विकिस्रोत hiwikisource https://hi.wikisource.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4:%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96%E0%A4%AA%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A0 MediaWiki 1.47.0-wmf.11 first-letter मीडिया विशेष वार्ता सदस्य सदस्य वार्ता विकिस्रोत विकिस्रोत वार्ता चित्र चित्र वार्ता मीडियाविकि मीडियाविकि वार्ता साँचा साँचा वार्ता सहायता सहायता वार्ता श्रेणी श्रेणी वार्ता लेखक लेखक वार्ता अनुवाद अनुवाद वार्ता पृष्ठ पृष्ठ वार्ता विषयसूची विषयसूची वार्ता TimedText TimedText talk मॉड्यूल मॉड्यूल वार्ता Event Event talk पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१७० 250 45932 668258 561795 2026-07-19T16:03:27Z Avantika Shaw 4732 668258 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" /></noinclude>​<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ​२. वन्ध्या स्त्री, वह स्त्री जिसे कोई सन्तान न होती हो। ​{{outdent|गतार्थ (सं० त्रि०) १. गतो विदितः अर्थो यस्य, बहुव्री०। जिसका अर्थ मालूम हो गया हो, चरितार्थ। २. जिसका प्रयोजन निवृत्ति को गया हो, जिसे अब किसी चीज़ की माँग न रह गई हो।}} ​{{outdent|गतासु (सं० त्रि०) गता असवो यस्य, बहुव्री०। १. मृत, मरा। २. शव, मुर्दा। <Small> "गतारूनां गतसूनां च नानुशोचन्ति पण्डिताः।" (गीता)</Small> ३. गतायु, जिसकी आयु शेष हो गई हो।}} ​{{outdent|गति (सं० स्त्री०) गम् भावे क्तिन्। १. गमन, चाल। <Small> "नही गतिः शकुनीनां च दृश्यते ख इव स्थिते।" (महाभारत) </Small> २. परिणाम, नतीजा। ३. ज्ञान, पहुँच। ४. प्रमाण, सबूत। ५. मार्ग, राह। ६. स्थान, जगह। ७. स्वरूप, रूप। ८. विषय, वात। ९. यात्रा, मुसाफिरी। १०. अभ्युपाय, तदबीर। ११. आश्रयण, शरण। १२. सरणी। १३. कर्मफल। १४. दशा, हालत। १५. यान्त्रिक गृह की संज्ञा। यान्त्रिक शास्त्र के मुख्य ७५ मुख तक गति संज्ञा निरूपित हुई है। १६. मुक्ति, मोक्ष। १७. सितार आदि बाजों में कुछ बोलों का क्रमबद्ध मिलान। १८. घड़ी की चाल जो तीन प्रकार की होती है, शीघ्र, मन्द और सम।}} ​१९. जैनमतानुसार— गतिनामक कर्म के उदय से जीव की पर्याय विशेष को गति कहते हैं। गति के मुख्य चार भेद हैं— नरकगति, तिर्यञ्चगति, मनुष्यगति और देवगति।<Small>(तत्वार्थसूत्र)</Small> ​२०. जीव जब दूसरा शरीर धारण करने जाता है, तब उसकी विग्रह गति होती है। इसके चार भेद हैं— ऋजु, पाणिमुक्ता, लाङ्गलिक और गोमूत्र। ​{{outdent|गतिक (सं० क्ली०) १. गति, चाल। २. अवस्था, हालत। ३. आश्रय, पनाह।}} ​{{outdent|गतिक्रिया (सं० स्त्री०) गमनक्रिया, जाना, चलना।}} ​{{outdent|गतिभास्कर्त्तु (सं० पु०) कार्त्तिकेय का एक सैन्य।}} ​{{outdent|गतिनामकर्म— जो कर्म जीव का आकार नारकी, तिर्यञ्च, मनुष्य और देवादि समान बनाता है, उसे गतिनामकर्म कहते हैं। <Small>(कर्मग्रन्थिका २।११ सूत्र)</Small>}} ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ​{{outdent|गतिबद्ध— जैनमतानुसार गतिनामकर्म का आत्मा के साथ मिल जाना।}} ​{{outdent|गतिभण्डल (सं० पु०) नृत्यों में एक प्रकार का अङ्गहार।}} ​{{outdent|गति मार्गणा— जैनमतानुसार जीव के स्वरूप वर्णन करने का एक तरीका। गतिनामकर्म के उदय से होने वाली जीव की पर्याय की गति कहते हैं। उसके चार भेद हैं— मनुष्य, देव, तिर्यञ्च और नरक।}} ​{{outdent|गतिया (हिं० पु०) तबलाची।}} ​{{outdent|गतिला (सं० स्त्री०) १. वेतलता, बेंत। २. नदीविशेष। ३. परम्परा, सिलसिलेवार।}} ​{{outdent|गतिविधि (सं० पु०) गतेर्विधिः, ६-तत्। १. गतिविधान। २. सामान्य ज्ञान।}} ​{{outdent|गतिशक्ति (सं० स्त्री०) गतेः शक्तिः, ६-तत्। गमनागमन की क्षमता, आने जाने की शक्ति।}} ​{{outdent|गतिसमञ्ज (सं० पु०) गतिर्वाञ्छा म चासो समञ्जश्चेति कर्म०। परमेश्वर।}} <Small>"गतिसमञ्जो मोहितानां च बद्धिकर्त्ता मवताः।" (विष्णुसहस्र०)</Small> ​{{outdent|गतोज (सं० वि०) गमन योग्य, जाने लायक।}} ​{{outdent|गत्ता (हिं० पु०) कूट, कागज़ की कई परतों का बनाया हुआ।}} ​{{outdent|गन्तृ (सं० वि०) गमनकर्त्ता, जाने वाला।}} ​{{outdent|गन्त्वर (सं० वि०) १. गमनशील, चलने वाला। २. पथिक।}} ​{{outdent|गल्वरा (सं० स्त्री०) प्राचीन काल की एक प्रकार की नाव। यह ८० हाथ लम्बी, १० हाथ चौड़ी और ८ हाथ ऊँची होती थी और प्रायः सागर में चला करती थी।}} ​{{outdent|गद (हिं० पु०) १. पूँजी, जमा। २. माल। ३. झुंड।}} ​{{outdent|गदना (हिं० क्रि०) एक को दूसरे में मिलाना। आपस में गूंथना।}} ​{{outdent|गद (सं० पु०) १. रोग। "मदाग्नि हुतमे सोऽयं जातो गदः।" (माधव०) २. समध्वनि, मेघ का शब्द। ३. विष। ४. कुष्ठ, कोढ़। ५. श्रीकृष्णचन्द्र के छोटे भाई। इनके पिता का नाम वासुदेव और रोहिणी माता का नाम था। ६. रामचन्द्र जी की सेना का एक वानर। ७. एक असुर का नाम।}} ​{{outdent|गदकारा (हिं० पु०) गुदगुदा, गुदगुदी।}} ​{{outdent|गदग— बम्बई प्रान्त के धारवाड़ जिले का एक ताल्लुका। यह अक्षा० १५° २' तथा १५° ३८' उ० और देशा० ७५°...}} ​<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8llpchpet51vfxz6gnrfpuw0vasp156 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१७३ 250 45957 668263 561798 2026-07-19T16:40:49Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668263 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{||गदाधर-गदाधर भट्टाचार्य|१७१}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> स्वीकार कर लिया। इस वर को पाकर वह दुसहेतिर मतवाला हो गया और थोड़े दिनों के बाद इन्द्र को भगाकर चन्द्रपुरी अपने अधिकार में कर लिया। क्रमानुसार समस्त देवताओं को पदच्युत कर भगाने लगा। हेतिरक्ष के इस असह्य अत्याचार को देखकर समस्त देवगण विष्णु के निकट उपस्थित हुए और उन्होंने हेति के भयङ्कर अत्याचार को कह सुनाया। विष्णु भगवान् ने उन पर दया दिखाकर कहा— "यदि तुम लोग मुझे एक महाअस्त्र दो, तो मैं हेति का नाश शीघ्र कर डालूँ।" इस पर देवताओं ने समयानुकूल देख गदासुर की वज्र सी कठिन अस्थि से बनी हुई गदा विष्णु भगवान् को अर्पण कर दी। विष्णु ने गदा के दृढ़ आघात से हेतिरक्ष का विनाश कर डाला। वह गदा उन्हें बहुत अच्छी लगी, इसलिए उन्होंने इसे लौटाकर देवताओं को नहीं दिया, वरन् अपने हाथ में ही धारण कर लिया; तभी से इनका नाम गदाधर पड़ा। (गयामाहात्म्य ५०) २. गया तीर्थ स्थित देवमूर्ति विशेष। (वि०) ३. जो गदा धारण करता हो। कई एक प्रसिद्ध ग्रन्थकारों के नाम— १. क्रियाकल्पद्रुम-प्रणीता। २. ग्रहयागतत्त्वहोमादिसिद्धि नामक संस्कृत ग्रन्थ के रचयिता। ३. एक प्राचीन वैद्यक ग्रन्थकार। ४. एक धर्मशास्त्र-संग्रहकार, इन्होंने गदाधरपद्धति, सम्प्रदायप्रदीप और नवकण्डिका सूत्रभाष्य प्रणीत किए हैं। ५. बृहद्भारतस्तोत्र के रचयिता। ६. भगवत्तत्त्वदीपिका नामक भक्तिशास्त्र के प्रणेता। ७. रसिकजीवन नामक संस्कृत अलङ्कार के रचयिता। ८. विवाहसिद्धान्तरहस्य नामक ज्योतिष ग्रन्थ के प्रणेता। ९. एक प्रसिद्ध तान्त्रिक। ये राघवेन्द्र के पुत्र और धीरसिंह के पौत्र थे। इन्होंने तन्त्रप्रदीप नामक शारदातिलक की टीका की है। १०. एक प्राचीन कवि। {{outdent|गदाधर चक्रवर्ती— काव्यप्रकाश के एक टीकाकार।}} {{outdent|गदाधरतर्काचार्य- रामतर्कालङ्कार के पुत्र, देवीमाहात्म्य-टीका के रचयिता। राढ़ीय ब्राह्मण निर्दोष कुलपत्रिका नामक कुलग्रन्थ में एक नैयायिक गदाधर भट्टाचार्य का नाम पाया जाता है, वे भी रामतर्कालङ्कार के पुत्र होते हैं। ऐसी हालत में दोनों एक ही व्यक्ति हों तो असम्भव नहीं।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|गदाधरदास— एक हिन्दी कवि, ब्रजवासी प्रसिद्ध हिन्दी कवि कृष्णदास के शिष्य और वल्लभाचार्य के प्रशिष्य।}} {{outdent|गदाधर दीक्षित— एक प्राचीन वैदिक सूत्रभाष्यकार। इनके पिता का नाम वामन था। इनके बनाए हुए आश्वलायन गृह्यसूत्रभाष्य और पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्य पाए जाते हैं।}} {{outdent|गदाधर नदी— ब्रह्मपुत्र की एक शाखा नदी। यह भूटान की गिरिस्रोतों से निकलकर जलपाईगुड़ी और ग्वालपाड़ा को परसपर विभक्त करती है। इसकी गति बड़ी ही परिवर्तनशील है। इसीलिये स्थान-स्थान पर इसका नाम बदलता गया है। किसी के मत से यह नदी उत्तर में मोश, गङ्गाधर तथा ग्वालपाड़ा इसके निम्नभाग में भी प्राचीन गर्भ गदाधर नाम से मशहूर है। रामनाई नाम की इसकी एक शाखा है।}} {{outdent|गदाधरनाथ— एक प्राचीन कवि।}} {{outdent|गदाधर पण्डित— चैतन्य देव के एक प्रधान अन्तरङ्ग। चैतन्यभक्तगण इन्हें बड़ी महती दृष्टि से देखते हैं।}} {{outdent|गदाधरभट्ट— बान्दा प्रदेश के एक प्रसिद्ध हिन्दी कवि। इनके प्रपितामह मोहन भट्ट, पितामह पद्माकर और पिता मिहीलाल, ये तीनों कवि थे। किन्तु गदाधर कविता लिखकर अपने पितृगण से उच्च आसन लाभ किया था। ये राजा भवानीसिंह के यहाँ रहते थे। अलङ्कारचन्द्रोदय इन्हीं का बनाया है।}} {{outdent|गदाधर भट्टाचार्य— संस्कृत अध्यापक और विख्यात नैयायिक। ये वारेन्द्र गोत्र के ब्राह्मणवंशीय पण्डित थे। इनके पिता का नाम जीवाचार्य था। ये पावना जिला के अन्तर्गत लक्ष्मीचांपड़ा नामक ग्राम में रहते थे। विद्याभ्यास करने के लिये नवद्वीप आकर नैयायिक हरिरामतर्कवागीश के विद्यालय में न्यायशास्त्र का अध्ययन किया था। गदाधर की शिक्षा समाप्त न होने पाई थी कि हरिराम की मृत्यु हो गई। हरिराम के ऐसा कोई सुयोग्य पुत्र न था जो पाठशाला में विद्यार्थियों को पढ़ा सकता। मृत्यु के समय उन्होंने अपनी स्त्री से गदाधर को ही पाठशाला में नियुक्त करने को कहा था। गदाधर पढ़ाने में प्रवृत्त हो गए। किन्तु छात्रगण उनसे पढ़ने में अपनी अनिच्छा प्रकट कर दूसरी-दूसरी पाठशालाओं में अध्ययन करने के लिये चले गए।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> feqv7nmcbsd6b4xm2syu45mfxd1i64k 668265 668263 2026-07-19T16:43:02Z Avantika Shaw 4732 668265 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||गदाधर-गदाधर भट्टाचार्य|१७१}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> स्वीकार कर लिया। इस वर को पाकर वह दुसहेतिर मतवाला हो गया और थोड़े दिनों के बाद इन्द्र को भगाकर चन्द्रपुरी अपने अधिकार में कर लिया। क्रमानुसार समस्त देवताओं को पदच्युत कर भगाने लगा। हेतिरक्ष के इस असह्य अत्याचार को देखकर समस्त देवगण विष्णु के निकट उपस्थित हुए और उन्होंने हेति के भयङ्कर अत्याचार को कह सुनाया। विष्णु भगवान् ने उन पर दया दिखाकर कहा— "यदि तुम लोग मुझे एक महाअस्त्र दो, तो मैं हेति का नाश शीघ्र कर डालूँ।" इस पर देवताओं ने समयानुकूल देख गदासुर की वज्र सी कठिन अस्थि से बनी हुई गदा विष्णु भगवान् को अर्पण कर दी। विष्णु ने गदा के दृढ़ आघात से हेतिरक्ष का विनाश कर डाला। वह गदा उन्हें बहुत अच्छी लगी, इसलिए उन्होंने इसे लौटाकर देवताओं को नहीं दिया, वरन् अपने हाथ में ही धारण कर लिया; तभी से इनका नाम गदाधर पड़ा। (गयामाहात्म्य ५०) २. गया तीर्थ स्थित देवमूर्ति विशेष। (वि०) ३. जो गदा धारण करता हो। कई एक प्रसिद्ध ग्रन्थकारों के नाम— १. क्रियाकल्पद्रुम-प्रणीता। २. ग्रहयागतत्त्वहोमादिसिद्धि नामक संस्कृत ग्रन्थ के रचयिता। ३. एक प्राचीन वैद्यक ग्रन्थकार। ४. एक धर्मशास्त्र-संग्रहकार, इन्होंने गदाधरपद्धति, सम्प्रदायप्रदीप और नवकण्डिका सूत्रभाष्य प्रणीत किए हैं। ५. बृहद्भारतस्तोत्र के रचयिता। ६. भगवत्तत्त्वदीपिका नामक भक्तिशास्त्र के प्रणेता। ७. रसिकजीवन नामक संस्कृत अलङ्कार के रचयिता। ८. विवाहसिद्धान्तरहस्य नामक ज्योतिष ग्रन्थ के प्रणेता। ९. एक प्रसिद्ध तान्त्रिक। ये राघवेन्द्र के पुत्र और धीरसिंह के पौत्र थे। इन्होंने तन्त्रप्रदीप नामक शारदातिलक की टीका की है। १०. एक प्राचीन कवि। {{outdent|गदाधर चक्रवर्ती— काव्यप्रकाश के एक टीकाकार।}} {{outdent|गदाधरतर्काचार्य- रामतर्कालङ्कार के पुत्र, देवीमाहात्म्य-टीका के रचयिता। राढ़ीय ब्राह्मण निर्दोष कुलपत्रिका नामक कुलग्रन्थ में एक नैयायिक गदाधर भट्टाचार्य का नाम पाया जाता है, वे भी रामतर्कालङ्कार के पुत्र होते हैं। ऐसी हालत में दोनों एक ही व्यक्ति हों तो असम्भव नहीं।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|गदाधरदास— एक हिन्दी कवि, ब्रजवासी प्रसिद्ध हिन्दी कवि कृष्णदास के शिष्य और वल्लभाचार्य के प्रशिष्य।}} {{outdent|गदाधर दीक्षित— एक प्राचीन वैदिक सूत्रभाष्यकार। इनके पिता का नाम वामन था। इनके बनाए हुए आश्वलायन गृह्यसूत्रभाष्य और पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्य पाए जाते हैं।}} {{outdent|गदाधर नदी— ब्रह्मपुत्र की एक शाखा नदी। यह भूटान की गिरिस्रोतों से निकलकर जलपाईगुड़ी और ग्वालपाड़ा को परसपर विभक्त करती है। इसकी गति बड़ी ही परिवर्तनशील है। इसीलिये स्थान-स्थान पर इसका नाम बदलता गया है। किसी के मत से यह नदी उत्तर में मोश, गङ्गाधर तथा ग्वालपाड़ा इसके निम्नभाग में भी प्राचीन गर्भ गदाधर नाम से मशहूर है। रामनाई नाम की इसकी एक शाखा है।}} {{outdent|गदाधरनाथ— एक प्राचीन कवि।}} {{outdent|गदाधर पण्डित— चैतन्य देव के एक प्रधान अन्तरङ्ग। चैतन्यभक्तगण इन्हें बड़ी महती दृष्टि से देखते हैं।}} {{outdent|गदाधरभट्ट— बान्दा प्रदेश के एक प्रसिद्ध हिन्दी कवि। इनके प्रपितामह मोहन भट्ट, पितामह पद्माकर और पिता मिहीलाल, ये तीनों कवि थे। किन्तु गदाधर कविता लिखकर अपने पितृगण से उच्च आसन लाभ किया था। ये राजा भवानीसिंह के यहाँ रहते थे। अलङ्कारचन्द्रोदय इन्हीं का बनाया है।}} {{outdent|गदाधर भट्टाचार्य— संस्कृत अध्यापक और विख्यात नैयायिक। ये वारेन्द्र गोत्र के ब्राह्मणवंशीय पण्डित थे। इनके पिता का नाम जीवाचार्य था। ये पावना जिला के अन्तर्गत लक्ष्मीचांपड़ा नामक ग्राम में रहते थे। विद्याभ्यास करने के लिये नवद्वीप आकर नैयायिक हरिरामतर्कवागीश के विद्यालय में न्यायशास्त्र का अध्ययन किया था। गदाधर की शिक्षा समाप्त न होने पाई थी कि हरिराम की मृत्यु हो गई। हरिराम के ऐसा कोई सुयोग्य पुत्र न था जो पाठशाला में विद्यार्थियों को पढ़ा सकता। मृत्यु के समय उन्होंने अपनी स्त्री से गदाधर को ही पाठशाला में नियुक्त करने को कहा था। गदाधर पढ़ाने में प्रवृत्त हो गए। किन्तु छात्रगण उनसे पढ़ने में अपनी अनिच्छा प्रकट कर 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अध्यापन-प्रणाली और व्याख्या सुनकर वे मन ही मन उनकी प्रशंसा करते थे। छात्रगण एकान्त में आकर उनसे नाना विषयों में अपना-अपना सन्देह दूर करते थे और कुछ उनकी बनाई व्याख्या की नकल करने लगे। उस समय नवद्वीप के सुप्रसिद्ध नैयायिक जगदीश तर्कालङ्कार की पाण्डित्य की प्रशंसा बहुत दूर तक फैली हुई थी। इन्होंने एक दिन गदाधर की दीधिति टीका (बोधिविचार दीधिति टीका) पढ़कर कहा कि इस टीका को पढ़कर मैं निश्चय नहीं कर सकता कि कौन पाठ प्रकृति है। इस तरह गदाधर की ख्याति नवद्वीप में परिव्याप्त हो गई और तभी से लड़के-के-लड़के उनके पास पढ़ने के लिये आने लगे। गदाधर भट्टाचार्य ने कई एक टीकाएँ प्रणीत कीं जो "गादाधरी टीका" और "गादाधरी पत्रिका" नाम से मशहूर हैं। {{outdent|गदाधर मिश्र— ब्रज के एक हिन्दी कवि। १५२३ ई० को इन्होंने जन्म लिया था। ये बहुत अच्छी कविता करते थे—}} {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"आज नंदलाल मुखचन्द्र नयननि निरखि, परम मङ्गल भयो भाग्य मेरे। कोटि कन्दर्प लावण्य एकत करि वारों तब ही जबहिं मो वा हेरे। सकल सुख सदन हर्षित गोपवर बदन प्रबल दल मदन जनु सह घेरे। काका को हम सुधि बुधि रहे गदाधर मिश्र गिरिधरन टेरे॥"</poem>}}}} {{outdent|गदान्त (सं० पु०) गदासुरनिहन्ता विष्णु, गदासुर राक्षस के मारने वाले विष्णु।}} {{outdent|गदापाणि (सं० पु०)गदा पाणौ यस्य, बहुव्री०। १. विष्णु। २. माष्टिकादेवी भक्त राजा चापपाणि के पुत्र।}} {{outdent|गदाभृत् (सं० पु०) विष्णु।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|गदामुद्रा (सं० स्त्री०)विष्णु पूजा की अङ्गमुद्रा विशेष। दोनों हाथों को परस्पर मिलाकर अङ्गुली आवृत करनी पड़ती है और दोनों अङ्गुष्ठ तथा दोनों मध्यमा को संलग्न करके प्रसारित करें, इसे भी गदामुद्रा कहते हैं।}} {{outdent|गदाम्बर (सं० पु०)मेघ, बादल।}} {{outdent|गदाराति (सं० पु०)गदस्य अरातिः, ६-तत्। औषध, एक दवा।}} {{outdent|गदालोल (सं० क्ली०)गयातीर्थस्थ एक तीर्थ। विष्णु भगवान् ने हेतिरक्ष को मारकर जिस स्थान पर गदा साफ़ किया था, वह स्थान गदालोल से मशहूर है। (गयामाहात्म्य)}} {{outdent|गदावसान (सं० क्ली०)गदाया जरासन्धत्यागस्य अवसानमत्र, बहुव्री०। मथुरा के निकटस्थ एक स्थान। श्रीकृष्णचन्द्र ने कंस को मारा था। इस पर कंस के श्वशुर जरासन्ध ने जामाता की हत्या से दुःखित हो यदुनन्दन को संहार करने के अभिप्राय से एक गदा को निन्यानवे (९९) बार घुमाकर गिरिव्रज से मथुरा पर निक्षेप किया था। गिरिव्रज से मथुरा १०० योजन की दूरी पर है। इसलिये गदा मथुरा तक नहीं पहुँच सकी; ९९ योजन जाकर ही गदा पृथिवी पर गिर पड़ी। जिस स्थान पर गदा गिरी, वही स्थान गदावसान कहलाता है। (भागवत १०)}} {{outdent|गदासन (सं० क्ली०)आसनविशेष, एक प्रकार का आसन। दोनों हाथों को ऊर्ध्व कर गदा की नाईं उपवेशन को गदासन कहते हैं। इस आसन से महती लाभ होती है।}} {{outdent|गदाह्व (सं० क्ली०)गद एव ह्वया यस्य, बहुव्री०। कुष्ठ, कोढ़।}} {{outdent|गदाह्वया (सं० स्त्री०)कुष्ठ, कोढ़।}} {{outdent|गदाला (हिं० पु०)हाथी पर कसने का गद्दा।}} {{outdent|गदावारण (हिं० पु०) एक प्रकार का प्राचीन बाजा जिसमें तार लगा रहता था।}} {{outdent|गदित (वि०)कथित, कहा हुआ। (क्ली०) २. कथन, कहना।}} {{outdent|गदितोक्ता (सं० स्त्री०)छन्दविशेष, एक प्रकार का छन्द।}} {{outdent|गदिन् (सं० पु०) १. विष्णु।}} {{C|<small>"किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च" (गीता)</small>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> emnv8ak6sr5mhg1bpu7hiydyihi7uc4 668271 668270 2026-07-19T17:29:02Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668271 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१७२'''|'''गदाधर मिश्र - गदिन्'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> तेजस्वी गदाधर इससे कुछ भी निरुत्साह न हुए। इन्होंने हरिराम की पाठशाला परित्याग कर गङ्गास्नान के पथ पर एक स्वतन्त्र चतुष्पाठी और उससे संलग्न एक फूलबागान बनाया। उनके फूलबागान लगाने का यह उद्देश्य था कि पण्डितगण पूजा के लिये फूल तोड़ने यहाँ प्रायः आया करेंगे और उन्हीं से आलाप करके अपना पाण्डित्य प्रचार करने में समर्थ होंगे। अपनी जन्मभूमि लक्ष्मीचांपड़ा से थोड़े विद्यार्थी मँगाने के लिये आदमी भेजा, तब तक वे फूलबागान में बैठकर फल-वृक्षों को ही लक्ष्य कर पढ़ाने लगे। अध्यापक और बहुत से छात्र जब फूल तोड़ने के लिये आते, तब गदाधर की अध्यापन-प्रणाली और व्याख्या सुनकर वे मन ही मन उनकी प्रशंसा करते थे। छात्रगण एकान्त में आकर उनसे नाना विषयों में अपना-अपना सन्देह दूर करते थे और कुछ उनकी बनाई व्याख्या की नकल करने लगे। उस समय नवद्वीप के सुप्रसिद्ध नैयायिक जगदीश तर्कालङ्कार की पाण्डित्य की प्रशंसा बहुत दूर तक फैली हुई थी। इन्होंने एक दिन गदाधर की दीधिति टीका (बोधिविचार दीधिति टीका) पढ़कर कहा कि इस टीका को पढ़कर मैं निश्चय नहीं कर सकता कि कौन पाठ प्रकृति है। इस तरह गदाधर की ख्याति नवद्वीप में परिव्याप्त हो गई और तभी से लड़के-के-लड़के उनके पास पढ़ने के लिये आने लगे। गदाधर भट्टाचार्य ने कई एक टीकाएँ प्रणीत कीं जो "गादाधरी टीका" और "गादाधरी पत्रिका" नाम से मशहूर हैं। {{outdent|गदाधर मिश्र— ब्रज के एक हिन्दी कवि। १५२३ ई० को इन्होंने जन्म लिया था। ये बहुत अच्छी कविता करते थे—}} {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“"आज नंदलाल मुखचन्द्र नयननि निरखि, परम मङ्गल भयो भाग्य मेरे। कोटि कन्दर्प लावण्य एकत करि वारों तब ही जबहिं मो वा हेरे। सकल सुख सदन हर्षित गोपवर बदन प्रबल दल मदन जनु सह घेरे। काका को हम सुधि बुधि रहे गदाधर मिश्र गिरिधरन टेरे॥"</poem>}}}} {{outdent|गदान्त (सं० पु०) गदासुरनिहन्ता विष्णु, गदासुर राक्षस के मारने वाले विष्णु।}} {{outdent|गदापाणि (सं० पु०)गदा पाणौ यस्य, बहुव्री०। १. विष्णु। २. माष्टिकादेवी भक्त राजा चापपाणि के पुत्र।}} {{outdent|गदाभृत् (सं० पु०) विष्णु।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|गदामुद्रा (सं० स्त्री०)विष्णु पूजा की अङ्गमुद्रा विशेष। दोनों हाथों को परस्पर मिलाकर अङ्गुली आवृत करनी पड़ती है और दोनों अङ्गुष्ठ तथा दोनों मध्यमा को संलग्न करके प्रसारित करें, इसे भी गदामुद्रा कहते हैं।}} {{outdent|गदाम्बर (सं० पु०)मेघ, बादल।}} {{outdent|गदाराति (सं० पु०)गदस्य अरातिः, ६-तत्। औषध, एक दवा।}} {{outdent|गदालोल (सं० क्ली०)गयातीर्थस्थ एक तीर्थ। विष्णु भगवान् ने हेतिरक्ष को मारकर जिस स्थान पर गदा साफ़ किया था, वह स्थान गदालोल से मशहूर है। (गयामाहात्म्य)}} {{outdent|गदावसान (सं० क्ली०)गदाया जरासन्धत्यागस्य अवसानमत्र, बहुव्री०। मथुरा के निकटस्थ एक स्थान। श्रीकृष्णचन्द्र ने कंस को मारा था। इस पर कंस के श्वशुर जरासन्ध ने जामाता की हत्या से दुःखित हो यदुनन्दन को संहार करने के अभिप्राय से एक गदा को निन्यानवे (९९) बार घुमाकर गिरिव्रज से मथुरा पर निक्षेप किया था। गिरिव्रज से मथुरा १०० योजन की दूरी पर है। इसलिये गदा मथुरा तक नहीं पहुँच सकी; ९९ योजन जाकर ही गदा पृथिवी पर गिर पड़ी। जिस स्थान पर गदा गिरी, वही स्थान गदावसान कहलाता है। (भागवत १०)}} {{outdent|गदासन (सं० क्ली०)आसनविशेष, एक प्रकार का आसन। दोनों हाथों को ऊर्ध्व कर गदा की नाईं उपवेशन को गदासन कहते हैं। इस आसन से महती लाभ होती है।}} {{outdent|गदाह्व (सं० क्ली०)गद एव ह्वया यस्य, बहुव्री०। कुष्ठ, कोढ़।}} {{outdent|गदाह्वया (सं० स्त्री०)कुष्ठ, कोढ़।}} {{outdent|गदाला (हिं० पु०)हाथी पर कसने का गद्दा।}} {{outdent|गदावारण (हिं० पु०) एक प्रकार का प्राचीन बाजा जिसमें तार लगा रहता था।}} {{outdent|गदित (वि०)कथित, कहा हुआ। (क्ली०) २. कथन, कहना।}} {{outdent|गदितोक्ता (सं० स्त्री०)छन्दविशेष, एक प्रकार का छन्द।}} {{outdent|गदिन् (सं० पु०) १. विष्णु।}} {{C|<small>"किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च" (गीता)</small>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1lw7t8btm8dia8mqeb488uriviorey0 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१७५ 250 45973 668276 561800 2026-07-19T18:06:45Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668276 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>​<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ​(वि०) २. गदाधारी, जो गदा रखता हो। ३. रोगी। ​{{outdent|गदिनगलज— कोल्हापुर जिले के अन्तर्गत इसी नाम के उपविभाग का सदर। यह कोल्हापुर से ४५ मील दक्षिण-पूर्व संकेश्वर-पारपोली सड़क के निकट हिरण्यकेशी नदी के तीर पर अवस्थित है। लगभग १६०० ई० में जब लगातार अनावृष्टि होने लगी थी, तो अधिवासियों ने शहर को उक्त नदी तीर पर ला स्थापित किया था। तभी से यह शहर नदी तट पर बसा आ रहा है। कोल्हापुर की नाईं लगभग १८वीं शताब्दी में पटवर्द्धन कोण्डराव और निपानिकर ने इस शहर को तहस-नहस कर डाला था। इसके पास ही एक प्राचीन दुर्ग भग्नावस्था में पड़ा है। कहा जाता है कि वह पूर्व पुरुषों का निर्माण किया हुआ है। इसमें लगभग ७०० घर लगते और ३००० मनुष्य वास करते हैं। यहाँ मामलतदार और मुंसिफ ऑफ़िस हैं। इसके अलावे एक सरकारी अस्पताल, पुस्तकालय, डाकघर और विद्यालय है। इस शहर से तीन मील की दूरी पर एक मन्दिर है जहाँ प्रतिवर्ष मार्च महीने में एक भारी मेला लगा करता है।}} ​{{outdent|गद्दार (हिं० पु०)— रुई आदि से परिपूर्ण एक बहुत मोटा बिछौना, कासवान।}} ​{{outdent|गदोरी (हिं० स्त्री०)— ...}} ​{{outdent|गढ़खाली— बङ्गाल के यशोर जिला के अन्तर्गत एक नगर। यह कलकत्ते से यशोर जाने के रास्ते पर अक्षा० २२° ५' २०" उ० और देशा० ८९° पू० के मध्य कपोताक्ष नदी के किनारे अवस्थित है। बेदिया जाति के उत्पाद के लिये यह स्थान प्रसिद्ध है।}} ​{{outdent|गद्गद (सं० पु०)— गद्गद भावे अच्। १. अव्यक्त अस्पष्ट शब्द, वह आवाज़ जो साफ़-साफ़ सुनाई न पड़े। २. अत्यधिक हर्ष, प्रेम। ३. प्रसन्न, आनन्दित, पुलकित। ४. एक प्रकार का रोग। इसमें मनुष्य स्पष्ट शब्द नहीं बोल सकते, एक ही शब्द बोलने में कई बार उच्चारण करने पड़ते हैं। यह रोग या तो जन्म से होता है या लकवे की बीमारी से। हकलाना।}} ​{{outdent|गद्गदक (सं० त्रि०)— गद्गदे चाटु-वाक्ये कुशलः। गद्गद-कन्। चाटु-वाक्य निपुण।}} ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ​{{outdent|गद्गदध्वनि (सं० पु०)— गद्गदः कफादिना भवेत् अव्यक्तध्वनिः। अव्यक्तध्वनि, अस्पष्ट शब्द।}} ​{{outdent|गद्गदध्वनि (सं० वि०)— गद्गदो ध्वनिर्यस्य, बहुव्री०। १. जिसकी बोली स्पष्ट न हो, अव्यक्तध्वनियुक्त। (पु०) २. अव्यक्त ध्वनि।}} ​{{c|<small>"गद्गदस्वरं किंचित् प्रियं प्रायेण भावनम्।" (नादि०)</small>}} ​{{outdent|गद्गदस्वर (सं० पु०)— गद्गदः कफादिना अव्यक्तः स्वरो ध्वनिः। अव्यक्तध्वनि, वह शब्द जो साफ़-साफ़ सुनाई न पड़े।}} ​{{outdent|गद (हिं० पु०)— १. कोमल स्थान पर किसी भारी पदार्थ के गिरने का शब्द। २. अपच के कारण पेट का भारीपन।}} ​{{outdent|गदमा (हिं० पु०)— पक्षीविशेष। इसका सिर पीला, पैर सफेद और पेट लाल होता है।}} ​{{outdent|गदर (हिं० वि०)— १. अपक, जो अच्छी तरह पक्का न हो, अधपका। २. मोटा गद्दार।}} ​{{outdent|गद्दा (हिं० पु०)— १. रुई आदि से भरा हुआ मोटा बिछावन, तोशक, गदेला। २. टाट का बना हुआ फुट भर मोटा एक चौकोर बिछावन, जिसके मध्य में लगभग गज परिमाण का एक लम्बा छेद होता है। यह हाथी की पीठ पर हौदा कसने से पहले रखकर बाँधा जाता है। ३. घास, पुआल, रुई आदि के मुलायम पदार्थों का बोझ। ४. किसी मुलायम चीज़ की मार या ठोकर।}} ​{{outdent|गद्दी (हिं० स्त्री०)— १. छोटा गद्दा। २. वह कपड़ा जो घोड़े, ऊँट आदि की पीठ पर जीन आदि रखने के लिये रखा जाता है। ३. व्यवसायी आदि के बैठने की जगह। ४. किसी बड़े अधिकारी का पद। ५. किसी राजवंश की पीढ़ी वा आचार्य की शिष्यपरम्परा।}} ​६. हिमालय के चम्बा, सरवा और रामपुर अञ्चल प्रदेशस्थ जातिविशेष, गोपालन करना ही इनका प्रधान कार्य है। गद्दियों को बलपूर्वक मुसलमान बना लिया गया था। घोसियों और पहरों से इनका निकटस्थ सम्बन्ध है। गद्दी २२५ प्रकार के होते हैं। इनका वास अधिक है। खत्री देखो। ​{{outdent|गद्दीनशीन (फा० वि०)— १. सिंहासनारूढ़। २. उत्तराधिकारी।}} ​{{outdent|गद्य (सं० वि०)— गद-यत्। १. कथनीय, कहने योग्य। {{C|<small>"गद्यः कथं वियोगोऽय गद्यमेतत् त्वया मम।" (महाभारत) </small>" (क्ली०) २. छन्दरहित वाक्य। साहित्यदर्पण के<noinclude></noinclude> 6hqr94woqdtygnnzxr9769vz3hprdai 668277 668276 2026-07-19T18:07:51Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668277 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" /></noinclude>​<noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> ​(वि०) २. गदाधारी, जो गदा रखता हो। ३. रोगी। ​{{outdent|गदिनगलज— कोल्हापुर जिले के अन्तर्गत इसी नाम के उपविभाग का सदर। यह कोल्हापुर से ४५ मील दक्षिण-पूर्व संकेश्वर-पारपोली सड़क के निकट हिरण्यकेशी नदी के तीर पर अवस्थित है। लगभग १६०० ई० में जब लगातार अनावृष्टि होने लगी थी, तो अधिवासियों ने शहर को उक्त नदी तीर पर ला स्थापित किया था। तभी से यह शहर नदी तट पर बसा आ रहा है। कोल्हापुर की नाईं लगभग १८वीं शताब्दी में पटवर्द्धन कोण्डराव और निपानिकर ने इस शहर को तहस-नहस कर डाला था। इसके पास ही एक प्राचीन दुर्ग भग्नावस्था में पड़ा है। कहा जाता है कि वह पूर्व पुरुषों का निर्माण किया हुआ है। इसमें लगभग ७०० घर लगते और ३००० मनुष्य वास करते हैं। यहाँ मामलतदार और मुंसिफ ऑफ़िस हैं। इसके अलावे एक सरकारी अस्पताल, पुस्तकालय, डाकघर और विद्यालय है। इस शहर से तीन मील की दूरी पर एक मन्दिर है जहाँ प्रतिवर्ष मार्च महीने में एक भारी मेला लगा करता है।}} ​{{outdent|गद्दार (हिं० पु०)— रुई आदि से परिपूर्ण एक बहुत मोटा बिछौना, कासवान।}} ​{{outdent|गदोरी (हिं० स्त्री०)— ...}} ​{{outdent|गढ़खाली— बङ्गाल के यशोर जिला के अन्तर्गत एक नगर। यह कलकत्ते से यशोर जाने के रास्ते पर अक्षा० २२° ५' २०" उ० और देशा० ८९° पू० के मध्य कपोताक्ष नदी के किनारे अवस्थित है। बेदिया जाति के उत्पाद के लिये यह स्थान प्रसिद्ध है।}} ​{{outdent|गद्गद (सं० पु०)— गद्गद भावे अच्। १. अव्यक्त अस्पष्ट शब्द, वह आवाज़ जो साफ़-साफ़ सुनाई न पड़े। २. अत्यधिक हर्ष, प्रेम। ३. प्रसन्न, आनन्दित, पुलकित। ४. एक प्रकार का रोग। इसमें मनुष्य स्पष्ट शब्द नहीं बोल सकते, एक ही शब्द बोलने में कई बार उच्चारण करने पड़ते हैं। यह रोग या तो जन्म से होता है या लकवे की बीमारी से। हकलाना।}} ​{{outdent|गद्गदक (सं० त्रि०)— गद्गदे चाटु-वाक्ये कुशलः। गद्गद-कन्। चाटु-वाक्य निपुण।}} ​<noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ​{{outdent|गद्गदध्वनि (सं० पु०)— गद्गदः कफादिना भवेत् अव्यक्तध्वनिः। अव्यक्तध्वनि, अस्पष्ट शब्द।}} ​{{outdent|गद्गदध्वनि (सं० वि०)— गद्गदो ध्वनिर्यस्य, बहुव्री०। १. जिसकी बोली स्पष्ट न हो, अव्यक्तध्वनियुक्त। (पु०) २. अव्यक्त ध्वनि।}} ​{{c|<small>"गद्गदस्वरं किंचित् प्रियं प्रायेण भावनम्।" (नादि०)</small>}} ​{{outdent|गद्गदस्वर (सं० पु०)— गद्गदः कफादिना अव्यक्तः स्वरो ध्वनिः। अव्यक्तध्वनि, वह शब्द जो साफ़-साफ़ सुनाई न पड़े।}} ​{{outdent|गद (हिं० पु०)— १. कोमल स्थान पर किसी भारी पदार्थ के गिरने का शब्द। २. अपच के कारण पेट का भारीपन।}} ​{{outdent|गदमा 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सिंहासनारूढ़। २. उत्तराधिकारी।}} ​{{outdent|गद्य (सं० वि०)— गद-यत्। १. कथनीय, कहने योग्य। {{C|<small>"गद्यः कथं वियोगोऽय गद्यमेतत् त्वया मम।" (महाभारत) </small>" (क्ली०) २. छन्दरहित वाक्य। साहित्यदर्पण के<noinclude></noinclude> evo6qnj97fltdpicusa9bzx770ifvy4 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१७६ 250 45981 668333 561801 2026-07-20T04:32:46Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668333 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{Rh|'''१७६'''|गध्रया-गधका'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>मत से गद्य चार प्रकार का माना गया है— मुक्तक, वृत्तगन्धि, उत्कलिकाप्राय और वर्णक। समासरहित गद्य भाग को मुक्तक कहते हैं। यथा— गुरुं नमसि, एहि-पृथ,- पृथ,- अर्जुनो यशसि इत्यादि। वृत्तगन्धि वह है जिसमें कहीं-कहीं पद्य सा आभास हो। यथा— <Small>"सगरकथनं न शृणोति को दक्षिणद्वारे।" </Small> दीर्घ समासयुक्त गद्य को उत्कलिका कहते हैं। वर्णक वह है जिसमें छोटे-छोटे समास हों। यथा— <Small>"गुणवत्सागर जगदेकसागर कामिनीमनोजन जन।"</Small> छन्दोमञ्जरी के मत से गद्य तीन प्रकार का होता है— वृत्तक, उत्कलिकाप्राय और वृत्तगन्धि। कठोराक्षरशून्य अल्पसमासयुक्त गद्य को वृत्तक कहते हैं। यह वैदर्भी रीति से रचा जाता है। कठोराक्षर और बहुत समासयुक्त उत्कलिकाप्राय तथा तर्क एकदेशयुक्त को वृत्तगन्धि गद्य कहते हैं। काव्यादर्श के मत से पादलक्षणरहित पदसमूह को गद्य कहते हैं। गद्य काव्य प्रधानतः दो भागों में विभक्त है— कथा और आख्यायिका। काव्य देखो। ३. साम गान में शुद्ध राग का एक भेद। {{outdent|गद्याण (सं० पु०)— परिमाणविशेष। भावप्रकाश के मत से २ जौ का एक गुञ्जा, ८ गुञ्जा का एक माष और ६ माष या ४८ गुञ्जा का एक गद्याण होता है।}} {{outdent|गद्याणक (सं० पु०)— गद्याण एव स्वार्थे कन्। १. गद्याण। २. लीलावती में उक्त परिमाणविशेष। लीलावती मत में २ जौ का एक गुञ्जा, ३ गुञ्जा का एक वल्ल, ८ वल्ल का एक धरण और २ धरण का एक गद्याणक होता है।}} {{outdent|गद्यात्मक (सं० त्रि०)— गद्य में रचा हुआ।}} {{outdent|गधड़ा— १. बम्बई प्रदेश के काठियावाड़ गोहलवाड़ प्रान्त के अन्तर्गत एक नगर। यहाँ की जनसंख्या प्रायः छह हज़ार है। यहाँ फ़ौजदारी अदालत, बालक और बालिका के विद्यालय और एक औषधालय है। यहाँ सहजानन्द-प्रतिष्ठित स्वामीनारायण सम्प्रदाय का एक प्रधान अड्डा है। इसी स्थान पर १८३० ई० में सहजानन्द का देहान्त हुआ था।}} २. सिन्धु प्रदेश के थर और पारकर जिला के अन्तर्गत <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उमरकोट तालुके का एक नगर। यहाँ प्रायः दो हज़ार मनुष्य रहते हैं। {{outdent|गधड़ा— बम्बई में काठियावाड़ के अन्तर्गत भावनगर राज्य का शहर। यह भावनगर शहर से ४२ मील की दूरी पर अवस्थित है। लोकसंख्या प्रायः ५५०५। हिन्दूधर्मप्रवर्तक सहजानन्द-निर्मित स्वामीनारायण सम्प्रदाय का यह एक प्रधान केन्द्र है। यहाँ चन्दन लकड़ी की गुटिका की माला यथेष्ट रूप से बनाई जाती है, जिसे उक्त सम्प्रदाय के अनुयायी पहनते हैं।}} {{outdent|गधानि— काठियावाड़ के गोहलवाड़ प्रान्त के अन्तर्गत एक क्षुद्र राज्य। यह उमराला रेलस्टेशन से ३½ कोस पश्चिम में अवस्थित है। लोकसंख्या १५३० है। इस राज्य की आमदनी दस हज़ार रुपया है और उसमें से २००० रु० गायकवाड़ और जूनागढ़ के नवाब को देना पड़ता है।}} {{outdent|गधिदूभार— संयुक्त प्रदेश में मुज़फ़्फ़रनगर जिला के अन्तर्गत एक ग्राम। यहाँ दो हज़ार से अधिक मनुष्य रहते हैं, जिनमें बलूची मुसलमानों की संख्या अधिक है। यहाँ कई एक ईंटों के घर, तीन मस्जिद और प्रात्यहिक बाज़ार है। चीनी और नमक का व्यवसाय यहाँ अधिक होता है। इस ग्राम के चारों ओर सुन्दर उपवन हैं।}} {{outdent|गधिया— दक्षिण काठियावाड़ के अन्तर्गत एक क्षुद्र राज्य। इस राज्य के दो ग्राम दो सामन्तों के अधीन हैं। लोकसंख्या ५२८ है। वार्षिक आमदनी प्रायः ४५०० रु० की है, उसमें से २८५ रु० गायकवाड़ और जूनागढ़ के नवाब को देना पड़ता है।}} {{outdent|गधीला (हिं० पु०)— एक जङ्गली जाति।}} {{outdent|गधुन— काठियावाड़ के गोहलवाड़ प्रान्त के अन्तर्गत एक क्षुद्र राज्य। धोला रेलपथ से २० कोस दूरी में अवस्थित है। लोकसंख्या २६६ है। यह दो सामन्त राजाओं के अधीन है। यहाँ की आमदनी तीन हज़ार रु० है, उसमें से १६ रु० कर गायकवाड़ और जूनागढ़ के नवाब को देना पड़ता है।}} {{outdent|गधूल (सं० पु०)— एक फल का नाम।}} {{outdent|गधेड़ी— काठियावाड़ के हालार प्रान्त के अन्तर्गत एक छोटा राज्य। एक करद सामन्ताधीन यहाँ ग्राम है। यह राजकोट से पाँच कोस पूर्व में अवस्थित है। राज्य की...}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> cushq9lznk7dkw64fw0ydq870tps9eo 668334 668333 2026-07-20T04:33:22Z Avantika Shaw 4732 668334 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{Rh|'''१७६'''|'''गध्रया-गधका'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>मत से गद्य चार प्रकार का माना गया है— मुक्तक, वृत्तगन्धि, उत्कलिकाप्राय और वर्णक। समासरहित गद्य भाग को मुक्तक कहते हैं। यथा— गुरुं नमसि, एहि-पृथ,- पृथ,- अर्जुनो यशसि इत्यादि। वृत्तगन्धि वह है जिसमें कहीं-कहीं पद्य सा आभास हो। यथा— <Small>"सगरकथनं न शृणोति को दक्षिणद्वारे।" </Small> दीर्घ समासयुक्त गद्य को उत्कलिका कहते हैं। वर्णक वह है जिसमें छोटे-छोटे समास हों। यथा— <Small>"गुणवत्सागर जगदेकसागर कामिनीमनोजन जन।"</Small> छन्दोमञ्जरी के मत से गद्य तीन प्रकार का होता है— वृत्तक, उत्कलिकाप्राय और वृत्तगन्धि। कठोराक्षरशून्य अल्पसमासयुक्त गद्य को वृत्तक कहते हैं। यह वैदर्भी रीति से रचा जाता है। कठोराक्षर और बहुत समासयुक्त उत्कलिकाप्राय तथा तर्क एकदेशयुक्त को वृत्तगन्धि गद्य कहते हैं। काव्यादर्श के मत से पादलक्षणरहित पदसमूह को गद्य कहते हैं। गद्य काव्य प्रधानतः दो भागों में विभक्त है— कथा और आख्यायिका। काव्य देखो। ३. साम गान में शुद्ध राग का एक भेद। {{outdent|गद्याण (सं० पु०)— परिमाणविशेष। भावप्रकाश के मत से २ जौ का एक गुञ्जा, ८ गुञ्जा का एक माष और ६ माष या ४८ गुञ्जा का एक गद्याण होता है।}} {{outdent|गद्याणक (सं० पु०)— गद्याण एव स्वार्थे कन्। १. गद्याण। २. लीलावती में उक्त परिमाणविशेष। लीलावती मत में २ जौ का एक गुञ्जा, ३ गुञ्जा का एक वल्ल, ८ वल्ल का एक धरण और २ धरण का एक गद्याणक होता है।}} {{outdent|गद्यात्मक (सं० त्रि०)— गद्य में रचा हुआ।}} {{outdent|गधड़ा— १. बम्बई प्रदेश के काठियावाड़ गोहलवाड़ प्रान्त के अन्तर्गत एक नगर। यहाँ की जनसंख्या प्रायः छह हज़ार है। यहाँ फ़ौजदारी अदालत, बालक और बालिका के विद्यालय और एक औषधालय है। यहाँ सहजानन्द-प्रतिष्ठित स्वामीनारायण सम्प्रदाय का एक प्रधान अड्डा है। इसी स्थान पर १८३० ई० में सहजानन्द का देहान्त हुआ था।}} २. सिन्धु प्रदेश के थर और पारकर जिला के अन्तर्गत <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> उमरकोट तालुके का एक नगर। यहाँ प्रायः दो हज़ार मनुष्य रहते हैं। {{outdent|गधड़ा— बम्बई में काठियावाड़ के अन्तर्गत भावनगर राज्य का शहर। यह भावनगर शहर से ४२ मील की दूरी पर अवस्थित है। लोकसंख्या प्रायः ५५०५। हिन्दूधर्मप्रवर्तक सहजानन्द-निर्मित स्वामीनारायण सम्प्रदाय का यह एक प्रधान केन्द्र है। यहाँ चन्दन लकड़ी की गुटिका की माला यथेष्ट रूप से बनाई जाती है, जिसे उक्त सम्प्रदाय के अनुयायी पहनते हैं।}} {{outdent|गधानि— काठियावाड़ के गोहलवाड़ प्रान्त के अन्तर्गत एक क्षुद्र राज्य। यह उमराला रेलस्टेशन से ३½ कोस पश्चिम में अवस्थित है। लोकसंख्या १५३० है। इस राज्य की आमदनी दस हज़ार रुपया है और उसमें से २००० रु० गायकवाड़ और जूनागढ़ के नवाब को देना पड़ता है।}} {{outdent|गधिदूभार— संयुक्त प्रदेश में मुज़फ़्फ़रनगर जिला के अन्तर्गत एक ग्राम। यहाँ दो हज़ार से अधिक मनुष्य रहते हैं, जिनमें बलूची मुसलमानों की संख्या अधिक है। यहाँ कई एक ईंटों के घर, तीन मस्जिद और प्रात्यहिक बाज़ार है। चीनी और नमक का व्यवसाय यहाँ अधिक होता है। इस ग्राम के चारों ओर सुन्दर उपवन हैं।}} {{outdent|गधिया— दक्षिण काठियावाड़ के अन्तर्गत एक क्षुद्र राज्य। इस राज्य के दो ग्राम दो सामन्तों के अधीन हैं। लोकसंख्या ५२८ है। वार्षिक आमदनी प्रायः ४५०० रु० की है, उसमें से २८५ रु० गायकवाड़ और जूनागढ़ के नवाब को देना पड़ता है।}} {{outdent|गधीला (हिं० पु०)— एक जङ्गली जाति।}} {{outdent|गधुन— काठियावाड़ के गोहलवाड़ प्रान्त के अन्तर्गत एक क्षुद्र राज्य। धोला रेलपथ से २० कोस दूरी में अवस्थित है। लोकसंख्या २६६ है। यह दो सामन्त राजाओं के अधीन है। यहाँ की आमदनी तीन हज़ार रु० है, उसमें से १६ रु० कर गायकवाड़ और जूनागढ़ के नवाब को देना पड़ता है।}} {{outdent|गधूल (सं० पु०)— एक फल का नाम।}} {{outdent|गधेड़ी— काठियावाड़ के हालार प्रान्त के अन्तर्गत एक छोटा राज्य। एक करद सामन्ताधीन यहाँ ग्राम है। यह राजकोट से पाँच कोस पूर्व में अवस्थित है। राज्य की...}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> m4hzerd43t8cwpsy6nuxptjchxojf3q पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१७७ 250 45989 668335 561802 2026-07-20T04:46:03Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668335 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||''' गध्य-गन्तवय '''|'''१७५'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>आय प्रायः १०००० रु० हैं, जिसमें ब्रिटिश गवर्नमेंट को ... रु० और जूनागढ़ के नवाब को २०० रु० कर देना पड़ता है। (१८४९ ई०) {{outdent|गद्ध्य (सं० त्रि०)— प्राप्य, जो पाने के योग्य हो।}} {{outdent|गन (सं० पु०)— गदं ख...}} {{outdent|मनकेरूआ (हिं० पु०)— एक प्रकार का घास जो गाय-भैंस के चारे के काम आती है।}} {{outdent|गनगौर (सं० स्त्री०)— चैत्र शुक्ल तृतीया। इस दिन गणेश और गौरी की पूजा होती है।}} {{outdent|गनना (सं० क्रि०)— गिनती करना।}} {{outdent|गनतङ्ग— पंजाब प्रदेश के बुशहर विभाग में स्थित कुनावार और चीन साम्राज्य के मध्यवर्ती गिरिसङ्कट। यह अक्षा० ३१° २८' उ० और देशा० ७८°... में स्थित है। इसकी ऊँचाई २१२२८ फुट होगी। इसका सर्वोच्च स्थानसमूह बहुत दिन तक बर्फ़ से आच्छादित रहता है। बर्फ़ से ढका रहने के कारण यह पर्वत दुरारोह है। यहाँ एक भी वृक्ष उगने नहीं पाता है। गिरिसङ्कट से पर्वतशिखर की ऊँचाई १८२८५ फुट है।}} {{outdent|गनिग— मणिपुर राज्यस्थ जातिविशेष। ये तेल निकालते और बेचते हैं। इनमें कुछ लोग अपना परिचय माहेश्य वैश्य जैसा देते हैं।}} {{outdent|गनिमर्द— बम्बई प्रदेश के सम्पगाँव उपविभाग में १० मील दक्षिण हिरेनन्दीहल्ली ग्राम के निकटस्थ एक पर्वतश्रेणी। यह समतल से २०० फुट ऊँची है।}} {{outdent|गनियारी (हिं० स्त्री०)— पौधाविशेष। यह अरणी की तरह होता है। इसकी पत्तियाँ बबूल की पत्तियों से चौड़ी होती हैं। इस पौधे में श्वेत पुष्प और करौंदे के बराबर छोटे-छोटे फल होते हैं। इसकी लकड़ी रगड़ने से आग उत्पन्न करती है। वैद्यक में गनियारी कटु, उष्ण, अग्निदीपक और वातनाशक मानी जाती है।}} {{outdent|गनी (सं० पु०)— धनी, धनवान्।}} {{outdent|गनी— एक मुसलमान कवि। इनका असली नाम मीर मुहम्मद ताहिर था, ये काश्मीर में पैदा हुए। ये मुहसिन फ़ानी के छात्र रहे और अपने विद्याप्रभाव से एक सुकवि हो गये। ... अधिक प्रतिष्ठा पायी थी। इनका बनाया 'दीवान-ए-गनी' नामक काव्य <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ग्रन्थ बहुत अच्छा है। १०७० हिजरी को ये यह लोक छोड़ गये। कहते हैं कि दिल्ली के बादशाह आलमगीर ने काश्मीर के शासनकर्ता सैफ़ ख़ाँ को इन्हें अपने पास भेज देने के लिये लिखा था। सैफ़ ख़ाँ ने जब यह संवाद सुनाया, तो वे जाने को अस्वीकृत हुए और कहने लगे: सम्राट को कह दीजिये कि एक गनी पागल हो गया है और उस अवस्था में बादशाह के सामने जाने लायक नहीं। सैफ़ ख़ाँ ने कहा, वे कैसे उन जैसे ज्ञानी व्यक्ति को उन्मत्त कहें? इस पर उन्होंने बात की बात में उन्मादग्रस्त होकर अपने कपड़े फाड़ डाले और तीन दिन बाद मर गये।}} {{outdent|गनीगार— मणिपुर राज्यस्थ जातिविशेष। यह छालवस्त्र, टाट, घर आदि बुनते हैं। परन्तु वे खेती करने में भी समर्थ हैं।}} {{outdent|गनीम (अ० पु०)— १. लुटेरा, डाकू। २. बग़ी, शत्रु।}} {{outdent|गर्नाटिया— बीरभूम जिला के अन्तर्गत रामपुरहाट परगना का एक नगर। यह अक्षा० २३° ५२' उ० और देशा० ८७° ५०' पू० में अवस्थित है। लोकसंख्या ४०० है। पहले यहाँ रेशम बहुत तैयार किया जाता था। रेशम का व्यवसाय ही अधिवासियों का जीवनाधार था। १७८६ ई० को फ्रान्स फ्रास हास साहब ने रेशम के व्यवसाय के लिये एक कोठी बनवाई थी और ईस्ट इण्डिया कम्पनी का एजेण्ट होकर यहाँ अपने मुल्क में प्रस्तुत रेशम रफ़्ता करते थे। आजकल इस नगर में रेशम का व्यापार नहीं होता है और फ्रान्स फ्रास हास साहब की बनाई कोठी कलकत्ता के किसी अंग्रेज़ ने ख़रीद ली।}} {{outdent|गनीमत (अ० पु०)— लूट का माल, मुफ़्त का माल।}} {{outdent|गैनन (हिं० स्त्री०)— एक प्रकार की घास जो छप्पर छाने के काम में आती है।}} {{outdent|गनोद— काठियावाड़ जिला के अन्तर्गत एक छोटा करद-राज्य। यह उपलेटा से ७ मील दक्षिण-पश्चिम और आगरम पहाड़ी से ६ मील उत्तर-पश्चिम भादर नदी के उत्तरीय तीर पर अवस्थित है। यह गोन्दल भायाद के अधीन है। यह एक बड़ा और समृद्धिशाली शहर है। लोकसंख्या लगभग २२१० है।}} {{outdent|गनोरिया— सुज़ाक (Gonorrhoea)।}} {{outdent|गनौरी— नागरमोथा।}} {{outdent|गन्तव्य (सं० स्त्री०)— गमनीय, जाने योग्य, चलने लायक।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qh8097ulxzjy5spaeyrjximkr0emtsj पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१७८ 250 45997 668338 561803 2026-07-20T04:55:33Z Avantika Shaw 4732 668338 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh||'''गन्त। - गन्ध'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> (सं० त्रि०) गमनकर्त्ता, जाने वाला। {{outdent|गन्तु (सं० त्रि०)— गम कर्त्तरि तुन्। १. पथिक, टोही, गमनकर्त्ता, चलने वाला। (पु०) २. गमन, जाने की यात्रा, प्रस्थान।}} {{outdent|गन्तृ (सं० त्रि०)— गम शीलार्ये तृन्। १. गमनशील, चलने वाला। २. प्राप्तिशील, पाने वाला। ३. गमन, जाने वाला।}} {{outdent|गन्तो (सं० स्त्री०)— २. वृषवहनीय शकट, बैलगाड़ी। "न वसुमतीनाम उद... वतानि च।" (याज्ञवल्क्य १।१०)}} {{outdent|गन्धीर (सं० पु०)— गन्धोर इव यद्वा गन्धोण गच्छ स्त्रीणां गमनाय रथः, ६-तत्। शकट, गाड़ी।}} {{outdent|गन्दिका (सं० स्त्री०)— नगरीविशेष, एक नगर का नाम।}} {{outdent|गन्दीकोट— मद्रास प्रेसिडेंसी कडप्पा जिला के जमालमडुगू {{gap}}तालुका का एक प्राचीन दुर्ग। यह अक्षा० १४° ४९' उ० और देशा० ७८° २४' पू० पर समुद्रतल से १६७० फुट ऊँचे पर्वत पर अवस्थित है। दुर्ग के पास ही पेन्नार नदी प्रवाहित है। कहा जाता है कि वोम्मनपाल नामक एक राजा थे। उन्होंने गन्दीकोट नाम का एक ग्राम स्थापित किया और उसी ग्राम में गन्दीकोट नामक दुर्ग उन्हीं का निर्माण किया हुआ है। विजयनगर के राजा हरिहर ने इस क़िले में एक मन्दिर बनवाया था। पूर्व समय में गोलकुण्डा के सुलतान ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया था, किन्तु कडप्पा के पठान नवाब ने सुलतान को पराजित कर दुर्ग अपने अधिकार में लाया। पठान नवाब के यहाँ फ़तेह नायक (हैदर अली के पिता) उस समय सैनिक थे। उनके मरने के बाद उनके लड़के हैदर ने क़िले की बहुत कुछ उन्नति की और उसमें अनेक सैनिक रहने लगे थे। १७९१ ई० में कप्तान लिटल ने हैदर के लड़के टीपू को लड़ाई में हराकर क़िला अधिकार में कर लिया था।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|गन्देवी— बड़ौदा राज्य के नवसारी प्रान्त में इस नाम के तालुका का प्रधान सदर। यह अक्षा० २०° ४८' उ० और देशा० ७३° २' पू० पर बम्बई, बड़ौदा और सेण्ट्रल इण्डिया रेलवे के अमलसार से ३ मील और सूरत से २८ मील दक्षिण-पूर्व स्थित है। लोकसंख्या लगभग ५८२७ होगी। यहाँ मजिस्ट्रेट की अदालत, अस्पताल, एक हाई स्कूल और बहुत-से देशी विद्यालय हैं। अनाज, गुड़, घी और मिट्टी के तेल का व्यापार यहाँ अधिक होता है। यहाँ ताँत के वस्त्र उत्कृष्ट प्रस्तुत होते हैं।}} {{outdent|गन्ध (सं० पु०)— घ्राणेन्द्रियग्राह्य गुण, बास, महक, सुगन्ध और सौरभ। प्राचीन आर्य दार्शनिकों का मत है कि केवल पृथिवी में ही गन्ध है और किसी पदार्थ में नहीं। जल प्रभृति तथा दूसरे-दूसरे पदार्थ में जो गन्ध मालूम पड़ता है, वह यथार्थ में उनका गन्ध नहीं, वरन् उनके साथ मिश्रित पार्थिवांश का है। आधुनिक वैज्ञानिक जल में गन्ध बतलाते हैं, क्योंकि ऊँट बहुत दूर से जल का गन्ध पाता है। जल में यही उनका प्रधान प्रमाण है। उनका कहना है कि यदि जल में गन्ध नहीं रहता, तो ऊँट बहुत दूर से जल का अनुसरण करते हुए वहाँ तक पहुँच न सकता। आधुनिक मत ठीक प्रतीत नहीं होता है। हम लोग विशुद्ध परिष्कृत जल में किसी प्रकार का गन्ध नहीं पाते हैं। निकट में जलाशय होने से वायु भी शीतल हो जाती है। जिस प्रकार वायु दूरस्थित पदार्थ का गन्ध लेकर हम लोगों की नासिका के निकट आ जाती है और हम लोग उस पदार्थ का गन्ध अनुभव कर सकते हैं, उसी प्रकार वायु जल के स्पर्श से शीतल बहने लगती है और तब हम लोग दूरस्थित जलाशय का होना अनुमान कर सकते हैं। हम लोगों के जैसे ऊँट भी वायु के द्वारा दूरस्थित जल अनुभव कर उसी का अनुसरण करता जाता है। यही प्रमाण ठीक मालूम पड़ता है। वैशेषिक दर्शन के उपस्कारप्रणेता शङ्करमिश्र का मत है कि गन्ध नित्य तथा अनित्य दो भागों में बाँटा है। पृथिवी में जो गन्ध है वही नित्य है, उसका विनाश कभी नहीं होता है। घट प्रभृति के लिखे पृथिवी का गन्ध अनित्य है, यह पाक प्रभृति के कारण विनष्ट हो जाता है। मुक्तावलीकार विश्वनाथ के मत में समस्त गन्ध अनित्य है, वे नित्य गन्ध स्वीकार नहीं करते हैं। दार्शनिकों के मत से यहाँ गन्ध फिर दो प्रकार का है— सुरभि और असुरभि।}} महाभारत में लिखा है कि गन्ध दस भागों में है— {{C|<small>"इष्टो मन्दो मधुरोऽथ कटु निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशदश्चेति।"</small>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> kjgsi177aojbb1wz6xtpt8q6iwojhxm 668341 668338 2026-07-20T05:18:32Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668341 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||'''गन्त। - गन्ध'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> (सं० त्रि०) गमनकर्त्ता, जाने वाला। {{outdent|गन्तु (सं० त्रि०)— गम कर्त्तरि तुन्। १. पथिक, टोही, गमनकर्त्ता, चलने वाला। (पु०) २. गमन, जाने की यात्रा, प्रस्थान।}} {{outdent|गन्तृ (सं० त्रि०)— गम शीलार्ये तृन्। १. गमनशील, चलने वाला। २. प्राप्तिशील, पाने वाला। ३. गमन, जाने वाला।}} {{outdent|गन्तो (सं० स्त्री०)— २. वृषवहनीय शकट, बैलगाड़ी।}} <Small> "न वसुमतीनाम उद... वतानि च।" (याज्ञवल्क्य १।१०)</Small> {{outdent|गन्धीर (सं० पु०)— गन्धोर इव यद्वा गन्धोण गच्छ स्त्रीणां गमनाय रथः, ६-तत्। शकट, गाड़ी।}} {{outdent|गन्दिका (सं० स्त्री०)— नगरीविशेष, एक नगर का नाम।}} {{outdent|गन्दीकोट— मद्रास प्रेसिडेंसी कडप्पा जिला के जमालमडुगू {{gap}}तालुका का एक प्राचीन दुर्ग। यह अक्षा० १४° ४९' उ० और देशा० ७८° २४' पू० पर समुद्रतल से १६७० फुट ऊँचे पर्वत पर अवस्थित है। दुर्ग के पास ही पेन्नार नदी प्रवाहित है। कहा जाता है कि वोम्मनपाल नामक एक राजा थे। उन्होंने गन्दीकोट नाम का एक ग्राम स्थापित किया और उसी ग्राम में गन्दीकोट नामक दुर्ग उन्हीं का निर्माण किया हुआ है। विजयनगर के राजा हरिहर ने इस क़िले में एक मन्दिर बनवाया था। पूर्व समय में गोलकुण्डा के सुलतान ने इस दुर्ग पर आक्रमण किया था, किन्तु कडप्पा के पठान नवाब ने सुलतान को पराजित कर दुर्ग अपने अधिकार में लाया। पठान नवाब के यहाँ फ़तेह नायक (हैदर अली के पिता) उस समय सैनिक थे। उनके मरने के बाद उनके लड़के हैदर ने क़िले की बहुत कुछ उन्नति की और उसमें अनेक सैनिक रहने लगे थे। १७९१ ई० में कप्तान लिटल ने हैदर के लड़के टीपू को लड़ाई में हराकर क़िला अधिकार में कर लिया था।}} {{outdent|गन्देवी— बड़ौदा राज्य के नवसारी प्रान्त में इस नाम के तालुका का प्रधान सदर। यह अक्षा० २०° ४८' उ० और देशा० ७३° २' पू० पर बम्बई, बड़ौदा और सेण्ट्रल इण्डिया रेलवे के अमलसार से ३ मील और सूरत से २८ मील दक्षिण-पूर्व स्थित है। लोकसंख्या लगभग ५८२७}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>होगी। यहाँ मजिस्ट्रेट की अदालत, अस्पताल, एक हाई स्कूल और बहुत-से देशी विद्यालय हैं। अनाज, गुड़, घी और मिट्टी के तेल का व्यापार यहाँ अधिक होता है। यहाँ ताँत के वस्त्र उत्कृष्ट प्रस्तुत होते हैं।}} {{outdent|गन्ध (सं० पु०)— घ्राणेन्द्रियग्राह्य गुण, बास, महक, सुगन्ध और सौरभ। प्राचीन आर्य दार्शनिकों का मत है कि केवल पृथिवी में ही गन्ध है और किसी पदार्थ में नहीं। जल प्रभृति तथा दूसरे-दूसरे पदार्थ में जो गन्ध मालूम पड़ता है, वह यथार्थ में उनका गन्ध नहीं, वरन् उनके साथ मिश्रित पार्थिवांश का है। आधुनिक वैज्ञानिक जल में गन्ध बतलाते हैं, क्योंकि ऊँट बहुत दूर से जल का गन्ध पाता है। जल में यही उनका प्रधान प्रमाण है। उनका कहना है कि यदि जल में गन्ध नहीं रहता, तो ऊँट बहुत दूर से जल का अनुसरण करते हुए वहाँ तक पहुँच न सकता। आधुनिक मत ठीक प्रतीत नहीं होता है। हम लोग विशुद्ध परिष्कृत जल में किसी प्रकार का गन्ध नहीं पाते हैं। निकट में जलाशय होने से वायु भी शीतल हो जाती है। जिस प्रकार वायु दूरस्थित पदार्थ का गन्ध लेकर हम लोगों की नासिका के निकट आ जाती है और हम लोग उस पदार्थ का गन्ध अनुभव कर सकते हैं, उसी प्रकार वायु जल के स्पर्श से शीतल बहने लगती है और तब हम लोग दूरस्थित जलाशय का होना अनुमान कर सकते हैं। हम लोगों के जैसे ऊँट भी वायु के द्वारा दूरस्थित जल अनुभव कर उसी का अनुसरण करता जाता है। यही प्रमाण ठीक मालूम पड़ता है। वैशेषिक दर्शन के उपस्कारप्रणेता शङ्करमिश्र का मत है कि गन्ध नित्य तथा अनित्य दो भागों में बाँटा है। पृथिवी में जो गन्ध है वही नित्य है, उसका विनाश कभी नहीं होता है। घट प्रभृति के लिखे पृथिवी का गन्ध अनित्य है, यह पाक प्रभृति के कारण विनष्ट हो जाता है। मुक्तावलीकार विश्वनाथ के मत में समस्त गन्ध अनित्य है, वे नित्य गन्ध स्वीकार नहीं करते हैं। दार्शनिकों के मत से यहाँ गन्ध फिर दो प्रकार का है— सुरभि और असुरभि।}} महाभारत में लिखा है कि गन्ध दस भागों में है— {{C|<small>"इष्टो मन्दो मधुरोऽथ कटु निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशदश्चेति।"</small>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> m0akd621gi74nf6bgjadc3lj5el5mc6 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१७९ 250 46005 668342 561804 2026-07-20T05:27:44Z Avantika Shaw 4732 668342 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" />{{rh||''' गंध गंधक '''|'''१७७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>निरो मतः खिग्धी बच्ची विशद एव च ॥ स्निग्धो रूक्षो विशदश्चेति॥ एवं दशविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्ध उत्तमः॥” (१४।५०।३)</poem>}}}} १. इष्ट, २. अनिष्ट, ३. मधुर, ४. अम्ल, ५. कटु, ६. निर्हारी, ७. संहत, ८. स्निग्ध, ९. रूक्ष और १०. विशद। इनमें से कस्तूरी प्रभृति का गन्ध इष्ट, विष्ठादि का गन्ध अनिष्ट, मधुयुक्त पुष्पादि का मधुर, मिर्च का कटु, हींग का निर्हारी, मिश्रित का संहत, तप्त घृत का स्निग्ध, सरसों तेल का रूक्ष, शालितण्डुल का विशद और इमली प्रभृति का गन्ध अम्ल माना गया है। कालिकापुराण के मत से सुरभिगन्ध पाँच भागों में विभक्त है— चूर्णित, घृष्ट, दाहकर्षित, सम्मर्दज और प्राण्यङ्गसमुद्भवरस। गन्धद्रव्य के चूर्ण तथा गन्धपत्र वा पुष्प के चूर्णों को चूर्णित गन्ध कहते हैं। चन्दन, सरल और शलाका घर्षण के लिये गन्ध एवं अगुरु प्रभृति घर्षण द्वारा जिसका पक्ष निर्गत करके देवताओं को अर्पण किया जाता है, उसी को घृष्ट गन्ध कहते हैं। देवदारु, अगुरु, पद्म, गन्धसार और चन्दनप्रिया को चुआने से जो सुगन्धि रस निकलता है, उसी का नाम दाहकर्षित है। सुगन्ध करवीर, विगन्धिनी एवं तिलक प्रभृति को कूट करके जो रस निकाला जाता है, वही सम्मर्दज गन्ध है। मृगनाभि या उसके कोष से जो गन्ध उत्पन्न होता है, उसको प्राण्यङ्गज गन्ध कहते हैं। यह स्वर्गवासियों का अत्यन्त प्रमोदप्रद है। (कालिकापुराण २४ अ०) तन्त्रसार का मत है कि मध्यमा, अनामिका और अङ्गुष्ठ के अग्रभाग द्वारा देवताओं को गन्ध देना उचित है। गन्धयुक्त देखो। २. लेश, छोटाई, कण। ३. सम्बन्ध। ४. गन्धक। ५. गर्वद्वार, घमण्ड। ६. शोभाञ्जन, सहिजन। (वि०) ७. गन्धयुक्त, जिसमें गन्ध हो। ८. प्रतिवेशी, पड़ोसी। (को०) ९. कृष्णागुरु, काला अगर। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|गन्धक (सं० पु०)— गन्धोऽस्य गन्धः, पश्चात् ततः स्वार्थे कन्। १. अमरा, राजमो का पेड़। २. उपधातुविशेष, पीले रङ्ग की धातु। पर्याय— गन्धाश्मा, सौगन्धिक, गन्धिक, सुगन्धिक, गन्धपाषाण, पाषाण, गन्धमोदन, पूतिगन्ध, अतिगन्ध, कीटघ्न, शरभूमिज, गन्धी, वर, सुगन्ध, दिवागन्ध, रसगन्धक, कुष्ठादि और करगन्ध है। राजवल्लभ के मत से इसका गुण कटु, उष्ण, तिक्त, अतिशय अग्निदीपक, विष, क्रिमि, प्लीहा और कफनाशक माना गया है। (राजवल्लभ)}} भावप्रकाश में गन्धक की उत्पत्ति के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है— किसी एक दिन देवी भगवती श्वेतद्वीप में क्रीड़ा कर रही थीं। इसी समय उनका परिधेय वस्त्र आर्त्तवरज में रँग गया। पर्वतनन्दिनी लज्जा से चञ्चल हो उस वस्त्र को परित्याग न कर क्षीरसमुद्र में स्नान करने लगीं। उस वस्त्र से रजः निःसृत हुआ और इसी से गन्धक की उत्पत्ति हुई। गन्धक वर्ण-भेद से चार प्रकार का है— यथा रक्त, पीत, श्वेत और कृष्णवर्ण। स्वर्णसंस्कार विषय में रक्तवर्ण, रसायन क्रिया में पीतवर्ण और व्रणआलेपन विषय में श्वेतवर्ण गन्धक प्रशस्त है। कृष्णवर्ण गन्धक स्वर्णसंस्कारादि में प्रशस्त है, किन्तु वह बहुत कम पाया जाता है। अशुद्ध गन्धक कुष्ठ, पित्तरोग और भ्रान्तिजनक एवं वीर्य, बल और रूपनाशक है। इसलिये गन्धक शोधन किये बिना प्रयोग में नहीं लाना चाहिये। गन्धक शोधन प्रणाली— एक लोहनिर्मित पात्र में घृत देकर अग्नि में उत्तप्त करना चाहिये। घृत के गरम होने पर उसके समान परिमाण का गन्धकचूर्ण उसमें डाल देना चाहिये। जब गन्धक गल जाय तो उसे वस्त्र से छान कर दुग्ध में मिला देना चाहिये। ऐसा करने से गन्धक शोधित हो जाता है। शुद्ध या शोधित गन्धक के गुण— कटु, तिक्त, कषायरस, उष्णवीर्य, पित्तकृत्, दीपन, सरगुणविशिष्ट, कटुपाक, रसायन एवं कण्डू (खुजली), विसर्प, क्रिमि, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, कफ और वायुनाशक है। (भावप्रकाश पूर्व० ९ भा०) रसेन्द्रसारसंग्रह के मत से गन्धक की शोधन प्रणाली— एक मिट्टी के बर्तन में दूध और घृत रख कर कपड़े से बर्तन का मुँह बाँध दे और उसके ऊपर में गन्धक रख एक ढक्कन से ढक कर सन्धिस्थान में लेप लगा दे। इसके बाद उसे मिट्टी में गाड़ कर ऊपर से धन्य उत्ताप देने से गन्धक गल कर दूध में टपकने लगेगा। इस विशुद्ध गन्धक को औषध में प्रयोग करना चाहिए। विशुद्ध गन्धक का गुण— रसायन, सुमधुर, पाक में और उष्ण है तथा इससे कुष्ठ, कटु <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> atba6b8a2pg23ruthvcq5i4fv43qbkh 668344 668342 2026-07-20T06:23:47Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668344 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh||''' गंध गंधक '''|'''१७७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>निरो मतः खिग्धी बच्ची विशद एव च ॥ एवं दशविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्ध उत्तमः॥” (१४।५०।३)</poem>}}}} १. इष्ट, २. अनिष्ट, ३. मधुर, ४. अम्ल, ५. कटु, ६. निर्हारी, ७. संहत, ८. स्निग्ध, ९. रूक्ष और १०. विशद। इनमें से कस्तूरी प्रभृति का गन्ध इष्ट, विष्ठादि का गन्ध अनिष्ट, मधुयुक्त पुष्पादि का मधुर, मिर्च का कटु, हींग का निर्हारी, मिश्रित का संहत, तप्त घृत का स्निग्ध, सरसों तेल का रूक्ष, शालितण्डुल का विशद और इमली प्रभृति का गन्ध अम्ल माना गया है। कालिकापुराण के मत से सुरभिगन्ध पाँच भागों में विभक्त है— चूर्णित, घृष्ट, दाहकर्षित, सम्मर्दज और प्राण्यङ्गसमुद्भवरस। गन्धद्रव्य के चूर्ण तथा गन्धपत्र वा पुष्प के चूर्णों को चूर्णित गन्ध कहते हैं। चन्दन, सरल और शलाका घर्षण के लिये गन्ध एवं अगुरु प्रभृति घर्षण द्वारा जिसका पक्ष निर्गत करके देवताओं को अर्पण किया जाता है, उसी को घृष्ट गन्ध कहते हैं। देवदारु, अगुरु, पद्म, गन्धसार और चन्दनप्रिया को चुआने से जो सुगन्धि रस निकलता है, उसी का नाम दाहकर्षित है। सुगन्ध करवीर, विगन्धिनी एवं तिलक प्रभृति को कूट करके जो रस निकाला जाता है, वही सम्मर्दज गन्ध है। मृगनाभि या उसके कोष से जो गन्ध उत्पन्न होता है, उसको प्राण्यङ्गज गन्ध कहते हैं। यह स्वर्गवासियों का अत्यन्त प्रमोदप्रद है।<small> (कालिकापुराण २४ अ०)</small> तन्त्रसार का मत है कि मध्यमा, अनामिका और अङ्गुष्ठ के अग्रभाग द्वारा देवताओं को गन्ध देना उचित है। गन्धयुक्त देखो। २. लेश, छोटाई, कण। ३. सम्बन्ध। ४. गन्धक। ५. गर्वद्वार, घमण्ड। ६. शोभाञ्जन, सहिजन। (वि०) ७. गन्धयुक्त, जिसमें गन्ध हो। ८. प्रतिवेशी, पड़ोसी। (को०) ९. कृष्णागुरु, काला अगर।}} {{outdent|गन्धक (सं० पु०)— गन्धोऽस्य गन्धः, पश्चात् ततः स्वार्थे कन्। १. अमरा, राजमो का पेड़। २. उपधातुविशेष, पीले रङ्ग की धातु। पर्याय— गन्धाश्मा, सौगन्धिक, गन्धिक, सुगन्धिक, गन्धपाषाण, पाषाण, गन्धमोदन, पूतिगन्ध, अतिगन्ध, कीटघ्न, शरभूमिज, गन्धी, वर, सुगन्ध, दिवागन्ध, रसगन्धक, कुष्ठादि और करगन्ध है। बैध्य्कके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> मतों से इसका गुण कटु, उष्ण, तिक्त, अतिशय अग्निदीपक, विष, क्रिमि, प्लीहा और कफनाशक माना गया है। <Small>(राजवल्लभ)</small>}} भावप्रकाश में गन्धक की उत्पत्ति के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है— किसी एक दिन देवी भगवती श्वेतद्वीप में क्रीड़ा कर रही थीं। इसी समय उनका परिधेय वस्त्र आर्त्तवरज में रँग गया। पर्वतनन्दिनी लज्जा से चञ्चल हो उस वस्त्र को परित्याग न कर क्षीरसमुद्र में स्नान करने लगीं। उस वस्त्र से रजः निःसृत हुआ और इसी से गन्धक की उत्पत्ति हुई। गन्धक वर्ण-भेद से चार प्रकार का है— यथा रक्त, पीत, श्वेत और कृष्णवर्ण। स्वर्णसंस्कार विषय में रक्तवर्ण, रसायन क्रिया में पीतवर्ण और व्रणआलेपन विषय में श्वेतवर्ण गन्धक प्रशस्त है। कृष्णवर्ण गन्धक स्वर्णसंस्कारादि में प्रशस्त है, किन्तु वह बहुत कम पाया जाता है। अशुद्ध गन्धक कुष्ठ, पित्तरोग और भ्रान्तिजनक एवं वीर्य, बल और रूपनाशक है। इसलिये गन्धक शोधन किये बिना प्रयोग में नहीं लाना चाहिये। गन्धक शोधन प्रणाली— एक लोहनिर्मित पात्र में घृत देकर अग्नि में उत्तप्त करना चाहिये। घृत के गरम होने पर उसके समान परिमाण का गन्धकचूर्ण उसमें डाल देना चाहिये। जब गन्धक गल जाय तो उसे वस्त्र से छान कर दुग्ध में मिला देना चाहिये। ऐसा करने से गन्धक शोधित हो जाता है। शुद्ध या शोधित गन्धक के गुण— कटु, तिक्त, कषायरस, उष्णवीर्य, पित्तकृत्, दीपन, सरगुणविशिष्ट, कटुपाक, रसायन एवं कण्डू (खुजली), विसर्प, क्रिमि, कुष्ठ, क्षय, प्लीहा, कफ और वायुनाशक है।}} {{Right|<small>(भावप्रकाश पूर्व० ९ भा०)</small> }} रसेन्द्रसारसंग्रह के मत से गन्धक की शोधन प्रणाली— एक मिट्टी के बर्तन में दूध और घृत रख कर कपड़े से बर्तन का मुँह बाँध दे और उसके ऊपर में गन्धक रख एक ढक्कन से ढक कर सन्धिस्थान में लेप लगा दे। इसके बाद उसे मिट्टी में गाड़ कर ऊपर से धन्य उत्ताप देने से गन्धक गल कर दूध में टपकने लगेगा। इस विशुद्ध गन्धक को औषध में प्रयोग करना चाहिए। विशुद्ध गन्धक का गुण— रसायन, सुमधुर, पाक में और उष्ण है तथा इससे कुष्ठ, कटु <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> dvvjs99waxnzfpoua2cabpy24n2amas पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८० 250 46013 668368 561806 2026-07-20T10:26:02Z Avantika Shaw 4732 /* शोधित */ 668368 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१८'''|'''गन्धक—गन्धकारिका'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>(खुजली), कुष्ठ और विसर्प रोग जाता रहता है। इसके सिवा यह अग्निवृष्टिकर, पाचन, श्रमशोधक, निवारक, कृमिनाशक, विषघ्न, पुत्रोत्पादक, इन्द्रियबलकारक और वीर्यप्रद है। यह सुवर्ण से भी अत्यन्त वीर्यकर है। रसेन्द्रसारसंग्रह में गन्धकशोधन की एक दूसरी तरकीब भी लिखी हुई है— गन्धकचूर्ण को भृङ्गराज के रस में भिगो कर धूप में सुखाना चाहिए। इस तरह तीन बार करके इसे बेर की लकड़ी की आग में गलाकर वस्त्र पूत पात्रपूर्ण भृङ्गराजरस में ढाल देना चाहिये। इस तरह दो बार करके धोने और सुखाने से गन्धक शुद्ध हो जाता है। (रसेन्द्रसारसंग्रह) पाश्चात्य मत से गन्धक शुद्ध हरिद्रावर्ण का है। कभी-कभी हरिद्रावर्ण के साथ अन्यान्य वर्णों की आभा रहती है। यह दहनशील, कठिन, भङ्गप्रवण तथा स्वादहीन है। यह २३९ डिग्री उत्ताप से गल जाता है और ४८२ डिग्री उत्ताप से जल जाता है। जलन के समय इससे एक प्रकार की गन्ध और नीलवर्ण शिखा बाहर निकलती है। अधिक उत्ताप लगने से शिखा श्वेतवर्ण धारण करती है। गन्धक खनिज है लेकिन धातु नहीं है। खान में यह कभी स्वतन्त्र, कभी सीसा, जस्ता, लोहा, विष, पारद और ताम्बा के साथ मिला हुआ पाया जाता है। सरसों के तेल में भी गन्धक का अंश है। डिम्ब के श्वेत अंश में और मनुष्यदेह के रक्त में गन्धक देखा गया है। खनिज गन्धक ही विशेष कर व्यवहार में प्रशस्त है। मिश्रित द्रव्य से गन्धक सुखा कर निकाला जाता है। आग्नेय पर्वतवाले देश में ही गन्धक अधिक परिमाण में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त यूरोप, स्पेन, सिमिली, स्विजरलैण्ड, अमेरिका के संयुक्त राज्य, एशिया पारस, नेपाल प्रदेश, बलुचिस्तान, अफगानिस्तान, उत्तर ब्रह्म, भारत के मनिहाट, डेरा-इस्माइल खाँ, उदयपुर प्रभृति स्थानों में भी गन्धक पाया जाता है। अभी दक्षिण भारत में मसुलीपत्तन, सलेम, कड़ापा, विशाखपट्टणम्, त्रिचिनापल्ली पर उत्तर सरकार प्रभृति स्थानों में बहुत कम गन्धक पाया जाता है। भारत के उष्णप्रस्रवण में बहुत गन्धक पाया जाता है। इस तरह उष्णप्रस्रवण यूरोप, सलिविश प्रभृति कई एक स्थान हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गन्धक से अनेक प्रयोजनीय द्रव्य प्रस्तुत होते हैं। पहले इस देश में गन्धक से दियासलाई बनाई जाती रही। आजकल भी बहुत-सी दियासलाई में गन्धक दिया जाता है। पाश्चात्य मतानुसार गन्धक से अनेक औषध प्रस्तुत होते हैं। गन्धक का बाष्प लेने से रक्त परिष्कार होता है। फुसफुस की पीड़ा, हृदय में ठण्ड लग जाना, यक्ष्मा, उदरामय, फोड़ा, कृमिरोग, गोला, वात, बहुमूत्र, हैजा और आमाशय प्रभृति रोगों में गन्धक का प्रयोग विशेष उपकारजनक है। क्या होमियोपैथी क्या एलोपैथी दोनों तरह की चिकित्सा प्रणालियों में ही इसका प्रयोग हुआ करता है। {{outdent|गन्धककज्जली(सं० स्त्री०) औषधविशेष। रसेन्द्रसारसंग्रह के मतानुसार इसकी प्रस्तुत प्रणाली यह है—निगिण्डी और नाटाकरञ्ज के रस को एकत्र कर उसमें गन्धक मिला देना चाहिये। मन्दाग्नि में उसको गरम करना उचित है। गन्धक गल जाने पर उसी परिमाण का पारा डाल दें। जब पारा और गन्धक मिल जाय तब उसे नीचे उतार कर घोटना चाहिये। ऐसा करने से जब वह कज्जल हो जाय तो वह औषध प्रस्तुत हो जायगी। उसकी मात्रा एक रत्ती बना कर जीरा एक माशा और नमक एक माशा लेकर पान के साथ सेवन करना चाहिये। इसके सेवन से त्रिदोषजनित ज्वर नाश होता है। औषध खाने के बाद गर्म जल पीना हितकर है। <Small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</small>}} {{outdent|गन्धकचूर्ण(सं० को०) गन्धकप्रधानं चूर्णम् [मध्यपदलो०]। गन्धप्रधान चूर्ण, बारूद।}} {{outdent|गन्धकद्रावक(सं० पु०) औषधविशेष। <small>गंधक देखो।</small>}} {{outdent|गन्धकन्द(सं० पु०) गन्धप्रधानः कन्दोऽस्य। कशेरुक, केशर।}} {{outdent|गन्धकली(सं० स्त्री०) चम्पककली।}} {{outdent|गन्धकस्तूरिका (सं० स्त्री०) सुगन्धि द्रव्यविशेष, एक खुशबूदार चीज।}} {{outdent|गन्धकस्तूरी(सं० स्त्री०) सुगन्धि द्रव्यविशेष।}} {{outdent|गन्धकारिका(सं० स्त्री०) गन्धं गन्धप्रधान देशिकादिकं करोतीति रन्ध्रो, परगृहस्थिता शिल्पनिपुणा स्वाधीना स्त्री, पराये घर में रहनेवाली शिल्पकारिणी स्त्री।