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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१६१
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Avantika Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh|'''१५८'''|'''गण्ड-गण्ड कालो'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
सज्जित करते हैं। दिन को कोली और कुरमी जाति की स्त्रियाँ आकर देवी के सम्मुख नृत्य-गीत लगाती हैं। तीन दिन प्रभृति (बाद) देवी के भूषणादि खोलकर उनके अञ्चल में कुछ खाद्य और पैसे बाँध किसी दास वा दासी के हस्त में दिया जाता है। दास उसको लेकर घर से बाहर निकलता है। भोजन की धारा देती गृहणी चली जाती है। शेष में दास देवी को जल में विसर्जन करके वस्त्र और थोड़ा सा जल ले गृह लौट आता है।
{{outdent|गणेशजननी (सं० स्त्री०) गणेशस्य जननी, ६-तत्। दुर्गा। "मन्त्रो दुर्गा राधा च सरस्वती" (तन्त्रसार)}}
गंगादत्त क्रमदीपिका तन्त्र का एक टीकाकार।
गणेशदत्तशर्मा— "मैथिल गणेशदत्त शर्मा" नाम से ख्यात तथा मालतीमाधव का बनाया "प्रकरणोद्धार" के टीकाकार हैं।
गणेशदास— द्रव्यादर्श नामक वैद्यक ग्रन्थकार।
गणेश दीक्षित— एक विख्यात दार्शनिक। ये भावा विश्वनाथ दीक्षित के पुत्र, भावा रामकृष्ण के पौत्र तथा विज्ञानभिक्षु की टीका, प्रबोधचन्द्रोदय की चन्द्रिका नाम की टीका, तर्कभाषा की तत्त्वप्रबोधिनी नामक टीका, तत्त्वसमास यथार्थ दीपन, योगानुशासतिप्रभृति की संस्कृत टीकाओं की रचना की है।
गणेशदेव संगीतशास्त्रविद् पण्डित। राजा खड्गसिंह के देशीरूपा को सुबोधिनी नाम की टीका प्रणयन की है।
गणेशदेव— नन्दीग्रामवासी एक प्रसिद्ध ज्योतिर्विद्। उनका दूसरा नाम गणेश्वर आचार्य था। ये केशवार्क के पौत्र और nनृसिंह के चाचा थे। इन्होंने कई एक ज्योतिः ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें ग्रहलाघव, चाबुकयन्त्र, तर्जनीययन्त्र, प्रतोदयन्त्र, लघुपयन्त्र, वृहद् और लघुतिथिचिन्तामणि, मदननिर्णय (धर्मशास्त्र), यात्रादिनिर्णय, सिद्धान्तशिरोमणिविवृति, चन्द्रोन्मीलनटीका, पातसारणी, बुद्धि विलासिनी नाम की लीलावती व्याख्या तथा केशव के मुहूर्ततत्त्व और विवाहवृन्दावन की टीका पाई जाती है। उक्त ग्रन्थों में से ग्रहलाघव ही प्रधान है। गणेश का ग्रहलाघव १४४२ शक में (१५२० ई०), पातसारणी १४४४ शक (१५२२ ई०) और लीलावती व्याख्या १५४६ ई० में रची गई हैं।
गणेशपण्डित हरिविनोद नामक संस्कृत ग्रन्थकार।
गणेशपाठक— निर्णयकौस्तुभ नामक न्याय और प्रयोगकौस्तुभ नामक धर्मशास्त्रकर्ता।
गणेशपुराण एक उपपुराण का नाम। इसमें गणेशमाहात्म्य वर्णित है।
गणेशभट्ट— १. उद्वाहविवेक नामक संस्कृत ग्रन्थकर्ता। २. शाकुनदीपक के रचयिता।
गणेशभारती— शिवताण्डवस्तोत्रटीका के प्रणेता।
गणेशभिषक् एक विख्यात चिकित्सक। इन्होंने चिकित्सामृत, योगचिन्तामणि, रुग्विनिश्चयार्थप्रकाशिका प्रभृति वैद्यक ग्रन्थ प्रणयन किये हैं।
{{outdent|गणेशभूषण (सं० क्ली०) गणेशं भूषयति, गणेश-भूष्। सिन्दूर।
गणेशमहोपाध्याय हरिभक्तिदीपिका के रचयिता।}}
गणेशराय भाषा के एक कवि, इनका जन्म १५५८ ई० को हुआ था।
गणेशराय— दिनाजपुर के अञ्चल के एक राजा का नाम। ई० १४वें शतक में गौड़ का एक राजा हुआ था।
गणेश मिश्र प्रायश्चित्त पारिजात नामक धर्मशास्त्र संग्रहकार।
{{outdent|गणेशान (सं० पु०) गणानामीशानः, ६ तत्। गणेश। "ततः सस्मार हेरम्बं व्यासः सत्यवतीसुतः। स्मरणाद् गोमन्तः चिन्तितपूरकः" (महाभारत १।१।७४)। २. शिव, महादेव।}}
{{outdent|गणेश्वर (सं० पु०) गणानां ईश्वरः, ६ तत्। १. गणेश। २. शिव। ३. गणात्मक ईश्वर। १२ रुद्र, १२ आदित्य, ८ वसु और २ अश्विनीकुमार, इन तेतीस देवताओं को गणेश्वर कहते हैं। "एवं स्वस्ति सर्वभूतं गणेश्वरः" (महाभारत अनुशासन १५० अ०)।}}
गणेश्वर जिलान्तर्गत एक परगना। इसमें चालूने और पाँपा नामक दो ग्राम लगते हैं।
गणेश्वरी— एक नदी, यह आसाम के अन्तर्गत गारो पर्वत के कैलास से क्रमशः दक्षिणवाहिनी होकर मैमनसिंह जिला होती हुई प्रवाहित है।
{{outdent|गणोत्साह (सं० पु० / स्त्री०) गणे गणभावे samyak-karane उत्साहः यस्य, बहुव्री०। गण्डक, गेंडा।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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Avantika Shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१५८'''|'''गण्ड-गण्ड कालो'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent|गण्ड (सं० पु०) गडि वदनैकदेशे, गडि-अच्। यद्वा गम-ड। १. कपोल, गाल। २. हस्तिकपोल, हाथी की कनपटी। इसका संस्कृत पर्याय— कट, करट, कटक और hस्तीगण्डक है। ३. गण्डक, गैंडा। ४. वीथ्यङ्ग। ५. पिटक। ६. चित्र, निशान। ७. वीर, बहादुर। ८. अश्वभूषण, घोड़े का जेवर। ९. बुद्बुद, बुलबुला। १०. स्फोटक, फोड़ा। ११. ग्रन्थि, गाँठ। १२. विष्कम्भ आदि योगों के मध्य दशम योग।}}
कोष्ठीप्रदीप के मत से इस योग में जन्म लेने से मनुष्य स्वार्थपर, दूसरे का अनिष्टकारी, अतिशय धूर्त, कुरूप और आत्मीयवर्ग की यन्त्रणा का कारण होता है। उसके दोनों गण्ड अपेक्षाकृत स्थूल और कभी कुछ बड़े-बड़े होते हैं।
१३. अश्विनी प्रभृति कई एक नक्षत्रों का दुष्ट अंश। इस विषय में ज्योतिर्विदों का मतभेद लक्षित होता है— किस नक्षत्र के कौन अंश को गण्ड कहते हैं और उसका क्या फल समझते हैं।
अश्विनी, मघा और मूला नक्षत्र के प्रथम ३ दण्ड और रेवती, अश्लेषा तथा ज्येष्ठा नक्षत्र के शेष ५ दण्ड गण्ड कहलाते हैं। इसमें मूला तथा ज्येष्ठा नक्षत्र के गण्ड को दिवागण्ड, मघा एवं अश्लेषा के गण्ड को रात्रिगण्ड और रेवती और अश्विनी के गण्ड को सन्ध्यागण्ड कहते हैं। गण्डयोग में जात बालक की प्रायः मृत्यु होती है। उसके बच जाने से पिता वा माता की मृत्यु निश्चित है। किन्तु दिवागण्ड में बालिका और रात्रिगण्ड में बालक का जन्म होने से किसी प्रकार का विघ्न नहीं पड़ता। मूला के प्रथम पाद में अर्थात् गण्ड के मध्य बालक अथवा बालिका का जन्म होने से पिता का विनाश होता है। इसी प्रकार मूला के द्वितीय पाद में जननी को भयानक रोग, तृतीय पाद में धनहानि और चतुर्थ पाद में सम्पत्तिलाभ है। अश्लेषा नक्षत्र में इसके विपरीत समझना चाहिए। गण्डयोग में जन्म होने से बालक वा बालिका को परित्याग करना ही उचित है। यदि सहजवशतः उसको परित्याग न किया जा सके, पिता को चाहिए कि ६ मास तक उसका मुँह न देखे। कारण, मुख देख लेने से विपद् पड़ने की सम्भावना है। ऐसे स्थल में कुछ मूल, चन्दन, कुष्ठ और गोरोचन— इसके साथ मिला चार जलपूर्ण कल
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
मियोंसे से बालक को स्नान कराना चाहिए। महानदी के सम्भेद (संगम) से स्नान कराना पड़ता है। बालक दिवागण्ड-जात होने से अपने पिता, रात्रिगण्ड-जात होने से जननी और सन्ध्यागण्ड-जात होने से पिता-माता दोनों के साथ बाहर लाया जाता है। घृतपूर्ण कांस्यपात्र, सुवर्ण और धन ग्रहविप्र को दान करते और ग्रहगण की पूजा करते हैं। इसी प्रकार शान्ति करने से गण्डदोष मिटता. है। (ज्योतिस्तत्त्व)
मुहूर्तचिन्तामणि और पीयूषधारा ग्रन्थ में लिखा है कि नारद के मतानुसार ज्येष्ठा नक्षत्र के शेष चार और मूला नक्षत्र के प्रथम चार कुल आठ दण्ड ही गण्ड कहलाते हैं। इसी प्रकार अश्लेषा के शेष चार और मघा के प्रथम चार दण्ड भी गण्ड हैं। वसिष्ठ के मत में ज्येष्ठा नक्षत्र का शेष एक और मूला के प्रथम दो-तीन दण्डों का ही नाम गण्ड है। बृहस्पति ने ज्येष्ठा के शेष अर्ध और मूला के प्रथम अर्धदण्ड को गण्ड जैसा निर्देश किया है। किसी-किसी ज्योतिर्विद् के मत में मूला के प्रथम आठ और ज्येष्ठा के शेष पाँच— १३ दण्ड का ही नाम गण्ड है। पीयूषधारा को देखते नारद का ही मत ग्राह्य है। गण्ड में बालक वा बालिका के जन्म होने से परित्याग करते अथवा ८ वत्सर (वर्ष) पर्यन्त पिता उसका मुख नहीं देखता।
१४. कोई जाति।<small>गोंड देखो।</Small>
{{outdent|गण्डक (सं० पु०) स्वार्थे कन्। १. गेंडा। २. ज्योतिर्विद्याविशेष। ३. अवच्छेद, भेद। ४. भूषण, अलङ्कार, जेवर। ५. दुष्ट, मूर्ख। ६. संख्या प्रभेद। ७. देशभेद, वह देश जिससे होकर गण्डकी नदी बहती है। ८. छन्दोभेद, एक छन्द का नाम। ९. ग्रन्थि, गाँठ। १०. स्फोटक रोगविशेष, एक रोग जिसमें बहुत से फोड़े निकलते हैं। }}
<Small>"वने वेणुघातसमुत्थबहुगण्डकम्।" (कादम्बरी)</Small>
११. नदीविशेष। गण्डकी देखो। १२. अन्तराय, विघ्न, बाधा।
{{outdent|गण्डकारी (सं० स्त्री०) गण्डः भग्नास्थिग्रन्थिं करोति संयोजयति। गण्डक-अण्-ङीष्। १. खदिरवृक्ष, खैर का पेड़। २. गण्डकद्रुमा, एक मकड़ी। ३. वराहक्रान्ता, वराहीकन्द। ४. श्वेतलज्जालुका, लज्जावती।}}
{{outdent|गण्डकाली (सं० स्त्री०) गण्ड-क-अण्-ङीप्, यद्वा गण्डेषु ग्रन्थिषु काली यस्याः, बहुव्री०। १. काकजङ्घा। २. शल्लकी वृक्ष। ३. खदिरीवृक्ष, खैर का पेड़।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४६७
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Lado Shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||तारस्य-तारविमा|४६३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
एक पिचकारीके मदृश बहुतसे छिद्रोवाला यंत्र जनसे
भर कर उसका पगंल बलपूर्वक यदि भोतर डाला जाय,
तो उसके समस्त छिद्रोंसे जल वाहर निकलता है। यदि
नागें पोर चाप संचालित न होता तो सभी छिट्रॉस जल
न निकलना।
जलादिके एक अशी चाप प्रयोग करनेमे यह चाप
उसके सर्वा शमें संचालित हो कर चाप युक्त शके माय
समायतनसम्पवयोंके जपर समपरिमाणमें और लम्ब-
भावसे कार्य करता है तरल पदार्थक एक अंशमें दिया
या चावसर्वा शमें मचालित होता है। यह भी पूर्तता
परीक्षाहाग प्रतिपादित हुवा है।
तरल पदार्थाका सरक्षेपक चाय ( दवाव )- तरल पदार्थों के
ऊपरमे नोभेको ओर चाप हारा जिस प्रकार नोचेके भण।
आक्रान्त होते हैं उमो तरह नीचे अपर की ओर चाप
द्वारा अपरके प्रण उद्भामित होते हैं। नीलेके स्तरोका।
अपरके स्तर्ग पर अवक्षेपक चाप और अपरके स्तरोंका
नोचेके स्तरों पर उत्तेवक चाप समान होता है। यह
निम्नलिखित परीक्षा द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
किमो जलपूर्ण पात्रमें दोनों ओर खुलो एक नलो डुबान
मे देखा जायगा, पालमें जितना ऊंचा जन है उतना ही
ॐचा पानी नलीमें भो उठता है, किन्तु इमो नलोके
है। यद्यपि महाममुद्रकै जिम भाग पर दृष्टि डालो जाय
नोचेका मह उमोके समान एक टुकड़ा कांच या अभ्रक
हाग पावड कर थोड़े से सून हारा वह कार या अभ्रक'
वधिक धीरे धीरे जलमें डुबाया जाय तो देखा जायगा,
सूत छोड़ देने पर भो नलो डुवेगो नहीं और जन्लर्क !
चापसे उद्भासित हो उठेगी। अब यदि नलोक भोतर
पानी डाला जाय तो देखा जायगा, नलोके भोतरका जल
ज्योंही बाहरके जल को अपेक्षा जचा होगा त्योहो नली
डूब जायगो। सुतरां देखा जाता है कि मोचेको पोर लग
एवा कांच जिस नम्ल मे उद्भासित होता है वह उसके ममा
यत और उसके पृष्ठदेशमे वहिर्भाग तक जल जितना
उव्रत है उतने हो उबत जलके समान होता है अर्थात्
उसके ऊपरसे मोचेको जो चाप है वही चाप नीचेसे
जपरको भी है अर्थात् जलके मध्यस्थित किमो पण
अपर उत्क्षेपक और अवक्षेपक चाप बराबर है।
साम्यवस्था तरल वस्तपोको पृष्ठदेश सर्वत्र सम-
तक रहती।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
कठिन पदार्थका जपरो भाग नहीं बचा कहीं नोचा
हो सकता है। किन्तु तरल द्रश्योको सतह व ममान
जची होतो है। कठिन अवस्था में पाणविक पाकर्षण
गुण के कारण द्रव्य के परमाणु परस्पर दृढ़रूपसे पासष्ट
रहते हैं। इसीलिए किमो दृयका कोई अंगविशे।
किश्चित् ऊचा होने पर भी मध्याकर्षण हाग विच्छिन
होकर पतित नहीं होता, किन्तु तरल अवस्थाम पाग.
विक पाकर्षण वसा प्रवल नहीं होता। इससे तरल
वस्तु के परमाणु महज हो विचलित और प्रवाहित होकर
ममतलभाव धारणा करते हैं।
किमो तरल वस्तुका यदि कोई भाग किश्चित् उक्त
हो उठे तो पृथ्वो के मध्याकष गमे उमे पुन: नितिन
होना पड़ता है। वास्तव में ताल पदार्थीको सतह स्वभा
वस: मम उच्च होतो है। जलक जंचे नोचे होने का
कारण मभोको विदित है।
जिम तरह धरापृष्ठ पर कहो जचे पर्वतशिखर,
कहौं गभोर गहर दिखाई देते हैं। सागर पृष्ठ में वैसा
नहीं दिखाई देता। यदि कभी किसी कारणसे कहीं
पर ममुद्रका जन किंचित् जचा उठ जाता है तो उस
कारण के हटते हो वहांका जल ममभाव धारण कर लेता
वहो समतल मालम देता है तथापि यह नहीं कहा
जा मकता कि उसका ममय पृष्ठ देश दर्पण की तरह मम-
तन्न है। उसको सतहका प्रत्ये क विन्दु पृथ्वोके केन्द्रके
। साथ तुलनामें समतलभावमे अवस्थित है, किन्तु भूपृष्ठ
इस तरह जहां बहत दूर पर्यन्त जल शाल है उमको
को जलरागिका प्राकार गोलेको मतहको तरह गोल है।
समस्त मतहका दपगाकार ममतल होना सम्भव नहीं।
२ तरलता, द्रवत्व। ३ पतलापन ।
तारबाई-हैदराबाद राज्यके वरङ्गाल जिलेका एक तालुक!
इसमें कुल १५५ ग्राम लगते हैं। राजस्व २७८०००
लगभग है । तालुकका अधिकांग जङ्गल में पाच्छादित है।
तारवाँयु (म० पु. ) तारः व यु कम धा । पत्युच्च शब्द-
युक्त वायु, बहुत जोग्मे बरनवालो हवा।
तारविमला (सं सो०) तारकप्यमिव विमला । उपधातु
विशंभ, पामक्खो नामको उपधातु ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/८९
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|८८|मुसलमान|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
खलीफा वंशके प्रथम शताब्दीका इतिहास पढ़नेसे यह बात जानी जाती है, कि मुसलमान सम्प्रदाय ने शृङ्गलाबद्ध विजयाभिमान द्वारा अपने साम्राज्यको समृद्धिरूपी भूषणसे अलङ्कृत किया था। अबूबकरके राजत्वकालमें वीरवर खालिदने समग्र सिरिया और मिसोपोटमिया राज्यको तथा जमरके प्रधान सेनापति अमरूबिन्लैसने समग्र मिश्र राज्यको अरब साम्राज्यके अधीन कर दिया था। इसके बाद उन्होंने १४ महीने तक अवरुद्ध होकर अलेकजेन्द्रिया और मेंफिसका जय तथा फीस्तात् (प्राचीन कायारी) नगरका स्थापन किया था।
मिश्रराज्य विजय करनेके बाद ही मुसलमान-सेनादलने भूमध्यसागरके तीर साहेरणिका प्रभृति क्षुद्र क्षुद्र राज्य अपने वश कर लिये। इसी समय अफीकाके हबशी लोगोंके साथ अरब देशीय मरुपुत्र लोगोंको मित्रता स्थापित हुई और इससे मुसलमान सम्प्रदायको शक्ति और भी दृढ़ हो गई।
सैयद बिन आवि बख्शने ६३५ ई॰ के समय कादेसियाके युद्धमें। ६३७ ई॰ के समय जलला रणक्षेत्रमें, और ६४२ ई॰ के समय हालेवन और नेहवन्दके रणप्राङ्गणमें एकके बाद एक पारसिक सेनाको परास्त किया और पारस्य सिंहासनपर मुसलमान अधीश्वर को स्थापना की। उस्मानके राजत्वकालमें ६४२ ई॰ के समय साइप्रासद्दीप लुण्ठित हुआ था। इसके बाद अबदुल्ला बिनऊमर खुरासानने अपने अधिकार को विस्तृति वाल्हिकराज्य पर्यन्त कर मुसलमान साम्म्राज्य का पत्तन किया।
अली-बिन-आबी-तालेवरके राज्यकालमें गृहविवाद होनेसे राष्ट्रविप्लव खड़ा हो गया। उन्होंने उस विप्लवके शान्त होनेकी चेष्टा की, तो भी वे अबदुर-रहमान बिन मुलजिम नामक प्रबल विद्रोहीके हाथ मार डाले गये। बस! इन्होंके राजत्वकी समाप्ति होते ही मुहम्मदी खलीफा-वंशके शासन की भी समाप्ति हो गई। फिर उनका सिंहासन उमेयदगणने सुशोभित किया।
इसी उमैयद वंशके प्रथम खलीफा मुयावियाने
{{Multicol-break}}
यूफेटिस तीरवर्ती किडेयग नगरीसे उठाकर दमास्कास नगरीमें अपनो राजधानी स्थापित की। उसके राजत्वकालमें मुसलमान-सेनापति उकबा-बिन-नफ़ीर के उद्योगसे ६७५ ई॰ में करवान नगरकी स्थापना हुई। इसके बाद उकबा ताञ्जियारसे लेकर अतलान्तिक महासागरके तीर पर्यन्त मुसलमान साम्राज्यकी प्रभुता फैल गई। यहांसे जब इन्होंने समुद्रपारकर स्पेन राज्यमें जानेका उद्योग किया, तब इनको यहां मृत्यु हो गई। इसलिये किसी प्रधानक न होनेसे मुसलमानोंकी शक्ति भिन्न भिन्न हो गई और सुदूर अफ्रीकाके पश्चिम भूभागमें मुसलमानी द्वारा विध्वस्त समस्त राज्य फिर स्वतन्त्र हो गये।
इसके बाद फिर ६८८ ई॰ में जिब्राल्तार-प्रणाली पर्यन्त समग्र उत्तर अफ्रीका अरबजातिक हस्तगत हो गया। खलीफा प्रथम वालिदके राज्यकालमें (৩০५-७१५ ई॰) अरबके साम्राज्यकी खूब ही विस्तृति हुई। इसी समय स्पेनराज रेडाविक किउटारने शासनकर्ता जुलियानासकी कन्याको विशेषरूपस लाच्छित और अपमानित किया, इसलिये जुलियानास उनसे विरुद्ध हो गया। उसने अफ्रीकाके तात्कालिक प्रतिनिधि मूसाबिन नौशेरकी स्पेनराजक विरुद्ध उभाड दिया। तदनुसार अरब-सेनापति तारीख बिनजियाद समुद्रको पारकर स्पेनराज्यमें पदार्पण किया, उनके नामानुसार तबसे उस स्थानका नाम 'जेब्रल तारीख' (तारीख पर्यन्त) पड़ा। एवं क्रमसे अपभ्रंश होते होते हो वह अब जिब्रालतार (Gibraltar) अन्तरोप कहलाने लगा है।
तारीख-बिन-जियादने स्पेनराज्यमें पहुंच कर ७११ ई॰ की १८ वीं जुलाइको जेरेज डिला फ्रण्टे रके युद्धमें स्पेनराज रेडाविकको पराजित किया और स्वयं वहांके राजा बने। इसके थोड़े ही दिन बाद आदालसिया, ग्राणाडा और मासिंया प्रभृति स्थानोंमें भी उन्होंने मुसलमान शक्तिका प्रभाव विस्तृत कर दिया। इस तरफ पूर्वाञ्चलमें खुरासानपति कोतिवा विन्मुसलिम मवराल-नहरने वीखारा तुर्कस्थान और खारिजम् राज्यपर अपना अधिकार कर लिया एवं
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/८८
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ममता साव9
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इसलाम|८७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
ही तबसे आजतक मुसलमानोंका चान्द्रवत्सर गणित होता आता है।
मदीनामें आकर मुहम्मद अपनी शिष्यमण्डलीके उपदेष्टा, पुरोहित, दलपति वा राजा नियुक्त हुये। इस जगह उन्होंने अपने सदस्यों और शिष्योंकी सहायतासे जिसप्रकार इसलामधर्मकी पुष्टि और उन्नति की, उसे यथास्थान हमने लिखा है। {{smaller|मुहम्मद देखो।}} ६३२ ई॰ में अरब देशके मुक्तिपथप्रदर्शक महात्मा मुहम्मदने अपना चौसठ वर्षका आयु समाप्त और संसारमें शान्तिधर्म स्थापितकर ऐहिक लीला संवरण की। जब उनका तिरीधानसमय निकट आया, तब वह अपनी प्रियपत्नी आयेसाके बाहुभागमें शिर रखकर आकाशकी तरफ शान्तिपूर्णहृदयसे देखने लगे और अस्फट स्वरमें "स्वर्गके सर्वश्रेष्ठ सङ्गी" की उद्देश्यकर अपने प्राणोंका अभाव बतलाते हुये इस लोकको छोड़ चल बसे। इस घटनासे ऐसा स्पष्ट मालूम होता है, कि मुहम्मद अपने अन्तसमयनें स्वर्गप्राप्तिको प्रत्याशासे प्रफुल्लित हो गये थे।
मुहम्मद जिस दिन मक्काको छोड़ मदीना आये थे अर्थात् जिस दिन हिज़री संवत्की प्रतिष्ठा हुई थी, उस दिनसे लेकर मुहम्मदकी मृत्युपर्यन्त अर्थात् हिज़री संवत्के १० वर्ष भीतर भीतर मुसलमानधर्म और मुसलमान जाति एसियाप्रदेशमें इस रूपसे दृढ़ संघटित हो गई, कि उसे वहांके राजधर्म, जातिविप्लव आदि कोई भी विघ्न कम्पित न कर सके। इस समय भी यह मुहम्मदप्रचारित इसलामधर्म चौदह करोड़ मनुष्योंके हृदयमें अपने शक्तिमय अनुशासनके प्रभावसे अप्रतिहत रूपमें अवस्थिति कर रहा है।
जब मुहम्मद मदीनामें आ गये, तब उनके अनुचर लोग वहां ही जाकर रहने लगे और उन सबके मध्यमें मुहम्मदी सम्प्रदायका प्रथम मुसलमानतनय जाबिरका पुत्र अबदुल्ला हुआ। फिर उसके बाद क्रम क्रमसे मुसलमानजाति मुहम्मदकीशक्तिके प्रभावसे तल-वार और कुरानको हाथमें लेकर 'दीन, दीन' शब्द—बोलते यूरोपके समस्त दक्षिण भागमें विस्तृत हो गई। इतिहास-पाठक प्रायः सबलोग ही इस बातसे
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सुपरिचित हैं कि मुहम्मदी इसलामधर्मको उत्पत्तिसे पहिले अरबमें सूर्योपासक सगी, औत्तलिक और बृष्टान सम्प्रदायका प्रादुर्भाव था। भिन्न भिन्न सम्प्रदायावलम्बी जब एकत्र होते हैं, तब प्रायः वैरका अङ्गर फूट निकलता है। इसी नियमके अनुसार जब अरबमें दो भिन्न भिन्न सम्प्रदायोंका सङ्गम हुआ, तब वहां भी सूर्योपासक मोंके साथ वैजयन्ती (Byzantine) साम्राज्यको आत्मश्लाघामें तत्परता होनेसे विरोध खड़ा हो गया। परस्परमें झगड़ा होनेसे दोनों पक्षोंका बल घटता है, इसलिये करको अधिकता और मनुष्योंको न्यूनतासे पारससाम्राज्य धीरे धीरे हीनशक्ति होने लगा। {{smaller|पारस्य देखो।}}
सुप्राचीन जरथस्त्र (Zoroaster) के मतानुयायी पारसिक लोग परस्परमें एकता न रखनेके कारण नवोत्थित मुहम्मदी सम्पदायकी शक्तिके सामने अपने धर्मकी यथावत् रक्षा न कर सके। इसलिये अचिरोत्थित अरब जातिके राज्यजयके साथ ही पासके दो हीनशक्ति साम्राज्य मुसलमानोंके हाथ लग गये। अब तो मुहम्मदी सम्प्रदायका विस्तार अनिर्वार्य हो गया और अपनी तलवारकी सहायतासे अपने मतका प्रचार करने लगा। जो मनुष्य उसके कथनानुसार इसलामधर्मको न स्वीकार करता वह उसे अपनी तलवारकी पनीधारसे, उड़ा दिया करता था फिर जो भयभीत ही उसका अनुयायी हो जाता था, उसे ससम्मान अपनेमें परिगणित करता था। परन्तु ऐसे समयमें भी बहुतसे यहूदी और खुष्टान अपने सम्मानको कुछ भी परवा न कर अधिक कर-प्रदान कर किसी तरह अपनी रक्षाकर बच गये।
जिस समय यह समस्त परिष्वृद्धि चरित्र अरब देशमें हुआ, उस समय वहां मुसलमान जातिके अधिनायक, साम्राज्यके अधीश्वर स्वयं इसलामधर्मप्रवत्तेक मुहम्मद ही थे। उनको मृत्युके बाद खलीफा लोगोंने मुसलमान समाजका नेतृत्व ग्रहण किया। उनकी राजशक्ति धर्मप्रणोदित होनेका कारण जातीय एकता द्वारा शासन करनेसे अक्षुणरीत्या देशदेशान्तरोंमें विस्तृत हो गई।
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इसलाम|८९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
वहां मुसलमान साम्राज्यकी परिवृद्धि की। इसके ही राजत्वकालमें मुहम्मद बिन्-कासिमने ७१२ ई॰ में सिन्धुप्रदेशपर आक्रमण किया। इसके बाद गुर्जर जयकर चित्तोर पर धावा मारा, किन्तु उसमें बप्पारावसे उन्हें पराजित होना पड़ा।
७१४ ई॰ में मुसलमान साम्राज्यके कलेवरकी जिस प्रकार वृद्धि हुई, उसका वृत्तान्त इतिहासमें उल्लिखित है। इस समय मुसलमान वीरोंने एसिया और युरोप इन दोनों महादेशोंमें अपने साम्राज्य और इसलाम धर्मकी यथेष्ट श्रीवृद्धि की थी। इन दोनों देशोंके मध्यभागमें एक समुद्रसे दूसरे समुद्र पर्यन्त मुसलमानोंकी विजयपताका उस समय फहिरायी थी। पश्चिममें अतलान्तिक महासागर, उत्तरमें पिरिनिज् पर्वतमाला, दक्षिणमें साहारा मरु पर्यन्त विस्तृत समग्र उत्तर अफ्रीकाके राज्य (इजिप्त और आबिसिनिया राजा) और पूर्वमें अर्थात् एसिया खण्डमें समग्र सिनाइ प्रायद्वीप (अरब), पालेस्तिन, सिरीया, आर्मेनियाका कुछ अंश, एसिया-माइनर, मिसोपोटेमिया, पारस्य, काबुल और सिन्धुनदके पश्चिमदिग्वर्ती समस्त प्रदेश मुसलमान साम्राज्यके अधिकारमुक्त और इसलाम धर्ममें दीश्चित ही मुसलमान संप्रदायको परिपुष्टि करनेमें सहायक हुये थे।
इसी समय मुसलमान लोग भारतके विजय करनेमें भी उद्यत हुये। इसके बाद तातार जातिको भी शक्तिशाली संप्रदायमें सम्मिलित कर इन्होंने अपने जनशक्तिशाली संप्रदायमें सम्मिलित कर इन्होंने अपने संप्रदायके कलेवरकी वृद्धि की थी। इसी सुविस्तृत मुसलमान-साम्राज्यमें परवर्ती ११वीं शताब्दमें और भी अनेक क्षुद्र क्षुद्र राजा सन्निविष्ट हो गये, जिससे इसलामकी शक्ति और भी बढ़ गई। किन्तु बहुत काल पर्यन्त मुसलमान शासनाधीशों द्वारा परिचालित इस समस्त साम्राज्यमें एकमात्र स्पेनराजनको छोड़कर अन्य कोई भी राजा इसलामधर्मकी छायाको दूर करनेमें समर्थ न हुआ।
सुलेमान्के राजत्वकालमें (७१५–७१७ ई॰) एसिया-माइनर तथा कनस्तान्तिनोपल, और ऊमर बिन्-अब्द-अल् अज़ीज़के शासन समयमें (७१७-७२० ई॰)
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जोर्जन और तबरिस्तान राजा मुसलमानोंके शासन-से शासित हुये। ऊमरके वंशधर २२ यज़ीद (७२०–७२५ ई॰) एवं परवर्ती खुलीफ़ागणको शासनशक्तिके नष्ट हो जानेसे और हिसामकी बढ़ती हुई तीव्र राजप्रप्राप्तिकी अभिलाषसे मुसलमानराजा में अन्तविप्लव उपस्थित हुआ। विश्शृङ्गल शासन होनेसे प्रजा विद्रोही हो गई और खलीफा पदाकाङ्गी नूतन नेताओंको मुसलमान् साम्नाजत्र प्रदान कर सन्तुष्ट हुई। ७२४ ई॰ से ७४३ ई॰ तक खलीफा हिसामके राजत्वकालमें मुसलमानों का बिजयी बाहु सबसे प्रथम पराभूत हुआ। ७३२ ई॰ को पद्मटियके युद्धमें सुसल मान्सेनापति अब्दुर रहमान् बिन् अब्दुल्ला चार्लस माटेलसे पराजित हुये। इसी युद्धके बाद युरोप महादेशमें अरबी लोगों का अक्षुस्स प्रताप क्रमशः क्षुस्स होने लगा।
इसके बाद ७४८ ई॰ में जिस समय अब्बासवंश धर्मप्राण मुसलमान-समाजका नेता बना था, उस समय उमैयद वंशके लोग अति निष्ठरभावसे निहत हुये थे। इसी वंशके एकमात्र राजा अब्दुर-रहमान्-बिन्-सुयावियाने स्पेजराज्यमें भाग कर अपना प्राण बचाया और कर्डीभा नगरमें ७५८ ई॰ को उमैयाद-राजपाटकी स्थापना कर स्वयं खलीफापद ग्रहण किया था।
अब्बासवंशके अधिकारके समय बगदाद नगर में राजपाट परिवर्तित हुआ था। उसीके यत्नसे उस समय कई मुमलमान राज्य स्थापित हुये। भूमध्य-सागरके क्रोट, कर्सिका, सार्डिनिया और सिसिलीहोप भी अफ्रीकाके मुसलमानोंके अधिकार में आ गये थे।
पूर्ववर्ती खलीफ़ावोंने अपने अपने वीर्यके प्रभावसे सभ्य जगत्में राज्यप्रतिष्ठा-प्रसङ्गपर जेसा सुयश कमाया था, वैसा ही अब्बासियोंने भी शिल्पविद्या और साहित्य सम्बन्धपर अपना विशेष आग्रह एवं अनुराग दिखा विद्दन्मण्डली तथा सभ्यसाधारणमें अपना गौरव जमाया।
मन्सूर, हारून् अल् रसीद् और मामून् प्रभृति खलीफावोंने उससमय साहित्य-जगत्में शीर्ष स्थान पाया था।
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 23.}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|९०|इसलाम|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
उनका राज्यकाल भी मुसलमानोंकी शक्तिसमृद्धिका उज्ज्वल निदर्शन है।
मानसिक एवं ऐकान्तिक चित्तवृत्तिके उन्नति साधनकी आसक्तिसे अब्बास-वंशीय लोग क्रमशः निर्जनताप्रिय और विलासी बन गये थे। सुतरां राजकार्यमें अवश्यम्भावी अमनीयोग देख मुसलमान प्रतिनिधियोंने गृहविच्छेद बढ़ाया। धीरे-धीरे राजद्रोहिता फैलने लगी। बगदादकी राजशक्ति उस समय बाह्यतः अच्क्षुस्स थी तो भी वस्तुतः अन्तरङ्गमें वह घट रही थी। यह विद्रोहवद्भि साम्राज्यके एक सुदूर प्रान्तमें प्रथम भड़की। अबदुर-रहमान्का स्पेनहराज्य में स्वतन्त्र एवं स्वाधीन उमैयद राज्य स्थापन इसका प्रारम्भ था। इस दृष्टान्तको देखकर अपरापर स्थानके मुसलमान-प्रतिनिधियोंने भी स्वाधीन बननेका प्रयास उठाया।
विद्यानुरक्त एवं विलासी अब्बासवंशीय खलीफ़ावोंने इस राष्ट्रविप्लवके समय अपना अवस्थान विपष्जनक विचारा इसलिये उन्होंने सिंहासनका तथा अपनी रक्षा करने लिये वेतनभोगी तुर्कप्रहरी नियुक्त किये और नियमातिरिक्त क्षमता प्रदान कर प्रधान-प्रधान अमात्योंके (अमीर-उल्-उमरा) हाथ राज्यपरिचालनके कार्य सौंप दिये।
राज्य-शासनहेतु एतादृश व्यवस्थाके निर्देश, सलजूकी तुर्कवंशके उपर्युपरि आक्रमण और सरकार-दरबारमें तुर्की के प्राधान्य-विस्तारसे खलीफा नाममात्र मुसलमान् समाजके नेता माने जाते थे। १२५८ ई॰ में हलाकू के बगदाद आक्रमण तथा अधिकार करते हो अब्बास वंशका अवसान हुआ।
उमैयद वंशीय खलीफा मुयावियाके दामास्कस नगरमें राजधानी जमाने और परवर्ती अब्बास वंशके बगदाद नगरमें प्रतिपत्ति कमाने पर्यन्त मुसलमान् जातिका अभ्युदयक्षेत्र अरब-राज्य समग्र साम्राज्यसे नगण्य प्रदेश ससझा जाता था। अविलम्ब ही वह विभिन्न सामन्तराज्यमें बंट गया। इस सकल विभागके मध्य एकमात्र यमन प्रदेशने मुहम्मदके जन्मसे ई॰ के १५वें शताब्द पर्यन्त विशेष प्रतिष्ठा पाई थी। प्रत्ति
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वत्सर पवित्र नगरमें तोर्थयात्रियोंके समागम, बहु सरदारोंके परस्पर विरोध और नेजद प्रदेशमें बह्हावी राजवंशके अभ्युत्थान एवं अवसानके सिवा अरबी राज्यमें दूसरी किसी इतिहास-प्रसिद्ध घटनाका उल्लेख नहीं मिलता।
सीरिया, फारस, मोरिटोनिया और स्पेन राज्य जीतनेपर अरब जातिका वाणिज्य बढ़ा था। एकमात्र इसलामधर्म और अरबी भाषाका प्रचलन रहनेसे तथा पर्याटक बणिकोंके यातायातकी विशेष सुविधा पड़नेसे विस्तीर्ण मुसलमान-साम्राज्यमें एक बाणिज्य-साम्राज्य-के स्थापनका भी सुन्दर सुयोग लगा। बग्दाद-राज-वंशकी विलासिता एवं' अब्बास-वंशीय खलीफावोंको सुखसमृद्धि तथा विलासवासना परिपूरणके निमित्त मुसलमान बणिकौंको भारतीय उत्तम द्रव्य ले जानेके लिये पैदलकी राह भारत आना पड़ता था। ई॰ ९म शताब्दके प्रारम्भमें अरब भारतके नाना स्थानमें पहुंच बसने लगे और उसी समयसे बहुसंख्यक भारतीय राजन्य अपने धर्मका आश्रय छोड़ इसलाम धर्ममें दीक्षित होने लगे। अतः पर अरबोंने भारतीय द्वीप-पुष्ञ्ज, सिंहल, सुमात्रा, यब, सिलेविश प्रभृति द्वीपराज्य और सुदूर चीन साम्राज्य में भी बाणिज्यके व्यपदेशसे इसलाम धर्मका प्रभाव जा फैलाया।
पदव्रजसे गमनकारी अरबी बणिक्सम्प्रदाय इसी प्रकार स्थलपथ द्वारा तातार राज्य ओर साइबेरियाके उत्तरांश पर्यन्त पहुंचकर अवाध बाणिज्य-कार्य चलाता था। अफरीका-खण्डमें वह नाइगार पर्यन्त अग्रसर हुआ था। यहीं ई॰ १० वें शताब्दसे मुसलमानांक प्रभाव द्वारा घाना, बङ्गरा, तीक्रूर, कुकू, सेन्द्रायार, दफूर, बुरनू, तिम्बाकतू और मेल्ली प्रसृति अनेक सामन्त राज्य जम गये। अफ़रीकाके पूर्वोपकूल में बाबेलमान्द ब प्रणालीसे जब्जीबार तक समुद्रतटपर उनके यत्त्रसे मकदाशुया, मेलिन्द, सीफला, केलू और मीजाम्बिक बन्दर बंसे थे। यहांस वह मादागास्करवासी लोगकि साथ वैदेशिक बाणिज्य चलाते थे। लुसितानियावासी बाणिज्यप्रिय बणिक् जलपथसे पण्यद्रव्य ले ई॰ ११वें शताब्दकी सुदूर अमेरिका-खण्ड में जा पहुंचे। साधा-
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इसलाम—इसलाम ख़ान् शैख़|९१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
रणको विश्वास होता है, कि अरब सम्प्रदाय ही प्रक्कत पक्षमें अमेरिका महादेशका आविष्कर्ता है।
वसुन्धराके भोगविलासकी भूमि भारत ही मुसलमान सम्प्रदायके साम्राज्य विस्तारका सर्वशेष निदर्शन है। किन्तु प्रक्ततपक्ष में ई॰ ७वें शताब्दके अन्त और ८वें शताब्दके आरम्भसे भारतवर्षपर मुसलमान सम्प्रदायका अधिष्ठान हुआ था। खलीफावोंकी भोग-लालसा पूरी करन ही मुसलमान् बणिकोंने भारत-के साथ संस्स्रव जमाया। मीरकासिमके सिन्धुपर आक्रमण करनेसे भारतमें मुसलमानोंका समागम हुआ और इसलामधर्म फैला। उसके बाद १० और ११ वे शताब्द गुजुनीपति महमूदकी चेष्टासे भारतमें मुसलमानी शक्ति प्रतिष्ठित हुई। उक्त मुसलमान पुङ्गवने सप्तदश बार भारतपर आक्रमण मार बहु अर्थ लुण्ठनपूर्वक स्वदेशको पलायन किया था। विख्यात सोमनाथ-मन्दिर और वहांकी देवमूर्ति दोनोंही उनके द्वारा धूलिमें मिल गये। महमूद गज़नवीने ईरान्से भारतके उत्तर-पश्चिम पञ्जाब प्रदेश पर्यन्त अपना राजा बढ़ाया था। इससे प्रायः दो शताब्द बाद ११८३ ई॰ को मुहम्मद गोरी ने दिल्ली अधिकारपूर्वक भारतकी सर्वप्राचीन राजधानीमें मुसलमानी शासन चला दिया। १८५७ ई॰ के सिपाही-विद्रोह पर्यन्त दिल्ली मुसलमान् बादशाहोंकी राजधानी गिनी जाती थी। यहां पठानोंका प्रादुर्भाव मिटनेपर ई॰ १४वें शताब्दी मुगलतीशका प्रभ्यय हुआ। मुगल सम्म्राट अकबर और उनके प्रपौत्र औरङ्गजेबके समय भारतमें मुसलमानी प्रभावने पराकाष्ठा पायी।
भारतवासी इसलाम धर्मावलम्बी मुसलमान् विभिन्न जातिसे समुडूत हैं। उनमें कितने ही विभिन्न शाखायुक्त अरब जातिके सन्तान हैं। कितने ही पारस्यवासी ईरानियों, शकों, तातारों मुगलों, तुकों', बलूचियों, अफगानों, अग्निकुल-राजपूतों', जाटों और आर्योपनिवेशके पूर्ववर्ती भारतसमागत मोङ्गलीय शाखा जातिके लोगोंसे इसलामी धर्मान्तर लेने बाद भारतीय विभिन्न मुसलमान् सम्प्रदाय परिपुष्ट हुआ है। आर्यावर्त भूमिमें मोङ्गलीय सम्पदायके मुग़ल,
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:अफमान, पाठान और विशुद्ध अरबी मुसलमान शेख कहाते हैं। सुक्ष्मद, मुसलमान, खलीफा प्रभृति शब्द देखिये।
{{outdent|इसलामखान्—१ मीर जिया-उद्-दीन बदखूशीका उपाधि। कवितामें इनका उपनाम वाला रहा। बादशाह आलमगीरके अधीन इन्होंने कार्य किया था। १६६३ ई॰ को आगरेमें इनकी मृत्यु हुयी। नवाब हिम्मत खान्, सैफखान् और अबदुर-रहीम खान् इनके बेटे थे।<br>{{gap}}२ सफीखान्के पुत्र और इसलाम खान् मशहदीके पौत्र। बादशाह फारुखसियारके समय यह लाहोरके सूबेदार थे। सुहम्मद शाहने इन्हें सात हजार सवार रखनेका अधिकार दिया था।}}
{{outdent|इसलाम खान् मशहदी—बङ्गाली एक सूबेदार। प्रथम यह मशहदमें रहते थे। उस समय इनका नाम मीर अबदुस्स भान रहा। जहांगीरके राजत्वकाल में ये पांच हज़ार, मनसबदार और बङ्गालके सूबेदार बने थे। सम्म्राट् शाहजहाने भी इन्हें छः हज़ारी मनसबदार किया ओर मीतमदु-उद्-दौलाकी उपाधि तथा दक्षिणापथके शासनकर्ताकै पदवी दी। शाहजहान् इन्हें बहुत चाहते थे। मृत्य से कई वर्ष पहले इन्हें सात हजार मनसबदार और मन्त्रीका पद मिला। १५८७ ई॰ में यह दक्षिणापथमें मरे थे। औरङ्गा-बादमें इनको कब्र बनी है। कोई-कोई भूलसे इन्हें इसलाम खान् रूमी भी कहते हैं।}}
{{outdent|इसलाम खान् रूमी-अली पाशाके लड़के। इनका प्रक्कृत नाम हुसेन पाशा था। यह बसराके शासनकर्ता थे। अपने चाचा द्वारा उक्त पट्से निकाले जानेपर इन्हें भारतवर्ष आना पड़ा। आलमगीर बादशाहने इन्हें पांच हजारी मनसबदार बनाया था। १६७६ ई॰ को १३ वीं जूनको यह विजयपुरके युद्धमें मारे गये। इन्होंने आगरा दुर्गके समीप यमुना किनारे अपना गृह बनाया और उद्यान लगाया था।}}
{{outdent|इसलाम खान् शैख-शैखु सलीम चिश्तीके पौत्र। १६०८ ई॰ को बादशाह जहांगीरने इन्हें बङ्गालका सूबेदार बनाया था। इनके पुत्रका नाम इकराम खान् और भ्राताका नाम कासिम खान् था। १६१३ ई॰ में इस-}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|९२|इसलामगढ़-इस्तिञ्जा|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:लाम खान् मरे और इक़राम ख़ान् बङ्गालके सूबेदार बने। आगरेके पास फ़तेहपुर सीकरीमें इनकी कबर है।
{{outdent|इसलामगढ़ —राजपूताना प्रान्तभागमें भावलपुरके अन्तर्गत एक दुर्ग। खान्पुरसे जैसलमेर जानके पथपर यह दुर्ग खड़ा है। पहले इसपर जैसलमेरके राजपूतोंका अधिकार था, किन्तु भावलपुरके खानोंने उनके हाथसे कौन लिया।}}
{{outdent|इसलामनगर—युक्तप्रदेशस्य बदायूं जिलेके अन्तर्गत बिसौली परगनेका एक नगर। यह अक्षा॰ २८° १९' ४५" उ॰ और द्राधि॰ ७८° ४६′ पू॰ के मध्य अवस्थित है। इस नगरके चारों ओर आमका बाग़ लगा है।}}
{{outdent|इसलामाबाद—१ बङ्गालके चट्टग्राम जिलेका एक प्रधान नगर। {{smaller|चट्टयान देखो।}} २ काश्मीरका एक नगर। यह अक्षा॰ ३३° ४१′ उ॰ तथा द्राधि॰ ७५° १७' पू॰ के मध्य झेलम नदी किनारे गिरिशृङ्गपर अवस्थित है। गिरिके नीचे प्रस्त्रवण है। सुनने में आता है, कि विष्णुने उक्त प्रस्रवण बनाया था। इसका प्राचीन नाम अनन्तनाग है। अम्बरनाथ जानेवाले यात्री इसी स्थानसे आहार्य संग्रह करते हैं। ई॰ के १८वें शताब्दमें मुसलमानोंने इस नगरका नाम इसलामाबाद रक्खा था। यहां काश्मीरी शाल और नानाप्रकार रुई एवं ऊनका कपड़ा बिकने आता है। केसर खूब मिलती है।}}
{{outdent|इसलाह (अ॰ स्त्री॰) १ संशोधन, दुरुस्ती, सुधार। २ चिवुककेश, टुड्डीका बाल।}}
{{outdent|इसहाव, खान्—दिल्ली-सम्म्राट् मुहम्मद शाहके एक अति प्रियपात्र बन्धु। इनकी उपाधि मीतमिनउद्-दौला और प्रक्कत नाम मिर्ज़ा गुलाम अली था। ये अच्छी कविता बनाते थे। १७४० ई॰ में इनकी मृत्यु हुई। १७४६ ई॰ में इनकी कन्याका विवाह सफदरजङ्गके पुत्र शुजाउद्दौलाके साथ धूमधामसे किया गया था।}}
{{outdent|इसहाक मौलाना—पञ्जाब प्रान्तस्थ मूलतान जिलेवाले उच्छा स्थानके एक पढ़े-लिखे मुसलमान्। युवावस्था में इन्होंने अपनेको चाचा सैयद सदर-उद्-दीन राजू कत्तानकी देख रेखपर छोड़ रक्खा था। १४५६ ई॰ में}}
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:इनकी मृत्यु हुयी। सहारनपुरमें अपने मकान्पर ही मौलानाकी कबर बनी है।
{{outdent|इसायी, {{smaller|ईसाई देखो ।}}}}
{{outdent|इसीका (हिं॰) १ 'यह' का सम्बन्ध कारक। {{smaller|इशीका देखो।}} इसे (हिं॰ सर्व॰) इसको, इसके लिये । 'इसे' यह शब्दके कर्मकारक और सम्प्रदानकारकका रूप है।}}
{{outdent|इस्कात (अ॰ पु॰) पतन, गिराव श।}}
{{outdent|इस्कात इमल (अ॰ पु॰) गर्भपात, पेटका गिराना।}}
{{outdent|इस्कातर (= पोर्तुगीज Escritoire) सम्पुटविशिष्ट लेखनमञ्च, खानेदार लिखनेका मेज़।}}
{{outdent|इस्कार्दी (स्कार्द)—काश्मीर-राज्यान्तर्गत बलती नामक प्रदेशका एक नगर। यह अक्षा॰ ३५° १२' उ॰ और द्राधि॰ ७५° ३५′ पू॰ के मध्य अवस्थित तथा पर्वतमाला द्वारा वेष्टित है। नगर में एक दुर्ग बना है, जो पर्वतपर निकटस्थ सिन्धुनदी से ८०० फीट ऊंचा खड़ा है। काश्मीरराज गुलाबसिंहने स्थानीय राजा अह-मद-शाहसे इसे कीन अपने राज्यमें मिला लिया था।}}
{{outdent|इस्तमरार (अ॰ पु॰) १ सनातनत्व, क्याम, ठहराव। २ एकाधिकार, बेरोक कब्जा। कानूनमें नियत और अपरिवर्तनशील करकी इस्तमरार कहते हैं।}}
{{outdent|इस्तमरारदार (अ॰ पु॰) क्षेत्र वा पट्टका सनातन-अधिकारी, जो शख्स खेत या पट्टे पर हमेशा के लिए कब्ज़ा रखता हो।}}
{{outdent|इस्तमरारो (अ॰ वि॰) १ सनातन, कायम, कभी न बदलनेवाला। (स्त्री॰) २ नियत पटुकी भूमि, कायम पट्टे की ज़मीन।}}
{{outdent|इस्तिकबाल (अ॰ पु॰) १ स्वागत, अगवानी। २ भविष्यत्काल, जुमाना आइन्दा।}}
{{outdent|इस्तिक्लाल (अ॰ पु॰) १ दृढ़ता, मज़बूती। २ स्थिरता, कयाम।}}
{{outdent|इस्तिङ्गी (हिं॰ स्त्री॰) जहाजी रस्ती। यह विनीबर लगती है। पालकी इसीसे तानते और खींचते हैं। यह अंगरेजी string शब्दका अपभ्रंश है।}}
{{outdent|इस्तिष्ना (अ॰ पु॰) १ मूत्रोत्सर्ग, पेशाब करना, मुतायी। २ मूत्रपुरीषीत्सर्ग के पश्चात् कर शुद्धि, हाथपानीका लेना। ३ मूत्रोत्सर्गके पश्चात् मृत्तिकाः}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इस्तिरजा-इहेहमातृ|९३}}</noinclude>
{{Multicol|line=1px solid black}}
:खण्डसे मूत्रके बिन्दुका सुखाना, मूतनेके बाद मट्टीके ढेलेसे पेशाबके बूंदका जजुब करना। किसी तुच्छ वस्तुकी 'इस्तिच्चेका ढेला' कहते हैं।
{{outdent|इस्तिरजा (अ॰ स्त्री॰) स्वीक्कति, रजामन्दी।}}
{{outdent|इस्तिरी (हिं॰ स्त्री॰) १ स्तरी, कपड़ेको बराबर और कड़ा करनेका औज़ार। यह लोहेकी बनती और खोखली होती है। नीचेकी ओर पीतल लगाते हैं। खोखली जगह गर्म कोयला भरा जाता है। जब कपड़ा घुलकर साफ होता, तब धोबी इस्तिरीको उसपर फेरता है। इससे कपड़ेका शिकन मिट और तह बराबर जम जाता है। दरज़ी भी इससे काम लेते हैं। किसी-किसीके मतानुसार यह अंगरेजी steel शब्दका अपभ्रंश है। २ स्त्री, लोगाई। ३ पत्नी, जोड़ू।}}
{{outdent|इस्तिसना (अ॰ पु॰) १ वजेन, इखराज, कूट। ३ निराकरण, नामजूरी, इनकार।}}
{{outdent|इस्तेदाद (अ॰ स्त्री॰) १ योग्यता, लियाकत। २ बुद्धि, समझ। ३ अंश, हिस्सा। ४ विज्ञान, हुनर।}}
{{outdent|इस्तेफ़ा (अ॰ पु॰) उत्सर्ग, तर्क, छोड़।}}
{{outdent|इस्तेमाल (अ॰ पु॰) १ अभ्यास, रब्त। २ व्यवहार, चाल। ३ कार्य, काम।}}
{{outdent|इस्तेमाली (अ॰ वि॰) १ व्यवद्वत, पुराना। २ साधारण, मामूली। (अ॰) ३ उत्तम शालि, बढ़िया चावल।}}
{{outdent|इस्म (अ॰ पु॰) १ अभिधान, लकब, नाम। २ व्याकरणमें—संज्ञा। इस्मनवीसी (अ॰ स्त्री॰) १ नाम लिखनेका काम। २ नामका रजिष्टर। ३ नामसूची, लकबनामा।}}
{{outdent|इह (सं॰ अव्य॰) इदं-हः। इदमी हः। {{smaller|पा ५।३।११।}} १ इस स्थानपर, इस जगह, यहां। २ इस स्थानकी, इस जगहके तई। ३ इस लोकमें, इस दुनिया के बीच। ४ इस पुस्तकमें, इस कायदेमें। ५ इस अवस्थामें, इस हालत में। ६. सम्प्रति, अब।}}
{{outdent|इहकाल (सं॰ पु॰) इदम्-हः, कर्मधा॰। इतराभ्योऽपि दृश्यते। {{smaller|पा ५।३।१४।}} वर्तमान समय, ज़माना हाल, यह ज़िन्दगी।}}
{{outdent|हक्रतु (सं॰ वि॰) इस लोक वा स्थानका ध्यान}}
{{Multicol-break}}
:रखनेवाला, जिसे इस दुनिया या जगहका खयाल रहे।
{{outdent|इहचित्त, {{smaller|इहक्रतु देखो।}}}}
{{outdent|इहतन (सं॰ ति॰) इदम् भावार्थं व्यल् तुट्च। इस जगत्में जन्म लेनेवाला, जो इस दुनियामें पैदा हो।}}
{{outdent|इहतियात (अ॰ स्त्री॰) १ सावधानता, खबरदारी, चौकसो। २ अप्रमाद, होशियारी।}}
{{outdent|इहत्य (सं॰ ति॰) इह भवम्, सप्तम्यन्तात् त्यप। अव्ययात् त्य। {{smaller|पा ४।२।१०४।}} इहकालमें होनेवाला, जो इस वक्त हो।}}
{{outdent|इहन (सं॰ अव्य॰) इस स्थानपर, इस दुनियामें, यहां।}}
{{outdent|इहभोजन (वै॰ त्रि॰) जिसके वस्तु और दान यहां पहुंचे, जिसके चीज़ और बखू शिश यहां आये।}}
{{outdent|इहद्वितीया (सं॰ स्त्री॰) इस कालकी दितीया, इस वक्तकी दूज।}}
{{outdent|इहपञ्चमी (सं॰ स्त्री॰) इस समयकी पञ्चमी।}}
{{outdent|इहलोक (सं॰ पु॰) इदम् प्रथमाया हः, कर्मधा॰। १ यह जगत्, यह जिन्दगी। (अव्य॰) २ इस लोकमें, इस दुनियामें।}}
{{outdent|इहवां (हिं॰ क्रि॰ वि॰) इस स्थानपर, यहां।}}
{{outdent|इहसान्, {{smaller|एहसान् देखो।}}}}
{{outdent|इहस्थ (सं॰ ति॰) इस स्थानपर उपस्थित, जो यहां खड़ा हो।}}
{{outdent|इहस्थान (सं॰ क्ली॰) १ यह जगत्, यह दुनिया। (त्रि॰) २ पृथिवीपर निवास करनेवाला, जो इस दुनियामें रहता हो। (अव्य॰) ३ इस स्थानपर, इस जगह।}}
{{outdent|इहां, {{smaller|यहां देखो।}}}}
{{outdent|इहागत (सं॰ त्रि॰) इस स्थानपर आ पहुंचनेवाला, जो यहां भा गया हो।}}
{{outdent|इहामुत्र (सं॰ अव्य॰) इहलोक और परलोकमें, इस दुनिया और उस दुनियामें, यहां और वहां।}}
{{outdent|इडेह (सं॰ अव्य॰) अत्र-तत्त्र, अन्तत्र, बारवीर।}}
{{outdent|इन्हेहमात्टः (वे॰ वि॰) जिसके सर्वत्र माता रहे, जो अपनी माको सब जगह रखता हो।}}
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. 24 .|2em}}</noinclude>
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{c|{{x-larger|ई}}}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{larger|ई}}—हिन्दी वर्णमालाका चतुर्थ स्वरवर्णं। यह इकारका दीर्घ रूप है। तालुसे निकलनेके कारण इसे तालव्य वर्ण कहते हैं। ई का उच्चारणः कभी दीर्घ कभी प्लतु होता है। तन्त्रके मतसे यह कुण्डलिनी है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव प्रभृति देव इसमें रहते हैं। इसकी उपासनासे चतुर्वर्ग फल मिलता है। {{smaller|(कामधेनुतन्त्र)}}
वर्णोर्यारतन्त्रके मतसे ई लिखनेका नियम यह है,—
ऊपर-नीचे और मध्यदिक पर यह कुञ्चित होता है। अधीगत तीन कोण रहते, जो दक्षिण दिक्से ऊपरकी सिकुड़ते हैं। ऊपरी दक्षिण कोणपर कोणयुक्त एक दूसरी रेखा कुञ्चित भावसे खींचना पड़ती है। ई में चन्द्र, सूर्य और अग्नि विद्यमान हैं। इसकी मात्रा शक्ति है। {{smaller|(वर्णोंहारतन्न)}} ई को तन्वमें त्रिमूर्ति, महामाया, लीलाची, वामलीचन, गोविन्द, शेखर, पुष्टि, सुभद्रा, रत्नसंज्ञा, विष्णु, लक्ष्मी, प्रहास, वाग्विशुद्ध, परापर, कालीत्तरीय, मेरुण्डा, रीति, पीण्डवर्धन, शिवोत्तम, शिवा, तुष्टि, चतुर्थी, विन्दु, मालिनी, वैष्णवी, वैन्दवी, जिह्वा, कामकला, सनादका, पावक, कीटर, कीर्ति, मोहिनी, कालकारिका, कुचहन्द, तर्जनी, शान्ति और त्रिपुर-सुन्दरी भी कहते हैं। माटकान्यासमें इसका स्थान वामचक्षु है। {{smaller|(ईं नमो वामचक्षुसि)}}
हिन्दीमें ई प्रत्ययका काम भी देती है। इसके सहारे विशेष्य और विशेषण दोनों बनते हैं। जैसे-बेटासे बेटी और लेटासे लेटी। कभी-कभी विशेष्यके अन्तमें लगनेसे विशेषण और विशेषणके अन्तमें ई लगनेसे विशेष्य हो जाता है। जैसे—चालसे चाली और लालसे लाली।
{{outdent|ई॰ (सं॰ अव्यव॰) १ विषाद! अफसोस! हाय! २ अनुकम्पा! रहम! ३ क्रोध! गुस्सा! ४ दुःखानुभव।}}
{{Multicol-break}}
:तकलीफ! ५ प्रत्यच्च। आंखके सामने! ६ सनिधि! नज़दीकी! (स्त्री॰) अस्य विष्णी॰ पत्नी, अ-ङीप्। ७ लक्ष्मी। ८ माया। (पु॰) ९ शान्ति। १० कामदेव। ११ गोविन्द। १२ त्रिमूर्ती। १३ वाम-लोचन। १४ नृसिंहास्त्र। १५ सुरेश्वर। १६ कन्या-युग्म। १७ कर्केट।
{{outdent|डेंगुर (हिं॰ पु॰) सिन्दूर, शिङ्गरफ, लालसीस। यह भारतमें बनता और बाहरसे भी आता है। गलते सीसकी वायुप्रवाह में रखनेसे ईंगुर तैयार होता है। यह विशेषतः महावीर पर चढ़ता है। सौभाग्यवती स्त्री अपनी मांग इससे भरती हैं। ई गुरसे पारा भी निकालते हैं। सिन्दूर और {{smaller|हिङ्गल देखो।}}}}
{{outdent|ईवे (हिं॰ क्रि॰ वि॰) इधर, यहां, इस ओर।}}
{{outdent|ईंचना (हिं॰ क्रि॰) १ अश्वन करना, खींचना। २ लिखना, घसीटना। ३ असि निकालना, तलवारको म्यानसे बाहर करना। ४ फांसी चढ़ाना। ५ शोषण करना, सीख लेना। पीना। ७ ग्रहण करना, ऐंठ लेना। ८ रख छोड़ना, ९ पान करना, दम लेना, दाब रखना। ८ बांधना, अंगेजना।}}
{{outdent|ईंचमनौती (हिं॰ स्त्री॰) भूमिपतिका अपने क्ऊषकके महाजनसे कर ग्रहण करना। क्कषक भूमिकर देनेमें असमर्थ होनेसे ज़मीन्दार महाजनसे वह धन लेता है और उसके खातेमें कृषकके नाम जमा करा देता है। इसीका नाम ईचमनौती है।}}
{{outdent|ईंट (हिं॰ स्त्री॰) १ इष्टका, मट्टीका टुकड़ा। यह चौखूंटी और लम्बी रहती तथा सांचमें ढलती है। ईंट कच्ची और पक्की दो तरहकी होती है। पक्की ईंट पजावेमें पकती है। इसे लखोरी, नम्बरी भौर मुट्ठी कहते हैं। लखौरी पतलो और छोटी होती है। इसका चलम अब बन्द हो गया है। पुराने समय}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदावर्ता-उदासी'''|'''२५१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:क्लान्त, क्षीण, शूलार्त और शोध शीघ्र पुरीष एवं वमि करनेवाले रोगीको छोड़ देना चाहिये।
:{{gap}}वायुके विपथ गमनपर उत्पन्न होनेसे सकल ही अवस्था में वायुको
स्वाभाविक पथपर पहुंचाना ही इस रोग-प्रतीकारका प्रधान उपाय है।
:{{gap}}वायुसे उत्पन्न होनेवाले उदावर्त रोगमें स्नेह और स्वेद डाल आस्थापन लगाना चाहिये। मलरोधसे होनेवालेकी चिकित्सा आनाह रोगकी तरह चलती है। मूत्रारोधके उदावर्त पर एला वा दुग्ध मिला कर मदिरा तीन दिन अथवा जल डालकर तीन दिन आमलकीका रस पिलाते हैं। अश्रुधारणसे होनेपर इस रोगमें स्नेह और स्वेद लगा अश्रुमोक्षण कराये।उद्गारसे जो उदावत उभरता, उसमें रोगी बिजौरा नीबू का रस मिला सुरापान करता है। वमनसे उदावर्त उठनेपर क्षार वा लवणके साथ अभ्यङ्ग प्रयोग किया जाता है। शुक्ररोधवालेमें स्त्रीका सहवास आवश्यक है। अनिद्रासे उपजनेपर उदावर्त रोगमें सुरापान करना और निद्रा लानेका ध्यान रखना चाहिये। कोष्ठगत वायु बिगडने उदावर्त उपजनेपर हृदय एवं वस्तिदेशमें शूल उठता, देह पर गौरव चढ़ता, अरुचि, तृष्णा तथा हिक्का का वेग बढ़ता, कष्टसे वायु, मूत्र एवं मल ढलता, श्वास लगता, काश कढ़ता, प्रतिश्याय पड़ता, दाह दहता, मोह मदता, वमन चलता, शिरोरोग चलता और मन एवं श्रवणेन्द्रियका विभ्रम रहता है। इसी प्रकार वायुके प्रकोपसे अनेक विकार उठ खड़े होते हैं। सुश्रुतके मतमें ऐसे स्थल
पर तेल एवं लवण मलाये और स्वेद तथा निरूहका वस्ति लगाये। मदनफल, अलाबुवीज, पिप्पली और कण्टकारीका चूर्ण पिचकारीसे मलद्वारमें पहुंचाना चाहिये। इससे शीघ्र ही उदावर्त रोग अच्छा हो जाता है।
{{Outdent|उदावर्ता (सं॰ स्त्री॰) वायुजन्य-स्त्रीयोनिरोगविशेष, औरतोंकी एक बीमारी। इसमें कष्टके साथ सफेनिल रज निकलता है। <small>(भावप्रकाश)</small>}}
{{Outdent|उदावर्तिन् (सं॰ त्रि॰) उदावर्तरोगविशिष्ट, जिसके कांच निकल आनेकी बीमारी रहे।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उदावसु (सं॰ पु॰) निमिके पौत्र और जनकके पिता। यह राजर्षि जनकसे भिन्न रहे। <small>जनक देखो।</small>}}
{{Outdent|उदास (सं॰ पु॰) १ विराग, मसला-जब्र। २ उपेक्षा, बेपरवाई। ३ उच्चता, उंचाई। ४ उत्क्षेपण, उछाल। (त्रि॰) ५ उदासीन, जब्रिया मज़हबका मोतक़िद। ६ विरक्त, बेपरवा। ७ दुःखी, रञ्जीदा।}}
{{Outdent|उदासना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्वासन करना, मट्टीमें मिलाना। २ उठाना, समेटना, लपेट डालना।}}
{{Outdent|उदासितृ (सं॰ त्रि॰) विरक्त, बेपरवा, किसीसे सरोकार न रखनेवाला।}}
{{Outdent|उदासिन (सं॰ त्रि॰) विरक्त, बेपरवा। <small>उदासी देखो।</small>}}
{{Outdent|उदासिल, <small>उदासितृ देखो।</small>}}
{{Outdent|उदासी (सं॰ पु॰) १ दर्शनज्ञ, मुहक्किक। २ विरक्त पुरुष, बेपरवा आदमी। ३ सन्यासी, एक मज़हबी फिरको का पाबन्द। यह नानकके धर्मपर चलते और मठमें बसते हैं। उदासी अपने हाथ से भोजन नहीं मठमें बसते हैं। उदासी अपने हाथ से भोजन नहीं बनाते, दूसरेका ही बनाया खाते हैं। नानककर ‘ग्रन्थ’ नामक धर्मग्रन्थ ही उपास्य है। सकल जातिके लोग उदासी सम्प्रदायभुक्त हो जाते हैं। इनके शिखा नहीं रहती। मस्तक मुंडवा डालते हैं। लंगोट सभी चढ़ाते हैं। (हिं॰ स्त्री॰) ३ दुःख, अफ़सोस। <br>
{{gap}}४ बम्बई प्रान्तस्थ सूरत जिलेवाले बारडोलोके उदा कुनबियोंका एक सम्प्रदाय। कोई सवा तीन सौ वर्ष हुये,गोपालदास नामक एक व्यक्तिने यह सम्प्रदाय चलाया था। उन्होंने वैदिक मत अस्वीकार कर केवल एक परमेश्वरपर विश्वास करने के लिये अपने अनुयायियाको उपदेश दिया। यह सम्प्रदाय ईश्वरके ध्यानसे मुक्तिकी प्राप्ति और पुनर्जन्मको मानता है। पांच लोग मिलकर महन्तको निर्वाचन करते हैं। महन्तको शिष्यके गलेमें सेली पहनाने, विवाह एवं अन्त्येष्टिक्रियाका समय ठहराने और आज्ञाभङ्ग करनेवालेको सम्प्रदायसे निकलानका अधिकार है उदा-कुनबी उदासी प्रात:काल नहाते, काली तुलसींपर जल चढ़ाते और अपने पवित्र धर्मग्रन्थसे ध्यान लगाते हैं। सन्ध्या समय वह धर्मग्रन्थके पीठोपाधामको नम-स्कार करते हैं! फिर उसकी आरती उतारी और स्तुति}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदावर्ता-उदासी'''|'''२५१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:क्लान्त, क्षीण, शूलार्त और शोध शीघ्र पुरीष एवं वमि करनेवाले रोगीको छोड़ देना चाहिये।
:{{gap}}वायुके विपथ गमनपर उत्पन्न होनेसे सकल ही अवस्था में वायुको स्वाभाविक पथपर पहुंचाना ही इस रोग-प्रतीकारका प्रधान उपाय है।
:{{gap}}वायुसे उत्पन्न होनेवाले उदावर्त रोगमें स्नेह और स्वेद डाल आस्थापन लगाना चाहिये। मलरोधसे होनेवालेकी चिकित्सा आनाह रोगकी तरह चलती है। मूत्रारोधके उदावर्त पर एला वा दुग्ध मिला कर मदिरा तीन दिन अथवा जल डालकर तीन दिन आमलकीका रस पिलाते हैं। अश्रुधारणसे होनेपर इस रोगमें स्नेह और स्वेद लगा अश्रुमोक्षण कराये।उद्गारसे जो उदावत उभरता, उसमें रोगी बिजौरा नीबू का रस मिला सुरापान करता है। वमनसे उदावर्त उठनेपर क्षार वा लवणके साथ अभ्यङ्ग प्रयोग किया जाता है। शुक्ररोधवालेमें स्त्रीका सहवास आवश्यक है। अनिद्रासे उपजनेपर उदावर्त रोगमें सुरापान करना और निद्रा लानेका ध्यान रखना चाहिये। कोष्ठगत वायु बिगडने उदावर्त उपजनेपर हृदय एवं वस्तिदेशमें शूल उठता, देह पर गौरव चढ़ता, अरुचि, तृष्णा तथा हिक्का का वेग बढ़ता, कष्टसे वायु, मूत्र एवं मल ढलता, श्वास लगता, काश कढ़ता, प्रतिश्याय पड़ता, दाह दहता, मोह मदता, वमन चलता, शिरोरोग चलता और मन एवं श्रवणेन्द्रियका विभ्रम रहता है। इसी प्रकार वायुके प्रकोपसे अनेक विकार उठ खड़े होते हैं। सुश्रुतके मतमें ऐसे स्थल पर तेल एवं लवण मलाये और स्वेद तथा निरूहका वस्ति लगाये। मदनफल, अलाबुवीज, पिप्पली और कण्टकारीका चूर्ण पिचकारीसे मलद्वारमें पहुंचाना चाहिये। इससे शीघ्र ही उदावर्त रोग अच्छा हो जाता है।
