश्वर ।
५ महादेव । ६ कोई कवि। ७ कोई राजा। इनकी
दा, काम-ध-अच्। कामरूपदेशीय मत्स्वध्वन नामक
राजधानी जयन्तीपुरमें थी।
या "राघवपालवीय
प्रणेता कविराज नामक कविके प्रतिपालक थे।
८ प्रायश्चित्त-परति नामक स्मृतिग्रन्यके प्रणेता।
९"सत्कत्यमुलावतो प्रणेता रघुनाथके प्रति.
पासका।
१० "चतुर्वगचिन्तामणि" प्रणेता हेमाट्रिके पिता ।
इनके पिताका नाम वासुदेव पौर पितामहका नाम
वामन था।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
११ कोई प्राचीन ज्योतिर्वित्।
१२ "कर्मप्रदीपिका “पारस्करपति' "पारस्कर-
राज्यपरिशिष्टपति प्रसुति ग्रंथ बनानेवाले। इनके
पिताका नाम गोपान था।
कामदेव कविवल्लभ-चण्डीके एक प्राचीन टोकाकार।
कामदेवकृत (सं० क्लो० ) तविशेष, एक धी। अब
गन्धा १०० पल, गोक्षुर ५० पल और शतावरी, भूमि.
कुष्माण्ड, शालपर्णी, बला, गुलेचीन, अखत्यको या, .
गाम्भारोफल तथा माषवीज प्रत्येक
दश दश पल २५६ थरावक जसमें पका कर
६४ शरावक जन शेष रहनेसे उतार कर जान
दुग्ध १६ भरावक, और जीवक, ऋषभक, मैदा,
महामेदा, काकाली, चोरकाकोली, जीवन्ती, महक,
ऋद्धि, वृद्धि, ट्राचा, पद्मकाष्ठ, कुष्ठ, पिप्पली
रतचन्दन, बाचक, नागकेशर, एकशिम्बौवीज,
नीलोत्पल, श्यामा
अनन्तमूलका करक
दो-दो तोला एवं शर्करा २ पल उल क्वाथमें डासं
यह त यथारीति पकाते और बनाते हैं। इसको
व्यवहार करनेसे रत्तपित्त, क्षत, कामखा, वातरता,
हलीमक, पाण्डु, विषर्णता, खरीद, मूवच्छ,
वक्षीदाह और पाचशूल पादि रोग निवारित
होते हैं (चक्रदच)
कामदेव मीमांसा (दीप्ति)- प्रायचित्पतिका
प्रणेता।
कामदोही (सं० वि० ) कामं दोन्धि, काम-दुइ-णिनि ।
अभीष्टप्रद, सुराद पूरी करनेवाला।
कामधर (सं.पु.).काम इति संज्ञां धरति धारयति
पर्वतस्थित सरोवर विशेष, एक तालाब। यह सरोवर
एक तीर्थ माना गया है। इसमें खान और जलपान
करने पर समुदाय पापसे छूट मुक्ति पाते और शिवलोक
माते हैं। (कालिकापुराण),
कामधरण ( सं• को० ) पभिसाषप्राप्ति, मुरादया
उसूल।
हसूप।कामधेनु ( संस्त्री. ) कामप्रतिपादिका धेनु,<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामधेनु|
४२७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
मध्यपदसोपी कर्मधा। गो विशेष, एक गाय । इस
गायसे इच्छानुसार जो वस्तु मांगते, वही पाते हैं।
अग्निपुराणमें कामधेनुका दान महापुण्य माना
गया है। दानविधि पर भी इसमें इस प्रकार निखा
है, कार्तिक मासको शुक्ल एकादशीको उपवास कर
चार दिन तक लक्ष्मौके साथ नारायएको पूजा करना
पड़ती है। फिर पश्चम दिन प्रातःकाल नामकर
शक्ल वस्त्र, शक्ल मात्य और शुक्ल पनुलेपन धारण करते
है। दानको भूमिको मृगके धर्म, तिलके प्रस्थ और
वर्ण पादिसे सजा सवसा कामधेनु वहां लायी जाती
है। धेनुके शृङ्ग और खुर स्वर्णसे मदा समस्त गावमें
शल वस्त्र लपेट देते हैं। अनन्तर यथाविधि मन्वादिसे
गायको पूज नारायणके उद्देश दान होता है।'
२ दानके लिये स्वनिर्मित धेनु विशेष, देनेको
सोने की गाय।
दान-सागरमें स्वर्णनिर्मित कामधेनुके दानका
विधि लिखा है, 'शक्तिक अनुसार तीन पलसे अधिक
सहस्रपल तक खणं द्वारा सवत्सा कामधेनु बना रखसे
विभूषित करना चाहिये। सहन पल उत्कष्ट, पांच
सौ पल मध्यम और ढाई सौ पल सुवर्ण अधम विधि है।
अत्यन्त असमर्थक चिये तीन पलसे अधिक सुवर्णका
जन्म लिया था। यौवनमें कामधेनु को लावण्यत्री
-मी विधान है। तुतापुरुष कथित समयके मध्य
किसी दिन दानका काल निर्दिष्ट कर उसके पूर्व
