विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.11 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५४ 250 46138 667790 561777 2026-07-15T15:27:48Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 667790 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|१५२| गग्रहास---गणिपिटक}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> एक गणक में आश्रय कर रहते हैं, मरुत् प्रभृति मात देवता। ​{{outdent|गणहास (सं० पु०) १. चोर नामक गन्धद्रव्य। (त्रि०) २. जो बहुत मनुष्यों को हँसा सके।}} ​{{outdent|गणदासक, गणदास देखो।}} ​{{outdent|गणाक्रान्त (सं० वि०) गणेन आक्रान्तः। १. किसी पक्ष में स्थित। २. जिस पर बहुत मनुष्यों ने आक्रमण किया हो।}} ​{{outdent|गणाग्रणी (सं० पु०) गणानां अग्रणीः, ६ तत्। १. गणेश। जो बहुतों से सम्मानित हो, जो बहुतों में श्रेष्ठ गिना जाता हो।}} ​{{outdent|गणाचल (सं० पु०) गणभूयिष्ठोऽचलः। कैलास पर्वत। इस पर्वत पर गणदेवता रहते हैं, इसलिए इसका नाम गणाचल पड़ा है।}} ​{{outdent|गणाचार्य (सं० पु०) लोकगुरु, शिक्षक।}} ​{{outdent|गणाधिप (सं० पु०) गणानां अधिपः, ६ तत्। १. गणेश। २. शिव। ३. गणों के मालिक। ४. गणाधिप, जैनमतानुसार साधुओं के संघ में जो सबसे श्रेष्ठ अथवा वृद्ध और बहुज्ञानी हों। मुनियों के अधिपति। जैसे, श्रीजिनेसेनाचार्य ५०० मुनियों के संघ के गणाधिप थे। (राजवार्तिक)}} ​{{outdent|गणाध्यक्ष (सं० पु०) १. गणेश। २. शिव।}} ​{{outdent|गणान्न (सं० क्ली०) गणानामन्नं ६ तत्। बहुस्वामिक अन्न, वह अन्न जिस पर बहुतों का अधिकार हो।}} ​{{outdent|गणाभ्यन्तर (सं०) गण गणानां समूहानां... तेन अभ्यन्तर उपजीवी, ३-तत्। वह मनुष्य जो मठादि में गण द्वारा उसे दिए हुए धनादि से प्रतिपालित होता हो, या वह मनुष्य जिसकी रक्षा मन्दिर के धन से होती हो। भाष्यकार मेधातिथि ने 'गणाभ्यन्तर' शब्द का अर्थ दूसरे प्रकार से किया है। उनके मत से जो मिलकर एक कार्य का अनुष्ठान करके जीविका निर्वाह करते हैं, वे ही गण कहलाते हैं। इस गण के अन्तर्गत चातुर्विद्य ब्राह्मणों को गणाभ्यन्तर कहते हैं।}} ​{{outdent|गणि (सं० स्त्री०) गण-इन्। गणन, गणना, गिनती।}} ​{{outdent|गणिका (सं० स्त्री०) गणो लम्पटे गण उपपतित्वं नास्ति अस्याः गण-ठन्-टाप। १. वेश्या, रंडी। मेधातिथि के मत से जो कामिनी सिर्फ संभोग की इच्छा से बहुत मनुष्यों में <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अनुरत हो जाती हो उन्हें पुंश्चली कहते हैं एवं जो अपने को सज-धज कर युवकों को वशीभूत करती हैं और वेश्या के वेश में रहती हैं और यथार्थ में जिनके हृदय में संभोग की इच्छा कभी भी नहीं रहती तथा धन देने पर जो सभी के प्रति अनुराग करती हैं, उन वेश्याओं को गणिका कहते हैं। मनु के मतानुसार इनका अन्न खाने से किसी तरह की सद्गति नहीं मिलती है। २. यूथिका।}} ​{{outdent|गणिकारिका (सं० स्त्री०) गणि गणनं करोति। नदी के समीप उत्पन्न वृक्षविशेष, एक गनियार। इसका पर्याय श्रीपर्णी, अग्निमन्य, गणिका, जरा, तेजोमन्य, ज्योतिष्का, पावका, अरणी, वनिमन्य, मन्थन, गिरिकर्णिका, अग्निमन्थन, तर्कारी, वैजयन्तिका, अरणीकेतु, नादेयी, विजया, अनन्ता और नदीजा है। इसका गुण तिक्त, कफ, वायु, शोथ, अग्निमान्द्य, अर्श, मलबन्ध और कृमिनाशक है।}} ​{{outdent|गणिकारी (सं० स्त्री०) पुष्पवृक्षविशेष, गनियार का पेड़। वसंत काल में इसके फूल खिल कर चारों ओर सुगन्धित कर देते हैं।}} ​{{outdent|गणित (सं० क्ली०) १. गणन, गणना, गिनती। २. ग्रहों की गति, स्थिति की गणना। ३. ज्योतिष शास्त्र। गणित दो भागों में विभक्त है— पाटीगणित और बीजगणित। ४. प्रजा का उपहार जो गिना गया हो। (वि०) ५. खेतों का फल जिसकी गणना की गई हो।}} ​{{outdent|गणितज्ञ (सं० पु०) गणित जानने वाला, ज्योतिषी।}} ​{{outdent|गणिताध्याय (सं० पु०) भास्कराचार्य कृत सिद्धांतशिरोमणि का एक विस्तृत अध्याय। इसमें ग्रहों की मध्यगति और स्फुटादि विषय अच्छी तरह लिखे गए हैं। लीलावती और बीजगणित जान लेने पर इसका मर्म ग्रहण करना सहज है।}} ​{{outdent|गणितिन् (सं० वि०) हिसाबी, जो हिसाब-किताब करता हो।}} ​{{outdent|गणिपिटक (सं० क्ली०) जैनों के द्वादश अङ्ग। १. आचाराङ्ग, २. सूत्रकृताङ्ग, ३. स्थानाङ्ग, ४. समवायाङ्ग, ५. व्याख्याप्रज्ञप्ति, ६. ज्ञातृधर्मकथा, ७. उपासकदशा, ८. अन्तकृद्दशा...}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> lame49u9xwuzdbk5krrwuj618hzfyn6 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५५ 250 46144 667794 561778 2026-07-15T15:50:44Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 667794 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गणीभूत-गणेश'''|'''१५३'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>अनुत्तरोपपादक दशाङ्गः, १०. प्रश्नव्याकरण, ११. विपाक-श्रुत, १२. दृष्टिप्रवाद इन बारहों को गणिपिटक कहते हैं। ​{{outdent|गणीभूत (सं० वि०) जो किसी गण या पक्ष में स्थित हो, गणाक्रान्त।}} ​{{outdent|गण्य (सं० वि०) संख्येय, गिनने योग्य, गिनती लायक।}} ​{{outdent|गणेरु (सं० पु०) १. कर्षिकावृक्ष। २. वेश्या। ३. हस्तिनी, मादा हाथी।}} ​{{outdent|गणेरुका (सं० स्त्री०) गणरूप वैश्यासु कायति कै-कः। कुटनी, दूती।}} ​{{outdent|गणेश (सं० पु०) गणानां ईशः, ६ तत्। पार्वतीनन्दन, गिरिजा के पुत्र। शनैश्चर की दृष्टि पड़ने से इनका सिर कट गया था— इस पर विष्णु ने एक हाथी का सिर काट कर धड़ पर संयोजित कर दिया, इसी कारण इनका नाम गजानन पड़ा। गजानन देखो। महाबल क्षत्रियान्तकारी परशुराम क्षत्रियों का विनाश कर शिव और पार्वती को नमस्कार करने के लिए कैलास गए। उस समय शिव और पार्वती गाढ़ी निद्रा में पड़े थे और गजानन द्वार पर पहरा देते थे जिससे उनकी निद्रा में किसी प्रकार का विघ्न न हो। परशुराम ने आकर कहा कि मैं शिव और पार्वती से भेंट करना चाहता हूँ। किन्तु गणेश ने उन्हें बाधा देते हुए कहा, अभी दोनों निद्रा के वश हैं। कृपया थोड़ी देर जाइए, जागने पर उनसे साक्षात् कर सकते हैं। इस पर परशुराम जी सन्तुष्ट न हुए। एक दूसरे को मीठी बातों से कुछ काल तक समझाने की चेष्टा करते रहे किन्तु निष्फल हुए। तब परशुराम जी क्रोधित हो राजराजेश की अवहेलना करते हुए भीतर जाने लगे। इस पर गणेश ने उनको सूँड से पकड़ कर समस्त त्रिभुवन में घुमा कर पटक दिया। परशुराम ने लज्जित हो अपने परशु को बाहर निकाला और उन पर निक्षेप किया। परशु को पिता का शस्त्र समझ कर गणेश ने उसका प्रतिकार नहीं किया, जिसके आघात से गणेश का एक दाँत जड़ से उखड़ गया। इसी कारण गणेश एकदन्त कहलाते हैं। <Small>(ब्रह्मवैवर्त पु० गणेशखण्ड)</small>}} ​ गणेश एक प्रसिद्ध लेखक थे। महाभारत में लिखा है कि सत्यवतीनन्दन व्यासदेव ने योगबल से विपुलायतन महाभारत मन ही मन रचा था, किन्तु लेखक के अभाव से जनसमाज में उसका प्रचार न कर सके। इसलिए वे <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अत्यन्त चिन्तित और विषण्ण हो गए। एक दिन हिरण्यगर्भ से उन्होंने अपने मन की व्यथा कह सुनाई। इस पर हिरण्यगर्भ ने गणेश को लेखक करने के लिए परामर्श दिया। व्यासदेव ने गणेश को लिखने के लिए अनुरोध किया। गणेश ने यह कहते हुए लिखना अङ्गीकार किया कि यदि व्यासदेव को बोलने में विलम्ब हो गया, जिस कारण मेरे हाथ या मेरी लेखनी विश्रान्त हो पड़ी, तो मैं कदापि लिख नहीं सकता। गणेश ने लिखना आरम्भ किया और व्यासदेव कहने लगे। जब व्यासदेव देखते कि अब अधिक कहा नहीं जाता, तो उसी समय दो-एक कूट श्लोक की रचना कर बोलते जाते थे। गणेश को इस कूट श्लोक का अर्थ शीघ्र समझ में न आने के कारण लेखनी को कुछ काल के लिए रोक देना पड़ता था, इसी अवसर पर व्यासदेव मन ही मन बहुत से श्लोक की रचना कर डालते थे। {{Right|<small>(महाभारत १।१।७८)</small>}} जब कोई कार्य आरम्भ करना होता है तो उस समय गणेश की मूर्ति को स्मरण करने से वह कार्य निर्विघ्न समाप्त हो जाता है। इसी कारण गणेश को सिद्धिदाता भी कहा करते हैं। आस्तिक हिन्दू-लेखक सबसे पहले गणेश का नाम लिखा करते हैं। उन्हीं का विश्वास है कि गणेश एक प्रसिद्ध लेखक और सिद्धिदाता हैं। इसलिए इनका नाम पहले लिखने से किसी प्रकार के विघ्न की सम्भावना नहीं रहती है। ​ स्कन्दपुराण के गणेशखण्ड में वक्रतुण्ड, कपिल, चिन्तामणि तथा विनायक प्रभृति रूपों में गणेश के अवतार की कथा लिखी है। गणपति तत्त्व नामक ग्रन्थ के मत से गणेश ही परब्रह्म, श्रुति-मति-पति, परमब्रह्म, परमेश्वर हैं। गणपति तत्त्व में लिखा है कि गणेश सर्वस्वरूप, भूत, भविष्य और वर्तमान की हालत जानने वाले हैं। मूर्तिभेद से ये ही मस्तक के प्रतिपालक हैं, फिर समस्त जड़-पदार्थ इन्हीं में लय हो जाते हैं तथा दो प्रधान अर्थात् प्रकृति एवं पुरुष अर्थात् जीवात्मा के अधिपति हैं। इनकी आराधना करने से मुक्तिलाभ होता है। जिस तरह शक्ति के उपासक शाक्त और विष्णु के उपासक वैष्णव कहलाते हैं, उसी तरह जो गणपति के उपासक हैं वे गाणपत्य कहलाते हैं। हिन्दू सिद्धिदाता गणेश की पूजा सबसे पहले करते हैं। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude> {{left|Vol. VI. 39|2em}}</noinclude> oczjbmulehn1432jndw90grj19fqgvt पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५६ 250 46148 667807 561779 2026-07-15T16:54:52Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 667807 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१५४'''|'''गणेश'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>पहले करते हैं। गणेश अनेक प्रकार के हैं। तन्त्र में ५० गणेश का उल्लेख है, यथा— १. विघ्नेश, २. विघ्नराज, ३. विनायक, ४. शिवोत्तम, ५. विघ्नकृत्, ६. विघ्नहर्त्ता, ७. गण, ८. एकदन्त, ९. अदन्तक, १०. गजवक्त्र, ११. निरञ्जन, १२. कपर्दी, १३. दीर्घजिह्वक, १४. शङ्खकर्ण, १५. वृषभध्वज, १६. गणनायक, १७. गजेन्द्र, १८. शूर्पकर्ण, १९. त्रिलोचन, २०. लम्बोदर, २१. महानन्दा, २२. मृत्युमूर्ति, २३. सदाशिव, २४. आमोद, २५. दुर्मुख, २६. सुमुख, २७. प्रमोदक, २८. एकपाद, २९. द्विजिह्व, ३०. शूरवीर, ३१. षण्मुख, ३२. वरद, ३३. वामदेव, ३४. वक्रतुण्ड, ३५. द्विरण्डक, ३६. सेनानी, ३७. ग्रामणी, ३८. मत्त, ३९. विमत्त, ४०. मत्तवारक, ४१. जटी, ४२. मुण्डी, ४३. खड्गी, ४४. वरेण्य, ४५. वृषकेतन, ४६. भूतप्रिय, ४७. गणेश, ४८. मेघनाद, ४९. व्यापी और ५०. गणेश्वर। गणेश के उपरोक्त पचास नामों की फिर पचास शक्तियाँ हैं। ​यथा— १. ह्री, २. श्री, ३. पुष्टि, ४. शान्ति, ५. स्वस्ति, ६. सरस्वती, ७. स्वाहा, ८. मेधा, ९. कान्ति, १०. कामिनी, ११. मोहिनी, १२. नटी, १३. पार्वती, १४. श्यालिनी, १५. नन्दा, १६. सुषमा, १७. कामरूपिणी, १८. उमा, १९. तेजोवती, २०. सत्या, २१. विघ्नेशी, २२. सुरूपिणी, २३. कामदा, २४. मङ्गला, २५. भूति, २६. भौतिकी, २७. विघ्नेशानी, २८. मिता, २९. रमा, ३०. महिषी, ३१. विकर्णा, ३२. भ्रुकुटी, ३३. दीर्घघोणा, ३४. धनुर्धरा, ३५. यामिनी, ३६. रात्रि, ३७. कामान्धा, ३८. शशिप्रभा, ३९. लोलाक्षी, ४०. चला, ४१. दीप्ति, ४२. सुभगा, ४३. दुर्भगा, ४४. शिवा, ४५. भर्गा, ४६. भगिनी, ४७. शुभदा, ४८. कालरात्रि, ४९. कालिका, और ५०. लज्जा।<Small>(शारदातिलकटीका में राघवभट्ट)</Small> ​ गणेश के शरीर स्थूल तथा मुख हाथी का और उदर लम्बा है। इनके कपाल से मदजल निःसृत होता है, जिसके सौरभ से आकुल होकर मधुपकुल (भौंरों का समूह) गण्डस्थल के निकट सर्वदा भ्रमण करते रहते हैं। वृहत् कानों के आघात से अरिकुल (शत्रु समूह) निधन होकर उनका रक्त सिन्दूर सी शोभा देता है। गणेश यथार्थ में महत सुन्दर हैं और इनकी आराधना करने से विघ्न नाश तथा सिद्धि होती है। (सत्त्व) ​गणेश का ध्यान: यथा— <Small>"गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरम्।</Small> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम्॥<br> दन्तविदारितारिरुधिरेः सिन्दूरशोभाकरम्।<br> वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कर्मसु॥"</poem>}}}} ​प्रायः सब कोई इसी ध्यान से गणेश की पूजा किया करते हैं। तन्त्रसार में गणेश का और दूसरा ध्यान लिखा है। तान्त्रिकगण इसी ध्यान से गणेश पूजा करते हैं— ​गणेश का तान्त्रिक ध्यान: यथा— {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतरजठरं हस्तपद्मैर्दधानं।<br> दन्तं पाशाङ्कुशेष्टान्युरुकरविलसद्बीजपूराभिरामम्॥<br> बालेन्दुद्योतमौलिं करिवरवदनं दानपूराद्र्रगण्डं।<br> भोगीन्द्राबद्धभूषं भजत गणपतिं रक्तवस्त्राङ्गरागम्॥" (तन्त्रसार)</poem>}}}} ​इस ध्यान से जाना जाता है कि गणेश के चार हाथ और तीन नेत्र हैं, उनकी मूषक (चूहे) की सवारी है, जिस पर चढ़कर वे त्रिभुवन भ्रमण किया करते हैं। बहुत स्त्रियों का विश्वास है कि गणेश की आराधना से इन्दुर (चूहे) का उपद्रव नहीं रहता है। इसलिए बहुत सी गृहस्थ महिलाएँ विजयादशमी के दिन दुर्गाप्रतिमा के पार्श्व में स्थित गणेशमूर्ति के पद पर मूषक (चूहे) की मिट्टी रख देती हैं और उनके दौरात्म्य (उत्पात) निवारण के लिए प्रार्थना करती हैं। ​गणेश का बीजमन्त्र:— <Small>'गं' देवाय नमः, 'गं' शिरसे स्वाहा,</Small> इत्यादि क्रम से अङ्गन्यास और करन्यास करना पड़ता है। गणेश का पौराणिक मन्त्र—<Small>"ॐ नमः गणेशाय।"</Small> ​गणेश गायत्री:— <Small>"एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो विघ्नः प्रचोदयात॥" (प्राणतोषिणी)</Small> ​ गणेश का नमस्कार मन्त्र— {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"देवेन्द्रमौलिमन्दार-मकरन्द-कणारुणाः।<br> विघ्नं हरन्तु हेरम्ब-चरणाम्बुज-रेणवः॥"</poem>}}}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ls95czcb1v2gmw7ouhw72f4ynt773dn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५८ 250 46161 667811 561781 2026-07-15T17:20:31Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 667811 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''२५६'''|''' गणेशकुण्ड -- गणेश चतुर्थी'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> महाराज ईश्वरीनारायणसिंह की सभा में उपस्थित रहते और १८८३ ई० को जीवित थे। रसचन्द्रोदय ग्रन्थ के रचयिता ठाकुरप्रसाद से इनकी मित्रता थी। ​{{outdent|गणेशकुण्ड (सं० क्ली०) १. नर्मदा नदी के तीरवर्ती एक कुण्ड। स्कन्दपुराण के गणेशखण्ड में इस कुण्ड का उत्पत्ति-विषय इस प्रकार लिखा हुआ है— एक दिन पार्वती और शिव घोर निद्रा में पड़े थे। इसी समय सिन्दूर नाम का एक दुष्ट दैत्य वहाँ आ पहुँचा। पार्वती और शिव को घोर निद्रा में देखकर वह दुष्ट दैत्य पार्वती के उदर में प्रवेश कर गया और उनके गर्भस्थ सन्तान का मस्तक काटकर निकल आया, इस गर्भ में गणेश का जन्म था। सिन्दूर दैत्य ने गणेश के मस्तक को नर्मदा के किनारे जिस स्थान पर रखा था, उसी समय उस स्थान पर एक कुण्ड हो गया जो रक्तकुण्ड नाम से मशहूर है। इस कुण्ड के निकट रक्तवर्ण शिलाखण्ड है, कोई-कोई इसे गणेशशिला कहा करते हैं।}} ​{{outdent|गणेशकुम्भ (सं० पु०) उड़ीसा की एक पहाड़ी कन्दरा।}} ​{{outdent|गणेशकुसुम (सं० क्ली०) गणेशवद् रक्तकुसुमं। १. करवीर, लाल कनेर। २. रक्तकुसुम, लाल फूल।}} ​{{outdent|गणक्रिया (सं० स्त्री०) योग की एक क्रिया जिसमें उँगली आदि की सहायता से गुदा का मल साफ़ करते हैं।}} ​{{outdent|गणेशखण्ड (सं० क्ली०) स्कन्दपुराण का एक अंश। इसमें गणेश आविर्भाव प्रभृति का वर्णन है।}} ​{{outdent|गणेशखिन्द, बम्बई प्रदेश में पूना जिला के अन्तर्गत एक प्रसिद्ध बड़ा ग्राम। यह बम्बई जाने की राह पर अवस्थित है। यहाँ चतुरशृंगी देवी का मन्दिर है। भीमवर्षा पहाड़ अश्वखुराकार में इस ग्राम से मिला हुआ है। इस पहाड़ के ऊपर एक गुहामन्दिर विद्यमान है, जिसकी लम्बाई प्रायः २० फुट, चौड़ाई १५ फुट और ऊँचाई १० फुट होगी। अभी इस गुहामन्दिर में एक साधु वास करते हैं। यहाँ शिवलिङ्ग तथा लक्ष्मी की मूर्ति है। उससे २० हाथ पश्चिम पहाड़ के ऊपर की ओर दो गुफाएँ हैं। उससे भी कुछ दूर जल रखने का एक कुण्ड है। प्रत्येक शुक्रवार को यहाँ हाट लगता है। आश्विन मास में नवरात्रि के समय मन्दिर में कुछ उत्सव हुआ करता है। जाट राजा से प्रतिष्ठित एक अधूरा कुआँ है। गणेशखिन्द में बम्बई के लाट साहब का एक घर है। आषाढ़ मास से आश्विन मास तक वे यहाँ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> रहते हैं। इसके निकट दूसरे-दूसरे अँग्रेज़ों के रहने के लिए स्वतन्त्र घर हैं।}} ​ गणेशगुहा (गणेशलेना) १. बम्बई प्रदेश में पूना नगर के निकटस्थ कई एक गुफाएँ, जहाँ पर हाटकेश्वर और सुलेमान पहाड़ मिले हैं, वहाँ से एक छोटा पहाड़ निकल कर पूना नगर के उत्तर की ओर गया है। इस छोटे पहाड़ पर कई जगह गुफाएँ खोदी हुई हैं, उनमें से सबसे बड़ी गुफा का नाम गणेशलेना है। इसमें गणेशपति का मन्दिर अवस्थित है। नगर के उत्तर भाग से ईख, इमली और आम का उद्यान होकर मन्दिर पर जाना होता है। १७७४ ई० में पेशवा रघुनाथ राव के पुत्र अमृतराव ने इन सब आम्रवृक्षों को रोपा था। इसके बाद मन्दिर के ऊपर जाने के रास्ते पर पहाड़ के नीचे गणपति के भक्तों की बनाई हुई सोपान श्रेणी है। सोपान और असम पहाड़ की भूमि पार होकर मन्दिर पर जाना होता है। एकादि क्रम से इसमें २४ गुहामन्दिर हैं जिनमें भिन्न-भिन्न तरह की देव-देवियों की मूर्तियाँ और अनेक तरह के शिलालेख हैं। २. उड़ीसा के अन्तर्गत उदयगिरि पहाड़ का एक गुहा मन्दिर है। पहाड़ के ऊपर यह गुफा अवस्थित है। इस मन्दिर में गणेशदेव की मूर्ति तथा और कई तरह की मूर्तियाँ हैं। इस गुफा का शिल्पनैपुण्य देख कर आश्चर्य मानना पड़ता है। ​{{outdent|गणेशचतुर्थी (सं० स्त्री०) भाद्रपद और माघ की शुक्ल चतुर्थी। इस दिन गणेश का व्रत और पूजन किया जाता है।}} ​{{outdent|गणेशचतुर्थी (सं० स्त्री०) दक्षिणापथवासियों का करणीय एक प्रधान व्रत, गणेश चौथ। बम्बई और पूना अञ्चल में इसके उपलक्ष्य में विशेष उत्सव हुआ करता है। स्कन्दपुराण के मत में भाद्रपदी चतुर्थी को गणेश का जन्म हुआ था। उसी के उपलक्ष्य में इस व्रत की उत्पत्ति है।<ref>भविष्योत्तर पुराण के मतानुसार फाल्गुन मास की चतुर्थी तिथि को यह व्रत करना चाहिए।</ref> इसके लिए बम्बई प्रदेश के बहुत से घरों में स्वतन्त्र स्थान निर्दिष्ट होता है। इस व्रत में पूजा का आडम्बर यथेष्ट है। व्रत के कई दिन पहले उक्त स्थान कलई से परिष्कृत किया जाता है। लोग अपने सामर्थ्यानुसार आलोकमाला (रोशनी) से गृह को सुसज्जित करते हैं। गणेशचतुर्थी के दिन प्रातःकाल}} {{Rule}} {{smallrefs}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 4fulmlpnu2vyad7xw9tifj10z40wtpe पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१५९ 250 46169 667832 561782 2026-07-16T05:01:27Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 667832 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{Rh||'''गणेश चतुर्थी'''|'''१५०'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>घर के बड़े बड़े और लड़के कहार, डोली और वाद्यकार साथ ले करके बाजार जाते और वहां महो की एक गण- प्रतिमूर्ति क्रय कर और डोली में रख करके वाद्य कर करते उसको गृह ले आते हैं। बड़े श्रम और नियमों से बहुत से लोगों के घर पर ही मूर्ति बना करती है। कहीं कहीं थाली में चावल से ही गणेश मूर्ति तैयार कर ली जाती है। भिन्न भिन्न घरों का अलग अलग नियम है। मूर्ति प्रायः चतुर्भुज होती है। बाजार में जो मूर्तियां बिकतीं, एक ही ब्राह्मण के हाथ की बनी रहती हैं। देवमूर्ति निर्माण ही उनका व्यवसाय है बाजार में गणेश मूर्ति घर पहुंचने पर गृहिणी प्रदीप ले करके आरती उतारती और लीपे पोते दालान में ले जा करके सिंहासन पर उसको स्थापन करती है फिर पुरोहित आकर यथाविधि पूजादि करते हैं। गण का वाहन इन्दुर भी निकट ही रहता है। पुरोहित की पूजा पश्चात घर के लोग मिल करके उस काल में गणपतिदेव की महिमा का गान कर सकते हैं। इसी प्रकार प्रातः और सायं काल को गान होता है। समस्त लोग चावल के आटे से बने लड्डू आहार करते हैं रात को उसका कुछ अंश इन्दुर को खिलाया जाता है। प्रवाद है- एक दिन गणपति मूषक पर चढ़ करके चलते चलते गिर पड़े थे आकाश- से चन्द्र यह देख करके हंस पड़े। गणपति ने उस पर क्रुद्ध होकर चन्द्र को अभिसम्पात किया था कोई अब तुम्हें न देखेगा। चन्द्रदेव अपराध स्वीकार करके शाप मोचन के लिये प्रार्थना करने लगे। गणपति संतुष्ट हो गये, परन्तु उनका वाक्य व्यर्थ होने वाला न था। इसी से उन्होंने कहा कि वत्सर में अन्ततः एक दिन लोग चन्द्र का मुख न देखें सुतरं गणपति के जन्मदिवस को नष्टचन्द्र होता है। उस दिन कोई उसके प्रति दृष्टिपात नहीं करता। चतुर्थी व्रत के पीछे कोई १ दिन कोई २ दिन और कोई २१ दिन पर्यन्त गणपति की प्रतिमा की पूजा करता है। प्रातः और संध्या को यह पूजा होती है। विसर्जन के दिन फिर कहार पालकी ले आते हैं। वाद्य बराबर हुआ करता है। पुरोहित आकर गणेश की पूजा और गृहस्थ मङ्गल तथा बालक {{Left|Vol VI 40|2 em}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> की विद्या प्राप्ति के लिये प्रार्थना करते हैं। उसके पीछे विसर्जन होता है। जिससे पूर्व गृहिणियां आकर प्रदीप जला आरती उतार यात्रा समय दही डाल देवमूर्ति को पालकी पर बैठा देती हैं। पालकी को नाना पुष्पों से सुशोभित करके निकटस्थ नदी वा ह्रद कूल पर ले जाते हैं। जल के निकट डोली रख करके देवमूर्ति को निकाल एक बार प्रदीप ले आरती की जाती है। फिर सब लोग रोते रोते देवमूर्ति को जल में विसर्जन करते हैं। उसकी भावना करके दुःख शोक से कातर हो सबके सब घर चले आते, फिर एक वत्सर पीछे वह देखने को मिलेगा या नहीं। ​ भाद्रपद की पञ्चमी अर्थात् गणेश पूजा के परदिन को स्त्रियां 'सप्तभ्रात' वा सात भाइयों के सम्मानार्थ व्रत पालन करती हैं। उस दिन क्षेत्रज वा मानवहस्तप्रस्तुत कोई द्रव्य वह भक्षण नहीं करतीं। सभी फलमूल आहार करके दिन यापन करती हैं। भाद्रपद अष्टमी पर नवमी को गणेश जननी गौरी का व्रत होता है। उस दिन घर में चन्दन का आलिम्पन लगाते और गृहद्वार को चन्दन- वारि से सजाते हैं। तेड़दा वृक्ष को वस्त्र में लपेट जो नव- पत्रिका बनती, वही गौरी की प्रतिमा ठहरती है। इसको कोई बालिका गोद में लेती है। बालिका के हाथ में एक पात्र, एक प्रज्वलित दीप, कई एक शस्य और सिन्दूर- का एक पत्ता रहता है। एक बालक घण्टा बजाते बजाते साथ चला जाता है। गृहस्थ रमणी उस बालिका- को घर में ले जा करके बैठालती और प्रदीप जला करके गौरी देवी की आरती उतारती है। फिर उसको एक एक फल खिला करके कहती है- लक्ष्मी, लक्ष्मी ! क्या तुम आयी हो। बालिका के उत्तर में कहने से कि वह आयी थी, प्रश्न होता है- तुम क्या लायी हो बालिका इस पर बोल उठती है- घोड़ा, हाथी, सैन्य और राशि राशि धन जिससे तुम्हारा घर और यह नगर परिपूर्ण हो जावेगा। इसी प्रकार एक एक करके सब घरों में जा शेष पर गौरी को मध्य कमरे में ले जा करके निर्दिष्ट स्थान पर दीवार में ठांस करके रखा जाता है। संध्या पीछे नानाविध फल दुग्ध और मिष्टान्न भोग लगता है। फिर रात चढ़ने पर नानाविध अलंकारों से गौरी को <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8lieic38cpok81ravj2p2upyoxaejtf पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१६० 250 46176 667833 561784 2026-07-16T05:25:46Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 667833 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१५८'''|'''गणेश मनो— गणोत्सार'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude> सज्जित करते हैं। दिन को कोली और कुरमी जाति की स्त्रियाँ आकर देवी के सम्मुख नृत्य-गीत लगाती हैं। तीन दिन प्रभृति (बाद) देवी के भूषणादि खोलकर उनके अञ्चल में कुछ खाद्य और पैसे बाँध किसी दास वा दासी के हस्त में दिया जाता है। दास उसको लेकर घर से बाहर निकलता है। भोजन की धारा देती गृहणी चली जाती है। शेष में दास देवी को जल में विसर्जन करके वस्त्र और थोड़ा सा जल ले गृह लौट आता है। ​{{outdent|गणेशजननी (सं० स्त्री०) गणेशस्य जननी, ६-तत्। दुर्गा।}} <Small>"मन्त्रो दुर्गा राधा च सरस्वती" (तन्त्रसार)</Small> ​ गंगादत्त क्रमदीपिका तन्त्र का एक टीकाकार। ​ गणेशदत्तशर्मा— "मैथिल गणेशदत्त शर्मा" नाम से ख्यात तथा मालतीमाधव का बनाया "प्रकरणोद्धार" के टीकाकार हैं। गणेशदास— द्रव्यादर्श नामक वैद्यक ग्रन्थकार। ​गणेश दीक्षित— एक विख्यात दार्शनिक। ये भावा विश्वनाथ दीक्षित के पुत्र, भावा रामकृष्ण के पौत्र तथा विज्ञानभिक्षु की टीका, प्रबोधचन्द्रोदय की चन्द्रिका नाम की टीका, तर्कभाषा की तत्त्वप्रबोधिनी नामक टीका, तत्त्वसमास यथार्थ दीपन, योगानुशासतिप्रभृति की संस्कृत टीकाओं की रचना की है। ​ गणेशदेव संगीतशास्त्रविद् पण्डित। राजा खड्गसिंह के देशीरूपा को सुबोधिनी नाम की टीका प्रणयन की है। ​ गणेशदेव— नन्दीग्रामवासी एक प्रसिद्ध ज्योतिर्विद्। उनका दूसरा नाम गणेश्वर आचार्य था। ये केशवार्क के पौत्र और नृसिंह के चाचा थे। इन्होंने कई एक ज्योतिः ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें ग्रहलाघव, चाबुकयन्त्र, तर्जनीययन्त्र, प्रतोदयन्त्र, लघुपयन्त्र, वृहद् और लघुतिथिचिन्तामणि, मदननिर्णय (धर्मशास्त्र), यात्रादिनिर्णय, सिद्धान्तशिरोमणिविवृति, चन्द्रोन्मीलनटीका, पातसारणी, बुद्धि विलासिनी नाम की लीलावती व्याख्या तथा केशव के मुहूर्ततत्त्व और विवाहवृन्दावन की टीका पाई जाती है। उक्त ग्रन्थों में से ग्रहलाघव ही प्रधान है। गणेश का ग्रहलाघव १४४२ शक में (१५२० ई०), पातसारणी १४४४ शक (१५२२ ई०) और लीलावती व्याख्या १५४६ ई० में रची गई हैं।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गणेशपण्डित हरिविनोद नामक संस्कृत ग्रन्थकार। गणेशपाठक— निर्णयकौस्तुभ नामक न्याय और प्रयोगकौस्तुभ नामक धर्मशास्त्रकर्ता। गणेशपुराण एक उपपुराण का नाम। इसमें गणेशमाहात्म्य वर्णित है। गणेशभट्ट— १. उद्वाहविवेक नामक संस्कृत ग्रन्थकर्ता। २. शाकुनदीपक के रचयिता। गणेशभारती— शिवताण्डवस्तोत्रटीका के प्रणेता। ​ गणेशभिषक् एक विख्यात चिकित्सक। इन्होंने चिकित्सामृत, योगचिन्तामणि, रुग्विनिश्चयार्थप्रकाशिका प्रभृति वैद्यक ग्रन्थ प्रणयन किये हैं। ​{{outdent|गणेशभूषण (सं० क्ली०) गणेशं भूषयति, गणेश-भूष्। सिन्दूर।}} गणेशमहोपाध्याय हरिभक्तिदीपिका के रचयिता।}} गणेशराय भाषा के एक कवि, इनका जन्म १५५८ ई० को हुआ था। गणेशराय— दिनाजपुर के अञ्चल के एक राजा का नाम। ई० १४वें शतक में गौड़ का एक राजा हुआ था। गणेश मिश्र प्रायश्चित्त पारिजात नामक धर्मशास्त्र संग्रहकार। ​{{outdent|गणेशान (सं० पु०) गणानामीशानः, ६ तत्। गणेश।}} {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ "ततः सस्मार हेरम्बं व्यासः सत्यवतीसुतः। स्मरणाद् गोमन्तः चिन्तितपूरकः" (महाभारत १।१।७४)। </Poem>}}}} २. शिव, महादेव।}} ​{{outdent|गणेश्वर (सं० पु०) गणानां ईश्वरः, ६ तत्। १. गणेश। २. शिव। ३. गणात्मक ईश्वर। १२ रुद्र, १२ आदित्य, ८ वसु और २ अश्विनीकुमार, इन तेतीस देवताओं को गणेश्वर कहते हैं।,}} <Small>"एवं स्वस्ति सर्वभूतं गणेश्वरः" (महाभारत अनुशासन १५० अ०)।</Small> ​ गणेश्वर जिलान्तर्गत एक परगना। इसमें चालूने और पाँपा नामक दो ग्राम लगते हैं। गणेश्वरी— एक नदी, यह आसाम के अन्तर्गत गारो पर्वत के कैलास से क्रमशः दक्षिणवाहिनी होकर मैमनसिंह जिला होती हुई प्रवाहित है। {{outdent|गणोत्साह (सं० पु० / स्त्री०) गणे गणभावे सम्यक्करणे उत्साहः यस्य, बहुव्री०। गण्डक, गेंडा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 16kj4kxnfxbm9fjqpw36533tth98tkp पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/७७ 250 75771 667786 303281 2026-07-15T14:53:08Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667786 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|७६|इलायची-दाना—इलेक्ट्रिक|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} :इङ्गलैण्ड, अरब, जर्मनी, आदन और ईरान्‌को भारतवर्षसे इलायची जाती है। इसका तेल पीला होता और मन्द्राज प्रान्तमें बहुत खिंचता है। यह लगाते-लगाते हो चक्षुःको शीतलकर देता है। {{outdent|इलायची-दाना (हिं॰ पु॰) १ एलावीज, इलाचीका तुख्म। २ किसी किस्मकी मिठायी। इलायची कीलकर दाना निकालते और उसे चीनीमें पागते हैं। इसी मिठायीका नाम इलायची दाना है।}} {{outdent|इलायचीपण्डू (हिं॰ पु॰) वन्यफल-विशेष, एक जङ्गली मेवा।}} {{outdent|इलावर्त (सं॰ पु॰) जम्बद्दीपका एक खण्ड। {{smaller|इलाहत देखो।}}}} {{outdent|इलावृत (सं॰ क्ली॰) इला पृथिवी वाटतः। १ जस्बू-हीपके नववर्ष में चतुर्थ। इलावृतवर्ष मेरुपर्वतको लपेटे है। इससे उत्तर नील, दक्षिण निषध, पश्चिम माल्यवान् और पूर्व गन्धमादन पर्वत है। २ बुध ग्रह। ३ अग्नीध्रके पुत्र। इन्हें पितासे इलावृत वर्ष मिला था।}} {{outdent|इलाही (अ॰ पु॰) १ परमेश्वर। २ शैख इलाही नामक एक मुसलमान् दार्शनिक। ये बयाना के अधिवासी रहे। दिल्लीपति सलीमशाहके समय इन्होंने एक नया धर्म निकाल बड़ी हलचल डाल दी थी। इलाहीने अपनेको इमाम महदी बताया था। साम्राज्यमें उपद्रव बढ़ते देख १५४७ ई॰ को उक्त बादशाहने इन्हें मरवा दिया था। (त्रि॰) ३ ईश्वरसे सम्बन्ध रखनेवाला।}} {{outdent|इलाही-खर्च (अ॰ पु॰) अतिशय व्यय, ज्यादा खर्च।}} {{outdent|इलाही गजू (अ॰ पु॰) एक प्रकारका गजु। यह ४१ अङ्गुल होता और मकान् नापनेके काममें आता है। अकबर बादशाहने इलाही गज चलाया था।}} {{outdent|इलाही मीर-हमदान् रशीदाबादवासी सैयदोंके गीत्रापत्य। ये जहांगीरके अन्तिम राजत्वकालमें भारतवर्ष आये और फिर शाहजहाँके नौकर बने। इन्होंने 'खजोन्गष्न इलाही' नामक जीवनवृत्तान्त और सकाम गीतयुक्त एक दीवान् बनाया है। कोई}} {{Multicol-break}} :१६४८ और कोई १६५४ ई॰ इनकी मृत्य, का समय बताते हैं। {{outdent|इलाहीमुहर (अ॰ वि॰) अखण्ड, अविकल, अछूता जो बिगड़ा न हो। (स्त्री॰) २ आधि, अमानत, धरीड़।}} {{outdent|इलाहोरात (हिं॰ स्त्री॰) जागरणको निशा, नींद न लेनेको रात।}} {{outdent|इलि, {{smaller|इली देखो।}}}} {{outdent|इलिका (सं॰ स्त्री॰) इला स्वार्थ कन्, आकारस्यकारः टाप् च। पृथिवी, जुमीन्।}} {{outdent|इलिनी (सं॰ स्त्री॰) इला अस्तार्थ इलि ङीप्। चन्द्रवंशीय राजा मेधातिथिकी कन्या। (हरिवंश २२०२०)}} {{outdent|इलिय, {{smaller|इलीश देखो।}}}} {{outdent|इलो (सं॰ स्त्री॰) इल-क-डोष। करपालिका, कटारी।}} {{outdent|इलोविश (व॰ पु॰) असुर-विशेष। इसे इन्द्रने जीता था। {{smaller|(निरुक्त ६।१८)}}}} {{outdent|इलोश (सं॰ पु॰) मत्स्यविशेष, हिलसा नामको मछली। (Clubea Ilisha) संस्कृतमें इसे गाङ्गेय, वारिकपूर, शफराधिप, जलताल, राजशफर, इल्लोश और जलतापी भी कहते हैं। यह मत्स्य पारस्योप-सागर, सिन्धुनदके उपकूल और भारतवर्ष, ब्रह्मदेश एवं मलयद्दीपको बड़ी-बड़ी नदीमें रहता है। क्कष्णामें आश्विन, गोदावरीमें कार्तिक, कावेरीमें ज्येष्ठ, सिन्धु-नदमें फाल्गुन-चैत्र और ब्रह्मदेशकी इरावती नदीमें कार्तिक मास यह अधिक देख पड़ता है। गात्र चांदीजैसा खेत होता, जिसपर सुनहला रङ्ग चढ़ा रहता है। बीच-बीचमें कुछ-कुछ लाली भी झलका करतो है। इलीश डेढ़ हाथ तक लम्बा होता और खानमें बहुत अच्छा लगता है। इसके शरीर में तैलपदार्थ अधिक रहता है। वैद्यमतसे यह मधुर, स्निग्ध, रोचक, अग्नि-वर्धक, पित्तकर, किञ्चित् लघु, दृष्य और वायुनाशक है।}} {{outdent|इलूष (बै॰ पु॰) कवषके पिताका नाम।}} {{outdent|इलेक्ट्रिक (अं॰ वि॰ = Electric) विद्युत्-सम्बन्धीय, बिज़लीसे ताल्लुक रखनेवाला। {{smaller|ताड़ित देखो।}}}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> j1m6u80vlh5bfz3m64gd8z4c7ru9lrz पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/८१ 250 75776 667788 303286 2026-07-15T15:23:08Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667788 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|८०|इल्लत-इश्क़|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} :इल्म-नबातात, ज्योतिषशास्त्रको इल्म-नजूम, न्यायशास्त्रको इल्म-बहस या इल्म-मन्तिक, लोहकान्तधर्मको इल्म-मकुनातीस, विनयरीतिको इल्म-मजलिस, दृग्विद्या को इल्म-मनाजिर, राजनीतिको इल्म-मुदन, त्रिकोणमितिको इल्म-मूसोकी, वायुविद्याको इल्म-हवा, रेखा-गणितको इल्म हिन्दसा, खगोलविद्याको इल्म-हैयत और पशुविद्याको इल्म-हैवानात कहते हैं। {{outdent|इल्लत (अ॰ स्त्री॰) १ कारण, बायस। २ अभियोग, इलज़ाम। ३ दुर्व्यसन, बुरी आदत। ४ अपराध, कुसूर। ५ मल, कूड़ा।}} {{outdent|इन्क्लती (अ॰ वि॰) दुर्व्यसनमें फंसा हुवा, जो बुरी आदत रखता हो।}} {{outdent|इलल (सं॰ पु॰) पक्षिभेद, एक चिड़िया।}} {{outdent|इल्ला (हिं॰ अव्य॰) १ परन्तु, लेकिन। (स्त्री॰) २ पिटका विशेष, एक फुन्सी। यह त्वक्के ऊपर उठती है और कठिन तथा मस्से-जैसी होती है।}} {{outdent|इलिश (सं॰ पु॰) मत्स्यभेद, इलीश। {{smaller|इलीग देखो।}}}} {{outdent|इस्वका, {{smaller|इलवला देखो।}}}} {{outdent|इल्वड़, {{smaller|इल्वल देखो।}}}} {{outdent|इल्वल (सं॰ पु॰) इल्-वल वा इल-क्किए-वलच्। १ मत्स्यभेद, बाम मछली। २ दैत्यविशेष। यह सिंहिकाके गर्भ और विप्रचिन्त्तिके औरससे उत्पन्न हुवा था। इसका अपर नाम सैंहिकेय था। व्यंश्य, शल्य, नभ, वातापि, नमुचि, खसुम, आश्विक, नरक, कालनाभ और राहु (शुक, पीतरण, वज्रनाभ) इसके भ्राता थे। इसका वासस्थान मणिमतीपुर था। कनिष्ठ भ्राता वाप्तापिने किसी तपस्वी ब्राह्मणसे इन्द्रतुल्य पुत्र पानेका वर मांगा था। किन्तु अभिमत वर न मिलनेसे वातापि और इल्वल दोनों उस ब्राह्मण-पर क्रूड हो गये। उसी समयसे इल्वलने ब्रह्महत्यापर कमर बांधी थी। अपने कनिष्ठ भ्राता वातापिको यह भेड़ बनाकर ब्राह्मणके सामने लाता और अच्छोतरह बना-चुना मांस रांधकर खिला देता। फिर बाहर बैठ वातापिको बुलाता था। वह आवाज पाते हो ब्राह्मणका पेट फाड़ निकल पाता और बेचारा ब्राह्मण उसी समय मर जाता। इल्वल अपने मायाबलसे मृत-}} {{Multicol-break}} :व्यक्तिकी शरीर यमके सदनसे बुला सकता था। किसी दिन अनेक राजर्षि मुनिगणके साथ इसके मकान्पर आये। इल्वलने अति समादरसे उनकी अभ्यर्थना को और फिर भेड़का रूप रखनेवाले वातापिको काटकर इसने मांस बनाया। उसे देख ऋषि चकराये। किन्तु अगस्ताने कहा, 'कोई भय नहीं, हमीं यह मांस खायेंगे। आप ठहर जायिये।' इल्वल उन्हें मांस खिला जब वातापिको पुकारने लगा, तब अगस्तत्रका वायु निकल पड़ा। उन्होंने उत्तर दिया,—'आपका वातापि कहां है? उसे तो हमने पेटमें पचा डाला।' उसपर यह धमकी देने लगा। अवशेषकी इल्वल भी अगस्ताके नेत्रसे निर्गत अग्नि द्वारा जल गया। {{smaller|(रामायण और महाभारत)}} {{outdent|इल्वला (सं॰ स्त्री॰) मृगशिरानचत्रके शिरःपर स्थित पांच क्षुद्र तारा।}} {{outdent|इव (सं॰ अव्य॰) १ सदृश, मानिन्द, बराबर। २ जिसप्रकार, जैसे। ३ किसीप्रकार, शायद, कुछ-कुछ। ४ प्रायः, करीब-करीब। ५ इसप्रकार, ठीक तौरपर।}} {{outdent|इवोलक (सं॰ पु॰) लम्बोदरके पुत्र। {{smaller|(विष्णुपुराण)}}}} {{outdent|इवेपोरेशन (अ॰ पु॰ = Evaporation) बाष्पभाव, तबखीर, पानीका भाप बनना। {{smaller|वाष्प देखो।}}}} {{outdent|इशरत (अ॰ स्त्री॰) सन्तोष, तुष्टि, खुशी, आराम, चैन। आनन्द-भवनको इशरत-कदा, इशरत-खाना या इशरतगाह कहते हैं।}} {{outdent|इशारा (अ॰ पु॰) १ सङ्केत, रम्जु, सैन। २ चिह्न, निशान्। ३ मूकदर्शन, गूंगा देखाव। ४ प्रेम, प्यार। "आकिलको इशारा। मूरखकी फटकारा॥" {{smaller|(लोकोक्ति)}}}} {{outdent|इशिका, {{smaller|इशीका देखो।}}}} {{outdent|इशीका (सं॰ स्त्री॰)<br> {{gap}}१ हस्तोका चक्षुःगोलक, हाथीको आंखका ढेला।<br> {{gap}}२ शरकाण्ड, रामशरका तना।}} {{outdent|इश्क (अ॰ पु॰) १ अनुराग, प्यार। {{smaller|"इश्क़में शाह और गदा बराबर।"