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{{Outdent|उदासना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्वासन करना, मट्टीमें मिलाना। २ उठाना, समेटना, लपेट डालना।}}
{{Outdent|उदासितृ (सं॰ त्रि॰) विरक्त, बेपरवा, किसीसे सरोकार न रखनेवाला।}}
{{Outdent|उदासिन (सं॰ त्रि॰) विरक्त, बेपरवा। <small>उदासी देखो।</small>}}
{{Outdent|उदासिल, <small>उदासितृ देखो।</small>}}
{{Outdent|उदासी (सं॰ पु॰) १ दर्शनज्ञ, मुहक्किक। २ विरक्त पुरुष, बेपरवा आदमी। ३ सन्यासी, एक मज़हबी फिरको का पाबन्द। यह नानकके धर्मपर चलते और मठमें बसते हैं। उदासी अपने हाथ से भोजन नहीं मठमें बसते हैं। उदासी अपने हाथ से भोजन नहीं बनाते, दूसरेका ही बनाया खाते हैं। नानककर ‘ग्रन्थ’ नामक धर्मग्रन्थ ही उपास्य है। सकल जातिके लोग उदासी सम्प्रदायभुक्त हो जाते हैं। इनके शिखा नहीं रहती। मस्तक मुंडवा डालते हैं। लंगोट सभी चढ़ाते हैं। (हिं॰ स्त्री॰) ३ दुःख, अफ़सोस। <br>
{{gap}}४ बम्बई प्रान्तस्थ सूरत जिलेवाले बारडोलोके उदा कुनबियोंका एक सम्प्रदाय। कोई सवा तीन सौ वर्ष हुये,गोपालदास नामक एक व्यक्तिने यह सम्प्रदाय चलाया था। उन्होंने वैदिक मत अस्वीकार कर केवल एक परमेश्वरपर विश्वास करने के लिये अपने अनुयायियाको उपदेश दिया। यह सम्प्रदाय ईश्वरके ध्यानसे मुक्तिकी प्राप्ति और पुनर्जन्मको मानता है। पांच लोग मिलकर महन्तको निर्वाचन करते हैं। महन्तको शिष्यके गलेमें सेली पहनाने, विवाह एवं अन्त्येष्टिक्रियाका समय ठहराने और आज्ञाभङ्ग करनेवालेको सम्प्रदायसे निकलानका अधिकार है उदा-कुनबी उदासी प्रात:काल नहाते, काली तुलसींपर जल चढ़ाते और अपने पवित्र धर्मग्रन्थसे ध्यान लगाते हैं। सन्ध्या समय वह धर्मग्रन्थके पीठोपाधामको नम-स्कार करते हैं! फिर उसकी आरती उतारी और स्तुति}}
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२५२'''|'''उदासीन-उदीच्यवृत्ति'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
सुनाई जाती है। विवाहके समय महन्त अगुवा रहते | उदाहृत (सं॰ त्रि॰) उत् पाहत। १ उल्लिखित,
हैं। औल दैहिक कर्म कोई नहीं करता। किन्तु यह लिखा हुआ। २ कथित, कहा हुआ। ३ उच्चारित,
अखाड़े में रहनेवाले नानकपन्थी उदासियोंसे अलग हैं। निकाला हुआ। ४ वर्णित, बताया हुआ। ५ उपन्यस्त,
उदासीन (सं॰ त्रि॰) उत्-आस-शान्च-ईदास इति रखा हुआ।
इत्वम्। १ वैरागी, वेपरवा। २ मध्यस्थ, बीचवाला। उदाहति (सं॰ स्त्री॰) उदाहरण देखो।
३ स्वतन्त्र, आजाद, झगड़ेमें न पड़नेवाला। ४ सम्पर्क- उदित (सं॰ त्रि॰) उत्-इन्-क्त । १ उहत, चढ़ा
रहित, निराला। ५ तटस्थ, नज़दीकी। अपरिचित, हुआ। २ उचित, वाजिब। ३ उन्नत, उठा हुआ।
जिससे जान-पहचान न रहे। (पु॰) ७ अपरिचित | ४ उत्पन्न, निकला हुआ। ५ प्रादुभूत, चमका हुआ।
व्यक्ति, अजनवी, जो दोस्त या दुश्मन् न हो। ६ कथित, कहा हुआ। (क्ली॰) उत्-इन भाव क्त।
उदासीनता (सं॰ स्त्री॰) विराग, बेपरवाई। ७ राशिका उदय, लग्न । “उदित उदयगिरि मञ्जपर ।” (तुलसी)
उदासी बाजा (हिं॰ पु॰) वाद्यविशेष, एक बाजा। (पु॰) ८ नोवार, किसी किस्मका चावल।
यह भोंपे-जैसा रहता और फूकनेसे बजता है। उदितयौवना (सं॰ स्त्री॰) मुग्धा नायिकाका एक भेद ।
उदास्थित (सं॰ पु॰) उत्-श्रा-स्था-क्त । १ अध्यक्ष, | इसमें तीन भाग यौवन और एक भाग वाल्यकाल रहता है।
मालिक। २ हारपाल, दरबान्। ३ चर, एलची। उदितहोमिन् (वै॰ त्रि॰) सूर्योदयके पश्चात् यन्न
४ नष्टसन्यास। ५ प्रव्रज्यावसित।
करनेवाला।
उदाहट (हिं॰ स्त्री॰) जदे रङ्गको झलक, नौले | उदिति (सं॰ स्त्री॰) उत्-इ-क्तिन्। १ उदय, उठान ।
रङ्गमें सुखीको चमक।
२ वाक्य, बात। ३ अस्त, गुरूब।
उदाहरण (सं॰ क्ली॰) उत्-श्रा-हृ भावे ल्युट । दृष्टान्त, उदितोदित (सं॰ त्रि॰) उदिते कथिते शास्त्रे अभ्य-
मिसाल। कोई विषय सप्रमाण करनेको अन्य विषयका दितः। शास्त्रोक्त, जो शास्त्र में कहा गया हो।
उल्लेख उदाहरण कहाता है-
उदोक्षण (सं॰ क्ली॰) सन्दर्शन, देखभाल ।
“साध्यसाधत्तमभावी दृष्टान्त उदाहरणम्।"
| उदीच्य (सं॰ अव्य॰) सन्दर्शन करके, देखभालकर।
साध्यसाधर्म्य से उसके धर्मादि प्रकाशक दृष्टान्तको उदीची (सं॰ स्त्री॰) उत्क्रान्तं दृष्टिपथं अञ्चति, उत्-
उदाहरण कहते हैं। न्यायमतसे अन्वयी और अञ्च ऋत्विगादिना क्विन् उगितचे ति डो। उत्तर
व्यतिरेको दो प्रकारका उदाहरण होता है। साधन | दिक, शिमाल।
की तरह अप्रयुक्त एवं साध्यवत्ताका अनुभावक अवयव | उदीचीन (सं॰ त्रि॰) उदीची-ख । उत्तरदिक्-सम्ब-
अन्वयी और साध्यसाधनसे व्यतिरेक तथा व्याप्तिके | धीय, शिमाली।
प्रदर्शन हारा प्रकाशित दृष्टान्त व्यतिरेकी है। उदीच्य (सं॰ त्रि॰) उदीची भावार्थे यत्। १ उत्तर
२ निदर्शन, झलक । ३ उल्लेख, लिखाई। ४ वर्णन, | देशीय, शिमालमें होने या रहनेवाला। (पु॰) २ सर-
बयान । ५ सन्दर्भ, जाड़तोड़। कथाप्रसङ, बात-
स्वती नदीके उत्तरपश्चिमस्थ देश। ३ उदीय देशका
चीत। ७ नाव्यशास्त्रोक्त गर्भाव-विशेष ।
अधिवासो। (क्ली॰) ४ हौवेर, एक खुशबूदार चौम।
उदाहार (सं॰ पु॰) उत्-मा-ह-धञ्। १ उदा- | उदीच्यकाष्ठ (सं॰ क्ली॰) चोपचीनी।
हरण, मिसाल । युक्ति और व्याप्ति हारा दिया जाने- | उदीच्यवृत्त (सं॰ क्ली॰) उदौचाहत्ति देखो।
वाला दृष्टान्त उदाहार कहाता है। २ वक्त ताका | उदीच्यवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) वैतालीय छन्दका एक भेद।
आरम्भ, बातका शुरू।
"पविषमेऽष्टौ समे कलास्ताय समे स्युर्मो निरन्तराः ।
उदाहार्य (सं॰ त्रि॰) उदाहरण दिये जाने योग्य, जो।
न समाव पराश्रिता कला वैताखीयेऽन्ते रवी गुरुः ॥ १२
मिशालमें पाने काबिल हो।
उदीच्यवत्तिनि तीवल: सक्तोऽयव भवेयुग्मयोः।"१६ (उत्तरवाकर)
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५२'''|'''उदासीन-उदीच्यवृत्ति'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:सुनाई जाती है। विवाहके समय महन्त अगुवा रहते हैं। और्ध्व दैहिक कर्म कोई नहीं करता। किन्तु यह अखाड़े में रहनेवाले नानकपन्थी उदासियोंसे अलग हैं।
{{Outdent|उदासीन (सं॰ त्रि॰) उत्-आस-शान्च्-ईदास इति इत्वम्। १ वैरागी, वेपरवा। २ मध्यस्थ, बीचवाला। ३ स्वतन्त्र, आजा़द, झगड़ेमें न पड़नेवाला। ४ सम्पर्क-रहित, निराला। ५ तटस्थ, नज़दीकी। ६ अपरिचित,
जिससे जान-पहचान न रहे। (पु॰) ७ अपरिचित व्यक्ति, अजनवी, जो दोस्त या दुश्मन् न हो।}}
{{Outdent|उदासीनता (सं॰ स्त्री॰) विराग, बेपरवाई।}}
{{Outdent|उदासी बाजा (हिं॰ पु॰) वाद्यविशेष, एक बाजा। यह भोंपे-जैसा रहता और फूंकनेसे बजता है।}}
{{Outdent|उदास्थित (सं॰ पु॰) उत्-आ-स्था-क्त। १ अध्यक्ष, मालिक। २ द्वारपाल, दरबान्। ३ चर, एलची। ४ नष्टसन्नयास। ५ प्रव्रज्यावसित।}}
{{Outdent|उदाहट (हिं॰ स्त्री॰) ऊदे रङ्गकी झलक, नीले रङ्गमें सुर्खीकी चमक।}}
{{Outdent|उदाहरण (सं॰ क्ली॰) उत्-आ-हृ भावे ल्युट्। दृष्टान्त, मिसाल। कोई विषय सप्रमाण करनेको अन्य विषयका उल्लेख उदाहरण कहाता है――<br>
“साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्।”<br>
साध्यसाधर्म्य से उसके धर्मादि प्रकाशक दृष्टान्तको उदाहरण कहते हैं। न्यायमतसे अन्वयी और व्यतिरेको दो प्रकारका उदाहरण होता है। साधन की तरह अप्रयुक्त एवं साध्यवत्ताका अनुभावक अवयव अन्वयी और साध्यसाधनसे व्यतिरेक तथा व्याप्तिके प्रदर्शन द्वारा प्रकाशित दृष्टान्त व्यतिरेकी है।<br>
२ निदर्शन, झलक। ३ उल्लेख, लिखाई। ४ वर्णन, बयान। ५ सन्दर्भ, जोड़तोड़। ६ कथाप्रसङ्ग, बातचीत। ७ नाट्यशास्त्रोक्त गर्भाङ्क-विशेष।}}
{{Outdent|उदाहार (सं॰ पु॰) उत्-आ-हृ-घञ्। १ उदाहरण, मिसाल। युक्ति और व्याप्ति द्वारा दिया जानेवाला दृष्टान्त उदाहार कहाता है। २ वक्त ताका आरम्भ, बातका शुरू।}}
{{Outdent|उदाहार्य (सं॰ त्रि॰) उदाहरण दिये जाने योग्य, जो मिशालमें आने का़बिल हो।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उदाहृत (सं॰ त्रि॰) उत् आ-हृ। १ उल्लिखित, लिखा हुआ। २ कथित, कहा हुआ। ३ उच्चारित, निकाला हुआ। ४ वर्णित, बताया हुआ। ५ उपन्धस्त, रखा हुआ।}}
{{Outdent|उदाहृति (सं॰ स्त्री॰) <small>उदाहरण देखो।</small>}}
{{Outdent|उदित (सं॰ त्रि॰) उत्-इन्-क्तृ। १ उद्गत, चढ़ा हुआ। २ उचित, वाजिब। ३ उन्नत, उठा हुआ। ४ उत्पन्न, निकला हुआ। ५ प्रादुभूर्त, चमका हुआ। ६ कथित, कहा हुआ। (क्ली॰) उत्-इन् भावे क्त। ७ राशिका उदय, लग्न। <small>“उदित उदयगिरि मञ्जपर।” (तुलसी)</small><br>
{{gap}(पु॰) ८ नोवार, किसी किस्मका चावल।}}}
{{Outdent|उदितयौवना (सं॰ स्त्री॰) मुग्धा नायिकाका एक भेद। इसमें तीन भाग यौवन और एक भाग वाल्यकाल रहता है।}}
{{Outdent|उदितहोमिन् (वै॰ त्रि॰) सूर्योदयके पश्चात् यज्ञ करनेवाला।}}
{{Outdent|उदिति (सं॰ स्त्री॰) उत्-इ-क्तिन्। १ उदय, उठान। २ वाक्य, बात। ३ अस्त, गुरूब।}}
{{Outdent|उदितोदित (सं॰ त्रि॰) उदिते कथिते शास्त्रे अभ्युदितः। शास्त्रोक्त, जो शास्त्र में कहा गया हो।}}
{{Outdent|उदीक्षण (सं॰ क्ली॰) सन्दर्शन, देखभाल।}}
{{Outdent|उदीक्ष्य (सं॰ अव्य॰) सन्दर्शन करके, देखभालकर।}}
{{Outdent|उदीची (सं॰ स्त्री॰) उत्क्रान्तं दृष्टिपथं अञ्चति, उत्-अञ्च ऋत्विगादिना क्विन् उगितश्चेति ङीप्। उत्तर दिक, शिमाल।}}
{{Outdent|उदीचीन (सं॰ त्रि॰) उदीची-ख। उत्तरदिक्-सम्बधीय, शिमाली।}}
{{Outdent|उदीच्य (सं॰ त्रि॰) उदीची भावार्थे यत्। १ उत्तर देशीय, शिमालमें होने या रहनेवाला। (पु॰) २ सरस्वती नदीके उत्तरपश्चिमस्थ देश। ३ उदीच्य देशका अधिवासी। (क्ली॰) ४ हीवेर, एक खुशबूदार चीज़।}}
{{Outdent|उदीच्यकाष्ठ (सं॰ क्ली॰) चोपचीनी।}}
{{Outdent|उदीच्यवृत्त (सं॰ क्ली॰) <small>उदौच्यवृत्ति देखो।</small>}}
{{Outdent|उदीच्यवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) वैतालीय छन्दका एक भेद।}}
{{x-smaller|{{c|<poem>“षड़्विषमेऽष्टौ समे कलास्ताय समे स्युर्मो निरन्तराः।
न समाव पराश्रिता कला वैताखौयेऽन्ते रतौ गुरुः॥ १२
उदौच्यवत्तिर्हि तीवल: सक्तोऽयण भवेयुग्मयोः।” १६ (वृत्तरवाकर)</poem>}}}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५२'''|'''उदासीन-उदीच्यवृत्ति'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:सुनाई जाती है। विवाहके समय महन्त अगुवा रहते हैं। और्ध्व दैहिक कर्म कोई नहीं करता। किन्तु यह अखाड़े में रहनेवाले नानकपन्थी उदासियोंसे अलग हैं।
{{Outdent|उदासीन (सं॰ त्रि॰) उत्-आस-शान्च्-ईदास इति इत्वम्। १ वैरागी, वेपरवा। २ मध्यस्थ, बीचवाला। ३ स्वतन्त्र, आजा़द, झगड़ेमें न पड़नेवाला। ४ सम्पर्क-रहित, निराला। ५ तटस्थ, नज़दीकी। ६ अपरिचित,
जिससे जान-पहचान न रहे। (पु॰) ७ अपरिचित व्यक्ति, अजनवी, जो दोस्त या दुश्मन् न हो।}}
{{Outdent|उदासीनता (सं॰ स्त्री॰) विराग, बेपरवाई।}}
{{Outdent|उदासी बाजा (हिं॰ पु॰) वाद्यविशेष, एक बाजा। यह भोंपे-जैसा रहता और फूंकनेसे बजता है।}}
{{Outdent|उदास्थित (सं॰ पु॰) उत्-आ-स्था-क्त। १ अध्यक्ष, मालिक। २ द्वारपाल, दरबान्। ३ चर, एलची। ४ नष्टसन्नयास। ५ प्रव्रज्यावसित।}}
{{Outdent|उदाहट (हिं॰ स्त्री॰) ऊदे रङ्गकी झलक, नीले रङ्गमें सुर्खीकी चमक।}}
{{Outdent|उदाहरण (सं॰ क्ली॰) उत्-आ-हृ भावे ल्युट्। दृष्टान्त, मिसाल। कोई विषय सप्रमाण करनेको अन्य विषयका उल्लेख उदाहरण कहाता है――<br>
{{gap}}<Small>“साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी दृष्टान्त उदाहरणम्।”</small><br>
{{gap}}साध्यसाधर्म्य से उसके धर्मादि प्रकाशक दृष्टान्तको उदाहरण कहते हैं। न्यायमतसे अन्वयी और व्यतिरेको दो प्रकारका उदाहरण होता है। साधन की तरह अप्रयुक्त एवं साध्यवत्ताका अनुभावक अवयव अन्वयी और साध्यसाधनसे व्यतिरेक तथा व्याप्तिके प्रदर्शन द्वारा प्रकाशित दृष्टान्त व्यतिरेकी है।<br>
{{gap}}२ निदर्शन, झलक। ३ उल्लेख, लिखाई। ४ वर्णन, बयान। ५ सन्दर्भ, जोड़तोड़। ६ कथाप्रसङ्ग, बातचीत। ७ नाट्यशास्त्रोक्त गर्भाङ्क-विशेष।}}
{{Outdent|उदाहार (सं॰ पु॰) उत्-आ-हृ-घञ्। १ उदाहरण, मिसाल। युक्ति और व्याप्ति द्वारा दिया जानेवाला दृष्टान्त उदाहार कहाता है। २ वक्त ताका आरम्भ, बातका शुरू।}}
{{Outdent|उदाहार्य (सं॰ त्रि॰) उदाहरण दिये जाने योग्य, जो मिशालमें आने का़बिल हो।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उदाहृत (सं॰ त्रि॰) उत् आ-हृ। १ उल्लिखित, लिखा हुआ। २ कथित, कहा हुआ। ३ उच्चारित, निकाला हुआ। ४ वर्णित, बताया हुआ। ५ उपन्धस्त, रखा हुआ।}}
{{Outdent|उदाहृति (सं॰ स्त्री॰) <small>उदाहरण देखो।</small>}}
{{Outdent|उदित (सं॰ त्रि॰) उत्-इन्-क्तृ। १ उद्गत, चढ़ा हुआ। २ उचित, वाजिब। ३ उन्नत, उठा हुआ। ४ उत्पन्न, निकला हुआ। ५ प्रादुभूर्त, चमका हुआ। ६ कथित, कहा हुआ। (क्ली॰) उत्-इन् भावे क्त। ७ राशिका उदय, लग्न। <small>“उदित उदयगिरि मञ्जपर।” (तुलसी)</small><br>
{{gap}}(पु॰) ८ नोवार, किसी किस्मका चावल।}}
{{Outdent|उदितयौवना (सं॰ स्त्री॰) मुग्धा नायिकाका एक भेद। इसमें तीन भाग यौवन और एक भाग वाल्यकाल रहता है।}}
{{Outdent|उदितहोमिन् (वै॰ त्रि॰) सूर्योदयके पश्चात् यज्ञ करनेवाला।}}
{{Outdent|उदिति (सं॰ स्त्री॰) उत्-इ-क्तिन्। १ उदय, उठान। २ वाक्य, बात। ३ अस्त, गुरूब।}}
{{Outdent|उदितोदित (सं॰ त्रि॰) उदिते कथिते शास्त्रे अभ्युदितः। शास्त्रोक्त, जो शास्त्र में कहा गया हो।}}
{{Outdent|उदीक्षण (सं॰ क्ली॰) सन्दर्शन, देखभाल।}}
{{Outdent|उदीक्ष्य (सं॰ अव्य॰) सन्दर्शन करके, देखभालकर।}}
{{Outdent|उदीची (सं॰ स्त्री॰) उत्क्रान्तं दृष्टिपथं अञ्चति, उत्-अञ्च ऋत्विगादिना क्विन् उगितश्चेति ङीप्। उत्तर दिक, शिमाल।}}
{{Outdent|उदीचीन (सं॰ त्रि॰) उदीची-ख। उत्तरदिक्-सम्बधीय, शिमाली।}}
{{Outdent|उदीच्य (सं॰ त्रि॰) उदीची भावार्थे यत्। १ उत्तर देशीय, शिमालमें होने या रहनेवाला। (पु॰) २ सरस्वती नदीके उत्तरपश्चिमस्थ देश। ३ उदीच्य देशका अधिवासी। (क्ली॰) ४ हीवेर, एक खुशबूदार चीज़।}}
{{Outdent|उदीच्यकाष्ठ (सं॰ क्ली॰) चोपचीनी।}}
{{Outdent|उदीच्यवृत्त (सं॰ क्ली॰) <small>उदौच्यवृत्ति देखो।</small>}}
{{Outdent|उदीच्यवृत्ति (सं॰ स्त्री॰) वैतालीय छन्दका एक भेद।}}
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न समाव पराश्रिता कला वैताखौयेऽन्ते रतौ गुरुः॥ १२
उदौच्यवत्तिर्हि तीवल: सक्तोऽयण भवेयुग्मयोः।” १६ (वृत्तरवाकर)</poem>}}}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२५४
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उदीप-उदुम्बल'''|२५३}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उदीच्यवृत्तिके विषम चरणको द्वितीय और तृतीय उदीयमाण (सं॰ त्रि॰) १ चलाया या हटाया
मात्रा संयुक्त होकर गुरुवर्ण बन जाती हैं। जानेवाला, जो फेंका या अलग किया जा रहा हो।
उदीप (सं॰ त्रि॰) उगता आपो यतः, अच् समा० उदीषित (सं॰ त्रि॰) उन्नत, ऊंचा, जो बढ़
ईत्वम्। १ उहतजल, पानोसे डूबा या भरा हुआ। गया हो।
(पु॰)२ जलप्लावन, पानीको बाढ़।
उद्या (हिं॰ पु॰) धान्य विशेष, एक चावल
उदीपन, उदीपित (हिं॰) उद्दीपन और उद्दीपित देखो। यह वर्षाके अन्त समय कटता है।
उदोपी-श्मन्द्राज प्रान्तके दक्षिण कनाड़ा ज़िलेका एक | उदुखल, उदूखल देखी।
तालुक। भूमिका परिमाण ७८७ वर्गमील है। प्रायः उदुम्बर (सं॰ पु॰) १ उडूम्बर, गूलर। (Ficus glo-
ढाई लाख मनुष्थ बसते हैं। हिन्दू और ईसाई merata) पर्याय है-जन्तुफल, तपसाङ्ग, क्रिमिफल,
अधिक हैं।
शीतवल्कल, यज्ञाङ्ग, विषवृक्ष, हेमपुष्य, क्षौरवृक्ष, जन्तु-
२ अपने तालकका नगर और हेडक्वार्टर। यह वृक्ष, सदाफल, हेमदुग्धक, कालस्कन्द, यज्ञयन्न, सुप्रति-
अक्षा० १३ २०३० उ॰ और द्राघि॰ ७४° ४७ पू॰ ष्ठित, पुष्पशून्य, पवित्रक, सौम्य । वैद्यकके मतसे यह
पर अवस्थित है। कनाड़ा प्रान्तमें यह स्थान हिन्दु शीतल, रुक्ष, गुरु, मधुर, कषाय, वण कारो, व्रणशोधक
वोंका पवित्र तीर्थ है। महिसुरसे प्रतिवर्ष यात्री एवं व्रणपूरक होता और प्रदर, पित्त, कफ तथा रुधिरः
आया करते हैं। मन्दिर बहुत पुराना है। हिन्दु-
रोगको खोता है। उटुम्बरका पक्क फल मधुर, शीतल
वोंके पाठ मठाधीश दो-दो वर्षके हिसाबसे उसका एवं क्रिमिकर और रक्तपित्त, दृष्या, मूळ, दाह,
प्रबन्ध करते हैं। निकटवर्ती कल्याणपुर सम्भवत: कोस. पित्त, श्रम, शोष, अपस्मार तथा उन्माद-रोगनाशक
मस इनडिकोप्लसटेस (५४५ ई॰) का कालियेना है। है। कच्चा गूलर कषाय, अग्निदीपक, रुच, मांस-
उदोरण (सं॰ क्ली॰) उत्-ईर् ल्युट्। १ उच्चारण,
वर्धक और रक्तविकारनाशक ठहरता है। बल्कल
बोलचाल । २ कथन, कहाई। ३ उद्दीपन, भड़काव । शीतल, कषाय, गर्भरक्षक एवं स्तनदुग्धकर होता और
४ प्रेरण, पहुंचाने या भेजनेका काम। ५ विजम्भण, व्रण, क्षत, कुष्ठ तथा चर्मरोगको खोता है।
जमहाई। उत्पत्ति, पैदायश। ७ उल्लेख, लिखाई। २ कुष्ठ विशेष, किसी किस्मका कोढ़। ३ देहली,
८ उत्क्षेपण, उछाल।
चौखट। ४ पण्डक, नामद। (क्ली॰) ५ ताम्र,
उदीरित. (सं॰ त्रि॰) उत्-ईर-क्त। १ कथित, तांबा। ६ कषे, दो तोलेको एक तौल। ७ मेढ़।
कहा हुआ। २ उद्रिक्त, बढ़ाया या समझाया हुआ। उदुम्बरच्छदा, उदुम्बरदला देखो।
३ प्रेरित, भेजा हुआ।
उदुम्बरदला (सं॰ स्त्री॰) उदुम्बरस्य दलमिव दल-
उदीरितधी (सं॰ त्रि॰) कुशाग्रबुद्धि, तेज़फहम, मस्याः। द्रवदन्तीवृक्ष, छोटी दांतीका पड़।
समझदार।
उदुम्बरपर्णी (सं॰ स्त्री॰) १ दन्तीवृक्ष, दांतीका
उदीर्ण (सं॰ क्ली॰) उत्-ऋ-त। १ उदित, उठा या पेड़। २ लघुदन्तीवृक्ष, छोटी दांतीका पेड़।
चढ़ा हुआ । २ प्रबल, जोरदार । (पु॰) ३ विष्णु । उदुम्बरमशक ( सं॰ पु॰) मूषिक, चूहा।
उदीर्ण दीधिति (सं॰ त्रि॰) अतिशय प्रभान्वित, उदुम्बरावती (सं॰ स्त्री॰) हरिवंशोक्त नदीविशेष।
बहुत चमकीला।
उदम्बरी (सं॰ स्त्री॰) काकोदुम्बरिका, कठगूलर,
उदोर्ण वेग (सं॰ त्रि॰) अतिशय वेगशील, निहा- गोबला।
यत जोरदार।
उदुम्बल (वै॰ त्रि॰) विस्तारित शक्तिसम्पन्न, बड़ी
उदीय (सं॰ त्रि॰) १ उच्चारणके योग्य, जो कहे जाने | ताकत रखनेवाला। (सायण) (सं॰ पु॰)२ उटु-
काबिल हो। (अव्य॰) २कहकर, बोलके । बर, गूलर।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III 64|1em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उदीप-उदुम्बल'''|२५३}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:{{gap}}उदीच्यवृत्तिके विषम चरणको द्वितीय और तृतीय मात्रा संयुक्त होकर गुरुवर्ण बन जाती हैं।
{{Outdent|उदीप (सं॰ त्रि॰) उगता आपो यतः, अच् समा॰ ईत्वम्। १ उद्गतजल, पानीसे डूबा या भरा हुआ। (पु॰)२ जलप्लावन, पानीकी बाढ़।}}
{{Outdent|उदीपन, उदीपित (हिं॰) <small>उद्दीपन और उद्दीपित देखो।</small>}}
{{Outdent|उदीपी-१ मन्द्राज प्रान्तके दक्षिण कनाड़ा ज़िलेका एक तालुक। भूमिका परिमाण ७८७ वर्गमील है। प्रायः ढाई लाख मनुष्थ बसते हैं। हिन्दू और ईसाई अधिक हैं।<br>
{{gap}}२ अपने ताल्लूकका नगर और हेडक्वार्टर। यह अक्षा॰ १३° २०° ३०‘‘ उ॰ और द्राघि॰ ७४° ४७‘ पू॰ पर अवस्थित है। कनाड़ा प्रान्तमें यह स्थान हिन्दुवोंका पवित्र तीर्थ है। महिसुरसे प्रतिवर्ष यात्री आया करते हैं। मन्दिर बहुत पुराना है। हिन्दुवोंके आठ मठाधीश दो-दो वर्षके हिसाबसे उसका प्रबन्ध करते हैं। निकटवर्ती कल्याणपुर सम्भवत: कोसमस इनडिकोप्लसटेस (५४५ ई॰) का काल्लियेना है।}}
{{Outdent|उदीरण (सं॰ क्ली॰) उत्-ईर् ल्युट्। १ उच्चारण, बोलचाल । २ कथन, कहाई। ३ उद्दीपन, भड़काव। ४ प्रेरण, पहुंचाने या भेजनेका काम। ५ विजृम्भण, जमहाई। ६ उत्पत्ति, पैदायश। ७ उल्लेख, लिखाई।
८ उत्क्षेपण, उछाल।}}
{{Outdent|उदीरित (सं॰ त्रि॰) उत्-ईर-क्त। १ कथित, कहा हुआ। २ उद्रिक्त, बढ़ाया या समझाया हुआ। ३ प्रेरित, भेजा हुआ।}}
{{Outdent|उदीरितधी (सं॰ त्रि॰) कुशाग्रबुद्धि, तेज़फहम, समझदार।}}
{{Outdent|उदीर्ण (सं॰ क्ली॰) उत्-ऋ-क्त। १ उदित, उठा या
चढ़ा हुआ । २ प्रबल, जो़रदार। (पु॰) ३ विष्णु।}}
{{Outdent|उदीर्ण दीधिति (सं॰ त्रि॰) अतिशय प्रभान्वित, बहुत चमकीला।}}
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{{Outdent|उदीर्यमाण (सं॰ त्रि॰) १ चलाया या हटाया जानेवाला, जो फेंका या अलग किया जा रहा हो।}}
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{{Outdent|उदुआ (हिं॰ पु॰) धान्य विशेष, एक चावल। यह वर्षाके अन्त समय कटता है।}}
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{{Outdent|उदुम्बर (सं॰ पु॰) १ उडूम्बर, गूलर। (Ficus glomerata) पर्याय है-जन्तुफल, तपसाङ्गु, क्रिमिफल, शीतवल्कल, यज्ञाङ्ग, विषवृक्ष, हेमपुष्य, क्षीरवृक्ष, जन्तु-वृक्ष, सदाफल, हेमदुग्धक, कालस्कन्द, यज्ञयज्ञ, सुप्रतिष्ठित, पुष्पशून्य, पवित्रक, सौम्य। वैद्यकके मतसे यह शीतल, रुक्ष, गुरु, मधुर, कषाय, वर्णकारी, व्रणशोधक एवं व्रणपूरक होता और प्रदर, पित्त, कफ तथा रुधिर रोगको खोता है।उटुम्बरका पक्क फल मधुर, शीतल एवं क्रिमिकर और रक्तपित्त, तृष्णा, मुर्छा, दाह, पित्त, श्रम, शोष, अपस्मार तथा उन्माद-रोगनाशक है। कच्चा गूलर कषाय, अग्निदीपक, रुच्य, मांस-वर्धक और रक्तविकारनाशक ठहरता है। बल्कल शीतल, कषाय, गर्भरक्षक एवं स्तनदुग्धकर होता और व्रण, क्षत, कुष्ठ तथा चर्मरोगको खोता है।<br>
{{gap}}२ कुष्ठ विशेष, किसी कि़स्मका कोढ़। ३ देहली, चौखट। ४ पण्डक, नामर्द। (क्ली॰) ५ ताम्र, तांबा। ६ कर्ष, दो तोलेकी एक तौल। ७ मेढ़्।}}
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{{Outdent|उदुम्बरदला (सं॰ स्त्री॰) उदुम्बरस्य दलमिव दल-मस्याः। ह्रस्वदन्तीवृक्ष, छोटी दांतीका पेड़।}}
{{Outdent|उदुम्बरपर्णी (सं॰ स्त्री॰) १ दन्तीवृक्ष, दांतीका पेड़। २ लघुदन्तीवृक्ष, छोटी दांतीका पेड़।}}
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{{Outdent|उदुम्बल (वै॰ त्रि॰) विस्तारित शक्तिसम्पन्न, बड़ी ताकत रखनेवाला। <small>(सायण)</small> (सं॰ पु॰) २ उदुम्बर, गूलर।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२५५
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२५४'''|'''उदुम्भल-उद्गमनीय'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उदुम्भल, उदम्बर देखो।
उनके १०५००० रु॰ अंगरेज सरकारको देने पर राजी
उदुष्टमुख (वै॰ त्रि॰) अश्वसदृश रक्तवर्ण मुखयुक्त, होनेसे गायकवाड़ने यह राज्य अंगरेजोंके अधीन
घोड़ेकौ तरह लाल मुह रखनेवाला।
बनाया। राजाको बदलेमें सम्मानार्थ सरोपा और
उदूखल (सं॰ क्ली॰) १ तण्डुलादि कण्डनार्थ काष्ठ गायकवाड़के ग्रामोंसे कुछ रुपया मिला करता है।
पात्र, चावल वगेरह कूटनेको लकड़ीका बरतन, उदै (हि॰) उदय देखो।
ओखली, इमामदस्ता। २ गुग्गल, गूगल ।
उदो (हिं॰) उदय देखो।
उदृखलसन्धि (सं॰ पु॰) उदखलाकारग्रीवोधंगत-उदोजस् (वै॰ त्रि॰) अतिशय प्रचण्ड, निहायत
सन्धि, ओखली-जैसा गर्दैनके ऊपरका जोड़।
ताकतवर।
उदृढ़ (सं॰ त्रि॰) उत्-वह-त । १ विवाहित, व्याहा।। उदोत (हिं॰) उद्योत देखो।
२ स्थल, मोटा। ३कृत, वाहित, असली। ४ उन्नत, उदोतकर (हिं॰ त्रि॰) प्रकाशक, रौशनी बखशनेवाला।
ऊंचा।
उदोती, उद्योतकर देखो।
उदल (सं॰ पु॰) शासनभन, नाफरमानी, हुक्म न उदौ (हि॰)
माननेकी बात।
उदौदन (सं॰ पु॰) जलसे सिद्ध अन्न, पानीमें
उदलहुक्म (अ॰ वि॰) आज्ञाभङ्गकारी, नाफरमान, पकाया हुआ चावल।
जो हुक्म् मानता न हो।
उद्गत (सं॰ त्रि॰) उत्-गम-त। १ उस्थित, उठा हुश्रा।
उदूलहुक्मी, उटूल देखो। .
२ उत्पन्न, पैदा । ३ उदित, निकला हुआ। ३ विगत,
उदेग (हिं॰) उद्दे ग देखो।
गया हुआ। ४ त्यक्ता, फेंका हुआ।
उदेजय (सं॰ त्रि॰) उत्-एज-णिच-खश् । १ उद्देग- उद्गतशृङ्ग (सं० वि०)
उद्गतशृङ्ग (स० वि०) नतन शृङ्गयुक्त, निकलते
कारक, घबरा देनेवाला। २ भयप्रद, खौफनाक ।। सींगोवाला।
३ उत्कम्पजनक, कंपा देनेवाला।
उगता (सं॰ स्त्री॰) विषमवृत्तिछन्दका एक भेद।
उदेपुर-बम्बईप्रान्तस्थ रेवाकांठे जिलेके छोटे उदेपुर इसमें चार पाद पड़ते हैं। पहले तीनमें दश दश
राज्यका प्रधान नगर। यह अक्षा॰ २२°२० उ॰ और पिछले चौथे पादमें तेरह अक्षर लगते हैं। .
और द्रघि॰ ७४ १ पू॰ पर, समतल भूमिमें अवस्थित “सजसादिमे सलघुकी च नसजगुरुकैऽरथोद्गता।
है। इसके निकट ही ओड़सङ्ग नद उत्तरपश्चिम बद्यविगतभनजलगा युताः सजसा जगौ च चरणमकतः पठेत् ॥”
घम पड़ा है। नगरको दक्षिण भोर उक्त नद और
(वृत्तरबाकर)
पूर्व ओर विचित्र इद पड़ता, जिसके किनारे घना उद्गतासु (सं॰ त्रि॰) मृत, मुर्दा, मरा हुआ।
जङ्गल मिलता है। १८५८ ई॰ के दिसम्बर मास उद्गति (सं॰ स्त्री॰) उत-गम-क्तिन्। १ अर्वगति,
ब्रगेडियर पार्कने ह्रदको ओर सुन्दर आम्रवन एवं चढ़ाव। २ उदय, निकास । ३ उत्पत्ति, उपज ।
नदौके मध्य तांतिया तोपीको फौजको भगाया था। उदगन्धि (सं॰ त्रि॰) उत्कृष्ट गन्धयुक्त , खुशबूदार ।
हुदके पार्खपर एक मनोरम देवमन्दिर बना है। राज- उद्गम (सं॰ पु॰) १ उत्थान, उठान। २ उत्पत्ति,
प्रासाद बहुत ऊंचा है। शहरपनाह पूरी नहीं, पैदायश। ३ उदय, निकास। ४ अर्ध्वगति, चढ़ाई।
अधूरी खड्ने है। नगरमें कोई वाणिज्य व्यवसाय नहीं | ५ वान्ति, के, उलटी।
होता। लोग राज्ययर ही अपने जीवन निर्वाहार्थ उगमन (सं॰ क्ली॰) सद्गम देखो।
निर्भर हैं। ई॰ का १८ वां शताब्द लगते अलीमोहनसे उदगमनीय (सं॰ क्ली॰) उत्-गम-अनीयर् । १ धौत-
राजधानी उठकर यहां आयी थी। पहले राजा | वस्त्रद्दय, धोया जोड़ा। (त्रि॰) २ अर्ध्वगमनके योग्य,
गायकवाड़को कर देते रहे। किन्तु १८२२ ई॰ में | चढ़े जाने काबिल।
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५४'''|'''उदुम्भल-उद्गमनीय'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उदुम्भल, <small>उदुम्बर देखो।</small>}}
{{Outdent|उदुष्टमुख (वै॰ त्रि॰) अश्वसदृश रक्तवर्ण मुखयुक्त, घोड़ेकी तरह लाल मुंह रखनेवाला।}}
{{Outdent|उदूखल (सं॰ क्ली॰) १ तण्डुलादि कण्डनार्थ काष्ठ पात्र, चावल वगैरह कूटनेको लकड़ीका बरतन, ओखली, इमामदस्ता। २ गुग्गुल, गूगल।}}
{{Outdent|उदृखलसन्धि (सं॰ पु॰) उदूखलाकारग्रीवोर्धगत-सन्धि, ओखली-जैसा गर्दनके ऊपरका जोड़।}}
{{Outdent|उदूढ़ (सं॰ त्रि॰) उत्-वह-क्त। १ विवाहित, व्याहा। २ स्थूल, मोटा। ३ धृत, वाहित, असली। ४ उन्नत, ऊंचा।}}
{{Outdent|उदूल (अ॰ पु॰) शासनभङ्ग, नाफ़रमानी, हुक्म न माननेकी बात।}}
{{Outdent|उदलहुक्म (अ॰ वि॰) आज्ञाभङ्गकारी, नाफरमान, जो हुक्म् मानता न हो।}}
{{Outdent|उदूलहुक्मी, <small>उदूल देखो।</small>}}
{{Outdent|उदेग (हिं॰) <small>उद्वेग देखो।</small>
{{Outdent|उदेजय (सं॰ त्रि॰) उत्-एज-णिच-खश्। १ उद्वेग कारक, घबरा देनेवाला। २ भयप्रद, खौ़फ़नाक। ३ उत्कम्पजनक, कंपा देनेवाला।}}
{{Outdent|उदेपुर――बम्बईप्रान्तस्थ रेवाकांठे जिलेके छोटे उदेपुर राज्यका प्रधान नगर। यह अक्षा॰ २२° २०‘ उ॰ और द्रघि॰ ७४° १‘ पू॰ पर, समतल भूमिमें अवस्थित है। इसके निकट ही ओड़सङ्ग नद उत्तरपश्चिम घूम पड़ा है। नगरकी दक्षिण भोर उक्त नद और पूर्व ओर विचित्र हद पड़ता, जिसके किनारे घना जङ्गल मिलता है। १८५८ ई॰ के दिसम्बर मास बृगेडियर पार्कने ह्रदको ओर सुन्दर आम्रवन एवं नदीके मध्य तांतिया तोपीको फौजको भगाया था। हदके पार्श्व पर एक मनोरम देवमन्दिर बना है। राज-प्रासाद बहुत ऊंचा है। शहरपनाह पूरी नहीं अधूरी खड़ी है। नगरमें कोई वाणिज्य-व्यवसाय नहीं होता। लोग राज्ययर ही अपने जीवन निर्वाहार्थ निर्भर हैं। ई॰ का १८ वां शताब्द लगते अलीमोहनसे राजधानी उठकर यहां आयी थी। पहले राजा गायकवाड़को कर देते रहे। किन्तु १८२२ ई॰ में}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:उनके १०५०० रु॰ अंगरेज सरकारको देने पर राजी होनेसे गायकवाड़ने यह राज्य अंगरेजोंके अधीन बनाया। राजाको बदलेमें सम्मानार्थ सरोपा और गायकवाड़के ग्रामोंसे कुछ रुपया मिला करता है।
{{Outdent|उदै (हि॰) <small>उदय देखो।</small>}}
{{Outdent|उदो (हिं॰) <small>उदय देखो।</small>}}
{{Outdent|उदोजस् (वै॰ त्रि॰) अतिशय प्रचण्ड, निहायत ताकतवर।}}
{{Outdent|उदोत (हिं॰) <small>उद्योत देखो।</small>}}
{{Outdent|उदोतकर (हिं॰ त्रि॰) प्रकाशक, रौशनी बख़्शनेवाला।}}
{{Outdent|उदोती, <small>उद्योतकर देखो।</small>}}
{{Outdent|उदौ (हि॰)}}
{{Outdent|उदौदन (सं॰ पु॰) जलसे सिद्ध अन्न, पानीमें पकाया हुआ चावल।}}
{{Outdent|उद्गत (सं॰ त्रि॰) उत्-गम-क्त। १ उस्थित, उठा हुआ। २ उत्पन्न, पैदा। ३ उदित, निकला हुआ। ३ विगत, गया हुआ। ४ त्यक्ता, फेंका हुआ।}}
{{Outdent|उद्गतशृङ्ग (सं॰ त्रि॰) नूतन शृङ्गयुक्त, निकलते सींगोवाला।}}
{{Outdent|उद्गता (सं॰ स्त्री॰) विषमवृत्तिछन्दका एक भेद। इसमें चार पाद पड़ते हैं। पहले तीनमें दश दश और पिछले चौथे पादमें तेरह अक्षर लगते हैं।}}
{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“सजसादिमे सलघुकौ च नसजगुरुकैऽरथोद्गता।
त्र्याङ्धिगतभनजलगा युताः सजसा जगौ च चरणमेकतः पठेत्॥”</poem>}}}}
{{right|<small>(वृत्तरत्राकर)</small>}}
{{Outdent|उद्गतासु (सं॰ त्रि॰) मृत, मुर्दा, मरा हुआ।}}
{{Outdent|उद्गति (सं॰ स्त्री॰) उत-गम-क्तिन्। १ ऊर्ध्व गति, चढ़ाव। २ उदय, निकास । ३ उत्पत्ति, उपज।}}
{{Outdent|उदगन्धि (सं॰ त्रि॰) उत्कृष्ट गन्धयुक्त, खु़शबूदार ।}}
{{Outdent|उद्गम (सं॰ पु॰) १ उत्थान, उठान। २ उत्पत्ति, पैदायश। ३ उदय, निकास। ४ ऊर्ध्वगति, चढ़ाई। ५ वान्ति, कै़, उलटी।}}
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{{Outdent|उदेजय (सं॰ त्रि॰) उत्-एज-णिच-खश्। १ उद्वेग कारक, घबरा देनेवाला। २ भयप्रद, खौ़फ़नाक। ३ उत्कम्पजनक, कंपा देनेवाला।}}
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:उनके १०५०० रु॰ अंगरेज सरकारको देने पर राजी होनेसे गायकवाड़ने यह राज्य अंगरेजोंके अधीन बनाया। राजाको बदलेमें सम्मानार्थ सरोपा और गायकवाड़के ग्रामोंसे कुछ रुपया मिला करता है।
{{Outdent|उदै (हि॰) <small>उदय देखो।</small>}}
{{Outdent|उदो (हिं॰) <small>उदय देखो।</small>}}
{{Outdent|उदोजस् (वै॰ त्रि॰) अतिशय प्रचण्ड, निहायत ताकतवर।}}
{{Outdent|उदोत (हिं॰) <small>उद्योत देखो।</small>}}
{{Outdent|उदोतकर (हिं॰ त्रि॰) प्रकाशक, रौशनी बख़्शनेवाला।}}
{{Outdent|उदोती, <small>उद्योतकर देखो।</small>}}
{{Outdent|उदौ (हि॰)}}
{{Outdent|उदौदन (सं॰ पु॰) जलसे सिद्ध अन्न, पानीमें पकाया हुआ चावल।}}
{{Outdent|उद्गत (सं॰ त्रि॰) उत्-गम-क्त। १ उस्थित, उठा हुआ। २ उत्पन्न, पैदा। ३ उदित, निकला हुआ। ३ विगत, गया हुआ। ४ त्यक्ता, फेंका हुआ।}}
{{Outdent|उद्गतशृङ्ग (सं॰ त्रि॰) नूतन शृङ्गयुक्त, निकलते सींगोवाला।}}
{{Outdent|उद्गता (सं॰ स्त्री॰) विषमवृत्तिछन्दका एक भेद। इसमें चार पाद पड़ते हैं। पहले तीनमें दश दश और पिछले चौथे पादमें तेरह अक्षर लगते हैं।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२५६
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उद्गाढ़-उद्ग्राम'''|'''२५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उद्गाढ़ (सं॰ त्रि॰) अतिशय अधिक, बहुत ज्यादा।। होते हैं-१ प्रस्ताव, २ उद्गीथ, ३ प्रतिहार, ४ उपद्रव,
उद्गाता, उगाट देखो।
५ निधन, ६ हिङ्कार और ७ प्रणव। उद्गाता जो
उद्गातुकाम (सं॰ त्रि॰) गान करनेको अभिलाषी, साम गाता, वही उद्गीथ कहाता है। साम देखो।
जो गाना चाहता हो।
वर्षाकालको उहीथ गाया जाता है। उपनिषत्के
उगाट (सं॰ पु॰) उत्-गै-टच् । १ सामवेद मतसे पशु में अश्व, पञ्चप्राणमें चक्षु और सप्तविध वाक्यमें
गायक। २ ऋविग्भेद।
उद्धृत शब्द हो उद्गीथ है। छान्दोगाके कथनानुसार-
उद्गाथा ( सं॰ स्त्री॰) आर्याछन्दोभेद । यह “उहीथ ही साम है। जो उहीथ (ॐ) गाता, उसका
गौति सदृश रहती और अपने चार पादमें क्रमशः निश्वास-प्रश्वास नहीं पाता-जाता। ‘उत्’ प्राण है।
बारह तथा अट्ठारह मात्रा रखती है।
क्योंकि इसी प्राणवायुसे लोग ऊपर चढ़ते हैं। ‘गो’
उद्गार (सं॰ पु॰) उत्-ग-धज। उन्नयोग:। पा वाक् और ‘थ’ अन्न है। कारण अन्य हारा सकलको
शश६ । १ वमन, के, उलटी। २ मुखसे वायुका स्थिति होती है। ‘उत्’ स्वर्ग, ‘गो’ आकाश और ‘घ’
निर्गम, डकार। ३ निःसरण, टपकाव, चुवाव । पृथिवी है। ‘उत्’ सूर्य, ‘गौं’ वायु और ‘थ’ अग्नि
४ उच्चारण, कहाई। ५ निष्ठीवन, थूक । ६ प्राधिक्य, है। ‘उत्’ सामवेद ‘गो’ यजुर्वेद और ‘थ’ ऋग्वेद
बढ़ती। ८ गर्जन, फुफकार।
है। लोगोंको उद्गीथका ध्यान करना चाहिये ।”
उद्गारकमणि (सं॰ पु॰) प्रबाल, मूंगा। (छान्दोग्वउ॰ १ प्र॰ ३ स्व॰) २ सामवेद का द्वितीय अंश ।
उद्गारशुद्धि (सं॰ स्त्री॰) उद्गारका अनवरोध, | ३ ओङ्कार। ४ भवपुत्र। (विष्णुपुराण २१०३८) ५ वेदके
सधम अम्लोहारका भाव।
एक टीकाकार।
उद्गारशोधन (सं॰ पु॰) उद्गारं शोधयति, शुध-णिच्- | उदगीरण, उगिरण देखो।
ल्य । श्वेतजीरक, कृष्णजीरक, काला या सफेद जीरा। उदगीण (सं॰ त्रि॰) उत्-ग-उ। १ वमित, के
उद्गारशोधनी (सं॰ स्त्री॰) जीरक, जीरा। किया हुआ। २ उच्चारित, कहा हुआ। ३ उदगत,
उद्गारिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-ग-णिनि । उद्गार-
उत-ग-णिनि । उद्गार- उठा हुआ। ४ अनुरन्जित, खश किया हुपा ।
युक्त, उगलनेवाला।
५ निगेंत, निकला हुआ। ६ प्रतिविम्बित, झलका
उदगिरण ( सं॰ क्ली॰) उत्-गृ-ल्य ट। निपात- | हुआ।
नात् इत्वम्। १ उद्गार, डकार। २ वमन, के, उद्गूर्ण (सं॰ त्रि॰) उत्-गूर्त । उत्तोलित,
उलटौ। ३ कण्ठखरभेद, गलेको घरघराघट। | उछाला हुआ। २ उद्यत, मुस्तै द, तैयार।
उद्गीत ( सं॰ त्रि॰) उत्-गै-क्त । उच्चैःस्वरमें उग्ग्रथित (सं॰ त्रि॰) उत्-ग्रन्थ-क्त । १ उपरि भागमें
गौत, बुलन्द आवाजसे गाया हुआ।
वड, ऊपरी हिस्से पर बंधा हुआ। २ मुक्त,खुला हुआ।
उदगीति (सं॰ स्त्री॰) उत-गै भावे तिन । १ उच्चः | उग्रन्थ (सं॰ त्रि॰) उन्म क्त, खुला हुआ। (पु॰)
स्वरसे गान, ऊंची आवाजका गाना। कर्मणि क्तिन् । उत्-ग्रन्थ-घञ् । २ उन्मोचन, छोड़ाई। ३ अध्याय,
२मात्रावृत्त भेद। इसके प्रथम एवंटतीयमें पन्द्रह, । भाग, बाब, हिस्सा।
द्वितीयमें बारह और चतुर्थ पादमें अट्ठारह मात्रा | उद्ग्रभण (वै॰ क्ली॰) उत्-ग्रह-ल्य ट् वेदे हस्य भः ।
लगती हैं।
१ग्रहण, पकड़, ऊपर पकड़के दान । (काल्या॰ श्री॰ १५।५।११)
“पाशिकलहितय' व्यात्ययरचितं भवेद्यस्याः ।
उद्ग्रह (सं॰ पु॰) १ जव ग्रहण, उठाव । २ धर्म
सोहीतिः किल गदिता तइत्यत्य शभेदसंयुक्ता ॥” (वृत्तरत्नाकर)| द्वारा किया जानेवाला काय।।
उद्गीथ (सं॰ पु॰) उत्-गै-थक् । गोदि । उण २।१०। । उद्ग्रहण (सं॰ क्ली॰) ऊर्ध्व ग्रहण, उठाव, चढ़ाव ।
१ सामगानका अवयवभेद । सामके पञ्च वा सप्त अवयव | उग्राम (वै॰ पु॰) उत्-ग्रह-घञ् । वैदे हस्य
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उद्गाढ़-उद्ग्राम'''|'''२५५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उद्गाढ़ (सं॰ त्रि॰) अतिशय अधिक, बहुत ज्यादा।।
उद्गाता, उगाट देखो।
उद्गातुकाम (सं॰ त्रि॰) गान करनेको अभिलाषी,
जो गाना चाहता हो।
उगाट (सं॰ पु॰) उत्-गै-टच् । १ सामवेद
गायक। २ ऋविग्भेद।
उद्गाथा ( सं॰ स्त्री॰) आर्याछन्दोभेद । यह “
गौति सदृश रहती और अपने चार पादमें क्रमशः
बारह तथा अट्ठारह मात्रा रखती है।
उद्गार (सं॰ पु॰) उत्-ग-धज। उन्नयोग:। पा
शश६ । १ वमन, के, उलटी। २ मुखसे वायुका
निर्गम, डकार। ३ निःसरण, टपकाव, चुवाव ।
४ उच्चारण, कहाई। ५ निष्ठीवन, थूक । ६ प्राधिक्य,
बढ़ती। ८ गर्जन, फुफकार।
उद्गारकमणि (सं॰ पु॰) प्रबाल, मूंगा।
उद्गारशुद्धि (सं॰ स्त्री॰) उद्गारका अनवरोध, |
सधम अम्लोहारका भाव।
उद्गारशोधन (सं॰ पु॰) उद्गारं शोधयति, शुध-णिच्- | उदगीरण, उगिरण देखो।
ल्य । श्वेतजीरक, कृष्णजीरक, काला या सफेद जीरा। उदगीण (सं॰ त्रि॰) उत्-ग-उ। १ वमित, के
उद्गारशोधनी (सं॰ स्त्री॰) जीरक, जीरा। किया हुआ। २ उच्चारित, कहा हुआ। ३ उदगत,
उद्गारिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-ग-णिनि । उद्गार-
उत-ग-णिनि । उद्गार- उठा हुआ। ४ अनुरन्जित, खश किया हुपा ।
युक्त, उगलनेवाला।
५ निगेंत, निकला हुआ। ६ प्रतिविम्बित, झलका
उदगिरण ( सं॰ क्ली॰) उत्-गृ-ल्य ट। निपात- | हुआ।
नात् इत्वम्। १ उद्गार, डकार। २ वमन, के, उद्गूर्ण (सं॰ त्रि॰) उत्-गूर्त । उत्तोलित,
उलटौ। ३ कण्ठखरभेद, गलेको घरघराघट। | उछाला हुआ। २ उद्यत, मुस्तै द, तैयार।
उद्गीत ( सं॰ त्रि॰) उत्-गै-क्त । उच्चैःस्वरमें उग्ग्रथित (सं॰ त्रि॰) उत्-ग्रन्थ-क्त । १ उपरि भागमें
गौत, बुलन्द आवाजसे गाया हुआ।
वड, ऊपरी हिस्से पर बंधा हुआ। २ मुक्त,खुला हुआ।
उदगीति (सं॰ स्त्री॰) उत-गै भावे तिन । १ उच्चः | उग्रन्थ (सं॰ त्रि॰) उन्म क्त, खुला हुआ। (पु॰)
स्वरसे गान, ऊंची आवाजका गाना। कर्मणि क्तिन् । उत्-ग्रन्थ-घञ् । २ उन्मोचन, छोड़ाई। ३ अध्याय,
२मात्रावृत्त भेद। इसके प्रथम एवंटतीयमें पन्द्रह, । भाग, बाब, हिस्सा।
द्वितीयमें बारह और चतुर्थ पादमें अट्ठारह मात्रा | उद्ग्रभण (वै॰ क्ली॰) उत्-ग्रह-ल्य ट् वेदे हस्य भः ।
लगती हैं।
१ग्रहण, पकड़, ऊपर पकड़के दान । (काल्या॰ श्री॰ १५।५।११)
“पाशिकलहितय' व्यात्ययरचितं भवेद्यस्याः ।
उद्ग्रह (सं॰ पु॰) १ जव ग्रहण, उठाव । २ धर्म
सोहीतिः किल गदिता तइत्यत्य शभेदसंयुक्ता ॥” (वृत्तरत्नाकर)| द्वारा किया जानेवाला काय।।
उद्गीथ (सं॰ पु॰) उत्-गै-थक् । गोदि । उण २।१०। । उद्ग्रहण (सं॰ क्ली॰) ऊर्ध्व ग्रहण, उठाव, चढ़ाव ।
१ सामगानका अवयवभेद । सामके पञ्च वा सप्त अवयव | उग्राम (वै॰ पु॰) उत्-ग्रह-घञ् । वैदे हस्य
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:होते हैं――१ प्रस्ताव, २ उद्गीथ, ३ प्रतिहार, ४ उपद्रव, ५ निधन, ६ हिङ्कार और ७ प्रणव। उद्गाता जो साम गाता, वही उद्गीथ कहाता है। <small>साम देखो।</small> वर्षाकालको उद्गीथ गाया जाता है। उपनिषत्के मतसे पशु में अश्व, पञ्चप्राणमें चक्षु और सप्तविध वाक्यमें उद्भूत शब्द ही उद्गीथ है। छान्दोग्यके कथनानुसार――“उद्गीथ ही साम है। जो उद्गीथ (ॐ) गाता, उसका निश्वास-प्रश्वास नहीं आता-जाता। ‘उत्’ प्राण है। क्योंकि इसी प्राणवायुसे लोग ऊपर चढ़ते हैं। ‘गी’ वाक् और ‘थ’ अन्न है। कारण अन्य द्वारा सकलकी स्थिति होती है। ‘उत्’ स्वर्ग, ‘गो’ आकाश और ‘थ’ पृथिवी है। ‘उत्’ सूर्य, ‘गौं’ वायु और ‘थ’ अग्नि है। ‘उत्’ सामवेद ‘गी’ यजुर्वेद और ‘थ’ ऋग्वेद है। लोगोंको उद्गीथका ध्यान करना चाहिये।” (छान्दोग्वउ॰ १ प्र॰ ३ ख॰) २ सामवेद का द्वितीय अंश। ३ ओङ्कार। ४ भवपुत्र। (विष्णुपुराण २।१।३८) ५ वेदके एक टीकाकार।
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{{Outdent|उद्गातृ (सं॰ पु॰) उत्-गै-तृच्। १ सामवेद गायक। २ ऋविग्भेद।}}
{{Outdent|उद्गाथा (सं॰ स्त्री॰) आर्याछन्दोभेद। यह गीति सदृश रहती और अपने चार पादमें क्रमशः बारह तथा अट्ठारह मात्रा रखती है।}}
{{Outdent|उद्गार (सं॰ पु॰) उत्-गृ-घञ्। <small>उन्न्योर्ग्र:। पा ३।३।२९।</small> १ वमन, कौ, उलटी। २ मुखसे वायुका निर्गम, डकार। ३ निःसरण, टपकाव, चुवाव। ४ उच्चारण, कहाई। ५ निष्ठीवन, थूक। ६ आधिक्य, बढ़ती। ९ गर्जन, फुफकार।}}
{{Outdent|उद्गारकमणि (सं॰ पु॰) प्रबाल, मूंगा।}}
{{Outdent|उद्गारशुद्धि (सं॰ स्त्री॰) उद्गारका अनवरोध, सधम अम्लोद्गारका भाव।}}
{{Outdent|उद्गारशोधन (सं॰ पु॰) उद्गारं शोधयति, शुध-णिच्-ल्यु । श्वेतजीरक, कृष्णजीरक, काला या सफेद जीरा।}}
{{Outdent|उद्गारशोधनी (सं॰ स्त्री॰) जीरक, जीरा।}}
{{Outdent|उद्गारिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-गृ-णिनि। उद्गार-युक्त, उगलनेवाला।}}
{{Outdent|उद्गिरण (सं॰ क्ली॰) उत्-गृ-ल्युट्। निपात-नात् इत्वम्। १ उद्गार, डकार। २ वमन, कौ, उलटी। ३ कण्ठखरभेद, गलेको घरघराघट।}}
{{Outdent|उद्गीत (सं॰ त्रि॰) उत्-गै-क्त। उच्चैःस्वरमें गीत, बुलन्द आवाज़से गाया हुआ।}}
{{Outdent|उद्गीति (सं॰ स्त्री॰) उत्-गै भावे क्तिन। १ उच्चैः स्वरसे गान, ऊंची आवाज़का गाना। कर्मणि क्तिन्। २ मात्रावृत्त भेद। इसके प्रथम तृतीयमें पन्द्रह, द्वितीयमें बारह और चतुर्थ पादमें अट्ठारह मात्रा लगती हैं।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“आर्याशकलहितयं व्यात्ययरचितं भवेद्यस्याः।
सोद्गीतिः किल गदिता तद्दत्यत्यं शभेदसंयुक्ता॥” (वृत्तरत्नाकर) </poem>}}}}
{{Outdent|उद्गीथ (सं॰ पु॰) उत्-गै-थक्। <small>गोश्चोदि। उण् २।१०।</small> १ सामगानका अवयवभेद। सामके पञ्च वा सप्त अवयव}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:होते हैं――१ प्रस्ताव, २ उद्गीथ, ३ प्रतिहार, ४ उपद्रव, ५ निधन, ६ हिङ्कार और ७ प्रणव। उद्गाता जो साम गाता, वही उद्गीथ कहाता है। <small>साम देखो।</small> वर्षाकालको उद्गीथ गाया जाता है। उपनिषत्के मतसे पशु में अश्व, पञ्चप्राणमें चक्षु और सप्तविध वाक्यमें उद्भूत शब्द ही उद्गीथ है। छान्दोग्यके कथनानुसार――“उद्गीथ ही साम है। जो उद्गीथ (ॐ) गाता, उसका निश्वास-प्रश्वास नहीं आता-जाता। ‘उत्’ प्राण है। क्योंकि इसी प्राणवायुसे लोग ऊपर चढ़ते हैं। ‘गी’ वाक् और ‘थ’ अन्न है। कारण अन्य द्वारा सकलकी स्थिति होती है। ‘उत्’ स्वर्ग, ‘गो’ आकाश और ‘थ’ पृथिवी है। ‘उत्’ सूर्य, ‘गौं’ वायु और ‘थ’ अग्नि है। ‘उत्’ सामवेद ‘गी’ यजुर्वेद और ‘थ’ ऋग्वेद है। लोगोंको उद्गीथका ध्यान करना चाहिये।” (छान्दोग्वउ॰ १ प्र॰ ३ ख॰) २ सामवेद का द्वितीय अंश। ३ ओङ्कार। ४ भवपुत्र। (विष्णुपुराण २।१।३८) ५ वेदके एक टीकाकार।
{{Outdent|उदगीरण, <small>उद्गिरण देखो।</small>}}
{{Outdent|उद्गीर्ण (सं॰ त्रि॰) उत्-गँ-उ। १ वमित, के किया हुआ। २ उच्चारित, कहा हुआ। ३ उदगत, उठा हुआ। ४ अनुरञ्जित, खु़श किया हुआ। ५ निगेंत, निकला हुआ। ६ प्रतिविम्बित, झलका हुआ।}}
{{Outdent|उद्गूर्ण (सं॰ त्रि॰) उत्-गूर्-क्त। उत्तोलित, उछाला हुआ। २ उद्यत, मुस्तैद, तैयार।}}
{{Outdent|उग्ग्रथित (सं॰ त्रि॰) उत्-ग्रन्थ-क्त। १ उपरि भागमें वद्ध, ऊपरी हिस्से पर बंधा हुआ। २ मुक्त,खुला हुआ।}}
{{Outdent|उग्रन्थ (सं॰ त्रि॰) उन्म क्त, खुला हुआ। (पु॰) उत्-ग्रन्थ-घञ्। २ उन्मोचन, छोड़ाई। ३ अध्याय, भाग, बाब, हिस्सा।}}
{{Outdent|उद्ग्रभण (वै॰ क्ली॰) उत्-ग्रह-ल्युट् वेदे हस्य भः। १ ग्रहण, पकड़, ऊपर पकड़के दान। <small>(काल्या॰ श्रौ॰ १५।५।११)</small>}}
{{Outdent|उद्ग्रह (सं॰ पु॰) १ ऊर्ध्व ग्रहण, उठाव। २ धर्म द्वारा किया जानेवाला कार्य।}}
{{Outdent|उद्ग्रहण (सं॰ क्ली॰) ऊर्ध्व ग्रहण, उठाव, चढ़ाव।}}
{{Outdent|उद्ग्राभ (वै॰ पु॰) उत्-ग्रह-घञ्। वेदे हस्य}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५६'''|'''उद्ग्राह-उद्घाटिन्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
भः । १ ग्रहण, पकड़ । २ तत्निबन्ध, पकड़की, उद्घर्षण (सं० लो०) उत्-घृष-लुषट् । १ उपरि
बन्दिश। ३ दान, बख शिश। .
घर्षण, रगड। २ इष्टकादि द्वारा गानादि मार्जन,
“वाजस्य माप्रसव उदग्राभेगोग्रभीत्।" (वाजसनेयस० १३३८)ईट या पत्थरसे जिस्म की रगड़ाई। ३ लगुड़, लठ।
"उद्गार्भय अध्व' विग्रह्य दीयते उदगाभणं दानम् ।' (महौधर) | "सिरामुखविविक्तत्व त्वस्थस्याग्नेच तेजनम् ।
उदग्राह (सं० पु०) उत्-ग्रह-घञ् । १ दान, उघर्षणोत्सादनाभ्यां जायेयातामस'श्रयम् ॥” (सुश्रु त )
बखुशिश। २ वामभेद, विद्या विचार। यह प्राति- उद्ध्वस ( स० लो०) उत्-अद-अप घसादेशः।
शाख्यकी सन्धिका एक नियम है। इससे विसर्ग, १ मांस, गोश्त। २ भक्ष्यवस्तु, खाने लायक चीज़
इकार और ओकारके स्थानमें वर मागे रहनेपर | उद्घाट (स० पु.) उत्-घट-घञ्। १ उद्घाटन,
प्रकार आदेश होता है। ३तर्क का उत्तर, बहसका खोलाई। २पण्यादि द्रव्य देखानेको खोलने का
जवाब । ४.आपत्ति, उज्ज। ५ उदगार, डकार। | स्थान, बेचनेकी चीज़ खोलकर देखानेको जगह ।
उदग्राहणिका (सं० स्त्री०) तर्कका उत्तर, बहसका | ३ राजस्वके ग्रहणका स्थान, चुङ्गोघर। ४ हनन,
जवाब ।
मारकाट । ५ क्षत, जख्म । ६ स्खलन, सरकाव ।
उदग्राहिणी (सं. स्त्री०) उत्-ग्रह-णिनि-डौ। ७ उन्नति, उठान । ८ आरम्भ, शुरू। ८ प्राणायाम ।
पाशरज्ज, जालको रस्सी।
१० गदा, सोंटा। ११ अध्याय, बाब। १२ प्रहरी
उग्राहित (सं० त्रि०) उत्-ग्रह-णिच्-क्त। उपरि | रहनेका स्थान, चौकी।
नौत, चढाया हुआ। २ बद्ध, बांधा हुआ। ३ उदोण, | उद्घाटक (स० पु. लो०) उत्-घट-णिच्-खुल
निकाला हुआ। ४ अन्तःकरणसे अर्पित, सौंपा १ घटीयन्त्र, लोटाडोर । २ कुञ्चिका, चाबी।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
हुआ। ५ आक्रान्त, सताया हुआ। ६ उन्नमित, | ३ उन्मोचनकारी, खोलनेवाला।
उचकाया हुआ। ७ ग्राहित, पकड़ा हुआ। ८ स्मरण | उद्घाटन ( स० लो० ) उत्-घट भावे ल्युट !
किया हुआ, जो सोचा गया हो।
१ उन्मोचनकारी, खोलनेवाला।
उदग्रोव (सं० वि०) ग्रीवाको उठानेवाला, जो | उद्घाटन (सं० क्लो) उत्-घट भावे ल्यु ट । १ उन्मो-
गर्दन ऊंचौ करता हो।
चन, खोलाई । २ उल्लेख, लिखाई। ३ प्रकाशकरण,
उग्रीविन्, उदुगौव देखो।
जाहिर करनेका काम। .४ घटीयन्त्र, लोटाडोर।
उद्घ (सं० पु०) उत्-इन-ड। १ अग्नि, आग। ५ कुच्चिका, चाबी। ६ उन्मोचनकारी, खोलने-
२ प्रशंसा, तारीफ़। ३ देहवायु, जिस्मको हवा। ४ कर- वाला।
पुट, अंजुरी। ५ उत्कर्ष, उम्दगी। ६ आदर्श, | उद्घाटनीय (सं० त्रि०) उन्मोचनयोग्य, खोला
नमूना।
जानेवाला।
उबट (स' लो०) वार्ताकुपुष्प, भाटेका फल ।
उपटक (सं० पु०) उद्दट्ट-कन्। ताल।
शित, जाहिर, खुला हुआ। २ कृतारम्भ, शुरू किया
उबट्टन (सं० लौ०) उत्-घट्ट-ल्य ट्। १ आघात, हुआ। ३ उत्तोलित, उठाया हुआ। ४ कृतोद्योग,
रगड़। २ उन्मोचन, खोलाव।
कोशिशके साथ किया हुआ।
उदहित (सं०वि०) उन्मुक्ता, खुला हुआ। उद्घाटितज्ञ (सं० त्रि.) चतुर, होशियार।
उधन (स• पु०) अवस्थाप्य हन्यतेऽत्र, उत्-हन | उद्घाटिताङ्ग (सं० त्रि.) १ नग्न, नङ्गा । २ चतुर,
आधार अप् निपातनात्। काष्ठमय आधार, लक होशियार।
डोका तख ता। तक्षक इसी आधार पर काष्ठको | उद्घाटिन् (सं० त्रि०) उन्मोचनकारी, खोलने या
रख परिष्कार करता है।
। शुरू करनेवाला। .
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उद्घात-उद्दिन'''|'''२५७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उद्घात (सं० पु.) उत्-इन-घ । १ प्रतिघात, | उद्दानक (सं• पु०) १ शिरीषच, कलसीसका पेड़ ।
ठोकर । २ वाधा, बाफत । ३ प्रारम्भ, शुरू। ४ पाद-
सूखलन, पैरको फिसलाइट। ५ कुम्भक। सूचना, उद्दान्त (सं.वि.) उत्-दम-क्त । अतिदमित, शान्त,
दोबाचा। ७ मुदगर। ८ अरघट्ट, कुवेंसे पानी ठण्डा, जो बहुत दवा हो।
निकालनेको कल। निदर्शन, देखाव।
उद्दाम (सं.वि.) उदगतं दामः। १ उच्छकुल,
उदघातक (सं०नि०) १ प्रतिघात लगानेवाला, जो खुला हुमा। २ खतन्त्र, आजाद । ३ उत्कट, गुस्ताख ।
ठोकर मारता हो। (पु०) २ नाटककी एक प्रस्ता ४ असीम, बेहद। ५ दीर्घ, बड़ा। (पु०) ६ यम ।
वना। इसमें कोई पात्र सूत्रधार वा नटीका कथन ७ वरुण। (पव्य.)८ उच्छकल रूपसे, खुले मैदान ।
श्रवण कर अन्य पथ जोड़ता है।
| उद्दामन् (सं० त्रि०) उत्-दामन् बन्धनम् । १ बन्धन-
उदराती (सं० त्रि०) १ प्रतिघात करनेवाला, जो रहित, खुला। २ उत्कट, झगड़ाल। ३ अतिशय,
ठोकर लगाता हो। २ उच्चनीच, चढ़ा-उतार। बहुत, ज्यादा।
उदघष्ट (सं० त्रि.) १ शब्दायमान, पुरशोर। २ उद्दारदा (सं० स्त्री०) शाकतरु, साखका पेड़।
विघोषित, कहा हुआ। (लौ०) ३ शब्द, भावाज। उद्दारा (सं० स्त्रो०)।
उद्घष्ट (सं.लो.) उच्चारणका दोषविशेष, तलफ-उद्दारी, उद्दारा देखो।
फुजका एक ऐब।
उहाल (स० पु०) उत्-दल-णिच्-अच् । १ बहुवार-
उद्घोष (स.पु.) उत्-घुष-धज । १ उच्च शब्दकरण, वृक्ष, लसोड़ेका पेड़। २ वनकोद्रव, कोदो। ३ कुष्ठ,
बुलन्द आवाजमें कहनेकौ बात। २ साधारण कथन, केज। ४ धान्यविशेष, एक अनाज।
मामूली बात।
उद्दालक (स.पु.) १ षिविशेष । इनके पुत्रका
उहंश (सं० पु०) उत्-दन्श-अच्। १ मशक, मच्छड़।। नाम खेतकेतु था। उद्दालक यान्नवल्काके गुरु रहे।
२ मत्कुण, खट्मल। ३ केशकीट, जं।
भारुषि देखो। २ बहुवार वृक्ष, लसोड़ेका पेड़।
उहण्ड (सं० त्रि.) १ प्रचण्ड, बखेड़िया । २ उव्रत-! ३आरण्यकोद्रव, कोदो।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
टण्डयन, ऊंची डालवाला। ३ दण्डोपरि उत्तोलित, उद्दालकपुष्यभञ्चिका (सं० स्त्री०) क्रीडाविशेष, एक
बांसपर चढ़ाया हुआ। (पु.) ४ उन्नत दण्ड, खेल । यह 'आती मार छाती की तरह खेला जाता है।
जंचा सोटा।
उहालकव्रत (सं० लो०) व्रतविशेष । षोड़श वत्सरके
उद्दण्डपाल (सं० पु.) १ उन्नत दण्डाकार सर्पविशेष, वयस पर्यन्त गायत्रीकी दीक्षा न मिलनेसे द्विजातिको
ऊ'चे डण्डे-जैसा एक सांप। २ मत्स्यविशेष, एक यह व्रत करना पड़ता है। दो मास यव, एकमास
मछली। ३ दण्ड देनेवाला राजा वा शासनाधिकारी, दधि, टुग्ध तथा शर्कराका शर्बत, श्रष्ट रात्रि घृत,
जोहाकिम सजा देता हो।
षड राति अयाचित रूपसे प्राप्त द्रव्य, विरात्रि केवल
उहन्तर (सं० त्रि.) अतिशयेन दन्तुरः। १ उत्तुङ्ग, जल और एक दिन उपवास पर निर्वाह करते हैं।
ऊंचा। २ कराल, खौफनाक। ३ उत्कटदन्त, बड़े उद्दालकायन (सं० पु०) उद्दालकस्य गोत्रापत्यम्,
दांतोंवाला।
फक् । ऋषिभेद, खेतकेतु ।
उहम ( स० पु०) वशीकरण, दमन, मगलबी, दबाव। उहित (सं• त्रि.) उत्-दो-त। बद्द, बंधा हुपा।
उहान (सं० ली.) उत्-दो भाव ल्युट । १ बन्धन, (हिं०) उद्यत, उदित पौर उद्दत देखो।
बंधाई। २ उद्यम, कोशिश। ३ चुलो, चलहा। उद्दिधौर्षा (सं० स्त्री०) खानान्तरित करने की इच्छा,
४ बड़वाग्नि, दरयाकै भौतरको आग। ५मध्य, दर-| हटा देनेको खाहिश ।
मियान्। ६ लग्न। ७पालन, पलाई।
| उद्दिन (सं.ली.) मध्याकाल, दोपहर ।
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. |65}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२५८'''|'''उद्दिम-उद्धोतकृत्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उद्दिम (हिं॰) <small>उद्यम देखो।</small>}}
{{Outdent|उद्दिश् (सं॰ स्त्री॰) दिक्विशेष।}}
{{Outdent|उद्दिश्य (संं॰ अव्य॰) १ प्रकाश वा वर्णन करके, देखाकर। २ निर्देश करके, मांगकर। ३ प्रति, तर्फ़।}}
{{Outdent|उद्दिष्ट (सं॰ त्रि॰) उत्-दिश-क्त। १ उपदिष्ट, समझाया हुआ। २ अभिप्रेत,देखाया हुआ। ३ कृतानु-सन्धान, ढूंढ़ा हुआ। (पु॰) ४ बदरवृक्ष, बेरका पेड़। ५ उपायभेद, छन्दके मात्रा-प्रस्तारवाले भेदका वर्णन।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“उद्दिष्ट द्विगुणानाद्यदुपर्यङ्कान् समालिखेत्।
लघुस्था ये तु तश्चाङ्कास्तै सै कैर्मिश्रितर्भवेत्॥” (वृत्तरत्राकर)</poem>}}}}
{{Outdent|उद्दीप (सं॰ पु॰) १ प्रकाशन, चमकाहट। २ प्रकाशक, चमकानेवाला। ३ प्रोत्साहन, हौसला बढ़ानेका काम। (क्ली॰) ४ गुग्गुलु, गूगुर।}}
{{Outdent|उद्दीपक ( सं॰ त्रि॰) उत्-दीप-णिच्-ख ल । १ उद्भा-
'भक, रौशनी देनेवाला । २ उत्तेजक, हौसला
बढ़ानेवाला।
{{Outdent|उद्दीपन ( सं॰ क्ली॰) उत्-दीप-णिच्-त्युट । १ प्रकाश,
रौशनी। २ उत्तेजन, भड़काव। ३ वर्धितकरण,
बढ़ावा। ४ कामक्रोधादि-प्रबल करनेका काम,
वाहिश गुस्सा वगेरहका उभाड़ना। ५ अलङ्कारोक्त
विभाव विशेष, शृङ्गार रसको बढानेवाली चीज ।
"रत्याद्युबोधका लोके विभावा: काव्यनाट्ययोः ।
बालम्बनोद्दीपनाख्यौ तस्य भेदावुभौ म तौ ॥
आलम्बनस्य चेष्टाद्या देशकालादयस्तथा।" (साहित्यदर्पण)
{{Outdent|उद्दीपमान (सं॰ त्रि॰) प्रकाशमान, चमकनेवाला..
