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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१४०
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१३८'''|'''गाठवन - गड़ग'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>और दर्द होता है। जिस अंग में यह रोग होता है, वह अंग फैलता नहीं है। इस बीमारी में कभी-कभी ज्वर और सन्निपात भी हुआ करता है, जिससे रोगी शीघ्र ही मर जाता है। यह रोग विशेषकर जोड़ों या गिरहों में हुआ करता है।
५. वृक्ष में एक प्रकार का रोग। इसमें डालियों का फैलना समाप्त हो जाता है तथा पत्तियाँ सिकुड़ और ऐंठ जाती हैं। यह रोग सिर्फ आम, जामुन जैसे बड़े-बड़े वृक्षों में ही नहीं होता, वरन् फसली पौधों में भी हुआ करता है। उड़द, मूँग तथा कुम्हड़ा, ककड़ी, करेला आदि तरकारियों में भी यह रोग उत्पन्न होकर उन्हें नष्ट कर डालता है।
{{outdent|गाठवन (हिं० पु०) मझौले तरह का एक वृक्ष। इसकी शाखाएँ पतली और पत्तियों में जगह-जगह पर गिरह होते हैं। इसमें नीले रंग के फूल लगते हैं। नेपाल की उपत्यका में यह पेड़ पाया जाता है। इसकी गोलाकार कलियाँ दवा में उपयोगी हैं। वैद्यक में इसे तीखा, चरपरा, गरम, अग्निदीपक तथा कफ, वात, श्वास और दुर्गन्ध को नाश करने वाला माना है। खुजली भी इस दवा से जाती रहती है।}}
{{outdent|गठुवा (हिं० पु०) भूसे की गाँठ जो खलिहान में फेंक दी जाती है। इसे बुन्देलखण्ड में गेठुआ और अवध में खूँटी बोलते हैं।}}
{{outdent|गड़वा (हिं० पु०) १. कपड़े का एक भाग। जुलाहे इसे करघे में रखते हैं, जिससे कि उसके तागे से ताने के तागे को गाँठकर बुनने के लिये चढ़ावें। २. मेठुरा, गंढरा घंटी।}}
{{outdent|गठौंद (हिं० स्त्री०) १. गाँठ की बधाई, गिरहबन्दी। २. धरोहर, थाती।}}
{{outdent|गठीत (हिं० स्त्री०) १. मित्रता, घनिष्ठता, मेल, मिलाप। २. अभिसंधि, साँठ-गाँठ।}}
{{outdent|गठीती (हिं० स्त्री०) १. मैत्री, घनिष्ठता। २. षड्चक्र, गाँठ-गाँठाई बात।}}
{{outdent|गड़खाना (हिं० पु०) बारूद, गोले और हथियारादि रखने का स्थान, मैगज़ीन।}}
{{outdent|गड़गिया (हिं० वि०) घमण्ड करने वाला, शेखीबाज़।}}
{{outdent|गड़न्त (हिं० पु०) टोटके या अभिचार के लिये गाड़ने की वस्तु। तान्त्रिक या प्रेतविद्या के जानने वाले मारण,
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
मोहन और उच्चाटन के लिये थोड़े पदार्थों को मन्त्र पढ़कर किसी चौराहे पर गाड़ देते हैं और इस गाड़ने को गड़न्त कहते हैं।}}
{{outdent|गड़ (सं० पु०) १. मत्स्यविशेष, एक प्रकार की मछली। २. व्यवधान, ओट, आड़। ३. परिवेष्टन, घेरा। ४. खाई। ५. गढ़। ६. अन्तराय, विघ्न, बाधा।}}
{{outdent|गड़— गुजरात में रेवाकान्ठा के अन्तर्गत शङ्खेडा मेहवास का एक राज्य। इसके उत्तर और पूर्व में छोटा उदयपुर, दक्षिण में नर्मदा और खान्देश तथा पश्चिम में पलासिनी और वीरपुर है। इसका क्षेत्रफल २१ वर्ग मील है। लोकसंख्या प्रायः ३,०१८ है। इस राज्य में २८ ग्राम लगते हैं। अधिवासी प्रायः भील जाति के हैं। चौहान राजपूत वंशीय एक सामन्त इस राज्य के अधिपति हैं। सालाना आमदनी ८,३७७ रु० है और उदयपुर के राजा को ३६५ रु० देना पड़ता है।}}
{{outdent|गड़क (सं० पु०) गड़ संज्ञायां कन्। मत्स्यविशेष, एक प्रकार की मछली।}}
{{outdent|गड़क (अ० पु०) १. डुबाव। २. बकने का शब्द।}}
{{outdent|गड़गड़ा (हिं० पु०) एक प्रकार का हुक्का।}}
{{outdent|गड़ग— १. बम्बई प्रान्त के धारवाड़ का पूर्वीय तालुक। यह अक्षा० १५° २' और १५° ३८' उ० तथा देशा० ७५° २६' एवं ७५° ५७' पू० के बीच पड़ता है। इसका क्षेत्रफल ६८.८ वर्ग मील और लोकसंख्या प्रायः १,३७,५७३ है। कप्पट पहाड़ सबसे बड़ा है। जलवायु मुअतदिल (समशीतोष्ण) और अच्छा है। डम्बल तालाब से खेत सींचे जाते हैं।
२. बम्बई प्रान्तीय धारवाड़ जिले के गड़ग तालुक का सदर। यह अक्षा० १५° २५' उ० और देशा० ७५° १८' पू० में दक्षिण मराठा रेलवे पर अवस्थित है। इस नगर की लोकसंख्या ३०,६५२ है। १८५८ ई० को यहाँ म्युनिसिपैलिटी पड़ी। गड़ग में कपास और सूत कातने तथा रेशमी कपड़ों का बड़ा व्यवसाय रहता है और वहाँ जिले का एक कारखाना भी चलता है। यहाँ अच्छे-अच्छे मन्दिरों का ध्वंसावशेष देखने में पड़ता है। इनमें उत्कीर्ण शिलालिपियाँ बतलाती हैं कि गड़ग ८७३, ११७० से ११८३ तक पश्चिमी चालुक्यों }}
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५. वृक्ष में एक प्रकार का रोग। इसमें डालियों का फैलना समाप्त हो जाता है तथा पत्तियाँ सिकुड़ और ऐंठ जाती हैं। यह रोग सिर्फ आम, जामुन जैसे बड़े-बड़े वृक्षों में ही नहीं होता, वरन् फसली पौधों में भी हुआ करता है। उड़द, मूँग तथा कुम्हड़ा, ककड़ी, करेला आदि तरकारियों में भी यह रोग उत्पन्न होकर उन्हें नष्ट कर डालता है।
{{outdent|गाठवन (हिं० पु०) मझौले तरह का एक वृक्ष। इसकी शाखाएँ पतली और पत्तियों में जगह-जगह पर गिरह होते हैं। इसमें नीले रंग के फूल लगते हैं। नेपाल की उपत्यका में यह पेड़ पाया जाता है। इसकी गोलाकार कलियाँ दवा में उपयोगी हैं। वैद्यक में इसे तीखा, चरपरा, गरम, अग्निदीपक तथा कफ, वात, श्वास और दुर्गन्ध को नाश करने वाला माना है। खुजली भी इस दवा से जाती रहती है।}}
{{outdent|गठुवा (हिं० पु०) भूसे की गाँठ जो खलिहान में फेंक दी जाती है। इसे बुन्देलखण्ड में गेठुआ और अवध में खूँटी बोलते हैं।}}
{{outdent|गड़वा (हिं० पु०) १. कपड़े का एक भाग। जुलाहे इसे करघे में रखते हैं, जिससे कि उसके तागे से ताने के तागे को गाँठकर बुनने के लिये चढ़ावें। २. मेठुरा, गंढरा घंटी।}}
{{outdent|गठौंद (हिं० स्त्री०) १. गाँठ की बधाई, गिरहबन्दी। २. धरोहर, थाती।}}
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मोहन और उच्चाटन के लिये थोड़े पदार्थों को मन्त्र पढ़कर किसी चौराहे पर गाड़ देते हैं और इस गाड़ने को गड़न्त कहते हैं।}}
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{{outdent|गड़— गुजरात में रेवाकान्ठा के अन्तर्गत शङ्खेडा मेहवास का एक राज्य। इसके उत्तर और पूर्व में छोटा उदयपुर, दक्षिण में नर्मदा और खान्देश तथा पश्चिम में पलासिनी और वीरपुर है। इसका क्षेत्रफल २१ वर्ग मील है। लोकसंख्या प्रायः ३,०१८ है। इस राज्य में २८ ग्राम लगते हैं। अधिवासी प्रायः भील जाति के हैं। चौहान राजपूत वंशीय एक सामन्त इस राज्य के अधिपति हैं। सालाना आमदनी ८,३७७ रु० है और उदयपुर के राजा को ३६५ रु० देना पड़ता है।}}
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२. बम्बई प्रान्तीय धारवाड़ जिले के गड़ग तालुक का सदर। यह अक्षा० १५° २५' उ० और देशा० ७५° १८' पू० में दक्षिण मराठा रेलवे पर अवस्थित है। इस नगर की लोकसंख्या ३०,६५२ है। १८५८ ई० को यहाँ म्युनिसिपैलिटी पड़ी। गड़ग में कपास और सूत कातने तथा रेशमी कपड़ों का बड़ा व्यवसाय रहता है और वहाँ जिले का एक कारखाना भी चलता है। यहाँ अच्छे-अच्छे मन्दिरों का ध्वंसावशेष देखने में पड़ता है। इनमें उत्कीर्ण शिलालिपियाँ बतलाती हैं कि गड़ग ८७३, ११७० से ११८३ तक पश्चिमी चालुक्यों }}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१४१
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गड़गड़ाहट - गड़लवण|'''१३८'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
तक कलचुरियाँ, १०४०-१२१ तक होयसल बल्लाल और १२२६ से १५६५ ई० तक विजयनगर के राजाओं का गड़ग में अधिकार रहा। १६७३ ई० को नसरताबाद या धारवाड़ जिले का बङ्गापुर सरकार का प्रधान जिला था। १८१८ ई० को जनरल मुनरो ने गड़ग घेर लिया। इसमें अदालत, अस्पताल और विद्यालय वर्तमान हैं।
{{outdent|गड़गड़ाहट (हिं०) १. गड़गड़ाने का शब्द। २. हुक्का पीने का शब्द, वह आवाज़ जो हुक्का पीने से निकलती है।}}
{{outdent|गड़गड़ी (हिं० स्त्री०) नगाड़ा, डग्गी।}}
{{outdent|गड़गूदड़ (हिं० पु०) चिथड़ा, लत्ता, फटे-पुराने कपड़े का टुकड़ा।}}
गड़गा— असम के शिवसागर जिले के अन्तर्गत एक प्राचीन नगर और गढ़। यह शिवसागर नगर के दक्षिण-पूर्व और देईखु नदी के तीर पर अवस्थित है। एक समय यह अहम् राजाओं की राजधानी थी। इसका ध्वंसावशेष अब तक भी विद्यमान है। राजगृह एक कोस विस्तृत ईंटों की दीवारों से घिरा था। आजकल उसका कुछ चित्र दिखाई पड़ता है।
गड़चोंद— बङ्गाल के अन्तर्गत तिरहुत जिले का एक परगना। इस परगना होकर छोटी गण्डक, बागमती और लखनदेई नदियाँ प्रवाहित हैं। यहाँ बहुत-सी पक्की सड़कें हैं। इस परगना की अदालत मुजफ्फरपुर है। इसके अन्तर्गत सरोफ उद्दीनपुर, धमोर, अकबरपुर और कई एक ग्राम प्रसिद्ध हैं। अकबरपुर ग्राम में चामुण्डा देवी का मन्दिर है, जहाँ प्रतिवर्ष आश्विन मास में एक बड़ा भारी मेला लगता है।
{{outdent|गड़दार (हिं० पु०) मतवाले हाथी के साथ भाला लेकर चलने वाला नौकर, वह नौकर जो बदमाश हाथी के साथ गड़दार (भाला) लेकर चलता हो।}}
{{outdent|गड़प (हिं० पु०) पक्षिविशेष, एक बड़ी चिड़िया।}}
{{outdent|गड़प (फा० स्त्री०) पानी या कीचड़ में किसी वस्तु के गिरने का शब्द।}}
{{outdent|गड़प्पा (हिं० पु०) धोखा खाने का स्थान।}}
{{outdent|गड़वच (हिं० स्त्री०) १. ममतल या मोचा। २. अनियमित, वह जो ठीक समय पर न किया जाता हो।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|गड़बड़ा (हिं० पु०) गर्त, खत्ता, गड्ढा।}}
{{outdent|गड़बड़ी (हिं० स्त्री०) अव्यवस्था, गोलमाल।}}
गड़मान्दारण— वर्तमान जिले के जाहानाबाद महकुमा के अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम। इसका दूसरा नाम विठुरगढ़ है। मुसलमानों के समय में यहाँ मृत्तिका निर्मित एक बड़ा गढ़ था। यहाँ समाईल गाजी वली लस्कर नामक मुसलमान साधु की कब्र है। स्थानीय मुसलमान अधिवासी साधु को अत्यन्त भक्ति-श्रद्धा के साथ देखते हैं।
गड़मुक्तेश्वर— उत्तर-पश्चिमाञ्चल के मेरठ जिले का एक प्राचीन नगर। यह अक्षा० २८° ४७' उ० और देशा० ७८° ६' पू० में गङ्गा के दक्षिण किनारे, गढ़-मुक्तेश्वर-मन्दिर से दो कोस नीचे में अवस्थित है। लोकसंख्या प्रायः १०,६१६ है। बहुतों का कहना है कि यह नगर एक समय प्राचीन हस्तिनापुर का एक महल्ला कहकर प्रसिद्ध था। यहाँ मुक्तेश्वर महादेव का मन्दिर है। इन्हीं के नाम पर नगर का नाम रखा गया है। इसके अतिरिक्त और कई एक पुरातन तथा ८० मन्दिर और भी हैं। यहाँ कार्तिक मास में एक लाख से अधिक मनुष्य जुटते हैं और एक भारी मेला लगता है।}}
{{outdent|गड़यन्त्र (सं० पु०) गड़बड़ी, बिगड़ा हुआ भाग।
{{outdent|गड़रातवा (हिं० पु०) लौहविशेष, एक तरह का लोहा जो प्राचीन काल में मध्य भारतवर्ष में निकलता था।}}
गड़रिया— युक्त प्रदेश की एक जाति। यह भेड़-बकरी पालते और चराते तथा उनके कम्बल आदि बनाते हैं। गड़रिया अपना परिचय क्षत्रिय वंशीय जैसा देते हैं। ये कहते हैं कि 'गड़वामी राजवंशियों' का नाम बिगड़कर 'गड़रिया' हो गया है। दूसरों का मत है कि गदाधारी हनुमान के उपासकों अथवा भेड़ (गद) पालने वालों को गड़रिया कहा जाता है। इनके बहुत से भेद मिले हैं।}}
{{outdent|गड़लवण (सं० क्ली०) गड़देश में लवणं, साम्भरदेशोत्पन्न, शुभ्र लवण, साम्भर नमक। इसका पर्याय— शुभ्र, पृथ्वीज, महदेवन, गोड़त्व, महारम्भ, साम्बर और सम्भर। इसका गुण— उष्ण, लवण, मलनाशक, दीपन, कफ-वात और शूल नाशक तथा कोष्ठ परिष्कारक है। भावप्रकाश के मत से इसका गुण— लघु, वातनाशक, अतिशय उच्च, भेदकारक, पित्तवर्धक, तीक्ष्ण और कटुपाक है।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१६२
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''''''|'''१६०'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{C|smaller|"सकालो नमस्कारो समझा बदिरी कविता"}}}}
पुर, सत्सर, मारनपुर, सोहांसो, रेवा, बाग्वा, मज्जा और सोनपुर में इसका घाट है।
{{outdent|गण्डकी (सं० स्त्री०) गण्डक-ङीष्। १. गण्डक जातीय स्त्री, मादा गेंडा। २. कोई नदी, बड़ी गण्डकी। इसका दूसरा नाम नारायणी, शालग्रामी और हिरण्यवाह है। यह停留 हिमालय में नेपाल राज्य के मध्य अक्षा० २७° २७' उ० और देशा० ८३° ५६' पू० पर सप्तगण्डकी शैल से निकल करके दक्षिण-पश्चिम को चल गोरखपुर और चम्पारन जिले के बीच में मुजफ्फरपुर के पश्चिम और सारन के पूर्व प्राप्त होती हुई पटना के अपरपार (सामने) गङ्गा में मिल गई है। गण्डकी के पूर्व की ओर गोसाईंथान के पार्वतीय तुषारराशि से स्रोतस्विनी रूप में परिणत होकर चम्पारन के उत्तर-पश्चिम त्रिवेणीघाट से नदी के रूप में प्रवाहित होना प्रारम्भ किया है। यहाँ पूर्व ओर के तट पर कच्चे पत्थर का एक पहाड़ है। उसमें पेड़ भरे पड़े हैं। इसकी दूसरी ओर जङ्गल है। यहाँ से हिमालय की तुषारराशि देख पड़ती है। त्रिवेणीघाट से प्रायः ९ कोस पथ दोनों ओर वनाकीर्ण है। नदी पहाड़ी भूमि पर बहने से जल भी परिष्कृत है। बाढ़ के समय पार्श्वस्थ भूमि दूरस्थ भूमि की अपेक्षा ऊँची हो जाती है। किनारे पर ज़मीन की जो जगह नीची पड़ती है, वहाँ से बाढ़ का पानी घुस करके निकटस्थ प्रदेश को प्लावित करता है। बाढ़ से देश को बचाने के लिए अनेक स्थानों पर बाँध लगाया गया है। इस प्रदेश की ज़मीन का पानी इकट्ठा होकर नदी में नहीं आता, दूसरी ओर चला जाता है। पहाड़ से जहाँ नदी निकली, वहाँ अत्यन्त तीव्र स्रोत है। फिर बीच-बीच में भँवर का पानी मिलता है, जिसमें नाव चलाने का सुभीता नहीं पड़ता। उससे नेपाल की लकड़ी भले ही आया करती है। बर्फ गल करके जल निकलने से यह कभी नहीं सूखती। वर्षा के पीछे जगह-जगह इसमें बालू की रेत पड़ जाती है। कोई ठिकाना नहीं कि कब कहाँ रेत खुलेगी। बरसात में गण्डकी कहीं आधी और कहीं एक कोस चौड़ी हो जाती है। किन्तु शीतकाल में किसी भी जगह २३ रस्सी से ज्यादा चौड़ाई नहीं बनी रहती। सत्तरघाट, संग्रामपुर, गोविन्दगञ्ज, बरियारपुर, रतवाल, बगहा, नारायणपुर, सनीचरी, सलीमपुर, सत्तर, मारनपुर, सोहांसो, रेवा, बाग्वा, मज्जा और (तन्त्रमाला)}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
गण्डकी नदी अति प्राचीन काल से पुण्यसलिला जैसी विख्यात है। (स्कन्दपुराण, अवन्तीखण्ड ८४, पातालखण्ड ११३।१६, भविष्य पुराण २०१।१०) महाभारत-सभापर्व के २०वें अध्याय में लिखा है कि कृष्ण, अर्जुन और भीमसेन कुरुदेश से चल कुरुजाङ्गल पार होकर पद्म सरोवर पहुँचे थे। वहाँ से कालकूट पर्वत अतिक्रम करके वह गण्डकी, चक्रावर्ता और कोई पार्वत्य स्रोतस्विनी पार हुए। बौद्धों के ग्रन्थों में भी गण्डकी नदी का नामोल्लेख मिलता है। फिर यूनानियों की पुस्तकों में भी इसके उल्लेख से खाली नहीं। मेगास्थनीज़ ने इसको कन्दोचतिस (Kandochates) नाम से उल्लेख किया है। टॉलेमी ने इसका कोई नाम नहीं लिखा, परन्तु प्रकारान्तर से इसका वृत्तान्त दे दिया है। उनके मत में वह नदी मलयपुर से निकल शैलपुर वा शालग्राम होती हुई गङ्गा के साथ जाकर मिल गयी है। पहले इसमें शालग्राम शिला मिलती थी। इसी से गण्डकी शालग्रामी वा नारायणी कहलाती है। कहते हैं कि नारायण शनि के भय से अपनी माया के प्रभाव से शैलमय पर्वत बन गए थे। शनि के यह समझने पर कीट रूप में उसके मध्य में प्रवेश कर एक ओर से दूसरी ओर तक उसको खोद डाला। एक वर्ष तक इसी प्रकार उद्विग्न होने पर नारायण का पसीना छूटा था। एक ही गण्ड से कृष्णवर्ण और श्वेतवर्ण दो प्रकार का पसीना निकला। उसी काले पसीने से कृष्णा और सफेद से श्वेत-गण्डकी प्रवाहित हुई। इनमें एक पूर्व और दूसरी पश्चिम को चली थी। एक वर्ष पीछे विष्णु ने अपना रूप धारण करके प्रस्थान किया, परन्तु शालग्राम शिला को नारायण रूप में पूजने को कह दिया। शालग्राम देखो। उसी समय से शालग्राम शिला पूजित हुई है। गण्डकी के जल में नारायण का अंश रहने से वह हिन्दुओं के निकट अति पवित्र है। ३. गण्डकी नदी की अधिष्ठात्री देवी।
गण्डकी देवी ने दस हजार वर्ष पर्यन्त बड़े कष्ट में वायु और पेड़ों के सड़े-गले पत्ते खा करके भगवान् विष्णु की आराधना की थी। विष्णु गण्डकी की तपस्या से सन्तुष्ट होकर उनके पास जा पहुँचे। गण्डकी ने चतुर्भुज...
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''''''|'''१६०'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{C|<small>"सकालो नमस्कारो समझा बदिरी कविता"</small>}}
पुर, सत्सर, मारनपुर, सोहांसो, रेवा, बाग्वा, मज्जा और सोनपुर में इसका घाट है।
{{outdent|गण्डकी (सं० स्त्री०) गण्डक-ङीष्। १. गण्डक जातीय स्त्री, मादा गेंडा। २. कोई नदी, बड़ी गण्डकी। इसका दूसरा नाम नारायणी, शालग्रामी और हिरण्यवाह है। यह停留 हिमालय में नेपाल राज्य के मध्य अक्षा० २७° २७' उ० और देशा० ८३° ५६' पू० पर सप्तगण्डकी शैल से निकल करके दक्षिण-पश्चिम को चल गोरखपुर और चम्पारन जिले के बीच में मुजफ्फरपुर के पश्चिम और सारन के पूर्व प्राप्त होती हुई पटना के अपरपार (सामने) गङ्गा में मिल गई है। गण्डकी के पूर्व की ओर गोसाईंथान के पार्वतीय तुषारराशि से स्रोतस्विनी रूप में परिणत होकर चम्पारन के उत्तर-पश्चिम त्रिवेणीघाट से नदी के रूप में प्रवाहित होना प्रारम्भ किया है। यहाँ पूर्व ओर के तट पर कच्चे पत्थर का एक पहाड़ है। उसमें पेड़ भरे पड़े हैं। इसकी दूसरी ओर जङ्गल है। यहाँ से हिमालय की तुषारराशि देख पड़ती है। त्रिवेणीघाट से प्रायः ९ कोस पथ दोनों ओर वनाकीर्ण है। नदी पहाड़ी भूमि पर बहने से जल भी परिष्कृत है। बाढ़ के समय पार्श्वस्थ भूमि दूरस्थ भूमि की अपेक्षा ऊँची हो जाती है। किनारे पर ज़मीन की जो जगह नीची पड़ती है, वहाँ से बाढ़ का पानी घुस करके निकटस्थ प्रदेश को प्लावित करता है। बाढ़ से देश को बचाने के लिए अनेक स्थानों पर बाँध लगाया गया है। इस प्रदेश की ज़मीन का पानी इकट्ठा होकर नदी में नहीं आता, दूसरी ओर चला जाता है। पहाड़ से जहाँ नदी निकली, वहाँ अत्यन्त तीव्र स्रोत है। फिर बीच-बीच में भँवर का पानी मिलता है, जिसमें नाव चलाने का सुभीता नहीं पड़ता। उससे नेपाल की लकड़ी भले ही आया करती है। बर्फ गल करके जल निकलने से यह कभी नहीं सूखती। वर्षा के पीछे जगह-जगह इसमें बालू की रेत पड़ जाती है। कोई ठिकाना नहीं कि कब कहाँ रेत खुलेगी। बरसात में गण्डकी कहीं आधी और कहीं एक कोस चौड़ी हो जाती है। किन्तु शीतकाल में किसी भी जगह २३ रस्सी से ज्यादा चौड़ाई नहीं बनी रहती। सत्तरघाट, संग्रामपुर, गोविन्दगञ्ज, बरियारपुर, रतवाल, बगहा, नारायणपुर, सनीचरी, सलीमपुर, सत्तर, मारनपुर, सोहांसो, रेवा, बाग्वा, मज्जा और (तन्त्रमाला)}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
गण्डकी नदी अति प्राचीन काल से पुण्यसलिला जैसी विख्यात है। (स्कन्दपुराण, अवन्तीखण्ड ८४, पातालखण्ड ११३।१६, भविष्य पुराण २०१।१०) महाभारत-सभापर्व के २०वें अध्याय में लिखा है कि कृष्ण, अर्जुन और भीमसेन कुरुदेश से चल कुरुजाङ्गल पार होकर पद्म सरोवर पहुँचे थे। वहाँ से कालकूट पर्वत अतिक्रम करके वह गण्डकी, चक्रावर्ता और कोई पार्वत्य स्रोतस्विनी पार हुए। बौद्धों के ग्रन्थों में भी गण्डकी नदी का नामोल्लेख मिलता है। फिर यूनानियों की पुस्तकों में भी इसके उल्लेख से खाली नहीं। मेगास्थनीज़ ने इसको कन्दोचतिस (Kandochates) नाम से उल्लेख किया है। टॉलेमी ने इसका कोई नाम नहीं लिखा, परन्तु प्रकारान्तर से इसका वृत्तान्त दे दिया है। उनके मत में वह नदी मलयपुर से निकल शैलपुर वा शालग्राम होती हुई गङ्गा के साथ जाकर मिल गयी है। पहले इसमें शालग्राम शिला मिलती थी। इसी से गण्डकी शालग्रामी वा नारायणी कहलाती है। कहते हैं कि नारायण शनि के भय से अपनी माया के प्रभाव से शैलमय पर्वत बन गए थे। शनि के यह समझने पर कीट रूप में उसके मध्य में प्रवेश कर एक ओर से दूसरी ओर तक उसको खोद डाला। एक वर्ष तक इसी प्रकार उद्विग्न होने पर नारायण का पसीना छूटा था। एक ही गण्ड से कृष्णवर्ण और श्वेतवर्ण दो प्रकार का पसीना निकला। उसी काले पसीने से कृष्णा और सफेद से श्वेत-गण्डकी प्रवाहित हुई। इनमें एक पूर्व और दूसरी पश्चिम को चली थी। एक वर्ष पीछे विष्णु ने अपना रूप धारण करके प्रस्थान किया, परन्तु शालग्राम शिला को नारायण रूप में पूजने को कह दिया। शालग्राम देखो। उसी समय से शालग्राम शिला पूजित हुई है। गण्डकी के जल में नारायण का अंश रहने से वह हिन्दुओं के निकट अति पवित्र है। ३. गण्डकी नदी की अधिष्ठात्री देवी।
गण्डकी देवी ने दस हजार वर्ष पर्यन्त बड़े कष्ट में वायु और पेड़ों के सड़े-गले पत्ते खा करके भगवान् विष्णु की आराधना की थी। विष्णु गण्डकी की तपस्या से सन्तुष्ट होकर उनके पास जा पहुँचे। गण्डकी ने चतुर्भुज...
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पुर, सत्सर, मारनपुर, सोहांसो, रेवा, बाग्वा, मज्जा और सोनपुर में इसका घाट है।
{{outdent|गण्डकी (सं० स्त्री०) गण्डक-ङीष्। १. गण्डक जातीय स्त्री, मादा गेंडा। २. कोई नदी, बड़ी गण्डकी। इसका दूसरा नाम नारायणी, शालग्रामी और हिरण्यवाह है। यह停留 हिमालय में नेपाल राज्य के मध्य अक्षा० २७° २७' उ० और देशा० ८३° ५६' पू० पर सप्तगण्डकी शैल से निकल करके दक्षिण-पश्चिम को चल गोरखपुर और चम्पारन जिले के बीच में मुजफ्फरपुर के पश्चिम और सारन के पूर्व प्राप्त होती हुई पटना के अपरपार (सामने) गङ्गा में मिल गई है। गण्डकी के पूर्व की ओर गोसाईंथान के पार्वतीय तुषारराशि से स्रोतस्विनी रूप में परिणत होकर चम्पारन के उत्तर-पश्चिम त्रिवेणीघाट से नदी के रूप में प्रवाहित होना प्रारम्भ किया है। यहाँ पूर्व ओर के तट पर कच्चे पत्थर का एक पहाड़ है। उसमें पेड़ भरे पड़े हैं। इसकी दूसरी ओर जङ्गल है। यहाँ से हिमालय की तुषारराशि देख पड़ती है। त्रिवेणीघाट से प्रायः ९ कोस पथ दोनों ओर वनाकीर्ण है। नदी पहाड़ी भूमि पर बहने से जल भी परिष्कृत है। बाढ़ के समय पार्श्वस्थ भूमि दूरस्थ भूमि की अपेक्षा ऊँची हो जाती है। किनारे पर ज़मीन की जो जगह नीची पड़ती है, वहाँ से बाढ़ का पानी घुस करके निकटस्थ प्रदेश को प्लावित करता है। बाढ़ से देश को बचाने के लिए अनेक स्थानों पर बाँध लगाया गया है। इस प्रदेश की ज़मीन का पानी इकट्ठा होकर नदी में नहीं आता, दूसरी ओर चला जाता है। पहाड़ से जहाँ नदी निकली, वहाँ अत्यन्त तीव्र स्रोत है। फिर बीच-बीच में भँवर का पानी मिलता है, जिसमें नाव चलाने का सुभीता नहीं पड़ता। उससे नेपाल की लकड़ी भले ही आया करती है। बर्फ गल करके जल निकलने से यह कभी नहीं सूखती। वर्षा के पीछे जगह-जगह इसमें बालू की रेत पड़ जाती है। कोई ठिकाना नहीं कि कब कहाँ रेत खुलेगी। बरसात में गण्डकी कहीं आधी और कहीं एक कोस चौड़ी हो जाती है। किन्तु शीतकाल में किसी भी जगह २३ रस्सी से ज्यादा चौड़ाई नहीं बनी रहती। सत्तरघाट, संग्रामपुर, गोविन्दगञ्ज, बरियारपुर, रतवाल, बगहा, नारायणपुर, सनीचरी, सलीमपुर, सत्तर, मारनपुर, सोहांसो, रेवा, बाग्वा, मज्जा और (तन्त्रमाला)}}
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गण्डकी नदी अति प्राचीन काल से पुण्यसलिला जैसी विख्यात है। (स्कन्दपुराण, अवन्तीखण्ड ८४, पातालखण्ड ११३।१६, भविष्य पुराण २०१।१०) महाभारत-सभापर्व के २०वें अध्याय में लिखा है कि कृष्ण, अर्जुन और भीमसेन कुरुदेश से चल कुरुजाङ्गल पार होकर पद्म सरोवर पहुँचे थे। वहाँ से कालकूट पर्वत अतिक्रम करके वह गण्डकी, चक्रावर्ता और कोई पार्वत्य स्रोतस्विनी पार हुए। बौद्धों के ग्रन्थों में भी गण्डकी नदी का नामोल्लेख मिलता है। फिर यूनानियों की पुस्तकों में भी इसके उल्लेख से खाली नहीं। मेगास्थनीज़ ने इसको कन्दोचतिस (Kandochates) नाम से उल्लेख किया है। टॉलेमी ने इसका कोई नाम नहीं लिखा, परन्तु प्रकारान्तर से इसका वृत्तान्त दे दिया है। उनके मत में वह नदी मलयपुर से निकल शैलपुर वा शालग्राम होती हुई गङ्गा के साथ जाकर मिल गयी है। पहले इसमें शालग्राम शिला मिलती थी। इसी से गण्डकी शालग्रामी वा नारायणी कहलाती है। कहते हैं कि नारायण शनि के भय से अपनी माया के प्रभाव से शैलमय पर्वत बन गए थे। शनि के यह समझने पर कीट रूप में उसके मध्य में प्रवेश कर एक ओर से दूसरी ओर तक उसको खोद डाला। एक वर्ष तक इसी प्रकार उद्विग्न होने पर नारायण का पसीना छूटा था। एक ही गण्ड से कृष्णवर्ण और श्वेतवर्ण दो प्रकार का पसीना निकला। उसी काले पसीने से कृष्णा और सफेद से श्वेत-गण्डकी प्रवाहित हुई। इनमें एक पूर्व और दूसरी पश्चिम को चली थी। एक वर्ष पीछे विष्णु ने अपना रूप धारण करके प्रस्थान किया, परन्तु शालग्राम शिला को नारायण रूप में पूजने को कह दिया। शालग्राम देखो। उसी समय से शालग्राम शिला पूजित हुई है। गण्डकी के जल में नारायण का अंश रहने से वह हिन्दुओं के निकट अति पवित्र है। ३. गण्डकी नदी की अधिष्ठात्री देवी।
गण्डकी देवी ने दस हजार वर्ष पर्यन्त बड़े कष्ट में वायु और पेड़ों के सड़े-गले पत्ते खा करके भगवान् विष्णु की आराधना की थी। विष्णु गण्डकी की तपस्या से सन्तुष्ट होकर उनके पास जा पहुँचे। गण्डकी ने चतुर्भुज...
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१६३
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गण्डको (छोटो)
गण्डदूर्वा'''|'''१६१'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>भुजशङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी विष्णु को देख करके भक्ति सहकार से नाना विध स्तव किया था। इससे विष्णु और भी प्रसन्न हुए और उससे वर माँगने को कहने लगे। गण्डकी ने कहा— जगदीश्वर! यदि इस दासी पर आपकी करुणा हुई है, तो आप गर्भगत होकर मेरे पुत्र बनिए। इस पर विष्णु बोल उठे— 'गण्डकि! मैं शालग्राम शिला बनकर तुम्हारे गर्भ में वास करूँगा। तुम जगत् में बड़ी विख्यात होगी। तुम्हारा दर्शन, स्पर्शन, अवगाहन वा स्नान तथा जलपान करने से कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकार का पाप छूट जायेगा।' इसी प्रकार वर दे भगवान् अन्तर्धान हुए। इसी से गण्डकी सब नदियों में बड़ी है। भारत में जो शालग्राम शिला भक्ति सहकार से विष्णु समझकर पूजी जाती है, वह गण्डकी नदी से ही आती है। विष्णु के वर से ही वह सबको आदरणीय है। {{Right|<small>(वराहपुराण)</small>}}
गण्डकी (छोटी) बड़ी गण्डकी की तरह यह भी नेपाल राज्य के पहाड़ी जिले में होकर बही है। छोटी गण्डकी नदी बड़ी गण्डकी से कुछ दूर रहकर समान्तराल भाव से चलती हुई सारन जिले के बीच सोनारिया नामक स्थान पर (अक्षा० २५° ४१' उ० तथा देशा० ८५° १४' २०" पू०) घाघरा नदी में गिरी है। इसके उत्पत्ति स्थान का नाम सोमेश्वर पर्वत है। वह चम्पारन के दून पहाड़ का टुकड़ा है। हरहा नामक गिरिसङ्कट इसके बहुत निकट है। इस छोटी गण्डकी का प्रथम अंश हरहा ही कहलाता है। आगे चलकर इसको क्रमशः शिखराना, बड़ी गण्डक और छोटी गण्डक कहते हैं। रामनगर, बेतिया और सुगौली नगर इसके तीर पर अवस्थित हैं। ग्रीष्मकाल को इसमें जल नहीं रहता। उस समय इसका विस्तार ४० हस्त मात्र होता है। किन्तु वर्षाकाल को इसमें प्रचुर जल आ जाता है। उड़िया, धोराम, जमुआ, पण्डई, हरबोरा, बलइया, रामरेखा और मसाई नामक उपनदियाँ इसमें आ मिली हैं। किसी-किसी के मत में छोटी गण्डकी का नाम हिरण्यवती है।
गण्डकी - गण्डकी नदी से निकली एक प्रणालिका है। यह गण्डकी नदी की किसी शाखा से निकलकर सारन
{{Left|Vol VI 41|2em}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</include>
जिले के बीच दक्षिण-पूर्व भाग में शीतलपुर के पास मही नाम से गङ्गा में मिलित हुई है। गोपालगञ्ज, चोकी, हुसनपुरा, कोवाम, गुरखा और शीतलपुर इसके किनारे अवस्थित हैं। गङ्गा में बाढ़ आने से पानी गुरखा तक पहुँचता है और दिघवारा तक सब स्थान जलप्लावित होता है। ग्रीष्मकाल को इसमें सामान्य ही जल रहता है, उस समय किसान इसमें बाँध लगा कृषिकार्य करते हैं। गण्डकी नदी में बाँध पड़ने से इसका पानी कम पड़ गया है। पहले गण्डक नदी तक इसमें बड़ी-बड़ी नावें चलती थीं। आजकल बरसात में हजार मन की नाव गुरखा तक ले जाया जा सकता है। यह ४५ कोस लम्बी है। इसके बीच में नदी का गर्भ ५२ हाथ उतर गया है।
{{outdent|गण्डकीपुत्र (सं० पु०) गण्डक्याः पुत्रः, ६-तत्। शालग्राम शिला, वह शिला जिसे हिन्दू विष्णु समझकर पूजा करते हैं।}}
{{outdent|गण्डकुसुम (सं० क्ली०) गण्डस्य प्रतिकुसुममिव, तत्। हस्तिमद, हाथी का मद।}}
{{outdent|गण्डपद (सं० पु०) गण्डे गण्डपर्वणि पदम्, ७-तत्। पर्वत का उच्च स्थान, पहाड़ की चोटी।}}
{{outdent|गण्डगढ़— पंजाब के अन्तर्गत रावलपिण्डी और हजारा जिला की एक गिरिश्रेणी। यह अक्षा० ३३° ५७' उ० और देशा० ७२° ४६' पू० में अवस्थित है। छछ नामक उपत्यका की ओर यह पर्वत ढालू होता गया है और सब जगह यह ऊँचा और दुरारोह है।}}
{{outdent|गण्डगात्र (सं० क्ली०) गण्ड इव उच्चावचं गात्रमस्य, बहुव्री०। फलविशेष, शरीफ़ा। इसका गुण— शीतल, मधुर, वातपित्तनाशक, श्लेष्मवृद्धिकर, तृष्णानाशक और वमननिवारक है। (भावप्रकाश)}}
{{outdent|गण्डग्राम (सं० पु०) गण्डः भूषणस्वरूपः प्रशस्तः ग्रामः। प्रशस्त ग्राम, वह ग्राम जिसमें बहुत मनुष्य रहते हों।}}
{{outdent|गण्डदूर्वा (सं० स्त्री०) गण्डा ग्रन्थिका दूर्वा, कर्मधा०। दूर्वाविशेष, गाँडर घास। इसका पर्याय— दानी, शतपर्वा, वारुणी, भीमपर्णी, सूचनेत्रा, श्यामग्रन्थि, ग्रन्थिला, ग्रन्थिपर्णी, सूचिपत्रा, श्यामकाण्डा, जलस्था, शकुलाक्षी, कलाया और चित्रा है। इसका गुण— मधुर, वातपित्त, ज्वर, भ्रान्ति और तृष्णा-श्रमनाशक है।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गण्डको(छोटो)गण्डदूर्वा '''|'''१६१'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>भुजशङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी विष्णु को देख करके भक्ति सहकार से नाना विध स्तव किया था। इससे विष्णु और भी प्रसन्न हुए और उससे वर माँगने को कहने लगे। गण्डकी ने कहा— जगदीश्वर! यदि इस दासी पर आपकी करुणा हुई है, तो आप गर्भगत होकर मेरे पुत्र बनिए। इस पर विष्णु बोल उठे— 'गण्डकि! मैं शालग्राम शिला बनकर तुम्हारे गर्भ में वास करूँगा। तुम जगत् में बड़ी विख्यात होगी। तुम्हारा दर्शन, स्पर्शन, अवगाहन वा स्नान तथा जलपान करने से कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकार का पाप छूट जायेगा।' इसी प्रकार वर दे भगवान् अन्तर्धान हुए। इसी से गण्डकी सब नदियों में बड़ी है। भारत में जो शालग्राम शिला भक्ति सहकार से विष्णु समझकर पूजी जाती है, वह गण्डकी नदी से ही आती है। विष्णु के वर से ही वह सबको आदरणीय है। {{Right|<small>(वराहपुराण)</small>}}
गण्डकी (छोटी) बड़ी गण्डकी की तरह यह भी नेपाल राज्य के पहाड़ी जिले में होकर बही है। छोटी गण्डकी नदी बड़ी गण्डकी से कुछ दूर रहकर समान्तराल भाव से चलती हुई सारन जिले के बीच सोनारिया नामक स्थान पर (अक्षा० २५° ४१' उ० तथा देशा० ८५° १४' २०" पू०) घाघरा नदी में गिरी है। इसके उत्पत्ति स्थान का नाम सोमेश्वर पर्वत है। वह चम्पारन के दून पहाड़ का टुकड़ा है। हरहा नामक गिरिसङ्कट इसके बहुत निकट है। इस छोटी गण्डकी का प्रथम अंश हरहा ही कहलाता है। आगे चलकर इसको क्रमशः शिखराना, बड़ी गण्डक और छोटी गण्डक कहते हैं। रामनगर, बेतिया और सुगौली नगर इसके तीर पर अवस्थित हैं। ग्रीष्मकाल को इसमें जल नहीं रहता। उस समय इसका विस्तार ४० हस्त मात्र होता है। किन्तु वर्षाकाल को इसमें प्रचुर जल आ जाता है। उड़िया, धोराम, जमुआ, पण्डई, हरबोरा, बलइया, रामरेखा और मसाई नामक उपनदियाँ इसमें आ मिली हैं। किसी-किसी के मत में छोटी गण्डकी का नाम हिरण्यवती है।
गण्डकी - गण्डकी नदी से निकली एक प्रणालिका है। यह गण्डकी नदी की किसी शाखा से निकलकर सारन
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जिले के बीच दक्षिण-पूर्व भाग में शीतलपुर के पास मही नाम से गङ्गा में मिलित हुई है। गोपालगञ्ज, चोकी, हुसनपुरा, कोवाम, गुरखा और शीतलपुर इसके किनारे अवस्थित हैं। गङ्गा में बाढ़ आने से पानी गुरखा तक पहुँचता है और दिघवारा तक सब स्थान जलप्लावित होता है। ग्रीष्मकाल को इसमें सामान्य ही जल रहता है, उस समय किसान इसमें बाँध लगा कृषिकार्य करते हैं। गण्डकी नदी में बाँध पड़ने से इसका पानी कम पड़ गया है। पहले गण्डक नदी तक इसमें बड़ी-बड़ी नावें चलती थीं। आजकल बरसात में हजार मन की नाव गुरखा तक ले जाया जा सकता है। यह ४५ कोस लम्बी है। इसके बीच में नदी का गर्भ ५२ हाथ उतर गया है।
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गण्डकी (छोटी) बड़ी गण्डकी की तरह यह भी नेपाल राज्य के पहाड़ी जिले में होकर बही है। छोटी गण्डकी नदी बड़ी गण्डकी से कुछ दूर रहकर समान्तराल भाव से चलती हुई सारन जिले के बीच सोनारिया नामक स्थान पर (अक्षा० २५° ४१' उ० तथा देशा० ८५° १४' २०" पू०) घाघरा नदी में गिरी है। इसके उत्पत्ति स्थान का नाम सोमेश्वर पर्वत है। वह चम्पारन के दून पहाड़ का टुकड़ा है। हरहा नामक गिरिसङ्कट इसके बहुत निकट है। इस छोटी गण्डकी का प्रथम अंश हरहा ही कहलाता है। आगे चलकर इसको क्रमशः शिखराना, बड़ी गण्डक और छोटी गण्डक कहते हैं। रामनगर, बेतिया और सुगौली नगर इसके तीर पर अवस्थित हैं। ग्रीष्मकाल को इसमें जल नहीं रहता। उस समय इसका विस्तार ४० हस्त मात्र होता है। किन्तु वर्षाकाल को इसमें प्रचुर जल आ जाता है। उड़िया, धोराम, जमुआ, पण्डई, हरबोरा, बलइया, रामरेखा और मसाई नामक उपनदियाँ इसमें आ मिली हैं। किसी-किसी के मत में छोटी गण्डकी का नाम हिरण्यवती है।
गण्डकी - गण्डकी नदी से निकली एक प्रणालिका है। यह गण्डकी नदी की किसी शाखा से निकलकर सारन
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जिले के बीच दक्षिण-पूर्व भाग में शीतलपुर के पास मही नाम से गङ्गा में मिलित हुई है। गोपालगञ्ज, चोकी, हुसनपुरा, कोवाम, गुरखा और शीतलपुर इसके किनारे अवस्थित हैं। गङ्गा में बाढ़ आने से पानी गुरखा तक पहुँचता है और दिघवारा तक सब स्थान जलप्लावित होता है। ग्रीष्मकाल को इसमें सामान्य ही जल रहता है, उस समय किसान इसमें बाँध लगा कृषिकार्य करते हैं। गण्डकी नदी में बाँध पड़ने से इसका पानी कम पड़ गया है। पहले गण्डक नदी तक इसमें बड़ी-बड़ी नावें चलती थीं। आजकल बरसात में हजार मन की नाव गुरखा तक ले जाया जा सकता है। यह ४५ कोस लम्बी है। इसके बीच में नदी का गर्भ ५२ हाथ उतर गया है।
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{{outdent|गण्डगात्र (सं० क्ली०) गण्ड इव उच्चावचं गात्रमस्य, बहुव्री०। फलविशेष, शरीफ़ा। इसका गुण— शीतल, मधुर, वातपित्तनाशक, श्लेष्मवृद्धिकर, तृष्णानाशक और वमननिवारक है। (भावप्रकाश)}}
{{outdent|गण्डग्राम (सं० पु०) गण्डः भूषणस्वरूपः प्रशस्तः ग्रामः। प्रशस्त ग्राम, वह ग्राम जिसमें बहुत मनुष्य रहते हों।}}
{{outdent|गण्डदूर्वा (सं० स्त्री०) गण्डा ग्रन्थिका दूर्वा, कर्मधा०। दूर्वाविशेष, गाँडर घास। इसका पर्याय— दानी, शतपर्वा, वारुणी, भीमपर्णी, सूचनेत्रा, श्यामग्रन्थि, ग्रन्थिला, ग्रन्थिपर्णी, सूचिपत्रा, श्यामकाण्डा, जलस्था, शकुलाक्षी, कलाया और चित्रा है। इसका गुण— मधुर, वातपित्त, ज्वर, भ्रान्ति और तृष्णा-श्रमनाशक है।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१६४
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{Rh|'''१६२'''|'''गगडदेव – गण्डस्थल'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
तथा शीतल है। भावप्रकाश के मत से इसका गुण शीतल, लोहद्रावक, ग्राही, लघु, तिक्त, कषाय, मधुर, कटुपाक, वातवृद्धिकर, दाह, तृष्णा, दुर्बलता, श्वास, कुष्ठ और पित्तज्वरनाशक है। (भावप्रकाश)
{{outdent|गण्डदेव दक्षिण में गङ्गवंशीय एक प्राचीन राजा। इन्होंने काञ्चीपुर के पल्लवराज और चोल राजा को पराजित किया था। काञ्चीराज गण्डदेव को कर देते थे। पाण्ड्य राजा ने इनके साथ मित्रता की थी।}}
{{outdent|गण्डदेश (सं० पु०) कपोल, गाल, कनपटी।}}
{{outdent|गण्डपाद (सं० वि०) गण्डस्य पाद इव पादोऽस्य, बहुव्री०। जिसके दोनों पैर गैंडे के सदृश हों।}}
{{outdent|गण्डपोलिका (सं० स्त्री०) कीटविशेष, एक प्रकार का कीड़ा।}}
{{outdent|गण्डक (सं० स्त्री०) कीटविशेष, एक कीड़ा।}}
{{outdent|गण्डफलक (सं० क्ली०) गण्डः फलकमिव, उपमितस०। १. विस्तीर्ण गण्ड, बड़ी कनपटी। (वि०) २. जिसकी कनपटी बहुत बड़ी हो।}}
{{outdent|गण्डभित्ति (सं० स्त्री०) गण्डं भित्तिरिव, उपमि०। प्रशस्त कपोल, सुन्दर गाल, अच्छी कनपटी।}}
{{C|<small>"अंसासक्तलतद्गण्डभित्तिभिरूचुः।" (रघु० १२।१०२)</Small>}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</include>
गण्डमार्क— अफगानिस्तान के निकट जलालाबाद से काबुल जाने की राह पर अवस्थित एक ग्राम। यह जलालाबाद से १०॥ कोस की दूरी पर है। यह ग्राम जलालाबाद से अधिक शीतल है। १८३८ और १८४२ ई० को अँगरेज़ और अफगानिस्तान के बीच इसी ग्राम के निकट लड़ाई हुई थी। १८४२ ई० में जब अँगरेज़ी सेना काबुल से लौटकर आ रही थी, तब अवशिष्ट २० सेनानायक और ४५ गोरे इसी स्थान पर कट गए थे।
{{outdent|गण्डमाला (सं० स्त्री०) गण्डानां ग्रीवाजातस्फोटविशेषाणां माला समूहोऽस्यां, बहुव्री०। गले का एक प्रकार का रोग, गलगण्ड, कण्ठमाला। गलगण्ड देखो।}}
{{outdent|गण्डमालिका (सं० स्त्री०) गण्डानां ग्रन्थीनां माला यत्र, बहुव्री०। १. लज्जालु लता, एक प्रकार की लता जिसकी पत्तियाँ छूने से सिकुड़ जाती हैं। २. गण्डमाला।}}
{{outdent|गण्डमाली (सं० वि०) जिसको गलगण्ड रोग हुआ हो।}}
{{outdent|गण्डमूर्ख (सं० वि०) गण्डः अतिशयितः मूर्खः। अतिशय मूढ़, घोर निर्बुद्धि, घोर मूर्ख, भारी बेवकूफ।}}
{{outdent|गण्डयन्त्र (सं० पु०) मेघ, बादल। गण्डयन्त्र देखो।}}
{{outdent|गण्डवलिख्या (सं० स्त्री०) चर्मकरा, एक सुगन्धि द्रव्य। (वैद्यक)}}
{{outdent|गण्डली (सं० स्त्री०) गण्डबलं तत्र लीयते, ली-डीप्। १. महादेव, शिव। "गण्डली मेधवान्मा च देवाधिपतिरेव च।" (महाभारत अनुशासन १४।३९०) २. छोटी पहाड़ी।}}
{{outdent|गण्डलेखा (सं० स्त्री०) प्रशस्तकपोल, सुन्दर गाल, अच्छी कनपटी।}}
{{outdent|गण्डविन्दु (सं० पु०) कुबेर का सेनापति। विश्रवा मुनि के ज्येष्ठ पुत्र धर्मपरायण कुबेर पिता की आज्ञा से लङ्का पर राज्य करते थे। दुरात्मा रावण ने उनको भगाकर लङ्का पर अपना अधिकार जमाया। कुबेर उसके भय से लङ्का देश छोड़कर कैलास पर्वत पर रहने लगे, लेकिन उनका वहाँ रहना भी रावण को असह्य जान पड़ा। इसलिए दुष्ट रावण ने कुबेरपुरी पर आक्रमण किया। कुबेर ने अपने सेनापति गण्डविन्दु के उत्साह और परामर्श से रावण के साथ लड़ाई आरम्भ कर दी। उस लड़ाई में सेनापति गण्डविन्दु ने अपना भुजविक्रम और युद्धकौशल दिखलाया। उनके पराक्रम से रावण के बहुत से योद्धा मारे गए। अन्त में मारीच के माया-युद्ध से गण्डविन्दु को हार माननी पड़ी। (रामरसायन उत्तरखण्ड)}}
{{outdent|गण्डव्यूह (सं० पु०) बौद्ध सूत्र का एक अङ्ग।}}
{{outdent|गण्डशिला (सं० स्त्री०) गण्डः भूमेरुन्नतप्रदेशः शिला। स्थूलपाषाण, बड़ा पत्थर। "दृष्टोऽगुशिरोभावः क्षयाद् गण्डशिलासमः।" (भागवत ११।१३।१)}
{{outdent|गण्डशैल (सं० पु०) गण्डवच्छैलेन बद्धः शैलाद्वा गण्डवद् राजदन्तादित्वात्। भूकम्पादि द्वारा पर्वत से गिरा हुआ स्थूल पाषाण, वह बड़ा पत्थर का टुकड़ा जो भूकम्प से पर्वत से गिरा हो। २. क्षुद्र पर्वत, छोटी पहाड़ी। ३. ललाट, भाल।}}
{{outdent|गण्डसाह्वया (सं० स्त्री०) गण्डेन सहिता साह्वया यस्याः, बहुव्री०। गण्डकी नदी। "गङ्गा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डसाह्वया।" (महाभारत १३।१६८)}}
{{outdent|गण्डस्थल (सं० क्ली०) गण्डः स्थलमिव, उपमितस०। १. गण्डदेश, समस्त गाल। २. हाथी की कनपटी।}}
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<noinclude><pagequality level="1" user="Avantika Shaw" />{{Rh|'''१६२'''|'''गगडदेव – गण्डस्थल'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
तथा शीतल है। भावप्रकाश के मत से इसका गुण शीतल, लोहद्रावक, ग्राही, लघु, तिक्त, कषाय, मधुर, कटुपाक, वातवृद्धिकर, दाह, तृष्णा, दुर्बलता, श्वास, कुष्ठ और पित्तज्वरनाशक है। (भावप्रकाश)
{{outdent|गण्डदेव दक्षिण में गङ्गवंशीय एक प्राचीन राजा। इन्होंने काञ्चीपुर के पल्लवराज और चोल राजा को पराजित किया था। काञ्चीराज गण्डदेव को कर देते थे। पाण्ड्य राजा ने इनके साथ मित्रता की थी।}}
{{outdent|गण्डदेश (सं० पु०) कपोल, गाल, कनपटी।}}
{{outdent|गण्डपाद (सं० वि०) गण्डस्य पाद इव पादोऽस्य, बहुव्री०। जिसके दोनों पैर गैंडे के सदृश हों।}}
{{outdent|गण्डपोलिका (सं० स्त्री०) कीटविशेष, एक प्रकार का कीड़ा।}}
{{outdent|गण्डक (सं० स्त्री०) कीटविशेष, एक कीड़ा।}}
{{outdent|गण्डफलक (सं० क्ली०) गण्डः फलकमिव, उपमितस०। १. विस्तीर्ण गण्ड, बड़ी कनपटी। (वि०) २. जिसकी कनपटी बहुत बड़ी हो।}}
{{outdent|गण्डभित्ति (सं० स्त्री०) गण्डं भित्तिरिव, उपमि०। प्रशस्त कपोल, सुन्दर गाल, अच्छी कनपटी।}}
{{C|<small>"अंसासक्तलतद्गण्डभित्तिभिरूचुः।" (रघु० १२।१०२)</Small>}}
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गण्डमार्क— अफगानिस्तान के निकट जलालाबाद से काबुल जाने की राह पर अवस्थित एक ग्राम। यह जलालाबाद से १०॥ कोस की दूरी पर है। यह ग्राम जलालाबाद से अधिक शीतल है। १८३८ और १८४२ ई० को अँगरेज़ और अफगानिस्तान के बीच इसी ग्राम के निकट लड़ाई हुई थी। १८४२ ई० में जब अँगरेज़ी सेना काबुल से लौटकर आ रही थी, तब अवशिष्ट २० सेनानायक और ४५ गोरे इसी स्थान पर कट गए थे।
{{outdent|गण्डमाला (सं० स्त्री०) गण्डानां ग्रीवाजातस्फोटविशेषाणां माला समूहोऽस्यां, बहुव्री०। गले का एक प्रकार का रोग, गलगण्ड, कण्ठमाला। गलगण्ड देखो।}}
{{outdent|गण्डमालिका (सं० स्त्री०) गण्डानां ग्रन्थीनां माला यत्र, बहुव्री०। १. लज्जालु लता, एक प्रकार की लता जिसकी पत्तियाँ छूने से सिकुड़ जाती हैं। २. गण्डमाला।}}
{{outdent|गण्डमाली (सं० वि०) जिसको गलगण्ड रोग हुआ हो।}}
{{outdent|गण्डमूर्ख (सं० वि०) गण्डः अतिशयितः मूर्खः। अतिशय मूढ़, घोर निर्बुद्धि, घोर मूर्ख, भारी बेवकूफ।}}
{{outdent|गण्डयन्त्र (सं० पु०) मेघ, बादल। गण्डयन्त्र देखो।}}
{{outdent|गण्डवलिख्या (सं० स्त्री०) चर्मकरा, एक सुगन्धि द्रव्य। (वैद्यक)}}
{{outdent|गण्डली (सं० स्त्री०) गण्डबलं तत्र लीयते, ली-डीप्। १. महादेव, शिव। "गण्डली मेधवान्मा च देवाधिपतिरेव च।" (महाभारत अनुशासन १४।३९०) २. छोटी पहाड़ी।}}
{{outdent|गण्डलेखा (सं० स्त्री०) प्रशस्तकपोल, सुन्दर गाल, अच्छी कनपटी।}}
{{outdent|गण्डविन्दु (सं० पु०) कुबेर का सेनापति। विश्रवा मुनि के ज्येष्ठ पुत्र धर्मपरायण कुबेर पिता की आज्ञा से लङ्का पर राज्य करते थे। दुरात्मा रावण ने उनको भगाकर लङ्का पर अपना अधिकार जमाया। कुबेर उसके भय से लङ्का देश छोड़कर कैलास पर्वत पर रहने लगे, लेकिन उनका वहाँ रहना भी रावण को असह्य जान पड़ा। इसलिए दुष्ट रावण ने कुबेरपुरी पर आक्रमण किया। कुबेर ने अपने सेनापति गण्डविन्दु के उत्साह और परामर्श से रावण के साथ लड़ाई आरम्भ कर दी। उस लड़ाई में सेनापति गण्डविन्दु ने अपना भुजविक्रम और युद्धकौशल दिखलाया। उनके पराक्रम से रावण के बहुत से योद्धा मारे गए। अन्त में मारीच के माया-युद्ध से गण्डविन्दु को हार माननी पड़ी। (रामरसायन उत्तरखण्ड)}}
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{{outdent|गण्डशिला (सं० स्त्री०) गण्डः भूमेरुन्नतप्रदेशः शिला। स्थूलपाषाण, बड़ा पत्थर। "दृष्टोऽगुशिरोभावः क्षयाद् गण्डशिलासमः।" (भागवत ११।१३।१)}
{{outdent|गण्डशैल (सं० पु०) गण्डवच्छैलेन बद्धः शैलाद्वा गण्डवद् राजदन्तादित्वात्। भूकम्पादि द्वारा पर्वत से गिरा हुआ स्थूल पाषाण, वह बड़ा पत्थर का टुकड़ा जो भूकम्प से पर्वत से गिरा हो। २. क्षुद्र पर्वत, छोटी पहाड़ी। ३. ललाट, भाल।}}
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<noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh||'''गण्डस्थली - गण्ड षविधि'''|'''१६३
'''}}</noinclude>
गगडात (सं० पु०.स्त्री० गंदगण्लो सत्रो०) गंड:
कपोलस्थल, गंदेश, कनपटी ।
गण्डा - प्रदेशका एक नगर । यह अक्षा० २७
३० उ० और देगा० ८२ पू०के मध्य फैजावादसे
१४ कोस दूर में अवस्थित है । यह गंडा जिलेका
प्रधान नगर है । इम जिलेमें अहीर जाति कृषिकार्य
करती है। यह प्रदेश पहले उत्तरकोशल राज्यके
अन्तर्गत गोड नाम से मशहूर था । श्रावस्ती देखे । श्रावस्ती
नगरका ध्व मावशेष इस जगह से दीखता है।
-
बहुव्री० । गंडक, गौंड़ा ।
।
तमिव उपमितम० । गण्डिकोट-मन्द्रान प्रदेश के अन्तर्गत कड़ापा जिलामें
येरमलय नामक पर्वतका एक दुर्ग यह सुह दुर्ग
अक्षा० १४ ४८ उ० और देशा० ७८ २० पू० में अव-
स्थित है। यहां विजयनगरके राजाचीका एक देव-
मन्दिर है। प्रसिद्ध ऐतिहासिक लेखक फेरिस्ता लिखते
हैं कि यह दुर्ग १५८८ ई० में निर्माण किया गया है।
गोलकुण्डा राजाने एक बार इसे अपने अधिकारमें लाया
था । औरङ्गजेवके सेनापति मोरजुम्लाने इसे कई
बार दखल किया था। बाद यह हैदराबादक वाला-
घाटके पांच सरकारीमै एक सरकारको राजधानी
हुई । अन्तमें कड़ापार्क पाठान नवावने इस स्थान-
को अपने अधिकारमें लाया । किन्तु १७८९ ई०को टिपूको
लाईके समय अङ्ग-रेज सेनापति कप्तान लिटलने इसे
जीत लिया। १८०० ई० में निजामने इसे अङ्गरेजीको
अर्पण कर दिया। यह दुर्ग रतीला पत्थर के पहाड़
ऊपर बना हुआ है । इम होकर पेनार नामक नदी
प्रवाहित होतो हुई कड़ापा अञ्चल तक चलो है ।
गण्डी ( मं• स्त्री० ) खड़ोसे रखा खींच कर सीमाको
चिह्नित करनेका गाम गण्डा है।
व उक नमह यस्
इव नमङ्ग
गडात (सं०ली० ) तिथि, नक्षत्र और लग्नका सन्धि-
काल ।
“क्षतिथिग्रन्तं विविध मतं ।
नवपचचर्याना घटिकामि ॥" (ज्योतिष)
गण्डारि (सं० पु० ) १ कोविदारच, कचनारका पेड़ ।
कोविदार दे २ मत्सा विशेष ।
गण्डारी (मं० [स्त्री०) मष्ठा, मंजीठ ।
गगडाली (मं००१
)
तदूर्वा, सफेद, गडर
घास । २ मर्पाक्षीवृक्ष, मरहची, ग'डिनिका पेड़ ।
२ महलोकी पां
गण्डाव--- बलुचिस्तान काको नामक विभागका एक
प्रधान नगर । यह पा० २८ २२ ४० और देशा०
६० ३२ पृ० वाघ नामक स्थानसे २० कोस दक्षिण-
पथिममें मूला नामक गिरिमइट जानके रास्ते पर
अवस्थित है। यह एक जं'ची भूमिके ऊपर चहार
दोबारोमे घिरे हुए ग द्वारा सुरक्षित है। यहां खिला
खाँका एक घर है। शोत कालमें खाँ साहव यहाँ श्रा
कर रहते हैं ।
गण्डि (सं० पु० ) इतकी जड़से शाखा तक के भागको
गंड कहते हैं ।
गण्डिक (सं०वि०) मुदबुद सा क्षुद्र पाषाणादि,
बुदबुद के ममान छोटे छोटे पत्थरके खंड २ एक
प्रकारका अमृत
|
|
गण्डीर (सं० पु०) १ समष्टिला, खीरा । २ शाकविशेष,
पोईका साग । २ वीर बहादुर, शूरवीर
गण्डीरो (स० [स्त्री० )
गण्डु
|
का पेड़ ।
सं० पु० ) १ उपधान, तकिया २ ग्रन्थि, गांठ,
गिरहा (वि०) २ यन्दियुक्त, जिसमें गांठ ही गिरहदार
गराड़, पद (सं० पु० ) गगड ग्रन्थियुतानि पदानि यस्य
बहवो विश्व तक के सुधा ।
गराड पदभव (मं की०) गंड. पद व भवति उत्प
यते। मोमक, सोमा नामक धातु ।
गण्डग
'0'
.
।
पदी ( ० स्त्री० ) १ एक क्षुद्र कोड़ा, छोटा
कंचुधा २ किड तक जातोय तो मादा केचुषा।
गड (म० पु० ) १ मुखपूरण, कुलो २मुहका
पानो। २ हाथोकी सड़का अग्र भाग, हाथीको मुंडकी
नोक ४ प्रसृति परि' मत, मोलह तोलेके बराबरका एक
मान, पसर ।
गण्डिका (सं० स्त्री० ) शुद्र गण्ड पाषाण, पत्थरके छोटे गण्ड षविधि मं पु० ) गगड षस्य विधिः विधान, ६ तत् ।
छोटे टुकड़े
·
मुखगड. प करनेके नियम
सुधोके नियम | भाव-<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१६६
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१६४'''|'''गण्डूषा गतभत् का'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
प्रकाश में लिखा है कि दतुअन और जिभी करने के बाद शीतल जल देकर बार-बार कुल्ला करना चाहिये। इससे कफ, अरुचि और मुखमल दूर होता है। कुछ गर्म जल से कुल्ला करने पर कफ, अरुचि, मुखमल और दाँतों की जड़ता जाती रहती है। विष, मूर्च्छा, मदात्यय, राजयक्ष्मा और रक्तपित्त— इन समस्त रोगाक्रान्त मनुष्यों के लिये गण्डूष धारण अहितकर है। जिसकी आँखें दूषित या मल-कूपित हो गई हों अथवा जो मनुष्य अत्यन्त दुर्बल हो, उनके लिये उष्ण जल से कुल्ला करना प्रशस्त नहीं है।
{{outdent|गण्डूषा (सं० स्त्री०) गण्डूष-टाप्। गण्डूष।}}
{{outdent|गण्डोपधान (सं० क्ली०)गण्डस्य उपधानम्, ६-तत्। उपधानविशेष, गालबालिश, वह छोटा तकिया जो गाल के नीचे रखा जाता है।}}
{{outdent|गण्डाल (सं० पु०)१. गुड़। २. ग्रास, कौर।}}
{{outdent|गण्डालपाद (सं० वि०)गण्डाल इव पादौ यस्य, बहुव्री०। गण्डाल के जैसा वर्तुलाकार पादविशिष्ट, जिसके पैर गैंडे के समान मोटे या गोल हों।}}
{{outdent|गण्य (वि०)१. गिनने योग्य, गिनती के लायक। २. प्रतिष्ठित, जिसकी पूछ हो, जिसे लोग सम्मान करते हों।}}
{{outdent|गत् (सं० त्रि०)गच्छति गम्-क्विप मकारस्य लोपः। गमनशील, जो चलता हो। यह शब्द प्रायः दूसरे शब्द के साथ प्रयोग किया जाता है।}}
{{outdent|गत (सं० त्रि०)१. गया हुआ, बीता हुआ। २. प्राप्त, पाया हुआ। ३. समाप्त, पूरा किया हुआ। ४. पतित, गिरा हुआ। ५. ज्ञात, जाना हुआ। ६. लब्ध, पाया हुआ। ७. गमन, जाना, चलना।}}
{{outdent|गतौंड (हिं० पु०)हिजड़ा, नपुंसक।}}
{{outdent|गतकलुष (सं० वि०)गतं कलुषं पापं यस्य, बहुव्री०। निष्पाप, जिसका पाप नष्ट हो गया हो।}}
{{outdent|गतकल्मष (सं० त्रि०) निष्पाप, जिसे पाप न हो।}}
{{outdent|गतकल्य (सं० क्ली०)गतकाल, बीता हुआ समय।}}
{{outdent|गतका (हिं० पु०)लकड़ी का एक डंडा। इसके ऊपर चर्म की खोल लगी रहती है। यह ढाई वा तीन हाथ लम्बा होता है। यह प्रायः खेलने (गतका खेलने) के काम में आता है।}}
{{outdent|गतकार्य (सं० वि०)१. जिसका कर्त्तव्य कार्य नष्ट हो गया हो। २. अतीत कर्म, जो काम बीत गया हो।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent|गतकाल (सं० क्ली०)बीता हुआ कल।}}
{{outdent|गतकीर्ति (सं० त्रि०)गता प्रतीता नष्टा वा कीर्तिर्यस्य, बहुव्री०। जिसकी कीर्ति नष्ट हो गई हो, जिसका यश लुप्त हो गया हो।}}
{{outdent|गतक्लम (सं० त्रि०) जिसका श्रम दूर हुआ हो, विश्रान्त।}}
{{outdent|गतकुल (सं० पु०)वह सम्पत्ति जिसका कोई अधिकारी न बचा हो, लावारिस माल।}}
{{outdent|गतचौबीसी— जैनियों के भूतकाल सम्बन्धी चौबीस तीर्थङ्कर। नाम— १. निर्वाण, २. सागर, ३. महासाधु, ४. विमलप्रभ, ५. श्रीधर, ६. सुदत्त, ७. अमलप्रभ, ८. उद्धर, ९. अङ्घज, १०. सन्मति, ११. सिंधु, १२. कुसुमाञ्जलि, १३. शिवगण, १४. उत्साह, १५. ज्ञानेश्वर, १६. परमेश्वर, १७. विमलेश्वर, १८. यशोधर, १९. कृष्ण, २०. ज्ञानमति, २१. शुद्धमति, २२. श्रीभद्र, २३. अतिक्रान्त और २४. शान्त। (इष्टकत्तीसी)}}
{{outdent|गतत्रप (सं० त्रि०) गता त्रपा लज्जा यस्य, बहुव्री०। निर्लज्ज, लज्जाहीन, बेशर्म।}}
{{outdent|गतनासिक (सं० वि०)गतनामिका यस्य, बहुव्री०। नासिकाशून्य, जिसके नाक नहीं हो, नकटा।}}
{{outdent|गतनिबन्धन (सं० क्ली०)पाशभेद, बन्धनजाल, एक प्रकार का फंदा।}}
{{outdent|गतपाप (सं० त्रि०)गतं नष्टं पापं यस्य, बहुव्री०। निष्पाप, जिसके पाप दूर हो गये हों।}}
{{outdent|गतपुण्य (सं० त्रि०)जिसका पुण्य नष्ट हो गया हो।}}
{{outdent|गतप्रत्यागत (सं० त्रि०)पूर्वं गतः पश्चात् प्रत्यागतः, कर्मधा०। १. जो जाकर फिर लौट आया हो, गमन और प्रत्यागमन। २. सङ्गीत में ताल के साठ भेदों में एक।}}
{{outdent|गतप्रत्यागता (सं० स्त्री०) वह स्त्री जो अपने स्वामी के घर से भाग गई हो और फिर थोड़े दिनों के बाद लौट आई हो।}}
{{outdent|गतप्रभ (सं० वि०)गता दूरीभूता प्रभा यस्य, बहुव्री०। जिसमें प्रभा नहीं हो, निष्प्रभ, तेजरहित।}}
{{outdent|गतप्राण (सं० त्रि०)गतः प्राणो यस्य, बहुव्री०। जिसके प्राण ने शरीर त्याग कर दिया हो, मृत।}}
{{outdent|गतबुद्धि (सं० त्रि०)गता बुद्धिर्यस्य, बहुव्री०। बुद्धिशून्य, निर्बोध, अज्ञान, अनजान।}}
{{outdent|गतभर्तृका (सं० स्त्री०)गतो नष्टः प्रोषितो वा भर्ता यस्याः, बहुव्री०। विधवा स्त्री, जिसका पति मर गया हो या परदेस गया हो।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२६३
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२६२'''|'''उद्धृत्य-उद्भव'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:पाये हुआ। २ निज भागदाता, किसीका हिस्सा दे देनेवाला।
{{Outdent|उद्धत्य (सं॰ अव्य॰) उत्तोलन वा पाकर्षण करके, उठा या खींच कर।}}
{{Outdent|उद्ध्मान (सं॰ क्ली॰) उत्-ध्मा-ल्युट्। चुल्ली, चूल्हा}}
{{Outdent|उद्ध्माय (सं॰ अव्य॰) निश्वास या सांस छोड़कर।}}
{{Outdent|उद्ध्य (सं॰ पु॰) उज्झत्युदमिति क्यप्, निपातनात् साधुः। <small> भिद्योध्योनदे। पा ३।१।११५।</small> १ नद, दरया।(क्ली॰) २ जलोत्क्षेपण, पानीका उछाल।}}
{{Outdent|उद्ध्वंस (सं॰ पु॰) भङ्ग, फटाव, खरखराहट।}}
{{Outdent|उद्बद्ध (सं॰ चि॰) १ ऊर्ध्वबद्ध, ऊपर बंधा हुआ, जो टंगा हो। २ बन्धनभ्रष्ट, जो खुल गया हो।}}
{{Outdent|उबन्ध (सं॰ पु॰) <small>उद्धग्धन देखो।</small>}}
{{Outdent|उद्बन्धक (सं॰ पु॰) वर्णसङ्कर जातिविशेष।}}
{{Outdent|उद्बन्धन (सं॰ क्ली॰) उत्-बन्ध भावे ल्युट्। १ कण्ठ में रज्जु डाल ऊर्ध्व बन्धन, गलेमें फांसी लगाकर टंग जानेका काम। २ मृत्यु के अर्थ कण्ठमें रज्जुवेष्टन, मरनेके लिये गलेमें रस्सी की लपेट। ३ बन्धनच्युति, बंधाईका खोलाव। ४ बन्धन, बंधाई, टंगाई।}}
{{Outdent|उद्बन्धुक (वै॰ त्रि॰) उद्बन्धन करनेवाला, जो टांगता या लटकाता हो।}}
{{Outdent|उद्बल (सं॰ त्रि॰) शक्तिशाली, जोरदार।}}
{{Outdent|उद्बाड़――बम्बईके गुजरात प्रान्तका एक ग्राम। यह बलसारसे १५ मील दूर है। १७४२ ई॰ की २८ वीं अक्तोबरको सञ्जान पारसियों ने यहां आ अपना अग्नि प्रतिष्ठित किया था। उस समयसे बराबर इस स्थान
पर सञ्जान अग्नि जल रहा है।}}
{{Outdent|उद्बाहु (सं॰ त्रि॰) १ ऊध्व बाहु, हाथ उठाये हुआ। २ प्रसारित बाहु, हाथ फैलाये हुआ। ३ शुण्ड उठाये हुआ, जो सूंड खड़ी किये हो।}}
{{Outdent|उद्बिल (सं॰ त्रि॰) बिलसे बहिर्गत, मांदको छोड़े हुआ।}}
{{Outdent|उबुद्ध (सं॰ त्रि॰) उत् बुध-क्त। १ प्रस्फुटित, खिला हुआ। २ उद्दीपित, रौशन, किया हुआ। ३ प्रबुद्ध, जगाया हुआ। ४ उदित, उठा हुआ। ५ अणुस्मत, जो याद आ गया हो।}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{Outdent|उद्बुद्धसंस्कार (सं॰ पु॰) वासनासंसर्ग, इत्तिफा़क़-मनसूबा, किसी बातको यादगारौ।}}
{{Outdent|उद्बुद्धा (सं॰ स्त्री॰) परकीया नायिका भेद। यह निज इच्छानुरूप परपुरुषसे स्नेह बढ़ाती है।}}
{{Outdent|उद्बोध (सं॰ पु॰) उत्-बुध-घञ्। १ किञ्चित् ज्ञान, हलकी समझ। २ न्यायादि मतसे――पूर्वज संस्कारका उद्दीपन। ३ अणुस्मरण, यादगारी, भूली हुई बातका कोई सबब पड़नेसे फिर याद आ जाना।}}
{{Outdent|उद्बोधक (स॰ त्रि॰) उत्-बुध-णिच्-ण्वुल्। १ प्रकाशक, देखाने या बतानेवाला। २ उद्दीपक, रौशन करनेवाला। ३ उद्बोध उत्पन्न करनेवाला, जो याद दिला देता हो। जैसे―–किसी व्यक्तिने काशीमें विश्वेश्वरके निकट एक श्मश्रुल पुरुषको देखा था। फिर वह प्रदेशान्तरस्थित स्त्रीय ग्रामको आया। वहां अन्य श्मश्रुल पुरुषको देख उसे काशीके विश्वे-श्वरका स्मरण हुआ। इसमें श्मश्रुल पुरुष उसके विश्वेश्वर स्मरणका उब्दोधक बन गया। ४ जागृत करनेवाला, जो जगाता हो। (पु॰) ५ सूर्य।}}
{{Outdent|उद्बोधन (सं॰ क्ली॰) उत्-बुध णिच्-ल्युट्। १ ज्ञापन, जगांई। २ स्मरणोत्पादन, याद दिलानेका काम। (त्रि॰) ३ ज्ञानोत्पादक, समझाने, देखाने या जगाने वाला।}}
{{Outdent|उद्बोधिता (सं॰ स्त्री॰) परकीया नायिकाका एक भेद। जब परपुरुष कौशलसे स्नेह देखाता, जब इसका हृदय उसपर मुग्ध हो जाता है।}}
{{Outdent|उद्भट (सं॰ त्रि॰) उत्-भट-अप्। १ महाशय। २ उदार, सखी। ३ श्रेष्ठ, बड़ा। (पु॰) ४ ग्रन्थ बर्हिभूत। ५ कच्छप, कछुवा। ६ पूर्व, मशरिक़। ७ शूर्प, सूप। ८ सूर्य, आफ़ताब। ९ जयापीड़के अधीनस्थ सभापति। इन्होंने एक अलङ्कारका ग्रन्थ बनाया था। इन्दुराजन उसकी टीका की। (राजतरङ्गिणी ४।४९४) आनन्दवर्धन और अभिनव गुप्तने इनका वचन उद्धृत किया है।}}
{{Outdent|उद्भव (सं॰ पु॰) उत्-भू भावे अप्। १ उत्पत्ति, पैदायश।}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इटली|१९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
रांतो, कालतानीसेत्ता, कातानिआ, गिरगेंती, मेस्सिना, पालेर्मौं, सिराकुसा, भपानी, जेनोबा, कागलिआरी, सस्सारी अलेस्सन्द्रिआ, बेनेवेन्ता, बेर्गामो, कोमो, क्रेमोना, कुनेओ, मानतुआ, मिलन, नोवारा, पेविआ, पिअसेनजा, पोर्ती भाउरिजिओ, रेग्गिओ, एमिलिआ, सोन्द्रियओ, तूरिन और उम्बिआ। नेपिल्स, मिलन, रोम, पालेर्नो, तूरिन, फ्रोरेन्स, जिनोआ, वेनिस, बोलोना, मेस्सिना, लेघोरन, और कातानिया, बड़ा नगर है।
इटलीमें श्रमजीवियोंका वेतन अधिक और खाद्य वस्तुवोंका मूल्य न्यून है। व्यापारके केन्द्र लोमबार्डी और पीडमीण्टमें हड़ताल बहुत पड़ती है। किन्तु कितनी ही सेविङ्गबद्ध, बीमा कम्पनी और परस्पर साहाय्य-समिति खुली हैं। कोआपरेशन वा सम्भूय व्यवसायका भी बड़ा वैभव है। उसमें छोटे-छोटे व्यवसायी और कृषक योग देते हैं। अब लोगोंको अधिक व्याज देनेका कष्ट उठाना नहीं पड़ता।
पाठशाला सरकारके हाथ है। विनामूल्य शिक्षा मिलती है। सरकार और व्यवसायी पर पाठशालाके व्ययका भार पड़ता है। पढ़े-लिखोंकी संख्या दिन दिन बढ़ती जाती है। पुस्तकालय बहुत हैं। हस्तलिखित और बहुमूल्य पुस्तकोंकी कोई कमी नहीं। थोड़े दिन हुये, कोई दो सहस्र पुस्तकालय गिने गये थे। स्थानीय इतिहासका अन्वेषण हुवा करता है। शिल्पसम्बन्धीय पुस्तक खरीदनेको करोड़ों रुपए जमा हैं।
दरिद्रोंको अन्न-वस्त्र देनेके लिये सार्वजनिक संस्थायें प्रतिष्ठित हैं। रोगियोंके लिये औषधालय, अनाथोंके लिये निवासस्थान और लूलों, लंगडों, बहरों तथा अन्धोंके लिये विद्यालय और विश्रामालय बनाये गये हैं।
इटली राज्य एक राजाके अधीन है। वही लोगोंको पदाधिकार देते और पारलियामेण्टको एकत्र कर लेते हैं। अदालतका काम फ्रान्सको तरह चलता है। विचारपतिका वेतन कम है। मुक़दमा जल्द नहीं निबटता।
{{Multicol-break}}
{{gap}}सेनाविभागमें विभिन्न प्रान्तके लोग एकत्र भरती कर लिये जाते हैं। सिपाही बननेसे कोई इनकार कर नहीं सकता। शान्तिके समय सेनाकी संख्या ढायी या तीन और युद्धके समय साढ़े सात लाख रहती है। स्पोजिया, नेपल्स, वेनिस, तारान्तो और मड्डा लोनाद्वीपमें जङ्गी जहाजोंका अड्डा है। इटलीका आय-व्यय बढ़ते जाता है। सोने, चांदी रूपे और कांसेका सिक्का चलता है। कर अधिक लगता है।
{{smaller|इतिहास}}—अतिशय रमणीय देश होने और जलवायु स्वास्थाप्रद रहनेसे पुराकाल उत्तरसे कितने ही लोगोंने इटलीपर आक्रमण किया था। इसीसे नाना प्रकारकी भाषाका प्रचार हुआ। रोमके ऐतिहासिकोंके कथनानुसार ई॰ से ३९० वर्ष पहले गालोंका दल रोमनगर मारते-काटते पहुंचा था। रोमकोंने इटली को जीत अच्छी-अच्छी सड़कें बनवाया। ४७६ ई॰ को हेरूदलीयोंके राजा ओडोआकर रोमुलस को सिंहासनच्युत कर सम्म्राट् बने थे। ४८८ ई॰ को ग्रीक-सम्म्राट् जेनोकी आज्ञासे पूर्व गालांके नरेश थिसोकोरिकने ओडोआकरको हराया और ४९३ ई॰ को जानसे मार डाला। फिर गालों और यूनानियोंमें ५३९ से ५५३ ई॰ तक खूब युद्ध हुवा था। अन्तको गालीय नृपति टेइगा वेसूविअस् के पास यूनानियोंसे हार गये और यूनानी इटलीके अधिपति बने। ५६८ ई॰ को लोमबार्डीं ने गालोंको मार भगाया था। ५९० से ६०४ ई॰ तक ग्रिगोरीने लोमबार्डीं को मूर्ति-पूजक बनाया और ७२६ ई॰ को द्वितीय ग्रिगोरीने रोममें स्वतन्त्र राज्य प्रतिष्ठित किया। ७५६ ई॰ को फ्रान्स-सरदारने इटलीका कितना ही उत्तरांश जीत पोपको सौंप दिया था। ७७४ ई॰ को चार्लस अपने श्वसुर देसीदेरिअस्को सिंहासनसे उतार इटलीके सम्राट् बने। चार्लस वंशके आठ नरेशोंने इटलीमें राज्य किया था। ८८८ ई॰ को चार्लस दी फत्राट (मोटे) सिंहासन-च्युत हुये। ९६१ ई॰ को इटलीय नृपति द्वितीय बेरेङ्गरने अपना राज्य ओटोको दिया था। चार्लस और ओटोके समय अराजकताकी धूम रही। चारो ओर लूट-मार होनेसे किले बहुत बने
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||इण्डिया—इतरेतराश्रय|२३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|इण्डिया (अं॰ स्त्री॰ = India) भारतवर्ष, हिन्दुस्थान।}}
{{outdent|इण्डीन्य (सं॰ पु॰) छुरो, चाकू।}}
{{outdent|इण्डु (बै॰ क्ली॰) मुञ्जापत्र, मूंजकी चद्दर। कड़ाही चूल्हे से उतारते समय यह हाथमें लपेट लेनेके काम आता है।}}
{{outdent|इण्येरिका (सं॰ त्रि॰) वटिका, बाटी, भौंरिया।}}
{{outdent|इत् (सं॰ त्रि॰) एतीति, इ-कि्कप्। देखते-देखते चला जानेवाला, जो बातकी बातमें उड़ जाता हो। व्याकरणका प्रयोग साधनेके लिये जो अक्षर आते ही चल जाता, वह इत् कहाता है।}}
{{outdent|इत (सं॰ त्रि॰) इक्त। १ गत, गुज़रा हुआ, गया-बीता। (क्ली॰) भावे क्यप्। २ गमन, चाल। ३ ज्ञान, समझ। ४ प्राप्ति, याफ़त। (हिं॰ क्रि॰ वि॰) ५ इस ओर, इधर, यहां!}}
{{outdent|इतः, {{smaller|इतस् देखो।}}}}
{{outdent|इतःपर (सं॰ अव्य॰) इसके पीछे, इसके बाद, इसपर।}}
{{outdent|इत-उत (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ इधर-उधर, जहां-तहां। (पु॰) २ छल फ़रेब।}}
{{outdent|इत ऊति (वै॰ त्रि॰) इस ओरसे लम्बायमान, जो इधरसे फैला या पहुंचा हो। २ भविष्यत्, वर्तमान समयसे अधिक स्थायी, अयिन्दा, जो ज़माना-हालसे ज्यादा ठहरता हो।}}
{{outdent|इतना (हिं॰ वि॰) एतावत्, इस क़दर, इत्ता, इतक।}}
{{outdent|इतनो, {{smaller|इतना देखी।}}}}
{{outdent|इतम (सं॰ त्रि॰) अन्य, दूसरा, और।}}
{{outdent|इतमाम (अ॰ पु॰) पूर्णता, कमाल, पूरापन।}}
{{outdent|इतमीनान् (अ॰ पु॰) १ सन्तोष, आराम, ढारस। २ बन्धक, जमानत।}}
{{outdent|इतमीनान् करना (हिं॰ क्रि॰) विश्वास मानना, खुश रहना।}}
{{outdent|इतमीनान् ख़ातिर होना (हिं॰ क्रि॰) सन्तुष्ट रहना, यक़ीन् रखना।}}
{{outdent|इतमीनान् न करना (हिं॰ क्रि॰) सन्देह रखना, यक़ीन् न लाना।}}
{{outdent|इतमीनान् होना (हिं॰ क्रि॰) सन्तुष्ट रहना, खुशी मनाना।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|इतमीनानी (अ॰ वि॰) विश्वस्त, एतबारी, जिसमें यक़ीन् रहे।}}
{{outdent|इतर (सं॰ त्रि॰) इना कामेन तरति तीर्येते, इतं प्राप्तं रातीति; इत-रा-क, इ-तृ-अप् वा अच्। १ नीच, कमीना। २ अन्य, दूसरा। ३ अवशेष, बाक़ीं।}}
{{outdent|इतरजन (सं॰ पु॰) इतरश्चासौ जनश्चैति, कर्मधा॰। जन साधारण, आम लोग।}}
{{outdent|{{block center|<poem>{{smaller|"कन्या वरयते रूपं माता वित्तं पिता श्रुतम्।
बान्धवाः कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरे जनाः॥" (शुक्रनीति)}}</poem>}}}}
{{outdent|इतर जाना (हिं॰ क्रि॰) दस्युके विरुद्ध प्रथम ही समाचार पाना, डाकुवोंको खबर पहले ही लगना।}}
{{outdent|इतरतः (सं॰ अव्य॰) विभिन्न रीतिसे, दूसरे तौरपर।}}
{{outdent|इतरथा (सं॰ अव्य॰) इतरथाल्। {{smaller|प्रकारवचने थाल्। पा ५।३।२३।}} विपरीत, बरक्स, जिदसे।}}
{{outdent|इतरविशेष (सं॰ पु॰) इतरस्मात् विशेषः, ५-तत्। अन्य प्रभेद, दूसरा फ़र्क।}}
{{outdent|इतरा (सं॰ स्त्री॰) ऐतरेयकी माता। {{smaller|ऐतरेव देखो।}}}}
{{outdent|इतराजी (हिं॰ स्त्री॰) विराध, एतराज, अनवन।}}
{{outdent|इतराना (हिं॰ क्रि॰) अभिमान देखाना, उसक करना, अपनेको बड़ा समझना।}}
{{outdent|इतराहट (हिं॰ स्त्री॰) अभिमान, गुरूर, ठसक।}}
{{outdent|इसरीफल (हिं॰ पु॰) अवलेह विशेष। इसमें आंवला, धनिया और शहद डालते हैं।}}
{{outdent|इतरेतर (सं॰ त्रि॰) इतर इतर निपातनात् दन्दम्। अन्यीन्य, सुतफ़रिक, अलग, दो-चार।}}
{{outdent|इतरेतरकाव्या (सं॰ स्त्री॰) १ अन्योन्य वासना, मुतफ़रिक खयाल।}}
{{outdent|इतरेतख्योग (सं॰ पु॰) ६. तत्। १ परस्पर सम्बन्ध, आपसका ताल्लुक। २ दन्दनामक समास, इसमें पर-स्पर पदार्थका योग रहता है।}}
{{outdent|इतरेतराभाव (सं॰ पु॰) अन्योन्याभाव, एकका दूसरेसे न मिलना। घटका पट और पटका घट न होना इतरेतराभाव है। {{smaller|अन्योन्याभाव देखो।}}}}
{{outdent|इतरेतराश्रय (सं॰ पु॰) इतरेतर आश्रयति, आ-"श्री-अच्। अन्योन्याश्रयरूप न्यायका दोषविशेष। {{smaller|अन्योन्याश्रय देखो।}}}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२६|इतिहास|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
उपाख्यान प्रभृतिके साथ बहुत अवान्तर विषय। प्रविष्ट हो जानेसे आज महाभारतको कितने ही लोग। इतिहास माननेसे हिचकते हैं। किन्तु जिन युरोपीय ऐतिहासिकोंके आदर्शपर हम वर्तमान कालके इतिहासका उपादान मानते, वह जानते हैं,—
"* * * *It is evident that Freeman's definition of history as 'past politics' is miserably inadequate. Political events are mere externals. History enters into every phase of activity, and the economic forces which urge society along are as much its subject as the political result. In short the historical spirit of the age has invaded every field." ''Encyclopædia Britannica,'' 11th. Ed. (1911), Vol. XIII, p. 527.