}} (लोकोक्ति) २ महाव्यसन, खुब्त, दीवानगी। ३ सुप्रसिद्ध मुसलमान कवि शाह रुक्न-उद्-दोनका उपनाम ये शाह आलम्‌के समयमें वर्तमान थे।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> jkobrnekmp86yzogndgjnn9w7rsnjb4 667789 667788 2026-07-15T15:26:15Z ममता साव9 2453 667789 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|८०|इल्लत-इश्क़|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} :इल्म-नबातात, ज्योतिषशास्त्रको इल्म-नजूम, न्यायशास्त्रको इल्म-बहस या इल्म-मन्तिक, लोहकान्तधर्मको इल्म-मकुनातीस, विनयरीतिको इल्म-मजलिस, दृग्विद्या को इल्म-मनाजिर, राजनीतिको इल्म-मुदन, त्रिकोणमितिको इल्म-मूसोकी, वायुविद्याको इल्म-हवा, रेखा-गणितको इल्म हिन्दसा, खगोलविद्याको इल्म-हैयत और पशुविद्याको इल्म-हैवानात कहते हैं। {{outdent|इल्लत (अ॰ स्त्री॰) १ कारण, बायस। २ अभियोग, इलज़ाम। ३ दुर्व्यसन, बुरी आदत। ४ अपराध, कुसूर। ५ मल, कूड़ा।}} {{outdent|इन्क्लती (अ॰ वि॰) दुर्व्यसनमें फंसा हुवा, जो बुरी आदत रखता हो।}} {{outdent|इलल (सं॰ पु॰) पक्षिभेद, एक चिड़िया।}} {{outdent|इल्ला (हिं॰ अव्य॰) १ परन्तु, लेकिन। (स्त्री॰) २ पिटका विशेष, एक फुन्सी। यह त्वक्के ऊपर उठती है और कठिन तथा मस्से-जैसी होती है।}} {{outdent|इलिश (सं॰ पु॰) मत्स्यभेद, इलीश। {{smaller|इलीग देखो।}}}} {{outdent|इस्वका, {{smaller|इलवला देखो।}}}} {{outdent|इल्वड़, {{smaller|इल्वल देखो।}}}} {{outdent|इल्वल (सं॰ पु॰) इल्-वल वा इल-क्किए-वलच्। १ मत्स्यभेद, बाम मछली। २ दैत्यविशेष। यह सिंहिकाके गर्भ और विप्रचिन्त्तिके औरससे उत्पन्न हुवा था। इसका अपर नाम सैंहिकेय था। व्यंश्य, शल्य, नभ, वातापि, नमुचि, खसुम, आश्विक, नरक, कालनाभ और राहु (शुक, पीतरण, वज्रनाभ) इसके भ्राता थे। इसका वासस्थान मणिमतीपुर था। कनिष्ठ भ्राता वाप्तापिने किसी तपस्वी ब्राह्मणसे इन्द्रतुल्य पुत्र पानेका वर मांगा था। किन्तु अभिमत वर न मिलनेसे वातापि और इल्वल दोनों उस ब्राह्मण-पर क्रूड हो गये। उसी समयसे इल्वलने ब्रह्महत्यापर कमर बांधी थी। अपने कनिष्ठ भ्राता वातापिको यह भेड़ बनाकर ब्राह्मणके सामने लाता और अच्छोतरह बना-चुना मांस रांधकर खिला देता। फिर बाहर बैठ वातापिको बुलाता था। वह आवाज पाते हो ब्राह्मणका पेट फाड़ निकल पाता और बेचारा ब्राह्मण उसी समय मर जाता। इल्वल अपने मायाबलसे मृत-}} {{Multicol-break}} :व्यक्तिकी शरीर यमके सदनसे बुला सकता था। किसी दिन अनेक राजर्षि मुनिगणके साथ इसके मकान्पर आये। इल्वलने अति समादरसे उनकी अभ्यर्थना को और फिर भेड़का रूप रखनेवाले वातापिको काटकर इसने मांस बनाया। उसे देख ऋषि चकराये। किन्तु अगस्ताने कहा, 'कोई भय नहीं, हमीं यह मांस खायेंगे। आप ठहर जायिये।' इल्वल उन्हें मांस खिला जब वातापिको पुकारने लगा, तब अगस्तत्रका वायु निकल पड़ा। उन्होंने उत्तर दिया,—'आपका वातापि कहां है? उसे तो हमने पेटमें पचा डाला।' उसपर यह धमकी देने लगा। अवशेषकी इल्वल भी अगस्ताके नेत्रसे निर्गत अग्नि द्वारा जल गया। {{smaller|(रामायण और महाभारत)}} {{outdent|इल्वला (सं॰ स्त्री॰) मृगशिरानचत्रके शिरःपर स्थित पांच क्षुद्र तारा।}} {{outdent|इव (सं॰ अव्य॰) १ सदृश, मानिन्द, बराबर। २ जिसप्रकार, जैसे। ३ किसीप्रकार, शायद, कुछ-कुछ। ४ प्रायः, करीब-करीब। ५ इसप्रकार, ठीक तौरपर।}} {{outdent|इवोलक (सं॰ पु॰) लम्बोदरके पुत्र। {{smaller|(विष्णुपुराण)}}}} {{outdent|इवेपोरेशन (अ॰ पु॰ = Evaporation) बाष्पभाव, तबखीर, पानीका भाप बनना। {{smaller|वाष्प देखो।}}}} {{outdent|इशरत (अ॰ स्त्री॰) सन्तोष, तुष्टि, खुशी, आराम, चैन। आनन्द-भवनको इशरत-कदा, इशरत-खाना या इशरतगाह कहते हैं।}} {{outdent|इशारा (अ॰ पु॰) १ सङ्केत, रम्जु, सैन। २ चिह्न, निशान्। ३ मूकदर्शन, गूंगा देखाव। ४ प्रेम, प्यार। "आकिलको इशारा। मूरखकी फटकारा॥" {{smaller|(लोकोक्ति)}}}} {{outdent|इशिका, {{smaller|इशीका देखो।}}}} {{outdent|इशीका (सं॰ स्त्री॰) १ हस्तोका चक्षुःगोलक, हाथीको आंखका ढेला। २ शरकाण्ड, रामशरका तना।}} {{outdent|इश्क (अ॰ पु॰) १ अनुराग, प्यार। {{smaller|"इश्क़में शाह और गदा बराबर।"}} (लोकोक्ति) २ महाव्यसन, खुब्त, दीवानगी। ३ सुप्रसिद्ध मुसलमान कवि शाह रुक्न-उद्-दोनका उपनाम ये शाह आलम्‌के समयमें वर्तमान थे।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> onma95x3cev0a5z7y39xpdmwr33n07l पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/८२ 250 75777 667796 303287 2026-07-15T15:59:14Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667796 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इश्क़पेचा—इषु|८१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इश्कपेचा (हिं॰ पु॰) मल्लिका विशेष, अमरीकाकी। चमेली। (Quamoclit vulgaris) यद्यपि यह प्रधानतः अमेरिकामें उपजता है, तो भी इस वृक्षकी भारतमें कोई कमी नहीं। यह दो प्रकारकी होती है। एकमें लाल और दूसरे में सफेद फूल आते हैं। इसका पत्र सूत्र-जैसा सूक्ष्म रहता है। इश्कृपेचा ठण्डा है। आघात लगनेसे क्षतपर इसकी पत्तीका पुलटिस चढ़ाते और रस गर्म घीमें मिला रोगीको पिलाते हैं। विस्फोटपर पत्रका लेप भी लगाया जाता है।}} {{outdent|इश्कबाज़ (अ॰ पु॰) कामुक, रसिया, कैला।}} {{outdent|इश्कबाज़ी (अ॰ स्त्री॰) कामचेष्टा, इस्रपरस्ती।}} {{outdent|इश्क मजाज़ी (अ॰ पु॰) सांसारिक प्रेम, दुनियावी मुहब्बत।}} {{outdent|इश्क हकीकी (अ॰ पु॰) ईश्वरीय प्रेम, सच्ची मुहब्बत। इश्क है (हिं॰ अव्य॰) धन्य धन्य! क्या खूब! शाबाश!}} {{outdent|इश्की—१ एक प्रसिद्ध कवि। यह मुहम्मद शाहके समयमें वर्तमान थे। १७२८ ई॰ में इनकी मृत्यु हुई। १२ पटनाके रहनेवाले एक मुसलमान कवि, शाह शैखु मुहम्मद वजीहका उपनाम। इनके पिताका नाम गुलाम हुसैन मुजरिम था। इश्कीने अंगरेज सरकारके अधीन दश वर्ष खरवारमें तहसीलदारी की। १८०८ ई॰ में यह जीवित थे।}} {{outdent|इश्तहार (अ॰ पु॰) १ घोषणा, इत्तिला, व्यौरा। २ प्रकाशन, तशहीर, फैलावा। २ विज्ञापन, एलान। ४ जवाब, हरकारा।}} {{outdent|इश्तहारी (अ॰ पु॰) पलायित व्यक्ति, भागा हुआ शखूम।}} {{outdent|इश्तियाक (अ॰ पु॰) १ अभिलाष, चाह। २ प्रबलेच्छा, लालच। ३ प्रेम, प्यार।}} {{outdent|इश्तियालक (अ॰ स्त्री॰) १ उत्तेजना, भड़क। ३ दीपकमें बत्ती सरकानेको सोंक।}} {{outdent|इष् (सं॰ ति॰) इष इच्छार्थं क्विप्। १ इच्छायुक्त, खाद्दिशमन्द। कर्मणि किप्। २ अभिलषित, खाहिश किया हुआ। ३ खाद्य, खाने-लायकः। ४ अभिलाषके योग्य, जिसे चाहें। (स्त्री॰) भावे किप्। ५ यात्रा, रवानगी। ६ अभिलाष, खाहिम‌।}} {{Multicol-break}} {{outdent|इष (सं॰ पु॰) इष यात्रा विद्यते यस्मिन् मासे, इष गत्यर्थे किप्-इट्-अच्। १ सौर एवं चान्द्र आश्विनमास‌।}} {{c|{{smaller|"इषे मास्यसिते पक्षे नवस्यामार्द्र योगतः।" {{right|(तिथितत्त्वष्टत देवीपुराण)}}}}}} :२ प्रेषण, भेजना। ३ अन्न। {{outdent|इषण (हिं॰) {{smaller|एषण देखो।}}}} {{outdent|इषणि (हि॰ स्त्री॰) इष निपातनात् अणि। १ प्रेषण, प्रेरण, भेजनेका काम। २ इच्छा, ग्वाहिश।}} {{outdent|इषण्य (सं॰ स्त्री॰) इषणिमिच्छतोति, इषणि-क्यच-अङ् भावे टाप्। प्रेरण, खाहिश, चाह।}} {{outdent|इषव्य (सं॰ ति॰) इषुणा विध्यति इषौ कुशलो वा, इषु-यत्। १ शरलच्य, जिसपे तौरका निशाना लगे। २ सम्यरूपसे वाण चला सकनेवाला, जो तीर मारनेमें होशियार हो।}} {{outdent|इषिका (सं॰ स्त्री॰) इष वुन्। क्नञादिभ्यी उन्। उण् ५।३५। १ गजाक्षिगोलक, हाथीकी आंखका ढेला। २ चित्र-कर्मका यन्त्रविशेष, बालोंका कलम। यह घोड़े या सूत्ररके बालसे बनता है।}} {{outdent|इषित (सं॰ त्रि॰) १ चलित, प्रेरित, जो सरकाया या पहुंचाया गया हो। २ उत्तेजित, भड़काया हुआ। ३ चपल, तेजु।}} {{outdent|इषिर (सं॰ ति॰) इष-किरच्। इषिनदौत्यादिना। उण् ११५२। १ गमनशील, चल सकनेवाला। (अ॰) २ अग्नि, आग।}} {{outdent|इषोक (सं॰ पु॰) जातिविशेष, एक कौम।}} {{outdent|इषोकतूल (सं॰ क्ली॰) शरटणका उपरिभाग, राम-शरका ऊपरी हिस्सा।}} {{outdent|इषीका (सं॰ स्त्री॰) ईष-इकन्। {{smaller|ईषः किट्ट ह्रस्वष। उण् ४।२।१।}} १ गजाचिगोलक, हाथोकी आंखका ढेला। २ काशटण, मूंज। ३ मुज्जामध्यवर्ती तृण, मू'जके बोचको सोंक। इसीपर जीरा लगता है। ४ शर-काण्ड, रामभरका तना। ५ वेणाका काण्ड, बेणाका तना। इस तृणसे एक प्रकारका अस्त्र बनता है।}} {{c|{{smaller|"तस्मिन्नास्यदिषीकास्त्रम्।” (रघुवंश)}}}} {{outdent|इषु (सं॰ पु॰ स्त्री॰) ईष-उ। {{smaller|ईषः किश्च। उण् १।१।४१}} १ वाण, तोर। २ संख्या, अदद।२ वृत्तक्षेत्र के मध्यकी}} {{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 21|2em}}</noinclude> 4nepdy1gupm6id062515hmq45kqfxow 667798 667796 2026-07-15T16:01:43Z ममता साव9 2453 667798 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इश्क़पेचा—इषु|८१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इश्कपेचा (हिं॰ पु॰) मल्लिका विशेष, अमरीकाकी। चमेली। (Quamoclit vulgaris) यद्यपि यह प्रधानतः अमेरिकामें उपजता है, तो भी इस वृक्षकी भारतमें कोई कमी नहीं। यह दो प्रकारकी होती है। एकमें लाल और दूसरे में सफेद फूल आते हैं। इसका पत्र सूत्र-जैसा सूक्ष्म रहता है। इश्कृपेचा ठण्डा है। आघात लगनेसे क्षतपर इसकी पत्तीका पुलटिस चढ़ाते और रस गर्म घीमें मिला रोगीको पिलाते हैं। विस्फोटपर पत्रका लेप भी लगाया जाता है।}} {{outdent|इश्कबाज़ (अ॰ पु॰) कामुक, रसिया, कैला।}} {{outdent|इश्कबाज़ी (अ॰ स्त्री॰) कामचेष्टा, इस्रपरस्ती।}} {{outdent|इश्क मजाज़ी (अ॰ पु॰) सांसारिक प्रेम, दुनियावी मुहब्बत।}} {{outdent|इश्क हकीकी (अ॰ पु॰) ईश्वरीय प्रेम, सच्ची मुहब्बत। इश्क है (हिं॰ अव्य॰) धन्य धन्य! क्या खूब! शाबाश!}} {{outdent|इश्की—१ एक प्रसिद्ध कवि। यह मुहम्मद शाहके समयमें वर्तमान थे। १७२८ ई॰ में इनकी मृत्यु हुई। १२ पटनाके रहनेवाले एक मुसलमान कवि, शाह शैखु मुहम्मद वजीहका उपनाम। इनके पिताका नाम गुलाम हुसैन मुजरिम था। इश्कीने अंगरेज सरकारके अधीन दश वर्ष खरवारमें तहसीलदारी की। १८०८ ई॰ में यह जीवित थे।}} {{outdent|इश्तहार (अ॰ पु॰) १ घोषणा, इत्तिला, व्यौरा। २ प्रकाशन, तशहीर, फैलावा। २ विज्ञापन, एलान। ४ जवाब, हरकारा।}} {{outdent|इश्तहारी (अ॰ पु॰) पलायित व्यक्ति, भागा हुआ शखूम।}} {{outdent|इश्तियाक (अ॰ पु॰) १ अभिलाष, चाह। २ प्रबलेच्छा, लालच। ३ प्रेम, प्यार।}} {{outdent|इश्तियालक (अ॰ स्त्री॰) १ उत्तेजना, भड़क। ३ दीपकमें बत्ती सरकानेको सोंक।}} {{outdent|इष् (सं॰ ति॰) इष इच्छार्थं क्विप्। १ इच्छायुक्त, खाद्दिशमन्द। कर्मणि किप्। २ अभिलषित, खाहिश किया हुआ। ३ खाद्य, खाने-लायकः। ४ अभिलाषके योग्य, जिसे चाहें। (स्त्री॰) भावे किप्। ५ यात्रा, रवानगी। ६ अभिलाष, खाहिम‌।}} {{Multicol-break}} {{outdent|इष (सं॰ पु॰) इष यात्रा विद्यते यस्मिन् मासे, इष गत्यर्थे किप्-इट्-अच्। १ सौर एवं चान्द्र आश्विनमास‌।}} {{c|{{smaller|"इषे मास्यसिते पक्षे नवस्यामार्द्र योगतः।"}}}} {{right|{{smaller|(तिथितत्त्वष्टत देवीपुराण)}}}} :२ प्रेषण, भेजना। ३ अन्न। {{outdent|इषण (हिं॰) {{smaller|एषण देखो।}}}} {{outdent|इषणि (हि॰ स्त्री॰) इष निपातनात् अणि। १ प्रेषण, प्रेरण, भेजनेका काम। २ इच्छा, ग्वाहिश।}} {{outdent|इषण्य (सं॰ स्त्री॰) इषणिमिच्छतोति, इषणि-क्यच-अङ् भावे टाप्। प्रेरण, खाहिश, चाह।}} {{outdent|इषव्य (सं॰ ति॰) इषुणा विध्यति इषौ कुशलो वा, इषु-यत्। १ शरलच्य, जिसपे तौरका निशाना लगे। २ सम्यरूपसे वाण चला सकनेवाला, जो तीर मारनेमें होशियार हो।}} {{outdent|इषिका (सं॰ स्त्री॰) इष 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21|2em}}</noinclude> 7w8216xhvo2oagxv25h4etc51384qyx पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/८३ 250 75783 667801 609518 2026-07-15T16:30:48Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667801 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|८२|इषुक—इष्ट|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} :रेखा, दायरेके बीचकी सतर। ४ सामवेदविहित यज्ञ विशेष। {{outdent|इषुक (सं॰ ति॰) वाण सदृश, तीरके मानिन्द।}} {{outdent|इक्षुका (सं॰ स्त्री॰) वाण, तीर।}} {{outdent|इषुकामशमी (सं॰ स्त्री॰) इषी कामः इषुकामः स शस्यते यत्त्र, इषुकाम-शम अधिकरणे घञ् ङीप्। ग्रामविशेष, एक बसती।}} {{outdent|दूषकार (सं॰ पु॰) इषु करीतीति, इषु-क्क-अण्, उप॰ समा॰। वाण बनानेवाला, जो शख्स तोर तैयार करता हो।}} {{outdent|इषुक्तत् (सं॰ पु॰) इष-क-किप्। कर्मकार, लोहार, तीर तैयार करनेवाला।}} {{outdent|इषुगोलक (सं॰ पु॰) कोकिलाच वृक्ष, तालमखानेका पेड़।}} {{outdent|इषुधर (सं॰ पु॰) इघु-४-अच्, ६-तत् वा उप-तत्। वाणधारी, तीरन्दाज़। इषुभृत् प्रभृति शब्दोंका अर्थ भी वाणधारी ही है।}} {{outdent|इषुधि (सं॰ पु॰-स्त्री॰) इषु-धा अधिकरणे कि। वाणाधार, तूण, तरकश।}} {{outdent|इषुधिमत् (वे॰ त्रि॰) तूणयुक्त, तरकश रखनेवाला।}} {{outdent|इषुधी (हिं॰) {{smaller|इषुधी देखो।}}}} {{outdent|दृषध्या (वै॰ स्त्री॰) टाप्। प्रार्थना, अर्जु।}} {{outdent|इषुध्यु (बै॰ वि॰) १ प्रार्थी, अर्जु लगानेवाला। २ गमनशील, जानेवाला। {{smaller|(सायण)}}}} {{outdent|इषुप (सं॰ पु॰) इषु-पा-क, उप-तत्। असुरविशेष। यही असुर अंशरूपसे अवतीर्ण हो नग्नजित् नामक राजा बना था।}} {{outdent|इषुपत्रिका, {{smaller|इखुपवी देखो।}}}} {{outdent|इषुपत्त्रो (सं॰ स्त्री॰) अर्कमूला, ईश्वरमूल।}} {{outdent|इषुपथ (सं॰ पु॰) वाणका पथ, तौरका टप्पा‌।}} {{outdent|इषुपुङ्खा, {{smaller|इषुबुद्धिका देखो।}}}} {{outdent|इषुपुङिका (सं॰ स्त्री॰) शरपुडा, सरफोंका।}} {{outdent|इखुपुष्पा (सं॰ स्त्री॰) इषुरिव पुष्प यस्याः, दूर-विसारिगन्धत्वात् बहुव्री॰। शरपुष्पा वृक्ष। इस वृक्ष के पुष्पका गन्ध वाणको तरह बहुत दूरतक पहुंचता है।}} {{Multicol-break}} {{outdent|इषुवल (वै॰ त्रि॰) वाणका बल रखनेवाला, जिसका तीरको ताकत हो।}} {{outdent|इषुभृत् (सं॰ ति॰) इषु-भृ-किप्। वाणधारी, जो तीर लिये हो।}} {{outdent|इषुमत् (वै॰ त्रि॰) इषु अस्त्यर्थं प्राशस्त्ये मतुप्, मस्य चवः। प्रशस्त वाणधारी, तीरन्दाज़।}} {{outdent|इषुमात्त्र (सं॰ ति॰) {{smaller|इषुः प्रमाणमस्य, इषु मात्रच्। प्रमाणे इयसज दृन्नमावचः। पा ५।२।३७।}} १ वाणप्रमाण, तोरके बराबर, जो तीन फोट ही। (अव्य॰) २ वाणके प्रमाण पर्यन्त, तोरके टप्पे तक। (प॰) ३ ऋग्वेदि-योंका कुण्ड।}} {{outdent|इषुमान्, {{smaller|इयुमत् देखो।}}}} {{outdent|इषुविच्चेप (सं॰ पु॰) वाण मारनेका स्थान, तोर छाड़नेको जगह। १५० हस्त परिमाण-विशिष्ट प्रदेशको इस नामसे पुकारते हैं।}} {{outdent|दृषुस्त्रिकाण्डा (सं॰ स्त्री॰) मृगशिरा नक्षत्रका तारा-मण्डल । इसमें तीन तारे होते हैं।}} {{outdent|इषुहस्त (सं॰ ति॰) वाग्ण हाथमें लिये हुआ, जिसके हाथमें तलवार रहे।}} {{outdent|इषूपल (सं॰ पु॰) अग्नास्त्र विशेष, एक तोप। यह दुर्गके द्वारपर रहता और प्रस्तरादि विक्षेप करता है।}} {{outdent|इषेत्वाक (सं॰ पु॰) इषेका इति अस्ति यस्मिन्, {{smaller|इषोत्वा-वुन्। गोषदादिभग्रो वुन्। पा ५।२।६२।}} इषत्वा शब्द-युक्त अनुवाक्य वा अध्याय। यजुर्वेदके प्रथम अध्यायको इस नामसे पुकारते हैं।}} {{outdent|इष्कर्ट (वै॰ ति॰) निस्-क्क-तृच्। निशब्दो बहुत्वभिनि। प्रातिशाख्य सूत्रेण नलोपः। निष्कर्ता, निष्पादनकारी, बनानेवाला।}} {{outdent|इष्कृति (वै॰ स्त्री॰) निष-क-क्तिच् इष्कर्ट वत् नलोपः। जननी, धात्रो, मा, धाय।}} {{outdent|इष्ट (सं॰ स्त्री॰) यज वा इष कर्मणि त। १ अभि-लषित, खाहिश किया हुआ। २ प्रिय, प्यारा। ३ पूजित, परस्तिश किया हुआ। ४ हित, फायदेमन्द। ५ अन्वेषण किया हुआ, जो ढंढा गया हो। ६ अभिमत, खुशगवार। ७ ईप्सित, पसन्द किया हुषा। ८. सबल, जोरदार। (क्ली॰) भावेक्त। १० यन्नादि-}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> ivv2s4j1s99c68r1caiupps27i4b7jv पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/८४ 250 75785 667806 609519 2026-07-15T16:54:08Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667806 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||दृष्टक-दूष्टवत्|८३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} :कर्म। ११ संस्कार, सुधार। १२ अऔतकर्म, वेदका ढङ्ग। १३ जातूकर्णोक्त धर्मकार्य। १४ कृत, एहसान्। (५०) १५ एरण्ड वृक्ष, रेडका पेड़। १६ उशोर, खस। १७ यज्ञद्वारा तुष्ट परमात्मा। १८ विष्णु। १६ पति, खाविन्द। (अव्य॰) २० इच्छापूर्वक, राज़ीसे। {{outdent|इष्टक (सं॰ पु॰) दग्ध मृत्तिकाखण्ड, ईट।}} {{outdent|इष्टकचित (सं॰ त्रि॰) ३ तत्, अकारस्य ह्रस्वत्वम्। {{smaller|इष्टकेषीकामालानां चिततृलभारिषु। पा ६।३।६।५।}} इष्टक द्वारा व्याप्त, ईंटसे भरा हुआ।}} {{outdent|इष्टकर्मन् (सं॰ क्ली॰) इष्ट प्रसिद्धार्थं कर्म, शाक-तत्। गणित विशेष, फुर्जो अददसे हिसाब लगानेका कायदा।}} {{block center|<poem>{{smaller|"उद्दे शकालापदिष्टराशिः क्षणी इतोऽभं रहितो युतो वा। इष्टाहत' दृष्टमने न भक्त' राशिर्भवेत् प्रोक्तमितौष्टकमे॥" (लीलावती)}}</poem>}} {{outdent|इष्टका (सं॰ स्त्री॰) १ गृहादिके निर्माणार्थ दग्ध मृत्खण्ड, ईंट। २ संग्रह, ढेरो।}} {{outdent|इष्टकाग्गृह (सं॰ क्ली॰) दग्ध मृत्खण्ड द्वारा निर्मित भवन, पक्का मकान्, ईंटका घर।}} {{outdent|इष्टकाचित (सं॰ ति॰) दग्ध मृत्खण्ड द्वारा निर्मित, पक्को ईटसे बना हुआा।}} {{outdent|द्रष्टकान्यास (सं॰ पु॰) ग्टहके भित्तिमूलका संस्था-पन, मकान्को नोवका डालना।}} {{outdent|इष्टकापथ (सं॰ क्ली॰) दृष्टकायामपि पन्था यस्य दृष्टं कापथ अगम्यवर्म यस्य दृष्टकेव सुदृढ़ः पन्थाः यस्येति वा, सर्वत्र अच् समासान्तः। ऋक्‌पूरब्ध:पथामानचे।}} {{Multicol-break}} :{{smaller|पा ५।४।७४।}} १ वीरणमूल, खस। २ इष्टकनिर्मित पथ, ईटकी बनी राह, पक्की सड़क। {{outdent|इष्टकापथक, {{smaller|इष्टकापथ देखो।}}}} {{outdent|इष्टकामदुह (सं॰ स्त्री॰) इष्टं प्रियं काममभिलषितम्, इष्ट-काम-दुह-क। अभिलषित प्रियकार्य सम्पादन करनेवाली, जो मन मांगी मुराद बख शती हो।}} {{outdent|इष्टकामधुक्, {{smaller|इष्टकामदुह् देखो।}}}} {{outdent|इष्टकाराशि (सं॰ पु॰) दग्ध मृत्खण्डनिचय, ईंटका ढेर।}} {{outdent|इष्टकारिन् (सं॰ ति॰) इष्टं करोतीति णिनि। हितैषी, भलायो करनेवाला।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 6mo3v3ag0fgbym1t5mx8y2oirveypyi 667808 667806 2026-07-15T17:12:54Z ममता साव9 2453 667808 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||दृष्टक-दूष्टवत्|८३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} :कर्म। ११ संस्कार, सुधार। १२ अऔतकर्म, वेदका ढङ्ग। १३ जातूकर्णोक्त धर्मकार्य। १४ कृत, एहसान्। (५०) १५ एरण्ड वृक्ष, रेडका पेड़। १६ उशोर, खस। १७ यज्ञद्वारा तुष्ट परमात्मा। १८ विष्णु। १६ पति, खाविन्द। (अव्य॰) २० इच्छापूर्वक, राज़ीसे। {{outdent|इष्टक (सं॰ पु॰) दग्ध मृत्तिकाखण्ड, ईट।}} {{outdent|इष्टकचित (सं॰ त्रि॰) ३ तत्, अकारस्य ह्रस्वत्वम्। {{smaller|इष्टकेषीकामालानां चिततृलभारिषु। पा ६।३।६।५।}} इष्टक द्वारा व्याप्त, ईंटसे भरा हुआ।}} {{outdent|इष्टकर्मन् (सं॰ क्ली॰) इष्ट प्रसिद्धार्थं कर्म, शाक-तत्। गणित विशेष, फुर्जो अददसे हिसाब लगानेका कायदा।}} {{block center|<poem>{{smaller|"उद्दे शकालापदिष्टराशिः क्षणी इतोऽभं रहितो युतो वा। इष्टाहत' दृष्टमने न भक्त' राशिर्भवेत् प्रोक्तमितौष्टकमे॥" (लीलावती)}}</poem>}} {{outdent|इष्टका (सं॰ स्त्री॰) १ गृहादिके निर्माणार्थ दग्ध मृत्खण्ड, ईंट। २ संग्रह, ढेरो।}} {{outdent|इष्टकाग्गृह (सं॰ क्ली॰) दग्ध मृत्खण्ड द्वारा निर्मित भवन, पक्का मकान्, ईंटका घर।}} {{outdent|इष्टकाचित (सं॰ ति॰) दग्ध मृत्खण्ड द्वारा निर्मित, पक्को ईटसे बना हुआा।}} {{outdent|द्रष्टकान्यास (सं॰ पु॰) ग्टहके भित्तिमूलका संस्था-पन, मकान्को नोवका डालना।}} {{outdent|इष्टकापथ (सं॰ क्ली॰) दृष्टकायामपि पन्था यस्य दृष्टं कापथ अगम्यवर्म यस्य दृष्टकेव सुदृढ़ः पन्थाः यस्येति वा, सर्वत्र अच् समासान्तः। ऋक्‌पूरब्ध:पथामानचे।}} {{smaller|पा ५।४।७४।}} १ वीरणमूल, खस। २ इष्टकनिर्मित पथ, ईटकी बनी राह, पक्की सड़क। {{outdent|इष्टकापथक, {{smaller|इष्टकापथ देखो।}}}} {{outdent|इष्टकामदुह (सं॰ स्त्री॰) इष्टं प्रियं काममभिलषितम्, इष्ट-काम-दुह-क। अभिलषित प्रियकार्य सम्पादन करनेवाली, जो मन मांगी मुराद बख शती हो।}} {{outdent|इष्टकामधुक्, {{smaller|इष्टकामदुह् देखो।}}}} {{outdent|इष्टकाराशि (सं॰ पु॰) दग्ध मृत्खण्डनिचय, ईंटका ढेर।}} {{outdent|इष्टकारिन् (सं॰ ति॰) इष्टं करोतीतिणिनि। हितैषी, भलायी करनेवाला।}} {{Multicol-break}} {{outdent|इष्टकाल (सं॰ पु॰) ज्योतिष मतसे सन्तान उपजने वा अन्यकार्य लगनेका निर्दिष्ट समय।}} {{outdent|इष्टकाव (सं॰ वि॰) इष्टका विद्यतेऽत्र, इष्टका-वः। इष्टकयुक्त, पीखूता, पक्का।}} {{outdent|इष्टकावत् (सं॰ वि॰) इष्टका-मतुप् मध्वादित्वात्, मस्य च वः। चतुरर्ष्याम्। पा ४।२।८६। दग्ध मृत्खण्ड-सम्पन्न, ईंट रखनेवाला।}} {{outdent|इष्टगन्ध (सं॰ त्रि॰) इष्टी गन्धी यस्य, बहुव्री॰ इष्ट-चासी गन्धवेति वा कर्मधा॰। १ सुगन्ध, खुशबूदार। (अ॰) २ सुगन्धिद्रव्य, खुशबूदार चीज़। (क्ली॰) २ बालुका, बालू, रेत।}} {{outdent|इष्टजन (सं॰ पु॰) दृष्टश्चासी जनश्चेति, कर्मधा॰। १ प्रियव्यक्ति, प्यारा शख्स। २ प्रियतम, माशूक।}} {{outdent|इष्टतम (सं॰ त्रि॰) अयमेर्षा अतिशयेन इष्टः, इष्ट-तमप्। अतिशायन तमविष्टनी। पा ५।२।५५। १ अतिशय प्रिय, निहायत प्यारा। गृहस्थकी स्वीपुत्त्रादि और उदा-सोनको ब्रह्म इष्टतम है। २ अत्यन्त मनोमत, निहायत मुवाफिक।}} {{outdent|इष्टतर (सं॰ त्रि॰) अधिक प्रिय, ज्यादा प्यारा।}} {{outdent|इष्टता (सं॰ त्रि॰) इष्टल देखो।}} {{outdent|दृष्टत्व (सं॰ क्ली॰) स्पृहणीयता, पतन्दीदगी, प्यार या परस्तिश किये जानेकी हालत।}} {{outdent|इष्टदेव (सं॰ पु॰) इष्टदेवता देखो।}} {{outdent|इष्टदेवता (सं॰ स्त्री॰) उपास्यदेवता, जो देव बरा-बर पूजा जाता हो।}} {{outdent|इष्टप्रयोग (सं॰ पु॰) शिष्टप्रयोग, महत्‌का वाक्य।}} {{outdent|इष्टमूलांगजाति (सं॰ पु॰) लीलावती कथित मूलांग जाति विशेष। मूलांशजाति देखो।}} {{outdent|इष्टयजुः (वै॰ त्रि॰) जिसके लिये याज्ञिक गीत निकले।}} {{outdent|इष्टयामन् (वै॰ त्रि॰) इच्छानुकूल गमनमोल, मर्जीके मुवाफिक चलनेवाला।}} {{outdent|इष्टरश्मि (वै॰ वी॰) ईप्सित अग्रहसे सम्पत्र, नी पसन्दीदा लगाम रखता हो।}} {{outdent|दृष्टवत् (सं॰ स्त्री॰) यज वा इष-क्त-वतु। १ यन्त्रकारी। २ इच्छाविशिष्ट, खाहिशमन्द। ३ इष्टकर्मकारी, वेदादिका अध्ययन करनेवाला।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 72aghpe33g950o524u9fo2tvbc59o2x पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/८५ 250 75787 667813 609520 2026-07-15T17:44:28Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667813 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|८४|इष्टब्रत-इष्वसन|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इष्टव्रत (सं॰ वि॰) अपनो इच्छाका आज्ञाकारी, जो अपनी मर्जीके मुवाफ़िक चलता हो।}} {{outdent|इष्टसाधन (सं॰ क्ली॰) अभीष्टसिद्धि, मुरादका बर घाना।}} {{outdent|इष्टा (सं॰ स्त्री॰) यज करणे क्त टाप्। शमोष्वृक्ष, होममें लगनेसे समिध्‌का नाम यह पड़ा है।}} {{outdent|इष्टादि (सं॰ पु॰) पाणिन्युक्त शब्दगणविशेष। इस गण में इष्ट, पूर्त, उपसादित, निगदित, परिगदित, परिवादित, निकथित, निषादित, निपठित, सङ्कलित, परिकलित, संरक्षित, परिरक्षित, अचिंत, गणित, अवकीर्ण, अयुक्त, गृहीत, आम्लात, श्रुत, अधीत, अवधान, आसेवित, अवधारित, अवकल्पित, निराक्कृत, उपक्कृत, उपाक्कृत, अणुयुक्त, अणुगणित, अणुपठित और व्याकुलित शब्द पड़ता है।}} {{outdent|इष्टापत्ति (सं॰ स्त्री॰) अभिलषित-प्राप्ति, इष्टसिद्धि, लाभ, फायदा।}} {{outdent|इष्टापूर्त (सं॰ क्ली॰) समाहारद्वन्दः पूर्वपददीर्घश्च। १ अग्निहोत्रादि यज्ञ। २ साधारणके उपकारकी यज्ञ एवं कूपखननादि कर्म। तालाब, कूयां, बावड़ी आदि बनाने और उपवन लगानेको पण्डित पूर्त कहते हैं। एकाग्नि कर्म हीमादित्रतामें जो डाला और वेदोके मध्य दिया जाता, वह दृष्ट कहाता है। उपरोक्त दोनोंका नाम इष्टापूर्त है।}} {{outdent|इष्टार्थ (सं॰ पु॰) ईप्सित अथवा प्रियवस्तु, मनभाव चीज।}} {{outdent|इष्टार्थोद्युक्त (सं॰ ति॰) उत्साहयुक्त, अभीष्टवस्तुके लिये त्वरायित, मनभावू चीज़के लिये जो-जान्से कोशिश करनेवाला।}} {{outdent|इष्टालाप (सं॰ पु॰) सदालाप, परस्पर भद्राब्ताप, मेलको बातचीत।}} {{outdent|इष्टाश्व (दै॰ ति॰) अभिलषित अश्व रखनेवाला, जो बहुत अच्छे घोड़े रखता हो।}} {{outdent|दृष्टि (सं॰ स्त्री॰) यज बा इष-क्तिन्। १ यज्ञ। २ इच्छा, मर्जी। ३ अभिलाष, खाहिश। ४ श्लोक-संग्रह। ५ दानसंग्रह। ६ निमन्त्रण, बुलावा। ७ अन्वेवण, तलाश। ८ अभिलषित वस्तु, खाहिशको चीज। (प॰) ९ पश्चाद्गमन, हिफाजत।}} {{Multicol-break}} {{c|{{smaller|"इष्टीः पार्वायनान्तीयाः केवला निर्वपेत् सदा।" (मनु)}}}} {{outdent|इष्टिका (सं॰ स्त्री॰) इष्टका, ईंट।}} {{c|{{smaller|"उदृघर्ष णस्विष्टकया कटुकीठविनाशनम्।" (सुश्रुत)}}}} {{outdent|इष्टिकापथिक, {{smaller|इष्टकापथ देखो।}}}} {{outdent|इष्टिक्लत् (सं॰ ति॰) इष्टि-क्ल-किप्-तुक्। यन्त्रकारी, यज्ञ करनेवाला।}} {{outdent|दृष्टिन् (सं॰ ति॰) इष्टमनेन, इष्ट इनि। इष्टादिस्थ्ये ति। पा ५।२।८८। यन्तकारी, जो यन्न कर चुका हो।}} {{outdent|दृष्टिपच (सं॰ पु॰) इष्टये पचति, दृष्टि-पच्-अच्। १ क्तपण, कञ्जूस। २ असुर, दानव। असुर अपने हो लिये पाक बनाता है, यज्ञके लिये नहीं; इसीसे उसका नाम इष्टिपच पड़ा है।}} {{outdent|दृष्टिमुष् (सं॰ पु॰) दृष्टिं मुष्यति, दृष्टि-मुष-किप्। दैत्य, राक्षस।}} {{outdent|दृष्टीक्कत (सं॰ क्ली॰) नेष्टमिष्टं क्कतम् इष्ट-क्क-चिः। क्लस्वास्तियोगे सस्पयकर्तरि विः। या ५।४।५०। १ न चाहे जाने-वाले वस्तुको इच्छाका करना। २ यत्न्नविशेष।}} {{outdent|इष्टु (सं॰ स्त्री॰) इष-तुन्। इच्छा, मर्जी।}} {{outdent|इष्टायन (सं॰ क्ली॰) इष्टिभिरयन गमन यत्र, बहुव्री॰। यागविशेषका अनुष्ठान, सांवत्सरिक आद्धादि। अग्निदैवत्य प्रभृति अनेक प्रकार इसका भेद होता है।}} {{outdent|इष्म (सं॰ पु॰) इष-मक्। इषियुधीन्वित्यादिना मक्। छण् १।१४४। १ कामदेव। २ वसन्तकाल, मौसम-बहार। ३ गमन, रवानगी।}} {{outdent|इष्य (सं॰ पु॰) इष करणे क्यप्। वसन्तकाल, मौसम-बहार।}} {{outdent|दृष्व (सं॰ पु॰) इष-वन्। सर्वनिघ्नष्वे त्यादिना। उण् १।१५३। आचार्य, मुर्शद।}} {{outdent|इष्वग्र (सं॰ क्ली॰) वाणका अग्रभाग, तीरकी नोक।}} {{outdent|इष्वग्रीय (सं॰ ति॰) वाणके अग्रभागमें उत्पन्न होनेवाला, जो तीरकी नोकसे निकला हो।}} {{outdent|इष्वनीक (सं॰ क्ली॰) वाणका अवयव, तीरका तीरका अज़ी।}} {{outdent|इष्वसन (सं॰ क्ली॰) इषु-अस करणे ल्युट्। धनुः,कमान्।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 5xpp5h65xfrg2h1h5siu1sfhgwjuvfn पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/८६ 250 75789 667817 609521 2026-07-15T18:20:12Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667817 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इष्वस्त्र-इसमाईल|८६}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इष्वस्त्र (सं॰ क्ली॰) इषुरेवास्त्रम्। वाणास्त्र, तीर हथियार। {{smaller|"इष्वस्त्रे ज्येष्ठी बभूव।" (रामायण)}}}} {{outdent|इष्वास (सं॰ त्रि॰) इषवोऽस्यन्ते अनेन, इषु अस करणे घञ् कर्तर्यण् वा। १ वाणक्षेपक, तीरन्दाज़। (क्ली॰) २ चाप, कमान्।}} {{outdent|इस् (सं॰ अव्य॰) १ कोप! गुस्सा! मारो! पकड़ो! २ सन्ताप! जलन! ३ दुःख! अफसोस! हाय! ४ भावना! ख्याल! देखो!}} {{outdent|इस (हिं॰ सर्व॰) 'यह' शब्दका रुप विशेष। विभक्ति जुड़ते समय 'यह' शब्द बदल कर 'इस' हो जाता है। जैसे—इसने, इसको, इससे, इसके लिये, इसमें, इसका, इसपर।}} {{outdent|इसकन्दर—सिकन्दर बादशाह। {{smaller|अलेक्सन्दर देखो।}}}} {{outdent|इसपच्न (अं॰ पु॰ = Sponge) इसफच्न, सुवा-बादल। यह समुद्रमें रहनेवाला एक प्रकारका जीव है। यूनानी शूरवीर इसे अपनी टोपोपर लगाते थे। कोई इसपच्न बहुत छोटा और कोई बड़ा होता है। इसके भीतर चक्कर और ऊपर छेद रहते हैं। इन्हों केदोंसे जल और वायु इसपच्नके भीतर पहुंचता और बाहर निकलता है। यह बहुत कोमल और प्रायः तीन प्रकारका है। इसपज्ञ्ज भूमध्यसागर, फ्रोरिडासागरतट और बहामा होपसे आता है। स्नानका इसपच्न उथले जलमें उपजता है। लोग गोता या कांटा लगा इसे समुद्रसे निकालते हैं।<br>{{gap}}इसपञ्जका रेशा पानीसे अलग होते हो छूट जाता है। फिर इसे धो कूटकर साफ़ करते और डोरीमें लटका सुखा लेते हैं। इसपक्षका भार बढ़ानेके लिये नमक, गुड़, शीशा, कङ्गड़, बालू और पत्थर भर देते हैं। यह बहुत जल्द बढ़ा करता है।}} {{outdent|इसपात (हिं॰ पु॰) अयस्पत्र, फौलाद, कड़ा लोहा। आजकल कितने ही बड़े-बड़े मकान् इससे बनाये जाते हैं। वह बहुत मज़बूत होते और आग लगनेसे भो खड़े रहते हैं। {{smaller|लौह देखो।}}}} {{outdent|इसपार (हिं॰ क्रि॰ वि॰) इस ओर, इस तर्फ।}} {{outdent|इसपिरिट (अं॰ = Spirit). १ प्राण, जान्। २ आत्मा, रूह। ३ चित्त, तबीयत। ४ उत्साह,}} {{Multicol-break}} :हौसला। ५ भावार्थ, मतलब। ६ सार, निचोड़। ७ प्रक्वति, कुदरत। ८ भूत, शैतान्। ८ रस, अर्क। १० सुरा, शराब। चीन और भारतवर्षमें इसपिरिट बहुत प्राचीन समयसे बनते आयो है। यह विशुद्ध सुरा होतो, जो आग लगते हो भड़क उठती है। मद्य, सुरा और {{smaller|सुरासार देखो।}} {{outdent|इसपेशल (अ॰ = Special) १ असामान्य, गौर-मामूली। (स्त्री॰) २ असामान्य रेलगाड़ी, गौर-मामूली ट्रेन। यह किसी समय विशेष वा व्यक्ति विशेषके लिये छूटती है। प्रायः बड़ेलाट, छोटेलाट और राजा-महाराज इसपेशल पर ही आते-जाते हैं। कहीं बड़ा मेला लगनेसे रेलवे कर्मचारी इसे समय-समयपर छोड़ा करते हैं।}} {{outdent|इसबगोल (फा॰ पु॰) एक प्रकारका वृक्ष, कोई दरखत (Plantago ovata) यह पीदा पन्जाब में सतलजसे पश्चिम स्पेनतक उत्पन्न होता है। प्रथमतः. ईरानसे इसे लोग भारतवर्ष लाये थे। वीज ही व्यव हारमें आता, जो तिल-जैसा, भूरा और गुलाबी होता है। इसबगील शीतल एवं कोमल है। यह प्रदाह तथा पित्तको बढ़ाता और पाकयन्त्रीय रोगमें विशेष उपकार देखाता है। वीजको तिलके साथ कूट-पीस और तेल मिला पुलटिस चढ़ानेसे ग्रन्थिबातका स्फीत पुरातन उदरामयपर इसका काथ काशरोग स्थान अच्छा हो जाता है। इसबगील बहुत हितकर है। पर चलता है। ईरानसे कितना ही वीज बम्बई शहर आता है। यूनानी हकीम इसे बहुत व्यवहार करते हैं। यह चिपचिपा, शीतल एवं सङ्कोचक होता और मूत्रक्वच्छ, मूत्ररोध, मूत्राघात, आमरक्त,}} {{outdent|रक्तातिसार, उन्माद, दाह प्रलाप, तथा मादकताको खोता है।}} {{outdent|इसवन्द (फा॰ पु॰) कालादाना, राई।}} {{outdent|इसमाईल—१ प्रथम इब्राहीमके पुत्र। २ एक मुसलिम योगी। बाजीगर खेल देखाते समय इसमाईलका नाम ले लेते हैं। ३ ईरानके एक सम्म्राट्। इनके पूर्वज साधु समझे जाते थे। यह १४८७ ई॰ को उपजे और १५२४ ई॰ को मर गये।}} {{Multicol-end}}<noinclude>{{Left|Vol. III 22}}</noinclude> nwurlksxtzezlwjolf9vx5klqlw9ubg पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/८७ 250 75791 667821 609522 2026-07-15T18:50:09Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 667821 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|८६|इसमाईल-आदिलशाह-इसलाम|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|इसमाईल-आदिलशाह—दक्षिणविजयपुरके एक नवाब। यह यूसफ-आदिलशाहके लड़के थे। १५१० ई॰ में इन्हें राजसिंहासन मिला था। पच्चीस वर्षतक शान्ति पूर्वक शासनकर १५३४ ई॰ की २७ वीं अगस्त को इनकी मृत्यु हुई।}} {{outdent|इसमाईल निजामशाह—बुरहान शाहके लड़के। इनके पिता अपने भाई सुर्तजा निजाम शाहसे लड़ अकबरके पास भाग कर जा रहे थे। उसी समय ये और इनके बड़े भाई इब्राहीम लोहागढ़के किलेमें कद किये गये। १५८८ ई॰ के मार्च मासमें मीरान् हुसेन शाहके मरनेपर जमाल खान्ने इन्हें अहमद-नगरका राजसिंहासन सौंपा था। अकबरसे साहाय्य पा इनके पिता इनसे लड़ने आये, किन्तु हार गये। दूसरी बार उन्होंने राजमन्त्री जमालखान्का वध किया था। वुरहान् निज़ाम शाहने अन्तको इन्हें बन्दी बना राज्य अपने हाथमें ले लिया। इन्होंने प्रायः दो वर्ष शासन चलाया था।}} {{outdent|इसर—विहारस्थ दीसाद और बांसफोड़ डीमोंको एक शाखा।}} {{outdent|इसरार (अ॰ पु॰) १ गोपनकार्य, छिपाव। २ भेद। ३ प्रेतवाधा, शैतानका साया। ४ वादित्न विशेष, एक बाजा । यह सितार-जैसा रहता और गजसे बजता है।}} {{outdent|इस्राएल—उत्तर पालेस्तिन वा सामारियावासी प्राचीन जाति। खुष्टधर्म-प्रचारक ईसा इसी जातिमें आविर्भूत हुए थे। ईसा और {{smaller|यहूदी देखो।}}}} {{outdent|इसलाम (अ॰ पु॰) मुहम्मद द्वारा प्रवर्तित धर्म, मुसलमानोंका शास्त्रमार्गावलम्बन।