जो रौशन हो।
{{Outdent|उद्दीप्त (सं॰ त्रि॰) उत्-दीप-त । १ प्रकाशान्वित,राशन।
२ प्रज्वलित, जलनेवाला। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ। ।
उद्दीप्र (सं॰ पु॰) उत्-दीप-रण। १ गुग्गुलु, गूगुर।
(त्रि॰) २ उद्दीप्त, चमकता हुआ।
{{Outdent|उद्दत (सं॰ त्रि॰) उत्-ट्टप-ती। उद्दत, गुस्ताख,
घमण्डौ।
{{Outdent|उद्देश (सं॰ पु॰) उत्-दिश-घञ्। १ अनुसन्धान, '
खोज। २ लक्ष्य, इशारा। ३ अभिलाष, खाहिश ।। |
४ उपदेश, नसीहत । ५ वार्ता, बातचीत। ६ उल्लेख,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:लिखाई। ७ नामकथन, इस्म बतानेका काम। ८ प्रदेश, मुल्क। <small>“उद्दे शमनतिक्रम्य यथोद्दे शम्। उद्वेश उपदेश-देश:। अधिकरण साधनश्चायम्। यत्र देशे उपदिश्यते तद्देशः।” (नागेश)</small> ९ संक्षेप, मुख़्तसर। १० तन्त्राधिकरणभेद। ११ उत्-कृष्ट देश, बढ़िया मुल्क। १२ गिरिगण्डकूप, पहाड़की चोटी। १३ उदाहरण, मिसाल।
{{Outdent|उद्देशक (सं॰ पु॰) उत्-दिश-ण्वुल्। १ उपदेशक, नसीहत देनेवाला। २ उदाहरणवाक्य, मिसालका जुमला। ३ ग्रच्छक, सवाल करनेवाला। <small>“उद्दे शकाला-पवदिष्ट राशि:।" (लीलावती)</small> ४ प्रश्न, सवाल। (त्रि॰) ५ दार्ष्टान्तिक, मिसाल देनेवाला, जो समझाता हो।}}
{{Outdent|उद्देशतः (सं॰ अव्य॰) वर्णन करके, मिसाल देकर।}}
{{Outdent|उद्देश्य, (सं॰ त्रि॰) उत्-दिश-स्थत्। १ लक्ष्य बताने का़बिल। २ अभिप्रेत, मतलबवाला। ३ अनुवाद्य, कह देने लायक़। (क्ली॰) ३ तात्पर्य, मतलब। विशेषण और विशेष्य के सम्बन्धको ‘उद्देश्य-विधेयभाव’ कहते हैं।}}
{{Outdent|उद्देश्यसिद्धि (सं॰ स्त्री॰) अभिप्रेत सिद्धि, मतलबकी कामयाबी।}}
{{Outdent|उद्देष्ट ( सं॰ त्रि॰) १ सङ्कत करनेवाला, जो इशारा देता हो। २ अभिप्रायसे कार्य करनेवाला जो मतलबसे चलता हो।}}
{{Outdent|उद्देहिक (संं॰ पु॰) १ विदेह देश, एक मुल्क।}}
{{Outdent|उद्देहिका (सं॰ स्त्री॰) १ उत्पादिका, पैदा करने वाली। २ कोट विशेष, दीमक।}}
{{Outdent| उद्दोत (हिं॰) <small>उद्द्योत देखो।</small>}}
{{Outdent|उद्द्योत (सं॰ पु॰) उत्-द्युत-घञ्, वा दलोपः। १ प्रकाश, रौशनी। २ उद्घाटन, खोलाई। (त्रि॰) ३ प्रकाशमान, चमकीला।}}
{{Outdent|उद्द्योतकर-मेघदूतकी टीकाके रचयिता। कल्याण-मल्लने इनका वचन उद्धृत किया है।}}
{{Outdent|उद्द्योतकराचार्य (सं॰ पु॰) भरद्वाजगोत्रके एक जन प्रसिद्ध नैयायिक। इनके बनाये ‘न्यायवार्तिक’ और ‘न्यायत्रिसूत्रिवार्तिक’ नामक दो ग्रन्थ विद्यमान हैं। वाचस्पतिमिश्रने ‘न्यायवार्तिक’ की टीका बनायी है।}} {{Outdent|उद्द्योतकृत्―― १ एक अलङ्कार ग्रन्थ-रचयिता। रत्न-}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५८'''|'''उद्दिम-उद्धोतकृत्'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उद्दिम (हिं॰) <small>उद्यम देखो।</small>}}
{{Outdent|उद्दिश् (सं॰ स्त्री॰) दिक्विशेष।}}
{{Outdent|उद्दिश्य (संं॰ अव्य॰) १ प्रकाश वा वर्णन करके, देखाकर। २ निर्देश करके, मांगकर। ३ प्रति, तर्फ़।}}
{{Outdent|उद्दिष्ट (सं॰ त्रि॰) उत्-दिश-क्त। १ उपदिष्ट, समझाया हुआ। २ अभिप्रेत,देखाया हुआ। ३ कृतानु-सन्धान, ढूंढ़ा हुआ। (पु॰) ४ बदरवृक्ष, बेरका पेड़। ५ उपायभेद, छन्दके मात्रा-प्रस्तारवाले भेदका वर्णन।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“उद्दिष्ट द्विगुणानाद्यदुपर्यङ्कान् समालिखेत्।
लघुस्था ये तु तश्चाङ्कास्तै सै कैर्मिश्रितर्भवेत्॥” (वृत्तरत्राकर)</poem>}}}}
{{Outdent|उद्दीप (सं॰ पु॰) १ प्रकाशन, चमकाहट। २ प्रकाशक, चमकानेवाला। ३ प्रोत्साहन, हौसला बढ़ानेका काम। (क्ली॰) ४ गुग्गुलु, गूगुर।}}
{{Outdent|उद्दीपक (सं॰ त्रि॰) उत्-दीप-णिच्-खु ल्। १ उद्भाभक, रौशनी देनेवाला। २ उत्तेजक, हौसला बढ़ानेवाला।}}
{{Outdent|उद्दीपन ( सं॰ क्ली॰) उत्-दीप-णिच्-ल्युट। १ प्रकाश, रौशनी। २ उत्तेजन, भड़काव। ३ वर्धितकरण, बढ़ावा। ४ कामक्रोधादि-प्रबल करनेका काम, खवाहिश गुस्सा वगैरहका उभाड़ना। ५ अलङ्कारोक्त
विभाव विशेष, शृङ्गार रसको बढानेवाली चीज।}}
{{c|{{x-smaller|<poem>“रत्याद्युबोधका लोके विभावा: काव्यनाट्ययोः।
आलम्बनोद्दीपनाख्यौ तस्य भेदावुभौ स्प्रृतौ॥
आलम्बनस्य चेष्टाद्या देशकालादयस्तथा।” (साहित्यदर्पण)</poem>}}}}
{{Outdent|उद्दीपमान (सं॰ त्रि॰) प्रकाशमान, चमकनेवाला, जो रौशन हो।}}
{{Outdent|उद्दीप्त (सं॰ त्रि॰) उत्-दीप-क्त। १ प्रकाशान्वित,राशन। २ प्रज्वलित, जलनेवाला। ३ वर्धित, बढ़ा हुआ।}}
{{Outdent|उद्दीप्र (सं॰ पु॰) उत्-दीप-रण्। १ गुग्गुलु, गूगुर। (त्रि॰) २ उद्दीप्त, चमकता हुआ।}}
{{Outdent|उद्दप्त (सं॰ त्रि॰) उत्-ट्टप-क्त। उद्धत, गुस्ताख, घमण्डी।}}
{{Outdent|उद्देश (सं॰ पु॰) उत्-दिश-घञ्। १ अनुसन्धान, खोज। २ लक्ष्य, इशारा। ३ अभिलाष, खाहिश। ४ उपदेश, नसीहत। ५ वार्ता, बातचीत। ६ उल्लेख,}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:लिखाई। ७ नामकथन, इस्म बतानेका काम। ८ प्रदेश, मुल्क। <small>“उद्दे शमनतिक्रम्य यथोद्दे शम्। उद्वेश उपदेश-देश:। अधिकरण साधनश्चायम्। यत्र देशे उपदिश्यते तद्देशः।” (नागेश)</small> ९ संक्षेप, मुख़्तसर। १० तन्त्राधिकरणभेद। ११ उत्-कृष्ट देश, बढ़िया मुल्क। १२ गिरिगण्डकूप, पहाड़की चोटी। १३ उदाहरण, मिसाल।
{{Outdent|उद्देशक (सं॰ पु॰) उत्-दिश-ण्वुल्। १ उपदेशक, नसीहत देनेवाला। २ उदाहरणवाक्य, मिसालका जुमला। ३ ग्रच्छक, सवाल करनेवाला। <small>“उद्दे शकाला-पवदिष्ट राशि:।" (लीलावती)</small> ४ प्रश्न, सवाल। (त्रि॰) ५ दार्ष्टान्तिक, मिसाल देनेवाला, जो समझाता हो।}}
{{Outdent|उद्देशतः (सं॰ अव्य॰) वर्णन करके, मिसाल देकर।}}
{{Outdent|उद्देश्य, (सं॰ त्रि॰) उत्-दिश-स्थत्। १ लक्ष्य बताने का़बिल। २ अभिप्रेत, मतलबवाला। ३ अनुवाद्य, कह देने लायक़। (क्ली॰) ३ तात्पर्य, मतलब। विशेषण और विशेष्य के सम्बन्धको ‘उद्देश्य-विधेयभाव’ कहते हैं।}}
{{Outdent|उद्देश्यसिद्धि (सं॰ स्त्री॰) अभिप्रेत सिद्धि, मतलबकी कामयाबी।}}
{{Outdent|उद्देष्ट ( सं॰ त्रि॰) १ सङ्कत करनेवाला, जो इशारा देता हो। २ अभिप्रायसे कार्य करनेवाला जो मतलबसे चलता हो।}}
{{Outdent|उद्देहिक (संं॰ पु॰) १ विदेह देश, एक मुल्क।}}
{{Outdent|उद्देहिका (सं॰ स्त्री॰) १ उत्पादिका, पैदा करने वाली। २ कोट विशेष, दीमक।}}
{{Outdent| उद्दोत (हिं॰) <small>उद्द्योत देखो।</small>}}
{{Outdent|उद्द्योत (सं॰ पु॰) उत्-द्युत-घञ्, वा दलोपः। १ प्रकाश, रौशनी। २ उद्घाटन, खोलाई। (त्रि॰) ३ प्रकाशमान, चमकीला।}}
{{Outdent|उद्द्योतकर-मेघदूतकी टीकाके रचयिता। कल्याण-मल्लने इनका वचन उद्धृत किया है।}}
{{Outdent|उद्द्योतकराचार्य (सं॰ पु॰) भरद्वाजगोत्रके एक जन प्रसिद्ध नैयायिक। इनके बनाये ‘न्यायवार्तिक’ और ‘न्यायत्रिसूत्रिवार्तिक’ नामक दो ग्रन्थ विद्यमान हैं। वाचस्पतिमिश्रने ‘न्यायवार्तिक’ की टीका बनायी है।}} {{Outdent|उद्द्योतकृत्―― १ एक अलङ्कार ग्रन्थ-रचयिता। रत्न-}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४४९
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४४८'''|'''ऋषी—ऋष्यमूक'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
स्तु-अप्। ऋषिगणका स्तुतिपात्र, जो ऋषियों द्वारा प्रशंसा किया गया हो।
{{outdent|ऋषी (सं॰ स्त्री॰) ऋषि-ङीप्। ऋषिपत्नी।}}
{{outdent|ऋषीक (सं॰ पु॰) १ ऋषिपुत्र। २ काशतृण, कास।}}
{{outdent|ऋषीतत (सं॰ त्रि॰) ऋषियों द्वारा प्रसिद्ध किया हुआ, जिसको ऋषियोंने मशहूर किया हो।}}
{{outdent|ऋषीवत् (सं॰ त्रि॰) ऋषिः स्तोतृत्वेन अस्यास्ति, ऋषि-मतुप्, मस्य वः दीर्घश्च। छन्दसीरः। पा ८।२।१५। १ ऋषिष्टुत, ऋषियों द्वारा प्रशंसा किया हुआ। २ ऋषिस्तोता, ऋषियोंकी प्रशंसा करनेवाला।}}
{{outdent|ऋषीवन् (वै॰ त्रि॰) १ ऋषितुल्य, जो ऋषियोंके बराबर हो। २ जिसके साथ ऋषि रहे।}}
{{outdent|ऋषीवह (सं॰ त्रि॰) ऋषीन् वहति, ऋषि-वह, पचाद्यच् दीर्घश्च। ऋषिवाहक, ऋषियोंको ले जानेवाला।}}
{{outdent|ऋषु (वै॰ पु॰) ऋष्-कु। १ अनवरत गति, कभी बन्द न होनेवाली चाल। २ सूर्यरश्मि, आफताबकी रोशनी। ३ अङ्गार, अंगारा।}}
{{outdent|ऋष्टि (सं॰ स्त्री॰) ऋष् हिंसायां क्तिन्। १ खड्ग, तलवार। २ साधारण अस्त्रमाल, कोई मामूली हथियार। ३ दीप्ति, चमक। (त्रि॰) ४ गमनागमनशील, आने-जानेवाला। (पु॰) ५ धर्मसावर्णिक मन्वन्तरके एक ऋषि। ६ ग्रहदोष। ७ अशुभ, बुराई।}}
{{outdent|ऋष्टिक (सं॰ पु॰) देशविशेष, एक मुल्क। यह दाक्षिणात्यमें अवस्थित है। {{smaller|(वाल्मीकीय रामायण)}}}}
{{outdent|ऋष्टिमत् (वै॰ त्रि॰) खड्गयुक्त, तलवार या भाला बांधे हुआ।}}
{{outdent|ऋष्टिविद्युत् (वै॰ त्रि॰) १ विद्युत्के न्याय खड्ग चलानेवाला, जो बिजलीकी तरह बरछी मारता हो। २ अस्त्र द्वारा प्रकाशमान्, जो हथियारोंसे चमकता हो। {{smaller|(सायण)}}}}
{{outdent|ऋष्य (सं॰ पु॰) ऋष्य-यत् निपातनात् सिद्धम्। मृगविशेष, एक हिरन। इसका वर्ण नील और मांस मधुर, बलकारक, स्निग्ध, उष्ण एवं कफपित्तजनक होता है। {{smaller|(भावप्रकाश)}} २ कुरुवंशीय देवातिथिके एक पुत्र। (क्ली॰) ३ श्वेत कुष्ठ, सफेद कोढ़।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋष्यक (सं॰ पु॰) मृगविशेष। {{smaller|ऋष्य देखो।}}}}
{{outdent|ऋष्यकेतन, {{smaller|ऋक्षकेतु देखो।}}}}
{{outdent|ऋष्यकेतु (सं॰ पु॰) ऋष्यः केतौ यस्य, बहुव्री॰। अनिरुद्ध।}}
{{outdent|ऋष्यगता (सं॰ स्त्री॰) ऋष्येण ऋषिसमूहेन गता ज्ञाता, ३-तत्। १ शतमूली, सतावर। २ माषपर्णी। ३ अतिबला।}}
{{outdent|ऋष्यगन्धा (सं॰ स्त्री॰) ऋष्यस्य मृगस्य गन्ध इव गन्धो यस्याः, बहुव्री॰। १ ऋषिजाहृक्षला। २ अतिबला। ३ क्षीरविदारी। ४ श्वेतशर्करकन्द, सफेद शकरकन्द। ५ रक्तशर्करकन्द, लाल शकरकन्द।}}
{{outdent|ऋष्यगन्धिका, {{smaller|ऋष्यगन्धा देखो।}}}}
{{outdent|ऋष्यजिह्व (सं॰ क्ली॰) महाकुष्ठ रोग, बड़ा कोढ़। यह पैत्तिक, मृगकी जिह्वाके न्याय खरस्पर्श और आभ्यन्तरिक उष्णाविशिष्ट होता है। अल्पदिनके मध्य ही ऋष्यजिह्व पककर फट जाता है। फिर इसमें कमि पड़ते भी देर नहीं लगती। {{smaller|(सुश्रुत)}}}}
{{outdent|ऋष्यजिह्वक, {{smaller|ऋष्यजिह्व देखो।}}}}
{{outdent|ऋष्यपुष्पी (सं॰ स्त्री॰) अतिबला, बरियारी।}}
{{outdent|ऋष्यप्रोक्ता (सं॰ स्त्री॰) १ श्वेतवाटागलक, सफेद बरियारी। २ शतमूली, सतावर। ३ महाशतावरी, बड़ी सतावर। ४ महाबला, बड़ी बरियारी। ५ कपिकच्छूलता, केवांच। ६ पीतवाटागलक, पीली बरियारी। ७ माषपर्णी।}}
{{outdent|ऋष्यमूक (सं॰ पु॰) एक पर्वत। रामायणमें लिखा, कि रावणके सीताहरण करने पर नाना स्थान घूम-फिर रामचन्द्रका एक पर्वतपर जाना हुआ था। वहीं कबन्ध नामक दानवने उनसे कहा—'पम्पा नदीके तीर ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव रहते हैं। वह आपकी सीताका संवाद बता सकेंगे।' {{smaller|(अरण्य ७३ सर्ग)}}}}
तुलसीदासने भी रामचन्द्रके ऋष्यमूक पर्वतको जानेका उल्लेख किया है—
{{block center|<poem>
"आगे चले बहुरि रघुराई। ऋष्यमूक पर्बत निअराई॥"
</poem>}}
प्रथमतः समझना चाहिये—पम्पानदी कहां है। पम्पा नदीकी वर्त्तमान अवस्थिति ठहरा सकनेपर ऋष्यमूक पर्वतका पता अनायास ही लग जायेगा।
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६६२|कण्ठक-कण्ठमाला|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
कण्ठदेशमें विशुद्ध नामक षोड़श स्वरयुक्त, धमवर्ण और महाप्रभाविशिष्ट षोडशदल पद्मका अवस्थान है।
<Small>{{center|<poem>"तदूर्धन्तु विश्वद्धाख्य दलषोडशपङजम् ।
खरेः षोड़शभियुकधू मवर्ण: महाप्रभम् ।
विश्वचपामाख्यातमाकाशाख्यमहाङ्ग तम्।"</poem>}}{{right|( गौतमतन्त्र )}}</small>
३ ध्वनि, आवाज । ४ न्निधान, कुब । ५ मदन-वृक्ष, मैनफलका पेड़। ६ गर्भस्फ टन, रेहमकी शिगुफ्तगी। यह शब्द उपमारूपसे शाखाविशिष्ट कलिकाका द्योतक है। ७ होमकुण्डके बाहर पङ्गलि-परिमित स्थान। ८ मुनि। ९ फैन । १० संस्कृतके एक प्राचीन वैयाकरण। क्षीरस्वामीने अपनी 'क्षौर-तरङ्गिणी में इनका वचन उद्दत किया है।
कण्ठक (सं० पु०) कण्ठ-स्वार्थ कन्। १ कण्ठ,टेंटवा। २ शाक्यमुनिका अश्व।
कण्ठकुन ( सं० पु० ) सन्निपातज्वरविशेष, एक बोखार। इसमें शिरोति, कण्ठग्रह, दाह, मोह,कम्प, ज्वर, रक्तसमीरणार्ति, हनुग्रह, ताप, विलाप और मूळका वेग बढ़ता है। कण्ठकुन कष्टसाध्य है।
<Small>{{right|( भावप्रकाश )}}</small>
कण्ठकुल्लक,<small> कण्ठकुन देखो।</small>
कण्ठकुत्रप्रतीकार (सं० पु०) कण्ठकुन नामक सविपातन्वरको चिकित्सा, सोनों माहाके बिगाइसे पैदा हुये बुखारको एक इन्लाज।
कण्ठ कूजन (सं० क्ली० ) गलकूजन, गुल की गुटरगू ।
कण्ठकूणिका (सं० स्त्री०) कण्ठइव कण्ठध्वनिरिव कूणयति, कण्ठ-कुण-ख ल-टाप् प्रत इत्वम्। वीणा,बौन। कण्ठके स्वरको भांति इसका स्वर भी प्रति सुस्पष्ट होता है।
कण्हग (सं० त्रि०) कण्ठदेश पर्यन्त व्याप्त, गलेतक फैला हुआ ।
कण्ठगत ( स० त्रि०) कण्ठे गतः, ७-तत् । १ कण्ठस्थ, गले में लगा हुआ । २ कण्ठागत,गलेतक पहुंचा हुआ ।।
कण्ठग्रह,<small> कण्ठकुन देखो।</small>
कण्ठतः (सं० अव्य० ) कण्ठसे, अलाहिदा लफू जोंके साथ, साफ-साफ ।
कण्डतलासिका (सं० स्त्री०) कण्ठतले पखानां कण्ठ-
{{Multicol-break}}
देशे पास्ते, कण्ठतल-आस-ख ल्-टाप् अत इत्वम् । अश्ववन्धनरज्ज, घोड़ा बांधनेको रस्मो या बद्दी।
कण्ठदन (सं० वि०) कण्ठः परिमाणमस्य, कण्ठ-दनच । <Small>प्रमाणे यसज्दन्नमावचः। पा ५।२।३७। </Small>गलपरिमाग, गलेतक पहुंचनेवाला
कण्ठधान (सं० पु० ) १ जनपदविशेष, कोई मुल्क । २ सज्जनपदवासीय जातिविशेष, एक कौम।
<Small>{{right|(बृहत्संहिता १४।२६)}}</small>
कण्ठनाली (सं० लो०) कण्ठगता नाड़ी डस्य लत्वम्, मध्यपदलो। कण्ठास्थि स्थल धमनी, गलेको मोटी नलो। भुक्त द्रव्य इसी नाड़ीकी राह नीचे चलता पौर शब्दादि भी इसी नाड़ीसे निकलता है।
कण्ठनोड़क (सं० पु०) कण्ठे प्रासादवृक्षादीनां शिरो-भाग नोडं यस्य, कण्ठनोड़-कए । चिल्लपक्षी, चील।
कण्ठनोलक (सं० पु०) कण्ठं धारकस्य कण्ठादिक-मूवंदेहं नीलयति स्वशिखाकज्जलेन नीलवर्ण करोति कण्ठ-नोल-णिच-ख ल। १ उल्का, मसाल। २ चिस पक्षी, चील।
कण्ठपाशक (सं० पु०) कण्ठे पाश इव कार्यात प्रकाशते, कण्ठ-पाश-कै-क। १ करिगलवेष्टनरन्न, हाथोके गलेमें बंधनेवाली रस्मी। २ कण्ठपाश, पगाड़ी, सरक-फांसी।
कण्ठबन्ध (सं० पु०) कण्ठे बन्धः, ७-तत्। १ करि-कण्ठ-बन्धनरज्जु, हाथोके गलेमें बांधी जानेवाली रस्त्री। २ गलबन्धन, गलेको डोर।
कण्ठभूषा (सं० स्त्री०) कण्ठस्य भूषा अलङ्कारः,६ तत्। गलदेशका अलङ्कार, गलेका जेवर। पट्टे, हलके, तौक, गण्डे, कण्ठी और हंसलोको कण्ठभूषा कहते हैं। इसका संस्कृत पर्याय अवेय, ग्रेव, रुचक और निष्क है।
कण्ठमणि (स० पु०) कण्ठे धार्यों मणिः, मध्य-पदलो० । गलदेशमें धारणोपयोगी मणि, गले में पहना जानेवाला जवाहर । संस्कृत पर्याय-काकल है।
कण्ठमाला (सं० स्त्री०) कण्ठे धार्या माला हारविशेषः, मध्यपदलो। कण्ठदेशमें धारणीय रत्न, गले में पहना जानेवाला जवाहर।<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओलन्दाज|५४५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ई० के १६वें शताब्द युरोपमें धर्ममतपर तुमुल
आन्दोलन उठा था। उसी समय मार्टिन लूथरने
धर्मसम्बन्ध में सर्वतोभावसे रोमके पोपों को प्रभुताको
अस्वीकार किया। भोलन्दान भी उनके मत में मिल
गये। इससे इनपर राजा कोपको दृष्टि पड़ी थां
स्पेनराज २य फिलिप हालेण्ड के अधीश्वर रहे । वह
कहर काथलिक है। इससे फिलिप प्रजावर्गको
अपने मतका विरुडवादो पा लूथरके शिष्यों को सताने
और "दोषानुसन्धान” नामक विचारालयको प्रतिष्ठाकर
प्रोटेष्टा एटोंको जीवन्त अवस्था में ही जलाने लगे। इस
कार्य से सकल ही प्रजा उनपर विरक्त हो गयो । क्रमसे
प्रजाविद्रोह झलक उठा। एक ओर युरोपीय तात्-
कालिक प्रवलपराक्रान्त नरपति, युद्धविद्या- विशारद
सेनापति एवं सेनानी और दूसरी ओर दोन, दरिद्र
तथा महान प्रजामण्डली यो बहुकालतक
यह हालेण्ड में यह युद्ध चला । एक समय चंगरेजोने पोलन्दाओंको
कुछ सहाय भेजा था । उससे जुटफ्रेसका युद्ध और
सर फिलिप सिडनीका मृत्य ु हुआ । इस तरह कहीं
कभी कुछ सहाय मिलते भी पोलन्दाज मध्यवसाय के
बली फिलिप प्रतियोगिता कर सके थे।
शतवार परास्त और पर्युदस्त हुये, किन्तु पौछे न
टेन्सको यो जोते थे। फिलिप शत चेष्टा
करते भी हालेण्डको वशमें लान सके ।
साधारणतन्त्रको शासनप्रणाली प्रतिष्ठित यो फिलिप
१६३ मतान्दके शेष भाग पोर्तुगाल अधोमार बने
थे। उस समय केवल पोर्तुगीज हो भारतवर्ष में
वाणिज्य करते रहे । घोलन्दाज उनसे द्रव्य ले युरोपके
सकल स्थानोंमें बेचते थे। इससे भी इन्हें प्रभूत लाभ
होता था। पोलन्दाओंको दबानेके लिये फिलिपने
पोर्तुगीजों के साथ वाणिज्यका होना रोक दिया।
किन्तु यह भग्नोत्साहन हुये इन्होंने एकादिक्रमसे |
भारतवर्षके साथ वाणिज्य चलाना मनःस्थ किया।
एक वषि समितिने करनेलियस इटमानको ४
करने- जहाजोंका अध्यच्च बना भारतवर्ष भेजा था।
लियने मिर्च वगैरह मसाला बाद खदेशको प्रत्या-
वर्तन किया और भाकर कह दिया- पोतुं गौज़ सर्वत्र
{{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}137}}{{Multicol-break}}
घृणित और अनाइत हुये हैं। यह बात सुन १५१८
ई०को भान-नेक घाट जहाजोंके साथ भारतवर्ष भेने
गये। चामटरडम किने उन्हें एक
कोठी खोलने को भी अनुज्ञा दो थो। भाननेकके कृत-
कार्य हो स्वदेश लौटने पर कितने हो लोगोंने ईवी-
परचम भारतवर्ष में वाचिष्य करनेको उद्योग लगाया।
उस समय सकल श्रोलन्दाज वणिकोंके वाणिल्य
लोपको पाइयो यो किन्तु गवरनमेटने इस
विषयमें हस्तक्षेप कर सकल विवाद मिटा दिया।
सकल दलका एकत्र ईष्ट इण्डिया कम्पनी नाम रखा
था । वणिकोंको पूर्व देशके वाणिज्य स्थानोंमें सब
विषयोंको चमता मिलो अर्थात् साधित देश मध्य
वह आवश्यकतानुसार कानून बना और जित देश
अधिकार में रखनेको पूर्व देशके राजावोंसे हुब वा सन्धि
चला सकते थे। इसी प्रकार पोलन्दाको ईट-
इडिया कम्पनीका सूत्रपात पृथा इसमें नूतनत्व
यह था - उस समय पोतुं गौज़ केवल स्वदेशको गवरन-
मेण्टके आदेशानुसार चलते, किन्तु भोलन्दाज इस
देशमें एक साधारपानी डाल सत्व रावेलिये
लेण्ड गवरमेवे अधोन होते भी अपने कार्य-
क्षेत्रमें एक प्रकार स्वाधीन रहते थे।
यन और परिश्रम हो फललाभ होता है। पोल
न्दाजीने भो भो शोध यय और मलकास प्रवृति
दोपनि यथेष्ट प्रतिपत्ति स्थापन को यो पोतुं गोल
सर्वत्र हो इनसे परास्त होने लगे। एडमिरल चोया-
रिकमे १४ जहाजोंके साथ यवदीप पहुंच बटेविया
नगरको पत्तन किया। मसाले कारवारमे १८२२
ई०को पोर्तुगीज़ एकबारगी हो विदूरित हुये थे ।
पोयारिकने जापान, फिलिपाइन प्रकृति दोपोंके साथ
वाणिज्य सम्बन्ध स्थापन किया, बटेविया नगर शीघ्र
हो पोलन्दाओंके यावतोय वाषिन्य स्थानोंका केन्द्र
बन गया । १६७६ ई० से पूर्व ओलन्दाजोंने बंगाल के
साथ वायिकार्यमें लिप्त होनेको पेष्टा को न थो।
२०६०को इन्होंने प्रथम महाजन कोठी
खोलो। इससे पहले हो बोलदानोंने सिंह प्रति
-खान पोतुं गोमके हायसे निकाले और मलयवर उप<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४४५
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2026-07-16T13:53:13Z
AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४४४'''|'''ऋष्यपट्ट—ऋषभ'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋष्यपट्ट (सं॰ त्रि॰) मृगचरणविशिष्ट, जिसके हिरनका पैर रहे।}}
{{outdent|ऋष्यादि (सं॰ पु॰) पाणिनिका कहा हुआ एक गण। इसमें ऋष्य, न्यग्रोध, शर, निलीन, विनाश, निवात, निधान, निबन्ध, विवध, परिगूह, उपगूह, अशनि, सित, मत, वेश्मन्, उत्तराश्मन्, अश्मन्, स्थूल, बाहु, खदिर, शर्करा, अनडुह, अरभु, परिवंश, वेणु, वरिष, खण्ड, दण्ड, परिहस्त, कर्द्दम और अंश शब्द पड़ता है।}}
{{outdent|ऋष् (धातु) तुदा॰ पर॰ सक॰ सेट्। "ऋषोष गतौ।" {{smaller|( कविकल्पद्रुम )}} १ गमन करना, जाना। २ वध करना, मारना।}}
{{outdent|ऋषभदगु (सं॰ पु॰) यदुवंशीय एक राजा। यह वृजिनीवत्के पुत्र और चित्ररथके पिता थे।}}
<div style="text-align: right;">{{smaller|( भारत, अनु॰ १४७ अ॰ )}}</div>
{{outdent|ऋषभ (सं॰ पु॰) ऋष्-अभच्-कित्। वृषिभृषिभ्यां कित्। उण् ३।१२३। यह अन्य शब्दके पीछे लगनेसे श्रेष्ठताबोधक होता है। १ वृष, बैल। २ कर्णरन्ध्र, कानका सूराख। ३ कुम्भीरपुच्छ, मगरकी पूंछ। ४ ओषधि विशेष, एक जड़ी। यह वृषके शृङ्ग जैसा होता है। ऋषभ बलकारक, शीतल, शुक्र एवं कफजनक, मधुर और पित्त, दाह, कास, वायु तथा क्षयरोगनाशक है। हिमालय-शिखर इसकी उत्पत्तिका स्थान है। संस्कृत पर्याय—वृष, ऋषभक, वीर, गोपति, धौर, विषाणी, दुर्धर, ककुद्मान्, पुङ्गव, वोढा, शृङ्गी, धुर्य, भूपति, कामी, रुचप्रिय, उक्षा, लाङ्गली, गो, बल्गुर, गौरक्ष और वनवासी है। {{smaller|( भावप्रकाश )}}}}
६ सप्तस्वरके अन्तर्गत द्वितीय स्वर। यह बैलके स्वर-जैसा होता है। फिर कोई इसे चातकके स्वर-जैसा भी बताता है। नाभि मूलसे उठ यह अनायास ही ऋषभके स्वरकी तरह निकला करता है। ऋग्वेदसे ऋषभ स्वरकी उत्पत्ति है। दयावती, रञ्जनी और रतिका तीन इसकी श्रुति हैं। श्रुति जाति भी करुण मध्य और मृदु भेदसे तीन प्रकार हैं। वंश ऋषि, जाति क्षत्रिय, वर्ण पिङ्गल, उत्पत्ति-स्थान शाकद्वीप, ऋषि, एवं देवता ब्रह्मा और छन्द गायत्री है। {{smaller|( सङ्गीतरत्नाकर )}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|७ पर्वत विशेष, एक पहाड़। ८ वराहपुच्छ, सूअरकी पूंछ। ९ कोई मुनि। १० भगवान्के एक अवतार। भागवतोक्त २२ अवतारमें ऋषभ अष्टम हैं। इन्होंने भारतवर्षाधिपति नाभिराजाके औरस और मरुदेवीके गर्भसे जन्मग्रहण किया था।}}
भागवतमें लिखते, कि जन्म लेते ही ऋषभदेवके अङ्गमें सकल भगवत् लक्षण झलकते थे। सर्वत्र समता, उपशम, वैराग्य, ऐश्वर्य और महैश्वर्यके साथ उनका प्रभाव दिन दिन बढने लगा। वह स्वयं तेजः प्रभाव, शक्ति, उत्साह, कान्ति और यशः प्रभृति गुणसे सर्वप्रधान बन गये। कुछ दिन पीछे नाभिराजाने अपने पुत्र ऋषभको राज्य सौंप मरुदेवीके साथ वदरिकाश्रमकी पन्था पकड़ी थी। {{smaller|नाभि देखो।}} ऋषभदेवको राज्यपर अभिषिक्त होनेसे इन्द्रने जयन्ती नाम्नी कन्या दी। उस पत्नीके गर्भसे एकशत पुत्र उत्पन्न हुये। भरत ज्येष्ठ थे। कुशावर्त्त, इलावर्त्त, ब्रह्मावर्त्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इन्द्रस्पृक्, विदर्भ और कीकट उनके अनुगत रहे। दूसरे नौ पुत्र कवि, हरिः, अन्तरीक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन भागवत धर्मप्रदर्शक थे। अवशिष्ट ८१ पुत्र विनीत वेदज्ञ और घोरयज्ञशील ब्राह्मण बन गये।
ऋषभदेवने अपने ज्येष्ठ पुत्र भरतको राज्य सौंप परमहंसधर्म सीखनेके लिये संसार त्याग किया था। उसी समय उन्होंने उन्मत्तके न्याय दिगम्बर वेशमें आलुलायित केश हो ब्रह्मावर्त्तसे पैर बढाया। ऋषभदेवने मौनव्रत पकड़ा था। एकाकी घूमते देख कितने ही लोग उनसे आलाप करने पहुंचे। किन्तु वह जड़, मूक, अन्ध, बधिर, पिशाच वा उन्मत्तके न्याय दण्डायमान रह कोई बात कहते न थे। उस अवस्था पर दुष्ट लोगोंने गात्र पर मल, मूत्र, धूलि एवं प्रस्तर फेंक, ताड़ना दे, अथवा भय देखा नाना प्रकारसे उन्हें विचलित करनेका चेष्टा लगायी। किन्तु वह किसीसे विचलित न हुये। क्योंकि उनका मनोविकार निकल गया था। संसारके लोगोंको अपने प्रतिपक्ष पर देख उन्होंने अजगरव्रत पकड़ा था। ऋषभदेव एक ही स्थानपर रह खाने-पीने, सोने-बैठने और हगने-मूतने
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋधवार—ऋष्यद'''|'''४४३'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋधवार ( वै॰ त्रि॰ ) १ अपना ऐश्वर्य बढ़ानेवाला, जो अपना माल बढ़ा रहा हो। २ यथाभिलषित सम्पत्तिशाली, मनमानी दौलत रखनेवाला। {{smaller|( सायण )}}}}
{{outdent|ऋधक् ( सं॰ त्रि॰ ) न्यून, कम, छोटा।}}
{{outdent|ऋनिया, ऋनी ( हिं॰ ) {{smaller|ऋणी देखो।}}}}
{{outdent|ऋफ् ( धातु ) तुदा॰ पर॰ सक॰ सेट्। "ऋफ दाने श्लष हिंसानिन्दाप्तौ।" {{smaller|(कविकल्पद्रुम)}} १ दान करना, देना। २ प्रशंसा करना, तारीफ बताना। ३ हिंसा करना, मारना। ४ निन्दा करना, बुराई बताना। ५ युद्ध करना, लड़ना।}}
{{outdent|ऋबीस ( वै॰ क्ली॰ ) ऋ-यच् पृषोदरादित्वात् साधुः। १ पृथिवी, जमीन। २ पृथिवीस्थ अग्नि, जमीन की आग। ३ सन्धि, दराज।}}
{{outdent|ऋभु ( सं॰ पु॰ ) अरि देवमातरि अदितौ भवति, ऋ-भू-डु। १ देवता। २ मेधावी, आकिल। ३ यज्ञ-देवता। ४ देवगण विशेष। यह वैवस्वत मन्वन्तरके देवता हैं। ५ सुधन्वाके पुत्र। ऋक् संहितामें ऋभु शब्द इन्द्र, अग्नि और आदित्यके नामान्तर रूपसे व्यवहृत हुआ है। पुराणमतसे ऋभु ब्रह्माके पुत्र हैं। इन्होंने तपोबलसे विशुद्ध ज्ञान लाभ किया था। पुलस्त्यपुत्र निदाघ इनके शिष्य रहे। पौराणिक मतसे यह चार कुमारोंमें एक थे। आङ्गिरसगोत्रीय सुधन्वाके तीन पुत्र रहे। यह तीनों वेदमें 'ऋभवः' अर्थात् ऋभुगण कहे गये हैं। प्रत्येकका पृथक् नाम १म ऋभुक्षा ( ऋभु ), २य विभु और ३य वाज था। भाष्यकार सायणाचार्यके मतसे ऋभुगण सूर्यमण्डलमें रहते और सूर्यके रश्मिरूपसे चमकते हैं। ऋक्संहिताको देखते ऋभुगण अतिशय कार्य कुशल रहे। इन्होंने इन्द्रके रथ और अश्वगणको शोभान्वित किया था। उससे सन्तुष्ट हो इन्द्रने इनके पितामाताको पुनयौवन दिया। मोक्षमूलर साहबने वैदिक ऋभु और प्राचीन यूनानी देवता अर्फियस ( Orpheus ) में सादृश्य स्थापन करनेकी चेष्टा लगायी है। ६ एक मुनि। ७ एक निकृष्ट जाति। ८ सैन्यभेद।}}
{{outdent|ऋभुक्ष ( सं॰ पु॰ ) ऋभवः क्षिपन्ति वसन्ति यत्र, ऋभु-क्षि-ड। १ स्वर्ग, बिहिश्त। २ वज्र। ३ इन्द्र।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋभुक्षा ( सं॰ पु॰ ) ऋभुक्षः स्वर्गः वज्रं वा अस्त्यस्य, ऋभुक्ष-इनि-'आ' आदेशः। पथिन्मथृक्षमामात्। पा ७।१।८५। १ इन्द्र। २ मरुत्। ३ ऋभु। ४ तीन ऋभुओंमें पहले ऋभु।}}
{{outdent|ऋभुक्षी ( सं॰ पु॰ ) ऋभुक्षः स्वर्गः वज्रं वा अस्यास्ति, ऋभुक्ष-इनि। इन्द्र।}}
{{outdent|ऋभुक्षीण ( सं॰ त्रि॰ ) ऋभुक्षीव आचरति, ऋभुक्षिन्-क्विप्-दीर्घः। छन्दसिहस्व इक्षुकयोः ऋञ्जिति। पा ६।४।१५। इन्द्रके न्याय आचारविशिष्ट, जो इन्द्रकी तरह कामकाज करता हो।}}
{{outdent|ऋभुमत् ( वै॰ त्रि॰ ) १ चतुर, होशियार। २ ऋभु-सम्बन्धीय। ३ अतिशय दीप्त, दूर दूर तक चमकनेवाला। {{smaller|( सायण )}}}}
{{outdent|ऋष्व ( वै॰ त्रि॰ ) उरुर्मूरुस्य, पृषोदरादित्वात् साधुः। १ उरुसे उत्पन्न, रानसे निकला हुआ। २ आक्रामक, हमलावर। ३ व्याप्त, भरा या ठूंसतक फेला हुआ। ४ चतुर, होशियार।}}
{{outdent|ऋष्वन् ( वै॰ त्रि॰ ) १ आक्रामक, हमलावर। २ अतिशय प्रदीप्त, दूरदूर तक चमकनेवाला। {{smaller|( सायण )}}}}
{{outdent|ऋष्यस्, {{smaller|ऋष्य देखो।}}}}
{{outdent|ऋम्फ् ( धातु ) तूदा॰ पर॰ सक॰ सेट् मुचादि। वध करना, मार डालना।}}
{{outdent|ऋल्लक ( सं॰ पु॰ ) वादित्र विशेष बजानेवाला, एक बाजेवाला।}}
{{outdent|ऋल्लरी ( सं॰ स्त्री॰ ) वादित्र विशेष, एक बाजा।}}
{{outdent|ऋश् ( धातु ) सौत्र॰ पर॰ स॰ सेट्। १ गमन करना, जाना। २ स्मृति करना, सोचना।}}
{{outdent|ऋश्य ( सं॰ पु॰ ) ऋश्-क्यप्। १ मृगविशेष, एक हिरन। यह चित्रित वा श्वेतवर्ण पदविशिष्ट होता है। मांस कषाय, मधुर, वातघ्न, पित्तघ्न, हृद्य, तीक्ष्ण और वस्तिशोधन है। {{smaller|( सुश्रुत )}}}}
{{outdent|ऋश्यक ( सं॰ क्ली॰ ) ऋश्य-कः। वृष्यण् कठेति। पा ४।२।८०। मृगसन्निकृष्ट देशादि, जिस देशमें चित्रित मृग रहे। २ हिंसा, शिकार।}}
{{outdent|ऋष्यकेतु ( सं॰ पु॰ ) विश्वकेतु, अनिरुद्ध।}}
{{outdent|ऋष्यद ( सं॰ पु॰ ) ऋश्यं हिंसां ददाति, ऋश्य-दा-क। कूप, गड़हा। इसमें हिरनको फांसकर पकड़ते हैं।}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४४६'''|'''ऋषिका—ऋषितर्पण'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
होते हैं—महर्षि, परमर्षि, देवर्षि, ब्रह्मर्षि, श्रुतर्षि, राजर्षि और काण्डर्षि। प्रत्येक मन्वन्तरके सप्तर्षिगणका नाम इसप्रकार है—स्वायम्भुव मन्वन्तरमें मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ; स्वारोचिष मन्वन्तरमें ऊर्ज, स्तम्भ, प्राण, दत्तोलि, ऋषभ, निश्चर तथा चार्वावीर; उत्तम मन्वन्तरमें वशिष्ठके प्रमदादि सप्तपुत्र; तामस मन्वन्तरमें ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वलक एवं पौरव; रैवत मन्वन्तरमें हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सूधामा, पर्जन्य तथा वशिष्ठ; चाक्षुष मन्वन्तरमें सुमेधा, विरजा, हविष्मान्, उन्नत, मधु, अतिनामा और सहिष्णु; वर्त्तमान वैवस्वत मन्वन्तरमें अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज एवं कश्यप; सावर्णि का मन्वन्तरमें गालव, दीप्तिमान्, परशुराम, अश्वत्थामा, कृप, ऋष्यशृङ्ग तथा व्यास; दक्षसावर्णिक मन्वन्तरमें मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, सरल एवं हव्यवाहन; ब्रह्मसावर्णिक मन्वन्तरमें आप, भूति, हविष्मान्, सुकृती, सत्य, नाभाग और वशिष्ठके पुत्र अप्रतिम; धर्मसावर्णिक मन्वन्तरमें हविष्मान्, वरिष्ठ, ऋष्टि, आरुणि, निश्चर, अनघ एवं विष्टि; रुद्रसावर्णिक मन्वन्तरमें द्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्त्ति, तपोरति तथा तपोधृति; देवसावर्णिक मन्वन्तरमें द्युतिमान्, अव्यय, तत्त्वदर्शी, निरुत्सुक, निर्मोह, सुतपा एवं निष्प्रकम्प; इन्द्रसावर्णिक मन्वन्तरमें अग्नीध्र, अग्निबाहु, शुचि, मुक्त, माधव, शुक्र और अजित।
मार्कण्डेयपुराणके मतसे इन्द्रसावर्णिक मन्वन्तरका नाम 'भौत्य' है। पुराणान्तरमें उक्त सप्तर्षियोंके नामपर भी मतभेद पड़ता है।
ज्योतिषशास्त्रको देखते वशिष्ठकी पत्नी अरुन्धतीके साथ वर्त्तमान मन्वन्तरके सप्तर्षि मघा नक्षत्रपर अवस्थान किया और मघाके उदयमें उदित हुआ करते हैं। काशीखण्ड शनिलोकके ऊर्ध्व और ध्रुवलोकके अधोदेशमें इनकी अवस्थिति बताता है।
३ वेद। ४ किरण। ५ भृगु प्रभृति महर्षि सन्तान।
{{outdent|ऋषीक (सं॰ पु॰) ऋषेः पुत्रः, ऋषि संज्ञायां कन्,}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
पृषोदरादित्वात् दीर्घः। १ ऋषिपुत्र, ऋषिके लड़के। २ ऋषियोंके राजा। (क्ली॰) ३ लताविशेष, एक बेल।
{{outdent|ऋषिका (सं॰ स्त्री॰) नदी विशेष, एक दरया।}}
{{outdent|ऋषिकुल्या (सं॰ क्ली॰) ऋषीणां कुल्या कृत्रिमाल्पसरित् इव। १ गङ्गा। २ ऋषियोंका कृत्रिम जलाशय। ३ तीर्थविशेष। ४ सरस्वती। ५ भारतवर्षकी एक नदी।}}
{{block center|<poem>
"स एष देशप्रवर उत्कलाख्यो द्विजोत्तमाः।
ऋषिकुल्यां समासाद्य दक्षिणोदधिगामिनीम्॥" {{smaller|(उत्कलखण्ड ६अ॰)}}
</poem>}}
यह नदी उत्कलके गुमसर और गञ्जामप्रदेशमें प्रवाहित है। आजकल इसे ऋषिकुलिया कहते हैं। ६ भूमाकी पत्नी और उद्गीथकी जननी।
{{outdent|ऋषिकृत् (सं॰ त्रि॰) १ उत्तेजना देनेवाला, जो भड़काता हो। २ उपस्थित होनेवाला, जो अपनी शक्ल दिखाता हो। {{smaller|( सायण )}}}}
{{outdent|ऋषिगण (सं॰ पु॰) ऋषिसमूह, ऋषियोंका झुण्ड।}}
{{outdent|ऋषिगिरि (सं॰ पु॰) मगधदेशीय पर्वतविशेष, बिहारका एक पहाड़। यह पर्वत क्षुद्र और राजगृहके निकट अवस्थित है।}}
{{block center|<poem>
"एष पार्थ महान् भाति पञ्चमात्रिरभ्यसूजान् ।
निरामयः सुवेशाख्यो निवेषी मागधः शुभः ॥
वैभारो विपुलः शैलो वराहो वृषभस्तथा ।
तथा ऋषिगिरिस्तात शुभाश्चैत्यकपञ्चमाः ॥" {{smaller|( भारत, सभा २१अ० )}}
</poem>}}
{{outdent|ऋषिगुप्त (सं॰ पु॰) बौद्धविशेष।}}
{{outdent|ऋषिग्राम (सं॰ क्ली॰) वीरभूमके अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम। यह मानसेपी नदीके तटपर अवस्थित है।}}
{{block center|<poem>
"मानसेपी नदीपार्श्वे गङ्गायाश्चोत्तरेऽपि च ।
ऋषिग्रामकं ग्रामञ्च स्थापयिष्यति यत्नतः॥" {{smaller|(भ॰ ब्रह्मखण्ड ५७।१०२)}}
</poem>}}
{{outdent|ऋषिचोदन (वै॰ त्रि॰) ऋषिको उत्तेजित करनेवाला, जो गानेवालेका हौसला बढ़ाता हो।}}
{{outdent|ऋषिजाहृक्ष (सं॰ पु॰) {{smaller|ऋष्यगन्धा देखो।}}}}
{{outdent|ऋषिजाहृक्षलक (सं॰ पु॰) {{smaller|ऋष्यगन्धा देखो।}}}}
{{outdent|ऋषिजाहृक्षलकी, {{smaller|ऋष्यगन्धा देखो।}}}}
{{outdent|ऋषिजाहृक्षला, {{smaller|ऋष्यगन्धा देखो।}}}}
{{outdent|ऋषिजाहृक्षलिका, {{smaller|ऋष्यगन्धा देखो।}}}}
{{outdent|ऋषितर्पण (सं॰ क्ली॰) ऋषीणां तर्पणम्, ६-तत्। ऋषियोंके उद्देश्यसे दी जानेवाली जलाञ्जलि।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४३०'''|'''ऋष्यशृङ्ग—ऋष्यादि'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
"ऋष्यमूकात् हनुमान् गत्वा तं मलयं गिरिम्।
आचचक्षे तदा वीरो कपिराजाय राघवौ॥ १॥"
{{smaller|( किष्किन्धा ५ सर्ग )}}
</poem>}}
हनूमान्ने ऋष्यमूकसे मलयगिरिपर पहुंच कपिराज सुग्रीवसे रघुवीरद्वयका वृत्तान्त बताया था।
वर्त्तमान मन्द्राज प्रदेशके अन्तर्गत त्रिवाङ्कोड़ नामक राज्यमें एक 'पम्बे' नदी पड़ती है। जिस पर्वतसे यह नदी निकलती, उसको संज्ञा पश्चिमघाट या अनमलय है। यही नदी रामायणोक्त 'पम्पा' मानी जाती है। इसीकी उत्पत्तिका स्थान ऋष्यमूक है। आजकल अनमलय वा हस्तिगिरि कहते हैं।
रामायणमें ऋष्यमूक पर्वतके उद्भिदादिका जो विषय पड़ता, उसका अधिकांश अद्यापि इस अनमलय गिरिपर मिलता है। वास्तविक ऐसी उर्वरा स्थली दक्षिणापथ पर प्रायः देखनेमें नहीं आती।
हण्टर साहबने इस गिरिके सम्बन्धमें लिखा है—
{{block center|<poem>
"The soil supports a flora of extraordinary variety and beauty; while the climate equals in salubrity that of any sanitarium, and......any plantation of Southern India."
{{smaller|( Hunter's Imp. Gaz. India, 2nd Ed. Vol. I. p. 269. )}}
</poem>}}
अतएव हमारे मतमें अनमलय पर्वत ही ऋष्यमूक ठहरता है।
{{outdent|ऋष्यशृङ्ग (सं॰ पु॰) ऋष्यस्य मृगस्य शृङ्गमिव शृङ्गमस्य, बहुव्री॰। १ कोई मुनि। रामायण और महाभारतमें इनका वृत्तान्त इसप्रकार कहा है—विभाण्डक नामक एक महातेजा कश्यपवंशीय ऋषि रहे। किसी समय अप्सरा उर्वशीको देखनेसे जलके मध्य उनका रेतः गिर गया था। एक मृगी वह जलमिश्र रेतः पीकर गर्भिणी हुई। यह मृगी भी शापभ्रष्टा कोई देवकन्या थी। यथाकाल मृगीने एक पुत्र प्रसव किया। मृगीके गर्भसे उत्पन्न होनेपर उसके एक शृङ्ग निकला था। इसीसे लोग उसे ऋष्यशृङ्ग कहने लगे। पिता भिन्न अपर व्यक्ति कभी देख न पड़नेसे उसका मन सिवा ब्रह्मचर्यके अन्य विषय पर चलता न था।}}
इसी समय दशरथके बन्धु अङ्गेश्वर लोमपादको किसी अपराध वश ब्राह्मणोंने छोड़ रखा था। उनका
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
यज्ञकार्यादि बिगड़ा और इन्द्रके असन्तुष्ट रहनेसे राज्यपर जल भी न पड़ा। फिर लोमपादने विव्रत हो किसी प्रकार ब्राह्मणोंको परितुष्ट कर इस विपद्से बचनेका उपाय पूछा था। उन्होंने ऋष्यशृङ्गको लानेकी बात कही। उसीके अनुसार राजाने इस दुष्कर कार्यपर कितनी ही वेश्याओंको लगा दिया। जलपथसे लानेका परामर्श कर नौकायोगमें तपोवनके समीप वह पहुंचीं और दूर ही नौका खड़ी रख ऋष्यशृङ्गके निकट गयी थीं। नानारूप भावभङ्गी देखा, विचित्र माल्य एवं विविध वस्त्रादि पहना और नानाप्रकार सुस्वादु पेयादि पिला उन्होंने ऋष्यशृङ्गको क्रमशः कामोन्मत्त किया, फिर नौकाका पथ लिया। पीछे विभाण्डकने वहां पहुंच और ऐसी अवस्था देख पुत्रको नाना प्रकार सान्त्वना दी थी। किन्तु तपस्यार्थ उनके पुनर्वार गमन करते ही वेश्यायें आ और ऋष्यशृङ्गको नौकापर बैठा अतिसत्वर लोमपादके पास उपस्थित हुईं। लोमपादने सन्तुष्टचित्तसे उन्हें अन्तःपुरमें रखा था। उनके आते ही समस्त राज्यमें प्रभूत वर्षण पड़ा। फिर लोमपादने कृतकृतार्थ हो विभाण्डकके अभिशापसे बचनेके लिये मित्र दशरथकी शान्ता नाम्नी कन्या ऋष्यशृङ्गको सौंप दी। इधर विभाण्डकने आश्रममें पहुंच और पुत्रके अदर्शनमें ध्यानस्थ हो समुदाय देख लिया था। वह क्रोधसे प्रज्वलित हो लोमपादके राज्यमें आये। उनके आगमनसे सब लोग भय खा ऋष्यशृङ्गका राज्य बताने लगे। फिर विभाण्डकने कोपको छोड़ दिया और पुत्र तथा पुत्रवधूको आदर प्रदर्शनपूर्वक आश्रमके प्रति प्रत्यागमन किया था। ऋष्यशृङ्ग पत्नीके साथ उसी राज्यमें रहने लगे।
इन्हीं ऋष्यशृङ्गने दशरथ राजाका पुत्रेष्टियज्ञ किया, जिसके फलसे रामादि भ्रातृचतुष्टयने जन्म लिया था। यह अतिशय प्रतापशाली एवं यज्ञनिष्ठ रहे। २ सावर्णिक मन्वन्तरके एक ऋषि।
{{outdent|ऋष्याङ्कु (सं॰ पु॰) प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्ध। {{smaller|अनिरुद्ध देखो।}}}}
{{outdent|ऋष्यादि (सं॰ पु॰) ऋषिरादिरस्य, बहुव्री॰। वैदिक मन्त्रके अवश्य ज्ञातव्य ऋषि प्रभृति पांच विषय। पांचो}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४४६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋषभ—ऋषि'''|'''४४५'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
लगी। उनका सुन्दर देह मलमूत्रसे आच्छन्न हुआ था। किन्तु आश्चर्यका विषय यह ठहरा, कि विष्ठामें दुर्गन्धका नाम भी न रहा। इसीप्रकार वह नाना स्थान घूमने लगे। कुछ काल घूम-फिर ऋषभदेवने देह छोड़ना चाहा था। उस समय वह कोङ्कण, वेङ्कट, कुटक और दक्षिण कर्णाटक देश जा पहुंचे। वहां कुटकाचल उपवनके निकट कितनी ही क्षुद्र शिला उठा उन्होंने मुखमें डालो थीं। फिर ऋषभदेव उन्मत्तके न्याय घूमने लगे। दैवात् वनमें दावानल भड़का था। उसी अनलमें वह जल गये।
भागवतमें ऋषभदेवका धर्ममत इसप्रकार कहा है।
मानव देह पा मनुष्यको समुचित आचरण करना चाहिये। जो सकलका सुहृद्, प्रशान्त, क्रोधहीन एवं सदाचार रहता और सब पर समान दृष्टि रखता, वही महत् ठहरता है। जो धनपर स्पृहा तथा पुत्र कलत्रादि पर प्रीति नहीं रखता और ईश्वरपर निर्भर कर चलता, वही मनुष्योंमें बड़ा निकलता है। इन्द्रियकी तृप्ति ही पाप है। कर्मस्वभाव मन ही शरीरके बन्धका कारण बन जाता है। स्त्री-पुरुष मिलनेसे परस्परके प्रति एक प्रकार प्रेमाकर्षण होता है। उसी आकर्षणसे महामोहका जन्म है। किन्तु उस आकर्षणके टलने और मनके निवृत्ति-पथपर चलनेसे संसारका अहङ्कार जाता तथा मानव परमपद पाता है।
भागवतमें लिखते, कि ऋषभदेव स्वयं भगवान् और कैवल्यपति ठहरते हैं। योगचर्या उनका आचरण और आनन्द उनका स्वरूप है। {{smaller|(भागवत ५।४,५,६ अ०)}}
जैनोंने इन्हीं ऋषभदेवको अपना तीर्थङ्कर वा आदिनाथ माना है। जैनधर्मशास्त्रके मतानुसार—ऋषभदेवने सर्वार्थसिद्धि नामक विमानसे उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें धनुराशिपर चैत्रमासकी कृष्णाष्टमी तिथिको इक्ष्वाकुवंशीय नाभिके औरस और मरुदेवीके गर्भसे विनीता नगरीमें जन्म लिया था। यह नौ मास चार दिन गर्भमें रहे। शरीरका परिमाण ५०० धनुः रहा। अङ्गकी कान्ति सुवर्णप्राय थी। ऋषभदेव इक्षुरस पीकर श्रेयांसके निकट ४००० साधुओंके साथ
<br><br>Vol. III. 112
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
चैत्राष्टमीको दीक्षित हुये थे। फिर एक वर्षतक नाना स्थान घूम पुरिमत्तल नामक स्थानपर यह पहुंचे। यहां फाल्गुन मासके कृष्णपक्षकी तीन दिन उपवासके पीछे इन्होंने ज्ञानलाभ किया था। इनके ८० गणधर, ८४००० साधु, ३००००० साध्वी, ८००० अवधिज्ञानी, १०००० केवली, ३५०००० श्रावक, ५५४००० श्राविका, ४७५० चतुर्दशपूर्वी और १२७५० मनपर्याय थे। प्रथम गणधरका पुण्डरीक और प्रथम आर्याका नाम ब्राह्मी था। आयुःका परिमाण ८४ लक्ष पूर्व कहते हैं। ऋषभदेवको अष्टपद नामक स्थानपर चैत्रमासकी कृष्णात्रयोदशीके दिन पद्मासनमें मोक्षपद मिला था।
<div style="text-align: right;">{{smaller|( जैनहरिवंश ८ सर्ग, आदिनाथपुराण एवं जैनतत्त्वादर्श १६-२० पृ० )}}</div>
{{outdent|ऋषभक (सं॰ पु॰) वैद्यकोक्त अष्टवर्गान्तर्गत औषधविशेष, एक जड़ी। {{smaller|ऋषभ देखो।}}}}
{{outdent|ऋषभकूट (सं॰ पु॰) हेमकूट पर्वत, एक पहाड़।}}
{{outdent|ऋषभगजविलसित (सं॰ क्ली॰) षोडशाक्षर छन्दोविशेष, सोलह सोलह अक्षरोंके चार पादोंका एक छन्द।}}
{{block center|<poem>
"भनिनगैः स्ररात् ऋषभगजविलसितम्। {{smaller|( वृत्तरत्नाकर )}}
</poem>}}
{{outdent|ऋषभतर ( (सं॰ पु॰) भारवहनासमर्थ वृष, जो बैल बोझ ढो न सकता हो।}}
{{outdent|ऋषभदायी (सं॰ त्रि॰) वृषप्रदान करनेवाला, जो बैल देता हो।}}
{{outdent|ऋषभदेव (सं॰ पु॰) भगवान्के एक अवतार। {{smaller|ऋषभ देखो।}}}}
{{outdent|ऋषभद्वीप (सं॰ पु॰-क्ली॰) ऋषभ इव श्वेतः द्वीपः, मध्यपदलोपी कर्मधा॰। श्वेतद्वीप, किसी मुल्कका नाम।}}
{{outdent|ऋषभध्वज (सं॰ पु॰) ऋषभो ध्वजचिह्नमस्य ध्वजे अस्य वा, बहुव्री॰। १ महादेव, अपने झण्डेमें बैलका निशान् रखनेवाले शङ्कर। २ एक बौद्धसंन्यासी।}}
{{outdent|ऋषभी (सं॰ स्त्री॰) ऋषभ जाती ङीष्। १ नराकृति स्त्री, मर्दकी सूरत-शक्ल रखनेवाली औरत। २ कपिकच्छूलता, कौंच। ३ विधवा, बेवा। ४ शिराला।}}
{{outdent|ऋषि (सं॰ पु॰) ऋषति गच्छति संसारपारम्, ऋष्-, इन्-कित्। इगुपधात् कित्। उण् ४।११९। १ ज्ञानके द्वारा संसारपारगत वशिष्ठादि। २ शास्त्रप्रणेता। संस्कृत पर्याय सत्यव्रत और प्रापाख्य है। ऋषि सातप्रकारके}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋषितीर्थ—ऋषिस्वर'''|'''४४७'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋषितीर्थ (सं॰ पु॰) काठियावाड़का एक तीर्थ। {{smaller|(प्रभासखण्ड २२८।१।११)}}}}
{{outdent|ऋषितोया (सं॰ स्त्री॰) जूनागढ़के निकट बहनेवालो एक क्षुद्र नदी। इसी नदीके उपकूलपर प्रभासखण्डोक्त उन्नतनगर है। {{smaller|उन्नतनगर देखो।}}}}
{{outdent|ऋषित्व (सं॰ क्ली॰) ऋषिकी अवस्था वा नियमावली।}}
{{outdent|ऋषिदेव (सं॰ त्रि॰) किसी बुद्धका नाम।}}
{{outdent|ऋषिद्विष् (वै॰ त्रि॰) उत्तेजित कविसे द्वेष रखनेवाला।}}
{{outdent|ऋषिपञ्चमी (सं॰ स्त्री॰) ऋषीणां सप्तर्षीणां पञ्चमी, ६-तत्। व्रतविशेष। यह व्रत भाद्र शुक्लपञ्चमीको होता है। सप्तर्षियोंकी प्रतिमा बनाकर पूजी जाती है। पूजाके बाद अकृष्टभूमिजात शाकमात्र खानेका विधान है। इसी प्रकार सात वत्सर पर्यन्त यह व्रत किया जाता है। फिर अष्टम वर्ष सप्त कलसस्थित प्रतिमामें सप्तर्षियोंको पूज यथाविध मन्त्रद्वारा १०८ तिलीका होम करना पड़ता है। अन्तको ब्राह्मण भोजन देना चाहिये।}}
{{outdent|ऋषिपट्टन (सं॰ क्ली॰) वाराणसीस्थित बौद्धोंका एक पवित्र स्थान। {{smaller|( अवदानशतक ७६ ) सारनाथ देखो।}}}}
{{outdent|ऋषिपुत्रक (सं॰ पु॰) दमनवृक्ष, देवनेका पेड़।}}
{{outdent|ऋषिप्रशिष्ट (सं॰ त्रि॰) ऋषियोंकी शिक्षा पाये हुआ।}}
{{outdent|ऋषिप्रोक्ता (सं॰ स्त्री॰) ऋषिभिः प्रोक्ता भैषज्याय इति शेषः, ३-तत्। माषपर्णी वृक्ष। {{smaller|माषपर्णी देखो।}}}}
{{outdent|ऋषिबन्धु (सं॰ पु॰) ऋषिः बन्धुरस्य, बहुव्री॰। १ शरभ नामक ऋषि। २ ऋषिमित्र। (त्रि॰) ३ ऋषिवंशीय।}}
{{outdent|ऋषिमना (वै॰ पु॰) ऋषेर्मन इव मनोऽस्य, मध्यपदलोपी॰। ऋषिके न्याय सर्वार्थदर्शी, जो ऋषिकी तरह सब मतलब समझता हो।}}
{{outdent|ऋषिमुख (सं॰ क्ली॰) किसी ऋषिके बनाये मण्डलका आरम्भ।}}
{{outdent|ऋषियज्ञ (सं॰ पु॰) ऋषूद्देश्यको यज्ञः, मध्यपदलो॰। गृहस्थके कर्त्तव्य पञ्चयज्ञके मध्य एक यज्ञ। अध्ययन मात्र ही इस यज्ञमें करना चाहिये। मनुके मतसे यह पञ्चयज्ञ गृहस्थगणको अवश्य पालनीय हैं—}}
{{block center|<poem>
"ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञञ्च सर्वदा।
नृयज्ञं पितृयज्ञञ्च यथाशक्ति न हापयेत्॥" {{smaller|( मनु ४।२१ )}}
</poem>}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋषिलोक (सं॰ पु॰) ऋषीणां लोकः, ६-तत्। सप्तर्षिगणकी अवस्थितिका स्थान, ऋषियोंकी दुनिया। काशीखण्डके मतमें यह स्थान शनिलोकसे ऊर्ध्व और ध्रुवलोकसे अधः अवस्थित है।}}
{{outdent|ऋषिवदन, {{smaller|ऋषिपट्टन देखो।}}}}
{{outdent|ऋषिवह (सं॰ त्रि॰) ऋषिको वहन करने या ले जानेवाला।}}
{{outdent|ऋषिवानर—एक संस्कृतज्ञ पण्डित। इन्होंने 'वज्रहेतूदयविभङ्गटीका' बनायी थी।}}
{{outdent|ऋषिश्राद्ध (सं॰ क्ली॰) ऋषिभिः कर्त्तव्यं श्राद्धम्, मध्यपदलो॰। ऋषियोंका कर्त्तव्य श्राद्ध। इसमें कार्यकी अपेक्षा आडम्बर अधिक रहता है।}}
{{block center|<poem>
"अनावृतं ऋषिश्राद्धे प्रभाते मेघडम्बरे।
दम्पत्योः कलहे चैव बह्वारम्भे लघुक्रिया॥" {{smaller|( उद्भट )}}
</poem>}}
{{outdent|ऋषिश्रेष्ठ (सं॰ पु॰) १ पुण्डरीक वृक्ष, कमलका पेड़। २ ऋद्धि।}}
{{outdent|ऋषिश्रेष्ठा (सं॰ स्त्री॰) १ ऋद्धि। २ वृद्धि। यह एक ओषधि है।}}
{{outdent|ऋषिषाह् (वै॰ त्रि॰) ऋषिको उत्तेजित करनेवाला। यह शब्द सोमका विशेषण है।}}
{{outdent|ऋषिषाण (वै॰ त्रि॰) १ ऋषिद्वारा आकर्षित। २ ऋषिद्वारा पूजित। {{smaller|( सायण )}}}}
{{outdent|ऋषिषात्, {{smaller|ऋषिषाह् देखो।}}}}
{{outdent|ऋषिषेण (सं॰ पु॰) पुराणोक्त एक राजा।}}
{{outdent|ऋषिष्टुत (सं॰ त्रि॰) ऋषिभिः स्तुतः, आर्षत्वात् षत्वम्। १ ऋषिगण द्वारा स्तव किया हुआ। (पु॰) २ अग्नि, आग।}}
{{outdent|ऋषिसत्तम (सं॰ पु॰) सबसे उत्तम ऋषि, जो सबसे अच्छा ऋषि हो।}}
{{outdent|ऋषिसर्ग (सं॰ पु॰) ऋषीणां सर्गः, ६-तत्। ब्रह्माके आदेशानुसार ऋषियोंकी सृष्टि।}}
{{outdent|ऋषिसृष्टा (सं॰ स्त्री॰) ऋद्धि, एक जड़ी।}}
{{outdent|ऋषिस्तोम (सं॰ पु॰) एक दिवस-साध्य यज्ञ विशेष। इसमें ऋषियोंका स्तव होता है।}}
{{outdent|ऋषिस्वर (वै॰ पु॰) ऋषिभिः सूर्यते स्तूयते, ऋषि-}}
</div>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋष्यमूक'''|'''४४९'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
अध्यापक विलसन साहबके मतानुसार पम्पा नदी ऋष्यमूक पर्वतसे निकल अनागुण्डीके निकट तुङ्गभद्रामें जा मिली है। (Wilson's Mackenzie-Collection, p. 138.)