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> cesa94zcl5botvlmhj71vli7w5nyxb4 668369 668368 2026-07-20T10:28:15Z Avantika Shaw 4732 668369 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Avantika Shaw" />{{rh|'''१८'''|'''गन्धक—गन्धकारिका'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>(खुजली), कुष्ठ और विसर्प रोग जाता रहता है। इसके सिवा यह अग्निवृष्टिकर, पाचन, श्रमशोधक, निवारक, कृमिनाशक, विषघ्न, पुत्रोत्पादक, इन्द्रियबलकारक और वीर्यप्रद है। यह सुवर्ण से भी अत्यन्त वीर्यकर है। रसेन्द्रसारसंग्रह में गन्धकशोधन की एक दूसरी तरकीब भी लिखी हुई है— गन्धकचूर्ण को भृङ्गराज के रस में भिगो कर धूप में सुखाना चाहिए। इस तरह तीन बार करके इसे बेर की लकड़ी की आग में गलाकर वस्त्र पूत पात्रपूर्ण भृङ्गराजरस में ढाल देना चाहिये। इस तरह दो बार करके धोने और सुखाने से गन्धक शुद्ध हो जाता है। <Small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</Small> पाश्चात्य मत से गन्धक शुद्ध हरिद्रावर्ण का है। कभी-कभी हरिद्रावर्ण के साथ अन्यान्य वर्णों की आभा रहती है। यह दहनशील, कठिन, भङ्गप्रवण तथा स्वादहीन है। यह २३९ डिग्री उत्ताप से गल जाता है और ४८२ डिग्री उत्ताप से जल जाता है। जलन के समय इससे एक प्रकार की गन्ध और नीलवर्ण शिखा बाहर निकलती है। अधिक उत्ताप लगने से शिखा श्वेतवर्ण धारण करती है। गन्धक खनिज है लेकिन धातु नहीं है। खान में यह कभी स्वतन्त्र, कभी सीसा, जस्ता, लोहा, विष, पारद और ताम्बा के साथ मिला हुआ पाया जाता है। सरसों के तेल में भी गन्धक का अंश है। डिम्ब के श्वेत अंश में और मनुष्यदेह के रक्त में गन्धक देखा गया है। खनिज गन्धक ही विशेष कर व्यवहार में प्रशस्त है। मिश्रित द्रव्य से गन्धक सुखा कर निकाला जाता है। आग्नेय पर्वतवाले देश में ही गन्धक अधिक परिमाण में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त यूरोप, स्पेन, सिमिली, स्विजरलैण्ड, अमेरिका के संयुक्त राज्य, एशिया पारस, नेपाल प्रदेश, बलुचिस्तान, अफगानिस्तान, उत्तर ब्रह्म, भारत के मनिहाट, डेरा-इस्माइल खाँ, उदयपुर प्रभृति स्थानों में भी गन्धक पाया जाता है। अभी दक्षिण भारत में मसुलीपत्तन, सलेम, कड़ापा, विशाखपट्टणम्, त्रिचिनापल्ली पर उत्तर सरकार प्रभृति स्थानों में बहुत कम गन्धक पाया जाता है। भारत के उष्णप्रस्रवण में बहुत गन्धक पाया जाता है। इस तरह उष्णप्रस्रवण यूरोप, सलिविश प्रभृति कई एक स्थान हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गन्धक से अनेक प्रयोजनीय द्रव्य प्रस्तुत होते हैं। पहले इस देश में गन्धक से दियासलाई बनाई जाती रही। आजकल भी बहुत-सी दियासलाई में गन्धक दिया जाता है। पाश्चात्य मतानुसार गन्धक से अनेक औषध प्रस्तुत होते हैं। गन्धक का बाष्प लेने से रक्त परिष्कार होता है। फुसफुस की पीड़ा, हृदय में ठण्ड लग जाना, यक्ष्मा, उदरामय, फोड़ा, कृमिरोग, गोला, वात, बहुमूत्र, हैजा और आमाशय प्रभृति रोगों में गन्धक का प्रयोग विशेष उपकारजनक है। क्या होमियोपैथी क्या एलोपैथी दोनों तरह की चिकित्सा प्रणालियों में ही इसका प्रयोग हुआ करता है। {{outdent|गन्धककज्जली(सं० स्त्री०) औषधविशेष। रसेन्द्रसारसंग्रह के मतानुसार इसकी प्रस्तुत प्रणाली यह है—निगिण्डी और नाटाकरञ्ज के रस को एकत्र कर उसमें गन्धक मिला देना चाहिये। मन्दाग्नि में उसको गरम करना उचित है। गन्धक गल जाने पर उसी परिमाण का पारा डाल दें। जब पारा और गन्धक मिल जाय तब उसे नीचे उतार कर घोटना चाहिये। ऐसा करने से जब वह कज्जल हो जाय तो वह औषध प्रस्तुत हो जायगी। उसकी मात्रा एक रत्ती बना कर जीरा एक माशा और नमक एक माशा लेकर पान के साथ सेवन करना चाहिये। इसके सेवन से त्रिदोषजनित ज्वर नाश होता है। औषध खाने के बाद गर्म जल पीना हितकर है। <Small>(रसेन्द्रसारसंग्रह)</small>}} {{outdent|गन्धकचूर्ण(सं० को०) गन्धकप्रधानं चूर्णम् [मध्यपदलो०]। गन्धप्रधान चूर्ण, बारूद।}} {{outdent|गन्धकद्रावक(सं० पु०) औषधविशेष। <small>गंधक देखो।</small>}} {{outdent|गन्धकन्द(सं० पु०) गन्धप्रधानः कन्दोऽस्य। कशेरुक, केशर।}} {{outdent|गन्धकली(सं० स्त्री०) चम्पककली।}} {{outdent|गन्धकस्तूरिका (सं० स्त्री०) सुगन्धि द्रव्यविशेष, एक खुशबूदार चीज।}} {{outdent|गन्धकस्तूरी(सं० स्त्री०) सुगन्धि द्रव्यविशेष।}} {{outdent|गन्धकारिका(सं० स्त्री०) गन्धं गन्धप्रधान देशिकादिकं करोतीति रन्ध्रो, परगृहस्थिता शिल्पनिपुणा स्वाधीना स्त्री, पराये घर में रहनेवाली शिल्पकारिणी स्त्री।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 4aesvcpkw5gcijkywy6rhdr0ievln28 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष षष्ठ भाग.djvu/१८१ 250 46021 668375 561807 2026-07-20T10:58:41Z Avantika Shaw 4732 668375 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Vivek143India" /></noinclude>{{rh|'''१९'''|'''गन्धकारौ—गन्धतन्मात्र'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|गन्धकारी(सं० स्त्री०) मोहन, मलई का पेड़।}} {{outdent|गन्धकालिका(सं० स्त्री०) गन्धकाली कन्-टाप्। व्यासदेव की माता सत्यवती।}} {{outdent|गन्धकाली(सं० स्त्री०) गन्धः प्रशस्तगन्धस्तत्र चमति पर्याप्नोति चम्-अच् गौरादित्वात् ङीष्। १ व्यासदेव की माता, उनका दूसरा नाम सत्यवती था। सत्यवती देखो। २ कुन्ती की मूर्तिधारिणी शापभ्रष्टा एक अप्सरा। हनुमान् के हाथ से निहत होकर मुक्ति पाई थी। (रामायण)}} {{outdent|गन्धकाष्ठ(सं० क्ली०) गन्धयुक्तं काष्ठमसौ, बहुव्री०। १ अगुरुचन्दन, अगर की लकड़ी। २ शम्बरचन्दन। (राजनि०)}} {{outdent|गन्धकी(सं० स्त्री०) शल्लकी, शलई।}} {{outdent|गन्धकी(देशज) गन्धक के रंग का हलका पीला।}} {{outdent|गन्धकुटी(सं० स्त्री०) गन्धस्य कुटीव आधारः। १ मरा नामक गन्धद्रव्य। २ किसी मन्दिर के भीतर की वह कोठरी जिसमें बहुत-सी देवमूर्तियाँ रखी हों। ३ जैनियों के केवलियों की कुटी। तीर्थङ्करों के लिए इन्द्रादिदेव समवशरण की रचना करते हैं। परन्तु साधारण केवली भगवान् के लिये गन्धकुटी की रचना होती है। जैसे—रामचन्द्रकेवली और गौतमकेवली की गन्धकुटी।}} {{outdent|गन्धकुसुमा(सं० स्त्री०) गन्धयुक्तं कुसुमं यस्याः, बहुव्री०। गणिका पुष्पवृक्ष, गनियार का पेड़।}} {{outdent|गन्धकूटी(सं० स्त्री०) बौद्धविहारस्थ आराम स्थान। "यावत् भगवता गन्धकूट्याम्..." (दिव्यावदान में पूर्णावदान)}} {{outdent|गन्धकनिका(सं० स्त्री०) गन्धं लेशं धारयति, कस्तूरी, एक सुगन्धित द्रव्य, मृगनाभि।}} {{outdent|गन्धकोकिला(सं० स्त्री०) गन्धप्रधाना कोकिला इव। गन्धद्रव्यविशेष, सुगन्धकोकिला। इसका गुण—तीक्ष्ण, उष्ण, कफनाशक, तिक्त और सुगन्धि है। (भावप्रकाश)}} {{outdent|गन्धकोलिका(सं० स्त्री०) गन्धमालती के समान गन्धद्रव्यविशेष।}} {{outdent|गन्धखेड़(सं० क्ली०) गन्धस्य खेला यत्र, बहुव्री०। सुगन्धित ग्राम, गन्धखेड़। इसका पर्याय भूषण, रोहिष, गोमयप्रिय और मखवास है। "न यशस्विनम्।" (हरिवं० २०५।१०)}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गंध, सुरस, सुरभि, सुगन्धि। यह तिक्त, रसायन, स्निग्ध, मधुर, शीतल, कफ, पित्त और श्रमनाशक एवं सुगन्धि होता है। (राजनि०) {{outdent|गन्धगज(सं० पु०) हाथियों में श्रेष्ठ।}} {{outdent|गन्धगर्भ(सं० पु०) का पेड़।}} {{outdent|गन्धगृहा(सं० स्त्री०) गन्धद्रव्यविशेष।}} {{outdent|गन्धघ्राण (सं० स्त्री०) नासिका, नाक।}} {{outdent|गन्धत्राण(सं० क्ली०) गन्ध का बाण।}} {{outdent|गन्धचेलिका(सं० स्त्री०) गन्धं चेलति गच्छति येन। कस्तूरी, मृगनाभि।}} {{outdent|गन्धजटिला(सं० स्त्री०) जटिला, वच, हैमती का पेड़।}} {{outdent|गन्धजल(सं० क्ली०) गन्धद्रव्यवासितं जलम्, मध्यपदलो०। सुगन्धि कुसुमादि वासित जल, सुगन्धित जल, "फल्गूनां" (भाग० ११४)।}} {{outdent|गन्धजात(सं० क्ली०) गन्धो वासनादौ जातौ यस्मात्, बहु०। १ तेजपत्र, तेजपात। गन्धानां जातम्, ६-तत्। २ गन्धसमूह।}} {{outdent|गन्धज्ञा(सं० स्त्री०) गन्धं जानाति ज्ञा-कर्तरि क-टाप्। नासिका, नाक।}} {{outdent|गन्धतण्डुल(सं० क्ली०) गन्धः प्रधानं तण्डुलमस्य, बहुव्री०। सुगन्धि शालिविशेष, वासफुल चावल।}} {{outdent|गन्धतन्मात्र(सं० क्ली०) गन्धस्य तन्मात्रम्, ६-तत्। सांख्यमतसिद्ध सूक्ष्म द्रव्य। इसको हम लोग देख नहीं सकते, इस लिये हमारा यह भोग्य नहीं है। योगी और देवतागण इसका भोग करते हैं। स्थूल पृथ्वी का गन्ध जिसका हम लोग अनुभव करते हैं, वह शान्त, घोर या मूढ़ अर्थात् सुखकर, दुःखकर या मोहजनक है। किन्तु गन्धतन्मात्र में जो गन्ध है वह शान्त और घोर या मूढ़ नहीं है। दान्तगण इस तन्मात्र को ही अपञ्चीकृतभूत नाम से कहा करते हैं। नैयायिक और वैशेषिकगण तन्मात्र स्वीकार नहीं करते हैं, उनके मत में परमाणु (पृथ्वी का अत्यन्त सूक्ष्म भाग, जिसको और भाग कर नहीं सकते) वही चरम अवयव है। सांख्यभाष्यकार विज्ञानभिक्षु ने इस}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 5tsg6bxofd9m5y436gpgzt1z9e9rzgn पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०७ 250 75803 668266 608923 2026-07-19T16:43:42Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668266 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१०६|ईश्वर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{gap}} श्रीकृष्ण के मतमें (उपनिषद्प्रीक्त) अज, अक्षय और जगत्‌का मूलकारण हो ब्रह्म है। {{smaller|(गीता ८।२)}} वह जन्मरहित, अनखर-स्वभाव और सकलका ईश्वर होते भो मायामें पड़कर जन्मान्तरीण कर्मानुसार प्रलयकाल-विलीन कर्मादि परवश समस्त भूतोंके बनाता है, किन्तु स्वयं उस सकल सृष्टिके आयत्त नहीं होता। माया उसका अधिष्ठान ले इस चराचर विश्वंको उपजाती है। ईश्वरके अधिष्ठान निमित्त ही यह जगत् पुनः पुनः उत्पन्न होता है। {{block center|<poem>{{smaller|".........विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिम' कृत्स्नमवश प्रक्कृतेर्वशात्॥ ८ नच नां तानि कर्माणि निवघ्नति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्त' तेषु कर्मसु॥ ८ मयाध्यच्च ण प्रक्कृतिः सूयते च चराचरम्। हेतुनानेन कौन्तेय जगद्दिपरिवर्तते॥" १० (गीता ८ अध्याय)}}</poem>}} मैं स्वीय प्रक्ततिका आश्रय पकड़ अविद्यापरवश प्राणिसमूहको वारंवार सृष्टि करता हूं, किन्तु उस सृष्टि कर्मके आयत्त नहीं रहता। मैं सकल हो कर्मसे अनासक्त हो उदासीनकी भांति सर्वदा अवस्थान रखता हूं। प्रकृति मेरा अधिष्ठान पकड़ इस चराचर जगत्‌को बनाती है। मेरे अधिष्ठानके हेतु ही जगत् नियत रूपसे बदलता (पुनः पुनः उत्पन्न होता) रहता है। वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है। (गीता ८।९) वह स्वीय प्रक्ततिका आश्रय ले समय-समय पर जन्म-ग्रहण किया करता है। {{block center|<poem>{{smaller|"अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृति खामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥ ६ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ७ परिवारणाय साधू नां विनाशाय च दुष्क ताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥" ८ (गीता ४ अध्याय)}}</poem>}} यद्यपि मैं जन्मरहित, अव्ययात्मा एवं सर्वभूतका ईश्वर हं तो भी नित्य प्रक्ततिका आश्रय ले जन्मग्रहण करता हूं। जिस जिस समय धर्मका विप्लव और अधर्मका प्रादुर्भाव होता है, उसी उसी समय मैं आमाको सृष्टि किया करता हूं। मैं साधुके परित्राण, {{Multicol-break}} असाधुके विनाश और धर्मके संस्थापनके लिये युग-युगमें जन्म लेता हूं। ईश्वरको जो जिस भावसे पुकारता है, वह उसो भावसे उसे पा जाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्री सब कोई उस परमपुरुषका आश्रय ले अत्युत्कुष्ट गति पा सकते हैं। {{smaller|(गीता १ अध्याय)}} इसी प्रकार गीतामें सर्ववादिसम्मत ईश्वरतत्त्व स्थापित हुआ है। गोतामें ईश्वर के अवतारको कथा लिखी है और पुराणमें उसा महापुरुषको लोला वर्णित हुई है। सकल पुराणके मतमें ईश्वरने अपनो मायासे सगुण बन ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर संज्ञा पायो है। मत्स्यपुराणमें लिखा है, कि प्रक्ततिके गुणत्त्रयका नाम हो ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर पड़ा है। रजोगुण ब्रह्मा, सत्वगुण विष्णु और तमोगुण रुद्रका स्वरूप है। {{block center|<poem>{{smaller|"सत्वरजस्तमय व गुणवयमुदाहतम्। साम्यावस्थितिरतेषां प्रकृतिः परिकीर्तिता॥१४ केचित् प्रधानमित्याहुरव्यक्तमपरे जगुः। एतदेष प्रजासृष्टि करीति विकरीति च॥१५ गुणेभ्यी चीभ्यमाणभ्यस्त्रयी देवा विजिरे। एका मूर्तिस्त्रयो भागा ब्रह्माविष्णमहेश्वराः॥ १६ (मात्रय ३ अध्याय)}}</poem>}} पुराणमें इन तीनों देवतायोंको उपासना वर्णित है और यही त्रयीमूर्ति सर्वं शक्तिमान् ईश्वरभावसे पूजित है। सिवा इसके महामाया, लक्ष्मी प्रभृति देवियों और दूसरे देवतायोंकी उपासना भी देख पड़ती है। किन्तु सकल हो विशुद्ध सत्वोपाधिविशिष्ट परातीत परब्रह्म माने गये हैं। सकल पुराणमें प्रधानतः ईश्वरकी साकार उपासना निरूपित है। पुराणके मतसे इसी उपासना द्वारा ईश्वर मिल सकता है। ऐसे स्थलपर अनेक लोग आश्चर्यमें आकर पूछ बैठेंगे-जिस देशमें ज्ञान-प्रधान उपनिषद् एवं' दशन द्वारा ईश्वरको निराकार उपासना ठहरायी, और ईश्वरको सर्वव्यापी सर्व नियन्ता बता सर्वंत्र घोषणा को गयो, उसी ज्ञानप्रधान देशमें जगद्व्यापी ईश्वरको रूपकल्पना कैसे अव-धारित हुयी? जिसे निराकार कहा गया, उसके आकारको कल्पना करनेका क्या प्रयोजन पड़ा? पुराणकार व्यासदेवने देखा—जैसा समय है, {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> e4pdtmoktcdua3mkul4sz5vxhoer2fl पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०८ 250 75805 668267 608924 2026-07-19T17:06:04Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668267 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वर|१०७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} उसके अनुसार ईश्वरोपासनाका प्रचार करना भी कर्तव्य है। कर्म एवं ज्ञानमार्ग पर अनेक चलना चाहते हैं सही, किन्तु सहज ही उसे समझ नहीं सकते—कैसे उस परमेश्वरकी कल्पना की जाय। कर्म करते हैं सही और ज्ञानालोचना भी चलाते हैं सही, किन्तु उससे मनको तृप्ति दे नहीं सकते। हम संसारी है और संसारबन्धनमें प्रायः जड़ीभूत रहते हैं, जो कुछ समय मिलता है, उसमें मन इतना नहीं लगता कि उस निराकार अद्वितीय परमेश्वरका ध्यान बंध सके। संसारमें ऐसा निभृत स्थान ढूंढ़ नहीं पाते, जहां रहकर मनको ठहरावे और चित्तवृत्तिको निरोधमें ला सके। जितने समय कर्मकाण्ड एवं ज्ञानकाण्डकी आलोचना चलाते हैं, उसमें मनको शान्त नहीं पाते और न प्राणमें भक्तिका भाव हो बढ़ाते हैं; केवलमात्र संसारके वैराग्यमें हो पड़ जाते हैं। संसारमें रहकर कैसे उस परमपिताको पहुंचान सकेंगे? इसलिये संसारियोंकी उपासनाका भेद सिखाने और सहज ही ईश्वरका रूप समझानेके लिये भक्तिप्रधान अष्टादश महापुराण एवं उपपुराण बनाये गये । भगवान्ने भो कहा है,— {{block center|<poem>{{smaller|"पत्र' पुष्प' फलं तीयं यो में भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्यु पहतमश्नानि प्रयतात्मनः॥" (गीता १।२६ )}}</poem>}} जो भक्ति सहकारसे मुझे पत्र, पुष्प, फल और जल देता है, मैं संयमी व्यक्तिका वही द्रव्य खा पी लेता हूं। इसीसे पुराणमें पत्र, पुष्प, फल और जलसे सहज उपासना प्रचारित हुई है। पुराणकारके ईश्वरकी असंख्य मूर्ति माननेका यह कारण है कि जिसे जिस रूपकी भक्ति रहे, वह उसी रूपकी पूजा करे। हमारे शास्त्रमें ईश्वरके शरीरको जो कथा है वह समस्त ही रूपक है। वेदान्तसूत्रमें स्पष्ट लिखा है— {{c|{{smaller|"भानुमानिकमप्य केषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्तग्गृहीतेर्द श यति च।" (ब्रह्मसू व १।४।१)}}}} कुछ स्थिर होकर विचारनेसे स्पष्ट हो समझ पड़ता है कि पुराणोक्त ईश्वर के अवतारकी सकल लीला प्रकृत {{Multicol-break}} घटना नहीं-समस्त हो रूपक है। भगवान्‌के कूर्म अवतारमें समुद्रमन्थनका उपाख्यान आया है। इस उपाख्यानके पाठसे यही उपलब्धि होतो है- 'देहिमात्र इन्द्रियरूपी असुरगण-कर्तृक परिपीड़ित है। उसका कर्तव्य इन्द्रियगणको वशीभूत बना विवेकादि देवताके साहाय्यसे कैवल्यरूप अमृत उत्पादन करना है। किन्तु यह कोई साधारण बात नहीं है। इन्द्रियरूपी असुरगणका सहजमें वशीभूत होना कठिन है। इसीसे भगवान्ने प्रथम विवेकादि देवतागणसे उनको मिला दिया था। पोछे इन्द्रियादिके अधिपति मोह अर्थात् देहात्मबोधसे विवेकादिने सन्धि की और श्रुतिसमुद्र मथनेके लिये उभय दलने बुद्धिकी मन्थनदण्ड बना आशाकी रज्जु हाथमें ली। आत्मा कूटस्थ है। इसीसे कूमे उपाधि विशिष्ट आत्मा मन्दार नामक देहकूटमें था। मन्थनसे प्रथम ही उपसर्गरूप कालकूट निकला। महादेवरूप तमोलयकारी गुरुदेवने उसे पोकर शिष्य-गणका व्याघात हटा दिया। (क्योंकि प्रथम गुरुके अशेष कष्ट उठानेसे शिष्थको ज्ञान आता है) फिर निर्विघ्न्न वेदाभ्यास होने लगा। क्रम-क्रमसे यज्ञरूप सुरभि, ऐश्वर्यरूप उच्चःश्रवा घोटक, सांख्ययोगरूप ऐरावत नामक हस्तो, अष्टाङ्गयोग-रूप अष्ट दिग्हस्ती, अष्टसिद्धिरूप अष्टहस्तिनी, जीवोपाधिरूप कौस्तुभमणि, आत्मोपाधिक पद्मराग, चित्तोल्लास जनक आनन्दमय पारिजात वृक्ष, शान्ति एवं करुणा, श्रद्धादि अप्सरागण, चित्रशक्तिरूप लक्ष्मी और मिथ्यादृष्टि अर्थात् अविद्या-रूपी वारुणोकी उत्पत्ति हुई। परिशेष कैवल्यामृत हाथमें लिये ज्ञानरूप धन्वन्तरि निकले। इन्द्रियादि असुरगण अमृतरूप कैवल्य पानके अयोग्य था। इसीसे भगवान्ने विद्यारूप मोहिनीके वेशसे उन्हें मोहित कर विवेकादि देववर्गकी वह दे चिरंजीवी बनाया। इसी समय तमः (राड्डु) ने गुप्तभावसे अमृत पिया और रजः एवं सत्वरूपी चन्द्रसूयेने उसका परिचय दिया। अनन्तर अन्तर्यामी भगवान्ने ज्ञान-तत्वरूप चक्र द्वारा उसका शिरवेदन किया।' पुराणकारने यह भी सबको बार बार समझाया— {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> bhyamlpgvsxd8102mym4aolbshqghyb 668268 668267 2026-07-19T17:08:04Z ममता साव9 2453 668268 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वर|१०७}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} उसके अनुसार ईश्वरोपासनाका प्रचार करना भी कर्तव्य है। कर्म एवं ज्ञानमार्ग पर अनेक चलना चाहते हैं सही, किन्तु सहज ही उसे समझ नहीं सकते—कैसे उस परमेश्वरकी कल्पना की जाय। कर्म करते हैं सही और ज्ञानालोचना भी चलाते हैं सही, किन्तु उससे मनको तृप्ति दे नहीं सकते। हम संसारी है और संसारबन्धनमें प्रायः जड़ीभूत रहते हैं, जो कुछ समय मिलता है, उसमें मन इतना नहीं लगता कि उस निराकार अद्वितीय परमेश्वरका ध्यान बंध सके। संसारमें ऐसा निभृत स्थान ढूंढ़ नहीं पाते, जहां रहकर मनको ठहरावे और चित्तवृत्तिको निरोधमें ला सके। जितने समय कर्मकाण्ड एवं ज्ञानकाण्डकी आलोचना चलाते हैं, उसमें मनको शान्त नहीं पाते और न प्राणमें भक्तिका भाव हो बढ़ाते हैं; केवलमात्र संसारके वैराग्यमें हो पड़ जाते हैं। संसारमें रहकर कैसे उस परमपिताको पहुंचान सकेंगे? इसलिये संसारियोंकी उपासनाका भेद सिखाने और सहज ही ईश्वरका रूप समझानेके लिये भक्तिप्रधान अष्टादश महापुराण एवं उपपुराण बनाये गये । भगवान्ने भो कहा है,— {{block center|<poem>{{smaller|"पत्र' पुष्प' फलं तीयं यो में भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्यु पहतमश्नानि प्रयतात्मनः॥" (गीता १।२६ )}}</poem>}} जो भक्ति सहकारसे मुझे पत्र, पुष्प, फल और जल देता है, मैं संयमी व्यक्तिका वही द्रव्य खा पी लेता हूं। इसीसे पुराणमें पत्र, पुष्प, फल और जलसे सहज उपासना प्रचारित हुई है। पुराणकारके ईश्वरकी असंख्य मूर्ति माननेका यह कारण है कि जिसे जिस रूपकी भक्ति रहे, वह उसी रूपकी पूजा करे। हमारे शास्त्रमें ईश्वरके शरीरको जो कथा है वह समस्त ही रूपक है। वेदान्तसूत्रमें स्पष्ट लिखा है— {{c|{{smaller|"भानुमानिकमप्य केषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्तग्गृहीतेर्द श यति च।" (ब्रह्मसूत्र १।४।१)}}}} कुछ स्थिर होकर विचारनेसे स्पष्ट हो समझ पड़ता है कि पुराणोक्त ईश्वर के अवतारकी सकल लीला प्रकृत {{Multicol-break}} घटना नहीं-समस्त हो रूपक है। भगवान्‌के कूर्म अवतारमें समुद्रमन्थनका उपाख्यान आया है। इस उपाख्यानके पाठसे यही उपलब्धि होतो है- 'देहिमात्र इन्द्रियरूपी असुरगण-कर्तृक परिपीड़ित है। उसका कर्तव्य इन्द्रियगणको वशीभूत बना विवेकादि देवताके साहाय्यसे कैवल्यरूप अमृत उत्पादन करना है। किन्तु यह कोई साधारण बात नहीं है। इन्द्रियरूपी असुरगणका सहजमें वशीभूत होना कठिन है। इसीसे भगवान्ने प्रथम विवेकादि देवतागणसे उनको मिला दिया था। पोछे इन्द्रियादिके अधिपति मोह अर्थात् देहात्मबोधसे विवेकादिने सन्धि की और श्रुतिसमुद्र मथनेके लिये उभय दलने बुद्धिकी मन्थनदण्ड बना आशाकी रज्जु हाथमें ली। आत्मा कूटस्थ है। इसीसे कूमे उपाधि विशिष्ट आत्मा मन्दार नामक देहकूटमें था। मन्थनसे प्रथम ही उपसर्गरूप कालकूट निकला। महादेवरूप तमोलयकारी गुरुदेवने उसे पोकर शिष्य-गणका व्याघात हटा दिया। (क्योंकि प्रथम गुरुके अशेष कष्ट उठानेसे शिष्थको ज्ञान आता है) फिर निर्विघ्न्न वेदाभ्यास होने लगा। क्रम-क्रमसे यज्ञरूप सुरभि, ऐश्वर्यरूप उच्चःश्रवा घोटक, सांख्ययोगरूप ऐरावत नामक हस्तो, अष्टाङ्गयोग-रूप अष्ट दिग्हस्ती, अष्टसिद्धिरूप अष्टहस्तिनी, जीवोपाधिरूप कौस्तुभमणि, आत्मोपाधिक पद्मराग, चित्तोल्लास जनक आनन्दमय पारिजात वृक्ष, शान्ति एवं करुणा, श्रद्धादि अप्सरागण, चित्रशक्तिरूप लक्ष्मी और मिथ्यादृष्टि अर्थात् अविद्या-रूपी वारुणोकी उत्पत्ति हुई। परिशेष कैवल्यामृत हाथमें लिये ज्ञानरूप धन्वन्तरि निकले। इन्द्रियादि असुरगण अमृतरूप कैवल्य पानके अयोग्य था। इसीसे भगवान्ने विद्यारूप मोहिनीके वेशसे उन्हें मोहित कर विवेकादि देववर्गकी वह दे चिरंजीवी बनाया। इसी समय तमः (राड्डु) ने गुप्तभावसे अमृत पिया और रजः एवं सत्वरूपी चन्द्रसूयेने उसका परिचय दिया। अनन्तर अन्तर्यामी भगवान्ने ज्ञान-तत्वरूप चक्र द्वारा उसका शिरवेदन किया।' पुराणकारने यह भी सबको बार बार समझाया— {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> mhin7jbyip3qdkkgby8ywx5gp6umgza पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१०९ 250 75806 668272 608925 2026-07-19T17:33:31Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668272 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|१०८|ईश्वर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} यथार्थमें ईश्वरका रूप एवं वर्णं इत्यादि कुछ भी नहीं है, कल्पनामात्र है। {{smaller|(मार्कण्डेयपुराण ४ अध्याय)}} पुराणके मतसे ईश्वर हो पुरुष है। द्विजातिगण उसीको ब्रह्म बताते हैं और लयकालमें वही सङ्कर्षण नाम पाता है,— {{block center|<poem>{{smaller|"पुराणे पुरुषः प्रोक्ती ब्रह्म प्रोक्ती डिजातिषु। चये सद्धर्षणः प्रोक्तस्तसुपास्मसुपास्महे॥" (गरुड़ २ अध्याय)}}</poem>}} पुराणमें गीताका वही मूलतत्व कहा गया है,— {{block center|<poem>{{smaller|"मय्यावेश्यमनो ये मां नित्ययुक्‌त्वा उपासते। श्रद्धया परयीपेतास्ते में युक्ततमा मताः॥ २ ये त्वक्षरमनिर्दे श्वमव्यक्तं पर्युपासते। सर्ववगमचिन्ताच कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥ ३ संनियम्येन्द्रि‌यग्राम' सर्वव समबुद्धयः। ते प्राप्न वन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥ ४ क्के शोऽधिकतरस्ते षामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिदुःखं देहवङ्गिरवापाते॥ ५ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः। अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥ ६ तेषामष्ट' संसुद्धर्ता मृत्यु स'सारसागरात्।" (गीता १२ अध्याय)}}</poem>}} जो मेरे (ईश्वरके) प्रति अत्यन्त अनुरक्त और निविष्टमना हो श्रद्धापूर्वक उपासना करता है, वही प्रधान योगी है। एवं जो जितेन्द्रिय है सबको समान समझता है और अक्षर, अनिर्दिश्य, अव्यक्त, अचिन्त्य, सर्वव्यापी, ह्रास वृद्दिद्दीन, कूटस्थ तथा नित्य परब्रह्मको उपासना करता है, वह भी मेरे ही पास पहुंचता है। देही अतिकष्टसे अव्यक्त गति पा सकता है। जो अव्यक्त ब्रह्ममें आसक्तमना होता है, वह अधिकतर दुःख उठाता है। जो मेरेपर सकल निर्भर कर एकान्त भक्तिपूर्वक मेरा ही ध्यान धरता है और मेरि ही उपासना करता है, उसे मैं मृत्यु के आकर इस संसार-सागरसे छुड़ा देता हूं। इससे संसारी समझ सकता है, कि भक्तिसहकारसे इष्टदेवको सकल समर्पण कर ध्यान-उपासना करने पर मोक्ष मिलता है। पहले ही लिख दिया है, कि केवल साधकको सुविधाके लिये पुराणमें ईश्वरका नानारूप मान लिया है। वस्तुतः नाना रूपकल्पना रूपर्क मात्र है। पुराणमें {{Multicol-break}} भगवान्के मत्स्य, कूर्म, वराहादि नाना देह धारणपूर्वक अवतार होनेका जो प्रसङ्ग है, उसके विवरण पाठसे समझ पड़ता है, कि वह सर्वानयन्ता सुर, नर, तिर्यगादि यावत्तीय जीवके आभासरूपमें अवस्थान करता है। तन्वमें ईश्वर आकर्षणशक्तिके नामसे भी निर्दिष्ट है,— {{block center|<poem>{{smaller|"कालाकर्षणरू‌पा च हयाकर्षण-रूपिणी। अहद्धाराकर्षिणी च सर्वाकर्ष स्वरूपिणी॥ रसाकार्षणरूपा च गन्धाकर्ष णरुपिणी। चित्ताकर्षणरूपा च धर्याकर्ष णरुपिणी॥ वीजाकर्षणरुपा च तथा चाकर्षिणी पुनः। अमृताकर्षिणी देवो शरीराकर्षि थी तथा॥" (वाराहीतन्त्र एवं पटल)}}</poem>}} तन्त्रमें भी यही घोषणा हुई है,— {{block center|<poem>{{smaller|"चिन्मयस्याप्रमेयस्य निष्कलस्याशरीरिणः। साधकानां हितार्थाय ब्रह्मणी रूपकल्पना॥" (कुलार्णवतन्त्र ५ पटल ६ अध्याय)}}</poem>}} चिन्मय, अप्रमेय, निष्कल और अशरीरी ब्रह्मकी रुपकल्पना केवल साधकके हितार्थ है। इसीप्रकार साकार उपासना चली है। साकार उपासनाके प्रचारका प्रधान कारण यही है, कि मन अदृश्य वस्तुको धारणा कर नहीं सकता। विशेषतः निराकार अक्षय अव्यक्त इत्यादि विशेषणयुक्त नाम सुननेसे प्रथम उसकी चिन्ता करना दुःसाध्य हो जाता है। सुतरां ऐसी साकार मूर्ति रहना चाहिये, जिसमे सहज ही किसी प्रकार धारणा हो सके। आकार अवलम्बन करनेसे ध्यान और अर्चना उभयका काम निकल जाता है। मन नियत ही परिवर्तनशील है और नियत हो नव नव भाव ग्रहण करनेका प्रयासी है। इसीसे साकार-उपासक संसारी नाना मूर्तिमें ईश्वरकी पूजा करते हैं। आज षीड़शोपचारसे दशभुजाको और दो दिन पुछे भयङ्करा भीषण महाकालीकी मूर्ति पूजते हैं। किन्तु साधक समझता है, कि दोनोंमें उसी एक महाशक्तिका पूजन होता है; केवल रूप और उपाधिका भेद रहता है। आजकल शाक्त, शैव, वेष्णव, गाणपत्य प्रभृतिः विभिन्न मतावलम्बी देख पड़ते हैं। शाक्त इसप्रकार स्तव करते हैं— {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> d45ni80glhqevqy7duhjg2ngeg874du पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/११० 250 75807 668282 608927 2026-07-19T18:11:18Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668282 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वर|१०९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{block center|<poem>{{smaller|"नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥७ अतिसौम्यातिरुद्रायै देव्यै कृत्यै नमो नमः। नमो जगत्प्रतित्वायै देव्ये कृत्यै नमो नमः॥११ या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१२ या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥"(मार्कण्डेयपुराण (८५ अध्याय)}}</Poem>}} {{block center|<poem>{{smaller|"नमो देवि महामाये सृष्टिसंहारकारिणि। अनादिनिधने चण्डि भुक्तिमुक्तिप्रदे शिवे॥ न ते जपं विजानामि सगुण निर्गुणन्तथा। चरित्राणि कुती देवि संख्यातौतानि यानि ते॥" (देवीभागवत १।९।४०-४१)}}</Poem>}} शव पुकारते हैं,— {{block center|<poem>{{smaller|"तं प्रपद्ये महादेवः सर्वज्ञमपराजितम्‌। विभूतिः सकलं यस्य चराचरमिदं जगत्॥" (शिवपुराण— वायुसंहिता १।७)}}</Poem>}} वैष्णवोंकी स्तुति है,— {{block center|<poem>{{smaller|"अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने। सदै करुपरुपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे॥ नमो हिरण्यगर्भाय हरये शङ्कराय च। वासुदेवाय ताराय खर्गस्थित्यन्तकारिणे॥" (विष्णुपुराण १।२।१४)}}</Poem>}} यद्यपि भिन्न भिन्न सम्प्रदाय भिन्न रुप और भिन्न नामसे अपने उपास्य देवताको पुकारते हैं तो भी यह अनायास ही समझ पड़ता है, कि वे समस्त मतावलम्बी उसी एक अद्वितीय ईश्वरको लक्ष्यकर अपनी-अपनी स्तुति करते हैं। तन्त्रमें कहा है,— {{block center|<poem>{{smaller|"निर्गुणा प्रकृतिः सत्यमहमेव च निर्गुणः। यदैव सगुणा त्वंहि सगुणोऽहं सदाशिवः॥ सत्यंहि सगुणा देवी सत्यंहि निर्गुणः शिवः। उपासकानां सिद्धार्थं सगुणा सगुणो मतः॥" (मुण्डमालातन्त्र ७ पटल)}}</Poem>}} मेरा (ईश्वरका) और प्रक्ततिका निर्गुण होना सत्य है। किन्तु आपके सगुण होनेसे मैं भी सगुण (मूर्तिमान्) बन जाता हूं। देवीके सगुण और शिवके निर्गुण रहनेमें कोई सन्देह नहीं। हां, {{Multicol-break}} उपासककी कार्यसिद्धि के निमित्त उभय सगुण जाते हैं। यह साकार उपासना आजकल सकल संसारी ईश्वर-तत्त्वानुसन्धायी प्राथम-कल्पिक मात्रको ग्रहण करना उचित है। श्रीमद्भागवतमें लिखा है,— {{block center|<poem>{{smaller|"अर्चदावर्चयेत् तावदीश्वर' मां स्वकर्मक्लत्। यावन्नवेद स्वहदि सर्व्वभूतेष्ववस्थितम्॥" (भागवत ३।२०।२५)}}</poem>}} मैं ईश्वर हूं। मुझे प्रतिमादिमें पूजना कर्मी लोगोंका तभीतक कर्तव्य है, जबतक उन्हें निज हृदय एवं सर्वभूतमें मेरा अवस्थान समझ नहीं पड़े‌। किन्तु जब देही निज हृदय एवं सर्वभूतमें ईश्वरका अवस्थान पाये और प्रकृति ज्ञानमें समाजाये, तब उसे प्रतिमाका पूजन आवश्यक नहीं है। भगवान् ने समझाया है,— {{block center|<poem>{{smaller|"अथ मां सर्वभूतेषु भूतात्मान' कृतालयम्। अर्चयेद्दानमानाभ्यां मैग्राभिन्न न चक्षुषा॥" (भागवत ३।२९।२७)}}</poem>}} अनन्तर मुझे सर्वभूतमें अवस्थित समझ सकने पर मनुष्य सर्वत्र सकलको दान, मान तथा मैत्रीसे पूजे और अभिन्न दृष्टिसे देखे। (यही मेरी प्रक्कत पूजा है) हमारे प्राचीन शास्त्रोंमें जिस प्रकार ईश्वरका ग्रहण किया गया है उसे हमने अलग-अलग दिखा दिया। अब चार्वाकादि भिन्न सम्प्रदाय जिस प्रकार ईश्वरका अस्तित्व मानते या नहीं मानते उसे भी नीचे दिखाते हैं। चार्वाकके मतमें ईश्वर कोई वस्तु नहीं। चैतन्य-विशिष्ट देह ही आत्मा है। उसे छोड़ स्वतन्त्र लोकसिद्ध राजा पर-आत्माका रहना असङ्गत है। मेश्वर और देहका उच्छेद ही मोक्ष है। जैनमतमें अनन्तज्ञान, अनन्तसुख, अनन्तवीर्य आदि अनेक गुणोंसे विशिष्ट आत्माको ईश्वर माना है। संसारमें जितने आत्मा हैं, वे सब शक्तिकी अपेक्षा ईश्वर हैं, परन्तु ज्ञानावरण आदि आठ कर्मों से उनके गुण आवृत हो रहे हैं, इसलिये वे इस समय अल्पज्ज्ञता, अल्पशक्तिता आदि दूषणोंसे दूषित होनेके कारण ईश्वर नहीं हैं। जिस समय यह जोव अपने तप और ध्यानके प्रभावसे कर्मीको नष्टकर डालता है, उस समय {{Multicol-end}}<noinclude>{{left|Vol. III. 28}}</noinclude> gev3e6jvar6syz21zeh0lyt5rsg1zox पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१११ 250 75808 668286 608928 2026-07-19T18:38:05Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668286 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|११०|ईश्वर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} सर्वज्ञता आदि गुणोंसे विशिष्ट हो जाता है और उसी समयसे ईश्वर कहलाने लगता है। फलतः जितने आत्माओंने मुक्ति (ज्ञानावरणादि कर्मी से शून्यता) प्राप्त कर ली है, वे सब हो ईश्वर हैं। जैनलोग ऐसे ही आत्माओं को पूजते हैं, ऐसोंका ही ध्यान करते हैं और ऐसोंको ही ईश्वर नामसे पुकारते हैं। नैयायिकादि मतावलब्बियोंके समान जैनशास्त्र ईश्वरकी सृष्टिका कर्ता नहीं स्वीकार करता। उसके मतमें यह जगत् अनादि-निधन है। इसको न तो किसीने उत्पन्न किया आर न कोई इसका सर्वथा नाश ही कर सकता है। जो कुछ इसकी इस समय वर्तमान मालूम पड़ता है और थोड़ी देर बाद उसीका जो हम नाश देखते हैं, वह और कुछ नहीं केवल पदार्थका पर्याय मान बदलना है, ऐसे पर्याय तो सवंदा बदला करते हैं, परन्तु ऐसा कोई समय न था और न हो सकता है जिस समय कोई पदार्थ न हो वा न रहा हो। क्योंकि सत्का अभाव और असत्‌को उत्पत्ति प्रमाण-बाधित है। समन्तभद्रस्वामीने अपने 'रत्नकरण्डश्रावकाचार' में ईश्वरका जो लक्षण बतलाया है, वह यह है— {{block center|<poem>{{smaller|"आप्ते नोच्छिन्नदाषेण सर्वज्ञ नागमेशिना। भवितव्यं नियोगेन नान्यथा ह्याप्तता भवेत्॥ ५ क्षुत्पिपासाजरातजन्मातङ्मयस्मयाः। न रागई षमोहाय यस्याप्तः स प्रकीय ते॥" ६ परमेष्ठो पर ज्योतिर्विरागो विमलः कृतिः। सर्वज्ञोऽनादिमध्यान्तः सार्वः शातीपलांल्यते॥ ७}}</poem>}} अर्थात् जिसके भूख, प्यास, बुढ़ापा, रोग, जन्म, मरण, भय, गर्, राग, द्वेष, मोह और 'च'से रति अरति, खेद, खेद, निद्रा, चिन्ता, आश्चर्य ये अठारह दोष न हों जो सर्वज्ञही, समस्त प्राणियोंका हितैषी हो, कर्ममल रहित हो, कृतकृत्य हो, और जो परम पदमें रहनेवाला हो वही आप्त है। बहुतसे लोगोंका ख्याल है, कि जैनी ईश्वर नहीं मानते वा चौबीस तीर्थंकरोंको ही ईश्वर मानते हैं। परन्तु यह बात ठीक नहीं। गुणवाला ईश्वर माना गया है। जैन शास्त्र में उपर्युक्त चौबीस तीर्थङ्करों की {{Multicol-break}} जो विशेष रीतिसे जैनी पजते हैं, उसका कारण यह है कि सामान्य मुक्तात्माओंकी अपेक्षा उन्हनि समय समयपर सदुपदेश द्वारा आत्माके कल्याणका विशेष रीतिसे मार्ग बतलाया है। उन्हींके आविर्भूत मार्गपर चलकर जीवोंने मुक्ति पाई है और सामान्यासे बहुत थोड़ा उपदेश दिया है। {{Smaller|तीर्थकर 'बीर जैनधर्म शब्द देखो।}} बौद्धोंमें प्रधानतः हीनयान और महायान दो सम्प्रदाय हैं। हीनयान गौतमबुद्धका प्रचारित धर्ममत मानते हैं। उनके मतसे देह क्षणभङ्गूर है, ध्यान, धारणा एवं योग द्वारा ज्ञान मिलता है; और उसके पीछे निर्वाण होता है। वे ईश्वरका अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। सहावान शून्यशद मानते हैं। उनके शास्त्रमें ईश्वरको बात बिलकुल नहीं लिखी। परवर्तीकालमें उन्होंने हमारे तन्त्रोक्त देवताओंको स्वीकार किया सही, किन्तु एक अद्वितीय ईश्वरको माननसे मुंह मोड़ लिया। वे आत्माको भोगी, विनाशी और चणस्थायी बताते हैं। शरघरस्थ शून्यता हो नित्य, अक्षय और अव्यय है। अन-इन्द्रियगण अवधि अभावविशिष्ट रहता है अर्थात् आत्मदर्शन करनेको चमता नहीं रखता। एव अभाव-स्वभाव समझ अवार्णव अतिक्रम करना मुमुत्तुका धर्म है। जगत्‌की उत्पत्तिसे पूर्व केवल शून्य था, इसीसे शून्यके आश्रयका प्रयोजन पड़ा। शून्य व्यतीत सकल पदार्थ मिथ्या हैं। शून्यमें मन लगा समाधिस्थ होनेसे क्रमशः देही निर्वाणपद पाता है। समाधिराज, माध्यमिकसूत्रवृत्ति और अभिधर्मकोष व्याख्या नामक बौद्धग्रन्थमें यह बात अच्छी तरह लिखी है। {{Smaller|बौद्धधर्म देखो।}} उक्त जैनों और बौद्धोंको छोड़कर पहले दूसरे भी अनेक सम्प्रदाय थे; जिनमें कोई ईश्वरको मानते, कोई ईश्वरको जड़रूप जानते और कोई ईश्वरको बिलकुल पहचानते न थे। आमन्दगिरि-क्कत शङ्कर-दिग्विजयमें उनका विवरण विद्यमान है। बौद्धों आर जैनोंका प्राधान्य बढ़ने पर भारतवर्षसे सनातन ब्राह्मण धर्मके लोप होनेका उपक्रम उठा था। उसी समय भगवान् शङ्कराचायने जन्म ग्रहणकर {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 52d3bast6ev9wnnqg6xghibvpszkpz5 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/११२ 250 75809 668289 608929 2026-07-19T19:02:07Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668289 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वर|१११}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} विधर्मियोंके कराल कवलसे सनातन धर्मको निकाल अद्वैतवाद प्रचार किया। उनके मतसे— {{smaller|"न तावदयमेकान्तेनाविषयः। अस्मत् प्रत्ययविषयत्वात् अपरोक्षत्वाच्च प्रत्ययात्मप्रसिद्धेः। न चायमस्ति नियमः पुरोऽवस्थित एव विषये विषयान्तर-मध्यसितव्यमिति। अप्रत्यचे ऽपि ह्याकाशे वालास्तलमलिनताद्यध्यस्वन्ति । एवमविरुद्धः प्रत्ययात्मन्यपानात्माध्यासः।" (शारीरिकभाष्य १।१)}} यह कथन ठीक नहीं कि आत्मा बिलकुल अविषय है और उसमें किसी प्रकार विषय लगना सम्भव नहीं। इस जीवावस्थामें अस्मद्प्रत्ययको विषयता होती है और अन्तरात्मरूपस्ते प्रतीत पड़नेपर अपरीक्षता भी रहती है। आत्मा 'अहं' (मैं) ज्ञानका विषय होनेसे बिलकुल विषय और अपरोक्ष कहा जा नहीं सकता। अविद्याकल्पित 'अहं' जबतक रहेगा, तबतक उसे अहं वृत्तिका विषय कौन न कहेगा! आत्मा अप्रत्यक्ष नहीं, पूर्ण प्रत्यक्ष है। क्योंकि जीवमात्र आत्मा अर्थात् अपनेको अहं (मैं) रूपसे देखा करता है। बालक अप्रत्यक्ष आकाशमें मलिनताका दोष लगा देते हैं। अतएव साक्षात् ग्रत्यक्ष और इन्द्रियग्राह्य न होते भी आत्माके समझनेमें कोई बाधा नहीं पड़ती। {{smaller|"योत्पत्तित्र द्वाणः कारणात् तवेव स्थितिः प्रलयस्थ ते गृह्यते। न यथोक्तविशेषणस्य जगती यथोक्तविशे षणमीश्वरं मुक्त्वान्यतः प्रधानाद-चेतनादणुभ्योवाऽभावाव्दा संसारिणा वा उत्पत्यादि सम्भावयितु' शक्यम्।". (शारीरकभाप्य १।१।२)}} ब्रह्मसे जगत् उपजता, ब्रह्ममें ठहरता और ब्रह्ममें ही समा जाता है। बस! ईश्वर व्यतीत शून्य, अभाव, जड़प्रकृति, परमाणु किंवा जन्म-मृत्युके अधीन किसी संसारी जीवसे इस प्रकार सृष्टि, स्थिति और लय होना विज्ञ मतमें सम्भावित नहीं होता। शङ्कराचार्यने भिन्न भिन्न मतको काट इसप्रकार विशुद्ध वेदान्त मत प्रचार किया था,— {{block center|<poem>{{smaller|"अयं यत् सृजते विश्व' तदन्धथायतुः पुमान्। न कोपि शक्तस्ते नायं सर्वेश्वर इति श्रुतः।१०७ अशे षप्राणिबुद्धीनां वासनास्तव संस्थिताः। ताभिः कीड़ीकृतं सर्वं तेन सर्वज्ञ ईरितः।१०८ विज्ञानमयमुख्य षु कोष ध्वन्यव चेव हि। अन्तस्तिष्ठन् यमयति तेनान्तर्यामितां व्रजेत्।}}</poem>}} {{Multicol-break}} {{block center|<poem>{{smaller|बुडी तिष्ठन्नान्तरोऽस्याधियानीच्ाय धौवपुः। वियमन्तर्यमयतीत्य वं वेदेन घोषितम्॥" १०८ (पञ्चदशी ६ परिच्छेद)}}</poem>}} ईश्वरने जो कुछ बनाया, उसे कोई बिगाड़ नहीं सकता; इसीसे वह सर्वेश्वर कहलाता है। कारण, समस्त प्राणीको बुद्धि वासना उसी ईश्वरमें रहती है। बुद्धिवासनासे ही यह ब्रह्माण्ड व्याप्त है। बुद्धिवासना पराधीन होनेसे ईश्वरकी सर्वज्ञ कहते हैं। अन्तर्यामी होनेका कारण यह है, कि विज्ञानमय प्रसृति कोष ओर अन्यान्य वस्तुसमूहमें रह ईश्वर उसको यथानियम नियुक्त करता है। जो बुद्धिमें रहते भी बुद्धिसे दूर पड़ता है ओर धीमय होती भी धोंका विषय नहीं बनता, वही ईश्वर वुद्धिसे अन्तरस्थ रहते भी बुद्धिको नियुक्त कर देता है। {{block center|<poem>{{smaller|"नार्थः पुरुषकारेणेत्य व' मा शङ्कयतां यतः। ईशः पुरुषकारय रूपेणापि विवर्तते॥" ११९}}</poem>}} इसप्रकार आशङ्का न कोजिये, कि कुछ भी पुरुषकां कृतिसाध्य होना असन्भव है। क्योंकि ईश्वर हो पुरुषरूपमें परिणत होता है। {{block center|<poem>{{smaller|"राविधस्त्री सुप्तिबोधावुन्मोलननिमोलने। तुष्योम्भावमनोराज्य इव सृष्टिलयाविमी॥"१२३}}</poem>}} जैसे दिवा एवं रात्रि, जाग्रत एवं सुषुप्ति; चतुः के उन्मीलन एवं निमीलन ओर तुष्योभाव एवं मनोराज्य प्रभृतिमें ज्ञानका, वैसे हो ईश्वरमें जगत्‌का तिरोभाव तथा आविर्भाव स्पष्ट समझ पड़ता है और प्रलय तथा उत्पत्ति कहा जाता है। {{block center|<poem>{{smaller|"मायो सृजति विश्व' सन्निरुद्धस्तव मायया। अन्य इत्यपरा ब्रूते श्रुतिस्ते नेश्वरः सृजेत्॥ आनन्दमय ईशोऽयं बहुस्यामित्यवैचत। हिरण्यगर्भरूपोऽभूत् सुप्तिःस्वप्नो यथा भवेत्॥"१३०}}</poem>}} मायावी ईश्वर अपनो मायामें बद्ध हो इस समस्त विश्वकी सृष्टि करता है। श्रुतिमें ही उसे परब्रह्मसे भिन्न कहा है। सुषुप्तिके अवस्थाभेदसे स्वप्नरूपमें परिणत होनेकी भांति ईश्वरने बुद्धि शरीर में प्रविष्ट होनेके सङ्कल्प द्वारा हिरण्यगर्भरूप पाया है। ईश, हिरण्यगर्भ, विराट्, प्रजापति, विष्णु, रुद्र, {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 3vgzz2m02j7bmf9ubmxvcs71vb78c6d पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/११३ 250 75810 668294 608930 2026-07-19T19:15:27Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668294 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh|११२|ईश्वर|}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} इन्द्र, अग्नि, विघ्नभैरव, मैराल, मारिक, यक्ष, राक्षस, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, गौ, अश्व, मृग, पक्षी, अश्वत्थ, वट, आस्त्र, यव, धान्य, तृण, जल, प्रस्तर, मृत्तिका, काष्ठ, एवं कुद्दाल प्रभृति सकल ही उसके अवयव हैं और पूजा पानेसे शुभफल देते है। {{block center|<poem>{{smaller|"अडितौयब्रह्मतत्त्वे स्वप्नोऽयमखिलं जगत्। ईशजीवादिरूपेण चेतनाचेतनात्मकम्॥ आनन्दमयविज्ञानमयावीश्वरजीवकौ। मायया कल्पितावेतौ ताभ्यां सर्व प्रकल्पितम्॥ १३६}}</poem>}} ईश्वर, जीव एवं' देह प्रभृति चेतन और अचेत नात्मक जगत्समुदाय अद्वितीय ब्रह्मतत्त्वमें माया-कल्पित स्वप्नस्वरूप है। क्योंकि आनन्दमय ईश्वर और विज्ञानमय जीव दोनो माया द्वारा कल्पित हैं। इन्हीं दोनोसे समुदाय विश्व बना है। {{block center|<poem>{{smaller|"ईच्चणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीथेन कल्पिता। जायदादि विमोचान्तः स सारो जीवकल्पितः॥ १३७ (पञ्चदशी)}}</poem>}} सृष्टिविषयक सङ्कल्पसे सर्ववस्तुमें प्रवेंश पर्यन्त देश्वर और जाग्रत अवस्थादिसे मोक्ष पर्यन्त व्यापार समुदाय जीवकल्पित है। {{smaller|ब्रह्म और शङ्कराचार्य देखो।}} कुछ पीछे पूज्यपाद रामानुजने प्रचार किया,-ईश्वर सकलका अन्तर्यामी है। जगत्सृष्टिके प्रारम्भमें ईश्वर सकलका अन्तर्यामी है। जगत्सृष्टिके प्रारम्भमें चित् तथा अचित् सूक्ष्मभावसे उसके अङ्गरूपमें रहता है, किन्तु चित्, अचित् और ईश्वर तीनोंमें परस्पर भेद है। स्थूल रूपमें परिणत होनेसे चित् और अचित्का अन्तर्यामी ईश्वर होता है। जीवसमूह और जड़जगत्‌के नाना उपकरणमें ईश्वर सर्वदा वर्तमान रहता है। चैतन्यदेवको रामानन्दने इसप्रकार ईश्वरतत्त्व समझाया था,— {{block center|<poem>{{smaller|"ईश्वरः परमक्लष्णः संश्चिदानन्दविग्रहः । अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणः॥" (ब्रह्मसंहिता)}}</poem>}} अर्थात् सच्चिदानन्द-मूर्ति, सर्वकारणका कारण, अनादि और आदि गोविन्द ही परमक्कष्ण ईश्वर है। अनन्तर रामानन्दने विष्णुपुराणका वचन उहुतकर जो ईश्वर-तत्त्व समझाया, 'चैतन्यचरितामृत' ग्रन्यमें {{Multicol-break}} वही विस्तृत भावसे बताया है। हम नीचे उसोका सार संक्षेपमें लिखते हैं,— 'कृष्णका स्वरूप सत्, चित् और आनन्दमय है। अतएव स्वरूप-शक्ति तीनप्रकार होती है। आनन्दांशमें आल्हादिनी, सदंशमें सन्धिनी और चिदंशमें सम्विदु शक्ति रहती है। कृष्णको आल्हाद देनेसे आल्हादिनी नाम पड़ा है। सुखरुप कृष्ण सुखास्वादन करता है। भक्तको सुख देनेका कारण आल्हादिनी ही है। आल्हादिनी जिसका अंश है, उसको संज्ञा प्रेम है। प्रेम आनन्द और चिन्मय रूप-रसका आख्यान है। प्रेमका परम सार और भाव महाभावरूप श्रीराधा रानीको समझना चाहिये।' गौड़ीय वैष्णवसमाज के ईश्वरतत्त्वका सार यही है। रामानुजके बाद भारतमें नाना सम्प्रदायों द्वारा वैष्णवधर्भ प्रवर्तित हुआ था। मध्याचार्यसे वल्लभाचार्य पर्यन्त विभिन्न वैष्णव सम्प्रदायके प्रवर्तकोंने ज्ञान और कर्मकाण्डका प्राधान्य न मान भक्तिकाण्डको हो ईश्वर वा भगवत् प्राप्तिका प्रशस्त मार्ग बताया। अवशेषमें महाप्रभु चेतन्यदेवने विशुद्ध प्रेम हो ईश्वर वा कृष्ण-प्राप्तिका मुख्य कारण प्रदर्शित किया था। सपार्षद चैतन्यदेव गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदायके प्रवर्तक हैं। उन्होंके प्रभावसे परवर्तिकाल व्रजमण्डलमें नाना वैष्णव सम्प्रदायका प्रकाश हुआ। उसमें कोई श्रीक्लष्ण, कोई राधा और कोई राधाकृष्णको युगल मूर्तिको ईश्वर भावसे पुजते हैं। वैषावसम्प्रदाय शब्दमें विस्न त विवरण देखो। वङ्गालके परमसाधक रामप्रसादके कथनानुसार शक्ति हो मूलाधार है। उसीके करनेसे सब कुछ होता है। उसके रुपको कल्पना हम कर नहीं सकते। मन ही उसे पूजता और देखता है। प्रक्कति-पुरुषसे विश्व बनता है। महात्मा राममोहनरायके मतसे ब्रह्मका कालो-कृष्णादि रूपधारण केवल मायाका कार्य है। इसीसे भक्त केवल रूप नामसे बह नहीं रहता । जन्मस्थिति भङ्गका कारण समझ तटस्थ लक्षणसे भी ईश्वरको उपासना हो सकती है। वाद्योद्यभ, शक्घण्टाध्वनि और वेदमन्त्रयुक्त देवोत्सवमें भी आविर्भाव दर्शन- {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> o8tw202wdczsge2xbokzpk9ibjwb6ma पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/११४ 250 75811 668295 608931 2026-07-19T19:30:08Z ममता साव9 2453 /* शोधित */ 668295 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="ममता साव9" />{{rh||ईश्वर|११३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} पूर्व के साधक उसको पूजा करता है। जिसका मन भगवङ्गक्ति और ब्रह्मज्ञानसे परिपूर्ण रहता है, वह ही सकल प्रकार उसे पूज सकता है। वस्तुतः प्रतिमादि अर्चना और व्रतहीमादि कर्म साधकके पच्क्षमें ईश्वरभक्तिके उद्दीपक होते हैं। परमेश्वर सर्वजीव और सर्वत्र विक्षिप्त व्यष्टि प्रक्कृतिमें विराजमान है। सर्वत्र दर्शन-पूर्वक भगवान्के पवित्र आविर्भावकी ब्रह्मन्न साधु हृदयमें स्पर्श करता है। ईश्वरको शक्ति बहुत हो विचित्र है। वह भक्तके मङ्गलार्थ अवश्य युग युगमें अवतीर्ण हो सकता है। प्रक्कृति और जोवमें अवतीर्ण होनेकी भांति ईश्वर खेच्छारचित शरीरमें भी अवतार लेता है। इसीलिये शास्त्रमें रामक्कष्णादि अवतारों कथा है। स्वामी दयानन्द सरस्वतीने अपने मतका इस प्रकार प्रचार किया है,— {{smaller|"यज्ञो वै विष्णाः। (शतपथना॰ १ का॰ १ अ॰ १) इदं विष्णुविचक्रमे वेधानिदधे पदम्। (ऋक् १।२२।१७) इति सर्वजगत्‌कर्तृत्व विश्णौ परमेश्वर एव घटते नान्यव विवेष्टि व्याप्नोति चराचरं जगत् स विश्णुः परमे-नरः॥१॥ 'यस्मादृची॰' (अथ॰ १००७/२०) यस्मात् सर्वशक्तिमतः ऋचः ऋग्वेदः अपातच्चन् उत्पन्नोस्ति यस्मात् परब्रह्मणः यजुर्वेदः अपाकषन् प्रादुर्भू तीस्ति। तथैव यस्मात् सामानि सामवेदः आङ्गिरसः अथर्ववेदयोत्-पन्नौ स्तः। एवमेव यस्य वरस्याङ्गिरसोऽथर्ववेदसुखं मुखवन् मुख्योस्ति। सामानि लोमानीव सन्ति। यजुर्वस्य हृदयमृचः प्राणथति रुपकालङ्कारः। यमाच्चत्वारी वेदा उत्पन्नाः स कतमः खिदेवोस्तितं त्व' ब्रूहीति प्रश्नः। असीत्तरं तं स्तभं सर्वजगद्धारकं परमेश्वरं त्व' जानीहीति तस्मात् स्कंभात् सर्वाधारात् परमेश्वरात् पृथक् कचिदप्यन्यो देवो वेदकर्ता नेवास्तौति-मन्तव्यम्॥२"}} अर्थात् शतपथब्राह्मण और वेदमन्त्रके प्रमाणसे सिद्ध होता है, कि यन्न शब्दसे विष्णु एवं विष्णु शब्दसे सर्वव्यापक परमेश्वर ही लिया जाता है, कारण जगत्‌को उपजाना एक परमेश्वरसे भिन्न अन्य व्यक्ति द्वारा हो नहीं सकता। जिस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरसे ऋक्, यजुः, साम और अथवे ये वेदचतुष्टय उपजे हैं; उसका अथवं मुख, साम लोम, यजुः हृदय और ऋग्वेद प्राणस्वरूप है। इस मन्त्रमें रूपकालङ्कार द्वारा ईश्वरने वेदोत्पत्ति देखायो है। (पुनः वेद-शास्त्रमें ईश्वरने प्रश्नोत्तरके बहाने बतलाया है) जिससे {{Multicol-break}} चारों वेद निकले, वह कौनसा देव है? उसको आप बतला दीजिये। इस प्रश्न के उत्तर में भगवान्-ने कहा- समग्र जगत्‌का धारणकर्ता परमेश्वर हो स्कम्भ है और वही वेद सकलका कर्ता समझा जाता है। उस सर्वाधार परमेश्वरसे भिन्न न तो कोई वेदकर्ता है और न मनुष्यको उपासनाके योग्य इष्टदेव हो है। इसलिये जो मनुष्य वेदकर्ता परमात्माको छोड़ दूसरेको पूजता हैं, वह हतभाग्य गिना जाता है। {{smaller|"ईश्वरस्य सकाशाई दानामुत्पत्ती सत्यां स्वतो नित्यत्वमेव भवति तस्व सर्वसामा स्य नित्यत्वात्।"}} परमेश्वरका यावतोय सामथ्य नित्य है और उसी परमेश्वरसे उत्पन्न होनेके कारण वेद भी खतः नित्य स्वरूप है। {{smaller|"अन्यच्च। तद्दिश्योः परमं पद सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुरा-ततम्॥१ (ऋग्वेद १।२२।२०) अस्वायमर्थः। यत् विश्णोः व्यापकस्य परमेश्वरस्य परमं प्रक्कृष्टानन्दस्वरूपं पद' पदनौयं सर्वोत्तमोपायैर्मनुष्यैः प्रापणीयं मोच्चाख्यमस्ति तत् सूरयः विद्वांसः सदा सवषु कालेषु पश्यन्ति कौदृशं तत् आततम् भासमन्तात्ततं विस्तृतं यद्दे शकालवस्तु परिच्छेद रहितमस्ति। अतः सर्वैः सर्वव तदुपलभ्यते तस्य ब्रह्मस्वरूपस्य विभुत्वात्। कस्यां किमिव दिवीव चतुराततम् दिवि मार्तण्डप्रकाशे नेवदृष्टे व्योतिर्थया भवति। तथैव तत्पदं ब्रह्मापि वर्तते मीत्तस्य च सर्वस्मादधिकोत्कृष्टत्वात्। तदेव द्रष्ट प्राप्त मिच्छन्ति। अतो वेदा विशेष गण तस्य व प्रतिपादनं कुर्वन्ति एतद्दिषयकं वेदान्तसूत्रव व्यासोप्याह। तत्तु समन्वयात्। (१।१।४) अस्यायमर्थः। तदेव ब्रह्म सर्वव वेदवाक्येषु समन्वितं प्रतिपादितमस्ति। क्वचित् साचात् क्वचित्परम्परया च। अतः परमार्थों वेदानां ब्रह्म वास्ति। तथा यजुर्वेदे प्रमाणम्। यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा। प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्रोणि ज्योती षि सचते भुवनानि विश्वा। प्रजापतिः प्रजया सरराणस्त्रोणि ज्योती' षि सचते स षोडशी। (शुक्लयजुः ८१३६) एतस्यार्थ—यस्मात् नैव परब्रह्मणः सकाशात् परः उत्तमः पदार्थः जातः प्रादुर्भूतः प्रकटः अन्यः भिन्नः कश्चि-दपास्ति प्रजापतिः प्रजापतिरिति ब्रह्मणो नामास्ति प्रजापालकत्वात् य आविवेश यः परमेश्वरः विश्वा विश्वानि सर्वाणि सुवनानि सर्व-लोकान् श्राविवेश व्याप्तवानस्ति संररायणः सर्वप्राणिभ्योऽत्यन्तं सुखं दत्तवान् सन् त्रीणि ज्योती'षि वीण्यग्निसुयेविद्युदाख्यानि सर्वजगत्-प्रकाशकानि प्रजया ज्योतिषोऽन्यया सृष्ट्या सह तानि सचते सम वेतानि करोति कृतवानस्ति स अतः स एवेश्वरः षोड़शौ येन षोड़श-कला जगति रचितास्ता विद्यन्ते यस्मिन् यस्य वा तस्मात् स षोड़शोत्यु चाते। अतोऽयमेव परमोर्थों वेदितव्यः। भोमित्य तदचरमिदं सर्वं तस्योप-व्याख्यानम्। इद' माण्ड क्योपनिषदचनमस्ति। अस्यायमर्थः। ओमित्य तद्यस्य नामास्ति तदचरम्। यन्न चीयते कदाचिद्यश्चराचरं नगदश्रुते व्याप्नोति तद्ब्रह्म वास्तीति विज्ञेयम्। अस्यैव संबैर्वेदादिभिः शास्त्रैः सकलेन जगता-}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> qou5s74f2rz45s5i37yt2vho1xvpdmr पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५० 250 75839 668245 664842 2026-07-19T14:00:51Z अँजली चौधरी 2439 668245 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उ'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उ――(ह्रस्व उकार)――१ स्वरके मध्य पञ्चमवर्ण। इसके उच्चारणका स्थान ओष्ठ है। <small>ओष्ठनाबुपु। (शिक्षा)</small> ह्रस्व स्वरों में उकार तीसरा है। ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित् भेदमे यह नौ प्रकारका होता है। फिर प्रत्येक अनुनासिक और अननुनासिक रहनेसे इसके अट्ठारह भेद होते हैं। यह स्वयं कुण्डलनी है। उकारका वर्ण चम्पे के फल-जैसा होता है। इसमें पञ्चदेव और पञ्चप्राण रहते हैं। उकार चतुर्वर्गका फल देनेवाला है। <small>(कामधेनुतन्त्र)</small>}} :{{gap}}<small>लिखने का नियम</small>――ऊर्ध्व, अधः और मध्यस्थानमें वाम-दिगगामी तीन ऋजुरेखा खींचनेसे यह बनता है। इन रेखावों में अग्नि, वायु और इन्द्र रहते हैं। मात्रामें शक्तिका वास है। <small>(वर्णोद्धारतन्त्र)</small> मातृकान्याससे इसका स्थान दक्षिण कर्ण पड़ता है। उकारको शङ्कार,वर्तलाक्षी, मूत, कल्याण, अमरेश, दक्षकर्ण, षड़् वक्त्र, मोहन, शिव, उग्र, प्रभु, धृति, विष्णु, विश्वकर्मा, महेश्वर, शत्रुघ्न, चटिका, पुष्टि, पञ्चमी, वह्निवासिनी, कामघ्न, कामना, ईश, मोहिनी, विघ्नहत्, मही, उढसू, कुटिला, श्रोत्र, पारद्वीपी, वृष और हर भी कहते हैं। २ भ्वादि॰ आत्म॰ अक॰ अनिट् धातु। यह शब्द करनेके अर्थमें आता है। (अव्य॰) उ-क्विप् तुगभावः। ३ है! ए। सुनिये! ४ कोपप्रकाश! देखेंगे! ५ अनुकम्पा! रहम! बचावो! ६ नियोग, राय! कहिये! ७ पदपूरण! जुमलेका पुराव! ८ कोपयुक्ता कथा! गुस्मे की बात! ८ अङ्गीकार! मज्जूरी! हां! ठीक ! १० प्रश्न! सवाल! क्या! क्यों! ११ वितर्क! बहस! १२ विमर्श, अफ़सोस! हाय! १३ विकल्प, शक! शायद! १४ सम्भावना! इमकान! हो सकता है!<small> “स्त्रियः सतीस्तां उ मे पुंस आहु:।” (ऋक् १।१६४।१६) “उमेति मात्रा तपसो निषिद्धा।”(कुमार)</small> (पु॰) अत्-डु। १५ शिव। १६ त्रास। १७ ब्रह्मा। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|उं (हिं॰ अव्य॰) १ क्या! क्यों! २ नहीं! ३ अरे! कारणवश मुख न खुलनेपर वह अव्यय आता है।}} {{Outdent|उंकन (हिं॰) <small>उकुण देखो।</small>}} {{Outdent|उंकीत (हिं॰ पु॰) रोग विशेष, एक बीमारी। इसमें प्रायः वर्षाकालपर पदकी अङ्गुलि पिडिका पड़ने-से सड़ने लगती हैं।}} {{Outdent|उंखारी (हिं॰ स्त्री॰) इक्षुक्षेत्र, ऊखका खेत।}} {{Outdent|उंगनी (हिं॰ स्त्री॰) गाड़ी ओंगनेका काम, पहि-एमें तेलकी दिवाई। इससे पहिया खुब घूमता है और बेलोंको गाडी खीचने में ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़ता। उंगनी न होनेसे पहिया बिगड़ जाता है। गाड़ीवान् जोतनसे पहले उंगनी कर लिया करते हैं। इसमें प्रायः रेड़ीका तेल लगता है।}} {{Outdent|उंगलाई (हिं॰ स्त्री॰) अङ्गुलि नियोजन, उंगली चलानेका काम।}} {{Outdent|उंगलाना (हिं॰ क्रि॰) अङ्गुलि चलाना, उंगली करना, उंगलीसे इशारा लगाना।}} {{Outdent|उंगली (हिं॰) अङ्गुलि, अङ्गुश्त। <small>अङ्गुलि देखो।</small>}} {{x-smaller|{{c|“पांचो उंगलियां बराबर नहीं।” (लोकोक्ति)}}}} {{gap}}तर्जनीको कलमकी उंगली, मध्यमाको डाइन, अनामिकाको पूजाउंगली और कनिष्ठाको कानकी उंगली, घुंगलिया या चिठली उंगली कहते हैं। {{Outdent|उंगलीकी नोक (हिं॰ स्त्री॰) अङ्गुलिको शिखा, अङ्गुश्तका छोर।}} {{Outdent|उंघाई (हिं॰ स्त्री॰) निद्रा, सुस्ती, झपकी।}} {{Outdent|उंचन (हिं॰ पु॰) १ उदच्चन, ऊपरी खिंचाव। २ अदवान। यह रस्सी- खाटमें नीचेकी ओर रिक्त स्थानमें लगती है और बुनावटको पायतानेसे मिला खींच देती है। इससे खाटका ढीलापन निकल जाता है।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|Vol. III. 38|2em}}</noinclude> 3sexy7cq9i76lqxdjfwutwzl1mjf1u8 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/१५७ 250 75846 668246 664991 2026-07-19T14:02:52Z अँजली चौधरी 2439 668246 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh|'''१५६'''|'''उग्रजाति-उग्रपुत्र'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|उग्रजाति (सं॰ त्रि॰) नीचवंशसम्भूत, कमीने ख़ान्दानसे पैदा। <small>उग्र देखो।</small>}} {{Outdent|उग्रजित् (वै॰ स्त्री॰) एक अप्सरा। (अथर्व ६।११८।१)}} {{Outdent|उग्रता (सं॰ स्त्री॰) उग्रस्य भावः कर्म वा तल्। १ उग्रभाव, सख्ती, तेज़ी। २ उग्रकर्म, कड़ा काम। ३ कटुता, कड़वापन। ४ अलङ्कार शास्त्रका कहा हुआ व्यभिचारी गुणविशेष। अपराधादिके कारण चित्तमें रूखापन आनेको उग्रता कहते हैं। यह उग्रता धर्म, शिर:कम्पन, तर्जन, ताड़ना प्रभृति द्वारा झलकती है। यथा,――}} {{x-smaller|{{c|<poem>“शौर्यापराधादिभवः मवेञ्चण्डत्वमुखता। तब खेदशिरःकम्पः तर्जनाताडनादयः।”</poem>}}}} {{Right|{{x-smaller|(साहित्यदर्पण ३ परिच्छेद)|1em}}}} {{Outdent|उग्रतारा (सं॰ स्त्री॰) उग्र-तृ-णिच्-अच्-टाप्। भगवतीकी एक मूर्ति। ये उग्र भयसे भक्तोंको त्राण देती हैं। उत्पत्तिकी कथा इस प्रकार है――}} :{{gap}}किसी समय शुम्भ और निशुम्भ देवके यनका भाग चुरा स्वयं दिक्पाल बन गये थे। इस पर समस्त देवता इन्द्रके साथ इकट्ठे हो हिमालय पहुंचे। वहां सबने गङ्गावतारके निकट ठहर महामाया भगवतीका स्तव किया। भगवती देवोंके स्तवसे सन्तुष्ट हुई और मतङ्गका स्त्री रूप बना पूछने लगीं,-देव! तुम इस स्थान पर किस स्त्रीको स्तव सुनाते और इस मतङ्गके आश्रमपर क्यों आते हो? ऐसे कहते ही समय उनके शरीरकोषसे एक देवी निकल कर बोलीं,――‘ये देव हमारा ही स्तव करते हैं। शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दानव इन्हें बाधा देते हैं। इसीसे देव उनके वध निमित्त यहां आये हैं।’ शरीरसे इन देवीके निकलने बाद ही हिमालयमें रहनेवाली वह मौरवर्णा मातङ्गी अतिशय कृष्णावर्णा बन गयीं। ऋषि इन्हींको उग्रतारा कहते हैं। यह मूर्ति चतुर्भुजा, कृष्णवर्ण और मुण्डमालाधारिणी है। दक्षिणके ऊपरी हस्तमें खड़्ग तथा नीचेके हस्तमें चामर और वामके ऊपरी हस्तमें करपा-लिका तथा नोचेके हस्तमें खर्पर है। मस्तक पर आकाशभेदी एक जटा लगी और गले में मुण्डमाला <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :पड़ी है। छातीपर सीपका हार लिपटा है। चक्षु रक्त जैसे लाल हैं। उग्रतारा कृष्णवर्ण वस्त्र पहने हैं। कटिदेशमें व्याघ्रचर्म भूषित है। वामपद शवकी छाती और दक्षिण पद सिंहकी पीठपर रखा है। ये देवी स्वयं शवके शरीरको चाटती हैं। {{Outdent|उग्रतेजस् (सं॰ त्रि॰) १ उत्कट शक्तिशाली, खूंख़ार ताक़त रखनेवाला।}} {{Outdent|उग्रतेजा (सं॰ पु॰) १ नागविशेष। २ किसी बुद्धका नाम। ३ एक देवता।}} {{Outdent|उग्रदंष्ट्र (सं॰ त्रि॰) उत्कट दन्तयुक्त, तीखे दांतों-वाला।}} {{Outdent|उग्रदण्ड (सं॰ त्रि॰) १ उत्कट दण्डधारी, मोटा सोटा बांधनेवाला। २ निर्दय, बेरहम, कड़ी सज़ा देनेवाला।}} {{Outdent|उग्रदर्शन (सं॰ त्रि॰) भयानक, ख़ौफनाक, जिसे देखते डर लगे।}} {{Outdent|उग्रदुहितृ (सं॰ स्त्री० ) उत्कट पुरुषको कन्या, खूंखार आदमीकी बेटी।}} {{Outdent|उग्रधन्वन् (सं॰ पु॰) उग्रं धनुर्यस्य, अनङ् समा॰। १ शिव। २ इन्द्र। ३ मगधराज नन्दके कनिष्ठ पुत्र। शकटाल द्वारा ये मगधके राजा हुये। चन्द्रगुप्तने नेपाल-राज पर्वतेश्वरके साहाय्यसे उग्रधन्वाके राज्य छीनने की चेष्टा की थी। उससे इन्होंने क्रद्ध हो चन्द्रगुप्तके भातृगणको मार डाला। पीछे पर्वतेश्वरसे लड़ते उग्र-धन्वाने प्राण छोड़ा। (वै॰ त्रि॰) ४ असह्य धनु-विशिष्ट, कड़ी कमान् वाला, जिसके धनुसकी मार दुश्मन सह न सके।}} {{smaller|{{c|“वाहु र्शर्ध्युग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता।” (ऋक् १०।१०३।३)}}}} {{Outdent|उग्रनासिक (सं॰ त्रि॰) दीर्घनासिक, नक्क, बड़ी नाकवाला।}} {{Outdent|उग्रपत्रक (सं॰ पु॰) महानीला, काला भौंरा।}} {{Outdent|उग्रपुत्र (सं॰ पु॰)<small> उग्रस्य शूरस्य पुत्रः। १ शूरका पुत्र, बहादुर का लड़का। उग्रपुत्रः शूरान्वयः।” (शतपथ-ब्राह्मणभाष्य १४।६।८।२)</small> २ शिवके पुत्र कार्तिकेय। ३ गभीर जलाशय, गहरा तालाब। <small>“आ उग्रपुत्रे जिघांसत।” (ऋक् ८।१७।११) ‘उग्रपुवे उग्राः उदुगूर्णा पुत्रा यस्मिन् तस्मिनुदके’ (सायण)</small>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> ct9i0nmkljz4zo3crip46jl6nb8pwee पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/२१२ 250 75892 668247 667492 2026-07-19T14:15:10Z अँजली चौधरी 2439 668247 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अँजली चौधरी" />{{rh||'''उत्तरफाल्गुनी-उत्तरवस्ति'''|'''२११'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :अण्। हादश नक्षत्र, बारहवां मसकन् कमरी। (B. Leonis) इसका रूप दक्षिणोत्तर मिलित पर्यङ्काकृति तारकदय होता है। अर्यमा अधिष्ठात्री देवता है। उत्तरफला नी नक्षत्र में जन्म लेनेसे मनुष्य दाता, दयालु, सुशील, कीर्तिमान्, सुमति, श्रेष्ठ, धीर और अत्यन्त मृदुस्वभाव होता है। इसके प्रथममें सिंह और उत्तर पादत्रयमें कन्या राशि पड़ता है। {{Outdent|उत्तरफाल्गुनी, <small>उत्तरफल्गुनी देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तरभाद्रपद (सं॰ पु॰) षड़्विंश नक्षत्र, छब्बी-सवां मसकन् कमरी (a Andromede)। इसका पर्याय प्रोष्ठपदा और देवता अहिर्बुध्न है। यह पर्यङ्करूप अष्टतारात्मक होता है। इस नक्षत्रमें जन्म लेनेसे मनुष्य धनी, कुलीन, कार्यकुशल, राजमान्य, बलवान्, महातेजस्वी, सत्कर्मकारी और बन्धुभक्त निकलता है। (स्त्री॰) टाप्। उत्तरभाद्रपदा।}} {{Outdent|उत्तरमन्द्र (सं॰ पु॰) उच्च :स्वरसे मन्द मन्द गानेकी रीति, जो़रसे धीरे-धीरे गानेका तरीका। यह षड्ज-ग्रामकी मूर्छना है। इसमें स रि ग म प ध नि स्वर क्रमशः आगको बढ़ते जाते हैं। (स्त्री॰) उत्तरमन्द्रा।}} {{Outdent|उत्तरमात्र (सं॰ क्ली॰) केवल उत्तर, सिर्फ़ जवाब।}} {{Outdent|उत्तरमानस (सं॰ क्ली॰) मानसके उत्तरस्थ तीर्थ विशेष।}} {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“कालोदकं नन्दिकुण्डं तथा चोत्तरमानसम्। अभ्यत्य योजनशतादम्य णहा विप्रमुच्यते॥” (भारत अनु॰ २५ अ॰)</poem>}}}} {{Outdent|उत्तरमीमांसा (सं॰ स्त्री॰) उत्तरस्य वेदान्तभागस्य उपनिषदुरूपस्य मीमांसा। वेदान्त, वेदके द्वितीय भाग ज्ञानकाण्डका विचारमूलक ग्रन्थ, ब्रह्मसूत्र। <small>वेदान्त देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तररहित (सं॰ त्रि॰) उत्तरसे शून्य, ला जवाब, जो जवाब न रखता हो।}} {{Outdent|उत्तरराढ़――राढदेशका उत्तरांश। वर्तमान वङ्गाल प्रान्तका वर्द्धमान, मुर्शिदावाद और वीरभूम जिला पूर्वकालमें उत्तरराढ़ नामसे ख्यात था। <small>राढ़ देखो।</small>}} {{Outdent|उत्तरराढ़ी-उत्तरराढ़वासी। १ वङ्नन्देशीय कायस्थोंकी एक श्रेणी। जो कायस्थ राढ़के उत्तर अंशमें रहे, वेही इस नामसे विख्यात हुये। २ चौबीस-परगनेके लोहा-}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :रोंकी एक श्रेणी। ३ खेती करनेवाले धोबियों और नाइयों की एक श्रेणी। ४ वङ्गदेशीय हालिक कैवर्तीं-की एक श्रेणी। ५ मोचियोंको एक श्रेणी। {{Outdent|उत्तरलक्षण (सं॰ क्ली॰) प्रकृत उत्तरका प्रकाश, असली जवाबकी झलक। (त्रि॰) २ वाम दिक् चिन्हित, बाईं ओर निशान् रखनेवाला।}} {{Outdent|उत्तरलोमन् (सं॰ त्रि॰) ऊपरी या बाहरी ओर घुमावदार बाल रखनेवाला, जिसके बाल ऊपर या बाहरको घूमे रहें।}} {{Outdent|उत्तरवयस् (सं॰ क्ली॰) जोवनके पश्चाद वर्ष, जि़न्दगीके पिछले साल।}} {{Outdent|उत्तरवल्ली (सं॰ स्त्री॰) दो अध्यायमें विभक्त कठोप-निषदुका द्वितीय भाग।}} {{Outdent|उत्तरवस्ति (सं॰ पु॰) मूत्राशयमें स्नेवह पहुंचानेका सुश्रुतोक्त एक यन्त्र। सुश्रुतने कहा है―― यह यन्त्र रोगीको चतुर्दश अङ्गुलि परिमित दीर्घ, और अग्र भागमें मालतीपुष्यके वृन्त समान तथा क्षुद्र छिद्रयुक्त होगा। इसमें स्नेहका परिमाण रहेगा। रोगीका वयस पचीस वत्सरसे कम ठहरने पर विचारसङ्गत स्नेहकी मात्रा रखना चाहिये। स्त्रीके अपत्य पथसे चार अङ्गुलि अन्तर पर मूत्रनाली लगी है। उसके मुद्र तुल्य छिद्रका परिमाण दश अङ्गुलि दीर्घ है। उत्तरवस्ति लगानको अपत्यपथ में चार और मूत्र-नालीमें दो अङ्गुल पिचकारी देना चाहिये। अल्प वयस्का कन्याके एक ही अङ्गुल यथेष्ट है। ऐसे स्थलमें औरभ्र वा शूकरका वस्ति व्यवहार्य हैं। अभावमें पक्षीके गलदेशका चर्म चलता है। वह भी न मिलने पर हरिण के पद या अन्य किसी प्रकारका कोमल चर्म बस्ति बनाने में लगता है। प्रथम रोगीको स्निग्ध और स्वेद प्रयोग कर घृतटुग्धसह यथाशक्ति यवागू पिलाना चाहिये। फिर जानु परिमित स्थान-पर पृष्ठ टेक (उपविष्ट भावसे) और वस्ति तथा मूर्ध्नि देशमें उष्ण तैल लेप मेढ़नलको दृढ़ और ऋज़ु करे। उसके बाद मेढ़में शलाका द्वारा अन्वेषणकर छः अङ्गुलि परिमाणसे अल्प अल्प चलाये। वस्ति लगा नल फिर धीरे धीरे निकालना चाहिये। स्नेह}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1ydhxwlzd7vkuz5mp8aknpwk1l6mxqs पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२८ 250 76070 668235 667604 2026-07-19T12:15:24Z आदेश यादव 3609 668235 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्कारमान्धाता|५२७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं रहते। मेरु तुम्हारो अपेक्षा उच्च है। उसमें देवता वास करते हैं।' यह कहकर नारद जहांसे आये, वहीं चले गये। पीछे विन्ध्य अपनेको धिक्कार दे परिताप करने लगे और शिवको पूजनेकी इच्छासे आजकल जहां ओङ्कार विद्यमान है, वहीं आकर पहुंच गये। यहां उन्होंने मृत्तिकाके एक शिव बनाये‌ और एक स्थानमें रह अचल भावसे छह मास शिवके ध्यानमें बिताये थे। आशुतोष प्रसन्न हुये और‌ विन्ध्यको सम्बोधन कर कहने लगे,—'अपनी इच्छा के अनुसार वर मांगो।' तब विन्ध्य कातरकण्ठसे बोल उठे,—'हे देवादिदेव! यदि आप प्रसन्न हुये हैं, तो मेरी इच्छा के अनुसार शरीर बढ़ायिये। प्रभो! आपका जो ज्योतिर्मय रूप (ओङ्कार) सकल वेदोंमें वर्णित है, उसी भक्तवाञ्छित रूपसे मुझे दर्शन दीजिये। महादेवने भक्तकी वाञ्छा पूरी की और मनोभाव प्रकाशकर यह बात कह दी,—'क्या करें, अशुभ वरदान अन्यको दुःखजनक होगा सही, तथापि तुम्हारी इच्छा हमने‌ पूर्ण की।' इसी समय देवों और ऋषियोंने शिवका पूजन किया और उनसे वहीं उसी रूपमें रहनेको कहा। महादेव मानवके सुखको वहिं ठहर गये। इसी प्रकार एकमूर्ति ओङ्कार और पार्थिव लिङ्ग दो भागमें विभक्त हुआ। ओङ्कारमूर्तिका सदाशिव और पार्थिव लिङ्गका नाम अमरेश्वर है।"+{{rule}}<poem>+"बोद्धारख यथा ह्यासोत् तथा च श्रूयतां पुनः कस्मिंचित् समये चाव नारदो भगवांस्तदा ॥ ४२ गोकर्णाख्य' शिवं गत्वा भागतो विध्यकेश्वरम् । तव पूजितस्तेन बहुमानपुरःसरम् ॥ ४३ मयि सर्वच विद्येत न न्यून हि कदाचन । इति मान' तदा श्रुत्वा नारदो मानहा तदा ॥ 88 निश्वस्य संस्थितस्तव श्रुत्वा विन्धयोऽब्रवीदिदम् । किं न्यूनच त्वया दृष्ट' मयि निश्वासकारणम् ॥ ४५ तच्छ्रुत्वा नारदो वाक्यमुवाच श्रयतां पुनः । त्वयि तु विद्यते सर्व्व' मेरुरुञ्चतरं पुनः ॥ ४६ देवेष्वपि विभागोऽस्य न तवास्ति कदाचन । इत्वा नारदस्तव जगाम च यथागतम् ॥ ४७ विन्धाय परिततो वै धिगेव जीवितादिकम् । - विश्वेश्वरं तथा शम्भु' समाराध्य जपाम्यहम् ॥ ४८</poem> {{Multicol-break}} आजकल द्वीपके मध्यभागमें पोहारचिका पर नदीके दक्षिण भागमें अमरेश्वरका मन्दिर है। स्थानीय पूजक चोदारको चादिलिङ्ग कहा करते हैं। रेवाखण्ड में भी ओङ्कारको आदिदेव बताया है। {{smaller|"ओङारमादिदेवञ्च ये वै ध्यायन्ति नित्यशः।" (२२अ॰)}} तीर्थयात्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग दर्शन करनेकी इच्छासे था पहले पोनरमान्धाता चोर पोछे शिक्के पार्थिवलिङ्ग अमरेश्वरका दर्शन लेते हैं। पश्चिमके शास्त्रन्न पण्डित इसो श्रोङ्कारमूर्तिको ईश्वरका प्रत लिए मानते हैं। जिस समय देवद्वेषो सुलतान महमूदने सोम नायका मन्दिर तोड़ा, उस समय भी पोहार और अमरेश्वरका भाव भोंड़ा न था । उक्त दोनों मन्दिरों के अतिरिक्त अनेक लिङ्ग पोर मन्दिर विद्यमान रहे। उन सकल प्राचीन मन्दिरोंमें विधर्मी मुसलमानोंके उत्पात से कई एककाल हो नये कई ध्वसाथ- शेषमें पड़े और कई अङ्गहोन अवस्था में खड़े हैं। किसी <noinclude>{{rule}}</noinclude> <poem>इति निश्चित्य तव व मोङ्कारं यन्त्र के स्वयम् । कृत्वा चैव पुनस्तव पार्थिवौं शिवमूर्त्तिकाम् ॥ ४८ आरराध वदा शम्भु' षण्मासञ्च निरन्तरम् । न चचाल तदा स्थानाच्छिवध्यानपरायणः ॥ ५० प्रसन्नव तदा शम्भु ब्र ूहि त्वं मनसेसितम् । तमं च दर्शयामास दुलर्भ योगिनामपि ॥ ५१ रूपं यथोक्त' वेदेषु भक्तानामीसितञ्च यत् । यदि प्रसन्नो देवेश वृद्धि ं वे हि यथेप्सितम् ॥ ५२ किं करोनि यदा तेन ब्रियते दौयते मया । न युक्त परदुःखाय वरदान' ममाशुभम् ॥ ५३ तथापि दत्तवांस्तव यथेपससि तथा पुनः । एवं च समये देवा ऋषयश्च तथाऽमलाः ॥ ५४ सम्पूज्य शङ्करं तव स्थातव्यमिति चाब्रुवन् । तथैव कृतवान् देवो लोकानां सुखहेतवे ॥ ५५ चकार चैव यन्त्र वै लिङ्गमे तथा पुनः । पार्थिवे च तथारूपे लिङ्गमेकं तथा पुनः ॥ ५६ एवं दयं समुत्पन्न' लिङ्गमेकं हिचा व्रतम् । प्रणव चोद्धारच नामासीत् स सदाशिवः ॥ ५७ पार्थि वे चैव यज्जातं तदासीदमरेश्वरः ।”</poem>{{right|(शिवपुराण, ज्ञानसहिता ४६अ॰)}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> ctb010qfhvtgzyygrmbv4yguiwq6ix4 668236 668235 2026-07-19T12:31:43Z आदेश यादव 3609 668236 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्कारमान्धाता|५२७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं रहते। मेरु तुम्हारो अपेक्षा उच्च है। उसमें देवता वास करते हैं।' यह कहकर नारद जहांसे आये, वहीं चले गये। पीछे विन्ध्य अपनेको धिक्कार दे परिताप करने लगे और शिवको पूजनेकी इच्छासे आजकल जहां ओङ्कार विद्यमान है, वहीं आकर पहुंच गये। यहां उन्होंने मृत्तिकाके एक शिव बनाये‌ और एक स्थानमें रह अचल भावसे छह मास शिवके ध्यानमें बिताये थे। आशुतोष प्रसन्न हुये और‌ विन्ध्यको सम्बोधन कर कहने लगे,—'अपनी इच्छा के अनुसार वर मांगो।' तब विन्ध्य कातरकण्ठसे बोल उठे,—'हे देवादिदेव! यदि आप प्रसन्न हुये हैं, तो मेरी इच्छा के अनुसार शरीर बढ़ायिये। प्रभो! आपका जो ज्योतिर्मय रूप (ओङ्कार) सकल वेदोंमें वर्णित है, उसी भक्तवाञ्छित रूपसे मुझे दर्शन दीजिये। महादेवने भक्तकी वाञ्छा पूरी की और मनोभाव प्रकाशकर यह बात कह दी,—'क्या करें, अशुभ वरदान अन्यको दुःखजनक होगा सही, तथापि तुम्हारी इच्छा हमने‌ पूर्ण की।' इसी समय देवों और ऋषियोंने शिवका पूजन किया और उनसे वहीं उसी रूपमें रहनेको कहा। महादेव मानवके सुखको वहिं ठहर गये। इसी प्रकार एकमूर्ति ओङ्कार और पार्थिव लिङ्ग दो भागमें विभक्त हुआ। ओङ्कारमूर्तिका सदाशिव और पार्थिव लिङ्गका नाम अमरेश्वर है।"