विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.11 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१६७ 250 45904 668101 561791 2026-07-18T13:50:04Z Avantika Shaw 4732 668101 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh||'''गतरस-गतायु:'''|'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> यस्याः, बहुव्री०। १. विधवा। २. जिसका स्वामी दूर देश गया हो। {{outdent|**गतरस (सं० त्रि०)** जिसका रस नष्ट हो गया हो, विरस। "यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।" (गीता)}} {{outdent|**गतव्यथ (सं० त्रि०)** गता नष्टा व्यथा पीड़ा यस्य, बहुव्री०। व्यथाशून्य, जिसको कोई कष्ट न हो।}} {{outdent|**गतमर्याद (सं० वि०)** गता मर्यादा यस्य, बहुव्री०। अपमानित, जिसकी मर्यादा नष्ट हो गई हो।}} {{outdent|**गतरात्रि (सं० स्त्री०)** अतीत रात्रि, बीती हुई रात।}} {{outdent|**गतलज्ज (सं० त्रि०)** गता लज्जा यस्य, बहुव्री०। निर्लज्ज, बेशर्म, बेहया।}} {{outdent|**गतशोचन (सं० क्ली०)** गतस्य शोचनं यत्, प्रतीत ६-तत्। विनष्ट विषय का अनुशोचन वा अतीत बात का ख्याल करना।}} {{outdent|**गतशोचना (सं० स्त्री०)** गतस्य शोचना, ६-तत्। गतासु का शोचन, बीते हुए विषय का स्मरण।}} {{outdent|**गतश्री (सं० वि०)** गता श्रीः शोभा यस्य, बहुव्री०। जिसकी शोभा नष्ट हो गई हो, निष्प्रभ, जिसमें किसी तरह की चमक न हो।}} {{outdent|**गतसङ्ग (सं० त्रि०)** गतः नष्टः सङ्गः आसक्तिर्यस्य, बहुव्री०। निःसङ्ग, जिसने दूसरे का साथ छोड़ दिया हो।}} {{outdent|**गतसन्त्रक (सं० पु०)** मदशून्य हस्ती, वह हाथी जिसके मद न हो।}} {{outdent|**गतस्पृह (सं० त्रि०)** गता नष्टा स्पृहा यस्य, बहुव्री०। निस्पृह, किसी चीज़ की इच्छा न होना। "गतस्पृहाणामपि वामनभ्रुवाम्।" (माघ)}} {{outdent|**गतस्मय (सं० त्रि०)** १. गर्वशून्य, जिसके अभिमान न हो। २. विस्मयशून्य।}} {{outdent|**गताक्ष (सं० त्रि०)** गता अक्षीणि यस्य, बहुव्री०। नेत्रहीन, अन्धा।}} {{outdent|**गतांक (सं० पु०)** जिसमें सत्पुरुष चिह्न मात्र रह गये हों।}} {{outdent|**गतागत (सं० क्ली०)** गतं गमनं चागतं चागमनं तयोः समाहारः, समाहारद्वन्द्व। गमनागमन, आना-जाना। "एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते।" (गीता) २. पक्षी की गति, चिड़िया की चाल। **(पु०)** ३. गत अर्थात् आगमन, आगत अर्थात् गमन जिसमें, बहुव्री०। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> विनष्ट पुनरागमन, जिससे संसार-गमन समाप्त हो, महादेव। <Small>"मौक्तिकः सर्वलोकात्मा जोमूतश्च गतागतः।"</small> {{right|<small>(महाभारत १२।१००८)</small>}} {{outdent|**गतागति (सं० स्त्री०)** गमनागमन।}} {{outdent|**गतागतिक (सं० त्रि०)** गमनागमन से जो निष्पादित हुआ हो।}} {{outdent|**गताङ्क (सं० त्रि०)** जिसमें सत्पुरुष के चिह्न अब रह न गये हों।}} {{outdent|**गताध्वन् (सं० त्रि०)** तत्त्वज्ञ, ज्ञाततत्त्व, जानने का भाव।}} {{outdent|**गताध्वा (सं० स्त्री०)** चतुर्दशीयुक्त अमावस्या तिथि।}} {{outdent|**गतानुगत (सं० त्रि०)** गतस्य अनुगतः, ६-तत्। जो किसी आदमी के पीछे-पीछे जाता हो। **(क्ली०)** गतस्य अनुगतमनुगमनम्, ६-तत्। २. गमन का अनुगमन, एक के पीछे दूसरे का जाना।}} {{outdent|**गतानुगतिक (सं० त्रि०)** गतानुगतिः पण्यमस्य गतानुगत-ठञ्। गमनानुगमनविशिष्ट। "एकमार्गेण नीयन्ते अद्रोऽप्यन्योऽपि गर्हितः। गतानुगतिको लोको न लोकः पारमार्थिकः॥"}} {{outdent|**गतान्त (सं० त्रि०)** गतः उपस्थितः अन्तः अन्तकालो यस्य, बहुव्री०। मुमूर्षु, जिसका अन्तकाल उपस्थित हो गया हो।}} {{outdent|**गतायात (सं० क्ली०)** गतञ्च आयातञ्च तयोः समाहारः, समाहारद्वन्द्व। गमनागमन।}} {{outdent|**गतायुः (सं० त्रि०)** गतं गतप्रायं आयुर्जीवनकालो यस्य, बहुव्री०। जिसकी आयु शेष हो, चरमकाल उपस्थित, मरने वाला। रोगी की चिकित्सा आरम्भ करने से पहले वैद्य को उसकी आयु के विषय में अच्छी तरह विवेचना करके देख लेना चाहिये। यह विषय वैद्यशास्त्र में बहुत ही कठिन है। महात्मा सुश्रुत ने आयु प्रायः शेष होने पर रोगी के जो लक्षण प्रकाशित होते हैं, उनमें कई एक निर्णय किये हैं— मनुष्य का मृत्युकाल आ पहुँचने से उसका शरीर और स्वभाव बदल जाता है। जो व्यक्ति वास्तविक कोई शब्द न होते हुए भी नाना प्रकार के शब्द सुना करता है; जो समुद्र, पुरवा और मेघ का शब्द सुनकर उसे अन्य प्रकार समझता है—}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1r9co6bpf7y1vvgjriz8ofr89p6mrzs 668103 668101 2026-07-18T14:07:20Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668103 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गतरस-गतायु:'''|'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> यस्याः, बहुव्री०। १. विधवा। २. जिसका स्वामी दूर देश गया हो। {{outdent|**गतरस (सं० त्रि०)** जिसका रस नष्ट हो गया हो, विरस। "यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।" (गीता)}} {{outdent|**गतव्यथ (सं० त्रि०)** गता नष्टा व्यथा पीड़ा यस्य, बहुव्री०। व्यथाशून्य, जिसको कोई कष्ट न हो।}} {{outdent|**गतमर्याद (सं० वि०)** गता मर्यादा यस्य, बहुव्री०। अपमानित, जिसकी मर्यादा नष्ट हो गई हो।}} {{outdent|**गतरात्रि (सं० स्त्री०)** अतीत 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{{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“गतानुगतिः पण्यमस्य गतानुगत-ठञ्। गमनानुगमनविशिष्ट। "एकमार्गेण नीयन्ते अद्रोऽप्यन्योऽपि गर्हितः। गतानुगतिको लोको न लोकः पारमार्थिकः॥"</poem>}}}} {{outdent|गतान्त (सं० त्रि०) गतः उपस्थितः अन्तः अन्तकालो यस्य, बहुव्री०। मुमूर्षु, जिसका अन्तकाल उपस्थित हो गया हो।}} {{outdent|गतायात (सं० क्ली०) गतञ्च आयातञ्च तयोः समाहारः, समाहारद्वन्द्व। गमनागमन।}} {{outdent|गतायुः (सं० त्रि०)गतं गतप्रायं आयुर्जीवनकालो यस्य, बहुव्री०। जिसकी आयु शेष हो, चरमकाल उपस्थित, मरने वाला। रोगी की चिकित्सा आरम्भ करने से पहले वैद्य को उसकी आयु के विषय में अच्छी तरह विवेचना करके देख लेना चाहिये। यह विषय वैद्यशास्त्र में बहुत ही कठिन है। महात्मा सुश्रुत ने आयु प्रायः शेष होने पर रोगी के जो लक्षण प्रकाशित होते हैं, उनमें कई एक निर्णय किये हैं— मनुष्य का मृत्युकाल आ पहुँचने से उसका शरीर और स्वभाव बदल जाता है। जो व्यक्ति वास्तविक कोई शब्द न होते हुए भी नाना प्रकार के शब्द सुना करता है; जो समुद्र, पुरवा और मेघ का शब्द सुनकर उसे अन्य प्रकार समझता है—}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 3l5n0z3nz6nfvp8kjoswywqkrxav4uq 668104 668103 2026-07-18T14:12:52Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668104 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गतरस-गतायु:'''|'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> यस्याः, बहुव्री०। १. विधवा। २. जिसका स्वामी दूर देश गया हो। {{outdent|गतरस (सं० त्रि०)जिसका रस नष्ट हो गया हो, विरस।}} <Small>"यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।" (गीता)</Small> {{outdent|गतव्यथ (सं० त्रि०)गता नष्टा व्यथा पीड़ा यस्य, बहुव्री०। व्यथाशून्य, जिसको कोई कष्ट न हो।}} {{outdent|गतमर्याद (सं० वि०) गता मर्यादा यस्य, बहुव्री०। अपमानित, जिसकी मर्यादा नष्ट हो गई हो।}} {{outdent|गतरात्रि (सं० स्त्री०)अतीत रात्रि, बीती हुई रात।}} {{outdent|गतलज्ज (सं० त्रि०) गता लज्जा यस्य, बहुव्री०। निर्लज्ज, बेशर्म, बेहया।}} {{outdent|गतशोचन (सं० क्ली०)गतस्य शोचनं यत्, प्रतीत ६-तत्। विनष्ट विषय का अनुशोचन वा अतीत बात का ख्याल करना।}} {{outdent|गतशोचना 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/>{{rh|'''१६६'''|'''गतायुः'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ​अथवा उस शब्द को सुन ही नहीं सकता; जो घने जङ्गल के घोरतर शब्द को ग्राम्य शब्द और ग्राम के जनरव को वन्य जन्तुओं का शब्द जैसा अनुमान करता है; जिसे बन्धु-बान्धवों की बात सुनना अच्छा नहीं लगता और सुनते-सुनाते भी उनको अपना अनिष्ट समझकर कुपित हो पड़ता है और शत्रु की कथा वा उपदेश जिसको बहुत प्रीत कर जँचता है, उसकी आयु शेष जैसी ठहरानी चाहिये। जो व्यक्ति उष्ण को शीतल और शीतल को उष्ण जैसा ग्रहण करता है; शीत में शरीर रोमाञ्चित होने पर भी जिसका गात्र-दाह नहीं मिटता और शरीर अतिशय उष्ण रहने पर भी जो शीत से काँपने लगता है; प्रहार वा अङ्गच्छेद करते भी जो वेदना अनुभव नहीं करता; जिसके शरीर पर अकस्मात् वर्णान्तर या रेखा जैसा चिह्न निकल पड़ता है; चन्दन लगाने से जिसके शरीर पर नील मक्षिकाएँ (नीली मक्खियाँ) आश्रय करती हैं और अकस्मात जिसके शरीर से सुरभि गन्ध (सुगन्ध) निकल पड़ती है, वह शीघ्र ही मरता है। ​एक प्रकार का रस आस्वादन करके अन्य प्रकार समझने और सभी रसों अथवा मिथ्या आहार से दोष वा अग्निमान्द्य बढ़ने से कोई रस वा सुगन्ध दुर्गन्ध मालूम न पड़ने अथवा घ्राणशक्ति एक बारगी ही बिगड़ने; शीत, उष्ण आदि काल वा दिक्-विषयक अवस्था में विपरीत ज्ञान रहने; दिन को आकाशमण्डल में प्रति नक्षत्र वा चन्द्रकिरण और रात्रि को ज्वलन्त सूर्य; मेघशून्य आकाश में इन्द्रधनुष वा विद्युत् एवं निर्मल आकाश में कृष्णवर्ण मेघ देख पड़ने; आकाशमण्डल अट्टालिका वा विमानयान से परिपूर्ण तथा भूमण्डल धूम, नीहार (कोहरा) वा वस्त्र द्वारा आवृत जैसा लगने; समस्त लोक प्रज्वलित अथवा जलप्लावित जैसा जँचने; अरुन्धती, ध्रुव, आकाशगङ्गा, उष्ण जल तथा ज्योत्स्ना एवं आदर्श (दर्पण) में अपनी छाया न देख पड़ने अथवा अङ्गहीन, विकृत वा कुक्कुर, काक, गृध्र, प्रेत, यक्ष, राक्षस वा पिशाच की काया जैसी लगने और निर्धूम अग्नि मयूर के कण्ठ जैसी लगने से स्वस्थ शरीर रहते भी पीड़ित होते हैं और पीड़ित होने पर मरते हैं। (सुश्रुत सूत्र २० अ०) ​श्याव, लोहित, नील वा पीतवर्ण काया जिसका अनुगमन करती है, उसकी मृत्यु अवस्था आ पहुँचती है। हठात् लज्जा वा श्री (शोभा) विनष्ट होने अथवा तेज, बल, स्मृति ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> वा प्रभा एकाएक बढ़ने से निश्चय ही मनुष्य को मरना पड़ता है। जिसका निचला ओष्ठ गिर और ऊपरी ओष्ठ उठ जाता है अथवा दोनों का रङ्ग जामुन जैसा काला दिखाता है, उसकी आयु शेष हो जाती है। दाँत कुछ लाल, नीले अथवा बहुत काले पड़ जाने से आयु शेष हुई समझते हैं। जिसकी जिह्वा कृष्णवर्ण, स्तब्ध, अवलिप्त, कर्कश वा सून लगती है; जिसकी नासिका वक्र, स्फुटित, शुष्क, अवनत वा उद्यत रहती है; जिसके दोनों चक्षुओं में कानापन, बड़ा-छोटापन देख पड़ता है अथवा उनमें क्षुद्रता, निर्बलता, रक्तवर्णता अथवा अधोदृष्टिविशिष्टता रहती है और जिसकी आँख लगातार आर्द्र (गीली) रहती है, उसके मरने में कोई कसर नहीं पड़ती। ​बाल दोनों ओर बिखर पड़ने, झड़ने या बढ़ने और आँखों की पुतलियाँ उखड़ने से रोगी शीघ्र प्राणत्याग करता है। जो व्यक्ति मुखस्थित अन्न ग्रास नहीं कर सकता, मस्तक सीधा नहीं रख सकता और एकाग्रदृष्टि तथा अचेतन रहता है, वह शीघ्र ही मरता है। रोगी मोटा हो या दुर्बल, पूर्ववत् उठाकर भी बैठालने पर मूर्छित होने पर बचने की आशा न करनी चाहिये। जो रोगी चित लेटकर पैरों को सिकोड़ता या सर्वदा फैलाने का अभिलाष करता है, जिसका हाथ-पैर बहुत ठण्डा रहता है और ऊर्ध्वश्वास, छिन्नश्वास वा काक की भांति मुख विकृत होकर श्वास निकलता है, उसकी आयु शेष हुई समझ पड़ती है। ​निद्रा भङ्ग न होने, सर्वदा जागरित रहने, कोई बात कहने पर मोह लगने, नीचे का ओष्ठ लेहन करने (चाटने), भारी डकार उठने और कम्प के साथ बात चलने से रोगी का मृत्युकाल आ जाता है। शरीर किसी प्रकार से विषदूषित न होने पर भी जिस रोगी के रोमकूप से लोहू (रक्त) निकलता है, वह तत्क्षणात् प्राणत्याग करता है। वाताष्ठीला रोग में अष्ठीला के ऊर्ध्वगामिनी होकर हृदय में आ जाने और उसमें दारुण यन्त्रणा और अन्न में अरुचि दिखलाने से मृत्यु निश्चित है। बिना किसी दूसरे उपद्रव के पाद, नाभि और गुदा का प्रामुख सूज जाने पर भी रोगी को गतायु समझते हैं। अतीसार, ज्वर, कास, श्वास, अण्ड तथा देह की स्फीतता (सूजन) आदि उपद्रव होने से श्वासरोगी वा कासरोगी के जीने की आशा करना व्यर्थ है। अतिशय घर्म (पसीना), दाह, हिक्का और श्वास— ​<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> g16z0qrkjtosx8hc6vpoagxq2p9i5gx पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१६९ 250 45923 668167 561793 2026-07-19T03:38:50Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668167 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गतायुः गतासवा'''|'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>आदि उपद्रव उठ खड़े होने से बलवान् रोगी भी मर जाता है। जिस रोगी के चक्षु-जल (आँसुओं) से मुख भर जाता है, दोनों पैरों से अविरत पसीना चला आता है, चक्षु आकुलित दिखाता है, जिसका शरीर हठात् बहुत ही हलका या भारी हो जाता है या जिसके वमन से कीचड़, मदिरा, चर्बी या तेल जैसी गन्ध आती है, वह रोगी अवश्य परलोक पहुँचता है। मस्तक में कपाल तक जूँ भर आने, मङ्गल कामना से प्रदत्त बलि (पूजा-सामग्री) आदि के न खाने और रति-शक्ति एकबारगी बिगड़ जाने से मृत्यु उपस्थित होने में कोई सन्देह नहीं। जिस रोगी को ज्वर, अतीसार (दस्त) और सूजन— ये तीनों एक बार साथ घेर लेते हैं तथा बल में क्षीणता आती है, उसकी कभी भी चिकित्सा नहीं चलाते। शरीर अतिशय क्षीण होने पर रुचिकर, मिष्ट और हितकर अन्न द्वारा क्षुधा वा तृष्णा न मिटने से मृत्यु को ग्राम (निकट) समझना चाहिये। ग्रहणी, शिरःशूल, कोष्ठशूल, अतिशय पिपासा और बल-हानि जिसको एक ही साथ हो, उसके बचने की कोई आशा नहीं देखनी चाहिये। {{Right|(सुश्रुत सूत्र २१ अ०)}} ​शरीर का जो अङ्ग स्वभावतः जैसा होता है, उससे उलटा पड़ने पर मृत्यु का लक्षण ठहरता है। शरीर गोरे से काला तथा काले से गोरा पड़ने, रक्त प्रभृति वर्ण का अन्य प्रकार का वर्ण लगने, स्थिर के अस्थिर, स्थूल के कृश, कृश के स्थूल, दीर्घ अवयव पर सर्व दीर्घ बनने अथवा कोई अङ्ग एकाएक ठण्डा, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, विवर्ण वा अवसन्न पड़ने से थोड़े दिन में ही काल-कवलित होते हैं। शरीर का कोई अङ्ग अपने स्थान से चलित, उत्क्षिप्त, अति पतित, निर्गत, अन्तर्गत, गुरु वा लघु होना भी स्वभाव के विपरीत है। ​शरीर में अकस्मात् मूँगे जैसे चकत्ते पड़ने, ललाट की चमड़ी में शिट्टियाँ झलकने, नाक की डण्डी में फोड़ा-सा उठने, सवेरे मस्तक से पसीना निकलने, नेत्ररोग न रहते भी आँसू चलने, मस्तक में गोमय (गोबर) जैसी धूलि उड़ने अथवा उस पर कबूतर, कङ्क (गीध) आदि पक्षी गिरने; भोजन न करते भी मलमूत्र पड़ने वा भोजन करने पर भी मलमूत्र न उतरने; स्तनमूल, वक्षःस्थल वा हृदय में अतिशय वेदना उठने; किसी अङ्ग का मध्यस्थल स्फीत (सूजा) अथवा उभय पार्श्व कृश (पतला), वा मध्यस्थल कृश तथा ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उभय पार्श्व स्फीत पड़ने; अर्धाङ्ग में शोथ (सूजन) बढ़ने, समस्त शरीर शुष्क पड़ने, वह नष्ट, क्षीण, विकृत वा विकल लगने; दन्त, मुख वा नख प्रभृति स्थानों में विवर्ण पुष्प जैसे चिह्न पड़ने; कफ, पुरीष वा रेतः (वीर्य) के जल में मग्न रहने; दृष्टिमण्डल में भिन्न प्रकार का विकृत रूप देख पड़ने, केश या वस्त्र सेना जैसा लगने; अतीसार रोग में अरुचि तथा दुर्बलता बढ़ने; फेन के साथ पूय-रक्त (पीप और खून) वमन करने; कासरोग में तृष्णा से अभिभूत रहने, क्षीणता, वमन तथा अरुचि लगने; भग्नस्वर तथा वेदना के साथ हाथ, पैर और मुख पर सूजन उठने लग पड़ने या रुचिहीन रहने; नाभि, स्कन्ध एवं हस्त-पाद शिथिल पड़ने और ज्वर तथा कास से अभिभूत रहने पर रोगी का जीना कठिन है। ​पूर्वाह्न में आहार करके अपराह्न में वमन करने और पाकाशय में अम्ल-रस उत्पन्न न होते भी अतीसार जैसा मल निकलने; भूमि पर पतित हो बकरी की तरह बोलने; कोष शिथिल, उपस्थ नष्ट, चित्त तथा ग्रीवा टूट पड़ने; नीचे का ओष्ठ दंशन (चबाने) या ऊपर का ओष्ठ लेहन (चाटने) करते रहने अथवा केश वा कर्ण नोच रखने; देवता, द्विज (ब्राह्मण), गुरु, मित्र एवं वैद्य को बुरा समझने; पापग्रह के अधिकतम मन्द स्थानों में जाकर जन्मनक्षत्र को पीड़ित करने अथवा उल्का वा वज्र द्वारा अभिहत (प्रभावित) पड़ने में मनुष्य गतायुः कहलाता है। स्त्री, पुत्र, गृह, शयन, आसन, यान, वाहन और मणि-रत्न प्रभृति गृह-उपकरण द्रव्यों का बुरा प्रादुर्भाव होते भी आयु को शेष समझते हैं। बल और मांसहीन रोगी की चिकित्सा करते भी यदि रोग वृद्धि होती है, तो वह मरण का ही लक्षण देख पड़ती है। जिसकी उदर-पीड़ा एक काल ही हठात् निवृत्त हो जाती है अथवा जिसके शरीर में आहार की कोई बात नहीं दिखती, उसकी मौत शीघ्र ही हो जाती है। ​{{outdent|गतार्त्तवा (सं० स्त्री०) गतं नष्टं आर्त्तवं रजः शोणितं यस्याः, बहुव्री०। १. वृद्ध स्त्री, वह औरत जिसकी अवस्था पचास वर्ष से अधिक की हो। वैद्यकशास्त्र के मतानुसार बारह वर्ष से पचास वर्ष तक की स्त्रियों को ऋतु या रजोदर्शन होता है। इसके बाद स्त्री को गतार्त्तवा कहते हैं। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"वत्सराद्द्वादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतं समः। मासि मासि गतास्र्त्तवा प्रकृत्यैवात्र्तवं स्रवेत्॥" (भावप्रकाश)}}</poem>}}}} ​<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> mpjujiv35j3sy68rfgu9nybtahh5w41 668168 668167 2026-07-19T03:39:17Z Avantika Shaw 4732 668168 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गतायुः गतासवा'''|'''१६७'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>आदि उपद्रव उठ खड़े होने से बलवान् रोगी भी मर जाता है। जिस रोगी के चक्षु-जल (आँसुओं) से मुख भर जाता है, दोनों पैरों से अविरत पसीना चला आता है, चक्षु आकुलित दिखाता है, जिसका शरीर हठात् बहुत ही हलका या भारी हो जाता है या जिसके वमन से कीचड़, मदिरा, चर्बी या तेल जैसी गन्ध आती है, वह रोगी अवश्य परलोक पहुँचता है। मस्तक में कपाल तक जूँ भर आने, मङ्गल कामना से प्रदत्त बलि (पूजा-सामग्री) आदि के न खाने और रति-शक्ति एकबारगी बिगड़ जाने से मृत्यु उपस्थित होने में कोई सन्देह नहीं। जिस रोगी को ज्वर, अतीसार (दस्त) और सूजन— ये तीनों एक बार साथ घेर लेते हैं तथा बल में क्षीणता आती है, उसकी कभी भी चिकित्सा नहीं चलाते। शरीर अतिशय क्षीण होने पर रुचिकर, मिष्ट और हितकर अन्न द्वारा क्षुधा वा तृष्णा न मिटने से मृत्यु को ग्राम (निकट) समझना चाहिये। ग्रहणी, शिरःशूल, कोष्ठशूल, अतिशय पिपासा और बल-हानि जिसको एक ही साथ हो, उसके बचने की कोई आशा नहीं देखनी चाहिये। {{Right|(सुश्रुत सूत्र २१ अ०)}} ​शरीर का जो अङ्ग स्वभावतः जैसा होता है, उससे उलटा पड़ने पर मृत्यु का लक्षण ठहरता है। शरीर गोरे से काला तथा काले से गोरा पड़ने, रक्त प्रभृति वर्ण का अन्य प्रकार का वर्ण लगने, स्थिर के अस्थिर, स्थूल के कृश, कृश के स्थूल, दीर्घ अवयव पर सर्व दीर्घ बनने अथवा कोई अङ्ग एकाएक ठण्डा, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, विवर्ण वा अवसन्न पड़ने से थोड़े दिन में ही काल-कवलित होते हैं। शरीर का कोई अङ्ग अपने स्थान से चलित, उत्क्षिप्त, अति पतित, निर्गत, अन्तर्गत, गुरु वा लघु होना भी स्वभाव के विपरीत है। ​शरीर में अकस्मात् मूँगे जैसे चकत्ते पड़ने, ललाट की चमड़ी में शिट्टियाँ झलकने, नाक की डण्डी में फोड़ा-सा उठने, सवेरे मस्तक से पसीना निकलने, नेत्ररोग न रहते भी आँसू चलने, मस्तक में गोमय (गोबर) जैसी धूलि उड़ने अथवा उस पर कबूतर, कङ्क (गीध) आदि पक्षी गिरने; भोजन न करते भी मलमूत्र पड़ने वा भोजन करने पर भी मलमूत्र न उतरने; स्तनमूल, वक्षःस्थल वा हृदय में अतिशय वेदना उठने; किसी अङ्ग का मध्यस्थल स्फीत (सूजा) अथवा उभय पार्श्व कृश (पतला), वा मध्यस्थल कृश तथा ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उभय पार्श्व स्फीत पड़ने; अर्धाङ्ग में शोथ (सूजन) बढ़ने, समस्त शरीर शुष्क पड़ने, वह नष्ट, क्षीण, विकृत वा विकल लगने; दन्त, मुख वा नख प्रभृति स्थानों में विवर्ण पुष्प जैसे चिह्न पड़ने; कफ, पुरीष वा रेतः (वीर्य) के जल में मग्न रहने; दृष्टिमण्डल में भिन्न प्रकार का विकृत रूप देख पड़ने, केश या वस्त्र सेना जैसा लगने; अतीसार रोग में अरुचि तथा दुर्बलता बढ़ने; फेन के साथ पूय-रक्त (पीप और खून) वमन करने; कासरोग में तृष्णा से अभिभूत रहने, क्षीणता, वमन तथा अरुचि लगने; भग्नस्वर तथा वेदना के साथ हाथ, पैर और मुख पर सूजन उठने लग पड़ने या रुचिहीन रहने; नाभि, स्कन्ध एवं हस्त-पाद शिथिल पड़ने और ज्वर तथा कास से अभिभूत रहने पर रोगी का जीना कठिन है। ​पूर्वाह्न में आहार करके अपराह्न में वमन करने और पाकाशय में अम्ल-रस उत्पन्न न होते भी अतीसार जैसा मल निकलने; भूमि पर पतित हो बकरी की तरह बोलने; कोष शिथिल, उपस्थ नष्ट, चित्त तथा ग्रीवा टूट पड़ने; नीचे का ओष्ठ दंशन (चबाने) या ऊपर का ओष्ठ लेहन (चाटने) करते रहने अथवा केश वा कर्ण नोच रखने; देवता, द्विज (ब्राह्मण), गुरु, मित्र एवं वैद्य को बुरा समझने; पापग्रह के अधिकतम मन्द स्थानों में जाकर जन्मनक्षत्र को पीड़ित करने अथवा उल्का वा वज्र द्वारा अभिहत (प्रभावित) पड़ने में मनुष्य गतायुः कहलाता है। स्त्री, पुत्र, गृह, शयन, आसन, यान, वाहन और मणि-रत्न प्रभृति गृह-उपकरण द्रव्यों का बुरा प्रादुर्भाव होते भी आयु को शेष समझते हैं। बल और मांसहीन रोगी की चिकित्सा करते भी यदि रोग वृद्धि होती है, तो वह मरण का ही लक्षण देख पड़ती है। जिसकी उदर-पीड़ा एक काल ही हठात् निवृत्त हो जाती है अथवा जिसके शरीर में आहार की कोई बात नहीं दिखती, उसकी मौत शीघ्र ही हो जाती है। ​{{outdent|गतार्त्तवा (सं० स्त्री०) गतं नष्टं आर्त्तवं रजः शोणितं यस्याः, बहुव्री०। १. वृद्ध स्त्री, वह औरत जिसकी अवस्था पचास वर्ष से अधिक की हो। वैद्यकशास्त्र के मतानुसार बारह वर्ष से पचास वर्ष तक की स्त्रियों को ऋतु या रजोदर्शन होता है। इसके बाद स्त्री को गतार्त्तवा कहते हैं। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"वत्सराद्द्वादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतं समः। मासि मासि गतास्र्त्तवा प्रकृत्यैवात्र्तवं स्रवेत्॥" (भावप्रकाश)}}</poem>}}}} ​<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> a5ynflegru64unosw3v0muh5eyd4yv3 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१७१ 250 45941 668176 561796 2026-07-19T04:26:20Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668176 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गदगद-गदहलोटन'''|'''१५६'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>२६' एवं ७५° ५०' पू० के बीच पड़ता है। इसका क्षेत्रफल ६८८ वर्ग मील है। लोकसंख्या प्रायः १३०१०३ लिखी है। कपट पहाड़ बड़ा है। उसकी चिकनी मिट्टी में सोना होता है। जलवायु अत्यंत धीर और स्वास्थ्यकर है। डम्बल तालाब नीचेके लिये ६४००० हजार रुपये लगा करके बनाया गया है। २ धारवाड़ जिलेके गदग तालुक का हेड-क्वार्टर। यह अक्षा० १५° २४' उ० और देशा० ७५° ४२' पू० में दक्षिण मराठा रेलवे पर अवस्थित है। लोकसंख्या कोई २७६५२ है। १८७८ ई० को यहां म्युनिसिपलिटी हुई। यहां कपास और सूती तथा रेशमी कपड़ोंका बड़ा काम है। सूत कातनेका एक पुनर्जीव भी खुला है। गदगमें त्रिकूटेश्वर, सरस्वती, नारायण, सोमेश्वर और रामेश्वरके प्राचीन सुन्दर मन्दिरोंका भग्नावशेष विद्यमान है। इसके शिलालेख पढ़नेसे विदित होता है कि गदगका पुराना नाम क्रतुक था और वह (८७२-११७०) चालुक्यों, (११६१-८२) कलचुरियों, (११८४-१२१०) होयसल बलाल, (११९०-१३१०) देवगिरि-यादवों और (१३३६-१५६५ ई०) विजयनगर राजाओंके अधीन रहा। १६७३ ई०के समय गदग धारवाड़में बांकापुर सरकारके एक बड़े जिलेकी तरह मिलाया गया। १८१८ ई०को जनरल मुनरोने इसकी घेराउ की। शहरमें कोर्टी, जजी की अदालत, हस्पताल और कई स्कूल हैं। {{outdent|गदगद (सं० क्ली०) गद्गद् भाषण, पुलकित वचन।}} {{outdent|गदवास (हिं० पु० हाथीका एक रोग। इसके होनेसे पीठ पर घाव हो जाता है।}} {{outdent|गदनकेरी— बीजापुर जिलेके अन्तर्गत कलादगीका एक छोटा ग्राम। यह कलादगीसे ८ मील पूर्व बागलकोट सड़क पर अवस्थित है। लोकसंख्या प्रायः चारसौ है। ग्रामके पास ही पहाड़ पर बहुतसी ममाढ़ हैं, जो मल्लप्पा और उनके लड़के मल्लप्पाकी कब्र कही जाती हैं। अनावृष्टिके समय मनुष्य इस ममाढ़में था वर्षाके लिये आराधन करते हैं।}} {{outdent|गदम (फा० पु०) नाव बांधनेके लिये एक प्रकारकी बल्ली, बांस, पुश्ता।}} {{outdent|गदसुरारि (सं० पु०) ज्वर रोगका औषधविशेष। पारा, गन्धक, लौह, अभ्र, ताम्ब, हिंगुल और मीसक, इन सब का <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> समभाग लेकर मिलाना चाहिये। दो रत्ती प्रति दिन सेवन करनेसे मन्दज्वर नाश होता है। (भैषज्यर०)}} {{outdent|गदमुद्गरादिका मोदक- औषधविशेष। पारा, गन्धक, लोह, हरिताल, विष, शूंठ, पीपल, मिर्च, हरीतक्री, बीभितकी, आँवला, मोशाग, इनके समान भागमें उतना ही जयपाल देकर भृङ्गराजके रसमें दो प्रहर तक पोसना चाहिये। इसके सेवन करनेसे मन्दाग्न्यादि समस्त रोग जाते रहते हैं।}} {{outdent|गदयित्नु (सं० पु०) १ काम, इच्छा। २ शब्द, आवाज। (त्रि०)३ कामुक, इच्छुक। ४ वाग्दुक, गपोड़े।}} {{outdent|गदराना (हिं० वि०)१ परिपक्व होनेके निकट आना। २ जवानीमें अङ्गोंका भरना। ३ आँखमें कीचड़ आदि आना।}} {{outdent|गदरिया— युक्तप्रदेशका एक व्यापक जातिविशेष। ये कई एक श्रेणियोंमें बंटे हैं। एक श्रेणीके मनुष्य दूसरी श्रेणीके साथ विवाहमें दान यस्तक नहीं करते हैं। इस जातिकी विधवा स्त्रियां धरन देखके विवाह करती हैं। किन्तु ज्येष्ठ भ्राता कनिष्ठकी विधवासे विवाह नहीं कर सकते। थावा और फर्रुखाबाद के परगनोंमें इस जातिका वास अधिक है।}} {{outdent|गदसिंह— एक संस्कृत ग्रन्थकार। इन्होंने धर्मकार्य जातिभास्करी नामक एक संस्कृत धर्मभाग, तत्त्वचन्द्रिका नामक किराताजु नीय टीका और एकाधिविवेककी रचना की है।}} {{outdent|गदला (प्रा० वि०) मटमैला, गन्दा।}} {{outdent|गदषष्ठोभो (हिं० पु०) प्रायः १५ से २५ वर्ष तककी अवस्था। लोगोंका विश्वास है कि इतने दिन मनुष्य अनुभवी रहते तथा उनकी बुद्धि अपरिपक्व रहती है।}} {{outdent|गदहपन (हिं० स्त्री०) मूर्खता, बेवकूफी।}} {{outdent|गदहपूरना (हिं० स्त्री०)एक प्रकारका पौधा जो दवाके काममें आता है।}} {{outdent|गदहपूरन (हिं० पु०)कुलीका एक पेंच।}} {{outdent|गदहलोटन (हिं० पु०)१ क्लान्ति दूर करनेके लिये तथा प्रसन्नताके लिये गदहेका जमीन पर लोटना। २ गदहा लोटनेका स्थान। साधारणतः मनुष्योंका विश्वास है कि ऐसी जगह पर पांव रखनेसे मनुष्य यरु जाति और पांवमें दर्द होने लगता है।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> me61ych7sjsjxfwoi3th2gu5wua728h पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२०५ 250 75671 668189 667396 2026-07-19T05:44:43Z अँजली चौधरी 2439 668189 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२०४'''|'''उत्क्लिष्टवर्त्म-उत्तंस'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :वृष्य, वातकर और रस एवं पाकमें मधुर है। </small>(सुश्रुत)</small> २ पेचक, उल्लू। ३ कुररपक्षी,किसी किस्मका उका़ब। ४ चीत्कार, शोर, हल्ला। {{Outdent|उक्लिष्टवर्त्म (सं॰ क्ली॰) क्लिष्टवर्त्म नाम रोगविशेष, आंसू पैदा करनेवाले मवादकी बढ़ती। </small>क्लिष्टवां देखो:</small>}} {{Outdent|उत्क्लेद (सं॰ पु॰) १ आर्द्र भाव, तरी, भीगनेकी हालत।}} {{Outdent|उतक्लेदन (सं॰ क्ली॰) </small>उतक्लेद देखो।</small>}} {{Outdent|उत्क्लेदिन् (सं॰ त्रि०) आर्द्र, तर पड़नेवाला, जो भीग रहा हो।}} {{Outdent|उत्क्लेश (सं॰ पु॰) १ उत्तेजना, अशान्ति, हलचल, झगड़ा। २ वमनेच्छा, बलगमका बिगाड़। ३ रोग, बीमारी।}} {{Outdent|उत्क्लेशक (सं॰ पु॰) विषमय कीट विशेष, एक ज़हरीला कीड़ा। यह अग्निप्रकृति होता है। इसके काट खानसे पित्तजन्य रोग लग जाते हैं।}} {{Outdent|उत्क्लेशन (सं॰ त्रि॰) उत्तेजना देनेवाला, जो उभारता या बेतरतीबी पैदा करता हो।}} {{Outdent|उत्क्लेशिन्, </small>उत्क्लेशन देखो।</small>}} {{Outdent|उत्क्लेशन-वस्ति (सं॰ पु॰ स्त्री॰) वस्तिभेद, पिचकारीकी एक दवा। यह पहले एरण्डवीजादि कल्कसे उत्क्लेशनके लिये लगायी जाती है। उक्त कल्कमें एरण्डवीज, मधुक, पिप्पली, सैन्धव, बचा और हबुषा-फल डालते हैं। </small>(वैद्यकनिधण्टु)</small>}} {{Outdent|उत्क्षिप्त (सं॰ त्रि॰) उत्-क्षिप-क्त। १ ऊर्ध्वक्षिप्त उछाला या उठाया हुआ, जो ऊपर चढ़ा दिया गया हो। २ निराकृत, घटाया हुघा, जो फेंका गया हो। ३ दृगीकृत, खा़रिज किया हुआ। (पु॰) ४ धुस्तूर-फल, धतूरेका समर।}} {{Outdent|उत्क्षिप्तकम्पन (सं॰ क्ली॰) भूमिकम्यविशेष, किसी किस्मका ज़लज़ला, एक भूडोल। इस प्रकारसे कम्प-आनपर भूमि मानो उछन्त पड़ती है।}} {{Outdent|उत्क्षिप्तिका (सं॰ स्त्री॰) उत्-क्षिप-क्तिन्-कन् टाप्। कर्णालङ्कार विशेष, कानका एक गहमा। यह अर्ध-चन्द्राकार रहती और कर्ण के उपरि भागमें पहनी जाती है।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उत्क्षेप (सं॰ पु॰) उत्-क्षिप घञ्। १ ऊर्ध्वक्षेपण, उछाल। २ दूरीकरण, फेकफांक। ३ प्रेरण, चालान। ४ वमनकार्य, छांट, उलटी। ५ मन्दिरके ऊपरका स्थान। (त्रि॰) ६ उत्क्षेपकारक, फेंकनेवाला।}} {{Outdent|उत्क्षेपक (सं॰ त्रि॰) १ ऊर्ध्व निक्षेपकारी उछालने वाला। २ आज्ञा देनेवाला, जो हुक्म लगाता है। (पु॰) ३ वस्त्रको अपहरण करनेवाला, जो कपड़ेको उछालकर चुरा लेता हो।}} {{c|{{x-smaller|“उत्क्षेपकग्रन्धिभेदौ करसन्दशहीनकौ।” (याज्ञवल्क्य २।२७७)}}}} {{Outdent|उत्क्षेपण (सं॰ क्ली॰) उत्-क्षिप-ल्युट्। १ ऊर्ध्व-क्षेपण, उछाल। २ प्रेरण, चालान। ३ वमनकार्य, छांट, उलटी। ४ उदञ्चन, सूप। ५ व्यजन, पङ्खा। ६ षोड़शपण, सोलह, पणकी एक नाप। ७ न्याय-मतसे पञ्चकर्मान्तर्गत कर्मविशेष।}} {{c|{{x-smaller|<poem>“उत्क्षेपणं ततोऽवक्षेपणमाकुञ्चनं तथा। प्रसारणश्च गमनं कर्माण्येतानि पञ्चच॥” (भाषापरिच्छेद ६)</poem>}}}} {{Outdent|उत्खचित (सं॰ त्रि॰) मिश्रित, मखलूत, मिला हुआ।}} {{Outdent|उत्खरिन् (सं॰ पु॰) देव विशेष।}} {{Outdent|उत्खला (सं॰ स्त्री॰) उत्-खल-अच्-टाप्। मुरा नामक गन्धद्रव्य, एक खु़शबूदार चीज़।<small> मुरा देखो।</small>}} {{Outdent|उत्खात (सं॰ त्रि॰) उत्-खन-क्त। १ उम्मूलित, उखाड़ा हुथा। २ उत्पाटित, गिराया हुआ। ३ विनाशित, मारा हुआ। ४ खनित, खोदा हुआ।<small> “रथेनानुत् खातस्तिमितमतिना।”</small> (शकुन्तला) (क्ली॰) ५ उत्खनन, गड्ढा}} {{Outdent|उत्खातकेलि (सं॰ पु॰) क्रीड़ा विशेष, एक खेल। इसमें शृङ्गादि द्वारा वृष एवं गजकी भांति मृत्तिका खोदते हैं।}} {{Outdent|उत्खाता, <small>उत्खातिन् देखो।</small>}} {{Outdent|उत्खातिन् (सं॰ त्रि॰) १ माशक, बरबाद करने-वाला, जो खोद डालता हो। २ उत्खननयुक्त, जिसमें गड्ढे रहें।}} {{Outdent|उत्खेद (सं॰ पु॰) उत्-खिद भावे घञ्। छेदन, काटछांट।}} {{Outdent|उत्त (सं॰ त्रि॰) उन्द केदने त, णुदविदेति पक्षे णत्वा-भावः। आर्द्र, तर, भीगा। (हिं॰) <small>उत और उत देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तंस (सं॰ पु॰) उत्-तसि-अच् हलश्चेति घञ् वा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> a99w749j0abqyy5zpmeyoenc50u3tnb 668190 668189 2026-07-19T05:45:19Z अँजली चौधरी 2439 668190 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२०४'''|'''उत्क्लिष्टवर्त्म-उत्तंस'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :वृष्य, वातकर और रस एवं पाकमें मधुर है। </small>(सुश्रुत)</small> २ पेचक, उल्लू। ३ कुररपक्षी,किसी किस्मका उका़ब। ४ चीत्कार, शोर, हल्ला। {{Outdent|उक्लिष्टवर्त्म (सं॰ क्ली॰) क्लिष्टवर्त्म नाम रोगविशेष, आंसू पैदा करनेवाले मवादकी बढ़ती। </small>क्लिष्टवां देखो:</small>}} {{Outdent|उत्क्लेद (सं॰ पु॰) १ आर्द्र भाव, तरी, भीगनेकी हालत।}} {{Outdent|उतक्लेदन (सं॰ क्ली॰) </small>उतक्लेद देखो।</small>}} {{Outdent|उत्क्लेदिन् (सं॰ त्रि०) आर्द्र, तर पड़नेवाला, जो भीग रहा हो।}} {{Outdent|उत्क्लेश (सं॰ पु॰) १ उत्तेजना, अशान्ति, हलचल, झगड़ा। २ वमनेच्छा, बलगमका बिगाड़। ३ रोग, बीमारी।}} {{Outdent|उत्क्लेशक (सं॰ पु॰) विषमय कीट विशेष, एक ज़हरीला कीड़ा। यह अग्निप्रकृति होता है। इसके काट खानसे पित्तजन्य रोग लग जाते हैं।}} {{Outdent|उत्क्लेशन (सं॰ त्रि॰) उत्तेजना देनेवाला, जो उभारता या बेतरतीबी पैदा करता हो।}} {{Outdent|उत्क्लेशिन्, </small>उत्क्लेशन देखो।</small>}} {{Outdent|उत्क्लेशन-वस्ति (सं॰ पु॰ स्त्री॰) वस्तिभेद, पिचकारीकी एक दवा। यह पहले एरण्डवीजादि कल्कसे उत्क्लेशनके लिये लगायी जाती है। उक्त कल्कमें एरण्डवीज, मधुक, पिप्पली, सैन्धव, बचा और हबुषा-फल डालते हैं। </small>(वैद्यकनिधण्टु)</small>}} {{Outdent|उत्क्षिप्त (सं॰ त्रि॰) उत्-क्षिप-क्त। १ ऊर्ध्वक्षिप्त उछाला या उठाया हुआ, जो ऊपर चढ़ा दिया गया हो। २ निराकृत, घटाया हुघा, जो फेंका गया हो। ३ दृगीकृत, खा़रिज किया हुआ। (पु॰) ४ धुस्तूर-फल, धतूरेका समर।}} {{Outdent|उत्क्षिप्तकम्पन (सं॰ क्ली॰) भूमिकम्यविशेष, किसी किस्मका ज़लज़ला, एक भूडोल। इस प्रकारसे कम्प-आनपर भूमि मानो उछन्त पड़ती है।}} {{Outdent|उत्क्षिप्तिका (सं॰ स्त्री॰) उत्-क्षिप-क्तिन्-कन् टाप्। कर्णालङ्कार विशेष, कानका एक गहमा। यह अर्ध-चन्द्राकार रहती और कर्ण के उपरि भागमें पहनी जाती है।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उत्क्षेप (सं॰ पु॰) उत्-क्षिप घञ्। १ ऊर्ध्वक्षेपण, उछाल। २ दूरीकरण, फेकफांक। ३ प्रेरण, चालान। ४ वमनकार्य, छांट, उलटी। ५ मन्दिरके ऊपरका स्थान। (त्रि॰) ६ उत्क्षेपकारक, फेंकनेवाला।}} {{Outdent|उत्क्षेपक (सं॰ त्रि॰) १ ऊर्ध्व निक्षेपकारी उछालने वाला। २ आज्ञा देनेवाला, जो हुक्म लगाता है। (पु॰) ३ वस्त्रको अपहरण करनेवाला, जो कपड़ेको उछालकर चुरा लेता हो।}} {{c|{{x-smaller|“उत्क्षेपकग्रन्धिभेदौ करसन्दशहीनकौ।” (याज्ञवल्क्य २।२७७)}}}} {{Outdent|उत्क्षेपण (सं॰ क्ली॰) उत्-क्षिप-ल्युट्। १ ऊर्ध्व-क्षेपण, उछाल। २ प्रेरण, चालान। ३ वमनकार्य, छांट, उलटी। ४ उदञ्चन, सूप। ५ व्यजन, पङ्खा। ६ षोड़शपण, सोलह, पणकी एक नाप। ७ न्याय-मतसे पञ्चकर्मान्तर्गत कर्मविशेष।}} {{c|{{x-smaller|<poem>“उत्क्षेपणं ततोऽवक्षेपणमाकुञ्चनं तथा। प्रसारणश्च गमनं कर्माण्येतानि पञ्चच॥” (भाषापरिच्छेद ६)</poem>}}}} {{Outdent|उत्खचित (सं॰ त्रि॰) मिश्रित, मखलूत, मिला हुआ।}} {{Outdent|उत्खरिन् (सं॰ पु॰) देव विशेष।}} {{Outdent|उत्खला (सं॰ स्त्री॰) उत्-खल-अच्-टाप्। मुरा नामक गन्धद्रव्य, एक खु़शबूदार चीज़।<small> मुरा देखो।</small>}} {{Outdent|उत्खात (सं॰ त्रि॰) उत्-खन-क्त। १ उम्मूलित, उखाड़ा हुथा। २ उत्पाटित, गिराया हुआ। ३ विनाशित, मारा हुआ। ४ खनित, खोदा हुआ।<small> “रथेनानुत् खातस्तिमितमतिना।”</small> (शकुन्तला) (क्ली॰) ५ उत्खनन, गड्ढा}} {{Outdent|उत्खातकेलि (सं॰ पु॰) क्रीड़ा विशेष, एक खेल। इसमें शृङ्गादि द्वारा वृष एवं गजकी भांति मृत्तिका खोदते हैं।}} {{Outdent|उत्खाता, <small>उत्खातिन् देखो।</small>}} {{Outdent|उत्खातिन् (सं॰ त्रि॰) १ माशक, बरबाद करने-वाला, जो खोद डालता हो। २ उत्खननयुक्त, जिसमें गड्ढे रहें।}} {{Outdent|उत्खेद (सं॰ पु॰) उत्-खिद भावे घञ्। छेदन, काटछांट।}} {{Outdent|उत्त (सं॰ त्रि॰) उन्द केदने त, णुदविदेति पक्षे णत्वा-भावः। आर्द्र, तर, भीगा। (हिं॰) <small>उत और उत देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तंस (सं॰ पु॰) उत्-तसि-अच् हलश्चेति घञ् वा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> gygyhtm2zeaa590fopuib2tigpqlszs पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२९२ 250 75676 668182 302973 2026-07-19T05:06:47Z अनुश्री साव 80 668182 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh||उन्माद|२९१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कभी बुरी राह चलनेको जी चाहता है। मेधाकी शक्ति घट जाती है। मन डावांडोल रहता अथवा वस्तुका अनुभव और मोह लगता है। उन्मत्तता होनेसे मस्तिष्क बिगड़ता अथवा मस्तिष्क की क्रियाका क्रमशः अवसान होने लगता है। मनकी गति, इच्छा एवं प्रकृति उलट पलट जाती है। इस उन्मादमें प्रधानतः दो प्रकार होते हैं। कभी रोगी स्थिरभाव पकड़ता है और कभी भीषण मूर्ति बना अनर्थ साधन करता है। उत्कण्ठा रोगमें शोक अथवा दुःख, मनका भाव एवं मस्तिष्कका कार्य बढ़ता है। कभी कभी एक विषयकी चिन्तामें मन अस्थिर होनेसे यह रोग लग जाता है। ऐसी अवस्थाको एकान्तिक उन्माद कहते हैं। बुद्धिके विपर्ययमें मानसिकक्रिया घट जाती है और मनपर अधिक दुर्बलता आ जानेसे मानसिकशक्ति अकर्मण्य हो जाती है। रोगका कोई अनुमान नहीं लगा सकता। निर्बुद्धिता वा जड़ताका रोग लगनेसे एककाल ही बुद्धिकी शक्ति लुप्त हो जाती है। किसी स्थलमें अति सामान्य बुद्धिका परिचय मिलता है। यह रोग प्रायः गर्भाव वा बाल्यकालमें होता है। जन्मकालीन अथवा किसी विशेष कारणसे बुद्धिकी वृत्तिका पथ रुकनेसे जड़ता बढ़ती है। महर्षि चरकका कथन है—<small>"यस्तु दोषानिमित्तेभ्यो उन्मादेभ्यः समुत्थानपूर्वरूपलिङ्गविशेषसमन्वितो भवत्य न्मादस्तमानुमाचक्षते।"</small> अर्थात् जो उन्माद पूर्वोक्त दोषनिमित्तक उन्मादसे विशेष निदान, पूर्वरूप एवं रूपविशेष रखता है, उसका नाम आगन्तुक उन्माद है। किसीके मतमें पूर्व जन्मके अशुभ कर्मसे आगन्तुक उन्माद उठता है। इसमें देवताके समान बलवीर्यादि देख पड़ते है। प्राचीन वैद्योंके विचारसे देवतादिके डर करनेसे उपजनेवाला रोग ही आगन्तुक उन्माद है। चरकने स्पष्ट कहा है—देवतागणकी दृष्टि, गुरु ब्रह्म सिद्ध या ऋषिगणके अभिशाप, पितृलोककी अवज्ञा, गन्धर्वगणके स्पर्श, शरीरमें यक्ष तथा राक्षस प्रभृतिको प्रवेश और पिशाचगणके आरोहणसे उन्माद उपजता है। पूर्वोक्त देवतादिके द्वारा उन्मादकी उत्पत्ति पूर्वोक्वत- {{Multicol-break}} उन्माद २९१ कभी बुरी राह चलनेको जी चाहता है। मेधाको पापके परिणाम, एकाको शून्य ग्रहके वास, चतुष्यथपर, शक्ति घट जाती है। मन डावांडोल रहता अथवा सन्ध्याकाल अथवा अशुचि अवस्थामें पर्वसन्धिके मथुन, वस्तुका अनुभव और मोह लगता है। उन्मत्तता रजखला स्त्रोके अभिगमन, अध्ययन वलि मङ्गल- होनेसे मस्तिष्क बिगड़ता अथवा मस्तिष्क को। होमादि कार्य के अवैध आचरण, तुमुल युद्ध, देश कुल क्रियाका क्रमश: अवसान होने लगता है। मनकी। वा नगरादिके विनाश, स्त्रीके सन्तानोत्पादन, नाना- गति, इच्छा एवं प्रकृति उलट पलट जाती है। इस प्रकारके भूत और अशुचि स्पर्श, वमन तथा रक्तस्रावके उन्माद में प्रधानतः दो प्रकार होते हैं। कभी रोगी अशोच, अशुचि रहते चेत्य एवं देवालय वा नगर एवं स्थिरभाव पकड़ता है और कभी भोषण मूर्ति बना जनपद में रात्रिकालको चतुष्पय अथवा वायुमुख वा अनर्थ साधन करता है। उत्कण्ठा रोगमें शोक श्मशानके अभिमुख गमन, मांस मधु तिल गुड मद्य अथवा दुःख, मनका भाव एवं मस्तिष्कका कर्म प्रभृतिक सेवन को उच्छिष्टावस्था, विज गुरु देवता रागो बढ़ता है। कभी कभी एक विषयको चिन्तामें मन आदिको अवमानना, धर्मालापके व्यतिक्रम और पाप- अस्थिर होनेसे यह रोग लग जाता है। ऐसी अव कर्म अथवा अप्रशस्त काल में किसो मङ्गलकर कार्य के स्थाको ऐकान्तिक उन्माद कहते हैं। बुद्धि के विपर्ययमें आरम्भसे होती है। मानसिकक्रिया घट जाती है और मनपर अधिक दुबै भारतीय वैद्य कहते हैं-मोह छाने, मनमें उद्देग, लता आ जानसे मानसिकशक्ति अकर्मण्य हो जाती है। कर्णमें शब्द और हृदयमें अतिशय उत्साह समान, देह रोगका कोई अनुमान नहों लगा सकता। निबुद्धिता दुबलाने, अनपर अरुचि आने, स्वप्न में कलुषित द्रव्य वा जड़ताका रोग लगनेसे एककाल हो बुद्धिको शक्ति खाने और वायु द्वारा उन्मयन एवं भ्रमपान आदि लुप्त हो जाती है। किसी किसी स्थल में अति सामान्च लक्षण देखानसे उन्मादरोग शीघ्र आरोग्य होता है।* बुद्धिका परिचय मिलता है। यह रोग प्रायः शैशव चिकित्सा-देवता अथवा ग्रहादिद्वारा उन्माद उठने- वा बालककालमें होता है। जन्मकालीन अथवा | पर शान्ति और पौष्टिक आभिचारिक प्रभृति क्रियास किसी विशेष कारणसे बुद्धिको वृत्तिका पथ रुकनसे दब जाता है। साधारण औषधसे कोई फल नहों जड़ता बढ़ती है। निकलता। फिर भी यथार्थ शारीरिक और मानसिक महर्षि चरकका कथन है-“यस्तु दोषानिमित्तेभ्यो उन्मा. कारण लगनेपर भिन्न भिन्न उपायसे चिकित्सा चलाना देभ्यः समुत्थानपूर्वरूपलिङविशेषसमन्विती भवत्य न्मादस्तमागन्तुमाचचते।" चाहिये। अर्थात् जो उन्माद पूर्वोक्त दोषनिमित्तक उन्मादसे "उन्माद वातिके पूर्व नेहपानं विरेचनम् । विशेष निदान, पूर्वरूप एवं रूपविशेष रखता है, पित्त कफ जे वान्तिः पयोवस्ताहिकक्रमः ॥" (चक्रपापि) - वातिक उन्माद में स्नेहपान एवं विरेचन और उसका नाम आगन्तुक उन्माद है। किसीके मतमें पूर्व जन्मके अशुभ कर्मसे आगन्तुक उन्माद उठता है। इसमें पित्तज एवं कफज में वमन कराने बाद स्नेहपान, देवताके समान बलवीर्यादि देख पड़ते है। प्राचीन वस्ति शोधन तथा विरेचनके क्रमसे चिकित्सा वैद्योंकि विचारसे देवतादिके डर करनेसे उपजनेवाला होती है। रोग ही आगन्तुक उन्माद है। चरकने स्पष्ट कहा प्राचीन वैद्यगणके मतसे अपस्मार रोगको तरह उन्मादको चिकित्सा करनेसे भी निर्वाह हो जाता है-देवतागणको दृष्टि, गुरु वृद्ध सिद्ध या ऋषिगणके अभिशाप, पिलोकको अवज्ञा, गन्धवेगणके स्पर्श, “मोहोहे गौ खनः यौवे गावापामपकर्षयम् ॥ शरीरमें यक्ष तथा राक्षस प्रभृतिके प्रवेश पौर पिशाच- अत्यु तसाहोऽरुचिचा खप्ने कलुषभोजनम् । गणक पारोहणसे उन्माद उपजता है। जाता है। वायुनोन्मथनञ्चापि धमश्च क्रमतस्तथा। पूर्वोक्त देवतादिके द्वारा उन्मादकी उर यस्य स्यादचिरेणैवमुन्माद सोऽधिगच्छति ॥" (सञ्जत)<noinclude></noinclude> tjn49a4l57cqjke6y8bx787l9ti6zto 668185 668182 2026-07-19T05:38:02Z अनुश्री साव 80 668185 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh||उन्माद|२९१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कभी बुरी राह चलनेको जी चाहता है। मेधाकी शक्ति घट जाती है। मन डावांडोल रहता अथवा वस्तुका अनुभव और मोह लगता है। उन्मत्तता होनेसे मस्तिष्क बिगड़ता अथवा मस्तिष्क की क्रियाका क्रमशः अवसान होने लगता है। मनकी गति, इच्छा एवं प्रकृति उलट पलट जाती है। इस उन्मादमें प्रधानतः दो प्रकार होते हैं। कभी रोगी स्थिरभाव पकड़ता है और कभी भीषण मूर्ति बना अनर्थ साधन करता है। उत्कण्ठा रोगमें शोक अथवा दुःख, मनका भाव एवं मस्तिष्कका कार्य बढ़ता है। कभी कभी एक विषयकी चिन्तामें मन अस्थिर होनेसे यह रोग लग जाता है। ऐसी अवस्थाको एकान्तिक उन्माद कहते हैं। बुद्धिके विपर्ययमें मानसिकक्रिया घट जाती है और मनपर अधिक दुर्बलता आ जानेसे मानसिकशक्ति अकर्मण्य हो जाती है। रोगका कोई अनुमान नहीं लगा सकता। निर्बुद्धिता वा जड़ताका रोग लगनेसे एककाल ही बुद्धिकी शक्ति लुप्त हो जाती है। किसी स्थलमें अति सामान्य बुद्धिका परिचय मिलता है। यह रोग प्रायः गर्भाव वा बाल्यकालमें होता है। जन्मकालीन अथवा किसी विशेष कारणसे बुद्धिकी वृत्तिका पथ रुकनेसे जड़ता बढ़ती है। महर्षि चरकका कथन है—<small>"यस्तु दोषानिमित्तेभ्यो उन्मादेभ्यः समुत्थानपूर्वरूपलिङ्गविशेषसमन्वितो भवत्य न्मादस्तमानुमाचक्षते।"</small> अर्थात् जो उन्माद पूर्वोक्त दोषनिमित्तक उन्मादसे विशेष निदान, पूर्वरूप एवं रूपविशेष रखता है, उसका नाम आगन्तुक उन्माद है। किसीके मतमें पूर्व जन्मके अशुभ कर्मसे आगन्तुक उन्माद उठता है। इसमें देवताके समान बलवीर्यादि देख पड़ते है। प्राचीन वैद्योंके विचारसे देवतादिके डर करनेसे उपजनेवाला रोग ही आगन्तुक उन्माद है। चरकने स्पष्ट कहा है—देवतागणकी दृष्टि, गुरु ब्रह्म सिद्ध या ऋषिगणके अभिशाप, पितृलोककी अवज्ञा, गन्धर्वगणके स्पर्श, शरीरमें यक्ष तथा राक्षस प्रभृतिको प्रवेश और पिशाचगणके आरोहणसे उन्माद उपजता है। पूर्वोक्त देवतादिके द्वारा उन्मादकी उत्पत्ति पूर्वोक्वत- {{Multicol-break}} पापके परिपाक, एकाकी शून्य गृहके वास, चतुष्पथपर, सन्ध्याकाल अथवा अशुचि अवस्थामें पर्वसन्धिके मथुन, रजस्वला स्त्रीके अभिगमन, अध्ययन बलि मङ्गलहोमादि कार्यके अवैध आचरण, तुमुल युद, देश कुल वा नगरादिके विनाश, स्त्रीके सन्तानोत्पादन, नानाप्रकारके भूत और अशुचि स्पर्श, वमन तथा रक्तस्रावके अशोच, अशुचि रहते चैत्य एवं देवालय वा नगर एवं जनपदमें रात्रिकालको चतुष्पथ अथवा वायुमुख वा श्मशानके अभिमुख गमन, मांस मधु तिल गुड़ मद्द प्रभृतिके सेवनको उच्छिष्टावस्था, द्विज गुरु देवता रोगी आदिकी अवमानना, धर्मालापके व्यतिक्रम और पापकर्म अथवा अप्रशस्त कालमें किसी मङ्गलकर कार्यके आरम्भसे होता है। भारतीय वैद्य कहते हैं—मोह छाने, मनमें उद्वेग, कार्यमें शब्द और हृदयमें अतिशय उत्साह समाने, देह दुबलाने, अन्नपर अश्रुचि आने, स्वप्नमें कलुषित द्रव्य खाने और वायु द्वारा उत्थापन एवं भ्रमपान आदि लक्षण देखनेसे उन्मादरोग शीघ्र आरोग्य होता है।<ref> <small>चिकित्सा</small>—देवता अथवा ग्रहादि द्वारा उन्माद उठने- पर शान्ति और पौष्टिक आमिचारिक प्रकृति क्रियासे दव जाता है । साधारण औषधसे कोई फल नहीं निकलता । फिर भी यथार्थ शारीरिक और मानसिक उन्माद २९१ कभी बुरी राह चलनेको जी चाहता है। मेधाको पापके परिणाम, एकाको शून्य ग्रहके वास, चतुष्यथपर, शक्ति घट जाती है। मन डावांडोल रहता अथवा सन्ध्याकाल अथवा अशुचि अवस्थामें पर्वसन्धिके मथुन, वस्तुका अनुभव और मोह लगता है। उन्मत्तता रजखला स्त्रोके अभिगमन, अध्ययन वलि मङ्गल- होनेसे मस्तिष्क बिगड़ता अथवा मस्तिष्क को। होमादि कार्य के अवैध आचरण, तुमुल युद्ध, देश कुल क्रियाका क्रमश: अवसान होने लगता है। मनकी। वा नगरादिके विनाश, स्त्रीके सन्तानोत्पादन, नाना- गति, इच्छा एवं प्रकृति उलट पलट जाती है। इस प्रकारके भूत और अशुचि स्पर्श, वमन तथा रक्तस्रावके उन्माद में प्रधानतः दो प्रकार होते हैं। कभी रोगी अशोच, अशुचि रहते चेत्य एवं देवालय वा नगर एवं स्थिरभाव पकड़ता है और कभी भोषण मूर्ति बना जनपद में रात्रिकालको चतुष्पय अथवा वायुमुख वा अनर्थ साधन करता है। उत्कण्ठा रोगमें शोक श्मशानके अभिमुख गमन, मांस मधु तिल गुड मद्य अथवा दुःख, मनका भाव एवं मस्तिष्कका कर्म प्रभृतिक सेवन को उच्छिष्टावस्था, विज गुरु देवता रागो बढ़ता है। कभी कभी एक विषयको चिन्तामें मन आदिको अवमानना, धर्मालापके व्यतिक्रम और पाप- अस्थिर होनेसे यह रोग लग जाता है। ऐसी अव कर्म अथवा अप्रशस्त काल में किसो मङ्गलकर कार्य के स्थाको ऐकान्तिक उन्माद कहते हैं। बुद्धि के विपर्ययमें आरम्भसे होती है। मानसिकक्रिया घट जाती है और मनपर अधिक दुबै भारतीय वैद्य कहते हैं-मोह छाने, मनमें उद्देग, लता आ जानसे मानसिकशक्ति अकर्मण्य हो जाती है। कर्णमें शब्द और हृदयमें अतिशय उत्साह समान, देह रोगका कोई अनुमान नहों लगा सकता। निबुद्धिता दुबलाने, अनपर अरुचि आने, स्वप्न में कलुषित द्रव्य वा जड़ताका रोग लगनेसे एककाल हो बुद्धिको शक्ति खाने और वायु द्वारा उन्मयन एवं भ्रमपान आदि लुप्त हो जाती है। किसी किसी स्थल में अति सामान्च लक्षण देखानसे उन्मादरोग शीघ्र आरोग्य होता है।* बुद्धिका परिचय मिलता है। यह रोग प्रायः शैशव चिकित्सा-देवता अथवा ग्रहादिद्वारा उन्माद उठने- वा बालककालमें होता है। जन्मकालीन अथवा | पर शान्ति और पौष्टिक आभिचारिक प्रभृति क्रियास किसी विशेष कारणसे बुद्धिको वृत्तिका पथ रुकनसे दब जाता है। साधारण औषधसे कोई फल नहों जड़ता बढ़ती है। निकलता। फिर भी यथार्थ शारीरिक और मानसिक महर्षि चरकका कथन है-“यस्तु दोषानिमित्तेभ्यो उन्मा. कारण लगनेपर भिन्न भिन्न उपायसे चिकित्सा चलाना देभ्यः समुत्थानपूर्वरूपलिङविशेषसमन्विती भवत्य न्मादस्तमागन्तुमाचचते।" चाहिये। अर्थात् जो उन्माद पूर्वोक्त दोषनिमित्तक उन्मादसे "उन्माद वातिके पूर्व नेहपानं विरेचनम् । विशेष निदान, पूर्वरूप एवं रूपविशेष रखता है, पित्त कफ जे वान्तिः पयोवस्ताहिकक्रमः ॥" (चक्रपापि) - वातिक उन्माद में स्नेहपान एवं विरेचन और उसका नाम आगन्तुक उन्माद है। किसीके मतमें पूर्व जन्मके अशुभ कर्मसे आगन्तुक उन्माद उठता है। इसमें पित्तज एवं कफज में वमन कराने बाद स्नेहपान, देवताके समान बलवीर्यादि देख पड़ते है। प्राचीन वस्ति शोधन तथा विरेचनके क्रमसे चिकित्सा वैद्योंकि विचारसे देवतादिके डर करनेसे उपजनेवाला होती है। रोग ही आगन्तुक उन्माद है। चरकने स्पष्ट कहा प्राचीन वैद्यगणके मतसे अपस्मार रोगको तरह उन्मादको चिकित्सा करनेसे भी निर्वाह हो जाता है-देवतागणको दृष्टि, गुरु वृद्ध सिद्ध या ऋषिगणके अभिशाप, पिलोकको अवज्ञा, गन्धवेगणके स्पर्श, “मोहोहे गौ खनः यौवे गावापामपकर्षयम् ॥ शरीरमें यक्ष तथा राक्षस प्रभृतिके प्रवेश पौर पिशाच- अत्यु तसाहोऽरुचिचा खप्ने कलुषभोजनम् । गणक पारोहणसे उन्माद उपजता है। जाता है। वायुनोन्मथनञ्चापि धमश्च क्रमतस्तथा। पूर्वोक्त देवतादिके द्वारा उन्मादकी उर यस्य स्यादचिरेणैवमुन्माद सोऽधिगच्छति ॥" (सञ्जत)<noinclude></noinclude> 8dvmyy7lj1ebjsnmuyj4p23m9kl5hsr 668196 668185 2026-07-19T06:28:49Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 668196 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उन्माद|२९१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कभी बुरी राह चलनेको जी चाहता है। मेधाकी शक्ति घट जाती है। मन डावांडोल रहता अथवा वस्तुका अनुभव और मोह लगता है। उन्मत्तता होनेसे मस्तिष्क बिगड़ता अथवा मस्तिष्क की क्रियाका क्रमशः अवसान होने लगता है। मनकी गति, इच्छा एवं प्रकृति उलट पलट जाती है। इस उन्मादमें प्रधानतः दो प्रकार होते हैं। कभी रोगी स्थिरभाव पकड़ता है और कभी भीषण मूर्ति बना अनर्थ साधन करता है। उत्कण्ठा रोगमें शोक अथवा दुःख, मनका भाव एवं मस्तिष्कका कार्य बढ़ता है। कभी कभी एक विषयकी चिन्तामें मन अस्थिर होनेसे यह रोग लग जाता है। ऐसी अवस्थाको एकान्तिक उन्माद कहते हैं। बुद्धिके विपर्ययमें मानसिकक्रिया घट जाती है और मनपर अधिक दुर्बलता आ जानेसे मानसिकशक्ति अकर्मण्य हो जाती है। रोगका कोई अनुमान नहीं लगा सकता। निर्बुद्धिता वा जड़ताका रोग लगनेसे एककाल ही बुद्धिकी शक्ति लुप्त हो जाती है। किसी स्थलमें अति सामान्य बुद्धिका परिचय मिलता है। यह रोग प्रायः गर्भाव वा बाल्यकालमें होता है। जन्मकालीन अथवा किसी विशेष कारणसे बुद्धिकी वृत्तिका पथ रुकनेसे जड़ता बढ़ती है। महर्षि चरकका कथन है—<small>"यस्तु दोषानिमित्तेभ्यो उन्मादेभ्यः समुत्थानपूर्वरूपलिङ्गविशेषसमन्वितो भवत्य न्मादस्तमानुमाचक्षते।"</small> अर्थात् जो उन्माद पूर्वोक्त दोषनिमित्तक उन्मादसे विशेष निदान, पूर्वरूप एवं रूपविशेष रखता है, उसका नाम आगन्तुक उन्माद है। किसीके मतमें पूर्व जन्मके अशुभ कर्मसे आगन्तुक उन्माद उठता है। इसमें देवताके समान बलवीर्यादि देख पड़ते है। प्राचीन वैद्योंके विचारसे देवतादिके डर करनेसे उपजनेवाला रोग ही आगन्तुक उन्माद है। चरकने स्पष्ट कहा है—देवतागणकी दृष्टि, गुरु ब्रह्म सिद्ध या ऋषिगणके अभिशाप, पितृलोककी अवज्ञा, गन्धर्वगणके स्पर्श, शरीरमें यक्ष तथा राक्षस प्रभृतिको प्रवेश और पिशाचगणके आरोहणसे उन्माद उपजता है। पूर्वोक्त देवतादिके द्वारा उन्मादकी उत्पत्ति पूर्वोक्वत- {{Multicol-break}} पापके परिपाक, एकाकी शून्य गृहके वास, चतुष्पथपर, सन्ध्याकाल अथवा अशुचि अवस्थामें पर्वसन्धिके मथुन, रजस्वला स्त्रीके अभिगमन, अध्ययन बलि मङ्गलहोमादि कार्यके अवैध आचरण, तुमुल युद, देश कुल वा नगरादिके विनाश, स्त्रीके सन्तानोत्पादन, नानाप्रकारके भूत और अशुचि स्पर्श, वमन तथा रक्तस्रावके अशोच, अशुचि रहते चैत्य एवं देवालय वा नगर एवं जनपदमें रात्रिकालको चतुष्पथ अथवा वायुमुख वा श्मशानके अभिमुख गमन, मांस मधु तिल गुड़ मद्द प्रभृतिके सेवनको उच्छिष्टावस्था, द्विज गुरु देवता रोगी आदिकी अवमानना, धर्मालापके व्यतिक्रम और पापकर्म अथवा अप्रशस्त कालमें किसी मङ्गलकर कार्यके आरम्भसे होता है। भारतीय वैद्य कहते हैं—मोह छाने, मनमें उद्वेग, कार्यमें शब्द और हृदयमें अतिशय उत्साह समाने, देह दुबलाने, अन्नपर अश्रुचि आने, स्वप्नमें कलुषित द्रव्य खाने और वायु द्वारा उत्थापन एवं भ्रमपान आदि लक्षण देखनेसे उन्मादरोग शीघ्र आरोग्य होता है।<ref>{{block center|<poem><small> "मोहो द्दे गौः खनः श्रोवे गावाषामपकर्षणम्॥ अत्यु तषाहोऽरूचिश्रान्ने स्वप्ने कलुषभोजनम्। वायुनोन्मयनञ्चापि भमष क्रमतस्तथा। यस्य स्यादचिरेणेवमुन्मादं सोऽधिगच्छति॥" (सुश्रुत)</small></poem>}}</ref> <small>चिकित्सा</small>—देवता अथवा ग्रहादि द्वारा उन्माद उठनेपर शान्ति और पौष्टिक आमिचारिक प्रकृति क्रियासे दव जाता है। साधारण औषधसे कोई फल नहीं निकलता। फिर भी यथार्थ शारीरिक और मानसिक कारण लगनेपर भिन्न भिन्न उपायसे चिकित्सा चलाना चाहिये। {{block center|<poem><small> "उन्मादे वातिके पूर्वं स्नेहपानं विरेचनम्। पित्तजे कफजे वान्तिः पयोवस्त्यादिक्रमः॥" (चक्रपाणि)</small></poem>}} वातिक उन्मादमें स्नेहपान एवं विरेचन और पित्तज एवं कफजमें वमन कराने बाद स्नेहपान, वस्ति शाधन तथा विरेचनके क्रमसे चिकित्सा होती है। प्राचीन वैद्यगणके मतसे अपस्म्रार रोगकी तरह उन्मादकी चिकित्सा करनेसे भी निर्वाह हो जाता {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> rxj2n03gflvaptarfd46456jedsmvyj 668197 668196 2026-07-19T06:29:43Z अनुश्री साव 80 668197 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उन्माद|२९१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कभी बुरी राह चलनेको जी चाहता है। मेधाकी शक्ति घट जाती है। मन डावांडोल रहता अथवा वस्तुका अनुभव और मोह लगता है। उन्मत्तता होनेसे मस्तिष्क बिगड़ता अथवा मस्तिष्क की क्रियाका क्रमशः अवसान होने लगता है। मनकी गति, इच्छा एवं प्रकृति उलट पलट जाती है। इस उन्मादमें प्रधानतः दो प्रकार होते हैं। कभी रोगी स्थिरभाव पकड़ता है और कभी भीषण मूर्ति बना अनर्थ साधन करता है। उत्कण्ठा रोगमें शोक अथवा दुःख, मनका भाव एवं मस्तिष्कका कार्य बढ़ता है। कभी कभी एक विषयकी चिन्तामें मन अस्थिर होनेसे यह रोग लग जाता है। ऐसी अवस्थाको एकान्तिक उन्माद कहते हैं। बुद्धिके विपर्ययमें मानसिकक्रिया घट जाती है और मनपर अधिक दुर्बलता आ जानेसे मानसिकशक्ति अकर्मण्य हो जाती है। रोगका कोई अनुमान नहीं लगा सकता। निर्बुद्धिता वा जड़ताका रोग लगनेसे एककाल ही बुद्धिकी शक्ति लुप्त हो जाती है। किसी स्थलमें अति सामान्य बुद्धिका परिचय मिलता है। यह रोग प्रायः गर्भाव वा बाल्यकालमें होता है। जन्मकालीन अथवा किसी विशेष कारणसे बुद्धिकी वृत्तिका पथ रुकनेसे जड़ता बढ़ती है। महर्षि चरकका कथन है—<small>"यस्तु दोषानिमित्तेभ्यो उन्मादेभ्यः समुत्थानपूर्वरूपलिङ्गविशेषसमन्वितो भवत्य न्मादस्तमानुमाचक्षते।"</small> अर्थात् जो उन्माद पूर्वोक्त दोषनिमित्तक उन्मादसे विशेष निदान, पूर्वरूप एवं रूपविशेष रखता है, उसका नाम आगन्तुक उन्माद है। किसीके मतमें पूर्व जन्मके अशुभ कर्मसे आगन्तुक उन्माद उठता है। इसमें देवताके समान बलवीर्यादि देख पड़ते है। प्राचीन वैद्योंके विचारसे देवतादिके डर करनेसे उपजनेवाला रोग ही आगन्तुक उन्माद है। चरकने स्पष्ट कहा है—देवतागणकी दृष्टि, गुरु ब्रह्म सिद्ध या ऋषिगणके अभिशाप, पितृलोककी अवज्ञा, गन्धर्वगणके स्पर्श, शरीरमें यक्ष तथा राक्षस प्रभृतिको प्रवेश और पिशाचगणके आरोहणसे उन्माद उपजता है। पूर्वोक्त देवतादिके द्वारा उन्मादकी उत्पत्ति पूर्वोक्वत- {{Multicol-break}} पापके परिपाक, एकाकी शून्य गृहके वास, चतुष्पथपर, सन्ध्याकाल अथवा अशुचि अवस्थामें पर्वसन्धिके मथुन, रजस्वला स्त्रीके अभिगमन, अध्ययन बलि मङ्गलहोमादि कार्यके अवैध आचरण, तुमुल युद, देश कुल वा नगरादिके विनाश, स्त्रीके सन्तानोत्पादन, नानाप्रकारके भूत और अशुचि स्पर्श, वमन तथा रक्तस्रावके अशोच, अशुचि रहते चैत्य एवं देवालय वा नगर एवं जनपदमें रात्रिकालको चतुष्पथ अथवा वायुमुख वा श्मशानके अभिमुख गमन, मांस मधु तिल गुड़ मद्द प्रभृतिके सेवनको उच्छिष्टावस्था, द्विज गुरु देवता रोगी आदिकी अवमानना, धर्मालापके व्यतिक्रम और पापकर्म अथवा अप्रशस्त कालमें किसी मङ्गलकर कार्यके आरम्भसे होता है। भारतीय वैद्य कहते हैं—मोह छाने, मनमें उद्वेग, कार्यमें शब्द और हृदयमें अतिशय उत्साह समाने, देह दुबलाने, अन्नपर अश्रुचि आने, स्वप्नमें कलुषित द्रव्य खाने और वायु द्वारा उत्थापन एवं भ्रमपान आदि लक्षण देखनेसे उन्मादरोग शीघ्र आरोग्य होता है।<ref>{{block center|<poem><small> "मोहो द्दे गौः खनः श्रोवे गावाषामपकर्षणम्॥ अत्यु तषाहोऽरूचिश्रान्ने स्वप्ने कलुषभोजनम्। वायुनोन्मयनञ्चापि भमष क्रमतस्तथा। यस्य स्यादचिरेणेवमुन्मादं सोऽधिगच्छति॥" (सुश्रुत)</small></poem>}}</ref> <small>चिकित्सा</small>—देवता अथवा ग्रहादि द्वारा उन्माद उठनेपर शान्ति और पौष्टिक आमिचारिक प्रकृति क्रियासे दव जाता है। साधारण औषधसे कोई फल नहीं निकलता। फिर भी यथार्थ शारीरिक और मानसिक कारण लगनेपर भिन्न भिन्न उपायसे चिकित्सा चलाना चाहिये। {{block center|<poem><small> "उन्मादे वातिके पूर्वं स्नेहपानं विरेचनम्। पित्तजे कफजे वान्तिः पयोवस्त्यादिक्रमः॥" (चक्रपाणि)</small></poem>}} वातिक उन्मादमें स्नेहपान एवं विरेचन और पित्तज एवं कफजमें वमन कराने बाद स्नेहपान, वस्ति शाधन तथा विरेचनके क्रमसे चिकित्सा होती है। प्राचीन वैद्यगणके मतसे अपस्म्रार रोगकी तरह उन्मादकी चिकित्सा करनेसे भी निर्वाह हो जाता {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> h4yaddxbsm9amzjl7frvdssdbq79kcq पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२९१ 250 75705 668144 303021 2026-07-18T18:45:28Z अनुश्री साव 80 668144 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२९०|उन्माद}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} २६० उन्माद लोभ हर्ष भय शोक चिन्ता प्रमृतिक वशवों हो। अल्प निद्रा, कभो खाने को अनिच्छा, निर्जन एवं उण चित्तको दोष लगाता और जो बुद्धिको चञ्चलतासे रहनेको उत्कण्ठा, बीभत्सभाव, मुखपर शोथ, सादे दोषसमूहके प्रबल वेगसे तपकर हृदयस्थानको जाने चक्षु, स्थिर तथा आंख का मलमें ढाका और कफके हित- तथा मनको गति सकल घरमें अानपर मन, बुद्धि, जनकसे विपरीत द्रव्य खानसे अपकारका बोध होता है। संज्ञा, ज्ञान, स्मति, भक्ति, स्वभाव, चेष्टा तथा आहार वायुके प्रकोपसे जो उन्माद उठता है, उसमें देहको आदिका विश्वम पाता,उसोको उन्माद रोग दबाता है। रुक्षता, कर्कशता, श्वास, दुर्बलता, अङ्गको सन्धिका ___ उन्माद रोग लगने के पूर्व यह लक्षण देख पड़ता स्फरण, आस्फालन, नृत्य, गीत, रोदन, भ्रमण प्रभृति है-मस्तकका शून्य भाव, चक्षुद्दयका चाञ्चल्य, कर्णमें लक्षण रहते हैं। ध्वनि, निखास प्रवासका आधिक्य, मुखसे लारकी सविपातसे उन्माद आनेपर तोना दोषों का लक्षण टपक, भोजनमें अनिच्छा, अरुचि, हृदयमें वेदना, मिलता है। किसौके मतमें सत्रिपात जन्य उन्माद अकारण चिन्ता, अविपाक, परिश्रम का बोध, मोह, आरोग्य हो जाता है। किन्तु सम्पूर्ण लक्षण देख पड़ने मदका उद्वेग, लोमका हर्षण, ज्वर, मुख कुटि द्वारा पर रोग असाध्य ठहरता है। चक्षु तथा मुखको वक्रता, सोते समय भ्रम एव चित्र चौर, राजपुरुष वा शत्र द्वारा अत्यन्त भय पाने वा विचित्र प्रदर्शन, चक्षुका श्रावर्तन और प्रबल नदीको | अत्यन्त क्षोभ पाने अथवा अतिशय स्त्रोका ससर्ग धारामें कूद पड़ने की इच्छा। उठानेसे मनका उत्कट विकार बढ़ता है। चरक मतमें उन्माद रोग पांच प्रकारका होता है विषजन्य उन्माद में रोगो मूढ़ भावसे गाता हंसता १ वातज, २ पित्तज, ३ कफज, ४ सन्निपातज और या रोता है। चक्षु रक्त वर्ण पड़ जाते हैं। बल और .५ आगन्तुक ।* इन्द्रियोंका तेज घट जाता है। दोनभाव बढ़ने लगता पित्तोन्मादका लक्षण यह है-क्रोध, गर्व, अस- है। मुख कपिशवर्ण देखाई देता है। संज्ञाको हिष्णुता, जहां तहां ढील, काष्ठ वा अस्त्रादि फेंकना, होनता आती है। घुसा मारना, अपनी वा दूसरेको छाया देखना, ठण्डा महर्षि चरकने कहा है-वात, पित्त एवं कफज जल और वासी भात खाने को इच्छा, सर्वदा सन्तापक उन्मादमें जो कारण है, उन्होंसे अति भयङ्कर त्रिदोष- बोध, चक्षु तमतमाना, हरा या पीला पड़ना, सर्वदा का उन्माद उपजता है। उसमें तीनो दोषांका कारण चक्षु घूमते जैसे रहना। लक्षण देखाई देता है। सुश्रुतने त्रिदोषजनितको कफोन्मादमें ये देखते हैं-वमन,अग्निमान्द्य, अङ्गको सन्निपात-जन्य उन्माद लिखा है। प्रवसनता, अरुचि, कास, स्वीसंसर्गका अभिलाष, अल्प युरोपके प्रधान प्रधान चिकित्सक उन्माद रोगको ( Insanity) छः भागमें बांटते हैं-१म मतिविश्वम । • “एकैकश: समस्त व दोष धरत्यर्थमूर्छितैः । ( Delirium),श्य उन्मत्तता (Mania or Hyper- मानसेन च दुःखेन स पञ्चविध उचाते। phrenic), ३य उत्कण्ठारोग वा विषमता ( Melan- विषाद्भवति षष्ठय यथास्वन्नव भेषजम्।" (सुअत) cholia), ४थ विषाद ( Hypochondriasis), ५म विदोष भिन्न भिन्न वा पनन्य भावमें बिगड़ने अथवा मानसिक दुःख बुद्धिविपर्यय ( Dementia) और ठ जड़ता वा आगनेसे पांच प्रकारका उन्माद उपजता । सिवा इसके षष्ठ उन्माद निबुहिता ( Idiotey )। मतिमें विभ्रम पड़नेसे विषसे पाता है। इससे स्व स्व कारण समझ कर उनकी चिकित्सा चलाना चाहिये। अभिप्राय ठीक नहीं उतरता। कभी भली और + सुनुतने पित्तोन्मादका लक्षण कुछ विशेष लिखा है- वृषा, खेद, दाइ, पतिभोजन, निद्राको होनता, छाया, वायु एवं "हट्खे ददाहबहुली बहुभुम्विनिद्रछायाहिमानिखजलानविकारसेवी। । मलकै विहारमै पभिलाष, तौच्च-हिम-जख प्रतिसे भय, दिनकै समय नौलो हिमान्छ निचयेऽपि स वप्रियको पिचादिवा नभसि पश्यति तारकाथ।" पाकाथमें वाराका दर्शन। ।<noinclude></noinclude> on4cous7mj2aau6811ug4yqacj61wge 668150 668144 2026-07-18T19:12:40Z अनुश्री साव 80 668150 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२९०|उन्माद}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} लोभ हर्ष भय शोक चिन्ता। प्रकृतिके वशवर्तीं हो चित्तको दोष लगाता और जो बुद्धिकी चञ्चलतासे दोषसमूहके प्रबल वेगसे तपकर हृदयस्थानको जाने तथा मनकी गति सकल चेष्टमें आनेपर मन, बुद्धि, संज्ञा, ज्ञान, स्मृति, भक्ति, स्वभाव, चेष्टा तथा आहार आदिका विभ्रम पाता,उसीको उन्माद रोग दबाता है। उन्माद रोग लगनेके पूर्व यह लक्षण देख पड़ता है—मस्तकका शून्य भाव, चक्षुका चाञ्चल्य, कर्णमें ध्वनि, निश्वास प्रश्वासका आधिक्य, मुखसे लारका टपक, भोजनमें अनिच्छा, अरुचि, हृदयमें वेदना, अकारण चिन्ता, अविपाक, परिश्रमका बोध, मोह, मदका उद्वेग, लोमका हर्षण, ज्वर, मुखभ्रुकुटि द्वारा चक्षु तथा मुखकी वक्रता, सोते समय भ्रम एवं चित्त-विचित्र प्रदर्शन, चक्षुका आवर्तन और प्रबल नदीकी धारामें कूद पड़नेकी इच्छा। चरकके मतमें उन्माद रोग पांच प्रकारका होता है— १ वातज, २ पित्तज, ३ कफज, ४ सन्निपातज और ५ आगन्तुक।<ref><poem><small> "एकैकशः समस्तैश्च दोषैर्धर्यभ्रसङ्क्षयैः। मानसैश्च दुःखैश्च पञ्चविध उच्यते॥ विषाद्वापि षष्ठ यथासङ्ख्यं भेषजम्।" (सुश्रुत)</small></poem>}} <snall>विदोष भिन्न भिन्न वा अनन्य भावमें बिगड़ने अथवा मानसिक दुःख लगनेसे पांच प्रकारका उन्माद उत्पन्न होता । सिवा इसके षष्ठ उन्माद विषसे आता है। इसीसे स्व स्व कारण समझ कर उनकी चिकित्सा कराना चाहिये। पित्तोन्मादका लक्षण यह है—क्रोध, गर्व, असहिष्णुता, जढ़ां तढ़ां ढील, काष्ठ वा अस्त्रादि फेंकना, घूंसा मारना, अपनी वा दूसरेको छाया देखना, ठण्डा जल और वासी भात खानेको इच्छा, सदैव सन्तापक बोध, चक्षु तमतमाना, हरा या पीला पड़ना, सदैव चक्षु घूमते जैसे रहना। कफोन्मादमें ये देखते हैं—वमन,अग्निमान्द्य, अङ्गकी शवसदृशता, अरुचि, कास, स्त्रीसंगका अभिलाष, अल्प ६० उन्माद लोभ हर्ष भय शोक चिन्ता प्रमृतिक वशवों हो। अल्प निद्रा, कभो खाने को अनिच्छा, निर्जन एवं उण चित्तको दोष लगाता और जो बुद्धिको चञ्चलतासे रहनेको उत्कण्ठा, बीभत्सभाव, मुखपर शोथ, सादे दोषसमूहके प्रबल वेगसे तपकर हृदयस्थानको जाने चक्षु, स्थिर तथा आंख का मलमें ढाका और कफके हित- तथा मनको गति सकल घरमें अानपर मन, बुद्धि, जनकसे विपरीत द्रव्य खानसे अपकारका बोध होता है। संज्ञा, ज्ञान, स्मति, भक्ति, स्वभाव, चेष्टा तथा आहार वायुके प्रकोपसे जो उन्माद उठता है, उसमें देहको आदिका विश्वम पाता,उसोको उन्माद रोग दबाता है। रुक्षता, कर्कशता, श्वास, दुर्बलता, अङ्गको सन्धिका ___ उन्माद रोग लगने के पूर्व यह लक्षण देख पड़ता स्फरण, आस्फालन, नृत्य, गीत, रोदन, भ्रमण प्रभृति है-मस्तकका शून्य भाव, चक्षुद्दयका चाञ्चल्य, कर्णमें लक्षण रहते हैं। ध्वनि, निखास प्रवासका आधिक्य, मुखसे लारकी सविपातसे उन्माद आनेपर तोना दोषों का लक्षण टपक, भोजनमें अनिच्छा, अरुचि, हृदयमें वेदना, मिलता है। किसौके मतमें सत्रिपात जन्य उन्माद अकारण चिन्ता, अविपाक, परिश्रम का बोध, मोह, आरोग्य हो जाता है। किन्तु सम्पूर्ण लक्षण देख पड़ने मदका उद्वेग, लोमका हर्षण, ज्वर, मुख कुटि द्वारा पर रोग असाध्य ठहरता है। चक्षु 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हैं-वमन,अग्निमान्द्य, अङ्गको सन्निपात-जन्य उन्माद लिखा है। प्रवसनता, अरुचि, कास, स्वीसंसर्गका अभिलाष, अल्प युरोपके प्रधान प्रधान चिकित्सक उन्माद रोगको ( Insanity) छः भागमें बांटते हैं-१म मतिविश्वम । • “एकैकश: समस्त व दोष धरत्यर्थमूर्छितैः । ( Delirium),श्य उन्मत्तता (Mania or Hyper- मानसेन च दुःखेन स पञ्चविध उचाते। phrenic), ३य उत्कण्ठारोग वा विषमता ( Melan- विषाद्भवति षष्ठय यथास्वन्नव भेषजम्।" (सुअत) cholia), ४थ विषाद ( Hypochondriasis), ५म विदोष भिन्न भिन्न वा पनन्य भावमें बिगड़ने अथवा मानसिक दुःख बुद्धिविपर्यय ( Dementia) और ठ जड़ता वा आगनेसे पांच प्रकारका उन्माद उपजता । सिवा इसके षष्ठ उन्माद निबुहिता ( Idiotey )। मतिमें विभ्रम पड़नेसे विषसे पाता है। इससे स्व स्व कारण समझ कर उनकी चिकित्सा चलाना चाहिये। अभिप्राय ठीक नहीं उतरता। कभी भली और + सुनुतने पित्तोन्मादका लक्षण कुछ विशेष लिखा है- वृषा, खेद, दाइ, पतिभोजन, निद्राको होनता, छाया, वायु एवं "हट्खे ददाहबहुली बहुभुम्विनिद्रछायाहिमानिखजलानविकारसेवी। । मलकै विहारमै पभिलाष, तौच्च-हिम-जख प्रतिसे भय, दिनकै समय नौलो हिमान्छ निचयेऽपि स वप्रियको पिचादिवा नभसि पश्यति तारकाथ।" पाकाथमें वाराका दर्शन। ।