दिन गुरु, पुरोहित, यजमान और जापक चारो लोग
हविष्य-भोजनादि कर निवेदन एवं महाल्प कर रखते
हैं। दूसरे दिन यजमानको गोविन्दादिको आराधना,
मधुपर्कका दान और ब्राह्मणोंको धनुमतिका ग्रहण
करना चाहिये। उसी दिन गुरु, पुरोहित और
नापकको उपवास करना पड़ता है। उसके परदिन
पग्निस्थापनादि कार्य समापनपूर्वक पुरोहित प्रधान
वैदीके मध्यस्थसमें लिखित चक्र पर मृगचर्म एवं गुड़प्रस्थ
यथाक्रम स्थापन कर उसके ऊपर कौपिय वस्त्रद्वारा
पाच्छादित. सवत्सा धेनुको खड़ा करते हैं। : धेनुके
पाखंदेशमें पाठ पूर्ण कुम्भ, अष्टादश प्रकार धान्य,
नानाविध. फल, रस, इक्षुदण्ड, कांसपान, पट्टवस्त्र,
नामनिर्मित दोहनपान,. प्रदीपं, प्रातपत्र तथा
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पादुकाइय और धेनुके सम्मुखभाग, मधुरादि छह
रस, हरिद्रा, पुप्प पादि विविध पूजा ट्रथ जीरक,
धान्यक एवं शर्करा रखते हैं। फिर मङ्गसगीत
वाद्य तथा स्तुतिपाठके साथ यज्ञकुण्डके समीपस्थ
चार कुम्भोके नल हारा यजमानको खान कराया जाता
है। मानके पन्तमें यजमान शक्त वस्त्र परिधान कर
शक्ल मात्य एवं विविध अन्नद्वारधारणपूर्वक कुशहस्तसे
पुष्याचन्ति ले कामधेनुको प्रदक्षिणपूर्वक पूज गुरुको
प्रदान करता है। परिशेषमें गुरु पुरोहित और
याचकको दक्षिणा तथा प्रतिथि ब्राह्मणांको अर्थ दे
दानका व्रत समापन करना पड़ता है।'
३ वर्गधनु सुरमिको एक दौहिवां धेनु। इसकी
उत्पत्तिका विवरण इस प्रकार लिखा है,-'गासमूह
की प्रादिप्रसूति सुरभि दक्षको कन्या थों। प्रजापति
कश्यपके औरससे उनके गर्भमै रोहिणी का जन्म दुवा ।
रोहिणौने हो तपोनिधि शूरसेन नामक-वसुके पोरससे
सर्वलक्षणसम्पन्ना कामधेनुको प्रसव किया था। काम-
धेनुका वर्ण खेत है। चतुर्वेद चतुष्पदस्वरूप हैं।
चारो स्तनों से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष निकला
करते हैं। शिवके वाइन वृषने कामधेनु के गर्भ से ही
अधिकतर बढ़ी। इसीसे कोई कामुक वेतात उनको
देख कामातुर हुवा पौर स्वयं कृषकी मूर्ति बना उनके
साथ भोग किया। इस सङ्गमके फलसे एक विधान
काय वष निकला था। उसने अपनी तपस्याके बंद
महादेवका वाइनत्व लाम किया।'
{{Right|(कालिकापुराण १..)}}
४ कामधेनुको कुन्नजाता नन्दिनी वा शवला नानी
वशिष्ठको एक धेनु । कामधेनुके लिये ही वशिष्ठके
साथ विश्वामित्रका भयंकर विवाद उठा था। उसी
विवादके फसे विश्वामित्रने क्षत्रिय जाति होते भी
ब्रह्मर्षि बनने का लिये उद्योग किया। रामायणमें लिखा
है,-'किसो समय राना विश्वामित्रने बहु सैन्य एवं
अमात्य परिवार प्रभृतिके साथ वशिष्ठ ऋषिके निकट
पातिथ्य ग्रहण किया था। वशिष्ठने कामधेनुसे संवाद<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामधेनु-कामन्दकि|४२८}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
विश्वामित्र: राजा होते भी उक्त समस्त द्रव्य देख
चमत्कृत हुये। उन्होंने देखा कि कामधेनुसे वैसा
असाधारण ऐश्वयं भोग किया जा सकता था। इसीसे
विश्वामित्रने शत सहस्र दुग्धवती गायोंके बदले
वशिष्ठसे कामधेनु मांगी। किन्तु वशिष्ठने धेनु देना
स्वीकार न किया। उस समय विश्वामित्रने हरण
करनेके लिये सैन्यको आदेश दिया था। सैन्यने
कामधेनुको खोल ले जानेका उद्योग किया। नन्दिनी
यह सोच कर अत्यन्त दुःखित हुयौं कि वशिष्ठने उनको
छोड़ दिया था। फिर वह अपने बलसे वहु सैन्चको
मार वशिष्ठके निकट आ पहुंचीं। उन्होंने वशिष्ठसे
पूछा था,-'आपने क्या हमें परित्याग किया हैं ?