+{{rule}}<poem>+"ओङ्कारञ्च यथा ह्यासीत् तथा च श्रूयतां पुनः। कस्मिंश्रित् समये चात्र नारदो भगवांस्तदा॥ ४२ गोकर्णाख्यं शिवं गत्वा आगतो विध्यकेश्वरम्। तत्रैव पूजितस्तेन बहुमानपुरःसरम्॥ ४३ मयि सर्वञ्च विद्येत न न्यूनं हि कदाचन। इति मानं तदा श्रुत्वा नारदो मानहा तदा॥ ४४ निश्वस्य संस्थितस्तव श्रुत्वा विन्ध्योऽव्रवीदिदम्। किं न्यूञ्च त्वया दृष्टं मयि निश्वासकारणम्॥ ४५ तच्छ्रुत्वा नारदो वाक्यमुवाच श्रूयतां पुनः। त्वयि तु विद्यते सर्व्वं मेरुरुञ्चतरं पुनः॥ ४६ देवेष्वपि विभागोऽस्य न तवास्ति कदाचन। इत्युत्वा नारदस्तव जगाम च यथागतम्॥ ४७ विन्ध्यय परितप्तो वै धिगेव जीवितादिकम्। विश्वेश्वरं तथा शम्भुं समाराध्य जपाम्यहम्॥ ४८</poem> {{Multicol-break}} आजकल द्वीपके मध्यभागमें पोहारचिका पर नदीके दक्षिण भागमें अमरेश्वरका मन्दिर है। स्थानीय पूजक चोदारको चादिलिङ्ग कहा करते हैं। रेवाखण्ड में भी ओङ्कारको आदिदेव बताया है। {{smaller|"ओङारमादिदेवञ्च ये वै ध्यायन्ति नित्यशः।" (२२अ॰)}} तीर्थयात्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग दर्शन करनेकी इच्छासे था पहले पोनरमान्धाता चोर पोछे शिक्के पार्थिवलिङ्ग अमरेश्वरका दर्शन लेते हैं। पश्चिमके शास्त्रन्न पण्डित इसो श्रोङ्कारमूर्तिको ईश्वरका प्रत लिए मानते हैं। जिस समय देवद्वेषो सुलतान महमूदने सोम नायका मन्दिर तोड़ा, उस समय भी पोहार और अमरेश्वरका भाव भोंड़ा न था । उक्त दोनों मन्दिरों के अतिरिक्त अनेक लिङ्ग पोर मन्दिर विद्यमान रहे। उन सकल प्राचीन मन्दिरोंमें विधर्मी मुसलमानोंके उत्पात से कई एककाल हो नये कई ध्वसाथ- शेषमें पड़े और कई अङ्गहोन अवस्था में खड़े हैं। किसी <noinclude>{{rule}}</noinclude> <poem>इति निश्चित्य तव व मोङ्कारं यन्त्र के स्वयम् । कृत्वा चैव पुनस्तव पार्थिवौं शिवमूर्त्तिकाम् ॥ ४८ आरराध वदा शम्भु' षण्मासञ्च निरन्तरम् । न चचाल तदा स्थानाच्छिवध्यानपरायणः ॥ ५० प्रसन्नव तदा शम्भु ब्र ूहि त्वं मनसेसितम् । तमं च दर्शयामास दुलर्भ योगिनामपि ॥ ५१ रूपं यथोक्त' वेदेषु भक्तानामीसितञ्च यत् । यदि प्रसन्नो देवेश वृद्धि ं वे हि यथेप्सितम् ॥ ५२ किं करोनि यदा तेन ब्रियते दौयते मया । न युक्त परदुःखाय वरदान' ममाशुभम् ॥ ५३ तथापि दत्तवांस्तव यथेपससि तथा पुनः । एवं च समये देवा ऋषयश्च तथाऽमलाः ॥ ५४ सम्पूज्य शङ्करं तव स्थातव्यमिति चाब्रुवन् । तथैव कृतवान् देवो लोकानां सुखहेतवे ॥ ५५ चकार चैव यन्त्र वै लिङ्गमे तथा पुनः । पार्थिवे च तथारूपे लिङ्गमेकं तथा पुनः ॥ ५६ एवं दयं समुत्पन्न' लिङ्गमेकं हिचा व्रतम् । प्रणव चोद्धारच नामासीत् स सदाशिवः ॥ ५७ पार्थि वे चैव यज्जातं तदासीदमरेश्वरः ।”</poem>{{right|(शिवपुराण, ज्ञानसहिता ४६अ॰)}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> 6vgfhs05guwc82zlf9nlqakzc8cke9n 668237 668236 2026-07-19T12:40:51Z आदेश यादव 3609 668237 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्कारमान्धाता|५२७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं रहते। मेरु तुम्हारो अपेक्षा उच्च है। उसमें देवता वास करते हैं।' यह कहकर नारद जहांसे आये, वहीं चले गये। पीछे 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देवद्वेषो सुलतान महमूदने सोम नायका मन्दिर तोड़ा, उस समय भी पोहार और अमरेश्वरका भाव भोंड़ा न था । उक्त दोनों मन्दिरों के अतिरिक्त अनेक लिङ्ग पोर मन्दिर विद्यमान रहे। उन सकल प्राचीन मन्दिरोंमें विधर्मी मुसलमानोंके उत्पात से कई एककाल हो नये कई ध्वसाथ- शेषमें पड़े और कई अङ्गहोन अवस्था में खड़े हैं। किसी <noinclude>{{rule}}</noinclude> <poem>इति निश्चित्य तव व मोङ्कारं यन्त्र के स्वयम् । कृत्वा चैव पुनस्तव पार्थिवौं शिवमूर्त्तिकाम् ॥ ४८ आरराध वदा शम्भु' षण्मासञ्च निरन्तरम् । न चचाल तदा स्थानाच्छिवध्यानपरायणः ॥ ५० प्रसन्नव तदा शम्भु ब्र ूहि त्वं मनसेसितम् । तमं च दर्शयामास दुलर्भ योगिनामपि ॥ ५१ रूपं यथोक्त' वेदेषु भक्तानामीसितञ्च यत् । यदि प्रसन्नो देवेश वृद्धि ं वे हि यथेप्सितम् ॥ ५२ किं करोनि यदा तेन ब्रियते दौयते मया । न युक्त परदुःखाय वरदान' ममाशुभम् ॥ ५३ तथापि दत्तवांस्तव यथेपससि तथा पुनः । एवं च समये देवा ऋषयश्च तथाऽमलाः ॥ ५४ सम्पूज्य शङ्करं तव स्थातव्यमिति चाब्रुवन् । तथैव कृतवान् देवो लोकानां सुखहेतवे ॥ ५५ चकार चैव यन्त्र वै लिङ्गमे तथा पुनः । पार्थिवे च तथारूपे लिङ्गमेकं तथा पुनः ॥ ५६ एवं दयं समुत्पन्न' लिङ्गमेकं हिचा व्रतम् । प्रणव चोद्धारच नामासीत् स सदाशिवः ॥ ५७ पार्थि वे चैव यज्जातं तदासीदमरेश्वरः ।”</poem>{{right|(शिवपुराण, ज्ञानसहिता ४६अ॰)}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> j4pw2bn3rduol0667es4axw8o3kzin2 668241 668237 2026-07-19T12:59:30Z आदेश यादव 3609 668241 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्कारमान्धाता|५२७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं रहते। मेरु तुम्हारो अपेक्षा उच्च है। उसमें देवता वास करते हैं।' यह कहकर नारद जहांसे आये, वहीं चले गये। पीछे विन्ध्य अपनेको धिक्कार दे परिताप करने लगे और शिवको पूजनेकी इच्छासे आजकल जहां ओङ्कार विद्यमान है, वहीं आकर पहुंच गये। यहां उन्होंने मृत्तिकाके एक शिव बनाये‌ और एक स्थानमें रह अचल भावसे छह मास शिवके ध्यानमें बिताये थे। आशुतोष प्रसन्न हुये और‌ विन्ध्यको सम्बोधन कर कहने लगे,—'अपनी इच्छा के अनुसार वर मांगो।' तब विन्ध्य कातरकण्ठसे बोल उठे,—'हे देवादिदेव! यदि आप प्रसन्न हुये हैं, तो मेरी इच्छा के अनुसार शरीर बढ़ायिये। प्रभो! आपका जो ज्योतिर्मय रूप (ओङ्कार) सकल वेदोंमें वर्णित है, उसी भक्तवाञ्छित रूपसे मुझे दर्शन दीजिये। महादेवने भक्तकी वाञ्छा पूरी की और मनोभाव प्रकाशकर यह बात कह दी,—'क्या करें, अशुभ वरदान अन्यको दुःखजनक होगा सही, तथापि तुम्हारी इच्छा हमने‌ पूर्ण की।' इसी समय देवों और ऋषियोंने शिवका पूजन किया और उनसे वहीं उसी रूपमें रहनेको कहा। महादेव मानवके सुखको वहिं ठहर गये। इसी प्रकार एकमूर्ति ओङ्कार और पार्थिव लिङ्ग दो भागमें विभक्त हुआ। ओङ्कारमूर्तिका सदाशिव और पार्थिव लिङ्गका नाम अमरेश्वर है।"+{{rule}}<poem>+"ओङ्कारञ्च यथा ह्यासीत् तथा च श्रूयतां पुनः। कस्मिंश्रित् समये चात्र नारदो भगवांस्तदा॥ ४२ गोकर्णाख्यं शिवं गत्वा आगतो विध्यकेश्वरम्। तत्रैव पूजितस्तेन बहुमानपुरःसरम्॥ ४३ मयि सर्वञ्च विद्येत न न्यूनं हि कदाचन। इति मानं तदा श्रुत्वा नारदो मानहा तदा॥ ४४ निश्वस्य संस्थितस्तव श्रुत्वा विन्ध्योऽव्रवीदिदम्। किं न्यूञ्च त्वया दृष्टं मयि निश्वासकारणम्॥ ४५ तच्छ्रुत्वा नारदो वाक्यमुवाच श्रूयतां पुनः। त्वयि तु विद्यते सर्व्वं मेरुरुञ्चतरं पुनः॥ ४६ देवेष्वपि विभागोऽस्य न तवास्ति कदाचन। इत्युत्वा नारदस्तव जगाम 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ज्योतिर्लिङ्ग दर्शन करनेकी इच्छासे आ पहले ओङ्कारमान्धाता और पीछे शिवके पार्थिवलिङ्ग अमरेश्वरका दर्शन लेते हैं। पश्चिमके शास्त्रज्ञ पण्डित इसी ओङ्कारमूर्तिको ईश्वरका प्रकृत लिङ्ग मानते हैं। जिस समय देवद्वेषो सुलतान् महमूदने सोमनाथका मन्दिर तोड़ा, उस समय भी ओङ्कार और अमरेश्वरका भाव भोंड़ा न था। उक्त दोनों मन्दिरोंके अतिरिक्त अनेक लिङ्ग और मन्दिर विद्यमान रहे। उन सकल प्राचीन मन्दिरोंमें विधर्मी मुसलमानोंके उत्पात से कई एककाल ही नष्ट कई ध्वंसावशेषमें पड़े और कई अङ्गहीन अवस्था में खड़े हैं। किसी {{rule}} {{c|{{smaller|<poem>इति निश्चित्य तव व मोङ्कारं यन्त्र के स्वयम् । कृत्वा चैव पुनस्तव पार्थिवौं शिवमूर्त्तिकाम् ॥ ४८ आरराध वदा शम्भु' षण्मासञ्च निरन्तरम् । न चचाल तदा स्थानाच्छिवध्यानपरायणः ॥ ५० प्रसन्नव तदा शम्भु ब्र ूहि त्वं मनसेसितम् । तमं च दर्शयामास दुलर्भ योगिनामपि ॥ ५१ रूपं यथोक्त' वेदेषु भक्तानामीसितञ्च यत् । यदि प्रसन्नो देवेश वृद्धि ं वे हि यथेप्सितम् ॥ ५२ किं करोनि यदा तेन ब्रियते दौयते मया । न युक्त परदुःखाय वरदान' ममाशुभम् ॥ ५३ तथापि दत्तवांस्तव यथेपससि तथा पुनः । एवं च समये देवा ऋषयश्च तथाऽमलाः ॥ ५४ सम्पूज्य शङ्करं तव स्थातव्यमिति चाब्रुवन् । तथैव कृतवान् देवो लोकानां सुखहेतवे ॥ ५५ चकार चैव यन्त्र वै लिङ्गमे तथा पुनः । पार्थिवे च तथारूपे लिङ्गमेकं तथा पुनः ॥ ५६ एवं दयं समुत्पन्न' लिङ्गमेकं हिचा व्रतम् । प्रणव चोद्धारच नामासीत् स सदाशिवः ॥ ५७ पार्थि वे चैव यज्जातं तदासीदमरेश्वरः ।”</poem>{{right|(शिवपुराण, ज्ञानसहिता ४६अ॰)}}}}}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> p1fmh1kstlbutu4ne7ei6pnc80vb9do 668243 668242 2026-07-19T13:29:42Z आदेश यादव 3609 668243 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्कारमान्धाता|५२७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं रहते। मेरु तुम्हारो अपेक्षा उच्च है। उसमें देवता वास करते हैं।' यह कहकर नारद जहांसे आये, वहीं चले गये। पीछे विन्ध्य अपनेको धिक्कार दे परिताप करने लगे और शिवको पूजनेकी इच्छासे आजकल जहां ओङ्कार विद्यमान है, वहीं आकर पहुंच गये। यहां उन्होंने मृत्तिकाके एक शिव बनाये‌ और एक स्थानमें रह अचल भावसे छह मास शिवके ध्यानमें बिताये थे। आशुतोष प्रसन्न हुये और‌ विन्ध्यको सम्बोधन कर कहने लगे,—'अपनी इच्छा के अनुसार वर मांगो।' तब विन्ध्य कातरकण्ठसे बोल उठे,—'हे देवादिदेव! यदि आप प्रसन्न हुये हैं, तो मेरी इच्छा के अनुसार शरीर बढ़ायिये। प्रभो! आपका जो ज्योतिर्मय रूप (ओङ्कार) सकल वेदोंमें वर्णित है, उसी भक्तवाञ्छित रूपसे मुझे दर्शन दीजिये। महादेवने भक्तकी वाञ्छा पूरी की और मनोभाव प्रकाशकर यह बात कह दी,—'क्या करें, अशुभ वरदान अन्यको दुःखजनक होगा सही, तथापि तुम्हारी इच्छा हमने‌ पूर्ण की।' इसी समय देवों और ऋषियोंने शिवका पूजन किया और उनसे वहीं उसी रूपमें रहनेको कहा। महादेव मानवके सुखको वहिं ठहर गये। इसी प्रकार एकमूर्ति ओङ्कार और पार्थिव लिङ्ग दो भागमें विभक्त हुआ। ओङ्कारमूर्तिका सदाशिव और पार्थिव लिङ्गका नाम अमरेश्वर है।"<ref>{{c|{{smaller|<poem>"ओङ्कारञ्च यथा ह्यासीत् तथा च श्रूयतां पुनः। कस्मिंश्रित् समये चात्र नारदो भगवांस्तदा॥ ४२ गोकर्णाख्यं शिवं गत्वा आगतो विध्यकेश्वरम्। तत्रैव पूजितस्तेन बहुमानपुरःसरम्॥ ४३ मयि सर्वञ्च विद्येत न न्यूनं हि कदाचन। इति मानं तदा श्रुत्वा नारदो मानहा तदा॥ ४४ निश्वस्य संस्थितस्तव श्रुत्वा विन्ध्योऽव्रवीदिदम्। किं न्यूञ्च त्वया दृष्टं मयि निश्वासकारणम्॥ ४५ तच्छ्रुत्वा नारदो वाक्यमुवाच श्रूयतां पुनः। त्वयि तु विद्यते सर्व्वं मेरुरुञ्चतरं पुनः॥ ४६ देवेष्वपि विभागोऽस्य न तवास्ति कदाचन। इत्युत्वा नारदस्तव जगाम च यथागतम्॥ ४७ विन्ध्यय परितप्तो वै धिगेव जीवितादिकम्। विश्वेश्वरं तथा शम्भुं समाराध्य जपाम्यहम्॥ ४८</poem>}}}}</ref> {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-break}} आजकल द्वीपके मध्यभागमें ओङ्कारलिङ्गका और नदीके दक्षिण–भागमें अमरेश्वरका मन्दिर है। स्थानीय पूजक ओङ्कारको आदिलिङ्ग कहा करते हैं। रेवाखण्डमें भी ओङ्कारको आदिदेव बताया है। {{smaller|"ओङारमादिदेवञ्च ये वै ध्यायन्ति नित्यशः।" (२२अ॰)}} तीर्थयात्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग दर्शन करनेकी इच्छासे आ पहले ओङ्कारमान्धाता और पीछे शिवके पार्थिवलिङ्ग अमरेश्वरका दर्शन लेते हैं। पश्चिमके शास्त्रज्ञ पण्डित इसी ओङ्कारमूर्तिको ईश्वरका प्रकृत लिङ्ग मानते हैं। जिस समय देवद्वेषो सुलतान् महमूदने सोमनाथका मन्दिर तोड़ा, उस समय भी ओङ्कार और अमरेश्वरका भाव भोंड़ा न था। उक्त दोनों मन्दिरोंके अतिरिक्त अनेक लिङ्ग और मन्दिर विद्यमान रहे। उन सकल प्राचीन मन्दिरोंमें विधर्मी मुसलमानोंके उत्पात से कई एककाल ही नष्ट कई ध्वंसावशेषमें पड़े और कई अङ्गहीन अवस्था में खड़े हैं। किसी {{rule}} {{c|{{smaller|<poem>इति निश्चित्य तत्रैव ओङ्कारं यन्त्रके स्वयम्। कृत्वा चैव पुनस्तव पार्थिवीं शिवमूर्त्तिकाम्॥ ४९ आरराध वदा शम्भुं षण्मासञ्च निरन्तरम्। न चचाल तदा स्थानाच्छिवध्यानपरायणः॥ ५० प्रसन्नश्च तदा शम्भु ब्रूहित्वं मनसेप्तितम्। तस्मैच दर्शयामास दुलर्भं योगिनामपि॥ ५१ रूपं यथोक्तं वेदेषु भक्तानामीप्सितञ्च यत्। यदि प्रसन्नो देवेश वृद्धिं धेहि यथेप्सितम्॥ ५२ किं करोमि यदा तेन व्रियते दीयते मया। न युक्तं परदुःखाय वरदानं ममाशुभम्॥ ५३ तथापि दत्तवांस्तव यथेप्ससि तथा पुनः। एवं च समये देवा ऋषयश्च तथाऽमलाः॥ ५४ सम्पूज्य शङ्करं तत्र स्थातव्यमिति चाव्रुवन्। तथैव कृतवान् देवो लोकानां सुखहेतवे॥ ५५ ओंकारे चैव यन्त्रेयै लिङ्गमे तथा पुनः। पार्थिवे च तथारूपे लिङ्गमेकं तथा पुनः॥ ५६ एवं द्वयं समुत्पन्नं लिङ्गमेकं द्विषा कृतम्। प्रणवे चोद्धारश्च नामासीत् स सदाशिवः॥ ५७ पार्थिवे चैव यज्जातं तदासीदमरेश्वरः।"</poem>{{right|(शिवपुराण, ज्ञानसहिता ४६अ॰)}}}}}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> 7tbq9lb647sch0jwreg63g2c91eqe60 668244 668243 2026-07-19T13:31:06Z आदेश यादव 3609 668244 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh||ओङ्कारमान्धाता|५२७}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>नहीं रहते। मेरु तुम्हारो अपेक्षा उच्च है। उसमें देवता वास करते हैं।' यह कहकर नारद जहांसे आये, वहीं चले गये। पीछे विन्ध्य अपनेको धिक्कार दे परिताप करने लगे और शिवको पूजनेकी इच्छासे आजकल जहां ओङ्कार विद्यमान है, वहीं आकर पहुंच गये। यहां उन्होंने मृत्तिकाके एक शिव बनाये‌ और एक स्थानमें रह अचल भावसे छह मास शिवके ध्यानमें बिताये थे। आशुतोष प्रसन्न हुये और‌ विन्ध्यको सम्बोधन कर कहने लगे,—'अपनी इच्छा के अनुसार वर मांगो।' तब विन्ध्य कातरकण्ठसे बोल उठे,—'हे देवादिदेव! यदि आप प्रसन्न हुये हैं, तो मेरी इच्छा के अनुसार शरीर बढ़ायिये। प्रभो! आपका जो ज्योतिर्मय रूप (ओङ्कार) सकल वेदोंमें वर्णित है, उसी भक्तवाञ्छित रूपसे मुझे दर्शन दीजिये। महादेवने भक्तकी वाञ्छा पूरी की और मनोभाव प्रकाशकर यह बात कह दी,—'क्या करें, अशुभ वरदान अन्यको दुःखजनक होगा सही, तथापि तुम्हारी इच्छा हमने‌ पूर्ण की।' इसी समय देवों और ऋषियोंने शिवका पूजन किया और उनसे वहीं उसी रूपमें रहनेको कहा। महादेव मानवके सुखको वहिं ठहर गये। इसी प्रकार एकमूर्ति ओङ्कार और पार्थिव लिङ्ग दो भागमें विभक्त हुआ। ओङ्कारमूर्तिका सदाशिव और पार्थिव लिङ्गका नाम अमरेश्वर है।"<ref>{{blockcenter|{{smaller|<poem>"ओङ्कारञ्च यथा ह्यासीत् तथा च श्रूयतां पुनः। कस्मिंश्रित् समये चात्र नारदो भगवांस्तदा॥ ४२ गोकर्णाख्यं शिवं गत्वा आगतो विध्यकेश्वरम्। तत्रैव पूजितस्तेन बहुमानपुरःसरम्॥ ४३ मयि सर्वञ्च विद्येत न न्यूनं हि कदाचन। इति मानं तदा श्रुत्वा नारदो मानहा तदा॥ ४४ निश्वस्य संस्थितस्तव श्रुत्वा विन्ध्योऽव्रवीदिदम्। किं न्यूञ्च त्वया दृष्टं मयि निश्वासकारणम्॥ ४५ तच्छ्रुत्वा नारदो वाक्यमुवाच श्रूयतां पुनः। त्वयि तु विद्यते सर्व्वं मेरुरुञ्चतरं पुनः॥ ४६ देवेष्वपि विभागोऽस्य न तवास्ति कदाचन। इत्युत्वा नारदस्तव जगाम च यथागतम्॥ ४७ विन्ध्यय परितप्तो वै धिगेव जीवितादिकम्। विश्वेश्वरं तथा शम्भुं समाराध्य जपाम्यहम्॥ ४८</poem>}}}}</ref> {{rule}} {{smallrefs}} {{Multicol-break}} आजकल द्वीपके मध्यभागमें ओङ्कारलिङ्गका और नदीके दक्षिण–भागमें अमरेश्वरका मन्दिर है। स्थानीय पूजक ओङ्कारको आदिलिङ्ग कहा करते हैं। रेवाखण्डमें भी ओङ्कारको आदिदेव बताया है। {{smaller|"ओङारमादिदेवञ्च ये वै ध्यायन्ति नित्यशः।" (२२अ॰)}} तीर्थयात्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग दर्शन करनेकी इच्छासे आ पहले ओङ्कारमान्धाता और पीछे शिवके पार्थिवलिङ्ग अमरेश्वरका दर्शन लेते हैं। पश्चिमके शास्त्रज्ञ पण्डित इसी ओङ्कारमूर्तिको ईश्वरका प्रकृत लिङ्ग मानते हैं। जिस समय देवद्वेषो सुलतान् महमूदने सोमनाथका मन्दिर तोड़ा, उस समय भी ओङ्कार और अमरेश्वरका भाव भोंड़ा न था। उक्त दोनों मन्दिरोंके अतिरिक्त अनेक लिङ्ग और मन्दिर विद्यमान रहे। उन सकल प्राचीन मन्दिरोंमें विधर्मी मुसलमानोंके उत्पात से कई एककाल ही नष्ट कई ध्वंसावशेषमें पड़े और कई अङ्गहीन अवस्था में खड़े हैं। किसी {{rule}} {{blockcenter|{{smaller|<poem>इति निश्चित्य तत्रैव ओङ्कारं यन्त्रके स्वयम्। कृत्वा चैव पुनस्तव पार्थिवीं शिवमूर्त्तिकाम्॥ ४९ आरराध वदा शम्भुं षण्मासञ्च निरन्तरम्। न चचाल तदा स्थानाच्छिवध्यानपरायणः॥ ५० प्रसन्नश्च तदा शम्भु ब्रूहित्वं मनसेप्तितम्। तस्मैच दर्शयामास दुलर्भं योगिनामपि॥ ५१ रूपं यथोक्तं वेदेषु भक्तानामीप्सितञ्च यत्। यदि प्रसन्नो देवेश वृद्धिं धेहि यथेप्सितम्॥ ५२ किं करोमि यदा तेन व्रियते दीयते मया। न युक्तं परदुःखाय वरदानं ममाशुभम्॥ ५३ तथापि दत्तवांस्तव यथेप्ससि तथा पुनः। एवं च समये देवा ऋषयश्च तथाऽमलाः॥ ५४ सम्पूज्य शङ्करं तत्र स्थातव्यमिति चाव्रुवन्। तथैव कृतवान् देवो लोकानां सुखहेतवे॥ ५५ ओंकारे चैव यन्त्रेयै लिङ्गमे तथा पुनः। पार्थिवे च तथारूपे लिङ्गमेकं तथा पुनः॥ ५६ एवं द्वयं समुत्पन्नं लिङ्गमेकं द्विषा कृतम्। प्रणवे चोद्धारश्च नामासीत् स सदाशिवः॥ ५७ पार्थिवे चैव यज्जातं तदासीदमरेश्वरः।"</poem>{{right|(शिवपुराण, ज्ञानसहिता ४६अ॰)}}}}}}<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude> 2di95p4570p3s7efijvxbfwufrxtr35 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६५ 250 76160 668313 668220 2026-07-20T02:29:03Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668313 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४६४'''|'''एकभार्या—एकरस'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकभार्या (सं॰ स्त्री॰) एकस्यैव भार्या, ६-तत्। साध्वी, पतिव्रता, नेकबख्त बोवी।}} {{outdent|एकभाव (सं॰ पु॰) एकश्चासौ भावश्चेति, कर्मधा॰। १ एक स्वभाव। २ एक अभिप्राय। ३ अभेद, तौहीद। ४ समभाव, बराबरी। ५ एक विषयमें अनुराग, एक ही बातकी चाह। ६ एकका अभिप्राय। ७ एक रूप। (वि॰) ८ एक प्रकतिवाला, जिसके दूसरो बात न रहे।}} {{outdent|एकभुक्त (सं॰ त्रि॰) १ एक बार भोजन करनेवाला, जो एक ही मरतबा खाता हो। २ एक साथ भोजन करनेवाला, जो अलग खाता न हो।}} {{outdent|एकभूत (सं॰ त्रि॰) १ अविभक्त, मिला हुआ, जो बंटा न हो। २ एक विषयासक्त, एक ही काममें लगा हुआ।}} {{outdent|एकभूम (सं॰ पु॰) एकाभूमिर्यस्य, बहुव्री॰। एकतला गृह, एक मंजिला मकान्।}} {{outdent|एकभोजन (सं॰ क्ली॰) १ केवल एक बारका आहार, सिर्फ एक मरतबा खाना। २ एक साथका भोजन।}} {{outdent|एकमत (सं॰ त्रि॰) एक मात्र मत विशिष्ट, हमराय।}} {{outdent|एकमति (सं॰ स्त्री॰) एका अनन्यविषया मतिः, कर्मधा॰। १ एकविषयासक्त मन, एक ही बातमें लगा हुआ दिल। (वि॰) एकस्मिन् विषये मतिर्यस्य, बहुव्री॰। २ एक विषयमें चिन्ताशील, एक ही बात सोचनेवाला।}} {{outdent|एकमनाः (सं॰ त्रि॰) एकस्मिन् विषये मनोऽस्य, बहुव्री॰। एकाग्रचित्तसे चिन्ताकारी, दिल लगाकर सोचनेवाला।}} {{outdent|एकमय (सं॰ त्रि॰) एकसे युक्त, जो एक रखता हो।}} {{outdent|एकमात्र (सं॰ त्रि॰) एका मात्रा यस्य, बहुव्री॰। एक मात्राविशिष्ट, जो दूसरी मात्रा रखता न हो।}} {{outdent|एकमालिक, {{smaller|एकमात देखो।}}}} {{outdent|एकमुंहा (हिं॰ वि॰) एकमात्र मुखविशिष्ट, सिर्फ एक मुंह रखनेवाला। एकमुंहा दहरिया एक गहना होता है। यह फूल या कांसेसे बनता और नीच जातिकी स्त्रियोंके पहननेमें लगता है।}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकमुख (सं॰ त्रि॰) एकं मुखं यस्य, बहुव्री॰। १ एक द्वारविशिष्ट, एक दरवाजीवाला। २ एक ही स्थानकी ओर मुख झुकाये हुआ, जो किसी एक जगहको मुंह फेरे हो। ३ एकमात्र प्रधान रखनेवाला, जिसके एक ही अफसर रहे।}} {{outdent|एकमुखी, {{smaller|एकमुख देखो।}} एकमुखी रुद्राक्षमें फांककी रेखा एक ही रहती है।}} {{outdent|एकमूर्वा, {{smaller|एकमुख देखो।}}}} {{outdent|एकमूल (सं॰ पु॰) पुण्डरीकवृक्ष, सफेद कमलका पेड़।}} {{outdent|एकमूला (सं॰ स्त्री॰) एकं मूलं यस्याः, बहुव्री॰। १ शालपर्णी। २ अतसी, अलसी।}} {{outdent|एकम्बा—बङ्गाल प्रान्तके पुरनिया जिलेका एक ग्राम। यह अक्षा॰ २५° ५८' उ॰ और द्राघि॰ ८७° ३६' ३०" पू॰ पर अवस्थित है। एकम्बा अपने जिलेके व्यवसायका एक प्रधान स्थान है। अन्न, गन्धद्रव्य, वस्त्र, चर्म प्रभृतिका काम होता है। बाजार बराबर लगा रहता है।}} {{outdent|एकयष्टि (सं॰ स्त्री॰) मुक्ताकी एकमात्र यष्टि, मोतियोंकी अकेली लड़ी।}} {{outdent|एकयष्टिका (सं॰ स्त्री॰) एका यष्टिरिव, उपमि॰। फूलों या मोतियोंकी अकेली लड़ी।}} {{outdent|एकयोनि (सं॰ त्रि॰) एका समा योनिर्जातिर्यस्य, बहुव्री॰। १ एकजाति, हमकौम। २ एक स्थानसे उत्पन्न, जो एक ही जगहसे पैदा हो।}} {{outdent|एकरंग (हिं॰ वि॰) १ तुल्य, बराबर। २ निष्कल, दूसरी बात न रखनेवाला।}} {{outdent|एकरज (सं॰ पु॰) एको मुख्यो रजः रञ्जनद्रव्यम्, कर्मधा॰। भृङ्गराज। {{smaller|भृङ्गराज देखो।}}}} {{outdent|एकरदन, {{smaller|एकदन्त देखो।}}}} {{outdent|एकरन्ध्र (सं॰ पु॰) नदीवट।}} {{outdent|एकरस (सं॰ पु॰) एकोऽन्यविषयको रसः, कर्मधा॰। १ एकाभिप्राय, अकेला मतलब। २ एक विषयमें अनुराग, एक बातकी चाह। (त्रि॰) एको रसो यत्र। ३ अभिन्न स्वभाव, उसी मिजाजवाला। एकरस नाटकादिमें शृङ्गारादिके अन्तर्भूत कोई एकमात्र रस अङ्गी और अन्यान्य रस अङ्गीभूत रहता है।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> amyd8l3ebiv4jslgnpe7fg1nmzyqowe पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६६ 250 76163 668312 668218 2026-07-20T02:26:42Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668312 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकरसिक—एकलव्य'''|'''४६५'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकरसिक (सं॰ वि॰) एकमात्रविषयमें अनुरक्त, जो एक ही बातसे खूश रहता हो।}} {{outdent|एकराज (सं॰ पु॰) १ प्रधान राजा। २ एकोजी।}} <div style="text-align: right;">{{smaller|एकोजी देखो।}}</div> {{outdent|एकराट् (सं॰ पु॰) एक-राजन्-टच्। राजाहः सखिभ्यष्टच्। पा ५।४।९१। १ प्रधान राजा, बड़ा बादशाह। (त्रि॰) २ एकाकी प्रकाशमान, जो अकेले ही रौशन हो।}} {{outdent|एकरात्र (सं॰ क्ली॰) १ एकमात्र रात्रि, एक रात। २ उत्सव विशेष। यह एक ही रात रहता है।}} {{outdent|एकरात्रिक (सं॰ त्रि॰) एकरात्रिके अर्थं पर्याप्त, जो एक रातके लिये काफी हो।}} {{outdent|एकरार (अ॰ पु॰) १ अङ्गीकार, मंजूरी। २ वचन, कौल। प्रतिज्ञापत्रको एकारनामा कहते हैं।}} {{outdent|एकराशि (सं॰ पु॰) एकश्चासौ राशिश्च, कर्मधा॰। १ मेषादिके मध्य एकराशि। २ किसी वस्तुका एक स्तूप, ढेर। ३ आधिक्य, बढ़ती।}} {{outdent|एकराशीभूत (सं॰ त्रि॰) एकत्र, इकट्ठा।}} {{outdent|एकरिक्थी (सं॰ पु॰) एकस्य पितुः रिक्थमस्त्यस्य, एकरिक्थ-इनि। १ पिताकी सम्पत्तिका एक अंश पानेवाला, जो अपने बापकी जायदादका वारिश हो। २ तुल्यधनी, बराबरका दौलतमन्द।}} {{outdent|एकरूप (सं॰ त्रि॰) एकं समानं रूपं अस्य, बहुव्री॰। १ समानरूप, हमशक्ल।}} {{block center|<poem> "एकरूप तुम भ्राता दोऊ।" {{smaller|(तुलसी)}} </poem>}} (पु॰) २ एकमात्र रूप, एक सूरत, एक किस्म। {{outdent|एकरूपतः (सं॰ अव्य॰) एकमात्र रूपमें, बगैर तबदीली।}} {{outdent|एकरूपता (सं॰ स्त्री॰) १ तुल्यता, बराबरी। २ सायुज्यमुक्ति।}} {{outdent|एकरूपी (सं॰ त्रि॰) समान रूप रखनेवाला, हमशक्ल।}} {{outdent|एकरूप्य (सं॰ त्रि॰) एकस्मात् आगतः, एक-रूप्य। हेतुमनुष्येभ्योऽन्तरस्यां रूप्यः। पा ४।३।८१। १ एक स्थानसे आगत, उसी जगहसे आया हुआ। २ एकमात्र रौप्यविशिष्ट।}} {{outdent|एकरोन् (Ekron)—फिलिस्टाइनका एक राजनगर। यह रामलेफसे ५ मील दूर फिलिसिया और शारौंके मैदानको पृथक् करनेवाली उच्च भूमिके दक्षिण ढालू भागपर अवस्थित है। कारबारी राहसे एकरोन}} <br><br>Vol. &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 117 </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> अलग है। समूएलके समय सम्भवतः यह स्वतन्त्र रहा। असीरियाके शिलालेखोंसे विदित हुआ, एकरोनके राजा पाड़ी पहले हेजकियावाले जुदाके अधीन रहे। किन्तु सेना चेरिवका जुदापर दबाव पड़नेसे उन्होंने स्वाधीनता पायी थी। सन् ७॰ ई॰को इसमें यहूदी आकर बसे। मकान् मिट्टीके बने हैं। प्राचीनताका कोई लक्षण नहीं मिलता। आसपासकी भूमि उर्वरा है। {{outdent|एकर्च (सं॰ पु॰) एका ऋक्, कर्मधा॰। १ एक ऋक्। (क्ली॰) २ एक ऋक्युक्त सूक्त। (वि॰) ३ एक ऋक् आराध्ध।}} {{outdent|एकल (सं॰ त्रि॰) एक-ला-क। एकाकी, अकेला।}} {{outdent|एकलंगा (हिं॰ पु॰) कुश्तीका एक पेंच। एकलंगाडंड, एक प्रकारकी कसरतका नाम है।}} {{outdent|एकललौकपाई (हिं॰ स्त्री॰) कुश्तीमें ऊपरसे चित करनेका एक पेंच।}} {{outdent|एकलव्य (सं॰ पु॰) एका अङ्गुलिर्लव्या गुरुदक्षिणात्वेन छेद्या यस्य। निषादराज हिरण्यधनुके पुत्र। हरिवंशके मतसे इनके पिताका नाम श्रुतदेव था। किन्तु निषाद द्वारा प्रतिपालित होनेसे यह निषादके पुत्र-जैसे परिचित रहे। असाधारण गुरुभक्ति देखा एकलव्य अपनी कीर्त्ति स्थापनकर गये हैं। महाभारतमें लिखते, कि एकलव्य अस्त्रशिक्षाको द्रोणाचार्यके पास पहुंचे थे। किन्तु द्रोणाचार्यने उन्हें निषादका पुत्र समझ शिष्य न बनाया। फिर एकलव्यने किसी अरण्यमें जा द्रोणाचार्यकी एक काठमय प्रतिमूर्त्ति प्रस्तुत की थी। वह अनन्यमनसे उसकी आराधना कर योगके बल अस्त्रशिक्षा करने लगे। योगबल अथवा गुरुभक्तिसे वाणप्रयोगमें एकलव्यको लघुहस्तता उत्पन्न हुई। कौरव और पाण्डव अपने गुरु द्रोणके साथ उसी वनमें मृगया मारने गये थे। उनका एक कुत्ता हठात् एकलव्यका मलिन देह, कृष्णाजिन और जटापाश देख भूंकने लगा। एकलव्यने अति लघुहस्तसे उस कुत्तेके मुखमें सात शब्दभेदी वाण मारे थे। वह शरपूर्ण वदन लिये पाण्डवोंके निकट जा पहुंचा। वीर वाणक्षेपकारीकी भूयसी प्रशंसा करने लगे और}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> bpilav7mfykh5x0jp73346aoaotzrcr पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६७ 250 76165 668308 668215 2026-07-20T02:20:47Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668308 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४६६'''|'''एकला—एकवर्ण'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> अपनी अपेक्षा इसको शिक्षाका उत्कर्ष देख लज्जित हुये। फिर ढूंढ़ते-ढूंढ़ते निकट पहुंच उन्होंने एकलव्यसे परिचय पूछा था। उन्होंने कहा—मैं हिरण्यधनुका पुत्र और द्रोणाचार्यका शिष्य हूं। कौरवों और पाण्डवोंने यथासमय लौट आचार्यसे सब बता दिया। फिर निर्जनमें मिल अर्जुनने द्रोणाचार्यसे कहा—आपने मुझे अपना सबसे अच्छा शिष्य बताया था; किन्तु निषादकुमार ऐसे कैसे निकले ? द्रोण यह प्रश्न क्षणकाल सोच अर्जुनको ले एकलव्यके निकट गये। एकलव्य भी निरतिशय भक्ति-सहकारसे उनका अर्चनादि सम्पादन कर बोले—मैं आपका शिष्य हूं। गुरुने उत्तर दिया—यदि तुम प्रकृत रूपसे हमारे शिष्य हो, तो हमारी दक्षिणा दे डालो। एकलव्यने कहा—गुरो ! बतलाइये क्या दक्षिणा दूं, कोई भी वस्तु अदेय नहीं। एकलव्यकी यह बात सुन द्रोणाचार्यने कहा—यदि तुम दक्षिणा देना आवश्यक समझो, तो अपने दक्षिण हस्तका अङ्गुष्ठ उतार दो। एकलव्यने गुरुकी ऐसी आज्ञा पर भी अविचलित चित्तसे हंसी-खुशी अपना अङ्गुष्ठ काट दिया था। उससे उनका वाणप्रयोग एकबारगी ही न रुका सही, किन्तु वह लघुहस्तता जाती रही। {{smaller|( भारत, आदि १३४ अ॰ )}} {{outdent|एकला (हिं॰ वि॰) एकाकी, अकेला।}} {{outdent|एकलिङ्ग (सं॰ क्ली॰) एकं लिङ्गं यत्र, बहुव्री॰। १ सिद्दिके साधनका स्थान। पांच कोसके बीच जहां अन्य लिङ्ग नहीं रहता, उसे ही सब कोई एकलिङ्ग कहता है। ऐसा स्थान अतिशय सिद्धिप्रद है। (पु॰) एकं लिङ्गं पुंस्त्वादि यस्य। २ एकलिङ्गक शब्द, अजहल्लिङ्ग। अन्यलिङ्गक शब्दका विशेषण बनते भी इसका लिङ्ग नहीं बदलता। एकं पिङ्गलनेत्ररूपं चिह्नं यस्य। ३ कुवेर। {{smaller|एकपिङ्ग देखो।}}}} ४ मेवाड़वाले राजपूतोंके प्रधान उपास्य देव। उदयपुर राजधानीसे ४ कोस उत्तर गिरिपथमें एकलिङ्ग देवका मन्दिर बना है। चारो पार्श्वपर गगनस्पर्शी गिरिशृङ्ग हैं। उनसे अनेक सुनिर्मल निर्झर अविराम गतिमें प्रवाहित हैं। इस गिरिमालाके सकल वृक्ष एकलिङ्ग देवके नामपर उत्सर्गीकृत हैं। इनका </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> मन्दिर साधारण शिवके मन्दिर-जैसा है। निम्नतल श्वेत मरमर पत्थरसे अलङ्कृत है। मन्दिरका अभ्यन्तर भाग स्तम्भके समूहसे शोभमान है। मध्यमें संहाररूपी महादेवकी मूर्त्ति है। वही एकलिङ्ग नामपर बहु कालसे विख्यात हैं। लिङ्गके सम्मुख सुवृहत् नन्दीकी मूर्त्ति है। एकलिङ्ग देववाले मन्दिरके प्राङ्गणकी चारो ओर अन्यान्य देवताओंके भी मन्दिर बने हैं। {{outdent|एकलिङ्गभाक् (सं॰ त्रि॰) एक जातीय केशर विशिष्ट पुष्पयुक्त, जो एक ही जैसे फूल रखता हो।}} {{outdent|एकलु (सं॰ पु॰) एकं लुनाति, लू-क्विप्। ऋषिविशेष।}} {{outdent|एकलो (हिं॰ पु॰) तासका एक्का।}} {{outdent|एकलौता (हिं॰ वि॰) एकाकी, अकेला। यह शब्द 'पुत्र' का विशेषण है।}} {{outdent|एकवक्त्र (सं॰ पु॰) एकं भीषणत्वेन मुख्यतमं वक्त्रं यस्य, बहुव्री॰। १ असुर विशेष। (क्ली॰) २ एक मुखी रुद्राक्ष।}} {{outdent|एकवचन (सं॰ क्ली॰) एकमेत्वकं उच्यते अनेन, वच् करणे ल्युट्। व्याकरणोक्त एकत्ववाचक विभक्ति, वाहिद। सु, अम्, टा, ङे, ङसि, ङस् और ङि सात विभक्ति एकवचन बोधक हैं। हिन्दीमें भी जिससे एक पदार्थका बोध होता, वही एक वचन है। किन्तु अनेक स्थलोंपर एकवचन और बहुवचनके रूपमें भेद नहीं पड़ता, जैसे—एक मनुष्य आया, बीस मनुष्य आये। प्रायः हिन्दीके विद्वान संस्कृत शब्द न बिगाड़ एकवचन और बहुवचन दोनोंमें समान रूपसे रखते हैं।}} {{outdent|एकवत् (सं॰ त्रि॰) एकोऽस्यास्ति, एक-मतुप्, मस्य वः। १ एकसंख्याविशिष्ट, अकेला अदद रखनेवाला। (अव्य॰) एकस्येव, एक-वति। २ एकके न्याय, एककी तरह।}} {{outdent|एकवद्भाव (सं॰ पु॰) एकेन तुल्यो भावः भवनम्, ३-तत्। शब्दनिष्ठ एकवचनान्तरूप कार्य, बहुतोंका मजमूवा।}} {{outdent|एकवर्ण (सं॰ त्रि॰) एको वर्णो यत्र, बहुव्री॰।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> a8lbtvg53c4xv6hfox25afa4lbjggu4 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६८ 250 76168 668309 303998 2026-07-20T02:22:15Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668309 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकवर्णवत्—एकविंशतिगुग्गुल'''|'''४६७'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> १ एकमात्रवर्णविशिष्ट, सिर्फ एक हर्फ़ रखनेवाला। २ ब्राह्मणादि जातिभेद शून्य, जो ब्राह्मणादि जातिका भेद रखता न हो। यह कलिकालकी शेष अवस्थाका बोधक है। ३ एकखरूप, हमशक्ल। (पु॰) एक एव वर्णः। ४ शुक्लादिके मध्य एक वर्ण, एक रंग। ५ श्रेष्ठवर्ण, बढ़िया रंग। ६ ब्राह्मणादिके मध्य एक जाति। ७ एक अक्षर। ८ श्रेष्ठ जाति। ९ वीज-गणितोक्त तुल्य वर्णविशिष्ट सजातीय द्रव्य विशेष। {{outdent|एकवर्णवत् (सं॰ अव्य॰) एक वर्णके न्याय, एक हर्फ़ के मुताबिक।}} {{outdent|एकवर्णसमीकरण (सं॰ क्ली॰) एको वर्णः तुल्यरूपो समो क्रियते अनेन, कृ-ल्युट्। वीजगणितोक्त वीज चतुष्टयके मध्यका एक वीज।}} {{outdent|एकवर्णिक (सं॰ त्रि॰) एकः वर्णं अर्हति, एकवर्ण-ठक्। असाधारण, एक ही रंग या कौमवाला।}} {{outdent|एकवर्णी (सं॰ स्त्री॰) एकमेव शब्दं वर्णयतीति, एकवर्ण-अच्, गौरादित्वात् ङीष्। वाद्यविशेष, करताल।}} {{outdent|एकवर्षिका (सं॰ स्त्री॰) एको वर्षो यस्याः, एक वर्ष-कन्-टाप्, अत इत्वञ्च। एक वत्सर वयसकी बछिया।}} {{outdent|एकवसन (सं॰ त्रि॰) एकं वसनं यस्य, बहुव्री॰। १ उत्तरीय-वस्त्र शून्य, सिर्फ एक धोती रखनेवाला। (क्ली॰) एकञ्च तत् वसनञ्चेति, कर्मधा॰। २ केवल मात्र परिधेय वस्त्र, सिर्फ पहननेका कपड़ा। ३ एक वस्त्र, कोई कपड़ा। ४ एक जातीय वस्त्र, किसी किस्मका कपड़ा।}} {{outdent|एकवस्त्र, {{smaller|एकवसन देखो।}}}} {{outdent|एकवस्त्रता (सं॰ स्त्री॰) एक मात्र वस्त्र रखनेकी स्थिति, जिस हालत पे एक ही कपड़ा रहे।}} {{outdent|एकवस्त्रसंवौत (सं॰ त्रि॰) एक वस्त्र धारण किये हुआ, जो सिर्फ एक ही कपड़ा पहने हो।}} {{outdent|एकवस्त्रार्द्धसंवौत (सं॰ त्रि॰) आधा वस्त्र पहने हुआ, जो निस्फ पोशाक पहने हो।}} {{outdent|एकवांज (हिं॰ स्त्री॰) काकवन्ध्या, एक ही बच्चा देनेवाली औरत।}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकवाक्य (सं॰ क्ली॰) एकं एकार्थं वाक्यम्, कर्मधा॰। १ एक अर्थबोधक वाक्य, जिस बातसे दूसरा मानी न निकले। २ अविसम्वादी वाक्य, रायकी बात। (त्रि॰) एकं अविसम्वादि वाक्यं यस्य, बहुव्री॰। ३ एकमतानुसारो वाक्ययुक्त, एक-जैसी बात कहनेवाला।}} {{outdent|एकवाक्यता (सं॰ स्त्री॰) एकवाक्य-तल्-टाप्। वाक्यका ऐक्य, बातका मेल।}} {{outdent|एकवाद (सं॰ पु॰) एकोऽभिन्नस्वरो वादः वाद्यम्, कर्मधा॰। डिण्डिम नामक वाद्य विशेष, किसी किस्मका ढोल।}} {{outdent|एकवाद्य (सं॰ क्ली॰) एकमभिन्नस्वरं वाद्यम्। डिण्डिम, किसी किस्मका ढोल।}} {{outdent|एकवाया (सं॰ स्त्री॰) चुड़ैल, डाइन।}} {{outdent|एकवार (सं॰ अव्य॰) एकबारगी ही, एकाएक, फौरन्।}} {{outdent|एकवास (सं॰ त्रि॰) एकमात्र गृहयुक्त, जिसके एक ही मकान् रहे।}} {{outdent|एकवासस् (सं॰ पु॰) एकं वासोऽस्य, बहुव्री॰। एकमात्र वसनयुक्त, जिसके एक ही पोशाक रहे।}} {{outdent|एकविंश (सं॰ त्रि॰) एकविंशतेः पूरणम्, एक विंशत्-डट्। तस्य पूरणे डट्। पा ५।२।४८। १ एक विंशतिका पूरण, इक्कीसको भरनेवाला। २ इक्कीसवां। ३ एकविंशस्तोम सम्बन्धीय। (पु॰) ४ एकविंशस्तोम। ५ छह पृष्ठ स्तोममें एक स्तोम।}} {{outdent|एकविंशक (सं॰ त्रि॰) इक्कीसवां, जो इक्कीस रखता हो।}} {{outdent|एकविंशत्, {{smaller|एकविंशति देखो।}}}} {{outdent|एकविंशति (सं॰ स्त्री॰) एकेन अधिका विंशतिः, मध्यपदलो॰। इक्कीस, बीस और एककी संख्या, २१।}} {{outdent|एकविंशतिगुग्गुल (सं॰ पु॰) कुष्ठरोग नामक गुग्गुल विशेष। चित्रक, त्रिफला, त्रिकुट, जीरा, काला जीरा, वच, सैन्धव, अतीस, कुष्ठ, चव्य, इलायची, यवक्षार, विड़ङ्ग, अजवायन, अजमोद, मोथा तथा देवदारु बराबर बराबर ले सबके सम भाग गुग्गुल डाले और घीमें घोट गोली बनाये। यह औषध प्रातः काल भोजनके समय खाना चाहिये।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> nrpi5c3gh5z1rykidyl12br48b9puho पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६९ 250 76170 668310 304001 2026-07-20T02:23:50Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668310 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४६८'''|'''एकविंशतितम—एकशः'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकविंशतितम (सं॰ त्रि॰) एक-विंशति तमट्। विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम्। पा ५।२।५५। इक्कीसवां।}} {{outdent|एकविंशतिधा (सं॰ अव्य॰) एक विंशति प्रकारार्थे धा। संख्यायां विधार्थे धा। पा ५।४।४२। एक विंशति प्रकार, इक्कीस गुना।}} {{outdent|एकविंशवस् (सं॰ त्रि॰) एक विंशस्तोम-सम्बन्धीय।}} {{outdent|एकविंशस्तोम (सं॰ पु॰) एकविंशश्वासौ स्तोमश्च, कर्मधा॰। एकविंशति मन्त्र परिमित सामवेदोक्त पृष्ठादि नामक एक स्तव।}} {{outdent|एकविध (सं॰ त्रि॰) एक विधा प्रकारोऽस्य, बहुव्री॰ ह्रस्वः। एकप्रकार, साधारण, मामूली।}} {{outdent|एकविलोचन (सं॰ त्रि॰) एकं विलोचनं चक्षुर्यस्य, बहुव्री॰। १ काना। (पु॰) २ जनपद विशेष, एक बसती। ३ कुवेर। {{smaller|एकपिङ्ग देखो।}} ४ काक। (क्ली॰) ५ एक आंख।}} {{outdent|एकविषयी (सं॰ त्रि॰) एको विषयोऽस्यास्तीति, इनि। १ एकमात्र विषयमें आसक्त, जो सिर्फ एक ही बात पकड़े हो। २ एकमात्र विषयविशिष्ट, जो सिर्फ एक ही बातका हो।}} {{outdent|एकवीजपत्तिक (सं॰ त्रि॰) अङ्कुरोत्पत्तिके समय केवल एक पत्न देनेवाला, जो कोपल फूटते वक्त सिर्फ एक ही पत्ती देता हो। अंगरेजीमें इसे 'मनोकटिलिडन' ( Mono-cotyledon ) कहते हैं।}} {{outdent|एकवीर (सं॰ पु॰) १ वृक्ष विशेष, एक पेड़। इसका संस्कृत पर्याय महावीर, सल्लकीर और सुवीरक है। यह मदकारक, अतिशय उष्ण एवं कटु होता और वेदना, वात, कटिपृष्ठाश्रित वातव्याधि तथा पक्षाघातको नाश करता है। {{smaller|( राजनिघण्टु )}}}} {{outdent|एकवीरा (सं॰ स्त्री॰) बन्ध्याकर्कटी, कड़वी ककड़ी। यह तिक्त, अति उष्ण एवं वातघ्न होती और पक्वावातं तथा पृष्ठकटी शूलको दूर करती है। {{smaller|( वैद्यक निघण्टु )}}}} {{outdent|एकवीराकल्प (सं॰ पु॰) तन्त्रविशेष। इसमें वीराचारकी आराध्य देवताका रहस्य उक्त है।}} {{outdent|एकवृक्ष (सं॰ पु॰) एको वृक्षोऽत्र बहुव्री॰। १ स्थानविशेष, एक जगह। चार कोसके बीच जहां दूसरा}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> वृक्ष नहीं रहता, उस स्थानको सब कोई एकवृक्ष कहता है। २ एकमात्र वृक्ष, अकेला पेड़। {{outdent|एकवृत् (सं॰ स्त्री॰) एकधैव वर्त्तते, वृत कर्त्तरि क्विप् तुगागमः। १ एकरूप वर्त्तमान, एकजैसा हाल। एकधा वर्त्तते अत्र, आधारे क्विप्। २ स्वर्गलोक। एक धेव वर्त्तते, भावे क्विप्। ३ एकरूप आवर्त्तन, एकजैसा घुमाव।}} {{outdent|एकवृन्द (सं॰ पु॰) सुश्रुतोक्त कण्ठगत मुखरोग विशेष, गलेकी एक बीमारी। कण्ठके मध्य गोलाकार, उन्नत एवं दाह तथा कण्डू विशिष्ट जो शोथ उठता, उसका नाम एकवृन्द पड़ता है। यह कठिन-स्पर्श, गुरु और अपाकी होता है। इस रोगमें प्रथमतः किसी उपायसे रक्त मोक्षण कराना चाहिये। फिर दारु हरिद्रा, नीम तथा शालवृक्षकी छाल और इन्द्रयव आधा आधा तोला आध सेर जलमें पका आधपाव रहनेसे काथको सेवन कराते हैं। अथवा कुटकी, अतीस, देवदारु, निर्विषी, मोथा तथा इन्द्रयव चार-चार आने आधसेर गोमूत्रमें पका आध पाव रहनेसे पिलाते हैं। (क्ली॰) २ एकराशि।}} {{outdent|एकवृष (सं॰ पु॰) एकोऽद्वितीयो वृषः, कर्मधा॰। एक वृष, अनोखा बैल। (त्रि॰) एको वृषो यस्य, बहुव्री॰। २ एकमात्र वृष रखनेवाला, जिसके एक ही बैल रहे।}} {{outdent|एकवेणि, {{smaller|एकवेणी देखो।}}}} {{outdent|एकवेणी (सं॰ स्त्री॰) एकीभूता संस्काराभावेन जटावत् संहतिप्राप्ता वेणीः, कर्मधा॰। १ प्रोषितभर्तृकाकी वेणी, वियोगिनीकी लट। २ प्रोषितभर्तृका, अपना खाविन्द गैरमुल्कमें रखनेवाली औरत।}} {{outdent|एकवेश्म (सं॰ क्ली॰) एकेनैवाधिष्ठितं वेश्म गृहम्, कर्मधा॰। एकमात्र प्राणीके रहनेका गृह, जिस घरमें एकसे ज्यूदा आदमी न रहें।}} {{outdent|एकव्यवसायी (सं॰ पु॰) एकमात्र व्यवसाय करनेवाला पुरुष, जो शख्स वही रोज़गार करता हो।}} {{outdent|एकव्रात्य (सं॰ पु॰) प्रधान वा मुख्य व्रात्य।}} {{outdent|एकशः (सं॰ अव्य॰) एक-एक, अकेले।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> hhjhb4kltcr4ms1thc00j235bdwaxdy पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४७० 250 76173 668311 304004 2026-07-20T02:25:14Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668311 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकशत—एकशैल'''|'''४६९'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकशत (सं॰ क्ली॰) १ एक सौ एक, १०१। (त्रि॰) २ एकशत संख्यायुक्त, एक सौ एकवां।}} {{outdent|एकशतक (सं॰ वि॰) एकशतं परिमाणमस्य, एकशत कन्। १ एकशत परिमाणविशिष्ट, सौ रखनेवाला। (क्ली॰) स्वार्थे कन्। २ एकशत, सौ, १००।}} {{outdent|एकशततम (सं॰ त्रि॰) एकाधिकशत संख्याविशिष्ट, एक सौ एक रखनेवाला।}} {{outdent|एकशतधा (सं॰ अव्य॰) एकशत-धा। १ एकशत-प्रकार, एक सौ एक तरहसे। २ एक सौ एक गुना।}} {{outdent|एकशफ (सं॰ पु॰-क्ली॰) एकः शफः खुरो यस्य, बहुव्री॰। १ अश्व, घोड़ा। २ एक खुर जन्तुमात्र, फटे खुर न रखनेवाला कोई जानवर। खर, अश्व, अश्वतर, गौर, शरभ और चमरीको एकशफ कहते हैं। {{smaller|( भावप्रकाश )}}}} {{outdent|एकशफक्षीर (सं॰ क्ली॰) अविभक्तखुर पशुका दुग्ध, फटे खुर न रखनेवाले जानवरका दूध। यह उष्ण, लघु, वातहर, साम्ल, ईषत् लवण और जड़ताकर होता है। {{smaller|( वाभटटीका हेमाद्रि )}}}} {{outdent|एकशरण (सं॰ क्ली॰) एकमात्र आश्रय, अकेली पनाह। यह शब्द प्रधानतः देवताके लिये प्रयुक्त होता है।}} {{outdent|एकशरीर (सं॰ त्रि॰) एकमात्र शरीर वा रक्तसे सम्बन्ध रखनेवाला, जो उसी खूंनका हो।}} {{outdent|एकशरीरान्वय (सं॰ पु॰) सगोत्रता, सपिण्डता, कुरावत, बिरादरी।}} {{outdent|एकशरीरारम्भ (सं॰ पु॰) पिता और माताके संयोगसे सगोत्रताका प्रारम्भ, मां बापके मेलसे कुरावतका शुरू।}} {{outdent|एकशरीरावयव (सं॰ पु॰) सगोत्र, सम्बन्धी, कुरावतो, रिश्तेदार।}} {{outdent|एकशरीरावयवत्व (सं॰ क्ली॰) सगोत्र सम्बन्ध, कुराबती रिश्ता।}} {{outdent|एकशाख (सं॰ पु॰) एका शाखा यस्य, बहुव्री॰ ह्रस्वः। १ वेदकी तुल्य शाखावाले ब्राह्मण। २ एक शाखाविशिष्ट वृक्षादि, एक डालका पेड़ वग़ैरह।}} {{outdent|एकशाल (सं॰ पु॰) ग्रामविशेष, एक गांव। भरत}} Vol. &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 118 </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> राजगृहसे अयोध्या आते समय इस ग्राममें पहुंचे थे। यह स्थान खाणुमती नदी किनारे अवस्थित है। {{block center|<poem> "एकशाले खाणुमतो विमते गोमतीं नदीम्।" {{smaller|( रामायण २।७१।१६ )}} </poem>}} {{outdent|एकशिखा (सं॰ स्त्री॰) पाठा, निरविसी।}} {{outdent|एकशितिपाद् (सं॰ पु॰) एकः शितिः कृष्णः पादोऽस्य, बहुव्री॰। अश्वविशेष, एक घोड़ा। इसका एक पैर सफेद रहता है। इसे अश्वमेध यज्ञमें वरुण देवताके उद्देशसे चढ़ाते हैं।}} {{outdent|एकशीर्ष (सं॰ त्रि॰) एक ही स्थानको ओर मुख घुमाये हुआ, जो उसी जगहकी तर्फ़ मुंह फेरे हो।}} {{outdent|एकशीलसमाचार (सं॰ त्रि॰) एक ही प्रकारसे जीवन अतिवाहित करनेवाला, जो वही चाल-चलन रखता हो।}} {{outdent|एकशृङ्ग (सं॰ त्रि॰) एकमात्र कोशयुक्त, सिर्फ एक खोल रखनेवाला।}} {{outdent|एकशृङ्ग (सं॰ पु॰) एकं शृङ्गं यस्य, बहुव्री॰। १ विष्णु। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें अकालप्रलय आनेसे विष्णुने एकशृङ्गविशिष्ट मत्स्यका रूप धारण किया था। {{smaller|( कालिकपुराण ३२ अ॰ )}} २ गण्डक, गैंड़ा। ३ एक शृङ्गका पशु, जिस जानवरके एक ही सींग रहे। ३ पितृगण विशेष।}} {{outdent|एकशृङ्गा (सं॰ स्त्री॰) पितृगणकी एक कन्या। यह मस्तिष्कसे उत्पन्न हुई थीं।}} {{outdent|एकशृङ्गी—बौद्धशास्त्रोक्त एक ऋषिकुमार। काश्यपके वीर्य और हरिणीके गर्भसे ऋष्यशृङ्गकी तरह इनका भी जन्म हुआ था। मस्तकपर एक शृङ्ग रहनेसे यह नाम पड़ा। काश्यपराजकी कन्यासे एकशृङ्गका विवाह हुआ। बोधिसत्त्वावदान कल्पलताके मतसे यही बुद्ध थे। {{smaller|( नलिनी अवदान )}}}} {{outdent|एकशेष (सं॰ पु॰) एकः शेषोऽवशिष्टो यस्य, बहुव्री॰। १ द्वन्द्वसमास विशेष। इस समासमें दो या दो से अधिक शब्दोंमें केवल एक रहता और द्विवचन वा बहुवचन लगता है, जैसे—माता च पिता च पितरौ। एकः शेषः मूलमस्य। २ एक मूलयुक्त वृक्षविशेष, जिस पेड़के एक ही जड़ रहे।}} {{outdent|एकशैल (सं॰ क्ली॰) वरङ्गलका प्राचीन नाम।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> g77np0c9m5q2ov4e4jw7suihiyumf7r पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४७१ 250 76175 668304 304007 2026-07-20T02:15:12Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668304 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४७०'''|'''एकश्रुत—एकहत्थी डुलूक'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकश्रुत (सं॰ त्रि॰) एकवार श्रवण किया हुआ, जो एक ही मरतबा सुना गया हो।}} {{outdent|एकश्रुतधर (सं॰ त्रि॰) एकवार श्रवण किया हुआ विषय स्मरण रखनेवाला, जो एक मरतबा सुनी बात भूलता न हो।}} {{outdent|एकश्रुतधरत्व (सं॰ क्ली॰) एकवार श्रवण किया हुआ विषय स्मरण रखनेकी स्थिति, जिस हालतमें एक ही मरतबा सुनी बात याद रहे।}} {{outdent|एकश्रुति (सं॰ त्रि॰) एका श्रुतिर्यस्य, बहुव्री॰। १ उदात्त, अनुदात्त और स्वरित—त्रिविध स्वर मिश्रित, जो ऊंची, नीची और बराबरकी आवाज़में हो। (स्त्री॰) २ एकमात्र स्वरकी श्रुति। ३ एक वेद। ४ एककर्णविशिष्ट, जिसके एक ही कान रहे।}} {{outdent|एकश्रुष्टि एकमात्र आज्ञा पालन करनेवाला, जो एक ही हुक्म मानता हो।}} {{outdent|एकषष्ट (सं॰ त्रि॰) एकषष्ट्याः पूरणम्, एकषष्टि-डट्। एकषष्टि संख्या पूरण करनेवाला, इकसठवां।}} {{outdent|एकषष्टि (सं॰ स्त्री॰) एकेन अधिका षष्टिः, मध्यपदलो॰। साठकी अपेक्षा एक संख्या अधिक, एकसठ, ६१।}} {{outdent|एकषष्टितम, {{smaller|एकषष्ट देखो।}}}} {{outdent|एकसठ (हिं॰ पु॰) एकषष्टि, छह दहाई और एक एकाई, ६१।}} {{outdent|एकसत्तावाद (सं॰ पु॰) वादविशेष, एक दलील। इसमें सत्ता ही मुख्य मानी गयी है। असत् कुछ भी नहीं। युरोपमें परमेनडीज़ने यह मत फैलाया था।}} {{outdent|एकसप्तत (सं॰ त्रि॰) एकसप्ततियुक्त, एकहत्तरवां।}} {{outdent|एकसप्तति (सं॰ स्त्री॰) एकाधिका सप्ततिः। सत्तर और एक, एकहत्तर, ७१।}} {{outdent|एकसप्ततितम, {{smaller|एकसप्तत देखो।}}}} {{outdent|एकसभ (सं॰ पु॰) एका सभा यस्य। १ जगदीश्वर। (त्रि॰) २ एकसभाविशिष्ट, एक मजलिसवाला।}} {{outdent|एकसर (हिं॰ वि॰) १ एकाकी, साथमें दूसरा न रखनेवाला। २ एकहरा, जो दोहरा न हो। (फ़ा॰ वि॰) ३ सम्पूर्ण, पूरा।}} {{outdent|एकसर्ग (सं॰ त्रि॰) एकस्मिन् विषये सर्गो}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> निश्चयो यस्य। एकाग्रचित्त, एक ही बातपर झुका हुआ। {{outdent|एकसहस्र (सं॰ त्रि॰) एकसहस्रं एकाधिकं सहस्रं वा परिमाणमस्य। १ एक सहस्र परिमाणविशिष्ट, हज़ारवां। (क्ली॰) २ एक हज़ार, १०००। ३ एक हज़ार एक, १००१।}} {{outdent|एकसा (फ़ा॰ वि॰) १ तुल्य, बराबर। २ सम, हमवार, जो नीचा-ऊंचा न हो।}} {{outdent|एकसाक्षिक (सं॰ त्रि॰) एकमात्र साक्षी रखनेवाला, अकेलेका देखा हुआ, जो दूसरा गवाह रखता न हो।}} {{outdent|एकसार्थ (सं॰ अव्य॰) साथ-साथ, मिल-जुलकर।}} {{outdent|एकसूत्र (सं॰ पु॰) एकं सूत्रं यस्य, बहुव्री॰। डमरुवाद्य, डमरू। यह एक सूत्रसे बजाया जाता है।}} {{outdent|एकसूनु (सं॰ त्रि॰) एकोऽद्वितीयः सूनुर्यस्य, बहुव्री॰। १ एकमात्र पुत्र रखनेवाला, जिसके एक ही लड़का रहे। (पु॰) कर्मधा॰। २ एकमात्र पुत्र, एकलौता बेटा।}} {{outdent|एकस्तोम (सं॰ पु॰) सोमयज्ञविशेष। इसमें एक ही स्तोम होता है।}} {{outdent|एकस्थ (सं॰ त्रि॰) एकस्मिन् तिष्ठति, स्था-क। एकस्थानमें स्थित, इकट्ठा, साथ ही खड़ा हुआ।}} {{outdent|एकस्थान (सं॰ क्ली॰) एकमात्र स्थान, वही जगह।}} {{outdent|एकहंस (सं॰ क्ली॰) एकः श्रेष्ठो हंसो यत्र, बहुव्री॰। १ तीर्थविशेष, एक सरोवर।}} {{block center|<poem> "एकहंसं नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत्।" {{smaller|( भारत, वन ८३ अ॰ )}} </poem>}} (पु॰) २ जीवात्मा, रूह। ३ एक हंस। {{outdent|एकहत्तर (हिं॰ वि॰) एकसप्तति, सत्तर और एक, ७१।}} {{outdent|एकहत्थी (हिं॰ स्त्री॰) मालखम्भकी एक कसरत। एक हाथको उलटा कमरपर रखते और दूसरे हाथसे पकड़ मालखंभपर उड़ते हैं।}} {{outdent|एकहत्थी कूट (हिं॰ स्त्री॰) मालखंभकी एक कसरत। इसमें एक ही हाथकी थापसे उड़ान भरते हैं।}} {{outdent|एकहत्थी पीठकी उड़ान (हिं॰ स्त्री॰) मालखम्भकी एक कसरत। इसमें पीठके सहारे उड़ते हैं।}} {{outdent|एकहत्थी डुलूक (हिं॰ पु॰) कुश्तीका एक पेंच।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> fsohzvpo9rn8zjp6lk5zblfjivteell पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४७२ 250 76178 668303 304779 2026-07-20T02:08:09Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668303 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकहरा—एकाक्षरकोष'''|'''४७१'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> एक पहलवान् दूसरेकी गर्दन हाथसे लपेट दूसरे हाथसे तान लेता और टांग लगा चित फेंक देता है। {{outdent|एकहरा (हिं० वि०) एकमात्र स्तरयुक्त, एकपरता, जो दोहरा न हो।}} {{outdent|एकहरी (हिं० स्त्री०) कुश्तीका एक पेच। इसमें एक पहलवान् दूसरेकी हाथ पकड़ अपनी दक्षिण ओर झटकारता, फिर दोनों हाथोंसे रानको खींच पटक मारता है।}} {{outdent|एकहस्ती (सं० स्त्री०) अश्वकी शोभन वल्गाका एक भेद, घोड़ेकी एक लगाम।}} {{outdent|एकहाञ्च (सं० पु०) नृत्यविशेष, किसी किस्मका नाच।}} {{outdent|एकहायन (सं० पु०) एको हायनो वयोमानं यस्य, बहुव्री०। एक वत्सरका वत्स, एक सालका बछड़ा। (क्ली०) २ एक वत्सरका समय, एक सालका अरसा। (वि०) एक वत्सरवाला, एक-साला।}} {{outdent|एकहायनी (सं० स्त्री०) एकहायन-ङीष्। दामहायनान्ताच्च। पा ४।१।२७। १ एकवर्षीय गर्भी, एक सालकी बछिया। २ उद्भिद्विशेष, एक पेड़। जो पेड़ एक ही वर्षमें उपज और फल-फूल झड़ या मर जाता, वह एकहायनी कहलाता है।}} {{outdent|एकहृदय (सं० त्रि०) एकमभिन्नं हृदयं यस्य, बहुव्री०। १ अभिन्नहृदय, एकदिल। २ एकाग्रचित्त, दिलको एक ही जगहपर लगाये हुआ।}} {{outdent|एका (सं० स्त्री०) एक-टाप्। १ दुर्गा। जैसे स्फटिक विविध वर्णकी प्रभा प्राप्त होनेसे विविध समझ पड़ता, वैसे ही एकमात्र देवीका रूप भी गुणके वश अनेक प्रकार झलकता है। {{smaller|( देवीपुराण ४५ अ० )}} २ अद्वितीया, अनोखी। ३ एकाकिनी, अकेली। (हिं० पु०) ४ ऐक्य, मेल।}} {{outdent|एकाई (हिं० स्त्री०) एकत्व, वहदत, एककी जगह या हालत। २ नियमित मान विशेष, कोई नाप-जोख—जैसे रुपया, पेशा, सेर, छटांक, गज़, फुट इत्यादि। गणनाके प्रथम स्थान या अङ्कको भी एकाई कहते हैं।}} {{outdent|एकाएक (हिं० क्रि० वि०) अकस्मात्, इत्तिफ़ाक़से।}} {{outdent|एकाएकी, {{smaller|एकाएक देखो।}}}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकांश (सं० पु०) एक एव अंशः, कर्मधा०। एक भाग, एक हिस्सा।}} {{outdent|एकाकार (सं० त्रि०) एकस्तुल्य आकारो यस्य, बहुव्री०। १ समान आकारविशिष्ट, हमसूरत, वही शक्ल रखनेवाला। २ मिश्रित, मिला हुआ।}} {{outdent|एकाकी (सं० त्रि०) एक-आकिनच्। एकादाकिनिच्चासहाये। पा ५।३।५२। असहाय, तनहा, अकेला।}} {{outdent|एकाक्ष (सं० पु०) एकमक्षि यस्य, एक-अक्षि-षच्। बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच्। पा ५।४।११३। १ काक, कौवा। वनगमनके बाद चित्रकूट पर्वतपर रहते समय एकदा राम सीताके क्रोड़में लेटे थे। उसी समय किसी कामुक काकने सीताके कुचदेशमें तीक्ष्ण नख मार दिया। रामने दुष्ट काकपर ऐसे आचरणसे क्रुद्ध हो ब्रह्मास्त्र फेंका था। काकने प्राणके भयसे नाना स्थानोंपर अनेक देवताओंसे आश्रय मांगा। किन्तु अपने प्राणनाथकी आशङ्कासे कोई उसे आश्रय दे न सका। फिर काकने विधाताका आश्रय ढूंढ़ा था। विधाताने स्वयं आश्रय देनेमें असमर्थ हो उसे रामके शरणमें ही जानेको सिखाया। उसी उपदेशके अनुसार काक प्राणके भयसे विपन्न अवस्थामें रामके निकट जा पड़ा। सीताने दुर्वस्थाके दर्शनमें घबरा रामसे उसका जीवन बचानेको अनुरोध किया। रामने भी करुणासे आर्द्र हो एक चक्षु मात्र वाणभोग्य बना उसे छोड़ दिया। २ शिव। ३ एक दानव। (वि०) ४ एकनेत्रविशिष्ट, काना। ५ सुन्दर नेत्रविशिष्ट, उमदा आंख रखनेवाला। ६ एकमात्र अक्षाग्रविशिष्ट, जो एक ही धुरा या गोलडंडा रखता हो।}} {{outdent|एकाक्षपिङ्गल (सं० वि०) कुवेर।}} {{outdent|एकाक्षर (सं० क्ली०) एकमद्वितीयमक्षरम्, कर्मधा०। १ एक स्वरवर्ण। २ ओंकार। (वि०) एकमक्षरं यत्र, बहुव्री०। ३ एक अक्षरविशिष्ट, जो एक ही हर्फ़ रखता हो।}} {{outdent|एकाक्षरकोष (सं० पु०) अभिधानविशेष, कोषका एक ग्रन्थ। इसके रचयिता पुरुषोत्तम देव थे। अकारादि क्रमसे एक-एक अक्षरको पकड़ यह अभिधान लिखा गया है।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 7b52pm5cwjzxf24xr2bgovsdsqw45lu 668305 668303 2026-07-20T02:16:41Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668305 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकहरा—एकाक्षरकोष'''|'''४७१'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> एक पहलवान् दूसरेकी गर्दन हाथसे लपेट दूसरे हाथसे तान लेता और टांग लगा चित फेंक देता है। {{outdent|एकहरा (हिं॰ वि॰) एकमात्र स्तरयुक्त, एकपरता, जो दोहरा न हो।}} {{outdent|एकहरी (हिं॰ स्त्री॰) कुश्तीका एक पेच। इसमें एक पहलवान् 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pxkbsqkh567f16esc9egyn68yjym5kx पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६४ 250 76211 668314 668221 2026-07-20T02:30:10Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668314 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकपुष्कल—एकभार्य'''|'''४६३'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> सिर्फ एक मर्द रखनेवाला। एकः पुरुषो भोक्ता यत्र। ४ एकपुरुषभोग्य, एक मर्दके काममें आने लायक। {{outdent|एकपुष्कल (सं॰ पु॰) एकं पुष्कलं मुखं यस्य, बहुव्री॰। काहल नामक वाद्यविशेष, एक बाजा।}} {{outdent|एकपुष्पा (सं॰ स्त्री॰) एकं पुष्पं यस्याः, बहुव्री॰। वृक्षविशेष, एक पेड़। इसमें एकमात्र पुष्प आता है।}} {{outdent|एकपृथकत्व (सं॰ क्ली॰) भेदाभेद, लगाव और अलगाव।}} {{outdent|एकपेचा (फा॰ वि॰) १ एक ही पेच रखनेवाला, जो एक ही बलका हो। (पु॰) २ किसी किस्मकी पतली पगड़ी।}} {{outdent|एकप्रकार (सं॰ त्रि॰) अभिन्नरूप, वैसा हो।}} {{outdent|एकप्रख्य (सं॰ त्रि॰) अत्यन्त तुल्य, बिलकुल बराबर।}} {{outdent|एकप्रभुत्व (सं॰ क्ली॰) साम्राज्य, सल्तनत।}} {{outdent|एकप्रयत्न (सं॰ पु॰) शब्दकी एकमात्र चेष्टा, आवाज़की अकेली कोशिश।}} {{outdent|एकप्रस्थ (सं॰ पु॰) परिमाणविशेष, एक तौल। यह ३२ पल या २ सेरका होता है।}} {{outdent|एकप्राणयोग (सं॰ पु॰) एक श्वासका संयोग, एक ही सांसका मेल।}} {{outdent|एकफर्दा (फा॰ वि॰) एक ही फ़सलवाला, जो एक ही बार फलता या फल देता हो।}} {{outdent|एकफल (सं॰ त्रि॰) केवल एक अभिप्राय रखनेवाला जिसके एक ही नतीजा या मतलब रहे।}} {{outdent|एकफला (सं॰ स्त्री॰) एकं फलमस्याः, बहुव्री॰ टाप्। ओषधि विशेष, एक बूटी।}} {{outdent|एकफली (सं॰ स्त्री॰) एकं फलमस्याः, ङीष्। ओषधिविशेष, एक बूटी।}} {{outdent|एकफसला, {{smaller|एकफर्दा देखो}}}} {{outdent|एकबन्नी (हिं॰ स्त्री॰) दो आंकड़े वाला लुंगर। इससे नाव रोकी जाती है। (वि॰) २ एक रज्जु विशिष्ट, जो एक ही रस्सीका हो।}} {{outdent|एकबारगी (फा॰ क्रि॰ वि॰) १ एक ही बारमें, साथ-साथ। २ अकस्मात् एकाएक। ३ सम्पूर्ण रूपसे, बिलकुल।}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकबाल (अ॰ पु॰) १ भागर, किस्मत। २ अङ्गीकार, मंजूरी। राजीनामेको एकबाल-दावा कहते हैं।}} {{outdent|एकबुद्धि (सं॰ वि॰) १ एक ही ध्यान रखनेवाला, जो उसी खयालका हो। (पु॰) २ मण्डूक विशेष, एक मेंढक। पञ्चतन्त्रमें इसकी कथा लिखी है।}} {{outdent|एकभक्त (सं॰ क्ली॰) एकं भक्तं भोजनं यत्र, बहुव्री॰। १ व्रतविशेष। इस व्रतमें रात्रिका आहार छोड़ दिवसको दोपहरके समय केवल एकबार भोजन करते हैं। जो व्यक्ति विष्णुका भक्त रहता, सर्व जीवोंपर अहिंसा रखता, एकबार भोजन करता और प्रत्यह 'वासुदेवाय नमः' मन्त्र ८ सौ बार जपता, उसे अतिरात्र यज्ञका फल मिलता है। ऐसे ही नियम से जो संवत्सर काल अतिवाहित करता, वह पौण्डरीक यज्ञके फलका अधिकारी बनता और दश सहस्र वर्ष स्वर्ग भोग पुण्यक्षय होनेपर फिर मर्त्ये जाति भी माहात्म्यसे रहता है। (विष्णुधर्मोत्तर) (त्रि॰) एकमेव भजते। २ एकमात्र व्यक्तिका अनुरक्त, जो एक ही आदमीकी खिदमत करता हो। ३ एकमात्र परमेश्वरका भक्त। ४ प्रधान भक्त।}} {{outdent|एकभक्तव्रत (सं॰ क्ली॰) {{smaller|एकभक्त देखो।}}}} {{outdent|एकभक्ति (सं॰ स्त्री॰) एका अनन्यविषया भक्तिः, कर्मधा॰। १ एकमात्र विषयमें भक्ति, एक ही बातकी मुहब्बत। २ केवल एक बारका भोजन। (त्रि॰) एका अनन्यविषया भक्तिर्यस्य, बहुव्री॰। २ नितान्त भक्त, निहायत तावेदार।}} {{outdent|एकभङ्गेनय (सं॰ पु॰) एकाभिकरूपौ भङ्गौमधिकृत्य नयः, मध्यपदलोपी कर्मधा॰। न्याय विशेष, एक दलील। एकरूप बहु विषयोंके मध्य किसी स्थलमें एक की प्रवृत्ति पड़ने पर इस न्यायबलसे वैसे ही अन्य विषयोंकी भी प्रवृत्ति लग सकती है।}} {{outdent|एकभार्य (सं॰ पु॰) एका भार्या यस्य, बहुव्री॰ ह्रस्वः। १ एक पत्नीवाला पुरुष, जिस मर्दके दूसरी औरत न रहे। (त्रि॰) एकेन भार्यः। २ एक जन द्वारा प्रतिपाल्य, जो एक ही शख्सकी परवरिश पानेके काबिल हो।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> jv9jibl2ovnq9sdinvxui1xjrbociwl पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६३ 250 76212 668315 668222 2026-07-20T02:33:17Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668315 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४६२'''|'''एकपर्णी—एकपुरुष'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> एकपर्णी, {{smaller|एकपर्णिका देखो।}} {{outdent|एकपर्वतक (सं॰ पु॰) पर्वत विशेष, वर्तमान रोहेलखण्डकी दक्षिणस्थित गिरिमाला। {{smaller|( भारत, सभा २९ अ॰ )}}}} {{outdent|एकपलाश (सं॰ पु॰) एकः पलाशो यस्य, बहुव्री॰। एकमात्रपत्रविशिष्टवृक्ष, एक ही पत्तीका पेड़।}} {{outdent|एकपलिया (हिं॰ पु॰) गृह विशेष, किसी किस्मका घर। इसमें दुबड़ेर नहीं पड़ती। दीवारों पर लम्बाई के आमने-सामने कड़ी रख छप्पर डाल देते हैं। छप्पर ढालू रखनेको एक ओर दीवार ज़रा ऊंची कर लेते हैं।}} {{outdent|एकपाटला (सं॰ स्त्री॰) एकं पाटलं पुष्पं आहारो यस्याः। १ हिमालयकी एक कन्या। यह पार्वतीकी भगिनी रहीं। इन्होंने एकमात्र पुष्प खा तपस्या की थी। २ दुर्गा।}} {{outdent|एकपाश (सं॰ पु॰) एकमात्रपण, अकेली बाजी।}} {{outdent|एकपात् (सं॰ पु॰) एकः पादो यस्य, पाद् शब्दस्यान्तलोपः। संख्यासु पूर्वस्य। पा ५।४।१४। १ शिव। २ विष्णु। (त्रि॰) ३ एक पाद रखनेवाला, लंगड़ा।}} {{outdent|एकपात (सं॰ वि॰) अकस्मात् आ पड़ने वाला, जो एकाएक गुज़र जाता हो।}} {{outdent|एकपातिन् (सं॰ त्रि॰) एकः सन् पतति, एकपतणिनि। एकाकी खड़ा रहने वाला, आज़ाद।}} {{outdent|एकपातिनी (सं॰ स्त्री॰) स्वतन्त्र छन्दो विशेष।}} {{outdent|एकपाद (सं॰ पु॰) एकश्चासौ पादश्च, कर्मधा॰। १ एक पद, अकेला पैर। २ परमेश्वर। ३ एक असुर। ४ जनपदविशेष, एक बसती। ५ एकपादवासी, एकपाद मुल्कका बाशिन्दा। महाभारतमें लिखा, कि एकपाद जनपद दाक्षिणात्यके मध्य अवस्थित है। {{smaller|( सभा ३० अ॰ )}} यूनानी ऐतिहासिक मेगस्थिनिसने एकपाद जातिको ओकपेदिस् (Okupedes) एवं टिसियास् मनोपोदिस् ( Monopodes ) कहा है। यह लोग किरातजाति समझ पड़ते हैं।}} <div style="text-align: right;">{{smaller|किरात देखो।}}</div> {{outdent|एकपादिका (सं॰ स्त्री॰) १ एकपदके अवलम्बनसे पक्षियोंका एक अवस्थान। "अथावलम्ब्य श्रममेकपादिकाम्।" {{smaller|( नैषध १म स॰ )}} २ शतपथ ब्राह्मणका द्वितीय पुस्तक।}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकपादुका (सं॰ त्रि॰) एका पादुका यस्य, बहुव्री॰। १ एकपाद, एक पैरवाला। २ जातिविशेष, एक कौम। कहते, एकपाटुक एक ही पैरमें जूता पहनते हैं।}} {{outdent|एकपिङ्ग (सं॰ पु॰) एकं पिङ्ग-नेत्रं यस्य बहुव्री॰। कुवेर। कुवेरके एकनेत्र पर काशीखण्डमें लिखा—कुवेरने अति कठोर तपस्यासे महादेवकी रिझा लिया था। उन्होंने शङ्करके समीपस्थ हो देखा—गौरी महादेवके वामपार्श्वपर बैठी थीं। कुवेरने सोचा, यह सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी कौन रहीं। जैसी उनकी सौभाग्यश्री थी, उससे अपनी अपेक्षा भी तपस्याकी शक्ति अधिक समझ पड़ी। इसीप्रकार सोचते-सोचते उन्होंने क्रूरभावसे दृष्टि डाली थी। बस, उनका वाम चक्षु फूट गया। फिर देवीने महादेवसे कुवेरका परिचय पूछा था। उन्होंने कहा—यह अतिभक्त और तुम्हांरे पुत्रके तुल्य हैं। इसीप्रकार नानारूप परिचय दे महादेवने कुवेरसे गौरीके पदतलपर गिरनेको कहा। कुवेरको देवीने वैसा ही करनेपर आशीर्वाद दिया था—तुम स्फुटित वामनेत्र द्वारा 'एकपिङ्ग' विख्यात होगे।}} {{outdent|एकपिङ्गल (सं॰ पु॰) एकं पिङ्गलं नेत्रं यस्य, बहुव्री॰। कुवेर। {{smaller|एकपिङ्ग देखो।}}}} {{outdent|एकपिण्ड (सं॰ त्रि॰) एकः समानः पिण्डः श्राद्धादेः पिण्डः देहो वा यस्य, बहुव्री॰। सपिण्ड, रिश्तेदार।}} {{outdent|एकपिण्डता (सं॰ स्त्री॰) सपिण्डो-भाव, रिश्तेदारी।}} {{outdent|एकपितृक (सं॰ त्रि॰) एकः समानः पिता यस्य, बहुव्री॰ कः। एक पिताके औरससे उत्पन्न, एक ही बापसे पैदा।}} {{outdent|एकपुत्र (सं॰ पु॰) एक ही पुत्र रखनेवाला, जिस आदमीके एक ही बेटा रहे।}} {{outdent|एकपुत्रता (सं॰ स्त्री॰) एकमात्र पुत्रकी अवस्थिति, एक ही लड़का रहनेकी हालत।}} {{outdent|एकपुरुष (सं॰ पु॰) एकः श्रेष्ठः पुरुषः, कर्मधा॰। १ परमेश्वर। २ प्रधान पुरुष, बड़ा आदमी। (त्रि॰) एकः पुरुषो यस्मिन्, बहुव्री॰। ३ एकमात्र पुरुषयुक्त,}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> sxq172fif878647fxo2m37qqjhf51bx पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६२ 250 76214 668316 668223 2026-07-20T02:34:24Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668316 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकपक्ष—एकपर्णिका'''|'''४६१'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकपक्ष (सं॰ त्रि॰) एकः पक्षो यस्य, बहुव्री॰। १ उसी पक्षवाला, जो उसी ओरका हो। २ पक्षपाती, तरफदार। (पु॰) ३ एक पक्ष, वही ओर।}} {{outdent|एकपक्षीय (सं॰ त्रि॰) एक ही पक्षवाला, एकतरफा।}} {{outdent|एकपञ्चाश (सं॰ त्रि॰) एकपञ्चाशत पूरणार्थे डट्। इक्यावनवां।}} {{outdent|एकपञ्चाशत् (सं॰ त्रि॰) एकेन अधिका पञ्चाशत्। इक्यावन, पांच दहाई और एक इकाईसे बना, ५१।}} {{outdent|एकपञ्चाशत्तम, {{smaller|एकपञ्चाश देखो।}}}} {{outdent|एकपटा (हिं॰ वि॰) एक ही पाट रखनेवाला, जो चौड़ाईमें जुड़ा न हो।}} {{outdent|एकपट्टा (हिं॰ पु॰) कुश्तीका एक पेंच। लड़नेवालेकी एक जांघ हाथसे उठा दूसरे पैरमें अपने पैरसे चपरास मारते और ज़मीन पर चित फटकारते हैं।}} {{outdent|एकपतिका (सं॰ स्त्री॰) एकः समानः पतिर्यस्याः, क-टाप्, बहुव्री॰। सपत्नी, एक ही पतिकी स्त्री।}} {{block center|<poem> "सर्वासामेकपत्नीनामेका चेत् पुत्रिणी भवेत्। सर्वास्तास्तेन पुत्रेण प्राह पुत्रवतीर्मनुः॥" {{smaller|( मनु ९।१८३ )}} </poem>}} {{outdent|एकपत्नी (सं॰ स्त्री॰) एको अद्वितीयः पतिर्यस्याः, बहुव्री॰। १ पतिव्रता।}} {{block center|<poem> "तामावश्यं दिवसगणना तत्परामेकपत्नीम् !" {{smaller|( मेघ २।१० )}} </poem>}} २ सपत्नी। {{outdent|एकपत्र (सं॰ पु॰) १ चण्डाल कन्द। २ श्वेत तुलसी।}} {{outdent|एकपत्रक, {{smaller|एकपत्र देखो}}}} {{outdent|एकपत्रा, {{smaller|एकपतिका देखो।}}}} {{outdent|एकपत्रिका (सं॰ स्त्री॰) एकं गन्धवत्त्वात् श्रेष्ठं पत्रं यस्याः, बहुव्री॰ क-टाप् अत इत्। १ गन्धपत्रवृक्ष। २ पाण्डर-तुलसी वृक्ष।}} {{outdent|एकपत्री (सं॰ स्त्री॰) नागवल्ली लता, पान।}} {{outdent|एकपत्रोत्पत्तिक (सं॰ त्रि॰) अङ्कुरके समय एकमात्र पत्र निकालनेवाला, जो कोपल फूटते वक्त सिर्फ एक ही पत्ती देता हो।}} {{outdent|एकपद् (सं॰ त्रि॰) एकपाद् विशिष्ट, एक ही पैर रखनेवाला।}} Vol. &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 116 </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकपद (सं॰ क्ली॰) एकं पदं पदमात्रोच्चारणकालो यत्र, बहुव्री॰। १ एकमात्र पाद, सिर्फ एक कदम। २ साधारण शब्द, मामूली लफ़्ज़। ३ वर्त्तमान समय, हालका वक्त। ४ वैकुण्ठ। ५ विभक्त्यन्त पद। ६ एकस्थान, वही जगह। ७ वास्तुमण्डलस्थ एककोष्ठरूप स्थान। (पु॰) ८ शृङ्गारबन्ध विशेष। ९ वास्तुयागाराध्य देवता। १० एकपदविशिष्ट मृगविशेष। (त्रि॰) ११ एक पदवाच्य। १२ एकपदविशिष्ट, एक पैरवाला।}} {{outdent|एकपदवान् (सं॰ त्रि॰) एकपद-मतुप्, मस्य वः। एकपदविशिष्ट, एक पैरवाला।}} {{outdent|एकपदस्थ (सं॰ त्रि॰) एकस्मिन् तुल्ये पदे अधिकारे तिष्ठति, एक पद-स्था-क। १ समानकार्यकारी, बराबरीका काम करनेवाला। २ तुल्यसम्भ्रमशाली, बराबरीवाला।}} {{outdent|एकपदा (सं॰ स्त्री॰) एक पादात्मक छन्दोविशेष।}} {{outdent|एकपदि (सं॰ अव्य॰) एकपद-इच्, निपातनात् साधुः। विद्गणादिभ्यश्च। पा ५।४।१२८। एकपादपर, एक पैरसे}} {{outdent|एकपदी (सं॰ स्त्री॰) एकः पादो यस्याः, एकपाद-ङीप् ङीष् वा, पादस्य पदादेशः। १ पथ, पगडंडी। २ एकपदविशिष्टा, एक पैरवाली। ३ छन्दके चतुर्थांशसे विशिष्ट ऋक्।}} {{outdent|एकपदे (सं॰ अव्य॰) १ अकस्मात्, एकाएक। २ एकबारगी, फौरन्। ३ एक ही चेष्टामें, अकेली कोशिशसे।}} {{outdent|एकपर (सं॰ त्रि॰) एक चिह्नसे निर्णय करनेवाला। यह शब्द पाशेका विशेषण है।}} {{outdent|एकपरि (सं॰ अव्य॰) एक ऊपर-नीचे, एक घट बढ़ कर।}} {{outdent|एकपर्णी (सं॰ स्त्री॰) एकमेव पर्णं आहारो यस्याः। १ मेनकाके गर्भसे सम्भूत हिमालयकी तीन कन्याओंमें एक कन्या। यह असित देवलकी पत्नी थीं। {{smaller|(हरि १८ अ॰)}} २ दुर्गा।}} {{outdent|एकपर्णिका (सं॰ स्त्री॰) एकपर्ण-कन्-टाप्, अत इत्वम्। पार्वती। इन्होंने तपस्याके समय केवल एक पत्र खा जीवन धारण किया था।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 22ytqgvmy5if12lb4n4fwigr6g4nsrv पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६१ 250 76216 668317 668224 2026-07-20T02:35:50Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668317 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४६०'''|'''एकदेह—एकनेमि'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकदेह (सं॰ पु॰) एको मुख्यो देहो यस्य, बहुव्री॰। १ बुधग्रह, दबीर-फलक। एकः तुल्यो देहो यस्य। २ वंश, खान्दान्। ३ दम्पती, स्त्रीपुरुष। (त्रि॰) ४ एकशरीर, सिर्फ एक जिस्म रखनेवाला।}} {{outdent|एकद्युः (सं॰ पु॰) एकेन परमात्मना दिव्यति, दिव्-क्विप्-छट्। केवल परमात्मचिन्तक आत्माराम नामक एक ऋषि। यह नीधृके पुत्र थे।}} {{outdent|एकद्वार (सं॰ पु॰) गुजरात प्रदेशके मध्यस्थित वटतीर्थके निकटस्थ एक प्राचीन तीर्थ। {{smaller|( प्रभासख॰ )}}}} {{outdent|एकधन (सं॰ क्ली॰) एकमेव धनम्, मध्यपदलोपी कर्मधा॰। १ एक मात्र धन, अकेलो दौलत। एक-अयुग्मं धनं धौरमानसृदकं यत्र, बहुव्री॰। २ अयुग्म संख्यक कलस, अकेला घड़ा। ३ श्रेष्ठधन, बड़ी दौलत। (त्रि॰) ४ एकमात्र धनशाली, अकेला दौलतमन्द।}} {{outdent|एकधनवित् (सं॰ त्रि॰) १ एकधन नामक कलस प्राप्त करनेवाला। २ उत्तम बलि पानेवाला।}} {{outdent|एकधर्मी (सं॰ त्रि॰) एकस्तुल्यो धर्मोऽस्यास्तीति, एक-धर्म-इनि। समान धर्म विशिष्ट, हम मजहब।}} {{outdent|एकधा (सं॰ अव्य॰) एक-धा। संख्याया विधार्थे धा। पा ५।४।४२। १ एक प्रकार, साथ-साथ। २ साधारणतः, अकेले। ३ एक बार, फौरन्।}} {{outdent|एकधुर (सं॰ स्त्री॰) यानविशेष, एक गाड़ी।}} {{outdent|एकधुर (सं॰ त्रि॰) एका धूर्यस्य, एक-धुर-अ। ऋक्पूरब्धूः पथामानक्षे। पा ५।४।७४। १ केवल एक प्रकार भार वा धुरके योग्य, जो सिर्फ एक किस्मके बोझ या जुवेके क़ाबिल हो। २ भारविशेषवाही, कोई बोझ ढोनेवाला।}} {{outdent|एकधुरा (सं॰ स्त्री॰) एका न द्वितीया धूः, कर्मधा॰। एक भार, वही बोझ।}} {{outdent|एकधुरावह (सं॰ त्रि॰) एक धुरायाः वहः, ६-तत्। एक भारवाहक, वही बोझ ढोनेवाला।}} {{outdent|एकधुरीण (सं॰ त्रि॰) एकधुरां वहति यः, एक-धुर-ख। एकधुराल्लुक् च। पा ४।४।७८। एक भारवाहक, सिर्फ एक बोझ ढोनेवाला।