बेगलर साहब पम्पाकी अवस्थिति मध्यप्रदेशमें बताते हैं। उसका वर्त्तमान नाम राम्प है। (Archæological Survey of India, Reports, Vol. XIII. p. 57)
उक्त दोनों ही मत अयौक्तिक समझ पड़ते हैं। रामायणमें कहा है—
{{block center|<poem>
"एष राम शिवः पन्था यत्रैते पुष्पिता द्रुमाः।
प्रतीचीं दिशमाश्रित्य प्रकाशन्ते मनोरमाः॥२
जम्बू पियालपनसान्यग्रोधप्नक्षतिन्दुकाः।
अश्वत्थाः कर्णिकाराश्च चूताश्चान्ये च पादपाः॥३
धन्वना नागवृक्षाश्च तिलका नक्तमालकाः।
नीलाशोकाः कदम्बाश्च करवीराश्च पुष्पिताः॥४
अग्निमुख्या अशोकाश्च सुरक्ताः पारिभद्रकाः।
<nowiki>*   *   *   *   *</nowiki>
अतिक्रमन्तो वनान् शैलान् शैलाच्चैलं वनाद्वनम् ॥१०
ततः पुष्करिणीं वीरो पम्पां नाम गमिष्यथः।
अशर्करमविभ्रंशां समतीर्थामशैवलाम् ॥११
राम सञ्जात्वालूकां कमलोत्पलशोभिताम्।
तत्र हंसाः प्लवाः क्रौञ्चाः कुरराश्चैव राघव ॥१२
वल्गुस्वरानि कूजन्ति पम्पासलिलगोचराः।" {{smaller|( अरण्य ७३ सर्ग )}}
</poem>}}
हे राम ! ( पम्पाके ) पश्चिम दिग्वर्ती प्रदेश जानेको यही पथ मङ्गलकर है। इसकी चारो ओर पुष्पयुक्त मनोहर जम्बू, पियाल, पनस, वट, प्लक्ष, तिन्दुक अश्वत्थ, कर्णिकार, आम्र, धव, नागकेशर, करञ्ज, तिलक, नील, अशोक, कदम्ब, करवीर, रक्तचन्दन, रक्त अशोक, पारिजात और अन्यान्य वृक्ष प्रकाशित हो रहे हैं। हे वीरद्वय ! आप एक पर्वतसे दूसरा पर्वत और एक वनसे दूसरा वन—अनेक पर्वत एवं अनेक बन लांघ पद्मसमूहसे समाकीर्ण पम्पा नदी पर पहुंचेंगे। उसमें कंकड़ और सेवारका कहीं नाम नहीं, वालुका भरी तथा श्वेत एवं नील पद्मिनी खिली है। हंस, मण्डूक, क्रौञ्च और कुरर पक्षी मनोहर स्वरसे बोला करते हैं।
अपरस्थानमें लिखते हैं—
{{block center|<poem>
"ऋष्यमूकस्तु पम्पायाः पुरस्तात् पुष्पितद्रुमः।
सुदुःखारोहणश्चैव शिशुनागाभिरक्षितः ॥३२
</poem>}}
Vol. III. 113
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
उदारो ब्रह्मणा चैव पूर्वकालेऽभिनिर्मितः ॥" ३३
</poem>}}
दुरारोह्य, नागशिशु-समाकुल, पूर्वकालपर ब्रह्मा द्वारा निर्मित और पुष्पित-वृक्ष-शोभित ऋष्यमूक पर्वत उसी पम्पा नदीके सम्मुख है।
{{block center|<poem>
"तस्यास्तीरे तु पूर्वोक्तः पर्वतो धातुमण्डितः ॥१५
ऋष्यमूक इति ख्यातश्चित्रपुष्पितपादपः।" {{smaller|( अरण्यकाण्ड ७५ सर्ग )}}
</poem>}}
इसी नदीके तीरपर विविध धातुमण्डित एवं पुष्पित वृक्षसमूहसे समाकीर्ण पूर्वोक्त ऋष्यमूक पर्वत है।
रामचन्द्रके समय ऋष्यमूक पर्वत पर यह उद्भिद् उपजते थे—
{{block center|<poem>
"सौमित्रे पश्य पम्पाया दक्षिणे गिरिसानुषु ।
पुष्पितां कर्णिकारस्य यष्टिं परमशोभिताम् ॥ ७३॥
अधिकं शैलराजोऽयं धातुभिस्तु विभूषितः।
विचित्रं सृजते रेणुं वायुवेगविघट्टितम् ॥ ७४ ॥
गिरिप्रस्थास्तु सौमित्रेः सर्वतः सम्प्रपुष्पितैः।
निष्पत्रैः सर्वतो रम्यैः प्रदीप्ता इव किंशुकैः ॥ ७५ ॥
सुचुकुन्दार्जुनैश्चैव दृश्यन्ते गिरिसानुषु।
केतकोद्दालकैश्चैव शिरीषैः शिंशपा धवाः ॥ ८१ ॥
शाल्मल्यः किंशुकाश्चैव रक्ताः कुरुवकास्तथा।
तिनिशा नक्तमालाश्च चन्दनाः स्यन्दनास्तथा ॥ ८२ ॥
हिन्तालास्तिलकाश्चैव नागवृक्षाश्च पुष्पिताः।
पुष्पितान् पुष्पिताग्राभिलताभिः परिवेष्टितान् ॥ ८३ ॥"
{{smaller|( किष्किन्धा १ सर्ग )}}
</poem>}}
हे सुमित्रानन्दन ! पम्पाके दक्षिण भागपर गिरिसानुमें परम शोभित सुपुष्पित कर्णिकाके वृक्ष देखिये। यह शैलराज गैरिकादि धातुसमूहसे विभूषित हो वायुवेगमें विघूर्ण्णित रेणु उत्पन्न करते हैं। गिरिसानुकी चारो ओर पुष्पित पत्रहीन किंशुक चमक रहे हैं। सुचुकुन्द, अर्जुन, केतक, उद्दालक, शिरीष, शिंशपा, धव, शाल्मली, किंशुक, रक्तकुरुवक, तिनिश, करञ्ज, चन्दन, स्यन्दन, हिन्ताल, पुन्नाग और तिलक प्रभृति पुष्पित वृक्ष कैसे सुहावने लगते हैं।
फिर रामायणको देखते ऋष्यमूक और मलय उभय पर्वत निकटस्थ हैं। ऋष्यमूक मलयका एकदेशवर्ती पर्वत है।
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४२६'''|'''ऋग्वेद'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
बोधाग्निमाठरौ तद्वद्याज्ञवल्क्यापराशरौ।
प्रतिशाखास्तु शाखायास्तस्याश्च जगृहुर्मुने॥ १८
इन्द्रप्रमतिरेकां तु संहितां जगृहे ततः
माण्डूकेयं महात्मानं मैत्रेयाध्यापयत् तदा॥ १९
तस्य शिष्यप्रशिष्येभ्यः पुत्रशिष्यान् क्रमाद् ययौ।
वेदमित्रस्तु साकल्यः संहितां तामधीतवान्॥ २०
चकार संहिताः पञ्च शिष्येभ्यः प्रददौ च ताः।
तस्य शिष्यास्तु ये पञ्च तेषां नामानि मे शृणु॥ २१
मुद्गलो गालवश्चैव वात्स्यः शालीय एव च।
शिशिरः पञ्चमश्चासीन्मैत्रेय सुमहामुनिः॥ २२
संहितात्रितयञ्चक्रे शाकपूर्णिरथैतरम्।" {{smaller|(विष्णुपुराण ३।४ अ॰)}}
</poem>}}
प्रथम पैलने ऋग्वेदरुप वृक्ष दो भागमें बांट इन्द्रप्रमति और वास्कलि नामक शिष्यद्वयको दो संहिता कर दिया था। फिर वास्कलिने उसे चार भागमें बांट बोध आदि शिष्योंको सौंपा। बोध, अग्निमाठर, याज्ञवल्क्य और पराशर चारोंने उक्त शाखाको प्रतिशाखा पढ़ीं। हे मैत्रेय ! इन्द्रप्रमतिने अपनी पढ़ी संहिताका एकांश माण्डूकेयको पढ़ाया। उनके शिष्यप्रशिष्यकी परम्परासे क्रमशः यह शाखा फैल पुत्र और शिष्यसमूहमें चल पड़ीं। वेदमित्र और साकल्यने उक्त संहिता अध्ययन की थी। उन्होंने फिर इस शाखासे पांच संहिता बना पांच शिष्यको पढ़ाईं। इन पांचो शिष्यके नाम मुद्गल, गालव, वात्स्य, शालीय और शिशिर थे।
इन्द्रप्रमतिके द्वितीय शिष्यने अपनी अधीत ऋक्को बांट तीन संहिता बनायीं। वास्कलिने भी अपर तीन संहिता की थीं। उन्होंने कालायनि, गार्ग्य और कथाजव नामक तीन शिष्यको तीनों संहिता पढ़ा दीं।
ऋग्वेदमें १० मण्डल हैं। प्रथममें २४ अनुवाक, १९१ सूक्त; द्वितीयमें ४ अनुवाक, ४३ सूक्त; तृतीयमें ५ अनुवाक, ६२ सूक्त; चतुर्थमें ५ अनुवाक, ५८ सूक्त; पञ्चममें ६ अनुवाक, ८७ सूक्त; षष्ठमें ६ अनुवाक, ७५ सूक्त; सप्तमें ६ अनुवाक, १०४ सूक्त; अष्टममें १० अनुवाक, १०३ सूक्त; नवममें ७ अनुवाक, ११४ सूक्त और दशम मण्डलमें १२ अनुवाक, १९१ सूक्त विद्यमान हैं। इस प्रकार सूक्तसमष्टि १०२८ है। किन्तु चरण-व्यूहमें लिखा है—
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{block center|<poem>
"तत्र ऋग्वेदाष्टभेदा भवन्ति चर्चा श्रावकचर्चकः श्रवणोपारः
क्रमपारः क्रमजटाः क्रमरथः क्रमशकटः क्रमदण्डश्चेति चतुष्पारायणमेतेषां।
शाखाः पञ्च भवन्ति, आश्वलायनी, सांख्यायनी, शाकला, वाष्कला माण्डूका-
श्चेति तेषामध्ययनम्। अध्यायानां चतुःषष्टिर्मण्डलानि दशैव तु। वर्गाणां
परिसंख्यातं द्वे सहस्रे चतुःशते॥ सूक्तसमेकं सूक्तानां निविशस्तं विकल्पितम्।
दशसहस्रं च पच्यन्ते संख्यातं वै पदक्रमात्॥ एकशतसहस्रं वा द्विपञ्चाशत्
सहस्रार्द्धमेतानि। चतुर्थं शवासिद्धानामितरेषां पञ्चाशीतिः। ऋचां दशसहस्राणि
ऋचां पञ्चशतानि च। ऋचामशीतिपादश्च पारायणं प्रकीर्त्तितम्। एकर्चं
एकवर्गश्च नवकश्च तथा स्मृतः। द्वौ वर्गौ द्व्यृचश्चौ ज्ञेयौ ऋक्त्रयञ्च शत
स्मृतम्। चतसृर्च्चां पञ्चसप्तत्यधिकञ्च शतं तथा। पञ्चस्वृचां तु द्विशतं
सहस्रं रुद्रसंयुतम्। पञ्चचत्वारिधिकं तु षड़ृक्चान्तु शतत्रयम्। सप्तस्वृचां
शतन्त्रेयं विंशतिचाधिकाः स्मृताः। अष्ट ऋचां तु पञ्चाशत् पञ्चाधिका-
स्तथैव च। दशाधिकद्विसहस्राः पञ्चशाखासु निश्चिताः। वर्गसंख्या न
सूक्तस्य चत्वारश्चात्र कीर्त्तिताः।"
</poem>}}
ऋग्वेदके आठ भेद वा स्थान हैं—चर्चा, श्रावकचर्चक, श्रवणोपयार, क्रमपार, क्रमजटा, क्रमरथ, क्रमशकट और क्रमदण्ड। इनके चार पारायण होते हैं। आश्वलायन, सांख्यायन, शाकल, वास्कल और माण्डूक भेदसे पांच शाखा हैं। अध्याय ६४, मण्डल १०, वर्ग २००६, सूक्त १०१७ वाशिष्ठके पदक्रम १५२५१४ और दूसरेके पदक्रम ८५ पड़ते हैं। ऋक्के १०५८० पादको पारायण कहते हैं। प्रथममें एक वर्ग, १ ऋक्, द्वितीयमें दो वर्ग, २ ऋक्, तृतीयमें १०० ऋक्, चतुर्थमें १७५ ऋक्, पञ्चममें १२४५ ऋक्, षष्ठमें ३०० ऋक्, सप्तममें १२० ऋक् और अष्टम अष्टकमें ५५ ऋक् हैं। पञ्चशाखामें २०१० ऋक् विद्यमान हैं। पूर्व कथित चार वर्ग सूक्तको नहीं।
वास्कल शाखाके अनुसार ऋक् संहिताके संख्यादि इस प्रकार निर्दिष्ट हैं—
{{block center|<poem>
"चतुष्ट्रृचं समाख्यातं षट्सप्तत्युत्तरं शतम्।
पञ्चर्चं द्वादशशतामष्टाविंशोत्तराणि च॥
शतत्रयं षड़ृचञ्च सप्तपञ्चाशदुत्तरम्।
सप्तर्चमेकोनविंशदुत्तरं शतमेककम्॥
अष्टर्चाः पञ्चपञ्चाशदर्चां मुनिबिधौश्वराः"
</poem>}}
शाकलकी १५३७५२ तथा वालखिल्यकी पदसंख्या १२०७ एवं वर्गसंख्या १८, फिर साङ्ख्यायन शाखाकी पदसंख्या इसी प्रकार है। साङ्ख्यायन शाखाकी
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४२६
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ऋक्साम—ऋग्वेद'''|'''४२५'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऋक्साम (सं॰ क्ली॰) ऋक्च साम च तयोः समाहारः, समाहारद्वन्द्व। ऋक् और सामका मिलन।}}
{{outdent|ऋक्सामशृङ्ग (सं॰ पु॰) विष्णु।}}
{{outdent|ऋगयन (सं॰ क्ली॰) ऋचामयनं यत्र, बहुव्री॰। ऋक्-पारायण ग्रन्थ विशेष।}}
{{outdent|ऋगयनादि (सं॰ पु॰) पाणिनि कथित एक गण। इसके अन्तर्गत व्याख्यान, छन्दोगान, छन्दोभाषा, छन्दोविचिति, न्याय, पुनरुक्त, निरुक्त, व्याकरण, निगम, वास्तुविद्या, क्षत्रविद्या, अङ्गविद्या, विद्या, उत्पात, उत्पाद, उद्भाव, सम्बत्सर, मुहूर्त्त, उपनिषद्, निमित्त, शिक्षा और भिक्षा है।}}
{{outdent|ऋगावान (सं॰ क्ली॰) ऋचां आवानं ग्रथनम्, ६-तत्। वेद पढ़ते समय अर्द्ध ऋक् प्रभृति पूर्व पदके साथ सम्मिलन।}}
{{outdent|ऋगगाथा (सं॰ स्त्री॰) ऋचामिव गाथा, उप०। लौकिक गीतिवेद।}}
{{outdent|ऋग्भाक् (सं॰ त्रि॰) ऋक्का भाग लेनेवाला।}}
{{outdent|ऋग्मत् (सं॰ त्रि॰) ऋक् अस्त्यस्य, ऋक्-मतुप्। १ स्तावक, तारीफ़ करनेवाला। २ पूज्य, परस्तिशके काबिल।}}
{{outdent|ऋग्मिन् (सं॰ त्रि॰) ऋक् अस्यास्ति, ऋक्-मिनि। स्तोता, तारीफ़ करनेवाला।}}
{{block center|<poem>
"निर्णिजमृग्मिणो ययुः।" {{smaller|(ऋक् ८।५२।४६)}}
'ऋग्मिणः स्तोतारः।' {{smaller|(सायण)}}
</poem>}}
{{outdent|ऋग्यजुःसामवेदी (सं॰ त्रि॰) ऋक्, यजुः और सामवेद जाननेवाला।}}
{{outdent|ऋग्विधान (सं॰ क्ली॰) ऋग्वेदोक्त मन्त्र द्वारा व्रतविशेषका विधान। इसमें यह वर्णन चलता, ऋग्वेदका कौन मन्त्र जपनेसे क्या फल मिलता है। फिर ऋग्विधान पढ़नेसे जानते, जगत्के आदिग्रन्थ और महाधर्मग्रन्थ ऋग्वेदवाले मन्त्रादि प्राचीन ऋषि किस प्रकार सम्मान एवं पुण्यफलप्रद मानते थे।}}
अग्निपुराणमें इसतरह ऋग्विधान लिखा है—
जलके मध्य अथवा होमके समय प्राणायामपूर्वक गायत्री जपनेसे अभीष्टसिद्धि होती है। जो निराभोजी हो दशसहस्र गायत्री जप करता, उसका सकल
<br><br>Vol. III. 107
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
पाप छूट पड़ता है। हविष्यान्न खा लक्ष गायत्री मन्त्र जपनेवाला मोक्ष लाभका अधिकारी है।
ओङ्कार परब्रह्म है। प्रणवके जपनेसे सर्वपाप छूटता है। जो नाभिमात्र जलमें ठहर शतवार ओङ्कार जपता, उसको देखते ही पाप कांपता है।
तीन मात्रा, तीन वेद, सप्त महाव्याहृति और सप्तलोक उल्लेखपूर्वक होम करनेसे सकल जन्मका पाप छूटता है। जलके मध्य महाव्याहृति और परमा गायत्री जपनेको अघमर्षण कहते हैं। जो वह्निदैवत 'अग्निमीळे पुरोहितम्' (१।१।१) सूक्त यथाविहित एक वत्सर जपता, उसे सकल इष्ट मिलता है। मेधाकामी 'सदसस्पम्', मृत्यु निवारणेच्छु 'युनःशेपमृषिम्', शत्रु एवं विघ्न दमनाभिलाषी 'हिरण्यस्तूपम्', आरोग्यकामी अथवा रोगी 'प्रस्कण्वस्योत्तमम्', आसनकी सिद्धिका इच्छुक मध्याह्नकालको 'उत्तमस्तृत्स', अर्द्ध ऋक् तथा 'उदयत्यायु रघाय्यं तेजः' पूर्ण ऋक्, सूर्यास्त होनेपर गृध्रसे परित्राणेच्छु 'नवयय', मोक्षकामी 'आस्यामित्कोः कः', वस्त्रकामी 'त्वं सोम' और पुष्यकामी मध्यवेलामें 'आपन्नः शोशुचेत्' इत्यादि कामनानुयायी ऋक् यथाविहित जपनेसे सर्वप्रकार सिद्धिलाभ करता है। प्रसवके समय 'प्रमन्दिन्' सूक्त जपनेपर गर्भवेदना अनुभव न कर गर्भिणी सुखसे प्रसव कर सकती है। कर्षणकाल, वपनकाल एवं छेदनकालपर सूक्त द्वारा इन्द्रादि देवगणकी उपासना करनेसे सकल कर्म अमोघ पड़ता और कृषिके कार्यमें उत्कर्ष बढ़ता है। 'विजिगीषु र्वनस्पति' सूक्त जपनेसे मूढ़गर्भा स्त्रीका गर्भ अनायास निकल आता है। {{smaller|(अग्निपु० २६० अ०)}}
{{outdent|ऋग्वेद (सं॰ पु॰) ऋगेव वेदः। प्रथम वेद। यह संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और सूत्रभेदसे चार प्रकारका है।}}
ऋक्संहिताकी नाना शाखा हैं। महापुराणादिमें उल्लेख किया—कृष्णद्वैपायन वेदव्यासने वेद भागकर पैलको ऋग्वेद दिया था।
{{block center|<poem>
"ऋग्वेदं प्रथमं विप्र पैल ऋग्वेदपारगम्।
इन्द्रप्रमतये प्रादाद वाष्कलाय च संहिते॥ १६
चतुर्द्धा स विभेदाथ वाष्कलिर द्विज संहिताम्।
बोध्यादिभ्यो ददौ तास्तु शिष्येभ्यः स महामुनिः॥ १७"
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६६८
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अंजली राजभर
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/* शोधित */
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||करठलग्न-कण्ठागत|६६७}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
रहता, उसपर कृत्रिम झिल्लीका परदा चढ़ते देख पड़ता है। यह रोग सहज होने पर पाठ दिनसे अधिक नहीं चलता, कठिन होनेसे एक पक्ष रहता है। खास-प्रश्वासका पथ रुक जानेसे दो दिन में ही मृत्यु आ पड़ता है।
<Small>चिकित्सा</small>-२ डाम काष्टिक ६ डाम क्षरित जलमें घोल प्रातः और सायंकाल रूईसे गलेके भीतर लगाना चाहिये। कोई कोई ट्रङ्ग हाइड्रोक्लोरिक एसिड १० गुण जलमें मिला प्रलेप चढ़ानेको कहता है। शिशुको कुल्ला करनेका ज्ञान होनेसे १ डाम टिचर फेरिमिठरियस ४ औंस जलमें मिला व्यवहार करना चाहिये। ज्वरके समय १ बूंद टिङ्क्चर एको-नाइट १ औंस जलमें डाल आध-आध डाम दो-दो घण्टे बाद पिलाते हैं।
<Small>होमिओपाथी</small>-अधिक ज्वर, पवसनता, पङ्गप्रत्यङ्गमें व्यथा पौर शिर:पीड़ा होनेसे घण्टे या पाध घण्टे के अन्तर एकोनाइट दिया जाता है। कण्ठ एवं गल-अन्थि घोर रक्तवर्ण लगने, शोथको चारो पोर फुनसी पडने, गले में खेद निकलने और गन्धयुक्त कफ बढ़नेसे माकुरियास घण्टे-घण्टे पर चलता है। सिवा इसके आसेर्निक हाइडेष्टिस प्रयोग करते हैं।
कण्ठलग्न (सं० वि०) १ कण्ठसे बह, गले में बंधा हुआ। २ कण्ठसे लगा हुआ, जो गलेसे चिपटा हो।
कण्ठलता (सं० स्त्री०)१ कण्ठभूषण, गलेका गहना। २ अश्वबन्धन, अगाडी, घोड़ा बांधनेको रस्मो।
कण्ठवर्ती (सं० वि०) कण्ठमत, गलेको घेरे हुआ ।
कण्ठशालुक (सं० पु०) कण्डगत मुखरोगविशेष,गलेको एक बीमारी । इस रोगमें कफके कोपसे कण्ठ-मध्य शालुक-कन्दवत् बदरास्थिकी पाक्छति स्वरस्पर्श एवं कठिन ग्रन्थि पड़ जाता है। इससे कण्टक-शूकवत् वेदना बढ़ती है। कण्ठशालुक रोग शस्त्र-साध्य है। <Small>(राजनिघष्ट)</small>
कण्ठशुण्डी (सं० स्त्री०) तालुगत मुखरोगविशेष,मुंहके तालू को एक बीमारी। दूषित कफ और रक्त तालुमूलमें दीर्घावति पथच वायुपूर्ण मिस्ति-जैसा जो शोध उठाता, वही रोग कण्ठशण्डी कहाता है। इस
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रोगमें पिपासा, कास और खासका वेग बढ़ता है। इसका नामान्तर गलशुण्डो और तालुशुण्डी है।
<Small>चिकित्सा</small>-१ कण्ठशुण्डो रोगमें शोधको छेदन कर विकटु, वच, मधु एवं सैन्धव अथवा कुष्ठ, मरिच, सैन्धवलवण, पिप्पलो, पाकनादि तथा गुगगुलु सकल द्रव्य दारा घिस देना चाहिये। उक्त औषध घृतके साथ घर्षण और नासिकाके समोपवर्ती स्थानसे रक्त मोक्षण करते हैं। ३ हरसिंघार वृक्षका मूल चबानेसे कण्ठशुण्डी रोग विनष्ट होता है। अतिविषा, पाकनादि, राना, कटुको और निम्बत्वक् सकल ट्रव्यका क्वाथ बना कुल्ला करनेसे कण्ठशुण्डो कट जाती है। <Small>(चक्रदत्त)</small>
कण्ठशदि (सं० स्त्री०) गलका कफादिसे अलिप्तत्व, गलेकी सफाई।
कण्ठशूक, <small>कलशालुक देखो।</small>
कण्ठयोष (सं० पु०) १पित्तजन्य रोगविशेष, सफरसे पैदा होनेवालो एक बीमारो। २ गलको शुष्कता, गलेकी खुश्को। ३ निरर्थक प्रत्यादेश, बेफायदा रोक-टाक।
कण्ठसज्जन (सं० लो०) कण्ठे सज्जनम्, ७-तत्। कण्ठसे लग्न होकर आलिङ्गन, गलेसे मिलकर चिपटाचिपटी।
कण्ठसूत्र (सं० लो० ) कण्ठ सूत्र इव, उपमि। १माला, हार। २पालिङ्गन विशेष, किसी किस्मको हमागोयो । <Small>{{center|<poem>“यः कुर्वते वचसि वजमस्य स्तनाभिघात निविड़ीपघातात। परिश्रमातः सनकैर्विदग्धास्तत्कण्ठस्त्र प्रवदन्ति तज्ञ्चाः।"</poem>}} (रतिशास्त्र)</small>
कण्ठस्थः (सं० त्रि०) कण्ठ तिष्ठति, कण्ठ-रखा-क। १ मुख स्थ, जबानो, जो अच्छीतरह याद किया गया हो। २ कण्ठलग्न, गलेसे लमा हुपा। ३गबदेश पर रखा हुपा, जो गलेपर हो। ४ कण्ठस्थानीय, गलेसे निकलनेवाला।
कण्ठस्थाली (सं० स्त्री०) चन्द्रहोपके अन्तर्गत एक प्राचीन महाग्राम। <Small>(भविश्य० नखस १२१६)</small>
कण्डा, <small>कंठा देखो।</small>
कण्डामत (सं० वि०) करछे पागतः, ७- तत्।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२३
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४८२|ओई—ओखल|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ज़ोरकी आवाज़। २ वकविशेष, किसी क़िस्मका बगला। ३ वकविशेषका अव्यक्त शब्द, किसी बगलेकी बोली।
ओई (हिं॰ स्त्री॰) वृक्षविशेष, एक दरख़्त।
ओक (सं॰ त्की॰) उच–क निपातनात् साधुः। १ गृह, घर। २ आश्रय, ठिकाना। (पु॰) ३ पक्षी, चिड़िया। ४ शूद्र, वृषल।
ओकः (सं॰ त्की॰) उच्यते समवैति अस्मिन्, उच–असुन्। १ आश्रय, ठिकाना। २ गृह, घर। ३ स्थान, मुक़ाम।
ओक्कान—१ निम्नब्रह्मदेशस्य पेगू प्रान्तके हन्तावाड़ी ज़िलेकी एक नदी। यह पेगू–योमा पर्वतसे निकल मागोनके समीप हलैंगमें जा गिरती है। ओक्कान नदी बहुत छोटी है। किन्तु वर्षा के समय ओक्कान
ग्रामतक इसमें बड़ी–बड़ी नावें चल सकती है। साखू और दूसरी लकड़ीके इट्ठे इसमें बहाकर हलैंग पहुंचाये जाते हैं। २ निम्न् ब्रह्मके हन्तावाड़ी जिलेका एक ग्राम। यह हलैंग नदीसे ५ मील पश्चिम अवस्थित है। इसमें दो सराय पर दो वर्गाकार निर्मित बौद्ध मन्दिर हैं। सुननेमें आया, प्रायः ३०० वर्ष हुये किसी तैलङ्गने इसे बसाया था।
ओककेतु—बम्बई प्रान्तस्थ मालखेड़वाले राष्ट्रकूट राजावोंके छत्रका चिह्न। सिरूरके शिलालेखमें लिखते,
कि अमोघवर्षके तीन राजच्छत्र रहे—शङ्ल, पालिध्वज और ओककेतु।
ओकण (सं॰ पु॰) केशकीट; जूं।
ओकणि (सं॰ पु॰) मत्कुण, खटमल।
ओक़ताई खान्—चङ्गीज़ खान्के बड़े लड़के। १२२७ ई॰को इन्हें अपने पिताके राज्य तातार और उत्तर–चीनका उत्तराधिकार मिला था। १२४२ ई॰को यह अधिक शराब पीनेसे मर गये। ओक़ताई खान् बड़े सहृदय रहे। यह अपनी प्रजाको निरपेक्ष भाव और न्यायसे शासन करते थे। इनकी वीरता और बुद्धिमत्ता प्रसिद्ध है। ओक़ताई खान् बड़े दानी थे। राज्यका उत्तराधिकार इनके पुत्र याक़ूब खान्को मिला।
{{Multicol-break}}
ओकना (हिं॰ क्रि॰) १ वमन करना क़ै निकालना। २ महिषवत् शब्द करना, भैंसकी तरह बोलना।
ओकनी (सं॰ सत्री॰) ओकणि देखो।
ओकपति (सं॰ पु॰) सूर्य वा चन्द्र, आफ़ताब या माहताब।
ओकरी (सं॰ सत्री॰) राजगृह के अन्तर्गत एक
प्राचीन ग्राम । भविष्य प्रखण्ड में लिखा है-
कलियुग मध्य यहां शस्यजीवी कृषक वास
करेंगे। कलिकालमें चोकका नारोगण देवा चोर
हिजगयातिपरायण होगा। यहां के लोग पाप
कारण सर्पाघातसे विनष्ट होंगे। ( भ० ब्रह्मखण्ड ३२/५०-५२ )
धोकाई (हिं० स्त्री० ) १ वमन, क । २ वमनेच्छा,
के करनेकौ खाहिश ।
चो देखो।
घोकार (स ं० पु० ) 'भो', श्रो अक्षर ।
चीकारान्त (सं०] [वि०) अन्तमें चोकार रखनेवाला,
जिसके पछोर 'ओ' रहे ।
श्रोकिवस् ( सं ० वि० ) उच क्कसु । समवेत, एकत्र,
मिला था।
धोको,
घोकुल
चोकाई देखो।
(सं० पु० ) उच-उलच निपातनात् साधुः ।
अर्धगन्ध, श्रपक्क गोधूम । वैद्यक मतसे यह गुरु,
शुक्रवर्धक, मधुर, बलकारक, स्निग्ध, रुचिकारक,
मत्ततावर्धक और रक्त एवं वायुनाशक होता है ।
चाकोदनों (सं. स्त्री०) चीक: घाययस्थानमदन'
यस्याः, बहुव्रो० । मत्कुण, खटमल ।
श्रीकोदशानी (सं० स्त्री० ) प्राचीर, दीवार ।
श्रक्कणी ( स ं॰ स्त्री॰ ) श्रोच कण अच्- ङीप् । मत्कुण,
खटमल ।
श्रका (सं० त्रि०) १ गृहवासोके निमित्त उत्तम,
जो घरमें रहनेवालेके मुवाफिक हो । (क्लो०) २ प्रस-
व्रता, खु.शौ । २ सुविधाजनक स्थान, पाराम देने
वाली जगह । ४ विधामागार, मकान् ।
निरपेक्ष भाव
चोखट (हिं० स्त्रो) श्रीषच, दवा ।
दानो थे ।
खानुको
पोखरी,
श्रीखली देखो ।
।
पोखरा (हिं.पु.) १ ऊपर पड़ती मोन् २ उदू-
खल, चोखली ।
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आदेश यादव
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ज़ोरकी आवाज़। २ वकविशेष, किसी क़िस्मका बगला। ३ वकविशेषका अव्यक्त शब्द, किसी बगलेकी बोली।
ओई (हिं॰ स्त्री॰) वृक्षविशेष, एक दरख़्त।
ओक (सं॰ त्की॰) उच–क निपातनात् साधुः। १ गृह, घर। २ आश्रय, ठिकाना। (पु॰) ३ पक्षी, चिड़िया। ४ शूद्र, वृषल।
ओकः (सं॰ त्की॰) उच्यते समवैति अस्मिन्, उच–असुन्। १ आश्रय, ठिकाना। २ गृह, घर। ३ स्थान, मुक़ाम।
ओक्कान—१ निम्नब्रह्मदेशस्य पेगू प्रान्तके हन्तावाड़ी ज़िलेकी एक नदी। यह पेगू–योमा पर्वतसे निकल मागोनके समीप हलैंगमें जा गिरती है। ओक्कान नदी बहुत छोटी है। किन्तु वर्षा के समय ओक्कान
ग्रामतक इसमें बड़ी–बड़ी नावें चल सकती है। साखू और दूसरी लकड़ीके इट्ठे इसमें बहाकर हलैंग पहुंचाये जाते हैं। २ निम्न् ब्रह्मके हन्तावाड़ी जिलेका एक ग्राम। यह हलैंग नदीसे ५ मील पश्चिम अवस्थित है। इसमें दो सराय पर दो वर्गाकार निर्मित बौद्ध मन्दिर हैं। सुननेमें आया, प्रायः ३०० वर्ष हुये किसी तैलङ्गने इसे बसाया था।
ओककेतु—बम्बई प्रान्तस्थ मालखेड़वाले राष्ट्रकूट राजावोंके छत्रका चिह्न। सिरूरके शिलालेखमें लिखते,
कि अमोघवर्षके तीन राजच्छत्र रहे—शङ्ल, पालिध्वज और ओककेतु।
ओकण (सं॰ पु॰) केशकीट; जूं।
ओकणि (सं॰ पु॰) मत्कुण, खटमल।
ओक़ताई खान्—चङ्गीज़ खान्के बड़े लड़के। १२२७ ई॰को इन्हें अपने पिताके राज्य तातार और उत्तर–चीनका उत्तराधिकार मिला था। १२४२ ई॰को यह अधिक शराब पीनेसे मर गये। ओक़ताई खान् बड़े सहृदय रहे। यह अपनी प्रजाको निरपेक्ष भाव और न्यायसे शासन करते थे। इनकी वीरता और बुद्धिमत्ता प्रसिद्ध है। ओक़ताई खान् बड़े दानी थे। राज्यका उत्तराधिकार इनके पुत्र याक़ूब खान्को मिला।
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ओकना (हिं॰ क्रि॰) १ वमन करना क़ै निकालना। २ महिषवत् शब्द करना, भैंसकी तरह बोलना।
ओकनी (सं॰ सत्री॰) ओकणि देखो।
ओकपति (सं॰ पु॰) सूर्य वा चन्द्र, आफ़ताब या माहताब।
ओकरी (सं॰ स्त्री॰) राजगृह के अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम। भविष्यब्रह्मखण्ड में लिखा है—
कलियुगके मध्य यहां शस्यजीवी कृषक वास करेंगे। कलिकालमें ओकरीका नारीगण वेश्या और
द्विजगण वेश्यावृत्तिपरायण होगा। यहांके लोग पापके कारण सर्पाघातसे विनष्ट होंगे। {{smaller|(भ॰ ब्रह्मखण्ड ३२।५०–५२)}}
ओकाई (हिं॰ स्त्री॰) १ वमन, क़ै। २ वमनेच्छा, क़ै करनेकी ख़ाहिश।
ओकार (सं॰ पु॰) 'ओ', ओ अक्षर। {{smaller|ओ देखो।}}
ओकारान्त (सं॰ त्रि॰) अन्तमें ओकार रखनेवाला, जिसके अख़ीरमें 'ओ' रहे।
ओकिवस् (सं॰ त्रि॰) उच–क्वसु। समवेत, एकत्र, मिला हुआ।
ओकी, {{smaller|ओकाई देखो।}}
ओकुल (सं॰ पु॰) उच-उलच निपातनात् साधुः ।
अर्धगन्ध, श्रपक्क गोधूम । वैद्यक मतसे यह गुरु,
शुक्रवर्धक, मधुर, बलकारक, स्निग्ध, रुचिकारक,
मत्ततावर्धक और रक्त एवं वायुनाशक होता है ।
चाकोदनों (सं. स्त्री०) चीक: घाययस्थानमदन'
यस्याः, बहुव्रो० । मत्कुण, खटमल ।
श्रीकोदशानी (सं० स्त्री० ) प्राचीर, दीवार ।
श्रक्कणी ( स ं॰ स्त्री॰ ) श्रोच कण अच्- ङीप् । मत्कुण,
खटमल ।
श्रका (सं० त्रि०) १ गृहवासोके निमित्त उत्तम,
जो घरमें रहनेवालेके मुवाफिक हो । (क्लो०) २ प्रस-
व्रता, खु.शौ । २ सुविधाजनक स्थान, पाराम देने
वाली जगह । ४ विधामागार, मकान् ।
निरपेक्ष भाव
चोखट (हिं० स्त्रो) श्रीषच, दवा ।
दानो थे ।
खानुको
पोखरी,
श्रीखली देखो ।
।
पोखरा (हिं.पु.) १ ऊपर पड़ती मोन् २ उदू-
खल, चोखली ।<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ज़ोरकी आवाज़। २ वकविशेष, किसी क़िस्मका बगला। ३ वकविशेषका अव्यक्त शब्द, किसी बगलेकी बोली।
ओई (हिं॰ स्त्री॰) वृक्षविशेष, एक दरख़्त।
ओक (सं॰ त्की॰) उच–क निपातनात् साधुः। १ गृह, घर। २ आश्रय, ठिकाना। (पु॰) ३ पक्षी, चिड़िया। ४ शूद्र, वृषल।
ओकः (सं॰ त्की॰) उच्यते समवैति अस्मिन्, उच–असुन्। १ आश्रय, ठिकाना। २ गृह, घर। ३ स्थान, मुक़ाम।
ओक्कान—१ निम्नब्रह्मदेशस्य पेगू प्रान्तके हन्तावाड़ी ज़िलेकी एक नदी। यह पेगू–योमा पर्वतसे निकल मागोनके समीप हलैंगमें जा गिरती है। ओक्कान नदी बहुत छोटी है। किन्तु वर्षा के समय ओक्कान ग्रामतक इसमें बड़ी–बड़ी नावें चल सकती है। साखू और दूसरी लकड़ीके इट्ठे इसमें बहाकर हलैंग पहुंचाये जाते हैं। २ निम्न् ब्रह्मके हन्तावाड़ी जिलेका एक ग्राम। यह हलैंग नदीसे ५ मील पश्चिम अवस्थित है। इसमें दो सराय पर दो वर्गाकार निर्मित बौद्ध मन्दिर हैं। सुननेमें आया, प्रायः ३०० वर्ष हुये किसी तैलङ्गने इसे बसाया था।
ओककेतु—बम्बई प्रान्तस्थ मालखेड़वाले राष्ट्रकूट राजावोंके छत्रका चिह्न। सिरूरके शिलालेखमें लिखते, कि अमोघवर्षके तीन राजच्छत्र रहे—शङ्ल, पालिध्वज और ओककेतु।
ओकण (सं॰ पु॰) केशकीट; जूं।
ओकणि (सं॰ पु॰) मत्कुण, खटमल।
ओक़ताई खान्—चङ्गीज़ खान्के बड़े लड़के। १२२७ ई॰को इन्हें अपने पिताके राज्य तातार और उत्तर–चीनका उत्तराधिकार मिला था। १२४२ ई॰को यह अधिक शराब पीनेसे मर गये। ओक़ताई खान् बड़े सहृदय रहे। यह अपनी प्रजाको निरपेक्ष भाव और न्यायसे शासन करते थे। इनकी वीरता और बुद्धिमत्ता प्रसिद्ध है। ओक़ताई खान् बड़े दानी थे। राज्यका उत्तराधिकार इनके पुत्र याक़ूब खान्को मिला।
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ओकना (हिं॰ क्रि॰) १ वमन करना क़ै निकालना। २ महिषवत् शब्द करना, भैंसकी तरह बोलना।
ओकनी (सं॰ सत्री॰) ओकणि देखो।
ओकपति (सं॰ पु॰) सूर्य वा चन्द्र, आफ़ताब या माहताब।
ओकरी (सं॰ स्त्री॰) राजगृह के अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम। भविष्यब्रह्मखण्ड में लिखा है—
कलियुगके मध्य यहां शस्यजीवी कृषक वास करेंगे। कलिकालमें ओकरीका नारीगण वेश्या और
द्विजगण वेश्यावृत्तिपरायण होगा। यहांके लोग पापके कारण सर्पाघातसे विनष्ट होंगे। {{smaller|(भ॰ ब्रह्मखण्ड ३२।५०–५२)}}
ओकाई (हिं॰ स्त्री॰) १ वमन, क़ै। २ वमनेच्छा, क़ै करनेकी ख़ाहिश।
ओकार (सं॰ पु॰) 'ओ', ओ अक्षर। {{smaller|ओ देखो।}}
ओकारान्त (सं॰ त्रि॰) अन्तमें ओकार रखनेवाला, जिसके अख़ीरमें 'ओ' रहे।
ओकिवस् (सं॰ त्रि॰) उच–क्कसु।व्कसु समवेत, एकत्र, मिला हुआ।
ओकी, {{smaller|ओकाई देखो।}}
ओकुल (सं॰ पु॰) उच-उलच् निपातनात् साधुः। अर्धगन्ध, अपक्क गोधूम। वैद्यके मतसे यह गुरु,
शुक्रवर्धक, मधुर, बलकारक, स्निग्ध, रुचिकारक, मत्ततावर्धक और रक्त एवं वायुनाशक होता है।
ओकोदनी (सं॰ स्त्री॰) ओक: आश्रयस्थानमदनं यस्याः, बहुव्री॰। मत्कुण, खटमल।
ओकोदशानी (सं॰ स्त्री॰) प्राचीर, दीवार।
ओक्कणी (सं॰ स्त्री॰) ओच–कण–अच्–ङीप्। मत्कुण, खटमल।
ओक्य (सं॰ त्रि॰) १ गृहवासीके निमित्त उत्तम, जो घरमें रहनेवालेके मुवाफ़िक हो। (त्की॰) २ प्रसन्नता, ख़ुशी। ३ सुविधाजनक स्थान, आराम देनेवाली जगह। ४ विश्रामागार, मकान्।
ओखद (हिं॰ स्त्री॰) औषध, दवा।
ओखरी, {{smaller|ओखली देखो।}}
ओखल (हिं॰ पु॰) १ ऊषर, पड़ती ज़मीन्। २ उदूखल, ओखली।<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ज़ोरकी आवाज़। २ वकविशेष, किसी क़िस्मका बगला। ३ वकविशेषका अव्यक्त शब्द, किसी बगलेकी बोली।
ओई (हिं॰ स्त्री॰) वृक्षविशेष, एक दरख़्त।
ओक (सं॰ त्की॰) उच–क निपातनात् साधुः। १ गृह, घर। २ आश्रय, ठिकाना। (पु॰) ३ पक्षी, चिड़िया। ४ शूद्र, वृषल।
ओकः (सं॰ त्की॰) उच्यते समवैति अस्मिन्, उच–असुन्। १ आश्रय, ठिकाना। २ गृह, घर। ३ स्थान, मुक़ाम।
ओक्कान—१ निम्नब्रह्मदेशस्य पेगू प्रान्तके हन्तावाड़ी ज़िलेकी एक नदी। यह पेगू–योमा पर्वतसे निकल मागोनके समीप हलैंगमें जा गिरती है। ओक्कान नदी बहुत छोटी है। किन्तु वर्षा के समय ओक्कान ग्रामतक इसमें बड़ी–बड़ी नावें चल सकती है। साखू और दूसरी लकड़ीके इट्ठे इसमें बहाकर हलैंग पहुंचाये जाते हैं। २ निम्न् ब्रह्मके हन्तावाड़ी जिलेका एक ग्राम। यह हलैंग नदीसे ५ मील पश्चिम अवस्थित है। इसमें दो सराय पर दो वर्गाकार निर्मित बौद्ध मन्दिर हैं। सुननेमें आया, प्रायः ३०० वर्ष हुये किसी तैलङ्गने इसे बसाया था।
ओककेतु—बम्बई प्रान्तस्थ मालखेड़वाले राष्ट्रकूट राजावोंके छत्रका चिह्न। सिरूरके शिलालेखमें लिखते, कि अमोघवर्षके तीन राजच्छत्र रहे—शङ्ल, पालिध्वज और ओककेतु।
ओकण (सं॰ पु॰) केशकीट; जूं।
ओकणि (सं॰ पु॰) मत्कुण, खटमल।
ओक़ताई खान्—चङ्गीज़ खान्के बड़े लड़के। १२२७ ई॰को इन्हें अपने पिताके राज्य तातार और उत्तर–चीनका उत्तराधिकार मिला था। १२४२ ई॰को यह अधिक शराब पीनेसे मर गये। ओक़ताई खान् बड़े सहृदय रहे। यह अपनी प्रजाको निरपेक्ष भाव और न्यायसे शासन करते थे। इनकी वीरता और बुद्धिमत्ता प्रसिद्ध है। ओक़ताई खान् बड़े दानी थे। राज्यका उत्तराधिकार इनके पुत्र याक़ूब खान्को मिला।
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ओकना (हिं॰ क्रि॰) १ वमन करना क़ै निकालना। २ महिषवत् शब्द करना, भैंसकी तरह बोलना।
ओकनी (सं॰ सत्री॰) ओकणि देखो।
ओकपति (सं॰ पु॰) सूर्य वा चन्द्र, आफ़ताब या माहताब।
ओकरी (सं॰ स्त्री॰) राजगृह के अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम। भविष्यब्रह्मखण्ड में लिखा है—
कलियुगके मध्य यहां शस्यजीवी कृषक वास करेंगे। कलिकालमें ओकरीका नारीगण वेश्या और
द्विजगण वेश्यावृत्तिपरायण होगा। यहांके लोग पापके कारण सर्पाघातसे विनष्ट होंगे। {{smaller|(भ॰ ब्रह्मखण्ड ३२।५०–५२)}}
ओकाई (हिं॰ स्त्री॰) १ वमन, क़ै। २ वमनेच्छा, क़ै करनेकी ख़ाहिश।
ओकार (सं॰ पु॰) 'ओ', ओ अक्षर। {{smaller|ओ देखो।}}
ओकारान्त (सं॰ त्रि॰) अन्तमें ओकार रखनेवाला, जिसके अख़ीरमें 'ओ' रहे।
ओकिवस् (सं॰ त्रि॰) उच–व्कसु। समवेत, एकत्र, मिला हुआ।
ओकी, {{smaller|ओकाई देखो।}}
ओकुल (सं॰ पु॰) उच-उलच् निपातनात् साधुः। अर्धगन्ध, अपव्क गोधूम। वैद्यके मतसे यह गुरु,
शुक्रवर्धक, मधुर, बलकारक, स्निग्ध, रुचिकारक, मत्ततावर्धक और रक्त एवं वायुनाशक होता है।
ओकोदनी (सं॰ स्त्री॰) ओक: आश्रयस्थानमदनं यस्याः, बहुव्री॰। मत्कुण, खटमल।
ओकोदशानी (सं॰ स्त्री॰) प्राचीर, दीवार।
ओक्कणी (सं॰ स्त्री॰) ओच–कण–अच्–ङीप्। मत्कुण, खटमल।
ओक्य (सं॰ त्रि॰) १ गृहवासीके निमित्त उत्तम, जो घरमें रहनेवालेके मुवाफ़िक हो। (त्की॰) २ प्रसन्नता, ख़ुशी। ३ सुविधाजनक स्थान, आराम देनेवाली जगह। ४ विश्रामागार, मकान्।
ओखद (हिं॰ स्त्री॰) औषध, दवा।
ओखरी, {{smaller|ओखली देखो।}}
ओखल (हिं॰ पु॰) १ ऊषर, पड़ती ज़मीन्। २ उदूखल, ओखली।<noinclude>{{Multicol-end}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२२
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ऐषुकारि—ओआक|४८१}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ऐषुकारि (सं॰ पु॰) एषुकारस्य अपत्यम्, इषुकार–इञ्। वाणनिर्माताका पुत्र, तीर बनानेवालेका बेटा।
ऐषुकारिभक्त (सं॰ त्की॰) ऐषुकारिणां विषयो देशः, ऐषुकारि–भक्तल्। {{smaller|भोरिक्याघैषु कार्यादिम्बो विधल्भक्तलौ। पा ४।२।५४।}} १ ऐषुकारिविषय। २ ऐषुकारि देश, जिस मुल्क में तीर बनानेवाले रहें।
ऐषुकार्यादि (सं॰ पु॰) पाणिन्युक्त गणविशेष। इसमें ऐषुकारि, सारस्यायन, चान्द्रायण, द्व्याक्षायण, त्र्याक्षायण, औड़ायन, जौलायन, खाड़ायन, दासमित्रि, दासमित्रायण, शौद्रायण, दाक्षायण, शायण्डायन, तार्च्छायण, शौभ्रायण, सौवीर, सौवीरायण, शयण्ड, शौण्ड, शयाण्ड, वैश्वमानव, वैश्वधेनव, नड़, तुण्डदेव, विश्वदेव और सापिण्डि शब्द पड़ता है।
ऐष्टक (सं॰ त्की॰) याज्ञिक ईंटोंका ढेर।
ऐष्टिक (सं॰ पु॰) ईष्टि–ठक्। १ इष्टिके व्याख्यानका ग्रन्थ। २ यज्ञके हितका विषय। ३ अन्तर्वेदिक कर्मविशेष। (त्रि॰) ४ यज्ञ के साधनमें समर्थ। ५ यज्ञ–सम्बन्धीय।
ऐष्टिकपौर्तिक (सं॰ त्रि॰) इष्टापूर्त–सम्बन्धीय। ऐसा (हिं॰ क्रि॰–वि॰) इस प्रकारसे, इस तौरपर।
ऐहलौकिक (सं॰ त्रि॰) इहलोके भवः, इहलोक–ठक्। १ वर्तमान जन्मसम्बन्धीय। २ मर्त्यलोक
सम्बन्धीय, इस दुनिया से सरोकार रखनेवाला।
ऐहिक (सं० वि०) भवम् -ठक् । १ इह
लोक-जात, इस दुनियासे पैदा । २ इहलोक-सम्बन्धीय,
इस दुनियासे सरोकार रखनेवाला ।
ऐहिकदर्शी (सं० वि० ) इहलोकके कार्य निरीक्षण-
करनेवाला, जो इस दुनियाके काम देखता हो ।'
ऐहोल - बम्बईप्रान्तके वीजापुर जिलेका एक ग्राम
यहां जो शिलालेख मिला, उसमें २य पुलकेशीका
परिचय पड़ा है।
ओ
ओ—स्वरवर्णका त्रयोदश अश्चर । इसके उच्चारणका
स्थान कण्ठ ं और प्रोष्ठ है। यह वर्ण दीर्घ एवं झुत
भेदसे दो प्रकारका होता है। कामधेनुसन्धमें कहा,
कि बोकार पक्षदेवमय विद्युताकार, चिगुणात्मक,
{{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}131}}{{Multicol-break}}
ईश्वर, पचमाचमय, देवमाता चोर परमकुण्डली है।
लिखने में यह वाम दिवसे कुण्डली वन दचिप दि
मध्यस्थल में सिकुड़ेगा, उसके पीछे अधोदेशमें पुनर्वार
वामदिकको चलेगा। इसको सकल में ब्रह्मा,
विष्णु और महेश्वर अवस्थान करते हैं। इसकी मात्रा
ब्रह्मरूपियो महामति है। (वर्षोहारतन्त्र )
तन्त्रात्रो प्रकारका नाम-सत्य, पीयूष, पथि-
मास्य, श्रुति, शिरा, सद्योजात, वासुदेव, गायत्री, दो-
जङ्घक, आप्यायनी, ऊर्ध्वदन्त, लक्ष्मी, वाणी, मुखी, द्दिज,
उद्देश्यदर्शक, तीव्र, कैलास, वसुधाचर, प्रणवांध,
ब्रह्मसूत्र, अजेश, सर्वमङ्गला, त्रयोदशी, दीर्घनासा,
रतिनाथ, दिगम्बरा, वं लोकयविजया, प्रभा पर प्रीति-
वोजादिकर्षण है। माढकान्यासके अनुसार
दन्तको पंचियर न्यास किये जानेगे अभिधानमें
चोकारका एक नाम 'ऊर्ध्व दन्तपंक्ति' भी है।
२ धातुका एक अनुबन्ध। “भोर्निष्ठा त नः ।” ( कविकल्पदुम)
( अव्य० ) ३ सम्बोधन । ४ ब्राह्नान । ५ स्मरण ।
६ अनुकम्पा ( पु० ) ७ ब्रह्मा ।
ओं (सं० अव्य० ) १ ओङ्कार, प्रणव । ओम् देखो ।
२ तथास्तु, आमोन्, बहुत अच्छा ।
पॉइना (हिं० क्रि०) वारना, सदके या न्योछावर
करना ।
ओंकना, ओकना देखो।
आँगना (हिं० क्रि०) शकटके श्रचिमें तेल देना,
गांड़ीके घुरमें तेल लगाना। ओंगने से शकटका चक्र
बेखटके चलता है |
घोंगा (हिं० पु० ) अपामार्ग, लटजीरा ।
ओटना, चोटना देखो।
ओंठ (हिं०) श्रेष्ठ देखो।
घोड़ा (चिं०वि०) १ गभीर, गहरा (पुं) २. मले
गड्डा । ३ सेंध ।
(हिं.पु.) विशेष, एक रखो। इससे छाजन
पूरी करनेकी लकड़ियां बांधी जाती है।
श्रधा ( हिं० पु० ) हस्ती पकड़नेका गर्त, हाथो
फांसनेका गड़ो।
श्रोषाक (सं अव्य०) १ वमनके वेगका शब्द, के<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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ऐषुकारिभक्त (सं॰ त्की॰) ऐषुकारिणां विषयो देशः, ऐषुकारि–भक्तल्। {{smaller|भोरिक्याघैषु कार्यादिम्बो विधल्भक्तलौ। पा ४।२।५४।}} १ ऐषुकारिविषय। २ ऐषुकारि देश, जिस मुल्क में तीर बनानेवाले रहें।
ऐषुकार्यादि (सं॰ पु॰) पाणिन्युक्त गणविशेष। इसमें ऐषुकारि, सारस्यायन, चान्द्रायण, द्व्याक्षायण, त्र्याक्षायण, औड़ायन, जौलायन, खाड़ायन, दासमित्रि, दासमित्रायण, शौद्रायण, दाक्षायण, शायण्डायन, तार्च्छायण, शौभ्रायण, सौवीर, सौवीरायण, शयण्ड, शौण्ड, शयाण्ड, वैश्वमानव, वैश्वधेनव, नड़, तुण्डदेव, विश्वदेव और सापिण्डि शब्द पड़ता है।
ऐष्टक (सं॰ त्की॰) याज्ञिक ईंटोंका ढेर।
ऐष्टिक (सं॰ पु॰) ईष्टि–ठक्। १ इष्टिके व्याख्यानका ग्रन्थ। २ यज्ञके हितका विषय। ३ अन्तर्वेदिक कर्मविशेष। (त्रि॰) ४ यज्ञ के साधनमें समर्थ। ५ यज्ञ–सम्बन्धीय।
ऐष्टिकपौर्तिक (सं॰ त्रि॰) इष्टापूर्त–सम्बन्धीय। ऐसा (हिं॰ क्रि॰–वि॰) इस प्रकारसे, इस तौरपर।
ऐहलौकिक (सं॰ त्रि॰) इहलोके भवः, इहलोक–ठक्। १ वर्तमान जन्मसम्बन्धीय। २ मर्त्यलोक
सम्बन्धीय, इस दुनिया से सरोकार रखनेवाला।
ऐहिक (सं॰ त्रि॰) इह, भवम्, इह–ठक्। १ इहलोक–जात, इस दुनियासे पैदा। २ इहलोक–सम्बन्धीय, इस दुनियासे सरोकार रखनेवाला।
ऐहिकदर्शी (सं॰ त्रि॰) इहलोकके कार्य निरीक्षण–करनेवाला, जो इस दुनियाके काम देखता हो।
ऐहोल—बम्बईप्रान्तके वीजापुर ज़िलेका एक ग्राम। यहां जो शिलालेख मिला, उसमें २य पुलकेशीका
परिचय पड़ा है।
{{c|'''ओ'''}}
ओ—स्वरवर्णका त्रयोदश अक्षर। इसके उच्चारणका स्थान कण्ठ और ओष्ठ है। यह वर्ण दीर्घ एवं प्लुत भेदसे दो प्रकारका होता है। कामधेनुतन्त्रमें कहा, कि ओकार पञ्चदेवमय रक्तविद्युताकार, चिगुणात्मक,
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ईश्वर, पचमाचमय, देवमाता चोर परमकुण्डली है।
लिखने में यह वाम दिवसे कुण्डली वन दचिप दि
मध्यस्थल में सिकुड़ेगा, उसके पीछे अधोदेशमें पुनर्वार
वामदिकको चलेगा। इसको सकल में ब्रह्मा,
विष्णु और महेश्वर अवस्थान करते हैं। इसकी मात्रा
ब्रह्मरूपियो महामति है। (वर्षोहारतन्त्र )
तन्त्रात्रो प्रकारका नाम-सत्य, पीयूष, पथि-
मास्य, श्रुति, शिरा, सद्योजात, वासुदेव, गायत्री, दो-
जङ्घक, आप्यायनी, ऊर्ध्वदन्त, लक्ष्मी, वाणी, मुखी, द्दिज,
उद्देश्यदर्शक, तीव्र, कैलास, वसुधाचर, प्रणवांध,
ब्रह्मसूत्र, अजेश, सर्वमङ्गला, त्रयोदशी, दीर्घनासा,
रतिनाथ, दिगम्बरा, वं लोकयविजया, प्रभा पर प्रीति-
वोजादिकर्षण है। माढकान्यासके अनुसार
दन्तको पंचियर न्यास किये जानेगे अभिधानमें
चोकारका एक नाम 'ऊर्ध्व दन्तपंक्ति' भी है।
२ धातुका एक अनुबन्ध। “भोर्निष्ठा त नः ।” ( कविकल्पदुम)
( अव्य० ) ३ सम्बोधन । ४ ब्राह्नान । ५ स्मरण ।
६ अनुकम्पा ( पु० ) ७ ब्रह्मा ।
ओं (सं० अव्य० ) १ ओङ्कार, प्रणव । ओम् देखो ।
२ तथास्तु, आमोन्, बहुत अच्छा ।
पॉइना (हिं० क्रि०) वारना, सदके या न्योछावर
करना ।
ओंकना, ओकना देखो।
आँगना (हिं० क्रि०) शकटके श्रचिमें तेल देना,
गांड़ीके घुरमें तेल लगाना। ओंगने से शकटका चक्र
बेखटके चलता है |
घोंगा (हिं० पु० ) अपामार्ग, लटजीरा ।
ओटना, चोटना देखो।
ओंठ (हिं०) श्रेष्ठ देखो।
घोड़ा (चिं०वि०) १ गभीर, गहरा (पुं) २. मले
गड्डा । ३ सेंध ।
(हिं.पु.) विशेष, एक रखो। इससे छाजन
पूरी करनेकी लकड़ियां बांधी जाती है।
श्रधा ( हिं० पु० ) हस्ती पकड़नेका गर्त, हाथो
फांसनेका गड़ो।
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ऐषुकारि (सं॰ पु॰) एषुकारस्य अपत्यम्, इषुकार–इञ्। वाणनिर्माताका पुत्र, तीर बनानेवालेका बेटा।
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ऐषुकार्यादि (सं॰ पु॰) पाणिन्युक्त गणविशेष। इसमें ऐषुकारि, सारस्यायन, चान्द्रायण, द्व्याक्षायण, त्र्याक्षायण, औड़ायन, जौलायन, खाड़ायन, दासमित्रि, दासमित्रायण, शौद्रायण, दाक्षायण, शायण्डायन, तार्च्छायण, शौभ्रायण, सौवीर, सौवीरायण, शयण्ड, शौण्ड, शयाण्ड, वैश्वमानव, वैश्वधेनव, नड़, तुण्डदेव, विश्वदेव और सापिण्डि शब्द पड़ता है।
ऐष्टक (सं॰ त्की॰) याज्ञिक ईंटोंका ढेर।
ऐष्टिक (सं॰ पु॰) ईष्टि–ठक्। १ इष्टिके व्याख्यानका ग्रन्थ। २ यज्ञके हितका विषय। ३ अन्तर्वेदिक कर्मविशेष। (त्रि॰) ४ यज्ञ के साधनमें समर्थ। ५ यज्ञ–सम्बन्धीय।
ऐष्टिकपौर्तिक (सं॰ त्रि॰) इष्टापूर्त–सम्बन्धीय। ऐसा (हिं॰ क्रि॰–वि॰) इस प्रकारसे, इस तौरपर।
ऐहलौकिक (सं॰ त्रि॰) इहलोके भवः, इहलोक–ठक्। १ वर्तमान जन्मसम्बन्धीय। २ मर्त्यलोक
सम्बन्धीय, इस दुनिया से सरोकार रखनेवाला।
ऐहिक (सं॰ त्रि॰) इह, भवम्, इह–ठक्। १ इहलोक–जात, इस दुनियासे पैदा। २ इहलोक–सम्बन्धीय, इस दुनियासे सरोकार रखनेवाला।
ऐहिकदर्शी (सं॰ त्रि॰) इहलोकके कार्य निरीक्षण–करनेवाला, जो इस दुनियाके काम देखता हो।
ऐहोल—बम्बईप्रान्तके वीजापुर ज़िलेका एक ग्राम। यहां जो शिलालेख मिला, उसमें २य पुलकेशीका
परिचय पड़ा है।
{{c|{{larger|ओ}}}}
{{larger|ओ}}—स्वरवर्णका त्रयोदश अक्षर। इसके उच्चारणका स्थान कण्ठ और ओष्ठ है। यह वर्ण दीर्घ एवं प्लुत भेदसे दो प्रकारका होता है। कामधेनुतन्त्रमें कहा, कि ओकार पञ्चदेवमय रक्तविद्युताकार, चिगुणात्मक,
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ईश्वर, पञ्चप्राणमय, देवमाता और परमकुण्डली है। लिखने में यह वाम दिक्से कुण्डली बन दक्षिण दिक् मध्यस्थल में सिकुड़ेगा, उसके पीछे अधोदेशमें पुनर्वार
वामदिक्को चलेगा। इसकी सकल रेखावोंमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर अवस्थान करते हैं। इसकी मात्रा ब्रह्मरूपिणी महाशक्ति है। {{smaller|(वर्णोद्धारतन्त्र)}}
तन्त्रशास्त्रोक्त ओकारका नाम—सत्य, पीयूष, पश्चिमास्य, श्रुति, स्थिरा, सद्योजात, वासुदेव, गायत्री, दीर्घ-जङ्घक, आप्यायनी, ऊर्ध्वदन्त, लक्ष्मी, वाणी, मुखी, द्विज, उद्देश्यदर्शक, तीव्र, कैलास, वसुधाक्षर, प्रणवांश, ब्रह्मसूत्र, अजेश, सर्वमङ्गला, त्रयोदशी, दीर्घनासा, रतिनाथ, दिगम्बरा, त्रैलोक्यविजया, प्रज्ञा पर प्रीति-वीजादिकर्षणी है। मात्रृकान्यासके अनुसार ऊर्ध्व दन्तकी पंक्तिपर न्यास किये जानेसे अभिधानमें ओकारका एक नाम 'ऊर्ध्व दन्तपंक्ति' भी है।
{{outdent|२ धातुका एक अनुबन्ध। {{smaller|"ओर्निष्ठा–त नः।" (कविकल्पद्रुम)}}}}
(अव्य॰) ३ सम्बोधन। ४ आह्वान। ५ स्मरण। ६ अनुकम्पा। (पु॰) ७ ब्रह्मा।
ओं (सं॰ अव्य॰) १ ओङ्कार, प्रणव। {{smaller|ओम् देखो।}} २ तथास्तु, आमीन्, बहुत अच्छा।
ओंइछना (हिं॰ क्रि॰) वारना, सदक़े या न्योछावर करना।
ओंकना, {{smaller|ओकना देखो।}}
ओंगना (हिं॰ क्रि॰) शकटके अक्षिमें तैल देना, गाड़ीके धुरमें तेल लगाना। ओंगनेसे शकटका चक्र
बेखटके चलता है।
ओंगा (हिं॰ पु॰) अपामार्ग, लटजीरा।
ओंटना, {{smaller|ओटना देखो।}}
ओंठ (हिं॰) {{smaller|ओष्ठ देखो।}}
ओंड़ा (हिं॰ वि॰) १ गभीर, गहरा। (पु॰) २ गर्त, गड्डा। ३ सेंध।
ओंध (हिं॰ पु॰) रज्जुविशेष, एक रस्सी। इससे छाजन पूरी करनेको लकड़ियां बांधी जाती है।
ओआ (हिं॰ पु॰) हस्ती पकड़नेका गर्त, हाथी फांसनेका गड्ढा।
ओआक (सं॰ अव्य॰) १ वमनके वेगका शब्द, कैके<noinclude>{{Multicol-end}}
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{{outdent|ऐषुकार्यादि (सं॰ पु॰) पाणिन्युक्त गणविशेष। इसमें ऐषुकारि, सारस्यायन, चान्द्रायण, द्व्याक्षायण, त्र्याक्षायण, औड़ायन, जौलायन, खाड़ायन, दासमित्रि, दासमित्रायण, शौद्रायण, दाक्षायण, शायण्डायन, तार्च्छायण, शौभ्रायण, सौवीर, सौवीरायण, शयण्ड, शौण्ड, शयाण्ड, वैश्वमानव, वैश्वधेनव, नड़, तुण्डदेव, विश्वदेव और सापिण्डि शब्द पड़ता है।}}
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{{outdent|ऐष्टिकपौर्तिक (सं॰ त्रि॰) इष्टापूर्त–सम्बन्धीय। ऐसा (हिं॰ क्रि॰–वि॰) इस प्रकारसे, इस तौरपर।}}
{{outdent|ऐहलौकिक (सं॰ त्रि॰) इहलोके भवः, इहलोक–ठक्। १ वर्तमान जन्मसम्बन्धीय। २ मर्त्यलोक सम्बन्धीय, इस दुनिया से सरोकार रखनेवाला।}}
{{outdent|ऐहिक (सं॰ त्रि॰) इह, भवम्, इह–ठक्। १ इहलोक–जात, इस दुनियासे पैदा। २ इहलोक–सम्बन्धीय, इस दुनियासे सरोकार रखनेवाला।}}
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ईश्वर, पञ्चप्राणमय, देवमाता और परमकुण्डली है। लिखने में यह वाम दिक्से कुण्डली बन दक्षिण दिक् मध्यस्थल में सिकुड़ेगा, उसके पीछे अधोदेशमें पुनर्वार वामदिक्को चलेगा। इसकी सकल रेखावोंमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर अवस्थान करते हैं। इसकी मात्रा ब्रह्मरूपिणी महाशक्ति है। {{smaller|(वर्णोद्धारतन्त्र)}}
तन्त्रशास्त्रोक्त ओकारका नाम—सत्य, पीयूष, पश्चिमास्य, श्रुति, स्थिरा, सद्योजात, वासुदेव, गायत्री, दीर्घ-जङ्घक, आप्यायनी, ऊर्ध्वदन्त, लक्ष्मी, वाणी, मुखी, द्विज, उद्देश्यदर्शक, तीव्र, कैलास, वसुधाक्षर, प्रणवांश, ब्रह्मसूत्र, अजेश, सर्वमङ्गला, त्रयोदशी, दीर्घनासा, रतिनाथ, दिगम्बरा, त्रैलोक्यविजया, प्रज्ञा पर प्रीति-वीजादिकर्षणी है। मात्रृकान्यासके अनुसार ऊर्ध्व दन्तकी पंक्तिपर न्यास किये जानेसे अभिधानमें ओकारका एक नाम 'ऊर्ध्व दन्तपंक्ति' भी है।
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(अव्य॰) ३ सम्बोधन। ४ आह्वान। ५ स्मरण। ६ अनुकम्पा। (पु॰) ७ ब्रह्मा।
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओम्|५४१}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अधिक सहज नहीं। योगी प्रथम केवल अकार जपते हैं। रीतिके अनुसार अभ्यास हो जानेसे पीछे दूसरा अक्षर उच्चारण करना पड़ता है। {{smaller|ओङ्कारके उञ्चारणको प्रणाली अ २ पृष्ठमें देखो।}}
ॐ योगियोंका प्रधान अवलम्बन है—
{{c|<poem>{{smaller|"ओं योगशिखां प्रवच्यामि सर्वभावेषु चोत्तमाम्।
यदा तु ध्यायते मन्त्र गावकम्पोऽभिजायते॥ १
आसनं पद्मकं वध्वा यच्चान्यद्दापि रोचते।
कुर्यान्नासाग्रदृष्टिञ्च हस्तौ पादौ च संयुतौ॥२
मनः सर्वव संयम्य श्रीङ्कारं तव चिन्तयेत्।
ध्यायते सततं प्राज्ञो हृत्कृत्वा परमेष्ठिनम्॥ ३" (योगशिखोपनिषत् )}}</poem>}}
सर्वश्रेष्ठ योगशिखा कहती- मन्चके ध्यानकाल
गात्रकम्प उपस्थित होता है । पद्मासन अथवा अन्य
कोई अभिलषित आसन लगा और हस्त, पद, एवं
मन:संयमपूर्वक हृदयमें परमेटोको बेठा प्राप्त पीडार
चिन्ता किया करते हैं।
फिर योगशिखा में देखते हैं—
{{c|{{smaller|<poem>"वयी लोकास्त्रयो वेदास्त्रयः सन्ध्यास्वयः सुराः।
वयोऽग्ग्रयो गुण्णास्त्रौणि स्थिताः सर्वे वयाचरे॥६
वयानामचरे प्राप्त योऽधीतेऽपार्श्व मचरम्।
तेन सर्वमिदं प्राप्त' लब्ध' तत् परमं पदम्॥७
पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्येऽस्ति सर्पिवत्।
विलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम्॥८
हृदिस्थाने स्थितं पद्मं त पद्ममधोमुखम्।
ऊर्ध्व नालमधोबिन्दुस्तस्य मध्ये स्थितं मनः॥
प्रकारे शोचितं पद्ममुकारिचैव भिद्यते।
मकारे लभते नादमर्धमात्रा तु निचला॥१०
स्फटिकसङ्काशं किञ्चित् सूर्यमरोचिवत्।
लभते योगयुक्तात्मा पुरुषोत्तमतत्परः॥ ११"</poem>}}}}
तीन लोक, तीन वेद, तोन सन्ध्या, तीन देवता, तोन
अग्नि और सोन ग्रुप- समस्त ''तीन पथर
सन्निवेशित है । जो व्यक्ति यह तीनों अक्षर पाठकर
पोछे अर्ध पर पढ़ता, उसे परम पद मिलता है।
पुष्पके मध्य गन्ध, दुग्ध के मध्य घृत, तिलके मध्य तैल
और पाषाणके मध्य काञ्चनको भांति हृदयमें अधोमुख
ऊर्ध्व माल पद्म रहता, जिसमें मन बसता है ।
अकारके द्वारा शोषित पोर उकारके द्वारा मित्र हो
पद्म मकार में शब्द लाभ करता है। अर्धमात्रा निचल
{{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}136}}{{Multicol-break}}
है। ईश्वरतत्पर योगी सूर्यकिरणको भांति एड
स्फटिक तुल्य कोई पदार्थ पा जाते हैं।
{{c|<poem>{{smaller|"अकारो दचिणः पच उकारस्त तरः स्मृतः ।
मकारस्तस्य पुच्छ वा अर्द्ध मावा शिरस्तथा॥ १
यो प्रथमा मात्रा वायव्येषा वशानुगा ॥६
भानुमण्डलसङ्काशा भवेन्मावा तवोत्तरा ।
परमा चार्च मात्रा च वारुणीं तां विदुर्बुधाः ॥७
कलावयानना वापि तासां मावा प्रतिष्ठिता ।
एष श्रद्धार भाख्याती धारयामिर्निबोधत॥ ८(नादविन्दु उपनिषत्)}}</poem>}}
अकार दक्षिण एवं उकार उत्तर पच्च, मकार
पुच्छ और अर्द्धमात्रा उसका मस्तक है । प्रथमाको
श्रग्नयो, यो दितोयाको वायदो, ढतोयाको मामल
समाधीर माताको पति वारुवो कहते हैं।
उक्त मात्रावोंके मध्य कलत्रयानना मात्रा प्रतिष्ठित है ।
इसी समुदायका नाम घोङ्कार है। श्रोङ्कारका बोध
धारणासे होता है।
{{c|<poem>{{smaller|"भूमिभागे समेरमा सर्वदोषविवर्जिते ।
कृत्वा मनोमयी' रचां नया चैवाथ मण्डलम् ॥१७
पद्मकं स्वस्तिकं वापि मद्रासनमथापि वा ।
वध्वा योगासनं सम्यगुत्तराभिमुखः स्थितः ॥१८
नासिकापुटमङ्ग ुल्या पिधायैकैन मारुतम् ।
चालण्य धारवेदग्नि' शब्दमेवाभिचिन्तयेत् ॥ १८
ओमित्ये काचरं ब्रह्म श्रोमित्ये केन रेचयेत् ।
दिव्य मन्त्र या बहुशः कुर्यादात्ममलच्छ तिम् ॥” २० ( अमृतविन्दु-उ० )}}</poem>}}
दोषशून्य समतल भूमिभागमें मनोमयो रथा
विधान कर मण्डल रूप बनाये । अनन्तर पद्मक,
स्वस्तिक अथवा भद्रासन नामक योगासन लगा उत्तर-
मुख उपवेशनपूर्वक एक पहलि दारा नासापुटको
चाच्छादन कर पर नासापुटसे वायु भाकर्षणपूर्वक
पनि शब्द चिन्ता करना चाहिये । ( उसके पीछे )
एकाक्षर ब्रह्मस्वरूप श्रोम् शब्दसे रेचक निकाल दिव्य-
मन्त्र के द्वारा बालश्चचि करे।
{{c|{{smaller|<poem>"वर्णववात्मिका हो ते रेचकपूरककुम्भकाः!
स एष प्रथवः प्रोक्तः प्रायायामश्च तन्मयः ॥" (योगी याज्ञवल्का)</poem>}}}}
रेचक, पूरक और कुम्भक तोन वर्षात्मक होते
हैं। फिर उक्त तोनों वर्ष प्रथवामक है। इससे
प्राणायाम प्रणवमय रहता है।<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
7xk19ypc228m87nzyvr6h3eavuwwojr
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५४२|ओम्—ओमन्वान्|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{c|{{smaller|<poem>"अकारख तथोकारो मकारयाचरवयम्।
एता एव वयोमानाः सात्वराजसतामसाः ॥
निर्गुणा योगिगम्यान्या चार्धं मावोर्ध्वं संस्थिताः ।
गान्धारौति च विज्ञेया गान्धारख र संश्रया ।
पिपीलिकागतिस्पर्धा प्रयुक्ता मूर्ध्नि लचाते ॥ ४
तथा प्रयुक्त ओङ्कारः प्रतिनिं यति मूर्धनि ।
अथोङ्कारमयो योगी त्वचरे त्वंचरो भवेत् ॥६
प्राणो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म वेन्थमनुत्तमम् ।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत् ॥७
श्रमित्येतत् वयो वेदास्त्रयो लोकास्त्रयोऽग्रथः ।
विश्व श्रा हरयेव ऋक् सामानि यज'षि च ॥८
मात्राः साधय तिय विज्ञेयाः परमार्थतः ।
तत्र युक्तस्तु यो योगी सतवमवाप्नुयात् ॥
अकारस्तथ भूर्लोक उकारयोचाते भुवः ।
सव्यञ्जनो मकारच खर्लोकः परिकल्प] ते ॥ १०
व्यक्ता तु प्रथमा मावा द्वितीयोऽव्यक्तस जिता ।
मावा तृतीया चिच्छक्तिरधं मावा परं पदम् ॥११
अनेन व क्रमेण सा विज्ञेया योगभूमयः ।
श्रोमित्यु चारणात् सर्वे' ग्टहीतं सदसङ्गवेत् ॥ १२
स्वा तु प्रथमा मावा द्वितीया देय स युता ।
टतौया च शतार्घाख्या वचसः सा न गोचरा ।। १३
इत्ये तदचरं ब्रह्म परमोङ्कारस 'ज्ञितम् ॥” (मार्कण्डेयपु० ४२ अ॰)</poem>}}}}
अकार, उकार एवं मकार तीन अक्षर सात्व, राजस
तथा तामस विविध माना हैं। फिर इसमें निर्गुण
योगिगम्य अर्धमात्रा भी अवस्थित है । गान्धार खरके
श्राश्रयसे उसे गान्धारी कहते हैं। मस्तकपर लगने से
वह पिपीलिकागति को भांति देख पड़ती है।
पोद्दार उठने उसका स्वरूप जैसे मस्तक प्रति
निकल पाता, वैसे हो पोकारमय योगो पचरमें पथर
हो जाता है । प्राथ धनुःस्वरूप, आमा मरस्वरूप
और ब्रह्म वैवस्वरूप है। अप्रमत्त रहं मरवत्
विच कर सकनेसे साधक ब्रह्ममय हो जाता है। श्र
दोनों वेद, तोनों लोक चार तोनों पनि ।
ब्रह्मा, विष्णु एवं हर चोर ऋक्, साम तथा यजुः
हो है। इसमें साढ़े तीन मावा लगती है। जो
योगो उनमें मिलता, उसका लय ब्रह्म में जा लगता
है। अकार भूर्लोक, उकार भुवलोक और सव्यञ्जन
मकार स्वर्लोक है। प्रथम व्यक्त, द्वितीय अव्यक्त,
{{Multicol-break}}
तृतीय चित्शक्ति और अर्धमात्रा श्रेष्ठपद जैसी कल्पित
है। इसी प्रकार समस्त पोङ्कारको यागको भूमि
समझना चाहिये । ॐ शब्द के उच्चारणसे समुदाय
असत् सत् बन जाता है। इसको प्रथमा इस्व, द्वितीया
दीर्घ हतीया तर मात्रा वायगोचर है। इसी अक्षरमय ब्रह्मका नाम ओङ्कार है।
{{c|{{smaller|<poem>"इच्छा क्रिया तथा ज्ञान गौरो ब्राह्मी च देवी।
विधा शक्तिः स्थिता लोके तत्पर' शक्तिरोमिति॥" ( गोरक्ष संहिता)</poem>}}}}
श्राद्याजवरूप प्रत्ययसे लोन शक्तिसमुत्पन्न हुयी
थीं- इच्छति क्रियामजि चोर ज्ञानशक्ति इच्छ
शक्ति गौरी है । ( यह तमोगुण के अनुसार महेश्वर के
साथ रहतो है ।) क्रियाशक्ति ब्राह्मी है । (यह रजो-
गुणके अनुसार ब्रह्मा के साथ सृष्टिकार्य करती है।)
ज्ञानशक्ति वैष्णवी है। ( यह सत्वगुण के अनुसार
विष्णु के साथ रह पालन करतो है)।
अब सबने समझ लिया होगा- बोहार का है।
मूल कथा - श्र हो हमारे धर्मशास्त्रको भित्ति है ।
जिसने पोकार समझको चेटा लगायो, उसोने हमारे
धर्मको कुछ बात देख पायी है।
बौद्धधर्मशास्त्र में भी ॐ शब्द व्यवहृत हुआ है ।
भोट देशके बीच 'थों इन् हु" पवित्र मन्द धर्मकर्मादि-
में उच्चारण करते हैं । उक्त देशमें किसी किसी घरकी
छतपर यह तीनों शब्द खुदे हैं। लोग इनके बुद्ध,
धर्म और सङ्घ' तोन अर्थ लगाते हैं। कभी कभी बौद्ध
मणिपद्मे हुम्' पवित्र नाम उच्चारण करते हैं।
हमारे शास्त्रकाराने जैसे च चर्थात् म, म
तोन वर्ण से ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर अर्थात् सृष्टि-
कर्ता, पालनकर्ता चोर ईश्वरका अभिप्राय रखते, वैसे
हो प्राचीन मिसरके लोग भी 'ग्रामोन्स' 'ग्रामोन्
' और 'सिवेक रा' ईश्वर के परिचायक तीन नाम
उच्चारण करते थे।
उक्त तीनों मूर्तियां ही प्राचीन
ग्रोकों पर रोमको जुपिटर, नेपन एवं टी
घोम (सं० पु०) १ रचक, मुहाफिज २ कृपालु,
मेहरवान्, मलाई चाहनेवाला।
३ कृपापात्र, जो हिफाजत पाने काबिल हो।
ओमन्वान् (सं० वि०) १ अच्छा लगनेवाला, खुश-<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओमा—ओरछा|५४३}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>गवार । २ कृपालु, मेहरबान् । ३ सन्तोषदायक,
खुश कर देनेवाला।
श्रोमा (स० पु० ) १ रक्षा, हिफाजत, मदद।
२ छपा, मेहरबानी ।
२ कृपालु पुरुष, मेहरवान
शख्स ।
श्रोमात्रा (सं० स्त्री०) रचा, साहाय्य, मदद, हिफाजत ।
श्रम्या (सं० स्त्रो० ) कृपा, रक्षा, मेहरबानो, हिफाजत ।
श्रीयावान् (सं० वि०) कृपालु, मेहरवान् ।
घोयन्त युद्धप्रदेश के खेरी ज़िलेका एक नगर।
यह अक्षा॰ २७° ५० ३० उ०, तथा देशा० ८०° ४६ ५५
पू० में लखीमपुर से मोल पश्चिम सोतापुरको सड़क-
पर अवस्थित है। चारो और चिकनो मट्टोका मैदान है। षिकार्य अधिक होता है। बहुत है।
वृक्ष
किन्तु मकान महोके बने और टूटी फूटी दीवारों पर
छप्पर पड़े हैं। महादेवका मन्दिर अति सुन्दर है ।
चोनोंके कारखाने चला करते हैं।
यष्टरशेफ - निम्न ब्रह्मस्थ धाराकान समुद्रतट के समीप
डूबा हुआ एक भयानक शैल - सेतु । १८७६ ई० को
इस डूबे हुये शैलसेतुके दक्षिण किनारे एक आलोक-
भवन बनाया गया था। स्वच्छ आकाश रहते उक्त '
भवनका आलोक १५ मोलसे देख पड़ता है। इससे
चाकायाय वन्दर पहुंचने में पश्चिम और उत्तरको घोर
जहाजोंको भय नहीं रहता। आलोक बेलाके
तलसे ७७ फोट ऊंचे अवस्थित है !