'फीमेनकी यह परिभाषा अतिशय अपर्याप्त आती, कि इतिहासकी गणना 'गत राजनीति' में जाती है। राजनीतिक काण्ड केवल बहिरङ्ग होते हैं। इतिहास व्यापारके प्रत्येक अंशको छूता है। निर्वाहसम्बन्धी बल राजनीतिक फलकी भांति इतिहासका विषय बन जाता है। संक्षेपमें कहनेसे सामयिक इतिहासकी शक्तिने प्रत्येक क्षेत्रपर अपना प्रभाव डाला है।'
सुतरां पाश्चात्य वर्तमान ऐतिहासिकोंके मतसे महाभारतको भी इतिहास माननेमें कोई आपत्ति न पड़ेगी। हमारे आदि इतिहासके सार महाभारतमें ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिसे स्थावर जङ्गम सकल प्रकार सृष्टि-तत्त्व, देव ऋषि पिट प्रभृति जीवका संक्षिप्त परिचय, भारतके प्राचीन राजवंशका विवरण, दुर्गं नगर तीर्थक्षेत्र प्रभृति समुदाय जीवस्थान, धर्मरहस्य, कामरहस्य, वेदचतुष्टय, योगशास्त्र, विज्ञानशास्त्र, धर्मार्थकाम-विषयक नाना शास्त्र और लोकयात्राविषयक आयुर्वेद धनुर्वेद आलोचित है। कहनेसे क्या! वर्तमान पाश्चात्य इतिहासविद् इतिहासका जैसा व्यापकत्व और विषयनिर्धारण ठहराते, महाभारतरूप भारतके प्राचीन इतिहासमें, वैसा ही आयोजन पाते भी हैं।
जो विषय ध्रुव सत्य रहता और प्रत्यक्ष वा परोक्ष प्रमाण द्वारा प्रतिष्ठित होता, वही इतिहास बजता है। इसीसे भगवान् शङ्कराचार्यने इतिहासका प्रामाण्य मान बता दिया है,—{{smaller|"इतिहासपुराणमपि पौरुषेयत्वात् प्रमाणान्तरमूलतामाकाङ्गते।" (शारीरकभाष्य १।३।३२)}}
{{Multicol-break}}
{{gap}}अर्थात् इतिहास पुराणको भी पौरुषेय समझकर प्रमाणान्तरमूलता वा वेदके बाद गौणप्रमाण मानना पड़ेगा कैसे स्वीकार करेंगे। उत्तरमें शङ्कराचार्यने कहा है,—
{{smaller|"इतिहासपुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण सम्भवन् मन्त्रार्थवादमूलत्वात् प्रभवति देवताविग्रहादि प्रपञ्चयितुम्। प्रत्यक्ष मूलमपि सम्भवति। भवति हि अस्माकमप्रत्यक्षमपि चिरन्तनानां प्रत्यचम्। तथा च व्यासादयो देवताभिः प्रत्यक्षं व्यवहारन्तीति अर्थते।"}}
अर्थात् इतिहास और पुराण जिस भावसे व्याख्यात हुआ, मन्त्र और अर्थवाद होनेसे वह देवता विग्रहादिके प्रपञ्चनिर्णयमें समर्थ है। इसका प्रत्यक्षमूलक होना भी सम्भवपर है। हमारे पक्षमें अप्रत्यक्ष रहते भी प्राचीनोंके लिये यह प्रत्यक्ष हुआ। इसीसे स्मृतिमें कहा, कि व्यासप्रभृतिने देवताओंके साथ प्रत्यक्षरूपसे व्यवहार किया था।
भारतका प्राचीन ऋषिगण समझते, जो प्रत्यक्षमूलक वा समसामयिक लोगोंके रचित रहता और जिसकी मौलिकताके सम्बन्धपर कुछ सन्देह उठने न पाता वही प्रक्कृत इतिहास कहाता था।
हमारे महाभारतीय इतिहासकी मौलिकता और प्रामाणिकता आजकलकी अवस्था देख विचारनेसे नहीं बनता। उसे भगवान् शङ्कराचार्य ही अच्छी तरह देखा गये हैं। समसामयिकी घटना सम सामयिक मनीषी द्वारा लिपिबद्ध हुयी थी। पुराकालकी सकल विक्षिप्त कथाको जिसने परवर्ती कालमें एकत्र सङ्कलन किया, उसीने व्यासदेव वा संग्रहकार नाम कमा लिया। हमारे प्राचीन इतिहासका अधिकांश विलुप्त वा विक्कत पड़ जाना अत्यन्त दुःखका विषय है। अतिप्राचीन भारतका विशुद्ध इतिहास ढूंढ निकालना एकप्रकार दुःसाध्य व्यापार हो गया है। इसीसे वर्तमान ऐतिहासिक 'महा-भारत' को इतिहास नहीं समझते। तथापि कितनी ही मिलावट रहते और प्रक्षिप्त उपकरण बढ़ते भी भारतवर्षीय पण्डित समाजमें महाभारत इतिहास ही कहाता है।
महाभारतीय युगके बाद भी लगातार इतिहास
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उद्धारना-उद्धृतोद्धार'''|'''२६१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उद्धारना (हिं॰ क्रि॰) उद्धार करना, छोड़ाना।}}
{{Outdent|उद्धारपल्य――जैन-शास्त्रानुसार एक योजन लंबे एक योजन चौड़े और एक योजन गहरे खुदे हुये गड्ढे में एक दिनसे लेकर सात दिनके भीतर २ पैदा हुये मेषों के बच्चोंके बाल मुंह तक ऐसे काट २ कर भरे जिनके फिर टुकड़े न हो सके तो ऐसे गड्डे का नाम व्यवहारपल्य है। और उन अविभागी बालोंके टुकडोंमेंसे हर एक टुकड़े के-जितने असंख्यात करोड़ वर्षों के समय होते हैं उतने ही कल्पनासे टुकड़े किये जाय और उनसे पूर्वोक्त परिमाणवाला गढा भरा जाय तो उस भरे हुये गढे का नाम उद्धारपल्य है।}}
{{Outdent|उद्धारपल्योपमकाल――जैनशास्त्रानुसार उद्धारपल्यमें भरे हुये कल्पित बालोंके टुकड़ों में से एक एक टुकड़ा यदि एक एक समयमें निकाला जाय तो जितने कालमें वह गढा खाली हो जायगा उतने ही कालका नाम उद्धाररपल्योपमकाल है।}}
{{Outdent|उद्धारविभाग (सं॰ पु॰) अंशका विभाग, तकस़ीम-हिस्सा।}}
{{Outdent|उद्धारसागर-जैनशास्त्रानुसार दश कोड़ाकोडी उद्धारपल्योंका यह होता है।}}
{{Outdent|उद्धारसागरोपमकाल- जैनशास्त्रानुसार दंश कोडाकोडी
उद्धारपल्योपमकालोंका यह होता है।}}
{{Outdent|उद्धारा (सं॰ स्त्री॰) गुड़ची, गुर्च।}}
{{Outdent|उद्घारित (सं॰ त्रि॰) कृतोद्धार, छोड़ाया हुआ, जो बचा लिया गया हो।}}
{{Outdent|उद्धि (सं॰ पु॰) ऊर्ध्वको धारण, ऊपरको उठाव। २ अक्षाग्रस्थित शकटभाग, धुरीपर टिकनेवाला गाड़ीका हिस्सा। ३ उखास्थापनका मृण्मय उपष्टम्भ।}}
{{Outdent|उद्धित (सं॰ त्रि॰) स्थापित, दण्डायमान, रखा या खड़ा हुआ।}}
{{Outdent|उद्धु( सं॰ त्रि॰) उत्-धुर्-क, प्रादि बहुव्री॰। १ भारशून्य, बेबार, जिसपे बोझ या जुवा न रहे। २ दृढ़, मज़बूत। ३ उच्च, ऊंचा। ४ बन्द हो जाने-वाला, जो निकल पड़ता हो। ५ प्रसन्न, खुश, जो रोकमें न हो।}}
{{Outdent|उद्धूत (सं॰ त्रि॰) उत्-धू क्त। उत्कम्पित, हिला-}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
:डुला, जो छूट पड़ा हो। २ उत्पाटित, नोचा हुआ। ३ निरस्त, निकाला हुआ। ४ उत्क्षिप्त, उछाला हुआ। ५ क्वतीच्व, बढ़ाया हुआ। ६ उच्च, ऊंचा।
{{Outdent|उद्धूतपाप (सं॰ त्रि॰) पापको छोड़ाये हुआ, जो गुनाहको अलग कर चुका हो।}}
{{Outdent|उद्धूनन (संं॰ क्ली॰) उत्-धू-णिच्-णुक् भावे ल्युट्। १ कम्यन, कंपकंपी। २ उत्क्षेपण, उछाल।}}
{{Outdent|उद्धपन (सं॰ क्ली॰) उत्-धूप्-भावे ल्युट्। १ ऊर्ध्व सञ्चालन, ऊपरको उठाव। २ वासनकार्य, सोंधाव। करणे ल्युट्। ३ धूप। ४ धूना।}}
{{Outdent|उद्धूलन (सं॰ क्ली॰) १ चूर्णकरण, पिसाई। २ सतैल- लवङ्ग-कर्पूर-कस्तूरी-मरिच-त्वक्चूर्ण, मसालेकी बुकनी।<small> (पाकशास्त्र)</small>}}
{{Outdent|उद्धूषण (सं॰ क्ली॰) उत्-धूष्-ल्युट्। १ रोमाञ्च, रोंगटोका खड़ा होना। (त्रि॰) २ रोमाञ्चित, खड़े रोंगटे रखनेवाला।}}
{{Outdent|उद्धृत (सं॰ त्रि॰) रोमाञ्चित, जो खड़े रोंगटे रखता हो।}}
{{Outdent|उद्धूषित (सं॰ त्रि॰) उत्-हृ-क्त। १ पृथक्कृत, अलग किया हुआ। २ मोचित, छोड़ाया हुआ। ३ उच्छेदित, तोड़ा हुआ। ४ समाज में गृहीत, महफिलमें शामिल किया हुआ। ५ उद्वत्त, बचाया हुआ। ६ उत्क्षिप्त, उठाया, चढ़ाया या बढ़ाया हुआ। ७ विभक्त, बांटा हुचा। ८ उद्घाटित, खोला हुआ। ९ वमित, उगला हुआ। १० अविकल गृहीत, नकल़ किया हुआ।}}
{{Outdent|उद्धतपाणि (सं॰ त्रि॰) उन्मुक्तहस्त, हाथ समेटे हुआ।}}
{{Outdent|उद्धृतस्नेह (सं॰ त्रि॰) हृतफेन, झाग, फेन या मलाई उतारा हुआ।}}
{{Outdent|उद्धृतारि (सं॰ त्रि॰) रिपुसूदन, दुश्मन् को हटा देनेवाला।}}
{{Outdent|उद्धति (सं॰ स्त्री॰) उत्-हृ क्तिन्। १ उत्क्षेपण, उछाल। २ उत्तोलन, उठाव। ३ आकर्षण, खिंचाव। ४ रक्षा, बचाव।}}
{{Outdent|उद्धृतोद्धार(सं॰ त्रि॰) १ निज अंगप्राप्त, अपना हिस्सा}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 66|1em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/९३
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|९२|इसलामगढ़-इस्तिञ्जा|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:लाम खान् मरे और इक़राम ख़ान् बङ्गालके सूबेदार बने। आगरेके पास फ़तेहपुर सीकरीमें इनकी कबर है।
{{outdent|इसलामगढ़—राजपूताना प्रान्तभागमें भावलपुरके अन्तर्गत एक दुर्ग। खान्पुरसे जैसलमेर जानके पथपर यह दुर्ग खड़ा है। पहले इसपर जैसलमेरके राजपूतोंका अधिकार था, किन्तु भावलपुरके खानोंने उनके हाथसे कौन लिया।}}
{{outdent|इसलामनगर—युक्तप्रदेशस्य बदायूं जिलेके अन्तर्गत बिसौली परगनेका एक नगर। यह अक्षा॰ २८° १९' ४५" उ॰ और द्राधि॰ ७८° ४६′ पू॰ के मध्य अवस्थित है। इस नगरके चारों ओर आमका बाग़ लगा है।}}
{{outdent|इसलामाबाद—१ बङ्गालके चट्टग्राम जिलेका एक प्रधान नगर। {{smaller|चट्टयान देखो।}} २ काश्मीरका एक नगर। यह अक्षा॰ ३३° ४१′ उ॰ तथा द्राधि॰ ७५° १७' पू॰ के मध्य झेलम नदी किनारे गिरिशृङ्गपर अवस्थित है। गिरिके नीचे प्रस्त्रवण है। सुनने में आता है, कि विष्णुने उक्त प्रस्रवण बनाया था। इसका प्राचीन नाम अनन्तनाग है। अम्बरनाथ जानेवाले यात्री इसी स्थानसे आहार्य संग्रह करते हैं। ई॰ के १८वें शताब्दमें मुसलमानोंने इस नगरका नाम इसलामाबाद रक्खा था। यहां काश्मीरी शाल और नानाप्रकार रुई एवं ऊनका कपड़ा बिकने आता है। केसर खूब मिलती है।}}
{{outdent|इसलाह (अ॰ स्त्री॰) १ संशोधन, दुरुस्ती, सुधार। २ चिवुककेश, टुड्डीका बाल।}}
{{outdent|इसहाव, खान्—दिल्ली-सम्राट् मुहम्मद शाहके एक अति प्रियपात्र बन्धु। इनकी उपाधि मीतमिनउद्-दौला और प्रक्कत नाम मिर्ज़ा गुलाम अली था। ये अच्छी कविता बनाते थे। १७४० ई॰ में इनकी मृत्यु हुई। १७४६ ई॰ में इनकी कन्याका विवाह सफदरजङ्गके पुत्र शुजाउद्दौलाके साथ धूमधामसे किया गया था।}}
{{outdent|इसहाक मौलाना—पञ्जाब प्रान्तस्थ मूलतान जिलेवाले उच्छा स्थानके एक पढ़े-लिखे मुसलमान्। युवावस्था में इन्होंने अपनेको चाचा सैयद सदर-उद्-दीन राजू कत्तानकी देख रेखपर छोड़ रक्खा था। १४५६ ई॰ में}}
{{Multicol-break}}
:इनकी मृत्यु हुयी। सहारनपुरमें अपने मकान्पर ही मौलानाकी कबर बनी है।
{{outdent|इसायी, {{smaller|ईसाई देखो ।}}}}
{{outdent|इसीका (हिं॰) १ 'यह' का सम्बन्ध कारक। {{smaller|इशीका देखो।}} इसे (हिं॰ सर्व॰) इसको, इसके लिये । 'इसे' यह शब्दके कर्मकारक और सम्प्रदानकारकका रूप है।}}
{{outdent|इस्कात (अ॰ पु॰) पतन, गिराव।}}
{{outdent|इस्कात इमल (अ॰ पु॰) गर्भपात, पेटका गिराना।}}
{{outdent|इस्कातर (= पोर्तुगीज Escritoire) सम्पुटविशिष्ट लेखनमञ्च, खानेदार लिखनेका मेज़।}}
{{outdent|इस्कार्दी (स्कार्द)—काश्मीर-राज्यान्तर्गत बलती नामक प्रदेशका एक नगर। यह अक्षा॰ ३५° १२' उ॰ और द्राधि॰ ७५° ३५′ पू॰ के मध्य अवस्थित तथा पर्वतमाला द्वारा वेष्टित है। नगर में एक दुर्ग बना है, जो पर्वतपर निकटस्थ सिन्धुनदी से ८०० फीट ऊंचा खड़ा है। काश्मीरराज गुलाबसिंहने स्थानीय राजा अह-मद-शाहसे इसे कीन अपने राज्यमें मिला लिया था।}}
{{outdent|इस्तमरार (अ॰ पु॰) १ सनातनत्व, क्याम, ठहराव। २ एकाधिकार, बेरोक कब्जा। कानूनमें नियत और अपरिवर्तनशील करकी इस्तमरार कहते हैं।}}
{{outdent|इस्तमरारदार (अ॰ पु॰) क्षेत्र वा पट्टका सनातन-अधिकारी, जो शख्स खेत या पट्टे पर हमेशा के लिए कब्ज़ा रखता हो।}}
{{outdent|इस्तमरारी (अ॰ वि॰) १ सनातन, कायम, कभी न बदलनेवाला। (स्त्री॰) २ नियत पटुकी भूमि, कायम पट्टे की ज़मीन।}}
{{outdent|इस्तिकबाल (अ॰ पु॰) १ स्वागत, अगवानी। २ भविष्यत्काल, जुमाना आइन्दा।}}
{{outdent|इस्तिक्लाल (अ॰ पु॰) १ दृढ़ता, मज़बूती। २ स्थिरता, कयाम।}}
{{outdent|इस्तिङ्गी (हिं॰ स्त्री॰) जहाजी रस्ती। यह विनीबर लगती है। पालकी इसीसे तानते और खींचते हैं। यह अंगरेजी string शब्दका अपभ्रंश है।}}
{{outdent|इस्तिष्ना (अ॰ पु॰) १ मूत्रोत्सर्ग, पेशाब करना, मुतायी। २ मूत्रपुरीषीत्सर्ग के पश्चात् कर शुद्धि, हाथपानीका लेना। ३ मूत्रोत्सर्गके पश्चात् मृत्तिका}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{c|{{x-larger|ई}}}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{larger|ई}}—हिन्दी वर्णमालाका चतुर्थ स्वरवर्णं। यह इकारका दीर्घ रूप है। तालुसे निकलनेके कारण इसे तालव्य वर्ण कहते हैं। ई का उच्चारणः कभी दीर्घ कभी प्लतु होता है। तन्त्रके मतसे यह कुण्डलिनी है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव प्रभृति देव इसमें रहते हैं। इसकी उपासनासे चतुर्वर्ग फल मिलता है। {{smaller|(कामधेनुतन्त्र)}}
वर्णोर्द्धारतन्त्रके मतसे ई लिखनेका नियम यह है,—
ऊपर-नीचे और मध्यदिक पर यह कुञ्चित होता है। अधीगत तीन कोण रहते, जो दक्षिण दिक्से ऊपरकी सिकुड़ते हैं। ऊपरी दक्षिण कोणपर कोणयुक्त एक दूसरी रेखा कुञ्चित भावसे खींचना पड़ती है। ई में चन्द्र, सूर्य और अग्नि विद्यमान हैं। इसकी मात्रा शक्ति है। {{smaller|(वर्णोंहारतन्न)}} ई को तन्वमें त्रिमूर्ति, महामाया, लीलाची, वामलीचन, गोविन्द, शेखर, पुष्टि, सुभद्रा, रत्नसंज्ञा, विष्णु, लक्ष्मी, प्रहास, वाग्विशुद्ध, परापर, कालीत्तरीय, मेरुण्डा, रीति, पीण्डवर्धन, शिवोत्तम, शिवा, तुष्टि, चतुर्थी, विन्दु, मालिनी, वैष्णवी, वैन्दवी, जिह्वा, कामकला, सनादका, पावक, कीटर, कीर्ति, मोहिनी, कालकारिका, कुचहन्द, तर्जनी, शान्ति और त्रिपुर-सुन्दरी भी कहते हैं। माटकान्यासमें इसका स्थान वामचक्षु है। {{smaller|(ईं नमो वामचक्षुसि)}}
हिन्दीमें ई प्रत्ययका काम भी देती है। इसके सहारे विशेष्य और विशेषण दोनों बनते हैं। जैसे-बेटासे बेटी और लेटासे लेटी। कभी-कभी विशेष्यके अन्तमें लगनेसे विशेषण और विशेषणके अन्तमें ई लगनेसे विशेष्य हो जाता है। जैसे—चालसे चाली और लालसे लाली।
{{outdent|ई॰ (सं॰ अव्यव॰) १ विषाद! अफसोस! हाय! २ अनुकम्पा! रहम! ३ क्रोध! गुस्सा! ४ दुःखानुभव।}}
{{Multicol-break}}
:तकलीफ! ५ प्रत्यच्च। आंखके सामने! ६ सनिधि! नज़दीकी! (स्त्री॰) अस्य विष्णी॰ पत्नी, अ-ङीप्। ७ लक्ष्मी। ८ माया। (पु॰) ९ शान्ति। १० कामदेव। ११ गोविन्द। १२ त्रिमूर्ती। १३ वाम-लोचन। १४ नृसिंहास्त्र। १५ सुरेश्वर। १६ कन्या-युग्म। १७ कर्केट।
{{outdent|डेंगुर (हिं॰ पु॰) सिन्दूर, शिङ्गरफ, लालसीस। यह भारतमें बनता और बाहरसे भी आता है। गलते सीसकी वायुप्रवाह में रखनेसे ईंगुर तैयार होता है। यह विशेषतः महावीर पर चढ़ता है। सौभाग्यवती स्त्री अपनी मांग इससे भरती हैं। ई गुरसे पारा भी निकालते हैं। सिन्दूर और {{smaller|हिङ्गल देखो।}}}}
{{outdent|ईवे (हिं॰ क्रि॰ वि॰) इधर, यहां, इस ओर।}}
{{outdent|ईंचना (हिं॰ क्रि॰) १ अश्वन करना, खींचना। २ लिखना, घसीटना। ३ असि निकालना, तलवारकी म्यानसे बाहर करना। ४ फांसी चढ़ाना। ५ शोषण करना, सीख लेना। पीना। ७ ग्रहण करना, ऐंठ लेना। ८ रख छोड़ना, ९ पान करना, दम लेना, दाब रखना। ८ बांधना, अंगेजना।}}
{{outdent|ईंचमनौती (हिं॰ स्त्री॰) भूमिपतिका अपने क्ऊषकके महाजनसे कर ग्रहण करना। क्कषक भूमिकर देनेमें असमर्थ होनेसे ज़मीन्दार महाजनसे वह धन लेता है और उसके खातेमें कृषकके नाम जमा करा देता है। इसीका नाम ईचमनौती है।}}
{{outdent|ईंट (हिं॰ स्त्री॰) १ इष्टका, मट्टीका टुकड़ा। यह चौखूंटी और लम्बी रहती तथा सांचमें ढलती है। ईंट कच्ची और पक्की दो तरहकी होती है। पक्की ईंट पजावेमें पकती है। इसे लखोरी, नम्बरी और मुट्ठी कहते हैं। लखौरी पतली और छोटी होती है। इसका चलम अब बन्द हो गया है। पुराने समय}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईटका घर मट्टी होना—ईजाब|९५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:इसे घिस घिस कर सुन्दर गृह बनाये जाते थे। नम्बरी मोटी और लम्बी होती है। आजकल पक्के मकान्में यही लगती है। पुड्डीको गण भी कहते हैं। यह चौड़ी और परिधिके खण्ड जैसी रहती है। कूएंकी जोड़ायी इसीसे होती है। क्योंकि दूसरी ईंट लगनेसे गोलायी आ नहीं सकती। तामड़ा, फररा, ककैया, ननिहारी, नौतेरही और मेज़ां आदि अन्य प्रकारकी होती है। ईंट सोने, चांदी, तांबे, पीतल और जस्ते आदिकी भी बनती है।
{{c|{{smaller|मोरीकी ईट चौवारी चढ़ी। (लोकोक्ति)}}}}
:{{gap}}२ ताशका एक रङ्ग।
{{outdent|ईंटका घर मट्टी होना (हिं॰ क्रि॰) विनष्ट होना, बिगड़ना। 'ईंटका घर मट्टी हो गया।" (लोकोक्ति)}}
{{outdent|ईंटकारी (हिं॰ स्त्री॰) इष्टका-स्थापन, ईंटकी जोड़ाई।}}
{{outdent|ईंटमार चड्डाकड़ा (हिं॰ पु॰) क्रीड़ाविशेष, लड़कोंका एक खेल। कितने ही लड़के इकट्ठे होकर यह खेल खेलते हैं। कोई लड़का एक ईंट दूर फेंक देता और दूसरोंसे उसपर निशाना लगानेको कहता है। जो अपने ढेलेसे फेंकी हुयी ईटको मारता, वह ईंट फेंकनेवाले लड़के पर चढ़कर ईटको जगह तक जाता है।}}
{{outdent|ईंटा (हिं॰ पु॰) {{smaller|ईंट देखो।}}}}
{{outdent|ईंडवा (हिं॰ पु॰) १ गोलाकार पुट विशेष, चक्करदार तह, इंडुरी। इसे शिरपर रख जलकुम्भ उठाते हैं।}}
{{outdent|ईडवी (हिं॰ स्त्री॰) शिरोवेष्टन, पगड़ी।}}
{{outdent|ईंट (हिं॰ वि॰) सट्टश, बराबर।}}
{{outdent|ईत (हिं॰ पु॰) ईंटका टुकड़ा। यह औज़ारकी धार पैनानेके लिये सानके नीचे रखा जाता है।}}
{{outdent|ईंदर (हिं॰ पु॰) किदार, नये दूधकी मिठाई। गाय या भैंस व्यानेपर आठ-दश दिनके अन्दर दूधको औट कर जो मिठाई बनती, वह ईंदर बजती है।}}
{{outdent|ईंदूर (हिं॰ पु॰) इन्दूर, चूहा। {{smaller|इन्दूर देखो।}}}}
{{outdent|ईंधन (हिं॰ पु॰) १ इन्धन, जलानेकी लकड़ी। २ त्टण, घास-फूस। "बापको आटा न मिले, जो ईधनको भेजे।" (लोकोक्ति)}}
{{outdent|ईंकार (सं॰ पु॰) ई स्वार्थ कार। चतुर्थ वर्णं ई।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|ईक्षक (सं॰ पु॰) ईच्च-कन्। दर्शक, नाज़रीन्, देखनेवाला शखु म।}}
{{outdent|ईक्षण (सं॰ क्ली॰) ईच भावे लाट्। १ दर्शन, नज़र, देखावा। करणे लुाट्। २ चक्षुः, आंख। ३ पर्यावेक्षण, खुबरदारी, चौकसी।}}
{{c|{{smaller|"शौचे धर्मेऽनपक्तत्याच पारिणाह्यस्य वेच्चणे।" (मनु ८०११)}}}}
{{outdent|ईक्षणिक (सं॰ पु॰) ईक्षण हस्तपादादि रेखा शुभाशुभं अस्ति अस्मिन्, ईक्षण-ठन्। दैवन्न, पेयोन्गो, हाथ-पैरके निशान् देखकर भला-बुरा बता देनेवाला शख्स। "भद्राचे चणिकैः सह।" (मनु ८।२५८)}}
{{outdent|ईक्षणिका (सं॰ स्त्री॰) ईक्षणिक टाप्। गणककी स्त्री, नजदीकी औरत।}}
{{outdent|ईच्चमाण (सं॰ वि॰) पर्यावेच्चक, जांचनेवाला।}}
{{outdent|ईच्ता (सं॰ स्त्री॰) ईक्ष दर्शने क्त टाप् च। दर्शन, नज़र, देख-रेख।}}
{{outdent|ईक्षित (सं॰ त्रि॰) पर्यावेक्षित, देखा हुआ, जो समझा गया हो।}}
{{block center|<poem>{{smaller|"एकोऽहमस्मीत्यात्मान' यत् त्व' कल्याणमन्यसे।
नित्य' स्थितस्ते ह्रदयेष पुण्यपापेचिता मुनिः॥" (मनु ८१८१)}}</poem>}}
{{outdent|ईचिट (सं॰ त्रि॰) द्रष्टा, देखनेवाला।}}
{{outdent|ईक्षेण्य (वै॰ वि॰) अद्भुत, अनोखा, देखने लायक।}}
{{outdent|ईक्ष्यमाण (सं॰ ति॰) देखा जानेवाला, जो जांचा जा रहा हो।}}
{{outdent|ईख (हिं॰ स्त्री॰) {{smaller|इक्षु देखो}}}}
{{outdent|ईखना (हिं॰ क्रि॰) ईक्षण करना, देखना।}}
{{outdent|ईग्खराज (हिं॰ पु॰) इक्षु वपन करनेका प्रथम दिवस, जिस दिनको पहले पहल जख बोई जाती हो।}}
{{outdent|ईक्छन (हिं॰) {{smaller|ईचण देखो।}}}}
{{outdent|ईछना (हिं॰ क्रि॰) इच्छा रखना, खाहिश करना, चाहना।}}
{{outdent|ईछा (हिं॰) {{smaller|इच्छा देखो।}}}}
{{outdent|ईज़ा (अ॰ स्त्री॰) दुःख, मुसीबत, तकलीफ,।}}
{{outdent|ईजाद (अ॰ स्त्री॰) आविष्कार, सृष्टि, उत्पादन, दरियाफ्त, बनावट।}}
{{outdent|ईजान (सं॰ त्रि॰) यजमान, जो यन्न करता हो।}}
{{outdent|ईजाब (अ॰ पु॰) १ स्वीकार, मच्चूरी। २ प्रथम}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|९६|ईजिक—ईद|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
:प्रस्ताव, पहली तजवीज़। इसे दोमें एकदल कोयी कार्य हाथमें लेनेसे प्रथमतः उपस्थित करता है।
{{outdent|ईजिक (सं॰ पु॰) जनपद विशेष, एक
यहां कहीं-कहीं ईजक भिन्न पाठ भी मिलता है। अनेक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य प्रभृति रहते हैं। (औषापर्व)}}
{{outdent|ईज्या (सं॰ स्त्री॰) १ भूमि, ज़मीन्। २ गो, गाय।}}
{{outdent|ईट (हिं॰) {{smaller|दृष्ट देखो ।}}}}
{{outdent|ईठि (हिं॰) {{smaller|इष्ठि देखी।}}}}
{{outdent|ईठी (हिं॰ स्त्री॰) बरक्की, भाला।}}
{{outdent|ईठीदाड़ (हिं॰ पु॰) चौगानका डण्डा। इससे हाके या पोलो खेलते हैं।}}
{{outdent|ईड् (वै॰ स्त्री॰) उदकदान, देवतापर धारका चढ़ाना।}}
{{outdent|ईडन (सं॰ क्ली॰) प्रशंसाकार्य, तारीफ़का करना।}}
{{outdent|ईड़ा (सं॰ स्त्री॰) ईड-अ-टाप्। १ स्तुति, तारीफ़। २ नाड़ी, नब्ज। {{smaller|नाड़ी देखो।}}}}
{{outdent|ईड़ित (सं॰ ति॰) ईड कर्मणि क्त। स्तुति, जो तारीफ़ पा चुका हो। ईलित रूप भी होता है।}}
{{outdent|इडेन्य, {{smaller|ईय्य देखो।}}}}
{{outdent|ईद्य (वे॰ वि॰) ईडण्यत्। ईड़वन्दद्वश' सदुद्दां ख्यतः। पा ६।१।२१४। स्तवके योग्य, जो तारीफ के काबिल हो ईलेन्य रूप भी बनता है।}}
{{outdent|ईड्यमान (सं॰ ति॰) प्रशंसा पानेवाला, जो तारीफ किया जा रहा हो।}}
{{outdent|ईच्या (सं॰ स्त्री॰) भूम्यामलकी, भूई' आंवला।}}
{{outdent|ईढ़ (हिं॰ स्त्री॰) छठ, ज़िद।}}
{{outdent|ईढ़ी (हिं॰ वि॰) हठी, जिद्दी।}}
{{outdent|ईत (हिं॰ स्त्री॰) वनमच्चिका, डांस।}}
{{outdent|ईतर (हिं॰ पु॰) १ आत्मश्लाघी, शेखीबाजू, जो शखूस इतरीता हो।}}
{{c|{{smaller|"ईतर के घर तीतर बाहर बांध कि भीतर।" (लोकोक्ति)}}}}
:(वि॰) २ इतर, मामूली, छोटा।
{{outdent|ईति (सं॰ स्त्री॰) ईयते गम्यते, ई भावे क्तिन्। १ डिम्ब, तगड़ा। २ प्रवोस, डेरा। ३ सांसर्गिक रोग, लगनेवाली बीमारी। ४ राजद्रोपद्रव विशेष, आफत, सातिमें छः प्रकारको ईति कही है,-}}
{{Multicol-break}}
{{block center|<poem>{{smaller|"अतिवृष्टिरनादृष्टिः शलभा सुषिकाः खगाः।
प्रत्यासन्नाथ राजानः षड़े ता ईतयः स्वप्नताः॥" (कामन्दक)}}</poem>}}
:{{gap}}अर्थात् अधिक वर्षा होना, बिलकुल पानी न बरसना, टिड्डी आना, चूड़े लगना, पच्ची बढ़ना और शत्त्र, राजाका चढ़ना ईति कहाता है। उक्त छः प्रकार उपद्रव उठनेसे शस्य नहीं उपजता और प्रजाको बड़ा ही कष्ट मिलता है।
{{outdent|ईथर (अं॰ = Æther) १ पदार्थविज्ञानके अनुसुरासारकी सार अधिक स्थितिस्थापकता और अत्यन्त चीणताका कल्पित साधन। यह पदार्थ समस्त स्थानमें भरा है। घन द्रव्यका भीतरी भाग भी इससे खाली नहीं होता। प्रकाश और उष्णताके सञ्चारणका द्वार ईथर ही है। २ रसतन्त्रानुसार अत्यन्त लघु, वायु-परिणामशील और दाहात्मक द्रव पदार्थ। यह गन्धकके अम्ल साथ सुरासार क्षरण करनेसे बनता है। अपेक्षा ईथर अल्पभार होता और अद्भुत भेदक गन्ध तथा प्रखर, शीतल एवं सुर्गान्ध स्वाद रखता है। यह दश अंश जलमें हल पड़ और वायु लगनेसे उड़ जाता है। अधिक शीतल रहनेसे ईथर बरफ जमानेके काम आता है। इसे सूंघनेसे अवसन्नता भी बढ़ती है। ३ वायुके ऊपरका कल्पित पदार्थ। यह अतिसूक्ष्म होता है और चक्षुःसे देख नहीं पड़ता। शून्य स्थानमें इसकी स्थिति समझी जाती है। तारागण इसीमें घूमता और हमारे एक अङ्गका अनुभव दूसरेको इसीके सहारे मिलता है। प्रकाशके आने-जानेका द्वार ईथर ही है। निकटस्थ द्रव्यके चलते-फिरते भी इसमें गतिसञ्चार नहीं होता।}}
{{outdent|ईद (अ॰ स्त्री॰) १ मुसलमानोंके धर्मोत्सवका दिन। यह रमज़ान् महीनेके अन्त में पड़ती है। ईदसे पहले मुसलमान् तीस दिन रोजा रखते यानी दिनको भूखे प्यासे रह शाम पड़ते ही भोजन करते हैं। वर्षमें चार ईद होतो हैं—आखिरी चहार शम्बा, शाबन, रमज़ान् और बकरोद। इनमें ईद-उल्-फितर् और ईद-उजू-जुहा या बकरीद बड़ी है। उक्त अवसर पर विद्वान् और मूर्ख सभी मुसलमान् ईदगाहमें नमाज़ पढ़ने जाते हैं। सिवा इनके अशूर ओर}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|२७|ईद-उज-जुहा-ईम्|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
शबरात भी एक प्रकारको ईद है। किन्तु इसमें सिर्फ प्रधान साधुवोंके नामपर फातिहा पढ़ा जाता है।
नौरोज़ भी कोई छोटी ईद नहीं होती। सूर्यके मेषराशिपर आनेसे यह उत्सव मनाया जाता है। सब लोग क़रीब काले या किरमिज़ी रङ्गका कपड़ा पहनते हैं। राजा अपने सिंहासनपर बैठते हैं और अमीर-उल्-उमरा, दरबारी तथा नौकर चाकर नज़र गुजारते तथा मुबारक बाद देते हैं। 'मुबारक नौरोज़' कहकर सलाम किया जाता है। इस दिन खेल-तमाशा होता है, नज़राना दिया जाता और दरबारमें खानेके लिये नाश्ता मिलता है। लोग आपसमें एक दूसरेसे मुलाकात करने भी जाते हैं।
२ उत्सव, जलसा।
{{outdent|ईद-उजू-जुहा (अ॰ स्त्री॰) बक़रीद, मुसलमानोंका एक उत्सव। यह जिलहज महीनेमें होती है।}}
{{outdent|ईद-उल्-फितर (अ॰ स्त्री॰) उत्सव विशेष, मुसलमानोंका एक जलसा। यह शव्वाल महीने में पड़ती है।}}
{{outdent|ईदगाह (अ॰ स्त्री॰) उन्नतस्थान विशेष, एक चबूतरा। मुसलमान प्रधानतः ईद या दूसरे धर्मोत्सव-के दिन इस जगह नमाज़ पढ्नेको ईकट्ठा होते हैं।}}
{{outdent|ईदी (अ॰ स्त्री॰) १ उत्सवोपहार, ईद या किसी जलसेको भेंट। २ उत्सव-सम्बन्धीय कविता, ईद या किसी जलसेकी शायरी। ३ उत्सव-सम्बन्धीय कविता लिखनेका पत्र, जिस काग़ज़में ईद या किसी जलसेकी शायरी लिखी जाय। ४ उत्सव-सम्बन्धीय कविता लिखनेका पत्र, जिस काग़ज़में ईद या किसी जलसेकी शायरी लिखी जाय। ४ उत्सव-सम्बन्धीय कविता लिखनेका पारितोषिक, ईदकी शायरी बनानेका इनाम। इसे छात्र अपने मुसलमान गुरुको देते हैं। ५ उत्सवके दिन बालकोंको दिया जानेवाला धन, जो रुपया-पैसा ईदके दिन लड़कोंकी खाने और खेलनेकी दिया जाता हो।}}
{{outdent|ईट्टक् (सं॰ त्रि॰) {{smaller|इदमिव दृश्यते, इदम्-दृश्-क्किए, इद' क्रिमोरीश की। पा ६।३।८०।}} इति ईश इत्यादेशः। १ एव-म्भूत, ऐसा। (क्ली॰) २ एवम्भूत अवसर, ऐसी हालत।}}
{{outdent|ईदृक्ता (सं॰ स्त्री॰) ईदृशी भावः, ईदृश-तल्-टाप्। इस प्रकारका भाव, ऐसी हालत।}}
{{c|{{smaller|"विश्योरिवास्यानवधारणीयमीदृक्तया रूपमियत्तया वा।" (रघु १३।५)}}}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|ईदृश, {{smaller|ईहक् देखो।}}}}
{{outdent|ईदृश (सं॰ त्रि॰) इदम् दृश घञ्। १ एवम्भूत, ऐसा। (अव्य॰) २ इसप्रकार, इसतरह, ऐसे।}}
{{outdent|ईप्सन (सं॰ क्ली॰) {{smaller|ईप्सा देखो।}}}}
{{outdent|ईप्सा (सं॰ त्रि॰) आप-सन्-अङ-टाप्। वाच्छा, खाहिश, चाह।}}
{{outdent|ईप्सित (सं॰ त्रि॰) आप्तुमिष्टम्, आप्-सन् कर्मणि क्त। वाच्छित, खाहिश किया हुआ, जो चाहा गया हो।}}
{{outdent|इप्सितफल (सं॰ पु॰) नारिकेलवृक्ष, नारियलका पेड़।}}
{{outdent|ईप्सु (सं॰ वि॰) आप्-सन्-उ। १ प्राप्तिको चेष्टा करनेवाला, जो हासिल करनेकी कोशिशमें लगा हो। २ प्राप्तिको इच्छा रखनेवाला, जो हासिल करना चाहता हो।}}
{{c|{{smaller|"धर्मप्सवस्तु धर्मज्ञाः सतां वृत्तिमनुष्ठिताः।" (मनु १००१२७)}}}}
{{outdent|ईप्सयज्ञ (सं॰ पु॰) सोमयन्न विशेष। {{smaller|सोमयाग देखो।}}}}
{{outdent|ईफा (अ॰ पु॰) निष्पत्ति, साधन, अजामदिही, नबेड़ा। यह यौगिक शब्दोंमें लगता है।}}
{{outdent|ईफा-डिगरी (अ॰ और अं॰ मिश्रज) डिगरीके रुपयेको निष्पत्ति, डिगरीका रुपया दे देना।}}
{{outdent|ईफावादा (सं॰ पु॰) प्रतिज्ञा साधन, इकरारको अच्जामदिही, बातका पूरा करना।}}
{{outdent|ईबोसोबो (हिं॰ स्त्री॰) सम्भोगजनित शब्द विशेष, सोसोको आवाज़, सिसकारी।}}
{{outdent|ईब्नबतूता (इबुबतूता)—एक अरब पर्यटक। इन्हें मुहम्मद तुगलकने दिल्लीका विचारपति बना दिया था। 'सफर इब्नबतूता' नामक ग्रन्थ इन्होंने लिखा है। १३३२ ई॰ में ये मक्के तीर्थयात्रा करने गये थे। इनके उक्त ग्रन्थमें अरबका विशेष वर्णन नहीं मिलता। मक्काके विषयमें इन्होंने इतना हो कहा है,—“परमेश्वर इसे बड़ा बनाये।"}}
{{outdent|ईम् (वै॰ अव्य॰) १ अच्छा! हां! ठीक है! २ बस! ठहरो! यह प्रायः छोटे शब्दोंके अन्तमें वाक्य आरम्भहोते समय अथवा सम्बन्धवाचक सर्वनाम, यद् अव्यय, उपसर्ग और आत्, उत् तथा अथ आदि निपातोंके पोछे लगता है।}}
{{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 25|2em}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/९९
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ममता साव9
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<noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|९८|ईमन-ईर्म|}}</noinclude>
{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|ईमन (हिं॰ पु॰) एक रागिणी, एमनी। यह श्रीरागको स्त्री है। (सङ्गीतसार) कोई कोई इसे भूपाल रागको स्त्री बताते हैं। इसे रात्रिके प्रथम याममें गाते हैं।}}
{{outdent|ईमनकल्याण (हिं॰ पु॰) ईमन और कल्याणमिश्रित राग।}}
{{outdent|ईमा (अ॰ पु॰) सङ्केत, इशारा, सैन।}}
{{outdent|ईमान् (अ॰ पु॰) १ धर्म, दीन्, मानता।}}
{{c|{{smaller|"जाये जान् रहे ईमान्।” (लोकोक्ति)}}}}
:{{gap}}२ सत्य, सचाई। "जान्की जान् गई ईमान्का ईमान्।” (लीकोक्ति) सच्चे लेनदेनको 'ईमान्का सौदा' कहते हैं।
{{outdent|ईमान्दार (अ॰ वि॰) विश्वासपात्र, सच्चा, जो झूठा न हो।}}
{{outdent|ईमान्दारी (अ॰ स्त्रि॰) सत्य, सचाई।}}
{{outdent|ईयंमृग (अ॰ पु॰) १ वृक्ष, पेड़ । २ मृग, जानवर।}}
{{outdent|ईयचक्षुस् (वै॰ त्रि॰) चाउरो ओर देखनेवाला, जो हरजगह आंख फेंकता हो।}}
{{outdent|ईयिवस् (सं॰ ति॰) ई लिटः कसु निपातनात् साधुः । गत, गुज़रा हुआ, जो चला गया हो।}}
{{outdent|ईरण (सं॰ ति॰) १ उषर, वीरान्, जो कोई चीज़ पैदा करनेके लायक न हो। २ शून्य, खाली। ३ चोभक, घबरा देनेवाला। (प॰) ४ वायु, हवा।}}
{{outdent|ईरान् (फा॰ पु॰) देशविशेष, फारस (Persia) का अंश। यह अक्षा॰ ३७° से ८०° उ॰ और ट्धि॰ ८६° से १०° पू॰ के मध्य अवस्थित है। प्राचीन पारसिकों के 'बन्दोदाद' नामक धर्मपुस्तकमें 'ऐर्य्यन-बएजो' आर्य जातिके आदिम स्थानका नाम मिलता है। पाश्चात्य पण्डितोंके मतसे उक्त आदिम स्थान पामोर और वेलूरताघ्वके निकट था। आर्य शब्दमें आर्य जातिके आदि-निवासका विवरण देखो। इसी स्थानको अनेक लोग ईरान् कहा करते हैं। कोई कोई कास्यौय सागरसे दक्षिण-पूर्व ईरान राज्यका होना बताते है'। प्रिचार्ड साहबने इसो स्थानको आर्यजातिका आदिम वासस्थान माना है। आर्य शब्दनै प्रकृत विवरण देखो। ईरान्राज के सरके पुत्रने किसी दिन कहां था,—हमारे पिताके राज्य में 'एक ओर लोग जैसे शोतसे, वैसे ही दूसरी ओर ग्रोष्षमसे कातर रहते हैं । इससे विदित होता है कि पूर्वकालमें}}
{{Multicol-break}}
ईरान् एक विस्तृत राज्य था। इरान्को भूमि युफ्रेतिस् नदीतोरस्थ सुमेसात्से भारतवर्षकी तक्षशिला पर्यन्त कुल १२८° मील लम्बी और गेट्रोसियासे अक्षस नदी तोर पर्यन्त ८०० मोल चौड़ी थी।
पहिले ईरान्में अरमिय और एलाम नामक जातिका अधिकार था। पाश्चात्य पण्डितोंके मतमें पश्चिम भागको अरमिय जातिसे अहमरी, सिरोय एवं हिब्रू प्रभृति और पूर्वभागको अरमिय जातिसे असुरोय, वाबिरुष (बाबिलनीय) तथा कालदोय भाषाओंको उत्पत्ति हुई है। पारस्य शब्द 'अपर विवरण देखो। प्राचीन ईरानियोंमें विवाहको भयानक कुप्रथा प्रचलित थी। किसो रक्तको स्त्रो उसो रक्तके पुरुषर्म व्याह दो जातीथी। कहते है कि पहिले ईरानी अपरापर महोदरा भगिनी और अपनो विमातासे भो विवाह कर लेते थे। विवाह शब्द और Journal Bombay Branch of R. As. Soc., Vol. XVII. {{smaller|p. 97-136 देखो।}}
{{outdent|ईरामा (सं॰ स्त्री॰) नदीविशेष। (भारत यन)}}
{{outdent|ईरिका (सं॰ स्त्री॰) ईर्व न्-अत-इत्-टाप्। वृत्त-विशेष, एक दरखुत।}}
{{outdent|ईरिग्ण (सं॰ क्ली॰) १ शून्य, खाली जगह। २ ऊषर-क्षेत्र, बन्जर ज़मीन्। वृक्षलताटणादि शून्य स्थानको ऊषर कहते हैं।}}
{{outdent|ईरित (सं॰ ति॰) ईर्-क्त। १ क्षिप्त, कोड़ा हुआा। २ प्रेरित, भेजा हुआ। ३ कम्पित, कंपा हुआ। ४ गत, गया गुज़रा। ५ कथित, कहा हुआ। ६ विसर्जित, रखा हुआा। ७ विचिप्त, बिगड़ा हुआ। ८ चालित, जो सरकाया गया हो।}}
{{outdent|ईरिताकूट (सं॰ क्ली॰) प्रकाशित श्राशय, बताया हुआ मतलब।}}
{{outdent|ईरिन् (सं॰ पु॰) ईग्-इनि। गमनशील व्यक्ति, चलनेवाला आदमी।}}
{{outdent|ईर्म (सं॰ पु॰-क्ली॰) ईर् बाहुलकात् मक्। १ व्रग्ण, फोड़ा। २ क्षत, ज़खुम। व्रण दो प्रकारका है-शारीरिक और आगन्तुक। रक्तादिके दोषसे शारीरिक और अस्त्राघातादिसे आगन्तुक व्रण उत्पन होता है। (वै॰ अव्य॰) ३ इस स्थानमें, इस जगह, यहां।}}
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||'''उद्द्योतित-उड्वर्षण'''|'''२५९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
कण्ठने इनका वचन उद्दत किया है। २ काव्य- उद्धमाय (सं॰ अव्य॰) कष्टखास ग्रहणकर, हाफके।
प्रकाशके एक नवीन टीकाकार।
उदय (सं॰ त्रि॰) पान करनेवाला, जो पीता हो।
"उयोतित (सं॰ स्त्री॰) प्रकाशित, रौशन, जो उद्दर (सं॰ त्रि॰) उत-धेट-थ। १ उठाकर पान
जलाया या चमकाया गया हो।
करनेवाला, जो उठाकर पीता हो। (पु॰)२ राक्षस
उद्राव (सं॰ पु॰) उत्-टु-वञ्। १ प्रस्थान, द्रुत विशेष ।
पदसे पलायन, भागाभागी । (त्रि॰) २ उत्कृष्ट उद्धरण (सं॰ क्ली॰) उत्-ह-त्य ट। १ उद्दार, छुट-
गतियुक्त, भाग खड़ा होनेवाला, जो दौड़ते जा कारा। २ ऋणशोध, कर्ज की चकती। उन्म लन,
रहा हो।
उखाड़। ४ उत्तोलन, उठाव। ५ वमन, के, उलटी।
६ निराकरण, अलगाव । ७ व्यसनादिसे विमोचन,
दौड़ पड़ा हो। २ उगत, चढ़ा हुआ।
बुरी आदत वर्ग रहसे बरतफौ। ८ परिवेषण, धिराव।
उद्द (हिं॰ क्रि॰ त्रि॰) अर्ध्व, ऊपर।
८ उत्पाटन, नोचखसोट। १० पठित पाठ का पुनः
उडत (सं॰ पु॰) उत्-हन्-त । १ राजमल्ल, पठन, आमोख्ता। १२ गाहपत्य अग्निका ग्रहण ।
शाही पहलवान। (त्रि॰) २ अविनीत, अक्खड़। (पु॰) १३ शान्तनु नरेशके पिता। इन्होंने माकण्डेय
३ उस्थित, उठा हुआ। ३ उत्क्षिप्त, उछला हुआ। पुराणके कुछ अंशको टोका बनायी थी।
४ आहुत। ५ चालित, भड़काया हुआ। ६ घोर, उद्दरणी (हिं॰ स्त्री॰) पठित पाठका पुन: पठन,
बड़ा। ७ उत्कट, कड़ा।
आमोखू ता।
उद्दतमन (सं॰ क्ली॰) १ अभिमान, घमण्ड । उद्दरणीय (सं॰ त्रि॰) जपर चढ़ाने के योग्य, जो
(त्रि॰) २ अभिमानी, घमण्डी।
निकाल लेनेके काबिल हो।
उद्धतमनस्क (सं॰ त्रि॰) अभिमानी, घमण्डी।। | उरना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्धार करना, चाना ।
उद्दताण वनिश्वन (सं॰ त्रि॰) समुद्रकी भांति कोला- २ उद्धार पाना, उबरना ।
इल करनेवाला, जो समुन्दरकी तरह गरजता हो। उद्वर्तव्य, उद्दरणीय देखो।
उद्दति (सं॰ स्त्री॰) उत्-हन गतौ तिन् । १ उद्गति, उद्दलं (सं॰ त्रि॰) उत्-हट । १ उहारकारक,
उंचाई, चढ़ाव। २ उन्नति, तरक्को। ३ उत्पतन, उबारनेवाला।२ उन्मलक, उखाड़नेवाला। ३तारण-
ठोकर, चभेंट। ४ औद्धत्य, अक्खड़पन। ५ धृष्टता, कारक, पार लगानेवाला। “दिरातमस्तु पथि दौरोद्धत -
शरारत। ६ गर्व, घमण्ड ।
रवीत ।" (याज्ञवल्क्य) ४ अंश लेनेवाला, हिस्सेदार ।
उचनपुर (उद्धरणपुर)-बङ्गाल प्रान्तके वर्धमान जिलेका सम्पत्तिको पुन: प्राप्त करनेवाला, जो जायदाद
एक ग्राम। यह भागीरथी किनारे अक्षा॰ २३ ४१ फिरसे लेता हो।
१०‘‘ उ॰ और द्राघि॰ ८८° ११ पू॰ पर अवस्थित है। उद्घर्ष (सं॰ पु॰) उद् गतो हर्षो यस्मिन्। १ उत्सव,
नदीपारकरनेको नाव चला करती है। यहां रोज जलसा। प्रधानत: धार्मिक उत्सवको उद्घर्ष कहते
बाज़ार और पौषसंक्रान्तिको प्रति वर्ष मेला लगता है। हैं। २ पतिशय हर्ष, बड़ी खुशो। ३ कार्य करनेका
उद्दना (हिं॰ क्रि॰) उद गमन करना, उड़ना, फैल उत्साह, काम बनानेका हौसला। (त्रि॰) ४ उत्-
पड़ना।
कृष्ट, बढ़िया। ५ जातहर्ष
उद्दम (सं॰ त्रि॰) उत्-मा-श, धमादेशः। १ कृत- | उद्धर्षण (सं॰ क्ली॰) उत्-हष-ल्य ट। १ रोमाञ्च,
शब्द, जो बोला हो। (पु॰) २ कष्टखास, हंफो। रोंगटोका खड़ा होना। २ प्रोत्साहन, हौसलेका
३ शब्दकरण, आवाज निकालनेका काम ।
बढ़ाव। ३ हर्षयुक्त करना, खुश बनानेका काम !
उद्दमान (सं॰ क्ली॰) चुली, चूल्हा ।
(त्रि॰) ४ उत्तेजक, हौसला बढ़ानेवाला।
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अँजली चौधरी
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<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उद्द्योतित-उड्वर्षण'''|'''२५९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
:कण्ठने इनका वचन उद्धृत किया है। २ काव्य-प्रकाशके एक नवीन टीकाकार।
{{Outdent|उद्द्योतित (सं॰ स्त्री॰) प्रकाशित, रौशन, जो जलाया या चमकाया गया हो।}}
{{Outdent|उद्द्राव (सं॰ पु॰) उत्-टु-घञ्। १ प्रस्थान, द्रुत पदसे पलायन, भागाभागी। (त्रि॰) २ उत्कृष्ट गतियुक्त, भाग खड़ा होनेवाला, जो दौड़ते जा रहा हो।}}
{{Outdent|उद्द्रुत (सं॰ त्रि॰) १पलायित, भागा हुआ, जो दौड़ पड़ा हो। २ उद्गत, चढ़ा हुआ।}}
{{Outdent|उद्ध (हिं॰ क्रि॰ वि॰) ऊर्ध्व, ऊपर।}}
{{Outdent|उद्धत (सं॰ पु॰) उत्-हन्-क्त। १ राजमल्ल, शाही पहलवान्। (त्रि॰) २ अविनीत, अक्खड़। ३ उस्थित, उठा हुआ। ३ उत्क्षिप्त, उछला हुआ। ४ आहुत। ५ चालित, भड़काया हुआ। ६ घोर,
बड़ा। ७ उत्कट, कड़ा।}}
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{{Outdent|उद्धति (सं॰ स्त्री॰) उत्-हन गतौ क्तिन्। १ उद्गति, उंचाई, चढ़ाव। २ उन्नति, तरक्क़ी। ३ उत्पतन, ठोकर, चभेंट। ४ औद्धत्य, अक्खड़पन। ५ धृष्टता, शरारत। ६ गर्व, घमण्ड।}}
{{Outdent|उद्धनपुर (उद्धरणपुर)――बङ्गाल प्रान्तके वर्धमान जिलेका एक ग्राम। यह भागीरथी किनारे अक्षा॰ २३° ४१‘ १०‘‘ उ॰ और द्राघि॰ ८८° ११‘ पू॰ पर अवस्थित है। नदीपारकरनेको नाव चला करती है। यहां रोज बाज़ार और पौषसंक्रान्तिको प्रति वर्ष मेला लगता है।}}
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{{Outdent|उड्वमाय (सं॰ अव्य॰) कष्टश्वास ग्रहणकर, हांफके।}}
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{{Outdent|उड्व (सं॰ त्रि॰) उत-धेट-श। १ उठाकर पान करनेवाला, जो उठाकर पीता हो। (पु॰) २ राक्षस विशेष।}}
{{Outdent|उड्वरण (सं॰ क्ली॰) उत्-हृ-ल्युट्। १ उड्वार, छुट-कारा। २ ऋणशोध, क़र्ज़ की चुकती। उन्मुलन, उखाड़। ४ उत्तोलन, उठाव। ५ वमन, कै, उलटी। ६ निराकरण, अलगाव। ७ व्यसनादिसे विमोचन, बुरी आदत वगै़रहसे बरतर्फी़। ८ परिवेषण, धिराव। ९ उत्पाटन, नोचखसोट। १० पठित पाठ का पुनः पठन, आमोख्ता। १२ गार्हपत्य अग्निका ग्रहण। (पु॰) १३ शान्तनु नरेशके पिता। इन्होंने मार्कण्डेय पुराणके कुछ अंशकी टीका बनायी थी।}}
{{Outdent|उड्वरणी (हिं॰ स्त्री॰) पठित पाठका पुन: पठन, आमोख़्ता।}}
{{Outdent|उड्वरणीय (सं॰ त्रि॰) ऊपर चढ़ाने के योग्य, जो निकाल लेनेके का़बिल हो।}}
{{Outdent|उद्धरना (हिं॰ क्रि॰) १ उद्धार करना, बचाना। २ उद्धार पाना, उबरना।}}
{{Outdent|उद्धर्तव्य, <small>उद्धरणीय देखो।</small>}}
{{Outdent|उद्धर्तृ (सं॰ त्रि॰) उत्-हृ-तृद्। १ उद्धारकारक, उबारनेवाला। २ उन्मूलक, उखाड़नेवाला। ३ तारणकारक, पार लगानेवाला। <small>“विरातभर्तुस्तु पथि चौरोद्धतुं-रवीतके।” (याज्ञवल्क्य)</small> ४ अंश लेनेवाला, हिस्सेदार। सम्पत्तिको पुन: प्राप्त करनेवाला, जो जायदाद फिरसे लेता हो।}}
{{Outdent|उद्घर्ष (सं॰ पु॰) उद्गतो हर्षो यस्मिन्। १ उत्सव, जलसा। प्रधानत: धार्मिक उत्सवको उद्घर्ष कहते हैं। २ अतिशय हर्ष, बड़ी खुशी। ३ कार्य करनेका उत्साह, काम बनानेका हौसला। (त्रि॰) ४ उत्कृष्ट, बढ़िया। ५ जातहर्ष खु़श।}}
{{Outdent|उद्धर्षण (सं॰ क्ली॰) उत्-हृष-ल्युट्। १ रोमाञ्च, रोंगटोका खड़ा होना। २ प्रोत्साहन, हौसलेका बढ़ाव। ३ हर्षयुक्त करना, खु़श बनानेका काम। (त्रि॰) ४ उत्तेजक, हौसला बढ़ानेवाला।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२६१
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२६०'''|'''उड्वर्षिणी-उड्वारणदत्त'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उहर्षिणी (सं॰ स्त्री॰) वसन्ततिलक नामक वर्ण। उद्धारी न दशखस्ति सम्पन्नामां खकर्मसु।
वृत्तका भेद। इसमें चार पाद पड़ते और प्रत्येकमें
यत्किचिदेव दैयन्तु जायसे मानवर्ष नम्।
एवं समुड तोद्धार समानंशान् प्रकल्पयेत्।
चौदह-चौदह प्रक्षर लगते हैं――
उद्धारऽनुद्ध ते त्वेषामियं स्वाद'शकल्पना॥
"उक्ता वसन्ततिलका तभना अगी गः। मिहोन्नतेयमुदिता मुनिकश्यपैन।
एवं हषभमुद्धारं सहरेत स पूर्वजः।
उवर्षि नीयमुदिता मुनिसतन" (वृत्तरवाकर)
ततोऽपरेऽजो एडषास्तटूनानां स्वमावत:॥” ( १० ११२-१२३ श्ली॰)
उर्षिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-वृष-णिच-णिनि। १ वर्ष-
पैटक धनके विभाग कालपर विश ज्येष्ठ, चत्वा-
कारक, खुश करनेवाला। २ पुलकित, खड़े रोंगटे
रिंशद. मध्यम और पयोति भाग कमिष्ठको मिलना
रखनेवाला।
चाहिये। फिर अवशिष्टांश सकलको बराबर बराबर
उद्दव (सं॰ पु॰) उत्-धूङ-अच । १ यज्ञाग्नि।
प्राप्य है। ज्येष्ठ और कनिष्ठके मध्यगत सकल माता
२ उत्सव, जलसा। ३ वष्यमातुल एक यादव ।
ये सत्यकके पुत्र और वृहस्पतिके शिष्य रहे। दूसरा
चत्वारिंशद भागके अधिकारी होते हैं। ज्येष्ठ यदि
गुणवान् रहे, तो ट्रव्य सामग्रीके मध्य उत्कृष्ट वस्तु
नाम देवश्रवाः था। उद्धव अन्तिमदशाको बदरिका-
श्रम में रहते थे। श्रीकृष्णने इन्हें ज्ञानका उपदेश
सकल और १० गाभीमें श्रेष्ठ गाभी उसको मिले।
दिया। (भामवर ११ स्कन्द)
सकल माता समान गुणसम्पन्न होनेसे ज्येष्ठको दशम
उद्यमित्र-वैद्यप्रदीप नामक वैद्यकग्रन्थके रचयिता।
पदार्थ प्राप्य नहीं। फिर भी सम्मानको रक्षाके लिये यत-
उच्चस्त (सं॰ त्रि॰) उत्क्षिप्तौ हस्ती येन, प्रादि
किञ्चित् उसे अधिक देना उचित है। अवशिष्ट सकल
बहुव्री। उतृक्षिप्त हस्त, हाथ उठाये हुआ।
धन भ्राता बराबर बांट लें। पैटक धन बंटते समय
उद्यान ( सं॰ क्ली॰) उज्जयतेऽस्मिन्बग्निः, उत्धा-
ज्येष्ठको टूना, मध्यमको द्योढ़ा और तद्भिव सकलको
एक एक अंश मिलेगा। प्रथम विवाहितासे कनिष्ठ
ल्युट । १ चुलो, चू ल्हा। २ वमन, कै। (त्रि॰)
३ उगत, उठा या चढ़ा हुपा। ४ वमित, उगला दुचा।
और पश्चात् परिणीता पत्नीसे ज्येष्ठ सन्तान रहनेपर
५ स्थल, मोटा, सूजा हुआ।
प्रथम स्त्रीगर्भजात, कनिष्ठ पड़ते भी एक श्रेष्ठ वृष
उद्दान्त (सं॰ पु॰) उत्-धन-णिच त। १ मद-
उदाररूप पाता है। फिर अपर पत्नौगभेंज सन्तानको
शून्य हस्ती, जिस हाथोके मस्तकसे मद न बहे।
माताके कनिष्ठानुसार अपकृष्ट वृष मिलेगा।
(त्रि॰) २ वमित, उगला हुआ।
उद्धारक (सं॰ त्रि॰) उच्चार करनेवाला, जो उठाता
सहार (सं॰ पु॰) उदधियते, उत् ह भावे धज ।
१ मुक्ति, नजात, छुटकारा। २ पतित वा समाजच्यत | उद्घारण (सं॰ क्ली॰) उत्-ध-णिच्-लुट् । १ उत्थापन,
व्यक्तिका ग्रहण, गिरे या जाससे खारिज शखसको उठाव। उत-ह-णिच-लाट। २ उहारसाधन, उबार,
फिर मिला लेनेका काम। ३ ऋणशोध, अदाकज ।
बचाव। ३ भागकरण, बंटवारा।
४ नष्टवस्तुका पुनरधिकार, खोयी हुयी चीज़पर फिरसे
उद्दारणदत्त (सं॰ पु॰) महाप्रभु चैतन्यदेवके एक
कबजा करने की बात। ५ अंशभेद । मनुने उद्दारका
प्रसिद्ध भक्त । १४०३ शकको त्रिवेणीतौरवर्ती सप्तग्राममें
नियम इसप्रकार रखा है-
इन्होंने जन्म लिया था। पिताका श्रोकरदत्त और
"येष्ठख विश उद्धारः सर्वट्रव्याञ्च वरम्।
माताका नाम भद्रावती रहा। गोत्र शाण्डिल्य था।
ततोच मध्यमस्य स्यात् तुरीयन्तु यवीयसः।
ज्येष्ठबद कनिष्ठय सहरतां यथोदितम्।
ये घरमें अपने पुत्र श्रीनिवासको छोड़ और वाणिज्यका
येऽन्चे ज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्वान्मध्वमं धनम्।
कार्य सौंप विवेकाचारी बने। नीलाचलमें उद्धारण-
सर्वेषां धनजातानामाददौताग्य मग्रजः।
दत्त प्रभुसे मिलने प्रायः जाते और प्रसाद मांगकर
यञ्च सातिशयं किश्चिद्दशशतया यादरम्॥
खाते थे।
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<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|'''२६०'''|'''उड्वर्षिणी-उड्वारणदत्त'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
उहर्षिणी (सं॰ स्त्री॰) वसन्ततिलक नामक वर्ण।
वृत्तका भेद। इसमें चार पाद पड़ते और प्रत्येकमें
चौदह-चौदह प्रक्षर लगते हैं――
"उक्ता वसन्ततिलका तभना अगी गः। मिहोन्नतेयमुदिता मुनिकश्यपैन।
एवं हषभमुद्धारं सहरेत स पूर्वजः।
उवर्षि नीयमुदिता मुनिसतन" (वृत्तरवाकर)
उर्षिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-वृष-णिच-णिनि। १ वर्ष-
कारक, खुश करनेवाला। २ पुलकित, खड़े रोंगटे
रखनेवाला।
उद्दव (सं॰ पु॰) उत्-धूङ-अच । १ यज्ञाग्नि।
२ उत्सव, जलसा। ३ वष्यमातुल एक यादव ।
ये सत्यकके पुत्र और वृहस्पतिके शिष्य रहे। दूसरा
नाम देवश्रवाः था। उद्धव अन्तिमदशाको बदरिका-
श्रम में रहते थे। श्रीकृष्णने इन्हें ज्ञानका उपदेश
दिया। (भामवर ११ स्कन्द)
उद्यमित्र-वैद्यप्रदीप नामक वैद्यकग्रन्थके रचयिता।
उच्चस्त (सं॰ त्रि॰) उत्क्षिप्तौ हस्ती येन, प्रादि
बहुव्री। उतृक्षिप्त हस्त, हाथ उठाये हुआ।
उद्यान ( सं॰ क्ली॰) उज्जयतेऽस्मिन्बग्निः, उत्धा-
ल्युट । १ चुलो, चू ल्हा। २ वमन, कै। (त्रि॰)
३ उगत, उठा या चढ़ा हुपा। ४ वमित, उगला दुचा।
५ स्थल, मोटा, सूजा हुआ।
उद्दान्त (सं॰ पु॰) उत्-धन-णिच त। १ मद-
शून्य हस्ती, जिस हाथोके मस्तकसे मद न बहे।
(त्रि॰) २ वमित, उगला हुआ।
सहार (सं॰ पु॰) उदधियते, उत् ह भावे धज ।
१ मुक्ति, नजात, छुटकारा। २ पतित वा समाजच्यत |
व्यक्तिका ग्रहण, गिरे या जाससे खारिज शखसको
फिर मिला लेनेका काम। ३ ऋणशोध, अदाकज ।
४ नष्टवस्तुका पुनरधिकार, खोयी हुयी चीज़पर फिरसे
कबजा करने की बात। ५ अंशभेद । मनुने उद्दारका
नियम इसप्रकार रखा है-
"येष्ठख विश उद्धारः सर्वट्रव्याञ्च वरम्।
ततोच मध्यमस्य स्यात् तुरीयन्तु यवीयसः।
ज्येष्ठबद कनिष्ठय सहरतां यथोदितम्।
येऽन्चे ज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्वान्मध्वमं धनम्।
सर्वेषां धनजातानामाददौताग्य मग्रजः।
यञ्च सातिशयं किश्चिद्दशशतया यादरम्॥
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{c|{{x-smaller|<poem>उद्धारी न दशस्वस्ति सम्पन्नामां स्वकर्मसु।
यत्किचिदेव देयन्तु ज्यायसे मानवर्ध नम्॥
एवं समुद्धृ तोद्धारे समानंशान् प्रकल्पयेत्।
उद्धारऽनुद्ध ते त्वेषामियं स्यादं शकल्पना॥
ततोऽपरेऽज्ये ष्ठद्धषास्तदूनानां स्वमातृत:॥” (९ अ॰ ११२-१२३ श्ली॰)</poem>}}}}
:{{gap}}पैतृक धनके विभाग कालपर विंश ज्येष्ठ, चत्वा-रिंशद् मध्यम और अशीति भाग कनिष्ठको मिलना चाहिये। फिर अवशिष्टांश सकलको बराबर बराबर प्राप्य है। ज्येष्ठ और कनिष्ठके मध्यगत सकल भ्राता चत्वारिंशद् भागके अधिकारी होते हैं। ज्येष्ठ यदि गुणवान् रहे, तो द्रव्य सामग्रीके मध्य उत्कृष्ट वस्तु सकल और १० गाभीमें श्रेष्ठ गाभी उसको मिले। सकल भ्राता समान गुणसम्पन्न होनेसे ज्येष्ठको दशम पदार्थ प्राप्य नहीं। फिर भी सम्मानकी रक्षाके लिये यत्-किञ्चित् उसे अधिक देना उचित है। अवशिष्ट सकल धन भ्राता बराबर बांट लें। पैतृक धन बंटते समय ज्येष्ठको दूना, मध्यमको द्योढ़ा और तद्भिन्न सकलको एक एक अंश मिलेगा। प्रथम विवाहितासे कनिष्ठ और पश्चात् परिणीता पत्नीसे ज्येष्ठ सन्तान रहनेपर प्रथम स्त्रीगर्भजात, कनिष्ठ पड़ते भी एक श्रेष्ठ वृष उद्धाररूप पाता है। फिर अपर पत्नीगर्भज सन्तानको माताके कनिष्ठानुसार अपकृष्ट वृष मिलेगा।
{{Outdent|उद्धारक (सं॰ त्रि॰) उद्धार करनेवाला, जो उठाता या निकालता हो।}}
{{Outdent|उद्घारण (सं॰ क्ली॰) उत्-हृ-णिच्-ल्युट्। १ उत्थापन, उठाव। उत्-हृ-णिच्-ल्युट्। २ उद्धारसाधन, उबार, बचाव। ३ भागकरण, बंटवारा।}}
{{Outdent|उद्धारणदत्त (सं॰ पु॰) महाप्रभु चैतन्यदेवके एक प्रसिद्ध भक्त। १४०३ शकको त्रिवेणीतीरवर्ती सप्तग्राममें इन्होंने जन्म लिया था। पिताका श्रोकरदत्त और माताका नाम भद्रावती रहा। गोत्र शाण्डिल्य था। ये घरमें अपने पुत्र श्रीनिवासको छोड़ और वाणिज्यका कार्य सौंप विवेकाचारी बने। नीलाचलमें उद्धारण-दत्त प्रभुसे मिलने प्रायः जाते और प्रसाद मांगकर खाते थे।}}
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अँजली चौधरी
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२६०'''|'''उड्वर्षिणी-उड्वारणदत्त'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{Outdent|उद्धर्षिणी (सं॰ स्त्री॰) वसन्ततिलक नामक वर्ण। वृत्तका भेद। इसमें चार पाद पड़ते और प्रत्येकमें चौदह-चौदह अक्षर लगते हैं――<br>
{{gap}}<small>“उक्ता वसन्ततिलका तभना जगौ गः। सिहोन्नतेयमुदिता मुनिकश्यपेन। उद्धर्षि नोयमुदिता मुनिसैतवेन” (वृत्तरत्राकर)</small>}}
{{Outdent|उद्धर्षिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-हृष-णिच्-णिनि। १ उद्धर्षकारक, खु़श करनेवाला। २ पुलकित, खड़े रोंगटे रखनेवाला।}}
{{Outdent|उद्धव (सं॰ पु॰) उत्-धूङ-अच्। १ यज्ञाग्नि। २ उत्सव, जलसा। ३ कृष्णमातुल एक यादव ये सत्यकके पुत्र और वृहस्पतिके शिष्य रहे। दूसरा नाम देवश्रवाः था। उद्धव अन्तिमदशाको बदरिका-श्रम में रहते थे। श्रीकृष्णने इन्हें ज्ञानका उपदेश दिया। <small>(भामवत ११ स्कन्द)</small>}}
{{Outdent|उद्धवमित्र――वैद्यप्रदीप नामक वैद्यकग्रन्थके रचयिता।}}
{{Outdent|उद्धस्त (सं॰ त्रि॰) उत्क्षिप्तौ हस्तौ येन, प्रादि॰ बहुव्री॰। उतृक्षिप्त हस्त, हाथ उठाये हुआ।}}
{{Outdent|उद्धान ( सं॰ क्ली॰) उद्धयतेऽस्मिन्नग्नि, उत्-धा-ल्युट्। १ चुली, चूल्हा। २ वमन, कै। (त्रि॰) ३ उद्गत, उठा या चढ़ा हुआ। ४ वमित, उगला हुआ। ५ स्थूल, मोटा, सूजा हुआ।}}
{{Outdent|उद्धान्त (सं॰ पु॰) उत्-धन-णिच्-क्त। १ मद-शून्य हस्ती, जिस हाथीके मस्तकसे मद न बहे। (त्रि॰) २ वमित, उगला हुआ।}}
{{Outdent|उद्धार (सं॰ पु॰) उद्धियते, उत्-हृ भावे घञ्। १ मुक्ति, नजात, छुटकारा। २ पतित वा समाजच्युत व्यक्तिका ग्रहण, गिरे या जातसे खा़रिज शख्सको फिर मिला लेनेका काम। ३ ऋणशोध, अदाकर्ज।४ नष्टवस्तुका पुनरधिकार, खोयी हुयी चीज़पर फिरसे क़बजा करने की बात। ५ अंशभेद। मनुने उद्धारका नियम इसप्रकार रखा है――
{{c|{{x-smaller|<poem>“ज्येष्ठस्व विंश उद्धारः सर्वद्रव्याञ्च यद्वरम्।
ततोर्ध्व मध्यमस्य स्यातृ तुरीयन्तु यवीयसः।
ज्येष्ठस्वैब कनिष्ठय सहरेतां यथोदितम्।
येऽन्षे ज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्वान्मध्वमं धनम्।
सर्वेषां धनजातानामाददीताग्य मग्रजः।
यञ्च सातिशयं किश्चिद्दशशतश्चाप्लु याद्वरम्॥</poem>}}}}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{c|{{x-smaller|<poem>उद्धारी न दशस्वस्ति सम्पन्नामां स्वकर्मसु।
यत्किचिदेव देयन्तु ज्यायसे मानवर्ध नम्॥
एवं समुद्धृ तोद्धारे समानंशान् प्रकल्पयेत्।
उद्धारऽनुद्ध ते त्वेषामियं स्यादं शकल्पना॥
एवं वृषभमुद्धारं संहरेत स पूर्वजः।
ततोऽपरेऽज्ये ष्ठद्धषास्तदूनानां स्वमातृत:॥” (९ अ॰ ११२-१२३ श्ली॰)</poem>}}}}
:{{gap}}पैतृक धनके विभाग कालपर विंश ज्येष्ठ, चत्वा-रिंशद् मध्यम और अशीति भाग कनिष्ठको मिलना चाहिये। फिर अवशिष्टांश सकलको बराबर बराबर प्राप्य है। ज्येष्ठ और कनिष्ठके मध्यगत सकल भ्राता चत्वारिंशद् भागके अधिकारी होते हैं। ज्येष्ठ यदि गुणवान् रहे, तो द्रव्य सामग्रीके मध्य उत्कृष्ट वस्तु सकल और १० गाभीमें श्रेष्ठ गाभी उसको मिले। सकल भ्राता समान गुणसम्पन्न होनेसे ज्येष्ठको दशम पदार्थ प्राप्य नहीं। फिर भी सम्मानकी रक्षाके लिये यत्-किञ्चित् उसे अधिक देना उचित है। अवशिष्ट सकल धन भ्राता बराबर बांट लें। पैतृक धन बंटते समय ज्येष्ठको दूना, मध्यमको द्योढ़ा और तद्भिन्न सकलको एक एक अंश मिलेगा। प्रथम विवाहितासे कनिष्ठ और पश्चात् परिणीता पत्नीसे ज्येष्ठ सन्तान रहनेपर प्रथम स्त्रीगर्भजात, कनिष्ठ पड़ते भी एक श्रेष्ठ वृष उद्धाररूप पाता है। फिर अपर पत्नीगर्भज सन्तानको माताके कनिष्ठानुसार अपकृष्ट वृष मिलेगा।
{{Outdent|उद्धारक (सं॰ त्रि॰) उद्धार करनेवाला, जो उठाता या निकालता हो।}}
{{Outdent|उद्घारण (सं॰ क्ली॰) उत्-हृ-णिच्-ल्युट्। १ उत्थापन, उठाव। उत्-हृ-णिच्-ल्युट्। २ उद्धारसाधन, उबार, बचाव। ३ भागकरण, बंटवारा।}}
{{Outdent|उद्धारणदत्त (सं॰ पु॰) महाप्रभु चैतन्यदेवके एक प्रसिद्ध भक्त। १४०३ शकको त्रिवेणीतीरवर्ती सप्तग्राममें इन्होंने जन्म लिया था। पिताका श्रोकरदत्त और माताका नाम भद्रावती रहा। गोत्र शाण्डिल्य था। ये घरमें अपने पुत्र श्रीनिवासको छोड़ और वाणिज्यका कार्य सौंप विवेकाचारी बने। नीलाचलमें उद्धारण-दत्त प्रभुसे मिलने प्रायः जाते और प्रसाद मांगकर खाते थे।}}
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अँजली चौधरी
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{{Outdent|उद्धर्षिणी (सं॰ स्त्री॰) वसन्ततिलक नामक वर्ण। वृत्तका भेद। इसमें चार पाद पड़ते और प्रत्येकमें चौदह-चौदह अक्षर लगते हैं――<br>
{{gap}}<small>“उक्ता वसन्ततिलका तभना जगौ गः। सिहोन्नतेयमुदिता मुनिकश्यपेन। उद्धर्षि नोयमुदिता मुनिसैतवेन” (वृत्तरत्राकर)</small>}}
{{Outdent|उद्धर्षिन् (सं॰ त्रि॰) उत्-हृष-णिच्-णिनि। १ उद्धर्षकारक, खु़श करनेवाला। २ पुलकित, खड़े रोंगटे रखनेवाला।}}
{{Outdent|उद्धव (सं॰ पु॰) उत्-धूङ-अच्। १ यज्ञाग्नि। २ उत्सव, जलसा। ३ कृष्णमातुल एक यादव ये सत्यकके पुत्र और वृहस्पतिके शिष्य रहे। दूसरा नाम देवश्रवाः था। उद्धव अन्तिमदशाको बदरिका-श्रम में रहते थे। श्रीकृष्णने इन्हें ज्ञानका उपदेश दिया। <small>(भामवत ११ स्कन्द)</small>}}
{{Outdent|उद्धवमित्र――वैद्यप्रदीप नामक वैद्यकग्रन्थके रचयिता।}}
{{Outdent|उद्धस्त (सं॰ त्रि॰) उत्क्षिप्तौ हस्तौ येन, प्रादि॰ बहुव्री॰। उतृक्षिप्त हस्त, हाथ उठाये हुआ।}}
{{Outdent|उद्धान ( सं॰ क्ली॰) उद्धयतेऽस्मिन्नग्नि, उत्-धा-ल्युट्। १ चुली, चूल्हा। २ वमन, कै। (त्रि॰) ३ उद्गत, उठा या चढ़ा हुआ। ४ वमित, उगला हुआ। ५ स्थूल, मोटा, सूजा हुआ।}}
{{Outdent|उद्धान्त (सं॰ पु॰) उत्-धन-णिच्-क्त। १ मद-शून्य हस्ती, जिस हाथीके मस्तकसे मद न बहे। (त्रि॰) २ वमित, उगला हुआ।}}
{{Outdent|उद्धार (सं॰ पु॰) उद्धियते, उत्-हृ भावे घञ्। १ मुक्ति, नजात, छुटकारा। २ पतित वा समाजच्युत व्यक्तिका ग्रहण, गिरे या जातसे खा़रिज शख्सको फिर मिला लेनेका काम। ३ ऋणशोध, अदाकर्ज।४ नष्टवस्तुका पुनरधिकार, खोयी हुयी चीज़पर फिरसे क़बजा करने की बात। ५ अंशभेद। मनुने उद्धारका नियम इसप्रकार रखा है――
{{c|{{x-smaller|<poem>“ज्येष्ठस्व विंश उद्धारः सर्वद्रव्याञ्च यद्वरम्।
ततोर्ध्व मध्यमस्य स्यातृ तुरीयन्तु यवीयसः।
ज्येष्ठस्वैब कनिष्ठय सहरेतां यथोदितम्।
येऽन्षे ज्येष्ठकनिष्ठाभ्यां तेषां स्वान्मध्वमं धनम्।
सर्वेषां धनजातानामाददीताग्य मग्रजः।
यञ्च सातिशयं किश्चिद्दशशतश्चाप्लु याद्वरम्॥</poem>}}}}
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यत्किचिदेव देयन्तु ज्यायसे मानवर्ध नम्॥
एवं समुद्धृ तोद्धारे समानंशान् प्रकल्पयेत्।
उद्धारऽनुद्ध ते त्वेषामियं स्यादं शकल्पना॥
एवं वृषभमुद्धारं संहरेत स पूर्वजः।
ततोऽपरेऽज्ये ष्ठद्धषास्तदूनानां स्वमातृत:॥” (९ अ॰ ११२-१२३ श्ली॰)</poem>}}}}
:{{gap}}पैतृक धनके विभाग कालपर विंश ज्येष्ठ, चत्वा-रिंशद् मध्यम और अशीति भाग कनिष्ठको मिलना चाहिये। फिर अवशिष्टांश सकलको बराबर बराबर प्राप्य है। ज्येष्ठ और कनिष्ठके मध्यगत सकल भ्राता चत्वारिंशद् भागके अधिकारी होते हैं। ज्येष्ठ यदि गुणवान् रहे, तो द्रव्य सामग्रीके मध्य उत्कृष्ट वस्तु सकल और १० गाभीमें श्रेष्ठ गाभी उसको मिले। सकल भ्राता समान गुणसम्पन्न होनेसे ज्येष्ठको दशम पदार्थ प्राप्य नहीं। फिर भी सम्मानकी रक्षाके लिये यत्-किञ्चित् उसे अधिक देना उचित है। अवशिष्ट सकल धन भ्राता बराबर बांट लें। पैतृक धन बंटते समय ज्येष्ठको दूना, मध्यमको द्योढ़ा और तद्भिन्न सकलको एक एक अंश मिलेगा। प्रथम विवाहितासे कनिष्ठ और पश्चात् परिणीता पत्नीसे ज्येष्ठ सन्तान रहनेपर प्रथम स्त्रीगर्भजात, कनिष्ठ पड़ते भी एक श्रेष्ठ वृष उद्धाररूप पाता है। फिर अपर पत्नीगर्भज सन्तानको माताके कनिष्ठानुसार अपकृष्ट वृष मिलेगा।
{{Outdent|उद्धारक (सं॰ त्रि॰) उद्धार करनेवाला, जो उठाता या निकालता हो।}}
{{Outdent|उद्घारण (सं॰ क्ली॰) उत्-हृ-णिच्-ल्युट्। १ उत्थापन, उठाव। उत्-हृ-णिच्-ल्युट्। २ उद्धारसाधन, उबार, बचाव। ३ भागकरण, बंटवारा।}}
{{Outdent|उद्धारणदत्त (सं॰ पु॰) महाप्रभु चैतन्यदेवके एक प्रसिद्ध भक्त। १४०३ शकको त्रिवेणीतीरवर्ती सप्तग्राममें इन्होंने जन्म लिया था। पिताका श्रोकरदत्त और माताका नाम भद्रावती रहा। गोत्र शाण्डिल्य था। ये घरमें अपने पुत्र श्रीनिवासको छोड़ और वाणिज्यका कार्य सौंप विवेकाचारी बने। नीलाचलमें उद्धारण-दत्त प्रभुसे मिलने प्रायः जाते और प्रसाद मांगकर खाते थे।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८६
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अनुश्री साव
80
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उन्नतनगर|२८५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
पूर्वकालमें यह प्राचीन नगर अति पवित्र स्थान समझा जाता था। स्कन्दपुराणके प्रभासखण्डमें वर्णित है—देवादिदेव महादेवके आदेशसे विश्वकर्माने ऋषितोया नदीके तटपर यह नगर बनाया था। यह
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{{Smallrefs}}
{{block center|<poem><small>
लिङ्गमाहादयामास वजे शैव शतक्रतुः।
अष्टादशसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्॥
स्थित्वा तदनुप्रशान्ति लिङ्गमेतदनुत्तम्।
शक्रस्तु सहसा हष्टो वधे णैव समन्वितः॥
यावद्दाति शापं ते तावन्नष्टः पुरन्दरः।
दृष्टा चोल्कोपसङ्ग्रान् भगवांस्त्रिपुरान्तकः॥
उवाच शालयो देवी वाचा मधुरया मुनीन्।
कथं खिन्ना हि जश्रेष्ठाः सदा शान्तिपरायणाः॥
प्रसन्नवदना भूत्वा श्रुयतां वचनं मम।
भवद्भिर्ज्ञानसंयुक्तैः स्वर्गो विमुच्यते कथम्॥
यवैको वसवः प्रोक्ता आटिल्याय तथापरे।
रुद्रसं ज्ञाश्चैके ऋषिनावपि चापरौ॥
एतेषामधिपः कश्चिदेव इन्द्रः प्रकीर्तितः।
स्वपुरस्य च वि प्राप्ते यज्ञादौ भज्यते नरैः॥
एवं दुःखसमायुक्तः स्वर्गो नवैज्झते बुधैः।
एतस्मात् कारणाद्विप्राः कुरूध्वं वचनं मम॥
गृह्णीध्वं नगरं रम्यं निवासाय महाप्रभम्।
इयन्तामग्निहोवाणि देवताः सर्वदा द्विजाः॥
इज्यतां विविधैर्यगै: क्रियतां पितृपूजनम्।
आतिथ्यं क्रियतां नित्यं वेदाभ्यासस्तथैव च॥
एवं वै कुर्वतां नित्यं विज्ञानस्य च सञ्चयै:।
प्रसादान्मम विप्रेन्द्राशान्ते मुक्तिर्भविष्यति॥
ऋषय ऊचुः।
असमर्थाः परिवाणे जिताः सर्वे तपोधनाः।
नगरेणेह किं कुर्मस्तव भक्तिभाभीप्सिता॥
ईश्वर उवाच।
भविष्यति तदा भक्ति युष्माकं परमेश्वरे।
गृह्णीध्वं नगरं रम्यं कुरुध्वं वचनं मम॥
इत्युक्त्वा भगवान् देव ईषन्मीलितलोचनः।
सस्मार विश्वकर्माणं सर्वशिल्पविदाम्बरम्॥
स्पृ तनावो विश्वकर्मा प्राञ्जलिरायतः स्थितः।
आज्ञापयतु मां देवं वचनं करवाणि ते॥
ईश्वर उवाच।
नगरं क्रियतां त्वष्टः विप्रार्थं सुन्दरं शुभम्।
इत्युक्तो विश्वकर्मा तां भूमिं वीक्षा समन्ततः॥
</small></poem>}}
{{c|Vol III.{{gap}}72}}
{{Multicol-break}}
उन्नतनगर
२८५
पूर्वकालमें यह प्राचीन नगर अति पवित्र स्थान : ब्राह्मणों के वासके लियेही निर्मित हुआ था। उस समय
समझा जाता था। स्कन्दपुराणके प्रभासखण्डमें यहां स्थल केश्वर नामक एक जाग्रत शिवलिङ्ग था।
वर्णित है-देवादिदेव महादेवके आदेशसे विश्वकर्मान मुसलमानों के प्रानेसे । उन्-दिलवरमें उनेवाल
- ऋषितोया नदीक तटपर यह नगर बनाया था। यह नामक ब्राह्मण-सम्प्रदाय रहता था। किसी समय
ब्राधणोंने वैजलाबाजी नामक किसौ सामन्तको
लिङ्गमासादयामास बच्चे णैव शतक्रतुः ।
उवाच प्रणतो भूत्वा शङ्कर लोकशङ्करम् ।
अष्टादशसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् ।
परीचिता मया भूमिर्न युक्त' नगई विह।।
स्थित्वा तदनुपश्यन्ति लिङ्गमेतदनुत्तमम् ।
पव देवकुलस्य शलिङ्गस्य पतन तया।
शक्रस्तु सहसा दृष्टो वचे णैव समन्वितः ॥
यतिभिवाव वन्तव्यं न युक्त' गृहमेधिनाम् । ।
यावद्ददाति शापं ते तावन्नष्टः पुरन्दरः।
विराव पञ्चरावं वा सप्तरावं महेश्वर !