}} {{outdent|एकनक्षत्र (सं॰ क्ली॰) एकं नक्षत्रं यत्र, बहुव्री॰। १ एक ताराविशिष्ट नक्षत्र। आर्द्रा, चित्रा और}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> स्वाति नक्षत्र एकतारामय है। २ अमावस्या। ३ एक नक्षत्र, अकेला सितारा। {{outdent|एकनट (सं॰ पु॰) एको मुख्यो नटः, कर्मधा॰। प्रधान नाट्यप्रवर्त्तक, सूत्रधार, खास खिलाड़ी। यह प्रस्तावना सुनाता है।}} {{outdent|एकनयन (सं॰ त्रि॰) एकं नयनं यस्य, बहुव्री॰। १ काना। (पु॰) २ काक, कौवा। ३ कुवेर।}} {{outdent|एकनवत (सं॰ त्रि॰) इक्यानवेवां।}} {{outdent|एकनवति (सं॰ स्त्री॰) एकेन अधिका नवतिः, मध्यपदलोपी कर्मधा॰। इक्यानवे, नौ दहाई और एक इकाईकी संख्या, ९१।}} {{outdent|एकनवतितम, {{smaller|एकनवत देखो।}}}} {{outdent|एकनाथ (सं॰ पु॰) एकः प्रधानं नाथः, कर्मधा॰। १ प्रधान राजा, खास मालिक। (त्रि॰) २ एक प्रभु युक्त, जिसके एक ही मालिक रहे।}} {{outdent|एकनाथ भट्ट (सं॰ पु॰) एक प्रसिद्ध ग्रन्थकार। दाक्षिणात्यके प्रतिष्ठान ( पैठान ) नगरमें इनका जन्म हुआ था। इन्होंने अन्वयार्थप्रकाशिका नाम्नी एक चण्डीकी टीका बनायी है।}} {{outdent|एकनायक (सं॰ पु॰) एकः प्रधानं नायकः, कर्मधा॰। महादेव।}} {{outdent|एकनायकराज्यतन्त्र (सं॰ क्ली॰) एक ही राजाके मतानुसार निर्वाहित राज्यशासनका कार्य, जो हुक्म सल्तनतमें एक ही बादशाहके कहने पर चलता हो।}} {{outdent|एकनिश्चय (सं॰ पु॰) १ साधारण स्वीकृति वा फल, मामूली मञ्जूरी या नतीजा। (त्रि॰) २ एक ही प्रस्ताव को प्राप्त, जो वही मतलब रखता हो।}} {{outdent|एकनिष्ठ (सं॰ त्रि॰) एका एकविषयिणी निष्ठा यस्य, बहुव्री॰। एकासक्त, एक ही से लगा हुआ।}} {{outdent|एकनीड़ (सं॰ त्रि॰) १ केवल एक स्थान रखनेवाला, जिसके एक ही बैठक रहे। २ साधारण गृह रखनेवाला, जो मामूली मकान् रखता हो।}} {{outdent|एकनीत (सं॰ क्ली॰) रथ, गाड़ी। {{smaller|( भागवत ४।२६।२ )}}}} {{outdent|एकनेत्र, {{smaller|एकदृक् देखो।}}}} {{outdent|एकनेमि (सं॰ त्रि॰) एक मण्डलविशिष्ट, एक ही दायरा रखनेवाला।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 7at40zkjz6an8qojtgv4mkygb0h39jw पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४६० 250 76218 668318 668225 2026-07-20T02:36:50Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668318 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकदंडा—एकदेशीय'''|'''४५९'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> यह नाम रखते हैं। उनके मतानुसार एकाकी जीवका साथी केवल कर्म है। {{outdent|एकदंडा (हिं॰ पु॰) कुश्तीका एक पेच।}} {{outdent|एकदंता (हिं॰ पु॰) १ एकदन्तविशिष्ट हस्ति, एक दांतका हाथी। २ एक दांतवाला।}} {{outdent|एकदंष्ट्र (सं॰ पु॰) एका दंष्ट्रा यस्य, बहुव्री॰ ह्रस्वः। गणेश।}} {{outdent|एकदण्डी (सं॰ पु॰) एकः केवलो दण्डोऽस्यास्तीति, एक-दण्ड-इनि। सन्न्यासविशेष। जब हृदयमें सनातन ब्रह्मात्माका निश्चय जमता, तब सन्न्यासी एकमात्र दण्ड पकड़ता है। चतुर्विध सन्न्यासियोंमें हंसश्रेणीवालोंके ही दण्डधारणकी व्यवस्था है। {{smaller|सन्न्यासी देखो।}}}} {{outdent|एकदन्त (सं॰ पु॰) गणेश। किसी समय गणेशको द्वारपाल बना शिवसे दुर्गा कथोपकथन करती थीं। उसी समय परशुरामने शिवके दर्शनको आ गणेशसे द्वार छोड़नेको कहा। इनके अस्वीकार करनेपर दोनोंमें तुमुल युद्ध होने लगा। परशुरामके कुठाराघातसे गणेशका एक दन्त टूटा था। उसी समयसे इनका नाम एकदन्त पड़ गया। {{smaller|( ब्रह्मवैवर्त्तपुराण )}}}} {{outdent|एकदरा (हिं॰ पु॰) एक दरवाला, जो दालान एक ही दरवाज़ा रखता हो।}} {{outdent|एकदस्ती (फा॰ स्त्री॰) कुश्तीका एक पेच। इसमें लड़नेवालेका बायां हाथ अपने बायें हाथसे घुमा कर पकड़ते और दाहनेसे खोंच पीछे निकल जाते हैं। यह पेच कुश्ती लड़नेमें सबसे पहले सिखाया जाता है।}} {{outdent|एकदा (सं॰ अव्य॰) एकस्मिन् काले, एक-दा। सर्वैकाद्यकिं यत्तदः काले दा। पा ५।३।१५। १ एक ही समयपर, फौरन्। २ एकबार, एक मरतबा, कभी-कभी। ३ किसी दिनको। ४ एक समय पर।}} {{outdent|एकदिक् (सं॰ स्त्री॰) १ एक स्थान, वही जगह। २ एकपार्श्व, एक बगल। जैन शास्त्रमें दिक्सम्बन्धीय निर्धारित नियम लांघनेका एकदिशा—परिमाणातिक्रमण कहते हैं। श्रावकको प्रतिदिन चारो दिशाकी दूरी ठहरा चलना पड़ता है। उक्त नियम तोड़नेपर यह अतिचार लगता है।}} {{outdent|एकदुःखसुख (सं॰ वि॰) सहानुभूति रखनेवाला,}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> हमदर्द, जो दूसरेके दुःखमें दुःखी और सुखमें सुखी रहता हो। {{outdent|एकदृक् (सं॰ पु॰) एकमभिन्नं पश्यतीति, एक-दृश्-क्विप्। १ महादेव। २ तत्त्वज्ञानी। ३ ब्रह्मज्ञानी। ४ काक, कौवा। राम वाणसे कौवेकी एक आंख फूट गयी थी। (वि॰) ५ काना। ६ एकपक्षपाती, तरफदार।}} {{outdent|एकदृश्य (सं॰ त्रि॰) अकेला देखने योग्य, जो तनहा देखे जानेके क़ाबिल हो।}} {{outdent|एकदृष्टि (सं॰ स्त्री॰) एका एकविषयिणी दृष्टिः, कर्मधा॰। एकमात्र विषयपर दृष्टि, जो नज़र सिर्फ एक ही बातपर लड़ी हो। (पु॰) एका दृष्टिर्यस्य, बहुव्री॰। २ काक, कौवा। (वि॰) ३ काना।}} {{outdent|एकदेव (सं॰ पु॰) एकः प्रधानो देवः, कर्मधा॰। परमेश्वर।}} {{outdent|एकदेवत (सं॰ त्रि॰) एका देवता यस्य, बहुव्री॰। एक ही देवताको दिया हुआ, जो एक ही देवताको चढ़ाया गया हो।}} {{outdent|एकदेवल्य (सं॰ त्रि॰) एकां श्रेष्ठां देवतामर्हतीति, एकदेवता-यत्। श्रेष्ठ देवतापूजक, जो एक ही देवताको मानता हो।}} {{outdent|एकदेश (सं॰ पु॰) एकश्चासौ देशश्चेति, कर्मधा॰। १ एक स्थान, वही जगह। २ अंश, हिस्सा। (त्रि॰) ३ एक स्थानका अधिकारी, जो एक ही जगह रखता हो। (अव्य॰) ४ कुछ कुछ।}} {{outdent|एकदेशविभावितन्याय (सं॰ पु॰) एकदेशः साध्यस्य विभावितो येन स चासौ न्यायश्चेति, कर्मधा॰। तर्क विशेष, किसी किस्मकी दलील। इसमें प्रमाणादिसे साध्यका एकदेश अङ्गीकृत होता है।}} {{outdent|एकदेशस्थ (सं॰ त्रि॰) एक ही प्रान्तपर अवस्थित, जो उसी जगह पर हो।}} {{outdent|एकदेशी (सं॰ वि॰) एकोऽभिन्नो देशो वासस्थानत्वे नास्यास्तीति, इनि। १ एक देशवासी, उसी मुल्कका रहनेवाला। २ अंशोंमें विभक्त, जो हिस्सोंमें बंटा हो।}} {{outdent|एकदेशीय, {{smaller|एकदेशी देखो।}}}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> 69kybwizydx0yytaxw6xibm0wz7rjgb पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४७३ 250 76231 668302 304076 2026-07-20T02:05:48Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668302 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४७२'''|'''एकाक्षरी—एकादश'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकाक्षरी (सं० त्रि०) एक अक्षरवाला, जो एक ही हर्फ़ रखता हो।}} {{outdent|एकाक्षरीभाव (सं० पु०) एकमात्र अक्षरका उत्पादन, संक्षेप, इनफ, समेट।}} {{outdent|एकाग्र (सं० त्रि०) एकं अग्रं पुरोगतं ज्ञेयमस्य, बहुव्री०। १ अनन्यचित्त, एक ही बातपर लगा हुआ। २ अनाकुल, जो घबराया न हो। ३ प्रसिद्ध, मशहूर। ३ एकमात्र विन्दुमुख, जो एक ही नोक रखता हो। (पु०) ४ विभक्त प्रतिकृतिके विस्तृत बाहुका सम्मुख भाग।}} {{outdent|एकाग्रचित्त (सं० त्रि०) एकाग्रं एकविषयासक्तं चित्तं यस्य, बहुव्री०। एकमनाः, एक ही बातपर दिल लगाये हुआ।}} {{outdent|एकाग्रतः (सं० अव्य०) अविभक्त चित्तसे, पूरे तौरपर दिल लगाकर।}} {{outdent|एकाग्रता (सं० स्त्री०) एकाग्रस्य भावः, एकाग्र-तल्-टाप्। १ एक विषयमें आसक्ति, एक ही बातपर झुकाव। २ त्रिगुणात्मक चित्तमें सत्वगुणका उद्रेक और रजः एवं तमोगुणका विक्षेप। तन्त्रादिका प्रभाव पड़नेपर विषयान्तरके अवलम्बनरूप संसर्गसे शून्य चित्तका धर्मविशेष एकाग्रता कहलाता है।}} {{outdent|एकाग्रत्व (सं० क्ली०) एकाग्र-त्व। तस्य भावस्त्वतलौ। पा ५।१।११९। एकाग्रता, दिलदिही।}} {{outdent|एकाग्रदृष्टि (सं० त्रि०) एकस्मिन्नेव अग्रे पुरोगते दृष्टिर्यस्य, बहुव्री०। १ एकमात्र विषयपर दृष्टि डालनेवाला, जो एक ही ओर नज़र लड़ाये हो। (स्त्री०) कर्मधा०। २ एक विषयमें दृष्टि, एक ही चीज़पर पड़नेवाली नज़र।}} {{outdent|एकाग्रमनाः (सं० त्रि०) एकाग्रं एकविषयासक्तं मनो यस्य, बहुव्री०। १ एकाग्रचित्त, दिलको एक ही ओर लगाये हुआ। (क्ली०) २ स्थिरचित्त, बंधा हुआ ध्यान।}} {{outdent|एकाग्र्य (सं० त्रि०) एकं अग्रं यस्य, बहुव्री०। एकाग्र, एक ही ओर लगा हुआ। इसका संस्कृत पर्याय एकतान, अनन्यवृत्ति, एकायन, एकसर्ग, एकाग्र और एकायनगत है।}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकाघ्नी (सं० स्त्री०) वाणविशेष, एक तीर। इससे एक ही वीर मरता है। महाभारतमें लिखा—इन्द्रने कर्णको अपने कवचके साथ अर्जुनके मारनेको यह वाण सौंपा था। किन्तु भीषण समरमें कर्णने इसे घटोत्कच पर ही छोड़ दिया।}} {{outdent|एकाङ्ग (सं० पु०) एकं सुन्दरत्वेन मुख्यं अङ्गमस्य, बहुव्री०। १ बुधग्रह। (क्ली०) २ चन्दन, संदल। ३ एक अङ्ग, अकेला अजो। ४ मस्तक, दमाग।}} {{outdent|एकाङ्गवात (सं० पु०) १ पच्चवध रोग, आधे जिस्ममें होनेवाला लकवा। २ अश्वका एक वातव्याधि रोग। इसमें एक कर्ण बढ़ता, अर्द्ध शरीर शुष्क पड़ता और अश्व शून रहता है। {{smaller|( जयदत्त )}}}} {{outdent|एकाङ्गिका (सं० स्त्री०) चन्दनसे बननेवाली एक सामग्री।}} {{outdent|एकाङ्गी (सं० स्त्री०) १ मुरामांसी, एक खुशबूदार चीज़। यह कटु एवं कषाय लगती और भ्रम, मूर्च्छा, तृष्णा, विष तथा दाहको दूर करती है। {{smaller|( राजनिघण्टु )}} (वि०) २ एक अङ्ग-सम्बन्धीय, एकतरफ़ा।}} {{outdent|एकाण्ड (सं० पु०) एकमण्डमस्य, बहुव्री०। एक वृषणविशिष्ट अश्व, एक फोतेका घोड़ा। जिस घोड़ेका एक मुष्क बढ़ जाता, वह एकाण्ड कहलाता है।}} {{outdent|एकातपत्र (सं० त्रि०) एकच्छत्र, चक्रवर्त्ती।}} {{outdent|एकात्मता (सं० स्त्री०) एकात्माका भाव, दुनियामें एक रूह रहनेका मक़ूला।}} {{outdent|एकात्मवादी (सं० त्रि०) एक एव आत्मेति वक्तुं शीलमस्य, बहुव्री०। वेदान्तके मतका अवलम्बी। वेदान्तमें ब्रह्म अद्वितीय माना गया है।}} {{outdent|एकात्मा (सं० पु०) एकोऽभिन्न आत्मा, कर्मधा०। १ अद्वितीय आत्मा, एक रूह। (वि०) २ अभिन्नहृदय, एकदिल। ३ एकरूप, हमशक्ल। ४ सहायशून्य, तनहा।}} {{outdent|एकादश (सं० त्रि०) एकेन अधिका दश, मध्यपदलो०। १ दशसे एक संख्या अधिक, ग्यारह, ११। २ एकादशको पूर्ण करनेवाला, ग्यारहवां।}} </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> d7fh2qh7u0fkhzfac6156fa7bmiouq5 668306 668302 2026-07-20T02:18:01Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668306 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४७२'''|'''एकाक्षरी—एकादश'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकाक्षरी (सं॰ त्रि॰) एक अक्षरवाला, जो एक ही हर्फ़ रखता हो।}} {{outdent|एकाक्षरीभाव (सं॰ पु॰) एकमात्र अक्षरका उत्पादन, संक्षेप, इनफ, समेट।}} {{outdent|एकाग्र (सं॰ त्रि॰) एकं अग्रं पुरोगतं ज्ञेयमस्य, बहुव्री॰। १ अनन्यचित्त, एक ही बातपर लगा हुआ। २ अनाकुल, जो घबराया न हो। ३ प्रसिद्ध, मशहूर। ३ एकमात्र विन्दुमुख, जो एक ही नोक रखता हो। (पु॰) ४ विभक्त प्रतिकृतिके विस्तृत बाहुका सम्मुख भाग।}} {{outdent|एकाग्रचित्त (सं॰ त्रि॰) एकाग्रं एकविषयासक्तं चित्तं यस्य, बहुव्री॰। एकमनाः, एक ही बातपर दिल लगाये हुआ।}} {{outdent|एकाग्रतः (सं॰ अव्य॰) अविभक्त चित्तसे, पूरे तौरपर दिल लगाकर।}} {{outdent|एकाग्रता (सं॰ स्त्री॰) एकाग्रस्य भावः, एकाग्र-तल्-टाप्। १ एक विषयमें आसक्ति, एक ही बातपर झुकाव। २ त्रिगुणात्मक चित्तमें सत्वगुणका उद्रेक और रजः एवं तमोगुणका विक्षेप। तन्त्रादिका प्रभाव पड़नेपर विषयान्तरके अवलम्बनरूप संसर्गसे शून्य चित्तका धर्मविशेष एकाग्रता कहलाता है।}} {{outdent|एकाग्रत्व (सं॰ क्ली॰) एकाग्र-त्व। तस्य भावस्त्वतलौ। पा ५।१।११९। एकाग्रता, दिलदिही।}} {{outdent|एकाग्रदृष्टि (सं॰ त्रि॰) एकस्मिन्नेव अग्रे पुरोगते दृष्टिर्यस्य, बहुव्री॰। १ एकमात्र विषयपर दृष्टि डालनेवाला, जो एक ही ओर नज़र लड़ाये हो। (स्त्री॰) कर्मधा॰। २ एक विषयमें दृष्टि, एक ही चीज़पर पड़नेवाली नज़र।}} {{outdent|एकाग्रमनाः (सं॰ त्रि॰) एकाग्रं एकविषयासक्तं मनो यस्य, बहुव्री॰। १ एकाग्रचित्त, दिलको एक ही ओर लगाये हुआ। (क्ली॰) २ स्थिरचित्त, बंधा हुआ ध्यान।}} {{outdent|एकाग्र्य (सं॰ त्रि॰) एकं अग्रं यस्य, बहुव्री॰। एकाग्र, एक ही ओर लगा हुआ। इसका संस्कृत पर्याय एकतान, अनन्यवृत्ति, एकायन, एकसर्ग, एकाग्र और एकायनगत है।}} </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकाघ्नी (सं॰ स्त्री॰) वाणविशेष, एक तीर। इससे एक ही वीर मरता है। महाभारतमें लिखा—इन्द्रने कर्णको अपने कवचके साथ अर्जुनके मारनेको यह वाण सौंपा था। किन्तु भीषण समरमें कर्णने इसे घटोत्कच पर ही छोड़ दिया।}} {{outdent|एकाङ्ग (सं॰ पु॰) एकं सुन्दरत्वेन मुख्यं अङ्गमस्य, बहुव्री॰। १ बुधग्रह। (क्ली॰) २ चन्दन, संदल। ३ एक अङ्ग, अकेला अजो। ४ मस्तक, दमाग।}} {{outdent|एकाङ्गवात (सं॰ पु॰) १ पच्चवध रोग, आधे जिस्ममें होनेवाला लकवा। २ अश्वका एक वातव्याधि रोग। इसमें एक कर्ण बढ़ता, अर्द्ध शरीर शुष्क पड़ता और अश्व शून रहता है। {{smaller|( जयदत्त )}}}} {{outdent|एकाङ्गिका (सं॰ स्त्री॰) चन्दनसे बननेवाली एक सामग्री।}} {{outdent|एकाङ्गी (सं॰ 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668301 304079 2026-07-20T02:04:02Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668301 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकादशक—एकादशी'''|'''४७३'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकादशक (सं० वि०) एकादश परिमाणमस्य। १ एकादश परिमाणविशिष्ट, ग्यारहवां। २ एकादश, ग्यारह, ११।}} {{outdent|एकादशकृत्वः (सं० अव्य०) एकादशन्-कृत्वसुच्। संख्यायाः क्रियाभ्यावृत्तिगणने कृत्वसुच्। पा ५।४।१७। एकादशबार, ग्यारह मरतबा।}} {{outdent|एकादशतनु (सं० पु०) एकादश तनवो यस्य, बहुव्री०। महादेव। एकादश बार भिन्न भिन्न मूर्त्तिके परिग्रहसे शिवको एकादशतनु वा एकादश रुद्र कहते हैं। एकादश नाम यह हैं—अज, एकपात्, अहिर्बुध्न, पिनाकी, अपराजित, त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हरण और ईश्वर।}} {{outdent|एकादशतम (सं० वि०) एकादशक, ग्यारहवां।}} {{outdent|एकादशद्वार (सं० क्ली०) एकादश द्वाराणि रन्ध्राण्यस्य, बहुव्री०। शरीर, जिस्म। शरीरके मध्य दो चक्षु, दो कर्ण, दो नासारन्ध्र, मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुह्य और मेढ़्र सब मिलाकर एकादश छिद्र होते हैं। साधारणतः ब्रह्मरन्ध्र और नाभिको छोड़ लोग नवद्वार ही मानते हैं।}} {{outdent|एकादशशतिक महाप्रसारिणी तैल (सं० क्ली०) वातव्याधिका एक तैल। काथार्थ समूलपत्राग्र गन्धभद्रा साढ़े ३२ शरावक; भिष्टी, गुडूची एवं एरण्डमूल प्रत्ये क २५ शरावक; रास्ना, शिरोवलक्, देवदारु तथा केतकीका मूल प्रत्येका ६।० शरावक ले ६४०० शरावक जलमें पकाये और ६४ शरावक शेष रहनेसे उतारे। कांजी ६४ शरावक, दधिमण्ड १६ शरावक, शुक्त १६ शरावक, छागमांस ८ शरावक एवं जल ६४ शरावक डाल उबाले और १६ शरावक शेष रहनेपर उतारे। इक्षुरस १६ शरावक, दुग्ध १६ शरावक और पिण्डिङ्गफल, कर्कटशृङ्गी, जीवनीय दशक वा अष्टवर्ग, काकोली, मञ्जिष्ठा, क्षीरकाकोली, कौंचकी जड़, छोटी इलायची, कपूर, लुबान, सरलकाष्ठ, कुङ्कुम, जटामांसी, नखी, कृष्णागुरु, नीलोत्पल, पद्मकाष्ठ, हरिद्रा, कङ्कोल, नागेश्वर, खसकी जड़, गुड़त्वक्, सुपारी, जायफल, लताकस्तूरी, शतमूली, श्रीवासा, देवदारु, श्वेतचन्दन, वच, शैलेज, सैन्धव, शिलारस, मुस्तक,}} <br><br>Vol. &nbsp; &nbsp; III. &nbsp; &nbsp; &nbsp; 119 </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> गन्धभद्राका मूल, पुनर्नवा, नालुका, गन्धशटी, मृगनाभि, दशमूल, मैनफल, प्रियङ्गु, शाल, केतकी, तगरमूल, अश्वगन्धा, वाला, रेणुका, रसाञ्जन, सेमरका मुसरा, कटफल, अगुरु, श्यामालता वा अनन्तमूल, कुष्ठमञ्जातककी मुष्टि, त्रिफला, शुलफा, पद्मनागेश्वर, लवङ्ग और त्रिकटु प्रत्येक ३ पल छोड़नेसे यह औषध बनता है। {{smaller|( प्रयोगरत्न )}} {{outdent|एकादशायस (सं० पु०) ब्रध्नवृद्धिके अधिकारका एक औषध, बदकी एक दवा। जारित लोह, पारद, गन्धक, ताम्र, स्वर्णमाक्षिक, अभ्र, हिङ्गुल, कुङ्कुम, पोखराजमणि, शौच, पित्तल, विड़ङ्ग, त्रिफला, हिङ्गु, यमानी, जीरक, कृष्णजीरक, पियालफल, वचा, कर्कटशृङ्गी, मरिच, पिप्पली, राजपिप्पली, चवी, दुरालभा और चित्रकमूल बराबर-बराबर आर्द्रकके रसमें भावना देनेसे यह औषध बनता है।}} {{outdent|एकादशाह (सं० पु०) एकादशानां अह्नां समाहारः, एकादश-अहन्-टच्। एकादश दिनका समाहार, ग्यारह रोज़का अरसा। २ एकादश दिवस साध्य यज्ञ। ३ ब्राह्मणोंका एकादश दिवसमें कर्त्तव्य श्राद्ध। इस दिन सूतकके अर्थ वृषोत्सर्ग, महाब्राह्मणभोजन और शय्यादानादि होता है।}} {{outdent|एकादशिन् (सं० वि०) एकादश संख्या परिमाणमस्यास्तीति, एकादश-इनि। एकादश संख्या परिमित, ग्यारह अददवाला।}} {{outdent|एकादशी (सं० स्त्री०) एकादशानां पूरणी, एकादशन्-डट्-ङीप्। १ तिथि विशेष। इस तिथिको शुक्लपक्षपर सूर्यमण्डलसे चन्द्रमण्डलको एकादश निर्गत और कृष्णपक्षपर सूर्यमण्डलमें चन्द्रमण्डलकी एकादश कला प्रविष्ट होती हैं। इसका स्मृतिशास्त्रोक्त नामान्तर हरिदिन और हरिवासर है।}} तन्त्रकी व्यवस्थासे वैष्णव, सपुत्त्रक, गृही, विशेषतः ब्राह्मणको कृष्णा एकादशी पर उपवासका नित्य अधिकार है। वैष्णव और उनके-जैसे अन्यान्य व्यक्ति हरिशयनके मध्यवर्त्ती समयमें कृष्णा एकादशीका व्रत बराबर कर सकते हैं। अपुत्त्रक गृहीको सकल एकादशीके समय उपवास कर्त्तव्य है। काम्य उपवासमें </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> r9nim6xk97yr9w2le9qra61k5t08912 668307 668301 2026-07-20T02:19:20Z AMAN KUMAR 6475 सुधार 668307 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh||'''एकादशक—एकादशी'''|'''४७३'''}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> {{outdent|एकादशक (सं॰ वि॰) एकादश परिमाणमस्य। १ एकादश 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तन्त्रकी व्यवस्थासे वैष्णव, सपुत्त्रक, गृही, विशेषतः ब्राह्मणको कृष्णा एकादशी पर उपवासका नित्य अधिकार है। वैष्णव और उनके-जैसे अन्यान्य व्यक्ति हरिशयनके मध्यवर्त्ती समयमें कृष्णा एकादशीका व्रत बराबर कर सकते हैं। अपुत्त्रक गृहीको सकल एकादशीके समय उपवास कर्त्तव्य है। काम्य उपवासमें </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> copjlbvybeehuf60ae0pyz8nr1tmq4e पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६७७ 250 76256 668321 609420 2026-07-20T03:39:47Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 668321 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh|६७६|कथकथा-कथङ्ल्कता|}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} इसका संस्कृत पर्याय एकनट और कथाप्राण है। ३ वता, बयान करनेवाला। ४ एक नैयायिक ग्रन्थकर्ता। कथकता (सं० स्त्री०) कथक-तल-टाए। १ वाक्या-लाप, बातचीत। २ धर्मविषयक आलोचना, मज-हबी बयान्। कथकता पाठ ( पारायण ) से विभिन्न होती है। <Small>पाठ और पारायण देखो ।</small> पाठकार्य प्रात:काल-कर्तव्य है। किन्तु कथकता वैकालको हुआ करती है। कथकता शब्दसे भारतमें कथक-कट क पुराणादि धर्मशास्त्रोक्त उपाख्यानोंकी वर्णनाका बोध होता है। कथकताको सृष्टि चलनेका कारण क्या है? इस देशके लोग प्रायः सवेरे नाना कार्यों में व्यस्त रहते हैं। विशेषतः संस्कृतभाषामें होनेवाला पाठ साधारण व्यक्ति समझ नहीं सकते। किन्तु कथकता उससे अलग है। इसमें आडम्बर, विलक्षण सङ्गीतविद्या और सहज ही लोगोंके मन रिझानको क्षमताका होना प्रावश्यक है। कथकता देशको सरल भाषामें होमेसे सबको अच्छी लगती है। मीठी बातोंमें लोगोंको धर्मापदेश देने के लिये यह एक सहज उपाय है। किसी श्रेणीके व्यक्ति क्यों न रहे, कथकता सभीको प्रिय है। कथक गुणवान होनेसे लोग सहजमें ही खिंच जाते हैं। बङ्गालमें प्रायः सौ वर्षसे कथ-कताका प्रभाव बढ़ गया है। बङ्गालमें गदाधर और रामधन शिरोमणिने नये ढङ्गमें कथकताको प्रचार किया था। गदाधर शिरोमणि वधमान जिलेके सोनामुखी ग्राममें रहते थे। राढ़ पच्चलके प्राय सब कथक उनके शिष्य वा प्रशिष्य थे। उनमें प्रायः सभी सक्त शिरोमणिको बनायी । चर्णिके अनुसार कथकता करते थे। रामधन गोबरडांगके निवासी रहे। उनके अनेक ख्यातनामा शिष्य थे। उनके मध्य रामधनके ही भ्रातुष्पुत्र धरणि वङ्गदेशमें प्रसिद्ध हैं। धरणिका कण्ठ जैसा मधुर वैसा ही सङ्गीतविद्यामें ज्ञान भी प्रखर था। इससे जिसने एकबार उनकी कथाको सुना, वह उन्हें पहनामें फिर भूल न सका। कलकत्ते और {{Multicol-break}} इस नगरके निकटवर्ती लोग रामधनको चर्णिको पकड़ कथकता किया करते हैं। कथकताको चूर्णि को 'साट' कहते हैं। चर्णिमें मध्य मध्य कथकके कुछ आवश्यकीय सत रहते, जैसे-भी० उ० अर्थात् भीष्म उवाच या भीष्म कहते हैं। चर्णि के अतिरिक्त कथकको रात्रिवर्णना, मध्याह्नवर्णना, ग्रीष्मवर्णना, वसन्तवर्णना, देशवर्णना, वेश्यावर्णना प्रभृति मुखस्थ रखना पड़ता है। वर्णनाका स्वतन्त्र पुस्तक भी रहता है। इस वर्णनामें अनुप्रासका आडम्बर अधिक होता है। कथकताके समय आवश्यक वर्णना प्रयोग की जाती है। कथकता प्रारम्भ करते वेदीमें शालग्रामशिलाको रख कथक बैठते हैं। पहले मङ्गलाचरणपूर्वक कथाको सूचना होती है। फिर कथक कथकताका विषय बताते हैं। कथकका एकान्त कर्तव्य लोगोंके मनको मिलाने पर विशेष लक्ष्य रखना है। इस देशमें महाभारत, रामायण और भागवतकी कथकता होती है। जिस ग्रन्थको वर्णना चलती प्रति दिन उससे एक-एक विषयको कथकता निकलती है। इसी कथनीय विषयको कोई कोई 'पाला' भी कहता है, जैसे-वामन भिक्षा, ध्र पचरित्र, प्रसादचरित्र इत्यादि। ७०।८० वर्ष पहले बङ्गालमें कथकताका बड़ा आदर रहा। उस समय अनेक अच्छे अच्छे कथक विद्यमान थे। प्रवीण लोग कथकताके पक्षमें रहे। क्या राजा, क्या मध्यवित्त और क्या दरिद्र-सभीको कथकता सुनना अच्छा लगता था। आजकल कथ-कताका वैसा समादर देख नहीं पड़ता। दो-एकके अतिरिक्त अच्छे कथक भी अब दुर्लभ हैं। कथक्कड़ (f'० पु०) विज्ञ कथक, खुब किस्म कहनेवाला। कथऋथिक (सं० त्रि०) कथं कथमिति पृष्टत्वेनास्त्यस्य, कथम्-कथम् बाहुलकात् ठन्। प्रष्टा, पूछनेवाला, जो हमेशा सवाल किया करता हो। कथाथिकता (सं० स्त्री०) कथाथिकस्य भावः कथाथिक-सल-टाप। प्रन, जिज्ञासा, पूछताछ, सवाल. करते रहनेको हालत।<noinclude></noinclude> a6k1d75i9wrdaao9l5e1spp2fusurhd पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/६७८ 250 76262 668329 609421 2026-07-20T04:13:16Z अंजली राजभर 4516 /* शोधित */ 668329 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अंजली राजभर" />{{rh||कधङ्क्र्मा-कथा|६७७}}</noinclude>{{multicol|line=1px solid black}} कथइर्मा (सं० वि०) किस प्रकार काय करनेवाला,कैसे काम चलानेवाला। कथवार (सं० अव्य० ) कथम्-क-णमुल । किसप्रकार,किस तौरसे, कैसे करके। कथञ्चन (सं० अव्य०) कथम्-चन। किसी प्रकार नहीं, किसी तौरसे नहीं। कथञ्चित् (सं० अव्य०) १ किञ्चित्, कुछ। २ कीसी प्रकार, किसी तौरसे, बमुश्किल । कथन (सं० लो०) कथ भावे ल्य ट्। १ कथा, वाक्य,बयान्। (त्रि०) २ करनेवाला, बड़बड़िया, जो बहुत बात करता हो। कथना (हिं० क्रि०) १ कथन करना, कहना । २ काव्यरचना करना, शेर बनाना । ३ निन्दा निकालना, हिकारत करना। कथनी (हिं० स्त्री० ) १ कथन, बातचीत । २ वकवाद, बड़बड़ाहट। कथनीय (सं० त्रि०) कथ-अनीयर । तव्यत्तव्यानौयरः । पा ३।१।९६ । वक्तव्य, बयान् करने या कहने लायक । २ सम्बन्धके योग्य, जो नाम रखने काबिल हो। ३ निन्दनीय, खराब। कथन्ता (सं० स्त्री०) जिज्ञासा, पूछताछ। कथम्, <small>कथं देखो।</small> कथमपि (सं० अव्य०) कथञ्च पपिच, इन्द०। १ किसी प्रकार, किसी भी तौरसे। २ अति यत्नसे, बड़ी मुश्किल में। ३ पति कष्टस, बडी तकलीफ में। ४ प्रति गौरवसे, बड़े बारमें। ५ दृढ़रूपसे, पक्के तौरपर। कथम्प्रमाण (सं० वि०) किस प्रमाणवाला, कौनसी नापका। कथम्भाव (सं० पु०) कथम् भू-घञ्। कैसी स्थिति,कौनसी हालत। कथम्भत (सं० त्रि०) कथम् भू-त । १ किस रूप वाला, कौनसी सूरत रखनेवाला। २ किसप्रकार उत्पन्न हुआ, किस तौरपर पैदा। कथयान (सं० वि०) कथन करनेवासा, कहते हुआ, जो बोल रहा हो। </Small>Vol. III. . 170{{gap}}{{gap}} {{Multicol-break}} कवयितव्य (सं०वि०) कथ-णिच-तव्य । वक्तब्ध, कहने लायक, जो कहा जा सकता हो। कथरी (सं० स्त्री०) १ कन्यारी, नागफनी। (हिं०)२ वस्त्र-विशेष, एक कपड़ा। कथरी पुराने चिथड़ोंको जोड़ जोड़ बनायो और ओढ़ी या बिछायी जाती है। प्रायः दरिद्र इसे व्यवहार करते हैं। किन्तु कुछ वर्ष पहले भारतम कथरीका बड़ो चास रहो। कथरी बिछाने में मुलायम और ठण्डी रहती है। गरमौके दिनों कथरीपर सोना बहुत अच्छा लगता है। कथा (सं० स्त्री०) कथ-अड-टाए। <Small>चितिपूनिकविकुचि-चर्चिय। पा ३।३।१०५।</small> १ प्रबन्धकी बहु मिथ्या एवं अल्पसत्यपूर्ण कल्पना, किस्सा, कहानी। २ तक, बहस । <Small>“तत्त्वनिर्णयविजवान्यवरखरूपयोगान्धावानुमवधचनसन्दर्भ: कथा।" (गौतमत्ति १।४१)</small> पदार्थके यथार्थ निश्चय किंवा प्रतिपक्षक पराजय प्रयोजक वाक्यका ही नाम कथा है। न्यायदर्शनके मतमें कथा विविध होती है- वाद, जल्प और वितण्डा। नैयायिक उन्हों व्यक्तियों को कथाका अधिकारी समझते-जो श्रवणेन्द्रिय प्रतिमें कोई कोई दोष नहीं रखते, साधारण लोगोंका स्वीकृत वाक्य मानने में तकै उठानेसे डरते, प्रकलहकारो रहते स्त्रीय वार्तामें साधारणका विश्वास बढ़ानेको युक्ति आदि कहते और यथार्थ निर्णयमें समर्थ पड़ते अथवा विपक्षक पराजयको कामना करते हैं। <Small>"कथाधिकारिस्त तत्त्वनिर्णयविजयान्चतराभिलाषिणः सर्वजनसिद्धानुभवापलापिनः श्रवचादि- पटव: अकलाकारिणः कचौपथिकव्यापारसमाः।” (गौतमचि १।४१)</small> किसी किसी मतमें वादिप्रतिवादीके पक्ष और पतिपक्षका परिग्रह कथा कहाता है। <Small>{{center|<poem>"वादिप्रतिवादिना पचप्रतिपचपरिग्रहः कया।"</poem>}}{{right|(सर्वदर्शनस यह-पचपा० द०)}}</small> ३ वार्ता, बात। ४ वाक्य, जुमला। ५ विवरण, वयान्, तफसील। ६ धर्मालोचना, मजहबी बयान् । ७ उपन्यास विशेष, किसी किस्मका दास्तान्। इसमें पूर्वपीठिका और उत्तरपौठिका रहती है। पूर्व-पीठिका एक कथक कहता है। अनेक श्रोता उसे उत्साह प्रदान करते हैं। कथक वा वक्ता सब कथा कहता है। कथा समाप्त होनेसे उत्तरपीठिका पंडती<noinclude></noinclude> 7q7llrdkugank5mksv87qiarl3qkky6 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/४७५ 250 76279 668300 609199 2026-07-20T02:02:19Z AMAN KUMAR 6475 /* शोधित */ 668300 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="AMAN KUMAR" /></noinclude>{{rh|'''४७४'''|'''एकादशी'''|}} {{Multicol|line=1px solid black}} <div style="text-align: justify;"> सभी समान अधिकार रखते हैं। नित्य उपवासमें रवि शुक्रादिका दोष मानना आवश्यक नहीं। अष्टम वर्षसे अशीति वत्सर पर्य्यन्त मानव इस उपवासका अधिकारी है। विधवा समुदय एकादशी पर नित्य अधिकार रखती हैं। उनके लिये मलमासादि कोई दोष बाधा नहीं देता। एकादशीके उपवासका विधि—पारणके दिन द्वादशी मिलनेसे पूर्णा छोड़ खण्डा एकादशीमें गृहस्थको उपवास करना चाहिये। किन्तु वशा न होनेसे गृही पूर्णाके एवं दूसरे और विधवा आनेवाले दिन उपवास करें। जो एकादशी उदयके दो दण्ड पहले लगती, उसीको पूर्णा संज्ञा पड़ती है। पूर्व दिन दशमी और पर दिन द्वादशी युक्त रहनेसे परदिनको ही उपवास कर्त्तव्य है। अरुणोदय कालपर दशमी होनेसे विद्धा एकादशी कहाती है। विद्धा एकादशीको उपवास करना न चाहिये। ऐसी अवस्थामें द्वादशीको उपवास रख त्रयोदशीको पारण करना उचित है। हरिभक्तिविलासके मतसे उपवासकी व्यवस्था—वैष्णवको उपवासके पूर्वदिन प्रातःस्नान कर धौतवस्त्र परिधान प्रभृति सुवेश करना चाहिये। उसके बाद— {{block center|<poem> "दशमीदिनमारभ्य करिष्येऽहं व्रतं तव। त्रिदिनं देवदेवेश निर्विघ्नं कुरु केशव॥" </poem>}} हे देवदेवेश केशव ! मैं दशमीसे तुम्हारा व्रत करूंगा। इन तीन दिनों मुझे निर्विघ्न रखो। उक्त मन्त्रको पढ़ महोत्सवके सहकारसे सङ्कल्प करना चाहिये। हरिदिनको क्षारलवण छोड़ एकवार मात्र हविष्यान्न खाते, मृत्तिकाशयनपर सो जाते और स्त्रीसङ्गसे दूर रह पुरुषोत्तमका स्मरण करते अवस्थान लगाते हैं। स्कन्दपुराणमें दशमीको कांस्यपात्र, मांस, मसूर, मधु, मिथ्यावाक्य, दो बार भोजन, परिश्रम और पारणके दिन न किया जानिवाला सकल कार्य निषिद्ध कहा है। देवलौक्त उपवासके दिनका कर्त्तव्य—उत्तरास्य होने पर जलपूर्ण उडुम्बरपात्र ग्रहणपूर्वक निम्नोक्त मन्त्रपाठ सहकारसे </div> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <div style="text-align: justify;"> तीन अञ्जलि पुष्पदान एवं मन्त्रपूत जलपान कर उपवास रखना चाहिये। मन्त्र— {{block center|<poem> "एकादश्यां निराहारो स्थित्वाहमपरेऽहनि। भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥" </poem>}} हे पुण्डरीकाक्ष अच्युत ! मैं एकादशीको निराहार रह परदिन भोजन करूंगा। तुम मेरे आश्रय बनो। दोनों पक्षकी एकादशीको निराहार रह, समाहितचित्त बन, सम्यक् विधानके अनुसार स्नान कर, स्नानके अन्तमें धौत वस्त्र पहन, जितेन्द्रियता पकड़ और पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, बहुविध उपहार, जल, होम, प्रदक्षिण, स्तोत्र, मनोरम नृत्यगीत एवं वाद्यादि सहकारसे यथाविधि विष्णुको पूज रात्रिके समय जागरण रखना चाहिये। स्कन्दपुराणमें भी रात्रिके जागरणकी व्यवस्था इसी प्रकार लिखी है। विशेषतः रात्रिके प्रत्येक प्रहर हरिकी आरति करनेका विधान है। पारणके दिन कर्त्तव्य-सम्बन्धमें कात्यायनके मतानुसार प्रातःकाल स्नान और श्रीहरिकी पूजा समापन कर निम्नलिखित मन्त्र पढ़ना चाहिये। {{block center|<poem> "अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव। प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदृष्टिप्रदो भव॥" </poem>}} हे नाथ केशव ! इस व्रतके द्वारा प्रसन्न हो तुम अज्ञानतिमिरान्धको ज्ञानदृष्टि दो। यही मन्त्र पढ़ उपवास समर्पण करते हैं। उसके पीछे हरिको स्मरण कर व्रतकी सिद्धिके लिये पारण कर्त्तव्य है। जो व्यक्ति पारणके दिन द्वादशी अतिक्रम कर त्रयोदशीको खाता, वह शतजन्म पर्य्यन्त नरकवास पाता है। द्वादशी अल्पक्षण स्थायी रहनेसे अरुणोदयको और अत्यल्प होनेसे निशीथ कालके बाद पारण करना चाहिये। स्कन्दपुराणमें यह सकल द्रव्य द्वादशीको निषिद्ध कहे हैं—मधु, मांस, सुरा, तैल, व्यायाम, क्रोध, मैथुन, परान्न, कांस्यपात्र, ताम्बूल, लोभ, निर्माल्यलङ्घन, मिथ्यावाक्य, प्रवास, दिवास्वप्न, अञ्जन, शिलापिष्ट द्रव्य, मसूर, द्यूतक्रीड़ा, हिंसा, चना, कोरदूषक और औषध। एकादशीको उपवासमें असमर्थ होनेपर पुत्र अथवा </div> {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> mubcy9574tk5abmy5jeff4lzq2ghas4 पृष्ठ:हिंदी विश्वकोष भाग ३.djvu/५२९ 250 76358 668274 667393 2026-07-19T17:53:17Z आदेश यादव 3609 668274 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|'''५२८'''|'''ओद्वारमान्धाता—ओङ्कारेश्वर'''}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>स्थानपर गगनस्पर्शी मन्दिरको चूड़ा टूट गई है। कहीं अत मन्दिरभवन विध्वस्त हो जानेसे कुछ र मालको वासभूमि बना है। कहीं भन्न देवदेवको मूर्ति भूमिमें गड़ी पड़ी है। उक्त दृश्य धर्मनिष्ठ हिन्दु वोंके प्राण व्यथित कर डालता है। पर्वतके ऊपर सिद्धेश्वर महादेवके सुरम्य मन्दिरका भङ्गावशेष देखने में आता है। इस मन्दिरको चारो ओर चार द्वार हैं। प्रत्येक द्वारके सम्मुख १४ फोट उच्च एवं १४ स्तम्भविशिष्ट द्वारप्रकोष्ट खड़ा है । मन्दिरको भित्तिके प्रस्तर में पंक्तिपर हाथी षक्ति है। पान कल केवल दो हाथो प्रकृत आकार में देख पड़ते, अपर विकत ही गये हैं। इस मन्दिरसे थोड़ी दूर मौरी- सोमनाथका मन्दिर है। इसी मन्दिरको अवस्था अति शोचनीय है किन्तु मन्दिर में दर्शन करने कितने ही लोग पाते हैं। श्वाखण्ड में लिखा है- “सोमनाथ' ततो विद्धि कल्पना तौरमाश्रितम् । सोमेनाराधितं तीर्थ' भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥" (एष० ) सोमनाथ नर्मदा नदीवे तोर विद्यमान है।चन्द्र इस तीर्थ की आराधना को थी । यह तोथ भोग और मोचफलदायक है। स्थानीय पूजक कहते पहले सोमनाथ तव थे। मुसलमानोंके ध्वस करने आने पर यह मूर्ति प्रति- विम्बित हुई। उसी प्रतिविम्ब में शूकरका बच्चा देख पढ़ा था। फिर वही विधर्मी मुसलमान क्रोधसे अधीर ही और सोमनाथको चग्निमें फेंक चल दिये। उसो समय सोमनाथ कृष्णवर्य बन गये हैं। सोमनाथ मन्दिर सम्म हरे पत्थरको एक उत् मन्दोमूर्ति है। सुखसमानोंने उसका [मत्या तोड़ डाला है। मान्धाता होप में प्रायः समस्त हो शिवमन्दिर हैं । किन्तु इससे थोड़ी दूर उत्तर नर्मदा किनारे शिव- मन्दिर व्यतीत अनेक विष्णु और जेन देवदेवोके मन्दिर बने हैं। नर्मदा द्विधारा होनेकी जगह मुखपर अनेक बड़े-बड़े मन्दिर विद्यमान हैं। उनमें २४ चतुर्भुज विष्णुमूर्ति है। इसके पतिरिक्त विष्णु के दशावतारको मूर्ति भी देख पड़ती है। एक मन्दिरमें विष्णुको {{Multicol-break}} वृहदाकार महावराहमूर्ति है। उसो मन्दिर में १३४६ ई० को एक शिवलिङ्ग प्रतिष्ठित हुआ था । उससे थोड़ी दूर रावण नाला है। इस नालेके मध्य साढ़े अट्ठारह फोट उच्च काले पत्थरको एक मूर्ति है। इस मूर्ति के दम हाथ और एक सुरह है। कोई-कोई इसे रावणको मूर्ति बताया करते हैं। किन्तु वह बात ठोक नहीं। क्योंकि राज्यको मूर्ति रहने सम्भवतः दश मुण्ड और बौस हाथ होते । यह वसनि महाकालीको मूर्ति है । वचः स्थलपर वृश्चिक, वाम पार्श्वपर इन्दुर और पाददेशपर भन्न शिव पड़े हैं। नदीसे थोड़ी दूर दूसरे भी कई जैन मन्दिर विद्य मान हैं। इन सफल मन्दिरोंमें जेन देवदेवीको कितनी ही मूर्ति देख पड़ती हैं। मन्दिरोंपर जैन धर्म चक्रादिको प्रतिकृति खुदी है। पहले यह स्थान भील राजावोंके अधिकार में रहा। मान्धाता के एक राजा भारतसिंह नामक चौहान राजपूत को अपना आदिपुरुष बताते हैं । ११६५. ईको उन्होंने नाथू भोसको हरा मान्धाता पधि- कार किया था। उन्होंने नाथू भोलको कन्यासे फिर विवाह कर लिया । आज भी श्रोङ्कार से थोड़ी दूर पहाड़ के उत्तर कई प्राचोन मन्दिर नाथकेश धके अधीन है। नाथू भोलके समय दुर्जयनाथ नामक एक गोसाई पोवारको पूजा करते रहे। यहां प्रवाद है उस समय कालभैरव और महाकालो दोनों नरमांस खाते, उसो भयसे तीर्थ-यात्री यहां न थे। यात्रियों के हितार्थ दुर्जयनाथने तपोबल से काली- देवीको रिझा गुहाके मध्य स्थापित किया । किन्तु कालस्वरूप कालभैरव में दस हुये न थे। दुर्जय- नाथने उनके सन्तोषाय नरवलिका प्रबन्ध कर दिया। फिर कालभैरव नरवलि लेने पाये रहे । अवशेष १८२४ ई०को अंगरेज़ कर्मचारियोंके यत्नसे यह प्रथा बन्द । दुर्जयनाथ के शिष्य परम्परासे योङ्कारको हुई पूजा करते चले जाते हैं प्रति वर्ष कार्तिक मासमें श्रोङ्कारजीका महोत्सव होता है। धोद्वारा (सं० [स्त्री०) बुचमनिविशेष पोङ्कारेश्वर - बम्बई प्रान्तके पूना नगरका एक शिव-<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> kx5o2l0j7w85wf7iirbemoaqz8f8pjk 668279 668274 2026-07-19T18:09:04Z आदेश यादव 3609 668279 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५२८|ओङ्कारमान्धाता—ओङ्कारेश्वर}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>स्थानपर गगनस्पर्शी मन्दिरकी चूड़ा टूट गई है।‌ कहीं अलङ्कृत मन्दिरभवन विध्वस्त हो जानेसे कुक्कुर‌ श्रृगालकी वासभूमि बना है। कहीं भम्न देवदेवकी मूर्ति भूमिमें गड़ी पड़ी है। उक्त दृश्य धर्मनिष्ठ हिन्दुवोंके प्राण व्यथित कर डालता है। पर्वतके ऊपर‌ सिद्धेश्वर महादेवके सुरम्य मन्दिरका भङ्गावशेष देखनेमें आता है। इस मन्दिरकी चारो ओर चार‌ द्वार हैं। प्रत्येक द्वारके सम्मुख १४ फीट उच्च एवं‌ १४ स्तम्भविशिष्ट द्वारप्रकोष्ट खड़ा है। मन्दिरकी भित्तिके प्रस्तरमें पंक्ति–पंक्तिपर हाथी अङ्कित है। आज–कल केवल दो हाथी प्रकृत आकारमें देख पड़ते,‌ अपर विकृत ही गये हैं। इस मन्दिरसे थोड़ी दूर‌ गौरी–सोमनाथका मन्दिर है। इसी मन्दिरकी अवस्था अति शोचनीय है। किन्तु मन्दिरमें दर्शन करने‌ कितने ही लोग आते हैं। रेखाखण्ड में लिखा है— {{blockcenter|{{smaller|<poem>"सोमनाथं ततो विद्धि कल्पना तीरमाश्रितम्। सोमेनाराधितं तीर्थं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥" (९अ॰)</poem>}}}} सोमनाथ नर्मदा नदीवे तोर विद्यमान है।चन्द्र इस तीर्थ की आराधना को थी । यह तोथ भोग और मोचफलदायक है। स्थानीय पूजक कहते पहले सोमनाथ तव थे। मुसलमानोंके ध्वस करने आने पर यह मूर्ति प्रति- विम्बित हुई। उसी प्रतिविम्ब में शूकरका बच्चा देख पढ़ा था। फिर वही विधर्मी मुसलमान क्रोधसे अधीर ही और सोमनाथको चग्निमें फेंक चल दिये। उसो समय सोमनाथ कृष्णवर्य बन गये हैं। सोमनाथ मन्दिर सम्म हरे पत्थरको एक उत् मन्दोमूर्ति है। सुखसमानोंने उसका [मत्या तोड़ डाला है। मान्धाता होप में प्रायः समस्त हो शिवमन्दिर हैं । किन्तु इससे थोड़ी दूर उत्तर नर्मदा किनारे शिव- मन्दिर व्यतीत अनेक विष्णु और जेन देवदेवोके मन्दिर बने हैं। नर्मदा द्विधारा होनेकी जगह मुखपर अनेक बड़े-बड़े मन्दिर विद्यमान हैं। उनमें २४ चतुर्भुज विष्णुमूर्ति है। इसके पतिरिक्त विष्णु के दशावतारको मूर्ति भी देख पड़ती है। एक मन्दिरमें विष्णुको {{Multicol-break}} वृहदाकार महावराहमूर्ति है। उसो मन्दिर में १३४६ ई० को एक शिवलिङ्ग प्रतिष्ठित हुआ था । उससे थोड़ी दूर रावण नाला है। इस नालेके मध्य साढ़े अट्ठारह फोट उच्च काले पत्थरको एक मूर्ति है। इस मूर्ति के दम हाथ और एक सुरह है। कोई-कोई इसे रावणको मूर्ति बताया करते हैं। किन्तु वह बात ठोक नहीं। क्योंकि राज्यको मूर्ति रहने सम्भवतः दश मुण्ड और बौस हाथ होते । यह वसनि महाकालीको मूर्ति है । वचः स्थलपर वृश्चिक, वाम पार्श्वपर इन्दुर और पाददेशपर भन्न शिव पड़े हैं। नदीसे थोड़ी दूर दूसरे भी कई जैन मन्दिर विद्य मान हैं। इन सफल मन्दिरोंमें जेन देवदेवीको कितनी ही मूर्ति देख पड़ती हैं। मन्दिरोंपर जैन धर्म चक्रादिको प्रतिकृति खुदी है। पहले यह स्थान भील राजावोंके अधिकार में रहा। मान्धाता के एक राजा भारतसिंह नामक चौहान राजपूत को अपना आदिपुरुष बताते हैं । ११६५. ईको उन्होंने नाथू भोसको हरा मान्धाता पधि- कार किया था। उन्होंने नाथू भोलको कन्यासे फिर विवाह कर लिया । आज भी श्रोङ्कार से थोड़ी दूर पहाड़ के उत्तर कई प्राचोन मन्दिर नाथकेश धके अधीन है। नाथू भोलके समय दुर्जयनाथ नामक एक गोसाई पोवारको पूजा करते रहे। यहां प्रवाद है उस समय कालभैरव और महाकालो दोनों नरमांस खाते, उसो भयसे तीर्थ-यात्री यहां न थे। यात्रियों के हितार्थ दुर्जयनाथने तपोबल से काली- देवीको रिझा गुहाके मध्य 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भङ्गावशेष देखनेमें आता है। इस मन्दिरकी चारो ओर चार‌ द्वार हैं। प्रत्येक द्वारके सम्मुख १४ फीट उच्च एवं‌ १४ स्तम्भविशिष्ट द्वारप्रकोष्ट खड़ा है। मन्दिरकी भित्तिके प्रस्तरमें पंक्ति–पंक्तिपर हाथी अङ्कित है। आज–कल केवल दो हाथी प्रकृत आकारमें देख पड़ते,‌ अपर विकृत ही गये हैं। इस मन्दिरसे थोड़ी दूर‌ गौरी–सोमनाथका मन्दिर है। इसी मन्दिरकी अवस्था अति शोचनीय है। किन्तु मन्दिरमें दर्शन करने‌ कितने ही लोग आते हैं। रेखाखण्ड में लिखा है— {{blockcenter|{{smaller|<poem>"सोमनाथं ततो विद्धि कल्पना तीरमाश्रितम्। सोमेनाराधितं तीर्थं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥" (९अ॰)</poem>}}}} सोमनाथ नर्मदा नदीके तीर विद्यमान है। चन्द्रने‌ इस तीर्थकी आराधना की थी। यह तीर्थ भोग और मोक्षफलदायक है। स्थानीय पूजक कहते, पहले सोमनाथ श्वेतवर्ण थे। मुसलमानोंके ध्वंस करने आने पर यह मूर्ति प्रतिविम्बित हुई। उसी प्रतिविम्बमें शूकरका बच्चा देख‌ पड़ा था। फिर वही विधर्मी मुसलमान क्रोधसे अधीर हो और सोमनाथको अग्निमें फेंक चल दिये।‌ उसी समय सोमनाथ कृष्णवर्ण बन गये हैं। सोमनाथ मन्दिर सम्मुख हरे पत्थरकी एक वृहद नन्दीमूर्ति है। मुखसमानोंने उसका मत्था तोड़ डाला है। मान्धाता द्वीपमें प्रायः समस्त ही शिवमन्दिर हैं। किन्तु इससे थोड़ी दूर उत्तर नर्मदा किनारे शिवमन्दिर व्यतीत अनेक विष्णु और जैन देवदेवीके मन्दिर बने हैं। नर्मदा द्विधारा होनेकी जगह मुखपर अनेक बड़े–बड़े मन्दिर विद्यमान हैं। उनमें २४ चतुर्भुज विष्णुमूर्ति है। इसके अतिरिक्त विष्णुके दशावतारकी मूर्ति भी देख पड़ती है। एक मन्दिरमें विष्णुकी {{Multicol-break}} वृहदाकार महावराहमूर्ति है। उसो मन्दिर में १३४६ ई० को एक शिवलिङ्ग प्रतिष्ठित हुआ था । उससे थोड़ी दूर रावण नाला है। इस नालेके मध्य साढ़े अट्ठारह फोट उच्च काले पत्थरको एक मूर्ति है। इस मूर्ति के दम हाथ और एक सुरह है। कोई-कोई इसे रावणको मूर्ति बताया करते हैं। किन्तु वह बात ठोक नहीं। क्योंकि राज्यको मूर्ति रहने सम्भवतः दश मुण्ड और बौस हाथ होते । यह वसनि महाकालीको मूर्ति है । वचः स्थलपर वृश्चिक, वाम पार्श्वपर इन्दुर और पाददेशपर भन्न शिव पड़े हैं। नदीसे थोड़ी दूर दूसरे भी कई जैन मन्दिर विद्य मान हैं। इन सफल मन्दिरोंमें जेन देवदेवीको कितनी ही मूर्ति देख पड़ती हैं। मन्दिरोंपर जैन धर्म चक्रादिको प्रतिकृति खुदी है। पहले यह स्थान भील राजावोंके अधिकार में रहा। मान्धाता के एक राजा भारतसिंह नामक चौहान राजपूत को अपना आदिपुरुष बताते हैं । ११६५. ईको उन्होंने नाथू भोसको हरा मान्धाता पधि- कार किया था। उन्होंने नाथू भोलको कन्यासे फिर विवाह कर लिया । आज भी श्रोङ्कार से थोड़ी दूर पहाड़ के उत्तर कई प्राचोन मन्दिर नाथकेश धके अधीन है। नाथू भोलके समय दुर्जयनाथ नामक एक गोसाई पोवारको पूजा करते रहे। यहां प्रवाद है उस समय कालभैरव और महाकालो दोनों नरमांस खाते, उसो भयसे तीर्थ-यात्री यहां न थे। यात्रियों के हितार्थ दुर्जयनाथने तपोबल से काली- देवीको रिझा गुहाके मध्य स्थापित किया । किन्तु कालस्वरूप कालभैरव में दस हुये न थे। दुर्जय- नाथने उनके सन्तोषाय नरवलिका प्रबन्ध कर दिया। फिर कालभैरव नरवलि लेने पाये रहे । अवशेष १८२४ ई०को अंगरेज़ कर्मचारियोंके यत्नसे यह प्रथा बन्द । दुर्जयनाथ के शिष्य परम्परासे योङ्कारको हुई पूजा करते चले जाते हैं प्रति वर्ष कार्तिक मासमें श्रोङ्कारजीका महोत्सव होता है। धोद्वारा (सं० [स्त्री०) बुचमनिविशेष ओङ्कारेश्वर - बम्बई प्रान्तके पूना नगरका एक शिव-<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> jh5hn6cm7uw76tboc8zs0dfggunnwnj 668285 668284 2026-07-19T18:34:58Z आदेश यादव 3609 668285 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५२८|ओङ्कारमान्धाता—ओङ्कारेश्वर}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>स्थानपर गगनस्पर्शी मन्दिरकी चूड़ा टूट गई है।‌ कहीं अलङ्कृत मन्दिरभवन विध्वस्त हो जानेसे कुक्कुर‌ श्रृगालकी वासभूमि बना है। कहीं भम्न देवदेवकी मूर्ति भूमिमें गड़ी पड़ी है। उक्त दृश्य धर्मनिष्ठ हिन्दुवोंके प्राण व्यथित कर डालता है। पर्वतके ऊपर‌ सिद्धेश्वर महादेवके सुरम्य मन्दिरका भङ्गावशेष देखनेमें आता है। इस मन्दिरकी चारो ओर चार‌ द्वार हैं। प्रत्येक द्वारके सम्मुख १४ फीट उच्च एवं‌ १४ स्तम्भविशिष्ट द्वारप्रकोष्ट खड़ा है। मन्दिरकी भित्तिके प्रस्तरमें पंक्ति–पंक्तिपर हाथी अङ्कित है। आज–कल केवल दो हाथी प्रकृत आकारमें देख पड़ते,‌ अपर विकृत ही गये हैं। इस मन्दिरसे थोड़ी दूर‌ गौरी–सोमनाथका मन्दिर है। इसी मन्दिरकी अवस्था अति शोचनीय है। किन्तु मन्दिरमें दर्शन करने‌ कितने ही लोग आते हैं। रेखाखण्ड में लिखा है— {{blockcenter|{{smaller|<poem>"सोमनाथं ततो विद्धि कल्पना तीरमाश्रितम्। सोमेनाराधितं तीर्थं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥" (९अ॰)</poem>}}}} सोमनाथ नर्मदा नदीके तीर विद्यमान है। चन्द्रने‌ इस तीर्थकी आराधना की थी। यह तीर्थ भोग और मोक्षफलदायक है। स्थानीय पूजक कहते, पहले सोमनाथ श्वेतवर्ण थे। मुसलमानोंके ध्वंस करने आने पर यह मूर्ति प्रतिविम्बित हुई। उसी प्रतिविम्बमें शूकरका बच्चा देख‌ पड़ा था। फिर वही विधर्मी मुसलमान क्रोधसे अधीर हो और सोमनाथको अग्निमें फेंक चल दिये।‌ उसी समय सोमनाथ कृष्णवर्ण बन गये हैं। सोमनाथ मन्दिर सम्मुख हरे पत्थरकी एक वृहद नन्दीमूर्ति है। मुखसमानोंने उसका मत्था तोड़ डाला है। मान्धाता द्वीपमें प्रायः समस्त ही शिवमन्दिर हैं। किन्तु इससे थोड़ी दूर उत्तर नर्मदा किनारे शिवमन्दिर व्यतीत अनेक विष्णु और जैन देवदेवीके मन्दिर बने हैं। नर्मदा द्विधारा होनेकी जगह मुखपर अनेक बड़े–बड़े मन्दिर विद्यमान हैं। उनमें २४ चतुर्भुज विष्णुमूर्ति है। इसके अतिरिक्त विष्णुके दशावतारकी मूर्ति भी देख पड़ती है। एक मन्दिरमें विष्णुकी {{Multicol-break}} वृहदाकार महावराहमूर्ति है। उसी मन्दिरमें १३४६ ई॰को एक शिवलिङ्ग प्रतिष्ठित हुआ था। उससे थोड़ी 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हितार्थ दुर्जयनाथने तपोबल से काली- देवीको रिझा गुहाके मध्य स्थापित किया । किन्तु कालस्वरूप कालभैरव में दस हुये न थे। दुर्जय- नाथने उनके सन्तोषाय नरवलिका प्रबन्ध कर दिया। फिर कालभैरव नरवलि लेने पाये रहे । अवशेष १८२४ ई०को अंगरेज़ कर्मचारियोंके यत्नसे यह प्रथा बन्द । दुर्जयनाथ के शिष्य परम्परासे योङ्कारको हुई पूजा करते चले जाते हैं प्रति वर्ष कार्तिक मासमें श्रोङ्कारजीका महोत्सव होता है। {{outdent|ओङ्कारा (सं॰ स्त्री॰) बुद्धशक्तिविशेष।}} {{outdent|ओङ्कारेश्वर—बम्बई प्रान्तके पूना नगरका एक शिव–}}<noinclude>{{Multicol-end}} {{smallrefs}}</noinclude> koi0v28qaye9y6itxfbxg6pwtzg2vlq 668287 668285 2026-07-19T18:59:45Z आदेश यादव 3609 668287 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="आदेश यादव" />{{rh|५२८|ओङ्कारमान्धाता—ओङ्कारेश्वर}} {{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>स्थानपर गगनस्पर्शी मन्दिरकी चूड़ा टूट गई है।‌ कहीं अलङ्कृत मन्दिरभवन विध्वस्त हो जानेसे कुक्कुर‌ श्रृगालकी वासभूमि बना है। कहीं भम्न देवदेवकी मूर्ति भूमिमें गड़ी पड़ी है। उक्त दृश्य धर्मनिष्ठ 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बन गये हैं। सोमनाथ मन्दिर सम्मुख हरे पत्थरकी एक वृहद नन्दीमूर्ति है। मुखसमानोंने उसका मत्था तोड़ डाला है। मान्धाता द्वीपमें प्रायः समस्त ही शिवमन्दिर हैं। किन्तु इससे थोड़ी दूर उत्तर नर्मदा किनारे शिवमन्दिर व्यतीत अनेक विष्णु और जैन देवदेवीके मन्दिर बने हैं। नर्मदा द्विधारा होनेकी जगह मुखपर अनेक बड़े–बड़े मन्दिर विद्यमान हैं। उनमें २४ चतुर्भुज विष्णुमूर्ति है। इसके अतिरिक्त विष्णुके दशावतारकी मूर्ति भी देख पड़ती है। एक मन्दिरमें विष्णुकी {{Multicol-break}} वृहदाकार महावराहमूर्ति है। उसी मन्दिरमें १३४६ ई॰को एक शिवलिङ्ग प्रतिष्ठित हुआ था। उससे थोड़ी दूर रावण–नाला है। इस नालेके मध्य साढ़े अट्ठारह फीट उच्च काले पत्थरकी एक मूर्ति है। इस मूर्तिके दश हाथ और एक मुण्ड है। कोई–कोई इसे रावणकी मूर्ति बताया करते हैं।‌ किन्तु वह बात ठीक नहीं। क्योंकि रावणकी मूर्ति रहने सम्भवतः दश मुण्ड और बीस हाथ होते। यह शिवसङ्गनी‌‌ महाकालीकी मूर्ति है। वक्ष:स्थलपर वृश्चिक, वाम पार्श्वपर इन्दुर और पाददेशपर नग्न शिव पड़े हैं। नदीसे थोड़ी दूर दूसरे भी कई जैन–मन्दिर विद्यमान हैं। इन सफल मन्दिरोंमें जैन देवदेवीकी कितनी ही मूर्ति देख पड़ती हैं। मन्दिरोंपर जैन धर्मके चक्रादिकी प्रतिकृति खुदी है। पहले यह स्थान भील राजावोंके अधिकारमें रहा। मान्धाताके एक राजा भारतसिंह नामक चौहान राजपूतको अपना आदिपुरुष बताते हैं। ११६५ ई॰को उन्होंने नाथू भीलको हरा मान्धाता अधिकार किया था। उन्होंने नाथू भीलकी कन्यासे फिर विवाह कर लिया। आज भी ओङ्कारसे थोड़ी दूर पहाड़के उत्तर कई प्राचीन मन्दिर नाथूके वंशधरोके अधीन है। नाथू भीलके समय दुर्जयनाथ नामक एक गोसाईं ओङ्कारकी पूजा करते रहे। यहां प्रवाद है—उस समय कालभैरव और महाकाली दोनों नरमांस खाते, उसी भयसे तीर्थ–यात्री यहां‌ आते न थे। यात्रियोंके हितार्थ दुर्जयनाथने तपोबलसे कालीदेवीको रिझा गुहाके मध्य स्थापित किया। किन्तु कालस्वरूप कालभैरव सहजमें तृप्त हुये न थे। दुर्जयनाथने उनके सन्तोषाय नरवलिका प्रबन्ध कर दिया। फिर कालभैरव नरवलि लेने आते रहे। अवशेष १८२४ ई॰को अंगरेज़ कर्मचारियोंके यत्नसे यह प्रथा बन्द हुई। दुर्जयनाथके शिष्य परम्परासे ओङ्कारकी पूजा करते चले जाते हैं। प्रति वर्ष कार्तिक मासमें ओङ्कारजीका महोत्सव होता है। {{outdent|ओङ्कारा (सं॰ स्त्री॰) बुद्धशक्तिविशेष।}} 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{{Multicol-break}} वृहदाकार महावराहमूर्ति है। उसी मन्दिरमें १३४६ ई॰को एक शिवलिङ्ग प्रतिष्ठित हुआ था। उससे थोड़ी दूर रावण–नाला है। इस नालेके मध्य साढ़े अट्ठारह फीट उच्च काले पत्थरकी एक मूर्ति है। इस मूर्तिके दश हाथ और एक मुण्ड है। कोई–कोई इसे रावणकी मूर्ति बताया करते हैं।‌ किन्तु वह बात ठीक नहीं। क्योंकि रावणकी मूर्ति रहने सम्भवतः दश मुण्ड और बीस हाथ होते। यह शिवसङ्गनी‌‌ महाकालीकी मूर्ति है। वक्ष:स्थलपर वृश्चिक, वाम पार्श्वपर इन्दुर और पाददेशपर नग्न शिव पड़े हैं। नदीसे थोड़ी दूर दूसरे भी कई जैन–मन्दिर विद्यमान हैं। इन सफल मन्दिरोंमें जैन देवदेवीकी कितनी ही मूर्ति देख पड़ती हैं। मन्दिरोंपर जैन धर्मके चक्रादिकी प्रतिकृति खुदी है। पहले यह स्थान भील राजावोंके अधिकारमें रहा। मान्धाताके एक राजा भारतसिंह नामक चौहान राजपूतको अपना आदिपुरुष बताते हैं। ११६५ ई॰को उन्होंने नाथू भीलको हरा मान्धाता अधिकार किया था। उन्होंने नाथू भीलकी कन्यासे फिर विवाह कर लिया। आज भी ओङ्कारसे थोड़ी दूर पहाड़के उत्तर कई प्राचीन मन्दिर नाथूके वंशधरोके अधीन है। नाथू भीलके समय दुर्जयनाथ नामक एक गोसाईं ओङ्कारकी पूजा करते 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black}}</noinclude></noinclude>राजा । इनके पुत्रका नाम पुण्यवन्त था । बौद्धों के अवदान ग्रन्थ में पुण्यवन्त के सम्बन्धपर कितनी ही कहानियां लिखी हैं ( महाववदान) । {{outdent|अञ्जनयुग्म (सं० क्लो० ) स्रोतोञ्जन और रसाञ्जन ।}} {{outdent|अञ्जनरस (सं० पु० ) सन्निपातज्वरका नास ।}} {{outdent|अञ्जनविधि (सं० पु० ) नेत्रप्रसाधन-क्रियाविशेष}} {{outdent|अञ्जनवेल - बम्बई प्रेसिडेन्सीके अन्तर्गत रत्नागिरि जिलेका एक बन्दर । अक्षां' १७' ३३ उ० और द्राघि० ७३° १३ पू० के मध्य में यह अवस्थित है । एक छोटी खाड़ी के पास अज्ञ्जनवेल नामक नदी किनारे यह बसा है। इस बन्दरसे प्रति वत्सर प्रायः साठ लाख रुपये के द्रव्यादि भेजे और प्राय: पैंतालीस लाख रुपये के द्रव्यादि मंगाये जाते हैं ।}} {{outdent| अञ्जनशलाका (सं० स्त्री० ) अञ्जनलेपनार्थ शलाका मध्यपदलोप- कर्मधा० । चक्षुमें अज्ञ्जन लगानेको शलाका, आंखमें सुरमा डालनेको मलाई । यह प्रायः ससा धातु से निर्मित और गुणसूची जैसी मोटी और बड़ी होतो, किन्तु दोनो मुखों पर ढालू रहती है।}} {{outdent| अञ्जना (सं० स्त्री० ) अञ्जन- आप् । १ वानरो- विशेष, हनूमान्‌को माता ।}} यह सुमेरु पर्व्वतके निकटस्थ प्रदेशवाले अधिपति केशरी वानरकी पत्नी थीं। इनके गर्भ और पवनके औरस से हनूमान्का जन्म हुआ । अञ्जना बड़ी धीर वीर नारी थी। कहते हैं, कि हनूमान् लङ्काविजय होनेके बाद जब फिर मातासे मिलने गये, तब अज्ञ्जनाने उन्हें तिरस्कार कर कहा, 'हनू ! तु धिक्कार है। तूने मेरा पुत्र होकर अतिसामान्य रावणके साथ युद्ध किया ! दश नखसे रावणके दश मुण्ड नोच रामको उपहार ला न सका ! सीताके साथ अशोकवनको उठा लानेमें असमर्थ हुआ ! समुद्र क्यों बांधा गया ? तेरे निज शरीर विस्तार कर सेतुस्वरूप बन जानेसे क्या काम न चलता ? तु धिक्कार, तू मेरा कुपुत्र है ।' २ काश्मीरको एक राणी, जो तोरमाणको पत्नी और वज्रन्द्रको कन्या थीं। इनके पुत्रका नाम प्रवरसेन रहा।<small>(राजतरङ्गिणी)</small> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ३ नदीविशष । कृष्णनगर जिले के अन्तर्गत बारुईहुदेसे दक्षिण और दोगाछिया और हंसखालौसे उत्तर यह नदी बही है। यात्रापुर के निकट अञ्जना नदो द्विधा बनी और आगे बढ़कर उभय धारा मामजोयानो ग्रामके निकट से दक्षिण पहुंचीं और अन्तमें हरधामसे उत्तर होकर चाकदहके निकट गङ्गा में मिल गई हैं। राजा रुद्रके समय यह नदी वह रहती थी । ४ दिग्हस्तिनौ । ५ आंखको फुन्सो । ६ दुरङ्गी छिपकली । ७ धान्य-विशेष । अञ्जनागिरि (सं० पु०) अञ्जनवर्णो गिरिः पर्वतः।<small> वनगिर्योः संज्ञायां कोटरकिंशुकादीनाम्। पा ६।३।११७।</small> नीलपर्वत। ​{{outdent| अञ्जनादि (सं० पु०) द्रव्यसमूह। अञ्जन, रसाञ्जन, नागपुष्प, प्रियङ्गु, नीलोत्पल, नलद, नलिन, केशर और मधूक। सुश्रुत के मत में इस द्रव्य का गुण रक्तपित्त, विष और दाहनाशक है। }} ​{{outdent| अञ्जनाद्रि (सं० पु०) अञ्जनमिव कृष्णवर्णः अद्रिः। नीलपर्वत। }} ​{{outdent| अञ्जनाधिका, अञ्जनिका (सं० स्त्री०) अञ्जनादधिका कृष्णवर्णत्वात् ५-तत्। १ अञ्जनिका, हलिनी, हलाहल। २ क्षुद्र मूषिका, छोटा चूहा। }} ​{{outdent| अञ्जनानन्दन (सं० पु०) अञ्जना के नन्दन, हनूमान्। }} ​{{outdent| अञ्जनाम्भ (सं० क्ली०) अञ्जन का पानी। }} {{outdent|अञ्जनावली (सं० स्त्री०) अञ्जन-मतुप्, मकारस्य वः। अञ्जनं विद्यते अस्याः अधिककृष्णवर्णत्वात्। १ ईशानकोण की दिग्हस्तिनी, सुप्रतीक नामक हस्ती की भार्या। कालाञ्जनी वृक्ष, कुटकी।}} {{outdent| अञ्जनिक (सं० वि०) १ अञ्जनसम्बन्धी। स्त्रियां टाप् अञ्जनिका। २ चूहा। ३ छिपकली। }} {{outdent| अञ्जनी (सं० स्त्री०) अन्ज्-ल्युट् कर्मणि, ङीप्। अज्यन्ते चन्दनकुङ्कुमादिभिरसौ। १ कुङ्कुमादि अनुलिप्त नारी। २ कालाञ्जनी वृक्ष, कुटकी। ३ वानरी-विशेष, हनूमान् की माता। ४ माया। ५ बिलनी, आँख की फुन्सी। }} {{outdent| अञ्जनेरी (अञ्जना-गिरि) — बम्बई प्रेसिडेन्सी का एक पर्वत। यह नासिक से दक्षिण-पश्चिम साढ़े सात... }} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 36ub3tqigxw75yoirans3oxen8x83zt पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२२२ 250 83411 668232 346724 2026-07-19T12:04:05Z Shivaniya shaw 4129 668232 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२१६'''|'''अञ्जर -अञ्जार'''}}</noinclude> कोसपर अवस्थित है। पर्वतके शिखर में एक देवी- मन्दिर है और इसमें कितने ही देवमन्दिरोंका भग्नावशेष देख पड़ता है। एक टूटे मन्दिरपर शक १०१६ में खोदी गई सेनचन्द्र नामक किसी यादवराजको एक लिपि देख पड़ती है। अज्ञ्जर-कच्छ प्रदेशका एक छोटा जिला । सन् १८१६ ई॰में कच्छराजने इसे ईष्ट इण्डिया कम्पनीको दे | दिया था। अब यह बम्बई-गवर्नमेण्ट के तत्त्वावधान में शासित होता है। यहां रत्नाल नामक एक ग्राम और रोहर नामक एक बन्दर है, किन्तु यह दोनो भूभाग जलशून्य हैं । २ अज्जर जिलेका प्रधान नगर। यह पर्वतके किनारे बना और कच्छोपसागर से कोई पांच कोस दूर है । अञ्जल – अञ्जलि देखो । अज्ञ्जलि (सं० पु० ) अञ्ज- अलिच् । अञ्ज रलिएँ । उण् ४।२। १ हस्तसम्पुट, अंजुरी । २ परिमाण विशेष, कुड़व । अज्ञ्जलिका (सं॰ स्त्री॰) अञ्जलिरिव कायति प्रकाशते — कै-क-टाप् । १ बालमूषिका, मुसरिया । २ लज्जालु, लाजवन्ती । यह भारतके उष्णप्रधान देशोंमें अधिक उत्पन्न होती है । दाक्षिणात्य में इसकी जड़ पेटके दर्दको औषध समझो जाती है । कुरुमण्डलमें | अर्श और भगन्दर होनेसे इसको पत्तीका चूर्ण दूधके साथ सवेरे खिलाया जाता है । पञ्जाबमें भी लोग इस औषधको इसी प्रकार सेवन करते हैं। रक्तपित्त बिगड़नेपर मुसलमान हकीमोंने इसे पाचक, स्वास्थप्रवर्द्धक और लाभदायक बताया है। भगन्दरके क्षतोंपर इसका रस भी लगाया जाता है । लोग इसको पत्तो टोने-टटकेसे तोड़ते हैं। पहले सप्ताह यह समस्त पित्तरोग और ज्वर, दूसरे सप्ताह अर्श, भगन्दर आदि और तीसरे सप्ताह कुष्ठादिको मिटा देती है। कोङ्कण प्रान्त में areefsue इसको पत्तीका पुलटिस बांधते और इसके रस और घोड़ेके पेशाब से अञ्जन बनाते, जो आंखें उठनेपर लगाया जाता है । बहुत खांसी आनेसे इसको जड़ गलेमें यन्त्रको भांति बांधते हैं । १३ जटामांसी ॥ लज्जालु लता, लज्जावती लता, पुत्तलिका, लाजवन्ती । अञ्जलिका देखो । २ वराहक्रान्ता । अज्ञ्जलिगत ( स ं० त्रि० ) अञ्जलिके भीतर, अञ्जलिमें रखा हुआ । अञ्जलिनो (सं० स्त्री० ) लज्जालुका, लाजवन्ती । अञ्जलिपुट (स ं० पु० ) अञ्जलिका पुट या: गड्ढा । अञ्जलिबद्द (सं० त्रि० ) अञ्जलि बांधे या हाथ जोड़े. हुए, विनम्र । अञ्जस (सं० क्लो० ) अन्जु गतौ मिश्रणे छ — असुन्। श्रजःसहोम्भस्तमसस्तृतीयायाः । पा शिशा अञ्जस उप- स ंख्यानम् । ( कात्या॰ वार्त्तिक) १ वेग, बल; जोर, ताकृत । २ औचित्य, मुनासिब बात । अज्जस (सं० त्रि० ) अन्ज असच् । सरल, ऋजु, अवक्र ; सीधा, टेढ़ा नहीं । स्त्रियां ङीप् । स्वर्णदीभेद । अञ्जसा (सं० अव्य०) १ द्रुत, शीघ्र ; जल्द, फ़ौरन । २ यथार्थ में, प्रकृतसे । श्रञ्जसाशब्द श्राख्यातस्तत्त्वतूर्णार्थयोरपि । (मेदिनी) । नाञ्जसा निगदितुं विभक्तिभिः । माघ १४|२३| अथवा अञ्जसा इति तृतीयान्तप्रतिरूपकमन्ययं तत्त्वार्थे । ( मल्लिनाथ ) अञ्जसायन (सं० त्रि० ) सोधा जानेवाला । अञ्जसोन (वै० त्रि०) सीधा जानेवाला । अज्जस्पा (वै० त्रि०) सोमरसको पीते हुए । अञ्जः सव (सं० पु० ) सोमका शीघ्र साधन, सोम- रसकी जल्द तय्यारी । अञ्जार - बम्बई प्रेसिडेन्सोके अन्तर्गत कच्छ प्रदेशका एक नगर । अक्षा' २३° ६ उ० और द्राघि० ७०° १० पू० के मध्य में यह अवस्थित है। इसको लोक- संख्या अठ्ठारह हजारसे कुछ ज्यादा है। नगर के बाहर एक मन्दिर देख पड़ता है । अजमेर वाले चौहानराजके भ्वाताको अश्वारूढ़ मूर्ति इस मन्दिर में विद्यमान है । सन् ई०वाले वें शताब्द के प्रारम्भ में अजयपाल, राज्यसे विताड़ित हो इस स्थानमें आ पहुंचे. और सन्यासधर्म अवलम्बनपूर्वक रहे थे । उन्होंके - नामसे अजार नामकी उत्पत्ति है । इस मन्दिरके व्ययनिर्वाहार्थं कितनी ही देवोत्तर भूमि लगी है ।<noinclude></noinclude> f7zx18t4yuttkzv2aq72ol7xuc1sjpq 668238 668232 2026-07-19T12:41:12Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 668238 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२१६'''|'''अञ्जर -अञ्जार'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid 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अर्श और भगन्दर होनेसे इसकी पत्तीका चूर्ण दूधके साथ सबेरे खिलाया जाता है। पञ्जाबमें भी लोग इस औषधको इसी प्रकार सेवन करते हैं। रक्तपित्त बिगड़नेपर मुसल्मान हकीमोंने इसे पाचक, स्वास्थ्यवर्द्धक और लाभदायक बताया है। भगन्दरके चतोंपर इसका रस भी लगाया जाता है। लोग इसकी पत्ती टोने-टटकेसे तोड़ते हैं। पहले सप्ताह यह समस्त पित्तरोग और ज्वर, दूसरे सप्ताह अर्श, भगन्दर आदि और तीसरे सप्ताह कुष्ठादिको मिटा देती है। कोङ्कण प्रान्तमें वृषणवृद्धिपर इसकी पत्तीका पुलटिस बांधते और इसके रस और घोड़ेके पेशाबसे अञ्जन बनाते, जो आंखें उठनेपर लगाया जाता है। बहुत खांसी आनेसे इसकी जड़ गलेमें यन्त्रकी भांति बांधते हैं। ३ जटामांसी। }} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent| अञ्जलिकारिका (सं० स्त्री०)<Small>द्विविधमञ्जलिः। पा ५।४।१०२।</Small>लज्जालु लता, लज्जावती लता, पुत्तलिका, लाजवन्ती।<Small>अञ्जलिका देखो।</Small>२ वराहक्रान्ता। }} {{outdent| अञ्जलिगत (सं० त्रि०) अञ्जलिके भीतर, अञ्जलिमें रक्खा हुआ। }} {{outdent| अञ्जलिनी (सं० स्त्री०) लज्जालुका, लाजवन्ती। }} {{outdent| अञ्जलिपुट (सं० पु०) अञ्जालिका पुट या गड्डा। }} {{outdent| अञ्जलिबद्ध (सं० त्रि०) अञ्जलि बांधे या हाथ जोड़े हुए, विनम्र। }} {{outdent| अञ्जस् (सं० क्ली०) अञ्जु गतौ म्रिप्रण्ये क्व — असुन्। <Small>ओजःसहोभ्रशसस्तुतीत्यादिः। पा ६।१।६७। अञ्जस उपसंख्यानम्। (कात्या० वार्त्तिक)</Small>१ वेग, बल; ज़ोर, ताक़त। २ औचित्य, मुनासिब बात। }} {{outdent| अञ्जस (सं० वि०) अञ्ज-असुन्। सरल, ऋजु, अवक्र; सीधा, टेढ़ा नहीं। स्त्रियां ङीप्। स्वर्णदीभेद। }} {{outdent| अञ्जसा (सं० अव्य०) १ द्रुत, शीघ्र; जल्द, फ़ौरन। २ यथार्थमें, प्रकृतसे।<Small>अञ्जसाशब्द आख्याताख्यातार्थयोरपि। (मेदिनी)। नाञ्जसा निगदितुं विभूतिभिः। माघ १४।२२। अथवा अञ्जसा इति तृतीयान्तप्रतिरूपकमव्ययं तस्वार्थे। (मल्लिनाथ)</Small>}} {{outdent| अञ्जसायन (सं० त्रि०) सीधा जानेवाला। }} {{outdent| अञ्जसीन (वै० त्रि०) सीधा जानेवाला। }} {{outdent| अञ्जस्या (वै० त्रि०) सोमरसको पीते हुए। }} {{outdent| अञ्जसव (सं० पु०) सोमका शीघ्र साधन, सोमरसकी जल्द तय्यारी। }} {{outdent| अञ्जार — बम्बई प्रेसिडेन्सीके अन्तर्गत कच्छप्रदेशका एक नगर। अक्षा० २३° ६' उ० और द्राघि० ७०° १०' पू०के मध्यमें यह अवस्थित 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सन् १८२२ ई० में नई सन्धिके अनुसार कच्छ के राव वात्सरिक अट्ठासी हज़ार रुपये कर देने को राजी हुए और अञ्जार फिर उनको दे दिया गया। {{outdent| अञ्जि (सं० पु०) अञ्ज-इन् करणे, अज्यते अनेन। १ प्रेषणिक, प्रेरक। २ तिलक। }} {{outdent| ३ मध्यप्रदेश के अन्तर्गत वर्धा जिलेका एक नगर। यह धामा नदीके तीर वर्धा नगरसे साढ़े चार कोस उत्तर-पश्चिम अवस्थित है। महाराष्ट्रों के अधीन यह एक प्रसिद्ध नगर था। मट्टीका जो किला अभी यहां वर्तमान है, उसे महाराष्ट्रोंने ही बनवाया था। इस नगरमें कोई ढाई हज़ार लोग रहते हैं। कुछ जुलाहोंके सिवा अधिकांश नगरवासी कृषि-जीवी हैं। }} {{outdent| अञ्जिक, अञ्जक—१ यदुके एक पुत्र। (हरिवंश) २ विप्रचित्तिके पुत्र। (विष्णुपु०) }} {{outdent| अञ्जित (सं० त्रि०) अञ्जन लगा हुआ, अंजा। }} {{outdent| अञ्जिद्दीप (अञ्जद्दीप)—बम्बई प्रेसिडेन्सीके उत्तर-कनाडा जिलेका एक क्षुद्र द्वीप या छोटा टापू। इसका आयतन पाव वर्गकोस और यह उत्तर-कनाड़ेसे एक कोस दूर है। पहले यह पोर्तुगीजोंके अधिकार में था। सन् १६६२ ई०में अंगरेज नौ-सेनापति अब्राहम शिपमेनने बम्बई नगरका अधिकार न पा, पांच सौ लोगोंके साथ इसी स्थान में आश्रय-ग्रहण किया। यहांका जलवायु अत्यन्त अस्वास्थ्यकर है। इसका वहिर्भाग अनुर्वर और प्रस्तरमय; किन्तु पार्श्वदिक् देखनेमें बहुत ही मनोहर है, जिस ओर सुदृढ़ प्राचीर और दुर्ग भी बने हैं। पश्चिममें हवाका प्रवाह होनेसे यहां जहाज़ निरापद रह सकते हैं। गोआ नगर यहांसे साढ़े पचीस कोस उत्तर-पूर्व है। यहां नारियल और दूसरे फलोंके उत्पन्न करनेवाले रहते हैं। सन् १९०१ ई० की मनुष्यगणना में यहां केवल ४८ लोग थे। }} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent| अञ्जिव (वै० त्रि०) चिकना। (अथर्व० ८।६।९) }} {{outdent| अञ्जिमत् (वै० त्रि०) १ रंगीला। २ चमकीला। ३ संवारा। (ऋक्० ५।५७।५) }} {{outdent| अञ्जिष्ठ (सं० पु०) अञ्ज-इष्णुच्। ऋतन्यञ्जीति। उण् ४।२॥ }} {{outdent| अञ्जिस्थ (वै० त्रि०) पुण्ड्रोरुविशिष्ट। (बाजस० २४।४) }} {{outdent| अञ्जिहिषा (सं० स्त्री०) गमनकी इच्छा, जानेकी मरज़ी। }} {{outdent| अञ्जी (सं० स्त्री०) अञ्ज ङीप् विकल्प। १ पेषण-यन्त्र, चक्की। २ मङ्गल। }} {{outdent| अञ्जीर (सं० पु०-क्ली०) अञ्ज-ईरन्। काकोदुम्बरिका फल, गूलर जैसा एक फल। अंजीरकी (Ficus carica) काबुल प्रभृति देशोंसे आमदनी होती है। पञ्जाब और युक्तप्रदेशमें भी अंजीर उत्पन्न होता है। यह शीतल और मृदुविरेचक स्वभावतः जिन्हें कोष्ठबद्ध होता, अंजीर उनके पक्ष में हितकर है। अंगरेज़ीमें इसे फिगस् (Figs) कहते हैं। }} {{outdent| बङ्गाला—अञ्जीर। पारसी—आञ्जीर, ऑजिर। तुरकी—अञ्जर। आरबी—तीन्, एल-केर्मस्। तामिल—सिमाइ-अट्टाइ। मलय—बुया आर। रुष—डइन्नुया जागडि। भोलन्दाज—भाइगेन। दिनेमार—फिगेन। सुइदस—फिकन्। स्पेन—हिस्। पोल—फिकि। पोर्चु—फिगस्। इतालो—फिचि। अल्—फेइगेन्। लाटिन—फिकास। फरासी—फिगुस् (Figues.) जर्मण—फिग् (Feige.) क्यारिका। }} {{outdent| युरोपके वाणिज्यक्षेत्रमें अञ्जीर एक प्रसिद्ध फल है। इसका वृक्ष रूम, सिसिली, गिनी, स्पेन, पोर्तुगाल, साइप्रस, माल्टा, ईरण प्रभृति स्थानोंमें उत्पन्न होता है। }} {{outdent| अञ्जीरका पेड़ कोई ६।७ हात ऊंचा होता और इसके पत्ते असमान रहते, जो थोड़े ही आघात से गिर जाते हैं। पुष्प प्रायः ही मुखकी ओर रहते और अल्प परिमाणमें उत्पन्न होते हैं। पकनेके साथ-साथ पुष्पकोष बढ़ा करता और उसके साथ ही बीजपूर्ण कई बीजकोष निकल आते हैं। }} अञ्जीर दो-तीन तरहका देख पड़ता है। फ़ारोज— <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> tcp5p8hkodc2grwz7lq54sdnq0nhy3e 668324 668240 2026-07-20T03:53:39Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 668324 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh|'''अञ्जि-अञ्जीर'''|'''२१७'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>बहुतसे साधु-सन्त आजकल इस मन्दिर के सान्निध्य में रहा करते हैं। इन सब साधु-सन्तोंमें जो प्रधान होते, उन्हें ‘पीर' कहते हैं। सन् १८१६ ई० में कच्छ प्रदेशके रावने ईष्ट-इण्डिया-कम्पनीको अञ्जार नगर और अञ्जार जिला सौंपा था। इसके बाद सन् १८२२ ई० में नई सन्धिके अनुसार कच्छ के राव वात्सरिक अट्ठासी हज़ार रुपये कर देने को राजी हुए और अञ्जार फिर उनको दे दिया गया। {{outdent| अञ्जि (सं० पु०) अञ्ज-इन् करणे, अज्यते अनेन। १ प्रेषणिक, प्रेरक। २ तिलक। }} ३ मध्यप्रदेश के अन्तर्गत वर्धा जिलेका एक नगर। यह धामा नदीके तीर वर्धा नगरसे साढ़े चार कोस उत्तर-पश्चिम अवस्थित है। महाराष्ट्रों के अधीन यह एक प्रसिद्ध नगर था। मट्टीका जो किला अभी यहां वर्तमान है, उसे महाराष्ट्रोंने ही बनवाया था। इस नगरमें कोई ढाई हज़ार लोग रहते हैं। कुछ जुलाहोंके सिवा अधिकांश नगरवासी कृषि-जीवी हैं। {{outdent| अञ्जिक, अञ्जक—१ यदुके एक पुत्र। (हरिवंश) २ विप्रचित्तिके पुत्र। (विष्णुपु०) }} {{outdent| अञ्जित (सं० त्रि०) अञ्जन लगा हुआ, अंजा। }} {{outdent| अञ्जिद्दीप (अञ्जद्दीप)—बम्बई प्रेसिडेन्सीके उत्तर-कनाडा जिलेका एक क्षुद्र द्वीप या छोटा टापू। इसका आयतन पाव वर्गकोस और यह उत्तर-कनाड़ेसे एक कोस दूर है। पहले यह पोर्तुगीजोंके अधिकार में था। सन् १६६२ ई०में अंगरेज नौ-सेनापति अब्राहम शिपमेनने बम्बई नगरका अधिकार न पा, पांच सौ लोगोंके साथ इसी स्थान में आश्रय-ग्रहण किया। यहांका जलवायु अत्यन्त अस्वास्थ्यकर है। इसका वहिर्भाग अनुर्वर और प्रस्तरमय; किन्तु पार्श्वदिक् देखनेमें बहुत ही मनोहर है, जिस ओर सुदृढ़ प्राचीर और दुर्ग भी बने हैं। पश्चिममें हवाका प्रवाह होनेसे यहां जहाज़ निरापद रह सकते हैं। गोआ नगर यहांसे साढ़े पचीस कोस उत्तर-पूर्व है। यहां नारियल और दूसरे फलोंके उत्पन्न करनेवाले रहते हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> सन् १९०१ ई० की मनुष्यगणना में यहां केवल ४८ 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फरासी—फिगुस् (Figues.) जर्मण—फिग् (Feige.) क्यारिका।}} युरोपके वाणिज्यक्षेत्रमें अञ्जीर एक प्रसिद्ध फल है। इसका वृक्ष रूम, सिसिली, गिनी, स्पेन, पोर्तुगाल, साइप्रस, माल्टा, ईरण प्रभृति स्थानोंमें उत्पन्न होता है। अञ्जीरका पेड़ कोई ६।