<noinclude></noinclude> n0b9m3pyany9ca9m72c9jvcxusfpsj2 668151 668150 2026-07-18T19:21:35Z अनुश्री साव 80 668151 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२९०|उन्माद}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} लोभ हर्ष भय शोक चिन्ता। प्रकृतिके वशवर्तीं हो चित्तको दोष लगाता और जो बुद्धिकी चञ्चलतासे दोषसमूहके प्रबल वेगसे तपकर हृदयस्थानको जाने तथा मनकी गति सकल चेष्टमें आनेपर मन, बुद्धि, संज्ञा, ज्ञान, स्मृति, भक्ति, स्वभाव, चेष्टा तथा आहार आदिका विभ्रम पाता,उसीको उन्माद रोग दबाता है। उन्माद रोग लगनेके पूर्व यह लक्षण देख पड़ता है—मस्तकका शून्य भाव, चक्षुका चाञ्चल्य, कर्णमें ध्वनि, निश्वास प्रश्वासका आधिक्य, मुखसे लारका टपक, भोजनमें अनिच्छा, अरुचि, हृदयमें वेदना, अकारण चिन्ता, अविपाक, परिश्रमका बोध, मोह, मदका उद्वेग, लोमका हर्षण, ज्वर, मुखभ्रुकुटि द्वारा चक्षु तथा मुखकी वक्रता, सोते समय भ्रम एवं चित्त-विचित्र प्रदर्शन, चक्षुका आवर्तन और प्रबल नदीकी धारामें कूद पड़नेकी इच्छा। चरकके 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हैं—वमन,अग्निमान्द्य, अङ्गकी अवसन्नता, अरुचि, कास, स्त्रीसंगका अभिलाष, अल्प {{rule} {{smallrefs}} {{Multicol-break}} ६० उन्माद लोभ हर्ष भय शोक चिन्ता प्रमृतिक वशवों हो। अल्प निद्रा, कभो खाने को अनिच्छा, निर्जन एवं उण चित्तको दोष लगाता और जो बुद्धिको चञ्चलतासे रहनेको उत्कण्ठा, बीभत्सभाव, मुखपर शोथ, सादे दोषसमूहके प्रबल वेगसे तपकर हृदयस्थानको जाने चक्षु, स्थिर तथा आंख का मलमें ढाका और कफके हित- तथा मनको गति सकल घरमें अानपर मन, बुद्धि, जनकसे विपरीत द्रव्य खानसे अपकारका बोध होता है। संज्ञा, ज्ञान, स्मति, भक्ति, स्वभाव, चेष्टा तथा आहार वायुके प्रकोपसे जो उन्माद उठता है, उसमें देहको आदिका विश्वम पाता,उसोको उन्माद रोग दबाता है। रुक्षता, कर्कशता, श्वास, दुर्बलता, अङ्गको सन्धिका ___ उन्माद रोग लगने के पूर्व यह लक्षण देख पड़ता स्फरण, आस्फालन, नृत्य, गीत, रोदन, भ्रमण प्रभृति है-मस्तकका शून्य भाव, चक्षुद्दयका चाञ्चल्य, कर्णमें लक्षण रहते हैं। ध्वनि, निखास प्रवासका आधिक्य, मुखसे लारकी सविपातसे उन्माद आनेपर तोना दोषों का लक्षण टपक, भोजनमें अनिच्छा, अरुचि, हृदयमें वेदना, मिलता है। किसौके मतमें सत्रिपात जन्य उन्माद अकारण चिन्ता, अविपाक, परिश्रम का बोध, मोह, आरोग्य हो जाता है। किन्तु सम्पूर्ण लक्षण देख पड़ने मदका उद्वेग, लोमका हर्षण, ज्वर, मुख कुटि द्वारा पर रोग असाध्य ठहरता है। चक्षु तथा मुखको वक्रता, सोते समय भ्रम एव चित्र चौर, राजपुरुष वा शत्र द्वारा अत्यन्त भय पाने वा विचित्र प्रदर्शन, चक्षुका श्रावर्तन और प्रबल नदीको | अत्यन्त क्षोभ पाने अथवा अतिशय स्त्रोका ससर्ग धारामें कूद पड़ने की इच्छा। उठानेसे मनका उत्कट विकार बढ़ता है। चरक मतमें उन्माद रोग पांच प्रकारका होता है विषजन्य उन्माद में रोगो मूढ़ भावसे गाता हंसता १ वातज, २ पित्तज, ३ कफज, ४ सन्निपातज और या रोता है। चक्षु रक्त वर्ण पड़ जाते हैं। बल और .५ आगन्तुक ।* इन्द्रियोंका तेज घट जाता है। दोनभाव बढ़ने लगता पित्तोन्मादका लक्षण यह है-क्रोध, गर्व, अस- है। मुख कपिशवर्ण देखाई देता है। संज्ञाको हिष्णुता, जहां तहां ढील, काष्ठ वा अस्त्रादि फेंकना, होनता आती है। घुसा मारना, अपनी वा दूसरेको छाया देखना, ठण्डा महर्षि चरकने कहा है-वात, पित्त एवं कफज जल और वासी भात खाने को इच्छा, सर्वदा सन्तापक उन्मादमें जो कारण है, उन्होंसे अति भयङ्कर त्रिदोष- बोध, चक्षु तमतमाना, हरा या पीला पड़ना, सर्वदा का उन्माद उपजता है। उसमें तीनो दोषांका कारण चक्षु घूमते जैसे रहना। लक्षण देखाई देता है। सुश्रुतने त्रिदोषजनितको कफोन्मादमें ये देखते हैं-वमन,अग्निमान्द्य, अङ्गको सन्निपात-जन्य उन्माद लिखा है। प्रवसनता, अरुचि, कास, स्वीसंसर्गका अभिलाष, अल्प युरोपके प्रधान प्रधान चिकित्सक उन्माद रोगको ( Insanity) छः भागमें बांटते हैं-१म मतिविश्वम । • “एकैकश: समस्त व दोष धरत्यर्थमूर्छितैः । ( Delirium),श्य उन्मत्तता (Mania or Hyper- मानसेन च दुःखेन स पञ्चविध उचाते। phrenic), ३य उत्कण्ठारोग वा विषमता ( Melan- विषाद्भवति षष्ठय यथास्वन्नव भेषजम्।" (सुअत) cholia), ४थ विषाद ( Hypochondriasis), ५म विदोष भिन्न भिन्न वा पनन्य भावमें बिगड़ने अथवा मानसिक दुःख बुद्धिविपर्यय ( Dementia) और ठ जड़ता वा आगनेसे पांच प्रकारका उन्माद उपजता । सिवा इसके षष्ठ उन्माद निबुहिता ( Idiotey )। मतिमें विभ्रम पड़नेसे विषसे पाता है। इससे स्व स्व कारण समझ कर उनकी चिकित्सा चलाना चाहिये। अभिप्राय ठीक नहीं उतरता। कभी भली और + सुनुतने पित्तोन्मादका लक्षण कुछ विशेष लिखा है- वृषा, खेद, दाइ, पतिभोजन, निद्राको होनता, छाया, वायु एवं "हट्खे ददाहबहुली बहुभुम्विनिद्रछायाहिमानिखजलानविकारसेवी। । मलकै विहारमै पभिलाष, तौच्च-हिम-जख प्रतिसे भय, दिनकै समय नौलो हिमान्छ निचयेऽपि स वप्रियको पिचादिवा नभसि पश्यति तारकाथ।" पाकाथमें वाराका दर्शन। ।<noinclude></noinclude> qkn42cw8hgeajua5u3xa02lc4vlr4y5 668152 668151 2026-07-18T19:23:25Z अनुश्री साव 80 668152 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२९०|उन्माद}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} लोभ हर्ष भय शोक चिन्ता। प्रकृतिके वशवर्तीं हो चित्तको दोष लगाता और जो बुद्धिकी चञ्चलतासे दोषसमूहके प्रबल वेगसे तपकर हृदयस्थानको जाने तथा मनकी गति सकल चेष्टमें आनेपर मन, बुद्धि, संज्ञा, ज्ञान, स्मृति, भक्ति, स्वभाव, चेष्टा तथा आहार आदिका विभ्रम पाता,उसीको उन्माद रोग दबाता है। उन्माद रोग लगनेके पूर्व यह लक्षण देख पड़ता है—मस्तकका शून्य भाव, चक्षुका चाञ्चल्य, कर्णमें ध्वनि, निश्वास प्रश्वासका आधिक्य, मुखसे लारका टपक, भोजनमें अनिच्छा, अरुचि, हृदयमें वेदना, अकारण चिन्ता, अविपाक, परिश्रमका बोध, मोह, मदका उद्वेग, लोमका हर्षण, ज्वर, मुखभ्रुकुटि द्वारा चक्षु तथा मुखकी वक्रता, सोते समय भ्रम एवं चित्त-विचित्र प्रदर्शन, चक्षुका आवर्तन और प्रबल नदीकी धारामें कूद पड़नेकी इच्छा। चरकके मतमें उन्माद रोग पांच प्रकारका होता है— १ वातज, २ पित्तज, ३ कफज, ४ सन्निपातज और ५ आगन्तुक।<ref>{{block center|<poem><small> "एकैकशः समस्तैश्च दोषैर्धर्यभ्रसङ्क्षयैः। मानसैश्च दुःखैश्च पञ्चविध उच्यते॥ विषाद्वापि षष्ठ यथासङ्ख्यं भेषजम्।" (सुश्रुत)</small></poem>}} <small>विदोष भिन्न भिन्न वा अनन्य भावमें बिगड़ने अथवा मानसिक दुःख लगनेसे पांच प्रकारका उन्माद उत्पन्न होता। सिवा इसके षष्ठ उन्माद विषसे आता है। इसीसे स्व स्व कारण समझ कर उनकी चिकित्सा कराना चाहिये।</small></ref> पित्तोन्मादका लक्षण यह है—क्रोध, गर्व, असहिष्णुता, जढ़ां तढ़ां ढील, काष्ठ वा अस्त्रादि फेंकना, घूंसा मारना, अपनी वा दूसरेको छाया देखना, ठण्डा जल और वासी भात खानेको इच्छा, सदैव सन्तापक बोध, चक्षु तमतमाना, हरा या पीला पड़ना, सदैव चक्षु घूमते जैसे रहना।<ref> † सुश्रुतने पित्तोन्मादका लक्षण कुछ विशेष लिखा है— {{block center|<poem><small> "तृट्स्वे ददाहङ्क्षली षङ्मूष्णिन्द्रधयाहिमानिक्षालाविशस्त्रसेवी। शीतो हिमान्शु निचयेऽपि स वक्रिशङ्डी पित्ताहिब नभसि पश्यति तारकाच।"</small></poem>}}</ref> कफोन्मादमें ये देखते हैं—वमन,अग्निमान्द्य, अङ्गकी अवसन्नता, अरुचि, कास, स्त्रीसंगका अभिलाष, अल्प {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-break}} ६० उन्माद लोभ हर्ष भय शोक चिन्ता प्रमृतिक वशवों हो। अल्प निद्रा, कभो खाने को अनिच्छा, निर्जन एवं उण चित्तको दोष लगाता और जो बुद्धिको चञ्चलतासे रहनेको उत्कण्ठा, बीभत्सभाव, मुखपर शोथ, सादे दोषसमूहके प्रबल वेगसे तपकर हृदयस्थानको जाने चक्षु, स्थिर तथा आंख का मलमें ढाका और कफके हित- तथा मनको गति सकल घरमें अानपर मन, बुद्धि, जनकसे विपरीत द्रव्य खानसे अपकारका बोध होता है। संज्ञा, ज्ञान, स्मति, भक्ति, स्वभाव, चेष्टा तथा आहार वायुके प्रकोपसे जो उन्माद उठता है, उसमें देहको आदिका विश्वम पाता,उसोको उन्माद रोग दबाता है। रुक्षता, कर्कशता, श्वास, दुर्बलता, अङ्गको सन्धिका ___ उन्माद रोग लगने के पूर्व यह लक्षण देख पड़ता स्फरण, आस्फालन, नृत्य, गीत, रोदन, भ्रमण प्रभृति है-मस्तकका शून्य भाव, चक्षुद्दयका चाञ्चल्य, कर्णमें लक्षण रहते हैं। ध्वनि, निखास प्रवासका आधिक्य, मुखसे लारकी सविपातसे उन्माद आनेपर तोना दोषों का लक्षण टपक, भोजनमें अनिच्छा, अरुचि, हृदयमें वेदना, मिलता है। किसौके मतमें सत्रिपात जन्य उन्माद अकारण चिन्ता, अविपाक, परिश्रम का बोध, मोह, आरोग्य हो जाता है। किन्तु सम्पूर्ण लक्षण देख पड़ने मदका उद्वेग, लोमका हर्षण, ज्वर, मुख कुटि द्वारा पर रोग असाध्य ठहरता है। चक्षु तथा मुखको वक्रता, सोते समय भ्रम एव चित्र चौर, राजपुरुष वा शत्र द्वारा अत्यन्त भय पाने वा विचित्र प्रदर्शन, चक्षुका श्रावर्तन और प्रबल नदीको | अत्यन्त क्षोभ पाने अथवा अतिशय स्त्रोका ससर्ग धारामें कूद पड़ने की इच्छा। उठानेसे मनका उत्कट विकार बढ़ता है। चरक मतमें उन्माद रोग पांच प्रकारका होता है विषजन्य उन्माद में रोगो मूढ़ भावसे गाता हंसता १ वातज, २ पित्तज, ३ कफज, ४ सन्निपातज और या रोता है। चक्षु रक्त वर्ण पड़ जाते हैं। बल और .५ आगन्तुक ।* इन्द्रियोंका तेज घट जाता है। दोनभाव बढ़ने लगता पित्तोन्मादका लक्षण यह है-क्रोध, गर्व, अस- है। मुख कपिशवर्ण देखाई देता है। संज्ञाको हिष्णुता, जहां तहां ढील, काष्ठ वा अस्त्रादि फेंकना, होनता आती है। घुसा मारना, अपनी वा दूसरेको छाया देखना, ठण्डा महर्षि चरकने कहा है-वात, पित्त एवं कफज जल और वासी भात खाने को इच्छा, सर्वदा सन्तापक उन्मादमें जो कारण है, उन्होंसे अति भयङ्कर त्रिदोष- बोध, चक्षु तमतमाना, हरा या पीला पड़ना, सर्वदा का उन्माद उपजता है। उसमें तीनो दोषांका कारण चक्षु घूमते जैसे रहना। लक्षण देखाई देता है। सुश्रुतने त्रिदोषजनितको कफोन्मादमें ये देखते हैं-वमन,अग्निमान्द्य, अङ्गको सन्निपात-जन्य उन्माद लिखा है। प्रवसनता, अरुचि, कास, स्वीसंसर्गका अभिलाष, अल्प युरोपके प्रधान प्रधान चिकित्सक उन्माद रोगको ( Insanity) छः भागमें बांटते हैं-१म मतिविश्वम । • “एकैकश: समस्त व दोष धरत्यर्थमूर्छितैः । ( Delirium),श्य उन्मत्तता (Mania or Hyper- मानसेन च दुःखेन स पञ्चविध उचाते। phrenic), ३य उत्कण्ठारोग वा विषमता ( Melan- विषाद्भवति षष्ठय यथास्वन्नव भेषजम्।" (सुअत) cholia), ४थ विषाद ( Hypochondriasis), ५म विदोष भिन्न भिन्न वा पनन्य भावमें बिगड़ने अथवा मानसिक दुःख बुद्धिविपर्यय ( Dementia) और ठ जड़ता वा आगनेसे पांच प्रकारका उन्माद उपजता । सिवा इसके षष्ठ उन्माद निबुहिता ( Idiotey )। मतिमें विभ्रम पड़नेसे विषसे पाता है। इससे स्व स्व कारण समझ कर उनकी चिकित्सा चलाना चाहिये। अभिप्राय ठीक नहीं उतरता। कभी भली और + सुनुतने पित्तोन्मादका लक्षण कुछ विशेष लिखा है- वृषा, खेद, दाइ, पतिभोजन, निद्राको होनता, छाया, वायु एवं "हट्खे ददाहबहुली बहुभुम्विनिद्रछायाहिमानिखजलानविकारसेवी। । मलकै विहारमै पभिलाष, तौच्च-हिम-जख प्रतिसे भय, दिनकै समय नौलो हिमान्छ निचयेऽपि स वप्रियको पिचादिवा नभसि पश्यति तारकाथ।" पाकाथमें वाराका दर्शन। ।<noinclude></noinclude> 4ymkmlrhc6x4j9ch1ifb6xdf42mq2pe 668178 668152 2026-07-19T04:41:21Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 668178 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh|२९०|उन्माद}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} लोभ हर्ष भय शोक चिन्ता। प्रकृतिके वशवर्तीं हो चित्तको दोष लगाता और जो बुद्धिकी चञ्चलतासे दोषसमूहके प्रबल वेगसे तपकर हृदयस्थानको जाने तथा मनकी गति सकल चेष्टमें आनेपर मन, बुद्धि, संज्ञा, ज्ञान, स्मृति, भक्ति, स्वभाव, चेष्टा तथा आहार आदिका विभ्रम पाता,उसीको उन्माद रोग दबाता है। उन्माद रोग लगनेके पूर्व यह 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होता है— १ वातज, २ पित्तज, ३ कफज, ४ सन्निपातज और ५ आगन्तुक।<ref>{{block center|<poem><small> "एकैकशः समस्तैश्च दोषैर्धर्यभ्रसङ्क्षयैः। मानसैश्च दुःखैश्च पञ्चविध उच्यते॥ विषाद्वापि षष्ठ यथासङ्ख्यं भेषजम्।" (सुश्रुत)</small></poem>}} <small>विदोष भिन्न भिन्न वा अनन्य भावमें बिगड़ने अथवा मानसिक दुःख लगनेसे पांच प्रकारका उन्माद उत्पन्न होता। सिवा इसके षष्ठ उन्माद विषसे आता है। इसीसे स्व स्व कारण समझ कर उनकी चिकित्सा कराना चाहिये।</small></ref> पित्तोन्मादका लक्षण यह है—क्रोध, गर्व, असहिष्णुता, जढ़ां तढ़ां ढील, काष्ठ वा अस्त्रादि फेंकना, घूंसा मारना, अपनी वा दूसरेको छाया देखना, ठण्डा जल और वासी भात खानेको इच्छा, सदैव सन्तापक बोध, चक्षु तमतमाना, हरा या पीला पड़ना, सदैव चक्षु घूमते जैसे रहना।<ref><small> † सुश्रुतने पित्तोन्मादका लक्षण कुछ विशेष लिखा है—</small> {{block center|<poem><small> "तृट्स्वे ददाहङ्क्षली षङ्मूष्णिन्द्रधयाहिमानिक्षालाविशस्त्रसेवी। शीतो हिमान्शु निचयेऽपि स वक्रिशङ्डी पित्ताहिब नभसि पश्यति तारकाच।"</small></poem>}}</ref> कफोन्मादमें ये देखते हैं—वमन,अग्निमान्द्य, अङ्गकी अवसन्नता, अरुचि, कास, स्त्रीसंगका अभिलाष, अल्प {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-break}} अल्प निद्रा, कभी खानेको अनिच्छा, निर्जन एवं दुःख रहनेकी उत्कण्ठा, बीभत्सभाव, मुखपर शोथ, सादे चक्षु, स्थिर तथा आंखका मलमें ढाका और कफके हित-जनकसे विपरीत द्रव्य खानेसे अपकारका बोध होता है। वायुके प्रकोपसे जो उन्माद उठता है, उसमें देहकी रूक्षता, कंकशता, श्वास, दुर्बलता, अङ्गकी सन्धिका स्फुरण, आस्फालन, नृत्य, गीत, रोदन, भ्रमण प्रभृति लक्षण रहते हैं। सन्निपातसे उन्माद आनेपर तीना दोषोंका लक्षण मिलता है। किसीके मतमें सन्निपात-जन्य उन्माद आरोग्य हो जाता है। किन्तु सम्पूर्ण लक्षण देख पड़ने पर रोग असाध्य ठहरता है। चौर, राजपुरुष वा शत्रु द्वारा अत्यन्त भय पाने वा अत्यन्त क्षोभ आने अथवा अतिशय स्त्रोका संसर्ग उठानेसे मनका उत्कट विकार बढ़ता है। विषजन्य उन्मादमें रोगी मूढ़ भावसे गाता हंसता या रोता है। चक्षु रक्तवर्ण पड़ जाते हैं। बल और इन्द्रियोंका तेज घट जाता है। दीनभाव बढ़ने लगता है। मुख कपिशवर्ण दिखाई देता है। संज्ञाकी हीनता आती है। महर्षि चरकने कहा है—वात, पित्त एवं कफज उन्मादमें जो कारण है, उन्हींसे अति भयंकर त्रिदोषका उन्माद उपजता है। उसमें तीनो दोषोंका कारण लक्षण दिखाई देता है। सुश्रुतने त्रिदोषजनितको सन्निपात-जन्य उन्माद लिखा है। युरोपके प्रधान चिकित्सक उन्माद रोगको (Insanity) छ: भागमें बांटते हैं—१म मतिविभ्रम (Delirium), २य उन्मत्तता (Mania or Hyperphrenic), ३य उत्कण्ठारोग वा विषणता (Melancholia), ४र्थ विषाद (Hypochondriasis), ५म बुद्धिविपर्यय (Dementia) और ६ष्ठ जड़ता वा निर्बुद्धिता (Idiotcy)। मतिमें विभ्रम पड़नेसे अभिप्राय ठीक नहीं उतरता। कभी भली और {{rule}} {{smallrefs}} <small>तृणा, खेद, दाह, अतिभोजन, निद्राको हीनता, काया, वायु एवं जलके विहारमें अभिलाष, तीक्ष्ण-दिन-जल प्रभृतिसे भय, दिनके समय आकाशमें ताराका दर्शन।</small> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> gy9ff5l8crwujotyk6elrjygx5zp2o1 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२०६ 250 75713 668195 667397 2026-07-19T06:24:42Z अँजली चौधरी 2439 668195 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्त'सिक-उत्तमपुरुष'''|'''२०५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :१ कर्णभूषण, बाली, कानका गहना। २ शिरोभूषण, कलंगी। {{Outdent|उत्तंसिक (सं॰ पु॰) नागविशेष।}} {{Outdent|उत्तंसित (सं॰ त्रि॰) १ कर्णभूषणविशिष्ट, बाली पहने हुआ। २ शिरोभूषण युक्त, कलंगी लगाये हुआ।}} {{Outdent|उत्तङ्कराई–१ मन्द्राजप्रान्तके सलेम् ज़िलेका एक ताल्लुक। यह अक्षा॰ ११° ४६‘ तथा १२° २४‘ उ॰ और द्राघि॰ ७८° १५‘ एवं ७८° ४६‘ पु॰ के मध्य अवस्थित है। भूमिका परिमाण ९०९ वर्गमील है।इसमें कोई ४३६ ग्राम लगते और प्राय ११०००० मनुष्य बसते हैं। हिन्दुवों की ही संख्या सबसे अधिक है। कुछ मुसलमान और ईसाई भी हैं। दक्षिण, पूर्व और थोड़े बहुत पश्चिम भी पहाड़ खड़े हैं। उत्तरकी ओर तिरुपातूर उपत्यका है। भूमि प्रधानतः लाल और रेतीली है।<br> {{gap}}२ अपने ताल्लुकका प्रधान नगर। यह दक्षिण-पश्चिम मन्द्राजरेलवेके जोल्लारपेट जङ्कशन-ष्टेशनसे कोई २४ मील दूर है।}} {{Outdent|उत्तङ्ग (सं॰ पु॰) महादेवके एक अनुचरका नाम। (हिं॰) <small>उत्तुङ्ग देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तट (सं॰ त्रि॰) स्वीय तटको उत्सिक्त करनेवाला, जो अपने किनारेको सीचता हो।}} {{Outdent|उत्तप्त (सं॰ क्ली॰) उत्-तप-क्त। १ शुष्कमांस, सूखा गोश्त। २ सन्ताप, उबाल, गर्मी। (त्रि॰)३ तप्त, तपा हुआ, गर्म। ४ सन्तप्त, जो जल गया हो। ५ परिसत, तरबतर, नहाया-धोया। ६ चिन्तित, फिक्रमन्द।}} {{Outdent|उत्तभित (सं॰ त्रि॰) उन्नमित, झुका हुआ।}} {{Outdent|उत्तम (सं॰ त्रि॰) उत्-तमप। १ उत्कृष्ट, श्रेष्ठ, उमदा,बढ़िया। <small>“उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।” (तुलसी)</small> २ अन्त्य, आख़िरी <small>“उत्तमशब्दोऽन्यार्थः।” (सिद्धान्तकौमुदी)</small> ३ प्रधान, खास, सबसे बड़ा। ४ प्रथम, औवल। (अव्य॰) ५ अत्यन्त, निहायत, बहुत। (पु॰) ६ विष्णु। ७ व्याकरणानुसार――अन्त्य पुरुष, आख़िरी सीगा़।युरोपीय इसे आदिपुरुष कहते हैं। ८ सुरुचिके गर्भजात उत्तानपादके एक पुत्र। यह ध्रुवके सौतेले भाई और प्रियव्रतके भतीजे रहे। कुवेरने}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :इन्हें मार डाला था। ९ प्रियव्रतके पुत्र तृतीय मनु। १० छब्बीसवें व्यास। ११ जनपद विशेष। <small>(भारत भीष्म ९ अ॰)</small> यह विन्ध्यप्रदेशमें अवस्थित था। पुराणान्तरमें उत्तमर्ण और उत्तामार्ण पाठ लक्षित है। १२ अश्व-विशेष, किसी किस्मका घोड़ा। यह बड़ा वीर होता है। युद्ध में उत्तम आघात खाते भी अपने सादिनको नहीं छोड़ता। <small>(जयदत्त)</small><br> {{gap}}विशेषणके रूप में समास लगनेपर उत्तम शब्द प्रायः संज्ञासे पोछे आता है, जैसे――द्विजोत्तम, सर्वोत्तम और नरोत्तम। {{Outdent|उत्तमगन्धा (सं॰ स्त्री॰) मल्लिका, चमेली।}} {{Outdent|उत्तमगन्धाव्य (सं॰ त्रि॰) मधुर-सौरभ-विशिष्ट, मीठी ख़शबूवाला।}} {{Outdent|उत्तमता (सं॰ स्त्री॰) १ श्रेष्ठता, ख़ूबी, बड़ाई। २ साधुशीलता, नेकचलनी, भलाई।}} {{Outdent|उत्तमताई (हिं॰) उत्तमता।}} {{Outdent|उत्तमपद (सं॰ पु॰) उच्चस्थान, ऊंचा ओहदा।}} {{Outdent|उत्तमपालैयम्-मन्द्राजप्रान्तीय मदुरा जिलेके पेरिया-कुलम् ताल्लुक़का एक नगर। यह अक्षा॰ ९° ४८‘ ३०‘‘ उ॰ और द्राघि॰ ७७° २२‘ २०‘‘ पू॰ में चिन्नामनूरसे ५ मील दक्षिण अवस्थित है। पहले उत्तमपालैयम् मदुराके एक प्राचीन पालैयम् राज्यका प्रधान स्थान था।}} {{Outdent|उत्तमपुरुष (सं॰ पु॰) १ श्रेष्ठ मनुष्य, अच्छा आदमी। २ शाब्दिक गणका उत्तम व्यक्ति, फेलके गरदानका आदना सीगा। (First person) हिन्दीमें ‘मैं’ शब्द उत्तमपुरुषका द्योतक है। कर्ता कारकमें सकर्मक क्रियाके साथ प्रयोग पड़नेपर ‘ने’ आगम होता है। जैसे-मैंने पत्र पढ़ा था। किन्तु अकर्मक और वर्तमान तथा भविष्यत् कालकी सकर्मक क्रियाके साथ ‘ने’ का आगमनका निषेध है। जैसे――मैं पत्र पढ़ता हूं, मैं पत्र पढ़ूंगा, मैं आता हूं, मैं आया था और मैं आऊंगा। ‘मैं’ का बहुवचन ‘हम’ है। ‘मैं’ के साथ वर्तमानकालको क्रियापर ‘हूं’ का आगम पड़ता है, जैसे――मैं बोलता हूं। कर्मकारकमें 'मैं' का ‘मुझे’ आदेश हो जाता है, जो अव्यय लगनेसे अपने}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 52|1em}}</noinclude> ex2q90gvlwr10tba2uzqqae342js4de पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२६४ 250 75715 668092 303031 2026-07-18T12:32:48Z अँजली चौधरी 2439 668092 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh||'''उद्भवकर-उद्भिविद्या'''|'''२६३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> “स्थलजोदकशाकानि पुष्पमूलफलानि च। । उद्भित् (सं॰ पु॰) १ तरु गुल्मादि, पेड़ भाड़ वगै- मेधाउचोद्भवान्चद्यात् स्नेहाय फलसम्भवान्।” (मनु ६।१३) रह। २ निर्भर, झरना। ३यागभेद। (त्रि॰) २ विष्णु। (त्रि॰) कतरि अच। ३ उत्पत्तिमान्, उद्भिद देखो। उपजनेवाला। ४ संसारातीत, दुनियासे निराला। उद्भिद (सं॰ त्रि॰) उत्-भिद विप। १ उद्भिज्ज, उडवकर (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न करनेवाला, जो उगने वाला। २ भेदक, तोड़ डालनेवाला। उपजाता हो। उभिद (सं॰ पु॰) उत्-भिद-क। १ वृक्षादि, उद्भाव (पु॰) १ उत्पत्ति, पैदायश। २ चित्तौ पेड़ वगैरह। (क्ली॰) २ पांशुलवण, मतबखी दार्य, सखावत। ३ उमा, उमस। नमक। (त्रि॰) ३ भूमिको भेदकर उतपत्र होने- उद्भावन (सं० क्ली॰) उत्-भू-णिच-ल्युट्। १ कल्पन, वाला, जो जमीन् फोड़ कर निकलता हो। अन्दाज। २ उत्पादन, पैदा करनेका काम।। उद्भिदजल (सं॰ क्ली॰) वृक्षजल विशेष, पेड़का ३ चिन्तन, खयाल। ४ उत्क्षेपण, उछाल। ५ अज्ञात पानी। मरुभूमिमें पान्थपादप नामक एक प्रकारका विषय प्रकाश, न समझो बातका खोलाव। (त्रि॰) वृक्ष उपजता है। उसका कोई स्थान काटनेसे खिग्ध ६ प्रकाशक, जाहिर या रौशन करनेवाला। ७ चिन्ता- और शीतल जल निकलता है। उत्तप्त वालुकामय कारक, फिक्रमन्द। मरुभूमिमें चलते समय पथिक उक्त जल पोकर ही उद्भावना (सं॰ स्त्री॰) १ कल्पना, अन्दाज। जीते-जागते हैं। उसी जल का नाम उभिदजल है। २ उत्पत्ति, पैदायश। उभिद्विद्या (सं॰ स्त्री॰) जिस शास्त्र द्वारा उद्. उद्भावयिट (सं॰ त्रि॰) उन्नतिकारक, ऊपर उठा भिक विषयका सकल तत्त्व समझते, उसे उद्भिद्- देनेवाला। विद्या (Botany) कहते हैं। यह विज्ञानशास्त्र को उद्भावित (सं॰ त्रि॰) १ उपेक्षाकृत, खयालमें न एक शाखा है। उद्देश्य-उद्भिद् सकल को रोति लाया हुआ। २ कथित, कहा हुआ। और प्रकृतिका अनुसन्धान लगाना है। उद्भास (स॰ पु॰) उत्-भास भावे घञ्। प्रकाश, उद्भिद सजीव एवं वर्धिष्णु होता और प्राणि- चमक। २ शोभा, खुबसूरती। गणको भांति जन्म लेता, फिर समय पाकर मृत्यु के उद्भासन (सं॰ क्ली॰) उत्-भास्-ल्यट। १ उद्दीपन, मुखमें गिर पड़ता है। मस्तिष्क न रहते भो यह चमकाहट। २ उज्ज्वल करण, उजलाहट। (त्रि॰) अनुभवको शक्ति रखता है। सूर्यास्तके पीछे कोई ३ प्रकाशक, चमकानवाला। कोई उद्भिद पत्रको लपेट सो जाता है। वह समझ उदासयत (सं॰ त्रि॰) प्रकाशक, जो रौशन कर भी सकता, चतुष्याच कैसा गुजरता है। हमारे रहा हो। देहमें जैसे रक्त, उसके देहमें वैसे ही रस कार्य किया 'उहासवत् (सं॰ त्रि॰) प्रकाशमान, चमकदार। करता है। फिर जाति सम्पर्कोयता भी देख पड़ती उभासित (सं॰ त्रि॰) उत्-भास्-क्त। १ दीप्त, है। उद्भिद् मामा माई लता प्रभृति एवं अनेक चमकाया हुआ। २ शोभित, सजाया हुआ। मित्र और शत्र रखता है। उद्भासिन् (सं॰ त्रि॰) दैदीप्यमान, चमकदार।। प्रथम वह वीज रूप पर रहता, जिसके भूमिमें उद्भिज, डगिज देखो। पड़नेसे अङ्करित होता है। उस समय उत्ताप, जल उद्भिज्ज (सं॰ त्रि॰) उद्भिनत्ति क्विप उद्भित् तथा और वायुके यथोचित साहाय्य का प्रयोजन है। क्योंकि सन् जायते जन-ड। भूमिको भेदकर जन्म लेनेवाला, ताप, जल और वायु न मिलनेसे वौजस्थ अङ्कर जो जमीनको फोड़कर निकलता हो। (काण्डस्थ भ्रूण) फिर कैसे पनपेगा! उद्भिज्जविद्या, उद्भिविद्या देखो। अङ्गु रोत्पत्तिको प्रथमावस्था पर भ्र णके स्वकार्य <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} {{Outdent|}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9rlpv6yaaabme7vp972bw2sx2fhy98n 668105 668092 2026-07-18T14:16:32Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 668105 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उद्भवकर-उद्भिविद्या'''|'''२६३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“स्थलजोदकशाकानि पुष्पमूलफलानि च। मेधावृचोद्भवान्धद्यात् स्नेहाय फलसम्भवान्।” (मनु ६।१३)</poem>}}}} :{{gap}}२ विष्णु। (त्रि॰) कतरि अच्। ३ उत्पत्तिमान्, उपजनेवाला। ४ संसारातीत, दुनियासे निराला। {{Outdent|उद्भवकर (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न करनेवाला, जो उपजाता हो।}} {{Outdent|उद्भाव (सं॰ पु॰) १ उत्पत्ति, पैदायश। २ चित्तौदार्य, सखावत। ३ उष्मा, उमस।}} {{Outdent|उद्भावन (सं॰ क्ली॰) उत्-भू-णिच्-ल्युट्। १ कल्पन, अन्दाज़। २ उत्पादन, पैदा करनेका काम।। ३ चिन्तन, ख़याल। ४ उत्क्षेपण, उछाल। ५ अज्ञात विषय प्रकाश, न समझी बातका खोलाव।(त्रि॰) ६ प्रकाशक, जा़हिर या रौशन करनेवाला। ७ चिन्ता-कारक, फिक्रमन्द।}} {{Outdent|उद्भावना (सं॰ स्त्री॰) १ कल्पना, अन्दाज़। २ उत्पत्ति, पैदायश।}} {{Outdent|उद्भावयितृ (सं॰ त्रि॰) उन्नतिकारक, ऊपर उठा देनेवाला।}} {{Outdent|उद्भावित (सं॰ त्रि॰) १ उपेक्षाकृत, ख़यालमें न लाया हुआ। २ कथित, कहा हुआ।}} {{Outdent|उद्भास (स॰ पु॰) उत्-भास् भावे घञ्। प्रकाश, चमक। २ शोभा, खुबसूरती।}} {{Outdent|उद्भासन (सं॰ क्ली॰) उत्-भास्-ल्युट्। १ उद्दीपन, चमकाहट। २ उज्ज्वल करण, उजलाहट। (त्रि॰) ३ प्रकाशक, चमकानेवाला।}} {{Outdent|उद्भासयत (सं॰ त्रि॰) प्रकाशक, जो रौशन कर रहा हो।}} {{Outdent|उद्गासवत् (सं॰ त्रि॰) प्रकाशमान, चमकदार।}} {{Outdent|उद्भा़सित (सं॰ त्रि॰) उत्-भास्-क्त। १ दीप्त, चमकाया हुआ। २ शोभित, सजाया हुआ।}} {{Outdent|उद्भासिन् (सं॰ त्रि॰) दैदीप्यमान, चमकदार।}} {{Outdent|उद्भिज, <small>डड्भिज्ज देखो।</small>}} {{Outdent|उद्भिज्ज (सं॰ त्रि॰) उद्भिनत्ति क्विप् उद्भित् तथा सन् जायते जन-ड। भूमिको भेदकर जन्म लेनेवाला, जो ज़मीनको फोड़कर निकलता हो।}} {{Outdent|उद्भिज्जविद्या, <small>उड्भिद्विद्या देखो</small>}}। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उद्भित् (सं॰ पु॰) १ तरु गुल्मादि, पेड़ झाड़ वगै-रह। २ निर्भर, झरना। ३ यागभेद। (त्रि॰) <small>उद्भिद देखो।</small>}} {{Outdent|उद्भिद् (सं॰ त्रि॰) उत्-भिद क्विप। १ उद्भिज्ज, उगने वाला। २ भेदक, तोड़ डालनेवाला।}} {{Outdent|उद्भिद (सं॰ पु॰) उत्-भिद-क। १ वृक्षादि, पेड़ वगै़रह। (क्ली॰) २ पांशुलवण, मतबखी़ नमक। (त्रि॰) ३ भूमिको भेदकर उत्पन्न होने-वाला, जो जमीन् फोड़ कर निकलता हो।}} {{Outdent|उद्भिदजल (सं॰ क्ली॰) वृक्षजल विशेष, पेड़का पानी। मरुभूमिमें पान्थपादप नामक एक प्रकारका वृक्ष उपजता है। उसका कोई स्थान काटनेसे स्निग्ध और शीतल जल निकलता है। उत्तप्त वालुकामय मरुभूमिमें चलते समय पथिक उक्त जल पीकर ही जीते-जागते हैं। उसी जल का नाम उद्भिदजल है।}} {{Outdent|उद्भिद्विद्या (सं॰ स्त्री॰) जिस शास्त्र द्वारा उद्भिद्के विषयका सकल तत्त्व समझते, उसे उद्भिद्विद्या (Botany) कहते हैं। यह विज्ञानशास्त्र की एक शाखा है। उद्देश्य-उद्भिद् सकल की रीति और प्रकृतिका अनुसन्धान लगाना है।<br> {{gap}}उद्भिद् सजीव एवं वर्धिष्णु होता और प्राणि-गणकी भांति जन्म लेता, फिर समय पाकर मृत्यु के मुखमें गिर पड़ता है। मस्तिष्क न रहते भी यह अनुभवकी शक्ति रखता है। सूर्यास्तके पीछे कोई कोई उद्भिद् पत्रको लपेट सो जाता है। वह समझ भी सकता, चतुष्पार्श्व कैसा गुज़रता है। हमारे देहमें जैसे रक्त, उसके देहमें वैसे ही रस कार्य किया करता है। फिर जाति सम्पर्कीयता भी देख पड़ती है। उद्भिद् मामा माई लता प्रभृति एवं अनेक मित्र और शत्रु रखता है।<br> {{gap}}प्रथम वह वीज रूप पर रहता, जिसके भूमिमें पड़नेसे अङ्करित होता है। उस समय उत्ताप, जल और वायुके यथोचित साहाय्य का प्रयोजन है। क्योंकि ताप, जल और वायु न मिलनेसे वीजस्थ अङ्कुर (काण्डस्थ भ्रूण) फिर कैसे पनपेगा!<br> {{gap}}अङ्कुरोत्पत्तिकी प्रथमावस्था पर भ्रूणके स्वकार्य}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> lp8726bueux4gfcz2k4bs2djvsbsats 668106 668105 2026-07-18T14:17:39Z अँजली चौधरी 2439 668106 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उद्भवकर-उद्भिविद्या'''|'''२६३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“स्थलजोदकशाकानि पुष्पमूलफलानि च। मेधावृचोद्भवान्धद्यात् स्नेहाय फलसम्भवान्।” (मनु ६।१३)</poem>}}}} {{gap}}२ विष्णु। (त्रि॰) कतरि अच्। ३ उत्पत्तिमान्, उपजनेवाला। ४ :संसारातीत, दुनियासे निराला। {{Outdent|उद्भवकर (सं॰ त्रि॰) उत्पन्न करनेवाला, जो उपजाता हो।}} {{Outdent|उद्भाव (सं॰ पु॰) १ उत्पत्ति, पैदायश। २ चित्तौदार्य, सखावत। ३ उष्मा, उमस।}} {{Outdent|उद्भावन (सं॰ क्ली॰) उत्-भू-णिच्-ल्युट्। १ कल्पन, अन्दाज़। २ उत्पादन, पैदा करनेका काम।। ३ चिन्तन, ख़याल। ४ उत्क्षेपण, उछाल। ५ अज्ञात विषय प्रकाश, न समझी बातका खोलाव।(त्रि॰) ६ प्रकाशक, जा़हिर या रौशन करनेवाला। ७ चिन्ता-कारक, फिक्रमन्द।}} {{Outdent|उद्भावना (सं॰ स्त्री॰) १ कल्पना, अन्दाज़। २ उत्पत्ति, पैदायश।}} {{Outdent|उद्भावयितृ (सं॰ त्रि॰) उन्नतिकारक, ऊपर उठा देनेवाला।}} {{Outdent|उद्भावित (सं॰ त्रि॰) १ उपेक्षाकृत, ख़यालमें न लाया हुआ। २ कथित, कहा हुआ।}} {{Outdent|उद्भास (स॰ पु॰) उत्-भास् भावे घञ्। प्रकाश, चमक। २ शोभा, खुबसूरती।}} {{Outdent|उद्भासन (सं॰ क्ली॰) उत्-भास्-ल्युट्। १ उद्दीपन, चमकाहट। २ उज्ज्वल करण, उजलाहट। (त्रि॰) ३ प्रकाशक, चमकानेवाला।}} {{Outdent|उद्भासयत (सं॰ त्रि॰) प्रकाशक, जो रौशन कर रहा हो।}} {{Outdent|उद्गासवत् (सं॰ त्रि॰) प्रकाशमान, चमकदार।}} {{Outdent|उद्भा़सित (सं॰ त्रि॰) उत्-भास्-क्त। १ दीप्त, चमकाया हुआ। २ शोभित, सजाया हुआ।}} {{Outdent|उद्भासिन् (सं॰ त्रि॰) दैदीप्यमान, चमकदार।}} {{Outdent|उद्भिज, <small>डड्भिज्ज देखो।</small>}} {{Outdent|उद्भिज्ज (सं॰ त्रि॰) उद्भिनत्ति क्विप् उद्भित् तथा सन् जायते जन-ड। भूमिको भेदकर जन्म लेनेवाला, जो ज़मीनको फोड़कर निकलता हो।}} {{Outdent|उद्भिज्जविद्या, <small>उड्भिद्विद्या देखो</small>}}। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उद्भित् (सं॰ पु॰) १ तरु गुल्मादि, पेड़ झाड़ वगै-रह। २ निर्भर, झरना। ३ यागभेद। (त्रि॰) <small>उद्भिद देखो।</small>}} {{Outdent|उद्भिद् (सं॰ त्रि॰) उत्-भिद क्विप। १ उद्भिज्ज, उगने वाला। २ भेदक, तोड़ डालनेवाला।}} {{Outdent|उद्भिद (सं॰ पु॰) उत्-भिद-क। १ वृक्षादि, पेड़ वगै़रह। (क्ली॰) २ पांशुलवण, मतबखी़ नमक। (त्रि॰) ३ भूमिको भेदकर उत्पन्न होने-वाला, जो जमीन् फोड़ कर निकलता हो।}} {{Outdent|उद्भिदजल (सं॰ क्ली॰) वृक्षजल विशेष, पेड़का पानी। मरुभूमिमें पान्थपादप नामक एक प्रकारका वृक्ष उपजता है। उसका कोई स्थान काटनेसे स्निग्ध और शीतल जल निकलता है। उत्तप्त वालुकामय मरुभूमिमें चलते समय पथिक उक्त जल पीकर ही जीते-जागते हैं। उसी जल का नाम उद्भिदजल है।}} {{Outdent|उद्भिद्विद्या (सं॰ स्त्री॰) जिस शास्त्र द्वारा उद्भिद्के विषयका सकल तत्त्व समझते, उसे उद्भिद्विद्या (Botany) कहते हैं। यह विज्ञानशास्त्र की एक शाखा है। उद्देश्य-उद्भिद् सकल की रीति और प्रकृतिका अनुसन्धान लगाना है।<br> {{gap}}उद्भिद् सजीव एवं वर्धिष्णु होता और प्राणि-गणकी भांति जन्म लेता, फिर समय पाकर मृत्यु के मुखमें गिर पड़ता है। मस्तिष्क न रहते भी यह अनुभवकी शक्ति रखता है। सूर्यास्तके पीछे कोई कोई उद्भिद् पत्रको लपेट सो जाता है। वह समझ भी सकता, चतुष्पार्श्व कैसा गुज़रता है। हमारे देहमें जैसे रक्त, उसके देहमें वैसे ही रस कार्य किया करता है। फिर जाति सम्पर्कीयता भी देख पड़ती है। उद्भिद् मामा माई लता प्रभृति एवं अनेक मित्र और शत्रु रखता है।<br> {{gap}}प्रथम वह वीज रूप पर रहता, जिसके भूमिमें पड़नेसे अङ्करित होता है। उस समय उत्ताप, जल और वायुके यथोचित साहाय्य का प्रयोजन है। क्योंकि ताप, जल और वायु न मिलनेसे वीजस्थ अङ्कुर (काण्डस्थ भ्रूण) फिर कैसे पनपेगा!<br> {{gap}}अङ्कुरोत्पत्तिकी प्रथमावस्था पर भ्रूणके स्वकार्य}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> pax03h4pyhee4l427i296y0ioqi51q9 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२९३ 250 75716 668204 303032 2026-07-19T08:00:46Z अनुश्री साव 80 668204 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|२९२|उन्माद-उन्मादन}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} २६२ उन्माद-उन्मादन है। क्योंकि इन दोनों में दृष्य एवं दोषको तुल्यता । वमन एवं विरचनादिसे कोष्ठ, हृदय, इन्द्रिय तथा विद्यमान है। मस्तक शुद्धः होनेपर रोगी प्रसन्नता, स्मृति और संज्ञा सुश्रुत कहते हैं-सकलप्रकारके उन्मादमें चित्तको पाता है। किन्तु शुद्ध हो जाते भी यदि उसके आच- आल्हादित रखना प्रधान कर्तव्य है। मद रोग रण अयोग्य देखाते है, तो नस्य सुंधाते और अञ्जन अर्थात् सन्मादकी प्रथमावस्थापर मृदु क्रिया किया लगाते हैं। ऐसे स्थलपर ताड़न और मनः बुद्धि तथा करते हैं। विषजन्य रोग लगते भी विक्रियाक साथ | देहके प्रति उद्देग प्रापण अतिशय हितकर है। साथ मृदु क्रिया कही है।* फिर अतिशय शक्तिसम्पन्न होनेपर कड़े कपड़ेसे बांध और अंधेरे घरमें डाल रोगी दबाया जाता है। ब्राह्मणयष्टि, पुरातन कुमाण्ड, शाहपुष्यो एवं तुलसी पृथक् पृथक् इन्द्रयव तथा मधु मिलाकर घरमें लक्कड़ पत्थर बिलकुल रहना न चाहिये । खिलानेसे उन्माद रोग मिट जाता है। . उन्मादके रोगीको सुधारनेका उपाय- हिङ्ग, सैन्धव लवण, मरिच, पिप्पली और शुण्ठी "तर्जनं वासनं दानं सान्त्वनं हर्षण भयम्। प्रत्येकका दो पल कल्क छ: सेर घत और चतुर्गण गो- विस्मयो विस्म ते हेतुर्नयन्ति प्रकृति मनः ॥" (चरक) मूत्रमें पकाकर देनेसे उन्माद निश्चय आरोग्य होता है। तर्जन, नासन, दान, सान्त्वना, हर्ष, भय एवं विस्मय सहद्य इस रोगमें बाषणाद्य-वटिका और कल्या- मनको भटका कर प्रकृति पर पहुंचा देता है। " णक, क्षौरकल्याण, चैतस, महापैशाशिक, हिङ्गाद्य डाकरीवो मतसे रोगीका परिधेय वस्त्र सर्वदा तथा लशुनाद्य प्रभृति घृत खिलाते हैं। उष्ण रखा जाता, भौगने या शीतल पड़ने नहीं पाता। समुदायके मध्य जिसमें रोगी क्रोध और आक्रो देहके मध्य भागपर फ्लाबेल लिपटा रहना अच्छा । शसे हस्त उठा निष्क्रिय भावसे अपने या अन्य के शरीर है। रोगी रोयको बनी या मुलायम चटाई पर पर छोड़ देता है, वही उन्माद रोग असाध्य होता नर्म तकियाके सहार लिटाया जाता है। शयन कालमें है। फिर जिस उन्मादमें चक्षुसे अश्रु चलता, मेढ़से देहके अपर अङ्ग प्रत्यङ्गको अपेक्षा मस्तक कुछ रक्त बहता, जिवापर क्षत पड़ता और नासिकासे जल उन्नत और अनावृत रहना चाहिये। मूर्छा पानेसे गिरता, वह भी आसाध्य-जैसा ही होता है। अथवा उसे भूमिपर लेटाते और आहारादि अवस्थालें देख रोगोंके ताली बजाने, सर्वदा चिल्लाने, अपने ममस्थान- भालकर खिलाते हैं। पर चोट लगाने, दुर्ण देखाने, वृषणासे घबराने - आलोपाथोक मतमें उन्मादके रोगीको प्रथमा- और दुर्गन्ध एवं हिंस्रक बन जानसे उन्माद अच्छा वस्थामें ठण्डा रखनेको सविशेष चेष्टा करना चाहिये। नहीं होता। इसपर नाइट्रेट अव पोटास, म्यरिएट अव अमोनिया, प्रथम रोगीको शान्त रखना चाहिये। किन्तु सिलुशन एसैटेट अव अमोनिया मिश्र, स्पिरिट अव पित्तजनित उन्मादमें विशेषतः वमन करा देते हैं। नाइट्रिक ईथर, टार्टाराइस अञ्जन और कपूरका जुलद देनेसे विशेष उपकार पहुंचता है। कपूर, कालोमल "उन्मादिषु च सषु कर्याचित्तप्रसादनम् । और बिनिगार प्रभृति भी विशेष लाभदायक हैं। - मृटुयूर्व मदेऽप्ये व क्रियां विद्वान् प्रयोजयेत् । फिर रोगीको अवस्थाके अनुसार नानाप्रकार औषध विषजे मृटुपूर्वाञ्च विषघ्नौं कारयेत् क्रियाम् ॥" दिया जाया करता है। (सुध त उत्तरतन्त्र ६२ १०) "सब ष्वपि तु खल्वेष यो इस्तावुद्यम्य रोषस रम्भान्निःस'ज्ञोऽन्येष्वा-1 उन्मादक ( स० त्रि. ) उत-मद-णिच-गख ल । त्मनि वा पातयेत् सोह्यसाध्यो शेयस्तथा साधु नेवी मैदप्रवृत्तरतः क्षतजिनः | उन्मादजनक, नशा लाने या पागल बनानेवाला। : प्रस तमासिकश्चिद मानमर्मा प्रतिहन्धमानपाणिः सततं विकूजनं दुर्वर्णरूपातः | उन्मादन (सं० पु०) उत्-मद-णिच्-न्यु। १ काम- पुतिगन्धय हिंसाौँ उन्मत्तो जयस्त' परिवर्जयेत् ।" (चरक) . | देवके पञ्चवाणान्तर्गत वाण विशेष। ..<noinclude></noinclude> 5gdljqonlqtoa2fy6me317t9zapms00 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२०७ 250 75728 668200 667398 2026-07-19T07:06:28Z अँजली चौधरी 2439 668200 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२०६'''|'''उत्तमफलिनी-उत्तमार्ध'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :अन्तका एकार खो देता है,जैसे-मुझको, मुझसे,मुझपर और मुझमें। मैं का सम्बन्धकारक ‘मेरा’ और ‘हम’ का ‘हमारा’ है। कोई कोई समझते हैं कि――उत्तम पुरुषमें संस्कृत और अंगरेजी व्याकरण नहीं मिलता। किन्तु यह बात झूठ है। क्योंकि उत्तमका अर्थ प्रथम (First) ही है।<br> {{gap}}३ जैनशास्त्रानुसार संसार में सबसे उत्कृष्ट ऐश्वर्यवाले पुरुष। परिवर्तनशील कालके एक अपेक्षासे जैन शास्त्रमें दो विभाग किये हैं―― उत्सर्पिणी, और अवसर्पिणी। इन दोनों कालोंमेंसे हर एकमें तिरेसठ तिरेसठ उत्तमपुरुष हुआ करते हैं। वे इसप्रकार हैं―― चक्रवर्ती १२, तीर्थकर २४, नारायण ९, प्रतिनारायण ९, और बलभद्र ९।<small> शलाका और चक्रवर्ती आदि शब्द देखो।</small> {{Outdent|उत्तमफलिनी (सं॰ स्त्री॰) उत्तम फल-णिनि-ङीप्। दुग्धिका, दूधी।}} {{Outdent|उत्तमभद्र――बम्बईप्रान्तके एक क्षत्रिय राजा। नासिककी एक गुफामें जो शिलालिपि मिली, उसपर यह बात लिखी है――मलयके लोगोंने एक बार स्थानीय क्षत्रिय नृपति उत्तमभद्रपर चढ़ाई की थी। बहरात नहपान नृपतिके जामाता और दीनीक उशवदातके पुत्र इनके साहाय्यको सैन्य लेकर आगे बढ़े, जिससे शत्रु पीछे हटे और उत्तमभद्र के अधीन हुये थे।}} {{Outdent|उत्तमर्ण (सं॰ पु॰) उत्तम-मृणमस्य। ऋणदाता, क़र्ज़ दिहन्दा, महाजन, साह।}} {{Outdent|उत्तमर्णिक (सं॰ पु॰) उत्तमं देयत्वे नास्त्यस्य, ठन्। उत्तमर्ण, क़र्ज़ दिहिन्दा, मालिक।}} {{c|{{xx-smaller|<poem>“राज्ञाधमर्णि को दाप्य: साधिताद्दशकं शतम्। पञ्च पञ्च शतं दाप्य: प्राप्तार्थोह्युत्तमर्णिकः॥” (याज्ञवल्क्य २।४३)</poem>}}}} {{Outdent|उत्तमणिन, <small>उत्तमर्ण देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तमलाम (सं॰ पु॰) विपुल कलान्तर, बड़ा फा़यदा।}} {{Outdent|उत्तमवारि (सं॰ क्ली॰) १ तण्डुलोदक, चावलका पानी। २ उत्कष्ट जल, उम्दा पानी।}} {{Outdent|उत्तमवेश (सं॰ पु॰) शिव, महादेव।}} {{Outdent|उत्तमवैद्य (सं॰ पु॰) कृतसाङ्ग-वेदाध्ययन वैद्य, उम्दा तबीब, बढ़िया डाक्टर।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उत्तमसंग्रह (सं॰ पु॰) १ सम्यक् संग्रहण, गिरफ्त। २ निर्जनमें पर पत्नीके साथ परस्पर आलिङ्गन उपवेशनादिरूप प्रेमालाप, दूसरेकी औरतके साथ अकेले मिलना-जुलना और हंसना बोलना।}} {{Outdent|उत्तमसाहस (सं॰ पु॰) १ स्मृत्युक्त दण्ड विशेष। इसमें १०००, ८००० वा १८०००० पण जुर्माना देना पड़ता है। <small>“परस्य पतनीयाक्षेपे कृते तूत्तमसाहसम्।” (याज्ञवल्क्य)</small> २ उत्कट दण्ड, कड़ी सज़ा――जैसे सर्वस्व हरण, अङ्गकर्तन और व्यापादन।}} {{Outdent|उत्तमा (सं॰ स्त्री॰) उत्-तमप्-टाप्। १ उत्कृष्ट स्त्री, उम्दा औरत। २ स्वीयादि नायिकाभेद। यह मन्दकारिणी होते भी प्रियतमके प्रति हितकारिणी रहती है। ३ दुग्धिका, दूधी। ४ मनःशिला। ५ भूम्यामलकी, भुयिं आंवला। ५ त्रिफला; आंवला, हर और बहेरा। ६ मुस्ता, मोथा। ७ शूकदोषविशेष, ज़कर बढ़ानेकी दवा लगानेसे पैदा हुई एक बीमारी। इसमें शूक और अजीर्ण से लिङ्गपर मुद्गमाषके समान रक्तपित्तकी रक्तपिड़का पड़ जाती हैं। <small>(सुश्रुत)</small>}} {{Outdent|उत्तमाङ्ग (सं॰ क्ली॰) उत्तम प्रशस्तमङ्गम, कर्मधा॰। १ मस्तक, सर। <small>मस्तक देखो।</small> २ मुख, दहन।}} {{c|{{xx-smaller|“उत्तमाङ्गोडवाज्ज्ये ष्ठाब्राह्मणयेव धारणात्।” (मनु १।९३)}}}} {{Outdent|उत्तमाधम (सं॰ त्रि॰) उच्च नीच, भला-बुरा, बढ़िया-घटिया, छोटा-बड़ा।}} उत्तमाधममध्यम (सं॰ त्रि॰) उच्च, नीच और मध्य, ऊंचे, नीचे और औसत दरजेवाला।}} {{Outdent|उत्तमाम्भस (सं॰ क्ली॰) तुष्टि विशेष, एक आसू-दगी। सांख्य मतानुसार यह हिंसा छोड़नसे मिलती है। योगमें इसका नाम सार्वभौम-महाव्रत है।}} {{Outdent|उत्तमाय्य (वै॰ त्रि॰) उठाया या देखाया जाने-वाला, जो मनाया जानेवाला हो।}} {{Outdent|उत्तमारणी (सं॰ स्त्री॰) १ इन्दीवरा। २ इन्द्र-वारुणी। ३ इन्द्रचिर्भिटी। ४ योधामल्लिका, जूही।}} {{Outdent|उत्तमार्ध (सं॰ पु॰) १ अन्तिम अर्ध वा भाग, आखिरी अद्धा या हिस्सा। २ उत्कृष्ट अर्ध, निहायत उम्दा अहा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> aaoa2m2u9p8ln11ufd3w1ug735d3czw पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२६५ 250 75730 668110 303202 2026-07-18T14:48:43Z अँजली चौधरी 2439 /* शोधित */ 668110 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२७४'''|'''उद्भिद्विद्या'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> साधनमें लगनेसे वीजान्तर्गत सञ्चित खाद्य द्वारा उद्भिद् पुष्ट हुआ करता है। भ्रूणके एक पार्श्व से किसी प्रकारका कोमल पदार्थ वीजके: अधिकांश अङ्गमें भर जाता, जो श्वेतसार वा धातुविशेष (Albumen) कहाता है। अङ्कुरोतपत्तिके समय स्वाभाविक नियमानुसार उक्त श्वेतसार शर्कराका आकार बनाता है। शर्कराको जल में घुलनेसे बालोद्भिद् सहज ही चाट लेता है। फिर अङ्कुरकी उत्पत्तिके कालपर उद्भिद्को भिन्न भिन्न श्रेणी में बांट देते हैं। एक वीजपत्र निकालनेवालेका एकपर्णिक (Monocotyledon) और दो वीजयन निकालनेवालेका द्विविपर्णिक (Dicoty-ledon) नाम है। एकपर्णिक उद्भिद् जबतक जीता, तबतक मेरुदण्ड के अन्तिम भागसे नहीं-मध्यभागसे कितनी ही पत्ती फूट पनपा करता है। किन्तु द्विपर्णिकका उक्त भाग दीर्घ होकर भूमिमें शाखा-प्रशाखा डालता है। अधिकांश एकपर्णिकमें शाखा नहीं-केवल मस्तककी दिक् कितनी ही पत्ती पड़ती है। ताल खर्जूरादि एकपर्णिक वा एकपत्रोत्पत्तिक हैं। फिर आम्र जम्बु आदि द्विपर्णिक वा द्विपत्रोत्पत्तिक होते हैं। पत्र सकलको साधारणतः किसलय, वृन्त और वृन्तकोष तीन भागमें बांटते हैं। वीजपत्रका वृन्त और वृन्तकोष अधिक पनपनेसे मेरुदण्ड निकल आता है। वीजपर अङ्कुरोत्पादक शक्तिका प्रभाव पड़नसे उभिदमें मूल लगता है। वीजसे प्रथम जो इन्द्रिय निकलता, वही मूल ठहरता है। एकपर्णिकके अन्तिम भागमें फैल जो मूल चलता, वह गौण रहता है। फिर द्विपर्णिकमें अन्तिम भागके स्वयं बढ़नेसे उपजनेवाला मूल मुख्य है। मूल प्रधानतः मिश्र वा शाखान्वित और तान्तविक वा तन्तुवत् बहु शाखायुक्त, दो प्रकारका होता है। वह अधोगामी है। उसमें अन्त्यभागके रसा-कर्षणकी शक्ति रहती है। फिर प्रत्येक ही मूलका अन्त्य भाग बर्धिष्णु और रसाकर्षी है। मूल तीन प्रकारका होता है-मृण्मूल, जलीय मूल और वायव मूल। जो मूल मृत्तिकामें रहता, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उसे सब कोई मृणमूल कहता है। इस श्रेणीके उद्भिद् पृथिवीके मध्य अधिक हैं। केवल जलमें रहने और अङ्कुर उत्पन्न करनेवाले उद्भिद्का मूल भूमिको न भेद जलपर ही उतराता है। इसीका नाम जलीय मूल है। जैसे-काई प्रभृति। कोई कोई उद्भिद् न तो मृत्तिकामें घुसता और न जलमें बसता, आलोक एवं वायु लेने के लिये बल्कल वा पर्वत-विवरमें धंसता है। इसका मूल हरा और काण्ड-जैसा होता है। एतद्भिन्न दूसरे प्रकारका भी मूल है। उसे परभृत मूल कहते हैं। क्योंकि वह अन्य तरुकी त्वक् फाड़ जहां पुष्टिकर रस पाता, वहीं पहुंच जाता है। वट प्रभृति वृक्षके काण्डमें ईषत् पीतवर्ण मूल लटकते देख पड़ता है। वह साधारण नहीं।उद्भिद् के तत्त्वज्ञ उसे असाधारण वा अनियत मूल कहते हैं। प्रथमावस्था में काण्डका नाम मुकुल (Plumule) है। उसके अन्त्य भागमें एक कलिका आती, जो अन्त्य कलिका या मांझ कहाती है। उसी कलिकापर काण्डकी वृद्धि निर्भर है। उससे वीजपत्र निकलते हैं। काण्ड कई प्रकारका होता है,――१ भूपृष्ठशायी, २ ऊर्ध्वग, ३ लतायुक्त, ४ लम्बमान और ५ आरोही। <small>प्रत्येक शब्दमें तत्तत् विवरण देखो।</small> मूलमें नहीं-पत्र, वल्कल वा अन्य उपकरण काण्ड में रहता है। काण्डकी जिस जिस गांठसे पत्ती आती, वह पर्वसन्धि (Node) कहाती है। सन्धिद्वयके मध्यस्थित भागका नाम अन्तःपर्व (Inter-node) है। काण्डका एक अंश मट्टीमें रहता है। मूलको कलिका-विकाशकी क्षमता नहीं। मृण्मध्यस्थ काण्डसे किसी किसी पेड़की कोंपल निकल आती है। जैसे-केलेसे। अनेक व्यक्ति भ्रान्तिक्रमसे मट्टीके मध्यस्थ काण्डकी मूल-जै़सा समझते हैं। वस्तुतः जो कदलीकाण्ड कहाता, वह अत्यन्त विस्तृत पत्रवृन्तसमूहका कठिन काण्डाकार होनेके सिवा दूसरा कोई द्रव्य नहीं। उसका नाम मूलाकार काण्ड (Rhizoma) है। चक्षुःसंयुक्त मृण्मध्यस्थ काण्डको स्फीतकाण्ड (Tuber) कहते हैं। जैसे-आलू। कभी कभी काण्डके पत्र सम्पूर्ण खिल एक वा ततोधिक कठिन वस्तु उत्पन्न करते हैं। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 59bwo6lxyjpxbdbaxhr4xfckb6kcd00 668111 668110 2026-07-18T14:49:27Z अँजली चौधरी 2439 668111 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२६४'''|'''उद्भिद्विद्या'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> साधनमें लगनेसे वीजान्तर्गत सञ्चित खाद्य द्वारा उद्भिद् पुष्ट हुआ करता है। भ्रूणके एक पार्श्व से किसी प्रकारका कोमल पदार्थ वीजके: अधिकांश अङ्गमें भर जाता, जो श्वेतसार वा धातुविशेष (Albumen) कहाता है। अङ्कुरोतपत्तिके समय स्वाभाविक नियमानुसार उक्त श्वेतसार शर्कराका आकार बनाता है। शर्कराको जल में घुलनेसे बालोद्भिद् सहज ही चाट लेता है। फिर अङ्कुरकी उत्पत्तिके कालपर उद्भिद्को भिन्न भिन्न श्रेणी में बांट देते हैं। एक वीजपत्र निकालनेवालेका एकपर्णिक (Monocotyledon) और दो वीजयन निकालनेवालेका द्विविपर्णिक (Dicoty-ledon) नाम है। एकपर्णिक उद्भिद् जबतक जीता, तबतक मेरुदण्ड के अन्तिम भागसे नहीं-मध्यभागसे कितनी ही पत्ती फूट पनपा करता है। किन्तु द्विपर्णिकका उक्त भाग दीर्घ होकर भूमिमें शाखा-प्रशाखा डालता है। अधिकांश एकपर्णिकमें शाखा नहीं-केवल मस्तककी दिक् कितनी ही पत्ती पड़ती है। ताल खर्जूरादि एकपर्णिक वा एकपत्रोत्पत्तिक हैं। फिर आम्र जम्बु आदि द्विपर्णिक वा द्विपत्रोत्पत्तिक होते हैं। पत्र सकलको साधारणतः किसलय, वृन्त और वृन्तकोष तीन भागमें बांटते हैं। वीजपत्रका वृन्त और वृन्तकोष अधिक पनपनेसे मेरुदण्ड निकल आता है। वीजपर अङ्कुरोत्पादक शक्तिका प्रभाव पड़नसे उभिदमें मूल लगता है। वीजसे प्रथम जो इन्द्रिय निकलता, वही मूल ठहरता है। एकपर्णिकके अन्तिम भागमें फैल जो मूल चलता, वह गौण रहता है। फिर द्विपर्णिकमें अन्तिम भागके स्वयं बढ़नेसे उपजनेवाला मूल मुख्य है। मूल प्रधानतः मिश्र वा शाखान्वित और तान्तविक वा तन्तुवत् बहु शाखायुक्त, दो प्रकारका होता है। वह अधोगामी है। उसमें अन्त्यभागके रसा-कर्षणकी शक्ति रहती है। फिर प्रत्येक ही मूलका अन्त्य भाग बर्धिष्णु और रसाकर्षी है। मूल तीन प्रकारका होता है-मृण्मूल, जलीय मूल और वायव मूल। जो मूल मृत्तिकामें रहता, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उसे सब कोई मृणमूल कहता है। इस श्रेणीके उद्भिद् पृथिवीके मध्य अधिक हैं। केवल जलमें रहने और अङ्कुर उत्पन्न करनेवाले उद्भिद्का मूल भूमिको न भेद जलपर ही उतराता है। इसीका नाम जलीय मूल है। जैसे-काई प्रभृति। कोई कोई उद्भिद् न तो मृत्तिकामें घुसता और न जलमें बसता, आलोक एवं वायु लेने के लिये बल्कल वा पर्वत-विवरमें धंसता है। इसका मूल हरा और काण्ड-जैसा होता है। एतद्भिन्न दूसरे प्रकारका भी मूल है। उसे परभृत मूल कहते हैं। क्योंकि वह अन्य तरुकी त्वक् फाड़ जहां पुष्टिकर रस पाता, वहीं पहुंच जाता है। वट प्रभृति वृक्षके काण्डमें ईषत् पीतवर्ण मूल लटकते देख पड़ता है। वह साधारण नहीं।उद्भिद् के तत्त्वज्ञ उसे असाधारण वा अनियत मूल कहते हैं। प्रथमावस्था में काण्डका नाम मुकुल (Plumule) है। उसके अन्त्य भागमें एक कलिका आती, जो अन्त्य कलिका या मांझ कहाती है। उसी कलिकापर काण्डकी वृद्धि निर्भर है। उससे वीजपत्र निकलते हैं। काण्ड कई प्रकारका होता है,――१ भूपृष्ठशायी, २ ऊर्ध्वग, ३ लतायुक्त, ४ लम्बमान और ५ आरोही। <small>प्रत्येक शब्दमें तत्तत् विवरण देखो।</small> मूलमें नहीं-पत्र, वल्कल वा अन्य उपकरण काण्ड में रहता है। काण्डकी जिस जिस गांठसे पत्ती आती, वह पर्वसन्धि (Node) कहाती है। सन्धिद्वयके मध्यस्थित भागका नाम अन्तःपर्व (Inter-node) है। काण्डका एक अंश मट्टीमें रहता है। मूलको कलिका-विकाशकी क्षमता नहीं। मृण्मध्यस्थ काण्डसे किसी किसी पेड़की कोंपल निकल आती है। जैसे-केलेसे। अनेक व्यक्ति भ्रान्तिक्रमसे मट्टीके मध्यस्थ काण्डकी मूल-जै़सा समझते हैं। वस्तुतः जो कदलीकाण्ड कहाता, वह अत्यन्त विस्तृत पत्रवृन्तसमूहका कठिन काण्डाकार होनेके सिवा दूसरा कोई द्रव्य नहीं। उसका नाम मूलाकार काण्ड (Rhizoma) है। चक्षुःसंयुक्त मृण्मध्यस्थ काण्डको स्फीतकाण्ड (Tuber) कहते हैं। जैसे-आलू। कभी कभी काण्डके पत्र सम्पूर्ण खिल एक वा ततोधिक कठिन वस्तु उत्पन्न करते हैं। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> jzde6rj6z7p0q1a43ups3d8g5mbkput पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०० 250 75793 668117 608916 2026-07-18T16:04:36Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668117 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईर्मान्त—ईलिका|९९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|ईर्मान्त (व॰ त्रि॰) १ परिपूर्ण नितम्बयुक्त, पूरा पुट्ठा रखनेवाला। २ अस्थूल नितम्बयुक्त, पतले पुट्ठेवाला। ३ जोड़ीके दोनों बहुत बड़े घोड़े रखनेवाला। यह शब्द सूर्यके अश्वोंका विशेषण है।}} {{outdent|ईर्य (सं॰ त्रि॰) उत्तेजित किया जानेवाला, जो भड़काया जाता हो।}} {{outdent|ईर्यता (सं॰ स्त्री॰) भड़काये जानेवालेकी स्थिति, जिस हालतमें लोग भड़काये जायें।}} {{outdent|ईर्या (सं॰ स्त्री॰) ईर्यंत गुरोः शास्त्रीपासनया ज्ञायते, ईरि गती याचने चण्यत्-टाप्। १ भिक्षुव्रत, मज़हबी फ़कोरको तरह घूमनेको हालत। गुरुके निकट रहकर इसका अभ्यास बढ़ाना पड़ता है। २ शरीरके चार संस्थान, जिस्मकी चार सूरतें।}} {{outdent|ईर्यापथ (सं॰ पु॰) १ ध्यान धारणादि सीखनेका उपाय, मज़हबी फ़क़ीरका दस्तुर।}} {{outdent|ईर्यापथ आस्त्रव—जैनमतमें मन वचन और कायकी सहायतासे आत्मप्रदेशोंका हलन चलन होना योग है। और इसी योग द्वारा आत्मामें कर्मको पुनलवर्गणा ओंका सम्बन्ध होता है सो आस्त्रव है। {{smaller|(वर्गणा देखो)}} इस आस्रवके दो भेद हैं। एक सांपरायिक आस्त्रव, दूसरा ईर्यापथ आस्त्रव। शरीरधारी आत्माओंमेंसे कोई भी ऐसी आत्मा नहीं है जिसके ज्ञानावरणादि कर्मों का (आयुकर्मको छोड़कर) प्रति समयबन्ध न होता हो। इसलिये जो क्रोध मान माया लोभ आदि कषायवाली आत्मायें हैं उनके तो सांपरायिक आस्त्रव (शुभ) अशुभ फल देनेकी शक्तिवाले कर्मों का आना) होता है और जो क्रोधादि रहित हैं उनके ईर्यापथ आस्त्रव (फल न देनेकी शक्तिवाले कर्मों का आना) होता है।}} {{outdent|ईर्यापथक्रिया-सांपरायिक आस्त्रवके ३९ भेदोंमेंसे एक भेद। गमनके लिये जो क्रिया की जाय उसे ईर्यापथ-क्रिया कहते हैं। (जैनशास्त्र)}} {{outdent|ईर्यासमिति (सं॰ स्त्री॰) निरीक्षणके साथ गमन, देख-देखकर चलना। जैनमुनियोंको सूर्योदयके पश्चात् लोगोंके आवागमनसे मर्दित मार्ग होनेपर साढ़े तीन हाथ आगे देखकर चलनेका नियम है। इससे पैरके}} {{Multicol-break}} :नीचे पड़नेवाले कीड़े मकोड़े देख पड़ते हैं और कुचल जानेसे बचते हैं। {{outdent|ईर्वारु (सं॰ पु॰-क्ली॰) ईरुं वीजमियर्ति, ईरु-ऋ बाहुलकात् उण्। १ कर्कटी, ककड़ी। २ स्फुटी, फूट।}} {{outdent|ईर्षणा (हिं॰) {{smaller|ईर्षा देखो।}}}} {{outdent|ईर्षा (सं॰ स्त्री॰) ईर्ष्यणम्, ईर्ष्य-वञ्, हसात् यलोपः। १ क्रोध, गुस्सा। २ अन्य स्त्री सहवासजनित पतिके चिज्ञादि देखनेसे उत्पन्न पत्नीका अभिमानविशेष, रश्क। ३ परचीकातरता, हसद, डाह। जो पुरुष स्वयं सम्भोग कर नहीं सकता और दूसरोंको करते देख जलता है, वह ईर्षाषण्ड कहलाता है।}} {{outdent|ईर्षालु (सं॰ त्रि॰) ईर्षास्त्यस्येति, ईर्ष्य-आलुच्। {{smaller|ईर्प्यस्यृहि गृहीति। पा ३।२।१५८।}} परश्रीकातर, हसदी।}} {{outdent|ईर्षित (सं॰ त्रि॰) ईर्षास्य संजाता, ईर्षा-इतच्। १ सञ्जातेर्षा, देख न सका गया। (क्ली॰) २ ईर्षा, इसद। {{smaller|"पत्यु र्वार्ध कमौर्षितं प्रसवनं नाशस्य हेतुः स्त्रियाः।" (हितोपदेश)}}}} {{outdent|ईर्षितव्य (सं॰ त्रि॰) ईर्षा किये जाने योग्य, जो हसद किये जाने काबिल हो।}} {{outdent|ईर्षी (सं॰ त्रि॰) ईर्षा ईष्य-छ-इनि। ईर्ष्याशील, देख न सकनेवाला।}} {{outdent|ईर्षु, {{smaller|ईर्षालु देखो।}}}} {{outdent|ईर्ष्यक (सं॰ पु॰) दृष्टियोनि नामक क्लीव, हिस्सी टट्टू। (त्रि॰) २ ईर्षालु, हसदी।}} {{outdent|ईर्ष्य माण, {{smaller|ईर्षालु देखो।}}}} {{outdent|ईर्ष्या, {{smaller|ईर्षा देखो।}}}} {{outdent|ईर्ष्यालु, {{smaller|ईषांलु देखो।}}}} {{outdent|ईर्ष्या, {{smaller|ईर्षा देखो।}}}} {{outdent|ईर्ष्यु, {{smaller|ईर्षु देखो।}}}} {{outdent|ईल (सं॰ पु॰) १ वन्यजन्तुविशेष, एक जङ्गली जानवर। २ मत्स्यविशेष, किसी किस्म़की मछली, वांग।}} {{outdent|ईलि (सं॰ स्त्री॰) ईद्यते स्तूयते, ईङ्-कि डस्य च लः। खङ्गाकार छुरिका विशेष, तलवार-जैसा चाकू। इसे ईलिका, ईली, करपाली, करपालिका और गुप्तिका भी कहते हैं।}} {{outdent|ईलिका, {{smaller|ईलि देखो।}}}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> dpox55x1cyev2vg7vmaef6146cn4kzm पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०१ 250 75794 668119 608917 2026-07-18T16:11:13Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668119 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१००|ईलिन-ईशितव्य|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|ईलित (सं॰ ति॰) ईड्-क्त, डस्य च लः। स्तुत, जो तारीफ़ या चुका हो।}} {{outdent|ईलिन (सं॰ पु॰) तंसुके पुत्र और दुष्यन्तके पिताका नाम।}} {{outdent|ईली, {{smaller|ईलि देखो।}}}} {{outdent|ईवत् (वै॰ त्रि॰) इसप्रकार सप्रताप, ऐसा शान्दार।}} {{outdent|ईश्—१ अदा॰ आत्म॰ अक॰ सेट। यह धातु अधिकार, आज्ञा और शासन अर्थमें आता है (वै॰ पु॰) २ प्रभु, मालिक।}} {{outdent|ईश (सं॰ त्रि॰) ईश्-क। १ अधिकारयुक्त, क़ाबिज़, हिस्सेदार। २ योग्य, क़ाबिल। ३ एकाधिकारी, पूरी मिलकियत रखनेवाला। ४ प्रधान, बड़ा। (पु॰) ५ स्वामी, मालिक। ६ शिव, महादेव। ७ विष्णु। ८ रुद्र। ९ नेता, राह देखानेवाला। १० एकादश संख्या, ग्यारह हिन्दसा। ११ आर्द्रा नक्षत्र। १२ ईशावास्य उपनिषद्। १३ पारद, पारा। १४ अञ्जनरस। १५ पञ्चवक्तरस।}} {{outdent|ईशता (सं॰ स्त्री॰) {{smaller|ई शत्व देखो।}}}} {{outdent|ईशत्व (सं॰ क्ली॰) ईशस्य भावः, त्व। प्राधान्य, बड़ाई।}} {{outdent|ईशन (सं॰ क्ली॰) ईश-ल्युट्। शासन, हुकूमत।}} {{outdent|ईशसखि (सं॰ पु॰) ईशस्य सखा, ततष्टच् समासान्तः। शिवके मित्र कुवेर।}} {{outdent|ईशलिङ्गिनी, {{smaller|ईशलिङ्गी देखो।}}}} {{outdent|ईशलिङ्गी (सं॰ स्त्री॰) विष्णुक्रान्तालता, एक बेल।}} {{outdent|ईशा (सं॰ स्त्री॰) ईश-अ-टाप्। १ लाङ्गलदण्ड, इलका डण्डा। ईशस्य भार्या, आप्। २ शिवपत्नी, दुर्गा। ३ स्वामीकी स्त्री, मालकन। ४ शक्ति, ताक़त। ईशादण्ड (सं॰ पु॰) शकट प्रभृतिके चक्रमें लगने-वाला दण्ड, पहियेका डण्डा।}} {{block center|<poem>{{smaller|"योजनानां सहस्राणि भास्करस्व रथो नव। ईशादण्णस्तथै वास्व द्विगुणो सुनिसत्तम॥" (विष्णुपुराण २।८।२)}}</poem>}} :{{gap}}अर्थात् नव योजन पर्यन्त सूर्यरथ और उससे द्विगुण ईशादण्ड विस्तृत है। {{outdent|ईशादन्त (सं॰ पु॰) ईशेव दीर्घो दन्तोऽस्य, बहुव्री॰। १ उदग्रदन्ती, बड़े दांतका हांथी। २ हस्तिदन्त, हाथीदांत।}} {{Multicol-break}} {{outdent|ईशाध्याय (सं॰ पु॰) ईशोपनिषत्।}} {{outdent|ईशान (सं॰ क्ली॰) {{smaller|ईश-चानश्। ताच्छील्यवयोवचन-शक्तिषु चानश्। पा ।२।१२८।}} १ ज्योतिः, रौशनी। (पु॰) २ महादेव। ३ एकादशके मध्य रुद्रविशेष। ४ शिवकी अष्टमूर्तिमें सूर्यमूर्ति। ५ रुद्रसंख्या, ११। ६ आर्द्रा नक्षत्र। ७ साध्य विशेष। ८ विष्णु। ९ व्यक्तिविशेष, किसी शख्सका नाम। १० प्रभु, मालिक। ११ जैन मतमें माने गये १६ स्वर्गों में दूसरा स्वर्ग।}} {{outdent|ईशानकृत् (वै॰ त्रि॰) अपने अधिकारको काममें लानेवाला, जो अपनी लियाकत इस्तेमाल करता हो।}} {{outdent|ईशानकोण (सं॰ पु॰) ईशानाधिष्ठितः कोणः, शाक॰ तत्। पूर्व तथा उत्तरके मध्यका दिक्‌कोण। इस कोणके अधिपति शिव हैं।}} {{outdent|ईशानज (सं॰ पु॰) ईशाने इन्द्रस्य कल्पे जातः, ईशान-जन ड। ईशान कल्पभव एक प्रकारके देवता।}} {{outdent|ईशानवर्मा—एक प्राचीन मौखरिराज। इनकी महिषीका नाम लक्ष्मीवती था। मगधराज कुमार-गुप्तने इन्हें पराजित किया था। {{smaller|भौखरि राजवंश देखो।}}}} {{outdent|ईशानवायु (सं॰ पु॰) पूर्व और उत्तर मध्यवर्ती दिक् कोणसे चलनेवाला वायु। यह कटु होता है। {{smaller|(वैद्यकनि॰)}}}} {{outdent|ईशाना, {{smaller|ईशानी देखो।}}}} {{outdent|ईशानादिपञ्चमूति (सं॰ स्त्री॰) ईशान आदिर्यस्यां तादृशः पञ्चमूर्तयः। महादेवकी पांच मूर्ति अर्थात् ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजात।}} {{outdent|ईशानाध्युषित (सं॰ पु॰) ईशानेन अध्यषितः। तीर्थविशेष। {{smaller|(भारत ३।८४।८)}}}} {{outdent|ईशानी (सं॰ स्त्री॰) ईशानस्य पत्नी, ङीप्। १ दुर्गा। २ शमीवृक्ष, सेमल।}} {{outdent|ईशावस (सं॰ स्त्री॰) कूर्पूर विशेष, किसी किस्मका काफ़ूर। यह भेदी, वृष्य, मदापह तथा अति शुभ्र होता है और उन्माद, तृषा, श्रम, कास, कृमि, क्षय, खेद एवं अङ्गदाहको नाश करनेवाला है। {{smaller|(वैद्यकनिघण्ट)}} {{outdent|ईशावास्य (सं॰ क्ली॰) ईशा वास्यं पदं वर्तते, भभआद्यच्। ईशा उपनिषत्। {{smaller|पनिषद् देखो।}}}} {{outdent|ईशितव्य (सं॰ त्रि॰) ईश-तव्य। १ अधीन, मातहत, जो हुक्म मान सकता हो।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> rixim0soxhyrgsuxxzh5ni0m6ibo76s पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०२ 250 75795 668121 608918 2026-07-18T17:00:54Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668121 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||देशिता-ईश्वर|१०१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|ईशिता (सं॰ स्त्री॰) ईशिन् भावे तल्। अणिमादि अष्टके मध्य प्रथम ऐश्वर्य, सब पर दबाव रखनेको ताकत।}} {{outdent|ईशिट (सं॰ ति॰) ईष्टे इश-तृच्। १ राजा, नवाब २ प्रभु, मालिक।}} {{c|{{smaller|"तदीशितारं चेदीनां भवांस्तमवमंस्त मा।" (माघ)}}}} {{outdent|ईशित्व (सं॰ क्ली॰) ईशिनो भावः। ऐश्वर्य, सबक़त, बड़ापन। यह योगका एक धर्म है, जिससे जङ्गमादि जीवजन्तु सकल वशीभूत हो जाते हैं। ईशिता शक्ति आनेसे जगत् वश्य हो सकता है।}} {{outdent|देशिन् (सं॰ ति॰) ईश्-णिनि। १ ईश्वर, खुदा। २ पति, खाविन्द। ३ प्रभु, मालिक। {{smaller|"शंसेद ग्रामदशे शाय दशेशी विंशतीशिने।" (मनु ७।११६)}}}} {{outdent|ईशिर (सं॰ पु॰) अग्नि, आग।}} {{outdent|ईशोपनिषत् (सं॰ क्ली॰) उपनिषत् विशेष।}} {{outdent|ईश्वर (सं॰ त्रि॰) ईष्टे ईश-वरच्। {{smaller|स्थशभासेति। पा ३।२।१७५।}} १ आढ्य, कर सकने लायक। (पु॰) २ शिव। ३ ब्रह्म। ४ कामदेव। ५ नियन्ता, हुक्म रान्। ६ प्रभवादिके मध्य एकादश वत्सर। ७ स्वामी, मालिक। ८ ऐश्वर्यशाली, हैसियतवाला। ९ राजा। १० पारद, पारा। ११ मकरध्वज। १२ पित्तल, पीतल। १३ परमेश्वर।}} {{block center|<poem>{{smaller|"ईश एवाहमत्यर्थ" न च मामीशते परे। ददामि च सदेश्वर्थ ईश्वरस्ते न कीर्त्यते॥" (स्कन्दपुराण)}}</poem>}} अर्थात् मैं ही सकलका अतिशय नियन्ता हूं। मेरा नियन्ता कोई नहीं। मैं सर्वदा ऐश्वर्य देता हूं। इसीसे लोग मुझे ईश्वर कहते हैं। यदि ऋक्संहिता एवं अपरापर वेदमें इन्द्र तथा उनके मातापिताकी कथा मिले, तो वह वैदिक ऋषिगणकी प्रथम अवस्था मानना पड़ेगी। क्योंकि उसके बाद ही अजर, अमर, असीम इत्यादि विशेषण द्वारा विशेषित होनेसे इन्द्रका ईश्वरत्व प्रतिपादित है। कौषातकी ब्राह्मणीपनिषत् (३।२) में इन्द्रको उक्ति है,—इन्द्रही प्राण और वही मत्यन्नात्मा हैं। उन्हों प्रत्य-ज्ञात्माका ध्यान करनेसे अक्षय और अमर स्वर्ग प्राप्त होता है। {{smaller|(तैत्तिरीयस द्विता ३।१।१)}} {{Multicol-break}} जगत्‌को प्रथम अवस्थामें मानव जिसे अपने चारों ओर देखता, जिसे देख प्रफुल्लित होता, जिसके द्वारा उसका उपकार होता और जिससे डरता, उसे हो भक्तिपूर्वक मानता और पूजता था। कालवश जितना हो ज्ञानोन्मेष होता गया उतना ही वह सोचने-समझने भी लगा, जिससे में डरता है, जिसे मैं मानता और पूजता है, वह कहांसे उपजता है? उसके पिताका पिता कौन है? उसे किसने बनाया है? जो तरु-गुल्म-लता देख पडती है, वह क्या स्वभावसे ही उपजी है? जिस अग्निने द्रव्यको जलाया हैं, उसने दाहिकाशक्तिको कहांसे पाया है श? आकाशमें जो चन्द्र सूर्य तारा सकल निकलते हैं, जिनके रूपसे जगत् मुग्ध होता है और जिनसे कितना हो उपकार होता है; उन सबका स्रष्टा कौन है? जिस शक्तिसे चन्द्रसर्य निकलकर चमकते हैं, उसका आदि कारण कहां है? इसी प्रकार चिन्ता जबसे मानवके मनमें उठी, तबसे उसे एक अज्ञात पुरुष रहनेकी बात सुझने लगी और उस अज्ञात पुरुषको ढुढ़नेकी इच्छासे दौड भी लगाना पड़ी। यही ईश्वरत्तत्त्वका प्रथम सोपान है। हमारी चिराराध्य वेदसंहितामें उक्त महातत्त्वका आभास मिलता है। प्रथम भारतवासी इन्द्र, अग्नि, मित्र, वरुण, सूर्य, सोम, वनस्पति प्रभृतिकी आराधना करते थे। उसी समयसे ऋषियोंके मनमें ईश्वरचिन्ता चढ़ो और यह भावना बढ़ी, - {{block center|<poem>{{smaller|"अचिकित्वाश्चिकितुषश्चिदव कवीन् पृच्छामि विद्मने न विद्दान्ं। वि यस्त स्तम्भ षलिमा रजांस्यजस्य रुपे किमपि खिदेकम् ॥"(ऋक् १।१६४।६)}}</poem>}} हम ज्ञानहीन हैं। कुछ न समझकर यह ज्ञानियोंसे पूछना चाहते है, जो ये छः लोक हैं, वे क्या एक अज रूपसे रहते हैं? भारतीय ऋषियोंने ठहराया, कि उन्हीं असीम अनन्तमय दौष्पिताने सकल जगत् उपजाया है। इससे वे मुक्तकण्ठ ही पुकारने लगे,— {{block center|<poem>{{smaller|"अदितिर्दौरदितिरन्तरिक्षं' अदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वे देवा अदितिः पश्च जनाः अदितिर्जातमदितिज नित्यम्॥" (ऋक् १।९९।१०)}}</poem>}} अदिति आकाश, अदिति अन्तरीक्ष, अदिति माता {{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. 26}}</noinclude> 9k1kkkz3ulw16srdlibnps3dj5m3nzm पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०३ 250 75796 668122 608919 2026-07-18T17:28:28Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668122 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१०२|ईश्वर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पिता तथा पुत्र, अदिति सकल देव, अदिति पञ्च श्रेणीलोक और अदिति ही जन्म एवं मरणके कारण हैं। सामस हितामें ईश्वरतत्त्वका और अधिकतर परिचय मिलता है, ऋषियोंने कहा है,— {{block center|<poem>{{smaller|२१।२।३२ २१। २। ३९ "य‌द्याव इन्द्र ते शत ओं शत भूमी रुतासूत्र। नत्वा वव्चित् सहस्र ओं सूर्या अणु न जात मष्ट रोदसी॥" (साम १।३।२।४।६)}}</poem>}} हे इन्द्र! आपके परिमाणार्थ यदि समस्त द्युलोक शत संख्यक एवं समस्त पृथिवी भी शत संख्यक हो जाय, तो भी वे आपको छोड़ निकल नहीं सकते। हे वञ्चिन्! आपको सहस्र-सहंस्र सूर्य भी अनुभव कर नहीं सकते। अधिक क्या द्यावापृथिवी भी आपको व्याप निकल नहीं सकती। उसी प्राचीन कालमें ही ऋषियोंने ठहराया, कि वह ईश्वर ही मनुष्यको ज्ञान सिखलाता है,一 {{block center|<poem>{{smaller|२३ १२३ १२ ३२ ३२३ १२ "इन्द्र क्रतुन्न आभर पिता पुत्र भ्यो यथा। २३ ३१ २ ३ १२ २। "शिक्षा यो अस्मिन् पुरुहूत यामनि नौवा ज्योति रशीमहि॥ (साम १।६।२।२।७)}}</poem>}} हे इन्द्र! सर्वं भूत-प्रकाशक परमात्मन्! पिता पुत्रोंको जैसे, विद्या एवं धन प्रदान करता है, वैसे हो आप भी हमलोगोंको आत्मविषयक ज्ञानधन दीजिये। हे पुरुहूत! जिससे हम जीव सकलके पानयोग्य परब्रह्ममें विलीन हो परं ज्योतिःकी सेवा करें। अथर्व संहितामें काल ही ईश्वर-स्वरूप निर्दिष्ट हुआ है,— {{block center|<poem>{{smaller|"काली अश्श्री वहति सप्तरश्मिः सहस्त्रक्षो अजरी भूरिरताः। तमा रोहन्ति कव्यो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा॥१ काली भूमिमसृजत काले तपति सूर्यः‌। काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्वि पश्यति॥६ काले मनः काले प्राणः काले नामसमाहितम्। कालेन सर्वा नन्दत्यागतेन प्रजा इमाः ॥७॥ (अथर्वसंहिता १९।५६ स्॰)}}</poem>}} इसप्रकार सर्वज्ञ ऋषिगणने वेदके संहिताभागमें ईश्वरके अस्तित्वका आभास मात्र दिया है। किन्तु संहितामें जो वीज फूटा है, वेदके ब्राह्मण और आरण्यक {{Multicol-break}} अंशमें वही मानो खिल गया है। संहिता, ब्राह्मण और आरण्यकके प्रथमांशमें कर्मकाण्ड द्वारा ईश्वरकी आराधना निश्चित हुई है। किन्तु वैदिक ऋषियोंने विचारा-केवल कर्मकाण्ड द्वारा ईश्वरकी पूजाकर महाप्रभु प्रीत हो सकते हैं और हम भी यथेष्ट इश्वसुख मिल सकता है सही, किन्तु उस ईश्वरप्राप्तिके उपाय क्या हैं? किस प्रकार आचरण करनेसे मानव अनन्त सुख पायेगा और ईश्वरमें समाजायेगा? उस समय सकल हो ज्ञानके लिये लालायित हुये थे। ज्ञानकाण्ड में ईश्वरकी पूजा करने, ज्ञानतत्त्वमें ईश्वरको पहुंचानने और ज्ञानयोगमें परब्रह्मरूपी ईश्वरमें विलीन होनेका पथ लोग ढूंढ़ने लगे। ज्ञानमय ईश्वरके लिये सकल घबड़ा गये थे। इसलिये समय समझकर वैदिक ऋषियोंने ज्ञानकाण्डका प्रचार किया। इससे पहले हो वेद में बता दिया था—ईश्वर सर्वव्यापी है और इन्द्र तथा सोम प्रभृति देवता उसके नाम मात्र हैं। {{c|{{smaller|"'सुपर्ण' विप्राः कवयो वचोभिरेकं सन्तंषिहुधा कल्पयन्ति।" (ऋक् १०।११४।५) }}}} उपनिषत्में यह परमतत्त्व अच्छी तरह बताया गया है। ज्ञानपिपासु समझ सके थे,— {{block center|<poem>{{smaller|"महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः। पुरुषान परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः॥" (कठवल्ली १।११)}}</poem>}} महत्तत्त्वसे पृथिवीका आदिवीज और पृथिवीके आदिवीजसे परमात्मा सूक्ष्म है, किन्तु उस पुरुषकी अपेक्षा कुछ भी सूक्ष्म नहीं है। {{block center|<poem>{{smaller|"न जायते सियते वा विपश्चित् नाय' कुतश्चित् न बभूव कषित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न इन्यते इन्यमान शरीरे॥" (कठ २।१८)}}</poem>}} उस परम पुरुषका जम्म नहीं, मरण नहीं; वह ज्ञानस्वरूप है। किसी कारणसे उसको उत्पत्ति नहीं होती। वह आप भी अपना कारण नहीं है। वह अज, नित्य, शाश्वत और पुराण है। शरीर विनष्ट होनेसे वह विनष्ट नहीं होता। {{block center|<poem>{{smaller|"एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्जोतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥" (मुण्कोपनिषत् २।१।३)}}</poem>}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 6qdtu70s940yee8qnu6fnn7t0c9d5hp पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०४ 250 75798 668127 608920 2026-07-18T18:01:58Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668127 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वर|१०३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} इसो पुरुषसे प्राण, मन, इन्द्रिय सकल, आकाश, वायु, ज्योतिः, जल और विश्वको धारण करनेवाली पृथिवीने जन्म लिया है। {{block center|<poem>{{smaller|"अग्निमूर्धा चक्षुषो चन्द्रसूर्यौं दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः। वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पङ्गयां पृथिवी हाष सं रात्मा॥" (मुण्डकोपनिषत् २।१।