पोलिटन
ओयेलेस्लि — वेलेस लि देखो।
ओर (हिं० स्त्रो०) दिक्, तरफ। २ पंच, अलंग ।
(पु.) २ पन्त, किनारा।
ओरंगोटंग (अं० पु० = Orangoutang) वानर-
विशेष, एक बन्दर । इस शब्दका अर्थ जङ्गली श्रादमी
या बनमानुस है । यह भारत - महासागर के बोरनियो
और इमात्रा दोषमें रहता है। बोरनियोका पोरं-
गोटंग को दलदलोंमें पहाड़ोंके नोचे मिलता पौर
मनुष्यके भूमिपर चलनेको तरह वृक्षोंकी शाखोंपर
उछलता फिरता है । फिर यह वृचोंपर शयनागार भी
बना लेता है। इसको प्राय: छह जाति होती हैं।
{{Multicol-break}}
पुरुषजातिके पोरंगोटंग कोई दो तक लम्बे देव
पड़ते हैं। गाल दोनो चोर लटके रहते हैं। गले पर
छाती के सामने एक घेत होतो वा बहुत
बाहें
लम्बी रहती हैं। चाकार-प्रकार मनुष्यसे मिलता है।
वर्ण रक्त रहता है। इसके बाल लालभूरे होते हैं ।
ओरछा -१ बुदेलखण्डका एक देशी राज्य । यह
अक्षा० २४° २६ एवं २५° ३४ उ०, देशा० ७८ २८
२० तथा ०८२२ के मध्य
टेहरी या टीकमगढ़ भी कहते हैं ।
हांसो तथा ललितपुर जिला, दचिप
1
स्थित है। इसे
ओरछेसे पश्चिम
बलितपुर, पचा
चरखारो तथा
क्षेत्रफल प्रायः २००० वर्म
वन एवं पर्वत चित्र है। भूमि उपजाऊ
को
तथा विजावर चोर पूर्व बिजावर,
गरौब्बो राज्य पड़ता है।
मोल है।
नहीं कुछ तालाब बहुत अच्छे हैं। घने जंगलो
डाकूजोंको छिनेका सुमीता है। १८०३-०४
डाकूचोंने कितने हो ग्रामों और यात्रियों को लूट लिया
था। बुदेलखण्ड राज्यों में भारका सबसे प्राचीन
और प्रतिष्ठित है। पेशवा इसे अपने अधीन करन
सके थे। अंगरेजों के बुंदेलखण्ड पहुंचते समय
विक्रमादित्य महेन्द्र राजा रहे।
१८१२
सरकारने उनसे मित्रता को सन्धि को
प्राय प्रायः 2 लाख रुपया है । १८५७
अंगरेज सरकारने राजभक्ति के उपहारमें इस राज्य का
कर छोड़ दिया था। १८६३ ई० को राजाने 'महा
राज' उपाधि पाया। फिर १८८२ ई० के समय
राजपरिवारको 'खामों का भी उपाधि मिला।
महाराज १५ तोपों को सलामो पाते हैं। युद्द -
विभाग में २०० सवार ४४०० पैदल, १० तोप और
१०० तोपची हैं ।
ई० को
वाषि
ई० को
एक
२ बुंदेलखण्ड के ओरछा राज्यको प्राचीन राजधानी 1
यह प्रचा० २५० २१ उ० तथा देशा० ७८° ४२
पू० में वेतवा नदोके दोनों किनारे अवस्थित है।
पत्थरपर थोपा किला बना, जिसमें प्राचीन राजाके
रहनेका भवन खड़ा है। जहांगीरके निवासको
एक प्रासादभी बनाया गया था। किलेसे नगरतक
नदीपर लकड़ी का पुल बंधा है।<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५४४|ओरना—ओलन्दाज|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ओरना (हिं० पु०) फालो बा
श्ररमना (हिं० क्रि० ) अवलम्बन पकड़ना, लटक
पड़ना ।
ओरमा ( हिं० स्त्रो० ) स्यूतिभेद, किसी किस्म की
सिलाई। इससे कोरोंको जोड़ाई होती है । पहले
दो घरोंको टांक पोछे गोट लगानेको घरमा
करते हैं।
श्रीरखना (हिं० क्रि० ) स्तनमें दुग्ध उतरना, पेट
बढ़ना, व्यानेका वक्त आ पहुंचना । यह शब्द प्रायः
के लिये हो व्यहोता है।
चोरहना, रहना देखो।
चोराना (हिं० कि०) चुकना, निश्टना ।
चोराहना, उरहना देखो ।
। खु
।
(श्रव्य ० )
बोलने में
कोरिया (हिं. स्त्री०) १ बोलती २ टोके
पासको लकड़ी ।
ओरो ( हिं० स्त्री०) १ श्रीलती । २ माता
२ सम्बोधन शब्द इसे प्रायः माताको
व्यवहार करते हैं ।
श्रोता ( हिं० पु० )
पोरीती (पिं खो )
पानी निकलनेको जग
श्री (चिं० पु० ) एक प्रकारका बांस। यह बहुत
बड़ा होता है। उत्पत्तिका स्थान ब्रह्मदेश तथा
आसाम है। बाई और चौड़ाई पोन मजल
बैठती है। इसे तथा थकटके निर्माणकार्य में
लगाते हैं।
पन्त, चुकतो ।
पोलतो, छप्परसे बरसातका
८
(वि.) चाङ-उन्दकः पृषोदरादित्वात् ।
१ पाई, पाला, गोला । (पु० ) २ मूलविशेष,
जमकेंद। इसका संस्क्रत पर्याय शूरण, कन्दकन्द
और अर्शोघ्न है। घोल अम्ना होपक, रुच, कषाय,
कंण्ड कारो, कटु, विष्टम्भो, विशद, रुचिकारक, पर्यो-
नाशक, लघु और प्लीहगुल्मनाशक होता है। यह
रोगपर विशेष हितकर और समग्र कन्दयाकडे
मध्य श्रेष्ठ समझा जाता है। (भावप्रकाश) दद्रु, रक्त-
पित्त पर कुष्ठरोग रहनेसे पोलभचण निषि है।
इसे हिन्दीमें जमोन्कन्द, तामिलमें करूच भोर तेलगु
{{Multicol-break}}
भाषामै मुखाकन्द कहते है। पोलका पेड़ दोसे चार
हाथ तक बढ़ता है। अच्छे खेतमें बोनेसे दश-पन्द्रह
सेर तक यह वजनमें निकलता है। जंगलो जमकंद
स्वभावत: किनकिना रहता, किन्तु बोया हुआ वैसा
नहीं ठहरता। भारतवर्ष में सर्वत्र हो यह उपजता
और भोजनके व्यवहार में लगता है। सिंडल, ब्रह्म,
मालाकास प्रभृति स्थानमें भी बोल होता है ।
(हिं० खो०) २ क्रोड, गोद। 8 व्यवधान, आड़ ।
५ रक्षा, हिफाज़त। ६ जुमानत।
ओलन्दाज - युरोप देशान्तर्गत हालेण्ड या नेदरले एडके
अधिवासी । यह हालेण्डर्स शब्दका अपभ्रंश है ।
अंगरेजीमें डच कहते हैं। शब्द जर्मन शब्द
डच तुल्य अर्थका वाचक है। पोलन्दाज इन्दो-जर्मन वंशले
उत्पन्न हैं। अंगरेजो इनको भाषा बहुत कुछ मिलती
है। इन्होंने इस बातको सार्थकता सम्पादन की है,
कि अध्यवसायके आगे कुछ असाध्य नहीं । हालेण्ड-
के अनेक स्थान समुद्र-जनमें निमग्न रहते थे।
इन्होंने बांध बना उस उपद्रवसे देशको बचाया और
समुद्रको बहुत दूरतक हटाया है। इसी प्रकार
वालुकापूर्ण लाभूमिको भी क्रम-क्रम पोलन्दाजोंने
यस्यमालिनो बना डाला है। इन्होंने गवादिके
लिये ढणपूर्ण गोठ निर्दिएकर गाईस पढ जातिको
जैसी उन्नति साधन को, वैसो कहीं देख न पड़ी ।
कृषि एव शिल्पविद्या में यह विशेष पारदर्शी और वस्त्र-
वयन तथा मी निर्माण प्रकृति कार्यके लिये सर्वत्र
प्रसिद्ध हैं ।
ओलन्दाज सत्खभावापत्र होते हैं। यह ह
पितामाताका विशेष सम्मान करते और इसीसे सारस
पचीपर भी बड़ा प्रेम रखते हैं । यह मितव्ययी
पोर साहसके लिये अधिक विख्यात न होते भो
लम्बी है। विद्याको चर्चा लिये यह सुविख्यात
है। इनके विश्वविद्यालयोंमें धर्मयाजकोंका कोई
उपद्रव नहीं । सब लोग इच्छानुरूप शास्त्रको अनु
शोलन कर सकते है। धर्मयाजक व व निर्दिष्ट:
स्थानोंके लोगोंको हो धर्ममतको शिक्षा देते हैं। ओलन्दाज साधारणत: प्रोटेष्टाष्ट हैं। {{smaller|ईसाई देखो।}}<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
mts6x7jl1vdvs3irkv0007pcavalmr1
पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६६४
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अंजली राजभर
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कण्ठरोग|६६३}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
कण्ठरोग (सं० पु०) कण्ठगतो रोगः, मध्यपदलो०। कण्ठनालौके पभ्यन्तरमें उत्पन्न सकल रोग, गलेकी नलीमें होनेवाली सब बीमारी। महर्षि सुश्रुतके मतसे कण्ठनालोमें अष्टादश प्रकारका रोग उत्पन्न होता है-पांच प्रकारको रोहियो, शालुकण्ठक,अधिजिव, वलय, वलास, एकवृन्द, शतनो, शिलाघ,गलविद्रधि, गलौघ, स्वरन, मांसतान और विदारी।
<Small>रोहिणौ</small>-दूषित वायु, पित्त, कफ पौर रक्त गल-देशस्थ मांसको बिगाड़ मांसाकुर उत्पादन करता। है। इससे कण्ठ खुलने नहीं पाता और शीघ्र प्राण छूट जाता है। इसी रोगको रोहिणी कहते हैं। वायुजन्य रोहिणीरोगमें जिह्वाको चारो और अत्यन्त वेदनायुक्ता कण्ठरोधक मांसाङ्कर उत्पन हो जाता और रोगी स्तम्भव प्रभृति वातजनित उपद्रवसमूहसे दुःख पाता है। पित्तजन्य रोहिणी रोग प्रतिथय दाह एवं पाकयुक्त मांसाकर शीघ्र ही निकलता है। विशेषतः रोगीको अत्यन्त वेगवान् ज्वर धर दबाता है। कफजन्य रोहिणी रोग, मांसाङ्कर गुरु एवं स्थिर रहता और विलम्बसे पकता है। कण्ठका स्रोत कक जाता है। साविपातिक रोहिणी रोममें उक्त तीनों दोषों का लक्षण झलकता और मांसका अकुर गम्भीर भावसे पकता है। यह रोग चिकित्सासाध्य नहीं होता। रक्तजन्य रोहिणी रोगमें जिह्वामूल स्फोटक द्वारा व्याप्त हो जाता और वित्तका सकत लक्षण देखने में पाता है। भावमिश्रके मतानुसार वैदोषिक रोहिणी रोगमें रोगोका जोवन सद्य नष्ट होता है। कफज रोहिणी तीन रात्रि, पैत्तिक रोहिणी पांच रात्रि और वातज रोहिणी सात रात्रिके मभ्य रोगीका जोवन हरण कर लेती है। साध्य रोहिणी रोगमें रवमोचण, वमन, धूमपान, गण्ड षधारण और नस्य हितकारक है। वातज रोहिणी रोगमें रक्त निकलवा सैन्धव द्वारा प्रतिसारण और ईषत् उष्ण न ह द्वारा पुनः पुनः गण्ड षधारण कराना चाहिये। पित्तज एवं रक्तज रोहिणी में रक्त मोक्षण कर प्रियङ्गवर्ण, शर्करा तथा मधु एकमें मिला रगड़ते और द्राक्षा एवं फालसेके क्वाथसे कुल्ला करते
{{Multicol-break}}
हैं। कफज राहिणीरोगमें बदरीफल, शुण्डो, पिप्पली और मरिच प्रतिसारण करना चाहिये।
<Small>कसशालक</small>-कुपित कफ हारा वेरको गुठलीको भांति काष्ठवत् वा शूकवत् वेदनाजनक खर एवं स्थिर प्रन्थि पड़नेसे कण्ठ पालक समझा जाता है। यह रोग अस्वसाध्य है। कण्ठ पालकमें कर तुण्डिकेरो रोगको भांति चिकित्सा चलाना चाहिये। स्निग्ध यवान अल्प परिमाण एकवार खिलाया जाता है।
<Small>अधिनि</small>-रक्तमिश्चित कफसे जिह्वापर जिवाय-जैसा जो शोध उठता, उसोका नाम अधिजिन पड़ता है। शोध पकनेसे यह रोग पसाध्य हो जाता है।
<Small>वलय</small>-नेमासे गलनालोपर जो दोघे एवं उन्नत शोथ उठता और जिससे मुक्त द्रव्यका पथ सकता, उसीका नाम वलय पड़ता है। यह रोग असाध्द है।
<Small>क्लास</small>-लेमा और वायु द्वारा गलदेशमें शोथ उठने और मर्मच्छेदा दारुण वेदना पड़नेसे वलास रोग समझा जाता है। यह रोग भी साध्य नहीं।
<Small>एकहन्द</small>-गलदेशका गोल, उबत, दाह एवं कण्ड- विशिष्ट और भार तथा कोमल बोध होनेवाला शोथ एकन्द कहाता है। इस रोगमें रक्त निकाल विरेचनादि द्वारा शोधन करना चाहिये ।
रक्तपित्तजन्य, मोल एवं पतिपय उव्रत शोध उठनेसे रोगोको अत्यन्त ज्वर पाता और दाह सताता है। इसो रोगको वृन्द कहते हैं। फिर यही प्रत्यन्त वेदनायुक्त रहनेसे वातज समझा जाता है।
<Small>शतनो</small>-गलनानीमें मोटो बत्तो-जैसा, कठिन, कण्ठरोधकारी, वातजादि भेदसे नानाप्रकार वेदनायुक्त अथच मांसाङ्कर द्वारा अधिक व्याप्त जो शोथ उठता और जिसमें नानाप्रकार यातनाका वेग बढ़ता, उसीका नाम त्रिदोषज शतघ्नी पड़ता है। इस रोगमें रोगीज्ञप्रायः मर जाता है।
<Small>शिलाघ</small>-जिस रोगमें दूषित कफ एवं रक्तसे कण्ड के भीतर आंवलेको गुठली-जैसा स्थिर तथा अल्प वेदना-युक्त अन्धि उठता और भुक्तद्रव्य संलग्न मालम पडता,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६६५
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६६४|कस्ठरोग|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
उसोको संस्कृतज्ञ शिलाघ कहता है। यह रोग यन्त्र- साध्य है। सुश्रुतने इस रोगका नाम 'गिलायु' लिखा है।
<Small>गलविद्रधि</small>-समस्त गलदेशका फलना और उसमें नानाप्रकार यातना होना गलविद्रधि कहाता है। यह रोग यदि मरस्थानमें न रहे और अच्छीतरह पक उठे, तो छेदन कर देना चाहिये।
<Small>गलीध</small>-कफ एवं रक्तसे गलदेश अत्यन्त फूल उठनेपर अबनाली वा जलप्रवेशका पथ रुकना, वायुकी गतिका बिगड़ना और तीव्र ज्वरका चढ़ना ही गलौघ रोग है।
<Small>खरन</small>-रोगीको मूळ पाने, सर्वदा श्वास जाने,स्वरभङ्ग पाने और कण्ठ मुखानेसे स्वरघ्न रोग समझा जाता है। रोगी कुछ पहचान नहीं सकता और श्वासका पथ सकता है।
<Small>मांसतान<small>-गलदेशका शोथ क्रमशः बढ़ते बढ़ते कण्ठनालीको रुध लेनेसे मांसतान रोग होता है। इस रोगमें शोथ विस्तुत, अति क्लेशदायक और सम्बमान रहता है। इसमें रोगी बच नहीं सकता।
<Small>वेदारी</small>-पित्तके प्रकोपसे गलदेश एवं मुखमें ताम्ब-वर्ग तथा दाह और वेदनायुक्त जो शोथ उठता, उसीका नाम विदारी पड़ता है। विदारोसे सड़ागला मांस गिर जाया करता है। रोगी जिस पार्श्व पर अधिक सोता, उसी में पार्श्व में यह रोग होता है।
साधारणतः कण्ठरोगमात्र में दारुहरिद्रा, निम्बत्वक, शालच एवं इन्द्रयव सकल ट्रव्योंका क्वाथ अथवा मधु मिला हरीतकोका कषाय पीना चाहिये। १-कटुकी, अतिविषा, देवदारु, पाकनादि, मुस्तक और इन्द्रयव सकल द्रव्यका क्वाथ गोमूत्र के साथ पान करते हैं। २-पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, शुण्ठी, सर्जिक्षार और यवक्षार सकल द्रव्य समभागमें चर्ण कर व्यवहार में लाना योग्य है। ३-मनःपिला, यवनार, हरिताल, सैन्धव और दारुहरिद्रा सकलका चर्ण मधु तथा घृतके साथ मुखमें धारण करनेसे मुखरोग एवं गलरोग विनष्ट होता है। ४-यवक्षार, गजपिप्पली, पाकनादि, रसाजन,देवदार, हरिद्रा और पिप्पली सकल द्रव्य कूटपीस
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मधुके साथ गुड़िका बना डाले। यह गुड़िका मुख में धारण करनेसे गलरोग छूट जाता है। <Small>(चक्रदत्त)</small>
युरोपीय चिकित्सकोंके मतसे कण्ठरोग नाना-प्रकार होता है। उसमें सामान्य कण्ठ गोथ ( Simple sore throat), क्षतयुक्त कण्ठशोथ (Ulcerated sore- throat ), गलग्रन्थिप्रदाह (Quinsy or Tonsilitis),साङ्घातिक कण्ठशोथ ( Malignant sore-throat ), पौर साबिपातिक कण्ठरोग (Diphtheria) प्रधान है।
कण्ठशोथ उठनेसे कण्ठमें प्रदाह, निगलने में कष्ट-बोध, श्वास छोड़ने में दुःख, कण्ठके स्वरका परिवर्तन और ज्वर होता है। प्रथम वाधा न देनेसे यह रोगvक्रमशः बढ़ जाता है। जिह्वा फलती पार बिगड़ती है। गलका ग्रन्थि रक्तवर्ण रहता और गलदेशके पीछे छोटा छोटा पीला फोड़ा पड़ता है। वृष्णा और नाडीको गति बढ़ती है। कभी कभी गाल फूल कर लाल हो जाता है। चक्षु जलने लगते हैं। रोग बढ़नेपर चित्तविभ्रम होता है। रोगवृद्धिके साथ ही साथ गलग्रन्थि भी बढ़ता और उसमें पूय पड़ता है। स्फोटक फट जानेसे स्वास्थ्यबोध होता है। कभी कभी फटने पीछे ग्रन्थि फिर पूर्ववत् फल उठता है। इसकी चिकित्सा साथ ही साथ होना चाहिये। कारण चिकित्सा न करनेसे यह रोग साङ्घातिक पड़ जाता है। ऐसे स्थलमें कठिन ज्वर पाता है।
सामान्य कण्ठशोथमें होमिओपाथिक चिकितसा विशेष उपकारी है। भोजन पौछ शीत लगनेसे जो सामान्य कण्ठशोथ हो जाता, उसका औषध डल- कामरा है। वायुके परिवर्तनसे होनेवाले कण्ठ-शोथपर गेलसेमिनम् चलता है। ज्वर के साथ शीत लगने और कण्ठशोथ उठनेसे एकोनाइट दिया जाता है। कण्ठवेदना, कण्ठशुष्कता एवं शिरःपीड़ा बढ़ने और मुख लाल पड़नेसे बेलोडोना खिलाते हैं। कण्ठ खिंचने, निगलने में कष्ट मालम पड़ने और कफ निकलते रहने से माकु रियास उपकारी है। क्षतयुक्त कण्ठयोथमें प्रथम बेलोडोना बताते हैं। लघु, पांशवणे अथच अनिष्टदायक क्षत होनेसे एसिड नाइट्रिक चलता है। दुर्गन्ध और धातुदौर्बल्य<noinclude></noinclude>
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६६४|कस्ठरोग|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
उसोको संस्कृतज्ञ शिलाघ कहता है। यह रोग यन्त्र- साध्य है। सुश्रुतने इस रोगका नाम 'गिलायु' लिखा है।
<Small>गलविद्रधि</small>-समस्त गलदेशका फलना और उसमें नानाप्रकार यातना होना गलविद्रधि कहाता है। यह रोग यदि मरस्थानमें न रहे और अच्छीतरह पक उठे, तो छेदन कर देना चाहिये।
<Small>गलीध</small>-कफ एवं रक्तसे गलदेश अत्यन्त फूल उठनेपर अबनाली वा जलप्रवेशका पथ रुकना, वायुकी गतिका बिगड़ना और तीव्र ज्वरका चढ़ना ही गलौघ रोग है।
<Small>खरन</small>-रोगीको मूळ पाने, सर्वदा श्वास जाने,स्वरभङ्ग पाने और कण्ठ मुखानेसे स्वरघ्न रोग समझा जाता है। रोगी कुछ पहचान नहीं सकता और श्वासका पथ सकता है।
<Small>मांसतान</small>-गलदेशका शोथ क्रमशः बढ़ते बढ़ते कण्ठनालीको रुध लेनेसे मांसतान रोग होता है। इस रोगमें शोथ विस्तुत, अति क्लेशदायक और सम्बमान रहता है। इसमें रोगी बच नहीं सकता।
<Small>वेदारी</small>-पित्तके प्रकोपसे गलदेश एवं मुखमें ताम्ब-वर्ग तथा दाह और वेदनायुक्त जो शोथ उठता, उसीका नाम विदारी पड़ता है। विदारोसे सड़ागला मांस गिर जाया करता है। रोगी जिस पार्श्व पर अधिक सोता, उसी में पार्श्व में यह रोग होता है।
साधारणतः कण्ठरोगमात्र में दारुहरिद्रा, निम्बत्वक, शालच एवं इन्द्रयव सकल ट्रव्योंका क्वाथ अथवा मधु मिला हरीतकोका कषाय पीना चाहिये। १-कटुकी, अतिविषा, देवदारु, पाकनादि, मुस्तक और इन्द्रयव सकल द्रव्यका क्वाथ गोमूत्र के साथ पान करते हैं। २-पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, शुण्ठी, सर्जिक्षार और यवक्षार सकल द्रव्य समभागमें चर्ण कर व्यवहार में लाना योग्य है। ३-मनःपिला, यवनार, हरिताल, सैन्धव और दारुहरिद्रा सकलका चर्ण मधु तथा घृतके साथ मुखमें धारण करनेसे मुखरोग एवं गलरोग विनष्ट होता है। ४-यवक्षार, गजपिप्पली, पाकनादि, रसाजन,देवदार, हरिद्रा और पिप्पली सकल द्रव्य कूटपीस
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मधुके साथ गुड़िका बना डाले। यह गुड़िका मुख में धारण करनेसे गलरोग छूट जाता है। <Small>(चक्रदत्त)</small>
युरोपीय चिकित्सकोंके मतसे कण्ठरोग नाना-प्रकार होता है। उसमें सामान्य कण्ठ गोथ ( Simple sore throat), क्षतयुक्त कण्ठशोथ (Ulcerated sore- throat ), गलग्रन्थिप्रदाह (Quinsy or Tonsilitis),साङ्घातिक कण्ठशोथ ( Malignant sore-throat ), पौर साबिपातिक कण्ठरोग (Diphtheria) प्रधान है।
कण्ठशोथ उठनेसे कण्ठमें प्रदाह, निगलने में कष्ट-बोध, श्वास छोड़ने में दुःख, कण्ठके स्वरका परिवर्तन और ज्वर होता है। प्रथम वाधा न देनेसे यह रोगvक्रमशः बढ़ जाता है। जिह्वा फलती पार बिगड़ती है। गलका ग्रन्थि रक्तवर्ण रहता और गलदेशके पीछे छोटा छोटा पीला फोड़ा पड़ता है। वृष्णा और नाडीको गति बढ़ती है। कभी कभी गाल फूल कर लाल हो जाता है। चक्षु जलने लगते हैं। रोग बढ़नेपर चित्तविभ्रम होता है। रोगवृद्धिके साथ ही साथ गलग्रन्थि भी बढ़ता और उसमें पूय पड़ता है। स्फोटक फट जानेसे स्वास्थ्यबोध होता है। कभी कभी फटने पीछे ग्रन्थि फिर पूर्ववत् फल उठता है। इसकी चिकित्सा साथ ही साथ होना चाहिये। कारण चिकित्सा न करनेसे यह रोग साङ्घातिक पड़ जाता है। ऐसे स्थलमें कठिन ज्वर पाता है।
सामान्य कण्ठशोथमें होमिओपाथिक चिकितसा विशेष उपकारी है। भोजन पौछ शीत लगनेसे जो सामान्य कण्ठशोथ हो जाता, उसका औषध डल- कामरा है। वायुके परिवर्तनसे होनेवाले कण्ठ-शोथपर गेलसेमिनम् चलता है। ज्वर के साथ शीत लगने और कण्ठशोथ उठनेसे एकोनाइट दिया जाता है। कण्ठवेदना, कण्ठशुष्कता एवं शिरःपीड़ा बढ़ने और मुख लाल पड़नेसे बेलोडोना खिलाते हैं। कण्ठ खिंचने, निगलने में कष्ट मालम पड़ने और कफ निकलते रहने से माकु रियास उपकारी है। क्षतयुक्त कण्ठयोथमें प्रथम बेलोडोना बताते हैं। लघु, पांशवणे अथच अनिष्टदायक क्षत होनेसे एसिड नाइट्रिक चलता है। दुर्गन्ध और धातुदौर्बल्य<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कण्ठरोग|६६५}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
बढ़नेपर बापटेसिया तथा कार्बो-वेजिटेबिलिस दिया जाता है।
<Small>गलयन्थिप्रदाह</small>[ (Tonsilitis)-गलदेशमें किसी स्थान-पर प्रदाह उठनेसे यह रोग होता है। यह रोग भी,नाना प्रकारका है। किन्तु स्तन्यपायो शिशुसन्तानको गलग्रन्थिप्रदाह अधिक नहीं सताता। पांचसे दश वर्ष तक इस रोगका प्राबल्य रहता है। फिर पचास वर्षको अवस्थामें भी गलग्रन्थि-प्रदाह उठ खड़ा होता है। यह रोग सकल ऋतुमें लगता और शीतकालमें विशेष प्रबल पड़ता है। शीतल वा हिम एवं आर्द्र वा दूषित वायुके सेवन और शीत पैत्तिक प्रकृति दोषके कारण गलग्रन्थिप्रदाह उतपन्न होता है। यह रोग उसी मनुष्यको प्रायः आक्रमण करता, जो देखने में अच्छा लगता है। गण्डमाला रोग अच्छा होने पोछे भी गलग्रन्थि प्रदाह उठा करता है। यह रोग लगनेसे पहले रोगी विशेष स्वस्थ अवस्थामें रहता, कभी कभी उदरमें गड़बड़ पड़ता है। गलगन्धिप्रदाहका लक्षण शीतबोध, कम्पन, चर्ममें उत्ताप, उत्तेजित नाडी कृष्णा, शिरःपौड़ा अथवा क्षुधामान्दा, असुखबोध और प्रत्यङ्गमें व्यथा वा शोथ है। चूंट उतारने में कष्ट मालम देता, मानो गलदेशको कोई दबा लेता है। घण्टे दो घण्टे में सामान्यसे अति दारुण यन्त्रणा, प्रदाह और निगलनेकी इच्छाका उगमन होता है। घूंट उतारने में कभी कभी इतना कष्ट पड़ता, कि आक्षेप पर्यन्त श्रा लगता है। इस रोगमें खांसीका वेग बढ़ता और कफ निकलता है। कण्ठमें दोषका सञ्चार होता है। खासप्रश्वास कष्टसे चलता है। कण्ठ घरघराने लगता है। कभी कभी रोग कठिन होनेसे बिलकुल स्वर रुक जाता है। किसी किसी स्थानपर गलेका शोथ अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त होता है। निश्वास छोड़ते समय वेदना मालम पड़तो, कभी कभी सांसतक रुकती है। यह रोग अति पीड़ादायक है। सचराचर गलग्रन्थिप्रदाह सातसे चौदह दिनतक रहता है।
शोध काट न डालनसे बात कहते, वमि करते या खांसते समय फट जाता है। सोते समय भी वह फटा करता, किन्तु उस अवस्थामें रोगीको अधिक
</Small>Vol. III. 167{{gap}}{{gap}}
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कष्ट मालूम नहीं पड़ता। नोंद टूटनेसे स्वास्था बोध होता है। यह रोग पांच सात दिनमें मिटता है। खास रुकनेसे मृत्युका भय रहता, नहीं तो केवल कष्ट पड़ता है।
<Small>चिकित्सा</small>-प्रथम अवस्थापर किसी पात्रमें उण्या जल डाल थोड़ा कपूर और पाध छटांक विनिगार छोड़ देते हैं। फिर सांसको एकाएक ऊपर चढ़ा इसका उत्ताप ग्रहण किया जाता है। धम लगनेसे किसी कारण यदि अधिक खांसी पाये, तो शयनकाल मृटु विरेचक और प्रातःकाल भेदक पौषध व्यवहारमें लाये। उष्ण जलमें लवण और राजसप मिला रोगीके हाथ-पैर डबाकर रखना चाहिये। पहले यह रोग होनेसे चिकित्सक फली काट डालते थे। फिर कोई तेज़ाबसे उसे उड़ाही देता था। किन्तु उसमें भी अनिष्ट समझ कोई कोई अस्त्रचिकित्सा द्वारा रक्त निःसारण किया करते हैं। दुवैल, मन्दमोजो एवं अस्वस्थ व्यक्ति यह रोग लगनेसे बहुत दुबला हो जाता है। ऐसौ अवस्थामें रक्त निकालना न चाहिये। सहज उपायसे चिकित्सा करना उचित है। २ ड्राम नमकका तेजाब ड्राम के जलमें मिला कईसे साव-धानतापर प्रलेप लगाते हैं। दिनको डिकाक्सन अव सिनकोना, टिक्चर सिनकोना और एसेटेट अव अमो-निया प्रयोग करना चाहिये। इस औषधको कियत-काल कण्ठमें दवा पिछे निगलना कहा है। कोई
कोई इस रोगमें पदतल छेद रक्त निकाला करता है।
होमियोपाधिक मतसे इस रोगपर बेलोडोना, माकु रियास, हेपार, आर्सेनिक, साइलेसिया प्रकृति प्रयोग करते हैं।
दुग्धपोष्य शिशुवोंके एकप्रकारका जो कण्डशोथ होता, उसे अंगरेजीमें थश ( Thrush ) और हिन्दौमें मुहाना या मुंहावां कहते हैं। इस रोगसे मुंहमें एक प्रकार कुकुरमुत्ता उत्पन्न हो जाता है। मुखमें पहले छोटे-छोटे सफेद दाग उठते, जो बांसको गांठ जैसे देख पड़ते हैं। रोगोको ज्वरबोध होता है। तन्द्रा, उदरामान, शूलव्यथा, अजीर्ण रोग प्रभृति लक्षण झलकने लगते हैं। शिशु स्तन्यपान करने में<noinclude></noinclude>
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बढ़नेपर बापटेसिया तथा कार्बो-वेजिटेबिलिस दिया जाता है।
<Small>गलयन्थिप्रदाह</small>[ (Tonsilitis)-गलदेशमें किसी स्थान-पर प्रदाह उठनेसे यह रोग होता है। यह रोग भी,नाना प्रकारका है। किन्तु स्तन्यपायो शिशुसन्तानको गलग्रन्थिप्रदाह अधिक नहीं सताता। पांचसे दश वर्ष तक इस रोगका प्राबल्य रहता है। फिर पचास वर्षको अवस्थामें भी गलग्रन्थि-प्रदाह उठ खड़ा होता है। यह रोग सकल ऋतुमें लगता और शीतकालमें विशेष प्रबल पड़ता है। शीतल वा हिम एवं आर्द्र वा दूषित वायुके सेवन और शीत पैत्तिक प्रकृति दोषके कारण गलग्रन्थिप्रदाह उतपन्न होता है। यह रोग उसी मनुष्यको प्रायः आक्रमण करता, जो देखने में अच्छा लगता है। गण्डमाला रोग अच्छा होने पोछे भी गलग्रन्थि प्रदाह उठा करता है। यह रोग लगनेसे पहले रोगी विशेष स्वस्थ अवस्थामें रहता, कभी कभी उदरमें गड़बड़ पड़ता है। गलगन्धिप्रदाहका लक्षण शीतबोध, कम्पन, चर्ममें उत्ताप, उत्तेजित नाडी कृष्णा, शिरःपौड़ा अथवा क्षुधामान्दा, असुखबोध और प्रत्यङ्गमें व्यथा वा शोथ है। चूंट उतारने में कष्ट मालम देता, मानो गलदेशको कोई दबा लेता है। घण्टे दो घण्टे में सामान्यसे अति दारुण यन्त्रणा, प्रदाह और निगलनेकी इच्छाका उगमन होता है। घूंट उतारने में कभी कभी इतना कष्ट पड़ता, कि आक्षेप पर्यन्त श्रा लगता है। इस रोगमें खांसीका वेग बढ़ता और कफ निकलता है। कण्ठमें दोषका सञ्चार होता है। खासप्रश्वास कष्टसे चलता है। कण्ठ घरघराने लगता है। कभी कभी रोग कठिन होनेसे बिलकुल स्वर रुक जाता है। किसी किसी स्थानपर गलेका शोथ अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त होता है। निश्वास छोड़ते समय वेदना मालम पड़तो, कभी कभी सांसतक रुकती है। यह रोग अति पीड़ादायक है। सचराचर गलग्रन्थिप्रदाह सातसे चौदह दिनतक रहता है।
शोध काट न डालनसे बात कहते, वमि करते या खांसते समय फट जाता है। सोते समय भी वह फटा करता, किन्तु उस अवस्थामें रोगीको अधिक
</Small>Vol. III. 167{{gap}}{{gap}}
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कष्ट मालूम नहीं पड़ता। नोंद टूटनेसे स्वास्था बोध होता है। यह रोग पांच सात दिनमें मिटता है। खास रुकनेसे मृत्युका भय रहता, नहीं तो केवल कष्ट पड़ता है।
<Small>चिकित्सा</small>-प्रथम अवस्थापर किसी पात्रमें उण्या जल डाल थोड़ा कपूर और पाध छटांक विनिगार छोड़ देते हैं। फिर सांसको एकाएक ऊपर चढ़ा इसका उत्ताप ग्रहण किया जाता है। धम लगनेसे किसी कारण यदि अधिक खांसी पाये, तो शयनकाल मृटु विरेचक और प्रातःकाल भेदक पौषध व्यवहारमें लाये। उष्ण जलमें लवण और राजसप मिला रोगीके हाथ-पैर डबाकर रखना चाहिये। पहले यह रोग होनेसे चिकित्सक फली काट डालते थे। फिर कोई तेज़ाबसे उसे उड़ाही देता था। किन्तु उसमें भी अनिष्ट समझ कोई कोई अस्त्रचिकित्सा द्वारा रक्त निःसारण किया करते हैं। दुवैल, मन्दमोजो एवं अस्वस्थ व्यक्ति यह रोग लगनेसे बहुत दुबला हो जाता है। ऐसौ अवस्थामें रक्त निकालना न चाहिये। सहज उपायसे चिकित्सा करना उचित है। २ ड्राम नमकका तेजाब ड्राम के जलमें मिला कईसे साव-धानतापर प्रलेप लगाते हैं। दिनको डिकाक्सन अव सिनकोना, टिक्चर सिनकोना और एसेटेट अव अमो-निया प्रयोग करना चाहिये। इस औषधको कियत-काल कण्ठमें दवा पिछे निगलना कहा है। कोई कोई इस रोगमें पदतल छेद रक्त निकाला करता है।
होमियोपाधिक मतसे इस रोगपर बेलोडोना, माकु रियास, हेपार, आर्सेनिक, साइलेसिया प्रकृति प्रयोग करते हैं।
दुग्धपोष्य शिशुवोंके एकप्रकारका जो कण्डशोथ होता, उसे अंगरेजीमें थश ( Thrush ) और हिन्दौमें मुहाना या मुंहावां कहते हैं। इस रोगसे मुंहमें एक प्रकार कुकुरमुत्ता उत्पन्न हो जाता है। मुखमें पहले छोटे-छोटे सफेद दाग उठते, जो बांसको गांठ जैसे देख पड़ते हैं। रोगोको ज्वरबोध होता है। तन्द्रा, उदरामान, शूलव्यथा, अजीर्ण रोग प्रभृति लक्षण झलकने लगते हैं। शिशु स्तन्यपान करने में<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६६६|कण्ठरोग|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
अत्यन्त कष्ट पाता है। इस रोगमें मधु पिलाना चाहिये। २ भाग काबेनेट अव सोडा और १भाग ग्रे-पाउडर मिला दो ग्रेनसे पांच ग्रेनतक प्रत्यह तीन-बार खिलाते हैं। लाइमवाटर, विस्मथ, चक इत्यादि भी उपकारक है।
होमियोपाथिक मतमें मुलायम रूईसे बोराक्सको बाहर लगाना चाहिये। अधिक परिमाणसे कफ निकलने या क्षत पड़ने पर मारकुरियास, पीछे सलफर दिन और रातको खिलाते हैं। अधिक दूध गिरने वा अम्ल लगनेसे पलसाटिला या नक्स देना चाहिये। रोग कठिन हो जानेपर छह या बारह घण्टे के अन्तर प्रथम आर्सेनिक, पौछे एसिड नाइटिक प्रयोग करना
चाहिये।
सांघातिक कलशोथ (विदारी)-यह रोगं सचराचर शरत्कालके प्रारम्भमें देख पड़ता और बहुव्यापी एवं संक्रामक ठहरता है। इसका लक्षण शोत, कम्पन, ताप, दौर्बल्य, हृदयमें वेदना, वमन आर भेद है। चक्षु जलमय और ज्वालायुक्त हो जाते हैं। श्रोष्ठ अधिक रक्तवर्ण देख पड़ते हैं। नाड़ी दुर्बल लगती है। जिह्वा खेत पड़ जाती है। निगलने में अति कष्ट बोध होता है। कण्ठ फलकर लाल पड़ जाता है। कण्ठपर नाना आकारमें नालोके क्षत उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी यह नाली ऊपर नासिका और नीचे नली पर्यन्त फैल जाती है। पहलेसे शरीर प्रव-सब लगता है। रोगी मध्य मध्य अण्डबण्ड बक देता है। निवासमें दुष्ट गन्ध पाता और रोगीके हृदय में भी दुर्गन्ध छा जाता है। गलितावस्था उपस्थित किसी
होनेपर कम्पन बढ़ता, नाड़ोका वेग दुर्बल पड़ता, मुख नौचेको झुकता, कठिन भेद लगता और नासिका तथा मुखसे रक्त गिरता है। उक्त लक्षण झलकनसे रोग साङ्घातिक समझा जाता है।
चिकित्सा-इस रोगमें पहले ही अधिक ज्वर चढ़ने पर दो घण्टे के अन्तरसे एकोनाइट देना चाहिये। उसके बाद बैलेडोना चलता है। मुखमें विस्वाद एवं दुर्गंध रहने, गाढ़ कफ गिरने, शीत लगने, कम्पन बदने, बीच बीच शरीर उष्ण पड़ने और रात्रिको
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खेद निकलनेसे दी घण्ट के अन्तरसे माकु रियास खिलाते हैं। रोग अत्यन्त कठिन होनेपर रसको व्यवहार करते हैं। सिवा इसके सलफर, साइलिसिया, आर्सेनिक, एसिड नाइटिक प्रभृतिको भी प्रयोगमें ला सकते है।
<Small>वकछादन</small>( Diphtheria)-कण्ठ के मध्य श्लेष्माको झिल्लीपर प्रदाह-जनित कृत्रिम झिल्ली ( False mem. brane) पड़ जाती है। इस कण्ठरोगको डाकर डिफ़थिरिया कहते हैं। (अपर नाम Cynanche Maligna वा Angina Maligna है) यह रोग १ वर्षसे ८ वर्ष वयस पर्यन्त प्रायः शिशवोंको अधिक लग जाता है। वाह्य वायु और शरीरस्थ रक्त के दोषसे यह रोग उत्पन्न होता है। कृत्रिम झिल्लो प्रथम गलग्रन्थि वा तालुमें पड़तो, फिर कभी तालुमूल और कभी खासनाली ( Larynx and Trachea ) पर्यन्त बढ़ चलतो है। श्वासनालोमें यह रोग उत्पन्न होनेसे मृत्य रोके नहीं सकता।
<Small>लक्षण</small>-कण्ठ के भीतर भिक झिल्ली लाल और फलो देखाती है। सहज पोड़ामें ज्वर पाता, गलेका दुःख बढ़ जाता, ग्रोवाका ग्रन्थि कुछ सूजा देखाता और चूंट निगलने में रोगो कष्ट पाता है। फिर स्वर टूट जाता, नासाके रन्धमें शब्द समाता और पल्प पल्प श्वास भो पाता है। इपिण्ड असार रहनेसे सहज हो मृत्य दौड़ सकता है। कण्ठके स्थानविशेष पर आक्रमण होनेसे रोगका लक्षण भी बदल जाता है।
<Small>१ नासात्वकछादन </small>(Nasal Diphtheria)-किसी चिकित्सकके मतमें यह रोग नासासे निकल गलदेश पर्यन्त फैलता, किन्तु सचराचर गलदेशसे चल नासिकातक पहुंचता है। इस रोगमें खासरोधको सम्भावना रहती और प्रायः मृत्युको दौड़ लगा करती है।
<Small>२ त्वछादनिक काश </small>(Diphtheric Croup)-इस रोगमें धड़ाधड़ काशका लक्षच झलकता, जो साङ्घा-तिक निकलता है।
<Small>३ वहिस्त कछादन </small>(Cutanedus Diphtheria)-सचराचर कण्ठरोग होनेपर वकके जिस स्थानमें चत<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२०९
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Shivaniya shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अजादनी — अजामिल'''|'''२०३'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>जो बकरेका गोश्त खाये । २ एक प्राचीन युद्धप्रिय जातिके पूर्वपुरुष, एक
पुरानी लड़ाकू कौम के बुजुर्ग ।
{{Outdent|अजादनी (सं० स्त्री०) अजैः छागैः अक्लेशेन अद्यते असौ; अज-अद-ल्युट् कर्मणि, ६-तत्। दुरालभा, बेर; वह वृक्ष जिसे बकरे बड़े प्रेम से खाते हैं।}}
{{outdent| अजादि (सं० पु०) अज इति शब्द आदौ येषां, बहुव्री०। अज प्रभृति, बकरे वगैरह। }}
{{outdent| अजादुग्ध (सं० क्ली०) बकरी का दूध। }}
{{outdent| अजान (हिं० वि०) १ बेसमझ, भोला-भाला, सीधा, न जानने वाला। २ जो जाना हुआ न हो, बिना पहचान का। (पु०) ३ नासमझी, अज्ञान। ४ एक वृक्ष जिसके नीचे जाने से लोग कहते हैं, कि मनुष्य की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। }}
{{outdent| अजानपन (हिं० पु०) ज्ञान का अभाव, मूर्खता, बेवकूफी, नादानी, नासमझी। }}
{{outdent| अजानय (सं० पु०) उत्तमाश्व, बढ़िया घोड़ा। }}
{{outdent| अजानि (सं० पु०) नास्ति जाया यस्य, बहुव्री०। जायाया निङ्। पा ५।४।१३४। जायाशून्य, वह पुरुष जिसके स्त्री न हो। }}
{{outdent| अजानिक (सं० त्रि०) अज विक्रयादिना आनो कागव्यवसायी, जीवनं अस्ति अस्य, अजान-ठन्। बकरे बेचने वाला। }}
{{outdent| अजानेय (सं० पु०) अजेऽपि विक्षेपेऽपि आनेयः प्रापणीयः येन; अज-आ-नी- यत् कर्मणि, ३-तत्। उत्तम अश्व, बढ़िया घोड़ा। }}
{{outdent| अजान्त्री (सं० स्त्री०) अजस्य अन्त्रमिव अन्त्रमन्त्राकारवती कोठरमञ्जरी यस्याः। हिरनपत्ती, नीलधुना, नीलपुष्पा, अतिलोमशा। यह ओषधि कटुरसा, कासनी, वीर्यदा और गर्भजननी होती है। }}
{{outdent| अजापक्व (सं० क्ली०) पक्वघृतविशेष, खूब तपाया हुआ घी। }}
{{outdent| अजापञ्चक (सं० क्ली०) यक्ष्मरोग का घृत, क्षयरोग में दिया जाने वाला आयुर्वेदिक घी -
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
बकरी का घी, बकरी की लेंडी का रस, बकरी का दूध, बकरी का दही, बकरी का मूत्र दो सौ छप्पन
तोले ले और इसमें ३२ तोले यवक्षार डालकर यथाविधि पकाये। यह घी यक्ष्मरोग का नाश करता है। }}
{{outdent| अजापय, अजापयस् (सं० क्ली०) छागदुग्ध, बकरी का दूध। }}
{{outdent| अजापालक (सं० त्रि०) १ बकरी पालने वाला। २ बकरियों का झुण्ड। }}
{{outdent| अजाप्रिया (सं० स्त्री०) बदरीवृक्ष, बेर का पेड़। }}
{{outdent| अज़ाब (अ० पु०) १ पाप, गुनाह। २ दण्ड, सज़ा। ३ पीड़ा, तकलीफ। ४ प्रायश्चित्त। }}
{{outdent| अजामांस (सं० क्ली०) बकरी का मांस। यह लघु, स्निग्ध, किञ्चिदुष्ण, रुचिप्रद, मधुर, पुष्टिकर, बल्य और वात-पित्तघ्न होता है। }}
{{outdent| अजामि (वै० त्रि०) १ असम्बन्धी, २ असम्बद्ध, बेतरतीब। वेमेल। }}
{{outdent| अजामिता (वै० स्त्री०) १ सम्बन्धराहित्य, वेमेली। २ दुश्मनी, शत्रुता। }}
अजामिल - वह पापी ब्राह्मण जो अपने लड़के 'नारायण' का नाम लेने से मुक्त हुआ था। भागवत में लिखा है, – अजामिल कान्यकुब्ज-देशीय एक ब्राह्मण थे। पहले यह शास्त्रविशारद और समस्त सद्गुण-सम्पन्न रहे। एक दिन यह पिता की आज्ञा से वन को चले। वहाँ एक शूद्रा वेश्या को मधुपान से मत्त हो किसी शूद्र के साथ क्रीड़ा करते देख यह उसके प्रति एकान्त अनुरक्त हो गये और उसे अपने घर ले आये। इन्होंने उसकी इच्छा पूरी करने के लिए समस्त पितृसम्पत्ति को व्यय कर डाला। धीरे-धीरे चौर्यादि असद्वृत्ति का अवलम्बन कर यह उस वेश्या के साथ दिनपात करने लगे। और अपनी परिणीता सत्कुलजाता ब्राह्मणी का इन्होंने परित्याग किया। कालक्रम में उस वेश्या के गर्भ से इनके दस पुत्र उत्पन्न हुए; सबसे छोटे का नाम 'नारायण' था। अजामिल छोटे पुत्र का बड़ा प्यार करते, सर्वदा उसके लालन-पालन में लगे रहते और किसी भी समय परलोक का विषय सोचते न थे। अठासी वर्ष उस शूद्रा के साथ बिताने के बाद इनका आसन्नकाल आ
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२०४'''|'''
अजामूत्र—अजिण्ठा'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>उपस्थित हुआ। उस समय यह नारायण का विषय सोचने लगे। इन्होंने देखा, कि तीन, पाशहस्त, वक्रमुख और भयानक यमदूत उन्हें लेने पहुँचे थे। उन्हें देख अजामिल अत्यन्त भीत हुए, उद्वेगवश बालक नारायण को बार-बार पुकारने लगे। भयाकुल अजामिल के मुख से नारायण का नाम निकलने पर विष्णुदूतों ने आकर यमदूतों को निवारण और इनके निकट हरिगुणानुवाद का कीर्तन किया। चचमाल साधुसङ्ग का लाभ कर अजामिल का निर्वेद वा उपस्थित हुआ। यमदूतों के हाथ से संसार बन्धन को छिन्न कर इन्होंने गङ्गाद्वार की यात्रा की और वहाँ योगसाधनपूर्वक देह का त्याग कर वैकुण्ठधाम गये।
{{outdent| अजामूत्र (सं० क्ली०) बकरी का पेशाब। यह कटु, उष्ण, रूक्ष, नाड़ीविघ्नघ्न; प्लीहोदर, कफ, श्वास, गुल्म एवं शोथहर और लघु है। }}
{{outdent| अजामेद (सं० क्ली०) छागवसा, बकरी की चर्बी। }}
{{outdent| अजाय (हिं० वि०) अनुचित, गैरवाजिब। }}
{{outdent| अजायब (फ़ा० पु०) आश्चर्यजनक द्रव्य, अनोखी चीज़। }}
{{outdent| अजायबखाना (फ़ा० पु०) आश्चर्यजनक द्रव्यों का भवन, अनोखी-अनोखी चीजें रहने का स्थान; Museum. }}
{{outdent| अजायबघर—Museum. अजायबखाना देखो। }}
{{outdent| अजार (हिं० पु०) आजार, रोग, बीमारी। }}
{{outdent| अजारा (हिं० पु०) इजारा। अधिकार, इख्तियार। }}
{{outdent| अजाविक (सं० क्ली०) १ भेड़-बकरा। २ कीटे पशु। }}
{{outdent| अजाविद् (सं० क्ली०) छागविष्ठा, बकरी की लेंडी। }}
{{outdent| अजाम्ब (सं० क्ली०) १ घोड़ा-बकरा। २ सूर्य। }}
{{outdent| अजास्त्रा (सं० क्ली०) आत्मगुप्ता, कौंच। }}
{{outdent| अजि (सं० त्रि०) अज गतो-अपि च इन्। गतिशील, चलनेवाला। }}
{{outdent| अजिधौरा (हिं० पु०) बाजी या दादी के बाप का मकान। }}
{{outdent| अजिका (सं० स्त्री०) तरुण छाग, नौजवान बकरी। }}
{{outdent| अजिष्ठा, (अजण्ठा)—नर्मदा और ताप्ती नदी के निकटवर्ती खानदेश की इत्याद्रिकी प्रसिद्ध गुहावली। इसका चलित नाम अजण्ठा है, लोग अजन्ता भी}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
भूलसे कहते हैं। इस गुफा में बौद्धों का चैत्य और बौद्ध-सन्न्यासियों के कई विहार या मठ वर्तमान हैं। इसीलिये अजिष्ठा इतना प्रसिद्ध हो गया है। अक्षा० २०° १२' उ० और द्राघि० ७५°४६' पू० यह अवस्थित है। यह गुफा अजिष्ठा ग्राम से ४ मील पश्चिम और वघार-रणस्थल के निकट है।
इसका अपर नाम इत्याद्रि है। अजिष्ठे के बौद्ध-विहार और चैत्य जगद्विख्यात हैं। यह चैत्य निजाम राज्य के फर्दापुर नगर से साढ़े तीन मील दक्षिण-पश्चिम और पचोरा रेलवे-स्टेशन से सत्रह कोस दक्षिण-पूर्व में अवस्थित है। हिन्दू कारीगरों के हाथ का बहुकाल पाला नक्काशी का काम और चित्रकौशल भारतवर्ष के अनेक स्थानों में आज भी विद्यमान देखा जाता है। कटक, भुवनेश्वर, इलोरा और अजिष्ठा की शोभा आज भी नूतन बनी, आज भी वह सौन्दर्य नष्ट हुआ नहीं है। छठें विहार में बुद्धदेव की एक मूर्ति बड़े ही परिथम से निर्माण की गई, जो बोलना जैसा चाहती है। यहाँ जैसे चित्र इटली में भी कहीं देख नहीं पड़ते।
फर्दापुर होकर जाने में अजिष्ठा के गिरि-चैत्य का पथ वाघुर उपत्यका से दक्षिण दिक् में बारह कोस दूर जा निकलता है। इसके बाद दक्षिण-पश्चिम दिक् में दूसरी एक छोटी उपत्यका है। इस उपत्यका के भीतर से वाघुर-नद के किनारे-किनारे जाना पड़ता है। कोई एक कोस पथ के बाद वाघुर नद एकबारगी ही ठीक पश्चिम दिक् को घूम गया है। इसी जगह खड़े होने से अजिष्ठा के गिरि-चैत्य देख पड़ते हैं। पहाड़ छोटे-छोटे हैं, ढाई सौ फुट से अधिक ऊँचे नहीं। इसका एक दिक् काटकर नाना प्रकार की बनावट के खम्भे और तरह-तरह की मूर्तियाँ निकाली गई हैं। कुछ दूर से यहाँ के मन्दिर और विहार देखने से फिर आँख फेरी जा नहीं सकती, इच्छा होती है, कि बराबर इन्हें देखते ही रहें।
अजिष्ठे में सब मिलाकर उन्तीस गुहालिकायें हैं। इनमें पांच चैत्य अर्थात् देवमन्दिर, और चौबीस
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अजामूत्र—अजिण्ठा'''}}
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{{outdent| अजामूत्र (सं० क्ली०) बकरी का पेशाब। यह कटु, उष्ण, रूक्ष, नाड़ीविघ्नघ्न; प्लीहोदर, कफ, श्वास, गुल्म एवं शोथहर और लघु है। }}
{{outdent| अजामेद (सं० क्ली०) छागवसा, बकरी की चर्बी। }}
{{outdent| अजाय (हिं० वि०) अनुचित, गैरवाजिब। }}
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{{outdent| अजाविक (सं० क्ली०) १ भेड़-बकरा। २ कीटे पशु। }}
{{outdent| अजाविद् (सं० क्ली०) छागविष्ठा, बकरी की लेंडी। }}
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भूलसे कहते हैं। इस गुफा में बौद्धों का चैत्य और बौद्ध-सन्न्यासियों के कई विहार या मठ वर्तमान हैं। इसीलिये अजिष्ठा इतना प्रसिद्ध हो गया है। अक्षा० २०° १२' उ० और द्राघि० ७५°४६' पू० यह अवस्थित है। यह गुफा अजिष्ठा ग्राम से ४ मील पश्चिम और वघार-रणस्थल के निकट है।
इसका अपर नाम इत्याद्रि है। अजिष्ठे के बौद्ध-विहार और चैत्य जगद्विख्यात हैं। यह चैत्य निजाम राज्य के फर्दापुर नगर से साढ़े तीन मील दक्षिण-पश्चिम और पचोरा रेलवे-स्टेशन से सत्रह कोस दक्षिण-पूर्व में अवस्थित है। हिन्दू कारीगरों के हाथ का बहुकाल पाला नक्काशी का काम और चित्रकौशल भारतवर्ष के अनेक स्थानों में आज भी विद्यमान देखा जाता है। कटक, भुवनेश्वर, इलोरा और अजिष्ठा की शोभा आज भी नूतन बनी, आज भी वह सौन्दर्य नष्ट हुआ नहीं है। छठें विहार में बुद्धदेव की एक मूर्ति बड़े ही परिथम से निर्माण की गई, जो बोलना जैसा चाहती है। यहाँ जैसे चित्र इटली में भी कहीं देख नहीं पड़ते।
फर्दापुर होकर जाने में अजिष्ठा के गिरि-चैत्य का पथ वाघुर उपत्यका से दक्षिण दिक् में बारह कोस दूर जा निकलता है। इसके बाद दक्षिण-पश्चिम दिक् में दूसरी एक छोटी उपत्यका है। इस उपत्यका के भीतर से वाघुर-नद के किनारे-किनारे जाना पड़ता है। कोई एक कोस पथ के बाद वाघुर नद एकबारगी ही ठीक पश्चिम दिक् को घूम गया है। इसी जगह खड़े होने से अजिष्ठा के गिरि-चैत्य देख पड़ते हैं। पहाड़ छोटे-छोटे हैं, ढाई सौ फुट से अधिक ऊँचे नहीं। इसका एक दिक् काटकर नाना प्रकार की बनावट के खम्भे और तरह-तरह की मूर्तियाँ निकाली गई हैं। कुछ दूर से यहाँ के मन्दिर और विहार देखने से फिर आँख फेरी जा नहीं सकती, इच्छा होती है, कि बराबर इन्हें देखते ही रहें।
अजिष्ठे में सब मिलाकर उन्तीस गुहालिकायें हैं। इनमें पांच चैत्य अर्थात् देवमन्दिर, और चौबीस
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२०५'''|'''अजिष्ठा'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>विहार या संन्यासियों के मठ बने हैं । आजकल इन सबके ऊपर चढ़ा जा नहीं सकता। चार चंत्य और तेईस विहारोंपर चढ़ने में क्लश नहीं। बाकी दो स्थान अतिशय दुर्गम हैं । मन्दिर उंचाई और चौड़ाई में समान और जितने चौड़े, उससे दूने लम्बें हैं। छत ऊंची और उसमें नक्काशी को हुई है । किसी-किसी छतमें लकड़ी के तख्ते पटे हुए हैं। जिन मकानोंमें तख्ते नहीं पटे, उनको छतमें पत्थर ठीक तख ते जैसे काट-काटकर लगाये गये हैं । पुराने मन्दिरोंके खम्भे अठपहलू हैं, उनके नीचे या ऊपर किसी तरहको नक्काशी नहीं बनी है । किन्तु आधुनिक स्तम्भोंके नीचे वेदी है और उनके गात्र और कार्निसमें तरह-तरहके बेल-बूटे और चित्र सजाये गये हैं । मन्दिरके सम्मुखमें प्राचीर है । प्राचीरमें एक मन्दिर के पास चबूतरा और दूसरेके पास नाट्य- शाला विद्यमान है ।
यह ठीक नहीं कह सकते, कि अजिण्ठेके बौद्धाश्रमको बने कितने दिन हुए। पत्थरके ऊपर जो सकल वृत्तान्त खुदे थे, वह मिट गये हैं- अब सब पढ़े नहीं जा सकते । कोई-कोई विद्दान् अनुमान करते हैं, कि ईसा मसीह के जन्म से २०० वर्ष पहले राज वशिष्ठ अजिण्ठेका देवालय जनक गृहस्थको दान कर दिया था । कोई-कोई इसके निर्माणका समय सन् ५५० से ६४२ ई० तक ब हैं । किन्तु इसपर रंगामेजो समय-समय से होती रही, जो अधिक चालुक्य और अल्प बरारराज या वाकाटकके समय रची गई ।
अजिण्ठेके चैत्योंवाले चित्र देखने से पूर्वकालको वेशभूषा और उसके आचार-व्यवहारका अनेक परिचय मिलता है। चित्रोंमें अनेक हो देवमूर्तियां हैं। स्थान- स्थानमें राजसभा बनी है । सभाके मध्यस्थल में नृपति और उनको चारो ओर सभासद बैठे हैं। राजाको मूर्ति -परिष्कृत काञ्चनवर्ण है ; चतु छोटे-छोटे होंठ मोटे, कान बड़े, दाढ़ीका नाम नहीं, मुखमें केवल थोड़ी- थोड़ी मूछ और शिरके बाल एकत्र ऐंछकर दक्षिण दिक्की चूड़ा बंधी है । अलङ्कारके मध्य गलेमें
{{Left|५|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
मोती या सोनेका पंचलरा हार, बांहपर बाजूबन्द और
हाथ में कड़ा विद्यमान है; अङ्गपर पोशाक देख नहीं पड़ती । किसी स्थलमें वीरपुरुषोंके अङ्गपर पोशाक सजी हुई है। कोई हाथीपर बैठे और हाथमें धनुर्वाण और बरछा लिये सशस्त्र मृगया करने जाता, किसीने - मृगयाके लिये जाकर वनके भीतर दुर्जय सिंहको मार डाला है । पुरातन चित्रोंमें वीरपुरुषोंके हाथ नाना प्रकार अस्त्र देख पड़ते हैं, किन्तु कहीं भी बन्दूक नहीं मिलती । उस कालका अग्न्यस्त्र बन्दूक होनेसे क्या हम उसे किसी वीरके हाथ में नहीं देखते ? विहार में ईरान के बादशाह द्वारा सन् ६२६ ई० में दक्षिणके अधिपति पुलकेशिके पास भेजे गये एक दूत और उसके आनेका अपूर्व चित्र उतारा गया है। दो बैलोंको लड़ाई भी बड़ी ही खूबसूरती से दिखाई गई है। एक राजाका जुलूस के साथ निकलना देख मनमुग्ध हो जाता है ।
अजिण्ठेकी दूसरी ओर जाइये, — और भी अनेक चित्र देख पड़ते; चित्रोंके गात्रमं और भी अनेक इतिहास लिखे हैं । नृपति अन्तःपुरमें राजमहिषि- योंके साथ बात करते ; पास ही सहचरियां बैठी हैं । सहचरियां गौराङ्गिण । हैं, – बैठी हुई मानो अपने रूपकी गरिमा दिखा रही हैं। देखनेसे बोध होता है, मानो वह इस भारतकी नहीं - सकल हो यवन- कन्यायें हैं, ईरान या युरोपसे आ पहुंची हैं । एक. बड़े चित्रमें विजयका लङ्कामें पहुंचना और सिंहासनारूढ़ होना और एक मन्दिरको कारीगरी देख बौद्धोंके गुणकी प्रशंसा करनी पड़ती है । मिष्टर ग्रिफिथ के मत से युरोपमें इन चित्रोंकी कहीं भी समता नहीं मिलती। चीना साधुओंके भी चित्र ही बहुत अच्छे हैं। पूर्वकालसे ही इस देश के नृपति ईरा
आदि देशोंकी सुश्री यवनकन्या लाकर अपनी सहचरी बना लेते थे । दुष्यन्त राजा अनुमालिनौ नदीके कूलपर कख मुनिके आश्रम में मृगया करने गये थे; उनके साथ यवनकन्या भी थी। इसका उल्लेख शकुन्तला - नाटक में मिलता है-
<Small>" एसी वाणासणहत्याहिं जवणौहिं वण्पुप्फमालाधारिणौहिं परिवूदो इदो एव्व श्रभच्छदि पिश्रवसो ।"</small>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२१२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२०६'''|
अजिण्ठा - अजिण्ठा पर्वत}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>विदूषक कहता है - यह देखो ! धनुर्हस्ता वनमालाधारिणी यवनकन्यासे परिवृत हो मेरे प्रिय वयस्य इसी ओरको आ रहे हैं ।
चित्रके कोई नृपति और राजसभासद प्रजाका आवेदन सुनते, कोई बणिकोंके साथ बात करते हैं । किसी स्थलमें नौका और जहाज़ हैं । कोई नौका- पर चढ़ते, कोई नौकापर बैठ घूमते हैं । हमें ऋग्वेदमें समुद्र-पोतको बात देख पड़ती है, उससे कितने ही पीछे भी समुद्रपोत विद्यमान रहे हैं । इसका भी प्रमाण मिलता है, कि इस समय से कोई दो सहस्र वर्ष पहले इस देशके बणिक् समुद्रपथ द्वारा देशदेशान्तरमें बाणिज्य करने जाते थे । चित्रोंको देख यह बात स्पष्ट मालूम होती है, कि दो सहस्र वत्सर पहले हिन्दुओंमें विदेशयात्रा निषिद्ध मानी न जाती थी ।
डाकर बरगसने अजिण्ठेको चित्रकारो के विषयमें निम्नलिखित मत प्रकट किया है,-
चित्रकारीकी प्रशंसा लोग अधिक करते और कहते, कि जिस समय वह तैयार हुई, उस समय युरोपमें वैसी कारीगरी न थी । मनुष्यको आकृति प्रत्येक स्थितिमें दिखाई गई, जिससे अङ्गविद्याका विज्ञान प्रकट होता है। चित्रोंको विषम रूपसे बनानेमें चित्रकारोंने अनोखी सफलता प्राप्त की है । हाथ बहुत सुन्दर मालूम पड़ते हैं । बुद्धदेव, उनके शिष्यों और भक्तोंके सिवा सड़कों, जुलूसों, लड़ाइयों, और भवनवाले अन्तःपुरोंके चित्र अच्छे बनाये गये, जिनमें लोग अपने घराऊ काम करने लगे हैं । कहीं प्रेम, कहीं विवाह और कहीं मृत्युके समयका दृश्य चित्रित है । कहीं स्त्रियां तपस्या करती हैं । जङ्गली भैंसेका भालेसे शिकार करनेवाले सवारों को देख चित्त प्रसन्न हो जाता है । हाथोसे ले बटेर तक — सब पशु-पक्षी बनाये गये हैं । सांप, मछली, जहाज़ - किसी चीज की कोई कमी नहीं । घराऊ बरतन देखते ही बनते हैं। मट्टोका घड़ा, लोटा, पानी पीने का प्याला, कटोरी, थाल, सुन्दर सुराही और मसाला पीसनेका सिल और लोढ़ा बहुत ही
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
अच्छा लगता है। लड़ाईके हथियार भी खूब ही हैं। सोधी-तिरछी और छोटी-मोटी तलवारें, तरह-तरहके भाले, गदा, धनुर्वाण, चक्र और विभिन्न प्रकारको ढालें देखनेवालोंको वीररसमें डुबो देती हैं । यूनानी कलंगी जैसी भी एक चीज़ बनाई गई और एक ही रथमें तोन घोड़े जोत कर दिखाये गये हैं । चित्रकारी बहुत ही चमकीले रङ्गमें हुई है। प्रकाश और छाया ठोक परिमाणसे पड़ी, जिसे देख विदित होता, कि चित्र मर्मरवाले चुनेके मोटे तहपर उतारे गये हैं। कई जगह रङ्ग बहुत ही गहरा चढ़ा है ।'
उपरोक्त नानाविध सुन्दर चित्रोंके सिवा अजिण्ठेके गुहामन्दिर में बुद्धजीवन-सम्बन्धीय बहुतसे जातक दृश्य देख पड़ते हैं । इनमें शिशु बुद्धके निकट असितका आना, बुद्धदेवको योगभ्रष्ट करनेके लिये सदलबल कामदेवका प्रलोभन दिखाना, शिविजातक और नागजातक विशेष भावसे उल्लेख योग्य हैं । कहते हैं, कि मौर्य सम्राट् अशोकवाले राज्यावसान के कुछ पीछेसे भारतसे बौद्धप्रभाव विलोप होनेके कुछ पहले तक प्रायः आठ सौ वर्षसे ऊपरवाला भारतीय बौद्धोंका अपूर्व निदर्शन आजकल के चैत्यों और गुहामन्दिरों में इस समय भी प्रतिफलित हो रहा है ।
सन् १९०३-४ ई० में अंगरेजोंने झाड़-पोंछ इसे साफ कराया । सन् १८७० ई० में डाकर बरगसने जिस रंगामेजोका वर्णन लिखा था, अब वह अधिकांश उड़ गई।
अजिण्ठा ग्राम - औरङ्गाबाद जिलेके भोकरदन ताल्लुक - का एक ग्राम । यह स्थान दक्षिण- हैदराबाद राज्य के अन्तर्गत सर सलारजङ्गके वंशको जागीर है। इसमें कोई ढाई हज़ार आदमी रहते होंगे। सन् १७२७ ई० में निजामने यहां कुछ किले बनवाये थे । अजिण्ठा पर्वत ( इन्ध्याद्रि ) – यह गिरिमाला नासिक- जिलेके भनवाड स्थानसे मनमाडतक कोई पचीस कोसके अन्तरमें ४००० फुट ऊंची फैली है। मन- माड़के दक्षिण अङ्काईसे यह पूर्व की ओर राजपुरको ओर चली गई है। फिर कसारीसे इसकी दूसरी शाखाने निकल अजिण्ठेके समीप खान्देशको औरङ्गा-
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||अजित — अजितात्मन्'''|'''२०७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
बादसे पृथक् किया है। पूर्व की ओर बरारके बुल- 'डाना, अकोला और येवतमाल और दक्षिणकी ओर हैदराबाद के परभनी और निज़ामाबाद जिलोंमें भी इसका विस्तार देख पड़ता, जहां इसे सह्याद्रिपर्वत कहते हैं। सह्याद्रि पछत्तर और अजिण्ठा पर्वत पचास कोस लम्बा है। पुराने समय में व्यवसायी और योद्धा अजिण्ठा पर्वतको राह ही गुजरात और मालवेसे दक्षिण पहुंचते थे ।
अजित (सं० त्रि०) न-जि-क्त, नञ - तत् । १ परा- जितभिन्न, न हारा हुआ । (पुं०) २ विष्णु ।
३
शिव । ४ चतुर्दशमन्वन्तरका सप्तर्षिभेद । ५ द्वितीय तीर्थङ्कर । अजितनाथ देखो । ६ मैत्रेय बुद्ध । ७ तैलौषध-
अजिततैल (सं० क्लो० ) नेत्ररोगका
तैलविशेष, आंखकी बीमारीका एक तेल । इसके बनानेको यह विधि है, – तिलका तेल ३२ या ६४ तोले और आंवलेका रस और दूध दो सौ छप्पन छप्पन तोले डालकर खूब पकाये । कल्कके लिये एक पल यष्टि- मधु भी छोड़ देना चाहिये ।
अवस्थित है। इसकी उत्तर ओर
एक पुरातन
प्रसिद्ध : चीन
नगरका निदर्शन देख पड़ता है। परिव्राजक उअङ्ग चुअङ्ग इस स्थानको एक अद्भुत कहानी इसतरह लिख गये हैं- 'जनैक राजाने अजय- पुरमें एक गन्धहस्तौ पकड़ा था । बुद्धदेवने उसी हस्तीके औरससे जन्मग्रहण किया। पहले अजय- पुरमें मार्तण्डपुष्करिणी नामक एक सरोवर था । अनेकोंको विश्वास है, कि आजकल उसी पुष्करिणी- को लोग बुद्धकुण्ड कहा करते हैं। प्रति वत्सर बुद्ध- कुण्डपर अनेक लोगोंका समारोह होता है । यात्री स्नान के बाद पास-पास बैठ गयाके निकट- वर्ती समस्त तीर्थस्थानोंका नाम लेते हैं।
भेद । ८ एक प्रकारका ज.हर-मोहरा । एक | अजितबला (सं० स्त्री० ) जैनियोंको देवी विशेष, प्रकारका जहरीला चूहा । जो अर्हत अजितके आदेशानुसार कार्य करती हैं । अजितविक्रम (सं० पु० ) १ अपारशक्ति रखने- वाला | २ द्वितीय चन्द्रगुप्तको उपाधि | अजितसिंह – १ मारवाड़ — जोधपुर के जनैक राठौर महाराज । इनका जन्म सन् १६८१ ई० और मृत्यु सन् १७२४ ई० में हुई। इन्होंने राजरूपाख्यात नामक एक पुस्तक लिखाई, जिसमें सन् ४६८ ई० से पोछेका इतिहास सन्निवेशित किया गया । यह पुस्तक तीन भागों में बंटी है। पहले में नयन पालका अजयपालको मार जयचन्द्र के समय तक कन्नौज में
अजितनाथ - द्वितीय जैन तीर्थङ्कर, जैनियोंके दूसरे तीर्थङ्कर । इनके पिताका जितशत्रु और माताका नाम विजया था । चवणतिथि वैशाख शुक्ला त्रयोदशी, विमान- नाम विजय, तिथि माघशुक्ला अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र में इन्होंने जन्मग्रहण किया । यह विनीता नगरी में रहते थे । इनको जन्मराशि धनु, चिह्न वृषभ, शरीरमान ५०० धनु, आयुमान ८४ लक्ष पूर्व, कुल इक्ष्वाकु, साध्वी ३०००, चतुर्दश पूर्वी ४७५०, केवलो २००००, श्रावक ३५००००, श्राविका ५५४०००, ज्ञानतिथि फाल्गुन कृष्णा एकादशी, दीक्षावृक्ष वटवृक्ष, मोक्षासन मोक्षतिथि माघ कृष्णा त्रयोदशी, मोक्षस्थान अष्टपद, प्रथम गणधर पुण्डरोक और १ली आर्या ब्राह्मी है । अजितपुर, अजयपुर– एक प्राचीन नगर, जिसका आधुनिक नाम बक्रूर है । यह फला नदीके कूलमें
गणधर संख्या ८४, साधु ८४०००,
पद्मासन,
१६८१ ई० के समय
शासन करना, दूसरे में सन् महाराज यशोवन्त सिंहका शरीर छोड़ना और तौसरमें सूर्यवंशीय क्षत्रियोंका सन् १७३४ ई० तक इतिहा दिखाया गया है । इनके पुत्रका नाम महाराज अभयसिंह था, जो सन् १७२४ ई० में उत्पन्न और सन् १७५० ई० में स्वर्गवासी हुए थे। चूड़ामणि कविने भी अपनी पुस्तकोंमें महाराज अजितसिंहको बड़ी प्रशंसा की है । २ युक्तप्रदेश - प्रतापगढ़ के जनैक स्वर्गीय महाराज । मातादोन शुक्ल इनके दरबार में जाते, जिन्होंने ज्ञान - दोहावली लिखी थी। अजिता (सं० स्वी० ) भाद्रकृष्ण - एकादशी अजितात्मन् (सं० त्रि०) जिसने आत्माको न जीता, इन्द्रियोंके वशीभूत ।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३८०
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अध्यर्धकार्षापण—अध्यवहनन'''|'''३७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>काकिणी हो। काकिणी बीस कौड़ीके सिक्के़ और अध्यर्धसहस्र, अध्वर्धसाहस्र (सं० ति० ) परिमाण एक हाथकी नापको कहते हैं।
अध्यर्धकार्षापण, अध्यर्धकार्षापणिक (सं॰ त्रि॰) १ सार्ध कार्षापण-परिमित, डेढ़ कार्षापणके वज़नका। २ अर्धविशिष्ट कार्षापणके मूल्यवाला, जिसका
दाम डेढ़ कार्षापण हो। एक कार्षापण परिमाण और मूल्यमें अस्सी कौड़ियोंका होता है।
अध्यर्धखारीक (सं॰ त्रि॰) सार्ध खारीपरिमित, डेढ़ खारीकी तौलका। २ अर्धविशिष्ट खारीके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़ खारी हो। एक खारी दो मन सोलह सेरकी होती है।
अध्यर्धपण्य (सं॰ त्रि॰) १ सार्ध पणपरिमित, डेढ़ पण के वज़नका। २ अर्धविशिष्ट पणके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़ पण हो। पण एक तोले और आठ माशेका होता है।
अध्यर्धपाद्य (सं॰ त्रि॰) सार्ध पादपरिमित, डेढ़ क़दमका।
अध्यर्धप्रतीक (सं॰ त्रि॰) सार्धकार्षापण-परिमित, डेढ़ कार्षापण या १२० कौड़ियोंकी तौलका।
अध्यर्धमाश्य (सं० त्रि० ) सार्धमाश-परिमित, डेढ़ माशेका।
अध्यर्धविंशतिकीन (सं० त्रि०) परिमाण या मूल्य में सार्धं विंशतिका, जो वज़न या क़ीमतमं डेढ़ कोड़ो या तोसके बराबर हो।
अध्यर्धशत, अध्यर्धशत्य (सं० त्रि० ) सार्धं शत परिमित अथवा अर्धविशिष्ट शतसे क्रौत डेढ़ सौको संख्याका या डेढ़ सौ से खरीदा गया।
अध्यर्धशतमान (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शतमानके तुला, जो वजन या कीमत में ढेढ़ सेकड़ेके बराबर हो।
अध्यर्धशाण, अध्यर्धशाण्य (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शाणके तुल्य, जो वज़न या कोमतमें छ:माशे या आधे तोलेके बराबर हो । शाण चार माका होता है ।
अध्यर्धशूर्प (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शूर्प के सदृश, जो वजन या क़ीमतमें तौन माशेके बराबर हो। शूर्प दो माशेका होता है।
अध्यर्धसुवर्ण, अध्यर्धसुवर्णिक (सं० त्रिः ) परिमाण अथवा मूलप्रमें सार्ध सुवर्णके समान, जो वज़न या कीमतमें दो तोलेके बराबर हो।
सुवर्ण सोलह
माका होता है ।
अधार्बुद (सं० पु० ) अर्बुदोपरि जातार्बुदरोग, फोड़े-
पर फोड़ा या आबलेपर आबला पड़नेको बीमारी ।
"बज्जायतेऽन्यत् खलु पूर्वजाते ज्ञेयं तदध्यवु दमवु दनैः ।”
( मुश्रुत० नि० ११ अ० )
‘जो फोड़ा पहले हुए फोड़ेपर पड़े, उसे अध्यर्बुद
रोग समझना चाहिये ।'
अध्यवसान (सं० लौ० )
१ अभिप्राय, इरादा ।
२ चेष्टा, कोशिश ।
३ उत्साह, हौसला । ४ वाक्य-
रचनाका संक्षिप्त और शक्तिशाली वचन ; सनअते-
;
कलाम, जो बात मुख्तसर और जोरदार तौरपर
कहौ जाये ।
अध्यवसाय (सं० पु० ) अधि अव-सो- घञ् । १ उत्साह,
हौसला ।
२ अविश्रान्त उद्योग, जो काम बराबर
जारौ रहे । ३ निश्चय, यकीन । जो किसीको कोई
काम करनेसे किसौ तरहके फलका निश्चय हो जाये,
तो उस निश्चयको अध्यवसाय कहते हैं । नैयायिक
इसे आत्मधर्म बताते हैं ; किन्तु सांख्यवादियोंके
मतसे यह बुद्धिका धर्म है ।
अध्यवसायित (स ं० त्रि० ) अध्यवसायो जातोऽस्य,
तारकादित्वात् इतच् । जाताध्यवसाय, चेष्टित; कुरद
किये हुए,
जिसने पूरा इरादा बांध लिया हो ।
अध्यवसायिन् ( सं० त्रि० ) अधि-अव-सो- णिनि ।
१ उत्साहान्वित, हौसलेमन्द । २ उद्यमशील, रोज-
गारो । ३ निश्चयकारी, जिसे यकौन आ गया हो ।
अध्यवसायो, श्रध्यवसायिन् देखो ।
८४
अध्यवसित (सं० त्रि०) हृदयसे ज्ञात, निश्चित,
अनुमोदित ; दिलसे समझा बूझा, यकीन किया हुआ,
इरादा बांधा गया ।
अध्यवहनन (वै० क्लौ० ) अधि उपरि अवहननम्
अथवा मूलामें सार्धं सहस्रके समान, जो वजुन या
कोमतमें डेढ़ हज़ार के बराबर हो ।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अध्यर्धकार्षापण—अध्यवहनन'''|'''३७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>काकिणी हो। काकिणी बीस कौड़ीके सिक्के़ और अध्यर्धसहस्र, अध्वर्धसाहस्र (सं० ति० ) परिमाण एक हाथकी नापको कहते हैं।
अध्यर्धकार्षापण, अध्यर्धकार्षापणिक (सं॰ त्रि॰) १ सार्ध कार्षापण-परिमित, डेढ़ कार्षापणके वज़नका। २ अर्धविशिष्ट कार्षापणके मूल्यवाला, जिसका
दाम डेढ़ कार्षापण हो। एक कार्षापण परिमाण और मूल्यमें अस्सी कौड़ियोंका होता है।
अध्यर्धखारीक (सं॰ त्रि॰) सार्ध खारीपरिमित, डेढ़ खारीकी तौलका। २ अर्धविशिष्ट खारीके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़ खारी हो। एक खारी दो मन सोलह सेरकी होती है।
अध्यर्धपण्य (सं॰ त्रि॰) १ सार्ध पणपरिमित, डेढ़ पण के वज़नका। २ अर्धविशिष्ट पणके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़ पण हो। पण एक तोले और आठ माशेका होता है।
अध्यर्धपाद्य (सं॰ त्रि॰) सार्ध पादपरिमित, डेढ़ क़दमका।
अध्यर्धप्रतीक (सं॰ त्रि॰) सार्धकार्षापण-परिमित, डेढ़ कार्षापण या १२० कौड़ियोंकी तौलका।
अध्यर्धमाश्य (सं० त्रि० ) सार्धमाश-परिमित, डेढ़ माशेका।
अध्यर्धविंशतिकीन (सं० त्रि०) परिमाण या मूल्य में सार्धं विंशतिका, जो वज़न या क़ीमतमं डेढ़ कोड़ो या तोसके बराबर हो।
अध्यर्धशत, अध्यर्धशत्य (सं० त्रि० ) सार्धं शत परिमित अथवा अर्धविशिष्ट शतसे क्रौत डेढ़ सौको संख्याका या डेढ़ सौ से खरीदा गया।
अध्यर्धशतमान (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शतमानके तुला, जो वजन या कीमत में ढेढ़ सेकड़ेके बराबर हो।
अध्यर्धशाण, अध्यर्धशाण्य (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शाणके तुल्य, जो वज़न या कोमतमें छ:माशे या आधे तोलेके बराबर हो । शाण चार माका होता है ।