७ हात ऊंचा होता और इसके पत्ते असमान रहते, जो थोड़े ही आघात से गिर जाते हैं। पुष्प प्रायः ही मुखकी ओर रहते और अल्प परिमाणमें उत्पन्न होते हैं। पकनेके साथ-साथ पुष्पकोष बढ़ा करता और उसके साथ ही बीजपूर्ण कई बीजकोष निकल आते हैं। अञ्जीर दो-तीन तरहका देख पड़ता है। फ़ारोज— <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left| ५५|2em}}</noinclude> nni9whfrxj7pm060a2e8nbra2j5nddw 668326 668324 2026-07-20T03:55:21Z Shivaniya shaw 4129 668326 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''अञ्जि-अञ्जीर'''|'''२१७'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>बहुतसे साधु-सन्त आजकल इस मन्दिर के सान्निध्य में रहा करते हैं। इन सब साधु-सन्तोंमें जो प्रधान होते, उन्हें ‘पीर' कहते हैं। सन् १८१६ ई० में कच्छ प्रदेशके रावने ईष्ट-इण्डिया-कम्पनीको अञ्जार नगर और अञ्जार जिला सौंपा था। इसके बाद सन् १८२२ ई० में नई सन्धिके अनुसार कच्छ के राव वात्सरिक अट्ठासी हज़ार रुपये कर देने को राजी हुए और अञ्जार फिर उनको दे दिया गया। {{outdent| अञ्जि (सं० पु०) अञ्ज-इन् करणे, अज्यते अनेन। १ प्रेषणिक, प्रेरक। २ तिलक। }} ३ मध्यप्रदेश के अन्तर्गत वर्धा जिलेका एक नगर। यह धामा नदीके तीर वर्धा नगरसे साढ़े चार कोस उत्तर-पश्चिम अवस्थित है। महाराष्ट्रों के अधीन यह एक प्रसिद्ध नगर था। मट्टीका जो किला अभी यहां वर्तमान है, उसे महाराष्ट्रोंने ही बनवाया था। इस नगरमें कोई ढाई हज़ार लोग रहते हैं। कुछ जुलाहोंके सिवा अधिकांश नगरवासी कृषि-जीवी हैं। {{outdent| अञ्जिक, अञ्जक—१ यदुके एक पुत्र। (हरिवंश) २ विप्रचित्तिके पुत्र। (विष्णुपु०) }} {{outdent| अञ्जित (सं० त्रि०) अञ्जन लगा हुआ, अंजा। }} {{outdent| अञ्जिद्दीप (अञ्जद्दीप)—बम्बई प्रेसिडेन्सीके उत्तर-कनाडा जिलेका एक क्षुद्र द्वीप या छोटा टापू। इसका आयतन पाव वर्गकोस और यह उत्तर-कनाड़ेसे एक कोस दूर है। पहले यह पोर्तुगीजोंके अधिकार में था। सन् १६६२ ई०में अंगरेज नौ-सेनापति अब्राहम शिपमेनने बम्बई नगरका अधिकार न पा, पांच सौ लोगोंके साथ इसी स्थान में आश्रय-ग्रहण किया। यहांका जलवायु अत्यन्त अस्वास्थ्यकर है। इसका वहिर्भाग अनुर्वर और प्रस्तरमय; किन्तु पार्श्वदिक् देखनेमें बहुत ही मनोहर है, जिस ओर सुदृढ़ प्राचीर और दुर्ग भी बने हैं। पश्चिममें हवाका प्रवाह होनेसे यहां जहाज़ निरापद रह सकते हैं। गोआ नगर यहांसे साढ़े पचीस कोस उत्तर-पूर्व है। यहां नारियल और दूसरे फलोंके उत्पन्न करनेवाले रहते हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> सन् १९०१ ई० की मनुष्यगणना में यहां केवल ४८ लोग थे। }} {{outdent| अञ्जिव (वै० त्रि०) चिकना। (अथर्व० ८।६।९) }} {{outdent| अञ्जिमत् (वै० त्रि०) १ रंगीला। २ चमकीला। ३ संवारा। (ऋक्० ५।५७।५) }} {{outdent| अञ्जिष्ठ (सं० पु०) अञ्ज-इष्णुच्। ऋतन्यञ्जीति। उण् ४।२॥ }} {{outdent| अञ्जिस्थ (वै० त्रि०) पुण्ड्रोरुविशिष्ट। (बाजस० २४।४) }} {{outdent| अञ्जिहिषा (सं० स्त्री०) गमनकी इच्छा, जानेकी मरज़ी। }} {{outdent| अञ्जी (सं० स्त्री०) अञ्ज ङीप् विकल्प। १ पेषण-यन्त्र, चक्की। २ मङ्गल। }} {{outdent| अञ्जीर (सं० पु०-क्ली०) अञ्ज-ईरन्। काकोदुम्बरिका फल, गूलर जैसा एक फल। अंजीरकी (Ficus carica) काबुल प्रभृति देशोंसे आमदनी होती है। पञ्जाब और युक्तप्रदेशमें भी अंजीर उत्पन्न होता है। यह शीतल और मृदुविरेचक स्वभावतः जिन्हें कोष्ठबद्ध होता, अंजीर उनके पक्ष में हितकर है। अंगरेज़ीमें इसे फिगस् (Figs) कहते हैं। }} {{outdent|बङ्गाला—अञ्जीर। पारसी—आञ्जीर, ऑजिर। तुरकी—अञ्जर। आरबी—तीन्, एल-केर्मस्। तामिल—सिमाइ-अट्टाइ। मलय—बुया आर। रुष—डइन्नुया जागडि। भोलन्दाज—भाइगेन। दिनेमार—फिगेन। सुइदस—फिकन्। स्पेन—हिस्। पोल—फिकि। पोर्चु—फिगस्। इतालो—फिचि। अल्—फेइगेन्। लाटिन—फिकास। फरासी—फिगुस् (Figues.) जर्मण—फिग् (Feige.) क्यारिका।}} युरोपके वाणिज्यक्षेत्रमें अञ्जीर एक प्रसिद्ध फल है। इसका वृक्ष रूम, सिसिली, गिनी, स्पेन, पोर्तुगाल, साइप्रस, माल्टा, ईरण प्रभृति स्थानोंमें उत्पन्न होता है। अञ्जीरका पेड़ कोई ६।७ हात ऊंचा होता और इसके पत्ते असमान रहते, जो थोड़े ही आघात से गिर जाते हैं। पुष्प प्रायः ही मुखकी ओर रहते और अल्प परिमाणमें उत्पन्न होते हैं। पकनेके साथ-साथ पुष्पकोष बढ़ा करता और उसके साथ ही बीजपूर्ण कई बीजकोष निकल आते हैं। अञ्जीर दो-तीन तरहका देख पड़ता है। फ़ारोज— <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left| ५५|2em}}</noinclude> 25ma1eecok5uku0voyk0lzbznegc2yp पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२२४ 250 83413 668327 346726 2026-07-20T03:59:16Z Shivaniya shaw 4129 668327 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''२१८'''|''' अञ्ज'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>पुरके उद्भिद्-उद्यानमें नीचे लिखा दो तरहका अञ्जीर विद्यमान है— पहलेमें ईरानके छोटे अञ्जर जैसा फल लगता है। यह खानेमें अत्यन्त सुखादु और मुखप्रिय है । वृक्ष बहुत सबलकाय और मोटा होता है। अन्य वृक्ष कानपुरका है। इसका फल अत्यन्त सुन्दर और आंवले जैसा बड़ा होता है । पकनेसे यह गहरा बैंजनी बन जाता है । शीतकाल आनेपर उपरोक्त दोनो प्रकारके वृक्षों में पत्ते नहीं रहते। फाल्गुन माससे कोंपल फुफूटने लगतो, उसी समय कली भी निकलती है । ग्रीष्म- ऋतुके मध्य में फल परिपक्क हो जाता है। इसी समय वृक्षमें नये फल आते, किन्तु वह फिर पकते नहीं। भारतवर्षके बीच पञ्जाब अञ्चलमें अजीर अधिक होता, जो दूसरी श्रणौके अज्ञ्जीरसे अनेकांशमें श्रेष्ठ है। वहांका अञ्जीर दो तरहका - काला और सफेद होता है । दाक्षिणात्य में भी अञ्जीर उपजता है। वहांके बाजारोंमें ढेरका ढेर अञ्जीर बिका करता है । जहां अञ्जीर उपजता है, वहां दूसरा वृक्ष अधिक नहीं लगता । एक-एक अज्ञ्जीरफल वजनमें कोई एक छटांक तक होता है। इस फलको बहुकाल से मनुष्य व्यवहार करते आये हैं । यहूदियोंकी प्रधान धर्मपुस्तकमें अञ्जोर शब्द वारंवार लिखा गया है । हिरोदोतासकौ पुस्तक पढ़नेसे मालूम होता है, कि कायरुसके समय ईरान देशमें अज्ञ्जीर प्रचलित न था । किन्तु ईजिया और लिवाण्टके निकटस्थ प्रदेशसमूहमें बहुकाल पूर्व से इसका प्रचलन था । यूनानियों को पहले केरियासे अञ्जीर मिला, इसीसे वह इसे 'केरिया ' कहते हैं । प्रथमतः हेलेतिकोंने इसको कृषि बढ़ाई थो । प्लिनीने नाना प्रकारके अच्ञ्जीरका उल्लेख किया है। रोमके विलासौ लोग इवुसासके अज्ञ्जौरको अच्छा कहते थे । पहले इटली देशके क्रीतदास यानी गुलाम और किसान ही अधिक अञ्जीर खाते थे। रोमियोंके पुराण-ग्रन्थमें और बहुत शुद्ध और पवित्र फल बताया गया है। यह रोमके देवता वाक्काशकी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पूजा में चढ़ता था । प्राचीन काल से अद्यावधि तुरुष्क अज्ञ्जौरके लिये प्रसिद्ध होता आया है। तुरुष्ककी राज- धानी स्मिरना नगर में अज्ञ्जीरको बड़ी-बड़ी दुकानें मौजूद हैं। विदेशमें अज्ञ्जीर भेजनेको स्मिरनाके लोग बड़ी मिहनत और खूबसूरतीसे पेटियां बनाते हैं। उनके दूसरे कामको देखते इस काम में आडम्बर अधिक रहता है। रूमके धनो लोग भी बड़े-बड़े भोजोंमें अज्ञ्जरको व्यवहार करते हैं । आजकल भूमध्यस्थ- सागर के उपकूलस्थ देशसमूह- में अञ्जीरकी खेती की जाती है। एशिया माइनर, स्पेन, पोर्तूगाल और दक्षिण फ्रान्ससे राशि राशि अज्जार नाना देशोंको भेजे जाते है। इसमें तुरुष्कका अञ्जीर हो सबसे अच्छा है । युरोपवाले सभी देशोंके लोग अज्ञ्जीर खाते हैं । विलायत में दरिद्र लोग अच्ज्ञ्जीर के साथ बादाम मिला एक प्रकारका पिष्टक बनाते हैं । यह पिष्टक विलायत में राह-राह बिकते देख पड़ता है । पके अज्ञ्जीरकौ शराब भी बनाई जाती, जिसे प्राचीन रूमी साइसिटिस् (Sycites) नामसे व्यवहार करते थे । युरोपीय और तुरुस्कदेशीय चिकित्सकोंके मतसे अञ्जीरका गुण भेदक है; किन्तु कभी-कभी यह उदरव्यथा और रूक्षता उत्पादन करता है । इसके क्वाथका सारभाग शीतल और मृदु-विरेचक होता है । उपरोक्त चिकित्सक निम्नलिखित रोगों में अज्जीरको प्रयोग करते हैं,- १ । स्वभावतः अलसक ( constipation ) यानी कल होनेसे सूखा अञ्जीर बहुत उपकारी है। २ | स्फोटक यानो फोड़ा या व्रण होनेसे अञ्जीरको पका पुलटिस बांधा जाता है ३। फेफड़े और मूत्राशयको पीड़ामें अञ्जीरका fate अतिशय शीतल और विरेचक होता है । अञ्जीर - एक नगर जो बलूचिस्थान - ख़िलातसे सोन- मियानी जानेकी राहमें मूला नदीको एक पयःप्रणाली किनारे अवस्थित और खिलातसे ३० कोस दूर . पहले यहां जौह्रो जातिके बलूची रहते थे । सन १८३८ ई० के शेषभागमें अंगरेजोंके सेनापति विलशा- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> pwj8epvdxjyx5xjgoc6yiwlnfoavsjv 668345 668327 2026-07-20T06:59:33Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 668345 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२१८'''|''' अञ्ज'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>पुरके उद्भिद्-उद्यानमें नीचे लिखा दो तरहका अञ्जीर विद्यमान है— पहलेमें ईरानके छोटे अञ्जर जैसा फल लगता है। यह खानेमें अत्यन्त सुखादु और मुखप्रिय है । वृक्ष बहुत सबलकाय और मोटा होता है। अन्य वृक्ष कानपुरका है। इसका फल अत्यन्त सुन्दर और आंवले जैसा बड़ा होता है । पकनेसे यह गहरा बैंजनी बन जाता है । शीतकाल आनेपर उपरोक्त दोनो प्रकारके वृक्षों में पत्ते नहीं रहते। फाल्गुन माससे कोंपल फुफूटने लगतो, उसी समय कली भी निकलती है । ग्रीष्म- ऋतुके मध्य में फल परिपक्क हो जाता है। इसी समय वृक्षमें नये फल आते, किन्तु वह फिर पकते नहीं। भारतवर्षके बीच पञ्जाब अञ्चलमें अजीर अधिक होता, जो दूसरी श्रणौके अज्ञ्जीरसे अनेकांशमें श्रेष्ठ है। वहांका अञ्जीर दो तरहका - काला और सफेद होता है । दाक्षिणात्य में भी अञ्जीर उपजता है। वहांके बाजारोंमें ढेरका ढेर अञ्जीर बिका करता है । जहां अञ्जीर उपजता है, वहां दूसरा वृक्ष अधिक नहीं लगता । एक-एक अज्ञ्जीरफल वजनमें कोई एक छटांक तक होता है। इस फलको बहुकाल से मनुष्य व्यवहार करते आये हैं । यहूदियोंकी प्रधान धर्मपुस्तकमें अञ्जोर शब्द वारंवार लिखा गया है । हिरोदोतासकौ पुस्तक पढ़नेसे मालूम होता है, कि कायरुसके समय ईरान देशमें अज्ञ्जीर प्रचलित न था । किन्तु ईजिया और लिवाण्टके निकटस्थ प्रदेशसमूहमें बहुकाल पूर्व से इसका प्रचलन था । यूनानियों को पहले केरियासे अञ्जीर मिला, इसीसे वह इसे 'केरिया ' कहते हैं । प्रथमतः हेलेतिकोंने इसको कृषि बढ़ाई थो । प्लिनीने नाना प्रकारके अच्ञ्जीरका उल्लेख किया है। रोमके विलासौ लोग इवुसासके अज्ञ्जौरको अच्छा कहते थे । पहले इटली देशके क्रीतदास यानी गुलाम और किसान ही अधिक अञ्जीर खाते थे। रोमियोंके पुराण-ग्रन्थमें और बहुत शुद्ध और पवित्र फल बताया गया है। यह रोमके देवता वाक्काशकी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पूजा में चढ़ता था । प्राचीन काल से अद्यावधि तुरुष्क अज्ञ्जौरके लिये प्रसिद्ध होता आया है। तुरुष्ककी राजधानी स्मिरना नगर में अज्ञ्जीरको बड़ी-बड़ी दुकानें मौजूद हैं। विदेशमें अज्ञ्जीर भेजनेको स्मिरनाके लोग बड़ी मिहनत और खूबसूरतीसे पेटियां बनाते हैं। उनके दूसरे कामको देखते इस काम में आडम्बर अधिक रहता है। रूमके धनी लोग भी बड़े-बड़े भोजोंमें अज्ञ्जरको व्यवहार करते हैं । आजकल भूमध्यस्थ- सागर के उपकूलस्थ देशसमूह- में अञ्जीरकी खेती की जाती है। एशिया माइनर, स्पेन, पोर्तूगाल और दक्षिण फ्रान्ससे राशि राशि अज्जार नाना देशोंको भेजे जाते है। इसमें तुरुष्कका अञ्जीर हो सबसे अच्छा है । युरोपवाले सभी देशोंके लोग अज्ञ्जीर खाते हैं । विलायत में दरिद्र लोग अच्ज्ञ्जीर के साथ बादाम मिला एक प्रकारका पिष्टक बनाते हैं । यह पिष्टक विलायत में राह-राह बिकते देख पड़ता है । पके अज्ञ्जीरकौ शराब भी बनाई जाती, जिसे प्राचीन रूमी साइसिटिस् (Sycites) नामसे व्यवहार करते थे । युरोपीय और तुरुस्कदेशीय चिकित्सकोंके मतसे अञ्जीरका गुण भेदक है; किन्तु कभी-कभी यह उदरव्यथा और रूक्षता उत्पादन करता है । इसके क्वाथका सारभाग शीतल और मृदु-विरेचक होता है । उपरोक्त चिकित्सक निम्नलिखित रोगों में अज्जीरको प्रयोग करते हैं,- १ । स्वभावतः अलसक ( constipation ) यानी कल होनेसे सूखा अञ्जीर बहुत उपकारी है। २ । स्फोटक यानो फोड़ा या व्रण होनेसे अञ्जीरको पका पुलटिस बांधा जाता है ३। फेफड़े और मूत्राशयको पीड़ामें अञ्जीरका काथ अतिशय शीतल और विरेचक होता है । अञ्जीर - एक नगर जो बलूचिस्थान - ख़िलातसे सोन- मियानी जानेकी राहमें मूला नदीको एक पयःप्रणाली किनारे अवस्थित और खिलातसे ३० कोस दूर पहले यहां जौह्रो जातिके बलूची रहते थे । सन १८३८ ई० के शेषभागमें अंगरेजोंके सेनापति विलशा- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> tt2z7ik13zqphh3nbljwt40i0l6nvtw 668346 668345 2026-07-20T06:59:48Z Shivaniya shaw 4129 668346 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२१८'''|'''अञ्ज'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>पुरके उद्भिद्-उद्यानमें नीचे लिखा दो तरहका अञ्जीर विद्यमान है— पहलेमें ईरानके छोटे अञ्जर जैसा फल लगता है। यह खानेमें अत्यन्त सुखादु और मुखप्रिय है । वृक्ष बहुत सबलकाय और मोटा होता है। अन्य वृक्ष कानपुरका है। इसका फल अत्यन्त सुन्दर और आंवले जैसा बड़ा होता है । पकनेसे यह गहरा बैंजनी बन जाता है । शीतकाल आनेपर उपरोक्त दोनो प्रकारके वृक्षों में पत्ते नहीं रहते। फाल्गुन माससे कोंपल फुफूटने लगतो, उसी समय कली भी निकलती है । ग्रीष्म- ऋतुके मध्य में फल परिपक्क हो जाता है। इसी समय वृक्षमें नये फल आते, किन्तु वह फिर पकते नहीं। भारतवर्षके बीच पञ्जाब अञ्चलमें अजीर अधिक होता, जो दूसरी श्रणौके अज्ञ्जीरसे अनेकांशमें श्रेष्ठ है। वहांका अञ्जीर दो तरहका - काला और सफेद होता है । दाक्षिणात्य में भी अञ्जीर उपजता है। वहांके बाजारोंमें ढेरका ढेर अञ्जीर बिका करता है । जहां अञ्जीर उपजता है, वहां दूसरा वृक्ष अधिक नहीं लगता । एक-एक अज्ञ्जीरफल वजनमें कोई एक छटांक तक होता है। इस फलको बहुकाल से मनुष्य व्यवहार करते आये हैं । यहूदियोंकी प्रधान धर्मपुस्तकमें अञ्जोर शब्द वारंवार लिखा गया है । हिरोदोतासकौ पुस्तक पढ़नेसे मालूम होता है, कि कायरुसके समय ईरान देशमें अज्ञ्जीर प्रचलित न था । किन्तु ईजिया और लिवाण्टके निकटस्थ प्रदेशसमूहमें बहुकाल पूर्व से इसका प्रचलन था । यूनानियों को पहले केरियासे अञ्जीर मिला, इसीसे वह इसे 'केरिया ' कहते हैं । प्रथमतः हेलेतिकोंने इसको कृषि बढ़ाई थो । प्लिनीने नाना प्रकारके अच्ञ्जीरका उल्लेख किया है। रोमके विलासौ लोग इवुसासके अज्ञ्जौरको अच्छा कहते थे । पहले इटली देशके क्रीतदास यानी गुलाम और किसान ही अधिक अञ्जीर खाते थे। रोमियोंके पुराण-ग्रन्थमें और बहुत शुद्ध और पवित्र फल बताया गया है। यह रोमके देवता वाक्काशकी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पूजा में चढ़ता था । प्राचीन काल से अद्यावधि तुरुष्क अज्ञ्जौरके लिये प्रसिद्ध होता आया है। तुरुष्ककी राजधानी स्मिरना नगर में अज्ञ्जीरको बड़ी-बड़ी दुकानें मौजूद हैं। विदेशमें अज्ञ्जीर भेजनेको स्मिरनाके लोग बड़ी मिहनत और खूबसूरतीसे पेटियां बनाते हैं। उनके दूसरे कामको देखते इस काम में आडम्बर अधिक रहता है। रूमके धनी लोग भी बड़े-बड़े भोजोंमें अज्ञ्जरको व्यवहार करते हैं । आजकल भूमध्यस्थ- सागर के उपकूलस्थ देशसमूह- में अञ्जीरकी खेती की जाती है। एशिया माइनर, स्पेन, पोर्तूगाल और दक्षिण फ्रान्ससे राशि राशि अज्जार नाना देशोंको भेजे जाते है। इसमें तुरुष्कका अञ्जीर हो सबसे अच्छा है । युरोपवाले सभी देशोंके लोग अज्ञ्जीर खाते हैं । विलायत में दरिद्र लोग अच्ज्ञ्जीर के साथ बादाम मिला एक प्रकारका पिष्टक बनाते हैं । यह पिष्टक विलायत में राह-राह बिकते देख पड़ता है । पके अज्ञ्जीरकौ शराब भी बनाई जाती, जिसे प्राचीन रूमी साइसिटिस् (Sycites) नामसे व्यवहार करते थे । युरोपीय और तुरुस्कदेशीय चिकित्सकोंके मतसे अञ्जीरका गुण भेदक है; किन्तु कभी-कभी यह उदरव्यथा और रूक्षता उत्पादन करता है । इसके क्वाथका सारभाग शीतल और मृदु-विरेचक होता है । उपरोक्त चिकित्सक निम्नलिखित रोगों में अज्जीरको प्रयोग करते हैं,- १ । स्वभावतः अलसक ( constipation ) यानी कल होनेसे सूखा अञ्जीर बहुत उपकारी है। २ । स्फोटक यानो फोड़ा या व्रण होनेसे अञ्जीरको पका पुलटिस बांधा जाता है ३। फेफड़े और मूत्राशयको पीड़ामें अञ्जीरका काथ अतिशय शीतल और विरेचक होता है । अञ्जीर - एक नगर जो बलूचिस्थान - ख़िलातसे सोन- मियानी जानेकी राहमें मूला नदीको एक पयःप्रणाली किनारे अवस्थित और खिलातसे ३० कोस दूर पहले यहां जौह्रो जातिके बलूची रहते थे । सन १८३८ ई० के शेषभागमें अंगरेजोंके सेनापति विलशा- <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> q3xrfxvj0vl3luv0f5pq86z43eopm8l पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२२५ 250 83495 668347 541894 2026-07-20T07:14:20Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 668347 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh||'''अञ्जनाल'''|'''२१९'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>यर, खिलातके अवरोध बाद इस स्थानको अधिकृत कर गाण्डव नामक गिरिपथसे सिन्धुदेशको गये थे । यहां दो बड़ी राहें हैं - एक सोनमियानी और एक मूला नदीको ओर चली गई है । अञ्जोर से कुछ दूर दक्षिण एक बड़े किलेको चहारदीवारोका टूटा-फूटा हिस्सा देख पड़ता है। यहां पौष और माघमें इतना शीत होता, कि बरतन में रखा पानीतक जम जाता है {{outdent|'अञ्जनाल - दाक्षिणात्यके सलेम जिले को पल्लियों में मृत्युके पांचवें दिन श्राद्धादि क्रिया सम्पन्न करनेवाले लोग । इस शब्द का अर्थ पञ्चम दिन है ।}} {{outdent|अञ्जे ( अञ्जितेङ्ग ) – तिरुवाङ्गोड़ राज्यका नगर । यह समुद्र किनारे बसा है । इसकी दोनो ओर गृह बिलकुल समान्तराल भावसे बनाये गये हैं । यहांके अधिवासी अधिकांश ईसाई हैं। नारियल वृक्ष खूब उत्पन्न होता है । गरीब आदमी नारियलको गिरी बेच दिन काटते हैं । सन् १६८४ ई० में अज्जितेङ्गको राणीने ईष्ट इण्डिया कम्पनीको अनुमति दी थी, कि वह यहां आबादी बढ़ाती और एक कोठी बनवाती ; किन्तु सन् १८२३ ई० में अधिक हानि होनेसे सब काम बिगड़ गया । यह नगर मन्द्राजसे १८५ कोस दक्षिण-पश्चिम और कन्नूरसे १२० कोस दक्षिण-पूर्व है ।}} {{outdent|अट - गति, भ्वा०, पर० ; सकं सेट् । गति अर्थको एक धातु ।}} {{outdent|अट, (अटि ) - इदित् । भ्वा० आ० ; सकं सेट्, भ्वादि गणको एक धातु ।}} {{outdent|अटक, अटकन (हिं० स्त्री० ) १ प्रतिवन्धक, रोक- टोक । २ ज़रूरत, आवश्यकता ।}} ३ एक ज़िला । अटक जिला पञ्जाबके रावलपिण्डी डिविजन में ४०२२ वर्ग मीलपर फैला है। इसकी पश्चिम और उत्तर-पश्चिम और सिन्धुनद बहता है । आकृतिमें यह विषम रूपसे अण्डाकार है, और इसके उत्तर समतल भूमि और दक्षिण कालाचित्ता पहाड़ वर्तमान है । इसका मध्यभाग समतल है, जिसके उत्तरको भूमि पथरीली ; <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> किन्तु दक्षिणमें पूर्व और पश्चिमको सोल नदियां इसे हरा भरा बनाती हैं । ग्रोमऋतु में ताप लोगोंको अधिक सताता, रेतीली भूमि धूप पड़ने से भट्ठो जैसी जलने लगती है। ओहिन्द के पास महमूद गज़नवीने अनङ्गपालको रणमें विजय किया था । सन् १८०४ ई० में यह ज़िला बना । इसकी आबादी कोई पौने पांच लाख होगी, जिसमें सैकड़े पोछे नव्वेसे ज्यादा मुसलमान हैं । यहां पञ्जाबी और पश्तो दो भाषा बोली जाती इस ज़िले में अधिकांश मनुष्य कृषिजीवी पशु अच्छे देख नहीं पड़ते । फतेहजङ्ग और पिण्डोघेब तहसील में घोड़े उत्पन्न करनेका खूब व्यवसाय चलता है । गरकावे नगर में सङ्गमरमरका काम अच्छा किया जाता है । खेरीमूरत पहाड़ियों में कच्चे पत्थरका कोयला प्रायः मिलता है। फतेहजङ्ग- के पास मट्टीका तेल भी निकलता है । सिन्धु सोहन और दूसरे नदोंका रेत धोनेसे सोना हाथ लग जाता है। चूना और खड़ियामहो — दोनो वस्तु अधित्यकासे उत्पन्न होती हैं । व्यापारका चमत्कार विशेष नहीं । नर्थ वेष्टर्न रेलवेको प्रधान लाइन इस जिले में चलती है । प्रधान सड़कें तीन हो हैं । सिन्धु-नदपर अटकका पुल बंधा । ४ अटकजिलेका एक तहसील - इसका क्षेत्रफल ६५१ वर्गमील है । इसमें हसन अब्दाल नामक एक ऐतिहासिक स्थान है । ५ अटकनगर - यह नर्थ वेष्टर्न रेलवे और ग्राण्ड - टुङ्गरोडपर अवस्थित है। इसमें एक किला बना हुआ है, जहां तोपखाना और पैदल फ़ौज रहती है । अनुमानतः सिकन्दर बादशाहने अटक से ऊपर आठ कोस ओहिन्द में नावोंके पुलपर सिन्धु नदीको पार किया था । सन् १५८१ ई० में अकबर ने यह किला - अपने साम्राज्यको काबुलके सिपहसालार हकीम मिरज़ाके आक्रमणोंसे रक्षित रखनेको बनवाया । सन् १८१२ ई० में रणजित् सिंहने इस किले पर छापा मारा। पहले सिख युद्ध में यह अंगरेजों के हाथ आया, किन्तु दूसरे में निकल गया। अंगरेजोंने <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> rfre62wu13ltktmfgnbl672pnkyk3uv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२२६ 250 83500 668356 541893 2026-07-20T08:52:37Z Shivaniya shaw 4129 668356 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''२२०'''|'''अटकन-बटकन — अटरुष'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>दूसरा- सिख युद्ध समाप्त होनेपर इसका अधिकार अटपट ( हिं० वि०) १ वक्र, टेढ़ा । २ भयङ्कर, पाया है । {{Outdent|अटकन-बटकन ( हिं० पु० )एक प्रकारका खेल, क्रीड़ाविशेष । हिन्दुस्थानी लड़के इस खेल में निम्नलिखित वाक्य कहते और एक-एक शब्दपर एक-एक लड़केकी ओर सङ्केत करते जाते हैं; जिस लड़के पर उचक्का शब्द जाकर पड़ता, वही चोर समझा जाता और उसीको दांव देना पड़ता है,—}} {{block center|<poem><small> "अङ्ग भड़ जड़ी जबरङ्ग निहाल कोट घरे घर काना । सिरकी चद्दर लेव मुरद्दर, पान फूल चोर शाह उचक्का ॥" </small></poem>}} {{Outdent|अटकना (हिं० क्रि० )१ चलते-चलते रुक जाना । २ ठहरना । ३ प्रीति लगाना, इश्क करना । ४ झगड़ा मचाना, विवाद बढ़ाना ।}} {{Outdent|अटकर, अटकल (हिं० स्त्री० )अन्दाज़, अनुमान ।}} {{Outdent|अटकल (हिं० वि०)आनुमानिक, अन्दाजी । (पु० ) २ अनुमान, अन्दाज़ । ( क्रि० वि० ) ३ आनुमानिक रूपसे, अन्दाज़न ।}} {{Outdent|अटका ( हिं० पु० )१ वह भात जो जगन्नाथजीको समर्पण किया और सुखाकर दूसरे देशोंको प्रसाद स्वरूप पहुंचाया जाता है। (वि०) २ रुका, ठहरा ।}} {{Outdent|अटकाना (हिं० क्रि० )१ गतिरोध करना, रोकना । २ संयुक्त करना, लगाना । ३ झमेलमें डालना, फांसना । ४ उठा रखना, मुलतवी करना ।}} {{Outdent|अटकाव (हिं० पु० )ठहराव, प्रतिबन्ध ।}} {{Outdent|अंटखट ( हिं० वि० )खराब, वाहियात ; छिन्न-भिन्न, टूटा-फूटा।}} {{Outdent|अटखेलौ (हिं॰ स्त्री० )१ खेल - कूद, क्रीड़ा - कौतुक । २ मन्दगति, झूमती चाल ।}} {{Outdent|अटन (सं० क्ली०)अट- ल्युट् भावे । १ गमन, रवानगी । २ भ्रमण, हवाखोरी ।}} {{Outdent|अटना (हिं० क्रि०)१ भ्रमण करना, घूमना, राह चलना, यात्रापर जाना । २ पूर्ण होना, यथेष्ट निकलना । ३ रोकना, छिपाना ।}} {{Outdent|अटनि, अटनी (सं० स्त्री० )अट अनि, पक्षे ङीप् ।}} धनुषका अग्रभाग, जहां गुण बंधता है,कमानका अगला हिस्सा, जहां रोदा चढ़ाया जाता है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|अटपट ( हिं० वि०)१ वक्र, टेढ़ा । २ भयङ्कर, जिससे डर हो। ३ दुस्तर, मुश्किल । ४ गूढ़, छिपा । ५ गहन, गहरा। ६ अद्भुत, अनोखा ।}} {{Outdent|अटपटाना (हिं० क्रि० )१. इधर-उधर होना, विपर्यय पड़ना । २ सकुचाना, निःसाहस रहना ।}} {{Outdent|अटपटी (हिं० वि०)१ इधर-उधर की, विपर्यस्त । २ सङ्कोच-भरी, सङ्कुचित ।}} {Outdent|अटपाडी—बम्बई प्रान्तके औध राज्यका एक नगर । इसकी लोकसंख्या कोई साढ़े पांच हजार होगी। यह धांगड़ोंसे पाले, अपने खोलर देशवाले पशुओंके लिये प्रसिद्ध है । और कराढ़ - नगरकी राह में अवस्थित होनेके कारण पण्ढरपुरके यात्री यहां अधिक आते हैं । इस स्थानसे कोई छः कोस दूर खरसुन्दीमें नाथका सुप्रसिद्ध मन्दिर है, जहां वर्षमें दो बार मवेशियोंका मेला लगता और प्रायः यात्री पहुंचा करते हैं। यहांसे देशी कम्बल और मोटा कपड़ा कोङ्कण में भेजा जाता है। इसमें डाकघर, दवाखाना और अंगरेजीका छोटा स्कूल बना है।}} {{Outdent|अटब्बर (हिं० पु०)१ दिखाव, आडम्बर । २ अभिमान, घमण्ड । ३ वंश, घराना ।}} {{Outdent|अटमाब (सं० त्रि०)इधर-उधर घूमनेवाला ।}} {{Outdent|अटरनौ (अं० Attorney.)}} मुख्तार, मध्यस्थ, प्रतिनिधि ।}} {{Outdent|अटरुष, अटरूष, अटरूषक (सं० पु० ) अटे गमनकाले अरूषः सूर्य इव दृश्यते शुभ्रवर्णत्वात् । वाकस वृक्ष, जगमोहन, अरूसा ।}} यह छोटी झाड़ी बङ्गाल और हिमालयकी तराईमें प्रायः उत्पन्न होती है। इसकी पत्तियाँ उबालकर लोग मोटे कपड़ेको पीला रंगते हैं । नीलके साथ इसे मिलानेसे हरा-बैंजनी रङ्ग बनता है। आसाम के नागे इसे गांवोंके पास छायाके लिये लगाते हैं । इसकी जड़ और पत्ती अदरक के साथ खांसी में दी जाती हैं । क्षयरोगका यह अनोखा महौषध है। इसका फूल और फल कड़वा और खुशबूदार होता है। आंखें उठनेसे इसके ताजे फूल उनपर बांधे जाते हैं। पत्ते पशुको भी औषधस्वरूप <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> qfcjj1p4m1qg6duvslfstgzw7cearsb 668357 668356 2026-07-20T08:53:20Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 668357 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{Rh|'''२२०'''|'''अटकन-बटकन — अटरुष'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>दूसरा- सिख युद्ध समाप्त होनेपर इसका अधिकार अटपट ( हिं० वि०) १ वक्र, टेढ़ा । २ भयङ्कर, पाया है । {{Outdent|अटकन-बटकन ( हिं० पु० )एक प्रकारका खेल, क्रीड़ाविशेष । 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कारण पण्ढरपुरके यात्री यहां अधिक आते हैं । इस स्थानसे कोई छः कोस दूर खरसुन्दीमें नाथका सुप्रसिद्ध मन्दिर है, जहां वर्षमें दो बार मवेशियोंका मेला लगता और प्रायः यात्री पहुंचा करते हैं। यहांसे देशी कम्बल और मोटा कपड़ा कोङ्कण में भेजा जाता है। इसमें डाकघर, दवाखाना और अंगरेजीका छोटा स्कूल बना है।}} {{Outdent|अटब्बर (हिं० पु०)१ दिखाव, आडम्बर । २ अभिमान, घमण्ड । ३ वंश, घराना ।}} {{Outdent|अटमाब (सं० त्रि०)इधर-उधर घूमनेवाला ।}} {{Outdent|अटरनौ (अं० Attorney.)मुख्तार, मध्यस्थ, प्रतिनिधि ।}} {{Outdent|अटरुष, अटरूष, अटरूषक (सं० पु० ) अटे गमनकाले अरूषः सूर्य इव दृश्यते शुभ्रवर्णत्वात् । वाकस वृक्ष, जगमोहन, अरूसा ।}} यह छोटी झाड़ी बङ्गाल और हिमालयकी तराईमें प्रायः उत्पन्न होती है। इसकी पत्तियाँ उबालकर लोग मोटे कपड़ेको पीला रंगते हैं । नीलके साथ इसे मिलानेसे हरा-बैंजनी रङ्ग बनता है। आसाम के नागे इसे गांवोंके पास छायाके लिये लगाते हैं । इसकी जड़ और पत्ती अदरक के साथ खांसी में दी जाती हैं । क्षयरोगका यह अनोखा महौषध है। इसका फूल और फल कड़वा और खुशबूदार होता है। आंखें उठनेसे इसके ताजे फूल उनपर बांधे 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पत्ती खेतमें खादको भांति डाली जाती है। गुड़ बनाने और ईंट पकाने में यह खूब जलाई जाती है । {{Outdent|अटल(हिं० वि०)१ न टलनेवाला, अवश्यम्भावी । २ स्थिर, ठहरा हुआ ।}} {{Outdent|अटलस(अं० Atlas ) मानचित्रसमूह, नक्शींका ज़ख़ीरा। इस पुस्तका में देश-देश के नक्शे होते हैं ।}} {{Outdent|अटवि, अटवी (सं० स्त्री० )अटन्ति व्रजन्ति वाऽत्र, अट अवि ङीप् पक्षे । वन, जङ्गल, बियाबां ।}} {{Outdent|अटविक (सं० पु० )लकड़हारा ।}} {{Outdent|अटविशिखर (सं० पु० )एक प्रदेश या उसके लोग ।}} {{Right|<Small>(विष्णुपु० )</Small>}} {{Outdent|अटवी -<Small>अटवि देखो ।</Small>}} {{Outdent|अटवी -शङ्खद्दीपस्थ वनविशेष इसके पार्श्वसे कालिनदी प्रवाहित हुई है ।}}<Small>(ब्रह्माण्डपुराण । )</Small> {{Outdent|अटवीदेवी–भवानीका नामान्तर, पार्वतीका दूसरा नाम । कहते हैं, कि भवने मनुष्योंको ब्रह्मचर्यं सिखाने के लिये अरण्यको एक वार गमन किया । भवानी उन्हें वनको जाते देख अरण्यदेवीका रूप धारण कर वृक्ष-वृक्षमें खेलती हुई, घूमने लगी । उनकी रूप-ज्योतिः से एक सुन्दर देवताको सृष्टि हुई। इसके बाद भवानी और सुन्दर देवता दोनो आकर अटवीवनमें खेलने लगे। इसी वनमें}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> भवानी अटवीदेवीके नामसे अभिहित हुईं। यह वन पुराणमें भवाटवीके नामसे उल्लिखित हुआ है। यूनानी इन भवाटवीको बाटोई (Butoi) कहते हैं । विलफोड साहबने निश्चय किया है, कि यह अटवीवन अफ्रीका के नोलनद किनारे अवस्थित था । इस जगह पहले यूनानियोंको अरण्यदेवो डायनाका भी मन्दिर बना था । {{Outdent|अटवीलता (सं० स्त्री० )कुम्भाटवृक्ष, कुम्हड़े का पौधा ।}} {{Outdent|अटहर (हिं० पु० )राशि, ढेर, जखीरा ।}} {{Outdent|अटा (सं० स्त्री )अट-अङ । भ्रमण, पर्यटन । घूम-फिर, टहल-पहल । २ अटारी, छत । ३ ढेर, राशि। ( वि० ) ४ लगा, चिपका ।}} {{Outdent|अटाउ, अटाव (हिं० पु० ) १ लगाव, आयोजन । २ विद्वेष, हसद ।}} {{Outdent|अटाटुट, अटाटूट (हिं० वि० )१ न टूटनेवाला, अभङ्ग । २ पोढ़ा, मजबूत । ३ बृहत्, भारी ।}} {{Outdent|अटाट्यमान (सं० ति० )बहुत घूमनेवाला ।}} {{Outdent|अटाट्या, अटाटा (सं० स्त्री० )अट-यङ-भावे अ स्त्रीत्वात् टाप् । परिभ्रमण, पुनःपुनः भ्रमण, मिथ्या भ्रमण, अतिशय भ्रमण ; मारे-मारे फिरना, गश्त लगाना, झूठ-मूठ घूमना, आवारागर्दी ।}} {{Outdent|अटारी (हिं० स्त्री० ) १ छत । २ छतके ऊपरका कोठा ।}} {{Outdent|अटाल ( हिं० पु० ) धराहरा, बुर्ज ; बहुत ऊंचा मकान जिसपर चढ़नेसे दूर-दूरको चीजें देख पड़ती हैं।}} {{Outdent|अटाला (हिं० पु० )१ जखोरा, ढेर, राशि | २ कसाइयोंका वासस्थान ।}} {{Outdent|अटि (सं० पु० ) शरारिपक्षी, चाहा ।}} {{Outdent|अटी (हिं० खो० )जलके समीप रहनेवाला पक्षिविशेष, चाहा ।}} {{Outdent|अटूट, अटुट ( हिं० वि०)१ न टूटनेवाला, जो टूट नसके ; अखण्डनीय । २ अजेय, लाशिकश्त । ३ दृढ़, मज़बूत । ४ बराबर, सिलसिलेवार । ५ अधिक, ज्यादा।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude> यह</noinclude> q2ce347mywrb0nqnr2kbinfhqq0z31b पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२२८ 250 83502 668370 346903 2026-07-20T10:35:42Z Shivaniya shaw 4129 668370 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''२२२'''|'''अटेरन — अट्टालिका'''}}</noinclude>noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अटेरन (हिं० पु० )}} १ यन्त्रविशेष, योजना । यह यन्त्र सूतको आँटी तैयार करनेको लकड़ीका बनाया जाता है। २ घोड़ा फेरनेका एक तरीक़ । २-३ कुश्तीका एक दांव । {{Outdent|अटेरना (हिं० क्रि० )}} १ सूतको पोनी या ऑटो तय्यार करना । २ नशे चकनाचूर होना । {{Outdent|अटोक ( हि० वि० )}} निषेधरहित, जिसकी रोक-टोक न हो। {{Outdent|अटम्बर ( हि० पु० )}} ढेर, राशि, जखौरा । {{Outdent|अट्ट —}} अतिक्रम, हिंसा | भ्वा॰, आ०, सक० सेट् । २ अनादर । चु०, पर० ; सक० सेट् । {{Outdent|अट्ट (सं० पु० )}} अट्ट घञ् आधारे ; अयति न आद्रियते अन्यत् यत्र । १ पट्टवस्त्र, क्षौम । २ प्रासाद, हर्म्य ; महल । ३ प्रासादका उपरिस्थित गृह, महलके ऊपरका मकान । ४ प्राचौरका उपरिस्थित सैन्यगृह, चहारदीवारीके ऊपरका किला । ५ हाट, बाज़ार । ६ अन्न, अनाज । ७ भक्त, ईश्वरको सेवा करनेवाला । ( वि० ) ८ उच्च, ऊंचा। ९ अतिशय, बहुत ज्यादा । १० शुष्क, सूखा । अट्टं भक्तं चतुष्के ना क्षौमेऽत्यर्थे गृहान्तरे । ( मेदिनी ) {{Outdent|अट्टक (सं० पु० )}} छतका कमरा । {{Outdent|अट्टट्ट (सं० अव्य० )}} अट्ट अनादरे, अट्ट-अट्ट । प्रकारे गुणवचनस्य । पा ८|१|१२| अत्युच्च होकर, निहायत बुलन्दीसे । बहुत ऊँचे स्वरमें । {{Outdent|अट्टट्टहास (स ं० पु० )}} अत्युच्च हास्य, बड़े जोरको ऊंची हँसो । कहकहा । {{Outdent|अट्टन (सं० क्ली० )}} अट्ट-ल्युट करणे, अद्यते अनाद्रियते रिपुरनेन । १ चक्रफलकास्त्र, पहिये जैसे फलक (पृष्ठ) वाला हथियार, ढाल । -२ अनादर, बेइज्जती । भावे ल्युट् । {{Outdent|अट्टनगर —}} अयोध्या प्रदेशका एक शहर । यह लखनऊसे साढ़े बत्तीस कोस दक्षिणपूर्वमें एक नदी किनारे अवस्थित है। यहांके अधिवासी युद्धकुशल और परिश्रमी होते हैं । {{Outdent|अट्टपाडी —}} मन्द्राजके मलवर जिलेवाले वलवनाड तालुकुको एक उपत्यका । इसका विस्तार कोई सदा <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> सौ वर्ग कोस है, और यह पश्चिमघाट पहाड़ से पीछे पड़ो, और कुण्डेसे दक्षिण-पश्चिम पालघाटको घाटीतक फैली है। इस उपत्यकामें भवानो नदीका स्रोत और चारो ओर घना जङ्गल है । सारे वर्ष यहां मलेरियाका प्रकोप बना रहता है । {{Outdent|अट्टस्थली (सं० स्त्री० )}} अट्ट प्रधाना स्थलो, शाकतत् । १ प्रासाद-विशेष, एक प्रकारका महल । २ देश-विशेष, एक मुल्क । {{Outdent|अट्टासित (सं० क्ली० )}} ऊंची हंसी । {{Outdent|अट्टहास ( सं० पु० )}} अट्ट- हस्- घञ् ; अट्टेन अतिशयेन हासः, ३-तत्। उच्च हास, ऊंची हंसी; खिलखिलाहट, कहकहा । २ बर्द्धमान जिलेके अन्तर्गत देवताका पीठस्थान-विशेष । {{Outdent|अट्टहासक (सं० पु० )}} अट्टहास इव कः प्रकाशो दीप्तिर्यस्य । १ जोर से हंसने वाला, कहकहा लगानेवाला । २ कुन्द वृक्ष । ३ मोगरा । यह झाड़ी बड़ी और पत्तीसे भरी होती है । ब्रह्म और चीनमें भी इसका विस्तार देख पड़ता है । प्रायः बागों में इसे बो देते हैं । इसकी सूखी पत्ती पानीमें भिगोते और उसका पुलटिस बनाकर नासूरपर बांधते हैं । इसकी जड़ सांपके काटने का पक्का ज़हर मोहरा है । {{Outdent|अट्टहासिन् (सं० पु० )}} अट्ट उच्च हसति, हस्- णिनि । शिव । {{Outdent|अट्टहास्य (सं० क्ली० )}} ऊंची हंसी । {{Outdent|अट्टा (हिं० पु० )}} १ मञ्च, मचान । २ अटारी । {{Outdent|अट्टा (सं० पु० )}} १ अत्युच्च निहायत ऊंचापन । २ सर्वोत्कर्ष, सबसे बड़प्पन । ३ अनादराधिक्य, अधिक अनादर करना । {{Outdent|अट्टाट्टहास्य (सं० क्ली० )}} ऊँची हंसी । {{Outdent|अट्टाल, अट्टालक (सं० पु० )}} अट्ट इव प्रासाद इव अलति पर्याप्तो भवति, अल-अच्-कन् स्वार्थे । प्रासादोपरिस्थ गृह, महलके ऊपरका मकान । {{Outdent|अट्टालिका (सं० स्त्री) : अट्टालिक टाप् । १ प्रासाद, महल । २ राजगृर्ह, शाही इमारत । ३ इष्टकादि निर्मित गृह, पक्का मकान ।}} Hhjm अटेरन (हिं० पु० ) १ यन्त्रविशेष, योजना । यह यन्त्र सूतको आँटी तैयार करनेको लकड़ीका बनाया जाता है। २ घोड़ा फेरनेका एक तरीक़ | २-३ कुश्तीका एक दांव । अटेरना (हिं० क्रि० ) १ सूतको पोनी या ऑटो तय्यार करना । २ नशे चकनाचूर होना । अटोक ( हि० वि० ) निषेधरहित, जिसकी रोक- टोक न हो। अटम्बर ( हिं० पु० ) ढेर, राशि, जखौरा ।<noinclude></noinclude> mar34tmh4f34cwypg7e9pks0v5o3ocy 668371 668370 2026-07-20T10:40:33Z Shivaniya shaw 4129 668371 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="बिपिन बिहारी साव २३" />{{Rh|'''२२२'''|'''अटेरन — अट्टालिका'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अटेरन (हिं० पु० ) १ यन्त्रविशेष, योजना । यह यन्त्र सूतको आँटी तैयार करनेको लकड़ीका बनाया जाता है। २ घोड़ा फेरनेका एक तरीक़ । २-३ कुश्तीका एक दांव ।}} {{Outdent|अटेरना (हिं० क्रि० )१ सूतको पोनी या ऑटो तय्यार करना । २ नशे चकनाचूर होना ।}} {{Outdent|अटोक ( हि० वि० )निषेधरहित, जिसकी रोक-टोक न हो।}} {{Outdent|अटम्बर ( हि० पु० )ढेर, राशि, जखौरा । 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text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४३०'''|'''अनाशिन्—अनास्था'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>तारीफ़ न किया गया। २ वश्यताविहीन, क़ाबूमें न आनेवाला। ३ अनाशान्वित, नाउम्मीद। अनाशिन् (सं॰ त्रि॰) न नश्यति, णश-णिनि; कर्म-फलमश्नुते अश-णिनि इति वा। १ अविनश्वर, लाज़वाल, न मिटनेवाला। २ कर्मफल भोगसे रहित, जो किए हुए कर्मका फल भोग न करे। अनाशीर्दा (सं॰ पु॰) १ आशीर्वाद न देनेवाला, जो दूसरेको मुबारकबाद न दे। २ अकृतज्ञ व्यक्ति; एहसानफ़रामोश शख्स। अनाशु (सं॰ त्रि॰) णश-उण्, अश व्याप्तौ-उण् वा; नञ्-तत्। १ विनाशशून्य; लाज़वाल; मिटाया न जा सकनेवाला। २ अव्याप्त, न समाया हुवा। <small>धन्वञ्चिद्ये अनाशवो जीराश्चिदगिरौकसः।" (ऋक् १।१३६।९)</small> न आशुः शीघ्रः। ३ विलम्ब, क्षिप्रभिन्न, तेज नहीं, सुस्त। अनाश्रमवास (सं॰ पु॰) १ आश्रमसे सम्बन्ध न रखनेवाला व्यक्ति, जो शख्श आश्रममें न बसता हो। २ आश्रममें न रहना, आश्रमके रहनेको छोड़ देना। अनाश्रमिन् (सं॰ त्रि॰) न आश्रमी, नञ्-तत्। गृहाश्रमशन्य, चार आश्रममें किसीसे सम्बन्ध न रखनेवाला। अनाश्रमी, <small>अनाश्रमिन् देखो।</small> अनाश्रमेवास, <small>अनाश्रमवास देखो।</small> अनाश्रय (सं॰ त्रि॰) नास्ति आश्रयो यस्य। १ आश्रयशून्य, अशरण; बेचारा, बेपनाह; सहारा न रखनेवाला। (पु॰) २ आश्रयराहित्य, बेपनाही, सहारेका न रहना। अनाश्रित (सं॰ त्रि॰) १ सम्बन्धविहीन, बिला-ताल्लुक्, बेमेल। २ आश्रयसे पृथक् किया गया, पनाहसे छूटा हुवा, जिसे सहारा न रहा हो। ३ स्वतन्त्र, आज़ाद, जो किसीके अधिकार में रहता न हो। अनाश्वस् (सं॰ त्रि॰) नञ् पूर्वात् अश्नातेः क्वसु-रिडभावश्च निपात्यते। भोगशून्य, न खाये हुवा, उपवास या फ़ाक़ा करनेवाला। अनाश्वास (सं॰ पु॰) अभावार्थे नञ्-तत्। विश्वास अथवा आस्थाका अभाव, ऐतबार या तस्कीनकी नामौजूदगी, भरोसेका न रहना। अनाष्ट्र (सं॰ त्रि॰) भय अथवा भयावह शत्रुसे रहित, ख़ौफ़ या ख़ौफ़नाक दुश्मनसे आज़ाद। अनास् (सं॰ त्रि॰) अस्यते निरास्यते ष्ठीवनमनेन आ-अस क्षेपे-क्किप्ः आः मुखं नास्ति तत् साधनत्वे-नास्य। आस्यरहित, विना मुख; लक्षण द्वारा बात न कर सकनेवाला, जो वक्त़ के मुताबिक न बोल सके। <small>"अनासोदस्युं रमृणः।" (ऋक् ५।२९।१०)</small> कोई-कोई लोग अनुमान करते हैं, कि इस अनास् शब्दसे अनार्यजातिका मतलब निकलता है। आर्य अनार्यजातिकी बात न समझ सकते, इसीसे उन्हें अनास् कहते थे। चीन और प्राच्य-भारतवासी मंगोलिया जातिकी नाक बहुत चपटी होने और वैदिक आर्य लोगोंके साथ उसके दस्युता करनेसे ही वेदमें वह चपटी-नाकवाली अनास् शब्दसे कही गयी है। यहांकी अनार्य जाति साधारणतः नकटी होती थी। इसीसे अनेक अनुमान करते हैं, कि वेदमें अनास् शब्दका अर्थ नकटा रखा गया। अनास (वै॰ त्रि॰) नासाशून्य; नकटा, नाक न रखनेवाला। यह शब्द दस्यु और राक्षसके लिये व्यवहृत होता था। अनासती (हिं॰ स्त्री॰) अशुभ घटिका, बुरी घड़ी। अनासन्न (सं॰ त्रि॰) न आसन्नम्। असन्निहित, दूरस्थ; नज़दीक नहीं, दूर दराज़; जो पास न हो। अनासादित (सं॰ त्रि॰) १ न मिला हुवा, न पाया गया, जिसपर आक्रमण न पड़ा हो। २ न हुवा, न गुज़रा, न रहनेवाला। अनासादितविग्रह (सं॰ त्रि॰) युद्ध में अनभ्यस्त; जुङ्गका महावरा न रखनेवाला, जिसे लड़ाई करनेकी आदत न हो। अनासिक (सं॰ त्रि॰) नास्ति नासिका यस्य। १ नक्कू, विकृत नाकवाला। २ नासिकाशून्य, नकटा, जिसकी नाक कट गयी हो। अनास्था (सं॰ त्रि॰) नास्ति आस्था यस्य। १ आदररहित, बेइज्ज़त, जिसका कोई सम्मान न<noinclude></noinclude> hctk8bfvz1erlilyuthe2agbu3c6vtz 668251 668250 2026-07-19T14:36:43Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668251 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४३०'''|'''अनाशिन्—अनास्था'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>तारीफ़ न किया गया। २ वश्यताविहीन, क़ाबूमें न आनेवाला। ३ अनाशान्वित, नाउम्मीद। अनाशिन् (सं॰ त्रि॰) न नश्यति, णश-णिनि; कर्म-फलमश्नुते अश-णिनि इति वा। १ अविनश्वर, लाज़वाल, न मिटनेवाला। २ कर्मफल भोगसे रहित, जो किए हुए कर्मका फल भोग न करे। अनाशीर्दा (सं॰ पु॰) १ आशीर्वाद न देनेवाला, जो दूसरेको मुबारकबाद न दे। २ अकृतज्ञ व्यक्ति; एहसानफ़रामोश शख्स। अनाशु (सं॰ त्रि॰) णश-उण्, अश व्याप्तौ-उण् वा; नञ्-तत्। १ विनाशशून्य; लाज़वाल; मिटाया न जा सकनेवाला। २ अव्याप्त, न समाया हुवा। <small>धन्वञ्चिद्ये अनाशवो जीराश्चिदगिरौकसः।" (ऋक् १।१३६।९)</small> न आशुः शीघ्रः। ३ विलम्ब, क्षिप्रभिन्न, तेज नहीं, सुस्त। अनाश्रमवास (सं॰ पु॰) १ आश्रमसे सम्बन्ध न रखनेवाला व्यक्ति, जो शख्श आश्रममें न बसता हो। २ आश्रममें न रहना, आश्रमके रहनेको छोड़ देना। अनाश्रमिन् (सं॰ त्रि॰) न आश्रमी, नञ्-तत्। गृहाश्रमशन्य, चार आश्रममें किसीसे सम्बन्ध न रखनेवाला। अनाश्रमी, <small>अनाश्रमिन् देखो।</small> अनाश्रमेवास, <small>अनाश्रमवास देखो।</small> अनाश्रय (सं॰ त्रि॰) नास्ति आश्रयो यस्य। १ आश्रयशून्य, अशरण; बेचारा, बेपनाह; सहारा न रखनेवाला। (पु॰) २ आश्रयराहित्य, बेपनाही, सहारेका न रहना। अनाश्रित (सं॰ त्रि॰) १ सम्बन्धविहीन, बिला-ताल्लुक्, बेमेल। २ आश्रयसे पृथक् किया गया, पनाहसे छूटा हुवा, जिसे सहारा न रहा हो। ३ स्वतन्त्र, आज़ाद, जो किसीके अधिकार में रहता न हो। अनाश्वस् (सं॰ त्रि॰) नञ् पूर्वात् अश्नातेः क्वसु-रिडभावश्च निपात्यते। भोगशून्य, न खाये हुवा, उपवास या फ़ाक़ा करनेवाला। अनाश्वास (सं॰ पु॰) अभावार्थे नञ्-तत्। विश्वास<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अथवा आस्थाका अभाव, ऐतबार या तस्कीनकी नामौजूदगी, भरोसेका न रहना। अनाष्ट्र (सं॰ त्रि॰) भय अथवा भयावह शत्रुसे रहित, ख़ौफ़ या ख़ौफ़नाक दुश्मनसे आज़ाद। अनास् (सं॰ त्रि॰) अस्यते निरास्यते ष्ठीवनमनेन आ-अस क्षेपे-क्किप्ः आः मुखं नास्ति तत् साधनत्वे-नास्य। आस्यरहित, विना मुख; लक्षण द्वारा बात न कर सकनेवाला, जो वक्त़ के मुताबिक न बोल सके। <small>"अनासोदस्युं रमृणः।" (ऋक् ५।२९।१०)</small> कोई-कोई लोग अनुमान करते हैं, कि इस अनास् शब्दसे अनार्यजातिका मतलब निकलता है। आर्य अनार्यजातिकी बात न समझ सकते, इसीसे उन्हें अनास् कहते थे। चीन और प्राच्य-भारतवासी मंगोलिया जातिकी नाक बहुत चपटी होने और वैदिक आर्य लोगोंके साथ उसके दस्युता करनेसे ही वेदमें वह चपटी-नाकवाली अनास् शब्दसे कही गयी है। यहांकी अनार्य जाति साधारणतः नकटी होती थी। इसीसे अनेक अनुमान करते हैं, कि वेदमें अनास् शब्दका अर्थ नकटा रखा गया। अनास (वै॰ त्रि॰) नासाशून्य; नकटा, नाक न रखनेवाला। यह शब्द दस्यु और राक्षसके लिये व्यवहृत होता था। अनासती (हिं॰ स्त्री॰) अशुभ घटिका, बुरी घड़ी। अनासन्न (सं॰ त्रि॰) न आसन्नम्। असन्निहित, दूरस्थ; नज़दीक नहीं, दूर दराज़; जो पास न हो। अनासादित (सं॰ त्रि॰) १ न मिला हुवा, न पाया गया, जिसपर आक्रमण न पड़ा हो। २ न हुवा, न गुज़रा, न रहनेवाला। अनासादितविग्रह (सं॰ त्रि॰) युद्ध में अनभ्यस्त; जुङ्गका महावरा न रखनेवाला, जिसे लड़ाई करनेकी आदत न हो। अनासिक (सं॰ त्रि॰) नास्ति नासिका यस्य। १ नक्कू, विकृत नाकवाला। २ नासिकाशून्य, नकटा, जिसकी नाक कट गयी हो। अनास्था (सं॰ त्रि॰) नास्ति आस्था यस्य। १ आदररहित, बेइज्ज़त, जिसका कोई सम्मान न<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 39gsbx7jfqe5mkxealej68rp3ejvv93 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४३८ 250 87747 668252 351960 2026-07-19T15:01:37Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668252 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनास्थान—अनाहदवाणी'''|'''४३१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>करे। (स्त्री॰) अभावार्थे नञ्-तत्। २ अनादर, अपमान, बेइज्ज़ती, सम्मानका न मिलना। ३ आस्थाका अभाव, तस्कीनका न रहना। ४ विचारका अभाव, बेख़याली, ध्यानका न जमना। ५ भक्ति विहीनता, नावफ़ादारी। ६ निश्चेष्टता, बेफ़िक्री। अनास्थान (सं॰ त्रि॰) आस्थीयतेऽस्मिन् आ-स्था-आधारे ल्युट्, आस्थानो भूप्रदेशः, न आस्थानः, नञ्-तत्। १ भूप्रदेशभिन्न, बेजगह, बेठिकाना, जहां कोई बंधी बैठक न हो। २ आधार न बनानेवाला, जो बुनियाद न बांधे। अनास्राव (सं॰ त्रि॰) आ-स्रु-ण आस्रावः, नास्ति आस्रावः क्लेशो यस्य यत्र वा। क्लेशरहित, तक़लीफ़से बरी, दुःख न उठानेवाला। अनास्वाद (सं॰ पु॰) १ स्वादका अभाव, ज़ायकेका न जमना, फीकापन। (त्रि॰) २ स्वादशून्य, बेज़ायक़ा, जिसके खानेमें मज़ा न मिले। अनास्वादित (सं॰ त्रि॰) स्वाद न लिया गया; जिसका ज़ायका किसीने न चखा हो। अनाह, आनाह (सं॰ पु॰) नह-घञ्, नञ्-तत्। विण्मूत्ररोधक व्याधिविशेष; पाख़ाना-पेशाब रोकनेवाला ख़ास आज़ार; अफ़रा। {{Block center|<poem><small>"आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानिलेन। प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति॥" (माधव निदान)</small></poem>}} आंव या पाखाने के क्रमसे इकट्ठा हो, कुपित वायुसे बंध जाने पर पेट फूलनेको आनाह कहते हैं। अनाहक, अनहक (हिं॰-क्रि॰ वि॰) १ अधर्मपर, बेईमानीमें। २ विना लाभ, बेफ़ायदे। ३ भ्रमसे, झूठ-मूठ। अनाहत (सं॰ क्ली॰) आ-हन-भावे क्त, आहतं छेदो भोगो वा; नास्ति आहतं यत्र, नञ्-बहुव्री॰। १ नूतन वस्त्र, नया कपड़ा। कभी न पहने या धोये गये कोरे कपड़े को अनाहत कहते हैं। अमरकोषमें लिखा है, <small>"अनाहतं निष्प वाणि तन्त्रकञ्च नवाम्बरम्।"</small>कात्यायनका मत यह था,— {{Block center|<poem><small>"ईषद्धौतं नवं शुक्तं सदशं यन्नधारितम्। आहतं तद्विजानीयाद्दैवे पैत्रे च कर्मणि॥"</small></poem>}} 'सूक्ष्म, चिक्कण, धौत, नूतन, कोरे और कभी न पहने गये कपड़ेको आहत वस्त्र कहते हैं। वह दैव और पितृकर्ममें प्रशस्त होता है।' २ तन्त्रसारोक्त सुषुम्ना-नाड़ीमध्यस्थित हृदयका पद्म या चक्र। इस पद्ममें बारह दल होते हैं। षट्चक्रनिरूपणमें लिखा है,— {{Block center|<poem><small>"तस्योर्द्धे हृदि पङ्कजं सुललितं वन्धूककान्तु प्रज्ज्वलं कादे र्द्वादशवर्णकैरुपहृतं सिन्दूररागाञ्चितैः। नाम्नानाहतसंज्ञकं सुरतरुं वाञ्छातिरिक्तप्रदं वायोर्मण्डलमव धूमसदृशं षट्कोणशोभान्वितम्॥"</small></poem>}} 'उसके ऊर्ध्वभागमें (नाभिके ऊपर) हृदयके मध्य बन्धूकपुष्पवत् उज्ज्वलकान्तियुक्त, ककारादिसे ठकार पर्यन्त बारह वर्ण में शोभित, सिन्दूर-जैसा रक्तवर्ण और सुललित पद्म विद्यमान है। उसका नाम है—अनाहत। वह कल्पतरुकी तरह वाञ्छातिरिक्ति फल देता है। उसका वायुमण्डल धूम्रवर्ण और षट्कोण-विशिष्ट है।'— {{Block center|<poem><small>"तन्मध्ये पवनाक्षरञ्च मधुरं घूमावलीधूसरं ध्यायेत् पाणिचतुष्टयेन लसितं कृष्णाधिरूढं परम्। तन्मध्ये करुणानिधानममलं हंसाभमीशाभिधं पाणिभ्यामभयं वरञ्च विदधल्लोकत्रयाणामपि॥" (षट् चक्रनिरूपण)</small></poem>}} 'उसके मध्य यं वीजस्वरूप, माधुर्यविशिष्ट, धूमसमूह जैसे धूसरवर्ण, निर्मल हंसकी तरह शुक्लवर्ण जो ईश नामक महादेव हैं और जो हस्तद्वारा त्रिलोकको अभय और वर दे रहे हैं, उनका मैं ध्यान धरता हूं।' ३ पुनर्वारकी उपनिधि, दोबारेकी धरोहर। (त्रि॰) ४ अगुणित, बेज़र्ब। ५ अनाघात, बेचोट। ६ नूतन, नया। ७ आघातसे प्रस्तुत न किया गया, जो कुट कर न तैयार हुवा हो। अनाहतनाद (सं॰ त्रि॰) १ आघातसे न उत्पन्न हुवा शब्द, धक्का लगनेसे न निकली हुई आवाज़। योगी इस नादको दोनो हाथके अंगूठेसे दोनो कानके छेद बन्द कर सुना करते हैं। २ औँ शब्द। अनाहदगढ़—पञ्जाबके अन्तर्गत पटियाला राज्यके अपने नामवाली तहसीलका प्रधान नगर। अनाहदवाणी (हिं॰ स्त्री॰) अनाहत वचन, आपसे<noinclude></noinclude> inz3d6vpeoo91cbl96kyhbz6cey1l0r 668253 668252 2026-07-19T15:02:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668253 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनास्थान—अनाहदवाणी'''|'''४३१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>करे। (स्त्री॰) अभावार्थे नञ्-तत्। २ अनादर, अपमान, बेइज्ज़ती, सम्मानका न मिलना। ३ आस्थाका अभाव, तस्कीनका न रहना। ४ विचारका अभाव, बेख़याली, ध्यानका न जमना। ५ भक्ति विहीनता, नावफ़ादारी। ६ निश्चेष्टता, बेफ़िक्री। अनास्थान (सं॰ त्रि॰) आस्थीयतेऽस्मिन् आ-स्था-आधारे ल्युट्, आस्थानो भूप्रदेशः, न आस्थानः, नञ्-तत्। १ भूप्रदेशभिन्न, बेजगह, बेठिकाना, जहां कोई बंधी बैठक न हो। २ आधार न बनानेवाला, जो बुनियाद न बांधे। अनास्राव (सं॰ त्रि॰) आ-स्रु-ण आस्रावः, नास्ति आस्रावः क्लेशो यस्य यत्र वा। क्लेशरहित, तक़लीफ़से बरी, दुःख न उठानेवाला। अनास्वाद (सं॰ पु॰) १ स्वादका अभाव, ज़ायकेका न जमना, फीकापन। (त्रि॰) २ स्वादशून्य, बेज़ायक़ा, जिसके खानेमें मज़ा न मिले। अनास्वादित (सं॰ त्रि॰) स्वाद न लिया गया; जिसका ज़ायका किसीने न चखा हो। अनाह, आनाह (सं॰ पु॰) नह-घञ्, नञ्-तत्। विण्मूत्ररोधक व्याधिविशेष; पाख़ाना-पेशाब रोकनेवाला ख़ास आज़ार; अफ़रा। {{Block center|<poem><small>"आमं शकृद्वा निचितं क्रमेण भूयो विबद्धं विगुणानिलेन। प्रवर्तमानं न यथास्वमेनं विकारमानाहमुदाहरन्ति॥" (माधव निदान)</small></poem>}} आंव या पाखाने के क्रमसे इकट्ठा हो, कुपित वायुसे बंध जाने पर पेट फूलनेको आनाह कहते हैं। अनाहक, अनहक (हिं॰-क्रि॰ वि॰) १ अधर्मपर, बेईमानीमें। २ विना लाभ, बेफ़ायदे। ३ भ्रमसे, झूठ-मूठ। अनाहत (सं॰ क्ली॰) आ-हन-भावे क्त, आहतं छेदो भोगो वा; नास्ति आहतं यत्र, नञ्-बहुव्री॰। १ नूतन वस्त्र, नया कपड़ा। कभी न पहने या धोये गये कोरे कपड़े को अनाहत कहते हैं। अमरकोषमें लिखा है, <small>"अनाहतं निष्प वाणि तन्त्रकञ्च नवाम्बरम्।"</small>कात्यायनका मत यह था,— {{Block center|<poem><small>"ईषद्धौतं नवं शुक्तं सदशं यन्नधारितम्। आहतं तद्विजानीयाद्दैवे पैत्रे च कर्मणि॥"</small></poem>}}<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>'सूक्ष्म, चिक्कण, धौत, नूतन, कोरे और कभी न पहने गये कपड़ेको आहत वस्त्र कहते हैं। वह दैव और पितृकर्ममें प्रशस्त होता है।' २ तन्त्रसारोक्त सुषुम्ना-नाड़ीमध्यस्थित हृदयका पद्म या चक्र। इस पद्ममें बारह दल होते हैं। षट्चक्रनिरूपणमें लिखा है,— {{Block center|<poem><small>"तस्योर्द्धे हृदि पङ्कजं सुललितं वन्धूककान्तु प्रज्ज्वलं कादे र्द्वादशवर्णकैरुपहृतं सिन्दूररागाञ्चितैः। नाम्नानाहतसंज्ञकं सुरतरुं वाञ्छातिरिक्तप्रदं वायोर्मण्डलमव धूमसदृशं षट्कोणशोभान्वितम्॥"</small></poem>}} 'उसके ऊर्ध्वभागमें (नाभिके ऊपर) हृदयके मध्य बन्धूकपुष्पवत् उज्ज्वलकान्तियुक्त, ककारादिसे ठकार पर्यन्त बारह वर्ण में शोभित, सिन्दूर-जैसा रक्तवर्ण और सुललित पद्म विद्यमान है। उसका नाम है—अनाहत। वह कल्पतरुकी तरह वाञ्छातिरिक्ति फल देता है। उसका वायुमण्डल धूम्रवर्ण और षट्कोण-विशिष्ट है।'— {{Block center|<poem><small>"तन्मध्ये पवनाक्षरञ्च मधुरं घूमावलीधूसरं ध्यायेत् पाणिचतुष्टयेन लसितं कृष्णाधिरूढं परम्। तन्मध्ये करुणानिधानममलं हंसाभमीशाभिधं पाणिभ्यामभयं वरञ्च विदधल्लोकत्रयाणामपि॥" (षट् चक्रनिरूपण)</small></poem>}} 'उसके मध्य यं वीजस्वरूप, माधुर्यविशिष्ट, धूमसमूह जैसे धूसरवर्ण, निर्मल हंसकी तरह शुक्लवर्ण जो ईश नामक महादेव हैं और जो हस्तद्वारा त्रिलोकको अभय और वर दे रहे हैं, उनका मैं ध्यान धरता हूं।' ३ पुनर्वारकी उपनिधि, दोबारेकी धरोहर। (त्रि॰) ४ अगुणित, बेज़र्ब। ५ अनाघात, बेचोट। ६ नूतन, नया। ७ आघातसे प्रस्तुत न किया गया, जो कुट कर न तैयार हुवा हो। अनाहतनाद (सं॰ त्रि॰) १ आघातसे न उत्पन्न हुवा शब्द, धक्का लगनेसे न निकली हुई आवाज़। योगी इस नादको दोनो हाथके अंगूठेसे दोनो कानके छेद बन्द कर सुना करते हैं। २ औँ शब्द। अनाहदगढ़—पञ्जाबके अन्तर्गत पटियाला राज्यके अपने नामवाली तहसीलका प्रधान नगर। अनाहदवाणी (हिं॰ स्त्री॰) अनाहत वचन, आपसे<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 9cn3v4nr4etnaz0e72nra76i09i46zu पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४३९ 250 87750 668254 351963 2026-07-19T15:25:47Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668254 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४३२'''|'''अनाहार—अनितभा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>निकली बात। २ आकाशवाणी, आस्मानसे आने-वाली आवाज़। अनाहार (सं॰ पु॰) न आहारः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ भोजनाभाव, अनशन, उपवास, फ़ाकाकशी, खानेका न मिलना। (त्रि॰) २ भोजन न पाये हुवा, जिसने खाना न खाया हो। अनाहारमार्गणा (सं॰ स्त्री॰) जैनियोंका व्रतविशेष। अनाहारिन् (सं॰ त्रि॰) आहार या भोजन न लेनेवाला, जो खाना न खाये। अनाहार्य (सं॰ त्रि॰) आहार्य कृत्रिमं आहरणीयञ्च, नञ्-तत्। १ स्वाभाविक, अकृत्रिम, तबयी, ग़ैरमसन्बी, असली। २ आहरणीय नहीं, खानेके नाक़ाबिल; जिसे खाना वाजिब न हो। अनाहिताग्नि (सं॰ पु॰) न आहितः अग्निर्येन। विधिपूर्वक अग्न्याधान न करनेवाला व्यक्ति, निरग्नि ब्राह्मण। अनाहुति (सं॰ स्त्री॰) १ आहुतिका अभाव, यज्ञका न होना। २ अयोग्य आहुति, खराब यज्ञ। अनाहूत (सं॰ त्रि॰) न आहूतः। अनिमन्त्रित, अकृताह्वान, न्योता न दिया गया, बेबुलाया। अनाहूतोपजल्पिन् (सं॰ पु॰) निष्पयोजन अभिमान अड़ानेवाला व्यक्ति, जो शख्स बेमतलब फ़ख्र फैलाये, जिस बातको लोग सुनना नहीं चाहते, उसी बातपर बहस बढ़ानेवाला। अनाहूतोपविष्ट (सं॰ नि॰) अनिमन्त्रित व्यक्तिकी तरह उपवेशन किये हुवा, जो बेन्यौते आदमीकी तरह बैठा हो। अनाह्लाद (सं॰ पु॰) १ आह्लादका अभाव, निरानन्द, खु़शीका न खुलना, बेचैनी। (त्रि॰) २ आह्लादरहित, नाखुश, उदास। अनाह्वादित (सं॰ त्रि॰) आह्लाद न उठाये हुवा, जो खु़श न रहा हो। अनि:शस्त (सं॰ त्रि॰) अप्रशंसित, निन्दा; जिसकी तारीफ़ न हुई हो। अनिकामतस् (सं॰ अव्य॰) विना अभिलाष, क़स्द न करके, स्वयं, खु़द-ब-खु़द, आप ही आप। अनिकेत (सं॰ पु॰) नास्ति निकेतो निर्दिष्टवास-स्थानं यस्य। १ परिव्राजक, सन्यासी, जो फ़कीर कहीं घर बनाकर न ठहरे। (त्रि॰) २ गृहविहीन, लामकां, बेघर, जिसके घर-द्वार न हो। अनिक्षिप्तधूर (सं॰ पु॰) बोधिसत्वभेद। अनिक्षु (सं॰ क्ली॰) कुश, कास। (Saccharum Spontaneum) इक्षु जातीय होते भी ठीक ऊख-जैसा न रहनेसे इसका नाम अनिक्षु पड़ा है। अनिगीर्ण (सं॰ त्रि॰) न निगीर्णम्। १ अपलाप न लगाया गया, जो छिपाकर न रखा गया हो। २ अनधःकृत, न निगला हुवा। अनिग्रह (सं॰ त्रि॰) १ निग्रहरहित, अबाध, बेरोक। (पु॰) २ निग्रहका अभाव, रोकका न रहना। ३ खण्डनका अभाव, काट-कूटका न होना। अनिग्रहस्थान (सं॰ क्ली॰) अनिग्रहका स्थान, काट-छांट न फटकारनेकी जगह। यह शब्द वैज्ञानिक और तथ्य विषयका द्योतक है। अनिङ्ग्य (सं॰ त्रि॰) विभाग न बांटने योगा, तक़सीम देनेके नाक़बिल। अनिच्छ (सं॰ त्रि॰) १ इच्छारहित, बेख्व़ाहिश। २ तृप्त, आसूदा। अनिच्छा (सं॰ स्त्री॰) अभावार्थे नञ्-तत्। <small>इच्छा। पा ३।३।१०१ ।</small> इच्छाका अभाव, ख़्वाहिशका न होना, अनभिलाष, बेपरवाई। अनिच्छित (सं॰ त्रि॰) इच्छामें न आया हुवा, जिसकी ख़्वाहिश न लगी हो। अनिच्छु (सं॰ त्रि॰) इच्छतीति, इष-उ, निपातनात् षस्य छः। <small>विन्दुरिच्छुः। पा ३।२।१६९ ।</small> अनिच्छाविशिष्ट, अनाकाङ्क्षी, ख़्वाहिश न रखनेवाला, जिसे चाह न हो। अनिच्छुक, <small>अनिच्छु देखो।</small> अनिजक (सं॰ त्रि॰) निजका नहीं, जो ख़ास अपना न हो, अन्यका, ग़ैरवाला; पराया। अनित (हिं॰ त्रि॰) रहित, शून्य, ख़ाली। <small>अनित्य देखो।</small> अनितभा (वै॰ स्त्री॰) ऋग्वेदोक्त एक नदी। मालूम होता, कि यह पञ्जाबकी कोई नदी है। किन्तु इसका वर्तमान नाम नहीं बता सकते।<noinclude></noinclude> klz6cvqm8khm5q9pnwhokvahdayjo4u 668255 668254 2026-07-19T15:26:49Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668255 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४३२'''|'''अनाहार—अनितभा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>निकली बात। २ आकाशवाणी, आस्मानसे आने-वाली आवाज़। अनाहार (सं॰ पु॰) न आहारः, अभावार्थे नञ्-तत्। १ भोजनाभाव, अनशन, उपवास, फ़ाकाकशी, खानेका न मिलना। (त्रि॰) २ भोजन न पाये हुवा, जिसने खाना न खाया हो। अनाहारमार्गणा (सं॰ स्त्री॰) जैनियोंका व्रतविशेष। अनाहारिन् (सं॰ त्रि॰) आहार या भोजन न लेनेवाला, जो खाना न खाये। अनाहार्य (सं॰ त्रि॰) आहार्य कृत्रिमं आहरणीयञ्च, नञ्-तत्। १ स्वाभाविक, अकृत्रिम, तबयी, ग़ैरमसन्बी, असली। २ आहरणीय नहीं, खानेके नाक़ाबिल; जिसे खाना वाजिब न हो। अनाहिताग्नि (सं॰ पु॰) न आहितः अग्निर्येन। विधिपूर्वक अग्न्याधान न करनेवाला व्यक्ति, निरग्नि ब्राह्मण। अनाहुति (सं॰ स्त्री॰) १ आहुतिका अभाव, यज्ञका न होना। २ अयोग्य आहुति, खराब यज्ञ। अनाहूत (सं॰ त्रि॰) न आहूतः। अनिमन्त्रित, अकृताह्वान, न्योता न दिया गया, बेबुलाया। अनाहूतोपजल्पिन् (सं॰ पु॰) निष्पयोजन अभिमान अड़ानेवाला व्यक्ति, जो शख्स बेमतलब फ़ख्र फैलाये, जिस बातको लोग सुनना नहीं चाहते, उसी बातपर बहस बढ़ानेवाला। अनाहूतोपविष्ट (सं॰ नि॰) अनिमन्त्रित व्यक्तिकी तरह उपवेशन किये हुवा, जो बेन्यौते आदमीकी तरह बैठा हो। अनाह्लाद (सं॰ पु॰) १ आह्लादका अभाव, निरानन्द, खु़शीका न खुलना, बेचैनी। (त्रि॰) २ आह्लादरहित, नाखुश, उदास। अनाह्वादित (सं॰ त्रि॰) आह्लाद न उठाये हुवा, जो खु़श न रहा हो। अनि:शस्त (सं॰ त्रि॰) अप्रशंसित, निन्दा; जिसकी तारीफ़ न हुई हो। अनिकामतस् (सं॰ अव्य॰) विना अभिलाष, क़स्द न करके, स्वयं, खु़द-ब-खु़द, आप ही आप।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अनिकेत (सं॰ पु॰) नास्ति निकेतो निर्दिष्टवास-स्थानं यस्य। १ परिव्राजक, सन्यासी, जो फ़कीर कहीं घर बनाकर न ठहरे। (त्रि॰) २ गृहविहीन, लामकां, बेघर, जिसके घर-द्वार न हो। अनिक्षिप्तधूर (सं॰ पु॰) बोधिसत्वभेद। अनिक्षु (सं॰ क्ली॰) कुश, कास। (Saccharum Spontaneum) इक्षु जातीय होते भी ठीक ऊख-जैसा न रहनेसे इसका नाम अनिक्षु पड़ा है। अनिगीर्ण (सं॰ त्रि॰) न निगीर्णम्। १ अपलाप न लगाया गया, जो छिपाकर न रखा गया हो। २ अनधःकृत, न निगला हुवा। अनिग्रह (सं॰ त्रि॰) १ निग्रहरहित, अबाध, बेरोक। (पु॰) २ निग्रहका अभाव, रोकका न रहना। ३ खण्डनका अभाव, काट-कूटका न होना। अनिग्रहस्थान (सं॰ क्ली॰) अनिग्रहका स्थान, काट-छांट न फटकारनेकी जगह। यह शब्द वैज्ञानिक और तथ्य विषयका द्योतक है। अनिङ्ग्य (सं॰ त्रि॰) विभाग न बांटने योगा, तक़सीम देनेके नाक़बिल। अनिच्छ (सं॰ त्रि॰) १ इच्छारहित, बेख्व़ाहिश। २ तृप्त, आसूदा। अनिच्छा (सं॰ स्त्री॰) अभावार्थे नञ्-तत्। <small>इच्छा। पा ३।३।१०१ ।</small> इच्छाका अभाव, ख़्वाहिशका न होना, अनभिलाष, बेपरवाई। अनिच्छित (सं॰ त्रि॰) इच्छामें न आया हुवा, जिसकी ख़्वाहिश न लगी हो। अनिच्छु (सं॰ त्रि॰) इच्छतीति, इष-उ, निपातनात् षस्य छः। <small>विन्दुरिच्छुः। पा ३।२।१६९ ।</small> अनिच्छाविशिष्ट, अनाकाङ्क्षी, ख़्वाहिश न रखनेवाला, जिसे चाह न हो। अनिच्छुक, <small>अनिच्छु देखो।</small> अनिजक (सं॰ त्रि॰) निजका नहीं, जो ख़ास अपना न हो, अन्यका, ग़ैरवाला; पराया। अनित (हिं॰ त्रि॰) रहित, शून्य, ख़ाली। <small>अनित्य देखो।</small> अनितभा (वै॰ स्त्री॰) ऋग्वेदोक्त एक नदी। मालूम होता, कि यह पञ्जाबकी कोई नदी है। किन्तु इसका वर्तमान नाम नहीं बता सकते।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> jjqsabxv5qy9cii08upjho269fy3j2g पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४४० 250 87752 668330 351965 2026-07-20T04:25:35Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668330 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनित्य—अनिद्रा'''|'''४३३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{block center|<poem><small>"मा वी रसानितभा कुभा क्रु मुर्मा वः सिन्धुर्नि रीरमत्। मा वः परि ष्ठात्सरयुः पुरीषिण्यस्मे इत्सुम्नमस्तु वः॥"</small></poem>}} {{Left|<small>(ऋग्वेद ५।५।३।९)</small>}} अनित्य (सं॰ त्रि॰) नियतं ध्रुवं नित्यं; न नित्यम्, नञ्-तत्। १ अस्थायी, सदा न रहनेवाला; नापायदार, जो हमेशा न रहे। २ अवसरका, मौक़ेबाला। ३ अनियमित, बेक़ायदा। ४ अदृढ़, ग़ैरमज़बूत। ५ अनिश्चित, बेठिकाना। ६ नश्वर, मिटजानेवाला। ७ विकल्प। (अव्य॰) ८ अवसरपर, मौक़े बमौक़े; कभी-कभी। अनित्यकर्मन् (सं॰ क्ली॰) समय विशेषका पूजन, मुख्य प्रयोजनका याग। अनित्यक्रिया (सं॰ स्त्री॰) <small>अनित्यकर्मन् देखो।</small> अनित्यता (सं॰ स्त्री॰) चञ्चल अथवा सीमाबद्ध जीवन; नापायदार या महदूद हस्ती। अनित्यत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अनित्यता देखो।</small> अनित्यदत्त (सं॰ पु॰) अपने माता-पिता द्वारा अन्यको गोदमें लिये जानेके लिये थोड़े-दिन दिया गया पुत्र। अनित्यदत्तक, अनित्यदत्रिम, <small>अनित्यदत्त देखो</small> अनित्यप्रत्यवेक्षा (सं॰ स्त्री॰) जैन मतानुसार—यह विवेक, कि सब बीतते जा रहा है; जैनियोंकी सब गुज़रते चले जानेकी समझ। अनित्यभाव (सं॰ पु॰) अस्थिरता, नापायदारी, न ठहरनेकी हालत। अनित्यसम (सं॰ पु॰) मिथ्या हेतु, झुठा सबब, धोका-धड़ी, चालबाज़ी। अनित्यसमा (सं॰ स्त्री॰) <small>अनित्यसम देखो।</small> अनित्यसमप्रकरण (सं॰ क्ली॰) न्यायका भागविशेष, जिसमें मिथ्या हेतुपर वितर्क बंधा है। अनित्यसमास (सं॰ पु॰) वह समास या शब्दयोग जिसका अर्थ शब्द पृथक् कर भी समभावसे लगा सकते हैं। अनिदान (सं॰ त्रि॰) निदान-विहीन, कारणरहित, बेसबब, बिलाबायस, जिसका कोई सबब न सूझे। अनिद्र (सं॰ त्रि॰) निद्रारहित, बेनींद, जिसे नींद न लगती हो। अनिद्रा (सं॰ स्त्री॰) अभावार्थे नञ्-तत्। <small>निन्देर्न लोपश्च। उण् २।१७। १ निद्राभाव, नींदका न पड़ना। २ जागरण, जगाई। (त्रि॰) ३ निद्रारहित, बेनींद, जिसे नींद न आती हो। अनिद्रा (Insomnia) नाना प्रकारके रोगका पूर्व लक्षण है। उन्मादरोग उठनेसे पहले ख़ुद रोगी या उसका आत्मीयस्वजन कुछ भी समझ नहीं सकता। किन्तु वास्तविक मनुष्य हठात् पागल नहीं पड़ता। पागल होनेके तीन-चार मास पहलेसे रोगी रात्रिकालमें जागा करता है। नींद लेने से वह स्वप्न देखता, उसी समय दिलमें बरबराने लगता है। इसी कष्टके कारण नींद लगते भी रोगी इच्छासे सोना नहीं चाहता। उसके कुछ दिन बाद उन्मादरोग उभरता है। हृत्पिण्डकी पीड़ा, अजीर्णरोग, यकृत्की विकृतिसे उत्पन्न पाण्डुरोग, अतिशय मानसिक चिन्ता, मनस्ताप, शारीरिक श्रमाभाव प्रभृति अनेक कारणसे निद्राभाव निकलता है। यह निश्चित करना कठिन है, कि मनुष्य नींद न लेकर कितने दिन बच सकता है। इतिहासके मध्य केवल एक घटना देख पड़ती है। सन् १८५९ में चीन देशके किसी व्यक्तिने अपनी स्त्रीका प्राण ले डाला था। विचारसे अपराधीको प्राणबधकी आज्ञा मिली। बोध बंधता, कि मुजरिमके निष्ठुर भावसे अपनी स्त्रीका ख़ून बहानेपर विचार- पतिने कुछ नूतन तर्ज़ से उसे मारनेकी अनुमति दी थी। तीन चौकीदार नियुक्त किये गये। हुक्म हुवा, कि मुजरिम एकबारगी ही सोने न पाता; जितने दिन उसका प्राण न छूटता, उतने दिन वह क्रमागत जगाया जाता। हाकिमने कहा था,—"देशमें सब कोई सोये, नींद ले; केवल बारी-बारी एक चौकीदार जागे, दूसरे हतभाग्य अपराधी ख़ुद न सोने पाये।" हाय-हाय मचाते, लोटते-पोटते, मट्टीमें घिसलते सात-आठ दिन निकल चले। मनुष्यका प्राण बहुत कठिन है, कण्ठके पास पहुंचकर भी बाहर नहीं जाता; अन्तमें अट्ठारहवां दिन देख पड़ा। अपराधी रोते-रोते<noinclude></noinclude> 25h3r61w4iq0xa82g1c9fpy76azplsd 668331 668330 2026-07-20T04:30:19Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668331 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनित्य—अनिद्रा'''|'''४३३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>{{block center|<poem><small>"मा वी रसानितभा कुभा क्रु मुर्मा वः सिन्धुर्नि रीरमत्। मा वः परि ष्ठात्सरयुः पुरीषिण्यस्मे इत्सुम्नमस्तु वः॥"</small></poem>}} {{Right|<small>(ऋग्वेद ५।५।३।९)</small>}} अनित्य (सं॰ त्रि॰) नियतं ध्रुवं नित्यं; न नित्यम्, नञ्-तत्। १ अस्थायी, सदा न रहनेवाला; नापायदार, जो हमेशा न रहे। २ अवसरका, मौक़ेबाला। ३ अनियमित, बेक़ायदा। ४ अदृढ़, ग़ैरमज़बूत। ५ अनिश्चित, बेठिकाना। ६ नश्वर, मिटजानेवाला। ७ विकल्प। (अव्य॰) ८ अवसरपर, मौक़े बमौक़े; कभी-कभी। अनित्यकर्मन् (सं॰ क्ली॰) समय विशेषका पूजन, मुख्य प्रयोजनका याग। अनित्यक्रिया (सं॰ स्त्री॰) <small>अनित्यकर्मन् देखो।</small> अनित्यता (सं॰ स्त्री॰) चञ्चल अथवा सीमाबद्ध जीवन; नापायदार या महदूद हस्ती। अनित्यत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अनित्यता देखो।</small> अनित्यदत्त (सं॰ पु॰) अपने माता-पिता द्वारा अन्यको गोदमें लिये जानेके लिये थोड़े-दिन दिया गया पुत्र। अनित्यदत्तक, अनित्यदत्रिम, <small>अनित्यदत्त देखो</small> अनित्यप्रत्यवेक्षा (सं॰ स्त्री॰) जैन मतानुसार—यह विवेक, कि सब बीतते जा रहा है; जैनियोंकी सब गुज़रते चले जानेकी समझ। अनित्यभाव (सं॰ पु॰) अस्थिरता, नापायदारी, न ठहरनेकी हालत। अनित्यसम (सं॰ पु॰) मिथ्या हेतु, झुठा सबब, धोका-धड़ी, चालबाज़ी। अनित्यसमा (सं॰ स्त्री॰) <small>अनित्यसम देखो।</small> अनित्यसमप्रकरण (सं॰ क्ली॰) न्यायका भागविशेष, जिसमें मिथ्या हेतुपर वितर्क बंधा है। अनित्यसमास (सं॰ पु॰) वह समास या शब्दयोग जिसका अर्थ शब्द पृथक् कर भी समभावसे लगा सकते हैं। अनिदान (सं॰ त्रि॰) निदान-विहीन, कारणरहित, बेसबब, बिलाबायस, जिसका कोई सबब न सूझे। अनिद्र (सं॰ त्रि॰) निद्रारहित, बेनींद, जिसे नींद न लगती हो।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>"-"अनिद्रा (सं॰ स्त्री॰) अभावार्थे 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{{Right|<small>(ऋग्वेद ५।५।३।९)</small>}} अनित्य (सं॰ त्रि॰) नियतं ध्रुवं नित्यं; न नित्यम्, नञ्-तत्। १ अस्थायी, सदा न रहनेवाला; नापायदार, जो हमेशा न रहे। २ अवसरका, मौक़ेबाला। ३ अनियमित, बेक़ायदा। ४ अदृढ़, ग़ैरमज़बूत। ५ अनिश्चित, बेठिकाना। ६ नश्वर, मिटजानेवाला। ७ विकल्प। (अव्य॰) ८ अवसरपर, मौक़े बमौक़े; कभी-कभी। अनित्यकर्मन् (सं॰ क्ली॰) समय विशेषका पूजन, मुख्य प्रयोजनका याग। अनित्यक्रिया (सं॰ स्त्री॰) <small>अनित्यकर्मन् देखो।</small> अनित्यता (सं॰ स्त्री॰) चञ्चल अथवा सीमाबद्ध जीवन; नापायदार या महदूद हस्ती। अनित्यत्व (सं॰ क्ली॰) <small>अनित्यता देखो।</small> अनित्यदत्त (सं॰ पु॰) अपने माता-पिता द्वारा अन्यको गोदमें लिये जानेके लिये थोड़े-दिन दिया गया पुत्र। अनित्यदत्तक, अनित्यदत्रिम, <small>अनित्यदत्त देखो</small> अनित्यप्रत्यवेक्षा (सं॰ स्त्री॰) जैन मतानुसार—यह विवेक, कि सब बीतते जा रहा है; जैनियोंकी सब गुज़रते चले जानेकी समझ। अनित्यभाव (सं॰ पु॰) अस्थिरता, नापायदारी, न ठहरनेकी हालत। अनित्यसम (सं॰ पु॰) मिथ्या हेतु, झुठा सबब, धोका-धड़ी, चालबाज़ी। अनित्यसमा (सं॰ स्त्री॰) <small>अनित्यसम 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शान्ति निकाले। <small>यकृत् और हृत्पिण्ड देखो।</small> कौलिक उन्मादरोगका लक्षण देख या उन्मादरोगका कोई पूर्व लक्षण समझ पड़नेसे रोगीके प्रति विशेष यत्न रखना आवश्यक है। <small>उन्माद देखो।</small> इस स्थान में अनिद्रा निवारणके कई एक साधारण उपाय लिखे जाते हैं। निद्रा न आनेसे अनेक अफीम मर्फ़िया, कोरल प्रभृति औषध की व्यवस्था बांधते हैं। किन्तु उस प्रकारकी चिकित्सा भली नहीं होती। विशेष उत्कट अवस्था न होनेसे औषधका प्रयोग मना है। प्रथम केवल सुनियमसे पीड़ाका उपशम करनेकी चेष्टा चलाये। प्रत्यूषमें किञ्चित् व्यायामके बाद दुग्ध और कच्चा अण्डा सुपथ्य होता है। इससे शरीर स्निग्ध पड़ता और स्नायुमें बल बढ़ता है। ऐसा द्रव्य कभी न खाये, जिससे क्षुधामान्द्य या अजीर्ण बढ़े, नहीं तो पेट फूल जाये गा। उदराध्मान या अजीर्ण रहनेसे निद्रा लगना कठिन है। रात्रिको अल्प आहार ले, किन्तु अधिक रात्रि बीतनेपर भोजन न करे। सोने से पहले कियत्काल गर्म जलमें पैर डुबाये रहे, गर्म जलसे अंगोछा तर कर सर्वाङ्ग पोंछ डाले। फिर दक्षिण पार्श्वसे इसतरह लेटे, जिसमें जिह्वा और ओष्ठ न झुके। इसीतरह स्थिरभावमें एक मनसे यानी दिल लगाकर ओँ जपे किंवा एक, दो इत्यादि गिना करे। साढ़े चार सौ बार जपने या गिननेके बाद प्रायः गाढ़ निद्राकर्षण पड़ता है। काश्मीरदेशमें शिशुके सुलानेका एक बहुत सहज उपाय होता है। रात्रिकालमें लड़केको नींद न आनेसे जननी उसके मत्थे पर जलकी धारा छोड़ती है। कोई दो घण्टे जल छोड़नेसे लड़का चुपके सो जाता है। डाक्टर ब्रेडने आदमीके सुलानेका एक सहज उपाय बता दिया है। रात्रिको अच्छी नींद न आने किंवा एकबारगी ही अनिद्रा रहनेसे रोगीको निस्तब्ध घरमें परिष्कार विस्तरपर लिटाये। फिर उसके भ्रूवाले मध्यस्थलमें दश-बारह इञ्च दूर कोई उज्ज्वल द्रव्य रख दे। इस चमकते हुए द्रव्यकी ओर देखते-देखते क्रमसे शरीर मानो अवश होता और ख़ुदबख़ुद आंख मूंद जाती है। किन्तु इस प्रकार प्रक्रिया अधिक क्षण चलानेपर विपद् बढ़नेकी सम्भावना है, इसलिये विज्ञ चिकित्सक भिन्न किसी दूसरेको इसमें हस्तक्षेप करने देना उचित नहीं समझते। डाक्टर ब्रेड एतद्भिन्न दूसरे भी अनेक उपाय करते थे। किन्तु लोगोंने देखा, कि उन्मादरोग या शारीरिक विशेष यन्त्रणा न रहते इस सामान्य उपायसे ही सुनिद्रा आ जाती है। अनिद्रित (सं॰ त्रि॰) न निद्रितम्। निद्रित नहीं, जागरित, न सोते हुवा, जो जाग रहा हो। अनावृष्ट (सं॰ त्रि॰) अबाध, अनधीन, रोका न गया, जो मातहत न बना हो। अनिध्म (सं॰ त्रि॰) काष्ठकी आवश्यकता न रखते हुवा, जिसे लकड़ी या ईंधनकी ज़रूरत न पड़े। अनिन (सं॰ त्रि॰) प्रभुविहीन, बेमालिक, जिसका कोई रक्षक न रहे। अनिन्दनीय, <small>अनिन्द्रा देखो।