४)}}</poem>}} अग्नि मस्तक, चन्द्रसूयं दोनों चक्षु, दिक् सकल कर्ण, वेद प्रसिद्ध वाक्य, वायु प्राण, ये विश्व हृदय पृथिवी ईश्वरका पद हैं। और वही सर्वभूतका और अन्तरात्मा है। इसप्रकार ज्ञानतत्त्व द्वारा ईश्वरका स्वरूप निरूपित हुआ कि आत्माही ईश्वर है। परन्तु इस ईश्वरको कौन देख सकता है? {{block center|<poem>{{smaller|"एष सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वयया बुद्या सूक्ष्मया सूमदर्शिभिः॥" (कठोपनिषत् ३।१२)}}</poem>}} आत्मा सर्वव्यापी होकर भी अविद्याकी मायासे ढका रहता है और अज्ञानीकें हृदय में प्रकाशित नहीं होता। सूक्ष्मदर्शीको सूक्ष्म बुद्धिसे ही उसका दर्शन मिलता है। {{smaller|परमात्मा शब्द विशेष विवरण देखो।}} उस समय ऋषिगणने मानवको सिखाया था,— {{block center|<poem>{{smaller|"यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्तः सदा शुचिः। स तु तत् पदमाप्नीति यस्माङ्ग यो न जायते॥" (कठ ३।८)}}</poem>}} जिसका बुद्धिरूप सारथि निपुण होता है, जो मनोरूप रज्जुको निजवशमें रखता है और जो सर्वदा सत्कर्म करता है, वही परमपद ईश्वरको पाता है। वह पद मिल जानेसे फिर जन्म नहीं होता । उपनिषत्में यह सकल हो निर्णीत हुना है,—मानव कैसे ईश्वरको पाता, कैसे ईश्वरमें समाता और कैसे इस संसारका दुःखदारिद्रा तथा माया-मोह छूट जाता है। इसी समय ज्ञानस्रोतमें बहने और कल्पनाके तरङ्गमें डूबनेसे मानवके मनमें ईश्वर-विषयक नाना-प्रकारके भाव उठने लगे। नानाभावके साथ-साथ अनेकोंने भिन्न-भिन्न सत निकाले। कोई वेदको संहिता तथा ब्राह्मणोक्त कर्मकाण्ड द्वारा और कोई आरण्यक एवं उपनिषद्‌ग्रीक्त ज्ञानकाण्ड द्वारा ईश्वरसे मिलनेको 'यत्नवान् हुआ। इसी मतविभिनतासे क्रमशः ऋषियोंमें नानाप्रकार वादानुवाद बढ़ा। कोई ऋषि श्रौतसूत्र {{Multicol-break}} बना वनवासी ऋषियोंको यागादि कर्मकाण्डकी और कोई गृह्यसूत्र प्रचारकर गार्हस्थ व्यक्तियोंको कर्मकाण्डकी रीति-नीति सिखाने लगा। इसी समय एक ओर जिस तरह कर्मकाण्डका प्राधान्य बढ़ा, दूसरी ओर उसीतरह ऋषिगण दर्शनसूत्र बना ज्ञान-बलसे ईश्वरका सूक्ष्मतम सूक्ष्मतत्त्व ढूंढ़नेमें प्रवृत्त हुये। इस सकल दर्शनसूत्रमें भी मतविभिन्नता देख पड़ती है। सांख्यसूत्रमें कपिलमुनिने स्थिर किया है,— {{c|{{smaller|"ईश्वरासिद्धेः।" (सांख्यस्॰ १।९२)}}}} ईश्वरका अस्तित्व प्रमाणित नहीं होता। {{c|{{smaller|"नश्वराधिष्ठिते फलनिष्पत्तिः कर्मणा तत्सिद्धः।" (५।२)}}}} ईश्वराधिष्ठित कारणमें कर्मद्वारा कर्मफलरूप परिणामकी निष्पत्ति अप्रमाणित है। {{c|{{smaller|"नात्माविद्या नीभयं जगदुपादानकारणं निःसङ्गत्वात्।" (५।६५)}}}} आत्मा और अविद्या उभय जगत्का कारण नहीं हो सकते, क्योंकि आत्मा निसङ्ग रहता है। {{c|{{smaller|"पुरुषबहुत्व' व्यवस्थातः।" (५।६५)}}}} पुरुषका बहुत्व प्रतिपादित हुआ है। {{c|{{smaller|"प्रमाणाभावान्न तत्तिद्धिः।" (५।१०)}}}} ऐसा सिद्धान्त हो नहीं सकता, कि नित्येश्वर विद्यमान है। क्योंकि उसके प्रमाणका अभाव है। फिर भी यदि कोई नित्येश्वरका अस्तित्व मानता है, तो— {{c|{{smaller|"खोपकारादधिष्ठानं लोकवत्।" (५।३)}}}} सामान्य लोगोंको तरह अपने स्वार्थपूरणके लिये उसका अधिष्ठान है। (क्योंकि वह कर्मफल भोग करता है) {{c|{{smaller|"लौकिकेश्वरवदितर था।" (५।४)}}}} (ऐसी अवस्थामें वह निश्चय ही) लौकिक राजा जैसा समझ पड़ता है। (इसलिये वह जगत्का उपादान कारण हो नहीं सकता) {{c|{{smaller|"मूले मूलोभावादमूलं मूलम्।" (१।६९)}}}} मूल (प्रकृति) का मूल नहीं होता, सुतरां मूल (प्रकृति) मूलशून्य रहता है। (अतएव मूलशून्य प्रकति ही जगत्‌का उग्रादान-कारण हो सकती है) {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> g24pfdib5jkiq9i1slrvzgficgjuvr8 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०५ 250 75800 668140 608921 2026-07-18T18:34:07Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668140 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१०४|ईश्वर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{c|{{smaller|"प्रकृतिवास्तवे च पुरुषस्याध्याससिद्धिः‌।" (२।५)}}}} वस्तुतः प्रकृति में पुरुषका अध्यास सिद्ध होता है। क्योंकि वेदने ही निर्देश किया है, कि पुरुषसे जगत् निकला है। {{smaller|(आत्मासे नहीं)}} ईश्वरवादीने ब्रह्म और हिरण्यगर्भ शब्दसे जैसे ईश्वरको समझा है, वैसे ही कपिलने भी समुदय जीवका आदिवीज एक पुरुषको माना है। {{c|{{smaller|"ईट्टशे श्वरसिद्धिः सिद्ध।" (३।५७)}} इस प्रकार (प्रक्कृतिलीन) जनेश्वर अवश्य मानना पड़ेगा। {{c|{{smaller|"प्रधानसृष्टिः परार्थ स्वतोऽप्यभोक्तृत्वादृष्ट्र, कुङु मवहनवत्।"}}}} (उस) प्रधानकी जगत्सृष्टि दूसरेके लिये है। क्योंकि उष्ट्रके कुङ्कुम वहनकी तरह वह स्वयं भोक्ता नहीं होता। {{c|{{smaller|"प्रक्लतिपुरुषयोरण्यत् सर्वमनित्यम्।" (५।१२)}}}} प्रकृति और पुरुषको छोड़ कर सभी अनित्य है। (अतएव प्रकृति और पुरुष ही जगत्‌का उपादान-कारण ठहरता है) अवशेषमें महर्षि कपिलने धारणा, ध्यान, आसन, विहित कर्मानुष्ठान और वैराग्यको ही मोक्षका द्वार बतलाया हैं। {{smaller|सांख्यसूत्र ३।३०-३६ देखो।}} योगसूत्रमें पतञ्जलि मुनिने प्रकाशित किया है,— {{c|{{smaller|"क्ले शकर्मविपाकाशयेरपरासृष्टः पुरुषविशे ष ईश्वरः।" (योगस्॰१।२४)}}}} क्लेश, कर्म, विपाक एवं आशय जिसे छू नहीं सकता और जो कालत्रयसे पृथक् तथा आमासे खतन्व रहता है, वही ईश्वर है। {{c|{{smaller|"तव निरतिशयं सूर्वज्ञत्ववीजम्।" (१।२५)}}}} ईश्वर निरतिशय ज्ञान रखनेसे सर्वज्ञ है। {{c|{{smaller|"सपूर्वक्षामपि गुरुः कालेनानवच्छ दात्।" (१।२६)}}}} वह पूर्वतनों (आदि सृष्टिकर्तावों) का भी गुरु है। वह किसी काल द्वारा अवच्छिन नहीं होता। {{c|{{smaller|"तस्य वाचकः प्रणवः।" (१।२७)}}}} प्रणव उसका बोधक है। {{c|{{smaller|"तज्जपस्तदर्व भावमम्।" (१।२८)}}}} उस प्रणवका जप और उसके अर्थका ध्यान करना उपासना है। {{c|{{smaller|"ततः प्रत्यक्‌चेतमाचिगमोऽप्यन्तरायाभावाय।” (१९९८)}}}} {{Multicol-break}} (पूर्वोक्त उपासना द्वारा चित्त निर्मल होनेपर) उसके प्रत्यक्‌चैतन्यका (अर्थात् शरीरान्तर्गत आत्म-सम्बन्धीय) ज्ञान उपजता है। उस समय दूसरा कोई विघ्न नहीं पड़ता। (निर्विघ्न समाधि लग जाता है) कणाद ऋषिने ईश्वर अथवा पुरुष नामसे किसीका अस्तित्व नहीं माना है। (इसीसे अनेक उन्हें नास्तिक कहा करते हैं) किन्तु उनके भी गौणरूपसे ईश्वर माननेका प्रमाण मिलता है। कणादके मतमें— {{c|{{smaller|"इक्षभिसरणमित्यदृष्टकारितम्।" (वैशेषिक ५।२।७)}}}} वृक्षसे रस सञ्चार होनेका कारण अदृष्ट ही है। {{block center|<poem>{{smaller|"अपसर्पणसुपसर्पणमशितपीतस योगाः कार्यान्तरस थोगाचे त्यद टकारितानि।" (५।२।१७)}}</poem>}} अपसर्पण, उपसर्पण और मुक्त एवं पीत वस्तुका संयोग अदृष्टसे ही उत्पन्न होता है। सिवा इसके अन्यान्य स्थलमें अदृष्टकी अनेक वस्तुका कारण कहा है। इससे समझ पड़ता है कि कणाद-कथित अदृष्ट हो (अर्थात् जिसका कार्यकारण प्रत्यच्च दृष्टिगोचर नहीं होता) ईश्वर है। कणादमत में अदृष्ट कारण-विशेष द्वारा परमाणु समुदायका संयोग होनेसे यह विश्वब्रह्माण्ड बना है। {{smaller|परमाणु देखो।}} महर्षि गौतमके मतसे— {{c|{{smaller|"ईश्वरः कारणं पुरुषकर्माफलादर्श नात्।" (न्यायस्व १।१।१८)}}}} ईश्वर ही कारण ठहरता है, क्योंकि मनुष्य-कृत कर्म सर्वदा सफल नहीं होता। {{smaller|न्याय देखो।}} गौतमके मतसे परमेश्वरमें नित्य ज्ञान, इच्छा और यत्नादि कतिपय गुण रहते हैं। वह जगत्का केवल गौतमके मतसे परमेश्वरमें नित्य ज्ञान, इच्छा और यत्नादि कतिपय गुण रहते हैं। वह जगत्‌का केवल निमित्त कारण है, उपादान कारण नहीं। जैमिनि ऋषिके मतमें वैदिक कर्मानुष्ठान द्वारा पुरुषार्थ मिल सकता है। उन्होंने भी ब्रह्मका अस्तित्व स्वीकार किया है,— {{c|{{smaller|"ब्रह्मापीति चेत्।” (पूर्वमीमांसा १२।१।३६)}} महर्षि वादरायणने समग्र उपनिषद्का सार निकाल वेदान्तसूत्रमें अच्छीतरह ईश्तरतत्वकी मीमांसा लिखी है। उन्होंने कपिल, कणाद, गौतम प्रसूतिका मत काटकर एक अद्वितीय परब्रह्मका स्वरूप देखा दिया है। उनके मतसे— {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 8iuwvmzjg9vyrs6i3jqof1r2gqqz0pj पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०६ 250 75802 668145 608922 2026-07-18T18:50:08Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668145 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वर|१०५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{c|{{smaller|"जन्माद्यस्य यतः।" (वेदान्तस्॰ १।१।२)}}}} जिससे जन्मादि (उत्पत्ति, स्थिति, भङ्ग) होते हैं, वही ब्रह्म है। {{c|{{smaller|"आनन्दमयोऽभ्यासात्।" (१।१।१२)}} परमात्म विषयमें आनन्द शब्दका बहु उच्चारण सुनते हैं। (इसी हेतु श्रुति-उक्त आनन्दमय परमात्मासे भिन नहीं है) {{c|{{smaller|"नेतरोऽनुपपत्तेः।" (२।१।१६)}}}} क्योंकि आनन्दमयमें जीवत्व नहीं है (पर-मात्मा और जोव भिन्न है) {{c|{{smaller|"गतिसामान्यात्।" (१।१।१०)}} समानरूपसे चेतनमें हो जगत्‌को कारणता प्रतीत होती है। {{c|{{smaller|"श्रुतत्वाच्च।" (१।१।१२)}}}} श्रुतिके मतमें सर्वज्ञ ईश्वर ही जगत्‌का कारण है। {{c|{{smaller|"अनुपपत्तिस्तु न शारीरः।" (१।२।३)}}}} ब्रह्ममें जोवका धर्म मिल सकता है, किन्तु जीवमें ब्रह्मका धर्म नहीं रहता। {{c|{{smaller|"परात्तु तच्छते।" (२।३।४२)}}}} क्या कर्तृत्व और क्या भीक्तत्व समस्त ही पर-मात्माके अधीन हैं। परमात्मा और {{smaller|वेदान्त देखो।}} प्रधानके जगत्‌कर्तृत्वको छोड़, वेदान्तका अपरापर मत अनेकांशमें सांख्यसे मिल जाता है। किन्तु इतने दिनोंसे कर्म एवं ज्ञानकाण्डपर जो झगड़ा था और दर्शनकारोंमें अपने-अपने विभिन्न मतपर जो विवाद बढ़ा था, श्रीकृष्णने जन्म ले उसको साधारणका सन्देह हटाकर मिटा दिया और सर्वशास्त्र-सङ्गत विशुद्ध ईश्वर-तत्त्व देखा दिया। श्रीकृष्ण-प्रीत गीता, वेद उपनिषद् और दर्शनशास्त्रके एकत्र मिलनको परिचायक है। वास्तवमें भगवद्‌गीताके तुल्य सार्वजनिक उपदेश-शास्त्र आजतक कहीं देख नहीं पड़ता। गोतामें भगवान्ने सांख्यके 'प्रधान', योगके 'ईश्वर', वैशेषिक के 'परमाणु', न्याय के 'कारण' और मीमांसाके 'ब्रह्म'को ईश्वर मान लिया है। उन्होंने लोगोंको समझाया-वेदीक्त कर्मकाण्ड और उपनिषद्‌प्रीक्त ज्ञानकाण्ड दोनोंसे ईश्वर वा मोच मिला जुला है। उनके मतमें— {{Multicol-break}} {{block center|<poem>{{smaller|"व्यक्ता कर्मफलासङ्ग' नित्यतृप्ती निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तेऽपि नेव किञ्चित् करोति सः॥२० निराश्रीर्यतश्चित्तात्मा व्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीर' केवल' कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्॥२१ यदृच्छा लाभसन्तुष्टी इन्दातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धी च कृत्वापि न निवध्यते॥२२ गतसङ्गस्य सुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समय' प्रविलीयते॥२३ ब्रह्मार्पण' ब्रह्महवित्र ह्माग्री ब्रह्मणाहुतः। ब्रह्मव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥" २४ (गीता ४ अध्याय)}}</poem>}} 'जो कर्मफलकी आसक्ति छोड़ चिरटप्त और सबके आश्रयसे दूर रहता है, वह सम्यक् प्रवृत्त होते भो कोई कर्म नहीं करता। जो कामना और सकल परिग्रह छोड़कर अपने आत्मा तथा मनको विशुद्ध रखता है, वह केवल शरीर द्वारा कर्मानु-ष्ठान करते भी पापभोगी नहीं बनता। जो यदृच्छा लाभसे सन्तुष्ट, शीतउष्ण एवं सुखदुःखादि दन्दसहिष्णु, शत्र विहीन और सिद्धि तथा असिडिको समान मानने-वाला है, वह कर्म करते भो किसी बन्धनमें नहीं पड़ता। जो कामना छोड़कर, रागादिसे मुक्त हो ज्ञानको चित्तमें अवस्थान देता है उसके यज्ञार्थ कर्मानुष्ठान करनेसे सकल कर्म विलुप्त हो जाते हैं। सुक् स्त्रवादि सकल पात्र ब्रह्म, हवनीय घृतादि ब्रह्म, अग्नि ब्रह्म और होम करनेवाला भो ब्रह्म ही है। कर्मस्वरूप ब्रह्म जिसका समाधि लगता, उसीको ब्रह्म मिलता है।' इस प्रकार भगवान्ने कर्मयोगीको ईश्वरतत्त्वका उपदेश दे पीछे प्रकाश किया है—{{block center|<poem>{{smaller|"आरुरुचोसु नेयो'ग' कर्म कारणमुच्यत योगारुढ़स्य तस्य व शमः कारणमुच्यते॥" (गीता ६।३)}}</poem>}} जो मुनि ज्ञानयोग पर आरोहण करना चाहता है, कर्म हो उसका सहाय बनता है। अनन्तर योगपर आरोहण करनेवालेको 'कर्मत्यागका सहारा लेना पड़ता है। इसी प्रकार कर्म और ज्ञानकाण्डका मिलन हुआ है। गोतामें व्यक्त किया है—एकके अभाव में दूसरा हो नहीं सकता। {{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol III. 27|2em}}</noinclude> 7i0pyuup8nnh7i5t99cuwesngby7fb6 668147 668145 2026-07-18T18:52:08Z ममता साव9 2453 668147 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वर|१०५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{c|{{smaller|"जन्माद्यस्य यतः।" (वेदान्तस्॰ १।१।२)}}}} जिससे जन्मादि (उत्पत्ति, स्थिति, भङ्ग) होते हैं, वही ब्रह्म है। {{c|{{smaller|"आनन्दमयोऽभ्यासात्।" (१।१।१२)}}}} परमात्म विषयमें आनन्द शब्दका बहु उच्चारण सुनते हैं। (इसी हेतु श्रुति-उक्त आनन्दमय परमात्मासे भिन नहीं है) {{c|{{smaller|"नेतरोऽनुपपत्तेः।" (२।१।१६)}}}} क्योंकि आनन्दमयमें जीवत्व नहीं है (पर-मात्मा और जोव भिन्न है) {{c|{{smaller|"गतिसामान्यात्।" (१।१।१०)}}}} समानरूपसे चेतनमें हो जगत्‌को कारणता प्रतीत होती है। {{c|{{smaller|"श्रुतत्वाच्च।" (१।१।१२)}}}} श्रुतिके मतमें सर्वज्ञ ईश्वर ही जगत्‌का कारण है। {{c|{{smaller|"अनुपपत्तिस्तु न शारीरः।" (१।२।३)}}}} ब्रह्ममें जोवका धर्म मिल सकता है, किन्तु जीवमें ब्रह्मका धर्म नहीं रहता। {{c|{{smaller|"परात्तु तच्छते।" (२।३।४२)}}}} क्या कर्तृत्व और क्या भीक्तत्व समस्त ही पर-मात्माके अधीन हैं। परमात्मा और {{smaller|वेदान्त देखो।}} प्रधानके जगत्‌कर्तृत्वको छोड़, वेदान्तका अपरापर मत अनेकांशमें सांख्यसे मिल जाता है। किन्तु इतने दिनोंसे कर्म एवं ज्ञानकाण्डपर जो झगड़ा था और दर्शनकारोंमें अपने-अपने विभिन्न मतपर जो विवाद बढ़ा था, श्रीकृष्णने जन्म ले उसको साधारणका सन्देह हटाकर मिटा दिया और सर्वशास्त्र-सङ्गत विशुद्ध ईश्वर-तत्त्व देखा दिया। श्रीकृष्ण-प्रीत गीता, वेद उपनिषद् और दर्शनशास्त्रके एकत्र मिलनको परिचायक है। वास्तवमें भगवद्‌गीताके तुल्य सार्वजनिक उपदेश-शास्त्र आजतक कहीं देख नहीं पड़ता। गोतामें भगवान्ने सांख्यके 'प्रधान', योगके 'ईश्वर', वैशेषिक के 'परमाणु', न्याय के 'कारण' और मीमांसाके 'ब्रह्म'को ईश्वर मान लिया है। उन्होंने लोगोंको समझाया-वेदीक्त कर्मकाण्ड और उपनिषद्‌प्रीक्त ज्ञानकाण्ड दोनोंसे ईश्वर वा मोच मिला जुला है। उनके मतमें— {{Multicol-break}} {{block center|<poem>{{smaller|"व्यक्ता कर्मफलासङ्ग' नित्यतृप्ती निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तेऽपि नेव किञ्चित् करोति सः॥२० निराश्रीर्यतश्चित्तात्मा व्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीर' केवल' कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्॥२१ यदृच्छा लाभसन्तुष्टी इन्दातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धी च कृत्वापि न निवध्यते॥२२ गतसङ्गस्य सुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समय' प्रविलीयते॥२३ ब्रह्मार्पण' ब्रह्महवित्र ह्माग्री ब्रह्मणाहुतः। ब्रह्मव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥" २४ (गीता ४ अध्याय)}}</poem>}} 'जो कर्मफलकी आसक्ति छोड़ चिरटप्त और सबके आश्रयसे दूर रहता है, वह सम्यक् प्रवृत्त होते भो कोई कर्म नहीं करता। जो कामना और सकल परिग्रह छोड़कर अपने आत्मा तथा मनको विशुद्ध रखता है, वह केवल शरीर द्वारा कर्मानु-ष्ठान करते भी पापभोगी नहीं बनता। जो यदृच्छा लाभसे सन्तुष्ट, शीतउष्ण एवं सुखदुःखादि दन्दसहिष्णु, शत्र विहीन और सिद्धि तथा असिडिको समान मानने-वाला है, वह कर्म करते भो किसी बन्धनमें नहीं पड़ता। जो कामना छोड़कर, रागादिसे मुक्त हो ज्ञानको चित्तमें अवस्थान देता है उसके यज्ञार्थ कर्मानुष्ठान करनेसे सकल कर्म विलुप्त हो जाते हैं। सुक् स्त्रवादि सकल पात्र ब्रह्म, हवनीय घृतादि ब्रह्म, अग्नि ब्रह्म और होम करनेवाला भो ब्रह्म ही है। कर्मस्वरूप ब्रह्म जिसका समाधि लगता, उसीको ब्रह्म मिलता है।' इस प्रकार भगवान्ने कर्मयोगीको ईश्वरतत्त्वका उपदेश दे पीछे प्रकाश किया है—{{block center|<poem>{{smaller|"आरुरुचोसु नेयो'ग' कर्म कारणमुच्यत योगारुढ़स्य तस्य व शमः कारणमुच्यते॥" 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बुद्बुद् के स्तरद्वारा निर्मित है। वास्तविक किसी जीवित पदार्थकी पहिचान करनेके लिये प्रथम बुद्बुद् को चिन्ता रखना पड़ती है। नारङ्गीका-गूदा देखनेसे बुद् बुद् का दृष्टान्त मिलता है। बुद्बुद् का परिमाण अङ्गुलके चार सौ भागमें एकसे तीनतक बैठता है। और किसी किसी उद्भिद् में स्क्रु जैसी पेचदार नली (Spiral vessel) रहती है। ऐसे आकारविशिष्ट एवं सञ्चित पदार्थयुक्त और गोल बुद्बुद् के संयोगसे (Anular vessel) मण्डलाकार नली। निकलती है। बुद्बुद् अपने मध्यस्थ सञ्चित पदार्थ के कठिन पड़नेसे नालाकार बन जाते है,जिन्हें कोष्ठ कहते हैं। कोष्ठके वहिःस्थित व्यावर्तक स्तरकी त्वक्को और बुद्बुद्विशिष्ट मध्यस्तम्भका नाम मज्जा है। एक पर्णिक उद्भिद् दारुमय काष्ठविशिष्ट होनेसे नारियल और द्विपर्णिक आमके पेड़ जैसा देख पड़ता है। मज्जा और वल्कलके अव्यवहित निम्नभागमें अणु वीक्षणयन्त्र लगानेसे काष्ठका स्तर दृष्टिगोचर होता है। वही त्वक् और काष्ठकी वृद्धिका प्रधान स्थान है। वहां बुद्बुद् अतिसूक्ष्म प्राचीरविशिष्ट और अपने उपरिस्थ सञ्चित पदार्थसे विहीन रहते हैं। नूतन काष्ठ स्तरमें निर्माता बुद्बुद्, केवल दीर्घ एवं पदार्थके सञ्चयसे परिमाणमें कठिन तथा जलद्वारा अभेद्य हो सकते हैं।अन्तरस्थ कठिन काष्ठके स्तरको सार वा आन्तरिक काष्ठ (Heart-wood) कहते हैं। वह नाना वर्णयुक्त हो सकता है। सर्वापेक्षा अन्तरस्थ स्तरका नाम तन्तूत्पादक प्रदेश (Liber) है। क्योंकि कागज़ बननेसे पहले वृक्षका उक्त भाग निकाल लोग लिखा-पढ़ी करते थे। तन्तूत्पादक प्रदेशसे बाहर एक स्वतन्त्र हरित् एवं प्रस्फुट बुद्बुद् होता है।। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उसको हरित्स्तर कहते हैं। हरित्स्तरसे बाहर चीप पैदा करनेवाला स्तर (Cortical lair) है। सर्ववहिःस्थित स्तरका नाम चर्म (Epidermis) है। यह स्तर अधिकांश देख पड़ता है। नारियल या वैसे ही वृक्षके बीच जब पत्र फूटते, तब काण्डके नववर्धिष्णु अंशवाले अग्रभागसे निकटस्थ कितने ही बुदबुद सञ्चित पदार्थ द्वारा कठिन पड़ नली-जैसे बन जाते हैं। फिर वही नली एक बुदबुदके स्तरसे रक्षित रहती है। उक्त नली और कठिन बुदबुद सकल एकत्र स्तवक स्तवक पर मिल काण्डमें चञ्चुवा तन्तु उत्पादन करते हैं। किसी काण्डकी समस्त कलिकायें एककालमें ही व्यक्त हो डाल नहीं बनतीं। उनमें अनेक गुप्त रहतीं और वर्धिष्णुके अनिष्ट होने पर देख पड़ती हैं। कितनी ही परिवर्तित कलिकाओंके कठिन और सूच्यग्रवत् बननेसे कण्टक निकलता है। शरीफ़ और पीपलके पेड़में प्रत्येक पर्वकी सन्धिसे एक-एक पत्र निकलता है। इसको एकोत्तरक्रम कहते हैं। मदार और सेंहुड़ प्रभृति कितने ही पेड़ोमें प्रत्येक पर्वकी सन्धिसे दो पत्र फूटते हैं। इसका नाम प्रतीपस्थ है। काण्ड आदिम अवस्था पर कलिकामें रहता है। तन्मध्यस्थित स्तरविशिष्ट और घन सन्निविष्ट पत्र यथा-काल प्रस्फुटित हा सौन्दर्य, वर्णोत्कर्ष एवं सद्गन्ध द्वारा प्रकृतिको मतवाला बना देते हैं। इन पत्रोंका निगूढ़ तत्त्व ढूढ़नेसे नहीं मिलता। जितना ही इनकी उत्पत्तिका विषय जांचते है, उतना ही प्राणों में अभूतपूर्व आनन्दका सञ्चार हो निकलता है। इसलिये कहना पड़ता है――सिवा उस विश्वविधाता जगदीश्वरके कौन इसप्रकार कार्य को सुसम्पन्न कर सकता है! हम जैसे रक्तके शोधनार्थ श्वास लेते है, वैसे ही पत्र भी वायुग्रहणसे जीवगणके श्वासयन्त्रका कार्य चलाते हैं। वे वायुके ग्रहण और रचनके सिवा अधिक परिमाणसे जलका भी निषेक करते हैं। वृष्टिका जल प्रथम गिरकर मट्टी में घुसता है, जिसे उद्भिदका मूल चूसता है। प्रत्येक वृक्ष में सहस्र सहस्त्र <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol III. 67|1em}}</noinclude> 1ky162vsl2sfpnshu5utq8rnorwzvtn पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२४९ 250 75926 668205 667804 2026-07-19T09:06:16Z अँजली चौधरी 2439 668205 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२४८'''|'''उदरस्फुटा-उदवास'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उदरस्फटा (सं॰ स्त्री॰) नागवल्ली, पान।}} {{Outdent|उदराग्नि (सं॰ पु॰) जठराग्नि, सफरा, पेटमें खाना हज़म करने वाली हरारत।}} {{Outdent|उदराध्मान (सं॰ क्ली॰) उदरस्य आध्मानम्। उदरकी वायुफुल्लता, पेटका फूलना।}} {{Outdent|उदरानलपत्रक (सं॰ पु॰) लघुतालीशपत्र।}} {{Outdent|उदरामय (सं॰ पु॰) उदरस्य आमयः। अतीसार रोग, आंवके दस्त लगने की बीमारी। <small>अतिसार देखो।</small>}} {{Outdent|उदरामयकुम्भकेशरी (सं॰ पु॰) प्लीहाधिकारका एक रस, तिल्लीकी एक दवा। पारा, गन्धक, ताम्र, त्रिकटु, यवक्षार, टङ्गण, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, पञ्चलवण, यमानी एवं हिङ्गू प्रत्येक समभाग ले नीबूके रसमें घोंटे। एक माषा परिमित वटिका खिलानेसे उदरामय रोग अच्छा हो जाता है। <small>(रसेन्द्रसारसनग्रह)</small>}} {{Outdent|उदरामयिन् (सं॰ त्रि॰) उदरामययुक्त, जिसके आवकी बीमारी रहे।}} {{Outdent|उदरारिरस (सं॰ पु॰) उदराधिकारका रस, पेटकी एक दवा। पारद, शुक्तितस्थ, जैपाल और पिप्पली बराबर बराबर डाल वज्रीक्षीरमें घोंटे। माषामात्र वटी खानेसे स्त्रीका जलोदर आरोग्य होता है। दधि और ओदनका पथ्य देना योग्य है। <small>(रसेन्द्रसारसग्रह)</small>}} {{Outdent|उदरावर्त (सं॰ पु॰) उदरस्य आवर्त इव। नाभि, नाफ़, सूंड़ी।}} {{Outdent|उदरावेष्ट (सं॰ पु॰) शारीर कृमिभेद, पेटका केंचुवा।}} {{Outdent|उदरिक, <small>उदरिन् देखो।</small>}} {{Outdent|उदरिणी (सं॰ स्त्री॰) उदर-इनि-ङीप्। गर्भवती, हामिला, जिसके पेटमें लड़का रहे।}} {{Outdent|उदरिन् (सं॰ त्रि॰) १ उदरिक, बड़े पेटवाला। २ कुक्षिसम्बन्धीय, शिकमी, जो पेटसे सरोकार रखता हो। ३ उदरसर्वस्व।}} {{Outdent|उदरिल (सं॰ त्रि॰) उदर-इलच्। <small>तुन्दादिभ्य इलच् पा ५।२।११७।</small> उदरी, तोंदल, मुरमुरोंका थैला।}} {{Outdent|उदक (सं॰ पु॰) उत्-ऋच-घञ्। १ उत्तरकाल, आयिन्दा ज़माना। २ भाविफल, कामका आगे आने-वाला नतीजा। ३ मदनकण्टक, मैनफल। ४ धुस्तूर}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :वृक्ष, धतूरेका पेड़। ५ उत्कर्ष, सबकत, आगे निकल जानेका काम। ६ अन्त, सिरा। ७ भवनको उच्चता इमारतकी बुलन्दी। ८ उपहार, इनाम। {{Outdent|उदर्चिस् (सं॰ पु॰) उद्गतमर्चिः शिरा यस्य। १ अग्नि, आग। २ शिव। ३ कामदेव। (त्रि॰) उद्गतं प्रभा यस्मात्। ४ प्रज्वलित, भभकता हुआ।}} {{Outdent|उदर्द (सं॰ पु॰) उत्-अर्द अच्। दद्रु, हुमरा, ददोरा। वरटीके दष्टसंस्थान पर शोथ चढ़ने, कण्डू उठने, व्यथा बढ़ने, सड़न पड़ने और छर्दि, ज्वर एवं विदाह लगनेसे यह रोग उपजता है। <small>(माधवनिदान)</small>}} {{Outdent|उदर्दप्रशमनवर्ग (सं॰ पु॰) उदर्दक शमनका एक योग, ददोरा मिटानेवाली चीजोंका ज़खीरा। तिन्दुक, पियाल, वदर, खदिर, कदर, सप्तपर्ण, अश्वकर्ण, अर्जुन, पीतशाल और विट्खदिर मिलनेसे यह वर्ग बनता है। (चरक)}} {{Outdent|उदर्ध (सं॰ पु॰) शोणज्वर, सुर्ख बुखा़र।}} {{Outdent|उदर्य (सं॰ त्रि॰) १ उदरी, पेटवाला। (वै॰ क्ली॰) २ उदरपूरक, पेटका माद्दा।}} {{Outdent|उदलगुरी-आसाम प्रान्तके दरङ्ग जिलेका एक ग्राम। यह भूटानकी सीमाके समीप है। निकटवर्ती पहाड़ी लोगोंके साथ व्यापार करनेको प्रति वर्ष यहां मेला लगता, जो प्रायः एक मास चलता है। भूटानके राजा भेटकी चीजें खरीदने आया करते हैं। भूटिये हजारों रुपये का टट्टू, कम्बल, नमक तथा मोम बेचते और चावल, रुई, कपड़ा एवं पीतलका बरतन ख़रीदते हैं।}} {{Outdent|उदलावणिक (सं॰ त्रि॰) उदलवण-ठक्। लवणोदकसिद्ध, नमक और पानीसे पकाया हुआ।}} {{Outdent|उदवग्रह (सं॰ पु॰) स्वरित आघात विशेष। यह उदात्तपर निर्भर रहता, जो अवग्रहमें उठता है।}} {{Outdent|उदवना (हिं॰ क्रि॰) उदय होना, निकलना, देख पड़ना।}} {{Outdent|उदवसानीय (वै॰ त्रि॰) अन्तिम, अखी़र।}} {{Outdent|उदवसित (सं॰ क्ली॰) उदूर्ध्वमवसीयते स्म, उद-अव-षिञ् बहुवचने वाक्त। भवन, मकान्, रहने की जगह।}} {{Outdent|उदवास (सं॰ पु॰) उदके व्रतार्थवासः, उदादेशः।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> nqcdelo1tw7dhcxla40fzc19hebi48d पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२५१ 250 75931 668208 667805 2026-07-19T09:51:43Z अँजली चौधरी 2439 668208 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५०'''|'''उदापि-उदावर्त'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“उदानो नाम यस्तूर्ध्व मुपैति पवनीतमः। ऊर्ध्वजक्रु गतान् रोगान् करोति च विशेषतः।” (सुश्नुत)</poem>}}}} :{{gap}}महर्षि सुश्रुतके कथनानुसार ऊर्ध्वदिक् सञ्चरण करने वाले वायुका नाम उदान है। इसके कुपित होने से स्कन्धसन्धिसे उपरिस्थित सकल रोग उपजते हैं। :{{gap}}योगार्णवमें इसका क्रियास्थान आदि इसप्रकार निरूपित है―― {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“स्पन्दयत्यधरं वक्त गात्रनेत्रप्रकोपनः। उद्वेजयति मर्माणि उदानो नाम मारुतः॥ विद्युत्पावकवर्णः स्यादुत्थानासनकारकः। पादयोर्हन्तयोश्चापि सर्वसन्धिषु वर्तते॥”</poem>}}}} :{{gap}}उदानवायु अधर और मुखको फड़काता है। यह चक्षु एवं शरीरको प्रकोपकारी और मर्मको उत्तेजक है। वर्ण विद्युत् एवं पावक जैसा होता है। इसीके सहारे लोग उठते बैठते हैं। हस्त एवं पाद सकल सन्धिमें यह विद्यमान है। :{{gap}}वैद्यकके मतानुसार उदानवायु ऊपरको चढ़ता है। इसीके सहारे गाना और बात करना होता है। विशेषतः यह ऊर्ध्व-जत्रु-गत रोग बढ़ाता है। <small>(सुश्रुत)</small> :{{gap}}२ उदरावर्त, ढोंढी। ३ सर्प, सांप। ४ पक्ष्म, पलक। ५ बौद्ध शास्त्रभेद। इस शास्त्र में बुद्धदेवका चरित्र लिखा है। {{Outdent|उदापि (सं॰ पु॰) सहदेवके पुत्र और मगधराज जरा सन्धके पौत्र। <small>(हरिवंश)</small>}} {{Outdent|उदापेक्षी (सं॰ पु॰) विश्वामित्रके एक पुत्र। <small>(भारत)</small>}} {{Outdent|उदाप्य (वै॰ अव्य॰) धाराके ऊपर, दरयाके सामने।}} {{Outdent|उदाम (हिं॰) <small>उद्दाम देखो।</small>}} {{Outdent|उदायन (हिं॰) <small>उद्यान देखो।</small> {{Outdent|उदायुध (सं॰ त्रि॰) उदूर्ध्वं आयुधो यस्य। उद्धृतास्त्र, हथियार उठाये हुआ। <small>(रघु १२।४४)</small>}} {{Outdent|उदार (सं॰ त्रि॰) उत् उत्कृष्टं आ समन्तात् राति ददाति, उत्-आ-रा-आतश्चेति क। १ दाता, देने वाला। २ महात्मा, साधु। (गीता ७। १८) ३ सरल, सीधा। ४ उत्कृष्ट, बढ़िया। ५ गम्भीर, गहरा। ६ महोच्च, बहुत ऊंचा। ७ वदान्य, रहीम। ८ सारवान्, असली। ९ रम्य, उम्दा। १० न्याय्य, वाजिब।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :११ शिष्ट, शरीफ़। १२ असाधारण, अनोखा। (पु॰) १३ दीर्घशालि, लम्बा चावल। (अव्य॰) १४ ऊंचे स्वरसे, बुलन्द आवाज़में। (वै॰ त्रि॰) १५ उत्तेजक, उठाने या भड़कानेवाला। (पु॰) १६ उत्थानशील बाष्प, उठनेवाली भाप। १७ काव्यालङ्कार विशेष। इससे निर्जीव पदार्थमें शिष्टता प्रदर्शित करते हैं। {{Outdent|उदारा――सङ्गीतशास्त्रका सप्तक विशेष। सा ऋ ग म प ध और नि सात स्वरको एकत्र करने से सप्तक संज्ञा होती है। मनुष्यके देहमें स्वाभाविक तीन सप्तकसे अधिक नहीं निकलते। एसीसे भारतीय सङ्गीतशास्त्रमें उदारा, मुदारा और तारा तीन सप्तकका उल्लेख है। नाभिसे जो सप्तक उठता, उसे सङ्गीतज्ञ उदारा कहता है। वेदान्तके मतसे यह अनुदात्त है।}} {{Outdent|उदाराशय (सं॰ त्रि॰) उतकृष्ट आशयविशिष्ट, ऊंचा मतलब रखनेवाला, बड़ा।}} {{Outdent|उदावत्सर (सं॰ पु॰) वर्ष विशेष। इस वर्ष रौप्य देने से महाफल मिलता है। <small>इदावत्सर देखो।</small>}} {{Outdent|उदावर्त (सं॰ पु॰) उत्-आ-वृत्-घञ्। रोग-विशेष, पेटकी एक बीमारी। इसके होनेसे न तो मल गिरता, न मूत्र उतरता और न वायु ही चलता है।<br> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>वातविण्मूत्रजृ म्भाश्रुक्षवोद्गारवमौन्द्रियैः। व्याहन्यमानरुदितैरुदावर्तो निरुच्यते॥” (सुश्रुत)</poem>}}}}<br> {{gap}}वायु, मल, मूत्र, जृम्भा, अश्रु, काश, हिक्का, उद्गार, वमि, शुक्र प्रभृतिका वेग रोकने पर वायु ऊर्ध्वजान से यह रोग उतपन्न होता है। इसी कारण उदावर्त नाम पड़ा है।<br> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem> “क्षुतृष्णाश्वा-सनिद्रानामुदावर्तो विधारणात्। वायु:कोष्ठानुगो रुक्षैः कषायकटुषिक्तकैः। भोजनैः कुपित: सद्य सदावर्त करोति हि॥” (सुश्रुत)</poem>}}}}<br>{{gap}}क्षुधा, तृष्णा, निद्रा और श्वासका वेग रोकनेसे भी यह रोग हो जाता है। फिर रुक्ष, कषाय, कटु और तिक्त भोजन कोष्ठमें पहुंचनेसे वायु भड़कना इसकी उत्पत्तिका दूसरा कारण है।<br> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“तृष्णादित परिक्लिष्टं क्षीणं शूलैरभिद्रुतम्। शकृद्वमन्तं मतिमानुदावर्तिनमुत्सृजेत्।”</poem>}}}}<br> {{gap}}सुश्रुतने कहा――उदावत रोगमें तृष्णार्त, अत्यन्त}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qibzdt44le9zz2gehwg44u84jk7x4kn 668209 668208 2026-07-19T09:53:48Z अँजली चौधरी 2439 668209 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''२५०'''|'''उदापि-उदावर्त'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“उदानो नाम यस्तूर्ध्व मुपैति पवनीतमः। ऊर्ध्वजक्रु गतान् रोगान् करोति च विशेषतः।” (सुश्नुत)</poem>}}}} :{{gap}}महर्षि सुश्रुतके कथनानुसार ऊर्ध्वदिक् सञ्चरण करने वाले वायुका नाम उदान है। इसके कुपित होने से स्कन्धसन्धिसे उपरिस्थित सकल रोग उपजते हैं। :{{gap}}योगार्णवमें इसका क्रियास्थान आदि इसप्रकार निरूपित है―― {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“स्पन्दयत्यधरं वक्त गात्रनेत्रप्रकोपनः। उद्वेजयति मर्माणि उदानो नाम मारुतः॥ विद्युत्पावकवर्णः स्यादुत्थानासनकारकः। पादयोर्हन्तयोश्चापि सर्वसन्धिषु वर्तते॥”</poem>}}}} :{{gap}}उदानवायु अधर और मुखको फड़काता है। यह चक्षु एवं शरीरको प्रकोपकारी और मर्मको उत्तेजक है। वर्ण विद्युत् एवं पावक जैसा होता है। इसीके सहारे लोग उठते बैठते हैं। हस्त एवं पाद सकल सन्धिमें यह विद्यमान है। :{{gap}}वैद्यकके मतानुसार उदानवायु ऊपरको चढ़ता है। इसीके सहारे गाना और बात करना होता है। विशेषतः यह ऊर्ध्व-जत्रु-गत रोग बढ़ाता है। <small>(सुश्रुत)</small> :{{gap}}२ उदरावर्त, ढोंढी। ३ सर्प, सांप। ४ पक्ष्म, पलक। ५ बौद्ध शास्त्रभेद। इस शास्त्र में बुद्धदेवका चरित्र लिखा है। {{Outdent|उदापि (सं॰ पु॰) सहदेवके पुत्र और मगधराज जरा सन्धके पौत्र। <small>(हरिवंश)</small>}} {{Outdent|उदापेक्षी (सं॰ पु॰) विश्वामित्रके एक पुत्र। <small>(भारत)</small>}} {{Outdent|उदाप्य (वै॰ अव्य॰) धाराके ऊपर, दरयाके सामने।}} {{Outdent|उदाम (हिं॰) <small>उद्दाम देखो।</small>}} {{Outdent|उदायन (हिं॰) <small>उद्यान देखो।</small>}} {{Outdent|उदायुध (सं॰ त्रि॰) उदूर्ध्वं आयुधो यस्य। उद्धृतास्त्र, हथियार उठाये हुआ। <small>(रघु १२।४४)</small>}} {{Outdent|उदार (सं॰ त्रि॰) उत् उत्कृष्टं आ समन्तात् राति ददाति, उत्-आ-रा-आतश्चेति क। १ दाता, देने वाला। २ महात्मा, साधु। (गीता ७। १८) ३ सरल, सीधा। ४ उत्कृष्ट, बढ़िया। ५ गम्भीर, गहरा। ६ महोच्च, बहुत ऊंचा। ७ वदान्य, रहीम। ८ सारवान्, असली। ९ रम्य, उम्दा। १० न्याय्य, वाजिब।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :११ शिष्ट, शरीफ़। १२ असाधारण, अनोखा। (पु॰) १३ दीर्घशालि, लम्बा चावल। (अव्य॰) १४ ऊंचे स्वरसे, 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/>{{rh||उन्मथित-उन्माद|२८९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|उन्मथित (सं॰ त्रि॰) उत्-मथ-क्त। १ मर्दित, रगड़ा हुआ। २ विनष्ट, कुचला हुआ।}} {{outdent|उन्मद (सं॰ त्रि॰) उद्गतो मदो यस्य। १ उन्मादयुक्त, मतवाला। <small>(माघ ६।२९)</small> २ उन्मत्त, नशा पिये हुआ। (पु॰) ३ उन्माद, पागलपन।}} {{outdent|उन्मदन (सं॰ त्रि॰) प्रोतिसे उत्पन्न, द्रव्यसे जला हुआ।}} {{outdent|उन्मदिष्णु (सं॰ त्रि॰) उत्-मद-इष्णुच्। <small>अलंकृञ्निरा- कृञ्-प्रजनोत्पचोत्पतोन्मदरूच्प्रपवृतु-वृधु सहचर इच्छुक्। पा ३।२।१३६।</small> उन्मत्त, मतवाला।}} {{outdent|उन्मनम (सं॰ त्रि॰) उत्कण्ठितं मनो यस्य। १ उद्भिन्न, बेचैन। २ विमना, दूसरी तरफ दिल लगाये हुआ। <small>"पयोधरेणोरसि काचिदुन्मना:।" (भारवि ८।१९)</small>}} {{outdent|उन्मनस्क, <small>उन्मनस् देखो।</small>}} {{outdent|उन्मनायित (सं॰ क्ली॰) उन्माद, पागलपन।}} {{outdent|उन्मनी (सं॰ स्त्री॰) उन्मनस् पृषोदरादित्वात् ङीष्। योगीकी एक अवस्था। यह हठयोगकी एक मुद्रा है। दृष्टिको नासाके अग्रभागपर लगाने और भ्रुकुटिको ऊपर चढ़ानिसे उन्मनी मुद्रा बनती है।}} {{outdent|उन्मथ्य (सं॰ पु॰) १ हिंसा, मारकाट। २ कर्णपालीगत रोगविशेष, कानकी लौमें होनेवाली एक बीमारी।}} {{block center|<small><poem> "बलादबधर्यत कर्णे पालयां वायु: प्रकुप्यति। गृहीला सनफं कुर्याच्छोफं तदर्षवेदनम्॥ उन्मथ्यक: सकण्डू को विकार: कफवातज:।" (सुश्रुत)</small></poem>}} बलसे कर्णपालि बढ़ानिपर कर्णके प्रान्तभागमें वायु बिगड़ जाता है। फिर कफयुक्त हो वातश्रेष्माका वर्ण और वेदनाविशिष्ट शोथ उठता है। यह रोग कफवातसे उपजता और कण्डुविशिष्ट रहता है। {{outdent|उन्मन्धक (सं॰ पु॰) १ कणपालीगत रोग विशेष, कानकी लवका एक आजार। <small>उन्मन्ध देखो। (त्रि॰)</small> २ कम्पित करनेवाला, जो हिला डालता हो। ३ आघातकारी, मारनेवाला।}} {{outdent|उन्मथन (सं॰ क्ली॰) उत्-मन्थ-ल्युट्। १ मथन, मथाई। २ हनन, मारकाट।}} {{outdent|उन्मथित (सं॰ त्रि॰) मथा हुआ, जो हिलाया डुलाया या सताया गया हो।}} {{c|Vol III.{{gap}} 73}} {{Multicol-break}} {{outdent|उन्मयूख (सं॰ त्रि॰) उज्ज्वल, चमकीला, जो चमक रहा हो। जिसकी किरणें फैल रही हों।}} {{outdent|उन्मर्दन (सं॰ क्ली॰) उत्-मृद-ल्युट्। १ उद्घर्षण, रगड़। २ वायु वा शूल प्रश्तिके निवारणार्थ क्रिया विशेष, मालिश। <small>(सुश्रुत)</small> करणे ल्युट्। ३ मर्दनयोग्य द्रव्यादि, मालिशकी चीज़।}} {{block center|<poem><small> "उन्मर्दनमभिषेके ऽड्गमनीयैके।" (काव्यायनश्रौतसू॰ १९।४।१८) 'उन्मर्दनचन्दनादि।' (कर्क)</small></poem>}} {{outdent|उन्मा (वै॰ स्त्री॰)ऊर्ध्वमान, एक नाप। <small>(शुक्लयजु १५।६५)</small>}} {{outdent|उन्माथ (सं॰ पु॰) उन्मथ्यतेऽनेन, उत्-मथ करणे घञ्। १ ऋगवध्योग्य यन्त्र, फन्दा, जाल। भावे घञ्। २ मारण, मारकाट। (त्रि॰) ३ घातक, चोट करनेवाला।}} उन्मथित ( सं० त्रि०) उत्-मथ क्त। १ मर्दित, । उन्मयूख (सं० वि०) उद्दीप्त, चमकौला, जो चमक रगड़ा हुआ। २ विनष्ट, कुचला हुआ। | रहा हो। जिसको किरण फैल रही हो। उन्मद (सं० त्रि०) उद्गतो मदो यस्य । १ उन्माद- उन्मदैन (सं० क्लो०) उत्-मृद-ल्य ट् । १ उद्घ युक्त, मतवाला। (माघ हा२९) २ उन्मत्त, नशा पिये षण, रगड़। २ वायु वा शूल प्रभृतिके निवारणार्थ हुश्रा। (पु.) ३ उन्माद, पागलपन। क्रिया विशेष, मालिश । (मुत्रत) करण ल्युट । उन्मदन (सं० त्रि. ) प्रीतिसे उत्पन्न, इश्कसे ३ मर्दैनयोग्य द्रव्यादि, मालिशको चीज़ । जला हुआ। "उन्म नमभिषे केऽवनीयैक ।” ( कात्यायनश्रौतसू० १६१८) उन्मदिष्णु (सं. त्रि०) उत्-मद-दूष्णुच् । अलंवनिरा- 'उन्मर्द नचन्दनादि ।' (कर्क) क्ज-प्रजनोत्पचोत्पतोन्मदरुचापवपस्तु-धु सहचर इशाक् । पा शरा१३८ । उन्मा (वै० स्त्री० ) अवमान. एक नाप । उन्मत्त, मतवाला। (शुक्लयजु १५५६५) उन्मनस (सं. वि. ) उत्कण्ठितं मनो यस्य। उन्नाथ (सं० पु.) उन्मथ्यतेऽनेन, उत्-मथ करणे १ उद्विग्न, बेचैन। २ विमना, दूसरी तर्फ दिल लगाये घन। १ मृगवधयोग्य यन्त्र, फन्दा, जाल। भावे हुआ। “पयोधरेणोरसि काचिढन्मनाः।” (भारवि ८१६) घज। २ मारण, मारकाट। (त्रि.) ३ घातक, उन्मनस्क, उन्मनस देखो। चोट करनेवाला। उन्मनायित (स. क्लो) उन्माद, पागलपन। उमाथिन् (सं० त्रि. ) व्याकुल करनेवाला, जो उन्मनी ( स० स्त्री०) उन्म नस पृषोदरादित्वात् डी। घबरा देता हो। योगीको एक अवस्था। यह हठयोगकी एक मुद्रा है। उन्माद (स० वि०) उत्-मद वञ् । १ उन्मत्त, पागल । दृष्टिको नासाके अग्रभागपर लगाने और भृकुटिको (पु०)२ उत्-मद आधार घञ् । मत्तता रोग विशेष, ऊपर चढ़ानेसे उन्मनी मुद्रा बनती है। पागलपनकी बीमारी। नाना कारणोंसे मनोविकार उन्मन्थ (सं० पु.) १ हिंसा, मारकाट । २ कर्णपाली. होने पर यह रोग उपजता है। सुश्रुतके मतमें - गत रोगविशेष, कानको लौमें होनेवाली एक बीमारी। “मदयन्त्य सता दोषा यमाटुन्मार्गमाश्रिताः । . “वलावध यत कर्ण पाल्यां वायुः प्रजुपाति। मानसोऽयमतो व्याधिरन्माद इति कौर्तितः ॥" गृहीत्वा सकफ कुर्याच्छोफ तहर्णवेदनम् ॥ जिस रोगमें उगत दोष सकल अवंगत शिराके उन्मन्थक: सकको विकारः कफवातजः।” (मुश्रुत ) पथका आश्रय ले मनको मत्तता उपजात है, उसको बलसे कर्णपालि बढ़ानपर कर्णके प्रान्तभागमें उन्माद कहते हैं ।* वायु बिगड़ जाता है। फिर कफयुक्त हो वातश्लेष्मा । महर्षि चरकके कथनानुसार-जो अति भय खाता, का वर्ण और वेदनाविशिष्ट शोच उठता है। यह जो सत्त्वगुणसे दूर रहता, जो अखाद्य भोजन द्वारा रोग कफवातसे उपजता और कण्डविशिष्ट रहता है। एक प्रकारसे अधःपात लाता, जो मानसिक एवं उन्मन्धक (स'० पु०) १ कणेपालीगत रोग विशेष, शारीरिक स्वाभाविक क्रियायोंके विरुद्ध इन्द्रियादि कानको लवका एक आजार। उन्मन्ध देखो। (त्रि.) चलाता, जो शरीरको नितान्त क्षीण बनाता, जो २ कम्पित करनेवाला, जो हिला डालता हो। ३ आ रोगको असह्य यन्त्रणासे घबराता, जो काम क्रोध घातकारी, मारनेवाला। * "रुचानशौतानविरेकधातुचयोपवासरनिलोऽतिबद्धः । उन्मन्यन (स'• लौ०) उत्-मन्य-ल्युट। १ मथन, चिन्तादिदुष्टं हृदयं प्रदृष्य बुद्धि'म तिं वायुहन्ति शीघ्रम् ॥" (चरक) मथाई। २ हनन, मारकाट । शूखा या वासी भात, विरेक, धातुक्षय, उपवास आदि कारणोंसे उन्मथित (सं० त्रि.) मथा हुआ, जो हिलाया बहुत बढ़ा हुआ वायु चिन्ता द्वारा इदयको अत्यन्त विगाड़ता है और शीत्र डुलाया या सताया गया हो। हो बुद्धि एव' समतिको नष्ट कर देता है।... ... . Vol III. 73<noinclude></noinclude> g5gety3aoxjc06n6cz2veo4myc6gatd 668096 668088 2026-07-18T13:03:30Z अनुश्री साव 80 /* शोधित */ 668096 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अनुश्री साव" />{{rh||उन्मथित-उन्माद|२८९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|उन्मथित (सं॰ त्रि॰) उत्-मथ-क्त। १ मर्दित, रगड़ा हुआ। २ विनष्ट, कुचला हुआ।}} {{outdent|उन्मद (सं॰ त्रि॰) उद्गतो मदो यस्य। १ उन्मादयुक्त, मतवाला। <small>(माघ ६।२९)</small> २ उन्मत्त, नशा पिये हुआ। (पु॰) ३ उन्माद, पागलपन।}} {{outdent|उन्मदन (सं॰ त्रि॰) प्रोतिसे उत्पन्न, द्रव्यसे जला हुआ।}} {{outdent|उन्मदिष्णु (सं॰ त्रि॰) उत्-मद-इष्णुच्। <small>अलंकृञ्निरा- कृञ्-प्रजनोत्पचोत्पतोन्मदरूच्प्रपवृतु-वृधु सहचर इच्छुक्। पा ३।२।१३६।</small> उन्मत्त, मतवाला।}} {{outdent|उन्मनम (सं॰ त्रि॰) उत्कण्ठितं मनो यस्य। १ उद्भिन्न, बेचैन। २ विमना, दूसरी तरफ दिल लगाये हुआ। <small>"पयोधरेणोरसि काचिदुन्मना:।" (भारवि ८।१९)</small>}} {{outdent|उन्मनस्क, <small>उन्मनस् देखो।</small>}} {{outdent|उन्मनायित (सं॰ क्ली॰) 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नानसोऽभ्यमते व्याधिरुन्माद इति कीर्तितः॥"</poem></small>}} जिस रोगमें उक्त दोष सकल ऊर्ध्वगत शिराके पथका आश्रय ले मनकी मत्तता उपजाते है, उसको उन्माद कहते हैं।<ref>{{block center|<poem><small> "रूक्षान्नशीतान्नविरेकधातुक्षयोपवासैरनिलोऽतिवृद्धः। चिन्तादिदुष्टं हृदयं प्रदूष्य बुद्धिं स्मृतिं बाप्रदूष्य शीघ्रम्॥" (चरक)</small></poem>}} <small>शूखा या बासी भात, विरेक, धातुक्षय, उपवास आदि कारणोंसे बहुत बढ़ा हुआ वायु चिन्ता द्वारा हृदयको अत्यन्त बिगाड़ता है और शीघ्र ही बुद्धि एवं स्मृतिको नष्ट कर देता है।</small></ref> महर्षि चरकके कथनानुसार—जो अति भय खाता, जो सत्त्वगुणसे दूर रहता, जो अन्नाव्य भोजन द्वारा एक प्रकारसे अधःपात लाता, जो मानसिक एवं शारीरिक स्वाभाविक क्रियाओंके विरुद्ध इन्द्रियादि चलाता, जो शरीरको नितान्त क्षीण बनाता, जो रोगकी असह्य यन्त्रणासे घबराता, जो काम क्रोध {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> s2ndk2rfm0mrzh74tvzto60id20ni6n पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५७१ 250 76064 668128 609303 2026-07-18T18:05:52Z आदेश यादव 3609 668128 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|५७०|औरङ्गजेब|}}</noinclude>मथुरा पहुंचे। वहां मुरादके पारिषदोंने कहा, "बाप चोरङ्गसाथ न रहिये। मठ बड़े कठिन होते है। वह आपके प्राथनाथ करनेकी चेष्टामें है। हम लोगोंका परामर्श यही है, कि आप पहले हो उसे विनष्ट कर डालिये, नहीं तो और निष्क ति नहीं।" आखिर यही ठहरा, चोरी,बको मार डालना चाहिये। मुरादने अपने बड़े भाईको निमन्त्रण किया। पास तम्ब में कुछ पादमो किया रखे ये इशारा पाते हो वे औरङ्गजेवका शिर उतार ते । स्वभावतः, मुराद अकपट उदार पुरुष रहे । शत्रु मित्र सबके साथ वह समान व्यवहार करते थे। इससे पोरजे, व निःशङ्क निमन्त्रण पूर्ण करने गये। दोनों भाई भोजन करने बैठे थे । उमो समय नाज़िरने आकर मुरादके कानमें कुछ कहा । खल- विद्या में औरङ्गजे. ब दृष्टगुरु थे। दोनों का रङ्गट देखकर इनके मन सन्देह उठ पड़ा था। इन्होंने कातरता के साथ मुराद मे कहा, – “भाई ! आज आमोद न होगा। मेरे पेट में बहुत दर्द हो रहा है । तुम सब तय्यारी कर रखना, मैं कल फिर आखगा।" इतना कह ये झटपट तम्ब से बाहर निकल अपने शरीर रचको के पास चले पाये। बहाना करके औरङ्गजे व तीन चार दिनतक चारपाई पर पड़े रहे। पेटपोड़ाको चिकित्सा होने लगी। मुरादका मन सरल था; उन्होंने समझा- सचमुच ही दर्द हुधा है, इसमें कोई चातुरो नहीं है । लोन चार दिनमें दर्द दूर हो गया। पोरजे, बजे मुरादको कहला भेजा, "भाई! उस दिन वैसे उद्योगमें मैंने व्याघात लगा दिया था इसलिये मेरे मनमेंन्ट जोन मेरे वहां तुम्हारा निमन्त्रण है। कई सुन्दर, सुन्दर नाचने और गानेवाली है। उनका रूपयौवन स्वर्गको विद्याधरी भी अधिक है।" सुरादके पारिषदोंने बहुत समझाया-निमा मे जानेसे विपद हायहाय है परन्तु मुरादने किसोको भोन सुमो शरोररचक बाहर रहे सुराद चार प्रधान प्रधान सरदारोंको साथ ले घोरजे, ब खेमे में गये । नाच गान होने लगा। परन्तु इन सब आमोदों- का एक प्रधान अङ्ग सुरा है । औरङ्गजेबने इस आयो- जनमें बुटि न की यो सम्में चानन्दको घटा उम उठी। मुराद इतचैतन्य, उनके पारिषद इतचैतन्य और मरोररक्षक नये वाले हो गये। यह सुयोग पा परङ्गजेबने अपने भाईको बांधकर घागरे भेज दिया। कहते हैं, घागरा पहुंचनेपर सुरादका शिर काट लिया गया था औरङ्गजेबने देखा – यदि अभी सिंहासन अधिकार नहीं करता, तो फिर लोग पूरे सौरी मुझे न मानेंगे, अनेक आदमी अनेक प्रकारको बात कहेंगे । पारिषद भी समझ गये घौरङ्गजेब जो रात दिन धर्मको दुहाई दिया करते हैं, यह केवल पाषण्ड है पिता और वाताचोंको राज्यसे वचित करना हो उनका अभिप्राय है, अतएव मनमानी करनेसे हो वे सन्तुष्ट होंगे। यह सोच सब कोई इनसे यथाविधान राज्य में अभिषित होनेको धनुरोध करने लगे। पहले औरङ्गजेब बादशाह। उदासीन भातिको बहुत कुछ आपत्ति करके पीछे इन्होंने कहां देखता है. तुम लोग अपने सुख-चैन के लिये मुझे संसार त्याग करने न दोगे । अच्छा, न दो; संन्यासी लोग निर्जन गिरिगुहा में बैठकर जो शान्ति- "सुख लाभ करते हैं, ईश्वर करें, इस राजसिंहासन पर बैठ मैं भी वही सुखभोग करूं । यह बात सच है कि राजकाज देखने में ईवरको चिन्ता करनेका अवसर न मिलेगा, परन्तु कामसे काम है।<noinclude></noinclude> l4h7zpry93edqx2fdvcn5m3okafaail 668129 668128 2026-07-18T18:07:03Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 668129 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५७०|औरङ्गजेब|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मथुरा पहुंचे। वहां मुरादके पारिषदोंने कहा, "बाप चोरङ्गसाथ न रहिये। मठ बड़े कठिन होते है। वह आपके प्राथनाथ करनेकी चेष्टामें है। हम लोगोंका परामर्श यही है, कि आप पहले हो उसे विनष्ट कर डालिये, नहीं तो और निष्क ति नहीं।" आखिर यही ठहरा, चोरी,बको मार डालना चाहिये। मुरादने अपने बड़े भाईको निमन्त्रण किया। पास तम्ब में कुछ पादमो किया रखे ये इशारा पाते हो वे औरङ्गजेवका शिर उतार ते । स्वभावतः, मुराद अकपट उदार पुरुष रहे । शत्रु मित्र सबके साथ वह समान व्यवहार करते थे। इससे पोरजे, व निःशङ्क निमन्त्रण पूर्ण करने गये। दोनों भाई भोजन करने बैठे थे । उमो समय नाज़िरने आकर मुरादके कानमें कुछ कहा । खल- विद्या में औरङ्गजे. ब दृष्टगुरु थे। दोनों का रङ्गट देखकर इनके मन सन्देह उठ पड़ा था। इन्होंने कातरता के साथ मुराद मे कहा, – “भाई ! आज आमोद न होगा। मेरे पेट में बहुत दर्द हो रहा है । तुम सब तय्यारी कर रखना, मैं कल फिर आखगा।" इतना कह ये झटपट तम्ब से बाहर निकल अपने शरीर रचको के पास चले पाये। बहाना करके औरङ्गजे व तीन चार दिनतक चारपाई पर पड़े रहे। पेटपोड़ाको चिकित्सा होने लगी। मुरादका मन सरल था; उन्होंने समझा- सचमुच ही दर्द हुधा है, इसमें कोई चातुरो नहीं है । लोन चार दिनमें दर्द दूर हो गया। पोरजे, बजे मुरादको कहला भेजा, "भाई! उस दिन वैसे उद्योगमें मैंने व्याघात लगा दिया था इसलिये मेरे मनमेंन्ट जोन मेरे वहां तुम्हारा निमन्त्रण है। कई सुन्दर, सुन्दर नाचने और गानेवाली है। उनका रूपयौवन स्वर्गको विद्याधरी भी अधिक है।" सुरादके पारिषदोंने बहुत समझाया-निमा मे जानेसे विपद हायहाय है परन्तु मुरादने किसोको भोन सुमो शरोररचक बाहर रहे सुराद चार {{Multicol-break}} प्रधान प्रधान सरदारोंको साथ ले घोरजे, ब खेमे में गये । नाच गान होने लगा। परन्तु इन सब आमोदों- का एक प्रधान अङ्ग सुरा है । औरङ्गजेबने इस आयो- जनमें बुटि न की यो सम्में चानन्दको घटा उम उठी। मुराद इतचैतन्य, उनके पारिषद इतचैतन्य और मरोररक्षक नये वाले हो गये। यह सुयोग पा परङ्गजेबने अपने भाईको बांधकर घागरे भेज दिया। कहते हैं, घागरा पहुंचनेपर सुरादका शिर काट लिया गया था औरङ्गजेबने देखा – यदि अभी सिंहासन अधिकार नहीं करता, तो फिर लोग पूरे सौरी मुझे न मानेंगे, अनेक आदमी अनेक प्रकारको बात कहेंगे । पारिषद भी समझ गये घौरङ्गजेब जो रात दिन धर्मको दुहाई दिया करते हैं, यह केवल पाषण्ड है पिता और वाताचोंको राज्यसे वचित करना हो उनका अभिप्राय है, अतएव मनमानी करनेसे हो वे सन्तुष्ट होंगे। यह सोच सब कोई इनसे यथाविधान राज्य में अभिषित होनेको धनुरोध करने लगे। पहले औरङ्गजेब बादशाह। उदासीन भातिको बहुत कुछ आपत्ति करके पीछे इन्होंने कहां देखता है. तुम लोग अपने सुख-चैन के लिये मुझे संसार त्याग करने न दोगे । अच्छा, न दो; संन्यासी लोग निर्जन गिरिगुहा में बैठकर जो शान्ति- "सुख लाभ करते हैं, ईश्वर करें, इस राजसिंहासन पर बैठ मैं भी वही सुखभोग करूं । यह बात सच है कि राजकाज देखने में ईवरको चिन्ता करनेका अवसर न मिलेगा, परन्तु कामसे काम है।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 6jcte4dt46za9puy7rpqtnqih0f1b5f पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६५ 250 76160 668220 303989 2026-07-19T10:51:08Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668220 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४६४'''|'''एकभार्या—एकरस'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकभार्या (सं० स्त्री०) एकस्यैव भार्या, ६-तत्। साध्वी, पतिव्रता, नेकबख्त बोवी।}} {{outdent|एकभाव (सं० पु०) एकश्चासौ भावश्चेति, कर्मधा०। १ एक स्वभाव। २ एक अभिप्राय। ३ अभेद, तौहीद। ४ समभाव, बराबरी। ५ एक विषयमें अनुराग, एक ही बातकी चाह। ६ एकका अभिप्राय। ७ एक रूप। (वि०) ८ एक प्रकतिवाला, जिसके दूसरो बात न रहे।}} {{outdent|एकभुक्त (सं० त्रि०) १ एक बार भोजन करनेवाला, जो एक ही मरतबा खाता हो। २ एक साथ भोजन करनेवाला, जो अलग खाता न हो।}} {{outdent|एकभूत (सं० त्रि०) १ अविभक्त, मिला हुआ, जो बंटा न हो। २ एक विषयासक्त, एक ही काममें लगा हुआ।}} {{outdent|एकभूम (सं० पु०) एकाभूमिर्यस्य, बहुव्री०। एकतला गृह, एक मंजिला मकान्।}} {{outdent|एकभोजन (सं० क्ली०) १ केवल एक बारका आहार, सिर्फ एक मरतबा खाना। २ एक साथका भोजन।}} {{outdent|एकमत (सं० त्रि०) एक मात्र मत विशिष्ट, हमराय।}} {{outdent|एकमति (सं० स्त्री०) एका अनन्यविषया मतिः, कर्मधा०। १ एकविषयासक्त मन, एक ही बातमें लगा हुआ दिल। (वि०) एकस्मिन् विषये मतिर्यस्य, बहुव्री०। २ एक विषयमें चिन्ताशील, एक ही बात सोचनेवाला।}} {{outdent|एकमनाः (सं० त्रि०) एकस्मिन् विषये मनोऽस्य, बहुव्री०। एकाग्रचित्तसे चिन्ताकारी, दिल लगाकर सोचनेवाला।}} {{outdent|एकमय (सं० त्रि०) एकसे युक्त, जो एक रखता हो।}} {{outdent|एकमात्र (सं० त्रि०) एका मात्रा यस्य, बहुव्री०। एक मात्राविशिष्ट, जो दूसरी मात्रा रखता न हो।}} {{outdent|एकमालिक, {{smaller|एकमात देखो।}}}} {{outdent|एकमुंहा (हिं० वि०) एकमात्र मुखविशिष्ट, सिर्फ एक मुंह रखनेवाला। एकमुंहा दहरिया एक गहना होता है। यह फूल या कांसेसे बनता और नीच जातिकी स्त्रियोंके पहननेमें लगता है।}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकमुख (सं० त्रि०) एकं मुखं यस्य, बहुव्री०। १ एक द्वारविशिष्ट, एक दरवाजीवाला। २ एक ही स्थानकी ओर मुख झुकाये हुआ, जो किसी एक जगहको मुंह फेरे हो। ३ एकमात्र प्रधान रखनेवाला, जिसके एक ही अफसर रहे।}} {{outdent|एकमुखी, {{smaller|एकमुख देखो।}} एकमुखी रुद्राक्षमें फांककी रेखा एक ही रहती है।}} {{outdent|एकमूर्वा, {{smaller|एकमुख देखो।}}}} {{outdent|एकमूल (सं० पु०) पुण्डरीकवृक्ष, सफेद कमलका पेड़।}} {{outdent|एकमूला (सं० स्त्री०) एकं मूलं यस्याः, बहुव्री०। १ शालपर्णी। २ अतसी, अलसी।}} {{outdent|एकम्बा—बङ्गाल प्रान्तके पुरनिया जिलेका एक ग्राम। यह अक्षा० २५° ५८' उ० और द्राघि० ८७° ३६' ३०" पू० पर अवस्थित है। एकम्बा अपने जिलेके व्यवसायका एक प्रधान स्थान है। अन्न, गन्धद्रव्य, वस्त्र, चर्म प्रभृतिका काम होता है। बाजार बराबर लगा रहता है।}} {{outdent|एकयष्टि (सं० स्त्री०) मुक्ताकी एकमात्र यष्टि, मोतियोंकी अकेली लड़ी।}} {{outdent|एकयष्टिका (सं० स्त्री०) एका यष्टिरिव, उपमि०। फूलों या मोतियोंकी अकेली लड़ी।}} {{outdent|एकयोनि (सं० त्रि०) एका समा योनिर्जातिर्यस्य, बहुव्री०। १ एकजाति, हमकौम। २ एक स्थानसे उत्पन्न, जो एक ही जगहसे पैदा हो।}} {{outdent|एकरंग (हिं० वि०) १ तुल्य, बराबर। २ निष्कल, दूसरी बात न रखनेवाला।}} {{outdent|एकरज (सं० पु०) एको मुख्यो रजः रञ्जनद्रव्यम्, कर्मधा०। भृङ्गराज। {{smaller|भृङ्गराज देखो।}}}} {{outdent|एकरदन, {{smaller|एकदन्त देखो।}}}} {{outdent|एकरन्ध्र (सं० पु०) नदीवट।}} {{outdent|एकरस (सं० पु०) एकोऽन्यविषयको रसः, कर्मधा०। १ एकाभिप्राय, अकेला मतलब। २ एक विषयमें अनुराग, एक बातकी चाह। (त्रि०) एको रसो यत्र। ३ अभिन्न स्वभाव, उसी मिजाजवाला। एकरस नाटकादिमें शृङ्गारादिके अन्तर्भूत कोई एकमात्र रस अङ्गी और अन्यान्य रस अङ्गीभूत रहता है।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 8u5mmpaglzrso413bjxnuvelsitp90x पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६६ 250 76163 668218 303993 2026-07-19T10:48:02Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668218 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकरसिक—एकलव्य'''|'''४६५'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकरसिक (सं० वि०) एकमात्रविषयमें अनुरक्त, जो एक ही बातसे खूश रहता हो।}} {{outdent|एकराज (सं० पु०) १ प्रधान राजा। २ एकोजी।}} <div style="text-align: right;">{{smaller|एकोजी देखो।}}</div> {{outdent|एकराट् (सं० पु०) एक-राजन्-टच्। राजाहः सखिभ्यष्टच्। पा ५।४।९१। १ प्रधान राजा, बड़ा बादशाह। (त्रि०) २ एकाकी प्रकाशमान, जो अकेले ही रौशन हो।}} {{outdent|एकरात्र (सं० क्ली०) १ एकमात्र रात्रि, एक रात। २ उत्सव विशेष। यह एक ही रात रहता है।}} {{outdent|एकरात्रिक (सं० त्रि०) एकरात्रिके अर्थं पर्याप्त, जो एक रातके लिये काफी हो।}} {{outdent|एकरार (अ० पु०) १ अङ्गीकार, मंजूरी। २ वचन, कौल। प्रतिज्ञापत्रको एकारनामा कहते हैं।}} {{outdent|एकराशि (सं० पु०) एकश्चासौ राशिश्च, कर्मधा०। १ मेषादिके मध्य एकराशि। २ किसी वस्तुका एक स्तूप, ढेर। ३ आधिक्य, बढ़ती।}} {{outdent|एकराशीभूत (सं० त्रि०) एकत्र, इकट्ठा।}} {{outdent|एकरिक्थी (सं० पु०) एकस्य पितुः रिक्थमस्त्यस्य, एकरिक्थ-इनि। १ पिताकी सम्पत्तिका एक अंश पानेवाला, जो अपने बापकी जायदादका वारिश हो। २ तुल्यधनी, बराबरका दौलतमन्द।}} {{outdent|एकरूप (सं० त्रि०) एकं समानं रूपं अस्य, बहुव्री०। १ समानरूप, हमशक्ल।}} {{block center|<poem> "एकरूप तुम भ्राता दोऊ।" {{smaller|(तुलसी)}} </poem>}} (पु०) २ एकमात्र रूप, एक सूरत, एक किस्म। {{outdent|एकरूपतः (सं० अव्य०) एकमात्र रूपमें, बगैर तबदीली।}} {{outdent|एकरूपता (सं० स्त्री०) १ तुल्यता, बराबरी। २ सायुज्यमुक्ति।}} {{outdent|एकरूपी (सं० त्रि०) समान रूप रखनेवाला, हमशक्ल।}} {{outdent|एकरूप्य (सं० त्रि०) एकस्मात् आगतः, एक-रूप्य। हेतुमनुष्येभ्योऽन्तरस्यां रूप्यः। पा ४।३।८१। १ एक स्थानसे आगत, उसी जगहसे आया हुआ। २ एकमात्र रौप्यविशिष्ट।}} {{outdent|एकरोन् (Ekron)—फिलिस्टाइनका एक राजनगर। यह रामलेफसे ५ मील दूर फिलिसिया और शारौंके मैदानको पृथक् करनेवाली उच्च भूमिके दक्षिण ढालू भागपर अवस्थित है। कारबारी राहसे एकरोन}} <br><br>Vol. &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 117 </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> अलग है। समूएलके समय सम्भवतः यह स्वतन्त्र रहा। असीरियाके शिलालेखोंसे विदित हुआ, एकरोनके राजा पाड़ी पहले हेजकियावाले जुदाके अधीन रहे। किन्तु सेना चेरिवका जुदापर दबाव पड़नेसे उन्होंने स्वाधीनता पायी थी। सन् ७० ई०को इसमें यहूदी आकर बसे। मकान् मिट्टीके बने हैं। प्राचीनताका कोई लक्षण नहीं मिलता। आसपासकी भूमि उर्वरा है। {{outdent|एकर्च (सं० पु०) एका ऋक्, कर्मधा०। १ एक ऋक्। (क्ली०) २ एक ऋक्युक्त सूक्त। (वि०) ३ एक ऋक् आराध्ध।}} {{outdent|एकल (सं० त्रि०) एक-ला-क। एकाकी, अकेला।}} {{outdent|एकलंगा (हिं० पु०) कुश्तीका एक पेंच। एकलंगाडंड, एक प्रकारकी कसरतका नाम है।}} {{outdent|एकललौकपाई (हिं० स्त्री०) कुश्तीमें ऊपरसे चित करनेका एक पेंच।}} {{outdent|एकलव्य (सं० पु०) एका अङ्गुलिर्लव्या गुरुदक्षिणात्वेन छेद्या यस्य। निषादराज हिरण्यधनुके पुत्र। हरिवंशके मतसे इनके पिताका नाम श्रुतदेव था। किन्तु निषाद द्वारा प्रतिपालित होनेसे यह निषादके पुत्र-जैसे परिचित रहे। असाधारण गुरुभक्ति देखा एकलव्य अपनी कीर्त्ति स्थापनकर गये हैं। महाभारतमें लिखते, कि एकलव्य अस्त्रशिक्षाको द्रोणाचार्यके पास पहुंचे थे। किन्तु द्रोणाचार्यने उन्हें निषादका पुत्र समझ शिष्य न बनाया। फिर एकलव्यने किसी अरण्यमें जा द्रोणाचार्यकी एक काठमय प्रतिमूर्त्ति प्रस्तुत की थी। वह अनन्यमनसे उसकी आराधना कर योगके बल अस्त्रशिक्षा करने लगे। योगबल अथवा गुरुभक्तिसे वाणप्रयोगमें एकलव्यको लघुहस्तता उत्पन्न हुई। कौरव और पाण्डव अपने गुरु द्रोणके साथ उसी वनमें मृगया मारने गये थे। उनका एक कुत्ता हठात् एकलव्यका मलिन देह, कृष्णाजिन और जटापाश देख भूंकने लगा। एकलव्यने अति लघुहस्तसे उस कुत्तेके मुखमें सात शब्दभेदी वाण मारे थे। वह शरपूर्ण वदन लिये पाण्डवोंके निकट जा पहुंचा। वीर वाणक्षेपकारीकी भूयसी प्रशंसा करने लगे और}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> f7wjbnp50lml2p73y6wyq6jr0y2xq9m पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६७ 250 76165 668215 303995 2026-07-19T10:44:27Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668215 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४६६'''|'''एकला—एकवर्ण'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> अपनी अपेक्षा इसको शिक्षाका उत्कर्ष देख लज्जित हुये। फिर ढूंढ़ते-ढूंढ़ते निकट पहुंच उन्होंने एकलव्यसे परिचय पूछा था। उन्होंने कहा—मैं हिरण्यधनुका पुत्र और द्रोणाचार्यका शिष्य हूं। कौरवों और पाण्डवोंने यथासमय लौट आचार्यसे सब बता दिया। फिर निर्जनमें मिल अर्जुनने द्रोणाचार्यसे कहा—आपने मुझे अपना सबसे अच्छा शिष्य बताया था; किन्तु निषादकुमार ऐसे कैसे निकले ? द्रोण यह प्रश्न क्षणकाल सोच अर्जुनको ले एकलव्यके निकट गये। एकलव्य भी निरतिशय भक्ति-सहकारसे उनका अर्चनादि सम्पादन कर बोले—मैं आपका शिष्य हूं। गुरुने उत्तर दिया—यदि तुम प्रकृत रूपसे हमारे शिष्य हो, तो हमारी दक्षिणा दे डालो। एकलव्यने कहा—गुरो ! बतलाइये क्या दक्षिणा दूं, कोई भी वस्तु अदेय नहीं। एकलव्यकी यह बात सुन द्रोणाचार्यने कहा—यदि तुम दक्षिणा देना आवश्यक समझो, तो अपने दक्षिण हस्तका अङ्गुष्ठ उतार दो। एकलव्यने गुरुकी ऐसी आज्ञा पर भी अविचलित चित्तसे हंसी-खुशी अपना अङ्गुष्ठ काट दिया था। उससे उनका वाणप्रयोग एकबारगी ही न रुका सही, किन्तु वह लघुहस्तता जाती रही। {{smaller|( भारत, आदि १३४ अ० )}} {{outdent|एकला (हिं० वि०) एकाकी, अकेला।}} {{outdent|एकलिङ्ग (सं० क्ली०) एकं लिङ्गं यत्र, बहुव्री०। १ सिद्दिके साधनका स्थान। पांच कोसके बीच जहां अन्य लिङ्ग नहीं रहता, उसे ही सब कोई एकलिङ्ग कहता है। ऐसा स्थान अतिशय सिद्धिप्रद है। (पु०) एकं लिङ्गं पुंस्त्वादि यस्य। २ एकलिङ्गक शब्द, अजहल्लिङ्ग। अन्यलिङ्गक शब्दका विशेषण बनते भी इसका लिङ्ग नहीं बदलता। एकं पिङ्गलनेत्ररूपं चिह्नं यस्य। ३ कुवेर। {{smaller|एकपिङ्ग देखो।}}}} ४ मेवाड़वाले राजपूतोंके प्रधान उपास्य देव। उदयपुर राजधानीसे ४ कोस उत्तर गिरिपथमें एकलिङ्ग देवका मन्दिर बना है। चारो पार्श्वपर गगनस्पर्शी गिरिशृङ्ग हैं। उनसे अनेक सुनिर्मल निर्झर अविराम गतिमें प्रवाहित हैं। इस गिरिमालाके सकल वृक्ष एकलिङ्ग देवके नामपर उत्सर्गीकृत हैं। इनका </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> मन्दिर साधारण शिवके मन्दिर-जैसा है। निम्नतल श्वेत मरमर पत्थरसे अलङ्कृत है। मन्दिरका अभ्यन्तर भाग स्तम्भके समूहसे शोभमान है। मध्यमें संहाररूपी महादेवकी मूर्त्ति है। वही एकलिङ्ग नामपर बहु कालसे विख्यात हैं। लिङ्गके सम्मुख सुवृहत् नन्दीकी मूर्त्ति है। एकलिङ्ग देववाले मन्दिरके प्राङ्गणकी चारो ओर अन्यान्य देवताओंके भी मन्दिर बने हैं। {{outdent|एकलिङ्गभाक् (सं० त्रि०) एक जातीय केशर विशिष्ट पुष्पयुक्त, जो एक ही जैसे फूल रखता हो।}} {{outdent|एकलु (सं० पु०) एकं लुनाति, लू-क्विप्। ऋषिविशेष।}} {{outdent|एकलो (हिं० पु०) तासका एक्का।}} {{outdent|एकलौता (हिं० वि०) एकाकी, अकेला। यह शब्द 'पुत्र' का विशेषण है।}} {{outdent|एकवक्त्र (सं० पु०) एकं भीषणत्वेन मुख्यतमं वक्त्रं यस्य, बहुव्री०। १ असुर विशेष। (क्ली०) २ एक मुखी रुद्राक्ष।}} {{outdent|एकवचन (सं० क्ली०) एकमेत्वकं उच्यते अनेन, वच् करणे ल्युट्। व्याकरणोक्त एकत्ववाचक विभक्ति, वाहिद। सु, अम्, टा, ङे, ङसि, ङस् और ङि सात विभक्ति एकवचन बोधक हैं। हिन्दीमें भी जिससे एक पदार्थका बोध होता, वही एक वचन है। किन्तु अनेक स्थलोंपर एकवचन और बहुवचनके रूपमें भेद नहीं पड़ता, जैसे—एक मनुष्य आया, बीस मनुष्य आये। प्रायः हिन्दीके विद्वान संस्कृत शब्द न बिगाड़ एकवचन और बहुवचन दोनोंमें समान रूपसे रखते हैं।}} {{outdent|एकवत् (सं० त्रि०) एकोऽस्यास्ति, एक-मतुप्, मस्य वः। १ एकसंख्याविशिष्ट, अकेला अदद रखनेवाला। (अव्य०) एकस्येव, एक-वति। २ एकके न्याय, एककी तरह।}} {{outdent|एकवद्भाव (सं० पु०) एकेन तुल्यो भावः भवनम्, ३-तत्। शब्दनिष्ठ एकवचनान्तरूप कार्य, बहुतोंका मजमूवा।}} {{outdent|एकवर्ण (सं० त्रि०) एको वर्णो यत्र, बहुव्री०।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> oe3y2g2b6q4p5nl4tj0zb1ccdytznm6 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६४ 250 76211 668221 304055 2026-07-19T10:53:49Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668221 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकपुष्कल—एकभार्य'''|'''४६३'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> सिर्फ एक मर्द रखनेवाला। एकः पुरुषो भोक्ता यत्र। ४ एकपुरुषभोग्य, एक मर्दके काममें आने लायक। {{outdent|एकपुष्कल (सं० पु०) एकं पुष्कलं मुखं यस्य, बहुव्री०। काहल नामक वाद्यविशेष, एक बाजा।}} {{outdent|एकपुष्पा (सं० स्त्री०) एकं पुष्पं यस्याः, बहुव्री०। वृक्षविशेष, एक पेड़। इसमें एकमात्र पुष्प आता है।}} {{outdent|एकपृथकत्व (सं० क्ली०) भेदाभेद, लगाव और अलगाव।}} {{outdent|एकपेचा (फा० वि०) १ एक ही पेच रखनेवाला, जो एक ही बलका हो। (पु०) २ किसी किस्मकी पतली पगड़ी।}} {{outdent|एकप्रकार (सं० त्रि०) अभिन्नरूप, वैसा हो।}} {{outdent|एकप्रख्य (सं० त्रि०) अत्यन्त तुल्य, बिलकुल बराबर।}} {{outdent|एकप्रभुत्व (सं० क्ली०) साम्राज्य, सल्तनत।}} {{outdent|एकप्रयत्न (सं० पु०) शब्दकी एकमात्र चेष्टा, आवाज़की अकेली कोशिश।}} {{outdent|एकप्रस्थ (सं० पु०) परिमाणविशेष, एक तौल। यह ३२ पल या २ सेरका होता है।}} {{outdent|एकप्राणयोग (सं० पु०) एक श्वासका संयोग, एक ही सांसका मेल।}} {{outdent|एकफर्दा (फा० वि०) एक ही फ़सलवाला, जो एक ही बार फलता या फल देता हो।}} {{outdent|एकफल (सं० त्रि०) केवल एक अभिप्राय रखनेवाला जिसके एक ही नतीजा या मतलब रहे।}} {{outdent|एकफला (सं० स्त्री०) एकं फलमस्याः, बहुव्री० टाप्। ओषधि विशेष, एक बूटी।}} {{outdent|एकफली (सं० स्त्री०) एकं फलमस्याः, ङीष्। ओषधिविशेष, एक बूटी।}} {{outdent|एकफसला, {{smaller|एकफर्दा देखो}}}} {{outdent|एकबन्नी (हिं० स्त्री०) दो आंकड़े वाला लुंगर। इससे नाव रोकी जाती है। (वि०) २ एक रज्जु विशिष्ट, जो एक ही रस्सीका हो।}} {{outdent|एकबारगी (फा० क्रि० वि०) १ एक ही बारमें, साथ-साथ। २ अकस्मात् एकाएक। ३ सम्पूर्ण रूपसे, बिलकुल।}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकबाल (अ० पु०) १ भागर, किस्मत। २ अङ्गीकार, मंजूरी। राजीनामेको एकबाल-दावा कहते हैं।}} {{outdent|एकबुद्धि (सं० वि०) १ एक ही ध्यान रखनेवाला, जो उसी खयालका हो। (पु०) २ मण्डूक विशेष, एक मेंढक। पञ्चतन्त्रमें इसकी कथा लिखी है।}} {{outdent|एकभक्त (सं० क्ली०) एकं भक्तं भोजनं यत्र, बहुव्री०। १ व्रतविशेष। इस व्रतमें रात्रिका आहार छोड़ दिवसको दोपहरके समय केवल एकबार भोजन करते हैं। जो व्यक्ति विष्णुका भक्त रहता, सर्व जीवोंपर अहिंसा रखता, एकबार भोजन करता और प्रत्यह 'वासुदेवाय नमः' मन्त्र ८ सौ बार जपता, उसे अतिरात्र यज्ञका फल मिलता है। ऐसे ही नियम से जो संवत्सर काल अतिवाहित करता, वह पौण्डरीक यज्ञके फलका अधिकारी बनता और दश सहस्र वर्ष स्वर्ग भोग पुण्यक्षय होनेपर फिर मर्त्ये जाति भी माहात्म्यसे रहता है। (विष्णुधर्मोत्तर) (त्रि०) एकमेव भजते। २ एकमात्र व्यक्तिका अनुरक्त, जो एक ही आदमीकी खिदमत करता हो। ३ एकमात्र परमेश्वरका भक्त। ४ प्रधान भक्त।}} {{outdent|एकभक्तव्रत (सं० क्ली०) {{smaller|एकभक्त देखो।}}}} {{outdent|एकभक्ति (सं० स्त्री०) एका अनन्यविषया भक्तिः, कर्मधा०। १ एकमात्र विषयमें भक्ति, एक ही बातकी मुहब्बत। २ केवल एक बारका भोजन। (त्रि०) एका अनन्यविषया भक्तिर्यस्य, बहुव्री०। २ नितान्त भक्त, निहायत तावेदार।}} {{outdent|एकभङ्गेनय (सं० पु०) एकाभिकरूपौ भङ्गौमधिकृत्य नयः, मध्यपदलोपी कर्मधा०। न्याय विशेष, एक दलील। एकरूप बहु विषयोंके मध्य किसी स्थलमें एक की प्रवृत्ति पड़ने पर इस न्यायबलसे वैसे ही अन्य विषयोंकी भी प्रवृत्ति लग सकती है।}} {{outdent|एकभार्य (सं० पु०) एका भार्या यस्य, बहुव्री० ह्रस्वः। १ एक पत्नीवाला पुरुष, जिस मर्दके दूसरी औरत न रहे। (त्रि०) एकेन भार्यः। २ एक जन द्वारा प्रतिपाल्य, जो एक ही शख्सकी परवरिश पानेके काबिल हो।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> ggrxwyh7iieijdkj827u6z2labqpt0i पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६३ 250 76212 668222 304057 2026-07-19T10:58:11Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668222 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४६२'''|'''एकपर्णी—एकपुरुष'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> एकपर्णी, {{smaller|एकपर्णिका देखो।}} {{outdent|एकपर्वतक (सं० पु०) पर्वत विशेष, वर्तमान रोहेलखण्डकी दक्षिणस्थित गिरिमाला। {{smaller|( भारत, सभा २९ अ० )}}}} {{outdent|एकपलाश (सं० पु०) एकः पलाशो यस्य, बहुव्री०। एकमात्रपत्रविशिष्टवृक्ष, एक ही पत्तीका पेड़।}} {{outdent|एकपलिया (हिं० पु०) गृह विशेष, किसी किस्मका घर। इसमें दुबड़ेर नहीं पड़ती। दीवारों पर लम्बाई के आमने-सामने कड़ी रख छप्पर डाल देते हैं। छप्पर ढालू रखनेको एक ओर दीवार ज़रा ऊंची कर लेते हैं।}} {{outdent|एकपाटला (सं० स्त्री०) एकं पाटलं पुष्पं आहारो यस्याः। १ हिमालयकी एक कन्या। यह पार्वतीकी भगिनी रहीं। इन्होंने एकमात्र पुष्प खा तपस्या की थी। २ दुर्गा।}} {{outdent|एकपाश (सं० पु०) एकमात्रपण, अकेली बाजी।}} {{outdent|एकपात् (सं० पु०) एकः पादो यस्य, पाद् शब्दस्यान्तलोपः। संख्यासु पूर्वस्य। पा ५।४।१४। १ शिव। २ विष्णु। (त्रि०) ३ एक पाद रखनेवाला, लंगड़ा।}} {{outdent|एकपात (सं० वि०) अकस्मात् आ पड़ने वाला, जो एकाएक गुज़र जाता हो।}} {{outdent|एकपातिन् (सं० त्रि०) एकः सन् पतति, एकपतणिनि। एकाकी खड़ा रहने वाला, आज़ाद।}} {{outdent|एकपातिनी (सं० स्त्री०) स्वतन्त्र छन्दो विशेष।}} {{outdent|एकपाद (सं० पु०) एकश्चासौ पादश्च, कर्मधा०। १ एक पद, अकेला पैर। २ परमेश्वर। ३ एक असुर। ४ जनपदविशेष, एक बसती। ५ एकपादवासी, एकपाद मुल्कका बाशिन्दा। महाभारतमें लिखा, कि एकपाद जनपद दाक्षिणात्यके मध्य अवस्थित है। {{smaller|( सभा ३० अ० )}} यूनानी ऐतिहासिक मेगस्थिनिसने एकपाद जातिको ओकपेदिस् (Okupedes) एवं टिसियास् मनोपोदिस् ( Monopodes ) कहा है। यह लोग किरातजाति समझ पड़ते हैं।}} <div style="text-align: right;">{{smaller|किरात देखो।}}</div> {{outdent|एकपादिका (सं० स्त्री०) १ एकपदके अवलम्बनसे पक्षियोंका एक अवस्थान। "अथावलम्ब्य श्रममेकपादिकाम्।" {{smaller|( नैषध १म स० )}} २ शतपथ ब्राह्मणका द्वितीय पुस्तक।}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकपादुका (सं० त्रि०) एका पादुका यस्य, बहुव्री०। १ एकपाद, एक पैरवाला। २ जातिविशेष, एक कौम। कहते, एकपाटुक एक ही पैरमें जूता पहनते हैं।