अध्यर्धशूर्प (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शूर्प के सदृश, जो वजन या क़ीमतमें तौन माशेके बराबर हो। शूर्प दो माशेका होता है।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अध्यर्धसुवर्ण, अध्यर्धसुवर्णिक (सं० त्रिः ) परिमाण अथवा मूलप्रमें सार्ध सुवर्णके समान, जो वज़न या कीमतमें दो तोलेके बराबर हो।
सुवर्ण सोलह
माका होता है ।
अधार्बुद (सं० पु० ) अर्बुदोपरि जातार्बुदरोग, फोड़े-
पर फोड़ा या आबलेपर आबला पड़नेको बीमारी ।
"बज्जायतेऽन्यत् खलु पूर्वजाते ज्ञेयं तदध्यवु दमवु दनैः ।”
( मुश्रुत० नि० ११ अ० )
‘जो फोड़ा पहले हुए फोड़ेपर पड़े, उसे अध्यर्बुद
रोग समझना चाहिये ।'
अध्यवसान (सं० लौ० )
१ अभिप्राय, इरादा ।
२ चेष्टा, कोशिश ।
३ उत्साह, हौसला । ४ वाक्य-
रचनाका संक्षिप्त और शक्तिशाली वचन ; सनअते-
;
कलाम, जो बात मुख्तसर और जोरदार तौरपर
कहौ जाये ।
अध्यवसाय (सं० पु० ) अधि अव-सो- घञ् । १ उत्साह,
हौसला ।
२ अविश्रान्त उद्योग, जो काम बराबर
जारौ रहे । ३ निश्चय, यकीन । जो किसीको कोई
काम करनेसे किसौ तरहके फलका निश्चय हो जाये,
तो उस निश्चयको अध्यवसाय कहते हैं । नैयायिक
इसे आत्मधर्म बताते हैं ; किन्तु सांख्यवादियोंके
मतसे यह बुद्धिका धर्म है ।
अध्यवसायित (स ं० त्रि० ) अध्यवसायो जातोऽस्य,
तारकादित्वात् इतच् । जाताध्यवसाय, चेष्टित; कुरद
किये हुए,
जिसने पूरा इरादा बांध लिया हो ।
अध्यवसायिन् ( सं० त्रि० ) अधि-अव-सो- णिनि ।
१ उत्साहान्वित, हौसलेमन्द । २ उद्यमशील, रोज-
गारो । ३ निश्चयकारी, जिसे यकौन आ गया हो ।
अध्यवसायो, श्रध्यवसायिन् देखो ।
८४
अध्यवसित (सं० त्रि०) हृदयसे ज्ञात, निश्चित,
अनुमोदित ; दिलसे समझा बूझा, यकीन किया हुआ,
इरादा बांधा गया ।
अध्यवहनन (वै० क्लौ० ) अधि उपरि अवहननम्
अथवा मूलामें सार्धं सहस्रके समान, जो वजुन या
कोमतमें डेढ़ हज़ार के बराबर हो ।<noinclude></noinclude>
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अध्यर्धकार्षापण, अध्यर्धकार्षापणिक (सं॰ त्रि॰) १ सार्ध कार्षापण-परिमित, डेढ़ कार्षापणके वज़नका। २ अर्धविशिष्ट कार्षापणके मूल्यवाला, जिसका
दाम डेढ़ कार्षापण हो। एक कार्षापण परिमाण और मूल्यमें अस्सी कौड़ियोंका होता है।
अध्यर्धखारीक (सं॰ त्रि॰) सार्ध खारीपरिमित, डेढ़ खारीकी तौलका। २ अर्धविशिष्ट खारीके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़ खारी हो। एक खारी दो मन सोलह सेरकी होती है।
अध्यर्धपण्य (सं॰ त्रि॰) १ सार्ध पणपरिमित, डेढ़ पण के वज़नका। २ अर्धविशिष्ट पणके मूल्यवाला, जिसका दाम डेढ़ पण हो। पण एक तोले और आठ माशेका होता है।
अध्यर्धपाद्य (सं॰ त्रि॰) सार्ध पादपरिमित, डेढ़ क़दमका।
अध्यर्धप्रतीक (सं॰ त्रि॰) सार्धकार्षापण-परिमित, डेढ़ कार्षापण या १२० कौड़ियोंकी तौलका।
अध्यर्धमाश्य (सं० त्रि० ) सार्धमाश-परिमित, डेढ़ माशेका।
अध्यर्धविंशतिकीन (सं० त्रि०) परिमाण या मूल्य में सार्धं विंशतिका, जो वज़न या क़ीमतमं डेढ़ कोड़ो या तोसके बराबर हो।
अध्यर्धशत, अध्यर्धशत्य (सं० त्रि० ) सार्धं शत परिमित अथवा अर्धविशिष्ट शतसे क्रौत डेढ़ सौको संख्याका या डेढ़ सौ से खरीदा गया।
अध्यर्धशतमान (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शतमानके तुला, जो वजन या कीमत में ढेढ़ सेकड़ेके बराबर हो।
अध्यर्धशाण, अध्यर्धशाण्य (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शाणके तुल्य, जो वज़न या कोमतमें छ:माशे या आधे तोलेके बराबर हो । शाण चार माका होता है ।
अध्यर्धशूर्प (सं० त्रि०) परिमाण अथवा मूल्यमें सार्ध शूर्प के सदृश, जो वजन या क़ीमतमें तौन माशेके बराबर हो। शूर्प दो माशेका होता है।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अध्यर्धसुवर्ण, अध्यर्धसुवर्णिक (सं० त्रिः ) परिमाण अथवा मूलप्रमें सार्ध सुवर्णके समान, जो वज़न या कीमतमें दो तोलेके बराबर हो।
सुवर्ण सोलह
माका होता है ।
अधार्बुद (सं० पु० ) अर्बुदोपरि जातार्बुदरोग, फोड़े-
पर फोड़ा या आबलेपर आबला पड़नेको बीमारी ।
"बज्जायतेऽन्यत् खलु पूर्वजाते ज्ञेयं तदध्यवु दमवु दनैः ।”
( मुश्रुत० नि० ११ अ० )
‘जो फोड़ा पहले हुए फोड़ेपर पड़े, उसे अध्यर्बुद
रोग समझना चाहिये ।'
अध्यवसान (सं० लौ० )
१ अभिप्राय, इरादा ।
२ चेष्टा, कोशिश ।
३ उत्साह, हौसला । ४ वाक्य-
रचनाका संक्षिप्त और शक्तिशाली वचन ; सनअते-
;
कलाम, जो बात मुख्तसर और जोरदार तौरपर
कहौ जाये ।
अध्यवसाय (सं० पु० ) अधि अव-सो- घञ् । १ उत्साह,
हौसला ।
२ अविश्रान्त उद्योग, जो काम बराबर
जारौ रहे । ३ निश्चय, यकीन । जो किसीको कोई
काम करनेसे किसौ तरहके फलका निश्चय हो जाये,
तो उस निश्चयको अध्यवसाय कहते हैं । नैयायिक
इसे आत्मधर्म बताते हैं ; किन्तु सांख्यवादियोंके
मतसे यह बुद्धिका धर्म है ।
अध्यवसायित (स ं० त्रि० ) अध्यवसायो जातोऽस्य,
तारकादित्वात् इतच् । जाताध्यवसाय, चेष्टित; कुरद
किये हुए,
जिसने पूरा इरादा बांध लिया हो ।
अध्यवसायिन् ( सं० त्रि० ) अधि-अव-सो- णिनि ।
१ उत्साहान्वित, हौसलेमन्द । २ उद्यमशील, रोज-
गारो । ३ निश्चयकारी, जिसे यकौन आ गया हो ।
अध्यवसायो, श्रध्यवसायिन् देखो ।
८४
अध्यवसित (सं० त्रि०) हृदयसे ज्ञात, निश्चित,
अनुमोदित ; दिलसे समझा बूझा, यकीन किया हुआ,
इरादा बांधा गया ।
अध्यवहनन (वै० क्लौ० ) अधि उपरि अवहननम्
अथवा मूलामें सार्धं सहस्रके समान, जो वजुन या
कोमतमें डेढ़ हज़ार के बराबर हो ।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७४'''|'''अध्यशन—अध्यात्मिक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>धानको कुटाई, जो एकबार चावलको भूसो निकल
जानेपर फिर की जाती है।
अध्यशन (सं० क्लो० ) अधिकं अशनम् । अतिभोजन ; हद से ज्यादा गिजा, जो अजीर्ण या बदहज़मी रहते भी खाया जाये । इसका लक्षण यों कहा गया है,-
{{Block center|<poem><small>“अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते ।
प्राग्भुक्त त्वनले मन्दे विरहो न समाहरेत् ॥
प्रातराशे त्वजीर्णे तु सायमाशो न दुष्यति ।
पूर्वभुक्त विदग्धेऽन्न भुञ्जानो हन्ति पावकम् ॥
सायमाशे त्वजण तु प्रातर्भुत विषोपमम् । "</small></poem>}}
{{Right|<small>(वैद्यक निघण्ट दिनचर्या)</small>}}
अध्यस्त (सं० ति० ) अधि-अस-त कर्मणि । १ कृता-ध्यास, ऊपर रखा गयां । २ आरोपित, ख्याली । ३ छिपा हुआ, पोशीदा ।
अध्यस्थि (सं० क्लो० ) अस्थिके ऊपरकी अस्थि जो हड्डी हड्डीपर जमती है ।
अध्याण्डा, अध्या देखो ।
अध्यात्म ( सं अव्य० ) आत्मानं देहमिन्द्रियादिकं क्षेत्रज्ञ' ब्रह्म वा अधिकृत्य । अनश्च । पा ५।४ । १०८ । आत्मा अथवा ब्रह्मको अधिकार कर, रूह या परमेश्वरको बाबत | (क्लो०) २ परब्रह्म, परमेश्वर । (त्रि० ) ३ आत्मविषयक, रूहानी ।
अध्यात्मक वायु (सं० पु० ) न्यायमतसे प्राणाख्य वायु, हवा जिसे प्राणाख्य कहते है।
अध्यात्मचेतस् (सं० पु० ) ईश्वर का ध्यान करनेवाला व्यक्ति, जो शख्स परमेश्वरका चिन्तन करे।
अध्यात्मज्ञान ( सं० क्लो० ) ईश्वर अथवा आत्माका ज्ञान, परमेश्वर या रूहका इला।
अध्यात्मदृश् (सं०वि० ) अध्यात्मं पश्यतीति, दृश-क्विन् । आत्मज्ञ, विषयादि व्यापार-शून्य होकर जो केवल आत्माको देखे ; रूहका राज समझनेवाला, जो सब ! दुनिया के सब काम छोड़ सिपर निगाह डाले।
अध्यात्मयोग (सं० पु० ) कृत्य योगः। विषयव्यापारसे हटा केवल आत्मतत्त्वमें मनोनिवेश, दुनियाको बातोंसे खींच रूही एल टिलका लगाव।
अध्यात्मरति (स० पु० ) ईश्वर या श्रात्माके विचार में
आनन्द लेनेवाला व्यक्ति, जो शख्स परमेश्वर या रूह खयालमें मस्त रहे।
अध्यात्मरामायण (सं० क्लो० ) आत्मानमधिकृत्य कृतं रामस्य अयनं शास्त्रम्। ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गत सप्त-काण्डात्मक ग्रन्थविशेष । प्राचीन पुराणों की उप- क्रमणिकामें बात कहनेको यह प्रथा रही, कि कलिकाल में जब पृथिवो पापभारसे भारी पड़ती, तब जीवके परित्राणका क्या उपाय होता था। अध्यात्मरामायण के आदिमें भौ लेखकने यहो प्रथा पकड़ गल्पको आरम्भ किया है । नारदने ब्रह्मा के पास पहुंच पूछा, कि कलिकालमें लोग नाना प्रकार के पापकर्म करेंगे ; उससे उनके निस्तारका क्या उपाय है? कमलयोनि ब्रह्माने कहा, कि एक समय महादेवने पावँतोको अध्यात्मरामायण सुनाया था ; कलिके लोग वह उपाख्यान सुननेसे हो मुक्त होंगे। लेखकने यह भूमिका बना वाल्मीकिरामायणकी स'क्षेपसे दूसरी कथामें नकुल उतारो है। यह नहीं
कहा जा सकता, कि अध्यात्मरामायणका प्रकृत लेखक कौन था। जो हो, पुस्तक अधिक पुरातन नहीं । आदिकाण्ड में लिखा है, -
{{Block center|<poem><small>"बहुना किमिहोक्तेन शृणु नारद तत्त्वतः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च ।
अर्हन्ति नाल्पामध्यात्मरामायणकलामपि । ”</small></poem>}}
'हे नारद! इस विषय में अधिक कहने से क्या फल है ? मैं मुख्य बात कहता ह, सुनिये । शत-शत श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास, आगम प्रभृति अध्यात्मरामायणको एक अल्प कलाके बराबर भो नहीं हो सकते।'
अध्यात्मविद्, अध्यात्मदृश् देखो।
अध्यात्मविद्या (सं० स्त्रो० ) अध्यात्मज्ञान देखो।
अध्यात्मशास्त्र (स० क्लो०) अध्यात्मप्रतिपादकं शास्त्रम्। शास्त्रग्रन्थ जिसमें अध्यात्मयोगादिका विषय लिखा हो।
अध्यात्मा (सं० क्लो० ) परमेश्वर, भगवान्।
अध्यात्मिक, आध्यात्मिक (सं० त्रि०) परमात्मा अथवा जीवात्मा सम्बन्धीय, जिसका लगाव ईश्वर या रूहसे हो।<noinclude></noinclude>
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७४'''|'''अध्यशन—अध्यात्मिक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>धानको कुटाई, जो एकबार चावलको भूसो निकल
जानेपर फिर की जाती है।
अध्यशन (सं० क्लो० ) अधिकं अशनम् । अतिभोजन ; हद से ज्यादा गिजा, जो अजीर्ण या बदहज़मी रहते भी खाया जाये । इसका लक्षण यों कहा गया है,-
{{Block center|<poem><small>“अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते ।
प्राग्भुक्त त्वनले मन्दे विरहो न समाहरेत् ॥
प्रातराशे त्वजीर्णे तु सायमाशो न दुष्यति ।
पूर्वभुक्त विदग्धेऽन्न भुञ्जानो हन्ति पावकम् ॥
सायमाशे त्वजण तु प्रातर्भुत विषोपमम् । "</small></poem>}}
{{Right|<small>(वैद्यक निघण्ट दिनचर्या)</small>}}
अध्यस्त (सं० ति० ) अधि-अस-त कर्मणि । १ कृता-ध्यास, ऊपर रखा गयां । २ आरोपित, ख्याली । ३ छिपा हुआ, पोशीदा ।
अध्यस्थि (सं० क्लो० ) अस्थिके ऊपरकी अस्थि जो हड्डी हड्डीपर जमती है ।
अध्याण्डा, अध्या देखो ।
अध्यात्म ( सं अव्य० ) आत्मानं देहमिन्द्रियादिकं क्षेत्रज्ञ' ब्रह्म वा अधिकृत्य । अनश्च । पा ५।४ । १०८ । आत्मा अथवा ब्रह्मको अधिकार कर, रूह या परमेश्वरको बाबत | (क्लो०) २ परब्रह्म, परमेश्वर । (त्रि० ) ३ आत्मविषयक, रूहानी ।
अध्यात्मक वायु (सं० पु० ) न्यायमतसे प्राणाख्य वायु, हवा जिसे प्राणाख्य कहते है।
अध्यात्मचेतस् (सं० पु० ) ईश्वर का ध्यान करनेवाला व्यक्ति, जो शख्स परमेश्वरका चिन्तन करे।
अध्यात्मज्ञान ( सं० क्लो० ) ईश्वर अथवा आत्माका ज्ञान, परमेश्वर या रूहका इला।
अध्यात्मदृश् (सं०वि० ) अध्यात्मं पश्यतीति, दृश-क्विन् । आत्मज्ञ, विषयादि व्यापार-शून्य होकर जो केवल आत्माको देखे ; रूहका राज समझनेवाला, जो सब ! दुनिया के सब काम छोड़ सिपर निगाह डाले।
अध्यात्मयोग (सं० पु० ) कृत्य योगः। विषयव्यापारसे हटा केवल आत्मतत्त्वमें मनोनिवेश, दुनियाको बातोंसे खींच रूही एल टिलका लगाव।
अध्यात्मरति (स० पु० ) ईश्वर या श्रात्माके विचार में
आनन्द लेनेवाला व्यक्ति, जो शख्स परमेश्वर या रूह खयालमें मस्त रहे।
अध्यात्मरामायण (सं० क्लो० ) आत्मानमधिकृत्य कृतं रामस्य अयनं शास्त्रम्। ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गत सप्त-काण्डात्मक ग्रन्थविशेष । प्राचीन पुराणों की उप- क्रमणिकामें बात कहनेको यह प्रथा रही, कि कलिकाल में जब पृथिवो पापभारसे भारी पड़ती, तब जीवके परित्राणका क्या उपाय होता था। अध्यात्मरामायण के आदिमें भौ लेखकने यहो प्रथा पकड़ गल्पको आरम्भ किया है । नारदने ब्रह्मा के पास पहुंच पूछा, कि कलिकालमें लोग नाना प्रकार के पापकर्म करेंगे ; उससे उनके निस्तारका क्या उपाय है? कमलयोनि ब्रह्माने कहा, कि एक समय महादेवने पावँतोको अध्यात्मरामायण सुनाया था ; कलिके लोग वह उपाख्यान सुननेसे हो मुक्त होंगे। लेखकने यह भूमिका बना वाल्मीकिरामायणकी स'क्षेपसे दूसरी कथामें नकुल उतारो है। यह नहीं
कहा जा सकता, कि अध्यात्मरामायणका प्रकृत लेखक कौन था। जो हो, पुस्तक अधिक पुरातन नहीं । आदिकाण्ड में लिखा है, -
{{Block center|<poem><small>"बहुना किमिहोक्तेन शृणु नारद तत्त्वतः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च ।
अर्हन्ति नाल्पामध्यात्मरामायणकलामपि । ”</small></poem>}}
'हे नारद! इस विषय में अधिक कहने से क्या फल है ? मैं मुख्य बात कहता ह, सुनिये । शत-शत श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास, आगम प्रभृति अध्यात्मरामायणको एक अल्प कलाके बराबर भो नहीं हो सकते।'
अध्यात्मविद्, अध्यात्मदृश् देखो।
अध्यात्मविद्या (सं० स्त्रो० ) अध्यात्मज्ञान देखो।
अध्यात्मशास्त्र (स० क्लो०) अध्यात्मप्रतिपादकं शास्त्रम्। शास्त्रग्रन्थ जिसमें अध्यात्मयोगादिका विषय लिखा हो।
अध्यात्मा (सं० क्लो० ) परमेश्वर, भगवान्।
अध्यात्मिक, आध्यात्मिक (सं० त्रि०) परमात्मा अथवा जीवात्मा सम्बन्धीय, जिसका लगाव ईश्वर या रूहसे हो।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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2026-07-16T16:03:33Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७४'''|'''अध्यशन—अध्यात्मिक'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>धानको कुटाई, जो एकबार चावलको भूसो निकल
जानेपर फिर की जाती है।
अध्यशन (सं० क्लो० ) अधिकं अशनम् । अतिभोजन ; हद से ज्यादा गिजा, जो अजीर्ण या बदहज़मी रहते भी खाया जाये । इसका लक्षण यों कहा गया है,-
{{Block center|<poem><small>“अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते ।
प्राग्भुक्त त्वनले मन्दे विरहो न समाहरेत् ॥
प्रातराशे त्वजीर्णे तु सायमाशो न दुष्यति ।
पूर्वभुक्त विदग्धेऽन्न भुञ्जानो हन्ति पावकम् ॥
सायमाशे त्वजण तु प्रातर्भुत विषोपमम् । "</small></poem>}}
{{Right|<small>(वैद्यक निघण्ट दिनचर्या)</small>}}
अध्यस्त (सं० ति० ) अधि-अस-त कर्मणि । १ कृता-ध्यास, ऊपर रखा गयां । २ आरोपित, ख्याली । ३ छिपा हुआ, पोशीदा ।
अध्यस्थि (सं० क्लो० ) अस्थिके ऊपरकी अस्थि जो हड्डी हड्डीपर जमती है ।
अध्याण्डा, अध्या देखो ।
अध्यात्म ( सं अव्य० ) आत्मानं देहमिन्द्रियादिकं क्षेत्रज्ञ' ब्रह्म वा अधिकृत्य । अनश्च । पा ५।४ । १०८ । आत्मा अथवा ब्रह्मको अधिकार कर, रूह या परमेश्वरको बाबत | (क्लो०) २ परब्रह्म, परमेश्वर । (त्रि० ) ३ आत्मविषयक, रूहानी ।
अध्यात्मक वायु (सं० पु० ) न्यायमतसे प्राणाख्य वायु, हवा जिसे प्राणाख्य कहते है।
अध्यात्मचेतस् (सं० पु० ) ईश्वर का ध्यान करनेवाला व्यक्ति, जो शख्स परमेश्वरका चिन्तन करे।
अध्यात्मज्ञान ( सं० क्लो० ) ईश्वर अथवा आत्माका ज्ञान, परमेश्वर या रूहका इला।
अध्यात्मदृश् (सं०वि० ) अध्यात्मं पश्यतीति, दृश-क्विन् । आत्मज्ञ, विषयादि व्यापार-शून्य होकर जो केवल आत्माको देखे ; रूहका राज समझनेवाला, जो सब ! दुनिया के सब काम छोड़ सिपर निगाह डाले।
अध्यात्मयोग (सं० पु० ) कृत्य योगः। विषयव्यापारसे हटा केवल आत्मतत्त्वमें मनोनिवेश, दुनियाको बातोंसे खींच रूही एल टिलका लगाव।
अध्यात्मरति (स० पु० ) ईश्वर या श्रात्माके विचार में<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>आनन्द लेनेवाला व्यक्ति, जो शख्स परमेश्वर या रूह खयालमें मस्त रहे।
अध्यात्मरामायण (सं० क्लो० ) आत्मानमधिकृत्य कृतं रामस्य अयनं शास्त्रम्। ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गत सप्त-काण्डात्मक ग्रन्थविशेष । प्राचीन पुराणों की उप- क्रमणिकामें बात कहनेको यह प्रथा रही, कि कलिकाल में जब पृथिवो पापभारसे भारी पड़ती, तब जीवके परित्राणका क्या उपाय होता था। अध्यात्मरामायण के आदिमें भौ लेखकने यहो प्रथा पकड़ गल्पको आरम्भ किया है । नारदने ब्रह्मा के पास पहुंच पूछा, कि कलिकालमें लोग नाना प्रकार के पापकर्म करेंगे ; उससे उनके निस्तारका क्या उपाय है? कमलयोनि ब्रह्माने कहा, कि एक समय महादेवने पावँतोको अध्यात्मरामायण सुनाया था ; कलिके लोग वह उपाख्यान सुननेसे हो मुक्त होंगे। लेखकने यह भूमिका बना वाल्मीकिरामायणकी स'क्षेपसे दूसरी कथामें नकुल उतारो है। यह नहीं
कहा जा सकता, कि अध्यात्मरामायणका प्रकृत लेखक कौन था। जो हो, पुस्तक अधिक पुरातन नहीं । आदिकाण्ड में लिखा है, -
{{Block center|<poem><small>"बहुना किमिहोक्तेन शृणु नारद तत्त्वतः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च ।
अर्हन्ति नाल्पामध्यात्मरामायणकलामपि । ”</small></poem>}}
'हे नारद! इस विषय में अधिक कहने से क्या फल है ? मैं मुख्य बात कहता ह, सुनिये । शत-शत श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास, आगम प्रभृति अध्यात्मरामायणको एक अल्प कलाके बराबर भो नहीं हो सकते।'
अध्यात्मविद्, अध्यात्मदृश् देखो।
अध्यात्मविद्या (सं० स्त्रो० ) अध्यात्मज्ञान देखो।
अध्यात्मशास्त्र (स० क्लो०) अध्यात्मप्रतिपादकं शास्त्रम्। शास्त्रग्रन्थ जिसमें अध्यात्मयोगादिका विषय लिखा हो।
अध्यात्मा (सं० क्लो० ) परमेश्वर, भगवान्।
अध्यात्मिक, आध्यात्मिक (सं० त्रि०) परमात्मा अथवा जीवात्मा सम्बन्धीय, जिसका लगाव ईश्वर या रूहसे हो।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३८२
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2026-07-16T14:44:10Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अध्यापक—अध्यासन'''|'''३७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अध्यापक (सं० पु० ) अधि- इङ्-णिच्ख ल्, अध्या-पयतोति । आचार्य, उपाध्याय, शिक्षक, उस्ताद, मुअल्लिम ; जो किसोको पढ़ाये । विष्णुका वचन है, कि जो वेदादि अध्ययन कराते, वह आचार्य और जो वेतनादि ले शिक्षा देते, वह उपाध्याय कहा हैं । (स्त्री) अध्यापिका।
अध्यापक (हिं० स्त्री०) आचार्यता, उपाध्यायो, उस्तादी, मुअल्लमी।
अध्यापन (सं० क्लो० ) अधि-इङ -णिच्- ल्युट् भावे । पाठन, शिक्षादान ; अध्ययनका कराना, किताबका पढ़ाना। अध्यापन तीन प्रकारसे होता है, – १ धर्मके कारण, २ अर्थके कारण और ३ शुश्रूषा के कारण। ( स्त्री० ) अध्यापना।
अध्यापयिट (सं० पु० ) शिक्षक, उस्ताद, पढ़ानेवाला।
अध्यापित (स० वि० ) लिखा या पढ़ाया, तालोम दिया हुआ।
अध्याय (सं० त्रि०) अधि-इङ - णिच् यत् कर्मणि। पाठनीय, अध्यापनयोग्य; पढाने या तालीम देने काबिल।
अध्याय (सं० पु० ) अधि-इङ-घञ् ।अध्यायन्यायो- द्यावस' हाराश्च । पाश३ १२२। १ अध्ययन, तालीम । २ ग्रन्थ- विभाग, मुकालह | ३ पाठ लेने योग्य समय, तालीम पाने काबिल वक्त. । इस शब्द के यह पर्याय हैं, – सर्ग, वर्ग, परिच्छेद, उदघात, अङ्क, संग्रह, उच्छास, परिवर्त, पटल, काण्ड, स्थान, प्रकरण, पर्व, आह्निक, स्कन्द, स्तवक, उल्लास, पाद, उद्योत् और विरचन।
`अध्यायशतपाठ (सं० पु० ) १ शत अध्यायका सूची पत्त्र, मौ मुकालहको फेहरिस्त। २ ग्रन्थविशेष।
अध्यायिन् (सं० त्रि०) पठनशील, पढ़ता हुआ, जो तालीममें लगा हो।
अध्यारूढ़ (सं० त्रि० ) अधि आ रुह त कर्मणि कर्तरि वा । १ समारूढ़, चढ़ा हुआ । २ आक्रान्त, ऊंचा, बड़ा । ३ तुच्छ, हकौर । ४ अधिक, अतिशय ; हद से ज्यादा ।
अध्यारोप (सं० पु० ) अधि-आ-रुह - णिच् पादेशः घस्।
रुहः पोऽन्यतरस्याम् पा १२२४३ १ चढ़ना,ऊपरका पहुंचना | २ आरोप, लगाव | ३ मिथ्याज्ञान, झूठो समझ । रज्जु में सपको भ्रमसे देखना और सच्चिदानन्द परमेश्वरमें जड़धमं लगाना आदि विषय अध्या-
रोपके हैं।
अध्यारोपण (सं० क्लो० ) अधि आ रुह णिच् पादेशः ल्य ुट् । १ धान्यादिका वपन, अनाज वर्गरहको बोआई। २ अतिशय आरोपण, हृढ़से ज्यादा लगाव।
अध्यारोपित (सं० त्रि०) १ मिथ्याकल्पित, गुलत समझा हुआ। २ धोखे या मुबालगेका।
अध्यावाप (सं० पु० ) अधि आ वप घञ्। १ बौनी, शस्य या अनाजका बोना । २ शस्य बोनेका क्षेत्र, बोन डालनेका खेत।
अध्यावाहनिक (सं० क्लो० ) अधि-आ-वह- णिच्-लुट् ; अध्यावाहनं पिटग्टहात् भग्टहागमनं तत्काले लब्ध' अस्मात्, लब्धायें ठन् । स्त्रीधनविशेष।
{{Block center|<poem><small>“यत् पुनर्लभते नारी नीयमाना हि पैटकात् ।
श्रध्यावाहनिकं नाम तत् स्त्रीधनमुदाहृतम् ॥” ( दायभाग )</small></poem>}}
'पिताके घरसे चलते समय स्त्रियां पुनर्वार जो धन पातीं, वही अध्यावाहनिक कहाता है।'
अधवास (सं० पु० ) अधि- अस क्षेपे घञ । १ आरोप, लगाव । २ मिथ्याज्ञान, झूठा इल्म । शङ्कराचार्यका वचन है, कि पहले कोई वस्तु देखनेसे हृदयमें उसके रूपादिका एक संस्कार जम जाता है; पोछे वैसी हो कोई दूसरी वस्तु देखनेसे रूपादि विषयमें किञ्चित् सादृश्यके कारण वह पहली हो वस्तु जैसी समझ पड़ती है । जैसे,—कोई व्यक्ति यदि पहले सर्प देखता, तो सर्पके अवयव - सम्बन्धपर उसके हृदयमें एक धारणा जम जाती है; पीछे हठात् रज्जु, देखने से उसी सर्पका आकार उसके हृदयमें दौड़ पड़ता है। उस समय रज्जु सर्प दिखाई देती और उसी मिथ्याज्ञानको अधग्रास कहते हैं।
अध्यासन (सं० क्लो० ) अधि-आस वासे उपवेशने वा-लुट । १ निवास, रहन। २ अधिष्ठान, बैठक। ३ अधिरोहण, चढ़ाव ।<noinclude></noinclude>
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2026-07-16T16:04:13Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अध्यापक—अध्यासन'''|'''३७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अध्यापक (सं० पु० ) अधि- इङ्-णिच्ख ल्, अध्या-पयतोति । आचार्य, उपाध्याय, शिक्षक, उस्ताद, मुअल्लिम ; जो किसोको पढ़ाये । विष्णुका वचन है, कि जो वेदादि अध्ययन कराते, वह आचार्य और जो वेतनादि ले शिक्षा देते, वह उपाध्याय कहा हैं । (स्त्री) अध्यापिका।
अध्यापक (हिं० स्त्री०) आचार्यता, उपाध्यायो, उस्तादी, मुअल्लमी।
अध्यापन (सं० क्लो० ) अधि-इङ -णिच्- ल्युट् भावे । पाठन, शिक्षादान ; अध्ययनका कराना, किताबका पढ़ाना। अध्यापन तीन प्रकारसे होता है, – १ धर्मके कारण, २ अर्थके कारण और ३ शुश्रूषा के कारण। ( स्त्री० ) अध्यापना।
अध्यापयिट (सं० पु० ) शिक्षक, उस्ताद, पढ़ानेवाला।
अध्यापित (स० वि० ) लिखा या पढ़ाया, तालोम दिया हुआ।
अध्याय (सं० त्रि०) अधि-इङ - णिच् यत् कर्मणि। पाठनीय, अध्यापनयोग्य; पढाने या तालीम देने काबिल।
अध्याय (सं० पु० ) अधि-इङ-घञ् ।अध्यायन्यायो- द्यावस' हाराश्च । पाश३ १२२। १ अध्ययन, तालीम । २ ग्रन्थ- विभाग, मुकालह | ३ पाठ लेने योग्य समय, तालीम पाने काबिल वक्त. । इस शब्द के यह पर्याय हैं, – सर्ग, वर्ग, परिच्छेद, उदघात, अङ्क, संग्रह, उच्छास, परिवर्त, पटल, काण्ड, स्थान, प्रकरण, पर्व, आह्निक, स्कन्द, स्तवक, उल्लास, पाद, उद्योत् और विरचन।
`अध्यायशतपाठ (सं० पु० ) १ शत अध्यायका सूची पत्त्र, मौ मुकालहको फेहरिस्त। २ ग्रन्थविशेष।
अध्यायिन् (सं० त्रि०) पठनशील, पढ़ता हुआ, जो तालीममें लगा हो।
अध्यारूढ़ (सं० त्रि० ) अधि आ रुह त कर्मणि कर्तरि वा । १ समारूढ़, चढ़ा हुआ । २ आक्रान्त, ऊंचा, बड़ा । ३ तुच्छ, हकौर । ४ अधिक, अतिशय ; हद से ज्यादा ।
अध्यारोप (सं० पु० ) अधि-आ-रुह - णिच् पादेशः घस्।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>रुहः पोऽन्यतरस्याम् पा १२२४३ १ चढ़ना,ऊपरका पहुंचना | २ आरोप, लगाव | ३ मिथ्याज्ञान, झूठो समझ । रज्जु में सपको भ्रमसे देखना और सच्चिदानन्द परमेश्वरमें जड़धमं लगाना आदि विषय अध्या-
रोपके हैं।
अध्यारोपण (सं० क्लो० ) अधि आ रुह णिच् पादेशः ल्य ुट् । १ धान्यादिका वपन, अनाज वर्गरहको बोआई। २ अतिशय आरोपण, हृढ़से ज्यादा लगाव।
अध्यारोपित (सं० त्रि०) १ मिथ्याकल्पित, गुलत समझा हुआ। २ धोखे या मुबालगेका।
अध्यावाप (सं० पु० ) अधि आ वप घञ्। १ बौनी, शस्य या अनाजका बोना । २ शस्य बोनेका क्षेत्र, बोन डालनेका खेत।
अध्यावाहनिक (सं० क्लो० ) अधि-आ-वह- णिच्-लुट् ; अध्यावाहनं पिटग्टहात् भग्टहागमनं तत्काले लब्ध' अस्मात्, लब्धायें ठन् । स्त्रीधनविशेष।
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श्रध्यावाहनिकं नाम तत् स्त्रीधनमुदाहृतम् ॥” ( दायभाग )</small></poem>}}
'पिताके घरसे चलते समय स्त्रियां पुनर्वार जो धन पातीं, वही अध्यावाहनिक कहाता है।'
अधवास (सं० पु० ) अधि- अस क्षेपे घञ । १ आरोप, लगाव । २ मिथ्याज्ञान, झूठा इल्म । शङ्कराचार्यका वचन है, कि पहले कोई वस्तु देखनेसे हृदयमें उसके रूपादिका एक संस्कार जम जाता है; पोछे वैसी हो कोई दूसरी वस्तु देखनेसे रूपादि विषयमें किञ्चित् सादृश्यके कारण वह पहली हो वस्तु जैसी समझ पड़ती है । जैसे,—कोई व्यक्ति यदि पहले सर्प देखता, तो सर्पके अवयव - सम्बन्धपर उसके हृदयमें एक धारणा जम जाती है; पीछे हठात् रज्जु, देखने से उसी सर्पका आकार उसके हृदयमें दौड़ पड़ता है। उस समय रज्जु सर्प दिखाई देती और उसी मिथ्याज्ञानको अधग्रास कहते हैं।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३८३
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2026-07-16T14:51:04Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
667873
proofread-page
text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७६'''|'''अध्यासनयोग—अध्येष्यमाण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अग्रासनयोग (सं० पु० ) बौद्धमतसे - एक प्रकारका धान, एक तरहका ख्याल।
अध्यासित (सं ० वि०) अधि-आसक्त भावे। नपुसके भावे क्तः। पा ११४। १ अधिष्ठित, बैठा हुआ । २ सभापतिके आसनपर आसीन, प्रेसिडेण्टको कुरसी
पर बैठा हुआ । ३ बसा हुआ, आबाद।
{{C|<small>“वेन्वा तदध्यासितकातराच्या निरीक्षमाणः सुतरां दयाल :।"</small>}}
{{Right|<small>(रघु २५२ )</small>}}
यासीन (सं० त्रि०) अधि- आस - शानच् । ईदासः । मा ७८ उपविष्ट, बैठा हुआ । (स्त्री०) अधग्रासीना।
अध्याहरण (स० क्ली०) अधि-आ-हृ-लुट् । १ अधा- हार, बहस। २ उपस्थित करनेका कार्य, पहुंचानेका काम । ३ प्रमाण देनेका कार्य, सुबूत पहुंचानेको बात ।
अध्याहरणीय (सं० त्रि०) १ उपस्थित करने योग्य, पहुंचाने काबिल | २ तक, जो बहस करनेके काबिल हो।
अग्रहार (सं० पु० ) अधप्रायते, अधि-आ-ह- घञ् भावे । १ ऊहाका करना, तर्क; बहस । “अश्रुतपदानामनुसन्धानम् ।”(दि० ४) २ असम्पूर्ण वाक्य के पूर्णार्थं पदान्तको योजना, अधूरे जुमलेको पूरा करनेके लिये फ़िकरेके आखोरका जोड़। २ अन्य शब्द द्वारा अस्पष्ट विषयका स्पष्ट करना, दूसरे लफ्ज़से जो बात साफ़ न हो, उसका खोलना । ४ किसी विषयको आकाङ्क्षाके पूरणार्थ अनुसन्धान, जिस बातको दिल चाहे उसके पूरा करनेको तलाश । अध्याहार दो प्रकारका होता है, – १ शब्दाध्याहार, २ अर्थावग्राहार । शब्दाधया हारमें शब्द और अर्थावग्राहारमें अर्थ ऊपरसे जोड़ा
जाता है।
अग्रहार्यं (सं० त्रि० ) अधि-आ- हृ ण्यत् । १ ऊ, बहस करने काबिल । २ अनुसन्धेय, तलाशके काबिल।
अध्याहृत (स ं० त्रि० ) १ उपस्थित किया या पहुंचाया गया । २ वितर्कित, जिसपर बहस की गई हो।
अप्रषित (सं० वि० ) अधि-वस-आधारस्य कर्म संज्ञायां कर्मणि क्त, वकारस्य सम्प्रसारणम् । वसति चुधोरि | पा ७१५२ शासिवसिघसोनां च । पाश६०।
उपान्वध्याङ वसः । पा १ ४ ४८ । १ अधिष्ठित, उपविष्ट; बैठा हुआ। २ प्राप्त, मिला हुआ। ( पु० ) ३ सर्वाक्षि- रोग, सारी आंखको बीमारी।
अध्युषिताश्ख, अध्युषिताश्व (सं० पु० ) दशरथके वंशज एक राजकुमार, दशरथके खान्दानमें पैदा हुए एक राजा।
अष्ट (सं० त्रि०) १ साढ़े तीन बार लपेटा गया, जिसमें साढ़े तीन बल लगे हों । २ बसा हुआ, आबाद।
अष्टवलय (सं० पु० ) सांप, जिसने साढ़े तीन बल खाये हों।
धुप्रष्ट्र (सं० त्रि० ) अधारूढ़ उष्ट्रम्, अत्या० तत् । १ उष्ट्रयुक्त, जिसमें ऊंट जुते हों। ( पु० ) २ ऊंट - गाड़ो, वह रथ जिसमें ऊंट जोते जाते हैं।
अधूगढ़ (सं० त्रि०) अधि - (उपरि ) वह-क्त । १ अधिक, वृद्धियुक्त, खूब बढ़ा-चढ़ा | २ समृद्ध, भरापूरा ३ अतिशय, कसौर । ( पु० ) ४ शिव, महादेव।
अध्यूढा (सं० स्त्री० ) अधिविन्ना, वह स्त्री जिसके रहते पतिने दूसरा विवाह कर लिया हो।
अध्यनी (सं० स्त्री० ) अधिकं ऊधः स्तनो यस्याः, अधि-ऊधस् अनङ । ऊधसोऽनङ । पा ५।४।१३१। संख्या व्ययादेङप् । पा ४।१।२६। १ दुग्धवतो गौ, दूध देनेवालो गाय । २ वह गौ जिसके स्तन बड़े-बड़े हों | ३
नली-जैसी नस जो स्तनपर उभर आती है।
अध्यष्वस् (सं० त्रि० ) अधि-वस् क्वसु । भाषायां सदवस- श्रुवः । पा २ १०८ | अधिष्ठित, जिसने अधिवास किया हो ; ठहरा हुआ।
अध्यूहन (सं० क्लौ० ) भस्म या अङ्गारके पुटपर स्थापन, ख़ाक या अंगारकी तहपर जमाव।
अध्येतव्य (सं० त्रि०) अधि - इङ-तव्य कर्मणि । पाठ्य, पढ़ने काबिल।
अध्येट (सं० पु० ) विद्यार्थी, पाठक, अधायनकर्ता ; तालिब इल्म, जो पढ़े-लिखे।
अध्येय (सं० त्रि० ) पाठ्य, पढ़ने काबिल।
अध्येष्यमाण (सं० त्रि० ) अध्ययन करनेका इच्छुक, जो पढ़ना चाहता हो ।<noinclude></noinclude>
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2026-07-16T16:05:13Z
अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७६'''|'''अध्यासनयोग—अध्येष्यमाण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अग्रासनयोग (सं० पु० ) बौद्धमतसे - एक प्रकारका धान, एक तरहका ख्याल।
अध्यासित (सं ० वि०) अधि-आसक्त भावे। नपुसके भावे क्तः। पा ११४। १ अधिष्ठित, बैठा हुआ । २ सभापतिके आसनपर आसीन, प्रेसिडेण्टको कुरसी
पर बैठा हुआ । ३ बसा हुआ, आबाद।
{{C|<small>“वेन्वा तदध्यासितकातराच्या निरीक्षमाणः सुतरां दयाल :।"</small>}}
{{Right|<small>(रघु २५२ )</small>}}
यासीन (सं० त्रि०) अधि- आस - शानच् । ईदासः । मा ७८ उपविष्ट, बैठा हुआ । (स्त्री०) अधग्रासीना।
अध्याहरण (स० क्ली०) अधि-आ-हृ-लुट् । १ अधा- हार, बहस। २ उपस्थित करनेका कार्य, पहुंचानेका काम । ३ प्रमाण देनेका कार्य, सुबूत पहुंचानेको बात ।
अध्याहरणीय (सं० त्रि०) १ उपस्थित करने योग्य, पहुंचाने काबिल | २ तक, जो बहस करनेके काबिल हो।
अग्रहार (सं० पु० ) अधप्रायते, अधि-आ-ह- घञ् भावे । १ ऊहाका करना, तर्क; बहस । “अश्रुतपदानामनुसन्धानम् ।”(दि० ४) २ असम्पूर्ण वाक्य के पूर्णार्थं पदान्तको योजना, अधूरे जुमलेको पूरा करनेके लिये फ़िकरेके आखोरका जोड़। २ अन्य शब्द द्वारा अस्पष्ट विषयका स्पष्ट करना, दूसरे लफ्ज़से जो बात साफ़ न हो, उसका खोलना । ४ किसी विषयको आकाङ्क्षाके पूरणार्थ अनुसन्धान, जिस बातको दिल चाहे उसके पूरा करनेको तलाश । अध्याहार दो प्रकारका होता है, – १ शब्दाध्याहार, २ अर्थावग्राहार । शब्दाधया हारमें शब्द और अर्थावग्राहारमें अर्थ ऊपरसे जोड़ा
जाता है।
अग्रहार्यं (सं० त्रि० ) अधि-आ- हृ ण्यत् । १ ऊ, बहस करने काबिल । २ अनुसन्धेय, तलाशके काबिल।
अध्याहृत (स ं० त्रि० ) १ उपस्थित किया या पहुंचाया गया । २ वितर्कित, जिसपर बहस की गई हो।
अप्रषित (सं० वि० ) अधि-वस-आधारस्य कर्म संज्ञायां कर्मणि क्त, वकारस्य सम्प्रसारणम् । वसति चुधोरि | पा ७१५२ शासिवसिघसोनां च । पाश६०।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>उपान्वध्याङ वसः । पा १ ४ ४८ । १ अधिष्ठित, उपविष्ट; बैठा हुआ। २ प्राप्त, मिला हुआ। ( पु० ) ३ सर्वाक्षि- रोग, सारी आंखको बीमारी।
अध्युषिताश्ख, अध्युषिताश्व (सं० पु० ) दशरथके वंशज एक राजकुमार, दशरथके खान्दानमें पैदा हुए एक राजा।
अष्ट (सं० त्रि०) १ साढ़े तीन बार लपेटा गया, जिसमें साढ़े तीन बल लगे हों । २ बसा हुआ, आबाद।
अष्टवलय (सं० पु० ) सांप, जिसने साढ़े तीन बल खाये हों।
धुप्रष्ट्र (सं० त्रि० ) अधारूढ़ उष्ट्रम्, अत्या० तत् । १ उष्ट्रयुक्त, जिसमें ऊंट जुते हों। ( पु० ) २ ऊंट - गाड़ो, वह रथ जिसमें ऊंट जोते जाते हैं।
अधूगढ़ (सं० त्रि०) अधि - (उपरि ) वह-क्त । १ अधिक, वृद्धियुक्त, खूब बढ़ा-चढ़ा | २ समृद्ध, भरापूरा ३ अतिशय, कसौर । ( पु० ) ४ शिव, महादेव।
अध्यूढा (सं० स्त्री० ) अधिविन्ना, वह स्त्री जिसके रहते पतिने दूसरा विवाह कर लिया हो।
अध्यनी (सं० स्त्री० ) अधिकं ऊधः स्तनो यस्याः, अधि-ऊधस् अनङ । ऊधसोऽनङ । पा ५।४।१३१। संख्या व्ययादेङप् । पा ४।१।२६। १ दुग्धवतो गौ, दूध देनेवालो गाय । २ वह गौ जिसके स्तन बड़े-बड़े हों | ३
नली-जैसी नस जो स्तनपर उभर आती है।
अध्यष्वस् (सं० त्रि० ) अधि-वस् क्वसु । भाषायां सदवस- श्रुवः । पा २ १०८ | अधिष्ठित, जिसने अधिवास किया हो ; ठहरा हुआ।
अध्यूहन (सं० क्लौ० ) भस्म या अङ्गारके पुटपर स्थापन, ख़ाक या अंगारकी तहपर जमाव।
अध्येतव्य (सं० त्रि०) अधि - इङ-तव्य कर्मणि । पाठ्य, पढ़ने काबिल।
अध्येट (सं० पु० ) विद्यार्थी, पाठक, अधायनकर्ता ; तालिब इल्म, जो पढ़े-लिखे।
अध्येय (सं० त्रि० ) पाठ्य, पढ़ने काबिल।
अध्येष्यमाण (सं० त्रि० ) अध्ययन करनेका इच्छुक, जो पढ़ना चाहता हो ।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७६'''|'''अध्यासनयोग—अध्येष्यमाण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अग्रासनयोग (सं० पु० ) बौद्धमतसे - एक प्रकारका धान, एक तरहका ख्याल।
अध्यासित (सं ० वि०) अधि-आसक्त भावे। नपुसके भावे क्तः। पा ११४। १ अधिष्ठित, बैठा हुआ । २ सभापतिके आसनपर आसीन, प्रेसिडेण्टको कुरसी
पर बैठा हुआ । ३ बसा हुआ, आबाद।
{{C|<small>“वेन्वा तदध्यासितकातराच्या निरीक्षमाणः सुतरां दयाल :।"</small>}}
{{Right|<small>(रघु २५२ )</small>}}
यासीन (सं० त्रि०) अधि- आस - शानच् । ईदासः । मा ७८ उपविष्ट, बैठा हुआ । (स्त्री०) अधग्रासीना।
अध्याहरण (स० क्ली०) अधि-आ-हृ-लुट् । १ अधा- हार, बहस। २ उपस्थित करनेका कार्य, पहुंचानेका काम । ३ प्रमाण देनेका कार्य, सुबूत पहुंचानेको बात ।
अध्याहरणीय (सं० त्रि०) १ उपस्थित करने योग्य, पहुंचाने काबिल | २ तक, जो बहस करनेके काबिल हो।
अग्रहार (सं० पु० ) अधप्रायते, अधि-आ-ह- घञ् भावे । १ ऊहाका करना, तर्क; बहस । “अश्रुतपदानामनुसन्धानम् ।”(दि० ४) २ असम्पूर्ण वाक्य के पूर्णार्थं पदान्तको योजना, अधूरे जुमलेको पूरा करनेके लिये फ़िकरेके आखोरका जोड़। २ अन्य शब्द द्वारा अस्पष्ट विषयका स्पष्ट करना, दूसरे लफ्ज़से जो बात साफ़ न हो, उसका खोलना । ४ किसी विषयको आकाङ्क्षाके पूरणार्थ अनुसन्धान, जिस बातको दिल चाहे उसके पूरा करनेको तलाश । अध्याहार दो प्रकारका होता है, – १ शब्दाध्याहार, २ अर्थावग्राहार । शब्दाधया हारमें शब्द और अर्थावग्राहारमें अर्थ ऊपरसे जोड़ा
जाता है।
अग्रहार्यं (सं० त्रि० ) अधि-आ- हृ ण्यत् । १ ऊ, बहस करने काबिल । २ अनुसन्धेय, तलाशके काबिल।
अध्याहृत (स ं० त्रि० ) १ उपस्थित किया या पहुंचाया गया । २ वितर्कित, जिसपर बहस की गई हो।
अप्रषित (सं० वि० ) अधि-वस-आधारस्य कर्म संज्ञायां कर्मणि क्त, वकारस्य सम्प्रसारणम् । वसति चुधोरि | पा ७१५२ शासिवसिघसोनां च । पाश६०।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>उपान्वध्याङ वसः । पा १ ४ ४८ । १ अधिष्ठित, उपविष्ट; बैठा हुआ। २ प्राप्त, मिला हुआ। ( पु० ) ३ सर्वाक्षि- रोग, सारी आंखको बीमारी।
अध्युषिताश्ख, अध्युषिताश्व (सं० पु० ) दशरथके वंशज एक राजकुमार, दशरथके खान्दानमें पैदा हुए एक राजा।
अष्ट (सं० त्रि०) १ साढ़े तीन बार लपेटा गया, जिसमें साढ़े तीन बल लगे हों । २ बसा हुआ, आबाद।
अष्टवलय (सं० पु० ) सांप, जिसने साढ़े तीन बल खाये हों।
धुप्रष्ट्र (सं० त्रि० ) अधारूढ़ उष्ट्रम्, अत्या० तत् । १ उष्ट्रयुक्त, जिसमें ऊंट जुते हों। ( पु० ) २ ऊंट - गाड़ो, वह रथ जिसमें ऊंट जोते जाते हैं।
अधूगढ़ (सं० त्रि०) अधि - (उपरि ) वह-क्त । १ अधिक, वृद्धियुक्त, खूब बढ़ा-चढ़ा | २ समृद्ध, भरापूरा ३ अतिशय, कसौर । ( पु० ) ४ शिव, महादेव।
अध्यूढा (सं० स्त्री० ) अधिविन्ना, वह स्त्री जिसके रहते पतिने दूसरा विवाह कर लिया हो।
अध्यनी (सं० स्त्री० ) अधिकं ऊधः स्तनो यस्याः, अधि-ऊधस् अनङ । ऊधसोऽनङ । पा ५।४।१३१। संख्या व्ययादेङप् । पा ४।१।२६। १ दुग्धवतो गौ, दूध देनेवालो गाय । २ वह गौ जिसके स्तन बड़े-बड़े हों | ३
नली-जैसी नस जो स्तनपर उभर आती है।
अध्यष्वस् (सं० त्रि० ) अधि-वस् क्वसु । भाषायां सदवस- श्रुवः । पा २ १०८ | अधिष्ठित, जिसने अधिवास किया हो ; ठहरा हुआ।
अध्यूहन (सं० क्लौ० ) भस्म या अङ्गारके पुटपर स्थापन, ख़ाक या अंगारकी तहपर जमाव।
अध्येतव्य (सं० त्रि०) अधि - इङ-तव्य कर्मणि । पाठ्य, पढ़ने काबिल।
अध्येट (सं० पु० ) विद्यार्थी, पाठक, अधायनकर्ता ; तालिब इल्म, जो पढ़े-लिखे।
अध्येय (सं० त्रि० ) पाठ्य, पढ़ने काबिल।
अध्येष्यमाण (सं० त्रि० ) अध्ययन करनेका इच्छुक, जो पढ़ना चाहता हो ।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३८४
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अध्येषण—अध्वर'''|'''३७७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अषण (सं० क्लो०) अधि-दूष प्रेषणे णिच् ल्य ुट्। १ विनयपूर्वक जिज्ञासा, आजिज़ीका सवाल । २ प्रार्थना, आरज ू । ३ सत्कारपूर्वक प्रेरण, इज्जतकी विदाई । (स्त्री० ) अध्येषणा।
अत्रि (वै० त्रि०) अष्टत, न पकड़ाहुत्रा, हाथसे बाहर।
अगुि (वै० त्रि० ) अधिक्कतो गौर्यस्मिन् मन्त्र,
बहुव्री॰ ।
इति निरुक्तम् । १ अधृतगमन, अप्रतिहतगति ; चलता
हुआ, जल्दबाज़ | ( पु० ) २ अधिकृत पशुविशिष्ट
मन्त्र । ३ अग्नि । ४ इन्द्र ।
'अधिकृतशब्दस्य अनिभावः, गोशब्दयात पशुभावोपलचकः ।'
अत्रिज (वै० त्रि०) अष्टतं जनयति, जन-ड अन्त-
र्भूतण्यर्थे । १ अष्टतजनक, अधृष्यजनक, जो रुके नहीं ।
त्रिपुष्पिका (वै० स्त्री० )
ताम्बूल, नागवल्ली,
नागरवेल, पान । ( Piper betel )
अत्रियमाण (सं० त्रि०) १ न पकड़ा हुआ, वेहाथ ।
२ जो पकड़ा न जाये, वेपहुंच । ३ मृत, मरा हुआ ।
अधियामणी (हिं० स्त्री० ) कटारो, कुरो ।
ध्रुव (सं० त्रि०) न ध्रुवम्, नञ्- तत् । १ अनिश्चित |
ठीक नहीं ।
२ चञ्चल, चुलबुला । ३ पृथक् करने
योग्य, जो अलग किया जा सके ।
अष (सं० पु० ) विकृतरक्तजनित और ज्वरभुक्त
शोथरोग विशेष ; खुनक् । यह एक तरहको सूजन
है, जो मुखमें तालुपर उभर आती है । इसका रङ्ग
लाल और इसको पोड़ासे ज्वर आ जाता है।
“शोथस्तब्धो लोहितन्तालुदेशे रक्ताज्ज्ञेयः सोऽधुषा रुग्ज्वरायः ।
"
( मुश्रुत नि० १६ अ० )
३७७
सुलभ वृक्ष है, राहके लोगोंके तोड़कर खानेपर भी
कोई कुछ नहीं बोलता ।
अध्वगमन (सं० क्लो०) मार्गका जाना, राहका चलना ।
अध्वगवृक्ष (सं० पु० ) आम्म्रातक, अमरा ।
अध्वगामिन् (सं० त्रि०) मार्गमें यात्रा करने या
राह चलेनेवाला |
अध्वजा (सं० स्त्री० ) अध्वनि जायते, जन्-ड ७- तत् ।
स्वर्णपुष्पी, स्वर्गुली; एक लता जो राह में जमती है
और जिसमें सुनहले फूल लगते हैं ।
अध्वन् (सं० पु० )
अद-क्वनिप् दकारस्य धकारः ।
अदेव च । उण् ४|११५। 'अदनं स्वस्तिगच्छतां पच्प्रादीनां विषमस्थाना-
भावात् । यहा, – अधिगत्यर्थः कश्चिद्धातुः, बाहुलकात् पूर्वेण वनिप् ।
गच्छन्त्यस्मिन् देवतादय इत्यध्वा।' (देवराजः ) १ पथ, राह |
२ अन्तरिक्ष, जमीन और आसमान के बीचको खाली
जगह । ३ आकाश, आसमान । ४ यात्रा, सफर |
५ दूरी, फासिला । ६ काल, समय । ७ हार,
जरिया |
८ वायु, हवा । 2 स्थान, जगह । १० वेद-
मत । ११ आक्रमण, हमला । २२ स्कन्द, मुक़ा-
१३ अवयव, अज़ो |
अध्वनिषेवण (सं० क्लो० ) अध्वचलन, चङ्क्रमण ;
हवाखोरी, टहलपहल ।
लह |
अध्वनीन (सं० त्रि०) अध्वानं अलं गामी, अध्वन्-ख ।
अध्वनो यत्खौ । पा५।२।१६ खूब होशियारीसे राह
चलनेवाला ।
अध्वन्य (सं० त्रि०) अध्वानं अलंगामी, अध्वन्-यत् ।
खूब होशियारीसे पथ चलनेवाला ।
अध्वपति (सं० ति० ) ७ वा ६ तत् । १ मार्गपालक,
राहका रखवाला । ( पु० ) २ सूर्य, जो राशिचक्र के
राजा हैं।
अध्वग (स ं० पु० ) अध्वानं गच्छतीति, गम-ड |
अन्तात्यन्ताध्वदूरपारसर्वानन्तेषु डः । पाश२४८१ पथिक, मुसा-
फिर । २ उष्ट्र; शतर, ऊंट । ३ सूर्य, आफताब |
४ अश्वतर, खच्चर | (त्रि०) ५ राह चलनेवाला ।
अध्वगमी (सं० पु० ) पच्ची, परिन्द |
अध्वगत् ( स ं० पु० ) अध्वानं गच्छति, गम- क्विप् । अध्वर (वै० पु० )
पथिक ; मुसाफिर, बटोही ।
अध्वगभोग्य, अध्वगभोज्य (सं० पु० ) . अध्वगेन
अतिसौलभ्यात् भोग्यः, ३-तत् ।
आम्म्रातक वृक्ष,
अमरा। ( Spondias mangifera ) अमरा अति-
अध्वयत् (वै० त्रि०) १ दौड़ता हुआ । २ शीघ्रगामी,
जल्द चलनेवाला ।
3
ध्वृ हिंसाकर्मे घ, ध्वरति ध्वरः;
हिंसा यस्मिन्, नञ्- बहुव्री० ।
न विद्यते ध्वरो
पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण । पा ३।३।११८ । १ यज्ञ । २ हिंसा-
• रहित यज्ञ अर्थात् जिस यज्ञमें कोई विघ्न न हो ।
निरुक्तमें अध्वर शब्दको अनेक प्रकारसे व्युत्पत्ति की
ल्यू<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अध्येषण—अध्वर'''|'''३७७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अषण (सं० क्लो०) अधि-दूष प्रेषणे णिच् ल्य ुट्। १ विनयपूर्वक जिज्ञासा, आजिज़ीका सवाल । २ प्रार्थना, आरज ू । ३ सत्कारपूर्वक प्रेरण, इज्जतकी विदाई । (स्त्री० ) अध्येषणा।
अत्रि (वै० त्रि०) अष्टत, न पकड़ाहुत्रा, हाथसे बाहर।
अगुि (वै० त्रि० ) अधिक्कतो गौर्यस्मिन् मन्त्र, बहुव्री॰। 'अधिकृतशब्दस्य अनिभावः, गोशब्दयात पशुभावोपलचकः।' इति निरुक्तम्। १ अधृतगमन, अप्रतिहतगति ; चलता हुआ, जल्दबाज़। (पु॰) २ अधिकृत पशुविशिष्ट
मन्त्र। ३ अग्नि। ४ इन्द्र।
अत्रिज (वै० त्रि०) अष्टतं जनयति, जन-ड अन्त-र्भूतण्यर्थे। १ अष्टतजनक, अधृष्यजनक, जो रुके नहीं।
त्रिपुष्पिका (वै० स्त्री० ) ताम्बूल, नागवल्ली, नागरवेल, पान । ( Piper betel)
अत्रियमाण (सं० त्रि०) १ न पकड़ा हुआ, वेहाथ । २ जो पकड़ा न जाये, वेपहुंच । ३ मृत, मरा हुआ।
अधियामणी (हिं० स्त्री० ) कटारो, कुरो।
ध्रुव (सं० त्रि०) न ध्रुवम्, नञ्- तत् । १ अनिश्चित। ठीक नहीं। २ चञ्चल, चुलबुला । ३ पृथक् करने योग्य, जो अलग किया जा सके।
अष (सं० पु० ) विकृतरक्तजनित और ज्वरभुक्त शोथरोग विशेष ; खुनक् । यह एक तरहको सूजन है, जो मुखमें तालुपर उभर आती है । इसका रङ्ग
लाल और इसको पोड़ासे ज्वर आ जाता है।
{{C|<small>“शोथस्तब्धो लोहितन्तालुदेशे रक्ताज्ज्ञेयः सोऽधुषा रुग्ज्वरायः।"</small>}}
{{Right|<small>(मुश्रुत नि० १६ अ०)</small>}}
अध्वग (स ं० पु० ) अध्वानं गच्छतीति, गम-ड। अन्तात्यन्ताध्वदूरपारसर्वानन्तेषु डः। पाश२४८१ पथिक, मुसाफिर। २ उष्ट्र; शतर, ऊंट। ३ सूर्य, आफताब। ४ अश्वतर, खच्चर। (त्रि०) ५ राह चलनेवाला।
अध्वगमी (सं० पु० ) पच्ची, परिन्द।
अध्वगत् (स पु०) अध्वानं गच्छति, गम- क्विप्।पथिक ; मुसाफिर, बटोही। अध्वगभोग्य, अध्वगभोज्य (सं० पु०) अध्वगेनअतिसौलभ्यात् भोग्यः, ३-तत्।
आम्म्रातक वृक्ष, अमरा। ( Spondias mangifera ) अमरा अति-
सुलभ वृक्ष है, राहके लोगोंके तोड़कर खानेपर भी कोई कुछ नहीं बोलता।
अध्वगमन (सं० क्लो०) मार्गका जाना, राहका चलना।
अध्वगवृक्ष (सं० पु० ) आम्म्रातक, अमरा।
अध्वगामिन् (सं० त्रि०) मार्गमें यात्रा करने या राह चलेनेवाला।
अध्वजा (सं० स्त्री० ) अध्वनि जायते, जन्-ड ७- तत्। स्वर्णपुष्पी, स्वर्गुली; एक लता जो राह में जमती है और जिसमें सुनहले फूल लगते हैं।
अध्वन् (सं० पु० ) अद-क्वनिप् दकारस्य धकारः। अदेव च । उण् ४|११५। 'अदनं स्वस्तिगच्छतां पच्प्रादीनां विषमस्थाना-भावात् । यहा,–अधिगत्यर्थः कश्चिद्धातुः, बाहुलकात् पूर्वेण वनिप्। गच्छन्त्यस्मिन् देवतादय इत्यध्वा।' (देवराजः ) १ पथ, राह। २ अन्तरिक्ष, जमीन और आसमान के बीचको खाली जगह। ३ आकाश, आसमान। ४ यात्रा, सफर। ५ दूरी, फासिला। ६ काल, समय। ७ हार, जरिया ८ वायु, हवा। 2 स्थान, जगह। १० वेदमत। ११ आक्रमण, हमला। २२ स्कन्द, मुक़ा-लह। १३ अवयव, अज़ो।
अध्वनिषेवण (सं० क्लो० ) अध्वचलन, चङ्क्रमण ; हवाखोरी, टहलपहल।
अध्वनीन (सं० त्रि०) अध्वानं अलं गामी, अध्वन्-ख। अध्वनो यत्खौ। पा५।२।१६ खूब होशियारीसे राह चलनेवाला।
अध्वन्य (सं० त्रि०) अध्वानं अलंगामी, अध्वन्-यत्। खूब होशियारीसे पथ चलनेवाला।
अध्वपति (सं० ति०) ७ वा ६ तत् । १ मार्गपालक, राहका रखवाला। (पु०) २ सूर्य, जो राशिचक्र के राजा हैं।
अध्वयत् (वै० त्रि०) १ दौड़ता हुआ । २ शीघ्रगामी, जल्द चलनेवाला।
अध्वर (वै० पु० )ध्वृ हिंसाकर्मे घ, ध्वरति ध्वरः; न विद्यते ध्वरो हिंसा यस्मिन्, नञ्- बहुव्री०। पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण। पा ३।३।११८ । १ यज्ञ । २ हिंसारहित यज्ञ अर्थात् जिस यज्ञमें कोई विघ्न न हो। निरुक्तमें अध्वर शब्दको अनेक प्रकारसे व्युत्पत्ति की<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
नियम सुधार
667895
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अध्येषण—अध्वर'''|'''३७७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अषण (सं० क्लो०) अधि-दूष प्रेषणे णिच् ल्य ुट्। १ विनयपूर्वक जिज्ञासा, आजिज़ीका सवाल । २ प्रार्थना, आरज ू । ३ सत्कारपूर्वक प्रेरण, इज्जतकी विदाई । (स्त्री० ) अध्येषणा।
अत्रि (वै० त्रि०) अष्टत, न पकड़ाहुत्रा, हाथसे बाहर।
अगुि (वै० त्रि० ) अधिक्कतो गौर्यस्मिन् मन्त्र, बहुव्री॰। 'अधिकृतशब्दस्य अनिभावः, गोशब्दयात पशुभावोपलचकः।' इति निरुक्तम्। १ अधृतगमन, अप्रतिहतगति ; चलता हुआ, जल्दबाज़। (पु॰) २ अधिकृत पशुविशिष्ट
मन्त्र। ३ अग्नि। ४ इन्द्र।
अत्रिज (वै० त्रि०) अष्टतं जनयति, जन-ड अन्त-र्भूतण्यर्थे। १ अष्टतजनक, अधृष्यजनक, जो रुके नहीं।
त्रिपुष्पिका (वै० स्त्री० ) ताम्बूल, नागवल्ली, नागरवेल, पान । ( Piper betel)
अत्रियमाण (सं० त्रि०) १ न पकड़ा हुआ, वेहाथ । २ जो पकड़ा न जाये, वेपहुंच । ३ मृत, मरा हुआ।
अधियामणी (हिं० स्त्री० ) कटारो, कुरो।
ध्रुव (सं० त्रि०) न ध्रुवम्, नञ्- तत् । १ अनिश्चित। ठीक नहीं। २ चञ्चल, चुलबुला । ३ पृथक् करने योग्य, जो अलग किया जा सके।
अष (सं० पु० ) विकृतरक्तजनित और ज्वरभुक्त शोथरोग विशेष ; खुनक् । यह एक तरहको सूजन है, जो मुखमें तालुपर उभर आती है । इसका रङ्ग
लाल और इसको पोड़ासे ज्वर आ जाता है।
{{C|<small>“शोथस्तब्धो लोहितन्तालुदेशे रक्ताज्ज्ञेयः सोऽधुषा रुग्ज्वरायः।"</small>}}
{{Right|<small>(मुश्रुत नि० १६ अ०)</small>}}
अध्वग (स ं० पु० ) अध्वानं गच्छतीति, गम-ड। अन्तात्यन्ताध्वदूरपारसर्वानन्तेषु डः। पाश२४८१ पथिक, मुसाफिर। २ उष्ट्र; शतर, ऊंट। ३ सूर्य, आफताब। ४ अश्वतर, खच्चर। (त्रि०) ५ राह चलनेवाला।
अध्वगमी (सं० पु० ) पच्ची, परिन्द।
अध्वगत् (स पु०) अध्वानं गच्छति, गम- क्विप्।पथिक ; मुसाफिर, बटोही। अध्वगभोग्य, अध्वगभोज्य (सं० पु०) अध्वगेनअतिसौलभ्यात् भोग्यः, ३-तत्।
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अध्वगवृक्ष (सं० पु० ) आम्म्रातक, अमरा।
अध्वगामिन् (सं० त्रि०) मार्गमें यात्रा करने या राह चलेनेवाला।
अध्वजा (सं० स्त्री० ) अध्वनि जायते, जन्-ड ७- तत्। स्वर्णपुष्पी, स्वर्गुली; एक लता जो राह में जमती है और जिसमें सुनहले फूल लगते हैं।
अध्वन् (सं० पु० ) अद-क्वनिप् दकारस्य धकारः। अदेव च । उण् ४|११५। 'अदनं स्वस्तिगच्छतां पच्प्रादीनां विषमस्थाना-भावात् । यहा,–अधिगत्यर्थः कश्चिद्धातुः, बाहुलकात् पूर्वेण वनिप्। गच्छन्त्यस्मिन् देवतादय इत्यध्वा।' (देवराजः ) १ पथ, राह। २ अन्तरिक्ष, जमीन और आसमान के बीचको खाली जगह। ३ आकाश, आसमान। ४ यात्रा, सफर। ५ दूरी, फासिला। ६ काल, समय। ७ हार, जरिया ८ वायु, हवा। 2 स्थान, जगह। १० वेदमत। ११ आक्रमण, हमला। २२ स्कन्द, मुक़ा-लह। १३ अवयव, अज़ो।
अध्वनिषेवण (सं० क्लो० ) अध्वचलन, चङ्क्रमण ; हवाखोरी, टहलपहल।
अध्वनीन (सं० त्रि०) अध्वानं अलं गामी, अध्वन्-ख। अध्वनो यत्खौ। पा५।२।१६ खूब होशियारीसे राह चलनेवाला।
अध्वन्य (सं० त्रि०) अध्वानं अलंगामी, अध्वन्-यत्। खूब होशियारीसे पथ चलनेवाला।
अध्वपति (सं० ति०) ७ वा ६ तत् । १ मार्गपालक, राहका रखवाला। (पु०) २ सूर्य, जो राशिचक्र के राजा हैं।
अध्वयत् (वै० त्रि०) १ दौड़ता हुआ । २ शीघ्रगामी, जल्द चलनेवाला।
अध्वर (वै० पु० )ध्वृ हिंसाकर्मे घ, ध्वरति ध्वरः; न विद्यते ध्वरो हिंसा यस्मिन्, नञ्- बहुव्री०। पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण। पा ३।३।११८ । १ यज्ञ । २ हिंसारहित यज्ञ अर्थात् जिस यज्ञमें कोई विघ्न न हो। निरुक्तमें अध्वर शब्दको अनेक प्रकारसे व्युत्पत्ति की<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३८५
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३७८'''|'''अध्वर—अध्वर्यु'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>गई है। ऋग्वेदको व्याख्या में सायणाचार्यने अध्वर शब्दका विघ्नरहित यज्ञ ही अर्थ किया है,—
{{C|<small>"अग्नयं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि । स इद्द वेषु गच्छति ।"</small>}}
{{Right|<small>(ऋक् १|१|४ ) ।</small>}}
<small>कोह यज्ञ' ? अध्वरं हिंसारहितम् । नहि अग्निना सर्वतः पालितं यज्ञ' राक्षसादयो हिंसितु प्रभवन्ति । + + न विद्यतेऽध्वरोऽस्येति बहुव्रीहौ इत्यादि ।”</small>
'किस प्रकारका यज्ञ? - अध्वर अर्थात् हिंसा-रहित यज्ञ। सब ओर अग्नि द्वारा पालित यज्ञको नष्ट करनेके लिये राक्षस समर्थ न होते थे।' फिर देखिये, {{block center|<poem><small>"राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवि। वर्धमानं वे दमे।"
{{Right|(ऋक् १८)}}
'अध्वराणां राक्षसकृतहिंसारहितानां यज्ञानां।' (सायण)</small></poem>}}
३ आठ वसुओंमें एक वसुका नाम। ४ वंशका प्रधान, खान्दानका सरदार (क्लो०) ५ अन्तरिक्ष, आसमान। ६ वायु, हवा। (त्रि०) ७ कुटिलता-
शून्य; सौधा, जो टेढ़ा नहीं। ८ अखण्ड, नटुटा हुआ। 2 बाधारहित, जिसे किसोने काटा न हो। १० टिकाऊ, बहुत दिन चलनेवाला। ११ सुस्थ, तनदुरुस्त। १२ व्यस्त, मशगूल, लगा हुआ।
अध्वरकर्मन् (सं० क्लो०) अध्वर एव कर्म। कर्म, यज्ञका काम।
अध्वरकल्पा (सं० स्त्री०) यज्ञरूप नाम, जिसे काम्येष्टि भी कहते हैं।
अध्वरकाण्ड (सं० क्लो०) शतपथब्राह्मणके उसअंशका नाम जिसमें अध्वर-यज्ञको बात लिखी है।
अध्वरकृत् (सं० पु० ) अध्वरयज्ञ करनेवाला पुरुष।
अध्वरग (सं० वि० ) अध्वरके लिये ईप्सित, जो अधरके लिये विचारा जाये।
अधरगु, अध्वर देखो।
अधुरदोक्षणीया ( सं॰ स्त्री॰ ) अधुरसम्बन्धीय दीक्षा, यसको शुभक्रियाविशेष।
प्रायश्चित्ति (वै० स्वी० ) अधरके प्रायश्चित्तको रीति।
श्रध्वरमीमांसा (सं० स्वी० ) अध्वरस्य यज्ञस्य कर्त-व्यताज्ञानाय मीमांसा विचारः। जैमिनिप्रोक्त धर्म-
मौमांसाख्य शास्त्र विशेष, जैमिनीका बनाया धर्म-मीमांसा नामक एक ग्रन्थ।
अरथ (सं० पु० ) अध्वैव रथो यस्य, बहुव्री०। १ पथके विषयमें अभिन्न दूत, वह एलची जो सममता-बूझता और राहका हाल जानता हो। २ मार्ग में गमनोपयुक्त रथ, जो गाड़ी राह में चलने काबिल हो। 'पथगमनोपयुक्त रथ' कहनेका मतलब यह है, कि रथ कई प्रकारका होता है ; जैसे, १ लड़कोंके खलनेका रथ, २ देवताओंको ऊपर बैठा खींचा जानेवाला रथ, ३ समान लादनेका रथ । ४ राहमें चलने काबिल रथ और ५ गन्त्रोरथ। यहां 'अधुरथ' शब्दसे मार्गगमनोपयुक्त रथका हौ ग्रहण है।
अधुरवत् (वै० त्रि०) अध्वरशब्दवाला, जिसमें अध्वर लफ्ज़ शामिल हो।
अधूरी (वै० पु० ) अधरको महिमा यानो अधरका सहायक।
अधूरा (सं० स्त्री०) मेदा, अदरक-जैसी एक जड़।
अवरसमिश्रयजुस् (वै० क्लो०) यज्ञसे सम्बन्ध रखनेवाले नौ पवित्र जलोंका समूह, नौ तरहके पानीका ढेर जो धार बांधकर यज्ञमें देवतापर चढ़ाया जाता है ।
अधूरस्थ (वै० त्रि०) यज्ञमें खड़ा या काम करता हुआ ।
१ यजु अधुरेष्ठ (सं०वि० ) यज्ञमें अधिष्ठित या खड़ा हुआ । एक इच्छानुरूप यज्ञका अधूर्यु, अधरयु ( सं ० पु० ) अधुरं युक्तौति,
अध्वर-युज्-डु। कव्यध्वरपृतनस्यचि लोपः । पा ७७४।३।र्वेद पढ़नेवाला ब्राह्मण । २ याजक, यज्ञ करानेवाला प्रधान पुरोहित । ३ होता, उद्गाता और ब्रह्मासे भिन्न पुरोहित विशेष । इनका काम भूमि नापना, वेदी बनाना, यज्ञपात्र प्रस्तुत करना, काष्ठ और जल लाना, आग जलाना और पशुको वलिदान देना था । इस काममें लगे हुए इन्हें विना भूल-चूक यजुर्वेद क मन्त्र पढ़ना पड़ते थे; इससे यजुर्वेद श्रध्वर्यवके भी नाम से लिखा है, -
अधुर्यु या कारा गया । हरिवंश में
{{block center|<poem><small>"ब्राह्मणं परमं वक्वादुङ्गातारश्च सामगम् ।
होतारमथ चाध्वर्यु "बाहुभ्यामसृजत् प्रभुः ॥"</small></poem>}}
'प्रभुने अपने मुख से श्रेष्ठ ब्राह्मणको उत्पन्न किया<noinclude></noinclude>
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<small>कोह यज्ञ' ? अध्वरं हिंसारहितम् । नहि अग्निना सर्वतः पालितं यज्ञ' राक्षसादयो हिंसितु प्रभवन्ति । + + न विद्यतेऽध्वरोऽस्येति बहुव्रीहौ इत्यादि ।”</small>
'किस प्रकारका यज्ञ? - अध्वर अर्थात् हिंसा-रहित यज्ञ। सब ओर अग्नि द्वारा पालित यज्ञको नष्ट करनेके लिये राक्षस समर्थ न होते थे।' फिर देखिये, {{block center|<poem><small>"राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवि। वर्धमानं वे दमे।"
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'अध्वराणां राक्षसकृतहिंसारहितानां यज्ञानां।' (सायण)</small></poem>}}
३ आठ वसुओंमें एक वसुका नाम। ४ वंशका प्रधान, खान्दानका सरदार (क्लो०) ५ अन्तरिक्ष, आसमान। ६ वायु, हवा। (त्रि०) ७ कुटिलता-
शून्य; सौधा, जो टेढ़ा नहीं। ८ अखण्ड, नटुटा हुआ। 2 बाधारहित, जिसे किसोने काटा न हो। १० टिकाऊ, बहुत दिन चलनेवाला। ११ सुस्थ, तनदुरुस्त। १२ व्यस्त, मशगूल, लगा हुआ।
अध्वरकर्मन् (सं० क्लो०) अध्वर एव कर्म। कर्म, यज्ञका काम।
अध्वरकल्पा (सं० स्त्री०) यज्ञरूप नाम, जिसे काम्येष्टि भी कहते हैं।
अध्वरकाण्ड (सं० क्लो०) शतपथब्राह्मणके उसअंशका नाम जिसमें अध्वर-यज्ञको बात लिखी है।
अध्वरकृत् (सं० पु० ) अध्वरयज्ञ करनेवाला पुरुष।
अध्वरग (सं० वि० ) अध्वरके लिये ईप्सित, जो अधरके लिये विचारा जाये।
अधरगु, अध्वर देखो।
अधुरदोक्षणीया ( सं॰ स्त्री॰ ) अधुरसम्बन्धीय दीक्षा, यसको शुभक्रियाविशेष।
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अरथ (सं० पु० ) अध्वैव रथो यस्य, बहुव्री०। १ पथके विषयमें अभिन्न दूत, वह एलची जो सममता-बूझता और राहका हाल जानता हो। २ मार्ग में गमनोपयुक्त रथ, जो गाड़ी राह में चलने काबिल हो। 'पथगमनोपयुक्त रथ' कहनेका मतलब यह है, कि रथ कई प्रकारका होता है ; जैसे, १ लड़कोंके खलनेका रथ, २ देवताओंको ऊपर बैठा खींचा जानेवाला रथ, ३ समान लादनेका रथ । ४ राहमें चलने काबिल रथ और ५ गन्त्रोरथ। यहां 'अधुरथ' शब्दसे मार्गगमनोपयुक्त रथका हौ ग्रहण है।
अधुरवत् (वै० त्रि०) अध्वरशब्दवाला, जिसमें अध्वर लफ्ज़ शामिल हो।
अधूरी (वै० पु० ) अधरको महिमा यानो अधरका सहायक।
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अधूरस्थ (वै० त्रि०) यज्ञमें खड़ा या काम करता हुआ ।
१ यजु अधुरेष्ठ (सं०वि० ) यज्ञमें अधिष्ठित या खड़ा हुआ । एक इच्छानुरूप यज्ञका अधूर्यु, अधरयु ( सं ० पु० ) अधुरं युक्तौति,
अध्वर-युज्-डु। कव्यध्वरपृतनस्यचि लोपः । पा ७७४।३।र्वेद पढ़नेवाला ब्राह्मण । २ याजक, यज्ञ करानेवाला प्रधान पुरोहित । ३ होता, उद्गाता और ब्रह्मासे भिन्न पुरोहित विशेष । इनका काम भूमि नापना, वेदी बनाना, यज्ञपात्र प्रस्तुत करना, काष्ठ और जल लाना, आग जलाना और पशुको वलिदान देना था । इस काममें लगे हुए इन्हें विना भूल-चूक यजुर्वेद क मन्त्र पढ़ना पड़ते थे; इससे यजुर्वेद श्रध्वर्यवके भी नाम से लिखा है, -
अधुर्यु या कारा गया । हरिवंश में
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अध्वर्यु—अन्'''|'''३७९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>था। वह उद्गाता रहे, उच्चैःस्खरसे सामगान
करते थे। अपने वाहुसे फिर उन्होंने होता और अधर्यु निकाले।'
यह बड़े ही पेचको बात है । प्रभुने जिन ब्रह्माको मुखसे उत्पन्न किया था, वही सामवेदके गायक हुए। फिर जो अर्थात् यजुर्वेद के पुरोहित रहे, प्रभुने उन्हें अपने बाहुसे बनाया था। यह बात कहनेसे ब्रह्मा और यजुर्वेदके पुरोहित दोनो पृथक् श्रेणोके हो जाते हैं। जो ब्रह्मा हैं, वह अधर्यु या यजुर्वेद के पुरोहित नहीं । ऋग्वेद और अथर्ववेदके पुरुषसूक्त में लिखा है, कि पुरुषके वाहुसे राजन्यकौ उत्पत्ति हुई थी। फिर यहां लिखते, कि प्रभुने अपने बाहुसे अध्वर्युं उत्पन्न किये हैं । इससे यही सन्देह होता है, कि राजन्य और अधर्यु एक हो श्रेणीके लोग हैं । निरुक्तमें देखिये,—
<small>"तिख एव देवता इति नैरुक्ताः। अग्निः पृथिवीस्थानो, वायुव
इन्द्रो वाऽन्तरिक्षस्थानः। सूर्यो द्युस्थान:। तासां महाभाग्यात् एकैकाना
मपि वहनि नामधेयानि भवन्ति। अपि वा कर्मपृथक्त्वात् यथा,—होता-
ध्वर्यु ब्रह्म उद्गाता इत्यपि एकस्य शताः। श्रपि वा पृथगेव स्युः। पृथग हि स्तुत्यो भवन्ति तथाऽभिधानानि"। (७५)</small>
‘नैरुक्तोंके मतसे देवता तोन हैं । पृथिवीमें अग्मि, अन्तरीक्षमें वायु या इन्द्र और द्युलोकमें सूर्य रहते हैं । उनके माहात्मप्रानुसार एक-एक देवताके अनेक नाम हुआ करते हैं। अथवा जैसे पृथक् कर्मसे होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता प्रभृति अनेक नाम पड़ते, वैसे ही देवताओंके भी अनेक नाम निकलते हैं। यदि ऐसा नहीं, तो सभी पृथक् मानना पड़ेंगे; क्योंकि उन सबके स्वतन्त्र नाम रहे और सब पृथक् स्तवनीय हुए हैं।
बिरुक्का यह वाक्य देखनेसे बोध होता है, कि ब्रह्मा, अधूर्यु प्रभृति भिन्न-भिन्न नाम केवल कार्यभेदसे रखे गये हैं। ऋषि जो सकल बेदमन्त्र बनाते उनका अलग-अलग् नाम पड़ता था । जैसे, — ऋच्, उक्थ, स्तोम, अर्क, वाच्, वाचस्, ब्रह्म, गोर्, मन्त्र, सूक्त, धी, मति, नोथ, निविद् इत्यादि । इसीसे ज्ञात होता है, कि जो ब्रह्म अर्थात् वेदका गानविशेष रचते या उसके स्तोत्रको गाते, वह ब्रह्मा कहाते थे। सायण के वेदभाष्य में
इसका कितना हो आभास मिलता है। उन्होंने 'अब्राह्मण' शब्दको व्याख्यामें इसका अर्थ ' स्तोत्रहीन' लगाया है। यह भी देखा जाता है, कि ऋङ्मन्त्रोंमें अनृच् और अब्राह्मण दोनो शब्द एक ही प्रकार के अर्थमें प्रयुक्त हुए हैं।
अध्वर्यु क्रतु (सं० पु० ) अध्वर्युवेदे यस्य क्रतोर्विधानं सोऽध्वर्यु क्रतुः। अध्वर्यु क्रतुरनपु ंसकम् । पा २|४|४| यजुर्वेद- विहित यज्ञ, जिसे अध्वर्यु कराते हैं।
अध्वर्युवेद (सं० पु० ) यजुर्वेद, जिसे अध्वर्यु पढ़ते हैं।
अध्वशल्य (सं० पु० ) अध्वनि पथि शल्यमिव आचर-तीति, ततोऽच्। अपामार्ग, लटजीरा, चिचड़ा।
अध्वशोष (सं० पु० ) मार्गश्रमजन्य शोषरोग, राहको थकावटसे पैदा हुई सूखेकी बोमारो।
{{Block center|<poem><small>"अध्वप्रशोषो खस्ताङ्गः संसृष्टपरुषच्छविः।
प्रसुप्तगावा वयवः शुष्कक्क़ मगलानलः॥"(निदान)</small></poem>}}
'जिसे राह चलनेकौ थकावटसे सूखेकी बीमारी लगतो, उसका अङ्ग ढोला पड़ और चेहरेका रङ्ग उड़ जाता है। वह अपने हाथ-पैर नहीं उठा सकता और उसका गला और मुंह सूखता है।'