नतुवा विश्वामित्र के सिपाही हमें क्यों लिये जाते हैं?'
वशिष्ठने उत्तर दिया, 'नहीं इमने तुम्हें परित्याग
नहीं किया है। तथा फिर हम कभी तुम्हें परित्याग
न करेंगे। अतएव तुम शत शत महावीर सैन्य सृष्टि
.कर विश्वामित्रको पराजित करी। वशिष्ठली आज्ञा
पाते ही नन्दिनीने योनिदेशसे यवन, पुरीषसे शक और
रोमकूपसे म्लेच्छ, हारीत तथा किरात सैन्य निकाले थे।
उन्होंने विश्वामित्रको समुदाय सैन्यका विनाश कर
पराजित किया। विश्वामित्रके पुत्र इससे बहुत कुछ
हुये और (एकवारगी ही सौ पुत्र ) वशिष्ठके ऊपर
झपट पड़े। वशिष्ठने क्रोधके साथ एक ही हुशारसे
उनको जला डाला। इस अपमानके पीछे विखा-
मित्रने राजशनिकी अपेक्षा तपस्याको शक्तिको बड़ा
माना था। वह गजकार्य छोड़ कठोर तपस्या में लग
‘गये। उसी तपस्याके फलसे उन्होंने ब्रह्मर्षिकी भांति
चमताशाली बन ब्रह्मर्षि नाम पाया था ।
{{Right|(रामायब, परख, ५१०)}}
कामधेनुतन्य : (सं.ली.) कामधेनुरिव सर्वाभीष्टप्रद
तन्त्रम्। शिवप्रोत एक तन्त्र ।
कामधेन्वी-रामात वा..निमात सम्पदायभुक्ता वैष्णव
इनमें अधिकांश भिक्षुक रहते हैं। कामधेनु नामक
भिचायन्त्र व्यवहार करनेसे ही कामधेन्वी नाम पड़ा।
.:कामधेनुयन्त्र बैंगीको भांति होता है। उसकी दोनों
घोर दो खते नगे रहते है। एक पोरका तखता
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
गायके पाकारका होता है। दूसरो पोरके तख्ते में
हनमान्को मूर्ति रहती है। यह लोग सवेरे और
शाम दोनों समय उक्त यन्त्र की पूजा तथा पारतो
करते हैं। कामधेन्वी कामधेनुयन्त्र कन्धे पर रख
भिक्षा मांगने निकलते हैं। यह किसीके द्वार पर
खड़े नहीं रहते, 'धनुषधारी राम धनुषधारी राम,
कहते राइ राह घूमा करते हैं। यही यह नाम सुन
इच्छानुसार कामधेनुपात्रमें भिक्षा डाल देते हैं।
कामध्वंसी (सं० पु०) कामं कन्दप ध्वसयति, काम-
ध्वनस्-णिच-णिनि। कामको ध्वंस करनेशने शिव ।
कामध्वज (सं० पु०) मत्स्य, मछौ। कामदेवकी
पताका मछली है।
कामन : (सं० त्रि० ) कामयतीति, कम पिङ्युच् ।।
१ कामुक, चाहनेवाचा । ( लौ• ) भावे युच् ।
२ अभिलाष, ख़ाहिय।
कामना (सं० स्त्री०) कामन-टाप ।खाहिश
२ बन्दाक, बांदा।
कामनाशक (सं० पु. ) काम कन्द नाशयति,
काम-नश्-णिच्-खुल् । १ महादेव । (वि.)