}} {{outdent|एकपिङ्ग (सं० पु०) एकं पिङ्ग-नेत्रं यस्य बहुव्री०। कुवेर। कुवेरके एकनेत्र पर काशीखण्डमें लिखा—कुवेरने अति कठोर तपस्यासे महादेवकी रिझा लिया था। उन्होंने शङ्करके समीपस्थ हो देखा—गौरी महादेवके वामपार्श्वपर बैठी थीं। कुवेरने सोचा, यह सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी कौन रहीं। जैसी उनकी सौभाग्यश्री थी, उससे अपनी अपेक्षा भी तपस्याकी शक्ति अधिक समझ पड़ी। इसीप्रकार सोचते-सोचते उन्होंने क्रूरभावसे दृष्टि डाली थी। बस, उनका वाम चक्षु फूट गया। फिर देवीने महादेवसे कुवेरका परिचय पूछा था। उन्होंने कहा—यह अतिभक्त और तुम्हांरे पुत्रके तुल्य हैं। इसीप्रकार नानारूप परिचय दे महादेवने कुवेरसे गौरीके पदतलपर गिरनेको कहा। कुवेरको देवीने वैसा ही करनेपर आशीर्वाद दिया था—तुम स्फुटित वामनेत्र द्वारा 'एकपिङ्ग' विख्यात होगे।}} {{outdent|एकपिङ्गल (सं० पु०) एकं पिङ्गलं नेत्रं यस्य, बहुव्री०। कुवेर। {{smaller|एकपिङ्ग देखो।}}}} {{outdent|एकपिण्ड (सं० त्रि०) एकः समानः पिण्डः श्राद्धादेः पिण्डः देहो वा यस्य, बहुव्री०। सपिण्ड, रिश्तेदार।}} {{outdent|एकपिण्डता (सं० स्त्री०) सपिण्डो-भाव, रिश्तेदारी।}} {{outdent|एकपितृक (सं० त्रि०) एकः समानः पिता यस्य, बहुव्री० कः। एक पिताके औरससे उत्पन्न, एक ही बापसे पैदा।}} {{outdent|एकपुत्र (सं० पु०) एक ही पुत्र रखनेवाला, जिस आदमीके एक ही बेटा रहे।}} {{outdent|एकपुत्रता (सं० स्त्री०) एकमात्र पुत्रकी अवस्थिति, एक ही लड़का रहनेकी हालत।}} {{outdent|एकपुरुष (सं० पु०) एकः श्रेष्ठः पुरुषः, कर्मधा०। १ परमेश्वर। २ प्रधान पुरुष, बड़ा आदमी। (त्रि०) एकः पुरुषो यस्मिन्, बहुव्री०। ३ एकमात्र पुरुषयुक्त,}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 34zd3lwiszo69s15jm2mww9ls78mqyf पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६२ 250 76214 668223 304059 2026-07-19T11:00:30Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668223 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकपक्ष—एकपर्णिका'''|'''४६१'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकपक्ष (सं० त्रि०) एकः पक्षो यस्य, बहुव्री०। १ उसी पक्षवाला, जो उसी ओरका हो। २ पक्षपाती, तरफदार। (पु०) ३ एक पक्ष, वही ओर।}} {{outdent|एकपक्षीय (सं० त्रि०) एक ही पक्षवाला, एकतरफा।}} {{outdent|एकपञ्चाश (सं० त्रि०) एकपञ्चाशत पूरणार्थे डट्। इक्यावनवां।}} {{outdent|एकपञ्चाशत् (सं० त्रि०) एकेन अधिका पञ्चाशत्। इक्यावन, पांच दहाई और एक इकाईसे बना, ५१।}} {{outdent|एकपञ्चाशत्तम, {{smaller|एकपञ्चाश देखो।}}}} {{outdent|एकपटा (हिं० वि०) एक ही पाट रखनेवाला, जो चौड़ाईमें जुड़ा न हो।}} {{outdent|एकपट्टा (हिं० पु०) कुश्तीका एक पेंच। लड़नेवालेकी एक जांघ हाथसे उठा दूसरे पैरमें अपने पैरसे चपरास मारते और ज़मीन पर चित फटकारते हैं।}} {{outdent|एकपतिका (सं० स्त्री०) एकः समानः पतिर्यस्याः, क-टाप्, बहुव्री०। सपत्नी, एक ही पतिकी स्त्री।}} {{block center|<poem> "सर्वासामेकपत्नीनामेका चेत् पुत्रिणी भवेत्। सर्वास्तास्तेन पुत्रेण प्राह पुत्रवतीर्मनुः॥" {{smaller|( मनु ९।१८३ )}} </poem>}} {{outdent|एकपत्नी (सं० स्त्री०) एको अद्वितीयः पतिर्यस्याः, बहुव्री०। १ पतिव्रता।}} {{block center|<poem> "तामावश्यं दिवसगणना तत्परामेकपत्नीम् !" {{smaller|( मेघ २।१० )}} </poem>}} २ सपत्नी। {{outdent|एकपत्र (सं० पु०) १ चण्डाल कन्द। २ श्वेत तुलसी।}} {{outdent|एकपत्रक, {{smaller|एकपत्र देखो}}}} {{outdent|एकपत्रा, {{smaller|एकपतिका देखो।}}}} {{outdent|एकपत्रिका (सं० स्त्री०) एकं गन्धवत्त्वात् श्रेष्ठं पत्रं यस्याः, बहुव्री० क-टाप् अत इत्। १ गन्धपत्रवृक्ष। २ पाण्डर-तुलसी वृक्ष।}} {{outdent|एकपत्री (सं० स्त्री०) नागवल्ली लता, पान।}} {{outdent|एकपत्रोत्पत्तिक (सं० त्रि०) अङ्कुरके समय एकमात्र पत्र निकालनेवाला, जो कोपल फूटते वक्त सिर्फ एक ही पत्ती देता हो।}} {{outdent|एकपद् (सं० त्रि०) एकपाद् विशिष्ट, एक ही पैर रखनेवाला।}} Vol. &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 116 </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकपद (सं० क्ली०) एकं पदं पदमात्रोच्चारणकालो यत्र, बहुव्री०। १ एकमात्र पाद, सिर्फ एक कदम। २ साधारण शब्द, मामूली लफ़्ज़। ३ वर्त्तमान समय, हालका वक्त। ४ वैकुण्ठ। ५ विभक्त्यन्त पद। ६ एकस्थान, वही जगह। ७ वास्तुमण्डलस्थ एककोष्ठरूप स्थान। (पु०) ८ शृङ्गारबन्ध विशेष। ९ वास्तुयागाराध्य देवता। १० एकपदविशिष्ट मृगविशेष। (त्रि०) ११ एक पदवाच्य। १२ एकपदविशिष्ट, एक पैरवाला।}} {{outdent|एकपदवान् (सं० त्रि०) एकपद-मतुप्, मस्य वः। एकपदविशिष्ट, एक पैरवाला।}} {{outdent|एकपदस्थ (सं० त्रि०) एकस्मिन् तुल्ये पदे अधिकारे तिष्ठति, एक पद-स्था-क। १ समानकार्यकारी, बराबरीका काम करनेवाला। २ तुल्यसम्भ्रमशाली, बराबरीवाला।}} {{outdent|एकपदा (सं० स्त्री०) एक पादात्मक छन्दोविशेष।}} {{outdent|एकपदि (सं० अव्य०) एकपद-इच्, निपातनात् साधुः। विद्गणादिभ्यश्च। पा ५।४।१२८। एकपादपर, एक पैरसे}} {{outdent|एकपदी (सं० स्त्री०) एकः पादो यस्याः, एकपाद-ङीप् ङीष् वा, पादस्य पदादेशः। १ पथ, पगडंडी। २ एकपदविशिष्टा, एक पैरवाली। ३ छन्दके चतुर्थांशसे विशिष्ट ऋक्।}} {{outdent|एकपदे (सं० अव्य०) १ अकस्मात्, एकाएक। २ एकबारगी, फौरन्। ३ एक ही चेष्टामें, अकेली कोशिशसे।}} {{outdent|एकपर (सं० त्रि०) एक चिह्नसे निर्णय करनेवाला। यह शब्द पाशेका विशेषण है।}} {{outdent|एकपरि (सं० अव्य०) एक ऊपर-नीचे, एक घट बढ़ कर।}} {{outdent|एकपर्णी (सं० स्त्री०) एकमेव पर्णं आहारो यस्याः। १ मेनकाके गर्भसे सम्भूत हिमालयकी तीन कन्याओंमें एक कन्या। यह असित देवलकी पत्नी थीं। {{smaller|(हरि १८ अ०)}} २ दुर्गा।}} {{outdent|एकपर्णिका (सं० स्त्री०) एकपर्ण-कन्-टाप्, अत इत्वम्। पार्वती। इन्होंने तपस्याके समय केवल एक पत्र खा जीवन धारण किया था।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 38x0co0l9e53qlnusybucgnsk47u2av पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६१ 250 76216 668224 304061 2026-07-19T11:02:40Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668224 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४६०'''|'''एकदेह—एकनेमि'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकदेह (सं० पु०) एको मुख्यो देहो यस्य, बहुव्री०। १ बुधग्रह, दबीर-फलक। एकः तुल्यो देहो यस्य। २ वंश, खान्दान्। ३ दम्पती, स्त्रीपुरुष। (त्रि०) ४ एकशरीर, सिर्फ एक जिस्म रखनेवाला।}} {{outdent|एकद्युः (सं० पु०) एकेन परमात्मना दिव्यति, दिव्-क्विप्-छट्। केवल परमात्मचिन्तक आत्माराम नामक एक ऋषि। यह नीधृके पुत्र थे।}} {{outdent|एकद्वार (सं० पु०) गुजरात प्रदेशके मध्यस्थित वटतीर्थके निकटस्थ एक प्राचीन तीर्थ। {{smaller|( प्रभासख० )}}}} {{outdent|एकधन (सं० क्ली०) एकमेव धनम्, मध्यपदलोपी कर्मधा०। १ एक मात्र धन, अकेलो दौलत। एक-अयुग्मं धनं धौरमानसृदकं यत्र, बहुव्री०। २ अयुग्म संख्यक कलस, अकेला घड़ा। ३ श्रेष्ठधन, बड़ी दौलत। (त्रि०) ४ एकमात्र धनशाली, अकेला दौलतमन्द।}} {{outdent|एकधनवित् (सं० त्रि०) १ एकधन नामक कलस प्राप्त करनेवाला। २ उत्तम बलि पानेवाला।}} {{outdent|एकधर्मी (सं० त्रि०) एकस्तुल्यो धर्मोऽस्यास्तीति, एक-धर्म-इनि। समान धर्म विशिष्ट, हम मजहब।}} {{outdent|एकधा (सं० अव्य०) एक-धा। संख्याया विधार्थे धा। पा ५।४।४२। १ एक प्रकार, साथ-साथ। २ साधारणतः, अकेले। ३ एक बार, फौरन्।}} {{outdent|एकधुर (सं० स्त्री०) यानविशेष, एक गाड़ी।}} {{outdent|एकधुर (सं० त्रि०) एका धूर्यस्य, एक-धुर-अ। ऋक्पूरब्धूः पथामानक्षे। पा ५।४।७४। १ केवल एक प्रकार भार वा धुरके योग्य, जो सिर्फ एक किस्मके बोझ या जुवेके क़ाबिल हो। २ भारविशेषवाही, कोई बोझ ढोनेवाला।}} {{outdent|एकधुरा (सं० स्त्री०) एका न द्वितीया धूः, कर्मधा०। एक भार, वही बोझ।}} {{outdent|एकधुरावह (सं० त्रि०) एक धुरायाः वहः, ६-तत्। एक भारवाहक, वही बोझ ढोनेवाला।}} {{outdent|एकधुरीण (सं० त्रि०) एकधुरां वहति यः, एक-धुर-ख। एकधुराल्लुक् च। पा ४।४।७८। एक भारवाहक, सिर्फ एक बोझ ढोनेवाला।}} {{outdent|एकनक्षत्र (सं० क्ली०) एकं नक्षत्रं यत्र, बहुव्री०। १ एक ताराविशिष्ट नक्षत्र। आर्द्रा, चित्रा और}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> स्वाति नक्षत्र एकतारामय है। २ अमावस्या। ३ एक नक्षत्र, अकेला सितारा। {{outdent|एकनट (सं० पु०) एको मुख्यो नटः, कर्मधा०। प्रधान नाट्यप्रवर्त्तक, सूत्रधार, खास खिलाड़ी। यह प्रस्तावना सुनाता है।}} {{outdent|एकनयन (सं० त्रि०) एकं नयनं यस्य, बहुव्री०। १ काना। (पु०) २ काक, कौवा। ३ कुवेर।}} {{outdent|एकनवत (सं० त्रि०) इक्यानवेवां।}} {{outdent|एकनवति (सं० स्त्री०) एकेन अधिका नवतिः, मध्यपदलोपी कर्मधा०। इक्यानवे, नौ दहाई और एक इकाईकी संख्या, ९१।}} {{outdent|एकनवतितम, {{smaller|एकनवत देखो।}}}} {{outdent|एकनाथ (सं० पु०) एकः प्रधानं नाथः, कर्मधा०। १ प्रधान राजा, खास मालिक। (त्रि०) २ एक प्रभु युक्त, जिसके एक ही मालिक रहे।}} {{outdent|एकनाथ भट्ट (सं० पु०) एक प्रसिद्ध ग्रन्थकार। दाक्षिणात्यके प्रतिष्ठान ( पैठान ) नगरमें इनका जन्म हुआ था। इन्होंने अन्वयार्थप्रकाशिका नाम्नी एक चण्डीकी टीका बनायी है।}} {{outdent|एकनायक (सं० पु०) एकः प्रधानं नायकः, कर्मधा०। महादेव।}} {{outdent|एकनायकराज्यतन्त्र (सं० क्ली०) एक ही राजाके मतानुसार निर्वाहित राज्यशासनका कार्य, जो हुक्म सल्तनतमें एक ही बादशाहके कहने पर चलता हो।}} {{outdent|एकनिश्चय (सं० पु०) १ साधारण स्वीकृति वा फल, मामूली मञ्जूरी या नतीजा। (त्रि०) २ एक ही प्रस्ताव को प्राप्त, जो वही मतलब रखता हो।}} {{outdent|एकनिष्ठ (सं० त्रि०) एका एकविषयिणी निष्ठा यस्य, बहुव्री०। एकासक्त, एक ही से लगा हुआ।}} {{outdent|एकनीड़ (सं० त्रि०) १ केवल एक स्थान रखनेवाला, जिसके एक ही बैठक रहे। २ साधारण गृह रखनेवाला, जो मामूली मकान् रखता हो।}} {{outdent|एकनीत (सं० क्ली०) रथ, गाड़ी। {{smaller|( भागवत ४।२६।२ )}}}} {{outdent|एकनेत्र, {{smaller|एकदृक् देखो।}}}} {{outdent|एकनेमि (सं० त्रि०) एक मण्डलविशिष्ट, एक ही दायरा रखनेवाला।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> cvl48lsyj8f4bi7r6yucti6eeojar1y पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६० 250 76218 668225 304063 2026-07-19T11:05:10Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668225 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकदंडा—एकदेशीय'''|'''४५९'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> यह नाम रखते हैं। उनके मतानुसार एकाकी जीवका साथी केवल कर्म है। {{outdent|एकदंडा (हिं० पु०) कुश्तीका एक पेच।}} {{outdent|एकदंता (हिं० पु०) १ एकदन्तविशिष्ट हस्ति, एक दांतका हाथी। २ एक दांतवाला।}} {{outdent|एकदंष्ट्र (सं० पु०) एका दंष्ट्रा यस्य, बहुव्री० ह्रस्वः। गणेश।}} {{outdent|एकदण्डी (सं० पु०) एकः केवलो दण्डोऽस्यास्तीति, एक-दण्ड-इनि। सन्न्यासविशेष। जब हृदयमें सनातन ब्रह्मात्माका निश्चय जमता, तब सन्न्यासी एकमात्र दण्ड पकड़ता है। चतुर्विध सन्न्यासियोंमें हंसश्रेणीवालोंके ही दण्डधारणकी व्यवस्था है। {{smaller|सन्न्यासी देखो।}}}} {{outdent|एकदन्त (सं० पु०) गणेश। किसी समय गणेशको द्वारपाल बना शिवसे दुर्गा कथोपकथन करती थीं। उसी समय परशुरामने शिवके दर्शनको आ गणेशसे द्वार छोड़नेको कहा। इनके अस्वीकार करनेपर दोनोंमें तुमुल युद्ध होने लगा। परशुरामके कुठाराघातसे गणेशका एक दन्त टूटा था। उसी समयसे इनका नाम एकदन्त पड़ गया। {{smaller|( ब्रह्मवैवर्त्तपुराण )}}}} {{outdent|एकदरा (हिं० पु०) एक दरवाला, जो दालान एक ही दरवाज़ा रखता हो।}} {{outdent|एकदस्ती (फा० स्त्री०) कुश्तीका एक पेच। इसमें लड़नेवालेका बायां हाथ अपने बायें हाथसे घुमा कर पकड़ते और दाहनेसे खोंच पीछे निकल जाते हैं। यह पेच कुश्ती लड़नेमें सबसे पहले सिखाया जाता है।}} {{outdent|एकदा (सं० अव्य०) एकस्मिन् काले, एक-दा। सर्वैकाद्यकिं यत्तदः काले दा। पा ५।३।१५। १ एक ही समयपर, फौरन्। २ एकबार, एक मरतबा, कभी-कभी। ३ किसी दिनको। ४ एक समय पर।}} {{outdent|एकदिक् (सं० स्त्री०) १ एक स्थान, वही जगह। २ एकपार्श्व, एक बगल। जैन शास्त्रमें दिक्सम्बन्धीय निर्धारित नियम लांघनेका एकदिशा—परिमाणातिक्रमण कहते हैं। श्रावकको प्रतिदिन चारो दिशाकी दूरी ठहरा चलना पड़ता है। उक्त नियम तोड़नेपर यह अतिचार लगता है।}} {{outdent|एकदुःखसुख (सं० वि०) सहानुभूति रखनेवाला,}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> हमदर्द, जो दूसरेके दुःखमें दुःखी और सुखमें सुखी रहता हो। {{outdent|एकदृक् (सं० पु०) एकमभिन्नं पश्यतीति, एक-दृश्-क्विप्। १ महादेव। २ तत्त्वज्ञानी। ३ ब्रह्मज्ञानी। ४ काक, कौवा। राम वाणसे कौवेकी एक आंख फूट गयी थी। (वि०) ५ काना। ६ एकपक्षपाती, तरफदार।}} {{outdent|एकदृश्य (सं० त्रि०) अकेला देखने योग्य, जो तनहा देखे जानेके क़ाबिल हो।}} {{outdent|एकदृष्टि (सं० स्त्री०) एका एकविषयिणी दृष्टिः, कर्मधा०। एकमात्र विषयपर दृष्टि, जो नज़र सिर्फ एक ही बातपर लड़ी हो। (पु०) एका दृष्टिर्यस्य, बहुव्री०। २ काक, कौवा। (वि०) ३ काना।}} {{outdent|एकदेव (सं० पु०) एकः प्रधानो देवः, कर्मधा०। परमेश्वर।}} {{outdent|एकदेवत (सं० त्रि०) एका देवता यस्य, बहुव्री०। एक ही देवताको दिया हुआ, जो एक ही देवताको चढ़ाया गया हो।}} {{outdent|एकदेवल्य (सं० त्रि०) एकां श्रेष्ठां देवतामर्हतीति, एकदेवता-यत्। श्रेष्ठ देवतापूजक, जो एक ही देवताको मानता हो।}} {{outdent|एकदेश (सं० पु०) एकश्चासौ देशश्चेति, कर्मधा०। १ एक स्थान, वही जगह। २ अंश, हिस्सा। (त्रि०) ३ एक स्थानका अधिकारी, जो एक ही जगह रखता हो। (अव्य०) ४ कुछ कुछ।}} {{outdent|एकदेशविभावितन्याय (सं० पु०) एकदेशः साध्यस्य विभावितो येन स चासौ न्यायश्चेति, कर्मधा०। तर्क विशेष, किसी किस्मकी दलील। इसमें प्रमाणादिसे साध्यका एकदेश अङ्गीकृत होता है।}} {{outdent|एकदेशस्थ (सं० त्रि०) एक ही प्रान्तपर अवस्थित, जो उसी जगह पर हो।}} {{outdent|एकदेशी (सं० वि०) एकोऽभिन्नो देशो वासस्थानत्वे नास्यास्तीति, इनि। १ एक देशवासी, उसी मुल्कका रहनेवाला। २ अंशोंमें विभक्त, जो हिस्सोंमें बंटा हो।}} {{outdent|एकदेशीय, {{smaller|एकदेशी देखो।}}}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> st0xic0ybe49f4ow7rr7l2zfoexke9z पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६७३ 250 76244 668090 609416 2026-07-18T12:15:02Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 668090 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६७२|कतक-कतरछांट|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} यद्यपि कतक वृक्षका फल अम्बुको परिष्कार करता, तथापि उसका नाम लेनेसे ही जल स्वच्छ नहीं पड़ता। यह वृक्ष भारतवर्ष पार्वत्य प्रदेश, बङ्गाल, दाक्षि-णात्य और सिंहलके किसी किसी स्थानमें उत्पन्न होता है। प्रत्येक वृचकी उंचाई ३०से ६० फीट तक रहती है। इसको लकड़ोसे जो तख ते बनते,वह गृहस्थके अनेक आवश्यक कार्यों में लगते हैं। कतकका फल बादामी और आध इञ्च मोटा होता, किन्तु पकनेसे काला पड़ जाता है। वल्कल हरिताभ धूसरवर्ण लमता और रेशमको भांति परिष्कार रूयेसे आच्छन्न रहता है। कतकका श्वेतसार आस्वादनहीन होता है। कतक कटु, तिक्त, उष्ण, चक्षुहितकर, रुचिकर और कमिदोषघ्न एवं शुलनाशक है। वीज जलको निर्मल बना देता है। <Small>(राजनिघण्टु )</small> भावप्रकाशके मतसे कतकका फल जलपरिष्कारक, चक्षुस्तिकर, वायु एवं समाको नाश करनेवाला,शीतल, मधुर, गुरु और कषाय है। चक्रदत्त बताते,कि चक्षुसे जलका गिरना दबाने और दृष्टिकी शक्ति बढ़ानेको निर्मलो मधु तथा कपूरके साथ रगड़ कर लगाते हैं। मुसलमान चिकित्सक कतकको शीतल और शुष्क समझते हैं। पेटपर इसे लगानेसे उदरव्यथा दूर होती है। यह चक्षुको लाभ पहुंचाता और सर्पके विषको धर दबाता है।किसी पारस्य ग्रन्थमें लिखा-मेह और मूत्राशय- सम्बन्धीय किसी प्रकारको पीड़ापर निर्मली विशेष उपकारी है। तामिल वैद्योंके मतसे पक्क फलको बुकनी वमनकारक होती है। कार्कपाटिक साहब कहते-निर्मलीको मूत्रवच्छ रोगके औषधको भांति व्यवहार करते हैं। युद्ध की यात्राके काल यह फल सिपाहियोंके पास रहना अच्छा है। क्योंकि पथमें किसी प्रकारका गन्दा जल मिलने से निर्मली द्वारा परिष्कार किया जा सकता है। जल परिष्कार करनेका गुण रखनसे ही अंगरेज लोग इसे क्लियरिङ्ग नट (Clearing nut)कहते है। {{Multicol-break}} २ कासमद, कसौंदो। ३ कुचेलक, कुचला। ४ जम्बोरवृक्ष, जंभौरी नीबू। ५ रामायणकी एक प्राचीन टोका। रामाभुज प्रभृति रामायणके टीकाकारोंने अपनी-अपनी टीकामें कतकका उल्लेख किया है। डा० बुरनेलके मतसे कतक सम्भवतः ई के १४वें अथवा १५वें शताब्द विद्यमान रहे। किन्तु अपर टीकाकारोंको उक्तिके अनुसार कतक-टोकाकार ५ म वा ६ ष्ठ शताब्दके लोग थे। कतक-टीकाकारने ग्रन्थके प्रारम्भमें कालहस्तिकका स्तव किया है। इससे अनुमान होता, कि वह दक्षिण देशमें रहते थे। कतकफल (सं० पु०) १ कतकक्ष,रौठेका पेड़ ।२ तमाल-वृक्ष, दमपल। (लो०) ३ वारिप्रसादनफल, रोठा। कतचेता (सं० पु०) किसी मुनिका नाम । कृतजन (फा० पु०) कलमका कुत काटनेके लिये एक दस्ता। यह लकड़ी या हाथीदांतका बनता है। कतट्रेण (सं० पु०) सिन्धु राज्यके अन्तर्गत एक नगर । कतना (हिं० क्रि०) १ काता जाना, बनना, तैयार होना। (क्रि० वि०) २ कितना, किस कदर। कतनी (हिं॰ स्त्रो०) १ ढेरिया, सूत कातनेको टेकुरी। २. सूत कातनका सामान रखनेको टोकरी। कतन्ना (हिं० पु०) बड़ी कैची, कतरना। कतनी (हिं० स्त्री०) कैची, कतरनी। कतफल (सं० पु०) कतं जलप्रसादकं फलमस्त्र, बहुव्री०। १ निर्मलोवृक्ष, रोठेका पेड़। २ निर्मली-फल, रोठा। कतम ( सं० वि०) किम्-डतमच् । बहु पदार्थो के मध्य कोई एक, कौन, दोमें एक। कतमाल (सं० पु०) कस्य जलस्य तमाय शोषणाय अलति पर्याप्नोति, क-तम-अल-अच् । पग्नि, आग। इसका पाठान्तर कचमाल और खचमाल है। कतर (सं० त्रि०) किम्-डतरप्। दोमें एक, दोंमें कौन। <Small>“योनमनसितदा कतरोवरस्ते।" (नैषध)</Small> कतरछांट (हिं० स्त्री०) काटछांट, कतरब्योंत, कतराई और कंग।<noinclude></noinclude> k1hcjnqmm0afefquqzwazmspd6ncsr7 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६७४ 250 76247 668094 609417 2026-07-18T12:46:37Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 668094 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कतरत-कताई|६७३}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कतरतः (स'० अव्य० ) दोमें किस पोर, कौन तर्फ। कतरन (हिं० स्त्री०) काटछांटका टकड़ा, कटा हुआ रद्दी हिस्सा। काग़ज, कपड़े, धातु आदिका कटा हुआ रद्दी टकड़ा कतरन कहाता है। कतरना (हिं० क्रि०) १ कैचोसे काटना, छांटना। २ किसी औज़ारसे काटना, टुकड़े करना। (पु०)३ बड़ी कैची। ४ बतकटा, बातको काट डालनेवाला। कतरनाल (हिं० स्त्री०) किसी किस्मकी घिनी। इसपर दोहरी गड़ारी रहती है। कतरनी (हिं० स्त्री०) १ कैची, मेकराज, बाल कपड़े वगैरह काटनेका एक औजार। २ कर्मकारों और स्वर्णकारीका एक यन्त्र। इससे धातुको चद्दर,तार वगैरह चीजें काटी जाती हैं। यह संडसी-जैसी होती है। ३ तंबोलियाँका एक औज़ार। इससे तंबोली पान कतरते हैं। ४ जुलाहोंका एक औजार। इससे कपड़ा कटता है। ५ किलोमिकी मुतारी। इससे मोची और जीनगर कड़ी जगह पर छोटी सुतारी घुसेड़नेके लिये छेद बनाते हैं। यह चौड़ी और नकीली रहती है। ६ चम्बी, पत्ती। यह सादे कागज या मोमजामका एक टकड़ा है। छीपी बेल छापने में इसे व्यवहार करते हैं। जिस कोणपर वह पूरी छाप मारना नहीं चाहते, उसपर इसे जमा देते हैं। ७ मत्स्यविशेष, एक मछली। यह मल-वारकी नदीयों में रहती है। कतरब्योंत (हिं० पु०) १काट-छांट, कतराई। २ हेरफेर, उलट-पुलट। ३ सोचविचार । ४ निकास,चोरी। ५ हिसाब-किताब, जोड़तोड़। कतरवां (हिं० वि०) कटावदार, औरबी, टेढा, तिरछा। कतरवाई (हिं० स्त्री०) १ कतरानेका काम । २ कत-रानेका पारिश्रमिक, कटाईको मजदूरी । कतरा (हिं० पु०) १खण्ड, विच्छिन्न अंश, कटा-हुआ टुकड़ा। २ प्रस्तरखण्ड, पत्थरका छोटा टकड़ा । यह गढ़ाईसे निकलता है। ३ नौकाविशेष, एक बड़ी नाव। इसपर खडे होकर मांझी नावको खेने में डांड चलाते हैं। यह पटेलेसे बराबर लम्बी रहते। </Small>Vol. IIL 169{{gap}}{{gap}} {{Multicol-break}} भी कम चौड़ी होती है। कतरेपर पत्थर वन रह लदता है। कतरा (अ० पु० ) विन्दु, बूद। कतराई (हिं० स्त्री०) १ कतरनेका काम, कतरब्योंत । २ कतरनेका पारिश्रमिक, कटाईको मजदूरो। कतराना (हिं० क्रि०) १ बचाना, बचकर निकल जाना। २ कटाना, कतरवाना। कतरौ (हिं० स्त्रो०) १ कातर, कोल्हका पाट । इसीपर बैठ मनुष्य बैल हांकता है। २ अलङ्कार-विशेष, एक जवर। यह पीतलकी बनती और ढलवां रहती है। नीच जातिकी स्त्रियां कतरीको हाथोंपर धारण करती हैं। ३ यन्त्रविशेष, एक औजार। यह लकड़ीकी बनती और कारनिस जमाने में लगती है। इसको लम्बाई १ फुट, चौड़ाई ३ इञ्च और मोटाई पाव इच्च होती है। ४ जमी हुई मिठाईका एक टुकड़ा। ५ कैची, कतरनी। कतल (अ० पु०) वध, हत्या, जानसे मारनेका काम। कृतलबाज़ (अ० पु०) वधिक, जल्लाद,मार डालनेवाला। कतला (हिं० पु०) मत्स्य विशेष, एक मछलो। यह बड़ी नदियों में मिलता है। कतला कर को लम्बा होता है। इसमें बल अधिक रहता है। कभी कभी पकड़ते समय कतला मछुवोंको झपटकर मिरा देता और काट लेता है। कृतलाम (अ० पु०) सर्वसंहार, अन्धाधुन्ध, मार-काट। कृतलाममें अपराधी और निरपराधी नहीं देखते, एक ओरसे सबको मार देते हैं। कतवाना (हिं० क्रि०) कताना, कातनेका काम दूसरेसे कराना। कतवार (हिं० पु०)१ अप्रयोजनीय वृणादि, बेकाम घासफूस। २ कातनवाला, जो व्यक्ति कातता हो। कतई, (हिं० अव्य० ) किसी प्रोर, कहीं। कतई, <small>कतई देखो।</small> कता (अ० स्त्री०) १रूप, शल, सूरत, बनावट २ प्रकार, तज, ढङ्क। ३ काटछांट, सफाई। कसाई (हिं० स्त्री०)१ कातनेका काम। कातनेका पारिश्रमिक, कतौनी।<noinclude></noinclude> ex5k4mmu5op1d6v04v41apnhybukalv पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६७५ 250 76250 668138 609418 2026-07-18T18:27:34Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 668138 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६७४|कताना-कचय|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कताना (हिं० क्रि०) कतबाना, कातनेका किसी दूसरेसे निकलाना। कुतार (अ० स्त्रा०)१ पंक्ति, पांति, लैन। २ समूह,ढेर। कतारा (हिं० पु०) १ इक्षुभेद, किसो किस्मको ऊख। कतारा लाल और लम्बा होता है। इसका वल्कल,स्थूल और सार मृटु रहता है। कतारके रसको गाढ़ा कर गुड़ बनाते हैं। २ इमलीका फल । कतारी (हिं० स्त्री०) १ कृतार, पंक्ति । २ छोटा कतारा। कति (सं० त्रि०) का संख्या परिमाणं येषाम्, किम् डति। <Small>किम: संख्यापरिमाणे डति च । पा ५।२।४१।</small> १ कौन संख्या रखनेवाला, कितना। २ कौन। ३ कितना । ४ बहुतसा। (पु०) ५ विश्वामित्रके एकतम पुत्र। यह एक ऋषि और कात्यायनके पूर्वपुरुष रहे। कतिक (हिं० वि०) १ कितना, किस परिमाणवाला। २ अल्प, थोड़ा। ३ अधिक, ज्यादा। कतिचित् (सं० अव्य०) कितना, किस कदर। कतिथ (सं० वि०) कति पूरण डट थक् च । <Small>षट्कतिकतिपयचतुरां थु क्। पा ५।२।५१।</small> कहांतक, किस दरजेतक पहुंचा हुआ। कतिधा (सं० अव्य०) कति विधार्थ धा। १ कहां कहां,कितनी जगह। २ कितने अंशोंमें। ३ कब कब । कतिपयं (सं० त्रि०) कति-श्रयक पुक् च । १ कुछ, कितना हो, थोड़ासा । २ इतना । कतिविध (सं० त्रि०) कतिः विधा प्रकारोऽस्य, बहुव्रो० । कितने प्रकारका, कैसा कैसा। कतिशः (सं० अव्य०) कति वौसाथै शस्। संख्यै क <small>वचनाच्च वीमायाम् । पा ५।४।४४।</small> कितना कितना। कतीमुष (सं० लो०) किसी अग्रहारका नाम । कतीरा (हिं० पु०) निर्यासविशेष, एक प्रकारका गोंद। यह खेत निर्यास गूल वृक्षसे उत्पन्न होता है। जलमें कतीरा नहीं घुलता। यह शीतल एवं रुक्ष रहता और रक्तविकार तथा धातविकार पर चलता है। पावविशेषमें बन्द कर रखनेसे कसोरा सिरकेकी तरह महकने लगता है। प्रसूतिके अनन्तर इसे {{Multicol-break}} स्त्रियोंको खिलाते हैं। कहते, कतीरा अधिक सेवन करनेसे पुरुष नपुंसक बन जाता है। कतेक, <small>कतिक देखो।</small> कतेहार-- रोहेलखण्डके पूर्वीशका प्राचीन नाम। कत्तर (हिं० पु०) गुणभेद, किसी किस्मका डोरा । इससे स्त्रियां अपनी चोटी बांधती हैं। कत्तल (हिं० पु०) १ कतरा, टुकड़ा । २ प्रस्तरखण्ड-विशेष, पत्थरका एक टुकड़ा। यह गढ़ाईसे निकल पड़ता है। कत्ता हिं० पु०) १ अस्त्रविशेष, बांका। इससे बांस वगैरह काटा या चौरा जाता है। २ प्रसिभेद, किसी किस्मकी तलवार। यह छोटा और टेढ़ा होता है। ३ पासा । कत्ताशब्द (सं० पु०) पासोंको खड़खड़ाहट। कत्ती (हिं० स्त्री०) १ छुरिका, चाकू, कुरी। २ छोटा कत्ता, किसी किस्म की तलवार । ३ कटारी। किसी किस्पको कैची। इसे सोनार व्यवहार करते हैं। ५ किसी प्रकारको पगड़ी। इसे बत्तीकी तरह बटकर बांधते हैं। कत्तण (सं० क्लो०) कु कुत्सितं तृणम्, कोः कदादेशः । <Small>तणे च जाती। पा ६।३।१०३।</small> १ सुगन्धि तणविशेष, सोंधिया, एक खुशबूदार घास। इसका संस्कृतपर्याय-पौर, सौगन्धिक, ध्याम, देवजगधक, रोहिष, सुगन्ध, ढण-शीत, सुशोतल, रोहिषण, काण, भूति, भूतिक, श्यामक, ध्यामक, पूति, मुदगल और देवगन्धक है। भावप्रकाशके मलसे कत्तृण कटुपाक, तिल एवं कषाय-रस और हृद्रोग, कण्ठरोग, पित्त, रक्त, शूल, कास तथा ज्वरनाशक है। राजनिघण्टु इसे कट एवं तिक्तरस और कफदोष, शस्त्र वा शल्यदोष तथा बालकोंके ग्रहदोषका निवारक बताता है। २ पृश्चिपर्णी, जलकुम्भी। कत्तोय (सं० स्त्रो०) कु कुत्सितं तोयं यत्र, बहुव्री०। १ मद्य, शराब। २ मैरेय, धातकीपुष्य, गुड़, धान्य और अम्लके सन्धानसे प्रस्तुत मद्य, किसी किस्मको शराब। कत्रय (सं० पु०) कुत्सिताश्रयः। तीन कुत्सित<noinclude></noinclude> apxutbgzxf3yqv21supguqbs11te7pl पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६७६ 250 76253 668149 609419 2026-07-18T18:59:39Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 668149 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कवादि-कथक|६७५}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} पदार्थ, तोन खराब चोजे। यह शब्द नित्य ही बहु-वचनान्त है। कत्रादि (सं० पु०) पाणिनि उक्त जातादि अर्थ में ढकञ् प्रत्ययसे बना हुआ शब्दसमूह। कच्चयादिगणके अन्तभूत कचि, उम्भि, पुष्कल, मोदव, कुम्भी, कुण्डिन,नगरी, माहिमती, वमती, जरव्या और ग्राम शब्द है। कत्थ (हिं० पु०) लोहेको स्याही, एक रंग। किसी घटमें १५ सेर जल और आध सेर गुड या चीनी मिला थोडासा लोहचुन डालते हैं। फिर यह घट आतपमें रखा जाता है। कुछ दिन बाद घड़े का पानी उठता और मुखपर गाज आ जमता है। जल का रूप काला भूरा होनेपर कत्थ पक्का पड़ता और रंगाईमें लगता है। कत्थई (हिं० पु०) १ किसी किस्मका रंग। लाल-काले रंगको कत्थई कहते हैं। इसके बनाने में हर्रा,कसोस, गेरू, कत्था और चूना पड़ता है। कत्थई रंगमें खटाई या फिटकरीका बोर नहीं लगाते। (वि०) २ खैरा, खेरका रंग रखनेवाला । कत्थक (हिं० पु०) जातिविशेष, एक कौम । कत्थक नाचते और गाते-बाजते हैं। भारतवर्ष में जयपुरके कत्थक प्रसिद्ध हैं। <Small>कथकता देखो।</small> कत्थन (सं० ली०) १ अहङ्कारोक्ति, लन्तरानी, डींग । (त्रि०) २ आत्मश्लाघापर, डौंगिया। ३ शूरमन्य, शेखीखोर, लबाड़िया। कत्था (हि० पु०) १ खैर, खेरको लकड़ियों को डबाल कर निकाला हुआ सत। इसे इकट्ठा कर चौकोर टकड़े या छोटे छोटे गोले बना लेते हैं। कत्वा पानमें खाया, और अख मोंपर लगाया जाता है। कत्था और चूना बराबर पड़ने में ही पामका मजा है। <Small>{{right|खदिर और खैर शब्द देखो।}}</small> कत्यय (सं० लो०) कत् सुखकरं पयोऽस्य, बहुव्री० । १ मुखकर जलाशय, फरहतबखूश तालाब। २ सुख-कर जल, पाराम देनेवाला पानी। (वि०)३ तर-जित, उमड़ा हुआ, जो चढ़ रहा हो। कत्लखान्-एक लोहाना अफगान। इन्हीके समय बङ्गालमें विद्रोह उठा था। उसी सुयोममें (१५८०ई०) कत्ल खानने पठान सिपाही संग्रह कर उड़ोसे पर {{Multicol-break}} धावा मारा । क्रमशः इनके तत्त्वावधानमें चारो ओरसे पठान सिपाहो पा पाकर जमा हुये। कत्लखान्ने उनके साहाय्य से सलीमाबादमें सातगांवोके शासन-कर्ता मिर्जा नजातको हराया और मेदनीपुर,वसन्तपुर एवं दामोदर नदोके दक्षिण तीरका अधिकार पाया। उसी समय सम्राट अकबरने मिर्जा पजीजको बङ्गाल, विहार और उड़ोमेका शासनकर्ना नियुक्त कर भेजा था। किन्तु वह भी इनसे हार गये। १५८३ ई० को मुगलमारोके निकट दामोदर नदी किनारे मुगलों और पठानों में युद्ध हुआ था। उसमें सादिक खान और शाहकुलो महरमने इन्हें परास्त किया। फिर प्रकवरके कर्मचारी और कवनखानके बोच सन्धि दुई। उसके अनुसार उडीसा इन्होंके अधिकारमें रहा। किन्तु मम्राट अकबरने उस सन्धिको माना न था। कत्लखान् का शास्ति देने मानसिंह बङ्गाल और विहारके शासनकर्ता बनकर पाये। धरपुरके निकट युद्ध चला था। इन्होंने सम्राट के सिपाहि-योको हरा विष्णुपुर अधिकार किया और मानसिंहके पुत्र जगसिंहको बांध लिया। कुछ दिन पीछे ही कुत्लखान् मर गये। इनके प्रधान वज़ोर ईसा-खान्ने मानसिंहसे सन्धि कर जगतसिंहको छोड दिया। कन्सवर (सं० लो०) कस-व-अप। स्कन्ध, कन्धा । कथं (सं० अव्य०) केन प्रकारण, किम् थम्। <Small>किमय । पा ५।५।३५।</small> १ किस विधानसे, लौन तरीके पर। ३ कुतः, कस्मात्, क्यों, कहांसे । <Small>{{center|<poem>"कथं मृताः प्रभवति वेदशास्त्रविदां प्रभो।" (मनु ५।२)</Poem>}}</small> कथंरूप (सं० वि०) किस प्रकारका, कौनसी सूरत-शक्ल रखनेवाला । कथंवीय (सं० वि०) किस शक्तिका, कौनसी ताकत रखनेवाला। कथ, <small>कत्या देखो।</small> कथक (सं० पु०) कथयतोति, कथ कर्तरि खलन ६ पौराणिक कथा बांचकर जीविका निर्वाह करने-वाला । २ नाटकको वर्णना करनेवाला, बड़ा नक्काल ।<noinclude></noinclude> i3i84ua4jlfmtsbj1d3011228u8vlsu पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५६९ 250 76300 668123 609300 2026-07-18T17:46:27Z आदेश यादव 3609 668123 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="ममता साव" />{{rh|५६८|औरङ्गजेब|}}</noinclude>राजपूत वीरमहिलाओंको इतनी स्पर्धा, वोरत्वका । इतना चादर उनको रग रग में गयी खून दोड़ा करता था । रणोन्मत्त प्राण- पुतलो युद्धका नाम सुनते ही नाच उठती थी । पान कालको गति सव निर्वाण हुआ जाता है। जो हो, पोरके बड़े भाई एक प्रकार शान्त हुए । जयसिंह प्रभृति जो लोग महावीर दाराके प्रधान सेनापति थे, बारबार चिट्ठी और खत भेज भेज कर और उनका भय तोड़ दिया। सेनापतियों ने भी सोचा, दाराका अब कल्याण नहीं है। शाह- जहां भी दिन पूर पाये हैं। यह विशाल साम्राज्य औरङ्गजेवके हो हाथमें जायगा, इससे सेनापति और सिपाही सब दारासे अवाध्य हो गये। सम्पति सिंहासन प्रधान कार्य सम्बाद ही हैं। मुराद और एक प्रतियोगी है। इन दोनोंको शान्त कर देने से हो मनोरथ सिद्ध हो सकता है। शठके लिये साध्य कुछ भी नहीं है। श्रीरङ्गजेबने विचार कर देखा, अभो बलप्रयोग करनेका समय नहीं पाया। अभीष्ट सिद्ध करनेके लिये कौशल ही एक- मात्र उपाय है। इसलिये मुरादको साथ लाकर उन्होंने भाग पास छावनी डाल दो किले में सम्राट थे । श्ररङ्गजेबने एक विश्वासो दूत द्वारा सम्राट्को यह कहला भेजा में जमीन बुकर कहता में, मैंने जो काम किया है, वह सन्तानके प्रयोग्य है, किन्तु उसमें मेरा दोष नहीं है, दोष दाराका है । ओ हो, आपने कठिन रोगसे छुटकारा पाया है, यही मङ्गल है । अब यदि पुत्र जानकर इस दासको चमा करते, ती हृदय शोतल होता । चरने जाकर सम्वाद का संदेशा कहा। वृचावस्था में बुद्धि मारी जाती है, जो हो तो भी पिता रहे। शाहजहां अपने लड़के को अच्छी तरह पहचानते थे । औरङ्गजेवके मनमें यह लालसा लड़कपन से लगी थो, अवसर पाकर मोगलराज्यका सम्राट् होना होगा। दूसरे लोग चाहे न समझाते, परन्तु या इस दुरभिसन्धिको बहुत दिनोंसे समझ थे। भीतरी बात क्या है, यह खबर लेने के लिये उन्होंने अपनी कन्या जहांनाराको लड़कोंके खेमें में भेज दिया। जहांन पहले मुराद में गई। गत युद्ध में उनका शरीर घावोंसे भर गया था। वे कातर होकर सो रहे थे। उसी समय जहांनारा वहां पहुंचीं। मुराद जानते थे, कि वह मनसे दाराकी ओर रहीं । इसलिये उन्होंने उनका कुछ भी समादर न किया, वर अनेक कड़ी कड़ी बातें कहकर अपमान किया। टूतने जाकर पोरङ्गजेब से इन वालोंको चुप- चाप कह दिया। पोरङ्गजेब के सब कामका वोजमन्त्र कुचक्र था। क्रोध करके जब हमारा चल खड़ी हुई, तो दौड़कर पोरजेय उनके पास गये। सलके हृदय में विष और हमें मधुरता भरी रहती है। इन्होंने जहां- "बहिन ! यह क्या ! नाराका हाथ पकड़कर कहा, मैं क्या तुम्हारा कोई नहीं हूं? - जब पा गई हो, तो भाई समझकर एकवार समाचार तो लेना चाहिये ।. क्या इतने दिन विदेश में रहने से भूल गई हो ? पिता इतने बीमार हो गये थे, चादमी भेजकर सबर तो दे देना था ।" इस तरह खुशामद करके औरङ्गजेबने जहांनाशको अपने तम्ब में ले जाकर कहा- "बहिन ! क्या कह, लोगोंका रङ्ग ढङ्ग देखकर मेरे मनमें उदासीनता छा गई है, तुम पितासे मेरा यह सानुनय निवेदन करना में एकवार उनके पद- सरोजका दर्शन कर इस संसार सम्बन्ध तोड़ देना चाहता है। अतएव चौर विलयका काम नहीं, परसों उनके दर्शन करनेकी इच्छा है।" जहांनाराके जाने बाद औरङ्गजेब पिताको कारारुद करनेको चेष्टा करने लगे। माह भी समझ गये, कि शठको इतनी भक्ति में सुलक्षण नहीं है । उन्होंने दाराके पास लिख भेजा, "दो दिन बाद औरङ्गजेब आकर मेरो शरण लेगा। मुरादसे वह विरक्त हो गया है। जो हो, खलका विश्वास नहीं । तुम सैन्य सामन्त लेकर शीघ्र आगरे भावो । औरङ्ग- जेबको गिरफ़ार करना होगा ।" दारा उसे समय दिशो में थे। घाघोरातके समय:<noinclude></noinclude> 0jyfrnuhpgybym3iuk69zq8akys5j3z 668124 668123 2026-07-18T17:49:43Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 668124 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५६८|औरङ्गजेब|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>राजपूत वीरमहिलाओंको इतनी स्पर्धा, वोरत्वका । इतना चादर उनको रग रग में गयी खून दोड़ा करता था । रणोन्मत्त प्राण- पुतलो युद्धका नाम सुनते ही नाच उठती थी । पान कालको गति सव निर्वाण हुआ जाता है। जो हो, पोरके बड़े भाई एक प्रकार शान्त हुए। जयसिंह प्रभृति जो लोग महावीर दाराके प्रधान सेनापति थे, बारबार चिट्ठी और खत भेज भेज कर और उनका भय तोड़ दिया। सेनापतियों ने भी सोचा, दाराका अब कल्याण नहीं है। शाह- जहां भी दिन पूर पाये हैं। यह विशाल साम्राज्य औरङ्गजेवके हो हाथमें जायगा, इससे सेनापति और सिपाही सब दारासे अवाध्य हो गये। सम्पति सिंहासन प्रधान कार्य सम्बाद ही हैं। मुराद और एक प्रतियोगी है। इन दोनोंको शान्त कर देने से हो मनोरथ सिद्ध हो सकता है। शठके लिये साध्य कुछ भी नहीं है। श्रीरङ्गजेबने विचार कर देखा, अभो बलप्रयोग करनेका समय नहीं पाया। अभीष्ट सिद्ध करनेके लिये कौशल ही एक- मात्र उपाय है। इसलिये मुरादको साथ लाकर उन्होंने भाग पास छावनी डाल दो किले में सम्राट थे । श्ररङ्गजेबने एक विश्वासो दूत द्वारा सम्राट्को यह कहला भेजा में जमीन बुकर कहता में, मैंने जो काम किया है, वह सन्तानके प्रयोग्य है, किन्तु उसमें मेरा दोष नहीं है, दोष दाराका है । ओ हो, आपने कठिन रोगसे छुटकारा पाया है, यही मङ्गल है । अब यदि पुत्र जानकर इस दासको चमा करते, ती हृदय शोतल होता । चरने जाकर सम्वाद का संदेशा कहा। वृचावस्था में बुद्धि मारी जाती है, जो हो तो भी पिता रहे। शाहजहां अपने लड़के को अच्छी तरह पहचानते थे । औरङ्गजेवके मनमें यह लालसा लड़कपन से लगी थो, अवसर पाकर मोगलराज्यका सम्राट् होना होगा। दूसरे लोग चाहे न समझाते, परन्तु या इस दुरभिसन्धिको बहुत दिनोंसे समझ थे। भीतरी बात क्या है, यह खबर लेने के लिये {{Multicol-break}} उन्होंने अपनी कन्या जहांनाराको लड़कोंके खेमें में भेज दिया। जहांनारा पहले मुराद में गई। गत युद्ध में उनका शरीर घावोंसे भर गया था। वे कातर होकर सो रहे थे। उसी समय जहांनारा वहां पहुंचीं। मुराद जानते थे, कि वह मनसे दाराकी ओर रहीं । इसलिये उन्होंने उनका कुछ भी समादर न किया, वर अनेक कड़ी कड़ी बातें कहकर अपमान किया। टूतने जाकर पोरङ्गजेब से इन वालोंको चुप- चाप कह दिया। पोरङ्गजेब के सब कामका वोजमन्त्र कुचक्र था। क्रोध करके जब हमारा चल खड़ी हुई, तो दौड़कर पोरजेय उनके पास गये। सलके हृदय में विष और हमें मधुरता भरी रहती है। इन्होंने जहां- "बहिन ! यह क्या ! नाराका हाथ पकड़कर कहा, मैं क्या तुम्हारा कोई नहीं हूं? - जब पा गई हो, तो भाई समझकर एकवार समाचार तो लेना चाहिये ।. क्या इतने दिन विदेश में रहने से भूल गई हो ? पिता इतने बीमार हो गये थे, चादमी भेजकर सबर तो दे देना था ।" इस तरह खुशामद करके औरङ्गजेबने जहांनाशको अपने तम्ब में ले जाकर कहा- "बहिन ! क्या कह, लोगोंका रङ्ग ढङ्ग देखकर मेरे मनमें उदासीनता छा गई है, तुम पितासे मेरा यह सानुनय निवेदन करना में एकवार उनके पद- सरोजका दर्शन कर इस संसार सम्बन्ध तोड़ देना चाहता है। अतएव चौर विलयका काम नहीं, परसों उनके दर्शन करनेकी इच्छा है।" जहांनाराके जाने बाद औरङ्गजेब पिताको कारारुद करनेको चेष्टा करने लगे। माह भी समझ गये, कि शठको इतनी भक्ति में सुलक्षण नहीं है । उन्होंने दाराके पास लिख भेजा, "दो दिन बाद औरङ्गजेब आकर मेरो शरण लेगा। मुरादसे वह विरक्त हो गया है। जो हो, खलका विश्वास नहीं । तुम सैन्य सामन्त लेकर शीघ्र आगरे भावो । औरङ्ग- जेबको गिरफ़ार करना होगा ।" दारा उसे समय दिशो में थे। घाघोरातके समय:<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 6dwz7krqo7dgcy4c5gkmis63v0mxd1o पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२६ 250 76354 668183 668085 2026-07-19T05:17:46Z आदेश यादव 3609 668183 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओखामण्डल—ओघरथ|५२५}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अंगरेजो फोजके चढ़नेका खर्च डाल दिया। १८१८ ई० को पनमल मानक के पधोन कुछ राजा बिगड़े थे किन्तु स्थानीय सेना ने उन्हें शीघ्र ही दबा दिया। १८१८ ई०को वाधेरोंने विद्रोह उठा मिटर हेलोको पोरबन्दर भगाया था। १८२० ईबो बम्बई सरकारने करनल ष्टानडोपको लड़ने भेजा । उन्होंने अकस्मात् दारका अधिकार कर राजावको नौचा देखाया था । इस युद्ध में कपतान मोरियट मारे गये। दारका-नरेश मूलमानक और उनके छोटे भाई वरसी मानक भी धराशायी हुये। राणा संग्राम- जो पकड़ कर सूरत भेजे गये। किन्तु कच्छ के रायने जमानत दे उन्हें छोड़ा लिया था। फिर शान्ति स्थापित हुई । १८५७ ई०को वाघेरोंने काठियावाड़ पर आक्रमण मारा था। लेफटिनण्ट बरटनने द्वारका जा इस उपद्रवका कारण पूछा। वह वाघेरोंसे अच्छा चाल-चलन रखनेको जमानत से बड़ोदे नोट पाये। दूसरे वर्ष बसाईके वाघेर राजावीने खुले मैदान बलवा कर वेयत होप और उनके साथी सिबन्दियोंने दुर्गको अधिकार किया था मांडवोचे कपतान मेले कुछ सेनाले यसमें जा उतरे घोर दुर्गपर झपट पड़े, किन्तु दुर्ग सह रहने कुछ कर न सके। रातको वाघेर स्वयं दुर्ग छोड़ वसाई भाग गये। फिर बड़ोदेके मन्त्रियोंने सरकार अंगरेज से अलग रहनेको कह वसाई आक्रमण किया था । वसाईको किलेबन्दी मज़बूत रहने से कई वार युद्ध षा । अन्तको बड़ोदेके गायकवाड़ने वाघेरोंसे सन्धि- कर झगड़ा मिटाया। दूसरे वर्ष फिर उपद्रव उठा था गायकवाड़ने लड़ने-भिड़नेका सब काम अंगरेजोंको खौंप दिया। वाघेरोंने श्राक्रमण मार द्वारका और यत होप अधिकार किया था। जोधा मानक ओखा- मण्डलके राजा बने । फिर करनल डोनोवन कुछ सेनाले यस पहुंचे थे युद्ध में न हारते भी वाघेर कि.ला छोड़ द्वारका भाग गये। कपतान डोनोवनने शीघ्र ही द्वारकाको जा आक्रमण किया और वाघेरोंको जंगल में देर दिया। पन्तको उन्होंने श्रोद्यामण्डल छोड़ अभयपुर-पहाड़ में खाई खोद डेरा डाला था । {{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}132}}{{Multicol-break}} १८५८ ई० के दिसम्बर मास करनल होनरने कितने हो फोजके साथ चक्रमय मार उन्हें वहां भी निकाल बाहर किया। कुछ वाधेर राजाने गिर पहाड़ की राह ली थी । बाकी अपने हथियार रख ओखामण्डल लौटनेको सम्मत हुये । उधर जोधा मानक के मर जानेसे गिर पहाड़ के वाघेर भी पकड़े गये । १८६२ ई०को कैद किये वाघेर निकल भगे और पोखामण्डल पहुंच उपद्रव उठाने लगे। काठिया बाद में कई वर्ष लुटमार होते रहो। १८५० १०को मेजर रेनोलडस्ने उन्हें परास्त किया था। युद्दमें मेजर रमोलse पाहत चोर पोलिटिकल एक्ट के सहकारी कपतान हेबर्ट एवं लाटूश हत हुये। इसपर वाघेर शान्त पड़े और फिर कभी जोरसे न लड़े। ओोग (हिं० पु० ) कर, महसूल, लगान । योग (सं०वि०) अवगारी पव-गय कर्मणि क श्रीगण श्रवगस्यते सम्प्रसारणञ्च । अवगण्य, नफरत किया हुआ । घोगर- एकप्रकार सवासी यह अपनेको पचड़ । उघड़ योगी भी कहते हैं। हाथमें रस्सोसे लिपटी हुई छड़ी रहती है। श्रीगर यज्ञोपवीत नहीं पहनते मरनेपर देह जलाना मना है। शवका देह समाधिस्थ किया जाता है। सिन्धुप्रदेश में दो-एक भोगर योगो देख पड़ते हैं । घोगरना (पिं० श०) भवगरण होना, चुना, पसोजना, पनियाना । ओगल ( हिं० पु० ) १ ऊषर, पड़ती जमीन् । २ कूपविशेष, एक कुवां । श्रीगोयस (सं०वि०) उग्र, अत्यन्त तेजखी । श्रोध (सं० पु० ) उच-धब् पृषोदरादित्वात् साधुः । १ समूह ढेर २ नदीवेग, पानोका बहाव, बाढ़ २ परम्परा, पुरानो चा ४ उपदेश, नसीहत | ५ हुतनृत्य, फुर्तीला नाच नदी, दरवा प्रोधदेव (सं० पु० ) प्राचीन शिलालिपि-वर्धित उच्छकल्पके एक महाराज। इनकी पत्नी कुमारदेवी थीं। (Inscriptionum Indicarum, Vol III. p. 119.) घोघरथ (सं.) एक राजा यह घोषवान् नृपतिके पुत्र धोर पोचवतोके भ्राता थे।<noinclude>{{Multicol-end}} 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मैदान बलवा कर वेयत द्वीप और उनके साथी सिबन्दियोंने दुर्गको अधिकार किया था। मांडवीसे कपतान मेले कुछ सेना ले वेयतमें जा उतरे और दुर्गपर झपट पड़े, किन्तु दुर्ग सुदृढ़ रहनेसे कुछ कर न सके। रातको वाघेर स्वयं दुर्ग छोड़ वसाई भाग गये। फिर बड़ोदेके मन्त्रियोंने सरकार अंगरेजसे अलग रहनेको कह वसाई आक्रमण किया था। वसाईकी किलेबन्दी मज़बूत रहनेसे कई वार युद्ध हुआ। अन्तको बड़ोदेके गायकवाड़ने वाघेरोंसे सन्धिकर झगड़ा मिटाया। दूसरे वर्ष फिर उपद्रव उठा था। गायकवाड़ने लड़ने–भिड़नेका सब काम अंगरेजोंको सौंप दिया। वाघेरोंने आक्रमण मार द्वारका और वेयत द्वीप अधिकार किया था। जोधा मानक ओखामण्डलके राजा बने। फिर करनल डोनोवन कुछ सेना ले वेयत पहुंचे थे। युद्धमें न हारते भी वाघेर क़िला छोड़ द्वारका भाग गये। कपतान डोनोवनने शीघ्र ही द्वारकाको जा आक्रमण किया और वाघेरोंको जंगल में खदेर दिया। अन्तको उन्होंने ओखामण्डल छोड़ अभयपुर–पहाड़ में खाई खोद डेरा डाला था। {{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}132}}{{Multicol-break}} १८५८ ई० के दिसम्बर मास करनल होनरने कितने हो फोजके साथ चक्रमय मार उन्हें वहां भी निकाल बाहर किया। कुछ वाधेर राजाने गिर पहाड़ की राह ली थी । बाकी अपने हथियार रख ओखामण्डल लौटनेको सम्मत हुये । उधर जोधा मानक के मर जानेसे गिर पहाड़ के वाघेर भी पकड़े गये । १८६२ ई०को कैद किये वाघेर निकल भगे और पोखामण्डल पहुंच उपद्रव उठाने लगे। काठिया बाद में कई वर्ष लुटमार होते रहो। १८५० १०को मेजर रेनोलडस्ने उन्हें परास्त किया था। युद्दमें मेजर रमोलse पाहत चोर पोलिटिकल एक्ट के सहकारी कपतान हेबर्ट एवं लाटूश हत हुये। इसपर वाघेर शान्त पड़े और फिर कभी जोरसे न लड़े। ओोग (हिं० पु० ) कर, महसूल, लगान । योग (सं०वि०) अवगारी पव-गय कर्मणि क श्रीगण श्रवगस्यते सम्प्रसारणञ्च । अवगण्य, नफरत किया हुआ । घोगर- एकप्रकार सवासी यह अपनेको पचड़ । उघड़ योगी भी कहते हैं। हाथमें रस्सोसे लिपटी हुई छड़ी रहती है। श्रीगर यज्ञोपवीत नहीं पहनते मरनेपर देह जलाना मना है। शवका देह समाधिस्थ किया जाता है। सिन्धुप्रदेश में दो-एक भोगर योगो देख पड़ते हैं । घोगरना (पिं० श०) भवगरण होना, चुना, पसोजना, पनियाना । ओगल ( हिं० पु० ) १ ऊषर, पड़ती जमीन् । २ कूपविशेष, एक कुवां । श्रीगोयस (सं०वि०) उग्र, अत्यन्त तेजखी । श्रोध (सं० पु० ) उच-धब् पृषोदरादित्वात् साधुः । १ समूह ढेर २ नदीवेग, पानोका बहाव, बाढ़ २ परम्परा, पुरानो चा ४ उपदेश, नसीहत | ५ हुतनृत्य, फुर्तीला नाच नदी, दरवा प्रोधदेव (सं० पु० ) प्राचीन शिलालिपि-वर्धित उच्छकल्पके एक महाराज। इनकी पत्नी कुमारदेवी थीं। (Inscriptionum Indicarum, Vol III. p. 119.) घोघरथ (सं.) एक राजा यह घोषवान् नृपतिके पुत्र धोर पोचवतोके भ्राता थे।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> pvs1t147t30gjyxceukwgbg2iir3ugk 668188 668184 2026-07-19T05:42:05Z आदेश यादव 3609 668188 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओखामण्डल—ओघरथ|५२५}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अंगरेजी फौजके चढ़नेका खर्च डाल दिया। १८१८ ई॰को पत्रमल मानकके अधीन कुछ राजा बिगड़े थे। किन्तु स्थानीय सेनाने उन्हें शीघ्र ही दबा दिया। १८१९ ई॰को वाधेरोंने विद्रोह उठा मिष्टर हेण्लीको पोरबन्दर भगाया था। १८२० ई॰को‌ बम्बई सरकारने करनल ष्टानहोपको लड़ने भेजा। उन्होंने अकस्मात् द्वारका अधिकार कर राजावोंको नीचा देखाया था। इस युद्धमें कपतान मोरियट मारे गये। द्वारका–नरेश मूलूमानक और उनके छोटे भाई वरसी मानक भी धराशायी हुये। राणा संग्रामजी पकड़ कर सूरत भेजे गये। किन्तु कच्छ के रायने ज़मानत दे उन्हें छोड़ा लिया था। फिर शान्ति‌ स्थापित हुई। १८५७ ई॰को वाघेरोंने काठियावाड़‌ पर आक्रमण मारा था। लेफटिनण्ट बरटनने द्वारका जा इस उपद्रवका कारण पूछा। वह वाघेरोंसे अच्छा चाल–चलन रखनेकी जमानत ले बड़ोदे लौट आये। दूसरे वर्ष वसाईके वाघेर राजावोंने खुले मैदान बलवा कर वेयत द्वीप और उनके साथी सिबन्दियोंने दुर्गको अधिकार किया था। मांडवीसे कपतान मेले कुछ सेना ले वेयतमें जा उतरे और दुर्गपर झपट पड़े, किन्तु दुर्ग सुदृढ़ रहनेसे कुछ कर न सके। रातको वाघेर स्वयं दुर्ग छोड़ वसाई भाग गये। फिर बड़ोदेके मन्त्रियोंने सरकार अंगरेजसे अलग रहनेको कह वसाई आक्रमण किया था। वसाईकी किलेबन्दी मज़बूत रहनेसे कई वार युद्ध हुआ। अन्तको बड़ोदेके गायकवाड़ने वाघेरोंसे सन्धिकर झगड़ा मिटाया। दूसरे वर्ष फिर उपद्रव उठा था। गायकवाड़ने लड़ने–भिड़नेका सब काम अंगरेजोंको सौंप दिया। वाघेरोंने आक्रमण मार द्वारका और वेयत द्वीप अधिकार किया था। जोधा मानक ओखामण्डलके राजा बने। फिर करनल डोनोवन कुछ सेना ले वेयत पहुंचे थे। युद्धमें न हारते भी वाघेर क़िला छोड़ द्वारका भाग गये। कपतान डोनोवनने शीघ्र ही द्वारकाको जा आक्रमण किया और वाघेरोंको जंगल में खदेर दिया। अन्तको उन्होंने ओखामण्डल छोड़ अभयपुर–पहाड़ में खाई खोद डेरा डाला था। {{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}132}}{{Multicol-break}} १८५९ ई॰के दिसम्बर मास करनल होनरने कितने ही फौजके साथ आक्रमण मार उन्हें वहांसे भी निकाल बाहर किया। कुछ वाघेर राजावोंने गिर पहाड़ की राह ली थी। बाकी अपने हथियार रख ओखामण्डल लौटनेको सम्मत हुये। उधर जोधा मानकके मर जानेसे गिर पहाड़ के वाघेर भी पकड़े गये। १८६२ ई॰को क़ैद किये वाघेर निकल भगे और ओखामण्डल पहुंच उपद्रव उठाने लगे। काठियावाड़में कई वर्ष लुटमार होते रही। १८६७० ई॰को मेजर रेनोलडस्ने उन्हें परास्त किया था। युद्दमें मेजर रेनोलडस् आहत और पोलिटिकल एजण्टके सहकारी कपतान हेबर्ट एवं लाटूश हत हुये। इसपर वाघेर शान्त पड़े और फिर कभी जोरसे न लड़े। ओोग (हिं० पु० ) कर, महसूल, लगान । योग (सं०वि०) अवगारी पव-गय कर्मणि क श्रीगण श्रवगस्यते सम्प्रसारणञ्च । अवगण्य, नफरत किया हुआ । घोगर- एकप्रकार सवासी यह अपनेको पचड़ । उघड़ योगी भी कहते हैं। हाथमें रस्सोसे लिपटी हुई छड़ी रहती 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मेजर रेनोलडस् आहत और पोलिटिकल एजण्टके सहकारी कपतान हेबर्ट एवं लाटूश हत हुये। इसपर वाघेर शान्त पड़े और फिर कभी जोरसे न लड़े। ओग (हिं॰ पु॰) कर, महसूल, लगान। ओगण (सं॰ त्रि॰) अवगस्यते, अव–गण कर्मणिक सम्प्रसारणञ्च। अवगण्य, नफरत किया हुआ। ओगर—एकप्रकार सन्नयासी। यह अपनेको अउघड़ योगी भी कहते हैं। हाथमें रस्सीसे लिपटी हुई छड़ी रहती है। ओगर यज्ञोपवीत नहीं पहनते। मरनेपर‌ देह जलाना मना है। शवका देह समाधिस्थ किया जाता है। सिन्धुप्रदेश में दो–एक ओगर योगी देख पड़ते हैं। ओगरना (हिं॰ क्रि॰) अवगरण होना, चूना, पसीजना, पनियाना। ओगल (हिं॰ पु॰) १ ऊषर, पड़ती जमीन्। २ कूपविशेष, एक कुवां। ओगीयस् (सं॰ त्रि॰) उग्र, अत्यन्त तेजस्वी। ओघ (सं॰ पु॰) उच-घञ् पृषोदरादित्वात् साधुः। १ समूह, ढेर। २ नदीवेग, पानीका बहाव, बाढ़। ३ परम्परा, पुरानी चाल। ४ उपदेश, नसीहत। ५ द्रुतनृत्य, फुर्तीला नाच। ६ नदी, दरया। ओघदेव (सं॰ पु॰) प्राचीन शिलालिपि–वर्णित उच्छकल्पके एक महाराज। इनकी पत्नी कुमारदेवी थीं। (Inscriptionum Indicarum, Vol III. p. 119.) ओघरथ (सं॰ पु॰) एक राजा। यह ओघवान् नृपतिके पुत्र और ओघवतीके भ्राता 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वर्ष वसाईके वाघेर राजावोंने खुले मैदान बलवा कर वेयत द्वीप और उनके साथी सिबन्दियोंने दुर्गको अधिकार किया था। मांडवीसे कपतान मेले कुछ सेना ले वेयतमें जा उतरे और दुर्गपर झपट पड़े, किन्तु दुर्ग सुदृढ़ रहनेसे कुछ कर न सके। रातको वाघेर स्वयं दुर्ग छोड़ वसाई भाग गये। फिर बड़ोदेके मन्त्रियोंने सरकार अंगरेजसे अलग रहनेको कह वसाई आक्रमण किया था। वसाईकी किलेबन्दी मज़बूत रहनेसे कई वार युद्ध हुआ। अन्तको बड़ोदेके गायकवाड़ने वाघेरोंसे सन्धिकर झगड़ा मिटाया। दूसरे वर्ष फिर उपद्रव उठा था। गायकवाड़ने लड़ने–भिड़नेका सब काम अंगरेजोंको सौंप दिया। वाघेरोंने आक्रमण मार द्वारका और वेयत द्वीप अधिकार किया था। जोधा मानक ओखामण्डलके राजा बने। फिर करनल डोनोवन कुछ सेना ले वेयत पहुंचे थे। युद्धमें न हारते भी वाघेर क़िला छोड़ द्वारका भाग गये। कपतान डोनोवनने शीघ्र ही द्वारकाको जा आक्रमण किया और वाघेरोंको जंगल में खदेर दिया। अन्तको उन्होंने ओखामण्डल छोड़ अभयपुर–पहाड़ में खाई खोद डेरा डाला था। {{left|Vol.{{gap}}III.{{gap}}132}}{{Multicol-break}} १८५९ ई॰के दिसम्बर मास करनल होनरने कितने ही फौजके साथ आक्रमण मार उन्हें वहांसे भी निकाल बाहर किया। कुछ वाघेर राजावोंने गिर पहाड़ की राह ली थी। बाकी अपने हथियार रख ओखामण्डल लौटनेको सम्मत हुये। उधर जोधा मानकके मर जानेसे गिर पहाड़ के वाघेर भी पकड़े गये। १८६२ ई॰को क़ैद किये वाघेर निकल भगे और ओखामण्डल पहुंच उपद्रव उठाने लगे। काठियावाड़में कई वर्ष लुटमार होते रही। १८६७० ई॰को मेजर रेनोलडस्ने उन्हें परास्त किया था। युद्दमें मेजर रेनोलडस् आहत और पोलिटिकल एजण्टके सहकारी कपतान हेबर्ट एवं लाटूश हत हुये। इसपर वाघेर शान्त पड़े और फिर कभी जोरसे न लड़े। {{outdent|ओग (हिं॰ पु॰) कर, महसूल, लगान।}} {{outdent|ओगण (सं॰ त्रि॰) अवगस्यते, अव–गण कर्मणिक सम्प्रसारणञ्च। अवगण्य, नफरत किया हुआ।}} {{outdent|ओगर—एकप्रकार सन्नयासी। यह अपनेको अउघड़ योगी भी कहते हैं। हाथमें रस्सीसे लिपटी हुई छड़ी रहती है। ओगर यज्ञोपवीत नहीं पहनते। मरनेपर‌ देह जलाना मना है। शवका देह समाधिस्थ किया जाता है। सिन्धुप्रदेश में दो–एक ओगर योगी देख पड़ते हैं।}} {{outdent|ओगरना (हिं॰ क्रि॰) अवगरण होना, चूना, पसीजना, पनियाना।}} {{outdent|ओगल (हिं॰ पु॰) १ ऊषर, पड़ती जमीन्। २ कूपविशेष, एक कुवां।}} {{outdent|ओगीयस् (सं॰ त्रि॰) उग्र, अत्यन्त तेजस्वी।}} {{outdent|ओघ (सं॰ पु॰) उच-घञ् पृषोदरादित्वात् साधुः। १ समूह, ढेर। २ नदीवेग, पानीका बहाव, बाढ़। ३ परम्परा, पुरानी चाल। ४ उपदेश, नसीहत। ५ द्रुतनृत्य, फुर्तीला नाच। ६ नदी, दरया।}} {{outdent|ओघदेव (सं॰ पु॰) प्राचीन शिलालिपि–वर्णित उच्छकल्पके एक महाराज। इनकी पत्नी कुमारदेवी थीं। (Inscriptionum Indicarum, Vol III. p. 119.)}} {{outdent|ओघरथ (सं॰ पु॰) एक राजा। यह ओघवान् नृपतिके पुत्र और ओघवतीके भ्राता थे।}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> b4z4nigl7h9gzahipa8y81hpp4kvcmx पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२७ 250 76356 668194 667605 2026-07-19T06:22:13Z आदेश यादव 3609 668194 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५२६|ओघवत्—ओङ्कारमान्धाता|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ओघवत् (सं॰ त्रि॰) ओघः जलवेनादिरस्तास्य, ओघ–मतुप् मस्य वः। १ जलवेगादियुक्त, जोरसे बहनेवाला। (पु॰) २ एक राजा। यह ओघरथके पिता थे। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}}}} {{outdent|ओघवती (स॰ स्त्री॰) १ महाभारतोक्त ओघवान् राजाकी कन्या। इन्होंने स्वामीके आज्ञानुसार द्विज-रूपधारी अतिथि धर्मको अपना शरीरतक दे डाला था। धर्मने परितुष्ट हो उन्हें वर प्रदान किया। उसीसे यह लोकोपकारार्थ अर्ध देहसे नदी बन गयी। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}} २ कुरुक्षेत्रकी एक नदी।{{right|{{smaller|(भारत, भीष्म॰)}}}}}} {{outdent|ओङ्कार (सं० पु० ) ओम्–कार। १ प्रणव। पहले ओङ्कार उच्चारण कर, पीछे वेद पढ़ते है। ब्रह्माके कण्ठको फोड़ प्रथम आङ्कार और अथ शब्द निकला था। इसीसे यह दोनों शब्द माङ्गलिक समझे जाते हैं। {{smaller|ओम् देखो।}} २ आरम्भ, शुरू। ३ सप्त समावयवका प्रथम अवयव। ४ एक लिङ्ग। {{smaller|"ओङ्कारं प्रथमं लिङ्गं द्वितीयन्तु विलोचनम्।" (काशीखण्ड)}}}} {{outdent|ओङ्कारभट्ट—एक प्राचीन संस्कृतग्रन्थकार। भूगोलसार नामक पुस्तक इन्होंने लिखा था।}} {{outdent|ओङ्कारमान्धाता (सं॰ पु॰) मध्यप्रदेशमें नीमाड़ जिलेके अन्तर्गत नर्मदा नदीका मध्यवर्ती एक द्वीप। यह अक्षा॰ २२° १४’ उ॰ और देशा॰ ७६° १७’ पू॰पर अवस्थित है। चलित नाम मान्धाता है। ओङ्कार-मूर्तिधारी महादेवका मन्दिर रहनेसे इस स्थानको ओङ्कारमान्धाता भी कहते हैं। मान्धाताका प्राचीन नाम 'वैदूर्यशूल' था। स्कन्दपुराणके रेवाखण्डमें लिखा है—राजा मान्धाताने ओङ्कारके निकट प्रार्थना की, जिससे सन्तुष्ट हो उन्होंने वैदूर्यशूलके बदले मान्धाता संज्ञा रख दी।*}} {{rule}} {{c|{{smaller|मान्धातोवाच। <poem>यदि तुष्टोऽसि देवेश वरंदातुं त्वमिच्छसि। वैदूर्य्यो नाम शैलेन्द्रो मान्धाता ख्यातुमर्हतु॥ देवस्थानसभं ह्येतत् त्वत्प्रसादाडविष्यति। अन्नदानं तपः पूजा तथा प्राणविसर्जनम्॥ ये कुर्व्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासिना।</poem>}}}} {{Multicol-break}} इस दोपका श्रवस्थान अति सुन्दर है। इससे थोड़ी दूरपर नर्मदाको कावेरौ नाम्नो एक शाखा बहती है। फिर इसो नामको एक छोटो नदी नर्मदा- से अलग रह मान्धाताके निकट कावेरोमें जा मिलो है। एक ही स्थानमें दो सहम है। ऐसा पवित्र तो भारतवर्षमें पति विरल है। पुरायादिका तो- माहामा देखते ऐसे तो में वास वा खान करनेसे अशेष पुण्यलाभ होता है। यहां नर्मदाके उभय पार्श्व पर हरे रङ्गका पहाड़ देख पड़ेगा। पहाड़के मध्य जहां नदोका प्रवाह चलता, वहां जल गभीर, स्वच्छ और शान्त रहता है । जनमें असंख्य कच्छप और मत्स्य सेलते फिरते हैं। वह इतने निर्भीक और विश्वासी रहते, कि घाट किनारे [लाई छोड़ देनेसे निर्भय था चाया करते हैं। परिमाण प्राय: एक वर्ग मील है। ओङ्कार लिङ्ग आधुनिक नहीं । स्कन्द, शिव, पद्म प्रभृति पुरायोंमें पोद्धारका नाम उजा है । शिवपुराण में लिखा है, “किसी समय महर्षि नारद गोकर्ष तीर्थसे विन्ध्यपर्वतको पाये थे। यहां विधने बड़े सन्मान से उनको पूजा को पहले नारदको विश्वास रहा विन्ध्यपर्वतके पास सव कुछ है, किसी वस्तुका अभाव नहीं; इससे विन्ध्य अहङ्कार करते - हमारे सब है । अतएव नारदने निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर पूछा, 'भगवन् ! मैंने क्या दोष किया, जो विश्वास छोड़ दिया‌ हैं। नारदने कहा—'विन्ध्य तुम्हारे पास सब कुछ है। किन्तु तुम्हारे ऊपर देवता {{rule}} <poem>तस्य तद्दचनं श्रुत्वा मान्धातुः परमेश्वरः। उवाच वचन' देवो मान्धातारं महीपतिम्॥ सर्वमेतन्न पश्रेष्ठ मत्प्रसादाद्भविष्यति। यन्म े चीर्यं महौपाल दृष्ट्वाहयत्वयाऽनघ॥ तदा प्रभृति मान्धाता वैदूर्य्यो गौयते गिरिः। अस्य तीर्थस्य माहात्मग्रामान्प्रमुखा नृपाः।। सर्व्वकामसमापन्ना लोके क्रौड़न्ति वैष्णवे। श्रवणात् कीर्त्तनाद्यापि इयमेधफलं लभेत्॥”</poem>{{right|(स्कन्दपुराण, रेवाखण्ड २२अ॰)}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> iqchf8g95bp2oemrfitg3sq0chjrga2 668199 668194 2026-07-19T06:43:09Z आदेश यादव 3609 668199 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५२६|ओघवत्—ओङ्कारमान्धाता|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ओघवत् (सं॰ त्रि॰) ओघः जलवेनादिरस्तास्य, ओघ–मतुप् मस्य वः। १ जलवेगादियुक्त, जोरसे बहनेवाला। (पु॰) २ एक राजा। यह ओघरथके पिता थे। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}}}} {{outdent|ओघवती (स॰ स्त्री॰) १ महाभारतोक्त ओघवान् राजाकी कन्या। इन्होंने स्वामीके आज्ञानुसार द्विज-रूपधारी अतिथि धर्मको अपना शरीरतक दे डाला था। धर्मने परितुष्ट हो उन्हें वर प्रदान किया। उसीसे यह लोकोपकारार्थ अर्ध देहसे नदी बन गयी। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}} २ कुरुक्षेत्रकी एक नदी।{{right|{{smaller|(भारत, भीष्म॰)}}}}}} {{outdent|ओङ्कार (सं० पु० ) ओम्–कार। १ प्रणव। पहले ओङ्कार उच्चारण कर, पीछे वेद पढ़ते है। ब्रह्माके कण्ठको फोड़ प्रथम आङ्कार और अथ शब्द निकला था। इसीसे यह दोनों शब्द माङ्गलिक समझे जाते हैं। {{smaller|ओम् देखो।}} २ आरम्भ, शुरू। ३ सप्त 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नर्मदाको कावेरौ नाम्नो एक शाखा बहती है। फिर इसो नामको एक छोटो नदी नर्मदा- से अलग रह मान्धाताके निकट कावेरोमें जा मिलो है। एक ही स्थानमें दो सहम है। ऐसा पवित्र तो भारतवर्षमें पति विरल है। पुरायादिका तो- माहामा देखते ऐसे तो में वास वा खान करनेसे अशेष पुण्यलाभ होता है। यहां नर्मदाके उभय पार्श्व पर हरे रङ्गका पहाड़ देख पड़ेगा। पहाड़के मध्य जहां नदोका प्रवाह चलता, वहां जल गभीर, स्वच्छ और शान्त रहता है । जनमें असंख्य कच्छप और मत्स्य सेलते फिरते हैं। वह इतने निर्भीक और विश्वासी रहते, कि घाट किनारे [लाई छोड़ देनेसे निर्भय था चाया करते हैं। परिमाण प्राय: एक वर्ग मील है। ओङ्कार लिङ्ग आधुनिक नहीं । स्कन्द, शिव, पद्म प्रभृति पुरायोंमें पोद्धारका नाम उजा है । शिवपुराण में लिखा है, “किसी समय महर्षि नारद गोकर्ष तीर्थसे विन्ध्यपर्वतको पाये थे। यहां विधने बड़े सन्मान से उनको पूजा को पहले नारदको विश्वास रहा विन्ध्यपर्वतके पास सव कुछ है, किसी वस्तुका अभाव नहीं; इससे विन्ध्य अहङ्कार करते - हमारे सब है । अतएव नारदने निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर पूछा, 'भगवन् ! मैंने क्या दोष किया, जो विश्वास छोड़ 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था। स्कन्दपुराणके रेवाखण्डमें लिखा है—राजा मान्धाताने ओङ्कारके निकट प्रार्थना की, जिससे सन्तुष्ट हो उन्होंने वैदूर्यशूलके बदले मान्धाता संज्ञा रख दी।*}} {{rule}} {{c|{{smaller|मान्धातोवाच।}}}}{{c|<poem>{{smaller|यदि तुष्टोऽसि देवेश वरंदातुं त्वमिच्छसि। वैदूर्य्यो नाम शैलेन्द्रो मान्धाता ख्यातुमर्हतु॥ देवस्थानसभं ह्येतत् त्वत्प्रसादाडविष्यति। अन्नदानं तपः पूजा तथा प्राणविसर्जनम्॥ ये कुर्व्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासिना।}}</poem>}} {{Multicol-break}} इस द्वीपका अवस्थान अति सुन्दर है। इससे थोड़ी दूरपर नर्मदाकी कावेरी नाम्नी एक शाखा बहती है। फिर इसी नामकी एक छोटो नदी नर्मदासे अलग रह मान्धाताके निकट कावेरीमें जा मिली है। एक ही स्थानमें दो सङ्गम है। ऐसा पवित्र तीर्थ भारतवर्षमें अति विरल है। पुरायादिका तीर्थ–माहाम्य देखते ऐसे तीर्थमें वास वा स्नान करनेसे अशेष पुण्यलाभ होता है। यहां नर्मदाके उभय पार्श्व पर हरे रङ्गका पहाड़ देख पड़ेगा। पहाड़के मध्य जहां नदीका प्रवाह चलता, वहां जल गभीर, स्वच्छ और शान्त रहता है। जलमें असंख्य कच्छप और मत्स्य खेलते फिरते हैं। वह इतने निर्भीक और विश्वासी रहते, कि घाट किनारे लाई छोड़ देनेसे निर्भय आ खाया करते हैं। द्वीपका परिमाण प्राय: एक वर्ग मील है। ओङ्कार लिङ्ग आधुनिक नहीं । स्कन्द, शिव, पद्म प्रभृति पुरायोंमें पोद्धारका नाम उजा है । शिवपुराण में लिखा है, “किसी समय महर्षि नारद गोकर्ष तीर्थसे विन्ध्यपर्वतको पाये थे। यहां विधने बड़े सन्मान से उनको पूजा को पहले नारदको विश्वास रहा विन्ध्यपर्वतके पास सव कुछ है, किसी वस्तुका अभाव नहीं; इससे विन्ध्य अहङ्कार करते - हमारे सब है । अतएव नारदने निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर पूछा, 'भगवन् ! मैंने क्या दोष किया, जो विश्वास छोड़ दिया‌ हैं। नारदने कहा—'विन्ध्य तुम्हारे पास सब कुछ है। किन्तु तुम्हारे ऊपर देवता {{rule}} <poem>तस्य तद्दचनं श्रुत्वा मान्धातुः परमेश्वरः। उवाच वचन' देवो मान्धातारं महीपतिम्॥ सर्वमेतन्न पश्रेष्ठ मत्प्रसादाद्भविष्यति। यन्म े चीर्यं महौपाल दृष्ट्वाहयत्वयाऽनघ॥ तदा प्रभृति मान्धाता वैदूर्य्यो गौयते गिरिः। अस्य तीर्थस्य माहात्मग्रामान्प्रमुखा नृपाः।। सर्व्वकामसमापन्ना लोके क्रौड़न्ति वैष्णवे। श्रवणात् कीर्त्तनाद्यापि इयमेधफलं लभेत्॥”</poem>{{right|(स्कन्दपुराण, रेवाखण्ड 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सुन्दर है। इससे थोड़ी दूरपर नर्मदाकी कावेरी नाम्नी एक शाखा बहती है। फिर इसी नामकी एक छोटो नदी नर्मदासे अलग रह मान्धाताके निकट कावेरीमें जा मिली है। एक ही स्थानमें दो सङ्गम है। ऐसा पवित्र तीर्थ भारतवर्षमें अति विरल है। पुरायादिका तीर्थ–माहाम्य देखते ऐसे तीर्थमें वास वा स्नान करनेसे अशेष पुण्यलाभ होता है। यहां नर्मदाके उभय पार्श्व पर हरे रङ्गका पहाड़ देख पड़ेगा। पहाड़के मध्य जहां नदीका प्रवाह चलता, वहां जल गभीर, स्वच्छ और शान्त रहता है। जलमें असंख्य कच्छप और मत्स्य खेलते फिरते हैं। वह इतने निर्भीक और विश्वासी रहते, कि घाट किनारे लाई छोड़ देनेसे निर्भय आ खाया करते हैं। द्वीपका परिमाण प्राय: एक वर्ग मील है। ओङ्कार लिङ्ग आधुनिक नहीं। स्कन्द, शिव, पद्म प्रभृति पुरायोंमें ओङ्कारका नाम उक्त‌ हुआ है। शिवपुराण में लिखा है—"किसी समय महर्षि नारद गोकण तीर्थसे विन्ध्यपर्वतको पाये थे। यहां विन्ध्यने बड़े सन्मानसे उनकी पूजा की। पहले नारदको विश्वास रहा—विन्ध्यपर्वतके पास सब कुछ है, किसी वस्तुका अभाव नहीं; इसीसे विन्ध्य‌ अहङ्कार करते—हमारे सब है। अतएव नारदने निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर पूछा,—'भगवन्! मैंने क्या दोष किया, जो विश्वास छोड़ दिया‌ हैं।' नारदने कहा—'विन्ध्य तुम्हारे पास सब कुछ है। किन्तु तुम्हारे ऊपर देवता {{rule}} <poem>तस्य तद्दचनं श्रुत्वा मान्धातुः परमेश्वरः। उवाच वचन' देवो मान्धातारं महीपतिम्॥ सर्वमेतन्न पश्रेष्ठ मत्प्रसादाद्भविष्यति। यन्म े चीर्यं महौपाल दृष्ट्वाहयत्वयाऽनघ॥ तदा प्रभृति मान्धाता वैदूर्य्यो गौयते गिरिः। अस्य तीर्थस्य माहात्मग्रामान्प्रमुखा नृपाः।। सर्व्वकामसमापन्ना लोके क्रौड़न्ति वैष्णवे। श्रवणात् कीर्त्तनाद्यापि इयमेधफलं लभेत्॥”</poem>{{right|(स्कन्दपुराण, रेवाखण्ड २२अ॰)}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 4xavj8x8j0ie5s7fstmtmjvjaercgq6 668216 668213 2026-07-19T10:44:48Z आदेश यादव 3609 668216 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५२६|ओघवत्—ओङ्कारमान्धाता|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ओघवत् (सं॰ त्रि॰) ओघः जलवेनादिरस्तास्य, ओघ–मतुप् मस्य वः। १ जलवेगादियुक्त, जोरसे बहनेवाला। (पु॰) २ एक राजा। यह ओघरथके पिता थे। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}}}} {{outdent|ओघवती (स॰ स्त्री॰) १ महाभारतोक्त ओघवान् राजाकी कन्या। इन्होंने स्वामीके आज्ञानुसार द्विज-रूपधारी अतिथि धर्मको अपना शरीरतक दे डाला था। धर्मने परितुष्ट हो उन्हें वर प्रदान किया। उसीसे यह लोकोपकारार्थ अर्ध देहसे नदी बन गयी। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}} २ कुरुक्षेत्रकी एक नदी।{{right|{{smaller|(भारत, भीष्म॰)}}}}}} {{outdent|ओङ्कार (सं० पु० ) ओम्–कार। १ प्रणव। पहले ओङ्कार उच्चारण कर, पीछे वेद पढ़ते है। ब्रह्माके कण्ठको फोड़ प्रथम आङ्कार और अथ शब्द निकला था। इसीसे यह दोनों शब्द माङ्गलिक समझे जाते हैं। {{smaller|ओम् देखो।}} २ आरम्भ, शुरू। ३ सप्त समावयवका प्रथम अवयव। ४ एक लिङ्ग। {{smaller|"ओङ्कारं प्रथमं लिङ्गं द्वितीयन्तु विलोचनम्।" (काशीखण्ड)}}}} {{outdent|ओङ्कारभट्ट—एक प्राचीन संस्कृतग्रन्थकार। भूगोलसार नामक पुस्तक इन्होंने लिखा था।}} {{outdent|ओङ्कारमान्धाता (सं॰ पु॰) मध्यप्रदेशमें नीमाड़ जिलेके अन्तर्गत नर्मदा नदीका मध्यवर्ती एक द्वीप। यह अक्षा॰ २२° १४’ उ॰ और देशा॰ ७६° १७’ पू॰पर अवस्थित है। चलित नाम मान्धाता है। ओङ्कार-मूर्तिधारी महादेवका मन्दिर रहनेसे इस स्थानको ओङ्कारमान्धाता भी कहते हैं। मान्धाताका प्राचीन नाम 'वैदूर्यशूल' था। स्कन्दपुराणके रेवाखण्डमें लिखा है—राजा मान्धाताने ओङ्कारके निकट प्रार्थना की, जिससे सन्तुष्ट हो उन्होंने वैदूर्यशूलके बदले मान्धाता संज्ञा रख दी।*}} {{rule}} {{c|{{smaller|मान्धातोवाच।}}}}{{c|<poem>{{smaller|यदि तुष्टोऽसि देवेश वरंदातुं त्वमिच्छसि। वैदूर्य्यो नाम शैलेन्द्रो मान्धाता ख्यातुमर्हतु॥ देवस्थानसभं ह्येतत् त्वत्प्रसादाडविष्यति। अन्नदानं तपः पूजा तथा प्राणविसर्जनम्॥ ये कुर्व्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासिना।}}</poem>}} {{Multicol-break}} इस द्वीपका अवस्थान अति सुन्दर है। इससे थोड़ी दूरपर नर्मदाकी कावेरी नाम्नी एक शाखा बहती है। फिर इसी नामकी एक छोटो नदी नर्मदासे अलग रह मान्धाताके निकट कावेरीमें जा मिली है। एक ही स्थानमें दो सङ्गम है। ऐसा पवित्र तीर्थ भारतवर्षमें अति विरल है। पुरायादिका तीर्थ–माहाम्य देखते ऐसे तीर्थमें वास वा स्नान करनेसे अशेष पुण्यलाभ होता है। यहां नर्मदाके उभय पार्श्व पर हरे रङ्गका पहाड़ देख पड़ेगा। पहाड़के मध्य जहां नदीका प्रवाह चलता, वहां जल गभीर, स्वच्छ और शान्त रहता है। जलमें असंख्य कच्छप और मत्स्य खेलते फिरते हैं। वह इतने निर्भीक और विश्वासी रहते, कि घाट किनारे लाई छोड़ देनेसे निर्भय आ खाया करते हैं। द्वीपका परिमाण प्राय: एक वर्ग मील है। ओङ्कार लिङ्ग आधुनिक नहीं। स्कन्द, शिव, पद्म प्रभृति पुरायोंमें ओङ्कारका नाम उक्त‌ हुआ है। शिवपुराण में लिखा है—"किसी समय महर्षि नारद गोकण तीर्थसे विन्ध्यपर्वतको पाये थे। यहां विन्ध्यने बड़े सन्मानसे उनकी पूजा की। पहले नारदको विश्वास रहा—विन्ध्यपर्वतके पास सब कुछ है, किसी वस्तुका अभाव नहीं; इसीसे विन्ध्य‌ अहङ्कार करते—हमारे सब है। अतएव नारदने निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर पूछा,—'भगवन्! मैंने क्या दोष किया, जो विश्वास छोड़ दिया‌ हैं।' नारदने कहा—'विन्ध्य तुम्हारे पास सब कुछ है। किन्तु तुम्हारे ऊपर देवता {{rule}} {{c|{{smaller|<poem>तस्य तद्दचनं श्रुत्वा मान्धातुः परमेश्वरः। उवाच वचनं देवो मान्धातारं महीपतिम्॥ सर्वमेतन्न पश्रेष्ठ मत्प्रसादाडविष्यति। यन्मे चोग्रं महीपाल दृष्ट्वाहयत्वयाऽनघ॥ तदा प्रभृति मान्धाता वैदूर्य्यो गौयते गिरिः। अस्य तीर्थस्य माहात्म्यान्मान्धातृप्रमुखा नृपाः।। सर्व्वकामसमापन्ना लोके क्रीड़न्ति वैष्णवे। श्रवणात् कीर्त्तनाद्वापि हयमेधफलं लभेत्॥"{{right|(स्कन्दपुराण, रेवाखण्ड २२अ॰)}}</poem>}}}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> by7es2atx6aedsz06pgydzukau8i79z 668217 668216 2026-07-19T10:47:59Z आदेश यादव 3609 668217 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५२६|ओघवत्—ओङ्कारमान्धाता|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{outdent|ओघवत् (सं॰ त्रि॰) ओघः जलवेनादिरस्तास्य, ओघ–मतुप् मस्य वः। १ जलवेगादियुक्त, जोरसे बहनेवाला। (पु॰) २ एक राजा। यह ओघरथके पिता थे। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}}}} {{outdent|ओघवती (स॰ स्त्री॰) १ महाभारतोक्त ओघवान् राजाकी कन्या। इन्होंने स्वामीके आज्ञानुसार द्विज-रूपधारी अतिथि धर्मको अपना शरीरतक दे डाला था। धर्मने परितुष्ट हो उन्हें वर प्रदान किया। उसीसे यह लोकोपकारार्थ अर्ध देहसे नदी बन गयी। {{smaller|(भारत, अनु॰ २अ॰)}} २ कुरुक्षेत्रकी एक नदी।{{right|{{smaller|(भारत, भीष्म॰)}}}}}} {{outdent|ओङ्कार (सं० पु० ) ओम्–कार। १ प्रणव। पहले ओङ्कार उच्चारण कर, पीछे वेद पढ़ते है। ब्रह्माके कण्ठको फोड़ प्रथम आङ्कार और अथ शब्द निकला था। इसीसे यह दोनों शब्द माङ्गलिक समझे जाते हैं। {{smaller|ओम् देखो।}} २ आरम्भ, शुरू। ३ सप्त समावयवका प्रथम अवयव। ४ एक लिङ्ग। {{smaller|"ओङ्कारं प्रथमं लिङ्गं द्वितीयन्तु विलोचनम्।" (काशीखण्ड)}}}} {{outdent|ओङ्कारभट्ट—एक प्राचीन संस्कृतग्रन्थकार। भूगोलसार नामक पुस्तक इन्होंने लिखा था।}} {{outdent|ओङ्कारमान्धाता (सं॰ पु॰) मध्यप्रदेशमें नीमाड़ जिलेके अन्तर्गत नर्मदा नदीका मध्यवर्ती एक द्वीप। यह अक्षा॰ २२° १४’ उ॰ और देशा॰ ७६° १७’ पू॰पर अवस्थित है। चलित नाम मान्धाता है। ओङ्कार-मूर्तिधारी महादेवका मन्दिर रहनेसे इस स्थानको ओङ्कारमान्धाता भी कहते हैं। मान्धाताका प्राचीन नाम 'वैदूर्यशूल' था। स्कन्दपुराणके रेवाखण्डमें लिखा है—राजा मान्धाताने ओङ्कारके निकट प्रार्थना की, जिससे सन्तुष्ट हो उन्होंने वैदूर्यशूलके बदले मान्धाता संज्ञा रख दी।<ref>{{c|{{smaller|मान्धातोवाच।}}}}{{c|<poem>{{smaller|यदि तुष्टोऽसि देवेश वरंदातुं त्वमिच्छसि। वैदूर्य्यो नाम शैलेन्द्रो मान्धाता ख्यातुमर्हतु॥ देवस्थानसभं ह्येतत् त्वत्प्रसादाडविष्यति। अन्नदानं तपः पूजा तथा प्राणविसर्जनम्॥ ये कुर्व्वन्ति नरास्तेषां 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इसीसे विन्ध्य‌ अहङ्कार करते—हमारे सब है। अतएव नारदने निश्वास छोड़ा था। विध्यने समझ सकनेपर पूछा,—'भगवन्! मैंने क्या दोष किया, जो विश्वास छोड़ दिया‌ हैं।' नारदने कहा—'विन्ध्य तुम्हारे पास सब कुछ है। किन्तु तुम्हारे ऊपर देवता {{rule}} {{c|{{smaller|<poem>तस्य तद्दचनं श्रुत्वा मान्धातुः परमेश्वरः। उवाच वचनं देवो मान्धातारं महीपतिम्॥ सर्वमेतन्न पश्रेष्ठ मत्प्रसादाडविष्यति। यन्मे चोग्रं महीपाल दृष्ट्वाहयत्वयाऽनघ॥ तदा प्रभृति मान्धाता वैदूर्य्यो गौयते गिरिः। अस्य तीर्थस्य माहात्म्यान्मान्धातृप्रमुखा नृपाः।। सर्व्वकामसमापन्ना लोके क्रीड़न्ति वैष्णवे। श्रवणात् कीर्त्तनाद्वापि हयमेधफलं लभेत्॥"{{right|(स्कन्दपुराण, रेवाखण्ड २२अ॰)}}</poem>}}}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> 6dpht3cevmwno0j2q75zkygl7b9putp पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५७२ 250 76381 668130 609304 2026-07-18T18:15:32Z आदेश यादव 3609 668130 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" /></noinclude> इसमें कुछ भी सन्देह नहीं, कि दिल्लीका अधोवर हो मैं बहुत सी कर सकूंगा। लोगों को इस -तरह समझा बुझा १६५८ ई० को दूसरी चो दिल्लोके निकटवर्ती एक सुन्दर उद्यानमें औरङ्गजेब यथाविधान राजसिंहासनपर अभिषिक्त हुये। पोरजे के बादगाह होने की खबर बनदेय में पहुंचो पुनर्पर समरच्याकर प्रयागक पास पहुंच गये। कोरीव ससैन्य उनको गति रोकने आये । एक ग्राम में घोर युद्ध हुआ । उस दिनके युद्दमें यदि शाहशुजा थोड़ा और सुस्थिर रह जाते, - तो सौभाग्यलक्ष्मी उन्हीं पर प्रसन्न होतों। औरङ्गजे. व जिस हाथोपर चढ़कर युद्ध कर रहे थे, अस्त्राघात से उसका पैर टूट गया। शुजाका हाथो भी घायल हुआ। दोनों पादमौ अपने अपने हाथो से उतरकर - दूसरेपर चढ़नेका उपक्रम करने लगे। उसी वक्त - मोरजुमलाने चौरङ्गजे. बसे कहा, "प्रभो ! इस समय हाथो से उतरने में राज्य गया हो समझिये चोरी, व न उतरे ; परन्तु शजाः हाथो से उतर घोड़े पर सवार हुए। सिपाही लोग मालिकको न देख दूधर उधर भाग गये। यत्रा बहुदेश कोट पाये। किन्तु चोर -बड़े लड़के मुहम्मद और वज़ोर मोरजुमलाने उनके पोछे पड़ देश भी उन्हें पदेड़ दिया। भारत- - में भागनेका दूसरा कोई स्थान नहीं था । जहाँ जाते वह भोरङ्गजेवको पताका फहराती अन्तमें बहुत कुछ सोच विचार कर शुजा अराकान गये । उनके साथ बहुमूल्य रत्न और प्रायः डेढ़ हजार आदमी थे। किन्तु घराकानको पात्रहवा बहुत ही खराब होनेसे डेढ़ हजार पादमियोंमें धीरे धीरे प्रायः सभी मर गये। केवल माजा उनको दूसरी खो, -दो लड़के तीन लड़कियां पार चालीस नोकर जोते बचे विधाताके विमुख होनेपर चारो चोर विपद् उम पाती है। चराकानके राजा एक ती बरसे सदा महित रहते थे, दूसरे माको रूपवती कन्यापर उनको दृष्टि पड़ी; तीसरे साथ में बहु जो होरा मोतो थे, उन्हें भी फोन लेनेका ५७१ लोभ पैदा हुआ। इससे अनेक प्रकारका बहाना बता भाचित राजकुमारको उन्होंने अपने राज्यसे निकाल दिया। शुजाने अपने परिवार और अनुचरवर्गके साथ पर्वत के एक खड़में जाकर श्राश्रय लिया । वह स्थान अत्यन्त दुर्गम था। दोनों ओर पहाड़ और बगद्य में खड़ था। नोचे गवतो नदी कल कल करतो हुई वह रही थी । उसो दुर्गम स्थानमें अराकानके राजाको सेना चाकर हा धीर उनके साथियोंपर बापट करने लगी। किसी किसोने पहाड़पर से बड़े बड़े पत्थर लुढका दिये जाने बहुत देरतक प्राचपयले यु किया, अन्तमें एक बड़े भारी पत्थरके टुकड़ेको चोटसे अभिभूत हो गये। राजाके सिपाहियोंने उन्हें पोर उनके दो अनुचरोंको एक डोंगोपर चढ़ाकर बीच नदीमें छोड़ दिया । प्रवल स्रोतमें वे लोग तैर कर बाहर न जा सके, दो एक बार अङ्ग श्रास्फालन कर अन्त में डूब गये । उसके बाद लोग शुजाके पन्याह परोंको विनष्ट कर उनको खो, तोनों कन्यायों और दोनों पुत्रोको पकड़ राजाके पास पहुंचाया। राजाने स्त्रियां को चन्तःपुरमें रखा था। किन्तु 'हतभाग्य दोनों बालक मारे गये। इनाको प सुलताना प्यारो बानो परम वे सुन्दर थौं । उस समय रमयोकुलको प्रवद्वार रूप ध तेर- कुलवधू और तैमूर - कुलकन्याके चरित्रमें केल लगने से सत्य हो अच्छा था किन्तु यह को विना मारे मर जानेमें मरनेको मय्यादा हो Fait इसलिये प्यारो वानाने घपने कपड़े में एक कुरो ि रखो। पियावत्ति राजाने मानेपर उसे वह उनका प्राथ विनष्ट करना चाहती । परन्तु दासियाँको किसी तरह यह भेद मालूम हो गया। उन्होंने छुरी छीन ली। फिर और कोई उपाय न रहा । इसलिये उन्होंने अपना मुंह नोच डाला। मुखदन्द्रका सौन्दर्य कम पड़ गया। उसके बाद एक पत्थरपर शिर पटक पटक कर प्यारो बानोने प्राणत्याग कर दिया। शुजाको दो लड़कियां विष खाकर मर गई। एक लड़की भी अधिक दिन जो न सको ।<noinclude></noinclude> ht2jck4pgbovdy22t64fujwbk532ueu 668131 668130 2026-07-18T18:17:52Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 668131 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||औरङ्गजेब|५७१}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>इसमें कुछ भी सन्देह नहीं, कि दिल्लीका अधोवर हो मैं बहुत सी कर सकूंगा। लोगों को इस -तरह समझा बुझा १६५८ ई० को दूसरी चो दिल्लोके निकटवर्ती एक सुन्दर उद्यानमें औरङ्गजेब यथाविधान राजसिंहासनपर अभिषिक्त हुये। पोरजे के बादगाह होने की खबर बनदेय में पहुंचो पुनर्पर समरच्याकर प्रयागक पास पहुंच गये। कोरीव ससैन्य उनको गति रोकने आये । एक ग्राम में घोर युद्ध हुआ । उस दिनके युद्दमें यदि शाहशुजा थोड़ा और सुस्थिर रह जाते, - तो सौभाग्यलक्ष्मी उन्हीं पर प्रसन्न होतों। औरङ्गजे. व जिस हाथोपर चढ़कर युद्ध कर रहे थे, अस्त्राघात से उसका पैर टूट गया। शुजाका हाथो भी घायल हुआ। दोनों पादमौ अपने अपने हाथो से उतरकर - दूसरेपर चढ़नेका उपक्रम करने लगे। उसी वक्त - मोरजुमलाने चौरङ्गजे. बसे कहा, "प्रभो ! इस समय हाथो से उतरने में राज्य गया हो समझिये चोरी, व न उतरे ; परन्तु शजाः हाथो से उतर घोड़े पर सवार हुए। सिपाही लोग मालिकको न देख दूधर उधर भाग गये। यत्रा बहुदेश कोट पाये। किन्तु चोर -बड़े लड़के मुहम्मद और वज़ोर मोरजुमलाने उनके पोछे पड़ देश भी उन्हें पदेड़ दिया। भारत- - में भागनेका दूसरा कोई स्थान नहीं था । जहाँ जाते वह भोरङ्गजेवको पताका फहराती अन्तमें बहुत कुछ सोच विचार कर शुजा अराकान गये । उनके साथ बहुमूल्य रत्न और प्रायः डेढ़ हजार आदमी थे। किन्तु घराकानको पात्रहवा बहुत ही खराब होनेसे डेढ़ हजार पादमियोंमें धीरे धीरे प्रायः सभी मर गये। केवल माजा उनको दूसरी खो, -दो लड़के तीन लड़कियां पार चालीस नोकर जोते बचे विधाताके विमुख होनेपर चारो चोर विपद् उम पाती है। चराकानके राजा एक ती बरसे सदा महित रहते थे, दूसरे माको रूपवती कन्यापर उनको दृष्टि पड़ी; तीसरे साथ में बहु जो होरा मोतो थे, उन्हें भी फोन लेनेका {{Multicol-break}} लोभ पैदा हुआ। इससे अनेक प्रकारका बहाना बता भाचित राजकुमारको उन्होंने अपने राज्यसे निकाल दिया। शुजाने अपने परिवार और अनुचरवर्गके साथ पर्वत के एक खड़में जाकर श्राश्रय लिया । वह स्थान अत्यन्त दुर्गम था। दोनों ओर पहाड़ और बगद्य में खड़ था। नोचे गवतो नदी कल कल करतो हुई वह रही थी । उसो दुर्गम स्थानमें अराकानके राजाको सेना चाकर हा धीर उनके साथियोंपर बापट करने लगी। किसी किसोने पहाड़पर से बड़े बड़े पत्थर लुढका दिये जाने बहुत देरतक प्राचपयले यु किया, अन्तमें एक बड़े भारी पत्थरके टुकड़ेको चोटसे अभिभूत हो गये। राजाके सिपाहियोंने उन्हें पोर उनके दो अनुचरोंको एक डोंगोपर चढ़ाकर बीच नदीमें छोड़ दिया । प्रवल स्रोतमें वे लोग तैर कर बाहर न जा सके, दो एक बार अङ्ग श्रास्फालन कर अन्त में डूब गये । उसके बाद लोग शुजाके पन्याह परोंको विनष्ट कर उनको खो, तोनों कन्यायों और दोनों पुत्रोको पकड़ राजाके पास पहुंचाया। राजाने स्त्रियां को चन्तःपुरमें रखा था। किन्तु 'हतभाग्य दोनों बालक मारे गये। इनाको प सुलताना प्यारो बानो परम वे सुन्दर थौं । उस समय रमयोकुलको प्रवद्वार रूप ध तेर- कुलवधू और तैमूर - कुलकन्याके चरित्रमें केल लगने से सत्य हो अच्छा था किन्तु यह को विना मारे मर जानेमें मरनेको मय्यादा हो इसलिये प्यारो वानाने घपने कपड़े में एक कुरो ि रखो। पियावत्ति राजाने मानेपर उसे वह उनका प्राथ विनष्ट करना चाहती । परन्तु दासियाँको किसी तरह यह भेद मालूम हो गया। उन्होंने छुरी छीन ली। फिर और कोई उपाय न रहा । इसलिये उन्होंने अपना मुंह नोच डाला। 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देखकर राजाओंका मन ईर्ष्या से जल उठता है । इस सब पापों निरुद्वेग होनेके लिये इन्होंने अपने बड़े सादको ग्वालियर के किलेमें यायोक्न चावह कर दिया। सुषमादसे एक अपराध भी हो गया था। बङ्ग-युद्ध के समय माजावी कन्या रूपलावण्य प्र मुग्ध हो उन्होंने उसके साथ विवाह कर लिया। इसलिये बिताका पक्ष छोड़ उन्होंने कुछ खशुरका पक्ष पकड़ा था। चौरङ्गजेबने विशेष कौशल कर उन लोगो, विच्छेद डाल दिया। दाराने लाहोर चोर चजमेर में कई बार युवका चायोजन किया था, परन्तु औरङ्गजेब से परास्त हो बड़े में चोर कोई उपाय न देख उन्होंने सोचा, कि बसे दुःसमय में ईराम जाकर आश्रय लेना ही अच्छा था। इससे अनुचरों को साथ ले उन्होंने रानको राह पकड़ो। सिन्धुवार साताराके निकट पहुचने पर उनकी स्त्री नादिरा बानो बहुत बीमार हो गई। तातारके सरदारका नाम जहान खां था । पहले दो बार वे भी सुबह में फंसे थे। प्रधान विचारपतिके यहां उनका अपराध प्रमाणित हुआ । सम्राट शाहजहांने उनको सारी सम्पत्ति कुर्क कर के प्रापदण्डको पात्रा दो। किन्तु केवल दाराके अनुरोधसे महान यो दोनों वार छुटकारा पा गये थे। इससे दाराने सोचा- ऐसो विपद् के समय में मेरे उपकृत सुहृद् अवश्य हो दोचार दिनके लिये मुझे आश्रय देंगे। जानने चाचय दिया। यहीं सुलताना नादिरा बानोका मृत्यु हुषा। द्वारा सोवियोगी बात हो रहे थे उसी समय उन्होंने सुना, कि औरङ्गजेवके सेनानायक खांजहां मुलतानसे उन्हें पकड़ने आ रहे थे। घबराकर दारा जहानसे विदा हुए। वे तातार नगरसे आध हो कोस दूर गये थे, कि देखा -पीछेसे अहान प्रायः एक हजार घुड़सवार सेना लिये चले जाते हैं। दाराने स्थिर किया मेरे साथ अधिक पादमो नहीं जो हैं ये भी रोग चोर पथथममे कातर हो रहे हैं, इसलिये मुझे ईरानतक पहुंचा देनेके लिये जहान साथ भाते हैं। किन्तु जहानको ऐसा अभ्यास न था। गुरु यह पाठ लेना जहान भूल गये - उपकार करने से कृतज्ञ होना चाहिये। पर्वका दो माहात्म्य वि समझते थे। लोभमें पड़कर उन्होंने दारा और उनके संभाले लड़का पकड़कर ज किया इनको गिरफ़्तार कर लेनेपर औरङ्गजे, बसे पुरस्कार मिलेगा। दाराको उस समय बड़ी दुर्दशा थी मरीर पर फटे हुए कपड़े चोर मिरपर मेलो पगड़ी! उनके भी अवस्था वैसी ही रहो। खांजहां उन लोगों को हाथी पर चढ़ाकर दिल्ली ले गये । दाराको दुरवस्था देखकर नगर के पद्मपचो भी रोने लगे परन्तु धीर जे. बका मन न पसीजा। बड़े भाई और भतीजे को दुर्दशा प्रजावर्गको दिखलानेके लिये इन्होंने एकबार उन लोगों को नगरका प्रदचिप करा एक निर्जन स्वानमें कद कर दिया। दारा जानते थे-मृत निश्चित है। उन्होंने पहले हो से एक कुरो, एक कलम, एक दावात और कुछ काग़ज़ अपने कपड़े में दिपा रखा। कारागारमें बेठकर कुक्षम बनाते और दुःखको कविता लिखते थे। जब शोकका वेग उमड़ उठता, तो लड़केका गला पकड़ कर रोने लगते।<noinclude></noinclude> obly3k6yv7d0dxfjwvo8qchtqyhs1ol 668133 668132 2026-07-18T18:22:31Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 668133 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५७२|औरङ्गजेब|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>माको दुर्दशाका समाचार या चोरी व पुल- कित हो गये। परन्तु इनके मनमें एक दिनके लिये भी सुख उत्पन्न न हुआ। शाहजहां वृदावस्था में पाठ वर्ष कद रहे। यह सदा उदिन रहते थे-पीछे कह उनके गत सिपाही उपद्रवन मचायें। फिर दारा भी जीते थे। उनके पुत्र सुलेमानने श्रीनगर में जाकर आश्रय लिया । अवसर पानेपर वे लोग भी उपद्रव मचा सकते थे। सिवा इसके पिताको कर राज्यलाभका जो सहज कौन इन्होंने दिखाया, इनके पुत्रोंके भी वही कौशल मोख लेने में विचित्र हो क्या था ! राजा- चौका मन सर्वदा सन्दिग्ध रहता है। मतिमान् मनुष्य उनके चक्षुशूल होते हैं। अपनो को छाया देखकर राजाओंका मन ईर्ष्या से जल उठता है । इस सब पापों निरुद्वेग होनेके लिये इन्होंने अपने बड़े सादको ग्वालियर के किलेमें यायोक्न चावह कर दिया। सुषमादसे एक अपराध भी हो गया था। बङ्ग-युद्ध के समय माजावी कन्या रूपलावण्य प्र मुग्ध हो उन्होंने उसके साथ विवाह कर लिया। इसलिये बिताका पक्ष छोड़ उन्होंने कुछ खशुरका पक्ष पकड़ा था। चौरङ्गजेबने विशेष कौशल कर उन लोगो, विच्छेद डाल दिया। दाराने लाहोर चोर चजमेर में कई बार युवका चायोजन किया था, परन्तु औरङ्गजेब से परास्त हो बड़े में चोर कोई उपाय न देख उन्होंने सोचा, कि बसे दुःसमय में ईराम जाकर आश्रय लेना ही अच्छा था। इससे अनुचरों को साथ ले उन्होंने रानको राह पकड़ो। सिन्धुवार साताराके निकट पहुचने पर उनकी स्त्री नादिरा बानो बहुत बीमार हो गई। तातारके सरदारका नाम जहान खां था । पहले दो बार वे भी सुबह में फंसे थे। प्रधान विचारपतिके यहां उनका अपराध प्रमाणित हुआ । सम्राट शाहजहांने उनको सारी सम्पत्ति कुर्क कर के प्रापदण्डको पात्रा दो। किन्तु केवल दाराके अनुरोधसे महान यो दोनों वार छुटकारा पा गये {{Multicol-break}} थे। इससे दाराने सोचा- ऐसो विपद् के समय में मेरे उपकृत सुहृद् अवश्य हो दोचार दिनके लिये मुझे आश्रय देंगे। जानने चाचय दिया। यहीं सुलताना नादिरा बानोका मृत्यु हुषा। द्वारा सोवियोगी बात हो रहे थे उसी समय उन्होंने सुना, कि औरङ्गजेवके सेनानायक खांजहां मुलतानसे उन्हें पकड़ने आ रहे थे। घबराकर दारा जहानसे विदा हुए। वे तातार नगरसे आध हो कोस दूर गये थे, कि देखा -पीछेसे अहान प्रायः एक हजार घुड़सवार सेना लिये चले जाते हैं। दाराने स्थिर किया मेरे साथ अधिक पादमो नहीं जो हैं ये भी रोग चोर पथथममे कातर हो रहे हैं, इसलिये मुझे ईरानतक पहुंचा देनेके लिये जहान साथ भाते हैं। किन्तु जहानको ऐसा अभ्यास न था। गुरु यह पाठ लेना जहान भूल गये - उपकार करने से कृतज्ञ होना चाहिये। पर्वका दो माहात्म्य वि समझते थे। लोभमें पड़कर उन्होंने दारा और उनके संभाले लड़का पकड़कर ज किया इनको गिरफ़्तार कर लेनेपर औरङ्गजे, बसे पुरस्कार मिलेगा। दाराको उस समय बड़ी दुर्दशा थी मरीर पर फटे हुए कपड़े चोर मिरपर मेलो पगड़ी! उनके भी अवस्था वैसी ही रहो। खांजहां उन लोगों को हाथी पर चढ़ाकर दिल्ली ले गये । दाराको दुरवस्था देखकर नगर के पद्मपचो भी रोने लगे परन्तु धीर जे. बका मन न पसीजा। बड़े भाई और भतीजे को दुर्दशा प्रजावर्गको दिखलानेके लिये इन्होंने एकबार उन लोगों को नगरका प्रदचिप करा एक निर्जन स्वानमें कद कर दिया। दारा जानते थे-मृत निश्चित है। उन्होंने पहले हो से एक कुरो, एक कलम, एक दावात और कुछ काग़ज़ अपने कपड़े में दिपा रखा। कारागारमें बेठकर कुक्षम बनाते और दुःखको कविता लिखते थे। जब शोकका वेग उमड़ उठता, तो लड़केका गला पकड़ कर रोने लगते।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> iuklcialqyed53bzbdwt01kyl5aqi8o पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५७४ 250 76384 668135 609306 2026-07-18T18:26:48Z आदेश यादव 3609 /* शोधित नहीं */ 668135 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh||औरङ्गजेब|५७३}}</noinclude>औरङ्गजेब का दरवार लगा। दारा बड़े थे। वे चटपट राजा होने चले थे, उन्हें क्या दण्ड देना उचित या ? अनेक पादमियों ने कहा- इन्हें यायोवन वालियर के किलेमें कूद रखना मुनासिव है । परन्तु औरङ्गजेवको वैसी इच्छा न थी । यहो समझकर दो एक सभासद बोले, – “ दारा नास्तिक हैं। नास्तिकका प्राणवध न करना मुहम्मदके प्रतिष्ठित धर्मका विरुद्धाचरण है ।" अब बात मनके लायक हुई चोरी, कहा- "यह बात ठीक है। दाराको ओ मेरी हानि करतो हो करें। मैं उसे स सकता है, परन्तु नास्तिकता असह्य है।” अतएव उसी रातको दाराके प्राणविनष्ट करनेका भार नाज़िर और सफी नामक दो अफगान सरदारोंको सौंपा गया। धीरातका समय था। दाराके कमरे के पास हठात् पत्रों को मानसनाहट सुनाई दो बदनसीब महादेव दुःखको कुछ रात जागने में बोल गई, कुछ काकनिद्रा में वीतनेवाली रही। भांख लगती जाती थी। उसी समय कानमें अस्त्रोंको झनझनाहट पड़ी। वे चौंक उठे चोर समझ गये - पात्र अन्तिम काल उपस्थित है । लड़का सो रहा था, उसे उन्होंने जगाया । घातकोंने दरवाजा खोला । दारा कलमतराश कुरोको ले एक कोने में जा खड़े हुए दुष्टों दारार्क लड़के को गुल वाले एक कमरेमें बांध दिया। पहले उन लोगों ने ख. याल किया - गला घोटकर दाराको मार डालेंगे। किन्तु इसप्रकार प्राणदण्ड पाना राजपुत्रके लिये प्रथाकर था। इसलिये घसोम विक्रमके साथ दाराने एक घातकके कलेजे अपनो कुरो घुसेड़ दो। 'चार चन्तमें उन लोगों ने तलवार से दाराका भिर काटा। दाराका पुत्र अपने पिताको लइसे लथपथ लामको गोद लिये रातभर रोता रहा। नादिर कटे हुए शिरको लेकर चले गये। उस दिन सारी रात और बको नींद न आई । बड़े भाईका मुख देखने से उन्हें शान्ति होता । प्रात:काल होनेके पहले हो नाज़िर दाराका लहसे भरा, और वर्ण शिर लेकर आ पंहुंचे। Vol.III. 144 सम्राट देखकर उसे पहचान न सके कुछ देतक जल खुन पोछ डाला, पोरजे,बने में भिगाकर अपने हाथ के रूमाल से फिर अच्छी तरह उसे पहुंचाना। कहा, “हां, यहो मेरा दुग्दृष्ट भाई दारा है ।" इस तरह कहते कहते पत्थर फटकर दो बूंद धांसू निकल गये 1 इसके बाद सुलेमान चौर दाराका ला लड़का ग्वालियर के किले में कैद किया गया । ओर वाले लड़के मुहाद वाम दचि णाचल में थे। चरजे बने इसलिये उन्हें अपने पान बुला लिया-क्या मालूम पोछे कहीं वह कोई उपद्रव न मचावें। औरङ्गजेबके राज्यलाभका कौशल यही था । किन्तु इसमें निरता भित्र बुद्दिमत्ताका परिचय कुछ भी नहीं है। पितासे पुत्र, भाईसे भाई और प्रभुसे भृत्यको काम पड़ता है। अभी अविश्वास रहता, फिर कुछ रोनेपर तुरत ही खोह, ममता और विश्वास श्री जाता है। ऐसे में जो अधिक पावण्ड होता, इसोको जय मिलता है । कुकर्मी लोग अपना अपना कलङ्क छिपानेके लिये एक एक सतक करते हैं। पोरजे, व मो इक कौशलको अच्छी तरह समझते थे। एकवार सारे भारतवर्ष में अकाल पड़ गया। राजकोषसे धन देकर इन्होंने प्रजाको भलाई की । यत्नपूर्वक विद्या सोखना हमारे देश के राजपुत्रोंके साम्य में प्राय: नहीं रहता । उन लोगोंका लड़कपन प्रायः चानन्द सुखमें हो कट जाता है । परन्तु चौरङ्गजे बने विद्याभ्यास में कभी पास न किया था। घरवो और फारसी भाषा के यह अच्छे पण्डित रहे। इसके अतिरिक्त भारत- वर्ष अनेक स्थानोंशी भाषा चोंमें यह चिट्ठी लिख सकते और उन्हें बोल भी सकते थे। सर्वत्र विद्यालोचनाका उत्कर्ष साधन करनेके निमित्त इन्होंने अनेक पाठ- शालायें स्थापन की किन्तु केवल विद्यालय रहने हो काम नहीं बनता । तत्त्वावधान न होनेसे विद्या- लय स्थापन करना निष्फल है। इसलिये इन्होंने कई चतुर और कुविद्य तत्वावधायक नियुक्त कर दिये। मुसलमान सम्राटोंमें प्राय: समो विलासी भोर<noinclude></noinclude> krxzy872krnh1v1vpa6hc101e53c76e 668137 668135 2026-07-18T18:27:34Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 668137 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||औरङ्गजेब|५७३}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>औरङ्गजेब का दरवार लगा। दारा बड़े थे। वे चटपट राजा होने चले थे, उन्हें क्या दण्ड देना उचित या ? अनेक पादमियों ने कहा- इन्हें यायोवन वालियर के किलेमें कूद रखना मुनासिव है । परन्तु औरङ्गजेवको वैसी इच्छा न थी । यहो समझकर दो एक सभासद बोले, – “ दारा नास्तिक हैं। नास्तिकका प्राणवध न करना मुहम्मदके प्रतिष्ठित धर्मका विरुद्धाचरण है ।" अब बात मनके लायक हुई चोरी, कहा- "यह बात ठीक है। दाराको ओ मेरी हानि करतो हो करें। मैं उसे स सकता है, परन्तु नास्तिकता असह्य है।” अतएव उसी रातको दाराके प्राणविनष्ट करनेका भार नाज़िर और सफी नामक दो अफगान सरदारोंको सौंपा गया। धीरातका समय था। दाराके कमरे के पास हठात् पत्रों को मानसनाहट सुनाई दो बदनसीब महादेव दुःखको कुछ रात जागने में बोल गई, कुछ काकनिद्रा में वीतनेवाली रही। भांख लगती जाती थी। उसी समय कानमें अस्त्रोंको झनझनाहट पड़ी। वे चौंक उठे चोर समझ गये - पात्र अन्तिम काल उपस्थित है । लड़का सो रहा था, उसे उन्होंने जगाया । घातकोंने दरवाजा खोला । दारा कलमतराश कुरोको ले एक कोने में जा खड़े हुए दुष्टों दारार्क लड़के को गुल वाले एक कमरेमें बांध दिया। पहले उन लोगों ने ख. याल किया - गला घोटकर दाराको मार डालेंगे। किन्तु इसप्रकार प्राणदण्ड पाना राजपुत्रके लिये प्रथाकर था। इसलिये घसोम विक्रमके साथ दाराने एक घातकके कलेजे अपनो कुरो घुसेड़ दो। 'चार चन्तमें उन लोगों ने तलवार से दाराका भिर काटा। दाराका पुत्र अपने पिताको लइसे लथपथ लामको गोद लिये रातभर रोता रहा। नादिर कटे हुए शिरको लेकर चले गये। उस दिन सारी रात और बको नींद न आई । बड़े भाईका मुख देखने से उन्हें शान्ति होता । प्रात:काल होनेके पहले हो नाज़िर दाराका लहसे भरा, और वर्ण शिर लेकर आ पंहुंचे। Vol.III. 144 {{Multicol-break}} सम्राट देखकर उसे पहचान न सके कुछ देतक जल खुन पोछ डाला, पोरजे,बने में भिगाकर अपने हाथ के रूमाल से फिर अच्छी तरह उसे पहुंचाना। कहा, “हां, यहो मेरा दुग्दृष्ट भाई दारा है ।" इस तरह कहते कहते पत्थर फटकर दो बूंद धांसू निकल गये 1 इसके बाद सुलेमान चौर दाराका ला लड़का ग्वालियर के किले में कैद किया गया । ओर वाले लड़के मुहाद वाम दचि णाचल में थे। चरजे बने इसलिये उन्हें अपने पान बुला लिया-क्या मालूम पोछे कहीं वह कोई उपद्रव न मचावें। औरङ्गजेबके राज्यलाभका कौशल यही था । किन्तु इसमें निरता भित्र बुद्दिमत्ताका परिचय कुछ भी नहीं है। पितासे पुत्र, भाईसे भाई और प्रभुसे भृत्यको काम पड़ता है। अभी अविश्वास रहता, फिर कुछ रोनेपर तुरत ही खोह, ममता और विश्वास श्री जाता है। ऐसे में जो अधिक पावण्ड होता, इसोको जय मिलता है । कुकर्मी लोग अपना अपना कलङ्क छिपानेके लिये एक एक सतक करते हैं। पोरजे, व मो इक कौशलको अच्छी तरह समझते थे। एकवार सारे भारतवर्ष में अकाल पड़ गया। राजकोषसे धन देकर इन्होंने प्रजाको भलाई की । यत्नपूर्वक विद्या सोखना हमारे देश के राजपुत्रोंके साम्य में प्राय: नहीं रहता । उन लोगोंका लड़कपन प्रायः चानन्द सुखमें हो कट जाता है । परन्तु चौरङ्गजे बने विद्याभ्यास में कभी पास न किया था। घरवो और फारसी भाषा के यह अच्छे पण्डित रहे। इसके अतिरिक्त भारत- वर्ष अनेक स्थानोंशी भाषा चोंमें यह चिट्ठी लिख सकते और उन्हें बोल भी सकते थे। सर्वत्र विद्यालोचनाका उत्कर्ष साधन करनेके निमित्त इन्होंने अनेक पाठ- शालायें स्थापन की किन्तु केवल विद्यालय रहने हो काम नहीं बनता । तत्त्वावधान न होनेसे विद्या- लय स्थापन करना निष्फल है। इसलिये इन्होंने कई चतुर और कुविद्य तत्वावधायक नियुक्त कर दिये। मुसलमान सम्राटोंमें प्राय: समो विलासी भोर<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> o704m6mic841zj5ads7ja9b4cknxvs5 668139 668137 2026-07-18T18:28:02Z आदेश यादव 3609 668139 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||औरङ्गजेब|५७३}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>औरङ्गजेब का दरवार लगा। दारा बड़े थे। वे चटपट राजा होने चले थे, उन्हें क्या दण्ड देना उचित या ? अनेक पादमियों ने कहा- इन्हें यायोवन वालियर के किलेमें कूद रखना मुनासिव है । परन्तु औरङ्गजेवको वैसी इच्छा न थी । यहो समझकर दो एक सभासद बोले, – “ दारा नास्तिक हैं। नास्तिकका प्राणवध न करना मुहम्मदके प्रतिष्ठित धर्मका विरुद्धाचरण है ।" अब बात मनके लायक हुई चोरी, कहा- "यह बात ठीक है। दाराको ओ मेरी हानि करतो हो करें। मैं उसे स सकता है, परन्तु नास्तिकता असह्य है।” अतएव उसी रातको दाराके प्राणविनष्ट करनेका भार नाज़िर और सफी नामक दो अफगान सरदारोंको सौंपा गया। धीरातका समय था। दाराके कमरे के पास हठात् पत्रों को मानसनाहट सुनाई दो बदनसीब महादेव दुःखको कुछ रात जागने में बोल गई, कुछ काकनिद्रा में वीतनेवाली रही। भांख लगती जाती थी। उसी समय कानमें अस्त्रोंको झनझनाहट पड़ी। वे चौंक उठे चोर समझ गये - पात्र अन्तिम काल उपस्थित है । लड़का सो रहा था, उसे उन्होंने जगाया । घातकोंने दरवाजा खोला । दारा कलमतराश कुरोको ले एक कोने में जा खड़े हुए दुष्टों दारार्क लड़के को गुल वाले एक कमरेमें बांध दिया। पहले उन लोगों ने ख. याल किया - गला घोटकर दाराको मार डालेंगे। किन्तु इसप्रकार प्राणदण्ड पाना राजपुत्रके लिये प्रथाकर था। इसलिये घसोम विक्रमके साथ दाराने एक घातकके कलेजे अपनो कुरो घुसेड़ दो। 'चार चन्तमें उन लोगों ने तलवार से दाराका भिर काटा। दाराका पुत्र अपने पिताको लइसे लथपथ लामको गोद लिये रातभर रोता रहा। नादिर कटे हुए शिरको लेकर चले गये। उस दिन सारी रात और बको नींद न आई । बड़े भाईका मुख देखने से उन्हें शान्ति होता । प्रात:काल होनेके पहले हो नाज़िर दाराका लहसे भरा, और वर्ण शिर लेकर आ पंहुंचे। {{left|Vol.III. 144}}{{Multicol-break}} सम्राट देखकर उसे पहचान न सके कुछ देतक जल खुन पोछ डाला, पोरजे,बने में भिगाकर अपने हाथ के रूमाल से फिर अच्छी तरह उसे पहुंचाना। कहा, “हां, यहो मेरा दुग्दृष्ट भाई दारा है ।" इस तरह कहते कहते पत्थर फटकर दो बूंद धांसू निकल गये 1 इसके बाद सुलेमान चौर दाराका ला लड़का ग्वालियर के किले में कैद किया गया । ओर वाले लड़के मुहाद वाम दचि णाचल में थे। चरजे बने इसलिये उन्हें अपने पान बुला लिया-क्या मालूम पोछे कहीं वह कोई उपद्रव न मचावें। औरङ्गजेबके राज्यलाभका कौशल यही था । किन्तु इसमें निरता भित्र बुद्दिमत्ताका परिचय कुछ भी नहीं है। पितासे पुत्र, भाईसे भाई और प्रभुसे भृत्यको काम पड़ता है। अभी अविश्वास रहता, फिर कुछ रोनेपर तुरत ही खोह, ममता और विश्वास श्री जाता है। ऐसे में जो अधिक पावण्ड होता, इसोको जय मिलता है । कुकर्मी लोग अपना अपना कलङ्क छिपानेके लिये एक एक सतक करते हैं। पोरजे, व मो इक कौशलको अच्छी तरह समझते थे। एकवार सारे भारतवर्ष में अकाल पड़ गया। राजकोषसे धन देकर इन्होंने प्रजाको भलाई की । यत्नपूर्वक विद्या सोखना हमारे देश के राजपुत्रोंके साम्य में प्राय: नहीं रहता । उन लोगोंका लड़कपन प्रायः चानन्द सुखमें हो कट जाता है । परन्तु चौरङ्गजे बने विद्याभ्यास में कभी पास न किया था। घरवो और फारसी भाषा के यह अच्छे पण्डित रहे। इसके अतिरिक्त भारत- वर्ष अनेक स्थानोंशी भाषा चोंमें यह चिट्ठी लिख सकते और उन्हें बोल भी सकते थे। सर्वत्र विद्यालोचनाका उत्कर्ष साधन करनेके निमित्त इन्होंने अनेक पाठ- शालायें स्थापन की किन्तु केवल विद्यालय रहने हो काम नहीं बनता । तत्त्वावधान न होनेसे विद्या- लय स्थापन करना निष्फल है। इसलिये इन्होंने कई चतुर और कुविद्य तत्वावधायक नियुक्त कर दिये। मुसलमान सम्राटोंमें प्राय: समो विलासी भोर<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> g1q8e3bxy8x2zi041ncur5c3jldiuwl पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५७५ 250 76387 668141 609307 2026-07-18T18:39:11Z आदेश यादव 3609 /* शोधित नहीं */ 668141 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh|५७४|औरङ्गजेब|}}</noinclude>अपव्ययी रहे। परन्तु औरङ्गजे, बमें ऐसे दोष न थे । सचराचर यह सामान्य वस्त्र पहनकर रहते । विवाह आदि उत्सव के सिवा अनर्थक नाच तमाशेमें इनका पर्यटन होता था। भारतवर्ष नाना इन्होंने स्थानों में पथिकोंके लिये श्राश्रम बनवा दिये। उन आश्रमों में भोजनको सामग्री भी सचित रहतो थो। प्रजामात्र सम्राट के पास जा सकती थी । विश्वागलय में यदि किसोपर अन्याय होता, तो वह स्वयं सम्म्राट् से जाकर कह देता। इसलिये विचारपति घस न ले सकते थे। देखने में सम्राट पुरुष न थे, परन्तु अतिशय मिष्ट भाषी रहे । नित्य प्रातःकाल उठ यह स्नान आह्निक करते थे। उसके बाद एक प्रहरतक राजकाज संभालते । एक प्रचरके बाद भोजनका समय निर्दिष्ट था। भोजनके बाद औरङ्गजेब हाथी, घोड़ा और बाघ पादिको लड़ाई देखते यही इनका पाद प्रमोद था। वाद-प्रमोद के बाद दीवान - श्राममें बैठ यह सभा करते थे। इसी समय अमीर उमरा और विदेश के राजदूत पादि पाकर इनसे मिल जाते । शुक्रवारको दरबार बन्द रहता था। ईसाइयों के लिये जैसे रविवार मुसलमानो के लिये पैसे हो शुक्रवार है। इससे सम्राट शुक्रवार के दिन कामे काज न देखते थे । प्रायः सम्राटोंका अन्तःपुर असंख्य रूपवती रमणियों से परिपूर्ण रहता है । औरङ्गजेब के अन्तःपुर में भी अनेक दासियाँ थीं । परन्तु वे सब केवल राजप्रासादको गोमाके लिये हो रहीं। फलत: विवाहिता य वह कभी दूसरी स्त्रीका मुंह न देखते थे। अतएव ओरङ्गजेबका गुणराशि दोषके ठोक विपरीत था । एक घोर पूर्णचन्द्रको हिमधारासनी ज्योत्स्ना के सौन्दर्य से हृदय बोतल रहता, दूसरो चोर अमावस्याका निविड़ अन्धकार - नि, रताका कठिन हस्त देखने से प्राण कांप उठता था। जो हो, इनका दुखरित हो मोगल साम्राज्य के पतनका प्रधान कारण है । प्रजा असन्तुष्ट होनेसे राजा नहीं रहता, इन्द्रका इन्द्रत्व भी डोल उठता- कुटिल राजनीति एवं वल मिष्या है। ओरङ्गजेब अपनी गठता छिपानेके लिये सबको प्यार करते थे। पहले जो लोग इनके विरोधो रहे उनके साथ भी यह खेर थे । परन्तु लोग समझ गये - यन्त्र कौशल भिन्न और कुछ नहीं है। इसलिये हिन्दुत्रोंको कौन कहे, मुसलमान भी मन ही मन इनके शत्रु थे । खलके' प्रेममें पढ़ना काले सपिके साथ रहने के समान है, विपद श्रा जाने में देर नहीं लगती। यह तो हुई साधारण लोगोंको बात! हिन्दू इनके अत्यन्त विरक्त हो गये थे । यह हिन्दुको मुसलमान बनानेके लिये उत्पीड़न करते थे। इससे जिन राजपूत बोरोंके बाहुवलसे तैमूरवंशको इतनी प्रतिपत्ति हुई थो, अन्त में उन लोगोंने भो सम्राट्को छोड़ दिया । औरङ्गजे, बको वृद्धावस्था में जब चारो घोर विश्र्व उपस्थित था, तो उस दुःसमय में किसीने इनकी घोर न देखा। उधर महाराष्ट्र देश में शिवाजी म के भीतर अग्निस्फ ुलिङको क्रमसे प्रभूमित होकर उन्होंने काला कुण्ड जला दिया, मोगल साम्राज्यका मीतक कांप उठा! चौरङ्गजे, बका उतना तेज, उतना उद्यम, - फिर कुछ भी न रहा । वह व्यन्त दोषथिया बुझने लगी । इन्होंने पहले जो दुष्कर्म किये थे, उन्हों पापोंके कारण हृदय सत्रों विच्चोंके काटनेको ज्वाला उठ खड़ी हुई। यह लोगोंड सामने अपना मुंहतक दिखा न सके । क्रमसे अनु- तापनें जो किट पर जरजर हो पापी माय पचभूत शरोरसे निकल गये। अन्तिम अवस्था में औरङ्गजेब प्रायः दाक्षिणात्य प्रदेश से रहते थे। अहमदनगर में इनका मृत्यु हुआ। वहां अनेक प्रकारके मसालोंमें इनका मृतदेह रचित किया गया। पोछे इलोरा और गोदावरी के विकट रोला नामक स्थान में यह समाहित हुये। कहते हैं. इन्होंने एक प्रकारको दापी बनाई घो उसोको विक से इनके सम्माधिका व्यय निर्वाह किया गया।<noinclude></noinclude> tqsbi92joib40z0mqmzyg4us1l81hc9 668142 668141 2026-07-18T18:41:13Z आदेश यादव 3609 668142 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh|५७४|औरङ्गजेब|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अपव्ययी रहे। परन्तु औरङ्गजे, बमें ऐसे दोष न थे । सचराचर यह सामान्य वस्त्र पहनकर रहते । विवाह आदि उत्सव के सिवा अनर्थक नाच तमाशेमें इनका पर्यटन होता था। भारतवर्ष नाना इन्होंने स्थानों में पथिकोंके लिये श्राश्रम बनवा दिये। उन आश्रमों में भोजनको सामग्री भी सचित रहतो थो। प्रजामात्र सम्राट के पास जा सकती थी । विश्वागलय में यदि किसोपर अन्याय होता, तो वह स्वयं सम्म्राट् से जाकर कह देता। इसलिये विचारपति घस न ले सकते थे। देखने में सम्राट पुरुष न थे, परन्तु अतिशय मिष्ट भाषी रहे । नित्य प्रातःकाल उठ यह स्नान आह्निक करते थे। उसके बाद एक प्रहरतक राजकाज संभालते । एक प्रचरके बाद भोजनका समय निर्दिष्ट था। भोजनके बाद औरङ्गजेब हाथी, घोड़ा और बाघ पादिको लड़ाई देखते यही इनका पाद प्रमोद था। वाद-प्रमोद के बाद दीवान - श्राममें बैठ यह सभा करते थे। इसी समय अमीर उमरा और विदेश के राजदूत पादि पाकर इनसे मिल जाते । शुक्रवारको दरबार बन्द रहता था। ईसाइयों के लिये जैसे रविवार मुसलमानो के लिये पैसे हो शुक्रवार है। इससे सम्राट शुक्रवार के दिन कामे काज न देखते थे । प्रायः सम्राटोंका अन्तःपुर असंख्य रूपवती रमणियों से परिपूर्ण रहता है । औरङ्गजेब के अन्तःपुर में भी अनेक दासियाँ थीं । परन्तु वे सब केवल राजप्रासादको गोमाके लिये हो रहीं। फलत: विवाहिता य वह कभी दूसरी स्त्रीका मुंह न देखते थे। अतएव ओरङ्गजेबका गुणराशि दोषके ठोक विपरीत था । एक घोर पूर्णचन्द्रको हिमधारासनी ज्योत्स्ना के सौन्दर्य से हृदय बोतल रहता, दूसरो चोर अमावस्याका निविड़ अन्धकार - नि, रताका कठिन हस्त देखने से प्राण कांप उठता था। जो हो, इनका दुखरित हो मोगल साम्राज्य के पतनका प्रधान कारण है । प्रजा असन्तुष्ट होनेसे राजा नहीं रहता, {{Multicol-break}} इन्द्रका इन्द्रत्व भी डोल उठता- कुटिल राजनीति एवं वल मिष्या है। ओरङ्गजेब अपनी गठता छिपानेके लिये सबको प्यार करते थे। पहले जो लोग इनके विरोधो रहे उनके साथ भी यह खेर थे । परन्तु लोग समझ गये - यन्त्र कौशल भिन्न और कुछ नहीं है। इसलिये हिन्दुत्रोंको कौन कहे, मुसलमान भी मन ही मन इनके शत्रु थे । खलके' प्रेममें पढ़ना काले सपिके साथ रहने के समान है, विपद श्रा जाने में देर नहीं लगती। यह तो हुई साधारण लोगोंको बात! हिन्दू इनके अत्यन्त विरक्त हो गये थे । यह हिन्दुको मुसलमान बनानेके लिये उत्पीड़न करते थे। इससे जिन राजपूत बोरोंके बाहुवलसे तैमूरवंशको इतनी प्रतिपत्ति हुई थो, अन्त में उन लोगोंने भो सम्राट्को छोड़ दिया । औरङ्गजे, बको वृद्धावस्था में जब चारो घोर विश्र्व उपस्थित था, तो उस दुःसमय में किसीने इनकी घोर न देखा। उधर महाराष्ट्र देश में शिवाजी म के भीतर अग्निस्फ ुलिङको क्रमसे प्रभूमित होकर उन्होंने काला कुण्ड जला दिया, मोगल साम्राज्यका मीतक कांप उठा! चौरङ्गजे, बका उतना तेज, उतना उद्यम, - फिर कुछ भी न रहा । वह व्यन्त दोषथिया बुझने लगी । इन्होंने पहले जो दुष्कर्म किये थे, उन्हों पापोंके कारण हृदय सत्रों विच्चोंके काटनेको ज्वाला उठ खड़ी हुई। यह लोगोंड सामने अपना मुंहतक दिखा न सके । क्रमसे अनु- तापनें जो किट पर जरजर हो पापी माय पचभूत शरोरसे निकल गये। अन्तिम अवस्था में औरङ्गजेब प्रायः दाक्षिणात्य प्रदेश से रहते थे। अहमदनगर में इनका मृत्यु हुआ। वहां अनेक प्रकारके मसालोंमें इनका मृतदेह रचित किया गया। पोछे इलोरा और गोदावरी के विकट रोला नामक स्थान में यह समाहित हुये। कहते हैं. इन्होंने एक प्रकारको दापी बनाई घो उसोको विक से इनके सम्माधिका व्यय निर्वाह किया गया।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> gd8j90hsnxoneqxgpf3v3t3y8int78m 668143 668142 2026-07-18T18:41:52Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 668143 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५७४|औरङ्गजेब|}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अपव्ययी रहे। परन्तु औरङ्गजे, बमें ऐसे दोष न थे । सचराचर यह सामान्य वस्त्र पहनकर रहते । विवाह आदि उत्सव के सिवा अनर्थक नाच तमाशेमें इनका पर्यटन होता था। भारतवर्ष नाना इन्होंने स्थानों में पथिकोंके लिये श्राश्रम बनवा दिये। उन आश्रमों में भोजनको सामग्री भी सचित रहतो थो। प्रजामात्र सम्राट के पास जा सकती थी । विश्वागलय में यदि किसोपर अन्याय होता, तो वह स्वयं सम्म्राट् से जाकर कह देता। इसलिये विचारपति घस न ले सकते थे। देखने में सम्राट पुरुष न थे, परन्तु अतिशय मिष्ट भाषी रहे । नित्य प्रातःकाल उठ यह स्नान आह्निक करते थे। उसके बाद एक प्रहरतक राजकाज संभालते । एक प्रचरके बाद भोजनका समय निर्दिष्ट था। भोजनके बाद औरङ्गजेब हाथी, घोड़ा और बाघ पादिको लड़ाई देखते यही इनका पाद प्रमोद था। वाद-प्रमोद के बाद दीवान-आममें बैठ यह सभा करते थे। इसी समय अमीर उमरा और विदेश के राजदूत पादि पाकर इनसे मिल जाते। शुक्रवारको दरबार बन्द रहता था। ईसाइयों के लिये जैसे रविवार मुसलमानो के लिये पैसे हो शुक्रवार है। इससे सम्राट शुक्रवार के दिन कामे काज न देखते थे । प्रायः सम्राटोंका अन्तःपुर असंख्य रूपवती रमणियों से परिपूर्ण रहता है । औरङ्गजेब के अन्तःपुर में भी अनेक दासियाँ थीं । परन्तु वे सब केवल राजप्रासादको गोमाके लिये हो रहीं। फलत: विवाहिता य वह कभी दूसरी स्त्रीका मुंह न देखते थे। अतएव ओरङ्गजेबका गुणराशि दोषके ठोक विपरीत था । एक घोर पूर्णचन्द्रको हिमधारासनी ज्योत्स्ना के सौन्दर्य से हृदय बोतल रहता, दूसरो चोर अमावस्याका निविड़ अन्धकार - नि, रताका कठिन हस्त देखने से प्राण कांप उठता था। जो हो, इनका दुखरित हो मोगल साम्राज्य के पतनका प्रधान कारण है । प्रजा असन्तुष्ट होनेसे राजा नहीं रहता, {{Multicol-break}} इन्द्रका इन्द्रत्व भी डोल उठता- कुटिल राजनीति एवं वल मिष्या है। ओरङ्गजेब अपनी गठता छिपानेके लिये सबको प्यार करते थे। पहले जो लोग इनके विरोधो रहे उनके साथ भी यह खेर थे । परन्तु लोग समझ गये - यन्त्र कौशल भिन्न और कुछ नहीं है। इसलिये हिन्दुत्रोंको कौन कहे, मुसलमान भी मन ही मन इनके शत्रु थे । खलके' प्रेममें पढ़ना काले सपिके साथ रहने के समान है, विपद श्रा जाने में देर नहीं लगती। यह तो हुई साधारण लोगोंको बात! हिन्दू इनके अत्यन्त विरक्त हो गये थे । यह हिन्दुको मुसलमान बनानेके लिये उत्पीड़न करते थे। इससे जिन राजपूत बोरोंके बाहुवलसे तैमूरवंशको इतनी प्रतिपत्ति हुई थो, अन्त में उन लोगोंने भो सम्राट्को छोड़ दिया । औरङ्गजे, बको वृद्धावस्था में जब चारो घोर विश्र्व उपस्थित था, तो उस दुःसमय में किसीने इनकी घोर न देखा। उधर महाराष्ट्र देश में शिवाजी म के भीतर अग्निस्फ ुलिङको क्रमसे प्रभूमित होकर उन्होंने काला कुण्ड जला दिया, मोगल साम्राज्यका मीतक कांप उठा! चौरङ्गजे, बका उतना तेज, उतना उद्यम, - फिर कुछ भी न रहा । वह व्यन्त दोषथिया बुझने लगी । इन्होंने पहले जो दुष्कर्म किये थे, उन्हों पापोंके कारण हृदय सत्रों विच्चोंके काटनेको ज्वाला उठ खड़ी हुई। यह लोगोंड सामने अपना मुंहतक दिखा न सके । क्रमसे अनु- तापनें जो किट पर जरजर हो पापी माय पचभूत शरोरसे निकल गये। अन्तिम अवस्था में औरङ्गजेब प्रायः दाक्षिणात्य प्रदेश से रहते थे। अहमदनगर में इनका मृत्यु हुआ। वहां अनेक प्रकारके मसालोंमें इनका मृतदेह रचित किया गया। पोछे इलोरा और गोदावरी के विकट रोला नामक स्थान में यह समाहित हुये। कहते हैं. इन्होंने एक प्रकारको दापी बनाई घो उसोको विक से इनके सम्माधिका व्यय निर्वाह किया गया।<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 2zqc9jpfqdpw7cycgm1rfztmyctdh3b पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५७६ 250 76388 668146 609308 2026-07-18T18:51:29Z आदेश यादव 3609 668146 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Sujata phillip" />{{rh||औरङ्गाबाद—औरत|५७५}}</noinclude>औरङ्गाबाद-१ दक्षिणात्यके हैदरावाद राज्यका एक नगर । यह अचा० १८ ५४ उ० तथा देशा० ८५° २२ ० पर कोम नदी किनारे अवस्थित है। नांद- गांव रेलवे मन 14 माल पड़ता है। १५१० को बोसोनिया के मलिक अम्बर या मोदी अम्बरने इसे बसाया था । अनेक भवनांका ध्वंसावशेष पड़ा है । औरंगजेबका बनाया प्रासाद बिलकुल टूटफूट गया है। नगरको चारों पार दोवार उठी है। पहले इसका नाम 'किरको' रहा। चौरंगी को प्यारो बोबोका म ति मन्दिर सागरके ताजमहल से मिलता जुलता है। नगरसे२ मोल पथिम 'हरसूल' ग्रामका ध्वंसावशेष है। राह में औरंगजेब द्वारा यात्रियों के लिये बनाया पत्थरका एक मकान् खड़ा है। औरंगा- बादसे पूर्व कुछ दूर अरमेनियाके लोगों को ५० कब्र जनी हैं। शिलालेख यहदो भाषामे हैं। नगरसे १४ मोल दूर रोजामें मलिक अम्बरको कम और १ मोल पश्चिम छावनी है। फिर २ मोल उत्तर १३ गुफा हैं । उनमें दो बौद्ध गुफा समझ पड़ती हैं। पहले यह नगर व्यवसायका केन्द्र रहा, किन्तु हैदरा- राजधानी होनेसे वह महत्व घट गया। फिर भी गेहूं, रूई, कपड़े और लोहेलंगड़का काम खूब होता है। २ युक्तप्रदेश के खेरौ जिलेका एक परगना । क्षेत्रफल २१ वर्ग मील है। सोलापुरसे मानपुर जानेवाल को सड़क पर में पड़ीं है। पूर्व सोमावर इस- कवना धीर पंथिम सोमावर गोमती नदी बहती है। ३ युक्त प्रदेशके खेरौ जिलेका एक नगर । अचा॰ २८° ४८´ उ० तथा देशा० ८३ २८ पू० पर सीतापुर २८ मोल दूर अवस्थित है। से हो नामपर इसका नामकरण हुआ। नवाब सैयद रमने औरंगाबाद बसाया था। डे फटे महल में बाज भी सेयद खु. रसके वंशज रहते हैं । किला विलकुल बिगड़ गया है। कहीं कहों दीवारें खड़ी हैं। पहले से गोगरे तक सेयद राज्य करते थे। किन्तु गौर क्षत्रियोंने उन्हें परास्त कर नोचा -देखाया। मुसलमान हो यहां बड़े जमोन्दार हैं। ४ युक्त प्रदेश के सीतापुर जिलेका एक परगना । क्षेत्रफल ६० वर्ग मीन है। दक्षिण और पश्चिम सीमापर गोमती नदी बहती है। मुसलमानों को जमीन्दारी बहुत है। औरंगजेब से पहले पंवार राजपूतोंका अधिकार रहते भी अब कोई बड़ा राजपूत- जमीन्दार देख नहीं पड़ता । ५ युक्तप्रदेश के सोलापुर जिलेका एक नगर । बहादुर वेगको श्रीरंगज़ ेबने यहां जागोर दो थो " इससे नगरका नाम औरंगाबाद पड़ा। उनके वंशज ताल ुकदार कहाते हैं । सप्ताह में दो बार बड़ा बाज़ार लगता है। कई और नमकका काम होता है जलवायु स्वास्थ्यकर और भूमि उवंश है। ६ विहार प्रान्त के गया जिलेको एक सहसोच यह श्रच्चा० २४° २८´ एवं २५० ८ ३० उ० और देशा० ८४° २ ३०” तथा ८४° ४६ ३० पू० पर स्थित है। १२४६ वर्ग मील है। इसमें चौरंगाबाद, दाऊदनगर और नवीनगरको पुलिसका थाना लगता है। ७ विहार प्रान्त के गया जिलेका एक ग्राम। यह अक्षा० २४° ४५ ६” उ० और देवा० ८४० २५ २ पर स्थित है व सरकारी मकान्, एक न औषधालय और कैदखाना बना है। अनाज, तेलहन, चमड़े, गो, बत्ती, कपड़े, मसाले, मोके तेल और नमकका काम होता है। चोराबाद सेवदयुत प्रदेश बुलन्दशहर जिलेका एक नगर । यह बुलन्दशहर नगरसे १० मौल उत्तर- पश्चिम अवस्थित है। डाकखाना, स्कूल और बाजार मौजूद है। औरंगजेबको आज्ञा से संयद अबदुल अज़ीजने उदण्ड जरोलियों का दवा यह नगर बसाया था। इससे प्रारङ्गजे, बके नामपर प्रौ ड्राबाद कहाया । सेयद अवदुत भोजन पात्र भो वह नगर और १५ दूसरे ग्राम अपने अधिकारमें रखते हैं। सैयद पचदुल को अपर हरनाल मेला लगता है। कब्रपर नगरको चारा घोर तालाब भरे हैं। औरत (अ॰ स्त्री॰) १ स्त्री,‌ लोगाई। {{smaller|"औरतपर हाथ उठाना अच्छा नहीं।"(लोकोक्ति)}} २ पत्नी, बीवी, जोड़ू।<noinclude></noinclude> 4bsfp8hsqew7l2ezzhos7zwrhiqcb4q 668148 668146 2026-07-18T18:52:54Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 668148 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||औरङ्गाबाद—औरत|५७५}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>औरङ्गाबाद—१ दक्षिणात्यके हैदरावाद राज्यका एक नगर । यह अचा० १८ ५४ उ० तथा देशा० ८५° २२ ० पर कोम नदी किनारे अवस्थित है। नांद- गांव रेलवे मन 14 माल पड़ता है। १५१० को बोसोनिया के मलिक अम्बर या मोदी अम्बरने इसे बसाया था । अनेक भवनांका ध्वंसावशेष पड़ा है । औरंगजेबका बनाया प्रासाद बिलकुल टूटफूट गया है। नगरको चारों पार दोवार उठी है। पहले इसका नाम 'किरको' रहा। चौरंगी को प्यारो बोबोका म ति मन्दिर सागरके ताजमहल से मिलता जुलता है। नगरसे२ मोल पथिम 'हरसूल' ग्रामका ध्वंसावशेष है। राह में औरंगजेब द्वारा यात्रियों के लिये बनाया पत्थरका एक मकान् खड़ा है। औरंगा- बादसे पूर्व कुछ दूर अरमेनियाके लोगों को ५० कब्र जनी हैं। शिलालेख यहदो भाषामे हैं। नगरसे १४ मोल दूर रोजामें मलिक अम्बरको कम और १ मोल पश्चिम छावनी है। फिर २ मोल उत्तर १३ गुफा हैं । उनमें दो बौद्ध गुफा समझ पड़ती हैं। पहले यह नगर व्यवसायका केन्द्र रहा, किन्तु हैदरा- राजधानी होनेसे वह महत्व घट गया। फिर भी गेहूं, रूई, कपड़े और लोहेलंगड़का काम खूब होता है। २ युक्तप्रदेश के खेरौ जिलेका एक परगना । क्षेत्रफल २१ वर्ग मील है। सोलापुरसे मानपुर जानेवाल को सड़क पर में पड़ीं है। पूर्व सोमावर इस- कवना धीर पंथिम सोमावर गोमती नदी बहती है। ३ युक्त प्रदेशके खेरौ जिलेका एक नगर । अचा॰ २८° ४८´ उ० तथा देशा० ८३ २८ पू० पर सीतापुर २८ मोल दूर अवस्थित है। से हो नामपर इसका नामकरण हुआ। नवाब सैयद रमने औरंगाबाद बसाया था। डे फटे महल में बाज भी सेयद खु. रसके वंशज रहते हैं । किला विलकुल बिगड़ गया है। कहीं कहों दीवारें खड़ी हैं। पहले से गोगरे तक सेयद राज्य करते थे। किन्तु गौर क्षत्रियोंने उन्हें परास्त कर नोचा -देखाया। मुसलमान हो यहां बड़े जमोन्दार हैं। {{Multicol-break}} ४ युक्त प्रदेश के सीतापुर जिलेका एक परगना । क्षेत्रफल ६० वर्ग मीन है। दक्षिण और पश्चिम सीमापर गोमती नदी बहती है। मुसलमानों को जमीन्दारी बहुत है। औरंगजेब से पहले पंवार राजपूतोंका अधिकार रहते भी अब कोई बड़ा राजपूत- जमीन्दार देख नहीं पड़ता । ५ युक्तप्रदेश के सोलापुर जिलेका एक नगर । बहादुर वेगको श्रीरंगज़ ेबने यहां जागोर दो थो " इससे नगरका नाम औरंगाबाद पड़ा। उनके वंशज ताल ुकदार कहाते हैं । सप्ताह में दो बार बड़ा बाज़ार लगता है। कई और नमकका काम होता है जलवायु स्वास्थ्यकर और भूमि उवंश है। ६ विहार प्रान्त के गया जिलेको एक सहसोच यह श्रच्चा० २४° २८´ एवं २५० ८ ३० उ० और देशा० ८४° २ ३०” तथा ८४° ४६ ३० पू० पर स्थित है। १२४६ वर्ग मील है। इसमें चौरंगाबाद, दाऊदनगर और नवीनगरको पुलिसका थाना लगता है। ७ विहार प्रान्त के गया जिलेका एक ग्राम। यह अक्षा० २४° ४५ ६” उ० और देवा० ८४० २५ २ पर स्थित है व सरकारी मकान्, 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किया। किन्तु उस जगह शायस्ता खांका गुप्तचर उपस्थित था। उसने शायस्ताखां से जाकर पत्रको बात कह दो, परन्तु उसमें जो लिखा था, सो बता न सका । इसके पहले बादशाहने शायस्ताखांक प्राणदखको श्राज्ञा दो यो उसो क्रोध में उन्होंने कई घुड़सवार भेज चुप- चाप नसीरुहोनकी पकड़ मंगाया पत्र पढ़कर देखा गया, तो उसमें रबको बात निकसो शीघ्र ही इनके डेरेमें आकर उन्होंने इन्हें खत दे दिया । औरङ्गजेब स्थिर चित्तके साथ उस पत्रको आदिसे अन्तक पढ़ गये, परन्तु बोले कुछ भी नहीं; केवल मको एक गुप्त स्थानमें छिपा रखा। भेंट करनेका दिन आया। ससैन्य दारा आ पहु- चते-कों में नहीं आये। श्ररङ्गजेब भी मुला- कात करने न गये। इन्होंने सम्राट्को यह पत्र लिखा, “ श्राप जानते हैं, कि मैं अपराधी हूं। अप- राधी मनमैं सदा भय चोर सन्देह रहता है। इससे सहसा पाप में पाया होती है। अतएव पहले कुछ शरीररक्षकोंके साथ अपने लड़के मुहम्मदको आपके पास मेजूंगा। वहां जाकर जब मुहम्मद मेरे पास यह समाचार भेजेगा, कि किले में एक भी हथियारबन्द सिपाही नहीं है, सब में आपके पास आनेका साहस कर सकूंगा ।" पत्र पाकर शाहजहां बड़ौ देरतक सोचते रहे। बोच विचारवर बजे प्रस्तावपर हो सात हुए। परन्तु दुष्ट सन्तानको गिरफ़ार करना उचित था । इसलिये किले में स्थान स्थानपर कुछ अस्त्रधारी सिपाहियोंको बादशाहने छिपा रखा। इसके सिवा उनके अन्तःपुरमें कई तातारी बांदियां थीं। वे सब वीरमहिला थीं। सम्राट ने उन्हें भी अस्त्र-शस्त्र दे तय्यार कर रखा। घर पर बने लड़के को सब बात सिखा पढ़ाकर शाहजहांके पास भेज दिया। किलेमें जाकर मुहम्मद एकबार चारो ओर देख आये, परन्तु कहीं कोई न देख पड़ा। हरमके पास जाकर देखा, तो वहां Vol. III. 143 बहुत से अस्त्रधागे सिपाहियोंको छिपा पाया । उन्होंने बादशाह से साफ हो कह दिया, "इन बाद मियोंको देखकर मुझे सन्देह होता है। ये लोग कहेंगे तो बना सकेंगे।" शाहजहांके शिरपर दुर्मति सवार हुई। उन्होंने उन लोगों को भी कि.ले से बाहर कर दिया। मुहम्मदने देखा - चारो अब किले में बादमात्रसे और साफ हो गया है, हमारे दम है। श्री जे. चके पास समाचार गया । शीघ्र ही पादमोन वापस आकर कहा- शाहजादा तब्बार पाकर मुलाकात करेंगे सबट उनको प्रतोचा में रहे। घोड़े पर सवार होकर चोर जेब अपने शरीररक्षकों और पारिषदों को साथ लिये एकवार किले की तरफ चावे; कुछ दूर चकवरको कनको ओर चले गये। यह सुन शाहजहांने क्रोधके साथ मुहम्मद से कहा, "जब तुम्हारे पिता ही यहां न भावेंगे, तो तुम यहां क्या करने आये हो ?" इसपर मुहम्मद विनोतभाव से उत्तर दिया, - " महाशय ! में किलेा भार चापलेने पाया है। मु माच्छारको चाबो दोजिये सम्राटने देवा- अपने फन्दे में में पाप हो फंस गया है. अब और कोई उपाय नहीं । लाचार मुहमद के हाथमें चाि याँका गुच्छा फेंक दिया। पिताको कदकर औरङ्गजे बने मुरादसे कहा,- “इतने दिनों मेरा अभिलाष पूर्व हु आजसे तुम दिल्लीके सम्राट हुए। अब मेरो यही भिचा है, तुम मुझे कुछ धन दो । मक जाकर में सुखचैन दिन बिताओं" मुराद इस बातपर राजी हो गये। बाहरमें तो ऐसो धर्मनिष्ठा, परन्तु अन्तःकरण में इलाइल भरा था । यह मन ही मन मुराद के विनाश करनेको चेष्टा करने लगे। इसी दोष समाचार पाया दाराने दिवानें बहुत सो में सेना इकट्ठो को है, शीघ्र हो भागरे आकर को सूत्र करेंगे। सुरादको साथ ले रह जेब वह दिलोको चोर चले। दोनों पादमो<noinclude></noinclude> 1s9h98xes1mjcv2rihpn2al192jf7eg 668126 668125 2026-07-18T17:57:20Z आदेश यादव 3609 /* शोधित */ 668126 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||औरङ्गजेब|५६९}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>सम्राट्ने नसीरुद्दीन नामक किसी विश्वासो नौकरकों ! पत्र सौंप विदा किया। किन्तु उस जगह शायस्ता खांका गुप्तचर उपस्थित था। उसने शायस्ताखां से जाकर पत्रको बात कह दो, परन्तु उसमें जो लिखा था, सो बता न सका । इसके पहले बादशाहने शायस्ताखांक प्राणदखको श्राज्ञा दो यो उसो क्रोध में उन्होंने कई घुड़सवार भेज चुप- चाप नसीरुहोनकी पकड़ मंगाया पत्र पढ़कर देखा गया, तो उसमें रबको बात निकसो शीघ्र ही इनके डेरेमें आकर उन्होंने इन्हें खत दे दिया । औरङ्गजेब स्थिर चित्तके साथ उस पत्रको आदिसे अन्तक पढ़ गये, परन्तु बोले कुछ भी नहीं; केवल मको एक गुप्त स्थानमें छिपा रखा। भेंट करनेका दिन आया। ससैन्य दारा आ पहु- चते-कों में नहीं आये। श्ररङ्गजेब भी मुला- कात करने न गये। इन्होंने सम्राट्को यह पत्र लिखा, “ श्राप जानते हैं, कि मैं अपराधी हूं। अप- राधी मनमैं सदा भय चोर सन्देह रहता है। इससे सहसा पाप में पाया होती है। अतएव पहले कुछ शरीररक्षकोंके साथ अपने लड़के मुहम्मदको आपके पास मेजूंगा। वहां जाकर जब मुहम्मद मेरे पास यह समाचार भेजेगा, कि किले में एक भी हथियारबन्द सिपाही नहीं है, सब में आपके पास आनेका साहस कर सकूंगा ।" पत्र पाकर शाहजहां बड़ौ देरतक सोचते रहे। बोच विचारवर बजे प्रस्तावपर हो सात हुए। परन्तु दुष्ट सन्तानको गिरफ़ार करना उचित था । इसलिये किले में स्थान स्थानपर कुछ अस्त्रधारी सिपाहियोंको बादशाहने छिपा रखा। इसके सिवा उनके अन्तःपुरमें कई तातारी बांदियां थीं। वे सब वीरमहिला थीं। सम्राट ने उन्हें भी अस्त्र-शस्त्र दे तय्यार कर रखा। घर पर बने लड़के को सब बात सिखा पढ़ाकर शाहजहांके पास भेज दिया। किलेमें जाकर मुहम्मद एकबार चारो ओर देख आये, परन्तु कहीं कोई न देख पड़ा। हरमके पास जाकर देखा, तो वहां {{left|Vol. III. 143}}{{Multicol-break}} बहुत से अस्त्रधागे सिपाहियोंको छिपा पाया । उन्होंने बादशाह से साफ हो कह दिया, "इन बाद मियोंको देखकर मुझे सन्देह होता है। ये लोग कहेंगे तो बना सकेंगे।" शाहजहांके शिरपर दुर्मति सवार हुई। उन्होंने उन लोगों को भी कि.ले से बाहर कर दिया। मुहम्मदने देखा - चारो अब किले में बादमात्रसे और साफ हो गया है, हमारे दम है। श्री जे. चके पास समाचार गया । शीघ्र ही पादमोन वापस आकर कहा- शाहजादा तब्बार पाकर मुलाकात करेंगे सबट उनको प्रतोचा में रहे। घोड़े पर सवार होकर चोर जेब अपने शरीररक्षकों और पारिषदों को साथ लिये एकवार किले की तरफ चावे; कुछ दूर चकवरको कनको ओर चले गये। यह सुन शाहजहांने क्रोधके साथ मुहम्मद से कहा, "जब तुम्हारे पिता ही यहां न भावेंगे, तो तुम यहां क्या करने आये हो ?" इसपर मुहम्मद विनोतभाव से उत्तर दिया, - " महाशय ! में किलेा भार चापलेने पाया है। मु माच्छारको चाबो दोजिये सम्राटने देवा- अपने फन्दे में में पाप हो फंस गया है. अब और कोई उपाय नहीं । लाचार मुहमद के हाथमें चाि याँका गुच्छा फेंक दिया। पिताको कदकर औरङ्गजे बने मुरादसे कहा,- “इतने दिनों मेरा अभिलाष पूर्व हु आजसे तुम दिल्लीके सम्राट हुए। अब मेरो यही भिचा है, तुम मुझे कुछ धन दो । मक जाकर में सुखचैन दिन बिताओं" मुराद इस बातपर राजी हो गये। बाहरमें तो ऐसो धर्मनिष्ठा, परन्तु अन्तःकरण में इलाइल भरा था । यह मन ही मन मुराद के विनाश करनेको चेष्टा करने लगे। इसी दोष समाचार पाया दाराने दिवानें बहुत सो में सेना इकट्ठो को है, शीघ्र हो भागरे आकर को सूत्र करेंगे। सुरादको साथ ले रह जेब वह दिलोको चोर चले। दोनों पादमो<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> nb8fectj7ecp941ywidmr5prokqnphw पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२१७ 250 83406 668107 668078 2026-07-18T14:17:58Z Shivaniya shaw 4129 668107 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh||'''अज्ञातशोल-अनंच्ल'''|'''२११'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>अज्ञातशील ( सं० त्रि० ) जिसको चाल मालूम न हो, बेजाने चालचलनवाला । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अज्यू (वै० त्रि० ) १ खेतका । २ मैदानवाला । अज्विन् (सं० त्रि० ) तेज़, चालाक । अज्ञात (सं० पु० ) असम्बन्धीय पुरुष, बेरिश्ता अमर (हिं० वि०) न भरनेवाला, और नाता ।}} पतनशून्य, न बरसनेवाला । १ विना अभोरो (हिं० स्त्री० ) थैली, अधारी । अञ्चक(सं० क्क़ी ० ) नेत्र, आंख । अज्ञान ( सं० त्रि०) नास्ति ज्ञानं यस्य । ज्ञानका, बेवकूफ । ( क्लो० ) न ज्ञानम् । २ ज्ञाना- भाव, बेवकूफी । ३ विरुद्ध ज्ञान, उलटी समझ । श्रीमद्भागवतके मतसे सृष्टिकाल में ब्रह्माने पांच प्रकारके अज्ञानोंको कल्पना की थी । यथा - तमः, मोह, महामोह, तामिश्र और अन्धतामिश्र । वेदान्त- मतसे सत् और असत् समझने के लिये जो त्रिगुणा- भावरूप ज्ञान है, उसके विरोधीको अज्ञान त्मक कहते हैं । अज्ञानकृत (सं० त्रि०) बेजाने किया गया । अज्ञानतस्, अज्ञानात् (सं० अव्य० ) बेजाने-समझे, विना विचारे । अज्ञानता (सं० स्त्री०) बेवक फो, मूर्खता; लाइल्मी, हिमाकत, बेसमझी। अज्ञानपन ( हिं० पु० ) बेवकूफौ, मूर्खता । अज्ञानवन्धन (स ं० क्लो० ) मूर्खताका हिमाकतको जकड़ । बंधाव, `अज्ञानिन्, अज्ञानी ( सं० त्रि० ) मूर्ख, बेवकूफ । ) असम्बन्धीय पुरुष, जो रिश्तेदार अज्ञास् (वै० पु० न हो । अज्ञेय (सं० त्रि. ) ज्ञानके अयोग्य, अक्ल से बाहर । अज्म (वै० पु० ) जङ्ग, युद्ध | 'अज्मन् (सं० स्त्री० ) अजति गच्छति स्वर्ग दानेन अनया, अज्-मनिन् करणे । जिसे दानकर लोग स्वर्ग जाते हैं ; गो, गाय । अज्यानि (वै० स्त्री० ) नष्ट न होनेवाली प्रकृति । अज्येष्ठ ( स ं० त्रि० ) बड़ा या बुजुर्ग नहीं । ज्येष्ठवृत्ति (सं० त्रि०) जिसका स्वभाव बड़ोंकासा न हो । 'अज्यों-जौं' देखो। अज्र (वै० पु० ) १ खेत । २ मैदान । (त्रि०) ३ तेज, चालाक । {{outdent|अञ्चति (सं० पु० -क्ली०) अनच्-अति । अच को वा । उय् ४।६१| १ वायु, हवा । (त्रि०) २ गतिशील, चलनेवाला ।}} {{outdent|अञ्चल (सं० पु० ) अञ्च- अलच् । आंचल, प्रान्तभाग, दामन । कपड़ेकौ जिस ओर बेल-बूटे और किनारीका अधिक सौन्दर्य रहता, उसे आंचल या अंचला कहते हैं। इस देशको स्त्रियोंके वस्त्रों में ही आंचल होता है। पुरुषोंके वस्त्रोंका भी प्रान्तभाग है, परन्तु उसे चल नहीं कहते । est गृहिणी स्त्रियोंके चल लथेरते-लघेरते चलनेको बड़ा कुलक्षण समझती हैं । स्त्रियोंको ऐसा विश्वास है, कि भूतप्रेतादि कपड़े का आंचल पकड़ शरीरमें प्रवेश करते हैं ।}} अञ्चलका अपभ्रंश आंचल या अंचला है। प्रतिमाको सज्जित करते समय जो डङ्गका गहना देवीको छातीपर लटका दिया जाता, उसे भी प्रांचल कहते हैं । नया कपड़ा जब कितनी हो उड़िया, बङ्गाली और विहारी स्त्रियां पहनतीं, तब अचलका एक कोना हलदोसे रंग लेतीं और आंचलका कुछ सूत खोल और टुकड़े-टुकड़े कर कांटे, खोंचे, चोर और अग्नि प्रभृतिको समर्पण करती हैं । इसका तात्पर्य यह है, कि कांटा प्रभृति समस्त शत्रुओंका अंश दिया गया, इस- लिये आगे कोई अनिष्ट न करेगा। जब भाग दे दिया गया, तब कांटा उसे क्यों छेदेगा या अग्नि ही उसे क्यों जलायेगी ? कोई बात मनमें बनाई रखनेके लिये स्त्रियां आंचल के एक कोने में गांठ लगा देती हैं । बालकोंके माथे में कपड़े का आंचल लगने- से अकल्याण होता है । इसलिये हठात् किसी शिशुके माथेमें आंचल छू जानेसे एकबार उसे मट्टोमें लथेरना पड़ता, जिससे सब दोष दूर हो जाता है । विवाहमें कन्याका आंचल और वरका दुपट्टा गांठ देकर जोड़ दिया जाता है ।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> bpv5yacke6yxaomi4tjvlrjodv0qyb6 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२१८ 250 83407 668108 346720 2026-07-18T14:35:15Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 668108 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''२१२'''|'''अञ्चित — अञ्जन'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude> {{outdent| अञ्चित (सं० त्रि०) अञ्चु-क्त।<small>अञ्चेः पूजायाम्। पा ७।२।५३।</small> १ पूजित, पूजा गया। २ आकुञ्चित, सिकुड़ा हुआ।}} {{outdent| अञ्चितभ्रू (सं० स्त्री०) अञ्चिते कुटिले भ्रुवौ यस्याः। सुन्दरभ्रूयुक्त नारी, टेढ़ी भौंहों वाली स्त्री। }} {{outdent| अञ्जक (सं० पु०) १ यदु के पुत्र। २ विप्रचित्त के पुत्र। }} {{outdent| अञ्जन (सं० क्ली०) अज्यतेऽनेन, अञ्ज-ल्युट् करणे। १ काजल। २ सुरमा। अञ्जन सौवीर, जाम्बद, तुत्थ, मयूर, श्रीकर, दर्विका और मेघनील—छः तरह का होता है। }} {{c|{{x-smaller|<poem>"सौवीरं जाम्बदं तुत्थं मयूरं श्रीकरं तथा। दर्विका मेघनीलञ्च अञ्जनानि भवन्ति षट्॥ सवद्गदन्तु सौवीरं जाम्बदं प्रस्तरं तथा। मयूरं श्रीकरं रत्नं मेघनीलञ्च तैजसम्॥ घृततैलादियोगेन ताम्रादौ दीपवर्त्तिना। यदञ्जनं जायते तु दर्विका परिकीर्त्तिता॥"</poem>}}}} {{Right|<small>( कालिका-पुराण। )</small>}} अज्ञ्जनमें अनेक गुण होते और यह कितने ही रोगोंको दूर करता है । भावप्रकाश में लिखा है, - {{Block center|{{x-smaller|<poem>"श्रथाञ्जनं शुद्धतनी मात्राश्रये मले । पक्कलिङ्गेऽल्प शोथार्ति कण्डूपैच्छित्य लचिते ॥ मन्दघर्षाश्रु रोगेऽक्षिण प्रयोज्यं घनदूषिके । लेखनं रोपणं दृष्टिप्रसादनमिति विधा ।। अञ्जनं लेखनं तत्र कषायान्त्रकटूषणैः । रोपणं तिक्तकैर्द्रव्यैः स्वादृशीतैः प्रसादनं ॥ दशाङ्गुला तनुर्भध्ये शलाका मुकुलानना । प्रशस्ता लेखने ताम्र रोपणे काल लोहजा ॥ अङ्गुलाव वर्णीत्या रूप्यजा च प्रसादने । पिण्डी रसक्रिया चूर्णं विधेवाञ्जन कल्पना ॥ गुरौ मध्ये लघौ रोषे तां क्रमेण प्रयोजयेत् । अधानुन्मौलयन् दृष्टो अन्तःसञ्चारयेच्छनैः ॥ श्रञ्जिते वर्त्म नौ किञ्चित् चालयेच वमञ्जनं । अपेतौषध सम्बन्धं निर्हतं नयनं यदा ॥ व्याधि दोषन्तु योग्याभिरह्निः प्रचालयेत्तदा । दक्षिणाङ्गुष्ठकेनाचि ततोकामं सवाससा ॥ ङ्घ वर्त्मनि संग्टह्य शोध्य वामे न चेतरत् । निशि खनन मध्याहपानान्नी ष्णागतस्त्रिभिः ॥</poem>}}}} {{Multicol-break}} {{Block center|{{x-smaller|<poem>अक्षि रोगाय दोषाः स्युर्वैर्द्दितोत्पीड़ित द्रुताः । प्रातः सायञ्च तच्छान्तेरभकेऽतोऽञ्जयेत् सदा ॥ कण्डूजातेऽञ्जनं तोच्ण' धूम' वा योजयेत् पुनः । तीच्याञ्जनाभितप्ते तु चूर्ण प्रत्यञ्जनं हितं ॥ नाहीत वसित विरक्ताशित वेगिते । क्रुद्ध ज्वरित भ्रान्ताचि शिरोरुव शोषजागरे ॥ श्रदृष्टेऽकेँ शिरः स्नाते पीतयोर्धम नद्योः । अत्यन्त दिवास्वप्ने पिपासिते ॥ निर्वाते तर्पणं योज्यं शुद्धश्रो काययः । काले साधारणे प्रातः सायं वोत्तान मायिनः ॥ यवमाषमयीं पाली' नेवकीरणादहिः समां । ह्यङ्गुलोच्चां दृढ़ां कल्प यथाख' सिमावपेत् ॥”</poem>}}}} इस देश में अनेक प्रकारका अञ्जन प्रचलित है । प्रसूतिवाली स्त्रियां सचराचर शिशुको आंख में जो अञ्जन लगातीं, वह सामान्य प्रणालीसे प्रस्तुत होता है। कजरौटेको कुछ तेल लगा प्रदीपको शिखापर रखनेसे काजल पड़ता है । वही काजल अङ्गुलौसे मिला लेनेपर अञ्जन बन जाता है । शिशुको आंखसे जल गिरने या रातको को छीप जानेसे चार प्रकारका अञ्जन बनाया जाता है । मकड़ेके जालेका चन्द्र जलाकर कजरौटे में उत्तम रूपसे चूर्ण कर ले फिर उसे अल्प तैल डाल प्रदीपकौ शिखापर रखे। कुछ पपरी पड़ने पर अङ्गुलि द्वारा उसे खूब मल डाले । इस तरह जो अञ्जन बनता, उसे शिशुको आंख में लगानेसे जल गिरना बन्द हो जाता है। लहसुनको गांठ या तम्बाकूका पत्ता भी अल्प दग्ध कर इसी तरह अज्जन बनता है । पांगरा (Erythrina indica) वृक्षका बकला अल्प तैल डाल प्रदीपको शिखापर रखनेसे कुछ पपरो पड़ती है। उसी पपरीको अङ्गलि द्वारा मर्दन कर लेनेसे उत्तम अञ्जन बन जाता है । पज्जाव और युक्तप्रदेश में सुरमेको सब लोग व्यवहार करते हैं। बङ्गाल में प्रसूतिवाली स्त्रियां शिशको आंखमें अज्ञ्जन लगा देती हैं; सिवा इसके और किसी इच्छासे वह काजल नहीं पारतीं । किन्तु हिन्दूस्थानमें प्राय: सभी सुरमेको धारण करते हैं । सुरमा लगानेके लिये दिल्ली, इलाहाबाद<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> hjfunzoefekfgd6if0cc4wewgnfyfp1 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२१९ 250 83408 668172 346721 2026-07-19T04:01:33Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 668172 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अनजन'''|'''२१३'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>प्रभृति बड़े-बड़े शहरोंमें पेशेकश लोग भी रहते हैं । नापितकी छरहरी जैसी उनके निकट एक- एक झोली होती है । झोलोके भीतर सुरमेकी शीशी, सोसेकी दो ढालू सलाइयां, सोसेके दो मोटे पत्ते, थोड़ासा इत्र, एक चिमटी और एक दर्पण - यह सब चीजें रखी जाती हैं । प्रातःकाल होनेसे यह पेशेकश झोली उठा धनवान् लोगोंके घर सुरमा लगाने जाते हैं। पहले यह सोसेको दोनो ढालू सलाइयां एक-एक बार आंखके भीतर फेर देते हैं । सीसा धातु सहज ही शीतल होती, इसीसे सावधान रहकर आंखमें फेरनेसे खूब स्वस्तिबोध होता है इसके बाद चिमटोसे माधेके बाल नोचकर आंखों में सुरमा लगा देते हैं । अज्ञ्जन लगाके दोनो मोटे पत्ते कुछ देर तक आंख पर रखे रहते हैं। अन्तमें इत्र लगाकर मुंह देखनेको दर्पण देते यह सब पेशेकश प्रत्येक व्यक्तिके निकटसे दो-एक पैसा पाते हैं । मालूम होता, कि मुसलमान-सम्राटोंके राजत्वकालसे यह काम निकला है । वैद्यशास्त्रमें अज्ञ्जनधारणका विशेष उपकार लिखा गया है— {{c|{{x-smaller|<poem>“"नेवमञ्जनसंयोगात् भवत्यमलतारकम् । दृष्टिर्निराकुला भाति निर्मलचन्द्रमा यथा ॥ "</poem>}}}} नेत्त्रमें अज्ञ्जनको धारण करने से पुतलो परिष्कृत और दृष्टि निर्मल चन्द्रको तरह निराकुल हो जाती है । ज्वररोगोके अज्ञान हो जानेसे वैद्य नेत्रमें अज्जन लगानेको व्यवस्था बताते हैं- {{c|{{x-smaller|<poem>“शिरीषवीज- गोमूत्र - कृष्णमरिचसैन्धवैः । अञ्जनं स्यात् प्रबोधाय सरसोन - शिलावचैः ॥”</poem>}}}} शिरीषवीज, गोमूत्र, पौपल, कालीमिर्च, सैन्धव- लवण, रसून यानी लहसुन, मनःशिला और वचको एकत्र पेषण कर नेत्रमें आजनेसे रोगोको चैतन्य प्राप्त होता है। आंख आनेसे ( Opthalmia ) ताम्रपात्र - में घृत डाल और उसे जल ढालते-ढालते मदन करनेसे एक प्रकारका अञ्जन बनता है । यह अज्ञ्जन <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> नेत्रमें लगानेसे अल्प- अल्प ज्वाला बढ़ती, किन्तु पीड़ाका कितना हो उपशम हो जाता है । ३ मसी, स्याहो । ४ सौवीर | ५ मिश्रीकरण, मिलावट | ६ लेपन । ८ म्रक्षण | ८ गमन । ७ मालिन्य, मैलापन । १० व्यक्तीकरण । ( पु० ) ११ पश्चिम दिगृहस्तो । १२ अर्जुनवृक्ष । १३ काव्या- लङ्कारविशेष । अलङ्कारशास्त्रका अञ्जनावृत्ति शक्य और लक्ष्य भिन्न अर्थबोधक शब्दशक्ति विशेष है। काव्यप्रकाश में अज्ञ्जन या अञ्जनावृत्तिका इसतरह लक्षण लिखा गया हैं- {{c|{{x-smaller|<poem>“ "अनेकार्थस्य शब्दस्य वाचकत्व नियन्त्रिते । संयोगाद्यैरवाच्यार्थधोक्कृदृव्यापृतिरञ्जनम् ॥”