दृष्टा चोतकोपस'युक्रान् भगवांस्त्रिपुरान्तकः ॥
पक्षमासमतुञ्चापि अयन गृहमेधिभिः ॥
उवाच शान्तया देवो वाचा मधुरया मुनीन् ।
पुनदारयुतस्तीथे वस्तवं ग्रहमैधिभिः ।
कथ खिन्ना हिजश्रेष्ठाः सदा शान्तिपरायणाः ॥
वसताव॑न्तु षण्मासाद यदा तीर्थ सहाधिपः ।
प्रसन्नवदना भूत्वा अ यतां वचन मम।
अवज्ञा जायते तस्य मनश्चाप्यल्पकं भवेत् ॥
भवद्भिनिस'युक्ती: स्वर्गों विमुच्यते कथम् ॥
तदा धर्मा विनश्यन्ति सकला ग्टहमेधिनः ।
यवैक वसवः प्रोक्ता धादित्याश्च तथापर।
इत्युक्त: स तदा दैवस्त न वै विश्वकर्मणा ।
रुद्रसज्ञास्तथा के अश्विनावपि चापरौ॥
पुन: प्रोवाच तं तस्य निशामा वचन शिवः ।
एतेषामधिपः कशिहेत्र इन्द्रः प्रकीर्तितः ।
रोचते मे न वासोऽयं विप्राणां ग्रइमेधिनां ।
खपुण्यस्य चये प्राप्ने यस्माई वश्यते नरैः ॥
यत्र चोन्नामित लिङ्ग ऋषितायातटे मे ।
एव' दुःखसमायुक्त: स्व! नवोज झते बुधैः।
तत्र निर्मापय त्वष्ट गर' शिल्पिनां वर॥
एतस्मात् कारणाविप्राः कुरुध्व' वचन' मम ॥
तस्व तहचन यत्वा विश्वकर्मा त्वरान्वितः ।
गृहीध्व' नगरं रम्यं निवासाय महाप्रभम् ।
गत्वा चकार नगर शिल्पिकोटिभिरावतम् ॥
हयन्तामग्निहोवाणि देवता: सदा विजाः ॥
उन्नतं नाम य लोके विख्यात सुरमुन्दरि !
इज्यतां विविध यांगैः क्रियतां पिटप्ननम् ।
ततो हृष्टमना भूत्वा विलोक्य नगर' शिव: ॥
आतिथ्य क्रियतां नित्य वेदाभ्यासस्तथैव च ॥
पाहूय ब्राह्मणान् सर्वानुवाच नतकन्धरः ।
एवं वै कुर्वतां नित्य विज्ञानस्य च सञ्चयः ।
इद' स्थान वरं रमा निर्मितं विश्वकर्मणा ॥
प्रसादान्मम विप्रेन्द्रायान्ते मुक्तिभविष्यति ।
ग्रामाणाञ्च सहस्र स्तु प्रोत सर्वाङ्गसुन्दरम् ।
___ऋषय ऊचुः ।
नगरात् सर्वतः पुण्यो देशो नग्नहरः स्म तः ॥
असमर्था परिवाणे निता: सर्वे तपोधनाः।
अष्ट योजनविस्तीर्ण पायामव्यासतस्तथा ।
नगरेपेह किं कुर्मस्तव भक्तिमभौहिता ॥
नग्नो भूत्वा हरी यव देशो भान्तो यदृच्छया ।
___ईश्वर उवाच।
त' नग्नहरमित्याहु द शं पुण्यतमं जनः ।
भविष्यति तदा भन्नि यु भाकं परमेश्वरे।
पूर्व तु शङ्यार्था च पश्मि नाडुमत्यपि ॥
गढीव नगरं रम्यं कुरुध्व' वचन मम ॥
उत्तर कनकादाच दक्षिणे सागरावधिः ।
इतुका भगवान् देव ईषन्मीलितलोचनः ।
एतदन्तरमासाद्य देशो नग्नहर: म तः ॥
सम्मार विश्वकर्माण सशिल्पिविदाम्बरम् ॥
अष्टयोजनमानेन पायामव्यामतस्तथा।
सम तमावो विश्वकर्मा प्राञ्जलिबाग्रतः स्थितः ।
प्रोक्तोऽयं सकलो देश उन्नतेन समं मया ॥
श्राज्ञापयतु मां देवा वचन' करवाणि ते ॥
गृह्यतां च नरश्रेष्ठाः प्रसौदध्व' हिजोत्तमाः ।
ईश्वर उवाच ।
अव भुक्तिश्च मुक्तिश्य भविष्यति न संशयः ॥
नगर क्रियतां त्वष्टः विप्रार्थ' सुन्दर शुभम् ।
इतुकत्वास्त तदा सर्व विप्रा अचुमहेश्वरम् ।
इत्य तो विश्वकर्मा तां भूमि वौच्चा समन्ततः॥
ईश्वराचा वृधा कर्तुं न शक्या परमात्मनः ॥
Vol III.
72<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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पूर्वकालमें यह प्राचीन नगर अति पवित्र स्थान समझा जाता था। स्कन्दपुराणके प्रभासखण्डमें वर्णित है—देवादिदेव महादेवके आदेशसे विश्वकर्माने ऋषितोया नदीके तटपर यह नगर बनाया था। यह
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लिङ्गमाहादयामास वजे शैव शतक्रतुः।
अष्टादशसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्॥
स्थित्वा तदनुप्रशान्ति लिङ्गमेतदनुत्तम्।
शक्रस्तु सहसा हष्टो वधे णैव समन्वितः॥
यावद्दाति शापं ते तावन्नष्टः पुरन्दरः।
दृष्टा चोल्कोपसङ्ग्रान् भगवांस्त्रिपुरान्तकः॥
उवाच शालयो देवी वाचा मधुरया मुनीन्।
कथं खिन्ना हि जश्रेष्ठाः सदा शान्तिपरायणाः॥
प्रसन्नवदना भूत्वा श्रुयतां वचनं मम।
भवद्भिर्ज्ञानसंयुक्तैः स्वर्गो विमुच्यते कथम्॥
यवैको वसवः प्रोक्ता आटिल्याय तथापरे।
रुद्रसं ज्ञाश्चैके ऋषिनावपि चापरौ॥
एतेषामधिपः कश्चिदेव इन्द्रः प्रकीर्तितः।
स्वपुरस्य च वि प्राप्ते यज्ञादौ भज्यते नरैः॥
एवं दुःखसमायुक्तः स्वर्गो नवैज्झते बुधैः।
एतस्मात् कारणाद्विप्राः कुरूध्वं वचनं मम॥
गृह्णीध्वं नगरं रम्यं निवासाय महाप्रभम्।
इयन्तामग्निहोवाणि देवताः सर्वदा द्विजाः॥
इज्यतां विविधैर्यगै: क्रियतां पितृपूजनम्।
आतिथ्यं क्रियतां नित्यं वेदाभ्यासस्तथैव च॥
एवं वै कुर्वतां नित्यं विज्ञानस्य च सञ्चयै:।
प्रसादान्मम विप्रेन्द्राशान्ते मुक्तिर्भविष्यति॥
ऋषय ऊचुः।
असमर्थाः परिवाणे जिताः सर्वे तपोधनाः।
नगरेणेह किं कुर्मस्तव भक्तिभाभीप्सिता॥
ईश्वर उवाच।
भविष्यति तदा भक्ति युष्माकं परमेश्वरे।
गृह्णीध्वं नगरं रम्यं कुरुध्वं वचनं मम॥
इत्युक्त्वा भगवान् देव ईषन्मीलितलोचनः।
सस्मार विश्वकर्माणं सर्वशिल्पविदाम्बरम्॥
स्पृ तनावो विश्वकर्मा प्राञ्जलिरायतः स्थितः।
आज्ञापयतु मां देवं वचनं करवाणि ते॥
ईश्वर उवाच।
नगरं क्रियतां त्वष्टः विप्रार्थं सुन्दरं शुभम्।
इत्युक्तो विश्वकर्मा तां भूमिं वीक्षा समन्ततः॥
</small></poem>}}
{{c|Vol III.{{gap}}72}}
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ब्राह्मणोंके वास्ते लिये ही निमित्त हुआ था। उस समय
यहां स्थलकेश्वर नामक एक जागृत शिवलिङ्ग था।
मुसलमानोंके आनेसे पूर्व उन्-दिल्खरमें उनिवाल
नामक ब्राह्मण-सम्प्रदाय रहता था। किसी समय
ब्राह्मणोंने वैजलावाजी नामक किसी सामन्तको
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{{Smallrefs}}
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उवाच प्रणतो भूत्वा शङ्कर लोकशङ्करम्।
परीक्षिता मया भूमिर्न युक्तं नगरं त्विह॥
अव देवकुलस्य शालिङ्गस्य पतनं तथा।
यतिमिषाव वल्लवं न युक्तं गृहमोधिनाम्॥
विरावं पञ्चरावं वा सप्तरात्रं महेश्र्वर!
पक्ष मासमृतुस्यापि अयनं गृहमेधिभि:॥
पुत्रहारयुतैस्तीयें वल्लवं गृहमेधिभिः॥
वसतूर्ध्वन्तु षण्मासाद यदा तीर्थें गृहाधिपः!
अवज्ञा जायते तस्य मनस्खाप्यल्पकं भवेत्॥
तदा धर्मा विनश्यन्ति सकला गृह्मेमेधिनः॥
इत्युक्तः स तदा दैवत्यो न वै विश्वकर्मणा॥
पुनः प्रोवाच तं तस्मि निशम्य वचनं शिवः।
रोचते मे न वासोऽयं विप्राणां गृह्मेधिनाम्॥
यत्र चोन्मितं लिङ्गं ऋषिताताटे शुभे।
तस्व निर्मापय त्वष्टर्नगरं शिल्पिनां वर॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विश्वकर्मा त्वरान्वितः।
गत्वा चकार नगरं शिल्पिकोटिभिरावृतम्॥
उन्नतं नाम यं लोके विख्यातं सुरसुन्दरि।
ततो हष्टमना भूत्वा विलोक्य नगरं शिवः॥
आहूय ब्राह्मणान् सर्वानुवाच नतकन्धरः।
इदं स्थानं वरं रम्यं निर्मितं विश्वकर्मणा॥
ग्रामाणां सहस्रेषु प्रोक्तं सर्वोत्तमसुन्दरम्।
नगरात् सर्वतः पुखो देशो नग्रहरः कृतः॥
अष्टयोजनविस्तीर्ण आयामव्यासतस्तथा।
नग्नो भूत्वा हरो यत्र देशो भाति वहच्छया॥
तं नग्रहरमित्याहुर्देशं पुखतमं जनः।
पूर्वे तु शङ्ख्याध्वी च पश्चिमे नादुमत्यपि॥
उत्तरे कनकादाच दक्षिणे सागरावधि।
एतदन्तरमासाद्य देशो नग्रहरः स्प्रृ तः॥
अष्टयोजनमानेन आयामव्याप्तत्सया।
प्रोक्तोऽयं सकलो देश उन्नतेन समं मया॥
गृह्णतां च नरश्रेष्ठाः प्रसीदध्वं द्विजोत्तमाः।
अत्र भुक्त्विश्च मुक्तिश्च भविष्यति न संशयः॥
इत्युक्त्वान्ते तदा सर्वे विप्रा ऊचुर्महेश्वरम्।
ईश्वराज्ञा हृदा कर्तुं न शक्या परमात्मनः॥
</small></poem>}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८८
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अनुश्री साव
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उन्नमन-उन्नेय|२८७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
उन्नमन-उन्नय
२८७
उन्नमन (सं० लो०) उत्-नम-ल्य ट् । १ उन्नति, , उन्नाभ (सं० पु.) रघुवंशीय राजविशेष । (घु १८१८)
तरक्की। २ उत्तोलन, उठाव । ३ सुश्रुतोक्त यन्त्र द्वारा उन्नाय (सं० पु०) उत्-नो उपपदे घञ । पद नियः ।
व्रणरुधिर साबसाधक चिकित्सा कर्मविशेष, नश्तरसे पा ।२६। १ उत्तोलन, उठाव, खिंचाव। २ परामर्श,
जखमके लह निकालनेका इलाज।
मशविरा।
उन्नमित (स. त्रि.) उत्-नम-णिच-त । १ उत्ता- उन्नायक (सं.वि.) १ उत्तोलन करने वाला, जो
लित, उठाया या चढ़ाया हुआ। २ जोक्कत, ऊचा उठाता हो। २ प्रमाण दनेवाला, जो हवाला देता हो।
किया हुपा। “अथ प्रयबोन्नमितानमत्फणैः।" (माघ १।१३।) उन्नायकत्व (सलो . ) १नावकत्व, समझान या
उन्नम् (सं. त्रि.) उत्-नम्ब-रन्। उनत, ऊंचा, बतलानेका काम। २ जनकन्नानविषयत्व (धायकौमुदी)
खड़ा हुआ।
उन्नासी (हिं.वि.) ऊनाशीति, सात दाइ और
उन्नय (२० पु. ) उत्-नो क्वचिदपवादविषये अच् । नो एकाई रखनेवाला।
१ उत्तालन, खिंचाव । २ उत्थान, उठान। उन्नाह (सं० पु.) उत्-नह-घज । काञ्चि, शांजी।
३ सादृश्य, बराबरी।
यह तण्ड लके मण्डसे बनता है।
उन्नयन ( स० लो०) उत्-नी-ल्यु ट्। क्लत्यल्युटो बहुलम् । उन्निद्र ( स० त्रि०) उगता निद्रा स्वप्ना दः वादिक
पा ३।११३। १ उत्तोलन, खिंचाव। २ परामर्श, मश- वा यस्मात्। १ प्रफल, फला हुपा। २ विकसित,
विरा। ३ अनुमान, अन्दाज । ४ उन्नति, तरक्को, खिला हुआ। ३ निद्रारहित, जागता हु पा. जिसे
उठान। ५ उद्भावन, गफलत। ६ न्यायशास्त्र, इल्म- नोंद न लगे। ४ सतर्क, खबरदार। ५ उद्दोप्त, चम-
मन्तिक । ७ पूतभृत्पात्र, अर्क. रखनेका वरतन। कोला। ६ निद्रा न लेनेवाला, जो सोता न हो।
"उन्नयने च" (कात्यायनश्रोतसू० १५।१२।१४) 'उन्नत्यस्मादित्य ब्रयन उबिद्रता (सं० स्त्रो. ) निद्राराहित्य, बेदाग, नोंद न
पूतभृटुच्यते । (कर्क) (त्रि.) उवमितं नयनं येन। ८ उन्न- लगनेकी हालत।
मितचक्षुः, आंख उठाये हुआ।
उन्नी (सं० त्रि०) उत्तोलन करनेवाला, जाजरको
उन्नविष्क-काठियावाड़ गिरनार पर्वतके निकटस्थ खींचता हो।
एक प्राचीन ग्राम। भीमने इसो स्थानपर उनक उन्नीत (स.वि.) उतनो-त । १ अव नीत, अपर
नामक असुरको मारा था। आजकल इसे 'पोसम'
! उठाया हुआ। २ विकसित, खिला हुआ।
कहते हैं।
उन्नीस (हिं० वि०) १ एकोनविंशति, एक दहाई और
"ततो गच्छेन्महादेवि उन्नविश्क ति विश्रुतम् ।
नौ एकाई रखनेवाला। २ किञ्चित् न्य न, कुछ कम।
योजनस्यान्तर देवि पश्चिमे मङ्गला स्थितः ॥
उन्नीसवां (हिं० वि०) उन्नीस संख्या रखनेवाला।
उन्नको यव भौमेन हत्वा त्यक्तस्तथा प्रिये।” (प्रभासखख २८८/२,४-५)
उन्नेल (सं. त्रि०) उत्-नो-टच्। १ अर्व नेता,
उन्नस (स.वि.) उन्नता नासिका यस्य, बहुव्रोहः। ऊपर ले जानेवाला । २ उदभावक, तरको देनेवाला।
समासान्तोऽच् स्यात् । उपसर्गाच। या ५।४।११९ । १ उच्च (पु.) ३ सोलाह ऋत्विक्के अन्तर्गत एक ऋत्विक ।
नासायुक्ता, ऊंचौ नाकवाला।
इसके द्वारा सोमरसको भाण्डसे पात्रमें छोड़ाते हैं।
उबाद (सं० पु० ) उत्-नद-धज । उच्च शब्द, उन्नेत्र (सं० लो०) १ उता ऋत्विकका कार्य ।
ऊंची आवाज़। (भारत वन १५८ अ०)
(कात्यायनश्चीतम्. २४।४।४६) (त्रि.)२ अर्वनेत्र, आंख .
उबाब (१० पु.) वदरोफल, बेर। यह अफगान- जपरको उठाये हुआ।
स्थानसे शुष्क पाता और औषधमें डाला जाता है। उन्ने य (स• त्रि०) उत्-नो-यत्। १ अर्ध्व ले जाने
उन्नाबी (अ. वि. ) बदरी फलवत् रलावणे, बेर- योग्य, जो ऊपर चढ़ाने काबिल हो। २ उद्भावनौय,
जैसा लाल।
ख्यालमें न लाये जाने काबिल।<noinclude></noinclude>
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{{outdent|उन्नमन (सं॰ क्ली॰) उत्-नम-ल्युट्। १ उन्नति, तरक्की। २ उत्तोलन, उठाव। ३ सुश्रुतोक्त यन्त्र द्वारा व्रणरूधिर स्रावसाधक चिकित्सा कर्मविशेष, नथरसे ज़ख्मके लहू निकालनेका इलाज।}}
{{outdent|उन्नमित (सं॰ त्रि॰) उत्-नम-णिच्-क्त। १ उत्तालित, उठाया या बढ़ाया हुआ। २ ऊर्ध्वोकृत, ऊँचा किया हुआ। <small>"अथ प्रयबोप्रोन्नमितानतफणै:।" (माघ १।१३।)</small>}}
{{outdent|उन्नस्र (सं॰ त्रि॰) उत्-नम्र-रन्। उन्नत, ऊंचा, खड़ा हुआ।}}
{{outdent|उन्नय (सं॰ पु॰) उत्-नी क्वचिदपवादविषये अच्। १ उत्तालन, खिंचाव। २ उत्थान, उठान। ३ सादृश्य, बराबरी।}}
{{outdent|उन्नयन (सं॰ क्ली॰) उत्-नी-ल्युट्। <small>कृत्यल्युटो बहुलम्। पा ३।३।११३।</small> १ उत्तोलन, खिंचाव। २ परामर्श, मशविरा। ३ अनुमान, अन्दाज़। ४ उन्नति, तरक्की, उठान। ५ उद्भावन, ग़फ़लत। ६ न्यायशास्त्र, इल्समन्तिक़। ७ पूतभृत्पात्र, अर्क रखनेका बरतन। "उन्नयने च।" (कात्यायनश्रौतसू॰ १५।१२।१४) 'उन्नत्यस्प्रादिल्यु उन्नयन' पूतभृदुच्यते।'</small> (कर्क) (चि॰) उन्नमितं नयनं येन। ८ उन्नमितचक्षुः, आंख उठाये हुआ।}}
{{outdent|उन्नविष्क—काठियावाड़के गिरनार पर्वतके निकटस्थ एक प्राचीन ग्राम। भीमने इसी स्थानपर उन्नक नामक असुरको मारा था। आजकल इसे 'ओसम'
कहते हैं।}}
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"ततो गच्छेन्महादेवि उन्नविष्के ति विश्रुतम्।
योजनषट्नरे देवि पश्चिमे मङ्गला स्थिते:॥
उन्नको यव भीमेन हत्वा त्यक्तास्तथा प्रिये।" (प्रभासखण्ड २८८।२,४-५)</small></poem>}}
{{outdent|उन्नस (सं॰ त्रि॰) उन्नता नासिका यस्य, बहुव्रीहिः समासान्तोऽच् स्यात्। <small>उपसर्गाच्च। पा ५।२।११९। १ उच्च नासायुक्त, ऊंची नाकवाला।}}
{{outdent|उन्नाद (सं॰ पु॰) उत्-नद-घञ्। उच्च शब्द,
ऊंची आवाज़। <small>(भारत वन १५८ अ॰)</small>}}
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उन्नमन-उन्नय
२८७
उन्नमन (सं० लो०) उत्-नम-ल्य ट् । १ उन्नति, , उन्नाभ (सं० पु.) रघुवंशीय राजविशेष । (घु १८१८)
तरक्की। २ उत्तोलन, उठाव । ३ सुश्रुतोक्त यन्त्र द्वारा उन्नाय (सं० पु०) उत्-नो उपपदे घञ । पद नियः ।
व्रणरुधिर साबसाधक चिकित्सा कर्मविशेष, नश्तरसे पा ।२६। १ उत्तोलन, उठाव, खिंचाव। २ परामर्श,
जखमके लह निकालनेका इलाज।
मशविरा।
उन्नमित (स. त्रि.) उत्-नम-णिच-त । १ उत्ता- उन्नायक (सं.वि.) १ उत्तोलन करने वाला, जो
लित, उठाया या चढ़ाया हुआ। २ जोक्कत, ऊचा उठाता हो। २ प्रमाण दनेवाला, जो हवाला देता हो।
किया हुपा। “अथ प्रयबोन्नमितानमत्फणैः।" (माघ १।१३।) उन्नायकत्व (सलो . ) १नावकत्व, समझान या
उन्नम् (सं. त्रि.) उत्-नम्ब-रन्। उनत, ऊंचा, बतलानेका काम। २ जनकन्नानविषयत्व (धायकौमुदी)
खड़ा हुआ।
उन्नासी (हिं.वि.) ऊनाशीति, सात दाइ और
उन्नय (२० पु. ) उत्-नो क्वचिदपवादविषये अच् । नो एकाई रखनेवाला।
१ उत्तालन, खिंचाव । २ उत्थान, उठान। उन्नाह (सं० पु.) उत्-नह-घज । काञ्चि, शांजी।
३ सादृश्य, बराबरी।
यह तण्ड लके मण्डसे बनता है।
उन्नयन ( स० लो०) उत्-नी-ल्यु ट्। क्लत्यल्युटो बहुलम् । उन्निद्र ( स० त्रि०) उगता निद्रा स्वप्ना दः वादिक
पा ३।११३। १ उत्तोलन, खिंचाव। २ परामर्श, मश- वा यस्मात्। १ प्रफल, फला हुपा। २ विकसित,
विरा। ३ अनुमान, अन्दाज । ४ उन्नति, तरक्को, खिला हुआ। ३ निद्रारहित, जागता हु पा. जिसे
उठान। ५ उद्भावन, गफलत। ६ न्यायशास्त्र, इल्म- नोंद न लगे। ४ सतर्क, खबरदार। ५ उद्दोप्त, चम-
मन्तिक । ७ पूतभृत्पात्र, अर्क. रखनेका वरतन। कोला। ६ निद्रा न लेनेवाला, जो सोता न हो।
"उन्नयने च" (कात्यायनश्रोतसू० १५।१२।१४) 'उन्नत्यस्मादित्य ब्रयन उबिद्रता (सं० स्त्रो. ) निद्राराहित्य, बेदाग, नोंद न
पूतभृटुच्यते । (कर्क) (त्रि.) उवमितं नयनं येन। ८ उन्न- लगनेकी हालत।
मितचक्षुः, आंख उठाये हुआ।
उन्नी (सं० त्रि०) उत्तोलन करनेवाला, जाजरको
उन्नविष्क-काठियावाड़ गिरनार पर्वतके निकटस्थ खींचता हो।
एक प्राचीन ग्राम। भीमने इसो स्थानपर उनक उन्नीत (स.वि.) उतनो-त । १ अव नीत, अपर
नामक असुरको मारा था। आजकल इसे 'पोसम'
! उठाया हुआ। २ विकसित, खिला हुआ।
कहते हैं।
उन्नीस (हिं० वि०) १ एकोनविंशति, एक दहाई और
"ततो गच्छेन्महादेवि उन्नविश्क ति विश्रुतम् ।
नौ एकाई रखनेवाला। २ किञ्चित् न्य न, कुछ कम।
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उन्नीसवां (हिं० वि०) उन्नीस संख्या रखनेवाला।
उन्नको यव भौमेन हत्वा त्यक्तस्तथा प्रिये।” (प्रभासखख २८८/२,४-५)
उन्नेल (सं. त्रि०) उत्-नो-टच्। १ अर्व नेता,
उन्नस (स.वि.) उन्नता नासिका यस्य, बहुव्रोहः। ऊपर ले जानेवाला । २ उदभावक, तरको देनेवाला।
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नासायुक्ता, ऊंचौ नाकवाला।
इसके द्वारा सोमरसको भाण्डसे पात्रमें छोड़ाते हैं।
उबाद (सं० पु० ) उत्-नद-धज । उच्च शब्द, उन्नेत्र (सं० लो०) १ उता ऋत्विकका कार्य ।
ऊंची आवाज़। (भारत वन १५८ अ०)
(कात्यायनश्चीतम्. २४।४।४६) (त्रि.)२ अर्वनेत्र, आंख .
उबाब (१० पु.) वदरोफल, बेर। यह अफगान- जपरको उठाये हुआ।
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{{outdent|उन्नमन (सं॰ क्ली॰) उत्-नम-ल्युट्। १ उन्नति, तरक्की। २ उत्तोलन, उठाव। ३ सुश्रुतोक्त यन्त्र द्वारा व्रणरूधिर स्रावसाधक चिकित्सा कर्मविशेष, नथरसे ज़ख्मके लहू निकालनेका इलाज।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२८९
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh|२८८|उन्नेयत्व-उन्मथन}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
२८८
उन्नेयत्व-उन्मथन
उन्नेयत्व (स. ली.) १ज्ञापनयोग्यत्व, समझाये। उन्मत्तदर्शन (सं० त्रि.) उन्मादग्रस्त, जो पागल-
जाने काबिल हालत। २ जन्य ज्ञानविषयत्व (न्यायकौमुदौ) | जैसा देख पड़ता हो।
उन्मज्जक (सं० पु.) उत्-मस्ज-ख ल। १ तपखो उन्मत्तप्रलपित (सं० त्रि.) उन्मादको अवस्थामें
भेद। उन्मज्जक तपस्वी गले बराबर जलमें खड़े हो कहा हुआ, जो पागलपनसे कहा गया हो।
तपस्या किया करते हैं।
उन्मत्तरस (सं० पु.) शौताङ्ग सन्निपातपर दिया
"करदने जले स्थित्वा तप: कुर्वन् प्रवर्तते ।
जानेवाला एक औषध । रस एवं गन्धकको तुल्यांश
उन्मचकः स विज्ञ यस्तापसो लोकपूजितः ॥” (योगसार) ले धुस्तरफलके द्रवमें एक दिन घोंटे और फिर सबके
(त्रि.) २ जलमें डूबनेवाला।
बराबर त्रिकटुका चूर्ण छोड़े। इस औषधके सेवनसे
उझज्जन (स. लो०) उत्-मस्ज-ल्युट । १ प्लवन,
शीताङ्ग सन्निपात दूर होता है। ( रसेन्द्रसारसग्रह)
तैरने या पानी में कूदनका काम। २ शिवके किसौ उन्मत्तरूप, उन्मत्तदर्शन देखो।
गण का नाम।
उन्मत्तलिङ्गिन (सं० त्रि.) उन्मत्त बनता हुआ,
उन्मण्डल (स.ली.)) ज्योतिषोक्त दिनरात्रिकी क्षय जो झूठमूठ पागलपन देखाता हो।
वृद्धिका ज्ञापक मण्डल विशेष ।
उन्मत्तत् (स'• अव्य०) उन्मत्त व्यक्ति की भांति.
“पूर्वापरचितिजसमयोबिलग्न' यान्ये अवै पललवैः चितिजादधःस्थे । । पागलकी तरह।
सौमा कुजादिपरि चाचलवैन वैतदुन्मण्डलं दिननिशी: क्षयवृद्धिकारि" | उन्मत्तवेश (सं० पु०) शिव, महादेव ।
(सिद्धान्तशिरोमणि ) | उन्मत्ता, उन्मत्तकारिणौ देखी ।
उन्मण्डलकणे (सं० पु.) ज्योतिषोक्त उम्मण्डलस्थ उन्मत्तावन्ति-काश्मीरके एक राजा। चन्द्रवर्माके मारे
सूर्यको छायाका कर्ण।
जानपर शवंट और अपरापर मन्त्रिगणने पार्थपुत्र
"युतारनाशार्क हहदभुजजाया खरामतिथ्यवभुवो (१० १५ ३०) इताः परः ।। उन्मत्तावन्तिको काश्मीरका राजासन सौंपा था। किन्तु
पलश्नुतिन्नः पलमा विभाजितः परोऽथ वोवृत्तगते रवौ श्रुतिः ॥" इनके राजत्वकालमें अत्याचार और व्यभिचार वृद्धिगत
(सिद्धान्तशिरोमणि) होने लगा। राजा विज्ञ मन्त्रिगण की बात न मान दृष्ट'
उन्मण्डल (स• पु०) ज्योतिषोक्त अक्षक्षेत्रके प्रदर्शनार्थ लोगोंके तोषामोदमें. भूले और अत्यन्त गहित
उमण्डलका शगु ।
आचरणसे फूले थे। भयसे पिता पार्थने राजधानी छोड़
उन्मत्त (स. त्रि.) उत्-मद-त। १ उन्मादग्रस्त, जयेन्द्रविहारमें जा सपरिवार वास किया। वहांके
पागल । २ वाह्यज्ञानशून्य,बेखबर।३ मतवाला। (पु०) भिक्षुक जा कुछ उन्हें आहारीय देते, वे उसौपर जीते
करणे त । ४ धुस्त र, धतूरेका पेड़। ५ खेतधुस्त र, थे। 'कन्तु इनसे वह भी सहा न गया। उन्मत्तावन्तिने
सफेद धतूरा। ६ मुचकुन्दवृक्ष। ७ राक्षसविशेष। दुत्त लोग लगा अपने पूजनीय पिता और ज्ञाति- . ।
उम्मत्तक (स'. त्रि.) उन्मत्त इव, कन्। १ मत वर्गको मरवा डाला था। राजा इतने निष्ठ र थे, कि
वाला, जो नशेमें हो। २ उन्मादग्रस्त, पागल। गर्भवतीका पेट फड़ा गर्भस्थ भ्रूण को देखते और उसमें
__कौवोऽथ पतितस्तजः पङ्ग रुन्मत्तको जड़: " (याज्ञवल्का २।११३), आनन्द मानते। अवशेषमें राजयक्ष्मा रोगसे आक्रान्त
उन्मत्तकारिणी (स. स्त्रो०) दुग्धिका, दूधी। हो इन्होंने (८३८ ई०) प्राण छोड़ा। काश्मीर देखो।
उन्मत्तगङ्ग (सं० क्लो०) देशविशेष। (सिद्धान्तकौमुदी)| उन्मथ (सं० पु०) उत्-मथ-अप । वध, कत्ल ।
उन्मत्तगीत ( सं० त्रि०) प्रलापसे कहा हुआ, जो | उन्मथन (सं० लो०) उत्-मथ भावे ल्यु ट । १ उन्म-
पागलपनसे गाया गया हो।
दैन, धक्का-मुक्को। २ हिंसा, मारकाट। (र ४ाद )
उन्मत्तता (सं० स्त्री०) उन्मादग्रस्त होनेकी बात, | ३ सुश्रुतोक्त यन्त्रक कर्मका एक भेद। (नि.) कतरि
पागलपन।
त्य । ४ मदन-कारक, मल डालनेवाला ।<noinclude></noinclude>
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{{outdent|उन्नेयत्व (सं॰ क्ली॰) १ ज्ञापनयोग्यत्व, समझाये जाने क़ाबिल हालत। २ जन्य ज्ञानविषयत्व। <small>(न्यायकौमुदी)</small>}}
{{outdent|उन्मज्जक (सं॰ पु॰) उत्-मस्ज्-ण्वुल्। १ तपस्वीभेद। उन्मज्जक तपस्वी गले बराबर जलमें खड़े हो
तपस्या किया करते हैं।}}
{{block center|<poem><small>
"कण्ठद्घने जले स्थित्वा तपः कुर्वन् प्रवर्तते।
उन्मज्जकः स विज्ञेयस्तापसी लोकपूजितः॥" (योगसार)</small></poem>}}
(त्रि॰) २ जलमें डूबनेवाला।
{{outdent|उन्मज्जन (सं॰ क्ली॰) उत्-मस्ज्-ल्युट्। १ प्लवन, तैरने या पानीमें कूदनेका काम। २ शिवके किसी
गण्यका नाम।}}
{{outdent|उन्मण्डल (सं॰ क्ली॰) ज्योतिषोक्त दिनरात्रिको क्षयवृद्धिका ज्ञापक मण्डल विशेष।}}
{{block center|<poem><small>
“पूर्वापरक्षितिजसम्पर्कयोर्विलग्रं व्यये ध्रुवे पललवैः क्षितिजासधः स्थे ।
शीघ्रो कुजादिपरि चाचलवैषु चैतदुन्मण्डलं दिननियोः चयवृद्धिकारि ॥”
( सिद्धान्तशिरोमणि )
उन्मण्डलकर्ण ( सं० पु० ) ज्योतिषोक्त उन्मण्डलस्थ
सूर्यकी छायाका कर्ण ।
“वृतार्धनाघ्रार्कहृतभुजानया खरामतियस्मुवो ( १० १५ २० ) इता: परः ।
पलश्रुतिघ्नः पलभा विभाजितः परीष्ठ बोध्युगते रवी युतिः ॥”
( सिद्धान्तशिरोमणि )
उन्मण्डलन ( सं० पु० ) ज्योतिषोक्त चक्रद्वैतके प्रदर्शनार्थ
उन्मण्डलका यन्त्रु ।
उन्मत्त ( सं० वि० ) उत्-मद्-त्त । १ उन्मादग्रस्त,
पागल । २ वाङ्मानशून्य, बेखबर । ३ मतवाला । ( पु० )
कर्षो ता । ४ धुस्तूर, धतूरेका पेड़ । ५ श्वेतधुस्तूर,
सफेद धतूरा । ६ मुचकुन्दवृक्ष । ७ राक्षसविशेष ।
उन्मत्तक ( सं० वि० ) उन्मत्त इव, कन् । १ मत-
वाला, जो नशेमें हो । २ उन्मादग्रस्त, पागल ।
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उन्नेयत्व-उन्मथन
उन्नेयत्व (स. ली.) १ज्ञापनयोग्यत्व, समझाये। उन्मत्तदर्शन (सं० त्रि.) उन्मादग्रस्त, जो पागल-
जाने काबिल हालत। २ जन्य ज्ञानविषयत्व (न्यायकौमुदौ) | जैसा देख पड़ता हो।
उन्मज्जक (सं० पु.) उत्-मस्ज-ख ल। १ तपखो उन्मत्तप्रलपित (सं० त्रि.) उन्मादको अवस्थामें
भेद। उन्मज्जक तपस्वी गले बराबर जलमें खड़े हो कहा हुआ, जो पागलपनसे कहा गया हो।
तपस्या किया करते हैं।
उन्मत्तरस (सं० पु.) शौताङ्ग सन्निपातपर दिया
"करदने जले स्थित्वा तप: कुर्वन् प्रवर्तते ।
जानेवाला एक औषध । रस एवं गन्धकको तुल्यांश
उन्मचकः स विज्ञ यस्तापसो लोकपूजितः ॥” (योगसार) ले धुस्तरफलके द्रवमें एक दिन घोंटे और फिर सबके
(त्रि.) २ जलमें डूबनेवाला।
बराबर त्रिकटुका चूर्ण छोड़े। इस औषधके सेवनसे
उझज्जन (स. लो०) उत्-मस्ज-ल्युट । १ प्लवन,
शीताङ्ग सन्निपात दूर होता है। ( रसेन्द्रसारसग्रह)
तैरने या पानी में कूदनका काम। २ शिवके किसौ उन्मत्तरूप, उन्मत्तदर्शन देखो।
गण का नाम।
उन्मत्तलिङ्गिन (सं० त्रि.) उन्मत्त बनता हुआ,
उन्मण्डल (स.ली.)) ज्योतिषोक्त दिनरात्रिकी क्षय जो झूठमूठ पागलपन देखाता हो।
वृद्धिका ज्ञापक मण्डल विशेष ।
उन्मत्तत् (स'• अव्य०) उन्मत्त व्यक्ति की भांति.
“पूर्वापरचितिजसमयोबिलग्न' यान्ये अवै पललवैः चितिजादधःस्थे । । पागलकी तरह।
सौमा कुजादिपरि चाचलवैन वैतदुन्मण्डलं दिननिशी: क्षयवृद्धिकारि" | उन्मत्तवेश (सं० पु०) शिव, महादेव ।
(सिद्धान्तशिरोमणि ) | उन्मत्ता, उन्मत्तकारिणौ देखी ।
उन्मण्डलकणे (सं० पु.) ज्योतिषोक्त उम्मण्डलस्थ उन्मत्तावन्ति-काश्मीरके एक राजा। चन्द्रवर्माके मारे
सूर्यको छायाका कर्ण।
जानपर शवंट और अपरापर मन्त्रिगणने पार्थपुत्र
"युतारनाशार्क हहदभुजजाया खरामतिथ्यवभुवो (१० १५ ३०) इताः परः ।। उन्मत्तावन्तिको काश्मीरका राजासन सौंपा था। किन्तु
पलश्नुतिन्नः पलमा विभाजितः परोऽथ वोवृत्तगते रवौ श्रुतिः ॥" इनके राजत्वकालमें अत्याचार और व्यभिचार वृद्धिगत
(सिद्धान्तशिरोमणि) होने लगा। राजा विज्ञ मन्त्रिगण की बात न मान दृष्ट'
उन्मण्डल (स• पु०) ज्योतिषोक्त अक्षक्षेत्रके प्रदर्शनार्थ लोगोंके तोषामोदमें. भूले और अत्यन्त गहित
उमण्डलका शगु ।
आचरणसे फूले थे। भयसे पिता पार्थने राजधानी छोड़
उन्मत्त (स. त्रि.) उत्-मद-त। १ उन्मादग्रस्त, जयेन्द्रविहारमें जा सपरिवार वास किया। वहांके
पागल । २ वाह्यज्ञानशून्य,बेखबर।३ मतवाला। (पु०) भिक्षुक जा कुछ उन्हें आहारीय देते, वे उसौपर जीते
करणे त । ४ धुस्त र, धतूरेका पेड़। ५ खेतधुस्त र, थे। 'कन्तु इनसे वह भी सहा न गया। उन्मत्तावन्तिने
सफेद धतूरा। ६ मुचकुन्दवृक्ष। ७ राक्षसविशेष। दुत्त लोग लगा अपने पूजनीय पिता और ज्ञाति- . ।
उम्मत्तक (स'. त्रि.) उन्मत्त इव, कन्। १ मत वर्गको मरवा डाला था। राजा इतने निष्ठ र थे, कि
वाला, जो नशेमें हो। २ उन्मादग्रस्त, पागल। गर्भवतीका पेट फड़ा गर्भस्थ भ्रूण को देखते और उसमें
__कौवोऽथ पतितस्तजः पङ्ग रुन्मत्तको जड़: " (याज्ञवल्का २।११३), आनन्द मानते। अवशेषमें राजयक्ष्मा रोगसे आक्रान्त
उन्मत्तकारिणी (स. स्त्रो०) दुग्धिका, दूधी। हो इन्होंने (८३८ ई०) प्राण छोड़ा। काश्मीर देखो।
उन्मत्तगङ्ग (सं० क्लो०) देशविशेष। (सिद्धान्तकौमुदी)| उन्मथ (सं० पु०) उत्-मथ-अप । वध, कत्ल ।
उन्मत्तगीत ( सं० त्रि०) प्रलापसे कहा हुआ, जो | उन्मथन (सं० लो०) उत्-मथ भावे ल्यु ट । १ उन्म-
पागलपनसे गाया गया हो।
दैन, धक्का-मुक्को। २ हिंसा, मारकाट। (र ४ाद )
उन्मत्तता (सं० स्त्री०) उन्मादग्रस्त होनेकी बात, | ३ सुश्रुतोक्त यन्त्रक कर्मका एक भेद। (नि.) कतरि
पागलपन।
त्य । ४ मदन-कारक, मल डालनेवाला ।<noinclude></noinclude>
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अनुश्री साव
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{{outdent|उन्मज्जक (सं॰ पु॰) उत्-मस्ज्-ण्वुल्। १ तपस्वीभेद। उन्मज्जक तपस्वी गले बराबर जलमें खड़े हो
तपस्या किया करते हैं।}}
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"कण्ठद्घने जले स्थित्वा तपः कुर्वन् प्रवर्तते।
उन्मज्जकः स विज्ञेयस्तापसी लोकपूजितः॥" (योगसार)</small></poem>}}
(त्रि॰) २ जलमें डूबनेवाला।
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गण्यका नाम।}}
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"पूर्वापरक्षितिजसम्पर्कयोर्विलग्रं याम्ये ध्रुवे पललवैः क्षितिजासधः स्थे।
सौमो कुजादिपरि चाक्षलवैर्ध्रु वेतदुन्मण्डलं दिननिशो: क्षयवृद्धिकारि॥</small></poem>}}
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"युतार्धनांशार्कवृहतभुजानया खरामतिथ्यस्भुवो (१० १५ २०) इता: परः।
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करणे क्त। ४ धुस्तूर, धतूरेका पेड़। ५ श्वेतधुस्तूर, सफ़ेद धतूरा। ६ मुचकुन्दवृक्ष। ७ राक्षसविशेष।}}
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८८
उन्नेयत्व-उन्मथन
उन्नेयत्व (स. ली.) १ज्ञापनयोग्यत्व, समझाये। उन्मत्तदर्शन (सं० त्रि.) उन्मादग्रस्त, जो पागल-
जाने काबिल हालत। २ जन्य ज्ञानविषयत्व (न्यायकौमुदौ) | जैसा देख पड़ता हो।
उन्मज्जक (सं० पु.) उत्-मस्ज-ख ल। १ तपखो उन्मत्तप्रलपित (सं० त्रि.) उन्मादको अवस्थामें
भेद। उन्मज्जक तपस्वी गले बराबर जलमें खड़े हो कहा हुआ, जो पागलपनसे कहा गया हो।
तपस्या किया करते हैं।
उन्मत्तरस (सं० पु.) शौताङ्ग सन्निपातपर दिया
"करदने जले स्थित्वा तप: कुर्वन् प्रवर्तते ।
जानेवाला एक औषध । रस एवं गन्धकको तुल्यांश
उन्मचकः स विज्ञ यस्तापसो लोकपूजितः ॥” (योगसार) ले धुस्तरफलके द्रवमें एक दिन घोंटे और फिर सबके
(त्रि.) २ जलमें डूबनेवाला।
बराबर त्रिकटुका चूर्ण छोड़े। इस औषधके सेवनसे
उझज्जन (स. लो०) उत्-मस्ज-ल्युट । १ प्लवन,
शीताङ्ग सन्निपात दूर होता है। ( रसेन्द्रसारसग्रह)
तैरने या पानी में कूदनका काम। २ शिवके किसौ उन्मत्तरूप, उन्मत्तदर्शन देखो।
गण का नाम।
उन्मत्तलिङ्गिन (सं० त्रि.) उन्मत्त बनता हुआ,
उन्मण्डल (स.ली.)) ज्योतिषोक्त दिनरात्रिकी क्षय जो झूठमूठ पागलपन देखाता हो।
वृद्धिका ज्ञापक मण्डल विशेष ।
उन्मत्तत् (स'• अव्य०) उन्मत्त व्यक्ति की भांति.
“पूर्वापरचितिजसमयोबिलग्न' यान्ये अवै पललवैः चितिजादधःस्थे । । पागलकी तरह।
सौमा कुजादिपरि चाचलवैन वैतदुन्मण्डलं दिननिशी: क्षयवृद्धिकारि" | उन्मत्तवेश (सं० पु०) शिव, महादेव ।
(सिद्धान्तशिरोमणि ) | उन्मत्ता, उन्मत्तकारिणौ देखी ।
उन्मण्डलकणे (सं० पु.) ज्योतिषोक्त उम्मण्डलस्थ उन्मत्तावन्ति-काश्मीरके एक राजा। चन्द्रवर्माके मारे
सूर्यको छायाका कर्ण।
जानपर शवंट और अपरापर मन्त्रिगणने पार्थपुत्र
"युतारनाशार्क हहदभुजजाया खरामतिथ्यवभुवो (१० १५ ३०) इताः परः ।। उन्मत्तावन्तिको काश्मीरका राजासन सौंपा था। किन्तु
पलश्नुतिन्नः पलमा विभाजितः परोऽथ वोवृत्तगते रवौ श्रुतिः ॥" इनके राजत्वकालमें अत्याचार और व्यभिचार वृद्धिगत
(सिद्धान्तशिरोमणि) होने लगा। राजा विज्ञ मन्त्रिगण की बात न मान दृष्ट'
उन्मण्डल (स• पु०) ज्योतिषोक्त अक्षक्षेत्रके प्रदर्शनार्थ लोगोंके तोषामोदमें. भूले और अत्यन्त गहित
उमण्डलका शगु ।
आचरणसे फूले थे। भयसे पिता पार्थने राजधानी छोड़
उन्मत्त (स. त्रि.) उत्-मद-त। १ उन्मादग्रस्त, जयेन्द्रविहारमें जा सपरिवार वास किया। वहांके
पागल । २ वाह्यज्ञानशून्य,बेखबर।३ मतवाला। (पु०) भिक्षुक जा कुछ उन्हें आहारीय देते, वे उसौपर जीते
करणे त । ४ धुस्त र, धतूरेका पेड़। ५ खेतधुस्त र, थे। 'कन्तु इनसे वह भी सहा न गया। उन्मत्तावन्तिने
सफेद धतूरा। ६ मुचकुन्दवृक्ष। ७ राक्षसविशेष। दुत्त लोग लगा अपने पूजनीय पिता और ज्ञाति- . ।
उम्मत्तक (स'. त्रि.) उन्मत्त इव, कन्। १ मत वर्गको मरवा डाला था। राजा इतने निष्ठ र थे, कि
वाला, जो नशेमें हो। २ उन्मादग्रस्त, पागल। गर्भवतीका पेट फड़ा गर्भस्थ भ्रूण को देखते और उसमें
__कौवोऽथ पतितस्तजः पङ्ग रुन्मत्तको जड़: " (याज्ञवल्का २।११३), आनन्द मानते। अवशेषमें राजयक्ष्मा रोगसे आक्रान्त
उन्मत्तकारिणी (स. स्त्रो०) दुग्धिका, दूधी। हो इन्होंने (८३८ ई०) प्राण छोड़ा। काश्मीर देखो।
उन्मत्तगङ्ग (सं० क्लो०) देशविशेष। (सिद्धान्तकौमुदी)| उन्मथ (सं० पु०) उत्-मथ-अप । वध, कत्ल ।
उन्मत्तगीत ( सं० त्रि०) प्रलापसे कहा हुआ, जो | उन्मथन (सं० लो०) उत्-मथ भावे ल्यु ट । १ उन्म-
पागलपनसे गाया गया हो।
दैन, धक्का-मुक्को। २ हिंसा, मारकाट। (र ४ाद )
उन्मत्तता (सं० स्त्री०) उन्मादग्रस्त होनेकी बात, | ३ सुश्रुतोक्त यन्त्रक कर्मका एक भेद। (नि.) कतरि
पागलपन।
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"कण्ठद्घने जले स्थित्वा तपः कुर्वन् प्रवर्तते।
उन्मज्जकः स विज्ञेयस्तापसी लोकपूजितः॥" (योगसार)</small></poem>}}
(त्रि॰) २ जलमें डूबनेवाला।
{{outdent|उन्मज्जन (सं॰ क्ली॰) उत्-मस्ज्-ल्युट्। १ प्लवन, तैरने या पानीमें कूदनेका काम। २ शिवके किसी
गण्यका नाम।}}
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"पूर्वापरक्षितिजसम्पर्कयोर्विलग्रं याम्ये ध्रुवे पललवैः क्षितिजासधः स्थे।
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पलश्रुतिघ्नः पलभा विभाजितः परोऽथ बोहृत्तगते रवौ श्रुतिः॥"</small></poem>}}
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{{outdent|उन्मत्तरस (सं॰ पु॰) शीताङ्ग सन्निपातपर दिया जानेवाला एक औषध। रस एवं गन्धकको तुल्यांश ले धुस्तूरफलके द्रवमें एक दिन घोंटे और फिर सबके बराबर त्रिकटुका चूर्ण छोड़े। इस औषधके सेवनसे शीताङ्ग सन्निपात दूर होता है। <small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</small>}}
{{outdent|उन्मत्तरूप, <small>उन्मत्तदर्शन देखो।</small>}}
{{outdent|उन्मत्तलिङ्गिन् (सं॰ त्रि॰) उन्मत्त बनता हुआ, जो झूठमूठ पागलपन देखाता हो।}}
{{outdent|उन्मत्तवत् (सं॰ अव्य॰) उन्मत्त व्यक्तिकी भांति, पागलकी तरह।}}
{{outdent|उन्मत्तवेश (सं॰ पु॰) शिव, महादेव।}}
{{outdent|उन्मत्ता, <small>उन्मत्तकारिणी देखो।</small>}}
{{outdent|उन्मत्तावन्ति—काश्मीरके एक राजा। चन्द्रवर्माके मारे जानेपर शर्वट और अपरापर मन्त्रिगणने पार्थपुत्र
उन्मत्तावन्तिको काश्मीरका राजासन सौंपा था। किन्तु इनके राजत्वकालमें अत्याचार और व्यभिचार वृद्धिगत होने लगा। राजा विज्ञ मन्त्रिगणकी बात न मान दुष्ट लोगोंके तोषामोदमें भूले और अत्यन्त गर्हित आचरणसे फूले थे। भयसे पिता पार्थने राजधानी छोड़ जयेन्द्रविहारमें जा सपरिवार वास किया। वहांके भिक्षुक जा कुछ उन्हें आहारीय देते, वे उसीपर जीते
थे। किन्तु इनसे वह भी सहा न गया। उन्मत्तावन्तिने दुर्वृत्त लोग लगा अपने पूजनीय पिता और ज्ञातिवर्गको मरवा डाला था। राजा इतने निष्ठुर थे, कि गर्भवतीका पेट फाड़ा गर्भस्थ भ्रूणको देखते और उसमें आनन्द मानते। अवशेषमें राजयक्ष्मा रोगसे आक्रान्त हो इन्होंने (९३९ ई॰) प्राण छोड़ा। <small>काश्मीर देखो।</small>}}
{{outdent|उन्मथ (सं॰ पु॰) उत्-मथ-अप्। वध, कृत्ल।}}
{{outdent|उन्मथन (सं॰ क्ली॰) उत्-मथ भावे ल्युट्। १ उन्मर्दन, धक्का-मुकी। २ हिंसा, मारकाट। <small>(रघु ४।९)</small> ३ सुश्रुतोक्त यन्त्रके कर्मका एक भेद। (त्रि॰) कर्तरि ल्यु। ४ मर्दन-कारक, मल डालनेवाला।}}
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अनुश्री साव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२८८|उन्नेयत्व-उन्मथन}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|उन्नेयत्व (सं॰ क्ली॰) १ ज्ञापनयोग्यत्व, समझाये जाने क़ाबिल हालत। २ जन्य ज्ञानविषयत्व। <small>(न्यायकौमुदी)</small>}}
{{outdent|उन्मज्जक (सं॰ पु॰) उत्-मस्ज्-ण्वुल्। १ तपस्वीभेद। उन्मज्जक तपस्वी गले बराबर जलमें खड़े हो
तपस्या किया करते हैं।}}
{{block center|<poem><small>
"कण्ठद्घने जले स्थित्वा तपः कुर्वन् प्रवर्तते।
उन्मज्जकः स विज्ञेयस्तापसी लोकपूजितः॥" (योगसार)</small></poem>}}
(त्रि॰) २ जलमें डूबनेवाला।
{{outdent|उन्मज्जन (सं॰ क्ली॰) उत्-मस्ज्-ल्युट्। १ प्लवन, तैरने या पानीमें कूदनेका काम। २ शिवके किसी
गण्यका नाम।}}
{{outdent|उन्मण्डल (सं॰ क्ली॰) ज्योतिषोक्त दिनरात्रिको क्षयवृद्धिका ज्ञापक मण्डल विशेष।}}
{{block center|<poem><small>
"पूर्वापरक्षितिजसम्पर्कयोर्विलग्रं याम्ये ध्रुवे पललवैः क्षितिजासधः स्थे।
सौमो कुजादिपरि चाक्षलवैर्ध्रु वेतदुन्मण्डलं दिननिशो: क्षयवृद्धिकारि॥</small></poem>}}
{{right|<small>(सिद्धान्तशिरोमणि)</small>}}
{{outdent|उन्मण्डलकर्ण (सं॰ पु॰) ज्योतिषोक्त उन्मण्डलस्थ सूर्यकी छायाका कर्ण।}}
{{block center|<poem><small>
"युतार्धनांशार्कवृहतभुजानया खरामतिथ्यस्भुवो (१० १५ २०) इता: परः।
पलश्रुतिघ्नः पलभा विभाजितः परोऽथ बोहृत्तगते रवौ श्रुतिः॥"</small></poem>}}
{{right|<small>(सिद्धान्तशिरोमणि)</small>}}
{{outdent|उन्मण्डलनृ (सं॰ पु॰) ज्योतिषोक्त अक्षक्षेत्रके प्रदर्शनार्थ उन्मण्डलका शङ्कु।}}
{{outdent|उन्मत्त (सं॰ त्रि॰) उत्-मद्-त्त। १ उन्मादग्रस्त, पागल। २ वाह्यज्ञानशून्य, बेखबर। ३ मतवाला। (पु॰)
करणे क्त। ४ धुस्तूर, धतूरेका पेड़। ५ श्वेतधुस्तूर, सफ़ेद धतूरा। ६ मुचकुन्दवृक्ष। ७ राक्षसविशेष।}}
{{outdent|उन्मत्तक (सं॰ त्रि॰) उन्मत्त इव, कन्। १ मतवाला, जो नशेमें हो। २ उन्मादग्रस्त, पागल।}}
{{c|<small>"क्रीवोऽप्य पतितस्तज्ज: पङ्गु रून्मत्तको जडः॥" (याज्ञवल्क्य २। १२१३)</small>}}
{{outdent|उन्मत्तकारिणी (सं॰ स्त्री॰) दुग्धिका, दूधी।}}
{{outdent|उन्मत्तगङ्ग (सं॰ क्ली॰) देशविशेष। <small>(सिद्धान्तकौमुदी)</small>}}
{{outdent|उन्मत्तगीत (सं॰ त्रि॰) प्रलापसे कहा हुआ, जो पागलपनसे गाया गया हो।}}
{{outdent|उन्मत्तता (सं॰ स्त्री॰) उन्मादग्रस्त होनेकी बात, पागलपन।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|उन्मत्तदर्शन (सं॰ त्रि॰) उन्मादग्रस्त, जो पागल-जैसा देख पड़ता हो।}}
{{outdent|उन्मत्तप्रलापित (सं॰ त्रि॰) उन्मादकी अवस्थामें कहा हुआ, जो पागलपनसे कहा गया हो।}}
{{outdent|उन्मत्तरस (सं॰ पु॰) शीताङ्ग सन्निपातपर दिया जानेवाला एक औषध। रस एवं गन्धकको तुल्यांश ले धुस्तूरफलके द्रवमें एक दिन घोंटे और फिर सबके बराबर त्रिकटुका चूर्ण छोड़े। इस औषधके सेवनसे शीताङ्ग सन्निपात दूर होता है। <small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</small>}}
{{outdent|उन्मत्तरूप, <small>उन्मत्तदर्शन देखो।</small>}}
{{outdent|उन्मत्तलिङ्गिन् (सं॰ त्रि॰) उन्मत्त बनता हुआ, जो झूठमूठ पागलपन देखाता हो।}}
{{outdent|उन्मत्तवत् (सं॰ अव्य॰) उन्मत्त व्यक्तिकी भांति, पागलकी तरह।}}
{{outdent|उन्मत्तवेश (सं॰ पु॰) शिव, महादेव।}}
{{outdent|उन्मत्ता, <small>उन्मत्तकारिणी देखो।</small>}}
{{outdent|उन्मत्तावन्ति—काश्मीरके एक राजा। चन्द्रवर्माके मारे जानेपर शर्वट और अपरापर मन्त्रिगणने पार्थपुत्र
उन्मत्तावन्तिको काश्मीरका राजासन सौंपा था। किन्तु इनके राजत्वकालमें अत्याचार और व्यभिचार वृद्धिगत होने लगा। राजा विज्ञ मन्त्रिगणकी बात न मान दुष्ट लोगोंके तोषामोदमें भूले और अत्यन्त गर्हित आचरणसे फूले थे। भयसे पिता पार्थने राजधानी छोड़ जयेन्द्रविहारमें जा सपरिवार वास किया। वहांके भिक्षुक जा कुछ उन्हें आहारीय देते, वे उसीपर जीते थे। किन्तु इनसे वह भी सहा न गया। उन्मत्तावन्तिने दुर्वृत्त लोग लगा अपने पूजनीय पिता और ज्ञातिवर्गको मरवा डाला था। राजा इतने निष्ठुर थे, कि गर्भवतीका पेट फाड़ा गर्भस्थ भ्रूणको देखते और उसमें आनन्द मानते। अवशेषमें राजयक्ष्मा रोगसे आक्रान्त हो इन्होंने (९३९ ई॰) प्राण छोड़ा। <small>काश्मीर देखो।</small>}}
{{outdent|उन्मथ (सं॰ पु॰) उत्-मथ-अप्। वध, कृत्ल।}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२९०
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उन्मथित-उन्माद|२८९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|उन्मथित (सं॰ त्रि॰) उत्-मथ-क्त। १ मर्दित,
रगड़ा हुआ। २ विनष्ट, कुचला हुआ।}}
{{outdent|उन्मद (सं॰ त्रि॰) उद्गतो मदो यस्य। १ उन्मादयुक्त, मतवाला। <small>(माघ ६।२९)</small> २ उन्मत्त, नशा पिये हुआ। (पु॰) ३ उन्माद, पागलपन।}}
{{outdent|उन्मदन (सं॰ त्रि॰) प्रोतिसे उत्पन्न, द्रव्यसे
जला हुआ।}}
उन्मदिष्णु (सं॰ त्रि॰) उत्-मद-इष्णुच् । मलंकृष्णिरा-
कृत्-प्रजनीषपचतपती-मदइच्प्रपवहत-ङ्गु सहचर इच्छुक् । पा ३।२।१३६ ।
उन्मत्त, मतवाला ।
उन्मथित ( सं० त्रि०) उत्-मथ क्त। १ मर्दित, । उन्मयूख (सं० वि०) उद्दीप्त, चमकौला, जो चमक
रगड़ा हुआ। २ विनष्ट, कुचला हुआ। | रहा हो। जिसको किरण फैल रही हो।
उन्मद (सं० त्रि०) उद्गतो मदो यस्य । १ उन्माद- उन्मदैन (सं० क्लो०) उत्-मृद-ल्य ट् । १ उद्घ
युक्त, मतवाला। (माघ हा२९) २ उन्मत्त, नशा पिये षण, रगड़। २ वायु वा शूल प्रभृतिके निवारणार्थ
हुश्रा। (पु.) ३ उन्माद, पागलपन।
क्रिया विशेष, मालिश । (मुत्रत) करण ल्युट ।
उन्मदन (सं० त्रि. ) प्रीतिसे उत्पन्न, इश्कसे ३ मर्दैनयोग्य द्रव्यादि, मालिशको चीज़ ।
जला हुआ।
"उन्म नमभिषे केऽवनीयैक ।” ( कात्यायनश्रौतसू० १६१८)
उन्मदिष्णु (सं. त्रि०) उत्-मद-दूष्णुच् । अलंवनिरा-
'उन्मर्द नचन्दनादि ।' (कर्क)
क्ज-प्रजनोत्पचोत्पतोन्मदरुचापवपस्तु-धु सहचर इशाक् । पा शरा१३८ । उन्मा (वै० स्त्री० ) अवमान. एक नाप ।
उन्मत्त, मतवाला।
(शुक्लयजु १५५६५)
उन्मनस (सं. वि. ) उत्कण्ठितं मनो यस्य। उन्नाथ (सं० पु.) उन्मथ्यतेऽनेन, उत्-मथ करणे
१ उद्विग्न, बेचैन। २ विमना, दूसरी तर्फ दिल लगाये घन। १ मृगवधयोग्य यन्त्र, फन्दा, जाल। भावे
हुआ। “पयोधरेणोरसि काचिढन्मनाः।” (भारवि ८१६) घज। २ मारण, मारकाट। (त्रि.) ३ घातक,
उन्मनस्क, उन्मनस देखो।
चोट करनेवाला।
उन्मनायित (स. क्लो) उन्माद, पागलपन। उमाथिन् (सं० त्रि. ) व्याकुल करनेवाला, जो
उन्मनी ( स० स्त्री०) उन्म नस पृषोदरादित्वात् डी। घबरा देता हो।
योगीको एक अवस्था। यह हठयोगकी एक मुद्रा है। उन्माद (स० वि०) उत्-मद वञ् । १ उन्मत्त, पागल ।
दृष्टिको नासाके अग्रभागपर लगाने और भृकुटिको (पु०)२ उत्-मद आधार घञ् । मत्तता रोग विशेष,
ऊपर चढ़ानेसे उन्मनी मुद्रा बनती है।
पागलपनकी बीमारी। नाना कारणोंसे मनोविकार
उन्मन्थ (सं० पु.) १ हिंसा, मारकाट । २ कर्णपाली. होने पर यह रोग उपजता है। सुश्रुतके मतमें -
गत रोगविशेष, कानको लौमें होनेवाली एक बीमारी। “मदयन्त्य सता दोषा यमाटुन्मार्गमाश्रिताः ।
. “वलावध यत कर्ण पाल्यां वायुः प्रजुपाति।
मानसोऽयमतो व्याधिरन्माद इति कौर्तितः ॥"
गृहीत्वा सकफ कुर्याच्छोफ तहर्णवेदनम् ॥
जिस रोगमें उगत दोष सकल अवंगत शिराके
उन्मन्थक: सकको विकारः कफवातजः।” (मुश्रुत ) पथका आश्रय ले मनको मत्तता उपजात है, उसको
बलसे कर्णपालि बढ़ानपर कर्णके प्रान्तभागमें उन्माद कहते हैं ।*
वायु बिगड़ जाता है। फिर कफयुक्त हो वातश्लेष्मा । महर्षि चरकके कथनानुसार-जो अति भय खाता,
का वर्ण और वेदनाविशिष्ट शोच उठता है। यह जो सत्त्वगुणसे दूर रहता, जो अखाद्य भोजन द्वारा
रोग कफवातसे उपजता और कण्डविशिष्ट रहता है। एक प्रकारसे अधःपात लाता, जो मानसिक एवं
उन्मन्धक (स'० पु०) १ कणेपालीगत रोग विशेष, शारीरिक स्वाभाविक क्रियायोंके विरुद्ध इन्द्रियादि
कानको लवका एक आजार। उन्मन्ध देखो। (त्रि.) चलाता, जो शरीरको नितान्त क्षीण बनाता, जो
२ कम्पित करनेवाला, जो हिला डालता हो। ३ आ रोगको असह्य यन्त्रणासे घबराता, जो काम क्रोध
घातकारी, मारनेवाला।
* "रुचानशौतानविरेकधातुचयोपवासरनिलोऽतिबद्धः ।
उन्मन्यन (स'• लौ०) उत्-मन्य-ल्युट। १ मथन,
चिन्तादिदुष्टं हृदयं प्रदृष्य बुद्धि'म तिं वायुहन्ति शीघ्रम् ॥" (चरक)
मथाई। २ हनन, मारकाट ।
शूखा या वासी भात, विरेक, धातुक्षय, उपवास आदि कारणोंसे
उन्मथित (सं० त्रि.) मथा हुआ, जो हिलाया
बहुत बढ़ा हुआ वायु चिन्ता द्वारा इदयको अत्यन्त विगाड़ता है और शीत्र
डुलाया या सताया गया हो।
हो बुद्धि एव' समतिको नष्ट कर देता है।... ... .
Vol III. 73<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{rh||उन्मथित-उन्माद|२८९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|उन्मथित (सं॰ त्रि॰) उत्-मथ-क्त। १ मर्दित,
रगड़ा हुआ। २ विनष्ट, कुचला हुआ।}}
{{outdent|उन्मद (सं॰ त्रि॰) उद्गतो मदो यस्य। १ उन्मादयुक्त, मतवाला। <small>(माघ ६।२९)</small> २ उन्मत्त, नशा पिये हुआ। (पु॰) ३ उन्माद, पागलपन।}}
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जला हुआ।}}
{{outdent|उन्मदिष्णु (सं॰ त्रि॰) उत्-मद-इष्णुच्। <small>अलंकृञ्निरा-
कृञ्-प्रजनोत्पचोत्पतोन्मदरूच्प्रपवृतु-वृधु सहचर इच्छुक्। पा ३।२।१३६।</small>
उन्मत्त, मतवाला।}}
{{outdent|उन्मनम (सं॰ त्रि॰) उत्कण्ठितं मनो यस्य। १ उद्भिन्न, बेचैन। २ विमना, दूसरी तरफ दिल लगाये
हुआ। <small>"पयोधरेणोरसि काचिदुन्मना:।" (भारवि ८।१९)</small>}}
{{outdent|उन्मनस्क, <small>उन्मनस् देखो।</small>}}
{{outdent|उन्मनायित (सं॰ क्ली॰) उन्माद, पागलपन।}}
{{outdent|उन्मनी (सं॰ स्त्री॰) उन्मनस् पृषोदरादित्वात् ङीष्। योगीकी एक अवस्था। यह हठयोगकी एक मुद्रा है।
दृष्टिको नासाके अग्रभागपर लगाने और भ्रुकुटिको ऊपर चढ़ानिसे उन्मनी मुद्रा बनती है।}}
{{outdent|उन्मथ्य (सं॰ पु॰) १ हिंसा, मारकाट। २ कर्णपालीगत रोगविशेष, कानकी लौमें होनेवाली एक बीमारी।}}
{{block center|<small><poem>
"बलादबधर्यत कर्णे पालयां वायु: प्रकुप्यति।
गृहीला सनफं कुर्याच्छोफं तदर्षवेदनम्॥
उन्मथ्यक: सकण्डू को विकार: कफवातज:।" (सुश्रुत)</small></poem>}}
बलसे कर्णपालि बढ़ानिपर कर्णके प्रान्तभागमें वायु बिगड़ जाता है। फिर कफयुक्त हो वातश्रेष्माका वर्ण और वेदनाविशिष्ट शोथ उठता है। यह रोग कफवातसे उपजता और कण्डुविशिष्ट रहता है।
{{outdent|उन्मन्धक (सं॰ पु॰) १ कणपालीगत रोग विशेष,
कानकी लवका एक आजार। <small>उन्मन्ध देखो। (त्रि॰)</small>
२ कम्पित करनेवाला, जो हिला डालता हो। ३ आघातकारी, मारनेवाला।}}
{{outdent|उन्मथन (सं॰ क्ली॰) उत्-मन्थ-ल्युट्। १ मथन, मथाई। २ हनन, मारकाट।}}
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उन्मथित ( सं० त्रि०) उत्-मथ क्त। १ मर्दित, । उन्मयूख (सं० वि०) उद्दीप्त, चमकौला, जो चमक
रगड़ा हुआ। २ विनष्ट, कुचला हुआ। | रहा हो। जिसको किरण फैल रही हो।
उन्मद (सं० त्रि०) उद्गतो मदो यस्य । १ उन्माद- उन्मदैन (सं० क्लो०) उत्-मृद-ल्य ट् । १ उद्घ
युक्त, मतवाला। (माघ हा२९) २ उन्मत्त, नशा पिये षण, रगड़। २ वायु वा शूल प्रभृतिके निवारणार्थ
हुश्रा। (पु.) ३ उन्माद, पागलपन।
क्रिया विशेष, मालिश । (मुत्रत) करण ल्युट ।
उन्मदन (सं० त्रि. ) प्रीतिसे उत्पन्न, इश्कसे ३ मर्दैनयोग्य द्रव्यादि, मालिशको चीज़ ।
जला हुआ।
"उन्म नमभिषे केऽवनीयैक ।” ( कात्यायनश्रौतसू० १६१८)
उन्मदिष्णु (सं. त्रि०) उत्-मद-दूष्णुच् । अलंवनिरा-
'उन्मर्द नचन्दनादि ।' (कर्क)
क्ज-प्रजनोत्पचोत्पतोन्मदरुचापवपस्तु-धु सहचर इशाक् । पा शरा१३८ । उन्मा (वै० स्त्री० ) अवमान. एक नाप ।
उन्मत्त, मतवाला।
(शुक्लयजु १५५६५)
उन्मनस (सं. वि. ) उत्कण्ठितं मनो यस्य। उन्नाथ (सं० पु.) उन्मथ्यतेऽनेन, उत्-मथ करणे
१ उद्विग्न, बेचैन। २ विमना, दूसरी तर्फ दिल लगाये घन। १ मृगवधयोग्य यन्त्र, फन्दा, जाल। भावे
हुआ। “पयोधरेणोरसि काचिढन्मनाः।” (भारवि ८१६) घज। २ मारण, मारकाट। (त्रि.) ३ घातक,
उन्मनस्क, उन्मनस देखो।
चोट करनेवाला।
उन्मनायित (स. क्लो) उन्माद, पागलपन। उमाथिन् (सं० त्रि. ) व्याकुल करनेवाला, जो
उन्मनी ( स० स्त्री०) उन्म नस पृषोदरादित्वात् डी। घबरा देता हो।
योगीको एक अवस्था। यह हठयोगकी एक मुद्रा है। उन्माद (स० वि०) उत्-मद वञ् । १ उन्मत्त, पागल ।
दृष्टिको नासाके अग्रभागपर लगाने और भृकुटिको (पु०)२ उत्-मद आधार घञ् । मत्तता रोग विशेष,
ऊपर चढ़ानेसे उन्मनी मुद्रा बनती है।
पागलपनकी बीमारी। नाना कारणोंसे मनोविकार
उन्मन्थ (सं० पु.) १ हिंसा, मारकाट । २ कर्णपाली. होने पर यह रोग उपजता है। सुश्रुतके मतमें -
गत रोगविशेष, कानको लौमें होनेवाली एक बीमारी। “मदयन्त्य सता दोषा यमाटुन्मार्गमाश्रिताः ।
. “वलावध यत कर्ण पाल्यां वायुः प्रजुपाति।
मानसोऽयमतो व्याधिरन्माद इति कौर्तितः ॥"
गृहीत्वा सकफ कुर्याच्छोफ तहर्णवेदनम् ॥
जिस रोगमें उगत दोष सकल अवंगत शिराके
उन्मन्थक: सकको विकारः कफवातजः।” (मुश्रुत ) पथका आश्रय ले मनको मत्तता उपजात है, उसको
बलसे कर्णपालि बढ़ानपर कर्णके प्रान्तभागमें उन्माद कहते हैं ।*
वायु बिगड़ जाता है। फिर कफयुक्त हो वातश्लेष्मा । महर्षि चरकके कथनानुसार-जो अति भय खाता,
का वर्ण और वेदनाविशिष्ट शोच उठता है। यह जो सत्त्वगुणसे दूर रहता, जो अखाद्य भोजन द्वारा
रोग कफवातसे उपजता और कण्डविशिष्ट रहता है। एक प्रकारसे अधःपात लाता, जो मानसिक एवं
उन्मन्धक (स'० पु०) १ कणेपालीगत रोग विशेष, शारीरिक स्वाभाविक क्रियायोंके विरुद्ध इन्द्रियादि
कानको लवका एक आजार। उन्मन्ध देखो। (त्रि.) चलाता, जो शरीरको नितान्त क्षीण बनाता, जो
२ कम्पित करनेवाला, जो हिला डालता हो। ३ आ रोगको असह्य यन्त्रणासे घबराता, जो काम क्रोध
घातकारी, मारनेवाला।
* "रुचानशौतानविरेकधातुचयोपवासरनिलोऽतिबद्धः ।
उन्मन्यन (स'• लौ०) उत्-मन्य-ल्युट। १ मथन,
चिन्तादिदुष्टं हृदयं प्रदृष्य बुद्धि'म तिं वायुहन्ति शीघ्रम् ॥" (चरक)
मथाई। २ हनन, मारकाट ।
शूखा या वासी भात, विरेक, धातुक्षय, उपवास आदि कारणोंसे
उन्मथित (सं० त्रि.) मथा हुआ, जो हिलाया
बहुत बढ़ा हुआ वायु चिन्ता द्वारा इदयको अत्यन्त विगाड़ता है और शीत्र
डुलाया या सताया गया हो।
हो बुद्धि एव' समतिको नष्ट कर देता है।... ... .