{{Left|२ कामशक्तिनाथक।}}
कामनोड़ा (सं० स्त्री ) कस्तूरिका, मुश्क ।
कामनीयक (सं० लो०) कमनीयस्य भावः, कमनीय-
वुन् । रमीयता, खूबसूरती ।
कामन्दकि (सं० पु.) कमन्दकस्य अपत्वं पुमान्,
कमन्दक-दू। एक नीतिशास्त्र-प्रणेता। इनके
बनाये ग्रन्यका नाम कामन्दकीय नीतिशास्त्र है। वह
१८ पध्यायमें विभक्त और महाभारतकी भांति
प्राचीनकाल-रचित है। बहुत पारी उल नौतिमानः
बालि प्रभृति दीपमें नीति बमा था। वहां महा-
भारतको भांति वह विभाषा अनुवादित भी हुवा।
उसके यवदीप पहुँचनेका समय निर्धारित नहीं। बोई
अनुमान करता, कि,महाभारतकेही समकासवा मी
महामारव देखो। उसकी चार टीका
मिलती हैं। एक टीकाका नाम उपाचाय-निरपेच
है।.बाको तानमें एक जयराम, दूसरी पामाराम पौष
तीसरी वरदारामको बनायी है।
पहुंचा होमा।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामन्दकीय -वाममश्नरी|
४२८}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कामन्दकीय (सं• लो० ) कामन्दकेरिदम्, कामन्दकि
बायः। या ।। २८ ११४ । कामन्दकि-प्रणीत एक
नीतिशास्त्र।
कामन्धमी (सं० पु०) काम यथेष्टं धमति, काम-ध्या.
णिनि वाहतकात् धमादेशः निपातनात् मुमि साधुः।
कांस्यकार, कसेरा।
कामपति (सं० स्त्री० ) कामः पतिर्यस्याः, विकल्प-
खात् न डी। १ रति, कामदेवकी स्त्री (पु.)
२ चन्द्रवंथीय पृथुकुलनात एक राजपुत्र । इन्होंने पुष्टि
याग किया था (सद्याट्रिखण १।१०।२१)
कामपत्नी (सं० स्त्री० ) कामस्य पत्नी, तत् । रति,
कामदेवको स्त्री।
{{Left|कामपणिका, कामपों देखी।}}
कामपर्णी (सं० स्त्री०) पाहुल्यक्षुप, एक पेड़।
कामपाल (सं० पु.) कामान् पालयति, काम-पाल-
अण्। १ बलदेव । २ विष्णु ।
"कामहा कामपालय कामो कान्तः कृतागमः" (विपसाधनाम)
३ महादेव। ४ चन्द्रवंशीय इन्दुमण्डन राजाके पुत्र ।
इनके पुत्रका नाम सनिल घा। (सहयाद्रिख २०१२१)
५ एकवीरा देवीभक्त गौतम कुखज जलपालवंशके एक
राजा। (सह्याट्रिय ६१०) ६ कुमारिकामा
शाहजादे बड़े पमिमानी और निर्दय रहे। इनके
चम्बणक कुलज दलराजके पुत्र। इनके पुत्रका नाम
मुदर्शन था। (सह्याद्रिखण २४७) ७ महाराजघृत, एक
बढ़िया आम।
कामपीठ (सं० पु०-लो०) कूपादिक उपरिभागका
वक्षस्थान, कुवेंके ऊपर बंधी हुयौ जगह ।
कामपीड़ित (सं० वि०) कामेन कन्दपंपोड़या पीडितः,
३-तत्। सङ्गमैच्छुक, शहवतकी खाथि रखनेवाला ।
रूपसे पाहत होने पर १००८ ई. के फरवरी या मार्च
कामपूर (सं० वि०) कामं अभीष्टं पूरयति, काम-
पूर णिच्-पण् । १ अभीष्टमद, मुराद पूरी करनेवाला।
२ परमेश्वर ।
कामप्र (सं. वि. ) कामं पिपति काम--क।
अभीष्टप्रद, खाहिश पूरी करनेवाला।
कामप्रद (सं०५०) कामं कामजरतिभेदं प्रददाति,
काम-प्र-दा-क।१रतिबन्धविशेष, एक डौन्ला ।
"दो पादौ स्वखनो चिप्त्वावि मग वधा।
कामबैत बासुकः प्रौमा मन्यः कामप्रदो हिसः।" (घरदीपिका)