</poem>}}}} 'श्लोकादिके मध्य में अनेक अर्थोके बोधक शब्द रहते हैं; संयोग-विप्रयोगादि द्वारा उनका वाचकार्य निर्णीत होनेके बाद जिस व्यापार द्वारा अवाच्य अर्थका बोध होता है, उसे अञ्जन या अज्ञ्जनावृत्ति कहते हैं ।' यथा- {{c|{{x-smaller|<poem>““भद्रात्मनोदुरधिरोहतनोविशाल- वंशोन्नतेः कृतशिलीमुखस ग्रहस्य । यस्यानुपलुतगतैः परवारणस्य दानाम्बुसेकसुभगः सततं करोऽभूत् ॥”</poem>}}}} 'उत्तमस्वभाव, रिपुदलसे अनिर्जित, महद्वंशोद्भव, वाणधारी, उपद्रवहीन और शत्रुनिवारक राजाका हस्त सर्वदा दानजलसेक द्वारा सुन्दर बना था ।' इस जगह राजाके प्रकरण हेतु पहले राज- रूपका अर्थ बोध हुआ। फिर इन सकल शब्दों के शक्ति-सहकारसे हस्तिरूप अर्थ भी जाना गया । 'भद्राख्य- जातीय, बड़े बांसके पेड़ जैसा ऊँचा, जिसके कारण दुरारोह - पृष्ठ, भ्रमरदल-परिवेष्टित और गभीरगति हस्तिश्रेष्ठका शुण्ड सर्वदा मदजलसेक द्वारा शोभित हुआ है ।' यह अञ्जनावृत्ति काव्यको व्यङ्गार्थबोधक शक्ति है । इस शक्ति द्वारा तात्पर्यार्थका बोध होता है । जिन सकल शब्दों द्वारा श्लोकादि रचित होते, पहले उनके अर्थ द्वारा एक प्रकारका भाव घटा, पोछे फिर यदि <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Multicol-end}} {{Left|५४|4em}}</noinclude> iwlaz7z821os0lfizzxkpmdiy4crhqm 668173 668172 2026-07-19T04:03:32Z Shivaniya shaw 4129 668173 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अनजन'''|'''२१३'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>प्रभृति बड़े-बड़े शहरोंमें पेशेकश लोग भी रहते हैं । नापितकी छरहरी जैसी उनके निकट एक- एक झोली होती है । झोलोके भीतर सुरमेकी शीशी, सोसेकी दो ढालू सलाइयां, सोसेके दो मोटे पत्ते, थोड़ासा इत्र, एक चिमटी और एक दर्पण - यह सब चीजें रखी जाती हैं । प्रातःकाल होनेसे यह पेशेकश झोली उठा धनवान् लोगोंके घर सुरमा लगाने जाते हैं। पहले यह सोसेको दोनो ढालू सलाइयां एक-एक बार आंखके भीतर फेर देते हैं । सीसा धातु सहज ही शीतल होती, इसीसे सावधान रहकर आंखमें फेरनेसे खूब स्वस्तिबोध होता है इसके बाद चिमटोसे माधेके बाल नोचकर आंखों में सुरमा लगा देते हैं । अज्ञ्जन लगाके दोनो मोटे पत्ते कुछ देर तक आंख पर रखे रहते हैं। अन्तमें इत्र लगाकर मुंह देखनेको दर्पण देते यह सब पेशेकश प्रत्येक व्यक्तिके निकटसे दो-एक पैसा पाते हैं । मालूम होता, कि मुसलमान-सम्राटोंके राजत्वकालसे यह काम निकला है । वैद्यशास्त्रमें अज्ञ्जनधारणका विशेष उपकार लिखा गया है— {{c|{{x-smaller|<poem>“"नेवमञ्जनसंयोगात् भवत्यमलतारकम् । दृष्टिर्निराकुला भाति निर्मलचन्द्रमा यथा ॥ "</poem>}}}} नेत्त्रमें अज्ञ्जनको धारण करने से पुतलो परिष्कृत और दृष्टि निर्मल चन्द्रको तरह निराकुल हो जाती है । ज्वररोगोके अज्ञान हो जानेसे वैद्य नेत्रमें अज्जन लगानेको व्यवस्था बताते हैं- {{c|{{x-smaller|<poem>“शिरीषवीज- गोमूत्र - कृष्णमरिचसैन्धवैः । अञ्जनं स्यात् प्रबोधाय सरसोन - शिलावचैः ॥”</poem>}}}} शिरीषवीज, गोमूत्र, पौपल, कालीमिर्च, सैन्धव- लवण, रसून यानी लहसुन, मनःशिला और वचको एकत्र पेषण कर नेत्रमें आजनेसे रोगोको चैतन्य प्राप्त होता है। आंख आनेसे ( Opthalmia ) ताम्रपात्र - में घृत डाल और उसे जल ढालते-ढालते मदन करनेसे एक प्रकारका अञ्जन बनता है । यह अज्ञ्जन <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> नेत्रमें लगानेसे अल्प- अल्प ज्वाला बढ़ती, किन्तु पीड़ाका कितना हो उपशम हो जाता है । ३ मसी, स्याहो । ४ सौवीर | ५ मिश्रीकरण, मिलावट | ६ लेपन । ८ म्रक्षण | ८ गमन । ७ मालिन्य, मैलापन । १० व्यक्तीकरण । ( पु० ) ११ पश्चिम दिगृहस्तो । १२ अर्जुनवृक्ष । १३ काव्या- लङ्कारविशेष । अलङ्कारशास्त्रका अञ्जनावृत्ति शक्य और लक्ष्य भिन्न अर्थबोधक शब्दशक्ति विशेष है। काव्यप्रकाश में अज्ञ्जन या अञ्जनावृत्तिका इसतरह लक्षण लिखा गया हैं- {{c|{{x-smaller|<poem>“ "अनेकार्थस्य शब्दस्य वाचकत्व नियन्त्रिते । संयोगाद्यैरवाच्यार्थधोक्कृदृव्यापृतिरञ्जनम् ॥”</poem>}}}} 'श्लोकादिके मध्य में अनेक अर्थोके बोधक शब्द रहते हैं; संयोग-विप्रयोगादि द्वारा उनका वाचकार्य निर्णीत होनेके बाद जिस व्यापार द्वारा अवाच्य अर्थका बोध होता है, उसे अञ्जन या अज्ञ्जनावृत्ति कहते हैं ।' यथा- {{c|{{x-smaller|<poem>““भद्रात्मनोदुरधिरोहतनोविशाल- वंशोन्नतेः कृतशिलीमुखस ग्रहस्य । यस्यानुपलुतगतैः परवारणस्य दानाम्बुसेकसुभगः सततं करोऽभूत् ॥”</poem>}}}} 'उत्तमस्वभाव, रिपुदलसे अनिर्जित, महद्वंशोद्भव, वाणधारी, उपद्रवहीन और शत्रुनिवारक राजाका हस्त सर्वदा दानजलसेक द्वारा सुन्दर बना था ।' इस जगह राजाके प्रकरण हेतु पहले राज- रूपका अर्थ बोध हुआ। फिर इन सकल शब्दों के शक्ति-सहकारसे हस्तिरूप अर्थ भी जाना गया । 'भद्राख्य- जातीय, बड़े बांसके पेड़ जैसा ऊँचा, जिसके कारण दुरारोह - पृष्ठ, भ्रमरदल-परिवेष्टित और गभीरगति हस्तिश्रेष्ठका शुण्ड सर्वदा मदजलसेक द्वारा शोभित हुआ है ।' यह अञ्जनावृत्ति काव्यको व्यङ्गार्थबोधक शक्ति है । इस शक्ति द्वारा तात्पर्यार्थका बोध होता है । जिन सकल शब्दों द्वारा श्लोकादि रचित होते, पहले उनके अर्थ द्वारा एक प्रकारका भाव घटा, पीछे फिर यदि <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Multicol-end}} {{Left|५४|4em}}</noinclude> lul2wjrqgxkarsoei2hrepjoezzx1wr पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२२० 250 83409 668214 346722 2026-07-19T10:44:23Z Shivaniya shaw 4129 668214 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२१४'''|'''अञ्जन — अञ्जन महाराज'''}}</noinclude> भिन्न अर्थ द्वारा अन्य भाव घटाया जा सके, तो शब्दको इस शक्तिको अनावृत्ति कहते हैं । १४ शाक्यवंशीय राजविशेष यह राजा देव- दहके पुत्र और देवदह नगर में उत्पन्न हुए थे । जयसेनको कन्या यशोधराका इनके साथ विवाह हुआ । इनके दो कन्या, माया और प्रजापति, और दो पुत्र दण्डपाणि और सुप्रबुद्ध रहे । (महावंश २ परि० । ) अज्ञ्जनराजका राजत्वकाल अनुमानत: सन् ई० से ७११ वर्ष पूर्व था। पहले इन्होंने अञ्जनाब्द चलाया था। "बुद्धो नाम्राञ्जनसुतः कोकटेषु भविष्यति । " ( भागवत १३२४ ) १५ अब्द विशेष । अञ्जन नामक देवदहके महाराजने यह अब्द पहले प्रचलित किया था । ब्रह्मदेशीय धर्मपुस्तकमें उनका नाम 'इट्जेन' लिखा है। इस अव्दके ६८वें वर्ष बुद्धदेवने जन्मग्रहण किया । ब्रह्मवासी अपने ताज् मासवाले शुक्लपक्ष के प्रथम शनिवार से इस अब्दका पहला दिन गिनते हैं । अजातशत्रुके राजत्वकालमें यह इस शब्द का लोप हो गया था । १४८ अञ्जनाब्दमें बुद्धदेवके निर्वाण बाद इसी नामका एक नया अब्द प्रचलित हुआ । नये अञ्जनाब्दके तीसरे वर्ष अजातशत्रुने वैशाली पर आक्रमण किया । अञ्जनक (वै० पु० ) अञ्जन शब्दयुक्त वेदमन्त्रभेद । अञ्जनकर्म (सं० क्लो० ) नेत्रप्रसाधन, काजल अञ्जनकेश (सं०पु० ) दीप, चिराग, लम्प, दिया । अञ्जनकेशिका, अञ्जनकेशी (सं० स्त्री० ) अञ्जनमिव कृष्णवर्णः केशो यस्याः, बहुव्री० । नखी नामक एक प्रकारका गन्धद्रव्य । इसे लगानेसे बाल अत्यन्त कृष्णवर्ण हो जाते हैं। अमर के टीकाकार महेश्वरका कहना है, कि यह द्रव्य देखने में बहेड़े के पत्ते जैसा होता है। इसे हनु, हट्टविलासिनी, धमनी, नली, शुक्ति, शङ्ख और खुर भी कहते हैं । अञ्जनगाँव—बरार प्रदेशवाले अमरावती जिलेके अन्तर्गत दरियापुर ताल्लुक्का एक नगर । अक्षां' २१० १० उ०, और द्राघि० ७७° २० पू० के मध्य में यह अवस्थित । इसकी लोकसंख्या कोई पौने नौ हजार होगी। यह नगर सान्हर नदीके तीर बसा है । पान, रूईका कपड़ा और बांसको टोकरी प्रभृति द्रव्यादि यहां प्रचुर परिमाणसे बिकते हैं। स्थानीय व्यवसायका यह एक केन्द्रस्थल है। द्वितीय महाराष्ट्र युद्धके अवसान पर सन् १८०३ ई० की ३०वीं दिसम्बर को इस नगर में दौलतराव सेंधिया और अंगरेजोंको जो सन्धि हुई, उसके पत्रमें उस समयवाले बड़े लाट मारकिस वेलेसली के अनुमत्यनुसार जेनरल अर्थर वेलेसलीने दस्तखत किये थे । अञ्जनगाँव - बाड़ी—बरारके अन्तर्गत अमरावती जिलेका एक नगर या कसबा । यह अमरावतीसे पांच कोस दूर है । इसमें कोई तीन हज़ार आदमी रहते होंगे । अञ्जनगिरि (सं० पु० ) सितोदा नदीका पूर्वतीरस्थ पर्वतभेद । (लिङ्गपु० ४९५०) अञ्जनगुड़िका (सं० स्त्री० ) विशूचिकाका औषध | अज्ञ्जनत्रय (सं० क्लो० ) कालाज्ञ्जन, स्रोतोज्ञ्जन और रसाञ्जन । अञ्जननामिका (सं० स्त्रो० ) नेत्ररोगान्तर्गत वर्त्मज रोगविशेष । “दाहतोदवती ताम्रा पिड़का वर्त्म सम्भवा । मृद्दी मन्दरुजा सूक्ष्मा ज्ञेया साञ्जननामिका ॥" ( भावप्र० ) अञ्जनपर्वत– पूर्णोद या कास्पिअनके (Caspian ) पास एक पहाड़ । इसका दूसरा नाम कृष्णपर्वत है । यहां अनेक बृहदाकार सर्प देख पड़ते हैं । ( वायुपुराण) । ईरानो इसे आन्हेम कहते हैं । अज्ञ्जनपर्वा - महावीर घटोत्कचके एक पुत्र । कुरु- क्षेत्रके युद्धकालमें इनके साहस और वीरत्वको बड़ी प्रशंसा थी। उसी समय द्रोणाचार्य के हाथों यह मारे गये । (महाभारत, द्रोणपर्व १५ अ०) अज्ञ्जनपेड़- कोङ्कण प्रदेशका एक नगर और दुर्ग, यह, समुद्र के किनारे अवस्थित और बम्बई नगरसे ५० कोस दूर है । सन १८१८ ई० में यह अंगरेज़ी फौजके हाथ समर्पण किया गया था । अज्ञ्जनभैरव (सं० पु० ) सन्निपात ज्वरका एक रस, २ अर्जुनवृक्ष । जो आंख में लगाया जाता है । अज्ञ्जन महाराज - वाराणसी काशीके एक विख्यात<noinclude></noinclude> lyvz9f3zzmz0dbzskw3fuc4wsr1pb1p 668227 668214 2026-07-19T11:28:48Z Shivaniya shaw 4129 668227 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२१४'''|'''अञ्जन — अञ्जन महाराज'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>भिन्न अर्थ द्वारा अन्य भाव घटाया जा सके, तो शब्दको इस शक्तिको अनावृत्ति कहते हैं । १४ शाक्यवंशीय राजविशेष यह राजा देव- दहके पुत्र और देवदह नगर में उत्पन्न हुए थे । जयसेनको कन्या यशोधराका इनके साथ विवाह हुआ । इनके दो कन्या, माया और प्रजापति, और दो पुत्र दण्डपाणि और सुप्रबुद्ध रहे ।<small>(महावंश २ परि० । ) </Small> अज्ञ्जनराजका राजत्वकाल अनुमानत: सन् ई० से ७११ वर्ष पूर्व था। पहले इन्होंने 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हट्टविलासिनी, धमनी, नली, शुक्ति, शङ्ख और खुर भी कहते हैं । अञ्जनगाँव—बरार प्रदेशवाले अमरावती जिलेके अन्तर्गत दरियापुर ताल्लुक्का एक नगर । अक्षां' २१० १० उ०, और द्राघि० ७७° २० पू० के मध्य में यह अवस्थित । इसकी लोकसंख्या कोई पौने नौ हजार होगी। यह नगर सान्हर नदीके तीर बसा <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> है । पान, रूईका कपड़ा और बांसको टोकरी प्रभृति द्रव्यादि यहां प्रचुर परिमाणसे बिकते हैं। स्थानीय व्यवसायका यह एक केन्द्रस्थल है। द्वितीय महाराष्ट्र युद्धके अवसान पर सन् १८०३ ई० की ३०वीं दिसम्बर को इस नगर में दौलतराव सेंधिया और अंगरेजोंको जो सन्धि हुई, उसके पत्रमें उस समयवाले बड़े लाट मारकिस वेलेसली के अनुमत्यनुसार जेनरल अर्थर वेलेसलीने दस्तखत किये थे । {{outdent|अञ्जनगाँव - बाड़ी—बरारके अन्तर्गत अमरावती जिलेका एक नगर या कसबा । यह अमरावतीसे पांच कोस दूर है । इसमें कोई तीन हज़ार आदमी रहते होंगे ।}} {{outdent|अञ्जनगिरि (सं० पु० ) सितोदा नदीका पूर्वतीरस्थ पर्वतभेद । <Small>(लिङ्गपु० ४९५०)</Small>}} {{outdent|अञ्जनगुड़िका (सं० स्त्री० ) विशूचिकाका औषध ।}} {{outdent|अज्ञ्जनत्रय (सं० 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बुद्धदेवने जन्मग्रहण किया । ब्रह्मवासी अपने ताज् मासवाले शुक्लपक्ष के प्रथम शनिवार से इस अब्दका पहला दिन गिनते हैं । अजातशत्रुके राजत्वकालमें यह इस शब्द का लोप हो गया था । १४८ अञ्जनाब्दमें बुद्धदेवके निर्वाण बाद इसी नामका एक नया अब्द प्रचलित हुआ । नये अञ्जनाब्दके तीसरे वर्ष अजातशत्रुने वैशाली पर आक्रमण किया । {{outdent|अञ्जनक (वै० पु० ) अञ्जन शब्दयुक्त वेदमन्त्रभेद ।}} {{outdent|अञ्जनकर्म (सं० क्लो० ) नेत्रप्रसाधन, काजल ।}} {{outdent|अञ्जनकेश (सं०पु० ) दीप, चिराग, लम्प, दिया ।}} {{outdent|अञ्जनकेशिका, अञ्जनकेशी (सं० स्त्री० ) अञ्जनमिव कृष्णवर्णः केशो यस्याः, बहुव्री० । नखी नामक एक प्रकारका गन्धद्रव्य ।}} इसे लगानेसे बाल अत्यन्त कृष्णवर्ण हो जाते हैं। अमर के टीकाकार महेश्वरका कहना है, कि यह द्रव्य देखने में बहेड़े के पत्ते जैसा होता है। इसे हनु, हट्टविलासिनी, धमनी, नली, शुक्ति, शङ्ख और खुर भी कहते हैं । अञ्जनगाँव—बरार प्रदेशवाले अमरावती जिलेके अन्तर्गत दरियापुर ताल्लुक्का एक नगर । अक्षां' २१० १० उ०, और द्राघि० ७७° २० पू० के मध्य में यह अवस्थित । इसकी लोकसंख्या कोई पौने नौ हजार होगी। यह नगर सान्हर नदीके तीर बसा <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> है । पान, रूईका कपड़ा और बांसको टोकरी प्रभृति द्रव्यादि यहां प्रचुर परिमाणसे बिकते हैं। स्थानीय व्यवसायका यह एक केन्द्रस्थल है। द्वितीय महाराष्ट्र युद्धके अवसान पर सन् १८०३ ई० की ३०वीं दिसम्बर को इस नगर में दौलतराव सेंधिया और अंगरेजोंको जो सन्धि हुई, उसके पत्रमें उस समयवाले बड़े लाट मारकिस वेलेसली के अनुमत्यनुसार जेनरल अर्थर वेलेसलीने दस्तखत किये थे । {{outdent|अञ्जनगाँव - बाड़ी—बरारके अन्तर्गत अमरावती जिलेका एक नगर या कसबा । यह अमरावतीसे पांच कोस दूर है । इसमें कोई तीन हज़ार आदमी रहते होंगे ।}} {{outdent|अञ्जनगिरि (सं० पु० ) सितोदा नदीका पूर्वतीरस्थ पर्वतभेद । <Small>(लिङ्गपु० ४९५०)</Small>}} {{outdent|अञ्जनगुड़िका (सं० स्त्री० ) विशूचिकाका औषध ।}} {{outdent|अज्ञ्जनत्रय (सं० क्लो० ) कालाज्ञ्जन, स्रोतोज्ञ्जन और रसाञ्जन ।}} {{outdent|अञ्जननामिका (सं० स्त्रो० ) नेत्ररोगान्तर्गत वर्त्मज रोगविशेष ।}} {{c|{{x-smaller|<poem>“दाहतोदवती ताम्रा पिड़का वर्त्म सम्भवा । मृद्दी मन्दरुजा सूक्ष्मा ज्ञेया साञ्जननामिका ॥" ( भावप्र० 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<noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अञ्जनयुग्म – अञ्जनेरी'''|'''२१५'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>राजा । इनके पुत्रका नाम पुण्यवन्त था । बौद्धों के अवदान ग्रन्थ में पुण्यवन्त के सम्बन्धपर कितनी ही कहानियां लिखी हैं ( महाववदान) । {{outdent|अञ्जनयुग्म (सं० क्लो० ) स्रोतोञ्जन और रसाञ्जन ।}} {{outdent|अञ्जनरस (सं० पु० ) सन्निपातज्वरका नास ।}} {{outdent|अञ्जनविधि (सं० पु० ) नेत्रप्रसाधन-क्रियाविशेष}} {{outdent|अञ्जनवेल - बम्बई प्रेसिडेन्सीके अन्तर्गत रत्नागिरि जिलेका एक बन्दर । अक्षां' १७' ३३ उ० और द्राघि० ७३° १३ पू० के मध्य में यह अवस्थित है । एक छोटी खाड़ी के पास अज्ञ्जनवेल नामक नदी किनारे यह बसा है। इस बन्दरसे प्रति वत्सर प्रायः साठ लाख रुपये के द्रव्यादि भेजे और प्राय: पैंतालीस लाख रुपये के द्रव्यादि मंगाये जाते हैं ।}} {{outdent| अञ्जनशलाका (सं० स्त्री० ) अञ्जनलेपनार्थ शलाका मध्यपदलोप- कर्मधा० । चक्षुमें अज्ञ्जन लगानेको शलाका, आंखमें सुरमा डालनेको मलाई । यह प्रायः ससा धातु से निर्मित और गुणसूची जैसी मोटी और बड़ी होतो, किन्तु दोनो मुखों पर ढालू रहती है।}} {{outdent| अञ्जना (सं० स्त्री० ) अञ्जन- आप् । १ वानरो- विशेष, हनूमान्‌को माता ।}} यह सुमेरु पर्व्वतके निकटस्थ प्रदेशवाले अधिपति केशरी वानरकी पत्नी थीं। इनके गर्भ और पवनके औरस से हनूमान्का जन्म हुआ । अञ्जना बड़ी धीर वीर नारी थी। कहते हैं, कि हनूमान् लङ्काविजय होनेके बाद जब फिर मातासे मिलने गये, तब अज्ञ्जनाने उन्हें तिरस्कार कर कहा, 'हनू ! तु धिक्कार है। तूने मेरा पुत्र होकर अतिसामान्य रावणके साथ युद्ध किया ! दश नखसे रावणके दश मुण्ड नोच रामको उपहार ला न सका ! सीताके साथ अशोकवनको उठा लानेमें असमर्थ हुआ ! समुद्र क्यों बांधा गया ? तेरे निज शरीर विस्तार कर सेतुस्वरूप बन जानेसे क्या काम न चलता ? तु धिक्कार, तू मेरा कुपुत्र है ।' २ काश्मीरको एक राणी, जो तोरमाणको पत्नी और वज्रन्द्रको कन्या थीं। इनके पुत्रका नाम प्रवरसेन रहा।<small>(राजतरङ्गिणी)</small> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ३ नदीविशष । कृष्णनगर जिले के अन्तर्गत बारुईहुदेसे दक्षिण और दोगाछिया और हंसखालौसे उत्तर यह नदी बही है। यात्रापुर के निकट अञ्जना नदो द्विधा बनी और आगे बढ़कर उभय धारा मामजोयानो ग्रामके निकट से दक्षिण पहुंचीं और अन्तमें हरधामसे उत्तर होकर चाकदहके निकट गङ्गा में मिल गई हैं। राजा रुद्रके समय यह नदी वह रहती थी । ४ दिग्हस्तिनौ । ५ आंखको फुन्सो । ६ दुरङ्गी छिपकली । ७ धान्य-विशेष । अञ्जनागिरि (सं० पु०) अञ्जनवर्णो गिरिः पर्वतः।<small> वनगिर्योः संज्ञायां कोटरकिंशुकादीनाम्। पा ६।३।११७।</small> नीलपर्वत। ​{{outdent| अञ्जनादि (सं० पु०) द्रव्यसमूह। अञ्जन, रसाञ्जन, नागपुष्प, प्रियङ्गु, नीलोत्पल, नलद, नलिन, केशर और मधूक। सुश्रुत के मत में इस द्रव्य का गुण रक्तपित्त, विष और दाहनाशक है। }} ​{{outdent| अञ्जनाद्रि (सं० पु०) अञ्जनमिव कृष्णवर्णः अद्रिः। नीलपर्वत। }} ​{{outdent| अञ्जनाधिका, अञ्जनिका (सं० स्त्री०) अञ्जनादधिका कृष्णवर्णत्वात् ५-तत्। १ अञ्जनिका, हलिनी, हलाहल। २ क्षुद्र मूषिका, छोटा चूहा। }} ​{{outdent| अञ्जनानन्दन (सं० पु०) अञ्जना के नन्दन, हनूमान्। }} ​{{outdent| अञ्जनाम्भ (सं० क्ली०) अञ्जन का पानी। }} {{outdent|अञ्जनावली (सं० स्त्री०) अञ्जन-मतुप्, मकारस्य वः। अञ्जनं विद्यते अस्याः अधिककृष्णवर्णत्वात्। १ ईशानकोण की दिग्हस्तिनी, सुप्रतीक नामक हस्ती की भार्या। कालाञ्जनी वृक्ष, कुटकी।}} {{outdent| अञ्जनिक (सं० वि०) १ अञ्जनसम्बन्धी। स्त्रियां टाप् अञ्जनिका। २ चूहा। ३ छिपकली। }} {{outdent| अञ्जनी (सं० स्त्री०) अन्ज्-ल्युट् कर्मणि, ङीप्। अज्यन्ते चन्दनकुङ्कुमादिभिरसौ। १ कुङ्कुमादि अनुलिप्त नारी। २ कालाञ्जनी वृक्ष, कुटकी। ३ वानरी-विशेष, हनूमान् की माता। ४ माया। ५ बिलनी, आँख की फुन्सी। }} {{outdent| अञ्जनेरी (अञ्जना-गिरि) — बम्बई प्रेसिडेन्सी का एक पर्वत। यह नासिक से दक्षिण-पश्चिम साढ़े सात... }} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Block center|<poem><small></noinclude> ldq3tpnrkessdy804gymj43e0vxrul1 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४०१ 250 83762 668097 668083 2026-07-18T13:06:27Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668097 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''३९४'''|'''अनन्तपुर—अनन्तमूल'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude><small>जल-वायु—प्रधानतः आर्द्र नहीं। वर्षमें साधारणतः सत्रह इञ्च वृष्टि पड़ती है। नवम्बर और दिसम्बरके दिनों पारा ६७° से ८३° तक चढ़ता, और मई में कभी-कभी आधीरातको १००° पर भी पहुंच जाता है। सन् १८२० ई॰ से अट्ठारह वर्ष तक हैज़ेकी बीमारी बड़े ज़ोरसे रही थी। बुखार ग़ज़बका चढ़ता है। चेचक बहुत ही मामूली बीमारी है। पशु-रोगने कितने ही बार हलचल डाली थी; किन्तु सन् १८४०, १८५०, १८५७ और १८६८ ई॰ के बीच जो उपद्रव मचा, उसकी बात कही जा नहीं सकती। गूटी, ताड़पत्री, कल्याणदुर्ग, पेनू कोण्डे और अनन्तपुरमें स्थानीय और मूनिसिपल फण्डसे ग़रीबोंको बेदाम दबा देनेका प्रबन्ध बंधा है। ऐसे दवाख़ानोंकी गिनती बढ़ते जाती है। २ उक्त ज़िलेका एक ताल्लुक़। इसका क्षेत्रफल ८८८ वर्गमील है, जिसमें कोई सवा सौ गांव और कई हज़ार घर आबाद हैं। जन-संख्या कोई एक लाख देखते हैं। सारे क्षेत्रफलमें सैकड़े पीछे सत्तर बीघे खेती होती, और तर ज़मीन आधी से ज्य़ादा आमदनी अदा करती है। मामूली तौरपर ताल्लुक़ हमवार मैदान है, उत्तर और उत्तर-पूर्व पहाड़ी सीमाको बांधे है। यहांसे अनन्तपुर, बुक्कराय-समुद्रम्, ताड़मारी और सिंहानमलयको सड़क गई है। अनन्तपुर और सिंहानमलयके ही तालाब सबसे बड़े हैं, जिनसे बीस-बीस हज़ार एकड़ भूमि सींची जाती है। चियेड्दुर्ग सबसे बड़ा पहाड़ है, जो मैदानपर कोई १२०० फ़ीट ऊंचे उठा है। यह ताल्लुक़ गूटीकी मुनसिफ़ीमें लगता है। ३ उक्त ज़िलेका एक बड़ा शहर। यह गूटीसे दक्षिण सोलह और बेलारीसे दक्षिण-पूर्व इकतीस कोस दूर बसा है। यहां कोई बारह हज़ार लोग रहते। ज़िलेका हेडक्वार्टर, ख़ास पुलिस और मजिष्ट्रेटकी कचहरी, छोटा जेल, दवाख़ाना, स्कूल, डाकघर, और मुसाफ़िरका बंगला बना है। कहते, कि सन् ई॰ के १४ वें शताब्दमें विजयनगर-राजके दीवानने यह शहर बसाया; सन् १७७५ ई॰ में<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>जबतक हैदर अलीने न हड़पा, तबतक यह दीवान बहादुरके ही अधीन रहा था,। ४ मन्द्राज—कड़ापा ज़िलेके रायकोट ताल्लुक़का एक मन्दिर। यहां गङ्गायात्राका महोत्सव होता और उस समय इधर-उधरके सारे शूद्र इकट्ठा रहते हैं। कुछ वर्षसे यह जलसा फीका पड़ गया। अनन्तपुरी—एक सुप्रसिद्ध वैदान्तिक और कृष्णचैतन्यके पूर्वपुरुष। अनन्तभट्ट—१ आपदेवके पुत्र। <small>अनन्तदेव देखो।</small> २ यदु-भट्टके पुत्र, इन्होंने राजा अनूपसिंहके आदेशसे संस्कृत-भाषामें तीर्थरत्नाकर लिखा था। ३ सिद्धेश्वरभट्ट के पुत्र—इन्होंने सन् १६९३ ई॰ में गोविन्द-कृष्ण-रचित कुण्डमार्तण्डकी टीका बनायी थी। ४ अद्वैत-चन्द्रिका और सिद्धान्तचन्द्रिका नामसे नैयायिक ग्रन्थरचयिता। ५ तिथ्यादिनिर्णय-रचयिता। ६ नक्षत्रेष्टिनिरूपण नामक श्रीतग्रन्थकार। ७ नृसिंह-सर्वस्वके अन्यतम लेखक। ८ पदमञ्जरी नामक न्याय-ग्रन्थ-रचयिता। ९ प्रतिष्ठा-पद्धतिकार। १० प्रातिशाख्य-भाष्यकार। ११ भारत-चम्पू-काव्य रचयिता। १२ महाभाष्यप्रदीप-विवरण-प्रणेता। १३ कमलाकरभट्ट के पुत्र, इन्होंने संस्कृत भाषामें रामकल्पद्रुम, तत्पितृरचित जैमिनि-सूत्रभाष्यकी टीका और त्रिंशच्छ्लोकी व्याख्या- सुबोधिनी रची थी। अनन्तमति (सं॰ पु॰) किसी बोधिसत्वका नाम। अनन्तमायिन् (सं॰ वि॰) असीम रूपसे छली, जो बेहद धोखा द । अनन्तमिश्र - न्यायप्रदीप - रचयिता। अनन्तमूल (सं॰ पु॰) अनन्तं सुदीर्घ मूलमस्य। लताविशेष जिसे शारिवा भी कहते हैं, जङ्गली चमेली। (Hemidesmus indicus) अनन्तमूलके हिन्दी - सालसा ; बंगला - अनन्तमूल, अनन्तोमूल ; पर्याय यह हैं, – हिन्दी - मगरबू, जङ्गलौचमेली, विहारी — अनुन्तमूल; नन्नारी, नाटका औशबह; बम्बैया - उपरमार : दक्षिणी – सुगण्डीपाला, मारवाड़ी - अनन्तमूल उपलसरी; तामिल–नन्नारि; तेलगू - गदिमुगन्धि, पालचुक्कनिदेस, सुगन्धिपाल,<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> lm9qzj159zwd293x33q6b8k9rdgvv5w 668099 668097 2026-07-18T13:18:06Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार 668099 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''३९४'''|'''अनन्तपुर—अनन्तमूल'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude><small>जल-वायु—प्रधानतः आर्द्र नहीं। वर्षमें साधारणतः सत्रह इञ्च वृष्टि पड़ती है। नवम्बर और दिसम्बरके दिनों पारा ६७° से ८३° तक चढ़ता, और मई में कभी-कभी आधीरातको १००° पर भी पहुंच जाता है। सन् १८२० ई॰ से अट्ठारह वर्ष तक हैज़ेकी बीमारी बड़े ज़ोरसे रही थी। बुखार ग़ज़बका चढ़ता है। चेचक बहुत ही मामूली बीमारी है। पशु-रोगने कितने ही बार हलचल डाली थी; किन्तु सन् १८४०, १८५०, १८५७ और १८६८ ई॰ के बीच जो उपद्रव मचा, उसकी बात कही जा नहीं सकती। गूटी, ताड़पत्री, कल्याणदुर्ग, पेनू कोण्डे और अनन्तपुरमें स्थानीय और मूनिसिपल फण्डसे ग़रीबोंको बेदाम दबा देनेका प्रबन्ध बंधा है। ऐसे दवाख़ानोंकी गिनती बढ़ते जाती है। २ उक्त ज़िलेका एक ताल्लुक़। इसका क्षेत्रफल ८८८ वर्गमील है, जिसमें कोई सवा सौ गांव और कई हज़ार घर आबाद हैं। जन-संख्या कोई एक लाख देखते हैं। सारे क्षेत्रफलमें सैकड़े पीछे सत्तर बीघे खेती होती, और तर ज़मीन आधी से ज्य़ादा आमदनी अदा करती है। मामूली तौरपर ताल्लुक़ हमवार मैदान है, उत्तर और उत्तर-पूर्व पहाड़ी सीमाको बांधे है। यहांसे अनन्तपुर, बुक्कराय-समुद्रम्, ताड़मारी और सिंहानमलयको सड़क गई है। अनन्तपुर और सिंहानमलयके ही तालाब सबसे बड़े हैं, जिनसे बीस-बीस हज़ार एकड़ भूमि सींची जाती है। चियेड्दुर्ग सबसे बड़ा पहाड़ है, जो मैदानपर कोई १२०० फ़ीट ऊंचे उठा है। यह ताल्लुक़ गूटीकी मुनसिफ़ीमें लगता है। ३ उक्त ज़िलेका एक बड़ा शहर। यह गूटीसे दक्षिण सोलह और बेलारीसे दक्षिण-पूर्व इकतीस कोस दूर बसा है। यहां कोई बारह हज़ार लोग रहते। ज़िलेका हेडक्वार्टर, ख़ास पुलिस और मजिष्ट्रेटकी कचहरी, छोटा जेल, दवाख़ाना, स्कूल, डाकघर, और मुसाफ़िरका बंगला बना है। कहते, कि सन् ई॰ के १४ वें शताब्दमें विजयनगर-राजके दीवानने यह शहर बसाया; सन् १७७५ ई॰ में<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>जबतक हैदर अलीने न हड़पा, तबतक यह 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इरिमुसु ; संस्कृत- - अनन्ता, सुगन्धि, गोपिमूल, सारिवा; अरबौ- जैयान्, औशवतुन्नार ; फारसी - श्रशबहे हिन्दी ; यासमीने- बरौ । यह आसक्लेपियाडेसो जातिको हेमिडेस्मस्- 'इण्डिकस् नामक एक लता है । इसके पत्ते सीधे रहते और उनके बौचमें कोरो रेखायें होती हैं । श्यामा- लता के साथ अनन्तमूलका पूरा धोखा हो सकता है। व्यवसायी प्रायः श्यामालताको अनन्तमूल बताकर बेचा करते हैं। अनन्तमूलको जड़ कुछ कृष्णवर्ण होती ; किन्तु ऊपरका पतला बकला निकाल डालनेसे पोली देख पड़ती है। उसे तोड़नेसे दूध जैसा सफ़ेद आटा निकल पड़ता है। इसका गन्ध ठीक कुकरमुत्ते - जैसा होता, किन्तु कुछ तिक्त रहता है । औषधके निमित्त इसका मूल हो काम आता है । बङ्गालको सरस मृत्तिका और गड्ढे में यह लता प्रचुर रूपसे उपजती है । अनन्तमूल धातुपरिवर्धक है । इसको खानेसे बल, क्षुधा, धर्म और मूत्र बढ़ता है । वैद्य महामेदके बदले अनन्तमूलसे काम चलाते हैं। विलायती सालसेकी जगह भी अनेक चिकित्सक अनन्तमूलको ही काम में लाया करते हैं । डाकर औसानसीका कहना है, कि इसका गुण सालसेसे कितना ही उत्कृष्ट होता है । पुरातन कुष्ठ, प्रदर और सारे ही रक्तविकार में अनन्तमूल महोपकारी है । जो बहु कालसे पुरातन उपदंश रोग में (गर्मी) कष्ट पाता, · उसके लिये अनन्तमूलका पाचन विशेष हितकर है । उक्त महौषध इसतरह प्रस्तुत किया जाता है, - अनन्तमूल दो आने, चोपचीनो छ: आने, बड़ी हरी- तकौ चार आने, ज्येष्ठमधु या मुलेठौ दो आने, सेसेफ्रास् दो आने, मिजारियेन दो आने, कबाबचीनी दो रत्ती, कालपिन फूल दो रत्ती, इसबगोल तीन रत्ती, तकमारी दो रत्तो, तुकमलङ्गा दो रत्ती, असगन्ध दो रत्तौ, बिहीदाना तीन रत्ती, रेवाचीनौ | - एक आने, गोयाकम् एक आने, सालममिसरी तीन एक रत्ती, वंशलोचन दो रत्ती, पद्मकाठ तीन रत्ती, श्वेतचन्दन तीन रत्ती, लवङ्ग एक आने, छोटी इलायची दो रत्तौ, दालचीनो तीन रत्ती, तेजपत्र तीन रत्ती, सफेद मूसर तीन रत्ती, जेउफा दो रत्ती, गुलाब के फूल एक आने, जावित्री तीन रत्ती, बड़ी इलायची एक आने, धनिया एक आने, तेजबल एक आने, हरीतको एक आने, गोक्षुरबीज एक आने और त्यौखर दो आने – इन समस्त द्रव्योंको पहले उत्तम रूपसे कूट डाले, पोछे आध सेर जल से भरे मट्टी के पात्रमें मृदु सन्तापसे पका और आध पाव बाकी रहनेपर नीचे उतार आधा सवेरे और आधा सन्ध्याको खाये। शिशुको मात्रा एक परीके बरा- बर होती है । यदि इस औषधको एकबारगी हो अधिक दिनके लिये बनाना हो, तो सब चीजें ऊपर कही हुई मात्रामें तौला पहले क्वाथ प्रस्तुत करे । पोछे एक पाव क्वाथमें आध छटांकके हिसाब से सोरा और आध छटांकके हिसाब से ही स्पिरिट मिला उसे रख छोड़े। इस औषधको खाते समय रोगी तीन-चार दिन अत्यन्त उष्ण जलसे नहाये । मांस, पूड़ी, रोटी, घृतपक्क द्रव्य, चने और मूंगको दाल प्रभृति सुपथ्य खाना चाहिये । अम्ल निषिध है, किन्तु आम्र खाने में कोई वाधा नहीं लगती । रौद्र, रात्रिजागरण और स्त्री-संसर्ग अतिशय निषिद्ध है। इससे रक्त भली भांति परिष्कृत होता और कन्दर्प- जैसा रूप बन जाता है । जिन्होंने व्यर्थ विलायती सालसा खा राशि राशि अर्थ बिगाड़ा है, वह इसे व्यवहार कर विशेष फल पायेंगे । अनेक दुःसाध्य रोगियोंपर इस औषधको परीक्षा हो चुकी है। किन्तु जो यथोचित नियम न रखेगा, उसकी बात स्वतन्त्र है । अनन्तमूली (सं० स्त्री० ) १ दुरालभा, लटजीरा । २ रक्तदुरालभा, लाल लटजीरा । अनन्त यज्वा कवीयसाता भट्ट - क्वष्ण भट्टाचार्य के पुत्र, गौतमीय पितृमेधसूत्र के टीकाकार | अनन्तयाज्ञिक - प्रतिज्ञासूत्र भाष्य नामसे कात्यायन- श्रौतसूत्र के भाष्यकार । रत्ती, अजवायन तीन रत्ती, सौंफ तीन रत्ती, 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(गर्मी) कष्ट पाता, उसके लिये अनन्तमूलका पाचन विशेष हिंतकर है। उक्त महौषध इसतरह प्रस्तुत किया जाता है,—अनन्तमूल दो आने, चोपचीनी छः आने, बड़ी हरीतकी चार आने, ज्येष्ठमधु या मुलेठी दो आने, सेसेफ्रास् दो आने, मिजारियेन दो आने, कबाबचीनी दो रत्ती, कालपिन फूल दो रत्ती, इसबगोल तीन रत्ती, तकमारी दो रत्ती, तुकमलङ्गा दो रत्ती, असगन्ध दो रत्ती, बिहीदाना तीन रत्ती, रेवाचीनी एक आने, गोयाकम् एक आने, सालममिसरी तीन<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>रत्ती, अजवायन तीन रत्ती, सौंफ तीन रत्ती, केशर एक रत्ती, वंशलोचन दो रत्ती, पद्मकाष्ठ तीन रत्ती, श्वेतचन्दन तीन रत्ती, लवङ्ग एक आने, छोटी इलायची दो रत्ती, दालचीनी तीन रत्ती, तेजपत्र तीन रत्ती, सफ़ेद मूसर तीन रत्ती, जेउफा दो रत्ती, गुलाबके फूल एक आने, जावित्री तीन रत्ती, बड़ी इलायची एक आने, धनिया एक आने, तेजबल एक आने, हरीतकी एक आने, गोक्षुरबीज एक आने और त्यौखर दो आने—इन समस्त द्रव्योंको पहले उत्तम रूपसे कूट डाले, पीछे आध सेर जल से भरे मट्टीके पात्रमें मृदु सन्तापसे पका और आध पाव बाक़ी रहनेपर नीचे उतार आधा सवेरे और आधा सन्ध्याको खाये। शिशुकी मात्रा एक परीके बरा-बर होती है। यदि इस औषधको एकबारगी ही अधिक दिनके लिये बनाना हो, तो सब चीजें ऊपर कही हुई मात्रामें तौला पहले क्वाथ प्रस्तुत करे। पीछे एक पाव क्वाथमें आध छटांकके हिसाबसे सीरा और आध छटांकके हिसाब से ही स्पिरिट मिला उसे रख छोड़े। इस औषधको खाते समय रोगी तीन-चार दिन अत्यन्त उष्ण जलसे नहाये। मांस, पूड़ी, रोटी, घृतपक्क द्रव्य, चने और मूंगकी दाल प्रभृति सुपथ्य खाना चाहिये। अम्ल निषिद्ध है, किन्तु आम्र खानेमें कोई वाधा नहीं लगती। रौद्र, रात्रिजागरण और स्त्री-संसर्ग अतिशय निषिद्ध है। इससे रक्त भली भांति परिष्कृत होता और कन्दर्प-जैसा रूप बन जाता है। जिन्होंने व्यर्थ विलायती सालसा खा राशि-राशि अर्थ बिगाड़ा है, वह इसे व्यवहार कर विशेष फल पायेंगे। अनेक दुःसाध्य रोगियोंपर इस औषधकी परीक्षा हो चुकी है। किन्तु जो यथोचित नियम न रखेगा, उसकी बात स्वतन्त्र है। अनन्तमूली (सं॰ स्त्री॰) १ दुरालभा, लटजीरा। २ रक्तदुरालभा, लाल लटजीरा। अनन्त-यज्वा कवीयसाता भट्ट—क्वष्ण भट्टाचार्य के पुत्र, गौतमीय पितृमेधसूत्र के टीकाकार। अनन्तयाज्ञिक—प्रतिज्ञासूत्र भाष्य नामसे कात्यायन-श्रौतसूत्रके भाष्यकार।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qcq9kh15mvpss95hmjs26d50fg3l79w 668116 668115 2026-07-18T16:01:13Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 668116 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनन्तमूल—अनन्तयाज्ञिक'''|'''३९५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>तेल्लसुगन्धिपाल, पलसुगन्धि, युक्तपुलगम; कनाड़ी―सोगदहेरु, सुगन्धपालदगिदा; मलय—नन्नारीकिज़हन्न, नरूनीन्ति; सिंहली—इरिमुसु; संस्कृत—अनन्ता, सुगन्धि, गोपिमूल, सारिवा; अरबी—ज़ै यान्, औशवतुन्नार; फ़ारसी—औशबहे हिन्दी; यासमीनेबरी। यह आसक्लेपियाडेसी जातिकी हेमिडेस्मस्-इण्डिकस् नामक एक लता है। इसके पत्ते सीधे रहते और उनके बीचमें कोरी रेखायें होती हैं। श्यामालता के साथ अनन्तमूलका पूरा धोखा हो सकता है। व्यवसायी प्रायः श्यामालताको अनन्तमूल बताकर बेचा करते हैं। अनन्तमूलकी जड़ कुछ कृष्णवर्ण होती; किन्तु ऊपरका पतला बकला निकाल डालनेसे पीली देख पड़ती है। उसे तोड़नेसे दूध-जैसा सफ़ेद आटा निकल पड़ता है। इसका गन्ध ठीक कुकरमुत्ते-जैसा होता, किन्तु कुछ तिक्त रहता है। औषधके निमित्त इसका मूल ही काम आता है। बङ्गालकी सरस मृत्तिका और गड्ढे में यह लता प्रचुर रूपसे उपजती है। अनन्तमूल धातुपरिवर्धक है। इसको खानेसे बल, क्षुधा, धर्म और मूत्र बढ़ता है। वैद्य महामेदके बदले अनन्तमूलसे काम चलाते हैं। विलायती सालसेकी जगह भी अनेक चिकित्सक अनन्तमूलको ही काममें लाया करते हैं। डाक्टर औसानसीका कहना है, कि इसका गुण सालसेसे कितना ही उत्कृष्ट होता है। पुरातन कुष्ठ, प्रदर और सारे ही रक्तविकार में अनन्तमूल महोपकारी है। जो बहु कालसे पुरातन उपदंश रोगमें (गर्मी) कष्ट पाता, उसके लिये अनन्तमूलका पाचन विशेष हिंतकर है। उक्त महौषध इसतरह प्रस्तुत किया जाता है,—अनन्तमूल दो आने, चोपचीनी छः आने, बड़ी हरीतकी चार आने, ज्येष्ठमधु या मुलेठी दो आने, सेसेफ्रास् दो आने, मिजारियेन दो आने, कबाबचीनी दो रत्ती, कालपिन फूल दो रत्ती, इसबगोल तीन रत्ती, तकमारी दो रत्ती, तुकमलङ्गा दो रत्ती, असगन्ध दो रत्ती, बिहीदाना तीन रत्ती, रेवाचीनी एक आने, गोयाकम् एक आने, सालममिसरी तीन<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>रत्ती, अजवायन तीन रत्ती, सौंफ तीन रत्ती, केशर एक रत्ती, वंशलोचन दो रत्ती, पद्मकाष्ठ तीन रत्ती, श्वेतचन्दन तीन रत्ती, लवङ्ग एक आने, छोटी इलायची दो रत्ती, दालचीनी तीन रत्ती, तेजपत्र तीन रत्ती, सफ़ेद मूसर तीन रत्ती, जेउफा दो रत्ती, गुलाबके फूल एक आने, जावित्री तीन रत्ती, बड़ी इलायची एक आने, धनिया एक आने, तेजबल एक आने, हरीतकी एक आने, गोक्षुरबीज एक आने और त्यौखर दो आने—इन समस्त द्रव्योंको पहले उत्तम रूपसे कूट डाले, पीछे आध सेर जल से भरे मट्टीके पात्रमें मृदु सन्तापसे पका और आध पाव बाक़ी रहनेपर नीचे उतार आधा सवेरे और आधा सन्ध्याको खाये। शिशुकी मात्रा एक परीके बरा-बर होती है। यदि इस औषधको एकबारगी ही अधिक दिनके लिये बनाना हो, तो सब चीजें ऊपर कही हुई मात्रामें तौला पहले क्वाथ प्रस्तुत करे। पीछे एक पाव क्वाथमें आध छटांकके हिसाबसे सीरा और आध छटांकके हिसाब से ही स्पिरिट मिला उसे रख छोड़े। इस औषधको खाते समय रोगी तीन-चार दिन अत्यन्त उष्ण जलसे नहाये। मांस, पूड़ी, रोटी, घृतपक्क द्रव्य, चने और मूंगकी दाल प्रभृति सुपथ्य खाना चाहिये। अम्ल निषिद्ध है, किन्तु आम्र खानेमें कोई वाधा नहीं लगती। रौद्र, रात्रिजागरण और स्त्री-संसर्ग अतिशय निषिद्ध है। इससे रक्त भली भांति परिष्कृत होता और कन्दर्प-जैसा रूप बन जाता है। जिन्होंने व्यर्थ विलायती सालसा खा राशि-राशि अर्थ बिगाड़ा है, वह इसे व्यवहार कर विशेष फल पायेंगे। अनेक दुःसाध्य रोगियोंपर इस औषधकी परीक्षा हो चुकी है। किन्तु जो यथोचित नियम न रखेगा, उसकी बात स्वतन्त्र है। अनन्तमूली (सं॰ स्त्री॰) १ दुरालभा, लटजीरा। २ रक्तदुरालभा, लाल लटजीरा। अनन्त-यज्वा कवीयसाता भट्ट—क्वष्ण भट्टाचार्य के पुत्र, गौतमीय पितृमेधसूत्र के टीकाकार। अनन्तयाज्ञिक—प्रतिज्ञासूत्र भाष्य नामसे कात्यायन-श्रौतसूत्रके भाष्यकार।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> swbv76n3u37xz9ti3kwglymgcm05mgv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४३१ 250 87729 668118 351941 2026-07-18T16:08:03Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668118 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''४२४'''|'''अनायत्तवृत्ति—अनार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनायत्तवृत्ति (सं॰ त्रि॰) स्वतन्त्र जीविका रखते हुवा, जिसका रोज़गार आज़ाद रहे। अनायत्तवृत्तिता (सं॰ स्त्री॰) स्वतन्त्रता, आज़ादी; मातहत न रहनेकी हालत। अनायन (सं॰ क्ली॰) न आयनं चालनमत्र। एकान्त, निराली जगह। अनायसाग्र (सं॰ त्रि॰) लोहेकी नोक न रखते हवा, जिसमें लोहेकी नोक न हो। अनायास (सं॰ पु॰) आ-यस् - घञ् – आयासः ; न आयासः, अभावार्थे नञ्-तत् । १ अक्लेश, कष्ट या • प्रयत्नका अभाव ; आराम, तकलीफका न पहुंचना । ( त्रि०) नास्ति आयासः प्रयत्न यत्र । २ क्ल ेशशून्य, बेतकलीफ। (अव्य०) ३ सरलतापूर्वक, आसानीसे । अनायासकृत (सं० की ० ) अनायासेन क्लशं विनैव कृतम्, नञ्-तत् । १ कषायविशेष, जोशान्दा । (त्रि०) : २ सरलतापूर्वक किया गया, जिसके करनेमें मुश्किल न पड़ौ हो । बल और aarya कौं अनायुध (सं० त्रि. ) आयुधरहित, बेहथियार; जो हथियार न रखता हो । अनायुषा ( स ० स्त्री० ) माताका नाम । अनायुष्य (सं० क्लो० ) आयुषे हितं आयुष-यत् ; न आयुष्यम्, नञ्-तत् । आयुष्य के पक्ष में अहितकर वस्तु, अकालमृत्यु लानेवाला द्रव्य; जो चीज़ उम्रकी नुकसान पहुंचाये या बेवक्त, मौतको लाये । ....अतिभोजन, अतिमैथुन प्रभृति अनायुष्य होते हैं, क्योंकि इनसे स्वास्था बिगड़ता और आयु कम पड़ती । भगवान् आत्रेयने आयुःक्षय और अकालमृत्युके सम्बन्धमें कहा है, WORD 1200 * । “श्रूयतामग्निवेशं ! यथा यानसमायुक्तॊऽचः प्रकृत्यं बाचगुणैः समेतः स्यात् । स च सर्वगुणोपपन्नों वाह्यमानो यथाकाल, स्वप्रमाण- चाव अवसानं गच्छेत् । तथायुः शरीरापगतं बलवतः प्रकृत्या यथावदुपचीयमान' स्वप्रमाणचयादेव अवसानं गच्छतौति, स मृत्य: काले । तथा च स एवात्तोऽतिभाराधिष्ठितत्वात् विषमपथादपथाञ्च, अचचक्रभङ्गात् ह्य वाहकदोषात्, आणिमचात्, अनुपाङ्गात्, पर्यासनाञ्च अन्तराव्यसनमापद्यते । "तथायुः अयथाबलमारम्भात्, "अयर्थाग्न्यवहारात्, 'विषमाभ्यवहारात्, अति- मेथ नात्,´ उदीर्णवैमविधारणात् विषमशरीरन्यासात् श्रतिश्रवात्, असे | j संश्रयात्, आहारप्रतीकारवज नांतु अन्तरा भूतविष वायग्न्ये पघातात्, व्यापद्यते । स मृत्यु ुरकाले ।” ( चरक संहिता ) 'अग्निवेश ! सुनिये। जैसे गाड़ी स्वभावतः:. अच्छो होने और नियमित रूपसे चलने पर अल्प- अल्प बिगड़कर क्रमसे अनेक दिन बाद टूटती, परमायुकाः भी ठीक वैसा ही हाल है । सुस्थ और बलवान् व्यक्तिके शरीरको यथानियम चलानेसे क्रम-क्रम उसके क्षयमें: कितने ही दिन लग जाते हैं । यही कालमृत्यु कह- · लाती है । दूसरे गाड़ी अधिक बोझ भरने, ऊंचे-नीचे पथमें चलाने, पहिया टूटने, वाह्यवाहकका दोष: होने, पहियेका कोला उखड़ने, धुरोमें तेल न देने या अधिक पथ चलनेपर नियमित कालसे पहले ही जैसे • बिगड़ जातो, परमायुकी भी वैसी ही बात है । बलके - अतिरिक्त काम करने, अयथा आग तापने, अति भोजन पाने, अधिक मैथुन मचाने, मलमूत्रादिका वेंग रोकने, कष्टसाध्य व्यायामादि बढ़ाने, शरीरमें आघात लगने, असत् संश्रय साधने, भूत और विषम वायु एवं अग्निका उपघात उठने और आहारका 'प्रतीकार पठानेपर नियमित कालसे पहले ही मृत्यु आ जाती है। इसे अकाल मृत्यु, कहते हैं ।' अनार (फ़ा० पु० ) दाड़िम । ( Punica granatum): इसके संस्कृतमें निम्नलिखित पर्याय हैं, करकः, पिण्डपुष्प, दाडिम्ब पर्वरुट, स्वाद्दम्ल, पिण्डोर, शूक- वल्लभ इत्यादि । इसको बंगला में - डालिम्, मराठी में :-दाड़िम, कनाडीमें- दाड़िम्ब, तेलंगीमें - डानिम्मचेहु- उत्कल में - दालिम्ब, तामिलमें- मादल इचेहेडिड और गुजराती भाषामें डालम कहते हैं। यह एक छोटा वृक्ष है, जो ईरान, कुर्दस्तान, अफगानिस्तान और बलूचिस्तानको पथरोलो जमीनमें जङ्गली : तौर से पैदा होता और भारतवर्ष में सब जगह लगाया जाता है। इसको उचाई कोई पांच छः गज रहती और टहनीमें बारीक कांटा होता है। पुष्प रक्त लगता और फलके ऊपर कड़ा बकला रहता है । फलसे रसोले लाल या सफ़ेद दाने निकलते, जो खानेमें मौठे या खटमिट्टे मालूम पड़ते हैं । ग्रो- ऋतुमें लोग अनारका शर्बत बनाते, जो पोनेमें अत्यन्तः<noinclude></noinclude> 52p8md2s0cll8jduh60988hkh38fkjl 668120 668118 2026-07-18T16:42:15Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668120 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४२४'''|'''अनायत्तवृत्ति—अनार'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनायत्तवृत्ति (सं॰ त्रि॰) स्वतन्त्र जीविका रखते हुवा, जिसका रोज़गार आज़ाद रहे। अनायत्तवृत्तिता (सं॰ स्त्री॰) स्वतन्त्रता, आज़ादी; मातहत न रहनेकी हालत। अनायन (सं॰ क्ली॰) न आयनं चालनमत्र। एकान्त, निराली जगह। अनायसाग्र (सं॰ त्रि॰) लोहेकी नोक न रखते हवा, जिसमें लोहेकी नोक न हो। अनायास (सं॰ पु॰) आ-यस्-घञ्—आयासः; न आयासः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ अक्लेश, कष्ट या प्रयत्नका अभाव; आराम, तकलीफ़का न पहुंचना। (त्रि॰) नास्ति आयासः प्रयत्नं यत्र। २ क्लेशशून्य, बेतकलीफ़। (अव्य॰) ३ सरलतापूर्वक, आसानीसे। अनायासकृत (सं॰ क्ली॰) अनायासेन क्लेशं विनैव कृतम्, नञ्-तत्। १ कषायविशेष, जोशान्दा। (त्रि॰) २ सरलतापूर्वक किया गया, जिसके करनेमें मुश्किल न पड़ी हो। अनायुध (सं॰ त्रि॰) आयुधरहित, बेहथियार; जो हथियार न रखता हो। अनायुषा (सं॰ स्त्री॰) बल और वृत्रासुरकी माताका नाम। अनायुष्य (सं॰ क्ली॰) आयुषे हितं आयुष-यत्; न आयुष्यम्, नञ्-तत्। आयुष्यके पक्षमें अहितकर वस्तु, अकालमृत्यु लानेवाला द्रव्य; जो चीज़ उम्रको नुक़सान पहुंचाये या बेवक्त मौतको लाये। अतिभोजन, अतिमैथुन प्रभृति अनायुष्य होते हैं, क्योंकि इनसे स्वास्था बिगड़ता और आयु कम पड़ती है। भगवान् आत्रेयने आयुःक्षय और अकालमृत्युके सम्बन्धमें कहा है,— <small>"श्रूयतामग्निवेश! यथा यानसमायुक्तॊऽक्षः प्रकृत्यैवाक्षगुणैः समेतः स्यात्। स च सर्वगुणोपपन्नों वाह्यमानो यथाकालं, स्वप्रमाण-क्षयादेव अवसानं गच्छेत्। तथायुः शरीरापगतं बलवतः प्रकृत्या यथावदुपचीयमानं एवाप्रमाणक्षयादेव अवसानं गच्छतीति, स मृत्यः काले। तथा च स एवाक्षोऽतिभाराधिष्ठितत्वात् विषमपथादपथाञ्च, अक्षचक्रभङ्गात्, वाह्यवाहकदोषात्, आणिमोक्षात्, अनुपाङ्गात्, पर्यासनाच्च अन्तराव्यसनमापद्यते। तथायुः अयथाबलमारम्भात्, अयर्थाग्न्यवहारात्, विषमाभ्यवहारात्, अतिमैथ नात्, उदीर्णवैमविधारणात् विषमशरीरन्यासात् अतिघोवात्, असत्-</small><noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude><small>संश्रयात्, भूतविष-वायूग्न्यु पघातात्, आहारप्रतीकारवर्ज नात् अन्तरा व्यापद्यते। स मृत्यु रकाले। (चरकसंहिता)</small> 'अग्निवेश! सुनिये। जैसे गाड़ी स्वभावतः अच्छी होने और नियमित रूपसे चलनेपर अल्प-अल्प बिगड़कर क्रमसे अनेक दिन बाद टूटती, परमायुका भी ठीक वैसा ही हाल है। सुस्थ और बलवान् व्यक्तिके शरीरको यथानियम चलानेसे क्रम-क्रम उसके क्षयमें कितने ही दिन लग जाते हैं। यही कालमृत्यु कहलाती है। दूसरे गाड़ी अधिक बोझ भरने, ऊंचे-नीचे पथमें चलाने, पहिया टूटने, वाह्यवाहकका दोष होने, पहियेका कीला उखड़ने, धुरीमें तेल न देने या अधिक पथ चलनेपर नियमित कालसे पहले ही जैसे बिगड़ जाती, परमायुकी भी वैसी ही बात है। बलके अतिरिक्त काम करने, अयथा आग तापने, अति भोजन पाने, अधिक मैथुन मचाने, मलमूत्रादिका वेग रोकने, कष्टसाध्य व्यायामादि बढ़ाने, शरीरमें आघात लगने, असत् संश्रय साधने, भूत और विषम वायु एवं अग्निका उपघात उठने और आहारका प्रतीकार पठानेपर नियमित कालसे पहले ही मृत्यु आ जाती है। इसे अकाल मृत्यु कहते हैं।' अनार (फ़ा॰ पु॰) दाड़िम। (Punica granatum) इसके संस्कृतमें निम्नलिखित पर्याय हैं,—करकः, पिण्डपुष्प, दाडिम्ब पर्वरुट्, स्वाद्वम्ल, पिण्डीर, शूकवल्लभ इत्यादि। इसको बंगलामें—डालिम्, मराठीमें—दाड़िम, कनाडीमें—दाड़िम्ब, तेलंगीमें—डानिम्मचेट्टु, उत्कलमें—दालिम्ब, तामिलमें—मादल इचेहेडिड और गुजराती भाषामें डालम कहते हैं। यह एक छोटा वृक्ष है, जो ईरान, कुर्दस्तान, अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तानकी पथरीली ज़मीनमें जङ्गली तौरसे पैदा होता और भारतवर्षमें सब जगह लगाया जाता है। इसकी उंचाई कोई पांच छः गज़ रहती और टहनीमें बारीक कांटा होता है। पुष्प रक्त लगता और फलके ऊपर कड़ा बकला रहता है। फलसे रसीले लाल या सफ़ेद दाने निकलते, जो खानेमें मीठे या खटमिट्टे मालूम पड़ते हैं। ग्रीष्म ऋतुमें लोग अनारका शर्बत बनाते, जो पीनेमें अत्यन्त<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ap558rsjwf7tvjdewyk0kme5tdlefq0 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४३२ 250 87730 668169 351942 2026-07-19T03:56:13Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668169 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनार—अनारी'''|'''४२५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मधुर लगता और हृदयको शीतल कर बल बढ़ाता है। अनारके ३ भेद होते हैं:— (१) स्वाद, (२) स्वादु एवं अम्ल, और (३) केवल अम्ल। इन तीनोंके गुण भावप्रकाशमें इस प्रकार बतलाए गए हैं:— १—स्वादु (मीठा):— तीनो दोष हरता, तृष्णा, दाह, ज्वरको दूर करता, हृदय, कण्ठ और मुखकी दुर्गन्धको निकालता; फिर वीर्यवर्धक, लघु, किञ्चित्कषाय रसयुक्त, ग्राही, स्निग्ध, मेधा तथा बलको बढ़ानेवाला है। २—स्वादु एवं अम्ल अर्थात् खटमिट्ठा:—जठराग्नि को दीप्त करनेवाला होता है। ३—अम्ल (खट्टा):—पित्तको पैदा, वात और कफको दूर करनेवाला है। इसकी जड़ कृमियोंको नष्ट करती है। अनारका फूल भारतवर्षके विभिन्न स्थानोंमें कपड़ेपर लाल रङ्ग चढ़ानेके काम आता है। किन्तु रङ्ग टिकता नहीं, कच्चा होनेसे जल्द उड़ जाता है। इसका कसैला बकला रङ्ग चढ़ानेको क़ीमती सामान है, जो हलदी या नीलके रङ्गमें भी पड़ता है। अकेला बकला कपड़ेपर हरा-जैसा रङ्ग लाता, जिसे लोग युक्तप्रदेशमें काकरज़ी कहते हैं। जब बकला रङ्ग चढ़ानेके काम आता, तब उसे पानीमें डाल ख़ूब उबालते और चौथाई पानी बच जानेपर भट्टीसे उतारते हैं। इसके बाद कपड़ेको उस खिंचे हुये काढ़े में डुबा देते हैं। यद्यपि बकला कपड़ा रंगने के काम आता, तथापि चमड़े पर उसका रङ्ग बहुत अच्छा चढ़ता है। टञ्जीयर्सका मोरोक्को नामक चमड़ा इससे अधिक सिझाया जाता है। युक्तप्रदेशके जङ्गलसे अनारका कितना ही बकला विलायत भेजते हैं। अनार बहुत पुराने समय से अपने स्वाद और गुणके लिये प्रसिद्ध है। इसका ताज़ा रस ठण्डाईका असली मसाला है और अजीर्णके औषधमें भी डाला जाता है, इसकी जड़को केंचुयेकी अक्सीर दवा समझते थे। इसका रस बलवर्धक, गोंद सुपुष्ट, कली-फूल ख़ून रोकने और ज़ख्म भरनेवाला होता है। अनारका क़लम भी लगाते हैं। साल-साल खाद डालनेसे फल अच्छा निकलता है। २ आतिशबाज़ी। अनार-जैसे मट्टीके एक गोलेमें लोहेका बुरादा और बारूद भर ऊपर काग़ज़ से मुंह बन्द कर देते हैं। जैसे ही मुंहपर आग लगाते, वैसे ही चिनगारियां पेड़की शक्लमें फट पड़ती और चारो ओर फूल-जैसे झड़ने लगते हैं। अनारत (सं॰ क्ली॰) आ-रम्-क्त आरतं विरतिः, अत्यन्ताभावे नञ्-तत्। १ सतत, अविरत, अनवरत। (त्रि॰) बहुव्री॰। २ अनवरतयुक्त, मुदामी; जो सदा बना रहे। (अव्य॰) ३ सदा, हमेशा। अनारदाना (फ़ा॰ पु॰) अम्ल दाड़िमका वीज, खट्टे अनारका दाना। इसे लोग सुखाकर अपने पास रखते हैं। अनारभ्य (सं॰ अव्य॰) आ-रम्-ल्यप्, आरभ्य। १ विना आरम्भ, शुरू न करके। (त्रि॰) नञ्-तत्। २ आरम्भ होनेके अयोग्य, शुरू करनेके नाक़ाबिल। अनारभ्यत्व (सं॰ क्ली॰) आरम्भ होनेकी असम्भवता, शुरू करनेका महाल; हालत जिसमें कोई काम शुरू करना मुमकिन न हो। अनारभ्याधीत (सं॰ त्रि॰) न आरभ्य किञ्चिद् अधीतम्। पृथक् विषयकी भांति पढ़ा गया, जो अलग करके पढ़ा हुवा हो। इसका उल्लेख वर्तमान है, कि वैदिक कार्यमें वेदके कोई-कोई मन्त्र किसी कर्ममें विनियोग पाते हैं। किन्तु अनेक स्थलमें फिर विनियोगकी कोई बात नहीं लिखी। उस स्थलमें मन्त्रका अनारभ्य अर्थात् किञ्चित् अनधिकृत्य अधीत कहाता है। अनारम्भ (सं॰ पु॰) न आरम्भः, अभावार्थे नञ्-तत्। आरम्भका अभाव, अनुष्ठानका न ठनना; आग़ाजकी नामौजूदगी, शुरूका न होना। (त्रि॰) २ आरम्भ-रहित, बेआग़ाज, जिसका शुरू न रहे। अनारम्भण (वै॰ त्रि॰) १ असहाय, बेसहारा। २ अस्पृश्य, ग़ैर-महसूस; छूने या टटोलनेसे मालूम न होनेवाला। अनारी (हिं॰ वि॰) १ अनारका, अनार-जैसे रङ्गवाला। २ मूर्ख, बेवक़ूफ़। (पु॰) ३ कपोत<noinclude></noinclude> bi1silwgmdutja7zcqecrllnuels0eh 668170 668169 2026-07-19T03:58:28Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668170 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनार—अनारी'''|'''४२५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>मधुर लगता और हृदयको शीतल कर बल बढ़ाता है। अनारके ३ भेद होते हैं:— (१) स्वाद, (२) स्वादु एवं अम्ल, और (३) केवल अम्ल। इन तीनोंके गुण भावप्रकाशमें इस प्रकार बतलाए गए हैं:— १—स्वादु (मीठा):— तीनो दोष हरता, तृष्णा, दाह, ज्वरको दूर करता, हृदय, कण्ठ और मुखकी दुर्गन्धको निकालता; फिर वीर्यवर्धक, लघु, किञ्चित्कषाय रसयुक्त, ग्राही, स्निग्ध, मेधा तथा बलको बढ़ानेवाला है। २—स्वादु एवं अम्ल अर्थात् खटमिट्ठा:—जठराग्नि को दीप्त करनेवाला होता है। ३—अम्ल (खट्टा):—पित्तको पैदा, वात और कफको दूर करनेवाला है। इसकी जड़ कृमियोंको नष्ट करती है। अनारका फूल भारतवर्षके विभिन्न स्थानोंमें कपड़ेपर लाल रङ्ग चढ़ानेके काम आता है। किन्तु रङ्ग टिकता नहीं, कच्चा होनेसे जल्द उड़ जाता है। इसका कसैला बकला रङ्ग चढ़ानेको क़ीमती सामान है, जो हलदी या नीलके रङ्गमें भी पड़ता है। अकेला बकला कपड़ेपर हरा-जैसा रङ्ग लाता, जिसे लोग युक्तप्रदेशमें काकरज़ी कहते हैं। जब बकला रङ्ग चढ़ानेके काम आता, तब उसे पानीमें डाल ख़ूब उबालते और चौथाई पानी बच जानेपर भट्टीसे उतारते हैं। इसके बाद कपड़ेको उस खिंचे हुये काढ़े में डुबा देते हैं। यद्यपि बकला कपड़ा रंगने के काम आता, तथापि चमड़े पर उसका रङ्ग बहुत अच्छा चढ़ता है। टञ्जीयर्सका मोरोक्को नामक चमड़ा इससे अधिक सिझाया जाता है। युक्तप्रदेशके जङ्गलसे अनारका कितना ही बकला विलायत भेजते हैं। अनार बहुत पुराने समय से अपने स्वाद और गुणके लिये प्रसिद्ध है। इसका ताज़ा रस ठण्डाईका असली मसाला है और अजीर्णके औषधमें भी डाला जाता है, इसकी जड़को केंचुयेकी अक्सीर दवा समझते थे। इसका रस बलवर्धक, गोंद सुपुष्ट, कली-फूल ख़ून रोकने और ज़ख्म भरनेवाला होता है।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अनारका क़लम भी लगाते हैं। साल-साल खाद डालनेसे फल अच्छा निकलता है। २ आतिशबाज़ी। अनार-जैसे मट्टीके एक गोलेमें लोहेका बुरादा और बारूद भर ऊपर काग़ज़ से मुंह बन्द कर देते हैं। जैसे ही मुंहपर आग लगाते, वैसे ही चिनगारियां पेड़की शक्लमें फट पड़ती और चारो ओर फूल-जैसे झड़ने लगते हैं। अनारत (सं॰ क्ली॰) आ-रम्-क्त आरतं विरतिः, अत्यन्ताभावे नञ्-तत्। १ सतत, अविरत, अनवरत। (त्रि॰) बहुव्री॰। २ अनवरतयुक्त, मुदामी; जो सदा बना रहे। (अव्य॰) ३ सदा, हमेशा। अनारदाना (फ़ा॰ पु॰) अम्ल दाड़िमका वीज, खट्टे अनारका दाना। इसे लोग सुखाकर अपने पास रखते हैं। अनारभ्य (सं॰ अव्य॰) आ-रम्-ल्यप्, आरभ्य। १ विना आरम्भ, शुरू न करके। (त्रि॰) नञ्-तत्। २ आरम्भ होनेके अयोग्य, शुरू करनेके नाक़ाबिल। अनारभ्यत्व (सं॰ क्ली॰) आरम्भ होनेकी असम्भवता, शुरू करनेका महाल; हालत जिसमें कोई काम शुरू करना मुमकिन न हो। अनारभ्याधीत (सं॰ त्रि॰) न आरभ्य किञ्चिद् अधीतम्। पृथक् विषयकी भांति पढ़ा गया, जो अलग करके पढ़ा हुवा हो। इसका उल्लेख वर्तमान है, कि वैदिक कार्यमें वेदके कोई-कोई मन्त्र किसी कर्ममें विनियोग पाते हैं। किन्तु अनेक स्थलमें फिर विनियोगकी कोई बात नहीं लिखी। उस स्थलमें मन्त्रका अनारभ्य अर्थात् किञ्चित् अनधिकृत्य अधीत कहाता है। अनारम्भ (सं॰ पु॰) न आरम्भः, अभावार्थे नञ्-तत्। आरम्भका अभाव, अनुष्ठानका न ठनना; आग़ाजकी नामौजूदगी, शुरूका न होना। (त्रि॰) २ आरम्भ-रहित, बेआग़ाज, जिसका शुरू न रहे। अनारम्भण (वै॰ त्रि॰) १ असहाय, बेसहारा। २ अस्पृश्य, ग़ैर-महसूस; छूने या टटोलनेसे मालूम न होनेवाला। अनारी (हिं॰ वि॰) १ अनारका, अनार-जैसे रङ्गवाला। २ मूर्ख, बेवक़ूफ़। (पु॰) ३ कपोत<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Left|107|5em}}</noinclude> p1itolsssbc5q5k5qc5u18plqb7s5m0 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४३३ 250 87732 668171 351944 2026-07-19T04:01:27Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668171 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''४२६'''|'''अनारुह्य—अनार्तव'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>विशेष, लाल आंखका कबूतर। ४ मिष्टान्न विशेष, एक पकवान । यह एक तरहका तिकोना है, जिसमें मोठी या नमकीन चीजें भरते हैं । अनारुह्य (सं० अव्य०) आरोहण न करके, विना चढ़े । अनारोग्य (सं० क्लो० ) न आरोग्यम्, नञ-तत् । १ आरोग्यका अभाव, तन्दुरुस्तीका न रहना । (त्रि०) नास्ति आरोग्यं यस्मात्, ५- बहुव्री० । २ आरोगा न रखनेवाला, पौड़ादायक ; जो तन्दुरुस्तीमें खुलल डाले । अनार्जव (सं० पु० ) ऋजोर्भाव: आर्जवं सरलता स्वाच्छन्द्यं वा ; न श्रर्जवम्, अभावार्थे नञ-तत् । १ आर्जव, सरलता या स्वाच्छन्दाका अभाव ; सिधाई- का न होना । २ रोग, आज़ार । (त्रि० ) नास्ति आर्जवं यस्य, अभावायें अव्ययो० । ३ कुटिल, टेढ़ा | ४ नीरोग, बोमारीसे बयोद | अनार्तव (सं० त्रि०) ऋतु: स्त्री-कुसुमं तस्य भावः, ऋतु-अण् ; नञ्-तत् । ऋतोरण् । पा ५।१।१०५। १ अनुत्- पन्न रजः, रजोबध ; जिस स्त्रीको महीना न होता हो । २ बेफ़स्ल, ऋतुरहित जो मौसमके मुवाफ़िक न हो । : यह अनार्तव (Amenorrhoea) पोड़ा तीन प्रकारको होती है । प्रथम - एक कालसे ऋतुका अभाव, द्वितीय- भीतर निःसृत होते भी बाहर रजःका प्रकाशन पाना, और तृतीय — ऋतु निकल पोछे बन्द हो जाना । स्त्रीका यौवन काल श्रनेपर जरायुसे रजोनिःसरण होने लगता है । इसे ही हम ऋतु कहते हैं । ऋतु प्रत्येक चन्द्रमासमें अर्थात् २८-२० दिन बाद प्रकाश पाता । हमारे इस उष्णप्रधान देशमें तेरह वर्षके वयःक्रमसे सोलह वर्षके वयस पर्यन्त खाभा- • विक ऋतुका काल रहता है। किन्तु सचराचर कोई चौदह-पन्द्रह वर्षके वयसमें ही ऋतु आने लगता है । दूसरे किसी-किसीका रजः नौ-दश वर्ष में हो प्रकाश पाते देखते हैं । शीतप्रधान देशमें कुछ विलम्बसे ऋतु जारौ होता है। किन्तु फिर भी चौदह और सोलह वर्षके भीतर ही अनेकका रजः निकलने लगता है। इस देशमें बालिकाका दश-बारह वर्षपर रजः निकलता है। किसोका बीस-बाईस वर्षमें भी ऋतु कभी-कभी लगता है । किन्तु अनेकको जन्मावच्छिन्न ऋतु नहीं होता । ऐसी अवस्था में जन्मावधि जननेन्द्रियमें कोई न कोई दोष रह सकता है। सम्भव है, कि अण्डाधार एकबारगी हो गुम हो गया हो। किसीका तो नितान्त . क्षुद्र अण्डाधार होता है और ग्राफियान भेसिकिलका (graafian vesicles ) चिह्नमात्र भौ नहीं रहता । . दूसरे, अनेक स्त्रियोंके अण्डाधार और ग्राफ़ियान भेसि- किल दोनो होते हैं, किन्तु जरायु नितान्त क्षुद्र या बिलकुल नहीं भी रहता । द्वितीय प्रकार के अनार्तव रोगमें रजः भीतर निकलता है, किन्तु जरायुका मुख बन्द रहनेसे बाहर नहीं जा सकता। ऐसी अवस्थामें ठीक अन्तः सत्त्वा की तरह जरायु बढ़ा करता है। उस समय यह मीमांसा करना कठिन है, कि यथार्थ गर्भावस्था या पोड़ाके कारण उदर बढ़ रहा है। क्योंकि क्षत रहनेसे गर्भावस्थामें भी जरायुका मुंह जुड़ कर बन्द हो सकता है । यदि यथार्थ ही भीतर रक्त निकला करता, तो उसे बाहर लाना आवश्यक है । जरायुका मुख सामान्य पतले चर्मसे बन्द हो जानेपर विष्टोरी किंवा साउण्ड शलाका द्वारा छेदकर सहज में रक्त बाहर निकाल सकते हैं । किन्तु जरायुका मुख कठिन चर्मसे बन्द होनेपर ट्रोकार द्वारा छेदकर रक्त निकाल डालना चाहिये। उसके बाद बूजी या स्पन्जटेण्टका व्यवहार बढ़ानेसे फिर जरायुका मुख बन्द न होगा । तृतीय प्रकारका अनावर्त रोग हो अधिक देख पड़ता ; यौवनकाल झलकनेसे पहले एकबार ऋतु लगता है, उसके बाद फिर रजः देखनेमें नहीं आता। किसी-किसीको दो-तीन मास किंवा यथा- नियम दो-तीन वर्ष पर्यन्त ठोक मास मास ऋतु होता, पौछे हठात् रजः बन्द हो जाता है । अत्यन्त मनस्ताप, स्नायुके आघात, कासरोग, दुर्बलता, अतिशय शीतल द्रव्य व्यवहार प्रभृति अनेक प्रकार के कारणोंसे यह उपसर्ग उठता है । वृक्क (kidney) या गुर्देकी पीड़ासे भी रजोरोध हो सकता है ।<noinclude></noinclude> rk18i8qgrg2yo5ngfs6qb8kmnhpajlw 668174 668171 2026-07-19T04:24:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668174 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४२६'''|'''अनारुह्य—अनार्तव'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>विशेष, लाल आंखका कबूतर। ४ मिष्टान्न विशेष, एक पकवान। यह एक तरहका तिकोना है, जिसमें मीठी या नमकीन चींजें भरते हैं। अनारुह्य (सं॰ अव्य॰) आरोहण न करके, विना चढ़े। अनारोग्य (सं॰ क्ली॰) न आरोग्यम्, नञ-तत्। १ आरोग्यका अभाव, तन्दुरुस्तीका न रहना। (त्रि॰) नास्ति आरोग्यं यस्मात्, ५-बहुव्री॰। २ आरोगा न रखनेवाला, पीड़ादायक; जो तन्दुरुस्तीमें ख़लल डाले। अनार्जव (सं॰ पु॰) ऋजोर्भावः आर्जवं सरलता स्वाच्छन्द्यं वा; न आर्जवम्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ आर्जव, सरलता या स्वाच्छन्दाका अभाव; सिधाईका न होना। २ रोग, आज़ार। (त्रि॰) नास्ति आर्जवं यस्य, अभावार्थें अव्ययी॰। ३ कुटिल, टेढ़ा। ४ नीरोग, बीमारीसे बयीद। अनार्तव (सं॰ त्रि॰) ऋतुः स्त्री-कुसुमं तस्य भावः, ऋतु-अण्; नञ्-तत्। <small>ऋतोरण्। पा ५।१।१०५।</small> १ अनुत्-पन्न रजः, रजोबद्ध; जिस स्त्रीको महीना न होता हो। २ बेफ़स्ल, ऋतुरहित; जो मौसमके मुनाफ़िक़ न हो। अनार्तव (Amenorrhoea) पीड़ा तीन प्रकारकी होती है। प्रथम—एककालसे ऋतुका अभाव, द्वितीय—भीतर निःसृत होते भी बाहर रजःका प्रकाश न पाना, और तृतीय—ऋतु निकल पीछे बन्द हो जाना। स्त्रीका यौवन-काल आनेपर जरायुसे रजोनिःसरण होने लगता है। इसे ही हम ऋतु कहते हैं। यह ऋतु प्रत्येक चन्द्रमासमें अर्थात् २८-२९ दिन बाद प्रकाश पाता है। हमारे इस उष्णप्रधान देशमें तेरह वर्षके वयःक्रमसे सोलह वर्षके वयस पर्यन्त स्वाभाविक ऋतुका काल रहता है। किन्तु सचराचर कोई चौदह-पन्द्रह वर्षके वयसमें ही ऋतु आने लगता है। दूसरे किसी-किसीका रजः नौ-दश वर्ष में ही प्रकाश पाते देखते हैं। शीतप्रधान देशमें कुछ विलम्बसे ऋतु जारी होता है। किन्तु फिर भी चौदह और सोलह वर्षके भीतर ही अनेकका रजः निकलने लगता है। इस देशमें बालिकाका दश-बारह वर्षपर रजः निकलता है। कभी-कभी किसीका बीस-बाईस वर्षमें भी ऋतु लगता है। किन्तु अनेकको जन्मावच्छिन्न ऋतु नहीं होता। ऐसी अवस्थामें जन्मावधि जननेन्द्रियमें कोई न कोई दोष रह सकता है। सम्भव है, कि अण्डाधार एकबारगी ही गुम हो गया हो। किसीका तो नितान्त क्षुद्र अण्डाधार होता है और ग्राफ़ियान भेसिकिलका (graafian vesicles) चिह्नमात्र भी नहीं रहता। दूसरे, अनेक स्त्रियोंके अण्डाधार और ग्राफ़ियान भेसिकिल दोनो होते हैं, किन्तु जरायु नितान्त क्षुद्र या बिलकुल नहीं भी रहता। द्वितीय प्रकारके अनार्तव रोगमें रजः भीतर निकलता है, किन्तु जरायुका मुख बन्द रहनेसे बाहर नहीं जा सकता। ऐसी अवस्थामें ठीक अन्तः सत्त्वाकी तरह जरायु बढ़ा करता है। उस समय यह मीमांसा करना कठिन है, कि यथार्थ गर्भावस्था या पीड़ाके कारण उदर बढ़ रहा है। क्योंकि क्षत रहनेसे गर्भावस्थामें भी जरायुका मुंह जुड़ कर बन्द हो सकता है। यदि यथार्थ ही भीतर रक्त निकला करता, तो उसे बाहर लाना आवश्यक है। जरायुका मुख सामान्य पतले चर्मसे बन्द हो जानेपर विष्टोरी किंवा साउण्ड शलाका द्वारा छेदकर सहजमें रक्त बाहर निकाल सकते हैं। किन्तु जरायुका मुख कठिन चर्मसे बन्द होनेपर ट्रोकार द्वारा छेदकर रक्त निकाल डालना चाहिये। उसके बाद बूजी या स्पञ्जटेण्टका व्यवहार बढ़ानेसे फिर जरायुका मुख बन्द न होगा। तृतीय प्रकारका अनावर्त रोग ही अधिक देख पड़ता; यौवनकाल झलकनेसे पहले एकबार ऋतु लगता है, उसके बाद फिर रजः देखनेमें नहीं आता। किसी-किसीको 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सरलता स्वाच्छन्द्यं वा; न आर्जवम्, अभावार्थे नञ्-तत्। १ आर्जव, सरलता या स्वाच्छन्दाका अभाव; सिधाईका न होना। २ रोग, आज़ार। (त्रि॰) नास्ति आर्जवं यस्य, अभावार्थें अव्ययी॰। ३ कुटिल, टेढ़ा। ४ नीरोग, बीमारीसे बयीद। अनार्तव (सं॰ त्रि॰) ऋतुः स्त्री-कुसुमं तस्य भावः, ऋतु-अण्; नञ्-तत्। <small>ऋतोरण्। पा ५।१।१०५।</small> १ अनुत्-पन्न रजः, रजोबद्ध; जिस स्त्रीको महीना न होता हो। २ बेफ़स्ल, ऋतुरहित; जो मौसमके मुनाफ़िक़ न हो। अनार्तव (Amenorrhoea) पीड़ा तीन प्रकारकी होती है। प्रथम—एककालसे ऋतुका अभाव, द्वितीय—भीतर निःसृत होते भी बाहर रजःका प्रकाश न पाना, और तृतीय—ऋतु निकल पीछे बन्द हो जाना। स्त्रीका यौवन-काल आनेपर जरायुसे रजोनिःसरण होने लगता है। इसे ही हम ऋतु कहते हैं। यह ऋतु प्रत्येक चन्द्रमासमें अर्थात् २८-२९ दिन बाद प्रकाश पाता है। हमारे इस उष्णप्रधान देशमें तेरह वर्षके वयःक्रमसे सोलह वर्षके वयस पर्यन्त स्वाभाविक ऋतुका काल रहता है। किन्तु सचराचर कोई चौदह-पन्द्रह वर्षके वयसमें ही ऋतु आने लगता है। दूसरे किसी-किसीका रजः नौ-दश वर्ष में ही प्रकाश पाते देखते हैं। शीतप्रधान देशमें कुछ विलम्बसे ऋतु जारी 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/>{{Rh||'''अनार्तव—अनार्य'''|'''४२७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनार्तव रोगकी चिकित्सा करनेके लिये पहिले उसका सच्चा कारण जानना आवश्यक है। कारणको हटा न सकनेसे पीड़ा शान्त होनेकी आशा कहां रखी है! यद्यपि जन्मावधि जननेन्द्रियमें कोई न कोई दोष रहता है, फिर भी एकबारगी ही रोगकी शान्ति करना मनुष्यका काम नहीं होता। किन्तु इस प्रकारकी अवस्था में स्त्रीको जो सकल यन्त्रणा उठाना पड़ती, उसका निवारण निकाल सकते हैं। डाक्टर टेनरने एक स्त्रीका विषय लिखा है। उसे तीस वर्ष वयःक्रम पर्यन्त एकबार भी ऋतु न लगा, मध्य-मध्यमें रजोनिःसरणका उद्वेग उठा, किन्तु रक्त बाहर न निकला था। उस उद्वेग के समय पेड़ूमें अत्यन्त भार पड़ता और असह्य यन्त्रणा उठ खड़ी होती है। निद्राकर औषध खिलानेसे वेदनाका उपशम नहीं उठता और न रात्रिके मध्यमें एक बार भी काकनिद्रा लगती। अनार्तव में इस प्रकारकी यन्त्रणा उठनेपर वस्तिदेशकी दोनो ओर गर्म जलका सेक दिलाये और अण्डाधारपर जोंक चिपकाये। गर्म जलसे हौज़ भर रोगिणीको मध्य-मध्य उसमें बैठने कहे। खानेकी औषधमें अफीम या मरफ़िया ही सबसे श्रेष्ठ है। कर्पूरके साथ चौथायी ग्रेनकी मात्रामें परिष्कृत अफीमका सार सोते समय खिलाना चाहिये। जननेन्द्रियकी बनावटका दोष न दौड़नेसे रोगका प्रतीकार पड़ सकता है। रोगिणीको सबल रहने से मध्य-मध्य गर्म जलमें बैठाये। उसके सिवा पित्त-निःसारक और विरेचक औषध ही श्रेष्ठ है। सोनामाखी, गाम्बोज, पडोफिलिन् टाराक्षेकम्, मुसब्बर प्रभृति औषधका सेवन साधनेसे विशेष फल देख पड़ता है। हीराकश एक रत्ती और मिल्-एलोपेट मार डेढ़ रत्ती एकत्र मिला एक गोली बांधे। यह गोली प्रत्यह तीन बार खिलाये। फ़ेरि रिडेक्टायी पन्द्रह रत्ती, पिल एलोपेट मार सोलह रत्ती और कुचलेका सार दो रत्ती एकत्र मिलाकर बारह गोली बनाये। ऐसी ही तीन गोली प्रत्यक्ष खिलाना चाहिये। चिकित्साके ससय रोगिणी जिससे सबल रहे, वैसा ही पुष्टिकर और बलाधान द्रव्य खिलाया करते हैं । अनार्तव रोगके साथ क्षय, कास प्रभृति अन्य कोई पौड़ा वर्तमान रहनेसे उसका प्रतीकार पहुंचाने की चेष्टा चलाना चाहिये । अनार्तवजल (सं० क्लो० ) पौषादिमासचतुष्टयमें पड़ा दृष्टिका जल, पूस वगैरह चार महोनेमें हुवा बारिश- का पानी । यह वातादि दोषको जगा देता है,- " अनार्तवं प्रमुञ्चन्ति वारि वारिधरास्तु यत् । तत्त्वदोषाय सर्वेषां देहिनां परिकीर्तितम् ॥” : ( भावप्रकाश पू० वारिव० ) . 'बादलसे जो माहुट होतो, वह सब लोगोंमें त्रि- दोष उत्पन्न कर देती है ।' अनार्तवा (सं० स्त्री० ) १ रजः शून्या, जिस औरतको महोना न होता हो । २ योनिपीड़ाविशेष, योनिको एक बीमारी । अनार्तव देख अनार्त्विजीन (सं० त्रि०) पुरोहित होनेके प्रयोगा, काज़ी बननेके नाकाबिल । अनार्य (सं० त्रि० ) न आर्य, नञ - तत् । श्रार्य नहीं, असत्कुल जात, अप्रधान, असाधु, अभद्र, असच्चरित्र; बड़ा नहीं, कमीना, हकीर, बदमाश, नङ्गा, बिगड़ैल | प्राकृत भाषा में अनार्य की जगह " अणज्ज" लिखते हैं, - "तहवि तेन रराणा सउन्दलाए अणञ्ज' आचरिद ।” (शकुन्तला ) तथापि तेन राज्ञा शकुन्तलायां अनार्य आचरितम् ॥ नास्ति आर्यो यत्र, ७- बहुव्री० । विहीन देश, जहां आर्य न रहते हों । २ आर्यवास- युरोपौय पण्डितने भाषातत्त्वका अनुशीलन अड़ा स्थिर किया है, पहले आर्यका वासस्थान भारतवर्ष में नहीं रहा । यह बलूचिस्तानके निकटवर्ती आइदिया प्रभृति अञ्चल में रहते थे। सिवा इसो आर्यावर्त के अन्य स्थानको अनार्य देश कहते । इसीतरह आर्य- जातिको छोड़, शवर, पुलिन्द प्रभृति समस्त नीच जातिका नाम अनार्य रखा गया है । मनुसंहितामें लिखते हैं, - - “आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् तयोरेवान्तरं गियरार्यावर्त' विदुन्नु धाः ॥” 'पूर्व में पूर्वसमुद्र, पश्चिममें पश्चिमसमुद्र, दक्षिणमें<noinclude></noinclude> ahhng8nrqx14buyw1n30ibdhmx0j3ag 668180 668177 2026-07-19T05:01:33Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668180 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनार्तव—अनार्य'''|'''४२७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनार्तव रोगकी चिकित्सा करनेके लिये पहिले उसका सच्चा कारण जानना आवश्यक है। कारणको हटा न सकनेसे पीड़ा शान्त होनेकी आशा कहां रखी है! यद्यपि जन्मावधि जननेन्द्रियमें कोई न कोई दोष रहता है, फिर भी एकबारगी ही रोगकी शान्ति करना मनुष्यका काम नहीं होता। किन्तु इस प्रकारकी अवस्था में स्त्रीको जो सकल यन्त्रणा उठाना पड़ती, उसका निवारण निकाल सकते हैं। डाक्टर टेनरने एक स्त्रीका विषय लिखा है। उसे तीस वर्ष वयःक्रम पर्यन्त एकबार भी ऋतु न लगा, मध्य-मध्यमें रजोनिःसरणका उद्वेग उठा, किन्तु रक्त बाहर न निकला था। उस उद्वेग के समय पेड़ूमें अत्यन्त भार पड़ता और असह्य यन्त्रणा उठ खड़ी होती है। निद्राकर औषध खिलानेसे वेदनाका उपशम नहीं उठता और न रात्रिके मध्यमें एक बार भी काकनिद्रा लगती। अनार्तव में इस प्रकारकी यन्त्रणा उठनेपर वस्तिदेशकी दोनो ओर गर्म जलका सेक दिलाये और अण्डाधारपर जोंक चिपकाये। गर्म जलसे हौज़ भर रोगिणीको मध्य-मध्य उसमें बैठने कहे। खानेकी औषधमें अफीम या मरफ़िया ही सबसे श्रेष्ठ है। कर्पूरके साथ चौथायी ग्रेनकी मात्रामें परिष्कृत अफीमका सार सोते समय खिलाना चाहिये। जननेन्द्रियकी बनावटका दोष न दौड़नेसे रोगका प्रतीकार पड़ सकता है। रोगिणीको सबल रहने से मध्य-मध्य गर्म जलमें बैठाये। उसके सिवा पित्त-निःसारक और विरेचक औषध ही श्रेष्ठ है। सोनामाखी, गाम्बोज, पडोफिलिन् टाराक्षेकम्, मुसब्बर प्रभृति औषधका सेवन साधनेसे विशेष फल देख पड़ता है। हीराकश एक रत्ती और मिल्-एलोपेट मार डेढ़ रत्ती एकत्र मिला एक गोली बांधे। यह गोली प्रत्यह तीन बार खिलाये। फ़ेरि रिडेक्टायी पन्द्रह रत्ती, पिल एलोपेट मार सोलह रत्ती और कुचलेका सार दो रत्ती एकत्र मिलाकर बारह गोली बनाये। ऐसी ही तीन गोली प्रत्यक्ष खिलाना चाहिये। चिकित्साके ससय रोगिणी जिससे सबल रहे, वैसा ही पुष्टिकर और बलाधान द्रव्य खिलाया करते हैं। अनार्तव रोगके साथ क्षय, कास प्रभृति अन्य कोई पीड़ा वर्तमान रहनेसे उसका प्रतीकार पहुंचाने की चेष्टा चलाना चाहिये। अनार्तवजल (सं॰ क्ली॰) पौषादिमासचतुष्टयमें पड़ा वृष्टिका जल, पूस वग़ैरह चार महीनेमें हुवा बारिशका पानी। यह वातादि दोषको जगा देता है,— {{Block center|<poem><small>"अनार्तवं प्रमुञ्चन्ति वारि वारिधरास्तु यत्। तत्र्तिदोषाय सर्वेषां देहिनां परिकीर्तितम्॥"</small></poem>}} {{Right|<small>(भावप्रकाश पू॰ वारिव॰)</small>}} 'बादलसे जो माहुट होती, वह सब लोगोंमें त्रिदोष उत्पन्न कर देती है।' अनार्तवा (सं॰ स्त्री॰) १ रजः शून्या, जिस औरतको महीना न होता हो। २ योनिपीड़ाविशेष, योनिकी एक बीमारी। <small>अनार्तव देख।