<br>{{gap}}मुसलमान और इस्लाम ये दोनों शब्द अरबी भाषाके 'सलम्' धातुसे बने हैं। इसका अर्थ "विपत्तिरहित मुक्तिसुखको देना" है। जिस धर्म के धारण करनेसे संसारयात्रा निर्विघ्नरीतिसे परिसमाप्त हो, जाय और अन्तमें निर्बाध सुख प्राप्तः हो सके, उस धर्मको सुहम्मदने इसलामधर्मः कहकर प्रसिद्ध किया। सलाम, तसलीम, सलामत्, और मुसलीम आदि शब्द उपयुक्त धातुके ही मित्रः भिन्न प्रत्ययसि}} {{Multicol-break}} बने हैं। मुस्लिम और ईमान् शब्दके योगसे मुसलमान् शब्द बनता है। भारत में जो मुसलमान् पाये जाते, वे दो तरहके हैं। एक तो मुसल्लीम अर्थात् आदि मुसलमान् और दूसरे नवमुस्‌लीम (नवमुक्त) अर्थात् अपने अपने पूर्व धर्मों को छोड़कर इसलामधर्म धारण किये हुये मुसलमान्। ये लोग अपनेको मोहम्मदी वा मोमिन् भी कहते हैं। ये लोग जिस धर्मका आचरण करते हैं, वह 'दीन-इसल्ला म' नाम से प्रसिद्ध है। इस धर्मके प्रत्येक मुहम्मदने ५८३ सृष्टाब्ट्में अरब देशके मक्का नगर में जन्मग्रहण किया था। उन्होंने अपने बाल्यकाल में उपयुक्त शिक्षा पाई। जिस समय उनका जन्म हुआ, उस समय अरब देशमें सेविय, मगी और खुष्टानादि मतोंका प्राचल्य था। भिन्न भिन्न मतोंके अभ्युदयसे देशमें विश्शृङ्खलता के सूत्र-पात और धर्मविप्लवको आशङ्का कर उन्होंने दुःखसि निर्मुक्त करनेके लिये एक नवीन धर्मका आविष्कार करना उपयुक्त समझा। जिस समय उनकी उम्र ४० वर्षके करीब हुई, उस समय उन्होंने अपने नवोन आविष्कृत मतके विचार सर्वसाधारणमें प्रकट किये और अपनेको ईश्वरका प्रेरित पैग़म्बर बताया। मक्कावासी लोगोंने आर उनमें भी विशेषतः कीराइस् जातिने मुहम्मदके इस नव्य मतको पुरातन प्रथाका विरोधी समझा और उनके विरुद्ध खड़े हो मार मुहम्मदने जब डालनेतकका प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया। अपने विरुद्ध यह सब चरित्र देखा और अपने बलको पुरातन प्रथावलम्बियोंसे हीन समझा, तो वह मक्का छोड़ देनेके लिये लाचार हुये। मका छोड़ देनेके बाद १५ दिन तक बराबर चलकर वह 'यात्रेव' नगरमें पहुंचे और वही नगर फिर 'मदीना' नामसे लोकमें प्रसिद्ध हुआ। ६२२ ई॰ की १६वीं जुलाईके दिन मुहम्मद मक्का छोड़ 'मदीनात्-अल्-नबौं' में पहुंचे थे। फिर इसी दिनसे इसलाम धर्मको अभिव्यक्ति प्रतिष्ठित हुई। इसलिये खलीफा और ऊमर लोग उसी दिनको मुसलमानोंकाः अभ्युदय दिन समझ कर तबसे, हौ हिजरी अब्दको गणना करते हैं। फिर उसके अनुसार {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> tgrrec3d34m1n4sg5aw7y287n3ke11m पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२४५ 250 75920 667782 609051 2026-07-15T14:07:26Z अँजली चौधरी 2439 667782 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२४४'''|'''उदर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अतिशय उपजनेसे वही वर्धमान प्लीहा अधिक स्थल पड़ती है। लौहोदरका लच्चय वधा नौहावन्नसे उठ सकनेपाली समस्त सौड़ाका विवरण प्लौहा और यक्वत् उदरका लक्षय यक्वत् शब्दमैं देखो। । चरकमें बद्धोदरका लक्षण एवं निदान इसप्रकार लिखा है-खाद्य द्रव्य के साथ चक्षुका लोम पेटमें पहुं- चने और उदावत, अर्श एव अन्त्र सम्म छन प्रभृति कोई रोग रहनेसे मलका हार रुक जाता है। फिर अपान वायु अपना पथ बन्द होनेपर बिगड़ कर धातु, अग्नि, मल, पित्त एवं वेगको रोक देता है। इसीसे बद्धोदर रोग होता है। इससे तृष्णा, दाह, ज्वर एवं मुख तथा तालुशोषका वेग बढ़ता और उरु अवसन्न पड़ता है। खास, कास, दौर्बल्य, अरुचि, अपाक, मलमूत्र बन्ध, आक्ष्मान, वमि, कम्प, शिरपीड़ा, हृदयवेदना, नाभिशूल और उदरवेदनाका आगमन लगता है। इस पीडामें उदर स्थिर रहता है। पेटपर रक्त एवं नील वण रेखा तथा शिरा देख पड़ती हैं। किंवा रेखासमूह नाभि पर गोपुच्छ-जैसा आकार बना बढ़ा करता है। इसे बद्धोदर वा बद्धगुदोदर कहते हैं। डाकरीके मतसे यह मन्त्रावरोधको पौड़ा (obstruc . tion of the bowels) है। पाकस्थली आदि स्थानों में कर्कटरोग, पुरातन रक्तामाशय प्रभृति अनेक कारणोंसे अन्त्रका पथ रुक सकता है। अनादिके साथ कन्ड़, तण, काष्ठ, अस्थि, कण्टक . प्रभृति खा लेनेसे हिचकी आने लगती है। फिर अति | भोजन द्वारा ही अन्त्रमें छिद्र पड़ जाता है। उस समय अवव्यञ्जनादि भुक्त ट्रव्य सकल छिट्रसे बाहर निकल मलबार और अन्त्रको पूर देता है। क्रमशः वही रस नाभिसे नीचे जम उदकोदर एवं वातादि जिस पोलण्डने किसी रोगीका हाल कहा है। उसके दोषका आधिक्य पाता, उसोका लक्षण सकल देखाता हादशाङ्गल अन्त्र में सम्मुख दिक् छिद्र पड़ा था। . . है। इस प्रकारके उदरशोषमें नौल, पोत, पिच्छिल, पाकस्थली एवं अन्त्रमें सवा सेर लोहा-लङ्गन्ड और टुर्गन्ध एवं अपक्क मल निकलता और हिक्का, खास, ककड़-पत्थर रहा। काय, हष्णा, प्रमेह, अरुचि, अपरिपाक तथा दौब इन सकल कारणों के सिवा दूसरे भी अनेक कारणोंसे स्वादिका लक्षण झलकता है। (चरक) यही उदर पाकस्थली और अन्त्रमें छिट्र पड़ सकता है। अपने. रोग डाकरीके हिसाबसे ( Perforation of the अथवा यक्वत् तथा सोहाके फोड़ेसे भी पाकस्थलोमें bowels and stomach ) है। छिद्र हो जाता है। फिर कर्कट, पुरातन रखातिसार 1. पत्रान शिश अनेक प्रकार द्रव्य मुखम डासखा एवं मन्त्रज्वर प्रति रोगसे फोड़ा उभरता है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जाते हैं। पागल भी बाल, रस्सी और कङ्कड़ निगलते हैं। डाक्टर पोनकने एक उन्मत्त बालिकाकी बात लिखी है। उसका वयःक्रम १८ वत्सर रहा। उसके पेटपर आम-जैसा क्या न क्या उभर आया था। भोजनोपरान्त वमन करती थी। यही उसका उपसर्ग था। कुछ दिन बाद बालिका मर गयी। डाक्टरों ने पेट फाड़ कर देखा, कि पाकस्थलीका अधिकांश स्थान बाल और रस्सीके लच्छेसे भरा था। कितना ही पाकस्थलीके दक्षिण मुखमें फंसा, कुछ द्वाद शाङ्गुल यन्त्र के मध्य धंसा और थोड़ा लच्छा शून्यान्त्रके ऊपर ठंसा था। बफनिलने किसी अपस्मारके रोगिणीको कथा कही है। २२ वत्सर वयःक्रमपर अन्त्रवेष्टझिल्लीके प्रदाहसे वह मर गयी। पाकस्थलीके स्वल्प चक्रांश (lesser curvature)में अठन्नी परिमित एक छेद हुआ था। छिद्रकी चारो दिक् कृष्णवर्ण क्षत रहा। पाकस्थली चीरनेपर भीतरसे सात सेर आटा, सूत और नारियलका छिलका निकल पड़ा। हेमानने लिखा है――एक शिश मुख खोले सो रहा था। हठात् एक चुहिया दौड़कर उसके मुख में घुस गयी। किन्तु परिशेषको पचते-पचते मलद्वारसे वह नीचे गिरी थी। उससे कोई उपसर्ग न उठा। सोनि-ये-मोरने एक स्त्रीका विवरण बतलाया है। वह ग्यारह कांटे और छोटे छोटे कांसेके टुकड़े निकल गयी थी। जान मार्शलने लिखा है――एकस्त्रीकी पाकस्थलीमें प्रायः पांच छटांक सूत रहा। एतद्भिन्न द्वादशाङ्गुल अन्त्र में अनेक सूच भी मिले थे। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> mxla34si75gul6rlzmez9083vwvncw7 667785 667782 2026-07-15T14:31:04Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667785 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२४४'''|'''उदर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अतिशय उपजनेसे वही वर्धमान प्लीहा अधिक स्थूल पड़ती है।<small> प्लीहोदरका लक्षण तथा प्लीहायन्त्र से उठ सकनेवालीली समस्त पीड़ाका विवरण प्लीहा और यकृत् उदरका लक्षय यकृत् शब्दमें देखो।</small> चरकमें बद्धोदरका लक्षण एवं निदान इसप्रकार लिखा है――खाद्य द्रव्य के साथ चक्षुका लोम पेटमें पहुंचने और उदावर्त, अर्श एव अन्त्र सम्मूर्छन प्रभृति कोई रोग रहनेसे मलका द्वार रुक जाता है। फिर अपान वायु अपना पथ बन्द होनेपर बिगड़ कर धातु, अग्नि, मल, पित्त एवं वेगको रोक देता है। इसीसे बद्धोदर रोग होता है। इससे तृष्णा, दाह, ज्वर एवं मुख तथा तालुशोषका वेग बढ़ता और उरु अवसन्न पड़ता है। श्वास, कास, दौर्बल्य, अरुचि, अपाक, मलमूत्र बन्ध, आध्यमान, वमि, कम्प, शिरःपीड़ा, हृदयवेदना, नाभिशूल और उदरवेदनाका आगमन लगता है। इस पीडामें उदर स्थिर रहता है। पेटपर रक्त एवं नील वर्ण रेखा तथा शिरा देख पड़ती हैं। किंवा रेखासमूह नाभि पर गोपुच्छ-जैसा आकार बना बढ़ा करता है। इसे बद्धोदर वा बद्धगुदोदर कहते हैं। डाक्टरीके मतसे यह अन्त्रावरोधकी पीड़ा (obstruction of the bowels) है। पाकस्थली आदि स्थानों में कर्कटरोग, पुरातन रक्तामाशय प्रभृति अनेक कारणोंसे अन्त्रका पथ रुक सकता है। अन्नादिके साथ कङ्कड़, तृण, काष्ठ, अस्थि, कण्टक प्रभृति खा लेनेसे हिचकी आने लगती है। फिर अति भोजन द्वारा ही अन्त्रमें छिद्र पड़ जाता है। उस समय अन्नव्यञ्जनादि भुक्त द्रव्य सकल छिद्र से बाहर निकल मलद्वार और अन्त्रको पूर देता है। क्रमशः वही रस नाभिसे नीचे जम उदकोदर एवं वातादि जिस दोषका आधिक्य पाता, उसीका लक्षण सकल देखाता है। इस प्रकारके उदरशोषमें नील, पीत, पिच्छिल, दुर्गन्ध एवं अपक्व मल निकलता और हिक्का, श्वास, काश, तृष्णा, प्रमेह, अरुचि, अपरिपाक तथा दौर्ब स्वादिका लक्षण झलकता है। <small>(चरक)</small> यही उदर रोग डाक्टरीके हिसाबसे (Perforation of the bowels and stomach ) है। अज्ञान शिशु अनेक प्रकार द्रव्य मुख में डाल खा <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जाते हैं। पागल भी बाल, रस्सी और कङ्कड़ निगलते हैं। डाक्टर पोनकने एक उन्मत्त बालिकाकी बात लिखी है। उसका वयःक्रम १८ वत्सर रहा। उसके पेटपर आम-जैसा क्या न क्या उभर आया था। भोजनोपरान्त वमन करती थी। यही उसका उपसर्ग था। कुछ दिन बाद बालिका मर गयी। डाक्टरों ने पेट फाड़ कर देखा, कि पाकस्थलीका अधिकांश स्थान बाल और रस्सीके लच्छेसे भरा था। कितना ही पाकस्थलीके दक्षिण मुखमें फंसा, कुछ द्वाद शाङ्गुल यन्त्र के मध्य धंसा और थोड़ा लच्छा शून्यान्त्रके ऊपर ठंसा था। बफनिलने किसी अपस्मारके रोगिणीको कथा कही है। २२ वत्सर वयःक्रमपर अन्त्रवेष्टझिल्लीके प्रदाहसे वह मर गयी। पाकस्थलीके स्वल्प चक्रांश (lesser curvature)में अठन्नी परिमित एक छेद हुआ था। छिद्रकी चारो दिक् कृष्णवर्ण क्षत रहा। पाकस्थली चीरनेपर भीतरसे सात सेर आटा, सूत और नारियलका छिलका निकल पड़ा। हेमानने लिखा है――एक शिश मुख खोले सो रहा था। हठात् एक चुहिया दौड़कर उसके मुख में घुस गयी। किन्तु परिशेषको पचते-पचते मलद्वारसे वह नीचे गिरी थी। उससे कोई उपसर्ग न उठा। सोनि-ये-मोरने एक स्त्रीका विवरण बतलाया है। वह ग्यारह कांटे और छोटे छोटे कांसेके टुकड़े निकल गयी थी। जान मार्शलने लिखा है――एकस्त्रीकी पाकस्थलीमें प्रायः पांच छटांक सूत रहा। एतद्भिन्न द्वादशाङ्गुल अन्त्र में अनेक सूच भी मिले थे। पोलण्डने किसी रोगीका हाल कहा है। उसके द्वादशाङ्गूल अन्त्र में सम्मुख दिक् छिद्र पड़ा था। पाकस्थली एवं अन्त्रमें सवा सेर लोहा-लङ्गन्ड और ककड़-पत्थर रहा। इन सकल कारणों के सिवा दूसरे भी अनेक कारणोंसे पाकस्थली और अन्त्रमें छिद्र पड़ सकता है। अपने अथवा यकृत् तथा प्लीहा के फोड़ेसे भी पाकस्थलीमें छिद्र हो जाता है। फिर कर्कट, पुरातन रक्तातिसार एवं अन्त्रज्वर प्रभुति रोगसे फोड़ा उभरता है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> p4xsil7u4q75q2zdzhq4rrmh86uzqgc पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२४६ 250 75922 667787 609052 2026-07-15T15:01:39Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667787 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदर'''|'''२४५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> यकृत्से बड़ी पथरी खिसक अन्त्रके किसी स्थानमें पड़। जानेसे भी क्षत और छिद्र हो सकता है। अन्त्रमें छिद्र पड़ते समय हठात् रोगीकी अवस्था बदल जाती है। पेटमें दुःसह वेदना उठती है।। किसीको अधिक और किसीको अल्प हिक्का आने लगती है। फिर किसी किसी रोगीको कुछ भी हिक्का नहीं आती। जो़र जोरसे वमन होता है। कपालपर विन्दु विन्दु पसीना निकल आता और किसीका सर्वाङ्ग पसीनेसे भर जाता है। रोगी पैर समेट सुस्थिर भावमें पड़ा रहता, किन्तु हिलना डुलना या बात करना नहीं बनता। निश्वास छोड़ने में भी कष्ट लगता है। नाड़ी क्षीण, चञ्चल और शब्दहीन हो जाती है। मुखकी श्री कुम्हलाती और जिह्वा सुखाती है। अतिशय तृष्णा लगती है। पेटको अल्प दबानेसे ही कष्ट मालूम पड़ता है। ऐसी अवस्थामें रोगी अवसन्न हो शीघ्र प्राण खो देता है। किसीकी अवस्था कुछ दिनको थोड़ी बहुत सुधर जाती परन्तु परिशेषमें उसे मृत्यु धर दबाती है। अन्त्र में छिद्र पड़नेसे किसी किसी रोगीकी अन्त्रवेष्ट झिल्लीपर प्रदाह उठता है। उदकोदर, दकोदर वा जलोदरका लक्षण चरकमें इस प्रकार बतलाया है―― जो व्यक्ति अधिक खाता किंवा अग्निका तेजः गंवाता तथा अपनको क्षीण एवं कृश बनाता, वह अधिक परिमाणमें जल पीनेसे क्षुधा-मान्द्य रोग बढ़ाता है। उस समय वायु क्लोम स्थानमें ठहर जाता है। क्रमशः सकल स्रोतका पथ रुकता और पीत जलसे कफ बढता है। परिशेषमें उभय स्वस्थानसे पीत जल बढा उदर रोग उत्पन्न करते हैं। इस उदररोगमें भोजनकी इच्छा नहीं रहती। तृष्णा बहुत लगती है। गुदस्राव, शूल, श्वास, काश और दौर्बल्य हुआ करता है। पेटपर नाना वर्णकी रेखा तथा शिरा देख पड़ती और आघात लगानेसे जलपूर्ण मशककी तरह कंपकंपी उठती है। किन्तु डाक्टरीके हिसाबसे यह आसाइटिस (Ascites) रोग है। दकोदर स्वयं कोई विशेष व्याधि नहीं―अन्य अन्य रोगकी शेष अवस्थाका एक लक्षण <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मात्र है। यकृतकी विशुष्कता, पुरातन प्लीहा, पुरातन अन्त्रवेष्टप्रदाह, पुरातन रक्तातिसार प्रभृति नाना प्रकार रोगकी शेष दशामें दकोदर हो सकता है। फिर किसी व्यक्तिको शैत्य देकर भी यह रोग पकड़ लेता, परन्तु ऐसा दकोदर सुसाध्य है। किसी सञ्चित पीड़ापर शिरासमूहमें रक्त न पहुंचने किंवा आण्डलालिक पदार्थ स्वल्प पड़नेसे प्रथम उदरमें नहीं――अन्ववेष्ट झिल्ली में जल जमता है। पूर्व हस्तपाद पर शोथ चढ़ आता, पश्चात् उदरमें जल भर जाता है। किन्तु यकृत्की पीड़ामें हस्तपादपर शोथ न चढ़ते भी दकीदर हो सकता है। किसी किसी रोगोके पेट में अल्प परिमित जल रहता और दूसरोंके उदरमें आधे मनसे भी ज्यादा जल मिलता है। एक दकोदरवाले रोगीके पेटमें जलके साथ छः बड़े बड़े कीड़े भी थे। पुरातन सड़ेगले सहींजनके पेड़में ईषत् हरिद्रावर्ण बड़े मोटे मोटे कीड़ों-जैसे वे रहे। मस्तक, मुख तथा मल-द्वार कृष्णावर्ण और पृष्ठ ग्रन्थियुक्त था। लम्बाई तीन और चौड़ाई डेढ अङ्गुल बैठी, मुखमें कतरनी-जैसी तीक्षण दंष्ट्रा थी। सकल ही कीट जीवित थे। जल और खाद्य द्रव्यके साथ अनेक कीट उदरमें पहुंचते हैं। पेटमें उनके न मर मिटनेसे नानाप्रकार पीडा उठती है। फिर क्षुद्रावस्था पर अन्त्रको काट वह अन्त्रवेष्ट झिल्लीमें घुसते हैं। परणामको उन्हींकी उग्रतासे दकोदर रोग लग जाता है। इस रोगमें रोगी प्रायः दश वत्सर जीता है। दकोदरका जल अनेक स्थानोंपर अधिक परिष्कृत रहता और किसीके मैला और किसीके पेटमें पीला भी पड़ता है। इस जलका सन्ताप गात्रके सन्तापसे मिलता है। हां, इसमें लवणका अंश, आण्डलालिक पदार्थ और फेब्रिन होता है। पेटमें अधिक जल सञ्चित होनेसे यकृत, प्लीहा और वृक्कक् तीनो छोटे पड़ जाते हैं। हृदय और उदरमध्यवेष्ट (Diaphragm) ऊपरको उड़ने लगता है। दकोदर होनेसे प्रथम पेटमें भार मालूम पड़ता है। क्षुधा कम लगती है। कोष्ठकी शुद्धि नहीं <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 62|1em}}</noinclude> c2xcnky4mrwvhm6r9h247bkl8m7ydcv पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२४७ 250 75923 667795 609053 2026-07-15T15:58:27Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667795 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२४६'''|'''उदर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> होती। प्रस्राव भली भांति परिष्कृत नहीं पड़ता।। क्रममें जलका परिमाण बढनेसे श्वासकृच्छ्र हो जाता है। फिर अधिक फूलनेसे उदर, अण्डकोष एवं पुरुषाङ्ग पर सूजन आ जाती एवं उदर पर शिरा देखाती है। आघात लगानेसे पेट ढलका करता है। उदररोगकी चिकित्साका एक सामान्य विधि होता है। इसमें विशेष कुछ करने धरनेकी बात नहीं। कारण पहले ही कह चुके हैं.――उदररोग स्वयं कोई स्वतन्त्र पीड़ा नहीं। अतएव मूल पीड़ाकी ही निश्चित रूपसे चिकित्सा होना चाहिये। चरकमें असाध्य उदररोगके लक्षण बहुत अच्छी तरह लिखे हैं। यथा――<small>“तदातुरमुपद्रवाः स्प्रृ शन्ति छर्द्यतेऽतीसार-तमकः तृणा-श्वास-काश-हिक्कादौर्बल्यपार्श्व शूलरुचिस्वरभेदमूत्रसङ्गादयस्तथा- स्वंय विधमचिकित्स्यं विद्यादिति।”</small> वमन, अतिसार, तमक, पिपासा, श्वास, काश, हिक्का, दौर्बल्य, पार्श्व शूल, अरुचि, स्वरभेद, मूत्ररोध प्रभृति-जैसे उपसर्ग उठनेसे रोगीको अचिकितस्य समझते हैं। {{c|{{x-smaller|<poem>“पक्षाद्वद्धगुदं तूर्ध सर्व जातोदकं यथा। प्रायो भवत्यभावाय हिंद्रान्त्रं वोदरं नृणाम्॥”</poem>}}}} बद्ध गुदोदर, सकल प्रकार जलोदर और छिद्रान्त्रोदर राग होनेसे प्रायः एक पक्षके बाद मनुष्य मर जाता है। {{c|{{x-smaller|<poem>“शूनाक्ष कुटिलोपस्थमपक्लिन्नतनुत्वचम्। बलशोणितमांसाग्रिपरिक्षीणञ्च सन्त्यजेत्॥ स्वयथूः सर्वमर्मोत्यः श्वासो हिक्कारुचिः सतृट्। मूर्छाछर्द्यतिसारश्च निहन्त्युदरिणं नरम्॥”</poem>}}}} चक्षु पर सूज न चढ़ने, पुरुषाङ्ग झुकने, चर्म क्लेदयुक्त तथा पतला पड़ने और बल, रक्त, मांस एवं क्षुधा घटनेसे उदररोगीको छोड़ देना चाहिये। सकल मर्मस्थानपर शोथ बढ़ने और श्वास, हिक्का, अरुचि, तृष्णा, मूर्छा, वमन, अतिसार प्रभृति उपसर्ग उठनेसे दकोदरका रोगी मरता है। उदररोगमें विरेचक औषध खिलाना, पिचकारी लगाना और स्वेद कराना ही वैद्यशास्त्रकी प्रधान चिकित्सा है। तद्धिन्न अन्य अन्य प्रकार भी औषधकी व्यवस्था बंध सकती है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}इस रोगपर जलोदरादिरस देनेका विधान है――{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“पिप्पली मरिचं तासं रजनीचूर्णसयुतम्। स्रुहीचारैर्दिनं मर्द्यं तुल्यजै पालवीजकम्॥ निष्कं खादेहिरकं स्यात् सद्योहन्ति जलोदरम्। रेचनानाञ्च सर्वेषां दध्यन्नं स्तम्भने हितम्॥ दिनान्ते च प्रदातव्यमन्त्र वा मुद्गयूषकम्।” (रसेन्द्रसारसंग्रह)</poem>}}}} पिप्पली, मरिच, (मारित) ताम्र, धनिया और हरिद्रा सकल द्रव्यका एक-एक भाग रस एक दिवस सहींजनके दुग्धमें घोंटे, फिर जयपालवीजका चर्ण एक भाग मिला दो रत्ती प्रमाण वटिका बांध डाले। इस औषधको खानेसे जलोदर रोग सद्य ही मिट जाता है। सकल प्रकार विरेचनको दधियुक्त अन्न ही रोकता है। अतएव इस औषधके सेवनपर दिनान्तको दधि अथवा मुद्गयूषयुक्त अन्नका पथ्य देना चाहिये। उदररोगके अधिकारका इच्छाभेदीरस यह है―― {{c|{{x-smaller|<poem>“श्रुण्ठी मरिचसंयुक्त रसगन्धकटङ्गणम्। जैपालो द्विगुणः प्रोक्त: सर्वमेकन्न चूर्णयेत्। इच्छाभेदी हिगुञ्च: स्यात् सितया सह दापयेत्। पिवेत्तु चुल्लकान् यावत् तावदवारान् विरेचयेत्॥”</poem>}}}} शुण्ठी, मरिच, (शोधित) पारद, गन्धक और सोहागा समुदाय द्रव्य एक एक भाग और जयपालका वीज दो भाग ले पीस डाले। इस औषधको दो रत्ती प्रमाण चीनीके साथ खाना चाहिये। इसे इच्छाभेदी रस कहते हैं। यह औषध खाकर जितने गण्डूष जल पीते, उतने ही बार वमन करते हैं। वर्तमान डाक्टरोंकी तरह पेट में जल जमनसे प्राचीन आयुर्वेदाचार्य भी उसे निकाल डालते थे। उन्होंने लिखा है- {{c|{{x-smaller|<poem>“तस्मान्नाभर्वलीभागे वर्जयित्वाङ्गु लइयम्। जलनाडीञ्चानुमन्य कुशपत्रेण वेष्टयेत्॥ एरण्डजलनालञ्च तन्न सञ्जारयेद्वुधः। अन्तर्गतजल स्राव्यं ततः सन्धारयेदद्रुतम्॥ यदा न धरते तच्च तदा दाह: प्रशस्यते। कणाकल्कं परिस्राव्य घृतं देयं चतुर्गुणम्॥ शुण्ठिविषा समं पाच्यं पानमालेपनं हितम्। शस्त्रकर्म भिषक्श्रेष्ठो विज्ञातेनैव कारयेत्॥ दुष् करं शस्त्रकर्म व न कुर्यायत्र तत्र तु।</poem>}}}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> by3vdyubfmbbjbgevfpbjghv13x5akz 667797 667795 2026-07-15T15:59:51Z अँजली चौधरी 2439 667797 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२४६'''|'''उदर'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> होती। प्रस्राव भली भांति परिष्कृत नहीं पड़ता।। क्रममें जलका परिमाण बढनेसे श्वासकृच्छ्र हो जाता है। फिर अधिक फूलनेसे उदर, अण्डकोष एवं पुरुषाङ्ग पर सूजन आ जाती एवं उदर पर शिरा देखाती है। आघात लगानेसे पेट ढलका करता है। उदररोगकी चिकित्साका एक सामान्य विधि होता है। इसमें विशेष कुछ करने धरनेकी बात नहीं। कारण पहले ही कह चुके हैं.――उदररोग स्वयं कोई स्वतन्त्र पीड़ा नहीं। अतएव मूल पीड़ाकी ही निश्चित रूपसे चिकित्सा होना चाहिये। चरकमें असाध्य उदररोगके लक्षण बहुत अच्छी तरह लिखे हैं। यथा――<small>“तदातुरमुपद्रवाः स्प्रृ शन्ति छर्द्यतेऽतीसार-तमकः तृणा-श्वास-काश-हिक्कादौर्बल्यपार्श्व शूलरुचिस्वरभेदमूत्रसङ्गादयस्तथा- स्वंय विधमचिकित्स्यं विद्यादिति।”</small> वमन, अतिसार, तमक, पिपासा, श्वास, काश, हिक्का, दौर्बल्य, पार्श्व शूल, अरुचि, स्वरभेद, मूत्ररोध प्रभृति-जैसे उपसर्ग उठनेसे रोगीको अचिकितस्य समझते हैं। {{c|{{x-smaller|<poem>“पक्षाद्वद्धगुदं तूर्ध सर्व जातोदकं यथा। प्रायो भवत्यभावाय हिंद्रान्त्रं वोदरं नृणाम्॥”</poem>}}}} बद्ध गुदोदर, सकल प्रकार जलोदर और छिद्रान्त्रोदर राग होनेसे प्रायः एक पक्षके बाद मनुष्य मर जाता है। {{c|{{x-smaller|<poem>“शूनाक्ष कुटिलोपस्थमपक्लिन्नतनुत्वचम्। बलशोणितमांसाग्रिपरिक्षीणञ्च सन्त्यजेत्॥ स्वयथूः सर्वमर्मोत्यः श्वासो हिक्कारुचिः सतृट्। मूर्छाछर्द्यतिसारश्च निहन्त्युदरिणं नरम्॥”</poem>}}}} चक्षु पर सूज न चढ़ने, पुरुषाङ्ग झुकने, चर्म क्लेदयुक्त तथा पतला पड़ने और बल, रक्त, मांस एवं क्षुधा घटनेसे उदररोगीको छोड़ देना चाहिये। सकल मर्मस्थानपर शोथ बढ़ने और श्वास, हिक्का, अरुचि, तृष्णा, मूर्छा, वमन, अतिसार प्रभृति उपसर्ग उठनेसे दकोदरका रोगी मरता है। उदररोगमें विरेचक औषध खिलाना, पिचकारी लगाना और स्वेद कराना ही वैद्यशास्त्रकी प्रधान चिकित्सा है। तद्धिन्न अन्य अन्य प्रकार भी औषधकी व्यवस्था बंध सकती है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}इस रोगपर जलोदरादिरस देनेका विधान है――{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“पिप्पली मरिचं तासं रजनीचूर्णसयुतम्। स्रुहीचारैर्दिनं मर्द्यं तुल्यजै पालवीजकम्॥ निष्कं खादेहिरकं स्यात् सद्योहन्ति जलोदरम्। रेचनानाञ्च सर्वेषां दध्यन्नं स्तम्भने हितम्॥ दिनान्ते च प्रदातव्यमन्त्र वा मुद्गयूषकम्।” (रसेन्द्रसारसंग्रह)</poem>}}}} {{gap}}पिप्पली, मरिच, (मारित) ताम्र, धनिया और हरिद्रा सकल द्रव्यका एक-एक भाग रस एक दिवस सहींजनके दुग्धमें घोंटे, फिर जयपालवीजका चर्ण एक भाग मिला दो रत्ती प्रमाण वटिका बांध डाले। इस औषधको खानेसे जलोदर रोग सद्य ही मिट जाता है। सकल प्रकार विरेचनको दधियुक्त अन्न ही रोकता है। अतएव इस औषधके सेवनपर दिनान्तको दधि अथवा मुद्गयूषयुक्त अन्नका पथ्य देना चाहिये। उदररोगके अधिकारका इच्छाभेदीरस यह है―― {{c|{{x-smaller|<poem>“श्रुण्ठी मरिचसंयुक्त रसगन्धकटङ्गणम्। जैपालो द्विगुणः प्रोक्त: सर्वमेकन्न चूर्णयेत्। इच्छाभेदी हिगुञ्च: स्यात् सितया सह दापयेत्। पिवेत्तु चुल्लकान् यावत् तावदवारान् विरेचयेत्॥”</poem>}}}} शुण्ठी, मरिच, (शोधित) पारद, गन्धक और सोहागा समुदाय द्रव्य एक एक भाग और जयपालका वीज दो भाग ले पीस डाले। इस औषधको दो रत्ती प्रमाण चीनीके साथ खाना चाहिये। इसे इच्छाभेदी रस कहते हैं। यह औषध खाकर जितने गण्डूष जल पीते, उतने ही बार वमन करते हैं। वर्तमान डाक्टरोंकी तरह पेट में जल जमनसे प्राचीन आयुर्वेदाचार्य भी उसे निकाल डालते थे। उन्होंने लिखा है- {{c|{{x-smaller|<poem>“तस्मान्नाभर्वलीभागे वर्जयित्वाङ्गु लइयम्। जलनाडीञ्चानुमन्य कुशपत्रेण वेष्टयेत्॥ एरण्डजलनालञ्च तन्न सञ्जारयेद्वुधः। अन्तर्गतजल स्राव्यं ततः सन्धारयेदद्रुतम्॥ यदा न धरते तच्च तदा दाह: प्रशस्यते। कणाकल्कं परिस्राव्य घृतं देयं चतुर्गुणम्॥ शुण्ठिविषा समं पाच्यं पानमालेपनं हितम्। शस्त्रकर्म भिषक्श्रेष्ठो विज्ञातेनैव कारयेत्॥ दुष् करं शस्त्रकर्म व न कुर्यायत्र तत्र तु।</poem>}}}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 35baww1wtzohkifmuwq5289ckscl2bz पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२४८ 250 75924 667803 609054 2026-07-15T16:46:47Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667803 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदरक-उदरसर्वस्व'''|'''२४७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>अक्रियायां ध्रु वो मृत्यु: क्रियायां सशयो भवेत्। तस्मादवश्य कर्तव्य मौश्वरः साचिकारिण॥”</poem>}}}} इसी हेतु नाभिके वलिकी दिक् दो अङ्गुलि छोड़ जल नाडीको सुधार कुशपत्रसे लपेट दे और एरण्डके पत्रका नल उसमें चला अन्तर्गत जल निकाल ले। तदनन्तर सत्वर उसे बन्द करना चाहिये। यदि जलका निर्गमन हो सके,तो दाह लगानेको हो प्रशस्त समझे। जलको निकाल जीरकका कल्क चतुर्गुण घीमें मिला समभाग शुण्ठी एवं विषाके साथ पका पीने और चुपड़नेसे उपकार पहंचता है। दूसरी बात यह है, कि अतिशय निपुण और अभिन्न व्यक्तिसे अस्त्रका कार्य ले। अस्त्रकर्म अत्यन्त दुष्कर है। यत्र तत्र उसे न करे। इस रोगमें अस्त्र न लगानेसे निश्चय मृत्यु आती है। किन्तु अस्त्रकर्म कर देनेसे उसमें संशय पड़ जाता है। अतएव ईश्वरको साक्षी ठहरा अवश्य जलोदरमें अस्त्रकर्म करना चाहिये। जल निकाल डालनेसे अनेक स्थलों में रोगी आरोग्य नहीं पाता, केवल यन्त्रणाका वेग घट जाता है। क्योंकि निकाल डालते भी अल्प दिन बाद पुनर्वार जल पेटमें भरता और शीघ्र रोगी मरता है। किन्तु भीतर कोई विशेष यान्त्रिक पीड़ा न रहने पर इस प्रक्रियासे आरोग्य लाभ होता है। {{Right|<small>धड़ शब्दमैं उदरसंस्थानका चित्र देखो।</small>}} {{outdent|उदरक (सं॰ त्रि॰) उदरसम्बन्धीय, पेटके मुताल्लिक़।}} {{outdent|उटरग्रन्थि (सं॰ पु॰) उदरस्य ग्रन्थिरिव। १ अश्मरी-रोग, हबस्-उल्-बौल, चिनङ्ग। २ गुल्मरोग, तिल्ली, पिलही।}} {{outdent|उदरज्वाला (सं॰ स्त्री॰) १ जठराग्नि, खाना हजम करनेवाली हरारत। २ बुभुक्षा, भूंक।}} {{outdent|उदरत्राण (सं॰ क्ली॰) उदरस्य त्राणो यस्मात्। १ कवच, बखूतर। २ वरत्रा, कमरबन्द।}} {{outdent|उदरथि (संं॰ पु॰) उत्-ऋ-अथिन्-चित्। उदतेश्चित्। उण् ४।८८। १ समुद्र। २ सूयें।}} {{outdent|उदरना (हिं॰ क्रि॰) खण्ड खण्ड होना, टुकड़े उड़ना।}} {{outdent|उदरनाड़ी (सं॰ स्त्री॰) अन्त्रनाड़ी, आंत।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|उदरपरता (सं॰ स्त्री॰) रोगविशेष, एक बीमारी। इसमें बहुत खानेको मन चला करता है।}} {{outdent|उदरपरायण (सं॰ त्रि॰) उदरं उदरपूरणमेव परं अयनं प्रधानाश्रयो यस्य, यहा उदरे विषये परायण आसक्तः। पेटुक, पेट्र, सिर्फ़ पेट भरने की फिक्र रखनेवाला।}} {{outdent|उदरपरीक्षा (सं॰ स्त्री॰) जठर-परीक्षा, मेदेकी जांचा}} {{outdent|उदरपिशाच (सं॰ त्रि॰) उदराय तत्पूरणाय पिशाच इव। १ यधेच्छाहारी, मनमानी चीज़ खानेवाला। (पु॰) २ सर्वान्नभक्षक, बड़पेटा।}} {{outdent|उदरपीड़ा (सं॰ स्त्री॰) उदरामय, पेटका दर्द ।}} {{outdent|उदरपुर (सं॰ अव्य॰) उदरपूर्तिपर्यन्त, पेट भर जाने तलक।}} {{outdent|उदरपोषण (सं॰ क्ली॰) कुक्षिपालन, पेटका भराव।}} {{outdent|उदरभङ्ग (सं॰ पु॰) उदरस्य भङ्गः। अतीसाररोग, दस्तकी बीमारी।}} {{outdent|उदरभरणमात्रकेवलेच्छु (सं॰ त्रि॰) केवल उदर पोषणका अभिलाषी, जो सिर्फ पेट भरने की ख़ाहिश रखता हो।}} {{outdent|उदरम्भरि (सं॰ त्रि॰) उदरं विभर्ति, उदर-इन्-मुम् च। <small>“आत्मनोमुमागम इन्प्रत्ययय। अनुक्त समुच्चयार्थयकार।” (सिद्धान्तकौमुदी)</small> आत्मम्भरि, पेटू, बड़ा खानेवाला।}} {{outdent|उदररस (सं॰ पु॰) उदरका पाचक रस, जो अर्क पेटका खाना हज़म करता हो।}} {{outdent|उदररेखा (सं॰ स्त्री॰) उदरकी रेखा, पेटका बल।}} {{outdent|उदररोग (सं॰ पु॰) कुक्षिकी पीड़ा, पेटकी बीमारी। </small>उदर देखो।</small>}} {{outdent|उदरवत् (सं॰ त्रि॰) दीर्घ उदरयुक्त, बड़े पेटवाला।}} {{outdent|उदरवृद्धि (सं॰ स्त्री॰) उदरस्फीति, पेटको बढ़ाई ।}} {{outdent|उदरव्याधि (सं॰ पु॰) उदरामय, पेटकी एक बीमारी।}} {{outdent|उदरशय (सं॰ त्रि॰) उदरको भूमिसे लगा शयन करने वाला, जो पेटके बल लेटता हो।}} {{outdent|उदरशाण्डिस्य (सं॰ पु॰) ऋषिविशेष। <small>(भारत, सभा ३अ॰)</small>}} {{outdent|उदरसर्वस्व (संं॰ पु॰) भोजनचञ्चु, शिकमपरस्त, चटोरा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> h9g0psnlb7417ih9y27b47mxj82rbvj पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२४९ 250 75926 667804 609055 2026-07-15T16:49:18Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667804 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२४८'''|'''उदरस्फुटा-उदवास'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> उदरस्फ टा (स. स्त्री०) नागवल्ली, पान। वृक्ष, धतूरेका पेड़। ५ उत्कर्ष, सबकत, आगे निकल उदराग्नि (स.पु.) जठराग्नि, सफरा, पेटमें खाना | जानेका काम। ६ अन्त, सिरा। ७ भवनको उच्चता. हजम करने वाली हरारत। इमारतको बुलन्दी। ८ उपहार, इनाम। उदराध्यान (स० क्ली० ) उदरस्य प्राध्मानम् । उदरको उदर्चिस् (सं० पु०) उगतमचिः शिरा यस्य । वायुफुल्लता, पेटका फूलना। १ अग्नि, आग। २शिव। ३ कामदेव । (त्रि.) उदरानलपत्रक (स'. पु.) लघुतालीशपत्र। | उहतं प्रभा यस्मात्। ४ प्रज्वलित, भभकता हुआ। उदरामय ( स० पु०) उदरस्य प्रामयः। अतीसार उदर्द ( स० पु०) उत्-अर्द अच् । दगु, हुमरा, रोग, आंवके दस्त लगने की बीमारी। अतिसार देखो। । ददोरा। वरटोके दष्टसंस्थान पर शोथ चढ़ने, कण्ड उदरामयकुम्भकेशरी (सं० पु०) प्लीहाधिकारका एक उठने, व्यथा बढ़ने, सड़न पड़ने और छदि, ज्वर रस, तिल्लीकी एक दवा। पारा, गन्धक, ताम, एवं विदाह लगनेसे यह रोग उपजता है। (माधवनिदान) त्रिकटु, यवक्षार, टङ्गण, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, उदर्दप्रशमनवर्ग ( स० पु०) उदर्दक शमनका एक पञ्चलवण, यमानी एवं हिङ्ग प्रत्येक समभाग ले नौबूके | योग, ददोरा मिटानेवाली चीजोंका जखीरा । तिन्दुक, रसमें घोंटे। एक माषा परिमित वटिका खिलानेसे पियाल, वदर, खदिर, कदर, सप्तपर्ण, अश्वकर्ण, उदरामय रोग अच्छा हो जाता है। (रसेन्द्रसारस'ग्रह) अर्जुन, पीतशाल और विट्खदिर मिलनेसे यह वर्ग उदरामयिन् (स. त्रि०) उदरामययुक्त, जिसके बनता है। (चरक) आवको बीमारी रहे। उदर्ध (सं० पु०) शोणज्वर, सुखं बुखार। उदरारिरस (स• पु०) उदराधिकारका रस, पेटको उदयं ( स० वि०) १ उदरी, पेटवाला। (वै० क्लो०) एक दवा। पारद, शुक्तितस्य, जैपाल और पिप्पली | २ उदरपूरक, पेटका माद्दा। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> बराबर बराबर डाल वचीक्षौरमें घोंटे। माषामात्र उदलगुरी-आसाम प्रान्तके दरङ्ग जिलेका एक ग्राम । वटी खानेसे स्त्रीका जलोदर आरोग्य होता है। दधि यह भूटानको सोमाके समीप है। निकटवर्ती पहाड़ी और प्रोदनका पथ्य देना योग्य है। (रसेन्द्र सारस'ग्रह) लोगोंके साथ व्यापार करनेको प्रति वर्ष यहां मेला उदरावर्त (सं० पु०) उदरस्य आवर्त इव। नाभि, | लगता, जो प्रायः एक मास चलता है। भूटानके राजा नाफ़, सूड़ी। भेटकी चीजें खरीदने आया करते हैं। भूटिये हजारों उदरावेष्ट (सं० पु. ) शारीर क्वमिभेद, पेटका | रुपये का टट्ट, कम्बल, नमक तथा मोम बेचते और केंचुवा। चावल, रुई, कपड़ा एवं पीतलका बरतन खरीदते हैं। उदरिक, उदरिन् देखो। उदलावणिक (सं० त्रि० ) उदलवण-ठक। लव- उदरिणी (सं० स्त्री०) उदर-इनि-डीप् । गर्भवती, | णोदकसिद्ध, नमक और पानीसे पकाया हुआ। हामिला, जिसके पेटमें लड़का रहे। उदवग्रह (सं० पु०) खरित आघात विशेष । यह उदरिन् (सं० त्रि०) १ उदरिक, बड़े पेटवाला। उदात्तपर निर्भर रहता, जो अवग्रहमें उठता है। २ कुक्षिसम्बन्धीय, शिकमो, जो पेटसे सरोकार उदवना (हिं• क्रि०) उदय होना, निकलना, देख रखता हो। ३ उदरसर्वस्व । पड़ना। उदरिल (सं० त्रि०) उदर-इलच् । तुन्दादिभ्य इल। | उदवसानीय (वै० त्रि.) अन्तिम, अखीर । पा ५।२।११७। उदरी, तोंदल, मुरमुरोंका थैला। उदवसित (सं० लो०) उदूर्ध्वमवसीयते स्म, उद- उदक (सं० पु०) उत्-ऋच-घज । १ उत्तरकाल, प्रव-षिञ् बहुवचने वा तभवन, मकान्, रहने को आयिन्दा जमाना। २ भाविफल, कामका भागे आने जगह। वाला नतीजा। ३ मदनकण्टक, मैनफल। ४ धुस्तर ' उदवास (सपु०) उदके व्रतार्थवासः, उदादेशः। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> i14p9vtd48fk9wxldjz0zr95ovhhe7a पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२५० 250 75927 667825 609057 2026-07-16T00:50:25Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667825 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदवाह-उदान'''|'''२४९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :<small>पेयं वासवाहनधिषु च। पा ६।३।५८।</small> व्रतके पालनार्थ जलमें वास। {{Outdent|उदवाह (वै॰ पु॰) जलवाहक, पानी ढोने वाला।<small> (ऋक् ५।४८।३)</small> (हिं॰) <small>उद्दाह देखो।</small>}} {{Outdent|उदवेग (हिं॰) <small>उद्देग देखो।</small>}} {{Outdent|उदशराव (वै॰ पु॰) जलपूर्ण शराव, पानीसे भरा प्याला। <small>(छान्दोग्य उपनिषत् ८।८।१)</small>}} {{Outdent|उदश्रु (सं॰ त्रि॰) उद्गतमथु यस्य, प्रादि॰ बहुव्री॰। निर्गताश्रु, आंसू बहाने वाला।}} {{Outdent|उदश्वित् (सं॰ क्ली॰) उदके नश्वयति वर्धते, उद-श्वि-क्विप् -तुक्। अर्धजल तक्र, आधा पानी और आधा मठा। यह तृष्णा, दाह तथा मुखके शोष और चुपड़ने से कुष्ठको दूर करता है। <small>(राजवल्लभ)</small>}} {{Outdent|उदसन (सं॰ क्ली॰) उतक्षेपण, फेंक फांक, उठाव।}} {{Outdent|उदसना (हिं॰ क्रि॰) उठ जाना, उखड़ना, बरबाद होना।}} {{Outdent|उदस्त (सं॰ त्रि॰) उत्-अस-क्त। १ उत्क्षिप्त, फेंका हुआ। २ वहिष्कृत, निकाला हुआ।}} {{Outdent|उदस्य (सं॰ अव्य॰) १ उदसन करके, फेंक कर। २ वहिष्कार करके, निकालकर। ३ चेष्टा करके कोशिश लगाकर।}} {{Outdent|उदहरण (सं॰ पु॰) उदकं हियते अनेन, उत्-हृ करणे ल्युट्। कुम्भ, घड़ा।}} {{Outdent|उदहार (सं॰ त्रि॰) उदकं हरति, हृ-अण् उदादेशः। १ जलहारक, पानी लानेवाला। (पु॰) भावे घञ्। २ जलहरण, पानी लानेका काम।}} {{Outdent|उदाज (सं॰ पु॰) उद-अज-घञ्, कवर्गादेशो न स्यात्। <small>अजिब्रज्योभ्यश्च। पा ७।३।६०। “उदाज: चवियाणाम् (प्रेरणम्)।” (सिद्धान्तकौमुदी)</small> प्रेरण, पहुंचाने या भेजनेका काम।}} {{Outdent|उदाजी चौहान――दाक्षिणात्यवाले रामचन्द्रपन्तके एक सैनिक। इन्होंने शाइराजके समय पूनाकी वारना उपत्यकामें बत्तीस शिरालका किला जीत लिया था। किन्तु शाइने इन्हें शिराल और कराड़का चौथ दे अपना मित्र बनाया था।}} {{Outdent|उदाजी पवार――दाक्षिणात्यवाले शाहु नृपतिके एक अश्वारोही सेनापति। पहले इनके पिताको राम-}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :चन्द्रपन्त अमात्यने गिञ्जीके घेरे जानेपर शासक बनाया था। ये शाहुके सैन्यमें भरती हो कितनेही अश्वारोहियोंके अधिनायक रहे। इन्होंने गुजरात और मालवेपर आक्रमण मारा था। लूनावाड़ तक गुजरात लूटा गया, किन्तु गिरधर बहादुर मालवेके रक्षक बनने पर इन्हें धारका किला छोड़ पीछे हटना पड़ा। १६९६ ई॰ को उदाजी पंवारने मांड़ू का किला छीना था। १७३१ ई॰ की १ ली अपरेलको बड़ोदेके निकट भीलापुर में जो युद्ध हुआ, उसमें इन्होंने निजा़म् उल्-मुल्ककी फौजके हाथ आत्मसमर्पण किया। {{Outdent|उदात्त (सं॰ पु॰) उत्-आ-दा-क्त। <small>उच्चैरुदात्तः। पा १।२।२९। “ताल्वादिषु सभागेषु स्थानेष र्ध्व भागे निष्यन्नोऽजुदात्तः।" (सिद्धांतकौमुदी)</small> १ मुखमें तालु प्रभृति ऊर्ध्व भागसे उच्चारित होने वाली स्वर, तेज़ लहज, तीखा सुर। <small>अनुदात्त देखो।</small> २ वाद्य विशेष, एक बाजा। ३ दान, बख़् शिश। ४ काव्यालङ्कार विशेष। ५ सुदीर्घ भेरी, बड़ा ढोल। ६ कार्य, काम। (क्ली॰) ७ आभूषण-विशेष, एक गहना। (त्रि॰) कर्तरिक्त। ८ महत्, बड़ा। ९ समर्थ, काबिल। १० दाता, देने वाला। ११ उच्च, ऊंचा। १२ उच्च स्वरयुक्ता, तीखे स्वरवाला। १३ सुन्दर, खूबसूरत। १४ प्रिय, प्यारा।}} {{Outdent|उदात्तमय (सं॰ त्रि॰) उदात्तस्वरदृश, तीखे स्वरसे मिलता-जुलता।}} {{Outdent|उदात्तवत् (सं॰ त्रि॰) उदात्तस्वरसे उच्चारण किया जाने वाला, जो तीखी आवाज़से बोला जाता हो।}} {{Outdent|उदात्तत्रुति,<small> उदात्तवत् देखो।</small> }} {{Outdent|उदात्तश्रुतिता (सं॰ स्त्री॰) उदात्त स्वरसे उच्चारण करनेका भाव, जिस हालतमें तीखी आवाज़ से बोलें।}} {{Outdent|उदात्यूह (सं॰ पु॰) जलकाक, पानीकी एक चिड़िया।}} {{Outdent|उदाद्यन्त (सं॰ त्रि॰) अन्तमें उदात्त स्वर रखने-वाला, जिसके पीछे तीखी आवाज़ लगे।}} {{Outdent|उदान (सं॰ पु॰) उदूर्ध्वेन आनिति अनेन, उत्-आ-अन्-घञ्। कण्ठवायुविशेष, गलेसे निकलने और सरपे चढ़ने वाली हवा। <small>“उदान: ? कण्ठस्थानीयः ऊर्ध्व-गमनवामुत्क्रमणवायुः।” (वेदान्तसार)</small> वेदान्तके मतसे यह ऊर्ध्वगमनशील कण्ठस्थायी उत्क्रमण वायु है।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 63|1em}}</noinclude> fykdvcmctexmbh31zeojd9ymn4j18q7 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२५१ 250 75931 667805 609058 2026-07-15T16:51:58Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 667805 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५०'''|'''उदापि-उदावर्त'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> "उदानो नाम यस्त व मुपैति पवनीतमः । ११ शिष्ट, शरीफ.। १२ असाधारण, अनोखा। (पु०) ऊर्ध्वजक्र गतान् रोगान् करोति च विशेषतः।" (मुश्नुत) १३ दीर्घशालि, लम्बा चावल । (अव्य.) १४ ऊंचे महर्षि सश्रतके कथनानुसार अवं दिक सच्चरण खरसे, बुलन्द पावाज़में। (वै० त्रि.) १५ उत्तेजक, करने वाले वायुका नाम उदान है। इसके कुपित उठाने या भड़कानेवाला। (पु.) १६. उत्थानशील होने से स्कन्धसन्धिसे उपरिस्थित सकल रोग उपजते हैं। बाष्प, उठनेवाली भाप। १७ काव्यालङ्कार विशेष। योगार्णवमें इसका क्रियास्थान आदि इसप्रकार | इससे निर्जीव पदार्थमें शिष्टता प्रदर्शित करते हैं। निरूपित है- उदारा-सङ्गीतशास्त्रका सप्तक विशेष । सा ऋ ग म प "स्पन्दयत्यधर वक्त गावनेवप्रकोपनः । ध और नि सात स्वरको एकत्र करने से सप्तक संज्ञा उद्देजयति मर्माणि उदानो नाम मारुतः ॥ होती है। मनुष्यके देहमें स्वाभाविक तीन. सप्तकसे विद्यत्पावकवर्णः स्यादुत्थानासनकारकः। . अधिक नहीं निकलते। एसीसे भारतीय सङ्गीतशास्त्रमें पादयोईन्तयोश्चापि सर्वसन्धिषु वर्तते ॥” उदारा, मुदारा और तारा तीन सप्तकका उल्लेख है। उदानवायु अधर और मुखको फड़काता है।। नाभिसे जो सप्तक उठता, उसे सङ्गीतज्ञ उदारा कहता यह चक्षु एवं शरीरको प्रकोपकारी और मर्मको है । वेदान्तके मतसे यह अनुदात्त है। उत्तेजक है। वर्ण विद्यत् एवं पावक जैसा होता है। उदाराशय (स. त्रि.) उतक्लष्ट प्राशयविशिष्ट, ऊंचा इसीके सहारे लोग उठते बैठते हैं। हस्त एवं पाद मतलब रखनेवाला, बड़ा। सकल सन्धिमें यह विद्यमान है। उदावत्सर (स० पु०) वर्ष विशेष। इस वर्ष रौप्य वैद्यकके मतानुसार उदानवायु ऊपरको चढ़ता देने से महाफल मिलता है। इदावत्सर देखो। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> है। इसौके सहारे गाना और बात करना होता है। उदावर्त ( स० पु०) उत्-श्रा-वृत्-घञ्। रोग- विशेषतः यह अर्ध्व-जत्रु-गत रोग बढ़ाता है। (सुश्रुत ) | विशेष, पेटको एक बीमारी। इसके होनेसे न तो मल २ उदरावर्त, ढोंढो। ३ सर्प, सांप। ४ पक्ष्म, | गिरता, न मूत्र उतरता और न वायु ही चलता है। पलक। ५ बौद्ध शास्त्रभेद। इस शास्त्र में बुद्धदेवका “वातविरमूवज भानुक्षवोमारवमौन्द्रियः । चरित्र लिखा है। व्याहन्यमानरुदितैरदावों निरुच्यते ॥” ( सुश्रुत) उदापि (सं० पु०) सहदेवके पुत्र और मगधराज जरा वायु, मल, मूत्र, जम्भा, अशु, काश, हिक्का, सन्धके पौत्र। (हरिवंश) उद्गार, वमि, शक्र प्रभृतिका वेग रोकने पर वायु उदापक्षी (सं० पु०) विश्वामित्रके एक पुत्र । (भारत) अर्वजान से यह रोग उतपन्न होता है। इसी कारण उदाप्य (वै० अव्य०) धाराके ऊपर, दरयाके सामने । उदावत नाम पड़ा है। .. उदाम (हिं.) उद्दाम देखो। "तुतृष्णाश्वासनिद्रानामुदावर्तो विधारणात् । उदायन (हिं.) उद्यान देखो। वायु:कोष्ठानुगो रुः कषायकटुषिक्तकैः । उदायुध (सं० वि०) उदूर्ध्व आयुधो यस्य । उद्धृतास्त्र, भोजनैः कुपित: सद्य सदावर्त करोति हि ॥” (सुश्रुत ) - हथियार उठाये हुआ। (रघु १२।४४ ) क्षुधा, तृष्णा, निद्रा और खासका वेग रोकनेसे भी उदार (सं.वि.) उत् उत्कृष्टं पा समन्तात् राति यह रोग हो जाता है। फिर रुक्ष, कषाय, कट ददाति, उत्-प्रा-रा-पातश्चेति क। १दाता, देने और तिक्त भोजन कोष्ठमें पहुंचनेसे वायु भड़कना बाला। २ महात्मा, साधु । (गीता ॥१८) ३ सरल, | इसकी उत्पत्तिका दूसरा कारण है। सीधा। ४ उत्कृष्ट, बढ़िया। ५ गम्भीर, गहरा। "वृष्यादित परिक्लिष्ट होणं शूलैरभिद्रुतम् । महोच्च, बहुत ऊंचा। ७ वदान्य, रहीम । ८सार- शकहमन्त' मतिमानुदावर्तिनमुत्सृजेत्।" वान, असली। ८ रम्य, उमदा। १. न्याय्य, वाजिब।। सुश्रुतने कहा-उदावत रोगमें तृष्णात, अत्यन्त <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> oyk6glsrruh0j03udg424zao0pwtytu पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२५२ 250 75933 667826 609059 2026-07-16T01:09:06Z अँजली चौधरी 2439 667826 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उदावर्ता-उदासी'''|'''२५१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> 'क्लान्त, क्षीण, शूलात और शोध शीघ्र पुरोष एवं वमि | करनेवाले रोगीको छोड़ देना चाहिये। वायुके विपथ गमनपर उत्पन्न होनेसे सकल हो अवस्था में वायुको स्वाभाविक पथपर पहुंचाना ही इस रोग-प्रतीकारका प्रधान उपाय है। ____ वायुसे उत्पन्न होनेवाले उदावत रोगमें स्नेह और खेद डाल आस्थापन लगाना चाहिये। मलरोधसे होनेवालेको चिकित्सा पानाह रोगकी तरह चलती है। मूवारोधके उदावतेपर एला वा दुग्ध मिला कर मदिरा तीन दिन अथवा जल डालकर तीन दिन प्रामलकोका रस पिलाते हैं। अश्रुधारणसे होनेपर | इस रोगमें नेह और खेद लगा अश्रुमोक्षण कराये। उगारसे जो उदावत उभरता, उसमें रोगी बिजौरा नीबू का रस मिला सुरापान करता है। वमनसे उदावत उठनेपर क्षार वा लवणके साथ अभ्यङ्ग प्रयोग किया जाता है। शुक्ररोधवालेमें स्त्रीका सहवास आवश्यक है। अनिद्रासे उपजनेपर उदावत रोगमें सुरापान करना और निद्रा लानेका ध्यान रखना ' चाहिये। कोष्ठगत वायु बिगडने उदावत उपजनेपर हृदय एवं वस्तिदेशमें शूल उठता,देह पर गौरव चढ़ता, अरुचि, तृष्णा तथा हिकाका वेग बढ़ता, कष्टसे वायु, मूत्र एवं मल ढलता, खास लगता, काश कढ़ता, प्रतिश्याय पड़ता, दाह दहता, मोह मदता, वमन चलता, शिरोरोग चलता और मन एवं श्रवणेन्द्रियका विभ्रम रहता है। इसी प्रकार वायुके प्रकोपसे अनेक विकार उठ खड़े होते हैं। सुश्रुतके मतमें ऐसे स्थल पर तेल एवं लवण मलाये और खेद तथा निरूहका वस्ति लगाये। मदनफल, अलाबुवीज, पिप्पली और कण्टकारीका चूर्ण पिचकारीसे मलद्वारमें पहुंचाना चाहिये। इससे शीघ्र ही उदावत रोग अच्छा हो | जाता है। उदावर्ता (सं० स्त्री०) दायुजन्य-स्त्रीयोनिरोगविशेष, औरतोंको एक बीमारी। इसमें कष्टके साथ सफेनिल रज निकलता है। (भावप्रकाश) उदावर्तिन् (सं० वि०) उदावर्तरोगविशिष्ट, जिसके कांच निकल आनेकी बीमारी रहे। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उदावसु (सं॰ पु॰) निमिके पौत्र और जनकके पिता। यह राजर्षि जनकसे भिन्न रहे। <small>जनक देखो।</small>}} {{Outdent|उदास (सं॰ पु॰) १ विराग, मसला-जब्र। २ उपेक्षा, बेपरवाई। ३ उच्चता, उंचाई। ४ उत्क्षेपण, उछाल। (त्रि॰) ५ उदासीन, जब्रिया मज़हबका मोतक़िद। ६ विरक्त, बेपरवा। ७ दुःखी, रञ्जीदा।}} {{Outdent|उदासना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्वासन करना, मट्टीमें मिलाना। २ उठाना, समेटना, लपेट डालना।}} {{Outdent|उदासितृ (सं॰ त्रि॰) विरक्त, बेपरवा, किसीसे सरोकार न रखनेवाला।}} {{Outdent|उदासिन (सं॰ त्रि॰) विरक्त, बेपरवा। <small>उदासी देखो।</small>}} {{Outdent|उदासिल, <small>उदासितृ देखो।</small>}} {{Outdent|उदासी (सं॰ पु॰) १ दर्शनज्ञ, मुहक्किक। २ विरक्त पुरुष, बेपरवा आदमी। ३ सन्यासी, एक मज़हबी फिरको का पाबन्द। यह नानकके धर्मपर चलते और मठमें बसते हैं। उदासी अपने हाथ से भोजन नहीं मठमें बसते हैं। उदासी अपने हाथ से भोजन नहीं बनाते, दूसरेका ही बनाया खाते हैं। नानककर ‘ग्रन्थ’ नामक धर्मग्रन्थ ही उपास्य है। सकल जातिके लोग उदासी सम्प्रदायभुक्त हो जाते हैं। इनके शिखा नहीं रहती। मस्तक मुंडवा डालते हैं। लंगोट सभी चढ़ाते हैं। (हिं॰ स्त्री॰) ३ दुःख, अफ़सोस। <br> {{gap}}४ बम्बई प्रान्तस्थ सूरत जिलेवाले बारडोलोके उदा कुनबियोंका एक सम्प्रदाय। कोई सवा तीन सौ वर्ष हुये,गोपालदास नामक एक व्यक्तिने यह सम्प्रदाय चलाया था। उन्होंने वैदिक मत अस्वीकार कर केवल एक परमेश्‍वरपर विश्वास करने के लिये अपने अनुयायियाको उपदेश दिया। यह सम्प्रदाय ईश्वरके ध्यानसे मुक्तिकी प्राप्ति और पुनर्जन्मको मानता है। पांच लोग मिलकर महन्तको निर्वाचन करते हैं। महन्तको शिष्यके गलेमें सेली पहनाने, विवाह एवं अन्त्येष्टिक्रियाका समय ठहराने और आज्ञाभङ्ग करनेवालेको सम्प्रदायसे निकलानका अधिकार है उदा-कुनबी उदासी प्रात:काल नहाते, काली तुलसींपर जल चढ़ाते और अपने पवित्र धर्मग्रन्थसे ध्यान लगाते हैं। सन्ध्या समय वह धर्मग्रन्थके पीठोपाधामको नम-स्कार करते हैं! फिर उसकी आरती उतारी और स्तुति}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> m336s45z8y8k1afhp92jupu8g6twk4c पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५१५ 250 76337 667816 667416 2026-07-15T18:20:07Z आदेश यादव 3609 667816 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="4" user="सौरभ तिवारी 05" />{{rh|४७४|ऐज़न—ऐतावाड खुर्द|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ऐज़न (अ॰ अव्य॰) तथा, वैसा ही। गणना आदिमें किसी विषयको बार–बार न लिख एकही बार लिखते और उसके नीचे ऐज़न रखते हैं। इससे उक्त विषय बार बार लिखा समझा जाता है।}} {{outdent|ऐड़ (सं॰ पु॰) एड़ा अस्तयत्र, एड़ा–अण्। १ एड़ा शब्दयुक्त अध्याय वा अनुवाक। २ इड़ाके पुत्र पुरुरवा। (त्रि॰) ३ बलकारक पदार्थयुक्त। ४ इड़ा शब्दयुक्त।}} {{outdent|ऐड़क (सं॰ पु॰) एड़क स्वार्थे अण्। १ मेषाकार पशुविशेष, किसी क़िस्मका भेड़ा। (त्रि॰) २ मेषसम्बन्धीय, एड़क पशुसे उत्पन्न।}} {{outdent|ऐडमिरल (अं॰ पु॰<nowiki>=</nowiki>Admiral) नौसेनाका अध्यक्ष, जहाज़ी फ़ौजका बड़ा अफसर।}} {{outdent|ऐडविड (सं॰ पु॰) १ कुवेर। २ दशरथ राजाके एक पुत्र।}} {{outdent|ऐडवोकेट (अं॰ पु॰<nowiki>=</nowiki>Advocate) न्यायालयमें परार्थवक्ता, मुख़तार, वकील।}} {{outdent|ऐडवोकेट–जनरल (अं॰ पु॰<nowiki>=</nowiki>Advocate–general) हाइकोर्टका बड़ा सरकारी वकील।}} {{outdent|ऐड़क (सं॰ त्की॰) एड़क एव, स्वार्थे अण्। अस्थि एवं तुच्छ द्रव्यकी भित्ति, हड्डी और कूड़ेकी दीवार।}} {{outdent|ऐण (सं॰ त्रि॰) एणस्य इदम्, एण-अण्। १ मृगसम्बन्धीय, काले हिरनसे पैदा।}} {{outdent|ऐणिक (सं॰ त्रि॰) एणं मृगं हन्ति, एण-ठक्। मृगहन्ता, काले हिरनका शिकार करनेवाला।}} {{outdent|एणीपचन (सं॰ त्रि॰) एणीपचनदेशभवः, एणीपचनअण्। एणीपचन देशीय। {{smaller|एणीपचन देखो।}}}} {{outdent|ऐणेय (सं॰ त्रि॰) एण्या इदम्, एणी–ठञ्। १ कृष्णसार मृगीसे उत‍्पन्न, काली हिरनीसे पैदा। (पु॰)२ कृष्णसारमृग, काला हिरन। (त्की॰) ३ रतिबन्धविशेष।}} {{outdent|ऐणेयक (स॰ त्की॰) एलबालुक।}} {{outdent|ऐण्डिनेय (सं॰ पु॰) वेदकी एक शाखा।}} {{outdent|ऐतदात्म्य (स॰ त्की॰) यह पदार्थ वा प्रधानता रखनेका भाव।}} {{outdent|ऐतरेय (वै॰ पु॰) ऋग‍्वेदकी एक शाखा। भाष्यकारोंके मतसे महिदास ऐतरेय नामक एक ऋषि {{Multicol-break}} इस शाखाके प्रवर्तक हैं। छान्दोग्योपनिषद‍्में लिख दिया, कि महिदास ऐतरेयने पूर्णज्ञान लाभ किया था।}} भाष्यकार शङ्कराचार्य के मतसे 'इतराया अपत्यं ऐतरेयः' अर्थात् इतराके अपत्यको ऐतरेय कहते हैं। सायणाचार्य ने ऐतरेय–ब्राह्मणके भाष्यकी उपक्रमणिकामें महिदास ऐतरेयका परिचय इस प्रकार दिया है— "किसी महर्षिके अनेक पत्नियां रहीं। उनमें एकका नाम इतरा था। उनके महिदास नामक एक पुत्र हुआ। 'अरण्यकाण्डमें' उन्हीं को 'महिदास ऐतरेय' कहा है। महर्षि अपर पत्निवोंको बहुत {{SIC|चाहते|चहते}}, किन्तु महिदाससे दूर रहते थे। किसी यज्ञसभामें उन्होंने महिदासकि उपेक्षा कर अपर पुत्र गोद पर बैठा लिये। इतराने अपने पुत्रका म्लानमुख देख कुलदेवता भूमिसे प्रार्थना की थी। उसी समय भूमिदेवता दिव्यमूर्ति धारण कर यज्ञसभामें आविर्भूत हुईं। उन्होंने महिदासको दिव्य सिंहासनपर बैठा वर दिया था—तुम सकल पुत्रोंकी अपेक्षा अधिक पण्डित होगे और ऐतरेय-ब्राह्मण प्रतिभाषण कर दोगे।" आजकल ऐतरेय–शाखाका ऐतरेय–ब्राह्मण, ऐतरेय-आरण्यक और ऐतरेय उपनिषत् पुस्तक मिलता है। {{outdent|ऐतरेयक, {{smaller|ऐतरेयब्राह्मण देखो।}}}} {{outdent|ऐतरेयब्राह्मण (सं॰ त्की॰) ऋग्वेदका एक ब्राह्मण। इसमें होताका कार्य निर्दिष्ट है। ऐतरेय ब्राह्मणके ४० अध्याय ८ पञ्चिकामें विभक्त हैं। {{smaller|वेद और ब्राह्मण देखो।}}}} {{outdent|ऐतरेयी (सं॰ पु॰) ऐतरेय–ब्राह्मण पढ़नेवाला।}} {{outdent|ऐतरेयोपनिषद् (सं॰ त्की॰) ऐतरेय आरण्यककी एक उपनिषत्।}} {{outdent|ऐतश (सं॰ पु॰) भृगुवंशीय एक मुनि। इन्होंने ही 'ऐतश प्रलाप' नामक वैदिक ग्रन्थ बनाया था।}} {{outdent|ऐतशायन (सं॰ पु॰) ऐतशके सन्तान।}} {{outdent|ऐतावाड खुर्द—बम्बई प्रान्तके सतारा ज़िले का एक ग्राम। यह वालवा तहसीलके प्रधान नगर पेठसे दक्षिण ७ मील पड़ता है। मालखेड़के राष्ट्रकूट नृपतिने ब्राह्मणोंको ६७५ शककी रथाष्टमीपर जो भूमिदान किया, उसमें इसका नाम भी दिया है।}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> hmvcslzzdvg7f263k3l16hpuxti7x57 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२० 250 76347 667776 667740 2026-07-15T13:23:49Z आदेश यादव 3609 667776 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ऐरंमद—ऐल|४७९}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ऐरंमद (सं॰ पु॰) देवमुनिके अपत्य। इन्होंने ऋग्वेदके मन्त्र बनाये थे। ऐरंमदीय (सं॰ त्की॰) ब्रह्मलोकका एक समुद्र। ऐरक्य (सं॰ त्रि॰) एरका–ण्य। एरका–जात। {{smaller|एरका देखो।}} ऐराक, {{smaller|एराक देखो।}} ऐराकी, {{smaller|एराकी देखो।}} ऐराग़ैरा (हिं॰ वि॰) १ अपरिचित, जो समझा–बूझा न हो। २ तुच्छ, छोटा। ऐरापति (हिं॰) {{smaller|ऐरावत देखो।}} ऐराब (अ॰ पु॰) शतरंजमें किश्त बचानेके लिये बादशाह और किसी दूसरे मोहरके बीचमें मोहरेका आना। इससे बादशाहपर किश्त नहीं रहती। किन्तु ऐराबका मोहरा उठना नामुमकिन है। घोड़ेकी किश्त पड़नेसे ऐराब नहीं चलता। ऐरालू (हिं॰ पु॰) इन्द्रवारुणी विशेष, किसी किस्मकी ककड़ी। यह तरबूज–जैसा रहता और पहाड़पर कुमाऊंसे सिकिमतक उपजता है। ऐरावण (सं॰ पु॰) इरया जलेन वनति शब्दायते,‌ इरा–वन पचांद्यच्; अथवा इरा सुरा वनमुदकं यस्मिन तत्र भवः, अण्। १ ऐरावती हस्ती। २ जैनमतानु–सार जम्बुद्दीपका सप्तम वर्ष। {{smaller|(जैनहरि॰ ५।१८)}} ऐरावत (सं॰ पु॰) इरा जलानि सन्त्यत्र, मतुप् मस्य वः, इरावान् समुद्रः तत्र भवः अण् इरावत्या विद्यतोऽयम्। १ इन्द्रहस्ती। ऐरावत शुक्ल वर्ण और चतुर्दन्तविशिष्ट है। समुद्रके मन्थनकालपर यह उपजा था। यही पूर्व दिक्का गज है। इसका अपर नाम अभ्रमातङ्ग, ऐरावण, अभ्रभूवल्लभ, श्वेत–हस्ती, मल्लनाग, इन्द्रकुञ्जर, हस्तिमल्ल, सदादान, सुदामा, श्वेतकुञ्जर, गजाग्रणी और नागमल्ल है। {{smaller|<poem>"इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः। आरुह्यौरावतं ब्रह्मन् प्रययावमराक्तीम्॥" (विष्णुपु॰ १।९।२५)</poem>}} २ नागरङ्ग, नारंगी। ३ लकुचवृक्ष, बड़हर। ४ नाग–विशेष। (त्की॰) ५ इन्द्रधनु। ६ इरावती नदीके तीरका देश। ऐरावतक (सं॰ पु॰) १ हस्तिशुण्डी, हाथीकी सूंड। २ नागरङ्ग वृक्ष, नारंगीका पेड़। {{Multicol-break}} ऐरावतक्षेत्र (सं॰ त्की॰) कावेरीनदीतीरस्थ एक प्राचीन तीर्थस्थान। ऐरावतक्षेत्रके माहात्मामें लिखा है—इन्द्रने वृत्रासुरवधजनित पापसे मुक्ति पानेको इस स्थानमें आ तपस्या और लिङ्गमूर्तिकी स्थापना की थी। शिवकी कृपासे इन्द्रका ऐरावत फिर जी उठा और इस स्थानका नाम ऐरावतक्षेत्र पड़ा। ऐरावतपदी (सं॰ स्त्री॰) १ काकजङ्घा। २ महा ज्योतिष्मती लता, रतनजोत। ऐरावती (सं॰ स्त्री॰) इरावत्–इयम्, इरावत्–अण्–ङीप्। १ विद्युत्, बिजली। २ ऐरावतकी स्त्री। ३ वटपत्रीवृच, बड़ा पथरचटा। ४ उत्तरमार्गके एक नक्षत्रका नामान्तर। ५ पञ्चालदेशीय नदीविशेष। आजकल इसे रावी कहते हैं। इसका वेदोक्त नाम‌ परुष्णी है। ६ नागरङ्गवृक्ष, नारंगीका पेड़। ऐरावतीका पकाया हुआ रस अम्ल, उष्ण और सुगन्धित होता है। इससे वात, कास और श्वासका रोग छूट जाता है। {{smaller|(वैधकनिघण्टु)}} ऐरिकिन (सं॰ त्की॰) एरण नगरका प्राचीन नाम। कनिंग्हम साहबके मतसे एरणका प्राचीन नाम एरकैन है। {{smaller|एरण देखो।}} ऐरिण (सं॰ त्की॰) इरिणे ऊषरभूमौ भवम्, इरिण–अण्। सैन्धव ल़वण, पांशुलवण। ऐरी—मध्यप्रान्तके मंडला ज़िलेका एक सरकारी जंगल। यह अक्षा॰ २२° ३८’ से २२° ४०’ उ० तथा देशा॰ ८०° ४३’ ४५’’ से ८०° ४६’ ४५’’ पू॰ तक बुढ़नेर चोर हालाॅ नदीके सङ्गमपर अवस्थित है। ऐरीमें साखू ख़ूब होती है। ऐरेव (सं॰ त्की॰) इरा–ढक्। १ मघ, शराब। २ एलवालुक, एक ख़ुशबूदार चीज। ३ अन्नादि, अनाज वग़ैरह। ऐर्म्य (सं॰ त्की॰) इर्माय हितम्, इर्म व्यञ्। १ सुश्रुतोक्त अञ्जनविशेष, किसी क़िस्मका काजल या सुरमा। (त्रि॰) २ क्षत–पूरणके निमित्त लाभदायक, ज़ख़्मको सुखाने क़ाबिल। ऐल (सं॰ पु॰) इलाया अपत्यं पुमान्, इला–अण्। १ इलापुत्र। इनका अन्य नाम पुरुरवा है। यह<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 75tpvziupvjfnpw5k3ojl8g4wj8povv 667778 667776 2026-07-15T13:30:10Z आदेश यादव 3609 667778 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ऐरंमद—ऐल|४७९}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ऐरंमद (सं॰ पु॰) देवमुनिके अपत्य। इन्होंने ऋग्वेदके मन्त्र बनाये थे।}} {{outdent|ऐरंमदीय (सं॰ त्की॰) ब्रह्मलोकका एक समुद्र।}} {{outdent|ऐरक्य (सं॰ त्रि॰) एरका–ण्य। एरका–जात। {{smaller|एरका देखो।}}}} {{outdent|ऐराक, {{smaller|एराक देखो।}}}} {{outdent|ऐराकी, {{smaller|एराकी देखो।}}}} {{outdent|ऐराग़ैरा (हिं॰ वि॰) १ अपरिचित, जो समझा–बूझा न हो। २ तुच्छ, छोटा।}} {{outdent|ऐरापति (हिं॰) {{smaller|ऐरावत देखो।}}}} {{outdent|ऐराब (अ॰ पु॰) शतरंजमें किश्त बचानेके लिये बादशाह और किसी दूसरे मोहरके बीचमें मोहरेका आना। इससे बादशाहपर किश्त नहीं रहती। किन्तु ऐराबका मोहरा उठना नामुमकिन है। घोड़ेकी किश्त पड़नेसे ऐराब नहीं चलता।}} {{outdent|ऐरालू (हिं॰ पु॰) इन्द्रवारुणी विशेष, किसी किस्मकी ककड़ी। यह तरबूज–जैसा रहता और पहाड़पर कुमाऊंसे सिकिमतक उपजता है।}} {{outdent|ऐरावण (सं॰ पु॰) इरया जलेन वनति शब्दायते,‌ इरा–वन पचांद्यच्; अथवा इरा सुरा वनमुदकं यस्मिन तत्र भवः, अण्। १ ऐरावती हस्ती। २ जैनमतानु–सार जम्बुद्दीपका सप्तम वर्ष। {{smaller|(जैनहरि॰ ५।१८)}}}} {{outdent|ऐरावत (सं॰ पु॰) इरा जलानि सन्त्यत्र, मतुप् मस्य वः, इरावान् समुद्रः तत्र भवः अण् इरावत्या विद्यतोऽयम्। १ इन्द्रहस्ती। ऐरावत शुक्ल वर्ण और चतुर्दन्तविशिष्ट है। समुद्रके मन्थनकालपर यह उपजा था। यही पूर्व दिक्का गज है। इसका अपर नाम अभ्रमातङ्ग, ऐरावण, अभ्रभूवल्लभ, श्वेत–हस्ती, मल्लनाग, इन्द्रकुञ्जर, हस्तिमल्ल, सदादान, सुदामा, श्वेतकुञ्जर, गजाग्रणी और नागमल्ल है।}} {{smaller|<poem>"इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः। आरुह्यौरावतं ब्रह्मन् प्रययावमराक्तीम्॥" (विष्णुपु॰ १।९।२५)</poem>}} २ नागरङ्ग, नारंगी। ३ लकुचवृक्ष, बड़हर। ४ नाग–विशेष। (त्की॰) ५ इन्द्रधनु। ६ इरावती नदीके तीरका देश। {{outdent|ऐरावतक (सं॰ पु॰) १ हस्तिशुण्डी, हाथीकी सूंड। २ नागरङ्ग वृक्ष, नारंगीका पेड़।}} {{Multicol-break}} {{outdent|ऐरावतक्षेत्र (सं॰ त्की॰) कावेरीनदीतीरस्थ एक प्राचीन तीर्थस्थान। ऐरावतक्षेत्रके माहात्मामें लिखा है—इन्द्रने वृत्रासुरवधजनित पापसे मुक्ति पानेको इस स्थानमें आ तपस्या और लिङ्गमूर्तिकी स्थापना की थी। शिवकी कृपासे इन्द्रका ऐरावत फिर जी उठा और इस स्थानका नाम ऐरावतक्षेत्र पड़ा।}} {{outdent|ऐरावतपदी (सं॰ स्त्री॰) १ काकजङ्घा। २ महा ज्योतिष्मती लता, रतनजोत।}} {{outdent|ऐरावती (सं॰ स्त्री॰) इरावत्–इयम्, इरावत्–अण्–ङीप्। १ विद्युत्, बिजली। २ ऐरावतकी स्त्री। ३ वटपत्रीवृच, बड़ा पथरचटा। ४ उत्तरमार्गके एक नक्षत्रका नामान्तर। ५ पञ्चालदेशीय नदीविशेष। आजकल इसे रावी कहते हैं। इसका वेदोक्त नाम‌ परुष्णी है। ६ नागरङ्गवृक्ष, नारंगीका पेड़। ऐरावतीका पकाया हुआ रस अम्ल, उष्ण और सुगन्धित होता है। इससे वात, कास और श्वासका रोग छूट जाता है। {{smaller|(वैधकनिघण्टु)}}}} {{outdent|ऐरिकिन (सं॰ त्की॰) एरण नगरका प्राचीन नाम। कनिंग्हम साहबके मतसे एरणका प्राचीन नाम एरकैन है। {{smaller|एरण देखो।}}}} {{outdent|ऐरिण (सं॰ त्की॰) इरिणे ऊषरभूमौ भवम्, इरिण–अण्। सैन्धव ल़वण, पांशुलवण।}} {{outdent|ऐरी—मध्यप्रान्तके मंडला ज़िलेका एक सरकारी जंगल। यह अक्षा॰ २२° ३८’ से २२° ४०’ उ० तथा देशा॰ ८०° ४३’ ४५’’ से ८०° ४६’ ४५’’ पू॰ तक बुढ़नेर चोर हालाॅ नदीके सङ्गमपर अवस्थित है। ऐरीमें साखू ख़ूब होती है।}} {{outdent|ऐरेव (सं॰ त्की॰) इरा–ढक्। १ मघ, शराब। २ एलवालुक, एक ख़ुशबूदार चीज। ३ अन्नादि, अनाज वग़ैरह।}} {{outdent|ऐर्म्य (सं॰ त्की॰) इर्माय हितम्, इर्म व्यञ्। १ सुश्रुतोक्त अञ्जनविशेष, किसी क़िस्मका काजल या सुरमा। (त्रि॰) २ क्षत–पूरणके निमित्त लाभदायक, ज़ख़्मको सुखाने क़ाबिल।}} {{outdent|ऐल (सं॰ पु॰) इलाया अपत्यं पुमान्, इला–अण्। १ इलापुत्र। इनका अन्य नाम पुरुरवा है। यह}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 9iiqr662iixb7p0jgdds6qsfsaqwsqn 667779 667778 2026-07-15T13:34:12Z आदेश यादव 3609 667779 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ऐरंमद—ऐल|४७९}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ऐरंमद (सं॰ पु॰) देवमुनिके अपत्य। इन्होंने ऋग्वेदके मन्त्र बनाये थे।}} {{outdent|ऐरंमदीय (सं॰ त्की॰) ब्रह्मलोकका एक समुद्र।}} {{outdent|ऐरक्य (सं॰ त्रि॰) एरका–ण्य। एरका–जात। {{smaller|एरका देखो।}}}} {{outdent|ऐराक, {{smaller|एराक देखो।}}}} {{outdent|ऐराकी, {{smaller|एराकी देखो।}}}} {{outdent|ऐराग़ैरा (हिं॰ वि॰) १ अपरिचित, जो समझा–बूझा न हो। २ तुच्छ, छोटा।}} {{outdent|ऐरापति (हिं॰) {{smaller|ऐरावत देखो।}}}} {{outdent|ऐराब (अ॰ पु॰) शतरंजमें किश्त बचानेके लिये बादशाह और किसी दूसरे मोहरके बीचमें मोहरेका आना। इससे बादशाहपर किश्त नहीं रहती। किन्तु ऐराबका मोहरा उठना नामुमकिन है। घोड़ेकी किश्त पड़नेसे ऐराब नहीं चलता।}} {{outdent|ऐरालू (हिं॰ पु॰) इन्द्रवारुणी विशेष, किसी किस्मकी ककड़ी। यह तरबूज–जैसा रहता और पहाड़पर कुमाऊंसे सिकिमतक उपजता है।}} {{outdent|ऐरावण (सं॰ पु॰) इरया जलेन वनति शब्दायते,‌ इरा–वन पचांद्यच्; अथवा इरा सुरा वनमुदकं यस्मिन तत्र भवः, अण्। १ ऐरावती हस्ती। २ जैनमतानु–सार जम्बुद्दीपका सप्तम वर्ष। {{smaller|(जैनहरि॰ ५।१८)}}}} {{outdent|ऐरावत (सं॰ पु॰) इरा जलानि सन्त्यत्र, मतुप् मस्य वः, इरावान् समुद्रः तत्र भवः अण् इरावत्या विद्यतोऽयम्। १ इन्द्रहस्ती। ऐरावत शुक्ल वर्ण और चतुर्दन्तविशिष्ट है। समुद्रके मन्थनकालपर यह उपजा था। यही पूर्व दिक्का गज है। इसका अपर नाम अभ्रमातङ्ग, ऐरावण, अभ्रभूवल्लभ, श्वेत–हस्ती, मल्लनाग, इन्द्रकुञ्जर, हस्तिमल्ल, सदादान, सुदामा, श्वेतकुञ्जर, गजाग्रणी और नागमल्ल है।}} {{c|{{smaller|<poem>"इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रो देवराजोऽपि तं पुनः। आरुह्यौरावतं ब्रह्मन् प्रययावमराक्तीम्॥"</poem>}}}} {{right|{{smaller|(विष्णुपु॰ १।९।२५)}}}} २ नागरङ्ग, नारंगी। ३ लकुचवृक्ष, बड़हर। ४ नाग–विशेष। (त्की॰) ५ इन्द्रधनु। 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solid black}}</noinclude>चन्द्रवंशीय राजा थे। (हिं॰ पु॰) २ जलप्लावन, बाढ़। ३ आधिक्य, बढ़ती । ४ कोलाहल, हल्ला। ऐलक, {{smaller|एलक देखो।}} ऐलब (सं॰ पु॰) कोलाहल, शोर, हल्ला। ऐलबकार (सं॰ त्रि॰) १ कोलाहलकारी, शोर मचानेवाला। (पु॰) २ रुद्रका कुत्ता। ऐलबृद (सं॰ त्रि॰) खाघ लानेवाला, जो खाना लाता हो। ऐलवालुक (सं॰ त्की॰) एलवालुक स्वार्थे अण्। एलवालुक, एक अतर। {{smaller|एलवालुक देखो।}} ऐलविल (सं॰ पु॰) इलविलाया अपत्यं पुमान्, इलविल–अण्।‌ इलविला–पुत्र, कुवेर। ऐला (सं॰ स्त्री॰) नदीविशेष। {{smaller|(सह्याद्रिख॰ वदरीमा॰ २२अ॰)}} ऐलाक (सं॰ त्रि॰) ऐलाक्यस्य छात्रः अण, यञ्, लोपः। ऐलाक्यसे विद्या–पढ़नेवाला। ऐलिक (सं॰ पु॰) इलिन्यां भवः, ठक्। तंसु नामक राजा। यह इलिनीके पुत्र और दुष्मन्तादिके पितामह थे। ऐलव (स० पु० ) क (सखी) ईश्वरस्य इयम् - डीप । ईश्वर सम्बन्धिनी । ऐवालु, एलवालुक देखो। ऐश्वयं (सं० [को०) ईश्वरस्य भावः ईसर-चन् । १ ईश्वरका धर्म । इसका पर्याय - विभूति और भूति है। ऐष्टविव होता है- अणिमा, २ घिमा २ प्राप्ति, ४ प्राकाम्य, ५ महिमा ६ ईशित्व, ७ वशित्व और ८ कामावसायिता । २ सम्पत्ति, दौलत । ३ प्रभुत्व, मिलकियत । 8 शासनकर्ते व हुकमरानी । {{Multicol-break}} ऐशो (सं॰ स्त्री॰) ईशस्य इयम्, अण्–ङीप्। १ ईश्वर–सम्बन्धिनी। २ दुर्गा। ऐशी—एक मुसलमान कवि १६७५ ई॰को इन्होंने 'हफ़्त अख़्तर' नामक एक मसनवी लिखी थी। ऐशू (हिं॰ पु॰) पशुरोगविशेष, जानवरोंकी एक‌ बीमारी। इसमें पशु मुख रुक जानेसे जुगाली नहीं करते। ऐश्वर (सं॰ त्रि॰) १ प्रभु वा ईश्वरसे उत्पन्न। २ शक्तिशाली, आलीशान्। ३ ईश्वर–सम्बन्धीय। ४ सबसे बड़ा। ५ शिव–सम्बन्धीय। ऐश्वरिक (सं॰ पु॰) आस्तिक, ईश्वरवादी। ऐलेय ( सं .) १ एलवालुक, एक अतर २ मनुका, नाड़ीका शाक (पु० ) इलाया अपत्य ऐखयंकर्मा (स० पु० ) रेखयें कर्म यत्र बहुमो । पुमान् । ३ पुरुरवा । ४ मङ्गल । ईश्वर- कर्मयुक्त, बड़े-बड़े काम करनेवाला ऐश (सं० वि० ) ईशस्य इदम्, अण् । १ ईश- सम्बन्धय । ( ० पु० ) २ सुख, आराम । ऐश- एक मुसलमान् कवि। यह बादशाह शाह आलम के समय विद्यमान रहे। प्रकृत नाम मुहम्मद असकरी था । ऐशमूल (सं० क्लो० ) लाङ्गलोमूल, एक जड़ी । ऐशान (सं० वि०) १ शिवसम्बन्धीय । ( पु० ) २ ईशान कोषका वायु यह कटु और घोतल होता है । ( भावप्रकाश ) ऐप (सं० बि० ) ऐश्वर्यमस्तास्य रेखयं मतुप मध्वः । ऐखर्य विशिष्ट बड़ी ताकत रखनेवाला । ऐषम (सं अव्य०) अस्मिन् वत्सरे इति निया- तनात् साधुः । सद्यः परुत्पराय षम इत्यादि । पा ५।३।२२। वर्तमान वत्सर में मसाल ऐषमस्तन (सं०वि० ) ऐषमो भवः, ऐषमस्-तन ऐषमोह्यःश्वसो ऽन्यतरस्याम् । पा ४ २ १०५ । ऐषमसम्बन्धोय,. इस सालसे सरोकार रखनेवाला । ऐषमध्य (सं० वि०) एषमो भवः ऐषमस्-प् । वर्तमान वत्सर-सम्बन्धीय, इस सालसे सरोकार रखनेवाला । ऐशानी (सं० स्त्री० ) ईशानस्य यम्, ईशान- -ण- ङोप । १ ईशानकोण । २ शक्तिविशेष । ३ दुर्गा । ऐशिक (सं० ० ) शस्य भयम्, ईश ढक् । १ ईश्वर- सम्बन्धीय। २ मिवसम्बन्धोय २ राजसम्बन्धीय, बादमा सरोकार रखनेवाला । ऐषिका ऐषावीर (सं० ति०) दुर्बल, शक्तिहीन, कमजोर । (सं० [स्त्री०) १ पाठा । २विता । ऐषीक (सं० क्लो० ) इषोकमेव, खार्थे ण् । १ महा- भारतीय एक पर्वत । २ अस्त्र विशेष । षौक देखी ।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> qalc4stujr7d90fgtde9h2mfw9q0aou 667822 667783 2026-07-15T18:52:14Z आदेश यादव 3609 667822 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४८०|ऐलक—ऐषीक|}} {{Multicol|line=1px solid 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शासनकर्ते व हुकमरानी । ईश्वर- कर्मयुक्त, बड़े-बड़े काम करनेवाला ऐखयंकर्मा (स० पु० ) रेखयें कर्म यत्र बहुमो (सखी) ईश्वरस्य इयम् - डीप । ईश्वर सम्बन्धिनी । ऐप (सं० बि० ) ऐश्वर्यमस्तास्य रेखयं मतुप मध्वः । ऐखर्य विशिष्ट बड़ी ताकत रखनेवाला । ऐषम (सं अव्य०) अस्मिन् वत्सरे इति निया- तनात् साधुः । सद्यः परुत्पराय षम इत्यादि । पा ५।३।२२। वर्तमान वत्सर में मसाल ऐषमस्तन (सं०वि० ) ऐषमो भवः, ऐषमस्-तन ऐषमोह्यःश्वसो ऽन्यतरस्याम् । पा ४ २ १०५ । ऐषमसम्बन्धोय,. इस सालसे सरोकार रखनेवाला । ऐषमध्य (सं० वि०) एषमो भवः ऐषमस्-प् । वर्तमान वत्सर-सम्बन्धीय, इस सालसे सरोकार रखनेवाला । ऐषिका ऐषावीर (सं० ति०) दुर्बल, शक्तिहीन, कमजोर । (सं० [स्त्री०) १ पाठा । २विता । ऐषीक (सं० क्लो० ) इषोकमेव, खार्थे ण् । १ महा- भारतीय एक पर्वत । २ अस्त्र विशेष । षौक देखी ।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> m67fprfl5jxlwp6w5emcg8eju3y1u7q 667823 667822 2026-07-15T19:06:47Z आदेश यादव 3609 667823 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४८०|ऐलक—ऐषीक|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>चन्द्रवंशीय राजा थे। (हिं॰ पु॰) २ जलप्लावन, बाढ़। ३ आधिक्य, बढ़ती । ४ कोलाहल, हल्ला। ऐलक, {{smaller|एलक देखो।}} ऐलब (सं॰ पु॰) कोलाहल, शोर, हल्ला। ऐलबकार (सं॰ त्रि॰) १ कोलाहलकारी, शोर मचानेवाला। (पु॰) २ रुद्रका कुत्ता। ऐलबृद (सं॰ त्रि॰) खाघ लानेवाला, जो खाना लाता हो। ऐलवालुक (सं॰ त्की॰) एलवालुक स्वार्थे अण्। एलवालुक, एक अतर। {{smaller|एलवालुक देखो।}} ऐलविल (सं॰ पु॰) इलविलाया अपत्यं पुमान्, इलविल–अण्।‌ इलविला–पुत्र, कुवेर। ऐला (सं॰ स्त्री॰) नदीविशेष। {{smaller|(सह्याद्रिख॰ वदरीमा॰ २२अ॰)}} ऐलाक (सं॰ त्रि॰) ऐलाक्यस्य छात्रः अण, यञ्, लोपः। ऐलाक्यसे विद्या–पढ़नेवाला। ऐलिक (सं॰ पु॰) इलिन्यां भवः, ठक्। तंसु नामक राजा। यह इलिनीके पुत्र और दुष्मन्तादिके पितामह थे। ऐलूष (सं॰ पु॰) कवषके अपत्य। ऐलेय (सं॰ त्की॰) १ एलवालुक, एक अतर। २ नलुका, नाड़ीका शाक। (पु॰) इलाया अपत्यं पुमान्। ३ पुरुरवा। ४ मङ्गल। ऐल्वालु, {{smaller|एलवालुक देखो।}} ऐश (सं॰ त्रि॰) ईशस्य इदम्, अण्। १ ईश–सम्बन्धीय। (अ॰ पु॰) २ सुख, आराम। ऐश—एक मुसलमान् कवि। यह बादशाह शाह आलमके समय विद्यमान रहे। प्रकृत नाम मुहम्मद असकरी था। ऐशमूल (सं॰ त्की॰) लाङ्गलीमूल, एक जड़ी। ऐशान (सं॰ त्रि॰) १ शिवसम्बन्धीय। (पु॰) २ ईशान कोणका वायु। यह कटु और शीतल होता है। {{smaller|(भावप्रकाश)}} ऐशानी (सं॰ स्त्री॰) ईशानस्ययेम्, ईशान–अण्–ङीप। १ ईशानकोण। २ शक्तिविशेष। ३ दुर्गा। ऐशिक (सं॰ त्रि॰) ईशस्य अयम्, ईश–ढक्। १ ईश्वर–सम्बन्धीय। २ शिवसम्बन्धीय। ३ राजसम्बन्धीय, बादशाहसे सरोकार रखनेवाला। {{Multicol-break}} ऐशो (सं॰ स्त्री॰) ईशस्य इयम्, अण्–ङीप्। १ ईश्वर–सम्बन्धिनी। २ दुर्गा। ऐशी—एक मुसलमान कवि १६७५ ई॰को इन्होंने 'हफ़्त अख़्तर' नामक एक मसनवी लिखी थी। ऐशू (हिं॰ पु॰) पशुरोगविशेष, जानवरोंकी एक‌ बीमारी। इसमें पशु मुख रुक जानेसे जुगाली नहीं करते। ऐश्वर (सं॰ त्रि॰) १ प्रभु वा ईश्वरसे उत्पन्न। २ शक्तिशाली, आलीशान्। ३ ईश्वर–सम्बन्धीय। ४ सबसे बड़ा। ५ शिव–सम्बन्धीय। ऐश्वरिक (सं॰ पु॰) आस्तिक, ईश्वरवादी। ऐश्वरी (सं॰ स्त्री॰) ईश्वरस्य इयम्, अण्–ङीप। ईश्वर सम्बन्धिनी। ऐश्वर्य (सं॰ त्की॰) ईश्वरस्य भावः ईश्वर–व्यञ्। १ ईश्वरका धर्म। इसका पर्याय—विभूति और भूति है। ऐश्वर्य अष्टविध होता है—१ अणिमा, २ लघिमा, ३ प्राप्ति, ४ प्राकाम्य, ५ महिमा, ६ ईशित्व, ७ वशित्व और ८ कामावसायिता। २ सम्पत्ति, दौलत। ३ प्रभुत्व, मिलकियत। ४ शासनकर्तत्व, हुक्मरानी। ईश्वर- कर्मयुक्त, बड़े-बड़े काम करनेवाला ऐखयंकर्मा (स० पु० ) रेखयें कर्म यत्र बहुमो ऐप (सं० बि० ) ऐश्वर्यमस्तास्य रेखयं मतुप मध्वः । ऐखर्य विशिष्ट बड़ी ताकत रखनेवाला । ऐषम (सं अव्य०) अस्मिन् वत्सरे इति निया- तनात् साधुः । सद्यः परुत्पराय षम इत्यादि । पा ५।३।२२। वर्तमान वत्सर में मसाल ऐषमस्तन (सं०वि० ) ऐषमो भवः, ऐषमस्-तन ऐषमोह्यःश्वसो ऽन्यतरस्याम् । पा ४ २ १०५ । ऐषमसम्बन्धोय,. इस सालसे सरोकार रखनेवाला । ऐषमध्य (सं० वि०) एषमो भवः ऐषमस्-प् । वर्तमान वत्सर-सम्बन्धीय, इस सालसे सरोकार रखनेवाला । ऐषिका ऐषावीर (सं० ति०) दुर्बल, शक्तिहीन, कमजोर । (सं० [स्त्री०) १ पाठा । २विता । ऐषीक (सं० क्लो० ) इषोकमेव, खार्थे ण् । १ महा- भारतीय एक पर्वत । २ अस्त्र विशेष । षौक देखी ।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 0nxl9leylva8fr8ngqs2cifzq8qucwi 667834 667823 2026-07-16T06:42:47Z आदेश यादव 3609 667834 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४८०|ऐलक—ऐषीक|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>चन्द्रवंशीय राजा थे। (हिं॰ पु॰) २ जलप्लावन, बाढ़। ३ आधिक्य, बढ़ती । ४ कोलाहल, हल्ला। ऐलक, {{smaller|एलक देखो।}} ऐलब (सं॰ पु॰) कोलाहल, शोर, हल्ला। ऐलबकार (सं॰ त्रि॰) १ कोलाहलकारी, शोर मचानेवाला। (पु॰) २ रुद्रका कुत्ता। ऐलबृद (सं॰ त्रि॰) खाघ लानेवाला, जो खाना लाता हो। ऐलवालुक (सं॰ त्की॰) एलवालुक स्वार्थे अण्। एलवालुक, एक अतर। {{smaller|एलवालुक देखो।}} ऐलविल (सं॰ पु॰) इलविलाया अपत्यं पुमान्, इलविल–अण्।‌ इलविला–पुत्र, कुवेर। ऐला (सं॰ स्त्री॰) नदीविशेष। {{smaller|(सह्याद्रिख॰ वदरीमा॰ २२अ॰)}} ऐलाक (सं॰ त्रि॰) ऐलाक्यस्य छात्रः अण, यञ्, लोपः। ऐलाक्यसे विद्या–पढ़नेवाला। ऐलिक (सं॰ पु॰) इलिन्यां भवः, ठक्। तंसु नामक राजा। यह इलिनीके पुत्र और दुष्मन्तादिके पितामह थे। ऐलूष (सं॰ पु॰) कवषके अपत्य। ऐलेय (सं॰ त्की॰) १ एलवालुक, एक अतर। २ नलुका, नाड़ीका शाक। (पु॰) इलाया अपत्यं पुमान्। ३ पुरुरवा। ४ मङ्गल। ऐल्वालु, {{smaller|एलवालुक देखो।}} ऐश (सं॰ त्रि॰) ईशस्य इदम्, अण्। १ ईश–सम्बन्धीय। (अ॰ पु॰) २ सुख, आराम। ऐश—एक मुसलमान् कवि। यह बादशाह 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२ लघिमा, ३ प्राप्ति, ४ प्राकाम्य, ५ महिमा, ६ ईशित्व, ७ वशित्व और ८ कामावसायिता। २ सम्पत्ति, दौलत। ३ प्रभुत्व, मिलकियत। ४ शासनकर्तत्व, हुक्मरानी। ऐश्वर्यकर्मा (सं॰ पु॰) ऐश्वर्यं कर्म यस्य, बहुव्री॰। ईश्वर–कर्मयुक्त, बड़े–बड़े काम करनेवाला। ऐश्वर्यवत् (सं॰ त्रि॰) ऐश्वर्यमस्त्यस्य ऐश्वर्य–मतुप् मस्य वः।‌ ऐश्वर्यविशिष्ट बड़ी ताक़त रखनेवाला। ऐषमः (सं॰ अव्य॰) अस्मिन् वत्सरे इति निपातनात् साधुः। {{smaller|सद्यः परुत्परार्यैषम इत्यादि। पा ५।३।२२।}} वर्तमान वत्सरमें, इमसाल ऐषमस्तन (सं॰ त्रि॰) ऐषमो भवः, ऐषमस्-तन। ऐषमोह्यःश्वसो ऽन्यतरस्याम्। पा ४।२।१०५।ऐषमसम्बन्धीय, इस सालसे सरोकार रखनेवाला। ऐषमस्त्य (सं॰ त्रि॰) एषमो भवः, ऐषमस्-त्यप्। वर्तमान वत्सर–सम्बन्धीय, इस सालसे सरोकार रखनेवाला। ऐषावीर (सं॰ त्रि॰) दुर्बल, शक्तिहीन, कमज़ोर। ऐषिका (सं॰ स्त्री॰) १ पाठा। २ त्रिवृता। ऐषीक (सं॰ त्की॰) इषीकमेव, स्वार्थे अण्। १ महाभारतोक्त एक पर्वत। २ अस्त्रविशेष। {{smaller|इषीक देखो।}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 4mlqs5e6vlozqk803qpxb5h307xp49y 667835 667834 2026-07-16T09:38:01Z आदेश यादव 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सारस्यायन, चान्द्रायण, झाक्षायण, वाचा- यप, चौड़ायन, जौलायन, खाड़ायन, दासमित्रि, दासमित्रायण, शौद्रायण, दाचायण, शायण्डायन, तार्च्छायण, शौभ्रायण, सौवीर, सौवोरायण, भयण्ड, शौण्ड, शयाण्ड, वैश्वमानव, वैश्वधेनव, नड़, तुण्डदेव, विश्वदेव और सापिङ शब्द पड़ता है। ऐष्टक (सं० क्रो०) याचिक ईटोंका ढेर । ऐष्टिक (सं० पु० ) दृष्टि ठक् । १ इष्टिके व्याख्यानका ग्रन्थ । २ यज्ञके हितका विषय । ३ अन्तर्वेदिक कर्म- विशेष (बि०) ४ यश के साधन में समर्थ ५ यत्र- सम्बन्धीय । ऐष्टिकपौर्तिक (सं० त्रि० ) इष्टापूर्त - सम्बन्धीय | ऐसा (हिं० क्रि० वि० ) इस प्रकार से, इस तौरपर । ऐहलौकिक (स०] [वि०) हो भवः इहलोक ठक् । १ वर्तमान जन्मसम्बन्धीय । २ मर्त्यलोक सम्वन्धीय इस दुनिया से सरोकार रखनेवाला । ऐहिक (सं० वि०) भवम् -ठक् । १ इह लोक-जात, इस दुनियासे पैदा । २ इहलोक-सम्बन्धीय, इस दुनियासे सरोकार रखनेवाला । ऐहिकदर्शी (सं० वि० ) इहलोकके कार्य निरीक्षण- करनेवाला, जो इस दुनियाके काम देखता हो ।' ऐहोल - बम्बईप्रान्तके वीजापुर जिलेका एक ग्राम यहां जो शिलालेख मिला, उसमें २य पुलकेशीका परिचय पड़ा है। ओ ओ—स्वरवर्णका त्रयोदश अश्चर । इसके उच्चारणका स्थान कण्ठ ं और प्रोष्ठ है। यह वर्ण दीर्घ एवं झुत भेदसे दो प्रकारका होता है। कामधेनुसन्धमें कहा, कि बोकार पक्षदेवमय विद्युताकार, चिगुणात्मक, {{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}131}}{{Multicol-break}} ईश्वर, पचमाचमय, देवमाता चोर परमकुण्डली है। लिखने में यह वाम दिवसे कुण्डली वन दचिप दि मध्यस्थल में सिकुड़ेगा, उसके पीछे अधोदेशमें पुनर्वार वामदिकको चलेगा। इसको सकल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर अवस्थान करते हैं। इसकी मात्रा ब्रह्मरूपियो महामति है। (वर्षोहारतन्त्र ) तन्त्रात्रो प्रकारका नाम-सत्य, पीयूष, पथि- मास्य, श्रुति, शिरा, सद्योजात, वासुदेव, गायत्री, दो- जङ्घक, आप्यायनी, ऊर्ध्वदन्त, लक्ष्मी, वाणी, मुखी, द्दिज, उद्देश्यदर्शक, तीव्र, कैलास, वसुधाचर, प्रणवांध, ब्रह्मसूत्र, अजेश, सर्वमङ्गला, त्रयोदशी, दीर्घनासा, रतिनाथ, दिगम्बरा, वं लोकयविजया, प्रभा पर प्रीति- वोजादिकर्षण है। माढकान्यासके अनुसार दन्तको पंचियर न्यास किये जानेगे अभिधानमें चोकारका एक नाम 'ऊर्ध्व दन्तपंक्ति' भी है। २ धातुका एक अनुबन्ध। “भोर्निष्ठा त नः ।” ( कविकल्पदुम) ( अव्य० ) ३ सम्बोधन । ४ ब्राह्नान । ५ स्मरण । ६ अनुकम्पा ( पु० ) ७ ब्रह्मा । ओं (सं० अव्य० ) १ ओङ्कार, प्रणव । ओम् देखो । २ तथास्तु, आमोन्, बहुत अच्छा । पॉइना (हिं० क्रि०) वारना, सदके या न्योछावर करना । ओंकना, ओकना देखो। आँगना (हिं० क्रि०) शकटके श्रचिमें तेल देना, गांड़ीके घुरमें तेल लगाना। ओंगने से शकटका चक्र बेखटके चलता है | घोंगा (हिं० पु० ) अपामार्ग, लटजीरा । ओटना, चोटना देखो। ओंठ (हिं०) श्रेष्ठ देखो। घोड़ा (चिं०वि०) १ गभीर, गहरा (पुं) २. मले गड्डा । ३ सेंध । (हिं.पु.) विशेष, एक रखो। इससे छाजन पूरी करनेकी लकड़ियां बांधी जाती है। श्रधा ( हिं० पु० ) हस्ती पकड़नेका गर्त, हाथो फांसनेका गड़ो। श्रोषाक (सं अव्य०) १ वमनके वेगका शब्द, के<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> kdc1fuktkf65x1nitjwezq45gofmp6v 667838 667837 2026-07-16T09:56:22Z आदेश यादव 3609 667838 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ऐषुकारि—ओआक|४८१}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ऐषुकारि (सं॰ पु॰) एषुकारस्य अपत्यम्, इसीकार इन्। वाण निर्माताका पुत्र, तोर बनानेवाले का बेटा। ऐषुकारिभक्त (सं० क्लो० ) ऐषुकारिणां विषयो देशः, ऐषुकारि-भक्त र कार्यादिमी विमा ४।