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
कामानां सर्वपुरुषाणां प्रदा, ६-तत् । २ विष्णु ।
(वि.) ३ अभीष्टप्रद, मुराद पूरी करनेवाला ।
कामप्रवेदन (सं० ली.) कामस्य अभिशाषस्य प्रवेदनं
पाविष्करणम्. ६.सत् । अमिताप प्रकाश, ख़ाहियका
इनहार।
कामप्रश्न (सं० पु.) कामं यष्टं प्रश्नः। यथेच्छ प्रश्न,
मनमाना सवाल।
कामप्रस्थ (सं० पु.ली.) कामस्य कामगिरीः प्रस्थः,
(मालादीनाथ पाहारा८८) आदिवर्ण उदात्तः, तत् ।
१ कामगिरिका सानुदेश, काम पहाड़कों ऊंची
हमवार जमीन् । २ एक नगर ।
कामप्रस्थीय (सं०वि०) कामपस्थे भवः, कामप्रस्थ छ ।
कामगिरिक सानुदेशमें उत्पन्न, काम पहाढको ऊंची
इमवार जमीनका पैदा।
काममि (सं० वि०) काम पिपति, काम-पृ-कि ।
अभीष्टपूरक, खाहिश पूरी करनेवाला ।
कामप्रियकरी (सं० स्त्री० ) अश्वगन्धा, असगंध ।
कामफल (सं• पु.) कामं यथेष्टं फलमस्य, बनी।
महारानाम्न, एक वढ़िया पाम ।
कामवखुध-वादगाह पालमगीरके कनिष्ठ पुत्र । यह
पितान इन्हें दक्षिणका राज्य सौंपा था। किन्तु इन्होंने
ज्येष्ठ भाता बहादुर शाहका संरक्षण स्वीकार न किया
और अपने नामका सिक्का चला दिया। इसीसे वह
एक बड़ी सेना ले इनसे सड़ने चले। हैदरावादके
निकट युद्ध हुवा था। युहमें यह हार गये। घोर-
मास इनका प्राण छटा था। इनकी माताका नाम-
उदयपुरो-महन्त रहा। १५६७ ई० को २५वों फर-
वरीको कामबखुश थाहज़ादेने जन्म लिया था।
कामम् (सं० प्रव्य०) कम-णिड्-प्रमु। १ यथेष्ट,
मनोंके मुत्राफिक. । २ अनुमतिसे, मयूरीके साथ।
३ स्वच्छन्द, खुयोसे।
४ पच्छा, बहुत अच्छा।
५ माना, हुवा। ६ निःसन्देह, वैयक ।
काममधरी (सं० खी.) दडिप्रणोत दशकुमार.
चरितकी एक नायिका।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||काममय-कामरी|४३०}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
साममय (सं० वि०) कामस्व विकारः, काम-मयट ।
भयड्व वयो वाया समक्षाच्छादमयोः । पा ॥१५॥ कामविकार,
स्वारिशसे भरा हुवा।।
काममदन (सं० पु.) काम कन्द मयति नाशयति,
काम-मृदछ। कामको मर्दन करनेवाले महादेव ।
काममलोलुप (सं• पु० ) सवैद्य, अच्छा कोम। .
काममलोलुभ, काममलोलुप देखो।
काममा (सं• पु०) कामस्य मह उत्सवो यत्र, बहुम्री ।
कामदेवके उद्देश उत्सव का दिन । चैत्री पूर्णिमा
इस उत्सवका निर्दिष्ट समय है।
काममालिका (सं• स्त्री०) मद्य विशेष, एक शराच ।
काममाली (सं• पु०) गणेश ।
काममुद्रा (सं० स्त्री.) तन्त्रशास्त्रीता एक मुद्रा।
काममूढ़ (सं• वि.) कामन मूढः, ३-तत् । कामको
..पौड़ासे हित पौर पहितको विवेचना न रखनेवाला,
जो शश्वसके जोरसे अन्धा बन गया हो।
काममूत (वै. त्रि.) कामन मूतः मूच्छितः, काम
मव-त छान्दसत्वात् इट् प्रभावः जट्च। १ काममूर्छित,
शहबतसे गश खाये दुधा। २ अत्यन्त कामपीड़ित,