</small> अनार्त्विजीन (सं॰ त्रि॰) पुरोहित होनेके आयोगा, क़ाज़ी बननेके नाक़ाबिल। अनार्य (सं॰ त्रि॰) न आर्यः, नञ्-तत्। आर्य नहीं, असत्कुल-जात, अप्रधान, असाधु, अभद्र, असच्चरित्र; बड़ा नहीं, कमीना, हक़ीर, बदमाश, नङ्गा, बिगड़ैल। प्राकृत-भाषामें अनार्य की जगह "अणज्ज" लिखते हैं,— {{Block center|<poem><small>"तहवि तेन रराणा सउन्दलाए अणञ्जं आचरिदं।" (शकुन्तला) तथापि तेन राज्ञा शकुन्तलायां अनार्य आचरितम्॥</small></poem>}} नास्ति आर्यो यत्र, ७-बहुव्री॰। २ आर्यवास-विहीन देश, जहां आर्य न रहते हों। युरोपीय पण्डितने भाषातत्त्वका अनुशीलन अड़ा स्थिर किया है, पहले आर्यका वासस्थान भारतवर्ष में नहीं रहा। यह बलूचिस्तानके निकटवर्ती आइदिया प्रभृति अञ्चलमें रहते थे। सिवा इसी आर्यावर्तके अन्य स्थानको अनार्य देश कहते हैं। इसीतरह आर्य-जातिको छोड़, शवर, पुलिन्द प्रभृति समस्त नीच जातिका नाम अनार्य रखा गया है। मनुसंहितामें लिखते हैं,— {{Block center|<poem><small>आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्। तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः॥</small></poem>}} 'पूर्वमें पूर्वसमुद्र, पश्चिममें पश्चिमसमुद्र, दक्षिणमें<noinclude></noinclude> 7039rijmnd9mtb0kfi8z0heo77eyku2 668181 668180 2026-07-19T05:02:54Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668181 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनार्तव—अनार्य'''|'''४२७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनार्तव रोगकी चिकित्सा करनेके लिये पहिले उसका सच्चा कारण जानना आवश्यक है। कारणको हटा न सकनेसे पीड़ा शान्त होनेकी आशा कहां रखी है! यद्यपि जन्मावधि जननेन्द्रियमें कोई न कोई दोष रहता है, फिर भी एकबारगी ही रोगकी शान्ति करना मनुष्यका काम नहीं होता। किन्तु इस प्रकारकी अवस्था में स्त्रीको जो सकल यन्त्रणा उठाना पड़ती, उसका निवारण निकाल सकते हैं। डाक्टर टेनरने एक स्त्रीका विषय लिखा है। उसे तीस वर्ष वयःक्रम पर्यन्त एकबार भी ऋतु न लगा, मध्य-मध्यमें रजोनिःसरणका उद्वेग उठा, किन्तु रक्त बाहर न निकला था। उस उद्वेग के समय पेड़ूमें अत्यन्त भार पड़ता और असह्य यन्त्रणा उठ खड़ी होती है। निद्राकर औषध खिलानेसे वेदनाका उपशम नहीं उठता और न रात्रिके मध्यमें एक बार भी काकनिद्रा लगती। अनार्तव में इस प्रकारकी यन्त्रणा उठनेपर वस्तिदेशकी दोनो ओर गर्म जलका सेक दिलाये और अण्डाधारपर जोंक चिपकाये। गर्म जलसे हौज़ भर रोगिणीको मध्य-मध्य उसमें बैठने कहे। खानेकी औषधमें अफीम या मरफ़िया ही सबसे श्रेष्ठ है। कर्पूरके साथ चौथायी ग्रेनकी मात्रामें परिष्कृत अफीमका सार सोते समय खिलाना चाहिये। जननेन्द्रियकी बनावटका दोष न दौड़नेसे रोगका प्रतीकार पड़ सकता है। रोगिणीको सबल रहने से मध्य-मध्य गर्म जलमें बैठाये। उसके सिवा पित्त-निःसारक और विरेचक औषध ही श्रेष्ठ है। सोनामाखी, गाम्बोज, पडोफिलिन् टाराक्षेकम्, मुसब्बर प्रभृति औषधका सेवन साधनेसे विशेष फल देख पड़ता है। हीराकश एक रत्ती और मिल्-एलोपेट मार डेढ़ रत्ती एकत्र मिला एक गोली बांधे। यह गोली प्रत्यह तीन बार खिलाये। फ़ेरि रिडेक्टायी पन्द्रह रत्ती, पिल एलोपेट मार सोलह रत्ती और कुचलेका सार दो रत्ती एकत्र मिलाकर बारह गोली बनाये। ऐसी ही तीन गोली प्रत्यक्ष खिलाना चाहिये। चिकित्साके ससय रोगिणी जिससे सबल<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>रहे, वैसा ही पुष्टिकर और बलाधान द्रव्य खिलाया करते हैं। अनार्तव रोगके साथ क्षय, कास प्रभृति अन्य कोई पीड़ा वर्तमान रहनेसे उसका प्रतीकार पहुंचाने की चेष्टा चलाना चाहिये। अनार्तवजल (सं॰ क्ली॰) पौषादिमासचतुष्टयमें पड़ा वृष्टिका जल, पूस वग़ैरह चार महीनेमें हुवा बारिशका पानी। यह वातादि दोषको जगा देता है,— {{Block center|<poem><small>"अनार्तवं प्रमुञ्चन्ति वारि वारिधरास्तु यत्। तत्र्तिदोषाय सर्वेषां देहिनां परिकीर्तितम्॥"</small></poem>}} {{Right|<small>(भावप्रकाश पू॰ वारिव॰)</small>}} 'बादलसे जो माहुट होती, वह सब लोगोंमें त्रिदोष उत्पन्न कर देती है।' अनार्तवा (सं॰ स्त्री॰) १ रजः शून्या, जिस औरतको महीना न होता हो। २ योनिपीड़ाविशेष, योनिकी एक बीमारी। <small>अनार्तव देख।</small> अनार्त्विजीन (सं॰ त्रि॰) पुरोहित होनेके आयोगा, क़ाज़ी बननेके नाक़ाबिल। अनार्य (सं॰ त्रि॰) न आर्यः, नञ्-तत्। आर्य नहीं, असत्कुल-जात, अप्रधान, असाधु, अभद्र, असच्चरित्र; बड़ा नहीं, कमीना, हक़ीर, बदमाश, नङ्गा, बिगड़ैल। प्राकृत-भाषामें अनार्य की जगह "अणज्ज" लिखते हैं,— {{Block center|<poem><small>"तहवि तेन रराणा सउन्दलाए अणञ्जं आचरिदं।" (शकुन्तला) तथापि तेन राज्ञा शकुन्तलायां अनार्य आचरितम्॥</small></poem>}} नास्ति आर्यो यत्र, ७-बहुव्री॰। २ आर्यवास-विहीन देश, जहां आर्य न रहते हों। युरोपीय पण्डितने भाषातत्त्वका अनुशीलन अड़ा स्थिर किया है, पहले आर्यका वासस्थान भारतवर्ष में नहीं रहा। यह बलूचिस्तानके निकटवर्ती आइदिया प्रभृति अञ्चलमें रहते थे। सिवा इसी आर्यावर्तके अन्य स्थानको अनार्य देश कहते हैं। इसीतरह आर्य-जातिको छोड़, शवर, पुलिन्द प्रभृति समस्त नीच जातिका नाम अनार्य रखा गया है। मनुसंहितामें लिखते हैं,— {{Block center|<poem><small>आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्। तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः॥</small></poem>}} 'पूर्वमें पूर्वसमुद्र, पश्चिममें पश्चिमसमुद्र, दक्षिणमें<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bb3kxxwnpdk83wqlakupcg5ndxtq9p5 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४३५ 250 87738 668186 351951 2026-07-19T05:40:21Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668186 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४२८'''|'''अनार्यक—अनावर्ति'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>विन्ध्यगिरि और उत्तरमें हिमालय—इसके मध्यवर्ती स्थानको पण्डित आर्यावर्त कहते हैं।' कुल्लू कभट्टने आर्यावर्तकी इसतरह व्युत्पत्ति बतायी है,—<small>'आर्य अत्रावर्तन्ते पुनःपुनरुद्भवन्तौत्यार्यावर्तः।'</small> आर्य इस स्थानमें पुनःपुनः उत्पन्न होते, जिससे यहांका नाम आर्यावर्त पड़ा है। अमरसिंहने यों लिखा है,— <small>"आर्यावर्तः पुण्यभूमिर्मध्यं विन्ध्यहिमालयोः।"</small> निरुक्तके भी एक स्थानमें आर्यजनपदका विषय बताया गया है। यह नहीं कह सकते, कि यास्कने इस आर्य शब्द से आर्यावर्तका निर्देश निकाला था या नहीं। जो हो, पहले आर्य जहां बसते, उसे छोड़ दूसरा स्थान अनार्य देश कहाता था। <small>इसका विस्तारित विवरण आर्य शब्दमें देखो।</small> वर्तमान भारतवासी कोल, साँओताल प्रभृति वन्य जातियोंको अनार्य बताते हैं। अनायक (सं॰ क्ली॰) अनार्य-कन्, आर्यो न वसति यत्र तत्रार्यवर्जिते देशान्तरे भवः। अगुरु काष्ठ, मुसब्बर, ऊद। अगुरु वृक्ष सिलहट और अराकान प्रभृति अञ्चलमें जन्मता है। मनुसंहितामें जो सीमा सजायी गयी, उसे देखकर विचारने से श्रीहट्ट आर्यावर्तके भीतर जा पड़ता है। अतएव इसके द्वारा अराकान प्रभृति देश समझे जाते और वहां जो अगुरु लकड़ी होती, उसीको अनार्यक कहते हैं। अनार्यकर्मिन् (सं॰ पु॰) अनार्यका कर्म करनेवाला व्यक्ति, जो शख्स कमीनेका काम करे। अनार्यज (सं॰ क्ली॰) अनार्यदेशे जायते, जन-ड। १ अनार्यदेशजात अगुरु काष्ठ, कमीने मुल्कमें पैदा हुई मुसब्बरकी लकड़ी, ऊद। (त्रि॰) २ अनार्य-देश जात, कमीने मुल्कमें पैदा हुवा। अनार्यजुष्ट (सं॰ त्रि॰) अनार्य द्वारा अध्युषित, साधित अथवा अधिकृत, कमीनेसे मिलाया, साधा या लिया गया। अनार्यता (सं॰ स्त्री॰) अनार्य होनेका भाव, कमीनापन। अनार्यतिक्त, अनार्यतिक्तक (सं॰ पु॰) अनार्यदेशे जातस्तिक्तः। भूनिम्ब, चिरायता। (Gentiana cherayta, Rox.) दार्जिलिङ्ग प्रभृति हिमालयके नाना स्थानमें चिरायतेका पेड़ जङ्गली तौर पर पैदा होता है। लेप्चा प्रभृति पार्वतीय जाति अनार्य कहती थी, इसी कारण उसके देशका नाम अनार्यदेश रखा गया। उसी अनार्यदेशका तिक्त वृक्ष चिरायता है। चिरायतेका दूसरा नाम 'किरात-तिक्त' भी होता, जिसका मतलब पर्वतकी अनार्य किरात जातिके देशमें पैदा होनेवाला तिक्त वृक्ष है। <small>चिरायता देखो।</small> अनार्यत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अनार्यता देखो।</small> अनार्ष, अनार्षेय (सं॰ त्रि॰) ऋषिसेवितत्वात् ऋषिः वेदः तत्रोक्त आर्षस्तद्भिन्ने। अवैदिक, वेदका अव्यवहृत; वेद या ऋषिसे सम्बन्ध न रखनेवाला। अनालम्ब (सं॰ त्रि॰) निराश्रित, बेसहारा; जिसे कोई टेक न मिले। (पु॰) २ निराश्रयता, सहारेका न सधना। अनालम्बन (सं॰ त्रि॰) आश्रयशून्य, बेसहारा। अनालम्बी (सं॰ स्त्री॰) शिवकी वीणा, महादेवका तम्बूर। अनालम्बुका, अनालम्भुका (सं॰ स्त्री॰) मासिक धर्मसे सम्पन्न स्त्री, जो स्त्री कपडोंसे हो। अनालाप (सं॰ त्रि॰) १ मौनावलम्बी; मुंहचुप्पा; ज्य़ादा बात न करनेवाला। (पु॰) २ मौनावलम्बन; कमगोयी; कम बोलनेकी हालत। अनालोचित (सं॰ त्रि॰) न आलोचितम्। १ अविवेचित, बेसमझा। २ अष्ट, बेदेखा। अनालोच्य (सं॰ अव्य॰) अविवेचनासे; बेसमझें, बेदेखेभाले। अनालोडित (सं॰ त्रि॰) न आलोड़ितम्। अनान्दोलित, अविवेचित; न समझा गया, जिसकी देखभाल न चली हो। अनावया (वै॰ त्रि॰) कठोर; सख़्त; न देनेवाला, हाथ न उठाते हुवा। अनावर्ति (सं॰ स्त्री॰) पुनरागमनविहीनता; ग़ैरवापसी; पीछेका न लौटना। इस शब्दका तात्पर्य इहलोकसे जाकर फिर न फिरना अर्थात् मुक्ति पाना है।<noinclude></noinclude> i8itjc10fjfgpzx7qx0xnvrjzam2n2n 668187 668186 2026-07-19T05:41:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668187 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४२८'''|'''अनार्यक—अनावर्ति'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>विन्ध्यगिरि और उत्तरमें 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अनार्षेय (सं॰ त्रि॰) ऋषिसेवितत्वात् ऋषिः वेदः तत्रोक्त आर्षस्तद्भिन्ने। अवैदिक, वेदका अव्यवहृत; वेद या ऋषिसे सम्बन्ध न रखनेवाला। अनालम्ब (सं॰ त्रि॰) निराश्रित, बेसहारा; जिसे कोई टेक न मिले। (पु॰) २ निराश्रयता, सहारेका न सधना। अनालम्बन (सं॰ त्रि॰) आश्रयशून्य, बेसहारा। अनालम्बी (सं॰ स्त्री॰) शिवकी वीणा, महादेवका तम्बूर। अनालम्बुका, अनालम्भुका (सं॰ स्त्री॰) मासिक धर्मसे सम्पन्न स्त्री, जो स्त्री कपडोंसे हो। अनालाप (सं॰ त्रि॰) १ मौनावलम्बी; मुंहचुप्पा; ज्य़ादा बात न करनेवाला। (पु॰) २ मौनावलम्बन; कमगोयी; कम बोलनेकी हालत। अनालोचित (सं॰ त्रि॰) न आलोचितम्। १ अविवेचित, बेसमझा। २ अष्ट, बेदेखा। अनालोच्य (सं॰ अव्य॰) अविवेचनासे; बेसमझें, बेदेखेभाले। अनालोडित (सं॰ त्रि॰) न आलोड़ितम्। अनान्दोलित, अविवेचित; न समझा गया, जिसकी देखभाल न चली हो। अनावया (वै॰ त्रि॰) कठोर; सख़्त; न देनेवाला, हाथ न उठाते हुवा। अनावर्ति (सं॰ स्त्री॰) पुनरागमनविहीनता; ग़ैरवापसी; पीछेका न लौटना। इस शब्दका तात्पर्य इहलोकसे जाकर फिर न फिरना अर्थात् मुक्ति पाना है।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> fbd8ar1jb1wzudmkmti1mf0c58y4ne4 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४३६ 250 87741 668206 351954 2026-07-19T09:41:05Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668206 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनावर्षण—अनाशस्त'''|'''४२९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनावर्षण (सं॰ क्ली॰) वृष्टिका अभाव, पानीका न बरसना; दुर्भिक्ष, क़हत। अनावश्यक (सं॰ त्रि॰) आवश्यकतारहित, जिसकी कोई ज़रूरत न रहे। अनावश्यकता (सं॰ स्त्री॰) आवश्यकताराहित्य, ज़रूरतका न पड़ना। अनाविद्ध (सं॰ त्रि॰) अनाहत; बेज़ख्म; चोट न खाये हुवा। अनाविल (सं॰ त्रि॰) न अविलम्। १ परिष्कार, स्वच्छ, मलिनताशून्य, कलुषतारहित; साफ़, सुथरा। अनाविष्ट (सं॰ त्रि॰) न आविष्टम्। अमनोयोगी; दिल न लगानेवाला। अनावृत् (वै॰ त्रि॰) पुनरागमनरहित, वापस न आनेवाला। अनावृत (सं॰ त्रि॰) न ढंका हुवा, खुला। अनावृत्त (सं॰ त्रि॰) न आवृत्तं अभ्यस्तम्। १ घूमकर फिर न आनेवाला, जो जाकर वापस न हो। २ पीछे न हटते हुवा। ३ यातायात न करनेवाला, जो आमदरफ़्त न रखे। ४ पसन्द न किया गया। अनावृत्ति (सं॰ स्त्री॰) न आवृत्तिः पुनरागमनम्। १ पुनर्वार के आगमनकी शून्यता, ग़ैरवापसी। २ मुक्ति, निर्वाण। ३ अभ्यासका अभाव, महावरेका न मंजना। अनावृष्टि (सं॰ स्त्री॰) न आदृष्टिः सम्यग्वृष्टिः। वृष्टिका अभाव, पानीका न पड़ना; सूखा। यह शस्यहानिका प्रधान कारण है। छः ईतियोंमें अनावृष्टि भी शामिल है। <small>अतिवृष्टि देखी।</small> पहले हिन्दू अनावृष्टिके समय भोजपत्रपर रक्तचन्दनसे ऐसे एक सौ आठ स्थानके नाम लिखते, जिसका आद्यक्षर 'क' रहता था—जैसे काशी, काञ्ची, कलकत्ता, कनौज इत्यादि। किन्तु जिस स्थानके अन्तमें 'पुर' या ग्राम शब्द होता, (जैसे कल्याणपुर, कुलग्राम इत्यादि) उसका नाम छोड़ देते थे। पीछे उसी भोजपत्रको कटोरीमें डाल जलमें डुबाकर रखनेसे उन्हें वृष्टिहोनेका निश्चये हो जाता था। सिवा इसके अनावृष्टिको निवारण करनेके लिये दैवक्रिया भी अनेक थीं। ब्राह्मण ग्रामके शिवको जलमें डुबा देते, होम और याग भी किया करते थे। आदिशूरने जो कई बार यज्ञानुष्ठान किया, उसमें कदाचित् अनावृष्टिके निवारणार्थ भी एक यज्ञ रचा गया था। कितने ही वर्ष हुए, जब पञ्जाबमें अतिशय अनावृष्टि रही, तब पञ्जाबके ब्राह्मणोंने यह श्लोक पताका पर लिख झण्डा उड़ाया था,— {{Block center|<poem><small>"भूयश्च शतवार्षि क्यामनावृष्ट्यामनम्भसि। मुनिभिः संस्तुता भूमौ संभविष्याम्ययोनिजा॥" (चण्डी)</small></poem>}} पूर्वापेक्षा अब भारतवर्षमें वर्षा बहुत कम होती है। युरोपीय बताते हैं, कि क्रमसे इस देशका जङ्गल परिष्कार हो रहा, जो अनावृष्टिका प्रधान कारण है; बड़े-बड़े पेड़ न रहनेपर अच्छीतरह पानी नहीं पड़ता। अनावेदित (सं॰ त्रि॰) आवेदनविहीन; ग़ैरमुश्तहिर, ज़ाहिर न किया गया। अनाव्याध (वै॰ त्रि॰) जिसका टूटना या खुल जाना असम्भव हो, किसीतरह न टूटने या न खुलनेवाला। अनाव्रस्क (सं॰ पु॰) १ अनाहत दशा, नुक़सान न पहुंचनेकी हालत। (त्रि॰) २ हानि न पहुंचानेवाला, जो नुक़सान न करे। अनाश (सं॰ त्रि॰) १ आशाशून्य; नाउम्मेद। भरोसा न रखनेवाला। २ नाशशून्य; लाज़वाल; न मिटनेवाला, जीता-जागता। अनाशक (सं॰ पु॰) णश-ण्वुल्—नाशकः न नाशकः, नञ्-तत्। अथवा न आ सम्यक् अश-घञ्-आशः; अशनं कप्, नञ्-बहुव्री॰। १ अनश्वर, फलकामना-शून्य; उम्मीदसे खाली बात। २ उपवास। अनाशकनिवृत्त (सं॰ पु॰) उपवासका अभ्यास छोड़नेवाला व्यक्ति, जो शख्श फ़ाक़ाकशीकी आदत छोड़ दे। अनाकाशयन (सं॰ क्ली॰) न नश्यति अनाशक आत्मा तस्यायनं प्राप्त उपायः। आत्मज्ञान-साधन ब्रह्मचर्य-विशेष, जो उपवास करनेसे बनता है। अनाशस्त (सं॰ त्रि॰) न आशस्तम्। १ अस्तुत,<noinclude></noinclude> eefvviy98uyhnt7c2astnljpvja9uj2 668207 668206 2026-07-19T09:42:43Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668207 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनावर्षण—अनाशस्त'''|'''४२९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>अनावर्षण (सं॰ क्ली॰) वृष्टिका अभाव, पानीका न बरसना; दुर्भिक्ष, क़हत। अनावश्यक (सं॰ त्रि॰) आवश्यकतारहित, जिसकी कोई ज़रूरत न रहे। अनावश्यकता (सं॰ स्त्री॰) आवश्यकताराहित्य, ज़रूरतका न पड़ना। अनाविद्ध (सं॰ त्रि॰) अनाहत; बेज़ख्म; चोट न खाये हुवा। अनाविल (सं॰ त्रि॰) न अविलम्। १ परिष्कार, स्वच्छ, मलिनताशून्य, कलुषतारहित; साफ़, सुथरा। अनाविष्ट (सं॰ त्रि॰) न आविष्टम्। अमनोयोगी; दिल न लगानेवाला। अनावृत् (वै॰ त्रि॰) पुनरागमनरहित, वापस न आनेवाला। अनावृत (सं॰ त्रि॰) न ढंका हुवा, खुला। अनावृत्त (सं॰ त्रि॰) न आवृत्तं अभ्यस्तम्। १ घूमकर फिर न आनेवाला, जो जाकर वापस न हो। २ पीछे न हटते हुवा। ३ यातायात न करनेवाला, जो आमदरफ़्त न रखे। ४ पसन्द न किया गया। अनावृत्ति (सं॰ स्त्री॰) न आवृत्तिः पुनरागमनम्। १ पुनर्वार के आगमनकी शून्यता, ग़ैरवापसी। २ मुक्ति, निर्वाण। ३ अभ्यासका अभाव, महावरेका न मंजना। अनावृष्टि (सं॰ स्त्री॰) न आदृष्टिः सम्यग्वृष्टिः। वृष्टिका अभाव, पानीका न पड़ना; सूखा। यह शस्यहानिका प्रधान कारण है। छः ईतियोंमें अनावृष्टि भी शामिल है। <small>अतिवृष्टि देखी।</small> पहले हिन्दू अनावृष्टिके समय भोजपत्रपर रक्तचन्दनसे ऐसे एक सौ आठ स्थानके नाम लिखते, जिसका आद्यक्षर 'क' रहता था—जैसे काशी, काञ्ची, कलकत्ता, कनौज इत्यादि। किन्तु जिस स्थानके अन्तमें 'पुर' या ग्राम शब्द होता, (जैसे कल्याणपुर, कुलग्राम इत्यादि) उसका नाम छोड़ देते थे। पीछे उसी भोजपत्रको कटोरीमें डाल जलमें डुबाकर रखनेसे उन्हें वृष्टिहोनेका निश्चये हो जाता था। सिवा इसके अनावृष्टिको निवारण करनेके लिये<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>दैवक्रिया भी अनेक थीं। ब्राह्मण ग्रामके शिवको जलमें डुबा देते, होम और याग भी किया करते थे। आदिशूरने जो कई बार यज्ञानुष्ठान किया, उसमें कदाचित् अनावृष्टिके निवारणार्थ भी एक यज्ञ रचा गया था। कितने ही वर्ष हुए, जब पञ्जाबमें अतिशय अनावृष्टि रही, तब पञ्जाबके ब्राह्मणोंने यह श्लोक पताका पर लिख झण्डा उड़ाया था,— {{Block center|<poem><small>"भूयश्च शतवार्षि क्यामनावृष्ट्यामनम्भसि। मुनिभिः संस्तुता भूमौ संभविष्याम्ययोनिजा॥" (चण्डी)</small></poem>}} पूर्वापेक्षा अब भारतवर्षमें वर्षा बहुत कम होती है। युरोपीय बताते हैं, कि क्रमसे इस देशका जङ्गल परिष्कार हो रहा, जो अनावृष्टिका प्रधान कारण है; बड़े-बड़े पेड़ न रहनेपर अच्छीतरह पानी नहीं पड़ता। अनावेदित (सं॰ त्रि॰) आवेदनविहीन; ग़ैरमुश्तहिर, ज़ाहिर न किया गया। अनाव्याध (वै॰ त्रि॰) जिसका टूटना या खुल जाना असम्भव हो, किसीतरह न टूटने या न खुलनेवाला। अनाव्रस्क (सं॰ पु॰) १ अनाहत दशा, नुक़सान न पहुंचनेकी हालत। (त्रि॰) २ हानि न पहुंचानेवाला, जो नुक़सान न करे। अनाश (सं॰ त्रि॰) १ आशाशून्य; नाउम्मेद। भरोसा न रखनेवाला। २ नाशशून्य; लाज़वाल; न मिटनेवाला, जीता-जागता। अनाशक (सं॰ पु॰) णश-ण्वुल्—नाशकः न नाशकः, नञ्-तत्। अथवा न आ सम्यक् अश-घञ्-आशः; अशनं कप्, 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अनु-नो-क्त। १ विनयप्राप्त, अर्ज़ किया गया, जिससे हाथ जोड़कर कहा हो। २ पश्चात् गृहीत, पीछे लिया गया।}} {{Outdent|अनुनीति (सं॰ स्त्री॰) नम्रता, झुकाव, सभ्यता, शायस्तगी, रजा़, प्रसन्नता।}} {{Outdent|अनुनेय (सं॰ त्रि॰) अनु-नी-कर्मणि अर्हार्थे वा यत्। अनुनयके योग्य, नवाजिशके काबिल, जो सहजमें राजी़ हो जाये।}} {{Outdent|अनुन्नत (सं॰ त्रि॰) उन्नत नहीं, नीच, जो ऊंचा न हो निचला।}} {{Outdent|अनुन्नतगात्र (सं॰ त्रि॰) बौद्ध मतसे-पुष्ट, प्रधान अथवा प्रबल अङ्गविहीन, जिसके अजा मजबूत, आलीशान या ताक़तवर न हों।}} {{Outdent|अनुन्नतानत (सं॰ त्रि॰) उच्चनिम्न-भिन्न, जो न ऊंचे उठाया न नीचे गिराया गया हो, बराबर, हमवार।}} {{Outdent|अनुन्मत्त (सं॰ त्रि॰) समझदार, होश न खोनेवाला, गभीर, सञ्जीदा, नशा न पीनेवाला, परहेज़गार, जो जङ्गली या पागल न हो।}} {{Outdent|अनुप (सं॰ त्रि॰) जलीय, पानीदार, दलदली, कीचड़से भरा हुवा।}} {{Outdent|अनुपकार (सं॰ पु॰) न-उप-कृ-घञ् उपकारः, अभावार्थे नञ्-तत्। उपकारका अभाव, भलाईका न रहना।}} {{Outdent|अनुपकारिन् (सं॰ त्रि॰) न उपकारी, विरोधार्थे नञ्-तत्। १ अपकारी, उपकार न करनेवाला, जो भलाई, न करे। २ व्यर्थ, नाकाम, जिसमें कोई फायदा न हो। (स्त्री॰) अनुपकारिणी।}} {{Outdent|अनुपकारी, <small>अनुपकारिन् देखो।</small>}} {{Outdent|अनुपकृत (सं॰ त्रि॰) उपकार न किया गया,}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :जिसपर कोई एहसान न रखा हो, अप्राप्त-साहाय्य, जिसे मदद न मिली हो। {{Outdent|अनुपक्षित (सं॰ पु॰) उप-क्षि-कर्मणि क्त; न उपक्षीयते कामः, नञ्-तत्। १ क्षीण न होनेवाली वाञ्छा अथवा वस्तु-विशेष, जो खाहिश या कोई चीज न घटे। (त्रि॰) २ अप्रतिहत, अनाहत, चोट न खाये हुवा, जिसके ज़ख्म न आया हो। {{Outdent|अनुपक्षीण (सं॰ त्रि॰) उप-क्षि-कर्तरि क्त; न उपक्षीणम्, नञ्-तत्। क्षीण न होनेवाला, जो घटता न हो।}} {{Outdent|अनुपगत (सं॰ त्रि॰) पास न पहुंचा हुवा, जो दूर पड़ा हो।}} {{Outdent|अनुपगीत (सं॰ त्रि॰) १ अप्रशंसित, तारीफ न किया गया। २ संगीतमें छूटा हुवा, जो गानेके साथ रह गया हो। (अव्य॰) ३ संगीतमें जिससे दूसरा व्यक्ति साथ न दे, ताकि गाने में दूसरा शख्स मेल न मिलाये।}} {{Outdent|अनुपघातार्जित (सं० वि०) विना हानि प्राप्त, जो बेनुकसान हाथ लगे।}} {{Outdent|अनुपघ्नत् (सं॰ त्रि॰) हानि न पहुंचाते हुवा, जो नुकसान न दे रहा हो।}} {{Outdent|अनुपज (सं॰ त्रि॰) अनुपदेशजात, जो अनुप मुल्कमें पैदा हुवा हो।}} {{Outdent|अनुपजीवनीय (सं॰ त्रि॰) जीविका न देते हुवा, जो रोजी न बताता हो। २ जीविका न जमाते हुवा, जिसके कोई रोजी़-रोजगार न रहे।}} {{Outdent|अनुपठित (सं॰ क्ली॰) अनु-पठ-भावे क्त। १ गुरुके बताये-जैसे पाठका पढ़ना, शिक्षकके उपदेशानुसार पढ़ाई, उस्तादने जैसा सबक़ दिया हो, उसीके सुवा-फ़िक उसका मुताला। (त्रि॰) २ खूब पढ़ा गया, जिसका बखबी मुताला हो चुका हो।}} {{Outdent|अनुपठितिन् (सं॰ त्रि॰) अनुपठितमनेन, इष्टादि त्वात् इनि। पाठ पढ़ लेनेवाला, जिसने सबक़ हासिल कर लिया हो।}} {{Outdent|अनुपतन (सं॰ त्रि॰) अनु-पत-युच्। जुचंक्रम्यदन्द्रम्य-सृग्धज्वलशचलषपतपदः। पा ३।२।१५०। अनुकूल पतन, अनु-}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> kkwray8gboqi2ay6tfhsey1sht70fjr 668136 668134 2026-07-18T18:27:01Z Sanjana Chowdhury 5438 668136 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुनिर्वाप्या-अनुपतन'''|४५९}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px 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अनुपद्यते प्रतिदिन लभ्यते, अनु-पद-क्विप्। प्रतिदिनलभ्य, जो प्रत्यह प्राप्त हो, रोज मिलनेवाला।}} {{Outdent|अनुपद (सं॰ क्ली॰) अनुरूपं योग्य पदम्, प्रा॰ स॰। <small> अव्ययौभावश्च। पा १।१।४१।</small> १ अस्थायी, मुखताल, मुखड़ा, गीतका वह हिस्सा जो कड़ीके बाद बार-बार गया जाता और गीतके आगे रहता है। २ अनुकूल-पद, योग्यस्थान, अच्छा वोहदा, काबिल जगह। (अव्य॰) ३ पद-पद, कदम-ब-कदम, प्रतिपदमें, डग-डग, पैर-पैर। पदस्य पश्चात्, (अव्ययी॰)। ४ पीछे पीछे। पदमनतिक्रम्य, अव्ययी॰। ५ पद अतिक्रम न करके, बे-कद़म-उखाड़े, ठीक पैरपर पैर रखकर।— {{c|{{x-smaller|<poem>“पदं शब्द च वाक्ये च व्यवसायापदेशयोः। पादतच्चियह स्थानत्राण्योरड्कवस्तुने॥” (विश्व)</poem>}}}} {{Outdent|अनुपदवी (सं॰ स्त्री॰) पथ, मार्ग, राह, सड़क, गली, कूचा, डगर, बाट।}} {{Outdent|अनुपदसूत्र (सं॰ क्ली॰)। ब्राह्मण-विशेषका भाष्य, जिसमें मूलका अर्थ शब्द-शब्द वर्णित है।}} {{Outdent|अनुपदस्वत् (वै॰ त्रि॰) सूखते न हुवा, जो मुरझा न रहा हो।}} {{Outdent|अनुपदिक (सं॰ त्रि॰) अनुपदं अस्ति अस्य, ठन्। पश्चाद्वत, पीछे रहा, जो पीछे छुट गया हो।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|अनुपदिन् (सं॰ त्रि॰) पदस्य पश्चादनुपदं तयन्वेष्टा-इनि। अनुपद्यन्वेष्टा। पा ५।२।९० अन्वेष्टा, जो अन्वेषण निकाले, ढूंढनेवाला, जिसे किसीकी तलाश लगे।}} {{Outdent|अनुपदिष्ट (सं॰ त्रि॰) न उपदिष्टम्, नञ्-तत्। उपदेश न दिया गया, जिसे तालीम न मिली हो, अशिक्षित, तालीम न पाये हुवा।}} {{Outdent|अनुपदीना (सं॰ स्त्री॰) अनु आयाम सादृश्ये वा अनुपदं बध्वा-ख। <small>अनुपदसर्वांन्नायानयं बद्धाभक्षयतिनेयेषु। पा ५।२।९।</small> ठीक पैरके प्रमाणानुरूप पादुका, जो जूता पैर के बराबर हो।}} {{Outdent|अनुपदेष्ट (सं॰ पु॰) उपदेश न देनेवाला व्यक्ति, जो शखूश तालीम न बख़्शे।}} {{Outdent|अनुपध (सं॰ पु॰) अक्षर अथवा शब्दांश जिसके पूर्व दूसरा प्रतिष्ठित न हो, अपने पहले दूसरा न रखनेवाला हर्फ़ या लफूज का टुकड़ा।}} {{Outdent|अनुपधा (सं॰ स्त्री॰) धूर्तता, धोकेबाजी, वञ्चकता, हीलासाजी।}} {{Outdent|अनुपधि (सं॰ त्रि॰) नास्ति उपधिश्छलं यत्र। १ निश्छल, कपटताशून्य, धोका न देनेवाला। (स्त्री॰) नञ्-तत्। २ सरलभाव, सीधापन, सिधाई।}} {{c|<small>“कपटोऽस्त्रो व्याजदम्भोपधयश्छद्मकैतवे।” (अमर)</small>}} {{Outdent|अनुपधिशेष (सं॰ पु॰) वह व्यक्ति जिसमें मनुष्यत्व न विद्यमान हो, जो शख्स इन्सानियतसे खा़ली रहे।}} {{Outdent|अनुपनाह (सं॰ पु॰) बौद्ध मतसे-प्रगाढ़ प्रेम अथवा भक्तिका अभाव, गहरी मुहब्बत या मुरब्बतका न मिलना।}} {{Outdent|अनुपनीत (सं॰ पु॰) न उपनीतः, नञ्-नत्। १ उपनयनविहीन, जिसका उपनयन या यज्ञोपवीत न हुवा हो, (त्रि॰) २ जो ज्ञानका विषयीभूत न हो, समझमें न आनेवाला। ३ लाया न गया, जिसे लाये न हों।}} {{Outdent|अनुपन्यस्त (सं॰ त्रि॰) विशदरूपसे अनिर्मित, अग्रतिष्ठित, साफ़ तौरपर न बनाया गया, जिसकी नीव ठीक-ठीक न पड़ी हो।}} {{Outdent|अनुपन्यास (सं॰ पु॰) न उपन्यासः, नञ्-तत्।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 5axt3b26q5v0y7hp9mc2iumyalc9buu 668210 668153 2026-07-19T09:55:40Z Sanjana Chowdhury 5438 668210 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४६०'''|'''अनुपति–अनुपन्यासस'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :रूप पतन, अच्छासा गिरना, गहरा गिराव। २ गणितमें-राशि, भाग, जिन्स, टुकड़ा। {{Outdent|अनुपति (सं॰ अव्य॰) पत्युः सामीप्यम्, अव्ययी॰। पतिके समीप, स्वामी के निकट, खाविन्दके पास, शौहरके नज़दीक, दूलहकी बगल में।}} {{Outdent|अनुपतित (सं॰ त्रि॰) १ निपतित, स्त्रवित, उद्गत, गिरा-पड़ा, टपका, उतरा। २ पीछा किया गया, लगा हुवा।}} {{Outdent|अनुपथ (सं॰ पु॰) अनुकूलः पन्थाः। १ अनुकूल पथ, शुभ मार्ग, भली राह, मौके की गली, सीधी सड़क। (त्रि॰) २ सड़कके पीछे पड़ते हुवा, जो राह-राह जा रहा हो। ३ भली राह चलनेवाला, जो सीधी सड़क पकड़े। (अव्य॰) राह-राह, सड़कसे, गलीकी बगलमें।}} {{Outdent|अनुपद् (सं॰ क्ली॰) अनुपद्यते प्रतिदिन लभ्यते, अनु-पद-क्विप्। प्रतिदिनलभ्य, जो प्रत्यह प्राप्त हो, रोज मिलनेवाला।}} {{Outdent|अनुपद (सं॰ क्ली॰) अनुरूपं योग्य पदम्, प्रा॰ स॰। <small> अव्ययौभावश्च। पा १।१।४१।</small> १ अस्थायी, मुखताल, मुखड़ा, गीतका वह हिस्सा जो कड़ीके बाद बार-बार गया जाता और गीतके आगे रहता है। २ अनुकूल-पद, योग्यस्थान, अच्छा वोहदा, काबिल जगह। (अव्य॰) ३ पद-पद, कदम-ब-कदम, प्रतिपदमें, डग-डग, पैर-पैर। पदस्य पश्चात्, (अव्ययी॰)। ४ पीछे पीछे। पदमनतिक्रम्य, अव्ययी॰। ५ पद अतिक्रम न करके, बे-कद़म-उखाड़े, ठीक पैरपर पैर रखकर।—}} {{c|{{x-smaller|<poem>“पदं शब्द च वाक्ये च व्यवसायापदेशयोः। पादतच्चियह स्थानत्राण्योरड्कवस्तुने॥” (विश्व)</poem>}}}} {{Outdent|अनुपदवी (सं॰ स्त्री॰) पथ, मार्ग, राह, सड़क, गली, कूचा, डगर, बाट।}} {{Outdent|अनुपदसूत्र (सं॰ क्ली॰)। ब्राह्मण-विशेषका भाष्य, जिसमें मूलका अर्थ शब्द-शब्द वर्णित है।}} {{Outdent|अनुपदस्वत् (वै॰ त्रि॰) सूखते न हुवा, जो मुरझा न रहा हो।}} {{Outdent|अनुपदिक (सं॰ त्रि॰) अनुपदं अस्ति अस्य, ठन्। पश्चाद्वत, पीछे रहा, जो पीछे छुट गया हो।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|अनुपदिन् (सं॰ त्रि॰) पदस्य पश्चादनुपदं तयन्वेष्टा-इनि। अनुपद्यन्वेष्टा। पा ५।२।९० अन्वेष्टा, जो अन्वेषण निकाले, ढूंढनेवाला, जिसे किसीकी तलाश लगे।}} {{Outdent|अनुपदिष्ट (सं॰ त्रि॰) न उपदिष्टम्, नञ्-तत्। उपदेश न दिया गया, जिसे तालीम न मिली हो, अशिक्षित, तालीम न पाये हुवा।}} {{Outdent|अनुपदीना (सं॰ स्त्री॰) अनु आयाम सादृश्ये वा अनुपदं बध्वा-ख। <small>अनुपदसर्वांन्नायानयं बद्धाभक्षयतिनेयेषु। पा ५।२।९।</small> ठीक पैरके प्रमाणानुरूप पादुका, जो जूता पैर के बराबर हो।}} {{Outdent|अनुपदेष्ट (सं॰ पु॰) उपदेश न देनेवाला व्यक्ति, जो शखूश तालीम न बख़्शे।}} {{Outdent|अनुपध (सं॰ पु॰) अक्षर अथवा शब्दांश जिसके पूर्व दूसरा प्रतिष्ठित न हो, अपने पहले दूसरा न रखनेवाला हर्फ़ या लफूज का टुकड़ा।}} {{Outdent|अनुपधा (सं॰ स्त्री॰) धूर्तता, धोकेबाजी, वञ्चकता, हीलासाजी।}} {{Outdent|अनुपधि (सं॰ त्रि॰) नास्ति उपधिश्छलं यत्र। १ निश्छल, कपटताशून्य, धोका न देनेवाला। (स्त्री॰) नञ्-तत्। २ सरलभाव, सीधापन, सिधाई।}} {{c|<small>“कपटोऽस्त्रो व्याजदम्भोपधयश्छद्मकैतवे।” (अमर)</small>}} {{Outdent|अनुपधिशेष (सं॰ पु॰) वह व्यक्ति जिसमें मनुष्यत्व न विद्यमान हो, जो शख्स इन्सानियतसे खा़ली रहे।}} {{Outdent|अनुपनाह (सं॰ पु॰) बौद्ध मतसे-प्रगाढ़ प्रेम अथवा भक्तिका अभाव, गहरी मुहब्बत या मुरब्बतका न मिलना।}} {{Outdent|अनुपनीत (सं॰ पु॰) न उपनीतः, नञ्-नत्। १ उपनयनविहीन, जिसका उपनयन या यज्ञोपवीत न हुवा हो, (त्रि॰) २ जो ज्ञानका विषयीभूत न हो, समझमें न आनेवाला। ३ लाया न गया, जिसे लाये न हों।}} {{Outdent|अनुपन्यस्त (सं॰ त्रि॰) विशदरूपसे अनिर्मित, अग्रतिष्ठित, साफ़ तौरपर न बनाया 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जिसे ढूढ अनुपसंहारिन् (सं॰ त्रि॰) १ जो उपसंहारकर्ता न सकें। न हो, मार न डालनेवाला। २ न्यायमतसे दुष्ट अनुपलक्ष्यवमन् (सं॰ त्रि॰) अनुसन्धानशून्य मार्ग हेतु-विशेष-विशिष्ट, जिसमें कोई बुरा सबब लगा हो। विशिष्ट, पता न लगने काबिल राह रखनेवाला, जिस- अनुपसर्ग (सं॰ पु॰) १ उपसर्गभिन्न शब्द, जो को राह ढूढे न मिले। लफ ज ज न हो। २ संयोजनाको आवश्यकता न अनुपलब्ध (सं॰ त्रि॰) अप्राप्त, अविदित, अनिश्चित, रखनेवाला द्रव्य, जिस चीज़में जोड़ने मिलानेको नायाब, नामालूम, बैठौर-ठीक। ज़रूरत न पड़े। अनुपलब्धि (सं॰ स्त्री॰) न उपलब्धिः, अभावे नञ्- अनुपसेचन (सं॰ त्रि॰) नास्ति उपसेचनं व्यञ्जनं तत्। लाभका अभाव, प्रत्यक्षका न पाना, अप्राप्ति, यत्र। दध्यादि व्यञ्जन-शून्य, जिसमें दही वगैरह लाइल्मी, बैसमझी। ज़ायकेको चीज न पड़ी हो। यह शब्द भोजनका अनुपलब्धिसम - (सं॰ पु॰) मिथ्याहेतु, दलोले- विशेषण ठहरता है। बातिल, किसी झूठी बातको समझ-बूझकर साबित अनुपस्कृत (सं॰ त्रि॰) उप-कप्रतियत्नाद्यर्थेषु क्त-सुट्- करने की कोशिश। (स्त्री॰) अनुपलब्धिसमा। उपस्कृतम् ; न उपस्कृतम्, नञ्-तत्। उपात् प्रतियववकृत- अनुपलभ्यमान (सं॰ त्रि॰) विदित न होता हुवा, वाक्याध्याहारेषु। पा ॥१॥१३९ । १ असमाप्त, अरञ्जित, खत्म जो मालूम न पड़ता हो। न हुवा, नातराश, जो पूरा न पड़ा या जिसपर अनुपलम्भ (सं॰ पु॰) अनुपलब्ध देखो। सैकल न लगा हो। २ विकारशून्य, न बिगड़ा हुवा, अनुपलम्भन (सं॰ क्ली॰) अनुपलब्ध देखी। जो विकत न हो। ३ अनावश्यक, जिसकी ज़रूरत अनुपवीत (सं॰ पु॰) न उपवीतः । उपनयन न पड़ी हो। संस्कारसे रहित दिज, जिस हिजका यज्ञोपवीत न अनुपस्थान (सं॰ क्ली॰) न उपस्थानम्, अभावाथ हुवा हो, जिस ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्यको जनेऊ न नज-तत्। उपस्थानका अभाव, पास न रहनेको दिया रहे। अनुपवीतिन्, अनुपवीत देखो। स्थिति, गैरहाजिरी, जिस हालतमें नज़दीक न रहें। अनुपशम (सं॰ पु॰) न उपशमः शान्तिः, अभावार्थे (त्रि॰) नज-बहुव्री॰। २ उपस्थानशून्य, उपासना. नञ्-तत्। शान्ति का अभाव, अमनका न मिलना, रहित, उपस्थितिविहीन, गैरहाजिर, पास मौजूद चैनका न चेहकना, बेचैनौ, घबराहट। न रहनेवाला, जो आस-पास देख न पड़े। अनुपशय (सं॰ पु॰) रोगबर्धक द्रव्य-विशेष, जिस अनुपस्थापन (सं॰ क्ली॰) १ अनुपपत्ति, अनुपस्थिति, चीज़से बीमारी बढ़ जाये।- दानका अभाव, पैदाका न होना, किसी चीजका न "हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारिणाम्। रखना, न देनेको बात। २ गैरहाजिरी या नातय्यारी। पौषधानविहाराणामुपयोगं सुखावहम् ॥ अनुपस्थापयत् (सं॰ त्रि॰) उपस्थित न रहते हुवा, विद्यादपशयं व्याधैः सहि सामामिति मा तः। जो हाज़िर न रहे। विपरीतोऽनुपशयो व्याध्य सात्मयाभिस जितः॥" (माधव निदान) अनुपस्थापित (सं॰ त्रि॰) अनुपस्थित, नातय्यार, <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 4c20zaq8c9fhdpn6pybqwb1bct7xij5 668211 668154 2026-07-19T10:20:27Z Sanjana Chowdhury 5438 668211 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४६२'''|'''अनुपरिश्रित्-अनुपस्थापित'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अनुपरिश्रित् (सं॰ अव्य॰) वृत्ताकार परिधिपर,। जहां चारो ओर घेरा बना हो।}} {{Outdent|अनुपलक्षित (सं॰ त्रि॰) न उपलक्षितं सविशेष-मवगतम्। विशेषरूपसे अविदित, अविवेचित, जिसका पता न लगा हो, नामालूम, बेनिशान्, बेपहुंच।}} {{Outdent|अनुपलक्ष्य (सं॰ त्रि॰) विवेचनाके 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बन्धुको स्त्रीका "पूर्णवलेहगुटिका कल्कानामनुपानकम्। गमन। ५ औरसजात पुत्र-भिन्न अन्य पुत्रकी स्त्रीका वातपित्तकफोद्रेके विप्रकपलमाहरेत् ॥” (शार्ङ्गधर मध्यख॰ ६०) गमन । ६, पुत्रको असवर्णा स्त्रोका गमन। ७, मौसोके अनुपानत्क (सं॰ त्रि॰) बेजूता, जो जूता न पहने साथ रति रखना। ८, फूफूके साथ सहवास। हो, नङ्गेपैर। ८, साससे प्रसङ्ग लगाना। १०, मामीको रखना। अनुपायिन् (सं॰ त्रि॰) उपायको काममें न लानेवाला, ११, पुरोहितको खोका गमन। १२, भगिनी गमन। जो वसीलेको काममें न लाता हो। १३, आचार्यको स्त्रीका गमन । १४, शरणागता | अनुपाखं (सं॰ त्रि॰) १ पार्श्वसम्बन्धीय, बगली, १५, राणीगमन। १६, यहाश्रम पहलूवाला। (अन्य॰) २ पार्श्वमें, बगलसे, पहलूपर । छोडी हुयी स्त्रीका गमन। १७, श्रोत्रियस्त्रीगमन । अनुपालु (सं॰ पु॰) पानीयालुक, जङ्गली १८, साध्वीस्त्रीगमन। १८, उच्चवर्णको स्त्रीके साथ आलू। नीच वर्णके पुरुषका सहवास। यह उन्नीस अनुपातक अनुपावृत्त (सं॰ त्रि॰) न उपावृत्तम्। १ अपरा- गुरुपत्नौके हरण तुल्य रहते हैं। अनुपातकका विवरण वृत्त, वापस न आनेवाला। २ नैष्ठिक ब्रह्मचारी। मनुसंहिताके ११वें अध्याय में ५६ लोकादिपर और अनुपातकका प्रायश्चित्त अनुपासन (सं॰ क्ली॰) उपासनाका अभाव, ध्यानका महापातक शब्दमें देखो। न लगाया जाना, बेखयालो। अनुपातकिन् (सं॰ त्रि॰) अनुपातकमस्ति यस्य, इनि। अनुपासित (सं॰ त्रि॰) उपासना न पहुंचाया गया, अनुपातकग्रस्त, अनुपातक उठानेवाला। जिसका ध्यान न लगा हो। अनुपातम् (सं॰ अव्य॰) क्रमशः, सिलसिलेवार, अनुपुरुष (सं॰ पु॰) १ पूर्वोक्त पुरुष, पहले बताया लगातार। हुवा मर्द । २ शिष्य, चेला, जो शख्स पीछे रहे। अनुपातिन् (सं॰ त्रि॰) अनुपतति अनुगच्छति, अनु- अनुपुष्प (सं० पु०) अनुगतं पुष्पं तबिकाशम्, पत्-णिनि। १ अनुगामी, पश्चाद्गामी, पीछे पड़ने- अति-तत्। शरवृक्ष, सरपत, खड्गटण, वेतस्, रमसर, वाला, जो फल या नतीजको तरह पीछे आ रहा मूज। (Saccharum sara) हो। अनुपातयति वृक्षात् फलादिकम्। अनु-पत्- अनुपूर्व (सं॰ त्रि॰) अनुगतं पूर्व परिपाटौम्, अति॰ णिच्-णिनि। २ टपकानेवाला, जो वृक्षादिसे फल स॰। बिलकुल क्रमानुसार, ठीक क्रमानुयायी, सिल- सिलेवार, तरतीबवाला, जो ठीक कायदेके मुताबिक, अनुपादक (सं॰ पु॰) तत्त्वविशेष, जिसे तान्त्रिक लगा हो। (स्त्री॰) अनुपूर्वी। आकाशसे भी सूक्ष्म समझते हैं। अनुपूर्वकेश (सं॰ पु॰) नियमित केशविशिष्ट व्यक्ति, अनुपान (सं० लो०) अनु भेषजेन सह पश्चाहा जिस शखसके बाल कायदेसे बने हों। पोयते, पा कर्मणि ल्युट्। १ औषधके साथ मिलाकर अनुपूर्वगान (सं॰ पु॰) नियमित अङ्गविशिष्ट व्यक्ति, पिया जानेवाला ट्रव्य, जो चीज़ दवाके साथ या पीछे जिस शखसके अजा कायदेसे गंठे हों। 1 गिराये। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> gcafithwp2j6bxaxf72isiizos96sgy 668156 668155 2026-07-18T19:46:58Z Sanjana Chowdhury 5438 668156 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''२६६'''|'''अनुपातकिन्–अनुपूर्वगाव'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> स्त्रोका गमन। १, अमानतमें खयानत अर्थात् किसीका रखा पी जाये। वैद्य का औषध खानेसे अनुपानके प्रति हुवा धन धोकेसे हड़प जाना। २, मनुष्य चुराना। विशेष दृष्टि दौड़ाना आवश्यक है। अनुपानभेदसे ३, घोड़ा चुराना। ४, चांदीकी चोरी करणा। एक-एक औषधके नाना प्रकार गुण खिलते हैं। ५, भूमिको चुरा लेना। ६, होरा चुराना। ७, मणि “अनुपानविशेषेण करोति 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साथ आलू। नीच वर्णके पुरुषका सहवास। यह उन्नीस अनुपातक अनुपावृत्त (सं॰ त्रि॰) न उपावृत्तम्। १ अपरा- गुरुपत्नौके हरण तुल्य रहते हैं। अनुपातकका विवरण वृत्त, वापस न आनेवाला। २ नैष्ठिक ब्रह्मचारी। मनुसंहिताके ११वें अध्याय में ५६ लोकादिपर और अनुपातकका प्रायश्चित्त अनुपासन (सं॰ क्ली॰) उपासनाका अभाव, ध्यानका महापातक शब्दमें देखो। न लगाया जाना, बेखयालो। अनुपातकिन् (सं॰ त्रि॰) अनुपातकमस्ति यस्य, इनि। अनुपासित (सं॰ त्रि॰) उपासना न पहुंचाया गया, अनुपातकग्रस्त, अनुपातक उठानेवाला। जिसका ध्यान न लगा हो। अनुपातम् (सं॰ अव्य॰) क्रमशः, सिलसिलेवार, अनुपुरुष (सं॰ पु॰) १ पूर्वोक्त पुरुष, पहले बताया लगातार। हुवा मर्द । २ शिष्य, चेला, जो शख्स पीछे रहे। अनुपातिन् (सं॰ त्रि॰) अनुपतति अनुगच्छति, अनु- अनुपुष्प (सं० पु०) अनुगतं पुष्पं तबिकाशम्, पत्-णिनि। १ अनुगामी, पश्चाद्गामी, पीछे पड़ने- अति-तत्। शरवृक्ष, सरपत, खड्गटण, वेतस्, रमसर, वाला, जो फल या नतीजको तरह पीछे आ रहा मूज। (Saccharum sara) हो। अनुपातयति वृक्षात् फलादिकम्। अनु-पत्- अनुपूर्व (सं॰ त्रि॰) अनुगतं पूर्व परिपाटौम्, अति॰ णिच्-णिनि। २ टपकानेवाला, जो 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इन लोगोंमें विधवा विवाह प्रचलित व्यक्ति, जिस शख्सको तोंदी बाकायदा बनी हो। है। किन्तु व्यभिचारिणी स्त्री पतिके छोड़ देनेपर अनुपूर्वपाणिलेख (सं॰ त्रि॰) नियमित हस्तरेखा भी उसके जीते-जी पुनर्विवाह नहीं कर सकती। विशिष्ट, जिसके हाथको लकौर बाकायदा पड़ो हो। अन्यजातीय पुरुषके साथ किसी स्त्रीका व्यभिचार अनुपूर्ववत्सा (सं॰ स्त्री॰) नियमित रूपसे वत्स लगनेपर उसको जातिच्युत कर देते और उसे मरी उत्पन्न करनेवाली गो, जो गाय कायदेसे बच्चा जने । समझ अनेक प्रकारका क्रियानुष्ठान उठाते हैं। अनुपूर्वशस् (सं॰ अव्य॰) १ नियमित क्रमसे, बंध इस उपलक्ष्यमें एक जोवित बकरा पृथ्वीमें गाड़ दिया सिलसिलेपर। २ प्रथमतः, पहलेसे, प्रारम्भमें, जाता है। 'शुरूपर। अनुप्रदान (सं॰ क्ली॰) अनुप्रदीयते अनु-प्र-दा-करणे अनुपूर्वेण, अनुपूर्वशस् देखो। ल्युट्। १ वर्णोत्पादनके निमित्त वाह्यप्रयत्नविशेष, अनुपूर्व (सं॰ त्रि॰) नियमित, क्रमबद्ध, बाकायदा, हर्फ निकालनेके लिये बाहरी खास तरकीब । सिलसिलेवार। “एते श्वासानुप्रदाना अघोषाश्च विवखते॥” (भट्टीजि) अनुपृक्त (सं॰ त्रि॰) सम्मिलित, मिला हुवा। २ दान, बखू शिश। अनुपृष्ठय (सं॰ त्रि॰) १ पोठपर बंधा 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सके। जोते-बोये आप ही पैदा हुवा हो। अनुप्रयोग (सं॰ पु॰) अतिरिक्त संस्थापन, ऊपरी अनुप्पन-मन्द्राज प्रेसिडेन्सीको कनाड़ी जातिके लगाव। कृषक । प्रधानतासे मदुरा, तिब्रेवेली और कोयम्बातुर अनुप्ररोह (सं॰ त्रि॰) क्रमानुसार बढ़ते हुवा, जो जिलेमें इनका वासस्थान है। सम्भवतः इनका आदि| सिलसिलेवार निकल रहा हो। अथवा <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> m6e8tog1qbjgtes68i7d14lmy3ut6tr 668226 668157 2026-07-19T11:15:19Z Sanjana Chowdhury 5438 668226 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुपूर्वज–अनुप्ररोह'''|'''४६७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अनुपूर्वज (सं॰ त्रि॰) नियमितरूपसे उत्पन्न, जो बाका़यदा पैदा हुवा हो।}} {{Outdent|अनुपूर्वदंष्ट्र (सं॰ त्रि॰) नियमित दन्तविशिष्ट, कायदेके दांत रखनेवाला, जिसके दांत ठीक-ठीक बने हों।}} {{Outdent|अनुपूर्वनाभि (सं॰ पु॰) नियमिताकार नाभिविशिष्ट व्यक्ति, जिस शख्सकी तोंदी बाकाधयदा बनी हो।}} 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1.djvu/४७५ 250 88365 668158 352668 2026-07-18T20:04:15Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 668158 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४६८'''|'''अनुप्रवचन-अनुप्रास'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> अनुप्रवचन (सं॰ क्ली॰) अनुरूपं प्रवचनं उच्चारणम् ।। अंश और शब्दको पुनरावृत्ति, एक जेसे हर्फ, टुकड़े अनुप्रवचनादिभ्यश्च। पा ५:१।१११॥ गुरुके कथनानुसार उच्चारण, और लफ्जका दुहराया जाना। किसी वाक्यमें पास उस्तादका बताया-जैसा तलफ फुज। अनुप्रवचनादिमें हौ पास समान वर्णका विन्यास बंधनेसे अनुप्रासा- निम्नलिखित शब्द रहते हैं, अनुप्रवचन, उत्थापन, लङ्कार बनता है। (Alliteration) मम्मटभट्टने अनु- प्रवेशन, अनुप्रवेशन, उपस्थापन, संवेशन, अनुवेशन, प्रासका यह लक्षण लगाया है, अनुवचन, अनुवादन, अनुवासन, आरम्भण, प्ररोहण, "वर्णसाम्यमनुप्रासः। अन्वारोहण । खरवसाय ऽपि व्यञ्जनसदृशत्व' वर्गसाम्यम्। रहस्यानुगतः प्रकृष्टी न्यासोऽनुप्रासः॥” (काव्यप्रकाश) अनुप्रविश्य (सं॰ अव्य०) प्रवेश पाकर, दाखिल होके, पहुंचनेपर, घुसनेमें। वर्णको समता अनुप्रास कहातो है। स्वरको समता अनुप्रवेश (सं० पु॰) अनुरूपः प्रवेशः। १ सूर्यके यथानु- न मिलते यदि केवल व्यञ्जनवर्णको हो समता सजे, रूप किरणका चन्द्रमण्डलमें प्रवेश, आफताबवाली तो भी समान वर्ण बन जाता है। वाक्यक रसादि- जैसी-को तैसी शुवाका चांदके घेरे में घुसना। २ अनु- जनक वर्णविन्यासका अनुप्रास नाम पड़ा है। रूप प्रवेश, वापसी। ३ घरके भीतर जानेकी राह। अनुप्रास काव्यका अलङ्कार है। यह अलङ्कार ४. प्रतिविम्बपतन, अक्सका पड़ना। (Reflection) भावसे नहीं, वर्ण और शब्दसे सजता है। इसीसे अनु- ५ प्रतिलक्षित होना, झलकका आना। ६.सदृशी प्रास, रचनाके ऊपरको शोभा है, इस अनुप्रास भौतरौ करण, नकल। अधिक गुण नहीं रहता। जिस समय कविको "अनुप्रवेशादिव बालचन्द्रमाः।” ( रघु ३२२२) सहृदयता अक्षुण रहती, तब वह अनुप्रास ढुंढते नहीं अनुप्रवेशन (सं॰ क्ली॰) अप्रवेश देखो। फिरता, अनुप्रास उसे अच्छा भी नही लगता। वह अनुप्रवेशनीय (सं॰ त्रि॰) प्रत्यावर्तन अथवा प्रत्या हृदयका चित्र खींच लोगोंको प्रसन्नता पहुंचाता है। गमन सम्बन्धीय, लौटने या दाखिल होनेवाला। इसीसे हिन्दुस्थानके प्रधान कवि तुलसीदास, सूरदास अनुप्रश्न (सं॰ पु॰) गुरु द्वारा पूर्वकथित विषयका और केशवको कवितामें अनुप्रासको मिठास नहीं प्रमाण देते हुवा अनुयायी प्रश्न, जो पिछला सवाल, पाते। कालिदासको शकुन्तला सीधी बातोंमें बनी है। उस्तादको पहले बतायो बातका हवाला रखे। शकुन्तला तपस्विकन्या रहीं, वनके भीतर बसती अनुप्रसक्त (सं॰ त्रि॰) अतिशय संलग्न, खूब सटा थों। उन्होंने पट्टवस्त्रपर मणि-मुक्ता लगा झला- हुवा, जो पूरे तौरसे फंसा हो। झलीमें दुष्यन्तसे मुलाकात न की थी। अनुप्रसक्ति (सं॰ स्त्री॰) घनिष्ठ सम्बन्ध, गहरा समाज निस्तेज जानसे जब मनुष्यको सहृदयता. लगाव। घटने लगती, तब कविको दृष्टि शब्दकी ओर ही अनुप्रस्थ (सं॰ त्रि॰) प्रशस्त, चौड़ा, जो चौड़ाईके झुकती है। हरिश्चन्द्र गद्य लिखने बैठ भी एक मुवाफिक रहे। छत्रमें विस्तर अनुप्रास सटाते थे। वाणभट्टके समय अनुप्रहरण (सं॰ क्ली॰) धक्का, झोंक, गिराना, डालना। लोगोंमें अधिक सहृदयता नहीं रही ; इससे उन्होंने अनुपाप्त (सं॰ त्रि॰) १ आगत, पहुंचा, प्रत्या कादम्बरीमें छोरसे ओरतक केवल अनुप्रास अड़ा वर्तित, लौटा। २ प्राप्त, मिला। दिया, जो कादम्बरी पड़नेपर अतिशय विरक्ति अनुप्राशन (सं॰ क्ली॰) अनुरूप भक्षण, खा लेना, निकालता है। चतुष्पाठौके अध्यापकको भी अनु- खवायो। प्रास अथवा यमक बहुत अच्छा लगता, इसौसे. वह अनुप्रास (सं॰ पु॰) प्राश्यते प्रकष्टमाक्षिप्यते प्रासः; दो एक चोतुका सुनते. हौ आंखसे. आंसू टपका. अनुसदृशः प्रासः वर्णविन्यासः, प्रादिसः। सदृश वर्ण, देता है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 3ixcuup6jae9obrp3tef2iesomstp90 668229 668158 2026-07-19T11:40:33Z Sanjana Chowdhury 5438 668229 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४६८'''|'''अनुप्रवचन-अनुप्रास'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अनुप्रवचन (सं॰ क्ली॰) अनुरूपं प्रवचनं उच्चारणम्। <small>अनुप्रवचनादिभ्यश्च। पा ५।१।१११।</small> गुरुके कथनानुसार उच्चारण, उस्तादका बताया-जैसा तलफ् फुज। अनुप्रवचनादिमें निम्नलिखित शब्द रहते हैं,—— अनुप्रवचन, उत्थापन, प्रवेशन, अनुप्रवेशन, उपस्थापन, संवेशन, अनुवेशन, अनुवचन, अनुवादन, अनुवासन, आरम्भण, प्ररोहण, अन्वारोहण।}} {{Outdent|अनुप्रविश्य (सं॰ अव्य॰) 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अधिक गुण नहीं रहता। जिस समय कविकी सहृदयता अक्षुण रहती, तब वह अनुप्रास ढुंढते नहीं फिरता, अनुप्रास उसे अच्छा भी नही लगता। वह हृदयका चित्र खींच लोगोंको प्रसन्नता पहुंचाता है। इसीसे हिन्दुस्थानके प्रधान कवि तुलसीदास, सूरदास और केशवको कवितामें अनुप्रासकी मिठास नहीं पाते। कालिदासकी शकुन्तला सीधी बातोंमें बनी है। शकुन्तला तपस्विकन्या रहीं, वनके भीतर बसती थीं। उन्होंने पट्टवस्त्रपर मणि-मुक्ता लगा झला-झलीमें दुष्यन्तसे मुलाका़त न की थी। समाज निस्तेज जानसे जब मनुष्यकी सहृदयता घटने लगती, तब कविकी दृष्टि शब्दकी ओर ही झुकती है। हरिश्चन्द्र गद्य लिखने बैठ भी एक छत्रमें विस्तर अनुप्रास सटाते थे। वाणभट्टके समय लोगोंमें अधिक सहृदयता नहीं रही; इससे उन्होंने कादम्बरीमें छोरसे ओरतक केवल अनुप्रास अड़ा दिया, जो कादम्बरी पड़नेपर अतिशय विरक्ति निकालता है। चतुष्पाठीके अध्यापकको भी अनुप्रास अथवा यमक बहुत अच्छा लगता, इसीसेश वह दो एक चोतुका सुनते ही आंखसे आंसू टपका देता है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> sr92hwqi0knw02o2jqjp964dgq1urlk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४७६ 250 88366 668159 352670 2026-07-18T20:08:09Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 668159 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुप्रास'''|'''४६९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> सभी काममें बढ़ाबढ़ी दोष मानी गयी है। अल्पप्राण और दीर्घप्राण वर्णसे कविता बनाना परिमित काम करनेसे गुण निकलता है। अब यही चाहिये। आदि, करुण और शान्तिरस अल्पप्राण एवं देखना चाहिये, अनुप्रास क्या है और उससे रचना वीभत्स, हास्य, रौद्र, वीर, भय और अद्भुतरस दीर्घप्राण कितनी मिष्ट पड़ती है ? वर्णसे रचे । वर्गके प्रथम, तृतीय, पञ्चम वर्ण और य र "ततोऽरुणपरिस्यन्दमन्दीक तवपुः शशी । ल व को अल्पप्राण, और वर्गके द्वितीय, चतुर्थ वर्ण, दने कामपरिक्षामकामिनीगण्डपाण्डुताम् ॥". एवं श ष स ह को महाप्राण कहते हैं। आदि प्रभृति ऊपरके श्लोकमें 'स्यन्द,' 'मन्द', 'काम' 'क्षाम', रसमें न और म संयुक्त वर्ण प्रशस्त है, किन्तु टवर्गका 'गण्ड', 'पाण्डु', यह तीन अनुप्रास आये हैं। संयुक्त वर्ण ठीक नहीं पड़ता। वीभत्स प्रभृति रसमें होलीमें रोली लिये बोली तिय मुसकाय । अनुनासिक-भिन्न अन्य संयुक्त वर्ण और टवर्गका हौ वैगि कामह इत आइये माखन दह' खवाय ॥ संयुक्त वर्ण प्रशस्त रहता है। किन्तु रचनाके समय यहाँ होली, रोली और बोली शब्द अनुप्रासके हैं। चुन-चुन केवल अल्पप्राण और दीर्घप्राण वर्णका प्रयोग इसीतरह दो-तीन वर्ण एक प्रकार पास-पास पड़नेसे 'प्रायः नही पहुंचता। सर्वत्र ही दोनो प्रकारका वर्ण अनुप्रास गंठता है। मिल जाता है। फिर भी आदि, करुण और शान्ति- व्यञ्जनवर्णका ही अनुप्रास मिष्ट लगता है, वर- रसमें अल्पप्राण वर्णको संख्या अधिक सजती और वर्णका अनुप्रास उतना मोठा नहीं उठता। वीर प्रभृति रसमें दीर्घप्राण बहुल परिमाणसे नाची गावी रंग करो खेलो पाज गुलाल । होलीको मौको भलो चली मनावो लाल ॥ पड़ता है। कण करन कल किङ्गिणी कलित कटि यहां ओकार वर्णका अनुप्रास पड़ा है। ओकार कञ्चनं कंगूरा कुचं कारी कैश यामिनी। स्वरवर्ण है, इससे व्यञ्जन-अनुप्रासकी तरह सुनने में कानन करनफ ल कोमल कपोत कण्ठ 'मोठा नहीं लगाता। कम्बुक कपोत कौर कोकिल कलामिनी।। किसी प्रकारके व्यञ्जनवर्णमें यदि अ, इ, उ प्रभृति कैशर कुसुम कलधौतकी कळू न कान्ति नानारूप स्वरवर्ण युक्त हों, तो अनुप्रासको कोई क्षति कोविद प्रवीण वेणी करिवरगामिनी। नहीं निकलती। कोक कारिकासी किन्नरोक कन्यकासौ किल "अयमति मन्द मन्द कारीवारिपावन: पवनः ।" कामको कलासी कमलासी खासी कामिनी। यहां वेरी और वारि इन दो शब्दमें भिन्न-भिन्न इस कवितामें अल्पप्राण वर्ण ही अधिक पाये जाते स्वरवर्ण लगे हैं। अर्थात् वेरीका व एकार-संयुक्त और हैं, इसलिये कामिनीके लावण्यभावका जो आदि रस वारिका व अकार-संयुक्त है। इसतरह विभिन्न स्वर रहा, वह ख ब टपक पड़ा है। सटनेसे अनुप्रासको क्षति नहीं होती। दूसरे, पावन "धो धो धो धो नगारा गड़ गड़ गड् गड चौघड़ी घोरघर्ष: और पवन इन दो शब्दमें भी एक प वर्णपर आकार भों भौं भीरङ्ग शब्दर्घन घन घन बाजे च मन्दीरनादः। है, दूसरेपर नहीं पाते। तथापि - अनुप्रास अधिक भेरी तूरौ दमामा दगडदड़मसाशब्दनिस्तब्धदेवे- दैत्योऽसौ घोरदैत्य : प्रविशति महिषः सार्वभौमो बभूव ॥" सुश्राव्य बना है। इसीतरह कविताके स्थान-स्थानमें सम्भवमत दो- इस कविताके भीतर दीर्घप्राण वणको ही संख्या एक अनुप्रास पड़नेसे पद्य सुननेपर मिष्ट मालूम होता अधिक है। इसमें अल्पप्राणवणं उतने नहीं पड़े, है। किन्तु अधिक अनुप्रासका आडम्बर बांधनेसे इसीसे वीररस खू.ब स्पष्टरूपसे झलका है। 'पदलालित्य लापते हो जाता ; वरन् वैसी रचना अलङ्कारिकोंने अनुप्रासको अनेक श्रेणीमें बांटा पढ़नेमें कटु लगती है। है। नौचे स्पष्ट तालिकामें देखाते हैं, कौन श्रेणीका अनुप्रासमें कविता लगाते समय काव्यका रस देख अनुप्रास किस अनुप्रासके अनुगत 118. <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> njylkoqnpw4cdwl3dny1h70pjepip5j पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४७८ 250 88368 668160 352672 2026-07-18T20:17:19Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 668160 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुप्रक्षा-अनुबन्धी'''|'''४७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> मतलब यह, कि जिसके पास दयिता (स्त्री॰) ऐसा अनुवन्ध अवश्य आयेगा। इससे गुण-वृद्धिका नही दिखाती, उसके लिये चन्द्र भी अग्नि-जैसा काम निकलता और प्रत्ययमें इसका लोप भ’ चमकता है। फिर जिसके पास दयिता रहती, लगता है। उसके पक्षमें अग्नि भी चन्द्र-जैसा झलकता है। इस अनु-बन्ध-भावे घन। ४ बन्धन, सम्बन्ध, रिश्ता, स्थानमें श्लोकके उभय अर्धपर ‘दवदहन,' शब्दसे जकड़। ५ अनुवृत्ति, सीधा उतार। ६ प्रारम्भ, अग्नि एवं ‘तुहिनदीधिति’ शब्दसे चन्द्र समझ पड़ता आगाज। ७ उपक्रम, सिलसिला। ८ पूर्वलक्षण, है, अर्थमें कोई भी भेद नहीं। केवल पूर्वार्धके पहले आसार। है अविच्छेद, लगाव। तुहिनदीधिति शब्दमें दवदहनका एवं परार्धमें फ़र्क। ११ अनुरोध, इरादा। १२ आरोप, अन्दाज। दवदहन शब्दसे तुहिनदीधितिका विधान बंधा, इससे अनुवध्यते कर्मणि घञ्। १३ जन्य, पैदा होनेवाली- यह तात्पर्यमानभदसे लाटानुप्रास बना है। १४ अनित्य, जो शै मुदामी न हो। पदगत अनुप्रास समासमें भी पड़ा करता है। १५ पश्चाभावी शुभाशुभ, आगे आनेवाला भला-बुरा। वहौ फिर एक समास, भिन्न समास, समास या १६ लेश, छोटा हिस्सा। असमासमें प्रातिपदिकका सामा रहनेसे सजता है। अनुबध्नाति, कर्तरि अच् । १७ जनक, पैदाकरने- "सितकरकररुचिरविभा विभाकराकारधरणिधरकौतिः। वाला शख स। १८ प्रकृति, कुदरत। १८ वैद्यमतसे पौरुषकमला कमला सापि तथैवास्ति नान्यस्य॥" वातादि दोषका अप्राधान्ध। २० गणितमें भग्नांशका हे विभाकराकार! (सूर्यतुल्य). हे धरणिधर! संयोग, कसरका जोड़। वेदान्त-मतमें-अधिकारि- (पृथिवीपालक) आप ही को कीर्ति चन्द्रकिरण विषयके सम्बन्धका प्रयोजन, जो वैदान्तिक तत्व जैसी निर्मल है, अन्यको नजर नहीं आती एवं उन अक्षुस्स रहे। प्रसिद्ध कमलान (लक्ष्मी) भी आपके पौरुषरूप: 'दोषोत्पादोऽनुबन्धः स्यात् प्रकृतादिविनश्वर। कमलमें (पद्म) अधिष्ठान लिया है, दूसरेके नहीं। मुख्यानुयायिनि शिशौ प्रकृतस्यानुवर्तने॥' (अमर) पदानुप्रास पांच प्रकारसे पड़ता है। तदेव पञ्चधा अनुबन्धक (सं॰ त्रि॰) सम्मिलित, गठित, सम्बन्ध. मतः।” (कावाप्रकाश) असमास में एक-एक पद और अनेक विशिष्ट, मिला, लगा, सटा, गंठा। पदका सामा दी एव समासमें तीन-इसतरह पांच अनुबन्धन (सं॰ क्ली॰) सम्बन्ध, श्रेणी, सिलसिला, प्रकार निकलता है। रिश्ता, लगाव, जकड़। अनुप्रेक्षा (सं॰ स्त्री॰) १ अक्षुस्स दृष्टिका देखना। अनुबन्धा (सं॰ स्त्री॰) अनुबध्यतेऽतिखासन व्याप्रियते- २ शास्त्रार्थसाधन, किसी किताबी बातका गौर ऽनया , अनु-बन्ध-घञ्, गौरादित्वात् ङीष् । १ हिक्का- अनुप्लव (सं॰ पु॰) अनु-प्लु-अप्, अनु पश्चात् प्लवते रोग, हिचकी। २ तृष्णा, प्यास। आज्ञापालनपरतया सख्यतया वा शीघ्रं गच्छति। अनुबन्धित्व (सं॰ क्ली॰) संसर्ग साधित होने की अनुचर, दास, सहाय, नौकर, चाकर, खिदमतगार, स्थिति, साथ रहनेको हालत, सहचारिता, मातहतो। हाजिरबाश। अनुबन्धिन् (सं॰ त्रि॰) अनुबनाति, अनुबन्ध-णिनि । 'अनुबन्ध (सं॰ पु॰) अनुबध्यते अनेन, अनु-बन्ध १ अनुगत, मातहत। २ सहचर, साथ रहनेवाला। १ बालक, बच्चा। २ शिष्य, शागिर्द। ३ अनुबन्धविशिष्ट, नतीजेका। ४ अविच्छिन, लगा- ३ व्याकरणवाले किसी उद्देश्य को सिद्धिके निमित्त हुवा। ५ अनुरोधी। ६ व्यापक, समाया। ७ अनु- कल्पित वर्ण, जो हर्फ़ नहवका कोई मतलब निका वर्ती, अगला या पिछला। लनेको मान लिया जाये। यह वर्ण कार्यकालमें अनुबन्धी (सं॰ पु॰ त्रि॰) १-अनुबन्धिन् देखो। (स्त्री॰) "इत्' रहता है। कोई विशेष सङ्केत समझानेको २-अनुबन्धा देखो। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> oiy824xcag0jfzjbydr8fowcf06oxqw पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२३ 250 101979 668112 668055 2026-07-18T14:52:20Z Sweta rani Gupta 6713 668112 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||'''कफचय—कफना'''|'''२३'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> वत्सनाभ बराबर बराबर ले आर्द्रक के स्वरस में मर्दन करे। कफकेतु भावना देने से यह रस बनता है। मात्रा गुञ्जामात्र है। (भैषज्यरत्नावली) {{outdent| कफचय (सं० पु०) कफानां चयः, ६-तत्। शरीरस्थ स्वाभाविक कफ का नाश, जिससे कुदरती बलगम का बिगाड़। }} {{outdent| कफण्ड (सं० पु०) गलरोग, गले की एक बीमारी। यह स्थिर, सवर्ण, गुरु, उग्रकण्डू, शीत, महान् कफात्मक, पारुष्ययुक्त और चिरचिपाक होता है। फिर इस रोग के प्रभाव से रोगी का मुख वैरस्य पकड़ता और तालु तथा गल सूखने लगता है। (माधवनिदान) }} {{outdent| कफगोर (फा० पु०) कच्छा, करछी, डोई। इसका अग्रभाग करतल की भाँति चपटा रहता और दण्ड लम्बा लगता है। कफगोर से दाल, भात, खिचड़ी, घी या मलाई का मैल उतारते और पूरी कचौरी भी निकालते हैं। हिन्दुस्थान में इसे प्रायः कलकुल कहते हैं। }} {{outdent| कफगुल्म (सं० पु०) श्लेष्मज गुल्म, बलगम के बिगाड़ से पेट में पड़ने वाली गिलटी या गाँठ। इसका रूप स्तिमित्य, शीतज्वर, गात्रसाद, हृल्लास, कास, अरुचि, गौरव, शैत्य और कठिनोन्नतत्व है। (चरक) }} {{outdent| कफघ्न (सं० वि०) कफं तद्विकारञ्च हन्ति, कफ-हन्-टक्। आमनामक वा कफजनित पीड़ानाशक, बलगम या बलगम की बीमारी दूर करने वाला। सुश्रुतोक्त आरग्वधादि, वरुणादि, सालसारादि, रोध्रादि, अर्कादि, सुरसादि, पिप्पल्यादि, एलादि, वृहत्यादि, पटोलादि, ऊषकादि तथा मुस्तादि गणोक्त और त्रिकटु, त्रिफला, पञ्चमूल एवं दशमूल प्रभृति सकल द्रव्य कफनाशक हैं।}} {{C|<small>अन्यान्य कफघ्न द्रव्य कफ शब्द में देखो।</small>}} {{outdent| कफघ्नी (सं० स्त्री०) कफघ्न-ङीष्। १ शुकनासा, केवाञ्च। २ वृक्षाभेद, एक पेड़। }} {{outdent| कफज (सं० त्रि०) कफाज्जायते, कफ-जन्-ड। आम से उत्पन्न, बलगम से पैदा। }} {{outdent| कफज्वर (सं० पु०) कफनिमित्तो ज्वरः, मध्यपदलो०। आमज्वर, बलगमी बुखार।<small>ज्वर देखो।</small> }} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent| कफणि (सं० पु०-स्त्री०) केन सुखेन फणति अनायासेन मोच विकचनत्वं प्राप्नोति, क-फण्-इन्; केन अनायासेन स्फुरति, क-स्फुर-इन् पृषोदरादित्वात् साधुः। कफोणि, मिरफ़क़, कोहनी, बाँह के बीच की गाँठ। }} {{outdent| कफणी (सं० स्त्री०) कफणि देखो। }} {{outdent| कफद (सं० त्रि०) कफं ददाति, कफ-दा-ड। कफकारक, बलगम पैदा करने वाला। }} {{outdent| कफन (अ० पु०) शवाच्छादनवस्त्र, मुर्दे पर डाला जाने वाला कपड़ा। }} {{outdent| कफनखसोट (हिं० वि०) १ शव के आच्छादन का वस्त्र नोच लेने वाला, जो मुर्दे पर डाला जाने वाला कपड़ा फाड़ लेता हो। पहले डोम श्मशान में मुर्दे का कपड़ा उतार आपस में फाड़ लेते थे। २ कृपण, कंजूस। ३ दरिद्र का धन हरण करने वाला, जो गरीब का माल उड़ा लेता हो। }} {{outdent| कफनखसोटी (हिं० स्त्री०) १ शवाच्छादनवस्त्र की चीरफाड़, मुर्दे पर डाले जाने वाले कपड़े की नोच-खसोट; यह डोमों का कर है। २ वृत्तिविशेष, रुपया कमाने की एक चाल। अयोग्य रीति से दरिद्र का धन-हरण करना कफनखसोटी कहलाता है। ३ कृपणता, सूमपन। }} {{outdent| कफनचोर (हिं० पु०) १ प्रधान तस्कर, बड़ा चोर। जो गड़े मुर्दे को उखाड़ कफन चुराता, वही कफनचोर कहलाता है। २ दुष्ट, बदमाश, उचक्का। क्षुद्र द्रव्य चुराने और किसी को देख में न पाने वाले का नाम कफनचोर है। }} {{outdent| कफनाड़ी (सं० स्त्री०) दन्तमूलगत रोगविशेष, दाँतों की जड़ में होने वाली एक बीमारी। }} {{outdent| कफनाना (हिं० क्रि०) शव को वस्त्र से आच्छादन करना, मुर्दे को कपड़ा ओढ़ाना। }} {{outdent| कफनाशन (सं० वि०) कफं नाशयति, कफ-नश्-णिच्-युट्। कफ को नाश करने वाला, जो बलगम मिटाता हो। }} {{outdent| कफनी (हिं० स्त्री०) १ शव के कण्ठ में पड़ने वाला वस्त्र, जो कपड़ा मुर्दे के गले में डाला जाता हो। }} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1dy8meuwdxq4e8lzxxbj4h3uhxb1ji1 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२४ 250 101980 668113 367252 2026-07-18T14:55:52Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668113 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''२४'''|'''कफप्रकृति—कफाशय'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> २ परिधानविशेष, पहनने का एक कपड़ा जिसे साधु धारण करते हैं। कफ़नी सिला नहीं जाता। इसमें सिर निकालने को एक छिद्र रहता है। इसका दूसरा नाम चोलना है। {{outdent| कफप्रकृति (सं० स्त्री०) स्थिरचित्तता स्निग्धकेशत्व आदि, दिल का ठहराव और बालों का चिकनापन वगैरह। }} {{outdent| कफप्राय (सं० त्रि०) कफः प्रायः बाहुल्येन यत्र, बहुव्री०। कफल, जो बहुत बलग़म रखता हो। }} {{outdent| कफमन्दिर (सं० पु० क्ली०) मण्डभेद, माड़, भात। }} {{outdent| कफमरी (सं० स्त्री०) नागरमुस्ता, नागरमोथा। }} {{outdent| कफरोग (सं० पु०) कफजन्य रोगसमूह, बलगम से पैदा होने वाली कोई बीमारी। }} {{outdent| कफरोहिणी (सं० स्त्री०) कफजन्य गलरोगविशेष, बलगम से गले में होने वाली एक बीमारी। गलरोहिणी देखो। यह श्वासनिरोधन, मन्दपाक, सिराङ्कुर और कफ-होती है। सम्भव (माधवनिदान) है। }} {{outdent| कफल (सं० त्रि०) कः साध्यत्वेन यस्य, कफ-वच। कफविशिष्ट, बलगमी। }} {{outdent| कफवर्धक (सं० त्रि०) कफं वर्धयति, कफ-वृध-णिच-ज्वल-शुन। श्लेष्मा को वृद्धि करने वाला, जो बलगम बढ़ाता हो। }} {{outdent| कफवर्धन (सं० पु०) कफं कफजनितं विकारं वा वर्धयति, कफ-वृध-णिच्-ल्युट्। १ पिण्डीतगर, वृक्ष किसी किस्म का तगर का पेड़। (वि०) २ कफवर्धक, बलगम बढ़ाने वाला। }} {{outdent| कफविरोधि (सं० क्ली०) कफं विशेषेण रुन्धि, कफ-वि-रुध्-घिनि। १ मरिच, मिर्च। (वि०) २ श्लेष्मारोधक, बलगम रोकने वाला। }} {{outdent| कफविरोधी (सं० वि०) श्लेष्मरोधक, बलगम रोकने वाला। }} {{outdent| कफस (अ० पु०) १ पिञ्जर, पिंजरा। २ बन्दी-क़ैदखाना। सञ्चित स्थान। ३ कटहरा। जगह। जिसमें वायु और प्रकाश नहीं रहता, उस स्थान का नाम कफस पड़ता है। }} {{outdent| कफशमन (सं० पु०) कफशान्तिकर द्रव्यगण, मन्दा करने वाली चीज़ का जखीरा। कफ देखो। }} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent| कफसम्भव (सं० वि०) कफात् सम्भवः उत्पत्तिर्यस्य, ५-तत्। कफजात, बलगम से निकलने वाला। }} {{outdent| कफस्थान (सं० क्ली०) कफामय, बलगम का काम। आमाशय, वक्ष, कण्ठ, सिर और सन्धि को कफ-स्थान कहते हैं। }} {{outdent| कफस्राव (सं० पु०) नेत्रसन्धिगत रोगविशेष, आँख के जोड़ में पैदा होने वाली एक बीमारी। इसमें नेत्र का सन्धि पकता और उससे श्वेत सान्द्र एवं पिच्छिल पूय पड़ता है। (माधवनिदान) }} {{outdent| कफहर (सं० त्रि०) कफं हरति नाशयति, कफ-हृ-अच्। कफनाशक, बलगम दूर करने वाला। }} {{outdent| कफहृत् (सं० स्त्री०) कफं हरति, कफ-हृ-क्विप्। श्लेष्मनाशक, बलगम दूर करने वाला। }} {{outdent| कफातिसार (सं० पु०) कफजनित अतिसार, बलगमी दस्त। इसमें प्रथम लङ्घन और पाचन हितकर है। फिर सामातिसारण दीपनगण प्रयोग करना चाहिये। कफातिसार में मनुष्य शुक्ल, सान्द्र, सकफ, श्लेष्मयुक्त, पूतिगन्ध, शीत और हृष्टरोमा हो जाता है। (माधवनिदान) }} {{outdent| कफात्मक (सं० त्रि०) कफ़ आत्मा यस्य, कफ़-आत्मन्-कन्। १ कफमय, बलगमी। २ कफरूपी, बलगम की सूरत रखने वाला। }} {{outdent| कफान्तक (सं० पु०) कफस्य अन्तको नाशकः। बर्बरक वृक्ष, बबूल का पेड़। }} {{outdent| कफाबन्द (हिं० पु०) कण्ठ के पश्चात्भाग को फांस कर किया जाने वाला एक पेंच। कुश्ती में जब एक पहलवान नीचे आ जाता, तब ऊपर वाला दाईं ओर बैठ अपना वामहस्त उसकी कटि में घुसेड़ दक्षिण हस्त तथा पाद से उसका कण्ठ दबाता और वामहस्त से लँगोट पकड़ उसे उलटाता है। इसी का नाम कफाबन्द है। फ़ारसी में 'कफा' कण्ठ के पश्चात्भाग को कहते हैं। }} {{outdent| कफारि (सं० पु०) कफस्य अरिः, ६-तत्। १ आद्रक, अदरक। २ शुण्ठी, सोंठ। }} {{outdent| कफ़ालत (अ० स्त्री०) बन्धकता, ज़मानत। प्रतिभू-पत्र को कफ़ालतनामा कहते हैं। }} {{outdent| कफाशय (सं० पु०) कफस्थान, बलगम का मुकाम। }} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 4u4vbgpxseum9lkobtqk54keky43htu पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२५ 250 101981 668201 367253 2026-07-19T07:33:32Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668201 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||'''कफिनौ-सबन्ध'''|'''२५'''}} ​<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|कफिनो (सं० स्त्री०) कफिन्-ङीप्। १. हस्तिनी, हथिनी। २. अक्षध्यान की, बलगम की औरत। ३. नदीविशेष, एक नदी।}} ​{{outdent|कफिया (हिं० पु०) लाठी या लाठी का बोझ। यह बङ्गाल में लाठी और सोटी में लगता है। कफिया शब्द अँगरेज़ी 'कफ़' से बना है।}} ​{{outdent|कफी (सं० त्रि०) कफोऽस्यास्त्य, कफ-इनि। स्वादु रसत्वात् कफकारिणीति। वा प्रागुक्तम्। १. श्लेष्मयुक्त, बलगमी। (पु०) २. मरु, हाथी।}} ​{{outdent|कफ़ीट (हिं० पु०) कफ़ाफ का बुना हुआ कपड़ा। यह अँगरेज़ी 'कफ़' शब्द से बना है।}} ​{{outdent|कफ़ील (अ० गु०) ज़ामिन, जामिन, ज़मानत देने वाला।}} ​{{outdent|कफ़ेतु (सं० त्रि०) कफं हन्ति नाशयति, कफ-हन्-ड; निपातनात् हस्य तु। कफहन्तृमात्रम्, श्लेष्मघ्न मात्रम्। "ऋजुकुटुभाङ्गमुस्तैः कुटजत्वक्।" (च०) १. कफनाशक, बलगमी। २. श्वेताश्वगन्ध, आसन्देह पेड़।}} ​{{outdent|कफोणि (सं० पु०-स्त्री०) केन सुखेन पण्यति व्यवहरति वा, क-फण-इगुपधत्वात् कित्, कफोदरादित्वात् साधुः। कूर्पर, कोहनी।}} ​{{outdent|कफोणिघात (सं० पु०) कूर्परप्रहार, कोहनी की मार।}} ​{{outdent|कफोत्कट (सं० त्रि०) कफप्रधान, बलगमी, जो बड़ा बलगम रखता हो।}} ​{{outdent|कफोत्क्लेश (सं० पु०) वैद्यक रोगभेद, खांसी की एक बीमारी। यह रोग प्रविष्ट असात्म्य काठ के कारण छिन्न, श्लेष्म, सान्द्रिकस्रावित और परित्याग रूप देखाता है। (माधवनिदान)}} ​{{outdent|कफोत्सेध (सं० पु०) कफ के वमन की उपशस्ति, बलगम निकालने के लिये आकाङ्क्षा।}} ​{{outdent|कफ़ोदर (सं० क्ली०) कफजन्य उदररोग, बलगम से होने वाली पेट की एक बीमारी। इसमें उदर शीतल, सुप्त, स्थिर, शङ्खप्लीहायुक्त, स्निग्ध एवं शुक्ल सिरासन्नद रहता और धमन तथा मन्द का मन्द शूल लगता है। (माधवनिदान)}} ​{{outdent|कफौह (दै० पु०) कफोणि देखो कफोड़ादितः। सुघोदरादित्वात्। कफोणि, कोहनी।}} ​{{outdent|कब (हिं० क्रि०वि०) कदा, किस समय।}} ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ​{{outdent|कबकड़िया (हिं० पु०) जातिविशेष, एक घास। यह तोया सुवासवान् होती और अवध में सरकारी बोते हैं। फिर अपनी कोई सरकारी बेचना भी इन्हीं का काम है।}} ​{{outdent|कबड्डी (हिं० स्त्री०) १. बालकों का एक क्रीड़ा, लड़कों का एक खेल। इसमें बालक अपने अपने दो दल बनाते हैं। फिर मैदान में एक लकीर खींची जाती है, जो पाला या दाँड़मेड़ कहलाती है। इसकी एक ओर एक दल और दूसरी ओर दूसरा दल रहता है। फिर जोड़ा चारू खेला जाता है। किसी दल का एक बालक 'कबड्डी-कबड्डी' कहते पाले की दूसरी ओर जाता और विपक्ष दल के किसी बालक को छूने की चेष्टा लगाता है। यदि वह किसी बालक को छूकर लौट आता और विपक्ष दल की ओर पकड़ा नहीं जाता, तो जिस बालक को वह छू आता, वह मरा कहाता अर्थात् खेल से निकाल दिया जाता है। किन्तु छूने वाला बालक छूकर लौट न सके और विपक्ष दल के बालकों के पञ्जे में पकड़ने के साथ मर जाता अर्थात् हार पाता है। इसी प्रकार एक ओर के जब सब बालक मर जाते, तब दूसरी ओर के बालक पूर्ण रूप में विजय पाते हैं। फिर दूसरी ओर से बालक छूने पावें और पूर्वोक्त रीति से मारते या मर जाते हैं। इस खेल से बालकों में दौड़ने-भागने की शक्ति आती और उनकी वृद्धि तथा हड्डी तीव्र पड़ जाती है। २. काँपा, कम्पा।}} ​{{outdent|कबन्ध (सं० क्ली०) वस्त्या प्राच्छाद्यते; बन्ध आच्छादने, क-बन्धि-अच्। १. जल, पानी। (पु०) का नवं ब्रह्माङ्गि-क-चन्द्र-अच्। २. उदर, पेट। ३. राहु। ४. भूमकेतु। इसकी संख्या ८८ है। यह अति मरुभूमि में मिलती है। कबन्ध आकाश में फूलते हैं। इनका उदय प्रायः फल देता है। ५. मस्तकहीन जीवित एवं क्रियायुक्त कलेवर, धड़, सिरकटा शरीर। शास्त्र में लिखते हैं कि कबन्ध वीरहव्य में सहस्रार करती है। ६. गन्धर्व विशेष। ७. मुनिविशेष। ८. मेघ, बादल। ९. वज्रध्वनिविशेष। १०. दीर्घगोलाकार काष्ठ...}} ​<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> bbmcq0a14u6zviaw4pthv5qjwrhs5y3 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२६२ 250 105326 668202 371960 2026-07-19T07:54:47Z अनुश्री साव 80 668202 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" />{{rh||कष्टहरण पर्वत-कसनौ|२६३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} दुःखजनक स्थान, खराब जगह, तकलीफ़ देनेवाला मुकाम। कष्टहरण पर्वत—बिहार प्रान्तके मुड्गेर ज़िले का एक पाहाड़। {{outdent|कष्टहरणी (सं॰ स्त्री॰) कीकटदेशकी एक नदी। <small>(भविष्य ब्रह्मखण्ड २१।४०)</small> २ अङ्ग देशमें देवीकर्णके निकट प्रतिष्ठित देवीकी एक मूर्ति। (देशावलौ ४४।२।६) यह मुङ्गेरके निकट वर्तमान थी।}} {{outdent|कष्टागत ((सं॰ त्रि॰) कष्टसे आया हुवा, जो मुश्किलसे पहुँचा हो।}} {{outdent|कष्टि (सं॰ स्त्री॰) कष्ट भावे क्ति। १ परीक्षा, जांच, कसायी। अधिष्ठारणे क्ति। २ स्पर्शमणि, कसौटी, कसनेका पत्थर। ३ पीड़ा, दर्द, बीमारी।