</small> अनिन्दित (सं॰ त्रि॰) न निन्दितम्। १ अगर्हित, निन्दित नहीं, बुरा बताये जानेके नाक़ाबिल।<noinclude></noinclude> 6db2f5rxz9z2bowf2a7ncgkeecya2gs 668337 668336 2026-07-20T04:50:12Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668337 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४३४'''|'''अनिद्रा—अनिन्दित'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>चौकीदारके पैरपर गिर पड़ा और हाथ जोड़कर बोला,—आप मेरा गला काट डालिये, गोली मारिये, जल में डुबा दीजिये, नाक और मुंह दबाकर अन्त कीजिये; दूसरे जिस शास्ति में खासी यन्त्रणा देख पड़े, उसे ही चलाइये; लेकिन इस क्लेशसे मुझे बचा लीजिये। दूसरे दिन मुजरिम मर गया। शायद सुना है, कि चीना सचराचर अपराधीको ऐसा ही दण्ड दिया करते हैं। अनिद्राका प्रतीकार पहुंचानेसे पहले रोगका कारण काट डालना चाहिये। जो स्वभावतः अलस हैं, कुछ भी परिश्रम नहीं पकड़ते, उन सकल लोगोंको कायिक परिश्रम उठाना आवश्यक है। सन्ध्या और सवेरे निर्मल वायुमें घूमने-फिरनेसे भले आदमियोंका शरीर ख़ूब स्वस्थ रहता है। इससे क्षुधा बढ़ती और रात्रिको सुनिद्रा लगती है। यक्कृत् और हृत्पिण्डमें पीड़ा उठनेसे उपयुक्त औषध द्वारा उसकी शान्ति निकाले। <small>यकृत् और हृत्पिण्ड देखो।</small> कौलिक उन्मादरोगका लक्षण देख या उन्मादरोगका कोई पूर्व लक्षण समझ पड़नेसे रोगीके प्रति विशेष यत्न रखना आवश्यक है। <small>उन्माद देखो।</small> इस स्थान में अनिद्रा निवारणके कई एक साधारण उपाय लिखे जाते हैं। निद्रा न आनेसे अनेक अफीम मर्फ़िया, कोरल प्रभृति औषध की व्यवस्था बांधते हैं। किन्तु उस प्रकारकी चिकित्सा भली नहीं होती। विशेष उत्कट अवस्था न होनेसे औषधका प्रयोग मना है। प्रथम केवल सुनियमसे पीड़ाका उपशम करनेकी चेष्टा चलाये। प्रत्यूषमें किञ्चित् व्यायामके बाद दुग्ध और कच्चा अण्डा सुपथ्य होता है। इससे शरीर स्निग्ध पड़ता और स्नायुमें बल बढ़ता है। ऐसा द्रव्य कभी न खाये, जिससे क्षुधामान्द्य या अजीर्ण बढ़े, नहीं तो पेट फूल जाये गा। उदराध्मान या अजीर्ण रहनेसे निद्रा लगना कठिन है। रात्रिको अल्प आहार ले, किन्तु अधिक रात्रि बीतनेपर भोजन न करे। सोने से पहले कियत्काल गर्म जलमें पैर डुबाये रहे, गर्म जलसे अंगोछा तर कर सर्वाङ्ग पोंछ डाले। फिर दक्षिण पार्श्वसे<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>इसतरह लेटे, जिसमें जिह्वा और ओष्ठ न झुके। इसीतरह स्थिरभावमें एक मनसे यानी दिल लगाकर ओँ जपे किंवा एक, दो इत्यादि गिना करे। साढ़े चार सौ बार जपने या गिननेके बाद प्रायः गाढ़ निद्राकर्षण पड़ता है। काश्मीरदेशमें शिशुके सुलानेका एक बहुत सहज उपाय होता है। रात्रिकालमें लड़केको नींद न आनेसे जननी उसके मत्थे पर जलकी धारा छोड़ती है। कोई दो घण्टे जल छोड़नेसे लड़का चुपके सो जाता है। डाक्टर ब्रेडने आदमीके सुलानेका एक सहज उपाय बता दिया है। रात्रिको अच्छी नींद न आने किंवा एकबारगी ही अनिद्रा रहनेसे रोगीको निस्तब्ध घरमें परिष्कार विस्तरपर लिटाये। फिर उसके भ्रूवाले मध्यस्थलमें दश-बारह इञ्च दूर कोई उज्ज्वल द्रव्य रख दे। इस चमकते हुए द्रव्यकी ओर देखते-देखते क्रमसे शरीर मानो अवश होता और ख़ुदबख़ुद आंख मूंद जाती है। किन्तु इस प्रकार प्रक्रिया अधिक क्षण चलानेपर विपद् बढ़नेकी सम्भावना है, इसलिये विज्ञ चिकित्सक भिन्न किसी दूसरेको इसमें हस्तक्षेप करने देना उचित नहीं समझते। डाक्टर ब्रेड एतद्भिन्न दूसरे भी अनेक उपाय करते थे। किन्तु लोगोंने देखा, कि उन्मादरोग या शारीरिक विशेष यन्त्रणा न रहते इस सामान्य उपायसे ही सुनिद्रा आ जाती है। अनिद्रित (सं॰ त्रि॰) न निद्रितम्। निद्रित नहीं, जागरित, न सोते हुवा, जो जाग रहा हो। अनावृष्ट (सं॰ त्रि॰) अबाध, अनधीन, रोका न गया, जो मातहत न बना हो। अनिध्म (सं॰ त्रि॰) काष्ठकी आवश्यकता न रखते हुवा, जिसे लकड़ी या ईंधनकी ज़रूरत न पड़े। अनिन (सं॰ त्रि॰) प्रभुविहीन, बेमालिक, जिसका कोई रक्षक न रहे। अनिन्दनीय, <small>अनिन्द्रा देखो।</small> अनिन्दित (सं॰ त्रि॰) न निन्दितम्। १ अगर्हित, निन्दित नहीं, बुरा बताये जानेके नाक़ाबिल।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 6yaqphum5ijofd0h14ohq3f3n6drfun पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४४२ 250 87756 668339 351969 2026-07-20T05:13:29Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668339 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनिन्द्य—अनिमिख'''|'''४३५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>२ घृणित नहीं, जिसे नफ़रत न दिखाई गयी हो। ३ पवित्र, पाक। ४ धार्मिक, ईमानदार। ५ नेक, भला। ६ स्वतन्त्र, आज़ाद। अनिन्द्रा (सं॰ त्रि॰) निन्दाके अयोग्य, हिक़ारतके नाक़ाबिल, निर्दोष, बेऐब। अनिन्द्र (सं॰ त्रि॰) नास्ति इन्द्र याज्यो यस्य। १ इन्द्रको न जाननेवाला, जो इन्द्रका यज्ञ न करे। २ इन्द्रसे पृथक्, जो इन्द्रसे अलग हो गया हो। ऋग्वेदके छः ऋक् में अनिन्द्र शब्दको देखते हैं। यह बात निश्चित करनेमें अनेक सन्देह उठता है, कि अनिन्द्र कौन था। उस कालके राक्षस, असुर या दस्यु आर्यों का यज्ञादि न मानते, सर्वदा ही उनके प्रति उत्पात उठाया करते थे। इसीलिये वह अनिन्द्र कहाते रहे। किन्तु इस विषयपर भी सन्देह है, कि आर्यों के मध्य में भी सकल इन्द्रकी मानते थे या नहीं,— {{Block center|<poem><small>"अभीदमेकमेको अस्मि निष्षाड़भी द्वा किमु चयः करन्ति। खले न पर्षान् प्रतिहम्मि भूरि किं मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्राः॥"</small></poem>}} {{Right|<small>(ऋक् १०।४८।७।)</small>}} सायणाचार्यने 'अनिन्द्राः' का अर्थ 'इन्द्रमयजन्तः' अर्थात् इन्द्रका यज्ञ न करनेवाले लिखा है। निरुक्तमें यास्कने कहा है,—<small>"य इन्द्रं न विदुरिन्द्रो ह्यमस्मानिन्द्री इतर इति वा।"</small> अनिन्द्रिय (सं॰ क्ली॰) इन्द्रियसे पृथक् द्रव्य, जो चीज़ इन्द्रिय नहीं होती। अनिप (हिं॰ पु॰) सेनापति, अफ़सरे फ़ौज। अनिपद्यमान (सं॰ त्रि॰) नीचे न गिरते हुवा, बेथका-मांदा, जो सोनेके लिये न झुकता हो। अनिपात (सं॰ पु॰) जीवनका स्थायिभाव, ज़िन्दगीकी सदामत, जीते जीका न छूटना। अनिपुण (सं॰ त्रि॰) न निपुणम्। अपटु, अविज्ञ, नाहोशियार, बेवकूफ़, होशियारी न रखनेवाला। अनिबद्ध (सं॰ त्रि॰) न निबद्धम्। बद्ध नहीं, ग्रथित नहीं, अनायत, न बांधा गया, ताल्लुक़ न रखनेवाला। अनिबद्धप्रलापिन् (सं॰ त्रि॰) असम्बद्ध भाषण करते हुवा, जो उखड़ी-उखड़ी बात बना रहा हो। अनिबाध (सं॰ त्रि॰) नास्ति निबाधो यस्य। असम्बाध, न रोका गया, जिसकी हद न बंधी हो। (पु॰) २ निबाधका अभाव, रोकका न रहना, स्वतन्त्रता, आज़ादी। अनिभृत (सं॰ त्रि॰) न निभृतम्। चञ्चल, चुल-बुला, घरका नहीं, जो घराऊ न रहे, पृथक् न रखा गया, जो अलग न किया गया हो, निर्लज्ज, बेशर्म, वीर, बहादुर, संसार-सम्बन्धीय, दुनियासे ताल्लुक़ रखनेवाला। अनिभृष्ट (सं॰ त्रि॰) निभृश-क्त, निभृष्टम्। अबाधित, तकलीफ़ न पहुंचाया गया, अजित, ग़ैरमग़लूब, अन्यूनकृत, घटाया न गया। अनिभृष्टत्विहि (वै॰ पु॰) अन्यून शक्तिशाली द्रव्य, जिस चीज़ की ताक़त कम न पड़ी हो। अनिभ्य (सं॰ त्रि॰) धनविहीन, जो दौलतमन्द न हो। अनिमक (सं॰ पु॰) अन जीवने शब्दे च, बाहुलकात् इमन्; अनिमः जीवनं तेन कायति प्रकाशते शब्दायते वा, कै-क। १ भेक, मेंडक। शीतकालमें भेक मृतवत् रह पुनर्वार जी उठता, इसीसे इसका नाम अनिमक पड़ा है। २ कोकिल, कोयल। ३ भ्रमर, भौंरा। इनके मधुर शब्दसे म्रियमाण मनमें आस्वादका सञ्चार होता है। अनिमाय जीवनाय कं जलं यस्य। ४ पद्मकेशर। अनिमाय कं सुखं यस्मात्। ५ मधुकवृक्ष, महुवा। अनिमन् (सं॰ पु॰) १ कण, ज़रा। २ चिह्न, दाग़। अनिमन्त्रित (सं॰ त्रि॰) निमन्त्रण न पहुंचाया गया, जिसे न्योता न मिला हो। अनिमन्त्रितभोजिन् (सं॰ त्रि॰) विना निमन्त्रण पाये भोजन करते हुवा, जो बेन्यौते ही खाना खा रहा हो। अनिमा (हिं॰) <small>अणिमा देखो।</small> अनिमान (सं॰ त्रि॰) नि-मा-भावे ल्युट् नास्ति निमानं यस्य। अपरिच्छिन्न, परिच्छेदशून्य, बेहद, बहुत ज्य़ादा, जिसका कोई हिसाब न हो। अनिमिख (हिं॰ वि॰) चक्षुस्पन्दनशून्य, जिसकी पलक न पड़े। ऋग्वेदमें मूर्धन्य षकारका उच्चारण स्वकार-जैसा निकालते हैं। इसीसे हिन्दी प्रभृति भाषामें अपभ्रंशसे मूर्धन्य षकार के स्थानमें 'ख' और<noinclude></noinclude> bp2clw2882qgfp6yb6tfkmpgtq8rt2v 668340 668339 2026-07-20T05:15:04Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668340 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनिन्द्य—अनिमिख'''|'''४३५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>२ घृणित नहीं, जिसे नफ़रत न दिखाई गयी हो। ३ पवित्र, पाक। ४ धार्मिक, ईमानदार। ५ नेक, भला। ६ स्वतन्त्र, आज़ाद। अनिन्द्रा (सं॰ त्रि॰) निन्दाके अयोग्य, हिक़ारतके नाक़ाबिल, निर्दोष, बेऐब। अनिन्द्र (सं॰ त्रि॰) नास्ति इन्द्र याज्यो यस्य। १ इन्द्रको न जाननेवाला, जो इन्द्रका यज्ञ न करे। २ इन्द्रसे पृथक्, जो इन्द्रसे अलग हो गया हो। ऋग्वेदके छः ऋक् में अनिन्द्र शब्दको देखते हैं। यह बात निश्चित करनेमें अनेक सन्देह उठता है, कि अनिन्द्र कौन था। उस कालके राक्षस, असुर या दस्यु आर्यों का यज्ञादि न मानते, सर्वदा ही उनके प्रति उत्पात उठाया करते थे। इसीलिये वह अनिन्द्र कहाते रहे। किन्तु इस विषयपर भी सन्देह है, कि आर्यों के मध्य में भी सकल इन्द्रकी मानते थे या नहीं,— {{Block center|<poem><small>"अभीदमेकमेको अस्मि निष्षाड़भी द्वा किमु चयः करन्ति। खले न पर्षान् प्रतिहम्मि भूरि किं मा निन्दन्ति शत्रवोऽनिन्द्राः॥"</small></poem>}} {{Right|<small>(ऋक् १०।४८।७।)</small>}} सायणाचार्यने 'अनिन्द्राः' का अर्थ 'इन्द्रमयजन्तः' अर्थात् इन्द्रका यज्ञ न करनेवाले लिखा है। निरुक्तमें यास्कने कहा है,—<small>"य इन्द्रं न विदुरिन्द्रो ह्यमस्मानिन्द्री इतर इति वा।"</small> अनिन्द्रिय (सं॰ क्ली॰) इन्द्रियसे पृथक् द्रव्य, जो चीज़ इन्द्रिय नहीं होती। अनिप (हिं॰ पु॰) सेनापति, अफ़सरे फ़ौज। अनिपद्यमान (सं॰ त्रि॰) नीचे न गिरते हुवा, बेथका-मांदा, जो सोनेके लिये न झुकता हो। अनिपात (सं॰ पु॰) जीवनका स्थायिभाव, ज़िन्दगीकी सदामत, जीते जीका न छूटना। अनिपुण (सं॰ त्रि॰) न निपुणम्। अपटु, अविज्ञ, नाहोशियार, बेवकूफ़, होशियारी न रखनेवाला। अनिबद्ध (सं॰ त्रि॰) न निबद्धम्। बद्ध नहीं, ग्रथित नहीं, अनायत, न बांधा गया, ताल्लुक़ न रखनेवाला। अनिबद्धप्रलापिन् (सं॰ त्रि॰) असम्बद्ध भाषण करते हुवा, जो उखड़ी-उखड़ी बात बना रहा हो। अनिबाध (सं॰ त्रि॰) नास्ति निबाधो यस्य।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>असम्बाध, न रोका गया, जिसकी हद न बंधी हो। (पु॰) २ निबाधका अभाव, रोकका न रहना, स्वतन्त्रता, आज़ादी। अनिभृत (सं॰ त्रि॰) न निभृतम्। चञ्चल, चुल-बुला, घरका नहीं, जो घराऊ न रहे, पृथक् न रखा गया, जो अलग न किया गया हो, निर्लज्ज, बेशर्म, वीर, बहादुर, संसार-सम्बन्धीय, दुनियासे ताल्लुक़ रखनेवाला। अनिभृष्ट (सं॰ त्रि॰) निभृश-क्त, निभृष्टम्। अबाधित, तकलीफ़ न पहुंचाया गया, अजित, ग़ैरमग़लूब, अन्यूनकृत, घटाया न गया। अनिभृष्टत्विहि (वै॰ पु॰) अन्यून शक्तिशाली द्रव्य, जिस चीज़ की ताक़त कम न पड़ी हो। अनिभ्य (सं॰ त्रि॰) धनविहीन, जो दौलतमन्द न हो। अनिमक (सं॰ पु॰) अन जीवने शब्दे च, बाहुलकात् इमन्; अनिमः जीवनं तेन कायति प्रकाशते शब्दायते वा, कै-क। १ भेक, मेंडक। शीतकालमें भेक मृतवत् रह पुनर्वार जी उठता, इसीसे इसका नाम अनिमक पड़ा है। २ कोकिल, कोयल। ३ भ्रमर, भौंरा। 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user="अमिताभ साव" />{{Rh|'''४३६'''|'''अनिमित्त—अनियारा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>'ख' के स्थानमें भी मूर्धन्य षकार लिखा जाता है; जैसे—वर्खा (वर्षा) और भाखा (भाषा) इत्यादि। अनिमित्त (सं॰ त्रि॰) नास्ति निमित्तं कारणं यस्य यत्र वा। १ अकारण, निमित्तशून्य, बेसबब, मतलब न रखनेवाला। (क्ली॰) अभावार्थे नञ्-तत्। २ कारणाभाव, बेसबबी; कारण या सबबका न रहना। (हिं॰ क्रि॰ वि॰) ३ विना कारण, बेसबब, झठ-मूठ। अनिमित्तक (सं॰ त्रि॰) कारणरहित, निमित्तशून्य, बेसबब, कोई ग़रज़ न रखनेवाला। अनिमित्ततस् (सं॰ अव्य॰) अकारण, बेसबब, झूठ-मूठ। अनिमित्तनिराकृत (सं॰ त्रि॰) अकारण दूर किया गया, जो बेसबब नामज्जूर हुवा हो। अनिमित्तलिङ्गनाश (सं॰ पु॰) अक्षिरोग-विशेष, जिससे पीड़ा होनेपर अन्धूतक हो जाते हैं, तीमार, तिरमिरा। अनिमिष् (सं॰ स्त्री॰) निमिष्-क्विप्, स नास्ति यत्र। १ स्पन्दनशून्य दृष्टि, न झपकनेवाली नज़र। २ देवता। ३ मत्स्य, मछली। अनिमिष (सं॰ पु॰) न-मिष-क निमिषः; नास्ति निमेषो यस्य, बहुव्री॰। १ मत्स्य, मछली। २ देवता, फ़रिश्ता। ३ महाकाल। ४ विष्णु। देवतावोंकी आंख कभी नहीं झपकती, जिसका वर्णन नैषधमें दमयन्तीके स्वयम्बर-स्थलपर कविने लिखा है। ५ सूक्ष्मकाल-परिमाण, थोड़ी देरका समय। (त्रि॰) ६ चक्षुस्पन्दन-शून्य, आंख न झपकानेवाला। ७ चक्षु या पुष्पकी भांति विकसित, आंख या फूल-जैसा लिखा हुवा। अनिमिषम् (सं॰ अव्य॰) बेपलक मारे, आंख न झपका कर, लगातार, बराबर। अनिमिषा, <small>अनिमिषम् देखो।</small> अनिमिषाक्ष (सं॰ पु॰) टक-टकी बांधे हुये व्यक्ति, न झपकनेवाली आंखका शख्स। अनिमिषाक्षी (सं॰ स्त्री॰) <small>अनिमिषाक्ष देखो।</small> अनिमिषाचार्य, <small>अनिमेषाचार्य देखो।</small> अनिमिषीय (सं॰ त्रि॰) आंख न झपकानेवालेका सम्बन्धी, टकटकी बांधनेवालेसे ताल्लुक़ रखनेवाला। यह शब्द प्रधानतः देवताका विशेषण है; क्योंकि उनकी आंख कभी नहीं झपकती । अनिमेष (सं० पु० ) निमिष-वत्र निमेषः, नास्ति निमेषश्चक्षुः स्पन्दनं यस्य । १ मत्स्य, मछली । २ देवता, फरिश्ता | ( त्रि०) ३ चक्षुके निमेषसे शून्य, जिसकी खन झपके । अनिमेषम्, अनिमिषम् देखो । । अनिमेषाचार्य (सं० पु० ) अनिमेषाणां सुराणां श्राचार्य:- गुरुः, ६-तत्। बृहस्पति, देवतावोंके आचार्यं । अनियत (सं० वि० ) न नियतम् । अनित्य, गैरमुदामी, अस्थायो, नापायदार; रूप, क्रम या नियम न रखनेवाला, जो बेशक्ल, बेसिलसिले या बेकायदे हो । अनियतपुंचा (सं० स्त्रो० ) दुर्व्वत्त स्त्री, बुरे चाल-- चलनको औरत । अनियतवृत्ति (सं० त्रि. ) नियमित नियुक्ति अथवा आय न रखते हुवा, जिसको नौकरी या आमदनी बंधी न हो । अनियनाङ्ग (स ं० पु० ) गणित में - समाप्त न होने. वाली संख्या, जो हिसाबको अदद पूरी न पड़े । अनियतात्मन् (स ं० त्रि० ) अपने आत्माको नियम अथवा वशमें न रखनेवाला, जिसकी रूह कायदे या ताबे में न रहे। अनियन्त्रित (सं० त्रि०) न नियन्त्रितम् । १ अपरि- चालित, न चलाया गया । २ उच्छृङ्खल, मन- माना । ३ अनियत, लामुकरर । ४ अनिवारित, बेरोक-टोक | अनियमक (सं० पु० ) न नियम:, अभावार्थे नञ्-तत् । नियमका अभाव, विशृङ्खलता, कायदेका न रहना । २ दुराचार, बदचलनी । ३ अनिश्चय, शङ्का, शक्कोशबह । (त्रि०) ४ नियमशून्य, बेकायदा । अनियमित (सं० त्रि०) नियम या नौति न रखते हुवा, जो कायदे या · बेकायदा, नियमविहीन । कानूनसे न चलता हो, अनियारा (हिं० वि०) अनीदार, शानदार, नोकीला,. पैना, तीखी धारवाला । (स्त्री० ) अनियारी ।<noinclude></noinclude> mfwpgg9zuaqqwyqe024z162s6sn9t7l 668350 668343 2026-07-20T08:07:07Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668350 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh|'''४३६'''|'''अनिमित्त—अनियारा'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude>'ख' के स्थानमें भी मूर्धन्य षकार लिखा जाता है; जैसे—वर्खा (वर्षा) और भाखा (भाषा) इत्यादि। अनिमित्त (सं॰ त्रि॰) नास्ति निमित्तं कारणं यस्य यत्र वा। १ अकारण, निमित्तशून्य, बेसबब, मतलब न रखनेवाला। (क्ली॰) अभावार्थे नञ्-तत्। २ कारणाभाव, बेसबबी; कारण या सबबका न रहना। (हिं॰ क्रि॰ वि॰) ३ विना कारण, बेसबब, झठ-मूठ। अनिमित्तक (सं॰ त्रि॰) कारणरहित, निमित्तशून्य, बेसबब, कोई ग़रज़ न रखनेवाला। अनिमित्ततस् (सं॰ अव्य॰) अकारण, बेसबब, झूठ-मूठ। अनिमित्तनिराकृत (सं॰ त्रि॰) अकारण दूर किया गया, जो बेसबब नामज्जूर हुवा हो। अनिमित्तलिङ्गनाश (सं॰ पु॰) अक्षिरोग-विशेष, जिससे पीड़ा होनेपर अन्धूतक हो जाते हैं, तीमार, तिरमिरा। अनिमिष् (सं॰ स्त्री॰) निमिष्-क्विप्, स नास्ति यत्र। १ स्पन्दनशून्य दृष्टि, न झपकनेवाली नज़र। २ देवता। ३ मत्स्य, मछली। अनिमिष (सं॰ पु॰) न-मिष-क निमिषः; नास्ति निमेषो यस्य, बहुव्री॰। १ मत्स्य, मछली। २ देवता, फ़रिश्ता। ३ महाकाल। ४ विष्णु। देवतावोंकी आंख कभी नहीं झपकती, जिसका वर्णन नैषधमें दमयन्तीके स्वयम्बर-स्थलपर कविने लिखा है। ५ सूक्ष्मकाल-परिमाण, थोड़ी देरका समय। (त्रि॰) ६ चक्षुस्पन्दन-शून्य, आंख न झपकानेवाला। ७ चक्षु या पुष्पकी भांति विकसित, आंख या फूल-जैसा लिखा हुवा। अनिमिषम् (सं॰ अव्य॰) बेपलक मारे, आंख न झपका कर, लगातार, बराबर। अनिमिषा, <small>अनिमिषम् देखो।</small> अनिमिषाक्ष (सं॰ पु॰) टक-टकी बांधे हुये व्यक्ति, न झपकनेवाली आंखका शख्स। अनिमिषाक्षी (सं॰ स्त्री॰) <small>अनिमिषाक्ष देखो।</small> अनिमिषाचार्य, <small>अनिमेषाचार्य देखो।</small> अनिमिषीय (सं॰ त्रि॰) आंख न झपकानेवालेका सम्बन्धी, टकटकी बांधनेवालेसे ताल्लुक़ रखनेवाला।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>यह शब्द प्रधानतः देवताका विशेषण है; क्योंकि उनकी आंख कभी नहीं झपकती। अनिमेष (सं॰ पु॰) नि-मिष-घञ् निमेषः, नास्ति निमेषश्चक्षुः स्पन्दनं यस्य। १ मत्स्य, मछली। २ देवता, फ़रिश्ता। (त्रि॰) ३ चक्षुके निमेषसे शून्य, जिसकी आंख न झपके। अनिमेषम्, <small>अनिमिषम् देखो।</small> अनिमेषाचार्य (सं॰ पु॰) अनिमेषाणां सुराणां आचार्यः गुरुः, ६-तत्। वृहस्पति, देवतावोंके आचार्य। अनियत (सं॰ त्रि॰) न नियतम्। अनित्य, ग़ैरमुदामी, अस्थायी, नापायदार; रूप, क्रम या नियम न रखनेवाला, जो बेशक्ल, बेसिलसिले या बेक़ायदे हो। अनियतपुंक्षा (सं॰ स्त्री॰) दुर्वृत्त स्त्री, बुरे चाल-चलनकी औरत। अनियतवृत्ति (सं॰ त्रि॰) नियमित नियुक्ति अथवा आय न रखते हुवा, जिसकी नौकरी या आमदनी बंधी न हो। अनियनाङ्ग (सं॰ पु॰) गणित में—समाप्त न होनेवाली संख्या, जो हिसाबकी अदद पूरी न पड़े। अनियतात्मन् (सं॰ त्रि॰) अपने आत्माको नियम अथवा वशमें न रखनेवाला, जिसकी रूह क़ायदे या ताबेमें न रहे। अनियन्त्रित (सं॰ त्रि॰) न नियन्त्रितम्। १ अपरिचालित, न चलाया गया। २ उच्छृङ्खल, मन-माना। ३ अनियत, लामुक़रर। ४ अनिवारित, बेरोक-टोक। अनियमक (सं॰ पु॰) न नियमः, अभावार्थे नञ्-तत्। नियमका अभाव, विश्रृङ्खलता, क़ायदेका न रहना। २ दुराचार, बदचलनी। ३ अनिश्चय, शङ्का, शक्कोशुबह। (त्रि॰) ४ नियमशून्य, बेक़ायदा। अनियमित (सं॰ त्रि॰) नियम या नीति न रखते हुवा, जो क़ायदे या क़ानूनसे न चलता हो, बेक़ायदा, नियमविहीन। अनियारा (हिं॰ वि॰) अनीदार, शानदार, नोकीला, पैना, तीखी धारवाला। (स्त्री॰) अनियारी।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 0q4e5q8pt52iny5nrx966rqw0j017eu पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४४४ 250 87760 668361 351973 2026-07-20T10:00:37Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668361 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनियुक्त—अनिरुद्ध'''|'''४३७'''}}</noinclude>अनियुक्त (सं॰ त्रि॰) न लगाया गया, अनधिकार, बेवोहदा, जो काममें न पड़ा हो। अनियोगिन् (सं॰ त्रि॰) सम्बन्ध न रखते हुवा, जो ताल्लुक़ न लगाये। अनिर (वै॰ त्रि॰) भोजन, बल अथवा यज्ञीय दानसे रहित, जिसके पास खानेको न रहे, जो ताक़त न रखे या जो यज्ञमें वलिदान न दे। अनिरवा (हिं॰ पु॰) घूमते रहनेवाला पशु, जो जानवर आवारा घूमे। अनिरा (सं॰ स्त्री॰) इण-रन् गुणाभावे निपात्यते नास्ति इरा अन्नं यस्याः। १ अनावृष्टि प्रभृति शस्यकी विघ्नकर इति, सूखा वग़ैरह अनाज बिगाड़नेवाला क़हर। (त्रि॰) नास्ति इरा अन्नं अस्य अस्मिन् क। २ दारिद्य्, अन्नरहित, बेदौलत, जिसके पास अन्न न हो। न ईरयितुं शक्यते, ईर-क पृषोदरादित्वात् ह्स्खः; नञ्-तत्। ३ पहुंचानेके अयोग्य, जो भेजने के क़ाबिल न हो। अनिराकरण (सं॰ क्ली॰) अभावार्थे नञ्-तत्। निराकरणका अभाव, दूरीकरणका न दौड़ना; ना-मञ्जूरीका न होना। अनिराकरिष्णु (सं॰ त्रि॰) १ अप्रतिबन्धक, न रोकनेवाला। २ दोष न देखनेवाला, जो ऐबजोई न ऐंठे। अनिराकृत (सं॰ त्रि॰) न निराकृतम्। अनिवारित, अदूरीभूत, रोका न गया, जो नज़दीक खड़ा हो। अनिरुक्त (सं॰ त्रि॰) अर्थावरोधे निरपेक्षतया पदजातं यत्रोक्तं तनिरुक्तं निर्वचनम्, न निरुक्तम्, नञ्-तत्। विशेषरूप निर्वचनशून्य, ज्य़ादातर न बताया गया, अनिर्दिष्ट, साफ़ तौरसे न समझा हुवा। अनिरुक्तगान (सं॰ क्ली॰) १ अस्पष्ट संगीत, जो तान साफ़ न टूटे। २ भजनकी भनभनाहट, मज़हबी गानेकी गूं-गां; सामवेद सुनानेका नियम विशेष, सामवेद गानेका एक ख़ास तरीक़। अनिरुद्ध (सं॰ पु॰) न केनापि युद्धे निरुद्धः, नि-रुध्-क्त; नज-तत्। १ श्रीकृष्णके पौत्र। प्रद्युम्नके औरस और रुक्मितनयाके गर्भसे इनका जन्म जगा था। यह महाबल पराक्रान्त योद्धा रहे। संग्राममें कोई भी इनके सामने खड़ा न होता था। श्रीकृष्णने भोजकटके राजा रुक्मीकी पौत्रीसे इनका विवाह बनाया। इनके पुत्रका नाम वज्र था। वाणराजके उषा नामकी एक रूपवती कन्या रही। अनिरुद्धने उससे भी छिपकर विवाह बनाया। इस विवाहकी घटना अति अद्भुत है। किसी दिन कैलास शिखरपर शिवके साथ पार्वती क्रीड़ा कर रही थीं। उषा उसको देख स्वामिसहवासके निमित्त व्याकुला बनीं। पार्वतीने उनके मनका भाव समझ सकनेपर कहा,—'बेटी! दुःखित न होना, तुम भी शीघ्र ही यह सुख पावोगी। वैशाखमासकी शुक्लाद्वादशीको तुम जिसे स्वप्नमें देखोगी, वही तुम्हारा पति होगा।' वैशाखमास है, शुक्लपक्षने अपनी शोभासे पृथिवी को चमका दिया है। हादशीकी ज्योत्स्नासे भरे जगत्में चांदनी चटकी पड़ती है। ऐसे ही समय उषा सोते-सोते स्वप्न देख उठती और कहती हैं,—'नाथ! आपने क्या किया? मुझे छोड़ कहां चल दिये?' पास ही चित्रलेखा सखी सोती है। राजकन्याका प्रलापवाक्य सुन वह पूछने लगती है,—'प्रिय सखि! आप किससे बात बनाती हैं? क्या स्वप्न तो नहीं देखा?' उषा अधोमुखी होती हैं, लज्जासे कुछ बोल नहीं सकतीं। किन्तु स्त्रीसे दो बात मनकी कहनेपर उसका भेद खुल जाता है। चित्रलेखा कौशल काढ़ सारी बात समझ लेती है। उसके बाद वह उषासे कहती है,—'प्रिय सखि! चिन्ता किस बातकी है? पार्वतीने जो कहा है, कभी उससे अन्यथा न होगा। मैं चित्रपटपर देवता, गन्धर्व, दैत्य, मनुष्य प्रभृतिकी प्रतिमूर्ति खींचकर देखाती हूं। आप अपने पतिको बता दीजिये, मैं उसे उड़ाकर ले आऊंगी।' यह कह चित्र खींचकर चित्रलेखा राजकन्याके सामने रखती है। वह पहले अङ्गुलि रख देवता दिखाती है,—'देखो! इनके बीचमें क्या आपके प्राणनाथ प्रतिष्ठित हैं?' उषा शिर लटकाकर कहती हैं,—'नहीं, जिन्होंने मन चोराया, वह देवताके बीच नहीं रहते।' इसपर चित्रलेखा पूछती है,—'दैत्यमें क्या वह<noinclude></noinclude> eyq8npzi6993w838bb71rp186t714lb 668362 668361 2026-07-20T10:02:08Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668362 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनियुक्त—अनिरुद्ध'''|'''४३७'''}}</noinclude>अनियुक्त (सं॰ त्रि॰) न लगाया गया, अनधिकार, बेवोहदा, जो काममें न पड़ा हो। अनियोगिन् (सं॰ त्रि॰) सम्बन्ध न रखते हुवा, जो ताल्लुक़ न लगाये। अनिर (वै॰ त्रि॰) भोजन, बल अथवा यज्ञीय दानसे रहित, जिसके पास खानेको न रहे, जो ताक़त न रखे या जो यज्ञमें वलिदान न 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पूछने लगती है,—'प्रिय सखि! आप किससे बात बनाती हैं? क्या स्वप्न तो नहीं देखा?' उषा अधोमुखी होती हैं, लज्जासे कुछ बोल नहीं सकतीं। किन्तु स्त्रीसे दो बात मनकी कहनेपर उसका भेद खुल जाता है। चित्रलेखा कौशल काढ़ सारी बात समझ लेती है। उसके बाद वह उषासे कहती है,—'प्रिय सखि! चिन्ता किस बातकी है? पार्वतीने जो कहा है, कभी उससे अन्यथा न होगा। मैं चित्रपटपर देवता, गन्धर्व, दैत्य, मनुष्य प्रभृतिकी प्रतिमूर्ति खींचकर देखाती हूं। आप अपने पतिको बता दीजिये, मैं उसे उड़ाकर ले आऊंगी।' यह कह चित्र खींचकर चित्रलेखा राजकन्याके सामने रखती है। वह पहले अङ्गुलि रख देवता दिखाती है,—'देखो! इनके बीचमें क्या आपके प्राणनाथ प्रतिष्ठित हैं?' उषा शिर लटकाकर कहती हैं,—'नहीं, जिन्होंने मन चोराया, वह देवताके बीच नहीं रहते।' इसपर चित्रलेखा पूछती है,—'दैत्यमें क्या वह<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 8b5jc7y9zpwn4mk7fwnpn3dry3bkkb0 668363 668362 2026-07-20T10:03:01Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668363 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" 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पावोगी। वैशाखमासकी शुक्लाद्वादशीको तुम जिसे स्वप्नमें देखोगी, वही तुम्हारा पति होगा।' वैशाखमास है, शुक्लपक्षने अपनी शोभासे पृथिवी को चमका दिया है। हादशीकी ज्योत्स्नासे भरे जगत्में चांदनी चटकी पड़ती है। ऐसे ही समय उषा सोते-सोते स्वप्न देख उठती और कहती हैं,—'नाथ! आपने क्या किया? मुझे छोड़ कहां चल दिये?' पास ही चित्रलेखा सखी सोती है। राजकन्याका प्रलापवाक्य सुन वह पूछने लगती है,—'प्रिय सखि! आप किससे बात बनाती हैं? क्या स्वप्न तो नहीं देखा?' उषा अधोमुखी होती हैं, लज्जासे कुछ बोल नहीं सकतीं। किन्तु स्त्रीसे दो बात मनकी कहनेपर उसका भेद खुल जाता है। चित्रलेखा कौशल काढ़ सारी बात समझ लेती है। उसके बाद वह उषासे कहती है,—'प्रिय सखि! चिन्ता किस बातकी है? पार्वतीने जो कहा है, कभी उससे अन्यथा न होगा। मैं चित्रपटपर देवता, गन्धर्व, दैत्य, मनुष्य प्रभृतिकी प्रतिमूर्ति खींचकर देखाती हूं। आप अपने पतिको बता दीजिये, मैं उसे उड़ाकर ले आऊंगी।' यह कह चित्र खींचकर चित्रलेखा राजकन्याके सामने रखती है। वह पहले अङ्गुलि रख देवता दिखाती है,—'देखो! इनके बीचमें क्या आपके प्राणनाथ प्रतिष्ठित हैं?' उषा शिर लटकाकर कहती 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पास अन्न न हो। न ईरयितुं शक्यते, ईर-क पृषोदरादित्वात् ह्स्खः; नञ्-तत्। ३ पहुंचानेके अयोग्य, जो भेजने के क़ाबिल न हो। अनिराकरण (सं॰ क्ली॰) अभावार्थे नञ्-तत्। निराकरणका अभाव, दूरीकरणका न दौड़ना; ना-मञ्जूरीका न होना। अनिराकरिष्णु (सं॰ त्रि॰) १ अप्रतिबन्धक, न रोकनेवाला। २ दोष न देखनेवाला, जो ऐबजोई न ऐंठे। अनिराकृत (सं॰ त्रि॰) न निराकृतम्। अनिवारित, अदूरीभूत, रोका न गया, जो नज़दीक खड़ा हो। अनिरुक्त (सं॰ त्रि॰) अर्थावरोधे निरपेक्षतया पदजातं यत्रोक्तं तनिरुक्तं निर्वचनम्, न निरुक्तम्, नञ्-तत्। विशेषरूप निर्वचनशून्य, ज्य़ादातर न बताया गया, अनिर्दिष्ट, साफ़ तौरसे न समझा हुवा। अनिरुक्तगान (सं॰ क्ली॰) १ अस्पष्ट संगीत, जो तान साफ़ न टूटे। २ भजनकी भनभनाहट, मज़हबी गानेकी गूं-गां; सामवेद सुनानेका नियम विशेष, सामवेद गानेका एक ख़ास तरीक़। अनिरुद्ध (सं॰ पु॰) न केनापि युद्धे निरुद्धः, नि-रुध्-क्त; नज-तत्। १ श्रीकृष्णके पौत्र। प्रद्युम्नके औरस और रुक्मितनयाके गर्भसे इनका जन्म जगा<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>था। यह महाबल पराक्रान्त योद्धा रहे। संग्राममें कोई भी इनके सामने खड़ा न होता था। श्रीकृष्णने भोजकटके राजा रुक्मीकी पौत्रीसे इनका विवाह बनाया। इनके पुत्रका नाम वज्र था। वाणराजके उषा नामकी एक रूपवती कन्या रही। अनिरुद्धने उससे भी छिपकर विवाह बनाया। इस विवाहकी घटना अति अद्भुत है। किसी दिन कैलास शिखरपर शिवके साथ पार्वती क्रीड़ा कर रही थीं। उषा उसको देख स्वामिसहवासके निमित्त व्याकुला बनीं। पार्वतीने उनके मनका भाव समझ सकनेपर कहा,—'बेटी! दुःखित न होना, तुम भी शीघ्र ही यह सुख पावोगी। वैशाखमासकी शुक्लाद्वादशीको तुम जिसे स्वप्नमें देखोगी, वही तुम्हारा पति होगा।' वैशाखमास है, शुक्लपक्षने अपनी शोभासे पृथिवी को चमका दिया है। हादशीकी ज्योत्स्नासे भरे जगत्में चांदनी चटकी पड़ती है। ऐसे ही समय उषा सोते-सोते स्वप्न देख उठती और कहती हैं,—'नाथ! आपने क्या किया? मुझे छोड़ कहां चल दिये?' पास ही चित्रलेखा सखी सोती है। राजकन्याका प्रलापवाक्य सुन वह पूछने लगती है,—'प्रिय सखि! आप किससे बात बनाती हैं? क्या स्वप्न तो नहीं देखा?' उषा अधोमुखी होती हैं, लज्जासे कुछ बोल नहीं सकतीं। किन्तु स्त्रीसे दो बात मनकी कहनेपर उसका भेद खुल जाता है। चित्रलेखा कौशल काढ़ सारी बात समझ लेती है। उसके बाद वह उषासे कहती है,—'प्रिय सखि! चिन्ता किस बातकी है? पार्वतीने जो कहा है, कभी उससे अन्यथा न होगा। मैं चित्रपटपर देवता, गन्धर्व, दैत्य, मनुष्य प्रभृतिकी प्रतिमूर्ति खींचकर देखाती हूं। आप अपने पतिको बता दीजिये, मैं उसे उड़ाकर ले आऊंगी।' यह कह चित्र खींचकर चित्रलेखा राजकन्याके सामने रखती है। वह पहले अङ्गुलि रख देवता दिखाती है,—'देखो! इनके बीचमें क्या आपके प्राणनाथ प्रतिष्ठित हैं?' उषा शिर लटकाकर कहती हैं,—'नहीं, जिन्होंने मन चोराया, वह देवताके बीच नहीं रहते।' इसपर चित्रलेखा पूछती है,—'दैत्यमें क्या वह<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{Left|110|5em}}</noinclude> dv56fp1lb7j1cn87a5kqcex799u7vvm पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४४५ 250 87762 668365 641832 2026-07-20T10:23:42Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 /* शोधित */ वर्तनी सुधार, नियम सुधार 668365 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{rh|'''४३८'''|'''अनिरुद्ध—अनिर्णीत'''}}</noinclude>मिलेंगे?' उषा लज्जिता हो फिर शिर लटका कर बोलती हैं,—'नहीं, वहां भी वह नहीं मिलनेवाले हैं! गन्धर्व में भी उनका पता नहीं पाया जाता।' इसपर चित्रलेखा एक-एक कर राजावोंकी देखाने लगती है। यदुकुलके प्रति दृष्टि पड़ते ही उषा मानो सङ्कुचित हो जाती हैं। वह देखते रहती हैं, राम, कृष्ण और प्रद्युम्नपर दृष्टि डाल उस ओर मुख घुमा नहीं सकतीं। चित्रलेखा समझ सकनेसे अनिरुद्ध पर अङ्गुलि रख बोलती है,—'देखिये, देखिये। यही हैं!! इस मुखको क्या आप पहचानती हैं?' उषा वैसे ही मनके आवेगमें लज्जा छोड़ कह उठती हैं,—'यही मेरे प्यारे हैं, इन्हीं सखाने स्वप्नमें मेरा मन चोरा लिया है।' इसके बाद चित्रलेखा छिपकर अन्तःपुरमें अनिरुद्धको लाती है। यह संवाद वाणराजके कानमें पहुंचता, कि अनिरुद्ध उषाके साथ अन्तःपुरमें रहते हैं। वह महाक्रुद्ध हो कृष्णपौत्रको नागपाशसे बांधते हैं। उधर द्वारकामें अनिरुद्धको न पा यादव अतिशय व्याकुल हो रहे हैं। पीछे महर्षि नारद जाकर सकल विपटुकी बात सुनाते हैं। इससे कृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न वाण-पुरी जा पहुंचते हैं। वाणराजके सहस्र बाहु हैं, दूसरे वह मृत्युञ्जयके वरपुत्र भी बने हैं। कृष्ण, बलराम प्रभृतिके वाण-पुरी पहुंचने पर महादेव, कार्तिकेय और प्रमथगणको साथ ले युद्ध मचाने आते हैं। इसी समय कृष्ण के साथ शिवका घोरतर संग्राम चलता और महादेव यादवगणको अभिभूत बनानेके निमित्त शिवज्वरकी सृष्टि सजाते हैं। अन्तमें कृष्ण वाणराजके समस्त बाहु चक्रसे काटते हैं, किन्तु शिवके अनुरोधसे उनके प्राण नह निकालते। इसके बाद युद्धमें जय पा यादव, अनिरुद्ध और नववधू उषाको साथ ले द्वारका वापस जाते हैं। {{Right|<small>(विष्णुपुराण ५।३२, ब्रह्मपुराण २०४-२०६ अ॰)</small>}} २ वासुदेव, सङ्घर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस चतुर्व्यूह परमेश्वरका अनिरुद्ध नामक अंश। यही आदिव्यूह है। महाभारतके मोक्षधर्मपर्वाध्यायमें लिखा है, कि इसी आदिव्यूहसे जगत्‌की सृष्टि सजी है,— {{Block center|<poem><small>"तमसो ब्रह्मसम्भूत तमोमूला मृतात्मकम्।" "सोऽनिरुड इति प्रोक्तस्तत्प्रधानं प्रचक्षते।"</small></poem>}} ३ दूत, चर, एलची, भेदिया। ४ शिव। ५ शाक्य-मुनिके सहयोगी किसी अर्हत्का नाम। (क्ली॰) ६ पशु बांधनेका रज्जु, जानवर जकड़नेकी रस्सी। (त्रि॰) ७ अबद्ध, न बंधा हुवा। ८ अनिवारित, रोका न जानेवाला। अनिरुद्ध—इस नामसे कई संस्कृत ग्रन्थकार परिचित हैं,—१ भावदास के पुत्र और हीराके पिता। इन्होंने सन् १४९६ ई॰ में शिशुबोधिनी भास्वतीकरण्टीका नामक ग्रन्थ रचा था। २ सांख्यप्रवेशनवृत्तिप्रणेता। ३ अनिरुद्ध भट्ट—इन्होंने चातुर्मास्यपद्धति, भगवत्तत्त्व-मज्जरी और हारलता ग्रन्थ रचे थे। किसी-किसीको विश्वास है, कि यह गौड़ेश्वर बल्लालसेनके गुरु रहे; इन्हींके साहाय्य से बल्लालसेनने 'दानसागर' का सङ्कलन लगाया था। अनिरुद्धपथ (सं॰ क्ली॰) न निरुद्धा पन्था यत्र, नञ्-बहुव्रो॰। १ अबाध मार्ग, खुली राह। २ वायुमण्डल, हवाका क़ुरा। (त्रि॰) ३ न रुकी हुई, खुली, साफ़। अनिरुद्धभाविनी (सं॰ स्त्री॰) अनिरुद्धस्य भाविनी पत्नी, ६-तत्। अनिरुद्धकी स्त्री। यह वाणराजकी कन्या रहीं, उषा नामसे पुकारी जाती थीं। {{Right|<small>उषाहरणका विवरण अनिरुद्ध शब्दमें देखो।</small>}} अनिरूपित (सं॰ त्रि॰) निरूपण न निकाला गया, अवर्णित, जिसका बयान न बंधा हो। अनिर्जात (सं॰ त्रि॰) न निर्जातं निश्चितं प्राप्तं वा। १ अप्राप्त, नादस्तयाब, जो न मिला हो। २ अनिश्चित, लायक़ीन, जिसका कोई ठीर-ठीक न गंठा हो। अनिर्जित (सं॰ त्रि॰) जीता न गया, जो फ़तेह न हुवा हो। अनिर्णय (सं॰ पु॰) निर्-नी-अच्; न निर्णयः, अभावार्थे नञ्-तत्। अनिश्चय, अवधारणका अभाव, फ़ैसलेका न फैलना, बेएतबारी। अनिर्णीत (सं॰ त्रि॰) अनिश्चित, अविचारित, यक़ीन न किया गया; ख्याल न जमाया हुवा।<noinclude></noinclude> 20xxnebymhx3dwjyfbd9fe01pda0zyu 668366 668365 2026-07-20T10:25:03Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668366 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{rh|'''४३८'''|'''अनिरुद्ध—अनिर्णीत'''}}</noinclude>मिलेंगे?' उषा लज्जिता हो फिर शिर लटका कर बोलती हैं,—'नहीं, वहां भी वह नहीं मिलनेवाले हैं! गन्धर्व में भी उनका पता नहीं पाया जाता।' इसपर चित्रलेखा एक-एक कर राजावोंकी देखाने लगती है। यदुकुलके प्रति दृष्टि पड़ते ही उषा मानो सङ्कुचित हो जाती हैं। वह देखते रहती हैं, राम, कृष्ण और प्रद्युम्नपर दृष्टि डाल उस ओर मुख घुमा नहीं सकतीं। चित्रलेखा समझ सकनेसे अनिरुद्ध पर अङ्गुलि रख बोलती है,—'देखिये, देखिये। यही हैं!! इस मुखको क्या आप पहचानती हैं?' उषा वैसे ही मनके आवेगमें लज्जा छोड़ कह उठती हैं,—'यही मेरे प्यारे हैं, इन्हीं सखाने स्वप्नमें मेरा मन चोरा लिया है।' इसके बाद चित्रलेखा छिपकर अन्तःपुरमें अनिरुद्धको लाती है। यह संवाद वाणराजके कानमें पहुंचता, कि अनिरुद्ध उषाके साथ अन्तःपुरमें रहते हैं। वह महाक्रुद्ध हो कृष्णपौत्रको नागपाशसे बांधते हैं। उधर द्वारकामें अनिरुद्धको न पा यादव अतिशय व्याकुल हो रहे हैं। पीछे महर्षि नारद जाकर सकल विपटुकी बात सुनाते हैं। इससे कृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न वाण-पुरी जा पहुंचते हैं। वाणराजके सहस्र बाहु हैं, दूसरे वह मृत्युञ्जयके वरपुत्र भी बने हैं। कृष्ण, बलराम प्रभृतिके वाण-पुरी पहुंचने पर महादेव, कार्तिकेय और प्रमथगणको साथ ले युद्ध मचाने आते हैं। इसी समय कृष्ण के साथ शिवका घोरतर संग्राम चलता और महादेव यादवगणको अभिभूत बनानेके निमित्त शिवज्वरकी सृष्टि सजाते हैं। अन्तमें कृष्ण वाणराजके समस्त बाहु चक्रसे काटते हैं, किन्तु शिवके अनुरोधसे उनके प्राण नह निकालते। इसके बाद युद्धमें जय पा यादव, अनिरुद्ध और नववधू उषाको साथ ले द्वारका वापस जाते हैं। {{Right|<small>(विष्णुपुराण ५।३२, ब्रह्मपुराण २०४-२०६ अ॰)</small>}} २ वासुदेव, सङ्घर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस चतुर्व्यूह परमेश्वरका अनिरुद्ध नामक अंश। यही आदिव्यूह है। महाभारतके मोक्षधर्मपर्वाध्यायमें लिखा है, कि इसी आदिव्यूहसे जगत्‌की सृष्टि सजी 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अनिर्दिष्ट (सं॰ त्रि॰) अवर्णित, अनिर्धारित, बयान न किया गया, जिसकी सिफ़त न बताई गयी हो। अनिर्देश (सं॰ पु॰) नियम अथवा दिक् का अभाव, क़ायदे या शिस्तका न रहना। अनिर्देश्य (सं॰ त्रि॰) न निर्देशम्, इदं तदिति निर्देष्टुं यन्न शक्यते परस्मै स्वयं वेद्यत्वात्; निर्-दि‍श्-ण्यत्। १ निर्विशेष, जिसका विषय न बन सके, लामज़मून्। २ निर्गुण, लासिफ़त। अनिर्धारित (सं॰ त्रि॰) न निर्धारितम्। अनिश्चित, यक़ीन न किया गया, जो अवधारित या फ़ैसल न हुवा हो। अनिर्धार्य (सं॰ त्रि॰) निश्चित निकलनेके अयोगा, फ़ैसल होनेके नाक़ाबिल, जिसका कोई ठौर-ठिकाना न ठहर सके। अनिर्बन्ध (सं॰ त्रि॰) १ बन्धनरहित, बेफांस। २ स्वतन्त्र, आज़ाद। अनिर्भर (सं॰ त्रि॰) १ क्षुद्र, छोटा। २ किञ्चित्, थोड़ा। ३ लघु, हलका। अनिर्भेद (सं॰ पु॰) भेदभावका अभाव, राज़का न रहना। अनिर्मल (सं॰ त्रि॰) न निर्मलम्। मलिन, मैला, अपरिष्कृत, गन्दा। अनिर्माल्या (सं॰ त्रि॰) निर्-मल्-ण्यत् स्त्रीत्वात् निर्माल्या, न निर्माल्या, नञ्-तत्। पृक्का नामक ओषधि विशेष, एक जड़ी-बूटी जिसे पृक्का कहते हैं। अनिर्लोचित (सं॰ त्रि॰) १ ध्यानसे न देखा गया, जिसे ग़ौरसे न देखा हो। २ अविचारित, ख़याल में न खौला हुवा। अनिर्लोड़ित (सं॰ त्रि॰) न निर्लोड़ितं आलोचि-तम्। अनालोचित, न बताया गया, जिसका बयान न हुवा हो। {{C|<small>"अनिर्लोड़ितकार्यस्व वाग् जालं वाग्मिनो वृथा।" (माघ, २।२७)</small>}} अनिर्वचनीय (सं॰ पु॰) निर्वक्तुं अयोग्यः। १ परमात्मा, ब्रह्म। (क्ली॰) २ अज्ञान, नादानी। ३ जगत्, दुनिया। (त्रि॰) ४ कहा न जा सकनेवाला, जिसकी बात बतायी न जा सके। ५ अगम्य, जिसकी बात न मिले। अनिर्वर्त्यमान (सं॰ त्रि॰) समाप्त या पूर्ण न किया गया, जो खत्म या पूरे न पड़ा हो। अनिर्वाच्य (सं॰ त्रि॰) निर्वाचनके अयोग्य चुननेके नाक़ाबिल। २ बताया न जा सकनेवाला, जिसका बयान् न हो सके। अनिर्वाण (सं॰ पु॰) १ कफ, बलग़म। (त्रि॰) २ न बुझा हुवा, जो जल रहा हो। अनिर्वाह (सं॰ पु॰) १ निर्वाहका अभाव, गुज़रका न होना। २ फलराहित्य, नतीजेका न निकलना। ३ आयकी न्यूनता, आमदनीकी कमी। अनिर्वाह्य (सं॰ त्रि॰) निर्वाह निकलनेके अयोग्य गुज़र होनेके नाक़ाबिल, जिसका प्रबन्ध बंध न सके। अनिर्विस्म (सं॰ त्रि॰) अवनतभिन्न, जो दिलगीर न हो, प्रसन्न, ख़ुश। अनिर्विद (सं॰ त्रि॰) अधोगतिके कारणसे रहित, जिसमें तनज्ज़ु लोका सबब न लगा हो। अनिर्वृति, अनिर्वृत्ति (सं॰ त्रि॰) १ पूरा न पड़ा हुवा, कच्चा निकल जानेवाला। २ असन्तुष्ट, नाराज़। ३ हतभाग्य, कमबख्त। अनिर्वृति, अनिर्वृत्ति (सं॰ स्त्री॰) न निर्वृत्तिः स्वच्छन्दता, अभावार्थे नञ्-तत्। १ स्वच्छन्दताका अभाव, आज़ादीका न आना। २ दरिद्रता, ग़रीबी। ३ अपूर्णता, नाकमाल। ४ असन्तोष, नाराज़ी। ५ अधम स्थिति, बद हालत। ६ दुःख, तकलीफ़।<noinclude></noinclude> amu8gfkn785dk2b8wc9toy2aa6ewsfx 668373 668372 2026-07-20T10:51:49Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 नियम सुधार 668373 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनिर्णेय—अनिर्वृति'''|'''४३९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>अनिर्णेय (सं॰ त्रि॰) निर्णयके अयोग्य, फैसल होनेके नाक़ाबिल। अनिर्दश (सं॰ त्रि॰) न निर्गतानि दशदिनानि यस्य, डच् अन्त बहुव्रो॰। <small>बहुब्रीहौ संख्ये ये डजबहुगणात्। पा ५।४।७३।</small> १ दश दिन न बिताये हुवा, जिसके दश रोज़ न गुज़रे हों। यह शब्द जन्म-मृतुके दश दिन अशौचका द्योतक है। अनिर्दशा (सं॰ स्त्री॰) व्याकर दश दिन न व्यतीत किये हुई गो, जिस गायको बच्चा जने दश रोज़ न गुज़रे हों। अनिर्दिश्य, <small>अनिर्देश्य देखो।/small> अनिर्दिष्ट (सं॰ त्रि॰) अवर्णित, अनिर्धारित, बयान न किया गया, जिसकी सिफ़त न बताई गयी हो। अनिर्देश (सं॰ पु॰) नियम अथवा दिक् का अभाव, क़ायदे या शिस्तका न रहना। अनिर्देश्य (सं॰ त्रि॰) न निर्देशम्, इदं तदिति निर्देष्टुं यन्न शक्यते परस्मै स्वयं वेद्यत्वात्; निर्-दि‍श्-ण्यत्। १ निर्विशेष, जिसका विषय न बन सके, लामज़मून्। २ निर्गुण, लासिफ़त। अनिर्धारित (सं॰ त्रि॰) न निर्धारितम्। अनिश्चित, यक़ीन न किया गया, जो अवधारित या फ़ैसल न हुवा हो। अनिर्धार्य (सं॰ त्रि॰) निश्चित निकलनेके अयोगा, फ़ैसल होनेके नाक़ाबिल, जिसका कोई ठौर-ठिकाना न ठहर सके। अनिर्बन्ध (सं॰ त्रि॰) १ बन्धनरहित, बेफांस। २ स्वतन्त्र, आज़ाद। अनिर्भर (सं॰ त्रि॰) १ क्षुद्र, छोटा। २ किञ्चित्, थोड़ा। ३ लघु, हलका। अनिर्भेद (सं॰ पु॰) भेदभावका अभाव, राज़का न रहना। अनिर्मल (सं॰ त्रि॰) न निर्मलम्। मलिन, मैला, अपरिष्कृत, गन्दा। अनिर्माल्या (सं॰ त्रि॰) निर्-मल्-ण्यत् स्त्रीत्वात् निर्माल्या, न निर्माल्या, नञ्-तत्। पृक्का नामक ओषधि विशेष, एक जड़ी-बूटी जिसे पृक्का कहते हैं।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अनिर्लोचित (सं॰ त्रि॰) १ ध्यानसे न देखा गया, जिसे ग़ौरसे न देखा हो। २ अविचारित, ख़याल में न खौला हुवा। अनिर्लोड़ित (सं॰ त्रि॰) न निर्लोड़ितं आलोचि-तम्। अनालोचित, न बताया गया, जिसका बयान न हुवा हो। {{C|<small>"अनिर्लोड़ितकार्यस्व वाग् जालं वाग्मिनो वृथा।" (माघ, २।२७)</small>}} अनिर्वचनीय (सं॰ पु॰) निर्वक्तुं अयोग्यः। १ परमात्मा, ब्रह्म। (क्ली॰) २ अज्ञान, नादानी। ३ जगत्, दुनिया। (त्रि॰) ४ कहा न जा सकनेवाला, जिसकी बात बतायी न जा सके। ५ अगम्य, जिसकी बात न मिले। अनिर्वर्त्यमान (सं॰ त्रि॰) समाप्त या पूर्ण न किया गया, जो खत्म या पूरे न पड़ा हो। अनिर्वाच्य (सं॰ त्रि॰) निर्वाचनके अयोग्य चुननेके नाक़ाबिल। २ बताया न जा सकनेवाला, जिसका बयान् न हो सके। अनिर्वाण (सं॰ पु॰) १ कफ, बलग़म। (त्रि॰) २ न बुझा हुवा, जो जल रहा हो। अनिर्वाह (सं॰ पु॰) १ निर्वाहका अभाव, गुज़रका न होना। २ फलराहित्य, नतीजेका न निकलना। ३ आयकी न्यूनता, आमदनीकी कमी। अनिर्वाह्य (सं॰ त्रि॰) निर्वाह निकलनेके अयोग्य गुज़र होनेके नाक़ाबिल, जिसका प्रबन्ध बंध न सके। अनिर्विस्म (सं॰ त्रि॰) अवनतभिन्न, जो दिलगीर न हो, प्रसन्न, ख़ुश। अनिर्विद (सं॰ त्रि॰) अधोगतिके कारणसे रहित, जिसमें तनज्ज़ु लोका सबब न लगा हो। अनिर्वृति, अनिर्वृत्ति (सं॰ त्रि॰) १ पूरा न पड़ा हुवा, कच्चा निकल जानेवाला। २ असन्तुष्ट, नाराज़। ३ हतभाग्य, कमबख्त। अनिर्वृति, अनिर्वृत्ति (सं॰ स्त्री॰) न निर्वृत्तिः स्वच्छन्दता, अभावार्थे नञ्-तत्। १ स्वच्छन्दताका अभाव, आज़ादीका न आना। २ दरिद्रता, ग़रीबी। ३ अपूर्णता, नाकमाल। ४ असन्तोष, नाराज़ी। ५ अधम स्थिति, बद हालत। ६ दुःख, तकलीफ़।<noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> e96n7345o5sqm1ny2wh9ep4kgq8d003 668374 668373 2026-07-20T10:52:34Z अमृता कुमारी पाण्डेय 2133 668374 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="अमृता कुमारी पाण्डेय" />{{Rh||'''अनिर्णेय—अनिर्वृति'''|'''४३९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>अनिर्णेय (सं॰ त्रि॰) निर्णयके अयोग्य, फैसल होनेके नाक़ाबिल। अनिर्दश (सं॰ त्रि॰) न निर्गतानि दशदिनानि यस्य, डच् अन्त बहुव्रो॰। <small>बहुब्रीहौ संख्ये ये डजबहुगणात्। पा ५।४।७३।</small> १ दश दिन न बिताये हुवा, जिसके दश रोज़ न गुज़रे हों। यह शब्द जन्म-मृतुके दश दिन अशौचका द्योतक है। अनिर्दशा (सं॰ स्त्री॰) व्याकर दश दिन न व्यतीत किये हुई गो, जिस गायको बच्चा जने दश रोज़ न गुज़रे हों। अनिर्दिश्य, <small>अनिर्देश्य देखो।</small> अनिर्दिष्ट (सं॰ त्रि॰) अवर्णित, अनिर्धारित, बयान न किया गया, जिसकी सिफ़त न बताई गयी हो। अनिर्देश (सं॰ पु॰) नियम अथवा दिक् का अभाव, क़ायदे या शिस्तका न रहना। अनिर्देश्य (सं॰ त्रि॰) न निर्देशम्, इदं तदिति निर्देष्टुं यन्न शक्यते परस्मै स्वयं वेद्यत्वात्; निर्-दि‍श्-ण्यत्। १ निर्विशेष, जिसका विषय न बन सके, लामज़मून्। २ निर्गुण, लासिफ़त। अनिर्धारित (सं॰ त्रि॰) न निर्धारितम्। अनिश्चित, यक़ीन न किया गया, जो अवधारित या फ़ैसल न हुवा हो। अनिर्धार्य (सं॰ त्रि॰) निश्चित निकलनेके अयोगा, फ़ैसल होनेके नाक़ाबिल, जिसका कोई ठौर-ठिकाना न ठहर सके। अनिर्बन्ध (सं॰ त्रि॰) १ बन्धनरहित, बेफांस। २ स्वतन्त्र, आज़ाद। अनिर्भर (सं॰ त्रि॰) १ क्षुद्र, छोटा। २ किञ्चित्, थोड़ा। ३ लघु, हलका। अनिर्भेद (सं॰ पु॰) भेदभावका अभाव, राज़का न रहना। अनिर्मल (सं॰ त्रि॰) न निर्मलम्। मलिन, मैला, अपरिष्कृत, गन्दा। अनिर्माल्या (सं॰ त्रि॰) निर्-मल्-ण्यत् स्त्रीत्वात् निर्माल्या, न निर्माल्या, नञ्-तत्। पृक्का नामक ओषधि विशेष, एक जड़ी-बूटी जिसे पृक्का कहते हैं।<noinclude>{{Multicol-break}}<noinclude>अनिर्लोचित (सं॰ त्रि॰) १ ध्यानसे न देखा गया, जिसे ग़ौरसे न देखा हो। २ अविचारित, ख़याल में न खौला हुवा। अनिर्लोड़ित (सं॰ त्रि॰) न निर्लोड़ितं आलोचि-तम्। अनालोचित, न बताया गया, जिसका बयान न हुवा हो। {{C|<small>"अनिर्लोड़ितकार्यस्व वाग् जालं वाग्मिनो वृथा।" (माघ, २।२७)</small>}} अनिर्वचनीय (सं॰ पु॰) निर्वक्तुं अयोग्यः। १ परमात्मा, ब्रह्म। (क्ली॰) २ अज्ञान, नादानी। ३ जगत्, दुनिया। (त्रि॰) ४ कहा न जा सकनेवाला, जिसकी बात बतायी न जा सके। ५ अगम्य, जिसकी बात न मिले। अनिर्वर्त्यमान (सं॰ त्रि॰) समाप्त या पूर्ण न किया गया, जो खत्म या पूरे न पड़ा हो। अनिर्वाच्य (सं॰ त्रि॰) निर्वाचनके अयोग्य चुननेके नाक़ाबिल। २ बताया न जा सकनेवाला, जिसका बयान् न हो सके। अनिर्वाण (सं॰ पु॰) १ कफ, बलग़म। (त्रि॰) २ न बुझा हुवा, जो जल रहा हो। अनिर्वाह (सं॰ पु॰) १ निर्वाहका अभाव, गुज़रका न होना। २ 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/>{{Rh|'''४४०'''|अनिर्वेद—अनिलारिरस'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} </noinclude>अनिर्वेद (सं॰ पु॰) न निर्वेदः, नञ्-तत्। १ असन्तोष, नाराज़ी। २ वैराग्यका न बढ़ना। ३ मोहका न मढ़ना, मुहब्बतका न मचलना। अनिर्वेश (सं॰ त्रि॰) नियुक्तिविहीन, बेकार, दुर्दशाग्रस्त, कमबख्त। अनिल (सं॰ पु॰) अन-इलच्। १ वायु, हवा। <small>इसका विस्तारित विवरण वायु शब्दमें देखो।</small> २ वसुविशेष। <small>अनिलो वसुवातयोः। (मेदिनी)</small> ३ चन्द्रवंशके नृपतिविशेष। यह तंसुके पुत्र रहे। दुष्मन्तादि इनके चार सन्तान हुए थे। यही दुष्मान्त भरत के पिता शकुन्तलानाटकके नायक हैं। <small>(विष्णुपुराण ४।१९।२)</small> ३ वातरोग, गठिया, लक़वा वग़ैरह वायुकी बीमारी। ४ शाकतरु, साखूका दरख्त़। (Capparis Trigoliata) अनिलकपित्थक (सं॰ पु॰) स्थूलाम्रातक, बड़ा अमरा। अनिलकारक (स ं० पु० ) काजिक विशेष, खौलतेचावलका मांड | अनिलकुमार (सं० पु० ) १ पवनतनय, हनूमान् २ जैन देवविशेष, जैनियोंके खास देवता । अनिलघ्न, अनिलघ्नक (सं० पु० ) अनिलं वातरोगं हन्ति, हन-टक् । स ंज्ञायां कन् । पा- ४। ३ । १४० । १ विभीतक - वृक्ष, बहेरेका पेड़। (Terminalia Belerica) (त्रि ० ) २ वातरोगनाशन, वायुकी बीमारी मिटानेवाला । अनिलज्वर ( सं० पु० ) वातिकज्वर, वायुका बुखार । यह साम और निराम भेदसे दो तरहका होता है । अनिलनिर्यास (स ं० पु० ) प्रियालवृच, पोतसालक : एक तरहका दरख । अनिलपर्यय, अनिलपर्याय (सं० पु० ) वायुरोगविशेष, जिसमें पलकपर आंखका बाहरी भाग सूजता और दुखता है। अनिलप्रकृति (सं० त्रि ० ) वायुको प्रकृति रखनेवाला । अनिलभुक् (सं० पु० ) सर्प, सांप। सांप हवाको खाकर जीता-जागता, इससे अनिलभुक् कहाता है । अनिलम्भसमाधि (सं० पु० ) जैनशास्त्रोक्त समाधिविशेष, जैनियोंके ध्यान लगानेका खास तरीक ।' अनिलकारक (सं॰ पु॰) रसविशेष जो पाण्डुरोग पर चलता है । अनिलरिपु (सं० पु० ) एरण्ड वृक्ष, अण्डेका दरख्त । अनिलव्याधि (सं० पु० ) आन्तर वायुका विपर्यय, भीतरी वायुका बिगड़ जाना, वातरोगविशेष, वायुको खास बीमारी । अनिलसख (सं० पु० ) अनिलस्य वायोः सखा, जन्त ६- तत् । अग्नि, आग । हवा लगनेसे आग खूब धधकती, इससे अनिलसख या हवाका दोस्त कहलाती है। अनिलहर (स ं० क्लो० अनिला (स० स्त्री०) खड़िया हो । कृष्ण अगुरु, काला देवदारु । १ नदी, दरया । २ खटिका, - अनिलाजीर्ण (सं० क्लो० ) वाताजीर्ण, वायु बिगड़ने से पैदा हुई बदहजमी । अनिलाटिका (सं० स्त्री० ) रक्तपुनर्नवा | अन्तं करोतीति; अन्त- । अनिलात्मज (सं० पु० ) वायुपुत्र । हनुमान् और भीमसेन दोनो ही पवनके पुत्र रहे । अनिलान्तक ( सं ० पु० णिच्-खुल्- अन्तकः, अनिलस्य वायुरोगस्य अन्तको नाशक: । इङ्ग ुदौवृक्ष, अङ्गारपुष्प, अङ्गोट । अनिलापहा (स ं० पु० ) रक्तकुलत्थक, लाल कुरथी । अनिलामय ( सं ० ० पु० ) अनिलेन दुष्टवायुना उद्भावित आमयः पौड़ा, शाक० तत् । वायुरोग, वातव्याधि, वायुको बीमारी । अनिलायन (स ं० क्लो० ) वायुपथ, हवाको राह, जिस डगरसे हवा निकले। अनिलारिरस (सं० पु० ) वातव्याधिके अधिकारका रस, जो ख़ाक वायुकी बीमारीपर चले,- “रसेन गन्धं द्विगुणं विमर्द्य वातारिनिगु रिडर सैर्दिनैकं । निवेशयेत्ताम्रमये पुटे तत्सर्वं मृदावेष्टा च वालुकाख्य ॥ यन्त्र पुटे गोमय वङ्गौ स्वभावशौते तु समुद्धरेत्तत् । निर्गुण्डिकावातहराग्नितौयैः संच एवं यवन विभावयेत्तत् ॥” (रसेन्द्रसारस'ग्रह) '.अनिलयन ( सं० त्रि०) गृहरहित, लामकां, जो कोई बंधा घर न रखता हो ।<noinclude></noinclude> ajayxxr416422g267fhytwv2gyg0koz पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४७६ 250 88366 668233 668159 2026-07-19T12:14:15Z Sanjana Chowdhury 5438 668233 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुप्रास'''|'''४६९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{gap}}सभी काममें बढ़ाबढ़ी दोष मानी गयी है। परिमित काम करनेसे गुण निकलता है। अब यही देखना चाहिये, अनुप्रास क्या है और उससे रचना कितनी मिष्ट पड़ती है? {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ततोऽरुणपरिस्यन्दमन्दीकृ तवपुः शशी। दघ्रे कामपरिक्षामकामिनीगण्डपाण्डुताम्॥”</poem>}}}} ऊपरके श्लोकमें ‘स्यन्द,’ ‘मन्द’, ‘काम’ '‘क्षाम’, ‘गण्ड’, ‘पाण्डु’,—— यह तीन अनुप्रास आये हैं। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>होलीमें रोली लिये बोली तिय मुसकाय। वैगि कान्ह इत आइये माखन देहुं खवाय॥</poem>}}}} यहाँ होली, रोली और बोली शब्द अनुप्रासके हैं। इसीतरह दो-तीन वर्ण एक प्रकार पास-पास पड़नेसे अनुप्रास गंठता है। व्यञ्जनवर्णका ही अनुप्रास मिष्ट लगता है, स्वर-वर्णका अनुप्रास उतना मीठा नहीं उठता। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>नाचो गावो रंग करो खेलो आज गुलाल। होलीको मौको भलो चली मनावो लाल॥</poem>}}}} यहां ओकार वर्णका अनुप्रास पड़ा है। ओकार स्वरवर्ण है, इससे व्यञ्जन-अनुप्रासकी तरह सुनने में मोठा नहीं लगाता। किसी प्रकारके व्यञ्जनवर्णमें यदि अ, इ, उ प्रभृति नानारूप स्वरवर्ण युक्त हों, तो अनुप्रासकी कोई क्षति नहीं निकलती। {{blockcenter|{{x-smaller|“अयमेति मन्दं मन्दं कावेरीवारिपावन: पवनः।”}}}} यहां वेरी और वारि इन दो शब्दमें भिन्न-भिन्न स्वरवर्ण लगे हैं। अर्थात् वेरीका व एकार-संयुक्त और वारिका व अकार-संयुक्त है। इसतरह विभिन्न स्वर सटनेसे अनुप्रासकी क्षति नहीं होती। दूसरे, पावन और पवन इन दो शब्दमें भी एक प वर्णपर आकार है, दूसरेपर नहीं पाते। तथापि अनुप्रास अधिक सुश्राव्य बना है। इसीतरह कविताके स्थान-स्थानमें सम्भवमत दो-एक अनुप्रास पड़नेसे पद्य सुननेपर मिष्ट मालूम होता है। किन्तु अधिक अनुप्रासका आडम्बर बांधनेसे पदलालित्य लापते हो जाता; वरन् वैसी रचना पढ़नेमें कटु लगती है। अनुप्रासमें कविता लगाते समय काव्यका रस देख . <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अल्पप्राण और दीर्घप्राण वर्णसे कविता बनाना चाहिये। आदि, करुण और शान्तिरस अल्पप्राण एवं वीभत्स, हास्य, रौद्र, वीर, भय और अद्भुतरस दीर्घप्राण वर्णसे रचे। वर्गके प्रथम, तृतीय, पञ्चम वर्ण और य र ल व को अल्पप्राण, और वर्गके द्वितीय, चतुर्थ वर्ण, एवं श ष स ह को महाप्राण कहते हैं। आदि प्रभृति रसमें न और म संयुक्त वर्ण प्रशस्त है, किन्तु टवर्गका संयुक्त वर्ण ठीक नहीं पड़ता। वीभत्स प्रभृति रसमें अनुनासिक-भिन्न अन्य संयुक्त वर्ण और टवर्गका ही संयुक्त वर्ण प्रशस्त रहता है। किन्तु रचनाके समय चुन-चुन केवल अल्पप्राण और दीर्घप्राण वर्णका प्रयोग प्रायः नही पहुंचता। सर्वत्र ही दोनो प्रकारका वर्ण मिल जाता है। फिर भी आदि, करुण और शान्ति-रसमें अल्पप्राण वर्णकी संख्या अधिक सजती और वीर प्रभृति रसमें दीर्घप्राण बहुल परिमाणसे पड़ता है। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>कङ्कण करन कल किङ्गिणी कलित कटि {{gap}}{{gap}}{{gap}}कञ्चनं कंगूरा कुचं कारी कैश यामिनी। कानन करनफूल कोमल कपोत कण्ठ {{gap}}{{gap}}{{gap}}कम्बुक कपोत कौर कोकिल कलामिनी॥ केशर कुसुम कलधौतकी कछू न कान्ति {{gap}}{{gap}}{{gap}}कोविद प्रवीण वेणी करिवरगामिनी। कोक कारिकासी किन्नरीक कन्यकासी किल {{gap}}{{gap}}{{gap}}कामकी कलासी कमलासी खासी कामिनी॥</poem>}}}} इस कवितामें अल्पप्राण वर्ण ही अधिक पाये जाते हैं, इसलिये कामिनीके लावण्यभावका जो आदि रस रहा, वह ख ब टपक पड़ा है। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“धो धो धो धो नगारा गड़ गड़ गड् गड् चौघड़ी घोरघर्षै: भों भौं भीरङ्ग शब्दैर्घन घन घन बाजे च मन्दीरनादैः। भेरी तूरी दमामा दगडदड़मसाशब्दनिस्तब्धदेवै- र्दैत्योऽसौ घोरदैत्यै: प्रविशति महिषः सार्वभौमो बभूव॥"</poem>}}}} इस कविताके भीतर दीर्घप्राण वर्णकी ही संख्या अधिक है। इसमें अल्पप्राणवणं उतने नहीं पड़े, इसीसे वीररस खूब स्पष्टरूपसे झलका है। अलङ्कारिकोंने अनुप्रासको अनेक श्रेणीमें बांटा है। नीचे स्पष्ट तालिकामें देखाते हैं,——कौन श्रेणीका अनुप्रास किस अनुप्रासके अनुगत <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|118|1em}}</noinclude> 2v5lait9dnjkqs08j9gnxurf14hu2ko 668234 668233 2026-07-19T12:15:05Z Sanjana Chowdhury 5438 668234 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुप्रास'''|'''४६९'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{gap}}सभी काममें बढ़ाबढ़ी दोष मानी गयी है। परिमित काम करनेसे गुण निकलता है। अब यही देखना चाहिये, अनुप्रास क्या है और उससे रचना कितनी मिष्ट पड़ती है? {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“ततोऽरुणपरिस्यन्दमन्दीकृ तवपुः शशी। दघ्रे कामपरिक्षामकामिनीगण्डपाण्डुताम्॥”</poem>}}}} ऊपरके श्लोकमें ‘स्यन्द,’ ‘मन्द’, ‘काम’ '‘क्षाम’, ‘गण्ड’, ‘पाण्डु’,—— यह तीन अनुप्रास आये हैं। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>होलीमें रोली लिये बोली तिय मुसकाय। वैगि कान्ह इत आइये माखन देहुं खवाय॥</poem>}}}} यहाँ होली, रोली और बोली शब्द अनुप्रासके हैं। इसीतरह दो-तीन वर्ण एक प्रकार पास-पास पड़नेसे अनुप्रास गंठता है। व्यञ्जनवर्णका ही अनुप्रास मिष्ट लगता है, स्वर-वर्णका अनुप्रास उतना मीठा नहीं उठता। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>नाचो गावो रंग करो खेलो आज गुलाल। होलीको मौको भलो चली मनावो लाल॥</poem>}}}} यहां ओकार वर्णका अनुप्रास पड़ा है। ओकार स्वरवर्ण है, इससे व्यञ्जन-अनुप्रासकी तरह सुनने में मोठा नहीं लगाता। किसी प्रकारके व्यञ्जनवर्णमें यदि अ, इ, उ प्रभृति नानारूप स्वरवर्ण युक्त हों, तो अनुप्रासकी कोई क्षति नहीं निकलती। {{blockcenter|{{x-smaller|“अयमेति मन्दं मन्दं कावेरीवारिपावन: पवनः।”}}}} यहां वेरी और वारि इन दो शब्दमें भिन्न-भिन्न स्वरवर्ण लगे हैं। अर्थात् वेरीका व एकार-संयुक्त और वारिका व अकार-संयुक्त है। इसतरह विभिन्न स्वर सटनेसे अनुप्रासकी क्षति नहीं होती। दूसरे, पावन और पवन इन दो शब्दमें भी एक प वर्णपर आकार है, दूसरेपर नहीं पाते। तथापि अनुप्रास अधिक सुश्राव्य बना है। इसीतरह कविताके स्थान-स्थानमें सम्भवमत दो-एक अनुप्रास पड़नेसे पद्य सुननेपर मिष्ट मालूम होता है। किन्तु अधिक अनुप्रासका आडम्बर बांधनेसे पदलालित्य लापते हो जाता; वरन् वैसी रचना पढ़नेमें कटु लगती है। अनुप्रासमें कविता लगाते समय काव्यका रस देख . <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अल्पप्राण और दीर्घप्राण वर्णसे कविता बनाना चाहिये। आदि, करुण और शान्तिरस अल्पप्राण एवं वीभत्स, हास्य, रौद्र, वीर, भय और अद्भुतरस दीर्घप्राण वर्णसे रचे। वर्गके प्रथम, तृतीय, पञ्चम वर्ण और य र ल व को अल्पप्राण, और वर्गके द्वितीय, चतुर्थ वर्ण, एवं श ष स ह को महाप्राण कहते हैं। आदि प्रभृति रसमें न और म संयुक्त वर्ण प्रशस्त है, किन्तु टवर्गका संयुक्त वर्ण ठीक नहीं पड़ता। वीभत्स प्रभृति रसमें अनुनासिक-भिन्न अन्य संयुक्त वर्ण और टवर्गका ही संयुक्त वर्ण प्रशस्त रहता है। किन्तु रचनाके समय चुन-चुन केवल अल्पप्राण और दीर्घप्राण वर्णका प्रयोग प्रायः नही पहुंचता। सर्वत्र ही दोनो प्रकारका वर्ण मिल जाता है। फिर भी आदि, करुण और शान्ति-रसमें अल्पप्राण वर्णकी संख्या अधिक सजती और वीर प्रभृति रसमें दीर्घप्राण बहुल परिमाणसे पड़ता है। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>कङ्कण करन कल किङ्गिणी कलित कटि {{gap}}{{gap}}कञ्चनं कंगूरा कुचं कारी कैश यामिनी। कानन करनफूल कोमल कपोत कण्ठ {{gap}}{{gap}}कम्बुक कपोत कौर कोकिल कलामिनी॥ केशर कुसुम कलधौतकी कछू न कान्ति {{gap}}{{gap}}कोविद प्रवीण वेणी करिवरगामिनी। कोक कारिकासी किन्नरीक कन्यकासी किल {{gap}}{{gap}}कामकी कलासी कमलासी खासी कामिनी॥</poem>}}}} इस कवितामें अल्पप्राण वर्ण ही अधिक पाये जाते हैं, इसलिये कामिनीके लावण्यभावका जो आदि रस रहा, वह ख ब टपक पड़ा है। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“धो धो धो धो नगारा गड़ गड़ गड् गड् चौघड़ी घोरघर्षै: भों भौं भीरङ्ग शब्दैर्घन घन घन बाजे च मन्दीरनादैः। भेरी तूरी दमामा दगडदड़मसाशब्दनिस्तब्धदेवै- र्दैत्योऽसौ घोरदैत्यै: प्रविशति महिषः सार्वभौमो बभूव॥"</poem>}}}} इस कविताके भीतर दीर्घप्राण वर्णकी ही संख्या अधिक है। इसमें अल्पप्राणवणं उतने नहीं पड़े, इसीसे वीररस खूब स्पष्टरूपसे झलका है। अलङ्कारिकोंने अनुप्रासको अनेक श्रेणीमें बांटा है। नीचे स्पष्ट तालिकामें देखाते हैं,——कौन श्रेणीका अनुप्रास किस अनुप्रासके अनुगत <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|118|1em}}</noinclude> dnyvr5rhf7hjchyaib613yz10kggm5f पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४७८ 250 88368 668239 668160 2026-07-19T12:41:15Z Sanjana Chowdhury 5438 668239 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुप्रेक्षा-अनुबन्धी'''|'''४७१'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> :{{gap}}मतलब यह, कि जिसके पास दयिता (स्त्री॰) नही दिखाती, उसके लिये चन्द्र भी अग्नि-जैसा चमकता है। फिर जिसके पास दयिता रहती, उसके पक्षमें अग्नि भी चन्द्र-जैसा झलकता है। इस स्थानमें श्लोकके उभय अर्धपर ‘दवदहन,’ शब्दसे अग्नि एवं ‘तुहिनदीधिति’ शब्दसे चन्द्र समझ पड़ता है, अर्थमें कोई भी भेद नहीं। केवल पूर्वार्धके तुहिनदीधिति शब्दमें दवदहनका एवं परार्धमें दवदहन शब्दसे तुहिनदीधितिका विधान बंधा, इसीसे यह तात्पर्यमात्रभदसे लाटानुप्रास बना है। :{{gap}}पदगत अनुप्रास समासमें भी पड़ा करता है। वही फिर एक समास, भिन्न समास, समास या असमासमें प्रातिपदिकका साम्य रहनेसे सजता है। {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“सितकरकररुचिरविभा विभाकराकारधरणिधरकीर्तिः। पौरुषकमला कमला सापि तथैवास्ति नान्यस्य॥”</poem>}}}} :{{gap}}हे विभाकराकार! (सूर्यतुल्य) हे धरणिधर! (पृथिवीपालक) आप ही की कीर्ति चन्द्रकिरण जैसी निर्मल है, अन्यकी नजर नहीं आती एवं उन प्रसिद्ध कमलान (लक्ष्मी) भी आपके पौरुषरूप कमलमें (पद्म) अधिष्ठान लिया है, दूसरेके नहीं। पदानुप्रास पांच प्रकारसे पड़ता है। <small>“तदेव पञ्चधा मतः।” (काव्य प्रकाश)</small> असमास में एक-एक पद और अनेक पदका साम्य दी एव समासमें तीन-इसतरह पांच प्रकार निकलता है। {{Outdent|अनुप्रेक्षा (सं॰ स्त्री॰) १ अक्षुस्स दृष्टिका देखना। २ शास्त्रार्थसाधन, किसी किताबी बातका गौर।}} {{Outdent|अनुप्लव (सं॰ पु॰) अनु-प्लु-अप्, अनु पश्चात् प्लवते आज्ञापालनपरतया सख्यतया वा शीघ्रं गच्छति। अनुचर, दास, सहाय, नौकर, चाकर, ख़िदमतगार, हाजिरबाश।}} {{Outdent|अनुबन्ध (सं॰ पु॰) अनुबध्यते अनेन, अनु-बन्ध घञ्। १ बालक, बच्चा। २ शिष्य, शागिर्द। ३ व्याकरणवाले किसी उद्देश्य की सिद्धिके निमित्त कल्पित वर्ण, जो हर्फ़ नहवका कोई मतलब निकालनेको मान लिया जाये। यह वर्ण कार्यकालमें ‘इत्’ रहता है। कोई विशेष सङ्केत समझानेको}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> :ऐसा अनुवन्ध अवश्य आयेगा। इससे गुण-वृद्धिका काम निकलता और प्रत्ययमें इसका लोप भी लगता है। :{{gap}}अनु-बन्ध-भावे घञ्। ४ बन्धन, सम्बन्ध, रिश्ता, जकड़। ५ अनुवृत्ति, सीधा उतार। ६ आरम्भ, आगाज। ७ उपक्रम, सिलसिला। ८ पूर्वलक्षण, पहले आसार। ९ अविच्छेद, लगाव। १० भेद, फ़र्क। ११ अनुरोध, इरादा। १२ आरोप, अन्दाज। अनुवध्यते कर्मणि घञ्। १३ जन्य, पैदा होनेवाली-चीज़ १४ अनित्य, जो शै मुदामी न हो। १५ पश्चाद्भावी शुभाशुभ, आगे आनेवाला भला-बुरा। १६ लेश, छोटा हिस्सा।}} :{{gap}}अनुबध्नाति, कर्तरि अच्। १७ जनक, पैदाकरने-वाला शख्स। १८ प्रकृति, कुदरत। १९ वैद्यमतसे वातादि दोषका अप्राधान्ध। २० गणितमें भग्नांशका संयोग, कसरका जोड़। वेदान्त-मतमें-अधिकारि-विषयके सम्बन्धका प्रयोजन, जो वैदान्तिक तत्व अक्षुण रहे। {{c|{{x-smaller|<poem> ‘दोषोत्पादोऽनुबन्धः स्यात् प्रकृतादिविनश्वर। मुख्यानुयायिनि शिशौ प्रकृतस्यानुवर्तने॥' (अमर)</poem>}}}} {{Outdent|अनुबन्धक (सं॰ त्रि॰) सम्मिलित, गठित, सम्बन्ध-विशिष्ट, मिला, लगा, सटा, गंठा।}} {{Outdent|अनुबन्धन (सं॰ क्ली॰) सम्बन्ध, श्रेणी, सिलसिला, रिश्ता, लगाव, जकड़।}} {{Outdent|अनुबन्धा (सं॰ स्त्री॰) अनुबध्यतेऽतिश्वासन व्याप्रियते-ऽनया , अनु-बन्ध-घञ्, गौरादित्वात् ङीष्। १ हिक्का-रोग, हिचकी। २ तृष्णा, प्यास।}} {{Outdent|अनुबन्धित्व (सं॰ क्ली॰) संसर्ग साधित होने की स्थिति, साथ रहनेकी हालत, सहचारिता, मातहती।}} {{Outdent|अनुबन्धिन् (सं॰ त्रि॰) अनुबनाति, अनुबन्ध-णिनि। १ अनुगत, मातहत। २ सहचर, साथ रहनेवाला। ३ अनुबन्धविशिष्ट, नतीजेका। ४ अविच्छिन, लगा-हुवा। ५ अनुरोधी। ६ व्यापक, समाया। ७ अनु-वर्ती, अगला या पिछला।}} {{Outdent|अनुबन्धी (सं॰ पु॰ त्रि॰) १-<small>अनुबन्धिन् देखो।</small> (स्त्री॰) २-<small>अनुबन्धा देखो।</small>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> my5x7mfylb99t05557sx2o4hapd62lf पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४७९ 250 88369 668264 352673 2026-07-19T16:41:24Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 668264 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४७२'''|'''अनुबन्ध्य-अनुभावन'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अनुबन्ध्य (संं॰ त्रि॰) अनु पश्चात् वधार्थ बध्यते रुध्यते यत्, अनुबन्ध कर्मणि खत्। १ मारा जानेवाला, जो ज़बहके लिये बांधा गया हो। २ प्रधान, प्रथम, तत्त्व जैसा; बड़ा, पहला। इस अर्थमें यह विशेषण ज्योतिष्ठोम यज्ञके तीन प्रधान पशुका द्योतक है।}} {{Outdent|अनुबल (सं॰ क्ली॰) पश्चादगामी रक्षक सैन्य, जो फौ़ज हिफा़जत के लिये पीछे रहती है।}} {{Outdent|अनुबोध (सं॰ पु॰) अनु-बुध-णिच्-घञ्। १ पूर्व-संलग्न चन्दनादिके गन्धोद्दीपनको पुनर्वार मर्दन, पहली खुशबू निखारनेका दुबारा मालिश। २ अनुयायी ज्ञान, पिछली समझ।}} {{Outdent|अनुबोधन (सं॰ क्ली॰) स्मरण, स्मृति, याददाश्त, ख़याल।}} {{Outdent|अनुबोधित (सं॰ स्त्रि॰) स्मरण द्वारा सूचित अथवा विश्वसित, याददाश्तसे जो मालूम हुवा या जिसपर एतबार आया हो।}} {{Outdent|अनुब्राह्मण (सं॰ क्ली॰) ब्राह्मणं वेदस्य मन्त्रेतर-भागविशेषः; ब्राह्मणसदृशोऽयं ग्रन्थोऽनुब्राह्मणम्।<small> अनुब्राह्मणादिनिः। पा ४।२।६२।</small> ब्राह्मण-सदृश ग्रन्थ। (स्त्री॰) अनुब्राह्मणिनी।<br> {{gap}}वेदके ब्राह्मण परिशिष्टपर कोई गड़वड़ नहीं पड़ता। किन्तु अनुब्राह्मण किसे कहते है? जान पड़ता है, कि सामवेदका परिशिष्ट और याज्ञवल्क्य प्रभृतिका रचित ग्रन्थ अनुब्राह्मण कहाता है। सामवेदके निदानसूत्र में ‘अनुब्राह्मणिनाः’ शब्दका उल्लेख निकलता है। फिर पाणिनिका यह सूत्र सुन याज्ञवल्क्य प्रभृति आधुनिक मुनिरचित पुस्तकको अनुब्राह्मण बताना असङ्गत नही लगता,——<small>पुराणपप्रोक्तेषु ब्राह्यणकल्पेषु। पा ४।३।१०५।</small> याज्ञवल्क्य अधिक दिनके प्राचीन नहीं, क्योंकि वह पाणिनिके समय प्रादुर्भूत हुये थे। इसलिये उन्हें पुरातन मुनि कैसे मान सकते हैं? इन बातोंसे अनुमान आता, कि याज्ञवल्क्यादि आधुनिक मुनिके रचित ब्राह्मणसदृश ग्रन्थका ही नाम अनुब्राह्मण होगा।}} {{Outdent|अनुब्राह्मणिक, (सं॰ प॰) अनुब्राह्मणवेत्ता, जो शखस अनुब्राह्मण पढ़ा हो।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|अनुब्राह्मणिन्, <small>अनुब्राह्मणिकं देखो।</small>}} {{Outdent|अनुब्राह्मणिनी (सं॰ स्त्री॰) <small>अनुब्राह्मण देखो।</small>}} {{Outdent|अनुभर्तृ (वै॰ त्रि॰) अनुरूप प्रशंसा पहुंचाते हुवा, जो मुवाफ़िक़ तारीफ़ सुनाता हो, नकल निकालनेवाला।}} {{Outdent|अनुभव (सं॰ पु॰) अनु-भू-अप्। १ ज्ञान, अक्ल। २ उपलब्धि, समझ। ३ स्मृति-भिन्न ज्ञान, जो अक्ल याददाश्तसे ताल्लुक न रखे। ४ बोध, जो समझ अपने तजरबसे आती है। ५ फल, नतीजा।}} {{Outdent|अनुभवना (हिं॰ क्रि॰) अनुभव लाना, बोध बांधना, ज्ञान निकालना, समझ सभालना।}} {{Outdent|अनुभवसिद्ध (सं॰ त्रि॰) परीक्षा अथवा प्रतिपत्तिसे प्रतिष्ठित, जो तजरबे या कमालसे कायम किया गया हो।}} {{Outdent|अनुभवानन्द-कृष्णानन्दके शिष्य और कोषरत्नप्रकाश नामक वेदान्त-ग्रन्थके रचयिता।}} {{Outdent|अनुभवारूढ़ (सं॰ त्रि॰) परीक्षामें पड़ा, तजरबेपर लगा, जो जांच कर रहा हो।}} {{Outdent|अनुभवी (सं॰ पु॰ त्रि॰) अनुभवप्राप्त, तजरबेकार, जिसने कोई बात जांच ली हो।}} {{Outdent|अनुभाव (सं॰ पु॰) अनुभावयति अनेन, अनु-भू-णिच्-घञ्। १ सङ्केत, इशारा। २ प्रभाव, सामर्थ, महिमा, रुवाब, शान-शौकत, नामवरी। ३ निश्चय विश्वास, सम्मति, यकी़न, एतबार, सलाह। कर्तरि अच्। ४ अलङ्कारशास्त्रोक्त स्थायिरसविशेषका प्रकाशक, रत्यादिजनक कटाक्ष भ्रूभङ्गि प्रभृति। सात्विक, कायिक, मानसिक और आहार्य भेदसे अनुभाव चार तरहका होता, जिसमें हाव भी मिला रहता है।}} {{blockcenter|{{x-smaller|<poem>“विभावा अनुभावाय कथ्यन्ते व्यभिचारिणः। वक्तः स तैर्विभावाद्यैः स्थायी भावो रसः स्मृतः॥” (काव्यप्रकाश)</poem>}}}} {{Outdent|अनुभावक (सं॰ त्रि॰), अनुभावयति बोधयति, अनु-भू-णिच्-खुल्। अनुबोधक, बता देनेवाला, जिसके जरिये जान जायें।}} {{Outdent|अनुभावन (सं॰ क्ली॰), सङ्गेत अथवा अनुमानसे विषयका प्रकाशन, इशारे या अन्दाजसे: बातका बताना।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> jjpvxk5mo25vizbf2kco34qas5quv1u पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४८० 250 88370 668269 352674 2026-07-19T17:16:37Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 668269 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुभाविन्–अनुमन्यमान'''|'''४७३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अनुभाविन् (सं॰ त्रि॰) अनु-भू-णिनि। १ साक्षात् रखनेवाला, समझते हुवा, जिसे किसी बातका तजरबा हासिल हो रहा हो। २ अनुभवके सङ्केत देखाते हुवा, जो तजरबके इशारे मारता हो। ३ पश्चात् जन्म लेनेवाला, जो पीछे पैदा हुवा हो। ४ कनिष्ठ, छोटा, जिसकी उम्र कम रहे।}} {{Outdent|अनुभावी, small>अनुभाविन् देखो।</small>}} {{Outdent|अनुभाषण (सं॰ क्ली॰) १ अनुकूल वचन, मीठी बात। २ साथ-साथका बताना, जो गुफ्तगू किसीके सखु़नपर लगायी जाये।}} {{Outdent|अनुभास (सं॰ पु॰) काक-विशेष, किसी क़िस्मका कौवा।