Vol III. 73<noinclude></noinclude>
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओखलडांगा—ओखामण्डल|४८३}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ओखलडांगा—युक्तप्रदेशके कुमायूं ज़िलेका एक ग्राम। यह अक्षा॰ २९° १४’ २०’’ उ॰, तथा देशा॰ ७९° ३९’पू॰पर मुरादाबाद और अलमोड़ेके मध्यवर्ती पथमें कोशीला नदी किनारे अवस्थित है। इस स्थानमें अति उत्कृष्ट चावल होता है।}}
{{outdent|ओखली (हिं॰ स्त्री॰) उदूखल़ कांड़ी। यह काष्ठ वा प्रस्तरकी होती है। इसमें धान्यको छोड़ और मूसलसे कूट भूसी निकालते हैं। हिन्दुस्थान में प्राय: भूमिको खोद और पत्थर जोड़ ओखली बना लेते हैं।}}
{{outdent|ओखा (हिं॰ पु॰) १ व्याज, बहाना। (वि॰) २ शुष्क, सूखा। ३ कुटिल, टेढ़ा, खराब। ४ दूषित, खोटा। ५ विरल, जो गाढ़ा न हो।}}
{{outdent|ओखामण्डल—काठियावाड़ प्रान्तका एक छोटा ज़िला। यह अक्षा॰ २२° एवं २२° २८॔ उ॰ और देशा॰ ६८° ५९ तथा ६९° १२’ पू॰के मध्य अवस्थित है। ओखामण्डलसे उत्तर कच्छकी खाड़ी, पश्चिम अरब–समुद्र और पूर्व तथा दक्षिण रान या नाना दलदल पड़ता, जो इसे नवानगर जिलेसे पृथक करता है। असलमें यह एक द्वीप है। क्षेत्रफल २५० वर्गमील है। कहीं कहीं पहाड़ी देख पड़ती है। थूहरका जंगल बहुत है। यहां गोमती नदी छोटी है। भीमगज झीलसे एक पहाड़ी नाला भी निकला है। बरवाला, बरदिया और पोसितरामें रेतीला पत्थर बहुत होता, जो मकान् बनानेमें काम देता है। मूलवासर, मूलवेल और सामलासरमें बड़े–बड़े तालाब हैं। घर–घर और खेत–खेत कूवें बने हैं। पानी प्राय: खारी है। समुद्रके किनारे कुछ नहीं उपजता। किन्तु भीतरी भूमि उर्वरा है। दक्षिणांशकी अपेक्षा उत्तरांशमें दूनी चीज़ होती है। वनका अभाव है। कहीं कहीं बबूल और इमलीके वृक्ष लगे है। बम्बई, सूरत, कराची और जंजीबारकें साथ व्यवसाय होता है। बाजरी, तिल घी, घास, चूना और नमक बाहर भेज जाता है। चावल, चना, गेहूं, ज्वार, कपासका वीज, चीनी, मसाला, आलू और कपड़ा बाहरसे आता है। रूपन और बेयत बंदर हैं। रूपन द्वारकासे १ मील उत्तर पड़ता है। खाड़ीमें पानीके भीतर छिपे पहाड़ हैं।}}
{{Multicol-break}}
जहाजोंको ख ूब सचेत रहना पड़ता है। यहां ब्राह्मण
और सोहाने महाजन हैं। पहले यहांके लोग काब,
मोद और काल तोम पोमें विभक्त थे। किन्तु काय
और मोद अब देख नहीं पड़ते। काल जाति वर्तमान
वाघेरोंको उत्पत्ति है। पहले श्रीकृष्णने यहां अपना
राज्य स्थापित किया था । किन्तु श्रखामण्डलके भाट
वर्णन करते हैं- ई० २य शताब्दके मध्य काल
लोगोंने इसे फिर जीत लिया। सिरोयाके वीर सुक्क ुर
बेलिमने भी श्रखामण्डल अधिकार किया था । किन्तु
दारका समुद्रमें डब जानेसे वह अपनी राजधानी
गोरिंजाको उठा ले गये । पोछे सिरोयाके दूसरे वार
मेहेम गुटुकने सुक्कर बेलिमको मार अपना राज्य
जमाया । अन्तको काल लोंगोंने फिर चोखामण्डल
जोता था । ई० ६ष्ठ शताब्द के समय काठियावाड़ के
चावड़ राजपूतोंने चाक्रमण किया चोर कालों वा
वाघेरोंको यहांसे निकाल दिया। अक्षयराज राजा
बने थे। फिर उनके पुत्र भूवड़राय और भूवरायके
पुत्र जयसेन सिंहासनारूढ़ हुये जयसेनने हो चावड़ा-
पादर नगर बसाया और एक बड़ा तालाब बनाया
था। मूलवासर भोलमें उनके समयका एक पत्थर
मिला है। जयसेनका उत्तराधिकार उनके भाई जय-
देवने पाया जगदेव के पुत्र मलजी अपने पिता के
मृत्य ु होने बाद कुछ वर्ष जो कर मर गये । उनके
लड़के देवलदेव फिर राजा बने । देवलदेव के बाद
उनके लड़के जगदेव सिंहासनपर बैठे, जिनके नक
सेन और अनन्तदेव दो पुत्र रहे। कनकसेनने हो
'कनकपुरो' बसाई, जो पोछे 'बसाई' कहाई प्राचीन
कालपर यह पुरो प्रोखामण्डल के व्यवसायका केन्द्र-
स्थल थी । वर्तमान समय केवल एक ग्राम रह गया
है। कनकसेनके बनाये बड़े-बड़े जेन मन्दिर टूटे-
फूटे पड़े है अनन्तदेव दारकामे राज्य करते थे।
हैं। उनके अयोग्य होनेसे परमार या रोल राजपूतोंने
अपना अधिकार जमा लिया। किन्तु चावड़ों पोर
उनमें युद्द होने लगा। इधर वेरावलजी और
वोजसकी दो राठौर राजपूत जोधपुर से निकाल दिये
गये थे। यह कितनी हो फोजके साथ दारका पाये।<noinclude>{{Multicol-end}}
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667964
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2026-07-17T13:08:37Z
आदेश यादव
3609
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओखलडांगा—ओखामण्डल|४८३}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ओखलडांगा—युक्तप्रदेशके कुमायूं ज़िलेका एक ग्राम। यह अक्षा॰ २९° १४’ २०’’ उ॰, तथा देशा॰ ७९° ३९’पू॰पर मुरादाबाद और अलमोड़ेके मध्यवर्ती पथमें कोशीला नदी किनारे अवस्थित है। इस स्थानमें अति उत्कृष्ट चावल होता है।}}
{{outdent|ओखली (हिं॰ स्त्री॰) उदूखल़ कांड़ी। यह काष्ठ वा प्रस्तरकी होती है। इसमें धान्यको छोड़ और मूसलसे कूट भूसी निकालते हैं। हिन्दुस्थान में प्राय: भूमिको खोद और पत्थर जोड़ ओखली बना लेते हैं।}}
{{outdent|ओखा (हिं॰ पु॰) १ व्याज, बहाना। (वि॰) २ शुष्क, सूखा। ३ कुटिल, टेढ़ा, खराब। ४ दूषित, खोटा। ५ विरल, जो गाढ़ा न हो।}}
{{outdent|ओखामण्डल—काठियावाड़ प्रान्तका एक छोटा ज़िला। यह अक्षा॰ २२° एवं २२° २८॔ उ॰ और देशा॰ ६८° ५९ तथा ६९° १२’ पू॰के मध्य अवस्थित है। ओखामण्डलसे उत्तर कच्छकी खाड़ी, पश्चिम अरब–समुद्र और पूर्व तथा दक्षिण रान या नाना दलदल पड़ता, जो इसे नवानगर जिलेसे पृथक करता है। असलमें यह एक द्वीप है। क्षेत्रफल २५० वर्गमील है। कहीं कहीं पहाड़ी देख पड़ती है। थूहरका जंगल बहुत है। यहां गोमती नदी छोटी है। भीमगज झीलसे एक पहाड़ी नाला भी निकला है। बरवाला, बरदिया और पोसितरामें रेतीला पत्थर बहुत होता, जो मकान् बनानेमें काम देता है। मूलवासर, मूलवेल और सामलासरमें बड़े–बड़े तालाब हैं। घर–घर और खेत–खेत कूवें बने हैं। पानी प्राय: खारी है। समुद्रके किनारे कुछ नहीं उपजता। किन्तु भीतरी भूमि उर्वरा है। दक्षिणांशकी अपेक्षा उत्तरांशमें दूनी चीज़ होती है। वनका अभाव है। कहीं कहीं बबूल और इमलीके वृक्ष लगे है। बम्बई, सूरत, कराची और जंजीबारकें साथ व्यवसाय होता है। बाजरी, तिल घी, घास, चूना और नमक बाहर भेज जाता है। चावल, चना, गेहूं, ज्वार, कपासका वीज, चीनी, मसाला, आलू और कपड़ा बाहरसे आता है। रूपन और बेयत बंदर हैं। रूपन द्वारकासे १ मील उत्तर पड़ता है। खाड़ीमें पानीके भीतर छिपे पहाड़ हैं।}}
{{Multicol-break}}
जहाजोंको ख़ूब सचेत रहना पड़ता है। यहां ब्राह्मण और सोहाने महाजन हैं। पहले यहांके लोग काब, मोद और काल तीन श्रेणीमें विभक्त थे। किन्तु काब और मोद अब देख नहीं पड़ते। काल ज़ाति वर्तमान वाघेरोंकी उत्पत्ति है। पहले श्रीकृष्णने यहां अपना राज्य स्थापित किया था। किन्तु ओखामण्डलके भाट वर्णन करते हैं— ई॰ २य शताब्दके मध्य काल लोगोंने इसे फिर जीत लिया। सिरीयाके वीर सुक्कुर बेलिमनेभी ओखामण्डल अधिकार किया था। किन्तु द्वारकाके समुद्रमें डूब जानेसे वह अपनी राजधानी गोरिंजाको उठा ले गये। पीछे सिरीयाके दूसरे वीर मेहेम–गुटुकने सुक्कुर बेलिमको मार अपना राज्य जमाया। अन्तको काल लोंगोंने फिर ओखामण्डल जीता था। ई॰ ६ष्ठ शताब्दके समय काठियावाड़के चाबढ़ राजपूतोंने आक्रमण किया और कालों या वाघेरोंको यहांसे निकाल दिया। अक्षयराज राजा बने थे। फिर उनके पुत्र भूवड़राय और भूवड़रायके पुत्र जयसेन सिंहासनारूढ़ हुये। जयसेनने ही चावड़ा–पादर नगर बसाया और एक बड़ा तालाब बनाया था। मूलवासर झीलमें उनके समयका एक पत्थर मिला है। जयसेनका उत्तराधिकार उनके भाई जगदेवने पाया। जगदेव के पुत्र मङ्गलजी अपने पिता के मृत्यु होने बाद कुछ वर्ष जी कर मर गये। उनके
लड़के देवलदेव फिर राजा बने। देवलदेवके बाद उनके लड़के जगदेव सिंहासनपर बैठे, जिनके कनकसेन और अनन्तदेव दो पुत्र रहे। कनकसेनने ही 'कनकपुरी' बसाई, जो पीछे 'वसाई' कहाई। प्राचीन कालपर यह पुरी ओखामण्डलके व्यवसायका केन्द्रस्थल थी। वर्तमान समय केवल एक ग्राम रह गया है। कनकसेनके बनाये बड़े–बड़े जैन मन्दिर टूटे–फूटे पड़े है। अनन्तदेव द्वारकामें राज्य करते थे। उनके अयोग्य होनेसे परमार या हेरोल राजपूतोंने अपना अधिकार जमा लिया। किन्तु चावड़ों और उनमें युद्द होने लगा। इधर वेरावलजी और वीजलकी दो राठौर राजपूत जोधपुर से निकाल दिये गये थे। वह कितनी ही फौजके साथ द्वारका आये।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude>
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओखलडांगा—ओखामण्डल|४८३}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ओखलडांगा—युक्तप्रदेशके कुमायूं ज़िलेका एक ग्राम। यह अक्षा॰ २९° १४’ २०’’ उ॰, तथा देशा॰ ७९° ३९’पू॰पर मुरादाबाद और अलमोड़ेके मध्यवर्ती पथमें कोशीला नदी किनारे अवस्थित है। इस स्थानमें अति उत्कृष्ट चावल होता है।}}
{{outdent|ओखली (हिं॰ स्त्री॰) उदूखल़ कांड़ी। यह काष्ठ वा प्रस्तरकी होती है। इसमें धान्यको छोड़ और मूसलसे कूट भूसी निकालते हैं। हिन्दुस्थान में प्राय: भूमिको खोद और पत्थर जोड़ ओखली बना लेते हैं।}}
{{outdent|ओखा (हिं॰ पु॰) १ व्याज, बहाना। (वि॰) २ शुष्क, सूखा। ३ कुटिल, टेढ़ा, खराब। ४ दूषित, खोटा। ५ विरल, जो गाढ़ा न हो।}}
{{outdent|ओखामण्डल—काठियावाड़ प्रान्तका एक छोटा ज़िला। यह अक्षा॰ २२° एवं २२° २८॔ उ॰ और देशा॰ ६८° ५९ तथा ६९° १२’ पू॰के मध्य अवस्थित है। ओखामण्डलसे उत्तर कच्छकी खाड़ी, पश्चिम अरब–समुद्र और पूर्व तथा दक्षिण रान या नाना दलदल पड़ता, जो इसे नवानगर जिलेसे पृथक करता है। असलमें यह एक द्वीप है। क्षेत्रफल २५० वर्गमील है। कहीं कहीं पहाड़ी देख पड़ती है। थूहरका जंगल बहुत है। यहां गोमती नदी छोटी है। भीमगज झीलसे एक पहाड़ी नाला भी निकला है। बरवाला, बरदिया और पोसितरामें रेतीला पत्थर बहुत होता, जो मकान् बनानेमें काम देता है। मूलवासर, मूलवेल और सामलासरमें बड़े–बड़े तालाब हैं। घर–घर और खेत–खेत कूवें बने हैं। पानी प्राय: खारी है। समुद्रके किनारे कुछ नहीं उपजता। किन्तु भीतरी भूमि उर्वरा है। दक्षिणांशकी अपेक्षा उत्तरांशमें दूनी चीज़ होती है। वनका अभाव है। कहीं कहीं बबूल और इमलीके वृक्ष लगे है। बम्बई, सूरत, कराची और जंजीबारकें साथ व्यवसाय होता है। बाजरी, तिल घी, घास, चूना और नमक बाहर भेज जाता है। चावल, चना, गेहूं, ज्वार, कपासका वीज, चीनी, मसाला, आलू और कपड़ा बाहरसे आता है। रूपन और बेयत बंदर हैं। रूपन द्वारकासे १ मील उत्तर पड़ता है। खाड़ीमें पानीके भीतर छिपे पहाड़ हैं।}}
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जहाजोंको ख़ूब सचेत रहना पड़ता है। यहां ब्राह्मण और सोहाने महाजन हैं। पहले यहांके लोग काब, मोद और काल तीन श्रेणीमें विभक्त थे। किन्तु काब और मोद अब देख नहीं पड़ते। काल ज़ाति वर्तमान वाघेरोंकी उत्पत्ति है। पहले श्रीकृष्णने यहां अपना राज्य स्थापित किया था। किन्तु ओखामण्डलके भाट वर्णन करते हैं— ई॰ २य शताब्दके मध्य काल लोगोंने इसे फिर जीत लिया। सिरीयाके वीर सुक्कुर बेलिमनेभी ओखामण्डल अधिकार किया था। किन्तु द्वारकाके समुद्रमें डूब जानेसे वह अपनी राजधानी गोरिंजाको उठा ले गये। पीछे सिरीयाके दूसरे वीर मेहेम–गुटुकने सुक्कुर बेलिमको मार अपना राज्य जमाया। अन्तको काल लोंगोंने फिर ओखामण्डल जीता था। ई॰ ६ष्ठ शताब्दके समय काठियावाड़के चाबढ़ राजपूतोंने आक्रमण किया और कालों या वाघेरोंको यहांसे निकाल दिया। अक्षयराज राजा बने थे। फिर उनके पुत्र भूवड़राय और भूवड़रायके पुत्र जयसेन सिंहासनारूढ़ हुये। जयसेनने ही चावड़ा–पादर नगर बसाया और एक बड़ा तालाब बनाया था। मूलवासर झीलमें उनके समयका एक पत्थर मिला है। जयसेनका उत्तराधिकार उनके भाई जगदेवने पाया। जगदेव के पुत्र मङ्गलजी अपने पिता के मृत्यु होने बाद कुछ वर्ष जी कर मर गये। उनके
लड़के देवलदेव फिर राजा बने। देवलदेवके बाद उनके लड़के जगदेव सिंहासनपर बैठे, जिनके कनकसेन और अनन्तदेव दो पुत्र रहे। कनकसेनने ही 'कनकपुरी' बसाई, जो पीछे 'वसाई' कहाई। प्राचीन कालपर यह पुरी ओखामण्डलके व्यवसायका केन्द्रस्थल थी। वर्तमान समय केवल एक ग्राम रह गया है। कनकसेनके बनाये बड़े–बड़े जैन मन्दिर टूटे–फूटे पड़े है। अनन्तदेव द्वारकामें राज्य करते थे। उनके अयोग्य होनेसे परमार या हेरोल राजपूतोंने अपना अधिकार जमा लिया। किन्तु चावड़ों और उनमें युद्द होने लगा। इधर वेरावलजी और वीजलकी दो राठौर राजपूत जोधपुर से निकाल दिये गये थे। वह कितनी ही फौजके साथ द्वारका आये।<noinclude>{{Multicol-end}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४५२
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''ॠ—ॡ'''|'''४५१'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
विषयोंके नाम यह हैं—आर्ष, छन्द, देवत्य, विनियोग और ब्राह्मण। {{smaller|( योगिया० )}}
{{outdent|ऋष्यादिन्यास (सं॰ पु॰) ऋष्यादीनां न्यासः, ६-तत्। तन्त्रोक्त न्याससमूह। मस्तकमें ऋषिन्यास, मुखमें छन्दोन्यास, हृदयमें देवतान्यास, गुह्यदेशमें वीजन्यास, पादद्वयमें शक्तिन्यास और सर्वाङ्गमें कीलकन्यास करना चाहिये। {{smaller|( तन्त्र )}}}}
{{outdent|ऋष्व (सं॰ त्रि॰) ऋष-व निपातनात् साधुः। १ वृहत्, बड़ा। २ महत्नाम, मशहूर।}}
{{outdent|ऋष्ववीर (सं॰ त्रि॰) वृहत् जीवों द्वारा बसा हुआ।}}
{{outdent|ऋष्वौजस् (वै॰ त्रि॰) महत्त्वविशिष्ट, बड़ी ताकत रखनेवाला।}}
{{outdent|ऋहत् (सं॰ त्रि॰) रह-शतृ पृषोदरादित्वात् साधुः। खर्वाकृति, छोटा, कमजोर।}}
<div style="text-align: center;">'''ॠ'''</div>
{{outdent|ॠ—१ हिन्दी और संस्कृतके स्वरवर्णका अष्टम अक्षर। इसके उच्चारणका स्थान मूर्द्धा है। उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित भेदसे ॠ वर्ण तीन और अनुनासिक तथा निरनुनासिक भेदसे दो प्रकारका होता है। इसके}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
लिखनकी प्रणाली प्रायः ह्रस्व ऋकारके न्याय रहती है। केवल ह्रस्व ऋकारके नीचे एक रेखा दक्षिण दिक्से आरम्भ हो वक्रभावमें वाम दिक् पहुंच कुञ्चित पड़ती, फिर दक्षिण दिक्को चलती है। {{smaller|( वर्णोद्धारतन्त्र )}} इसका तन्त्रशास्त्रोक्त नाम क्रोध, अतितीक्ष्ण, वाणी, वामनी, गो, श्री, धृति, ऊर्ध्वमुखी, निशनाथ, पद्ममाला, विनष्टधी, शशिनो, मोचिका, श्रेष्ठा, दैत्यमाता, प्रतिष्ठाता, एकदण्डाद्वय, माता, हरिता, मिथुनोदया, कोमला, श्यामला, मेधो, प्रतिष्ठा, पति, अष्टमो, पावक और गन्धकर्षिणी है।
२ नासिका, नाक। ३ धातुका एक अनुबन्ध।
{{block center|<poem>
"ॠॡलृङ्ङोऽयङ्ङनी।" {{smaller|( कविकल्पद्रुम )}}
</poem>}}
( धातु ) प्रादि॰ क्र्यादि॰ पर॰ सक॰ सेट्। ४ वाक्यारम्भ करना, बोलने लगना। ५ रक्षा करना, बचाना। ६ निन्दा करना, बुरा बताना। ७ भय देखना, खौफ दिलाना। ८ गमन करना, जाना। ( क्ली॰ ) ॠ-क्विप्। ९ वक्षः, छाती। (स्त्री॰) १० दानवमाता। ११ देवमाता। १२ स्मृति, याद। १३ गमन, चाल। (पु॰) १४ दनुज। १५ भैरव, सङ्गादेव।
{{block center|<poem>
"ॠनन्ददाविः प्रमथेशसङ्गे" {{smaller|( उद्भट )}}
</poem>}}
</div>
{{Multicol-end}}
<hr style="border-top: 1px solid black; margin: 0px 370px;">
<div style="text-align: center; font-size: 250%; margin-bottom: 20px;">'''ऌ'''</div>
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ऌ—१ स्वरवर्णका नवम अक्षर। इसके उच्चारणका स्थान दन्त है। यह वर्ण ह्रस्व, दीर्घ एवं प्लुत भेदसे तीन, अनुनासिक तथा निरनुनासिक भेदसे दो और उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित भेदसे फिर तीन प्रकारका होता है। कामधेनुतन्त्रमें लिखा, कि ऌकार कुण्डलाकृति और श्रेष्ठ देवता है। यह पञ्चगुण और चतुर्ज्ञानमय रहता है। ऌकारमें ब्रह्मादि देव सर्वदा वास करते हैं। इसका प्राण पांच, गुण तीन, विन्दु तीन और वर्ण पीत विद्युल्लता जैसा होता है। लिखनप्रणाली पर अधोदेशको कुण्डलाकृति रेखा वक्रभावमें दक्षिणसे वामदिक् जाती है। ऌकारमें अग्नि, महादेव और वायु रहा करते हैं। {{smaller|(वर्णोद्धारतन्त्र)}}}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
इसका तन्त्रोक्त नाम स्थाणु, श्रीधर, शुद्ध, मेधा, धृग्द्रावक, वियत्, देवयोनि, दत्तगण्ड, सहेद्य, कौन्त, रुद्रक, विश्वेश्वर, दीर्घजिह्वा, महेन्द्र, लाङ्गलि, परा, चन्द्रिका, पार्थिव, धूम्रा, दिदन्त, कामवर्द्धन, शुचिस्मिता, नवमी, कान्ति, आस्नातकेश्वर, चित्ताकर्षिणी, काम और तृतीयकुलसुन्दरी है।
२ धातुका अनुबन्धविशेष। यह अनुबन्ध पड़नेसे धातुके उत्तर लुङ् विभक्ति पर अङ् लगता है।
{{block center|<poem>
"ऌरङ् वान्।" {{smaller|( कविकल्पद्रुम )}}
</poem>}}
( अव्य॰ ) ३ देवमाता। ४ भूमि। ५ पर्वत।
{{outdent|ॡ—१ स्वरवर्णका दशम अक्षर। इसका उच्चारणस्थान दन्त है। यह वर्ण दीर्घ एवं प्लुत तथा अनु-}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४५९
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४५८'''|'''एकता—एकत्वभावना'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|एकता (सं॰ स्त्री॰) एकस्य भावः, एक-तल्-टाप्। १ ऐक्य, वहदत, मेलजोल। २ अभिन्नता, बराबरी। ३ मुक्तिविशेष। ( फा॰ वि॰ ) ४ अद्वितीय, अनोखा।}}
{{outdent|एकतान (सं॰ त्रि॰) एकेन भावरसेन तन्यते, तन-अण्। १ एकाग्र, एक ही काममें लगा हुआ। २ एक स्वर तथा एक तालविशिष्ट, जो दूसरा स्वर या ताल रखता न हो। ( पु॰ ) ३ एक ही विषयपर नियोजित ध्यान, जो ख्याल एक ही बातपर लगा हो। ४ स्वर एवं ताल की एकता, गाने-बजानेका मेल।}}
{{outdent|एकतार (सं॰ त्रि॰) एका तारा यत्र, बहुव्री॰ ह्रस्वः। केवल एक ताराविशिष्ट, सिर्फ एक ही सितारा रखनेवाला। नभको एकतार देखनेपर नारद मुनिका स्मरण करना चाहिये।}}
{{outdent|एकतारा (हिं॰ पु॰) एक तारवाला सितार-जैसा लम्बा बाजा। कद्दूकी तौबीका मुंह चमड़ेसे मढ़ा बांसका एक डण्डा लगा देते हैं। डण्डेके ऊपरी हिस्सेपर एक खूंटी रहती है। खूंटीसे मढ़े चमड़े पर लगी घोड़ियाके नीचे तक एक लोहे या पीतलका तार चढ़ता है। अनेक भिक्षुक एकतारा बजा बजा भौख मांगते घूमते हैं।}}
{{outdent|एकताल (सं॰ पु॰) एकः समानस्तालो यत्र, बहुव्री॰। १ तानविशिष्ट, तालसे मिला हुआ। ( पु॰ ) २ तानविशिष्ट गीतवाद्यादि, सुरीला गाना। ३ एकमात्र तालवृक्षका पर्वत।}}
{{block center|<poem>
"एकताल इवोत्पातपवनप्रेरितो गिरिः।" {{smaller|(रघु १२।१२)}}
</poem>}}
{{outdent|एकताला (हिं॰ पु॰) एकतालका गीतवाद्यादि, दूसरे तालकी ज़रूरत न रखनेवाला गाना-बजाना। इसमें १२ मात्रा और ३ आघात हैं। खाली ताल नहीं पड़ता। तबले या ढोलकसे निकलता है—}}
{{block center|<poem>
धिन् धिन् धा, धा दिनुता, तादीन् तागे तेरे केटे धिनुता धा।
</poem>}}
हिन्दुस्तानी गाने-बजानेवाले प्रायः अन्तको दादरे एकतालमें गाया करते हैं।
{{outdent|एकतालिका (सं॰ स्त्री॰) एक रागिणी।}}
{{outdent|एकताली (सं॰ स्त्री॰) एक तालका बाजा।}}
{{outdent|एकतालीस (हिं॰ वि॰) एकचत्वारिंशत्, चालीस और एक, चार दहाई और एक इकाईसे बना हुआ, ४१।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|एकतीर्थी (सं॰ वि॰) एकं समं तीर्थं आश्रमोऽस्त्यस्य, इनि। १ सतीर्थ, उसी ठिकानेवाला। ( पु॰ ) २ एक ही गुरुका शिष्य, उसी उस्तादका शागिर्द।}}
{{outdent|एकतीस (हिं॰ वि॰) एकत्रिंशत्, तीस और एक, तीन दहाई और एक इकाई रखनेवाला, ३१।}}
{{outdent|एकतेजन (सं॰ त्रि॰) एकमात्र काण्डविशिष्ट, एक ही डण्डा रखनेवाला।}}
{{outdent|एकतेश्वर—बंगाल प्रान्तके बांकुड़ा जिलेका एक प्राचीन ग्राम। यह बांकुड़ा नगरसे दक्षिण-पूर्व १ कोस द्वारिकेश्वर नदीके तीर अवस्थित है। एकतेश्वर नामक शिवमन्दिर देखने योग्य है। मन्दिरमें महादेवके लिङ्गकी एक मूर्त्ति है। लिङ्गको एकतेश्वर कहते हैं। मन्दिरकी बनावट बहुत अच्छी है। ऐसी दृढ़ भित्ति इस अञ्चलमें कहीं देख नहीं पड़ती। मन्दिर अतिप्राचीन है। लाल बिल्लौरी पत्थर जड़ा है। बीचमें दो तीन बार संस्कार हुआ है।}}
{{outdent|एकतोदत् (सं॰ त्रि॰) एकतो दन्ता यस्य, बहुव्री॰ दत् आदेशः। एकपाटी दन्तयुक्त, जो एक ही ओर दांत रखता हो।}}
{{outdent|एकत्र (सं॰ अव्य॰) एक-त्रल्। सप्तम्यास्त्रल्। पा ५।३।१०। १ एक ही स्थानमें, उसी जगहपर। २ एकसङ्ग, एक साथ, मिल-जुलकर।}}
{{outdent|एकत्रा (हिं॰ पु॰) निरवशेष, जमा, जोड़।}}
{{outdent|एकत्रिंश (सं॰ त्रि॰) एकत्रिंशत् संख्याविशिष्ट, इकतीसवां।}}
{{outdent|एकत्रिंशत् (सं॰ स्त्री॰) एकतीस, तीन दहाई और एक इकाई रखनेवाला, ३१।}}
{{outdent|एकत्रिक (सं॰ पु॰) यज्ञविशेष।}}
{{outdent|एकत्रित (सं॰ त्रि॰) एकत्रप्राप्त, इकट्ठा, जमाया हुआ।}}
{{outdent|एकत्व (सं॰ क्ली॰) एकस्य भावः, एक-त्व। १ एकता, तौहीद, इकाई। २ अभेद, मेल। ३ साम्य, बराबरी। ४ मुक्तिविशेष। व्याकरणमें एकवचनको एकत्व कहते हैं।}}
{{outdent|एकत्वभावना (सं॰ स्त्री॰) एक की चिन्ता, एक का ख्याल। जैन आत्माके एकत्वपर ध्यान लड़ानेका}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकजन्मा—एकतरा'''|'''४५७'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
इतिवृत्तमें एकजटा कामदेवका एकजटा महादेव और किसी ग्रन्थमें कामदेव नाम लिखा है।
{{outdent|एकजन्मा ( सं॰ पु॰ ) एकं मुख्यमद्वितीयं वा जन्म यस्य, बहुव्री॰। १ राजा, बादशाह। २ शूद्र। उपनयन संस्कार न होनेसे शूद्र द्विजोंकी श्रेणीसे विभिन्न रहता है।}}
{{outdent|एकजात ( सं॰ त्रि॰ ) एकस्मात् जातः, ५-तत्। १ सहोदर, एक ही मा बापसे पैदा। २ एक वस्तुसे उत्पन्न, जो दूसरी चीजसे पैदा न हो।}}
{{outdent|एकजाति ( सं॰ पु॰ ) एका जातिर्जन्म यस्य, बहुव्री॰। १ शूद्र।}}
{{block center|<poem>
"ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः।
चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः॥" {{smaller|( मनु १०।४ )}}
</poem>}}
( त्रि॰ ) २ समान जाति, एक ही कौमवाला। ३ एक बार उत्पन्न होनेवाला, जो दोबारा पैदा न हो।
{{outdent|एकजातिप्रतिबद्ध ( सं॰ त्रि॰ ) केवल एक जन्मसे सम्बन्ध रखनेवाला, जो दोबारा पैदा न हो।}}
{{outdent|एकजातीय ( सं॰ त्रि॰ ) एकः प्रकारः, एक-जातीयर्। प्रकारवचने जातोयर्। पा ५।३।६९। १ एकप्रकार, एक-जैसा। २ एक ही जातिसे सम्बन्ध रखनेवाला, जो दूसरी कौमसे सरोकार रखता न हो।}}
{{outdent|एकजौक्यूटिव ( अं॰ वि॰ = Executive ) कार्य-निर्वाहक, कारगुजार। कार्यक्षम शासनको एकजौक्यूटिव आथारिटी, विधायक अधिकारियोंको एकजौक्यूटिव आफिसर, निष्पादक समितिको एकजौक्यूटिव कमिटी और अनुष्ठान-नियुक्त सभाको एकजौक्यूटिव काउन्सिल कहते हैं।}}
{{outdent|एकजीववाद ( सं॰ पु॰ ) वेदान्त दर्शनका एक वाद। इसमें जीव एक-जैसा माना गया है।}}
{{outdent|एकज्या ( सं॰ स्त्री॰ ) १ चापकी ज्या, कमान् की डोर। २ व्यासार्धका चिह्न, निस्फ कुतरका निशान्।}}
{{outdent|एकज्योतिः ( सं॰ पु॰ ) एकं प्रधानं सर्वाभिभवकरं ज्योतिरस्य, बहुव्री॰। शिव।}}
{{outdent|एकज्वर ( सं॰ पु॰ ) ज्वररोग विशेष, किसी किस्म का बुखार। {{smaller|ज्वर देखो।}}}}
<br><br>Vol. III. 115
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|एकट ( अं॰ पु॰ = Act ) व्यवस्था, विधि, कानून।}}
{{outdent|एकटंगा ( हिं॰ वि॰ ) एकपदविशिष्ट, लंगड़ा, जिसके एक ही पैर रहे।}}
{{outdent|एकटकी ( हिं॰ स्त्री॰ ) निश्चल दृष्टि, टकटकी, जमी हुई निगाह।}}
{{outdent|एकट्ठा ( हिं॰ वि॰ ) एकत्र, जमा हुआ।}}
{{outdent|एकठा ( हिं॰ स्त्री॰ ) नौका विशेष, किसी किस्मकी नाव। यह एक ही काठ या लकड़ी खोदकर बनायी जाती है।}}
{{outdent|एकड़ ( अं॰ पु॰ = Acre ) भूमि नापनेकी एक परिमाण। यह १ बीघे १२ बिस्वे पड़ता है।}}
{{outdent|एकडाल ( हिं॰ वि॰ ) १ अभिन्न, एक जैसा। ( पु॰ ) २ अस्त्र विशेष, किसी किस्मका छुरा। जिस छुरेमें फल और बेंट एक ही लोहेके टुकड़ेका रहता, उसे सब कोई एकडाल कहता है।}}
{{outdent|एकत ( सं॰ पु॰ ) १ देवविशेष। २ मुनिविशेष। ( हिं॰ वि॰ ) ३ एकांत, जो अलग न हो।}}
{{outdent|एकतः ( सं॰ अव्य॰ ) एक-तसिल्। १ प्रथमतः, पहले। २ एक पार्श्व पर, एक तरफ। ३ एकसे। ४ एक पक्षमें, एक ओरसे। ५ एक दिक्, एक सिम्त। ६ अकेले, एक-एक।}}
{{block center|<poem>
"यात्येकतोऽस्तशिखरं पतिरोषधीना-
माविष्कृतारुणपुरःसर एकतोऽर्कः।" {{smaller|( शकुन्तला )}}
</poem>}}
{{outdent|एकतत्त्वी ( सं॰ त्रि॰ ) एकतत्त्वमस्यास्तीति, एक-तत्त्व-इनि। समानकर्म, बराबरका काम करनेवाला।}}
{{outdent|एकतम ( सं॰ त्रि॰ ) एक-डतमच्। एकाच्च प्राचाम्। पा ५।३।९४। १ बहुके मध्य एक, बहुतोंमें अकेला। २ दोमें एक। ३ एक।}}
{{block center|<poem>
"अस्यापि वा शरीरे वा ब्रह्मन्न कतमं इष्ट।" {{smaller|( भारत )}}
</poem>}}
{{outdent|एकतर ( सं॰ त्रि॰ ) एक-डतरच्। १ दोमें एक। २ बहुतोंमें एक।}}
{{outdent|एकतरफा ( फा॰ वि॰ ) १ एकपक्षसे सम्बन्ध रखनेवाला, जो दूसरी ओरका न हो। २ पक्षपातयुक्त, तरफदारीवाला। ३ पार्श्वस्थ, बगली।}}
{{outdent|एकतरा ( हिं॰ पु॰ ) एक दिनके अन्तरसे चढ़नेवाला ज्वर, जो बुखार एक दिन ठहर कर आता हो।}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४५६'''|'''एकचारिणी—एकजटा कामदेव'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
घूमता हो। (पु॰) २ बुद्धदेवके एक सहचर। ३ प्रत्येकबुद्ध।
{{outdent|एकचारिणी (सं॰ स्त्री॰) सती, साध्वी, पतिव्रता, नेकबख्त बोवी।}}
{{outdent|एकचित (हिं॰) {{smaller|एकचित्त देखो।}}}}
{{outdent|एकचित्त (सं॰ त्रि॰) एकमेकविषयासक्तं चित्तं यस्य, बहुव्री॰। १ अनन्यचित्त, अलाहिदा खयाल न रखनेवाला। २ अभिन्नचेता, एक ही बात सोचनेवाला। (क्ली॰) ३ किसी विषयके ध्यानकी दृढ़ता, खयालको पाबन्दी।}}
{{outdent|एकचित्तता (सं॰ स्त्री॰) ध्यानकी दृढ़ता, खयालकी जमावट।}}
{{outdent|एकचिन्तन (सं॰ त्रि॰) एक ही विषयकी चिन्ता रखनेवाला, जिसे दूसरी बातका खयाल न रहे।}}
{{outdent|एकचूर्णि (सं॰ पु॰) एक मुनि। यह तैत्तिरीय यजुर्वेदके भाष्यकर्त्ता थे। सायणाचार्यने अपने बनाये वेदके भाष्यमें एकचूर्णिका नाम लिखा है।}}
{{outdent|एकचेतः (सं॰ त्रि॰) अभिन्नहृदय, एकदिल।}}
{{outdent|एकचोदन (सं॰ क्ली॰) एक वचनका वर्णन, अकेलेकी बात। (त्रि॰) २ एक नियमपर आश्रित, जो एक ही कायदे पर टिका हो।}}
{{outdent|एकचोबा (हिं॰ पु॰) एक ही चोबका खौमा, जो डेरा एक ही खंभेके सहारे खड़ा हो।}}
{{outdent|एकच्छाय (सं॰ त्रि॰) एका अविच्छिन्ना छाया आच्छादनं यत्र, बहुव्री॰। एक आच्छादनविशिष्ट, सिर्फ साया रखनेवाला, जो बिलकुल धुंधला हो।}}
{{outdent|एकच्छाया (सं॰ स्त्री॰) अधमर्णका सादृश्य, कर्जदारकी बराबरी।}}
{{block center|<poem>
"एकच्छाया प्रविष्टानां दाप्यौ यस्तत दृश्यते।" {{smaller|( कात्यायन )}}
</poem>}}
{{outdent|एकछत्र (सं॰ त्रि॰) १ एक ही छत्र रखनेवाला, जिसके दूसरा मालिक न रहे। (अव्य॰) २ अभिन्न शासनसे, अकेली हुकूमत पर। (पु॰) ३ अनन्य शासन, पूरी हुकूमत।}}
{{outdent|एकज (सं॰ त्रि॰) एकस्मात् जायते, एक-जन-ड। १ एक हीसे उत्पन्न, जो एक हीसे पैदा हो। २ अकेला उत्पन्न होनेवाला, जो दूसरेके साथ पैदा न हो।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
३ एकाकी बढ़नेवाला, जो अकेला ही उगता हो। ४ अपने प्रकारका अकेला, जो अपनी किस्ममें निराला हो। ५ एकप्रकार, जो दूसरी किस्मका न हो। (पु॰) ६ शूद्र। ७ राजा।
{{outdent|एकजटा (सं॰ स्त्री॰) एका एकसंख्याका मुख्या वा जटा यस्याः, बहुव्री॰। १ उग्रतारा। ध्यानमें इनकी मूर्त्ति चतुर्भुज और कृष्णवर्ण वर्णित है। मुण्डमाला ही आभूषण है। दक्षिण हस्तद्वयके मध्य ऊर्द्धहस्तमें खड्ग और अधोहस्तमें इन्दीवर विद्यमान है। वामहस्तद्वयमें कर्त्तरी एवं खर्पर है। मस्तक पर गगनस्पर्शी एक जटा खड़ी है। मस्तक एवं गलदेशमें मुण्डकी माला पड़ी है। वक्षःदेशपर सर्पका हार है। नयन आरक्त हैं। कटिदेशपर व्याघ्रचर्म और कषावस्त्र पहने हैं। वामपद शवके हृदय और दक्षिण पद सिंहके पृष्ठपर विन्यस्त है। यह अट्टहास किया करती हैं। गर्ज्जन भीषण और मूर्त्ति भयंकर है। इनकी अष्ट योगिनियोंके नाम यह हैं—महाकाली, रुद्राणी, उग्रा, भीमा, घोरा, भ्रामरी, महारात्रि और भैरवी।}}
<div style="text-align: right;">{{smaller|( कालिकापु॰ ६१ अ॰ )}}</div>
नेपालके बौद्ध इन्हीं देवीको एकजटा-आर्य्यतारा-देवीके नामसे पूजते हैं। बौद्ध ग्रन्थमें यह बात लिखी, कि अवलोकितेश्वरने वज्रपाणि बोधिसत्वसे एकजटा देवीकी पूजा कही थी। {{smaller|( ताराष्टोत्तरशतनामस्तोत्र )}}
२ रावण द्वारा नियुक्ता एक विकटाकार राक्षसी।
<div style="text-align: right;">{{smaller|( रामायण ४।२३।५ )}}</div>
{{outdent|एकजटा कामदेव (सं॰ पु॰) उत्कल देशके गङ्गवंशीय एक राजा। यह गङ्गेश्वरके पुत्र और गङ्गवंशीय प्रथम राजा चोड़गङ्गके पौत्र रहे। गङ्गेश्वर किसी कार्यसे महापापमें लिNormally I can help with things like this, but I don't seem to have access to that content. You can try again or ask me for something else.<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकचक्रा—एकचारी'''|'''४५५'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
आजकल आरामें लोग कहते, कि पञ्चपाण्डव जननी कुन्तीके साथ उसी स्थानमें जा कर रहे। वहां वक राक्षसका वास स्था, जिसे भीमने मार डाला। सुतरां इस स्थानको महाभारतोक्त एकचक्रा नगरी-जैसा समझ सकते हैं। यह प्रवाद बहुकालसे सुनते—विशेषतः पहले यहां नरमांसभक्षक राक्षस रहते थे। चीना परिव्राजककी वर्णना पढ़नेसे यह बात समझ पड़ती है।
वर्त्तमान आराका दूसरा प्राचीन नाम चक्रपुर है। इसके पार्श्वपर ही बकरी नामक एक क्षुद्र ग्राम पड़ता है। यहांके लोगोंको विश्वास है—इसी बकरी ग्राममें वक राक्षस रहता था। महाभारतमें भी लिखा—एकचक्राके निकट वक राक्षसका वास रहा।
{{block center|<poem>
"समीपे नगरस्यास्य वको वसति राक्षसः।" {{smaller|(आदिपर्व १६०।३)}}
</poem>}}
यहां ब्राह्मण कहा करते—भीम मङ्गलवारके दिन वक राक्षसको मार चक्रपुर लाये थे। इसीसे चक्रपुरका नाम आरा* पड़ गया।
महाभारतके पाठसे समझा गया, कि एकचक्रा नगरीसे अनतिदूर वेत्रकीयगृह नामक एक नगर रहा—
{{block center|<poem>
"वैत्रकीयगृहे राजा नायं नयमिवाश्रितः।
उपायं तं न कुरुते यद्यपि स मन्दधीः॥
अनामयं जनस्यास्य येन स्यादद्य शाश्वतम्।
स दृष्ट वयं नूनं वसामो दुर्बलस्य वै॥
विषये नित्यमुद्दिग्नाः कुराजानमुपाश्रिताः।
ब्राह्मणाः कस्य वासव्याः कस्य वा कन्दचारिणः॥"
<div style="text-align: right;">{{smaller|( आदि १६२।९-११ )}}</div>
</poem>}}
इस नगरसे अनतिदूर वेत्रकीयगृहमें एक राजा रहते हैं। वह नहीं समझते—न्याय किसको कहते हैं। वह नितान्त अबोध हैं। इस नगरपर उनका कुछ भी यत्न नहीं। वह ऐसी कोई चेष्टा भी नहीं करते, जिससे हमारा भला हो। हम अनामयके पात्र हैं। किन्तु अकर्मण्य दुर्बल राजाके राजत्वमें पड़ हम सर्वदा ही उद्विग्न रहते हैं। नतुवा ब्राह्मणोंको क्या किसीकी बात सुनना और किसीके इच्छाधीन बन चलना पड़ता है ?
<hr style="width:50%; text-align:left; margin-left:0;">
{{smaller|* आरा शब्द मङ्गलवारका एक नाम है।}}
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
उक्त वर्णना पढ़नेसे समझते—महाभारतके समय एकचक्रा नगरी वेत्रकीयगृहवाले राजाके अधिकारमें रही, पीछे वक राक्षस उसे दबा बैठा।
वर्त्तमान आरा नगरसे दक्षिण-पूर्व ५।७ कोस दूर 'विता' या 'वेता' नामक एक अतिप्राचीन क्षुद्र ग्राम है। यह ग्राम भगवान्गञ्जके ठीक उत्तर पार्श्वपर पुनपुन नदी किनारे अवस्थित है। यहां प्राचीन बौद्ध स्तूपका निदर्शन मिलता है। (Archæological Survey of India, Rept. Vol. VIII p. 19.) बोध होता—बौद्धोंके अभ्युत्थानसे पहले यहां हिन्दू राजाओंका राजत्व रहा। यह 'विता' या 'वेता' ग्राम ही महाभारतोक्त वेत्रकीयगृह-जैसा समझ पड़ता है। इससे थोड़ी दूर पुनपुन नदी है। अपर पारपर आराके निकट दूसरा विता ग्राम है। इससे अनुमान लगता—प्राचीन वेत्रकीय राज्य पुनपुन नदीके पूर्वपारसे वर्त्तमान आरा नगर तक विस्तृत था।
{{outdent|एकचत्वारिंश (सं॰ त्रि॰) इकतालीसवां, जो इकतालीस की जगह पड़ता हो।}}
{{outdent|एकचत्वारिंशत् (सं॰ वि॰) इकतालीस, चार दहाई और एक इकाई रखनेवाला, ४१।}}
{{outdent|एकचर (सं॰ पु॰) एकः सन् चरति, एक-चर पचाद्यच्। १ गण्डक, गैंड़ा। २ सर्पादि हिंस्रक जन्तु, सांप वगैरह खूंखार जानवर। (त्रि॰) ३ एकाकी विचरण करनेवाला, जो अकेला घूमता हो। ४ एक ही अनुचर रखनेवाला, जिसके दूसरा साथी न रहे। ५ साथ-साथ चलनेवाला। ६ यूथचारी, गोलमें रहनेवाला।}}
{{outdent|एकचरण (सं॰ पु॰) एकश्चरणो यस्य, बहुव्री॰। १ एकपदविशिष्ट मनुष्य, एक पैरका आदमी। २ जनपदविशेष, एक बसती। (त्रि॰) ३ एकपदविशिष्ट, एक पैरवाला।}}
{{outdent|एकचर्या (सं॰ स्त्री॰) एकस्य चर्या, चर भावे क्यप्-टाप्। एकाकी गमनकी अवस्था, अकेले चलनेकी हालत।}}
{{outdent|एकचारी (सं॰ त्रि॰) एकः सन् चरति, एक-चर-णिनि। १ एकाकी विचरण करनेवाला, जो अकेला}}
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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AMAN KUMAR
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४५४'''|'''एककोष्ठि—एकचक्रा'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
इससे शरीर कृष्ण और अरुण पड़ जाता है। एककुष्ठ असाध्य होता है। {{smaller|( सुश्रुत )}}
{{outdent|एककोष्ठि (सं॰ त्रि॰) एककोष्ठ चूर्णमय आधार पर अवस्थान करनेवाला, जो एक ही कोठेमें रहता हो। शिरःपदी, कटल मत्स्य, अर्गोनट, वेलेम, नाइट, अक्टोपस प्रभृति प्राणी एककोष्ठि हैं।}}
{{outdent|एकक्षौर (सं॰ क्ली॰) एक ही धात्रीका दुग्ध, उसी अन्ना वगैरहका दूध।}}
{{outdent|एकगम्य (सं॰ त्रि॰) एकत्वेन गम्यः, एक-गम-यत्। एकमात्र लभ्य, अकेला मिलनेवाला। २ एकमात्र निर्विकल्पक ज्ञान द्वारा प्राप्त होनेवाला।}}
{{outdent|एकागाछी (हिं॰ स्त्री॰) केवल एक वृक्षद्वारा निर्मित नौका, जो नाव एक ही पेड़से बनी हो।}}
{{outdent|एकगुरु (सं॰ पु॰) एको गुरुर्यस्य, बहुव्री॰। सतीर्थ, एक ही उस्तादका शागिर्द।}}
{{outdent|एकगुरुख, {{smaller|एकगुरु देखो।}}}}
{{outdent|एकग्राम (सं॰ पु॰) एकश्चासौ ग्रामश्चेति, कर्मधा॰। अभिन्न ग्राम, वही गांव।}}
{{outdent|एकग्रामीण (सं॰ त्रि॰) एकस्मिन् ग्रामे भवन्, एक-ग्राम-खञ्। एक ही ग्रामका अधिवासी, जो उसी गांवमें रहता हो।}}
{{outdent|एकग्रामीय (सं॰ त्रि॰) एक-ग्राम-छ। गहादिभ्यश्च। पा ४।२।१३८। एकग्रामवासी, उसी गांवका बाशिन्दा।}}
{{outdent|एकचक्र (सं॰ क्ली॰) एकं चक्रं यस्य, बहुव्री॰। १ हरिगृह वा शुभ्रपुरी नामक एक पुरी।}}
{{block center|<poem>
"एकचक्रं हरिगृहं शुभ्रपुर्य्यं वसन्ति।" {{smaller|( त्रिकाण्डशेष २।१।१२ )}}
</poem>}}
यहां हरिगृह और शुभ्र एकचक्रका पर्याय-जैसा गृहीत हुआ है।
अध्यापक विलसन प्रभृति कुछ पाश्चात्य पण्डितोंके मतसे शुभ्र (एकचक्रा)-का वर्त्तमान नाम सम्बलपुर है। किन्तु यह बात ठीक नहीं। वर्त्तमान सम्बलपुर महाभारतकी एकचक्रा नगरी कैसे हो सकता है !
<div style="text-align: right;">{{smaller|एकचक्रा देखो।}}</div>
(त्रि॰) २ एकाकी विचरण करनेवाला, जो अकेले घूमता हो। ३ एकमात्र राजविशिष्ट, जो उसी सल्तनतमें हो। (पु॰) ४ सूर्य देवका रथ। ५ एक
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
असुर। महाभारतमें इस असुरका नाम प्रतिविन्ध्य लिखा है। {{smaller|( भारत, सभा ६७।२२ )}}
{{outdent|एकचक्रवर्त्तिता (सं॰ स्त्री॰) एक चक्रवर्त्तिनो भावः, एक-चक्रवर्त्तिन्-तल्। समग्र पृथिवीका शासनकर्त्तृत्व, कुल ज़मीन की सल्तनत। भूमण्डलके एकचक्रकी तरह राजत्व करनेका भाव वा धर्म एकचक्रवर्त्तिता कहलाता है।}}
{{outdent|एकचक्रवर्त्ती (सं॰ पु॰) समग्र पृथिवीका शासनकर्त्ता, तमाम मुल्कका बादशाह।}}
{{outdent|एकचक्रा (सं॰ स्त्री॰) महाभारतोक्त एक प्राचीन नगर। जतुगृहदाहके बाद पञ्च पाण्डव कुन्तीको ले गुप्त भावसे गङ्गा तीर गये थे। वहांसे नौकापर बैठ वह गङ्गा पार हुये और क्रमागत दक्षिणाभिमुख चलने लगे। फिर वह एक गभीर अरण्यमें पहुंचे थे। इसी वनमें भीमने हिड़िम्ब नामक राक्षसको मारा। उसके बाद नाना स्थान अतिक्रम कर पञ्चपाण्डव व्यासदेवकी आज्ञासे एकचक्रा नगरीमें राक्षसके घर जा बसे। {{smaller|( भारत, आदि १५८—१५७ अ॰ )}}}}
अब देखना चाहिये—एकचक्रा कहां है। एकचक्रा नगरी पर बहुत दिनसे गड़बड़ उठ रहा है। कुछ बङ्गाली कहते—एकचक्रा मेदिनीपुर ज़िलेमें गढ़वैता ग्रामके निकट रही, जहां आज भी वक राक्षसकी हड्डी पड़ी है। फिर पश्चिमाञ्चलके लोग इस नगरीकी अवस्थिति शाहाबाद जिलेमें बताते हैं। मीमांसा करना आवश्यक आता, किसका मत प्रकृत देखाता है।
चीना परिव्राजक युअन् चुयङ्गने अपने भ्रमण-वृत्तान्तमें लिखा, कि गाज़ीपुर ( चेन चु ) से महासार ( मो-हो-स लो ) नामक ग्रामको उनका जाना हुआ था। इस ग्रामके आगे पहुंच कर उन्होंने सुना—यहां पहले एक नरभोजी राक्षस रहा, जिसके उत्पातसे सबको विपद्ग्रस्त होना पड़ा; बुद्धदेवने फिर उसे शासन किया।
उक्त महासार ग्रामका वर्त्तमान नाम मासार है। वह शाहाबाद जिलेमें आरा नगरके निकट अवस्थित है। अतएव सहज ही अनुमान करते, कि चीना परिव्राजक महासार ग्रामसे आरा नगर पहुंचे थे।
</div>
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एंडुवा—एककुष्ठ'''|'''४५३'''}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
म्बर, फरवरी और मई में एंड़ी अच्छा रेशम देती है। किन्तु एंड़ीकी अपेक्षा मूंगेका रेशम बढ़िया होता है। २ अंडी, एंड़ीका रेशम। इस रेशमकी बनी चद्दरको भी अंडी ही कहते हैं।
{{outdent|एंडुवा (हिं॰ पु॰) बोझके नीचे रखनेकी तकिया, गेंड़ुरी। मज़दूर बोझ शिरपर लादते समय इसे नीचे रख लेते हैं। एंडुवा शिरकी रक्षा करता है। इससे बोझ हलका मालूम पड़ता और शिर कम दुखता है।}}
{{outdent|एक (सं॰ त्रि॰-सर्व॰) एतीति, इण्-कन्। इणभीकापाशल्यतिमर्चिभ्यः कन्। उण् ४।४३। १ प्रधान, खास, बड़ा। २ अन्य, दूसरा। ३ केवल, अकेला। ४ आदि, अव्वल। ५ अद्वितीय, निराला। ६ सत्य, सच्चा। ७ समान, बराबर। ८ अल्प, थोड़ा। ९ प्रथम, पहला। १० कोई। ११ एकसंख्याविशिष्ट, जो एक ही अददका हो।}}
{{block center|<poem>
"एक अण्डा वह भी गन्दा।"
एक पन्थ दो काज।"
"एक ही थैलीके चट्टे बट्टे।" {{smaller|( लोकोक्ति )}}
</poem>}}
(पु॰) १२ परमेश्वर। १३ विष्णु। १४ ऐलवंशीय एक राजा। {{smaller|( भागवत ९।१४।२ )}} १५ अग्नि। १६ सूर्य। १७ देवराज। १८ यम।
परमात्मा, विधु, क्षिति, शशिशब्दन्त और शुक्रचक्षु एकसंख्याबोधक शब्द हैं।
{{outdent|एकांग (हिं॰ वि॰) एकाकी, अकेला।}}
{{outdent|एकांगा (हिं॰ वि॰) एकां दिक्स्थ, जो एक ही ओर हो।}}
{{outdent|एकांगी (हिं॰ स्त्री॰) यष्टिका विशेष, एक लाठी। यह लट्ठदार होती है। लम्बाई ४।५ हाथ रहती है। पकड़नेके लिये मुठिया लगा दी जाती है। एकांगीसे लकड़ी खेलते हैं। यह मार और बचाव दोनों काम आती है। एकांगी एक प्रकारका बड़ा गदका है।}}
{{outdent|एकंड़िया (हिं॰ वि॰) १ एक अण्डयुक्त, जो एक ही गांठका हो। (पु॰) २ एक अण्डकोषयुक्त अश्व वा वृषभ, जिस बैल या घोड़ेके एक ही फोता रहे। ३ एक गांठका लहसुन।}}
{{outdent|एकंत (हिं॰) {{smaller|एकान्त देखो।}}}}
Vol. III. 114
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|एकक (सं॰ त्रि॰) एक-कन्। असहाय, अकेला, जिसके साथी न रहे।}}
{{block center|<poem>
"विधिरेककचक्रचारिणम्।" {{smaller|( नैषध २।३६ )}}
</poem>}}
{{outdent|एककन्द (सं॰ पु॰) पानीयालुक, कन्दशाक।}}
{{outdent|एककपाल (सं॰ त्रि॰) एक ही पात्रमें रहनेवाला, जो एक ही बरतनमें हो।}}
{{outdent|एककर (सं॰ त्रि॰) एकं करोतीति, एक-कृ-ट। दिवाविभानिशेति। पा ३।२।२१। एकमात्रकारक, अकेला करनेवाला।}}
{{outdent|एककर्ण—भारतवर्षके अन्तर्गत जनपदविशेष। उत्तर-पश्चिम सीमान्तमें अवस्थित है। {{smaller|(मत्स्य ११०।४५,मार्क॰ ५८।३७)}}}}
{{outdent|एककर्मकारक, {{smaller|एककर्मकारी देखो।}}}}
{{outdent|एककर्मकारी (सं॰ त्रि॰) एकं कर्म करोतीति, एक-कर्म-कृ-णिनि। एक कार्यकारक, हमपेशा, एक ही काम करनेवाला।}}
{{outdent|एककार्य्य (सं॰ त्रि॰) एकं समानं कार्य्यं यस्य, बहुव्री॰। १ समानकार्यकारक, वही काम करनेवाला। (क्ली॰) २ प्रधान कर्म, वही काम।}}
{{outdent|एककाल (सं॰ पु॰) एकश्चासौ कालश्च, कर्मधा॰। १ एक समय, समकाल, वही वक्त। (अव्य॰) २ एक ही समय पर, एकबारगी।}}
{{outdent|एककालभोजन (सं॰ क्ली॰) किसी नियत समय एक ही बारका भोजन, जो खाना किसी मुकरर वक्तपर एक ही मरतबा खाया जाता हो।}}
{{outdent|एककालोक (सं॰ त्रि॰) १ केवल एक बार होनेवाला, जो सिर्फ एक ही मरतबा पड़ता हो। २ दिनमें एक बार होनेवाला, जो रोज़ एक मरतबा गुज़र जाता हो।}}
{{outdent|एककालीन (सं॰ त्रि॰) एककाल-खञ्। १ समकालीन, हम्-असर। २ एक ही समय उत्पन्न होनेवाला, जो उसी वक्त पैदा हो।}}
{{outdent|एककालोनता (सं॰ स्त्री॰) एककालीन-तल्। समकालीन भाव वा धर्म, हम-असरी।}}
{{outdent|एककुण्डल (सं॰ पु॰) एकं कुण्डलं यस्य, बहुव्री॰। १ बलराम। २ कुवेर। ३ शेषनाग।}}
{{outdent|एककुष्ठ (सं॰ क्ली॰) क्षुद्रकुष्ठभेद, एक मामूली कोढ़।}}
</div>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४५३
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AMAN KUMAR
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<noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४५२'''|'''ए—एंड़ी'''|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
नासिक और निरनुनासिक भेदसे द्विविध, फिर उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित भेदसे त्रिविध रहता है। कामधेनुतन्त्रके मतसे ऌकार पूर्णचन्द्रतुल्य, पञ्चदेव एवं प्राणात्मक, तीन गुण तथा तीन विन्दु विशिष्ट, चतुर्वर्गप्रद और परम कुण्डली है। इसकी लिखनप्रणालीमें रेखा ह्रस्व ऌकारके क्रोड़ तुल्य लगती है। इस रेखाको वैष्णवी कहते हैं। फिर इस रेखामें दुर्गा, वाणी और सरस्वती रहती हैं। (वर्णोद्धारतन्त्र) तन्त्रशास्त्रोक्त नाम कमला, हर्षा, हृषीकेश, मधुव्रत, सूक्ष्मा, कान्ति, वामगण्ड, रुद्र, कामोदरी, सुरा, शान्तिकृत्, स्वस्तिका, शक्र, मायावी, लोलुप, वियत्, कुणसौ, सुस्थिर, माता,
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
नीलपीत, गजानन, कामिनी, विखपा, काल, नित्या, शुभ, शुचि, कृती, सूर्य, धैर्याकर्षिणी, एकाकी और दनुजप्रसू है।
पाणिनि ऌकारका दीर्घत्व नहीं मानते। किन्तु वार्त्तिक सूत्रके अनुसार आवश्यक स्थलपर ऌकारके स्थानमें ऌकार लगा लेना पड़ता है। "ऌ ति ऌ वा।" (वार्त्तिक) इसलिये तन्त्र और मुग्धबोध-व्याकरणमें स्वीकृत ऌकार विरुद्ध नहीं ठहरता।
(अव्य॰) २ देवनारी। ३ नार्याज्ञा। ४ माता। (स्त्री॰) ५ दैत्यस्त्री। ६ दनुजमाता। ७ कामधेनुमाता। (पु॰) ८ सर्व। ९ महादेव।
</div>
{{Multicol-end}}
<div style="text-align: center; font-size: 300%;">'''ए'''</div>
{{Multicol|line=1px solid black}}
<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ए—१ स्वरवर्णका एकादश अक्षर। इसके उच्चारणका स्थान कण्ठ और तालु है। एकार दीर्घ एवं प्लुत तथा अनुनासिक एवं निरनुनासिक भेदसे द्विविध और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित भेदसे त्रिविध होता है। कामधेनुतन्त्रके मतसे यह परम, दिव्य, ब्रह्मविष्णु-शिवात्मक, रङ्गिणी-कुसुमतुल्य, पञ्चदेवमय, पञ्चप्राणात्मक, विन्दुत्रयविशिष्ट, चतुर्वर्गप्रद और परम कुण्डली है। लिखनकी प्रणालीमें वामदिक्से एक कुञ्चित रेखा दक्षिण दिक्को जा अधोगत पड़ती, फिर वहांसे वाम दिक्को चलती है। इस रेखामें अग्नि, महादेव और वायु रहते हैं। (वर्णोद्धारतन्त्र) एकारका तन्त्रशास्त्रोक्त नाम वास्तव, शक्ति, त्रिकूटा, सोठ, भग, मरुत्, सूक्ष्मा, भूत, अर्द्धकेशी, ज्योत्स्ना, अदा, प्रमर्द्दन, भय, ज्ञान, ऊषा, घोरा, जृम्भा, सर्वसमुद्भव, वह्नि, विष्णु, भगवती, कुण्डली, मोहिनी, वस, योषित्, आधारशक्ति, त्रिकोणा, ईश, सन्धि, एकादशी, भद्रा, पद्मनाभ और कुलाचल है। वीजवर्णाभिधानमें वामगण्डान्त, मोक्षवीज, विजया और ओष्ठ कई नाम अधिक लिखे हैं। शिक्षाके अनुसार यह सन्धिका अक्षर लगता और अकार तथा इकार मिलनेसे बनता है।}}
२ धातुका अनुबन्ध विशेष। "एः सिचि वृद्धिः।"
{{smaller|( कविकल्पद्रुम )}}
(अव्य॰) ३ स्मृति, याद। ४ असूया, नाखुशी।
</div>
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
<div style="text-align: justify;">
५ अनुग्रह, मेहरबानी। ४ आमन्त्रण, न्योता, बुलावा। ५ आह्वान, पुकार।
(पु॰) एति प्राप्नोति सर्वं विश्वम्, इण्-अच्। ६ विष्णु।
(हिं॰ सर्व॰) ७ यह।
{{outdent|एंच (हिं॰ स्त्री॰) १ न्यूनता, कमी। २ विलम्ब, देर। ३ जमीन्दारोंके असामदनी देनेका महाजनी नियम।}}
{{outdent|एंचना (हिं॰ क्रि॰) १ रेखा निर्माण करना, सतर खींचना। २ लिखना, खींच देना। ३ निकालना। ४ फांसी देना। ५ शुष्क करना, सुखाना। ६ लेना। ७ रखना। ८ लगाना।}}
{{outdent|एंचपेंच (हिं॰ पु॰) १ आवर्त्त, हेरफेर। २ वक्रगति, टेढ़ी चाल।}}
{{outdent|एंचाताना (हिं॰ वि॰) वक्रदृष्टि, तिरछा देखनेवाला।}}
{{block center|<poem>
"सौपर फुला हज़ार पर काना सवा लाखपर एंचाताना।"
</poem>}}
<div style="text-align: right;">{{smaller|( लोकोक्ति )}}</div>
{{outdent|एंचातानी (हिं॰ स्त्री॰) १ युद्ध, लड़ाई। २ कठिनता, मुश्किल। ३ खींचखांच, धर-पकड़।}}
{{outdent|एंड, {{smaller|एड देखो।}}}}
{{outdent|एंडाबेंड़ा (हिं॰ वि॰) ऊंचनीच, उलटपुलट।}}
{{outdent|एंड़ी (हिं॰ स्त्री॰) कीट विशेष, एक कीड़ा। यह रेशमका कीड़ा एरण्डके पत्र भक्षण करता है। पूर्वबङ्ग तथा आसाम इसका निवासस्थान है। नव-}}
</div>
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<div style="text-align: justify;">
नासिक और निरनुनासिक भेदसे द्विविध, फिर उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित भेदसे त्रिविध रहता है। कामधेनुतन्त्रके मतसे ऌकार पूर्णचन्द्रतुल्य, पञ्चदेव एवं प्राणात्मक, तीन गुण तथा तीन विन्दु विशिष्ट, चतुर्वर्गप्रद और परम कुण्डली है। इसकी लिखनप्रणालीमें रेखा ह्रस्व ऌकारके क्रोड़ तुल्य लगती है। इस रेखाको वैष्णवी कहते हैं। फिर इस रेखामें दुर्गा, वाणी और सरस्वती रहती हैं। (वर्णोद्धारतन्त्र) तन्त्रशास्त्रोक्त नाम कमला, हर्षा, हृषीकेश, मधुव्रत, सूक्ष्मा, कान्ति, वामगण्ड, रुद्र, कामोदरी, सुरा, शान्तिकृत्, स्वस्तिका, शक्र, मायावी, लोलुप, वियत्, कुणसौ, सुस्थिर, माता,
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नीलपीत, गजानन, कामिनी, विखपा, काल, नित्या, शुभ, शुचि, कृती, सूर्य, धैर्याकर्षिणी, एकाकी और दनुजप्रसू है।
पाणिनि ऌकारका दीर्घत्व नहीं मानते। किन्तु वार्त्तिक सूत्रके अनुसार आवश्यक स्थलपर ऌकारके स्थानमें ऌकार लगा लेना पड़ता है। "ऌ ति ऌ वा।" (वार्त्तिक) इसलिये तन्त्र और मुग्धबोध-व्याकरणमें स्वीकृत ऌकार विरुद्ध नहीं ठहरता।
(अव्य॰) २ देवनारी। ३ नार्याज्ञा। ४ माता। (स्त्री॰) ५ दैत्यस्त्री। ६ दनुजमाता। ७ कामधेनुमाता। (पु॰) ८ सर्व। ९ महादेव।
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<div style="text-align: center; font-size: 300%;">'''ए'''</div>
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<div style="text-align: justify;">
{{outdent|ए—१ स्वरवर्णका एकादश अक्षर। इसके उच्चारणका स्थान कण्ठ और तालु है। एकार दीर्घ एवं प्लुत तथा अनुनासिक एवं निरनुनासिक भेदसे द्विविध और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित भेदसे त्रिविध होता है। कामधेनुतन्त्रके मतसे यह परम, दिव्य, ब्रह्मविष्णु-शिवात्मक, रङ्गिणी-कुसुमतुल्य, पञ्चदेवमय, पञ्चप्राणात्मक, विन्दुत्रयविशिष्ट, चतुर्वर्गप्रद और परम कुण्डली है। लिखनकी प्रणालीमें वामदिक्से एक कुञ्चित रेखा दक्षिण दिक्को जा अधोगत पड़ती, फिर वहांसे वाम दिक्को चलती है। इस रेखामें अग्नि, महादेव और वायु रहते हैं। (वर्णोद्धारतन्त्र) एकारका तन्त्रशास्त्रोक्त नाम वास्तव, शक्ति, त्रिकूटा, सोठ, भग, मरुत्, सूक्ष्मा, भूत, अर्द्धकेशी, ज्योत्स्ना, अदा, प्रमर्द्दन, भय, ज्ञान, ऊषा, घोरा, जृम्भा, सर्वसमुद्भव, वह्नि, विष्णु, भगवती, कुण्डली, मोहिनी, वस, योषित्, आधारशक्ति, त्रिकोणा, ईश, सन्धि, एकादशी, भद्रा, पद्मनाभ और कुलाचल है। वीजवर्णाभिधानमें वामगण्डान्त, मोक्षवीज, विजया और ओष्ठ कई नाम अधिक लिखे हैं। शिक्षाके अनुसार यह सन्धिका अक्षर लगता और अकार तथा इकार मिलनेसे बनता है।}}
२ धातुका अनुबन्ध विशेष। "एः सिचि वृद्धिः।"
{{smaller|( कविकल्पद्रुम )}}
(अव्य॰) ३ स्मृति, याद। ४ असूया, नाखुशी।
</div>
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<div style="text-align: justify;">
५ अनुग्रह, मेहरबानी। ४ आमन्त्रण, न्योता, बुलावा। ५ आह्वान, पुकार।
(पु॰) एति प्राप्नोति सर्वं विश्वम्, इण्-अच्। ६ विष्णु।
(हिं॰ सर्व॰) ७ यह।
{{outdent|एंच (हिं॰ स्त्री॰) १ न्यूनता, कमी। २ विलम्ब, देर। ३ जमीन्दारोंके असामदनी देनेका महाजनी नियम।}}
{{outdent|एंचना (हिं॰ क्रि॰) १ रेखा निर्माण करना, सतर खींचना। २ लिखना, खींच देना। ३ निकालना। ४ फांसी देना। ५ शुष्क करना, सुखाना। ६ लेना। ७ रखना। ८ लगाना।}}
{{outdent|एंचपेंच (हिं॰ पु॰) १ आवर्त्त, हेरफेर। २ वक्रगति, टेढ़ी चाल।}}
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अंजली राजभर
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<noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh|६६८|कण्ठाग्नि-कण्डन|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
वहिर्गमनोमु ख, कण्ठ में उपस्थित, बाहर निकल जानेवाला, जो गलमें आकर लग गया हो।
कण्ठाग्नि ( सं० पु०) कण्ठ कण्ठाभ्यन्तरे अग्निः पाचकाग्निः यस्य, बहुव्री०। पक्षी, चिड़िया। पक्षीका आहार गलाध:करणसे ही परिपाक हो जाता है।
कण्ठाभरण (सं० लो०) कण्ठे धार्य प्राभरणम्,मध्यपदलो०। १ गलदेशका अलङ्कार, गलेका ज़ेवर,हार माला । २ सरस्वतीकण्ठाभरणका संक्षिप्त नाम।
कण्ठार-स्वर्गभूमिके उत्तरका एक महाग्रामः। दुर्गाने दुर्गासुरका मस्तक काट पादके अङ्गुष्ठसे उसका कण्ठ इसी स्थानपर डाल दिया था। दुर्गासुरका कण्ठ यहां गिरनेसे ही इस स्थानका नाम कण्ठार पड़ा। कलिकालमें यहां भूमिहार और राजपूत जाति रहती है। राजपूतोंसे यवनोंका युद्ध होगा। कण्ठारवासी अपने ग्राममें भाग लगा पलायन करेंगे।
(भविष्य० ब्रह्मखण्ड ५६।३९-४१)
१ सिंह, शेर। २ मत्तहस्ती, मतवाला हाथो।
| ३ कपोत, कबूतर।
| कण्ठौरवो (सं० स्त्री० ) कण्ठोरव-डीए । वासक वृक्ष,
अड़ सेका पेड़।
कण्ठोल (स० पु०) क्रमेलक, अट।
कण्डोला (स. स्त्री०) पान विशेष, मटकी, मथनेका
बरतन।
कण्ठेकाल (स. पु.) कण्ठ कालः विषपानजो
नीलिमा यस्य, अलुक समा०। महादेव ।
कण्ठ खरतीर्थ (सं० लो०) तीर्थविशेष, एक पवित्र
। स्थान। .
कण्ठोक्त (सं० लो०) अपनी साक्षी, ज़ाती शहादत ।
कण्य (सं.वि.) कण्ठे भव:, कण्ठ शरीरावयव-
त्वात् यत्। यतोऽनावः । पा दा१।२१३ । १ गलदेशजात,
हलकसे निकलनेवाला। २ कण्ठोच्चारित, हलक से
बोला जानेवाला। अ, श्रा, क, ख, ग, घ और ह
कण्ठाल (स० पु०) कठि-बालच। १ शूरण, जमीं | अक्षर कण्ठसे उच्चारण किया जाता है। ३ कण्ठ-
कन्द। २ युद्ध, लड़ाई। ३ नौका, नाव। ४ खन्ता, स्वरके उपकारी, गलेकी आवाज़को फायदा पहुं.
खुरपी। ५ उष्ट्र, अंट। ६ गुण, रस्सी। ७ वृक्ष- चानेवाला।
विशेष, एक पेड़।
"यवकोलकुलत्थानां यूष: कख्योऽनिलापहा।” ( मुश्चत)
कण्ठालङ्कार ( पु.) कास, एक घास। . . कण्ठावर्ग (सं० पु.) कण्ठके लिये उपकारी कुछ
कंण्ठाला (सं० स्त्री०) कण्ठाल-टाप। १ जाल- औषध, हलकको फायदा पहुंचानेवाली जड़ो-
गोणिका, फांसको रस्सो। २ ब्राह्मणयष्टिका । बूटियोंका जखीरा। अनन्तमूल, इक्षुमूल, मधुक,
३ द्रोणिविशेष, मटकी।
पिप्पली, द्राक्षा, विदारी, कैटर्य, हंसपादी, बहती
कण्ठालु (स. स्त्री०) कण्ठ-पुङ्खा, गलफोंका। और कण्दकारिकाके समुदायको कण्ठयवर्ग कहते हैं।
२ त्रिपर्णी नामक कन्दशाक।
कण्ठावर्ण (सं० पु०) कण्ाश्चासौ वर्णश्चेति,
कण्ठावसक्त (स० वि०) कण्ठसे चिपटा हुआ, जो कर्मधा। कण्ठसे उच्चारण किया जानेवाला वर्ण,
गले लगा रहा हो।
जो हर्फ हलकसे निकलता हो। कण्डा देखो।
कण्ठिका (सं० स्त्री०) कण्ठो मूष्यतया अस्त्यस्याः, कण्ठास्वर (सं० पु०) कण्ठका खर, जो हफ-इल्लत
कण्ठ-ठन्-टाप। कण्ठाभरणविशेष, कण्ठो, गलेमें हलकसे निकलता हो। केवल प्रकार और प्राकार
पहनेको एकलड़ी छोटी माला।
हो कण्ठाखर होता है।
कण्ठी (स० स्त्री० ) कण्ठ अल्पार्थे ङोप। १ गलदेश, कण्डक (स• पु० ) कासामयविशेष, खांसोको एक
गुल। २ अखकण्ठ-वेष्टनरज्जु, अमाड़ी, घोड़ेके गलेमें | बीमारी। .
बंधनेवाली रस्मी। (त्रि.) ३ गलसम्बन्धीय, गलेसे कण्डन (सं० लो०) कडि भावे ल्य ट इदित्वात् मुम् ।
सरोकार रखनेवाला। (पु०) ४ कलाय, मटर। १.निस्तुषीकरण, छराई, कुटाई। २ तष, भसी,
कण्ठोरख (संपु०), कण्ठयां रखो यस्य, बहुव्री०।। अनाजका उतरा हुपा छिलका।<noinclude></noinclude>
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अंजली राजभर
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वहिर्गमनोमु ख, कण्ठ में उपस्थित, बाहर निकल जानेवाला, जो गलमें आकर लग गया हो।
कण्ठाग्नि ( सं० पु०) कण्ठ कण्ठाभ्यन्तरे अग्निः पाचकाग्निः यस्य, बहुव्री०। पक्षी, चिड़िया। पक्षीका आहार गलाध:करणसे ही परिपाक हो जाता है।
कण्ठाभरण (सं० लो०) कण्ठे धार्य प्राभरणम्,मध्यपदलो०। १ गलदेशका अलङ्कार, गलेका ज़ेवर,हार माला । २ सरस्वतीकण्ठाभरणका संक्षिप्त नाम।
कण्ठार-स्वर्गभूमिके उत्तरका एक महाग्रामः। दुर्गाने दुर्गासुरका मस्तक काट पादके अङ्गुष्ठसे उसका कण्ठ इसी स्थानपर डाल दिया था। दुर्गासुरका कण्ठ यहां गिरनेसे ही इस स्थानका नाम कण्ठार पड़ा। कलिकालमें यहां भूमिहार और राजपूत जाति रहती है। राजपूतोंसे यवनोंका युद्ध होगा। कण्ठारवासी अपने ग्राममें भाग लगा पलायन करेंगे।
<Small>{{right|(भविष्य० ब्रह्मखण्ड ५६।३९-४१)}}</small>
कण्ठाल (सं० पु०) कठि-बालच। १ शूरण, जमीं-कन्द। २ युद्ध, लड़ाई। ३ नौका, नाव। ४ खन्ता,खुरपी। ५ उष्ट्र, अंट। ६ गुण, रस्सी। ७ वृक्ष-विशेष, एक पेड़।
कण्ठालङ्कार ( सं० पु०) कास, एक घास।
कंण्ठाला (सं० स्त्री०) कण्ठाल-टाप। १ जाल- गोणिका, फांसको रस्सो। २ ब्राह्मणयष्टिका । ३ द्रोणिविशेष, मटकी।
कण्ठालु (सं० स्त्री०) कण्ठ-पुङ्खा, गलफोंका। २ त्रिपर्णी नामक कन्दशाक।
कण्ठावसक्त (सं० वि०) कण्ठसे चिपटा हुआ, जो गले लगा रहा हो।
कण्ठिका (सं० स्त्री०) कण्ठो मूष्यतया अस्त्यस्याः, कण्ठ-ठन्-टाप। कण्ठाभरणविशेष, कण्ठी, गलेमें पहनेको एकलड़ी छोटी माला।
कण्ठी (सं० स्त्री० ) कण्ठ अल्पार्थे ङोप। १ गलदेश,गुल। २ अखकण्ठ-वेष्टनरज्जु, अमाड़ी, घोड़ेके गलेमें बंधनेवाली रस्मी। (त्रि०) ३ गलसम्बन्धीय, गलेसे सरोकार रखनेवाला। (पु०) ४ कलाय, मटर।
कण्ठोरख (सं० पु०), कण्ठयां रखो यस्य, बहुव्री०।
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१ सिंह, शेर। २ मत्तहस्ती, मतवाला हाथो। ३ कपोत, कबूतर।
कण्ठौरवो (सं० स्त्री० ) कण्ठोरव-डीए । वासक वृक्ष, अड़ू सेका पेड़।
कण्ठोल (सं० पु०) क्रमेलक, ऊट।
कण्डोला (सं० स्त्री०) पान विशेष, मटकी, मथनेका बरतन।
कण्ठेकाल (सं० पु०) कण्ठ कालः विषपानजो नीलिमा यस्य, अलुक समा०। महादेव ।
कण्ठ खरतीर्थ (सं० लो०) तीर्थविशेष, एक पवित्र स्थान।
कण्ठोक्त (सं० लो०) अपनी साक्षी, ज़ाती शहादत ।
कण्य (सं० वि०) कण्ठे भव:, कण्ठ शरीरावयव-त्वात् यत्। <Small>यतोऽनावः । पा ६।१।२१३ ।</small> १ गलदेशजात, हलकसे निकलनेवाला। २ कण्ठोच्चारित, हलक से बोला जानेवाला। अ, आ, क, ख, ग, घ और ह अक्षर कण्ठसे उच्चारण किया जाता है। ३ कण्ठ- स्वरके उपकारी, गलेकी आवाज़को फायदा पहुंचानेवाला।
<Small>{{center|<poem>"यवकोलकुलत्थानां यूष: कख्योऽनिलापहा।” ( मुश्रुत)</poem>}}</small>
कण्ठावर्ग (सं० पु०) कण्ठके लिये उपकारी कुछ औषध, हलकको फायदा पहुंचानेवाली जड़ो- बूटियोंका जखीरा। अनन्तमूल, इक्षुमूल, मधुक, पिप्पली, द्राक्षा, विदारी, कैटर्य, हंसपादी, बहती और कण्दकारिकाके समुदायको कण्ठयवर्ग कहते हैं।
कण्ठावर्ण (सं० पु०) कण्ाश्चासौ वर्णश्चेति, कर्मधा। कण्ठसे उच्चारण किया जानेवाला वर्ण, जो हर्फ हलकसे निकलता हो। <Small>कण्डा देखो।</small>
कण्ठास्वर (सं० पु०) कण्ठका खर, जो हफ-इल्लत हलकसे निकलता हो। केवल प्रकार और प्राकार हो कण्ठाखर होता है।
कण्डक (सं० पु० ) कासामयविशेष, खांसोको एक बीमारी।
कण्डन (सं० लो०) कडि भावे ल्य ट इदित्वात् मुम् । १.निस्तुषीकरण, छराई, कुटाई। २ तष, भसी, अनाजका उतरा हुपा छिलका।<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२३
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2026-07-17T12:06:19Z
आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४८२|ओई—ओखल|}}
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{{outdent|ओई (हिं॰ स्त्री॰) वृक्षविशेष, एक दरख़्त।}}
{{outdent|ओक (सं॰ त्की॰) उच–क निपातनात् साधुः। १ गृह, घर। २ आश्रय, ठिकाना। (पु॰) ३ पक्षी, चिड़िया। ४ शूद्र, वृषल।}}
{{outdent|ओकः (सं॰ त्की॰) उच्यते समवैति अस्मिन्, उच–असुन्। १ आश्रय, ठिकाना। २ गृह, घर। ३ स्थान, मुक़ाम।}}
{{outdent|ओक्कान—१ निम्नब्रह्मदेशस्य पेगू प्रान्तके हन्तावाड़ी ज़िलेकी एक नदी। यह पेगू–योमा पर्वतसे निकल मागोनके समीप हलैंगमें जा गिरती है। ओक्कान नदी बहुत छोटी है। किन्तु वर्षा के समय ओक्कान ग्रामतक इसमें बड़ी–बड़ी नावें चल सकती है। साखू और दूसरी लकड़ीके इट्ठे इसमें बहाकर हलैंग पहुंचाये जाते हैं। २ निम्न् ब्रह्मके हन्तावाड़ी जिलेका एक ग्राम। यह हलैंग नदीसे ५ मील पश्चिम अवस्थित है। इसमें दो सराय पर दो वर्गाकार निर्मित बौद्ध मन्दिर हैं। सुननेमें आया, प्रायः ३०० वर्ष हुये किसी तैलङ्गने इसे बसाया था।}}
{{outdent|ओककेतु—बम्बई प्रान्तस्थ मालखेड़वाले राष्ट्रकूट राजावोंके छत्रका चिह्न। सिरूरके शिलालेखमें लिखते, कि अमोघवर्षके तीन राजच्छत्र रहे—शङ्ल, पालिध्वज और ओककेतु।}}
{{outdent|ओकण (सं॰ पु॰) केशकीट; जूं।}}
{{outdent|ओकणि (सं॰ पु॰) मत्कुण, खटमल।}}
{{outdent|ओक़ताई खान्—चङ्गीज़ खान्के बड़े लड़के। १२२७ ई॰को इन्हें अपने पिताके राज्य तातार और उत्तर–चीनका उत्तराधिकार मिला था। १२४२ ई॰को यह अधिक शराब पीनेसे मर गये। ओक़ताई खान् बड़े सहृदय रहे। यह अपनी प्रजाको निरपेक्ष भाव और न्यायसे शासन करते थे। इनकी वीरता और बुद्धिमत्ता प्रसिद्ध है। ओक़ताई खान् बड़े दानी थे। राज्यका उत्तराधिकार इनके पुत्र याक़ूब खान्को मिला।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|ओकना (हिं॰ क्रि॰) १ वमन करना क़ै निकालना। २ महिषवत् शब्द करना, भैंसकी तरह बोलना।}}
{{outdent|ओकनी (सं॰ सत्री॰) ओकणि देखो।}}
{{outdent|ओकपति (सं॰ पु॰) सूर्य वा चन्द्र, आफ़ताब या माहताब।}}
{{outdent|ओकरी (सं॰ स्त्री॰) राजगृह के अन्तर्गत एक प्राचीन ग्राम। भविष्यब्रह्मखण्ड में लिखा है—}}
कलियुगके मध्य यहां शस्यजीवी कृषक वास करेंगे। कलिकालमें ओकरीका नारीगण वेश्या और
द्विजगण वेश्यावृत्तिपरायण होगा। यहांके लोग पापके कारण सर्पाघातसे विनष्ट होंगे। {{smaller|(भ॰ ब्रह्मखण्ड ३२।५०–५२)}}
{{outdent|ओकाई (हिं॰ स्त्री॰) १ वमन, क़ै। २ वमनेच्छा, क़ै करनेकी ख़ाहिश।}}
{{outdent|ओकार (सं॰ पु॰) 'ओ', ओ अक्षर। {{smaller|ओ देखो।}}}}
{{outdent|ओकारान्त (सं॰ त्रि॰) अन्तमें ओकार रखनेवाला, जिसके अख़ीरमें 'ओ' रहे।}}
{{outdent|ओकिवस् (सं॰ त्रि॰) उच–व्कसु। समवेत, एकत्र, मिला हुआ।}}
{{outdent|ओकी, {{smaller|ओकाई देखो।}}}}
{{outdent|ओकुल (सं॰ पु॰) उच-उलच् निपातनात् साधुः। अर्धगन्ध, अपव्क गोधूम। वैद्यके मतसे यह गुरु, शुक्रवर्धक, मधुर, बलकारक, स्निग्ध, रुचिकारक, मत्ततावर्धक और रक्त एवं वायुनाशक होता है।}}
{{outdent|ओकोदनी (सं॰ स्त्री॰) ओक: आश्रयस्थानमदनं यस्याः, बहुव्री॰। मत्कुण, खटमल।}}
{{outdent|ओकोदशानी (सं॰ स्त्री॰) प्राचीर, दीवार।}}
{{outdent|ओक्कणी (सं॰ स्त्री॰) ओच–कण–अच्–ङीप्। मत्कुण, खटमल।}}
{{outdent|ओक्य (सं॰ त्रि॰) १ गृहवासीके निमित्त उत्तम, जो घरमें रहनेवालेके मुवाफ़िक हो। (त्की॰) २ प्रसन्नता, ख़ुशी। ३ सुविधाजनक स्थान, आराम देनेवाली जगह। ४ विश्रामागार, मकान्।}}
{{outdent|ओखद (हिं॰ स्त्री॰) औषध, दवा।}}
{{outdent|ओखरी, {{smaller|ओखली देखो।}}}}
{{outdent|ओखल (हिं॰ पु॰) १ ऊषर, पड़ती ज़मीन्। २ उदूखल, ओखली।}}<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कण्डनौ-कण्डून्घ|६६९}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
<Small>{{center|<poem>"क्रियां कुर्यात् भिषक् पश्चात् शलौतस्युलकखनैः।” ( सुश्चत)</poem>}}</small>
कण्डनी (सं० स्त्री०) कण्डाते तृषादिरपनीयते अनया, कडि करणे स्य ट इदित्वात् मुम्। उदूखल, ओखली।
कण्डरव्रण (सं० पु०) व्रणरोग, खुजली, खाज।
कण्डरा (सं० स्त्री०) कडि-अरन् इदित्वात् मुम् टाप च। १ महानाड़ी, बड़ी नन्। २ महानायु, मोटी रग। सर्वाङ्ग में १६ कण्डरा होती हैं। उनसे हस्त पद, ग्रीवा और पृष्ठदेशमें चार-चार रहती हैं। हस्त एवं पदगत कण्डरावोंकी प्रान्तसीमा नख, ग्रीवा तथा हृदय बन्धनीको अधोगत कण्डरावोंको प्रान्तसीमा मेद्र और पृष्ठनिबह कण्डरावोंको प्रान्तमीमा नितम्ब,
मस्तक, उरु, वच, अक्ष एवं स्तनपिण्ड है। <Small>(मुश्रुत)</small>कण्डरावों द्वारा शरीर आकुच्चन और प्रसारण किया जाता है। <Small>(भावप्रकाश)</small> बाहुपृष्ठसे अङ्गुलिपर्यन्त आने-वाली कण्डरावोंके वातसे पीड़ित होनेपर बाहुद्दयका कार्य बिगड़ जाता है। इस रोगका नाम विश्वाची है।
कण्डरीक (सं० पु०) सप्तजातिस्परके मध्य विप्र-विशेष। <Small>(हरिवंश)</small>
कण्डवल्ली ( सं० स्त्री०) काण्डवली, करेला।
कण्डाग्नि (सं० पु०) पक्षी, चिड़िया।
कण्डानक (सं० पु०) महादेवके एक अनुचर।
कण्डिका (सं० स्त्री०) कडि-ख ल-टाए। काण्ड, कण्डिका, वेदका एकदेश। अध्याय प्रपाठक प्रभृतिके अन्तर्गत ब्राह्मणवाक्यसमूहको कण्डिका कहते है।
कण्डोर (सं० पु०) १ लघुकारवेल, छोटा करेला । २ पीतमुह, पीली मोट।
कण्ड (सं० पु०) १ ऋषिविशेष। इनके पिताका नाम कण्ड रहा। विष्णुपुराणमें लिखा है, --'किसी समय कण्ड मुनिने गोमती किनारे उत्कट तपस्या आरम्भ की थी। इन्द्रने उससे भय भौत हो प्रलोचा नाम्नी अप्सराको उनका तपोभत करने भेजा। मुनि भी उसका रूपलावण्य और हावभाव देख मोहित हो गये थे। इन्होंने अपनी तपस्या छोड़ बहुकाल उसके
साथ एकत्र पतिवाहित किया। बहकाल बाद एक दिन सन्ध्याकालको कण्डुने सन्ध्यावन्दना करना चाहा। किन्तु प्रलोचाने इनकी बात सुन उपहास
</Small>Vol. III. 168{{gap}}{{gap}}
{{Multicol-break}}
किया था। उसीसे इनका मोह छट गया। इन्होंने फिर पुरुषोत्तमम अध्वबाहु हो तपस्या द्वारा मुक्ति पायी । (स्त्रो०) कण्ड यति शरीरम्, कण्ड-कु । <Small>मृग्वादवय</small> २ वायुजन्य कण्डूयादि, खुजली, खाज । ३ कर्णरोग-विशेष, कानको एक बीमारी। ४ शुकशिम्बो, केवांच।
कण्डक (सं० पु०) कण्ड-कन्। १ कण्टक, कांटा। २ कण्ड, खुजली। ३ किसी नापितका नाम ।
कण्डन, <small>कखून देखो।</small>
कण्डर (पु०) कण्ड राति ददाति, काह-रा-क पृषोदरादित्वात् हस्वः। <Small>भावोऽनुपसमें । पा ३।२।३।</small> १ कारवेललता, करेलेको वैल। २ कुन्दरण, कंद- रूकी वेल।
कण्डरा (सं० स्त्री०) कण्डर-टाप् । १ शूकशिम्बो, केवांच। २ कर्पूरक, शौरकन्द। ३ अत्यलपर्णी, एक बेल । इसकी पत्ती बहुत खट्टी होती है।
कण्डुला (सं० स्त्री० ) अत्यनपणों, बहुत खट्टो पति-योंको एक वेल।
कण्डुली, <small>कणुला देखो।</small>
कण्डू (सं० स्त्रो०) कण्डय सम्पदादित्वात् क्लिप अलोपो यलोपश्च। १ कण्डु, खुजली। २ क्षुद्र-क्षुद्र पिड़काविशेष, छोटी-छोटी फुनसो। इसका संस्कृत पर्याय--खजु, कण्ड्या , कण्डूति और कण्डूयन है।
<Small>चिकित्सा</small>--दूर्वा एवं हरिद्रा एकच पीसकर प्रलेप लगानेसे कण्ड, पामा, दह्न शीतपित्त प्रकृति रोग विनष्ट होते हैं। गुनाफल और सृङ्गराजके रसमें तेलको पका मलनेसे कण्ड, दारण, कुष्ठ और कालाप रोग मिट जाता है। हरिद्राखण्ड प्रभृति पौषध भी इस रोगपर विशेष उपकारी है। <Small>हरिद्राखस देखो।</small>
कण्डूक (सं० क्ली०) कण्ड खार्थे कन् । कण्ड, खुजली, खाज।
कण्डूकरी (सं० स्त्री०) कण्डौं करोति, कण्ड-क-ट-डीप् । शूकशिम्बो, खजोहरा।
कण्डका (सं० स्त्री०) काकतुण्डा, घुघची, रत्ती, चिरमिटी।
कण्डघ्न (सं० पु०) कण्ड हन्ति, कण्ड-हन्-ठक् । १ पारग्वध, अमलतास । २ गौरसर्षप, सफेद सरसों।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh|६७०|कण्डू प्रवर्ग-कण्व|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
कण्डघ्नवर्ग (सं० पु०) कण्डनानां वर्ग: समूहः, ६-तत् । कण्डू नाशकरनेवाली ओषधियोंका समूह,खाज मिटानेवाली जड़ीबूटियोंका जखीरा। चन्दन,वेणामूल, प्रारम्बध, करज, निम्ब, कुटज, सषेप, मौल,दारुहरिद्रा और मुस्तकके समूहको कण्डनवर्ग कहते हैं। <Small>(चरक)</small>
कण्डूति (सं० स्त्री०) कण्ड्य भावे तिन् अलोपो यलोपश्च। कण्डूयन, खुजली, खाज।
कण्डमका (सं० स्त्री०) कोटविशेष, एक कीड़ा। यह कृष्ण, सार, कुहक, हरित, रक्त, यववर्णाभ और भ्रकुटी पाठ प्रकारको होती है। इसके काटनेसे रोगीका प्रङ्ग पीतवर्ण पड़ और वमन, अतिसार,ब्जर प्रभृतिसे वह मर जाता है। <Small>(सुश्रुत )</small>
कण्डूमत् (सं० वि०) खुजलाते हुआ, जो खरोंच रहा हो।
कण्डू यन (सं० वि०) खुजलाते हुआ, जो रगड़ रहा हो।
कण्डू यन (सं० ली०) कण्ड य भावे ल्युट । १ कण्डू,खुजली खाज। <Small>“यन्म धनादि सहमधि सुखं हि तुच्छ' कल्यनेन करयोरिव दुःखदुःखम् ।” ( भागवत ७।९।५५)</small>
२ वष्यशृङ्ग, खुजलानेका औज़ार । गात्रमें कण्डू उपस्थित होनेपर दीक्षित इसीसे खुजलाया करते हैं।
कण्डू यनक (सं० वि०) कण्ड यन-खार्थे कन् । १ खुजलाते हुआ, जो रगड़ रहा हो। (पु०) २ खुज-लानेवाला।
कण्डर (सं० पु०) माणक, मानकच्छु।
कण्ड रा (सं० स्त्री०) कण्डू राति, कण्डू-रा-क-टाप् । शकशिम्बोलता, खजोहरा।
{{Multicol-break}}
कण्ड ल (सं० पु.) कण्ड अस्त्यर्थ लच् । १ कण्ड -
| कारक अोल प्रभृति, जमौंकन्द । (त्रि.) २ का
युक्ता, खाजसे भरा हुआ।
कण्डूला (सं० स्त्री०) अत्यन्त्रपर्णीलता, बेलका
| जौं कन्द।
कण्डोल (सं० पु०) कडि बाहुलकात् ओलच ।
१ वंशादि निर्मित धान्यरक्षक भाण्डार, बांस वगैरहसे
बना धान्य रखनेका पात्र । इसका संस्कृत पर्याय-
पिट, पिटक और पटक है। २ उष्ट्र, अंट। ३ गोणी-
भेद, किसी किस्मका बोरा। ४ गुजरातके खान
जिलेका एक पर्वत। यहां प्रतिप्राचीन देवमन्दिर
बना है।
कण्डोलक (सं० पु०) कण्डाल-खार्थे कन्। कण्डोल,
| बाँसका बना डोल।
कण्डोलवीणा (स.स्त्री०) कण्डोलइव वीणा कण्डो-
लस्या वीणा वा। चण्डालोंको वीणा, छोठा बोन ।
इसका संस्कृत पर्याय-चाण्डालिका, चण्डालवल्लको.