शावतके जोरसे बड़ी तकलीफ पाये हुवा।
{{Right|काममोदी (सं• स्त्री० ) कस्तू री, सुश्क ।}}
काममोहित (सं० त्रि.) कामेन कामनरत्या मोहितः,
३-सत्। १ कामको पीड़ासे हित और अहितका
जान न रखनेवासा, अहवतके जोरसे अन्धा बना '
२ सुरतासायावत-परस्त ।
"मा निवाद प्रतिष्ठा लमगमः भाववीः समाः।
यत् कोचमिव मादिकमवधीः काममोहितम् ।" (रामायण)
कामयमान (सं.वि.) काम-पिङ्-थानच् । कामुक,
खामियमन्द।
कामयान सं.वि.) काम-णिड्-शानच् मुगभावः
आगमशास्त्रस्य अनिस्यत्वात्। कामुक, खाहिशमन्द ।
कामायामा (सं. स्त्री.) गर्भिणी, हामिया, जिसके
पेटमें सड़का रहे।
कामयाब (फा• वि.) सफल, नसीबा पाये हुवा।
कामयाबी (फा. सी.) सफलता, मक्सदवरी,
बासबाता।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
कामयिता (सं० वि०) कामयते, कम-विच-तम्।
कामुक, चाटनेवाला।
कामरस (सं.पु.) कामः कामजरत्यादिरेव रसः ।
सुरतादि, यहबत वगैरह।
कामरसिक (सं• वि०) कामे कामजरत्वादी रसिका
सुनिपुणः, ७तत्। सुरतादि विषयमें मुनिपुण,
शहबतपरस्त ।
कामराज-१ कालिकामक्त कौण्डिन्य मुनिकृन्चोडव
श्रीधररानके पुत्र । इनके पुत्र मातुल
(सधादिषक१॥३१) २ कैवख्य-दीपिका-प्रणेता माट्रिके प्रति-
पालक। ३गोपालचम्यू-प्रणेता जीवराजके पितामह ।
इनके पुत्र अर्थात् जीवरानके पिताका नाम ब्रजराज
था। फिर इनके पिताको श्यामराज कहते थे।
कामराज दीक्षित-काव्येन्दुप्रकाय, ऋहारकतिकाकाव्य
प्रभृतिक प्रणेता।
कामरान् मिर्जा-बादशा वावर शाहके श्य पुत्र और
बादशाह हुमायूंक भ्राता। १५३० ई० को सिंहा.
सनारूढ़ होने पर हुमायूँने इन्हें कानुन, कन्दहार,
गजनी पौर प्रचाबका राज्य सौंपा था। किन्तु
१५५३ ई. को काबुल में हुमायूँने इनको पांखें नश्तरसे
छदवा कर निकलवा चौं। कारण इनोंने राज्यका
प्रबन्ध बिगाड़ बड़ा गड़बड़ किया था। पांखोंमें
नोवूका रस और नमक पड़ते समय इनोंने कहा-
हे परमेखर। मैंने इस संसारमें जो पाप कमाया,
उसका यथेष्ट फल पाया है। अब परलोकमें मेरे
ऊपर कृपादृष्टि रखिये। अन्त में इन्हें मजानको
पाना मिली थी। वहां यह तीन वर्ष रहे और
१५५६ ई. को अपनी मौत मरे। इनके तीन कन्या
और पदुल कासिम मिर्जा नामक एक पुष चार
सन्तान रहे। १५६५ ई. को पकबरको पानासे
पबुल कासिम मिर्जा ग्वालियरके किसे में कैद किये
पौर मारे गये।
कामरिपु (सं• पु.) १ शरीरमश रिपुके मष
प्रथम रिपु। अभिसाप पौर श्रीसम्मोगादि इसका
कार्य है। २.भिव।....
बामरी (सि.) बम, बामरी।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|
४३२}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
बामरचि (सं. स्त्री.) पनविशेष, एक इथियार ।
विखामिवने इसे रामचन्द्रको पत्रके प्रख विफल
करनेके लिये दिया था।
{{Left|कामरू (हिं.) कामरूप देखो।}}
कामरूप (सं.वि.) कामं मनो रूपं यस्य, बहुब्री.