२।५४। १ ऐषुकारिविषय । २ ऐषुकारि देश, जिस मुल्क में तोर बनानेवाले रहें। कार्यादि (सं० पु० ) पावित्युक्त मयविशेष। इसमें ऐषुकारि, सारस्यायन, चान्द्रायण, झाक्षायण, वाचा- यप, चौड़ायन, जौलायन, खाड़ायन, दासमित्रि, दासमित्रायण, शौद्रायण, दाचायण, शायण्डायन, तार्च्छायण, शौभ्रायण, सौवीर, सौवोरायण, भयण्ड, शौण्ड, शयाण्ड, वैश्वमानव, वैश्वधेनव, नड़, तुण्डदेव, विश्वदेव और सापिङ शब्द पड़ता है। ऐष्टक (सं० क्रो०) याचिक ईटोंका ढेर । ऐष्टिक (सं० पु० ) दृष्टि ठक् । १ इष्टिके व्याख्यानका ग्रन्थ । २ यज्ञके हितका विषय । ३ अन्तर्वेदिक कर्म- विशेष (बि०) ४ यश के साधन में समर्थ ५ यत्र- सम्बन्धीय । ऐष्टिकपौर्तिक (सं० त्रि० ) इष्टापूर्त - सम्बन्धीय | ऐसा (हिं० क्रि० वि० ) इस प्रकार से, इस तौरपर । ऐहलौकिक (स०] [वि०) हो भवः इहलोक ठक् । १ वर्तमान जन्मसम्बन्धीय । २ मर्त्यलोक सम्वन्धीय इस दुनिया से सरोकार रखनेवाला । ऐहिक (सं० वि०) भवम् -ठक् । १ इह लोक-जात, इस दुनियासे पैदा । २ इहलोक-सम्बन्धीय, इस दुनियासे सरोकार रखनेवाला । ऐहिकदर्शी (सं० वि० ) इहलोकके कार्य निरीक्षण- करनेवाला, जो इस दुनियाके काम देखता हो ।' ऐहोल - बम्बईप्रान्तके वीजापुर जिलेका एक ग्राम यहां जो शिलालेख मिला, उसमें २य पुलकेशीका परिचय पड़ा है। ओ ओ—स्वरवर्णका त्रयोदश अश्चर । इसके उच्चारणका स्थान कण्ठ ं और प्रोष्ठ है। यह वर्ण दीर्घ एवं झुत भेदसे दो प्रकारका होता है। कामधेनुसन्धमें कहा, कि बोकार पक्षदेवमय विद्युताकार, चिगुणात्मक, {{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}131}}{{Multicol-break}} ईश्वर, पचमाचमय, देवमाता चोर परमकुण्डली है। लिखने में यह वाम दिवसे कुण्डली वन दचिप दि मध्यस्थल में सिकुड़ेगा, उसके पीछे अधोदेशमें पुनर्वार वामदिकको चलेगा। इसको सकल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर अवस्थान करते हैं। इसकी मात्रा ब्रह्मरूपियो महामति है। (वर्षोहारतन्त्र ) तन्त्रात्रो प्रकारका नाम-सत्य, पीयूष, पथि- मास्य, श्रुति, शिरा, सद्योजात, वासुदेव, गायत्री, दो- जङ्घक, आप्यायनी, ऊर्ध्वदन्त, लक्ष्मी, वाणी, मुखी, द्दिज, उद्देश्यदर्शक, तीव्र, कैलास, वसुधाचर, प्रणवांध, ब्रह्मसूत्र, अजेश, सर्वमङ्गला, त्रयोदशी, दीर्घनासा, रतिनाथ, दिगम्बरा, वं लोकयविजया, प्रभा पर प्रीति- वोजादिकर्षण है। माढकान्यासके अनुसार दन्तको पंचियर न्यास किये जानेगे अभिधानमें चोकारका एक नाम 'ऊर्ध्व दन्तपंक्ति' भी है। २ धातुका एक अनुबन्ध। “भोर्निष्ठा त नः ।” ( कविकल्पदुम) ( अव्य० ) ३ सम्बोधन । ४ ब्राह्नान । ५ स्मरण । ६ अनुकम्पा ( पु० ) ७ ब्रह्मा । ओं (सं० अव्य० ) १ ओङ्कार, प्रणव । ओम् देखो । २ तथास्तु, आमोन्, बहुत अच्छा । पॉइना (हिं० क्रि०) वारना, सदके या न्योछावर करना । ओंकना, ओकना देखो। आँगना (हिं० क्रि०) शकटके श्रचिमें तेल देना, गांड़ीके घुरमें तेल लगाना। ओंगने से शकटका चक्र बेखटके चलता है | घोंगा (हिं० पु० ) अपामार्ग, लटजीरा । ओटना, चोटना देखो। ओंठ (हिं०) श्रेष्ठ देखो। घोड़ा (चिं०वि०) १ गभीर, गहरा (पुं) २. मले गड्डा । ३ सेंध । (हिं.पु.) विशेष, एक रखो। इससे छाजन पूरी करनेकी लकड़ियां बांधी जाती है। श्रधा ( हिं० पु० ) हस्ती पकड़नेका गर्त, हाथो फांसनेका गड़ो। श्रोषाक (सं अव्य०) १ वमनके वेगका शब्द, के<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> qiqndch12n09osucjj3yd03msicjzrx पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३८ 250 76370 667815 609266 2026-07-15T18:20:03Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 667815 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओम्|५३७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>फिर आत्माके पादस्वरूप अकार, उकार और मकार- को अधिकारकर अचर ( घोडार) सर्वदा अवस्थित है। चामाका पाद हो चोद्वारको मात्रा है। जिस स्थान से प्राणो जागरित होते, उम्रो खानको वैश्वानर पदवाच्य प्रकार बोलते हैं। यह अकार हो कारको प्रथम मात्रा है। जो व्यक्ति व्यापित्व एवं आदिमत्व द्वारा अकार तथा वैश्वानरको साम्य उपा- सना उठाता, वह समस्त अभीष्ट फल पाता और समुदायका श्रादि बन जाता है |2| स्वप्नस्थान तेजस हो श्रीङ्कारको द्वितीय मात्रा उकार है। जो व्यक्ति इसको उत्कर्ष एवं प्राप्त विश्वका मध्यस्थ समझ तेजस दृष्टि द्वारा उपासना करता, उसका ज्ञान बढ़ने लगता, शत्रु मित्र उभय उसके पक्ष में समान पड़ता और उसके वंश में कोई ब्रह्मज्ञानविहीन नहीं रहता ॥ १०॥ प्राज्ञ नामक सुषुप्त स्थान हो तृतीय मात्रा मकार हैं। मिति एवं अपोति द्वारा मकार तथा प्राज्ञको साम्य उपासना करनेसे अधिकारी जगत्‌को प्रत अवस्था देख पाता और ब्रह्मखरूपमें लोन हो जाता है |११| जो तुरोय ब्रह्म है, वह किसी व्यवहारका विषय नहीं। वह प्रपचविहीन पोर मङ्गलमय है। वही 'एकमेवादितोयं महावाक्यका पोर पोर स्वरूप है। वह समुदायमें जीवात्मा के भावसे विराज रहा है। जो उसका प्रकृत तत्त्व समझ सकता, वही स्वोय जोवामा द्वारा परमात्मा के साथ मिलता है | १२ | अथर्वशिराके मतमें— "हृदि त्वमसि यो नित्व ं विखो मावा: परस्तु सः।" जो हृदय में नित्य रहते, उन्हीं आपको प्रणव अ-उ-म् तीन मात्रा कहते हैं उन्हीं प्रदिखित पुरुषका उत्तरभाग पोद्दार है। पोइसर हो सर्वव्यापी, अनन्त, तारक, शुक्ल, सूक्ष्म, विद्युत् और ब्रह्म है । जो ब्रह्म है, वह एक है । वही रुद्र, वही ईशान और वही महेश्वर है। अनन्तर निर्देश करती है- “अथ कस्मादुच्यते श्रोद्धारः यस्मादुच्चार्यमाण एव प्राणान् ऊर्ध्वं मृत- क्रामयति तस्मादुच्यते श्रोद्धारः । अथ कस्मादुच्यते प्रणवः यस्मादुच्चार्य माय ! Vol. III. 135 {{Multicol-break}} एव ऋग्यजुः सामाधर्वाविरम: ब्रह्म ब्राह्मणेभ्यः प्रणामयति नामयति च तस्मादुचाते प्रणवः।” पथभितोपनिषद पोद्वारका स्वरूप विशेष - "ओमित्येतदचरमादी प्रयुक्त ध्यानध्यायितव्यम् । श्रमित्ये तदचरख पादयत्वारो देववत्वारो वेदश्वत्वारः चतुष्पादेतचर पर ब्रह्म पूर्वास्य मावा पृथिव्यकारः स ऋॠिग्वेदी ब्रह्मा वसवो गायव गाईपत्यः । द्वितौयान्तरिचमुकारः स यजुभिर्यजुर्वेदो विश्वरुद्रास्त्रिष्ट ुप दक्षिणाग्निः । वृतौयो धौर्मकार स मामभिः सामवेदी विश्वरादित्याजगत्याहवनीयः । यात्रमाऽस्त्र चतुर्थ्यां च मावा मा लुप्तमकारः सोऽथर्वणैर्मन्त्रं रथर्व वेदः सवर्त- कोऽग्निर्मस्ते विराड़क ऋषि ।" इत्यादि । प्रथमतः 'औ' अक्षर लगा ध्यान करना चाहिये । अचरके पाद चार हैं। चतुष्पादविशिष्ट पद अक्षर हौ परब्रह्म है। इसकी अकारस्वरूप प्रथम मात्रा पृथिवी है। व् मन्त्रद्वारा उपलचित होने इसे ऋगवेद कहते है। इसके देवता ब्रह्मा, वसू गाय और गाय है। द्वितीय पाद उकार चन्त वह यजुर्मन्त्र रिच है । द्वारा उपलचित होनेसे यजुर्वेद कहता है। उसके देवता विष्णु, रुद्र, त्रिष्टुप् और दक्षिणाग्नि है हृतीय पाद-दो मकार है। साममन्त्र द्वारा उपलचित होनेसे सामवेद नाम पड़ता, है। देवता विष्णु एवं आदित्य हैं। जगती भावहनीय पोहार अन्तमें जो मात्रा रहती वही लुप्त प्रकार है। इसका विराम लोप हो जानेसे स्पष्ट समझ नहीं पड़ता । आथर्वण मन्त्र द्वारा संयोजित होनेसे इसको अथर्ववेद कहते हैं। इसके देवता संवर्त्तक अग्नि, वायु विराट् और एक ऋषि नामक अग्नि है। भोङ्कारके शिरोभागको मात्रा अतिरमणीय, दीप्तिमान् और स्वप्रकाश है। चोद्वारको प्रथम मात्रा ( अकार ) रक्तवर्ण है । इसमें सर्वदा ब्रह्मा अवस्थ करते हैं । ब्रह्मा ही इसके अधिष्ठाट - देवता भी हैं। द्वितीय मात्रा (उकार) शुक्लवर्ण है। इसमें रुद्र रहते हैं । रुद्र हो इसके अधिष्ठाट - देवता भी है। बतोय मात्रा (मकार) कृष्णवर्ष है। इसमें विष्णु अवस्थान करते हैं। इसके अधिष्ठाता भौ विष्णु हो हैं । चतुर्थ मात्रा ( लुप्त मकार ) सर्व वर्ण-<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> mrdfkxq5oni1ydhs46dek26rdzme9el पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५३९ 250 76372 667818 609267 2026-07-15T18:24:31Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 667818 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५३८|ओम्|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मय है। इसमें विद्युत् विराजमान है। ईमार इसका अधिष्ठात्र देवता है । इस पोङ्कारके चार पद और चार मुख हैं। नादसंज्ञक लुप्त मकाररूप प मात्रा इस श्रङ्गारकी चतुर्थ मात्रा है। इसको सूक्ष्म मात्रा कहते हैं । स्थूलमात्रा हस्व, दोघं तथा लुत भेदसे तीन प्रकारको होती है। 'ॐ' एकमात्रा विशिष्ट होनेसे इस दिमानाविशिष्ट (घोंघों) होनेसे दोघं और त्रिमात्रा ( ओ ओ ओ ) विशिष्ट होनेसे प्लुत कहाता है। अनुपमरूप शान्तभावापत्र स्वप्रकाश चतुर्थमात्रा त प्रयोग में अभिव्यक्त पड़ती, वह किसी शब्द द्वारा समझपर नहीं चढ़ती । श्रङ्कार एकवार मात्र उच्चारित होनेसे मनके साथ सकल प्राण- वायुको षट्चक्रमेदपूर्वका नाड़ी दारा जई देश (शिरोदेश ) में उतकामित करता है। इससे इसको पोद्वार कहते हैं। सकल प्राणवायुको नम्रता और कुम्भकादि द्वारा गतिरोध करने से चोहारको 'प्रणव' कहते हैं। चोद्वार चार भागमें अवस्थित होनेसे चार देवता (ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु और ईश्वर ) रखता और चार वेद (ऋक्, यजुः साम घोर पथ का उत्पत्तिस्थान ठहरता है । प्रकार उकार प्रभृति चोहार जो चार पाद होते, ध्यानके समय उन्हें छोड़ना न चाहिये । किन्तु अकारादि विशिष्ट श्रोङ्कारको हो ध्यान करना उचित है वैसा होनेपर चकारादिके ( अधिष्ठाता ) देवता समुदाय दुःख चोर भयसे उपासकको प्रवश्य हो वाथ करेंगे। आापकारी होनेसे हो स्वयं विष्णुने पोहार और उसको मात्राको ध्यान किया था। इससे वह असुरोंको जीत सके। इन्द्रिय संयत रख पोद्धारको ध्यान करने से हो पितामह ब्रह्मा (ड) बने अर्थात् ब्रह्मा जगत्सृष्टि करने में समर्थ हुवे थे। क्योंकि ईश्वर ही समुदाय सृष्टिका कर्त्ता है। इसीसे विष्णुने श्रोङ्कारात्मक नादान्त शान्त ब्रह्ममें मन लगा उसी ओङ्कारात्मक जगदोखरको ध्यान किया । श्रोङ्कारात्मक परमेश्वरने ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र एवं पचभूत के साथ समुदाय इन्द्रियको बनाया था। सकल कारणका सृष्टिकर्त्ता और एकमात्र मङ्गलमय {{Multicol-break}} एवं प्रभुशक्तिसम्पन्न है । वही सकल जीवोंके मध्य एक भावसे अवस्थान करता है । फिर उसने इस अपरिचित पावाशको बनाया है। उक्त नादान्त प्रणव के ध्यान कालपर समझना पड़ेगा- इसमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर पर शिव पांचो देवता विद्यमान है। अधिक यज्ञ करने से अधिक फलप्राप्तिको भांति पञ्चावयव ओङ्कारको स्थिर चित्तसे क्षणकाल भी ध्यान करने से शत शत यज्ञका पुण्य मिलता है । समुदाय ज्ञान, योग और ध्यानमें वह मङ्गलमव पोवार हो एकमात्र अवलम्बन है । जितने वैदिक ग्राम-यत्र कहाते, उन सबको छोड़ पोङ्गार अध्ययन करने पर दिन नियय हो गर्भवाससे कूट जाते हैं, फिर गर्भवास-जनित कष्ट नहीं उठाते।" "आत्मानमरणि' कृत्या प्रणवञ्चोत्तरारथिम् । ध्यान निर्मथनाभ्यासाद्दवं पश्यन्निगूढवत् ॥” ( ब्रह्मोपनिषद ) आमाको रण (निर्मन्य काष्ठ ) और प्रणवको उत्तरारणि* बना पुनः पुनः ध्यानरूप निर्मन्थन द्वारा गूढ़वकी भांति परमात्मा को देखना चाहिये । पहले ही कहा जा चुका - श्रोङ्कार हो ब्रह्म पहचानने का एक मात्र उपाय है। इससे उपनिषदुमें हारका रूपविशेष वर्णित है— " ओमित्ये काचरं ब्रह्म यदुक्त' ब्रह्मवादिभिः । शरीरं तस्य वच्चामि स्थान काल लय तथा ॥ तव देवास्त्रयः प्रोक्ता लोका वेदास्त्रयोऽग्रयः । तिस्रो मावाचं मावा च वाचरस्य शिवस्य च ॥ ऋग्वेदो गार्ह पत्यश्च पृथिवौ ब्रह्म रत्र च । अकारस्य शरीरन्तु व्याख्यातं ब्रह्मवादिभिः ॥ यजुर्वेदोऽन्तरिचञ्च द चया निस्तथैव च । विश्वाय भगवान् देव उकारः परिकोर्तितः ॥ सामवेदस्तथा दौवाहवनीयस्य वच । ईश्वरः परमो देवो मकारः परिकीर्तितः ॥ स ूर्य मण्डलमिवाभात्यकारः शङ्कमध्यमः । ठकारचन्द्रसङ्घाशस्तस्य मध्ये व्यवस्थितः ॥ मकारयाग्निसद्धाशी विध मी विद्युतोपमः । तिखो मात्रास्तथा ज्ञ ेयाः सोमश्वर्याग्नितेजसः ॥ जिन दो काष्ठोंकी परस्पर मन्यन करनेसे अग्नि उपजता, उनमें नीचेवालका चरपि और ऊपरवालका उत्तरारचि नाम पड़ता है।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> mw9xfe44im70f7s4y2jur8beby7fsr7 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५४० 250 76373 667819 609269 2026-07-15T18:27:22Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 667819 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओम्|५३८}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>शिखाभा दोपसङाथा यस्मिन्न परिवर्तते । मावा तु सा या प्रणवस्वोपरिस्थिता ॥ कांस्यघण्टा निनादस्तु यथा लौयति शान्तये । चोम् श्रङ्कारस्तु तथा योज्यः शान्तये सर्वमिच्छता ।” (ब्रह्मविद्योपनिषत् ) , ब्रह्मवादी जिस 'ॐ' अक्षरको ब्रह्म बताते, उसका शरीर, स्थान, काल और लय सुनाते हैं। इस मङ्गल- म हारके लोन देवता लोन लोड, सोन वेद लोन अग्नि और साढ़े तीन मात्रा हैं। ऋग्वेद, गार्ड- पत्यानि पृथिवीचौर ब्रह्माको ब्रह्मवादियोंने अकारका शरीर कहा है। यजुर्वेद, अन्तरिच, दचिणाग्नि और भगवान् विष्णु ठकारका शरीर हैं । सामवेद, स्वर्ग, आहवनीय, और ईश्वर मकारका शरीर है। सूर्यमण्डल -सदृश दीप्तिमान् प्रकार शङ्खशे मध्य और चन्द्रसदृश दीप्तिमान उकार उक्त प्रकारके मध्यं विराजता है। धूमरहित अर्थात् अतिशय 'दीप्तिशाली, अग्निसहथ एवं विद्युदाम जैसा शोभमान मकार है । उक्त पोद्धारको मोनों मात्रा क्रम चन्द्र सूर्य और अग्नि के तुल्य तेजःसम्पन है दोष- हम शिखा और दोसि कभी विमुक्त नहीं होती। पोहार के उपरि भागमें रहनेवालोको मात्रा कहते हैं। कांस्य और घण्टाके शव्दको तरह घोङ्कारके उच्चारणसे भी चित्तमें शान्ति आती है । इसलिये समुदाय दृष्टफल पनिको इच्छा रखनेवालेको सर्वदा श्रोङ्कार उच्चारण करना चाहिये ।” लिङ्गपुराण में पोद्वारको उत्पत्ति इस प्रकार वर्णित है— 'किसी समय भगवान् विष्णु मलयपयोधिके मध्य शेषको भव्यापर सोये थे। ब्रह्माने उन्हें निकट आकर जगा दिया। विष्णु ने उठकर हंसते हंसते कहा— " वत्स ब्रह्मन् ! तुम्हारा कुशल तो है ? वत्स ! तुम्हारा मङ्गल तो है ?' ब्रह्माने ऐसा सम्बोधन मन ही मन कुछ बुरा समझ विष्णु भत्सनापूर्वक पूछा था- 'बड़ा आश्चर्य है ! मैं सृष्टि, स्थिति और प्रलयका कर्ता!हूं। आप किस कारण मुझे, वक्स-वस कह कर पुकारते हो? इसी प्रकार अनेक पाविता होते होते पन्तको हाथाबाहों की नौबत आ गयी। {{Multicol-break}} घोरतर युद्ध चल हो रहा था, कि दोनोंके सम्म ुख एक दूसरे - मध्यसे अद्भुत बहुत ज्योतिर्मय लिङ्ग पाविभूत हुआ । उस समय दोनों युद्ध छोड़ अनुसन्धान करने लगे-यह ज्योतिर्मय लिङ्ग कहांसे आया है। विष्णु वराहमूर्ति धारण कर अधोगामी होते भी उस ज्योतिर्लिङ्गका मूल देख न सके थे। इधर ब्रह्मा हंसका रूप बना महावेगसे ऊपरको उड़, किन्तु के अन्ततक न पहुंचे। पीछे दोनों श्रान्त और क्लान्त हो ज्योतिर्लिङ्गको प्रणाम करते खड़े रह गये । दोनों हो साचने यह का है, यह कहा है वर्ष हो शब्द निकला था। दोनोंने घोंघों में उच्चारित त स्वर सुना । ब्रह्मा और विष्णु सोचते सोचते खड़े हो गये थे - यह महाशब्द क्या है, यह महाशब्द क्या है ! फिर दोनोंने देखा - लिङ्गके दचिव प्राद्यवयं चकार, . उत्तर उकार, मध्य मकार और ऊपर नादविन्दु है । उसके ऊपर समुदायका समवायरूप श्रोङ्कार शोभित है। दक्षिण दिशाका प्रकार सूर्यमण्डल, उत्तरस्थित उकार अग्नि और मध्यवर्ती मकार चन्द्र मण्डल जैसा तेजोमय है। ऊपर देख पड़नेवाला यह स्फटिकको शुद्द भांति तेजःसम्पन है। वह तुरीव हानेसे विद्युपासीत, अमृतस्वरूप, निष्कल, निरुपद्रव, इन्द होन, केवल, शून्य, वाह्याभ्यन्तररहित, भोतर और वाहरका स्वरूप, चादि, मध्य एवं अन्तरहित तथा आनन्दकारण है । चकार, उकार एवं मकार तीन मात्राके तथा नाद अर्धमात्राके रूपसे अवस्थान करता है । यहो शब्द ब्रह्म है। ऋक्, यजुः एवं साम तोनों वेद अकार, उकार तथा मकार तीनों मात्राके रूपसे अवस्थान करते हैं। यहां मन्दमय विखाबख शब्दब्रह्म है। समय से अतीन्द्रिय प्रकाशक वेद श्राविर्भूत हुये ! इस वेद निखिल जगत्का मङ्गल बनता है। विष्णु, इस वेदवाक्य द्वारा परमेश्वरको समझ सके थे । फिर यजुर्वेदने कहा - भगवान् रुद्र अचिन्त्य हैं । एकाचर प्रणव उन्होंका वाचक है। वह एकाचर- वाच्य रुद्र हो परमकारण, अमृतस्वरूप, ऋतुस्वरूप, सत्यस्वरूप, आनन्दस्वरूप, और परात्पर परम ब्रह्म- स्वरूप हैं । शब्द- ब्रह्मरूप एकाक्षर से प्रकार स्वरूप<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> tie56z32ofz7r3fatr7l7c1gmxfov1z पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५४१ 250 76375 667820 609270 2026-07-15T18:29:12Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 667820 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५४०|ओम्}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ब्रह्मा उत्पन्न हुये हैं। इसी एकाक्षरसे उकार स्वरूप विष्णु और मकारस्वरूप रुद्र निकले हैं। इसके मध्य अकारस्वरूप ब्रह्मा सृष्टिकर्त्ता, उकाररूप विष्णु पालन- कर्त्ता चोर मकाररूप इन दोनोंके प्रति अनुद कारो है। इसमें काररूप ब्रह्मा वौजस्वरुप, उकार रूप विष्णु योनिस्वरूप और मकाररूप रुद्र निषेककर्त्ता हैं। वोल, योनि, निषेक और शब्द ब्रह्मरूप चारो प्रणवात्मक हैं । शब्द ब्रह्मरूप निषेक- कर्ता मध्यार के इच्छानुसार अपनको पृथक् कर श्रवस्थान करते हैं। इसी शब्द ब्रह्मस्वरूप ईश्वर के लिङ्गसे अकारस्वरूप वौजको उत्पत्ति हुयी थी । वह वीज फिर उकाररूप योनिमें पड़ बढ़ने लगा । पौछे उससे सोनेका एक अण्डा निकला था। सहस्र वर्ष बोलने पर महेश्वरको इच्छा अनुसार दिखण्ड होते उससे हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुये । उसके ऊर्ध्व- भाग से स्वर्ग और अधोभागसे पाताल निकला । चकार रूप जो ब्रह्मा उपजे वो सर्वलोक कर्ता हैं। उन्होंने सत्व, रज और तमः गुणत्रयके भेदसे तीन मूर्ति धारण की हैं। (लिङ्गपु० ७म०) भगवान् मनुके मत- “अकारखाप्युकारच मकारञ्ज प्रजापतिः । वेदवात् निरदुहत् भूर्भु बस्तरिति विधा ॥" ( २७६ ) " अकार, उकार एवं मकार और भूः भुवः स्वः व्याइतिलयको प्रजापति ब्रह्माने यथाक्रम तीनों वेदसे उहार किया था। तर निघण्टुमें लिखा है- “श्रद्धारी वर्तु लस्तारो विन्दुः शक्तिस्त्रिदेवता प्रणवो मन्त्रगर्भश्च पञ्चदेवो ध्रुवः' शिव । ॥ मन्त्रार्थं परमं वोजं मूलमादाय तारकः । शिवादि व्यापकी व्यक्तः परं ज्योतिश्व संविदः ॥ " ओङ्कार वर्तुल, सारक, विन्दु यक्ति विदेवता, प्रणव मन्त्रगर्भ, पचदेव, ध्रुव, शिव चादिमन्त्र, परमवोल, मूल, प्रायतारक, शिवादिव्यापक, व्यक्त, श्रेष्ठ, ज्योतिः श्रौर संविद है। यह ॐ शब्द मन्त्रविशेष है। यह मन्त्र भगवान्को पतिप्रिय है। {{Multicol-break}} "ॐ तत्सदिति निदेशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्ते न वेदाय यज्ञाय विहिताः पुरा ॥ तस्मादमित्य दाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः । प्रवर्तते विधानोनाः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपः क्रियाः । दानक्रियाय विविधाः कियन्ते मोचकाङ्गिभिः ॥ सहावे साधुभावे च सदित्य तत् प्रयुज्यते । प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युजाते ॥” (गीता १७५० २३ २६ नो० ) परमात्मा ब्रह्म के तीन नाम हैं - ॐ, तत् और सत् । इससे ब्रह्मवादी श्रोङ्कार के उच्चारणसे यज्ञ, दान और तपस्यादि क्रिया सर्वदा अनुष्ठान करते हैं । मोक्षा- काही 'तत्' शब्द उच्चारणसे फलाकाङ्गारहित तप, यज्ञ और दानादि कार्यका अनुष्ठान किया करते हैं। हे पा' ! 'सत्' शब्द साधुभाव बतानेको बोला जाता है। इसके अतिरिक्त यज्ञ, तपस्या चौर दानादि प्रशस्त कार्यमें भी सत् शब्दका प्रयोग होता है । ( ॐ तत् सत् त्रिविध ब्रह्मका नाम उच्चारण करने से हो सकल कार्य सिद्ध हो सकता है ) । योगशास्त्र के मतने ॐ मन्त्र जप न करनेसे किस प्रकार योगी सिद्ध हो सकता है ! यह मन्त्र जप करनेसे परम कारुणिक भगवान् भक्तोंके चित्तको एका तासाधक शक्ति देते हैं। योगसूत्रकारने कहा - " तज्जपस्तदर्थभावनम् । ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽपान्तरायाभावाच ॥ उस प्रणवका जप तथा अर्थ भावना करने से ईश्वरत देख पढ़ता थोर व्याधि, अकर्मण्यता, संशय, अनवधानता, आलस्य, इन्द्रियके विषयको प्रबलता प्रभृति अन्तराय भगता है । भगवान् मनुने कहा है- “प्राक् कुशान् पर्युपासीनः पविचैव पावितः प्राणायामैस्त्रिभिः पूतस्तत ओडारमर्हति ॥” कुछ कुम पूर्वाभिमुख रख, । (२७५ ) उनके ऊपर बैठ और दोनों हाथमें कुश ले पवित्र होना चाहिये । फिर पचदम स्वस्वर उच्चारणके उपयुक्त समयमें तोन वार प्राचायाम द्वारा यह होनेपर अधिकारी प्रपवोचा- रणके योग्य बनता है । किन्तु योगो जिस भाव से श्रोछार जप करते, वह 1<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> lv55o3f7s4ueg4ojlj8r9pzyt8fnipx पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२०४ 250 83373 667800 667765 2026-07-15T16:22:51Z Shivaniya shaw 4129 667800 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{rh||'''अजमेर-अजय'''|'''१९८'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>इस दरगाहको पवित्र समझते हैं। शहाबुद्दोनके दोष नष्ट हो जाते हैं। युरोपीय चिकित्सकोंने अजमेरको आक्रमण करने आनेसे पहले खाजा मुईनुद्दीन चिश्ती नामक एक फ़कोर इस जगह आ पहुंचे थे। प्रायः वह खाजा नामसे प्रसिद्ध करती है। यह दरगाह उन्हींका कबरस्थान है। प्रति वत्सर इसमें उर्स नामका एक मेला लगता है। वह छः दिन रहता और उसमें कोई २०,००० लोग समवेत होते हैं। अजमेरमें एक दूसरी भी बड़ी मसजिद है, जो पहले जैनियोंका मन्दिर रही, पीछे मुसलमानोंने उसपर अपना अधिकार किया। अनासागर इदके ऊपर जहांगीरने सफेद पत्थरका महल बनवाया था। आजकल उसमें चीफ कमिशनर वास करते हैं। स्थलमें अजमोदाको जगह अजवायन, जङ्गली अज- वायन प्रभृति सकल प्रकारको अजवायने समझो जाती हैं। किन्तु यह बात ठीक नहीं। अजमोदा, अजवायन और जङ्गली अजवायन,-यह तीनो एक हो श्रेणोके उद्भिद् (Umbellifers) हैं। इनके मध्यमें फिर अजमोदा और अजवायन एक जातीय (Carum), और जङ्गलो अजवायन अन्य जातीय अजमेर-मेरवाड़ा-राजपूतानेका एक अंगरेजी प्रान्त । (Seseli) है। युरोपीय उद्भिद्शास्त्र में अजमोदाका गवरनर-जनरलके राजपूतानमें रहनेवाले एजण्ट Carum Roxburghianum, Benth ; atua- इस प्रान्तका प्रबन्ध चीफ कमिशनरकी भांति करते का Carum copticum, Benth; इसी जातिका हैं। इस प्रान्तमें दो छोटे-छोटे जिले हैं-अजमेर होने के कारण जीरका Caruin Carui, Linn और और मेरवाड़ा। यहां पर्वत खूब फैले हुए हैं। बहु जङ्गली अजवायनका नाम Seseli indicum है। मूल्य अभरक और प्रधानतः तांबा और सौसा धातु ईरानो अजवायन कोई स्वतन्त्र द्रव्य नहीं, ईरान जगह-जगह मिलती है। प्रधान फल अनार और देशसे इसको आमदनी होने के कारण ही इसे अमरूद है। चीता और भेड़िया तो कम देख ईरानी अजवायन कहते हैं। किन्तु खुरासानी पड़ता ; किन्तु बघेरा नागपर्वतसे देवैरतक भरा है अजवायन एकबारगी हो स्वतन्त्र पदार्थ है। यह और जङ्गली सूअरों को भी देशौ राज्योंमें कोई कमौ वार्ताकु, व्याकुड़, कण्टकारौके श्रेणीमुक्त वृक्षका वीज नहीं, जिन्हें राजपूत बड़े शौकसे शिकार करते है। (Solanaceae) है। उद्भिशास्त्र में इसका नाम जलवायु अत्यन्त स्वास्थ्यकर है। ग्रीष्ममें गर्मी और Hyoscyamus niger, Linn है। डाकरी पुस्तकमें शीतमें सर्दी रहती है। यहां पानी कम बरसता इसके पत्तेको हाइयोसियामस कहते हैं। है। अजमेर शब्दमें इतिहास देखो। अजमोदाख्या (स० स्त्री०) अजवायन । अजमोद, अजमोदा (सं० स्त्रो०) अज-मोदि-अण, अजमोदिका (स. स्त्री०) अजवायन । अजान् मोदयतोति। अजवायन। इस शब्दके कई अजमोदाद्यवटक (सं० पु०) आमवातका एक औषध । एक यह पर्याय हैं-खराह्वा, वस्तुमोदा, वर्कटी, अजमांस (स० लो०) छागमांस, बकरका गोश्त । मोदा, गन्धदला, हस्तिकारवी, गन्धपत्रिका, मायूरो, अजम्भ (सं० पु०) न सन्ति जम्भा दन्ता अस्य, बहुव्रो । शिखिमोदा, मोदाढ्या, वक्रिदीपिका, ब्रह्मकोशी, १ भेक, मेंड़क। २ सूर्य, आफ़ताब। (त्रि०) विशाली, हयगन्धा, उग्रगन्धिका, मोदिनौ, फलमुख्या ३ दन्तशून्य, जिसके दांत न हों। और विशल्या। वैद्यशास्त्रके मतसे अजमोदा-कटु, अजय (स' पु०) न जि-अच्. नञ्-तत्। १ जया- उष्ण, रुक्ष और रुचिकर होती है। इससे कफ, भाव, हार। अजैन छागलेन यातौति, या-क। वायु, शूल, आध्मान, अरुचि और क्षुधामान्य प्रभृति २ अग्नि, आग। ३ छप्पय छन्दका एक भेद।<noinclude>परीक्षा द्वारा देखा है, कि अजमोदा हिक्का, वमन और मूत्राशय प्रभृतिको वेदनामें विशेष उपकार वैद्यशास्त्र में अजमोदा, अजवायन, जङ्गली हैं। अजवायन, ईरानी अजवायन और खुरासानी अज- वायनके विषय में कुछ गड़बड़ जान पड़ती है । अनेक</noinclude> kbfilblxm1chc16onbz2lgdbi32nmzx पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२०५ 250 83394 667802 642485 2026-07-15T16:31:19Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 667802 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अजयगढ़—अजयनद'''|'''१९९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> '''अजयगढ़'''-बुंदेलखण्डके अन्तर्गत एक गिरिदुर्ग। यह कालञ्जर पर्वतसे आठ, बांदेसे साढ़े तेईस और प्रयाग से पैंसठ कोस दूर है। अजयगढ़ राज्यका विस्तार ४४७ वर्ग मील है; इसमें ६०८ ग्राम है; सर्वसमेत लोकसंख्या कोई एक लाख होगी। राज्यकी वात्सरिक आय दो लाख तीस हजार रुपया है। नये शहरमें अजयगढ़ राज्यकी राजधानी प्रतिष्ठित है। यहां मलेरिया ज्वरका अतिशय प्रादुर्भाव होता है। इस गिरिदुर्गकी उपत्यकामें अनेक प्रकारकी प्रस्तर-मूर्तियां चारों ओर बिखरी पड़ी हैं। टूटे मन्दिर, बड़े-बड़े खम्भे और खम्भोंकी चित्रकारी और देवमूर्तियाँ देखनेसे बोध होता है, कि मानो किसी काल में इस जगह जैन-देवालय रहा था। उपत्यका के चढ़ावमें बड़े-बड़े दालान बने और उनमें ५। ६ हाथ ऊचे मोटे-मोटे खम्भे लगे हैं। खम्भों में विचित्र बेल-बूटे खोदे हुए हैं। कार्णिसके ऊपर स्त्रियों की मूर्तियां हैं, जिनकी बनावट बहुत ही अच्छी देख पड़ती है। अब इन सकल देवालयों में मनुष्य नहीं केवल वानर और बृहत् बृहत् सर्प रहते हैं। अजयगढ़ देखने में कितना ही कालञ्जर जैसा है। पहाड़पर चढ़नेके पथमें पहले सात हार थे। रामजे साहब जिस समय देखने गये, उस समय चार हार टूटे थे, तोनको अवस्था कुछ कुछ अच्छी थी। हारों के वाम पार्श्वमें दो कुण्ड हैं, जिनका नाम गङ्गा-यमुना पुकारा जाता है। पहले तीर्थयात्री इन कुण्डोंके जलसे स्नानदान करते थे। कालञ्जर पर्वतमें भी ठीक ऐसे ही कुण्ड विद्यमान हैं। कुण्डोंके ऊपर पहाड़में संस्कृत भाषासे कुछ शिलालेख था। उसका कितना ही अंश मिट गया है, कितना हो नहों भी मिटा ; किन्तु वह स्पष्ट पढ़ा नहीं जा सकता। पर्वतको चढ़ाई में कहीं गणेश, कहीं हनूमान् और कहीं नन्दीकी मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं। प्रधान हारके कुछ भीतर बड़ा तालाब है। तालाब कुछ उपत्यका और कुछ पहाड़ खोदकर बनाया गया है। इस तालाबसे कुछ दूर एक पुरातन अट्टालिकाका भग्ना <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> वशेष देख पड़ता है। अट्टालिकाकी टूटी छतके पास पार्श्वनाथकी कई मूर्तियां बनी हैं। कोई मूर्ति बैठी और कोई खड़ी है। अट्टालिकाके भीतर नेमीनाथकी तीन बड़ी-बड़ी मूर्तियां हैं। मूर्तियां निर्वस्त्र हैं,दोनो हाथों में पद्म विराज रहा है, छातीपर रत्नजटित आभूषण खचित है, शिरके बाल घूंघरवाले और छोटे-छोटे कड़े हैं। अट्टालिकासे कुछ दूर एक बृहत् पुष्करिणी है। पुष्करिणी के किनारे अनेक लिङ्ग और योनिमूर्ति हैं, जिनमें एक गणेश और एक पञ्चानन लिङ्ग भी देखा जाता है। पुष्करिणीसे दक्षिण पञ्चमूर्ति लिङ्ग है और महादेव, पार्वती और नन्दीकी मूर्तियां विराज रही हैं। अजयगढ़ पहले अजयनगर नामसे प्रसिद्ध था।अजयनगरवाले राजा छत्रशालके अपने राज्यको विभाग करनेसे अजयगढ़ जगत्राज के अंशमें आया। सन् १८०३ ई० में पेशवाने ब्रिटिश गवर्नमेण्ट के हाथों बुंदेलखण्डके कियदंशको समर्पण किया। इसलिये कर्नल मेसेन्वाक्, जमान् खां और अण्डार्सन अनेक सैन्य ले अजयगढ़को अधिकार करने गये। अंग्रेजों की सैन्य देवग्राम पर्वतके नीचे पहुचनेसे लक्ष्मणदांव नामक अनेक व्यक्तिने हठात् ससैन्य आकर आक्रमण किया। उन्होंने कितनी ही बन्दूकें छीन ली थीं। इस युद्ध में अंगरेजों की विस्तर सैन्य हित और आहत हुई। महा-महा वीर भी शत्रुके सामने स्थिर न रह सकनेसे चारो ओर भाग खड़े हुए। शेषमें मेसेन्वाक्ने जाकर शत्रुओंसे पुनर्वार बन्दूके छीन ली एवं लक्ष्मणदांवने भी १८,००० रुपया देकर निष्कृति पाई । अब अजयगढ़के राजा अंगरेजोंको कर देते हैं। '''अजयनद'''-वीरभूम जिलेमें अजय नामका वृहत् नद है। हज़ारीबाग जिले में यह उत्पन्न हुआ है। इसके वाद सन्थाल परगनेसे कुछ दक्षिण, दक्षिण दिक्से कुछ पूर्वको बहते वीरभूम और वईमानके भीतरसे भेदियाग्राममें इसने प्रवेश किया है। अन्तमें भेदियासे पूर्वमुख आकर कंटोयाके निकट भागीरथौके साथ मिल गया है। इसी नदके उत्तर-कूलमें सुप्रसिद्ध <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 62af6jlbwp8k2bt030b8shr61u27rag पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२०६ 250 83395 667836 642484 2026-07-16T09:38:51Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 667836 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''२००'''|'''अजयपाल-अजस्तुन्द'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> केन्दुविल्वग्राम (केंदुली) है। इसी जगह जयदेवके कृष्णचन्द्र श्रीराधिकाके पैर पकड़े आंखोंसे आंसू बहाते जाते थे- {{c|{{smaller|" "प्रिय चारुशील मुञ्च मयि मानमनिदानम् ।"}}}} ​ग्रीष्मकाल में अजय नद के बीच जल नहीं रहता। केवल बालू छायापथ की तरह चमका करती है। बालू के ऊपर जगह-जगह छोटे-छोटे झरने अपने मनोहर शब्द से आकाश को मुखरित करते हैं। वर्षाकाल आने से दुकूल उमड़ पड़ते हैं, ग्राम भूमि समस्त डूब जाती है। इसीलिए स्थान-स्थान में ऊँचे-ऊँचे बाँध बँधवा दिए गए हैं। ​{{outdent| अजयपाल (सं० पु०-क्ली०) १ रागविशेष। २ कनौज के एक नृपति का नाम। ३ जमालगोटा। }} ​{{outdent| अजया (सं० स्त्री०) नास्ति जयो मादकत्वेन अस्याः। १ विजया। भांग, बूटी। (हिं०) २ बकरी। }} ​{{outdent| अजय्य (सं० वि०) न-जी-यत् शक्यार्थे, नञ्-तत्। दुर्जय, जीतने के अयोग्य। }} ​{{outdent| अजर (सं० त्रि०) नास्ति जराऽस्य। १ पीड़ाशून्य। २ वार्धक्यशून्य। ३ भारी, जो पचाया जा न सके। }} ​{{outdent| अजरक (सं० क्ली०) अजीर्ण, बदहजमी। }} ​{{outdent| अजरन्ती (सं० स्त्री०) न जीर्यन्तीं जरारहितां। बुड्ढी न होने वाली, सदा तरुण बनी रहने वाली।}} <small>( वाज० स० २१४५)</small> ​{{outdent| अजरयु (वै० वि०) बुड्ढा या नष्ट न होने वाला। }} ​{{outdent| अजरस् (वै० वि०) १ पीड़ाशून्य। २ वार्धक्यशून्य। ३ गरिष्ठ, मुक़व्वी। }} ​{{outdent| अजरा (सं० स्त्री०) नास्ति जरा अस्याः। घृतकुमारी, घिकुआर। घृतकुमारी वृक्ष कभी सूखता नहीं, इसीलिए इसका नाम अजरा पड़ा है। }} ​{{outdent| अजराज (सं० पु०) अजों के राजा या बादशाह। ऋग्वेद के एक मन्त्र में लिखा है, कि सुसाद की अध्यक्षता में तृत्सुओं ने अजों को हराया था। }} ​{{outdent| अजरायल (हिं० वि०) अजर, जो कभी पुराना न हो। सदावसन्ती। सदाबहार। }} ​{{outdent| अजराल (हिं० वि०) जो बुड्ढा या पुराना न हो। शक्तिशाली। ताकतवर। }} ​ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent| अजर्य (सं० क्ली०) न-जृ-यत् सङ्गमने कर्तरि निपात्यते; न जीर्यतीत्यजर्यम्।<small>अजर्य सङ्गतम्। पा ॥१॥१०५।</small>सङ्गत, अन्याय। सुहबत, साथ। }} ​{{outdent| अजर्षभ (सं० पु०) सबसे अच्छा बकरा। }} ​{{outdent| अजलम्बन (सं० क्ली०) अजलम्ब-ल्युट, अज इव लम्बते गृह्यते। स्रोतोंजन, रसांजन, सुरमा। }} ​{{outdent| अजलोमन्, अजलोमा (सं० पु०) अजस्य लोम इव लोम यस्य, बहुव्री०। १ केंवाच। २ जिसके शरीर में बकरे के से बाल हों। इस शब्द के पर्याय यह हैं-गोशिष और शिखी, केशी, महाइस्खा और अग्रपर्णी। }} ​{{outdent| अजवल्ली (सं० स्त्री०) मेढ़ासिंगी। }} ​{{outdent| अजवस् (सं० पु०) न जवस, जु-असुन्। वेगशून्य। }} ​{{outdent| अजवस्ति (हिं० पु०) अजस्य वस्तिरिव वस्तिर्यस्य। ऋषिविशेष। }} ​{{outdent| अजवाइन, अजवायन (हिं० स्त्री०) यवानिका, yवानी। एक प्रकार की औषध। }} ​{{outdent| अजवाह (सं० पु०) अजं वाहयति यद्देशम्, अजवह-घञ् अधिकरण। देशविशेष। }} ​{{outdent| अजवोथी (सं० स्त्री०) अजा अजाता नित्यकालव्यापिनी इति वा वीथि नक्षत्राणां श्रेणी, कर्मधा०। छायापथ, हाथी की राह। आकाश के उत्तर-दक्षिण-व्यापिनी नक्षत्रमाला। }} ​{{outdent| अजशृङ्गिका, अजशृङ्गी (सं० स्त्री०) अजस्य मेषस्य शृङ्गमिव फलं यस्याः, बहुव्री०। मेढ़ासिंगी। इसके पर्याय यह हैं-विषाणी, विषाणिका, चक्रश्रेणी, अजगन्धिनी, मौर्वी, नेत्रौषधि, आवर्तिनी, वर्तिका, सर्पदंष्ट्रिका, चक्षुष्या, तिक्तदुग्धा, पुत्रशृङ्गी और कर्णिका। यह गुण में कटु और तिक्त होती है। इससे कफ, अर्श, शूल, शोथ, श्वास, हृद्रोग, विषरोग, कास, कुष्ठ, प्रभृति पीड़ाएँ नष्ट हो जाती हैं। }} ​{{outdent| अजश्री (सं० स्त्री०) फिटकरी। }} ​{{outdent| अजस (हिं० पु०) अपयश, अख्याति, बदनामी। }} ​{{outdent| अजसी (हिं० वि०) अख्यात, बदनाम। }} ​{{outdent| अजस्तुन्द (वै० क्ली०) नगरविशेष, वेदोक्त एक शहर का}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bmntqqr6pohjesqpfsa3r4fvylhp7mt पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२०७ 250 83396 667839 642483 2026-07-16T09:57:48Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 667839 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अजस्र-अजाघ्रात'''||'''२८१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude> {{outdent|अजस्र (सं० क्लो०) न जसु मोक्षणे-र, तच्छोल्यादौ कर्तरि । <small>नमिकम्पिस्म्यजसकमहि'सदीपो रः । पा ३।२।१६७ । </small>सन्तत,चिरकालस्थायी, निरवच्छिन्न। (क्रि० वि०) सदा,हमेशा।}} {{outdent|अजहत्स्वार्था (सं० स्त्री०) न-ओहाक् त्यागे-शतृ अजहत्। न जहाति स्वार्थों याम्।१ जिसको निजका अर्थ परित्याग न करे। २् अलंकारशास्त्र के लक्षणा नामक शब्द की वृत्ति या शक्ति विशेष। इसका दूसरा नाम उपादानलक्षणा है-मम्मटभट्टने इसका यह लक्षण बताया है-}} {{c|{{x-smaller|<poem>"स्वसिद्धये परापेक्ष परार्थे स्वसमर्थनम् ।<br> उपादानं लक्षणञ्चेत्यु क्ता शुद्धेवसा द्विधा॥"</poem>}}}} अन्वयसिद्धिके लिये अन्यका आश्रय ले जो शब्द दूसरेके अर्थ में अपने अर्थको समर्थन करे, वही उपादानलक्षणा है। उपादानलक्षणा दो प्रकारको होती है-रूढ़िमूल और प्रयोजनमूल। जैसे-</small>श्र्वेती धावति।</small> यानी श्वेत वर्ण दौड़ता है। श्वेतवर्ण कभी दौड़ नहीं सकता।सुतरां इस जगह श्वेतवर्ण का प्रकृत अर्थ नहीं लगता,इसीसे क्रियाके साथ भी ठीक अन्वय नहीं होता।यहां श्वेतवर्ण में जो लक्षण है, उससे श्वेत पश्वादि समझना पड़ेगा (रूढ़िमूल )। <small>'कुन्ताः प्रविशन्ति' </small> का अर्थ है, कि अस्त्र प्रवेश करते हैं। इस बातके कहनेका प्रयोजन यह है, कि अष्टाङ्ग अस्त्रशस्त्रभूषित पुरुष प्रवेश करते हैं (प्रयोजन-मूल)। {{outdent|अज़हद (फा० वि०) अपरिमित रूपसे, अत्यन्त अधिक । बहुत ज्यादा।}} {{outdent|अजहल्लिङ्ग (सं०.