चण्डालिका और कटोलवीणा है।
।
कण्डोली (सं० स्त्री.) कण्डोलस्तहदाकारोऽस्त्यस्याः,
| कण्डोल अर्थ आदित्वात् अच्-डोष्। कण्डोलवीणा,
| छोटा बोन।
| कण्डोष (सं० पु०) कोषकार, झांझा, बूटका कोड़ा।
कण्डोध (स० पु०) कण्डनां ओघः समूहो यस्मात् ।
.| शूककोट, झांझा।
कख (स. क्लो०) कण्यते अपोद्यते, कण-वन् ।
कण्ह यना (सं० स्त्री०) कण्ड ति, खुजलो। १पाप, इजाब। (पु.) २ भूतयोनिविशेष, किसी
कण्डयनी (सं. स्त्री०) कृष्णशृङ्ग, खुजलानेको कूची। किस्मका शैतान्। ३ मुनिविशेष। यह घोरके पुत्र
कण्ड यमान (सं० वि०) खुजलानेवाला, जो खरोंच | और अङ्गिरसगोत्रसम्म त रहे। ऋक्संहिताका अष्टम
रहा हो।
अष्टक इनके नामसे प्रसिद्ध है। यह यजुर्वेदीय कख
कण्ड या (स. स्त्री०) कण्ड -यक्-अ-टाप् । कण्ड, शाखाके प्रवर्तक थे।
खुजली।
वेदमें दूसरे भी अनेक कखोंका नाम मिलता है-
कण्ड यित (स.ली.) कण्ड यन, खुजली। कखनाषद, कखश्रीयश और कखकाश्यप । यह
कण्ड यिट (संवि.) खुजलानेवाला।
सभी कण्खवंशीय रहे। मेनका परित्यक्त शकुन्तलाको
सम्भवतः कखकाश्यपने प्रतिपालित किया था।
महाभारतके टीकाकार नीलकण्ठ ने कख नामका
। अर्थ इस प्रकार लगाया है-<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६७०|कण्डू प्रवर्ग-कण्व|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
कण्डघ्नवर्ग (सं० पु०) कण्डनानां वर्ग: समूहः, ६-तत् । कण्डू नाशकरनेवाली ओषधियोंका समूह,खाज मिटानेवाली जड़ीबूटियोंका जखीरा। चन्दन,वेणामूल, प्रारम्बध, करज, निम्ब, कुटज, सषेप, मौल,दारुहरिद्रा और मुस्तकके समूहको कण्डनवर्ग कहते हैं। <Small>(चरक)</small>
कण्डूति (सं० स्त्री०) कण्ड्य भावे तिन् अलोपो यलोपश्च। कण्डूयन, खुजली, खाज।
कण्डमका (सं० स्त्री०) कोटविशेष, एक कीड़ा। यह कृष्ण, सार, कुहक, हरित, रक्त, यववर्णाभ और भ्रकुटी पाठ प्रकारको होती है। इसके काटनेसे रोगीका प्रङ्ग पीतवर्ण पड़ और वमन, अतिसार,ब्जर प्रभृतिसे वह मर जाता है। <Small>(सुश्रुत )</small>
कण्डूमत् (सं० वि०) खुजलाते हुआ, जो खरोंच रहा हो।
कण्डू यन (सं० वि०) खुजलाते हुआ, जो रगड़ रहा हो।
कण्डू यन (सं० ली०) कण्ड य भावे ल्युट । १ कण्डू,खुजली खाज। <Small>“यन्म धनादि सहमधि सुखं हि तुच्छ' कल्यनेन करयोरिव दुःखदुःखम् ।” ( भागवत ७।९।५५)</small>
२ वष्यशृङ्ग, खुजलानेका औज़ार । गात्रमें कण्डू उपस्थित होनेपर दीक्षित इसीसे खुजलाया करते हैं।
कण्डू यनक (सं० वि०) कण्ड यन-खार्थे कन् । १ खुजलाते हुआ, जो रगड़ रहा हो। (पु०) २ खुज-लानेवाला।
कण्डू यना (सं० स्त्री०) कण्ड ति, खुजलो।
कण्डयनी (सं० स्त्री०) कृष्णशृङ्ग, खुजलानेको कूंची।
कण्ड यमान (सं० वि०) खुजलानेवाला, जो खरोंच रहा हो।
कण्ड या (सं० स्त्री०) कण्डू-यक्-अ-टाप् । कण्डू,खुजली।
कण्ड यिट (सं० वि०) खुजलानेवाला।
कण्डर (सं० पु०) माणक, मानकच्छु।
कण्ड रा (सं० स्त्री०) कण्डू राति, कण्डू-रा-क-टाप् । शकशिम्बोलता, खजोहरा।
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कण्डू ल (सं० पु०) कण्ड अस्त्यर्थ लच् । १ कण्ड-कारक अोल प्रभृति, जमौंकन्द । (त्रि०) २ का युक्ता, खाजसे भरा हुआ।
कण्डूला (सं० स्त्री०) अत्यन्त्रपर्णीलता, बेलका जमींकन्द।
कण्डोल (सं० पु०) कडि बाहुलकात् ओलच । १ वंशादि निर्मित धान्यरक्षक भाण्डार, बांस वगैरहसे बना धान्य रखनेका पात्र । इसका संस्कृत पर्याय-पिट, पिटक और पटक है। २ उष्ट्र, अंट। ३ गोणी-भेद, किसी किस्मका बोरा। ४ गुजरातके खान जिलेका एक पर्वत। यहां प्रतिप्राचीन देवमन्दिर बना है।
कण्डोलक (सं० पु०) कण्डाल-खार्थे कन्। कण्डोल, बाँसका बना डोल।
कण्डोलवीणा (सं० स्त्री०) कण्डोलइव वीणा कण्डो-लस्या वीणा वा। चण्डालोंको वीणा, छोठा बीन । इसका संस्कृत पर्याय-चाण्डालिका, चण्डालवल्लको चण्डालिका और कटोलवीणा है।
कण्डोली (सं० स्त्री०) कण्डोलस्तहदाकारोऽस्त्यस्याः, कण्डोल अर्थ आदित्वात् अच्-डोष्। कण्डोलवीणा, छोटा बीन।
कण्डोष (सं० पु०) कोषकार, झांझा, बूटका कोड़ा ।
कण्डोध (सं० पु०) कण्डनां ओघः समूहो यस्मात् । शूककोट, झांझा।
कख (सं० क्लो०) कण्यते अपोद्यते, कण-वन् । १पाप, इजाब। (पु०) २ भूतयोनिविशेष, किसी किस्मका शैतान्। ३ मुनिविशेष। यह घोरके पुत्र और अङ्गिरसगोत्रसम्म त रहे। ऋक्संहिताका अष्टम अष्टक इनके नामसे प्रसिद्ध है। यह यजुर्वेदीय कख शाखाके प्रवर्तक थे।
वेदमें दूसरे भी अनेक कखोंका नाम मिलता है-- कण्ड यित (सं० ली०) कण्ड यन, खुजली। कखनाषद, कखश्रीयश और कखकाश्यप । यह सभी कण्खवंशीय रहे। मेनका परित्यक्त शकुन्तलाको सम्भवतः कखकाश्यपने प्रतिपालित किया था।
महाभारतके टीकाकार नीलकण्ठ ने कख नामका अर्थ इस प्रकार लगाया है--<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६७२
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<noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कखजभन-कतक|६७१}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}}
<Small>'कखः सुखमयः वत्त्वविद्याप्रभावात् मत्वर्थ म'सारबन्ध सुखमयः नहि तत्त्वज्ञानिनां क्वचित् संसारासक्ति: अविद्याधर्माभावात् ।'</small>
कखका अर्थ तत्त्वविद्याके प्रभावसे मुखमय रहने-वाला है। तत्त्वज्ञानियोंको अविद्याके प्रभावसे संसारमें किसी प्रकारको आसक्ति नहीं रहती। सुतरां वह संसारके सुखसे भी अलग रहते हैं।
४ पुरुवंशीय एक राजा। तपस्थाके बलसे यह भी मुनि हो गये थे। ५ एक राजा। यह प्रतिरथके पुत्र और मेधातिथिके पिता रहे। कोई कोई इन्हें अजमीढ़का पुत्र कहता है। ६ धर्मशास्त्रकार मुनि-विशेष। ७ तीर्थविशेष। (त्रि०) ८ वधिर, बहरा, जिसे सुन न पड़े। ९ विद्याक्रियाकुशल, आलिम । १० मेधावी, भलमन्द। ११ स्तुतिकारक, तारीफ,
करनेवाला। १२ स्तवनोय, तारीफ़के काबिल।
कखजम्भन (सं० वि०) कख नामक पिशाचोंको नाश करनेवाला।
कखतम (सं० त्रि०) अत्यन्त बुद्धिमान्, निहायत अल्मकन्द।
कखमान् (सं० वि०) १ कखोंके विधिसे तैयार किया हुआ। २ स्तुतिकारकों द्वारा सङ्गठित।
कण्खरथन्तर (सं० क्लो०) कखन गीतं रथन्तरम,मध्यपदलो। सामगानविशेष, सामवेदका एक गाना।
कखवत् (सं० अव्य) कख की भांति ।
कखसखा (सं० पु०) कांका मित्र, जो कखोसे दोस्ताना बर्ताव रखता हो।
कखसुता (सं० स्त्री०) कखस्य प्रतिपालिता मुता। शकुन्तला। एकदा विश्वामित्रको उग्र तपस्यासे डर देवराज इन्द्रने तपोविघ्नके लिये मेनका नाघी अप्सराको भेजा था। विश्वामित्र उसका रूपलावण्वादि देख विमोहित हुये। फिर उन्होंने उसके गर्भसे एक कन्धा उत्पादन को थी। मेनका उस सद्यप्रसूत कन्धाको वनमें फेंक यथारखानको चली गयी। दैववश कख मुनिने उस कन्याको देख लिया था। वह दयाचितसे उसे अपने आश्रममें ला तनयाकी तरह लालन-पालन करने लगे। <Small>शकुन्तला देखो।</small>
{{Multicol-break}}
कखहोता (सं० पु०) कखको होताके स्थानमें रखनेवाला यजमान, जिसके कख होता रहे।
कण्वाश्रम (सं० पु०) कखस्य पाश्रमः, ६-तत् । कण्व मुनिका पाश्रम, कख के रहने को जगह। यह आश्रम मालिनी नदी किनारे पवस्थित है। कखाधम आदि धर्मारख के नामसे विख्यात है। इस स्थानके प्रवेशमावसे समस्त पाप विदुरित होता है। (भारत) कोटा राज्यसे दक्षिण चम्बल नदीके निकट भी एक कखाश्रम विद्यमान है। इसी स्थानके समीप मौर्य- वंशीय शिवराजोंको शिलालिपि मिली है।
कखस्मृति (सं० स्त्रो०) कखन प्रयोता स्मृति,कर्मधा०। शुक्लयजुर्वेदसे कखमुनि द्वारा संग्रहीत एक धर्मशास्त्र ।
कत् (सं० अव्य०) १ ईषत्, अल्प, थोड़ा। २ कुत्सिता । ३ क्वाथ ।
कत (सं० पु०) कं जलं शुद्ध तनोति, कतन-ड। १ निर्मलोवृक्ष, निर्मलीका पेड़। कतक देखो। २ मुनि-विशेष। यह विश्वामित्रके एकतम पुत्र थे। (हिं० अव्य०) किस कारण, क्यों, किस लिये।
कत (अ० पु०) लेखनीके अग्रभागका तिर्यक् छेदन, कलमकी नोककी तिरछी तराश ।
कतक (सं० पु०) तक हासे बाहुलकात् घ, कस्ख जलस्य तकः हास: प्रकाशोऽस्मात्। १ वृक्षविशेष, एक पेड़। इसका संस्कृत पर्याय-अम्बप्रसाद, कत, तिला- फल, रुच्य, छेदनीय, गुच्छफल, कतफन और तिस-मरिच है। कतकको बंगला और हिन्दोमें निर्मलो, उड़ियामें कतोक, तेलङ्गमें कतकमु, इन्दुपुचेगु अथवा चिल्ल, तामिलमें तेतमरम् वा तेत्रकोत्ते, दक्षिणोमें चिखविन, सिंहलोमें इङ्गिवि और वैज्ञानिक अंगरेजोमें ष्ट्रिकनोस पोटेटोरम् (Strychnos potatorum ) कहते हैं।
अति पूर्वकालसे यह वृक्ष भारतवर्षमें प्रसिद्ध है। हमारे पूर्वतन ऋषि इसके फलसे जलस शोधन करते थे। <Small>(सुश्रुत)</small> भगवान् मनुने कहा है-
<Small>{{center|<poem>"पलं कवकाचस्व यद्यप्यम्बु प्रसादवम् ।
न नामयहादेव वस्य वारि प्रसौदवि।।" (६।६७)</Poem>}}</small><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२५
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४८४|ओखामण्डल|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>फिर चावोंसे मिल उन्होंने एकवार हेरोनोंको भोज
दिया। सब लोगोंके भोजनपर बैठ जानेसे राठोरोंको
मन्या के अनुसार चावड़ोंने धोके से पा उनमें कितनों
होको मार डाला था। फिर राठोरोंने चावढ़ोंको भी
नौचा देखाया। अपने भोषण कार्यके उपलक्ष में दोनों
भाइयोंने 'वावेत' उपाधि ग्रहण किया था। राठोरोंका
राज्य धीरे धीरे बढ़ा। वेरावलजीने कुछ सेना ले काठिया
बाढ़ भाक्रमण और सोमनाथपाटन अधिकार किया
था। उन्होंने अरामदमें अपनो राजधानी प्रतिष्ठित
की। राज्यका उत्तराधिकार पुत्र विक्रमसोको मिला
था। बच्चाकेराव जिवाजीने अपनी कन्या उन्हें व्या
टो। विक्रमसीके बाद जो राने १२० वर्षतक राज्य
करते रहे। १०३ राना सामगनजी घरामदेके
राजावोंमें बड़े मतिमाली निकले। उन्होंने अपना
राज्य खम्भालिया नगरतक बढ़ा लिया था । किन्तु
उनके पुत्र भोमजीने शब्द बनने पर मका जानेवाले
कितने ही जहाज लूटे। इससे अप्रसन्न हो अहमदा
बादके सुलतान महमूदने उन्हें दवाना चाहा। उसो
समय भोमलोन सेयद मुहम्मदका जहाज लूटा पोर
उन्हें दो दुधमुहे लड़कोंके साथ जहाज़में छोड़ा।
उनको स्त्री केंद कर घरामदे भेजी गयी थीं। इसपर
सुलतान को फोज बदला लेने पायो मुसलमानोंने
द्वारका लूटी थी। भोमली भाग गये। किन्तु उन्होंने
थोड़े ही दिनों बाद श्रा मुसलमानोंको मार भगाया
था। भोमली चौर हमोरखोके वंशज मानकोंमें
द्वारका अधिकार पर झगड़ा हुआ। मानकोंने
वाघेरोंके साहाय्यसे दारकाको अधिकार किया।
भोमजीने भी अपना पक्ष सबल न देख सन्धि कर को।
१५८२ ई०को अरामदे के वाघल राजा शिव रानाने
गुजरातके सुलतान मुजफ्फरको भरच दिया। कारण
अहमदाबादके स्वेदार छान्- माणसे काठियावाड़ में
हार वह श्रखामण्डल भाग आये थे । किन्तु खान्
धामको फौज उनके पीछे रहो वालोंसे यु
होनेपर शिवराना मारे गये।
सांगनजी काठियावाड़को भागे थे।
सामल मानकने अपने भाई मज्ञ
शिवराना के. पुत्र
इधर हारकाके
मानकसे कहा—
{{Multicol-break}}
किसी न किसी प्रकार मुसलमानोंको यहांसे निकाल
बाहर करना चाहिये। मैं सांगनजोको ढूंढ़ने जाता
हूँ । तुम मुसलमानोंसे लड़ो और उन्हें शान्तिसे
बैठने मत दो। सात वर्ष बाद वह सांगनजीको ले
लौटे थे । फिर घोर युद्ध होने लगा । अन्तको मुसल-
मान हारे और धोखामण्डल छोड़ भागे सांगनजी
अरामदेमें सिंहासनारूढ़ हुये थे । सांगनजीके बाद
उनके पुत्र संग्रामजीने राज्यका उत्तराधिकार पाया
और वर्ष
राज्यका सुख उठाया। फिर
उनको वहनका विवाह नवानगरके
रजो
कुछ
राजा बने थे।
जामसे हुआ । १६६४ ई०को अखेरजीके मरने पर
भोजराजजीने उत्तराधिकार पाया था। उनके एक
लड़को पर सात लड़के थे लड़को का विवाह
कच्छके रावसे हो गया । ज्येष्ठपुत्र वाजेराजजी अपने
भाइयोंसे लड़ा भिड़ा करते थे । इससे उन्हें पोसितरा
नगर अलग दे दिया गया ।
१७१५ और १७१८
०को बरामदे वाल राजा द्वारकावाले वाघेरोंके
साथ काठियावाड़ में कितनी हो वार घुसे । किन्तु :
नवानगर, गोंडल और पोरबंदरको फोन उनपर चढ़ो
थी। इससे उन्हें बड़ी हानि उठाना पड़ी। एक
राजा द्वारका और वसाई में राज्य करने लगे । १८०४
ई०की ने एक बम्बईका जहाज लट लिया।
मलाह और मुसाफिर पानोमें फेंके गये। अंगरेज
सरकारने जो लड़ाईका जहाज़ शास्ति देने को भेजा,
वह खाली हाथ लौटा था। चतिपूरण मांगा जानेपर
वाघेर अस्वीकार कर गये। किन्तु १८०७ ई० को
करनल वाकर उनसे परिपूरण लेने फोजके साथ-
द्वारका पहुचे थे। बाघेल और वाघेर राजा एक
लाख दश हजार रुपया देनेको सम्मत हुये । किन्तु :
१८१० ई०को उन्होंने फिर लूट मार मचायो यो ।
बड़ोदेके रोडट कप्तान कारनकने द्वारका कुछ
सवार भेज झगड़ा मिटाया। किन्तु डाका पड़ता हो
रहा । १८१० ई०को १८यों नवम्बरको अंगरेज
सरकारने हारका चोर वैयत तीर्थस्थान समझ
गायकवाड़ के अधीन किये थे गायकवाड़ने इसके
बदले भोखामण्डलके राजावका जुर्माना और<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>फिर चावढ़ोसे मिल उन्होंने एकबार हेरोनोंको भोज दिया। सब लोगोंके भोजनपर बैठ जानेसे राठोरोंको मन्त्रणाके अनुसार चावढ़ोंने धोके से आ उनमें कितनों हीको मार डाला था। फिर राठोरोंने चावढ़ोंको भी नीचा देखाया। अपने भीषण कार्यके उपलक्ष्यमें दोनों भाइयोंने 'वाधेत' उपाधि ग्रहण किया था। राठोरोंका राज्य धीरे धीरे बढ़ा। वेरावलजीने कुछ सेनाले काठियावाड़ आक्रमण और सोमनाथपाटन अधिकार किया था। उन्होंने अरामदमें अपनी राजधानी प्रतिष्ठित की। राज्यका उत्तराधिकार पुत्र विकमसीको मिला था। कच्चके राव जियाजीने अपनी कन्या उन्हें व्याह दी। विकमसीके बाद नौ राने १२० वर्षतक राज्य करते रहे। १०वें राना सानगनजी अरामदेके राजावोंमें बड़े शक्तिशाली निकले। उन्होंने अपना राज्य खम्भालिया नगरतक बढ़ा लिया था। किन्तु उनके पुत्र भीमजीने राज्य बनने पर मक्का जानेवाले कितने ही जहाज़ लूटे। इससे अप्रसन्न हो अहमदाबादके सुलतान महमूदने उन्हें दबाना चाहा। उसी समय भीमजीने सैयद मुहम्मदका जहाज लूटा और उन्हें दो दुधमुंहे लड़कोंके साथ जहाज़में छोड़ा। उनकी स्त्री क़ैद कर अरामदे भेजी गयी थीं। इसपर
सुलतान की फौज बदला लेने आयी। मुसलमानोंने द्वारका लूटी थी। भीमजी भाग गये। किन्तु उन्होंने
थोड़े ही दिनों बाद आ मुसलमानोंको मार भगाया था। भीमजी और हमीरजीके वंशज मानकोंमें
द्वारकाके अधिकार पर झगड़ा हुआ। मानकोंने वाघेरोंके साहाय्यसे द्वारकाको अधिकार किया। भीमजीने भी अपना पक्ष सबल न देख सन्धि कर ली। १५९२ ई॰को अरामदेके वाघल राजा शिव रानाने गुजरातके सुलतान मुज़फ्फरको शरण दिया। कारण अहमदाबादके सूबेदार खान्-आज़मसे काठियावाड़में हार वह ओखामण्डल भाग आये थे। किन्तु खान् आज़मकी फौज उनके पीछे रही। वाधेलोंसे युद्ध होनेपर शिवराना मारे गये। शिवराना के पुत्र सांगनजी काठियावाड़को भागे थे। इधर द्वारकाके सामल मानकने अपने भाई मल्ल मानकसे कहा—
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किसी न किसी प्रकार मुसलमानोंको यहांसे निकाल
बाहर करना चाहिये। मैं सांगनजोको ढूंढ़ने जाता
हूँ । तुम मुसलमानोंसे लड़ो और उन्हें शान्तिसे
बैठने मत दो। सात वर्ष बाद वह सांगनजीको ले
लौटे थे । फिर घोर युद्ध होने लगा । अन्तको मुसल-
मान हारे और धोखामण्डल छोड़ भागे सांगनजी
अरामदेमें सिंहासनारूढ़ हुये थे । सांगनजीके बाद
उनके पुत्र संग्रामजीने राज्यका उत्तराधिकार पाया
और वर्ष
राज्यका सुख उठाया। फिर
उनको वहनका विवाह नवानगरके
रजो
कुछ
राजा बने थे।
जामसे हुआ । १६६४ ई०को अखेरजीके मरने पर
भोजराजजीने उत्तराधिकार पाया था। उनके एक
लड़को पर सात लड़के थे लड़को का विवाह
कच्छके रावसे हो गया । ज्येष्ठपुत्र वाजेराजजी अपने
भाइयोंसे लड़ा भिड़ा करते थे । इससे उन्हें पोसितरा
नगर अलग दे दिया गया ।
१७१५ और १७१८
०को बरामदे वाल राजा द्वारकावाले वाघेरोंके
साथ काठियावाड़ में कितनी हो वार घुसे । किन्तु :
नवानगर, गोंडल और पोरबंदरको फोन उनपर चढ़ो
थी। इससे उन्हें बड़ी हानि उठाना पड़ी। एक
राजा द्वारका और वसाई में राज्य करने लगे । १८०४
ई०की ने एक बम्बईका जहाज लट लिया।
मलाह और मुसाफिर पानोमें फेंके गये। अंगरेज
सरकारने जो लड़ाईका जहाज़ शास्ति देने को भेजा,
वह खाली हाथ लौटा था। चतिपूरण मांगा जानेपर
वाघेर अस्वीकार कर गये। किन्तु १८०७ ई० को
करनल वाकर उनसे परिपूरण लेने फोजके साथ-
द्वारका पहुचे थे। बाघेल और वाघेर राजा एक
लाख दश हजार रुपया देनेको सम्मत हुये । किन्तु :
१८१० ई०को उन्होंने फिर लूट मार मचायो यो ।
बड़ोदेके रोडट कप्तान कारनकने द्वारका कुछ
सवार भेज झगड़ा मिटाया। किन्तु डाका पड़ता हो
रहा । १८१० ई०को १८यों नवम्बरको अंगरेज
सरकारने हारका चोर वैयत तीर्थस्थान समझ
गायकवाड़ के अधीन किये थे गायकवाड़ने इसके
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४८४|ओखामण्डल|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>फिर चावढ़ोसे मिल उन्होंने एकबार हेरोनोंको भोज दिया। सब लोगोंके भोजनपर बैठ जानेसे राठोरोंको मन्त्रणाके अनुसार चावढ़ोंने धोके से आ उनमें कितनों हीको मार डाला था। फिर राठोरोंने चावढ़ोंको भी नीचा देखाया। अपने भीषण कार्यके उपलक्ष्यमें दोनों भाइयोंने 'वाधेत' उपाधि ग्रहण किया था। राठोरोंका राज्य धीरे धीरे बढ़ा। वेरावलजीने कुछ सेनाले काठियावाड़ आक्रमण और सोमनाथपाटन अधिकार किया था। उन्होंने अरामदमें अपनी राजधानी प्रतिष्ठित की। राज्यका उत्तराधिकार पुत्र विकमसीको मिला था। कच्चके राव जियाजीने अपनी कन्या उन्हें व्याह दी। विकमसीके बाद नौ राने १२० वर्षतक राज्य करते रहे। १०वें राना सानगनजी अरामदेके राजावोंमें बड़े शक्तिशाली निकले। उन्होंने अपना राज्य खम्भालिया नगरतक बढ़ा लिया था। किन्तु उनके पुत्र भीमजीने राज्य बनने पर मक्का जानेवाले कितने ही जहाज़ लूटे। इससे अप्रसन्न हो अहमदाबादके सुलतान महमूदने उन्हें दबाना चाहा। उसी समय भीमजीने सैयद मुहम्मदका जहाज लूटा और उन्हें दो दुधमुंहे लड़कोंके साथ जहाज़में छोड़ा। उनकी स्त्री क़ैद कर अरामदे भेजी गयी थीं। इसपर
सुलतान की फौज बदला लेने आयी। मुसलमानोंने द्वारका लूटी थी। भीमजी भाग गये। किन्तु उन्होंने
थोड़े ही दिनों बाद आ मुसलमानोंको मार भगाया था। भीमजी और हमीरजीके वंशज मानकोंमें
द्वारकाके अधिकार पर झगड़ा हुआ। मानकोंने वाघेरोंके साहाय्यसे द्वारकाको अधिकार किया। भीमजीने भी अपना पक्ष सबल न देख सन्धि कर ली। १५९२ ई॰को अरामदेके वाघल राजा शिव रानाने गुजरातके सुलतान मुज़फ्फरको शरण दिया। कारण अहमदाबादके सूबेदार खान्-आज़मसे काठियावाड़में हार वह ओखामण्डल भाग आये थे। किन्तु खान् आज़मकी फौज उनके पीछे रही। वाधेलोंसे युद्ध होनेपर शिवराना मारे गये। शिवराना के पुत्र सांगनजी काठियावाड़को भागे थे। इधर द्वारकाके सामल मानकने अपने भाई मल्ल मानकसे कहा—
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किसी न किसी प्रकार मुसलमानोंको यहांसे निकाल बाहर करना चाहिये। मैं सांगनजोको ढूंढ़ने जाता हूँ । तुम मुसलमानोंसे लड़ो और उन्हें शान्तिसे बैठने मत दो। सात वर्ष बाद वह सांगनजीको ले लौटे थे । फिर घोर युद्ध होने लगा । अन्तको मुसल-मान हारे और धोखामण्डल छोड़ भागे सांगनजी अरामदेमें सिंहासनारूढ़ हुये थे । सांगनजीके बाद उनके पुत्र संग्रामजीने राज्यका उत्तराधिकार पाया और वर्ष राज्यका सुख उठाया। फिर उनको वहनका विवाह नवानगरके रजो कुछ राजा बने थे। जामसे हुआ । १६६४ ई०को अखेरजीके मरने पर भोजराजजीने उत्तराधिकार पाया था। उनके एक लड़को पर सात लड़के थे लड़को का विवाह कच्छके रावसे हो गया । ज्येष्ठपुत्र वाजेराजजी अपने भाइयोंसे लड़ा भिड़ा करते थे । इससे उन्हें पोसितरा नगर अलग दे दिया गया । १७१५ और १७१८ ०को बरामदे वाल राजा द्वारकावाले वाघेरोंके साथ काठियावाड़ में कितनी हो वार घुसे । किन्तु : नवानगर, गोंडल और पोरबंदरको फोन उनपर चढ़ो थी। इससे उन्हें बड़ी हानि उठाना पड़ी। एक राजा द्वारका और वसाई में राज्य करने लगे । १८०४ ई०की ने एक बम्बईका जहाज लट लिया। मलाह और मुसाफिर पानोमें फेंके गये। अंगरेज सरकारने जो लड़ाईका जहाज़ शास्ति देने को भेजा, वह खाली हाथ लौटा था। चतिपूरण मांगा जानेपर वाघेर अस्वीकार कर गये। किन्तु १८०७ ई० को करनल वाकर उनसे परिपूरण लेने फोजके साथ- द्वारका पहुचे थे। बाघेल और वाघेर राजा एक लाख दश हजार रुपया देनेको सम्मत हुये । किन्तु : १८१० ई०को उन्होंने फिर लूट मार मचायो यो । बड़ोदेके रोडट कप्तान कारनकने द्वारका कुछ सवार भेज झगड़ा मिटाया। किन्तु डाका पड़ता हो रहा । १८१० ई०को १८यों नवम्बरको अंगरेज सरकारने हारका चोर वैयत तीर्थस्थान समझ गायकवाड़ के अधीन किये थे गायकवाड़ने इसके बदले भोखामण्डलके राजावका जुर्माना और<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|४८४|ओखामण्डल|}}
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सुलतान की फौज बदला लेने आयी। मुसलमानोंने द्वारका लूटी थी। भीमजी भाग गये। किन्तु उन्होंने
थोड़े ही दिनों बाद आ मुसलमानोंको मार भगाया था। भीमजी और हमीरजीके वंशज मानकोंमें
द्वारकाके अधिकार पर झगड़ा हुआ। मानकोंने वाघेरोंके साहाय्यसे द्वारकाको अधिकार किया। भीमजीने भी अपना पक्ष सबल न देख सन्धि कर ली। १५९२ ई॰को अरामदेके वाघल राजा शिव रानाने गुजरातके सुलतान मुज़फ्फरको शरण दिया। कारण अहमदाबादके सूबेदार खान्-आज़मसे काठियावाड़में हार वह ओखामण्डल भाग आये थे। किन्तु खान् आज़मकी फौज उनके पीछे रही। वाधेलोंसे युद्ध होनेपर शिवराना मारे गये। शिवराना के पुत्र सांगनजी काठियावाड़को भागे थे। इधर द्वारकाके सामल मानकने अपने भाई मल्ल मानकसे कहा—
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किसी न किसी प्रकार मुसलमानोंको यहांसे निकाल बाहर करना चाहिये। मैं सांगनजीको ढूंढ़ने जाता हूँ। तुम मुसलमानोंसे लड़ो और उन्हें शान्तिसे बैठने मत दो। सात वर्ष बाद वह सांगनजीको ले लौटे थे। फिर घोर युद्ध होने लगा। अन्तको मुसलमान हारे और ओखामण्डल छोड़ भागे सांगनजी अरामदेमें सिंहासनारूढ़ हुये थे। सांगनजीके बाद उनके पुत्र संग्रामजीने राज्यका उत्तराधिकार पाया और कुछ वर्ष राज्यका सुख उठाया। फिर अखेरजी राजा बने थे। उनकी बहनका विवाह नवानगरके जामसे हुआ। १६६४ ई॰को अखेरजीके मरने पर भोजराजजीने उत्तराधिकार पाया था। उनके एक लड़की और सात लड़के थे। लड़कीका विवाह कच्छके रावसे हो गया। ज्येष्ठपुत्र वाजेराजजी अपने भाइयोंसे लड़ा–भिड़ा करते थे। इसीसे उन्हें पोसितरा नगर अलग दे दिया गया। १७१५ और १७१८ ई॰को अरामदेके वाधेल राजा द्वारकावाले वाघेरोंके साथ काठियावाड़में कितनी हो वार घुसे। किन्तु नवानगर, गोंडल और पोरबंदरकी फौज उनपर चढ़ी थी। इससे उन्हें बड़ी हानि उठाना पड़ी। एक राजा द्वारका और वसाईमें राज्य करने लगे। १८०४ ई॰को डाकुवोंने एक बम्बईका जहाज लूट लिया। मलाह और मुसाफिर पानीमें फेंके गये। अंगरेज सरकारने जो लड़ाईका जहाज़ शास्ति देनेको भेजा, वह खाली हाथ लौटा था। क्षतिपूरण मांगा जानेपर वाघेर अस्वीकार कर गये। किन्तु १८०७ ई॰को करनल बाकर उनसे क्षतिपूरण लेने फौजके साथ द्वारका पहुचे थे। वाधेल और वाघेर राजा एक लाख दश हज़ार रुपया देनेको सम्मत हुये। किन्तु १८१० ई॰को उन्होंने फिर लूट मार मचायी थी। बड़ोदेके रेसीडण्ट कप्तान कारनकने द्वारका कुछ सवार भेज झगड़ा मिटाया। किन्तु डाका पड़ता ही रहा। १८१७ ई॰को १८वीं नवम्बरको अंगरेज सरकारने द्वारका और बेयत तीर्थस्थान समझ गायकवाड़के अधीन किये थे। गायकवाड़ने इसके बदले ओखामण्डलके राजावोंका जुर्माना और<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओखामण्डल—ओघरथ|५२५}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अंगरेजो फोजके चढ़नेका खर्च डाल दिया। १८१८
ई० को पनमल मानक के पधोन कुछ राजा बिगड़े
थे किन्तु स्थानीय सेना ने उन्हें शीघ्र ही दबा
दिया। १८१८ ई०को वाधेरोंने विद्रोह उठा मिटर
हेलोको पोरबन्दर भगाया था।
१८२० ईबो
बम्बई सरकारने करनल ष्टानडोपको लड़ने भेजा ।
उन्होंने अकस्मात् दारका अधिकार कर राजावको
नौचा देखाया था । इस युद्ध में कपतान मोरियट मारे
गये। दारका-नरेश मूलमानक और उनके छोटे
भाई वरसी मानक भी धराशायी हुये। राणा संग्राम-
जो पकड़ कर सूरत भेजे गये। किन्तु कच्छ के रायने
जमानत दे उन्हें छोड़ा लिया था। फिर शान्ति
स्थापित हुई । १८५७ ई०को वाघेरोंने काठियावाड़
पर आक्रमण मारा था। लेफटिनण्ट बरटनने द्वारका
जा इस उपद्रवका कारण पूछा। वह वाघेरोंसे अच्छा
चाल-चलन रखनेको जमानत से बड़ोदे नोट पाये।
दूसरे वर्ष बसाईके वाघेर राजावीने खुले मैदान
बलवा कर वेयत होप और उनके साथी सिबन्दियोंने
दुर्गको अधिकार किया था मांडवोचे कपतान
मेले कुछ सेनाले यसमें जा उतरे घोर दुर्गपर
झपट पड़े, किन्तु दुर्ग सह रहने कुछ कर न
सके। रातको वाघेर स्वयं दुर्ग छोड़ वसाई भाग
गये। फिर बड़ोदेके मन्त्रियोंने सरकार अंगरेज से
अलग रहनेको कह वसाई आक्रमण किया था ।
वसाईको किलेबन्दी मज़बूत रहने से कई वार युद्ध
षा । अन्तको बड़ोदेके गायकवाड़ने वाघेरोंसे सन्धि-
कर झगड़ा मिटाया। दूसरे वर्ष फिर उपद्रव उठा था
गायकवाड़ने लड़ने-भिड़नेका सब काम अंगरेजोंको
खौंप दिया। वाघेरोंने श्राक्रमण मार द्वारका और
यत होप अधिकार किया था। जोधा मानक ओखा-
मण्डलके राजा बने । फिर करनल डोनोवन कुछ
सेनाले यस पहुंचे थे युद्ध में न हारते भी वाघेर
कि.ला छोड़ द्वारका भाग गये। कपतान डोनोवनने
शीघ्र ही द्वारकाको जा आक्रमण किया और वाघेरोंको
जंगल में देर दिया। पन्तको उन्होंने श्रोद्यामण्डल
छोड़ अभयपुर-पहाड़ में खाई खोद डेरा डाला था ।
{{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}132}}{{Multicol-break}}
१८५८ ई० के दिसम्बर मास करनल होनरने कितने
हो फोजके साथ चक्रमय मार उन्हें वहां भी
निकाल बाहर किया। कुछ वाधेर राजाने गिर
पहाड़ की राह ली थी । बाकी अपने हथियार रख
ओखामण्डल लौटनेको सम्मत हुये ।
उधर जोधा
मानक के मर जानेसे गिर पहाड़ के वाघेर भी पकड़े
गये । १८६२ ई०को कैद किये वाघेर निकल भगे
और पोखामण्डल पहुंच उपद्रव उठाने लगे। काठिया
बाद में कई वर्ष लुटमार होते रहो। १८५० १०को
मेजर रेनोलडस्ने उन्हें परास्त किया था। युद्दमें
मेजर रमोलse पाहत चोर पोलिटिकल एक्ट के
सहकारी कपतान हेबर्ट एवं लाटूश हत हुये। इसपर
वाघेर शान्त पड़े और फिर कभी जोरसे न लड़े ।
ओोग (हिं० पु० ) कर, महसूल, लगान ।
योग (सं०वि०) अवगारी पव-गय कर्मणि क
श्रीगण श्रवगस्यते
सम्प्रसारणञ्च । अवगण्य, नफरत किया हुआ ।
घोगर- एकप्रकार सवासी यह अपनेको पचड़
।
उघड़
योगी भी कहते हैं। हाथमें रस्सोसे लिपटी हुई छड़ी
रहती है। श्रीगर यज्ञोपवीत नहीं पहनते मरनेपर
देह जलाना मना है। शवका देह समाधिस्थ किया
जाता है। सिन्धुप्रदेश में दो-एक भोगर योगो देख
पड़ते हैं ।
घोगरना (पिं० श०) भवगरण होना, चुना,
पसोजना, पनियाना ।
ओगल ( हिं० पु० ) १ ऊषर, पड़ती जमीन् ।
२ कूपविशेष, एक कुवां ।
श्रीगोयस (सं०वि०) उग्र, अत्यन्त तेजखी ।
श्रोध (सं० पु० ) उच-धब् पृषोदरादित्वात् साधुः ।
१ समूह ढेर २ नदीवेग, पानोका बहाव, बाढ़
२ परम्परा, पुरानो चा ४ उपदेश, नसीहत |
५ हुतनृत्य, फुर्तीला नाच नदी, दरवा
प्रोधदेव (सं० पु० ) प्राचीन शिलालिपि-वर्धित
उच्छकल्पके एक महाराज। इनकी पत्नी कुमारदेवी थीं।
(Inscriptionum Indicarum, Vol III. p. 119.)
घोघरथ (सं.) एक राजा यह घोषवान्
नृपतिके पुत्र धोर पोचवतोके भ्राता थे।
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आदेश यादव
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/* शोधित */
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<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५६६|औरङ्गजेब|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>छियालीस वर्ष राजस्व करनेके बाद वर्षी
८८ उम्र में १७०७ ई० के फरवरी मास इन्होंने इहलोक
परित्याग किया।
आज भी जिन चोरवा नाम सुनकर मुसल
मानोंका कलेजा कांप उठता और हिन्दुओंके नेत्रोंसे
अयु चलने लगता, सेवड़ों वर्ष बोसे उनका निन्द
प्रेतशरीर इल्लोराको अधित्यकामें सो रहा है।
शाहजहांके दुश्चरित्र के कारण सात वर्षको उसरसे ही
ये इनके बड़े भाई द्वारा और राणा और छोटे भाई
मुराद अपने पितामह जहांगीर के पास कैद थे । यदि
शाहजहां पुनर अपने पिता के साथ प्रसव्यवचार
करते, तो इन लोगोंके प्राण कभी न बचते । जहां-
गौरके मृत्यु अनन्तर दश वर्षकी उम्र में औरङ्गजेव
पिताके निवाट पागरे लोट पाये।
१६३३ ई० को वुदेलोंके राजा जगत्सिंह और
शाहजहां के साथ विरोध उठ खड़ा हुआ । उस समय
पौरवको उम्र चौदह वर्ष अधिक न थी। जिस
खुनको प्यासे भूखे की तरह यह सर्वदा घूमते
फिरते रहे, यहां तक कि अपने भाइयों को भी नहीं
छोड़ा, उस दारुण पशुवृत्तिका सूत्रपात यह धा
पोरङ्गीय मालबेके सुवेदार मसरतके साथ बुदेलखण्ड
गये। एकादिक्रमसे दो वर्ष युद्ध हुआ । जगत्सिंहने
देखा, अब रक्षा नहीं, दिन दिन सेन्यचय हुआ जाता
-
.
है। अन्तमें घोड़े पर सवार हो कई अनुचरोंके साथ
'वे भागकर नर्मदाके उस पार किसी जङ्गलमें जा छिपे ।
घोड़को पोठपर वे लोग बहुत दूर निकल पाये,
न तो कुछ खाने और न सोने पाये थे; इसलिये घोड़ों को
पेड़ोंमें बांध सबके घुम धूलमें लेट गये। नींद श्री गई,
उस वनमें चारों पोर सभ्य पादमी थे। वे झोपडे
रहते, वनमें आखेट करते, पशुच पहनते, वनके फल-
मूल और मय मां खारी, राजभोग, राजेखय
जानते न थे । वनमें घोड़ोंको हिनहिनाहट सुनकर
वे लोग देखने आये चाकर देखा, पेड़ोंमें कई घोड़े
बंधे है, उनको पोठवर वैशकोमतो जड़ाऊ जोन
पड़े हैं और कई सुपुरुष भूमिपर सो रहे हैं। उनके
सर्वाङ्ग भी मणिमाणिक्यसे लड़े थे। नोच लोगोंके
{{Multicol-break}}
मोच प्रवृत्ति होती है। मनमें लोभ पाया। लोग हो
पाप है । उन लोगोंने निद्रावस्था में हो जगत्सिंह
और उनके अनुचरों को मार डाला, परन्तु पापका धन
भोग न कर सके । श्ररङ्गजेब और नसरतने जाकर
उन डाकुओं को वध किया। जगत्सिंहके खजाने में
सोना, चांदी, होरा, मोती सब मिलाकर सोस लाख
रूपयेको सम्पत्ति यो। उल सम्पत्तिको ले जाकर
रजेय पिताने पादपद्मपर रख दिया।
संसार में विजयका डङ्का बजा । श्ररङ्गजेब के
युद्धमें पदार्पण करते हो सौभाग्यलक्ष्मी पताका लेकर
आगे आगे चलती थीं। उस समय उजबक और
ईरानो प्रसिद्ध रथ पति संग्रामे पोरजेव
उन लोगों को भी परास्त किया। पुत्रका असाधारण
साहस और रणनैपुण्य देखकर शाहजहांके श्रह्लादकी
सीमा न रही। परन्तु दारा ज्येष्ठपुत्र थे । ज्येष्ठपुत्र हो
राज्यका अधिकारी होता है । अश्व पोरजेव यह
बात मन्दो मन समाते बाट दाराको प्रतिक्रम
कर और किसीको राजपदपर अभिषिक्त न कर
सकेंगे। इसके सिवा दारापर भो उनका चान्तरिक
प्रेम था। इसलिये चौरजेवने यहो खिर किया,
बिना विशेष कोमल किये राजसिंहासन मिलना
कठिन है । इससे लड़कपनसे हो ये कपट धार्मिक
बनते रहे । परन्तु दारासे इनका विद्वेष दिन दिन
बढ़ने लगा। निकटका रहना बहुत होता है,
इसलिये सामान्य बहाना पाकर ये पिताको आज्ञामे.
दाक्षिणात्यके शासनकर्त्ता होकर पते गये। यहां
गोलकुरहा राज्यके सेनानायक मोरजुमला चपने
स्वामीको परित्याग कर ओरङ्गजेब से श्र मिले । उस
समय हैदराबाद गोल कुरा के राजा के अधिकार में था।
मोरजुमलाको साथ लेकर औरङ्गजेबने हैदराबाद
लूट
ट लिया। गोत्र ही गोलकुण्डा अधिकार करनेका
भी इच्छा थी, परन्तु इसवार इनको चिरकालो
दुरभिसन्धिके पूर्ण होनेका अवसर न आया ।
शाहजहां बीमार हुए जोवन संकटापच हो,
गया। पोछे कहीं राज्य में घनिष्ट न हो, इसलिये
द्वारा सम्राटका का निर्वाह करने लगे।<noinclude>{{Multicol-end}}
{{smallrefs}}</noinclude>
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५६८
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||औरङ्गजेब|५६७}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>राजा बंगाल में थे। उस समय ये बंगाल के शासन-
कर्त्ता थे। बड़े भाईके सम्बाद होनेका समाचार
पाते हो क्रोधसे उनका शरीर जल उठा शोध हो
लड़ाईको तय्यारी करके उन्होंने दिल्लोको यात्रा कर दो।
औरङ्गजेब पत्यन्त कर थे लड़कपन से ही बे
कपटधार्मिक बने हुए थे । इस गोलमाल के समय
इन्होंने अपनी शान्ति प्रकृतिसे धीरे धीरे अपनो दुरभि -
सन्धि सच करनेका उपाय थिर कर लिया।
छोटे भाई मुराद उस समय गुजरातके शासनकर्त्ता
थे। श्ररङ्गजेवने उनके पास लिख भेजा, – “भाई !
पिताका तो मृत्युकाल निकट है! हमारे दोनों बड़े
भाई अलस, इन्द्रियपरायण चोर विलासी हैं। इस
विशाल राज्यको शासनमें रखनेके योग्य वे नहीं हैं।
मेरी बात तुमसे कुछ छिपो नहीं है। क्या करूं,
परमगुरु पिताका अनुरोध है, इससे कामकाज
स्पृहा देखता है, नहीं तो संसारमें सिलाई भी खड़ा नहीं
है। जो हो, इस समय सयुक्ति यही है कि तुम्हारे
हाथमें राज्यका भार सौंप में मक्के चला जाऊ ं ; अत-
एव चाइये, हम दोनों पादमो सेना लेकर भाग चलें"।
खलोंके कुचक्रमें देवता पड़ जाते हैं, मनुष्योंको
कोन मिनती है। चोरङ्गजेवके मायाजाल मुराद
फंस गये। वे आकर नर्मदाके किनारे चोरङ्गजेब से
मिले शाहजहांका जीवन संकटापच था, परन्तु
इतने दिनो में रोगका प्रकोप बहुत कुछ कम पड़
गया निर्विवाद दाराने पिताका सिंहासन छोड़
दिया। परन्तु शुजा प्रतिको इस बात का विश्वास
न हुआ । उन लोगोंने समझा लोग जो धारोग्य
होनेका समाचार फैला रहे हैं, वह केवल जनरव हैं;
इसमें भी दाराकी कोई चातुरी है। इसलिये युद्ध
करना हो उन लोगोंका दृढ़ संकल्प हुआ ।
-
दोपहर के पहले ही दाराको शुजाको दुरभि-
सन्धिका समाचार मिल गया था, इसलिये उन्होंने
अपने पुत्र सुलेमान और राजा जयसिंहको प्रयागको
चोर भेज दिया। परन्तु सम्राट्को इच्छा न यो कि
फैलती । इसलिये शाहजहांने चुपचाप
घरमै फूट
जयसिंहको कहला भेजा, - शुंजाको समझा बुझाकर
{{Multicol-break}}
फिर बंगाल मेज दें, विरोधका कोई प्रयोजन
नहीं सुलेमान और जयसिंह कामो पहु'चे
उस पार शाहशुजा थे। सम्राट्को आज्ञानुसार उन्हें नि
गुजाको वहुत समझाया बुझाया- भाई भाई
विराध होनेसे राज्यका अनिष्ट होगा। शुजाने भी इस
बात को समझा। वे निर्विवाद बंगाल नोट जाते.
परन्तु सुलेमान सहन हो छोड़नेवाले घादमो न वे ।
बड़े सवेरे हो सेना लेकर वे गङ्गापार गये । शुज्ञा उस
समय सो रहे थे। उसी निद्रितावस्था में सुलेमानने
उनको सेनापर आक्रमण किया । जागकर शाह-
राजाने बढ़ी देर तक युद्द किया, परन्तु अन्त में
परास्त होकर सुङ्गेर भाग गये ।
उधर उज्जैन में महाराज यशवन्तसिंह छावन
डाले पड़े थे। वे सम्राट्के पचके सेनानायक थे,
पोरजेय चोर मुरादको गति रोकने के लिये भेजे गये
श्ररङ्गजेव बैठे
थे। नर्मदा के उस पार युवराज घोरीव हुए
मुराद के धानेको प्रतोचा कर रहे थे। दोनों सेना मिल
गई, घोर युद्ध होने लगा । यशवन्त परास्त हुए।
उसके बाद स्वयं दारा छोटे भाइयोंका दण्ड देनेके लिये
पाये, परन्तु हार मानकर वे भी भाग गये ।
-
●
महानिसे यशवन्त अपनो राजधानीको चले गये,
लौटकर बादशाहके पास जाने का साहस न हुषा
परन्तु इधर घरमें स्त्रियोंका तिरस्कार सहने से तो
मृत्यु हजार गुना श्रेय था। निकट पहुंचते ही
महारानी दरवाजा रोककर धमकीके साथ करने
लगीं, –
लग हमलोग वीरकन्या है, वोरपुरुषको र
वरण
करतो है वोरपुरुषको जयमाल पहनाता है।
कापुरुष के साथ विवाह करना राणाकुल- कन्यायोंको
अभ्यास नहीं है। राजपूत प्राथको अपेक्षा मानका
गौरव अधिक करते हैं ।
युद्ध में परास्त होना नई.
बात नहीं है, परन्तु पत्र भाग चाना राजपूत बंग में
आज नया देख पड़ता है। मालूम होता है तुम
मेरे वह पति नहीं हो कोई उम हो, बहाना करके
दरवाजे पर पुकार रहे हो मेरे जो पति हैं, वे पान
समरक्षेत्रमें वीरशय्यापर सोये हैं । दुर्मति! दरवाजा
छोड़ दे। मैं चिता जलाकर पतिका अनुगमन करूं।”<noinclude>{{Multicol-end}}
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पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५४७
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="Praveen tiwary 2050" />{{rh|५४६|ओलन्दाज|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>कूल में कोचिन प्रभृति स्थान भी अधिकारको संभाले थे। उस समय लोग बोलन्दानोंका सम्मान करते रहे । वह सम्मान केवल इनके साहस वा युद्धको निपुणताके लिये हो न था । यह सत्य और न्यायको इतना देखकर काम करते, कि किसी स्थानके लोगोंसे असन्तुष्ट होने पर वहां से अपनौ कोठौ उठा चलते बनते । उधर पोर्तु -गोज पहले ही भारतवासियोंके प्रति निष्ठुर व्यवहार करते रहे। तर भारतवासी शीघ्र ही चोलन्दानों को भद्रता सुध हो गये। किन्तु समयके परिवर्तनने सत्यप्रिय पोखन्दाजकी भी प्रचल असत्यप्रिय पोर अत्याचारी बना डाला। चंगरेजों एभ्युदयसे मोघ्र ही इनका पात हुआ।
१२१८ ई०की अंगरेजोंके साथ पोलन्दाजका लगा। तत्पूर्व हो अंगरेजोने भारवर्ष में बाचिष्य चलाया किन्तु इनके साथ प्रतियोगिता से मसाले के काम में विशेष कुछ कर न पाया था। ऐसे हो समय रहते और हालेको गयरनमेष्टने मध्यस्थ बन दोनों कम्पनियोंके लोगोंको एक सत्वरचियो सभा स्थापित कर दो। इससे यो हो सब गड़बड़ मिट गया। किन्तु सभा भोलन्दाज सभ्योंको संख्या अधिक रही। सुतरां उसके द्वारा यह इच्छामत समस्त कार्य करने १५२३ ई० को उस समाने इनके विरु साज़िश करनेके अपराध पर दय अंगरेजों पर दश अपर व्यक्तियोंको पकड़ा था। विचार से सबने प्राणदण्ड पाया। इस घटनासे अंगरेज़ अत्यन्त विरक्त हुये। दोनों जातियोंके मध्य भयानक विद्देषानल जल उठा। अनेक दिन पर्यन्त मनोमालिन्य रहने पोछे १५५४ ०को अंगरेजोंने इनसे ८५०.... ६० चतिपूरण पाया था। किन्तु विवाद न मिटा । १६६७ ई०को अंगरेजोंके साथ ओलन्दाजका युद्ध उपस्थित था। इन्होंने अंगरेजोंके बाणिज्यमें विशेष चति डालो थी।
अवशेषको प्रमोसो विश्व चारा होनेसे इनका प्रताप घटा । श्रंमरेजोंने सिंहल प्रभृति अधिकार कर अन्यान्य खानोंमें भी इनको प्रतिपत्ति बिगाड़ी
{{Multicol-break}}
थी। उस समयतक ओलन्दाज कियत्परिमाणसे श्री हुये।
१६८० ई० को इन्होंने अंगरेजोंको बण्टामसे निकाला पोर भारतमहासागरीय होपों में मसालेका काम बना डाला था १६८७ ई०को हालेण्ड के प्रिन्स विलियम इङ्गलेण्ड के राजा हुये। इससे उभय जातिके मध्य सौहार्घ स्थापित हुआ। किन्तु वाणिज्य विषयमें इन्हींका प्राधान्य बना रहा। ई० १८श शताब्द के शेष भागसे हो ओलन्दाजोंको क्षमता घटते आयो । १७६० ई० तक युरोपमें जो विद्वेषवह्नि भभका उससे इनका वाणिज्य विशेष बिगड़ा न था। फिर इन्होंने बंगालसे अंगरेजोंको निकालने के लिये मोराफर चतु रोधपर बटेवियासे सात जंगी जहाज़ मेने किन्तु उन्होंने हार कर यह काम छोड़ दिया। अवशेष १०८८०को फ्रान्सोसो राष्ट्र विश्व उपस्थित हुषा फ्रान्सोसो सेनापति पिचेग्रुने हालेण्ड अधिकार किया था। फिर यह फ्रान्सोसियोंके शासनाधीन बने। इधर अंगरेज इनके वाणिज्यस्थान अधिकार करने को सचेष्ट हुये सिंहल प्रभृति स्थान उनके हाथ लगे ये १८०२०को चामिन्स सन्धि द्वारा अनेक विदेशीय अधिकार पुनः पाते भो इन्हें सिंहल और केप - कोलोनो अंगरेजों के लिये छोड़ना पड़ा। नेपोलियन के फ्रान्सका सम्राट बननेपर हालेण्ड प्रथमतः उनके स्वाता के अधीन पर पीछे फ्रान्सीसी साम्राज्य के अन्तर्भुक्त हुआ। ऐसे ही समय, इन्होंने इङ्गलेण्ड आक्रमणके लिये भी विशेषं पेष्टा लगायी पौर भारत- महासागर में अंगरेजोंके वायव्यको विशेष चति पहुंचायी थी।
१८११ ई० को अंगरेजोंने यह उपद्रव निवारण करनेके लिये बटेवियाको चाक्रमण मार हस्तगत किया। उसी समय से यह हतश्रो हो गये । १८१५ ई०को पारिसको सन्धि द्वारा उस स्थान पुनः पावे भी यह पूर्ववत् प्रबल बन न सके।
चाकल घोलन्दाजको परखा उचत नहीं, स्थितिथोल पड़ी है। भारत महासागर के दोषपुच में आज भी यह मसालेका काम करते हैं। बटेविया<noinclude>{{Multicol-end}}
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आदेश यादव
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५४६|ओलन्दाज|}}
{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>कूल में कोचिन प्रभृति स्थान भी अधिकारको संभाले थे। उस समय लोग बोलन्दानोंका सम्मान करते रहे । वह सम्मान केवल इनके साहस वा युद्धको निपुणताके लिये हो न था । यह सत्य और न्यायको इतना देखकर काम करते, कि किसी स्थानके लोगोंसे असन्तुष्ट होने पर वहां से अपनौ कोठौ उठा चलते बनते । उधर पोर्तु -गोज पहले ही भारतवासियोंके प्रति निष्ठुर व्यवहार करते रहे। तर भारतवासी शीघ्र ही चोलन्दानों को भद्रता सुध हो गये। किन्तु समयके परिवर्तनने सत्यप्रिय पोखन्दाजकी भी प्रचल असत्यप्रिय पोर अत्याचारी बना डाला। चंगरेजों एभ्युदयसे मोघ्र ही इनका पात हुआ।
१२१८ ई०की अंगरेजोंके साथ पोलन्दाजका लगा। तत्पूर्व हो अंगरेजोने भारवर्ष में बाचिष्य चलाया किन्तु इनके साथ प्रतियोगिता से मसाले के काम में विशेष कुछ कर न पाया था। ऐसे हो समय रहते और हालेको गयरनमेष्टने मध्यस्थ बन दोनों कम्पनियोंके लोगोंको एक सत्वरचियो सभा स्थापित कर दो। इससे यो हो सब गड़बड़ मिट गया। किन्तु सभा भोलन्दाज सभ्योंको संख्या अधिक रही। सुतरां उसके द्वारा यह इच्छामत समस्त कार्य करने १५२३ ई० को उस समाने इनके विरु साज़िश करनेके अपराध पर दय अंगरेजों पर दश अपर व्यक्तियोंको पकड़ा था। विचार से सबने प्राणदण्ड पाया। इस घटनासे अंगरेज़ अत्यन्त विरक्त हुये। दोनों जातियोंके मध्य भयानक विद्देषानल जल उठा। अनेक दिन पर्यन्त मनोमालिन्य रहने पोछे १५५४ ०को अंगरेजोंने इनसे ८५०.... ६० चतिपूरण पाया था। किन्तु विवाद न मिटा । १६६७ ई०को अंगरेजोंके साथ ओलन्दाजका युद्ध उपस्थित था। इन्होंने अंगरेजोंके बाणिज्यमें विशेष चति डालो थी।
अवशेषको प्रमोसो विश्व चारा होनेसे इनका प्रताप घटा । श्रंमरेजोंने सिंहल प्रभृति अधिकार कर अन्यान्य खानोंमें भी इनको प्रतिपत्ति बिगाड़ी
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थी। उस समयतक ओलन्दाज कियत्परिमाणसे श्री हुये।
१६८० ई० को इन्होंने अंगरेजोंको बण्टामसे निकाला पोर भारतमहासागरीय होपों में मसालेका काम बना डाला था १६८७ ई०को हालेण्ड के प्रिन्स विलियम इङ्गलेण्ड के राजा हुये। इससे उभय जातिके मध्य सौहार्घ स्थापित हुआ। किन्तु वाणिज्य विषयमें इन्हींका प्राधान्य बना रहा। ई० १८श शताब्द के शेष भागसे हो ओलन्दाजोंको क्षमता घटते आयो । १७६० ई० तक युरोपमें जो विद्वेषवह्नि भभका उससे इनका वाणिज्य विशेष बिगड़ा न था। फिर इन्होंने बंगालसे अंगरेजोंको निकालने के लिये मोराफर चतु रोधपर बटेवियासे सात जंगी जहाज़ मेने किन्तु उन्होंने हार कर यह काम छोड़ दिया। अवशेष १०८८०को फ्रान्सोसो राष्ट्र विश्व उपस्थित हुषा फ्रान्सोसो सेनापति पिचेग्रुने हालेण्ड अधिकार किया था। फिर यह फ्रान्सोसियोंके शासनाधीन बने। इधर अंगरेज इनके वाणिज्यस्थान अधिकार करने को सचेष्ट हुये सिंहल प्रभृति स्थान उनके हाथ लगे ये १८०२०को चामिन्स सन्धि द्वारा अनेक विदेशीय अधिकार पुनः पाते भो इन्हें सिंहल और केप - कोलोनो अंगरेजों के लिये छोड़ना पड़ा। नेपोलियन के फ्रान्सका सम्राट बननेपर हालेण्ड प्रथमतः उनके स्वाता के अधीन पर पीछे फ्रान्सीसी साम्राज्य के अन्तर्भुक्त हुआ। ऐसे ही समय, इन्होंने इङ्गलेण्ड आक्रमणके लिये भी विशेषं पेष्टा लगायी पौर भारत- महासागर में अंगरेजोंके वायव्यको विशेष चति पहुंचायी थी।
१८११ ई० को अंगरेजोंने यह उपद्रव निवारण करनेके लिये बटेवियाको चाक्रमण मार हस्तगत किया। उसी समय से यह हतश्रो हो गये । १८१५ ई०को पारिसको सन्धि द्वारा उस स्थान पुनः पावे भी यह पूर्ववत् प्रबल बन न सके।
चाकल घोलन्दाजको परखा उचत नहीं, स्थितिथोल पड़ी है। भारत महासागर के दोषपुच में आज भी यह मसालेका काम करते हैं। बटेविया<noinclude>{{Multicol-end}}
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२०८'''|'''अजितापौड़-अजीकव'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
{{outdent| अजितापीड (सं० पु०) नास्ति पीड़ा जयादिक्षु बाधा यस्य स अपीडः; अजिताश्चासौ अपीडश्चेति, कर्मधा०। काश्मीरके जनैक राजा। इनके पिताका त्रिभुवनापीड और इनकी माताका नाम जयादेवी था। जयादेवी अट्टूर नगरके कलपालकी कन्या थीं। उनके तुल्य सुन्दरी रमणी उस समय कोई भी न रहीं। इसीसे ललितापीड उन्हें वरण कर ले गये थे। त्रिभुवनापीड फिर इन रूपवती कामिनीको निकाल लाये। ललितापीडके औरस और जयादेवीके गर्भसे वृहस्पति नामक एक दूसरा पुत्र भी उत्पन्न हुआ था। वृहस्पति शैशवावस्थामें काश्मीरके राजा हुए, इसलिये पद्म, उत्पल, कल्याण, मम्म और धर्म नामक उनके पांच मातुल कत्तृत्व करने चल समस्त अर्थ आत्मसात् करने लगे। राजा क्रमसे बड़े हुए, चारों ओर उनके चक्षु पड़ने लगे; इसी कारणसे मातुलोंने देखा, कि तब सबकी प्रतात्मा न थी। अन्तमें उन दुराचारियोंने मारणविद्या द्वारा भागिनेयके प्राण विनष्ट किये। इसके बाद दुर्मति सोचने लगी—अब कौन राजा होगा? पांच लोगोंके पांच मत थे। अन्तमें उत्पलने अजितापीडको ही राजा बनाया। कुछ काल बाद उत्पलके साथ मम्मका घोर विरोध उपस्थित हुआ और युद्ध होनेपर वितस्ता नदी रक्तनदीमें परिणत हो गई। अन्तमें यशोधर्म्मा नामक मम्मके पुत्रने अजितापीडको राज्यच्युत किया। }}
{{outdent| अजितेन्द्रिय (सं० त्रि०) इन्द्रियोंके वशमें, विषयासक्त। }}
{{outdent| अजिन (सं० क्ली०) अज-इनच्। अजेरच्च पा.<small> ६।३।१०।</small> वीयते चिय्यते रज आदि अनेन इति। १ चर्म, चमड़ा। २ मृगचर्म, मृगछाला। (त्रि०) ३ जिन भिन्न और कुद्ध, चमड़ेको छोड़ कोई दूसरा। }}
{{outdent| अजिनपत्रा, अजिनपत्रिका, अजिनपत्री (सं० स्त्री०) <small>अजिनं चर्म तद्वत् पत्रे पर्णो यस्याः सा (इति चर्मटीकायाम मन्थरः)।</small>बहुव्री०। चमगोदड़, खगाङ्ग; जिसके पक्ष चर्मवत् हों, चमड़े-जैसे परोंवाली चिड़िया। }}
{{outdent| अजिनफला (सं० स्त्री०) अजिनमिव चर्मविकारत्वात् भस्त्रा इव फलं यस्याः। टिपारी, भंभाकार फल; वह पौधा जिसका फल भसक जैसा होता है। }}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent| अजिनयोनि (सं० पु०) मृग, हरिण; व्याघ्र। }}
{{outdent| अजिनवासिन् (सं० वि०) चमड़ेको पोशाक पहनने वाला। }}
{{outdent| अजिनसन्ध (सं० पु०) चमड़ेको सञ्चाय बेचनेवाला। }}
{{outdent| अजिर (सं० क्ली०) अज-किरच्।
<small> अजिरशिशिरशिरिखजिराजिरविशिरविदिभ्यः। उण् १।५३।</small>१ उठान, टोला। २ चत्वर, चौतरा। ३ प्राङ्गण, आंगन। ४ वात, हवा। ५ विषय, ऐन्द्रो दशरत। ६ दर्दुर, मेंढक। ७ तन्तु, जिह्वा। (त्रि०) ८ शीघ्रगामी, जल्द चलनेवाला। }}
{{C|<small> "अजिरं शाश्वते याति विषये रङ्गेऽङ्गने वनो।" (मेदिनी)</small>}}
{{outdent| अजिरवती (सं० स्त्री०) एक नदी जिसपर श्रावस्ती नगर अवस्थित था। }}
{{outdent| अजिरशोचिस् (वै० पु०) १ देदीप्यमान् वस्तु, चमकीली चीज़। २ अग्नीषोम। }}
{{outdent| अज़िरादि—अजिर आदि येषाम्। जिनके आदिमें अजिर हो, अजिर वगैरह। अज़िरादि गणमें निम्नलिखित शब्द पठित हैं,—अजिर, खदिर, पुलिन, हंस, कारण्डव और चक्रवाक। }}
{{outdent| अज़िराधिराज (वै० पु०) देवताओंका राजा, मुख्य। }}
{{outdent| अजिरोय (सं० त्रि०) न्यायालय-सम्बन्धीय, अदालतके मुतअल्लिक़। }}
{{outdent| अजिह्म (सं० त्रि०) न जिह्मः कुटिलः, नञ्-तत्।
<small> मज्जादेः सम्पदाद्योश्च। उण १।१४०।</small> ऋजु, सरल, अवक्र; सीधा, सादा, साधारण। }}
{{outdent| अजिह्मग (सं० पु०) अजिह्मं सरलं गच्छति, अजिह्म-गम्-ड। १ बाण, तीर। २ आशुग, जल्द चलनेवाला। ३ खग, चिड़िया। ४ सरलगामी, सीधे जानेवाला। }}
{{outdent| अजिह्माग्र (सं० त्रि०) सोधो नोकवाला। }}
{{outdent| अजिह्व (सं० पु०) नास्ति जिह्वा यस्य, बहुव्री०।
<small>भैरवचरिगादीनामुरधोभ्यः। उण १।१५७।</small> छिन्दन्ति अनया जिह्वा। दर्दुर, मेंढक। }}
{{outdent| अजी (हिं० अव्य०) जो, अजी; अरे। }}
{{outdent| अजीकव (सं० पु०—क्ली०) अजी-क-वा-क। व्यञ्या मरणेनानेन कं ब्रह्माणं वाति प्रोणाति (वाधं)। १ वरधनु, महादेवका धनुष। }}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२१५
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2026-07-17T17:36:49Z
Shivaniya shaw
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अजीगर्त — अजूबा'''|२०९}}</noinclude>
अजीगर्त (सं० पु० ) अज्य गमनाय गर्तमस्य । १ सर्प, सांप। २ शुनःशेफ के पिता । ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है-
हरिश्चन्द्र नामक जनैक व्यक्ति निःसन्तान थे । इसलिये उन्होंने वरुण देवसे इस वरकी प्रार्थना की, कि देवप्रसादसे यदि उनके सन्तान उत्पन्न होतो, तो वह प्रथम पुत्र वरुपको वलि देते । हरिश्चन्द्रके सन्तान हुई, जिसका उन्होंने रोहित नाम रखा । पहले वलि देनेकी प्रतिज्ञा हो चुकी थी, इसीसे वरुणने सन्तानको उनसे मांगा। किन्तु हरिश्चन्द्र अपने पुत्रको मायामें ऐसे फंसे थे, कि वह उसे वलि दे न सके। रोहितने बड़े होनेपर वनको गमन किया । परन्तु वरुणका राग क्षान्त न हुत्रा, उन्होंने हरिश्चन्द्रको जराजी कर डाला। रोहितने यह विचार, कि देवताका क्रुद्ध रहना अच्छा नहीं, एक शत धेनु दे अजगर्त नामक किसी व्यक्तिसे उनके पुत्र शुनःशेफको क्रय कर लिया। शुनःशेफ यूपकाष्ठ- से बांध दिये गये थे, केवल खड़ाघातका ही विलम्बं था। ऐसे ही समय विश्वामित्र के परामर्शसे उन्होंने वरुण देवका स्तवकर मुक्ति पाई ।
अधिक उत्पन्न होता, जहांसे बङ्गाल भेजा जाता है। भारतके कितने ही बागोंमें इसकी विस्तर कृषि होतो है। इसके चूर्णसे भी अबौर बनता है । यह सुगन्धित, उत्तेजक और वातघ्न है । पाकस्थलीको पुष्ट करने और चोट या मोचपर भी इसका प्रयोग किया जाता है। लोग मुंहका खाद बनानेको इसे चबाते और प्रसवके बाद कमज़ोर हो जानेसे शक्तिसञ्चारके लिये स्त्रियोंको खिलाते हैं । इसकी जड़ पोली हलदी जैसी होती और खानेसे कड़ लगती है । लोग इसका इत्र भी तैयार करते हैं ।
{{outdent|अजोर्णि (स० स्त्रो० ) अजीर्ण, बदहज़मी ।}}
{{outdent| अजोर्णिन्, अजीर्णो (सं० वि० ) जिसके अजीर्ण हो गया हो, बदहज़मीका बीमार ।}}
{{outdent|अजीव (सं० त्रि०)नासिक्य जीवों जीवन यस्य।}}
१ मृत, अवसन्न; मरा हुआ, ठण्डा। २ जीव अर्थात् प्राणी भिन्न अन्य वस्तु, जानदार के सिवा दूसरी चीज़।
{{outdent| अजीवत (सं० त्रि०) १ मुर्दा। २ बेकार। }}
{{outdent| अजीवन (सं० क्ली०) नास्ति जीवो जीवनं यस्य। १ मौत। २ बेकारी। }}
{{outdent| अजीवनि (सं० स्त्री०) न-जीव अनि। आक्रोशे नञानिः। पा ३।३।११२। १ शाप, बद्दुआ। २ जीवनाभाव, मौत। }}
{{outdent| अज़ीज़ (अ० वि०) १ प्रिय, प्यारा। (पु०) २ मित्र, दोस्त। ३ सम्बन्धी, रिश्तेदार। }}
{{outdent| अजीटन (अं० Adjutant का अपभ्रंश) सेनापति का सहायक कर्मचारी, अफ़सर फ़ौज का मददगार मुलाज़िम। एडजूटेण्ट। }}
{{outdent| अजीत — ताज़ा, खिला हुआ। अजित देखो। }}
{{outdent| अजीति (वै० स्त्री०) चिरवैभव, सदाबहारी। }}
{{outdent| अजीब (अ० वि०) अद्भुत, अनोखा। }}
{{outdent| अजीरन — अजीर्ण देखो। }}
{{outdent| अजीर्ण (सं० क्ली०) न-जॄ-क्त भावे। अपाक, वायुगण्ड, अन्तर्वमि, पलताशय; बदहज़मी। इस रोग का विवरण अग्निमान्द्य, उदरामय, अतिसार और आमाशय शब्द में देखो। }}
{{outdent| अजीर्णकण्टकरस (सं० पु०) अजीर्ण पर दिया जाने वाला एक औषध। }}
{{outdent| अजीर्णजरण (सं० पु०) कर्चूर, कचूर। यह चट्टग्राम में }}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
अनस्तित्व, नाहस्ती।
{{outdent| अजीवित (सं० क्ली०) १ मृत्यु, मौत। २... }}
{{outdent| अजुगुत — अजगुत देखो। }}
{{outdent| अजुगुप्सित (सं० त्रि०) न गुप निन्दायाम्-सन्-त। अनिन्दित, जिसे कोई बुरा न कहे। }}
{{outdent| अजुर, अजुर्य (वै० त्रि०) अज-कुरच्। वेगशील, बलवान्; जोरदार, ताक़तवर। }}
{{outdent| अजुष्ट (वै० त्रि०) १ अभोग्य, भोग न करने योग्य। २ असन्तोषप्रद, नागवार। }}
{{outdent| अजुष्टि (वै० स्त्री०) अप्रसन्नता; नाखुशी। }}
{{outdent| अजू — अजी देखो। }}
{{outdent| अजूजा (हिं० पु०) बिज्जू-जैसा मुर्दाख़ोर जानवर, वह पशु जो बिज्जू तुल्य होता और मृतशरीर को भोजन करता है। }}
{{outdent| अजूबा (अ० वि०) १ अनोखा, अद्भुत। (पु०) २ विचित्र वस्तु, निराली चीज़। }}
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{{outdent|अजीगर्त (सं० पु० ) अज्य गमनाय गर्तमस्य । १ सर्प, सांप। २ शुनःशेफ के पिता । ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है-}}
हरिश्चन्द्र नामक जनैक व्यक्ति निःसन्तान थे । इसलिये उन्होंने वरुण देवसे इस वरकी प्रार्थना की, कि देवप्रसादसे यदि उनके सन्तान उत्पन्न होतो, तो वह प्रथम पुत्र वरुपको वलि देते । हरिश्चन्द्रके सन्तान हुई, जिसका उन्होंने रोहित नाम रखा । पहले वलि देनेकी प्रतिज्ञा हो चुकी थी, इसीसे वरुणने सन्तानको उनसे मांगा। किन्तु हरिश्चन्द्र अपने पुत्रको मायामें ऐसे फंसे थे, कि वह उसे वलि दे न सके। रोहितने बड़े होनेपर वनको गमन किया । परन्तु वरुणका राग क्षान्त न हुत्रा, उन्होंने हरिश्चन्द्रको जराजी कर डाला। रोहितने यह विचार, कि देवताका क्रुद्ध रहना अच्छा नहीं, एक शत धेनु दे अजगर्त नामक किसी व्यक्तिसे उनके पुत्र शुनःशेफको क्रय कर लिया। शुनःशेफ यूपकाष्ठ- से बांध दिये गये थे, केवल खड़ाघातका ही विलम्बं था। ऐसे ही समय विश्वामित्र के परामर्शसे उन्होंने वरुण देवका स्तवकर मुक्ति पाई ।
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अधिक उत्पन्न होता, जहांसे बङ्गाल भेजा जाता है। भारतके कितने ही बागोंमें इसकी विस्तर कृषि होती है। इसके चूर्णसे भी अबीर बनता है । यह सुगन्धित, उत्तेजक और वातघ्न है । पाकस्थलीको पुष्ट करने और चोट या मोचपर भी इसका प्रयोग किया जाता है। लोग मुंहका खाद बनानेको इसे चबाते और प्रसवके बाद कमज़ोर हो जानेसे शक्तिसञ्चारके लिये स्त्रियोंको खिलाते हैं । इसकी जड़ पोली हलदी जैसी होती और खानेसे कड़ लगती है । लोग इसका इत्र भी तैयार करते हैं ।
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१ मृत, अवसन्न; मरा हुआ, ठण्डा। २ जीव अर्थात् प्राणी भिन्न अन्य वस्तु, जानदार के सिवा दूसरी चीज़।
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{{outdent| अजीवनि (सं० स्त्री०) न-जीव अनि।<small>आक्रोशे नञानिः। पा ३।३।११२।</small> १ शाप, बद्दुआ। २ जीवनाभाव, मौत। }}
अनस्तित्व, नाहस्ती।
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{{outdent| अजुगुप्सित (सं० त्रि०) न गुप निन्दायाम्-सन्-त। अनिन्दित, जिसे कोई बुरा न कहे। }}
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हरिश्चन्द्र नामक जनैक व्यक्ति निःसन्तान थे । इसलिये उन्होंने वरुण देवसे इस वरकी प्रार्थना की, कि देवप्रसादसे यदि उनके सन्तान उत्पन्न होतो, तो वह प्रथम पुत्र वरुपको वलि देते । हरिश्चन्द्रके सन्तान हुई, जिसका उन्होंने रोहित नाम रखा । पहले वलि देनेकी प्रतिज्ञा हो चुकी थी, इसीसे वरुणने सन्तानको उनसे मांगा। किन्तु हरिश्चन्द्र अपने पुत्रको मायामें ऐसे फंसे थे, कि वह उसे वलि दे न सके। रोहितने बड़े होनेपर वनको गमन किया । परन्तु वरुणका राग क्षान्त न हुत्रा, उन्होंने हरिश्चन्द्रको जराजी कर डाला। रोहितने यह विचार, कि देवताका क्रुद्ध रहना अच्छा नहीं, एक शत धेनु दे अजगर्त नामक किसी व्यक्तिसे उनके पुत्र शुनःशेफको क्रय कर लिया। शुनःशेफ यूपकाष्ठ- से बांध दिये गये थे, केवल खड़ाघातका ही विलम्बं था। ऐसे ही समय विश्वामित्र के परामर्शसे उन्होंने वरुण देवका स्तवकर मुक्ति पाई ।
{{outdent| अज़ीज़ (अ० वि०) १ प्रिय, प्यारा। (पु०) २ मित्र, दोस्त। ३ सम्बन्धी, रिश्तेदार। }}
{{outdent| अजीटन (अं० Adjutant का अपभ्रंश) सेनापति का सहायक कर्मचारी, अफ़सर फ़ौज का मददगार मुलाज़िम। एडजूटेण्ट। }}
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अधिक उत्पन्न होता, जहांसे बङ्गाल भेजा जाता है। भारतके कितने ही बागोंमें इसकी विस्तर कृषि होती है। इसके चूर्णसे भी अबीर बनता है । यह सुगन्धित, उत्तेजक और वातघ्न है । पाकस्थलीको पुष्ट करने और चोट या मोचपर भी इसका प्रयोग किया जाता है। लोग मुंहका खाद बनानेको इसे चबाते और प्रसवके बाद कमज़ोर हो जानेसे शक्तिसञ्चारके लिये स्त्रियोंको खिलाते हैं । इसकी जड़ पोली हलदी जैसी होती और खानेसे कड़ लगती है । लोग इसका इत्र भी तैयार करते हैं ।
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अनस्तित्व, नाहस्ती।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२१६
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" /></noinclude>
{{Rh|'''२१०'''|'''अजूरा अज्ञातवास'''|}}
अजूरा (हिं० वि० ) १ न इकट्ठा किया हुआ, गृहीत | २ न मिला हुआ, अप्राप्त । ३ गैर- हाजिर, अनुपस्थित । ४ अलग, पृथक् ; जुदा, भिन्न । अजूह (हिं० पु० ) युद्ध, जङ्ग; लड़ाई -भिड़ाई ।
अजे- अजय देखो ।
अजेइ - अजेय देखो ।
अजेतव्य (सं० त्रि०) जो जीता न जा सके, अजेय । अजेय (सं० त्रि०) न-जि-यत् । अजेतव्य, जयके अयोग्य, जो जीता जा न सके; फतहके नाकाविल । अजै—अजय देखो।
जैकपाद (सं० पु० ) अजस्य छागस्य पाद इव एक- पादो यस्य । १ रुद्रविशेष । २ शम्भु । ३ वीरभद्र । ४ पूर्वभाद्रपद नक्षत्र ।
अजैडक (सं० क्लो० ) भेड़-बकरा |
अजोग—अयोग्य देखो।
पत्ती बिका करती है। इसका फल बैंजनो बेर जैसा होता और वर्षाऋतुके समय ढाकेके बाज़ार में बिकने आता है । आसाम में भो लोग फलको खाद्य- स्वरूप व्यवहार करते हैं । इसकी लकड़ो भारो, भूरो, और कड़ी होतो ओर अरन्दा फेरनेसे खूब चमकने लगती है । अज्झल ( सं० क्लो० ) अञ्चति क्विप्-अक् ;
हलति
विलिखति, हल-अच् ; कर्मधा० । ढाल, फलक । अज्ञ (सं० त्रि० ) न जानाति, ज्ञा-क । स्वादनी जड़- मूर्खयो: ( मेदिनी) । मूर्ख, ज्ञानशून्य; बेवकूफ़, बेइला | सहज विषय भिन्न कठिन तत्त्वमें जिसका बोध प्रविष्ट नहीं होता, प्रायः जो लिखना-पढ़ना नहीं जानता, समाजके मध्य में जो अच्छी तरह बातचीत नहीं कर सकता और जो किसी विषयका सिद्धान्त करनेमें अक्षम है, उसे ही हम अज्ञ कहते हैं ।
.