अध्वसिद्धक (सं० पु० ) सिन्धुवार वृक्ष, सम्हाल।
अध्वस्मन् (सं० त्रि० ) ध्वन्स - मनिन्- किच्च ततो नञ्-बहुव्री०। १ ध्वंसरहित, बाज़वाल; जिसका कभी नाश न हो। २ न गिरानेवाला। ३ प्रशस्त, खुला।
अध्वाण्डशात्रव, अध्वान्तशात्रव (सं० पु० ) श्योनाक-वृक्ष, श्योना ; अरलू। यह वृक्ष अन्धकार में फूलता है।
अध्वाति (वै० पु० ) अध्वानमतति, अत-इ; ६-तत्। पथिक, मुसाफ़िर बटोही।
अध्वान्त (वै० क्ली ) १ सन्ध्या, गोधूलि। २ अन्धकार, तारौको।
अध्वायन ( सं० क्लो० ) अध्वनि अयनं गतिः। यात्रा, सफर, राइका चलना।
अन् (सं० अव्य०) १ नहीं, न । संस्कृतमें यह स्वरसे आरम्भ होनेवाले शब्दोंके आदिमें आता और इन्कारका मतलब रखता है। हिन्दीमें इसके अन्तका
नकार सखर हो जाता है। (सं० क्रि०) २ सांस लेना, हांफना, सरकना, जाना या जीना।<noinclude></noinclude>
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यह बड़े ही पेचको बात है । प्रभुने जिन ब्रह्माको मुखसे उत्पन्न किया था, वही सामवेदके गायक हुए। फिर जो अर्थात् यजुर्वेद के पुरोहित रहे, प्रभुने उन्हें अपने बाहुसे बनाया था। यह बात कहनेसे ब्रह्मा और यजुर्वेदके पुरोहित दोनो पृथक् श्रेणोके हो जाते हैं। जो ब्रह्मा हैं, वह अधर्यु या यजुर्वेद के पुरोहित नहीं । ऋग्वेद और अथर्ववेदके पुरुषसूक्त में लिखा है, कि पुरुषके वाहुसे राजन्यकौ उत्पत्ति हुई थी। फिर यहां लिखते, कि प्रभुने अपने बाहुसे अध्वर्युं उत्पन्न किये हैं । इससे यही सन्देह होता है, कि राजन्य और अधर्यु एक हो श्रेणीके लोग हैं । निरुक्तमें देखिये,—
<small>"तिख एव देवता इति नैरुक्ताः। अग्निः पृथिवीस्थानो, वायुव
इन्द्रो वाऽन्तरिक्षस्थानः। सूर्यो द्युस्थान:। तासां महाभाग्यात् एकैकाना
मपि वहनि नामधेयानि भवन्ति। अपि वा कर्मपृथक्त्वात् यथा,—होता-
ध्वर्यु ब्रह्म उद्गाता इत्यपि एकस्य शताः। श्रपि वा पृथगेव स्युः। पृथग हि स्तुत्यो भवन्ति तथाऽभिधानानि"। (७५)</small>
‘नैरुक्तोंके मतसे देवता तोन हैं । पृथिवीमें अग्मि, अन्तरीक्षमें वायु या इन्द्र और द्युलोकमें सूर्य रहते हैं । उनके माहात्मप्रानुसार एक-एक देवताके अनेक नाम हुआ करते हैं। अथवा जैसे पृथक् कर्मसे होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता प्रभृति अनेक नाम पड़ते, वैसे ही देवताओंके भी अनेक नाम निकलते हैं। यदि ऐसा नहीं, तो सभी पृथक् मानना पड़ेंगे; क्योंकि उन सबके स्वतन्त्र नाम रहे और सब पृथक् स्तवनीय हुए हैं।
बिरुक्का यह वाक्य देखनेसे बोध होता है, कि ब्रह्मा, अधूर्यु प्रभृति भिन्न-भिन्न नाम केवल कार्यभेदसे रखे गये हैं। ऋषि जो सकल बेदमन्त्र बनाते उनका अलग-अलग् नाम पड़ता था । जैसे, — ऋच्, उक्थ, स्तोम, अर्क, वाच्, वाचस्, ब्रह्म, गोर्, मन्त्र, सूक्त, धी, मति, नोथ, निविद् इत्यादि । इसीसे ज्ञात होता है, कि जो ब्रह्म अर्थात् वेदका गानविशेष रचते या उसके स्तोत्रको गाते, वह ब्रह्मा कहाते थे। सायण के वेदभाष्य में
इसका कितना हो आभास मिलता है। उन्होंने 'अब्राह्मण' शब्दको व्याख्यामें इसका अर्थ ' स्तोत्रहीन' लगाया है। यह भी देखा जाता है, कि ऋङ्मन्त्रोंमें अनृच् और अब्राह्मण दोनो शब्द एक ही प्रकार के अर्थमें प्रयुक्त हुए हैं।
अध्वर्यु क्रतु (सं० पु० ) अध्वर्युवेदे यस्य क्रतोर्विधानं सोऽध्वर्यु क्रतुः। अध्वर्यु क्रतुरनपु ंसकम् । पा २|४|४| यजुर्वेद- विहित यज्ञ, जिसे अध्वर्यु कराते हैं।
अध्वर्युवेद (सं० पु० ) यजुर्वेद, जिसे अध्वर्यु पढ़ते हैं।
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प्रसुप्तगावा वयवः शुष्कक्क़ मगलानलः॥"(निदान)</small></poem>}}
'जिसे राह चलनेकौ थकावटसे सूखेकी बीमारी लगतो, उसका अङ्ग ढोला पड़ और चेहरेका रङ्ग उड़ जाता है। वह अपने हाथ-पैर नहीं उठा सकता और उसका गला और मुंह सूखता है।'
अध्वसिद्धक (सं० पु० ) सिन्धुवार वृक्ष, सम्हाल।
अध्वस्मन् (सं० त्रि० ) ध्वन्स - मनिन्- किच्च ततो नञ्-बहुव्री०। १ ध्वंसरहित, बाज़वाल; जिसका कभी नाश न हो। २ न गिरानेवाला। ३ प्रशस्त, खुला।
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अध्वाति (वै० पु० ) अध्वानमतति, अत-इ; ६-तत्। पथिक, मुसाफ़िर बटोही।
अध्वान्त (वै० क्ली ) १ सन्ध्या, गोधूलि। २ अन्धकार, तारौको।
अध्वायन ( सं० क्लो० ) अध्वनि अयनं गतिः। यात्रा, सफर, राइका चलना।
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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यह बड़े ही पेचको बात है । प्रभुने जिन ब्रह्माको मुखसे उत्पन्न किया था, वही सामवेदके गायक हुए। फिर जो अर्थात् यजुर्वेद के पुरोहित रहे, प्रभुने उन्हें अपने बाहुसे बनाया था। यह बात कहनेसे ब्रह्मा और यजुर्वेदके पुरोहित दोनो पृथक् श्रेणोके हो जाते हैं। जो ब्रह्मा हैं, वह अधर्यु या यजुर्वेद के पुरोहित नहीं । ऋग्वेद और अथर्ववेदके पुरुषसूक्त में लिखा है, कि पुरुषके वाहुसे राजन्यकौ उत्पत्ति हुई थी। फिर यहां लिखते, कि प्रभुने अपने बाहुसे अध्वर्युं उत्पन्न किये हैं । इससे यही सन्देह होता है, कि राजन्य और अधर्यु एक हो श्रेणीके लोग हैं । निरुक्तमें देखिये,—
<small>"तिख एव देवता इति नैरुक्ताः। अग्निः पृथिवीस्थानो, वायुव
इन्द्रो वाऽन्तरिक्षस्थानः। सूर्यो द्युस्थान:। तासां महाभाग्यात् एकैकाना
मपि वहनि नामधेयानि भवन्ति। अपि वा कर्मपृथक्त्वात् यथा,—होता-
ध्वर्यु ब्रह्म उद्गाता इत्यपि एकस्य शताः। श्रपि वा पृथगेव स्युः। पृथग हि स्तुत्यो भवन्ति तथाऽभिधानानि"। (७५)</small>
‘नैरुक्तोंके मतसे देवता तोन हैं । पृथिवीमें अग्मि, अन्तरीक्षमें वायु या इन्द्र और द्युलोकमें सूर्य रहते हैं । उनके माहात्मप्रानुसार एक-एक देवताके अनेक नाम हुआ करते हैं। अथवा जैसे पृथक् कर्मसे होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, उद्गाता प्रभृति अनेक नाम पड़ते, वैसे ही देवताओंके भी अनेक नाम निकलते हैं। यदि ऐसा नहीं, तो सभी पृथक् मानना पड़ेंगे; क्योंकि उन सबके स्वतन्त्र नाम रहे और सब पृथक् स्तवनीय हुए हैं।
बिरुक्का यह वाक्य देखनेसे बोध होता है, कि ब्रह्मा, अधूर्यु प्रभृति भिन्न-भिन्न नाम केवल कार्यभेदसे रखे गये हैं। ऋषि जो सकल बेदमन्त्र बनाते उनका अलग-अलग् नाम पड़ता था । जैसे, — ऋच्, उक्थ, स्तोम, अर्क, वाच्, वाचस्, ब्रह्म, गोर्, मन्त्र, सूक्त, धी, मति, नोथ, निविद् इत्यादि । इसीसे ज्ञात होता है, कि जो ब्रह्म अर्थात् वेदका गानविशेष रचते या उसके स्तोत्रको गाते, वह ब्रह्मा कहाते थे। सायण के वेदभाष्य में<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>इसका कितना हो आभास मिलता है। उन्होंने 'अब्राह्मण' शब्दको व्याख्यामें इसका अर्थ ' स्तोत्रहीन' लगाया है। यह भी देखा जाता है, कि ऋङ्मन्त्रोंमें अनृच् और अब्राह्मण दोनो शब्द एक ही प्रकार के अर्थमें प्रयुक्त हुए हैं।
अध्वर्यु क्रतु (सं० पु० ) अध्वर्युवेदे यस्य क्रतोर्विधानं सोऽध्वर्यु क्रतुः। अध्वर्यु क्रतुरनपु ंसकम् । पा २|४|४| यजुर्वेद- विहित यज्ञ, जिसे अध्वर्यु कराते हैं।
अध्वर्युवेद (सं० पु० ) यजुर्वेद, जिसे अध्वर्यु पढ़ते हैं।
अध्वशल्य (सं० पु० ) अध्वनि पथि शल्यमिव आचर-तीति, ततोऽच्। अपामार्ग, लटजीरा, चिचड़ा।
अध्वशोष (सं० पु० ) मार्गश्रमजन्य शोषरोग, राहको थकावटसे पैदा हुई सूखेकी बोमारो।
{{Block center|<poem><small>"अध्वप्रशोषो खस्ताङ्गः संसृष्टपरुषच्छविः।
प्रसुप्तगावा वयवः शुष्कक्क़ मगलानलः॥"(निदान)</small></poem>}}
'जिसे राह चलनेकौ थकावटसे सूखेकी बीमारी लगतो, उसका अङ्ग ढोला पड़ और चेहरेका रङ्ग उड़ जाता है। वह अपने हाथ-पैर नहीं उठा सकता और उसका गला और मुंह सूखता है।'
अध्वसिद्धक (सं० पु० ) सिन्धुवार वृक्ष, सम्हाल।
अध्वस्मन् (सं० त्रि० ) ध्वन्स - मनिन्- किच्च ततो नञ्-बहुव्री०। १ ध्वंसरहित, बाज़वाल; जिसका कभी नाश न हो। २ न गिरानेवाला। ३ प्रशस्त, खुला।
अध्वाण्डशात्रव, अध्वान्तशात्रव (सं० पु० ) श्योनाक-वृक्ष, श्योना ; अरलू। यह वृक्ष अन्धकार में फूलता है।
अध्वाति (वै० पु० ) अध्वानमतति, अत-इ; ६-तत्। पथिक, मुसाफ़िर बटोही।
अध्वान्त (वै० क्ली ) १ सन्ध्या, गोधूलि। २ अन्धकार, तारौको।
अध्वायन ( सं० क्लो० ) अध्वनि अयनं गतिः। यात्रा, सफर, राइका चलना।
अन् (सं० अव्य०) १ नहीं, न । संस्कृतमें यह स्वरसे आरम्भ होनेवाले शब्दोंके आदिमें आता और इन्कारका मतलब रखता है। हिन्दीमें इसके अन्तका
नकार सखर हो जाता है। (सं० क्रि०) २ सांस लेना, हांफना, सरकना, जाना या जीना।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३८७
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३८०'''|'''अन—अनखौहा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अन (सं० क्रि०) अदा० प०, अक० सेट्। वा दि० आ०, अक० सेट्। १ जीना, ज़िन्दा रहना। गदादिभ्यः सार्वधातुके। पा ७१२:७६ (पु०) अन्-अच् बाहु०। २ प्राण। श्राणोऽपानोव्यान उदानः समानोऽन इत्येतत् सर्व प्राण इति। ३ प्राणन, नफ़्स ; सांस।
अनंश (सं० त्रि०) नास्ति अंशो दायग्रहणाधिकारोऽस्य। १ विभागरहित, जिसमें टुकड़े नहीं। २ पेटक विषयका अंश न पा सकनेवाला, जिसे अपने बाप दादेकी जायदाद का हिस्सा न मिल सके। क्लोव, पतित, जन्मान्ध और कुष्ठादिरूप अचिकित्स्य रोगा-क्रान्त पैटक धनके अधिकारी नहीं होते। मनुने अनंशका यह नियम रखा है,
{{Block center|<poem><small>"अनंशी क्लीवपतितौ जात्यन्धवधिरौ तथा।
उन्मत्त जड़मूकश्च ये च केचिन्निरिन्द्रियाः॥” मनु हा२०१</small></poem>}}
'क्लीव, पतित, जन्मान्ध, जन्मवधिर, उन्मत्त, जड़, मूक, विकलेन्द्रिय तथा होनेन्द्रिय व्यक्ति पैटक धनकेअधिकारी नहीं होते।
नास्ति अंशोऽवयवो यस्य ।३ निराकार, जिसको कोई सूरत नहीं।
अनंशुमत्फला (सं० स्त्री०) न अंशुमत्फलं यस्याः। कदली, केला।
अनहिबात (हिं० पु०) वैधव्य, रंडापा, अहिवातका अभाव।
अनइस (हिं० ) अनेस देखो।
अनइसी, अनैसा देखो।
अनऋतु (हिं० स्त्री० ) १ दुष्ट ऋतु, बुरा मौसम। २ अकाल, ख़राब वक्तृ।
३ ऋतुविपर्यय, मौसमका उलट-फेर।
अनक (सं० ति० ) अधम, कमीना। २ कुत्सित, खराब। ३ असुख, परेशान। (हिं० पु० ) ४ आनक देखो।
अनकदुन्दुभ (सं० पु०) श्रीकृष्णके पितामह या दादेका नाम।
अनकदुन्दुभि, आनकदुन्दुभि (स० पु० ) श्रीकृष्णके पिता वसुदेवका नाम, जो उनके जन्म समय ढोल बजनेसे रखा गया था।
अनकन ( हिं० क्रि० ) १ सुनना, कान देना । २ मौन-
भावसे श्रवण करना, चुपके से कान लगाना। ३ गुप्त भावसे सुन लेना, छिपकर कान देना।
अनकरोब ( अ० क्रि०-वि०) १ करीब-करौब, पास-पास। २ लगभग, कोई। ३ प्रायः, अकसर।
अनकस्मात् (सं॰ अव्य०) १ विना कारण या प्रयो-जनके नहीं, बेसबब या वेमतलब नहीं। २ अकस्मात् नहीं, एकाएक नहीं।
अनकहा (हिं० वि० ) अनुक्त, जो कहा नहीं गया। (स्त्री०) अनकही।
अनक्ष (वै० वि० ) न अक्ष्णाति व्याप्नोति विषयं इन्ट्रि-येण ; अक्ष-क्विप्, नञ्-तत् । १ अन्ध, नाबोना, जिसके आंख नहीं। नास्ति अक्ष इन्द्रियं चक्रं वा यस्य, २ चक्षु प्रभृति इन्द्रियशून्य, जिसके आंख वगैरह इन्द्रियां न हो। ३ चक्रशून्य, जो चक्र से खालो रहे।
अनक्षर (स ० क्लौ ०) अप्रशस्तानि अक्षराणि अत्र १ कुत्सित वाक्य, निन्दा ; गाली, हिकारत। ( त्रि०) नास्ति अक्षरं वर्णज्ञानं यस्य । २ वर्णज्ञानहौन, मूर्ख ; नाखू.ांदा, बेवकूफ़ । ३ उच्चारणके अयोग्य, जो तलफ़्फुज़ करने के काबिल नहीं।
अनक्षस्तम्भम् (सं० अव्य०) जिसमें धुरोपर आपत्ति न आये, ताकि धुरीमें दखल न पहुंचे।
अनक्षि (सं० क्लो० ) अप्रशस्तं अति, नञ्-तत्। मन्द चक्षु, बुरौ आंख। (त्रि०) अप्रशस्तं कुत्सितं अक्षि यस्य, अच्-स०। अनक्ष, बुरी आंखवाला।
अनख (हिं० पु० ) १ क्रोध, गुस्सा २ दुःख, तक-लौफ। ३ ईर्ष्या, हसद। ४ अन्याय, जुल्म। ५ डिठोना, काजलको बिन्दी। यह लड़कोंके माथेपर नज़र न पड़नेको लगा देते हैं।
अनखना, अनखाना (हिं० क्रि०) क्रोध करना, गुस्सा दिखाना।
अनखी ( हिं० वि० ) क्रोधी, कोपान्वित; गुस्सावर, जल्द नाराज होनेवाला।
अनखौहा (हिं० वि०) १ क्रुद्ध, नाराज़। २ चिड़चिड़ा, जो ज़रासी बातपर बिगड़ खड़ा हो। ३ क्रोधजनक, जिससे गुस्मा पैदा हो जाये। ४ अनुचित, गैरवाजिब।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३८०'''|'''अन—अनखौहा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अन (सं० क्रि०) अदा० प०, अक० सेट्। वा दि० आ०, अक० सेट्। १ जीना, ज़िन्दा रहना। गदादिभ्यः सार्वधातुके। पा ७१२:७६ (पु०) अन्-अच् बाहु०। २ प्राण। श्राणोऽपानोव्यान उदानः समानोऽन इत्येतत् सर्व प्राण इति। ३ प्राणन, नफ़्स ; सांस।
अनंश (सं० त्रि०) नास्ति अंशो दायग्रहणाधिकारोऽस्य। १ विभागरहित, जिसमें टुकड़े नहीं। २ पेटक विषयका अंश न पा सकनेवाला, जिसे अपने बाप दादेकी जायदाद का हिस्सा न मिल सके। क्लोव, पतित, जन्मान्ध और कुष्ठादिरूप अचिकित्स्य रोगा-क्रान्त पैटक धनके अधिकारी नहीं होते। मनुने अनंशका यह नियम रखा है,
{{Block center|<poem><small>"अनंशी क्लीवपतितौ जात्यन्धवधिरौ तथा।
उन्मत्त जड़मूकश्च ये च केचिन्निरिन्द्रियाः॥” मनु हा२०१</small></poem>}}
'क्लीव, पतित, जन्मान्ध, जन्मवधिर, उन्मत्त, जड़, मूक, विकलेन्द्रिय तथा होनेन्द्रिय व्यक्ति पैटक धनकेअधिकारी नहीं होते।
नास्ति अंशोऽवयवो यस्य ।३ निराकार, जिसको कोई सूरत नहीं।
अनंशुमत्फला (सं० स्त्री०) न अंशुमत्फलं यस्याः। कदली, केला।
अनहिबात (हिं० पु०) वैधव्य, रंडापा, अहिवातका अभाव।
अनइस (हिं० ) अनेस देखो।
अनइसी, अनैसा देखो।
अनऋतु (हिं० स्त्री० ) १ दुष्ट ऋतु, बुरा मौसम। २ अकाल, ख़राब वक्तृ।
३ ऋतुविपर्यय, मौसमका उलट-फेर।
अनक (सं० ति० ) अधम, कमीना। २ कुत्सित, खराब। ३ असुख, परेशान। (हिं० पु० ) ४ आनक देखो।
अनकदुन्दुभ (सं० पु०) श्रीकृष्णके पितामह या दादेका नाम।
अनकदुन्दुभि, आनकदुन्दुभि (स० पु० ) श्रीकृष्णके पिता वसुदेवका नाम, जो उनके जन्म समय ढोल बजनेसे रखा गया था।
अनकन ( हिं० क्रि० ) १ सुनना, कान देना । २ मौन-<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>भावसे श्रवण करना, चुपके से कान लगाना। ३ गुप्त भावसे सुन लेना, छिपकर कान देना।
अनकरोब ( अ० क्रि०-वि०) १ करीब-करौब, पास-पास। २ लगभग, कोई। ३ प्रायः, अकसर।
अनकस्मात् (सं॰ अव्य०) १ विना कारण या प्रयो-जनके नहीं, बेसबब या वेमतलब नहीं। २ अकस्मात् नहीं, एकाएक नहीं।
अनकहा (हिं० वि० ) अनुक्त, जो कहा नहीं गया। (स्त्री०) अनकही।
अनक्ष (वै० वि० ) न अक्ष्णाति व्याप्नोति विषयं इन्ट्रि-येण ; अक्ष-क्विप्, नञ्-तत् । १ अन्ध, नाबोना, जिसके आंख नहीं। नास्ति अक्ष इन्द्रियं चक्रं वा यस्य, २ चक्षु प्रभृति इन्द्रियशून्य, जिसके आंख वगैरह इन्द्रियां न हो। ३ चक्रशून्य, जो चक्र से खालो रहे।
अनक्षर (स ० क्लौ ०) अप्रशस्तानि अक्षराणि अत्र १ कुत्सित वाक्य, निन्दा ; गाली, हिकारत। ( त्रि०) नास्ति अक्षरं वर्णज्ञानं यस्य । २ वर्णज्ञानहौन, मूर्ख ; नाखू.ांदा, बेवकूफ़ । ३ उच्चारणके अयोग्य, जो तलफ़्फुज़ करने के काबिल नहीं।
अनक्षस्तम्भम् (सं० अव्य०) जिसमें धुरोपर आपत्ति न आये, ताकि धुरीमें दखल न पहुंचे।
अनक्षि (सं० क्लो० ) अप्रशस्तं अति, नञ्-तत्। मन्द चक्षु, बुरौ आंख। (त्रि०) अप्रशस्तं कुत्सितं अक्षि यस्य, अच्-स०। अनक्ष, बुरी आंखवाला।
अनख (हिं० पु० ) १ क्रोध, गुस्सा २ दुःख, तक-लौफ। ३ ईर्ष्या, हसद। ४ अन्याय, जुल्म। ५ डिठोना, काजलको बिन्दी। यह लड़कोंके माथेपर नज़र न पड़नेको लगा देते हैं।
अनखना, अनखाना (हिं० क्रि०) क्रोध करना, गुस्सा दिखाना।
अनखी ( हिं० वि० ) क्रोधी, कोपान्वित; गुस्सावर, जल्द नाराज होनेवाला।
अनखौहा (हिं० वि०) १ क्रुद्ध, नाराज़। २ चिड़चिड़ा, जो ज़रासी बातपर बिगड़ खड़ा हो। ३ क्रोधजनक, जिससे गुस्मा पैदा हो जाये। ४ अनुचित, गैरवाजिब।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अनगढ़—अनङ्ग'''|'''३८१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनगढ़ (हिं० वि० ) १ न गढ़ा गया ।१२ किसीका
बनाया नहीं, स्वयम्भू । ३ भद्दा, वेडौल ।
अनाड़ी। ५ आदि-अन्त-रहित, जिसका
न हो ।
अगणित, बेशुमार ।
४ असंस्कृत,
ओर छोर
अनगन ( हिं० वि० )
अनगना (हिं० वि० ) १ खपरे सुधारना, छप्परके
ऊपर उलट-फेर दुरुस्त करना, टपकनेवाले खपरोंको
मरम्मत बनाना। (वि०) २ अगणित, बेशुमार ।
अनगार (स ं० त्रि० ) नास्ति आगारं यस्य, बहुव्री० ।
१ भवनरहित, बेघर। (पु० ) परिव्राजक, जो घर में न
रहकर घूमता फ़िरे ।
अनगारिका (सं० स्त्री० ) परिव्राजिका ।
अनगिन, अनगिनत ( हिं० वि० ) अगणित, बेशुमार ।
अनगिना (हिं० वि०) जो गिना न गया हो; अगणित,
असंख्य ; बेशुमार, बेहिसाब । (स्त्री० ) अनगिनी |
अनगेरी (हिं० वि०) १ अन्य दूसरा । २ अपरिचित,
जिससे जान-पहचान नहीं ।
।
अनग्न (सं० त्रि०) न नग्नम् | विवस्त्र नहीं, वस्त्र-
परिहित ; जो नगा नहीं, कपड़े पहने हुए ।
अनग्नता (सं० स्त्री० ) नग्न न रहनेको स्थिति, नङ्गा
न होनेकी हालत |
अनग्ना (स ं० स्त्रौ ० ) कार्पास, कपास । अपनी
बोंड़ो ढंको रहनेसे कपास अनग्ना कहाती है।
अनग्नि (सं० पु० ) नास्ति अग्निः श्रौत: स्मार्ती वा
ऽस्य । १ श्रौतस्मार्त-कर्म-हीन, अग्निशून्य, प्रव्रजित ;
अग्निको प्रतिष्ठा न करनेवाला व्यक्ति । नञ्-तत् ।
२ अग्नि-भिन्न,आगको छोड़ दूसरी चीज़ । ३ अग्निका
अभाव, आतिशको नामौजूदगी । ४ अग्नि या चूल्हे कौ
आवश्यकता न रखनेवाला पुरुष, जिस आदमीको
आगकी ज़रूरत न पड़े। ५ अधर्मी, बेईमान
शख्स
६क्कांरा, बेव्याहा आदमी । ७ अग्निमान्द्यका रोगी,
बदहज़मीका बीमार ।
अनग्नित्रा (सं० क्लो० ) न अग्निं त्रायते रक्षति ।
अग्निको रक्षा न करनेवाला व्यक्ति, पापी; जो
आदमी आतिशकी हिफाज़त न करे, गुनहगारं ।
अनग्निदग्ध (सं० ति० ) न अग्निना दग्धम् ।
३८१
१ श्मशानके अग्निसंस्कार से शून्य, जो चितापर न
जलाया गया हो । २ अग्निसे दग्ध नहीं, आगसे
न जला हुआ । (पु० ) ३ ब्राह्मणों के पिटविशेष ।
अनघ (सं० त्रि० नास्ति अवं यस्य । १ दुःखहीन,
वेतकलीफ़ । २ पापशून्य, बेगुनाह ।
३ निर्मल,
साफ । ४ पवित्र, पाक । ५ मनोज्ञ, दिलकी बात
जाननेवाला | ६ सुन्दर, ख ूबसूरत। ( पु० ) ७ गौर-
सर्षप, सफेद सरसों । ८ शिवको उपाधि विशेष ।
८ पापका अभाव, गुनाहका न होना ।
अनघरी ( (हिं० स्त्रो० )
अनवैरी (हिं० बि० )
हो, बेबुलाया ।
अनघोर ( हिं० वि० )
अनंत्र (सं० पु० )
अनङ्कुश (सं० त्रि ० )
२ उद्दण्ड, वेरोक |
कुसमय, बुरा वक्त |
१ जिसे न्यौता न दिया गया
अत्याचार, जुल्म, अन्धेर ।
गौरसर्षप, सफेद सरसों ।
१ अङ्कुशशून्य, बेलगाम ।
।
३ अङ्ग
वज्रपाणि इन्द्र भौ
उस समय ब्रह्मादि
'महादेव के औरससे
अनङ्ग (सं० क्लो० ) नास्ति अङ्ग आकारः अस्य ।
१ आकाश, आसमान । २ मन, तबीयत ।
भिन्न उपकरण, अज़ोको छोड़ दूसरी चीज़ । (पु० )
४ कन्दर्प, कामदेव, मदन । मदनके अङ्गहीन होनेका
कारण इसतरह लिखा गया है, कभी तारकासुर के
भयसे स्वर्ग मर्त्य कांप उठा था
उसके सामने जा न सके ।
देवगणने परामर्शकर देखा,
देवसेनानी कार्तिकेय हो जन्म लेकर तारकासुरको
शास्ति दे सकेंगे।' किन्तु उस समय महादेव दत्ता-
लयमें सतीको खो हिमालयपर कठोर तपस्यासे लग
गये थे । उनका योग विना टुटे कार्तिकेयका जन्म
कैसे होता ! इसलिये इन्द्रने कन्दर्पको बुला महा-
देवका योग तोड़नेको भेज दिया । मदनने हिमालय-
पर पहुंचकर देखा, कि त्रिलोचन महादेवने देवदारु-
वनमें व्याघ्रचर्म बिका निविड़ तपस्या आरम्भ को थौं ।
कन्दर्पने ज़मीनपर एक घुटना झुका और
फूलका
धनुष कानतक चढ़ा एक वाण छोड़ दिया। उस
पुष्पवाणके आघातसे शिवजीने घबराकर क्रोधसे आंख
खोल दी । कन्दर्प उसीसे भस्म हो गये । इसीसे<noinclude></noinclude>
azniv4uynodb7co32jvig8c46zyrmnp
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनगढ़—अनङ्ग'''|'''३८१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनगढ़ (हिं॰ वि॰) १ न गढ़ा गया। २ किसीका बनाया नहीं, स्वयम्भू। ३ भद्दा, वेडौल। ४ असंस्कृत, अनाड़ी। ५ आदि-अन्त-रहित, जिसका ओर छोर न हो।
अनगन (हिं॰ वि॰) अगणित, बेशुमार।
अनगना (हिं॰ वि॰) १ खपरे सुधारना, छप्परके ऊपर उलट-फेर दुरुस्त करना, टपकनेवाले खपरोंको मरम्मत बनाना। (वि॰) २ अगणित, बेशुमार।
अनगार (सं॰ त्रि॰) नास्ति आगारं यस्य, बहुव्री॰। १ भवनरहित, बेघर। (पु॰) परिव्राजक, जो घर में न रहकर घूमता फिरे।
अनगारिका (सं॰ स्त्री॰) परिव्राजिका।
अनगिन, अनगिनत (हिं॰ वि॰) अगणित, बेशुमार।
अनगिना (हिं॰ वि॰) जो गिना न गया हो; अगणित, असंख्य; बेशुमार, बेहिसाब। (स्त्री॰) अनगिनी।
अनगेरी (हिं॰ वि॰) १ अन्य दूसरा। २ अपरिचित, जिससे जान-पहचान नहीं।
अनग्न (सं॰ त्रि॰) न नग्नम्। विवस्त्र नहीं, वस्त्र-परिहित; जो नङ्गा नहीं, कपड़े पहने हुए।
अनग्नता (सं॰ स्त्री॰) नग्न न रहनेकी स्थिति, नङ्गा न होनेकी हालत।
अनग्ना (सं॰ स्त्री॰) कार्पास, कपास। अपनी बोंड़ी ढंकी रहनेसे कपास अनग्ना कहाती है।
अनग्नि (सं॰ पु॰) नास्ति अग्निः श्रौतः स्मार्ती वा ऽस्य। १ श्रौत-स्मार्त-कर्म-हीन, अग्निशून्य, प्रव्रजित; अग्निकी प्रतिष्ठा न करनेवाला व्यक्ति। नञ्-तत्। २ अग्नि-भिन्न,आगको छोड़ दूसरी चीज़। ३ अग्निका अभाव, आतिशकी नामौजूदगी। ४ अग्नि या चूल्हे की आवश्यकता न रखनेवाला पुरुष, जिस आदमीको आगकी ज़रूरत न पड़े। ५ अधर्मी, बेईमान शख्स ६ क्कांरा, बेव्याहा आदमी। ७ अग्निमान्द्यका रोगी, बदहज़मीका बीमार।
अनग्नित्रा (सं॰ क्ली॰) न अग्निं त्रायते रक्षति। अग्निकी रक्षा न करनेवाला व्यक्ति, पापी; जो आदमी आतिशकी हिफ़ाज़त न करे, गुनहगार।
अनग्निदग्ध (सं॰ त्रि॰) न अग्निना दग्धम्।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>१ श्मशानके अग्निसंस्कार से शून्य, जो चितापर न जलाया गया हो। २ अग्निसे दग्ध नहीं, आगसे न जला हुआ। (पु॰) ३ ब्राह्मणों के पितृविशेष।
अनघ (सं॰ त्रि॰) नास्ति अघं यस्य। १ दुःखहीन, बेतकलीफ़। २ पापशून्य, बेगुनाह। ३ निर्मल, साफ़। ४ पवित्र, पाक। ५ मनोज्ञ, दिलकी बात जाननेवाला। ६ सुन्दर, ख़ूबसूरत। (पु॰) ७ गौर-सर्षप, सफ़ेद सरसों। ८ शिवकी उपाधि विशेष। ९ पापका अभाव, गुनाहका न होना।
अनघरी (हिं॰ स्त्री॰) कुसमय, बुरा वक्त़।
अनघैरी (हिं॰ बि॰) १ जिसे न्यौता न दिया गया हो, बेबुलाया।
अनघोर (हिं॰ वि॰) अत्याचार, ज़ुल्म, अन्धेर।
अनंघ्र (सं॰ पु॰) गौरसर्षप, सफ़ेद सरसों।
अनङ्कुश (सं॰ त्रि॰) १ अङ्कुशशून्य, बेलगाम। २ उद्दण्ड, वेरोक।
अनङ्ग (सं॰ क्ली॰) नास्ति अङ्गं आकारः अस्य। १ आकाश, आसमान। २ मन, तबीयत। ३ अङ्ग भिन्न उपकरण, अज़ोको छोड़ दूसरी चीज़। (पु॰) ४ कन्दर्प, कामदेव, मदन। मदनके अङ्गहीन होनेका कारण इसतरह लिखा गया है,—कभी तारकासुरके भयसे स्वर्ग मर्त्य कांप उठा था। वज्रपाणि इन्द्र भी उसके सामने जा न सके। उस समय ब्रह्मादि देवगणने परामर्शकर देखा, 'महादेवके औरससे देवसेनानी कार्तिकेय ही जन्म लेकर तारकासुरको शास्ति दे सकेंगे।' किन्तु उस समय महादेव दक्षालयमें सतीको खो हिमालयपर कठोर तपस्यासे लग गये थे। उनका योग बिना टुटे कार्तिकेयका जन्म कैसे होता! इसलिये इन्द्रने कन्दर्पको बुला महादेवका योग तोड़नेको भेज दिया। मदनने हिमालयपर पहुंचकर देखा, कि त्रिलोचन महादेवने देवदारुवनमें व्याघ्रचर्म बिछा निविड़ तपस्या आरम्भ की थी। कन्दर्पने ज़मीनपर एक घुटना झुका और
फूलका धनुष कानतक चढ़ा एक वाण छोड़ दिया। उस पुष्पवाणके आघातसे शिवजीने घबराकर क्रोधसे आंख खोलीं दी। कन्दर्प उसीसे भस्म हो गये। इसीसे<noinclude>{{Left|९६|4em}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनगढ़—अनङ्ग'''|'''३८१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनगढ़ (हिं॰ वि॰) १ न गढ़ा गया। २ किसीका बनाया नहीं, स्वयम्भू। ३ भद्दा, वेडौल। ४ असंस्कृत, अनाड़ी। ५ आदि-अन्त-रहित, जिसका ओर छोर न हो।
अनगन (हिं॰ वि॰) अगणित, बेशुमार।
अनगना (हिं॰ वि॰) १ खपरे सुधारना, छप्परके ऊपर उलट-फेर दुरुस्त करना, टपकनेवाले खपरोंको मरम्मत बनाना। (वि॰) २ अगणित, बेशुमार।
अनगार (सं॰ त्रि॰) नास्ति आगारं यस्य, बहुव्री॰। १ भवनरहित, बेघर। (पु॰) परिव्राजक, जो घर में न रहकर घूमता फिरे।
अनगारिका (सं॰ स्त्री॰) परिव्राजिका।
अनगिन, अनगिनत (हिं॰ वि॰) अगणित, बेशुमार।
अनगिना (हिं॰ वि॰) जो गिना न गया हो; अगणित, असंख्य; बेशुमार, बेहिसाब। (स्त्री॰) अनगिनी।
अनगेरी (हिं॰ वि॰) १ अन्य दूसरा। २ अपरिचित, जिससे जान-पहचान नहीं।
अनग्न (सं॰ त्रि॰) न नग्नम्। विवस्त्र नहीं, वस्त्र-परिहित; जो नङ्गा नहीं, कपड़े पहने हुए।
अनग्नता (सं॰ स्त्री॰) नग्न न रहनेकी स्थिति, नङ्गा न होनेकी हालत।
अनग्ना (सं॰ स्त्री॰) कार्पास, कपास। अपनी बोंड़ी ढंकी रहनेसे कपास अनग्ना कहाती है।
अनग्नि (सं॰ पु॰) नास्ति अग्निः श्रौतः स्मार्ती वा ऽस्य। १ श्रौत-स्मार्त-कर्म-हीन, अग्निशून्य, प्रव्रजित; अग्निकी प्रतिष्ठा न करनेवाला व्यक्ति। नञ्-तत्। २ अग्नि-भिन्न,आगको छोड़ दूसरी चीज़। ३ अग्निका अभाव, आतिशकी नामौजूदगी। ४ अग्नि या चूल्हे की आवश्यकता न रखनेवाला पुरुष, जिस आदमीको आगकी ज़रूरत न पड़े। ५ अधर्मी, बेईमान शख्स ६ क्कांरा, बेव्याहा आदमी। ७ अग्निमान्द्यका रोगी, बदहज़मीका बीमार।
अनग्नित्रा (सं॰ क्ली॰) न अग्निं त्रायते रक्षति। अग्निकी रक्षा न करनेवाला व्यक्ति, पापी; जो आदमी आतिशकी हिफ़ाज़त न करे, गुनहगार।
अनग्निदग्ध (सं॰ त्रि॰) न अग्निना दग्धम्।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>१ श्मशानके अग्निसंस्कार से शून्य, जो चितापर न जलाया गया हो। २ अग्निसे दग्ध नहीं, आगसे न जला हुआ। (पु॰) ३ ब्राह्मणों के पितृविशेष।
अनघ (सं॰ त्रि॰) नास्ति अघं यस्य। १ दुःखहीन, बेतकलीफ़। २ पापशून्य, बेगुनाह। ३ निर्मल, साफ़। ४ पवित्र, पाक। ५ मनोज्ञ, दिलकी बात जाननेवाला। ६ सुन्दर, ख़ूबसूरत। (पु॰) ७ गौर-सर्षप, सफ़ेद सरसों। ८ शिवकी उपाधि विशेष। ९ पापका अभाव, गुनाहका न होना।
अनघरी (हिं॰ स्त्री॰) कुसमय, बुरा वक्त़।
अनघैरी (हिं॰ बि॰) १ जिसे न्यौता न दिया गया हो, बेबुलाया।
अनघोर (हिं॰ वि॰) अत्याचार, ज़ुल्म, अन्धेर।
अनंघ्र (सं॰ पु॰) गौरसर्षप, सफ़ेद सरसों।
अनङ्कुश (सं॰ त्रि॰) १ अङ्कुशशून्य, बेलगाम। २ उद्दण्ड, वेरोक।
अनङ्ग (सं॰ क्ली॰) नास्ति अङ्गं आकारः अस्य। १ आकाश, आसमान। २ मन, तबीयत। ३ अङ्ग भिन्न उपकरण, अज़ोको छोड़ दूसरी चीज़। (पु॰) ४ कन्दर्प, कामदेव, मदन। मदनके अङ्गहीन होनेका कारण इसतरह लिखा गया है,—कभी तारकासुरके भयसे स्वर्ग मर्त्य कांप उठा था। वज्रपाणि इन्द्र भी उसके सामने जा न सके। उस समय ब्रह्मादि देवगणने परामर्शकर देखा, 'महादेवके औरससे देवसेनानी कार्तिकेय ही जन्म लेकर तारकासुरको शास्ति दे सकेंगे।' किन्तु उस समय महादेव दक्षालयमें सतीको खो हिमालयपर कठोर तपस्यासे लग गये थे। उनका योग बिना टुटे कार्तिकेयका जन्म कैसे होता! इसलिये इन्द्रने कन्दर्पको बुला महादेवका योग तोड़नेको भेज दिया। मदनने हिमालयपर पहुंचकर देखा, कि त्रिलोचन महादेवने देवदारुवनमें व्याघ्रचर्म बिछा निविड़ तपस्या आरम्भ की थी। कन्दर्पने ज़मीनपर एक घुटना झुका और
फूलका धनुष कानतक चढ़ा एक वाण छोड़ दिया। उस पुष्पवाणके आघातसे शिवजीने घबराकर क्रोधसे आंख खोलीं दी। कन्दर्प उसीसे भस्म हो गये। इसीसे<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Left|९६|4em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३८९
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३८२'''|'''अनङ्गक—अनङ्गभीम'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मदनके नाम—अनङ्ग, अतनु, अदेह, अशरीर इत्यादि पड़ गये हैं।
काम प्राणियोंके मनकी एक वृत्ति है। यह किसीको देख नहीं पड़ती; फिर भी इसका फल सभी पाते हैं; इसलिये पहले कन्दर्पका नाम अनङ्ग रखा गया था। इसके बाद महादेवके कोपानलसे भस्म होनेपर मदनका नाम अनङ्ग पड़ा। इस घटनामें कवियोंका दूसरा भी चमत्कार कौशल विद्यमान है। पार्वतीसे शङ्कर मिलेंगे किन्तु वह मिलन दोनोके गाढ़ अनुरागसे पवित्र होगा शिवकी शक्ति पार्वती और पार्वतीकी परमगति शिव हैं,—दोनो दोनोका अर्धाङ्ग बने हैं। उस मिलनमें कन्दर्पका कोई प्रभाव नहीं, मदनकी पीड़ासे वह परस्पर अनुरागी नहीं हुए थे; इसीसे कविने कौशल दिखा पहले ही मदनको जला डाला। जब दोनोके मनसे कन्दर्पका भाव निकल गया, तब पवित्र प्रेमभरसे दोनो एक दूसरेपर रीझ गये। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। ५ अङ्गशून्य, अज़ोसे ख़ाली।
अनङ्गक (सं॰ क्ली॰) मस्तिष्क, दिमाग़; मन, दिल।
अनङ्गकीड़ा (सं॰ स्त्री॰) अनङ्गेन क्रीड़ा। १ कामहेतुक क्रीड़ा, ऐशो-अशरतका खेल। २ सोलह अक्षरका छन्दोविशेष। <small>"अष्टावर्द्धे गा द्व्रभ्यस्ता यस्याः सानङ्गक्रीड़ोक्ता।" (वृत्तरत्नाकर)</small> जिस छन्दके अर्द्धमें द्विगुणित आठ यानी सोलह गुरु अक्षर रहते, उसे अनङ्गक्रीड़ा वृत्त कहते हैं। छन्दोमञ्जरी प्रभृति छन्दोग्रन्थ में इसका नाम विद्युन्माला लिखा है। <small>विद्युन्माला देखो।</small>
अनङ्गना (हिं॰ क्रि॰) देहका ध्यान भुला देना, बदनकी फ़िक्र न रखना, प्रेममें मतवाला बन जाना।
अनङ्गभीम (सं॰ पु॰) १ उड़ीसाके एक राजा। सन ११८२ ई॰ में इन्होंने राज्य लाभ किया था।
इनका दूसरा नाम 'अनियङ्गभीमदेव' रहा। यह उत्कल देशको जीतनेवाले गङ्गेश्वर चोड़गङ्गके कनिष्ठ पुत्र थे; इनकी माताका नाम चन्द्रलेखा था।
इतिहास में इनका परिचय 'प्रथम अनङ्गभीम' नामसे दिया गया है।
पुरीके पण्डों और मादलापच्जियोंके मतसे इन्होंने
ही जगन्नाथजीका मन्दिर बनवाया था। किन्तु यथार्थमें यह बात नहीं; क्योंकि 'केन्दु-पटना' से निकले हुए, अनङ्गभीमके वंशधर दूसरे नरसिंहदेवके ताम्रशासनमें लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"निर्म्मथ्योत्कलराजसिन्धुमपरं गङ्गेश्वरः प्राप्तवा
नेकः कीर्त्तिसुधाकरं पृथुतमं लक्ष्मीं धरण्या समा-
माद्यद्दन्तिसहस्रमश्वनियुतं रत्नान्यसंख्यानि वा
तत्सिन्धोः कि मियं प्रकर्ष मथवा ब्रूमस्तदुन्माथिनः।
पादौ यस्य धरान्तरीक्षमखिलं नाभिश्च सर्व्वा दिशः
श्रोत्रे नेत्रयुगं रवीन्दुयुगलं मूर्द्धापि च द्यौरसौ॥
प्रासादं पुरुषोत्तमस्य नृपतिः को नाम कर्त्तु क्षम-
स्तस्येत्याद्यनृपैरुपेचितमयं चक्रेथ गङ्गेश्वरः॥"</small></poem>}}
{{Right|<small>(२य नृसिंहदेवका ताम्रशासन २६-२७ श्लोक।)</small>}}
उपरोक्त श्लोक देखनेसे जाना जाता है, कि 'चोड़-गङ्ग'ने उत्कलदेशको जीतकर अपनी कीर्तिका स्तम्भरूप जगन्नाथजीवाला मूल-मन्दिर बनवाया था।
नाना स्थानकी शिलालिपि और ताम्रशासनते पता लगता है, कि भुवनेश्वरका वर्तमान अपूर्व मन्दिर और जगन्नाथजीका सुन्दर 'नाटमन्दिर' दोनो अनङ्गभीमदेवकी कीर्ति हैं। दूसरे नृसिंहदेवके ताम्रशासनके अनुसार 'अनङ्गभीम' ने केवल दश वर्ष राज्य किया था।
२ उक्त अनङ्गभीम राजाके पौत्र और दूसरे राज-राजाके पुत्र। यह भी एक महावीर दिग्विजयी राजा थे। इन्होंके आदेशानुसार इनके मन्त्री विष्णुसान्त्रा तथा प्रियपुत्र नरसिंहने तुग़रल तुग़ानखांको जीतनेके लिए राढ़ और वरेन्द्र पर्यन्त सेनाको भेजा था। उक्त विवरण दूसरे अनङ्गभीमकी चाटेश्वरशिलालिपिमें और केन्दु-पटनाके ताम्रशासनमें लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"विन्ध्याद्रेरधिसीमभीमतटिनीकुञ्जे तटऽम्भोनिधे-
र्विष्णुर्विष्णुरसावसाविति भयाच्चैतन्दिशः पश्यतः।
साम्राज्यं सपरिश्रमेण न तथा वैखानसानामिदं
विश्वं विष्णुमयं यथा परिणतं तुङ्घाण-पृथ्वीपतेः॥
कण्ठोत्तंसित सायकस्य सुभटानेकाकिनो निघ्नतः
किं ब्रूमो यवनावनीन्दुसमरे तत्तस्य वीरव्रतम्॥"</small></poem>}}
{{Right|<small>(२ य अनङ्गभीमकी चाटेश्वर-लिपि १३—१४ श्लोक।)</small>}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३८२'''|'''अनङ्गक—अनङ्गभीम'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मदनके नाम—अनङ्ग, अतनु, अदेह, अशरीर इत्यादि पड़ गये हैं।
काम प्राणियोंके मनकी एक वृत्ति है। यह किसीको देख नहीं पड़ती; फिर भी इसका फल सभी पाते हैं; इसलिये पहले कन्दर्पका नाम अनङ्ग रखा गया था। इसके बाद महादेवके कोपानलसे भस्म होनेपर मदनका नाम अनङ्ग पड़ा। इस घटनामें कवियोंका दूसरा भी चमत्कार कौशल विद्यमान है। पार्वतीसे शङ्कर मिलेंगे किन्तु वह मिलन दोनोके गाढ़ अनुरागसे पवित्र होगा शिवकी शक्ति पार्वती और पार्वतीकी परमगति शिव हैं,—दोनो दोनोका अर्धाङ्ग बने हैं। उस मिलनमें कन्दर्पका कोई प्रभाव नहीं, मदनकी पीड़ासे वह परस्पर अनुरागी नहीं हुए थे; इसीसे कविने कौशल दिखा पहले ही मदनको जला डाला। जब दोनोके मनसे कन्दर्पका भाव निकल गया, तब पवित्र प्रेमभरसे दोनो एक दूसरेपर रीझ गये। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। ५ अङ्गशून्य, अज़ोसे ख़ाली।
अनङ्गक (सं॰ क्ली॰) मस्तिष्क, दिमाग़; मन, दिल।
अनङ्गकीड़ा (सं॰ स्त्री॰) अनङ्गेन क्रीड़ा। १ कामहेतुक क्रीड़ा, ऐशो-अशरतका खेल। २ सोलह अक्षरका छन्दोविशेष। <small>"अष्टावर्द्धे गा द्व्रभ्यस्ता यस्याः सानङ्गक्रीड़ोक्ता।" (वृत्तरत्नाकर)</small> जिस छन्दके अर्द्धमें द्विगुणित आठ यानी सोलह गुरु अक्षर रहते, उसे अनङ्गक्रीड़ा वृत्त कहते हैं। छन्दोमञ्जरी प्रभृति छन्दोग्रन्थ में इसका नाम विद्युन्माला लिखा है। <small>विद्युन्माला देखो।</small>
अनङ्गना (हिं॰ क्रि॰) देहका ध्यान भुला देना, बदनकी फ़िक्र न रखना, प्रेममें मतवाला बन जाना।
अनङ्गभीम (सं॰ पु॰) १ उड़ीसाके एक राजा। सन ११८२ ई॰ में इन्होंने राज्य लाभ किया था।
इनका दूसरा नाम 'अनियङ्गभीमदेव' रहा। यह उत्कल देशको जीतनेवाले गङ्गेश्वर चोड़गङ्गके कनिष्ठ पुत्र थे; इनकी माताका नाम चन्द्रलेखा था।
इतिहास में इनका परिचय 'प्रथम अनङ्गभीम' नामसे दिया गया है।
पुरीके पण्डों और मादलापच्जियोंके मतसे इन्होंने<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>ही जगन्नाथजीका मन्दिर बनवाया था। किन्तु यथार्थमें यह बात नहीं; क्योंकि 'केन्दु-पटना' से निकले हुए, अनङ्गभीमके वंशधर दूसरे नरसिंहदेवके ताम्रशासनमें लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"निर्म्मथ्योत्कलराजसिन्धुमपरं गङ्गेश्वरः प्राप्तवा
नेकः कीर्त्तिसुधाकरं पृथुतमं लक्ष्मीं धरण्या समा-
माद्यद्दन्तिसहस्रमश्वनियुतं रत्नान्यसंख्यानि वा
तत्सिन्धोः कि मियं प्रकर्ष मथवा ब्रूमस्तदुन्माथिनः।
पादौ यस्य धरान्तरीक्षमखिलं नाभिश्च सर्व्वा दिशः
श्रोत्रे नेत्रयुगं रवीन्दुयुगलं मूर्द्धापि च द्यौरसौ॥
प्रासादं पुरुषोत्तमस्य नृपतिः को नाम कर्त्तु क्षम-
स्तस्येत्याद्यनृपैरुपेचितमयं चक्रेथ गङ्गेश्वरः॥"</small></poem>}}
{{Right|<small>(२य नृसिंहदेवका ताम्रशासन २६-२७ श्लोक।)</small>}}
उपरोक्त श्लोक देखनेसे जाना जाता है, कि 'चोड़-गङ्ग'ने उत्कलदेशको जीतकर अपनी कीर्तिका स्तम्भरूप जगन्नाथजीवाला मूल-मन्दिर बनवाया था।
नाना स्थानकी शिलालिपि और ताम्रशासनते पता लगता है, कि भुवनेश्वरका वर्तमान अपूर्व मन्दिर और जगन्नाथजीका सुन्दर 'नाटमन्दिर' दोनो अनङ्गभीमदेवकी कीर्ति हैं। दूसरे नृसिंहदेवके ताम्रशासनके अनुसार 'अनङ्गभीम' ने केवल दश वर्ष राज्य किया था।
२ उक्त अनङ्गभीम राजाके पौत्र और दूसरे राज-राजाके पुत्र। यह भी एक महावीर दिग्विजयी राजा थे। इन्होंके आदेशानुसार इनके मन्त्री विष्णुसान्त्रा तथा प्रियपुत्र नरसिंहने तुग़रल तुग़ानखांको जीतनेके लिए राढ़ और वरेन्द्र पर्यन्त सेनाको भेजा था। उक्त विवरण दूसरे अनङ्गभीमकी चाटेश्वरशिलालिपिमें और केन्दु-पटनाके ताम्रशासनमें लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"विन्ध्याद्रेरधिसीमभीमतटिनीकुञ्जे तटऽम्भोनिधे-
र्विष्णुर्विष्णुरसावसाविति भयाच्चैतन्दिशः पश्यतः।
साम्राज्यं सपरिश्रमेण न तथा वैखानसानामिदं
विश्वं विष्णुमयं यथा परिणतं तुङ्घाण-पृथ्वीपतेः॥
कण्ठोत्तंसित सायकस्य सुभटानेकाकिनो निघ्नतः
किं ब्रूमो यवनावनीन्दुसमरे तत्तस्य वीरव्रतम्॥"</small></poem>}}
{{Right|<small>(२ य अनङ्गभीमकी चाटेश्वर-लिपि १३—१४ श्लोक।)</small>}}<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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काम प्राणियोंके मनकी एक वृत्ति है। यह किसीको देख नहीं पड़ती; फिर भी इसका फल सभी पाते हैं; इसलिये पहले कन्दर्पका नाम अनङ्ग रखा गया था। इसके बाद महादेवके कोपानलसे भस्म होनेपर मदनका नाम अनङ्ग पड़ा। इस घटनामें कवियोंका दूसरा भी चमत्कार कौशल विद्यमान है। पार्वतीसे शङ्कर मिलेंगे किन्तु वह मिलन दोनोके गाढ़ अनुरागसे पवित्र होगा शिवकी शक्ति पार्वती और पार्वतीकी परमगति शिव हैं,—दोनो दोनोका अर्धाङ्ग बने हैं। उस मिलनमें कन्दर्पका कोई प्रभाव नहीं, मदनकी पीड़ासे वह परस्पर अनुरागी नहीं हुए थे; इसीसे कविने कौशल दिखा पहले ही मदनको जला डाला। जब दोनोके मनसे कन्दर्पका भाव निकल गया, तब पवित्र प्रेमभरसे दोनो एक दूसरेपर रीझ गये। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। ५ अङ्गशून्य, अज़ोसे ख़ाली।
अनङ्गक (सं॰ क्ली॰) मस्तिष्क, दिमाग़; मन, दिल।
अनङ्गकीड़ा (सं॰ स्त्री॰) अनङ्गेन क्रीड़ा। १ कामहेतुक क्रीड़ा, ऐशो-अशरतका खेल। २ सोलह अक्षरका छन्दोविशेष। <small>"अष्टावर्द्धे गा द्व्रभ्यस्ता यस्याः सानङ्गक्रीड़ोक्ता।" (वृत्तरत्नाकर)</small> जिस छन्दके अर्द्धमें द्विगुणित आठ यानी सोलह गुरु अक्षर रहते, उसे अनङ्गक्रीड़ा वृत्त कहते हैं। छन्दोमञ्जरी प्रभृति छन्दोग्रन्थ में इसका नाम विद्युन्माला लिखा है। <small>विद्युन्माला देखो।</small>
अनङ्गना (हिं॰ क्रि॰) देहका ध्यान भुला देना, बदनकी फ़िक्र न रखना, प्रेममें मतवाला बन जाना।
अनङ्गभीम (सं॰ पु॰) १ उड़ीसाके एक राजा। सन ११८२ ई॰ में इन्होंने राज्य लाभ किया था।
इनका दूसरा नाम 'अनियङ्गभीमदेव' रहा। यह उत्कल देशको जीतनेवाले गङ्गेश्वर चोड़गङ्गके कनिष्ठ पुत्र थे; इनकी माताका नाम चन्द्रलेखा था।
इतिहास में इनका परिचय 'प्रथम अनङ्गभीम' नामसे दिया गया है।
पुरीके पण्डों और मादलापच्जियोंके मतसे इन्होंने<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>ही जगन्नाथजीका मन्दिर बनवाया था। किन्तु यथार्थमें यह बात नहीं; क्योंकि 'केन्दु-पटना' से निकले हुए, अनङ्गभीमके वंशधर दूसरे नरसिंहदेवके ताम्रशासनमें लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"निर्म्मथ्योत्कलराजसिन्धुमपरं गङ्गेश्वरः प्राप्तवा
नेकः कीर्त्तिसुधाकरं पृथुतमं लक्ष्मीं धरण्या समा-
माद्यद्दन्तिसहस्रमश्वनियुतं रत्नान्यसंख्यानि वा
तत्सिन्धोः कि मियं प्रकर्ष मथवा ब्रूमस्तदुन्माथिनः।
पादौ यस्य धरान्तरीक्षमखिलं नाभिश्च सर्व्वा दिशः
श्रोत्रे नेत्रयुगं रवीन्दुयुगलं मूर्द्धापि च द्यौरसौ॥
प्रासादं पुरुषोत्तमस्य नृपतिः को नाम कर्त्तु क्षम-
स्तस्येत्याद्यनृपैरुपेचितमयं चक्रेथ गङ्गेश्वरः॥"</small></poem>}}
{{Right|<small>(२य नृसिंहदेवका ताम्रशासन २६-२७ श्लोक।)</small>}}
उपरोक्त श्लोक देखनेसे जाना जाता है, कि 'चोड़-गङ्ग'ने उत्कलदेशको जीतकर अपनी कीर्तिका स्तम्भरूप जगन्नाथजीवाला मूल-मन्दिर बनवाया था।
नाना स्थानकी शिलालिपि और ताम्रशासनते पता लगता है, कि भुवनेश्वरका वर्तमान अपूर्व मन्दिर और जगन्नाथजीका सुन्दर 'नाटमन्दिर' दोनो अनङ्गभीमदेवकी कीर्ति हैं। दूसरे नृसिंहदेवके ताम्रशासनके अनुसार 'अनङ्गभीम' ने केवल दश वर्ष राज्य किया था।
२ उक्त अनङ्गभीम राजाके पौत्र और दूसरे राज-राजाके पुत्र। यह भी एक महावीर दिग्विजयी राजा थे। इन्होंके आदेशानुसार इनके मन्त्री विष्णुसान्त्रा तथा प्रियपुत्र नरसिंहने तुग़रल तुग़ानखांको जीतनेके लिए राढ़ और वरेन्द्र पर्यन्त सेनाको भेजा था। उक्त विवरण दूसरे अनङ्गभीमकी चाटेश्वरशिलालिपिमें और केन्दु-पटनाके ताम्रशासनमें लिखा है,—
{{Block center|<poem><small>"विन्ध्याद्रेरधिसीमभीमतटिनीकुञ्जे तटऽम्भोनिधे-
र्विष्णुर्विष्णुरसावसाविति भयाच्चैतन्दिशः पश्यतः।
साम्राज्यं सपरिश्रमेण न तथा वैखानसानामिदं
विश्वं विष्णुमयं यथा परिणतं तुङ्घाण-पृथ्वीपतेः॥
कण्ठोत्तंसित सायकस्य सुभटानेकाकिनो निघ्नतः
किं ब्रूमो यवनावनीन्दुसमरे तत्तस्य वीरव्रतम्॥"</small></poem>}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३९०
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अनङ्गमेजय—अनजान'''|'''३८३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>“राढ़ावरेन्द्रय वनीनयनाञ्जनापूरेण दूरविनिवेशित कालिमश्री ।
तद्दिप्रलम्भकरणाइ तनिस्तरङ्गा गङ्गापि नूनममुना यमुनाधुनाभूत् ॥ *
( २य नृसिहदेवको ताम्रपट्टलिपि ८४ श्लोक । )
( मादला-पञ्जीके मतसे) मन्त्री और पुत्रके
बाहुवलसे इनका अधिकार बहुत दूरतक फेल पड़ा ।
उत्तर में भागीरथोकूल, दक्षिण में गोदावरी, पश्चिममें
सोनपुरके जङ्गल और पूर्वमें समुद्र तट - इस बहु
विस्तीर्ण राज्य में यह स्वच्छन्द अकेले आधिपत्य करते
थे । राज्यसे जो श्रय आती, उसका टतोयांश यह अपने
व्ययके लिये रखते और बचे हुए राजखसे पुरोहितों
और सैनिकोंका व्यय निकालते थे। कहते हैं, कि
राज्यको उन्नतिके लिये अनङ्गभीमने कितने ही सत्-
कार्य किये थे । इन्होंने साठ देवमन्दिर और दश
बड़ी नदियोंपर सेतु निर्माण कराये, चालीस कूप
खुदाये, नदी किनारे एकसोबावन घाट बंधाये, साढ़े
चार सौ ग्राम बसा और उनमें ब्राह्मणोत्तर -भूमि
प्रदानकर कितने ही ब्राह्मणोंको बसाया और कृषिमें
जल देनेकी सुविधा के लिये दश लाख पुष्करिणो
खुदवाई थीं। प्रवाद है— अनङ्गभीमने, ऐसे धार्मिक
'नृपति होते भी एक ब्राह्मणको मरवा डाला था । इस
महापातकवाले प्रायश्चित्त के लिये यह कठोर तपस्या
करने लगे । अन्तमें पुरौ पहुंच इन्होंने जगन्नाथ देवका
नाटमन्दिर बनानेकी आज्ञा दी । इन्होंने चौंतीस वर्ष
राजत्व रखा था ।
अनङ्गमेजय (स ं० त्रि ० ) शरीर न कंपाता हुआ,
जो जिस्म न हिला रहा हो ।
अनङ्गलेख (सं० पु० ) लिख्यते यस्मिन् स लेख:
पत्रिका |
कामव्यज्ञ्जकपत्र, चिट्ठौ जिससे प्यारको
बातें ज़ाहिर हों। (स्त्री० ) अनङ्गलेखा |
अनङ्गवती (सं० स्त्री० ) कामिनी, सुन्दरी स्त्री ।
'अनङ्गशेखर (स ं० पु० ) अनङ्गे कामविषये शेखरः
शिरोमाल्यमिव तद्दर्द्ध कत्वात् । छन्दोविशेष, एक
तरहकौ बहर । छन्दोमज्जरोमें इसका लक्षण यां
लिखा है,—'लघुगुरुनिजेच्छया यदा निवेश्यते तदेषदण्डको भवत्यनङ्ग-
"शेखरः ।"
'अपनी इच्छासे क्रमपूर्वक लघु और गुरु वर्ण अर्थात्
३८३
पहले एक लघु और उसके बाद एक गुरु वर्ण लगाने-
से दण्डकका अनङ्गशेखर बनता है।' इसके प्रति
चरणमें अट्ठाईस अक्षर होते हैं ।
अनङ्गसुन्दररस (सं० पु० ) वाजीकरणके अधिकार-
का रस, जो रस बृडको तरुण बनानेके लिये खिलाया
जाये ।
पल ं रक्तकुमुदरस
े: दिनवयं भावयेत्
अवतार्थ रक्तवक पुष्पश्वेतपद्मरसेन
" सूतस्य पलं गन्धकस्य
ततो वालुकायन्त्र प्रहरमावं पचेत् ।
दिनैकं भावयेत् ।” ( रसेन्द्र सारसं ० )
एक पल पारे और एक पल गन्धकको लाल
बघोलेके रस में तीन दिन घोंटे। इसके बाद बालुका
यन्त्र में इसे डाल तीन घण्टे तक पकाना चाहिये ।
उतारकर फिर तीन दिन लाल बघोले और सफेद
कमलके रस में घोंटनेसे अनङ्गसुन्दर रस तैयार
होता है ।
अनङ्गापोड़ (स० पु० ) कश्मीर के एक राजाका नाम ।
कश्मीर देखो ।
अनङ्गारि (सं० पु० ) कामदेवके शत्रु, महादेव ।
अनङ्गा-समङ्गा (सं० स्त्री०) नदीविशेष | ( महाभा० भौमप० )
अनङ्गासुहृत् (सं० पु० ) अनङ्गस्य असुहृत्, ६-तत्।
महादेव, मदनके दुश्मन ।
अनङ्गुरि (सं० त्रि० ) अङ्गुरिरहित, जिसके उंगलियां
न हों ।
अनचहा (हिं० वि० ) अनिच्छित, जिसकी चाह न
हुई हो।
अनचाहत (हिं० वि० ) प्रेम न करनेवाला, जिसे
चाह न हो।
;
अनचीन्हा ( हिं० वि० ) अपरिचित, अजनबी : जिससे
जान-पहचान न हो ।
अनचैन ( हिं॰ स्त्री॰ ) असुख, घबराहट; चैन न
मिलनेको हालत |
अनच्छ (सं० ति० )
न अच्छं निर्मलम्, ६-तत् ।
कलुष, अनिर्मल ; गन्दा, मैला; जो साफ़ नहीं ।
अनजान (हिं० वि०) १ अनभिज्ञ, नादान । २ अपरि-
चित, अजनबी । ( पु० ) ३ एक तरहको घास जिसे
प्रायः भैंसें खातीं और जिसे चरनेसे उनके दूधमें<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
2133
/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनङ्गमेजय—अनजान'''|'''३८३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{block center|<poem><small>"राढ़ावरेन्द्रय वनीनयनाञ्जनाश्रुपूरेण दूरविनिवेशित कालिमश्री।
तद्विप्रलम्भकरणाड्भु तनिस्तरङ्गा गङ्गापि नूनममुना यमुनाधुनाभूत्॥"</small></poem>}}
{{Right|<small>(२ य नृसिंहदेवकौ ताम्रपट्टलिपि ८४ श्लोक।)</small>}}
(मादला-पञ्जीके मतसे) मन्त्री और पुत्रके बाहुवलसे इनका अधिकार बहुत दूरतक फेल पड़ा। उत्तर में भागीरथीकूल, दक्षिणमें गोदावरी, पश्चिममें सोनपुरके जङ्गल और पूर्वमें समुद्र-तट—इस बहु विस्तीर्ण राज्यमें यह स्वच्छन्द अकेले आधिपत्य करते थे। राज्यसे जो आय आती, उसका तृतीयांश यह अपने व्ययके लिये रखते और बचे हुए राजस्वसे पुरोहितों और सैनिकोंका व्यय निकालते थे। कहते हैं, कि राज्यकी उन्नतिके लिये अनङ्गभीमने कितने ही सत्कार्य किये थे। इन्होंने साठ देवमन्दिर और दश बड़ी नदियोंपर सेतु निर्माण कराये, चालीस कूप खुदाये, नदी-किनारे एकसौबावन घाट बंधाये, साढ़े चार-सौ ग्राम बसा और उनमें ब्राह्मणोत्तर-भूमि
प्रदानकर कितने ही ब्राह्मणोंको बसाया और कृषिमें जल देनेकी सुविधाके लिये दश लाख पुष्करिणी खुदवाई थीं। प्रवाद है—अनङ्गभीमने, ऐसे धार्मिक नृपति होते भी एक ब्राह्मणको मरवा डाला था। इस महापातकवाले प्रायश्चित्तके लिये यह कठोर तपस्या करने लगे। अन्तमें पुरौ पहुंच इन्होंने जगन्नाथ-देवका नाटमन्दिर बनानेकी आज्ञा दी। इन्होंने चौंतीस वर्ष राजत्व रखा था।
अनङ्गमेजय (सं॰ त्रि॰) शरीर न कंपाता हुआ, जो जिस्म न हिला रहा हो।
अनङ्गलेख (सं॰ पु॰) लिख्यते यस्मिन् स लेखः पत्रिका। कामव्यञ्जकपत्र, चिट्ठी जिससे प्यारकी बातें ज़ाहिर हों। (स्त्री॰) अनङ्गलेखा।
अनङ्गवती (सं॰ स्त्री॰) कामिनी, सुन्दरी स्त्री।
अनङ्गशेखर (सं॰ पु॰) अनङ्गे कामविषये शेखरः शिरोमाल्यमिव तद्वर्ड्व कत्वात्। छन्दोविशेष, एक तरहकौ बहर। छन्दोमञ्जरीमें इसका लक्षण यां लिखा है,— <small>"लघुगुरुनिजेच्छया यदा निवेश्यते तदेषदण्डकोभवत्यनङ्ग-शेखरः।"</small>
'अपनी इच्छासे क्रमपूर्वक लघु और गुरु वर्ण अर्थात्
पहले एक लघु और उसके बाद एक गुरु वर्ण लगानेसे दण्डकका अनङ्गशेखर बनता है।' इसके प्रति चरणमें अट्ठाईस अक्षर होते हैं।
अनङ्गसुन्दररस (सं॰ पु॰) वाजीकरणके अधिकारका रस, जो रस बृद्धको तरुण बनानेके लिये खिलाया जाये।
<small>"सूतस्य पलं गन्धकस्य च पलं रक्तकुमुदरसैः दिनत्रयं भावयेत् ततो वालुकायन्त्रे प्रहरमात्रं पचेत्। अवतार्य रक्तवक पुष्पश्वेतपद्मरसेन दिनैकं भावयेत्।" (रसेन्द्रसारसं॰)</small>
एक पल पारे और एक पल गन्धकको लाल बघोलेके रस में तीन दिन घोंटे। इसके बाद बालुका यन्त्रमें इसे डाल तीन घण्टे तक पकाना चाहिये। उतारकर फिर तीन दिन लाल बघोले और सफ़ेद कमलके रसमें घोंटनेसे अनङ्गसुन्दर-रस तैयार होता है।
अनङ्गापीड़ (सं॰ पु॰) कश्मीरके एक राजाका नाम।
{{Right|<small>कश्मीर देखो।</small>}}
अनङ्गारि (सं॰ पु॰) कामदेवके शत्रु, महादेव।
अनङ्गा-समङ्गा (सं॰ स्त्री॰) नदीविशेष। <small>(महाभा॰ भौष्मप॰)</small>
अनङ्गासुहृत् (सं॰ पु॰) अनङ्गस्य असुहृत्, ६-तत्। महादेव, मदनके दुश्मन।
अनङ्गुरि (सं॰ त्रि॰) अङ्गुरिरहित, जिसके उंगलियां न हों।
अनचहा (हिं॰ वि॰) अनिच्छित, जिसकी चाह न हुई हो।
अनचाहत (हिं॰ वि॰) प्रेम न करनेवाला, जिसे चाह न हो।
अनचीन्हा (हिं॰ वि॰) अपरिचित, अजनबी; जिससे जान-पहचान न हो।
अनचैन (हिं॰ स्त्री॰) असुख, घबराहट; चैन न मिलनेकी हालत।
अनच्छ (सं॰ त्रि॰) न अच्छं निर्मलम्, ६-तत्। कलुष, अनिर्मल; गन्दा, मैला; जो साफ़ नहीं।
अनजान (हिं॰ वि॰) १ अनभिज्ञ, नादान। २ अपरिचित, अजनबी। (पु॰) ३ एक तरहकी घास जिसे प्रायः भैंसें खातीं और जिसे चरनेसे उनके दूधमें
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनङ्गमेजय—अनजान'''|'''३८३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{block center|<poem><small>"राढ़ावरेन्द्रय वनीनयनाञ्जनाश्रुपूरेण दूरविनिवेशित कालिमश्री।
तद्विप्रलम्भकरणाड्भु तनिस्तरङ्गा गङ्गापि नूनममुना यमुनाधुनाभूत्॥"</small></poem>}}
{{Right|<small>(२ य नृसिंहदेवकौ ताम्रपट्टलिपि ८४ श्लोक।)</small>}}
(मादला-पञ्जीके मतसे) मन्त्री और पुत्रके बाहुवलसे इनका अधिकार बहुत दूरतक फेल पड़ा। उत्तर में भागीरथीकूल, दक्षिणमें गोदावरी, पश्चिममें सोनपुरके जङ्गल और पूर्वमें समुद्र-तट—इस बहु विस्तीर्ण राज्यमें यह स्वच्छन्द अकेले आधिपत्य करते थे। राज्यसे जो आय आती, उसका तृतीयांश यह अपने व्ययके लिये रखते और बचे हुए राजस्वसे पुरोहितों और सैनिकोंका व्यय निकालते थे। कहते हैं, कि राज्यकी उन्नतिके लिये अनङ्गभीमने कितने ही सत्कार्य किये थे। इन्होंने साठ देवमन्दिर और दश बड़ी नदियोंपर सेतु निर्माण कराये, चालीस कूप खुदाये, नदी-किनारे एकसौबावन घाट बंधाये, साढ़े चार-सौ ग्राम बसा और उनमें ब्राह्मणोत्तर-भूमि
प्रदानकर कितने ही ब्राह्मणोंको बसाया और कृषिमें जल देनेकी सुविधाके लिये दश लाख पुष्करिणी खुदवाई थीं। प्रवाद है—अनङ्गभीमने, ऐसे धार्मिक नृपति होते भी एक ब्राह्मणको मरवा डाला था। इस महापातकवाले प्रायश्चित्तके लिये यह कठोर तपस्या करने लगे। अन्तमें पुरौ पहुंच इन्होंने जगन्नाथ-देवका नाटमन्दिर बनानेकी आज्ञा दी। इन्होंने चौंतीस वर्ष राजत्व रखा था।
अनङ्गमेजय (सं॰ त्रि॰) शरीर न कंपाता हुआ, जो जिस्म न हिला रहा हो।
अनङ्गलेख (सं॰ पु॰) लिख्यते यस्मिन् स लेखः पत्रिका। कामव्यञ्जकपत्र, चिट्ठी जिससे प्यारकी बातें ज़ाहिर हों। (स्त्री॰) अनङ्गलेखा।
अनङ्गवती (सं॰ स्त्री॰) कामिनी, सुन्दरी स्त्री।
अनङ्गशेखर (सं॰ पु॰) अनङ्गे कामविषये शेखरः शिरोमाल्यमिव तद्वर्ड्व कत्वात्। छन्दोविशेष, एक तरहकौ बहर। छन्दोमञ्जरीमें इसका लक्षण यां लिखा है,— <small>"लघुगुरुनिजेच्छया यदा निवेश्यते तदेषदण्डकोभवत्यनङ्ग-शेखरः।"</small>
'अपनी इच्छासे क्रमपूर्वक लघु और गुरु वर्ण अर्थात्<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>पहले एक लघु और उसके बाद एक गुरु वर्ण लगानेसे दण्डकका अनङ्गशेखर बनता है।' इसके प्रति चरणमें अट्ठाईस अक्षर होते हैं।
अनङ्गसुन्दररस (सं॰ पु॰) वाजीकरणके अधिकारका रस, जो रस बृद्धको तरुण बनानेके लिये खिलाया जाये।
<small>"सूतस्य पलं गन्धकस्य च पलं रक्तकुमुदरसैः दिनत्रयं भावयेत् ततो वालुकायन्त्रे प्रहरमात्रं पचेत्। अवतार्य रक्तवक पुष्पश्वेतपद्मरसेन दिनैकं भावयेत्।" (रसेन्द्रसारसं॰)</small>
एक पल पारे और एक पल गन्धकको लाल बघोलेके रस में तीन दिन घोंटे। इसके बाद बालुका यन्त्रमें इसे डाल तीन घण्टे तक पकाना चाहिये। उतारकर फिर तीन दिन लाल बघोले और सफ़ेद कमलके रसमें घोंटनेसे अनङ्गसुन्दर-रस तैयार होता है।
अनङ्गापीड़ (सं॰ पु॰) कश्मीरके एक राजाका नाम।
{{Right|<small>कश्मीर देखो।</small>}}
अनङ्गारि (सं॰ पु॰) कामदेवके शत्रु, महादेव।
अनङ्गा-समङ्गा (सं॰ स्त्री॰) नदीविशेष। <small>(महाभा॰ भौष्मप॰)</small>
अनङ्गासुहृत् (सं॰ पु॰) अनङ्गस्य असुहृत्, ६-तत्। महादेव, मदनके दुश्मन।
अनङ्गुरि (सं॰ त्रि॰) अङ्गुरिरहित, जिसके उंगलियां न हों।
अनचहा (हिं॰ वि॰) अनिच्छित, जिसकी चाह न हुई हो।
अनचाहत (हिं॰ वि॰) प्रेम न करनेवाला, जिसे चाह न हो।
अनचीन्हा (हिं॰ वि॰) अपरिचित, अजनबी; जिससे जान-पहचान न हो।
अनचैन (हिं॰ स्त्री॰) असुख, घबराहट; चैन न मिलनेकी हालत।
अनच्छ (सं॰ त्रि॰) न अच्छं निर्मलम्, ६-तत्। कलुष, अनिर्मल; गन्दा, मैला; जो साफ़ नहीं।
अनजान (हिं॰ वि॰) १ अनभिज्ञ, नादान। २ अपरिचित, अजनबी। (पु॰) ३ एक तरहकी घास जिसे प्रायः भैंसें खातीं और जिसे चरनेसे उनके दूधमें
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३९१
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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वर्तनी सुधार
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३८४'''|'''अनजोखा—अनतिविलम्बित'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नशा समा जाता। ४ वृक्षविशेष, एक पेड़ जिसे 'अनजान' कहते हैं।
अनोखा (हिं॰ वि॰) परिमाणरहित, बेवज़न, बेतौल; जो जोखा या तौला न गया हो।
अनञ्जन (सं॰ क्ली॰) न अज्यते लिप्यते; अञ्ज ल्युट् कर्मणि, नञ्-तत्। १ आकाश, आसमान। २ वायुमण्डल, हवाका कुरह। ३ विष्णु। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। ४ कज्जलशून्य, सुरमेसे ख़ाली। ५ दोषरहित, बेऐब।
अनट (हिं॰ पु॰) अत्याचार, उपद्रव; जुल्म, बलवा।
अनडीठ (हिं॰ वि॰) अदृष्ट, न देखा हुआ।
अनडुजिह्वा (सं॰ स्त्री॰) अनडुहो-जिह्वेव। गोजिह्वा, अनन्तमूल। इसकी पत्ती मवेशियोंकी जीभ-जैसी होती है। (Elephantopus Scaber)
अनडुत्क (सं॰ त्रि॰) बैल रखनेवाला, जो बैल रखे।
अनडुद्द (सं॰ पु॰) वृषभदाता, बैलको दान करनेवाला आदमी।
अनडुह् (सं॰ पु॰) अनः शकटं वहतीति निपातनात्। <small>चतुरनडुहोरामुदात्तः। पा ७।१।९८।</small> अनड्डान्। १ वृष, बैल जो गाड़ी खींचता है। २ वृषराशि।
अनडुह (सं॰ पु॰) गोत्रविशेषके प्रधानका नाम।
अनडुही, अनड्वाही (सं॰ स्त्री॰) गौ, गाय।
अनणु (सं॰ पु॰) न अणुः। १ स्थूल धान्य, मोटा अनाज। (त्रि॰) २ स्थूल, अणुभिन्न; मोटा।
अनत (सं॰ त्रि॰) झुका हुआ नहीं, जो नीचा न हुआ हो। २ सीधा, खड़ा। ३ कठिन, चिमड़ा। ४ अभिमानी, शोख़। (हिं॰ क्रि॰-वि॰) ५ यहां नहीं, किसी दूसरे स्थानमें, दूसरी जगहपर।
अनति (सं॰ त्रि॰) अधिक नहीं, न्यून; ज्यादा नहीं, कम। (स्त्री॰) २ सुशीलताका अभाव, शायस्तगीकी नामौजूदगी। ३ अहङ्कार, फ़ख़्र।
अनतिक्रम (सं॰ पु॰) न अतिक्रमः, नञ्-तत्। अतिक्रमका न उठाना, हदसे बाहर न जाना।
अनतिक्रमणीय (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। अतिक्रमके अयोग्य, लांघने नाक़ाबिल।
अनतिदृश्य (वै॰ त्रि॰) १ अनुज्ज्वल, मलिन; जो
शफाफ् नहीं । २ अतिशय प्रकट, निहायत नमूदार
अनतिभूत (स० त्रि०) सर्वानतिक्रम्य न भवति, अति-
भू-डुतच् । यथार्थभूत, सच्च तौर से हुआ । ( पु० )
२ वह मनुष्य जिसे किसीने लांघा न हो, ला - सबकृत ।
अनतिप्रश्ना (स ं० त्रि०) न अतिप्रश्नमर्हति यत् ।
अतिप्रश्न के अयोग्य, ज्यादा सवाल करनेके नाकाबिल ।
अनतिरिक्त (सं० त्रि० ) न अतिरिक्तम्, नञ-तत् ।
अनधिक, थोड़ा। न्यायमत से अपनी अन्यूनवृत्ति
प्रमेय अनतिरिक्त है ।
अनतिविलम्बित (सं० स्त्री० ) अभावार्थे नञ - तत् ।
१ अतिविलम्बाभाव, ज्यादा वक्फे को नामौजूदगी ।
२ वाग्गुणविशेष, ज़बानको एक सिफत । हेमचन्द्रके
अभिधान-चिन्तामणिमें कई एक वाग्गुण लिखे हैं-
“संस्कारवत्वमौदार्यमुपचारपरीतता ।
मेघनिर्घोषगाम्भीर्य' प्रविनादविधायिता ॥
दक्षिणत्वमुपनीतरागत्वश्च महार्थता ।
श्रव्याहतत्व' शिष्टत्व' स शयानामसम्भवः ।
निराकृतान्योत्तरत्व' हृदयङ्गमितापि च ।
मिथः साकाङ चता प्रस्तावौचित्य तत्त्वनिष्ठता ॥
अप्रकीर्ण प्रसृतत्वमस' श्लाघ्यानिन्दितता ।
आभिजात्यमतिस्निग्ध मधुरत्व प्रशस्यता ॥
श्रमर्मबोधितौदार्थ' धर्मार्थप्रविवद्धता ।
कारकाद्यविपर्यासो विभ्रमादिवियुक्तता ॥
चित्रकत्वमद्भुतत्व' तथानतिविलम्बिता ।
अनेक जातिवैचिवग्रमारोपितविशेषता ॥
सत्वप्रधानता वर्णपदवाक्यविविक्तताः ।
अव्युत्थितिरखेदित्व' पञ्चवि ंशञ्च वाग ्मगुणाः ॥”
'सब मिलाके पैंतीस वाग्गुण होते हैं,
१ संस्कारवत्व - वाक्यके व्याकरणसिद्ध कृत्तचित
समासादिका संस्कारगुण अर्थात् व्याकरणशुद्धि ;
२ औदार्य — वाक्यको उदारता, महत्व या उत्कर्ष - गुण;
३ उपचारपरीतता — यथायोग्य शब्द या अर्थका
समावेश-गुण या लाक्षणिक अर्थको शून्यता ; ५ मेघ-
निर्घोष-गाम्भीर्य – मेघनादकी तरह शब्दका गाम्भीर्य -
गुण यानी शब्दका गाढ़ प्रयोग ; ५ प्रतिनाद-
विधायिता - उच्चारणकालमें शब्दका प्रतिध्वनि-जनक-
गुण; ६ दक्षिणत्व - सरलता या प्रसाद-गुण; ७ उप-
नौतरागत्व - ऐसा गुण जिसे सुनने या कहने से अनु-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/१४
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Sweta rani Gupta
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="बैजनाथ चौधरी" /></noinclude>{{Rh|१४|
कपोत}}
उठता है। अंगरेजीमें इसे पोउटर पिजन (Pouter मिया-रत एवं पीतमिश्रित होता है। फिर
pigeon) कहते हैं।
चक्षु रक्तवर्ण रहता और चचुके पाखं पर फूस
लौटन-एक प्रकारका क्षुट्रजातीय खेतवर्ण पड़ता है।
गोला है।
यह मट्टीमें लोट सकता है। इसीसे दरयायौ-देखने में खर्वाकार लगता है। इसका
इसको लोटन कहा करते हैं। लोटानेके लिये चच्च क्षुद्र होता है। इस कपोतका गलदेश पर्यन्त
लोटनको दक्षिण इस्तसे ऐसे पकड़ते, जिसमें वहाङ्गठ
मस्तक और पुच्छ एकवणं रहता, मध्यस्थल खेत
द्वारा एक और अनामिका तथा कनिष्ठा हारा पपर पढ़ता है। जिसके मध्यस्थलमें गुल निकलता, उसको
पक्ष दबा रखते हैं। तर्जनी एवं मध्यमा गलदेशक कबूतरवाज गुम्न-दरयायो कहता है। यह कृष्ण,
दोनों पाखं से वक्षःस्थलके दोनों पाखं पर पहुंच रक्त और पीतवर्ण होता है।
जाती है। फिर दक्षिण एवं वाम लोटनको एसप्रकार बुगदादी-देखने में काला होता है।
इसका चषु
हिलाते, जिसमें घाट (गुद्दी)को एकवार दाहने और प्राय: डेढ़ इच्च लम्बा और उसका अग्रभाग टेढ़ा
बायें हिलता पाते हैं। कोई एक मिनट ऐसे ही रहता है। बड़े बड़े चक्षुवोंके पार्श्व में फूल पड़
हिला महोपर छोड़ देनेसे यह लोटा करता है। ४५
जाता है। यह एक हस्त पर्यन्त दीर्घ होता है।
लोट लगाने पर इसे पकड़ उठा देना चाहिये। किसी किसीके कथनानुसार यह कपोत तुर्कीके
नतुवा कड़ी मट्टोसे टकरा मत्था फट जाना सम्भव है। वुग़दाद नगरसे इस देशमें आया है।
इसको अंगरेजीमें स्वतन्त्र नाम न रहते भी टम्बलर उलुक-जातीय-प्रवादानुसार उलूक और कपोतके
(Tumbler ) कह सकते हैं। जो एकबारगी हो सङ्गमसे उत्पन्न है। यह देखनेमें खेत और
बहुत लोट सकता, उसे कबूतर वान वेदम-लोटन खर्वाकार होता है। फिर कोई कोई उलक सदृश भी
कहता है।
देख पड़ता है। यह उलूककी भांति बोलता है।
पाउष-(पुग्ध) के अनेक भेद हैं। इसका चचु गिरहवानों में नीचे लिखे कबूतर पच्छे होते हैं-
अधिक क्षुद्र होता है। गलदेशके पालक वक्षके ऊपर पपलका-देखने में सफेद लगता है। चक्षुके पाव-
उत्तराभिमुखौ हो नहीं रहते, दोनों पान को झुक पर सरसों-जैसा एक चुद चिन्ह प्रथवा पक्षपर कचा
बीचमें वालोंको विणनीसदृश लगते हैं। इसका समस्त
रहता है। सर्षप-सदृश्य कृष्ण चिङ्गविशिष्ट अब-
गलदेश भर नहीं जाता, वपके जल देशमें अधै लके का अधिक चिहयुक्त शावक उत्कष्ट जातीय
पङ्ग लि परिमित स्थान वैसा देखाता है। इस समझा जाता है।
जातिका कपोत सुगठित और दृढ़काय होता है।
कदा-पोताधिक्य रलवर्णं देख पड़ता है। पक्षपर
इसको मस्तक पर शिखा रहनेसे 'टरपेट' कहते हैं। रेखा रहती है। फिर चक्षुके मध्य दो गोलाकार दाग
भारु सा-वर्ण में कृष्णको अधिकता लिये धूसर
होते हैं।
रहता है। चक्षु रक्तकमलको मांति लाल होते है। कागनी-सफेद होता है। इसको चक्षुमें वर्णविशिष्ट
चच्च शुद्र और क्षणवर्ण लगता है। गलदेश कलङ्क रहनेसे मोतीचूर कहते हैं।
मयूरको भांति चिक्कण देख पड़ता है। बच्चु में खु,तमौ-ईषत् पिङ्गल रहता और चक्षुमें गोलाकार
आवरणी छष्णवर्ण.