पु०) हा-(ओहाक् त्यागे) शतृ,न जहत् लिङ्गं यम् ; बहुव्री। जो शब्द, भिन्न लिङ्ग विशेष्यके विशेषण रूपसे प्रयुक्त होते भी अपने लिङ्गको परित्याग न करे। यथा-<small>वेदः श्रुतिर्वा प्रमाणम्</small> यानी वेद किंवा श्रुति ही प्रमाण है। इस जगह वेद पुंलिङ्ग, श्रुति स्त्रीलिङ्ग और प्रमाण क्लीव लिङ्ग शब्द है। किन्तु वेद और श्रुति शब्दके विशेषण रूपसे प्रयुक्त होते भी प्रमाण शब्द अपने क्लीव लिङ्गको परित्याग नहीं करता। अर्थात् वेद शब्दका विशेषण स्वरूप होनेसे यह पुंलिङ्ग और श्रुति}} {{left|५१|3em}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> शब्दका विशेषण होनेके कारण स्त्रीलिङ्ग नहीं होता। {{outdent|अजहा (सं० स्त्री० ) हा-क, न जहाति शूकान्,नञ्-तत्। कोंच, कीचको फली।}} {{outdent|अजा (सं० स्त्री०) सांख्यमतसिद्ध प्रधान पर्यायस्थ समान अवस्था-विशिष्ट और सत्वरजस्तमोरूप गुणत्रय ।}} <small>"अजामको लोहितवष्णवीं बता प्रजाः सृजमानां सरूपाम् ।" (श्वेताश्व० उ०) </small> अर्थात्-लोहित, शुक्ल और कृष्णवर्णवाली समान रूपकी बहुतसी प्रजा जिस प्रकृतिने उत्पन्न की,अन्य पुरुष अर्थात् जीव उसे परित्याग करता है।इसी प्रकृतिको सत्वादि गुणानुसारसे खेतादि रूप-युक्त बहु प्रजा उत्पन्न करनेके कारण सांख्यवादियोंने नाना वर्ण होनेका उल्लेख किया है। {{outdent|अजाक्वपणीय (वै० त्रि०) बकरी और कञ्चीं जैसा ।}} {{outdent|'अजाक्षीर (सं० क्लो०) बकरीका दूध ।}} {{outdent|अजागर (सं० पु०) जागृ-अच् इति जागरः ,न जागरःयस्मात् बहुव्री।१ भृङ्गराज, भीमराज, धमिरा।भृङ्गराजको सेवन करनेसे निद्रा नहीं आती। २ अजगर। (त्रि०) ३ न जागनेवाला।}} {{outdent|अजागल (सं० पु०) १ बकरेकी गर्दन।}} {{outdent|अजागलस्तन (सं० पु०) १ बकरेके गर्दनका नाकाम स्तन।२ किसी व्यर्थ वस्तुको उपमा।}} {{outdent|'अजाघ्रात (सं० क्लो०) अजेन छागेन आघ्रातम्,३-तत् । बकरीसे शरीर सुंघाना, "प्रायश्चित्तविशेष ।काश्यपने व्यवस्था बताई है, कि यदि रजस्वला स्त्री चाण्डाल और श्वपाकको स्पर्श करे, तो ऋतुके तीन दिन बिता त्रिरात्र उपवासमें रहे और पञ्चगव्यसे शुद्ध हो, इसके बाद छागलसे अपना शरीर सुंघावे-}} {{c|{{x-smaller|<poem>"चाण्डालेन श्वपाके न संस्पृष्टा चेद्रजस्वला।<br> तान्यहानि व्यतिक्रम्य प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥<br> विरावमुपवासःस्वात् पञ्चगव्येन शुध्यति ।<br> तां निशान्तु व्यतिक्रम्य अजानातन्तु कारयेत्॥<br> </poem>}}}} स्पर्श विषयमें वृहस्पतिने एक अतिरिक्त विधि लिखी है। यथा- {{c|{{x-smaller|<poem>"तीर्थे विवाहे यात्रायां संग्रामे देशविप्लवे ।<br> नगरग्रामदाहे च स्पृष्टास्पृष्टि न दुष्यति ॥”</poem>}}}}<noinclude></noinclude> mrj1fdoxep6tr19fxl06sqeqaii6r38 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२०८ 250 83397 667846 642482 2026-07-16T10:47:59Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 667846 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''२०२'''|'''अजाघृत-अजाद'''|}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>तीर्थगमन, विवाह के समय, देवता आदि की पूजा करने जाने, युद्धकाल, देशविप्लव होने या नगर ग्रामादि में अग्नि लगने पर अस्पृश्य व्यक्ति को स्पर्श करने में दोष नहीं लगता। {{outdent| अजातघृत (सं० क्ली०) बकरी का घी। }} {{outdent| अजाचक (हिं० पु०) १ अयाचक, वह व्यक्ति जो कुछ न मांगे। (वि०) २ न मांगने वाला; सम्पन्न, खुश-खुर्रम। }} {{outdent| अजाची (हिं० पु०) वह व्यक्ति जो किसी से याचना न करे, भाग्यवान पुरुष। आसूदा शख्स। }} {{outdent| अजाजि, अजाजी (सं० स्त्री०) अज् क्षेपणे-घञ् इति आजः, अजेन छागेन वीयते गन्धोत्कटत्वात् त्यज्यते; अज्-आज-इन्, ६-तत्। १ जीरक, जीरा। २ काकोदुम्बरिका वृक्ष, गूलर का पेड़। }} {{outdent| अजाजिक (सं० पु०) पीतजीरक, सफेद जीरा। }} {{outdent| अजाजीव (सं० पु०) अजस्य क्रयविक्रयादिना जीवति इति; अज-आ-जीव-अच्, ३-तत्। छाग-मेषादिका व्यवसायी, भेड़-बकरे का सौदागर। }} {{outdent| अजात (सं० वि०) न उत्पन्न हुआ, जो पैदा न हुआ हो। }} {{outdent| अजातककूद (सं० पु०) न जातं ककुदम् अंसकूटम् अस्य, बहुव्री०। <small> ककुदस्यावस्थायां लोपः। पा ५।४।१४६। </small>जिस वृष के ककुद न निकला हो। वत्स, अल्पवयस्क गवादिका वत्स; बछड़ा। }} {{outdent| अजातक्र (सं० क्ली०) बकरी के दूध का मठा। }} {{outdent| अजातदन्त (सं० त्रि०) न जातो दन्तो अस्य अत्र वा, बहुव्री०। जिस शिशु के दाँत न निकले हों, बिना दाँतों वाला, दुधमुँहा। }} {{outdent| अजातपक्ष (सं० वि०) न जाती पक्षी अस्य। पक्षिशावक; जिस पक्षी के बाजू न निकले हों, जो छोटा पक्षी उड़ न सके। }} {{outdent| अजातव्यञ्जन (सं० वि०) बिना दाढ़ी-मूँछ का। }} {{outdent| अजातव्यवहार (सं० पु०) १ नाबालिग, जिसकी अवस्था पन्द्रह वर्ष से कम हो। }} {{outdent| अजातशत्रु (सं० पु०) न जातः शत्रुर्यस्य अथवा जातस्य जीवमात्रस्य न शत्रुः। १ काशी के राजा,}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> जिन्हें लोग जनक कह सम्बोधन करते थे। वेदादि समस्त शास्त्र में अजातशत्रु की प्रगाढ़ व्युत्पत्ति थी। कौषीतकि-ब्राह्मण उपनिषत् और शतपथब्राह्मण में इनके धर्मज्ञान का विषय कहा गया है। महाराज को वेदादि में ऐसी व्युत्पत्ति हो गई थी, कि यह क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणों को धर्मशास्त्र का उपदेश दे सकते थे। एक बार महर्षि गार्ग्य काशी में जा उपस्थित हुए। वहाँ पहुँच उन्होंने महाराज से कहा, 'मैं आपको ब्रह्म-ज्ञान के सम्बन्ध में उपदेश दूँगा।' राजा ने कहा,- 'अच्छा, आप मुझे उपदेश दीजिये; मैं भी आपको सहस्र धेनु पुरस्कार दूँगा।' किन्तु गार्ग्य राजा को अधिक उपदेश दे न सके। वरन् उन्होंने स्वयं ब्राह्मण होकर भी अजातशत्रु से ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध में उपदेश पाने के लिए अभिलाषा को प्रकाश किया। २ राजा युधिष्ठिर। ३ मगध के जनैक राजा का नाम। इनके पिता का नाम श्रेणिक या बिम्बिसार था। श्रेणिक ने राजगृह नगर को स्थापित किया था। राजगृह देखो। अजातशत्रु, बुद्धदेव शाक्यसिंह के समकालिक थे। बुद्धदेव की निर्वाणप्राप्ति के बाद उनके अस्थि और चिताभस्मादि इन्होंने राजगृह में एक बृहत् स्तूप के अभ्यन्तर बीच रखे थे। <Small>बुद्ध देखो।</Small> {{outdent| अजातानुसय (सं० त्रि०) बेपछतावा, न पछताने वाला। }} {{outdent| अजातारि (सं० पु०) १ जिसका कोई शत्रु न हो, दुश्मन न रखने वाला। २ युधिष्ठिर। }} {{outdent| अजाति, अजाती (सं० स्त्री०) न-जन्-क्तिन्, नञ्-तत्। १ अनुत्पत्ति। २ जातिभिन्न कुछ और। (त्रि०) ३ जातिशून्य, बिना जाति का। ४ नित्य, मुदामी। }} {{outdent| अजातौल्वलि (सं० पु०) तुल्वलस्य अपत्यं पुमान् इति तौल्वलिः, मध्यपदलोपि कर्मधा०। <small>न तौल्वलिभ्यः। पा २।४।६१।</small> छागमांसोपजीवी तुल्वल मुनि की सन्तान, बकरे का मांस बेचकर दिन काटने वाले तुल्वल मुनि के लड़के। }} {{outdent| अजात्व (सं० क्ली०) अज होने की स्थिति, बकरापन। }} {{outdent| अजाद (सं० पु०) बकरे का मांस भक्षण करनेवाला,}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1fx6ildwi7vzflsut2dxn7f48thqo0f पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३७७ 250 83719 667770 347173 2026-07-15T12:30:00Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 667770 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७०'''|'''अधोगत—अधोभूमि'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{block center|<poem><small>"तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तमधोक्षजम्। उर्वशीलोकमन्विच्छन् सर्वदेवमयं हरिम्॥" (भागवत ९।१४।३६।)</small></poem>}} अधोगत (सं॰ त्रि॰) १ नीचे पहुंचा हुआ। (पु॰) २ अस्थिभङ्गरोग, हड्डी टूटनेकी बीमारी। अधोगति (सं॰ स्त्री॰) अधरस्मिन् नरकादौ गतिः। १ निम्नगति, नीचेका जाना। २ नरक गमन, दोज़ख़का दाख़िला। (त्रि॰) अधोऽधस्तात् गतिर्यस्य। ३ अधोदिग्गामी, नीचेकी ओर जानेवाला। अधोगमन (सं॰ क्ली॰) १ उतार, नीचेका जाना। २ अवनति, तनज्जु ली। ३ पतन, गिराव। ४ दुर्दशा, बुरी हालत। अधोगामिन् (सं॰ त्रि॰) अधरस्मिन् गच्छतीति, गम-णिनि। १ नरकगामी, दोज़ख़ जानेवाला। २ अधोदिग्गामी, जो नीचेकी ओर चले। अधोघण्टा (सं॰ स्त्री॰) अधस्तात् आरभ्य घण्टव। अपामार्ग, लटजीरा। यह वृक्ष शीर्षके नीचेसे घण्टे-जैसा फल उत्पन्न करनेके कारण अधोघण्टा कहता है। अधोऽङ्ग, अधोचर्म (सं॰ क्ली॰) मलद्वार, गुदा, गांड, मिक़द। अधोजानु (सं॰ क्ली॰) जानुनोऽधस्तात्। १ जानुका निम्नभाग, घुटनेके नीचेका हिस्सा। (अव्य॰) २ जानु या घुटनेसे नीचे। अधोजिह्विका (सं॰ स्त्री॰) अधस्-जिह्वा-कन् अल्पार्थे, कर्मधा॰। १ तालमूलकी क्षुद्र जिह्वा, दरख़्तकी जड़वाली छोटी जीभ (uvula)। २ जिह्वाके निम्नभागका शोथरोग, जीभके नीचेकी सूजनवाली बीमारी। अधोतर (हिं पु॰) वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। यह बहुत मोटा बुना जाता है। अधोदारु (सं॰ क्ली॰) अधरं दारु, अधर-परमार्थ-असि, अधादेशः, कर्मधा॰। चौखटके नीचेका तख़्ता। अधोदिश् (सं॰ स्त्री॰) अधरा दि‍श्। १ दक्षिण दिक्। २ निम्नप्रदेश, नीचेका मुल्क। अधोदृष्टि (सं॰ त्रि॰) अधरस्मिन् दृष्टिर्यस्य। १ योगाभ्यास करते समय केवल नासिकाके अग्रभाग पर दृष्टि संयोजित करनेवाला। <small>योग देखो।</small> २ निम्न-दृष्टियुक्त, नीची नज़रवाला। (स्त्री॰) ३ निम्नदृष्टि, नीची नज़र। अधोदेश (सं॰ पु॰) शरीरके नीचेका भाग, जिस्मके नीचेका हिस्सा। २ निम्नांश, नीचेवाला हिस्सा। अधोद्वार (सं॰ क्ली॰) १ गुदा, गांड। २ योनि, चूत। अधोऽधस् (सं॰ अव्य॰) अधस् अधस्तात् सामीप्ये द्वित्वम्। १ नीचे-नीचे। २ निम्नप्रदेशमें, नीचे स्थानमें। अधोनाभम् (सं॰ अव्य॰) नाभीसे नीचे, तोंदीके तले। अधोपहास (वै॰ पु॰) अधोभागस्य मदनालयस्य उपहासः। स्त्रियोंके अधोभाग-योनिका उपहास, माशूक़ाना दिल्लगी। वैदिक होनेके कारण इस शब्द में सन्धि हुई है; साधारण रीतिसे विसर्गका लोप होनेपर 'अधउपहास' लिखा जायेगा। अधोपात (सं॰ पु॰) अधस्-पत-घञ्। अधोगति, ख़राब हालत। प्रचलित होनेसे यहां विसर्गका ओकार बनाया गया है, वस्तुतः 'अधःपात' होना चाहिए। अधोबन्धन (सं॰ क्ली॰) १ नीचेकी पट्टी। २ अन्दरका तङ्ग। ३ नाड़ा। ४ इजारबन्द। अधोभक्त (सं॰ क्ली॰) अधरं भक्तं यस्मात्, अधरं पक्कं भक्तमन्नंन येन वा, ५-३ बहुव्री॰। १ अन्नभोजनपर पिया जानेवाला जल, पानी जो खाना खाने बाद पीते हैं। २ भोजनोपरान्त सेवन किया जानेवाला औषध, दवा जो ग़िज़ापर खाई जाये। अधोभव (सं॰ त्रि॰) निम्न, नीचा। अधोभाग (सं॰ पु॰) अधरो भागः, कर्मधा॰। १ निम्नभाग, नीचा हिस्सा। २ स्त्रियोंका मदनालय, योनि। अधोभागहर (सं॰ त्रि॰) विरेचनके कामका, जुलाब लानेवाला। अधोभागदोषहर (सं॰ त्रि॰) शरीरके निम्नभागका रोग दूर करनेवाला, जिससे जिस्म के नीचे हिस्सेकी बीमारी छूट जाये। अधोभुवन (सं॰ क्ली॰) अधरं भुवनं लोकः, कर्मधा॰। पाताल, इस पृथिवीके नीचेका लोक। अधोभूमि (सं॰ स्त्री॰) १ निम्न भूमि, नीची<noinclude></noinclude> r02eiinshd4qh5dk3ae5moem8fvc4u4 667771 667770 2026-07-15T12:32:47Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667771 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७०'''|'''अधोगत—अधोभूमि'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{block center|<poem><small>"तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तमधोक्षजम्। उर्वशीलोकमन्विच्छन् सर्वदेवमयं हरिम्॥" (भागवत ९।१४।३६।)</small></poem>}} अधोगत (सं॰ त्रि॰) १ नीचे पहुंचा हुआ। (पु॰) २ अस्थिभङ्गरोग, हड्डी टूटनेकी बीमारी। अधोगति (सं॰ स्त्री॰) अधरस्मिन् नरकादौ गतिः। १ निम्नगति, नीचेका जाना। २ नरक गमन, दोज़ख़का दाख़िला। (त्रि॰) अधोऽधस्तात् गतिर्यस्य। ३ अधोदिग्गामी, नीचेकी ओर जानेवाला। अधोगमन (सं॰ क्ली॰) १ उतार, नीचेका जाना। २ अवनति, तनज्जु ली। ३ पतन, गिराव। ४ दुर्दशा, बुरी हालत। अधोगामिन् (सं॰ त्रि॰) अधरस्मिन् गच्छतीति, गम-णिनि। १ नरकगामी, दोज़ख़ जानेवाला। २ अधोदिग्गामी, जो नीचेकी ओर चले। अधोघण्टा (सं॰ स्त्री॰) अधस्तात् आरभ्य घण्टव। अपामार्ग, लटजीरा। यह वृक्ष शीर्षके नीचेसे घण्टे-जैसा फल उत्पन्न करनेके कारण अधोघण्टा कहता है। अधोऽङ्ग, अधोचर्म (सं॰ क्ली॰) मलद्वार, गुदा, गांड, मिक़द। अधोजानु (सं॰ क्ली॰) जानुनोऽधस्तात्। १ जानुका निम्नभाग, घुटनेके नीचेका हिस्सा। (अव्य॰) २ जानु या घुटनेसे नीचे। अधोजिह्विका (सं॰ स्त्री॰) अधस्-जिह्वा-कन् अल्पार्थे, कर्मधा॰। १ तालमूलकी क्षुद्र जिह्वा, दरख़्तकी जड़वाली छोटी जीभ (uvula)। २ जिह्वाके निम्नभागका शोथरोग, जीभके नीचेकी सूजनवाली बीमारी। अधोतर (हिं पु॰) वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। यह बहुत मोटा बुना जाता है। अधोदारु (सं॰ क्ली॰) अधरं दारु, अधर-परमार्थ-असि, अधादेशः, कर्मधा॰। चौखटके नीचेका तख़्ता। अधोदिश् (सं॰ स्त्री॰) अधरा दि‍श्। १ दक्षिण दिक्। २ निम्नप्रदेश, नीचेका मुल्क। अधोदृष्टि (सं॰ त्रि॰) अधरस्मिन् दृष्टिर्यस्य। १ योगाभ्यास करते समय केवल नासिकाके अग्रभाग<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>पर दृष्टि संयोजित करनेवाला। <small>योग देखो।</small> २ निम्न-दृष्टियुक्त, नीची नज़रवाला। (स्त्री॰) ३ निम्नदृष्टि, नीची नज़र। अधोदेश (सं॰ पु॰) शरीरके नीचेका भाग, जिस्मके नीचेका हिस्सा। २ निम्नांश, नीचेवाला हिस्सा। अधोद्वार (सं॰ क्ली॰) १ गुदा, गांड। २ योनि, चूत। अधोऽधस् (सं॰ अव्य॰) अधस् अधस्तात् सामीप्ये द्वित्वम्। १ नीचे-नीचे। २ निम्नप्रदेशमें, नीचे स्थानमें। अधोनाभम् (सं॰ अव्य॰) नाभीसे नीचे, तोंदीके तले। अधोपहास (वै॰ पु॰) अधोभागस्य मदनालयस्य उपहासः। स्त्रियोंके अधोभाग-योनिका उपहास, माशूक़ाना दिल्लगी। वैदिक होनेके कारण इस शब्द में सन्धि हुई है; साधारण रीतिसे विसर्गका लोप होनेपर 'अधउपहास' लिखा जायेगा। अधोपात (सं॰ पु॰) अधस्-पत-घञ्। अधोगति, ख़राब हालत। प्रचलित होनेसे यहां विसर्गका ओकार बनाया गया है, वस्तुतः 'अधःपात' होना चाहिए। अधोबन्धन (सं॰ क्ली॰) १ नीचेकी पट्टी। २ अन्दरका तङ्ग। ३ नाड़ा। ४ इजारबन्द। अधोभक्त (सं॰ क्ली॰) अधरं भक्तं यस्मात्, अधरं पक्कं भक्तमन्नंन येन वा, ५-३ बहुव्री॰। १ अन्नभोजनपर पिया जानेवाला जल, पानी जो खाना खाने बाद पीते हैं। २ भोजनोपरान्त सेवन किया जानेवाला औषध, दवा जो ग़िज़ापर खाई जाये। अधोभव (सं॰ त्रि॰) निम्न, नीचा। अधोभाग (सं॰ पु॰) अधरो भागः, कर्मधा॰। १ निम्नभाग, नीचा हिस्सा। २ स्त्रियोंका मदनालय, योनि। अधोभागहर (सं॰ त्रि॰) विरेचनके कामका, जुलाब लानेवाला। अधोभागदोषहर (सं॰ त्रि॰) शरीरके निम्नभागका रोग दूर करनेवाला, जिससे जिस्म के नीचे हिस्सेकी बीमारी छूट जाये। अधोभुवन (सं॰ क्ली॰) अधरं भुवनं लोकः, कर्मधा॰। पाताल, इस पृथिवीके नीचेका लोक। अधोभूमि (सं॰ स्त्री॰) १ निम्न भूमि, नीची<noinclude></noinclude> n1pepcl7lnqyaxmholjjft8rirdfnl4 667772 667771 2026-07-15T12:33:39Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 667772 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७०'''|'''अधोगत—अधोभूमि'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{block center|<poem><small>"तेनायजत यज्ञेशं भगवन्तमधोक्षजम्। उर्वशीलोकमन्विच्छन् सर्वदेवमयं हरिम्॥" (भागवत ९।१४।३६।)</small></poem>}} अधोगत (सं॰ त्रि॰) १ नीचे पहुंचा हुआ। (पु॰) २ अस्थिभङ्गरोग, हड्डी टूटनेकी बीमारी। अधोगति (सं॰ स्त्री॰) अधरस्मिन् नरकादौ गतिः। १ निम्नगति, नीचेका जाना। २ नरक गमन, दोज़ख़का दाख़िला। (त्रि॰) अधोऽधस्तात् गतिर्यस्य। ३ अधोदिग्गामी, नीचेकी ओर जानेवाला। अधोगमन (सं॰ क्ली॰) १ उतार, नीचेका जाना। २ अवनति, तनज्जु ली। ३ पतन, गिराव। ४ दुर्दशा, बुरी हालत। अधोगामिन् (सं॰ त्रि॰) अधरस्मिन् गच्छतीति, गम-णिनि। १ नरकगामी, दोज़ख़ जानेवाला। २ अधोदिग्गामी, जो नीचेकी ओर चले। अधोघण्टा (सं॰ स्त्री॰) अधस्तात् आरभ्य घण्टव। अपामार्ग, लटजीरा। यह वृक्ष शीर्षके नीचेसे घण्टे-जैसा फल उत्पन्न करनेके कारण अधोघण्टा कहता है। अधोऽङ्ग, अधोचर्म (सं॰ क्ली॰) मलद्वार, गुदा, गांड, मिक़द। अधोजानु (सं॰ क्ली॰) जानुनोऽधस्तात्। १ जानुका निम्नभाग, घुटनेके नीचेका हिस्सा। (अव्य॰) २ जानु या घुटनेसे नीचे। अधोजिह्विका (सं॰ स्त्री॰) अधस्-जिह्वा-कन् अल्पार्थे, कर्मधा॰। १ तालमूलकी क्षुद्र जिह्वा, दरख़्तकी जड़वाली छोटी जीभ (uvula)। २ जिह्वाके निम्नभागका शोथरोग, जीभके नीचेकी सूजनवाली बीमारी। अधोतर (हिं पु॰) वस्त्रविशेष, एक कपड़ा। यह बहुत मोटा बुना जाता है। अधोदारु (सं॰ क्ली॰) अधरं दारु, अधर-परमार्थ-असि, अधादेशः, कर्मधा॰। चौखटके नीचेका तख़्ता। अधोदिश् (सं॰ स्त्री॰) अधरा दि‍श्। १ दक्षिण दिक्। २ निम्नप्रदेश, नीचेका मुल्क। अधोदृष्टि (सं॰ त्रि॰) अधरस्मिन् दृष्टिर्यस्य। १ योगाभ्यास करते समय केवल नासिकाके अग्रभाग<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>पर दृष्टि संयोजित करनेवाला। <small>योग देखो।</small> २ निम्न-दृष्टियुक्त, नीची नज़रवाला। (स्त्री॰) ३ निम्नदृष्टि, नीची नज़र। अधोदेश (सं॰ पु॰) शरीरके नीचेका भाग, जिस्मके नीचेका हिस्सा। २ निम्नांश, नीचेवाला हिस्सा। अधोद्वार (सं॰ क्ली॰) १ गुदा, गांड। २ योनि, चूत। अधोऽधस् (सं॰ अव्य॰) अधस् अधस्तात् सामीप्ये द्वित्वम्। १ नीचे-नीचे। २ निम्नप्रदेशमें, नीचे स्थानमें। अधोनाभम् (सं॰ अव्य॰) नाभीसे नीचे, तोंदीके तले। अधोपहास (वै॰ पु॰) अधोभागस्य मदनालयस्य उपहासः। स्त्रियोंके अधोभाग-योनिका उपहास, माशूक़ाना दिल्लगी। वैदिक होनेके कारण इस शब्द में सन्धि हुई है; साधारण रीतिसे विसर्गका लोप होनेपर 'अधउपहास' लिखा जायेगा। अधोपात (सं॰ पु॰) अधस्-पत-घञ्। अधोगति, ख़राब हालत। प्रचलित होनेसे यहां विसर्गका ओकार बनाया गया है, वस्तुतः 'अधःपात' होना चाहिए। अधोबन्धन (सं॰ क्ली॰) १ नीचेकी पट्टी। २ अन्दरका तङ्ग। ३ नाड़ा। ४ इजारबन्द। अधोभक्त (सं॰ क्ली॰) अधरं भक्तं यस्मात्, अधरं पक्कं भक्तमन्नंन येन वा, ५-३ बहुव्री॰। १ अन्नभोजनपर पिया जानेवाला जल, पानी जो खाना खाने बाद पीते हैं। २ भोजनोपरान्त सेवन किया जानेवाला औषध, दवा जो ग़िज़ापर खाई जाये। अधोभव (सं॰ त्रि॰) निम्न, नीचा। अधोभाग (सं॰ पु॰) अधरो भागः, कर्मधा॰। १ निम्नभाग, नीचा हिस्सा। २ स्त्रियोंका मदनालय, योनि। अधोभागहर (सं॰ त्रि॰) विरेचनके कामका, जुलाब लानेवाला। अधोभागदोषहर (सं॰ त्रि॰) शरीरके निम्नभागका रोग दूर करनेवाला, जिससे जिस्म के नीचे हिस्सेकी बीमारी छूट जाये। अधोभुवन (सं॰ क्ली॰) अधरं भुवनं लोकः, कर्मधा॰। पाताल, इस पृथिवीके नीचेका लोक। अधोभूमि (सं॰ स्त्री॰) १ निम्न भूमि, नीची<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> tkd1syr8vw469qk6zcw0txl6kpmbogt पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३७८ 250 83722 667777 347177 2026-07-15T13:27:29Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 667777 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधोमर्म—अधोऽवेक्षि'''|'''३७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ज़मीन। २ पर्वतके नीचेकी भूमि, पहाड़के नीचेकी ज़मीन। अधोमर्म (सं॰ क्ली॰) अधरं मर्म, कर्मधा॰। गुह्यद्वार, मिक़द। अधोमार्ग (सं॰ पु॰) १ निम्न पथ, नीची राह। २ गुह्यद्वार, मिक़द। अधोमुख (सं॰ त्रि॰) अधोऽवनतं मुखं यस्य, बहुव्री॰। १ अधोवदन, जिसका मुंह लटका हो। (पु॰) २ विष्णु। ३ अनन्तमूल। ज्योतिषमें मूला, अश्लेषा, कृत्तिका, विशाखा, भरणी और मघा—ये नक्षत्र अधोमुख कहाते, जो भूमिखनन और विद्यारम्भके विषयमें प्रशस्त हैं। ४ नरका एक भाग, दोज़ख़का एक हिस्सा। अधोमुखा, अधोमुखी (सं॰ स्त्री॰) गोजिह्वा, अनन्तमूल। अधोयन्त्र (सं॰ क्ली॰) वकयन्त्र, आलेका नीचा हिस्सा। २ भभका। अधोरक्तपित्त (सं० क्लो० ) मलमूत्रद्वारसे रक्त- प्रवाह, दस्त और पेशाबको जगहसे खु नका गिरना । अधोरध (हिं० क्रि० वि० ) ऊपरनीचे, अधीर्ध । अधोराम (वै० पु० ) अधोभागे रम्यते येन स रामः शुक्तः । अज जिसके शरीरवाले निम्नभागमें अनुपम रूपसे कृष्ण या श्वेत चिह्न वर्तमान हों, अपने जिस्म के नीचे हिस्म में निराले तौरपर काले या सफेद धब्बे रखनेवाला बकरा । अधोर्ध (सं० अव्य० ) नीचे-ऊपर | अधोलम्ब (सं० पु० ) १ लम्ब, वह सरल रेखा जो दूसरी सरल रेखापर पड़कर पार्श्वके दोनो कोण सम बनाती है ( perpendiculer ) । २ पाताल, नीचेका मुल्क । ३ साहुल। यह एक लोहेका गोला होता और धागेसे बंधा रहता है। मौमार इसे परदेकी सिधाई जाननेके लिये दीवारके ऊपरसे नीचे लटकाते और नाप-जोख करते हैं । ४ पन्साल, पानीको गाहराई नापनेका यन्त्र या आला । अधोलोक (सं० पु० ) कर्मधा० । भुवन, नोचेको दुनिया | अधोवश (सं० पु० ) १ पेंदा, तलहटी । २ लिङ्ग, अजोतनासुल । ३ योनि, फ़लान । अधोवातावरोधोदावर्त्त (सं० पु० ) रोगविशेष, एक बीमारी । यह एक प्रकारका उदावर्त है, जो वायु- वेगके अवरोधसे उत्पन्न होता है । अधोवायु (सं० पु० ) अधोगामी वायुः । अपान- वायु, वातकर्म ; पाद, गोज ; हवा जो जिस्मके नीचे हिस्म से निकलतौ है । मन्त्रशास्त्री कहते हैं, कि जप करते समय छींकने, पादने और जंभानेसे आचमन कर लेना चाहिये । अधोविनी - ब्राह्मो, जलनोम (Herpestis Monneiria)। | नदी, नाले और तालाब के किनारे गोली महीमें यह उत्पन्न होती है । इसका पत्ता छोटा-छोटा, वृक्षका अवयव बड़ी णुनो- जैसा और रस तिक्त होता है। कासरोग ( खांसी ) और स्वरभङ्गमें ( गला बैठने) इस देशके वैद्य इस बूटीका विशेष उप- योग करते हैं। एनमिलीका कहना है, कि कोष्ठवद होनेमें पेशाब बन्द पड़नेपर ब्राह्मौका रस देनेसे विलक्षण उपकार होता है । रचबर्गने बताया, कि पेट्रोलिअमके साथ ब्राह्मीका रस मिला ग्रन्थिवातके (गठिया) ऊपर मलनेसे सृजन और तकलोक मिट जाती है । किन्तु फर्माकोपियाका ऐसा मत नहीं । अन्यान्य डाकरोंका यही विश्वास है, कि वातरोगमें वेदनास्थलपर उपरोक्त औषध मलनेसे जो कुछ उपकार होता, वह केवल पेट्रोलियमके गुणसे, ब्राह्मौके रससे कुछ भौ नहीं । ब्राह्मी देखो। अधोविन्दु - गगनमण्डलका वह स्थान जो हमारे पैरके ठीक नीचे अवस्थित है, हमारे ठौक पैर के नीचे रहनेवाली आसमानकी जगह । ( Nadir ) पाताल, अधी- अधोऽवेति (सं० अव्य० ) निममें दृष्टिपात करते हुए, नीचे नज़र डालते हुए ।अधोवदन, अधोमुख देखो | अधोवदना (स ं० स्त्री० ) मुद्राविशेष । अधोवर्चस् (सं० त्रि० ) अधोगामि वर्चः ज्योतिर्यस् बहुव्री० । निम्नदेशगामी ज्योतिवाला, जिसकी चमकनीचे जाये ।<noinclude></noinclude> 1cx5fyysms1ep9zf82du07nj0bdqvin 667780 667777 2026-07-15T13:40:12Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 667780 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अधोमर्म—अधोऽवेक्षि'''|'''३७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ज़मीन। २ पर्वतके नीचेकी भूमि, पहाड़के नीचेकी ज़मीन। अधोमर्म (सं॰ क्ली॰) अधरं मर्म, कर्मधा॰। गुह्यद्वार, मिक़द। अधोमार्ग (सं॰ पु॰) १ निम्न पथ, नीची राह। २ गुह्यद्वार, मिक़द। अधोमुख (सं॰ त्रि॰) अधोऽवनतं मुखं यस्य, बहुव्री॰। १ अधोवदन, जिसका मुंह लटका हो। (पु॰) २ विष्णु। ३ अनन्तमूल। ज्योतिषमें मूला, अश्लेषा, कृत्तिका, विशाखा, भरणी और मघा—ये नक्षत्र अधोमुख कहाते, जो भूमिखनन और विद्यारम्भके विषयमें प्रशस्त हैं। ४ नरका एक भाग, दोज़ख़का एक हिस्सा। अधोमुखा, अधोमुखी (सं॰ स्त्री॰) गोजिह्वा, अनन्तमूल। अधोयन्त्र (सं॰ क्ली॰) वकयन्त्र, आलेका नीचा हिस्सा। २ भभका। अधोरक्तपित्त (सं॰ क्ली॰) मलमूत्रद्वारसे रक्त-प्रवाह, दस्त और पेशाबकी जगहसे ख़नका गिरना। अधोरध (हिं॰ क्रि॰-वि॰) ऊपरनीचे, अधीर्ध। अधोराम (वै॰ पु॰) अधोभागे रम्यते येन स रामः शुक्तः। अज जिसके शरीरवाले निम्नभागमें अनुपम रूपसे कृष्ण या श्वेत चिह्न वर्तमान हों, अपने जिस्म के नीचे हिस्से में निराले तौरपर काले या सफ़ेद धब्बे रखनेवाला बकरा। अधोर्ध (सं॰ अव्य॰) नीचे-ऊपर। अधोवदन, <small>अधोमुख देखो।</small> अधोवदना (सं॰ स्त्री॰) मुद्राविशेष। अधोवर्चस् (सं॰ त्रि॰) अधोगामि वर्चः ज्योतिर्यस् बहुव्री॰। निम्नदेशगामी ज्योतिवाला, जिसकी चमकनीचे जाये । अधोलम्ब (सं॰ पु॰) १ लम्ब, वह सरल रेखा जो दूसरी सरल रेखापर पड़कर पार्श्वके दोनो कोण सम बनाती है (perpendiculer)। २ पाताल, नीचेका मुल्क। ३ साहुल। यह एक लोहेका गोला होता और धागेसे बंधा रहता है। मीमार इसे परदेकी सिधाई जाननेके लिये दीवारके ऊपरसे नीचे लटकाते और नाप-जोख करते हैं। ४ पन्साल, पानीकी गाहराई नापनेका यन्त्र या आला। अधोलोक (सं॰ पु॰) कर्मधा॰। पाताल, अधोभुवन, नीचेकी दुनिया। अधोवश (सं० पु० ) १ पेंदा, तलहटी । २ लिङ्ग, अजोतनासुल । ३ योनि, फ़लान । अधोवातावरोधोदावर्त्त (सं० पु० ) रोगविशेष, एक बीमारी । यह एक प्रकारका उदावर्त है, जो वायु- वेगके अवरोधसे उत्पन्न होता है । अधोवायु (सं० पु० ) अधोगामी वायुः । अपान- वायु, वातकर्म ; पाद, गोज ; हवा जो जिस्मके नीचे हिस्म से निकलतौ है । मन्त्रशास्त्री कहते हैं, कि जप करते समय छींकने, पादने और जंभानेसे आचमन कर लेना चाहिये । अधोविनी - ब्राह्मो, जलनोम (Herpestis Monneiria)। | नदी, नाले और तालाब के किनारे गोली महीमें यह उत्पन्न होती है । इसका पत्ता छोटा-छोटा, वृक्षका अवयव बड़ी णुनो- जैसा और रस तिक्त होता है। कासरोग ( खांसी ) और स्वरभङ्गमें ( गला बैठने) इस देशके वैद्य इस बूटीका विशेष उप- योग करते हैं। एनमिलीका कहना है, कि कोष्ठवद होनेमें पेशाब बन्द पड़नेपर ब्राह्मौका रस देनेसे विलक्षण उपकार होता है । रचबर्गने बताया, कि पेट्रोलिअमके साथ ब्राह्मीका रस मिला ग्रन्थिवातके (गठिया) ऊपर मलनेसे सृजन और तकलोक मिट जाती है । किन्तु फर्माकोपियाका ऐसा मत नहीं । अन्यान्य डाकरोंका यही विश्वास है, कि वातरोगमें वेदनास्थलपर उपरोक्त औषध मलनेसे जो कुछ उपकार होता, वह केवल पेट्रोलियमके गुणसे, ब्राह्मौके रससे कुछ भौ नहीं । ब्राह्मी देखो। अधोविन्दु - गगनमण्डलका वह स्थान जो हमारे पैरके ठीक नीचे अवस्थित है, हमारे ठौक पैर के नीचे रहनेवाली आसमानकी जगह । ( Nadir ) पाताल, अधी- अधोऽवेति (सं० अव्य० ) निममें दृष्टिपात करते हुए, नीचे नज़र डालते हुए 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वायु-वेगके अवरोधसे उत्पन्न होता है। अधोवायु (सं॰ पु॰) अधोगामी वायुः। अपान-वायु, वातकर्म; पाद, गोज़; हवा जो जिस्मके नीचे हिस्से से निकलती है। मन्त्रशास्त्री कहते हैं, कि जप करते समय छींकने, पादने और जंभानेसे आचमन कर लेना चाहिये। अधोविनी—ब्राह्मी जलनीम (Herpestis Monneiria)। नदी, नाले और तालाब के किनारे गीली मट्टीमें यह उत्पन्न होती है। इसका पत्ता छोटा-छोटा, वृक्षका अवयव बड़ी णुनी जैसा और रस तिक्त होता है। कासरोग (खांसी) और स्वरभङ्गमें (गला बैठने) इस देशके वैद्य इस बूटीका विशेष उपयोग करते हैं। एनमिलीका कहना है, कि कोष्ठवद्ध होनेमें पेशाब बन्द पड़नेपर ब्राह्मीका रस देनेसे विलक्षण उपकार होता है। रक्षबर्गने बताया, कि पेट्रोलिअमके साथ ब्राह्मीका रस मिला ग्रन्थिवातके (गठिया) ऊपर मलनेसे सृजन और तकलीक़ मिट जाती है। किन्तु फर्माकोपियाका ऐसा मत नहीं। अन्यान्य डाकृरोंका यही विश्वास है, कि वातरोगमें वेदनास्थलपर उपरोक्त औषध मलनेसे जो कुछ उपकार होता, वह केवल पेट्रोलियमके गुणसे, ब्राह्मौके रससे कुछ भी नहीं। <small>ब्राह्मी देखो।</small> अधोविन्दु—गगनमण्डलका वह स्थान जो हमारे पैरके ठीक नीचे अवस्थित है, 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पेंदा, तलहटी। २ लिङ्ग, अज़ोतनासुल। ३ योनि, फ़लान। अधोवातावरोधोदावर्त्त (सं॰ पु॰) रोगविशेष, एक बीमारी। यह एक प्रकारका उदावर्त है, जो वायु-वेगके अवरोधसे उत्पन्न होता है। अधोवायु (सं॰ पु॰) अधोगामी वायुः। अपान-वायु, वातकर्म; पाद, गोज़; हवा जो जिस्मके नीचे हिस्से से निकलती है। मन्त्रशास्त्री कहते हैं, कि जप करते समय छींकने, पादने और जंभानेसे आचमन कर लेना चाहिये। अधोविनी—ब्राह्मी जलनीम (Herpestis Monneiria)। नदी, नाले और तालाब के किनारे गीली मट्टीमें यह उत्पन्न होती है। इसका पत्ता छोटा-छोटा, वृक्षका अवयव बड़ी णुनी जैसा और रस तिक्त होता है। कासरोग (खांसी) और स्वरभङ्गमें (गला बैठने) इस देशके वैद्य इस बूटीका विशेष उपयोग करते हैं। एनमिलीका कहना है, कि कोष्ठवद्ध होनेमें पेशाब बन्द पड़नेपर ब्राह्मीका रस देनेसे विलक्षण उपकार होता है। रक्षबर्गने बताया, कि पेट्रोलिअमके साथ ब्राह्मीका रस मिला ग्रन्थिवातके (गठिया) ऊपर मलनेसे सृजन और तकलीक़ मिट जाती है। किन्तु फर्माकोपियाका ऐसा मत नहीं। अन्यान्य डाकृरोंका यही विश्वास है, कि वातरोगमें वेदनास्थलपर उपरोक्त औषध मलनेसे जो कुछ उपकार होता, वह केवल पेट्रोलियमके 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फर्माकोपियाका ऐसा मत नहीं। अन्यान्य डाकृरोंका यही विश्वास है, कि वातरोगमें वेदनास्थलपर उपरोक्त औषध मलनेसे जो कुछ उपकार होता, वह केवल पेट्रोलियमके गुणसे, ब्राह्मौके रससे कुछ भी नहीं। <small>ब्राह्मी देखो।</small> अधोविन्दु—गगनमण्डलका वह स्थान जो हमारे पैरके ठीक नीचे अवस्थित है, हमारे ठीक पैरके नीचे रहनेवाली आसमानकी जगह। (Nadir) अधोऽवेक्षि (सं॰ अव्य॰) निममें दृष्टिपात करते हुए, नीचे नज़र डालते हुए। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 484wxl9bz6fbggbrqtxdns11gyidjzh पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३७९ 250 83724 667799 347179 2026-07-15T16:04:34Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 667799 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३७२'''|'''अधोश्रपित्त—अध्यर्धकाकिणीक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधोश्रपित्त, <small>अधोरक्तपित्त देखो।</small> अधोऽखम् (सं॰ अव्य॰) अश्वके निममें, घोड़ेसे नीचे। अधौड़ी (हिं॰ स्त्री॰ ) १ चरसेकी आधी पट्टी, पूरे चमड़ेका आधा हिस्सा। २ स्थूल त्वक्, मोटी ख़ाल। 'नरी' अधौंड़ीसे पतली रहती है। अध्मान (सं॰ पु॰) रोगविशेष, पेटकी एक बीमारी। यह पेटको फुलाता, उसमें दर्द पैदा करता और अधोवायुको (पाद) रोकता है। अध्यंस (सं॰ त्रि॰) स्कन्धोपरि अवस्थित, कन्धेपर रखा हुआ। अध्यक्त (सं॰ त्रि॰) सुसज्जित, तय्यार। अध्यक्ष (सं॰ त्रि॰) अधिगतोऽचम्, अत्या॰ तत्। अधिगतं सर्वविषये दत्तमक्षि येन, अत्या-बहुव्री॰। १ प्रधान कर्मकर्त्ता, कर्मके प्रधान सम्पादक; अफ़सर, नायक, मुखिया। (पु॰) अधिगतं अक्षं इन्द्रियम्, अत्या॰-तत्। २ प्रत्यक्ष ज्ञान, आंखों देखी बात। ३ प्रत्यक्षसाक्षी, चश्मदीद गवाह। ४ इन्सपेकृर, सुपरिण्टेण्डे ण्ट, जो कामकी देखभाल रखे। ५ शरीर का वृक्ष, खिरनी। अध्यक्षर (सं॰ अव्य॰) अक्षरको अधिकार कर, हर्फ़ बहर्फ़। २ सब अक्षरोंपर। अध्यग्नि (सं॰ अव्य॰) १ अग्नि के समीप, आगके पास। (क्ली॰) २ विवाहकालमें अग्निके समीप स्त्रीको दान किया जानेवाला धन, स्त्रीधन; माल जो शादीके वक्त, आगके पास औरतको दिया जाता है। अध्यग्निकृत, अध्यग्निउपागत (स॰ क्ली॰) विवाहमें स्त्री॰ को दिया जानेवाला धन, शादी में जो दौलत औरतको दी जाती है। अध्यच्छ, <small>अध्यक्ष देखो।</small> अध्यञ्च (सं॰ त्रि॰) अधि-अञ्चु गतौ क्विप्। अधिगामी, अधिगत; आला, ममताज़; बड़ा, पहुंचा हुआ। अध्यण्डा (सं॰ स्त्री॰) अधिकं अण्डमिव फलं यस्याः, बहुव्री॰। १ कपिकच्छ, कोंच। २ तलिश, पनि-आमलक। ३ कोकिलाक्ष, तालमखाना। अध्यधिक्षेप (सं० पु० ) अधिकोऽधिक्षेपः, प्रादि- स० अतिशय तिरस्कार, अत्यन्त निन्दा ; हृदसे ज्यादा तानाजनी या हिकारत । अध्यधीन (स० वि० ) १ अत्यन्त पराधीन, द ज्यादा मातहत । ३ दासके गर्भसे उत्पन्न, गुलाम नुत्फे.से पैदा हुआ। अध्यय (सं० पु० ) यन, मुतालह, लिखा-पढ़ौ । अधि इक्-अच् । २ स्मरण, याद । ३ पाठ, सबक । ४ भाग, मुकालह । ५ व्याख्यान, वाज, लेक्चर । अध्ययन ( सं ० क्लो० ) अधि. इङ् - ल्युट् । अधि-इङ - अच् भावे । १ अध्य- पठन, मुतालह । यह शब्द प्रधानतः वेद पढ़ने के अर्थ में आता, जो ब्राह्मणोंके छः कर्मों में एक मुख्य कर्म है । २ गुरुके उपदेशानुसार उच्चारण, जो तलफ्फुज. उस्तादके बताने मुताबिक किया जाये । अध्ययनतपसी ( (सं० क्लो० ) अध्ययन और तप, मुतालह और नफ़संकुशी, पढ़ाई और मनकी मराई | अध्ययनपुण्य (स० क्लो० ) अध्ययन से प्राप्त धार्मिक गुण, जो मज़हबी लियाकत पढ़नेसे आये । अध्ययनीय (सं० त्रि०) अधययनयोग्य, पढ़ने काबिल । ar (सं० त्रि० ) अधप्रारूढं अर्धं यस्मिन् । श्रध्यर्धपूर्वद्विगोर्लु ग ्मसंज्ञायाम् । पा५।१।२८ विभाषाकार्षापणसहस्रा भ्याम । पा५|१|१टा १ सार्ध, अर्धविशिष्ट ; डेढ़ । २ जगत्को रखने और बढ़ानेवाला वायु जो सर्वत्र व्यापक है । अधार्धक (सं० त्रि०) १ सार्द्ध-परिमित, डेढ़के तख्मोनेका । २ अर्धविशिष्ट मूल्यका जिसका दाम डेढ़ हो। , अध्यर्धकंस (सं० क्लो० ) १ सार्धकंस, डेढ़ प्याला । (त्रि०) २ सार्धं कंसपरिमित, डेढ़ प्यालेको नापका । ३ अर्धविशिष्ट कंसके मूल्यका, जिसका दाम डेढ़ प्यालेके बराबर हो । अध्यर्धकाकिणीक (सं० त्रि० ) सार्धं काकिणी- - परिमित, तौलमें डेढ़ काकिणीके बराबर । अर्ध-- विशिष्ट काकिणोके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़<noinclude></noinclude> ohxoyscqiw22b1xwoygxu4we0shijcf 667809 667799 2026-07-15T17:16:26Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 667809 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३७२'''|'''अधोश्रपित्त—अध्यर्धकाकिणीक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधोश्रपित्त, <small>अधोरक्तपित्त 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क्लो० ) अध्ययन और तप, मुतालह और नफ़संकुशी, पढ़ाई और मनकी मराई | अध्ययनपुण्य (स० क्लो० ) अध्ययन से प्राप्त धार्मिक गुण, जो मज़हबी लियाकत पढ़नेसे आये । अध्ययनीय (सं० त्रि०) अधययनयोग्य, पढ़ने काबिल । ar (सं० त्रि० ) अधप्रारूढं अर्धं यस्मिन् । श्रध्यर्धपूर्वद्विगोर्लु ग ्मसंज्ञायाम् । पा५।१।२८ विभाषाकार्षापणसहस्रा भ्याम । पा५|१|१टा १ सार्ध, अर्धविशिष्ट ; डेढ़ । २ जगत्को रखने और बढ़ानेवाला वायु जो सर्वत्र व्यापक है । अधार्धक (सं० त्रि०) १ सार्द्ध-परिमित, डेढ़के तख्मोनेका । २ अर्धविशिष्ट मूल्यका जिसका दाम डेढ़ हो। , अध्यर्धकंस (सं० क्लो० ) १ सार्धकंस, डेढ़ प्याला । (त्रि०) २ सार्धं कंसपरिमित, डेढ़ प्यालेको नापका । ३ अर्धविशिष्ट कंसके मूल्यका, जिसका दाम डेढ़ प्यालेके बराबर हो । अध्यर्धकाकिणीक (सं० त्रि० ) सार्धं काकिणी- - परिमित, तौलमें डेढ़ काकिणीके बराबर । अर्ध-- विशिष्ट काकिणोके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़<noinclude></noinclude> t1r9rx721ydu0ji8dghxmxr3fl0fkfa 667810 667809 2026-07-15T17:17:10Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ नियम सुधार 667810 proofread-page text/x-wiki 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अध्य- पठन, मुतालह । यह शब्द प्रधानतः वेद पढ़ने के अर्थ में आता, जो ब्राह्मणोंके छः कर्मों में एक मुख्य कर्म है । २ गुरुके उपदेशानुसार उच्चारण, जो तलफ्फुज. उस्तादके बताने मुताबिक किया जाये । अध्ययनतपसी ( (सं० क्लो० ) अध्ययन और तप, मुतालह और नफ़संकुशी, पढ़ाई और मनकी मराई | अध्ययनपुण्य (स० क्लो० ) अध्ययन से प्राप्त धार्मिक गुण, जो मज़हबी लियाकत पढ़नेसे आये । अध्ययनीय (सं० त्रि०) अधययनयोग्य, पढ़ने काबिल । ar (सं० त्रि० ) अधप्रारूढं अर्धं यस्मिन् । श्रध्यर्धपूर्वद्विगोर्लु ग ्मसंज्ञायाम् । पा५।१।२८ विभाषाकार्षापणसहस्रा भ्याम । पा५|१|१टा १ सार्ध, अर्धविशिष्ट ; डेढ़ । २ जगत्को रखने और बढ़ानेवाला वायु जो सर्वत्र व्यापक है । अधार्धक (सं० त्रि०) १ सार्द्ध-परिमित, डेढ़के तख्मोनेका । २ अर्धविशिष्ट मूल्यका जिसका दाम डेढ़ हो। , अध्यर्धकंस (सं० क्लो० ) १ सार्धकंस, डेढ़ प्याला । (त्रि०) २ सार्धं कंसपरिमित, डेढ़ प्यालेको नापका । ३ अर्धविशिष्ट कंसके मूल्यका, जिसका दाम डेढ़ प्यालेके बराबर हो । अध्यर्धकाकिणीक (सं० त्रि० ) सार्धं काकिणी- - परिमित, तौलमें डेढ़ काकिणीके बराबर । अर्ध-- विशिष्ट काकिणोके 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अधिगतं अक्षं इन्द्रियम्, अत्या॰-तत्। २ प्रत्यक्ष ज्ञान, आंखों देखी बात। ३ प्रत्यक्षसाक्षी, चश्मदीद गवाह। ४ इन्सपेकृर, सुपरिण्टेण्डे ण्ट, जो कामकी देखभाल रखे। ५ शरीर का वृक्ष, खिरनी। अध्यक्षर (सं॰ अव्य॰) अक्षरको अधिकार कर, हर्फ़ बहर्फ़। २ सब अक्षरोंपर। अध्यग्नि (सं॰ अव्य॰) १ अग्नि के समीप, आगके पास। (क्ली॰) २ विवाहकालमें अग्निके समीप स्त्रीको दान किया जानेवाला धन, स्त्रीधन; माल जो शादीके वक्त, आगके पास औरतको दिया जाता है। अध्यग्निकृत, अध्यग्निउपागत (स॰ क्ली॰) विवाहमें स्त्री॰ को दिया जानेवाला धन, शादी में जो दौलत औरतको दी जाती है। अध्यच्छ, <small>अध्यक्ष देखो।