१ मनोन रूपविधिष्ट, खूबसुरत।
२इच्छानुसार
विविध रूपधारी, म के मुवाफिक तरह तरहको
सूरत बनानेवाला।
"कामरूप: कामगम: कामवीर्यो विनमः।" (महाभारत)
कामरूप-वर्तमान पासाम प्रदेशका एक विस्तृत
जिला। यह प्रचा. २५.४४ से २६ ५३३० और
देशा०४.४० से १२ १२ पूके मध्य ब्रह्मपुत्रके
उभय पार पर अवस्थित है। इसके उत्तर भूटान,
'पूर्व दरङ्ग एवं नौगांव निसा, दक्षिण खसिया पहाड़
और पश्चिम ग्वालपाड़ा जिला है। कामरूपका बड़ा
'शहर गौहाटी।
इस जिलेका प्राकृतिक दृश्य पति मनोहर है।
भूमि बहुत उर्वरा है। ब्रह्मपुत्रके तौरका स्थान
नीचा रहनेसे वर्षाकालमें डब जाता है। यहां धान्य
और सर्षप अपर्याप्त उत्पन होता है। शर, वंश प्रमृति
स्वभावतः अधिक निकलता है। ब्रह्मपुत्रके तौरसे
पागे उत्तर भूटान और दक्षिण खसिया पहाड़ तक
भूमि क्रमशः उच्च एवं समतल है। ब्रह्मपुत्रके दक्षिण
इस जिले में बहुतसे छोटे छोटे पहाड़ है। उनमें एक
एक दो हजारसे तीन हजार फीट तक ऊंचा है। उक्त
पर्वतोंके पाच देशमें चायके बाग है।
ब्रह्मपुत्र ही कामरूपको प्रधान नदी है। बहुतमी
-नदी और उपनदी ब्रह्मपुत्र में गिरी हैं। उनमें उत्तर
दिकसे मानस, चावतखोया तथा वरनदी पौर दक्षिण
'दिक्से कुलसी नदी पायी है।
ब्रह्मपुत्रके मध्य कई क्षुद्र शुद्र होप है, इसकी
संख्या नहीं।-बधपुनमें रेत पड़नसे शितने दीप
बनते और बिगड़ते हैं।
कामरूपके पर्वतीय कई क्षुद्र नदी निकली हैं।
श्रीभकास प्रायः उनमें जच नहीं रहता। फिर भी
बा भीतर भीतर बहा करती।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
यहां नाला या नहर नहीं। किन्तु शस्य की
रक्षाके लिये बीच बीच सामान्य बाँध मौजूद हैं।
इस भूभागमें प्रायः १३० वर्गमोल जंग है। इस
जङ्गलसे भी गवरनमेण्टको यथेष्ट पाय होता है। इसमें
कुलसी नदीके तौरका वनविभाग प्रधान । जिस
लिस वनसे रुपया पासा, इसमें बड़हार, दिमल्या,
पस्तान, मयरापुर और बरवै नामक धन उखयोग्य
दिखाता है।
वनमें साखू, शोधम, तुन, सूम, नाहर प्रभृति वध
यथेष्ट उपजते हैं। उनसे खूध कीमती कड़ियाँ,
बरगे और तख्ते बनाते हैं। लालुङ्ग, कहारी, गारो,
मिकिर और खासी प्रभृति सभ्य लोग वनसें लाख,
मोम, तन्तु, गोंद वगैरह एकट्ठा कर अपनी जीविका
चलाते हैं।उत्तराञ्चलमें भूटान पहाड़के पास
गोचारणका बड़ा मैदान है। यहां नानाविध वृक्ष
उपजते हैं।
जीवजन्तु, पती, गैंडा, नानाजातीय ब्यान,
महिष, हरिण, वन्य शूकर, नाना प्रकार सर्प और
नानाप्रकार पक्षी देख पड़ते हैं। मत्य भी यहां नाना
प्रकार होते हैं। उनमें रेह, चित्ती और पवी नामक
मन्य ही पधिक है।
यहक योगिनौतन चकवादिका उझेख मिलता है। यषा,-
"श दीफलविश्वानि बदरामलकानि च ।
खन र पनसव तथा तालफलानि च ।
दाहिम कदली-
लकुछ मधुकं युक्त' कथा पूगफलामि।
यस्य फलं विशालच तस्य शार्क प्ररोहकम् ।
बास्नूकस्य च माकच पावास्य मम प्रिये ।
विलयानि प्रियायन्यान् तथा च सिन्तिडीफल
कुष्माकं पायवीय तथा चारयसभवम् ।
कदलं यौणपूरच रामद पौवकन्तथा ।
सौमधान्य दान्य रखमालिकमेव च ।
राजधान्य पष्टिकव देववहमन्तथा।
चवर्क कोद्रपद......