}} {{Outdent|अनुभू (सं॰ त्रि॰) अनुभवरूप ज्ञानविशिष्ट, समझता बूझता, जिसकी समझमें कोई बात चढ़ रही हो।}} {{Outdent|अनुभूत (सं॰ त्रि॰) अनु-भू-कर्मणि क्त। १ अनुभव द्वारा ज्ञात, तजरबेसे समझा गया। २ उपलब्ध, मालूम, जाना-माना। ३ फलस्वरूप, जो नतीजेकी तरह निकला हो। ४. अवगत, तजरबेकार, जिसने लज्ज़त पा ली हो, या जिसे स्वाद आ चुका हो।}} {{Outdent|अनुभूताद्यविस्मृति (सं॰ स्त्री॰) अनुभूतादीनां स्मृतादीनां अविस्मृति यस्मात्। भावनाख्य संस्कार, जिस संस्कारका नाम भावना रखा गया है।}} {{Outdent|अनुभूति (सं॰ स्त्री॰) अनु-भू-क्तिन्। १ अनुभव, तजरबा। २ स्मृति-भिन्न ज्ञान, जो इल्म याददाश्तसे तात्लुक न रखे। ३ उपलब्धि, नतीजा। ४ त्रिकृता, नोसादर। न्यायमतसे——अनुभूति चार प्रकारकी होती है, प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्दबोध।}} {{Outdent|अनुभूतिस्वरूप——सरस्वती-प्रक्रिया, आख्यातप्रक्रिया और धातुपाठ नामक ग्रन्थके प्रणेता।}} {{Outdent|अनुभूतिस्वरूप यति——न्यायदीपावली नामक वेदान्तग्रन्थ और आनन्दबोधः प्रणीत प्रमाणरत्नमाला निबन्धकी टीका बनानेवाले।}} {{Outdent|अनुभूय (सं॰ अव्य॰) अनुभव पाकर, परीक्षा लेके, तजरबेसे, समझ-बूझ।}} {{Outdent|अनुभूयमान (सं॰ त्रि॰) अनुभवके अधीन, जिसका तजरबा लिया जाता हो।}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Outdent|अनुभोग (सं॰ पु॰) कार्यविशेषके परिवर्तनमें कर-रहित भूमिदान, जो जमीन किसी खिदमतके एवज़ बेलगान मिलती है।}} {{Outdent|अनुभ्रातृ (सं॰ पु॰) कनिष्ठ भ्राता, छोटा भाई।}} {{Outdent|अनुमत (सं॰ त्रि॰) अनु-मन्-क्त। १ प्रशंसित, पसन्द आया हुवा, अनुमोदित, मञ्जूर फ़रमाया गया, आदेशप्राप्त, जिसे हुक्म मिल चुका हो। २ सम्मत, राज़ी। ३ सुखादु, खुशगवार। ४ प्रिय, प्यारा। (क्ली) ५ स्वीकार, रजा, आज्ञा, इजाजत, प्रसन्नता, पसन्दगी। ६ वैद्यमतसे-परमतमप्रतिसिद्ध, जिसे सप्तरसा भी कहते हैं।}} {{Outdent|अनुमतकर्मकारिन् (सं॰ त्रि॰) आदेशानुसार कार्य करनेवाला, जो हुक्म के मुताबिक काम करे।}} {{Outdent|अनुमति (सं॰ स्त्री॰) अनु-मन् क्तिन्। १ सम्मति, सलाह। २ अनुज्ञा, इजाजत। ३ चतुर्दशौयुक्त पूर्णिमा, जब एक कलाहीन चन्द्र निकलता है।}} {{c|{{x-smaller|'अथानुमतिरूपेन्दुपूर्णिमानुज्ञयारपि।’ (मंदिनों)}}}} {{Outdent|अनुमतिपत्र (सं॰ क्ली॰) इकरारनामा, राजी़नामा, जिस दस्तावेज़से किसाकी रजामन्दी जा़हिर हो।}} {{Outdent|अनुमत्त (सं॰ त्रि॰) मतवाला, पगला, जो खुशी वगैरहसे अपनेको भूल जाये। २ जिसका नशा उतर गया हो।}} {{Outdent|अनुमध्यम (सं॰ अव्य॰) मंझलेके पास, बीचवाले-से नजदीक।}} {{Outdent|अनुमनन (सं॰ क्ली॰) १ स्वीकार, रजा़। २ स्वतन्त्रता, आज़ादी।}} {{Outdent|अनुमन्तृ (सं॰ त्रि॰) अनु-मन् तृच्। आज्ञा लेगाते हुवा, जो इजा़जत दे रहा हो, मान लेनेवाला, जो रजा़मन्दी जा़हिर करे।}} {{Outdent|अनुमन्त्रण (सं॰ क्ली॰) अनुमन्त्रण मन्त्रपाठः। मन्त्रोच्चारणपूर्वक संस्कार विशेष।}} {{Outdent|अनुमन्त्रणमन्त्र (सं॰ पु॰) संस्कार-विशेषका मन्त्र।}} {{Outdent|अनुमन्त्रित: (सं॰ त्रि॰) संस्कारसाधित, जिसका संस्कार किया गया हो।}} {{Outdent|अनुमन्यमान (सं॰ त्रि॰) ध्यान देते हुवा, जो दमाग़ लड़ा रहा हो, स्वीकृत, रजा़मन्द।}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude>{{left|119|2em}}</noinclude> nzgnztaze5n4uf8ond6geamhunztt25 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४८१ 250 88371 668273 352675 2026-07-19T17:52:21Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 668273 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४७४'''|'''अनुमरण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अनुमरण (सं॰ क्ली॰) अनु सह पश्चाद्वा मरणम्, मृ-ल्युट्। १ पीछेकी मृत्यु, जो मौत किसीके मरने बाद हो। २ पतिकी मृतदेहके सङ्ग किंवा पतिकी मृत्यु बाद उसका पादुकादि उठा ज्वलन्त चितामें स्त्रीका शरीर विसर्जन, खाविन्द के मरने बाद उसकी औरतका उसीके साथ जल मरना। पतिकी मृत-देहके साथ एक ही चितापर स्त्रीका जल मरना सचराचर सहगमन या सहमरण कहाता है। पतिक विदेशमें मरने किंवा उसकी मृतदेह न मिलनेसे उसके पादुकादि उठा स्त्रीका आप जल मरना अनुगमन या अनुमरण नामसे पुकारा जाता है। किन्तु अनेक स्थलमें फिर अनुमरण और सहमरण शब्दमें प्रभेद नही पड़ता। अनुमरण कहनेसे भी पतिकी देहके साथ जलकर मरना समझा जाता है। किन्तु सह-मरण शब्दसे पश्चात् मरणका मतलब कभी नहीं निकलता।<br> {{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“तृतीयेऽहि उदक्याया मृते भर्तरि वै द्विजाः। तस्वानुगमनार्थाय स्थापयेदेकरात्रकम्॥”}}</poem>}}<br> {{gap}}स्त्रीकी रजस्वलाके तृतीय दिवस उसके स्वामीकी मृत्यु पड़नेसे उस स्त्रीको अपने पतिके साथ अनुगमन लगा सकनेके लिए एकरात्र मृतदेह रख छोड़ना चाहिये।<br> {{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“देशान्तरमृते पत्यौ साध्वी तत् पाटदुकाद्वयम्। निधायोरसि संशुद्धा प्रविशत् जातवेदसम्॥” (ब्रह्मपुराण)}}</poem>}}<br {{gap}}देशान्तर में पतिकी मृत्यु होनेसे साध्वी स्त्री उसका पादुकाद्वय गोद में उठा, शुचि साध अग्निमें प्रवेश पहुंचाये।<br> {{gap}}किन्तु ब्राह्मणके पक्षमें यह विधि निषिद्ध है। यथा स्मृति——<small>“पृथक् चितिं समारुह्य न विप्रा गन्तुमर्हति।”</small><br> {{gap}}महाभारतमें बताया है,——<br> {{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“भर्तानुमरणं काले याः कुर्वन्ति तथा विधाः। कामात् क्रोधादभयान्मोहात् सर्वाः पूता भवन्ति ताः॥”}}</poem>}}<br> {{gap}}स्वामीके सहमरणकालमें काम, क्रोध, भय, किंवा मोहसे जो स्त्री पतिके साथ मरेगी, उसके सकल ही पवित्र पड़ जायेंगे।<br> {{gap}}अति प्राचीन कालमें पृथिवीके प्रायः सकल स्थानमें}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अनुमरणकी प्रथा प्रचलित रही। स्वामीकी मृत्यु होनेसे उसकी स्त्री किसी न किसी प्रकार पतिके साथ प्राण छोड़ती थी। प्राचीन यूनानी और शकजातिके मध्य यह प्रथा चलती थी, दिओदोरस्के पुस्तकमें जिसका प्रमाण मिला। प्रपार्सियास्ने लिखा, कि उस कालके रोमक पतिकी मृत्यु बाद उसकी स्त्रीको जला डालते थे। पहले उत्तर-युरोपमें भी सहमरणका प्रचलन रहा। कहानी में सुनते हैं, कि वहांके लोग उस समय वोदिन देवताको पूजते थे। किसी दिन वोदिनके पुत्र बालदारके शिरमें हठात् पेड़की कोई छोटी शाखा लग गयी। विधाताका कैसा निर्बन्ध है! उस क्षुद्र शाखाके आघातसे ही उनकघ मृत्यु हुयी। वोदिनने स्वर्ग में उतर यमदूतसे पुत्र वापस देनेका अनुरोध लगाया। यमदूतने कहा,——‘बालदार के लिये यदि समस्त जीव जन्तु रोयें, तो वह प्राण पा जायंगे।’ इसीसे उनके शोकमें सकल ही रोये, पशु-पक्षी भी हाय-हाय मचाने लगे। किन्तु लोकी नामक किसी वृद्धा स्त्रीके चक्षुसे एक बूंद भी पानी न पड़ा था। सुतरां बालदार फिर जो न सके। वोदिन की पुत्रवधू मृत पतिके साथ जल मरी। शकजातिके मध्यमें भी यह प्रथा रही। राजाके मरनेसे उनकी पटराणी, मद्यवाहिनी, पाचिका, साईस, नौकर और घोड़ा काटकर मृतदेहके साथ क़ब्रमें गाड़ दिया जाता था। इसका तात्पर्य यही है——राजा संसार छोड़ जब चल बसे, तब इस भव-समुद्रके पार उन्हें न जाने कितनी दूर जाना पड़े,——कहांतक पहुंचने बाद लोकान्तर मिले; इसलिये साथमें साथी ज़रूर चाहिये। यही कारण है, कि राजा अपनो प्रियतमा राणी और दासदासी साथ ले जाते थे। यह निष्ठुर प्रथा आज तक हबशी लोगों में चली आ रही है। यूनान देशके हेरोदोतस्ने लिखा है, कि थेस प्रान्तमें किसी पुरुषकी मृत्यु होनेसे उसके बन्धु-बान्धव पहले उसे मिट्टी देते, पीछे उसकी जो ज्या़दा प्यारी स्त्री होती, उसे उसी क़ब्रपर काट डालते थे। गेटो और ओसेनियाके लोग भी विधवा स्त्रियोंको इसीतरह मृतपतिके पास बलि चढ़ाते रहे। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> lib4f5wlltz2gyfkqslam7z43u2ec9w 668275 668273 2026-07-19T17:55:46Z Sanjana Chowdhury 5438 668275 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४७४'''|'''अनुमरण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{Outdent|अनुमरण (सं॰ क्ली॰) अनु सह पश्चाद्वा मरणम्, मृ-ल्युट्। १ पीछेकी मृत्यु, जो मौत किसीके मरने बाद हो। २ पतिकी मृतदेहके सङ्ग किंवा पतिकी मृत्यु बाद उसका पादुकादि उठा ज्वलन्त चितामें स्त्रीका शरीर विसर्जन, खाविन्द के मरने बाद उसकी औरतका उसीके साथ जल मरना। पतिकी मृत-देहके साथ एक ही चितापर स्त्रीका जल मरना सचराचर सहगमन या सहमरण कहाता है। पतिक विदेशमें मरने किंवा उसकी मृतदेह न मिलनेसे उसके पादुकादि उठा स्त्रीका आप जल मरना अनुगमन या अनुमरण नामसे पुकारा जाता है। किन्तु अनेक स्थलमें फिर अनुमरण और सहमरण शब्दमें प्रभेद नही पड़ता। अनुमरण कहनेसे भी पतिकी देहके साथ जलकर मरना समझा जाता है। किन्तु सह-मरण शब्दसे पश्चात् मरणका मतलब कभी नहीं निकलता।<br> {{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“तृतीयेऽहि उदक्याया मृते भर्तरि वै द्विजाः। तस्वानुगमनार्थाय स्थापयेदेकरात्रकम्॥”}}</poem>}}<br> {{gap}}स्त्रीकी रजस्वलाके तृतीय दिवस उसके स्वामीकी मृत्यु पड़नेसे उस स्त्रीको अपने पतिके साथ अनुगमन लगा सकनेके लिए एकरात्र मृतदेह रख छोड़ना चाहिये।<br>{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“देशान्तरमृते पत्यौ साध्वी तत् पाटदुकाद्वयम्। निधायोरसि संशुद्धा प्रविशत् जातवेदसम्॥” (ब्रह्मपुराण)}}</poem>}}<br> {{gap}}देशान्तर में पतिकी मृत्यु होनेसे साध्वी स्त्री उसका पादुकाद्वय गोद में उठा, शुचि साध अग्निमें प्रवेश पहुंचाये।<br> {{gap}}किन्तु ब्राह्मणके पक्षमें यह विधि निषिद्ध है। यथा स्मृति——<small>“पृथक् चितिं समारुह्य न विप्रा गन्तुमर्हति।”</small><br> {{gap}}महाभारतमें बताया है,——<br>{{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“भर्तानुमरणं काले याः कुर्वन्ति तथा विधाः। कामात् क्रोधादभयान्मोहात् सर्वाः पूता भवन्ति ताः॥”}}</poem>}}<br>{{gap}}स्वामीके सहमरणकालमें काम, क्रोध, भय, किंवा मोहसे जो स्त्री पतिके साथ मरेगी, उसके सकल ही पवित्र पड़ जायेंगे।<br> {{gap}}अति प्राचीन कालमें पृथिवीके प्रायः सकल स्थानमें}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अनुमरणकी प्रथा प्रचलित रही। स्वामीकी मृत्यु होनेसे उसकी स्त्री किसी न किसी प्रकार पतिके साथ प्राण छोड़ती थी। प्राचीन यूनानी और शकजातिके मध्य यह प्रथा चलती थी, दिओदोरस्के पुस्तकमें जिसका प्रमाण मिला। प्रपार्सियास्ने लिखा, कि उस कालके रोमक पतिकी मृत्यु बाद उसकी स्त्रीको जला डालते थे। पहले उत्तर-युरोपमें भी सहमरणका प्रचलन रहा। कहानी में सुनते हैं, कि वहांके लोग उस समय वोदिन देवताको पूजते थे। किसी दिन वोदिनके पुत्र बालदारके शिरमें हठात् पेड़की कोई छोटी शाखा लग गयी। विधाताका कैसा निर्बन्ध है! उस क्षुद्र शाखाके आघातसे ही उनकघ मृत्यु हुयी। वोदिनने स्वर्ग में उतर यमदूतसे पुत्र वापस देनेका अनुरोध लगाया। यमदूतने कहा,——‘बालदार के लिये यदि समस्त जीव जन्तु रोयें, तो वह प्राण पा जायंगे।’ इसीसे उनके शोकमें सकल ही रोये, पशु-पक्षी भी हाय-हाय मचाने लगे। किन्तु लोकी नामक किसी वृद्धा स्त्रीके चक्षुसे एक बूंद भी पानी न पड़ा था। सुतरां बालदार फिर जो न सके। वोदिन की पुत्रवधू मृत पतिके साथ जल मरी। शकजातिके मध्यमें भी यह प्रथा रही। राजाके मरनेसे उनकी पटराणी, मद्यवाहिनी, पाचिका, साईस, नौकर और घोड़ा काटकर मृतदेहके साथ क़ब्रमें गाड़ दिया जाता था। इसका तात्पर्य यही है——राजा संसार छोड़ जब चल बसे, तब इस भव-समुद्रके पार उन्हें न जाने कितनी दूर जाना पड़े,——कहांतक पहुंचने बाद लोकान्तर मिले; इसलिये साथमें साथी ज़रूर चाहिये। यही कारण है, कि राजा अपनो प्रियतमा राणी और दासदासी साथ ले जाते थे। यह निष्ठुर प्रथा आज तक हबशी लोगों में चली आ रही है। यूनान देशके हेरोदोतस्ने लिखा है, कि थेस प्रान्तमें किसी पुरुषकी मृत्यु होनेसे उसके बन्धु-बान्धव पहले उसे मिट्टी देते, पीछे उसकी जो ज्या़दा प्यारी स्त्री होती, उसे उसी क़ब्रपर काट डालते थे। गेटो और ओसेनियाके लोग भी विधवा स्त्रियोंको इसीतरह मृतपतिके पास बलि चढ़ाते रहे। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 09dcne7pu5plivwzr2rjg7iuk4u363n पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४८२ 250 88372 668280 352676 2026-07-19T18:10:35Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 668280 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुमरण'''|'''४७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पहले चौन-देशमें अनुमरणका चलन कुछ अधिक था। सम्राटको मृत्यु बाद, दास-दासी और दो-चार साथी सङ्गो भी उनके साथ मर जाते, न मरनेपर लोकगञ्जनासे कान फूटने लगते थे। चीनदेशक इतिहासमें लिखा है, कि सन् १६६२ ई० में सम्राट चुच्च मरे थे। रात्रिकाल रहा, इसीसे उस दिन दास- दासी कुछ न बोले। प्रभात हुवा। चीनको फिर किस और देखना था ?-चारो ओर मृत्यु हो मृत्यु रही, मानो एकमरणसे जगत् मर गया ; सम्राटका जो प्यारा था, वही आत्महत्या लगा रहा था। चोनवासियोंको विश्वास है, कि प्रभुके सङ्ग मर जानसे जन्मान्तरमै फिर वही प्रभु मिल जाता है। चीनदेशको स्त्रियां पतिका अनुगमन करनेको गले में फांसी बांध मरती थों। मरनेसे पहले जो धूमधाम मचती, वह विवाहसे भी अधिक पड़ती थी। स्त्री मन-माना वसन भूषण पहन पालकीपर जा चढ़ती, अनुचर वही पालको कन्धेपर रख नगरका फेरा फिराते रहे। जीवनको माया भूल, जन्मके लिये संसारका सुख छोड़ जो पतिके निमित्त मरने जातो, वह छिपकर क्यों मरेगी? यत्नसे जिसे हृदयमें रखते, हृदयमें रख परस्पर प्यार करते, उसके मरनेसे मरना ही पड़ता है। अबला नारीचरित्रका यह वीरत्व पुरुषमें पाना कठिन है। कुलबालिकाओं- को सती साध्वी स्त्रौके पास पहुंच पतिपरायणता सौखना चाहिये। अनुमरणके दिन श्मशान लोगोंको भौड़का ठिकाना न रहता, आशीर्वादके दो-एक चावल और एक टुकड़ा रस्मो पानेके लिये आदमीपर आदमी टटता था। अनुमरणका आयोजन अधिक न लगता रहा। प्रशस्त स्थानमें ऊंचा मचान बंधता, उसपर काला शामि- याना तनता था। मचानको दोनो ओर ऊपर दो खूटे गाड़े जाते जिनमें बांसका लम्बा डण्डा रखते “थे। उसौ डण्डे में रेशमकी रस्मो गला फांसनेको लटकते रहती। स्त्री पालकौपर बैठ मचानके पास पहुंचती, वहां. नाना मुखाद्य इधर-उधर रखा रहता था। स्त्री उसे..खाकर मचानके ऊपरसे <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> आशीर्वादवाले चावल चारो ओर फेंक देती। चावल लूटने के लिये इकट्ठी हुयी भीड़में महा कोलाहल गच जाता था। यह सब बातें पूर्वानुष्ठानकी हुयीं। इसके बाद पतिव्रता स्त्री अपने हाथसे गले में फांसी लगा प्राण छोड़ती थी। जब स्त्रीकी मृत्यु हो जाती, तब वही फांसीकी रस्सी टुकड़े-टुकड़े कर उपस्थित लोगों में बंटती थी। इस विषयके लेखक जनक सम्भ्रान्त युरोपीय रहे। उन्होंने ऐसौ घटना अपनी आंखों देखी थी। यवद्वीपके निकट बलि और लम्बक द्वीपमें आज भी हिन्दू धर्मका कुछ-कुछ आभास नज़र आता है। हिन्दू धर्मके प्रधान-प्रधान अस्थिपञ्जरमें सहमरणका बड़ा अङ्ग है। बलि और लम्बक द्वीपमें आजतक यह प्रथा ठण्डी नही पड़ी। वहांके बर्धिष्णु लोगोंके मरने-पर विधवा स्त्री पतिकी ज्वलन्त चितामें जल जाती है। किन्तु साधारण लोगोंके अनुमरणकी व्यवस्था दूसरी तरहकी है। सामान्य घरकी स्त्रीके विधवा होनेपर पहले उसे छुरी घुसेड़ मारना पड़ता, पीछे उसकी मृतदेहका सत्कार साधते हैं। ऐसे ही सहमरणके समय एक बार कोई युरोपीय वहां उपस्थित रहे, उन्होंने खड़े हो आदिसे अन्ततक सब व्यापार अपनी आंखों देखा था। घटनाका हाल यह है—— अम्पनम नगरमें कोई दरिद्र व्यक्ति मर गया था। उसके तीन स्त्री रहीं। उनमें सर्वकनिष्ठा अनुमरणके निमित्त प्रस्तुत हुयी। उसके पिता, माता, श्वशुर, सास सबने कितना ही समझाया, कितना ही निषेध किया; किन्तु उसने किसीकी बात न सुनी।चिरकाल मनकी आगसे क्रमशः जलते रहनेकी बनिस्वत, एकबारगी ही प्राण छोड़ देना अच्छा होता है। सतीने अनुमरणका आयोजन लगाया। स्वामिवियोगके दूसरे दिन उसने स्रानादि संभाल उत्तम वस्त्रालङ्कार पहना और आत्मीय स्वजनके मुलाकात करने आनेपर वह सबसे मिली-जुली। अन्तको पूर्वाह्न देवार्चनामें बीता, अपराह्न चार बजे उसके स्वामीकी मृतदेह बाहर निकली। पुरोहित <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> a6gq26no6u3y85lu2axrenj595dyw0h 668283 668280 2026-07-19T18:20:16Z Sanjana Chowdhury 5438 668283 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुमरण'''|'''४७५'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{gap}}पहले चीन-देशमें अनुमरणका चलन कुछ अधिक था। सम्राटकी मृत्यु, बाद, दास-दासी और दो-चार साथी सङ्गी भी उनके साथ मर जाते, न मरनेपर लोकगञ्जनासे कान फूटने लगते थे। चीनदेशक इतिहासमें लिखा है, कि सन् १६६२ ई॰ में सम्राट चुषञ्च मरे थे। रात्रिकाल रहा, इसीसे उस दिन दास-दासी कुछ न बोले। प्रभात हुवा। चीनको फिर किस और देखना था?——चारो ओर मृत्यु ही मृत्यु रही, मानो एकमरणसे जगत् मर गया; सम्राटका जो प्यारा था, वही आत्महत्या लगा रहा था। चीनवासियोंको विश्वास है, कि प्रभुके सङ्ग मर जानसे जन्मान्तरमें फिर वही प्रभु मिल जाता है। चीनदेशकी स्त्रियां पतिका अनुगमन करनेको गले में फांसी बांध मरती थों। मरनेसे पहले जो धूमधाम मचती, वह विवाहसे भी अधिक पड़ती थी। स्त्री मन-माना वसन भूषण पहन पालकीपर जा चढ़ती, अनुचर वही पालकी कन्धेपर रख नगरका फेरा फिराते रहे। जीवनकी माया भूल, जन्मके लिये संसारका सुख छोड़ जो पतिके निमित्त मरने जाती, वह छिपकर क्यों मरेगी? यत्नसे जिसे हृदयमें रखते, हृदयमें रख परस्पर प्यार करते, उसके मरनेसे मरना ही पड़ता है। अबला नारीचरित्रका यह वीरत्व पुरुषमें पाना कठिन है। कुलबालिकाओं-को सती साध्वी स्त्रीके पास पहुंच पतिपरायणता सीखना चाहिये। अनुमरणके दिन श्मशान लोगोंको भौड़का ठिकाना न रहता, आशीर्वादके दो-एक चावल और एक टुकड़ा रस्सी पानेके लिये आदमीपर आदमी टटता था। अनुमरणका आयोजन अधिक न लगता रहा। प्रशस्त स्थानमें ऊंचा मचान बंधता, उसपर काला शामियाना तनता था। मचानकी दोनो ओर ऊपर दो खूंटे गाड़े जाते जिनमें बांसका लम्बा डण्डा रखते थे। उसी डण्डे में रेशमकी रस्सी गला फांसनेको लटकते रहती। स्त्री पालकीपर बैठ मचानके पास पहुंचती, वहां नाना मुखाद्य इधर-उधर रखा रहता था। स्त्री उसे खाकर मचानके ऊपरसे <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> आशीर्वादवाले चावल चारो ओर फेंक देती। चावल लूटने के लिये इकट्ठी हुयी भीड़में महा कोलाहल गच जाता था। यह सब बातें पूर्वानुष्ठानकी हुयीं। इसके बाद पतिव्रता स्त्री अपने हाथसे गले में फांसी लगा प्राण छोड़ती थी। जब स्त्रीकी मृत्यु हो जाती, तब वही फांसीकी रस्सी टुकड़े-टुकड़े कर उपस्थित लोगों में बंटती थी। इस विषयके लेखक जनक सम्भ्रान्त युरोपीय रहे। उन्होंने ऐसौ घटना अपनी आंखों देखी थी। यवद्वीपके निकट बलि और लम्बक द्वीपमें आज भी हिन्दू धर्मका कुछ-कुछ आभास नज़र आता है। हिन्दू धर्मके प्रधान-प्रधान अस्थिपञ्जरमें सहमरणका बड़ा अङ्ग है। बलि और लम्बक द्वीपमें आजतक यह प्रथा ठण्डी नही पड़ी। वहांके बर्धिष्णु लोगोंके मरने-पर विधवा स्त्री पतिकी ज्वलन्त चितामें जल जाती है। किन्तु साधारण लोगोंके अनुमरणकी व्यवस्था दूसरी तरहकी है। सामान्य घरकी स्त्रीके विधवा होनेपर पहले उसे छुरी घुसेड़ मारना पड़ता, पीछे उसकी मृतदेहका सत्कार साधते हैं। ऐसे ही सहमरणके समय एक बार कोई युरोपीय वहां उपस्थित रहे, उन्होंने खड़े हो आदिसे अन्ततक सब व्यापार अपनी आंखों देखा था। घटनाका हाल यह है—— अम्पनम नगरमें कोई दरिद्र व्यक्ति मर गया था। उसके तीन स्त्री रहीं। उनमें सर्वकनिष्ठा अनुमरणके निमित्त प्रस्तुत हुयी। उसके पिता, माता, श्वशुर, सास सबने कितना ही समझाया, कितना ही निषेध किया; किन्तु उसने किसीकी बात न सुनी।चिरकाल मनकी आगसे क्रमशः जलते रहनेकी बनिस्वत, एकबारगी ही प्राण छोड़ देना अच्छा होता है। सतीने अनुमरणका आयोजन लगाया। स्वामिवियोगके दूसरे दिन उसने स्रानादि संभाल उत्तम वस्त्रालङ्कार पहना और आत्मीय स्वजनके मुलाकात करने आनेपर वह सबसे मिली-जुली। अन्तको पूर्वाह्न देवार्चनामें बीता, अपराह्न चार बजे उसके 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वर्ष कलियुग बीता ; नाम लिया, पुरकामिनाने अग्रसर था उसके हाथ में अतएव प्रायः ४३६२ वर्ष हुये, पाण्डव जीवित एक एक फूलका गुलदस्ता पकड़ाया; सतीने अभि रहे। उनके कोई सात सौ वर्ष पहले यदि सहमरण वादन दे वही गुलदस्ता फिर सबको वापस दिया। हो, तो कोई पांच हजार वर्ष हमारे देशमें इस उसके बाद स्त्रीने दुबारा इष्टदेवताका नाम निकाल प्रथाको चले निकलते हैं। किन्तु पुराणादि में पाते हैं, खामोका मस्तक, वक्षःस्थल, नाभि, जानु और पदतल कि उस समय सकल विधवा स्त्री पतिके साथ जलकर जा सूघा। बस, पूर्वानुष्ठान पूरे पड़ा। शेष सतौके न मरती थों-कोई ब्रह्मचारिणी बनतो, कोई घरमें ‘भाईने उसके निकट पहुंच पूछा,–'भगिनि ! तो रहती, कोई पुनर्वार विवाह भो कर लेती। क्या सत्य हो आप अनुमरण लगायेंगी?' स्त्रीने | पाण्डुको मृत्यु बाद कुन्तीने पतिका अनुगमन न कहा,-'हां। उसके बाद चाता छुरी निकाल बोल लगाया था। द्रोणाचार्यको मृत्यु होनेसे कपोने भी उठा,-'देखो, मैं. तब आपको मारता हूं, इसमें पतिका अनुगमन नहीं किया। भागवतमें लिखा मेरा कोई दोष नहीं।" यहो कहकर अपनी है-अश्वत्थामा नामक वीरपुत्र उत्पन्न होने के कारण भगिनीके वक्षःस्थल में अल्प अस्त्राघात लगा वह लम्बे कृपीको पतिका अनुगमग करना न पड़ा था- पड़ा। शेषमें फिर किसी सम्भ्रान्त व्यक्तिने जा स्त्रीको 'तस्वात्मनीई पबद्यास्त नान्वगाद्दौरसूः कपो।' (१७४३) जानसे मार डाला। पौछे दम्पतीको अन्त्येष्टिक्रिया बङ्गालमें इस नियमका चलन न रहा। वहां सम्पन्न की गयी। पुत्रवती भी मृतपतिके साथ जल मरतो थो। किन्तु <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> किन्तु भारतवर्षमें स्त्रोहत्या करनेकी प्रणाली पञ्जाबमें पुत्रवतोके पक्षमें सहमरण निषिद्द रहता था। "It is a cliaracteristic trait that, only those women दूसरी तरह रही। छोटो हो या बड़ो, इस देशके devote themselves to tliat dismal ceremony whose ate लोग सतीको पतिके चितानलमें जीते जी पतङ्गको had decreed them not to be mothers.' तरह जला डालते थे। कह नहीं सकते,-यह (Honigberger) दारुण निष्ठुर आचार कितने दिनसे चला आता रहा। पूर्वकालको बनिस्बत. इन दिनों सहमरण कुछ किन्तु इसका जीवन्त प्रमाण वेद हो हैं, कि वेदके अधिक प्रचलित हुवा। स्त्रोको इच्छा न रहते भी समय सहमरण होता. न था। लार्ड वेण्टिङ्क और जातिबन्धु आत्मीयस्वजन उसे जबरन जला डालते थे। राममोहन रायने जब सहमरण प्रथा उठा देनेका अकबरके सेनापति जयमल्ल सिंहको मृत्यु बाद उनकी यन्त्र निकाला, तब इस देश धर्मव्यवसायियोंने अनेक स्त्री पतिक सङ्ग जल मरनेको असम्मत हुयो। जय. आपत्ति उठायो ; सहमरणके, अनुकूल स्मृति और मल्लके पुत्र उदयसिंहने जबरन जननोको जलानक. पुराणादिका प्रमाण बढ़ा, वेदसे भी. प्रमाण पहुंचाया। चेष्टा चलायो। बादशाहने यह संवाद पा उदय- किन्तु वह मिथ्या था। वेदमें सहमरणका प्रमाण सिंहको कंद किया। बादशाहने ऐसा कड़ा नहीं मिलता, मनुने भी अनुमरणको व्यवस्था. बतायो कानन भो बनाया, कि कोई स्त्रो अपनी इच्छा नहीं। मानारोः इत्यादि ऋङ मन्त्रका अर्थ अनुमृता शब्दमें देखो। अनुमृता न बननेसे, कोई उसपर ज़ोर न डाल <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> d1r6c9wmanhk6z2babl6jw2vyc0q4z1 668296 668290 2026-07-20T00:46:41Z Sanjana Chowdhury 5438 668296 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४७६'''|'''अनुमरण'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> मन्त्र पढ़ने लगे। अपरापर लोगोंने मृतदेह को स्रान दे उसपर फूल बरसाये। इसके बाद पुरवासी सतीको बाहर लाये। उस समय वह साज न रहा, वह वसनभूषण न जाने कहां चला गया। उसके अङ्गमें केवल एक सादी धोती रही, बालमें फूलका गुच्छा बंधा था। सतीने स्वामीके सम्मुख दक्षिण हस्त उठा स्थिरगम्भीर चित्तसे इष्टदेवताका नाम लिया, पुरकामिनाने अग्रसर आ उसके हाथ में एक एक फूलका गुलदस्ता पकड़ाया; सतीने अभिवादन दे वही गुलदस्ता फिर सबको वापस दिया।उसके बाद स्त्रीने दुबारा इष्टदेवताका नाम निकाल स्वामीका मस्तक, वक्षःस्थल, नाभि, जानु और पदतल जा सूघां। बस, पूर्वानुष्ठान पूरे पड़ा। शेषमें सतीके भाईने उसके निकट पहुंच पूछा,——‘भगिनि! तो क्या सत्य ही आप अनुमरण लगायेंगी?’ स्त्रीने कहा,——‘हां।’ उसके बाद भ्राता छुरी निकाल बोल उठा,——‘देखो, मैं. तब आपको मारता हूं, इसमें मेरा कोई दोष नहीं।” यही कहकर अपनी भगिनीके वक्षःस्थल में अल्प अस्त्राघात लगा वह लम्बे पड़ा। शेषमें फिर किसी सम्भ्रान्त व्यक्तिने जा स्त्रीको जानसे मार डाला। पीछे दम्पतीकी अन्त्येष्टिक्रिया सम्पन्न की गयी। किन्तु भारतवर्षमें स्त्रोहत्या करनेकी प्रणाली दूसरी तरह रही। छोटी हो या बड़ी, इस देशके लोग सतीको पतिके चितानलमें जीते जी पतङ्गकी तरह जला डालते थे। कह नहीं सकते,——यह दारुण निष्ठुर आचार कितने दिनसे चला आता रहा। किन्तु इसका जीवन्त प्रमाण वेद हो हैं, कि वेदके समय सहमरण होता न था। लार्ड वेण्टिङ्क और राममोहन रायने जब सहमरण प्रथा उठा देनेका यत्न निकाला, तब इस देशके धर्मव्यवसायियोंने अनेक आपत्ति उठायो; सहमरणके, अनुकूल स्मृति और पुराणादिका प्रमाण बढ़ा, वेदसे भी प्रमाण पहुंचाया। किन्तु वह मिथ्या था। वेदमें सहमरणका प्रमाण नहीं मिलता, मनुने भी अनुमरणकी व्यवस्था बतायी नहीं।<small> इस नारीः इत्यादि ऋङ् मन्त्रका अर्थ अनुमृता शब्दमें देखो।</small> <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{gap}}किन्तु महाभारतके समय सहमरण चल पड़ा था। पाण्डु की मृत्यु बाद माद्रीने उनका अनुगमन लगाया। राजतरङ्गिण के मतसे ६५३ वत्सर कलि-युग बीतनेपर कुरुपाण्डव भूतल में प्रादुर्भूत हुये थे,—— {{blockcenter|<poem>{{x-smaller|“शत्रेषु षत्षु सार्धेषु त्यधिकेषु च भूतले। कलर्गतेषु वर्षाणामभवन् कुरुपाण्डवाः॥”}}</poem>}} आजकल कोई ५०१५ वर्ष कलियुग बीता ; अतएव प्रायः ४३६२ वर्ष हुये, पाण्डव जीवित रहे। उनके कोई सात सौ वर्ष पहले यदि सहमरण हो, तो कोई पांच हजार वर्ष हमारे देशमें इस प्रथाको चले निकलते हैं। किन्तु पुराणादि में पाते हैं, कि उस समय सकल विधवा स्त्री पतिके साथ जलकर न मरती थों——कोई ब्रह्मचारिणी बनती, कोई घरमें रहती, कोई पुनर्वार विवाह भी कर लेती। पाण्डुकी मृत्यु बाद कुन्तीने पतिका अनुगमन न लगाया था। द्रोणाचार्यकी मृत्यु होनेसे कृपीने भी पतिका अनुगमन नहीं किया। भागवतमें लिखा है——अश्वत्थामा नामक वीरपुत्र उत्पन्न होने के कारण कृपीको पतिका अनुगमग करना न पड़ा था,—— {{c|{{x-smaller|‘तस्वात्मनीद्धे पत्र्यास्त नान्वगाद्वोरसूः कृपी।’ (१।७।४३)}}}} बङ्गालमें इस नियमका चलन न रहा। वहां पुत्रवती भी मृतपतिके साथ जल मरती थो। किन्तु पञ्जाबमें पुत्रवतोके पक्षमें सहमरण निषिद्व रहता था। “It is a characteristic trait that, only those women devote themselves to tliat dismal ceremony whose ate had decreed them not to be mothers.” {{right|(Honigberger)|1em}} पूर्वकालकी बनिस्बत इन दिनों सहमरण कुछ अधिक प्रचलित हुवा। स्त्रीको इच्छा न रहते भी ज्ञातिबन्धु आत्मीयस्वजन उसे जबरन जला डालते थे। अकबरके सेनापति जयमल्ल सिंहकी मृत्यु बाद उनकी स्त्री पतिक सङ्ग जल मरनेको असम्मत हुयी। जयमल्लके पुत्र उदयसिंहने जबरन जननीको जलानेकी चेष्टा चलायो। बादशाहने यह संवाद पा उदय-सिंहको कंद किया। बादशाहने ऐसा कड़ा कानून भी बनाया, कि कोई स्त्रो अपनी इच्छा अनुमृता न बननेसे, कोई उसपर ज़ोर न डाल <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> k4w49k9qddjvxfr4slzvipe6d2duxtl पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४८४ 250 90546 668291 355009 2026-07-19T19:09:56Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 668291 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुमरण'''|'''४७७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> सकेगा। पाईन-अकबरी देखो। किन्तु हिन्दू सर्वत्र इस ऊपर विषयका लोभ लगा रहा; कहीं कोई स्त्री कानूनको मान काम न करते रहे। उलानिवासी ज्ञातिशत्रु न बन जाती और सम्पत्तिका एक अंश मुक्ताराम नामक व्यक्तिको मृत्यु होनेसे उसको तेरह छातीपर रख चार युगतक बैठे मौज मारतो! विधवा- स्त्री जल मरी थीं। चिताको अग्नि धक-धक जलती का प्राण बहुत कठिन होता है। एक सन्ध्या निरामिष थी, जब दो स्त्री फिर जा उपस्थित हुयीं। उनमें एक भोजन मिलता और मासके मध्य दो-तीन दिन निर्जल चिताको अग्निमें कूदनेके विचारसे सूर्य प्रभृति उपवास पड़ता, किन्तु उससे भी शरीर नहीं सूखता, देवताको अध्यं देनेका मन्त्र पढ़ने लगी ; उसी बीच नहीं आतो। अतएव यही सोच अनेक हठात् उसके प्राणमें न जाने कैसा भय भर गया। ज्ञाति, अपनी चाची आदिको जबरन जला देते थे, इसी कारण वह श्मशानसे भागनेकी चेष्टा लगाने कि उतनी ज्वालायन्त्रणाकी बनिखत विष-वृक्षका मूल लगी। मुक्तारामके पुत्रने विमाताको पकड़ आगमें पूर्वाह्नमें ही उखाड़ डालना अच्छा रहा। किन्तु यह डाल दिया। अपर स्त्री सतनीको पकड़ने चली, सब काम छिपा न था। लोगोंके मुंहसे गवर्णमेण्ट- मुक्तारामके पुत्रने उसे भी आगमें ढकेल मारा। को सब बात सुनने में आ जाती थी। इसी कारण, समय फोर्ट-विलियम कालेजके पण्डित रमानाथने यह सन् १८०५ ई से पुलिस कुछ सखत पड़ी। विधवाके निष्ठुर व्यवहार अपनी आंखों देखा था। सन् १८२८ इच्छापूर्वक सम्मत न ठहरनेपर कर्ट पक्ष सहमरणको ई० को वों मार्चको जेमस पेगस अनुमति देनेसे दूर रहता था। हिन्दूवोंने भी सोच- अंगरेज़ने एक पुस्तक निकाला। उसका नाम रहा, समझ एक उपाय ढूढ निकाला। ऐसा जान सकनेसे, वृटिश जातिके निकट सतीका क्रन्दन । ( The Sati's कि सहमरणको जाते समय कोई स्त्री इतस्ततः करेगी, ery to Britain.) फेनी पार्कस नानो युरोपीय उसके आत्मीय वजन छिपकर उसे थोड़ी भांग महिलाका भी एक पुस्तक वर्तमान है। पूर्वदेशमें खिलाते थे। कुछ देर बाद भांगसे मन बौरानेपर चौबीस वर्षके भ्रमण बाद यह पुस्तक लिखा गया लोग उससे अनुमति मांगते, स्त्री भी नशेको झोंकमें था। इसका नाम है,-"Wanderings of a Pilg- कुछ न कुछ बता देती। .rim in search of the Picturesque, during इसका कोई ठिकाना नहीं, कि पहले कितनी four and twenty years in the East with हिन्दू महिला पतिको चितापर जल मरौ हैं। Revelation of life in Zanana.” 37 atat जहांगौरके समय जयपुर-महाराज मानसिंहको डेढ पुस्तकमें सहमरणको कहानी लिखी, उसे पढ़ कर हजार स्त्रीमें साठ सहमृता हुयीं, मारवाड़वाले राजा शरीर कांप उठता है। इन्हीं दोनो पुस्तकको देखनेसे | अजित्सिंहके मरने बाद चौहान-राणो, देवडा- मालूम हुवा, हिन्दू सहमरणके निमित्त स्त्रीपर | राणी, तुवर-राणी, चावड़ा-राणी, शेखावती-राणी और कहांतक अत्याचार मचाते थे। अट्ठावन दासी जल मरौ थीं। दाक्षिणात्य और उस समय मनुष्यका मन और विश्वास एवं महाराष्ट्र देशमें भी सहमरणको विलक्षण धूम रही। समाजको अवस्था इस प्रकार नहीं रही। पतिवियोग कहते हैं कि, रामेश्वरके निकट मदुराके नायकको के बाद किसीकी स्त्री सहमृता न होनेपर कलङ्कसे मृत्यु होनेसे उनके साथ ग्यारह हजार स्त्री एक ही देश भर जाता था। पांच आदमी इकट्ठे होनेसे ही चितापर जली थीं। सन् १८४० ई में महाराज नाना प्रकारके दुर्नाम निकालते थे। इसी कारण रणजित् सिंह मरे, उनके साथ संसारचंदकी कन्या चिरकाल कलङ्कका टोकरा शिर पर रखे घूमनेको कुन्दन, नूरपुरवाले. पद्मसिंहकी कन्या हिन्दरी, एवं बनिस्बत स्त्रौहत्या अच्छी रही। लोकगञ्जनाके भयसे जयसिहको कन्या राजकुंवर वसन्तअली यह चार हिन्दू कितनी ही स्त्री जबरन जला देते थे। उसके राी और सात दासौने प्राण छोड़े थे। कर्नल हेनरी 120 <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> dwyo4yaj9l3j3rfwkd5chrgj8gjnqyy 668297 668291 2026-07-20T01:05:49Z Sanjana Chowdhury 5438 668297 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुमरण'''|'''४७७'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> सकेगा। <Small आईन-अकबरी देखो।</small> किन्तु हिन्दू सर्वत्र इस कानून को मान काम न करते रहे। उलानिवासी मुक्ताराम नामक व्यक्तिकी मृत्यु होनेसे उसकी तेरह स्त्री जल मरी थीं। चिताकी अग्नि धक-धक जलती थी, जब दो स्त्री फिर जा उपस्थित हुयीं। उनमें एक चिताकी अग्निमें कूदनेके विचारसे सूर्य प्रभृति देवताको अर्ध्य देनेका मन्त्र पढ़ने लगी; उसी बीच हठात् उसके प्राणमें न जाने कैसा भय भर गया। इसी कारण वह श्मशानसे भागनेकी चेष्टा लगाने लगी। मुक्तारामके पुत्रने विमाताको पकड़ आगमें डाल दिया। अपर स्त्री सतनीको पकड़ने चली, मुक्तारामके पुत्रने उसे भी आगमें ढकेल मारा। समय फो़र्ट-विलियम कालेजके पण्डित रमानाथने यह निष्ठुर व्यवहार अपनी आंखों देखा था। सन् १८२८ ई॰ की ९ वीं मार्चको जेमस् पेगस् नामक अंगरेज़ने एक पुस्तक निकाला। उसका नाम रहा,——बृटिश जातिके निकट सतीका क्रन्दन। (The Sati'sery to Britain.) फेनी पार्कस नाम्नी युरोपीय महिलाका भी एक पुस्तक वर्तमान है। पूर्वदेशमें चौबीस वर्षके भ्रमण बाद यह पुस्तक लिखा गया था। इसका नाम है,——“Wanderings of a Pilgrim in search of the Picturesque, during four and twenty years in the East with Revelation of life in Zanana.” इन दोनो पुस्तकमें सहमरणकी कहानी लिखी, उसे पढ़ कर शरीर कांप उठता है। इन्हीं दोनो पुस्तकको देखनेसे मालूम हुवा, हिन्दू सहमरणके निमित्त स्त्रीपर कहांतक अत्याचार मचाते थे। उस समय मनुष्यका मन और विश्वास एवं समाजकी अवस्था इस प्रकार नहीं रही।पतिवियोग के बाद किसीकी स्त्री सहमृता न होनेपर कलङ्कसे देश भर जाता था। पांच आदमी इकट्ठे होनेसे ही नाना प्रकारके दुर्नाम निकालते थे। इसी कारण चिरकाल कलङ्कका टोकरा शिर पर रखे घूमनेको बनिस्बत स्त्रीहत्या अच्छी रही। लोकगञ्जनाके भयसे हिन्दू कितनी ही स्त्री जबरन जला देते थे। उसके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ऊपर विषयका लोभ लगा रहा; कहीं कोई स्त्री ज्ञातिशत्रु न बन जाती और सम्पत्तिका एक अंश छातीपर रख चार युगतक बैठे मौज मारती! विधवा-का प्राण बहुत कठिन होता है। एक सन्ध्या निरामिष भोजन मिलता और मासके मध्य दो-तीन दिन निर्जल उपवास पड़ता, किन्तु उससे भी शरीर नहीं सूखता, सहज में मृत्यु नहीं आतो। अतएव यही सोच अनेक ज्ञाति, अपनी चाची आदिको जबरन जला देते थे, कि उतनी ज्वालायन्त्रणाकी बनिस्वत विष-वृक्षका मूल पूर्वाह्नमें ही उखाड़ डालना अच्छा रहा। किन्तु यह सब काम छिपा न था। लोगोंके मुंहसे गवर्णमेण्ट-को सब बात सुनने में आ जाती थी। इसी कारण, सन् १८०५ ई॰ से पुलिस कुछ सख्त पड़ी। विधवाके इच्छापूर्वक सम्मत न ठहरनेपर कर्तृ पक्ष सहमरणकी अनुमति देनेसे दूर रहता था। हिन्दूवोंने भी सोच-समझ एक उपाय ढूंढ निकाला। ऐसा जान सकनेसे, कि सहमरणको जाते समय कोई स्त्री इतस्ततः करेगी, उसके आत्मीय स्वजन छिपकर उसे थोड़ी भांग खिलाते थे। कुछ देर बाद भांगसे मन बौरानेपर लोग उससे अनुमति मांगते, स्त्री भी नशेकी झोंकमें कुछ न कुछ बता देती। इसका कोई ठिकाना नहीं, कि पहले कितनी हिन्दू महिला पतिकी चितापर जल मरी हैं। जहांगीरके समय जयपुर-महाराज मानसिंहकी डेढ़ हजार स्त्रीमें साठ सहमृता हुयीं, मारवाड़वाले राजा अजित्सिंहके मरने बाद चौहान-राणो, देवडा-राणी, तुवर-राणी, चावड़ा-राणी, शेखावती-राणी और अट्ठावन दासी जल मरी थीं। दाक्षिणात्य और महाराष्ट्र देशमें भी सहमरणकी विलक्षण धूम रही। कहते हैं कि, रामेश्वरके निकट मदुराके नायककी मृत्यु होनेसे उनके 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वह श्मशानसे भागनेकी चेष्टा लगाने लगी। मुक्तारामके पुत्रने विमाताको पकड़ आगमें डाल दिया। अपर स्त्री सतनीको पकड़ने चली, मुक्तारामके पुत्रने उसे भी आगमें ढकेल मारा। समय फो़र्ट-विलियम कालेजके पण्डित रमानाथने यह निष्ठुर व्यवहार अपनी आंखों देखा था। सन् १८२८ ई॰ की ९ वीं मार्चको जेमस् पेगस् नामक अंगरेज़ने एक पुस्तक निकाला। उसका नाम रहा,——बृटिश जातिके निकट सतीका क्रन्दन। (The Sati'sery to Britain.) फेनी पार्कस नाम्नी युरोपीय महिलाका भी एक पुस्तक वर्तमान है। पूर्वदेशमें चौबीस वर्षके भ्रमण बाद यह पुस्तक लिखा गया था। इसका नाम है,——“Wanderings of a Pilgrim in search of the Picturesque, during four and twenty years in the East with Revelation of life in Zanana.” इन दोनो पुस्तकमें सहमरणकी कहानी लिखी, उसे पढ़ कर शरीर कांप उठता है। इन्हीं दोनो पुस्तकको देखनेसे मालूम हुवा, हिन्दू सहमरणके निमित्त स्त्रीपर कहांतक अत्याचार मचाते थे। उस समय मनुष्यका मन और विश्वास एवं समाजकी अवस्था इस प्रकार नहीं रही।पतिवियोग के बाद किसीकी स्त्री सहमृता न होनेपर कलङ्कसे देश भर जाता था। पांच आदमी इकट्ठे होनेसे ही नाना प्रकारके दुर्नाम निकालते थे। इसी कारण चिरकाल कलङ्कका टोकरा शिर पर रखे घूमनेको बनिस्बत स्त्रीहत्या अच्छी रही। लोकगञ्जनाके भयसे हिन्दू कितनी ही स्त्री जबरन जला देते थे। उसके <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ऊपर विषयका लोभ लगा रहा; कहीं कोई स्त्री ज्ञातिशत्रु न बन जाती और सम्पत्तिका एक अंश छातीपर रख चार युगतक बैठे मौज मारती! विधवा-का प्राण बहुत कठिन होता है। एक सन्ध्या निरामिष भोजन मिलता और मासके मध्य दो-तीन दिन निर्जल उपवास पड़ता, किन्तु उससे भी शरीर नहीं सूखता, सहज में मृत्यु नहीं आतो। अतएव यही सोच अनेक ज्ञाति, अपनी चाची आदिको जबरन जला देते थे, कि उतनी ज्वालायन्त्रणाकी बनिस्वत विष-वृक्षका मूल पूर्वाह्नमें ही उखाड़ डालना अच्छा रहा। किन्तु यह सब काम छिपा न था। लोगोंके मुंहसे गवर्णमेण्ट-को सब बात सुनने में आ जाती थी। इसी कारण, सन् १८०५ ई॰ से पुलिस कुछ सख्त पड़ी। विधवाके इच्छापूर्वक सम्मत न ठहरनेपर कर्तृ पक्ष सहमरणकी अनुमति देनेसे दूर रहता था। हिन्दूवोंने भी सोच-समझ एक उपाय ढूंढ निकाला। ऐसा जान सकनेसे, कि सहमरणको जाते समय कोई स्त्री इतस्ततः करेगी, उसके आत्मीय स्वजन छिपकर उसे थोड़ी 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proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh|'''४८२'''|'''अनुमृता'''|}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पहुंचना चाहिये। तुम्हारा पाणिग्रहण जो करे, उसी बन्द कर देना भी कठिन काम है। वैदिक समयसे पुनर्बार विवाहेच्छु पतिको सम्यक् रूपसे जाया पूर्व सहमरण चलित रहा, इसी कारण वैदिक समयमें ऋषि यह प्रथा बिलकुल बन्द कर न ऋग्वेद और तैत्तिरीय-आरयकवाले दोनो मन्त्रके सके। इसलिये स्वामीको मृत्यु बाद पुरातन प्रत्येक शब्दका अर्थ मिलानेसे एक ही भाव निकलता, नियमको रक्षा रखनेके निमित्त विधवा नारी मृत किन्तु दोनो ही मन्त्र में कालके सम्बन्धपर गड़बड़ पड़ पतिको चिता-शय्यापर एक बार जा लेटती, जाता है। अन्त में लोग उसे उठा लाते थे। अनुमानसे इस "तामुत्थापयेद्दे वरः पतिस्थानीयोऽन्तेवासी। समय इतना ही कहा जा सकता है, कि वह सिवा जरहासो वोदीष्व नाभि जीवलोकमिति।" असली नियमको नकलके दूसरा कुछ भी न था। (आश्वलायन-सासूब ४।२।१८) यही सहमरणका पूर्व इतिहास हुवा। फिर भी, यह सकल प्रमाण देख स्पष्ट हो समझ पड़ा, कि मुसलमानी ज़माने में सहमरण-प्रथाके विशेष भावसे वैदिक समयमें स्वामीको मृत्यु बाद विधवा फिर घर प्रचलित होनेका कारण हिन्दूनारीको कुलधर्मरक्षा वापस जाती, मृतपतिके साथ जलती न थी। किन्तु रही। मुसलमानों में बहु विवाह विशेष भावसे प्रचलित एक बड़ा सन्देह उठ खड़ा होता है। असली वस्तु न है। मुसलमानोंके आधिपत्य-कालमें किसी-किसी रहनेपर उससे नकली वस्तु कैसे बनेगी ? असलो मोती मुसलमान-राजपुरुषकी हिन्दू महिलापर तीव्र और देखकर ही झूठे मोती तय्यार होते हैं। पहले यज्ञो लोलुप दृष्टि पड़ती थी। इस आशङ्कासे सकल हो पवीत होनेसे ब्रह्मचारी गुरुके आश्रम पहुंचता, जाकर पतिहौना नारीके सहमरणको अच्छा समझते, कि पीछे वेद पढ़ता था। अब वह चाल उठ गयौ ; यज्ञोपवीत उनकी पतिहीना विधवापर किसी प्रकार अत्याचार होनेसे कोई गुरुके घर वेद पढ़ने नहीं जाता। किन्तु न मचने लगता। इसीसे अंगरेजो अधिकारके प्रारम्भ पहलेके उस असली नियमको कुछ नकल आज भी पर्यन्त भारतमें सर्वत्र ही सहमरणके बाहुल्यका सन्धान देख पड़ती ; यज्ञोपवीत होनेपर ब्रह्मचारी घरसे लगा है। इसतरह बहुकाल भारतमें सहमरण प्रथा निकल जानेके लिये कई कदम आगे बढ़ता, पीछे प्रचलित रहनेसे देशीय राज्यके मध्य भी यह प्रथा जननी समझा-बुझा उसे वापस लाती है। यह केवल कुलगौरवजनक होनेके कारण सर्वत्र आद्रित हुयौ पुरातन नियमको रक्षामात्र है, वस्तुतः दूसरी कोई भी थी। बस, जो नारी सहमरणमें आत्मोत्सर्ग बात नहीं दिखाई देती। रखती, वह दाक्षायणी सती-जैसी भारतमें सर्वत्र पूजी वैदिक समयके सहमरणपर भी सन्देह है जाती रही। अनुमृता नारीको स्मृतिरक्षाके लिये स्वामीको मृत्यु बाद विधवा नारी मृतपतिको चितामें भारतके नानास्थानमें बहु सतौस्तम्भ बने हैं। सती देखो। क्यों जाकर लेटती थी। मालूम होता है, कि अब बताते हैं, पचास वत्सर पहले हिन्दुस्थानको वैदिक कालसे पूर्व आर्य-जातिके मध्य सहमरण स्त्री कैसे जल जाती थी। ऋतुमती, गर्भवती रहने चलित रहा। उत्साहपूर्वक भगिनी-हत्या, वा माट- और गोदमें छोटा बच्चा होनेसे स्त्री पतिके साथ कभी हत्या करना धार्मिक लोगोंको बुद्धिमें नही बैठता। जलने न पाती रही। फिर भी, ऋतुके तृतीय दिवस वेदके समय आर्य सुशिक्षित और सभ्य बने, धर्मके खामीको मृत्यु, पड़नेसे एक दिन शव रखनेको निर्मल ज्योतिःने उनके मनको आलोकित किया व्यवस्था विद्यमान है। किन्तु सन् १८२२।२३ ई० में था। वैसी अवस्थापर मिथ्या आशामें आ वह गवर्नमेण्ट चारो ओर तीव्र दृष्टि डालने लगी ; कभी स्त्रीहत्या कर न सके होंगे। किन्तु कोई पुलिसको विशेष अनुमति न मिलनेसे कोई सतीदाह प्रथा देशमें अधिक दिन चलती रहनेसे उसे बिलकुल कर न सकता, इसलिये उस समय तीनचार दिनतक <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 35fqc19c17yzc3epbdat82jt8hgb3kz पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/४९० 250 90552 668293 355017 2026-07-19T19:15:06Z Sanjana Chowdhury 5438 /* शोधित */ 668293 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sanjana Chowdhury" />{{rh||'''अनुमृता-अनुमोदक'''|'''४८३'''}}</noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> लाश पड़े सड़ते रहती थी। जितने दिन लाश पड़े ज्वालासे छटपटा कोई-कोई सती चितासे नीचे गिर सड़ती, उतने दिन पर्यन्त हतभाग्य विधवा नारी जाती थी। चिताभ्रष्ट सतीको प्राजापत्य प्रायश्चित्त कुछ भी न खाते रहो। उठाना पड़ता है। प्रायश्चित्तके बाद गृहस्थ उसे फिर अन्त्येष्टिक्रियाका आयोजन जुटा मृतदेहको घरमें घुसने न देते। इसीसे मुर्देफरोश उसे ले जाते चितापर रखते थे। प्रेत-पिण्डादि दिये जाने बाद रहे। इस कारण कदाचित् चितासे किसी स्त्रीके नापित सतौका नख काटता, पीछे वह अलङ्कार नीचे गिर पड़नेपर आत्मीय वजन उसके शिरमें लठ निकाल, हाथको चूड़ी फोड़ नहाती-धोती; स्नान फटकार उसका प्राण निकाल डालते थे। चिताका हो जानेसे आत्मीय स्वजन उसे कफ़न पहनाते, रंगे प्रदक्षिण लगाते समय अनेकके शरीरसे धर्मधारा डोरसे हाथमें महावर बांधते, बालों में कडी लगाते बह चलती और अल्पक्षण बाद ही वह मूळ खा और कपालपर सिन्दूर चढ़ा देते। ऐसी वेशभूषा गिरती। कोई-कोई ऐसे समय मर भी गयो है। बननेपर सती, आचमनकर तिल, जल और कुश जिन्होंने यह सकल घटना प्रत्यक्ष देखी, अद्यावधि हाथमें ले पूर्वमुख यों सङ्कल्प लगाते रहो,- वह बृद्ध लोग जीवित हैं। "अद्यामुकै मासि अमुकै पचे अमुकै तिथौ अमुक गोवा श्रीमती अमुकी उस कालमें सहमरण देखनेके निमित्त बालक, देवी अरुन्धतीसमाचारत्वपूर्वक स्वर्गलोकमहीयमानत्व मानवाधिकरणक बालिका एवं अनेक सधवा स्त्री श्मशान पहुंचती 'लोमसंख्याब्दावच्छिन्न वर्गवास भर्तृ सहित मोदमानत्व मातृपितृश्वशुरकुलवय और सतीके हाथको फूटी चूड़ी, कपालका सिन्दूर पूतत्व चतुर्दशेन्द्रावच्छिन्न-कालाचिकरणकाप्सरोगणस्त यमानत्व पतिसहित और बिखरा हुवा लावा बटोर लाती थीं। कोई क्रीड़मानत्व ब्रह्मनकृतघ्नपतिपूतत्वकामा भर्तृ ज्वलञ्चितारोहणमह' करिष्ये ।" बालवधू पतिपरायणा न रहनेपर उसके कपालमें इसतरह सङ्कल्प पढ़ लेनेसे, सती सूर्याध्य देकर वहो सिन्दूर चड़ाया जाता रहा । उस लावेको विस्तर दिक्पालको साक्षी बनाती थी,- पर रखनेसे खटमल भग जाते थे। किसीको "अष्टौ लोकपाला आदित्यचन्द्रानिलाग्नाकाशभूमिजलहदयावस्थितान्त- यमिपुरुषयमदिनरावि-सध्यया-धर्मा यूयं साक्षिणी भवत जलञ्चितारोहणेन पेतिनीमें पानेपर वही फूटी चूड़ी गले में बंधते रहो। भर्तृ शरीरानुगमनमहौं करोमि।" अनुमरणादिका ऐतिहासिक विवरण अनुमरण, सती और अशीचा- प्रकार लोकपालको साक्षी बना सती अञ्चलमें दिका हाल सहमरण शब्दमें देखी। लावा, नारियल और बताशे भर सात बार (व्यवस्थामें अनुमृग्यदाशु (सं० पु.) मनोकामना पूर्ण करनेवाला तीन ही बार लिखा है) चिताका प्रदक्षिण फिरती, व्यक्ति, जो शख्स मुंह-मांगी चीज़ बखूशे । प्रदक्षिण फिरने बाद, ‘इमा नारीः' इत्यादि ऋङ- अनुमाशम् (सं• अव्य०) पुनः-पुनः विचार बांध, मन्त्रका पाठ पढ़ा जाता। शेषमें वह चितापर चढ़ बार-बार ख़याल लड़ा, सोच-सोच, समझ-समझ। स्वामौके पास सो जाती थी। आत्मीय स्वजन बान और अनुमेय (स.त्रि.) अनुमौयते, अनु-मा कर्मणि दरखू तके कच्चे बकलेमें उसे और मृतदेह बड़े-बड़े यत्। १ अनुमान निकालने योग्य, अन्दाज़ लगाने लकड़ीके टुकडोंसे मजबूत तौरपर बांध देते ; फिर काबिल। अनु-मि-कर्मणि यत् । २ पश्चात् क्षेपके अग्निसमर्पण ठहरता, चारो ओरसे लोग झड़ा-झड़ योग्य, पोछे डालने लायक। अनु-मौ कर्मणि यत्। घास-फूस और रमशरका गट्ठा चितापर चलाने लगते। ३ पश्चात् वध्य, जो पीछे कत्लके काबिल हो। कोई-कोई चितापर बड़े-बड़े बांस रख दबाये रखता | अनुमोद (सं० पु. ) अनु-मुद-णिच्-चञ्। सम्मतिजनक था। दूसरी ओर पांच सात ढोल बजते, कीर्तनीय व्यापार, सम्मतिप्रकाश, आह्वादप्रकाश, पीछेको खुशौ। झांझ-मंजीर झनकार आकाश पाताल एक कर अनुमोदक (सं त्रि०) स्वीकार करते हुवा, मानता, डालते। चिताके भीतर घोर नाद निकलनेपर भी हामी भरनेवाला, मञ्ज.र. फरमाता, जो रहमको उसके सुननेका उपाय नहीं था। क्वचित् आगको खुशी जाहिर कर रहा हो। इसी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> j72984c5ztjnxuh34ckekofuvldmepe पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२६ 250 101982 668248 367254 2026-07-19T14:15:22Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668248 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''२६'''|'''कबन्धता—कवरी'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> पात्र, लकड़ी का बड़ा पीपा। ११ राक्षसविशेष। रामायण में लिखा है — दनु नामक किसी दानव को तपस्या द्वारा तुष्ट करने पर ब्रह्मा से दीर्घ जीवन का वर मिला था। वर के प्रभावजन्य गर्वित हो किसी समय वह इन्द्र से युद्ध करने को जा पहुँचा। इन्द्र ने वज्राघात से उसका हस्त और मस्तक शरीर में घुसेड़ दिया था। किन्तु ब्रह्मवर के कारण उससे भी प्राण-वियोग न हुआ। इसी प्रकार विकृत शरीर में दिन-दिन क्लिष्ट हो दनु बारम्बार इन्द्र से अनुग्रह प्रार्थना करने लगा। फिर इन्द्र ने भी उसके प्रति सदय हो योजन-परिमित हस्तद्वय और वक्षःस्थल के उपरिभाग में एक वदन बना दिया था। दनु उसी मूर्ति से वन-वन जा और दीर्घ बाहु द्वारा वन्यजन्तु ला चबाकर खाने लगा। फिर एकदा पिता की आज्ञा प्रतिपालन करने को राम लक्ष्मण और सीता के साथ उसी वन में जा पहुँचे। इस राक्षस ने दीर्घ बाहुद्वारा उन्हें पकड़ लिया था। राम ने वीर्य प्रदर्शन कर लघु हस्त से तीक्ष्ण खड्ग द्वारा दनु का प्राण विनाश किया। रामहस्त से मरने पर कबन्ध दिव्यमूर्ति धारण कर स्वर्ग को चला गया। महाभारत के मत से यह राक्षस पहले विश्वावसु नामक गन्धर्व रहा, पीछे किसी ब्राह्मण के अभिशाप से राक्षसयोनि को प्राप्त हुआ। {{outdent| कबन्धता (सं० स्त्री०) मस्तकहीनता, धड़त्व, सिर कटवाने की हालत। }} {{outdent| कबन्धी (वै० पु०) १ ऋषिविशेष। 'अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य' (श्रुति) (पु०) अस्ति कबन्ध-इनि। जलयुक्त, आबदार। }} {{outdent| कबर — कम्बल देखो। }} {{outdent| कबरस्थान — कब्रस्तान देखो। }} {{outdent| कबरा (हिं० वि०) कर्बुर, अबलक, सफेद रङ्ग पर काले, लाल, पीले या किसी दूसरे रङ्ग के अथवा काले, पीले, लाल या किसी दूसरे रङ्ग पर सफेद धब्बे रखने वाला। }} {{outdent| कबरीस्थान — कब्रस्तान देखो। }} {{outdent| कबरी — जातिविशेष, एक कौम। मद्रास प्रदेश में इस जाति के लोग रहते हैं। यह प्रायः १८ शाखा में <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> विभक्त हैं। उनमें बलिगि और तोत्तियार शाखा ही प्रधान है। }} पहले कबरी खेतीबारी के लिये ज़मीन रखते थे। उसी ज़मीन को अपर निकृष्ट जाति द्वारा जोता-बोया जा जो आय मिलता, उससे इनकी जीविका का काम चलता। आजकल इनमें यह पूर्व प्रथा नहीं, कितने ही लोग स्वयं कृषिकार्य करते हैं। फिर कोई नाव चलाता और कोई बनिये की दुकान लगाता है। तोत्तिया शाखा किसी-किसी स्थान में तोत्तियान वा कम्बन्तत्तार नाम से भी प्रसिद्ध है। यह परिश्रमी और बड़े उत्साही हैं। कृषि कार्य से लगा धनेश के कार्य पर्यन्त इनके द्वारा सम्पन्न होते हैं। मद्रास नगर में तोत्तियार अनेक उत्तम-उत्तम कार्य चलाते हैं। तोत्तियार श्रेणियों में विभक्त हैं। प्रत्येक श्रेणी पर श्रेणी से स्वतन्त्र रहती है। प्रायः पाँच सौ वर्ष पहले कितने ही तोत्तियारों ने मदुरा जिले में जाकर उपनिवेश किया था। यह सकल ही विष्णु के उपासक हैं। विष्णु की अलौकिक लीला-क्रीड़ा में यह आन्तरिक विश्वास रखते हैं। किसी के विष्णु की निन्दा करने पर इनके प्राण में बड़ा आघात लगता है। फिर निन्दाकारी को यथोचित आदर (दण्ड) देने से कोई पीछे नहीं हटता। इनमें से कितने ही लोग इन्द्रजाल जानते हैं, इससे साधारण लोग इनको भय-भक्ति से देखते हैं। सुनते हैं — यह इन्द्रजाल के बल से साँप काटे का विष उतार सकते हैं। पुरुष मस्तक पर पगड़ी बाँधते हैं; स्त्रियाँ नानाविध वस्त्र पहनती हैं। उनका वक्षःस्थल कितना ही अनावृत रहता है। किन्तु उससे उन्हें लज्जा नहीं आती। तोत्तियारों में बहुविवाह की प्रथा प्रचलित है। किन्तु प्रायः सकल ही एक बार विवाह करते हैं। एक पत्नी के मरने पर अपर पत्नी ग्रहण की जाती है। इनके विवाह वा धर्मकर्म में ब्राह्मणों की आवश्यकता नहीं पड़ती। कोड़ाङ्गिनायकन नामक इनका एक प्रधान रहता है। वही विवाहादि सम्पन्न करता है। जन्मकुण्डली बनाना भी उसका काम है। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 6ps3tqnzzwfil29lzbqtn9kqs82rgr4 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२७ 250 101983 668249 367255 2026-07-19T14:18:58Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668249 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''२७'''|'''कबा—कवीठ'''|}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> कबरी प्रधानतः तेलङ्ग होते हैं। यह प्रधानतः तेलङ्ग भाषा का व्यवहार करते हैं। किन्तु स्वदेश छोड़ अन्य स्थान में रहने वालों की बात स्वतन्त्र है। {{outdent| कबा (अ० पु०) परिच्छदविशेष, पहनने का एक कपड़ा। यह जानु पर्यन्त दीर्घ एवं अर्धवृत्त मिश्रित होता है। इसका अग्रभाग मुक्त और बाहु चलित रहता है। }} {{outdent| कबाड़ (हिं० पु०) १ निष्प्रयोजन वस्तु, बेकार चीज़। २ निरर्थक कार्य, बेफ़ायदा काम। }} {{outdent| कबाड़ा (हिं० पु०) निरर्थक व्यापार, झगड़ा-झंझट। }} {{outdent| कबाड़िया — कबाड़ी देखो। }} {{outdent| कबाड़ी (हिं० पु०) १ निरर्थक वस्तुविक्रेता, बेकार चीज़ बेचने वाला। २ क्षुद्र व्यवसायी, जो मनुष्य छोटा-मोटा रोज़गार करता हो। (वि०) ३ नीच, बसोना, छोटा। }} {{outdent| कबाब (अ० पु०) मांसभेद, किसी पशु का गोश्त। पहले मांस को भली भाँति काट-कूट बारीक बनाते, फिर उसमें बेसन, नमक और मसाला मिलाते हैं। पीछे इसकी गोलियाँ बना कोइले की आँच में गोदते और ढाँके हुए कोयले की आँच पर सेकते हैं। इन्हीं सेंके हुए गोश्तों का नाम कबाब है। इसे प्रायः मुसलमान ही खाते हैं। }} {{outdent| कबाबचीनी (हिं० स्त्री०) शीतलचीनी। इसे संस्कृत में कंकोल वा कङ्कोल, नेपाली में तिम्वर, यशोहरी में सुरतमरी, मारवाड़ी में चिनमोमौर, गुजराती में तदाँमरी, दक्खिनी में दुमकी, तमिल में वाश-मिळगु, तेलगु में तोशमिरियालू, कणारी में वालमेनसु, मलय में कोपुगकुस, ब्राहूई में सिनमनकरप, सिन्धी में बलगुमदग्गिस, अरबी में कबावा और फ़ारसी में कबाबह कहते हैं। (Piper cubeba) }} यह झाड़ी यवद्वीप और मोलूकास द्वीप में स्वभावतः उत्पन्न होती है। भारतवर्ष में भी कहीं-कहीं इसकी कृषि की जाती है। भारतवासी इसके फल को बाहर से मँगाते हैं। इसके गोंद की राल किसी बड़े काम में नहीं लगती। पत्ते बेर के पत्तों से मिलते हैं। किन्तु उनमें नुकीलापन कुछ अधिक रहता है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> पत्तों की खड़ी नसें ऊपर को उठ जाती हैं। फल गुच्छे में रहता और गोल-मिर्च जैसा देख पड़ता है। इसे भी कबाबचीनी ही कहते हैं। यह खाने में मरिच से मृदु, कटु एवं तिक्त लगती है। पहले यवद्वीप-वासी इसे किसी विदेशी के हाथ बेचने में हिचकते थे। वह भय रखते—कोई हमारे इस अपूर्व फल को अपने देश में ले जाकर लगा न ले। घर के प्राचीन वैद्यों को विदित था—कबाबचीनी मूत्रप्रणाली के मार्ग को ससदार भिंझी को बड़ा लाभ पहुँचाती है। किन्तु लोग इसे वायुनाशक गन्ध द्रव्य की भाँति भी व्यवहार करते आये हैं। कबाबचीनी धातुदोष एवं प्रमेह का महौषध है। यह दीपन, पाचन और शूलवर्धक होती है। बम्बई के वैद्य इसे औषधों में अधिक व्यवहार करते हैं। कबाबचीनी कण्ठ के स्वर को भी सुधारती है। गाने-बजाने वाले इसे प्रायः मुँह में डाले रहते हैं। कङ्कोल देखो। {{outdent| कबाबी (अ० वि०) १ कबाब बेचने वाला। २ कबाब खाने वाला। }} {{outdent| कबाय (हिं०) कबा देखो। }} {{outdent| कबार (हिं० पु०) १ व्यवसाय, कामकाज। २ हलविशेष, एक पेड़। }} {{outdent| कबाळ (हिं० स्त्री०) खजूर की तन्तु, खजूर का रेशा। इसे बटकर रस्सी तैयार की जाती है। }} {{outdent| कबाला (अ० पु०) स्वत्वभङ्ग, एक दस्तावेज़। इसके द्वारा एक की सम्पत्ति दूसरे के अधिकार में जाती है। }} कबाला लिखने वाले मुहर्रिर को 'कबाला-नवीस', और जायदाद बेचने वाले की पार से ख़रीदने वाले को दी जाने वाली सनद को 'कबाला-नीलाम' कहते हैं। {{outdent| कबाहट (हिं०) कबाहुत देखो। }} {{outdent| कबाहुत (अ० स्त्री०) १ अभद्रता, बुराई। २ कठिनता, दिक़्क़त, अड़चन। }} {{outdent| कबित्थ (सं० पु०) कपित्थवृक्ष, कैथे का पेड़। }} {{outdent| कबित्त (सं० त्रि०) कपित्थ, भूरा, ताँबड़ा। (पु०) २ कपित्थवर्ण, भूरा या ताँबड़ा रङ्ग। }} {{outdent| कबीठ (हिं० पु०) १ कपित्थवृक्ष, कैथे का पेड़। २ कपित्थफल, कैथे का मेवा। }} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 66fspwjl727kp3vgyjiibsvnwl8ick1 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२८ 250 101984 668256 367256 2026-07-19T15:51:10Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668256 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude><noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{rh|'''२८'''|'''कबीर'''|}} कबीर (अ० वि०) लब्धप्रतिष्ठ, बड़ा। बहुत बड़े आदमी को अमीर कबीर कहते हैं। (हिं० स्त्री०) अश्लील गीत, फूहड़ गाना। यह होली में गायी जाती है। कोई कबीर कहने से पहले लोग 'अररर कबीर' पद लगा लिया करते हैं। {{outdent| कबीर — कबीरपन्थी नामक सम्प्रदाय के प्रवर्तक। ठीक कह नहीं सकते — कबीर किसके पुत्र अथवा किस जाति के व्यक्ति रहे। इनकी जाति, सन्तति और उत्पत्ति के विषय में नाना विवरण मिलते हैं। मुसलमान इन्हें अपनी जाति के व्यक्ति बताते हैं। किन्तु भक्तमाल में लिखा है — }} रामानन्द-शिष्य किसी ब्राह्मण के एक बालविधवा कन्या रही। किसी दिन वह ब्राह्मण कन्या साथ ले गुरुदर्शन को पहुँचे। फिर रामानन्द ने उस ब्राह्मण-कन्या की भक्ति देख सहसा पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था। आशीर्वाद भी वृथा न गया, बालविधवा कन्या के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसी पुत्र का नाम कबीर है। भूमिष्ठ होते ही अभागिनी जननी लोकापवाद के भय से गुप्तभाव में शिशु को स्थानान्तर पर छोड़ आयी थी। फिर किसी जुलाहे और उसकी स्त्री ने दैवात् शिशु को पाकर निज पुत्र की भाँति लालन-पालन किया। कबीरपन्थी भक्तमाल के प्रथम अंश को बिलकुल नहीं मानते। उनके मत में कबीर एक दिन काशी के निकट 'लहर तालाब' नामक सरोवर के पद्मपत्र पर तैरते थे। उसी स्थान से नूरी जुलाहा अपनी पत्नी नीमा के साथ विवाह-निमन्त्रण में जाता रहा। नीमा इस शिशु को देख अपने स्वामी के निकट ले आयी। फिर शिशु ने उससे पुकार कर कहा — हमें काशी ले चलो। नूरी सद्योजात शिशु की बात सुन विस्मापन्न हुआ और सोचने लगा — कोई देवता मानवदेह धारण कर आ गया। अन्त को उसने प्राण के भय से डर और शिशु को फेंक पलायन किया। किन्तु शिशु उसके पीछे पड़ा था। कोई दूर को जाकर नूरी ने देखा, कि शिशु उसके आगे खड़ा है। उस समय वह भय से जड़ीभूत हो <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गया। शिशु ने उसका भय निवारण कर कहा था — तुम हमें प्रतिपालन करो और किसी बात से न डरो। इस प्रकार शिशुरूपी कबीर जुलाहे के हाथ लालित-पालित हुये। कबीर के जीवन का प्रथमांश जैसा कौतुकावह जाता, वैसा ही अवशिष्ट अंश भी दिखाता है। भक्ति-माहात्म्य नामक संस्कृत ग्रन्थ में लिखा है — पूर्वकाल वेदान्ताभ्यासनिरत एक ब्राह्मण रहे। वह स्त्री-पुत्र के लिये शिल्पकार्य से जीविका चलाते थे। एक दिन सूत्र लेने को उन्हें तन्तुवाय के भवन जाना पड़ा। वहाँ से अपने घर लौटने पर वह ज्वर रोग से आक्रान्त हुये और दैवयोग से उसी ज्वर में मर गये। मृत्युकाल को स्मरण आने से ही तन्तुवाय के घर उनका जन्म हुआ। तन्तुवाय के घर जन्म ले ब्राह्मण ने प्रथम वस्त्रादि निर्माण करना सीखा था। किन्तु पूर्वसंस्कारवशतः उनमें ब्रह्मज्ञान भी उत्पन्न हुआ। वह सर्वदा कहा करते थे — संसार असार और यह जीवन पद्मपत्र पर जल के समान है। इस काशीधाम में कौन हमारा गुरु होगा? कौन हमें इस संसार-सागर से बचायेगा? — कर्णधार न मिलने पर यह देहतरी कैसे चलेगी? किसी दिन उन्होंने कितने ही साधुओं के निकट उपस्थित हो अपना मनोभाव प्रकट किया। वैष्णव-साधुओं ने उनसे पूछा — तुम कौन और क्या चाहते हो? उन्होंने कहा — हम जाति के तन्तुवाय और रामानन्द के शिष्य होना चाहते हैं। वैष्णव उपहास कर कहने लगे — तुम म्लेच्छ हो, तुम्हारा गुरु कौन होगा! फिर तन्तुवाियरूपी कबीर भग्नमनोरथ घर को लौटे थे। उनका मन अस्थिर हो गया। उन्होंने फिर साधुओं के निकट जा अपने मन का दुःख दिखाया था। किन्तु इस बार भी उनकी मनस्कामना पूर्ण न हुई। फिर वह अस्थिर चित्त से वाराणसी में घूमने लगे। वह जिसको देखते, उसी से पूछते थे — क्या आप बता सकते, गुरु रामानन्द कहाँ हैं? इसी प्रकार बहुदिन बीत गये। किसी दिन एक वैष्णव ने उनसे दया कर कहा था — गुरु रामानन्द अमुक स्थान पर रहते हैं। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> a6re1m2l0k38l18xo1muvlt4783egto 668257 668256 2026-07-19T15:52:29Z Sweta rani Gupta 6713 668257 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''२८'''|'''कबीर'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> {{outdent|कबीर (अ० वि०) लब्धप्रतिष्ठ, बड़ा। बहुत बड़े आदमी को अमीर कबीर कहते हैं। (हिं० स्त्री०) अश्लील गीत, फूहड़ गाना। यह होली में गायी जाती है। कोई कबीर कहने से पहले लोग 'अररर कबीर' पद लगा लिया करते हैं।}} {{outdent| कबीर — कबीरपन्थी नामक सम्प्रदाय के प्रवर्तक। ठीक कह नहीं सकते — कबीर किसके पुत्र अथवा किस जाति के व्यक्ति रहे। इनकी जाति, सन्तति और उत्पत्ति के विषय में नाना विवरण मिलते हैं। मुसलमान इन्हें अपनी जाति के व्यक्ति बताते हैं। किन्तु भक्तमाल में लिखा है — }} रामानन्द-शिष्य किसी ब्राह्मण के एक बालविधवा कन्या रही। किसी दिन वह ब्राह्मण कन्या साथ ले गुरुदर्शन को पहुँचे। फिर रामानन्द ने उस ब्राह्मण-कन्या की भक्ति देख सहसा पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था। आशीर्वाद भी वृथा न गया, बालविधवा कन्या के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसी पुत्र का नाम कबीर है। भूमिष्ठ होते ही अभागिनी जननी लोकापवाद के भय से गुप्तभाव में शिशु को स्थानान्तर पर छोड़ आयी थी। फिर किसी जुलाहे और उसकी स्त्री ने दैवात् शिशु को पाकर निज पुत्र की भाँति लालन-पालन किया। कबीरपन्थी भक्तमाल के प्रथम अंश को बिलकुल नहीं मानते। उनके मत में कबीर एक दिन काशी के निकट 'लहर तालाब' नामक सरोवर के पद्मपत्र पर तैरते थे। उसी स्थान से नूरी जुलाहा अपनी पत्नी नीमा के साथ विवाह-निमन्त्रण में जाता रहा। नीमा इस शिशु को देख अपने स्वामी के निकट ले आयी। फिर शिशु ने उससे पुकार कर कहा — हमें काशी ले चलो। नूरी सद्योजात शिशु की बात सुन विस्मापन्न हुआ और सोचने लगा — कोई देवता मानवदेह धारण कर आ गया। अन्त को उसने प्राण के भय से डर और शिशु को फेंक पलायन किया। किन्तु शिशु उसके पीछे पड़ा था। कोई दूर को जाकर नूरी ने देखा, कि शिशु उसके आगे खड़ा है। उस समय वह भय से जड़ीभूत हो <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गया। शिशु ने उसका भय निवारण कर कहा था — तुम हमें प्रतिपालन करो और किसी बात से न डरो। इस प्रकार शिशुरूपी कबीर जुलाहे के हाथ लालित-पालित हुये। कबीर के जीवन का प्रथमांश जैसा कौतुकावह जाता, वैसा ही अवशिष्ट अंश भी दिखाता है। भक्ति-माहात्म्य नामक संस्कृत ग्रन्थ में लिखा है — पूर्वकाल वेदान्ताभ्यासनिरत एक ब्राह्मण रहे। वह स्त्री-पुत्र के लिये शिल्पकार्य से जीविका चलाते थे। एक दिन सूत्र लेने को उन्हें तन्तुवाय के भवन जाना पड़ा। वहाँ से अपने घर लौटने पर वह ज्वर रोग से आक्रान्त हुये और दैवयोग से उसी ज्वर में मर गये। मृत्युकाल को स्मरण आने से ही तन्तुवाय के घर उनका जन्म हुआ। तन्तुवाय के घर जन्म ले ब्राह्मण ने प्रथम वस्त्रादि निर्माण करना सीखा था। किन्तु पूर्वसंस्कारवशतः उनमें ब्रह्मज्ञान भी उत्पन्न हुआ। वह सर्वदा कहा करते थे — संसार असार और यह जीवन पद्मपत्र पर जल के समान है। इस काशीधाम में कौन हमारा गुरु होगा? कौन हमें इस संसार-सागर से बचायेगा? — कर्णधार न मिलने पर यह देहतरी कैसे चलेगी? किसी दिन उन्होंने कितने ही साधुओं के निकट उपस्थित हो अपना मनोभाव प्रकट किया। वैष्णव-साधुओं ने उनसे पूछा — तुम कौन और क्या चाहते हो? उन्होंने कहा — हम जाति के तन्तुवाय और रामानन्द के शिष्य होना चाहते हैं। वैष्णव उपहास कर कहने लगे — तुम म्लेच्छ हो, तुम्हारा गुरु कौन होगा! फिर तन्तुवाियरूपी कबीर भग्नमनोरथ घर को लौटे थे। उनका मन अस्थिर हो गया। उन्होंने फिर साधुओं के निकट जा अपने मन का दुःख दिखाया था। किन्तु इस बार भी उनकी मनस्कामना पूर्ण न हुई। फिर वह अस्थिर चित्त से वाराणसी में घूमने लगे। वह जिसको देखते, उसी से पूछते थे — क्या आप बता सकते, गुरु रामानन्द कहाँ हैं? इसी प्रकार बहुदिन बीत गये। किसी दिन एक वैष्णव ने उनसे दया कर कहा था — गुरु रामानन्द अमुक स्थान पर रहते हैं। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> pklkcaqjwxkm40nikq9su81a64jcit4 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२९ 250 101985 668259 367257 2026-07-19T16:22:23Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668259 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh||'''कबीर'''|'''२९'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> रात्रि बीतने पर वह वहिर्द्वार खोल प्रत्यक्ष गङ्गा-स्नान को जाते हैं। तुम रात को उनके द्वार के समक्ष जाकर सो रहो। जब वह द्वार खोल बाहर आयेंगे तब उनके पद तुम्हारे अङ्ग में जायेंगे। उस समय उनके मुख से निकले नाम को तुम गुरुमन्त्र समझ ग्रहण कर लेना। सिवा इसके रामानन्द के म्लेच्छ शिष्य होने का दूसरा कोई उपाय नहीं। कबीर वैष्णव की बात से आश्वस्त हुये और शुभ-दिन की रात्रि बीतने से रामानन्द के द्वार पर लेट गये। रात्रि शेष होने पर रामानन्द प्रातःकृत्यादि निपटा और कुश तिल उठा जैसे ही बाहर निकले, वैसे ही कबीर के अङ्ग में उनके पद छू गये। कबीर ने भी महासमादर गुरु के पद चूम लिये थे। रामानन्द सहसा अपने गात्र में पद लगते देख बोल उठे — राम राम। तुम कौन? इस प्रकार कबीर का मनोरथ पूरा हुआ। उन्होंने रामानन्द को गुरु कह साष्टाङ्ग प्रणिपात किया।<ref> रेखा ते के मत में कबीर ने राम रामानंद से द्रोणाचार्य को प्रार्थना की थी- "प्रथमहिं रूप जोलाहा कीन्हा। चारि वरन मोहिं काहु न चीन्हा॥ रामानन्द गुरु दीक्षा दीन्ह। गुरुपूजा कछु हमसों लीन्ह॥"</ref> उसी दिन से कबीर ने 'राम' नाम को सार माना था। वह स्तव स्तुति कुछ न करते, केवल 'राम' नाम को ही मुक्ति का सोपान समझते रहे। फिर कबीर तिलक-माला धारण कर अपरापर वैष्णवों की भाँति काशीधाम में रहने लगे। कबीर का आचार व्यवहार देख वैष्णव बिगड़े थे। एक दिन उन्होंने कबीर को बुलाकर कहा — रे म्लेच्छा-धम! तू किस साहस से तिलकमाला धारण करता है! तुझको यह दुर्बुद्धि किसने दी है। कबीर ने शान्तशिष्ट भाव से उत्तर दिया — मैं सत्य कहता हूँ, गुरु रामानन्द ने मुझे राममन्त्र दिया और इससे मैंने ऐसा कार्य किया है। फिर सबने जाकर रामानन्द से कबीर की कथा कही थी। रामानन्द ने अत्यन्त क्रुद्ध हो उन्हें बुला भेजा। उन्होंने गुरु के निकट जा कृताञ्जलिपुट से धीरभाव में कहा — हैं नाथ ! क्या आप भूल गये? उस दिन रात्रीविशेष पर मैं आपके द्वार पर जाकर लेटा था। {{Rule}} {{Smallrefs}} {{Left| Vol. IV 8|2em}} <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> था। आपने मेरे अङ्ग पर पद रख राम नाम उच्चारण किया। उसी दिन मैंने राममन्त्र लाभ किया था। उसी दिन से मैं नियत राम नाम जपता हूँ। प्रभो! इसमें यदि मेरा दोष मान लीजिये, तो दयाकर क्षमा कीजिये। रामानन्द से कबीर का परिचय मिला और उन्होंने क्रोध परित्याग कर हँसते-हँसते आशीर्वाद दिया। उसी दिन सब लोग कबीर को एक सच्चा भक्त समझने लगे। यह नहीं — कबीर केवल भक्त ही रहे, उनका हृदय दरिद्र दुःख से पिघल उठता था। किसी दिन वह एक वस्त्र बेचने जाते रहे। पथ में कोई वृद्ध मिल गया। उस समय शीतकाल रहा। दरिद्र वृद्ध ने शीतार्त हो उनसे वस्त्र माँगा था। कबीर ने दरिद्र की दुर्दशा देख अम्लानवदन वस्त्र दे डाला। दान किया तो सही, किन्तु परमुहूर्त्त उनके मन में संसार का उपाख्यान निकल पड़ा — हाय आज मेरे घर में अन्न नहीं, माता राह में बैठी मेरे आने की ताक लगाये होगी; मैं रिक्त हस्त कैसे घर वापस जाऊँगा। फिर उन्होंने मन ही मन सोचा — आज दरिद्र को यह वस्त्र दे मुझे जो सुख मिला, वस्त्र बेच कर अर्थ से उसका होना कहाँ था; मेरे अदृष्ट में जो आये, वही पड़ जायेगा। कबीर घर को लौट आये। आकर उन्होंने सुना था माता अन्न-व्यञ्जन बना बैठे रास्ता देख रही हैं। कबीर ने माता से पूछा — माता! आज हमारा संसार कैसे चला, आज तो हमारे कोई संस्थान न था। माता ने उत्तर दिया — कबीर क्या, तुम्हीं ने तो आदमी भेज हमारे पास अर्थ पहुँचाया है। कबीर आश्चर्य में आ गये और आवेग गद्गद्भाव में माता से कहने लगे — 'माता! तुम धन्य हो। साक्षात् भक्तवत्सल भगवान् आकर तुम्हें अर्थ दे गये हैं। माता! दीनदुःखी को धन वितरण करो। हमें धन का क्या प्रयोजन?' कबीर की माता ने दीन-दरिद्र को धन बाँटा था। चारों ओर राष्ट्र हो गया — 'कबीर बड़े दाता हैं। जो जाता वही पाता, कोई वृथा घूम नहीं पाता।' यह वदान्यता सुन एक दिन चारों ओर से बहुत से <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 70qo399op5r58ed1n3xtw3oikm3udm8 668260 668259 2026-07-19T16:22:53Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668260 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तुम्हारे अङ्ग में जायेंगे। उस समय उनके मुख से निकले नाम को तुम गुरुमन्त्र समझ ग्रहण कर लेना। सिवा इसके रामानन्द के म्लेच्छ शिष्य होने का दूसरा कोई उपाय नहीं। कबीर वैष्णव की बात से आश्वस्त हुये और शुभ-दिन की रात्रि बीतने से रामानन्द के द्वार पर लेट गये। रात्रि शेष होने पर रामानन्द प्रातःकृत्यादि निपटा और कुश तिल उठा जैसे ही बाहर निकले, वैसे ही कबीर के अङ्ग में उनके पद छू गये। कबीर ने भी महासमादर गुरु के पद चूम लिये थे। रामानन्द सहसा अपने गात्र में पद लगते देख बोल उठे — राम राम। तुम कौन? इस प्रकार कबीर का मनोरथ पूरा हुआ। उन्होंने रामानन्द को गुरु कह साष्टाङ्ग प्रणिपात किया।