}} {{outdent|कष्टी (हिं॰ स्त्री॰) प्रसवका कष्ट उठानेवाली।}} {{outdent|कष्टीर (सं॰ क्ली॰) रङ्ग, रांगा।}} {{outdent|कस (सं॰ पु॰) कसति विकसित स्वर्णादिरत्र, कस-अच्। १ स्वर्णमणि, कसौटी, सोना-चांदी कसनेका पत्थर। कस (हिं॰ पु॰) १ खड़्गका स्थितिस्थापकत्व, तलवारकी लचक। इससे तलवारकी तेज़ी पहचानी जाती है। २ शक्ति, ताक़त। वश, क़ाबू। कुश्तीका एक पेंच, यह 'कसकी गोदी' कहलाता है। ३ अवरोध, रोक। ४ कषाय, अर्क। ५ सार, निचोड़। (स्त्री॰) ६ बन्धनरज्ज, कसनेकी रस्सी। (क्रि॰ वि॰) ७ किस प्रकार, कैसे। कसई, <small>कसौ देखो।</small>}} {{outdent|कसक (हिं॰ स्त्री॰) १ पीड़ा विशेष, एक दर्द। २ कोई आघात आने और अच्छा हो जानेसे यह धीरे धीरे उठा करती है। ३ कसलकी चमक। ४ पुरातन बैर, पुरानी दुश्मनी। ५ सहानुभूति, हमदर्दी। ६ अभिलाष, हौसला।}} {{outdent|कसकना (हिं॰ क्रि॰) १ पीड़ा करना, दुखना, चमकना, रच रचके दर्द उठना। २ अप्रिय लगना, बुरा मालूम पड़ना।}} {{outdent|कसका (सं॰ स्त्री॰) कासमर्द, कसौंदी।}} {{outdent|कसकुट (हिं॰ पु॰) मिश्रधातु विशेष, एक मिलावटी फल्ज़। इसमें तांबा और जस्ता बराबर बराबर पड़ता है। कसकुटसे लोटे, कटोरे, आवखोरे वगैर:}} {{Multicol-break}} कष्टहरण पर्वत-कसनौ ६३ वरतन बनते हैं। किन्तु इसके पात्र अम्ल द्रव्य रखनेसे दुःखजनक स्थान, खराब जगह, तकलीफ देनेवाला बिगड़कर विषाक्त हो जाता है। कसकट का दूसरा मुकाम। कष्टहरण पर्वत-विहार प्रान्तके मुलेर जिलेका एक नाम भरत है। पाहाड़। कसगर (हि.पु.) जाति विशेष, कासागर कौम। . कष्टहरणी (स' स्त्री० ) कोकटदेशको एक नदी। यह मुसलमान होते हैं। इनका काम महोके छोटे (भविष्य बधखण २४०) २ महादेश में देवीकर्णके निकट छोटे बरतन बनाना है। प्रतिष्ठित देवीकी एक मूर्ति। (दपावली Brve) यह कसन (पु.) कसति हिनस्ति, कस-ल्यु । कस, मुशरके निकट वर्तमान थी। कास, खांसी। २ वेदना विशेष, एक दर्द। कष्टागन ((स० वि०) कष्टसे आया हुवा, जी मुश्कि- कसन (दि. स्त्री०) १ बन्धन, बंधाई, कसाई । लसे पहुंचा हो। २ बन्धनको रीति, कसनेका तरीका । ३.बन्धनरज्जु, कष्टि (सं. स्त्री०) कप भावे क्ति । १ परीचा, जांच, कसनेको रस्सी। वधी, तन, पट्टी। कसायो। अधिकरणे क्लि। २ स्पर्शमणि, कसौटी, कसनेका पत्थर। ३ पौड़ा, दर्द, बीमारी। क्सनई (वि. स्त्री.) पक्षि विशेष, एक चिड़िया। कष्टी (हिं. स्त्री.) प्रसवका कष्ट उठानेवाली। इसका पक्ष लणवणं, वक्षस्थल एवं पृष्ठदेश पाटल कष्टीर (सली.) रङ्ग, रांगा। और चञ्चु रत्तवर्ण होता है। कस (स• पु०) कसति विकसति स्वर्णादिरन,कस-अच् । कसनमर्दन ( स० पु.) कासमवक्ष, कसौंदौका.पेड़। १ स्पर्श मणि, कसौटी, सोना-चांदी कसनेका पत्थर । कसमा (सं० स्त्री०) साध्य लता विशेष, एक जह- कस (हि.पु.) १खनका स्थितिस्थापकल, तलवार रोली मकड़ी। लूला देखी। की लचक। इससे तलवारकी तेजी पहचानी जाती है। कसना (हिं० क्रि०) १ बन्धन करते समय रन्जु प्रादि २ शक्ति, ताकत। वश, काबू। कुश्तीका एक पेंच, दृढ़तापूर्वक खींचना, जोरसे सानना, जकड़ना। यह 'कसकी गोदी कराता है। ३ अवरोध, रोक। २ निष्कर्ष लगाना, दबाना। ३ वन्धन करना, बैठना, ४ कषाय, पकं । ५ सार, निचोड़ । (स्त्री०) ६ बन्धन ठिकाने पहुंचाना। ५ सन्जित करना, (हाथी-घोड़ा) कसनेको रस्सी। (क्रि० वि०) किस प्रकार,कैसे। सजाना। ६ भरना, ठूसना। ७ खिंचना, तनना। कसई, कसौ देखो। ८ ता पड़ना, कड़ा रहना। २ दबना, फुटना। कसक (डि. स्त्री०) १ पीड़ा विशेष, एक दर्द। १. प्रस्तुत या तैयार होना । ११ भर जाना। २ कोई पाघात पाने और अच्छा हो नानसे यह धीरे १२ घिसना, रगड़ना। १३ परीक्षा करना, परखना। धौर उठा करती है। ३ कसलको चमक। ४पुरा १४ औटना, गदियाना। १५ लचाना, नवना। तन वैर, पुरानी दुश्मनो। ५ सहानुभूति, हमदर्दी । १६ परिपाक करना, तलना। १७ कष्ट देना, ६ अमिताष, हौसला तकलीफ पहुंचाना। (पु.) १८ बन्धन, बंधना। कसकना (हि.क्रि.) १ पीड़ा करना, दुखना, चम १८ गिलाफ, खोल। २० मि विशेष, एक जा कना, रह रहके दर्द उठना। २ अप्रिय लगना, बुरा मालूम पड़ना। कमनि (हिं. स्त्री०) बन्धन, बंधाई, खींच। कसका (स्त्री) कासमद, कसौदी। कसनी (हिं. स्त्री०) १ रख्नु, रसो। २ गिलाफ, कसकुट (हि.पु.) मिश्रधातु विशेष, एक मिलावटी खोल। ३ कक्षुकी, चोली ४ स्पर्श मणि, कसौटी। फल्न । इसमें तांबा और जस्ता बराबर बराबर ५ परीचा, जांच। । यौड़ी। ७ काषायकल्प, पड़ता है। कसकुटसे लोटे, कटोरे, पावखोर वगैरः कसावका चढ़ावा .. । रोला कीड़ा।<noinclude></noinclude> 3hri6ulwsax8z18m11uajxeejfko95u 668203 668202 2026-07-19T07:56:13Z अनुश्री साव 80 668203 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Kajal Choudhary 07" /></noinclude>दुःख मुकाम | कष्टहरण पर्वत - कनो स्थान खराब जगह, तकलीफ देनेवाला कष्टहरण पर्वत - विहार प्रान्तके मुङ्गेर जिलेका एक पाहाड़ कष्टहरणी (स० स्त्रो० ) कोकटदेशको एक नदी । २ देशमें देवोनिट (मादी) यह प्रतिष्ठित देवीको एक मूर्ति सुरके निकट वर्तमान दी। कष्टगत ((सब) पाया हुवा श्री सु लसे पहुंचा हो । कष्टि (सं० स्त्री० ) कष भावे क्ति । १ परीक्षा, जांच, कसायो । अधिकरणे क्ति । २ स्पशंमणि, कसौटी, कसनेका पत्थर १ घोड़ा, दर्द, बोमारो। कष्टो (हिं० त्रो० ) प्रसवका कष्ट उठानेवाली । कटोर (सं० क्लो०) रङ्ग, रांगा । 1 २६३ वरतन बनते हैं किन्तु इसके पानमें पन्त द्रव्य रखने से बिगड़कर विषाल हो जाता है। कासकर का दूसरा नाम भरत है । कसगर (चिं० पु० ) जाति विशेष, कासागर कौम यह मुसलमान होते है। इनका काम महोके छोटे छोटे बरतन बनाना है । कथन (स० पु० ) कासति चिनन्ति, समृयु कस कास, खांसी । २ वेदना विशेष, एक दर्द । कसन ( हिं० स्त्रो० ) १ बन्धन, बंधाई, कसाई । २ वनको रोति करनेका तरीका . बन्धनरज्जु, कनेको रखो। वधी, तङ्ग, पहो । कसनई (छिं० खो० ) पक्षि विशेष,, एक चिड़िया । इसका पक्ष अभ्यवर्ष वचःस्थल एवं पृष्ठदेव पाटल और चरव होता है। कस (सं० पु०) वसति विकसति खर्णादिरन, कस-पच्कसनमर्दन (सं० पु० ) थासमर्दश्च कसोदोका पेड़ । कसमा (सं० स्त्री० ) कृच्छ्रसाध्य जूता विशेष, एक जूह- रोली मकड़ी १ स्पर्शमणि, कसौटी, सोना-चांदी कसनेका पत्थर । यस (हि०पु० ) १ खत्रका स्थितिस्थापकत्व, सलवार- को लचक। इससे तलवारको तेज़ी पहुंचानी जाती है । २ शक्ति, ताकत । वथ, काबू। कुश्तीका एक पेंच, यह 'कसको गोदी' कचाता है । ३ अवरोध, रोक । (स्त्रो०) ६ बन्धन- किस प्रकार के से ४ कषाय, अकं । ५ सार, निचोड़ । रज्ज, कसनेको रखो ( कि० वि०) कसई, कसो देखो । कसक (हि. स्त्री० ) १ पोड़ा विशेष, एक दर्द । २ कोई भावात पाने चोर चच्छा हो जानेसे यह धीरे धीरे छठा करती है। २ बसनको चमक। ४ पुरा तन वेद, पुरानी दुश्मनी सहानुभूति हमदर्दी अभिलाष होला) कसकना ( हि० क्रि० ) १ पोड़ा करना, दुखना, चम. कना, रच रहके दर्द उठना २ प्रिय लगना, बुरा मालूम पड़ना । कसका (सं० सी०) कासमर्द, कसौंदी कसकुट (हिं० पु० ) मिश्रधातु विशेष, एक मिलावटी फल्ल इसमें तांबा चोर जस्ता बराबर बराबर पड़ता है। ककुरसे लोटे कटोरे, धावडीवर देखी कसना (हिं० क्रि०) १ बन्धन करते समय रज्जु धादि हड़तापूर्वक खींचना, गोरखे सानना, जकड़ना । २ निण्वार्थ लगाना, दवाना ३ बन्धन करना, बैठना, ठिकाने पहुंचाना । ५ सन्जित करना, (हाथी-घोड़ा ) सजाना भरना, हंसना । ७ खिंचना, तनना । 2 दबना, फुटना । ११ भर जाना । ८ तक पड़ना, कड़ा रहना । १० प्रत या तैयार होना। १२ सिनाममा १२ परीक्षा करना, परखना । १४ घोटना, गढ़ियाना १५ चचाना, नवना १६ परिपाक करना, तकलीफ पहुंचाना। १८ गिलाफ खोल रोटा कोड़ा। कसनि (हिं० स्त्री० ) बन्धन, बंधाई, खौंध । कपनी (पंखो) १ र खोल । ३ कचुकी, चोलो । ★ परोचा, जांच 4 डयोड़ो। ७ कापाय कसायका चढ़ाव । ... सतना। १० कष्ट देना, (पु० ) १८ बन्धन, बंधना । २० मि विशेष एक रखो २ गिलाफ, ४ स्पर्श मणि, कसौटी।<noinclude></noinclude> 7iycs1gdn1n3d86ley61pldd67sennn पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४४८ 250 106341 668102 373205 2026-07-18T13:54:26Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668102 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|४४९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} नारायण कोचहानी प्रदेशम चौर समोनारायण कोचविहारमें राजत्व करते थे। यादशाहनामा लक्ष्मीनारायणको परीक्षितके पितामहका सहोदर ' बतलाता है। जहांगीरके राजलके म वर्ष मुसङ्गके राजा रघुनाथने परीक्षित्के विरुद्ध दरबारमें पभियोग लगाया कि उन्होंने उनके परिवारवर्गका अवरोध किया था। शेख अता-उद-दीन फतेहपुरी इसलाम खान् उस समय बगानके नवाब रहे। उन्होंने मकराम खानको कोचहाजो जीतने भेना था। लक्ष्मीनारायणने मुसलमानोंके पक्ष पर योग दिया। युइमें पगजित हो परीक्षितने पामसमर्पण किया था। फिर उनके माता बलदेवने पहोमराज स्वर्गदेवका प्राश्रय लिया। उसके पोछे परीक्षित् समाके प्रादेशानुसार दिल्ली भेजे गये और मकराम खान हाजोके शासनकर्ता नियुक्त हुये। बलदेव पासामराजको सहायतासे हानीक उहा रार्थ यत्न करने लगे। पहोमराज स्वीय अधीनता स्वीकार करा उनका साहाय्य करने पर प्रतित हुये। मकरामखान उसी समय शासनकर्तृत्वसे हटे थे। उनके स्थान पर कोई नतन शासनकर्ता पानेवाला था। इसी अवसरमें सुयोग देख बलदेवने दर अधिकार किया। उस समय इस देशमें बङ्गालके नवाबको पोरसे हाथी- नारायण भौत हो दक्षिणकूलके परगने सोलामारीको खेदाको रक्षा करने को जागीरदार पायक रहते थे। कासिम खान्ने बङ्गालके नवाब रहते समय बहुत दिन सक हाथियों को प्रामदनी न पायी थी। उन्होंने हाथी- खेदाके सरदारांको उपस्थित होनेका आदेश दिया। उपस्थित होने पर नवाबने उन्हे बन्दी बनाया। उनमें . सन्तोष और जयरामने भाग कर प्रासामराज स्वर्ग. देवका आश्रय लिया था। फिर इसलाम खान् नवाब हुये। उस समय पाण्डुके अत्याचारी थानेदार शत्रुजित् बल देवसे मिल गये। उन्होंने उनको हालोके शासनकर्ताके विरुद्ध युद्ध करनेके लिये गोपनमें परामर्श दिया था। बलदेव कोचा और पासामियोंका सैन्य ले युद्ध करनेको उपस्थित हुये । १६३६ ई० को इसलाम खान्ने यह बात सुनी। उन्होंने कई. मनसवदारोंको .१००० सवार, १०० बन्टूकवाने.. पैदल, १० घराव नामक नौका, २०० <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> नौका और बहुसंख्यक जसबाह नौकाके साथ मेजा था। श्रीघाट और पाण्डके निकट महा- युदहुवा। उभय पचमें मरते.और घायल होते भी युद्ध चलता रहा। इसलाम खानने फिर द्विगुण सैन्य भेज दिया। किन्तु उसी समय फिर पायकोंने बल- देवका पक्ष लिया था। इससे मुसलमानी सेनाको रसद बन्द हो गयी। इसलामखान्ने संवाद सुन रसद भेजी। किन्तु उसके पहुंचनेमें विलम्ब लगा था। उसी समय बलदेव ससैन्य श्रीघाट और पाण्डु छोड़ हालोके पभिमुख चले गये। फिर उन्होंने राज्य प्रवरोध कर रसद पहुचनेको राह रोकी थी। हाजोके शासनकर्ता प्रबद-उस-सलामको स्वीय माताके (यही प्रधान सेनापति बम ढाकेसे पाये थे) साथ विपक्ष शिविरमें सन्धिका प्रस्ताव करनेके लिये जाना पड़ा। किन्तु वह सदन बांध कर पासाम भेजे गये। उनके माता सैयदने वनपूर्वक शंवशिविरसे निकलनेको चेष्टा को यो। किन्तु विफल होने पर वह सदल मारे गये। उसके पीछे मोर अली सेनापति हुये। इसी बीच में ब्रह्मपुत्रके उत्तरकूल राजा चन्द्र- नारायण पर मुसलमानोंने पाक्रमण किया। चन्द्र- भागे थे। सालामारीके जमीन्दार चन्द्रनारायण के भयसे मुसत्तमानों में जा मिले । सुसम्तमान उसके पौछे गुप्तशत्रु शत्रुजित्को अनुसन्धान करनेको धुबड़ी पहुंचे थे शत्रुजित राय भूषणवाले जमीन्दार (राजा) मुकुन्दरायके पुत्र थे। सम्राट् जहांगीरके समयः शेख पला-उद-दीन बनानके शासनकर्ता रहे। उस समय उन्होंने सुकुन्दरायके हो अधीन एक दल सैन्य भेज एक बार हाजोप्रदेश पर अधिकार किया था। मुकुन्दराय युधमें जीतने पर पाण्ड और गौहाटीके थानेदार बने। उसी सुयोगमें पासामियोंके साथ उस सकल · अदाकार नोका जलयुद्धमें युद्धपोतको भांति 'व्यवइन कीती थी। कोसा नौकामैं एक मसल लगता है। फिर उसमें डॉ.बाव रहते हैं। एक मोकाके साहाय्यसे लोग बड़ी बड़ी युद्धको नौका (बड़ी होने से डोड़के सहारे न चलने वाली नाय) खौच है जाते थे।<noinclude></noinclude> itz9kj18vpl5uia58798hzwyfzr28p0 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४४९ 250 106342 668095 373206 2026-07-18T12:53:03Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668095 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४५०| कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} उनका सौहार्द स्थापित हुवा। फिर उन्होंने भूषणेके जमीन्दारकी भांति अासाम और कामरूपादेयके खान्दछिणकूलके अनेक प्रधान व्यक्तियों के साथ बन्धुता बढ़ाई। शेख अला-उद-दीनके पीछे होनेवाले सब नवार्थाने उन्हें दरबार में जानेके लिये कई बार श्रादेश किया था। किन्तु न तो वह कभी उपस्थित हुये न नियमित पेश कंश ही भेजी। नवाब इसनाम खानने देखा कि मुकुन्दरायका दरबार में पहुंचना कभी सम्भव न था। इसलिये उन्होंने उनके पुत्र शत्रु जित्को बुला भेजा। शत्र जित् गये। उन्होंने दरबारमें यथारीति नवाबकी वश्यता दिखलाई थी। उस समय नवाब हाजीके मिलनेको आगासे खुण्टाघाट गये हैं। मुहम्मद विरुद्धमें सैन्य भेज रहे थे। उन्होंने शव जित्को भी उसी सैन्चके साथ भेज दिया । किन्तु शत्रु मित् भासामराज एवं राजा बलदेवसे बन्धुता मान चुपके चुपके गूढ़ संवाद और दूसरे जमीदारों को उनसे मिलने के लिये उत्साह देने लगे। अन्तमें नवाचको सेनाने धुबड़ी पहुंचतेही शव जित्को वांध लिया और नहांगोरनगर भेज दिया। वहां विचार होने पर शव नित्को प्राणदण्ड मिला था। अबद-उस् सलामके विनष्ट होने पर कोचों और प्रासामियाँको सेना १२००० पदाति तथा वहुसंख्यक कासा नौका लेवनाश नदीको राह ब्रह्मपुत्रके तौर योगोघोपा (योगोगुहा) नामक पर्वत पर पहुंच गयो । उक्त पर्वतके नीचे हो ब्रह्मपुत्रका बनाश सङ्गम है। लिया। उसी समय बन्त देवने विष्णुपुरसे डेढ़ कोम प्रासामी वहां एक सुदृढ़ दुर्ग बना नवाबके सैन्यको प्रतीक्षा करने लगे। फिर उक्त दुर्गके बिलकुन्न सामने ब्रह्मपुत्रके दूसरे तटपर भी होरापुर नामक स्थानमें वैसाही एक और दूसरा दुर्ग बना था । योगीगुहाके दुर्गमें ३००० और होरापुरके दुर्गमे अवशिष्ट ८००० सैन्य रहा। नवाबका सैन्च धुबड़ी छोड़ खानपुर नदोको राह ब्रह्मपुत्र पार हुवा फिर वह जङ्गल काट और मार्ग बना योगीगुहाको ओर बढ़ा था। नवाब सैन्यके प्रधान सेनापति और सेनानी के अधीन ३००० पथरकलावाले सिपाही थे। क्रमशः गहमें दोनों दल सम्मखीन हुये। भासामी प्रथम प्राक्रमपसे ६ कोस इटे थे। दूसरे दिन नवावके सैन्यने योगीगुहाके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> दुर्ग पर आक्रमण किया। फिर ठीक उसी समय जमान चन्द्रनारायणको ध्वंम कर समन्य ना मिले। इसीसे वलदेव नूतन और वर्धित सैन्य का वेग सह न सके। वह समैन्य दुर्ग छोड़ भागे थे। टुर्ग अधिकार कर नवाबंका सैन्य चन्दनकोटको चना गया। राहमें बड़नगरके नमोन्दार उत्तमनारायणशा पत्रवाहक एक पत्र ले कर पहुंचा। उसमें जिग्ना था,-"वलदेवने वृहद सेन्यदन के साथ बड़नगर पर आक्रमण किया है। किन्तु उत्तमनारायण उन्हें वाधा न पहुंचा सकने केकारण नवाबके मैचमें जमान् खान्ने कुछ सैन्य ले उसी ममय वनदेवके विरुद्ध वड़नगरको यात्रा की। राहमें उत्तमनारायण मिन्न गये। नवावके सैन्यका अवशिष्ट अंश चन्दनकोट पहुंचा था। नवाब जमान् खान्ने पोमारी नदी पार हो बलदेव के एक क्षुद्र दुर्ग पर अधिकार किया । फिर वह अग्रसर होने लगे। वनदेवने देखा कि जमान खान् प्रायः जा पहुंचे थे। उसी समय उन्होंने बड़नगर छोड़ क्षत्री नामक स्थानको गमन किया। वहां बलदेव पर्वतके किनारे किनारे कई एक दुर्ग बना कर बैठ गये। जमान् खान्ने मो इसांसे लौट विष्णुपुर के जंगन में स्कन्धावार स्थापन किया था। फिर उन्होंने वर्षा अतीत होनपर बन्नदेव पर आक्रमण करना ठहरा दूर कालापानी नदोंके तौरपर रहनेवाले विपक्षियों का रषिदल छिन्न भिन्न कर डाला । पाण्डु और अोवाटसे उसो ममय उनका भी नूतनं, सैन्य भा पहुंचा था। उन्होंने बोचबीचमें रातको आक्रमण मार नवाव मेन्य को व्यतिथ्यस्त कर दिया। वर्षा होत गयो । प्रामाम- राजके नामाता बलदेवसे ना मिले थे। उसके पीछे १६३७ई० को ३१ वों अगस्त को रातके समय बमदेवने विपक्षियोंके दो क्षुद्र दुर्ग प्रधिकार कर लिये । किन्तु दूसरे दिन सबेरे जमान् खान्ने हठात् कितने ही सैन्यके साथ बलदेव पर आक्रमण मारा था। उनके कुछ सिपाही बनदेवमे सामने लड़ते रहे। फिर अवशिष्ट सैन्धके साथ उन्होंने वनदेवक रचित स्थानोंपर<noinclude></noinclude> cvy8hjbdwj3wxws5bw9mosjtwfg1u6p पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५० 250 106344 668093 373208 2026-07-18T12:33:44Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668093 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप| ४५१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पाक्रमण किया। उस समय उनमें वैसा सैन्य न था। इंसीसे वह एक एक कर विपनौके हाथ जा सगे। अनेक सेनापति मरे थे। फिर बहु सैन्य भी क्षय हुवा। कितनी ही बन्टूकों, तोपों और दूसरे इथियारोंकी हानि हुयी थी। किन्तु वनदेवको सम्पूर्ण पराजित होते न देख नपाएका सैन्य उसी दिन रातको विष्णु 'पुरकै जङ्गलमें भाग गया। उसके पीछे मवम्बर मासमें चन्दनकोटमे नतन सैन्धने जा तीन तरफसे बलदेव पर पाक्रमण किया था। उस समय बलदेव या प्रासाम रानका सैन्य पहुंचा मथा। इसोसे विपक्ष भीषण आक्रमण बलदेवका अल्पसंख्यक सैन्य ठहर न सका। वह शीघ्र ही रण छोड़ भागा था। बलदेवने स्वयं । दरत की राह पकड़ी। प्रासामरानके जामाता बन्दी बन गये। इतावशिष्ट सैन्यदल श्रीघाट और पाण्डुकी भोर भागा। वहां प्रासामराज ससैन्य रसद वगैरह लिये उपस्थित थे। नवाम का मैन्य एक बार उन पर थाक्रमण करने गया । अक्षय पर्वत, श्रीघाट और पाण्डुमें भीषण युद्ध हुवा। आसामराज परास्त "हो स्वराज्य लौट गये। कोचहाजो प्रदेश मुसलमानों के अधिकारमें हो गया। पासामग्रान्तमें कलङ्ग नदी और ब्रह्मपुत्रके मध्य काजली दुर्ग अधिकार कर मुसलमान क्षान्त हुये। उधर एक दल सैन्धने दरङ्ग ना बलदेवको भगाया था। बलदेवने अवशेषको आसाममें धुम 'शिङ्गी नामक स्थानमें श्राश्रय लिया। अन्तिम अवस्थाम दो पुत्रोंके साथ उन्होंने वहीं स्वर्गनाम किया। इसी युद्दमें कामरूप सम्पर्ण मुमलमानांके अधीन हो गया। उपरि-उता घटना पादशाह-नामसे दी गयी है। किन्तु बुरजी या मिटर मार्टिनक ग्रन्थमें बलदेवका नाम नहीं मिलता। परीचित् नारायणके चन्द्र. नारायण पुत्रको बात भी किसी ग्रन्थमें देख नही पड़ती। नरनारायणके पोछे होनेवाले सव राजावीका विषय कोचविहारकै इतिहासमें लिखा जावेगा। {{Right|कीचविहार देखी।}} • फारसी पादशाहनामाकै मतमै रामा चन्द्रनारायण परीचितक हुऐ थे। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पासामको बुरखीको देखते शुलध्वनके पुत्र रघुदेवने राजा हो नगर संस्कार और इयग्रीव-माधव- का मन्दिर निर्माण कराया। उनके पिताने प्रासामके महाम राजावाको युद्दमें परास्त कर अपने शासना. धीन रखा था। किन्तु रघुदेव वह कर न सके। उन्होंने पासामके अहोमराजको मङ्गलदेवी नानी निज कन्चा दे निरापद राजत्व किया। आधुनिक दुरबीके मतमें १५१५ शकको रघुदेव रामा हुये थे। रघुदेवने गदाधर तीर जो नगर बनाया, उसका चलित नाम गिन्नामाड़ या गिलाविजय है। (यहां गिना गेलहा या चियन इचका वन यथेष्ट था।) रघुदेवके पुत्र परीनित्-नारायणके जो मन्त्रा दिलीके बादशाहके पाससे कानूनगो हो कर पाये थे, उनका नाम कवीन्द्र बडुवा था। रांगामाटोके वर्तमान जमीन्दार उन्हीं कवीन्द्र बड़बाके वंशधर हैं। पटनामें परीक्षितको मृत्यु हुयो। उनका रान्य सुचनमानोंके हाथ पड़ते भी मानहानदोके पश्चिमसे स्वर्गकोषोंके पूर्व पर्यन्त उनके पुत्र विजितनारायणके वह मुसलमानों के नोचे करद राजा बने थे। इसी प्रकार मानहानटोके पूर्व से दिकराई तक परीक्षित्के माता वलितनारायण भो करद राजा हुये। विजनीक राजा विजितनारायण और दरङ्गके राजा वलितनारायण सन्तान हैं। सम्भवतः विजितनारा- यणने ही विजितनगर या विजनी स्यायन किया था। पहले वह मुसलमानांकी करमें अर्थ देते थे। फिर कर- स्वरूप हाथो देने का नियम हुवा। शेषको अंगरेजोंके अधीन प्रर्थ देने का नियम पुन: बंध गया है। मुसलमानोंके अधिकारसे कामरूप समस्त परि- वर्तित हो गया। देशका आचार व्यवहार, भूमिका प्रबन्ध और राज्यप्रणाली वङ्गदेश की भांति दीखने लगी। धलितमारायण जिम भागके राजा हुये, कामता- पुरका राजवंश मिटनेसे वह स्थान उतने दिनों तक एक प्रकार अराजक बन गया था। शेषमें चण्डीवरादि मयांवोंने वह देश कितना ही सुशासित किया। किन्तु वह बात मी अधिक दिन न चली। मुसलमान राज्य नीत कर लूट मार करते थे । सुतरां उनके समय<noinclude></noinclude> p5w6qetpe5rewa0c1ss6kwguuq018nh पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५१ 250 106345 668091 373209 2026-07-18T12:21:13Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668091 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४५२| कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} देशमें शान्ति स्थापित होना दूरकी बात थी, अधिक अशान्ति बढ़ गयो। भोट और कछारके अधिवासी दोनों ही उक्त प्रान्समें महा उपद्रव मचाते थे। फिर भी वलितनारायण दरङ्गा नगरमें राजधानी बना देशके शासन पर मनोयोगी हुये। किन्तु प्रासामराजका उपद्रव न घटा। पीछे उनको भ्रातुपुत्रीका विवाह होनेसे अासामराजके साथ उनको मित्रता हो गयो ।* स्वर्गनारायणने नतन पत्नी के नाम पर नगरको स्थापना और एक नदीका नामकरण किया। वनितनारायण को धर्मशीलता तथा सव्यवहारसे प्रोत हो उन्होंने उन्हें 'धर्मनारायण' उपाधि दिया और उनके कनिष्ठ चाता गजनारायणको बेलतलाका राजा बनाया। वैन तलाके राजा उक्त गजनारायणके वंशधर हैं। आधुनिक बुरचोके मतमें १५३८ शकको वलितनारायणने स्वर्ग: लाभ किया और उनके पुत्र महेन्द्रनारायणको सिंहासन मिला। महेन्द्रनारायणने ब्राह्मणांको बहुतसी निष्कर भूमि दी थी। उन्होंने १८ वर्ष निरापद यथेष्ट शान्तिसे राजत्व कर १६४३ शकको परलोक गमन किया। फिर उनके पुत्र चन्द्रनारायण राजा हुये। चन्द्रनारायण का राज्यकाल १७ वर्ष रहा। पीछे तत्पुत्र सूर्य- नारायण राजा बने। आधुलिक बुरझोके मतमें उनके समय १६८२ ई.को मन र खान् नामक किसी मुसलमान सेनापतिने उक्त देश पर पाक्रमण किया था। उस युद्ध में सूर्यनारायण बांध कर दिल्ली भेजे गये। राहसे सूर्यनारायण किसी प्रकार भाग आये। किन्तु वह लज्जासे फिर सिंहासन पर न बैठे। सूर्यनारायणके वन्दी होते समय उनके भ्राता इन्ट्रनारायण पांच वर्ष के थे। मन्त्रियों ने मिल कर उन्हें राजा बनाया। किन्तु मन्त्रियों में परस्पर विवाद उठनेसे आसामके अहोमराजने कामरूप पर्यन्त पधिकार कर लिया पहले का चुके हैं कि परीचितनारायएने शसामराजके पाक्रमपसे पव्याइति पाने के लिये खर्गनारायणको मङ्गलदेवी नामो कन्या प्रदान की थी। इससे समझ सकते कि परीचितनारायणक राशत्वकालमै ही बलितनारायण उक्त प्रदेश पर शासन करते थे। पौधासाकै मरने पर उन्होंने साधीन हो मुसलमान शासनकर्तासे निन राजा पृथक् । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> था। फिर भी वदितनारायणका वंश विसकुच मिटा न था।. उनके वंशीय दरङ्गके सिंहासन पर प्रतिष्ठित रहे। फिर इन्द्रनारायणके पीछे प्रादित्यनारायपने सिंहासनाधिरोहण किया। उनके समय राज्यको सीमा उत्तरमें गोसाई-कमन की प्रालि, दक्षिपमें ब्रह्मपुत्र, पूर्व में धनथिरी और पश्चिममें बहनदी निरूपित हुयो। उसोके मध्य क्रियदंश भाग कर आदित्यके भ्राता मधुनारायण राजा बने। आदित्यके मरने पर ध्वजनारायणकी सिंहासन मिन्ना। उनके समय दरग राज्य सम्म गरूपसे पहोमके अधीन हो गया। सूर्यनारायणक धोरनारायण नामक एक पुत्र थे। (आधुनिक दुरनी मतमें १७४४ शक ।) उन्होंने ध्वजनारायणको मार राज्य लिया। किन्तु वह तीन वर्ष ही राज्य कर डिमरूयाको ओर भाग गये। उनके पोछे महतनारायण बड़े पराक्रमी थे। वह दोनों भाई एकत्र राना बने थे। उनके पोछे (१७८८०). कीर्तिनारायणके पुत्रने राज्य पाया। उनके समय दरङ्गाके राजावोंका पराक्रम बिलकुल खर्व हो गया। वलितनारायणके समयसे इन्द्रनारायणके समय पर्यन्त वही कामरूप पर शासन करते रहे। मध्य मध्य मुसलमानों के आक्रमणमें भी उक्त वंशका ही प्राधान्य था। इन्द्रनारायणके समय कामरूपमें अहोमकाः अधिकार हुवा। किन्तु ध्वजनारायणके समय हो कामरूपको स्वाधीनता मिटी थी। उनके पीछे कीर्तिनारायणके पुत्रके समयसे दरङ्ग राज्यका नाम उठ गया। विजनीके राजबंधका इतिहास पालोचना करनेसे समझते है कि महाराज विश्वसिंहके दो पुत्र रहे। न्ये ४ नरनारायण भूप करतोया तथा विहारके मध्य और कनिष्ठ शुक्लध्वज भूप विहारसे दिकराई तक राज्य करते थे। शलध्वजके पुत्र रघुदेवनारायण रहे। रघुदेवके तीन पुत्र थे। उनमें यह परीचित्- नारायण विजनीक, मध्यम वलितनारायण दरपके और कनिष्ठ गजनारायण बेततलाके राजा धुये । ज्येष्ठ परीक्षित्नारायणकी दिल्ली के सम्राट्ने खिलपत दी थी। देशको दिशीसे लौटते समय उन्होंने राज<noinclude></noinclude> 3q4z55ael6zpml1z781pkhqxkm15zjv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५२ 250 106346 668089 373210 2026-07-18T12:09:54Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668089 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप| ४५३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पर राजमहनमें स्वर्गनाम किया। उनके साथ जो मन्त्री या दीवान् थे, वह कामरूपके कानन्गो हुये। परीक्षितके चन्द्रनारायण नामक एक पुत्र थे। उन्हीं वंश विजनीके राजावों की उत्पत्ति है। ववृत्तियारके सहयोगी मिनहाजउद्दीन्ने तवकात नासिरी नामक अपने इतिहासमें लिखा है,-लक्ष्मणा वती अधिकारके कई वर्ष पौछ (सम्भवतः ६०१ हिमरोको) बखूतियार तिब्बत और तुर्कस्थान जीतनेको अग्रधर हुये। तिव्वत और लागावतीके मध्यवर्ती भूभागमें उस समय कौंच, मैछ तथा तिहारू (वर्तमान थारू) नामक तीन प्रधान जातिका वास था। कोंचा और मैचोंका एक सरदार (तवकात-इ-नासिरीमें इस सरदारका नाम मेघोंका “अन्तो लिखा है ) बखूति यारमें हार गया। फिर उसने मुसनमान धर्मग्रहण किया था। वही पथप्रदर्शक बन बतियारको ससैन्य वर्धनकोटकी राह बाघमतीके तीर ले गया। वर्णना इस स्थानसे वह दश दिनमें पार्वत्य प्रदेश के किसी बौससे मी अधिक मेहरावधाले प्रस्तर-सेतुके निकट पहुंचे थे। उस सेतुको रक्षाके लिये बखतियार एक दल सैन्य छोड़ आगे बढ़े। सेतु पार होने पर कामरूपके रायने किसी विखासौ व्यक्तिको भेज कहला भेजा कि उस समय तिब्बत पर पाक्रमण करना युक्तिसङ्गत न था। उस समय लौट कर अधिक सैन्य संग्रह करना उचित था। फिर उन्होंने भी स्वीकार किया कि आगामी वर्ष वह अपना सैन्यदल ले उस देश जीतनका प्रयास उठायेंगे। - वतियारने किन्तु उक्त प्रस्ताव पाचन किया। इसके पोछेवह १६ वें दिन तिव्वत पहुंचे। वहां युहादिके पीछे अपने सेन्य में कुछ गड़बड़ हो जाने से लौटनेको बाध्य ये। उनके लौटनेका मार्ग कामरूप और बिहुतके मध्य तीस गिरिवन का एकतम था। फिर १६ दिन अनाहार अविश्रान्त चल उक्त सेतुके निकट आने पर उन्हें उसके दो मेहराध टूटे मिले। सेतु रक्षाके लिये नियुक्त सैन्यदलमें दो नायकोंके मध्य विवाद बढ़ा था। इमोसे वह मुख्यकार्य छोड़ चलते बने। फिर कामरूपके हिन्दुवों ने उसे तोड़ा था। पार जानेका उपाय न देख बखतियारने ससैन्य एक देवमन्दिरमें पाश्रय लिया। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> फिर उन्होंने वेड़ा बांध कर पार होनेके लिये काष्ठादिके संग्रह करनेकी चेष्टा को। कामरूपके राय उक्त संवाद के सुन सन्ध वहां गये। उन्होंने मन्दिरको चारो पोर तीक्ष्णमुख वंपदण्ड गाड़ और उनमें बरगवन्दो डान्त मुसलमानोंके सैन्यका निर्यापपथ रोकना चाहा। वख- तियारका सैन्य विपद देख एक भोर तोड़ कर निकला और बिलकुल नदीतौर पहुंचा था। कामरूपका सैन्य पोछे लगा। फिर प्रत्येकने प्राणमयसे घोड़े के साथ नदी में कूद कर पार जानेको चेष्टा को। किन्तु नदीके मध्यस्थल में पहुंच प्राय: सब ब सरे। केवल बतियार और कुछ थोड़े लोग प्रति कष्ट से प्राण बचा दूसरे पार आये। अत कोच-सरदार भलौने जा कर उन्हें उठाया और दोनाजपुरके देवकोटमें पहुंचाया।" बङ्गालवालों एशियाटिक सोसाइटीको पत्रिका २० खण्डके २८१ पृष्ठ पर डाल्टन साहव न सिलहाको नामक सेतुको प्रकार लिखी है,-"यह सेतु पश्चिम.काम- रूपमें गोहाटी पहुंचनेको एक पुरानी चौराहके बीच सम्भवतः इसी सेतुसे बखूतियार खिलजी (मतान्तरसे बखूतियारके पुत्र मुहम्मद खिलजी) सातारके पवारोहो ले गौहाटीमें घुसे थे । कारण, यह गौहाटीके उत्तर-पश्चिम प्रान्तको गिरिमानासे अति निकट अवस्थित है। इस पर्वत पर प्राज भी नगरप्रवेशके मार्ग और पथरक्षणोपयोगी वहिदुगके भग्नावशेषादि देख पड़ते हैं। किन्तु इसके विश्वास करनेका यथेष्ट कारण मिलता है कि वह महम्मद-इ. बखूतियार खिलजीके तिब्बत-पथका सिनहाकोवाखा वृहत् प्रस्तर सेतु हो नहीं सकता। उसके पीछे गौड़के नवाब गयास-उद-दीन (१२११.१७ ई.) कामरूप. जीतने गये। कामरूपसे सदिया नामक स्थान पर्यन्त उन्होंने जय किया और कर लिया था। किन्तु सदियाको पूर्वओर पहुंच वह परास्त हुये। १२५७-५८ ई०की गौड़के सेनापति मनिक ऐबकने कामरूप पर आक्रमण किया था। उन्होंने यहां एक मसजिद बनवायो । किन्तु वह युद्दमें जयंलाभ न कर सके। वर्षाले देश जलमें डूब जाने पर उनकी यथेष्ट सैन्यहानि हुयो। अन्तका वह महा<noinclude></noinclude> ryceli7yaow9yhlcnljeaxlz3715uw2 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५३ 250 106347 668087 373211 2026-07-18T12:00:43Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668087 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४५४| कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} दुरवस्था में पड़ कर गौड़ लौटे। फिर १२५८ ई०को गौड़के नवाब तुगलक खान खयं कामरूप पर चढ़े थे। कामरूपराजने उन्हें बांध कर मार डाला। यह निरूपित करना दुःसाध्य है, उस समय कामरूपमें कौन राजा थे। कामरूप जिलेमें "वैदरगड़ नामक एक पुरातन गढ़ है। प्रवादानुसार १२०४ से १२५८१ ई० वीच कोई मुसलमान-सेनापति कामरूप पर पाक्रमण करने गये थे। उनके हाथसे देशकी रक्षा करने के लिये फेंगुवा नामक राजाने वह गढ़ वनवाया। परन्तु उसके पहले वैद्यदेवने उक्त गढ़ स्थापित किया था। फेंगुवाके पोछे फिर मुसलमान वहां न पहुंचे। एक बार राजा नीलाम्बरके समय गौड़के नवाब हुसेनशाहने (१४८८. १५९६ ई०) १२ वत्सर अवरोध करनेके पीछे कामरूप पर अधिकार किया था। हुसेन शाह कामतापुर जीत कर स्वीयपुत्र नसरत शाहको प्रतिनिधि बना बङ्गालको लौटे। नसरत शाह काचविहार-राजवंशके पादि पुरुष विश्वसिंहसे हारकर भागे थे। फिर कामरूपके सौमारखण्ड (वर्तमान प्रासाम )में चहुंमुङ्ग वा स्वर्ग नारायण राजा हुये। ( १४८७-१५३८ ई० ) उस समय तुरबक नामक किसी पठान-सेनापतिने काम- रूपके अन्तर्गत उनाई देश पर आक्रमण किया। पासाममें कलियावर नामक स्थान पर युद्ध हुवा। युद्दमें • तुरवक जीते थे। किन्तु स्वर्गनारायणके प्रधान मन्त्री कन्चेंगने उनके विरुद्ध युद्दयात्रा की। वह तुरवकको पराजित कर करतीयाके अपर पार भगा गये थे ।* फिर विश्वसिंहके पुत्र नरनारायणके समय कालयवनने कामरूपमें गौहाटी तक पहुंच कर अनेक देवालय नष्ट किये। परीक्षित्नारायणके मरने पर ढाकाके नवाबने इससे पहले दस प्रबन्ध किसो स्थान पर कामवापुरकै विवरण में नसरत शाहके हाथसे विश्वसिंह द्वारा कामतापुर वा कामरूपरान्यके उद्दार सोनेकी बात लिखी जा चुकी है। फिर यहां देखते है कि पहोम राजा स्वर्गभारायणक मन्ची कनचे करतोया तक तुरबककै पौके लगे थे । पचान्तर पर तुरवक नामक किसी पठान सेनापतिक कामरूप जीतनेकी वात भारतवर्ष या बगालके दूसरे इतिहामि नहीं मिलती। यह विषय पर्यालाचना करनेसे समझ पड़ता कि तुरवककै कामपं पाक्रमयकी कथा प्रबादमाव हैं। 'क्योंकि विश्वसिंह कोचविहार और कामलापुरमै रहते तुरवककै अनुमरपको कनग क्यों चलते। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कामरूपके अन्तर्गत हाजोप्रदेश (परीक्षित्का राज्य ) ले लिया था। मुमतमान सेनापति मकरम खान् रांगा- माटीमें रह उक्त प्रदेश पर शासन करने लगे। फिर बड़टेनीलक्ष्मो नामक कोई व्यक्ति गंगामाटी गया था। उसके पीछे सैयद अबू बकर नामक एक व्यक्ति प्रामाम जीतने गये। तेजपुरके निकट भरतीमें युद्ध हुवा। युहमें अबूबकर मारे गये। उस समय कामरूपका अधिकांश पहोम राजाके, कुछ अंश रांगामाटोवान्ले सुसन्तमान शासनकर्ता और कुछ अंश राजा दरंगर्क अधीन था। कुछ दिन पाछे मिर्जाबाद नामक रांगा. माटोके किसी शासनकर्ताने पहोम राजावोंके हाथ में गौहाटी निकाल न्ने नेका यत्न किया। किन्तु वह बन न पड़ा। शेषको उनके परवर्ती बहरामवेग उसमें कृत- कार्य हुये। फिर क्रमशः मिर्जा रमन खान्, अवटुन- इसलाम शाह, इसलाम ग्वान्, शेख बहराम खान्, शेख समस्तो खान्, मकदूम इसलाम और मही-उद-दोन रांगामाटीके शासनकर्ता बने। उसी बीच मोमाई. तामूली बड़बडुवा नामक किसी प्रासामी सेनापतिन एक बार पत्यल्प दिनके लिये गौहाटीको उहार किया था। किन्तु वह फिर छोड़नेको वाध्य हुये। फिर मिर्जा जैन-उल-प्रावदीन, इसपच्चर खान्, नवाव नर-उन्न ना अनवर .खान्, मिर्जा हुसेन खान, जारी मियान, सैयद हुसेन, यद कुतुब, नाखुबा, प्रभृति कई लोगोंने कुल २६ वर्ष कामरूप पर शासन किया। उक्त शासन- कर्तावों में कोई हानी, कोई गंगामाटी, पोर कोई गोहाटीमें रहता था। शेषको उस समय ममस्त कामरूप जिला एक प्रकार मुसलमानोंक पधीन था। बिजनीका राज्य और ग्वालपाड़ा जिला भी मुसन- मानोंके ही हाथ था। केवन दरग-राज स्वाधीन रहे। किन्तु वह भी मुसलमानों का प्रभुत्व मानते थे। १६५४ ई०को जयध्वज सिंह वा चुतामूला रङ्गपुरमें महाम-सिंहासन पर बैठे। उनके किसी सेनापतिने गौहाटी अधिकार किया । १६१२ ई.को मौर जुमला कोचविहार जीतने गये। गौमाटोक पूर्व उनाई गड़गांव तक उनका अधिकार हुवा। फिर मौर जुमला स्वयं पीड़ित हुये। उनके सैन्यमें भी<noinclude></noinclude> 3yleg7bc2pm9cbuycn3v3o677xl82sx पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५६ 250 106350 668166 373214 2026-07-19T02:31:57Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668166 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरुप| ४५७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} वह गङ्गा नदीको निज देशान्तर्गत करनेके अभि पायसे वजन्देश पर चढ़नेको ससैन्य युझ्यावापूर्वक गौहाटीमें उपस्थित हुये। किन्तु दुर्भाग्यवश वहां उनको रोग लग गया। फिर कालके कराल कवल में पड़नेसे उनका प्रमिलाप सिह न हुवा। उनके पुत्र चुतनफा या शिषनाथ सिंहको सिंहासनका अधिकार मिला था। आसामके समस्त देवोत्तर, ब्रह्मोत्तर वा अन्य प्रकार निष्कर भूमिमें पधिकांश उन्हों का प्रदत्त है। उनको पट्टमहिषो फलेवरी वा प्रथमेश्वरीके उनके आदेशानुसार गौरीसागर नामक बहाद पुष्करिणी बनौ और उसके पार एक शिवमन्दिरको स्थापना हुयी। उनके मरने पर महाराजने उनको भगिनी द्रौपदी वा अम्बिकाको विवाह कर पट्टमहिषी बनाया था। उन्होंने अपनी नाष्ठाके आदेशसे शिवसागर जिलेकी दिखु नदीके उत्तर पार किश्चिदधिक चार सौ बौधे भूमिमें शिवसागर नाम्नी एक पुष्करिणी खोदा उसके तौर शिव, दुर्गा तथा विष्णुके तीन बहत् मन्दिरीको प्रतिष्ठा को और देवसेवाके लिये बहुत सी भूमि दी। उक्त तीनी मन्दिर और पुष्करिणी पाज भी विद्यमान है। उसी पुष्करिणीके नामानुसार उक्त देशका माम शिवसागर पड़ा है। फिर उसीके सौर वर्तमान समुदाय राजकार्याय और अंगीन राजकर्मचारियोंके , निवासरह स्थापित हैं। राजा शिवनाथ सिंहक मरने पर उनके माता प्रमत्त सिंह वा चुचेनफाने सिंहासन अधिकार किया। शिवसागर जिलेके अन्तर्गत दिखु नदीके दक्षिण पार रंगधर (रङ्गशाला) नामो हितल पटासिका उन्हींको बनायी है। उन्होंने इस्ती, व्याघ्र, महिष प्रभृति पशुवोका युद्ध देखने के लिये से बनाया था। उनके पीछे उनके चाता चुराम्फा या राजेश्वर सिंह सिंहासनाधिरूढ़ हुये। उन्होंने तदानीन्तन राजप्रासादक परिवर्तमें - शिवसागरकी दिखु नदीके उत्तर पार "गड़गांव" नामक बहत् और वितल भवन बनाया था। कुछ समय वहां रहनेके बाद वह प्रसन्तुष्ट हुये। फिर उस नदौके पर पार रंगधरके पास उन्होंने पति हात् और सप्ताल राजप्रासाद बनवाया। उसका नाम रंगपुर रख गया। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इसके निकट शिवसागरकी भांति वृहत् "जयसागर" नाम्री पुष्करिणी उनीको प्रतिष्ठित है। फिर तीरस्थ शिवमन्दिर भी उन्होंने स्थापित किये थे। उनके पोछे उनके माता चुन्येप्रोफा वा वक्ष्मीनाथ सिंह अभिषिक्त हुये। उन्होंने भी कतिपय देवमन्दिर स्थापित किये थे। उनमें कामपके अन्तर्गत मणियवंत पर अवकान्तका देवालय प्रधान है। उनके मरने पर उनके जेष्ठपुत्र चुहितपांगफा या गौरीनाथ सिंह सिंहासनाधिष्ठित हुये। रामलकालको प्रधाम घटना डिवरूगड़ के निकट स्थ. हिन्दूधर्ममें दोधित मटक, मोयामरीया या मरान नामक प्रादिम निवासी लोगोंको विद्रोहिता है। व दो बार विरोधी हुये । प्रथम बार तो राजाने उन्हें दमन किया, किन्तु दूसरी बार दवा न सकनेसे भागना. पड़ा। उन्होंने कलकत्ते दूत भेज अंगरेज गवरन- मेण्टसे साहाय्य मांगा था। उससे सार्ड कारनं- वालिसके पादेशानुसार कप्तान बेल्स और लेटिनेण्ट. भग्रेगर कितने ही देशीय सैन्यके साथ पासाम पहुंचे। उन्होंने विद्रोह दवा देशमें शान्तिको स्थापना किया था। रानाके मागने पर विद्रोहियोंने पसीव मिष्ठर भाषसे असंख्य निराश्रय प्रजाको मार डाला। उसोसे उन्हें मराम कहते हैं। विद्रोह-शान्तिके पोछ गोरी- नायने रंगपुर मगर छोड़ शिवसागरके अन्तर्गतं जाड़- हाट नामक स्थानमें नगर स्थापन किया। उसी स्थान पर वह कालग्रासमें पतित हुये। उनके पीछे काम- रूपीय वंशके कमलेश्वर सिंहने राज्य पाया था। यहां यह बता देना भी उचित है कि हिन्दू धर्म में दोधित होनेक समयसे अहोम राजा परापर पहोमांकी भांति पपने सन्तानका हिन्दू नाम रखते थे। फिर उनमें राना होनेवाले अभिषेकके समय अहोमः शास्त्रानुयायी कोई कार्य कर रहीम नाम ग्रहण करते थे। किन्तु उक्त कार्य अतीव व्ययसाध्य था। इसी कारण कमलेखर उसको कर न सके। उनके पहोम. नाम न पानेका यही कारण है। उनके पीछे न तो किसी राजान उक्त कार्य किया और न उसको पहोम. नाम ही मिला। उनोंने पश्चिमाचमसे बात<noinclude></noinclude> j1t8lba3lgm4p2acpe42tc4xtu2qjv5 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५७ 250 106351 668193 373215 2026-07-19T06:16:58Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668193 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४५८| कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} लोगों को ले जा कर सैनिक कार्य में लगाया पौर पथरकालेको चलाया। उनके परलोक पहुंचने पीछे भ्राता चन्द्रकान्त सिंह राजा हुये। उनके राजत्व- कालमें मन्त्रियों में विरोध उठा था। फिर गौहाटीके राजप्रतिनिधि बड़फूकन ब्रह्माराजामें पहुंचे पौर कितने ही सैन्यके साथ लौट पड़े। उन्होंने राज- धानीमें उपस्थित हो विपक्षियोंको दमनपूर्वक राजाको खायत्त किया और अपने ऊपर राजाके शासनका भार लिया। ब्रह्मदेशीय सैन्य पोछे लौट गया। उक्त सैन्यको स्वदेशयात्रा के पीछे बड़फकनके किसी किसी विपचने राजमाताको प्रणोदित किया और उन्होंने उनका शिर काट लिया। उनके मरनेके बाद उनके विपक्ष प्रधान रानमन्त्री रुचिनाथ बूढ़ा- गोसाईने अपरापर प्रधान राजपुरुषोंसे मिल चन्द्रकान्त सिंहको राज्यसे इटा पुरन्दर सिंहको अभि- षेक किया था। उसके पीछे ब्रह्मदेशीय सैन्य आसाम पर चढ़ा। युरमें परास्त हो पुरन्दर सिंह भागे थे। ब्रह्मदेशीयोंने फिर चन्द्रकान्त सिंहको राज्य दे प्रस्थान किया। अनन्तर ब्रह्मदेशीय राजाने चन्द्रकान्त सिंहके निकट बन्धुताके भावसे कितने ही सैन्यके साथ एक दूत भेजा था। किन्तु मन्त्रियोंने उनका अभिप्राय न समझ पथरोध किया। देशियोंने अपमानित और क्रुह हो युहनी घोषणा को प्रासामियों का सैन्य युद्ध में परास्त हुवा। राजाने फिर पलायन किया था। उसके पीछे ब्रह्मदेशसे अधिक सैन्य भेजा गया। उसने आसाम- वासियों की पत्यन्त सताया । धन और प्राणको विशेष हानि हुयी थी। बहु कष्ट के पीछे आसामका सौभाग्योदय हुवा। अंगरेज गवरनमेण्टने दुर्दान्त और निदारुण ब्रह्मवासियोंको निकाल कर भासाम अधिकार किया था। १८२५० को री फरवरीको आसामको दुःख रात्रिका अन्त त्रा। प्रजा असह्य यातनासे छूटी थी। ६.० वर्व राज्य भाग कर बहामवंश सिंहासन युत हुषा। अहोम वंशक राजावोंकी तालिका नीचे दी जाती है- <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Right|नाम}} {{Left|राज्यभोगकास}} {{Right|१ चुकाफा}} {{Left|१२२९-१२६८ ई.}} {{Left||२ उनके पुत्र चुते उफा}} {{ Right|१२१८-१२८१॥}} {{Left|चुखांगफा}} {{Right|३ चुविनफा १२८१-१२०३ ॥}} {{Right|१२८३-१३३२}} {{Left|५ चुखरांगफा}} {{Right|१३३२-१३६४ ॥}} {{Left|उनके माता चतुफा}} {{Right|१३६४-१३७६ ,}} {{Left|अराजक}} {{Right|१३७६-१३२..}} {{Left|त्यामोखामती}} {{Left|चुतुफाके भ्राता पराजक}}} {{Right|१३८८-१३८७"}} {{Left|८ चुडांगफा, त्याप्रोखामतीके पुत्र}} {{Right|१३८७-२४०७॥}} {{Left|उनके पुत्र चुजांगफा}} {{Right |१४०७-१४२२॥}} {{Left|" चुफाकफा}} {{Right|१४२२-१४३८॥}} {{Left|या गड़गायां राजा}} {{Right|१४३९-१४८८॥}} {{Left|१२ चुहेनफा}} {{Right |१४८८-१४८३॥}} {{Left|१३ चुपिम्फा}} {{Right|१४८३-१४९७.}} {{Left|१४ ,चुइंगमंग वा स्वर्गनारायण}} {{Right |१४८७-१५३८ ,}} {{Left|चुकलेनमुंग}} {{Right|१५३०-१५५२,}} {{Left|चुखामफा}} {{Right|-१६०३ ॥}} {{Left |या खोड़ा राजा}} {{Left|१७ चुचेंगफा या वुढ़ा स्वर्ग}} {{Right|१६.३-१६४१ ॥}} {{Left|नारायण वा प्रतापसिंह}} {{Left|१८ चुरामफा वा भगा राना}} {{Right |१६४१-१६४४,}} {{Left|१८ चुत्यिंगफा वा}} {{Right|१६४४-१६४८,}} {{Left|नड़िया राजा २०}} {{Left|" चुसामलावा जयध्वज}} {{Left|सिंह भगानिया राजा.}} {{Right |१६४८-१६६३ ,}} {{Left|चारिंगिया वंश}} {{Right|१६६३-१६७०}} {{Left|चुपंगमुग वा चक्रध्वनसिंह}} {{Left|२२ उनके भ्राता चुन्यातफा}} {{Right|१९७०-१६७३,}} {{Left|वा उदयादित्य}} {{Left| उससे ब्रह्म}} {{Right|१५५२-१६०३}} {{Right|१३८०-१३८८.}} {{Right|" चुचेनफा}}<noinclude></noinclude> 1f9cf5z6lmfp1i1r9tg6yp6llhpom3h पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५९ 250 106353 668165 373217 2026-07-19T02:23:27Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668165 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|४६४}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} विश्वास और भक्ति करते थे। रुद्रसिंहके पुत्र शिव सिंहने भी सपरिवार उनसे मन्त्र लिया। शिवसिंह 'स्वर्गदेव सपरिवार भट्टाचार्य महाशयके उपास्य देवी- मन्त्रमें दीक्षित हुये। किसी समय शिवसिंहको छत्रभन दोष नगा था। ज्योतिषी पण्डितों और मन्त्रियों ने परामर्श किया। फिर वह शिवसि'को प्रथमा पत्नी रानी फूलेखरीको सिंहासन पर बैठा कर राजकार्य चलाने लगे। उसी प्रकार शिवसिंहके दीर्घ राजत्व में उनको चार महिषी-फूलेश्वरी, प्रमत्तेखरी, द्रौपदी, वा अम्बिका और अनादेवी या सखरीने बारी बारी सिंहासनाधिरोहण किया। फलेखरी देवीके प्रति विशेष भक्तिमती थीं।एक वर्ष दुर्गोत्सवके समय उन्होंने मोयामरियाकै महन्त और अन्यान्य स्थानके कई महन्त मिमग्वस देकर बुलाये थे। फिर उन्होंने भगवतीका प्रसादित सिन्दूर, रक्तचन्दन और वलिका रक्तादि छिड़क उन्हें लाछित किया। दूसरों की अपेक्षा मोयामारीवाले महन्तके हृदय पर उच्छा व्यवहारसे दारुण भाघात लगा था। उन्होंने सब शिष्यों को बुलाकर कहा,-"इसका प्रति शोध लेना आवश्यक है। उसके लिये प्राणपणसे चेष्टा करनी पड़ेगी। कालक्रममे वह भी सिद्ध हो १७५१९०को राजेश्वर राजा बने। उनकी अन्तिम दशामें मोयामारीके महन्तने शिष्यों को एकत्र कर शिवसिंह रानाके पनीवत अपमानका प्रतिशोध लेने के लिये सबसे साहाय्य मांगा। शिष्य भी गुरुके ' अपमानका बदला सेनेको प्रतिघ्राबद्ध हुये। उसके पीछे लक्ष्मीसिंहको राज्य मिला। राजा रुद्र मिहके पन्तिम समयमें उन्होंने जन्म लिया था। पाकसिगत सौसादृश्य न रहनेसे गना रुद्रसिइ उन्हें अपना पुत्र न मानते थे। उसीसे राज्य अन्यान्य प्रधान लोगों में भी उनका वैसा पादर न रहा। फिर राजाके कुलगुरु पर्वतिया गोसाई भी उन्हें दीक्षा देने पर असम्मत हुये। समीसिहने खीय विद्यागुरु रमानन्द भट्टाचार्य नामक किसी प्रध्यापकको दीक्षागुरु बना लिया। बाल्यकाल में उन्होंसे राजाने शिवको पूजा खोखी थी। फिर उन्होंने दीक्षा भो शिवमन्त्रको ही <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ली। राजगुरु होनेरी रमानन्द ने बहुत इति पायो थी। फिर वह पहुमरिया गोसाई नामसे पाख्यात हुये। उनको वैसी पदमर्यादासे अन्यान्य महन्त वहुत चिढ़े थे । विशेषतः मोयामारीके महन्त कटु वचन प्रयोग करनेसे गनाके विरागभाजन हो गये। उसी वर्ष पाश्विन मासमें वर्गदेव नौका पर भमणार्थ बाहर निकले थे। साथ ही स्वतन्त्र नौकामें बड़बडुवा मोयामारीके महन्तने साचात् कर क्षमा मांगी थी। किन्तु बड़बड़वाने महन्तको यथेष्ट विद्रूप किया। महन्तने उससे अपना प्रतिपय अप- मान समझा था। उनके मनमें पूर्व अपमान भी दूना भड़क उठा। उन्होंने बुला कर भीतर ही भीतर थियोंको दलबद्ध किया। फिर महन्तने रुद्रसिंह स्वगंदेवके किसी ताड़ित राजवंशीयको दलपति होने के लिये बुलाया था। नाहरखोरा और राघमरान दो व्यक्ति सेनापति बने । विद्रोहमें योग देनेवाले कुरा,. कुल्हाड़ा, कमान, कांता, बरछा प्रमृति प्रस्त्रोंसे समित प्रायः नौ हजार पादमी अग्रहायणके प्रथम ही रङ्गापुरकी पोर चल खड़े हुये। प्रवादानुसार महन्तने अन्यायसे लक्ष्मोसिंहको राजा बनाने के लिये उस युद्ध. यात्रा की थी। मोयामरियाके लोगोंका उक्त उद्योग देख भूपाई बड़ गोसाई, बूढ़े गोसाई कीर्तिचन्द बड़बडुवा प्रभृति' मन्त्रियों ने भी परामर्श कर एक दल संन्य भेजाया। युद्दमें राजसैन्य हार गया। मोयामरियाके सैन्यदलने नगर पर अधिकार कर राजा, सेनापति और बड़बडुवा. प्रभृति मन्त्रियों को बांध लिया। राजा जयसागरके निकट बन्दी रहे और गोसाई, बूढ़े गोसाई प्रभृति प्रधान प्रधान लोग मारे गये। फिर मोयामरियावालोंने कोर्तिचन्द्रको सूली दे उनके पुत्रों को बध किया। खोरा- मरानके पुत्र रमाकान्स गनाये। उस घटना अग्र- हायणकी थी। किन्तु चैव मासमें लीकान्तकै पक्षसे कुंये, गयां, घनशाम प्रभृति कई लोगोंने सामिश कर रमाकान्सका दासत्व स्वीकार किया। उनके कौयससे रमाकान्त. मोयामरीयाके सेनापति प्रमसिने अपने प्राए गंवाये। उसके पीछे सच्चीसिह रावा बने। सनी<noinclude></noinclude> jmxuy1bmn1mfb5gqggyrovrnwoqdw45 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६० 250 106354 668164 373218 2026-07-19T02:12:10Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668164 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप| ४६१}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} सिंहने धनश्यामको बूढागोसाईके पद पर बैठाया था। लक्ष्मीसिंहके पीछे कोकनाथ गोसाई देवके गौरीनाथ नामसे राजा इये। उन्होंने राज्यमध्यस्थ समस्त मोया- मरीयाके लोगोको मार डालमा चाहा। उससे उन सबन साजिश कर १७८२ ई के वैशाखमासमें भाग साहवको विशेष पुरस्कार देनेकी पाशा दे उनके द्वारा लगा शिशीधर नामक राजप्रासाद नसा डाला। प्रधान सेनापति उक्त कार्य में बाधा न पहुंचा सकनेके कारण गौहाटी भाग गये। बृढ़े गोसाईन मोयामरीयावालों को पकड़ बुनाया था। फिर उन्होंने दोषी निर्दोष न देख सबको मरवा डाला। सुतरां मोयामरीयाके दूसरे सब आदमी उत्तेजित हो गये। वह गुरुवाक्य और गुरु कार्यको साक्षात् ईश्वरका पादेश तथा कार्य समझते थे। उसमे उन्होंने उक्त विद्रोहको धर्मविद्रोह मान लिया। चुपके चुपके मीयामरीया-महन्तके प्रत्येक शिष्यको संवाद दिया गया था। फिर सभी लोग युद्ध करनेको दृढ़प्रतिज्ञ हुये। उसी बीच घनश्याम मर गये। उनके सुयोग्य पुत्र पूर्णनन्द बूढ़ा गोसाई बने। उन्होंने विद्रोह-व्यापार देख सोचा कि सामान्य शास्ति देनेसे ही वह रुक सकता था। फिर उन्होंने मोयमरीयाके कई लोगोंको पकड़ मृदु शास्ति दे कठिन प्रदिप कर मुक्त किया। किन्तु उससे - फल विपरीत निकला। विद्रोहियोंने राजाको दुबल समझ पूर्ण उत्साहसे दश सहन सैन्य संग्रह किया। एक दन. नगराभिमुख चला था। बूढ़ा गोसाईने छ वाधा देनेको सैन्य भेजा, किन्तु परास्त होना पड़ा। . रायके मध्य हलचल मच गयो। प्रजा हताश हुयी। राना मगर छोड़ भागे थे। किन्तु सेनापति चारो ओर किलेबन्दी कर नगरमें ही रहे। अन्तको जयसागरके निकट विषम युद्ध हुवा। उस युधमें भी राजकीय सैन्य हार गया। : भरतसिंह नामक विपक्षके सेनापति राना. बने। राजा गौरी. नाथ कछार और जयन्ती राजसे साहाय्य ले उक्त विद्रोह दबाना चाहते थे। किन्तु उन्होंने कहला भेना कि स्वदेशको रक्षाके खिये पावश्यकसे अधिक सैन्य उनके पास न था। गौरीनाथ विद्रोहदलके भयसे गौ भाग गये। वहां उनोंने बड़फूकनसे ! <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> परामर्श ले कितना हो सैन्य संग्रहपूर्वक बूढ़ा गोसाई के सहायतार्थ भेजा था। किन्तु पथमें विद्रोहियोंने वाधा डाल. उसे मार डाला। उसी समय ग्वालपाड़े में रस नामक कोई अंगरेज लवणका व्यवसाय करते थे। गौरीनाथ निरुपाय हो हटिश गवरनमेण्टका साहाय्य पाने के लिये प्रायोजन करने लगे। साहबने ७०० बरकन्दाज दिये थे। बरकन्दाजीको फौजने नौगांवके विद्रोहियोको जा भगाया, किन्तु उत्तराभिमुख जाते समय जोड़हाटके निकट शत्र के हाथ सब बरकन्दाज मारे गये। कुछ दिन पीछे मणिपुरराज ५०० अश्वारोही और ४०० पदाति ले गौरीनाथके साहाय्यार्थ उपस्थित हुये। वह सेनादल भी युद्धमें हारा था। प्रायः १५०० योडा मृत्युमुखमें पड़नेसे मणिपुरीसैन्य स्वदेश लौट गया। विपद अकेले नहीं चलती। उधर कृष्णनारायणने पपने माता दरराज विष्णुनारायणको निकाल राज्य अधिकार किया था। फिर उन्होंने गौरीनाथको दुर्दया. देख हिन्दुस्थानी साठ-सन्यासियोंसे सेनास ग्रह कर कामरूप पर चढाई को। पुनः पुनः पराजित होते देख कामरूपके लोग अहोमोसे वृणा करने लगे। फिर गौहाटी नगरसे उनका वास भी लोगाने उठा दिया। उसी सूत्रसे उनके मध्य कोई कोई कृष्णनारायणका पक्षपाती बना था। गौरीनाथने चारो दिक् विपर्द देख गौहाटोके विका मजुमदार, दत्तराम खावंन्द और दरङ्गक विताड़ित राजा विष्णुनारायणको वृटिश गवरनमेण्टसे साहाय्य. मांगने के लिये कचकत्ते भेजा। ग्वालपाड़े के अंगरेज वणिक् रस साइबने कलविन बजेट कम्पमोके नाम एक चिट्ठी दी थो। : उस समय कलकत्तेके गवरनर जनरल . लार्ड कारनवालिस. थे। वे राजा गौरी- नाथ का आवेदनपत्र पाते भी प्रथमतः साहाय्य करने पर अस्खोलत हुये । कारण प्रामविच्छेदसे एक पक्षका साहाय्य करना दूसरे राजाके पक्ष में राजनीतिविरुद्ध है। किन्तु पन्तमें उन्होंने राजा वणनारायणको हिन्दु- स्थानी से नाके साथ कामरूप तोड़ते-फोड़ते देखा ।<noinclude></noinclude> kkockp70nys91qxlft6mn6m2lhtfo5u पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६१ 250 106355 668163 373219 2026-07-19T02:01:19Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668163 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४६२| कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} वह हिन्दुस्थानी अंगरेजोंको प्रजा थे। सुतरां उनको । दबाना लाट साहबने अपना कर्तव्य समझा। उसीसे १७८२ ई०को कप्ताम वेल्स साहब ससैना भेजे गये। उन्होंने वहां पहुंचते ही हिन्दुस्थानियोंको दबाना चाहा था। उधर भरतसिंह राजा हो निठुर भावसे शासन करते थे। सिपाहियों को आदेश रहा,-"तुम जिस प्रकार हो, अहोममजाको लटो मारो।" रम साहबके वरकन्दाज और मणिपुरके सिपाही विनष्ट होनेसे उन्होंने अपना रान्य निष्कण्टक समझ लिया। उन्होंने गौहाटीके निकटस्थ कई स्थान पधिकार किये थे। राजा गौरीनाथ उक्त संवाद पा कुछ सैन्य ले उसी ओर चल पड़े। फिर कप्तान वेल्स साहब भी जा पहुंचे। राजाके मुखसे देशको अवस्था सुन १७८२९ की २५वौं नवम्बरको उन्होंने गौहाटी प्रदेश उद्धार किया। मायामरीया दल छिन्न भिन्न हो गया। गौरीनाथ गौहाटीमें ही रहे। कप्तान वेल्स ६ठौं दिसम्बरको लौहित्यके उत्तर कूल गये थे। मायामरीयावालोंका पराजय सुन कृष्णनारायण का भी सैन्य भागा। कृष्ण नारायणने कहा, "हम गौरीनाथके विपक्ष नहीं थे। मायामरीया-विद्रोह निवारण करना हमारा भी उद्देश्य था। किन्तु गौरीनाथ यह बात समझ न सके। इसीसे उन्होंने हमें भी विद्रोही मान रखा है।" फिर कप्तान वेल्सने गौरीनाथ और कृष्णनारायणके मध्य सन्धि करा दी। सन्धिमें शर्त थी कपणनारायणको दरङ्ग, छुटिया तथा · चायःदोषावको प्रादमी देनेके बदले और भोट राज्यमें व्यवसाय करनेके लिये महसूलके हिसावमें ३०००० रु० देना पड़ेंगे। कप्तान वेल्सने गौहाटीमें रह देखा कि गौरीनाथ की बुद्धि विवे. चना बड़ी न थी। फिर निष्कण्टक होते भी उनके हारा राज्य स्थापित होने में बड़ा सन्देश रहा। उन्होंने निम्नलिखित मर्मका पत्र कलकत्ता मैना था,-"हम 'वर काम करके पाना चाहते हैं, जिसमें राज्यका सुप. बन्ध रहे। हमें बोध होता कि राजाके अन्याय्य पाच. : रणसे ही जयनारायण प्रभृति विद्रोही हुये थे।" {{Gap}}१०८३१ मार्च मास कप्तान वेल्सने प्रधान नगर <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> आक्रमण करनेको पैर बढ़ाया। गौरीनाथ भी साथ थे। जिस दिन वह नगरके निकट पहुंचे, उसी दिन नगरको अवस्था ज्ञात हो दूसरे दिन प्रातःकाच १२ सिपाही, १ जमादार, १ नायक और १ इवलदार कुल १५ श्रादमी नगरके निकट भेजे गये। राजा गौरीनाथ वह व्यापार देख विषम हुये । उन्होंने यह सोच जयकी पाशा छोड़ी थी कि ५००० मोयामरीयावालोंके साथ उन मुष्टिमय सिपाहियों का युद्ध होगा। मोया- मरीयावाले चारो ओर घेर कर खड़े हो गये। उन्होंने सोचा कि उन्हौं कई सिपाहियोंके मारनेसे जय होगा। पन्तको सिपाही वीरभावसे गोली छोड़ने लगे। यथेष्ट मोयामरीयाके लोग मरे थे। उन्हों कई सिपाहियों ने शव पक्ष प्रायः निःशेष कर डाला। फिर कुछ अंगरेज सिपाहियोंने जा नगर अधिकार किया। उसके दूसरे दिन बूढ़ा गोसाई गौरीनाथको नगरमें ले गये १७८५ ई०के चैत्र मास कमान वेल्स नगरमें घुसे थे। गौरीनाथ फिर जा कर सिंहासन पर बैठे। कप्तान साहबने बूढ़ा गोसाई प्रभृति प्रधान कर्मचारियाँको बहुत उपदेश दिया और गवरनर जनरलका अभिप्राय समझा कर कहा,-"देशमें मुशासन रखने के लिये कुछ बटिश सैन्य यहां रहेगा और कामरूपको पामदनीसे उस सैन्यदलका खर्च चलेगा।' उधर बर्ड कारनवालिस स्वदेश गये। १७८४ ई०को सर नान शोर गवरनर हो कर पाये थे। उन्होंने कप्तानको लोटने का आदेश किया। ५५००१)फिर १८१७९०को पुरन्दर सिंहने चन्द्रकान्तसिंह स्वर्गदेवको बन्दी बना कर राज्य लिया था। उसी समय बड़फकनके लोगोंने ब्रह्मदेशके अधोखर घालुन मिति या किवया मिलिमे जा कर उक्त विषयको सूचना को उन्होंने साहाय्यार्थ ३०.०० सैन्य भेजा था। बधशेनापतिके राज्य में प्रवेश करने पर पुरन्दर सिंहने सैन्य भेज कर बाधा दी। युद्दमें पुरन्दर सिंहका सैन्य परास्त हुवा। पुरन्दर डर कर गौहाटी भाग गये। ब्रह्मसेनापतिने चन्द्रकान्तको राजा बना पुरन्दरको पकड़नेके लिये सैन्य भेजा था। पुरन्दरको<noinclude></noinclude> 5bnt340qa9g6spwgm8jy89fbaphmf37 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६२ 250 106356 668162 373220 2026-07-19T01:50:03Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668162 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप| ४६३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} भोर बड़फकनने युद्ध किया। किन्तु उनके मो हारने पर पुरन्दर भाग कर चिलमारी में जा रहे। ब्रसेना पति चन्द्रकान्तके रक्षार्थ २००० सैन्य छोड़ स्वदेश लौट गये। पुरन्दरने निरुपाय हो कलकत्ते जा १८१८ई के सितम्बर मास वृटिश गवरनमेण्टके निकट निम्न लिखित प्रावेदन किया था,-"यदि हटिश गवरनमेण्ट सैन्य भेज कर हमारा राज्य उहार कर दे, तो हम उसके लिये व्यय देने और अवशेषको हटिश गवरन मेण्टके अधीन करद राजा बनने के लिये प्रस्तुत हैं।" किन्तु बटिश गवरनमेण्टने उक्त भावेदन न सुना। उस समय कोचविहारमें मिटर स्कट कमिशनर थे। वह प्रतिपत्रमें गवरनमेण्ट को देशको अवस्था देखाते रहे। फिर ब्रह्मसेना रीतिके असुसार देशमें घुस पड़ी। चन्द्रकान्तको नाममात्र राना रख ब्रह्मसेनापति सर्वमय कर्ता बन बैठे। चन्द्रकान्त भी अन्तको उनके हाथसे देशोदार करने की चेष्टामें लगे। १८२०ई०को लेफटनेण्ट डेविडसनको भय देखा ब्रह्मसेनापतिने ब्रह्मसेनापति मिङ्गिमाहा देशको अवस्था देखने गये थे। जयपुरके निकट एक गढ़ बनते देख उन्होंने कौशलसे वहाँके- बड़फकनको मार डाला। चन्द्रकान्तन उससे भीत हो सोचा कि उस बार ब्रह्मसेनापतिने शत्र रूपसे राज्यमें प्रवेश किया था। उसी विवेचनामें वह बूढ़ा गोगाईको नगरके रक्षार्थ रख स्वयं गौहाटी -भाग गये। मिनिमाहाने वहां पहुंच कर चन्द्रकान्तको अभय दिया था। किन्तु उनके उसमें · विश्वास न कर -सकनसे नगररक्षी सेन्यके साथ ब्रह्मसेनापतिका युद्ध 'हुवा। बूढ़ा गोसाई हार गये। चन्द्रकान्त जोड़ हाटकी ओर भागे थे। मिङ्गिमाहा योगेश्वर नामक किसौ कुमारको कहनके लिये राजा बना. स्वयं राज्यशासन करने लगे। उस समयं राज्य में प्रायः दश सहस्र ब्रह्म : सेना उपस्थित थी। दरङ्गराज भी उसी समय ब्रह्मको पधीनता स्वीकार करने पर बाध्य हुये। उसके पीछे महासेनापतिके साथ चन्द्रकान्त और पुरन्दरका नाना स्थानों में युद्ध हुवा। उसी अवस्थामें ब्रह्मसेनापतिने हटिश गवरनमेण्टको पत्र लिखा था कि वह किसी आसामी राजाका पच ग्रहण न करे। किन्तु टिश <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गयरनमेण्टने उक्त आवेदन सुना न था। किसोको सहायता न की। उसी समय गारो प्रति असभ्य नातियोंको सभ्यता सिखाने और उनके देशमें हटिश अधिकार फैलाने के लिये १८२२ ई० को १०वौं व्यवस्था निकली यो । कोच- विहारके कमिशनर स्कट साहब उक्त आईन (व्यवस्था) का कार्य करनेको उत्तराञ्चलके एजण्ट हुये। उसी समय रङ्ग-पुरसे विच्छिन हो ग्वालपाड़ा एक स्वतन्त्र जिल्ला बन गया। आसाममें उस समय ब्रह्म-अधिकार होनेसे ग्वालपाड़ेमें एकदन्न अंगरेजी सैन्य रहा। लेफटनेण्ट डेविडसन साहब उक्त सैन्यदलके नायक थे। मिष्टर डेविडसन और मिष्टर स्काट प्रासामियोंसे बड़ा नेह रखते थे। उधर महगड़के युद्ध में सम्पूर्ण परास्त हो चन्द्र कान्तने ग्वालपाड़े जा अंगरेजोंका प्राश्रय लिया। निम्नलिखित पत्र भेजा था,--"वद्याराज चाहते हैं कि कम्पनीके साथ मित्रता रहे और ब्रह्मसेना किसी प्रकार अंगरेजी सीमा अतिक्रम न करे। किन्तु चन्द्रकान्तने अंगरेजोंके अधिकारमें पात्रय लिया है। । अतएव उन्हें पकड़नेके लिये पादेश देना आवश्यक है।" मिष्टर डेविडसनने उस पत्र मिष्टर स्कटके पास पहुंचा दिया। फिर स्कटने वही पत्र गवरनर जनरलके पास गवरनर जनरलने ढाकेके अंगरेजी सेना- पतिको पादेश दिया कि मिष्टर स्काटको प्रावश्यक सैन्य मिल सकता है। ब्रह्मसेना यदि अंगरेजी सीमामें घुस भावे, तो वह बलपूर्वक भगायो जावे। १८१७ ई.को कछारके राजा गोविन्दचन्द्रने गवरनमेण्टसे आवेदन किया कि मणिपुरकी सोमा पर ब्रह्मसेन्यका आक्रमण हो सकता है। १८२० ई०को मणिपुरसे चौरनित् सिंह, मारजित् सिंह पौर गम्भीर सिंह नामक तीन राजकुमाराने ब्रह्मके अत्या- चारसे उत्पीड़ित हो कछार जा कर पायय लिया था। उसके पोछे गोविन्दचन्द्र के ग्रहविवादसे राज्यच्यु त होने पर उक्त तीनों भातावों में कछारके सिंहासन लिये बड़ी सचल पड़ो। .१८२३ ई.को चौरनित्<noinclude></noinclude> 12aur8q4baczz1ftfdrkuxevm3y00wl पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६३ 250 106357 668161 373221 2026-07-19T01:38:57Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668161 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh|४६४| कामरूप}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} सिंहने टिश गवरनमेण्टको एक पत्र लिखा - "मालम पड़ता है कि ब्रह्मराज शीघ्र ही इस प्रञ्चल पर आक्रमण करनेवाले हैं। अतएव इम कछार राज्य अंगरेनों को सौंपना चाहते हैं। हटिश गवरनमेण्ट । उक्त प्रस्ताव पर सम्मत हो गयी। मारजिसिंह पहले ही ब्रह्मके साहाय्यसे मणिपुर अधिकार कर वहां ब्रह्मक करद राजा बन बैठे थे। वृटिश गवरनमेण्टको कछार राज्य हाथमे लेने पर । संवाद मिला कि ब्रह्मवाले प्रासामसे कछार आक्र., मणके उद्योगमें थे। मिष्टर स्कटने ब्रह्मसेनापतिको एक पत्र लिखा,-"कछारके साथ बुटिश गवरनमेण्ट का सम्वन्ध है। आप इस प्रदेश पर आक्रमण न कौनिये।" प्रासाम और कछारके मध्य क्षुद्र जयन्ती राज्य है। ब्रह्मसेनापतिने उक्त देशके राजाको भय देखा वशीभूत करना चाहा था। किन्तु जयन्तीराजने वश्यता न मानी। ब्रह्मसेनापति भी कछारको अंगरजी सेनाके भयमे हठात् उक्त राज्यको प्राक्रमण कर न सके। उसके पीछे एक ही साथ पासाम और मणिपुर दोनों दिकसे अाक्रमण करनेके लिये जयन्ती एवं कछारके प्रान्त तथा श्रीकी सीमा पर ब्रह्मसेना यहुंची थी। अंगरंजाधिवत पाराकान ब्रह्मवालोंने जीत लिया। १८२३ ई०को उन्होंने घट्टग्रामके निकटवर्ती शाहपुर नामक एक क्षुद्र दीप पर अधिकार किया था। लार्ड प्रामहर्ट उस समय गवरनर जनरल थे। उन्होंने देखा कि ब्रह्मका अधिकार बङ्गालको सीमा तक फैला था। फिर स्थिर रहनेसे बङ्गालक सीमान्त प्रदेशमें मग अत्याचार १८२४ ई०को ब्रह्मसे युद्ध करना ठहर गया। गवरनर जनरलने ढाकासे ब्रिगेडियर मैकमरिनको ग्वालपाड़े जाने का आदेश दिया था। उधर लेफटि- नेण्ट डेविडसनकी त्रासाम प्रवेश करनेको भी अनुमति मिली। मिष्टर स्कटने समस्त प्रबन्धका भार पाया था। १८२४ १० को २८ वौं मार्चको ब्रिगेडियर मेकमरिनने विना युद्ध गौहाटी अधिकार कर लिया। सके। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ब्रह्मवाले अंगरेजोंका आगमन सुनते ही नगर छोड़ भाग गये। फिर ब्रिगेडियर मेकमरिन, कप्तान हरसवरा, लेफटिनेण्ट रिचार्डसन, करनन्त रिचार्डस प्रभृतिसे कलियावर, नौगांव, रहा, मरामुख आदि स्थानोंपर कई बार युद्धमें ब्रह्मायेना परास्त हुयी। युहमें ब्रिगेडियरके मरनेसे करनाल रिचार्डस प्रधान सेनापति बने थे। पन्तमें १८२४ ई के मई मास आसाम प्रदेशमें अंगरेनों का अधिकार हो गया। उसके पीछे जोड़हाट, जयन्ती, कछार, गौरीसागर प्रमृति स्थानों में शान्तिक रक्षार्थ क्षुद्र क्षुद्र युद्ध हुये। ब्रह्मके अधीनस्थ श्यामफकन और वगली फकनने ७०० सेनाके साथ- पामसमर्पण किया था। योगेश्वरसिंह योगीघोपामें १८२५ ई०को परलोक गये। उनके वंशीय हटिश गवरनमेण्टके वृत्तिभोगी बने । १८२६६० को २४ वौं फरवरीको यखाबू शहरमें अंगरेजी और ब्रह्मवासियोंसे एक सन्धि हुयो। उसके अनुसार पाराकान, मावान, तेनासरीम और पासाम अंगरेजीको मिला था। स्कट साहब उता नवजित राज्यके कमिशनर हुये। किन्तु वह उत्तरपूर्वाचनमें गवरनर जनरलके एजण्ट एवं कमिशनर तथा कोच- विहार, रङ्गपुर, मणिपुर एवं ककारके कमिशनर पौर श्रीमहके जज थे। सुतरा एक आदमौके हाथमें उतने कार्योकी सुविधा न पड़नेसे समस्त पूर्व-भारत निम्र और श्रेष्ठ खण्डमें विभक्त हुवा। खण्ड इयको उत्तरसीमा भरली और दक्षिणसीमा धमशिरी मदी थी। सीनियर वा श्रेष्ठ खडके मिष्टर स्कट और. जूनियर वा निम्नखण्डके करनन रिचार्डस कमिशनर हुये। किन्तु प्रधान कट व स्कट साहबको हो मिला था। गौहाटी भासामको राजधानी यो । १८२५ ई० के भक्तोबर मास करनल रिचार्डसके पीछे करनस कूपर कमिशनर बने थे। श्रेष्ठ विभागमें अकेले कार्य चलान सकनेसे स्कट मारवन कप्तान एडम हाइटको सहकारीरूपमें ग्रहण किया। स्करसे पासाम प्रदेशको यथेष्ट उबति हुयो । उनके बोके १८२१ई को चोरापूचीमें वा मर गये। टि, सि, रवाटसन प्रधान कमिशनर हुए।<noinclude></noinclude> aa7ii3by9crnakqpz8r13wzv2ljf234 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६४ 250 106358 668198 373222 2026-07-19T06:30:44Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668198 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूपं|४६५}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} 'उत्तरखण्ड में पुरन्दर सिंह राजा माने गये थे। उन्होंने वार्षिक ५००० रुकर देना भङ्गीकार किया। विश्वनाथ नामक स्थानमें एक 'पोलिटिकेत एजण्ट रखे गये। १८३२३३ ई०को : कामरूप प्रदेश दरक, कामरूप और नौगांव तीन जिलोंमें विभव हुवा। उसमें एक स्वतन्त्र कलकर पौर मजिष्ट्रेटको चमताके साथ एक प्रधान सहकारी कमि- sat ( Chief Assistant Commissioner ) रखा राबर्टसनके पीछे १८३४१०को जनकिन्स साहब कमिशनर हुये। उन्होंने जिले और मौन का सीमा विभाग ठोक किया था। १८३५ ई० को उक्त प्रदेश उक्त प्रदेश दी जिन्नों में बांटा गया। १८६६ ई०को जयन्तीराजने कम्पनौसे सन्धि कर अधीनता मानी थौ । किन्तु १८३५ ई में राजाको मासिक ५०१० वृत्ति दे जयन्ती प्रदेश कम्पनीके अधिकारमें लाया गया। १८३८ ई. को पुरन्दर सिंह नियमित कर दे न सके थे। उसीसे उन्हें राजच्युत कर तत्प्रदेश्य शिवसागर और सक्ष्मीपुर दो निसोंमें बांटा गया। चन्द्रकान्त सिंह गौहाटीमें ५०० रुवृत्ति पाते थे । किन्तु उस साल ही उन्होंने परलोक गमन किया। पुरन्दर सिंहको भी वत्ति दे जोड़हाटमें रखनेको बात उठी थी। किन्तु गर्वित पुरन्दरने वृत्ति न सौ। उसो स्थान पर चुकाफा-वंशक हायसे भासामका छत्र दण्ड प्रयाहत हुवा और पासाम वा प्राचीन कामरूप रान्य प्रकत प्रस्तावसे अंगरेजोंके अधिकारमें गया। उसके कुछ दिन पीछे १८३८ ईको एक कमिशनरके हाथ शासन और विचारका भार रचनेसे कार्यमें सुम्पखवा न देख पड़ी। एसौसे एक सहकारी नियुक्त हुवा उक्त सहकारी नियुक्त होनेसे एक काम्बन नागापर्वतकी पैमायश शुरू की थी। नौगांव में पदका नाम जुडिशल कमिशनर और दूसरेका नाम डेपुटी कमिशनर रखा गया। १८६० ई० को इनकमटेक्स प्रचलित होनेसे फूल गुड़ीके लोग भड़क उठे थे। असिष्टण्ट कमिशनर लेफटनण्ट सिंगर गड़बड़ मिटाने गये, किन्तु निहत हुये। अन्तमें बड़े कौघलसे गड़बड़ थमने पर दोषियोको उचित शास्ति मिली।; <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> १५६१०को कमिशनर जैनकिन्सने स्वपदसे पवसर लिया था। फिर उसी पद पर कप्तान हपकिन्सन नियुक्त हुये। १८६६ ई.को गौहाटीमें मेनकिन्स मर गये। १८६२ ई०को खसिया और जयन्तौ पर्वतमें भयानक विद्रोह उठा था। फिर १८६४ ईमें भूटानका युद्ध लगा। अंगरेज गीत गये। १५६५ ई० को सिञ्चोखा नामक स्थानमें सन्धि हुयो। उक्त सन्धिके अनुसार भूटानके दक्षिण कई स्थान अंगरेजोंका मिले थे। गारी पौर नागावोंके कई सरदारोंने अधीनता स्वीकार की। उनमें सभ्यता फैलाने के लिये चोर्ड अफ् रेपिन्य के अधीन गया।१८२६ ई. को गारो पर्वतमें तुरा और नागा पर्वतमें सामाटिंग राजधानी हुधा। उसी वर्ष कोचविहार पौर ग्वाल- पाड़ा सामवाले कमिशनरके हाथसे निकाल स्वतन्त्र कर दिया। १८७१ ई. को लेफटेण्ट गवरनर.सर जज कमवल उक्त देश देखने पहुंचे थे। उन्होंने वहांके विचारालयों पौर विद्यालयों में भासामो भाषा व्यवहार करनेका पादेश दिया। १८७८ ई०को करनेल हपकिनसनने अवसर लिया था। फिर पासाम देश बङ्गालके लेफटेनण्ट गवरनरके हाथसे निकल एक प्रधान कमिशनरको मिला। करनल किटिंग प्रथम चीफ कमिशनर हुये। चौफ कमिशनर बनने पर शिलङ्ग नगर राजधानी हुवा और ग्वालपाड़ा तथा गारो पर्वत फिर आसाममें चला गया। उसके पीछे कछार और पोष्ट बङ्गप्रदेशसे खतन्त्र हो चीफ कमिशनरके अधीन हुवा। उसी वर्ष अमिष्टण्ट कमिशनर लेफटेनण्ट इन- पहुंचने पर कई नागावोंने विश्वासघातकतापूर्वक शिविरमें घुस उन्हें मार डालाहलकम्ब प्रभृति १८७ भादमियोंमें उसी दिन ८. लोग मारे गये। ५१ लोग पाहत हुये थे। कुछ दिन पीछे उन नागावाको उपयुक्त मास्ति मिली। करनल किटिंगक पोछे सर टवटं बेली और उनके पीछे मिष्टर एलियट पासामके चीफ कमिशनर हुये। सर. एलियटके<noinclude></noinclude> e1w6x3pxsxi4km5fqwh863oarqn2tlb