अजोता ( हिं• पु० ) चैत्रको पूर्णमासी, जिस दिन अज्ञका, अज्ञिका (सं० स्त्री० ) बेसमझ स्त्री, भोली-
बैल नहीं जुतते ।
अजोरना - अंजोरना देखो ।
अजोष (वै० त्रि०) असन्तुष्ट, नाराज. |
अजोष्य (वै० त्रि०) सन्तुष्ट होनेके अयोग्य, आसूदा होनेके नाकाबिल ।
जौं (हिं० क्रि० - वि०) आज भी, अभीतक ; अद्यापि अद्यावधि |
अज्जका . ( सं॰ स्त्री॰ ) अर्जयति या सा । अर्जि-उक्, पृ० रकारस्य जत्वम् । नाव्योक्त वेश्या, नाटकको रण्डी । नाव्यादन्यव प्रयोगे नास्तीत्यर्थः (महेश्वरः) । अज्झटा (स ं० स्त्री० ) जति दोषं क्षिपति, अज- क्विप्; झटति संहन्यते, अज-भट-अच् । भूम्या- मलको पानी आंवला । यह आसाम, बङ्गाल, ब्रह्म, बम्बई और पश्चिम घाटका एक छोटा वृक्ष है, जिसकी कृषि साधारणतः भारतमें की जाती है । इसके वोजसे तेल निकलता, किन्तु उसका प्रयोग अज्ञात है । इसकी पत्तों और नई डालको लोग गरिष्ट और कसैलौ बताते और संग्रहणी, धातुक्षीणता और क्षयरोगमें खिलाते हैं । पित्त बिगड़ने से इसका फल भी लाभदायक होता है। महिसूरमें इसको
भाली औरत ।
अज्ञता (सं० स्त्री०) मूर्खता, बेवकूफी ।
अज्ञत्व
(सं० क्ली ० ) बेसमझो, नादानी ।
अज्ञात
सं० त्रि० ) न-ज्ञा-त । १ अपरिचित, जाना हुआ नहीं । २ ज्ञानका अविषयोभूत, अक्ल,से ईद |
अज्ञातक (सं० ति० ) बेजाना, नावाकिफ़ । अज्ञातकुलशील (सं० वि० ) जिसका कुल मालूम न हो, बेजाने-बूझे खान्दानका । अज्ञातकेत (वै० त्रि० )
राज़वाला ।
गुप्तभेदी,
पोशीदा
अज्ञातनामा (सं० त्रि० ) जिसका नाम ज्ञात न हो, नामालूम इस्मका ।
अज्ञातभुक्त (सं० - त्रि०) बेजानी चीज खानेवाला । अज्ञातयक्ष्म (वै० पु० ) रोग विशेष, राजयक्ष्मा । अज्ञातयौवना (सं० स्त्री० ) रखनेवाली मुग्धा, चढ़ती जवानीको न पहचाननेवाली नई औरत ।
ज्ञान न
अज्ञातवास (सं० त्रि०) जिसके रहनेको जगह जानी न हो।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''२१०'''|'''अजूरा—अज्ञातवास'''|}}
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{{outdent| अजेय (सं० त्रि०) न-जि-यत। अजेतव्य, जय के अयोग्य, जो जीता जा न सके; फ़तह के नाक़ाबिल। }}
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{{C|<small>नाट्यादन्यत्र प्रयोगे नास्तीत्यर्थः (महेश्वरः)।</small> }}
{{outdent| अज्झटा (सं० स्त्री०) अजति दोषं क्षिपति, अज-क्विप्; झटति संहन्यते, अज-झट-अच्। भूम्यामलकी, पानी आँवला। यह आसाम, बङ्गाल, ब्रह्म, बम्बई और पश्चिम घाट का एक छोटा वृक्ष है, जिसकी कृषि साधारणतः भारत में की जाती है। इसके बीज से तेल निकलता, किन्तु उसका प्रयोग अज्ञात है। इसकी पत्ती और नई डाल को लोग गरिष्ठ और कसैली बताते और संग्रहणी, धातुक्षीणता और क्षयरोग में खिलाते हैं। पित्त बिगड़ने से इसका फल भी लाभदायक होता है। मैसूर में इसकी
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पत्ती बिका करती है। इसका फल बैंजनी बेर जैसा होता और वर्षाऋतु के समय ढाके के बाज़ार में बिकने आता है। आसाम में भी लोग फल को खाद्य-स्वरूप व्यवहार करते हैं। इसकी लकड़ी भारी, भूरी और कड़ी होती है और रन्दा फेरने से खूब चमकने लगती है। }}
{{outdent| अज्झल (सं० क्ली०) अञ्चति क्विप्-अक्; हलति विलिखति, हल-अच्; कर्मधा०। ढाल, फलक। }}
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{{outdent| अज्ञातयक्ष्म (वै० पु०) रोगविशेष, राजयक्ष्मा। }}
{{outdent| अज्ञातयौवना (सं० स्त्री०) ज्ञान न रखने वाली मुग्धा, चढ़ती जवानी को न पहचानने वाली नई औरत। }}
{{outdent| अज्ञातवास (सं० त्रि०) जिसके रहने की जगह जानी न हो। }}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२१७
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अज्ञातशोल-अनंच्ल|२११}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>अज्ञातशील ( सं० त्रि० ) जिसको चाल मालूम न हो, बेजाने चालचलनवाला ।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
अज्यू (वै० त्रि० ) १ खेतका । २ मैदानवाला । अज्विन् (सं० त्रि० ) तेज़, चालाक ।
अज्ञात (सं० पु० ) असम्बन्धीय पुरुष, बेरिश्ता अमर (हिं० वि०) न भरनेवाला,
और नाता ।
२११
पतनशून्य,
न बरसनेवाला ।
१ विना
अोरो (हिं० स्त्री० ) थैली, अधारी ।
अञ्चक
(सं० क्क़ी ० ) नेत्र, आंख ।
अज्ञान ( सं० त्रि०) नास्ति ज्ञानं यस्य । ज्ञानका, बेवकूफ । ( क्लो० ) न ज्ञानम् । २ ज्ञाना- भाव, बेवकूफी । ३ विरुद्ध ज्ञान, उलटी समझ । श्रीमद्भागवतके मतसे सृष्टिकाल में ब्रह्माने पांच प्रकारके अज्ञानोंको कल्पना की थी । यथा - तमः, मोह, महामोह, तामिश्र और अन्धतामिश्र । वेदान्त- मतसे सत् और असत् समझने के लिये जो त्रिगुणा- भावरूप ज्ञान है, उसके विरोधीको अज्ञान
त्मक
कहते हैं ।
अज्ञानकृत (सं० त्रि०) बेजाने किया गया । अज्ञानतस्, अज्ञानात् (सं० अव्य० ) बेजाने-समझे, विना विचारे ।
अज्ञानता (सं० स्त्री०) बेवक फो, मूर्खता; लाइल्मी, हिमाकत, बेसमझी।
अज्ञानपन ( हिं० पु० ) बेवकूफौ, मूर्खता । अज्ञानवन्धन (स ं० क्लो० ) मूर्खताका हिमाकतको जकड़ ।
बंधाव,
`अज्ञानिन्, अज्ञानी ( सं० त्रि० ) मूर्ख, बेवकूफ । ) असम्बन्धीय पुरुष, जो रिश्तेदार
अज्ञास् (वै० पु०
न हो । अज्ञेय (सं० त्रि. ) ज्ञानके अयोग्य, अक्ल से बाहर । अज्म (वै० पु० ) जङ्ग, युद्ध |
'अज्मन् (सं० स्त्री० ) अजति गच्छति स्वर्ग दानेन अनया, अज्-मनिन् करणे । जिसे दानकर लोग स्वर्ग जाते हैं ; गो, गाय ।
अज्यानि (वै० स्त्री० ) नष्ट न होनेवाली प्रकृति । अज्येष्ठ ( स ं० त्रि० ) बड़ा या बुजुर्ग नहीं । ज्येष्ठवृत्ति (सं० त्रि०) जिसका स्वभाव बड़ोंकासा न हो ।
'अज्यों-जौं' देखो।
अज्र (वै० पु० ) १ खेत । २ मैदान । (त्रि०) ३ तेज,
चालाक ।
{{outdent|अञ्चति
(सं० पु० -क्ली०) अनच्-अति । अच को वा । उय् ४।६१| १ वायु, हवा । (त्रि०) २ गतिशील, चलनेवाला ।}}
{{outdent|अञ्चल (सं० पु० ) अञ्च- अलच् । आंचल, प्रान्तभाग, दामन । कपड़ेकौ जिस ओर बेल-बूटे और किनारीका अधिक सौन्दर्य रहता, उसे आंचल या अंचला कहते हैं। इस देशको स्त्रियोंके वस्त्रों में ही आंचल होता है। पुरुषोंके वस्त्रोंका भी प्रान्तभाग है, परन्तु उसे चल नहीं कहते । est गृहिणी स्त्रियोंके चल लथेरते-लघेरते चलनेको बड़ा कुलक्षण समझती हैं । स्त्रियोंको ऐसा विश्वास है, कि भूतप्रेतादि कपड़े का आंचल पकड़ शरीरमें प्रवेश करते हैं ।}}
अञ्चलका अपभ्रंश आंचल या अंचला है। प्रतिमाको सज्जित करते समय जो डङ्गका गहना देवीको छातीपर लटका दिया जाता, उसे भी प्रांचल कहते हैं । नया कपड़ा जब कितनी हो उड़िया, बङ्गाली और विहारी स्त्रियां पहनतीं, तब अचलका एक कोना हलदोसे रंग लेतीं और आंचलका कुछ सूत खोल और टुकड़े-टुकड़े कर कांटे, खोंचे, चोर और अग्नि प्रभृतिको समर्पण करती हैं । इसका तात्पर्य यह है, कि कांटा प्रभृति समस्त शत्रुओंका अंश दिया गया, इस- लिये आगे कोई अनिष्ट न करेगा। जब भाग दे दिया गया, तब कांटा उसे क्यों छेदेगा या अग्नि ही उसे क्यों जलायेगी ? कोई बात मनमें बनाई रखनेके लिये स्त्रियां आंचल के
एक कोने में गांठ लगा
देती हैं । बालकोंके माथे में कपड़े का आंचल लगने- से अकल्याण होता है । इसलिये हठात् किसी शिशुके माथेमें आंचल छू जानेसे एकबार उसे मट्टोमें लथेरना पड़ता, जिससे सब दोष दूर हो जाता है । विवाहमें कन्याका आंचल और वरका दुपट्टा गांठ देकर जोड़ दिया जाता है ।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude>
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३८४'''|'''अनजोखा—अनतिविलम्बित'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नशा समा जाता। ४ वृक्षविशेष, एक पेड़ जिसे 'अनजान' कहते हैं।
अनोखा (हिं॰ वि॰) परिमाणरहित, बेवज़न, बेतौल; जो जोखा या तौला न गया हो।
अनञ्जन (सं॰ क्ली॰) न अज्यते लिप्यते; अञ्ज ल्युट् कर्मणि, नञ्-तत्। १ आकाश, आसमान। २ वायुमण्डल, हवाका कुरह। ३ विष्णु। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। ४ कज्जलशून्य, सुरमेसे ख़ाली। ५ दोषरहित, बेऐब।
अनट (हिं॰ पु॰) अत्याचार, उपद्रव; जुल्म, बलवा।
अनडीठ (हिं॰ वि॰) अदृष्ट, न देखा हुआ।
अनडुजिह्वा (सं॰ स्त्री॰) अनडुहो-जिह्वेव। गोजिह्वा, अनन्तमूल। इसकी पत्ती मवेशियोंकी जीभ-जैसी होती है। (Elephantopus Scaber)
अनडुत्क (सं॰ त्रि॰) बैल रखनेवाला, जो बैल रखे।
अनडुद्द (सं॰ पु॰) वृषभदाता, बैलको दान करनेवाला आदमी।
अनडुह् (सं॰ पु॰) अनः शकटं वहतीति निपातनात्। <small>चतुरनडुहोरामुदात्तः। पा ७।१।९८।</small> अनड्डान्। १ वृष, बैल जो गाड़ी खींचता है। २ वृषराशि।
अनडुह (सं॰ पु॰) गोत्रविशेषके प्रधानका नाम।
अनडुही, अनड्वाही (सं॰ स्त्री॰) गौ, गाय।
अनणु (सं॰ पु॰) न अणुः। १ स्थूल धान्य, मोटा अनाज। (त्रि॰) २ स्थूल, अणुभिन्न; मोटा।
अनत (सं॰ त्रि॰) झुका हुआ नहीं, जो नीचा न हुआ हो। २ सीधा, खड़ा। ३ कठिन, चिमड़ा। ४ अभिमानी, शोख़। (हिं॰ क्रि॰-वि॰) ५ यहां नहीं, किसी दूसरे स्थानमें, दूसरी जगहपर।
अनति (सं॰ त्रि॰) अधिक नहीं, न्यून; ज्यादा नहीं, कम। (स्त्री॰) २ सुशीलताका अभाव, शायस्तगीकी नामौजूदगी। ३ अहङ्कार, फ़ख़्र।
अनतिक्रम (सं॰ पु॰) न अतिक्रमः, नञ्-तत्। अतिक्रमका न उठाना, हदसे बाहर न जाना।
अनतिक्रमणीय (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। अतिक्रमके अयोग्य, लांघने नाक़ाबिल।
अनतिदृश्य (वै॰ त्रि॰) १ अनुज्ज्वल, मलिन; जो<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>शफ़ाफ़् नहीं। २ अतिशय प्रकट, निहायत नमूदार।
अनतिभूत (सं॰ त्रि॰) सर्वानतिक्रम्य न भवति, अति-भू-डुतच्। यथार्थभूत, सच्चे तौरसे हुआ। (पु॰) २ वह मनुष्य जिसे किसीने लांघा न हो, ला-सबक़त।
अनतिप्रश्ना (सं॰ त्रि॰) न अतिप्रश्नमर्हति यत्। अतिप्रश्नके अयोग्य, ज्य़ादा सवाल करनेके नाक़ाबिल।
अनतिरिक्त (सं॰ त्रि॰) न अतिरिक्तम्, नञ-तत्। अनधिक, थोड़ा। न्यायमतसे अपनी अन्यूनवृत्ति या प्रमेय अनतिरिक्त है।
अनतिविलम्बित (सं॰ स्त्री॰) अभावार्थे नञ्-तत्। १ अतिविलम्बाभाव, ज्य़ादा वक़फ़े की नामौजूदगी। २ वाग्गुणविशेष, ज़बानकी एक सिफ़त। हेमचन्द्रके अभिधान-चिन्तामणिमें कई एक वाग्गुण लिखे हैं—
{{Block center|<poem><small>“संस्कारवत्वमौदार्यमुपचारपरीतता ।
मेघनिर्घोषगाम्भीर्य' प्रविनादविधायिता ॥
दक्षिणत्वमुपनीतरागत्वश्च महार्थता ।
श्रव्याहतत्व' शिष्टत्व' स शयानामसम्भवः ।
निराकृतान्योत्तरत्व' हृदयङ्गमितापि च ।
मिथः साकाङ चता प्रस्तावौचित्य तत्त्वनिष्ठता ॥
अप्रकीर्ण प्रसृतत्वमस' श्लाघ्यानिन्दितता ।
आभिजात्यमतिस्निग्ध मधुरत्व प्रशस्यता ॥
श्रमर्मबोधितौदार्थ' धर्मार्थप्रविवद्धता ।
कारकाद्यविपर्यासो विभ्रमादिवियुक्तता ॥
चित्रकत्वमद्भुतत्व' तथानतिविलम्बिता ।
अनेक जातिवैचिवग्रमारोपितविशेषता ॥
सत्वप्रधानता वर्णपदवाक्यविविक्तताः ।
अव्युत्थितिरखेदित्व' पञ्चवि ंशञ्च वाग ्मगुणाः ॥”</small></poem>}}
'सब मिलाके पैंतीस वाग्गुण होते हैं, १ संस्कारवत्व - वाक्यके व्याकरणसिद्ध कृत्तचित समासादिका संस्कारगुण अर्थात् व्याकरणशुद्धि ; २ औदार्य — वाक्यको उदारता, महत्व या उत्कर्ष - गुण; ३ उपचारपरीतता — यथायोग्य शब्द या अर्थका
समावेश-गुण या लाक्षणिक अर्थको शून्यता ; ५ मेघ- निर्घोष-गाम्भीर्य – मेघनादकी तरह शब्दका गाम्भीर्य -गुण यानी शब्दका गाढ़ प्रयोग ; ५ प्रतिनाद- विधायिता - उच्चारणकालमें शब्दका प्रतिध्वनि-जनक- गुण; ६ दक्षिणत्व - सरलता या प्रसाद-गुण; ७ उप- नौतरागत्व - ऐसा गुण जिसे सुनने या कहने से अनु-<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३८४'''|'''अनजोखा—अनतिविलम्बित'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नशा समा जाता। ४ वृक्षविशेष, एक पेड़ जिसे 'अनजान' कहते हैं।
अनोखा (हिं॰ वि॰) परिमाणरहित, बेवज़न, बेतौल; जो जोखा या तौला न गया हो।
अनञ्जन (सं॰ क्ली॰) न अज्यते लिप्यते; अञ्ज ल्युट् कर्मणि, नञ्-तत्। १ आकाश, आसमान। २ वायुमण्डल, हवाका कुरह। ३ विष्णु। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। ४ कज्जलशून्य, सुरमेसे ख़ाली। ५ दोषरहित, बेऐब।
अनट (हिं॰ पु॰) अत्याचार, उपद्रव; जुल्म, बलवा।
अनडीठ (हिं॰ वि॰) अदृष्ट, न देखा हुआ।
अनडुजिह्वा (सं॰ स्त्री॰) अनडुहो-जिह्वेव। गोजिह्वा, अनन्तमूल। इसकी पत्ती मवेशियोंकी जीभ-जैसी होती है। (Elephantopus Scaber)
अनडुत्क (सं॰ त्रि॰) बैल रखनेवाला, जो बैल रखे।
अनडुद्द (सं॰ पु॰) वृषभदाता, बैलको दान करनेवाला आदमी।
अनडुह् (सं॰ पु॰) अनः शकटं वहतीति निपातनात्। <small>चतुरनडुहोरामुदात्तः। पा ७।१।९८।</small> अनड्डान्। १ वृष, बैल जो गाड़ी खींचता है। २ वृषराशि।
अनडुह (सं॰ पु॰) गोत्रविशेषके प्रधानका नाम।
अनडुही, अनड्वाही (सं॰ स्त्री॰) गौ, गाय।
अनणु (सं॰ पु॰) न अणुः। १ स्थूल धान्य, मोटा अनाज। (त्रि॰) २ स्थूल, अणुभिन्न; मोटा।
अनत (सं॰ त्रि॰) झुका हुआ नहीं, जो नीचा न हुआ हो। २ सीधा, खड़ा। ३ कठिन, चिमड़ा। ४ अभिमानी, शोख़। (हिं॰ क्रि॰-वि॰) ५ यहां नहीं, किसी दूसरे स्थानमें, दूसरी जगहपर।
अनति (सं॰ त्रि॰) अधिक नहीं, न्यून; ज्यादा नहीं, कम। (स्त्री॰) २ सुशीलताका अभाव, शायस्तगीकी नामौजूदगी। ३ अहङ्कार, फ़ख़्र।
अनतिक्रम (सं॰ पु॰) न अतिक्रमः, नञ्-तत्। अतिक्रमका न उठाना, हदसे बाहर न जाना।
अनतिक्रमणीय (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। अतिक्रमके अयोग्य, लांघने नाक़ाबिल।
अनतिदृश्य (वै॰ त्रि॰) १ अनुज्ज्वल, मलिन; जो<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>शफ़ाफ़् नहीं। २ अतिशय प्रकट, निहायत नमूदार।
अनतिभूत (सं॰ त्रि॰) सर्वानतिक्रम्य न भवति, अति-भू-डुतच्। यथार्थभूत, सच्चे तौरसे हुआ। (पु॰) २ वह मनुष्य जिसे किसीने लांघा न हो, ला-सबक़त।
अनतिप्रश्ना (सं॰ त्रि॰) न अतिप्रश्नमर्हति यत्। अतिप्रश्नके अयोग्य, ज्य़ादा सवाल करनेके नाक़ाबिल।
अनतिरिक्त (सं॰ त्रि॰) न अतिरिक्तम्, नञ-तत्। अनधिक, थोड़ा। न्यायमतसे अपनी अन्यूनवृत्ति या प्रमेय अनतिरिक्त है।
अनतिविलम्बित (सं॰ स्त्री॰) अभावार्थे नञ्-तत्। १ अतिविलम्बाभाव, ज्य़ादा वक़फ़े की नामौजूदगी। २ वाग्गुणविशेष, ज़बानकी एक सिफ़त। हेमचन्द्रके अभिधान-चिन्तामणिमें कई एक वाग्गुण लिखे हैं—
{{Block center|<poem><small>"संस्कारवत्वमौदार्यमुपचारपरीतता।
मेघनिर्घोषगाम्भीर्यं प्रविनादविधायिता॥
दक्षिणत्वमुपनीतरागत्वश्च महार्थता।
अव्याहतत्वं शिष्टत्वं संशयानामसम्भवः।
निराकृतान्योत्तरत्वं हृदयङ्गमितापि च।
मिथः साकाङ् क्षता प्रस्तावौचित्यं तत्त्वनिष्ठता॥
अप्रकीर्ण प्रसृतत्वमसं श्लाघ्यानिन्दितता।
आभिजात्यमतिस्निग्ध मधुरत्वं प्रशस्यता॥
अमर्मबोधितौदार्यं धर्मार्थप्रविबद्धता।
कारकाद्यविपर्यासो विभ्रमादिवियुक्तता॥
चित्रकृत्वमद्भुतत्वं तथानतिविलम्बिता।
अनेक जातिवैचिवत्रामारोपितविशेषता॥
सत्वप्रधानता वर्णपदवाक्यविविक्तताः।
अव्युत्थितिरखेदित्वं पञ्चत्रिं शञ्च वाग् गुणाः॥"</small></poem>}}
'सब मिलाके पैंतीस वाग्गुण होते हैं,—१ संस्कारवत्व—वाक्यके व्याकरणसिद्ध कृत्तद्धित समासादिका संस्कारगुण अर्थात् व्याकरणशुद्धि; २ औदार्य—वाक्यकी उदारता, महत्व या उत्कर्ष-गुण; ३ उपचारपरीतता—यथायोग्य शब्द या अर्थका समावेश-गुण या लाक्षणिक अर्थकी शूशून्यत; ५ मेघ-निर्घोष-गाम्भीर्य—मेघनादकी तरह शब्दका गाम्भीर्य-गुण यानी शब्दका गाढ़ प्रयोग; ५ प्रतिनाद-विधायिता—उच्चारणकालमें शब्दका प्रतिध्वनि-जनक-गुण; ६ दक्षिणत्व—सरलता या प्रसाद-गुण; ७ उप-नीतरागत्व—ऐसा गुण जिसे सुनने या कहने से अनु-<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अनोखा (हिं॰ वि॰) परिमाणरहित, बेवज़न, बेतौल; जो जोखा या तौला न गया हो।
अनञ्जन (सं॰ क्ली॰) न अज्यते लिप्यते; अञ्ज ल्युट् कर्मणि, नञ्-तत्। १ आकाश, आसमान। २ वायुमण्डल, हवाका कुरह। ३ विष्णु। (त्रि॰) नञ्-बहुव्री॰। ४ कज्जलशून्य, सुरमेसे ख़ाली। ५ दोषरहित, बेऐब।
अनट (हिं॰ पु॰) अत्याचार, उपद्रव; जुल्म, बलवा।
अनडीठ (हिं॰ वि॰) अदृष्ट, न देखा हुआ।
अनडुजिह्वा (सं॰ स्त्री॰) अनडुहो-जिह्वेव। गोजिह्वा, अनन्तमूल। इसकी पत्ती मवेशियोंकी जीभ-जैसी होती है। (Elephantopus Scaber)
अनडुत्क (सं॰ त्रि॰) बैल रखनेवाला, जो बैल रखे।
अनडुद्द (सं॰ पु॰) वृषभदाता, बैलको दान करनेवाला आदमी।
अनडुह् (सं॰ पु॰) अनः शकटं वहतीति निपातनात्। <small>चतुरनडुहोरामुदात्तः। पा ७।१।९८।</small> अनड्डान्। १ वृष, बैल जो गाड़ी खींचता है। २ वृषराशि।
अनडुह (सं॰ पु॰) गोत्रविशेषके प्रधानका नाम।
अनडुही, अनड्वाही (सं॰ स्त्री॰) गौ, गाय।
अनणु (सं॰ पु॰) न अणुः। १ स्थूल धान्य, मोटा अनाज। (त्रि॰) २ स्थूल, अणुभिन्न; मोटा।
अनत (सं॰ त्रि॰) झुका हुआ नहीं, जो नीचा न हुआ हो। २ सीधा, खड़ा। ३ कठिन, चिमड़ा। ४ अभिमानी, शोख़। (हिं॰ क्रि॰-वि॰) ५ यहां नहीं, किसी दूसरे स्थानमें, दूसरी जगहपर।
अनति (सं॰ त्रि॰) अधिक नहीं, न्यून; ज्यादा नहीं, कम। (स्त्री॰) २ सुशीलताका अभाव, शायस्तगीकी नामौजूदगी। ३ अहङ्कार, फ़ख़्र।
अनतिक्रम (सं॰ पु॰) न अतिक्रमः, नञ्-तत्। अतिक्रमका न उठाना, हदसे बाहर न जाना।
अनतिक्रमणीय (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। अतिक्रमके अयोग्य, लांघने नाक़ाबिल।
अनतिदृश्य (वै॰ त्रि॰) १ अनुज्ज्वल, मलिन; जो<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>शफ़ाफ़् नहीं। २ अतिशय प्रकट, निहायत नमूदार।
अनतिभूत (सं॰ त्रि॰) सर्वानतिक्रम्य न भवति, अति-भू-डुतच्। यथार्थभूत, सच्चे तौरसे हुआ। (पु॰) २ वह मनुष्य जिसे किसीने लांघा न हो, ला-सबक़त।
अनतिप्रश्ना (सं॰ त्रि॰) न अतिप्रश्नमर्हति यत्। अतिप्रश्नके अयोग्य, ज्य़ादा सवाल करनेके नाक़ाबिल।
अनतिरिक्त (सं॰ त्रि॰) न अतिरिक्तम्, नञ-तत्। अनधिक, थोड़ा। न्यायमतसे अपनी अन्यूनवृत्ति या प्रमेय अनतिरिक्त है।
अनतिविलम्बित (सं॰ स्त्री॰) अभावार्थे नञ्-तत्। १ अतिविलम्बाभाव, ज्य़ादा वक़फ़े की नामौजूदगी। २ वाग्गुणविशेष, ज़बानकी एक सिफ़त। हेमचन्द्रके अभिधान-चिन्तामणिमें कई एक वाग्गुण लिखे हैं—
{{Block center|<poem><small>"संस्कारवत्वमौदार्यमुपचारपरीतता।
मेघनिर्घोषगाम्भीर्यं प्रविनादविधायिता॥
दक्षिणत्वमुपनीतरागत्वश्च महार्थता।
अव्याहतत्वं शिष्टत्वं संशयानामसम्भवः।
निराकृतान्योत्तरत्वं हृदयङ्गमितापि च।
मिथः साकाङ् क्षता प्रस्तावौचित्यं तत्त्वनिष्ठता॥
अप्रकीर्ण प्रसृतत्वमसं श्लाघ्यानिन्दितता।
आभिजात्यमतिस्निग्ध मधुरत्वं प्रशस्यता॥
अमर्मबोधितौदार्यं धर्मार्थप्रविबद्धता।
कारकाद्यविपर्यासो विभ्रमादिवियुक्तता॥
चित्रकृत्वमद्भुतत्वं तथानतिविलम्बिता।
अनेक जातिवैचिवत्रामारोपितविशेषता॥
सत्वप्रधानता वर्णपदवाक्यविविक्तताः।
अव्युत्थितिरखेदित्वं पञ्चत्रिं शञ्च वाग् गुणाः॥"</small></poem>}}
'सब मिलाके पैंतीस वाग्गुण होते हैं,—१ संस्कारवत्व—वाक्यके व्याकरणसिद्ध कृत्तद्धित समासादिका संस्कारगुण अर्थात् व्याकरणशुद्धि; २ औदार्य—वाक्यकी उदारता, महत्व या उत्कर्ष-गुण; ३ उपचारपरीतता—यथायोग्य शब्द या अर्थका समावेश-गुण या लाक्षणिक अर्थकी शूशून्यत; ५ मेघ-निर्घोष-गाम्भीर्य—मेघनादकी तरह शब्दका गाम्भीर्य-गुण यानी शब्दका गाढ़ प्रयोग; ५ प्रतिनाद-विधायिता—उच्चारणकालमें शब्दका प्रतिध्वनि-जनक-गुण; ६ दक्षिणत्व—सरलता या प्रसाद-गुण; ७ उप-नीतरागत्व—ऐसा गुण जिसे सुनने या कहने से अनु-<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३९२
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनतिविलम्बिता—अनद्यतन'''|'''३८५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>राग उत्पन्न हो; ८ महार्थता—अर्थके गौरवका गुण; ९ अव्याहतत्व—ऐसा गुण जो खण्डन न किया जाये; १० शिष्टत्व—शिष्टप्रयोगका गुण अर्थात् ग्राम्यादि दोषकी परिशून्यता; ११ संशयासम्भव—ऐसा गुण जिसमें संशय उत्पन्न न हो सके; १२ निरा-कृतान्योत्तरत्व—ऐसा गुण जिससे दूसरेका प्रतिकूल उत्तर खण्डित हो सके; १३ हृदयङ्गमिता—ऐसा गुण जिससे भाव सहजमें हृदयगत हो जाये; १४ मिथःसाकाङ्क्षता—वह गुण जिसमें वाक्यकी परस्पर आकङ्क्षा या सम्बन्ध रहे; १५ प्रस्तावौचित्य—प्रस्तावानुरूप वाक्य प्रयुक्त करनेवाला गुण; १६ तत्त्व-निष्ठता—वाक्यकी सारगर्भता या उसके गूढ़ाथका गुण; १७ अप्रकीर्णप्रसृतत्त्व—सुश्रृङ्खल अर्थात् अमिश्रित रूपकी विस्तृति या फैलाव; १८ असंश्लाघ्य—श्लाघ्य-शून्यता; १९ अनिन्दितता—निन्दा शूतन्या; २० आभिजात्य—पाण्डित्य-गुणकी प्रकाशकता; २१ अतिस्निग्ध-मधुरत्व—अतिशय कोमलत्व और माधुर्यका गुण; २२ प्रशस्यता—प्रशस्त शब्द और उत्कृष्ट भावादिके प्रयोगका गुण; २३ अमर्मबोधितौदार्य—अर्थका ईषत् प्रच्छन्नभाव और उसकी सरलताका गुण; २४ धर्मार्थप्रतिविद्धता—धर्मार्थयुक्त गुण; २५ कारकाद्यविपर्यास—ऐसा गुण जिसमें कारकादिका परस्पर सच्चा अन्वय लगे; २६ विभ्रमादि-वियुक्तता-भ्रमशून्यता; २७ चित्रकत्व—पद्मादिके चित्रकी रचनासे मिला गुण या चमत्कारकारित्व;
१८ अद्भुतत्व—कौतुकोत्पादक गुण; २९ अनति-विलम्बिता-अधिक विलम्बसे अर्थके बोध न होनेका गुण; ३० अनेकजातिवैचित्त्रा—नानाप्रकार से अर्थ अलङ्कार या छन्दकी विचित्रता; ३१ आरोपितविशे षता—एक वस्तुमें दूसरी वस्तुवाले धर्मके आरोपका गुण; ३२ सत्त्वप्रधानता—सत्वगुणके प्राधान्यकी प्रकाशिता; ३३ वर्णपदवाक्यविविक्तता—वर्ण, पद और वाक्यमें परस्पर भेदके लिये विच्छेदकी रक्षा;
३४ अव्युत्थिति—विरोधका राहित्य और ३५ अखेदित्व—खेदकी शून्यता।
पुस्तकविशेषमें वाग्गुणके कई पाठान्तर विद्यमान
हैं। कहीं-कहीं शिष्टत्वकी जगह श्लिष्टत्व और अमर्मबोधितौदार्यकी जगह अमर्मबेधितौदार्य लिखा है।
अनत्यन्तगति (सं॰ स्त्री॰) १ सामान्य शब्दोका अर्थ, आम लफ़जोंके माने। २ गति जो अधिक न हो, जो चाल ज्यादा ज़ोरकी नहीं।
अनत्यय (सं॰ त्रि॰) विनाशशून्य, खण्डरहित; लाज़वाल, समूचा; जो मिट न सके, टूटा हुआ नहीं।
अनत्युद्य (वै॰ त्रि॰) वर्णन करनेको पूर्ण रूपसे अयोग्य, ज़िक्र करनेके लिये बिलकुल नाक़ाबिल।
अनदत् (सं॰ त्रि॰) भोजन न करता हुआ, जो खाता हुआ नहीं।
अनदेखा (हिं॰ वि॰) न देखा हुआ, जो देखा न गया हो।
अनद्धा, अनद्धो (वै॰ अव्य॰ ) न अड्धा। १ अनिश्चित रूपसे, अयथार्थ रूपसे; सच्चे तौरपर नहीं, दरअसल नहीं। २ अप्रकाश्यरूपसे, साफ़-साफ़ नहीं। <small>'तत्त्वेत्वद्धाञ्जसाद्वयम्।' (इत्यमरः)</small> (त्रि॰) नह-क्त, नञ्-तत्। ३ अपरिबद्द; न बंधा हुआ, खुला।
अनापुरुष (वै॰ पु॰) न अड्डा स्वकार्ये निश्चयो यस्य तादृशः पुरुषः। देव-पितृ-कार्यसे विमुख व्यक्ति, जो आदमी पूजा-पाठ और श्राद्ध-तर्पण न करे।
अनड्धा-मिश्रित-वचन (सं॰ क्ली॰) जैन-मतसे—समयके विषयमें असत्य-कथन, वक्त बतानेकी झूटी बात।
अनद्य (सं॰ पु॰) न अद्यः भक्ष्यः, अप्राशस्ते्य नञ्-तत्। १ गौर-सर्षप, सफ़ेद सरसों। (त्रि॰) २ अभक्ष्य, खानेके नाक़ाबिल।
अनद्यतन (सं॰ पु॰) नञ्-तत्। अद्यतन भिन्न भूत भविष्यत् काल, ज़माना जो मौजूद रोज़में काम न आये। <small>अद्यतन देखो।</small> गत रात्रिके अन्तिम दो प्रहर ओर आगामी रात्रिके प्रथम दो प्रहर, इन दोनोके मध्यका समस्त दिवस परित्यागकर अवशिष्ट विगत या भविष्यत् समय अनद्यतन कहलाता है। गत
अर्धरात्रके प्रथम समयका भूत-अनद्यतन और आगामी अर्धरात्रके पिछले समयका नाम भविष्यत् अनद्यतन है।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनतिविलम्बिता—अनद्यतन'''|'''३८५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>राग उत्पन्न हो; ८ महार्थता—अर्थके गौरवका गुण; ९ अव्याहतत्व—ऐसा गुण जो खण्डन न किया जाये; १० शिष्टत्व—शिष्टप्रयोगका गुण अर्थात् ग्राम्यादि दोषकी परिशून्यता; ११ संशयासम्भव—ऐसा गुण जिसमें संशय उत्पन्न न हो सके; १२ निरा-कृतान्योत्तरत्व—ऐसा गुण जिससे दूसरेका प्रतिकूल उत्तर खण्डित हो सके; १३ हृदयङ्गमिता—ऐसा गुण जिससे भाव सहजमें हृदयगत हो जाये; १४ मिथःसाकाङ्क्षता—वह गुण जिसमें वाक्यकी परस्पर आकङ्क्षा या सम्बन्ध रहे; १५ प्रस्तावौचित्य—प्रस्तावानुरूप वाक्य प्रयुक्त करनेवाला गुण; १६ तत्त्व-निष्ठता—वाक्यकी सारगर्भता या उसके गूढ़ाथका गुण; १७ अप्रकीर्णप्रसृतत्त्व—सुश्रृङ्खल अर्थात् अमिश्रित रूपकी विस्तृति या फैलाव; १८ असंश्लाघ्य—श्लाघ्य-शून्यता; १९ अनिन्दितता—निन्दा शूतन्या; २० आभिजात्य—पाण्डित्य-गुणकी प्रकाशकता; २१ अतिस्निग्ध-मधुरत्व—अतिशय कोमलत्व और माधुर्यका गुण; २२ प्रशस्यता—प्रशस्त शब्द और उत्कृष्ट भावादिके प्रयोगका गुण; २३ अमर्मबोधितौदार्य—अर्थका ईषत् प्रच्छन्नभाव और उसकी सरलताका गुण; २४ धर्मार्थप्रतिविद्धता—धर्मार्थयुक्त गुण; २५ कारकाद्यविपर्यास—ऐसा गुण जिसमें कारकादिका परस्पर सच्चा अन्वय लगे; २६ विभ्रमादि-वियुक्तता-भ्रमशून्यता; २७ चित्रकत्व—पद्मादिके चित्रकी रचनासे मिला गुण या चमत्कारकारित्व;
१८ अद्भुतत्व—कौतुकोत्पादक गुण; २९ अनति-विलम्बिता-अधिक विलम्बसे अर्थके बोध न होनेका गुण; ३० अनेकजातिवैचित्त्रा—नानाप्रकार से अर्थ अलङ्कार या छन्दकी विचित्रता; ३१ आरोपितविशे षता—एक वस्तुमें दूसरी वस्तुवाले धर्मके आरोपका गुण; ३२ सत्त्वप्रधानता—सत्वगुणके प्राधान्यकी प्रकाशिता; ३३ वर्णपदवाक्यविविक्तता—वर्ण, पद और वाक्यमें परस्पर भेदके लिये विच्छेदकी रक्षा;
३४ अव्युत्थिति—विरोधका राहित्य और ३५ अखेदित्व—खेदकी शून्यता।
पुस्तकविशेषमें वाग्गुणके कई पाठान्तर विद्यमान<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>हैं। कहीं-कहीं शिष्टत्वकी जगह श्लिष्टत्व और अमर्मबोधितौदार्यकी जगह अमर्मबेधितौदार्य लिखा है।
अनत्यन्तगति (सं॰ स्त्री॰) १ सामान्य शब्दोका अर्थ, आम लफ़जोंके माने। २ गति जो अधिक न हो, जो चाल ज्यादा ज़ोरकी नहीं।
अनत्यय (सं॰ त्रि॰) विनाशशून्य, खण्डरहित; लाज़वाल, समूचा; जो मिट न सके, टूटा हुआ नहीं।
अनत्युद्य (वै॰ त्रि॰) वर्णन करनेको पूर्ण रूपसे अयोग्य, ज़िक्र करनेके लिये बिलकुल नाक़ाबिल।
अनदत् (सं॰ त्रि॰) भोजन न करता हुआ, जो खाता हुआ नहीं।
अनदेखा (हिं॰ वि॰) न देखा हुआ, जो देखा न गया हो।
अनद्धा, अनद्धो (वै॰ अव्य॰ ) न अड्धा। १ अनिश्चित रूपसे, अयथार्थ रूपसे; सच्चे तौरपर नहीं, दरअसल नहीं। २ अप्रकाश्यरूपसे, साफ़-साफ़ नहीं। <small>'तत्त्वेत्वद्धाञ्जसाद्वयम्।' (इत्यमरः)</small> (त्रि॰) नह-क्त, नञ्-तत्। ३ अपरिबद्द; न बंधा हुआ, खुला।
अनापुरुष (वै॰ पु॰) न अड्डा स्वकार्ये निश्चयो यस्य तादृशः पुरुषः। देव-पितृ-कार्यसे विमुख व्यक्ति, जो आदमी पूजा-पाठ और श्राद्ध-तर्पण न करे।
अनड्धा-मिश्रित-वचन (सं॰ क्ली॰) जैन-मतसे—समयके विषयमें असत्य-कथन, वक्त बतानेकी झूटी बात।
अनद्य (सं॰ पु॰) न अद्यः भक्ष्यः, अप्राशस्ते्य नञ्-तत्। १ गौर-सर्षप, सफ़ेद सरसों। (त्रि॰) २ अभक्ष्य, खानेके नाक़ाबिल।
अनद्यतन (सं॰ पु॰) नञ्-तत्। अद्यतन भिन्न भूत भविष्यत् काल, ज़माना जो मौजूद रोज़में काम न आये। <small>अद्यतन देखो।</small> गत रात्रिके अन्तिम दो प्रहर ओर आगामी रात्रिके प्रथम दो प्रहर, इन दोनोके मध्यका समस्त दिवस परित्यागकर अवशिष्ट विगत या भविष्यत् समय अनद्यतन कहलाता है। गत
अर्धरात्रके प्रथम समयका भूत-अनद्यतन और आगामी अर्धरात्रके पिछले समयका नाम भविष्यत् अनद्यतन है।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनतिविलम्बिता—अनद्यतन'''|'''३८५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>राग उत्पन्न हो; ८ महार्थता—अर्थके गौरवका गुण; ९ अव्याहतत्व—ऐसा गुण जो खण्डन न किया जाये; १० शिष्टत्व—शिष्टप्रयोगका गुण अर्थात् ग्राम्यादि दोषकी परिशून्यता; ११ संशयासम्भव—ऐसा गुण जिसमें संशय उत्पन्न न हो सके; १२ निरा-कृतान्योत्तरत्व—ऐसा गुण जिससे दूसरेका प्रतिकूल उत्तर खण्डित हो सके; १३ हृदयङ्गमिता—ऐसा गुण जिससे भाव सहजमें हृदयगत हो जाये; १४ मिथःसाकाङ्क्षता—वह गुण जिसमें वाक्यकी परस्पर आकङ्क्षा या सम्बन्ध रहे; १५ प्रस्तावौचित्य—प्रस्तावानुरूप वाक्य प्रयुक्त करनेवाला गुण; १६ तत्त्व-निष्ठता—वाक्यकी सारगर्भता या उसके गूढ़ाथका गुण; १७ अप्रकीर्णप्रसृतत्त्व—सुश्रृङ्खल अर्थात् अमिश्रित रूपकी विस्तृति या फैलाव; १८ असंश्लाघ्य—श्लाघ्य-शून्यता; १९ अनिन्दितता—निन्दा शूतन्या; २० आभिजात्य—पाण्डित्य-गुणकी प्रकाशकता; २१ अतिस्निग्ध-मधुरत्व—अतिशय कोमलत्व और माधुर्यका गुण; २२ प्रशस्यता—प्रशस्त शब्द और उत्कृष्ट भावादिके प्रयोगका गुण; २३ अमर्मबोधितौदार्य—अर्थका ईषत् प्रच्छन्नभाव और उसकी सरलताका गुण; २४ धर्मार्थप्रतिविद्धता—धर्मार्थयुक्त गुण; २५ कारकाद्यविपर्यास—ऐसा गुण जिसमें कारकादिका परस्पर सच्चा अन्वय लगे; २६ विभ्रमादि-वियुक्तता-भ्रमशून्यता; २७ चित्रकत्व—पद्मादिके चित्रकी रचनासे मिला गुण या चमत्कारकारित्व;
१८ अद्भुतत्व—कौतुकोत्पादक गुण; २९ अनति-विलम्बिता-अधिक विलम्बसे अर्थके बोध न होनेका गुण; ३० अनेकजातिवैचित्त्रा—नानाप्रकार से अर्थ अलङ्कार या छन्दकी विचित्रता; ३१ आरोपितविशे षता—एक वस्तुमें दूसरी वस्तुवाले धर्मके आरोपका गुण; ३२ सत्त्वप्रधानता—सत्वगुणके प्राधान्यकी प्रकाशिता; ३३ वर्णपदवाक्यविविक्तता—वर्ण, पद और वाक्यमें परस्पर भेदके लिये विच्छेदकी रक्षा;
३४ अव्युत्थिति—विरोधका राहित्य और ३५ अखेदित्व—खेदकी शून्यता।
पुस्तकविशेषमें वाग्गुणके कई पाठान्तर विद्यमान<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>हैं। कहीं-कहीं शिष्टत्वकी जगह श्लिष्टत्व और अमर्मबोधितौदार्यकी जगह अमर्मबेधितौदार्य लिखा है।
अनत्यन्तगति (सं॰ स्त्री॰) १ सामान्य शब्दोका अर्थ, आम लफ़जोंके माने। २ गति जो अधिक न हो, जो चाल ज्यादा ज़ोरकी नहीं।
अनत्यय (सं॰ त्रि॰) विनाशशून्य, खण्डरहित; लाज़वाल, समूचा; जो मिट न सके, टूटा हुआ नहीं।
अनत्युद्य (वै॰ त्रि॰) वर्णन करनेको पूर्ण रूपसे अयोग्य, ज़िक्र करनेके लिये बिलकुल नाक़ाबिल।
अनदत् (सं॰ त्रि॰) भोजन न करता हुआ, जो खाता हुआ नहीं।
अनदेखा (हिं॰ वि॰) न देखा हुआ, जो देखा न गया हो।
अनद्धा, अनद्धो (वै॰ अव्य॰ ) न अड्धा। १ अनिश्चित रूपसे, अयथार्थ रूपसे; सच्चे तौरपर नहीं, दरअसल नहीं। २ अप्रकाश्यरूपसे, साफ़-साफ़ नहीं। <small>'तत्त्वेत्वद्धाञ्जसाद्वयम्।' (इत्यमरः)</small> (त्रि॰) नह-क्त, नञ्-तत्। ३ अपरिबद्द; न बंधा हुआ, खुला।
अनापुरुष (वै॰ पु॰) न अड्डा स्वकार्ये निश्चयो यस्य तादृशः पुरुषः। देव-पितृ-कार्यसे विमुख व्यक्ति, जो आदमी पूजा-पाठ और श्राद्ध-तर्पण न करे।
अनड्धा-मिश्रित-वचन (सं॰ क्ली॰) जैन-मतसे—समयके विषयमें असत्य-कथन, वक्त बतानेकी झूटी बात।
अनद्य (सं॰ पु॰) न अद्यः भक्ष्यः, अप्राशस्ते्य नञ्-तत्। १ गौर-सर्षप, सफ़ेद सरसों। (त्रि॰) २ अभक्ष्य, खानेके नाक़ाबिल।
अनद्यतन (सं॰ पु॰) नञ्-तत्। अद्यतन भिन्न भूत भविष्यत् काल, ज़माना जो मौजूद रोज़में काम न आये। <small>अद्यतन देखो।</small> गत रात्रिके अन्तिम दो प्रहर ओर आगामी रात्रिके प्रथम दो प्रहर, इन दोनोके मध्यका समस्त दिवस परित्यागकर अवशिष्ट विगत या भविष्यत् समय अनद्यतन कहलाता है। गत
अर्धरात्रके प्रथम समयका भूत-अनद्यतन और आगामी अर्धरात्रके पिछले समयका नाम भविष्यत् अनद्यतन है।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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१८ अद्भुतत्व—कौतुकोत्पादक गुण; २९ अनति-विलम्बिता-अधिक विलम्बसे अर्थके बोध न होनेका गुण; ३० अनेकजातिवैचित्त्रा—नानाप्रकार से अर्थ अलङ्कार या छन्दकी विचित्रता; ३१ आरोपितविशे षता—एक वस्तुमें दूसरी वस्तुवाले धर्मके आरोपका गुण; ३२ सत्त्वप्रधानता—सत्वगुणके प्राधान्यकी प्रकाशिता; ३३ वर्णपदवाक्यविविक्तता—वर्ण, पद और वाक्यमें परस्पर भेदके लिये विच्छेदकी रक्षा;
३४ अव्युत्थिति—विरोधका राहित्य और ३५ अखेदित्व—खेदकी शून्यता।
पुस्तकविशेषमें वाग्गुणके कई पाठान्तर विद्यमान<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>हैं। कहीं-कहीं शिष्टत्वकी जगह श्लिष्टत्व और अमर्मबोधितौदार्यकी जगह अमर्मबेधितौदार्य लिखा है।
अनत्यन्तगति (सं॰ स्त्री॰) १ सामान्य शब्दोका अर्थ, आम लफ़जोंके माने। २ गति जो अधिक न हो, जो चाल ज्यादा ज़ोरकी नहीं।
अनत्यय (सं॰ त्रि॰) विनाशशून्य, खण्डरहित; लाज़वाल, समूचा; जो मिट न सके, टूटा हुआ नहीं।
अनत्युद्य (वै॰ त्रि॰) वर्णन करनेको पूर्ण रूपसे अयोग्य, ज़िक्र करनेके लिये बिलकुल नाक़ाबिल।
अनदत् (सं॰ त्रि॰) भोजन न करता हुआ, जो खाता हुआ नहीं।
अनदेखा (हिं॰ वि॰) न देखा हुआ, जो देखा न गया हो।
अनद्धा, अनद्धो (वै॰ अव्य॰ ) न अड्धा। १ अनिश्चित रूपसे, अयथार्थ रूपसे; सच्चे तौरपर नहीं, दरअसल नहीं। २ अप्रकाश्यरूपसे, साफ़-साफ़ नहीं। <small>'तत्त्वेत्वद्धाञ्जसाद्वयम्।' (इत्यमरः)</small> (त्रि॰) नह-क्त, नञ्-तत्। ३ अपरिबद्द; न बंधा हुआ, खुला।
अनापुरुष (वै॰ पु॰) न अड्डा स्वकार्ये निश्चयो यस्य तादृशः पुरुषः। देव-पितृ-कार्यसे विमुख व्यक्ति, जो आदमी पूजा-पाठ और श्राद्ध-तर्पण न करे।
अनड्धा-मिश्रित-वचन (सं॰ क्ली॰) जैन-मतसे—समयके विषयमें असत्य-कथन, वक्त बतानेकी झूटी बात।
अनद्य (सं॰ पु॰) न अद्यः भक्ष्यः, अप्राशस्ते्य नञ्-तत्। १ गौर-सर्षप, सफ़ेद सरसों। (त्रि॰) २ अभक्ष्य, खानेके नाक़ाबिल।
अनद्यतन (सं॰ पु॰) नञ्-तत्। अद्यतन भिन्न भूत भविष्यत् काल, ज़माना जो मौजूद रोज़में काम न आये। <small>अद्यतन देखो।</small> गत रात्रिके अन्तिम दो प्रहर ओर आगामी रात्रिके प्रथम दो प्रहर, इन दोनोके मध्यका समस्त दिवस परित्यागकर अवशिष्ट विगत या भविष्यत् समय अनद्यतन कहलाता है। गत
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३९३
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३८६'''|'''अनद्यतन-भविष्य—अनधीन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनद्यतन-भविष्य (सं॰ पु॰) १ आगामी अर्धरात्रके पीछेका काल, आयन्दा आधी रातके बादका ज़माना। २ भविष्यत् काल-विशेष, एक तरहका आयन्दा ज़माना। अब इसका चलन उठ गया है।
अनद्यतनभूत (सं॰ पु॰) १ गत अर्धरात्रके प्रथमका काल; गुज़री हुई आधीरातके पहलेका ज़माना। २ भूतकाल-विशेष, एक गुज़रा ज़माना। अब इस कालका प्रयोग उठ गया है।
अनधिक (सं॰ त्रि॰) १ प्रशस्त या विजित किये जानेके अयोग्य, जो फैलाया या जीता न जा सके। २ असीम, बेहद। ३ पूर्ण, पूरा।
अनधिकार (सं॰ पु॰) नञ्-तत्। १ अधिकारका अभाव, इख्तियारका न होना। २ बाध्यता, मजबूरी। ३ क्षमताभाव, क़ाबिलियतका न रहना। (त्रि॰) बहुव्री॰। ४ अधिकारशून्य, जिसे कोई इख़्तियार नहीं। ५ अयोग्य, नाक़ाबिल।
अनधिकारचर्चा (सं॰ स्त्री॰) ६- तत्। अधिकाररहित विषयमें हस्तक्षेप, बेइख्तियारकी बातमें मदाख़लत।
अनधिकारप्रवेश (Criminal trespass) सन् १८६० के आइनका (जिसे पेनलकोड कहते हैं) ४४१ वां क़ानून। किसी व्यक्तिके अपराध उठानेकी इच्छासे
लोगोंके घर या दूसरी किसी जगह पहुंचनेपर अनधिकारप्रवेश होता है। किन्तु कोई अनिष्ट करनेके अभिप्रायसे न घुसने पर यह अपराध नहीं लगता। इसीसे इस कानूनका नाम 'अपराधभावका अनधिकारप्रवेश' रखा गया है। 'अपराधभाव' शब्द इस क़ानूनमें रहते भी उसका कोई अर्थ नहीं निकलता। किन्तु अंगरेजी 'क्रिमिनल' शब्द देख उसका ठीक तात्पर्य समझ पड़ता है।
किसी सम्पत्ति के मध्य कोई विशेष नियम प्रचलित रहनेसे कोई व्यक्ति यदि उसे लांघ उस मम्पत्ति के भीतर प्रवेश करे, तो ऐसे स्थलमें दुरभिसन्धि न रहते भी अनधिकारप्रवेशका अपराध लगेगा। रेलकी राह तारसे घेर देते हैं। प्रयोजन यही है, कि कोई ईंट, पत्थर, लोहा या लकड़ी न चुराये और गाड़ी
छूटते समय जल्द-जल्द आने-जानेमें कोई कुचल न मरे। घेरेको लांघकर आने-जानेके लिये रेल-कम्पनीने निषेधकी विधी बना रखी है। यही कारण है, कि किसी व्यक्तिके इस नियमको उल्लङ्घनकर राह चलनेपर अनधिकारप्रवेशका अपराध होता है।
मनुष्यके घर, डेरे या जहाज़में यानी मनुष्यके रहनेकी किसी जगह और जहां मनुष्यकी कोई सम्पत्ति हो, वहां दुरभिसन्धि करनेके लिये घुसने पर अनधिकार-प्रवेशका दोष मढ़ा जाता है। अनधिकारप्रवेशका अपराध देख-भाल तीन महीने तक
क़ैद या पांच सौ रुपये तक जुर्माना या दोनो दण्ड दिये जा सकते हैं।
अनधिकारिता (सं॰ स्त्री॰) १ अधिकारराहित्य,
इखु तियारका न रखना। २ क्षमताभाव, काबिलियत -
का न होना ।
अधिकारिन् (सं० त्रि० ) नञ - तत् ।
१ अधि-
कारी-भिन्न, बेइखुतियार । २ उत्तराधिकार देनेके
अयोग्य, जो हक पानेके काबिल न हो । ३ अयोग्य,
कुपात्र ; नालायक ।
अनधिकारो, अनधिकारिन् देखो ।
अनधिकृत (सं० त्रि० ) नञ् तत् । अधिकार न दिया
हुआ, अनियुक्त ; जिसे इतियार न मिला हो, जो
मुकरर न किया गया हो ।
अनधिगत (सं० त्रि० ) नञ तत् । १ अज्ञात, समझा-
बा नहीं । २ अप्राप्त, लाहासिल ; जो न मिला हो ।
अनधिगतमनोरथ सं० त्रि०) हताश, नाउम्म ेद;
जिसका मतलब न निकला हो ।
अनधिगतशास्त्र (सं० त्रि०) जिसे शास्त्र अज्ञात
हो, शास्त्र न पढ़ा हुआ ।
अनधिगम्य (स ं० त्रि०) प्राप्त होनेके अयोगा,
पानेके नाकाबिल |
| अनधीन (सं० त्रि०) १ खाधीन, आज़ाद ; किसौके
अनधिष्ठान (सं० क्लो० ) पर्यावेक्षणका अभाव, देख-
भालका न होना ।
अनधिष्ठित (सं० त्रि०) १ अनवस्थित, गैरहाजिर ।
२ अनाविर्भूत, जो मुकरर न हुआ हो ।<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३८६'''|'''अनद्यतन-भविष्य—अनधीन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनद्यतन-भविष्य (सं॰ पु॰) १ आगामी अर्धरात्रके पीछेका काल, आयन्दा आधी रातके बादका ज़माना। २ भविष्यत् काल-विशेष, एक तरहका आयन्दा ज़माना। अब इसका चलन उठ गया है।
अनद्यतनभूत (सं॰ पु॰) १ गत अर्धरात्रके प्रथमका काल; गुज़री हुई आधीरातके पहलेका ज़माना। २ भूतकाल-विशेष, एक गुज़रा ज़माना। अब इस कालका प्रयोग उठ गया है।
अनधिक (सं॰ त्रि॰) १ प्रशस्त या विजित किये जानेके अयोग्य, जो फैलाया या जीता न जा सके। २ असीम, बेहद। ३ पूर्ण, पूरा।
अनधिकार (सं॰ पु॰) नञ्-तत्। १ अधिकारका अभाव, इख्तियारका न होना। २ बाध्यता, मजबूरी। ३ क्षमताभाव, क़ाबिलियतका न रहना। (त्रि॰) बहुव्री॰। ४ अधिकारशून्य, जिसे कोई इख़्तियार नहीं। ५ अयोग्य, नाक़ाबिल।
अनधिकारचर्चा (सं॰ स्त्री॰) ६- तत्। अधिकाररहित विषयमें हस्तक्षेप, बेइख्तियारकी बातमें मदाख़लत।
अनधिकारप्रवेश (Criminal trespass) सन् १८६० के आइनका (जिसे पेनलकोड कहते हैं) ४४१ वां क़ानून। किसी व्यक्तिके अपराध उठानेकी इच्छासे
लोगोंके घर या दूसरी किसी जगह पहुंचनेपर अनधिकारप्रवेश होता है। किन्तु कोई अनिष्ट करनेके अभिप्रायसे न घुसने पर यह अपराध नहीं लगता। इसीसे इस कानूनका नाम 'अपराधभावका अनधिकारप्रवेश' रखा गया है। 'अपराधभाव' शब्द इस क़ानूनमें रहते भी उसका कोई अर्थ नहीं निकलता। किन्तु अंगरेजी 'क्रिमिनल' शब्द देख उसका ठीक तात्पर्य समझ पड़ता है।
किसी सम्पत्ति के मध्य कोई विशेष नियम प्रचलित रहनेसे कोई व्यक्ति यदि उसे लांघ उस मम्पत्ति के भीतर प्रवेश करे, तो ऐसे स्थलमें दुरभिसन्धि न रहते भी अनधिकारप्रवेशका अपराध लगेगा। रेलकी राह तारसे घेर देते हैं। प्रयोजन यही है, कि कोई ईंट, पत्थर, लोहा या लकड़ी न चुराये और गाड़ी
छूटते समय जल्द-जल्द आने-जानेमें कोई कुचल न मरे। घेरेको लांघकर आने-जानेके लिये रेल-कम्पनीने निषेधकी विधी बना रखी है। यही कारण है, कि किसी व्यक्तिके इस नियमको उल्लङ्घनकर राह चलनेपर अनधिकारप्रवेशका अपराध होता है।
मनुष्यके घर, डेरे या जहाज़में यानी मनुष्यके रहनेकी किसी जगह और जहां मनुष्यकी कोई सम्पत्ति हो, वहां दुरभिसन्धि करनेके लिये घुसने पर अनधिकार-प्रवेशका दोष मढ़ा जाता है। अनधिकारप्रवेशका अपराध देख-भाल तीन महीने तक
क़ैद या पांच सौ रुपये तक जुर्माना या दोनो दण्ड दिये जा सकते हैं।
अनधिकारिता (सं॰ स्त्री॰) १ अधिकारराहित्य, इख़् तियारका न रखना। २ क्षमताभाव, क़ाबिलियतका न होना।
अनधिकारिन् (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। १ अधिकारी-भिन्न, बेइख़्तियार। २ उत्तराधिकार देनेके अयोग्य, जो हक़ पानेके क़ाबिल न हो। ३ अयोग्य, कुपात्र; नालायक़।
अनधिकारी, <small>अनधिकारिन् देखो।</small>
अनधिकृत (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। अधिकार न दिया हुआ, अनियुक्त; जिसे इख़्तियार न मिला हो, जो मुक़रर न किया गया हो।
अनधिगत (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। १ अज्ञात, समझा-बूझा नहीं। २ अप्राप्त, लाहासिल; जो न मिला हो।
अनधिगतमनोरथ (सं॰ त्रि॰) हताश, नाउम्मेद; जिसका मतलब न निकला हो।
अनधिगतशास्त्र (सं॰ त्रि॰) जिसे शास्त्र अज्ञात हो, शास्त्र न पढ़ा हुआ।
अनधिगम्य (सं॰ त्रि॰) प्राप्त होनेके अयोग्रा, पानेके नाक़ाबिल।
अनधिष्ठान (सं॰ क्ली॰) पर्यावेक्षणका अभाव, देख-भालका न होना।
अनधिष्ठित (सं॰ त्रि॰) १ अनवस्थित, गै़रहाज़िर। २ अनाविर्भूत, जो मुक़रर न हुआ हो।
अनधीन (सं॰ त्रि॰) १ स्वाधीन आज़ाद; किसीके
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३८६'''|'''अनद्यतन-भविष्य—अनधीन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनद्यतन-भविष्य (सं॰ पु॰) १ आगामी अर्धरात्रके पीछेका काल, आयन्दा आधी रातके बादका ज़माना। २ भविष्यत् काल-विशेष, एक तरहका आयन्दा ज़माना। अब इसका चलन उठ गया है।
अनद्यतनभूत (सं॰ पु॰) १ गत अर्धरात्रके प्रथमका काल; गुज़री हुई आधीरातके पहलेका ज़माना। २ भूतकाल-विशेष, एक गुज़रा ज़माना। अब इस कालका प्रयोग उठ गया है।
अनधिक (सं॰ त्रि॰) १ प्रशस्त या विजित किये जानेके अयोग्य, जो फैलाया या जीता न जा सके। २ असीम, बेहद। ३ पूर्ण, पूरा।
अनधिकार (सं॰ पु॰) नञ्-तत्। १ अधिकारका अभाव, इख्तियारका न होना। २ बाध्यता, मजबूरी। ३ क्षमताभाव, क़ाबिलियतका न रहना। (त्रि॰) बहुव्री॰। ४ अधिकारशून्य, जिसे कोई इख़्तियार नहीं। ५ अयोग्य, नाक़ाबिल।
अनधिकारचर्चा (सं॰ स्त्री॰) ६- तत्। अधिकाररहित विषयमें हस्तक्षेप, बेइख्तियारकी बातमें मदाख़लत।
अनधिकारप्रवेश (Criminal trespass) सन् १८६० के आइनका (जिसे पेनलकोड कहते हैं) ४४१ वां क़ानून। किसी व्यक्तिके अपराध उठानेकी इच्छासे
लोगोंके घर या दूसरी किसी जगह पहुंचनेपर अनधिकारप्रवेश होता है। किन्तु कोई अनिष्ट करनेके अभिप्रायसे न घुसने पर यह अपराध नहीं लगता। इसीसे इस कानूनका नाम 'अपराधभावका अनधिकारप्रवेश' रखा गया है। 'अपराधभाव' शब्द इस क़ानूनमें रहते भी उसका कोई अर्थ नहीं निकलता। किन्तु अंगरेजी 'क्रिमिनल' शब्द देख उसका ठीक तात्पर्य समझ पड़ता है।
किसी सम्पत्ति के मध्य कोई विशेष नियम प्रचलित रहनेसे कोई व्यक्ति यदि उसे लांघ उस मम्पत्ति के भीतर प्रवेश करे, तो ऐसे स्थलमें दुरभिसन्धि न रहते भी अनधिकारप्रवेशका अपराध लगेगा। रेलकी राह तारसे घेर देते हैं। प्रयोजन यही है, कि कोई ईंट, पत्थर, लोहा या लकड़ी न चुराये और गाड़ी<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>छूटते समय जल्द-जल्द आने-जानेमें कोई कुचल न मरे। घेरेको लांघकर आने-जानेके लिये रेल-कम्पनीने निषेधकी विधी बना रखी है। यही कारण है, कि किसी व्यक्तिके इस नियमको उल्लङ्घनकर राह चलनेपर अनधिकारप्रवेशका अपराध होता है।
मनुष्यके घर, डेरे या जहाज़में यानी मनुष्यके रहनेकी किसी जगह और जहां मनुष्यकी कोई सम्पत्ति हो, वहां दुरभिसन्धि करनेके लिये घुसने पर अनधिकार-प्रवेशका दोष मढ़ा जाता है। अनधिकारप्रवेशका अपराध देख-भाल तीन महीने तक
क़ैद या पांच सौ रुपये तक जुर्माना या दोनो दण्ड दिये जा सकते हैं।
अनधिकारिता (सं॰ स्त्री॰) १ अधिकारराहित्य, इख़् तियारका न रखना। २ क्षमताभाव, क़ाबिलियतका न होना।
अनधिकारिन् (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। १ अधिकारी-भिन्न, बेइख़्तियार। २ उत्तराधिकार देनेके अयोग्य, जो हक़ पानेके क़ाबिल न हो। ३ अयोग्य, कुपात्र; नालायक़।
अनधिकारी, <small>अनधिकारिन् देखो।</small>
अनधिकृत (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। अधिकार न दिया हुआ, अनियुक्त; जिसे इख़्तियार न मिला हो, जो मुक़रर न किया गया हो।
अनधिगत (सं॰ त्रि॰) नञ्-तत्। १ अज्ञात, समझा-बूझा नहीं। २ अप्राप्त, लाहासिल; जो न मिला हो।
अनधिगतमनोरथ (सं॰ त्रि॰) हताश, नाउम्मेद; जिसका मतलब न निकला हो।
अनधिगतशास्त्र (सं॰ त्रि॰) जिसे शास्त्र अज्ञात हो, शास्त्र न पढ़ा हुआ।
अनधिगम्य (सं॰ त्रि॰) प्राप्त होनेके अयोग्रा, पानेके नाक़ाबिल।
अनधिष्ठान (सं॰ क्ली॰) पर्यावेक्षणका अभाव, देख-भालका न होना।
अनधिष्ठित (सं॰ त्रि॰) १ अनवस्थित, गै़रहाज़िर। २ अनाविर्भूत, जो मुक़रर न हुआ हो।
अनधीन (सं॰ त्रि॰) १ स्वाधीन आज़ाद; किसीके<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३९४
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अनध्यक्ष—अनध्याय'''|'''३८७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>वश या मातहत नहीं। (पु॰) २ अपने लिये काम करनेवाला बढ़ई या सुनार।
अध्यक्ष (सं॰ त्रि॰) १ अप्रत्यक्ष, आंखसे छिपा। २ अध्यक्षशून्य, वे निगहबान।
अनध्ययन (सं॰ क्ली॰) अध्ययनराहित्य, तालीमकी बन्दी। २ पाठका अनध्याय, सबक़की छुट्टी।
अनध्यवसाय (सं॰ पु॰) अध्यवसायशून्यता, लाइस्तक़ लाली; ढीलापन। २ काव्यालङ्कारविशेष। यह कई सदृश गुणवाले पदार्थोंमें एकके सम्बन्धपर अनिश्चय दिखाता है। इसे सन्देहके अन्तर्गत ही समझना चाहिये; क्योंकि इसमें अलङ्कारकी कोई नई बात नहीं देख पड़ती।
अनध्याय (सं॰ पु॰) न योग्योऽव्ययनं अभावार्थे नञ्-तत्। १ अध्ययनाभाव, तालीमकी बन्दी। न अधीयतेऽस्मिन् काले, अधिकरणे घञ्। निषिद्ध काल, जिस वक्त़
पढ़ना-लिखना मना हो ।
मनुसंहिता में अनध्यायके कई कारण लिखे हैं,-
रात्री दिया पहने।
"
.
एतौ वर्गाखनध्यायावध्यायज्ञाः प्रचचते ॥ १०२ ।
विद्युत्स्तनितवर्षे षु महोल्कानाञ्च संप्लवे ।
आकालिकमनध्यायमेतेषु मनुरब्रवीत् ॥ १०३
एतां स्त्वभ्युदितान् विद्यात् यदा प्रादुष्क, ताग्निषु ।
तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चादर्शने ॥ १०४
निर्यात मिचल ज्योतिषा
1
एतामाकालिका विद्यादावपि ॥ १०५
प्रादुष्क तेष्वग्निषु तु विद्युत् स्तनितनिखने ।
न
अध्ययनका
सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषे रात्रौ यथा दिवा ॥ १०६
नित्या नध्याय एव स्याद्ग्रामेषु नगरेषु च ।
धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च सर्वदा ॥ १०७
अन्तर्गत ग्रामे वृषलस्य च सन्निधौ ।
अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च ॥ १०८
उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्वस्य विसर्जने ।
उच्छिष्टः श्राइभुक् चैव मनसापि न चिन्तयेत् ॥ १०८
प्रतिग्टह्य हिजो विहानैकोद्दिष्टस्य केतनं ।
वग्रहं न कीर्त्तयेत् ब्रह्म राशी राहोश्च सूतके ॥ ११०
यावदेकानुदिष्ट
तिति
विप्रस्य विदुषो देहे तावद ब्रह्म न कौर्तयेत् ॥ १११
शयानः प्रौढ़पादश्च कृत्वा चैत्रावसक्थिकाम् ।
नापौदीतामिष जगवा सूतकाद्यमेव च ॥ ११२
नौहारे वागणशब्दे च सन्धयोरेव चोभयोः ।
अमावस्या चतुर्दश्योः पौर्णमास्यष्टकासु च ॥ ११३
अमावस्या गुरु' हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी ।
ब्रह्माष्टका पौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥ ११४
वर्ष दिशां दा गोमायुविने तथा
श्वखरोष्ट्र े च रुवति प ंक्तौ च न पठेदुद्दिनः ॥ ११५
नाधीयीत श्मशानान्ते ग्रामान्ते गोत्रजे ऽपि वा ।
वसित्वा मैथुनं वासः श्राद्धिकं प्रतिग्टह्य च ॥ ११६
प्राणी वा यदि वा प्राणी यत्किञ्चिच्क्राद्धिकं भवेत् ।
तदालभ्याप्यनध्यायः प्राख्यास्यो हि दिजः स्मृतः ॥ ११७
चीरा चाशिकारिते।
आकालिकमनध्यायं विद्याद् सर्वाह्न तेषु च ॥ ११८
उपाकर्मणि च विराजत
अटकाव होराचसा राखि ११८
नाधीयीताश्वमारुढ़ो न वृत ं न च हस्तिनम् ।
न नाव न खरं नोट्र' नेरिणस्थो न यानगः ॥ १२०
न विवाद न कलहे न सेनायां न सङ्गरे ।
३८०
न भुक्तमावळे नाजीण न वमित्वा न सूक्तके ॥” १२१ ( मनु ४० )
वर्षाकाल में रात्रिको प्रबल वायुके चलने और
दिनको धूलि उड़नेपर अनध्याय होता है। मनुने
कहा है, कि विद्युत् चोर मेघगर्जनके साथ वर्षा
या उल्कापात होनेसे, जिस समय यह सब उत्पात
आरम्भ हो, दूसरे दिन उसी समय तक, पढ़ना न
चाहिये। होमको अग्नि जलाते समय ( सवेरे और
सन्ध्याको ) विजली चमकने और बादल गरजने से
अनध्याय रहता है। अन्तरिक्ष में उत्पातध्वनि उठने,
भूमिके कंपने और चन्द्रसूर्यादिके उपसर्ग चाका-
लिक अनध्याय होता है । होमाग्नि जलाने पोछे
विद्युत् और मेघगर्जन होनेपर सज्योति अनध्याय
होता है, अर्थात् दिनको होनेसे दिनको और रातको
पढ़ने को छुट्टी रहती है। जो अतिशय धर्म के प्रार्थी
हैं, उन्हें ग्राम, नगर और पूतिगन्धके स्थानमें नित्य
अनध्याय समझना चाहिये।
गये ग्राम और अधार्मिकके
ध्वनि सुन पड़ने और बहुत
अनध्याय माना जाता है।
मृत देह न निकाले
सविधान में और रोदन-
लोगोंको जनता जमने से
जलके मध्य, मध्यरात्रि,
.
मलमूत्र त्यागते समय, उच्छिष्ट सुख और वादका
भोजन पाने पोछे, अहोरात्रि मनमें भी वेद न विचारे ।<noinclude></noinclude>
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/* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार
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अध्यक्ष (सं॰ त्रि॰) १ अप्रत्यक्ष, आंखसे छिपा। २ अध्यक्षशून्य, वे निगहबान।
अनध्ययन (सं॰ क्ली॰) अध्ययनराहित्य, तालीमकी बन्दी। २ पाठका अनध्याय, सबक़की छुट्टी।
अनध्यवसाय (सं॰ पु॰) अध्यवसायशून्यता, लाइस्तक़ लाली; ढीलापन। २ काव्यालङ्कारविशेष। यह कई सदृश गुणवाले पदार्थोंमें एकके सम्बन्धपर अनिश्चय दिखाता है। इसे सन्देहके अन्तर्गत ही समझना चाहिये; क्योंकि इसमें अलङ्कारकी कोई नई बात नहीं देख पड़ती।
अनध्याय (सं॰ पु॰) न योग्योऽव्ययनं अभावार्थे नञ्-तत्। १ अध्ययनाभाव, तालीमकी बन्दी। न अधीयतेऽस्मिन् काले, अधिकरणे घञ्। निषिद्ध काल, जिस वक्त़ पढ़ना-लिखना मना हो। मनुसंहिता में अनध्यायके कई कारण लिखे हैं,—
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एतौ वर्गाखनध्यायावध्यायज्ञाः प्रचचते ॥ १०२ ।
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आकालिकमनध्यायमेतेषु मनुरब्रवीत् ॥ १०३
एतां स्त्वभ्युदितान् विद्यात् यदा प्रादुष्क, ताग्निषु ।
तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चादर्शने ॥ १०४
निर्यात मिचल ज्योतिषा
एतामाकालिका विद्यादावपि ॥ १०५
प्रादुष्क तेष्वग्निषु तु विद्युत् स्तनितनिखने ।
न अध्ययनका
सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषे रात्रौ यथा दिवा ॥ १०६
नित्या नध्याय एव स्याद्ग्रामेषु नगरेषु च ।
धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च सर्वदा ॥ १०७
अन्तर्गत ग्रामे वृषलस्य च सन्निधौ ।
अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च ॥ १०८
उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्वस्य विसर्जने ।
उच्छिष्टः श्राइभुक् चैव मनसापि न चिन्तयेत् ॥ १०८
प्रतिग्टह्य हिजो विहानैकोद्दिष्टस्य केतनं ।
वग्रहं न कीर्त्तयेत् ब्रह्म राशी राहोश्च सूतके ॥ ११०
यावदेकानुदिष्ट
तिति विप्रस्य विदुषो देहे तावद ब्रह्म न कौर्तयेत् ॥ १११
शयानः प्रौढ़पादश्च कृत्वा चैत्रावसक्थिकाम् ।
नापौदीतामिष जगवा सूतकाद्यमेव च ॥ ११२</small></poem>}}
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अमावस्या गुरु' हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी ।
ब्रह्माष्टका पौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥ ११४
वर्ष दिशां दा गोमायुविने तथा
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नाधीयीत श्मशानान्ते ग्रामान्ते गोत्रजे ऽपि वा ।
वसित्वा मैथुनं वासः श्राद्धिकं प्रतिग्टह्य च ॥ ११६
प्राणी वा यदि वा प्राणी यत्किञ्चिच्क्राद्धिकं भवेत् ।
तदालभ्याप्यनध्यायः प्राख्यास्यो हि दिजः स्मृतः ॥ ११७
चीरा चाशिकारिते।
आकालिकमनध्यायं विद्याद् सर्वाह्न तेषु च ॥ ११८
उपाकर्मणि च विराजत
अटकाव होराचसा राखि ११८
नाधीयीताश्वमारुढ़ो न वृत ं न च हस्तिनम् ।
न नाव न खरं नोट्र' नेरिणस्थो न यानगः ॥ १२०
न विवाद न कलहे न सेनायां न सङ्गरे ।
न भुक्तमावळे नाजीण न वमित्वा न सूक्तके ॥” १२१ ( मनु ४० )</small></poem>}}
वर्षाकाल में रात्रिको प्रबल वायुके चलने और दिनको धूलि उड़नेपर अनध्याय होता है। मनुने कहा है, कि विद्युत् चोर मेघगर्जनके साथ वर्षा या उल्कापात होनेसे, जिस समय यह सब उत्पात आरम्भ हो, दूसरे दिन उसी समय तक, पढ़ना न चाहिये। होमको अग्नि जलाते समय ( सवेरे और सन्ध्याको ) विजली चमकने और बादल गरजने से अनध्याय रहता है। अन्तरिक्ष में उत्पातध्वनि उठने, भूमिके कंपने और चन्द्रसूर्यादिके उपसर्ग चाकालिक अनध्याय होता है। होमाग्नि जलाने पोछे
विद्युत् और मेघगर्जन होनेपर सज्योति अनध्याय होता है, अर्थात् दिनको होनेसे दिनको और रातको पढ़ने को छुट्टी रहती है। जो अतिशय धर्म के प्रार्थी
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गये ग्राम और अधार्मिकके ध्वनि सुन पड़ने और बहुत अनध्याय माना जाता है।
मृत देह न निकाले सविधान में और रोदन-लोगोंको जनता जमने से जलके मध्य, मध्यरात्रि, मलमूत्र त्यागते समय, उच्छिष्ट सुख और वादका भोजन पाने पोछे, अहोरात्रि मनमें भी वेद न विचारे।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अध्यक्ष (सं॰ त्रि॰) १ अप्रत्यक्ष, आंखसे छिपा। २ अध्यक्षशून्य, वे निगहबान।
अनध्ययन (सं॰ क्ली॰) अध्ययनराहित्य, तालीमकी बन्दी। २ पाठका अनध्याय, सबक़की छुट्टी।
अनध्यवसाय (सं॰ पु॰) अध्यवसायशून्यता, लाइस्तक़ लाली; ढीलापन। २ काव्यालङ्कारविशेष। यह कई सदृश गुणवाले पदार्थोंमें एकके सम्बन्धपर अनिश्चय दिखाता है। इसे सन्देहके अन्तर्गत ही समझना चाहिये; क्योंकि इसमें अलङ्कारकी कोई नई बात नहीं देख पड़ती।
अनध्याय (सं॰ पु॰) न योग्योऽव्ययनं अभावार्थे नञ्-तत्। १ अध्ययनाभाव, तालीमकी बन्दी। न अधीयतेऽस्मिन् काले, अधिकरणे घञ्। निषिद्ध काल, जिस वक्त़ पढ़ना-लिखना मना हो। मनुसंहिता में अनध्यायके कई कारण लिखे हैं,—
{{Block center|<poem><small>रात्री दिया पहने।
एतौ वर्गाखनध्यायावध्यायज्ञाः प्रचचते ॥ १०२ ।
विद्युत्स्तनितवर्षे षु महोल्कानाञ्च संप्लवे ।
आकालिकमनध्यायमेतेषु मनुरब्रवीत् ॥ १०३
एतां स्त्वभ्युदितान् विद्यात् यदा प्रादुष्क, ताग्निषु ।
तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चादर्शने ॥ १०४
निर्यात मिचल ज्योतिषा
एतामाकालिका विद्यादावपि ॥ १०५
प्रादुष्क तेष्वग्निषु तु विद्युत् स्तनितनिखने ।
न अध्ययनका
सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषे रात्रौ यथा दिवा ॥ १०६
नित्या नध्याय एव स्याद्ग्रामेषु नगरेषु च ।
धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च सर्वदा ॥ १०७
अन्तर्गत ग्रामे वृषलस्य च सन्निधौ ।
अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च ॥ १०८
उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्वस्य विसर्जने ।
उच्छिष्टः श्राइभुक् चैव मनसापि न चिन्तयेत् ॥ १०८
प्रतिग्टह्य हिजो विहानैकोद्दिष्टस्य केतनं ।
वग्रहं न कीर्त्तयेत् ब्रह्म राशी राहोश्च सूतके ॥ ११०
यावदेकानुदिष्ट
तिति विप्रस्य विदुषो देहे तावद ब्रह्म न कौर्तयेत् ॥ १११
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अमावस्या चतुर्दश्योः पौर्णमास्यष्टकासु च ॥ ११३
अमावस्या गुरु' हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी ।
ब्रह्माष्टका पौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥ ११४
वर्ष दिशां दा गोमायुविने तथा
श्वखरोष्ट्र े च रुवति प ंक्तौ च न पठेदुद्दिनः ॥ ११५
नाधीयीत श्मशानान्ते ग्रामान्ते गोत्रजे ऽपि वा ।
वसित्वा मैथुनं वासः श्राद्धिकं प्रतिग्टह्य च ॥ ११६
प्राणी वा यदि वा प्राणी यत्किञ्चिच्क्राद्धिकं भवेत् ।
तदालभ्याप्यनध्यायः प्राख्यास्यो हि दिजः स्मृतः ॥ ११७
चीरा चाशिकारिते।
आकालिकमनध्यायं विद्याद् सर्वाह्न तेषु च ॥ ११८
उपाकर्मणि च विराजत
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नाधीयीताश्वमारुढ़ो न वृत ं न च हस्तिनम् ।
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विद्युत् और मेघगर्जन होनेपर सज्योति अनध्याय होता है, अर्थात् दिनको होनेसे दिनको और रातको पढ़ने को छुट्टी रहती है। जो अतिशय धर्म के प्रार्थी
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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अध्यक्ष (सं॰ त्रि॰) १ अप्रत्यक्ष, आंखसे छिपा। २ अध्यक्षशून्य, वे निगहबान।
अनध्ययन (सं॰ क्ली॰) अध्ययनराहित्य, तालीमकी बन्दी। २ पाठका अनध्याय, सबक़की छुट्टी।
अनध्यवसाय (सं॰ पु॰) अध्यवसायशून्यता, लाइस्तक़ लाली; ढीलापन। २ काव्यालङ्कारविशेष। यह कई सदृश गुणवाले पदार्थोंमें एकके सम्बन्धपर अनिश्चय दिखाता है। इसे सन्देहके अन्तर्गत ही समझना चाहिये; क्योंकि इसमें अलङ्कारकी कोई नई बात नहीं देख पड़ती।
अनध्याय (सं॰ पु॰) न योग्योऽव्ययनं अभावार्थे नञ्-तत्। १ अध्ययनाभाव, तालीमकी बन्दी। न अधीयतेऽस्मिन् काले, अधिकरणे घञ्। निषिद्ध काल, जिस वक्त़ पढ़ना-लिखना मना हो। मनुसंहिता में अनध्यायके कई कारण लिखे हैं,—
{{Block center|<poem><small>रात्री दिया पहने।
एतौ वर्गाखनध्यायावध्यायज्ञाः प्रचचते ॥ १०२ ।
विद्युत्स्तनितवर्षे षु महोल्कानाञ्च संप्लवे ।
आकालिकमनध्यायमेतेषु मनुरब्रवीत् ॥ १०३
एतां स्त्वभ्युदितान् विद्यात् यदा प्रादुष्क, ताग्निषु ।
तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चादर्शने ॥ १०४
निर्यात मिचल ज्योतिषा
एतामाकालिका विद्यादावपि ॥ १०५
प्रादुष्क तेष्वग्निषु तु विद्युत् स्तनितनिखने ।
न अध्ययनका
सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषे रात्रौ यथा दिवा ॥ १०६
नित्या नध्याय एव स्याद्ग्रामेषु नगरेषु च ।
धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च सर्वदा ॥ १०७
अन्तर्गत ग्रामे वृषलस्य च सन्निधौ ।
अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च ॥ १०८
उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्वस्य विसर्जने ।
उच्छिष्टः श्राइभुक् चैव मनसापि न चिन्तयेत् ॥ १०८
प्रतिग्टह्य हिजो विहानैकोद्दिष्टस्य केतनं ।
वग्रहं न कीर्त्तयेत् ब्रह्म राशी राहोश्च सूतके ॥ ११०
यावदेकानुदिष्ट
तिति विप्रस्य विदुषो देहे तावद ब्रह्म न कौर्तयेत् ॥ १११
शयानः प्रौढ़पादश्च कृत्वा चैत्रावसक्थिकाम् ।
नापौदीतामिष जगवा सूतकाद्यमेव च ॥ ११२</small></poem>}}<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>{{Block center|<poem><small>नौहारे वागणशब्दे च सन्धयोरेव चोभयोः ।
अमावस्या चतुर्दश्योः पौर्णमास्यष्टकासु च ॥ ११३
अमावस्या गुरु' हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी ।
ब्रह्माष्टका पौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥ ११४
वर्ष दिशां दा गोमायुविने तथा
श्वखरोष्ट्र े च रुवति प ंक्तौ च न पठेदुद्दिनः ॥ ११५
नाधीयीत श्मशानान्ते ग्रामान्ते गोत्रजे ऽपि वा ।
वसित्वा मैथुनं वासः श्राद्धिकं प्रतिग्टह्य च ॥ ११६
प्राणी वा यदि वा प्राणी यत्किञ्चिच्क्राद्धिकं भवेत् ।
तदालभ्याप्यनध्यायः प्राख्यास्यो हि दिजः स्मृतः ॥ ११७
चीरा चाशिकारिते।
आकालिकमनध्यायं विद्याद् सर्वाह्न तेषु च ॥ ११८
उपाकर्मणि च विराजत
अटकाव होराचसा राखि ११८
नाधीयीताश्वमारुढ़ो न वृत ं न च हस्तिनम् ।
न नाव न खरं नोट्र' नेरिणस्थो न यानगः ॥ १२०
न विवाद न कलहे न सेनायां न सङ्गरे ।
न भुक्तमावळे नाजीण न वमित्वा न सूक्तके ॥” १२१ ( मनु ४० )</small></poem>}}
वर्षाकाल में रात्रिको प्रबल वायुके चलने और दिनको धूलि उड़नेपर अनध्याय होता है। मनुने कहा है, कि विद्युत् चोर मेघगर्जनके साथ वर्षा या उल्कापात होनेसे, जिस समय यह सब उत्पात आरम्भ हो, दूसरे दिन उसी समय तक, पढ़ना न चाहिये। होमको अग्नि जलाते समय ( सवेरे और सन्ध्याको ) विजली चमकने और बादल गरजने से अनध्याय रहता है। अन्तरिक्ष में उत्पातध्वनि उठने, भूमिके कंपने और चन्द्रसूर्यादिके उपसर्ग चाकालिक अनध्याय होता है। होमाग्नि जलाने पोछे
विद्युत् और मेघगर्जन होनेपर सज्योति अनध्याय होता है, अर्थात् दिनको होनेसे दिनको और रातको पढ़ने को छुट्टी रहती है। जो अतिशय धर्म के प्रार्थी
हैं, उन्हें ग्राम, नगर और पूतिगन्धके स्थानमें नित्य अनध्याय समझना चाहिये।
गये ग्राम और अधार्मिकके ध्वनि सुन पड़ने और बहुत अनध्याय माना जाता है।
मृत देह न निकाले सविधान में और रोदन-लोगोंको जनता जमने से जलके मध्य, मध्यरात्रि, मलमूत्र त्यागते समय, उच्छिष्ट सुख और वादका भोजन पाने पोछे, अहोरात्रि मनमें भी वेद न विचारे।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३९५
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३८८'''|'''अनध्याय—अनन्त'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>विद्वान् ब्राह्मणके एकोद्दिष्टश्राका निमन्त्रण लेने, राजाके सन्तान जन्मने या चन्द्रसूर्यग्रहण पड़नेपर तौन दिन अनध्याय होता है। एकोद्दिष्टाङ्गके भोजन
पीछे जबतक विद्वान् ब्राह्मण के मस्तकपर कुङ्गमादिका गन्ध या प्रलेप रहेगा, तबतक विद्याध्ययन न होगा। सो, आसनपर पैर रख, टांगपर टांग चढ़ा, आमिष
खा और जन्ममरणाशौचका अन्न भोजनकर वेद न पढ़े। प्रातः सन्ध्या या सायंसन्ध्याके समय कुज्झटिका या मेघगर्जन होनेसे और अमावस्या, चतुदशी, पूर्णिमा
और अष्टमी तिथिको वेदाध्ययन निषिद्ध है । अमा वस्या गुरु और चतुर्दशी शिष्यको नष्ट करतौ और अष्टमी और पूर्णिमा वेदको भुला देती है, इसलिये इन
सकल तिथियोंमें अध्ययन और अध्यापना छोड़ दे । धूलि बरसने, दिग्दाह होने, शृगाल कुक्कुर, गर्दभ और उष्ट्र बोलने या उनके दल बांधनेसे द्विजाति वेद
न पढ़ें। श्मशान, ग्रामान्त और गोष्ठमें और
स्त्रीस ंसर्गवाले समयके वस्त्रपहन और श्राद्धका द्रव्य
ले ( का पक्का खाकर ) वेद पढ़ना मना
है | श्राद्धका द्रव्य किसी प्राणी या अप्राणौके हाथसे
लेनेपर अनध्याय हो जाता है; क्योंकि हस्त हो
ब्राह्मणका मुखखरूप है । ग्राममें चोरोंका उत्पात
मचने, गृहदाहादिसे डराने और कोई भी अद्भुत
बात देखनेसे आकालिक अनध्याय मानते हैं ।
उपाकर्म और उत्सर्ग कर्म में त्रिरात्र और अष्टका
( कृष्णाष्टमी ) और ऋतुके अन्त-दिन अहोरात्र
अनध्याय रहता है। घोड़े, वृक्ष, हाथी, नाव, गधे,
ऊंट, गाड़ी प्रभृतिपर चढ़ और ऊषर देशमें रह
कर वेद न पढ़े। कहा-सुनी या मारपीट होनेसे
सैन्यके पास, युद्धक्षेत्रमें, भोजनसे पीछे हो, अजीर्णमें
या वमन करनेपर वेदाध्ययन निषिद्ध है ।
अनध्यायदिवस (स० पु० ) पढ़नेकौ छुट्टीका दिन ।
अन (सं० क्लो० ) अन-ल्युट् भावे ।
१ जीवन,
ज़िन्दगी । २ गति, रविश, चाल । ३ श्वास, सांस ।
अननङ्गमेजय (सं० त्रि०) शरीरको विना कंपाये न
कोड़नेवाला, जो जिस्मको हिला डाले ।
अननुगत (सं० त्रि०) न अनुगतम्, नञ्- तत् । खतन्त्र,
आज़ाद, अनुगत-भिन्न, मातहतोसे अलग । तुल्याकार
की प्रतीतिका योजक धर्म अनुगत होता है ।
अननुगम (सं० पु० ) न अनुगमः, अभावार्थे नञ्-
तत् । अनुगमका अभाव, पोछेका छोड़ना । न्याय के
मतसे तुल्याकारको प्रतीतिके योजक धर्मका समालोचन
अनुगम कहता है ।
अनुज्ञात (स ं० त्रि०) असम्मत, आज्ञाविहीन, निषिद्ध ;
नामञ्जर, बेहुक्म, मना ।
अननुभावक (सं० त्रि०) मूर्ख, नादान ; जो बात समझ न सके।
अननुभावकतासं० स्त्री०) मूर्खता; नादानी ;
बेसमझो।
अननुभाषण (सं० क्लो० ) १ किसी साध्यको पुन-
रावृत्तिका न होना, किसी शक्लका न दुहराना ।
न्यायमें इसे निग्रहका स्थान मानते हैं । वादीके कोई
विषय तीन बार प्रमाणित करनेसे प्रतिवादीके उसका
उत्तर न देने पर अननुभाषण समझा जाता है। ऐसे
स्थलमें वादी जीतता और प्रतिवादी हारता है ।
२ मौन खौक्कृति, चुपके से मजुरी ।
अननुभूत (सं० त्रि०) अनुभवरहित, नामालूम ; .
अज्ञात, जो समझा-बुझा नहीं ।
अनुम (सं० ० ) मानविहीन, बेइज्जत ; अप्रिय,
नापसन्द ; असह्य, नागवार ; अयोग्य, नाकाबिल ।
अननुषङ्गिन् (सं० त्रि० ) पृथक्, अलग ; बेपरवा ।
अननुष्ठान (सं० क्लो० ) ष्ठानका न उठाना। १ अनरीति, बेरस्मी ; अनु- २ विस्मरण, भूलचूक ३ असभ्यता, नाशायस्तगी।
अननुक्त (सं० त्रि०) १ अपठित, न पढ़ा हुआ ।
२ गानरहित, न गाया गया । अप्रदत्त- प्रत्युत्तर, जिस-
का जवाब न दिया जाये ।
अनन्त (०सं० पु० ) नास्ति अन्तो गुणानां यस्य ।
१ विष्णु, नारायण । २ शेषनाग । ३ मेघ, बादल ।
४ बलराम, कृष्णके बड़े भाई । ५ बहुविस्तारयुक्त सिन्धु-
वार वृक्ष, खूब फैला हुआ पानीका संभालु । ६ जिन
विशेष | ७ दुरालभा, लटजीरा । ८ अनन्त नामक
चूर्ण, जो सर्वज्वर परचलता है । अभ्रक, अबरक<noinclude></noinclude>
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पीछे जबतक विद्वान् ब्राह्मण के मस्तकपर कुङ्गमादिका गन्ध या प्रलेप रहेगा, तबतक विद्याध्ययन न होगा। सो, आसनपर पैर रख, टांगपर टांग चढ़ा, आमिष
खा और जन्ममरणाशौचका अन्न भोजनकर वेद न पढ़े। प्रातः सन्ध्या या सायंसन्ध्याके समय कुज्झटिका या मेघगर्जन होनेसे और अमावस्या, चतुदशी, पूर्णिमा
और अष्टमी तिथिको वेदाध्ययन निषिद्ध है । अमा वस्या गुरु और चतुर्दशी शिष्यको नष्ट करतौ और अष्टमी और पूर्णिमा वेदको भुला देती है, इसलिये इन
सकल तिथियोंमें अध्ययन और अध्यापना छोड़ दे । धूलि बरसने, दिग्दाह होने, शृगाल कुक्कुर, गर्दभ और उष्ट्र बोलने या उनके दल बांधनेसे द्विजाति वेद
न पढ़ें। श्मशान, ग्रामान्त और गोष्ठमें और
स्त्रीस ंसर्गवाले समयके वस्त्रपहन और श्राद्धका द्रव्य
ले ( का पक्का खाकर ) वेद पढ़ना मना
है | श्राद्धका द्रव्य किसी प्राणी या अप्राणौके हाथसे
लेनेपर अनध्याय हो जाता है; क्योंकि हस्त हो
ब्राह्मणका मुखखरूप है । ग्राममें चोरोंका उत्पात
मचने, गृहदाहादिसे डराने और कोई भी अद्भुत
बात देखनेसे आकालिक अनध्याय मानते हैं ।
उपाकर्म और उत्सर्ग कर्म में त्रिरात्र और अष्टका
( कृष्णाष्टमी ) और ऋतुके अन्त-दिन अहोरात्र
अनध्याय रहता है। घोड़े, वृक्ष, हाथी, नाव, गधे,
ऊंट, गाड़ी प्रभृतिपर चढ़ और ऊषर देशमें रह
कर वेद न पढ़े। कहा-सुनी या मारपीट होनेसे
सैन्यके पास, युद्धक्षेत्रमें, भोजनसे पीछे हो, अजीर्णमें
या वमन करनेपर वेदाध्ययन निषिद्ध है ।
अनध्यायदिवस (स० पु० ) पढ़नेकौ छुट्टीका दिन ।
अन (सं० क्लो० ) अन-ल्युट् भावे ।
१ जीवन,
ज़िन्दगी । २ गति, रविश, चाल । ३ श्वास, सांस ।
अननङ्गमेजय (सं० त्रि०) शरीरको विना कंपाये न
कोड़नेवाला, जो जिस्मको हिला डाले ।
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आज़ाद, अनुगत-भिन्न, मातहतोसे अलग । तुल्याकार
की प्रतीतिका योजक धर्म अनुगत होता है ।
अननुगम (सं० पु० ) न अनुगमः, अभावार्थे नञ्-
तत् । अनुगमका अभाव, पोछेका छोड़ना । न्याय के
मतसे तुल्याकारको प्रतीतिके योजक धर्मका समालोचन
अनुगम कहता है ।
अनुज्ञात (स ं० त्रि०) असम्मत, आज्ञाविहीन, निषिद्ध ;
नामञ्जर, बेहुक्म, मना ।
अननुभावक (सं० त्रि०) मूर्ख, नादान ; जो बात समझ न सके।
अननुभावकतासं० स्त्री०) मूर्खता; नादानी ;
बेसमझो।
अननुभाषण (सं० क्लो० ) १ किसी साध्यको पुन-
रावृत्तिका न होना, किसी शक्लका न दुहराना ।
न्यायमें इसे निग्रहका स्थान मानते हैं । वादीके कोई
विषय तीन बार प्रमाणित करनेसे प्रतिवादीके उसका
उत्तर न देने पर अननुभाषण समझा जाता है। ऐसे
स्थलमें वादी जीतता और प्रतिवादी हारता है ।
२ मौन खौक्कृति, चुपके से मजुरी ।
अननुभूत (सं० त्रि०) अनुभवरहित, नामालूम ; .