फूल नहीं पाते। चक्षुको
कसा लगता है। इसमें स्त्रीनातिकी संख्या प्रति
रहती है।
पल्प पाती है।
कारा-मस्तकसे गलदेश पर्यन्त कष्यका प्राधिक्यं इस परिवारवाले दोबाज के पक्ष पनेक पालक
खेत होते हैं। जिसके पक्ष में केवल एकमात्र पासक
लिये धूसर रहता है। फिर पृष्ठ और वक्षस्थल
खेत पाता, वह एकबाल कहाता
पाटस तथा श्वेत विन्दुयुक्त होता है।
---<noinclude></noinclude>
kaahjpblowbvgjs5g8xt4d4ctvgqals
667907
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2026-07-16T17:18:47Z
Sweta rani Gupta
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/* शोधित */ उठता है। अंग्रेजी में इसे पोस्टर पिजन (Pouter pigeon) कहते हैं।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{Rh|१४|
कपोत}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
कपोत दुनिया-राह एवं पोत मिश्रित होता है। फिर चक्षु रक्तवर्ण रहता है।
<small>— लोटन -</small>— एक प्रकार का क्षुद्र जातीय गोला है। यह मिट्टी में लोट सकता है। इससे इसको लोटन कहा करते हैं। लोटाने के लिए लोटन को दाहिने हाथ से ऐसे पकड़ते हैं, जिसमें अँगूठे द्वारा एक ओर और अनामिका तथा कनिष्ठा द्वारा दूसरी ओर पंख दबा रखते हैं। तर्जनी एवं मध्यमा गले के दोनों पार्श्व से वक्षस्थल के दोनों पार्श्व पर पहुँच जाती हैं। फिर दाहिने एवं बाएँ लोटन को इस प्रकार हिलाते हैं, जिसमें गर्दन को एक बार दाहिने और बाएँ हिलता पाते हैं। कोई एक मिनट ऐसे ही हिलाकर मिट्टी पर छोड़ देने से यह लोटा करता है। ४-५ लोट लगाने पर इसे पकड़ कर उठा देना चाहिए। अन्यथा कड़ी मिट्टी से टकराकर सिर फट जाना सम्भव है। इसको अंग्रेजी में सचमुच नाम न रहते भी टम्बलर (Tumbler) कह सकते हैं। जो एक बार में ही बहुत लोट सकता है, उसे कबूतरबाज़ बेदम-लोटन कहते हैं।
</small>—आऊल-</small>— (घुग्घू) यह कबूतरों में अधिक क्षुद्र होता है। इसके अनेक भेद हैं। इसका चंचु गले के बालों के ऊपर रहता है, दोनों पार्श्व को झुककर बीच के बालों को कंघी की तरह लगते हैं। इसका समस्त गला भर नहीं जाता, वक्ष के ऊपरी भाग में आधा अंगुल परिमित स्थान वैसा ही दिखाई देता है। इस जाति का कपोत सुगठित और दृढ़काय होता है। इसके मस्तक पर शिखा रहने से इसे 'टरपेट' कहते हैं।
<small>— आख्यान-</small>— वर्ण में कृष्ण की अधिकता लिए हुए धूसर रहता है। आँखें लाल कमल की भाँति लाल होती हैं। कंठ पर कण्ठा लगता है, जो मयूर की भाँति चमकदार दिखाई पड़ता है। आँख की पलकें फूल नहीं पातीं, आँखों पर झिल्ली रहती है।
<Small>कमरा </small>— मस्तक से गले तक कालेपन की अधिकता लिए हुए धूसर रहता है। फिर पीठ और वक्षस्थल पीलापन लिए हुए तथा श्वेत बिन्दुयुक्त होता है।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<small>— दरियाई —</small>— देखने में छोटे आकार का लगता है। इसकी चोंच छोटी होती है। इस कपोत का गले तक मस्तक और पूँछ एक रंग की रहती है, मध्यभाग सफ़ेद पड़ता है। जिसके मध्यभाग में गोल दाग निकलता है, उसे कबूतरबाज़ गुप्त दरियाई कहते हैं। यह काला, लाल और पीले रंग का होता है।
<small>—बगवादी —</small>— देखने में काला होता है। इसकी चोंच प्रायः डेढ़ इंच लम्बी और उसका अग्रभाग टेढ़ा रहता है। बड़ी-बड़ी आँखों के पार्श्व में घेरा पड़ जाता है। यह एक हाथ तक लम्बा होता है। किसी-किसी के कथनानुसार यह कपोत तुर्की के बग़दाद नगर से इस देश में आया है।
</small>—उलूक-जातीय —</small>— जनश्रुति के अनुसार यह उल्लू और कपोत के संसर्ग से उत्पन्न है। यह देखने में सफ़ेद और छोटे आकार का होता है। फिर कोई-कोई उल्लू जैसा भी दिखाई पड़ता है। यह उल्लू की भाँति बोलता है। गिरहबाज़ों में नीचे लिखे कबूतर अच्छे होते हैं:
<small>— अवलका- </small>—देखने में सफ़ेद लगता है। चोंच के पास सरसों जैसा एक छोटा चिह्न अथवा पंख पर दाग रहता है। सरसों के समान काले चिह्न वाला शावक उत्तम जाति का समझा जाता है।
<small>— ऊदा —</small>— पीलेपन की अधिकता वाला लाल रंग दिखाई पड़ता है। पंख पर रेखा रहती है। फिर आँखों के बीच दो गोलाकार दाग होते हैं।
<small>—कागज़ी —</small>— सफ़ेद होता है। इसकी आँखों में रंग-बिरंगे दाने रहने से इसे मोतीचूर कहते हैं।
यरलवश
<small>—कसमी —</small>— थोड़ा पीलापन लिए रहता है और आँखों में गोलाकार घेरा लगता है। इसमें मादा कबूतरों की संख्या अधिक पाई जाती है।
इस परिवार वाले दोबाज़ के पंखों में अनेक पंख सफ़ेद होते हैं। जिसके पंख में केवल एक ही सफ़ेद पंख आता है, उसे एकबाज़ कहते हैं।
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||'''कपोत'''|'''१५'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
<small>आसभागौ — </small>देखने में तरह सवर्ण होता है। इसका चंचु श्वेत रहता है।
<small> सफेदा –</small> स्वाहा, चीना और मामूली तीन श्रेणी में विभक्त है। स्याहे की पूँछ काली या लाल होती है। गले में कण्ठे चपटे और आँख में गोल दाग रहते हैं। चीना के गले में कितनी ही लाल छीटें पड़ जाती हैं। आँख रंगीन रहती है। फिर उसमें दो गोल दाग भी होते हैं। स्याहा और चीना दोनों देखने में बहुत अच्छे लगते हैं। मामूली सफेदे के अंग, गलदेश और पुच्छ में कलंक रहता है।
<small>मूरा -</small> इस कपोत के गलदेश, पृष्ठ एवं पुच्छ में सफेद and काली छींट रहती है। फिर किसी के केवल अंग और चक्षु में ही कलंक देख पड़ता है।
<small>सबला —</small> देखने में गाढ़ धूसर वर्ण होता है। पंख पर दो-दो रेखा रहती हैं। यह कपोत वाणी, चक्कर और उड़ान के हिसाब से भला-बुरा समझा जाता है।
अंग्रेज खगतत्त्ववेत्ताओं के मत से कपोत और उलूक का साधारण नाम कोलम्बिडी (Columbidae) है। यह प्रधानतः शस्य खाकर जीवन धारण करते हैं। फिर इन्हें भूमि पर घूम-घूम कर चुगना अच्छा लगता है। इनमें अधिकांश का वर्ण नील रहता है। अंग और स्वभाव के अनुसार कपोत की तीन श्रेणी रखी गयी हैं। १म लफोलोमिनाई (Lapholaeminae) अर्थात् कलगीदार, (Crested-pigeons) २य पलम्बिनई (Palumbinae) अर्थात् वन्य (Wood-pigeons) और ३य कोलम्बिनई (Columbinae) अर्थात् पार्वत्य (Rock pigeons) कपोत।
प्रथम श्रेणी की एकमात्र जाति आज कल ऑस्ट्रेलिया में देख पड़ती है। इस कपोत के मस्तक पर मयूर की चूड़ा के समान द्विगुण शिखा रहती है। अंग्रेजी खगतत्त्व में इसको लाफोलोमस अंटार्कटिकस (Lapholaemus antarcticus) अर्थात् दक्षिण-महासागरीय गुण शिखायुक्त कपोत कहते हैं। २य श्रेणी में एक प्रकार बैंगनी चमक लिए पतले आसमानी रंग का कबूतर होता है। यह मध्य भारत के पूर्वी अंश से समुद्रोपकूल पर्यन्त सकल स्थानों में मिलता है। असम,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
आराकान और रामरी द्वीप में भी इसकी संख्या यथेष्ट है। [दुकूल] हिमालय के मध्य प्रदेश में इसी जाति का एक प्रकार शिखायुक्त कपोत होता है। इसका रूप अति मनोहर लगता है। दार्जिलिंग के निकट इस जाति के जो एक प्रकार कपोत रहते हैं, उन्हें नेपाली 'नामपुम्फो' कहते हैं। फिर नीलगिरि पर्वत में इसी जाति के होने वाले एक प्रकार कपोत राजकपोत कहलाते हैं। यह दैर्ध्य में पुच्छ के पंख समेत प्रायः २५ इंच पड़ता है। हिन्दुस्तान के जंगली गोले और गिरहबाज़ इस श्रेणी में आ सकते हैं। ३य श्रेणी के पार्वत्य कपोत कुमाऊँ प्रदेश के उत्तर, उत्तर-एशिया और जापान से समस्त यूरोपखण्ड पर्यन्त देख पड़ते हैं। इनका वर्ण अधिक नील नहीं रहता, नील की अधिकता लिए धूसर लगता है। कश्मीर अंचल में हिमालय पर एक प्रकार श्वेतचंचु कपोत होते हैं। यह देखने में अति सुन्दर समझ पड़ते हैं।
इन सकल एवं अन्यान्य जाति व कपोत भेद के अंग्रेजी खगतत्त्व में लिखे लक्षण अति सूक्ष्म रूप से बता देना एक प्रकार असम्भव है। कारण उक्त जातीय पक्षी न देख केवल कवि की वर्णना के सहारे कोई जाति कल्पना कर लिखना कैसे युक्तिसिद्ध हो सकता है। इससे अंग्रेजी खगतत्त्व के अनुसार समस्त जाति के लक्षणा-लक्षण नहीं लिखे।
कपोत अति सुखी प्राणी है। अति सामान्य सुख और विपत्ति से इसकी समूह क्षति हो जाती है। हिन्दुस्तान में कपोत को लक्ष्मी का वरपुत्र मानते हैं। अनेक को विश्वास रहता है — इसे पालने से गृहस्थ का मंगल बढ़ता है, दरिद्रता घटती है और लक्ष्मी का दर्शन मिलता है। फिर इसके पर की वायु मनुष्य के शरीर में लगने से सर्वरोग दूर होता है। इससे कितने ही लोग कपोत पालते हैं। वन्य कपोत के गृह में आ बसने पर कोई नहीं उड़ाता। कलकत्ते में बंगाली और हिन्दुस्तानी महाजन अपने-अपने व्यवसाय के स्थान में सयन कपोत प्रतिपालन करते हैं।
मनुष्य के असाधारण अध्यवसाय से राजकपोत का एक अपूर्व गुण आविष्कृत हुआ है। यह सिखाने
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||'''कपोत'''|'''१५'''}}
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<small>आसभागौ — </small>देखने में तरह सवर्ण होता है। इसका चंचु श्वेत रहता है।
<small> सफेदा –</small> स्वाहा, चीना और मामूली तीन श्रेणी में विभक्त है। स्याहे की पूँछ काली या लाल होती है। गले में कण्ठे चपटे और आँख में गोल दाग रहते हैं। चीना के गले में कितनी ही लाल छीटें पड़ जाती हैं। आँख रंगीन रहती है। फिर उसमें दो गोल दाग भी होते हैं। स्याहा और चीना दोनों देखने में बहुत अच्छे लगते हैं। मामूली सफेदे के अंग, गलदेश और पुच्छ में कलंक रहता है।
<small>मूरा -</small> इस कपोत के गलदेश, पृष्ठ एवं पुच्छ में सफेद and काली छींट रहती है। फिर किसी के केवल अंग और चक्षु में ही कलंक देख पड़ता है।
<small>सबला —</small> देखने में गाढ़ धूसर वर्ण होता है। पंख पर दो-दो रेखा रहती हैं। यह कपोत वाणी, चक्कर और उड़ान के हिसाब से भला-बुरा समझा जाता है।
अंग्रेज खगतत्त्ववेत्ताओं के मत से कपोत और उलूक का साधारण नाम कोलम्बिडी (Columbidae) है। यह प्रधानतः शस्य खाकर जीवन धारण करते हैं। फिर इन्हें भूमि पर घूम-घूम कर चुगना अच्छा लगता है। इनमें अधिकांश का वर्ण नील रहता है। अंग और स्वभाव के अनुसार कपोत की तीन श्रेणी रखी गयी हैं। १म लफोलोमिनाई (Lapholaeminae) अर्थात् कलगीदार, (Crested-pigeons) २य पलम्बिनई (Palumbinae) अर्थात् वन्य (Wood-pigeons) और ३य कोलम्बिनई (Columbinae) अर्थात् पार्वत्य (Rock pigeons) कपोत।
प्रथम श्रेणी की एकमात्र जाति आज कल ऑस्ट्रेलिया में देख पड़ती है। इस कपोत के मस्तक पर मयूर की चूड़ा के समान द्विगुण शिखा रहती है। अंग्रेजी खगतत्त्व में इसको लाफोलोमस अंटार्कटिकस (Lapholaemus antarcticus) अर्थात् दक्षिण-महासागरीय गुण शिखायुक्त कपोत कहते हैं। २य श्रेणी में एक प्रकार बैंगनी चमक लिए पतले आसमानी रंग का कबूतर होता है। यह मध्य भारत के पूर्वी अंश से समुद्रोपकूल पर्यन्त सकल स्थानों में मिलता है। असम,
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आराकान और रामरी द्वीप में भी इसकी संख्या यथेष्ट है। [दुकूल] हिमालय के मध्य प्रदेश में इसी जाति का एक प्रकार शिखायुक्त कपोत होता है। इसका रूप अति मनोहर लगता है। दार्जिलिंग के निकट इस जाति के जो एक प्रकार कपोत रहते हैं, उन्हें नेपाली 'नामपुम्फो' कहते हैं। फिर नीलगिरि पर्वत में इसी जाति के होने वाले एक प्रकार कपोत राजकपोत कहलाते हैं। यह दैर्ध्य में पुच्छ के पंख समेत प्रायः २५ इंच पड़ता है। हिन्दुस्तान के जंगली गोले और गिरहबाज़ इस श्रेणी में आ सकते हैं। ३य श्रेणी के पार्वत्य कपोत कुमाऊँ प्रदेश के उत्तर, उत्तर-एशिया और जापान से समस्त यूरोपखण्ड पर्यन्त देख पड़ते हैं। इनका वर्ण अधिक नील नहीं रहता, नील की अधिकता लिए धूसर लगता है। कश्मीर अंचल में हिमालय पर एक प्रकार श्वेतचंचु कपोत होते हैं। यह देखने में अति सुन्दर समझ पड़ते हैं।
इन सकल एवं अन्यान्य जाति व कपोत भेद के अंग्रेजी खगतत्त्व में लिखे लक्षण अति सूक्ष्म रूप से बता देना एक प्रकार असम्भव है। कारण उक्त जातीय पक्षी न देख केवल कवि की वर्णना के सहारे कोई जाति कल्पना कर लिखना कैसे युक्तिसिद्ध हो सकता है। इससे अंग्रेजी खगतत्त्व के अनुसार समस्त जाति के लक्षणा-लक्षण नहीं लिखे।
कपोत अति सुखी प्राणी है। अति सामान्य सुख और विपत्ति से इसकी समूह क्षति हो जाती है। हिन्दुस्तान में कपोत को लक्ष्मी का वरपुत्र मानते हैं। अनेक को विश्वास रहता है — इसे पालने से गृहस्थ का मंगल बढ़ता है, दरिद्रता घटती है और लक्ष्मी का दर्शन मिलता है। फिर इसके पर की वायु मनुष्य के शरीर में लगने से सर्वरोग दूर होता है। इससे कितने ही लोग कपोत पालते हैं। वन्य कपोत के गृह में आ बसने पर कोई नहीं उड़ाता। कलकत्ते में बंगाली और हिन्दुस्तानी महाजन अपने-अपने व्यवसाय के स्थान में सयन कपोत प्रतिपालन करते हैं।
मनुष्य के असाधारण अध्यवसाय से राजकपोत का एक अपूर्व गुण आविष्कृत हुआ है। यह सिखाने
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{Rh|१६|कपोत}}
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पर दूर देश से लिपि ला सकता है। इसका पंख अत्यन्त सबल होता है। आश्चर्य का विषय है — इस जाति के कपोत में जिसका पंख जितना सबल होता है, वह उतना ही अधिक जिया करता है। यह स्वभावतः दीर्घकाय और बलिष्ठ रहता है, किन्तु देखने में अति सुन्दर लगता है। राजकपोत हिन्दुस्तानी कोड़िया लिपि प्रेरण की बात अधिक सुनी नहीं पड़ती है।
रूपये लिपि लगा देने पर कपोत प्राप्य ही प्रतिपालक के गृह आ पहुँचता है। इसको सिखाने में प्रथमतः रास्ता भूल न जाने के लिए बड़ी दूर छोड़ आने के बदले पाव कोस दूर से लाकर छोड़ना पड़ता है। पाव कोस अभ्यस्त होने पर पक्षी को धीरे-धीरे एक, दो, तीन, चार, पाँच कोस दूरी से लाकर इसे छोड़ते हैं। पीछे ग्रामान्तर और अवशेष देशान्तर से लाकर इसे सिखाना पड़ता है। यह अति शीघ्र सीखता है। अब भी तुर्की राज्य में उक्त प्रथा बहुत चलती थी, वहाँ कहीं-कहीं धानियों के पास दो-एक कपोत विद्यमान हैं। ११४० ई० को बग़दाद के सुल्तान नूरुद्दीन मुहम्मद ने यह प्रथा चलायी थी। फिर १२५८ ई० को बग़दाद नगर मँगोलियों के हाथ पड़ने से यह प्रथा रहित हुई। फ्रांसीसी प्रसिया युद्ध में भी यह कपोत देख पड़े थे। थोड़े ही दिन हुए कलकत्ते की बड़ी बाज़ार में एक पत्रवाही कपोत आ गया था। अंग्रेजी में इसे कैरियर पिजन (Carrier pigeon) अर्थात् चिट्ठी पहुँचाने वाला कबूतर कहते हैं। वर्तमान यूरोपीय समर में इसने कुछ कम काम नहीं किया।
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कपोत को सिखाने में बहुत यत्न, आयास और समय लगता है। शावक परिणत होने पर एक स्त्री और एक पुरुष निकाल एकत्र रखना और यथेष्ट अन्न-पानी का यत्न करना पड़ता है। फिर पत्र लाने के स्थान को इन्हें पिंजड़े में डाल भेज देते हैं। इनमें एक को पृथक् कर कहीं ले जाने पर दूसरा उड़ने की इतनी क्षमता पाता है, कि वह उड़कर उसके पास निश्चय पहुँच जाता है। बहुत पतले और कड़े काग़ज़ पर पत्र लिखकर किसी पंख के प्रधान पंख से नत्थी कर देते हैं। पत्र का सूक्ष्माग्रभाग शरीर की बाहरी ओर रहता है, फिर उड़ा देने पर यह उसी घर में जा पहुँचता है, जिसमें इसका जोड़ा रहता है। वासस्थान के प्रति अत्यन्त ममता बढ़ने से एकमात्र कपोत पालने से भी काम चल सकता है। इसी प्रकार शिक्षित कपोत जहाँ संवाद लेना आवश्यक होता है, वहाँ किसी के हाथ सौंप कर भेज दिया जाता है।
यह समुद्र पार भी उड़ सकता है। शिक्षित कपोत एक घंटे में २० कोस उड़ सकता है। अधिक दूर से पत्र मँगाने के लिए वे बहाने से पहले आठ घंटे अनाहार किसी अन्धकार गृह में बन्द कर देते हैं। पीछे छोड़ने पर एकबारगी ही अति ऊँचे देश से उड़ते-उड़ते क्षुधा की ज्वाला में प्रभु के निकट आ पहुँचता है। न जाने कितने ही कपोतों ने समुद्र पार करने में पानी पर गिरकर अपने प्राण गँवाए हैं। कुहरा पड़ने या पानी की झड़ी लगने से यह सहज में आ जा नहीं सकता! सुतरां ऐसे समय पड़ने या राह में ऐसा समय आ जाने से इस पर अत्यन्त विपद पड़ती है।
यह प्रथा केवल तुर्की में ही न रही, पीछे यूरोप के नाना स्थानों में चल पड़ी। पहले मिस्र, पैलेस्टाइन, तुर्की, अरबस्थान और ईरान में युद्ध के समय जय-पराजय, सैन्य आनयन, खाद्य खाद्य-अखाद्य प्रभृति का संवाद इस कपोत द्वारा सहज में सम्पन्न होता था। इंग्लैंड के विलासी धनी लोग भी उस समय इनके द्वारा प्रेषी और बन्धु-बान्धव के निकट संवादादि भेजते रहे।
अनुमान लगा सकते हैं — रामायण, महाभारतादि के समय भी भारत में पक्षी के मुख से संवाद भेजने की प्रथा चलती थी। महाभारत में एक आख्यान लिखा है — गृह में ऋतुमती और कामातुर पत्नी को छोड़ चेदिदेशाधिपति महाराज उपरिचर पिता के निदेश से मृगया को गए थे। वहाँ वृक्ष की छाया में श्रान्ति दूर करते समय पक्षी को चरण पर लाते ही उनका रेतः.
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Lado Shaw
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|
४३०}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कामरूपतन्त्र समझेंगे, उन्हें यथाका सम्पूर्ण फल मिलेंगे।
'यह अभिशाप है वशिष्ठके अन्तहित होते ही
कामरूपके प्रमथगण म्लेच्छ बन गये। उग्रतारा वामा
हुयीं। महादेव म्लेच्छवत् फिरने लगे। कामरूप.
माहात्म्य-प्रकाशक सकल सन्त्र विरतप्रचार हुये।
सुतरां क्षणकालके मध्य कामरूप वेदमन्त्रहीन और
चतुर शून्य बन गया। फिर कामरूपपीठ में विष्णुका
पागमन हुवा। इससे कामरूपका शाप छूट गया।
फिर वह सम्पूर्ण फल देने लगा। किन्तु देवता और
मनुष्य पूर्ववत् इसका माहात्म्य समझ न सके।
उसी समय ब्रह्माने सब कुण्ड और नदी छिपाने के लिये
भान्तनुपनी पमोधाके गर्भसे एक जलमय पुत्र उत्पादन
किया था। उस पुत्रने परशुराम द्वारा अध्यन
भावमें अवतारित हो समुदाय कामरूपको जलमें डुवा
दिया। सुतरा अन्यान्य तीर्घ गुप्त हो गये।
'जो अन्य किसी तीर्थका विषय न समझ केवल
ब्रह्मपुत्रका ही अस्तित्व जानते और उसमें नहाते हैं, वह
केवल मात्र ब्रह्मापुत्रके मानसे हो सकल फल पाते हैं
फिर जो ब्रह्मपुत्र में समस्त तीर्थों का गुप्त भाव समझ
कर नहाते हैं वे लोग समस्त तौक मानका फललाम
. करते हैं।' (काधिकापुराए १०)
उक्त विवरण के पाठसे समझते हैं कि किसी समय
कामरूपमें बहुत तीर्थ थे। वास्तविक आज भी काम
रूपके नानास्थानों में पर्यटन करनेसे देखते हैं कि काम
रूपके अनेका तीर्थ और अनेक पवित्र स्थान ब्रह्मपुत्रके
गर्भमें दव है। ब्रह्मपुत्र कामरूपके प्राचीन
गौरवके साथ ही हिन्दुवोको सकल प्राचीन कोलियां '
भी खा गया है। योगिनीतन्त्र में लिखा है,-
"वो काम वियतन्य न वह समम् ।
पन्यव विरला देवी कामरूपे गहरा"
कामरूप देवीक्षेत्र है। ऐसा स्थान दूमरा देख
• वर्तमान पासामकै उचापूर्व मानवासिबमि प्रबाद है कि
परपरामने अपने कुठारसे धश्च स्थानम अमपुषवा पवताप किया था।
अद्यापि सस स्थानका नाम "षिकुठार"। यह एक पवित्र वीर्ष
है। मंदिया उत्तरपूर्व प्रमय निकट अषिकठार स्थित है।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
नहीं पड़ता। अन्यत्र देवीका दर्शनचाभ सुकठिन है।
किन्तु कामरूपमै घर घर देवी विरानती है।
योगिनीतन्त्रक पाठसे भी. कामरूप तीर्थका ऐसा
हो परिचय मिलता है.-'महापीठ कामरूप अति
गुध तीर्थ है। यहां महादेव पार्वतीके साथ नियत
अवस्थान करते हैं। इस पीठमें शत नदी और कोटि.
लिङ्ग प्रवस्थित हैं। वायुकूटको अन्तिम सीमा पर
धनुर्हस्त परिमित वायुरूपी चन्द्रका अवस्थान है।
वायुगिरिको पूर्व और चन्द्रकूट थैल, मध्यभागमें गोदन्त
और चन्द्रशैलके मध्यस्थलमै इन्द्रशैलसे कुछ दक्षिण
एवं चन्द्रशेलके कुछ उत्तर चन्द्रकुण्ड नामक सरो-
घर है। इस सरोवरके दक्षिणदिक्मागमें चार धनु
परिमित मानसतीर्थ है। मानस की दक्षिणदिक्
२८ धनु परिमित अयुततीर्थ है। उसके दक्षिण भागमें
दश धनु परिमित ऋणमोचन नामक सरोवर है।
अश्वकान्त पर्वतके दक्षिण और अम्निकोणांथ में प्राद्ध-
क्रान्ता नामक सरोवर भरा है। चन्द्रशैलसे गिरने-
वाले निझरको नाङ्गवो और इन्द्रशेलसे निकलनेवाले
निरको सरस्वती कहते हैं। वर्षाकाल प्रश्वक्रान्ता
तीर्थमें दोनों निझर मिल जाते हैं। इस लिये वह
प्रयागतीर्थक तुल्य माना जाता है।
इन तीर्थों में मान, दाम और पूजादि कार्य करनेसे
विविध पुण्यफल मिलता है। विशेषतः प्रयागतीर्थक
तुल्य माना जानसे अश्वक्रान्ता तीर्थमें मस्तक मुण्डनादि
कार्यका भी विधान है। इससे इहलोकमें यावतीय
सुखसम्भोग और परलोक में स्वर्गलाम होता है।'
{{Right|(योयिनीतव पाय पटस)}}
अश्वतीर्थको किचित् पथिम पार पाठ धनु-
परिमित स्थानमें सिद्धकुण्ड है। इस तीर्थ के पश्चिम
मरके निकट ६४ धनु-परिमित स्थानमें ब्रह्मसरः तीर्थ
है। इन्द्रकूटके उत्तर ८० धनु-परिमित गमक्षेत्र है।
यहां भी एक कुण्ड विद्यमान है। रामतौर्य के 2 धनु,
दूरवर्ती पूर्वदिकभागमें सौतातीर्थ है। सोतातीर्थक
दक्षिण १० धनुपरिमित विजयतीर्घ है। यहां
विजय नामक शिवलिङ्ग अवस्थित है। इसके निकट
योगतीर्थ है। वहां योगीय नामक शिवचिङ्ग अधि-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४३७
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Lado Shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४३८|
कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
ष्ठित है। उसके निकट २२ धनु परिमित मुक्ति.
तीर्थ है। मुक्तितीर्थ से बहुत दूर वृत्तकुण्ड है।
इन्द्रशैलके दक्षिण १२ धनु परिमित सूर्यतीर्थ
है। यहां सूर्य देव अदृश्य मूर्तिमें प्रवस्थान
करते हैं। रामक्षेत्रके मध्य दो दुर्गकूप और एक
ब्रह्मयूप देखते हैं। इन्द्रकूटमें मणिनाथः नामक
महादेव अवस्थित हैं। सोमतीर्थ की शेष सीमा पर
५ धनुपरिमित नागतीर्थ है। चन्द्रशैलके उत्तर ६४
धनुपरिमित एक पर्वत अवस्थित है, उसके जलाशयका
नाम गयाकुण्ड और तौरको भूमिका नाम क्षेत्र है।
पूर्वमें लोहित्य और उत्तरमें ब्रह्मयोनि पर्यन्त विस्तृत
-२२ धनुपरिमित स्थानको गयाशीर्ष वा गयातीर्थ
कहते हैं।
"इम समुदाय तीर्था में स्नान, दान, पूजा एवं
प्रदक्षिण और गयातीर्थमें श्राद्धादि कार्य करनेसे अक्षय
पुण्य मिलता है।' (योगिनौतम्ब, २ । ४र्थ पटल)
'सोमशैलकी ईशानदिक् मणिल है। मणि
शैलके किञ्चित पूर्वाश ईशानकोणमें ७ धनु दूर वारा
यसी नामक कुण्ड है। इस कुण्डका दैत्र २२ धनु
है। इसको दक्षिण दिक् ५ धनु दूर २२ धनुपरिमित
मणिकर्णिका नामक कुण्ड है। मणिशैल को ईशान
कोणमें मङ्गला नदी है। फिर दक्षिण दिक् कामेश्वरी,
पथिम हयग्रीव; उत्तर कमललिङ्ग और पूर्व विरजा
है। इस चतुःसीमाके मध्यस्थल में तीन कोस परिमित '
स्थानका नाम मणिपीठ है। -मानशैलके वायुकोणमें
(योगिनीवन्न सघन पटल)
उसके पूर्व-दक्षिण भागमें नर-
नारायण सरोवर है। इसके वायुकोणमें ८ धनुदूर '
वैमायक तीर्थ और १०० धनुपरिमित दीर्घ प्रभासतीर्थ
है। प्रभासतीर्थक वायुकोणमें विन्दुसरर है। नाटका.
चलके पूर्व भागमें मातङ्ग नामक पर्वत पौर अग्नि
कोषमें ध्याचल है। . इस तीर्थको शिवका अन्तर्ग्रह
कहते हैं। हयाचलके पूर्व और ईशानदिकभागम
भस्माचल है। इसको उत्तर ओर उर्वशी नामक तीर्थ -
है। उर्वशी नीर्थ के पूर्व और सूर्यतीर्थ है। उससे ५
धनु दूरवर्ती पूर्व दिक्में कामाख्या सरोवर है। मदन
तीर्थको दक्षिण पोर गडासरोवर तीर्थ है। गङ्गातीर्थसे
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
८ धनु दूरवर्ती दक्षिण दिक्में पागस्त्यतीर्थ है। इस
आगस्त्य तीर्थक किञ्चित् पश्चिमांशमें अग्निकोण पर २१
धनुपरिमित स्थानमें पासव नामक . तथं है। इसको
पश्चिम भोर अनतिदूरवर्ती ७ धनुपरिमित स्थानमें
रम्भातीथें है। उसकी ३० धनुपरिमित दूरवर्ती
पश्चिम दिकमें रुक्मिणी कुण्ड है। इस कुराहके वायु-
कोणमें ८ घनुपरिमित स्थान पर पिटतीर्घ है। उक्त
भस्मशेलके अग्निकोणमें ८ धनु दूर पिशाचमोचन
तीर्थ है। यहां कपर्दीश्वर नामक शिवलिङ्ग प्रवस्थित
है। भस्मकूटके वायुकोणमें कपालमोचन तीर्थ है।
यहां कपालेश्वर नामक शिवलिङ्ग अधिष्ठित है।
कपालमोचनसे ५ धनु दूरवर्ती उत्तरको कपिन्ना-
तीर्थ है। इस स्थानमें हपमध्वज नामक शिवलिङ्गका
अवस्थान है। इस शिवलिङ्गके पश्चिमभागमें २२ धनु
परिमित मातङ्गदेव है। मन्दर पर्वतकी रंगान
ओर १६ धनु-परिमित चक्रतीर्य है। चक्रतीर्थक
पश्चिम नन्दन पर्वत है। इसका परिमाण ६२ धनु
है। यहां बुद्धरूपी जनार्दनदेव अवस्थित हैं। मन्दर
शैलके - उत्तरांशमें ईशान कोणपर विरजातीय है।
गजशैलके दक्षिण-पश्चिम भागमें शोधनिङ्ग है।
चक्रतीर्थ के अग्निकोणमें २ धनु परिमित स्थान पर
शौभ्रलिङ्गतीर्थ है। इसी के निकट शुक्राचार्य-स्थापित
शुक्रखर नामक शिवलिङ्ग अधिष्ठित है।
इन तीर्थों में मान, दान, पूजा, प्रदक्षिण और
मान विशेषके समय याहादि करने से विशेष पुण्यनाम
वराहपर्वत है।होता है।'(योगगौतम शापुर पाताल)
लोहित्यसे दक्षिण दिक् जाते वायुकोण पर कोन-
पर्वत है। कोलपर्वतको पश्चिम ओर पाण्डुनाथ हैं।
उनके वायुकोणमें ब्रह्मकुण्ड नामक १२ धनु विस्त त
सरोवर है। इस सरोवरसे अनतिदूर दक्षिण दिक
धन्वन्तर कूम्स पर्यन्त विस्तृत विष्णुकुण्ड है। विष्णु-
कुण्डके दक्षिणंगमें नैऋतकोणेपर ११ धनुपरिमित
शिवकुण्ड है। इसीके निकटवर्ती स्थानमें पाण्डुगै न
पखत्य-चिड़ित धर्मक्षेत्र है। है। पाण्डुथै लके . ५ धनुदूरवर्ती नैऋतकोणमें
फिर इसी गैससे ५
धनु दुरवर्ती पर्वदिकमें स्वच्छाशति शिवा है। यह<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|
४३९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
शिला लक्ष्मी नामसे अभिहित होती है। इससे
अनतिदूर दक्षिणदिौ ८ धनुपरिमित कोमक्षेत्र है।
इसी स्थान पर अवस्थके मूलमें विष्णुको पाषाण मूर्ति
विराजित है। ब्रह्मकुण्डके निकट श्रीकुण्ड नामक
२ धनुपरिमित सरोवर है। उसकी पूर्व पोर २२
'धनु दूरवर्ती स्थानमें कनखल नामक तीर्थ है। उसके
दक्षिणदिकभागमें मनोहर पर्वतके ऊपर ४ धनु
परिमित चम्पकेश्वरको मूर्ति विराजित है। इस
मूर्तिको पूर्व पोर ८ धनुपरिमित पुष्करती है।
पुष्करको नैऋत ओर किञ्चित् वामभाग, २८ धन
परिमित वदरिकाश्चमतीर्थ है। यहां विभाण्डक
नामक शिवलिङ्ग पधिष्ठित है। पुष्करके पूर्वभागमें
कुमार नामक सरोवर है। यहां स्थाणु नामक
महादेव हैं। उक्त चम्पकेश्वरके नामानुसार ६२
धनुपरिमित स्थानमें एक वन है। वह चम्पकवनके
मामसे प्रसिद्द है। नीलकूट की पूर्व और दुर्गाकूपसे
३ धनु दूर घाम्रातकेश्वर नामक महादेव हैं।
श्रामातकेखरको दक्षिण भोर ८ धनु दूरवती स्थानमें
कृष्णवर्ण गजाकार गणदेवको मूर्ति है। उसको पूर्व
पोर १ धनु दूर विधिक्रमको मूर्ति विराजती है।
इस मूर्तिसे १ धनु दूरवती स्थानमें ४० इस्तपरिमित
सौभाग्य सरोवर है। यह कामाख्या देवीका क्रीड़ा
सरोवर कहाता है। इसोको ईशान पोर लोहित्य
सरोवर, पग्निकुण्ड धौर यामलसरोवर है। सौभाग्य
सरोवरसे ५ इस्त दूरवर्ती ने त दिकमें गङ्गासरः है।
इसके उपरिभागमें अगस्यकुण्ड है। इस कुण्डको
पूर्व और कृष्णशिलाको पश्चिम पोर वराहतीर्थ है।
इसके अग्निकोणमें कम्बन नामक शिवको मूर्ति
अधिष्ठित है। अनन्तकुण्डको पश्चिम ओर असिचनको
मदी है। उससे पचिम वरुणा नदी वही है।
'यह साल स्थान श्रेष्ठ तीर्थ गिने जाते हैं। यहाँ
यथाविधान पूजादि कार्य करनेसे अनन्त पुण्य
होता है।
{{Right|(योगिमीतन्त्र, राह पटल)}}
'मानमतीर्थ नामी महानदीको उत्तर ओर २ धनु
दूरवर्ती स्थानमें प्रेतशिला है। वासुदेवसे १८ धनु
दूर पश्चिम ओर पञ्चकोण उत्तरतीर्थ है। कोटि-
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
लिङ्गसे दक्षिण चतुष्कोण शिवमूर्तिका नाम दक्षिण-
मानस है। कामनाथसे ७ धनु दूर पश्चिम पोर
दीर्धेश्वरी देवी है । कामेश्वरदेवको उत्तर ओर १२ हस्त
दूरवर्ती स्थानमें कामसरोवर है। कम्बलदेवको दक्षिण
भोर ८ धनु दूरवर्ती स्थानमें कोटीश्वरी देवी हैं।
लोकचक्षु देवीसे २ धनु दूरवर्ती स्थानमें तीन धारा है।
हममें मध्य धारा सरखतौ, दक्षिण धारा वरुणा और
उत्तर धारा यमुना कहाती है। विधाराके सङ्गमस्थल
पर आकाशगङ्गा हैं। उनको उत्तर ओर प्रतिदूर
शुक्लवर्ण वासुदेवको मूर्ति है। कामेश्वरके पश्चाद्भागमें
सिद्धेश्वरको मूर्ति है। उनके निकटवर्ती स्थानमें
छायारुद्र हैं। विध्याचलके निकटवर्ती स्थानमें
विन्ध्येश्वरी शिन्ता है। उसको पूर्व-उत्तर भोर १००
धनु दूर आकाशगङ्गाका चिह्न मिलता है। इसके
दक्षिणभागमें सुरदीर्घिका शिला है। यह शिक्षा
ललिताकान्ता कहाती है। इस स्थानमें नन्दि-
रूपी अश्वत्थ और उसके मूलदेशमें कूक्तिति
चिला है। इससे अनतिदूर व्यासतीर्थ और व्यांसेश्वर-
देवका अवस्थान है। व्यासतीर्थसे २० धनु दूर पूर्व
और इस्तिरूपिणी देवीमूर्ति है। इसौकी पूर्व ओर
प्रतिदूर हस्त परिमित भुवनेखरको मूर्ति है।
उसके वायुकोण पर अगस्त्याश्रममें गङ्गाधरको मूर्ति
है। गङ्गाधरको अनसिदूरस्थ उज्ज्वल खेतशिलाका
नाम जल्पोश है। उसको पश्चिम और सदाशिव-मूर्ति
है। सदाशिव निकटवर्ती स्थानमें हो, गोविन्द
पर्वतस्थित गोविन्दकी मूर्ति है। उसको पूर्व ओर
धनु परिमित रक्तवर्ण शिलाका नाम शरणयी है।
उच्च शिवाचलमें प्रकटा नाम्नी महादेवी हैं। विध्या-
उत्तर पार धनु दूरवर्ती स्थानमें महालक्ष्मो
हैं। श्रीपर्वतमें बौकुण्ड नामक तीर्थ है। गोतमाश्रममें
वृषभध्वज नामझ शिवको मूर्ति और इंसतीर्थ सरोवर
है। पाण्डुकूटसे निकलनेवाली धाराका नाम. नर्मदा
नदी है। शिव और विष्णुमूर्तिके मध्यवर्ती स्थानसे
जो धारा आती, वह महानदी कहाती है। - नितम्ब
और धन उभयको मध्यवर्ती धारा मङ्गला नामसे
विख्यात है। विखंत्री पर्वतके सीमादेश निःसृत<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४४०|कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
धाराको सरस्वती कहते हैं। मतङ्ग पर्वतको धारा भी
नर्मदा नामसे पुकारी जाती है। कामकुण्डको .
धाराका नाम कामगङ्गा है। कामाख्याको धारा
गङ्गा कहाती है। नीलकुण्डको धाराको उर्वशी कहते
हैं। व्यासकुण्डको धारा सुभद्रा नामसे अभिहित है।
शक्रशैलकी धाराका नाम चन्द्रभागा है। सोमकुण्डको
धारा उर्वशी नामसे प्रसिद्ध है। यमशैलको धाराको
वैतरणी और भण्डौथको धाराकी गोदावरी कहते हैं।
धर्मारण्य के मध्य रामद नामक तीर्थ है। उससे ३०
धनु दूर उत्तर ओर कोटिलिङ्ग है। इसी लिङ्गके
सम्मख भागमें ब्रह्मायोनि है।
'वराह और कामके मध्यवर्ती स्थानमें अपुनर्भव
क्षेत्र तथा अपुनर्भव नामक ८ धनुपरिमित सरोवर है।
उसके उत्तर.तौर भद्रकाश पर्वत है इसी पर्वतम
पौत्रवित्ता और शोणच्युति शिला है। उसके ५ धनु
दूरवर्ती स्थानमें भववीथी नामक क्षेत्र है। अपुनर्भवको
पूर्व ओर धनु दुर ७ धनु विस्तृत वाराणसीकुण्ड है।
उसको पूर्व दिक् ५ धनु दोघं मार्कण्डेय इद है।
हुदके उत्तर तोर मार्कण्डेश्वर शिव हैं। गोकर्ण
अनतिदूर ब्रह्मसरः नामक कुण्ड है। उसको पश्चिम
दिक शैलरूपी वराहदेव हैं। गोकर्णको ईशान दिक्
३धनु दूरवर्ती स्थान पर मदन पर्वत है। वहां
केदार नामक महादेवको मूर्ति विराजित है।
केदारको पश्चिम दिक ब्रह्मवटवश है। केदारको
उत्तर दिक ३ धनु दूरवर्ती पौष्यक नगर में कमलाक्ष
ब्रह्मवट नामक कल्पवृक्षसे ३ धनु दूर
दक्षिणदिक को छत्रकोर पर्वत है। इसीके मध्य
.देशमें मन्दार नामक उन्नत गिरि है। छवकीरको
पूर्व और मधुरिपुनामक विष्णुको मूर्ति है। इसी
पर्वतको उत्तर दिक २० धन दूर कपिलाश्रम है।
वहां कपिलखा देवता हैं। कपिलाश्रमकी पूर्व
दिक ११ धनु दूर पिशाचमोचन तीर्थ है। यहां
कालभैरव देवता हैं। व्यानेश्वरदेवको ईशान दिक,
१० धनुदूर कत्तिवासेखर हैं। मदन पर्वतको ईशान
दिक. ३ धनु दूर वाणेश्वर, सप्तपातालभेदक और
वाहत लिङ्ग हैं। वाणेश्वर के वायुकोणमें गरु लिङ्ग प्रभा,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
है। उसको पश्चिम दिक् विष्णुका मन्दिर है। मणि-
कूटको उत्तर दिक, वलभा नदी है। मणिकूटको
पूर्वदिक पनतिदूर विष्णुका पुष्करतीर्थ है।
'यथाविधान इन तीर्थों में नान, दान, पूजा,
प्रदक्षिण पादि कार्य करनेसे अक्षय पुण्य लाभ
होता है।'
{{Right|(योगिमीतन्न २१-८ पटख)}}
कालिकापुराण और योगिनीतन्त्रक पाठसे काम-
रूपके प्राचीन भूतान्तका बहुत परिचय मिलता है।
कालिकापुराणके मतानुसार कामरूपमें निम-
लिखित पर्वत विद्यमान हैं,-.
१ चन्द्रगिरि, २ सुरस, ३ नौल, ४ कृति-
वासा, ५ मुतीक्ष्ण, ६ विधाट, ७ शुभाचल, ८ धवन,
८ गन्धमादन, १० गोप्रान्त, ११ मणिकूट, १२ मदन,
१३ दर्पण, १४ रोहण, १५ पग्निमान्, १६ कंसकर,
१७ वायुकूट, १८ दुर्गाल, १८ चन्द्रकूट, २० आनन्द
वा भस्माचल, २१ मत्सप्रध्वज, २२ काम, २३ सुकान्सक,.
२४ रचकूट, २५ पाण्डुनाथ, २६ चित्रवह, २० जन-
गिरि, २८ कष्ट, २८ वराह, ३० पर्वाक्, ३१ कन्जड,
३२ दुर्जयगिरि, ३३ चोभक, ३४ सन्ध्याचल, ३५ भग-
वान्, ३६ शृङ्गाट, ३७ नाटक, ३८ हेम, ३८ भद्रकाश,
४० नन्दन। इनको छोड़ योगिनीतन्त्रमें निम्नलिखितः
पर्वत भी कहे हैं,-४१ मन्दशैन, ४२ विहगाचल, ४३,.
स्पर्शचल, ४४ ब्रह्मायूप, ४५ विन्ध्याचल, ४६ मानशैल,
४७ शिवयूप, ४८ इन्द्रशैल, ४८ श्रीशैल, ५० मतक,५१.
हास्याचल, ५२ कोतपर्वत, ५३हस्तिकणं,५४ विकणंक,
५५ अमांचल, ५६ ह्युमन्त, ५७ कनक, ५८ नौस-
लोहित, ५० गन्धर्व, ६० पिशाच, ६१ पादित्य, .
६२ भन्नातक, ६३ धनद, ६४ महीध्र, ६५ जनक, 44
नल, ६७ मण्डल, ६८ यम, ६८ गोविन्द, ७० विखत्री,
७१ भण्डीश, ७२ छत्रक, ७३ परिपात्र, ७४ पूर्णशैत
इत्यादि।
वालिकापुराणमें कामरूपकी निनलिखित
नदियोका नाम मिलता है,-
१ सुवर्ण मानस, २ जटोद्धवा, ३ विस्रोता, ४ सिता
५ नवतोया, ६ योगदा, ७ महानदी, ८ वा<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh||कामरूप|४४२}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
वर्णवहा का सुवर्णश्री नदीका वर्तमान नाम
सुवर्णसिरी या सोवनसिरी है। यह नदी लखीमपुर
जिलेसे प्रवाहित हो ब्रह्मपुत्र में मिली है। कामा
लखोमपुर जिलेको वर्तमान कारानदी है। यह भी
ब्रह्मपुत्र में मिल गयी है।
सोमासनांका वर्तमान माम सिसी है। यह
श्वेतगङ्गा वर्तमान सदिया निकट प्रवाहित हैं।
राइ नदी है। इसीके निकट दिक्करवासिनीका प्राचीन लेकर 8वें अध्याय तक यह सम्यक रूपसे
'मन्दिर है।
विष्ठत है-नरकासुर कौन थे और कैसे कामरूपक
दिव्य यमुनाकी आजकल केवल यमुना कहते हैं। राजपद पर बेठे। ( उनके विशेष विवरणमें लिखा कि
यह नदी नागापहाड़से निकली है।
भगवान् विष्णुको कपासे उन्हें कामरूपका राजत्व
दमनिका उत यमुना नदौके पूर्व प्रवाहित हैं। मिला।) नरकासुरको कोर्ति पद्यापि कामरूपमें देख्नु
भांजकल यह दिमीना नामसे प्रसिद्ध है।
पड़ती है। नरकासुर और कामाख्याक सम्पर्कमें
कलिङ्गिका नौगांव निलेको कलङ्ग नदी है। यह निम्नलिखित कई किंवदन्ती प्रचलित हैं,-
ब्रह्मपुत्र में पतित हुयो है।
नरकासुरने किसी समय स्त्रीय प्रामुरिक दर्पमें
कपिलगङ्गिका वा कपिलाको पाजकल कपिली उन्मत्त हो भगवती कामाख्यासे विवाह करनेका
कहते हैं। यह जयन्ती पहाड़से निकल ब्रह्मपुत्र में प्रस्ताव उठाया था। उस समयं भगवती कामाख्याका
गिरी है।
मन्दिरादि बना न था। ति सामान्य भावसे भरण्यके
वृधगङ्गा दरङ्ग जिलेकी बड़गड नदी है।
मध्य पीठस्थानमात्र था। नरकका प्रस्ताव सुन
दोपवती दरङ्ग जिलेको दीपोता नदी है। भगवतीने कहा, 'यदि आप एक रातमें हमारा
दिक्षुनदीका वर्तमान नाम दीख है। यह शिव मन्दिर, मार्ग, पुष्करिणी इत्यादि समस्त निर्माण कर
सागरके निकट ब्रह्मपुत्र में मिली है। योगिनीतन्त्रके सकें तो हम प्रापको पति बना सकती हैं। मरकन
मतमें यही नदी प्राचीन कामरूपको पूर्व सीमा थी। उसी समय विखकर्माको वुन्ला उनके साहाय्यसे रात्रि-
चम्पावती ग्वालपाड़े जिले में प्रवाहित वर्तमान समाप्त होनसे पहिले ही प्रायः समस्त कार्य सम्पत्र
चम्यामती नदी है। इसके दक्षिणांशका नाम गदा करा दिया। भगवतीने देखा,-'महाविपद पा पड़ी।
धर है।
अब हमें असुरकी भार्या बनना पड़ेगा।' इस प्रकार
मानसा ग्वालपाड़े जिलेको मानहा नदी है। चिन्ताकर उन्होंने एक मायारूपो नुक्कट बनाया। नरकके
पिच्छिला दरङ्ग जिलेकी पिछला नदी है। यह कार्यसमाप्त होने से कुछ पहिले ही वह अपना प्रात:-
विश्वनाथकै निकट ब्रह्मपुत्र में गिरी है।
कालीन ध्वनि सुनाने लगा। - कुक्क टध्वनि हाते हो
होरिका नदीका वर्तमान नाम हिलिक है। यह भगवतीने नरकसे कहा,-'कार्यशष होनसे पहले
शिवसागर जिलेसे बह लखीमपुर जिलेके मध्य हो कर, ही कुकट बोसने सगा। रात्रि वीत गई। प्रभात
ब्रह्मपुत्र में मिली है।
हम आपको वरण करने पर प्रखप्त नहीं
हो सकती।' भगवतीके वाक्यसे क्रोधान्ध हो नरकने
धनदा पाकल धनेश्वरी कहाती है। यह नागा
यहाड़से निकल ब्रह्मपुत्र में पतित पुयी है। यही
श्रीपीठको पश्चिम सीमा है।
1
उस कुक्कटको मार डाला था। कुकुटके-मारे जाने का
स्थान भाजकल भी - "कुकुराकटारको नामसे प्रसिद्ध
पातामको वुरप्लीमें लिखा है कि-महौरङ्ग
नामक एक दानव कामरूपके प्रति प्राचीन राजा थे।
इस बातका कोई विशेष विवरण नहीं मिलता-वह
दानव कौन थे और कैसे या किस तरह उनके शासन में
कामरूप पाया।
लखीमपुर जिले में प्रवाहित है।
महोरङ्गवंशके पोछे नरकासुर कामरूपके राज-
दिक पद पर प्रतिष्ठितं हुये । कालिकापुराणके ३६वें से<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|
४४३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
है। सबसे पहिले नरकासुरने ही उक्त समय भगवती
कामाख्या का मन्दिर बनवाया था।
रामायण के समय कामरूप (प्राग्ज्योतिषपुर )के
शासनकर्ता नरकासुर थे। सीताको ढूंढ़नेके लिये
सुग्रीवने वामरादि सब देशों और दिशाओं में भेजे थे।
एक वानर कामरूपमें भी पा पहुंचा। वानररान
सुग्रीषने उस समय कामरूपका ऐसा परिचय
दिया था-
“योजनानि चतु:यष्टिराहो भाम पर्यवः ।
सुवर्षय ममहानगाधे यरुषालये । ३०
वव भागग्योतिष' नाम मातरूपमयं पुरम्।
मस्मिन् वसति दृष्टान्मा नरको नाम दानवः ॥२॥"
{{Right|(किचियाकाण, ४२ मग)}}
वर्तमान गौहाटीमें नरककी राजधानी थी। *
गौहाटोके पश्चिम दक्षिण पाच नोलाचलके निकट
भरकासुर नामक क्षुद्र पर्वत भी है।
नरकासुरके पोछे भगवान् श्रीकृष्ण ने उनके पुत्र
भगदत्तको कामरूपके सिंहासन पर बैठाया था ।
पूर्वदिक, चीनदेश और दक्षिण समुद्र पर्यन्त भगदत्तने
खीय शासन विस्तार किया। महाभारतकै समापर्वमें
अनके दिग्विजय पर भगदत्तका विषय इस प्रकार
लिखित है।
"सकिरातय पीनेय इतः प्रागल्यौतिषोमवत् ।
अन्य बहुमियाँध्यः सागरानुपवासिमिः।"
उन्होंने किरात, चीन, और समुद्रतीरवर्ती राजा-
यसि परिवत ही पर्जनके साथ युद्ध किया था।
कुरुक्षेत्रमें युद्धकै समय भी भगदत्तने चीन और
किरातको सेनासे दुर्योधनको साहाय्य दिया था।
अनेक स्थसमें नरकको म्लेच्छ, कामरूपेखरको
म्लेच्छोंका अधिप और कामरूपके अन्तर्वी देशों को
ग्लेच्छदेश लिखा गया है। प्रकृत कामरूपदेशका भी
किसी किसी ग्रन्थमें स्लेच्छदेश नाम मिलता है। इसका
कारण कामरूप तीर्थ विवरण प्रारम्भमें ही बता
दिया है।
• गौहाटीका से प्राचीन नाम प्रागल्यौतिषपुर था।
"प्रागज्योतिषपुर खातं कामाखायौनिमयलम्।"
{{Right|(यौगिनौतन, १२ पटव)}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
योगिनीतन्त्रर्म कामरूपके राजविवरण पर इस
प्रकार भविषहाणी लिखी है-
"कमवापुरम्पस्य राज्यमाशी या मवेत् ।
सहिनात परमेयानि बधमापः प्रवर्तते ।
सतोऽतीव दुराचारी कामदप भविष्यति।
सदा युद्ध महामायै सदा दुतमेव च ॥
देवदानवगन्धर्वाः सदा पौड़ापरायणा।
कुपूर्वकुखटापन्हें गते सार्क दिवानिशाम् ।
सौमारय कुवाय यवन हमस्वयम् ।
भविष्यति कामपृष्ठे बहुसैम्पसमाकृष्ठम् ।
न्ततीच सोमार गित्वा यवन-प्टिमम् ।
वर्ष मेवाकरोद्रानी मकारादिमहीपतिः।
सनमहायं समासाद्य कुवाच: खोयरामामाक् ।
वर्षाने यवनं हित्वा सौमारी राज्यनायकः।
कुमारीचन्द्रकान्दो गरी शाके मईचरि।
काम:मणैः पृष्ठसंयोग सम्भविष्यति ।
कामवपे नधा राज्य हादयाम्द महेश्वरि ।
वाचसहावी मूत्वा यवनय करिष्यति ।
षष्ठवर्ग पञ्चमादिततः भरीरमिछति ।
भासितम्यं कामपं सोमाय वाचकः ।
यवनय कुवाचा सौमारय तथा प्रवः ।
कामपाधिपी देवि गापमध्येन चान्धकः।
एवमेव बहुविध वधी खचणमौयरि।
क्रियते सत्कारकरं प्रत्यच परमैचरि
वशिष्ठस्य सपस्यादावनिः गाम्यति कामिनि ।
मविषानि च तरव: मालाखापर्वतोपरि।
वर्गहार मिलापात चैक वैपुरसनिधी।
कामाखाया मठे भने उपया सहयनमः।
ब्रह्मपुवस्य देवषि सूचधारातु वस्यच ।
पौड़गाद गते शाके भूमहोरिपचुनके
विगतो भविंसा न्यून' सीमारकामपृष्ठयोः ।
थपमानव स'पूना उत्तराकालकीषयोः ।
गमिष्यन्ति चं रामानः सर्व युद्धविभारदाः।
कुधार्यवनयान्वन्धसमाकुलः।
विमि छ: समाको महायुह भविषाति
पत्रमुरमुर्गनमक विशेषतः
स्वोदित्यो रसपूर्णय मविपाविन समयः ।
सदैव परमा माया योगिनीगणवन्दिवा.
कामाख वर्णकण्यामा बलिइस्ता सन्मुखो।
सोलनिहा मुग्धमाखा दिग्वना परमास्थिता
पर्व साय कमाथित्य रसपान करिपाति।
सतः कुवाची यवनं हित्वा सौम्यविनाभिवः।<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४४४|
कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
करतोयानदी थावत् करिषाति महद्रयम् ।
दशा तन संस्खाय यास्यन्ति पुनरालयम् ।
सती विमो स्पो मला कामपनिवासिनः।
करिषाति मनान देवी नपपूजादितत्परान् ।
एवं वर्ष वये राज्य कला को हिलो नृपः।
भविषावि महामायै योनिमणयसविधौ।
ततो दादगदले नाभिः कल्पते पूर्वभूमिपः ।
ईथानीमागतः कामामेकछव' करिपाति।।
नद्रामा सकलं दैविधा पावयिषाति।
तत्पी ग्यामवर्णा स्यात् सदाराधितपाती।
सवितं सनयं साध्वी राजान राजपुतकम्।
तजन्मदिवसाई वि यावत् स्यादवादगदिनम् ।
यावत् स्पांचल स्पर्णमपिराविमविष्यति ।
तमेव धनिमः सर्वे कामरूपमिवासिनः।
भविषान्ति सटव स्थान वशिष्ठशापमोचनम् ॥"
{{Right|(योगिनौतन्त्र, १९ पटल)}}
किसी समय कामरूपराज (नरक ) मन्दबुद्धि
होगे। उसी समय उनका रान्ध मिट जावेगा।
तदवधि कामरूपमें ब्रह्मयाप होनेसे नियत दुर्व्यवहार
और युद्धादि बढ़ेगा। फिर देवदानव गन्धर्व प्रभृति
भी पीड़ादायक बन जावेंगे।
१३११ शक( ? )में सौमारों, कुवाचों और
यवनोंका विपुल युद्ध उपस्थित होगा। इस युद्दमें
मकारादि कुवाच जय पा एक वर्ष राज्यशासन करेंगे,
फिर १३१४ शक( ? )में सौमार कामरूप पधिकार
कर बारह वर्ष राज्य चन्नावेंगे। इसी प्रकार शाप-
कालके मध्य यवन, * कुवाच, सौमार + और प्लव
थासनकर्ता बनेंगे । एतव्यतीत दूसरे भी कई
लक्षणादि सङ्घटित होंगे। वशिष्ठ ऋषिका
तपीदावानन शान्त
होने पर्वत पर यास
{{Gap}}योगिनीतबमैं यवम चौर भवनातिको उत्पतिक सम्बन्ध पर इस
प्रकार लिखा है,-"कोरवयुद्ध शायपुर बाटोकोके मरनेसे उनका वंश
बिलकुल मिट गया। उसी समय कोमि नायौ कोई वाडौकरमकी
विश्वनाथ मुक्तिमपमै म विश्वेशरको तपस्या करती थीं। बलिपुव .
वाणासुर उस समय महाकाल पसे हारोंको रक्षा करते थे। वर
कौमिका सौन्दर्य देख, काममुग्ध हुये। फिर सोमे उनसे सा किया
फिर उससे परिन्दम नामक, पापाचारी एव पुत्र उत्पन्न वा। फिर
महादेवने उन्हें शायरामा कामरूप दे 'प्रव' पर्चात लामो का विदा
किया था। इससे वह मामसे मिश्तिये।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
वृक्ष उपनेंगे। उसी समय शिखाके पात कामाख्याका
मठ टूट जावेगा। फिर ब्रह्मपुत्रका सङ्गम होनेसे
उर्वशीको जलधारा घटेगी। इस घटनादिके पीछे
मोक्षह वर्ष बीतने पर १११ शक(?)में सौमार
और कामपीठमें एक युद्ध होगा। छह मास 8.
स्थानमें युद्ध होने के पीछे समस्त योहा उत्तराकाचकोषमै
पहुंच भयहर संग्राम करेंगे। इस युद्दमें कुवाच,
यवन और चान्द्र विविध म्लेच्छ सैन्यमें बहुसंख्यक
सैन्य तथा प्रख गमादि मरनेसे युद्धस्थल रत
प्लावित हो जायेगा। दिगम्बरो मुण्डमाला विभूषिता
वेतायुगमैं बाहनामक धर्मपरायण एक राजा थे। उन्होंने समदीपक
मध्य समस्त पिठमव चौकीरा समग्र प्रथिवीम एकाधिपत्य स्थापित किया।
दुर्भाग्यवश इस कार्य करने से सनक सनम पाडार उपस्थित वा पौर
उसी पपराध परराजलभोने हम्हें छोड़ दिया। फिरीय और तालबार-
दो रामायने सन्दरा राज्य अधिकार किया था। वा सपरिवार वनकी
भाग थो दिन पौ? मर गये। मामसे उनके पुव सगरने वयामाप्त पिवयव
ध्य पोर वाहन पर पाकमण किया। उन्होंने हार मान वशिष्ठवा'
पात्रय दिया था। सगर मी वशिष्ठके निकट मांकर पोख,-'इम इन
दोनों पिशव वॉक भिरकाटने की प्रतिज्ञा की है। उधर पाप पात्रय दै
इन्हें मारनेसे रोकते। समय कार्य इमकी पालनीय। मुतरी बतला-
इये-हम क्या करें। वशिहने कहा, 'भास्त्रमै शिरच्छेद और
शिरोमण्डन एकरूप माना गया है। पतएव पाप इनको शिर मुंडवा'
देशसे भगा दो। इससे उमय दिक् रथा होगी।' सगरने वशिष्ठ
वाक्यानुसार एमको मतक मुडम करा निकाला था। पिर वह सुपेक्ष
सनिक निकट पर उनके उपदेशानुसार तपस्या करने बने। किन्तु
उस समय वह अत्यन्त मंकाचार बन गये चोर दवधि यवन भामसे
ख्यात हुये। फिर मी उन्होंने तपोबलसे महादेवको रिमाया पौर
कलियुगमें रामा होने का वर पाश । (योमिमौवन्न, ६ पटल)
{{Gap}}किसी समय इन्द्र कौशाहक साथ मृत्यगीत दर्शन करते थे।
उस समय नबियोंके मध्य कादती नाघी पसराका हावभाव देख
कौशाहीका मन विचवित पवा। सीसे इन्द्रने समानको होमेका
अभिशाप दिया था। बाडवो यथासमय. कौरववध पा कर ग्यौं ।
फिर करवमै नब शत शत कोरवरमयी प्रावस्याग करने वौ,
वह चन्दचड़ पर्वतके पति सच शिखर पर चढ़ गयो। नहीं उन्हें
मृतुकाल या था। इससे वह अपना कामपोषित यौ। उसो
समय एने उस पथरी नाते जाते देख सनसे सम्भोग-विया था।
उससे मारनामक महामवाली एक पूर्व उत्पन्न हुवा।
रुद्रके अनुप्रासे सब बामपका राजा बन गया। परिहमके .
ही बमवर सौमार नाम प्रसिद्ध ।(योगिनीता, १५ पटस)<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूपं|
४४५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
श्यामवर्णा कामाख्या देवी सहास्यमुख लोल
जिह्वा विस्तारपूर्वक योगिनियों के साथ पर्वतके
शिखर पर चढ़ कर रणका शोणित पान करेंगी।
कुवाच (कोच) इस युद्धमें जीत दश दिन वास कर
स्वदेशको लौट जायेंगे। इसके पीछे कामरूपदेशमें
ब्राह्मण राजा होंगे। राज्यमें वह प्रमादिको पूजा
और जप प्रभृति कार्य में लगा देंगे। इसी प्रकार वह
तीन वर्षे राजशासन करेंगे। फिर ब्राह्मणराजा योनि
मण्डलके निकटवर्ती स्थानमें वासस्थान ठहरा क्रम
क्रमसे एकच्छवी राजा बन
बैठेंगे इन राजाका पत्नी
'श्यामवर्ण होंगी। पति और पत्नी दोनों सर्वदा
पार्वतीको पाराधमा रह यथाकाल सवित नामक एक
पुत्र लाभ करेंगे। इस पुत्रके जन्मसे बारह दिन पर्यन्त
स्पर्शाचल पर्वतसे स्पर्शमणिका आविर्भाव होगा।
उससे कामरूपवासी सब धनी बन जायेंगे। फिर इसी
समय वशिष्ठ ऋषिका अभिशाप छुटेगा।
१६थ शताब्दके प्रारम्भमें वोचविहार राजवंधक
थी । कांचवंशसम्भूत हाजो नामक किसी व्यक्तिके
और जीरा नामको दो परमसुन्दरी कन्या रहीं।
कामरूप धरानक होते समय कोच निकटवर्ती
पन्यान्य इतर लोगोंको वशीभूत कर कुछ पराक्रान्त
बन गये थे। पराक्रममें कोचोंके मध्य हाजो अपाणी
रहे। प्रवादानुसार महादेवके औरससे होराके गर्भ
शिशु वा शिवसिंहने और जीराके गर्भमें विश वा विश्व-
सिंहने जन्म लिया था। कामतापुर देखो। ई० १६वें
शताब्दके प्रारम्भ पर ही विश्वसिंहने कोचविद्यारमें
राजत्व किया। विश्वसिंहने मुसलमानों द्वारा विध्वस्त
कामतापुर राज्य छुड़ा लिया था। पाधुनिक वुरक्षोके
मतमें उन्होंने १४२०१३. शक (१४८८१५०८ ई.) के
मध्य कामरूप अधिकार किया। उससे पहले
कामरूपमें थोड़े दिन मुसलमानोंका राजल रहा।
भासामी भाषाम रामसरखवी पणितका लिखा एक पन्य है।
उसको देखने से मालूम पड़ता है कि हरिदास मामक किसौ भादमौके
चौरस और होराकै गर्मसे विय वा विश्वसिंहका जन्म हुवा। रामसरखती
महाराज नरनारायणको समाक पंडित थे।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
हुसेनशाहके पुत्र शासनकर्ता थे। किन्तु उस समय
कोचोंका बड़ा उस्यात रहनेसे हुसेनशाहके पुत्र नसरत
शाह कामरूप छोड़ने पर वाध्य हुये। विश्वसिंहने
उसी सुयोगमें अवशिष्ट मुसलमानोंको भगा राज्य
अधिकार किया था। उन्होंने अति पराक्रमके साथ
१५२८ ई. तक रानव चचाया। उन्हों के रानवकालमें.
लुप्त कामाख्यापीठका उद्धारसाधन किया गया था।
फिर कामाख्याक अनुवर्ती भनेक पौठस्थान आविष्कत
भी हुये। कोचविहारके प्रतिपक्षमें राजा होते भी
कामरूप उस समय विखसिंहके शासनाधीन था।
कामरूपको सीमा कोचविहार तक फैली हुई थी।
विश्वसिंह समय अहोमोंने उजनिखण्ड पर पाकमण
किया। विश्वसिंहने सैन्य भेज पाक्रमण हटाया
था। किन्तु उनके सैन्यदनके उक्त स्थान छोड़ते हो
फिर अहोमोंने उत्पात उठाया। सुतरा विश्वसिंहने
बाध्य हो उनसे सन्धि को थो। उसी समय रामलुगड़
पूर्वसौमा माना गया।
कामरूप और विहार राज्यको
मूल पुरुष शिववंशीय विखसिंहने परामकता हटायो
होरा विश्वसिंहने डिमल्या. प्रभृति स्थानोंके सकल
क्षमतामाली विख्यात लोगोंको वशीभूत कर लिया
था। फिर उन्होंने कपास, सांवे, रांगे, सीसे, रुपे, साने,
चांदी, लोहे, कांच, मिट्टी, नमक वगैरह पर कर
लगा राज्यका पाय बढ़ाया। उन्होंके समय भोटान-
में वाले सर्वदा उपद्रव उठाया करते थे। उस समय
भोटानमें देवराम रामा थे। . विश्वसिंहने . उनकी
साथ सन्धि की। राज्य के सीमान्त-प्रदेशमें शान्ति
रक्षाके लिये विश्वसिंहके सिपाही नियुक्त थे।
विश्वसिंहके १८ सन्तान रहे। उनमें नरनारायण
सर्वजाष्ठ थे। उनको ही सिंहासन मिला। उनके
परवर्ती कनिष्ठ भ्राता चिलाराय वा शलध्वज राज्यक
दीवान या सेनापति बने। नरनारायणने शङ्करदेवके
माता रामगयकी कन्या कमनप्रिया पापीसे विवाह
किया था। किसी किसीके कथमानुसार शुलाध्वजका
उक्त शहरदेव गौराबादेवकै समसामयिक थे। वह भूषावगीय रहे,
समसामयिक, कामरूपमें वैशवधर्म प्रचार किया था। बनासक गोराादवको...:
भांति वह भी कामरूपम विणका अवतार मान नाते।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४४६|
कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
कमनप्रियासे विवाह हुवा। विवाहके स्थानको आज भी
"रामरायका कोठी" कहते हैं। ग्वालपाड़ा जिलेके
चना परगने में उक्त स्थान विद्यमान है। वहां मेला भी
लगता है। कमलनारायण नामक किसी दूसरे
कुमारने भो भाटान और आसामके मध्य ब्रह्मपुत्रके
उत्तर किनारे एक बांध बांधा था। उस बांधका नाम
"गोसाई कमलको प्रालि" है। लखीमपुर और
जलपाईगुड़ीके मध्य अनेक स्थलोंमें उसके चिह्न प्रान
भी वर्तमान हैं। उस समय सजन वा सुजन
ग्राममें पण्डित रामखान भूया नामक एक राजा थे।
उन्होंने चुपके चुपके विद्रोहको पाग सुलगायो।
किन्तु पन्तको भय देख उन्हें भागना पड़ा।
आसामको बुरजी और पन्यान्य इतिहासके मता
नुसार विश्खसिंहके बड़े पुत्र नरनारायण और
छोटे शलध्वज वा चिलाराय थे। किन्तु राम
सरस्वती पण्डित-प्रपीत ग्रन्थमें लिखा है,-
विखसिंहके शयीसिंह नामक एक पुत्र थे। शशी
सिंह पल्प वयसमें लोकान्तर प्राप्त हुये। उनकी
कन्याक गर्भसे (ठीक नहीं किसके औरससे) पपुत्रक
विश्वसिंह रानाके परम सुन्दर रूपवान् एक दौहित्रका
जन्म हुवा। पण्डितांने उसका नाम नारायण रख
दिया।
उक्त नारायण और उनके भ्राता शक्लध्वज (चिसा
राय) का नाम कामरूपमें सविशेष प्रसिद्ध है।
महाराज नरनारायण अधिक बलशाली थे। उन्होंने
विदेशियों के हाथसे सम्पूर्ण रूप उदार कर कामरूपको
बहुत उति को। महाराज नरनारायणका दूसरा
नाम मलदेव वा मलनारायण था। उनके समय
पुरुषोत्तम विद्यावागीधने संस्कृत रत्नमाला व्याकरण
बनाया। वह प्राजकल आसाममें प्रचलित है।
हिन्दूधर्म विद्वेषो विख्यात कालापहाड़ • १५६४
"श्रीमल्लदेवस्य गुर्ण कसिन्धीमहीमहेन्द्रस्य यथा निर्देशम् ।
यबात प्रयोगोचमरवमाला वितन्यते श्रीपुरुषोत्तमन।" रखमाला)
पाधुनिक बुरशीक मसमें १४९. शकको रखमाला बनी थी।
{{Gap}}कामरूप पचलमें कालापाहारको "पोरासुठार" "पोराकार,
भोर "कालामृठाम" भी कहते है।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
या १५६६ ई० को भगवती कामाख्या देवीका मन्दिर
तोड़ने गया था। कोचविहारमें उस समय महारान
नरनारायण राजा थे । कालापहाड़ के पराक्रमसे सन्त्रस्त
हो उन्होंने सन्धि को।कालापहाड़ भगवतीका
मन्दिर तोड़ और पीठस्थानवर्ती सुन्दर सुन्दर अन्यान्य
प्रतिमूर्ति बिगाड़ स्वदेशको नौट गया। महारानने
अपने माताके साथ भगवतीके मन्दिरादिका पुनः
संस्कार किया। कमसे कम बारह वर्षमें उस
नीर्ण संस्कारका कार्य सुसम्पन्न हुवा था। कामाख्या
मन्दिरको वर्तमान (चलन्ता) मूर्ति (जो साधारणतः
सरकायी जाती है) महाराज नरनारायणको बनायो
है। वर्तमान मन्दिरके मध्यभागमें ही महाराज
नरनारायण और उनके माता शुक्लध्वजको प्रस्तर
खोदित सुन्दर दो प्रतिमूर्तियां प्रद्या पिं वर्तमान हैं।
महाराज नरनारायण और शुक्लध्वन महामायाके
परम भक्त थे। भगवती भी उन पर यथेष्ट अनुग्रह
रखती थौं। महाराज कोचविहारसे विन्न ब्राण ले
जाकर भगवतीको पूजा आदि निर्वाह करते थे।
केन्टुकलाई नामक कामाख्याके एक पुनारी ब्राधण,
महाराज नरनारायण और शुक्लध्वजके सम्बन्ध पर
कामरूपमें अद्यापि निम्रलिखित जनप्रवाद प्रचलित
है-सन्ध्याको केन्दुकलाईके भारति करते समय
भगवती मुग्ध हो घण्टा वायके ताल ताल पर नृत्य
करती थों। महाराज नरनारायणने यह सुन
केन्टुकलाईसे भगवतीको चैतन्य मूर्ति देखनेका उपाय
पूछा। उन्होंने कहा कि घण्टा बजते समय सन्ध्याको
किसी रन्ध्रसे देखने पर उन्हें भगवती को चैतन्य मूर्तिका
दर्शन होगा! महाराजने उक्त परामर्शके अनुसार
एक दिन जाकर भगवतीको देखा था। दैवात्
भगवतीको यह बात मालूम हो गयो। उन्होंने केन्दु-
कचाईका शिर काट महाराज नरनारायणको शाप
दिया,-'भविष्यत्में तुम और तुम्हारे वंशका कोई
भी इमारा-दर्शन- कर न सकेगा। -मन्दिरको ओर
देखनेसे शिरश्छेद होगा।' उक्त शापके भयसे आज
भी कोचविहार, बिजनी, दरा इत्यादि शिववंशी
राजपरिवार कामाख्याके मन्दिरको भोर प्राय जाते<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|४४७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
जात प्रांख नहीं उठाता। किसी कार्यवश कामाख्या
की भोर गमन करते समय कपड़ेसे मुंह छिपा लेते है।
{{Gap}}मृत्यु के पीछे विश्वसिंहका राज्य नरनारायण और
शक्तध्वज दोनों पुत्रों के मध्य बंटा था। नरनारायणको
वर्णकोषोके पश्चिम तौर और शक्लध्वनको इसके
पूर्व तौरका समस्त राज्य मिला। शुक्लध्वजके
अंशमें ही ब्रह्मपुत्रके उभय तौरका भूभाग पड़ा।
सुतरा कामरूपमें भी उन्हींका अधिकार था।
शुक्लध्वजके पोछे उनके पुत्र रघुदेवनारायण राजा
हुये। उनके दो पुत्रों में ज्येष्ठ परीक्षित थे। कनिष्ठ
का नाम ज्ञात नहीं। उन्हें जायगौरकी भांति दरङ्ग
प्रदेश मिला था। उनके वंशधर आज भी पासामी
-राजाओंके अधीन उक्त प्रदेश अधिकार करते हैं।
परीचित्ने समग्र राज्यके अधोखर हो गिलाभाड़
नामक स्थान प्रासाद बनाया। वहां राजप्रासादका
भग्नावशेष आज भी देख पड़ता है। प्रासादके
निकट ही १८ दुर्ग भी बने थे। उनकी सभामें नित्य
७०० वेदपारग ब्राह्मण उपस्थित रहते थे। फिर उक्त
नगरमें ही ब्राह्मणांका भावास था। परीक्षितके ही
समयमै ढाकेके मुसलमान शासनकर्ताने मुगलसम्राटके
प्रतिनिधित्व में राजख मांगा था। फिर उन्होंने
सतोना भी शुरू किया। परीबित्ने भौत हो
मन्लियोंसे परामर्श लिया था। फिर वह सम्राटके
पास पागरे गये। वहां सम्राट्ने उन्हें दरबारमें
सादर ग्रहण किया। ढाकेके नवाब पर पादेश हुवा
कि परीक्षित् जितना रुपया राजखमें दें उतना हो
वह ले लें, कोई दिक्षति न करें। राजाने लौट कर
सरल मनसे नवाबको दो करोड़ रुपये देने कहा।
उनके मन्त्रीने यह सुन मुसलमानों के प्रसङ्गत अर्थ
लीभकी बात बतायी। इससे वह महामौत हो गये।
शेषको परामर्श करने पर स्थिर हुवा कि एक बार
वह फिर सम्राटके दरबार में ना भ्रम संशोधन कर
पाते। चक्षते समय मन्त्री भी साथ हो गये। किन्तु
दुर्भाग्यक्रमसे जाते समय पटनेमें (किसीके मतानुसार
राजमासादी) राजा परीक्षित् मर गये। इसी मुयोगमें
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
नवाबको फौजने 'प्रतिश्रुत अर्थ के लोमसे राज्य पर
अधिकार कर लिया। परीक्षितके मन्त्री अनेक कष्टसे
सम्राट्के दरबारमें पहुंचे थे। उन्होंने जा कर समस्त
विवरण निवेदन किया। सम्राटने उन्हें कानूनगोके
पद पर नियुक्त कर विदा किया था। उस समय
यह राज्य चार सरकारोंमें बंट गया-ब्रह्मपुत्रक
उत्तर उत्तरकूल या टेकेरी सरकार, दक्षिण दक्षिण-
कूल, पश्चिम बङ्गाल सरकार और गोहाटीके साथ
कामरूप सरकार। परीक्षितका स्वावराज्य दरङ्ग
उन्होंके अंशमैं रहा। परीक्षित्के पुत्र चन्द्रनारायणने
एक बड़ी जमीन्दारी भी पायी थी। वह जमीन्दारी
पाज भी उनके वंशीय भोगते हैं। प्राचीन मन्त्री
(नये काननगो)को भी उनके लिये बहुतसी समी-
न्दारी मिली। उख घटमा प्रायः १६.३ ई० में हुयी
थी। एका मुसलमान फौजदार नियुक्त हो रांगामाटी
नामक स्थानमें रहने लगे। फिर राजा मानसिंहक
बङ्गाल-विहारके नवाब हाते समय इस देशको विशेष
उति हुयी। औरङ्गजे के समय मोरजुमला
सैन्यदलले प्रासाम जय करने आये थे। उनके पो
कामरूपराज्यके उक्त अंश कामरूप, उत्तरकूल पौर
दक्षिणकूल . सरकारका कुछ भाग पासामवाले
रानावोंके अधिकारमें चला गया।
उस घटनाक
७० वर्ष पीछे रांगामाटोको फौजदारी उठ घोड़ाघाटमें
स्थापित हुयी।
मौरजुमलाके भाक्रमणके पीछे भामामके राजावाने
हिन्दूधर्म ग्रहण किया था। फिर वह नाममात्र फौज-
दारको पचोमता मान राजत्व करने लगे।
नरनारायण पौर शुक्लध्वज उभयंके मध्य राज्य-
विभागको बात पहले लिख चुके हैं। किन्तु
शुक्लध्वजके जीवित कालमें राज्य विभाग हुवा न
था। शुक्लध्वजके मरने के पोछे नारायण पपुत्रक
थे। इससे उन्होंने शुक्लध्वजके पुत्र रघुदेव नारा-
यणको. पोष्यपुत्र मान ग्रहण किया। उसके कुछ
दिन पीछे उनके एक पुत्र हुवा। रघुदेवको उससे
भविष्षतमें राज्यपाप्तिको आशा न रही। इससे चंह
भीतरी भीतर विद्रोहाचरण में प्रवृत्त हुये। अन्तमें<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४४७
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|४४८}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
नारायणको सब वात. मालूम हो गयी। फिर रखदेव
भाग कर पूर्वाप्नलके शवासे मिले और उनका सैन्य ले
ज्येष्ठनाताके राज्य भाक्रमणार्थ पापईचे । नारायण भी
खराज्य रक्षणार्थ ससैन्य अग्रसर हुये। स्वर्णकोषी नदीके .
पूर्व पार रघुदेव और पश्चिम पार नारायणको छावनी
पड़ी थी। नारायण स्वयं अखारोड़ी सैन्य ले पागे
बढ़े। रघुदेव भोत हो ससैन्य भागे थे। नारायणन
पाक्षेप कर कहा,-"दुःख है कि हम रान्य देनेके
लिये ही आये थे। किन्तु वह बात न हुयी। इस
लिये यह नदी ही पव दोनों राज्य सीमा रहगी।"
श्रावनिक आसामको बुरष्क्षीके मतमें उक्त घटना १५०३ .
शकको हुयी थी। रखदेवके राज्यको सीमा पश्चिम
स्वर्ण कोबी एवं पूर्व दिकराई और नारायणके राज्यको
सोमा पूर्व स्वर्णकोपौ पयिम करतोया थी। रघुदेवने
म्बालपाड़े जिलेके जोयार परगर्नमें आधुनिक गौरीपुर
नगरसे १० मील दूर गदाधरनदीके तीर नगर स्थापन
किया था।
शुक्लध्वजके जोते समय कामाख्याका मन्दिर फिरसे
बना था। मन्दिर समाप्त होने में १० वर्ष संगे।
किसी पश्चिमी हिन्दुस्थानीने उसे बनाया था। मन्दिरक
पूर्व द्वारके सम्मुख उक्त केन्टुकलाई पुरोहितके छिन्द्र
मुण्डको प्रतिमूर्ति वर्तमान है। शुक्लध्वजके नीवित
कालमें नरनारायण एक बार शनिग्रस्त हुये थे। न्योति
षियोंने गणना कर उक्त कथा
दी। फिर नरनारा-
यणने शुलध्वजको राज्यका प्रतिनिधि बना तीर्थयात्रा
की थी। प्रायः एक वर्ष पीछे वह लौटे। उत्त भ्रमणके
समय प्रासामराज्यके खेतइस्ती पर उनको लोम
बढ़ा। शुक्लध्वनकी यह खबर लग गयी। वह भ्राताको
दृप्तिके लिये आसामरानको युद्दमें परास्त कर हाथी
ले आये थे। अनेकांके कथनानुसार उक्त घटनासे हो
उनका नाम "शलध्वन" हुवा।
भावनिक बुरजीके . मतमें १५०६ शकको नर।
'नारायण मरे थे। फिर उनके पुत्र लक्ष्मीनारायणको
स्वर्गकोपीसे महानन्दा. और सरकार
घोडाघाट तथा भोटानके दक्षिणस्थ पार्वत्व प्रदेश तक
समस्त भूभाग उनके राज्यके अन्तर्भूत था। उक्त राज्य .
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
पश्चिमोत्तरसे दक्षिणपूर्व तक ९• मोक्ष दीर्घ और पूर्वो--
त्तरसे दक्षिणपश्चिम तक ६ • मौच विस्तृत रहा। उत्तर
पश्चिममें ककटा मौमान्त प्रदेश शिवसिंह (उच होरा
और जीराक मध्य नीराके पुत्र ) के मन्तानोंको दिया
गया। लक्ष्मीनारायण अपने राज्यको पहलेसे ही
"विहार" कहते थे। कारण शिव हौरा और जीराके.
साथ विहार करते थे। किन्तु मधदेयके वर्तमान
विहार (पटना) प्रदेशसे स्वतंत्रता दिखाने के लिये.
"कोचविहार नाम रक्खा गया।
आईन: प्रकवरीके अनुसार सुमोनारायणन प्रक-
वरको वचता मानी थी। उनके समय राज्यको
सीमा उत्तरमें सिव्वत, दक्षिप, घोड़ाघाट, पश्चिममें.
बिहुत और पूर्वमें ब्रह्मपुत्र यौ। भूमिका परिमाण-
फल दैव्य में प्रायः २०० कोम रहा। उनके 8....
अश्वारोही सैन्य, २ लाख पदाति, ७०० हस्ती
पौर १००० जहाज थे। फिर पाईन-अकबरीम
लक्ष्मीनारायणके पिताका नाम गुरुगोस्वामी रिणा
है। गलगोस्वामी नहीं, उनके कनिष्ठ खाता वाड.
गोस्वामी राजा थे। उन्होंने विवाह न किया था।
इससे उनके मन्तान कोई न था। बालगोस्वामी
अति सुविन राजा थे। उन्होंने अपने भातुष्प व
पाटकुमारको राज्याधिकारी ठहराया । शक्तगोस्वामौन
दूसरा विवाह किया था। उमौसे लक्ष्मीनारायणका
जन्म हुवा। पाटकुमार विट्रोही बने थे। उमौ
समय मानसिंह बङ्गालेके नवाव रहै । लक्ष्मीनारायणन
मानसिंहसे सम्राटी निकट परिचित होनेको प्रार्थना
को । किन्तु मानसिंहने वह वात न सुनी। मानमिंटने
उनकी एक कन्याका पाणिग्रहण किया था।
गोस्वामीने १५७८ ई० को एक बार बङ्गालक नवावको
अधीनता मान दरवारमें ५४ हाधियोंके माय विसर
उपटोकन दिया। लक्ष्मीनारायण १५८६ ई.में
राजत्व करते थे।
: ताजक-जहांगीरीके अनुसार सक्ष्मीनारायणने
१६१८ई को गुजरातको राजसमाम ५००. अगरफी
मज़र मेनी थीं।
वादशाइनामेको देखते जहांगोरखे समयं परीचित्<noinclude></noinclude>
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