चार पचौरच पच माविषोडवम्।"
मार प्रत्यामि बन्यानां चामवाशिनाम् ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४३२|
कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
पुरातत्वको देखते कामरूप अति प्राचीन जनपद
है। महाभारतके समय यह स्थान किरातपति भग-
दत्तके अधीन था। उस समय लोग इसे परशरामका
लौहित्यतीर्थ मानते थे।
पुराण और तन्त्रमें कामरूप महापीठस्थान माना
गया है। गरुडपुराणमें लिखा है,-
"कामरूपं महातीर्थ कामाख्या सन विष्ठति । (गरुडपुराण, श१६)
राधातन्त्रके २०३ पटलमें कहा है,-
"कामरूप' महभानि ब्रह्मणो मुखमुच्यते।"
है भगवति । यह कामरूप ब्रह्माका सुख
माना जाता है।
स्कन्दपुराणका प्रभासखण्ड ( ७० प्र०) देखते
इस स्थानमें शभकर लिङ्ग विद्यमान है।
नीलतन्त्र और वृहन्नीलतन्त्रके मतसे इस महा-
तीर्थम योगनिद्रा सर्वदा विरानती हैं।
पूर्वकालको कामरूपका आयतन इस समयको
अपेक्षा अधिक विस्तृत था।
कुमारिकाखण्डमें
लिखा है,
"कामरूपे च यामाया मवलया: कोलिता।" (२० ई०)
वर्तमान प्रासाम, कोचविहार, जलपाईगोड़ी और
रनपुर कामरूपके अन्तर्गत था। योगिनीतन्त्र में प्राचीन
कामरूपकी चतुःसीमा इस प्रकार वर्णित है,-
"करतोयो समाथिस्य यावहिकावासिनी।
उत्तरवां कश्चगिरिः करतोधानु परिमे ।
तीर्थ श्रेष्ठा दिखनदी पूर्वस्या गिरिकन्यके ।
दचिये नपुवस्य लामायाः समावधि ॥
येन यान्युपयोग्यानि गव्यं दैवि पयोमसम् ।
मार्ग मान्य तथा कागं शालन शाशक तथा।
माझिप वर्मयन्मास घौरं दवितस्ततः ।
पचिपा प्रवामि ये प्रयोज्या मम प्रिये।
हारितश्च मयुरष नारकं वर्तकन्नथा।
कपिलयब चाशय काककुटकी शिक्षा
बन्धक टकचव गणारिय कपोतक।
विश्वका कुलिकय व रहापुच्छर टिहिमः ।
अचमत्याभनय व पोयाच विशियाने।
चिवमव्य' रोहितच महायलच राजिवम्।"
{{Right|(योगिनौतन, रा८ पटल)}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
कामरूप इति ख्यातः सर्वशास्त्रेषु नियितः "
"विशन योजनविस्तीर्ण दोघे व शवयोजनम् ।
कामरूपं विनानीधि विकोणाकारमतमम् ।
थाने चव केदारी वाया गनासमः।
दक्षिणे सहमे देवौ वाचाया: बहरेसमः।
विकोयमेव मानौडि सुरासुरनमानम्।"
करतोयासे दिक्करवासिनी तक कामरूप विस्तृत है।
इसको उत्तरसीमामें कनगिरि, पश्चिम करतोया नदी,
पूर्वसीमामें तीर्थ श्रेष्ठ दिक्षु नदी और दक्षिण ब्रह्मपुत्र
नद तथा साक्षा नदीका सङ्गमस्थल है। यह सीमा
मिर्देश समुदाय शास्त्रका अनुमोदित है। यह सुरासुर-
पूजित कामरूप त्रिकोणाकार है। इसका देव एक
शत योजन पौर विस्तार तोस योजन है। कामरूपके
ईशानकोणमें केदार, वायुकोणम गजशासन और
दक्षिणम ब्रह्मरता तथा लाथाका सङ्गमस्थत है।
कालिकापुराणमें भी लिखा है-
"करतोया सव्यगना पूर्वभागावधिथिता।
याववलितकान्नास्ति वावद्देपुर वदा।"
{{Right|(कालिकापुराण, २८११२१०)}}
करतोया नामक सत्यगङ्गासे पूर्वदिक ललितकाम्बा
पर्यन्त यह पुर विस्तृत है। (ललितकान्ता दिक्कर-
वासिनोके निकट है।)
दुरबीके मतसे भी कामरूपको उत्तर सीमा
कनगिरि वा मूटानका पावत्य प्रदेश है। इसके
पूर्व महाचीन वा चीन-सामान्य, दक्षिण लाक्षा नदी
(यह नदी ब्रह्मपुत्र से पृथक् हो वङ्गदेशक सीमारूपसे
प्रवाहित है।) और पश्चिम करतोया नदी है।*
सपुरवारी रोगकि विश्वासानुसार देवीगंजी निवभागमें प्राचीन
विता (विसोवा) नदीमें पायराज नामको एक शेटौ नदी मिली है।
वही करवाया नदीका पुराना गर्म है। फिर पाथराज भी कामरूपक
Tanta Amali (Martin's Eastern India, Vol. III.
p. 361-63.) करतोया देखो।
पर वर्तमान भासाम प्रदेशके पूर्वप्रान्तमें सदियाके निकट
कामरूपपुव मामको एक नदी बहवी है। इसे मौ कामरूपको पूर्व सीमा
बवानेवाली कहना पड़ेगा। (Journey from Upper Assam
towards Rookhoom etc, by W. Griffith ; see Selection
of papers regarding the Hill Tracts between Assam ani.
Burmis, p. 126.)<noinclude></noinclude>
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