अज्ञात, जो समझा-बुझा नहीं ।
अनुम (सं० ० ) मानविहीन, बेइज्जत ; अप्रिय,
नापसन्द ; असह्य, नागवार ; अयोग्य, नाकाबिल ।
अननुषङ्गिन् (सं० त्रि० ) पृथक्, अलग ; बेपरवा ।
अननुष्ठान (सं० क्लो० ) ष्ठानका न उठाना। १ अनरीति, बेरस्मी ; अनु- २ विस्मरण, भूलचूक ३ असभ्यता, नाशायस्तगी।
अननुक्त (सं० त्रि०) १ अपठित, न पढ़ा हुआ ।
२ गानरहित, न गाया गया । अप्रदत्त- प्रत्युत्तर, जिस-
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१ विष्णु, नारायण । २ शेषनाग । ३ मेघ, बादल ।
४ बलराम, कृष्णके बड़े भाई । ५ बहुविस्तारयुक्त सिन्धु-
वार वृक्ष, खूब फैला हुआ पानीका संभालु । ६ जिन
विशेष | ७ दुरालभा, लटजीरा । ८ अनन्त नामक
चूर्ण, जो सर्वज्वर परचलता है । अभ्रक, अबरक<noinclude></noinclude>
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खा और जन्ममरणाशौचका अन्न भोजनकर वेद न पढ़े। प्रातः सन्ध्या या सायंसन्ध्याके समय कुज्झटिका या मेघगर्जन होनेसे और अमावस्या, चतुदशी, पूर्णिमा
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स्त्रीस ंसर्गवाले समयके वस्त्रपहन और श्राद्धका द्रव्य
ले ( का पक्का खाकर ) वेद पढ़ना मना
है | श्राद्धका द्रव्य किसी प्राणी या अप्राणौके हाथसे
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ब्राह्मणका मुखखरूप है । ग्राममें चोरोंका उत्पात
मचने, गृहदाहादिसे डराने और कोई भी अद्भुत
बात देखनेसे आकालिक अनध्याय मानते हैं ।
उपाकर्म और उत्सर्ग कर्म में त्रिरात्र और अष्टका
( कृष्णाष्टमी ) और ऋतुके अन्त-दिन अहोरात्र
अनध्याय रहता है। घोड़े, वृक्ष, हाथी, नाव, गधे,
ऊंट, गाड़ी प्रभृतिपर चढ़ और ऊषर देशमें रह
कर वेद न पढ़े। कहा-सुनी या मारपीट होनेसे
सैन्यके पास, युद्धक्षेत्रमें, भोजनसे पीछे हो, अजीर्णमें
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अनध्यायदिवस (स० पु० ) पढ़नेकौ छुट्टीका दिन ।
अन (सं० क्लो० ) अन-ल्युट् भावे ।
१ जीवन,
ज़िन्दगी । २ गति, रविश, चाल । ३ श्वास, सांस ।
अननङ्गमेजय (सं० त्रि०) शरीरको विना कंपाये न
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अननुगत (सं० त्रि०) न अनुगतम्, नञ्- तत् । खतन्त्र,
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आज़ाद, अनुगत-भिन्न, मातहतोसे अलग । तुल्याकार
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अननुगम (सं० पु० ) न अनुगमः, अभावार्थे नञ्-
तत् । अनुगमका अभाव, पोछेका छोड़ना । न्याय के
मतसे तुल्याकारको प्रतीतिके योजक धर्मका समालोचन
अनुगम कहता है ।
अनुज्ञात (स ं० त्रि०) असम्मत, आज्ञाविहीन, निषिद्ध ;
नामञ्जर, बेहुक्म, मना ।
अननुभावक (सं० त्रि०) मूर्ख, नादान ; जो बात समझ न सके।
अननुभावकतासं० स्त्री०) मूर्खता; नादानी ;
बेसमझो।
अननुभाषण (सं० क्लो० ) १ किसी साध्यको पुन-
रावृत्तिका न होना, किसी शक्लका न दुहराना ।
न्यायमें इसे निग्रहका स्थान मानते हैं । वादीके कोई
विषय तीन बार प्रमाणित करनेसे प्रतिवादीके उसका
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२ मौन खौक्कृति, चुपके से मजुरी ।
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अनुम (सं० ० ) मानविहीन, बेइज्जत ; अप्रिय,
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अननुषङ्गिन् (सं० त्रि० ) पृथक्, अलग ; बेपरवा ।
अननुष्ठान (सं० क्लो० ) ष्ठानका न उठाना। १ अनरीति, बेरस्मी ; अनु- २ विस्मरण, भूलचूक ३ असभ्यता, नाशायस्तगी।
अननुक्त (सं० त्रि०) १ अपठित, न पढ़ा हुआ ।
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अनन्त (०सं० पु० ) नास्ति अन्तो गुणानां यस्य ।
१ विष्णु, नारायण । २ शेषनाग । ३ मेघ, बादल ।
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनन्त—अनन्तजित्'''|'''३८९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>१० वासुकी, शेषनागके बड़े भाई। ११ कृष्ण। १२ शिव। १३ रुद्र। १४ विश्वेदेवा। १५ बांहपर रेशम या सूतका अनन्त-चतुर्दशीको बंधनेवाला गुंथा हुआ डोरा। १६ आकार अक्षर। १७ गणितविशेष, एक तरहका हिसाब। यह दशम लवसे मिला भिन्न है, जिसे बराबर चलाते जाते हैं। (क्ली॰) नास्ति अन्तः परिच्छदो यस्य। १८ परब्रह्म, जो सबसे बड़ा है। १९ आकाश, आसमान। (त्रि॰) २० अवधिशून्य, बेठिकाना ; असीम, बेहद।
अनन्त—इस नामके बहुत संस्कृत ग्रन्थकार उत्पन्न हुए थे। इनमें यह कई एक प्रसिद्ध हैं,—
१ उदयभानुकाव्य-रचयिता। २ कारकचक्रप्रणेता। ३ चिदम्बराष्टक-कार। ४ योगामृतार्थ-चन्द्रिका नामसे पातञ्जलयोग-सूत्रके भाष्यकार। ५ वाक्यमञ्जरी-रच-यिता। ६ विध्यपराधप्रायश्चित्त-प्रयोगकार। ७ वाजसनेय-संहिताके 'शुक्लदशभाष्य' कार। ८ साहित्य-कल्प-वल्लि-नाम्नी अलङ्कार-ग्रन्थ-रचयिता। ९ चिर्न्तामणिके पुत्र, विख्यात ज्योतिर्विद्,—जनिपद्धति, सुधारस और कामधेनु नामसे गणिताध्याय-टीकाकार। १० भीमके पुत्र-नैगेयार्चिकानुक्रमकार। ११ मन्त्रिमण्डलके पुत्र—इन्होंने सन् १४५८ ई॰ में 'कामसमूह-महा-प्रबन्ध' नामक कामशास्त्रीय ग्रन्थ रचा था।
अनन्त आचार्य—१ प्रसिद्ध वेदभाष्यकार, लक्ष्मीधरके पुत्र—इन्होंने वेदार्थ-दीपिका नामसे यजुर्वेदका भाष्य और वेदार्थचन्द्र नामसे मीमांसा-ग्रन्थ गढ़ा था। २ एक प्रसिद्ध हिन्दू दार्शनिक। संस्कृत भाषामें इनके रचित—अभिन्न-निमित्त-वाद, आकाशाधिकरण-वाद,
ओङ्कारवाद, ज्ञानार्थ-वाद, शरीरवाद, शास्त्रीय-मत-समर्थन, समासवाद प्रभृति छोटे-छोटे पुस्तक और न्याय-भास्कर, विधि-सुधाकर तथा सिद्धान्त-सिद्धाञ्जन नामक वैदान्तिक ग्रन्थ मिले हैं। ३ वैदिक निघण्टकी टीका, जटापटल, शतकोटिखण्डन और स्वरूप-सम्बन्धरूप नामक न्याय-ग्रन्थकार।
अनन्तक (सं॰ पु॰) १ मूलक, मूली। २ नलतृण, नरकट।
अनन्तकर (सं॰ त्रि॰) असीम करता, बेहद पहुंचाता या बेहद बढ़ाता हुआ।
अनन्तकवि—१ मुद्राराक्षस-पूर्व-पीठिका-रचयिता। २ भारत-चम्पू-काव्य-रचयिता, जो अनन्त भट्ट कवि नामसे भी परिचित हैं। ३ बालमनोरमा नामपर संस्कृत-व्याकरणकार।
अनन्तकवि—एक हिन्दी कवि। इनका जन्म सन् १६३५ ई॰ में हुवा और इन्होंने प्रेमियोंके विषयपर हिन्दीभाषा में 'अनन्तानन्द' नामक कविताको बनाया था।
अनन्तकिनी—बम्बई उत्तर-कनाड़े मुजगदीवाले बाल-किनीके पुत्र। कोई १५१२ शक और विरोधी संवत्-सरमें इन्होंने रघुनाथ-देवस्थान बनवाया था। अग्र शाला और मन्दिरके बीच सन्ध्यामण्डप खड़ा है। विमान स्वरूप चक्र-कुछ रथ या गाड़ी-जैसा देख पड़ता और उसपर नक्क़ाशी खिंची हुई है। मन्दिरका व्यय साधारण दान और सरकारी उत्सर्गसे सधता है।
अनन्तग (सं॰ त्रि॰) असीम रूपसे गमन-करनेवाला, जो बेहद चलता जाये।
अनन्तगुण (सं॰ त्रि॰) असीम गुण रखनेवाला, जिसकी सिफ़तका कोई ठिकाना न हो।
अनन्तगूर्जर—भुवनकोष नामसे संस्कृत ज्योतिर्ग्रन्थ-रचयिता।
अनन्तचतुर्दशी (सं॰ स्त्री॰) अनन्तस्य विष्णोरारा-धनार्थ चतुर्दशी। भाद्रमासकी शुक्लचतुर्दशी, भादों महीनेकी सुदौवाली चौदस, जिस दिन विष्णु भगवान्को पूजते और बांह पर अनन्त बांधते हैं।
अनन्तजित् (सं॰ पु॰) अनन्तानि भूतानि जितवान्, जि-क्विप्, <small>ह्रस्वस्य प्रतिक्कृति तुक् इति तुक्।</small> १ सर्वभूतके जयकारी वासुदेव, सब लोगोंके जीतनेवाले श्रीकृष्ण। अनन्तान् चित्तदोषान् जयति। २ चौबीस जिनान्तर्गत चौदहवें जिन। यह वर्तमान अवसर्पिणीसे आविर्भूत हुए थे।
इनके पिताका सिंहसेन और माताका नाम सुयशा रहा। इनकी चवणतिथि श्रावण-कृष्ण-सप्तमी और जन्म-तिथि वैशाखकृष्णा-त्रयोदशी थी। यह प्राणतदेव विमानपर बैठे और अयोध्या नगरीमें<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनन्त—अनन्तजित्'''|'''३८९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>१० वासुकी, शेषनागके बड़े भाई। ११ कृष्ण। १२ शिव। १३ रुद्र। १४ विश्वेदेवा। १५ बांहपर रेशम या सूतका अनन्त-चतुर्दशीको बंधनेवाला गुंथा हुआ डोरा। १६ आकार अक्षर। १७ गणितविशेष, एक तरहका हिसाब। यह दशम लवसे मिला भिन्न है, जिसे बराबर चलाते जाते हैं। (क्ली॰) नास्ति अन्तः परिच्छदो यस्य। १८ परब्रह्म, जो सबसे बड़ा है। १९ आकाश, आसमान। (त्रि॰) २० अवधिशून्य, बेठिकाना ; असीम, बेहद।
अनन्त—इस नामके बहुत संस्कृत ग्रन्थकार उत्पन्न हुए थे। इनमें यह कई एक प्रसिद्ध हैं,—
१ उदयभानुकाव्य-रचयिता। २ कारकचक्रप्रणेता। ३ चिदम्बराष्टक-कार। ४ योगामृतार्थ-चन्द्रिका नामसे पातञ्जलयोग-सूत्रके भाष्यकार। ५ वाक्यमञ्जरी-रच-यिता। ६ विध्यपराधप्रायश्चित्त-प्रयोगकार। ७ वाजसनेय-संहिताके 'शुक्लदशभाष्य' कार। ८ साहित्य-कल्प-वल्लि-नाम्नी अलङ्कार-ग्रन्थ-रचयिता। ९ चिर्न्तामणिके पुत्र, विख्यात ज्योतिर्विद्,—जनिपद्धति, सुधारस और कामधेनु नामसे गणिताध्याय-टीकाकार। १० भीमके पुत्र-नैगेयार्चिकानुक्रमकार। ११ मन्त्रिमण्डलके पुत्र—इन्होंने सन् १४५८ ई॰ में 'कामसमूह-महा-प्रबन्ध' नामक कामशास्त्रीय ग्रन्थ रचा था।
अनन्त आचार्य—१ प्रसिद्ध वेदभाष्यकार, लक्ष्मीधरके पुत्र—इन्होंने वेदार्थ-दीपिका नामसे यजुर्वेदका भाष्य और वेदार्थचन्द्र नामसे मीमांसा-ग्रन्थ गढ़ा था। २ एक प्रसिद्ध हिन्दू दार्शनिक। संस्कृत भाषामें इनके रचित—अभिन्न-निमित्त-वाद, आकाशाधिकरण-वाद,
ओङ्कारवाद, ज्ञानार्थ-वाद, शरीरवाद, शास्त्रीय-मत-समर्थन, समासवाद प्रभृति छोटे-छोटे पुस्तक और न्याय-भास्कर, विधि-सुधाकर तथा सिद्धान्त-सिद्धाञ्जन नामक वैदान्तिक ग्रन्थ मिले हैं। ३ वैदिक निघण्टकी टीका, जटापटल, शतकोटिखण्डन और स्वरूप-सम्बन्धरूप नामक न्याय-ग्रन्थकार।
अनन्तक (सं॰ पु॰) १ मूलक, मूली। २ नलतृण, नरकट।
अनन्तकर (सं॰ त्रि॰) असीम करता, बेहद पहुंचाता या बेहद बढ़ाता हुआ।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अनन्तकवि—१ मुद्राराक्षस-पूर्व-पीठिका-रचयिता। २ भारत-चम्पू-काव्य-रचयिता, जो अनन्त भट्ट कवि नामसे भी परिचित हैं। ३ बालमनोरमा नामपर संस्कृत-व्याकरणकार।
अनन्तकवि—एक हिन्दी कवि। इनका जन्म सन् १६३५ ई॰ में हुवा और इन्होंने प्रेमियोंके विषयपर हिन्दीभाषा में 'अनन्तानन्द' नामक कविताको बनाया था।
अनन्तकिनी—बम्बई उत्तर-कनाड़े मुजगदीवाले बाल-किनीके पुत्र। कोई १५१२ शक और विरोधी संवत्-सरमें इन्होंने रघुनाथ-देवस्थान बनवाया था। अग्र शाला और मन्दिरके बीच सन्ध्यामण्डप खड़ा है। विमान स्वरूप चक्र-कुछ रथ या गाड़ी-जैसा देख पड़ता और उसपर नक्क़ाशी खिंची हुई है। मन्दिरका व्यय साधारण दान और सरकारी उत्सर्गसे सधता है।
अनन्तग (सं॰ त्रि॰) असीम रूपसे गमन-करनेवाला, जो बेहद चलता जाये।
अनन्तगुण (सं॰ त्रि॰) असीम गुण रखनेवाला, जिसकी सिफ़तका कोई ठिकाना न हो।
अनन्तगूर्जर—भुवनकोष नामसे संस्कृत ज्योतिर्ग्रन्थ-रचयिता।
अनन्तचतुर्दशी (सं॰ स्त्री॰) अनन्तस्य विष्णोरारा-धनार्थ चतुर्दशी। भाद्रमासकी शुक्लचतुर्दशी, भादों महीनेकी सुदौवाली चौदस, जिस दिन विष्णु भगवान्को पूजते और बांह पर अनन्त बांधते हैं।
अनन्तजित् (सं॰ पु॰) अनन्तानि भूतानि जितवान्, जि-क्विप्, <small>ह्रस्वस्य प्रतिक्कृति तुक् इति तुक्।</small> १ सर्वभूतके जयकारी वासुदेव, सब लोगोंके जीतनेवाले श्रीकृष्ण। अनन्तान् चित्तदोषान् जयति। २ चौबीस जिनान्तर्गत चौदहवें जिन। यह वर्तमान अवसर्पिणीसे आविर्भूत हुए थे।
इनके पिताका सिंहसेन और माताका नाम सुयशा रहा। इनकी चवणतिथि श्रावण-कृष्ण-सप्तमी और जन्म-तिथि वैशाखकृष्णा-त्रयोदशी थी। यह प्राणतदेव विमानपर बैठे और अयोध्या नगरीमें<noinclude></noinclude>
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अनन्त—इस नामके बहुत संस्कृत ग्रन्थकार उत्पन्न हुए थे। इनमें यह कई एक प्रसिद्ध हैं,—
१ उदयभानुकाव्य-रचयिता। २ कारकचक्रप्रणेता। ३ चिदम्बराष्टक-कार। ४ योगामृतार्थ-चन्द्रिका नामसे पातञ्जलयोग-सूत्रके भाष्यकार। ५ वाक्यमञ्जरी-रच-यिता। ६ विध्यपराधप्रायश्चित्त-प्रयोगकार। ७ वाजसनेय-संहिताके 'शुक्लदशभाष्य' कार। ८ साहित्य-कल्प-वल्लि-नाम्नी अलङ्कार-ग्रन्थ-रचयिता। ९ चिर्न्तामणिके पुत्र, विख्यात ज्योतिर्विद्,—जनिपद्धति, सुधारस और कामधेनु नामसे गणिताध्याय-टीकाकार। १० भीमके पुत्र-नैगेयार्चिकानुक्रमकार। ११ मन्त्रिमण्डलके पुत्र—इन्होंने सन् १४५८ ई॰ में 'कामसमूह-महा-प्रबन्ध' नामक कामशास्त्रीय ग्रन्थ रचा था।
अनन्त आचार्य—१ प्रसिद्ध वेदभाष्यकार, लक्ष्मीधरके पुत्र—इन्होंने वेदार्थ-दीपिका नामसे यजुर्वेदका भाष्य और वेदार्थचन्द्र नामसे मीमांसा-ग्रन्थ गढ़ा था। २ एक प्रसिद्ध हिन्दू दार्शनिक। संस्कृत भाषामें इनके रचित—अभिन्न-निमित्त-वाद, आकाशाधिकरण-वाद,
ओङ्कारवाद, ज्ञानार्थ-वाद, शरीरवाद, शास्त्रीय-मत-समर्थन, समासवाद प्रभृति छोटे-छोटे पुस्तक और न्याय-भास्कर, विधि-सुधाकर तथा सिद्धान्त-सिद्धाञ्जन नामक वैदान्तिक ग्रन्थ मिले हैं। ३ वैदिक निघण्टकी टीका, जटापटल, शतकोटिखण्डन और स्वरूप-सम्बन्धरूप नामक न्याय-ग्रन्थकार।
अनन्तक (सं॰ पु॰) १ मूलक, मूली। २ नलतृण, नरकट।
अनन्तकर (सं॰ त्रि॰) असीम करता, बेहद पहुंचाता या बेहद बढ़ाता हुआ।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अनन्तकवि—१ मुद्राराक्षस-पूर्व-पीठिका-रचयिता। २ भारत-चम्पू-काव्य-रचयिता, जो अनन्त भट्ट कवि नामसे भी परिचित हैं। ३ बालमनोरमा नामपर संस्कृत-व्याकरणकार।
अनन्तकवि—एक हिन्दी कवि। इनका जन्म सन् १६३५ ई॰ में हुवा और इन्होंने प्रेमियोंके विषयपर हिन्दीभाषा में 'अनन्तानन्द' नामक कविताको बनाया था।
अनन्तकिनी—बम्बई उत्तर-कनाड़े मुजगदीवाले बाल-किनीके पुत्र। कोई १५१२ शक और विरोधी संवत्-सरमें इन्होंने रघुनाथ-देवस्थान बनवाया था। अग्र शाला और मन्दिरके बीच सन्ध्यामण्डप खड़ा है। विमान स्वरूप चक्र-कुछ रथ या गाड़ी-जैसा देख पड़ता और उसपर नक्क़ाशी खिंची हुई है। मन्दिरका व्यय साधारण दान और सरकारी उत्सर्गसे सधता है।
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अनन्तचतुर्दशी (सं॰ स्त्री॰) अनन्तस्य विष्णोरारा-धनार्थ चतुर्दशी। भाद्रमासकी शुक्लचतुर्दशी, भादों महीनेकी सुदौवाली चौदस, जिस दिन विष्णु भगवान्को पूजते और बांह पर अनन्त बांधते हैं।
अनन्तजित् (सं॰ पु॰) अनन्तानि भूतानि जितवान्, जि-क्विप्, <small>ह्रस्वस्य प्रतिक्कृति तुक् इति तुक्।</small> १ सर्वभूतके जयकारी वासुदेव, सब लोगोंके जीतनेवाले श्रीकृष्ण। अनन्तान् चित्तदोषान् जयति। २ चौबीस जिनान्तर्गत चौदहवें जिन। यह वर्तमान अवसर्पिणीसे आविर्भूत हुए थे।
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३९७
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३९०'''|'''अनन्तता—अनन्तदेव'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>उत्पन्न हुए, जिस समय कृत्तिका नक्षत्र से मीनराशि निकल पड़ी थी। इनका चिह्न सीचाणा, शरीर-मान पचास धनु, और आयुमान तीस लाख वर्ष रहा। रङ्ग सुवर्ण-जैसा चमकता था। इन्हें राजाकी उपाधि दी गई, और इनका विवाह हो गया था। इनके साथ एक हज़ार लाधुओंको काम्पिल्य नगरीमें दोक्षा मिली। यह दीक्षातपके दो उपवास उठाते और प्रथम पारण दुग्धसे साधते थे। इनका पारणस्थान जयराजगृह रहा, एक वर्षमें दो दिन ही पारण-काल पड़ता था। माघ-शुक्ल-चतुर्थीको इन्हें दीक्षा दी गई थी। इनके छद्मस्थ दो मास थे, और ज्ञाननगरी काम्पिल्य रही। यह आठ मास और इक्कीस दिन गर्भमें रहे थे। इनका कुल इक्ष्वाकु, गणधर संख्या पचास, साधु कांछठ हज़ार, केवली पांच हज़ार, श्रावक दो लाख और छः हज़ार, श्राविका चार लाख और तेरह हज़ार थीं। वैशाख कृष्णा-चतुर्दशी इनकी ज्ञानतिथि रही, और दीक्षावृक्ष अशोक था। यह कायोत्सर्ग मोक्षासनपर बैठे और चैत्र-शुक्ल-पञ्चमीको मुक्त हुए थे। इनका मोक्षस्थान—समेतशिखर, प्रथम गणधर—यश, और प्रथम भार्या—पद्मा थी।
अनन्तता (सं॰ स्त्री॰) असीमता; बक़ा, हमेशगी।
अनन्ततान (सं॰ त्रि॰) प्रशस्त, लम्बा-चौड़ा।
अनन्ततीर्थकृत् (सं॰ पु॰) अनन्तानि अनेकानि तीर्थानि शास्त्राणि करोतीति, कृ-क्किप। १ जिनविशेष। <small>अनन्तजित् देखो।</small> २ अनन्तजित् नामक एक लेखक जिन्होंने अनेक शास्त्र बनाये थे। (त्रि॰) ३ अनेकतीर्थ-गमनकारी, कितने ही तीर्थ घूमनेवाला।
अनन्ततृतीया (सं॰ स्त्री॰) अनन्ता तृतीया। भाद्र, अग्रहायण और वैशाख मासकी शुक्लतृतीया, भादों अगहन और वैशाख महीनेकी सुदीवाली तीज। यह दिन विष्णु भगवानन्के पूजनको शुभ समझा जाता है।
अनन्ततृतीयाव्रत (सं॰ पु॰) वशाखऽशुक्लतृतीयाका अनुष्ठेय व्रतभेद। भविष्योत्तर-पुराणके चौबीसवें अध्यायमें इस व्रतकी कथा लिखी है।
अनन्तत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अनन्तता देखो।</small>
अनन्तदीक्षित—एक विख्यात वैदिक पण्डित, विश्वनाथ दीक्षित के पुत्र। इन्होंने आश्वलायनके मतानुसार संस्कृत भाषामें प्रयोगरत्न या स्मार्तानुष्ठानपद्धति और महारुद्रप्रयोगपद्धति रचा था।
अनन्तदृष्टि (सं॰ पु॰) अनन्ता अनेक दृष्टयो नेत्राणि यस्यं। १ इन्द्र, जिनके हज़ारों नेत्र हैं। २ परमेश्वर, भगवान्। ३ शिव।
अनन्तदेव (सं॰ पु॰) अनन्तो देव इव। १ शेषनाग। अनन्ते शेषनागे दीव्यति, दिव-अच्। २ शेष-सर्पशायी नारायण, शेषनाग पर सोनेवाले भगवान्। ३ कश्मीरके एक राजा। इन्होंने पैंतीस वत्सर राजत्व चलाया; इनके पिताका नाम संग्रामराज या क्षमापति और माताका नाम श्रीलेखा था। सूर्यमतीके साथ इनका विवाह हुआ था। <small>कश्मीर देखो।</small>
अनन्त देव—१ एक बहुशास्त्रविद् पण्डित और कवि। यह बाज़बहादुर-चन्द्र के आश्रित रहे। इन्होंने संस्कृत भाषामें कृष्णभक्तिचन्द्रिका नामसे नाटक, भगवद्भक्ति-निर्णय नामसे भक्तिग्रन्थ, चातुर्मास्यप्रयोग, नक्षत्रसत्र-प्रयोग और देवतास्वरूपविचार नामक मीमांसा-ग्रन्थ, प्रायश्चित्त-प्रदीपिका और स्मृतिकौस्तुभ नामसे धर्म-ग्रन्थ और वाक्यभेद नामसे न्यायग्रन्थ बनाये थे। इन्हें छोड़ मीमांसा-न्यायप्रकाशटीका, सम्प्रदायनिरूपण
तत्त्वप्रक्रियाटीका (वेदान्तानुसारी), और लक्ष्मी-धर-रचित भगन्नामकौमुदी ग्रन्थकी 'प्रकाशाख्य' टीका भी लिखी थी। २ यजुर्वेदीय काखसंहिताके भाष्य-कार; यह वैदिकप्रयोग और पद्धतिकें कितने ही छोटे-छोटे वैदिक ग्रन्थ संस्कृत में लिख गये हैं।
३ गोत्रप्रवर निर्णय-रचयिता। ४ दत्तकपुत्रविधानकार। ५ निर्णयविन्दुप्रणेता। ६ कुण्डोद्योत-दर्शनकार। ७ बालसाङ्कर्यखण्डन और बलाबलाक्षेपपरिहार नामसे मीमांसा-ग्रन्थकार। ८ एक प्रसिद्ध श्रौत पण्डित। इनके रचित श्रौतसूत्रीय भोजनसूत्र, यजुः सन्धा, रुद्रकल्पद्रुम और सर्वव्रतोद्यापन प्रभृति संस्कृत ग्रन्थ मिलते हैं। ९ मथुरामाहात्मा-विषयक 'मथुरासेतु'-रचयिता। १० विष्णुयागकार। ११ बृद्धिश्राद्धदीपिका-<noinclude></noinclude>
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अनन्ततीर्थकृत् (सं॰ पु॰) अनन्तानि अनेकानि तीर्थानि शास्त्राणि करोतीति, कृ-क्किप। १ जिनविशेष। <small>अनन्तजित् देखो।</small> २ अनन्तजित् नामक एक लेखक जिन्होंने अनेक शास्त्र बनाये थे। (त्रि॰) ३ अनेकतीर्थ-गमनकारी, कितने ही तीर्थ घूमनेवाला।
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अनन्त देव—१ एक बहुशास्त्रविद् पण्डित और कवि। यह बाज़बहादुर-चन्द्र के आश्रित रहे। इन्होंने संस्कृत भाषामें कृष्णभक्तिचन्द्रिका नामसे नाटक, भगवद्भक्ति-निर्णय नामसे भक्तिग्रन्थ, चातुर्मास्यप्रयोग, नक्षत्रसत्र-प्रयोग और देवतास्वरूपविचार नामक मीमांसा-ग्रन्थ, प्रायश्चित्त-प्रदीपिका और स्मृतिकौस्तुभ नामसे धर्म-ग्रन्थ और वाक्यभेद नामसे न्यायग्रन्थ बनाये थे। इन्हें छोड़ मीमांसा-न्यायप्रकाशटीका, सम्प्रदायनिरूपण
तत्त्वप्रक्रियाटीका (वेदान्तानुसारी), और लक्ष्मी-धर-रचित भगन्नामकौमुदी ग्रन्थकी 'प्रकाशाख्य' टीका भी लिखी थी। २ यजुर्वेदीय काखसंहिताके भाष्य-कार; यह वैदिकप्रयोग और पद्धतिकें कितने ही छोटे-छोटे वैदिक ग्रन्थ संस्कृत में लिख गये हैं।
३ गोत्रप्रवर निर्णय-रचयिता। ४ दत्तकपुत्रविधानकार। ५ निर्णयविन्दुप्रणेता। ६ कुण्डोद्योत-दर्शनकार। ७ बालसाङ्कर्यखण्डन और बलाबलाक्षेपपरिहार नामसे मीमांसा-ग्रन्थकार। ८ एक प्रसिद्ध श्रौत पण्डित। इनके रचित श्रौतसूत्रीय भोजनसूत्र, यजुः सन्धा, रुद्रकल्पद्रुम और सर्वव्रतोद्यापन प्रभृति संस्कृत ग्रन्थ मिलते हैं। ९ मथुरामाहात्मा-विषयक 'मथुरासेतु'-रचयिता। १० विष्णुयागकार। ११ बृद्धिश्राद्धदीपिका-<noinclude></noinclude>
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अनन्ततृतीयाव्रत (सं॰ पु॰) वशाखऽशुक्लतृतीयाका अनुष्ठेय व्रतभेद। भविष्योत्तर-पुराणके चौबीसवें अध्यायमें इस व्रतकी कथा लिखी है।<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अनन्तत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अनन्तता देखो।</small>
अनन्तदीक्षित—एक विख्यात वैदिक पण्डित, विश्वनाथ दीक्षित के पुत्र। इन्होंने आश्वलायनके मतानुसार संस्कृत भाषामें प्रयोगरत्न या स्मार्तानुष्ठानपद्धति और महारुद्रप्रयोगपद्धति रचा था।
अनन्तदृष्टि (सं॰ पु॰) अनन्ता अनेक दृष्टयो नेत्राणि यस्यं। १ इन्द्र, जिनके हज़ारों नेत्र हैं। २ परमेश्वर, भगवान्। ३ शिव।
अनन्तदेव (सं॰ पु॰) अनन्तो देव इव। १ शेषनाग। अनन्ते शेषनागे दीव्यति, दिव-अच्। २ शेष-सर्पशायी नारायण, शेषनाग पर सोनेवाले भगवान्। ३ कश्मीरके एक राजा। इन्होंने पैंतीस वत्सर राजत्व चलाया; इनके पिताका नाम संग्रामराज या क्षमापति और माताका नाम श्रीलेखा था। सूर्यमतीके साथ इनका विवाह हुआ था। <small>कश्मीर देखो।</small>
अनन्त देव—१ एक बहुशास्त्रविद् पण्डित और कवि। यह बाज़बहादुर-चन्द्र के आश्रित रहे। इन्होंने संस्कृत भाषामें कृष्णभक्तिचन्द्रिका नामसे नाटक, भगवद्भक्ति-निर्णय नामसे भक्तिग्रन्थ, चातुर्मास्यप्रयोग, नक्षत्रसत्र-प्रयोग और देवतास्वरूपविचार नामक मीमांसा-ग्रन्थ, प्रायश्चित्त-प्रदीपिका और स्मृतिकौस्तुभ नामसे धर्म-ग्रन्थ और वाक्यभेद नामसे न्यायग्रन्थ बनाये थे। इन्हें छोड़ मीमांसा-न्यायप्रकाशटीका, सम्प्रदायनिरूपण
तत्त्वप्रक्रियाटीका (वेदान्तानुसारी), और लक्ष्मी-धर-रचित भगन्नामकौमुदी ग्रन्थकी 'प्रकाशाख्य' टीका भी लिखी थी। २ यजुर्वेदीय काखसंहिताके भाष्य-कार; यह वैदिकप्रयोग और पद्धतिकें कितने ही छोटे-छोटे वैदिक ग्रन्थ संस्कृत में लिख गये हैं।
३ गोत्रप्रवर निर्णय-रचयिता। ४ दत्तकपुत्रविधानकार। ५ निर्णयविन्दुप्रणेता। ६ कुण्डोद्योत-दर्शनकार। ७ बालसाङ्कर्यखण्डन और बलाबलाक्षेपपरिहार नामसे मीमांसा-ग्रन्थकार। ८ एक प्रसिद्ध श्रौत पण्डित। इनके रचित श्रौतसूत्रीय भोजनसूत्र, यजुः सन्धा, रुद्रकल्पद्रुम और सर्वव्रतोद्यापन प्रभृति संस्कृत ग्रन्थ मिलते हैं। ९ मथुरामाहात्मा-विषयक 'मथुरासेतु'-रचयिता। १० विष्णुयागकार। ११ बृद्धिश्राद्धदीपिका-<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३९८
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनन्तदेव याज्ञिक—अनन्तपुर'''|'''३९१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>कार। १२ वेदान्तसारपद्यमालाकार। १३ सिद्धान्ततत्त्व नामसे वैदान्तिक ग्रन्थकार। १४ कारिका नामसे धर्मग्रन्थकार।
अनन्तदेव याज्ञिक—व्यवहार-दर्पण और शुद्धिदर्पणके रचयिता।
अनन्तदेवायनि—शिशुपाल-वध-टीकाकार।
अनन्तदवज्ञ—नन्दिग्रामवासी केशव दैवज्ञके पुत्र, कालनिर्णयावरोध-रचयिता।
अनन्तनारायण—१ दाक्षिणात्यके प्रसिद्ध कवि। इन्होंने संस्कृत भाषामें आनन्द-वल्ली स्तोत्र और शरभोजि-चरित्र रचा था। २ प्रसिद्ध नैयायिक, कारिकावल्ली और तर्कसंग्रहके टीकाकार।
अनन्तनारायण दीक्षित—गीताशङ्कर नामसे संस्कृत ग्रन्थकार, इनके पिताका मृत्युञ्जय और पितामहका नाम कृष्ण दीक्षित था।
अनन्तनेमि (सं॰ पु॰) मालवेके एक राजा, जो शाक्यमुनिके सहयोगी थे।
अनन्तपण्डित—गोदावरीतीरस्थ पुण्यस्तम्भवाले अधिवासी त्राम्बक पण्डितके पुत्र, इन्होंने व्यङ्गार्थ-कौमुदी नाम्नी काव्य, गोवर्द्धनसप्तशतीटीका और रसमञ्जरी-टीका रची थी।
अनन्तपन्थी—युक्त प्रदेश रायबरेली और सीतापुर ज़िलेका फिरसे सुधरा वैष्णव सम्प्रदाय। इनकी संख्या बहुत कम है। यह अकेले परमेश्वरको मानते, जिन्हें अनन्तदेव कहकर पूजते हैं। मुंडवेमें रहने-वाले साधु मुन्नादास सोनारका चलाया यह वैष्णव-सम्प्रदाय विशेष है। कहते हैं, कि जब दुर्भिक्ष बड़े ज़ोरपर था, तब मुन्नादासने लोगोंको सूखे से बचाया और खेरी, सीतापुर और बहरायच ज़िलेमें कितने ही उनके चेले बन गये थे। नहीं देखते, कि मुन्नादासने जो उपदेश दिया, उसमें और साधारण वैष्णवोंकी बातमें कोई भेद हो।
अनन्तपार (सं॰ त्रि॰) असीम विस्तृतिसम्पन्न, बेहद लम्बा-चौड़ा।
अनन्तपाल (सं॰ पु॰) कश्मीरके एक वीर राजाका नाम। <small>कश्मीर देखो।</small>
अनन्तपालय्य—षष्ठ विक्रमादित्य के महाप्रधान मन्त्री, जो साढ़े सात लाख पन्नाय करका इन्तज़ाम पश्चिम-बम्बई में करते थे। बेलगांव से सन् १९०३ ई॰ की तारीख़का जो ताम्रफलक निकला, उसमें इनकी बात लिखी है।
अनन्तपुर—उड़ीसा बालेश्वर ज़िलेका एक गांव। यहांसे सोरोको एक पक्की सड़क निकली और एक छोटा-मोटा पुलिसका थाना भी बना है।
अनन्तपुर—मन्द्राज प्रान्तका एक ज़िला। यह सन् १८८२ ई॰ की ५वीं जनवरीको गूटी, ताडपत्री, अनन्तर, धर्मावरम्, पेनुकोण्डा, मरकसीर और हिन्दूपुर इन सात ताल्लुक़को मिलाकर बनाया गया, जो पहले बेलारी ज़िलेमें लगते थे। यह १३°४१
और १५°१४ अक्षांश, तथा ७६°४९ और ७८°९ द्राविमांशके बीच अवस्थित है। इसका क्षेत्रफल ५५५७ वर्गमील और जननिवास कोई छः लाखके लगभग है। मन्द्राज प्रान्त के ज़िलोंमें विस्तारको देखते पन्द्रहवां और मनुष्य-गणना देखते बीसवां दरजा इसने पाया है। इसके कोई एक हज़ार आबाद गांवमें दश शहर भी शामिल हैं। इसके उत्तर बेलारी और दक्षिण महिसूर राज्य और करनूल ज़िला, पश्चिम महिसूरका राज्य और बेलारी ज़िला, और पूर्व कड़ापा ज़िला सीमाको बांधे है।
अपने उत्तरीय और केन्द्रीय विभाग में यह ज़िला ऊंचा मैदान है, जिसके ऊपर जहां-तहां बड़ी-बड़ी भुरभुरे पत्थरकी चटान और नीची पहाड़ी उठी है। सिवा गांव के दूसरी जगह वृक्ष बहुत कम देख-पड़ते हैं। उत्तरमें काली रूई पैदा करने वाली मट्टी भरी है, किन्तु दक्षिणको आगे बढ़नेसे लाल पड़ जाती है। दक्षिण ताल्लुक़ में धरातल अधिक पथरीला है, जहां मैदान समुद्रतल से २२०० फ़ीट ऊंचा है। उत्तर
तालुक़ में पानीकी कमी है, किन्तु दक्षिण में वह भरा पड़ा है। इस ज़िलेमें बहनेवाली पवित्र पेन्नार नदी वर्षमें बहुत दिनतक सूखी पड़ी रहती है। इसके वामतटपर हिन्दूपुर शहर है, जहां हिन्दुओंका एक अति पवित्र मन्दिर बना, और यात्री दर्शन<noinclude></noinclude>
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अनन्तदेव याज्ञिक—व्यवहार-दर्पण और शुद्धिदर्पणके रचयिता।
अनन्तदेवायनि—शिशुपाल-वध-टीकाकार।
अनन्तदवज्ञ—नन्दिग्रामवासी केशव दैवज्ञके पुत्र, कालनिर्णयावरोध-रचयिता।
अनन्तनारायण—१ दाक्षिणात्यके प्रसिद्ध कवि। इन्होंने संस्कृत भाषामें आनन्द-वल्ली स्तोत्र और शरभोजि-चरित्र रचा था। २ प्रसिद्ध नैयायिक, कारिकावल्ली और तर्कसंग्रहके टीकाकार।
अनन्तनारायण दीक्षित—गीताशङ्कर नामसे संस्कृत ग्रन्थकार, इनके पिताका मृत्युञ्जय और पितामहका नाम कृष्ण दीक्षित था।
अनन्तनेमि (सं॰ पु॰) मालवेके एक राजा, जो शाक्यमुनिके सहयोगी थे।
अनन्तपण्डित—गोदावरीतीरस्थ पुण्यस्तम्भवाले अधिवासी त्राम्बक पण्डितके पुत्र, इन्होंने व्यङ्गार्थ-कौमुदी नाम्नी काव्य, गोवर्द्धनसप्तशतीटीका और रसमञ्जरी-टीका रची थी।
अनन्तपन्थी—युक्त प्रदेश रायबरेली और सीतापुर ज़िलेका फिरसे सुधरा वैष्णव सम्प्रदाय। इनकी संख्या बहुत कम है। यह अकेले परमेश्वरको मानते, जिन्हें अनन्तदेव कहकर पूजते हैं। मुंडवेमें रहने-वाले साधु मुन्नादास सोनारका चलाया यह वैष्णव-सम्प्रदाय विशेष है। कहते हैं, कि जब दुर्भिक्ष बड़े ज़ोरपर था, तब मुन्नादासने लोगोंको सूखे से बचाया और खेरी, सीतापुर और बहरायच ज़िलेमें कितने ही उनके चेले बन गये थे। नहीं देखते, कि मुन्नादासने जो उपदेश दिया, उसमें और साधारण वैष्णवोंकी बातमें कोई भेद हो।
अनन्तपार (सं॰ त्रि॰) असीम विस्तृतिसम्पन्न, बेहद लम्बा-चौड़ा।
अनन्तपाल (सं॰ पु॰) कश्मीरके एक वीर राजाका नाम। <small>कश्मीर देखो।</small><noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अनन्तपालय्य—षष्ठ विक्रमादित्य के महाप्रधान मन्त्री, जो साढ़े सात लाख पन्नाय करका इन्तज़ाम पश्चिम-बम्बई में करते थे। बेलगांव से सन् १९०३ ई॰ की तारीख़का जो ताम्रफलक निकला, उसमें इनकी बात लिखी है।
अनन्तपुर—उड़ीसा बालेश्वर ज़िलेका एक गांव। यहांसे सोरोको एक पक्की सड़क निकली और एक छोटा-मोटा पुलिसका थाना भी बना है।
अनन्तपुर—मन्द्राज प्रान्तका एक ज़िला। यह सन् १८८२ ई॰ की ५वीं जनवरीको गूटी, ताडपत्री, अनन्तर, धर्मावरम्, पेनुकोण्डा, मरकसीर और हिन्दूपुर इन सात ताल्लुक़को मिलाकर बनाया गया, जो पहले बेलारी ज़िलेमें लगते थे। यह १३°४१
और १५°१४ अक्षांश, तथा ७६°४९ और ७८°९ द्राविमांशके बीच अवस्थित है। इसका क्षेत्रफल ५५५७ वर्गमील और जननिवास कोई छः लाखके लगभग है। मन्द्राज प्रान्त के ज़िलोंमें विस्तारको देखते पन्द्रहवां और मनुष्य-गणना देखते बीसवां दरजा इसने पाया है। इसके कोई एक हज़ार आबाद गांवमें दश शहर भी शामिल हैं। इसके उत्तर बेलारी और दक्षिण महिसूर राज्य और करनूल ज़िला, पश्चिम महिसूरका राज्य और बेलारी ज़िला, और पूर्व कड़ापा ज़िला सीमाको बांधे है।
अपने उत्तरीय और केन्द्रीय विभाग में यह ज़िला ऊंचा मैदान है, जिसके ऊपर जहां-तहां बड़ी-बड़ी भुरभुरे पत्थरकी चटान और नीची पहाड़ी उठी है। सिवा गांव के दूसरी जगह वृक्ष बहुत कम देख-पड़ते हैं। उत्तरमें काली रूई पैदा करने वाली मट्टी भरी है, किन्तु दक्षिणको आगे बढ़नेसे लाल पड़ जाती है। दक्षिण ताल्लुक़ में धरातल अधिक पथरीला है, जहां मैदान समुद्रतल से २२०० फ़ीट ऊंचा है। उत्तर
तालुक़ में पानीकी कमी है, किन्तु दक्षिण में वह भरा पड़ा है। इस ज़िलेमें बहनेवाली पवित्र पेन्नार नदी वर्षमें बहुत दिनतक सूखी पड़ी रहती है। इसके वामतटपर हिन्दूपुर शहर है, जहां हिन्दुओंका एक अति पवित्र मन्दिर बना, और यात्री दर्शन<noinclude></noinclude>
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अनन्तदेव याज्ञिक—व्यवहार-दर्पण और शुद्धिदर्पणके रचयिता।
अनन्तदेवायनि—शिशुपाल-वध-टीकाकार।
अनन्तदवज्ञ—नन्दिग्रामवासी केशव दैवज्ञके पुत्र, कालनिर्णयावरोध-रचयिता।
अनन्तनारायण—१ दाक्षिणात्यके प्रसिद्ध कवि। इन्होंने संस्कृत भाषामें आनन्द-वल्ली स्तोत्र और शरभोजि-चरित्र रचा था। २ प्रसिद्ध नैयायिक, कारिकावल्ली और तर्कसंग्रहके टीकाकार।
अनन्तनारायण दीक्षित—गीताशङ्कर नामसे संस्कृत ग्रन्थकार, इनके पिताका मृत्युञ्जय और पितामहका नाम कृष्ण दीक्षित था।
अनन्तनेमि (सं॰ पु॰) मालवेके एक राजा, जो शाक्यमुनिके सहयोगी थे।
अनन्तपण्डित—गोदावरीतीरस्थ पुण्यस्तम्भवाले अधिवासी त्राम्बक पण्डितके पुत्र, इन्होंने व्यङ्गार्थ-कौमुदी नाम्नी काव्य, गोवर्द्धनसप्तशतीटीका और रसमञ्जरी-टीका रची थी।
अनन्तपन्थी—युक्त प्रदेश रायबरेली और सीतापुर ज़िलेका फिरसे सुधरा वैष्णव सम्प्रदाय। इनकी संख्या बहुत कम है। यह अकेले परमेश्वरको मानते, जिन्हें अनन्तदेव कहकर पूजते हैं। मुंडवेमें रहने-वाले साधु मुन्नादास सोनारका चलाया यह वैष्णव-सम्प्रदाय विशेष है। कहते हैं, कि जब दुर्भिक्ष बड़े ज़ोरपर था, तब मुन्नादासने लोगोंको सूखे से बचाया और खेरी, सीतापुर और बहरायच ज़िलेमें कितने ही उनके चेले बन गये थे। नहीं देखते, कि मुन्नादासने जो उपदेश दिया, उसमें और साधारण वैष्णवोंकी बातमें कोई भेद हो।
अनन्तपार (सं॰ त्रि॰) असीम विस्तृतिसम्पन्न, बेहद लम्बा-चौड़ा।
अनन्तपाल (सं॰ पु॰) कश्मीरके एक वीर राजाका नाम। <small>कश्मीर देखो।</small><noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>अनन्तपालय्य—षष्ठ विक्रमादित्य के महाप्रधान मन्त्री, जो साढ़े सात लाख पन्नाय करका इन्तज़ाम पश्चिम-बम्बई में करते थे। बेलगांव से सन् १९०३ ई॰ की तारीख़का जो ताम्रफलक निकला, उसमें इनकी बात लिखी है।
अनन्तपुर—उड़ीसा बालेश्वर ज़िलेका एक गांव। यहांसे सोरोको एक पक्की सड़क निकली और एक छोटा-मोटा पुलिसका थाना भी बना है।
अनन्तपुर—मन्द्राज प्रान्तका एक ज़िला। यह सन् १८८२ ई॰ की ५वीं जनवरीको गूटी, ताडपत्री, अनन्तर, धर्मावरम्, पेनुकोण्डा, मरकसीर और हिन्दूपुर इन सात ताल्लुक़को मिलाकर बनाया गया, जो पहले बेलारी ज़िलेमें लगते थे। यह १३°४१
और १५°१४ अक्षांश, तथा ७६°४९ और ७८°९ द्राविमांशके बीच अवस्थित है। इसका क्षेत्रफल ५५५७ वर्गमील और जननिवास कोई छः लाखके लगभग है। मन्द्राज प्रान्त के ज़िलोंमें विस्तारको देखते पन्द्रहवां और मनुष्य-गणना देखते बीसवां दरजा इसने पाया है। इसके कोई एक हज़ार आबाद गांवमें दश शहर भी शामिल हैं। इसके उत्तर बेलारी और दक्षिण महिसूर राज्य और करनूल ज़िला, पश्चिम महिसूरका राज्य और बेलारी ज़िला, और पूर्व कड़ापा ज़िला सीमाको बांधे है।
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तालुक़ में पानीकी कमी है, किन्तु दक्षिण में वह भरा पड़ा है। इस ज़िलेमें बहनेवाली पवित्र पेन्नार नदी वर्षमें बहुत दिनतक सूखी पड़ी रहती है। इसके वामतटपर हिन्दूपुर शहर है, जहां हिन्दुओंका एक अति पवित्र मन्दिर बना, और यात्री दर्शन<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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पहुंचते हैं। ज़िलेके दक्षिणसे चित्रावती नदी निकलती और धर्मावरम् और बुक्कापतनम्के बड़े तालाब भर देती है। मुचूकोटेकी नीची और पमादुरतीके पासवाली पहाड़ियोंमें क़ीमती लकड़ी पेदा होती है। गूटीमें समुद्रतलसे २१७१ फ़ीट ऊंची बहुत ही अच्छी क़िलेकी चटान है और पेनूकोण्डेमें भी ३१०० फ़ीट ऊंची दूसरी चटान खड़ी है। भुरभुरे पत्थरकी चटानका कोंई ठिकाना नहीं। तांबा, रांगा, सुरमा और फिटकरी सब कुछ पहाड़ियों में मिलता है। नमक और शोरा मट्टीसे निकालते हैं। सन् १८१३ ई॰ से ताड़पत्री और गूटीवाली हीरेकी खानियोंमें कोई लाभ नहीं हुआ, किन्तु अब फिर लोगोंका ध्यान उनपर दौड़ने लगा है। शेर (बहुतकम), चीता, लकड़ बग्घा, भेड़िया, काला रीछ, जङ्गली सूअर, बारहसिंहा और हिरण अधिक है। कितनी ही तरहकी शिकारी चिड़ियां मामूली तौरसे मिलती हैं। तुकदर, मुरग़ी, तीतर, घुग्घू, हंस, तोते और अनेक छोटे पक्षियोंकी कोई कमी नहीं। ज़हरीले सांप अकसर देखने में आते हैं। बबूल, बेर और जङ्गली खजूर असली वृक्ष हैं। आम, नारियल, इमली, केले और कितने ही दूसरे वृक्षों की भी लोगोंने यहां पहुंचाया है।
<small>इतिहास</small>—यह ज़िला सन् ई॰ के १४वें शताब्दके बीच विजयनगर के राज्यका एक भाग रहा। सन् १५६५ ई॰ में तालिकोटके युद्धपर विजापुर, गोलकुण्ड, दौलताबाद और बराड़के सुलतानोंकी मिली हुई फ़ौजने विजयनगरके महाराज रामराजको हराया और फिर उनकी राजधानी लूट-मारकर तोड़ डाली। रामराजके भाई तीरूमल पेन्कोण्डेको भागे, जहां पहले एक सुविशाल और जनसम्पन्न नगर रहने के लक्षण देख पड़ते हैं। विजयनगर-राजके दीवान चिकघा उदय्यरने अनन्तपुरको सन् १३६४ ई॰ में प्रतिष्ठित किया था। यह महाराष्ट्रोंके बल और
वीरत्वका एक स्मारक-जैसा रहा। सन् १६८० ई॰ में महाराज शिवाजीके निर्वाण बाद उनको साहाय्य देनेके कारण औरङ्गज़े बने कुचल डाला, किन्तु उनका प्रभाव भी अन्त में प्रतिष्ठित हो न सका और न कभी ठीक तौर से आमदनी ही शाही ख़ज़ाने में भेजी गई। औरङ्गज़ेब के मरने और निज़ामके ऊंचे उठने बाद सब और प्रधानतः गूटीके पलिगार स्वतन्त्र बन बैठे। इसी बीच महिसूर राज्य हड़पनेवाले हैदर अलीको अपना प्रभाव पासके देशपर फैलाने की उत्कण्ठा उठी। कोदीकोण्डा, जदकसीरा और
हिन्दूपुर तो उन्होंने ले लिया, किन्तु गूटी बराबर लड़ता रहा और एक पैसा भी उन्हें न दिया। अन्तमें हैदर अलीने गूटीको जीतकर अपना अड्डा बनाया और वह महाराष्ट्र और निज़ामसे लड़ते रहे। इधर-उधर के पलायम महिसूरके करद राज्य हो गये हैदर अलीके मरनेपर वह सब स्वतन्त्र बने। हैदर अलीके लड़के टीपूने गद्दीपर बैठ सब बलवाइयोंके धर दबाया था। किन्तु टीपूको शीघ्र ही अंगरेजोंसे लड़ना पड़ा। सन् १७८९ ई॰ में निज़ामने अनन्तपुर अंगरेज़-सरकारको अपनी ओर की सरकारी फ़ौजके
खर्चमें दे डाला। जब आमदनी वसूल करनेकी ठहरी, तब पलिगारोंने बलवा मचाया था, जिसे जनरल कम्बलने भली भांति दबा दिया। बदमाश अपनी रियासतसे निकाले गये और बाक़ी लोग डरकर चुपके हुए; लोगों के हाथमें प्रबन्धका भार न रहा और उन्हें फौज न रखनेका आदेश दिया गया।
इस ज़िले में कितनी ही ऊजड़ ज़मीन है। बाक़ी कोई एक तिहाईपर खेती होती और सैकड़े पीछे सोलह एकर भूमि इनाममें लगी है। कितने ही एकर भूमि चरागाह और जङ्गलके लिये भी रखी गई है। खेती तीन भागमें बंटी है,—सींची, सूखी और बाग़की ज़मीन। सूखी ज़मीनपर विना पानी दिये खेती होती है। ख़ास फ़सल कम्बू, चोलम्, रगी और कोरेकी है, जिसे खाकर अधिकांश लोग जीते-जागते हैं। सींचकी ज़मीनमें चावल और गन्ना बोते हैं। बाग़की<noinclude></noinclude>
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अमृता कुमारी पाण्डेय
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पहुंचते हैं। ज़िलेके दक्षिणसे चित्रावती नदी निकलती और धर्मावरम् और बुक्कापतनम्के बड़े तालाब भर देती है। मुचूकोटेकी नीची और पमादुरतीके पासवाली पहाड़ियोंमें क़ीमती लकड़ी पेदा होती है। गूटीमें समुद्रतलसे २१७१ फ़ीट ऊंची बहुत ही अच्छी क़िलेकी चटान है और पेनूकोण्डेमें भी ३१०० फ़ीट ऊंची दूसरी चटान खड़ी है। भुरभुरे पत्थरकी चटानका कोंई ठिकाना नहीं। तांबा, रांगा, सुरमा और फिटकरी सब कुछ पहाड़ियों में मिलता है। नमक और शोरा मट्टीसे निकालते हैं। सन् १८१३ ई॰ से ताड़पत्री और गूटीवाली हीरेकी खानियोंमें कोई लाभ नहीं हुआ, किन्तु अब फिर लोगोंका ध्यान उनपर दौड़ने लगा है। शेर (बहुतकम), चीता, लकड़ बग्घा, भेड़िया, काला रीछ, जङ्गली सूअर, बारहसिंहा और हिरण अधिक है। कितनी ही तरहकी शिकारी चिड़ियां मामूली तौरसे मिलती हैं। तुकदर, मुरग़ी, तीतर, घुग्घू, हंस, तोते और अनेक छोटे पक्षियोंकी कोई कमी नहीं। ज़हरीले सांप अकसर देखने में आते हैं। बबूल, बेर और जङ्गली खजूर असली वृक्ष हैं। आम, नारियल, इमली, केले और कितने ही दूसरे वृक्षों की भी लोगोंने यहां पहुंचाया है।
<small>इतिहास</small>—यह ज़िला सन् ई॰ के १४वें शताब्दके बीच विजयनगर के राज्यका एक भाग रहा। सन् १५६५ ई॰ में तालिकोटके युद्धपर विजापुर, गोलकुण्ड, दौलताबाद और बराड़के सुलतानोंकी मिली हुई फ़ौजने विजयनगरके महाराज रामराजको हराया और फिर उनकी राजधानी लूट-मारकर तोड़ डाली। रामराजके भाई तीरूमल पेन्कोण्डेको भागे, जहां पहले एक सुविशाल और जनसम्पन्न नगर रहने के लक्षण देख पड़ते हैं। विजयनगर-राजके दीवान चिकघा उदय्यरने अनन्तपुरको सन् १३६४ ई॰ में प्रतिष्ठित किया था। यह महाराष्ट्रोंके बल और<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>वीरत्वका एक स्मारक-जैसा रहा। सन् १६८० ई॰ में महाराज शिवाजीके निर्वाण बाद उनको साहाय्य देनेके कारण औरङ्गज़े बने कुचल डाला, किन्तु उनका प्रभाव भी अन्त में प्रतिष्ठित हो न सका और न कभी ठीक तौर से आमदनी ही शाही ख़ज़ाने में भेजी गई। औरङ्गज़ेब के मरने और निज़ामके ऊंचे उठने बाद सब और प्रधानतः गूटीके पलिगार स्वतन्त्र बन बैठे। इसी बीच महिसूर राज्य हड़पनेवाले हैदर अलीको अपना प्रभाव पासके देशपर फैलाने की उत्कण्ठा उठी। कोदीकोण्डा, जदकसीरा और
हिन्दूपुर तो उन्होंने ले लिया, किन्तु गूटी बराबर लड़ता रहा और एक पैसा भी उन्हें न दिया। अन्तमें हैदर अलीने गूटीको जीतकर अपना अड्डा बनाया और वह महाराष्ट्र और निज़ामसे लड़ते रहे। इधर-उधर के पलायम महिसूरके करद राज्य हो गये हैदर अलीके मरनेपर वह सब स्वतन्त्र बने। हैदर अलीके लड़के टीपूने गद्दीपर बैठ सब बलवाइयोंके धर दबाया था। किन्तु टीपूको शीघ्र ही अंगरेजोंसे लड़ना पड़ा। सन् १७८९ ई॰ में निज़ामने अनन्तपुर अंगरेज़-सरकारको अपनी ओर की सरकारी फ़ौजके
खर्चमें दे डाला। जब आमदनी वसूल करनेकी ठहरी, तब पलिगारोंने बलवा मचाया था, जिसे जनरल कम्बलने भली भांति दबा दिया। बदमाश अपनी रियासतसे निकाले गये और बाक़ी लोग डरकर चुपके हुए; लोगों के हाथमें प्रबन्धका भार न रहा और उन्हें फौज न रखनेका आदेश दिया गया।
इस ज़िले में कितनी ही ऊजड़ ज़मीन है। बाक़ी कोई एक तिहाईपर खेती होती और सैकड़े पीछे सोलह एकर भूमि इनाममें लगी है। कितने ही एकर भूमि चरागाह और जङ्गलके लिये भी रखी गई है। खेती तीन भागमें बंटी है,—सींची, सूखी और बाग़की ज़मीन। सूखी ज़मीनपर विना पानी दिये खेती होती है। ख़ास फ़सल कम्बू, चोलम्, रगी और कोरेकी है, जिसे खाकर अधिकांश लोग जीते-जागते हैं। सींचकी ज़मीनमें चावल और गन्ना बोते हैं। बाग़की<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनन्तपुर'''|'''३९३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ज़मीन नारियल, पान, केला, गेहूं, तम्बाकू, मिर्च, हलदी, सबज़ी और मेवा पैदा करती है। खाद भी उसमें देते हैं। बैलकी जोड़ी पछत्तरसे सौ रुपये तक आती है। भैंसे सस्ते होते भी हलमें नहीं जोते जाते। खेतीके औज़ार बहुत ही पुराने हैं। फिर भी हालमें कितनी ही चीज़ोंकी उन्नति की गई है। पुरानी गाड़ियोंकी जगह नयी गाड़ियां चलने लगी हैं। लोग अंगरेज़ी रीतिपर खेती करनेके उत्सुक हैं, पशुओंके रोगी होनेपर लोग उन्हें अलग रखना चाहते हैं। भाव बढ़ता आया है। सन् १८५० ई॰ से पहले मज़दूर और कारीगर जो पाते थे, उससे अब उज़रत दूनी चढ़ गई है। फिर भी मज़दूरोंको उज़रतमें अनाज दिया जाता, जिससे भावका बढ़ना उन्हें नहीं अखरता। दूसरी स्थितिमें किसानको लाभ है।
सन् १७०२-३ ई॰ में यहां बड़े ज़ोरका दुर्भिक्ष था। उस समय चावल रुपये में कोई ढाई सेर और चना कोई सात सेर बिका। सन् १८०३ ई॰ में अन्नका भाव तिगुना बढ़ गया था, जिससे अधिकांश लोग यहांसे भाग खड़े हुए। सन् १८३३ ई॰ में गूटीके हज़ारो आदमी हैज़े से मरे। अन्न न मिलने से भी कितने ही लोग चल बसे थे। सन् १८५१ ई॰ में यहां इतने ज़ोरसे तूफ़ान आया था, कि तालाबों और सींचके कारख़ानोंका बड़ा नुक़सान् हुवा, और सन् १८५३ ई॰ में सिर्फ़ छः इञ्च पानी बरसने से सूखा छा गया। कितने ही पशु इसके कारण मरे, किन्तु शीघ्र ही अकाल-मोचनका काम खुल जानेसे लोगोंके प्राण बच गये। सन् १८६६ ई॰ में फिर दुर्भिक्ष पड़ा। अकाल-मोचनके कामने लोगोंका कष्ट बहुत रोका। हैज़ा इतने ज़ोरसे फूंटा, कि बहुत से आदमी अपने मुरदे न देखने लगे। सन् १८७६-७८ में अनन्तपुरपर बड़े ज़ोरसे दुर्भिक्ष दौड़ा था। किन्तु अकाल-मोचनके काम और ख़ैरातसे कितना ही दुःख दूर हुआ।
खेतकी उपजके लिये दक्षिण भागमें चावल और उत्तर भागमें रूई सबसे बड़ी फ़सल है। यहांसे
चावल ढेरका ढेर कड़ापा, करनूल, बेलारी और महिसूर राज्यको भेजा जाता है। रूईकी चीज़ोंमें कपड़ा, रस्सी और फ़ीता खूब बनता है। धर्मवरम्के ताल्लुक़ में काग़ज़ भी तय्यार होता है। तेलहन, गन्ने, पटसन और नीलका खूब काम-काज चलता है। नारियलकी मोटी चीनी दूसरी जगह को रवाना की जाती है। गूटी ताल्लुक़ में आज भी छींटकी छाप जारी है। कितनी ही जगह कांचकी चूड़ी बनायी जाती है।
नमक निकालनेका निषेध है। इस ज़िलेके बिलकुल उत्तर मन्द्राज-रेलवेकी उत्तर-पश्चिम-लाइन लगी, और ताड़पत्री, रयाल-चेरुबू, गूटी और गण्टाकुलमें टेशन बनी है। फिर भी सड़क और रेल बढ़ानेकी ज़रूरत है। बङ्ग-लूरसे सिकन्दराबादको जो बड़ी सड़क गई, वह कोदीकोण्डेके पास इस ज़िलेसे मिलती और अनन्तपुर शहर पहुंचनेके बाद गूटीके पास अलग हो जाती है। सड़कें बनानेके लिये ज़मीनकी मालगुज़ा पर सवा छः रुपये सेकड़े महसूल लगाया गया है। इस महसूलका एक तिहाई हिस्सा दूसरी मददके साथ ज़िलेमें पढ़ाई, टीका और स्थास्थ्यके ख़र्च खपता है। अनन्तपुरमें छापेख़ाने और अख़बारकी कोई बात नहीं देख पड़ती।
<small>प्रबन्ध</small>—इन्तज़ाम करनेके लिये यह ज़िला सात ताल्लुक़ोमें बंटा है,—अनन्तपुर, धर्मवरम्, गूटी, हिन्दूपुर, मदकसीरा, पेनूकोण्डा और ताड़पत्री। दीवानी कारवाईकी चार आदलतें हैं,—गांवके मुनसिफ़, ज़िलेके मुनसिफ़, और छोटे सिविल जजकी। सबसे पीछे कही हुई अदालत में दौरे के मुक़द्दमे भी पेश होते हैं। बेलारीके जज भी सिविल और दौरेका काम चलाते हैं। हरेक ताल्लुक़में एक एक क़ैदख़ाना बना है। ज़िलेका जेल बेलारी में है। सिर्फ़ अनन्तपुर शहरमें ही मूनिसिपलिटी प्रतिष्ठित है, जहां स्थानीय संस्कारके लिये कई हज़ार रुपये प्रति वर्ष ख़र्च होता है। इस ज़िलेमें पढ़ाईका काम ढीला है, किन्तु उसे बढ़ानेके लिये
यत्न हो रहा है।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनन्तपुर'''|'''३९३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ज़मीन नारियल, पान, केला, गेहूं, तम्बाकू, मिर्च, हलदी, सबज़ी और मेवा पैदा करती है। खाद भी उसमें देते हैं। बैलकी जोड़ी पछत्तरसे सौ रुपये तक आती है। भैंसे सस्ते होते भी हलमें नहीं जोते जाते। खेतीके औज़ार बहुत ही पुराने हैं। फिर भी हालमें कितनी ही चीज़ोंकी उन्नति की गई है। पुरानी गाड़ियोंकी जगह नयी गाड़ियां चलने लगी हैं। लोग अंगरेज़ी रीतिपर खेती करनेके उत्सुक हैं, पशुओंके रोगी होनेपर लोग उन्हें अलग रखना चाहते हैं। भाव बढ़ता आया है। सन् १८५० ई॰ से पहले मज़दूर और कारीगर जो पाते थे, उससे अब उज़रत दूनी चढ़ गई है। फिर भी मज़दूरोंको उज़रतमें अनाज दिया जाता, जिससे भावका बढ़ना उन्हें नहीं अखरता। दूसरी स्थितिमें किसानको लाभ है।
सन् १७०२-३ ई॰ में यहां बड़े ज़ोरका दुर्भिक्ष था। उस समय चावल रुपये में कोई ढाई सेर और चना कोई सात सेर बिका। सन् १८०३ ई॰ में अन्नका भाव तिगुना बढ़ गया था, जिससे अधिकांश लोग यहांसे भाग खड़े हुए। सन् १८३३ ई॰ में गूटीके हज़ारो आदमी हैज़े से मरे। अन्न न मिलने से भी कितने ही लोग चल बसे थे। सन् १८५१ ई॰ में यहां इतने ज़ोरसे तूफ़ान आया था, कि तालाबों और सींचके कारख़ानोंका बड़ा नुक़सान् हुवा, और सन् १८५३ ई॰ में सिर्फ़ छः इञ्च पानी बरसने से सूखा छा गया। कितने ही पशु इसके कारण मरे, किन्तु शीघ्र ही अकाल-मोचनका काम खुल जानेसे लोगोंके प्राण बच गये। सन् १८६६ ई॰ में फिर दुर्भिक्ष पड़ा। अकाल-मोचनके कामने लोगोंका कष्ट बहुत रोका। हैज़ा इतने ज़ोरसे फूंटा, कि बहुत से आदमी अपने मुरदे न देखने लगे। सन् १८७६-७८ में अनन्तपुरपर बड़े ज़ोरसे दुर्भिक्ष दौड़ा था। किन्तु अकाल-मोचनके काम और ख़ैरातसे कितना ही दुःख दूर हुआ।
खेतकी उपजके लिये दक्षिण भागमें चावल और उत्तर भागमें रूई सबसे बड़ी फ़सल है। यहांसे<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>चावल ढेरका ढेर कड़ापा, करनूल, बेलारी और महिसूर राज्यको भेजा जाता है। रूईकी चीज़ोंमें कपड़ा, रस्सी और फ़ीता खूब बनता है। धर्मवरम्के ताल्लुक़ में काग़ज़ भी तय्यार होता है। तेलहन, गन्ने, पटसन और नीलका खूब काम-काज चलता है। नारियलकी मोटी चीनी दूसरी जगह को रवाना की जाती है। गूटी ताल्लुक़ में आज भी छींटकी छाप जारी है। कितनी ही जगह कांचकी चूड़ी बनायी जाती है।
नमक निकालनेका निषेध है। इस ज़िलेके बिलकुल उत्तर मन्द्राज-रेलवेकी उत्तर-पश्चिम-लाइन लगी, और ताड़पत्री, रयाल-चेरुबू, गूटी और गण्टाकुलमें टेशन बनी है। फिर भी सड़क और रेल बढ़ानेकी ज़रूरत है। बङ्ग-लूरसे सिकन्दराबादको जो बड़ी सड़क गई, वह कोदीकोण्डेके पास इस ज़िलेसे मिलती और अनन्तपुर शहर पहुंचनेके बाद गूटीके पास अलग हो जाती है। सड़कें बनानेके लिये ज़मीनकी मालगुज़ा पर सवा छः रुपये सेकड़े महसूल लगाया गया है। इस महसूलका एक तिहाई हिस्सा दूसरी मददके साथ ज़िलेमें पढ़ाई, टीका और स्थास्थ्यके ख़र्च खपता है। अनन्तपुरमें छापेख़ाने और अख़बारकी कोई बात नहीं देख पड़ती।
<small>प्रबन्ध</small>—इन्तज़ाम करनेके लिये यह ज़िला सात ताल्लुक़ोमें बंटा है,—अनन्तपुर, धर्मवरम्, गूटी, हिन्दूपुर, मदकसीरा, पेनूकोण्डा और ताड़पत्री। दीवानी कारवाईकी चार आदलतें हैं,—गांवके मुनसिफ़, ज़िलेके मुनसिफ़, और छोटे सिविल जजकी। सबसे पीछे कही हुई अदालत में दौरे के मुक़द्दमे भी पेश होते हैं। बेलारीके जज भी सिविल और दौरेका काम चलाते हैं। हरेक ताल्लुक़में एक एक क़ैदख़ाना बना है। ज़िलेका जेल बेलारी में है। सिर्फ़ अनन्तपुर शहरमें ही मूनिसिपलिटी प्रतिष्ठित है, जहां स्थानीय संस्कारके लिये कई हज़ार रुपये प्रति वर्ष ख़र्च होता है। इस ज़िलेमें पढ़ाईका काम ढीला है, किन्तु उसे बढ़ानेके लिये
यत्न हो रहा है।<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनन्तपुर'''|'''३९३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>ज़मीन नारियल, पान, केला, गेहूं, तम्बाकू, मिर्च, हलदी, सबज़ी और मेवा पैदा करती है। खाद भी उसमें देते हैं। बैलकी जोड़ी पछत्तरसे सौ रुपये तक आती है। भैंसे सस्ते होते भी हलमें नहीं जोते जाते। खेतीके औज़ार बहुत ही पुराने हैं। फिर भी हालमें कितनी ही चीज़ोंकी उन्नति की गई है। पुरानी गाड़ियोंकी जगह नयी गाड़ियां चलने लगी हैं। लोग अंगरेज़ी रीतिपर खेती करनेके उत्सुक हैं, पशुओंके रोगी होनेपर लोग उन्हें अलग रखना चाहते हैं। भाव बढ़ता आया है। सन् १८५० ई॰ से पहले मज़दूर और कारीगर जो पाते थे, उससे अब उज़रत दूनी चढ़ गई है। फिर भी मज़दूरोंको उज़रतमें अनाज दिया जाता, जिससे भावका बढ़ना उन्हें नहीं अखरता। दूसरी स्थितिमें किसानको लाभ है।
सन् १७०२-३ ई॰ में यहां बड़े ज़ोरका दुर्भिक्ष था। उस समय चावल रुपये में कोई ढाई सेर और चना कोई सात सेर बिका। सन् १८०३ ई॰ में अन्नका भाव तिगुना बढ़ गया था, जिससे अधिकांश लोग यहांसे भाग खड़े हुए। सन् १८३३ ई॰ में गूटीके हज़ारो आदमी हैज़े से मरे। अन्न न मिलने से भी कितने ही लोग चल बसे थे। सन् १८५१ ई॰ में यहां इतने ज़ोरसे तूफ़ान आया था, कि तालाबों और सींचके कारख़ानोंका बड़ा नुक़सान् हुवा, और सन् १८५३ ई॰ में सिर्फ़ छः इञ्च पानी बरसने से सूखा छा गया। कितने ही पशु इसके कारण मरे, किन्तु शीघ्र ही अकाल-मोचनका काम खुल जानेसे लोगोंके प्राण बच गये। सन् १८६६ ई॰ में फिर दुर्भिक्ष पड़ा। अकाल-मोचनके कामने लोगोंका कष्ट बहुत रोका। हैज़ा इतने ज़ोरसे फूंटा, कि बहुत से आदमी अपने मुरदे न देखने लगे। सन् १८७६-७८ में अनन्तपुरपर बड़े ज़ोरसे दुर्भिक्ष दौड़ा था। किन्तु अकाल-मोचनके काम और ख़ैरातसे कितना ही दुःख दूर हुआ।
खेतकी उपजके लिये दक्षिण भागमें चावल और उत्तर भागमें रूई सबसे बड़ी फ़सल है। यहांसे<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>चावल ढेरका ढेर कड़ापा, करनूल, बेलारी और महिसूर राज्यको भेजा जाता है। रूईकी चीज़ोंमें कपड़ा, रस्सी और फ़ीता खूब बनता है। धर्मवरम्के ताल्लुक़ में काग़ज़ भी तय्यार होता है। तेलहन, गन्ने, पटसन और नीलका खूब काम-काज चलता है। नारियलकी मोटी चीनी दूसरी जगह को रवाना की जाती है। गूटी ताल्लुक़ में आज भी छींटकी छाप जारी है। कितनी ही जगह कांचकी चूड़ी बनायी जाती है।
नमक निकालनेका निषेध है। इस ज़िलेके बिलकुल उत्तर मन्द्राज-रेलवेकी उत्तर-पश्चिम-लाइन लगी, और ताड़पत्री, रयाल-चेरुबू, गूटी और गण्टाकुलमें टेशन बनी है। फिर भी सड़क और रेल बढ़ानेकी ज़रूरत है। बङ्ग-लूरसे सिकन्दराबादको जो बड़ी सड़क गई, वह कोदीकोण्डेके पास इस ज़िलेसे मिलती और अनन्तपुर शहर पहुंचनेके बाद गूटीके पास अलग हो जाती है। सड़कें बनानेके लिये ज़मीनकी मालगुज़ा पर सवा छः रुपये सेकड़े महसूल लगाया गया है। इस महसूलका एक तिहाई हिस्सा दूसरी मददके साथ ज़िलेमें पढ़ाई, टीका और स्थास्थ्यके ख़र्च खपता है। अनन्तपुरमें छापेख़ाने और अख़बारकी कोई बात नहीं देख पड़ती।
<small>प्रबन्ध</small>—इन्तज़ाम करनेके लिये यह ज़िला सात ताल्लुक़ोमें बंटा है,—अनन्तपुर, धर्मवरम्, गूटी, हिन्दूपुर, मदकसीरा, पेनूकोण्डा और ताड़पत्री। दीवानी कारवाईकी चार आदलतें हैं,—गांवके मुनसिफ़, ज़िलेके मुनसिफ़, और छोटे सिविल जजकी। सबसे पीछे कही हुई अदालत में दौरे के मुक़द्दमे भी पेश होते हैं। बेलारीके जज भी सिविल और दौरेका काम चलाते हैं। हरेक ताल्लुक़में एक एक क़ैदख़ाना बना है। ज़िलेका जेल बेलारी में है। सिर्फ़ अनन्तपुर शहरमें ही मूनिसिपलिटी प्रतिष्ठित है, जहां स्थानीय संस्कारके लिये कई हज़ार रुपये प्रति वर्ष ख़र्च होता है। इस ज़िलेमें पढ़ाईका काम ढीला है, किन्तु उसे बढ़ानेके लिये
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<noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३९४'''|'''अनन्तपुर—अनन्तमूल'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude><small>जल-वायु—प्रधानतः आर्द्र नहीं। वर्षमें साधारणतः सत्रह इञ्च वृष्टि पड़ती है। नवम्बर और दिसम्बरके दिनों पारा ६७° से ८३° तक चढ़ता, और मई में कभी-कभी आधीरातको १००° पर भी पहुंच जाता है। सन् १८२० ई॰ से अट्ठारह वर्ष तक हैज़ेकी बीमारी बड़े ज़ोरसे रही थी। बुखार ग़ज़बका चढ़ता है। चेचक बहुत ही मामूली बीमारी है। पशु-रोगने कितने ही बार हलचल डाली थी; किन्तु सन् १८४०, १८५०, १८५७ और १८६८ ई॰ के बीच जो उपद्रव मचा, उसकी बात कही जा नहीं सकती। गूटी, ताड़पत्री, कल्याणदुर्ग, पेनू कोण्डे और अनन्तपुरमें स्थानीय और मूनिसिपल फण्डसे ग़रीबोंको बेदाम दबा देनेका प्रबन्ध बंधा है। ऐसे दवाख़ानोंकी गिनती बढ़ते जाती है।
२ उक्त ज़िलेका एक ताल्लुक़। इसका क्षेत्रफल ८८८ वर्गमील है, जिसमें कोई सवा सौ गांव और कई हज़ार घर आबाद हैं। जन-संख्या कोई एक लाख देखते हैं। सारे क्षेत्रफलमें सैकड़े पीछे सत्तर बीघे खेती होती, और तर ज़मीन आधी से ज्य़ादा आमदनी अदा करती है। मामूली तौरपर ताल्लुक़ हमवार मैदान है, उत्तर और उत्तर-पूर्व पहाड़ी सीमाको बांधे है। यहांसे अनन्तपुर, बुक्कराय-समुद्रम्, ताड़मारी और सिंहानमलयको सड़क गई है। अनन्तपुर और सिंहानमलयके ही तालाब सबसे बड़े हैं, जिनसे बीस-बीस हज़ार एकड़ भूमि सींची जाती है। चियेड्दुर्ग सबसे बड़ा पहाड़ है, जो मैदानपर कोई १२०० फ़ीट ऊंचे उठा है। यह ताल्लुक़ गूटीकी मुनसिफ़ीमें लगता है।
३ उक्त ज़िलेका एक बड़ा शहर। यह गूटीसे दक्षिण सोलह और बेलारीसे दक्षिण-पूर्व इकतीस कोस दूर बसा है। यहां कोई बारह हज़ार लोग रहते। ज़िलेका हेडक्वार्टर, ख़ास पुलिस और मजिष्ट्रेटकी कचहरी, छोटा जेल, दवाख़ाना, स्कूल, डाकघर, और मुसाफ़िरका बंगला बना है। कहते, कि सन् ई॰ के १४ वें शताब्दमें विजयनगर-राजके दीवानने यह शहर बसाया; सन् १७७५ ई॰ में
जबतक हैदर अलीने न हड़पा, तबतक यह दीवान बहादुरके ही अधीन रहा था,।
४ मन्द्राज—कड़ापा ज़िलेके रायकोट ताल्लुक़का एक मन्दिर। यहां गङ्गायात्राका महोत्सव होता और उस समय इधर-उधरके सारे शूद्र इकट्ठा रहते हैं। कुछ वर्षसे यह जलसा फीका पड़ गया।
अनन्तपुरी—एक सुप्रसिद्ध वैदान्तिक और कृष्णचैतन्यके पूर्वपुरुष।
अनन्तभट्ट—१ आपदेवके पुत्र। <small>अनन्तदेव देखो।</small> २ यदु-भट्टके पुत्र, इन्होंने राजा अनूपसिंहके आदेशसे संस्कृत-भाषामें तीर्थरत्नाकर लिखा था। ३ सिद्धेश्वरभट्ट के पुत्र—इन्होंने सन् १६९३ ई॰ में गोविन्द-कृष्ण-रचित कुण्डमार्तण्डकी टीका बनायी थी। ४ अद्वैत-चन्द्रिका और सिद्धान्तचन्द्रिका नामसे नैयायिक ग्रन्थरचयिता। ५ तिथ्यादिनिर्णय-रचयिता। ६ नक्षत्रेष्टिनिरूपण नामक श्रीतग्रन्थकार।
७ नृसिंह-सर्वस्वके अन्यतम लेखक। ८ पदमञ्जरी नामक न्याय-ग्रन्थ-रचयिता। ९ प्रतिष्ठा-पद्धतिकार। १० प्रातिशाख्य-भाष्यकार। ११ भारत-चम्पू-काव्य रचयिता। १२ महाभाष्यप्रदीप-विवरण-प्रणेता। १३ कमलाकरभट्ट के पुत्र, इन्होंने संस्कृत भाषामें रामकल्पद्रुम, तत्पितृरचित जैमिनि-सूत्रभाष्यकी टीका और त्रिंशच्छ्लोकी व्याख्या-
सुबोधिनी रची थी।
अनन्तमति (सं० पु० ) किसी बोधिसत्वका नाम ।
अनन्तमायिन् ( स े० वि० ) असीम रूपसे छली, जो
बेहद धोखा दे ।
अनन्तमिश्र - न्यायप्रदीप - रचयिता ।
अनन्तमूल (स ं० पु० ) अनन्तं सुदीर्घ मूलमस्य ।
लताविशेष जिसे शारिवा भी कहते हैं, जङ्गली
चमेली ।
( Hemidesmus indicus ) अनन्तमूलके
हिन्दी - सालसा ; बंगला - अनन्तमूल, अनन्तोमूल ;
पर्याय यह हैं, – हिन्दी - मगरबू, जङ्गलौचमेली,
विहारी — अनुन्तमूल;
नन्नारी, नाटका औशबह; बम्बैया - उपरमार :
दक्षिणी – सुगण्डीपाला,
मारवाड़ी - अनन्तमूल उपलसरी; तामिल–नन्नारि;
तेलगू - गदिमुगन्धि, पालचुक्कनिदेस, सुगन्धिपाल,<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/१७
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||'''कपोत - कपोतपाद '''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
गिर पड़ा। महाराज ने उद्विग्न हो उस रेतः को पत्ते के दोने में भरा और किसी श्येन पक्षी को सौंपकर पत्नी के निकट भेजा था। श्येन ने वह दोना मुख में दबा चेदि राजधानी के अभिमुख जाते-जाते किसी दूसरे श्येन से झगड़ कर फेंक दिया। इससे मत्स्य के उदर में व्यास की जननी मत्स्यगन्धा का जन्म हुआ। उक्त उपाख्यान से समझ पड़ता है — श्येन पक्षी भी शिक्षित होने से लिपि वहन का कार्य कर सकता है। एतद्भिन्न नल-दमयन्ती में 'हंसदूत' की कथा मिलती है। दमयन्ती का पोषित हंस उड़कर नल से उनके रूप का उत्कर्ष बता गया था। यह उपाख्यान इतने दिन कवि की कल्पना मान उपेक्षित होते रहे। किन्तु जब कपोत के इस स्वभाव की बात खुली, तब उक्त पौराणिक उपाख्यानों के अमूलक होने की आशंका घटी।
हम देखते हैं — प्रायः सकल ही देशों में लोग कपोत को पवित्र पक्षी समझते हैं। भारतवासी इसे लक्ष्मी का वरपात्र कहते हैं। फिर मक्का नगर में कपोतेश्वर नामक शिवलिङ्ग और कपोतेशी नाम्नी भवानी की मूर्ति विद्यमान है। प्राचीन असीरिया देश के राजा इसकी परम भक्ति करते थे। अरब देश के वृहत्काय नील कपोत को महासम्मान मिलता है। मुसलमानों के धर्मग्रन्थ में इसे 'स्वर्गदूत' कहा है। मुसलमान बताते हैं — मुहम्मद जब कुछ जानना चाहते, तब स्वर्ग से कपोत आ उनके कान में सब बात सुना देता था। मक्के के हरम में यह अति यत्न से पाले जाते हैं और मुसलमान इन्हें काको कुमरी समझ कभी नहीं खाते। पहले अंग्रेज भी कपोत को होली बर्ड (Holy bird) अर्थात् पवित्र पक्षी समझ आदर करते थे।
हमारे पुराण में भी लिखते हैं — शिवि राजा की दानशीलता देखने को अग्नि कपोत और इन्द्र श्येन का रूप धारण कर उनके निकट उपस्थित हुए। कपोत ने श्येन के भय से भीत हो शिवि की क्रोड़ में पड़कर आश्रय माँगा था। शिवि ने शरणागत को बचाया और श्येन को तुष्ट करने के लिए अपने देह का समस्त मांस गँवाकर महायश पाया। इससे कपोत का नाम अग्निमूर्ति पड़ा है। हमारे आयुर्वेद शास्त्र में इसके मांस का गुणागुण
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लिखा है। महर्षि चरक के मत से कपोत का मांस कषाय, मधुर, शीतल और रक्तपित्तनाशक है। हारीत उसे वृंहण, बलकर, वातपित्तनाशक, तृप्तिकर, शुक्रवर्धक, रुचिकर और मानव को हितकर बताते हैं। फिर भावमिश्र ने कपोत के मांस को गुरु, स्निग्ध, रक्तपित्त एवं वायुनाशक, संग्राही, शीतल, त्वचा के लिए हितकर और वीर्यवर्धक कहा है। सुश्रुत तथा वाग्भट्ट के मत में कृष्णवर्ण कपोत का मांस गुरु, लवण-युक्त, स्वादु और सर्वदोषकर होता है। बुद्ध देखो।
(क्ली०) १ सौवीराञ्जन, सुरमा। २ कपोताञ्जन, भूरा सुरमा।
{{outdent| कपोतक (सं० क्ली०) कपोत इव कपोतवर्णवत् कायति प्रकाशते, कपोत के क। १ सौवीराञ्जन, सुरमा। २ कपोताञ्जन, भूरा सुरमा। (पु०) ३ क्षुद्र-कपोत, छोटा कबूतर। ४ हाथ जोड़ने की एक रीति। }}
{{outdent| कपोतकनिषादी (सं० पु०) अश्व का एक वातव्याधि, घोड़े को होने वाली बाई की एक बीमारी। कठिनता से उठाने पर भी जो घोड़ा भूमि पर गिर पड़ता है, वह इस रोग से पीड़ित ठहरता है। कपोतनिषादी होने पर अश्व मुश्किल से जीता है। (जयदत्त) }}
{{outdent| कपोतकीय (सं० वि०) कपोतोऽस्त्यस्य, कपोत-छ-कुक् च। लड़ादीनां कुक्। पा ४।२।९१। कपोतयुक्त, कबूतरों से भरा हुआ। }}
{{outdent| कपोतकीया (सं० स्त्री०) कपोतयुक्ता देश, कबूतरों से भरा हुआ मुल्क। }}
{{outdent| कपोतचक्र (सं० पु०) देवाटचक्र वृक्ष, बेटुआ। }}
{{outdent| कपोतचरणा (सं० स्त्री०) कपोतस्य चरणचरणवत् आकारोऽस्त्यस्याः, कपोत चरण धर्म आदित्वात् घञ्-टाप्। १ नली नामक गन्धद्रव्य, एक खुशबूदार चीज़। २ चोरिका, खिरनी। }}
{{outdent| कपोतपर्णी (सं० स्त्री०) एला, इलायची का पेड़। }}
{{outdent| कपोतपाका (सं० पु०) कपोतस्य पाकः डिम्बः, ६-तत्। १ कपोतशिरा, कबूतर का बच्चा। २ पार्वत्य जातिभेद, एक पहाड़ी कौम। }}
{{outdent| कपोतपाद (सं० वि०) कपोतस्य पादाविव पादौ यस्य, हस्त्यादित्वात् नान्त्यलोपः। मध्यमपदलोपी बहुव्रीहि आदि। पा... }}
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Sweta rani Gupta
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||'''कपोत - कपोतपाद '''}}
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गिर पड़ा। महाराज ने उद्विग्न हो उस रेतः को पत्ते के दोने में भरा और किसी श्येन पक्षी को सौंपकर पत्नी के निकट भेजा था। श्येन ने वह दोना मुख में दबा चेदि राजधानी के अभिमुख जाते-जाते किसी दूसरे श्येन से झगड़ कर फेंक दिया। इससे मत्स्य के उदर में व्यास की जननी मत्स्यगन्धा का जन्म हुआ। उक्त उपाख्यान से समझ पड़ता है — श्येन पक्षी भी शिक्षित होने से लिपि वहन का कार्य कर सकता है। एतद्भिन्न नल-दमयन्ती में 'हंसदूत' की कथा मिलती है। दमयन्ती का पोषित हंस उड़कर नल से उनके रूप का उत्कर्ष बता गया था। यह उपाख्यान इतने दिन कवि की कल्पना मान उपेक्षित होते रहे। किन्तु जब कपोत के इस स्वभाव की बात खुली, तब उक्त पौराणिक उपाख्यानों के अमूलक होने की आशंका घटी।
हम देखते हैं — प्रायः सकल ही देशों में लोग कपोत को पवित्र पक्षी समझते हैं। भारतवासी इसे लक्ष्मी का वरपात्र कहते हैं। फिर मक्का नगर में कपोतेश्वर नामक शिवलिङ्ग और कपोतेशी नाम्नी भवानी की मूर्ति विद्यमान है। प्राचीन असीरिया देश के राजा इसकी परम भक्ति करते थे। अरब देश के वृहत्काय नील कपोत को महासम्मान मिलता है। मुसलमानों के धर्मग्रन्थ में इसे 'स्वर्गदूत' कहा है। मुसलमान बताते हैं — मुहम्मद जब कुछ जानना चाहते, तब स्वर्ग से कपोत आ उनके कान में सब बात सुना देता था। मक्के के हरम में यह अति यत्न से पाले जाते हैं और मुसलमान इन्हें काको कुमरी समझ कभी नहीं खाते। पहले अंग्रेज भी कपोत को होली बर्ड (Holy bird) अर्थात् पवित्र पक्षी समझ आदर करते थे।
हमारे पुराण में भी लिखते हैं — शिवि राजा की दानशीलता देखने को अग्नि कपोत और इन्द्र श्येन का रूप धारण कर उनके निकट उपस्थित हुए। कपोत ने श्येन के भय से भीत हो शिवि की क्रोड़ में पड़कर आश्रय माँगा था। शिवि ने शरणागत को बचाया और श्येन को तुष्ट करने के लिए अपने देह का समस्त मांस गँवाकर महायश पाया। इससे कपोत का नाम अग्निमूर्ति पड़ा है।
हमारे आयुर्वेद शास्त्र में इसके मांस का गुणागुण
{{Left|vol. Iv 6|2em
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लिखा है। महर्षि चरक के मत से कपोत का मांस कषाय, मधुर, शीतल और रक्तपित्तनाशक है। हारीत उसे वृंहण, बलकर, वातपित्तनाशक, तृप्तिकर, शुक्रवर्धक, रुचिकर और मानव को हितकर बताते हैं। फिर भावमिश्र ने कपोत के मांस को गुरु, स्निग्ध, रक्तपित्त एवं वायुनाशक, संग्राही, शीतल, त्वचा के लिए हितकर और वीर्यवर्धक कहा है। सुश्रुत तथा वाग्भट्ट के मत में कृष्णवर्ण कपोत का मांस गुरु, लवण-युक्त, स्वादु और सर्वदोषकर होता है। बुद्ध देखो।
(क्ली०) १ सौवीराञ्जन, सुरमा। २ कपोताञ्जन, भूरा सुरमा।
{{outdent| कपोतक (सं० क्ली०) कपोत इव कपोतवर्णवत् कायति प्रकाशते, कपोत के क। १ सौवीराञ्जन, सुरमा। २ कपोताञ्जन, भूरा सुरमा। (पु०) ३ क्षुद्र-कपोत, छोटा कबूतर। ४ हाथ जोड़ने की एक रीति। }}
{{outdent| कपोतकनिषादी (सं० पु०) अश्व का एक वातव्याधि, घोड़े को होने वाली बाई की एक बीमारी। कठिनता से उठाने पर भी जो घोड़ा भूमि पर गिर पड़ता है, वह इस रोग से पीड़ित ठहरता है। कपोतनिषादी होने पर अश्व मुश्किल से जीता है। (जयदत्त) }}
{{outdent| कपोतकीय (सं० वि०) कपोतोऽस्त्यस्य, कपोत-छ-कुक् च। लड़ादीनां कुक्। पा ४।२।९१। कपोतयुक्त, कबूतरों से भरा हुआ। }}
{{outdent| कपोतकीया (सं० स्त्री०) कपोतयुक्ता देश, कबूतरों से भरा हुआ मुल्क। }}
{{outdent| कपोतचक्र (सं० पु०) देवाटचक्र वृक्ष, बेटुआ। }}
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{{outdent| कपोतपर्णी (सं० स्त्री०) एला, इलायची का पेड़। }}
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{{outdent| कपोतपाद (सं० वि०) कपोतस्य पादाविव पादौ यस्य, हस्त्यादित्वात् नान्त्यलोपः। मध्यमपदलोपी बहुव्रीहि आदि। पा... }}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/१८
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५११८। कपोत की भाँति पादयुक्त, जो कबूतर की तरह पैर रखता हो।