<ref> रेखा ते के मत में कबीर ने राम रामानंद से द्रोणाचार्य को प्रार्थना की थी- "प्रथमहिं रूप जोलाहा कीन्हा। चारि वरन मोहिं काहु न चीन्हा॥ रामानन्द गुरु दीक्षा दीन्ह। गुरुपूजा कछु हमसों लीन्ह॥"</ref> उसी दिन से कबीर ने 'राम' नाम को सार माना था। वह स्तव स्तुति कुछ न करते, केवल 'राम' नाम को ही मुक्ति का सोपान समझते रहे। फिर कबीर तिलक-माला धारण कर अपरापर वैष्णवों की भाँति काशीधाम में रहने लगे। कबीर का आचार व्यवहार देख 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पूर्वमुख फेंका था। राजा इन्हें पागल समझ हँस पड़े। उस समय इन्होंने निर्भय राजा को सम्बोधन कर कहा था, — राजन्! हँसने का कोई कारण नहीं, जगन्नाथपुरी में किसी पूजक ब्राह्मण के पैर पर उबलता ओदन गिर पड़ा है। मैंने उसके पैर पर शीतल जल डाला। कबीर की बात से राजा को बड़ा कौतूहल लगा था। उन्होंने जगन्नाथपुरी को दूत भेजा। चर ने लौट कबीर की बात सप्रमाण की थी। फिर राजा ने कबीर को एक सिद्धपुरुष ठहरा लिया। साक्षात् करने को वह स्वयं इनके घर जा पहुँचे। कबीर राजा को अपने क्षुद्र कुटीर में देख अतिशय आह्लादित हुये और हाथ जोड़ कहने लगे, 'महाराज! आपके आगमन से यह दास कृतार्थ हुआ, शिष्य को कुछ करने के लिये आदेश दीजिये।' राजा ने इन्हें आलिङ्गन कर कहा, हे वैष्णव! आप हमारा दोष ग्रहण न कीजिये। हमने बेसमझ आप का उपहास किया है। बतलाइये, क्या करने से आप सुखी होंगे। धनरत्न जो चाहिये, हम अभी देने को प्रस्तुत हैं। इन्होंने सहास्यमुख उत्तर दिया था, — "राजन्! धनरत्न का क्या प्रयोजन है। जीवन और मरण सब समान होते हैं। मैं मूर्ख हूँ, इस तुच्छ जीविकानिर्वाह के लिये धन नहीं चाहता। जो दीन-दरिद्र, आतुर और अर्थ के लिये लालायित हैं, अपनी इच्छानुसार उसे धन दीजिये। आप का मङ्गल होगा।" राजा चकित हो निज प्रासाद को लौटे थे। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude>उसी दिन उन्होंने राज्यमय घोषणा की — कबीर हमको अति प्रिय हैं। कुछ दिन पीछे यह तीर्थयात्रा को निकले और मथुरा दर्शन कर दिल्ली पहुँचे थे। उस समय दिल्ली में मुसल्मानराज सिकन्दर लोदी का राजत्व रहा। दुष्टों ने जाकर सुलतान से कह दिया — एक धार्मिक जुलाहा आकर धर्म की वञ्चना करता है। ऐसे व्यक्ति को राजदण्ड मिलना उचित है। सिकन्दर ने कबीर को पकड़ने के लिये आदेश लगाया था। यथासमय राजपुरुषों ने इन्हें पकड़ लिया। फिर इन्होंने उनके मुख से आपद्ण्ड मिलने की बात सुनी। सिकन्दर के समीप पहुँचने पर पारिषदों ने इनसे नमस्कार करने को कहा था। किन्तु इन्होंने उनकी बात पर कर्णपात न किया और इससे हँसते सुना दिया — किसको प्रणाम किया जाये, इस संसार में कौन वन्द्य नहीं। फिर सुलतान ने अति क्रुद्ध हो और लौह शृङ्खल से आबद्ध कर यमुना के अगाध सलिल में डालने का उपाय निकाला था। राजपुरुषों ने तत्क्षण कबीर को यमुना के जल में निक्षेप किया। कालिन्दी के कृष्ण नीर में इनका देह अदृश्य हो गया। किन्तु परक्षण ही सकल ने यमुना के परपार इन्हें सहास्य मुख घूमते देखा। दुष्ट लोगों ने सुलतान से जाकर कह दिया — 'कबीर ऐन्द्रजालिक है। सामान्य इन्द्रजाल-विद्या के प्रभाव से निश्चय उन्हें रक्षा मिली है, इस बार अग्नि के मध्य निक्षेप कराइये।' दिलीश्वर ने दुष्टों की बातों में पड़ राजपुरुष बुला कर इन्हें महान् अनल में डालने को कहा था। किन्तु कैसा आश्चर्य, ज्वलन्त अग्नि में इनका एक केश नष्ट न हुआ। कबीर की इस अमानुष घटना से भी दिलीश्वर को चैतन्य आया न था। उन्होंने क्रोध से उन्मत्त और दुर्जनों की बात के वशीभूत हो हाथी के पैर नीचे इन्हें दबा मार डालने का आदेश दिया। किन्तु भगवान् जिस पर सदय रहते हैं, हज़ार हाथी भी उसका क्या कर सकते हैं। आज मतवाला हाथी भी इनका सिंहरूप देख भय से भाग गया। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> b1xyr89z4nwcsmsyn6sje29zitbbymp पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३१ 250 101987 668323 367259 2026-07-20T03:48:08Z Shivaniya shaw 4129 /* शोधित */ 668323 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''कबीर'''|'''३१'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>सिकन्दर कबीरकी भूयसी प्रशंसा करने लगे। इसबार सुलतानका मन भी झुक पड़ा था। उन्होंने इन्हें बुला सादर सम्भाषणमें कहा— साधु ! हमारा दोष क्षमा कीजिये। आप महाजन हैं। आज आपकी महिमा हम समझ सके हैं। यह दिल्लीश्वरसे विदाय हो काशीधाम पहुँचे और संसार की अनित्यता देख आत्मज्ञानके लाभको यत्नवान् हुये। काशीमें भी चारो ओर इनके विपक्षी घूमते थे। एक दिन कोई दुष्ट कबीरके नामसे काशीवासी समस्त साधुको निमन्त्रण दे आया। घटनाक्रमसे उसी दिन यह स्थानान्तर गये थे, कुटीरमें केवल कुछ शिष्य रहे। निमन्त्रण मिलनेसे काशीके सहस्र सहस्र साधु इनके वासस्थान पर उपनीत हुये। सहस्राधिक अतिथियों को क्षुधार्त देख शिष्योंका प्राण सूख गया। सकल ही सोचते थे— इतने लोगोंको खिला पिला कैसे विदा करेंगे। परक्षण ही भक्तवत्सल भगवान् कबीररूपसे प्रचुर भोज्य ला सर्वसमय देख पड़े और स्वहस्तसे साधुओंको भोजन करा चल दिये। प्रकाश कर नहीं सकते — साधु कितने परितुष्ट हुये थे। यह गृहको लौट महासमारोह देखकर अत्यन्त विस्मयमें आये। किसी शिष्यको पुकार इन्होंने पूछा था — वत्स ! यह क्या व्यापार है, किस लिये इतने लोग आये हैं। शिष्य आश्चर्य हो कहने लगा— आप क्या कह रहे हैं; आपने जिन सहस्राधिक व्यक्तियों को खिलाया पिलाया, उन्होंने आकर यह महोत्सव मचाया है। कबीर समझ गये — यह सकल हरिकी लीला है। इन्होंने मनोभाव छिपा शिष्यसे कहा था— वत्स ! मैं क्षुधासे अतिशय कातर हो गया हूँ, मुझे साधुओंका प्रसाद ला दो। फिर जो कबीरके नियत अनिष्टकी चेष्टा करते, वह दुर्जन भी महत्त्व के गुणसे वशीभूत होने लगे। जब वह इनके निकट निज निज दोष स्वीकार कर कितनी ही क्षमा मांगते, तब साधु कबीर सकलको आलिङ्गनकर राम नाम पुकारते थे। काशीवासी मात्र इनके गुणके पक्षपाती बन गये। किसी दिन एक रूपवती वेश्याने कबीरके निकट आ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कहा था- महामन्! में नृत्यगीतादि नानाप्रकार उपभोग द्वारा आपको सन्तुष्ट करना चाहती हूं । रूपसौन्दर्यशालिनी और नृत्यगीतादि-निपुणा नते- कौको देख यह सहास्य वोत उठे, मैं सुखभोग चोर नृत्यगीत नहीं समझता। फिर में स्त्री और पुरुष दोमें एक भी नहीं। मुझसे आपको मनस्कामना कैसे पूर्ण होगी ।' नर्तकौने अति काकुतिमिति भावमें इनसे प्रार्थना की- मैं घड़ी भाशासे भायी हैं । मुझे क्या हताश हो लौटना पड़ेगा । इन्होंने धीर भावसे उत्तर दिया- देखो! मेरे गृहमें स्वयं भक्तवत्सल हरि विराजते हैं । वह अति रागी और महाभोगी हैं । उनके सामने नाचगा आप अपनी भोगपिपासा मिटा सकती है। नर्तकी महाप्रानन्दित हुयी - मेरा ऐसा सौभाग्य, कि मैं स्वयं भगवान्‌को नृत्यगीत द्वारा रिकांगी । उसी दिनसे वह वेश्या कबीरके गृहमें रह प्रत्यह नाचने गाने लगी। इसी प्रकार कुछ दिन बोते थे । मनही मन वेश्या कबोरको चाहती थी। एक दिन गमीर रजनीको सब लोग सो गये। किन्तु वेश्याको पख न झपकी । कबीरके सम्भोगको लालसा से उसका fee स्थिर हुया था। वह किसी प्रकार भाकास यम कर न सकी और कबीरके सोनेकी जगह मनके आवेग में या पहुंची। उसने गभीर श्रमारजनीको वहां कदोर- के बदले ज्योतिर्मय हरिको मूर्ति देखो थी । फिर उसको कामपिपासा में जाने कहां अन्तर्हित हुयो ! चतुसे प्रेमाशुकी धारा वही घो। उसके लिये संसार असार समझ पड़ा। वेश्या उसी श्रमानिशाको एकाको गृह छोड़ निविड़ श्ररस्वकी और चली गयी। इन्होंने प्रत्यष उठ वेश्याको घरमें न देखा। उसके अलंकार वस्त्रादि सकल पड़े थे। कबोरने भावना लगायो -इतने दिनमें सम्भवतः वेश्याने सद्गति पायो है। इन्होंने शिष्योंको वोलाकर कहा- मेरे चलने- का समय आ पहुंचा है। वत्स ! तुम काशीवासि- योंको संवाद दो-मणिकर्णिकाघाट पर सब लोग कबोरसे जाकर मिली । <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 0yvc8fwqs8hnjag2me9v8req1rujntc 668328 668323 2026-07-20T04:03:46Z Shivaniya shaw 4129 668328 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Shivaniya shaw" />{{rh||'''कबीर'''|'''३१'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude></noinclude>सिकन्दर कबीरकी भूयसी प्रशंसा करने लगे। इसबार सुलतानका मन भी झुक पड़ा था। उन्होंने इन्हें बुला सादर सम्भाषणमें कहा— साधु ! हमारा दोष क्षमा कीजिये। आप महाजन हैं। आज आपकी महिमा हम समझ सके हैं। यह दिल्लीश्वरसे विदाय हो काशीधाम पहुँचे और संसार की अनित्यता देख आत्मज्ञानके लाभको यत्नवान् हुये। काशीमें भी चारो ओर इनके विपक्षी घूमते थे। एक दिन कोई दुष्ट कबीरके नामसे काशीवासी समस्त साधुको निमन्त्रण दे आया। घटनाक्रमसे उसी दिन यह स्थानान्तर गये थे, कुटीरमें केवल कुछ शिष्य रहे। निमन्त्रण मिलनेसे काशीके सहस्र सहस्र साधु इनके वासस्थान पर उपनीत हुये। सहस्राधिक अतिथियों को क्षुधार्त देख शिष्योंका प्राण सूख गया। सकल ही सोचते थे— इतने लोगोंको खिला पिला कैसे विदा करेंगे। परक्षण ही भक्तवत्सल भगवान् कबीररूपसे प्रचुर भोज्य ला सर्वसमय देख पड़े और स्वहस्तसे साधुओंको भोजन करा चल दिये। प्रकाश कर नहीं सकते — साधु कितने परितुष्ट हुये थे। यह गृहको लौट महासमारोह देखकर अत्यन्त विस्मयमें आये। किसी शिष्यको पुकार इन्होंने पूछा था — वत्स ! यह क्या व्यापार है, किस लिये इतने लोग आये हैं। शिष्य आश्चर्य हो कहने लगा— आप क्या कह रहे हैं; आपने जिन सहस्राधिक व्यक्तियों को खिलाया पिलाया, उन्होंने आकर यह महोत्सव मचाया है। कबीर समझ गये — यह सकल हरिकी लीला है। इन्होंने मनोभाव छिपा शिष्यसे कहा था— वत्स ! मैं क्षुधासे अतिशय कातर हो गया हूँ, मुझे साधुओंका प्रसाद ला दी। फिर जो कबीरके नियत अनिष्टकी चेष्टा करते, वह दुर्जन भी महत्त्व के गुणसे वशीभूत होने लगे। जब वह इनके निकट निज निज दोष स्वीकार कर कितनी ही क्षमा मांगते, तब साधु कबीर सकलको आलिङ्गनकर राम नाम पुकारते थे। काशीवासी मात्र इनके गुणके पक्षपाती बन गये। किसी दिन एक रूपवती वेश्याने कबीरके निकट आ <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> कहा था- महामन्! में नृत्यगीतादि नानाप्रकार उपभोग द्वारा आपको सन्तुष्ट करना चाहती हूं । रूपसौन्दर्यशालिनी और नृत्यगीतादि-निपुणा नते- कौको देख यह सहास्य वोत उठे, मैं सुखभोग चोर नृत्यगीत नहीं समझता। फिर में स्त्री और पुरुष दोमें एक भी नहीं। मुझसे आपको मनस्कामना कैसे पूर्ण होगी ।' नर्तकौने अति काकुतिमिति भावमें इनसे प्रार्थना की- मैं घड़ी भाशासे भायी हैं । मुझे क्या हताश हो लौटना पड़ेगा । इन्होंने धीर भावसे उत्तर दिया- देखो! मेरे गृहमें स्वयं भक्तवत्सल हरि विराजते हैं । वह अति रागी और महाभोगी हैं । उनके सामने नाचगा आप अपनी भोगपिपासा मिटा सकती है। नर्तकी महाप्रानन्दित हुयी - मेरा ऐसा सौभाग्य, कि मैं स्वयं भगवान्‌को नृत्यगीत द्वारा रिकांगी । उसी दिनसे वह वेश्या कबीरके गृहमें रह प्रत्यह नाचने गाने लगी। इसी प्रकार कुछ दिन बोते थे । मनही मन वेश्या कबोरको चाहती थी। एक दिन गमीर रजनीको सब लोग सो गये। किन्तु वेश्याको पख न झपकी । कबीरके सम्भोगको लालसा से उसका fee स्थिर हुया था। वह किसी प्रकार भाकास यम कर न सकी और कबीरके सोनेकी जगह मनके आवेग में या पहुंची। उसने गभीर श्रमारजनीको वहां कदोर- के बदले ज्योतिर्मय हरिको मूर्ति देखो थी । फिर उसको कामपिपासा में जाने कहां अन्तर्हित हुई ! चतुसे प्रेमाशुकी धारा वही घी । उसके लिये संसार असार समझ पड़ा। वेश्या उसी श्रमानिशाको एकाको गृह छोड़ निविड़ श्ररस्वकी और चली गयी। इन्होंने प्रत्यष उठ वेश्याको घरमें न देखा। उसके अलंकार वस्त्रादि सकल पड़े थे। कबीर ने भावना लगायी-इतने दिनमें सम्भवतः वेश्याने सद्गति पायो है। इन्होंने शिष्योंको बोलकर कहा- मेरे चलने- का समय आ पहुंचा है। वत्स ! तुम काशीवासि- योंको संवाद दो-मणिकर्णिकाघाट पर सब लोग कबोरसे जाकर मिली । <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> rejznyzpgimsaf9tqxgjxya43qizsia पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३२ 250 101988 668349 367260 2026-07-20T08:05:47Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668349 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''३२'''|'''कबीर'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> शिक्षियों ने चारों ओर गुरु की यात्रा घोषणा की थी। दल-दल लोग आ-आ पुष्पदन्तशिला के तट पर समवेत हुए। सकल ही कबीर की बात सुनने को उत्कण्ठित थे। वह अपने प्रियजनों को उपस्थित देख मिष्ट भाव से कहने लगी— 'मैं पार पार जाऊँगी। मेरे इह-जीवन की लीला समाप्त हो गयी है। भाइयो! मैं असत्य म्लेच्छ के धर्म में जन्म ले कमँमूल में वैष्णव बना हूँ।' इस मिथ्या-धर्मविद् देह को रखने से क्या फल मिलेगा। मगरराज्य में मेरा मोक्ष होगा। कबीर की बात सुन सकल ही हाहाकार करने लगे। इन्होंने मधुर भाषा में देह की अनित्यता देखा सर्वसाधारण को सांत्वना दी। अनन्तर यह सबको साथ ले मणिकर्णिका के पार पार पहुँचे थे। वहाँ जाकर इनका निद्राकर्षण लगा। कबीर भूमि में लेट गये। शिष्यों ने इनके शरीर पर वस्त्राच्छादन किया था। फिर दो घण्टे बीतते भी यह न उठे। इससे सकल का मन शङ्कित हुआ था। शिष्यों में भी कोई साहस कर उनके वस्त्र का आवरण खोल न सका। दो घण्टे अपेक्षा कर सबके मन में विजातीय भाव उदय हुआ था। सबों ने बारम्बार धूर्त्त लगाने को कहा। फिर भक्तया शिष्यों ने गुरु का आवरण वस्त्र खींच लिया। किन्तु वस्त्र के मध्य कबीर का दर्शन मिला न था। सब ने वस्त्र और धरासन पड़ा पाया। इसी प्रकार भक्त कबीर ने परमपद लाभ किया। (महिमाप्रकाश) {{Rule}} * महिमाप्रकाश का जो पुस्तक मिला, उसमें 'नगर' के स्थान में 'संग्रह' शब्द लिखा है। किन्तु 'नगर' ही युक्तिसङ्गत समझा जाता है। इससे यह पाठ गृहीत किया गया। सुना जाता— मृत्यु होने से कबीर के शव देख हिन्दू और मुसलमानों में विवाद उठा था। उसी समय कबीर स्वयं यह बात कह कर अन्तर्हित हुए— 'मेरे शवदेह का आवरण खोलकर देखिये।' अनन्तर खोलने पर शव के स्थान में सबको कुछ फूल देख पड़े। काशी के राजा वीरसिंह ने स्त्री आदि कुल को जलाये थे। फिर फूलों का मध्य काशी के 'कबीर-चौरा' नामक स्थान में समाहित किया गया। उधर पठानराज बिजली खान् चाही हुए गोरखपुर के निकट मगहर नामक प्रान्त में आवरण उठाये थे। उन्होंने वहाँ एक सुन्दर समाधिमठ भी बनवा दिया। उस 'कबीर-चौरा' और 'मगहर समाधिपीठ' कबीर-पन्थियों का प्रधान तीर्थस्थान गिना जाता है। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{outdent|वस्तुतः कौम न मानिए— कबीर एक महत् व्यक्ति रहे। यह कोई जाति क्यों न हों, इनके निकट हिन्दू-मुसलमान दोनों ही समान थे। यह प्रकृत भाव से ब्राह्म और कुरान का प्रतिवाद कर गये हैं। कबीर कहते— 'हिंदुओं के राम और मुसलमानों के रहीम स्वतन्त्र नहीं, धर्मसुभान धरम से हृदय में मिलेंगे। यह विश्व जिनका संसार और पृथ्वी एवं राम जिनके समान ठहरते, उन्हीं को हम पीर समझते हैं।' कबीर जप पूजादि मानते न थे। इसके सम्बन्ध में यह कहा करते— {{block centre|<poem><small> "माला फेरत जुग गयी नहीं न मन का फेर। कर का मनका छोड़ कर मनका मनका फेर॥" </poem></small>}} जापका की माला का गुरिया घर-काति-सरकाति युग बीत गया, किन्तु मन का द्वन्द्व न मिटा। इसी से कहते— 'हाथ की गुरिया छोड़ मन की गुरिया फेरकाया कीजिये। यह जातिभेद भी मानते न थे। इनके वचन में मिलता है— {{block centre|<poem><small> "सबसे मिलिये सबसे मिलिये सबसे मिलिये भाषि। हाँजी हाँजी सबसे मिलिये सबै धर्म अपने राखि॥" </poem></small>}} सबके साथी बनो, सबसे मिलो और सबका नाम ग्रहण करो। फिर सबसे 'हाँजी हाँजी' भी कहो, किन्तु धर्म की स्थान पर रहो। कबीर संसार-काण्ड को देख दुःख से कहते थे— {{block centre|<poem><small> "ब्राह्मण बाभन मूरख भये वेद पड़े गोता। हम ऊपर बद चचा खावे हाथ धरी पछीता॥ मूर्ख की मारे लट्ठ हा लरहु विषाद। गोरख मछेन्द्र की फिरे बैठे सुरा विषाद॥ मतो को ना धोती मिटै यहाँ पड़े थाहा। कहै कबीरा देवी माई दुनियाँ सब तमाशा॥" </poem></small>}} जातिकुल की भाँति इनके समय पर भी कबीरपन्थी गड़बड़ डाला करते हैं। उनके कथनानुसार कबीर ने संवत् १२०५ को टकसार-शास्त्र प्रकाश किया और {{Rule}} {{block centre|<poem><small> नाहि पाणि कुछ कापरा यह होगा दिन चारि। कहै कबीर सुनहु रामानन्द बैठु रहे सक्रतारि॥ जाति हमारी बानिया कुल करता घर माहि। कुटुम्ब हमारे सब को मूरख समझत नाहि॥ </poem></small>}}</noinclude>}} <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 1f4f9cwc0voha9ptu4629n9y3mn4yiu पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३३ 250 101989 668351 367261 2026-07-20T08:14:59Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668351 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''३३'''|'''कबीर—उद्-दीन् कबीरपन्थी'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> संवत् १४०५ को मगहर नगर में इहलोक छोड़ दिया। ऐसा होने से प्रायः १ शतक वर्ष इनका परमायु आता है। यह क्या सम्भव है। किन्तु भक्तिमालाग्रन्थ और कई मुसलमानी इतिहास के ग्रन्थ पढ़ने से हम समझते—कबीर सिकन्दर लोदी के समसामयिक रहे। १५५४ संवत् सिकन्दर ने राज्य पाया था। अतएव सम्भवतः मागशी उस समय कबीर विद्यमान रहे। सिखों के धर्मगुरु नानक ने कबीर का मत अपने ग्रन्थ में उद्धृत किया है। एतद्भिन्न सत्नामियों, साधुओं, श्रीनारायणियों और शून्यवादियों के ग्रन्थों में भी इनका मत मिलता है। इससे समझ पड़ता—उक्त सम्प्रदायग्रन्थों में इनका मत ले साथ-साथ अपना धर्म प्रचार किया है।<small>(अन्यान्य विवरण कबीरपन्थी शब्द में देखो)</small> {{outdent|कबीर-उद्-दीन्—शाह-उद्-दीन इरकी के पुत्र। दिल्ली-वासी बादशाह अला-उद्-दीन के समय यह जीवित रहे। इन्होंने उनके अभिमव पर एक पुस्तक लिखा था।}} {{outdent|कबीरपन्थी—सम्प्रदाय विशेष। इन्होंने महात्मा कबीर का प्रवर्त्तित धर्ममत अवलम्बन किया है। कबीरपन्थी सकल देवताओं की अपेक्षा विष्णु के प्रति अधिक भक्ति दिखाते हैं। रामानन्दी प्रभृति वैष्णव सम्प्रदाय के साथ यह सद्भाव रखते और आचार-व्यवहार में भी मिलते-जुलते हैं। इसी से कितने ही लोग इन्हें वैष्णव कहते हैं। कबीरपन्थी अपरापर वैष्णवों की भाँति तिलक लगाते, नासिका-पर चन्दन वा गोपीचन्दन की रेखा बनाते, कण्ठ में तुलसीमाला लटकाते और हाथ में भी जप की माला घुमाते हैं। किन्तु यह इस तिलकमुद्रा को वृथा बाह्याडम्बर मात्र समझते हैं। वास्तविक इनकी विवेचना में शास्त्रोक्त देवदेवी का पूजन अथवा क्रिया-कलाप का अनुष्ठान प्रयोजनीय नहीं ठहरता। कबीरपन्थियों में प्रधानतः दो दल होते हैं—गृहस्थ और संन्यासी। गृहस्थ सब-सब जातिगत और वर्णगत आचार-व्यवहार अवलम्बन करते हैं। फिर कोई निज धर्म को छोड़ हिन्दुओं के उपास्य देवों को भी पूजता है। संसारत्यागी संन्यासी एकमन नयन के अगोचर केवल कबीरदेव का ही भजन करते हैं। उन्हें <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गुरु के निकट मन्त्र लेना नहीं पड़ता। वह केवल ईश्वर ही को प्रायभर धर्मगान करने को ही उपासना समझते और अपनी इच्छा के अनुसार वेषभूषा रखते हैं। फिर कोई नग्नप्राय होकर भी पथ-पथ घूमता फिरता है। संन्यासियों के महन्त मस्तक पर टोपी लगाते हैं। उक्त दोनों दल प्रायः १२ शाखा में विभक्त हैं। इन १२ शाखाप्रवर्त्तकों के नाम नीचे लिखते हैं,— (१) श्रुत गोपालदास—सुखनिधान के प्रणेता रहे। इनके शिष्य-परम्परा से द्वारका के अखाड़े, वाराणसी के कबीर-चौरा, मगहर के समाधि और जगन्नाथ के अखाड़े पर अधिकार रखते हैं। (२) भगोदास—बीजक के रचयिता थे। इनके अनुयायी मिथिला-प्रन्थि धनौती नामक स्थान में रहते हैं। (३) नारायण दास और (४) चूड़ामणि दास—धर्मदास नामक वणिक् के पुत्र तथा गृहस्थ रहे। इसी से सब लोग इन्हें 'वंशगुरु' की भाँति सम्बोधन करते थे। आजकल चूड़ामणिका वंश समाज-भ्रष्ट और नारायण का वंश नष्ट हो गया है। (५) जीवनदास—सत्नामी सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक थे। (सत्नामी देखो) (६) जगूदास की गद्दी कटक में है। (७) कमाल को लोग कबीर का पुत्र बताते हैं। किन्तु इस पर पर कोई विशेष प्रमाण नहीं मिलता। यह विरक्त रहते थे। इनके मतावलम्बी योगाभ्यासी होते हैं। (८) टकसाली—वरदावासी थे। (९) ज्ञानी—सहसराम के निकट सभनी ग्राम में रहते थे। (१०) साहबदास—कटकनिवासी और मूलपन्थी नामक सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक थे। {{Right|<Small>(मूलपन्थी देखो)</small>}} (११) नित्यानन्द और (१२) कमलानन्द—दक्षिणवासवासी थे। सिवा इनके दान-कबीरी, मंगरेल-कबीरी, हंस-कबीरी प्रभृति दूसरी शाखा भी विद्यमान हैं। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> a3uypjxlm5njljmu0coz7xzx2g6d1n0 668352 668351 2026-07-20T08:15:49Z Sweta rani Gupta 6713 668352 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude>{{rh|'''३३'''|'''कबीर—उद्-दीन् कबीरपन्थी '''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> संवत् १४०५ को मगहर नगर में इहलोक छोड़ दिया। ऐसा होने से प्रायः १ शतक वर्ष इनका परमायु आता है। यह क्या सम्भव है। किन्तु भक्तिमालाग्रन्थ और कई मुसलमानी इतिहास के ग्रन्थ पढ़ने से हम समझते—कबीर सिकन्दर लोदी के समसामयिक रहे। १५५४ संवत् सिकन्दर ने राज्य पाया था। अतएव सम्भवतः मागशी उस समय कबीर विद्यमान रहे। सिखों के धर्मगुरु नानक ने कबीर का मत अपने ग्रन्थ में उद्धृत किया है। एतद्भिन्न सत्नामियों, साधुओं, श्रीनारायणियों और शून्यवादियों के ग्रन्थों में भी इनका मत मिलता है। इससे समझ पड़ता—उक्त सम्प्रदायग्रन्थों में इनका मत ले साथ-साथ अपना धर्म प्रचार किया है।<small>(अन्यान्य विवरण कबीरपन्थी शब्द में देखो)</small> {{outdent|कबीर-उद्-दीन्—शाह-उद्-दीन इरकी के पुत्र। दिल्ली-वासी बादशाह अला-उद्-दीन के समय यह जीवित रहे। इन्होंने उनके अभिमव पर एक पुस्तक लिखा था।}} {{outdent|कबीरपन्थी—सम्प्रदाय विशेष। इन्होंने महात्मा कबीर का प्रवर्त्तित धर्ममत अवलम्बन किया है। कबीरपन्थी सकल देवताओं की अपेक्षा विष्णु के प्रति अधिक भक्ति दिखाते हैं। रामानन्दी प्रभृति वैष्णव सम्प्रदाय के साथ यह सद्भाव रखते और आचार-व्यवहार में भी मिलते-जुलते हैं। इसी से कितने ही लोग इन्हें वैष्णव कहते हैं। कबीरपन्थी अपरापर वैष्णवों की भाँति तिलक लगाते, नासिका-पर चन्दन वा गोपीचन्दन की रेखा बनाते, कण्ठ में तुलसीमाला लटकाते और हाथ में भी जप की माला घुमाते हैं। किन्तु यह इस तिलकमुद्रा को वृथा बाह्याडम्बर मात्र समझते हैं। वास्तविक इनकी विवेचना में शास्त्रोक्त देवदेवी का पूजन अथवा क्रिया-कलाप का अनुष्ठान प्रयोजनीय नहीं ठहरता। कबीरपन्थियों में प्रधानतः दो दल होते हैं—गृहस्थ और संन्यासी। गृहस्थ सब-सब जातिगत और वर्णगत आचार-व्यवहार अवलम्बन करते हैं। फिर कोई निज धर्म को छोड़ हिन्दुओं के उपास्य देवों को भी पूजता है। संसारत्यागी संन्यासी एकमन नयन के अगोचर केवल कबीरदेव का ही भजन करते हैं। उन्हें <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> गुरु के निकट मन्त्र लेना नहीं पड़ता। वह केवल ईश्वर ही को प्रायभर धर्मगान करने को ही उपासना समझते और अपनी इच्छा के अनुसार वेषभूषा रखते हैं। फिर कोई नग्नप्राय होकर भी पथ-पथ घूमता फिरता है। संन्यासियों के महन्त मस्तक पर टोपी लगाते हैं। उक्त दोनों दल प्रायः १२ शाखा में विभक्त हैं। इन १२ शाखाप्रवर्त्तकों के नाम नीचे लिखते हैं,— (१) श्रुत गोपालदास—सुखनिधान के प्रणेता रहे। इनके शिष्य-परम्परा से द्वारका के अखाड़े, वाराणसी के कबीर-चौरा, मगहर के समाधि और जगन्नाथ के अखाड़े पर अधिकार रखते हैं। (२) भगोदास—बीजक के रचयिता थे। इनके अनुयायी मिथिला-प्रन्थि धनौती नामक स्थान में रहते हैं। (३) नारायण दास और (४) चूड़ामणि दास—धर्मदास नामक वणिक् के पुत्र तथा गृहस्थ रहे। इसी से सब लोग इन्हें 'वंशगुरु' की भाँति सम्बोधन करते थे। आजकल चूड़ामणिका वंश समाज-भ्रष्ट और नारायण का वंश नष्ट हो गया है। (५) जीवनदास—सत्नामी सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक थे। (सत्नामी देखो) (६) जगूदास की गद्दी कटक में है। (७) कमाल को लोग कबीर का पुत्र बताते हैं। किन्तु इस पर पर कोई विशेष प्रमाण नहीं मिलता। यह विरक्त रहते थे। इनके मतावलम्बी योगाभ्यासी होते हैं। (८) टकसाली—वरदावासी थे। (९) ज्ञानी—सहसराम के निकट सभनी ग्राम में रहते थे। (१०) साहबदास—कटकनिवासी और मूलपन्थी नामक सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक थे। {{Right|<Small>(मूलपन्थी देखो)</small>}} (११) नित्यानन्द और (१२) कमलानन्द—दक्षिणवासवासी थे। सिवा इनके दान-कबीरी, मंगरेल-कबीरी, हंस-कबीरी प्रभृति दूसरी शाखा भी विद्यमान हैं। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> gjl23svj2ld1fgjtvao4r1pj64uy2g4 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/३४ 250 101990 668355 367262 2026-07-20T08:23:11Z Sweta rani Gupta 6713 /* शोधित */ 668355 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Sweta rani Gupta" /></noinclude> {{rh|'''३४'''|'''कबीरपन्थी'''}} <noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}}</noinclude> यह पूर्वोक्त स्थानों में वाराणसी के 'कबीरचौरा' को ही सर्वप्रधान तीर्थ समझते हैं। कबीरपन्थियों का प्रकृत धर्ममत समझने में मालूम नहीं पड़ता। किन्तु सम्प्रदाय का ग्रन्थ पढ़ने से अनेक अंश में माना गया—हिन्दूधर्म से ही यह मत निकला है। कबीरपन्थी एकमात्र अपने मत को छोड़ अपरापर सकल धर्म दूषित बताते हैं। इनके मत में कबीरप्रवर्त्तित धर्म व्यतीत दूसरे सकल सम्प्रदाय भ्रमपूर्ण हैं। कबीरपन्थी एक ईश्वर को मानते हैं। वह साकार और सगुण है। उसके पाञ्चभौतिक शरीर और त्रिगुण-विशिष्ट अन्तःकरण विद्यमान हैं। वह सर्वशक्तिमान् एवं सर्वदोष-विवर्जित रहता और स्वेच्छानुसार सर्वप्रकार आकार बना सकता, किन्तु अपरापर सकल विषय में मनुष्य से पार्थक्य नहीं पड़ता। यह अपने सम्प्रदाय के साधुओं को ईश्वरानुरूप बताते, जो परलोक में उसके समान रह एकत्र परम सुख पाते हैं। ईश्वर आवरणहीन और नित्यस्वरूप है। बीज में वृक्ष के शाखापल्लव की भाँति सकल वस्तु व्यक्त होने से पूर्व ईश्वर के शरीर में अव्यक्ताभाव से अन्तर्निविष्ट रहते हैं। फिर इनके कथनानुसार परमपुरुष परमेश्वर ने प्रलयान्त की ७२ युग पर्यन्त एकाकी रह विश्वसृष्टि की इच्छा की थी। अवश्यमेव उसकी इच्छा ने एक स्त्रीमूर्ति बनायी। उसी स्त्री का नाम माया है। माया आद्याशक्ति वा प्रकृति कहाती है। परमेश्वर ने माया के साथ सम्भोग किया था। उससे ब्रह्मा, विष्णु और शिव की उत्पत्ति हुई। फिर परमपुरुष छिप गये। क्रमशः माया अपने पुत्रों के निकट पहुँचने लगी। उन्होंने उसका परिचय पूछा था। माया ने उत्तर में कहा—'मैं निराकार, अगोचर और आदिपुरुष की सहचारिणी हूँ। इस समय तुम्हारी सहचर्या के लिये आयी हूँ।' किन्तु ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने सहसा उसकी बात मानी न थी। विशेषतः विष्णु ऐसे वैसे व्यक्ति न रहे, माया से कठिन प्रश्न करने लगे। फिर अत्यन्त क्रुद्ध हो माया अपने पुत्रों को डराने के लिये दुर्गामूर्ति में आविर्भूत हुई। उस महाभयङ्करी मूर्ति को देख <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर बहुत डरे और आत्मविस्मृत हो माया की मनोवाञ्छा पूर्ण करते गये। इससे तीन कन्या हुईं—सरस्वती, लक्ष्मी और उमा। माया ब्रह्मादिक के साथ तीनों कन्याओं का विवाह कर ज्वालामुखी प्रदेश में रहने लगी। उसने उक्त वृक्षों पर विश्व बनाने और नानाविध भ्रमात्मक ज्ञान एवं धर्ममूलक क्रियाकाण्ड चलाने का भार डाल दिया था। ब्रह्मादि सकल माया के अधीन हैं। इससे उनका पूजनादि करने की विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल कबीर के स्वरूपज्ञान का लाभ करना ही सर्वधर्म का मूल अभिप्राय है। फिर भी सकल देवता और उपासक उस दुर्लभ ज्ञान को पा नहीं सकते। सकल जीवों का आत्मा समान है। वह पापमुक्त होने से मनमाना रूप परिग्रह कर सकता है। जीवात्मा जब तक पाप से नहीं छूटता, तब तक नाना योनि घूमता है। उल्कापात होने से वह किसी ग्रह के शरीर में प्रवेश करता है। स्वर्ग और नरक—उभय माया के कार्य हैं। वास्तविक स्वर्ग और नरक कहीं नहीं होता। पृथिवी का सुख ही स्वर्ग और पृथिवी का दुःख ही नरक है। कबीरपन्थी संसार के त्याग को ही सत् परमार्थ बताते हैं। कारण—संसार में रहते माया, भय, लोभ प्रभृति द्वारा चित्त की शुद्धि नहीं होती। सुतरां शान्ति के लाभ में भी नाना विघ्न पड़ते हैं। गुरु की भक्ति ही प्रधान धर्म है। दोष करने पर गुरु शिष्य को भर्त्सना कर सकता, किन्तु दण्ड देने का अधिकार नहीं रखता। कबीर देखो। संयुक्तप्रदेश और मध्यभारत में अनेक कबीरपन्थी रहते हैं। इनमें कोई विषयी और कोई धर्मव्रतावल्लम्बी है। यह अत्यन्त सत्यप्रिय, उपद्रवशून्य और सुशील होते हैं। इनके उदासीन अपरापर संन्यासियों की भाँति न तो दुरन्त स्वभाव रखते और न भिक्षा माँगते ही फिरते हैं। काशीधाम में कबीरचौरा नामक स्थान पर अनेक कबीरपन्थी पहुँच वास करते हैं। पूर्व काशीराज बलवन्तसिंह ने इनके आहारादि की वृत्ति बाँध दी थी। <noinclude>{{Multicol-end}}</noinclude><noinclude></noinclude> 2fxawhvof1dz2xzvqzecvy3ho90gj6x पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२६२ 250 105326 668278 668203 2026-07-19T18:07:58Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 668278 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh||कष्टहरण पर्वत-कसनौ|२६३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} दुःखजनक स्थान, खराब जगह, तकलीफ़ देनेवाला मुकाम। कष्टहरण पर्वत—बिहार प्रान्तके मुड्गेर ज़िले का एक पाहाड़। {{outdent|कष्टहरणी (सं॰ स्त्री॰) कीकटदेशकी एक नदी। <small>(भविष्य ब्रह्मखण्ड २१।४०)</small> २ अङ्ग देशमें देवीकर्णके निकट प्रतिष्ठित देवीकी एक मूर्ति। (देशावलौ ४४।२।६) यह मुङ्गेरके निकट वर्तमान थी।}} {{outdent|कष्टागत ((सं॰ त्रि॰) कष्टसे आया हुवा, जो मुश्किलसे पहुँचा हो।}} {{outdent|कष्टि (सं॰ स्त्री॰) कष्ट भावे क्ति। १ परीक्षा, जांच, कसायी। अधिष्ठारणे क्ति। २ स्पर्शमणि, कसौटी, कसनेका पत्थर। ३ पीड़ा, दर्द, बीमारी।}} {{outdent|कष्टी (हिं॰ स्त्री॰) प्रसवका कष्ट उठानेवाली।}} {{outdent|कष्टीर (सं॰ क्ली॰) रङ्ग, रांगा।}} {{outdent|कस (सं॰ पु॰) कसति विकसित स्वर्णादिरत्र, कस-अच्। १ स्वर्णमणि, कसौटी, सोना-चांदी कसनेका पत्थर। कस (हिं॰ पु॰) १ खड़्गका स्थितिस्थापकत्व, तलवारकी लचक। इससे तलवारकी तेज़ी पहचानी जाती है। २ शक्ति, ताक़त। वश, क़ाबू। कुश्तीका एक पेंच, यह 'कसकी गोदी' कहलाता है। ३ अवरोध, रोक। ४ कषाय, अर्क। ५ सार, निचोड़। (स्त्री॰) ६ बन्धनरज्ज, कसनेकी रस्सी। (क्रि॰ वि॰) ७ किस प्रकार, कैसे। कसई, <small>कसौ देखो।</small>}} {{outdent|कसक (हिं॰ स्त्री॰) १ पीड़ा विशेष, एक दर्द। २ कोई आघात आने और अच्छा हो जानेसे यह धीरे धीरे उठा करती है। ३ कसलकी चमक। ४ पुरातन बैर, पुरानी दुश्मनी। ५ सहानुभूति, हमदर्दी। ६ अभिलाष, हौसला।}} {{outdent|कसकना (हिं॰ क्रि॰) १ पीड़ा करना, दुखना, चमकना, रच रचके दर्द उठना। २ अप्रिय लगना, बुरा मालूम पड़ना।}} {{outdent|कसका (सं॰ स्त्री॰) कासमर्द, कसौंदी।}} {{outdent|कसकुट (हिं॰ पु॰) मिश्रधातु विशेष, एक मिलावटी फल्ज़। इसमें तांबा और जस्ता बराबर बराबर पड़ता है। कसकुटसे लोटे, कटोरे, आवखोरे वगैर:}} {{Multicol-break}} बरतन बनते हैं। किन्तु इसके पात्रमें अम्ल द्रव्य रखनेसे बिगड़कर विषाक्त हो जाता है। कसकटका दूसरा नाम भरत है। {{outdent|कसगर (हिं॰ पु॰) जाति विशेष, कासागर कौम। यह मुसलमान होते हैं। इनका काम मट्ठीके छोटे छोटे बर्तन बनाना है।}} {{outdent|कसन (सं॰ पु॰) कसति हिनस्ति, कस-ल्यु। १ कस, कास, खांसी। २ वेदना विशेष, एक दर्द।}} {{outdent|कसन (हिं॰ स्त्री॰) १ बन्धन, बंधाई, कसाई। २ बन्धनकी रीति, कसनेका तरीका। ३ बन्धनरज्जु, कसनेकी रस्सी। वधी, तङ्ग, पट्टी।}} {{outdent|कसनई (हिं॰ स्त्री॰) पक्षि विशेष, एक चिड़िया। इसका पृष्ठ कृष्णवर्ण, वक्षःस्थल एवं पृष्ठदेश पाटल और चञ्चु रक्तवर्ण होता है।}} {{outdent|कसनमर्दन (सं॰ पु॰) कासमर्दवृक्ष, कसौंदीका पेड़।}} {{outdent|कसमा (सं॰ स्त्री॰) क्वच्छसाध्य लूता विशेष, एक जहरीली मकड़ी। <small>जूता देखो।</small>}} {{outdent|कसना (हिं॰ क्रि॰) १ बन्धन करते समय रज्जु आदि दृढ़तापूर्वक खींचना, जोरसे तानना, जकड़ना। २ निष्कर्ष लगाना, दबाना। ३ बन्धन करना, बैठना, ठिकाने पहुँचाना। ५ सज्जित करना, (हाथी-घोड़ा) सजाना। ६ भरना, ठूंसना। ७ खींचना, तनना। ८ तल्ल पड़ना, कड़ा रहना। ९ दबना, फुटना। १० प्रस्तुत या तैयार होना। ११ भर जाना। १२ घिसना, रगड़ना। १३ परीक्षा करना, परखना। १४ औटना, गढ़ियाना। १५ लचाना, नवना। १६ परिपाक करना, तलना। १७ कष्ट देना, तकलीफ पहुँचाना। (पु॰) १८ बन्धन, बंधना। १९ ग़िलाफ़, खोल। २० कृमि विशेष, एक जहरीला कीड़ा।}} {{outdent|कसनि (हिं॰ स्त्री॰) बन्धन, बंधाई, खींच।}} {{outdent|कसनी (हिं॰ स्त्री॰) १ रज्जु, रस्सी। २ गिलाफ़, खोल। ३ कञ्चुकी, चोली। ४ स्वर्णमणि, कसौटी। ५ परीक्षा, जांच। ६ हथौड़ी। ७ काषायकल्प, कसावका चढ़ाव।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> a56fiulok43g7y3e6q2v1o126de5hfb पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/२६३ 250 105331 668281 371965 2026-07-19T18:10:46Z रेखा साव 5914 /* शोधित */ 668281 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="रेखा साव" />{{rh|२६४|कसनोत्पाटन-कसाम्बु}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} {{outdent|कसनोत्पाटन (सं॰ पु॰) कसनं कासरोगं उत्पाटयति, कसन-उत्-पट-णिच्-ल्युट्। वासक वृक्ष, अड़सेका पेड़।}} {{outdent|कसयत (हिं॰ पु॰) १ अम्बुप्रसाद-भेद, काला कूट्। २ शम्बुप्रसाद वृक्ष, कूटका पेड़।}} {{outdent|कसब (अ॰ पु॰) १ वाणिज्य, तिजारत, कामकाज। २ परिश्रम, मेहनत। ३ व्यवसाय, पेशा। ४ अभिचार, छिनाला।}} {{outdent|कसबल (हिं॰ पु॰) १ पराक्रम, ज़ोर, ताक़त। २ साहस, हिम्मत।}} {{outdent|कसबा (अ॰ पु॰) महाग्राम, बड़ा गांव। यह शहरसे छोटा और गांवले बड़ा होता है।}} {{outdent|कसवीती (हिं॰ वि॰) महाग्राम सम्बन्धीय, बड़े गांववाला।}} {{outdent|कसबिन (हिं॰ स्त्री॰) १ वेश्या, रण्ड़ी, देहाती पतुरिया। २ व्यभिचारिणी, छिनाल।}} {{outdent|कसबी, <small>कसबिन देखो।</small>}} {{outdent|क़सम (अ॰ स्त्री॰) शपथ, किरिया, सौगन्द।}} {{outdent|कसमसाना (हिं॰ क्रि॰) १ हिलना डुलना, उसकना, आराम न मिलना। २ ऊब उठना, घबरा जाना। ३ हिचकना, हिम्मत न पड़ना।}} {{outdent|कसमसाहट (हिं॰ स्त्री॰) उकताया, घबराहट।}} {{outdent|कसमसी (हिं॰ स्त्री॰) कसमसाहट, कुलबुलाहट।}} {{outdent|कसर (सं॰ स्त्री॰) १ त्रुटि, कमी। २ वैर, दुश्मनी। ३ हानि, नुकसान, घटी। ४ दोष, ऐव।}} {{outdent|कसर (हिं॰ पु॰) वृक्षविशेष, कुसुमका पौदा।}} {{outdent|कसरत (अ॰ स्त्री॰) १ व्यायाम, मेहनत। २ अधिकता, बहुतायत, बढ़ती।}} {{outdent|कसरती (हिं॰ त्रि॰) परिश्रमी, मेहनती, कसरत करनेवाला।}} {{outdent|कसरवानी, विहारके बनियोंकी एक शाखा। कसरवानी बनिये ९६ श्रेणियोंमें विभक्त हैं। उनमें प्रधान यह है,—सरीला, बरीला, कथौतिया, आबकहेला, चालाबिया, चौसवार, मालहाटिया, लौंगभराझरी, सोनचड़ा, पेकदांड़ी, सोनाल, तारसी और तिरसिया।}} यह अपनी अपनी श्रेणी या पांच पीढ़ीके सम्बन्धमें विवाह करते हैं। इनमें वाल्यविवाह प्रचलित है। {{Multicol-break}} पुरुष बहु विवाह भी कर सकते हैं। विधवाविवाहमें यह कोई दोष नहीं देखते। कसरवानो प्रायः वैष्णव होते हैं। विष्णु व्यतीत ग्रामदेवता 'बन्नो' और 'सूखा शम्भूनाथ' की भी पूजा की जाती है। अधिकांश दुकानदारीका काम चलाते हैं। कुछ लोग खेतीमें भी लगे हैं। तेली या मुसलमानके हाथ यह कभी गाथ नहीं बेचते। {{outdent|कसरहट्टा (हिं॰ पु॰) हट्टविशेष, कसेरोंका बाजार। इसमें पात्र बना और बिका करते हैं।}} {{outdent|कसर्णीर (वै॰ पु॰) सर्पविशेष, एक सांप।}} {{right|<small>(अथर्वसंहिता १०।४।५)</small>}} {{outdent|कसली (हिं॰ स्त्री॰) खनिज भेद, किसी किस्मका फावड़ा। यह शुद्ध और सूक्ष्माअविशिष्ट होती है।}} {{outdent|कसवाना (हिं॰ स्त्री॰) कसाना, कसनेका काम दूसरसे कराना।}} {{outdent|कसधार (हिं॰ पु॰) इक्षुभेद, किसी किस्मकी ऊख। यह प्रायः डेढ़ इंञ्च सान्द्र (मोटा) होता है। त्वक्- धूसरवर्ण और कठोर निकलती है। सारभागमें रस भरा रहता और तन्तु कम पड़ता है।}} {{outdent|कसडंड (हिं॰ पु॰) कांस्यपात्रका छिन्न भिन्न अंश, कांसेके टूटे-फूटे बरतनोका हिस्सा।}} {{outdent|कसदंडा (हिं॰ पु॰) कांश्य वा पित्तल पात्रभेद, कांसे या पीतलका एक बरतन। यह प्रशस्त होता है। उत्सवादिके समय कसदंडेमें पानी भरकर रखा जाता है।}} {{outdent|कसदंडी (हिं॰ स्त्री॰) <samll>कसदंडा देखो।</small>}} {{outdent|कसा (सं॰ स्त्री॰) कसति ताड़यति, कष-अच्-टाप्। अश्वादि ताड़िनी, चाबुक, कीड़ा।}} {{outdent|कसाई (हिं॰ पु॰) १ घातक, मारनेवाला। २ गोघातक, कस्साब, बूचड़। (वि॰) ३ निर्दय, बेदर्द।}} {{outdent|कसाना (हिं॰ क्लि॰) १ कषायरसविशिष्ट होना, कसेलापन आना, बिगड़ जाना। २ कषायित लगना, कसैला मालुम पड़ना। ३ कसवाना, सजवाना।}} {{outdent|कसाम्बु (सं॰ क्ली॰) पितृलोकको कव्यदानके समय दिया जानेवाला जल।}} {{Multicol-end}}<noinclude></noinclude> mlnene5fv7ukz5q47pylivp8mj2rzpv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६५ 250 106359 668322 373223 2026-07-20T03:41:22Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668322 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप|४६६}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} अनन्तर पोयाडं फिजपट्रिक एवं वेष्टलेण्ड और उनके बाद क्विनटन साहब चौफ कमिशनर बने थे। उनके मणिपुरमें मारे जाने पर भोयार्ड साहबको चौफ कमिशनरका यद मिला। १८३५ ई.को सर्वप्रथम कामरूप ( प्रासाम )में अंगरेजी विद्यालय खुला था। १८१०ई०को कोच. विहारके कमिशनर राबर्टसनने विचारसंक्रान्त कई देशीय अवहारसिद्ध नियम लगा दिये । उक्त निय. माँको 'भासामको कायदेवन्दी' कहते हैं। १८१८ ई. की आसाममें एक दल ईसाई मिशनरीने प्रवेश किया। उसने प्रथम जयपुर फिर शिवसागर में गिरना-घर बनाया था। १८४६ईको ईसाइयों ने प्रासामी भाषामें "अरुणोदय" नामक एक मासिक पंत्र निकाला। १८४३ई०को दासत्वप्रथा रोकनेको कानन बना था। उसी वर्ष पासामकी प्रसिह "चाय" कम्पनी भी गठित हुई। १७६३६० को आसाममें प्रथम पहिफेनकी खेती की गई थी। अन्तमें १८३ ईको गवरनमेण्टको पोरसे साधारणके लिये वह बन्द हुई। कामरूपमें ब्राह्मणों के मध्य सतलोत सर्व श्रेष्ठ है। यहां बम्लालियोंकी कोलीन्यप्रथा नहीं चलती। मिधि सावासी ब्राह्मणों की संख्या अधिक है। देवा यहां विशेष सम्मानके पात्र हैं। ब्राह्मण कायस्थ अपने हाधसे इन नहीं चलाते। कायस्थॉमें भूयांवोंके छह घर विशेष विख्यात हैं। कलिता कृषिप्रधान लोग है। वह नात्य में श्रेष्ठ होवे भी इसवाइनके दोषसे पसित हैं। केवट आदिम जाति हैं। वह भी कषक होते हैं। केवट कैवर्ती ( मस्यजीवियों )के अन्तर्गत हैं। उनको छोड़ कोच, मेच, लालुग, नट, नापित, पटवा, कुंभार, कलवार, धोबी, डोम प्रभृति भी रहते हैं। पहले हिन्दू धर्म पीछे दौडधर्म यहां प्रवल रहा। .समन भारतमें बौड प्रभाव नष्ट करते गहराचार्यक संस्कारका प्रभाव कामरूप पर भी पड़ा था। देवेश्वर नामक शूद्र राना ही उसका मूल । दूसरे प्रदेशोंको भांति बौधर्म शीघ्र कामरूपसे दूर न हुवा। ई० ११२ शताब्द भी यहां उसका प्रावस्या रहा। आज भी <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> हाजोके हयग्रीवको मूर्ति को बहुतसे सोग बुदेवका प्रतिमूर्ति मानते हैं। योगिनो तन्त्रमें भी कामरूप- वाती बुद्धमूर्तिको कथा लिखो है। पीछे शहरदेव पौर माधवदेव नामक दो व्यक्तियोंने वेष्णवधर्म प्रचार किया। बारह भूयांवोंसे चण्डीवर शिरोमणिके वंशमें कुसु- म्बर थिरोमपि भूयांके एक पुत्र हुषा था । उसका नाम शहर भूया शिरामपि वा शोधहरदेव था। उन्होंने वयःप्राप्त हो नाना तौ_दि दर्शन कर कन्दली नामक किसी व्यक्तिसे संस्कृत भाषा पढ़ी। संस्क त सोख कर शहरदेवने भागवतसे "कीर्तन दशम नामक पुस्तकका अनुवाद और सङ्कलन किया था। (गहरदेव देखो) शङ्कर वैष्णव ही स्वदेशमें वैष्णवधर्म फैलाने लगे। उन्होंने देशीय भाषाम नानाविध अन्य पौर सङ्गीत बना धर्मप्रचारको सुविधा तथा भाषाको श्रीहरि की। उससे कामरूपमें पौराणिक इतिवृत्तके अभिनयादि (खेल) चल पड़े। वाण्डका नामक स्थानवाले दोघल- गिरिक पुत्र माधवशाहरने शिष्य हो गुरुको वैष्णवधर्मके प्रचारमें यथेष्ट साहाय्य किया था। प्रहोमलोग उन्हीं के उपदेशसे वैष्णव हुये। किन्तु उससे पूर्व प्रहोमोने वैष्णवधर्मके प्रचारसे विरत हो शङ्करदेवके जामाता इरिको अति. सामान्य अपराध पर प्राणदण्ड दिया और माधवदेवको बांध लिया था। : भकर उसी सूत्रसे पहीमका अधिकार छोड़ पाटवाउसी नामक स्थानमें जा कर रहे और माधव किसी उपायमे बच उनके साथ मिल गये। गालों और पनाचा- रियों ने कई वार राजा नरनारायणक पास उनके विरुद्ध अभियोग पहुंचाया, किन्तु कोई फल न पाया था। दिन दिन बहुतसे लोगोंने वैष्णवधर्म ग्रहण किया। उसके पीछे राजाको पास्या पानसे कोचविहारमें भी उक्त धर्म प्रचारित हुवा। १e. शकको शहर- देवने वर्गलाभ किया। प्राज भी कामरूप अनसमें वह चैतन्यदेवकी भांति अवतार माने और बखाने आते हैं। शहरदेवके पौछ .माधवदेवने उनके धर्म को जगा रखा था। माधवदेव "महापुरषगुर" नाम से विस्थात<noinclude></noinclude> 6mqrty1o9rppdl5a2jo3sisq1zb02kv पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६६ 250 106360 668320 373224 2026-07-20T03:30:55Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668320 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप:|४६०}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} हैं। उनके मसमें पूजादि आवश्यक नहीं; एकमात्र हरिनामकीर्तनसे की सकल कामनायें सिर हो सकती हैं। इससे सर्वत्र सहीर्तन करने के लिये सत्र वा धर्मा सय वर्तमान हैं। उन सबों में अधिकारी और महन्त -रहते हैं। उल सकल सोंमें माधवदेव प्रतिष्ठित बड़पटाका सत्र ही प्रधान है। महन्त बङ्गालके गुरुव्यवसायी गोस्वामियाँको भांति शिष्यांके प्रदत्त अर्थसे जीविका चलाते हैं। उस प्रकार प्रथे न देनेसे शिष्य समाजच्युत होते हैं। माधवके पीछे बहुतसे नाधणोंने वैष्णव बन धर्मप्रचार किया था। उन्होंने माधवके धर्मसे कुछ मित्र भावमें वैष्णवधर्म चलाया, जिससे उनका "बामुनिया" और माधवका मत "महापुरुषीय" कहलाता है। महापुरुषों में भी एक "ठकुरिया" शाखा होती है। शहर के माधव प्रादि शिष्योंने अनेकानेक ग्रन्य और सङ्गीतादिकी रचना की। वैष्णव पौराणिक क्रियाकलाप पर इतने पास्थावान् नहीं होते। वैष्णव व्यतीत कामरूपमें तान्त्रिक मत भी प्रचलित है। परीतिया वा पूर्णसेवाके नामसे उक्त देशमें पानकल एक मत चल पड़ा है। उक्त सम्पदायी जातिभेद नहीं मानते। उनमें सकल जातीय लोग एकत्र मद्यमांसादि खाते पीते हैं। । उक्त सम्पदायको उपासनामें भक्तिमाता नाम्री किसी स्त्रीका प्रयोजन पड़ता है। वह सबकी पूज्य होती है। पूर्णसेवाचारी अपने धर्मको पूर्णरूपमें शङ्करदेवके प्रचारित धर्मसे मिलता जुलता बताते हैं। शिन्तु वह वामाचारी और 'वैषणव मतके मिश्रणसे बना है। कामरूपके मुसलमान सुबी मसांवलम्बी हैं। देहाती मुसलमान विषहरी प्रभृति हिन्दू देवतावोंकी पूजा करते हैं। हाजी नामक स्थानमें "पोवा मका" नामक एक मुसलमानोंका तीर्थस्थान है। बौदाचारी लोग अब कामरूपमें देख नहीं पड़ते। किन्तु जैन. धर्मक माननेवाले लोग अब भी वर्तमान हैं। पलाश बाड़ी, डिब्रूगढ़-पादि स्थानों में इनकी संख्या काफी है। वहां जैनमन्दिर मी हैं। जैनगण प्राय व्यापार करते है। छोटे छोटे बहससे गांवो में भी उन लोगोंकी दुकाने हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> {{Gap}} आज कत नाना धौके लोग पासाममें वर्तमान हैं। ब्राह्मणादि वर्गक मध्य कन्याको कुमारीकानमें वर ढूंढ कर विवाह करनेका नियम है। जातियों में उक्त नियम नहीं मिलता। ब्राह्मणों में विधवाविवाह प्रचलित नहीं, अन्य जातियों में होता है। गन्धर्व विवाहको भांति एकप्रकार विवाह शूद्रादिके मध्य चलता है। कोई प्राप्तवयस्का विधवा अपने मातापिता वा अभिभावकको सम्मतिसे स्वीय समाजमें किसी व्यक्तिके साथ आहारादि और सहवास कर सकती है। उक्त स्त्रीके गर्भसे उत्पत्र सन्सानादि विवाहिताके गर्भजात सन्तानों की भांति पितामाताके धनाधिकारी पौर समाजमें गण्य होते हैं। किसी किसी स्थति में वैसे दम्पतीको सधवा धान्यदूर्वास प्राशीर्वाद करती हैं। एक प्रकारक स्वयम्बरको प्रथा भी देख पड़ती है। कोई पुरुष वा स्त्री इच्छानुसार किसी स्त्री वा पुरुषके घरमें स्वामीस्त्री- रूपसे रह सकती है। सकल व्यवहारसे समाजमें कोई दोष नहीं लगता। हिन्दूधर्मके मतसे लिनका विवाद हो जाता है, उनमें स्वामीको छोड़ पत्यन्तर ग्रहण करनेका मार्ग नहीं दिखाता। किन्तु उक्त पन्च प्रघावोंके अनुसार वैसा होता है। काम- रूपके लोगों के मतमें शरीरको शुद्धि करनेके लिये हो विवाह पावश्यक है। इसी कारण विवाहके सम्बन्धमें उनका वैसा दृढ़ नियम नहीं। किसी किसी स्थलमें विधवा का विवाह अस्थिकी शुहिके लिये किसी पुस्तक, शिमाखण्ड वा कदलीहक्षसे किया जाता है। कहीं दूसरे किसौ पुरुषके साथ वैसे ही पस्थिशद्धि का विवाह होता है। अन्तमें उसे कुछ दक्षिणा देकर विदा करते हैं। "फिर स्त्री पुरुषान्तर ग्रहण करती है। कामरूपवासियों में भागन्तुकको प्रासन देनेका नियम नहीं। सब लोग स्वमण करते समय अपना अपना भासन, तासका रन्धनपान और घट साथ रखते हैं। वह लोग धर्मके अनुसार पशुपक्षी. और मत्सर पाहार करते हैं। दूसरेका क्या ज्ञातिका अब भी ले लिया जाता है। किसी किसी स्थल पर प्राममें एकही स्त्री रहती है। फिर उसके हाथका इन्धन<noinclude></noinclude> ofyqom7xqw3c1yj69iuzhqncufhrkpm पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६७ 250 106361 668325 373225 2026-07-20T03:53:50Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668325 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामरूप- -कामल|४६८}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} सब लोग खाते हैं। उत्सवादिमें उसोको भोजन बनाना पड़ता है। अन्य स्थल पर बोका और मुलायम दो प्रकारका चावल जलमें भिगा दधि, गुड़, कदली प्रभृति मिना साधारणतः निमन्त्रणादिमे खाया जाता पान खानकी चाल बहुत है। चैत्र, पाखिन और पौषको संक्रान्ति कामरूपियोंके प्रधान उत्सवका दिन है। उक्त तीनों परूको विहु कहते हैं। उक्त पनि पिताको प्रणाम करते और आत्मीय कुटुम्बादिसे मिलते हैं। फिर महा प्राडम्बरके साथ पानभोजनादि होता है। चैत्रकी संक्रान्तिको सात दिन किसी प्रकाश्य स्थल पर स्त्रीपुरुष मिल नाचते-गाते हैं। उक्त नृत्यगीतमें अश्वाव्य प्रवाच्य अश्लील गीत और अङ्गभङ्गी प्रदर्शित की जाती है दुर्गोत्सव, होलिका, जन्माष्टमी पौर शङ्कर-माधवके मृताहको तिथिको साधारण पर्व मानते हैं। कामरूप जिलेके दक्षिण प्रान्त में किसी स्थान पर प्रस्तरनिर्मित एक गृह है। प्रवादानुसार चांद सौदागरने उसे अपने लक्ष्मीन्द्र पुत्रके रहने के लिये लोहेसे बनाया था। यह बात बहुत लोगोंको मातम है बेहुलाके कौशल और नेता धोपानीको कपासे लक्ष्मीन्द्र कैसे जी उठे थे। धुबडीके निकट "नेता धोपानीका घाट" नामक एक घाट अभी वर्तमान है। किन्तु आज कल उसकी भग्नावस्था है। चांद सौदागर एक विख्यात वणिक् थे। तेजपुरके निकट दूसरे भी कई प्रस्तर-गृहोंके भग्नावशेष है। प्रवादानुसार वह वाणराजको कन्या उषाके प्रासाद हैं। फिर नौगांवके चंपानला पर्वतपर कई प्रस्तरासादोंका भग्नावशेष है। कहते हैं वह महाभारतात हंसध्वनके प्रासादका भग्नावशेष है डीमापुर में वैसे ही भग्नावशेष महाभारतोक्त हिडिम्बा नन्दन घटोत्कचको राजधानीका भग्नावशेष माने जाते हैं। ग्वालपाड़ेके हवड़ाघाट परगने में "श्रीसूर्यपर्वत" नामका एक पहाड़ है। वहां एक गोलाकार वृहत् स्तरखण्ड पर घड़ीके निशानको तरह कई रेखा है। किसी किसीके अनुमानसे एक समय वहां मानमन्दिर रहा । <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> किसी समय कामरूप प्रदेश इन्द्रजानकी विद्याके लिये प्रसिद्ध था। अनेक स्त्रियाँ इन्द्रलाल सोखती थी। किन्तु पाज कन अंगरेजी सभ्यतामें कामरुपको वह प्राचीन विद्या विलुप्त है। प्राचीन कामरूप वा वर्तमान पामामराज्यके पन्धान्ध शासव्य विवरकि 994 Hunter's Statistical Account of Assam, 2 vols ; Dalton's Ethnologs of Bengal ; M'cosb's Topography of Agsam ; Robinson's Assam; ML, Martin's Eastern India, rol. III ; Journal of the Asiatic Society of Bengal, vol. XLI., XLII, Gait's Assam gefa ya gtकामला देखो। कामरूपत्व (स क्लो० ) सिइिविशेष, एक बरकत । जैनशास्त्रके अनुसार यह कामादिसे निरपेक्ष रहने, मन्वसिद्धि करने पर या किसी देवकै प्रसव होने पर मिन्नता है। इससे साधक मनमाना रूप बना. सकता है। कामरूपधर (सं० वि० ) कामं यथेच्छ रूपं घरति- धारयति, काम-रूप--अच। इच्छानुसार विविधरूप- धारक, मनमानी सूरत बना लेनेवाला। कामरूपपति (सं० पु०) 'शारदातिनक' नामक तंत्रके टीकाकार । कामरूपिणी (सं० स्त्री.) काम मनाचं रूपं प्रस्त्वस्था, काम-रूप-इनि-डी । अखगन्धा, २ सुन्दरी, खूबसूरत पौरत।३ इच्छानुसार विविधरूप धारण करनेवाली, जो मनमानी सूरत बना लेती हो। कामरूपी (सं• पु.) कामं कमनीयं रूपं अस्यास्ति, काम-रूप-इनि। १ विद्याधर । २ जाहक जन्तु, खेखर, एक जानवर। ३ शूकर, सूवर । (कि) ४ इच्छा. नुसार विविधरूपधारी, मनमानी सूरत बना लेनेवाला। "सर्वमाय विच सव्यं हरिमिः कामपिमिः।" (रामायण) कामरूपोद्भवा (सं० स्त्री०) कृष्णकस्तूरी, काला मुश्क । कामरेखा (सं० स्त्री.) कामानां कामयापाराणां रेखा चिई लक्ष्य वा यन्त्र, वहुव्री.। वेश्या, रण्डी, छिनान। कामल (सं० पु.) कम णिच-कलच्। १ रोगविशेष, कंवलवाई। कमल देखो। २. वसन्तकाल, मौसम-बहार । ३ मरुदेश, रेगस्तान । (वि०) ४ कामुक, चाइनेवाला। असगंध।<noinclude></noinclude> 5dnw7h1nmmf1uf1kghm9zz9265r18za पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६८ 250 106362 668348 373226 2026-07-20T07:49:02Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668348 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामलकौरक-कामवती| ४६९}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कामलकीरक (सं० वि०) कमलकोरकस्य इदम कमल कोरक-प्रण। प्रस्वोत्तरपदपतंद्यादिकोपधादश् । पाहा११ कमलकोरक नामक कोटसम्बन्धीय, एक कोडेके मुताल्लिक। कामलता (सं० स्त्रो०) कामस्य लता इव, उपमित. समा०। उपस्थ, शिश्न । २ लताविशेष, एक वेल । कामला (सं० स्त्रो०) काफन्त टाप। रोगविशेष, कंवन बाई। ( A form of Jaundice ) पाण्डुरोग चि किसित रहने या पाण्डुरोममें पित्तकर वस्तु पाहारादि करनेसे विकृतपित्त रोगीका रक्त मांस बिगाड़ कर कामला रोग उत्पादन करता है। फिर प्रथमसे भी : कामला रोग हुवा करता है। इस रोगमें चक्षु, चर्म, नख और मुखदेश हरिद्रावणं देख पड़ता है। मलमूत्र रक्त वा पीतवर्ण लगता है। सर्वशरीर स्वर्णभेकवर्ण बन जाता है। इन्द्रिय शक्तिहीन रहते हैं। दाह, अजीर्ण, दुर्बलता, अवसन्नता और अरुचिका वेग बढ़ता है। यह दो प्रकारको होती है-कोष्ठात्रया पौर ! शाखाश्रया। भामाशयादि प्राभ्य न्तरिक कोष्ठ समूहमें उत्पन्न होनेसे कोष्ठकामला था कुम्भकामन्ता और इस्त- पादादि स्थानमें निकलेनेसे शाखाकामना कहलाती कामल-णिनि। १ कामलारोगपीड़ित, कंवल वाईको है। कुम्भ कामलामें वमन, अरुचि, उत्तथ, व्वर, बीमारीसे सकतीफ़ उठानेवाला । (पु.) कमलेन लान्ति, खास और कास उपजता और मलमंद होनेसे वैशम्पायमस्य अन्तवासिविशेषेण प्रोक्ष अघीयते । रोगी मरता है। फिर उभयविध कामलामें मन- मूत्र क्वष्य एवं पीतवर्ण लगने अथवा मल, मूत्र तथा यमनमें रक्त पड़ने, शरीर शोथविशिष्ट एवं अवसब रहने और दाह, अरुचि, पिपासा, पानाह, तन्द्रा, मोह, बुद्धिनाय प्रति पड़नेसे भी रोगी बहुत दिन तक नहीं जीता। वैद्यशास्त्र के मतसे इस रोगमें त्रिफला, गुलचीन, : दारहरिद्रा वा निम्बका क्वाथ मधुके साथ पीना चाहिये। द्रोणपुष्पक्षके पत्रका रस अांखमें लगाते हैं। गुलचीनको पत्तो पास कर सनक साथ खानेसे भो ! लाभ होता है। आमलकी, लोहचणं, शुण्ठी, पिप्पली, मरिच तथा हरिद्राचूण, घृत, मधु और शर्करा मिला चाटना चाहिये । कुम्भकामलामें भी उक्त सकल प्रोषध - उपयोगी है। गोमूत्रके साथ शिवाजतु सेवन करनेसे ' <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> अधिक लाभ होता है। विभीतक काष्ठसे मण्डुर जला पाठ बार गोमूवमें डालने और मधुके साथ उसका वर्ण चाटनेसे कुम्भकामना अच्छी हो जाती है। (भावप्रकाश) गरुडपुराणके मतानुसार इस रोगके निवारणार्थ मरिच और तिलपुथ्य एकत्र पीस पांखमें सगाते हैं। फिर दुग्धके साथ अपामार्ग पौर गोक्षुरमूल पौनसे भी कामलादि रोग पच्छ हो जाते हैं। मुखरोग भी नहीं रहते। कामलाचौ ( सं०स्त्री० ) कामले अधियो यस्याः, काम- ला-काषच् डोष्। प्राकर्षणकारक देवीमूर्ति विशेष । "पनामारामिण कामलाचौम' जपेत् ।। (सम्बसार) कामसायन (सं० पु. ) कमलस्य अपत्य पुमान्, कमल-पन्-फक् । कमलके पुत्र, एक मुनि। इनका कामसायनि, कामलायन देखो। कामनायाधिहन्त्री (सं० स्त्रो.) नागदन्ती, हाथोड। कामलि (सं० पु.) वैशम्पाय नके एक थिय । कामलिका (सं० स्त्रो०) कङ्ग धान्य, एक धान । कामली (सं० वि०) कामतो रोगविशेषो ऽस्यास्ति, कलापि वैशम्पायनान्ते वासिभ्यय। पा४।३।१४। वैशम्पायनक कामली (हि. स्त्रो०) क्षुद्र कम्बल, कमरो। ; शिष्यका बनाया हुआ शास्त्र पढ़नेवाला। : कामलेखा (संस्त्रो.) कामानां कामयापाराणां लेखा चि लक्षणं यत्र, बहुबी। वैश्या, रण्डी। कामलोक (सं० पु.) लोकविशेष, एक दुनिया। वौर- मतानुसार यह एकादश प्रकारका होता है, याम्य, तुषित, नरक, निर्माणरति, तिर्य कलोक, प्रेतलाक, पसुरलोक, त्रयस्त्रिंश, चातुर्महाराजिक, परनिर्मित- वशवर्ती और मनुष्यलोक । कामबोल (सं० वि०) कामेन कन्दर्प पौड़या लालः चञ्चलः, ३-सत्। कामको पौड़ासे पाकुल, शहवसके नारसे घबड़ाया हुवा। कामवती (सं० स्त्री.) कामः कमनीयता प्रस्त्यस्याः,<noinclude></noinclude> lkw5uuku9afl49k539wimrxmvdhihmd पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४६९ 250 106367 668353 667497 2026-07-20T08:20:52Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668353 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामवर -- कामशक्ति|४७०}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} काम-मतुप् छोए मस्य यः १ दारुहरिद्रा काम: - कन्दर्यभावः अस्वस्याः । २ मेथुमका अभिलाष रखने- वाली, जिस श्रौरतको शहवत चढ़ो हो । कामवर (सं०वि०) कामादपि सोन्दर्येच वर: ये छ: १ श्रतिसुन्दर, निहायत खूबसूरत । ( पु० ) २ यथेच्छ वर, मनमानी वख् शिश । कामवल्लभ (सं० पु० ) कामः कमनीयः अतएव वल्लभः प्रियः कर्मधा। यहा कामस्य कन्दस्य वक्षभः, १ आम्रवृक्ष, भामका पेड । 4- तत् । अम्रिका मुकुल कन्दर्पको बहुत प्यारा है। पूजा में प्राखमुकुल २ सारस पक्षी। कामयज्ञमा (सं० खो०) कामस्य कन्द बलभा प्रिया । १ रति । २ ज्योत्सा चांदनी । कामवश (सं० वि० ) कामस्य वश: वशीभूतः - तत् । कामरिपुके वशीभूत, जो शहबतके तावेमें रहता हो । कामवश्य (सं० वि० ) कामस्य वश्यः वश्यतामापत्रः, कामवश-य । कन्दर्प पोड़ा के वशीभूत, जी यत यक् । तावेमें हो । कामाच (सं० पु० ) कामं यचेच्छं जाती हच मध्य- पदनो० । बन्दाक, वांदा । कामवृत्त (सं० त्रि०) कामं यथेच्छ निरङ्गं वृत्तमस्य, वटुव्रो० यचेच्छाचारी, मनमानी पास चलनेवाला। कामहप्ति (सं. खां०) कामेन खेच्छया वृत्तिः तत्। शहवत स्त्रो०) १ स्वेच्छाचार, मनमानी चाल । २ कामरिपुका कार्य, कामदेवका काम (वि०) कामती उत्तिरस्य बहुब्री ३ यथेच्छाचारयुक्त, मनमौजी | कामवृषि (सं० पु० स्त्री०) कामस्य हरिणात् बहुमो कामवाण (सं० पु० ) कामस्य कन्दर्पस्य वाचः शरः, -तत् । कन्दर्प का वाण, कामदेवका तोर । कामदेव पुष्पके पांच वाण रखते हैं । "अरविन्दमशोक शिरीष' 'चवमुत्पलम् । पतानि प्रकीर्तन्ते पचवायस्य सायकाः ॥" पद्म, अशोक, शिरोष, भम्र और उत्पल पांचों पुष्प कन्दर्पपचवाण हैं। पांच प्रकार कर्मानुसार कन्दर्पयाथ अन्य नामों- से भी समिति - १. कामना नामक महाक्षुप, एक बड़ा झाड़ कर्णाटक देशमें इसे 'काम' कहते हैं। कारण कामइडि सेवन करनेसे बलवीर्य बढ़ता है। इसका संस्कृत पर्यायारहसिंग. मनोजहरि, मदनायुः, कन्दर्पजीव, जितेन्द्रियाह्न, कामैकजीव चौर जोवसंध है। राजनिघग्रह के मत से यह मधुररस चोर व रुचि काममति तथा इन्द्रियको गति बढ़ानेवाली है। २ कामरिपुको डि, कामदेवको बढ़ती। कामता (सं० स्त्री० ) कामं कमनीयं वन्तं यस्याः, । पेड़ । कामवाद (सं० पु० ) कामं यथेच्छ वादः। यच्छबी पाटलाच एक पेड़ प्रवाद, मनमानी बात। “सम्मोहनोन्मादनी च शोषयतापनस्तथा । स्तम्भमये ति कामस्य पञ्चवाणाः प्रकीर्तिताः ॥” सोहोन, उन्मादन, घोषण तापन, घोर स्तम्भन पांच कामवायोंके नाम हैं। - काममति (सं० सी०) कामस्य मतिर्नाविकामैद:, । । तत् कामदेवको एक पक्षो राधयमने इस २ मैथु | कामशक्तिके पचास विभाग किये हैं, -१ रति, २ मोति कामिनी, मोहिनी, कमलमिया, विलासिनो कामवान् (सं० पु० ) कामः प्रस्वास्ति, काम-मतुप् मस्य वः । १ अभिलाषयुक्त, खारिशमन्द । नेच्छायुक्त, महबतको खाहिश रखनेवाला । ५ कामवासी (सं०नि० ) कामं यथेच्छं वसति, फास वस्- णिनि । इच्छानुसार मानास्थानमें प्रस्थिरभाव से वास करनेवाला, जो पारियके सुवाषिक रहता ही कामविड (सं०जि०) कामवायेन विच कन्दर्पवाणविद्ध, स्थनको इच्छा से श्राकुल । कामविहन्ता (सं० पु० ) कामस्य कन्दर्पस्य विशेषेण इन्ता नाथयिता, काम-विन्दन्- १ महादेव । (वि०) २ कामरि जयकारो, कामदेवको जोत लेने- लगता है। इससे कन्दर्प को कामचोरों (४० वि०) कामं पर्याप्त' बोयें यस्य बहुव १ अपरिमित योर्यणालो, खूब साकत रखनेवाला । (को०) कामस्य बीर्यम् -सत् । २ कन्दको गि कामदेवका वल ।<noinclude></noinclude> n5na2im0lrhcwaut4ainr2auoda5wqa 668354 668353 2026-07-20T08:21:36Z Lado Shaw 6039 /* शोधित नहीं */ 668354 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="1" user="Lado Shaw" />{{rh||कामवर -- कामशक्ति|४७०}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} काम-मतुप् छोए मस्य यः १ दारुहरिद्रा काम: - कन्दर्यभावः अस्वस्याः । २ मेथुमका अभिलाष रखने- वाली, जिस 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कामाख्या}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कामदा कामिनी कामा कान्ता कामाइदायिनी। करमानाशिनी ययात् कामाखडा तेम चोचाते।" {{Right|(कालिकापुराण)}} भगवान ने कहा-महादेवी कामाख्या अभिलाष पूर या करने के लिये हमारे साथ नौलकूट गयी थौं। उता शिक्षाके स्पर्शसे देवत्व पाते और देव ब्रह्मलोक जाते इसीसे कामाख्या नाम प्राप्त हुआ। वह कामदा, कामिनी, कामा, काम्ला, कामानदायिनी और कामाङ्ग नाशिनी होनसे कामाख्या कायौ हैं। २ पीठस्थान विशेष । कामाख्यादेवी ही इस स्थामकी अधिष्ठात्री-देवता हैं। कालिका पुराणमें इस पोरस्थानके सम्बन्ध पर लिखा है,-"दक्षक यमें सतीने प्राण छोड़ा था। महादेव उनका मृतदेह स्कन्ध पर रख बहुत दिन परन्त इतस्ततः घूमते रहे। क्रमशः उस देहसे स्थान स्थान पर अवयव विशेष गिरा था। उससे न सकल स्थानों पर एक एक पवित्र पीठ बन गया। परिशेषको कुनिका नामक पौठ स्थानमें देवीका योनिमण्डल गिरा। उस समय महामाया योगनिद्रा भी महादेवमें लीन थीं। उन्होंने फिर प्रति उच्च पर्वतका रूप धारण कर पातालमें प्रवेश किया। यह व्यापार देख ब्रह्मान पर्वतरूपसे उन्हें पकड़ा था। विष्णु भी पृथिवी आक्रमण कर उनके निकट उपस्थित हुये। छत पर्वतवय शत शत योजन उबत थे, किन्तु देवीके पाक्रमणसे अधो गत हो एक कोस परिमित उच्च रह गये। उनमें पूर्व दिकका पर्वत ब्रह्मशैल है। उसे खेत कहते हैं। वह सर्वापेक्षा अधिक उच्च है। पश्चिम दिकका पर्वत वारा नामक विष्णुशैल है। फिर उमयके मध्यदेशस्थित त्रिकोण उदूखलावति शैलका नाम नील है। वही महादेवका रूपान्तर है। एतमिन ईशान दिकके दौप्तिशाली पर्वतरूपी कूर्म का नाम 'मणि कर्ण' है। वायुकोणस्थित पर्वत 'मणिपर्वत' कहलाता है। 8 पर्वत श्रीकृष्णका अति प्रियस्थान है। कोणस्थ पर्वतका नाम 'गन्धमादन' है। वह महादेवका प्रियस्थान है। ब्रह्माशक्ति-शिलाका पूर्व भागस्थित पर्वतं भी महादेवका रुपान्तर है। उसे 'भस्माचल कहते हैं। <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> इसी प्रकार पवित्र नीलकूट पर्वतस्थ कुनिकापीठ, देवी महखगेने महादेवके साथ अवस्थान किया। सनकर योनिमण्डल ही गिर कर प्रस्तर बन गया था। वही कामाख्यादेवीके नामसे विख्यात हुवा। मनुष्य है। उक्त स्थानका माहात्मा प्रति अद्भुत है। उसमें चौह डाल देने सो समय भन्मो जाता है। उक्त योनिमण्डल २१ अनलि दोध और १ वितस्ति ( बालित ) वित है। फिर वह सिन्दूर और कुटुमादिसे लेपित है। देवी महामाया वहां प्रत्यय पञ्चकामिनीमूर्तिसे अवस्थान करती हैं। पञ्चमूर्तिके नाम-कामाख्या, त्रिपुरा, कामेश्वरी, सारदा और महीसाहा है। देवीकी चारो ओर प्रष्ट योगिनी रहती है। उनके नाम-गुप्तकामा, श्रीकामा, विन्य- वासिनी, कटोखरी, घनस्था, पाट्दुर्गा, दीर्घवरो और प्रकटा है। अपरापर तीर्थ भी वहां जलरूपसे पव- खिस हैं। विष्णु उसके तीर कमल नामसे पषस्थान करते हैं। देवीके अनमें लक्ष्मी ललिता नाममे पौर सरस्वती मातङ्गी नामसे अवस्थित हैं। देवीके प्रिय- पुत्र गणदेव पर्वतके पूर्वभागमें हारदेव पर सिह नामसे रहते हैं। कल्पहन और कल्पलता तिन्तिड़ी तथा प्रपराजिता रूपसे वहां पवस्थित हैं। धाराममूर्ति हरि पाण्डनाथ नामसे परिचित हो रहे हैं। उन्होंने जहां मधु और कैटभासुरको मार गिराया, वहां निकट हो ब्रह्माने ब्रह्मकुण्ड बनाया है। उक्त बमकुडके निकट गया और वाराणसीक्षेत्र योनिमहलतुस्य कुण्डरूपसे अवस्थित है। उसके पास इन्द्र एवं अन्यान्य देवने महादेवको सन्तुष्टि के लिये अमृतपूर्ण अमृतकुण्ड स्थापित किया था। उसके निकट काम- श्वर नामक महापुण्यतीर्थ कामकुण्ड है। मिकण्ड और कामकुण्डक मध्यभागमें केदार नामक क्षेत्र है। वह देय में १४ व्याम बैठता है। उसे शयान भी. कहते हैं। गुप्तकुडके मध्यदेश में कामेखर पर्वतसे संलग्न शैलपुत्रीका नाम 'कामाख्या' है। कामेखर और कामाख्याके मध्यदेशमें कालरानि हैं। पोठ- स्थानमें दोधैखरी, सीमामागमें प्रचडिका पौर<noinclude></noinclude> m36zfzmdyr1i9ag99l9kkia3y1hira3 पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४७२ 250 107395 668299 375144 2026-07-20T01:42:57Z Lado Shaw 6039 /* शोधित */ 668299 proofread-page text/x-wiki <noinclude><pagequality level="3" user="Lado Shaw" />{{rh||कामाख्या-कामाग्निसन्दीपन| ४७३}}</noinclude>{{Multicol|line=1px solid black}} कामाख्याप्रस्तरके प्रान्तदेशमें कुष्माण्डी नाम्नी योगिनी रहती हैं। दक्षिण पीठमें कामेश्वरके अघोर नासक शिखरकी परमार्थी, भैरव नामसे अभिहित करते हैं। सन्ही भैरवके निकट चामुण्डा भैरवीका अवस्थान है । कामेश्वर और भैरवके मध्यवर्ती स्थानमें सुरापगा देवी हैं। सद्योजात नामक शिखरदेशमें पानातकैखर हैं। उसी स्थानमें योगरूपिणी दुर्गा नाम्नी नायिका हैं। फिर उक्त स्थानका पपक्क पत्रविशिष्ट लतावेष्टित पानातक वृक्ष ही कल्पलतावेष्टित कल्पक्ष है। उसी पानातक वृक्षके निकट स्वयं गङ्गा सिद्धगङ्गा नामसे अवस्थित हैं। उनके समीप पानातकक्षित्र नामक पुष्करक्षेत्र है। ईशान दिन तत्पुरुष नामक शिखरके उपरिभागमें भुवनेश्वर देवका पीठ है। उसके निकट कामधेनु नामसे सुरभिको शिलामूर्ति है। मध्यदेशमें कोटिलिङ्ग नामक महाभैरवको मूर्ति है। वह पांच मूर्ति द्वारा पांच भागमें विभक्त है। ब्रह्मपर्वतके जय देशमें भुवनेखरीके नाम पर महागौरीको शिलामूर्ति है। जहां या पर्वतरूपसे पर्वतरूपी महादेवके साथ मिलित हुये, वहां अप- गजिता नामको कल्पलता पवस्थित है। कामधेनुके निकट पग्निकोणमें योनिरूपा कामाख्याका पीठ है। उसी स्थान पर विन्ध्यवासिनी नामसे चण्डघण्टा, वन स्कन्दमाता और कात्यायनी वासिनी नामसे पाददुर्गा योगिनीका अवस्थान है। उक्त सकन्न योगिनी नोलशैलकी नैऋत दिक् अवस्थित हैं। पश्चिम हार पर हनमान्पोठमें पाषाणरूपी नन्दीका अवस्थान है। {{Right|(कालिकापुराण १०)}} देवीगीतामें भी कामाख्या-पीठस्थान सर्वोत्कृष्ट माना और लिखा गया है- देवी कामाख्या प्रतिमास इस स्थानमें रजखला होती हैं। (योगिमौसन्न, २६ पटई और कामरुप शब्द द्रष्टम्य है।) कामाख्याको कुमारी-पूना भगवतीपूजाका विशेष पता है। कामाख्यामें अनेक ब्राह्मण-कुमारीका पूना प्रहण एक व्यवसाय खरूप है। पूना हो या न हो, ' कामाख्यादर्शनके लिये पहुंचते ही कुमारी यांत्रीको धेर कर पकड़ेंगी और दक्षिणा मांगने लगेंगी। न्यूना <noinclude>{{Multicol-break}}</noinclude> धिक ३०० कुमारी सर्वदा कामाख्या में रहती हैं। अनेक समय वह यात्रियोंको दक्षिणाके लिये व्यति- व्यस्त कर डालती हैं। कामाख्याके भीतर न्यूनाधिक ५२ तीर्थ स्थान पद्यापि वर्तमान हैं। किन्तु दुःख है कि उनमें अनेक दुर्गम अरण्यसे समाहत हैं। उक्त समस्त तीर्थोके मध्य भगवती भुवनेश्वरी और दश महाविद्याका पीठस्थान ही समधिक प्रसिद्ध है। कामाख्याके पूनादि निर्वाहको पहोमराजाशेने अनेक भृत्य (पायक ) पौर निष्कर भूमिका दान किया है। पायक कार्य विशेष पर भगवतीको सेवामें लगे रहते हैं। फिर अंगरेज गवरनमेण्टने भी पूर्व नियमसे भगवतीको पूजाके लिये प्रवन्ध बांध दिया है। प्रायः सकल देवालयों में पायक निष्कर भूमि पाते हैं, जो कामाख्या, केदार और माधवमें सर्वापचा अधिक है। कामाग्नि (सं० पु.) कामः अग्निरिव, उपमितसमा० । १ कामरूप अग्नि, खाहिशको श्राग। २ कामरिपुका कामाग्निसन्दीपन (सं० लो० ) कामाग्नीनां सन्दीपनम्, ६.तत् । कामोद्दीपक रसविशेष, ताकतको एक दवा । यह एक प्रकार मोदक है। पारा २ तोला, गन्धक २ तोला, प्रधर ताला, यवक्षार, सर्जिक्षार, चित्रक, पञ्चलवण, शटी, यमानी, वनयमानी, कीटमारी तथा तालीयपन एकत्र ४ तोला, जीरा, तेजपत्र, दारचीनी, बड़ी इलायची, छोटी इलायची, लवङ्ग एवं जातीफल एकतर तोला, वृहदार, शुण्ठी, मरिच तथा पिप्पली एकत्र ८ तोला, धन्याक, यष्ठीमधु, एवं कशेरु कत्त दो-दो तोला, शतावरी, भूमिकुष्माण्ड, गजपिप्पली, बला, हस्तिकर्ण पलाश, गोक्षुरवीज, वीजपवयुक्त इन्द्रयव बराबर-बराबर और सबके समान चीनी, धो तथा शहद छोड़ इस प्रौषधका पाक करते हैं। पाक उतरने पर २ ताला कपूर डाल देते हैं। मोदक देखो। यह औषध वृष्यसे भी वृष्य है। इसे सेवन करनेसे मनुष्य सहस्र प्रमदाको रिझा और बलसे प्रमत्त नागाधिपको हरा सकता है। (मपकारवावली।):<noinclude></noinclude> cmsllm84sw3pttsbo0hf964yvp5560w