</small> अध्यञ्च (सं॰ त्रि॰) अधि-अञ्चु गतौ क्विप्। अधिगामी, अधिगत; आला, ममताज़; बड़ा, पहुंचा हुआ। अध्यण्डा (सं॰ स्त्री॰) अधिकं अण्डमिव फलं यस्याः, बहुव्री॰। १ कपिकच्छ, कोंच। २ तलिश, पनि-आमलक। ३ कोकिलाक्ष, तालमखाना।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अध्यधिक्षेप (सं॰ पु॰) अधिकोऽधिक्षेपः, प्रादि-स॰। अतिशय तिरस्कार, अत्यन्त निन्दा; हृदसे ज्य़ादा तानाज़नी या हिक़ारत। अध्यधीन (स॰ त्रि॰) १ अत्यन्त पराधीन, हदसे ज्य़ादा मातहत। ३ दासके 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सार्ध, अर्धविशिष्ट; डेढ़। २ जगत्को रखने और बढ़ानेवाला वायु जो सर्वत्र व्यापक है। अधार्धक (सं॰ त्रि॰) १ सार्द्ध-परिमित, डेढ़के तख्म़ीनेका। २ अर्धविशिष्ट मूल्यका जिसका दाम डेढ़ हो। अध्यर्धकंस (सं॰ क्ली॰) १ सार्धकंस, डेढ़ प्याला। (त्रि॰) २ सार्ध कंसपरिमित, डेढ़ प्यालेकौ नापका। ३ अर्धविशिष्ट कंसके मूल्यका, जिसका दाम डेढ़ प्यालेके बराबर हो। अध्यर्धकाकिणीक (सं॰ त्रि॰) सार्ध-काकिणी-परिमित, तौलमें डेढ़ काकिणीके बराबर। अर्ध-विशिष्ट काकिणीके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> gu0pjuqbimbd98ihpgmxharuw57yn1t पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३८० 250 83726 667840 347181 2026-07-16T10:00:58Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 वर्तनी सुधार 667840 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अध्यर्धकार्षापण—अध्यवहनन'''|'''३७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>काकिणी हो। काकिणी बीस कौड़ीके सिक्के़ और अध्यर्धसहस्र, अध्वर्धसाहस्र (सं० ति० ) परिमाण एक हाथकी नापको कहते हैं। अध्यर्धकार्षापण, अध्यर्धकार्षापणिक (सं॰ त्रि॰) १ सार्ध कार्षापण-परिमित, डेढ़ कार्षापणके वज़नका। २ अर्धविशिष्ट कार्षापणके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़ कार्षापण हो। एक कार्षापण परिमाण और मूल्यमें अस्सी कौड़ियोंका होता है। अध्यर्धखारीक (सं॰ त्रि॰) सार्ध खारीपरिमित, डेढ़ खारीकी तौलका। २ अर्धविशिष्ट खारीके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़ खारी हो। एक खारी दो मन सोलह सेरकी होती है। अध्यर्धपण्य (सं॰ त्रि॰) १ सार्ध पणपरिमित, डेढ़ पण के वज़नका। २ अर्धविशिष्ट पणके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़ पण हो। पण एक तोले और आठ माशेका होता है। अध्यर्धपाद्य (सं॰ त्रि॰) सार्ध पादपरिमित, डेढ़ क़दमका। अध्यर्धप्रतीक (सं॰ त्रि॰) सार्धकार्षापण-परिमित, डेढ़ कार्षापण या १२० कौड़ियोंकी तौलका। अथवा मूलामें सार्धं सहस्रके समान, जो वजुन या कोमतमें डेढ़ हज़ार के बराबर हो । अध्यर्धसुवर्ण, अध्यर्धसुवर्णिक (सं० त्रिः ) परिमाण अथवा मूलप्रमें सार्ध सुवर्णके समान, जो वज़न या कीमतमें दो तोलेके बराबर हो । सुवर्ण सोलह माका होता है । अधार्बुद (सं० पु० ) अर्बुदोपरि जातार्बुदरोग, फोड़े- पर फोड़ा या आबलेपर आबला पड़नेको बीमारी । "बज्जायतेऽन्यत् खलु पूर्वजाते ज्ञेयं तदध्यवु दमवु दनैः ।” ( मुश्रुत० नि० ११ अ० ) ‘जो फोड़ा पहले हुए फोड़ेपर पड़े, उसे अध्यर्बुद रोग समझना चाहिये ।' अध्यवसान (सं० लौ० ) १ अभिप्राय, इरादा । २ चेष्टा, कोशिश । ३ उत्साह, हौसला । ४ वाक्य- रचनाका संक्षिप्त और शक्तिशाली वचन ; सनअते- ; कलाम, जो बात मुख्तसर और जोरदार तौरपर कहौ जाये । अध्यर्धमाश्य (सं० त्रि० ) सार्धमाश-परिमित, डेढ़ अध्यवसाय (सं० पु० ) अधि अव-सो- घञ् । १ उत्साह, माशेका । अध्यर्धविंशतिकोन (सं० त्रि०) परिमाण या मूल्य में सार्धं विंशतिका, जो वज़न या क़ीमतमं डेढ़ कोड़ो या तोसके बराबर हो । अध्यर्धशत, अध्यर्धशत्य (सं० त्रि० ) सार्धं शत परिमित अथवा अर्धविशिष्ट शतसे क्रौत डेढ़ सौको संख्याका या डेढ़ सौ से खरीदा गया । अध्यर्धशतमान (सं० त्रि० ) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शतमानके तुला, जो वजन या कीमत में ढेढ़ सेकड़ेके बराबर हो । हौसला । २ अविश्रान्त उद्योग, जो काम बराबर जारौ रहे । ३ निश्चय, यकीन । जो किसीको कोई काम करनेसे किसौ तरहके फलका निश्चय हो जाये, तो उस निश्चयको अध्यवसाय कहते हैं । नैयायिक इसे आत्मधर्म बताते हैं ; किन्तु सांख्यवादियोंके मतसे यह बुद्धिका धर्म है । अध्यवसायित (स ं० त्रि० ) अध्यवसायो जातोऽस्य, तारकादित्वात् इतच् । जाताध्यवसाय, चेष्टित; कुरद किये हुए, जिसने पूरा इरादा बांध लिया हो । अध्यवसायिन् ( सं० त्रि० ) अधि-अव-सो- णिनि । १ उत्साहान्वित, हौसलेमन्द । २ उद्यमशील, रोज- गारो । ३ निश्चयकारी, जिसे यकौन आ गया हो । अध्यर्धशाण, अध्यर्धशाण्य (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शाणके तुल्य, जो वज़न या कोमतमें छ: माशे या आधे तोलेके बराबर हो । शाण चार | अध्यवसायो, श्रध्यवसायिन् देखो । माका होता है । अध्यर्धशूर्प (सं० त्रि० ) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शूर्प के सदृश, जो वजन या क़ीमतमें तौन माशेके बराबर हो । शूर्प दो माशेका होता है। ८४ अध्यवसित (सं० त्रि०) हृदयसे ज्ञात, निश्चित, अनुमोदित ; दिलसे समझा बूझा, यकीन किया हुआ, इरादा बांधा गया । अध्यवहनन (वै० क्लौ० ) अधि उपरि अवहननम्<noinclude></noinclude> idb21hu9vs9x7cduktfzr6858t91r5w पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२५४ 250 105310 667841 371944 2026-07-16T10:05:22Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 667841 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कविलास-काव्य|२५५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|कविलास (हिं॰ पु॰) १ कैलाश, महादेवके रहनेका पहाड़। २ स्वर्ग, विहिश्ट।}} {{outdent|कविलासिका (सं॰ स्त्री॰) कं सुखं विलासयति छीपयति, क-वि-लस-णिच्-एष्-टाप् अत इलम्। वीणाविशेष, किसी किस्मका तम्बूर।}} {{outdent|कविवर (सं॰ त्रि॰) कविषु वरः श्रेष्ठः। कविष्ठ, शायरोंमें बड़ा।}} {{outdent|कविवल्लभ (सं॰ पु॰) कालादर्श वा कालनिर्यय नामक स्मृतिग्रन्थके रचयिता। इनका अपर नाम भादिलसूरि था। विश्वेश्वर आचार्यने इन्हें शिक्षा दी थी।}} {{outdent|कविवृद्ध (वै॰ त्रि॰) कवियोंको बढ़ानेवाला।}} {{outdent|कविवेदी (सं॰ त्रि॰) कविं कविलं वेत्ति, कविविद्ष्टनि। १ काव्यवेत्ता, शायरी समझनेवाला। २ कवि, शायर।}} {{outdent|कवियशस्त (सं॰ त्रि॰) कविषु यशसः ख्यातः, ७-त्। कवियोंमें विख्यात, शायरोंमें मशहूर।}} {{outdent|कविशेखर (सं॰ पु॰) १ साधनसुभाषती नामक संस्कृत ग्रन्थके प्रणेता। २ सङ्गीत तालविशेष।}} {{outdent|कवी (सं॰ स्त्री॰) कवि-डीष्। खलीन, लगाम।}} {{outdent|कवीठ (हिं॰ पु॰) कपीष्ठ, कैथा।}} {{outdent|कवीन्द्र आचार्य (सरस्वती) कविकल्पद्रुम और पदचन्द्रिका नामका संस्कृत ग्रन्थके रचयिता।}} {{outdent|कवीन्द्रनारायण (शर्मा) एकावल्यचन्द्रिका और विरलामाहात्मा नामक संस्कृत ग्रन्थके रचयिता। इन्होंने उक्त दोनों ग्रन्थ उत्कलराज अलावुकेशरीके समयमें बनाये थे।}} {{outdent|कवोय (सं॰ क्ली॰) कवि स्वार्थे छ। खलीन, लगाम।}} {{outdent|कवीयत् (सं॰ त्रि॰) कविरिव आचरति, कविं स्तोतारं इच्छति वा, कवीय-शतृ। १ कविसदृश, शायरके बराबर। २ अपनी प्रशंसा इच्छुक, जो अपनी तारीफ़ चाहता हो।}} {{outdent|कवीयान् (सं॰ त्रि॰) अयमनयोस्तिशयेन कवि, कवि-ईयसुन्। <small>वियचनविम्बोषपदेत्तरकवीयसुनौ। पा ६।१।५७।</small> उभय कवियोंमें श्रेष्ठ, दोनों शायरोंमें बड़ा।}} {{outdent|कबुल, ज्योतिषका एक योग।}} {{outdent|कवेरा (हिं॰ पु॰) ग्रामीण, देहाती, गंवार।}} {{Multicol-break}} {{outdent|कवेल (सं॰ क्ली॰) कं शब्दं विलति स्तृणाति, क-विल-अण। १ उत्वज, नीला कंवल।}} {{outdent|कवेला (हिं॰ पु॰) भ्रमणका कीलक, चक्करकी कील। वह दिग्दर्शनयन्त्र (कुतुबनुमा) की सूची लगाती है। २ काकयावक, कौवेका बच्चा। कवोड़म्बर, <small>कबाटम्बर देखो।</small>}} {{outdent|कवोष्ण (सं॰ स्त्री॰) कुत्सितं ईषत् उष्णम्, कर्मधा॰ कोः कवादेशः। ईषत् उष्णायमान, थोड़ी गर्मी। (त्रि॰) २ ईषत् उष्णायमान, कुछ गर्म।}} {{block center|<poem><small> "भतपरं दुलर्भं मन्त्रानुस्मारनितं मया। पयः पूर्वै: सलिल्याहैः कवोष्णमुपभुज्यते॥" (रघु १।६७)</small></poem>}} {{outdent|कव्य (वै॰ त्रि॰) कवि यत्। <small>(वस्त्रपद, शोषणविषयकर्मन्निष्ठे वल उक्यजनपूर्वजद्वच्वरतयार्थ इत्य तेम्यष्ट्वद्वि खाँय यत्। काशिका ५।४।३०)</small> १ स्तवकारी, तारीफ़ करनेवाला। (सायण) (पु॰) २ वेदोक्त पितृलोक विशेष।}} {{c|<small>"मातली कवैर्यंसी अक्तिरोमिः।" (ऋग्वेद संहिता १०।१४।५)</small>}} ३ चतुर्थ मन्वन्तरके सप्तर्षियोंमें एक ऋषि। (क्ली॰) कूयते हीयते पिढभ्यः यत् शब्दादिकम् तु॰-अच्-यत्। अचो यत्। पा ३।१।९७। पितृलोक विशेषके उद्देश्यसे दिया जानेवाला अन्न। कव्य पदार्थ श्रत्रिय ब्राह्मणको दान न करनेसे निष्फल हो जाता है। मनुसंहितामें लिखते हैं कि विद्वान् ब्राह्मणको कव्य खिलानेसे अनेक पुष्कल-फल मिलते हैं। किन्तु पमन्नष्ट वड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे भी वह लाभ नहीं निकलता। दूसरे-अमन्नष्ट ब्राह्मण जितने घास लेता, पितृलोकके सुखमें उतने ही उत्सस कोटिके गोले छोड़ देता है। अतएव प्रथम ही परीक्षाके साथ ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणको कव्य भोजन कराना चाहिये। वेदतत्त्वविद् ब्राह्मणोंमें ज्ञाननिष्ठ, तपोनिष्ठ, तपःस्वाध्यायनिष्ठ और कर्मनिष्ठ भेदसे चार श्रेणियां होती हैं। हव्यके भोजनमें चारो श्रेणियोंका विधान है। किन्तु कव्यके भोजनमें एक मात्र ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणको ही अधिकार है। {{block center|<poem><small> "ज्ञाननिष्ठाः द्विजाः केचित् तपोनिष्ठास्तथापरे। तपःस्वाध्यायनिष्ठाय कर्मनिष्ठास्तथापरे॥"</small></poem>}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> tv5hyycmdswj1a6fnvasgh89oitrpwr पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२५५ 250 105311 667842 371945 2026-07-16T10:07:33Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 667842 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२५६|कव्यता कशाईफुलिया}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{block center|<poem><small> ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि भवतः। हव्यानि तु यथाशक्ति सर्वेष्वेव चतुप्वापि॥" (मनु १अ॰)</poem></small>}} ऐसे ब्राह्मणका अभाव होनेसे मातामह, मातुल, भगिनेय, श्वशुर, गुरुद, दौहित, जामाता, बन्धु पुरोहित वा यजमानको कव्य दे देना चाहिये। मनुके मतसे वेदज्ञ रहते भी निम्नोक्त ब्राह्मणको कव्य खिलाना निषिद्ध है,—चिकित्सक, दैवज्ञ, कन्याविक्रेता, दुकानदार, चौर्यादि दोषोंसे पतित, क्रोध, नास्तिक, जटाधारी, दुर्बल, प्रतारक, राजाके प्रेष्य, कुनख, श्यावदन्त, गुरुकि प्रतिरोद्धा, अग्नित्यागी, राजयक्ष्मी, पशुपालक, ब्रह्मद्वेषी अग्निनेता, शूद्राणोपति, विषवार्के गर्भजात, काने, वेतन ग्रहणपूर्वक अध्यापना करनेबाले, शूद्रके शिष्य, दुष्टवादी, माता पिता एवं गुरुक्के अकारणपरित्यागी, गृहदायक, विषदाता, कुण्डान्नभोजी, सोमविक्रेता, समुद्रयात्री, अविवाहित, अग्रजके वर्तमान रहते विवाहकारी, जारज, बन्दी, तेलिक, कुटकारक, पिताके विवादकारी, मद्यप, पापरोगी, दाम्भिक, रसविक्रेता, धनु तथा शस्त्रनिर्माता, दिधिषूपति, मित्रद्रोही, दूतवृत्ति, पुत्राचार्य, अपस्प्राररोगी, गण्डमालारोगी, व्यवरोगी, खल, दम्भक्त, भ्रूण, वेदनिन्दक, ज्योतिषी, व्यंसायी, पक्षिपोषक, शूद्रशास्त्रके आचार्य, स्थपति, दूत, हत्यारोपक कृतरक्षी क्रीड़ाशील, श्येनपक्षिजीवी, कन्यादूषक, हिंस्र, शूद्रवृत्ति, गण्यायाकारी, आचारहीन, कृषिजीवी, श्लोपदरोगी, और सज्जनिन्दित। {{outdent|कव्यता (वै॰ स्त्री॰) १ स्तुति, तारीफ । २ ज्ञान, समभ।}} {{outdent|कव्यवाड़, <small>कव्यवाल देखो।</small> कव्यवाल (सं॰ पु॰) कव्यं वहते द्रीयते अस्मै, कव्य-वह- घञ्। १ पितृगणाविशेष। {{block center|<poem><small> "कव्यवाहोऽनलः सोनो यमस्य वायसना तथा। अनिम्बाना वरिष्ठः सोमपाः पितृदेवताः॥" (ब्रह्माण्डपुराण)</small></poem>}} २ अग्नि, आग। अग्निमुखमें ही पितृगणके उद्देश्यसे दान किया जाता है। {{outdent|कव्यवाह् (सं॰ पु॰) कव्यं वहति, कव्य-वह्-ण्वि। अग्नि, आग। इसमें पितृगणके उद्देश्यसे कव्य डाला जाता है।}} {{outdent|कव्यवाह (सं॰ पु॰) कव्यं वहति प्रापयति पितृमिति {{Multicol-break}} शेष; कव्य वह्-अण्। अग्नि, पितरोंको कव्य पहुँचानेवाली आग। कव्यवाहन (वै॰ पु॰) कव्यं वहति, कव्य-वह्-व्युट्। <small>फव्यपुरीषुपुरौप्येषु ल्युट्। पा ३। २। ६४।</small> १ अग्नि, पितरोंकोकव्य पहुँचानेवाली आग। {{c|<small>"अग्रये कव्यवाहनाय स्वाहा।" (शुक्र यजुः २। २९)</small>}} यजुर्वेदके मतमें अग्नि तीन प्रकारका होता है,— हव्यवाहन, कव्यवाहन और सहरक्षा। देवगणका हव्यवाहन, पितृगणका कव्यवाहन और असुरगणका अग्नि सहस्राक्षा कहाता है। (तैत्तिरीयसंहिता २। १। ८। ६)। {{outdent|कश (सं॰ पु॰) कश्यति गच्छयते ताड़यति वा, कशअच्। १ अश्वादिताड़िनी, चाबुक, कोड़ा। यह चर्म, वस्त्र, वेत्र प्रभृति द्वारा प्रस्तुत होता है।}} {{c|<small>"स राजा तं कशेन अताड़यत्।" (महाभारत ३।१९६ पः)</small>}} २ क्षुद्र पक्षु विशेष, एक छोटा जानवर। {{outdent|कश (फा॰ स्त्री॰) १ आकर्षण, खींच। २ दम, फूंक।}} {{outdent|कशकु (सं॰ पु॰) गवेधुक, कसी, एक पौधा।}} {{outdent|कथकोल (फा॰ पु॰) कवांल, खप्पर। इन्हें भिक्षुक अपने हाथमें रखते हैं।}} {{outdent|कशमकश (फा॰ स्त्री॰) १ आकर्षण, खींचखांच। २ घसारोड़, रेलपेल। ३ घसमघस, आगा पीछा।}} {{outdent|कशस् (सं॰ क्ली॰) कशति नीचं गच्छति, कशअसुन्। जल, नीचे रहनेवाला पानी।}} {{outdent|कशा (सं॰ स्त्री॰) कश टाप्। १ अश्वादिताड़िनी, चाबुक, कोड़ा। <small>"अघान कशया मोक्षात् तदा राघप्तवस्य निम्।" (भारत १। १७७। १०)</small> २ मांसरोहिणी, एक खुश्बूदार पेड़। ३ रज्जु, रस्सी।}} {{outdent|कशाई—१ नदी विशेष, एक दरया। यह बङ्गालके मेदिनीपुर जिलेंमें प्रवाहित है। पढ़े लिखे लोग इसे कांसवती कहते हैं। किन्तु कालिदासने अपने रघुवंशमें कपिशानदीके नामसे इसका परिचय दिया है।}} {{outdent|कशाईमुखिया—पश्चिम बङ्गालकी एक बागदी जाति। यह कशाई नदीमें नौका चलाते और मत्स्य मार जाते हैं। चौदह प्रकारके बागदियोंमें कशाईमुखिया अपनेको श्रेष्ठ बताते हैं।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> ryrzq21hr7l5lvpn6qdpwrp4hu1g84m 667843 667842 2026-07-16T10:08:46Z रेखा साव 5914 667843 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२५६|कव्यता कशाईफुलिया}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{block center|<poem><small> ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि भवतः। हव्यानि तु यथाशक्ति सर्वेष्वेव चतुप्वापि॥" (मनु १अ॰)</poem></small>}} ऐसे ब्राह्मणका अभाव होनेसे मातामह, मातुल, भगिनेय, श्वशुर, गुरुद, दौहित, जामाता, बन्धु पुरोहित वा यजमानको कव्य दे देना चाहिये। मनुके मतसे वेदज्ञ रहते भी निम्नोक्त ब्राह्मणको कव्य खिलाना निषिद्ध है,—चिकित्सक, दैवज्ञ, कन्याविक्रेता, दुकानदार, चौर्यादि दोषोंसे पतित, क्रोध, नास्तिक, जटाधारी, दुर्बल, प्रतारक, राजाके प्रेष्य, कुनख, श्यावदन्त, गुरुकि प्रतिरोद्धा, 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वरिष्ठः सोमपाः पितृदेवताः॥" (ब्रह्माण्डपुराण)</small></poem>}} २ अग्नि, आग। अग्निमुखमें ही पितृगणके उद्देश्यसे दान किया जाता है। {{outdent|कव्यवाह् (सं॰ पु॰) कव्यं वहति, कव्य-वह्-ण्वि। अग्नि, आग। इसमें पितृगणके उद्देश्यसे कव्य डाला जाता है।}} {{outdent|कव्यवाह (सं॰ पु॰) कव्यं वहति प्रापयति पितृमिति}} {{Multicol-break}} शेष; कव्य वह्-अण्। अग्नि, पितरोंको कव्य पहुँचानेवाली आग। कव्यवाहन (वै॰ पु॰) कव्यं वहति, कव्य-वह्-व्युट्। <small>फव्यपुरीषुपुरौप्येषु ल्युट्। पा ३। २। ६४।</small> १ अग्नि, पितरोंकोकव्य पहुँचानेवाली आग। {{c|<small>"अग्रये कव्यवाहनाय स्वाहा।" (शुक्र यजुः २। २९)</small>}} यजुर्वेदके मतमें अग्नि तीन प्रकारका होता है,— हव्यवाहन, कव्यवाहन और सहरक्षा। देवगणका हव्यवाहन, पितृगणका कव्यवाहन और असुरगणका अग्नि सहस्राक्षा कहाता है। (तैत्तिरीयसंहिता २। १। ८। ६)। {{outdent|कश (सं॰ पु॰) कश्यति गच्छयते ताड़यति वा, कशअच्। १ अश्वादिताड़िनी, चाबुक, कोड़ा। यह चर्म, वस्त्र, वेत्र प्रभृति द्वारा प्रस्तुत होता है।}} {{c|<small>"स राजा तं कशेन अताड़यत्।" (महाभारत ३।१९६ पः)</small>}} २ क्षुद्र पक्षु विशेष, एक छोटा जानवर। {{outdent|कश (फा॰ स्त्री॰) १ आकर्षण, खींच। २ दम, फूंक।}} {{outdent|कशकु (सं॰ पु॰) गवेधुक, कसी, एक पौधा।}} {{outdent|कथकोल (फा॰ पु॰) कवांल, खप्पर। इन्हें भिक्षुक अपने हाथमें रखते हैं।}} {{outdent|कशमकश (फा॰ स्त्री॰) १ आकर्षण, खींचखांच। २ घसारोड़, रेलपेल। ३ घसमघस, आगा पीछा।}} {{outdent|कशस् (सं॰ क्ली॰) कशति नीचं गच्छति, कशअसुन्। जल, नीचे रहनेवाला पानी।}} {{outdent|कशा (सं॰ स्त्री॰) कश टाप्। १ अश्वादिताड़िनी, चाबुक, कोड़ा। <small>"अघान कशया मोक्षात् तदा राघप्तवस्य निम्।" (भारत १। १७७। १०)</small> २ मांसरोहिणी, एक खुश्बूदार पेड़। ३ रज्जु, रस्सी।}} {{outdent|कशाई—१ नदी विशेष, एक दरया। यह बङ्गालके मेदिनीपुर जिलेंमें प्रवाहित है। पढ़े लिखे लोग इसे कांसवती कहते हैं। किन्तु कालिदासने अपने रघुवंशमें कपिशानदीके नामसे इसका परिचय दिया है।}} {{outdent|कशाईमुखिया—पश्चिम बङ्गालकी एक बागदी जाति। यह कशाई नदीमें नौका चलाते और मत्स्य मार जाते हैं। चौदह प्रकारके बागदियोंमें कशाईमुखिया अपनेको श्रेष्ठ बताते हैं।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 7fifkd290g5nvgomyh56flbwvykdin2 667844 667843 2026-07-16T10:09:37Z रेखा साव 5914 667844 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२५६|कव्यता कशाईफुलिया}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{block center|<poem><small> ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि भवतः। हव्यानि तु यथाशक्ति सर्वेष्वेव चतुप्वापि॥" (मनु १अ॰)</poem></small>}} ऐसे ब्राह्मणका अभाव होनेसे मातामह, मातुल, भगिनेय, श्वशुर, गुरुद, दौहित, जामाता, बन्धु पुरोहित वा यजमानको कव्य दे देना चाहिये। मनुके मतसे वेदज्ञ रहते भी निम्नोक्त ब्राह्मणको कव्य खिलाना निषिद्ध है,—चिकित्सक, दैवज्ञ, कन्याविक्रेता, दुकानदार, चौर्यादि दोषोंसे पतित, क्रोध, नास्तिक, जटाधारी, दुर्बल, प्रतारक, राजाके प्रेष्य, कुनख, श्यावदन्त, गुरुकि प्रतिरोद्धा, अग्नित्यागी, राजयक्ष्मी, पशुपालक, ब्रह्मद्वेषी अग्निनेता, शूद्राणोपति, विषवार्के गर्भजात, काने, वेतन ग्रहणपूर्वक अध्यापना करनेबाले, शूद्रके शिष्य, दुष्टवादी, माता पिता एवं गुरुक्के अकारणपरित्यागी, गृहदायक, विषदाता, कुण्डान्नभोजी, सोमविक्रेता, समुद्रयात्री, अविवाहित, अग्रजके वर्तमान रहते विवाहकारी, जारज, बन्दी, तेलिक, कुटकारक, पिताके विवादकारी, मद्यप, पापरोगी, दाम्भिक, रसविक्रेता, धनु तथा शस्त्रनिर्माता, दिधिषूपति, मित्रद्रोही, दूतवृत्ति, पुत्राचार्य, अपस्प्राररोगी, गण्डमालारोगी, व्यवरोगी, खल, दम्भक्त, भ्रूण, वेदनिन्दक, ज्योतिषी, व्यंसायी, पक्षिपोषक, शूद्रशास्त्रके आचार्य, स्थपति, दूत, हत्यारोपक कृतरक्षी क्रीड़ाशील, श्येनपक्षिजीवी, कन्यादूषक, हिंस्र, शूद्रवृत्ति, गण्यायाकारी, आचारहीन, कृषिजीवी, श्लोपदरोगी, और सज्जनिन्दित। {{outdent|कव्यता (वै॰ स्त्री॰) १ स्तुति, तारीफ । २ ज्ञान, समभ।}} {{outdent|कव्यवाड़, <small>कव्यवाल देखो।</small> कव्यवाल (सं॰ पु॰) कव्यं वहते द्रीयते अस्मै, कव्य-वह- घञ्। १ पितृगणाविशेष।}} {{block center|<poem><small> "कव्यवाहोऽनलः सोनो यमस्य वायसना तथा। अनिम्बाना वरिष्ठः सोमपाः पितृदेवताः॥" (ब्रह्माण्डपुराण)</small></poem>}} २ अग्नि, आग। अग्निमुखमें ही पितृगणके उद्देश्यसे दान किया जाता है। {{outdent|कव्यवाह् (सं॰ पु॰) कव्यं वहति, कव्य-वह्-ण्वि। अग्नि, आग। इसमें पितृगणके उद्देश्यसे कव्य डाला जाता है।}} {{outdent|कव्यवाह (सं॰ पु॰) कव्यं वहति प्रापयति पितृमिति}} {{Multicol-break}} शेष; कव्य वह्-अण्। अग्नि, पितरोंको कव्य पहुँचानेवाली आग। कव्यवाहन (वै॰ पु॰) कव्यं वहति, कव्य-वह्-व्युट्। <small>फव्यपुरीषुपुरौप्येषु ल्युट्। पा ३। २। ६४।</small> १ अग्नि, पितरोंकोकव्य पहुँचानेवाली आग। {{c|<small>"अग्रये कव्यवाहनाय स्वाहा।" (शुक्र यजुः २। २९)</small>}} यजुर्वेदके मतमें अग्नि तीन प्रकारका होता है,— हव्यवाहन, कव्यवाहन और सहरक्षा। देवगणका हव्यवाहन, पितृगणका कव्यवाहन और असुरगणका अग्नि सहस्राक्षा कहाता है। (तैत्तिरीयसंहिता २। १। ८। ६)। {{outdent|कश (सं॰ पु॰) कश्यति गच्छयते ताड़यति वा, कशअच्। १ अश्वादिताड़िनी, चाबुक, कोड़ा। यह चर्म, वस्त्र, वेत्र प्रभृति द्वारा प्रस्तुत होता है।}} {{c|<small>"स राजा तं कशेन अताड़यत्।" (महाभारत ३।१९६ पः)</small>}} २ क्षुद्र पक्षु विशेष, एक छोटा जानवर। {{outdent|कश (फा॰ स्त्री॰) १ आकर्षण, खींच। २ दम, फूंक।}} {{outdent|कशकु (सं॰ पु॰) गवेधुक, कसी, एक पौधा।}} {{outdent|कथकोल (फा॰ पु॰) कवांल, खप्पर। इन्हें भिक्षुक अपने हाथमें रखते हैं।}} {{outdent|कशमकश (फा॰ स्त्री॰) १ आकर्षण, खींचखांच। २ घसारोड़, रेलपेल। ३ घसमघस, आगा पीछा।}} {{outdent|कशस् (सं॰ क्ली॰) कशति नीचं गच्छति, कशअसुन्। जल, नीचे रहनेवाला पानी।}} {{outdent|कशा (सं॰ स्त्री॰) कश टाप्। १ अश्वादिताड़िनी, चाबुक, कोड़ा। <small>"अघान कशया मोक्षात् तदा राघप्तवस्य निम्।" (भारत १। १७७। १०)</small> २ मांसरोहिणी, एक खुश्बूदार पेड़। ३ रज्जु, रस्सी।}} {{outdent|कशाई—१ नदी विशेष, एक दरया। यह बङ्गालके मेदिनीपुर जिलेंमें प्रवाहित है। पढ़े लिखे लोग इसे कांसवती कहते हैं। किन्तु कालिदासने अपने रघुवंशमें कपिशानदीके नामसे इसका परिचय दिया है।}} {{outdent|कशाईमुखिया—पश्चिम बङ्गालकी एक बागदी जाति। यह कशाई नदीमें नौका चलाते और मत्स्य मार जाते हैं। चौदह प्रकारके बागदियोंमें कशाईमुखिया अपनेको श्रेष्ठ बताते हैं।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> cmw7sfk9zzv0ihkom1sw43m3l3gsfsg पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२५६ 250 105312 667845 371946 2026-07-16T10:11:23Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 667845 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कशाघात-कशेरुक|२५७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|कशाघात (सं॰ पु॰) कशेन कशया वा आघातः, ३-तत्। कशका आघात, चाबुककी मार।}} {{outdent|कशावय (सं॰ क्ली॰) कशानां कशाघातानां वयम्, बहुब्री॰। तीन प्रकारका कशाघात, तीन तरहकी चाबुककी मार। यह मृदु, मध्य और निष्ठुर होता है। अश्वोंको साधारण दण्ड देते समय मृदु आघात लगाते हैं। किन्तु उपवेशन, निद्रा, स्खलन, दुष्ट-चेष्टा, अश्विनी (घोड़ी) देखनेका औत्सुक्य, गर्वित हेषारव (जोरकी छिनछिनाहट), त्रास, दुरूत्थान, विमार्गगमन, भय, शिक्षात्याग, चित्तभ्रम प्रभृति अपराधोंमें मध्य और निष्ठुर आघात देना पड़ता है। अपराध विशेषमें आघातका स्थान भी पृथक् है। त्रास एवं भयमें गलदेश, शिक्षात्याग तथा चित्तविभ्रममें घर, गर्दित हेषारव एवं अश्विनी देखनेके ओतसुक्यमें बाहु तथा स्कन्ददेश, उपवेशन एवं निद्रामें कटिदेश, दुर्यवहार तथा विमार्ग प्रधानमें मुख, स्खलन एवं दुष्त्यानमें जबन और कुद्ध प्रकृतिमें सर्वशानवर कशा मारते हैं।}} {{outdent|कशारि (सं॰ स्त्री॰) यज्ञकी एक वेदी। यह यज्ञस्थलमें उत्तर दिक् रहती है।}} {{outdent|कशाई (सं॰ त्रि॰) कशां अहंति, कशा-अर्ह-अण्। कश्य, चाबुक लगाने लायक। <small>कशावप देखो।</small>}} {{outdent|कशावान् (सं॰ त्रि॰) कशा लिये-हुवा, जो चाबुक रखता हो।}} {{outdent|कशिक (सं॰ पु॰) कशति छिनस्ति सर्वम्, कश बाहुलकात इक्। नकुल, सांपको मार डालनेवाला नेवला।}} {{outdent|कशिकपाद (सं॰ त्रि॰) कशिकस्य पादाविव पादौ यस्य, बहुब्री॰। हस्यादित्वात् नाक्यलोपः। <small>पादस्य खोपोऽहश्वादिभः। पा। ५। ४। १३८।</small> नकुलकी भांति पदविशिष्ट (जन्तु), नेवलेकी तरह पैरवाला (जानवर)। {{outdent|कशिका (सं॰ स्त्री॰) चर्मकशा, चमड़े का चाबुक।}} {{outdent|कशिपु (सं॰ पु॰) कशति दुःख कश्यते वा, मृगयूदिलात् निपातनात् साधुः। १ अन्न, अनाज। २ आच्छादन, कपड़ा। ३ भक्त,-भात। ४. शय्या, पलंग।}} {{c|<small>"धर्मा वित्तो निं कशिपोः प्रयासै:।" (भागवत २। ३। ४)</small>}} {{c|Vol. IV.{{gap}} 65}} {{Multicol-break}} ५ आसन विशेष, एक बैठक। {{outdent|कशियूपवर्हण (वै॰ क्ली॰) उपधान वृस्त्र, तकियेका गिलाफ।}} {{outdent|कशिश (फा॰ स्त्री॰) आकर्षण, खींच।}} {{outdent|कशीका (वै॰ स्त्री॰) कश बाहुलकात् ईकन्-टाप्। प्रस्तुत नकुली, ब्याई हुई नेवली।}} {{outdent|कशीदया (भा॰ पु॰) मल्लयुद्धका कूटोपायविशेष, कुश्तीका एक पेंच। इसमें खिलाड़ी अपनी जोड़की गर्दनपर हाथ रख बाम पदसे उसका दक्षिण पद अपनी ओर खींच लेता और उसे दक्षिण करसे पकड़ गिरा देता है।}} {{outdent|कशीदा (फा॰ पु॰) सूचिकर्म विशेष, कढ़ाव। इसमें वस्त्रपर सूई तथा सूत्रसे नानाप्रकार कृत्रिम पत्रपुष्प बनाते हैं।}} {{outdent|कशेरक (सं॰ पु॰) एक पक्ष। <small>(भारत २ । १० अ॰)</small>}} {{outdent|कशेरु (सं॰ पु॰-क्ली॰) के देहे शीर्यते, का-शृ-उ एरङ्देशच। <small>वैश्वएरङ्चास्य। उण् १। ९०।</small> १ पृष्ठास्थि, रीढ़, पाठकी बड़ी हड्डी। कं जालं वार्तं वा श्रृणाति। २ खनामख्यात तृणविशेष, कसेरु। इसका संस्कृत पर्याय-कशेरुक, कसेरु, कसेरुक और कचेरुक है। हिन्दीमें कसेरू, बंगलामें केशुर, मराठोंमें कचेर, पंजाबीमें दिला और तेलगु (तिलङ्गी) में गुन्द-गड्डी कहते हैं। (Sripus dubius)}} कशेरु एक प्रकारकी घास है। यह समग्र भारतमें सरोवरों और नदियोंके किनारे उत्पन्न होता है। इसका रजिल मूल जातिफल (जायफल) सदृश रहता और ऊपरसे क्षणवर्ण देख पड़ता है। यह सङ्कोचनशील है। गृहणी और विसूचिका रोगमें देशीय वैद्य इसे औषधकी भांति व्यवहार करते हैं। यह रोग न लगनेके लिये भी चवाया जाता है। शीतकालमें कशेरु खोद कर खाया करते हैं। इसके ऊपरका छिलका खींच डाला जाता है। कोई-कोई कसेरुको उबालकर भी खाता है। बंङ्गालमें यह देवताओं पर चढ़ता है। कशेरु खानेमें मधुर और शीतल है। यह दो प्रकारका होता है-राजकसेरुक और चिङ्कोड़। 'बड़' कशेरुको राजकशेरुक {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 66lorz98h7pbfx3str5h3999ecy1tuv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४३२ 250 106325 667828 373189 2026-07-16T01:42:42Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 667828 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप| ४३३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} योगिनीतन्त्रके मतसे विस्तृत कामरुप राज्य नवयोनि- पीठमें विमला है,- "उपवोषिय बौथिय उपपौठच पीठकम् । सिइपीठं महापौठे ब्रह्मपोठं सदसरम् । विष्णुपीठ महादवि कटपौठे तदन्तरम् । मवयोगिरि तिख्याता चर्टिच समन्ततः।" फिर योगिनौतन्त्रमें सौमारपीठ, श्रीपीठ, रत्नपीठ और कामपीठ इत्यादिका नाम मिलता है। सिवा इसके योगिनोसन्त्रमें दूसरे भो कई क्षुद्र क्षुद्र पीठों और उपपीठांका उल्लेख है,- "उडडीयामस्य देवेशि प्रादुर्भावः कृते युगे। पुषाशैलस्य सम्भूतिस्त्रे वायुगमुखेड भवत् । छापर मालशेलस्य कामाख्यास्य कलौ युगे। चौरस्य कलिपापस विभाथाय महश्चरि। प्रतिवर्ष सब पोठमुपपौठं युग युगम् । वयं वयं महाधिव' पुणारस्य वयं वयम् ॥ प्रति पौठे महादयः प्रति पौठे चतुसनः। प्रति पौठे स्थिता गहा पार्वती प्रतिपीठक । प्रति पीठ प्रविन पुथारन्तु पीठक । कलीग्रहात सच तीर्थ तद्धिः प्रजायते ॥ किन्तु नीर्थानि वे सन्ति मावनासिहिरिपाते। प्रति पौठे पृथग्धर्म पाधारय पृथक पृथक् ॥ देगे देश कुवाचारी महन्तव्यानि तुमिः । पृथक पूजा पृथक् मन्बो मन्ये च तौरपीठकम् । भद्रपौठे दाक्षिणात्य मध्यदेशस्य पार्वति। जालन्धरन्तु पायाग्य पूर्णपीठन्तु पूर्वतः । ऐशान्यां पूमागे च कामरूप विनामोहि। जालन्धरा वायव्ये कोल्वापुरन्तु परे । ईशान चैव विहार महेन्द्र उत्तर किया। श्रीमपि पूर्व च उपपौठान्यया शृणु। नौकायानन देशि भष्टषष्टिस्तु योजनः । प्रस्तार भोडपीठम्य भावामेति गुण भवेत् ॥ कटाकारक पी चतुष्कोणं सुपीठकम् । चतुरिसमायु वायुविम्वेग चिह्नितम् ॥ तीर्थकोटिश्ययुस सिन्धु भट्रकपीठकम् । थव सोमवालिकामादिपीठं क्यापरम् ॥ कामधेनुथ यवेव यक्ष चक्र धरोहरः। व विरजसंच एकाय तदनन्तरम् ॥ भास्करस्य महावयव मातशहर। कुमस्थली माश्या दन्तकस्य वमन्नथा। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> समन्तथ तथारण शिश्यपय पम्तः, पश्मेि मुकारण उत्तर तु गयाथिरः । दक्षिणे चन्द्राभागा च पोड़पोठं वरामने । विंशस्योननविस्तीर्णमायामे असयोजमम् ॥ यव कामेयरी देवो योनिमुद्रावरूपिणों। भूगोलपीठ नाम यव वंगीलोकेशरः। धर्मपीठ महापौठं यव कामेश्वरी इस पविमुख महाचे व इंसप्रपसम सथा । प्रयपस्त यवेध यव श्रेषटः स्थितः । कुरुसेवन्तु तवैव यव मायाखमा मदा। अयोध्यारण्यक पुण धर्मारणा तथा परम् । चाम महारा यव पातालगा। गणकीच नदी विष्यपथ पथिमे। दधिणे इषभं लिक उत्तर कदलीवनम् । एवम्मध्यसमं पीठ चापाकारं ममोरमे। अमाह मथा पर्न रकवर्ग विभावयेत् । एकादशशतायाम योजनाना था नव । प्रयीत्यष्टौ च प्रसार विकोण पौठमुत्तमम् ॥ प्रवरं पाठकं तब पौठवायोकमेव च । सौतायाय महादेव भगतास्याश्रमं सथा। हरस्य परम वववमिदं प्रिये । माधवारणकब हरस्यार प्यकं तथा । परणाचव भर्गस्य तदारणा अयम् । उत्तर प्रद्यपख दक्षिणे सागरावधि। पूर्ववोदयकूटश्च पयिक वीण्य प्रिये । एसम्मध्यतमं पौठं पुवाखा माम नामतः । पादात पादान्तरं यावन्मध्य इस्तव्यातरम् । शिधरावी च गमन सौरमासेम मासकम् ॥ कामरूप विज्ञानीयात् षट्कोणाचप्रगर्मकम् । तत्पुर्णा नस्सम वेव्य नवव्यू विमण खम् ॥ पर्व दशमियुका दिमध्यं प्रकीरितम्। मध्यपौठं महापौठं यव कामैन्य मवेत् । सन पीठे हि देवेशि यव चम्पावती नदी। कन्याश्रम महावं यव रुद्रपदश्यम् ॥ एकायर्क पर ईवयव मागाउपवारः। मामसवक व यव विश्व धरोहरः॥ नाटकारणाकव चम्पकारश्यक नथा। पिच्छिला वा दक्षिणसी गौतमस्य महावनम् ।" {{Right|(योगिनोसन्च, २१ पटख)}} 'हे देवि! बेतायुगके पूर्ववर्ती सत्ययुगमें उड्डयान नामक पुण्यशैतका प्रादुर्भाव हुवा था। उसके<noinclude></noinclude> s7v122rl0khzx3o9gw968931x2psavv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४३३ 250 106326 667829 373190 2026-07-16T01:54:59Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 667829 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४३४| कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पोछे हापर युगमें जालौन और कलियुगमें फलिपाप विनाशक कामाख्य पर्वत देख पड़ा। हे महेश्वरि । प्रत्येक वर्ष में तुम्हारे पीठ, उपपीठ, तीन महाक्षेत्र और तीन महारण्य विराजित हैं। फिर प्रत्येक पीठमें महादेव, चतुर्भुज विष्णु, गङ्गा और पार्वतीका अधि. ठान है। प्रत्येक पीठ और प्रत्येक क्षेत्रमें एक एक पुण्यारख अवस्थित है। 'कलिकाल में गृहसे दूरवर्ती स्थान मात्र पर तीर्थ बुद्धि रहती है। किन्तु जहां भावनाको सिद्धि पाती, वही भूमि तीर्थ मानी जाती है। प्रत्येक पीठ में धर्म और आचार पृथक् पृथक् है। देशभेदके अनुसार कुन्नका प्राचार भो पृथक होता है। इसलिये प्रत्येक पीठका पूजन और मन्त्र स्वतन्त्र है। हे पार्वति ! मत्यंभूमिमें तोरपीठ, दाक्षिणात्य देशमें भद्रपीठ, पाचात्य देशमै जालन्धर और पूर्व दिक्में पूर्वपीठ है। 'ईशान और पूर्वभाग, कामरुप है। इसके वायु- कोणमें जालन्धर, उत्तरमें कोल्वापुर, महेन्द्र के किञ्चित् उत्तर ईशानदिको विहार और पूर्वमें श्रीहट्ट है। सौमार है। है देवेखरि। अतःपर उपपौठका विवरण श्रवण करी। श्रोड्रपीठ ६८ योजन विस्तृत है। शकटाकार पीठ चतुष्कोण, चार हारयुक्त और वायुविम्ब चिन्हित है। सिन्धुभट्रक पीठमें दा कोटि तीर्थ हैं। फिर उता स्थानमें सीमेश्वरलिङ्ग अवस्थित है। पिरन नामक क्षेत्र और एकाम्रक्षेत्रमें कामधेनु तथा चक्रेखर शिवका अवस्थान है। भास्कर नामक महाश्वमें मातङ्ग महादेव, पवित्र कुशस्थली, दन्तकवन और सुमन्तवन है। इस क्षेत्रके पूर्व शिवयूप, पखिम धेनु. कारण्य, उत्तर गयाशिरः और दक्षिण चन्द्रभागा तथा प्रोडपीठ है। हे वरानने ! इसका देयं त योजन पौर विस्तार तीस योजन है। जहां योनिमुद्रारूपिणी कामेश्वरी देवी, भूगोलपीठ, गोलोकेश्वर, धर्मपीठ, महापीठ, कामेश्वर शिव, प्रविमुक्त एवं इंसप्रपतन क्षेत्र, ब्रह्मयूप, खेतवट, कुरुक्षेत्र, मायाखना नदी, पवित्र अयोध्यारण्य, धर्मारण्य, क्वचात्मक नामक महारख्य तथा. पातालयङ्करका अवस्थान है और जिसके पूर्व गण्डकी नदी, पश्चिम विष्णुयूप, दनिय हषभलिङ्ग एवं <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उत्तर कदलीवन है; उसोका मध्यवर्ती धनुषाकार पीठ पद्म तथा रक्तवर्ण है। यह पीठ त्रिकोणाकार है। इसका देयं १०० योजन और विस्तार ८८ योजन है। इस पीठस्थ में भी महादेषका क्षेत्र है। यह देव- त्रय और माधवारण्य, महादेवारण्य एवं मर्गारण्य अरण्यवय वर्तमान है।इम पेठके उत्तर प्रदचेव, दक्षिण समुद्र, पूर्व उदयकूट और पश्चिम बोपर्वत है। इसौके मध्यवर्ती पीठका नाम पुण्यपीठ है। काम रूपके मध्यस्थन्चमें षट्कोण, नवव्यूह और त्रिमण्डनयुक्त पवित्रतम एकवेदी है। फिर यहां दश पर्वत प्रव- स्थित हैं। मध्यपीठ नामक महापौठस्यममें कामेश्वर महादेव और चम्पावती नदी हैं। कन्यायम नामक महाक्षेत्रमें रुद्रदेवका पदय है। एकामक्षेत्रमें नागात- शङ्कर हैं। मानसक्षेत्रमें विश्वेश्वर, नाटकारण्य और चम्यकारण्यका प्रवस्थान है। गौतमके दक्षिण भागमें पिच्छिला और महावी है। प्राचीन कामरूप प्रदेशके समस्त उत्तरांशका नाम सिमर है। योगिनीतन्त्रमें इस प्रकार चतुःसीमा निर्दिष्ट है- "पूर्व स्वपनदी यावत् करतोया च पश्मेि । दक्षिरी मन्दशेलय उत्तरे विहगाचम्नः। प्रस्तार व व्यासाध" योजनानाच परकम् । अयुषवयच विमोसः पचौडव तथा दशा पष्टकोप सोमारं यन दिहरवासिनी। वस्मिन् वमति मा देवी ज्ञानात् ध्यानाद्वोऽपि वा । तेऽपि देव्याः प्रसादेन स्थिति गच्छन्ति नान्यथा। प्रयोदयौ नव पीठं मौमाराभ्यां तु कथ्यते । वसत्य जयं प्रत्यच यव दिकरवासिनी । दिक्करस्य च वायव्ये मौलपोठ मुटुर्लभम् ॥ यव कामेश्वरी देवी योनिमुद्रास्वपित्री। पारिजातं महा यवादित्यस्तु गढारः। कोषे यम्य पुरब तथा चामरकण्टकम । पारणामाथिनच व गीतमारण शिवम् ।" 'सौमारकी चतुःसीमा, पूर्व स्वर्णनदी ( वर्तमान स्वर्णधी), पश्चिम करतोया, दक्षिण मन्दशेस और उत्तर विहगाचन है। 