{{outdent| कपोतपालिका (सं० स्त्री०) कपोतान् पालयति, कपोत-पाल-णिच्-ण्वुल् स्वार्थे कन्-टाप् च इत्वम्। विटङ्क, कावुक, दर्जा, आशियाना, चिड़ियाखाना। }}
{{outdent| कपोतपाली (सं० स्त्री०) कपोतान् पालयति, कपोत-पाल-णिच्-ण्वुल् ङीप्। कबूतरों की छतरी, कपोतपालिका, कावुक, दर्जा। }}
<Small>"चित्रस्रजः कृत्रिमपक्षिभूपाः कपोतपालीषु निकेतनानाम्।” (माघ)</small>
{{outdent| कपोतपुट (सं० क्ली०) औषधपुटभेद, दवा की एक तह। जो पुट अष्टसंख्यक वनोपल से खात में दिया जाता है, वही कपोतपुट कहलाता है।}}
<small> (भावप्रकाश)</small>
{{outdent| कपोतपुरीष (सं० पु०) पारावतविष्ठा, कबूतर की बीट। यह व्रणदारण होता है। }}
{{outdent| कपोतराज (सं० पु०) पारावतप्रभु, कबूतरों का राजा या सरदार। }}
{{outdent| कपोतरेतस् (सं० पु०) प्रवरमुनि विशेष। }}
{{outdent| कपोतरीमा (सं० पु०) १ राजा उशीनर के पुत्र। कपोतरूपी अग्नि देव से इनका जन्म हुआ था।<small>(भारत, वन १९६ अ०)</small> २ यदुवंशीय कुकुद् नृपति के पौत्र।}}
<small>(हरिवंश ८०)</small>
{{outdent| कपोतलुब्धकीय (सं० क्ली०) कपोतम् लुब्धकम च अधिकृत्य ततो ग्रन्थः कपोतलुब्धक छ। महाभारत की आख्यायिका विशेष। इसमें कपोत और [कपोत-लुब्धक] के गल्पच्छल से उपदेश दिया है — गृहस्थ को प्राण देकर भी अतिथिसत्कार करना चाहिए। }}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent| कपोतवक्त्रा (सं० स्त्री०) काकमाची, मकोय। कपोतवक्ता, कपोतवक्त्रा देखो! }}
{{outdent| कपोतवञ्चा (सं० स्त्री०) कपोतो वञ्चते प्रतार्यतेऽनया, कपोत-वञ्च करणे घञ् कुत्वं टाप् च। ब्राह्मी, एक बूटी।}}<small>ब्राह्मी देखो।</small>
{{outdent| कपोतवर्ण (सं० वि०) धूसर, चमकीला भूरा, कबूतर का रंग रखने वाला। कपोतवर्णा, कपोतवर्णी देखो। }}
{{outdent| कपोतवर्णी (सं० स्त्री०) कपोतस्य वर्ण इव वर्णो यस्याः, गौरादित्वात् ङीष्। सूक्ष्मइला, छोटी इलायची। }}
{{outdent| कपोतवल्ली (सं० स्त्री०) कपोतवर्णा वल्ली, मध्यपदलोपी। ब्राह्मी, एक बूटी। उत्तर प्रदेश में यह गंगा किनारे होती है। }}
{{outdent| कपोतवाण (सं० स्त्री०) कपोतपाद इव यो वाणस्तद्वत् प्रकारो यस्य। नलिका नामक गन्धद्रव्य, एक खुशबूदार चीज़। }}
{{outdent| कपोतविष्ठा (सं० स्त्री०) कपोतपुरीष देखो। }}
{{outdent| कपोतवृत्ति (सं० वि०) कपोतानां येषां वृत्तिरिव वृत्तिर्यस्य, बहुव्री०। १ सञ्चयहीन, इकट्ठा न करने वाला, जो कबूतर की तरह रोज़ कमाता-खाता हो। (स्त्री०) २ सञ्चयशून्य जीविका, जिस रोज़गार में कुछ जोड़ न सकें। }}
{{outdent| कपोतवेगा (सं० स्त्री०) कपोतानां वेगो गतिरिव वेगो द्रुत-वृत्ता यस्याः, मध्यपदलोपी। ब्राह्मी नामक महाक्षुप, एक झाड़। }}
{{outdent| कपोतव्रत (सं० वि०) १ कपोत की भाँति कष्ट पाते भी मौन धारण करने वाला, जो सताया जाने पर भी कबूतर की तरह बोलता न हो। (पु०) २ कपोत का व्रत, कबूतर का अहद। मौनधारणपूर्वक ताड़नादि सहन करना कपोतव्रत कहलाता है। }}
{{outdent| कपोतसार (सं० क्ली०) कपोतवर्ण इव सारः कृष्णवर्णो यस्य, बहुव्री०। स्रोतोऽञ्जन, सुरमा। }}
{{outdent| कपोतहस्त (सं० क्ली०) उपासना के समय हाथ जोड़ने की एक रीति। कपोतहस्तक, कपोतहस्त देखो। }}
{{outdent| कपोताक्षी नदी — बंगाल की एक नदी। चलित भाषा में कपोतका कहते हैं। नदिया जिले में चन्द्रपुर के निकट माथाभाँगा नदी से यह निकली है। उत्पत्ति-स्थल से थोड़ी दूर पूर्व की ओर चल नदिया और यशोहर के मध्य यह दक्षिणाभिमुखी हो गयी है। इस स्थान पर यही नदी नदिया, चौबीस परगना और यशोहर जिले की सीमा को निर्दिष्ट करती है। चौबीस परगने के आशाशुनी से ५ मील पूर्व 'मरीचचाप गंगा' में कपोताक्षी नदी जा गिरी है। गंगा में कलकत्ता से नौका आया-जाया करती हैं। उक्त गंगा के संगमस्थान से २ मील दक्षिण इससे पूर्वमुख की ओर... }}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/१९
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<noinclude><pagequality level="1" user="बैजनाथ चौधरी" /></noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
जिलेका 'चांदखाली' नाला निकलता है। चांदखाली नालेके मुखसे यशा० २२° ११' ३०" उ० और देशा० ८९° २०' पू० पर इससे खोल-पटुआ नदी आ मिली है। इन दोनों संयुक्त नदियोंके सङ्गमस्थलसे दक्षिण कहीं इसे पांगासी, कहीं बाड़, कहीं पांगा, कहीं नामगाद और कहीं समुद्र कहते हैं। सागरके निकटवर्ती स्थानपर इसका नाम मालञ्च है। यह अवशेषको मालञ्च नामसे ही वङ्गोपसागरमें प्रविष्ट हुयी है।
यशोर जिलेमें इस नदीके तीर सागरदाँड़ी नामक एक क्षुद्र ग्राम है। १८२४ ई०को इसी ग्राममें बङ्गालके प्रसिद्ध कवि और मेघनादवध तथा व्रजाङ्गनादि काव्यके प्रणेता माईकेल मधुसूदन्ने जन्मग्रहण किया था।
{{outdent| कपोताङ्घ्रि (सं० स्त्री०) कपोतस्य चङ्खि इव, उपमि०। नलिका नामक गन्धद्रव्य, एक खुशबूदार चीज़। }}
{{outdent| कपोताञ्जन (सं० क्ली०) कपोतवर्णं अञ्जनम्, मध्यपदलो०। स्रोतोऽञ्जन, सुरमा। }}
{{outdent| कपीताण्डीपमफल (सं० क्ली०) निम्बू भेद, किसी किस्मका काग़ज़ी नीबू। }}
{{outdent| कपीताभ (सं० पु०) कपोतस्य आभा इव आभा यस्य, मध्यपदलो०। १ कपोतवर्ण, पीला या मैला भूरा रङ्ग। २ मूषिकविशेष, किसी किस्मका चूहा। इसके काटनेसे दंष्ट्रस्थान पर ग्रन्थि, पिड़का और शोथकी उत्पत्ति होती है। फिर उससे वायु, पित्त, कफ और रक्त चारों बिगड़ जाते हैं। (त्रि०) ३ कपोतसदृश वर्णविशिष्ट, चमकीला भूरा, जो कबूतरका रङ्ग रखता हो। }}
{{outdent| कपोतारी (सं० पु०) कपोतानां अरिर्मारकः, ६-तत्। श्येनपक्षी, बाज़ चिड़िया। }}
{{outdent| कपोतिका (सं० स्त्री०) कपोत स्वायें कन्-टाप् अत इत्वम्। १ कपोती, कबूतरी। २ चाषकसमूह, किसी किस्मकी सुराही। }}
{{outdent| कपोती (सं० स्त्री०) कपोत-ङीष्। १ कपोतजातिकी स्त्री, कबूतरी। २ यज्ञीय यूपविशेष। ३ पिङ्गी, फाख्ता। (त्रि०) ४ कपोतयुक्त, कबूतर रखनेवाला। ५ कपोतसदृश आकारयुक्त, जो कबूतरकी }}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
रङ्ग रखता हो। ६ कपोतवर्ण, कबूतरका रङ्ग रखनेवाला।
{{outdent| कपोतेश्वरी (सं० स्त्री०) कपोतेश्वर-ङीप्। पार्वती, दुर्गा। }}
{{outdent| कपोल (सं० पु०) कपि-घोलन् नलोपः। कव्यि-ष्विकटिरिटिभ घोलन्। उण ११६१। १ मस्तक, मथ्था। २ गण्डस्थल, गाल। यह लज्जासे सुकुड़ता, भयसे उभरता, क्रोधसे काँपता, हर्षसे खिलता, स्वाभाविक भावसे सम रहता, कष्टसे सूख पड़ता और उत्साहसे पूर्ण जगता है। }}
{{outdent| कपोलकल्पना (सं० स्त्री०) अमूलक कल्पना, झूठी बात। }}
{{outdent| कपोलकल्पित (सं० त्रि०) असत्य, झूठा। }}
{{outdent| कपोलकवि—संस्कृतके एक प्राचीन कवि। }}
{{outdent| कपोलकापण (सं० पु०) कपोलांनां कायः (कच्यौ अनेन इति कायः) कषं'पसानम्। १ हस्तिगण्डस्थल, हाथीकी कनपटी। २ हस्त्यादिका गन्धस्राव, हाथीके अपनी कनपटी रगड़नेका सुकाम, पैड़का थवा। }}
{{C|{{<smaller|>"मदैराः कषायित कपोलकाषः।" (भारवि)}}}}
{{outdent| कपोलगेंडुआ (हिं० पु०) गण्डखोपधान, गालतकिया। }}
{{outdent| कपोलफलक (सं० पु०) कपोलः फलक इव। प्रग्रस्थ-गण्डस्थल, चपटा गाल। सम्भवतः कपोलास्थिको ही कपोलफलक कहते हैं। }}
{{outdent| कपोलभित्ति (सं० स्त्री०) कपोला भित्तिरिव, उपमि०। विस्तृतकपोल, लम्बा-चौड़ा गाल। }}
{{outdent| कपोलराग (सं० पु०) गण्डस्थलकी रक्ता, गालकी चमक। }}
{{outdent| कपोक्षी (सं० स्त्री०) ज्ञानविशेष, घुटनेका अगला हिस्सा। }}
{{outdent| कपोशा (हिं० पु०) वैश्यजातविशेष, बनियोंकी एक कौम। }}
{{outdent| कप्तान (अ० पु०—Captain) १ सेनानी, सिपहसालार। २ पोताध्यक्ष, जहाज़का मुसाफ़िज़। ३ नायक, अगुआ। }}
{{outdent| कप्तानी (हिं० स्त्री०) १ अध्यक्षत्ता, सरदारी। (वि०) २ अध्यक्षसम्बन्धीय, सरदारीसे सरोकार रखनेवाला। }}
{{outdent| कप्पर (हिं० पु०) कर्पट, कपड़ा। }}
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जिलेका 'चांदखाली' नाला निकलता है। चांदखाली नालेके मुखसे यशा० २२° ११' ३०" उ० और देशा० ८९° २०' पू० पर इससे खोल-पटुआ नदी आ मिली है। इन दोनों संयुक्त नदियोंके सङ्गमस्थलसे दक्षिण कहीं इसे पांगासी, कहीं बाड़, कहीं पांगा, कहीं नामगाद और कहीं समुद्र कहते हैं। सागरके निकटवर्ती स्थानपर इसका नाम मालञ्च है। यह अवशेषको मालञ्च नामसे ही वङ्गोपसागरमें प्रविष्ट हुयी है।
यशोर जिलेमें इस नदीके तीर सागरदाँड़ी नामक एक क्षुद्र ग्राम है। १८२४ ई०को इसी ग्राममें बङ्गालके प्रसिद्ध कवि और मेघनादवध तथा व्रजाङ्गनादि काव्यके प्रणेता माईकेल मधुसूदन्ने जन्मग्रहण किया था।
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रङ्ग रखता हो। ६ कपोतवर्ण, कबूतरका रङ्ग रखनेवाला।
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{{outdent| कपोलकापण (सं० पु०) कपोलांनां कायः (कच्यौ अनेन इति कायः) कषं'पसानम्। १ हस्तिगण्डस्थल, हाथीकी कनपटी। २ हस्त्यादिका गन्धस्राव, हाथीके अपनी कनपटी रगड़नेका सुकाम, पैड़का थवा। }}
{{C|{{<smaller|>"मदैराः कषायित कपोलकाषः।" (भारवि)}}}}
{{outdent| कपोलगेंडुआ (हिं० पु०) गण्डखोपधान, गालतकिया। }}
{{outdent| कपोलफलक (सं० पु०) कपोलः फलक इव। प्रग्रस्थ-गण्डस्थल, चपटा गाल। सम्भवतः कपोलास्थिको ही कपोलफलक कहते हैं। }}
{{outdent| कपोलभित्ति (सं० स्त्री०) कपोला भित्तिरिव, उपमि०। विस्तृतकपोल, लम्बा-चौड़ा गाल। }}
{{outdent| कपोलराग (सं० पु०) गण्डस्थलकी रक्ता, गालकी चमक। }}
{{outdent| कपोक्षी (सं० स्त्री०) ज्ञानविशेष, घुटनेका अगला हिस्सा। }}
{{outdent| कपोशा (हिं० पु०) वैश्यजातविशेष, बनियोंकी एक कौम। }}
{{outdent| कप्तान (अ० पु०—Captain) १ सेनानी, सिपहसालार। २ पोताध्यक्ष, जहाज़का मुसाफ़िज़। ३ नायक, अगुआ। }}
{{outdent| कप्तानी (हिं० स्त्री०) १ अध्यक्षत्ता, सरदारी। (वि०) २ अध्यक्षसम्बन्धीय, सरदारीसे सरोकार रखनेवाला। }}
{{outdent| कप्पर (हिं० पु०) कर्पट, कपड़ा। }}
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||''' कफ'''|'''}}
<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
विशिष्ट एवं स्थानगत, बोधक रसनकी भांति कार्यकारी तथा स्थानगत और तर्पक श्लेष्मा सुश्रुतोक्त इनके सह क्रियाकारी एवं स्थानाश्रयी है।
{{c|{{x-smaller|<poem>"आस्यं गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः शीत एव च ।
मधुरस्त विदग्धः स्यादविदग्धो लवणः स्मृतः ॥” (सुश्रुत)</poem>}}}}
कफ श्वेत, गुरु (भारी), स्निग्ध, पिच्छिल, शीतल, मधुर रसात्मक और बिगड़ने से लवण रस-विशिष्ट होता है।
<Small>कफ के प्रकोप का कारण और काल — </small>गुरुपाकी, मधुररस-विशिष्ट, अत्यन्त स्निग्ध, द्रव (तरल) तथा पिष्टक एवं घृतसंयुक्त द्रव्य, दुग्ध तथा मधुररस खाने, दिन को सो जाने, और बाल्यकाल, शीतकाल, वसंतकाल, रात्रि का प्रथम भाग, प्रभात तथा भोजन का अन्त समय आने से कफ प्रकुपित होता है। कफ उभरने से स्तिमितभाव, मधुररस, शीतता, शौक्ल्य, प्रसेक, मल-प्राय स्थिरता, लवणास्यता, कण्डू, आलस्य, चिरकारिता, कठिनता, शोथ, अरुचि, स्निग्धता, तन्द्रा, हृप्ति, उपदेह, कास और गुरुता — विंशतिप्रकार लक्षण देख पड़ता है। कफज रोग में रूक्ष द्रव्य, क्षार द्रव्य, कषाय द्रव्य, तिक्त द्रव्य एवं कटु द्रव्य का सेवन, व्यायाम, निष्ठीवन (खखारकर थूकना), धूमपान, उष्ण शिरोविरेचक द्रव्य (नस्यादि) का व्यवहार, वमनकारक द्रव्य का प्रयोग, स्वेद (गर्म जल से अभिषिक्त फलालेन आदि वस्त्र द्वारा सेक प्रदान), उपवास, मद्यपान, पथपर्यटन, युद्ध, जागरण, जलक्रीड़ा और पदादि द्वारा आघात लगाना उपकारी है। ऐसे ही आहार-विहार और औषधादि से प्रकुपित कफ दब जाता है। उक्त रूक्ष द्रव्यादि को कफ-संशमनवर्ग कहते हैं।
जलक्रीड़ा (सन्तरण) और शीतल क्रिया द्वारा किस प्रकार कफ प्र शमित होता है — प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है, कि जलक्रीड़ाजनित शीतलता से शारीरिक ताप चलने नहीं पाता। सुतरां चतुर्दिक कर्दम लेपन कर देने से पाकाग्नि प्रखर पड़ने पर सत्वर पाकक्रिया सम्पन्न होने की भांति शारीरिक अग्नि जलक्रीड़ादि से अत्यन्त प्रखर हो कफ को सुखाती है। कफ बढ़ने से
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
अग्निमान्द्य, नासिकादि से कफस्राव एवं आलस्य आता, देह गुरु तथा श्वेतवर्ण दिखाता, अङ्गादि शीतल एवं शिथिल पड़ जाता और श्वास, कास तथा निद्रा का अधिक सताना है। फिर कफ घटने से
ग्लानि होती, हृदयादि श्लेष्माशय की शून्यता झलकती, द्रवत्व की अल्पता पड़ती और शारीरिक सन्धि-समूह की शिथिलता बढ़ती है। जिस व्यक्ति के शरीर में कफ अधिक परिमाण से रहता, वह कफ के गुण-क्रियादि विशिष्ट हो कफात्मक प्रकृति को पहुंचता है। ऐसे व्यक्ति को कफप्रकृतिक कहते हैं। कफप्रकृति का लक्षण — गम्भीर बुद्धि, श्यामवर्ण एवं स्निग्ध केश, क्षमाशीलता, वीर्यवत्ता, स्थूलदेह, समधिक बलवत्ता और निद्रावस्था में स्वप्नयोग से जलाशय-दर्शन है। फिर कफप्रकृति बिगड़ने से स्नेह, बन्ध (दृढ़ता), स्थिरता, गौरव, वृष की भांति बल, क्षमा, धृति और अलोभ लक्षित होता है। (सुश्रुत)
सुश्रुतंक मत से श्लेष्म प्रकृति का लक्षण — नीलवर्ण केश, सौभाग्यवत्ता, मेघ एवं मृदङ्ग की भांति स्वर, निद्रावस्था में स्वप्नयोग से प्रफुल्ल पद्म कुमुदादि विविध पुष्प, सन्तरणशील हंस चक्रवाकादि जलक्रीड़क पक्षी तथा हरित् मनोहर सरोवरादि जलाशय-दर्शन, रक्तान्तनेत्र, सुविभक्तगात्र, समावयव, स्निग्ध देह, सत्त्वगुणयुक्त क्लेशसहिष्णुता और गुरु की मान्यकारिता है।
मानव के शरीर में दो प्रकार का कफ होता है — साम और निराम। आम (अपक्व) रस मिश्रित रहने वाले कफ का नाम साम है। फिर अपक्व रस-विहीन कफ निराम कहलाता है। निराम कफ अविकृत उससे किसी प्रकार अनिष्ट होने की सम्भावना नहीं। वह निर्दोष होता है। किन्तु साम कफ विकृत और दूषित है। वह नाना प्रकार अहित उत्पन्न करता है। इसमें उसके सकल लक्षण लिखे गये हैं —
{{c|{{x-smaller|<poem>"आस्यतन्द्राहृदयाविशुद्धिदोषा प्रवृत्त्या विलमभूववामिः ।
गुरुदरत्वादरुचिसुप्तताभिरामान्वितं व्याधिमुदाहरन्ति ॥" (भावप्रकाश)</poem>}}}}
आलस्य, तन्द्रा, हृदय की अविशुद्धता (वक्षःस्थल में कफ की बाधाबोध), दोष की प्रवृत्ति (स्राव न
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>
होना), भूख की शिथिलता (मंदापन); उदर में गौरवबोध, अरुचि और निद्रालुता—आम कफ का लक्षण है।
प्रथम ही प्रकृतिस्थ स्वस्थ निरोग में व्युत्पत्ति द्वारा प्रतिपादन किया—कफ सब शरीरों में पचता-फिरता है। फिर यह भी कहा जा चुका—अविकृत समस्थिरूप हृदय, कण्ठ, आमाशय, मस्तक एवं सन्धिस्थल में रहता और विकृत होने पर कफ स्वस्थान छोड़ शरीर के सर्वस्थान में पहुँच नाना प्रकार के रोग उत्पादन करता है। किन्तु यह सर्वदा देह में प्रसरणशील रहते भी वायु के साहाय्य व्यतीत द्वन्द्वादि स्थान से अन्यत्र कैसे जा सकता है। यथा—
{{c|{{x-smaller|<poem>“"पंगुः कफः पंगुः पंगवः मलधातवः।
वायुना यत्र नीयन्ते तत्र वर्षन्ति मेघवत्॥" (शारङ्गधर) </Poem>}}}}
पित्त, कफ, विण्मूत्रादि मल और रस रक्तादि धातु समस्त पंगुवत् पड़े हैं। वह स्वयं शरीर में कदापि चल-फिर नहीं सकते। फिर वायु के द्वारा जिस स्थान में पहुँचाए जाते हैं, वहीं छात्र धातु मेघ वर्षण की भांति अपनी क्रिया दिखाते हैं। अर्थात् कफ बिगड़ने, उभरने या बढ़ने पर वायु द्वारा शरीर के नाना स्थानों में पहुँच नाना प्रकार की व्याधि उत्पादन करता है। जैसे— वक्षःस्थल फुफ्फुस में श्वास तथा कासरोग, मस्तक में शिरःपीड़ा और नासिका में कफ प्रतिश्याय रोग जमा देता है।
<Small>पथ्य—</Small> वमन, उपवास, नेत्राञ्जन, मैथुन, शरीर-मार्जन, उष्ण शस्त्रादि के स्वेद, चिन्ता, जागरण, परिश्रम, अत्यधिक पथपर्यटन, व्यायाम के वेगधारण, गरुड़ बंधारण, प्रतिसारण (दन्त, जिह्वा एवं मुख में घर्षण द्रव्य के प्रयोग), शिरोविरेचन नस्य, छत्री अस्त्रादि यानारोहण, धूमपान, शरीराच्छादन, युद्ध, मनोदुःख उत्पादन, रूक्षद्रव्य, उष्णद्रव्य, पुरातन तथा षष्टिक धान्य, त्रिस्त्रिक, तृणधान्य, चणक, मुद्ग, कुलत्थ, माष, यव, क्षार, सर्षपतैल, उष्णजल, धन्यदेगन्ध मांध, राजचम्पक, श्वेताग्र, पटोल, कारवेल्ल, वार्ताकी, उदुम्बर, कर्कोटक, सोभा, लहसुन, निम्ब, ...भांग, मूसक, कटुकी, षडङ्गर, मद्य, ताम्बूल, पुरातन मद्य, त्रिकटु, त्रिफला,
<noinclude>{{Multicol-break}}</include>
गोमूत्र, राई, क्षारकटुद्रव्यशलाका, द्वैमुण्ड्य स्वेद, काँस्य, रौप्य, सुवर्ण, वापूरेरसयुक्त तीक्ष्णकर एवं कषाय द्रव्य और यथोगमन के पादचर, पान वा पाशारादि से कफ नष्ट होता है।
<Small>अपथ्य—</Small> स्नेहप्रयोग, रेखासम्बद्ध, उपवेशन, दिवा-निद्रा, स्नान, नूतन जल, नूतन तण्डुल, मटर, माष, मांस, घृतादि मिष्टद्रव्य, छेने या मावे, दधि प्रभृति दुग्धविकृत द्रव्य, कमरख, पोय, कटहल, धान, खजूर, दुग्ध, घृतलेपन, नारियल, मिष्टान्न, मधुरद्रव्य, पच्छद्रव्य, गुरुद्रव्य और हिम—सब सबका आचरण, आहार वा विहारादि कफ के लिये अपथ्य ठहरता है अर्थात् कफ प्रविष्ट उत्पन्न करता, उभरता तथा बढ़ता है।
{{outdent|कफ़ (फा० पु०—Cuff) १. पियादा, पादतियों की पुश्तदार सङ्ख्या। यह एक दोहरी पट्टी रहती है, जो कुरती या कमीज़ की बाँह में हाथ के पास लगती है। इसमें कोई दो, कोई तीन और कोई चार बटन तक टाँकता है। चूड़ीदार कुरते में इसको साफ़ रखते हैं। कमीज़ में कफ़ लगा रहता है। २. सूती प्रसार, भीख, वधुक, तमाशा। ३. यन्त्रविशेष, एक औज़ार, नाली। यह लोहे का होता है। इसको मार-मार चमक से आग निकाली जाती है।}}
{{outdent|कफ (प्रा० पु०) फेन, झाग।}}
{{outdent|कफकर (सं० त्रि०)कफं करोति, कफ-कृ-अच्। १. कफवृद्धिकारक, बलगम बढ़ाने वाला। २. श्लेष्मा उत्पादन करने वाला, जो जुकाम लाता हो। महर्षि सुश्रुत के मत में काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, ऋषभक, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, मेदा, महामेदा, छिन्नरुहा, कर्कटशृङ्गी, तुगाक्षीरी, पद्मका, प्रपौण्डरीक, ऋद्धि, वृद्धि, मृद्विका, जीवन्ती और मधुर—शाकोष्यादि-यथोक्त सकल द्रव्य कफकर हैं।}} {{Right|<Small>अपथ्य द्रव्य कफ शब्द में देखो।</Small>}}
{{outdent|कफकूर्चिका (सं० वि०) कफ़ं कूर्चयति विकृतं करोति, कफ-कूर्च-च्युल्-टाप् अत इत्वम् प्र। साका, क्षार।}}
{{outdent|कफकेतु (सं० पु०)कफ़रोगाधिकार का औषध, बलगम की एक दवा। टङ्कण, मागधी, मरिच एवं...}}
<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''२२'''|'''कफ-कफकैतु'''}}
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होना), भूख की शिथिलता (मंदापन); उदर में गौरवबोध, अरुचि और निद्रालुता—आम कफ का लक्षण है।
प्रथम ही प्रकृतिस्थ स्वस्थ निरोग में व्युत्पत्ति द्वारा प्रतिपादन किया—कफ सब शरीरों में पचता-फिरता है। फिर यह भी कहा जा चुका—अविकृत समस्थिरूप हृदय, कण्ठ, आमाशय, मस्तक एवं सन्धिस्थल में रहता और विकृत होने पर कफ स्वस्थान छोड़ शरीर के सर्वस्थान में पहुँच नाना प्रकार के रोग उत्पादन करता है। किन्तु यह सर्वदा देह में प्रसरणशील रहते भी वायु के साहाय्य व्यतीत द्वन्द्वादि स्थान से अन्यत्र कैसे जा सकता है। यथा—
{{c|{{x-smaller|<poem>“"पंगुः कफः पंगुः पंगवः मलधातवः।
वायुना यत्र नीयन्ते तत्र वर्षन्ति मेघवत्॥" (शारङ्गधर) </Poem>}}}}
पित्त, कफ, विण्मूत्रादि मल और रस रक्तादि धातु समस्त पंगुवत् पड़े हैं। वह स्वयं शरीर में कदापि चल-फिर नहीं सकते। फिर वायु के द्वारा जिस स्थान में पहुँचाए जाते हैं, वहीं छात्र धातु मेघ वर्षण की भांति अपनी क्रिया दिखाते हैं। अर्थात् कफ बिगड़ने, उभरने या बढ़ने पर वायु द्वारा शरीर के नाना स्थानों में पहुँच नाना प्रकार की व्याधि उत्पादन करता है। जैसे— वक्षःस्थल फुफ्फुस में श्वास तथा कासरोग, मस्तक में शिरःपीड़ा और नासिका में कफ प्रतिश्याय रोग जमा देता है।
<Small>पथ्य—</Small> वमन, उपवास, नेत्राञ्जन, मैथुन, शरीर-मार्जन, उष्ण शस्त्रादि के स्वेद, चिन्ता, जागरण, परिश्रम, अत्यधिक पथपर्यटन, व्यायाम के वेगधारण, गरुड़ बंधारण, प्रतिसारण (दन्त, जिह्वा एवं मुख में घर्षण द्रव्य के प्रयोग), शिरोविरेचन नस्य, छत्री अस्त्रादि यानारोहण, धूमपान, शरीराच्छादन, युद्ध, मनोदुःख उत्पादन, रूक्षद्रव्य, उष्णद्रव्य, पुरातन तथा षष्टिक धान्य, त्रिस्त्रिक, तृणधान्य, चणक, मुद्ग, कुलत्थ, माष, यव, क्षार, सर्षपतैल, उष्णजल, धन्यदेगन्ध मांध, राजचम्पक, श्वेताग्र, पटोल, कारवेल्ल, वार्ताकी, उदुम्बर, कर्कोटक, सोभा, लहसुन, निम्ब, ...भांग, मूसक, कटुकी, षडङ्गर, मद्य, ताम्बूल, पुरातन मद्य, त्रिकटु, त्रिफला,
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गोमूत्र, राई, क्षारकटुद्रव्यशलाका, द्वैमुण्ड्य स्वेद, काँस्य, रौप्य, सुवर्ण, वापूरेरसयुक्त तीक्ष्णकर एवं कषाय द्रव्य और यथोगमन के पादचर, पान वा पाशारादि से कफ नष्ट होता है।
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<noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''|'''कफचय—कफना'''}}
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वत्सनाभ बराबर बराबर ले आर्द्रक के स्वरस में मर्दन करे। कफकेतु भावना देने से यह रस बनता है। मात्रा गुञ्जामात्र है। (भैषज्यरत्नावली)
{{outdent| कफचय (सं० पु०) कफानां चयः, ६-तत्। शरीरस्थ स्वाभाविक कफ का नाश, जिससे कुदरती बलगम का बिगाड़। }}
{{outdent| कफण्ड (सं० पु०) गलरोग, गले की एक बीमारी। यह स्थिर, सवर्ण, गुरु, उग्रकण्डू, शीत, महान् कफात्मक, पारुष्ययुक्त और चिरचिपाक होता है। फिर इस रोग के प्रभाव से रोगी का मुख वैरस्य पकड़ता और तालु तथा गल सूखने लगता है। (माधवनिदान) }}
{{outdent| कफगोर (फा० पु०) कच्छा, करछी, डोई। इसका अग्रभाग करतल की भाँति चपटा रहता और दण्ड लम्बा लगता है। कफगोर से दाल, भात, खिचड़ी, घी या मलाई का मैल उतारते और पूरी कचौरी भी निकालते हैं। हिन्दुस्थान में इसे प्रायः कलकुल कहते हैं। }}
{{outdent| कफगुल्म (सं० पु०) श्लेष्मज गुल्म, बलगम के बिगाड़ से पेट में पड़ने वाली गिलटी या गाँठ। इसका रूप स्तिमित्य, शीतज्वर, गात्रसाद, हृल्लास, कास, अरुचि, गौरव, शैत्य और कठिनोन्नतत्व है। (चरक) }}
{{outdent| कफघ्न (सं० वि०) कफं तद्विकारञ्च हन्ति, कफ-हन्-टक्। आमनामक वा कफजनित पीड़ानाशक, बलगम या बलगम की बीमारी दूर करने वाला। सुश्रुतोक्त आरग्वधादि, वरुणादि, सालसारादि, रोध्रादि, अर्कादि, सुरसादि, पिप्पल्यादि, एलादि, वृहत्यादि, पटोलादि, ऊषकादि तथा मुस्तादि गणोक्त और त्रिकटु, त्रिफला, पञ्चमूल एवं दशमूल प्रभृति सकल द्रव्य कफनाशक हैं।}}
{{C|<small>अन्यान्य कफघ्न द्रव्य कफ शब्द में देखो।</small>}}
{{outdent| कफघ्नी (सं० स्त्री०) कफघ्न-ङीष्। १ शुकनासा, केवाञ्च। २ वृक्षाभेद, एक पेड़। }}
{{outdent| कफज (सं० त्रि०) कफाज्जायते, कफ-जन्-ड। आम से उत्पन्न, बलगम से पैदा। }}
{{outdent| कफज्वर (सं० पु०) कफनिमित्तो ज्वरः, मध्यपदलो०। आमज्वर, बलगमी बुखार।<small>ज्वर देखो।</small> }}
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
{{outdent| कफणि (सं० पु०-स्त्री०) केन सुखेन फणति अनायासेन मोच विकचनत्वं प्राप्नोति, क-फण्-इन्; केन अनायासेन स्फुरति, क-स्फुर-इन् पृषोदरादित्वात् साधुः। कफोणि, मिरफ़क़, कोहनी, बाँह के बीच की गाँठ। }}
{{outdent| कफणी (सं० स्त्री०) कफणि देखो। }}
{{outdent| कफद (सं० त्रि०) कफं ददाति, कफ-दा-ड। कफकारक, बलगम पैदा करने वाला। }}
{{outdent| कफन (अ० पु०) शवाच्छादनवस्त्र, मुर्दे पर डाला जाने वाला कपड़ा। }}
{{outdent| कफनखसोट (हिं० वि०) १ शव के आच्छादन का वस्त्र नोच लेने वाला, जो मुर्दे पर डाला जाने वाला कपड़ा फाड़ लेता हो। पहले डोम श्मशान में मुर्दे का कपड़ा उतार आपस में फाड़ लेते थे। २ कृपण, कंजूस। ३ दरिद्र का धन हरण करने वाला, जो गरीब का माल उड़ा लेता हो। }}
{{outdent| कफनखसोटी (हिं० स्त्री०) १ शवाच्छादनवस्त्र की चीरफाड़, मुर्दे पर डाले जाने वाले कपड़े की नोच-खसोट; यह डोमों का कर है। २ वृत्तिविशेष, रुपया कमाने की एक चाल। अयोग्य रीति से दरिद्र का धन-हरण करना कफनखसोटी कहलाता है। ३ कृपणता, सूमपन। }}
{{outdent| कफनचोर (हिं० पु०) १ प्रधान तस्कर, बड़ा चोर। जो गड़े मुर्दे को उखाड़ कफन चुराता, वही कफनचोर कहलाता है। २ दुष्ट, बदमाश, उचक्का। क्षुद्र द्रव्य चुराने और किसी को देख में न पाने वाले का नाम कफनचोर है। }}
{{outdent| कफनाड़ी (सं० स्त्री०) दन्तमूलगत रोगविशेष, दाँतों की जड़ में होने वाली एक बीमारी। }}
{{outdent| कफनाना (हिं० क्रि०) शव को वस्त्र से आच्छादन करना, मुर्दे को कपड़ा ओढ़ाना। }}
{{outdent| कफनाशन (सं० वि०) कफं नाशयति, कफ-नश्-णिच्-युट्। कफ को नाश करने वाला, जो बलगम मिटाता हो। }}
{{outdent| कफनी (हिं० स्त्री०) १ शव के कण्ठ में पड़ने वाला वस्त्र, जो कपड़ा मुर्दे के गले में डाला जाता हो। }}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२५७
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रेखा साव
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२५८|कशेरुक-कश्यप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
और मुस्ताकृति लद्रको चिञ्चोड़ कहते हैं। दोनों प्रकारका कशेरु शीत, सधुर, तुवर (कषाय), गुरु, पित्तशोणित दाहघ्न और आंखकी बीमारी दूर करनेवाला होता है। (भावप्रकाश)
सिङ्गलपुरका कशेरु बहुत बड़ा निकलता है। कहीं कहीं इसे ठण्डाईमें भी घोंट कर पीते हैं।
३ भारतवर्षका एक विभाग।
{{block center|<poem>
"भारतस्यास्य वर्षस्य नवभेदाविमामय।
इन्द्रद्वीप: कशेरु कच तापवर्ण्यो गणखिमान्।
नागद्वीपस्तथा सौम्यो गाम्यर्च्छय वारुणः॥" (विष्णुपुराण)</poem></small>}}
{{outdent|कशेरुक, <small>कशेरु देखो।</small>}}
{{outdent|कशेरुका (सं॰ स्त्री॰) कशेरुक-टाप्। १ पृष्ठास्थि, रीढ़, पीठकी बड़ी हड्डी। २ कशेरु, कसेरु।}}
{{outdent|कशेरुमान् (सं॰ पु॰) यवनराजविशेष, एक राजा।}}
{{c|<small>"इन्दुध्वुवो इत: कोपाद्द यवनस्य कशेरुमान्॥" (हरिवंश १९४ अ॰)</small>}}
३ भारतवर्षका एक खण्ड।
{{outdent|कशेरुस् (सं॰ क्ली॰) कशेरु, कसेरु।}}
{{outdent|कशेरु (सं॰ स्त्री॰) क-म्पृ-च एरङ् चान्तादेश:। १ तृणकन्दविशेष, कसेरु। २ विश्वकर्माकी चतुर्दशी कन्धा। नरकासुरने हरिरूपसे इन्हें हरण किया था।}}
{{right|<small>|(हरिवंश, १२१ अ॰)</small>}}
{{outdent|कशेरुक, <small>कशेरु देखो।</small>
{{outdent|कशेरुका, <small>कशेरु देखो।</small>}}
{{outdent|कशोक (सं॰ त्रि॰) कश ताड़ने बाहुलकात् ओक। १ हिंसक, मार डालनेवाला। (पु॰) २ राक्षसादि,
शैतान वगैरह।}}
{{outdent|कञ्चन (सं॰ अव्य॰) किम्-चन इति सुग्ध बोधः। कोई, एक न एक यह अनिर्दिष्टवाचक है। पाणिनिने
इसे पृथक् शब्द माना है।}}
{{outdent|कश्चित् (सं॰ अव्य॰) किम्-चित् इति सुग्वबोधः। कोई, एक न एक। यह अनिर्दिष्टवाचक है। पाणिनिके मतमें 'कश्चित्' शब्द पृथक् ठहरता है।}}
{{block center|<poem><small>
"कश्चिन् वाल्माविरुदुषा स्वाधिकारममजः।" (मेघदूत)</small></poem>}}
{{outdent|कश्ती, <small>किश्ती देखो।</small>}}
{{outdent|कश्मल (सं॰ क्ली॰) काश-कल-मुट्। <small>कुटिवशिकौतिम्य: प्रत्ययस्य सुट्। उष् १ । १०८ ।</small> १ मूर्छा, गश, एकाएक बेहोश}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२५८|कशेरुक-कश्यप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
और मुस्ताकृति लद्रको चिञ्चोड़ कहते हैं। दोनों प्रकारका कशेरु शीत, सधुर, तुवर (कषाय), गुरु, पित्तशोणित दाहघ्न और आंखकी बीमारी दूर करनेवाला होता है। (भावप्रकाश)
सिङ्गलपुरका कशेरु बहुत बड़ा निकलता है। कहीं कहीं इसे ठण्डाईमें भी घोंट कर पीते हैं।
३ भारतवर्षका एक विभाग।
{{block center|<poem>
"भारतस्यास्य वर्षस्य नवभेदाविमामय।
इन्द्रद्वीप: कशेरु कच तापवर्ण्यो गणखिमान्।
नागद्वीपस्तथा सौम्यो गाम्यर्च्छय वारुणः॥" (विष्णुपुराण)</poem></small>}}
{{outdent|कशेरुक, <small>कशेरु देखो।</small>}}
{{outdent|कशेरुका (सं॰ स्त्री॰) कशेरुक-टाप्। १ पृष्ठास्थि, रीढ़, पीठकी बड़ी हड्डी। २ कशेरु, कसेरु।}}
{{outdent|कशेरुमान् (सं॰ पु॰) यवनराजविशेष, एक राजा।}}
{{c|<small>"इन्दुध्वुवो इत: कोपाद्द यवनस्य कशेरुमान्॥" (हरिवंश १९४ अ॰)</small>}}
३ भारतवर्षका एक खण्ड।
{{outdent|कशेरुस् (सं॰ क्ली॰) कशेरु, कसेरु।}}
{{outdent|कशेरु (सं॰ स्त्री॰) क-म्पृ-च एरङ् चान्तादेश:। १ तृणकन्दविशेष, कसेरु। २ विश्वकर्माकी चतुर्दशी कन्धा। नरकासुरने हरिरूपसे इन्हें हरण किया था।}}
{{right|<small>|(हरिवंश, १२१ अ॰)</small>}}
{{outdent|कशेरुक, <small>कशेरु देखो।</small>
{{outdent|कशेरुका, <small>कशेरु देखो।</small>}}
{{outdent|कशोक (सं॰ त्रि॰) कश ताड़ने बाहुलकात् ओक। १ हिंसक, मार डालनेवाला। (पु॰) २ राक्षसादि,
शैतान वगैरह।}}
{{outdent|कञ्चन (सं॰ अव्य॰) किम्-चन इति सुग्ध बोधः। कोई, एक न एक यह अनिर्दिष्टवाचक है। पाणिनिने
इसे पृथक् शब्द माना है।}}
{{outdent|कश्चित् (सं॰ अव्य॰) किम्-चित् इति सुग्वबोधः। कोई, एक न एक। यह अनिर्दिष्टवाचक है। पाणिनिके मतमें 'कश्चित्' शब्द पृथक् ठहरता है।}}
{{block center|<poem><small>
"कश्चिन् वाल्माविरुदुषा स्वाधिकारममजः।" (मेघदूत)</small></poem>}}
{{outdent|कश्ती, <small>किश्ती देखो।</small>}}
{{outdent|कश्मल (सं॰ क्ली॰) काश-कल-मुट्। <small>कुटिवशिकौतिम्य: प्रत्ययस्य सुट्। उष् १ । १०८ ।</small> १ मूर्छा, गश, एकाएक बेहोश}}
{{Multicol-break}}
हो जानेकी हलत। २ मोह, कमज़ोरी। ३ पाप; गुनाह। (त्रि॰) ४ मलिन, गन्दा। ५ दुराचार, बदकार। ६ पापी, गुनाहगार।
{{outdent|कसमश (वै॰ क्ली॰) वैदे पृषोदरादित्वात् सस श:।}}
{{right|<small>कशमन देखो।</small>}}
{{outdent|कश्मीर (सं॰ पु॰) कश्म-ईरन् मुड़ागमश्च। <small>कमेंर्सुच्। उष् । ४ । ३२ ।</small>काश्मीर जनपद। <small>काश्मीर देखो ।</small>}}
{{outdent|कश्मीरज (सं॰ क्ली॰) कश्मीरे जायते, कश्मीर-जन् ड। कुद्मविशेष, ज़ाफ़रान्, केसर। <small>कुदुम देखो।</small>}}
{{outdent|कश्मीरजन्म (सं॰ क्ली॰) कश्मीरे जन्म यस्य, बहुब्री॰। <small>कुसुम, केसर।</small>}}
{{outdent|कश्मीरी (हिं॰ त्रि॰) १ कश्मीरसम्बन्धीय, कश्मीरके मुताल्लिक। (स्त्री॰) २ कश्मीर देशकी भाषा या
बोली। ३ लेद्व विशेष, एक चटनी। आद्रांको छील छुद्र छुद्र खण्ड करते हैं। फिर उनमें पीस कर मरिच, कद्लोज, कश्मीरज (केसर), ऐला, जावित्री, सौंफ और जीरक पीसकर मिलाना पड़ता है। पस्तको लवण, चिरका और शक्करा डालनेसे कश्मीरी-चटनी तैयार हो जाती है। (पु॰) ४ कश्मीर देशका अधिवासी यानी रहनेवाला। ५ कश्मीरका घम यानी घोड़ा।}}
{{outdent|कश्य (सं॰ पु॰-स्त्री॰) कशां भर्द्धति, कशा-य। <small>दणादिभ्यो यः । पा ५ । १ । ६६ ।</small> १ अश्व, घोड़ा। २ अश्वका मध्यदेश, घोड़े का पट्ठा। ३ मद्य, शराब। (त्रि॰) कशाघातके योग्य, कोड़ा खाने लायक।}}
{{outdent|कश्यप (सं॰ पु॰) कश्यं सोमसरादिजनितं मघं
पिबति, कश्य-प-क। १ कोई ऋषि। ब्रह्माके मानसपुत्र मरीचिके पौरस और कलाके गर्भसे इनका जन्म हुवा था। मार्कण्डेयपुराणके मतानुसार कश्य अर्थात् सोमरसके मघ्यसे इनकी उत्पत्ति है, इसीसे कश्यप नाम पड़ गया।}}
{{block center|<poem><small>
"ब्रह्मणस्तङ्गयो योऽभूत् मरीचिरिति विश्रुतः।
कश्यपस्य सुतोऽभूत् कश्यपान्त् स कश्यपः॥</small></poem>}}
{{right|<small>(मार्कण्डेयपुराण १०८ । १)</small>}}
शुक यजुर्वेद प्रभृति वैदिक संहिताओंके, मतमें हिरण्यगर्भं ब्रह्मसे कश्यपने जन्म लिया था।
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कश्यपनन्दन-कषाय|२५९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{c|<small>"हिरण्यनवः ऋषयः याक्का यातु जातः कश्यपो याविन्द्रः॥"</small>}}
{{right|<small>(तैत्तिरीयसंहिता ५ । १ । १ । १)</small>}}
कश्यप एक प्रजापति थे। साम, यजुः और अथर्वसंहिताओंमें इन्हें इन्द्र चन्द्र प्रभृति देवोंमें एक माना है। <small>(साम १ । १ । १४, यजुषजु: १४ । २, अथर्व १३ । १ । १०)</small>
कात्यायनने अपनी वेदानुक्रमणिकामें लिखा है कि कश्यप ऋकूसंहितावाले कई सूक्तोंके ऋषि थे। श्रीमद्भागवतमें देखते हैं कि कश्यप ऋषिने इसकी १७ कन्याओंसे विवाह किया। उनके गर्भसे १७ जातियाँ उत्पन्न हुईं,—१ अदितिसे देव, २ दितिसे दैत्य, ३ दनुसे दानव, ४ काष्ठासे पश्वादि, ५ अरिष्टासे गन्धर्व, ६ सुरसासे राक्षस, ७ इरासे वृक्ष, ८ मुनिसे अयस्वरायें, ८ क्रोधवशाचे सर्प, १० ताम्राचे खेन गृध्र
प्रभृति, ११ सुरभिसे गोमष्टिषादि, १२ सर्यचे खापद, १३ तिमिसे जलजन्तु, १४ विनताचे गरुड़, एवं शुष्क, १५ कद्रुचे नाग, १६ पतङ्गीसे पतङ्ग और १७ यामिनिचे शलभ। किन्तु महाभारत और अन्यान्य पुराण प्रभृति में कश्यपकी त्रयोदश भार्यायें लिखी हैं। मार्कण्डेय-पुराणके मतसे उनके नाम थे,—१ अदिति, २ दिति, ३ दनु, ४ विनता, ५ खसा, ६ कद्रु, ७ मुनि, ८ क्रोधा, ९ अरिष्टा,१० इरा,१ ताम्रा,१२ सुरसा और १३ प्रधा।
{{right|<small>(मार्कण्डेयपुराण १०८ अ॰)</small>}}
पश्यतीति पश्य:, सर्वस्य पक्ष एव पश्यकः आद्यनांबरविपर्य्यात् सिध्यति यदा कस्यं अज्ञानं अविद्यामित्यर्थः विवति नाशयति अथवा कस्यं विज्ञानघनं पाति रक्षति स्वामनीति शेषः। २ परब्रह्म।
{{c|<small>"तदेय ब्रह्म वा आत्मा: पतयः पाता हर्वा प्रजानां गोप्ता वामष्ट कश्यपीष योऽप्सरानमोक्षा गान्धर्विः।" (तायनिणुति २।११)</small>}}
३ कच्छप, कछुवा। ४ मृगविशेष, एक हिरन। ५ मत्स्यविशेष, एक मछली। (त्रि॰) ६ म्यावदन्त,
बड़दन्ता।
{{outdent|कश्यपनन्दन (सं॰ पु॰) कश्यपस्यानन्दनः पुत्रः, ६-तत्। १ कश्यपके पुत्र गरुड़। २ देव, असुर आदि।}}
{{outdent|कश्यपुर (सं॰ क्ली॰) कश्यपस्य पुरम्, ६-तत्। वर्त्तमान काश्मीरका यह नाम रखा था। कश्यपुरको}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|ही हेरोदोतसने 'कम्मतुरस' और टलेमिने 'कश्यपीरा' लिखा है।}}
{{outdent|कश्यपसंहिता (सं॰ स्त्री॰) कश्यपस्य संहिता, ६-तत्। कश्यपप्रणीत एक धर्मशास्त्र।}}
{{outdent|कश्यपस्मृति, <small>कश्यप संहिता देखो।</small>}}
{{outdent|कष (सं॰ पु॰) कषति धन धनेन वा, कष-भ्रच् यदाकष-घ निपातनात् साधुः। गोधसखरवरजव्यजापशानि-
गमाप। पा ३।२।१९। १ कटिप्रस्तर, कसौटी। इसपर स्वर्ण राज्य घिसकर जांचते हैं। कषका संस्कृत पर्याय—शान और निकस है। २ घर्षण, घिसाव। (त्रि॰) घर्षण करनेवाला, जो घिसता या रगड़ता हो।}}
{{outdent|कषण (सं॰ त्रि॰) कप्पते घिषायते, कष कर्मणि खुट्। १ घपक, कषा। (पु॰) कषति घन्न। २ कटिप्रस्तर, कसौटी। (क्ली॰) भावे खुट्। ३ घर्षण, खुजलाहट, रगड़।}}
{{c|<small>"कपणकष्मलित्समहाक्षिणः क्षयविनमलमङ्गमङ्गिनजवर्जितै:" (मारति ५।४७)</small>}}
{{outdent|कषपाषाण (सं॰ पु॰) कषसासो पाषाणस्येति, कर्मधा॰। स्वर्ण मषि, कसौटी।}}
{{outdent|कषा (सं॰ स्त्री॰) कष्यते ताड्यते अनया, कष वादुलकात् करणे अप्-टाप्। कशा, चाबुक।}}
{{outdent|कषाघात (सं॰ पु॰) कशाका आघात, चाबुककी मार, उघड़़े।}}
{{outdent|कषाकु (सं॰ पु॰) कव—आकु। १ सूर्य, आफताब। २ अग्नि, आतिश, आग।}}
{{outdent|कषापुत्र (सं॰ पु॰) निकषात्मज, एक राक्षस।}}
{{outdent|कषाय (सं॰ पु॰ क्ली॰) कषति कणठम, कष—प्राय। १ रसविशेष, कसैलापन। इसका संस्कृत पर्याय—सुवर, कषर और तूबर हैं। सुश्रुतके मतानुसार घास्कादनसे
मुखको सुखाने, जिह्वाको ठहराने, कण्ठको वध बनाने और हृदयको खुरच पीड़ा पहुंचानेवाला रस कषाय कहलाता है। पृथिवी वायुगुणबहुल होनेसे यह उपजता है। पूगफल आदि खानेसे इसका आस्वाद मिलता है। कषाय रस मलग्राहक, ब्रणरोपक, स्तम्भन, शोधन, लेखन, शोषक, पीड़ादायक, क्लेशनाशक और वायुवर्धक है। इसके अतिरिक्त व्यवहारसे पीड़ा, सुखशोष, उदराध्यान, वाक्यग्रह (वात}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२६०|कषाय-कषायपाक}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|करते बक जानेकी हालत) मन्यास्तम्भ (गला जकड़ जानेकी हालत), गात्रस्फुरण, स्रोतअबरोध, श्यावत्व (भूरापन), शुक्रनाश, आण्डुञ्चन, आक्षेपण प्रभृति वायुविकार बढ़ते हैं।}}
२ क्वाथ, पाचन, जौशांदा, औंटी, काढ़ा। इसका
अपर संस्कृत नाम निर्यूह है। इसके पांच भेद है—स्वरख, कषक, क्वथित, शत और फाण्ट। <small>स्वरस, कल्ख, कषित, शत और फाण्ट देखो।</small>
३ निर्यास, गोंद। ४ विलेपन, चुपड़ाव।
{{c|<small>"कण्ठार्पि तो लोध कषायदचे गोरोषनाष पनितान्गौरे।" (कुमारसम्भव)</small>}}
५ अङ्गराग, उबटन। ६ श्योनाकवृक्ष, सोनापान। ७ कपित्यवृक्ष, कैथेका पेड़। ८ महासर्जवृक्ष, धूनेका बड़ा पेड़। ९ मण्डलिसर्प, एक सांप। १० राग, आसक्ति, लगाव। ११ कलियुग, बुरा ज़माना। निर्विकल्प समाधिक एक विघ्न। वाष्य विषयसे हट अखण्ड वस्तु ग्रहणमें लगते भा जो राग आदि संस्कार उठ मनको स्तब्ध और अखण्ड वस्तु ग्रहणसे पृथक रखते, उन्हें कषाय कहते हैं। १२ लोहितवर्ण, लालरंग। (त्रि॰) १४ कषायरसविशिष्ट, कसैला। १५ सुरभि, खुशबूदार।
{{c|<small>"प्रल्य पेषु षट् टितबमलामोदम्मोकषायः" ” (मेघदूत)</small>}}
१६ लोहित, सुर्ख, लाल। १७ रक्तपीत मिश्रित, लाल-पीला। १८ अपटु, नावाकिफ़। १९ सुश्राव्य, अच्छीतरह सुन पड़नेवाला, जो कानमें खटकता न हो। २० रक्षित, रंगदार। २१ आसक्त, संसारलिप्त, फंसा हुवा। जैनशास्त्रमें लिखा है,—
{{block center|<poem><small>
"बाप' स' सारसालारथय वे यान्ति वे जनाः।
ते कषायाः क्रोधमानमायालोभः इति श्रुताः॥" (लोकप्रकाश श ३।४०९)</small></poem>}}
जैनशास्त्रमें 'कषाय'के ऊपर बहुत विचार किया है। क्रोध, मान, माया, लोभका नाम ही कषाय है। इसके उत्तरोत्तर भेदोंका बड़ी ही सूक्ष्मताके साथ दिग्दर्शन कराया गया है। गोम्मटसार (जीवकांड)में कषाय शब्दकी दो तरहसे निरुक्ति लिखी है। जैसे—
{{block center|<poem><small>
खण्डद्रुषद्रुषय सुं कामक्रोध’ बदीति जीबसुस।
'संसारदूरमेर' तेण कषाओगि प' बै’ति ॥२८१॥</small></poem>}}
{{Multicol-break}}
अर्थात् जीवके सुख दुख आदि अनेक प्रकारके
धान्यको उत्पन्न करनेवाले, तथा जिसकी संसाररूपी
मर्यादा अत्यन्त दूर है ऐसे कर्मरूपी क्षेत्र ( खेत )का
जो कर्पण करता है उसे कषाय कहते हैं । दूसरी
प्रकार कष् धातुसे भी इसकी व्युत्पत्ति बतलाते हैं—
{{block center|<poem><small>
मन्मत्तदेस मयलचरि ममखमादर परणामे।
वादन्ति वा कपाया कउदोयखदङ् खलोर्गिमिदा॥२८१॥</small></poem>}}
ज़ीवके सम्यक्त्व, देशसंयम, सकलसंयम और यथाख्यात चारित्ररूपी शुद्ध परिणामों को जो कषै—न होने दे उसको कषाय कहते हैं। इसके अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्ज्वलन ये चार भेद हैं इन चारोंमें प्रत्येकके क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार चार भेद हैं इसतरह सोलह हो जाते हैं। फिर इनके भी उत्तरोत्तर असंख्याते भेद हैं। कषाय की विशेष व्याख्या करने लिये जैन धर्ममें अनेक शास्त्र हैं। सबसे बड़ा कषायप्राभृत है। गोम्मटसारमें भी इसका अनेक व्याख्यान है।
{{outdent|कषायक्वत (सं॰ पु॰) कषायं कषायरागं करोति, कषाय-कृ-क्विप् तुगागमः। १ रक्तकोष, लासलोध। इसकी छाल रंगनेमें लगती है। (मि॰) २ कषायपुस्तकारी, काढ़ा बनानेवाला।}}
{{outdent|कषायचित्र (सं॰ त्रि॰) लोहितवर्ण द्वारा रञ्जित, फींके सुर्ख रंगसे बनाया हुवा।}}
{{outdent|कषायजल (सं॰ क्ली॰) जलविशेष, एक पानी। इससे (पाकड़), अश्वत्य (पीपर) और वटके सिद्ध जलको कवायजल कहते हैं।}}
{{outdent|कषायता (सं॰ स्त्री॰) कषायस्य भावः, कषाय-तल्-टाप्। कषायंका धर्म, कसैलापन।}}
{{outdent|कषायदन्त (सं॰ पु॰) मूषिक विशेष, किसी किसका-चूहा। इसका शुक्र जहाँ गिरता, वहाँ शोध, क्रोध-
आदि उठता है। <small>(सुश्रुत)</small>}}
{{outdent|कषायदर्शन, <small>कषायदर्शन देखो।</small>}}
{{outdent|कषायनित्य (सं॰ त्रि॰) नित्य अतिमात्र कषायरसलेवी, रोज़ हदसे ज्यादा कसैली चीज़ खानेवाला।}}
{{outdent|कषायपाक (सं॰ पु॰) द्रव्य विशेषके काव्यकी प्रस्तुत प्रणाली, किसी चीज़के औशांदा बनाने का तरीका।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२६०
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कषायपाण-कषीका|२६१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
जिन सकल कार्योमें जलका परिमाण नहीं लिखते,
उनमें आद्र द्रव्य रहनेसे अष्ट् गुण और शुष्क द्रव्य
रहनेसे षोड़श गुण जलसे सिद्ध कर चतुर्थांश अवशिष्ट
रखते हैं।
{{outdent|कवायपाण (सं॰ पु॰) कषायः पानं यस्य, बहुव्री॰ णत्वम्। <small>पानन्देशे। पा ८।४।९</small> गान्धार जाति।}}
{{outdent|कषाय प्राभृत—एक जैन शास्त्र। इसमें जीवको संसारमें भ्रमण करानेवालो कषायों का वर्णन है।}}
{{outdent|कषायफल (सं॰ क्ली॰) पूगफल, सुपारी।}}
{{outdent|कषाय मार्गणा—जैन ग्रन्थमें संधारी जीवोंकी विशेष अवस्था बतलानेके लिये १४ मार्गणा लिखी है। उनमें की एक मार्गणा।}}
{{outdent|कषाययावनाल (सं॰ पु॰) कषायः रक्तवर्ण; यावनालः, कर्मधा॰। तुवर यावनाल धान्य, कसैलो जुवार।}}
{{outdent|कषाययोनि (सं॰ स्त्री॰) कषायाधिकरण, कसैलेपनकी बुनयाद। यह पांच प्रकारकी होती है,—मधुर कषाय, कटुकषाय, तिक्तकषाय और कषायकषाय। <small>(चरक)</small>}}
{{outdent|कषायरस (सं॰ पु॰) रसविशेष, एक जायका। <small>कषाय देखो।</small>}}
{{outdent|कषायवर्ग (सं॰ पु॰) कषायाणां कषायरसयुक्तद्रव्याणां वर्गः समूहः, ६ तत्। कषायरस द्रव्यगुण, कसैली चीलोंका ज़खीरा। त्रिफला, शल्लकी, जाम्बू, आम्ब, बकुल, तिन्दुकफल, न्यग्रोध आदि, अम्बडादि, प्रियङ्गु आदि, दोध्रादि, शालसारादि, कतकशाक, पाषाणभेदक, वनस्पतिफल, कुरवक, कोविदारक, जीवकौ,
चिल्ली पलङ्की, सुनिषण आदि, नीवारकादि और मुद्न
आदि द्रव्य कषायवर्गमें पड़ी हैं। <small>(सुश्रुत)</small>}}
{{outdent|कषायवासिका (सं॰ पु॰) सुश्रुतोक्त कीट विशेष, एक नहरौला कीड़ा। यह कीट सौम्य होनेसे श्लेश्म-प्रकोपक है। इसका मूल विषाक्त निकलता है।}}
{{outdent|कषायवृक्ष (सं॰ पु॰) बटामलकादि कषायत्वक् फल वृक्ष, बरगद आंबला वगैरह कसैली छालके फलवाला वृक्ष।}}
{{outdent|कषायकष्क (सं॰ पु॰) प्रियङ्, आदि कषाय द्रव्यकृत आस्थापन विशेष, एक कसैली दवा।}}
{{outdent|कषाया (सं॰ स्त्री॰) कष-आय-टाप्। १ क्षुद्र दुरालभा, छोटा जवासा। (Small sort of Hedysarum)
{{c|Vol. IV.{{gap}}66}}
{{Multicol-break}}
इसका संस्कृत पर्याय—यास, यवसा, दुष्पर्णी, धन्वयास,
दुरालभा, समुद्रान्ता, रोहिनी, गाम्भारी, कच्छुरा, धनन्ता, हरविग्रह और दुरभिग्रहा है। भावप्रकाशके मतसे यह मधुर, तिक्त एवं कषायरस, सारक, शीतल, लघु और कफ, भेद, मत्तता, श्रम, पित्त, रक्त, कुष्ठ, कास, तृष्णा, विसर्प, वातरक्त, वमि तथा ज्वरनाशक है। <small>दुरालभादेखो।</small>
{{outdent|कषायान्वित (सं॰ त्रि॰) कषाय-रसविशिष्ट, कसैला।}}
{{outdent|कषायित (सं॰ त्रि॰) कषायः रक्तपीतादिवर्णः सञ्जातोऽस्य, कषाय-इतच्। १ रक्तादि वर्णयुक्त, लाल रंगा हुवा।}}
{{c|<small>"असुनैव कषायितचनौ सुमगेन प्रियगात्रमक्षसा।" (कुमारसम्भव ४।३४)</small>}}
{{outdent|कषायी (सं॰ पु॰) कषायो विद्यते ऽस्य, कषायइनि। १ शालवृक्ष। २ लकुचवृक्ष, लुकाटका पेड़।
३ खर्जूरी वृक्ष, खजूरका पेड़। ४ सर्जवृक्ष, घूनेका पेड़।
५ शाकवृक्ष, सागौनका पेड़। ६ क्षुद्रपनस, छोटा कटहल। (त्रि॰) ७ कषायविशिष्ट, गोंददार। ८ कषायान्वित, कसैला। ९ संसारासक्त, दुनियाकी बातोंमें उलझा हुवा।}}
{{outdent|कषायीकृत (सं॰ त्रि॰) अकषायः कषायः कृतः, कषाय-चि-क्व-त्त। कषायवर्ण हुआ, जो सुर्ख किया
गया हो।}}
{{outdent|कषायीकृतलोचन (सं॰ त्रि॰) कषायवर्ण चक्षु, बनाये हुवा, जो आंखें लाल कर चुका हो।}}
{{outdent|कषायीभूत (सं॰ त्रि॰) अकषायः कषायो भूतः, कषायचि-भू-त्त। रक्त वर्ण बना हुवा, जो लाल पड़
गया हो।}}
{{outdent|कषि (सं॰ त्रि॰) कषति हिनस्ति, कष-इ।
<small>खनिकष्विचसिवसि इत्यादि। उण्। ४।१२९।</small> हिंसक, नुक्सान पहुंचानेवाला।}}
{{outdent|कषिका (सं॰ स्त्री॰) पक्षिजाति, कोई चिड़िया।}}
{{outdent|कषित (सं॰ त्रि॰) कष-क्त। परीक्षित, कसा हुवा, जो चोट खा चुका हो।}}
{{outdent|कषौका (सं॰ स्त्री॰) कषति, कष-ईकन्-टाप्। <small>कषिदूषिभ्यामीकन्। उण् । ४।१२९ ।</small> १ पक्षि जाति, चिड़िया। कषत्यनया। २ खन्ता।}}
{{Multicol-end}}<noinclude></noinclude>
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कषायपाण-कषीका|२६१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
जिन सकल कार्योमें जलका परिमाण नहीं लिखते,
उनमें आद्र द्रव्य रहनेसे अष्ट् गुण और शुष्क द्रव्य
रहनेसे षोड़श गुण जलसे सिद्ध कर चतुर्थांश अवशिष्ट
रखते हैं।
{{outdent|कवायपाण (सं॰ पु॰) कषायः पानं यस्य, बहुव्री॰ णत्वम्। <small>पानन्देशे। पा ८।४।९</small> गान्धार जाति।}}
{{outdent|कषाय प्राभृत—एक जैन शास्त्र। इसमें जीवको संसारमें भ्रमण करानेवालो कषायों का वर्णन है।}}
{{outdent|कषायफल (सं॰ क्ली॰) पूगफल, सुपारी।}}
{{outdent|कषाय मार्गणा—जैन ग्रन्थमें संधारी जीवोंकी विशेष अवस्था बतलानेके लिये १४ मार्गणा लिखी है। उनमें की एक मार्गणा।}}
{{outdent|कषाययावनाल (सं॰ पु॰) कषायः रक्तवर्ण; यावनालः, कर्मधा॰। तुवर यावनाल धान्य, कसैलो जुवार।}}
{{outdent|कषाययोनि (सं॰ स्त्री॰) कषायाधिकरण, कसैलेपनकी बुनयाद। यह पांच प्रकारकी होती है,—मधुर कषाय, कटुकषाय, तिक्तकषाय और कषायकषाय। <small>(चरक)</small>}}
{{outdent|कषायरस (सं॰ पु॰) रसविशेष, एक जायका। <small>कषाय देखो।</small>}}
{{outdent|कषायवर्ग (सं॰ पु॰) कषायाणां कषायरसयुक्तद्रव्याणां वर्गः समूहः, ६ तत्। कषायरस द्रव्यगुण, कसैली चीलोंका ज़खीरा। त्रिफला, शल्लकी, जाम्बू, आम्ब, बकुल, तिन्दुकफल, न्यग्रोध आदि, अम्बडादि, प्रियङ्गु आदि, दोध्रादि, शालसारादि, कतकशाक, पाषाणभेदक, वनस्पतिफल, कुरवक, कोविदारक, जीवकौ,
चिल्ली पलङ्की, सुनिषण आदि, नीवारकादि और मुद्न
आदि द्रव्य कषायवर्गमें पड़ी हैं। <small>(सुश्रुत)</small>}}
{{outdent|कषायवासिका (सं॰ पु॰) सुश्रुतोक्त कीट विशेष, एक नहरौला कीड़ा। यह कीट सौम्य होनेसे श्लेश्म-प्रकोपक है। इसका मूल विषाक्त निकलता है।}}
{{outdent|कषायवृक्ष (सं॰ पु॰) बटामलकादि कषायत्वक् फल वृक्ष, बरगद आंबला वगैरह कसैली छालके फलवाला वृक्ष।}}
{{outdent|कषायकष्क (सं॰ पु॰) प्रियङ्, आदि कषाय द्रव्यकृत आस्थापन विशेष, एक कसैली दवा।}}
{{outdent|कषाया (सं॰ स्त्री॰) कष-आय-टाप्। १ क्षुद्र दुरालभा, छोटा जवासा। (Small sort of Hedysarum)}}
{{c|Vol. IV.{{gap}}66}}
{{Multicol-break}}
इसका संस्कृत पर्याय—यास, यवसा, दुष्पर्णी, धन्वयास,
दुरालभा, समुद्रान्ता, रोहिनी, गाम्भारी, कच्छुरा, धनन्ता, हरविग्रह और दुरभिग्रहा है। भावप्रकाशके मतसे यह मधुर, तिक्त एवं कषायरस, सारक, शीतल, लघु और कफ, भेद, मत्तता, श्रम, पित्त, रक्त, कुष्ठ, कास, तृष्णा, विसर्प, वातरक्त, वमि तथा ज्वरनाशक है। <small>दुरालभादेखो।</small>
{{outdent|कषायान्वित (सं॰ त्रि॰) कषाय-रसविशिष्ट, कसैला।}}
{{outdent|कषायित (सं॰ त्रि॰) कषायः रक्तपीतादिवर्णः सञ्जातोऽस्य, कषाय-इतच्। १ रक्तादि वर्णयुक्त, लाल रंगा हुवा।}}
{{c|<small>"असुनैव कषायितचनौ सुमगेन प्रियगात्रमक्षसा।" (कुमारसम्भव ४।३४)</small>}}
{{outdent|कषायी (सं॰ पु॰) कषायो विद्यते ऽस्य, कषायइनि। १ शालवृक्ष। २ लकुचवृक्ष, लुकाटका पेड़।
३ खर्जूरी वृक्ष, खजूरका पेड़। ४ सर्जवृक्ष, घूनेका पेड़।
५ शाकवृक्ष, सागौनका पेड़। ६ क्षुद्रपनस, छोटा कटहल। (त्रि॰) ७ कषायविशिष्ट, गोंददार। ८ कषायान्वित, कसैला। ९ संसारासक्त, दुनियाकी बातोंमें उलझा हुवा।}}
{{outdent|कषायीकृत (सं॰ त्रि॰) अकषायः कषायः कृतः, कषाय-चि-क्व-त्त। कषायवर्ण हुआ, जो सुर्ख किया
गया हो।}}
{{outdent|कषायीकृतलोचन (सं॰ त्रि॰) कषायवर्ण चक्षु, बनाये हुवा, जो आंखें लाल कर चुका हो।}}
{{outdent|कषायीभूत (सं॰ त्रि॰) अकषायः कषायो भूतः, कषायचि-भू-त्त। रक्त वर्ण बना हुवा, जो लाल पड़
गया हो।}}
{{outdent|कषि (सं॰ त्रि॰) कषति हिनस्ति, कष-इ।
<small>खनिकष्विचसिवसि इत्यादि। उण्। ४।१२९।</small> हिंसक, नुक्सान पहुंचानेवाला।}}
{{outdent|कषिका (सं॰ स्त्री॰) पक्षिजाति, कोई चिड़िया।}}
{{outdent|कषित (सं॰ त्रि॰) कष-क्त। परीक्षित, कसा हुवा, जो चोट खा चुका हो।}}
{{outdent|कषौका (सं॰ स्त्री॰) कषति, कष-ईकन्-टाप्। <small>कषिदूषिभ्यामीकन्। उण् । ४।१२९ ।</small> १ पक्षि जाति, चिड़िया। कषत्यनया। २ खन्ता।}}
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<noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२६२|कषेंरूका-कष्टस्थान}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
{{outdent|कषेरुका (सं॰ स्त्री॰) कष-एरक्-ट सज्ञायां कन्-टाप्। १ पृथाखि, रीढ़। २ कशेरू, कसेरु।}}
{{outdent|कष्वष (वै॰ पु॰) कष इति अव्यक्त शब्दमुच्चार्य कषति, कष-कष-अच्। विषधर कृमिविशेष, एक जहरीला कीड़ा।}}
{{block center|<poem><small>
"वैवापास: कष्वषाश एतन्काः शिवविष्ठकाः।
दृष्टय इयन्तां क्रमिदतादस्य इयताम्॥" (अथर्ववेद ५। २३। ७)
</small></poem>}}
{{outdent|कष्ट (सं॰ त्रि॰) कश्यते ऽसौ, कर्प कर्मणि क्न नेट्। <small>अच्चगृधनयोः कष्टः। या ७। २। २२ ।</small> १ पीड़ायुक्त, पुरदर्द, दुखनेवाला। २ गहन, मुश्किल। ३ पीड़ाकारक, तकलीफ देनेवाला। ४ कष्टसाध्य, बहुत खराब। ५ कुत्सित, बुरा। (क्ली॰) कष भावे क्ता। ६ पीड़ामान, कोई दर्द या बीमारी। इसका संस्कृत पर्याय—
पीड़ा, वाधा, व्यथा, दुःख, अमानस्य, प्रसूतिज, कच्छ,
कलाकल, आर्ति, आर्तिं, पीड़न, वाधन, अमानस्य,
विवाधन, विट्ठेन, विधानक, पीड़ित, क्वाध और अशर्म
है। अर्थ-प्रतीति व्यवहित (अलग) होनेके कष्ट वा क्लिष्टता दोष कहलाता है,—
{{c|<small>"क्लिष्टत्वमर्थ प्रतीतेर्व्यवहितत्वम्।" (साहित्यदर्पण ७ अ॰)</small>}}
इसका उदाहरण 'क्षीरोदजावसतिजन्मभुवः प्रसन्ना:' वाक्यमें मिलता है। उक्त वाक्य 'जल प्रसन्न है' अर्थमें प्रयोग किया गया है। किन्तु सहजमें उसके समझनेका कोई उपाय देख नहीं पड़ता। क्षीरोदजा लक्ष्मी, उनकी वसति पद्म और पद्मका जन्मस्थान जल है। अतएव यहां पर क्लिष्टत्व वा कष्टदोष लगता है।
(अव्य) ७ हन्त! हाय!
{{outdent|कष्टकर (सं॰ त्रि॰) कष्टं करोति, कष्ट-ख-ट। १ पीड़ाजनक, दर्द पैदा करनेवाला। २ दु:खजनक, तकलीफ देनेवाला।}}
{{outdent|कष्टकल्पना (सं॰ स्त्री॰) कष्टेन कल्पना, ३-तत्। कठोर अनुमान, कड़ी कल्पना। जिसे देख स्थिर करनेमें कष्ट पड़ता और जो सहजमें कल्पनापर नहीं चढ़ता, उसे विद्वान् कष्टकल्पना कहता हैं।}}
{{outdent|कष्टकल्पित (सं॰ त्रि॰) कष्टेन कल्पितं रचितम्। कष्टसे बना हुवा, जो मुश्किलसे ठीक किया गया हो।}}
{{Multicol-break}}
{{outdent|कष्टकारक (सं॰ त्रि॰) कष्टकार स्वार्थे कन्, कष्ट-ख-खल् वा कष्टस्य कारकः, ६-तत्। दुःखका कारण बननेवाला, जो तकलीफ़का सबब ठहरता हो। (पु॰) २ संसार, दुनिया।}}
{{outdent|कष्टजीवी (सं॰ त्रि॰) कष्टेन जीवति, कष्ट-जीव-इनि। १ कष्टसे जीविका निर्वाह करनेवाला, जो मुश्किलसे काम चलता हो। २ अनेक भोग कर बचनेवाला, जो मुश्किलसे बचा हो। ३ पक्षिजाति, चिड़िया।}}
{{outdent|कष्टतपस् (सं॰ पु॰) कष्टं कष्टकरं तपो यस्य, बहुव्री॰। कठिन तपस्या करनेवाला, जो इसतिफ़गार मुताबिक अमसू करता हो।}}
{{outdent|कष्टर (सं॰ त्रि॰) सापेक्ष पीड़ायुक्त, ज्यादा तकलीफ देनेवाला।}}
{{outdent|कष्टद (सं॰ त्रि॰) कष्टं ददाति कष्ट-दा-क। कष्टदायक, तकलीफ पहुंचानेवाला।
{{outdent|कष्टरिपु (सं॰ त्रि॰) कष्टः कष्टसाध्यो रिपुः, कर्मधा॰।
कष्टसे पराजय किया जानेवाला शत्रु, जो दुश्मन मुशकिलसे हारता हो।}}
{{block center|<poem><small>
"प्राज्ञं कुलीनं गृहस्थ दक्ष' दातामलेव च।
छत्रज्ञ भृतिमन्वञ्च कष्टनाइशविं बुधः॥" (मनुसंहिता)</small></poem>}}
विद्वान, कुलीन, वीर, दक्ष, दाता, कृतज्ञ और धर्यशाली शत्रुको पण्डित कष्टरिपु कहते हैं।
{{outdent|कष्टलभ्य (सं॰ त्रि॰) कष्टेन लभ्यम्, ३-तत्। कष्टसे मिलनेवाला, जो मुश्किलसे हाथ आता हो।}}
{{outdent|कष्टचित्त (सं॰ त्रि॰) कष्टं श्रित्तं आश्रितं येन, बहुव्री॰। १ कष्टपानेवाला, जो तकलीफमें हो। २ कठोर व्रत-
कारक, कड़े इसतिफ़गारको अमलमें लानेवाला।}}
{{outdent|कष्टश्रोतिय–वङ्गदेशके श्रोतिय ब्राह्मणोंका एक विभाग।}}
{{right|<small>श्रोतिय देखो।</small>}}
{{outdent|कष्टसह (सं॰ त्रि॰) कष्टं सहते, कष्ट-सह-खच्। कष्टसहिष्णु, तकलीफ़ उठा सकनेवाला।}}
{{outdent|कष्टसाध्य (सं॰ त्रि॰) कष्टेन साध्यम्, ३-तत्। १ कष्टसे आरोग्य होनेवाला, जो मुश्किलसे अच्छा हो। २ कष्टसे पराजय-किया जानेवाला, जो मुश्किलसे हारता हो।}}
{{outdent|कष्टस्थान (सं॰ क्ली॰) कष्टं कष्टकरं स्थानम्, कर्मधा॰।}}
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{{outdent|कष्वष (वै॰ पु॰) कष इति अव्यक्त शब्दमुच्चार्य कषति, कष-कष-अच्। विषधर कृमिविशेष, एक जहरीला कीड़ा।}}
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"वैवापास: कष्वषाश एतन्काः शिवविष्ठकाः।
दृष्टय इयन्तां क्रमिदतादस्य इयताम्॥" (अथर्ववेद ५। २३। ७)
</small></poem>}}
{{outdent|कष्ट (सं॰ त्रि॰) कश्यते ऽसौ, कर्प कर्मणि क्न नेट्। <small>अच्चगृधनयोः कष्टः। या ७। २। २२ ।</small> १ पीड़ायुक्त, पुरदर्द, दुखनेवाला। २ गहन, मुश्किल। ३ पीड़ाकारक, तकलीफ देनेवाला। ४ कष्टसाध्य, बहुत खराब। ५ कुत्सित, बुरा। (क्ली॰) कष भावे क्ता। ६ पीड़ामान, कोई दर्द या बीमारी। इसका संस्कृत पर्याय—
पीड़ा, वाधा, व्यथा, दुःख, अमानस्य, प्रसूतिज, कच्छ,
कलाकल, आर्ति, आर्तिं, पीड़न, वाधन, अमानस्य,
विवाधन, विट्ठेन, विधानक, पीड़ित, क्वाध और अशर्म
है। अर्थ-प्रतीति व्यवहित (अलग) होनेके कष्ट वा क्लिष्टता दोष कहलाता है,—
{{c|<small>"क्लिष्टत्वमर्थ प्रतीतेर्व्यवहितत्वम्।" (साहित्यदर्पण ७ अ॰)</small>}}
इसका उदाहरण 'क्षीरोदजावसतिजन्मभुवः प्रसन्ना:' वाक्यमें मिलता है। उक्त वाक्य 'जल प्रसन्न है' अर्थमें प्रयोग किया गया है। किन्तु सहजमें उसके समझनेका कोई उपाय देख नहीं पड़ता। क्षीरोदजा लक्ष्मी, उनकी वसति पद्म और पद्मका जन्मस्थान जल है। अतएव यहां पर क्लिष्टत्व वा कष्टदोष लगता है।
(अव्य) ७ हन्त! हाय!
{{outdent|कष्टकर (सं॰ त्रि॰) कष्टं करोति, कष्ट-ख-ट। १ पीड़ाजनक, दर्द पैदा करनेवाला। २ दु:खजनक, तकलीफ देनेवाला।}}
{{outdent|कष्टकल्पना (सं॰ स्त्री॰) कष्टेन कल्पना, ३-तत्। कठोर अनुमान, कड़ी कल्पना। जिसे देख स्थिर करनेमें कष्ट पड़ता और जो सहजमें कल्पनापर नहीं चढ़ता, उसे विद्वान् कष्टकल्पना कहता हैं।}}
{{outdent|कष्टकल्पित (सं॰ त्रि॰) कष्टेन कल्पितं रचितम्। कष्टसे बना हुवा, जो मुश्किलसे ठीक किया गया हो।}}
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{{outdent|कष्टकारक (सं॰ त्रि॰) कष्टकार स्वार्थे कन्, कष्ट-ख-खल् वा कष्टस्य कारकः, ६-तत्। दुःखका कारण बननेवाला, जो तकलीफ़का सबब ठहरता हो। (पु॰) २ संसार, दुनिया।}}
{{outdent|कष्टजीवी (सं॰ त्रि॰) कष्टेन जीवति, कष्ट-जीव-इनि। १ कष्टसे जीविका निर्वाह करनेवाला, जो मुश्किलसे काम चलता हो। २ अनेक भोग कर बचनेवाला, जो मुश्किलसे बचा हो। ३ पक्षिजाति, चिड़िया।}}
{{outdent|कष्टतपस् (सं॰ पु॰) कष्टं कष्टकरं तपो यस्य, बहुव्री॰। कठिन तपस्या करनेवाला, जो इसतिफ़गार मुताबिक अमसू करता हो।}}
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कष्टसे पराजय किया जानेवाला शत्रु, जो दुश्मन मुशकिलसे हारता हो।}}
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"प्राज्ञं कुलीनं गृहस्थ दक्ष' दातामलेव च।
छत्रज्ञ भृतिमन्वञ्च कष्टनाइशविं बुधः॥" (मनुसंहिता)</small></poem>}}
विद्वान, कुलीन, वीर, दक्ष, दाता, कृतज्ञ और धर्यशाली शत्रुको पण्डित कष्टरिपु कहते हैं।
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{{outdent|कष्टसह (सं॰ त्रि॰) कष्टं सहते, कष्ट-सह-खच्। कष्टसहिष्णु, तकलीफ़ उठा सकनेवाला।}}
{{outdent|कष्टसाध्य (सं॰ त्रि॰) कष्टेन साध्यम्, ३-तत्। १ कष्टसे आरोग्य होनेवाला, जो मुश्किलसे अच्छा हो। २ कष्टसे पराजय-किया जानेवाला, जो मुश्किलसे हारता हो।}}
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५४
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<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|
४५५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
विद्रोह होने की सूचना मिली थी। इसीसे वह
राना जयध्वजसे सन्धि कर लौट गये। मजम खान
अधिकृत प्रदेशमें शासनकर्ता रहे। उनके पीछे मसीद
खान् भोर सैयदफीरीज खान् उक्त प्रदेशके शासगकर्ता
कामरूप
हुये। अहोमराज चक्रध्वज सिंहके निकट राजख
वसूस्त करने के लिये उनका दूत गया था। उन्होंने उसे .
बङ्गालम
अपमान कर निकाल दिया.और गौहाटौ पर्यन्त स्थान
अधिकार किया। दिल्लीश्वरने क्रुद्ध हो १६६८
इसौसे
ई. के समय राजा रामसिंहको भेजा था। रामसिंहने
नागौहाटी पर अधिकार किया। फिर वह उत्तरके
अभिमुख अग्रसर हुये। उस समय कामरूपके
सीमान्तस्थानमें बड़फूकन उपाधिधारी कोई शासन.
कर्ता रहते थे। १६२७ ईको स्वर्गनारायणने उस
पदकी सृष्टि की थी। वह सीमान्तस्थानमें रह अहोम
राज्यका विदेशीय पाक्रमण रोकते थे। राजा चक्र
ध्वनके समय साछित बड़फकन रहे। वह उस मोमाई. .
तामूली फूकनके पुत्र थे। लाछित बड़ फूकनने राजा
रामसिंहको गति वचनसे कहला भेजा कि १९६२
ई०को मीरजुमला रणमें हार पहोमरामसे सन्धि कर
गये थे। उस समय अहोमराज न तो दिल्ली.
सम्राट्के अधीनस्थ रहे और न उन्हें राजस्व देनेको
प्रस्तुत थे।
लाछित बड़फूकनका, सदप वाक्य
सुन मुसलमानोंका सैन्य युद्धको अग्रसर हुवा ।
:१६६८ ई० को औरंगजेबकी सेनाकै साथ कामरूपके
शासनकर्ता लाछित वड़फकनका घोरतर संग्राम
मुसलमानसैन्य पराभूत हो भागा। अहोम सन्चने
मानहा नदी तक उसका पीछा किया। उसी सिर्फ़
मानहा नदी अहोमराज्यको पश्चिम, सीमा मानी
गयी। अहोमराजने नदीतौर पर हाथोरात नामक
स्थानमें एकदल सैन्ध रखा था।१६०१ शकमें
अर्थात् १६७८ ई० को दिल्लीसे फिर सैन्य गया। उस
समय ग्रहोम-शासनकर्ता भीतस्वभाव शोला बड़फूकन
थे। उन्होंने कलियावर पर्यन्त देश सुसस्तमानोंको
दे सन्धि को। उसके पछि १६०८ शकको सन्दिको
बड़फूकनने निरुपद्रव गौहाटीका उहार किया।
<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>
फिर दूसरे वर्ष मंजूर खान नामके एक नवाच युह
करने गये थे। गौहाटीके निकट शुक्रखरके इट.
खोलेमें भयानक.युद्द हुवा। उस युद्दमें परास्त
मुसलमान रांगामाटो, हाजो, गोहाटी और शामरुपको
सीमा तक छोड़ कर भागने पर वाध्य हुये।
सम्पूर्ण रूपसे अहोमराजके अधिकारमें पड़. गया ।
फिर दिल्लीके बादशाह होनप्रभ हुये।
अंगरेजों, ओलन्दालों, फरामोसियों, पोत्गीजों प्रभृति
सुदूर युरोपवासियोंका उपटूव बढ़ा था।
नवाबों को भी कामरूपकी बात सोचनेका समय वा
अवकाश न मिला। घहोमराज..निरुपद्रव कामरूप
भोगने लगे। भोला बड़फूकनके सन्धिपत्र में कामरूप
सजाका नाम लिखा था। उस सन्धिपत्रको अहोम-
राजने अग्राह्य किया। इसीसे कामरूप राजाका
नाम लोप हो गया और वह आसामका अन्तर्गत
प्रदेश बना।
प्रासाम देशके राजका बहोम नाम है।
अनेकोंके अनुमानमें वह शान वंशके लोग हैं।
आसामको पूर्ववर्ती पर्वतमाला अतिक्रम
कर ई
त्रयोदश शताब्दके प्रारम्भमें ब्रह्म और श्यामदेशसे
सौमारपीठ राजत्व करने पहुंचे थे। फिर पासामका
राना स्थापित हुवा। दूसरा समकक्ष न माना जानेसे
उक्त राजाका नाम 'पसम' पड़ा था। कालक्रमसे स के
स्थानमें लग जानेसे लोग अहम वा अहोम कहने
लगे। अब उसका:
-परिणत नाम त्रासात
साराघाट नामक स्थानमें पड़ा। उस् .
संग्राममें पूर्वकान - पहोम लोग हिन्दू न थे। वह चोमदेव
नामक देवताको पूजते रहे। राजत्व स्थापनके कुछ
काल : पौछे उन्होंने हिन्दूधर्म ग्रहण किया और
अपनेको वर्गके राजा इन्ट्रका वंशोद्भव बता दिया।
पहले ही लिख चुके हैं कि योगिनीतन्त्र में वह: इन्ट्र-
वंशोतव "सौमारनामसे अभिहित हैं।
११५१ शकाव्द (१२२६ ई०)को चुकाफा नामक
कोई प्रतापशाली व्यक्ति ससैन्य पूर्वदिक्से अग्रसर
हुये थे। फिर उन्होंने प्रादिम निवासी छुटियावा
और बराहियों को जोत आसामके पूर्वभाग़में राजा
स्थापन किया। पीछे उनके बारह पुत्र क्रमसे राजा<noinclude></noinclude>
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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५५
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text/x-wiki
<noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४५६|
कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}
हुये। उन्होंने अपने राजाविस्तार और किसी किसी।
पादिम निवासी जातिके साथ युद्ध करनेको छोड़
दूसरा कोई योग्य कार्य न किया। फिर १४१५
शकको चुइंगमुंग राजा पा हिन्दू बने और स्वर्गः।
नारायण नामसे ख्यात हुये। वह भी कोई कौति
छोड़ न गये। पीछे उनके पुत्र और पौत्र राना
हुये। उन्होंने भी लिखने योग्य कोई कार्य न किया।
फिर १५३३ शकको चचेंगफाने राजा पाया था।
हिन्दू मतसे उनका नाम बुद्धिस्वर्गनारायण वा
प्रताप सिंह रखा गया। उन्होंने उक्त देशमें दुर्गोत्सव न
और स्वर्ण एवं रौप्यको मुद्राका प्रचार किया। उन्होंके
शासनकाल १५४८ शकको कामरूपके शासनकर्ताक
आसाम अाक्रमण करने पर युद्ध हुवा। उसमें
सैयद मारे गये। गौहाटी पासामराजके हाथ लगो।
उन्होंने बहुत मार्ग और घाट बनवा आसामको।
उन्नति की थी। देवमन्दिर और ब्राह्मणके प्रति- “
पालनार्थ भूमि देनेकी गौरव उन्हींके समय वृद्धि
यो। मरने पर उनके जेष्ठ और फिर कनिष्ठपुत्र .
सिंहासन पर बैठे। किन्तु वह दोनों अत्यन्त
उपद्रवी थे। इसीसे मन्त्रियों ने उन्हें रानाध्यत किया।
उसके पीछे चुतमला या जयध्वज राजा हुये । वह
पराक्रमी राजा रहे। उन्होंने पासामको बहुत उन्नति
को। १५७७ ई० को मीरजुमला और मंजम खान
दोनोंने आसाम पर आक्रमण किया। श्रासामराज
परास्त हो सन्धि करने पर बाध्य हुये । उनके मरने पर
चुयंगमंग या चक्रध्वज सिंहको राजा मिला। उन्होंने
सन्धिके अनुसार कर न दिया और बादशाहके दूतका
अपमान किया। इस कारण बादशाह औरंगज़ेबको बाकी
आज्ञासे राजा रामसिंह आसाम पर चढ़े थे। किन्तु
• वह युद्धमें हार भागनेको वाध्य हुये । इसलिये कामरूप
फिर प्रासामरानके हाथ लगा। राजधानी ऊपरी
आसाममें थी। वहांसे दूरस्थ कामरूपका शासन-
कार्य अच्छी तरह चलना कठिन था। उसीसे राजाने
गौहाटीमें एक बड़फकन अर्थात् अपना प्रतिनिधि
नियुक्त किया। उनके मन्त्रणागारका चिह्न अद्यापि
वर्तमान है। पीछे उनके माता चुन्यतफा या
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उदयादित्य राजा हुये। उनके मरने पर तददाता
चुकलमफा या रामध्वज सिंहने सिंहासनारोहण
किया। उनके पीछे होनेवाले चार रानानि हिन्दू
धर्म या हिन्दू नाम रखा न था। उनमें शेष राना
चुतयफा १६०१ शकको कामरूप प्रदेश मुसनमानोंके
हाथ समर्पण करनेको वाध्य हुये। उनके मरने पर
चुलि कफा या लगराजाको राना मिना। मन्त्रियोंने
उन्हें सिंहासनसे हटा चामुण्डरीयवंशीय चुपातफा
या गदाधर सिंहका अभिषेक किया था। वह हिन्दू
थे। हिन्दू और हिन्दूधर्म दानोंसे उन्हें बड़ी घृणा
रहो। ब्राह्मणों से उनका विजातीय विद्दप था। फिर
उन्होंने अनेक ब्राह्मणांको नगरसे निकान भी दिया
वह बलवान् और हत्काय पुरुष थे। मद्य.
मांस विना रहना उनके लिये असम्भव था। भेक और
गोमांस उनका प्रधान खाद्य रहा। वह कहते थे कि
हिन्दूधर्म हो अहोम वंशके पतनका कारण होगा।
वह हिन्दूधर्म मानते न थे। इसौकारण उन्होंने कोई
हिन्दू देवमन्दिरको प्रतिष्ठान की। किन्तु गौहाटोके
निकट ब्रह्मपुत्रमध्यस्थित भन्माचल पर्वत पर उमानन्द
शिवका मन्दिर उन्होंके राजत्वकालमें प्रतिष्ठित हुवा ।
वह अद्यापि वर्तमान है। उनके राजत्वकाल १६०५.
शकको मुसलमानोंने फिर पासाम पर भाक्रमण किया
था। किन्तु युद्ध में हार कर वह आसाम छोड़ने पर
वाध्य हुये। श्रासामराजने गौहाटीमें राजधानी
स्थापन कर एक बड़फकन भेना था। उनके मरने
पर जाठपुत्र चुचरंगका या रुटूनाथ सिंह राना
हुये। उनके पिता जैसे हिन्दू और हिन्दूधर्म-विहेपी
रहे, वह. तैसे ही हिन्दूधर्मपरायण और ब्राह्मणभक्त
वने। उन्होंने अनेक ब्राह्मणोंको भूमि दी और देव-
मन्दिरोंको स्थापना की। उन्होंके प्रादेशानुसार शिव-
सागरके अन्तर्गत लामडांग नदी पर बना वृहत् और
सुदृढ़ प्रस्तरमय सेतु अद्यापि विद्यमान है।
पनेक हस्तौ, अश्व और मनुष्यं गमनागमन करते हैं।
तभिन्न उनके स्थापित पनेक देवमन्दिर भी वर्तमान
हैं। उन्होंने बङ्गालसे गायक और वाद्यकर ले जाकर
अपने देश में बंगला गोम-वाद्यका प्रचलन बढ़ाया था।<noinclude></noinclude>
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