'प्रष्टकोण सौमार और दिकरवासिनीके सलमें<noinclude></noinclude> pqu9lqbeu6c85zykenll4hoz9837zyx पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४३४ 250 106327 667830 373191 2026-07-16T02:10:41Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 667830 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप| ४३५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} महादेवी अवस्थान करती हैं। फिर उक्त स्थलमें। देवौके अनुग्रहसे पीठादि भी अवस्थित हैं। अतः पर नवपीठका विषय कथित है। दिकरवासिनीमें अजय नामक प्रत्यक्ष पीठ और दिक्करके वायुकोणमें दुलर्भ नीलपीठ है। इसी स्थान पर योनिमुद्रारूपिणी कामेश्वरी देवीका अवस्थान है। आदित्यशंकरको अवस्थितिके स्थानका नाम महावि पारिजात और पपर पीठका नाम कौपियपुर, अमरकण्टक, पारण्य, आश्विन, गौतमारण्य और शिवनाथारण्य है।' सौमारके अंशविशेषका नाम सौमारपीठ है। यह आसामके उत्तर-पूर्व भागमें अवस्थित है। इसकी चतुःसीमा इस प्रकार निर्धारित है,- "परण्यं शिवनाघस्य गण पीठावधि प्रिये । पूर्व सौरशिलारण्य परिमे स्वपदी रामा । दधिणे वधायपस्त हार मानसरः। एतन्मध्यगत पीठं मुखिसविनायकम् । सौमाराला महापौठं षट्कोपन्तु विमङ्गलम् । सहनयोजनस्याम' इयवायच पचमम् ॥" ( योगिनीमन्च, २१) है प्रिये । इस शिवनाथके अरण्यको चतुःसीमाका निर्देश श्रवण करो। इसके पूर्व सौरशिलारण्य, पथिम खणदी, दक्षिण ब्रह्मयूप और उत्तर मानससरोवर है। इसीके मध्यस्थल में भुक्तिमुक्तिप्रद पट्कोण और त्रि- मडल सौमार नामक महापीठ है। इस पीठका परि- माण सहन योजन व्याम है। इसको पक्षम झ्यताम भी कहते हैं। आसामको दरलोके मतानुसार भैरवीर दिकराई मनोमवगुभावहो देवोशिखरमुनतम् नदी तक सौमारपीठ है। श्रीपीठको चतुःसीमा इस प्रकार है- "पारादी प्रथम पोठं दिसोय कोलपीठकम् । छमार प्रथम दितीय नन्दमाद्यम् । वतीय भाववी माता' प्रथम वनम् । सिद्धारया दितीय तीर्थ विपुल वनम् ॥ कोटिकोटियुतं लि कोटिकोटिंगयुतम्। पञ्चती भवेत् पूर्वे' पथिम धनदानदी । पनामा दत्तिये चैव सचरे कुरुवकावनम् । एतन्मध्यगतं देवि थोपीठं नाम नामतः" {{Right|(योगिनौतन्त्र, २१ पटक्ष)}} प्रथम पीठका नाम वाराही और द्वितीयका नाम <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कोलपीठ है। प्रथम क्षेत्रको कुमार क्षेत्र, हितोयको नन्दन और तृतीयको शाखती क्षेत्र कहते हैं। प्रथम वन माता, हितोय सिद्धारण्य और तीय विपुलवन कहलाता है। यह वन कोटि कोटि लिङ्गयुल और कोटि कोटि गणाधिष्ठित है। पूर्व सीमापर पञ्चतीर्थ, पश्चिम धनदा नदी, दक्षिण पत्रा और उत्तर कुरुवका वन है। इसोके मध्यस्थल में श्रीपीठ अवस्थित है। रत्नपीठका वर्तमान नाम कोचविहार है। सम्भवतः कामतेश्वरी देवी के यहां रहनेसे रत्नपीठ नाम पड़ा है। प्रासामको बुरखोके मतमें स्वर्णकोषो नदीसे रूपिका नदी तक रत्नपीठ है। योगिनीतन्त्रम लिखा है, {{C|"रणपोटे तु पडुम्त सोहिल्या चैव उत्तरे।"}} प्रासामकी बुरजीके मतमें करतोया और स्वर्ण- कोषी नदीका मध्यवर्तीस्थान कामपीठ है। किन्तु योगिनीतन्त्रमें कामपीठका अपर नाम योगिनीपोठ लिखा। योगिनीपोठका वर्तमान नाम कामाख्या है। कामगिरिके ऊपर अवस्थित होनेसे उक्त पीठका नाम कामपाठ पड़ा होगा। यथा,- “यौगिपीठं कामगिरी कामाखा तब देवता।" (नवचढ़ामणि, पौठमाला) {{Right|कामाखा देखो।}} कामाख्यासे कुछ दूर योगिनौतन्त्रोक्त उग्रपीठ और {{Left|ब्रद्धापीठ है। यथा,-}} "ब्रममुखाय पोटं उग्रतारांधिदेवतम् । सत् पीठं विविध प्रोत' गुम वान' महेश्वरि । सन्मडीयमिति यावं पोठं परमदुम्समम् । सिद्धिकालो धापा देवता भुवनेश्वरी। निवसे राव या काम्लो पारस्पषिमागिनी" {{Right|(योगिमीतन्त्र, ११)}} वुरलीमें स्वर्णपीठ नामक एक पीठका उल्लेख है। किन्तु कालिकापुराण और योगिनीतन्त्रमें स्वर्णपीठका नाम नहीं मिलता। कालिदासने अपने रघुवंशमें इसीको "हमपीठ" लिखा है,- "समीशः कामरूपाणामयाब लविक्रमम् । भने मित्रकटनांगरणानुपरुरोध यः । ८३ रखपुष्पोपहारपशवामानाचं कामरूपेश्वरमस्य हेमपीठाधिदेवताम् ।पादयोः। ८४ (रघुवंशध्य वर्ग)<noinclude></noinclude> sun6ji3156o0j7gdhj03pq8y2pubzsq पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४३५ 250 106328 667831 373192 2026-07-16T02:22:37Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 667831 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४३६| कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} फिर कामरूपेश्वर अन्य भूपालोंके पाक्रमणसे लथ प्रतिष्ठ प्रभिन्नगण्ड सब हाथी ले कर इन्द्रविजयी रघुके शरणापन्न हुये और सुवर्णपीठके पधिदेवता स्वरूप उनके चरण कमल परं रत्नरूप पुष्पोपहार प्रदान किये। आसामको बुरजीके मतमें रूपिका वा रूपही नदीसे भैरवी वा भरली नदो तक स्वर्णपीठ है। कालिकापुराणके मतानुसार कामदेवको महादेव क्रोधानलसे भस्मीभूत होने के पीछे इसी स्थानमें महा. देवकी कपासे स्वरूप प्राप्त हुवा था।इसीसे इसका नाम कामरूप पड़ गया। (कालिकापुराण, ५०) पहले ब्रह्माने यहीं रह नक्षत्रोंकी सृष्टि की थी। इसीसे कामरूपका प्राचीन नाम प्राग्ज्योतिष है। "अवैव हि स्थिती ब्रमा प्रतिनचत्र' समर्न । ततः प्राग्ज्योतिषावापुरी शक्रपुरी समा " {{Right|(कालिकापुराण, ३७ ई०)}} कामरूप अति प्राचीन तीर्थ है, यह पहले ही लिख चुके हैं। कालिकापुराणमें कामरूपतीर्थका ' विवरण इस प्रकार लिखा है,- 'पूर्वकालको महापीठ कामरूपको नदीमें नहा, जल पी और तथाकार देवता पूज अनेक लोग स्वर्ग जाते थे। फिर किसीने निर्वाणमुक्ति और किसीने शिवत्वको प्राप्त किया। पार्वतीके भयसे यमराज इन लोगोंमें किसी को न तो स्वर्ग जानेसे रोक सके और ' न अपने घर ले जा सके। प्रथमतः उन्होंने कई बार यमदूतोंको भेजा। किन्तु शिवके दूतोंने यमदूतोंको लोगोंके निकट जाने. न दिया। सुतरां. यमराजका कर्तव्यकार्य एक प्रकार बन्द हो गया। - उन्होंने फिर विधाताके निकट पहुंच कर कहा,-है विधाता ! मनुष्य कामरूपमें नहा, जल पी और देवता आदि पून मृत्युके पीछे कामाख्यादेवी वा शिवके पाचचर हो जाते हैं। वहां अपना अधिकार न रहनेसे हम उन्हें किसी प्रकार वाधा नहीं पहुंचा सकते । इसीसे हमारा काम बन्द हो गया है। अब इस सम्बन्धमें किसी उचित उपायका अवलम्वन बहुत आवश्यक है। पितामह दिखायेंगे। कामरूपके माहात्म्यप्रकाशक सकल तम्ब ब्रह्मा यह कथा सुन यमको साथ ले विष्णुके निकट पहुंचे और उनको उक्त समस्त कथा विष्णुसे कहने <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> लगे। विष्णु भी सब बातें सुन यम और ब्रह्मा दोनोंको साथ ले शिवके निकट उपस्थित हुये। महाटेवने सत्कारपूर्वक अभ्यर्थना कर उनसे पाने का कारण पूछा था। विष्णुने कहा,-कामरूप समस्त देवता, सकल तीर्थ और सकल देव द्वारा परिहत है। उसकी पपेक्षा उत्कृष्ट स्थान दूसरा काई नहीं। सुतरां उस पीठमें मरनेसे सबको स्वर्ग वा आपका पावंचरत्व मिलता है। फिर वहांके लोगों पर यमराजका कोई अधिकार नहीं रहता। यमका भय छुट जाने से उस पीठका नियम भी बिगड़ सकता है। इसलिये कोई ऐसा उपाय करना चाहिये, जिसमें यमका अधिकार पूर्ववत् अक्षुण रहे। 'महादेवने विष्णुवाक्य पालन करने पर स्वीकृत हो उन्हें विदा किया। फिर महादेव अपने गोंके साथ कामरूपमें भा पहुंचे। कामरूपमें पाते ही उन्होंने देवी उग्रतारा और अपने गोंसे कहा,- सत्वर यहांसे सब लोगोंको भगा दो। 'शिवकी पाज्ञा पाते ही महादेवी उग्रतारा और गणसमूहने समुदाय लोगोंको भगाना पारम्भ किया। क्रमशः उन्होंने कामरूपके अन्यान्य लोगों को दूरीभूत कर वशिष्ठको निकालने की चेष्टा की थी। इससे वशिष्ठ ने बहुत कह हो उग्रताराको अभिशाप दिया,- हे वामे। हम मुनि हैं। फिर भी तुम हमें भगानके लिये चेष्टा कर रहे हो। इसलिये तुम माळगणके साथ वाम अर्थात् वेदविरुद्ध भावसे पूजित होगी। तुम्हारे प्रमथगण मदमत्त चित्तसे म्लेच्छकी भांति घूमते फिरते हैं। इसलिये वह म्लेच्छरूपसे इस कामरूपमें वास करेंगे। हम शम-दम-गुणविशिष्ट, वेदपारग और तपोनिरत.मुनि हैं। फिर भी महादेवने विवे- चनाशून्य हो म्लेच्छ की भांति हमें भगानेको कहा है। इसलिये वह भी स्लेच्छकी भांति भस्म और अस्थि धारण कर इस कामरूपमें रहेंगे। फिर यह कामरूप- क्षेत्र अद्यावधि मेच्छपरिहत होगा। जबतक खयं विष्णु यहां न आयेंगे, तब तक इसमें यही भाव विरल हो जायेंगे। फिर भी जो परिहत विरसमचार<noinclude></noinclude> 333zl26nqns1yi7u3a1ylzrrsb53kij पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४४० 250 106333 667824 373197 2026-07-16T00:48:28Z Lado Shaw 6039 667824 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh||कामरूंप| ४४१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} रोका, 2 करतोया, १० वषमदा, ११ चन्द्रिका, १२ फेणिला, १३ शतानन्दा, १४ सुमदना, १५ भैरव. गङ्गा, १६ देवगङ्गा, १७ भद्रा, १८ पुनर्भ, १८ मानसा, २० भैरवी, २१वाया, २२ कुसुममालिनी, २३ धीरोदा, २४ नीला, २५ शिवाचण्ही वा चण्डिका, २६ सिह त्रिस्रोता, २७ वृदेविका, २८ भष्टारिका, २९ दिक रिका, ३. स्वर्णवहा, ३१ सुवर्णश्री, ३२ कामा, ३३ सोमासमा, ३४ वृषोदका, ३५खेतगङ्गा, ३६ कम खला, ३७ सीता, १८ सुमनता, ३८ शाखती, ४. कलिङ्गिका, ४१ दृश्यमाम, ४२ कपिसगणिका, ४३ दमनिका, ४५ रा. ४५ कांता, ४६ सालिता, ४७ संध्या, ४८ दीपवती, ४८ प्रगद नद । एतहिन योगिनीतन्त्रमें दूसरा भी कई नदियोंका नाम लिखा है,-५० चम्पावती, ५१ मानस, ५२ पिच्छिन्ता, ५३ स्वर्णदौ, ५४ हौरिका, ५५ धनदा, ५६ पत्राख्या, ५७ मनसा, ५८ धवसा, ५८ कपिसा, ६. सरस्वती, ६१ जाह्नवी, ६२ दिक्षु इत्यादि । सुवर्णमानस, जटोद्भवा पौर विसोसा तीनों नदियां जलपाईगुड़ी जिले में प्रवाहित हैं। सुवर्णमानसका वर्तः मान नाम स्वर्णकोपी है। चलती बोसीम सानकोथी कहते हैं। यह नदी भोटानके पर्वतसे निकल ब्रह्मपुत्र में पामिलो। जटोनवा नदी मोटानके पर्वत पर उत्पन्न हो जटोदा नामसे जलपाईगुड़ी जिले भौर कोचविहार राज्यके मध्य हो कर बमपुत्र में गिरी है। विस्रोताका वर्तमान नाम तिस्ता है। इसके प्राचीन गर्भमें बहुत पानकल यह सिकिमके पहाड़से निकल जलपाईगुड़ी पौर रजपुर जिलेके मध्य हो कर ब्रह्मपुत्र में पा मिली है। इस नदीसे पनतिदूर फ.कोर गच्चके मध्य लक्षपाईगुड़ी नगरसे प्रायः डेढकोस दूर जपोश नामक पुण्यपीठ है। कालिकापुरापमें कहा है,- वर्षाशा वर्तमान कामरूप जिलेंसे उत्पन्न हो "तवस्व कामरूपस्य बाधम्या विपुरासकः । पात्मनो विद्रमतुखं जल्योगास व्यद यत्" योगीघोप्रके निकट ब्रह्मपुत्र में मिली है। कामरूपके वायुकोपमें महादेवने जस्यीय नामक हादेविका कामरूपमें प्रवाहित बुहाड़ी नदी है। अपना पक्ष लिङ्ग दिखाया है। दिबरिकाका वर्तमान नाम दिकराई है। यह नदी "बादामयासोऽयं दिमुनकुन्दसनिमः । पका पहाड़से निकल दरF जिलेके मध्य होकर ब्राह्म- बनपुरषो.तु मन्नेर पूनर्यदनमुचमम् । पुवमें पा गिरी है। जल्योपदेवका मन्दिर प्रथम अल्पेखर नामक एष पुश्शाकर पौठो नसीयस्य महात्मनः। एवम्चात्वा मरो याविहारस्यालय प्रति" (कालिकापुराण,०००) या जल्योश नामक महादेव वरदाभयहस्तं पौर कुन्दस्य खेसवर्ण हैं। इन्हें तत्पुरुषकी भांति पूजना चाहिये। जल्पीशका विषय जिसे पच्छी तरह मालम हो जाता, वह शिवलोक पाता है। कालिकापुराणके मतमें नन्दीने महादेवको पारा- धना कर यहीं सशरीर गाणपत्य पाया था। किसी राजाने बनवाया था। मुसलमानोंने प्राचीन मन्दिर तोड़ डाला। उसके पीछे कोचविहारके प्राण- नारायणने ( कोई २२५ वर्षे हुये ) वर्तमान मन्दिर निर्माण कराया। पाज कच मन्दिर पहिलेकासा नहीं जीर्ण अवस्थामें पड़ा कद वह भूमिसात् हो जावेगा। पहिसे यहां बहुतसे यात्री पति थे। किन्तु अब वह समय नहीं है। जल्पीथपीठसे घनतिदूर तसमा नदीके पास प्राचीन पृथुरालके नगरका ध्वंसावशेष पड़ा है। किसी समय यहां पृथुराजका राजभवन, दुगंपरिखादि था। पात्र भी उसका निदर्शन देख पड़ता है। यह प्राचीन स्थान प्रनतत्वानुसन्धायियोंके देखने योग्य है। इसके निकट कई क्षुद्र शुद्र नदी है। वही कालिकापुराणमें लिखी गई सितप्रभा और मवतीया समझ पड़ती हैं। परिवर्तन हुवा है। इससे थोड़ी दूर पाटगन्न नामक स्थानमें पाटेखरी देवौका प्रसिह मन्दिर है। कोई कोई पाटेखरीदेवीको ही कालिकापुराणमें लिखित सिद्देखरौ मानता है। भैरवी नदीका वर्तमान नाम. भरली.है। यह प्रकामातिके देशसे निकस प्रधपुवमें पतित यो है।<noinclude></noinclude> 9ks9j0ag86n31pws19xfsgm1397q1ml 667827 667824 2026-07-16T01:34:20Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 667827 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूंप| ४४१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} रोका, 2 करतोया, १० वषमदा, ११ चन्द्रिका, १२ फेणिला, १३ शतानन्दा, १४ सुमदना, १५ भैरव. गङ्गा, १६ देवगङ्गा, १७ भद्रा, १८ पुनर्भ, १८ मानसा, २० भैरवी, २१वाया, २२ कुसुममालिनी, २३ धीरोदा, २४ नीला, २५ शिवाचण्ही वा चण्डिका, २६ सिह त्रिस्रोता, २७ वृदेविका, २८ भष्टारिका, २९ दिक रिका, ३. स्वर्णवहा, ३१ सुवर्णश्री, ३२ कामा, ३३ सोमासमा, ३४ वृषोदका, ३५खेतगङ्गा, ३६ कम खला, ३७ सीता, १८ सुमनता, ३८ शाखती, ४. कलिङ्गिका, ४१ दृश्यमाम, ४२ कपिसगणिका, ४३ दमनिका, ४५ रा. ४५ कांता, ४६ सालिता, ४७ संध्या, ४८ दीपवती, ४८ प्रगद नद । एतहिन योगिनीतन्त्रमें दूसरा भी कई नदियोंका नाम लिखा है,-५० चम्पावती, ५१ मानस, ५२ पिच्छिन्ता, ५३ स्वर्णदौ, ५४ हौरिका, ५५ धनदा, ५६ पत्राख्या, ५७ मनसा, ५८ धवसा, ५८ कपिसा, ६. सरस्वती, ६१ जाह्नवी, ६२ दिक्षु इत्यादि । सुवर्णमानस, जटोद्भवा पौर विसोसा तीनों नदियां जलपाईगुड़ी जिले में प्रवाहित हैं। सुवर्णमानसका वर्तः मान नाम स्वर्णकोपी है। चलती बोसीम सानकोथी कहते हैं। यह नदी भोटानके पर्वतसे निकल ब्रह्मपुत्र में पामिलो। जटोनवा नदी मोटानके पर्वत पर उत्पन्न हो जटोदा नामसे जलपाईगुड़ी जिले भौर कोचविहार राज्यके मध्य हो कर बमपुत्र में गिरी है। विस्रोताका वर्तमान नाम तिस्ता है। इसके प्राचीन गर्भमें बहुत पानकल यह सिकिमके पहाड़से निकल जलपाईगुड़ी पौर रजपुर जिलेके मध्य हो कर ब्रह्मपुत्र में पा मिली है। इस नदीसे पनतिदूर फ.कोर गच्चके मध्य लक्षपाईगुड़ी नगरसे प्रायः डेढकोस दूर जपोश नामक पुण्यपीठ है। कालिकापुरापमें कहा है,- "तवस्व कामरूपस्य बाधम्या विपुरासकः । पात्मनो विद्रमतुखं जल्योगास व्यद यत्" कामरूपके वायुकोपमें महादेवने जस्यीय नामक अपना पक्ष लिङ्ग दिखाया है। "बादामयासोऽयं दिमुनकुन्दसनिमः । बनपुरषो.तु मन्नेर पूनर्यदनमुचमम् । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> एष पुश्शाकर पौठो नसीयस्य महात्मनः। एवम्चात्वा मरो याविहारस्यालय प्रति" {{Right|(कालिकापुराण,०००)}} या जल्योश नामक महादेव वरदाभयहस्तं पौर कुन्दस्य खेसवर्ण हैं। इन्हें तत्पुरुषकी भांति पूजना चाहिये। जल्पीशका विषय जिसे पच्छी तरह मालम हो जाता, वह शिवलोक पाता है। कालिकापुराणके मतमें नन्दीने महादेवको पारा- धना कर यहीं सशरीर गाणपत्य पाया था। किसी राजाने बनवाया था। मुसलमानोंने प्राचीन मन्दिर तोड़ डाला। उसके पीछे कोचविहारके प्राण- नारायणने ( कोई २२५ वर्षे हुये ) वर्तमान मन्दिर निर्माण कराया। पाज कच मन्दिर पहिलेकासा नहीं जीर्ण अवस्थामें पड़ा कद वह भूमिसात् हो जावेगा। पहिसे यहां बहुतसे यात्री पति थे। किन्तु अब वह समय नहीं है। जल्पीथपीठसे घनतिदूर तसमा नदीके पास प्राचीन पृथुरालके नगरका ध्वंसावशेष पड़ा है। किसी समय यहां पृथुराजका राजभवन, दुगंपरिखादि था। पात्र भी उसका निदर्शन देख पड़ता है। यह प्राचीन स्थान प्रनतत्वानुसन्धायियोंके देखने योग्य है। इसके निकट कई क्षुद्र शुद्र नदी है। वही कालिकापुराणमें लिखी गई सितप्रभा और मवतीया समझ पड़ती हैं। इससे थोड़ी दूर पाटगन्न नामक स्थानमें पाटेखरी देवौका प्रसिह मन्दिर है। कोई कोई पाटेखरीदेवीको ही कालिकापुराणमें लिखित सिद्देखरौ मानता है। भैरवी नदीका वर्तमान नाम. भरली.है। यह प्रकामातिके देशसे निकस प्रधपुवमें पतित यो है। वर्षाशा वर्तमान कामरूप जिलेंसे उत्पन्न हो योगीघोप्रके निकट ब्रह्मपुत्र में मिली है। हादेविका कामरूपमें प्रवाहित बुहाड़ी नदी है। दिबरिकाका वर्तमान नाम दिकराई है। यह नदी पका पहाड़से निकल दरF जिलेके मध्य होकर ब्राह्म- पुवमें पा गिरी है।<noinclude></noinclude> slsnfnfqabzts2e1mamejahz58irpvn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५१२ 250 107500 667773 375253 2026-07-15T13:01:08Z Sonu kumar 07 6479 667773 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>{{rh|५१३|कायस्थ}} {{Multicol|line=1px solid black}} व्यक्ति कहा करते हैं-'पाले म सोगोंके साथ पसनीप्रभुवों का विवाह सम्बन्ध प्रचलित था। मध्यमें उन्होंने पत्तनोप्रभुवो में मिलनेकी चेष्टा की। पत्तनप्रभुवों ने उन्हें स्वजातीयकी भांति स्वीकार करते भी समाजमें ग्रहण किया न था। उनका आचार व्यवहार और गठनादि पत्तनमभुवों की ही भांति लगता है। उनकी स्थिति भी मन्द नहीं। वह क्षत्रियोचित संस्कारादि सम्पादन करते और ब्राह्मणा व्यतीत अपर सकल जातिको अपेक्षा अपनको श्रेष्ठ प्रभु कायस्योंका वास अधिक और ब्रह्माचत्रियों की समझते हैं। ब्राह्मणको छोड़ दूसरी किसी जासिके संख्या पख्य है, वहां उभयचौके मध्य विवाह-सम्बन्ध हाथ ध्रुवप्रभु पाहार नहीं करते। अष्टमसे दशम हो जाता है। वर्षके मध्य वह पुचको उपनयन देते हैं। हादश दिन षष्ठसे दशमवर्षके मध्य वह पुत्रका उपनयन मृताशौच ग्रहण किया जाता है। फिर त्रयोदश करते हैं। उनके विवाहका पाचारादि दाक्षिणात्यके दिवस मृतके उद्देश बाप-क्रिया सम्पन होती है। ब्राह्मणांकी भांति है। पानीय और सपिण्डके मरने उपनयन, विवाह और बाद तीनों संस्कार महा. पर दश दिनमान अशौच ग्रहण करके पीछे बाद- समारोह और बहु व्ययसे किये जाते हैं। विधवा भोजादि करते अधिकांश स्थलों में प्रचत्रिय विवार वा बहुविवाह उनके मध्य प्रचलित नहीं ।* मसिजीवी और वणिक्का कर्म चलाते हैं। कहों सिन्धु, गुजरात और महाराष्ट्र में ब्रह्मचत्रिय नामक कहों उन्हें पौरोहित्य करते भी देखा जाता है। कायस्थ रहते हैं। सद्याट्रिखण्ड में सूर्यवंशीय और अधक्षत्रिय देखने में अधिकांप गुजराती ब्राह्मणों- चन्द्रवंधीय प्रभु ही मनचत्रिय नामसे वर्णित जैसे होते हैं। सकस ही सुची, परिस्क त पौर अधिक सम्भव है कि प्रश्नपति एवं थिचित हैं कामपतिके सन्तानों में जो पैठनपत्तन पथवा पनहल. बाड़पाटनमें रहते उन्हें “पत्तनप्रभु और गुजरात, सिन्धु सथा कर्णाट प्रकृति स्थानमें नो रहते उन्हें भारतवर्ष में सर्वत्र कितने ही पकायस्थ मिलते "अमक्षत्रिय कहते हैं। कर्णाट और सिन्धु प्रदेश में हैं। कायखोंसे शूद्रकन्याके अवैध संयोगमें उस सक्त ब्रह्मक्षत्रिय किसी समय पति प्रवस पड़ गये थे। सकल उपकायस्थों की उत्पत्ति है। उनके साथ प्रक्षत सिन्धु और कच्छ प्रदेशमें उन्होंने बहुकाल राजत्व कायस्थोंका कोई सामाजिक संस्रव नहीं। फिर भी किया। कच्छमें बहुसंख्यक ब्रह्मक्षत्रियांका वास है। भनेक उपकायस्थ कायखोंके निन्दावाद और नीच- वहां ब्रह्मचत्रिय कहा करते है-"परशरामको परश. जातित्व प्रतिपादन करनेकी चेष्टामें लगे रहते हैं। धारासे जो क्षत्रिय प्रामरक्षा कर सके थे, हम उन्हींके उनको अवस्था देख कर ही सम्भवतः पौधनस धर्म- वंशधर हैं। सिन्धुप्रदेशमें हमारे पूर्वपुरुषोंने बहु- शास्त्रका वचन गठित और कमलाकर द्वारा सहार- कार राजत्व किया। विदेयौ वर लोगोंके हाथ कायस्थोंको व्यवस्था लिपिवई यी है। थोड़ोसी पाखोचना करनेसे समझ पड़ेगा-भारतवर्षीय प्रकृत ध्रुवप्रभु के जन्मसे मस्य, पर्यन्त पाचार-व्यवहारादिका विवरण कायस्थ-समाजके साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं। Bombay Gazetteer, Vol. XVIII, pt. I. p. 185-192 # द्रष्टब्ध। • Indian Antiquary, Vol. V. p. 171 Vol. IV. 129 उपवाया। राज्यच्यत और विताड़ित हो उहोंने हिसान- देवीका पात्रय लिया था। उन्हीं देवीने दया करके उनको कितने ही अधिकार प्रदान किये।"* गवन- मण्टने स्वीकार किया है कि काठियावाड़ पौर कच्छ- मण्टने स्वीकार किया है कि काठियावाड़ पौर कच्छ- यान्तिस्थापन तथा हटिश शासनके प्रचारकाल उक्त ब्रह्मक्षत्रिय वंशीय सुन्दरजी शिवाजीने कर्नल वाकर प्रकृतिको यथेष्ट साहाय्य दिया था। पेशवावोंक एमएम क्योंकि समय कोई कोई प्रभु जा कर उनसे मिच गये। जहां यू यू 4ú<noinclude></noinclude> jm6qyxdplnhhfyc2g13j9skhajqy4qx 667774 667773 2026-07-15T13:13:50Z Sonu kumar 07 6479 667774 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>{{rh|५१३|कायस्थ}} {{Multicol|line=1px solid black}} व्यक्ति कहा करते हैं-'पाले म सोगोंके साथ पसनीप्रभुवों का विवाह सम्बन्ध प्रचलित था। मध्यमें उन्होंने पत्तनोप्रभुवो में मिलनेकी चेष्टा की। पत्तनप्रभुवों ने उन्हें स्वजातीयकी भांति स्वीकार करते भी समाजमें ग्रहण किया न था। उनका आचार व्यवहार और गठनादि पत्तनमभुवों की ही भांति लगता है। उनकी स्थिति भी मन्द नहीं। वह क्षत्रियोचित संस्कारादि सम्पादन करते और ब्राह्मणा व्यतीत अपर सकल जातिको अपेक्षा अपनको श्रेष्ठ समझते हैं। ब्राह्मणको छोड़ दूसरी किसी जासिके हाथ ध्रुवप्रभु पाहार नहीं करते। अष्टमसे दशम वर्षके मध्य वह पुचको उपनयन देते हैं। हादश दिन मृताशौच ग्रहण किया जाता है। फिर त्रयोदश दिवस मृतके उद्देश बाप-क्रिया सम्पन होती है। उपनयन, विवाह और बाद तीनों संस्कार महा. समारोह और बहु व्ययसे किये जाते हैं। विधवा विवार वा बहुविवाह उनके मध्य प्रचलित नहीं ।* सिन्धु, गुजरात और महाराष्ट्र में ब्रह्मचत्रिय नामक कायस्थ रहते हैं। सद्याट्रिखण्ड में सूर्यवंशीय और चन्द्रवंधीय प्रभु ही मनचत्रिय नामसे वर्णित अधिक सम्भव है कि प्रश्नपति एवं कामपतिके सन्तानों में जो पैठनपत्तन अथवा अनहल. बाड़पाटनमें रहते उन्हें “पत्तनप्रभु और गुजरात, सिन्धु सथा कर्णाट प्रकृति स्थानमें नो रहते उन्हें "अमक्षत्रिय कहते हैं। कर्णाट और सिन्धु प्रदेश में हैं। कायखोंसे शूद्रकन्याके अवैध संयोगमें उस सक्त ब्रह्मक्षत्रिय किसी समय पति प्रवस पड़ गये थे। सिन्धु और कच्छ प्रदेशमें उन्होंने बहुकाल राजत्व किया। कच्छमें बहुसंख्यक ब्रह्मक्षत्रियांका वास है। भनेक उपकायस्थ कायखोंके निन्दावाद और नीच- वहां ब्रह्मचत्रिय कहा करते है-"परशरामको परश. जातित्व प्रतिपादन करनेकी चेष्टामें लगे रहते हैं। धारासे जो क्षत्रिय प्रामरक्षा कर सके थे, हम उन्हींके उनको अवस्था देख कर ही सम्भवतः पौधनस धर्म- वंशधर हैं। सिन्धुप्रदेशमें हमारे पूर्वपुरुषोंने बहु- शास्त्रका वचन गठित और कमलाकर द्वारा सहार- कार राजत्व किया। विदेयौ वर लोगोंके हाथ कायस्थोंको व्यवस्था लिपिवई यी है। थोड़ोसी पाखोचना करनेसे समझ पड़ेगा-भारतवर्षीय प्रकृत ध्रुवप्रभु के जन्मसे मस्य, पर्यन्त पाचार-व्यवहारादिका विवरण कायस्थ-समाजके साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं। Bombay Gazetteer, Vol. XVIII, pt. I. p. 185-192 # द्रष्टब्ध। • Indian Antiquary, Vol. V. p. 171 Vol. IV. 129 उपवाया। राज्यच्यत और विताड़ित हो उहोंने हिसान- देवीका पात्रय लिया था। उन्हीं देवीने दया करके उनको कितने ही अधिकार प्रदान किये।"* गवन- मण्टने स्वीकार किया है कि काठियावाड़ पौर कच्छ- मण्टने स्वीकार किया है कि काठियावाड़ पौर कच्छ- यान्तिस्थापन तथा हटिश शासनके प्रचारकाल उक्त ब्रह्मक्षत्रिय वंशीय सुन्दरजी शिवाजीने कर्नल वाकर प्रकृतिको यथेष्ट साहाय्य दिया था। पेशवावोंक एमएम क्योंकि समय कोई कोई प्रभु जा कर उनसे मिच गये। जहां यू प्रभु कायस्योंका वास अधिक और ब्रह्माचत्रियों की संख्या पख्य है, वहां उभयचौके मध्य विवाह-सम्बन्ध हो जाता है। षष्ठसे दशमवर्षके मध्य वह पुत्रका उपनयन करते हैं। उनके विवाहका पाचारादि दाक्षिणात्यके ब्राह्मणांकी भांति है। पानीय और सपिण्डके मरने पर दश दिनमान अशौच ग्रहण करके पीछे बाद- भोजादि करते अधिकांश स्थलों में प्रचत्रिय मसिजीवी और वणिक्का कर्म चलाते हैं। कहों कहों उन्हें पौरोहित्य करते भी देखा जाता है। अधक्षत्रिय देखने में अधिकांप गुजराती ब्राह्मणों- जैसे होते हैं। सकस ही सुची, परिस्क त पौर थिचित हैं भारतवर्ष में सर्वत्र कितने ही पकायस्थ मिलते सकल उपकायस्थों की उत्पत्ति है। उनके साथ प्रक्षत कायस्थोंका कोई सामाजिक संस्रव नहीं। फिर भी रेत और<noinclude></noinclude> h93iq8k8ftrx8spg936ku83dhdetwid 667775 667774 2026-07-15T13:21:44Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 667775 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५१३|कायस्थ}} {{Multicol|line=1px solid black}} व्यक्ति कहा करते हैं-'पाले म सोगोंके साथ पसनीप्रभुवों का विवाह सम्बन्ध प्रचलित था। मध्यमें उन्होंने पत्तनोप्रभुवो में मिलनेकी चेष्टा की। पत्तनप्रभुवों ने उन्हें स्वजातीयकी भांति स्वीकार करते भी समाजमें ग्रहण किया न था। उनका आचार व्यवहार और गठनादि पत्तनमभुवों की ही भांति लगता है। उनकी स्थिति भी मन्द नहीं। वह क्षत्रियोचित संस्कारादि सम्पादन करते और ब्राह्मणा व्यतीत अपर सकल जातिको अपेक्षा अपनको श्रेष्ठ समझते हैं। ब्राह्मणको छोड़ दूसरी किसी जासिके हाथ ध्रुवप्रभु पाहार नहीं करते। अष्टमसे दशम वर्षके मध्य वह पुचको उपनयन देते हैं। हादश दिन मृताशौच ग्रहण किया जाता है। फिर त्रयोदश दिवस मृतके उद्देश बाप-क्रिया सम्पन होती है। उपनयन, विवाह और बाद तीनों संस्कार महा. समारोह और बहु व्ययसे किये जाते हैं। विधवा विवार वा बहुविवाह उनके मध्य प्रचलित नहीं ।* सिन्धु, गुजरात और महाराष्ट्र में ब्रह्मचत्रिय नामक कायस्थ रहते हैं। सद्याट्रिखण्ड में सूर्यवंशीय और चन्द्रवंधीय प्रभु ही मनचत्रिय नामसे वर्णित अधिक सम्भव है कि प्रश्नपति एवं कामपतिके सन्तानों में जो पैठनपत्तन अथवा अनहल. बाड़पाटनमें रहते उन्हें “पत्तनप्रभु और गुजरात, सिन्धु सथा कर्णाट प्रकृति स्थानमें नो रहते उन्हें "अमक्षत्रिय कहते हैं। कर्णाट और सिन्धु प्रदेश में हैं। कायखोंसे शूद्रकन्याके अवैध संयोगमें उस सक्त ब्रह्मक्षत्रिय किसी समय पति प्रवस पड़ गये थे। सिन्धु और कच्छ प्रदेशमें उन्होंने बहुकाल राजत्व किया। कच्छमें बहुसंख्यक ब्रह्मक्षत्रियांका वास है। भनेक उपकायस्थ कायखोंके निन्दावाद और नीच- वहां ब्रह्मचत्रिय कहा करते है-"परशरामको परश. जातित्व प्रतिपादन करनेकी चेष्टामें लगे रहते हैं। धारासे जो क्षत्रिय प्रामरक्षा कर सके थे, हम उन्हींके वंशधर हैं। सिन्धुप्रदेशमें हमारे पूर्वपुरुषोंने बहु- कार राजत्व किया। विदेयौ वर लोगोंके हाथ ध्रुवप्रभु के जन्मसे मस्य, पर्यन्त पाचार-व्यवहारादिका विवरण Bombay Gazetteer, Vol. XVIII, pt. I. p. 185-192 # {{Left|द्रष्टब्ध।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> राज्यच्यत और विताड़ित हो उहोंने हिसान- देवीका पात्रय लिया था। उन्हीं देवीने दया करके उनको कितने ही अधिकार प्रदान किये।"* गवन- मण्टने स्वीकार किया है कि काठियावाड़ पौर कच्छ- मण्टने स्वीकार किया है कि काठियावाड़ पौर कच्छ- यान्तिस्थापन तथा हटिश शासनके प्रचारकाल उक्त ब्रह्मक्षत्रिय वंशीय सुन्दरजी शिवाजीने कर्नल वाकर प्रकृतिको यथेष्ट साहाय्य दिया था। पेशवावोंक एमएम क्योंकि समय कोई कोई प्रभु जा कर उनसे मिच गये। जहां यू प्रभु कायस्योंका वास अधिक और ब्रह्माचत्रियों की संख्या पख्य है, वहां उभयचौके मध्य विवाह-सम्बन्ध हो जाता है। षष्ठसे दशमवर्षके मध्य वह पुत्रका उपनयन करते हैं। उनके विवाहका पाचारादि दाक्षिणात्यके ब्राह्मणांकी भांति है। पानीय और सपिण्डके मरने पर दश दिनमान अशौच ग्रहण करके पीछे बाद- भोजादि करते अधिकांश स्थलों में प्रचत्रिय मसिजीवी और वणिक्का कर्म चलाते हैं। कहों कहों उन्हें पौरोहित्य करते भी देखा जाता है। अधक्षत्रिय देखने में अधिकांप गुजराती ब्राह्मणों- जैसे होते हैं। सकस ही सुची, परिस्क त पौर थिचित हैं {{C|उपवाया।}} भारतवर्ष में सर्वत्र कितने ही पकायस्थ मिलते सकल उपकायस्थों की उत्पत्ति है। उनके साथ प्रक्षत कायस्थोंका कोई सामाजिक संस्रव नहीं। फिर भी रेत और उनको अवस्था देख कर ही सम्भवतः पौधनस धर्म- शास्त्रका वचन गठित और कमलाकर द्वारा सहार- कायस्थोंको व्यवस्था लिपिवई यी है। थोड़ोसी पाखोचना करनेसे समझ पड़ेगा-भारतवर्षीय प्रकृत कायस्थ-समाजके साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं। Indian Antiquary, Vol. V. p. 171<noinclude></noinclude> 7z8ovhauy2gweemb38c8mcfkz2lhl0w पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५१३ 250 107501 667781 375254 2026-07-15T13:49:19Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 667781 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh||कारकः|५१५}} {{Multicol|line=1px solid black}} अन्य कारकके प्रवर्तनकारीको कर्तृकारक, क्रिया 'निष्पादनके विषय में प्रति निकटवर्ती कारणको कारण ‘क्रियाके उहिष्ट- व्यापारविशिष्टको कम, कटकम • व्यतीत अयर क्रियाधारणशील कारक (क्रियाके भाधार) को पधिशरण, प्रेरण पनुमति प्रभृति व्यापारविशिष्टको सम्प्रदान पर अवधि भावज्ञान विशिष्टको अपादान कहते हैं। कारक छह प्रकारका है-कर्ता, कर्म, करण, सम्पदान, अपादान पार पधिकरण।पाणिनिके मतमें बः कारकका लक्षण है, स्वतन्त्रः कर्ता । पा ११४५७ । पर्थात् क्रिया खातन्त्रको अवस्थापर विवक्षित कारक प्राप्य। कर्मकारक उब होनेसे प्रथमा और अनुल रहनेसे बतीया विमति लगती है। उसको अनुक्त कर्ममें द्वितीया विभक्ति भाती है। यथा - छोड़ अन्यन्त्र प्रथमा विभक्ति पाती है। प्राविपदिकार्यविपरिमापवचनमाने प्रथमा। पा । प्राति- पदिक पर्थमात्र, लिङ्कमान, परिमाणमात्र और संख्यामावमें प्रथमा विमति होती है। दूसरे-सम्बोधने च। पा ०४७ । अन्यको निस शब्दसे अपने सम्मुखीन बनया जाता, वह सम्बोधन कहाता है। उनमें भी प्रथमा विभक्ति ही लगती है। का करण्यौल दीया। पा सक्षम पनुन कट कारक और करणकारकमें वृतीया विभक्तिपात है। कर्मका लक्षण है,-कभिवतम कर्म। या 1881 अर्थात कर्ता क्रियांसे जिस ईप्सितंतम पदार्थको लेना चाहता, उसीका नाम कम है। बयापुर पानीभितम् । 'पा 8.1 फिर क्रिया हारामित पदार्थकी भांति कोई प्रनीप्सित पदार्थ निष्पन्न होते भी उसकी कमसंज्ञा पड़ती है। प्रकृषितं च । पा! अपादानादि द्वारा अविवचित कारक कर्मसंनक होता है। गतिबुद्धिप्रत्य वसानार्थ शब्दकमांकमवापामपिका सयौ। पा गति, बुद्धि और प्रत्यवसान अर्थ में अणिजन्त कालक्षा कर्ता पिजन्तकालमें कर्म कहता है। कोरन्यवरथाम्। पा ६५५५। और च धातुके अपिजन्तकालका कर्ता पिनन्तकालमें विकल्पसे , कर्ममंचक होता है। भषियोङ स्यामा वर्म। .पा. : अधि पूर्वक भी, स्या और पास भातुके योग, अधिकरणको क्रमसंधा. <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> होती. । अमिनिविश्य । पा 80, पमि और नी पूर्वक विश धातुके यागमें भी अधिकरणको कम कहते हैं। किसी किसी स्थलमें व्यभिचार दर्शनसे विधि विकल माना गया है। यथा-"पाद पमिनिवेशः। सपावध्या वसः।" पा राम । उप, पनु, अधि और अङ् पूर्वक वस धातुको कर्मसंज्ञा है। घटुहोरुपमष्टयोः कर्म। पा ! उपसर्गविशिष्ट क्रुध पौर ?ह धातुके प्रयोगमें जिसके प्रति क्रोध पाता, वह कर्म कहासा है। कर्म तीन प्रकारका है-नित, विकार्य और कर्ममें द्वितीया विभक्ति लगती है। कनगि हिवीया। पनुा. कर्ता कहता है। उन्होनसे काम ग्रंथमा और पा ।।९। यथा उसको छोड़ अन्यान्य स्थलोंमें भी द्वितीया विभक्ति पड़ती है। यथा-अन्तरातरेप यु । पा ३६४ । - अन्तरा और पन्तरण शब्दके योगमें हितीया विभक्ति लगती वर्मप्रवचनोययुठे दिवोया। पाशा :कर्म और प्रवचनीय संचाविशिष्ट शब्दके : योगमें द्वितीया विधि लगाते हैं। प्रवचनीय देखो। बालापनौरव्यनसंयोगे। पारा३५। कारवाचक एवं प्रध्ववाचक शब्दके साथ गुण, क्रिया और द्रव्यमा निरन्तर सम्बन्ध समझ पड़नेसे भी द्वितीया पाती है। करणका लक्षण है-साधववम करपम् । पारा । क्रियासिदिके विषय में जो प्रधान उपकारक होता, सोको करण जाहै। दिवः कर्म च ! पा ११४३१ दिव धातुके साधक कारकको कर्म और करण- उभय संद्रा होती है। कई करपयोच तौया । पा राश१८। अनुव कट.. पड़ती है। प्रकृषितं च । पा! अपादानादि द्वारा कारक कारक और करणमें ढतीया विमति स्वगती है। उसके छोड़ अन्य स्थलों में भी बतीया विभक्ति पाती यथा,-पपबमें वतीया। पा ससा फलप्राप्तिको सम्भावनासे काल और अध्व वाचक शब्दकाः निरन्तर सम्बन्ध होने पर तीया विभक्ति. लगती है। मायुछे. अश्वित । . पा ॥१६:सहार्य शब्दके योगसे अप्रधान पदार्थमें हतीया विभक्ति होती है। सहाथ शब्दकी विवचा रहते भी बतीया दिमखि लगाते हैं। सह, सावं, साध : शौर:सम सहाय मद। येनारियाः । :<noinclude></noinclude> d85auoi64u0cl89vjiu9fora0lx6drs पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/५१४ 250 107502 667784 375255 2026-07-15T14:30:17Z Sonu kumar 07 6479 /* शोधित */ 667784 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sonu kumar 07" /></noinclude>{{rh|५१४| कायस्था-कारक}} {{Multicol|line=1px solid black}} कायस्था (सं.स्त्री०) कायः तिष्ठति पनया, काय-स्था १ हरीतकों, हड़। २ पामलको, प्रांवला। ३ काकोली। ४ स्थलैला, बड़ी इलायची । ५ सूक्ष्म ला, छोटी इलायची। तुलसीवध। ७ सिन्दुवारतच, कायोढज संभालका पेड़। ८ कायस्थ-स्त्रीजाति। कायस्थादिधूपन (सं० लो०) धूपनविशेष, एक बफारा। हरीतकी, राना, केंटुकी, गुडूची, गुग्गुल, चोरक नामक गन्धद्रव्य, वाव्यासक, वचा तथा कुष्ठ बराबर बरोबर डाल बफारा लेनेसे शौतच्चर छूट जाता है। फिर उक्त कल्कको यवक्षार, लवण तथा कान्त्रिकके साथ यथाविधि पकाने और शरीरमें लगानेसे भी शीतज्वर शान्त होता है। (भावप्रकाश ) कायस्थाली (सं० स्त्री०) रसपाटल वृक्ष, लाल फलका एक पेड़। कायस्थिका (सं० स्त्री.) काकोली। कायस्थैर्य ( सं० क्ली० ) कायस्य स्थैर्यम्, ६-तत्। १ रसायन औषधादि द्वारा शरीरको स्थिरता, सुकब्बी दवा खाने से जिस्मको मजबूती। काया (हिं. स्त्री०) शरीर, जिस्म । कायाकल्प (हिं. पु.) कायस्थैर्य, दवाके जोरसे पुराने जिस्को नया बनानेकी तरकीब । कायाकाशसम्बन्धसंयम (सं० पु०) काय और पाकायके सम्बन्धका संयम, जिस्म पर पासमान्के लगावका जब्त। इससे भाकामें लोग उड़ सकते है। "बायाशामयोः सम्बन्धसंयमान . खनुतूबसमापचे राकाशगमनम्।" (पातचलसूब) कायाग्नि (सं० पु.) कायस्थितो पम्निः मध्यपदली० । पाचकाग्नि, हजम करनेकी ताकत । कायापटल (हि. स्त्री०) १ कायपरिवर्तन, जिस्मकी तबदौली। २ घोर परिवर्तन, बड़ा हेरफेर। कायिक (सं. नि. ) कायेन निष्पादितः निवत्तो वा, काय-ढक । १.शरीर द्वारा निष्यादित, जिससे किया हुवा। २ शरीर द्वारा उत्पन्न, जिससे निकला हुवा। {{Left|३ शरीर सम्बन्धीय, जिसमानी।}} कायिका ( सं. स्त्री० ) कायेन कायिकव्यापारण निर्वता, काय-टक । उषभ प्रतिके कायिक परित्रमसे <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> निष्पादित कृषि, बैल वगैरहको मेहनतसे अदा किया जानने वाला सूद। {{C|"दोधवाधकमयुता कायिका समुदाढता।” (न्यास)}} (• पु० ) पुत्रविशेष, एक बेटा। प्राजापत्य कायोत्सर्ग ( • पु०) जैन अईतकी एक मूर्ति । विवाइसे उत्पन्न होनेवाचे पुत्र को कायोटज कहते है। यह वीतरागावस्थामें खड़ा रहता है। कार (सं.पु.) क-वञ्। १ वध, कतन्न । २ निश्चय, यकीन। (कं सुखं ऋच्छति पनेन, क-ऋ-धन्) ३ स्वामी, मालिका ४ तुषारपर्वत, बरफका पहाड़। ५ करने या बनानेवाला। कोई कर्मपद पूर्व रहनेसे 'कार' शब्द कर्ता पर्थमें आता है, जैसे-वर्णकार, कुम्भकार, कर्मकार इत्यादि । ६ क्रिया, काम । यौगिक अर्थम ही इसका प्रयोग पड़ता है, जैसे-उपकार, चमत्कार । ७ अधरको बतानेवाला। यह भी यौगिक अर्थ में ही प्रयुक्त होता है, जैसे-प्रकार, ककार इत्यादि । ८ पूजाका व्यकरण, वलि । {{Left|कार ( फा० पु.) कार्य, काम।}} कारक (सं०.ली.) क्रियाभिरन्वितं भाष्यमते करोति क्रियां निवर्तयति, छ कर्तरि खुल। यमांनो, कटेया। २ बदर, देर । ३ वर्षापचीव जन, पोलेका ४ भवस्थाविशेष, हासत (Case)| क्रियाके साथ सम्बन्धविशिष्ट अथवा क्रिया निष्पादकको कारक कहते हैं। वैयाकरणभूषणके मसमें क्रियाजनक शक्लिविशिष्टमान कारकपदवाथ हैं। ट्रव्यादिमें उक्त शक्ति रहना असम्भव है। फिर भी शक्ति और शक्तिमान्का पभेद मानके 'द्रव्यादिमें कारकत्वका व्यवहार होता है। कारक शब्दका क्रियानिष्पादक अर्थ लगानेसे सकल कारक कर्तृकारक हो जाते हैं। किन्तु व्यापारके भेदानुसार उनका करणादि भेद मान लेना पड़ता है। मञ्चषामें कारकका भेद लिखा है- "कतु : कारकान्तरप्रवर्तनम्यापास। करस्य क्रियाजनकाव्यवडिव वयापारः। बियाफीनोई सवरुपयापारस व बर्मामरिक- क्रियापारचयापारो धिवरपस। चानुमब्यादि व्यापार समझामस-। अवधिभावोपगमद्यापारोऽपादामसेति।"<noinclude></noinclude> ls9rpx4xsrneetnqntzub875550kvt6